बिस्तर पर जो नज़ारा था, वह किसी भी सामाजिक मर्यादा की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी था।
रमेश, जो अभी कुछ पल पहले अपनी मर्दानगी का झूठा रौब झाड़ते हुए एक हैवान बना हुआ था, अब रघु की एक ही टक्कर और नशे की अधिकता से ढेर हो चुका था। वह बेहोशी के अंधेरे में औंधे मुंह पड़ा खर्राटे ले रहा था।
और ठीक उसके बगल में… उसी के बिस्तर पर, उसकी ‘पतिव्रता’ पत्नी कामिनी और उसका ‘गंदा’ शराबी नौकर रघु एक-दूसरे की बांहों में समाए हुए थे।
कामिनी के होंठ रघु के खुरदरे होंठों में कैद थे। वह पागलों की तरह उसकी जीभ चूस रही थी।
बरसों से महलों में रहने वाली कामिनी को आज रघु के मुंह से आती बीड़ी, सस्ती शराब, और कच्चे प्याज़-मटन की वो तीखी गंध किसी महंगे परफ्यूम से ज्यादा नशीली लग रही थी।
यह गंध ‘सभ्यता’ की नहीं, ‘असली मर्द’ की थी।
रघु ने धीरे से अपने होंठ अलग किए।
लार की एक पतली, चमकदार तार दोनों के होंठों के बीच खिंच गई और टूटकर कामिनी की ठुड्डी पर गिरते हुए, उसकी नंगी छाती की तरफ लुढ़क गई।
कामिनी ने भारी, नशीली आँखों से पहले रघु को देखा, और फिर गर्दन घुमाकर अपने पति रमेश को।
रमेश का बेहोश, लाचार शरीर देखकर उसे डर नहीं लगा, बल्कि एक अजीब सा पैशाचिक सुकून (Devilish Satisfaction) मिला।
‘देख रमेश…’ कामिनी ने मन ही मन सोचा, उसकी आँखों में एक कुतिया वाली चमक थी। ‘जिस जिस्म को तूने बेल्ट से मारा, जिसे तूने रंडी कहा… देख आज वही जिस्म तेरे ही बगल में, तेरे ही नौकर के नीचे लेटकर अपनी प्यास बुझा रहा है।”
इस विचार ने कामिनी की उत्तेजना में घी का काम किया। उसका पति पास लेटा था, और वह एक पराये मर्द के साथ नंगी थी—इस “खतरे” ने उसकी चूत को बाढ़ की तरह गीला कर दिया.
रघु की नज़र कामिनी के पेट पर पड़ी, जहाँ बेल्ट का एक ताज़ा, लाल और सूजा हुआ निशान (Welt) उभर आया था।
रघु की आँखों में दर्द और हवस का तूफ़ान तैर गया।
वह धीरे से झुका।
उसने अपनी खुरदरी, गरम जीभ निकाली और उस लाल निशान पर फेर दी।
“स्लर्रर्रप…..”
“आह्ह्ह्ह…… !!” कामिनी के मुंह से एक सिसकी निकल गई जो कमरे में गूंज गई।
बेल्ट की जलन पर रघु की गीली, गरम थूक और उसकी खुरदरी जीभ का स्पर्श किसी जादुई मरहम की तरह लगा।
रघु ने उस ज़ख्म को चूमना और चाटना शुरू कर दिया।
वह एक जानवर की तरह अपने साथी के घाव साफ़ कर रहा था।
उसकी जीभ कभी पेट पर, कभी पसलियों पर, तो कभी कामिनी की नाभि के गहरे गड्ढे में फिर रही थी।
कामिनी का बदन उस स्पर्श से ऐंठने लगा। दर्द और मज़ा आपस में मिल गए थे।
“और चाट रघु… उफ्फ्फ्फ… हाँ… मेरी सारी चोट पी जा… मुझे गंदा कर दे…” कामिनी बड़बड़ाई।
उसकी शर्म अब पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।
रमेश के बगल में लेटे होने के एहसास ने उसे बेशर्म बना दिया था।
अब उसे परवाह नहीं थी, रमेश जग भी गया तो आज वो नहीं रुकने वाली थी, उसकी जलती फड़फड़ाती चुत इस रुकने की इज़ाज़त देती ही नहीं.
कामिनी के हाथ अपने आप ऊपर उठे।
उसने अपने भारी, गोरे और पसीने से भीगे हुए स्तनों को अपने ही हाथों में भर लिया।
पहले वह इन्हें रमेश से छुपा रही थी, लेकिन अब… अब वह उन्हें रघु को दिखा रही थी, उन्हें ‘परोस’ रही थी।
कामिनी ने अपनी उंगलियां अपने मांस में गड़ा दीं।
“मसल…!”
उसने अपने निप्पल्स को, जो रघु के दिए लव-बाइट्स के बीच काले अंगूर की तरह तने हुए थे, अपनी उंगलियों में पकड़कर मरोड़ दिया।
“आह्ह्ह… रघु… यहाँ भी दर्द है” कामिनी सिसक उठी जैसे रघु डॉक्टर है और कामिनी मरीज की तरह बता रही है, यहाँ दर्द है यहाँ भी मरहम लगाना है..”
रघु ने सिर उठाकर देखा। कामिनी अपनी जाँघे धीरे धीरे खोलने लगी, रघु का कलेजा मुँह को आने लगा, संसार की सबसे सुंदर सुरंग का दरवाजा खुल रहा था.
मालकिन… उसकी देवी… उसके सामने अपनी छाती मसल रही थी, अपनी टांगें चौड़ी किए लेटी थी।
उसकी जांघों के बीच सिर्फ़ एक पतली सी पैंटी थी, जो अब काम-रस से इतनी गीली हो चुकी थी कि त्वचा से चिपक गई थी। अंदर का गुलाबी मांस उस गीले कपड़े के आर-पार झांक रहा था। चुत की लकीर मे कच्छी धंस के उसी का हिस्सा बन गई थी.
रघु पागल हो गया। लेकिन गुफा मे उतरने से पहले उसे दो पहाड़ चढ़ने थे.
उसकी लाल, हवस से भरी आँखें अब कामिनी के विशाल, गोरे और पसीने से भीगे हुए स्तनों पर टिकी थीं।
तेज़ सांसों के कारण कामिनी का सीना ऐसे ऊपर-नीचे हो रहा था, जैसे ज्वार-भाटा आया हो। उसके ब्लाउज की कैद से आज़ाद होकर, वे दोनों मांसल गोले अपनी पूरी भव्यता के साथ रघु के सामने थे।
रघु के दिए हुए कल के ‘लव-बाइट्स’ (नीले निशान) उन गोरे स्तनों पर किसी आभूषण की तरह चमक रहे थे।
रघु अब इंसान नहीं, एक भूखा भेड़िया लग रहा था।
उसने अपने दोनों खुरदरे, गंदे हाथों को फैलाया और एक ही झटके में कामिनी के दोनों स्तनों को अपनी मुट्ठी में दबोच लिया।
“दब्ब……!”
“आह्ह्ह…. रघु…. धीरे….” कामिनी मचली, लेकिन रघु ने उसकी नहीं सुनी।
रघु ने उन मुलायम मांस के गोलों को ऐसे मसला जैसे कोई भूखा इंसान आटे को गूंधता है। उसकी सख्त उंगलियां कामिनी के कोमल मांस में धंस गईं। वह उन्हें निचोड़ रहा था, मरोड़ रहा था, उनका आकार बदल रहा था।
रघु ने अपना चेहरा झुकाया और कामिनी के बाएं स्तन पर टूट पड़ा।
उसने अपना पूरा जबड़ा खोला और उस भारी-भरकम स्तन का एक बड़ा हिस्सा अपने मुंह में भर लिया।
“घप…!”
रघु के मुंह के अंदर का गीलापन और गर्मी कामिनी के निप्पल को झुलसाने लगी।
रघु ने चूसना शुरू किया।
“चुप… चुप… सुन्नन्न…..!!”
उसके गाल अंदर धंस गए। वह इतनी ताकत से खींच रहा था जैसे वह कामिनी के जिस्म से उसकी रूह खींच लेना चाहता हो।
उसकी जीभ निप्पल के चारों तरफ लट्टू की तरह घूम रही थी, और फिर अचानक वह निप्पल को अपने दांतों के बीच दबा देता।
“कच…!”
“आआईईईई…… उफ्फ्फ्फ…… मर गई…… !!” कामिनी ने अपनी कमर हवा में उठा दी।
दर्द का एक तीखा झटका लगा, लेकिन अगले ही पल वह दर्द एक मीठी खुजली में बदल गया।
कामिनी ने अपने हाथों से रघु का सिर और जोर से अपनी छाती में भींच लिया।
“हाँ… और जोर से… काट ले इसे… चबा जा इसे…” कामिनी सिसक रही थी। “ये तेरे ही है, तेरा हक़ है इस पर … इसे खा जा रघु…”
रघु ने बाएं स्तन को अपने मुंह से आज़ाद किया। उस पर रघु के दांतों के निशान थे और वह लार से लतपत चमक रहा था। निप्पल अब एक सख्त बेर की तरह तन चुका था।
रघु तुरंत दाहिने स्तन पर झपटा।
इस बार उसने निप्पल को अपनी उंगलियों की कैंची में फंसाकर खींचा और मुंह से स्तन के निचले हिस्से को काटने लगा।
“स्लर्रप… लप.. लप… काट…!”
वह कामिनी के दूध के कटोरे को खाली कर देना चाहता था।
वह कभी जीभ की नोक से निप्पल के छेद को कुरेदता, तो कभी उसे अपने होठों में भरकर वैक्यूम (Vacuum) बना देता।
“दूध… मुझे मालकिन का दूध चाहिए…” रघु बड़बड़ाया, उसका चेहरा कामिनी के स्तनों के बीच रगड़ खा रहा था।
वह कोशिश कर रहा था कि अपनी चूसने की ताकत से कामिनी के स्तनों से दूध की धार निकाल दे।
कामिनी का शरीर इस अत्याचार से तड़प रहा था। उसे लग रहा था जैसे उसके स्तनों की नशें खिंच रही हैं।
रघु की बीड़ी और मटन वाली बदबूदार सांसें उसके निप्पल्स को गरम कर रही थीं।
रघु ने अपनी तर्जनी उंगली और अंगूठे से कामिनी के निप्पल को पकड़ा और उसे मरोड़ दिया, ठीक वैसे ही जैसे रेडियो का वॉल्यूम बढ़ाया जाता है।
और साथ ही उसने दूसरे स्तन पर ज़ोरदार काट (Bite) लिया।
“आआआह्ह्ह्ह…… रघु मर गई…!!” कामिनी की चीख रमेश के कानों के पास गूंजी, पर वह बेहोश पड़ा रहा।
कामिनी को दर्द मे अजीब सा सुकून मिल रहा था, वो भले चिल्लाई लेकिन उसने रघु को रोकने की बिल्कुल चाहत नहीं दिखाई.
रघु की यह कोशिश—स्तनों से दूध निकालने की—नाकाम थी, लेकिन उसका असर कहीं और हो रहा था।
भले ही कामिनी के स्तनों से दूध की एक बूंद न निकली हो, लेकिन उसके पैरों के बीच, उसकी योनि (चूत) ने दूध की की तरह ‘सफ़ेद गाढ़ा चिपचिपा ‘ (काम-रस) बहाना शुरू कर दिया था।
रघु के हर खिंचाव, हर काटने, हर मसलने का सीधा तार कामिनी की बच्चेदानी से जुड़ा था।
“पच-पच…”
कामिनी की चूत अब इतनी गीली हो चुकी थी कि उसका रस बहकर उसकी जांघों से होता हुआ बिस्तर की चादर को भिगो रहा था।
“रघु… नहीं निकल रहा दूध वहां से…हंफ… हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़… आअह्ह्ह…” कामिनी ने रघु के बाल नोचते हुए, अपनी टांगें चौड़ी कर दीं। “दूध वहां से नहीं… मेरी चूत से बह रहा है…
कामिनी हांफ रही थी, कांप रही थी….
रघु पल भर को होश मे आया,
रघु ने अपना सिर उठाया। उसका चेहरा कामिनी की लार और पसीने से भीगा था।
उसने देखा कि कामिनी के दोनों स्तन अब लाल पड़ चुके थे, निप्पल्स सूजकर मोटे हो गए थे, और उन पर उसके दांतों के निशान थे।
यह नज़ारा किसी ‘बलात्कार’ जैसा लग रहा था, लेकिन कामिनी की आँखों में जो हवस थी, वह बता रही थी कि वह यही चाहती थी। वह एक जानवर का शिकार बनना चाहती थी।
रघु ने एक खूंखार मुस्कान दी। “दूध तो मैं निकालूँगा मालकिन… आज नहीं तो कल… लेकिन अभी… अभी इस दूसरे दूध (चूत के रस) को चखना है।”
और रघु नीचे की तरफ सरक गया, उस बाढ़ को पीने के लिए जो उसने अपने वहशीपन से कामिनी के अंदर पैदा की थी।
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रघु ने कामिनी के स्तनों को आज़ाद किया और धीरे-धीरे नीचे की ओर सरका। उसका चेहरा कामिनी के पसीने और काम-रस की मिली-जुली गंध से सराबोर था।
जब वह कामिनी की टांगों के बीच पहुंचा, तो वहां का नज़ारा और गंध उसे पागल करने के लिए काफी थी।
कामिनी की गीली पैंटी से छनकर आती वो कस्तूरी (Musk) जैसी गंध रघु के नथुनों में भर गई।
यह गंध किसी फूल की नहीं, बल्कि एक उत्तेजित और प्यासी औरत की थी—एक ऐसी गंध जो किसी भी मर्द को जानवर बना दे।
रघु ने पैंटी के गीले कपड़े के ऊपर से ही अपना मुंह कामिनी की योनि के उभार पर रख दिया और ज़ोर से एक गरम सांस छोड़ी।
“ह्ह्फ्फ्फ…”
वह भाप जैसी गर्मी कपड़े को पार करती हुई कामिनी के अंदरूनी मांस तक पहुँच गई। कामिनी की जांघें अनजाने में ही और चौड़ी हो गईं।
बिना कोई चेतावनी दिए, रघु ने अपने दोनों मज़बूत हाथों से कामिनी की पैंटी के किनारों को पकड़ा।
उसकी आँखों में एक जंगली चमक थी।
“चर्रर्रर्र……!!”
एक ही झटके में कपड़ा फट गया।
कामिनी की रूह कांप गई। यह सिर्फ कपड़ा फटने की आवाज़ नहीं थी, यह कामिनी की बची-खुची मर्यादा के टूटने की आवाज़ थी।
अब उसके पैरों के बीच कोई पर्दा नहीं था।
उसकी रसीली, फड़फड़ाती हुई योनि, जिसके होंठ (Lips) उत्तेजना और रगड़ से सूजकर मोटे और गुलाबी हो गए थे, अब रघु के सामने पूरी तरह अनावृत थी। वहां से बहता हुआ सफ़ेद गाढ़ा रस (Lubrication) कामिनी की जांघों पर चमक रहा था।
रघु एक पल के लिए भी नहीं रुका। उसने अपना चेहरा उस गीलेपन में गड़ा दिया।
“घप… चप-चप-चप…!”
उसने कामिनी की पूरी योनि को अपने मुंह में भर लिया। उसके होठों ने कामिनी के मांसल उभारों को सील कर दिया।
रघु की खुरदरी और सख्त जीभ किसी सांप की तरह बाहर निकली और सीधे कामिनी के दाने (Clitoris) को ढूंढ लिया।
जैसे ही उसकी जीभ ने उस अति-संवेदनशील बिंदु को छुआ…
“आआईईईई…… मार डाला…… रघुऊऊऊ….. !!”
कामिनी का शरीर बिस्तर पर उछल गया। उसने अपनी एड़ियां बिस्तर पर पटक दीं।
रघु की जीभ उस दाने पर किसी हथौड़े की तरह बज रही थी।
वह उसे सिर्फ़ चाट नहीं रहा था, वह उसे मरोड़ रहा था, कुरेद रहा था।
“स्लर्रप… लप-लप-लप…!”
कामिनी को महसूस हो रहा था कि उसकी योनि की एक-एक नस खिंच रही है।
रघु जब उस दाने को अपने होठों में भरकर चूसता, तो कामिनी की बच्चेदानी (Uterus) तक में मीठा दर्द होता। उसकी योनि की दीवारें (Vaginal walls) अपने आप सिकुड़ रही थीं और फैल रही थीं, जैसे वे रघु की जीभ को जकड़ना चाहती हों।
रघु अपनी नाक को चुत के शिखर पर रगड़ रहा था, जैसे वह उसकी गंध को अपने फेफड़ों में हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहता हो।
“और…. उफ्फ्फ्फ…. हाँ…. चबा जा इसे…..” कामिनी ने अपना सर उठा के नीचे पटका, लेकिन वो टिका रमेश के पेट पर, वो अपने सिर को दाएं-बाएं पटक रही थी.
उसकी उंगलियां रघु के बालों में फंस गईं। वह कभी उसका सिर अपनी चूत पर दबाती, तो कभी उसे नोचती।
रघु का थूक और कामिनी का रस मिलकर एक हो गए थे।
आवाज़ें इतनी गीली और गंदी थीं कि अगर रमेश होश में होता, तो शर्म से मर जाता।
“स्लप… गप… चप…”
कामिनी का शरीर अब टूटने की कगार पर था।
रघु की जीभ की वो रफ़्तार, वो दबाव… उसे पागलपन के मुहाने पर ले जा रहा था।
उसकी चूत के अंदर एक आग लग चुकी थी जिसे अब जीभ नहीं बुझा सकती थी। उसे अब कुछ ‘ठोस’ चाहिए था… कुछ ऐसा जो उसे भरकर फाड़ दे।
कामिनी ने रघु के बाल पकड़े और पूरी ताकत से उसका चेहरा ऊपर खींचा।
रघु का चेहरा कामिनी के रस से लिपटा हुआ था, उसकी दाढ़ी गीली थी।
कामिनी की आँखों में वहशत थी, एक भूखी शेरनी की मांग थी।
“बस… बस रघु…” वह हांफ रही थी।
“मिटा दे मेरे दुख… भर दे मेरे ज़ख्म… फाड़ दे मेरी चूत को…”
उसने अपनी टांगें और चौड़ी कर दीं, इतनी चौड़ी कि उसकी जांघों के जोड़ दुखने लगे थे, लेकिन उसे परवाह नहीं थी। उसके सामने रघु एक पहाड़ की तरह खड़ा था,
रघु ने कामिनी की आँखों में देखा। उन आँखों में अब शर्म नहीं थी, सिर्फ एक भूखी हवस थी।
रघु धीरे से पंजो के बल खड़ा हो गया।
उसने अपने पाजामे का नाड़ा खींचा।
“सर्रर्र…..!”
पाजामा नीचे गिरते ही, रघु का विशाल पौरुष आज़ाद होकर हवा में लहराने लगा,
कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। ये पहले के मुकाबले और ज्यादा मोटा और फुला हुआ था, एक एक नाश साफ उभर के आ चुकी थीी,
रघु के पैरों के बीच वह काला, नसों वाला मांस का खंभा तनकर खड़ा था, जो कामिनी की दुनिया हिलाने वाला था।
रघु ने अपने लंड की जड़ (Base) को पकड़ा। उसका हाथ भी उस विशाल औज़ार को पूरा मुट्ठी में नहीं भर पा रहा था।
कामिनी ने आँखों ही आँखों मे एक मुक सहमति दी, जिसे रघु ने भलीभांति समझा, और अपने घटनो को बिस्तर पर टिका दिया, और कामिनी की फैली हुई जांघो के बीच जा बैठा.
कामिनी का सीना धोकनी की तरह चल रहा था, आज उसके सती सावित्री जीवन मे वो मौका आ गया था जब किसी पराये मर्द का लंड उसकी चुत मे समाने वाला था.
कामिनी इसे स्वीकार कर चुकी थी, आने वाले पल की प्रतीक्षा मे उसकी आखरी बंद हो गई, वो अपने चरित्र के पतन को महसूस करना चाहती थी,.कामिनी तैयार थी
रघु ने लंड के उस मोटे, छतरीनुमा टोपे (Glans) को कामिनी की योनि के भीगे हुए, फड़फड़ाते होंठों पर टिकाया।
“ईईस्स्स्स….. रघु… “कामिनी कांप उठी… पच… करती उसकी चुत बंद हो कर खुल गई, जैसे स्वागत की तैयारी कर रही हो.
टोपे की परिधि (Girth) इतनी ज्यादा थी कि कामिनी की योनि का मुंह उसके सामने छोटा लग रहा था।
“आ रहा हूँ मालकिन मै….” रघु ने अपनी कमर हिलाई और टोपे से कामिनी के दाने (Clitoris) को ऊपर से नीचे तक रगड़ दिया।
“स्लप…!”
“आह्ह्ह… उफ्फ्फ…” कामिनी की कमर हवा में उछल गई। टोपे की वो सख्त और गरम रगड़ सीधे उसके दिमाग की नसों को झनझना गई।
रघु ने धीरे से दबाव बनाना शुरू किया।
टोपा योनि के द्वार को खोलने लगा।
कामिनी साफ़ महसूस कर सकती थी कि उसकी योनि की नाजुक चमड़ी (Skin) कैसे उस मोटे टोपे को रास्ता देने के लिए खिंच रही है।
“चर्रर्र…!” (मांस के खिंचने का अहसास)।
यह एक जलन थी, जैसे कोई बहुत बड़ी चीज़ जबरदस्ती घुस रही हो।
“रघु… आअह्ह्ह… आराम से…. बहुत बड़ा है..इस्स्स …..” कामिनी की आँखों से आंसू निकल आए, लेकिन उसने अपनी टांगें और कस लीं। वह फटना चाहती थी।
“फट जाने दो, …” रघु गुर्राया।
और उसने एक हल्का सा झटका मारा।
“पच…..!”
सिर्फ़ टोपा (Head) अंदर गया।
जैसे ही वह मोटा हिस्सा कामिनी की तंग गुफा (Vaginal Canal) के अंदर फिसला, कामिनी की सांस रुक गई। उसकी योनि की दीवारों ने उस घुसपैठिये को कसकर जकड़ लिया।
रघु रुका नहीं। उसने कामिनी की जांघो को मजबूती से पकड़ लगभग बिस्तर से चिपका दिया, ठाक…. टक….पैरो के जोड़ खुलने की धीमी आवाज़ गुंजी, लेकिन रघु ने कोई रहम नहीं दिखाया,
“धप्प…..!!”
उसने अपनी कमर का पूरा ज़ोर लगा दिया।
“आआआह्ह्ह्ह्ह…… माँ…… मर गई…… !!!”
कामिनी की चीख रमेश के कानों के पास गूंजी, लेकिन वह बेहोश पड़ा रहा।
रघु का वह 8 इंच का काला मूसल कामिनी की तंग गुफा को चीरता हुआ, उसकी तहों को खोलता हुआ, सीधा अंदर समा गया।
कामिनी को लगा जैसे उसके पेट के अंदर कोई गरम लोहे की रॉड उतार दी गई हो।
रघु पूरा जड़ तक (Balls deep) अंदर था। उसके अंडकोष कामिनी की गीली चूत से चिपक गए।
कामिनी की आँखों के आगे तारे नाचने लगे। वह पूरी तरह ‘भर’ चुकी थी। उसे अपनी नाभि के ठीक नीचे रघु के लंड की धमक महसूस हो रही थी।
“उफ्फ्फ्फ… रघु.. फाड़ दिया तूने, मर गई मै… आअह्ह्ह…. उउउफ्फफ्फ्फ़…..” कामिनी ने रघु के बाज़ू (Arms) पर अपने नाखून गड़ा दिए। “पूरा भर दिया मुझे…” कामिनी दिलेर निकली उसने दर्द को मजबूती से सहा, उसके जबडे भींच गए.
रघु कुछ पल रुका रहा, ताकि कामिनी इस आकार (Size) को झेल सके।
वह कामिनी के अंदर ही अपनी नब्ज़ महसूस कर सकता था।
फिर रघु ने ‘चोदना’ शुरू किया।
लेकिन यह तेज नहीं था। यह धीमा और जानलेवा था।
रघु ने अपनी कमर पीछे खींची।
कामिनी को महसूस हुआ कि वह मोटा लंड उसकी योनि की दीवारों को रगड़ता हुआ बाहर निकल रहा है। हर इंच बाहर निकलने पर उसे घर्षण (Friction) का मज़ा आ रहा था।
जब लंड सिर्फ़ टोपे पर अटक गया, तो रघु ने फिर से उसे अंदर ठोक दिया।
“स्लप… पच…!”
“आह्ह्ह… हाँ… ऐसे ही… धीरे-धीरे…” कामिनी सिसक रही थी।
रघु ने अब एक लय (Rhythm) पकड़ ली।
वह कामिनी की आँखों में देखते हुए उसे चोद रहा था।
उसका लंड हर बार अंदर जाते हुए कामिनी के जी-स्पॉट (G-Spot) को कुचल रहा था।
कामिनी के अंदर एक अजीब सी मीठी खुजली उठ रही थी जिसे वह खरोंच नहीं सकती थी, सिर्फ़ रघु का लंड ही उसे मिटा सकता था।
रघु अब कामिनी के ऊपर झुक गया।
उसका पसीने से लतपत सीना कामिनी के नंगे, उछलते स्तनों से रगड़ खाने लगा।
उसके सीने के बाल कामिनी के संवेदनशील निप्पल्स को गुदगुदा रहे थे।
रघु ने कामिनी के कान के पास अपना मुंह ले गया।
“बोल मालकिन… किसका लंड है तेरे अंदर?” रघु ने धक्का मारते हुए पूछा। “थप!”
“तेरा… आह्ह्ह… तेरा रघु…”
“मालिक का कैसा है?” रघु ने एक और गहरा धक्का मारा।
“छोटा… उफ्फ्फ… बहुत छोटा… मुझे पता ही नहीं चलता…” कामिनी सच उगल रही थी।
“और मेरा?” रघु ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। “पच-पच-पच…!”
“जानवर है तू… आह्ह्ह… तू फाड़ रहा है मुझे… उईईईई…. तेरा बहुत मोटा है रघु… मुझे और दे… पूरा दे…”
कामिनी की यह बातें रघु के पौरुष पर घी का काम कर रही थीं।
उसने रफ़्तार और बढ़ा दी।
अब कमरे में सिर्फ “थप… थप… थप…” की आवाज़ें गूंज रही थीं।
रघु के अंडकोष (Balls) कामिनी की चूत और गांड के बीच के हिस्से पर थप्पड़ मार रहे थे।
बिस्तर बुरी तरह हिल रहा था।
बगल में पड़ा रमेश हर झटके के साथ हिलता, कभी उसका हाथ कामिनी की तरफ आता, तो कभी उसका सिर।
कामिनी ने अपनी गर्दन मोड़ी और रमेश को देखा।
रघु उसे पागलों की तरह चोद रहा था, उसका शरीर झटके खा रहा था, और उसका पति वहीँ पड़ा था।
कामिनी ने अपना एक हाथ बढ़ाया और बेहोश रमेश के बालों को मुट्ठी में पकड़ लिया।
उसे एक अजीब सनक चढ़ी।
वह रमेश के बालों को खींचते हुए रघु से चुदने लगी।
“उठ रमेश… उठ ना नामर्द…” कामिनी मन ही मन चिल्लाई। “देख तेरी बीवी का क्या हाल कर दिया तेरे नौकर ने… देख मेरी चूत कैसे इसके लंड को चूस रही है…”
रघु ने देखा कि कामिनी रमेश के बाल पकड़ रही है। यह देखकर वह और वहशी हो गया।
उसने कामिनी की दोनों टांगों को कसकर और चोदा किया, ऊपर की ओर चढ़ा दिया.
अब वह कामिनी की चूत को सभी एंगल्स से रौंद रहा था।
वह कभी गोल-गोल (Grinding) घूमता, जिससे उसका टोपा कामिनी की बच्चेदानी के मुंह को घिसता।
तो कभी वह सिर्फ़ बाहर निकालकर ज़ोर से जड़ देता।
धप…. धप…. चप… चप… फच… फच… फाचक…. कामिनी की गीली चुत से सम्भग का मधुर संगीत गूंज रहा था.
कामिनी की चूत अब इतनी गीली थी कि लंड के अंदर-बाहर होने पर “पच-पच… चप-चप” की आवाज़ें आ रही थीं, जैसे कीचड़ में कोई चल रहा हो।
उसका रस बहकर रघु के जांघों और बिस्तर पर फैल गया था।
“रघु… मैं मरने वाली हूँ…” कामिनी का सिर दायें-बाएं डोल रहा था।
उसकी योनि की मांसपेशियां रघु के लंड को कसने (Grip) लगी थीं।
“मत रुकना… कसम है तुझे तेरी सुगना की… मत रुकना…” कामिनी चिल्लाई।
रघु ने कामिनी के दोनों स्तनों को एक साथ मुट्ठी में भरा और उन्हें पूरी ताकत से दबा दिया।
“दब्ब….!”
और नीचे अपनी कमर को मशीन की तरह चलाने लगा।
“धड़ाम… धड़ाम… धड़ाम…!”
हर धक्का कामिनी की रूह को हिला रहा था।
कामिनी का मुंह खुला रह गया, आँखें चढ़ गईं, और वह उस सुख के सागर में डूबने लगी जहाँ सिर्फ़ हवस और पसीना था।
कामिनी चरम सुख के उस शिखर पर थी, जहाँ दुनिया की हर आवाज़ धुंधली हो जाती है।
उसकी योनि रघु के लंड को बुरी तरह भींच रही थी, उसकी सांसें अटक रही थीं।
“मैं गई… रघु… मैं… आअह्ह्ह….”
वह छूटने ही वाली थी कि तभी…
“सटाक…!!”
रघु ने बिना किसी चेतावनी के, एक ही झटके में अपना पूरा लंड बाहर खींच लिया।
“नहीं…. !!!” कामिनी चिल्लाई।
उसे लगा जैसे किसी ने उसे सातवें आसमान से सीधे ज़मीन पर पटक दिया हो। उसका शरीर उस “खालीपन” से तड़प उठा। वह चरमसुख (Orgasm) के मुहाने पर खड़ी थी और रघु ने उसे वहीं लटका दिया।
कामिनी हांफती हुई, अधखुली आँखों से रघु को देखने लगी। “क्यों…? रघु क्यों रोका…?”
रघु घुटनों के बल खड़ा था, उसका लंड अभी भी लोहे की लाठ की तरह तना हुआ था, जिस पर कामिनी का रस और राल चमक रही थी।
रघु के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी।
“इतनी आसानी से नहीं मालकिन…” रघु ने भारी आवाज़ में आदेश दिया।
“घूमो… घोड़ी बन जाओ। आप जैसी रसीली घोड़ी को लेटा के चोदने में वो मज़ा नहीं है। मुझे पीछे से लेना है।”
कामिनी समझ गई। उसके पसीने से भीगे चेहरे पर एक मादक मुस्कान तैर गई।
उसे रघु का यह आदेश किसी वरदान जैसा लगा। वह खुद भी यही चाहती थी—पूरी तरह जानवर बनना।
कामिनी धीरे से बिस्तर पर पलटी।
उसने अपने घुटने बिस्तर पर टिकाए और अपनी विशाल, गोरी और भारी गांड को हवा में उठा दिया।
जैसे ही वह आगे झुकी, गुरुत्वाकर्षण (Gravity) के नियम अनुसार उसके नितम्बों (Buttocks) के दोनों हिस्से विपरीत दिशा में फैल गए।
बीच में… वह नज़ारा था जिसे देखकर किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए।
कामिनी की गुलाबी चूत और उसके ठीक ऊपर उसका गांड का छेद, दोनों काम-रस से लतपत होकर चमक रहे थे। चूत के होंठ सूजकर लटक गए थे, जो बता रहे थे कि अभी-अभी वहां क्या तूफ़ान आया था।
कामिनी ने अपनी कोहनियां बिस्तर पर टिका दीं।
और अपना चेहरा… अपने बेहोश पति रमेश के सीने पर रख दिया।
रमेश की छाती, जो सांसों से ऊपर-नीचे हो रही थी, अब कामिनी के लिए तकिया बन गई थी।
कामिनी ने अपनी जीभ निकाली और रमेश के कुर्ते के बटन के पास, उसकी छाती को चाट लिया।
“‘उठ रमेश… देख तेरी इज़्ज़त लूट रही है, अब नहीं मरेगा मुझे? ” कामिनी सनक मे, उत्तेजना मे बुदबूदा रही थी”
पीछे खड़ा रघु इस दृश्य को देख रहा था।
यह नज़ारा—मालकिन घोड़ी बनी है, गांड हवा में है, और मुंह पति के सीने पर है—उसकी बर्दाश्त से बाहर था।
उसने देखा कि कामिनी की चूत उत्तेजना में अभी भी “पच… पच…” कर रही है। वह अपने आप खुल रही थी और बंद हो रही थी, जैसे रघु के लंड को वापस बुला रही हो।
चूत का दरवाज़ा खुला हुआ था, अंदर का गुलाबी मांस झांक रहा था।
रघु ने देरी नहीं की।
उसने अपने लंड को मुट्ठी में पकड़ा, उसे सीधा किया और कामिनी की चूत के मुहाने पर सेट किया।
इस बार उसने धीरे-धीरे नहीं डाला।
उसने कामिनी की कमर को दोनों हाथों से जकड़ा और…
“ससससरररर….. धप्प….!!”
उसने एक ही बार में, बिना रुके, पूरा 8 इंच का मूसल कामिनी के अंदर जड़ दिया।
“आआआआहहहह… इस्स्स्स…. मार गई…. उउउफ्फ्फ्फ़…. !!”
कामिनी हुंकार उठी। उसकी आवाज़ रमेश के सीने में दबकर गुर्राहट बन गई।
इस ‘डोगी स्टाइल’ (Doggy Style) एंगल की वजह से, रघु का लंड सामान्य से भी गहरा चला गया।
टोपा सीधा जाकर कामिनी की बच्चेदानी (Cervix) से टकराया।
“उफ्फ्फ्फ… रघु… पेट में लग रहा है… आह्ह्ह…”
कामिनी ने दर्द और मज़े में अपनी गांड सिकोड़ ली, जिससे रघु का लंड अंदर और बुरी तरह जकड़ गया।
“अब ले….. अब देख कैसे दर्द दूर करता हूँ…”
रघु ने कामिनी के कूल्हों को लगाम की तरह पकड़ा और ‘ठुकाई’ शुरू कर दी।
“थप… थप… थप… थप…”
आवाज़ें बदल गईं। अब यह सिर्फ़ गीली पच-पच नहीं थी, अब यह मांस से मांस टकराने की आवाज़ थी।
रघु का पेट और जांघें, कामिनी की भारी गांड पर थप्पड़ मार रहे थे।
“पच-थप… पच-थप…!”
कामिनी का सिर रमेश के सीने पर बज रहा था।
रघु जब भी धक्का मारता— “धड़ाम!”
कामिनी का शरीर आगे जाता, और उसका माथा रमेश की छाती से टकराता— “धप्प!”
मानो वह अपने पति को जगाने के लिए सिर पटक रही हो।
“आह्ह्ह… रघु… आअह्ह्ह…. उउउफ्फ्फ्फ़……. उईईईई…” कामिनी का पूरा शरीर हिल रहा था।
उसके लटकते हुए स्तन (Boobs) नीचे की तरफ झूल रहे थे और पेंडुलम की तरह आगे-पीछे हो रहे थे।
रघु ने देखा कि कामिनी की गोरी गांड,धक्कों से लाल पड़ने लगी है।
उसने अपना एक हाथ ऊपर उठाया और कामिनी की गांड पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया।
“चटाक…..!!”
गांड का मांस लहरों की तरह हिल गया।
“हाँ… मार… और मार… जैसे रमेश को ललकार रही हो ” कामिनी, जिसका चेहरा रमेश की शर्ट में धंसा था, वहां से चिल्लाई।
रघु का लंड हर बार उसकी बच्चेदानी को ‘किस’ कर रहा था।
कामिनी को लग रहा था जैसे रघु उसके पेट के अंदर कुछ खोज रहा है।
वह हर धक्के के साथ रमेश के सीने को चूम रही थी और पीछे से रघु का वीर्य-दान स्वीकार करने के लिए तैयार हो रही थी।
रघु अब पूरी तरह हावी था। वह कामिनी की कमर को ऐसे खींच रहा था जैसे उसे तोड़ देगा, और फिर अपने लंड को हथौड़े की तरह ठोक रहा था।
कमरे में अब सिर्फ और सिर्फ मांस के टकराने की आवाज़ें गूंज रही थीं।
“थप-थप-थप-थप…!”
रघु किसी मशीन की तरह चल रहा था। उसकी रफ़्तार और ताकत समय के साथ बढ़ती जा रही थी।
कामिनी की भारी, गोरी गांड हवा में बुरी तरह हिल रही थी। रघु के हर धक्के पर उसके नितम्ब (Buttocks) किसी जेली की तरह थरथराते और फिर वापस रघु की जांघों से टकराते।
घर्षण और थप्पड़ों की वजह से उसकी दोनों ‘पुट्ठे’ अब लाल पड़ चुके थे, जैसे पके हुए सेब हों।
रघु का पसीना टपककर कामिनी की कमर की ढलान से होता हुआ, मिलन-बिंदु (Junction) पर गिर रहा था, जहाँ उसका काला लंड कामिनी की गुलाबी गुफा में अंदर-बाहर हो रहा था।
वह पसीना लुब्रिकेंट (Lubricant) का काम कर रहा था, जिससे “पच-पच” की आवाज़ और भी गीली और गंदी हो गई थी।
कामिनी का सिर अभी भी रमेश के सीने पर था।
रघु के धक्कों की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि कामिनी का चेहरा बार-बार रमेश की शर्ट में रगड़ खा रहा था।
कामिनी ने पागलपन में अपना मुंह खोला और रमेश की छाती को कपड़े के ऊपर से ही काट लिया।
“म्मम्म…..”
“हुउउम….. रमेश शायद थोड़ा सा हिला फिर शांत हो गया.
दांत गड़ाते हुए पीछे से रघु का धक्का सहना—यह कामिनी के लिए एक अलग ही नशा था।
उसे लग रहा था जैसे वह रमेश की मर्दानगी चूसकर पीछे रघु को सौंप रही है।
“रघु… आह्ह्ह… तू मेरी अंतड़ियां बाहर निकाल देगा…” कामिनी सिसक रही थी, लेकिन अपनी गांड और पीछे धकेल रही थी।
रघु का लंड अब सिर्फ़ योनि में नहीं था, वह कामिनी की आत्मा में घुस चुका था।
इस ‘डोगी पोज़’ में रघु का औज़ार इतना गहरा जा रहा था कि कामिनी को अपनी नाभि के अंदर एक अजीब सी गुदगुदी और मीठा दर्द महसूस हो रहा था।
उसकी बच्चेदानी (Uterus) हर धक्के पर हिल रही थी।
रघु ने देखा कि कामिनी के लटकते हुए भारी स्तन नीचे बिस्तर की चादर को छू रहे हैं और पेंडुलम की तरह झूल रहे हैं।
यह दृश्य उसे और भी उत्तेजित कर गया।
रघु ने कामिनी की कमर छोड़ी और झुककर नीचे लटकते हुए कामिनी के एक स्तन को मुट्ठी में पकड़ लिया।
“दब्ब…!”
उसने उसे खींचा।
“आआआह्ह्ह…. माँ…… !!” कामिनी चिल्लाई।
नीचे से स्तन खिंच रहा था और पीछे से लंड ठोक रहा था।
कामिनी दो तरफा वार से बौखला गई।
“मज़ा आ रहा है मालकिन?” रघु ने उसके कान के पास फुसफुसाते हुए एक और गहरा धक्का मारा। “धप्प!”
“हाँ… हाँ जानवर… और मार… फाड़ दे…”
“किसका है ये माल?” रघु ने उसकी गांड पर एक और चटाक मारा।
“तेरा… आह्ह्ह… सिर्फ़ तेरा रघु…”
कामिनी की योनि अब बाढ़ की तरह बह रही थी।
रघु का लंड अंदर जाते वक्त कामिनी की भीगी हुई दीवारों को प्रेस (Press) करता, और बाहर आते वक्त वैक्यूम (Vacuum) के साथ “चप” की आवाज़ करता।
कामिनी की योनि की मांसपेशियां (Muscles) अब रघु के लंड को जकड़ने लगी थीं।वह उसे छोड़ना नहीं चाहती थीं।
कामिनी का शरीर अकड़ने लगा।
उसके पैर की उंगलियां मुड़ गईं। उसने रमेश की शर्ट को मुट्ठी में जकड़ लिया और फाड़ने लगी।
“रघु… मैं… मैं फिर से… आह्ह्ह… रघु मैं गई…”
कामिनी का सिर तेज़ी से दायें-बायें हिलने लगा।
उसकी चूत के अंदर एक भूचाल आ गया।
रघु समझ गया कि मालकिन अपने चरम पर हैं।
उसने अपनी रफ़्तार को दोगुना कर दिया।
“बड़-बड़-बड़-बड़…!” (Tabad-tod thrusting).
रघु अब बाहर नहीं निकाल रहा था, वह बस अंदर ही अंदर छोटे और गहरे झटके मार रहा था। उसका टोपा कामिनी की बच्चेदानी के मुंह को कुचल रहा था।
“आआआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह……… रघूऊऊऊऊ…….. !!!!”
कामिनी ने एक लंबी, दर्दनाक और सुखी चीख मारी, जो रमेश की छाती में दबकर रह गई।
उसका पूरा शरीर हवा में तन गया।
उसकी चूत ने पिचकारी मार दी। गरम फव्वारे ने रघु के लंड को नहला दिया।
कामिनी बुरी तरह कांप रही थी, झड़ रही थी, और उसी वक्त…
रघु भी अपने बर्दाश्त की सीमा पार कर गया।
मालकिन के उस कसाव ने उसकी नसें तोड़ दीं।
उसने कामिनी की कमर को लोहे की पकड़ में जकड़ा, उसे अपनी जांघों से चिपकाया और…
“आअह्ह्ह…आआआ…… !!!”
रघु ने तीन-चार जानलेवा धक्के मारे— “धप्प… धप्प… धप्प…!!”
और अपना लंड जड़ तक (Deepest possible) अंदर गाड़ दिया।
रघु का शरीर अकड़ गया।
उसने अपनी रीढ़ की हड्डी तक का ज़ोर लगा दिया और…
“पिच… पिच… पिच…”
अपना गाढ़ा, गरम और सफ़ेद वीर्य (Cum) कामिनी की बच्चेदानी के बिल्कुल अंदर, सबसे गहराई में उड़ेलना शुरू कर दिया।
यह सिर्फ वीर्य नहीं था, यह रघु का वर्षों का दबा हुआ पौरुष, गुस्सा और प्यार था।
वह कामिनी को भर रहा था।
कामिनी महसूस कर सकती थी कि कैसे गरम लावा उसके पेट में फैल रहा है।
रघु कांप रहा था, और कामिनी के ऊपर ही ढेर हो रहा था, लेकिन उनका जुड़ाव अभी भी बना हुआ था।
दोनों उसी अवस्था में—कामिनी घोड़ी बनी हुई, और रघु उसके ऊपर लदा हुआ—हांफ रहे थे।
नीचे से कामिनी का रस और रघु का वीर्य मिलकर एक हो गया था और अब धीरे-धीरे कामिनी की जांघों से बहकर बिस्तर पर… और रमेश के हाथ के पास टपक रहा था।
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कमरे में भारी सांसों की आवाज़ धीरे-धीरे शांत होने लगी, लेकिन हवा में हवस की गंध अभी भी गाढ़ी थी।
कुछ पलों तक रघु कामिनी के ऊपर ही निढाल पड़ा रहा, अपना वजन उस पर डाले हुए। कामिनी को रघु का यह भार बुरा नहीं लग रहा था, बल्कि यह उसे सुरक्षा का अहसास दे रहा था।
फिर रघु ने अपने हाथ गद्दे पर टिकाए और धीरे से पीछे हटा।
“स्लप…..”
एक गीली और भरी हुई आवाज़ के साथ रघु का लंड कामिनी की योनि से बाहर फिसला।
जैसे ही वह ‘डाट’ हटी, कामिनी की योनि का मुंह खुला रह गया।
अंदर भरा हुआ रघु का गाढ़ा, सफ़ेद वीर्य और कामिनी का अपना रस धीरे-धीरे बाहर रिसने लगा।
वह गाढ़ा तरल कामिनी की जांघों के बीच से बहता हुआ बिस्तर की चादर पर फैल गया, और उसकी एक धार लुढ़ककर बेहोश पड़े रमेश के हाथ को भिगो गई।
यह उस रात का सबसे बड़ा व्यंग्य था—पति का हाथ पत्नी के प्रेमी के वीर्य से सने बिस्तर पर था।
कामिनी ने हिलने की कोशिश नहीं की। वह वैसे ही, घोड़ी बनी हुई अवस्था से लुढ़ककर करवट के बल लेट गई।
उसका चेहरा अभी भी रमेश के सीने के पास था। उसका एक हाथ रमेश की छाती पर पड़ा था, और उसके नंगे, सुडौल पैर रघु की तरफ फैले थे।
यह ‘काम-युद्ध’ समाप्त हो चुका था।
इस युद्ध में दो लोग जीते थे—कामिनी, जिसे अपनी प्यास बुझाने वाला मर्द मिल गया था, और रघु, जिसने अपनी ‘सुगना’ को पा लिया था।
सिर्फ़ एक ही इंसान हारा था—रमेश, जो अपनी ही बीवी के नंगे जिस्म और दो कोड़ी के रोड छाप भिखारी नौकर की गंध के बीच बेखबर सो रहा था।
रघु खड़ा हुआ।
उसका पौरुष अभी भी आधा तना हुआ था, जिस पर जीत की निशानी (कामिनी का खून और पानी) लगी थी।
उसने ज़मीन से अपना पाजामा उठाया और पहन लिया। नाड़ा बांधते हुए उसने एक बार उस बिस्तर की तरफ देखा।
वहां उसकी ‘मालकिन’ पूरी तरह नंगी, अस्त-व्यस्त बालों और लाल पड़ी गांड के साथ लेटी थी। उसके स्तनों पर रघु के दांतों के निशान अब गहरे लाल हो चुके थे।
रघु दरवाजे की तरफ बढ़ा।
चौखट पर पहुँचकर वह रुका और एक बार पीछे मुड़ा।
कामिनी की आँखें भारी हो रही थीं, नींद और सुकून से बोझिल। लेकिन उसने रघु को जाते हुए देखा।
उनकी नज़रें मिलीं।
कामिनी के होठों पर एक धीमी, रस्यमयी मुस्कान तैर गई।
वह मुस्कान कह रही थी— “शुक्रिया रघु… मुझे औरत बनाने के लिए।”
रघु ने भी सिर हिलाकर मौन स्वीकृति दी।
कामिनी की पलकें झुक गईं। वह वहीं, अपने बेहोश पति के बगल में, पूरी तरह नंगी और वीर्य से लतपत हालत में गहरी नींद के आगोश में समा गई।
रघु कमरे से बाहर निकला और धीरे से दरवाज़ा सटा दिया।
रात की ठंडी हवा उसके पसीने से भीगे बदन को छू रही थी।
वह आंगन से होता हुआ अपने स्टोर रूम की तरफ बढ़ा।
उसकी चाल में अब एक नौकर की झुकी हुई रीढ़ नहीं थी।
वह सीना तानकर, एक शेर की तरह चल रहा था। आज रात उसने सिर्फ़ संभोग नहीं किया था, उसने इस घर पर, और इस घर की मालकिन पर अपनी ‘फतेह’ हासिल की थी।
दोपहर के 12 बज रहे थे। घर में कब्रिस्तान जैसी खामोशी थी।
कामिनी लिविंग रूम के सोफे पर पसरी हुई थी। उसने सिर्फ़ अपना साटन का गाउन पहना हुआ था।
दर्द और सूजन के कारण वह अपनी टांगें सटाकर नहीं बैठ पा रही थी, इसलिए उसने अपने पैर सोफे पर फैला रखे थे और गाउन के नीचे उसकी जांघें चौड़ी थीं।
हर पल उसे अपनी योनि और कमर में एक मीठी-मीठी टीस महसूस हो रही थी, जो उसे बार-बार कल रात के ‘तूफ़ान’ की याद दिला रही थी।
तभी, मुख्य दरवाज़े (Main Door) के खुलने की आवाज़ आई।
“खट… खट…”
कामिनी चौंक गई। उसे लगा शायद बंटी वापस आ गया, लेकिन इतनी जल्दी?
कामिनी जैसे-तैसे कराहते हुए उठी और घर का दरवाजा खोला।
सामने रघु खड़ा था।
वह पसीने से लतपत था, उसकी सांसें फूल रही थीं, जैसे वह कहीं दूर से भागता हुआ आया हो। उसके हाथ में कांच की एक छोटी, पुरानी सी शीशी थी जिसमें हरे रंग का कोई गाढ़ा तेल भरा था।
सुबह से रघु को न पाकर कामिनी के अंदर जो गुस्सा भरा था, वह एकदम से फूट पड़ा।
“कहाँ मर गए थे तुम?” कामिनी दर्द के बावजूद चिल्लाई, उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “मैं यहाँ दर्द से मरी जा रही हूँ, चल भी नहीं पा रही… और तुम सुबह से ही शराब पीने निकल गए?”
रघु ने कोई सफाई नहीं दी, बस धीरे से मुस्कुराया और वह शीशी ऊपर उठा दी।
“भागने के लिए नहीं मालकिन…” रघु ने अपनी भारी आवाज़ में कहा, “आपके दर्द का इलाज लेने गया था।”
कामिनी का गुस्सा थोड़ा ठंडा हुआ। वह लंगड़ाते हुए वापस सोफे पर गई और टांगें चौड़ी करके धंस गई।
रघु सोफे के पास आया और घुटनों के बल नीचे कालीन पर बैठ गया।
“वो कल वाला दोस्त याद है मेरा, कादर खान…” रघु ने शीशी का ढक्कन खोलते हुए कहा। “उसके दादा जड़ी-बूटियों के जानकार थे, कुछ उसे भी सीखा गए। जेल में पुलिस की मार के बाद मेरे घाव पर वो ये तेल लगाता था, पल भर में दर्द उड़ जाता था।”
“कादर खान…”
रघु के मुंह से यह नाम सुनते ही कामिनी का दिमाग फ्लैशबैक में चला गया।
उसे याद आया अस्पताल का वो नज़ारा… जब वह रघु को लेकर गई थी।
गुंडों जैसा चेहरा, बेबाक आँखें, मुंह में पान, और गले में काला ताबीज़। उसने कामिनी को देखकर भी अनदेखा कर दिया था, जैसे कामिनी उसके लिए सिर्फ़ मांस का एक लोथड़ा हो।
उसकी वो ‘मावली’ शक्ल, वो खूंखार और लापरवाह अंदाज़…
अचानक, कामिनी की योनि में—जो रघु की रगड़ से छिल चुकी थी—एक अजीब सी सनसनी हुई।
यह दर्द नहीं था… यह हवस की खुजली थी।
कामिनी ने अपनी जांघें आपस में भिंच लीं।
‘हे भगवान… मुझे क्या हो गया है? मैं उस जाहिल गुंडे के बारे में सोचकर गीली हो रही हूँ?’
कामिनी को अपनी फितरत पर हैरानी हुई, लेकिन उसका जिस्म अब ‘सभ्यता’ नहीं, ‘असली पौरुष’ मांग रहा था।
रघु ने अपनी हथेली पर तेल उंडेला। तेल से कपूर और जड़ी-बूटियों की तेज़ गंध आई।
रघु ने अपनी दोनों हथेलियों को रगड़ा जिससे तेल गरम हो गया।
वह कामिनी के गाउन को नीचे से उठाने लगा।
कामिनी का हाथ अचानक रघु के हाथ पर गया। वह ठिठक गई।
भले ही उसने कल रात रघु के साथ हदों को पार कर दिया था, लेकिन अब दिन की रौशनी में, होश में, उसे थोड़ी झिझक महसूस हुई।
“र… रहने दो रघु…” कामिनी ने नज़रें चुराते हुए कहा। “लाओ मुझे दे दो, मैं खुद लगा लूँगी।”
रघु रुका। उसने अपनी गहरी, काली आँखों से कामिनी को देखा।
उसके चेहरे पर एक रस्यमयी मुस्कान आई।
“अब क्या शर्माना मालकिन?” रघु ने नरमी मगर अधिकार से कहा। “मुझसे क्या छिपा है अब? आपके बदन का कोना-कोना कल रात मेरी मुट्ठी में था। यह शरीर अब सिर्फ़ आपका नहीं है…”
कामिनी के पास कोई जवाब नहीं था। रघु सच कह रहा था। पर्दा तो कल रात ही जल चुका था।
कामिनी ने धीरे से अपना हाथ हटा लिया और अपनी आंखें बंद कर लीं, मूक सहमति देते हुए।
रघु ने गाउन को घुटनों से ऊपर सरकाया।
कामिनी की गोरी, सुडौल और भरी हुई पिंडलियां (Calves) अनावृत हो गईं।
रघु ने अपनी गरम, तेल से सनी हथेलियां कामिनी की पिंडलियों पर रख दीं।
“छनन्न……”
कामिनी के मुंह से एक सिसकी निकल गई।
रघु के खुरदरे, मज़बूत हाथ और वो जादुई तेल… जैसे ही त्वचा से मिले, एक करंट सा दौड़ गया।
रघु ने धीरे-धीरे, लेकिन मज़बूती से मालिश शुरू की।
वह अपने अंगूठों को कामिनी के मांस में गड़ाता और नीचे से ऊपर की ओर खींचता।
“दब्ब… दब्ब…!”
रघु के हाथों का घर्षण गर्मी पैदा कर रहा था।
वह धीरे-धीरे ऊपर बढ़ा… घुटनों को पार करते हुए… कामिनी की विशाल और मांसल जांघों (Thighs) पर।
कामिनी की जांघें अंदर से लाल और सूजी हुई थीं।
रघु ने वहां तेल की मात्रा बढ़ा दी।
उसके बड़े-बड़े हाथ कामिनी की गोरी जांघों को आटे की तरह गूंध रहे थे।
“आह्ह्ह… रघु… आराम से… वहां बहुत दर्द है…” कामिनी सिसकी, लेकिन उसने अपनी टांगें और चौड़ी कर दीं ताकि रघु अंदर तक पहुँच सके।
रघु अब अंदरूनी जांघों (Inner Thighs) पर आ गया था।
उसके हाथ योनि के होठों (Labia) से महज़ एक इंच की दूरी पर चल रहे थे।
उसकी उंगलियां बार-बार कामिनी की पैंटी-लाइन (जहाँ पैंटी नहीं थी) को छू रही थीं।
कामिनी की सांसें भारी हो गईं।
तेल की गर्माहट और रघु का स्पर्श मिलकर एक नशा पैदा कर रहे थे।
रघु की उंगलियां जब भी जांघों के जोड़ (Groin) के पास रगड़तीं, कामिनी का पेल्विस (Pelvis) अपने आप हवा में उठ जाता।
रघु ने मालिश करते हुए कामिनी के चेहरे को देखा।
मालकिन की आँखें बंद थीं, होंठ खुले थे, और माथे पर पसीने की नन्हीं बूंदें थीं।
रघु ने अपनी मर्यादा नहीं तोड़ी। उसने योनि को नहीं छुआ, लेकिन उसके आस-पास के हर इंच को अपनी गर्मी से भर दिया।
वह दर्द खींच रहा था और मज़ा भर रहा था।
कामिनी का दिमाग सुन्न होने लगा।
कादर खान का तेल सचमुच जादुई था। दर्द ऐसे गायब हो रहा था जैसे भाप।
शरीर में एक अजीब सा हल्कापन और खुमारी (Intoxication) छाने लगी।
रघु के हाथों की वो लयबद्ध गति (Rhythmic motion)… तेल की वो गंध… और अंदर सुलगती हुई काम-अग्नि…
कामिनी को पता ही नहीं चला कि कब उसकी सिसकियाँ धीमी पड़ गईं।
कब उसका तना हुआ शरीर ढीला पड़ गया।
रघु मालिश करता रहा, और कामिनी उसी सोफे पर, अपनी टांगें रघु के सामने फैलाए, एक गहरी, नशीली नींद के आगोश में समा गई।
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घड़ी की सुईयां शाम के 4 बजा रही थीं।
कमरे में भारी पर्दों के कारण हल्की-हल्की रौशनी थी।
कामिनी ने एक गहरी, सुकून भरी नींद के बाद अपनी आँखें खोलीं।
पहला अहसास जो उसे हुआ, वह था— नरमी।
उसने करवट ली और पाया कि वह सोफे पर नहीं, बल्कि अपने बेडरूम के मखमली गद्दे पर लेटी है।
और दूसरा अहसास, जिसने उसकी धड़कनों को बढ़ा दिया— वह पूरी तरह नंगी थी।
उसके शरीर पर न गाउन था, न कोई कपड़ा। वह सिर्फ़ एक पतली सी चादर के नीचे, अपनी प्राकृतिक अवस्था में लेटी थी।
कामिनी हड़बड़ाकर उठ बैठी। चादर सरककर उसकी कमर तक आ गई, जिससे उसके भारी, सुडौल स्तन आज़ाद होकर हवा में झूल गए।
“मैं यहाँ कैसे आई?” कामिनी ने सोचा।
उसे याद आया… रघु सोफे पर उसकी मालिश कर रहा था… उसकी उंगलियां जांघों पर चल रही थीं… और फिर उसे नींद आ गई थी।
इसका मतलब… रघु ने उसे अपनी गोद में उठाया होगा। उसे बेडरूम तक लाया होगा। और फिर… अपने उन खुरदरे हाथों से, कामिनी का गाउन उतारा होगा।
कामिनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
उसने कल्पना की—कैसे रघु ने उसके बेहोश जिस्म को निहारा होगा, कैसे उसे नंगा किया होगा।
कामिनी ने अपने पैरों को हिलाया। उसने अपनी कमर मोड़ी।
और वह दंग रह गई।
दर्द गायब था!
न जांघों में वो टीस, न कमर में वो जकड़न, और न ही योनि में वो जलन।
उसका शरीर किसी रबर की गुड़िया की तरह लचीला और हल्का महसूस हो रहा था।
कामिनी ने अपनी जांघों पर हाथ फेरा। वहां की त्वचा मक्खन जैसी मुलायम हो गई थी। तेल की एक भीनी-भीनी खुशबू अभी भी उसके रोम-रोम में बसी थी।
“कादर खान…का तेल ” कामिनी के होंठों पर एक मुस्कान तैर गई।
तभी, साइड टेबल पर रखा उसका मोबाइल थरथराने लगा।
कामिनी ने झुककर फ़ोन उठाया। स्क्रीन पर ‘सुनैना’ (रवि की मम्मी) का नाम था।
कामिनी ने गला साफ़ किया और अपनी आवाज़ में ताज़गी भर ली।
“हाँ सुनैना जी, नमस्ते…”
“नमस्ते भाभी जी!” उधर से सुनैना की चहकती हुई आवाज़ आई। “सो तो नहीं रही थीं? वो बंटी ने बताया कि आपकी तबियत थोड़ी नासाज़ है?”
“नहीं-नहीं,” कामिनी ने हंसते हुए कहा, और अपनी जांघों को एक-दूसरे से रगड़ा। ” छोटा मोटा चलता रहता है, अब ठीक हूँ, आप बताइये?
“अरे वाह! फिर तो कोई बहाना नहीं चलेगा,” सुनैना ने उत्साह से कहा। “आज रात का डिनर हमारे घर पर है। बंटी के नए स्कूटर की पार्टी समझ लीजिये। और एक खास बात और है… रवि के पापा (विक्रम जी) भी टूर से वापस आ गए हैं। उनकी बड़ी इच्छा थी आपसे और रमेश भाई साहब से मिलने की। तो प्लीज, 7:30 बजे तक आ जाइयेगा।”
‘रवि के पापा…’
यह शब्द सुनते ही कामिनी के दिमाग में एक घंटी बजी।
रवि जैसा प्यारा और गोरा-चिट्टा बेटा… सुनैना जैसी मॉडर्न और तीखी बीवी… तो रवि का बाप कैसा होगा?
क्या वह भी रमेश जैसा ही ढीला-ढाला होगा?
ना जाने क्यों कामिनी के जहन मे रवि के बाप को देखने की इच्छा कुलबुलाने लगी.
कामिनी का दिमाग अब हर मर्द को एक ‘संभावना’ की तरह देखने लगा था। उसकी जिज्ञासा जाग उठी।
कामिनी के जीवन, उसके चरित्र मे एक बदलाव आ गया था, वो मर्दो को एक अलग नजर से देखने लगी थी.
“जरूर आएंगे सुनैना जी,” कामिनी ने वादा किया। “मैं रमेश को बता देती हूँ।”
फ़ोन रखते ही कामिनी ने रमेश को कॉल लगाया।
रमेश, जो ऑफिस में बैठा अपनी ‘मर्दानगी’ के ख्यालों में खोया था, कामिनी का फ़ोन देखकर खिल उठा।
कामिनी ने उसे पार्टी और विक्रम जी के बारे में बताया।
“अरे वाह!” रमेश खुश हो गया। (मन ही मन उसे सुनैना से मिलने की ख़ुशी थी)।
” मैं 6 बजे तक पक्का घर आ जाऊंगा।”
“और सुनिये…” कामिनी ने हिदायत दी, “आज पीकर मत आना। पहली बार किसी के घर जा रहे हैं, इंप्रेशन ख़राब नहीं होना चाहिए।”
“अरे डार्लिंग, आज तेरा पति बिल्कुल ‘साधु’ बनकर आएगा,” रमेश ने हंसते हुए कहा। “आज सिर्फ़ सभ्य और संस्कारी रमेश बाबू दिखाई देंगे।”
रमेश ने अंदर वाकई आज देवता बैठा था, भले ही सुनैना के लालच मे लेकिन था तो सही.
फ़ोन कट गया।
कामिनी बिस्तर से उठी और सीधे बाथरूम की तरफ बढ़ी।
उसने गीजर ऑन किया और शावर के नीचे खड़ी हो गई।
गरम पानी की बूंदें जब उसके तेल लगे जिस्म पर गिरीं, तो पानी मोतियों की तरह फिसलने लगा।
कामिनी ने साबुन लगाकर अपने स्तनों, अपनी कमर और अपनी जांघों को साफ़ किया।
रघु का वीर्य और कादर का तेल—सब कुछ पानी के साथ बह गया, लेकिन उनकी यादें कामिनी के अंदर छप चुकी थीं।
नहाने के बाद, कामिनी तौलिया लपेटकर बाहर आई और ड्रेसिंग टेबल के आदमकद शीशे के सामने खड़ी हो गई।
उसने तौलिया खोल दिया।
शीशे में… एक ‘नयी कामिनी’ खड़ी थी।
उसका रंग और भी निखर गया था। उसकी आँखों में एक अजीब सा नशा और आत्मविश्वास था।
उसकी नज़र अपनी गर्दन और छाती के ऊपरी हिस्से पर गई।
वहाँ रघु के दिए नीले निशान (Love Bites) अब हलके पड़ चुके थे, रघु की छाप छूटने लगी थी.
कामिनी ने अपनी उंगलियां उन निशानों पर फेरीं।
“ईईस्स्सह्ह्ह… आअह्ह्हम्म….. एक मीठी लहर दौड़ गई, अब इन निशान पर दर्द नहीं था सम्पूर्ण कामुकता की इबारत बन कर रह गए थे वो बेंगनी निशान.
कामिनी ने अपनी अलमारी खोली।
उसने एक गहरे लाल रंग (Deep Red) की शिफॉन साड़ी निकाली। यह साड़ी ‘सभ्य’ भी थी, लेकिन इसका कपड़ा इतना पारदर्शी था कि शरीर के कटाव साफ़ झलकते थे।
ब्लाउज उसने स्लीवलेस और डीप-नेक (Deep Neck) वाला चुना।
तैयार होते वक़्त कामिनी ने सिंदूर लगाया, मंगलसूत्र पहना… वही मंगलसूत्र जो कल रात रघु के लंड से टकरा रहा था।
उसने हल्का मेकअप किया, आँखों में काजल लगाया, और होठों पर सुर्ख लाल लिपस्टिक।
वह किसी नई-नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी, लेकिन जिसकी आँखों में दुल्हन वाली शर्म नहीं रह गई थी, बल्कि एक सम्पूर्ण संतुष्ट वाली औरत की चमक थी।
6 बजते ही रमेश आ गया।
जैसा उसने वादा किया था, वह बिना पिए आया था। उसके कपडे साफ थे, बाल वैसे ही थे जैसे घर से सुबह निकला था,
जैसे ही वह कमरे में आया और कामिनी को देखा… उसके कदम रुक गए।
“उफ्फ्फ…” रमेश के मुंह से निकला। “कामिनी… आज तो तुम कहर ढा रही हो। कसम से, अगर आज सुनैना जी के घर ना जाना होता तो आज फिर…”
रमेश बिना पिए दुनिया का सबसे सभ्य आदमी होता था.
कामिनी ने उसे पास आने से रोक दिया।
“खबरदार जो हाथ लगाया,” कामिनी ने नखरे से कहा, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान थी। “साड़ी ख़राब हो जाएगी। चलो, देर हो रही है।”
रमेश, कामिनी की खूबसूरती (और अपनी तथाकथित मर्दानगी) के नशे में चूर होकर आगे-आगे चला।
और कामिनी, अपनी एड़ियों की ‘टक-टक’ के साथ पीछे चली।
उसकी चाल में अब लंगड़ापन नहीं था, बल्कि एक लचक थी। एक ऐसी लचक जो सिर्फ़ एक ‘संतुष्ट’ औरत में ही आ सकती है।
रमेश ने car मंगवा ली थी,
“घर का ध्यान रखना बे? ” जाते जाते बड़ी ही बदतमीज़ी से रमेश रघु को आदेश देता चला जा रहा था.
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रमेश की कार सुनैना के आलीशान बंगले के सामने रुकी।
यह बंगला रमेश के घर से कहीं बड़ा और आधुनिक था। गेट पर ही एक बड़ा सा नेमप्लेट लगा था— “विक्रम सिंह – कमिश्नर (एक्साइज)”।
नेमप्लेट देखकर ही रमेश ने अपनी टाई ठीक की और बालों पर हाथ फेरा। वह एक मामूली सिविल इंजीनियर था, और विक्रम एक बहुत बड़ा सरकारी अफसर। यह हीनभावना (Inferiority Complex) रमेश के चेहरे पर साफ़ झलक रही थी।
कामिनी कार से उतरी।
उसकी गहरे लाल रंग की शिफॉन साड़ी शाम की हवा में लहरा रही थी। रघु की ‘सेवा’ और कादर खान के तेल ने उसके बदन में जो लोच पैदा की थी, वह उसकी चाल में साफ़ दिख रही थी।
दोनों ने पोर्च पार किया और घंटी बजाई।
कुछ ही पलों में दरवाज़ा खुला।
सामने विक्रम सिंह खड़ा था।
कामिनी की नज़रें उठती चली गईं। विक्रम 6 फुट 2 इंच का एक विशालकाय पुरुष था।
उसकी उम्र 50 के आसपास रही होगी, लेकिन शरीर किसी पहलवान जैसा कसा हुआ था। चौड़े कंधे, बाहर को निकला हुआ मज़बूत सीना, और चेहरे पर ‘साल्ट एंड पेपर’ (काली-सफ़ेद) फ्रेंच कट दाढ़ी।
उसने एक सफ़ेद कुर्ता-पाजामा और ऊपर से एक गहरे नीले रंग की स्लीवलेस जैकेट पहनी थी।
वह सिर्फ़ खड़ा नहीं था, वह जगह को डोमिनेट (Dominate) कर रहा था। उसकी शख्सियत से एक ‘अल्फा मेल’ (Alpha Male) की महक आ रही थी।
रमेश ने अपनी बत्तीसी दिखाते हुए हाथ बढ़ाया। “नमस्ते विक्रम सर! मैं रमेश…”
विक्रम ने एक हल्की मुस्कान के साथ अपना विशाल पंजा आगे बढ़ाया।
जैसे ही दोनों के हाथ मिले, विक्रम ने रमेश के हाथ को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
रमेश की उंगलियां उस लोहे की पकड़ में दब गईं।
“नमस्ते रमेश जी,” विक्रम की आवाज़ भारी और गूंजने वाली (Baritone) थी। “सुना है आप सिविल इंजीनियर हैं? बहुत नाम सुना है आपका।”
यह सिर्फ़ शिष्टाचार था, लेकिन रमेश उस भारी आवाज़ और मज़बूत पकड़ के सामने एक बौना महसूस करने लगा।
फिर विक्रम की नज़र कामिनी पर गई।
“और ये…”
“जी, ये मेरी पत्नी कामिनी,” रमेश ने जल्दी से परिचय कराया।
“वो तो मै देखते ही समझ गया था, आप कामिनी जी है… रवि खूब तारीफ करता है आपकी, अपने उसका बहुत अच्छे से ध्याब रखा”
विक्रम की शेर जैसी आँखें कामिनी के चेहरे से होती हुई नीचे तक गईं।
वह उम्मीद कर रहा था कि रमेश जैसे मामूली आदमी की बीवी भी मामूली होगी।
लेकिन सामने एक अpsara खड़ी थी।
कामिनी की सादगी ने विक्रम को पहली ही नज़र में घायल कर दिया।
सुनैना (विक्रम की पत्नी) हमेशा मॉडर्न कपड़े, भारी मेकअप और इंग्लिश परफ्यूम में रहती थी। विक्रम उस बनावटीपन से ऊब चुका था।
और यहाँ कामिनी थी—माथे पर सिन्दूर, गले में मंगलसूत्र, लाल साड़ी, और आवाज़ में एक मीठा, देसीपन।
कामिनी ने झुककर शालीनता से नमस्ते किया। “नमस्ते भाई साहब।”
विक्रम के दिल में एक हलचल हुई।
‘ऐसी औरतें अब कहाँ मिलती हैं?’ विक्रम ने सोचा। ‘इतनी भरी-पूरी, इतनी संस्कारी… और रमेश जैसा लंगूर इस अंगूर को रख रहा है?’
विक्रम की नज़र कामिनी की गर्दन पर गई, जहाँ साड़ी के पल्लू की आड़ में वो हल्का सा नीला निशान झांक रहा था।
विक्रम की आँखों में एक चमक आ गई। वह समझ गया कि यह ‘संस्कारी’ देवी रात के अंधेरे में कुछ और ही है।
उधर, कामिनी भी विक्रम को देखकर दंग थी।
उसने मन ही मन सोचा— ‘हे भगवान! इतना मर्दाना आदमी… इतना रुतबा… फिर भी सुनैना जी बाहर क्यों भटक रही हैं? क्या कमी है इस आदमी में?’
कामिनी की योनि, जो अभी-अभी ठीक हुई थी, विक्रम के उस भारी-भरकम शरीर को देखकर फिर से संकुचित (Clench) हो गई।
रघु ‘जानवर’ था, लेकिन विक्रम एक ‘राजा’ था।
तभी अंदर से सुनैना आई।
सुनैना ने एक स्लीवलेस गाउन पहना था, बाल छोटे कटे थे, और हाथ में वाइन का ग्लास था।
“अरे रमेश जी! कामिनी भाभी! वेलकम!” सुनैना चहकी।
सुनैना की उस मॉडर्न अदा को देखकर रमेश पिघल गया।
उसने कामिनी की तरफ देखा और फिर सुनैना की तरफ।
रमेश के दिमाग में वही पुरुषवादी कीड़ा रेंगने लगा।
‘मेरी बीवी तो गांव की गवार है… असली औरत तो ये है—सुनैना। क्या क्लास है, क्या स्टाइल है। विक्रम कितना खुशनसीब है।’
यही विडंबना (Irony) उस ड्राइंग रूम में नाच रही थी।
विक्रम को अपनी मॉडर्न बीवी (सुनैना) प्लास्टिक की गुड़िया लग रही थी, और उसे रमेश की ‘गवार’ बीवी (कामिनी) में असली औरत की महक आ रही थी।
वही रमेश को अपनी वफादार और भरी-पूरी बीवी (कामिनी) बोरिंग लग रही थी, और उसे विक्रम की ‘चालू’ बीवी (सुनैना) में स्वर्ग दिख रहा था।
मर्दों की फितरत का यही कड़वा सच है— “जो हासिल है उसकी कोई औकात नहीं, और जो दूसरे के पास है, वही कोहिनूर है।”
विक्रम ने इशारा किया। “आइये, बैठिये।”
कामिनी जब सोफे पर बैठने लगी, तो विक्रम की नज़रें बेशर्मी से उसकी कमर के घुमाव और साड़ी के नीचे हिलते हुए भारी नितम्बों पर टिकी थीं।
कामिनी ने यह देख लिया।
उसने पल्लू ठीक करने का नाटक किया, लेकिन असल में उसने अपनी गर्दन का वह लव-बाइट विक्रम की नज़रों के सामने और साफ़ कर दिया।
लिविंग रूम में बैठने की व्यवस्था हो रही थी। सोफे मखमली और आरामदायक थे।
तभी रमेश की जेब में पड़े फोन ने अपनी कर्कश रिंगटोन से माहौल में खलल डाला।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था— ‘शमशेर’।
रमेश हड़बड़ा गया। कमिश्नर साहब के सामने वह शमशेर जैसे ‘टुच्चे’ पुलिसवाले से बात नहीं करना चाहता था।
“एक मिनट… ज़रूरी कॉल है,” रमेश ने खीसें निपोरते हुए कहा और बालकनी की तरफ बढ़ गया।
फोन उठाते ही उधर से शमशेर की गालियों भरी आवाज़ आई।
“अबे साले! कहाँ रह गया? दारू का टाइम निकल रहा है और तू गायब है?”
रमेश ने आवाज़ धीमी की।
“अरे भाई, आज नहीं आ पाऊँगा। मैं… वो… विक्रम सर के घर आया हूँ। डिनर पे।”
“विक्रम सर? एक्साइज कमिश्नर?” शमशेर की आवाज़ में ईर्ष्या और झटका दोनों था। “साले, इतनी ऊंची पहुँच बना ली? और मुझे बताया तक नहीं? दोस्त से गद्दारी कर रहा है?”
“अबे साले जिस सुनैना को तूने चोदा था, वो इस विक्रम की ही पत्नी है ,”। तू रख, मैं बाद में बात करता हूँ।”
रमेश ने जैसे-तैसे फोन काटा। उसे लगा बला टली।
जब रमेश वापस अंदर आया, तो नज़ारा बदल चुका था।
सेंटर टेबल पर विदेशी शराब (Imported Scotch) की एक बोतल रखी थी, जिसका लेबल चमक रहा था। रमेश ने ऐसी शराब सिर्फ़ फिल्मों में देखी थी या बड़े ठेकेदारों की पार्टियों में दूर से।
बंटी, जो पास ही खड़ा था, अपने स्कूटर की चाबी घुमा रहा था, इस उम्मीद में कि पापा पूछेंगे।
“पापा, स्कूटर…” बंटी ने कोशिश की।
लेकिन रमेश ने उसे देखा तक नहीं। उसकी आँखें तो सुनैना के मॉडर्न गाउन और उस टेबल पर रखी महंगी बोतल पर फिक्स थीं।
“हाँ-हाँ, बाद में…” रमेश ने हाथ के इशारे से बंटी को मक्खी की तरह हटा दिया। बंटी का चेहरा उतर गया, और वह कोने में जाकर बैठ गया।
विक्रम ने रमेश को सोफे पर बैठने का इशारा किया।
“आइये रमेश जी, शुरू करते हैं,” विक्रम ने बोतल उठाई।
रमेश संकोच में था। “सर, ये तो बहुत महंगी होगी…”
विक्रम हंसा। उसकी हंसी में एक भारीपन था। “महंगी-सस्ती क्या होती है रमेश जी? शौक़ बड़ी चीज़ है। और आपके जैसे ‘खास’ मेहमान के लिए तो यह भी कम है।”
विक्रम ने दो क्रिस्टल के गिलासों में शराब उंडेली। महक ही बता रही थी कि नशा कितना शानदार होगा।
रमेश ने गिलास उठाया, लेकिन विक्रम के सामने वह बहुत छोटा (Inferior) महसूस कर रहा था।
विक्रम का रुतबा, उसका घर, उसकी शराब—सब कुछ रमेश की औकात से बाहर था।
तभी विक्रम ने माहौल बदला। उसने रमेश की आँखों में देखा।
“वैसे रमेश जी, मैंने आपके कारनामे बहुत सुने हैं,” विक्रम ने संजीदगी से कहा।
रमेश का गिलास होठों तक जाते-जाते रुक गया। वह अंदर से डर गया।
‘कारनामे? कहीं रिश्वत और घपले की बात तो नहीं कर रहे?’
“जी… कौन से कारनामे सर?” रमेश ने डरते हुए पूछा।
विक्रम मुस्कुराया। “अरे वही… वो किशनगंज वाला रोड प्रोजेक्ट। सुना है वहां सालों से लफड़ा चल रहा था, कोई इंजीनियर हाथ डालने को तैयार नहीं था। और आपने? मात्र एक हफ्ते में पूरा मामला क्लियर करवा दिया।”
रमेश हैरान रह गया।
सच्चाई यह थी कि रमेश ने वहां के लोकल गुंडों को पैसे खिलाकर और शमशेर की मदद से डरा-धमकाकर काम करवाया था। वह उसका सबसे ‘करप्ट’ (Corrupt) काम था।
लेकिन विक्रम उसे ‘काबिलियत’ बता रहा था।
“जी… वो तो…” रमेश फूला नहीं समाया। “बस सर, थोड़ा मैनेजमेंट करना पड़ता है। काम निकलवाना आना चाहिए।”
“यही तो कला है!” विक्रम ने रमेश के घुटने पर हाथ मारा। “आजकल किताब पढ़ने वाले इंजीनियर बहुत हैं, लेकिन ‘ग्राउंड’ पर काम कराने वाले जिगरे वाले मर्द कम हैं। ऐसा कारनामा करने वाला कोई पैदा नहीं हुआ आज तक।”
अपनी झूठी तारीफ सुनकर रमेश चने के झाड़ पर चढ़ने लगा। उसका डर गायब हो गया और उसकी जगह अहंकार ने ले ली।
उसने एक बड़ा घूँट भरा। विदेशी शराब गले से नीचे उतरते ही उसे लगा कि वह विक्रम के बराबर का है।
“सच कहूँ रमेश जी,” विक्रम ने गिलास घुमाते हुए कहा, “मैं तो इस कुर्सी पर बंध गया हूँ। असली पॉवर तो आपके पास है। कोई जवाबदेही नहीं, अपनी मर्जी के मालिक।”
फिर विक्रम ने अपनी आवाज़ धीमी की और कनखियों से कामिनी (जो सुनैना के साथ बात कर रही थी) की तरफ देखा।
“और ऊपर से… कामिनी जी जैसी बीवी। सादगी और खूबसूरती की मूरत। सच में… मान गए गुरु। बहुत लकी हैं आप।”
रमेश का सीना 56 इंच का हो गया।
उसे लगा कि कमिश्नर साहब उससे जल रहे हैं। उसे अपनी बीवी और अपनी नौकरी दोनों पर गुमान होने लगा (जिनकी वह कल तक कद्र नहीं करता था)।
“अरे सर, बस आप लोगों की दुआ है,” रमेश ने दूसरा पेग भी गटक लिया।
नशा चढ़ने लगा था।
माहौल जम ही रहा था कि तभी विक्रम का सिक्योर फ़ोन बजा।
उसने स्क्रीन देखी और उसके चेहरे के भाव बदल गए। प्रेमी और मेज़बान का चेहरा गायब हो गया, और एक सख्त पुलिस कमिश्नर का चेहरा सामने आ गया।
“सॉरी,” विक्रम ने खड़े होते हुए कहा। “अर्जेंट कॉल है। शहर के बाहर एक बड़े ड्रग रैकेट की सूचना मिली है। मुझे अभी निकलना होगा।”
कामिनी का चेहरा उतर गया। वह विक्रम की तरफ खिंच रही थी, लेकिन विक्रम के लिए वर्दी पहले थी।
विक्रम ने अपना जैकेट ठीक किया और कामिनी की आँखों में देखा।
“माफ़ कीजियेगा कामिनी जी,” विक्रम ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा। “मन तो नहीं है जाने का… पर ड्यूटी। आपसे फिर मुलाक़ात होगी, तसल्ली से।”
उसकी आँखों में वादा था। वह मुड़ा और तेज़ कदमों से बाहर निकल गया।
इधर, विक्रम के जाते ही रमेश को खुजली होने लगी।
शमशेर के लगातार फ़ोन आ रहे थे। और सबसे बड़ी बात… विक्रम की वो विदेशी शराब रमेश की ‘प्यास’ नहीं बुझा पा रही थी।
उसे तो सस्ती दारू और वाहियात दोस्त शमशेर का साथ चाहिए था, ऊपर से कल रात कादर खान के ढाबे का मटन का चस्का लगा था, क्यूंकि उसके हिसाब से उसे वो ताकत मिल गई थी जिसने कामिनी की हालात भी ख़राब कर दी थी.
उसे वो मटन सूप चाहिए था जो उसे अंदर से जानवर बना दे। यहाँ इस ‘सभ्य’ माहौल में उसका दम घुट रहा था।
“वो… सुनैना जी,” रमेश ने हड़बड़ाते हुए बहाना बनाया। “मुझे भी निकलना पड़ेगा। साइट पर कुछ लफड़ा हो गया है। लेबर गिर गई है।”
कामिनी समझ गई कि रमेश झूठ बोल रहा है। वह जानती थी कि वह कहाँ जा रहा है—उसी गटर में।
“जाओ…” कामिनी ने मन ही मन कहा। “अच्छा है, घर खाली रहेगा।”
रमेश ने आव देखा न ताव, 5 मिनट में वहाँ से रफूचक्कर हो गया। बाहर शमशेर अपनी जीप स्टार्ट किये खड़ा था।
अब घर में सन्नाटा था।
ड्राइंग रूम में चार लोग बचे थे।
दो खूबसूरत, अधेड़ उम्र की औरतें— कामिनी और सुनैना।
बंटी रवि भी गार्डन की तरफ चल दिए, लड़को को भी स्पेस चाहिए होता है.
हालांकि यहाँ दो खूबसूरत यौवन से भरपूर औरते बैठी थी, लेकिन एक झिझक भी थी.
सुनैना ने दरवाज़े की तरफ देखा और फिर एक गहरी सांस छोड़ी।
“चलो, बोरिंग लोग गए,” सुनैना ने मुस्कुराते हुए कहा। उसने अपना वाइन का गिलास उठाया।”
“रवि आपसे बहुत लगाव रखता है कामिनी जी, आप को देख के ही ख़ुश ही जाता है”
सुनैना ने कामिनी के कंधे पर हाथ रख कहाँ.
कामिनी सकपका गई उसकी बातो से.
सुनैना की बात सुनकर कामिनी सकपका गई।
“ल… लगाव?” कामिनी ने हकलाते हुए पूछा।
सुनैना ने अपनी वाइन का एक घूंट भरा और एक कातिलाना मुस्कान दी।
“हाँ… लगाव,” सुनैना ने अपनी आँखों को नचाते हुए कहा। “मेरा बेटा रवि बहुत शर्मीला है, लेकिन आपकी बातें बहुत करता है। कहता है कामिनी आंटी बहुत ‘सिंपल और स्वीट’ हैं। आज के ज़माने में ऐसी औरतें कहाँ मिलती हैं?”
“वो… वो… थैंक्स यू ” कामिनी बुरी तरह सकपका गई.
एक अजीब सी ठंडी शांति छा गई, जैसे दोनों औरते मन ही मन एक दूसरे को समझ रही हो, एक दूसरे की सुंदरता की तारीफ कर रही हो.
ड्राइंग रूम के उस ठंडे, मखमली माहौल में अब सिर्फ़ दो औरतें थीं।
कामिनी और सुनैना।
सुनैना ने अपना आधा खाली वाइन का गिलास टेबल पर रख दिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—नशे की और हवस की।
वह सोफे पर खिसकते हुए कामिनी के बिल्कुल करीब
आ गई। इतना करीब कि उनकी जांघें आपस में सट गईं।
सुनैना का हाथ, जो कामिनी की जांघ पर रखा था, अब धीरे-धीरे ऊपर की ओर, उसकी साड़ी की सिलवटों को सहलाने लगा।
“कामिनी जी…” सुनैना ने फुसफुसाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक सम्मोहन था। “आप इतनी हसीन हैं, फिर भी आप अपनी इच्छाओं को दबाकर क्यों रखती हैं?”
कामिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसकी योनि में, जहाँ रघु ने कल रात आग लगाई थी, आज सुबह से एक ‘खालीपन’ था। वह तड़प रही थी। और सुनैना का यह रेशमी स्पर्श उस तड़प को और बढ़ा रहा था।
“स… सुनैना जी…” कामिनी की आवाज़ कांप रही थी। “ये… ये क्या कर रही है आप?.” कामिनी का जिस्म पसीना छोड़ने लगा, ऐसा अजीब अनुभव उसने कभी नहीं किया था.
लेकिन कामिनी ने सुनैना का हाथ हटाया नहीं। उसे वह स्पर्श अच्छा लग रहा था।
मर्दों के हाथ भारी और सख्त होते थे, जो नोचते थे। लेकिन सुनैना का हाथ पानी जैसा तरल और कोमल था, जो प्यार कर रहा था।
सुनैना कामिनी के चेहरे के और करीब आ गई।
कामिनी को सुनैना के मुंह से आती महंगी वाइन की खट्टी-मीठी खुशबू आ रही थी। यह खुशबू कामिनी के नथुनों से होकर सीधे उसके दिमाग पर असर कर रही थी। वह मदहोश हो रही थी।
सुनैना ने अपनी उंगलियां कामिनी के गालों पर फेरीं, फिर उसकी ठोड़ी (Chin) को धीरे से ऊपर उठाया।
“ठीक और गलत तो समाज तय करता है कामिनी,” सुनैना ने उसकी आँखों में डूबते हुए कहा।
“लेकिन सुख… सुख तो हमारा शरीर तय करता है।”
सुनैना की सांसें कामिनी के होठों पर टकरा रही थीं।
“हमें अपनी प्यास बुझाने के लिए मर्दों के भरोसे क्यों बैठना चाहिए? क्या सिर्फ़ वो ही हमें खुश कर सकते हैं?”
सुनैना ने अपना चेहरा कामिनी की गर्दन के पास ले जाकर, वहां एक गहरी सांस ली।
“औरत अपने आप में सम्पूर्ण (Complete) है कामिनी… भला कोई मर्द एक औरत के शरीर के राज़ को समझ सकता है क्या? वो सिर्फ़ लेना जानते हैं… हम देना जानती हैं।”
कामिनी के दिमाग के सारे तर्क पिघल गए।
सुनैना सही कह रही थी। रमेश ने उसे कभी नहीं समझा।
लेकिन सुनैना… वह उसे एक इंसान, एक औरत की तरह महसूस कर रही थी।
कामिनी की आँखें अपने आप बंद हो गईं। उसके होंठ कांपने लगे। वह इंतज़ार करने लगी।
सुनैना ने कामिनी की इस मूक स्वीकृति को पढ़ लिया।
वह झुकी।
और अपने गीले, वाइन के स्वाद से भरे होंठ… कामिनी के कांपते हुए होठों पर रख दिए।
“म्मम्म…..”
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकली।
यह उसके जीवन का पहला अनुभव था। उसने कभी किसी औरत को किस नहीं किया था।
सुनैना के होंठ बहुत नरम थे, मलाई जैसे।
कामिनी हैरान थी, लेकिन अगले ही पल, वह पिघल गई।
उसने विरोध नहीं किया, बल्कि उसने भी अपने होंठ खोल दिए।
दोनों की सांसें मिल गईं।
सुनैना ने धीरे से कामिनी के निचले होंठ को अपने दांतों और होठों के बीच दबाया और चूसा।
कामिनी के पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। उसे लगा जैसे उसके पेट में तितलियां उड़ रही हों।
यह किस (Kiss) आक्रामक नहीं था, यह मीठा और गहरा था।
कामिनी को वाइन का कड़वा स्वाद और सुनैना की लार का मीठा स्वाद एक साथ महसूस हुआ।
“उफ्फ्फ…” कामिनी ने अपना हाथ उठाया और अनजाने में ही सुनैना के कंधों पर रख दिया, उसे अपने और करीब खींचने के लिए।
वह काम-वासना में तड़प रही थी, और सुनैना उसे बूंद-बूंद करके पी रही थी।
सुनैना ने अपने होंठ अलग किए, लेकिन चेहरा अभी भी पास था। दोनों की आँखें बंद थीं, सांसें भारी थीं।
“महसूस हुआ?” सुनैना ने कामिनी के होठों पर अपनी उंगली फेरते हुए पूछा। “यह है हम औरतों की ताकत…
औरते बिना मर्द के भी बहुत कुछ है ”
सुनैना का ज्ञान बहुत गहरा था, औरत के वजूद पर खड़ा था.
कामिनी की आँखें खुलीं। उनमें अब शर्म नहीं थी, बल्कि एक नई भूख थी।
वह हैरान थी कि उसे एक औरत के साथ इतना अच्छा लगा, ये तो कुछ अलग ही था, ये तो उसने कभी सोचा ही नहीं था, असंभव चीज उसने अभी अभी महसूस की थी.
उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे, वो जड़ हो गई थी, एक अजीब सी रूहानियत ने उसके जिस्म को पकड़ लिया था.
उसने अपनी जीभ से अपने गीले होठों को चाटा—वहाँ अभी भी सुनैना की वाइन का स्वाद बाकी था।
तभी बाहर गार्डन से बंटी के स्कूटर स्टार्ट करने की आवाज़ आई।
दोनों एकदम से अलग हो गईं, लेकिन आँखों का संपर्क नहीं टूटा।
सुनैना मुस्कुराई।
जवाब मे कामिनी भी मुस्कुरा दी… शायद कुछ भावनाओं के लिए शब्द नहीं होते, किसी चीज को बस यूँ ही स्वीकार कर किया जाता है, बिना बोले.
सिर्फ महसूस कर के.
कामिनी भी इसे महसूस कर रही थी, एक अनोखे, अजीब से प्यार की तरफ खिंच रही थी,
नये अध्याय की तरफ बढ़ रही थी.
“चलिए खाना खाते है ” सुनैना कामिनी की जांघो को मसलती खड़ी हो गई.
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शहर के बाहर, सुनसान हाइवे के किनारे, कादर खान का ढाबा अपनी बदनामी और ‘खास’ मटन के लिए मशहूर था।
हवा में जलते हुए कोयले, सस्ते मटन और देसी शराब की मिली-जुली गंध थी।
एक खटिया पर रमेश और शमशेर बैठे थे।
रमेश ने प्लास्टिक के गिलास में सस्ती व्हिस्की भरी और एक ही सांस में गटक गया। विक्रम के घर की वो ‘ब्लू लेबल’ उसे वो किक नहीं दे पाई थी जो यहाँ की ‘संतरानुमा’ शराब ने दी।
शमशेर, जो पहले से टल्ली था, ने एक गंदी हंसी हंसा.
“अब बता ना साले…” शमशेर ने अपनी लाल आँखें नचाईं। “कैसी लग रही थी वो ‘रंडी’ (सुनैना)? मुझे बिना बताये पहुंच गया था साले.
रमेश ने गिलास मेज पर पटका। “अबे साले, चुप कर। उसका पति (विक्रम) वहीं बैठा था। तेरा बाप है वो आदमी,। मेरी तो फटी पड़ी थी वहां। घंटा कुछ कर पाता मैं।”
“अबे ऐसे कितने कमिश्नर आये और गए, और भूल मत इस कमिश्नर की बीवी को चोदा है मैंने, तु पड़ा हुआ था नशे मे हाहाहाहाहा….” शमशेर अपनी मर्दानगी पर चौड़ा हो रहा था.
“अब तो उसे चोदने का और मजा आएगा, जब जब चोदुँगा उस अड़ियल कमिश्नर विक्रम की याद आएगी मुझे हेहेहेहेहे…. गुटूक गटक…. शमशेर ने एक पेग और खींच लिया.
रमेश ने झुंझलाते हुए आवाज़ लगाई, “ओए कादर! मटन सूप ला बे! आज फिर शेर बनना है मुझे।”
रमेश को शमशेर की हसीं झेली नहीं जा रही थी.
अभी कादर खान ने “जी मालिक” कहा ही था कि…
अचानक रात के सन्नाटे को चीरते हुए सायरनों की आवाज़ गूंज उठी।
“सांय… सांय… सांय…!!”
एक नहीं, बल्कि चार-पाँच पुलिस जीपों के सायरन एक साथ बजने लगे।
ढाबे पर अफरा-तफरी मच गई। जो शराबी मटन चबा रहे थे, वो हड्डियां फेंककर भागने लगे। किसी का गिलास गिरा, किसी की खटिया पलटी।
शमशेर, जो खुद पुलिसवाला था, हड़बड़ा गया।
“ये किसकी रेड है बे? मुझे तो खबर ही नहीं थी!” शमशेर चिल्लाया।
रमेश की नशा एक पल में हिरन हो गया।
तभी ढाबे के अंदर एक हवलदार (Constable) बदहवास सा भागता हुआ आया। उसका चेहरा पसीने से तर था।
उसने शमशेर को देखा और ठिठक गया।
“अरे शमशेर साहब! आपको कितना फोन किया, लगा ही नहीं?” हवलदार की सांस फूल रही थी।
“साहब भागो! जल्दी निकलो यहाँ से! कमिश्नर विक्रम सिंह खुद लीड कर रहे हैं। ड्रग्स की टिप मिली है उन्हें।”
“विक्रम सिंह…”
यह नाम सुनते ही रमेश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
‘अरे बाप रे! वो अभी-अभी तो मेरे साथ व्हिस्की पी रहा था … इतनी जल्दी यहाँ? मतलब वो जो फ़ोन आया था… वो इसी रेड के लिए था?’
रमेश का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
अगर विक्रम ने उसे यहाँ, इस गंदे ढाबे पर, शमशेर के साथ देख लिया… तो उसकी ‘इज्जत’ का क्या होगा?
सुनैना से रिश्ता तो दूर, वो जेल की हवा खाएगा और समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा।
“शमशेर… भाई कुछ कर…” रमेश गिड़गिड़ाया, “मेरी नौकरी, मेरी बीवी… सब ख़त्म हो जाएगा अगर विक्रम ने मुझे देख लिया।”
शमशेर भी डरा हुआ था। “अबे चुप कर! सोचने दे!”
तभी किचन के पीछे से कादर खान एक पुरानी लोहे की पेटी (Box) सीने से चिपकाए भागता हुआ आया।
“मालिक… मालिक…” कादर का गुंडों जैसा चेहरा डर से भीगा हुआ था। “आज तो मैं गया जान से! ये पेटी…”
शमशेर ने पेटी देखी। “इसमें क्या है बे?”
“वही है जिसके लिए ये रेड पड़ी है साहब…” कादर ने हांफते हुए कहा। “असली माल (Drugs)। करीब 50 लाख का माल पड़ा हुआ है,”
“50 लाख…” रमेश की आँखें फैल गईं।
रमेश की हालत पतली हो गई। “ड्रग्स? अरे मरवाओगे क्या?”
“साब अगले सप्ताह सौदा होना था,” कादर शमशेर को देख मिमियाया जैसे शमशेर की ही गलती हो.
“अबे मुझे भी नहीं पता था, इस रेड के बारे मे” शमशेर भी कंफ्यूज था, क्या करे… यहाँ मौजूद होना भी उसकी नौकरी के लिए खतरा था.
तभी उस वफादार हवलदार ने इशारा किया। “साहब, सामने से मत जाओ, पूरा घेरा है। पीछे चलिए… मैंने आपका नमक खाया है, आंच नहीं आने दूंगा।”
चारों—शमशेर, रमेश, कादर (पेटी के साथ) और हवलदार—ढाबे के पिछले हिस्से की तरफ दौड़े।
रसोड़े के महकते मटन और जमीन पर पड़े बर्तनो से होते हुए वे उस बदबूदार बाथरूम के पास पहुँचे जिसकी दीवार टूटी हुई थी।
बाहर सायरन की आवाज़ें अब कान फोड़ रही थीं।
“कूद जाओ!” हवलदार ने दीवार की तरफ इशारा किया।
“पीछे जंगल है, जीप वहां नहीं आ पाएगी।”
रमेश ने अपनी पैंट संभाली और किसी तरह दीवार फांद गया। पीछे-पीछे शमशेर और कादर खान।
वे तीनों जंगल की झाड़ियों में गिरते-पड़ते भागने लगे। कांटे चुभ रहे थे, कीचड़ उछल रहा था। रमेश का महंगा सूट और ‘सभ्य’ दिखावा अब कीचड़ में मिल चुका था।
थोड़ी दूर जाकर वे रुके। तीनों की सांसें धोकनी की तरह चल रही थीं।
रमेश ने कादर के हाथ में वो पेटी देखी।
“फेंक इसे!” रमेश चिल्लाया। “ये मुसीबत की जड़ है! अगर ये हमारे पास मिली तो विक्रम एनकाउंटर कर देगा!”
“पागल हो गया है क्या?” शमशेर ने रमेश का गिरेबान पकड़ लिया। “50 लाख का माल है इसमें! 50 लाख! साले गांड फट जाती है इतना रुपया कमाने मे। इसे फेंकेंगे नहीं।”
“तो अब क्या करें?” कादर खान रोने जैसा हो गया। “मेरा ढाबा गया, मेरा ठिकाना गया। अब कहाँ जाऊं इस माल को लेकर?”
शमशेर का दिमाग तेज़ी से चला। चलता भी क्यों नहीं, इन सब मे उसका कमीशन फिक्स था.
“कादर…” शमशेर ने अपनी जीप की चाबी निकाली। “तुझे छुपना होगा। 5-6 दिन के लिए अंडरग्राउंड हो जा। जब तक मैं मामला शांत नहीं करता।”
“पर जाऊं कहाँ साहब? अब तो मेरा अड्डा पुलिस जानती ही है।”
शमशेर ने रमेश की तरफ देखा। एक कुटिल मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।
“रमेश के घर।”
रमेश उछल पड़ा। “क्या? मेरे घर? पागल हो गए हो? कामिनी है वहां, बंटी है… और वो विक्रम का पिल्ला मेरे बेटे का दोस्त है, कभी भी घर ले टपक पड़ता है,
“अबे तो वही सबसे सेफ जगह है!” शमशेर ने तर्क दिया।
वैसे भी 5,6 दिन की बात है, यहाँ कादर के ढाबे पे कुछ मिलेगा नहीं तो कोई दिक्कत ही नहीं है ना, ये पेटी तो इसके पास है.
“कमिश्नर सपने में भी नहीं सोचेगा कि ड्रग्स उस आदमी के घर में है जिसके साथ उसने शाम को दारू पी थी। चिराग तले अंधेरा, समझे?”
“पर… कामिनी…” रमेश हिचकिचाया।
“अबे क्या औरतों की तरह डर रहा है?” शमशेर ने रमेश की ‘मर्दानगी’ पर चोट की। “तू घर का मालिक है या वो?
वो तेरा बिना काम का शराबी नौकर रघु भी स्टोर रूम में पड़ा ही रहता है ना, वहां रखवा दे कादर को। बोल देना रघु का दोस्त है, मुसीबत में है। रघु तो वैसे भी शराबी है, दो बोत्तल फेंक के मार देना उसके मुँह पर.
इधर रघु का नाम सुनते ही कादर खान के कान खड़े हो गए, “अबे साला मतलब ये रमेश, उस मैडम का पति है जहाँ रघु रहता है, वाह री तकदीर ” कादर खान मंद ही मंद मुस्कुरा उठाया.
शमशेर की दोस्ती के आगे अब रमेश क्या कहता..
“ठीक है…” रमेश ने हार मान ली। “लेकिन सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए।”
शमशेर की जीप जंगल के दूसरे किनारे पर, एक कच्चे रास्ते पर खड़ी थी (क्योंकि वह पुलिस की जीप थी, इसलिए वहां खड़ी होने पर किसी को शक नहीं हुआ था)।
तीनों उसमें बैठे। कादर ने पेटी को अपनी टांगों के बीच दबा लिया।
शमशेर ने एक्सीलेटर दबाया और जीप अंधेरे को चीरती हुई शहर की तरफ दौड़ पड़ी।
पीछे ढाबे पर रेड चल रही थी, लेकिन ‘असली माल’ और ‘असली मुजरिम’ पुलिस की ही जीप में बैठकर शहर के सबसे ‘शरीफ’ इलाके की तरफ जा रहे थे।
रात का गहरा सन्नाटा था।
शमशेर की जीप रमेश के घर के पिछवाड़े वाले गेट पर आकर रुकी। हेडलाइट्स बंद थीं, ताकि किसी पड़ोसी का ध्यान न जाए।
जीप से तीन परछाइयां उतरीं—डरा हुआ रमेश, अकड़ा हुआ शमशेर, और पेटी छाती से चिपकाए कादर खान।
वे चोरों की तरह दबे पांव पिछवाड़े से स्टोर रूम की तरफ बढ़े।
स्टोर रूम का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। अंदर एक मद्धम बल्ब जल रहा था।
रघु अपनी खटिया पर लेटा बीड़ी पी रहा था। दिन मे कामिनी की मालिश फिर गार्डन की घाँस कटाई के बाद वह सुस्ता रहा था।
अचानक तीन लोगों को अंदर आते देख वह चौंककर उठ बैठा।
“अरे… मालिक? आप?” रमेश को देख सकपका गया, लेकिन जैसे ही रघु की नज़र कादर खान पर गई। “और ये…”
इससे पहले कि रघु कुछ बोलता, शमशेर ने आगे बढ़कर रघु का गिरेबान पकड़ लिया।
“अबे ओये बेवड़े! आवाज़ नीचे!” शमशेर गुर्राया। “कान खोलकर सुन ले। यह कादर खान है, मेरा पुराना पट्ठा, यह कुछ दिन यहीं रहेगा, इसी कोठरी में तेरे साथ।”
शमशेर ने अपनी लाल आँखें रघु के चेहरे के पास कीं।
“और सुन… मालकिन (कामिनी) को भनक भी नहीं लगनी चाहिए कि यह कौन है और यहाँ क्यों है। अगर किसी ने पूछा, तो बोल देना तेरे गांव का कोई रिश्तेदार है, इलाज करवाने आया है। समझ गया?”
रमेश, जो पीछे खड़ा पसीना पोंछ रहा था, उसने अपनी जेब से बटुआ निकाला।
उसने एक 200 का नोट निकाला और रघु की तरफ बढ़ा दिया।
“ये रख… ठर्रा लगा लेना,” रमेश ने कांपती आवाज़ में कहा। “और जो शमशेर भाई ने कहा, वही करना। जुबान बंद रखना।”
रघु ने वो नोट ले लिया और अपनी बनियान की जेब में ठूंस लिया। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, बस एक आज्ञाकारी नौकर का मुखौटा था।
“जी मालिक… जैसा आप कहें।”
शमशेर ने राहत की सांस ली। “ठीक है रमेश, मैं निकलता हूँ। मैं थाने जाकर देखता हूँ कि ये विक्रम का क्या मामला है।”
शमशेर अपनी जीप लेकर अंधेरे में गायब हो गया।
रमेश ने एक बार नफरत और डर से उस पेटी को देखा, फिर अपने घर के पिछले दरवाज़े से अंदर चला गया।अपने बेडरूम में…
रमेश अपने आलीशान बेडरूम में आया और धम्म से सोफे पर गिर पड़ा।
उसने टाई खींचकर फेंकी और बार कैबिनेट से व्हिस्की की बोतल निकाल ली।
गिलास में शराब उड़ेलते हुए वह बड़बड़ाया।
“साला दिन ही पनौती है! न वहां सुनैना को जी भरकर देख पाया, न ढंग से वो विदेशी दारू पी पाया… और न ही कादर के ढाबे का मटन नसीब हुआ। ऊपर से ये पुलिस और ड्रग्स का लफड़ा।”
रमेश ने एक बड़ा घूंट भरा। शराब गले को जलाती हुई नीचे उतरी।
उसे बहुत छोटा और लाचार महसूस हो रहा था। उसे लगा कि वह सिर्फ़ भाग रहा है, लेकिन मिल कुछ नहीं रहा.
वही स्टोर रूम में…
दरवाज़ा बंद हो चुका था।
स्टोर रूम में अब सिर्फ़ दो लोग थे— रघु और कादर खान।
पेटी कोने में पड़ी थी।
रघु ने कादर को ऊपर से नीचे तक देखा। कादर की हालत ख़राब थी, कपड़े कीचड़ में सने थे और चेहरे पर डर था।
“अबे ये सब क्या है?” रघु ने अपनी बीड़ी का कश लेते हुए पूछा। “तू यहाँ कैसे? और मालिक तुझे ऐसे चोरों की तरह क्यों लाए?”
कादर खान ने एक गहरी सांस छोड़ी और खटिया पर बैठ गया।
“क्या बताऊँ रघु भाई…” कादर ने सारी बात सच-सच उगल दी। पुलिस की रेड, 50 लाख का माल, और रमेश का डर।
सुनते-सुनते रघु के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई।
“कुदरत का निज़ाम देख कादर…” रघु हंसा। “एक वक़्त था जब मैं तेरे ढाबे पर पड़ा रहता था, तेरे रहमों करम पर था, तेरे ढाबे पर काम करता था। मेरा कोई ठिकाना नहीं था।”
रघु ने कादर के कंधे पर हाथ रखा।
“और आज? आज तू मेरे ठिकाने पर छुपा हुआ है। आज तू बेघर है और मैं तेरा सहारा हूँ। किस्मत बहुत अजीब चीज़ है भाई…”
कादर खान भी फीका सा हंसा। “सही कह रहा है यार। वक़्त का पहिया घूम गया।”
फिर कादर की नज़र छत की तरफ गई। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ गई।
“वैसे रघु…” कादर ने कुटिलता से पूछा, “तेरी मालकिन… जो हॉस्पिटल मे मिली थी… यहीं रहती हैं ना?”
रघु ने कादर की टोन पकड़ ली।
“हाँ…” रघु ने बीड़ी बुझाई। “क्यों?”
“कुछ नहीं…” कादर ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। “उस दिन से इच्छा थी तेरी मैडम को जी भर मे देखने की, किस्मत देख आज मै उसी के घर आ गया।”
स्टोर रूम में दोनों के ठहाके गूंजने लगे।
*****************
रात के 11:30 बज रहे थे।
सन्नाटे को चीरती हुई एक स्कूटर की आवाज़ आई।
“भ्रर्रर्र…!!”
रमेश, जो अभी दूसरा पेग बना ही रहा था, खिड़की के पास गया और पर्दा हटाकर बहार झांका।
बंटी अपना नया स्कूटर गेट के अंदर ला रहा था।
और पीछे बैठी थी— कामिनी।
हवा से कामिनी के बाल बिखरे हुए थे। उसका चेहरा स्ट्रीट लाइट की रोशनी में दमक रहा था। सुनैना के घर की ‘शाम’ उसके साथ बिताये ‘पल’… उन सबने कामिनी के चेहरे पर एक अजीब सा निखार (Glow) ला दिया था।
कामिनी स्कूटर से उतरी, अपनी साड़ी ठीक की और बंटी के साथ अंदर आई।
जैसे ही वह बेडरूम में दाखिल हुई, उसने देखा रमेश हाथ में गिलास लिए, उदास और परेशान सा सोफे पर बैठा है।
कामिनी की चाल में एक मस्ती थी।
“अरे?” कामिनी ने अपना पर्स टेबल पर रखा और रमेश को एक तीखी नज़र से देखा।
“जल्दी आ गए आप? साइट का काम इतनी जल्दी निपट गया?”
उसकी आवाज़ में एक व्यंग्य था, जिसे रमेश अपने नशे और डर के कारण समझ नहीं पाया।
रमेश ने गिलास टेबल पर रखा। “हाँ… बस हो गया काम। तुम बताओ, कैसी रही पार्टी?”
कामिनी मुस्कुराई। एक ऐसी मुस्कान जिसमें कई राज़ छिपे थे।
बेडरूम में रात की रानी का इत्र महक रहा था, लेकिन हवा में एक अजीब सा भारीपन था।
कामिनी ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी थी। शीशे में अपनी परछाई को देखते हुए, उसने अपने कान की बालियां (Earrings) उतारना शुरू किया।
उसकी गर्दन मुड़ी हुई थी, जिससे उसकी सुराहीदार गर्दन और उस पर बने वो नीले निशान शीशे में साफ़ चमक रहे थे।
तभी, रमेश सोफे से उठा और लड़खड़ाते हुए कामिनी के पीछे आया।
उसने अपने दोनों हाथ कामिनी की कमर पर रख दिए और अपना चेहरा उसकी गर्दन में छुपाने की कोशिश की।
“कामिनी…” रमेश ने नशे में भारी आवाज़ में पुकारा।
कामिनी का शरीर एक पल के लिए stiff (सख्त) हो गया।
उसे रमेश का स्पर्श बेजान लगा।
कल रात रघु की पकड़ में जो लोहे जैसी सख्ती थी… उसके मुकाबले रमेश का स्पर्श किसी मरे हुए जानवर जैसा ठंडा और ढीला था।
रमेश ने अपने शरीर को कामिनी के पिछवाड़े से सटाया, लेकिन उसे खुद महसूस हुआ कि नीचे कुछ नहीं हो रहा।
उसका औज़ार सुस्त पड़ा था।
रमेश के दिमाग में घंटी बजी— ‘धत् तेरी की! आज कादर का मटन सूप नहीं पिया ना… इसलिए करंट नहीं आ रहा।’
रमेश को यह भ्रम (Delusion) था कि उसकी मर्दानगी उसके अंदर नहीं, बल्कि कादर खान के उस जादुई सूप और शराब में है। आज वो ‘ईंधन’ नहीं मिला, तो इंजन स्टार्ट ही नहीं हो रहा था।
उसने कोशिश की, कामिनी की खुशबू ली, लेकिन उसका शरीर साथ नहीं दे रहा था। वह अंदर से खोखला महसूस कर रहा था।
हताश होकर, रमेश ने अपना सिर कामिनी के कंधे पर रख दिया।
“सॉरी कामिनी…” रमेश ने धीमी, अपराधी आवाज़ में कहा। “वो… कल रात के लिए।”
कामिनी ने अपनी बाली टेबल पर रखी और शीशे में रमेश को देखा। “किसलिए?”
“वो… कल रात मैंने कुछ ज्यादा ही कर दिया था ना…” रमेश ने झिझकते हुए कहा, उस ‘तूफ़ान’ का क्रेडिट लेते हुए जो असल में रघु ने बरपाया था। “तुम्हें दर्द दिया… जानवर बन गया था मैं। माफ़ कर देना, वो नशे मे थोड़ा ज्यादा हो गया…”
“कल रात…”
रमेश के मुंह से यह शब्द सुनते ही कामिनी के बदन में आग लग गई।
उसके दिमाग में फ़्लैशबैक चल गया—रघु का वो पसीने से लतपत बदन, वो धक्के, वो दर्द, और अंत में वो चरम सुख।
रमेश की वो ‘झूठी माफ़ी’ कामिनी के लिए ‘असली उत्तेजना’ का काम कर गई।
उसकी योनि, जो आज शाम सुनैना के स्पर्श से पहले ही गीली थी, अब रघु की याद से निचुड़ने लगी।
रमेश को लगा कामिनी चुप है क्योंकि वह नाराज़ है।
“अब सो जाते हैं… बहुत थकान है,” रमेश ने अपनी इज़्ज़त बचाई और कामिनी से दूर हो गया।
वह जाकर बेड पर धम्म से गिर गया और चादर तान ली। कुछ ही पलों में उसके नशे वाले खर्राटे गूंजने लगे।
कामिनी वहीं खड़ी रही।
अब कमरे में सिर्फ़ वो जाग रही थी… और उसकी जागी हुई प्यास।
उसने अपनी साड़ी खोली। रेशमी साड़ी जब उसके बदन से सरक कर नीचे गिरी, तो उसे लगा जैसे सुनैना के हाथ उसके शरीर से नीचे सरक रहे हों।
आज शाम… सुनैना के होंठ…
कामिनी ने अपनी उंगलियां अपने होंठों पर फेरीं।
उसे अभी भी वहां वाइन का स्वाद और सुनैना की कोमलता महसूस हो रही थी।
उसने अपना पेटीकोट और ब्लाउज़ उतारा और एक हल्का साटन का गाउन पहन लिया।
गाउन पहनते वक़्त उसका हाथ अपने स्तनों से टकराया।
उसे एक अजीब सी सिहरन हुई।
‘यह क्या हो रहा है मुझे?’ कामिनी ने खुद को आईने में देखा। उसकी आँखें नशीली हो रही थीं, गाल तमतमा रहे थे।
‘रघु के बारे में सोचती हूँ तो आग लगती है… लेकिन सुनैना के बारे में सोचती हूँ तो… बर्फ जैसी मीठी पिघलन होती है।’
कामिनी हैरान थी।
वह एक औरत होकर एक औरत के स्पर्श के लिए मचल रही थी।
सुनैना ने कहा था— “हम औरतें एक-दूसरे को बेहतर समझती हैं।”
कामिनी को अब उस बात का मतलब समझ आ रहा था। उसके अंदर की दबी हुई कामुकता अब हर दिशा से बाहर निकल रही थी—चाहे वो मर्द हो या औरत (सुनैना)।
वह धीरे से जाकर रमेश के बगल में लेट गई, लेकिन उसका मुंह दूसरी तरफ था।
उसकी जांघें आपस में रगड़ खा रही थीं।
***************
स्टोर रूम में…
कादर खान ने अपनी कीचड़ से सनी शर्ट को देखा और नाक सिकोड़ी।
“यार, पूरा कीचड़ से सना हुआ हूँ,” कादर ने रघु की तरफ देखा जो अपनी खटिया पर आँखें मूंदे पड़ा था। “नहाने का जुगाड़ है क्या यहाँ?”
रघु ने नींद में ही, बिना आँखें खोले, हाथ से इशारा किया।
“हाँ… वो किचन के सामने गार्डन में अमरूद का पेड़ दिख रहा है ना… वहीं नीचे नल लगा है। जा नहा ले…”
इतना बोलकर रघु ने करवट ली और अगले ही पल उसके खर्राटे गूंजने लगे।
कादर खड़ा का खड़ा रह गया।
“अरे सुन बे रघु… सुन तो…” कादर ने उसे टटोला, लेकिन रघु अब ‘बेहोशी’ की दुनिया में था।
“साला दारू पीने वालों से इसीलिए चिढ़ है मुझे,” कादर बड़बड़ाया। “होश ही नहीं रहता।”
कादर ने आस-पास नज़र दौड़ाई।
उसकी नज़र खूंटी पर टंगी एक पॉलीथिन पर पड़ी। उसने उसे खोला।
अंदर एक नया टी-शर्ट और पाजामा रखा था। वही कपड़े जो कामिनी परसो बाज़ार से रघु के लिए लाई थी, जिनमे से एक रघु ने अभी तक पहना नहीं था।
“चल, तेरा माल मेरा माल,” कादर ने कपड़े निकाले और कंधे पर डाल लिए।
कादर दबे पांव स्टोर रूम से बाहर निकला।
बगीचे में रात का गहरा सन्नाटा था। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।
कादर अमरूद के पेड़ के पास उस नल की तरफ बढ़ा।
उसने नल घुमाया। पानी की ठंडी धार निकल पड़ी.
उसने एक प्लास्टिक की बाल्टी भरी।
फिर उसने अपने कीचड़ सने कपड़े उतारने शुरू किए।
कुर्ता… पाजामा… और अंत में अपना मैला कच्छा।
कादर खान खुले आसमान के नीचे सम्पूर्ण नंगा खड़ा था।
उसने मग्गा भरा और पानी अपने जिस्म पर डाला।
“छाप… छाप… छप्पम…!!”
पानी की आवाज़ सन्नाटे में गूंजने लगी। कादर अपने मज़बूत हाथों से अपनी छाती और जांघों को रगड़-रगड़ कर साफ़ करने लगा।
बेडरूम में…
कामिनी बिस्तर पर करवटें बदल रही थी।
रमेश के खर्राटे उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे। उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था, बस जिस्म में एक अधूरी प्यास थी।
तभी… उसे बाहर से पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दी।
“छप… छप…”
कामिनी चौंक गई।
‘इतनी रात को कौन? रघु?’ कामिनी ने सोचा। ‘उसे क्या हुआ? इतनी रात को गार्डन मे क्या कर रहा है?’
जिज्ञासा और दबी हुई काम-वासना ने उसे बेचैन कर दिया।
उसने रमेश की तरफ देखा, वह घोड़े बेचकर सो रहा था।
कामिनी ने अपना साटन का गाउन ठीक किया और बिल्ली की तरह दबे पांव बिस्तर से उतरी।
वह कमरे से बाहर निकली और अंधेरे गलियारे से होती हुई किचन में आ गई।
किचन में अंधेरा था, लेकिन खिड़की से गार्डन साफ़ दिखता था।
कामिनी खिड़की के पास गई और जैसे ही उसने चिक (Blinds) के पीछे से बाहर झांका…
उसके होश उड़ गए।
उसका कलेजा मुंह को आ गया और सांस हलक में अटक गई।
गार्डन में लगे पीले बल्ब की मद्धम रौशनी में… रघु नहीं था।
वहाँ कादर खान खड़ा था।
कामिनी उसे पहचानती थी—अस्पताल वाला वो गुंडा।
लेकिन इस वक़्त उसके सामने जो नज़ारा था, उसने कामिनी के दिमाग को सुन्न कर दिया।
कादर का 6 फुट का भारी-भरकम, कसरती जिस्म पानी से भीगा हुआ चमक रहा था।
वह किसी ग्रीक देवता या किसी जंगली सांड जैसा लग रहा था।
उसकी चौड़ी छाती पर काले, घने बालों का जंगल था, जिसमें पानी की बूंदें अटकी हुई थीं और चमक रही थीं। उसके डोले (Biceps) और कंधे लोहे की तरह मज़बूत दिख रहे थे। रमेश का थुलथुला शरीर इसके सामने किसी बच्चे जैसा था।
लेकिन कामिनी की नज़रें फिसलते हुए नीचे गईं… और वहीं अटक गईं।
कादर की दोनों मज़बूत, खंभों जैसी जांघों के बीच… उसका विशाल पौरुष लटका हुआ था।
रात का सन्नाटा ऐसा था कि पत्ता भी गिरे तो शोर हो जाए।
लेकिन उस सन्नाटे को चीर रही थी—पानी गिरने की आवाज़।
“छप… छप… छपाक्…!!”
बेडरूम के अंधेरे से निकलकर कामिनी किचन में खड़ी थी।
उसका दिल पसलियां तोड़कर बाहर आने को बेताब था।
उसने कांपती उंगलियों से बांस की ‘चिक’ (Blind) को रत्ती भर सरकाया और अपनी एक आँख उस दरार पर जमा दी।
सामने गार्डन में लगे 100 वाट के पीले बल्ब की मद्धम और तिलिस्मी रौशनी में जो नज़ारा था, उसने कामिनी की रूह कपा दी।
वहाँ कादर खान खड़ा था।
सम्पूर्ण नंगा।
किसी आदिम युग के जानवर जैसा।
उसका 6 फुट का विशाल, काला, कसरती जिस्म पानी और पसीने में नहाया हुआ चमक रहा था।
कादर ने मग्गा भरकर पानी अपने सिर पर डाला।
पानी की धार उसके चेहरे से होती हुई, उसकी चौड़ी और गठीली छाती पर गिरी।
उसकी छाती पर काले, घने और घुंघराले बालों का एक घना जंगल था। पानी की बूंदें उन बालों में अटक-अटक कर, चमकते हुए मोतियों की तरह नीचे सरक रही थीं।
कामिनी की प्यासी नज़रें उस पानी की बूंद का पीछा करने लगीं।
वह बूंद सीने के बालों से फिसली… उसके पेट की कसी हुई मांसपेशियों (Abs) के खड्डों में रुकी… उसकी गहरी नाभि में गई… और फिर वहाँ से फिसलकर नीचे उस ‘प्रतिबंधित इलाके’ की तरफ बढ़ गई।
जैसे ही कामिनी की नज़रें नाभि से नीचे गईं, उसका गला सूखकर कांटा हो गया।
कादर का पूरा शरीर मर्दाना बालों से ढका था—हाथ, पैर, छाती, जांघें।
लेकिन… जांघों के बीच का वो त्रिकोण (Groin) बिल्कुल साफ़, चिकना और बाल रहित था।
काले जंगल के बीच में वो ‘मैदान’ उस्तरे से घिसकर इतना चिकना किया गया था कि वहां की सांवली त्वचा बल्ब की रौशनी में चमक रही थी।
यह सफाई चीख-चीख कर बता रही थी कि यह मर्द अपने ‘हथियार’ को हमेशा जंग के लिए तैयार रखता है।
और उस चिकने सिंहासन पर… उसका विशाल पौरुष विराजमान था।
कामिनी ने अपनी सांसें रोक लीं।
वह ‘चीज़’… रमेश के औज़ार जैसी नहीं थी। वह कोई अंग नहीं, बल्कि मांस का एक भारी-भरकम हथौड़ा लग रहा था।
वह अभी पूरी तरह तना हुआ नहीं था, फिर भी उसकी लम्बाई इतनी थी कि वह कादर की जांघों के आधे हिस्से तक लटक रहा था। एक मोटा, काला और भारी अजगर जो सुस्ता रहा हो।
कामिनी की आँखें कादर के लंड के अगले हिस्से पर जाकर चिपक गईं।
आज तक उसने जितने भी देखे थे (रमेश, रघु का ) सबके लिंग के आगे एक चमड़ी (Foreskin) होती थी जो सुपारी को ढक लेती थी।
लेकिन कादर के लंड के अगले भाग पर वो चमड़ी नहीं थी, वो लाल आलू जैसा “कुछ ” आज़ाद था, अपनी सुंदरता के चरम पर था.
उसका आगे का हिस्सा वह ‘टोपा’ (Glans)—पूरी तरह से नंगा, खुला और बेपर्दा था।
लिंग का तना (Shaft) काला था, जिस पर मोटी-मोटी हरी और नीली नसें सांप की तरह लिपटी हुई थीं।
लेकिन आगे का वो ‘खुला हुआ सिर’… एकदम गहरा गुलाबी और जामुनी (Purple-Pink) रंग का था।
उस नंगी सुपारी का व्यास (Girth) पीछे के लिंग से भी ज्यादा चौड़ा था, बिल्कुल एक मशरूम की तरह फैला हुआ।
उस सुपारी के किनारे (Rim) उभरे हुए थे और हवा के स्पर्श से फड़फड़ा रहे थे।
वह ‘लाल मुंडी’ इतनी संवेदनशील और चमकदार लग रही थी कि कामिनी को लगा जैसे वह उसे घूर रही हो, बुला रही हो।
उस हिस्से पर चमड़ी न होने के कारण, वह कच्चा मांस जैसा दिख रहा था, जो रगड़ खाने के लिए ही बना हो।
उसके लिंग के ठीक नीचे, उसके अंडकोष (Testicles) लटक रहे थे।
वे रमेश की तरह सिकुड़े हुए नहीं थे।
वे विशाल, भारी और लंबोतरे थे।
चूँकि वहां बाल नहीं थे, वे एकदम साफ़ और सुडौल दिख रहे थे। पानी के भार से वे और भी नीचे लटक गए थे, और जब कादर हिलता, तो वे भारी पेंडुलम की तरह उसकी जांघों से टकराते— “थप्प… थप्प…”
वह आवाज़ कामिनी के कानों में नहीं, सीधे उसकी बच्चेदानी में गूंज रही थी।
कादर ने साबुन उठाया और खूब घिस घिस कर अपने शरीर पर घिसने लगा।
झाग भरे हाथों से उसने अपने उस काले मूसल को मुट्ठी में भरा।
कामिनी ने देखा कि कादर की मुट्ठी पूरी बंद नहीं हो पा रही थी, वो इतना मोटा था।
जैसे ही कादर ने उस नंगी, गुलाबी सुपारी पर अंगूठा फेरा… वह सोया हुआ अजगर फनफनाने लग, उसके लंड ने एक हल्का सा झटका लिया, जो की कामिनी को साफ अपनी चुत के मुहने पर महसूस हुआ.
वह पूरा खड़ा नहीं हुआ, बस हलके फुल्के तनाव मे था,
उसमें खून का प्रवाह बढ़ा, और वह और भी मोटा होकर फूल गया। उस गुलाबी टोप पर एक पारदर्शी बूंद (Pre-cum) चमकने लगी।
खिड़की के इस पार, कामिनी की हालत ख़राब थी।
उस दृश्य की नग्नता और उस अजीब बिना चमड़ी वाले लिंग की ‘अलग बनावट’ ने उसे पागल कर दिया था।
उसके साटन के गाउन के अंदर, उसके स्तन के निप्पल (Nipples) पत्थर की तरह सख्त होकर तन गए थे। वे गाउन के कपड़े को चीरकर बाहर आना चाहते थे।
उसके पूरे बदन पर रोंगटे खड़े हो गए, डर से नहीं, बल्कि एक अजीब सी वासना से।
और उसकी जांघों के बीच?
वहाँ बाढ़ आ चुकी थी।
उसकी योनि से इतना गर्म और चिपचिपा पानी रिस रहा था कि उसकी जांघें अंदर से पूरी तरह लिसलिसी हो गई थीं। रस की एक धार उसकी जांघ से रपटते हुए उसके घुटने तक आ गई थी।
कामिनी का मन हुआ कि अभी… इसी वक़्त खिड़की तोड़कर बाहर कूद जाए।
उस कीचड़ और पानी में सने कादर के पास जाए… और घुटनों पर बैठकर उस विशाल, नंगे, गुलाबी टोप को अपने मुंह में भर ले।
उसे चखे, उसे प्यार करे आखिर वो दुसरो से अलग कैसे है?
वह जानना चाहती थी कि वह ‘कटा हुआ’ हिस्सा जीभ पर कैसा लगता है? वह कितना गरम होता है?
कादर ने मग्गा भरकर पानी की एक तेज धार सीधे अपने उस अर्ध मुरछीत लंड पर मारी।
पानी उस लाल सुपारी से टकराया और बिखर गया।
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खिड़की की ग्रिल पर अपना माथा टेक दिया।
“हम्मम्म… आह्ह्ह…इस्स्स्स…” कामिनी की आह निकल ही गई.
उसने अपनी एक जांघ को दूसरी जांघ से ज़ोर से मसला, ताकि उस गीलेपन और खुजली को थोड़ा सकून मिले।
लेकिन आग बुझने के बजाय और भड़क गई।
कामिनी की सांसें अटक चुकी थीं। उसकी नज़रें कादर खान के भीगे हुए जिस्म से हट ही नहीं रही थीं।
कादर ने नहाना बंद कर दिया था। उसने तौलिया उठाया और बेपरवाही से अपने बालों वाले सीने और जांघों को पोंछने लगा।
हर बार जब तौलिया उसके विशाल लिंग से टकराता, वह मांसल हथियार हल्का सा झूलता और फिर अपनी जगह वापस आ जाता।
कादर ने पास रखी थैली से कपड़े निकाले—वही सफ़ेद टी-शर्ट और नीला पाजामा, जो कामिनी खुद बाज़ार से रघु के लिए लाई थी।
लेकिन रघु, कादर के मुकाबले दुबला पतला था, और कादर एक सांड जैसा चौड़ा।
जैसे ही कादर ने वो टी-शर्ट पहनी… कपड़ा चीख उठा।
टी-शर्ट उसकी छाती और बाजुओं पर इतनी बुरी तरह कस गई (Tight) कि उसके शरीर का एक-एक कट साफ़ झलकने लगा।
उसके सीने के काले बाल टी-शर्ट के सफ़ेद कपड़े के नीचे से काले धब्बों की तरह दिख रहे थे। और सबसे उत्तेजक बात—ठंडे पानी की वजह से कादर के सीने के निप्पल पत्थर की तरह सख्त हो गए थे, जो टी-शर्ट के कपड़े को चीरकर बाहर को उभरे हुए साफ़ दिख रहे थे।
फिर उसने पाजामा पहना।
पाजामा भी उसकी भारी-भरकम जांघों पर किसी स्किन- tight लेगिंग्स की तरह चिपक गया।
कादर ने नाड़ा बांधा।
लेकिन कामिनी की नज़रें तो जांघों के बीच (Crotch) पर जमी थीं।
कादर का लिंग अभी पूरी तरह सोया नहीं था। उस ठंडे पानी और रगड़ ने उसे ‘अर्ध-जागृत’ कर दिया था।
तंग पाजामे के अंदर… उस विशाल और मोटे लंड का उभार (Bulge) साफ़… बिल्कुल साफ़ दिख रहा था।
वह एक तंबू की तरह कपड़े को आगे धकेल रहा था।
और उस तंग कपड़े के नीचे, कामिनी को उस मशरूम जैसे मोटे टोप (Glans) की गोलाई साफ़ महसूस हो रही थी।
वह ‘लाल मुंडी’ कपड़े के अंदर कैद होकर और भी ज्यादा खतरनाक लग रही थी, जैसे कोई कोबरा फन फैलाए बैठा हो।
यह दृश्य कामिनी के लिए अंतिम प्रहार था।
उसका दिमाग सुन्न हो गया।
‘यह आदमी… ये कादर…. मेरे घर में… इतनी रात को नहा रहा है, ”
कामिनी अब एक पल भी वहाँ खड़ी नहीं रह सकती थी। अगर वह नहीं भागी, तो शायद वह खिड़की तोड़कर बाहर कूद जाती।
वह पलटी और लड़खड़ाते कदमों से बेडरूम की तरफ भागी।
कामिनी बेडरूम में आंधी की तरह दाखिल हुई।
रमेश अभी भी मुंह फाड़े, हाथ-पैर फैलाए बेहोश पड़ा था। उसके खर्राटे कमरे में गूंज रहे थे।
लेकिन कामिनी को अब रमेश के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसकी दुनिया अब उसकी जांघों के बीच सिमट गई थी।
कामिनी ने लाइट ऑफ नहीं की, डिम लाइट जल रही थी।
वह बेड पर चढ़ी और रमेश से दूर, किनारे की तरफ लेट गई।
उसने रजाई अपने ऊपर खींच ली, लेकिन उसका पूरा शरीर बुखार की तरह तप रहा था।
उसने अपने साटन के गाउन को कमर तक ऊपर खींच लिया।
ठंडी हवा उसके नंगे पैरों और जांघों को छूने लगी, लेकिन अंदर ज्वालामुखी धधक रहा था।
कामिनी ने अपना कांपता हुआ हाथ अपनी पैंटी के ऊपर रखा।
इस्स्स्स…. आअह्ह्ह… कामिनी कांप उठी, जैसे किसी जलते तवे पर हाथ रख दिया हो.
पैंटी पूरी तरह गीली और लिसलिसी हो चुकी थी।
उसकी योनि से निकला हुआ गाढ़ा और गरम पानी (Lubrication) कपड़े के आर-पार हो चुका था।
कामिनी ने एक झटके में पैंटी उतारकर फेंक दी।
अब उसकी गोरी, मांसल और भरी हुई योनि आज़ाद थी।
उसने अपनी उंगलियां अपने ‘होठों’ (Labia) पर रखीं।
वहाँ इतना पानी था कि उसकी उंगलियां फिसलने लगीं।
“स्स्स्स्ह्ह्ह… उफ्फ्फ कादर…”
कामिनी के मुंह से अनजाने में कादर का नाम निकल गया।
उसने अपनी बीच की उंगली (Middle Finger) को अपनी योनि के द्वार पर रखा।
वह छेद, जो कल रात रघु ने चौड़ा किया था, आज कादर को देखकर फिर से फड़फड़ा (Pulsating) रहा था। वह मांग रहा था—कुछ मोटा, कुछ सख्त।
कामिनी ने अपनी उंगली अंदर धकेलनी शुरू की।
अंदर की दीवारें इतनी गरम थीं कि कामिनी को लगा उसकी उंगली जल जाएगी।
अंदर का मांस मखमली और सूजा हुआ था।
जैसे ही उंगली अंदर गई, एक “पिच्… पिच्…” की गीली आवाज़ आई।
कामिनी ने आँखें बंद कर लीं।
अंधेरे में उसे अपनी उंगली नहीं… बल्कि कादर का वो “काला नसों भरा लंड और उसका लाल खुला हुआ टोप” दिखाई दे रहा था।
कामिनी ने कल्पना की…
कि कादर अभी खिड़की से कूदकर अंदर आया है…
उसने कामिनी की टांगें चौड़ी की हैं…
और वो अपना ‘खतने वाला नंगा टोप’ कामिनी के गीले छेद पर रगड़ रहा है…
इस कल्पना मात्र से कामिनी की कमर हवा में उठ गई।
उसने अपनी उंगली तुरंत बहार निकाल ली,
उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी की वो ऊँगली को और अंदर डाल सके, वो चीख उठेगी,
कामिनी उत्तेजना बर्दाश्त करने की हालात मे नहीं थी, उसने आज से पहले ऐसा नहीं किया था,
उसकी पतली नाजुक उंगलियां असली मर्द की भरपाई नहीं कर सकती थी.
कामिनी ने अपनी ऊँगली को बहत खिंच लिया, उसकी ऊँगली चूतरस या यूँ कहिये चुत के मीठे शहद से सराबोर थी.
उसने अपने दूसरे हाथ से अपने स्तन (Boob) को गाउन के ऊपर से ही ज़ोर से भींच लिया। उसका निप्पल इतना सख्त हो गया था कि छूने पर दर्द हो रहा था, लेकिन वह दर्द मीठा था।
नहीं… नहीं…. मै इसे बर्बाद नहीं कर सकती. उत्तेजना और हवास मे भी कामिनी की चेतना लौट आई.
उसने अपने जिस्म को ढीला छोड़ दिया,
ये वो सुख नहीं है…. कामिनी का जिस्म उसकी खुद की छुवन को नकार रहा था, उसे कादर या रघु जैसे मजबूत मर्द का स्पर्श चाहिए था, जो की अभी संभव नहीं था.
कामिनी ने गुस्से और उत्तेजना मे अपना सर तकिये मे घुसा दिया, और गहरी गहरी सांसे भरने लगी, जैसे खुद को समझा रही हो.
थोड़ी ही देर मे सब शांत था, बहार से आती पानी की आवाज़ और कामिनी की वासना दोनों रात के अँधेरे मे विलीन हो गए.
कामिनी मीठे सपनो के आगोश मे समा गई थी.
वही कादर दिन भर की भागदौड़ और अभी स्नान के बाद रघु के बगल मे पड़ा खर्राटे भर रहा था.
अगली सुबह का सूरज निकला, लेकिन रमेश के घर के ऊपर काले बादल मंडरा रहे थे।
रमेश की आँखें लाल थीं, चेहरा सूजा हुआ था। रात की घटना और घर मे ड्रग के डर ने उसे तोड़ दिया था।
वह तैयार होकर ऑफिस के लिए निकलने लगा। जाते-जाते वह स्टोर रूम की तरफ गया।
उसने जेब से कुछ और नोट निकाले और रघु के हाथ पर रख दिए।
“रघु… ध्यान रखना,” रमेश ने फुसफुसाते हुए कहा। “किसी को भनक न लगे। और कादर भाई…”
रमेश ने कोने में बैठे कादर को देखा। “भाई, बाहर मत निकलना जब तक शमशेर का फ़ोन न आये। मामला गरम है।”
कादर ने लापरवाही से हाथ हिला दिया। “जाओ रमेश बाबू, अपनी कुर्सी संभालो। हम यहाँ पड़े हैं।”
रमेश भारी कदमों से चला गया।
थोड़ी देर बाद बंटी भी स्कूल के लिए निकल गया।
अब घर में सिर्फ़ कामिनी थी। और पिछवाड़े के स्टोर रूम में दो मर्द।
कामिनी अपने बेडरूम में तैयार हो रही थी।
उसने आज एक हल्की गुलाबी रंग की कॉटन साड़ी पहनी थी। बाल गीले थे और खुले छोड़े हुए थे। चेहरे पर रात की वो ‘कामुक थकान’ और ‘ताज़गी’ दोनों का मिश्रण था।
लेकिन उसके मन में एक ही सवाल था— ‘वह गुंडा मेरे घर में क्या कर रहा है? रघु कहाँ है दिखा नहीं कल रात से ही?’
कामिनी ने पल्लू कमर में खोंसा और दृढ़ कदमों से स्टोर रूम की तरफ बढ़ी।
दरवाज़ा खुला। कामिनी अंदर दाखिल हुई।
रघु, जो अपनी खटिया पर बैठा बीड़ी सुलगा रहा था, मालकिन को देखते ही हड़बड़ाकर खड़ा हो गया और बीड़ी नीचे जमीन लार फेंक दी।
“नमस्ते मैडम …” रघु ने सिर झुकाया।
लेकिन कादर खान… वह अपनी जगह से नहीं हिला।
वह ज़मीन पर एक बोरी बिछाकर बैठा था, पीठ दीवार से टिकाए। उसने कामिनी को ऊपर से नीचे तक घूरा।
रात के t-shirt उसके जिस्म पर कसे हुए थे, कादर का लिंग पाजामे मे साफ झलक रहा था, कामिनी ने एक नजर कादर को देखा, एक झुरझुरी सी हुई.
कादर की नज़रों में न तो डर था, न शर्म। वो बेबाक कामिनी की खूबसूरती को निहार रहा था.
“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” कामिनी ने खुद को संभाल कड़क आवाज़ में पूछा। चेहरे पे गुस्से के भाव ले आई, जैसे उसे कादर का यहाँ होना पसंद ना आया हो
रघु कुछ बोलने के लिए आगे बढ़ा, “मैडम वो कक… कल रात …”
“तू चुप रह रघु!” कादर ने रघु को रोका। कादर पहले से ही कुछ टेंशन मे दिख रहा था.
कामिनी का गुस्से मे पूछना उसे हजम नहीं हुआ.
कादर ने अपनी गहरी आँखों से कामिनी को देखा और मुस्कुराया।
“मै बताता हूँ ना, सच सुनने का शौक है, झूठ क्यों बोलना?”
कादर ने सीधा कामिनी की आँखों में देखा।
“पुलिस पड़ी है मेरे पीछे मैडम। 50 लाख का ‘माल’ (ड्रग्स) अभी इसी वक़्त मौजूद है मेरे पास और मुझे यहाँ लाने वाला कोई और नहीं, आपका पति रमेश बाबू है।”
कामिनी को झटका लगा। “रमेश? 50 लाख का माल? तुम… तुम नशा बेचते हो?”
कामिनी की आँखों में घृणा उतर आई।
“तुम्हें शर्म नहीं आती?” कामिनी चिल्लाई।
“तुम समाज को बर्बाद कर रहे हो! उन बच्चों को ज़हर दे रहे हो? तुम जैसे लोग नासूर हैं इस दुनिया के लिए!”
कादर खान हंसा। एक ठंडी, व्यंग्यात्मक हंसी।
“अरे मैडम… किस समाज की बात कर रही हैं आप?” कादर ने थूकने के अंदाज़ में कहा।
वह धीरे से खड़ा हुआ। उसका विशाल साया कामिनी पर पड़ने लगा।
“वही समाज जो शाम को दारू पीकर नालियों में लोटता है? क्यों? क्योंकि दारू पर सरकार का ठप्पा है, तो वो ‘अमृत’ हो गई? और मेरा पाउडर ‘ज़हर’ हो गया?”
कादर ने एक कदम आगे बढ़ाया। कामिनी अपनी जगह खड़ी रही, लेकिन अंदर से सहम गई।
“ये जो कानून और समाज की दुहाई दे रही हैं ना आप… ये सब अमीरों के चोचले हैं। वो शमशेर… जो वर्दी पहनता है, वो मुझसे हर महीने हफ्ता लेता है। आपका पति रमेश… बड़ा रसूखदार बाबू है, रोज़ नशे मे टुल हो कर मेरे ही ढाबे पर आकर मटन चबाता है।”
कादर की आवाज़ ऊंची हो गई।
“यहाँ सब चोर हैं मैडम! सब के सब! बस फर्क इतना है कि जो पकड़ा गया वो ‘चोर’, और जो बच गया वो ‘साहूकार’।”
कामिनी ने जवाब देना चाहा, लेकिन शब्द गले में अटक गए।
कादर ने रघु की तरफ इशारा किया।
“इस रघु को देखिये… इसने क्या बिगाड़ा था समाज का? एक गरीब किसान था। पुलिस वाले और एक सरकारी अफ़सर ने मिलकर इसकी ज़मीन हड़प ली, इसकी बीवी के साथ गलत किया, उसे मार दिया। और इसे? सालों तक जेल में सड़ने को छोड़ दिया।”
रघु ने सिर झुका लिया। उसकी पुरानी चोटें हरी हो गईं।
“कहाँ था आपका समाज तब?” कादर की आवाज़ में दर्द और गुस्सा दोनों था। “किसने दिया इसे इन्साफ? क्या आप देंगी?”
कादर कामिनी के बिल्कुल करीब आ गया।
“आप मुझे गलत नहीं कह सकतीं मैडम। आपके पास हक़ नहीं है। आप उस महल में रहती हैं जो शायद रमेश बाबू ने रिश्वत के पैसों से बनाया है। हम तो बस… ज़िंदा रहने का टैक्स भर रहे हैं।”
कामिनी सुन हो गई।
कादर का हर एक शब्द किसी चाबुक की तरह पड़ रहा था।
वह अपनी बगले झांकने लगी।
‘क्या मैं सच्ची हूँ?’ कामिनी का अंतर्मन उसे कोसने लगा। ‘मैं जो कल रात खिड़की से इस नंगे आदमी को घूर रही थी… मैं जो सुनैना के साथ… मैं जो रघु के साथ… क्या मैं पवित्र हूँ?’
कादर सही कह रहा था। हमाम में सब नंगे हैं।
“सही और गलत अमीरों के चोचले हैं मैडम,” कादर ने अपनी बात ख़त्म की। “जिसके पास पैसा है, उसका सच ‘सच’ है। गरीब का सच तो बस ‘बकवास’ है।”
कामिनी का चेहरा मुरझा गया। उसका नैतिक अहंकार (Moral Ego) चकनाचूर हो गया था।
वह अब कादर की आँखों में नहीं देख पा रही थी।
रघु को अब बर्दाश्त नहीं हुआ। वह कादर के सामने आ गया।
“बस कर कादर भाई! क्या कह रहा है?” रघु ने उसे रोका। “वो मालकिन हैं… उन्होंने मुझ जैसे लावारिस पर दया की। मुझे रहने को छत दी, खाना दिया। वो बाकियों जैसी नहीं हैं।”
“रहने दो रघु…” कामिनी की आवाज़ भर्रा गई। उसकी आँखों में आंसू तैरने लगे।
उसे अपनी हार महसूस हो रही थी। वह इस ‘गंदगी’ का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी, लेकिन उसे एहसास हो गया था कि वह भी इसी कीचड़ में खड़ी है।
कामिनी पलटी और तेज़ कदमों से, बिना कुछ कहे, स्टोर रूम से बाहर निकल गई।
स्टोर रूम मे सन्नाटा छा गया,
कादर अभी भी गुस्से में सांस ले रहा था।
“सब अमीर लोग ऐसे ही होते हैं रघु,” कादर ने ज़मीन पर थूक दिया। “दोगले। खुद पाप करेंगे तो ‘शौक’, हम करें तो ‘अपराध’। हम जैसे लोग इन्हें खटकते हैं।”
कादर भरा बैठा था, इसे जरा भी बर्दाश्त नहीं था की कोई उस से ऊँची आवाज़ मे बात करे.
रघु ने अपनी खटिया पर बैठते हुए सिर हिलाया।
“नहीं भाई… तू गलत समझ रहा है,” रघु ने भावुक होकर कहा। “मैडम वैसी नहीं हैं। तू नहीं जानता वो किस नर्क में जी रही हैं।”
कादर ने रघु को देखा। “मतलब?”
“उनका पति… वो रमेश…” रघु की मुट्ठी भिंच गई। “वो जानवर है। दारू पीकर रोज़ मारता है उन्हें, गालियां देता है। उनका दम घुटता है उस बड़े घर में। लेकिन उन्होंने कभी ‘उफ़’ तक नहीं की।”
रघु की आँखों में कामिनी के लिए एक अजीब सी भक्ति और प्रेम था।
“उन्होंने मुझे उस दिन बचाया जब मैं बुखार से मर रहा था। मेरे लिए नये कपड़े लाये (वही जो तूने पहने हैं), मेरे हाथ से खाना खाया… और…”
रघु एकदम से रुक गया।
“और…”
उसकी जुबान पर उस रात की चुदाई आने वाली थी।
“और… बस, बहुत अच्छी हैं वो,” रघु ने बात संभाल ली।
कादर खान हैरान होकर रघु को देख रहा था।
उसे उम्मीद नहीं थी कि उस ‘रानी’ जैसी दिखने वाली औरत की ज़िंदगी में इतना दर्द होगा।
“मैडम बहुत दयालु हैं कादर भाई…” रघु ने कादर के कंधे पर हाथ रखा। “तूने अपनी भड़ास गलत जगह उतार दी। वो भी हमारी तरह ही… सताई हुई हैं।”
कादर चुप हो गया।
उसके दिमाग में कामिनी का वो रोता हुआ चेहरा और रघु की बातें घूमने लगीं।
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दोपहर ढल रही थी। घड़ी में 4:30 बज रहे थे।
कामिनी अपने बेडरूम में बैठी खिड़की से बाहर देख रही थी। सुबह कादर खान की वो कड़वी बातें— “गरीब का सच बकवास है” —अभी भी उसके कानों में गूंज रही थीं। उसे अपनी परवरिश और अपनी ‘अमीरी’ पर पहली बार शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।
तभी रमेश का फ़ोन आया।
“हेलो कामिनी…” रमेश की आवाज़ में सुबह वाला डर कम और शाम के नशे की तलब ज्यादा थी। “शमशेर ने बताया है कि आज शाम को मटन सूप का प्रोग्राम है। अब कादर भाई घर में हैं ही, और रघु कह रहा था कि वो मटन बहुत शानदार बनाता है। तो क्यों न मौके का फायदा उठाया जाए?”
रमेश हंसा, अपनी ही चालाकी पर। “रघु को पैसे देकर मटन मंगवा लो, और सारा ज़रूरी सामान कादर को दे देना। आज शाम की दावत घर पर ही होगी।”
कामिनी ने फ़ोन रख दिया। उसके होठों पर एक फीकी मुस्कान आ गई।
“क्या रमेश….. ”
कामिनी के लिए अब स्टोर रूम की तरफ जाना मुश्किल हो रहा था।
सुबह जिस तरह वह कादर पर चिल्लाई थी, और फिर कादर ने जिस तरह उसे आईना दिखाया था… उसके बाद नज़रे मिलाना आसान नहीं था। उसे अफ़सोस था। वह आराम से भी पूछ सकती थी, लेकिन उसने अपने ‘मालकिन’ होने के अहंकार में उस पर गुस्सा किया था।
कामिनी ने अलमारी से पर्स निकाला और कुछ नोट लिए।
वह भारी कदमों से पिछले दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
बगीचे में धूप कम हो गई थी।
स्टोर रूम के बाहर रघु खटिया पर बैठा अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज़ कर रहा था।
दरवाज़ा खुला था, और अंदर के अंधेरे में कादर खान ज़मीन पर लेटा हुआ छत को घूर रहा था।
कामिनी स्टोर रूम के दरवाज़े पर जाकर रुक गई। उसने अंदर कदम नहीं रखा।
“रघु…” कामिनी ने आवाज़ दी।
रघु तुरंत खड़ा हो गया। “जी मैडम?”
अंदर लेटा कादर भी आवाज़ सुनकर उठ बैठा। उसने कामिनी की तरफ देखा। उसकी आँखों में अब कोई गुस्सा नहीं था, अपितु थोड़ी खुशी थी जो कामिनी को देख के आई थी।
कामिनी ने रघु की तरफ नोट बढ़ा दिए।
“रमेश जी का फ़ोन आया था,” कामिनी ने नज़रें झुकाकर कहा, लेकिन उसकी आवाज़ कादर को सुनाने के लिए काफी थी। “आज शाम को मटन सूप बनाना है। बाज़ार से ताज़ा गोश्त ले आओ।”
फिर कामिनी ने एक पल के लिए कादर की तरफ देखा, लेकिन तुरंत नज़रें हटा लीं।
“और… इन्हें (कादर को) जो भी मसाला या बर्तन चाहिए हो, दे देना।”
कादर अपनी जगह से खड़ा हुआ। वह दरवाज़े तक आया।
उसका विशाल शरीर दरवाज़े की चौखट को घेर रहा था।
“मैडम…” कादर ने अपनी भारी आवाज़ में कुछ कहना चाहा। शायद वह सुबह की बात को हल्का करना चाहता था, या शायद वह कामिनी के चेहरे पर अफ़सोस पढ़ चुका था।
लेकिन कामिनी ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया।
उसने रघु के हाथ में पैसे थमाए और पलट गई।
“कुछ और चाहिए हो तो आकर मांग लेना,” कामिनी ने जाते-जाते कहा, बिना पीछे मुड़े।
उसकी चाल में सुबह वाली अकड़ नहीं थी, बल्कि एक विनम्रता और दूरी थी।
कादर उसे जाते हुए देखता रहा।
वह समझ गया कि कामिनी अभी भी उसकी बातों से आहत है, या शायद उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है।
“हम्म…” कादर ने एक गहरी सांस छोड़ी और रघु की तरफ देखा। “जा भाई, ले आ गोश्त, ऐसा मटन बनाऊंगा की खाने वाला उंगलियां चाट जायेगा।”
“वाह कादर भाई आज तो मजा आ जायेगा….
रघु पैसे लेकर बाज़ार की तरफ निकल गया।
और कादर… वह स्टोर रूम की चौखट पर खड़ा, कामिनी के बेडरूम की खिड़की को देखता रहा, जहाँ पर्दा हिल रहा था।
खामोशी थी, लेकिन यह तूफ़ान से पहले की खामोशी थी।
*************
मुश्किल से 20 मिनट बीते होंगे कि रघु हांफता हुआ वापस आ गया। उसके हाथ में काले रंग की थैली थी, जिसमें से ताज़े कटे हुए गोश्त की महक आ रही थी।
“ये ले भाई…” रघु ने थैली कादर के हाथों में थमा दी। “जोरदार बनाना, मैडम खुश हो जानी चाहिए।”
कादर ने थैली पकड़ी। “ठीक है, अब ज़रा वो बर्तन और मसाला…”
लेकिन रघु कहाँ रुकने वाला था?
उसने अपनी बनियान की जेब से वो नोट (पैसे) निकालकर हवा में लहराए। उसकी आँखों में शाम की ‘तलब’ चमक रही थी।
“मैडम ने पैसे दिए हैं, मैं ज़रा अपनी ‘दवाई’ का इंतज़ाम करके आता हूँ। तू संभाल लेना।”
इतना बोलकर रघु ने आव देखा न ताव, स्टोर रूम से बाहर लपका और गेट की तरफ भाग गया।
“अरे… सुन… सुन तो बे…” कादर ने उसे रोकने के लिए हाथ बढ़ाया। “अकेले कैसे करूँगा सब…”
लेकिन रघु हवा हो चुका था। शाम ढलते ही एक शराबी के लिए दुनिया की हर ज़िम्मेदारी धुंधली हो जाती है।
कादर ने माथे पर हाथ मारा।
“साला… इसीलिए मुझे ये दारू पीने वाले पसंद नहीं,” कादर बड़बड़ाया। “वक़्त-बेवक़्त नशा सूझता है।”
अब कादर अकेला था। हाथ में मटन की थैली और सामने काम का पहाड़।
उसने इधर-उधर देखा। उसे मटन धोना था।
उसकी नज़र बगीचे के उसी अमरूद के पेड़ के नीचे गई, जहाँ नल लगा था।
वही जगह… जहाँ कल रात उसने अपने नंगे जिस्म की नुमाइश की थी, अनजाने में ही सही।
कादर थैली लेकर नल के पास गया और उकड़ूँ (Squat) बैठ गया।
उसने थैली पलटी और लाल, ताज़ा मटन के टुकड़े बाल्टी में डाल दिए।
उसने नल चालू किया।
“छप… छप… छपाक्…!!”
पानी गिरने की वही आवाज़… वही लय… सन्नाटे में गूंजने लगी।
उसी वक़्त कामिनी भी किचन में खड़ी थी, ख्यालों में खोई हुई।
अचानक, पानी गिरने की उस आवाज़ ने उसके कानों को भेदा।
उसका बदन सिहर उठा। यह आवाज़ अब उसके लिए सिर्फ़ ‘पानी’ की नहीं थी, यह उस ‘विशाल पौरुष’ और ‘गीले जिस्म’ का संगीत बन चुकी थी।
जिज्ञासा ने उसे फिर से खिड़की की तरफ खींच लिया।
कामिनी ने चिक (Blind) के पीछे से झांका।
इस बार कादर नंगा नहीं था, लेकिन जो उसने पहना था, वह नंगे होने से कम भी नहीं था।
रघु का वो सफ़ेद टी-शर्ट कादर के चौड़े सीने और बांहों पर किसी दूसरी त्वचा की तरह कसा हुआ था।
कादर के मज़बूत डोले (Biceps) टी-शर्ट की बांहों को फाड़ने पर उतारू थे।
पानी की छींटों से टी-शर्ट हल्की गीली हो गई थी, जिससे उसके काले, घने बालों वाला सीना कपड़े के नीचे से झांक रहा था।
लेकिन कामिनी की नज़रें, हमेशा की तरह, नीचे फिसल गईं।
कादर उकड़ूँ बैठा था। इस पोज़िशन में उसका तंग पाजामा उसकी जांघों और पेडू पर बुरी तरह खिंच गया था।
और उस खिंचाव ने… उसके विशाल लिंग की रूपरेखा (Outline) को पूरी तरह बेपर्दा कर दिया था।
पाजामे के कपड़े के नीचे, उसकी बाईं जांघ के सहारे, एक लंबा, मोटा और भारी ‘अजगर’ लेटा हुआ साफ़ दिख रहा था।
कामिनी को कल रात वाला वो ‘लाल, नंगा और मुठा हुआ टोप’ याद आ गया।
वह पाजामे के अंदर कैद होकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। वह उभार (Bulge) इतना स्पष्ट था कि कामिनी को लगा अगर वह हाथ बढ़ाए तो उस गर्माहट को महसूस कर सकती है।
कामिनी की नज़रें पीछे झाड़ियों पर गईं।
वहाँ कादर के कल रात वाले कपड़े (कुर्ता-पाजामा) सूख रहे थे। यह सबूत था कि यह वही आदमी है जिसने कल रात उसे पागल कर दिया था।
कादर मटन धो रहा था।
उसके बड़े-बड़े, खुरदरे हाथ मटन के लाल टुकड़ों को पानी में मसल रहे थे।
वह मांस के लोथड़ों को अपनी हथेलियों में भींचता, उन्हें रगड़ता और फिर नज़ाकत से निचोड़ता।
“पिच्… पिच्…”
मांस और पानी की वो आवाज़ कामिनी को उत्तेजित कर रही थी।
कामिनी ने कल्पना की… ‘अगर मटन की जगह मेरा जिस्म होता? अगर वो मेरे स्तनों को ऐसे ही मसल रहा होता?’
उसका गुस्सा, उसका अफ़सोस… सब उस पानी के साथ बह गया। अब बची थी तो बस एक मीठी टीस।
कामिनी को एहसास हुआ कि कादर के पास धुला हुआ मटन रखने के लिए कोई बर्तन नहीं है।
वह मुड़ी।
उसने रैक से एक बड़ी स्टील की प्लेट (परात) उठाई।
एक गहरी सांस ली, अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, और किचन के पिछले दरवाज़े से बाहर निकल गई।
कादर मटन धोने में मगन था।
उसे किसी के आने की आहट हुई। वह पलटा नहीं, उसे लगा रघु आ गया होगा।
“आ गया बेवड़े? ला बर्तन दे…”
लेकिन कोई जवाब नहीं आया। बस एक मीठी सी खुशबू हवा में तैर गई—इत्र और ताज़गी की खुशबू।
कादर ने सिर उठाकर देखा।
सामने कामिनी खड़ी थी।
हाथ में स्टील की बड़ी थाली लिए। शाम की ढलती रौशनी में उसका चेहरा दमक रहा था।
उसकी नज़रें कादर के चेहरे पर नहीं, बल्कि उसकी गीली टी-शर्ट और तने हुए सीने पर थीं।
कादर के हाथ रुक गए। उसके हाथों से मटन का लाल पानी टपक रहा था।
कामिनी धीरे से आगे बढ़ी।
उसने थाली कादर की तरफ बढ़ा दी।
“लो…” कामिनी की आवाज़ मद्धम और कांपती हुई थी। “इसमें रखो।”
कादर ने कामिनी की आँखों में देखा।
वहाँ अब सुबह वाला गुस्सा नहीं था। वहाँ एक समर्पण था, एक आमंत्रण था।
कादर ने अपने गीले हाथ पोंछे नहीं। उसने मटन का एक टुकड़ा थाली में रखा।
“शुक्रिया मैडम ..” कादर ने मुस्कुराते हुए कहा, लेकिन उसकी नज़रें कामिनी के ब्लाउज़ के डीप नेक पर थीं।
अब दोनों के बीच सिर्फ़ एक थाली की दूरी थी।
मांस, पानी, और दो धड़कते हुए जिस्म।
कादर ने धुले हुए मटन के टुकड़ों को स्टील की बड़ी थाली में सज़ा दिया।
“अब इसे कहाँ बनाना है? ” कादर ने खड़े होते हुए पूछा, उसका जिस्म पानी से भीग गया था, टाइट t-shirt पजामा बिल्कुल उसके जिस्म से चिपक गया था.
कामिनी की नजर उसके पुरे बदन पर घूम गई, गड़ब… कामिनी के सूखे गले से थूक निगला.
“अअअ…. अंदर रसोई ने और कहाँ ” जैसे तैसे कामिनी के हलक से आवाज़ निकली..
ना जाने क्यों कामिनी के नाभि के बीच गुदगुदी सी हो रही थी.
कादर ने इंकार में सिर हिलाया और एक गहरी, रसिक मुस्कान दी।
“किचन में? नहीं मैडम…” कादर ने मटन के लाल टुकड़ों को ऐसे देखा जैसे कोई कलाकार अपनी कलाकृति को देखता है।
“किचन की चारदीवारी में ये सब ‘चूज़े’ बेजान हो जाते हैं। असली स्वाद तब आता है जब ये खुले आसमान के नीचे पकता है। जब शाम की हवा और लकड़ी का धुआं इसमें घुलता है।”
कादर की आवाज़ में एक अजीब सा नशा था।
“मटन बनाना सिर्फ़ पकाना नहीं है मैडम, ये मोहब्बत है,” कादर ने कामिनी की आँखों में झांका। “जितना धीमी आंच पर, जितना प्यार और सब्र से इसे भूनोगे… ये उतना ही रसीला बनेगा। जल्दबाजी का काम तो पेट भरना है, मन भरना नहीं।”
कामिनी कादर की बातें सुनकर मंत्रमुग्ध थी। उसने आज तक रमेश को सिर्फ़ “खाना लाओ” चिल्लाते सुना था। एक मर्द खाने के बारे में इतनी शिद्दत से बात कर सकता है, यह उसने पहली बार देखा था।
वह अनजाने में ही मुस्कुरा दी।
“तो बताओ तुम ही, अब क्या करें?” कामिनी ने हथियार डाल दिए।
“आप बस मसाले और बर्तन ले आइये,” कादर ने आदेश दिया, लेकिन प्यार से। “बाकी जुगाड़ मैं करता हूँ।”
कादर ने थाली उठाई और मसालों के नाम गिना दिए, खड़े मसाले, तेल, अदरक, लहसुन।
कामिनी अंदर चली गई। कादर उसे जाते हुए देखता रहा। उसकी चाल में जो लचक थी, वह किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी थी।
जैसे ही कामिनी अंदर गई, कादर ने फुर्ती दिखाई।
उसने बगीचे के कोने से कुछ ईंटें उठाईं और स्टोर रूम के बाहर, घास पर एक देसी चूल्हा बना लिया।
आस-पास पड़ी सूखी लकड़ियां और टहनियां इकट्ठी कीं और आग सुलगा दी।
“चट… पट…”
लकड़ियां जलने लगीं और एक सौंधी सी खुशबू हवा में फैल गई।
थोड़ी ही देर में कामिनी वापस आई।
उसके हाथों में मसालों के डिब्बे, तेल की बोतल और एक बड़ा भगोना था।
साथ ही, वह एक चटाई भी ले आई थी।
उसने चूल्हे के पास, हरी घास पर चटाई बिछा दी।
शाम घिरने लगी थी, और चूल्हे की आग की नारंगी रौशनी उन दोनों के चेहरों पर नाच रही थी।
कादर और कामिनी चटाई पर आमने-सामने बैठ गए।
बीच में प्याज़ और लहसुन का ढेर था।
कादर ने चाकू उठाया और प्याज़ काटना शुरू किया, जबकि कामिनी लहसुन छीलने लगी।
माहौल में एक अजीब सी अपनायत थी, जैसे वे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों।
“मैडम…” कादर ने प्याज़ काटते हुए खामोशी तोड़ी। “सुबह के लिए माफ़ी चाहता हूँ। मेरा दिमाग ठिकाने पर नहीं था। पुलिस, ड्रग्स… सबने पागल कर दिया था।”
कामिनी ने लहसुन की कली छीली और कादर को देखा।
शाम की धुंधली रौशनी और आग की लपटों में कादर का चेहरा अब उतना डरावना नहीं लग रहा था। उसकी टी-शर्ट पसीने और पानी से हल्की गीली होकर उसके सीने से चिपकी थी, एक मादक मर्दाना खुसबू कामिनी महसूस कर सकती थी, लेकिन अब कामिनी को उसमें ‘गुंडा’ नहीं, बल्कि एक ‘परेशान मर्द’ दिख रहा था।
“कोई बात नहीं कादर,” कामिनी ने नरमी से कहा। “गुस्सा तो मुझे भी नहीं करना चाहिए था।”
“वैसे तुम रघु के साथ पीने क्यों नहीं गए? तुम दोनों तो पुराने दोस्त हो?” कामिनी ने अपनी जिज्ञासा शांत करनी चाही.
कादर ने चाकू रोका और कामिनी को देखा।
“मुझे चिढ़ है शराब पीने वालों से मैडम,” कादर ने संजीदगी से कहा। “साले होश में रहते ही नहीं हैं। और मेरा मानना है…”
कादर ने अपनी गहरी आँखों से कामिनी को भेदा।
“…कि बिना होश में की गई चीज़ों का कोई महत्व नहीं होता। चाहे वो खाना बनाना हो, या मोहब्बत करना। इंसान को पता होना चाहिए कि वो क्या कर रहा है, तभी असली मज़ा है।”
कामिनी के गाल लाल हो गए। वह कादर की सोच से प्रभावित हो रही थी। रमेश हमेशा पीकर उसके पास आता था, बेहोशी में उसे नोचता था। और यहाँ एक ‘गुंडा’ था जो होश और अहसास की बातें कर रहा था।
“लेकिन ड्रग्स बेचते हो…” कामिनी ने हिम्मत करके उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया।
“वो नशा नहीं है?”
कादर का हाथ एक पल को रुक गया। उसके चेहरे पर एक छाया पड़ गई।
“मज़बूरी थी मैडम,” कादर ने एक लंबी सांस छोड़ी। “शुरू में पेट पालने के लिए यह धंधा किया था। लगा था चार पैसे कमाकर छोड़ दूंगा। लेकिन यह दलदल है… अब चाहकर भी इसे नहीं छोड़ सकता। या यूं कहिये… यह धंधा मुझे नहीं छोड़ेगा।”
कादर ने एक कड़वी मुस्कान दी।
“खैर छोड़ो मुझे… मेरे जीवन का कोई क्या भरोसा? आज हूँ, कल पुलिस की गोली या किसी दुश्मन का चाकू… कहानी ख़त्म।”
उसने बात बदली। “प्याज़ कट गए हैं, मैं भगोना चढ़ाऊं?”
कादर ने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं।
आग की रौशनी में उसने देखा… कामिनी की आँखों में आंसू थे।
उसकी बड़ी-बड़ी, कजरारी आँखें पानी से भर आई थीं और एक बूंद उसकी गोरी गाल पर लुढ़क गई थी।
कादर का दिल पसीज गया। उसे लगा कामिनी उसकी दुखभरी दास्तां सुनकर रो रही है।
एक ‘गुंडे’ के लिए किसी ‘शरीफ औरत’ का रोना… यह कादर के लिए बहुत बड़ी बात थी।
वह बिना सोचे आगे बढ़ा।
उसने अपना बड़ा, खुरदरा हाथ बढ़ाया और अपने अंगूठे से कामिनी के गाल पर लुढ़कते उस आंसू को पोंछ दिया।
“अरे मैडम…” कादर की आवाज़ मखमली हो गई। “आप रो क्यों रही हैं? मेरी ज़िंदगी इतनी भी बुरी नहीं है कि आपकी खूबसूरत आँखों में मोती आ जाएं।”
कादर का अंगूठा कामिनी के गाल पर था।
वह स्पर्श… खुरदरा मगर बेहद कोमल।
कामिनी के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। रमेश मरियल था लेकिन उसके स्पर्श में जानवरो वाला अहसास होता था, लेकिन कादर खुद जानवर किसी भेड़िया जैसा दिखता था लेकिन उसके स्पर्श में संवेदना (Care) थी।
कामिनी अभी भी मर्दो को समझ नहीं पा रही थी.
मर्द वाकई है क्या चीज?
वह एक पल के लिए उस मर्दाने प्यार भरे अहसास में खो गई।
फिर उसे होश आया।
वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। आंसू अभी भी गाल पर थे, लेकिन होंठों पर हंसी थी।
“अरे बुद्धू…” कामिनी ने अपनी गीली आँखों को पल्लू से पोंछा। “यह तुम्हारी कहानी सुनकर नहीं… यह कम्बख्त प्याज़ की वजह से है। बहुत तीखे हैं।”
कादर एक पल के लिए हक्का-बक्का रह गया, फिर वह भी ज़ोर से हंस पड़ा।
“धत् तेरी की! और मैं यहाँ खुद को देवदास समझ रहा था!”
दोनों की हंसी स्टोर रूम के बाहर गूंजने लगी।
उस हंसी में जो दूरी थी, वह अब मिट चुकी थी।
कादर का हाथ अभी भी कामिनी के घुटने के पास चटाई पर था, और कामिनी का कंधा कादर की तरफ झुका हुआ था।
चूल्हे पर तेल गरम हो रहा था,
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चूल्हे की आग अब पूरी जवानी पर थी, लपटें ऊपर उठ रही थीं।
भगोने में तेल खौल रहा था।
कामिनी बिल्कुल पास बैठी थी, आँखों में एक बच्चे जैसी जिज्ञासा लिए। वह कादर के हर मूवमेंट को बारीकी से देख रही थी।
“अब क्या डाला?” कामिनी ने आगे झुकते हुए पूछा। “यह काला वाला क्या था?”
कामिनी के आगे झुकने से उसके स्तन बहार को लुढ़क आये, जिस पर कादर ने बराबर नजर फेरी, लेकिन कोई रिएक्शन नहीं दिया.
“यह बड़ी इलायची है मैडम,” कादर ने एक टीचर की तरह समझाया। “यह खुशबू को कैद करती है।”
कामिनी ऐसे सिर हिला रही थी जैसे कोई शिष्या अपने गुरु से जीवन का पाठ पढ़ रही हो।
कादर मसाले डालता गया, और हर एक मसाले की खासियत को बताता गया.
ये दालचीनी है… मीठा स्वाद होता है, लेकिन तभी जब अच्छे से पकाया जाये,
मसाले का धीमी आंच पर पकना जरुरी है, तभी स्वाद आता है.
कादर की नजर कामिनी के स्तनो मे पनपी स्तनों की घाटी के बीच ही थी,
जितना धीमी आंच पर चलाओगे उतना ही रस छोड़ेंगे ये मसाले… उतना ही स्वाद आएगा खाने मे.
कामिनी समझ रही थी, उसे अपना जिस्म, उसने उठती भावनाये भागोने मे पड़े मसलो जैसी ही महसूस हो रही थी.
मसाले भुन चुके थे, प्याज़ सुनहरा हो गया था। अब बारी थी ‘मटन’ की।
कादर ने अपनी टी-शर्ट की बांहें ऊपर चढ़ाईं। उसकी कलाई की नसें और बांहों की मछलियां (Muscles) फड़क रही थीं।
मटन की भारी थाली कामिनी के दूसरी तरफ रखी थी।
उसे उठाने के लिए कादर को अपनी जगह से उठना पड़ा।
वह अपने पंजों के बल, उकड़ूँ (Squat Position) होकर बैठा।
उसका वह नीला पाजामा पहले ही उसकी भारी-भरकम जांघों और पेडू पर किसी गुब्बारे की तरह तना हुआ था। सिलाई का एक-एक धागा चीख रहा था।
कादर ने जैसे ही मटन उठाने के लिए अपने घुटने चौड़े किये और आगे झुका… कपड़े ने हार मान ली।
“ससससररर….. चररररर….!!”
सन्नाटे को चीरती हुई कपड़े फटने की वह आवाज़ किसी बम धमाके जैसी हुई।
पाजामा बिल्कुल बीचों-बीच (Crotch area) से, मूठ से लेकर नीचे तक फटता चला गया।
और उस फटे हुए पर्दे से…
कादर का विशाल, काला और भारी पौरुष आज़ाद होकर, एक झटके के साथ बाहर आ गिरा।
साथ में उसके विशाल और भारी अंडकोष (टट्टे ) भी लटक कर बाहर झूल गए।
कामिनी की नज़रें, जो मटन की थाली पर थीं, चुंबक की तरह खिंचकर सीधे वहां जा चिपकीं।
उसका मुंह खुला का खुला रह गया। सांस हलक में अटक गई।
कल रात उसने जो देखा था, वह दूर से और धुंधला था।
लेकिन अभी?
अभी वह ‘विशाल अजगर’ उसकी आँखों से मात्र 1 फ़ीट की दूरी पर था।
चूल्हे की आग की नारंगी और पीली रौशनी सीधे कादर के नंगे लंड पर पड़ रही थी, जिससे वह किसी काले सोने की तरह दमक रहा था।
वह पूरी तरह तना हुआ नहीं था, लेकिन ‘सुप्त अवस्था’ (Flaccid) में भी वह इतना मोटा और लंबा था कि उसका सिरा नीचे बिछि चटाई को चूम रहा था।
कामिनी की नज़रें उसकी बनावट पर अटक गईं।
उसका तना (Shaft) काला और नसों से भरा था, लेकिन उसका आगे का हिस्सा (Glans)…
खतने की वजह से वह ‘टोप’ पूरी तरह नंगा और खुला था।
आग की गर्मी और लटकने की वजह से उसमें खून का दौरा बढ़ गया था। वह गहरा लाल और जामुनी रंग का दिख रहा था।
वह सुपारी (Head) मशरूम की तरह फूली हुई थी और चमक रही थी।
उस नंगे, गीले और संवेदनशील हिस्से को इतनी पास से देखना… कामिनी को लगा जैसे उसने साक्षात किसी ‘दानव’ का रूप देख लिया हो।
उसके नीचे लटकते हुए टट्टे (Balls)…
साफ़, चिकने और भारी, वे कादर की जांघों के बीच एक भारी ‘पेंडुलम’ की तरह झूल रहे थे।
वह पूरा ‘पैकेज’ इतना विशाल और ‘जानवर जैसा’ था कि कामिनी की आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था।
कामिनी का दिल और उसकी योनि… दोनों एक साथ धड़क उठे।
“धक्… धक्… धक्…”
उसकी छाती में तूफ़ान आ गया।
और उसकी जांघों के बीच?
वहाँ बाढ़ (Flood) आ गई।
उस दृश्य ने उसके दिमाग को बाईपास (Bypass) कर दिया और सीधा उसकी कामुकता पर चोट की। उसकी पैंटी एक ही पल में गीली होकर चिपचिपी हो गई।
उसका मन हुआ कि वह हाथ बढ़ाए और उस ‘झूलते हुए लाल टोप’ को छूकर देखे… क्या वह वाकई इतना गरम है जितना दिख रहा है?
यह दृश्य मुश्किल से 10 सेकंड का रहा होगा, लेकिन कामिनी के लिए वक़्त थम गया था।
तभी कादर को अपनी जांघों के बीच शाम की ठंडी हवा का स्पर्श हुआ।
उसे लगा कुछ बहुत गलत हुआ है।
उसने नीचे देखा…
और उसका खून जम गया।
उसका ‘हथियार’… उसकी इज़्ज़त… सरेआम बाहर लटक रही थी। और सामने बैठी ‘कामिनी मैडम’ उसे ऐसे घूर रही थीं जैसे कोई भूखी शेरनी जवान हिरन को देखती है।
कादर शर्म और हड़बड़ाहट से पानी-पानी हो गया।
अभी-अभी जो इज़्ज़त और दोस्ती कमाई थी, वह इस फटे पाजामे ने तार-तार कर दी।
कादर ने मटन की थाली छोड़ दी।
उसने बिजली की रफ़्तार से अपनी दोनों जांघों को आपस में चिपका लिया और अपने हाथों से उस फटे हुए हिस्से को ढकने की नाकाम कोशिश की।
उसका चेहरा शर्म से झुक गया।
“ममम… माफ़… माफ़ करना मैडम…” कादर की आवाज़ कांप रही थी। “वो… वो पाजामा टाइट था… पता नहीं कब…”
कादर तुरंत चूल्हे की तरफ पलट गया और अपनी पीठ कामिनी की तरफ कर ली, ताकि वह उसे और न देख सके।
कामिनी के सामने से वह ‘हसीन और खतरनाक’ दृश्य गायब हो गया।
कादर की आवाज़ सुनकर वह भी नींद से जागी।
वह खुद बुरी तरह सकपका गई। उसका चेहरा शर्म से लाल टमाटर हो गया।
लेकिन उस शर्म में डर नहीं था… उस शर्म में एक गहरा और गंदा नशा था।
“उह… मैं…” कामिनी हकलायी।
उसने अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
“रुको… मैं लाती हूँ कुछ…”
कामिनी वहाँ एक पल भी और नहीं रुक सकती थी। उसकी धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि उसे लगा दिल फट जाएगा।
वह चटाई से उठी और तेज़ कदमों से, लगभग दौड़ते हुए घर की तरफ भागी।
उसकी सांसें “धौंकनी” की तरह चल रही थीं।
लेकिन भागते वक़्त भी… उसकी आँखों के सामने अन्धेरा नहीं था।
उसकी आँखों के सामने अभी भी आग की रौशनी में चमकता हुआ, कादर का वो ‘विशाल, नंगा और लाल टोपे वाला मोटा लंड ‘ लहरा रहा था।
वह छविउसके दिमाग में छप चुकी थी—हमेशा के लिए।
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कामिनी दौड़ती हुई बेडरूम में आयी और अलमारी के पास जाकर सांस लेने लगी।
उसका दिल घोड़े की रफ़्तार से दौड़ रहा था।
उसने झटके से अलमारी खोली और रमेश के कपड़ों को टटोलना शुरू किया।
एक पैंट… एक लोअर…
उसने रमेश का एक लोअर उठाया, लेकिन अगले ही पल उसे फेंक दिया।
‘बेकार है…’ कामिनी ने मन ही मन सोचा। ‘रमेश की कमर 32 है और उस… उस जानवर की कम से कम 36 होगी। रमेश के कपड़े तो उसकी जांघों पर चढ़ेंगे भी नहीं।’
कादर के जिस्म की विशालता का ख्याल आते ही कामिनी के पेट में फिर से मीठी गुदगुदी होने लगी।
उसकी नज़र अपनी साड़ियों के ढेर पर गई।
उसने एक सफ़ेद रंग का शिफॉन का दुपट्टा खींचा।
कपड़ा बेहद महीन और पारदर्शी था।
कामिनी ने उसे हाथ में लिया। ‘यह उसे ढक तो नहीं पाएगा… लेकिन शायद लपेटने के काम आ जाए।’
कामिनी वापस जाने के लिए मुड़ी, लेकिन फिर आईने के सामने रुक गई।
उसने खुद को देखा।
सांसें फूलने की वजह से उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
गाल तमतमाए हुए थे।
उसकी योनि में एक अजीब सी ‘कुलबुलाहट’ थी, जैसे कोई चीज़ वहां रेंग रही हो। उसे बार-बार कादर का वो ‘लाल, नंगा लटकता हुआ लंड ‘ याद आ रहा था।
‘अगर वो सोया हुआ इतना बड़ा था… तो खड़ा होकर कैसा लगेगा?’
यह जिज्ञासा उसे पागल कर रही थी। उसे उस ‘शक्ति’ का पूरा रूप देखना था।
कामिनी ने एक गहरी सांस ली।
उसने अपने कांपते हाथों को अपने ब्लाउज़ के गले (Neckline) पर रखा।
और धीरे से…
ऊपर का एक हुक (Button) खोल दिया।
हुक खुलते ही ब्लाउज़ का गला ढीला होकर और चौड़ा हो गया।
उसके भारी, सुडौल और गोरे स्तनों की गहरी घाटी (Cleavage) अब और भी ज्यादा नुमाया हो गई। पसीने की एक बूंद उसकी गर्दन से रपटते हुए उस घाटी में समा गई।
कामिनी ने खुद को निहारा। अब वह भूखी प्यासी शेरनी लग रही थी, जो अपने संभावित शिकार की ओर बढ़ना चाहती थी.
उसने दुपट्टा उठाया और वापस बाहर की तरफ चल दी।
जब कामिनी वापस पहुंची, कादर अपनी शर्मिंदगी छुपाने के लिए मटन में व्यस्त हो गया था।
वह एक हाथ से अपने फटे हुए पाजामे को जांघों के बीच दबाए हुए था, और दूसरे हाथ से कलछी चला रहा था।
चूल्हे की आग में मटन भुन रहा था, लेकिन कादर का ध्यान कहीं और था।
कामिनी उसके पास आई।
“ये लो…” कामिनी की आवाज़ में अब एक अलग ही भारीपन था। “इसे लपेट लो। अभी बाद में रमेश के आने पर कुछ और मंगाती हूँ।”
कामिनी ने वो सफ़ेद, मखमली दुपट्टा कादर की तरफ बढ़ा दिया।
कादर ने सिर उठाकर दुपट्टे को देखा, फिर कामिनी को।
उसने दुपट्टा थाम लिया।
कपड़ा बहुत ही मुलायम और पतला था।
जैसे ही कादर ने उसे अपने हाथो मे लिया, कमर पर बांधना चाहा… उसे एक महक आई।
मोगरे का इत्र और कामिनी के बदन की मादक खुशबू।
वह दुपट्टा कामिनी की अलमारी में उसके कपड़ों के साथ रखा था, इसलिए उसमें उसकी ‘महक’ बसी हुई थी।
कादर ने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं। उस खुशबू ने उसके नथुनों को भर दिया।
उसने धीरे से उस दुपट्टे को अपनी कमर पर चारो तरफ लपेट लिया।
और फटे हुए पाजामे को कामिनी के सामने ही नीचे सरकाते हुए अपने जिस्म से अलग कर साइड मे राख दिया.
सफ़ेद, नाज़ुक दुपट्टा उस काले, खुरदरे और पसीने से सने मर्द की कमर पर लिपट गया—जैसे कामिनी खुद उससे लिपट गई हो।
कामिनी वापस अपनी जगह, चटाई पर बैठ गई।
लेकिन इस बार… उसके बैठने का अंदाज़ बदल चुका था।
वह कादर के बिल्कुल सामने बैठी थी।
उसने जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू ढीला छोड़ दिया, जो उसके कंधे से सरक कर कोहनी पर आ गिरा।
और पल्लू के हटते ही…
ब्लाउज़ के उस खुले हुए बटन ने अपना काम कर दिया।
चूल्हे की आग की रौशनी सीधे कामिनी की छाती पर पड़ रही थी।
उसके स्तनों का 80% हिस्सा ब्लाउज़ से बाहर झांक रहा था।
गोरे, भरे हुए और पसीने से चमकते हुए उभार बस निप्पल ने ही कामिनी की इज़्ज़त को बचा रखा था, वो अभी भी ब्लाउज के महीन कपडे मे कैद थे, लेकिन उसकी उपस्थिति उसके कड़कपान से महसूस की जा सकता थी.
उसके स्तन सांस लेने की वजह से वे ऊपर-नीचे हो रहे थे।
उनकी गहराई… वह ‘घाटी’ इतनी गहरी और आमंत्रित करने वाली थी कि किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए।
कादर, जो मटन चला रहा था, उसकी नज़र वहां अटक गई।
उसका हाथ भगोने में ही रुक गया।
उसकी आँखें कामिनी के चेहरे से हटकर, उस ‘सफ़ेद मांस’ (White Flesh) पर गड़ गईं।
उसके गले से ‘घूँट’ निगलने की आवाज़ आई।
“गटक…”
कादर को अपनी जांघों के बीच, उस दुपट्टे के नीचे, एक जबरदस्त करंट महसूस हुआ।
उसका लंड, जो शर्मिंदगी की वजह से सिकुड़ गया था… अब उस नज़ारे को देखकर फनफनाने लगा।
उसमें खून दौड़ने लगा।
कादर ने महसूस किया कि उसका ‘औज़ार’ दुपट्टे के नीचे खड़ा हो रहा है, उस नाज़ुक कपड़े को तान रहा है।
उसका लाल, नंगा टोप अब दुपट्टे के कपड़े से रगड़ खा रहा था।
कामिनी ने देखा कि कादर की नज़रें कहाँ हैं।
उसने अपना पल्लू ठीक नहीं किया।
बल्कि उसने अपनी कमर को थोड़ा और सीधा किया, जिससे उसका सीना और आगे को उभर आया।
उसने अपनी नशीली आँखों से कादर को देखा, कादर की नजरें तो पहले से ही कामिनी पर टिकी हुई थी.
मौसम रूहानी हो गया था, सूरज की अंतिम रौशनी भी डूब गई थी, दोनों के जिस्म आग की पिली रौशनी मे नुमाया थे..
पीछे से आती आग की रौशनी मे कादर के खड़े लंड की छाया साफ साफ दिख रही थी, वो पल प्रति पल आकर मे बड़ा हो रहा था.
माहौल में अब सिर्फ़ मटन पकने की खुशबू नहीं थी, बल्कि दो जिस्मों के जलने की गंध भी थी।
आग की लपटें नाच रही थीं।
कादर का हाथ भगोने में मटन चला रहा था, लेकिन उसकी आँखें कामिनी की “खुली हुई घाटी” में भटक रही थीं।
उस सफ़ेद, महीन दुपट्टे के नीचे… उसका औज़ार अब पूरी तरह जाग चुका था।
वह दुपट्टे को तंबू की तरह आगे धकेल रहा था।
कपड़ा इतना पतला था कि उसके नीचे कादर के लिंग का काला तना और आगे का वह लाल टोप एक धुंधली परछाई की तरह साफ़ दिख रहा था। वह रह-रहकर फड़क रहा था, जैसे बाहर आने के लिए बेताब हो।
“म… मटन पकने वाला है मैडम,” कादर की आवाज़ भारी और फटी हुई थी। उसका गला सूख रहा था।
उसने भगोने से कलछी बाहर निकाली।
उसमें गाढ़ा, रसीला शोरबा (Gravy) और एक मांस का टुकड़ा था।
कादर ने अपनी हथेली पर थोड़ा सा शोरबा गिराया।
वह गरम था, लेकिन कादर को महसूस ही नहीं हुआ।
उसने अपना हाथ धीरे से कामिनी के चेहरे की तरफ बढ़ाया।
उसकी उंगलियां शोरबे में सनी हुई थीं।
“चखिये…” कादर ने कामिनी की आँखों में झांका। “देखिये, नमक बराबर है या नहीं?”
कामिनी की नज़रें कादर के लंड के उभार से फिसलकर उसकी उंगलियों पर आईं।
उन खुरदरे, बड़े और मर्दाने हाथों पर लगा वो लाल शोरबा।
कामिनी धीरे से आगे झुकी।
उसके झुकते ही उसका ब्लाउज़ और ढीला हो गया, और उसके स्तनों का मांसल उभार कादर की आँखों के बिल्कुल सामने आ गया।
कामिनी ने अपने होंठ खोले।
उसने कादर की तर्जनी (Index Finger) को अपने मुंह में लिया।
“स्स्स्लर्प…”
कामिनी ने कादर की उंगली को अपनी जीभ से चाटा।
वह शोरबा तीखा और नमकीन था… लेकिन उसमें कादर के पसीने और उसकी मर्दानगी का स्वाद भी मिला हुआ था।
कामिनी ने उसकी उंगली को अपने होंठों के बीच दबाया और धीरे से चूसा।
कादर के बदन में एक बिजली दौड़ गई।
“आह्ह्ह…” कादर के मुंह से सिसकी निकल गई।
उसे लगा जैसे कामिनी उसकी उंगली नहीं, बल्कि उसका लंड चूस रही हो।
कामिनी ने उंगली मुंह से निकाली। उसकी जीभ पर अभी भी सालन लगा था।
“बहुत… बहुत स्वादिष्ट है,” कामिनी ने कादर की आँखों में देखते हुए कहा। उसका इशारा मटन की तरफ कम और कादर की तरफ ज्यादा था।
“नमक तो ठीक है… लेकिन…”
कामिनी की नज़रें नीचे झुकीं।
सीधे कादर की कमर पर।
वहाँ उस सफ़ेद दुपट्टे के नीचे… वह ‘दानव’ अब बेकाबू हो रहा था। वह दुपट्टे को फाड़कर बाहर आने को तैयार था।
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आग की लपटें नाच रही थीं, और उनके बीच कामिनी कादर की उंगली को अपने मुंह में भरे हुए थी।
उसकी जीभ कादर की पोरों पर लगे सालन को चाट रही थी, लेकिन उसकी आँखों में जो भूख थी, वह मटन के लिए नहीं थी।
वह उसकी उंगली को चूसते हुए उसे ऐसे घूर रही थी, जैसे कह रही हो ‘मुझे उंगली नहीं, वो चाहिए जो नीचे लटक रहा है।’
कादर, जो अब तक थोड़ा झिझक रहा था, कामिनी का यह रूप देखकर समझ गया।
वह एक माहिर खिलाड़ी था। उसने औरतों की आँखों में हवस पढ़ी थी, लेकिन कामिनी की आँखों में तो समर्पण था।
कादर ने अपनी उंगली कामिनी के गीले और गरम मुंह से बाहर निकाली।
एक लिसलिसी लार की तार उसकी उंगली और कामिनी के होंठों के बीच खिंच गई।
“मसाला तो आपने चख लिया मैडम…” कादर की आवाज़ अब भारी और फटी हुई थी, जैसे कोई जानवर गुर्रा रहा हो।
“लेकिन असली स्वाद अभी बाकी है। रुकिए, आपको और स्वादिष्ट सूप चखाता हूँ।”
कादर अपनी जगह से हल्का सा ऊपर उठा।
उसने एक झटके में अपनी कमर पर बंधे उस सफ़ेद दुपट्टे की गांठ को खींच दिया।
“सर्रररर……”
रेशमी दुपट्टा उसकी कमर से फिसलकर नीचे चटाई पर जा गिरा।
और फिर… धमाका।
कादर का विशाल, काला और पूरी तरह से खड़ा 10 इंच का लंड स्प्रिंग की तरह उछलकर कामिनी के चेहरे के बिल्कुल सामने आ गया।
वह हवा में ऐसे लहराया जैसे कोई कोबरा फन फैलाकर खड़ा हो गया हो।
कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
कल रात और अभी थोड़ी देर पहले जो दिखा था, वह ‘झांकी’ थी। यह ‘विश्वरूप’ था।
वह लंड रघु के औज़ार से भी कहीं ज्यादा मोटा और लंबा था।
उसका तना (Shaft) लोहे की रॉड जैसा सख्त था, जिस पर मोटी-मोटी नसें तनी हुई थीं।
और उसका आगे का हिस्सा…
खतने की वजह से उसका विशाल, लाल और मशरूम जैसा सुपाड़ा (Glans) पूरी तरह नंगा था। वह इतना चौड़ा था कि कामिनी सोचने लगी कि यह मेरे मुंह में समाएगा भी या नहीं।
कामिनी अभी उस विशालता को देखकर सम्मोहन में थी ही कि कादर ने कुछ ऐसा किया जिसने उसे हिला कर रख दिया।
कादर ने भगोने से कलछी उठाई।
उसमें से भाप निकल रही थी। गरम, मसालेदार और लाल तरी (Gravy) कलछी में भरी हुई थी।
कादर ने कामिनी की आँखों में देखा और मुस्कुराया।
और अगले ही पल…
उसने वह खौलता हुआ मसालेदार सूप अपने खड़े और नंगे लंड पर उंडेल दिया।
“छनन्नन्न……!!”
गरम तेल और मसालों की धार सीधे उसके नंगे लाल सुपाड़े पर गिरी और वहां से फिसलकर उसके नसों भरे तने और अंडकोषों पर बहने लगी।
सूप गरम था, बहुत गरम।
आम इंसान चीख पड़ता।
लेकिन कादर? कादर ने उफ़ तक नहीं की।
उल्टा, उस जलन और गर्मी ने उसके लंड को और भी ज्यादा पत्थर जैसा सख्त कर दिया।
लाल तरी (Gravy) उसके काले लंड पर बह रही थी, जिससे वह और भी ज्यादा चमकदार, रसीला और खतरनाक लग रहा था। तेल की बूंदें उस लाल टोप से टपक रही थीं।
कादर ने अपनी कमर को एक झटका दिया और अपने उस ‘सूप से नहाए हुए’ लंड को कामिनी के होंठों से इंच भर की दूरी पर ले आया।
उससे मटन, मसालों और कादर के पौरुष की मिली-जुली महक आ रही थी।
“अब चख के बताइये मैडम…” कादर ने चुनौती दी। “मसाला ठीक है? नमक ज्यादा तो नहीं?”
कामिनी पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थी। उसने ऐसा अहसास, ऐसे सख्त मर्द की कल्पना भी नहीं की थी.
उसकी योनि से इतना पानी बह रहा था कि वह चटाई पर फिसल रही थी।
उसके सामने एक गरम, मसालेदार और मांसल लॉलीपॉप था।
वह खुद को रोक नहीं पाई।
उसने अपने खूबसूरत, लाल होंठों को पूरा खोल दिया।
उसके होंठ कांप रहे थे, फड़फड़ा रहे थे।
कादर ने देखा कि शिकार तैयार है।
उसने अपनी कमर को आगे धकेला।
“धप्प…”
उसका विशाल, गरम और चिकना सुपाड़ा (Tip) कामिनी के खुले होंठों से टकराया।
कामिनी को अपने होंठों पर आग और मांस का अहसास हुआ।
उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और उस मसालेदार टोप को चाट लिया।
“स्स्स्लर्प…”
तीखे मसालों का स्वाद और कादर की नमकीन त्वचा का स्वाद… यह नशा कामिनी के दिमाग को चढ़ गया।
उसने अपना मुंह और चौड़ा किया, अपनी जबड़े की हड्डियों को पूरा खोल दिया।
कादर ने धीरे से दबाब बनाया।
वह मोटा, लाल सुपाड़ा कामिनी के दांतों को पार करते हुए उसके मुंह में घुसता चला गया।
कामिनी का मुंह छोटा पड़ रहा था, उसका गला भर गया था।
लेकिन वह उसे लेती गई… लेती गई…
उसका मुंह उस कसैले, मसालेदार और गरम लंड से भर गया।
कादर के मुँह से एक गहरी गुरराहट निकली— “आआआह्ह्ह्ह…. कामिनी….”
कामिनी की जीभ पागलों की तरह उस गरम लंड के नीचे की नसों को और उस सूप के स्वाद को चाटने लगी। उसकी नजरें कादर के वासना से भरे चेहरे पर टिकी हुई थी, आग की लाल रौशनी मे कामिनी का चेहरा दमक रहा था.
मटन सूप अब भगोने में नहीं… कामिनी के मुंह और कादर के लंड के बीच पक रहा था।
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चूल्हे की आग धीमी हो चुकी थी, लेकिन मटन के भगोने में “खदबद-खदबद” की आवाज़ जारी थी।
और ठीक वैसी ही, बल्कि उससे भी ज्यादा गीली और गंदी आवाज़ कामिनी के मुंह से आ रही थी।
“फच्… फच्… ग्लोप… स्लर्प…”
कामिनी, जो अब चटाई पर घुटनों के बल आ गई थी, कादर के उस विशाल, मसालेदार और लोहे जैसे सख्त लंड से जूझ रही थी।
शुरुआत में उसे बहुत मुश्किल हुई।
कादर का ‘औज़ार’ इतना मोटा था कि कामिनी के जबड़े दुखने लगे थे। वह उसके मुंह में समा ही नहीं रहा था।
उसका लाल, नंगा और चौड़ा टोप (Head) बार-बार कामिनी के दांतों से टकरा रहा था।
लेकिन कामिनी अब वो सभ्य घरेलु महिला नहीं थी, वो प्यासी शेरनी बन चुकी थी।
उसने अपनी जीभ से उस मटन सूप के जायके और कादर के पौरुष के स्वाद को चाटा, जिससे उसका मुंह लिसलिसा हो गया।
और फिर… उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस ‘मूसल’ को अंदर खींचना शुरू किया।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, कामिनी की लय (Rhythm) बनती गई।
उसने अपने गालों को पिचकाया और एक वैक्यूम (Vacuum) बनाया।
“सुऊऊऊप्प…”
कादर का वह 10 इंच का राक्षस, कामिनी के गीले, गरम और तंग हलक में सरकता चला गया।
कामिनी का गला घुट रहा था, आँखों से पानी बह रहा था, नाक से सांस लेना मुश्किल हो रहा था… लेकिन वह रुक नहीं रही थी।
उसे वो ‘ठूंसने’ का अहसास पागल कर रहा था।
हर बार जब कादर का वो मसालेदार टोप उसके गले की घंटी (Uvula) से टकराता, कामिनी को उबकाई आती, लेकिन वह उसे दबाकर और जोर से चूसती।
कामिनी का मुंह पूरी तरह भरा हुआ था, इसलिए वह अपनी लार (Saliva) निगल नहीं पा रही थी।
उसके मुंह के कोनों से गाढ़ी, लिसलिसी और चिपचिपी राल (Drool) की धार बह निकली।
वह राल कादर के काले लंड पर तेल की तरह फिसलती हुई नीचे गिरी…
सीधे उसके विशाल, लटकते हुए अंडकोषों (टट्टो) पर।
कादर के टट्टे, जो पहले से ही पसीने और सूप की बूंदों से सने थे, अब कामिनी की गरम थूक से नहा गए।
कामिनी ने एक पल के लिए लंड को मुंह से बाहर निकाला— “प्लॉप!”
एक लंबी तार लंड और उसके होंठों के बीच खिंच गई।
सांस लेने के लिए नहीं… बल्कि उन टट्टों का इन्साफ करने के लिए।
कामिनी ने अपना चेहरा नीचे झुकाया।
उसने कादर के उन भारी-भरकम, साफ़-चिकने और गीले ‘अंडों’ को अपनी हथेलियों में भरा।
वे गरम थे और भारी थे।
कामिनी ने अपनी जीभ निकाली और उन टट्टों को चाटना शुरू किया।
नीचे से ऊपर तक… जैसे कोई बच्चा आइसक्रीम चाटता है।
फिर उसने एक पूरा अंडकोष अपने मुंह में भर लिया और उसे चूसने लगी।
“स्स्स्लर्प… हम्मम्म…”
वह उन्हें चूम रही थी, चाट रही थी, अपने गालों से रगड़ रही थी।वह पूरी तरह पागल और वहशी हो गई थी। उसे कादर के जिस्म का हर एक हिस्सा अपने मुंह में चाहिए था।
और कादर?
कादर खान अपनी जगह पर किसी पहाड़ की तरह जमा खड़ा था।
उसकी टांगें चौड़ी थीं, ताकि कामिनी को खेलने के लिए पूरी जगह मिल सके।
उसकी आँखें आधी बंद थीं, और मुंह से “सी… सी…” की सिसकारी निकल रही थी।
लेकिन उसका ध्यान… अभी भी अपने ‘काम’ पर था।
हवस और वासना के इस तूफ़ान के बीच भी, कादर ने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं छोड़ी थी।
उसका एक हाथ (बायां हाथ) कामिनी के रेशमी बालों में उलझा हुआ था, जो उसके सिर को अपने लंड पर दबा रहा था।
लेकिन उसका दूसरा हाथ (दायां हाथ)… करछी चला रहा था।
कादर बीच-बीच में भगोने में करछी घुमाता, मटन को जलने से बचाता, और फिर अपनी कमर को कामिनी के मुंह में धकेल देता।
कादर पाक कला और यौनकला मे माहिर जान पड़ता था, उसे अहसास था समय के साथ पकवान को चलाया ना जाये तो वो जल जाता है.
यह दृश्य अद्भुत था।
ऊपर एक आदमी मटन पका रहा है… और नीचे एक औरत उसका ‘मीट’ खा रही है।
कादर ने करछी चलाते हुए नीचे देखा।
कामिनी की हालत ख़राब थी—बाल बिखरे हुए, काजल फैला हुआ, मुंह थूक से सना हुआ, और वह पागलों की तरह उसके लंड पर सिर पटक रही थी।
कादर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई।
“आराम से मेरी जान… आराम से…” कादर ने कामिनी के बालों को सहलाया, और फिर करछी से मटन को पलटा।
“मटन अभी कच्चा है… लेकिन मेरा तो तुमने पूरा पका दिया है।”
कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने बस ऊपर देखा… उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं।
और उसने दोबारा अपना मुंह खोला और उस विशाल खंभे को जड़ तक अपने अंदर समा लिया।
“ग्लोप… ग्लोप… ग्लोप…”
अब उसे किसी के आने का डर नहीं था, रमेश का डर नहीं था… उसे बस यह लंड चाहिए था, अभी और इसी वक़्त।
भगोने में मटन पक चुका था, लेकिन बाहर जो ‘पक’ रहा था, वह अब जलने की कगार पर था।
कादर का विशाल शरीर कांपने लगा था।
उसकी जांघें थरथरा रही थीं।
कामिनी के मुंह का वह वैक्यूम (Vacuum) और उसकी जीभ की वो सर्कुलर मोशन कादर की बर्दाश्त के बाहर हो रही थी।
उसका 10 इंच का काला लोहा अब कामिनी के हलक की गहराई नाप रहा था।
उस पर लगा मटन सूप, कामिनी की लार, और कादर का अपना प्री-कम (Pre-cum)… सब मिलकर एक चिकना लुब्रिकेंट बन गए थे।
“फच्… फच्… ग्लोप…!”
कादर के मुंह से अब सिसकियों की जगह गुर्राहट निकल रही थी।
“ओह्ह्ह… कामिनी… बस… बस अब… मैं गया… मैं गया…”
कादर का हाथ कामिनी के बालों को जोर से भींच रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि उसका लावा अब नसों से होता हुआ ऊपर चढ़ रहा है।
वह फटने वाला था। वह अपनी “सफेद मलाई” कामिनी के हलक में भरने ही वाला था।
और नीचे?
कामिनी की हालत उससे भी बुरी थी।
उसका एक हाथ कादर की जांघ पर था, और दूसरा हाथ… अपनी साड़ी के अंदर।
वह घुटनों के बल बैठी थी, और उसका बायां हाथ अपनी दोनों जांघों के बीच तेज़ी से चल रहा था।
वह अपनी साड़ी के ऊपर से ही अपनी उभरी हुई योनि (Clitoris) को पागलों की तरह रगड़ रही थी।
उसके मुंह में कादर का लंड था, और नीचे उसकी उंगलियां।
दोहरी मार।
उसका पूरा शरीर अकड़ गया था। उसकी योनि संकुचित (Contract) हो रही थी। वह भी बस कुछ ही पलों में झड़ने (Climax) वाली थी।
दोनों एक साथ उस ऊंचाई पर थे जहाँ से गिरने पर सिर्फ़ मोक्ष मिलता है।
अगले 10 सेकंड में कादर की पिचकारी छूटने वाली थी और कामिनी की चीख निकलने वाली थी।
लेकिन तभी…
“धड़ड़ड़ड़ड़…….धड… धड… धड…. पी… पी… पो… पो….!!”
सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी और कर्कश आवाज़ आई।
घर के मुख्य लोहे के गेट को किसी ने ज़ोर से धक्का देकर खोला था।
और उसके तुरंत बाद…
“घुर्र्र्र्र्र्र…….. पीं पीं!!”
एक भारी डीज़ल इंजन की गड़गड़ाहट और जीप का तेज़ हॉर्न।
वह आवाज़ स्टोर रूम के पिछवाड़े तक साफ़ सुनाई दी।
वह किसी आम कार की आवाज़ नहीं थी। वह पुलिस जीप की जानी-पहचानी, डरावनी आवाज़ थी।
शमशेर और रमेश आ गए थे।
उस आवाज़ ने उन दोनों के ऊपर बर्फ का ठंडा पानी डाल दिया।
कादर, जो झड़ने ही वाला था, एक पल के लिए पत्थर (Freeze) हो गया।
कामिनी, जो अपनी योनि रगड़ रही थी, उसका हाथ वहीं रुक गया।
एक सेकंड का सन्नाटा छाया रहा… जिसमें सिर्फ़ उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं।
फिर हकीकत ने जोर का झटका दिया।
“धम्म!!” (कार का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़)।
और फिर रमेश की आवाज़ गूंजी “अरे बंटी! गेट खोल बेटा… कामिनी कहाँ हो भई, दरवाजा खोलो…”
रमेश गार्डन से होता बंगले के मैन गेट को बाजा रहा था.
कामिनी की आँखों में नशा तुरंत डर में बदल गया।
उसने झटके से अपना मुंह पीछे खींचा।
“प्लॉप!”
कादर का विशाल, गीला और लाल लंड कामिनी के मुंह से बाहर निकल आया।
कामिनी के मुंह से और कादर के टोप से एक लंबी, गाढ़ी और चमकदार लार की तार जुड़ी हुई थी, जो खिंचती चली गई और अंत में टूटकर कादर के लटकते हुए टट्टों पर गिर गई।
कादर का लंड अभी भी लोहे की तरह खड़ा था। वह अभी भी चरम (Climax) पर था, उसे शांत होने में वक़्त लगता।
वह हवा में झूल रहा था, थूक और सूप से सना हुआ, कामिनी की तरफ इशारा करता हुआ।
कामिनी हड़बड़ाकर खड़ी हो गई।
उसकी टांगें कांप रही थीं। उसका ब्लाउज़ अभी भी खुला था, पल्लू गिरा हुआ था, और चेहरे पर “चूसने” के निशान थे—होंठ सूजे हुए और लाल।
“वो… वो आ गए…” कामिनी ने हांफते हुए फुसफुसाया। “रमेश… और शमशेर…”
उसने जल्दी से अपना पल्लू उठाया और अपने खुले हुए स्तनों को ढका।
उसने अपने होंठों को पल्लू से ज़ोर से पोंछा, ताकि कादर की लार और मटन सूप का निशान मिट जाए।
कादर भई सकपका गया, वो कितना ही बड़ा गुंडा हो लेकिन इस हालात मे पकडे जाने का अंजाम वो जनता था.
उसका 10 इंच का तंबू अभी भी खड़ा था। और उसने पहना क्या था? सिर्फ़ एक पारदर्शी सफ़ेद दुपट्टा।
अगर रमेश या शमशेर अभी यहाँ आ जाते, तो सब कुछ साफ़ दिख जाता, ऊपर से उसका खड़ा वो काला नाग।
उसे दर्द हो रहा था।
रुका हुआ वीर्य उसके अंडकोषों में दर्द पैदा कर रहा था। इसे ‘Blue Balls’ का दर्द कहते हैं।
“उफ्फ्फ…” कादर ने अपने लंड को मुट्ठी में भींच लिया।
“साला… इसी टाइम पर मरना था इनको…” कादर बड़बड़ाया।
“तुम… तुम संभालो…” कामिनी ने हड़बड़ाहट में कहा।
“मैं… मैं जाती हूँ, मै अंदर देखती हूँ…”
कामिनी ने एक आखिरी बार कादर के उस गीले, खड़े और अतृप्त (Unsatisfied) लंड को देखा।
उसकी आँखों में एक टीस थी— ‘काश 1 मिनट और मिल जाता…’
कामिनी अपने बाल ठीक करती हुई, अपनी साड़ी संवारती हुई, तेज कदमों से घर के पिछले दरवाज़े की तरफ भागी।
उसे अब रमेश और शमशेर का सामना करना था।
और कादर?
कादर वहीं खड़ा था… हाथ में करछी, कमर पर दुपट्टा, और जांघों के बीच एक आग का गोला लिए।
कामिनी भागती हुई पिछले गेट से अंदर पहुंची ही थी, बंटी भागता हुआ, छत से नीचे सीढिया उतरता हुआ आ रहा था.
कमीनी की नजरें बंटी से मिली, कामिनी की हालात ख़राब थी, उसके चेहरे पे हवाइया उडी हुई थी.
“आप आपने कमरे मे जाओ, मै दरवाजा खोलता हूँ ”
बंटी के अस्वसन से कामिनी हक्की बक्की रह गई, इसका मतलब बंटी छत से सब कुछ देख रहा रहा..
खेर अभी वक़्त नहीं था ये सब सोचने का, कामिनी अपने रूम मे पहुंच सीधा बाथरूम मे घुस गई.
कामिनी ने बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और अपनी पीठ उससे टिका दी।
उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। “हमफ़्फ़्फ़… हमफ़्फ़्फ़… हमफ़्फ़्फ़……..”
उसका पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था, लेकिन यह पसीना गर्मी का नहीं, चरम उत्तेजना का था।
एक चोर चोरी कर के भागा था.
कामिनी लड़खड़ाते कदमों से वॉशबेसिन के पास गई और आईने में अपनी शक्ल देखी।
उसका चेहरा… वह पहचान नहीं पा रही थी कि यह वही ‘कामिनी’ है।
उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं, पुतलियां फैली हुई थीं, और गाल टमाटर की तरह लाल थे।
लेकिन सबसे बुरी हालत उसके होंठों की थी।
कादर के उस खुरदरे, मोटे और विशाल लंड को इतनी देर तक चूसने की वजह से उसके होंठ सूजकर मोटे हो गए थे। वे कांप रहे थे।
कामिनी ने अपनी उंगली अपने निचले होंठ पर फेरी।
उसे वहां अभी भी कादर के लंड की गरमाहट और उस मसालेदार सूप का कसैला स्वाद महसूस हो रहा था।
“कादर…” कामिनी के मुंह से एक आह निकली।
उसकी नज़र अपनी छाती पर गई।
उसका ब्लाउज़ पसीने से चिपक गया था।
अंदर, उसके भारी स्तन फूलकर सख्त हो गए थे।
उत्तेजना के कारण उसके स्तनों पर नीली नसें उभर आई थीं, जो उसकी गोरी त्वचा के नीचे साफ़ चमक रही थीं।
निप्पल इतने सख्त हो गए थे कि ब्लाउज़ के कपड़े में चुभ रहे थे।
उसे अपने स्तनों में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था, जैसे वे किसी के मज़बूत हाथों का इंतज़ार कर रहे हों। वो मर्दाने हाथ जो कस कस के उसके स्तनों को भींचे उसका सारा दर्द निकाल दे.
और नीचे… उसकी योनि?
वह तो रो रही थी।
कामिनी की जांघों के बीच एक अजीब सी फड़कन (Throbbing) हो रही थी।
उसकी योनि की दीवारें बार-बार सिकुड़ रही थीं और फैल रही थीं— “धक्-धक्… धक्-धक्…”
वह अधूरी रह गई थी। वह उस मुकाम पर थी जहाँ से लौटना नामुमकिन होता है।
उसकी योनि चीख-चीख कर “लंड” मांग रही थी—मोटा, सख्त और भरने वाला।
कामिनी ने ठंडा पानी अपने चेहरे पर मारा, लेकिन अंदर का ज्वालामुखी शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वह हताश होकर आईने को घूरने लगी।
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उधर बाहर हॉल में, रमेश अपनी ही धुन में था।
रमेश को रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि उसकी बीवी कहाँ गायब हो गई। उसे बस अपनी दारू और मटन की पड़ी थी। उसने एक बार भी नहीं पूछा— “कामिनी कहाँ है? ठीक तो है?
बंटी ने दरवाजा खोला था,
उसकी नज़रें मोबाइल स्क्रीन पर गड़ी थीं, उंगलियां तेज़ी से गेम खेल रही थीं।
“अरे सुन.. वो… बहार… कुर्सी….” रमेश के शब्द मुँह मे ही बंद हो गए.
बंटी ने अपने बाप को देखा तक नहीं, और बिना कुछ बोले पलटकर वापस अपने कमरे की तरफ चल दिया।
उसे अपने बाप, उसके शराबी दोस्त, या अपनी माँ की ‘हरकतों’ से कोई मतलब नहीं दिख रहा था—या शायद वह सब जानकर भी अनजान बना हुआ था।
रमेश बड़बड़ाया, “साला… आजकल की औलाद…” और खुद ही कुर्सी उठाने लगा। शमशेर ने भी हाथ बटाया.
बगीचे में, उसी चूल्हे और आग के पास, जहाँ थोड़ी देर पहले ‘रासलीला’ हुई थी, अब महफ़िल जम रही थी।
रमेश और शमशेर ने प्लास्टिक की कुर्सियां आग के पास लगा ली थीं।
शमशेर ने गर्मी और ‘माहौल’ बनाने के लिए अपनी पुलिस की वर्दी उतार दी थी।
वह अब सिर्फ़ अपनी सफ़ेद बनियान और खाकी पैंट में बैठा था।
उसका गठीला, कसरती बदन और चौड़ा सीना बनियान में साफ़ दिख रहा था। उसके डोले (Biceps) रमेश के थुलथुले शरीर के सामने लोहे जैसे लग रहे थे।
शमशेर ने व्हिस्की की बोतल खोली और दो गिलास बनाए।
और कादर खान?
कादर की हालत ‘सांप-छछूंदर’ जैसी थी।
उसने कामिनी का दिया हुआ सफ़ेद दुपट्टा जल्दी से खोलकर एक कोने में छुपा दिया था, क्योंकि अगर वह दुपट्टा रमेश देख लेता तो सवाल खड़े हो जाते।
लेकिन अब समस्या यह थी कि उसका पाजामा तो अभी भी फटा हुआ था।
और उसका लंड… वह अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था। वह अर्ध-जागृत (Semi-hard) अवस्था में था और फटे हुए कपड़े से बाहर झांकने को बेताब था।
कादर ने एक हाथ में मटन का भगोना पकड़ा हुआ था, और दूसरे हाथ से अपनी पाजामे को जांघों के बीच भींचकर पकड़ रखा था।
वह अपनी टांगें सिकोड़कर, छोटे-छोटे कदम बढ़ाता हुआ चल रहा था, ताकि उसका ‘खुला हुआ राज़’ किसी को न दिखे।
“अरे कादर भाई! लाओ लाओ…” रमेश ने आवाज़ दी। “खुशबू से ही नशा हो रहा है।”
कादर धीरे से आया और टेबल की आड़ लेकर खड़ा हो गया, ताकि उसका निचला हिस्सा टेबल के पीछे छुप जाए।
उसने मटन का भगोना टेबल पर रखा।
उसकी नज़र शमशेर पर पड़ी।
शमशेर बनियान में बैठा सिगरेट फूंक रहा था। उसकी नज़रें कादर पर नहीं, बल्कि घर के दरवाज़े पर थी, शायद कमीनी की तलाश मे था.
एक तरफ कादर अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) बचा रहा था, दूसरी तरफ कामिनी बाथरूम में अपनी आग बुझाने का विचार कर रही थी, जिस्म मे फट पड़ने को बेताब ज्वालामुखी को दबा रही थी.
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बाहर बगीचे में आग जल रही थी।
रमेश ने मटन सूप का कटोरा मुंह से लगाया।
“सुऊऊऊप्प… सुड़पपप्पाप्प्पप….”
उसने एक बड़ा घूंट भरा। गरम, मसालेदार और रसीला शोरबा उसके गले से नीचे उतरा।
रमेश की आँखें फैल गईं।
“वाह! वाह भाई वाह!” रमेश चिल्लाया। “कादर… क्या जादू है तेरे हाथों में यार! कसम से, ऐसा स्वाद आज तक नहीं आया। एकदम… एकदम अलग ही नशा है इसमें, तुझे घर पर छुपा के रखने का अच्छा ईनाम दिया तूने”
“शुक्रिया साब ” कादर, जो टेबल की आड़ में अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) छुपाए खड़ा था, फीका सा मुस्कुराया।
उसने दबी हुई आवाज़ में कहा, “साब वो कुछ खबर लगी? छापा क्यों पड़ा था, किसने खबर दी ”
कादर ने शमशेर की तरफ उत्सुकता से पूछा, जैसे जानना चाहता था उसके पास कितना वक़्त है.
तभी पीछे से आहट हुई।
कामिनी सामने दरवाज़े से बाहर चली आ रही थी, बलखाती कमर मटकाती, पीछे से आती दूधिया रौशनी मे उसका कामुक जिस्म साफ झलक रहा था,
रमेश की पीठ उसकी तरफ थी लेकिन शमशेर और कादर इस अद्भुत नज़ारे का लुत्फ़ उठाया रहे थे.
उसने अपना चेहरा धो लिया था, बाल ठीक कर लिए थे, लेकिन साड़ी का पल्लू अभी भी सरका ही हुआ था, या यूँ कहिये उसने इसे ठीक करने की जरुरत ही नहीं समझी।
हाथ में पानी की बोतल और सलाद की प्लेट थी।
रमेश ने कामिनी को देखा।
“अरे कामिनी! आ भई… देख क्या चीज़ बनाई है कादर ने। अमृत है अमृत! तू भी ले एक कटोरी।”
कामिनी की सांस अटक गई।
उस सूप को पीना तो दूर, उसे देखकर ही कामिनी को अपनी जांघों के बीच गीलापन महसूस होने लगा। उसे याद आ गया कि कैसे वह सूप कादर के लाल टोप पर बह रहा था।
“न… नहीं,” कामिनी हकलायी। “म… मैंने चख लिया था। आप लोग खाओ।” कामिनी ने जिस तरीके से इस सूप को चखा था शायद ही और किसी औरत ने चखा हो.
कामिनी आगे बढ़ी और टेबल पर सलाद रखने लगी।
तभी उसे एक तीखी नज़र का अहसास हुआ।
सामने शमशेर बैठा था।
उसने अपनी वर्दी उतार दी थी। वह सिर्फ़ सफ़ेद बनियान में था।
आग की रौशनी में शमशेर का चौड़ा सीना, उसके बांहों के कसे हुए डोले और उसकी मोटी गर्दन साफ़ दिख रही थी। रमेश का शरीर ढीला-ढाला था, लेकिन शमशेर का शरीर कसा हुआ (Tight) और ताकतवर था।
शमशेर के हाथ में व्हिस्की का गिलास था, लेकिन उसकी नज़रें गिलास पर नहीं, कामिनी पर थीं।
उसकी बाज़ जैसी नज़रें कामिनी के चेहरे पर गड़ गईं।
उसने देखा…
वो कामिनी के हुस्न को बारीकी से निहार रहा था.
उसकी फूली हुई सांसें…
और सबसे अहम्… उसके सूजे हुए, लाल और कांपते होंठ।
शमशेर, जो एक पुराना पुलिस वाला था, औरतों की ‘बॉडी लैंग्वेज’ पढ़ना बखूबी जानता था।
उसने एक घूंट भरा और कामिनी की आँखों में सीधा देखा।
“भाभी जी…” शमशेर की आवाज़ भारी और गहरी थी। “आज आप बहुत थकी हुई लग रही हैं। होंठ भी सूज गए हैं… क्या मटन ज्यादा तीखा था?”
शमशेर के इस सवाल में एक चिंगारी थी।
कामिनी का दिल धक से रह गया। उसे लगा शायद शमशेर ने उसे वहाँ से भाग कर जाता देख लिया है।
“व… वो… बस गर्मी बहुत है,” कामिनी ने नज़रें चुरा लीं।
शमशेर मुस्कुराया।
जवाब मे कामिनी भी काँखियो से कादर की तरफ देख शमशेर को देख मुस्कुरा दी.
कादर अभी भी जाँघे दबाये खड़ा था.
“सुनिए आपके पुराने कपडे इसे दे दूँ क्या?” कामिनी ने रमेश के कंधे पर हाथ रख पूछा.
“मेरे कपडे कादर को कहाँ से आएंगे, देख उसे एक बार, साला राक्षस जैसा है ” रमेश हस पड़ा.
कामिनी जाने को ही थी की.
“अच्छा सुन वो एक दो पुरानी लुंगी होंगी वो दे दे, क्यों भाई कादर काम चला अभी कल देखते है तेरे लिए कोई कपडे ”
रमेश ने बेपरवाही से कहाँ.
उसने कादर को देखा तक नहीं, वो दारू और मटन सूप पीने में मगन था।
“आओ मै देती हूँ ” कामिनी आगे बढ़ चली पीछे पीछे कादर कामिनी की मादक गांड को निहारता चल पड़ा, चल क्या पड़ा जैसे उसकी गांड ने खिंच लिया हो.
तभी शमशेर ने रमेश के गिलास में और शराब डाल दी—बिना पानी के। “ले.भाई…. आज जी भर के पी। साला घर मे ऐसा मजा फिर कब मिलेगा,
शमशेर की कुटिल, चालक पोलीसिया नजरें कामिनी और कादर को अलग ही नजर से देख रही थी.
रमेश ने वह कड़क पेग एक सांस में गटक लिया।
शराब और कबाब का दौर चलने लगा.
कामिनी तेज़ कदमों से अपने बेडरूम में दाखिल हुई। उसके पीछे-पीछे कादर खान किसी साये की तरह अंदर आ गया।
कामिनी ने दरवाज़ा तो नहीं लगाया (ताकि शक न हो), लेकिन उसे हल्का सा भिड़ा दिया।
कमरे में सफ़ेद ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
बाहर की पीली आग की रौशनी के मुकाबले यहाँ सब कुछ साफ़, नंगा और सच दिख रहा था।
कामिनी अलमारी की तरफ लपकी और एक पुरानी चेकदार लुंगी निकाल लाई।
वह पलटी, “ये लो कादर… इसे…”
लेकिन उसके शब्द गले में ही अटक गए।
कादर ने लुंगी पकड़ने का इंतज़ार नहीं किया था।
उसने कामिनी के पलटते ही, अपने उस फटे हुए पाजामे को एक झटके में नीचे सरका दिया था।
वह बेडरूम के बीचों-बीच, सफ़ेद रौशनी में कमर के नीचे नंगा खड़ा था।
कामिनी की नज़रें सीधे उसके पैरों के बीच गड़ गईं।
बाहर तो अँधेरा था, लेकिन यहाँ ट्यूबलाइट की रौशनी में वह ‘राक्षस’ और भी डरावना और लुभावना लग रहा था।
उसका 10 इंच का काला, नसों भरा लंड अभी भी पूरी तरह तना हुआ था।
उसके लाल और नंगे टोप (सुपाड़े) पर अभी भी कहीं कहीं मटन सूप की चिकनाई और कामिनी की लार चमक रही थी। वह गीला था और फनफना रहा था।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
उसका गला सूख गया, लेकिन जांघों के बीच सुनामी आ गई।
वह उस काले खंभे की तरफ खिंची चली गई। उसे बस उसे छूना था, अपनी मुट्ठी में भरना था।
कामिनी ने कांपते हाथों से लुंगी बेड पर फेंकी और कादर की तरफ बढ़ी।
उसका हाथ उस सलामी देते हुए टोप को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा।
लेकिन तभी…
“खटाक!”
कादर ने हवा में ही कामिनी की कलाई थाम ली।
उसकी पकड़ लोहे जैसी मज़बूत थी।
कामिनी ने हैरान होकर कादर के चेहरे को देखा। कादर की आँखों में हवस की आग थी, लेकिन साथ ही एक जिद भी थी।
“रुको मैडम…..” कादर की आवाज़ भारी और मर्दाने गुरूर से भरी थी।
“अभी नहीं… तूने मेरा चखा है, अब मेरी बारी है।”
कामिनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही कादर ने उसे एक झटके से अपनी तरफ खींचा और अगले ही पल…
“धप्प!!”
कादर ने कामिनी को, उसकी साड़ी समेत, पीछे बेड पर धक्का दे दिया।
कामिनी का भारी बदन गद्दे पर गिरा। स्प्रिंग चरचरा उठे।
गिरते ही कामिनी की साड़ी और पेटीकोट घुटनों से ऊपर सरक गए।
उसने पैंटी नहीं पहनी थी, वो इतनी गीली हो चुकी थी की उसे उतार देना ही कामिनी को उचित लगा था.
कामिनी ने अपनी टांगें सिकोड़नी चाहीं, लेकिन कादर ने उन्हें अपने मज़बूत हाथों से पकड़कर चौड़ा कर दिया।
बेड की सफ़ेद चादर पर कामिनी की गोरी, मांसल और भरी हुई जांघें फैल गईं।
और उन दोनों जांघों के बीच…
उसकी गुलाबी, सूजी हुई और रस टपकाती योनि कादर के सामने बेपर्दा थी।
वह पूरी तरह गीली थी।
उसके गुलाबी होठ (Labia) बाहर की तरफ उभरे हुए थे और उनमें से कामिनी का पारदर्शी पानी (Lubrication) रिसकर जांघों पर बह रहा था।
वह मंज़र देखकर कादर पागल हो गया।
“आह्ह्ह… क्या माल है…” कादर बड़बड़ाया।
“वक़्त कम है मेरी जान… लेकिन प्यास बहुत है।”
कादर ने बिना कोई चेतावनी दिए, बिना कोई तैयारी किए, अपना सिर कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुसा दिया।
“स्स्स्लर्प……!!”
कादर ने अपनी खुरदरी और चौड़ी जीभ सीधे कामिनी की योनि के द्वार पर दे मारी।
“आआआआहहहहह…. कादर….!!”
कामिनी की चीख निकल गई। उसने जल्दी से अपना मुंह अपने हाथ से दबा लिया, ताकि आवाज़ बाहर न जाए।
लेकिन उसका शरीर बेड पर तड़प उठा।
कादर किसी भूखे कुत्ते की तरह उस पर टूट पड़ा था।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी के कूल्हों (Buttocks) को जकड़ लिया और उन्हें ऊपर उठा दिया, ताकि उसकी योनि का दाना-दाना उसके मुंह के सामने आ जाए।
कादर की जीभ कामिनी की योनि की गहराइयों को खंगालने लगी।
वह अपनी जीभ की नोक को कामिनी के उभरे हुए दाने (Clitoris) पर फिराता, और फिर पूरी जीभ से उसकी योनि के छेद को चाटने लगता।
“फच्… फच्… चप्प… चप्प…”
पूरे कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं।
कामिनी की योनि का स्वाद… नमकीन, खट्टा और कस्तूरी जैसा नशीला था।
कादर उसे ऐसे पी रहा था जैसे रेगिस्तान में पानी मिल गया हो।
कामिनी की हालत ख़राब थी।
उसकी कमर हवा में उठ रही थी। उसकी उंगलियां बेडशीट को नोच रही थीं।
“उफ्फ्फ्फ… कादर… मार डालोगे क्या… आह्ह्ह… ऐसे ही… और ज़ोर से…”
कामिनी का सिर दाएं-बाएं डोल रहा था।
उसे लंड चाहिए था, लेकिन कादर की गरम जीभ उसे पागल कर रही थी।
कादर ने अपनी नाक कामिनी के दाने पर रगड़ दी। वह उसकी महक को सूंघ रहा था, चाट रहा था।
उसने अपनी एक उंगली कामिनी की फड़कती हुई योनि में घुसा दी और जीभ से ऊपर क्लिटोरिस को रगड़ने लगा।
बाहर रमेश और शमशेर शराब पी रहे थे… और यहाँ अंदर कादर कामिनी की जवानी का रस पी रहा था।
कामिनी अब बर्दाश्त की सीमा पर थी।
उसकी जांघें कादर के सिर को भींच रही थीं।
“कादर… रुकना मत… मैं… मैं झड़ने वाली हूँ… कादर…!!”
कामिनी वैसे ही वासना की दहलीज पर खड़ी थी, बस थोड़ी और मेहनत और कुएँ से शर्तिया पानी निकलना ही था.
लेकिन कामिनी की किस्मत उसकी हवास उसकी परीक्षा लेने के मूड मे थी.
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कामिनी का शरीर धनुष की तरह तन गया था।
उसकी एड़ियां बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं।
उसकी योनि के अंदर कादर की उंगली और बाहर उसकी जीभ ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया था कि अब वह ज्वालामुखी फटने ही वाला था।
“कादर… बस… बस आ गई… आह्ह्ह्ह… मत रुकना… !!”
कामिनी का सिर पीछे लुढ़क गया, आँखें चढ़ गईं। वह उस ‘मोक्ष’ के अंतिम पड़ाव पर थी।
अगले 5 सेकंड में उसका शरीर ऐंठने वाला था और सारा रस कादर के मुंह में बहने वाला था।
लेकिन ठीक उसी “नाज़ुक पल” (Crucial Moment) पर…
बाहर से एक भारी और शराबी आवाज़ ने बेडरूम के सन्नाटे को चीर दिया।
“अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??”
वह शमशेर की आवाज़ थी। नशे में धुत, लेकिन तेज़।
“सूप ठंडा हो रहा है… और बोतल ख़त्म हो गई है! जल्दी आ भाई!”
वह आवाज़ किसी हथौड़े की तरह कामिनी के दिमाग पर पड़ी। ऐसा लगा ठीक उसके पीछे से, बिल्कुल पास से आवाज़ आई हो, दोनों ने चौंक कार बैडरूम की खुली खिड़की की तरफ देखा, वो खुली हुई थी.
कामिनी की सांसे थाम गई, उसने कैसे इस बात पर गौर नहीं किया, अक्सर हवास मे डूबा इंसान खुले दरवाजे, खुली खिड़की नहीं देख पाता.
कामिनी के साथ भी यही हुआ.
और उससे भी बड़ा झटका तब लगा, जब कादर ने अचानक अपना मुंह हटा लिया।
“चटाक!”
कादर ने एक झटके में अपना सिर पीछे खींच लिया।
कामिनी की योनि, जो चरम सुख के लिए तैयार थी, एकदम से सन्न रह गई।
वह ‘झड़ने’ वाली थी, लेकिन वह करंट वहीं का वहीं नसों में जम गया।
कादर खड़ा हुआ और लगभग नंगा ही दौड़ता हुआ खिड़की के पास पंहुचा, उसने देखा शमशेर और रमेश वही स्टोर के पास बैठे गप मार रहे थे,
“आया साब….. ” कादर वही से चिल्लाया।
उसके होंठ और दाढ़ी कामिनी के पानी (Juices) से सने हुए थे।
उसने अपनी कलाई से अपना मुंह पोंछा और एक गहरी सांस ली।
“मै जाता हूँ, वरना लफड़ा हो जायेगा ” कादर ने कामिनी की तरफ देखा, जो बिस्तर पर अभी भी टांगें फैलाए, तड़प रही थी।
कादर ने एक पल के लिए कामिनी की उस गीली, लाल और फड़कती हुई योनि को ललचाई नज़रों से देखा।
कादर ने पास पड़ी वो चेकदार लुंगी उठाई।
उसने उसे झटका और अपनी कमर पर बांधना शुरू किया।
कामिनी की नज़रें अभी भी धुंधली थीं, लेकिन उसने देखा…
कादर ने लुंगी के नीचे कुछ नहीं पहना था।
उसका काला, विशाल लंड अभी भी लोहे की तरह खड़ा था।
जैसे ही उसने लुंगी बांधी…
लुंगी के कपड़े में आगे की तरफ एक विशाल तंबू (Tent) बन गया।
वह खड़ा लंड लुंगी को आगे की तरफ धकेल रहा था, जैसे कह रहा हो कि ‘मैं अभी शांत नहीं हुआ हूँ’।
“मैं चलता हूँ…” आपकी सेवा मे फिर हाजिर होऊंगा.
कादर मुड़ा और बेडरूम से बाहर निकल गया।
कामिनी बिस्तर पर अकेली रह गई।
उसकी साड़ी उठी हुई थी, जांघें फैली हुई थीं।
उसकी योनि गीली थी, लेकिन प्यासी थी।
उस अधूरेपन ने उसे अंदर से तोड़ दिया। उसे रोना आ रहा था, और साथ ही गुस्सा भी।
गुस्सा रमेश पर, शमशेर पर….. जिसने गलत वक़्त पर आवाज़ दी।
गुस्सा कादर पर… जो उसे ऐसे छोड़ गया।
और गुस्सा खुद पर… कि वह अपनी हवस की गुलाम बन गई थी।
कामिनी ने अपनी जांघों को सिकोड़ा और करवट लेकर तकिये में मुंह छुपा लिया।
उसने अपनी मुट्ठी भींची और गद्दे पर दे मारी।
“उफ्फ्फ्फ……!!”
उसकी योनि में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था। यह दर्द उसे पूरी रात सोने नहीं देने वाला था।
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कादर बेडरूम से निकला और गैलरी से होता हुआ अंधेरे बगीचे में आया।
उसकी चाल अजीब थी।
वह अपनी टांगें चौड़ी करके चल रहा था, जैसे किसी पहलवान ने अखाड़े में लंगोट बांधा हो।
वजह साफ़ थी—लुंगी के नीचे उसका 10 इंच का खंभा अभी भी पूरे उफान पर था। वह ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा था।
लुंगी का कपड़ा आगे से बुरी तरह तना हुआ था, एक विशाल तंबू बना हुआ था जो हवा में झूल रहा था।
कादर टेबल के पास पहुंचा।
रमेश तो नशे में धुत था, उसकी गर्दन एक तरफ लुढ़की हुई थी।
लेकिन शमशेर?
शमशेर की आँखें जल रही थीं।
उसने कादर को आते हुए देखा।
उसकी नज़र सबसे पहले कादर के चेहरे पर गई।
कादर ने अपना मुंह पोंछ लिया था, लेकिन कामिनी की योनि का रस और उसकी लार की चमक अभी भी उसकी दाढ़ी और होठों पर कहीं-कहीं बाकी थी।
फिर शमशेर की नज़र नीचे गई… कादर की लुंगी पर।
शमशेर ने वो “उभार” देख लिया।
वह कोई बच्चा नहीं था। वह समझ गया कि लुंगी के नीचे क्या छुपा है और यह “हथियार” इतना तना हुआ क्यों है।
“आ गए कादर भाई…” शमशेर ने एक गहरी सांस ली और कुर्सी पर पीछे टिक गया।
उसने रमेश को कोहनी मारी। “ओए रमेश… उठ! तेरा बावर्ची आ गया।”
फिर शमशेर ने कादर की आँखों में देखा।
“बड़ा वक़्त लगाया अंदर? लुंगी ढूंढ रहे थे… या कुछ और भी कर रहे थे?”
शमशेर की आवाज़ में एक कुटिल व्यंग्य था।
उसने अपनी उंगली से इशारा किया।
“और ये लुंगी में क्या ‘तोप’ छुपा लाए हो भाई? लगता है अंदर कुछ ज्यादा ही ‘गर्मी’ थी?”
कादर का दिल धक से रह गया।
उसे लगा पकड़ा गया।
लेकिन शमशेर के चेहरे पर गुस्सा नहीं था… बल्कि एक गंदी मुस्कान थी।
शमशेर मज़े ले रहा था।
“कुछ नहीं साब…” कादर ने नज़रें झुका लीं और टेबल की आड़ में हो गया। “वो… बस कपड़ा टाइट बांध लिया है।”
अभी कादर कुछ सफाई देता की तभी बगीचे सन्नाटे को तोड़ता रघु लड़खड़ाते कदमों से अंदर दाखिल हुआ,
रघु, जो अपनी ‘दवाई’ (दारू) पीकर वापस आ गया था, नशे में झूमता हुआ स्टोर रूम की तरफ बढ़ा चला आ रहा था,
“अच्छा कादर भाई आ गया तेरा दोस्त, तुम लोग दावत उड़ाओ, हम लोगो का तो हो गया ” शमशेर ने रमेश को उठाया और अपने कंधे का सहारा दे घर की ओर बढ़ गया.
कादर, जो वहीं अंधेरे में लुंगी लपेटे खड़ा था, रघु को देखकर मन मसोस कर रह गया।
‘साला कबाब में हड्डी…’ कादर ने दांत पीसे।
रघु के आ जाने से अब कादर के लिए दोबारा घर में घुसना नामुमकिन था। उसका ‘खेल’ अधूरा रह गया था।
उधर, रमेश पूरी तरह नशे में धुत्त था।
उसे कादर के उस ‘जादुई मटन सूप’ पर इतना भरोसा था कि लड़खड़ाते हुए भी उसे लग रहा था कि आज रात वह कामिनी की चीखें निकलवा देगा।
“कामिनी… मेरी जान…देख तेरा शेर आ रहा है…” रमेश बड़बड़ा रहा था, जबकि उसके पैर ज़मीन पर टिक भी नहीं रहे थे।
शमशेर ने रमेश का हाथ अपने कंधे पर रखा और उसे सहारा देकर घर के अंदर ले जाने लगा।
शमशेर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। एक रहस्य था,
इन्ही सब उपक्रम मे कोई आधे घंटे बीत गए थे, शमशेर रमेश को घसीटता हुआ बेडरूम के दरवाज़े तक ले आया।
शमशेर ने बेडरूम का दरवाज़ा धकेला।
अंदर का नज़ारा देखकर शमशेर के कदम वहीं जम गए।
ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी में… कामिनी बिस्तर पर औंधे मुंह (पेट के बल) लेटी हुई थी।
उसका चेहरा तकिये में दबा हुआ था, शायद वह अपनी सिसकियाँ दबा रही थी।
लेकिन उसकी पोजीशन…
उसकी भारी और मांसल गांड (Buttocks) पीछे की तरफ उभरी हुई थी। साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ी हुई थी, जिससे उसकी गोरी, सुडौल पिंडलियां (Calves) और जांघों का पिछला हिस्सा साफ़ चमक रहा था।
शमशेर का दिमाग यह नज़ारा देखकर सुन्न हो गया।
उसे लगा जैसे कोई “हथिनी” अपने साथी का इंतज़ार कर रही हो।
उसकी मर्दानगी ने उसकी खाकी पैंट के अंदर तुरंत सलामी दे दी।
“आओ रमेश…” शमशेर ने जानबूझकर भारी आवाज़ में कहा, अपनी नज़रें कामिनी की गांड से हटाए बिना।
शमशेर की आवाज़ सुनते ही कामिनी बिजली के करंट की तरह चौंकी।
वह ख्यालों में थी—कादर के लंड और अपनी अधूरी प्यास के ख्यालों में।
हड़बड़ाहट में उसे याद ही नहीं रहा कि उसका हुक खुला हुआ है और पल्लू गिरा हुआ है।
“उह्ह… आप…”
कामिनी घबराकर झटके से पलटी और खड़ी होने की कोशिश की।
लेकिन इस जल्दबाज़ी में वही हुआ जिसका शमशेर को इंतज़ार था।
कामिनी का पल्लू, जो उसने बस नाम के लिए कंधे पर रखा था, सरककर नीचे ज़मीन पर आ गिरा।
और उसके साथ ही…
उसका ब्लाउज़, जिसका ऊपर का हुक कादर के लिए खोला गया था, तनाव न सह सका और फैल गया।
शमशेर की आँखों के सामने जन्नत का दरवाज़ा खुल गया।
कामिनी के विशाल, गोरे और पसीने से सने हुए स्तन लगभग पूरी तरह बेपर्दा हो गए।
वे भारी थे, और तेज़ सांसों की वजह से ऊपर-नीचे हो रहे थे।
उनकी गहरी घाटी (Cleavage) इतनी गहरी थी कि उसमें पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
कादर के लंड को चूसने और उत्तेजना की वजह से उसके निप्पल ब्लाउज़ के कपड़े को चीरकर बाहर झांक रहे थे।
उन पर उभरी हुई नीली नसें शमशेर को साफ़ दिखाई दे रही थीं।
शमशेर किसी भूखे कुत्ते की तरह उन घाटियों को घूरे जा रहा था।
उसने रमेश को पकड़ा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें कामिनी के ‘मांस’ को नोच रही थीं।
कामिनी ने शमशेर की नज़रों को अपने स्तनों पर रेंगते हुए महसूस किया।
वह शर्म से लाल हो गई, लेकिन उसने खुद को ढका नहीं।
शायद वह भी चाहती थी कि कोई उसे देखे… कोई उसे सराहे… क्योंकि कादर ने उसे ‘अधूरी’ छोड़ दिया था।
“थैंक्स भाई… थैंक्स…” रमेश ने लड़खड़ाते हुए कहा। उसकी आँखें बंद हो रही थीं।
“अब तू जा… और कामिनी… कामिनी तू इधर आ…”
रमेश बेहोशी में भी हुकुम चला रहा था। उसे लगा वह कामिनी को प्यार करेगा, जबकि वह खड़े होने के लायक भी नहीं था।
शमशेर ने रमेश को एक झटके में बेड पर पटक दिया।
रमेश गद्दे पर गिरते ही ढेर हो गया।
अब कमरे में सिर्फ़ दो लोग जाग रहे थे— शमशेर और कामिनी।
शमशेर कमरे से बाहर नहीं गया।
वह बेड के पास, रमेश के पैरों की तरफ खड़ा हो गया।
उसने अपनी बनियान ठीक की, जिससे उसका चौड़ा सीना और तन गया।
इस पोज़ (Pose) ने कामिनी का ध्यान शमशेर के निचले हिस्से पर खींच लिया।
शमशेर की टाइट खाकी पुलिसिया पैंट में एक विशाल उभार (Bulge) साफ़… बिल्कुल साफ़ दिख रहा था।
उसका लंड पूरा खड़ा था और पैंट की ज़िप को फाड़ने की कोशिश कर रहा था।
वह उभार कादर के लंड जितना विशाल तो नहीं था, लेकिन वह सख्त और खतरनाक लग रहा था।
शमशेर ने कामिनी की आँखों में देखा, फिर उसके खुले हुए स्तनों पर, और फिर वापस आँखों में।
“रमेश तो सो गया भाभी…” शमशेर की आवाज़ में एक गहरा नशा था।
वह एक कदम आगे बढ़ा।
“लेकिन लगता है… आपको नींद नहीं आ रही।”
कामिनी के होंठ (जो अभी भी सूजे हुए थे) कांपने लगे।
उसकी योनि ने एक बार फिर “धक्-धक्” किया।
सामने पति बेहोश पड़ा था, और उसके पैरों के पास एक ‘सांड’ जैसा मर्द खड़ा था जो उसे कच्चा चबाने को तैयार था।
कामिनी के पास दो रास्ते थे—चीखना, या… समर्पण करना।
