कामिनी मेरी माँ मादक जिस्म की मालकिन 8

दोस्त की बीवी

रमेश नशे में धुत होकर कुर्सी पर झूल रहा था। उसके हाथ से गिलास छूटने को हो रहा था।
सामने जल रही लकड़ियाँ अब राख बन चुकी थीं, आग बुझने की कगार पर थी।

“अबे… ये कादर कहाँ मर गया?” रमेश लड़खड़ाती जुबान में बड़बड़ाया। “सूप भी ठंडा हो रहा है… और आग भी ठंडी हो गई।”
शमशेर ने अपनी सिगरेट का कश खींचा और उसे पैर से मसल दिया।
“तू बैठ रमेश… मैं देखता हूँ। थोड़ी लकड़ियाँ और ले आता हूँ, लगाता हूँ चूल्हे मे” शमशेर अपनी कुर्सी से उठा।

शमशेर अंधेरे में चलता हुआ स्टोर रूम के पास लकड़ियों के ढेर की तरफ गया। वहाँ कुछ नहीं मिला, वो थोड़ा आगे बड़ा की उसे खिड़की से आतिज़ रौशनी मे कुछ लकड़िया दिखाई दी,
लकड़ियों का ढेर कामिनी के बेडरूम की खिड़की के ठीक नीचे था।
वह पास गया और झुककर लकड़ी उठाने ही वाला था कि तभी…

सन्नाटे में उसे एक दबी हुई आवाज़ सुनाई दी।
“आह्ह्ह…. उफ्फ्फ्फ…. कादर….”
शमशेर का हाथ हवा में रुक गया।
यह आवाज़ किसी बिल्ली की नहीं, एक औरत की सिसकारी थी।
और वो औरत कोई और नहीं, उसके खास दोस्त रमेश की बीवी कामिनी की थी।
शमशेर ने गर्दन उठाई ।
बेडरूम की खिड़की के पल्ले हल्के से खुले हुए थे। पर्दा नाम मात्र माँ लगा हुआ था।
अंदर ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
शमशेर ने सांस रोकी और दबे पांव खिड़की के पास गया।
उसने उस झीरी (Gap) से अंदर झांका।
और जो उसने देखा… उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

बेड पर कामिनी अपनी साड़ी समेटे, टांगें चौड़ी किए पड़ी थी।
और उसके दोनों पैरों के बीच… वह ‘गुंडा, कसाई दो कोड़ी का मटन काटने वाला कादर खान अपना मुंह गड़ाए हुए था।

शमशेर की आँखों ने देखा कि कैसे कादर की जीभ कामिनी की गुलाबी गुफा को चाट रही थी।
“फच्… फच्… चप्प… चप्प…” की आवाज़ें अब शमशेर को साफ़ सुनाई दे रही थीं।
शमशेर का लंड, जो पैंट के अंदर सोया हुआ था, एक झटके में लोहे की रॉड बन गया।
‘साला… यह क्या चल रहा है?’ शमशेर का दिमाग चकरा गया।
‘साला इसे तो मैं सती-सावित्री समझता था… और यहाँ ये रांड इस कल के आए लौंडे से अपनी चुत चटवा रही है?’
शमशेर की आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि हवस और जलन थी।
उसे जलन इस बात की थी कि वह जगह (कामिनी की टांगों के बीच) उसकी होनी चाहिए थी, लेकिन वहां कादर मज़े ले रहा था।

उसने देखा कामिनी तड़प रही थी।
कामिनी ने कादर के बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा था और उसे अपनी योनि पर दबा रही थी।
“चूस कादर…. खा जा मेरी चुत…. आह्ह्ह्ह… मुझे ख़त्म कर दे….”
कामिनी के ये शब्द शमशेर के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे।
‘अरे बाप रे… यह तो पूरी खिलाडी निकली…’ शमशेर ने अपने होंठों पर जीभ फेरी। ‘इतनी प्यास? इतनी आग?’
उसने देखा कि कामिनी की कमर हवा में उठने लगी है। वह क्लाइमेक्स (झड़ने) के करीब थी।

शमशेर की पुलिसिया खोपड़ी ने तुरंत काम किया।
‘अगर यह अभी झड़ गई… तो इसकी आग शांत हो जाएगी। और फिर यह मुझे भाव नहीं देगी।’

‘नहीं… इसे शांत नहीं होने देना। इसे तड़पाना है।’
एक भूखे जानवर को काबू करना आसान होता है,

शमशेर के दिमाग में एक वहशी प्लान ने जन्म लिया।
उसने तुरंत खिड़की से हटकर अपनी नज़रें रमेश की तरफ घुमाईं और अपनी आवाज़ को भारी और ऊँचा कर लिया।
उसने जानबूझकर ठीक उसी वक़्त चिल्लाया जब कामिनी चरम पर थी।
“अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??”
उसकी आवाज़ अंदर बम की तरह फटी।
शमशेर ने खिड़की की झीरी से देखा—कादर झटके से पीछे हटा और कामिनी बिस्तर पर अधूरी तड़पती रह गई।
शमशेर के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई।
‘तड़प मेरी जान… तड़प… अब तेरी यह अधूरी आग मैं बुझाऊंगा। कादर ने तो सिर्फ़ सुलगाया है… राख तो मैं करूँगा।’

शमशेर ने जल्दी से वहां से हटकर अपनी जगह वापस ले ली, जैसे उसे कुछ पता ही न हो।
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वही कहीं इस घर से दूर

स्थान: पुलिस कमिश्नर ऑफिस, शहर | समय: रात के 12:15 बजे)

कमरे में एसी की ‘हम्म्म’ की आवाज़ के अलावा सिर्फ़ बूटों की ‘ठक-ठक’ गूंज रही थी।
पुलिस कमिश्नर विक्रम सिंह एक घायल शेर की तरह अपने केबिन में इधर से उधर टहल रहा था।
उसकी वर्दी की बांहें ऊपर चढ़ी हुई थीं, टाई ढीली थी, और आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। उसकी आँखें लाल थीं—गुस्से से और थकान से।

“धत् तेरे की!” विक्रम ने टेबल पर मुक्का मारा। कांच का पेपरवेट हिल गया।

कल रात की रेड… उसके करियर का एक काला धब्बा बन गई थी।
उसे पक्की खबर थी कि कादर खान ढाबे पर ड्रग्स की बड़ी खेप के साथ मौजूद है। लेकिन जब उसकी टीम वहां पहुंची, तो चिड़िया उड़ चुकी थी। ढाबा खाली था।
कादर खान और 50 लाख का माल… दोनों हवा हो गए थे।

विक्रम के लिए यह सिर्फ़ एक केस नहीं, उसकी नाक का सवाल था। वह हार मानने वालों में से नहीं था।
तभी केबिन का दरवाज़ा हल्का सा खुला।
हवलदार ने डरते-डरते झांका।

“स… साहब…” हवलदार की आवाज़ कांप रही थी। “वो… वो खबरी आया है। ‘कल्लू काना’। बोल रहा है बहुत ज़रूरी बात बतानी है।”

विक्रम की आँखों में खून उतर आया।
“भेजो साले को अंदर…” विक्रम गुर्राया। “आज अगर उसने बकवास की, तो उसकी दूसरी आँख भी फोड़ दूंगा। हरामखोर ने मेरी इज़्ज़त मिटटी में मिला दी।”

दो मिनट बाद, एक मरियल, गंदा और शराब की बदबू में डूबा हुआ आदमी लगभग घिसटता हुआ अंदर आया।
उसके कपड़े फटे थे और वह नशे में झूल रहा था।
विक्रम ने उसे देखते ही अपना आपा खो दिया।
उसने लपककर उस खबरी की गिरेबान पकड़ी और उसे दीवार से सटा दिया।

“आ साले मादरचोद…” विक्रम चिल्लाया। “तूने गलत टिप दी मुझे? मेरा टाइम ख़राब किया?”
विक्रम का हाथ उठा, वह उसे मारने ही वाला था।

“मलिक… मलिक… रहम!” खबरी गिड़गिड़ाया। उसके हाथ जुड़ गए। “खबर सही थी मेरी माई-बाप… कसम खुदा की! कादर खान ड्रग का धंधा करता है और वो वहीं था।”

“तो कहाँ गया वो?” विक्रम ने उसकी गर्दन दबोच ली, उसकी सांसें घुटने लगीं। “कहाँ है कादर खान? कहाँ है उसकी ड्रग? ज़मीन खा गई या आसमान निगल गया?”

“साहब… वही… वही तो बताने आया हूँ…” खबरी ने मुश्किल से सांस ली।
विक्रम ने अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की।
“बक! जल्दी बक!”

खबरी ने हांफते हुए कहा, “कादर खान वहां से माल लेके भाग गया था साहब। उसे भी किसी ने टिप दे दी थी कि पुलिस आ रही है।”

विक्रम की भौहें तन गईं। ‘पुलिस की रेड की खबर लीक हुई? मतलब विभाग में कोई गद्दार है?’

खबरी ने अपनी बात जारी रखी, “आज शाम… जब मैं देसी ठेके पर था, तो एक आदमी नशे में बड़बड़ा रहा था। मैंने उससे दोस्ती की… उसे थोड़ी और पिलाई।”
खबरी ने एक कुटिल हंसी हंसी। “दारू पेट में जाती है तो राज़ बाहर आते हैं साहब।”

“उसने बताया उसका नाम रघु है… साला कभी कादर के ढाबे पर रहता था। आज हिचहह…. हिचहह…” खबरी को हिचकी आ गई।

“आज क्या?” विक्रम का सब्र टूट रहा था। उसने उसे झिंझोड़ा। “पूरा बोल!”
“आज साला बोल रहा था कि वो मेरे घर पर पड़ा हुआ है।”
“कौनसा घर? कैसा घर?” विक्रम उत्तेजना में चिल्लाया।
“बंगला नंबर 69…” खबरी ने धीरे से कहा।

विक्रम चौंक गया। “बंगला नंबर 69? सिविल लाइन्स वाला इलाका?”
विक्रम ने खबरी को घूरा। “साले, वो पॉश इलाका है। वहां बड़े अफ़सर और रईस लोग रहते हैं। वो शराबी वहां कैसे रह सकता है? तू फिर मुझे घुमा रहा है?”

विक्रम ने गुस्से में खबरी का कान पकड़कर मरोड़ दिया।
“आईईईई…. साहब पूरा तो सुनो बाप…” खबरी दर्द से बिलबिलाया। “वो उस बंगले का मालिक नहीं है। वो वहां नौकर है। कुछ दिन पहले ही वहां के बाबू ने उसे काम पर रखा है। वो अपना नाम रघु बताता है, और बोलता है कादर उसका पुराना जिगरी यार है।”

विक्रम ने खबरी को छोड़ा।
उसका दिमाग कंप्यूटर की तरह चलने लगा।
‘कादर का पुराना दोस्त… रघु… बंगला नंबर 69 में नौकर है। और कादर गायब है।’

‘यानी कादर खान कहीं भागा नहीं है… वो शहर के बीचों-बीच, एक रईस बंगले में, नौकर के क्वार्टर में छुपा बैठा है। पुलिस जंगलों, सस्ते होटेलों और ढाबों में खाक छान रही है, और वो एसी बंगले में मज़े कर रहा है!’

विक्रम के चेहरे पर एक शिकारी की चमक आ गई।
उसने तुरंत लैंडलाइन फ़ोन उठाया और नंबर घुमाया।
“ट्रिन… ट्रिन… ट्रिन…”
उधर पुलिस स्टेशन में सब-इंस्पेक्टर मोहन ऊंघ रहा था। फ़ोन की घंटी सुनकर वह हड़बड़ाकर उठा।

“ह… हेलो? पुलिस स्टेशन…सिविल लाइन”
“मोहन!” विक्रम की आवाज़ में बिजली कड़क रही थी। “कमिश्नर विक्रम बोल रहा हूँ।”

मोहन कुर्सी से खड़ा होकर सावधान की मुद्रा में आ गया। “जय हिन्द सर! सलाम सर!”
“सलाम छोड़,” विक्रम ने कड़क कर पूछा। “थाना इंचार्ज शमशेर सिंह कहाँ है? उसे फ़ोन दे।”

मोहन के पसीने छूट गए।
“स… सर… वो तो घर गए। उनकी शिफ्ट ख़त्म हो गई थी। शाम को ही निकल गए थे।”

“बास्टर्ड…!!” विक्रम चिल्लाया। “पुलिस कभी ऑफ़ ड्यूटी नहीं होती! शहर में इतना बड़ा क्रिमिनल घुम रहा है और ये हरामखोर घर जाकर सो रहा है?”

विक्रम ने एक पल सोचा, फिर आदेश दिया।
“मोहन, कान खोलकर सुन। अभी के अभी, पूरी फोर्स तैयार कर। एक रेड करनी है।”

“जी सर… कहाँ सर?” मोहन ने कांपते हुए पूछा।
“शहर के बंगला नंबर 69 में।”
विक्रम की आवाज़ में मौत का सन्नाटा था।

“मैं खुद वहां पहुँच रहा हूँ। तुम अपनी जीप लेकर निकलो। बंगले को चारों तरफ से घेर लो। एक भी परिंदा अंदर नहीं जाना चाहिए और एक भी चूहा बाहर नहीं निकलना चाहिए। समझ गया?”

“जी… जी सर! समझ गया!” मोहन ने फ़ोन रख दिया और “रेड अलर्ट” का सायरन बजा दिया।
विक्रम ने फ़ोन पटका।
उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर चेक की, उसे लोडेड किया और होल्स्टर में डाला।

उसकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे।
“कादर खान…” विक्रम बड़बड़ाया। “आज तू पाताल में भी छुपा होगा, तो घसीट कर निकालूँगा।”
वह लंबे डग भरता हुआ अपनी जीप की तरफ बढ़ा।
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वहीँ दूसरी तरफ… शहर के उसी बंगला नंबर 69 में…
बाहर का गेट बस आपस मे सटा हुआ था किसी को सुध नहीं थी की उसे बंद किया जाये,

घर का मालिक रमेश, शराब और मटन के नशे में बेड पर औंधे मुंह पड़ा था, दुनिया से बेखबर।
और उसके बेडरूम में…
उसकी खूबसूरत बीवी कामिनी दीवार से सटी खड़ी थी, उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसका पल्लू ज़मीन पर था, और छाती खुली हुई थी।
और उसके ठीक सामने…
उस इलाके का थाना इंचार्ज, दरोगा शमशेर सिंह खड़ा था।

जिसकी खाकी पैंट में ‘तंबू’ बना हुआ था और जिसकी आँखों में वहशीपन था।
उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस ‘शिकार’ (कामिनी) को वह खाने जा रहा है…
उसके घर के बाहर पुलिस की गाड़ियों के सायरन और कमिश्नर विक्रम के कदम बस कुछ ही पलों की दूरी पर हैं।
एक तूफ़ान बाहर आ रहा था… और एक तूफ़ान अंदर आने वाला था।

बेडरूम में रमेश के खर्राटों की गूंज थी, लेकिन कामिनी के कानों में सिर्फ़ अपनी धड़कनों का शोर और शमशेर की भारी सांसें थीं।
शमशेर ने कामिनी को दीवार से सटा रखा था। उसका विशाल शरीर कामिनी के लिए एक पिंजरे की तरह था।
कामिनी की नज़रें नीचे झुकी हुई थीं, जहाँ शमशेर की खाकी पैंट का ज़िप अब खुल चुका था।
शमशेर ने एक हाथ से अपनी पैंट नीचे सरकाई और अपना अंडरवियर भी खींच दिया।
“फटाक…”
इलास्टिक छूटने की आवाज़ के साथ ही शमशेर का विशाल, काला और लोहे जैसा सख्त लंड आज़ाद होकर बाहर उछल आया।
वह पूरी तरह तना हुआ था, हवा में झूल रहा था और कामिनी के पेट को लगभग छू रहा था।
कामिनी की आँखें उस मर्दाने हथियार पर गड़ गईं।
कादर का लंड ‘जंगली’ था, लेकिन शमशेर का लंड ‘ताकतवर’ था। वह मोटा था, और उसका सुपाड़ा (Head) गुस्से में लाल होकर चमक रहा था।
कामिनी की योनि, जो कादर के अधूरेपन से तड़प रही थी, अब उस पुलिसिया डंडे को महसूस करने के लिए मचल उठी।
उसका हाथ अनजाने में ही आगे बढ़ा।
उसकी उंगलियां उस गरम और नसों भरे लंड को अपनी मुट्ठी में भरने के लिए तड़प रही थीं।
लेकिन शमशेर खिलाड़ी था। वह शिकार को इतनी आसानी से शिकार नहीं करने देने वाला था।
“ना… ना…”
जैसे ही कामिनी का हाथ वहां पहुंचा, शमशेर ने उसका हाथ झटक दिया।
उसने कामिनी की साड़ी का पल्लू, जो पहले ही गिर चुका था, उसे एक झटके में पूरी तरह खींच लिया।

“पहले कपड़े उतारो…” शमशेर का आदेश स्पष्ट और खूंखार था। “ब्लाउज़ और पेटीकोट… सब कुछ। मुझे तुम्हारे जिस्म का कोना-कोना देखना है।”

कामिनी के पास कोई रास्ता नहीं था। वासना ने उसे लाचार बना दिया था।
कांपते हाथों से उसने अपनी कमर पर बंधी पेटीकोट की डोरी खोली।
“सर्रररर……”
रेशमी साड़ी और पेटीकोट एक साथ उसके पैरों पर गिरकर ढेर हो गए।

अब वह सिर्फ अपने ब्लाउज़ में खड़ी थी।
कामिनी ने अपने कन्धों को झटका, और ब्लाउज़ भी सरककर ज़मीन पर गिर गया।

ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी में कामिनी का सम्पूर्ण नंगा यौवन चमक उठा।

शमशेर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसने सुनैना को देखा था, कई औरतों, कोठे की रंडियो को देखा था, लेकिन कामिनी… कामिनी का जिस्म किसी संगमरमर की मूरत जैसा था, जो वासना की आग में तपकर गुलाबी हो गया था।

उसका बदन मक्खन जैसा गोरा और गठा हुआ था।
सबसे पहले शमशेर की नज़र उसके विशाल और भारी स्तनों पर गई।

वे पसीने से सने हुए थे और तेल की तरह चमक रहे थे।
वे इतने भारी थे कि उनका वजन कामिनी की छाती पर साफ़ दिख रहा था, लेकिन फिर भी वे तनकर खड़े थे।
कादर के चूसने और कामिनी की उत्तेजना की वजह से, उन गोरे स्तनों पर नीली नसें (Blue Veins) साफ़ उभर आई थीं, जो किसी नक्शे की तरह उसके निप्पलों तक जा रही थीं।

और उसके निप्पल…
मोटे, काले और बेर की तरह सख्त। वे अकड़े हुए थे और शमशेर को चुनौती दे रहे थे।
नीचे उसकी गहरी नाभि, और फिर उसकी चौड़ी कमर जो किसी सुराही की तरह थी।
और उन भरी हुई जांघों के बीच… उसका कामुक त्रिकोण… जहाँ बाल का कोई नामोनिशान नहीं था, एक दम साफ चिकना खूबसूरत, जहाँ से अब भी रस बह रहा था।
शमशेर ने ऐसा ‘भरा हुआ’ और ‘कसावदार’ माल अपनी ज़िन्दगी में नहीं देखा था।

“उफ्फ्फ्फ… क्या चीज़ हो तुम कामिनी…”
शमशेर के मुंह से लार टपकने को हो गई।
उससे अब रहा नहीं गया।
उसने एक जानवर की तरह कामिनी पर हमला बोल दिया।
उसने कामिनी को दीवार से इतनी जोर से सटाया कि कामिनी की नंगी पीठ ठंडी दीवार से चिपक गई।

“सीइइइ……” कामिनी के मुंह से सिसकी निकल गई।
दीवार बर्फ जैसी ठंडी थी, लेकिन सामने शमशेर का जिस्म भट्टी जैसा गरम था।

शमशेर ने कामिनी के दोनों गालों को अपने मज़बूत पंजों में जकड़ लिया और उसके सूजे हुए होंठों को अपने मुंह में भर लिया।
“म्मम्मम्म… चप्प… चप्प…”
वह उसे चूम नहीं रहा था, वह उसे नोच रहा था। शमशेर की जीभ कामिनी के मुंह को खंगाल रही थी।
मटन और शराब का तीखा नशा कामिनी के मुँह मे घुलने लगा, लार से होता हुआ पेट मे जाने लगा,
एक अजीब सा अहसास था, हल्का सा तीखा, कसैला लेकिन नशीला.
शमशेर का एक हाथ नीचे गया और उसने कामिनी के भरे हुए, भारी स्तन को अपनी मुट्ठी में भर लिया।
उसने उसे बुरी तरह भींचा, मसला और दबाया।

वह उस गोरे मांस को अपनी उंगलियों में ऐसे गूंथ रहा था जैसे कोई आटा गूंथता है।
“आह्ह्ह्ह… उम्मम्म… धीरे…” कामिनी दर्द और मज़े में सिसक उठी।

शमशेर ने उसके खड़े निप्पल को अपनी उंगलियों में पकड़कर मरोड़ दिया, और फिर अपना मुंह नीचे ले जाकर उस काले निप्पल को अपने दांतों और होंठों में जकड़ लिया।

“स्स्स्लर्प……”

शमशेर उसे पीने लगा, चूसने लगा, जैसे कोई बच्चा माँ का दूध पीता है,

लेकिन एक शैतानी भूख के साथ।
कामिनी का सिर पीछे दीवार से टकरा रहा था।
उसका पूरा जिस्म जल रहा था।
वह बार-बार अपने हाथ नीचे ले जाती, शमशेर के उस खड़े लंड को पकड़ने की कोशिश करती।

उसे उस खंभे की गर्मी अपनी हथेली में चाहिए थी।
लेकिन शमशेर उसे अपना ‘लंड ‘ पकड़ने ही नहीं दे रहा था।
जैसे ही कामिनी का हाथ नीचे जाता, शमशेर उसे पकड़कर वापस दीवार पर पटक देता।

“तड़प…साली रांड ” शमशेर उसके कान में गुर्राया, उसके स्तन को और ज़ोर से भींचते हुए।
“अभी और तड़प… जब तक मैं न कहूँ, तू मुझे छुएगी नहीं।”

कामिनी बेबस थी, गंदे शब्द खुद को रांड कहना उसे सुकून दे रहा था, शमशेर का ये जंगलीपना उसे मदहोश कर रहा था, साथ ही यही बेबसी उसे और गीला कर रही थी।
सामने बेड पर उसका पति रमेश बेहोश पड़ा था, और यहाँ दीवार से सटी कामिनी एक गैर-मर्द के हाथों अपनी जवानी लुटवा रही थी, अपने स्तनों को मसलवा रही थी।
उसकी योनि से पानी की धार बह निकली।
वह दर्द और हवस में चिल्ला रही थी—
“आह्ह्ह… शमशेर… मार डालोगे… आह्ह्ह… और ज़ोर से… !!”

बेडरूम की दीवार से सटी कामिनी अब सिर्फ़ मांस का एक टुकड़ा बनकर रह गई थी।
शमशेर, जो अब पूरी तरह ‘जानवर’ बन चुका था, कामिनी के जिस्म को नोच रहा था।
उसका मुंह कामिनी की गर्दन और स्तनों को चूस रहा था, लेकिन उसके हाथ… उसके हाथ पीछे जाकर कामिनी के सबसे मादक हिस्से के साथ खेल रहे थे।
शमशेर के मज़बूत और खुरदरे पंजे कामिनी की विशाल, नंगी और मुलायम गांड पर गड़ गए थे।
उसने उन दोनों भारी-भरकम कूल्हों (Buttocks) को अपनी मुट्ठी में भरकर बुरी तरह भींचा।

“आह्ह्ह…” कामिनी दर्द से बिलबिला उठी।
“साली… क्या मांस भरा है पीछे…” शमशेर गुर्राया। “आज तेरी यह गांड मारूंगा।”
कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।
उसे याद आया… जब शमशेर पहली बार उनके घर डिनर पर आया था। तब कामिनी साड़ी में थी, और झुककर पानी दे रही थी।
तब शमशेर ने रमेश से हंसते हुए कहा था— “भाई, अगर मेरी बीवी की गांड ऐसी होती, तो कसम से मार-मार के लाल कर देता।”
आज वह डरावनी फैंटेसी हकीकत बनने जा रही थी।
कामिनी को लगा जैसे कोई गर्म लोहे की सलाख उसके अंदर घुसने वाली है।

शमशेर की उंगलियां उसकी गांड की गहरी दरार (Butt Crack) में रेंगने लगीं।
वह सूखी थी, तंग थी। शमशेर ने अपनी ऊँगली पर थूका और फिर वापस से कामिनी की गांड दरार ने तेराने लगा, शमशेर वहां रास्ता बनाने की कोशिश कर रहा था।

“न… नहीं… प्लीज…” कामिनी ने तड़पते हुए शमशेर के सीने पर हाथ रखा।
“आअह्ह्ह…. उउउफ्फ्फ्फ़… ये क्या कर रहे हो? मैं तुम्हारे दोस्त की बीवी हूँ शमशेर… होश में आओ।”
कामिनी ने अपनी ‘इज़्ज़त’ और ‘रिश्ते’ का वास्ता देकर उसे रोकना चाहा।

यह सुनते ही शमशेर की आँखों में खून उतर आया।
वह रुका नहीं, बल्कि उसने कामिनी के बालों को पकड़कर उसका चेहरा ऊपर खींच लिया।

“दोस्त की बीवी?” शमशेर ने कामिनी की आँखों में झांका।
“साली… रांड… चुप!” शमशेर दहाड़ा।
“हरामखोर… अभी जब उस कादर से, उस दो टके के कसाई से अपनी चुत चटवा रही थी, तब याद नहीं आया कि तू दोस्त की बीवी है? तब तो बड़ा मज़ा आ रहा था तुझे?”

शमशेर का यह कथन सुनते ही कामिनी का जिस्म काठ (लकवा) मार गया।
उसकी गांड की मांसपेशियां, जो कस गई थीं, डर के मारे ढीली पड़ गईं।
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, जैसे जिस्म से सारा खून निचोड़ लिया गया हो।
उसकी चोरी पकड़ी गई थी। रंगे हाथों।

अब उसके पास कोई दलील नहीं थी, कोई बहाना नहीं था।
वह शमशेर की नज़रों में अब ‘भाभी’ नहीं, बस एक ‘बिगड़ी हुई रंडी’ थी।
शमशेर ने उसकी घबराहट को महसूस कर लिया,
“क्यों? निकल गई हवा?” शमशेर ने एक कुटिल मुस्कान दी।

“शुक्र मना कि तू मेरे दोस्त की बीवी है, इसलिए यहाँ बेडरूम में प्यार से पेश आ रहा हूँ। वरना जैसी हरकत तूने की है ना… तुझे तो भरे बाज़ार में नंगा करके चोदता।”
शमशेर का चेहरा गुस्से और उत्तेजना से लाल टमाटर हो रहा था। उसका खूंखार पुलिसिया रूप अब पूरी तरह बाहर आ चुका था।
कामिनी अभी सदमे में थी, कुछ सोच ही नहीं पा रही थी।
तभी शमशेर ने एक्शन लिया।
उसने कामिनी के बालों को मुट्ठी में जकड़ा और उसे एक झटके से बिस्तर की तरफ धकेल दिया।
“चल… झुक जा अपने खसम के सामने।”
शमशेर ने उसे ठीक उसी जगह झुकाया जहाँ रमेश बेहोश पड़ा था।

रमेश का मुंह खुला था, और उसके होंठों से थूक (लार) बहकर तकिये पर गिर रही थी।
कामिनी अपने ही पति के चेहरे के सामने, उसके बिल्कुल पास, घुटनों और कोहनी के बल (Doggy Style) आ गई।
उसकी आँखों के सामने रमेश का बेहोश चेहरा था।
उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थी, ग्लानि (Guilt) हो रही थी…
लेकिन उसका जिस्म?
उसका जिस्म इस अपमान और जबरदस्ती पर पागलों की तरह प्रतिक्रिया दे रहा था।
डर के बावजूद, उसकी योनि अभी भी कादर की याद में और अब शमशेर के डर में पानी छोड़ रही थी।

जैसे ही कामिनी झुकी, शमशेर के सामने जो मंज़र पेश हुआ, वह किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने वाला था।
कामिनी की विशाल, गोरी और मखमली गांड हवा में ऊपर उठ गई।
झुकने की वजह से उसके गांड के दोनों भारी पाट (Cheeks) फैलकर अलग हो गए।
ट्यूबलाइट की रौशनी सीधे उस ‘गुलाबी घाटी’ पर पड़ रही थी।

नीचे लटकती हुई उसकी योनि के गुलाबी होंठ (Lips) साफ़ दिख रहे थे। वे सूजे हुए थे और गीले थे।
उनमें से एक महीन लकीर में पारदर्शी पानी (Kamras) रिस रहा था, जो उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से को भिगो रहा था। वह गुफा कादर के जाने के बाद से खाली थी और अब भरने के लिए चीख रही थी।
और उसके ठीक ऊपर… वह छोटा, तंग और भूरा-गुलाबी छेद (Anus)।
गांड के पाटों के फैलने से वह छेद बिल्कुल नुमाया (Exposed) हो गया था।
कामिनी के डर और उत्तेजना की वजह से वह छेद “लपक” रहा था।
वह बार-बार सिकुड़ रहा था और खुल रहा था (Puckering)।
जैसे उसे समझ नहीं आ रहा हो कि वह शमशेर के लंड के स्वागत के लिए खुले, या अपनी सुरक्षा के लिए बंद हो जाए।
वह “खुल-बंद” होता हुआ छेद शमशेर को सीधा निमंत्रण दे रहा था— “आओ और मुझे फाड़ दो।”
शमशेर उस नज़ारे को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठा।
उसका खड़ा लंड पैंट को फाड़ने पर उतारू था।
“उफ्फ्फ्फ… साली…” शमशेर बड़बड़ाया।
“साला रमेश ऐसा नसीब पा कर भी बहार मुँह मारता रहा… शमशेर मन ही मन बड़बड़या,

शमशेर की आँखों के सामने कामिनी की वह विशाल, गोरी गांड किसी जन्नत के दरवाज़े की तरह खुली हुई थी।
ट्यूबलाइट की रौशनी में वह तंग, सिकुड़ता हुआ और गुलाबी छेद (Anus) उसे चुम्बन के लिए बुला रहा था।
वह नज़ारा इतना मादक था कि शमशेर का सारा पुलिसिया संयम, सारी सभ्यता धरी की धरी रह गई।
उसे अब लंड डालने की जल्दी नहीं थी… उसे उस “वर्जित फल” को चखना था।
शमशेर ने आव देखा न ताव।
उसने अपने दोनों मज़बूत हाथों से कामिनी के गांड के दोनों पाटों (Butt Cheeks) को पकड़कर और कसकर चौड़ा कर दिया।
और अगले ही पल…
उसने अपना पूरा चेहरा कामिनी की उस गहरी, महकती हुई दरार में दे मारा।
“चटाक…!!”
उसके खुरदरे गाल और दाढ़ी कामिनी के मुलायम कूल्हों से टकराए।
और शमशेर की मोटी, चौड़ी और खुरदरी जीभ सीधे निशाने पर लगी—कामिनी के गांड के छेद पर।

“आअह्ह्ह…. आउच…. उउउफ्फ्फ्फ़…!!”
कामिनी के मुंह से एक बेकाबू चीख निकल गई।
उसका पूरा शरीर बिजली का झटका खाकर कांप उठा (Convulsed)।
वह बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठी में भींचकर ऐंठ गई।
यह स्पर्श… यह हमला… उसने अपनी ज़िंदगी में, अपने सपनों में भी नहीं सोचा था।
शमशेर की जीभ गरम लोहे की तरह थी, लेकिन गीली और रसीली।
शमशेर ने अपनी जीभ की नोक को सुई की तरह कड़ा किया और उसे कामिनी के तंग छेद (Sphincter) पर गोल-गोल फिराने लगा।

“स्स्स्लर्प… लप… लप… लप…”
कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं, जो रमेश के खर्राटों को भी दबा रही थीं।
कामिनी का डर, उसकी हया, उसकी कुलीनता… सब इस एक स्पर्श के साथ हवा हो गए।
उसका जिस्म हवस की आग में दहक उठा।
यह मज़ा योनि के मज़े से बिल्कुल अलग था। यह गहरा था।

कामिनी को महसूस हुआ कि शमशेर की जीभ सिर्फ़ उसकी चमड़ी को नहीं चाट रही।
जैसे-जैसे शमशेर अपनी थूक से उस सूखे छेद को गीला कर रहा था और अपनी जीभ को अंदर धकेलने की कोशिश कर रहा था…
कामिनी को लगा जैसे गांड के उस छेद से होती हुई कोई बारीक नस (Nerve) सीधे उसके दिल से जुडी है।
शमशेर का हर एक ‘चाट’… उसके दिल को अंदर से गुदगुदा रही थी, झिंझोड़ रहा थी.

“उफ्फ्फ्फ… शमशेर… आह्ह्ह्ह… यह क्या… उईईई माँ…”
कामिनी का सिर तकिये में धंस गया।
वह किसी मादा भेड़िया की तरह हुंकार उठी।
उसकी पीठ धनुष की तरह तन गई और अनजाने में उसने अपनी गांड को और पीछे धकेल दिया—सीधे शमशेर के मुंह पर।
यह एक मूक सहमति थी— “और चाटो… और अंदर तक…”
शमशेर समझ गया कि नशा चढ़ गया है।
उसने कामिनी की जांघों के बीच से बहते हुए पानी (Vaginal Juice) को अपनी उंगलियों पर लिया और उसे कामिनी के गांड के छेद पर लगा दिया।

और फिर उसने अपनी जीभ को चपटा करके उस पूरे इलाके को एक आइसक्रीम की तरह चाटना शुरू किया।
वह अपनी नाक को कामिनी के कूल्हों के बीच रगड़ रहा था, उसकी कस्तूरी (Musk) जैसी गंध को सूंघ रहा था।
कामिनी की मनोदशा अब किसी जानवर जैसी हो गई थी।

उसे अब यह नहीं याद था कि वह किसकी बीवी है, या सामने कौन है।
उसे बस वह “गीलापन” और वह “गरमाहट” चाहिए थी।
उसकी गांड का छेद, जो पहले डर से बंद था, अब मज़े में ढीला पड़ने लगा था… शमशेर के स्वागत के लिए खुलने लगा था।
शमशेर ने अपना मुंह हटाया, उसकी दाढ़ी कामिनी के रसों से सनी हुई थी।
उसने कामिनी की कांपती हुई गांड पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।
“चटाक!!”
“साली… स्वाद आ गया…” शमशेर गुर्राया।
” अब हुई ना तैयार तेरी गुफा..”

शमशेर अब रुकने वाला नहीं था। कामिनी की गांड चाटने के बाद उस पर हवस का नशा पूरी तरह हावी हो चुका था।
उसने एक हाथ से अपनी बेल्ट का बक्कल पहले ही खोल रखा था।
अब उसने एक ही झटके में अपनी खाकी पैंट और अंडरवियर को घुटनों से नीचे सरका दिया।
पैंट के नीचे गिरते ही उसका विशाल, काला और नसों भरा लंड पूरी तरह आज़ाद हो गया।

वह हवा में ऐसे डोल रहा था जैसे कोई भूखा और गुस्से में भरा कोबरा (सांप) अपना फन फैलाए शिकार ढूंढ रहा हो।
वह ‘सांप’ फनफना रहा था, उसका लाल टोप (Suapada) सूजा हुआ था और वह अपना बिल (कामिनी की गांड) तलाश रहा था।
शमशेर ने कामिनी की कमर को अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया।
उसने अपने उस बेचैन सांप को दिशा दिखाई।
शमशेर ने अपने लंड को मुट्ठी में भरा और उसे कामिनी की गीली और खुली हुई गांड की दरार पर रख दिया।
उसने लंड को ऊपर-नीचे रगड़ना शुरू किया।
“स्लप… स्लप…”
शमशेर का गरम और सख्त लंड, कामिनी की मुलायम और थूक से गीली गांड के छेद पर घिसने लगा।
कामिनी उस झुलसा देने वाली गर्मी से सिहर उठी।
उसे पता चल गया कि अब ‘मौत या मजा दरवाज़े पर खड़ा है।
उसमें अब विरोध करने की न तो हिम्मत बची थी, और सच कहें तो… न ही इच्छा।
उसका शरीर उस कठोर दंड को पाने के लिए तैयार हो गया।
सामने बिस्तर पर रमेश बेहोश पड़ा था।
कामिनी ने झट से रमेश की शर्ट का कॉलर अपनी मुट्ठी में भरा और उसे अपने मुंह में ठूंस लिया।
उसने अपने जबड़े भींच लिए, ताकि उसकी चीखें बाहर न जा सकें।

उसने अपनी गांड को हल्का सा पीछे धकेला, अनजाने में ही शमशेर को इशारा कर दिया।
उसकी गांड का वह छोटा सा, गुलाबी छेद बाहर की तरफ (Prolapse) खुलने लगा, जैसे कह रहा हो— “आओ, मुझे भर दो।”
शमशेर ने अब और इंतज़ार नहीं किया।
उसने अपने लंड के विशाल, मशरूम जैसे टोपे (Glans) को कामिनी की गांड के ठीक मुहाने पर सेट किया।
वह छेद बहुत छोटा था, और टोप बहुत बड़ा।
शमशेर ने कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और अपनी कमर को आगे की तरफ धकेला।

एक धीमा लेकिन ताकतवर दबाव।
कामिनी की गांड की मांसपेशियां (Sphincter) खिंचने लगीं।
उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, पुतलियां फैल गईं। उसने रमेश की शर्ट को दांतों तले दबा लिया।
“तड़ड़ड़……”
गांड की चमड़ी तनने लगी। लंड का मोटा टोप उस तंग रास्ते को जबरदस्ती चौड़ा कर रहा था।
वह एक टाइट रबर रिंग को फाड़कर अंदर घुसने जैसा था।
“खचाक…..!!”
एक गीली और भारी आवाज़ के साथ शमशेर ने एक ज़ोरदार धक्का मारा।
मेहनत रंग लाई।
शमशेर के लंड का वह मोटा, लाल और विशाल टोप कामिनी की गांड के तंग दरवाज़े को तोड़ता हुआ अंदर घुस गया।
“आआआआआहहहहह…… उउउउफ्फ्फ्फ़…. म्म्म्म्म्प्पप्प…..!!!”
कामिनी की चित्कार निकल गई।
उसे लगा जैसे किसी ने गरम लोहे की कील उसकी गांड में ठोक दी हो।
उसका सिर झटके से ऊपर उठा, नसे तन गईं।
लेकिन रमेश की शर्ट ने उसकी उस गगनभेदी चीख को घोंट दिया।
और ठीक उसी पल…
जैसे ही वह विशाल लंड गांड के अंदर घुसा और उसने अंदर के अंगों (Bladder/G-Spot) पर ज़बरदस्त दबाव बनाया…
कामिनी का शरीर अपना नियंत्रण खो बैठा।
उसकी चुत, जो पहले से ही गीली थी, लंड के इस अचानक हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाई।
“सर्ररररर…… पिच….पाचककक ससससररर……!!”
कामिनी की चुत से पेशाब और उत्तेजना के पानी की एक तेज़ धार (Squirt) फव्वारे की तरह छूट गई।
वह धार सीधे बिस्तर पर गिरी, बिस्तर की चादर गीली हो गई।

ऐसा लगा जैसे कामिनी के शरीर ने शमशेर के लंड के लिए जगह खाली की हो।
वह नज़ारा अद्भुत था।
पीछे एक मर्द उसकी गांड मार रहा था, और आगे से वह औरत झड़ (Squirt) रही थी।
शमशेर ने उस गीलेपन को देखा और पागल हो गया।
“साली… मूत दिया तूने?” शमशेर हांफते हुए हंसा। “ले अब पूरा ले…”
और उसने अपना बाकी का 8 इंच का तना भी अंदर उतारना शुरू कर दिया।

शमशेर का विशाल लंड का ‘सुपाड़ा’ (Topa) कामिनी की गांड के तंग दरवाज़े को तोड़कर अंदर घुस चुका था।
शुरुआत में तो लगा जैसे कामिनी की गांड फट गई हो, लेकिन जैसे ही शमशेर ने रुकने के बजाय धीरे-धीरे कमर चलानी शुरू की, मंज़र बदलने लगा।
“स्लप… चप… स्लप…”
गीली थूक और कामिनी के रसों की वजह से लंड चिकना होकर अंदर-बाहर होने लगा।
शमशेर ने बहुत सधे हुए अंदाज़ में छोटे-छोटे धक्के मारने शुरू किए।
वह अपने लंड को आधा बाहर खींचता, और फिर धीरे से वापस अंदर ठेल देता।
इस रगड़ ने कामिनी के अंदर एक नया ही तूफ़ान खड़ा कर दिया।
वह गांड, जो कुछ पलों पहले दर्द से चीख रही थी, अब उस ‘भराव’ (Fullness) को महसूस करके पागल होने लगी।
कामिनी को महसूस हुआ कि उसकी गांड की मांसपेशियां (Sphincter) शमशेर के लंड को किसी रबर बैंड की तरह जकड़ रही हैं, उसे चूम रही हैं।

दर्द पल भर में ही उत्तेजना में तब्दील होने लगा।
उसे अपनी नाभि के नीचे, पेट की गहराई में एक मीठा-मीठा दर्द और भारीपन महसूस हुआ।
यह चुत के मज़े से ज्यादा गहरा और नशीला था।
कामिनी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि गांड मरवाने में भी इतना मज़ा है। वह उस ‘भरने’ के अहसास की गुलाम हो गई।
उसने रमेश की शर्ट को मुंह से थूक दिया और दबी हुई आवाज़ में सिसकी—
“आह्ह्ह… शमशेर… और… और अंदर…”
उसने अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेला।
वह चाहती थी कि वह मोटा सांप उसकी आंतों तक घुस जाए। वह अब और लंड मांग रही थी।
शमशेर ने यह इशारा समझ लिया।
“साली… स्वाद आ गया तुझे भी?” शमशेर हांफते हुए हंसा।
उसने कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और मौका देखकर एक ज़ोरदार धक्का मारा।
“धप्प…!!”
शमशेर का लंड, जो अब तक सिर्फ़ सुपाड़ा अंदर डाले हुए था, अब आधा (Half Shaft) अंदर चला गया।
कामिनी की आँखें पलट गईं। उसे लगा वह जन्नत में है।

वे दोनों अपनी लय (Rhythm) पकड़ने ही वाले थे।
कामिनी और लंड लेने के लिए पीछे धकेल रही थी, और शमशेर पूरा अंदर डालने के लिए जोर लगा रहा था।
तभी…
अचानक रात के सन्नाटे को चीरती हुई एक तेज़ और डरावनी आवाज़ बेडरूम में गूंज उठी।
“वी… वू… वी… वू… वी… वू…!!!!”
(Police Siren Wailing Loudly)

आवाज़ इतनी तेज़ और नज़दीक थी कि लगा पुलिस की जीप सीधे बेडरूम के अंदर घुस आई है।
और आवाज़ के साथ ही…
बेडरूम की खिड़की के पर्दे पर लाल और नीली रौशनी (Red & Blue Lights) चमकने लगी।
पर्दे से छनकर आती वह घूमती हुई रौशनी पूरे कमरे में डिस्को लाइट की तरह नाचने लगी—कभी कामिनी की नंगी पीठ पर लाल, तो कभी शमशेर के चेहरे पर नीला।
कामिनी और शमशेर बुरी तरह डर गए।
उनका नशा एक सेकंड में हिरन हो गया।
कामिनी, जो अभी मज़े में झूम रही थी, अब खौफ से कांप उठी।
“हय राम! ये… ये क्या हुआ? इतनी रात को पुलिस?” कामिनी बड़बड़ाई।
वह किसी खूंटे से बंधे जानवर की तरह छटपटाने लगी। उसे लगा अब सब ख़त्म। इज़्ज़त, घर, सब कुछ।

लेकिन असली मुसीबत तो अब शुरू हुई।
पुलिस के सायरन की आवाज़ सुनकर शमशेर का, जो एक पुलिस वाला ही था, डर के मारे बुरा हाल हो गया।
डर का सीधा असर उसके लंड पर पड़ा।
उसका वह लोहे जैसा खड़ा लंड, जो कामिनी की गांड में आधा घुसा हुआ था, अचानक सिकुड़ने लगा। वह ढीला पड़ गया।
शमशेर ने हड़बड़ाहट में अपना लंड बाहर खींचना चाहा।
लेकिन यहाँ फिजिक्स ने खेल कर दिया।
कामिनी भी डरी हुई थी। डर के कारण उसकी गांड की मांसपेशियां (Sphincter) बुरी तरह सिकुड़ गईं।

उसकी तंग गांड ने शमशेर के आधे-अधूरे और अब ढीले पड़ते हुए लंड पर एक वैक्यूम बना दिया।

शमशेर अपना लंड बहार खींच रहा था, लेकिन लंड बाहर नहीं आ रहा था।
उसका सुपाड़ा (Topa) अंदर बुरी तरह फंस (Stuck) गया था।
“अरे… अरे… छोड़ इसे…” शमशेर फुसफुसाया, पसीने से तर-बतर होकर।
“आआआआह्हः….. बहार निकालो इसे… हाय माँ…” कामिनी सिसक उठी।
उसे ऐसा लग रहा था जैसे शमशेर लंड नहीं, उसकी आंतें खींच रहा है।

शमशेर ने एक हाथ कामिनी की कमर पर रखा और दूसरे हाथ से अपनी जांघ पर जोर दिया।
उसने एक झटका मारा।
“इइइइ… पप्पाप्प… पुककक…!!” (PLUCK!)
एक गीली और अजीब सी आवाज़ आई, जैसे किसी ने शैंपेन की बोतल का कॉर्क (Cork) खोला हो, या कीचड़ में फंसा पैर बाहर निकाला हो।

शमशेर का लंड झटके से बाहर निकल आया।
उसका सुपाड़ा लाल था और उस पर कामिनी की गांड की गीलापन लगा हुआ था।
कामिनी को ऐसा लगा जैसे उसकी गांड का छेद बाहर की तरफ पलट गया हो।
उसे महसूस हुआ कि उसका दिल और कलेजा उस रास्ते से बाहर खिंच आया है।
उसकी गांड का छेद अब खुला (Gaping) रह गया था, जो हवा में “धक्-धक्” कर रहा था।
दर्द और खिंचाव ने उसकी आँखों में आंसू ला दिए।

लंड के निकलते ही शमशेर तुरंत पीछे हटा।
उसने आव देखा न ताव, अपनी खाकी पैंट और अंडरवियर को जल्दी-जल्दी ऊपर चढ़ाया।
उसकी हालत पतली थी। उसका लंड अब पूरी तरह सिकुड़कर केंचुआ बन गया था।

उसने बेल्ट लगाई भी नहीं, बस हाथ में पकड़ ली।
“मै… मैं देखता हूँ बाहर क्या है…” शमशेर ने हकलाते हुए कहा। “शायद रेड है… तुम… तुम जल्दी से कपड़े पहन लो।”
शमशेर ने रमेश की तरफ इशारा किया।
“और इस चूतिये को… रमेश को जगाओ! जल्दी!”
कामिनी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
वह नंगी थी, पसीने से लथपथ थी, उसकी गांड और योनि से पानी बह रहा था।
बाहर लाल-नीली बत्ती चमक रही थी।
उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी और पेटीकोट को उठाया जो ज़मीन पर पड़े थे।
उसने उन्हें लपेटा नहीं, बस अपने आगे पकड़ लिया।
वह रमेश के पास गई और उसे झिंझोड़ने लगी।
“उठो… उठो रमेश… प्लीज उठो…” कामिनी की आवाज़ में रुलाई थी।
“देखो बाहर पुलिस आई है… उठो ना!”
रमेश नशे में “हूं… हां…” कर रहा था, उसे खबर ही नहीं थी कि उसकी बीवी की गांड अभी-अभी मारी गई है और घर के बाहर पुलिस खड़ी है।
तभी बाहर से मेगाफोन (Loudspeaker) पर आवाज़ आई—
“बंगला नंबर 69! पुलिस ने घर को चारों तरफ से घेर लिया है। जो भी अंदर है, हाथ ऊपर करके बाहर आ जाओ!”
आवाज़ किसी और की नहीं, कमिश्नर विक्रम सिंह की थी।
शमशेर का खून जम गया।

समय: रात के 2:05 बजे

पुलिस के सायरन की “वी-वू… वी-वू…” अब कान फाड़ रही थी।
शमशेर, जो अभी-अभी अपनी पैंट चढ़ाकर कामिनी के बेडरूम से भागा था, अब बगीचे के अंधेरे कोने में खड़ा था।
उसका दिल हथौड़े की तरह धड़क रहा था।
उसने कांपते हाथों से अपना फ़ोन निकाला और अपने जूनियर मोहन को मिलाया।

“हैलो! मोहन! मादरचोद क्या हो रहा है ये? मेरे इलाके में मेरी इज़ाज़त के बिना ये सायरन क्यों बज रहे हैं?”
शमशेर ने रौब झाड़ने की कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज़ में डर था।
उधर से मोहन की हड़बड़ाई हुई आवाज़ आई, “सर! सर आप कहाँ हैं? हमें कमिश्नर साहब की तरफ से सख्त आदेश हैं। बंगला नंबर 69 पर रेड मारनी है। कादर खान और ड्रग्स की टिप मिली है।”

शमशेर का हलक सूख गया। ड्रग्स! कादर के बारे मे जानकारी कहाँ से लीक हुई.
मोहन ने आगे कहा, “सर, हम बंगले के गेट पर खड़े हैं। कमिश्नर साहब खुद पहुँच रहे हैं। अगर 5 मिनट में गेट नहीं खुला, तो हम तोड़कर घुस जाएंगे।”

शमशेर का पॉलिसीया शातिर दिमाग बिजली की तरह दौड़ा।
वह दौड़कर स्टोर रूम की तरफ गया।
“धड़ाम!”
उसने स्टोर रूम का दरवाज़ा लात मारकर खोला।
अंदर कादर खान हड़बड़ाकर उठ बैठा। सायरन की आवाज़ से उसकी नींद खुल गई थी, लेकिन पास में पड़ा रघु अभी भी नशे में मुर्दे की तरह सो रहा था।

“साब… पुलिस..आ गई क्या? .” कादर ने घबराकर पूछा।
“बैग कहाँ है…” शमशेर ने आस पास देखा, बैग लावारिस जमीनी पर पड़ा था, उसने बैग उठाकर कादर की छाती पर दे मारा।

“ये ले! इसे पकड़!” शमशेर फुसफुसाया, लेकिन उसकी आँखों में खौफ था।
“भागकर अंदर जा! कामिनी मैडम को दे! कहना शमशेर साहब ने भेजा है, इसे कहीं भी छुपा दें! जल्दी कर वरना सब मारे जाएंगे!”

शमशेर जानता था कामिनी से ज्यादा सवाल जवाब नहीं किया जायेगा, कुछ सोचने समझने का वक़्त मिल जायेगा।

कादर को खुद को कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसकी जान हलक मे थी, वह नंगे पैर ही घर के पिछले दरवाज़े की तरफ भागा।

इधर बेडरूम में कामिनी अपनी साड़ी ठीक कर रही थी।
उसके हाथ कांप रहे थे।
उसकी गांड में अभी भी वह मीठा-मीठा दर्द और खिंचाव था। चलने में उसे दिक्कत हो रही थी, उसके पैर लड़खड़ा रहे थे।
उसके चेहरे पे जिस्मानी दर्द कम और अधूरापन ज्यादा दिख रहा था, बार बार झड़ने के करीब पहुँचती की कोई ना कोई मुसीबत आ ही जाती.
उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था.

“रमेश… उठो ना…” वह रमेश को झिंझोड़ रही थी।
तभी पीछे से कादर आंधी की तरह अंदर आया।
“मैडम… मैडम…!”
कामिनी चौंक गई।
कादर ने वह काला बैग कामिनी के हाथों में थमा दिया।
“साब ने भेजा है… शमशेर साब ने! बोले पुलिस आई है… इसे छुपा दो!”

कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया। बैग भारी था।
उसे तुरंत समझ आ गया, पुलिस क्यों और किसलिए आई है।

“हाय राम…” कामिनी ने इधर-उधर देखा।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, समझने का समय ही कहाँ था.
“इसे मुझे दो माँ ” कामिनी ने सकपाकते हुए पीछे देखा, बंटी खड़ा था
उसने आगे बढ़ कर बैग कामिनी के हाथ से ले लिया,
“सब ठीक हो जायेगा ” कामिनी अभी भी बद हवास थी.
सिर्फ बंटी को जाता देखती रही.
उसकी सांसे तेज़ चल रही थी.
“और मैडम मै….?” कादर के चेहरे पे डर, सवाल सब एक साथ था.
“त तत… तुम?” कामिनी ना चाहते हुए भी उसे बचा लेना चाहती थी, कादर का इस घर मे पकड़ा जाना उसके और रमेश के लिए शर्मनाक होता.
“यहाँ नीचे… जल्दी…. ” कामिनी ने बेड के नीचे इशारा किया.
कादर को इशारा मिलने की देर थी की फुर्ती से किसी चूहें की तरह वो बेड के नीचे सरक गया.

इस उपक्रम मे कोई 5 मिनट गुज़र चुके थे। कामिनी ने खुद को नार्मल किया, एक बात रमेश को फिर से उठाने की कोशिश की, लेकिन रमेश नहीं उठाया.

“धाड़… धाड़…. धाड़….. बहार मैन गेट का दरवाजा पीटने की आवाज़ आने लगी.

“कौन है इतनी रात को?”
कामिनी हॉल से होती मुख्य दरवाज़े तक पहुंची।
उसने कांपते हाथों से चिटकनी खोली।
“चरररर……”
दरवाज़ा खुलते ही सामने का नज़ारा किसी फिल्म जैसा था।
चारों तरफ पुलिस थी, उनके पीछे गार्डन मे पुलिस की की गाड़ियाँ, लाल-नीली बत्तिया।
और उन सबके बीच… अपनी जीप से उतरता हुआ, वर्दी में तना हुआ कमिश्नर विक्रम सिंह।

विक्रम के बूटों की आवाज़ मार्बल के फर्श पर गूंजी।
“ठक… ठक… ठक…”
वह तेज़ कदमों से पोर्च में चढ़ा।
“माफ़ करना,” विक्रम ने अपनी कड़क आवाज़ में कहा, बिना ऊपर देखे। “हमें पुख्ता खबर है कि यहाँ ड्रग्स है। आपके घर की तलाशी लेनी होगी।”
विक्रम अपनी धुन में था, उसका ध्यान अपने मिशन पर था।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी नज़रें उठाईं…
“अ… अ… आप…?”
विक्रम के शब्द गले में ही फंस गए। उसका मुंह जाम हो गया।
उसके कदम वहीं रुक गए।
उसके सामने कामिनी खड़ी थी।
लेकिन यह वह कामिनी नहीं थी जिसे उसने कल शाम अपने घर पर देखा था,
यह एक ‘टूटी हुई, बिखरी हुई और अधूरी वासना मे जलती हुई ‘ कामिनी थी।

उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था, बाल बिखरे हुए थे और गालों पर उत्तेजना की लाली थी।
होंठ सूजकर मोटे और लाल हो गए थे, वे ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने उन्हें बेदर्दी से नोचा हो।
आँखों में नींद नहीं, बल्कि एक अजीब सा नशा और गुस्से का मिश्रण था।
उसकी साड़ी बेतरतीब लपेटी हुई थी। ब्लाउज़ के बटन शायद गलत लगे थे।

कामिनी उस वक़्त अपने कामुक हुस्न के चरम पर थी।
वह एक ‘ अधूरी’ औरत लग रही थी, जिससे अभी-अभी किसी मर्द ने खेला हो।
विक्रम उसे एकटक देखता रह गया। उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
“कामिनी जी…?” विक्रम के मुंह से अनजाने में उसका नाम निकल गया।
“ये… ये आपका घर है?”

विक्रम की आवाज़ में पुलिसिया रौब गायब हो गया था, उसकी जगह हैरानी और एक अजीब सी सहर (Fascination) ने ले ली थी।
कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ा, अपनी छाती को ढकने की नाकाम कोशिश की।

दरवाज़े पर खड़ी कामिनी का चेहरा तमतमा रहा था।
उसकी आँखों में जो लाल डोरे थे, वे अब नींद या नशे के नहीं, बल्कि खालिस गुस्से के थे।
उसके पीछे पुलिस की जीप की लाल-नीली बत्तियाँ चमक रही थीं, जो उसके पसीने से भीगे हुए चेहरे को और भी ज्यादा मादक और आकर्षक बना रही थीं।
विक्रम ने जैसे ही ड्रग्स की बात की, कामिनी के सब्र का बांध टूट गया।
उसके अंदर का लावा—जो कादर और शमशेर ने सुलगाया था, लेकिन बुझाया नहीं था—अब एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।

“ये क्या हरकत है कमिश्नर साहब?” कामिनी एकाएक विक्रम पर बरस पड़ी।
उसकी आवाज़ इतनी ऊंची और तीखी थी कि विक्रम के साथ खड़े दो हवलदार भी दो कदम पीछे हट गए।
“इतनी रात को… बिना बताए, आप शरीफों के घर का दरवाज़ा तोड़ रहे हैं?”
कामिनी एक कदम आगे बढ़ी। उसका सीना गुस्से से ऊपर-नीचे हो रहा था।
उसकी साड़ी का पल्लू फिर से हल्का सा सरक गया, लेकिन इस बार उसने उसे संभालने की ज़हमत नहीं उठाई।

“और कौनसी ड्रग? आपको क्या लगता है मैं यहाँ ड्रग बेचती हूँ? मेरा घर आपको अड्डा नज़र आता है?”
कामिनी किसी भूखी शेरनी की तरह दहाड़ रही थी।
उसका पूरा शरीर कांप रहा था। उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं।
पीछे खड़ा बंटी भी अपनी माँ का यह रूप देखकर एक पल के लिए सहम गया। उसने माँ को हमेशा दबी-कुचली, शांत देखा था। लेकिन आज… आज वह दुर्गा बनी खड़ी थी।
उसे अंदाज़ा नहीं था कि एक असंतुष्ट और उत्तेजित औरत का गुस्सा कितना खौफनाक हो सकता है।
सामने खड़ा कमिश्नर विक्रम सिंह, जिसे पूरा शहर ईमानदार और कड़क आदमी के रूप मे जानता था, आज एक औरत के सामने सकते में आ गया।

उसने मुजरिमों को रोते देखा था, लेकिन किसी औरत को अपनी आँखों में आँखें डालकर, इस तरह ललकारते हुए पहली बार देख रहा था।
और सच तो यह था…
कामिनी का यह बिखरा हुआ रूप—सूजे होंठ, अस्त-व्यस्त कपड़े, और आँखों में आग—विक्रम को बेइंतहा मोहक लग रहा था।
उसे लगा जैसे वह किसी ‘फायर ब्रांड’ को देख रहा है।
“म… म… माफ़ करना कामिनी जी…” विक्रम की जुबान लड़खड़ा गई।
वह शेर, जो अभी दहाड़ते हुए जीप से उतरा था, अब भीगी बिल्ली बन चुका था।
उसने अपनी कैप (Cap) को हल्का सा ठीक किया, जैसे अपनी घबराहट छुपा रहा हो।

“मुझे… मुझे सच में नहीं पता था कि यह आपका घर है,” विक्रम ने अपनी आवाज़ को और नरम किया। उसकी नज़रों में अब रौब नहीं, शर्मिंदगी थी।
“क्या करूँ मैडम… ड्यूटी ही ऐसी है मेरी। गलत फहमी हो गई होगी।”
विक्रम सफाई देना चाह रहा था, लेकिन कामिनी की जलती हुई आँखें उसे चुप करा रही थीं।
अक्सर बड़े से बड़ा शूरवीर भी औरत के हुस्न और गुस्से के कॉकटेल के आगे घुटने टेक देता है।

विक्रम पीछे मुड़ने ही वाला था, “हम चलते हैं…”
तभी पीछे से बंटी आगे आया।
उसका चेहरा एकदम शांत था, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

“नमस्ते अंकल!” बंटी ने बहुत ही शालीनता से हाथ जोड़े।
विक्रम रुका। “नमस्ते बेटा…”
“आप ऐसे कैसे जा सकते हैं? आप तो अपनी ड्यूटी कर रहे थे,” बंटी ने एक शातिर चाल चली।

“अगर आपको शक है, तो प्लीज… अंदर आ कर देख लीजिये।”
बंटी का यह दांव मास्टरस्ट्रोक था। अगर वह रोकता, तो शक होता। उसने बुलाकर शक ख़त्म कर दिया।
विक्रम असमंजस में पड़ गया।
“नहीं… नहीं बेटा… मैं चलता हूँ। लगता है खबरी ने नशा ज्यादा कर लिया था,” विक्रम अब कामिनी से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
“कोई बात नहीं अंकल… प्लीज, आईये,” बंटी ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया।
विक्रम ने एक नज़र कामिनी पर डाली।
कामिनी अभी भी उसे घूर रही थी, उसकी छाती तेज़ चल रही थी।
“Sorry… कामिनी जी…” विक्रम ने धीरे से कहा।
और फिर वह दबे पांव, एक पुलिस वाले की तरह नहीं, बल्कि एक मेहमान की तरह घर के अंदर दाखिल हुआ।
लेकिन यह तलाशी सिर्फ़ एक औपचारिकता थी।
विक्रम मन ही मन कामिनी को ‘क्लीन चिट’ दे चुका था।
उसे क्या पता था कि जिस घर को वह ‘शरीफों का घर’ समझ रहा है…
“कामिनी पानी ले आई तब तक ”
वो माफ़ करना रात मे नींद ख़राब हुई तो गुस्सा आ गया थोड़ा.
कामिनी ने खुद को संभाल लिया था.

हॉल में सन्नाटा था। पुलिस वाले बाहर खड़े थे, और अंदर सिर्फ़ विक्रम और बंटी थे।
विक्रम ने अपनी बाज़ जैसी नज़रों से ड्राइंग रूम का जायज़ा लिया। सब कुछ सामान्य था—सोफे, टीवी, पर्दे—कहीं भी ड्रग्स या किसी अपराधी के होने का नामोनिशान नहीं था।
“हम्म…” विक्रम ने धीरे से हुंकार भरी।
“रमेश जी नहीं दिख रहे कहीं?” विक्रम ने सवालिया नज़रों से पूछा।

“घर के मालिक हैं, कम से कम पुलिस को देखकर तो उठना चाहिए था।”
बंटी के चेहरे पर एक भी शिकन नहीं थी। गज़ब का शातिर और आत्मविश्वास से भरा लड़का था यह। इतनी बड़ी मुसीबत सामने थी, लेकिन वह ऐसे शांत था जैसे रोज़ का काम हो।
“पापा तो सो रहे हैं अंकल,” बंटी ने बहुत ही मासूमियत से कहा। “आज तबियत थोड़ी नासाज़ थी, शायद दवाई लेकर सोए हैं। आइये, मैं दिखाता हूँ।”

बंटी ने खुद आगे बढ़कर उस बेडरूम का रास्ता दिखाया, जो इस पूरी रात के गुनाहों का गवाह था।

विक्रम बंटी के पीछे-पीछे बेडरूम में दाखिल हुआ।
अंदर घुसते ही सबसे पहले रमेश के भारी खर्राटों की आवाज़ सुनाई दी।
सामने किंग साइज़ बेड पर रमेश औंधे मुंह, बेसुध पड़ा था।
“लो… इंजीनियर बाबू तो घोड़े बेचकर सो रहे हैं,” विक्रम ने मन ही मन सोचा। “हम बाहर दुनिया हिला रहे हैं और यह यहाँ मज़े में है।”
विक्रम पलटने ही वाला था कि तभी…
उसकी नज़र बिस्तर की चादर पर गई।
चादर बुरी तरह सिमटी हुई थी, उस पर अनगिनत सिलवटें थीं। तकिये इधर-उधर बिखरे हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे उस बिस्तर पर अभी-अभी कुश्ती लड़ी गई हो।

लेकिन जिस चीज़ ने विक्रम का ध्यान खींचा, वह था बिस्तर के बीचों-बीच बना एक बड़ा सा गीला धब्बा।
वह कामिनी के पेशाब और काम-रस (Squirt) का निशान था।
वह धब्बा अभी भी ताज़ा था, गीला था और ट्यूबलाइट की रौशनी में अलग ही चमक रहा था।
और कमरे की हवा में…
मटन की खुशबू के साथ-साथ एक मादक, कामुक और तीखी गंध (Sex Smell) फैली हुई थी। पसीने और स्त्री-रस की वह गंध,

विक्रम के चेहरे पर एक शरारती और समझदार मुस्कान आ गई।
वह सब समझ गया कामिनी इतने गुस्से मे क्यों थी,
‘ओह… तो ये बात है…’ विक्रम ने मन ही मन सोचा।

विक्रम को अपनी गलती का अहसास हुआ, लेकिन साथ ही एक अजीब सी जलन भी हुई कि रमेश जैसा साधारण आदमी कामिनी जैसी ‘आग’ के मज़े ले रहा है।

उसी बेड के ठीक नीचे…
फर्श पर चिपका हुआ कादर खान अपनी सांस रोके पड़ा था।
उसकी आँखों के ठीक सामने कमिश्नर विक्रम के काले, चमकते हुए बूट (Boots) थे।
कादर का दिल उसके हलक में आ गया था।
अगर विक्रम ज़रा सा भी नीचे झुकता, या रमेश का हाथ नीचे लटक जाता… तो खेल ख़त्म था।

कादर ने अपनी आँखें बंद कर लीं और दुआ मांगने लगा। उसके पसीने की बूंदें फर्श पर गिर रही थीं।

विक्रम ने बेड के नीचे नहीं देखा। उसे लगा उसने “सच” देख लिया है।
“ठीक है बेटा…” विक्रम ने बंटी के कंधे पर हाथ रखा।

“सोने दो अपने पापा को। डिस्टर्ब मत करो।”
विक्रम मुस्कुराता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।
वह वापस हॉल में आया।
कामिनी अभी भी सोफे के पास कुर्सी पर बैठी थी।
उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था। वह अपने पल्लू को बार-बार अपनी उंगलियों में लपेट रही थी। वह बेचैन थी, डरी हुई थी, शंका में थी कि कहीं कादर की कोई आवाज़ न आ जाए।

विक्रम उसके पास जाकर रुक गया।
उसने कामिनी को ऊपर से नीचे तक देखा। अब उसकी नज़रों में पुलिसिया सख्ती नहीं, बल्कि एक मर्द की प्रशंसा थी।
“माफ़ कीजियेगा कामिनी जी…” विक्रम ने धीमी आवाज़ में कहा।
“मुझे अंदाज़ा नहीं था कि मैंने गलत वक़्त पर दखल दे दिया।”
उसकी आँखों में एक चमक थी जो बिस्तर के उस ‘गीले धब्बे’ की तरफ इशारा कर रही थी।

कामिनी समझ नहीं पाई कि वह क्या कह रहा है, बस उसने राहत की सांस ली कि तलाशी ख़त्म हुई।
“जी… कोई बात नहीं…” कामिनी ने नज़रें नहीं मिलाईं।
विक्रम जाने के लिए मुड़ा, फिर रुका।
उसने कामिनी की आँखों में सीधे देखा।

“चलता हूँ बेटा बंटी…” विक्रम ने हाथ हिलाया और तेज़ कदमों से बाहर निकल गया, अपनी नाकामी और असफलता को एक नई उम्मीद के पीछे छुपाते हुए।
विक्रम का बहार निकलना था की कामिनी लगभग दौड़ती हुई बंटी के गले जा लगी, उसकी आँखों मे आंसू थे,
उसके स्तन बंटी के सीने मे पूरी तरह पीस गए.
“कोई बात नहीं माँ…. मै हूँ ना, आप पर कोई आंच नहीं आ सकती ”
बंटी ने अपनी माँ की नंगी पीठ को सहलाया.
इस छुवन मे असीम प्यार था, सांत्वना थी, हिम्मत थी.
कामिनी मन ही मन खुद पे गर्व महसूस कर रही थी की उसने बंटी जैसे बेटे को पैदा किया.
माँ बेटे का ये मिलन अभी चलता ही की….
चल… साले… मादरचोद शराबी…. जिस घर मे रहता है, उनकी को बदनाम करता है… चाट… चाट…..
बहार से शमशेर के गुरराने की आवाज़ आ रही थी.
कामिनी और बंटी तुरंत भागते हुए बहार गए…..
सामने जो नजारा था उसने कामिनी के पैरो तले जमीनी खिसका दी…
****************

कामिनी और बंटी दौड़ते हुए पोर्च में आए।
सामने का नज़ारा देखकर उनकी सांसें थम गईं।
बगीचे की धुंधली रौशनी में, शमशेर सिंह किसी जल्लाद की तरह चला आ रहा था।

उसने रघु का कॉलर अपनी मुट्ठी में जकड़ रखा था और उसे ज़मीन पर घसीटता हुआ ला रहा था।
रघु के पैर ज़मीन पर रगड़ खा रहे थे, वह धूल में सना हुआ था, और उसके होंठ से खून बह रहा था। वह किसी मरे हुए जानवर की तरह शमशेर की पकड़ में झूल रहा था।

कमिश्नर विक्रम सिंह, जो अपनी जीप का दरवाज़ा खोलकर बैठने ही वाला था, शोर सुनकर रुका।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
शमशेर, रघु को घसीटता हुआ सीधे विक्रम के बूटों के पास ले आया।
शमशेर का सीना तना हुआ था, माथे पर पसीना चमक रहा था, और आंखों में एक विजेता की चमक थी।
शमशेर ने एक झटके से रघु को विक्रम के कदमों में फेंक दिया।
“धप्प!!”
रघु धूल चाटता हुआ विक्रम के जूतों पर गिरा।

“जय हिन्द साहब!” शमशेर ने कड़क आवाज़ में सैल्यूट मारा।
“ये है वो हरामखोर… जिस घर में खाता है, उसी घर को बदनाम करना चाहता था।”
शमशेर ने रघु की पसलियों में एक लात मारी।

“साहब, इसी ने दारू के ठेके पे वो झूठी अफवाह फैलाई थी कि यहाँ ड्रग्स है। साला नशे में धुत था, और इसने पूरे डिपार्टमेंट को नचा दिया।”

रघु दर्द से कराह उठा। वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया—
“ससस… सब… साब… मुझे कुछ नहीं पता… माई बाप… गलती हो गई…”
उसकी आवाज़ शराब और डर में डूबी हुई थी।
विक्रम ने रघु की हालत देखी—फटे कपड़े, शराब की बदबू और लड़खड़ाती जुबान।

वह तुरंत सारा माजरा समझ गया।
‘साला… शराबीयों का नाटक है ये। खामखां मेरी नींद भी हराम हुई और इज़्ज़त का फालूदा भी बना।’

विक्रम को अपनी बेवकूफी पर गुस्सा आया।
फिर उसकी नज़र शमशेर पर गई।
शमशेर का बदन पसीने से लथपथ था, और वह यहाँ पहले से मौजूद था।
विक्रम की भौहें तन गईं।
“तुम…?” विक्रम ने शमशेर को ऊपर से नीचे तक देखा।
“तुम यहाँ कब आए शमशेर? मोहन ने तो कहा था तुम ऑफ ड्यूटी हो, घर पर हो?”

यह सवाल एक जाल था। अगर शमशेर लड़खड़ाता, तो फंस जाता।
लेकिन शमशेर ने विक्रम की आँखों में सीधे देखा। उसके चेहरे पर एक कुटिल और आत्मविश्वास भरी मुस्कान थी।
“सर…” शमशेर ने अपनी छाती चौड़ी की।
“पुलिस कभी ऑफ ड्यूटी नहीं होती।”
शमशेर ने विक्रम का ही डायलॉग (जो विक्रम ने फोन पर मोहन को बोला था) उसे वापस चिपका दिया।

“मेरे भी अपने खबरी हैं सर। मुझे शाम को ही भनक लग गई थी कि ये शराबी कुछ बकवास कर रहा है। इसलिए मैं घर जाने के बजाय सीधा यहाँ आ गया, ताकि मामले की तफ्तीश कर सकूं।”

शमशेर ने एक ही वार में बाज़ी पलट दी थी।
उसने अपनी इज़्ज़त, अपना ओहदा और अपनी मौज-मस्ती… सब बचा लिया था।
वह यह साबित करने में सफल हो गया कि वह कमिश्नर से भी एक कदम आगे है।
पूरे पुलिस डिपार्टमेंट के सामने वह हीरो बन गया था। आस पास के हवलदार धीमी हसीं हस रहे रहे, जिसे कमिश्नर विक्रम ने साफ महसूस किया.

विक्रम का चेहरा उतर गया।
उसे महसूस हुआ कि उसने जल्दबाज़ी में गलती की है। वह शमशेर के सामने छोटा साबित हो गया था।
अब वहां एक पल भी रुकना विक्रम के लिए गवारा नहीं था। उसकी नाक कट चुकी थी।

विक्रम ने एक बार फिर कामिनी की तरफ देखा, जो अभी भी दरवाज़े पर खड़ी थी—बिखरी हुई, लेकिन सुरक्षित।
विक्रम ने गुस्से और शर्मिंदगी में अपनी कैप ठीक की।
“हम्म… गुड जॉब शमशेर। इसे (रघु को) थाने ले जाओ और साले का नशा उतारो।”
विक्रम मुड़ा और अपनी जीप में बैठ गया।

ड्राइवर पीछे मुड़कर कुछ पूछने ही वाला था कि विक्रम उस पर फट पड़ा।
“निकलो यहाँ से! अब मेरा मुंह क्या देख रहे हो? गाड़ी बढ़ाओ!”
“घुर्र्र्र्र्र……..”
जीप का इंजन दहाड़ा और टायरों ने धूल उड़ा दी।
पुलिस की गाड़ियाँ एक-एक करके वहां से निकल गईं। सायरन अब बंद हो चुके थे।
धूल के गुबार के बीच…
अब बंगले के पोर्च में सन्नाटा था।
वहां सिर्फ़ तीन लोग खड़े थे—
विजेता के अंदाज़ में खड़ा शमशेर,
दरवाज़े पर खड़ी हांफती हुई कामिनी,
और सब कुछ खामोशी से देखता हुआ बंटी।
और उनके कदमों में… रघु बेहोश पड़ा था।
रघु ने एक बार फिर अपने नमक का कर्ज अदा किया था, उसने कामिनी और रमेश पार आई मुसीबत खुद पर ले ली थी, हालांकि गलती भी उसी की थी भुगता भी उसी ने ही.

“चल बे अब जा के सो जा वापस ” शमशेर ने एक ठोंकर रघु को जमा दी और अपनी टोपी ठीक करता हुआ जीप मे जा बैठा, गगगगह्ह्हह्ह्ह्हर्र्टट… घरररररररर…. करती उसकी जीप भी बहार निकल गई.
सन्नाटा…. घुप… बस बंटी और कामिनी के दिल धड़क रहे थे.
“उठो.. उठो… रघु…. ठीक तो हो ना?” कामिनी ने भाग के रघु के सर को अपनी गोद मे राख लिया, ना जाने क्या आकर्षण था कामिनी को रघु से.
बंटी भागता हुआ पानी ले आया.
उसने देखा रघु को बहुत मार मारी थी शमशेर ने…
होंठ फट गए थे, गाल सूज गया था.
इसे अंदर ले चल बंटी….
कामिनी और बंटी ने रघु को सहारा दे अंदर ले आये…
“ये वही है…. वही मार…. साले ने बहुत मारा, रघु नशे मे बड़बड़ा रहा था, जैसे कुछ याद आ रहा हो”
इस बड़बड़हत को कामिनी और बंटी ने साफ इग्नोर कर दिया.
दोनों रघु को ले कर घर के बरामदे मे पहुचे तब तक कादर भी बहार आ गया था,
“क्या हुआ मैडम? ” कादर ने आते ही पूछा.
“जाओ तुम यहाँ से ” याकायाक कामिनी चिल्ला उठी.. जिसे सुन कादर भी सहम उठाया,
इन सब की गलती की वजह से बेचारा रघु मार खा रहा था, उसकी इस हालात के जिम्मेदार रमेश, शमशेर और कादर ही थे.
कादर समझ गया ये शेरनी फाड़ खायेगी.
बंटी ने जैसे तैसे रघु को बैडरूम मे रमेश के बाजु मे लेता दिया.
और तुरंत भाग कर फर्स्ट ऐड ले आया.
लो माँ…. दवाई लगा देना…. बेचारे ने मार खाई है…
बंटी की आँखों मे दया थी, माँ कर प्रति एक अजीब सा भाव था, जैसे वो समझ रहा हो की वो किस स्थिति से गुजर रही है.
उसने कामिनी के हाथ मे फर्स्ट ऐड बॉक्स पकड़ाया और बिना कुछ कहे अपने कमरे मे चल दिया.
चारो तरफ सन्नाटा था.
बस एक बैडरूम था, जहाँ रमेश के खर्राटे की आवाज़ थी, उसके पास लेता उसका नोकरी दर्द और नशे मे कराह रहा था,

रात के 3 बज रहे थे
बेडरूम में अब अजीब सी शांति थी, जिसे सिर्फ़ रमेश के भारी खर्राटों और रघु की दबी हुई कराहों ने तोड़ा हुआ था।
बंटी जा चुका था।
कामिनी बेड के किनारे बैठी थी। उसके हाथ में आयोडीन (दवा) की रुई थी।
वह रघु के सूजे हुए गालों और फटे हुए होंठों पर दवा लगा रही थी।
“सीइइइ… आह्ह्ह… मैडम…” रघु दर्द से कुलबुला रहा था।
वह आधे होश में था, आधे नशे में। उसे पता भी नहीं था कि शमशेर की मार के बाद अब उसे कौन सा ‘मरहम’ मिलने वाला है।
कामिनी दवा लगा रही थी, लेकिन उसका दिमाग कहीं और था।
उसकी चुत अधूरी प्यास से जूझ रही थी, इतनी मुसीबत के बावजूद उसे अपनी जांघो के बीच गिलापन महसूस हो रहा था, शमशेर का अधूरा लंड और फिर पुलिस का डर… इस सबने उसकी अधूरी प्यास को एक जुनून बना दिया था।

उसे मुक्ति चाहिए थी। उसे शांति चाहिए थी।
और यह शांति अब सिर्फ़ एक मर्द ही दे सकता था। वही जिसने हमेशा कामिनी की मदद की, फिलहाल वो कामिनी के सामने खुद मदद के लिए मोहताज़ था.

दवा लगाते-लगाते कामिनी की नज़र रघु के पजामे पर गई।
मैला-कुचैला, सस्ता सा पजामा।
लेकिन उस पजामे के बीचों-बीच… एक तंबू तना हुआ था।
रघु भले ही मार खाकर अधमरा था, लेकिन कामिनी के यौवन की महक, उसके स्तनों का दृश्य (जो झुकने पर दिख रहे थे) और उसके कोमल स्पर्श ने रघु की मर्दानगी को जगा दिया था।
उसका लंड पजामे के अंदर सिर उठाए खड़ा था, जैसे कह रहा हो— “मालिक पिट गया तो क्या हुआ, मैं तो ज़िंदा हूँ।”
कामिनी की सांसें अटक गईं।
उसकी उंगलियां कांपने लगीं। दवा की रुई उसके हाथ से छूटकर गिर गई।
अब और नहीं… अब वह एक पल भी इंतज़ार नहीं कर सकती थी।
उसने आव देखा न ताव।
उसने अपने दोनों हाथों से रघु के पजामे का नाड़ा पकड़ा और उसे एक झटके में खींच दिया।

“सर्ररर……”
रघु का काला, झांटों से भरा और नसों वाला देसी लंड बाहर उछल आया।
वह शमशेर जैसा विशाल था लेकिन कादर जैसा साफ़-सुथरा नहीं था।
वह एक मज़दूर का लंड था।
काला, टेढ़ा, और जिसके टोपे (Supada) पर एक अजीब सी लस्सेदार गंदगी (Smegma) और पेशाब की बूंदें जमा थीं।
उससे कच्ची शराब, पसीने और मूत्र की एक तीखी गंध आ रही थी।
लेकिन इस वक़्त कामिनी के लिए यह गंदगी ही सबसे बड़ा इत्र (Perfume) थी।
उस लंड को देखते ही कामिनी की लार टपक पड़ी।
रघु का लंड कामिनी की नज़रों का स्पर्श पाकर ही झटके मारने लगा।
“फच्… फच्…”
कामिनी से अब रहा नहीं गया।
वह किसी प्यासे जानवर की तरह उस पर टूट पड़ी।
उसने अपनी गर्दन झुकाई शनिफ्फफ्फ्फ़…. आअहम्म.. ससससस्स्स…. संउफ्फ्फ्फ़… कामिनी ने एक जबरजस्त सांस अंदर खिंच ली, एक कैसेली गंदी पेशाब से भारी खुसबू उसके जहन मे उतरती चली गई, उसके निप्पल टाइट होते गए,
उसने अपना पूरा मुँह खोल दिया, लाल होंठ खुलते गए और रघु के उस खड़े लंड को जड़ तक अपने मुंह में भर लिया।
“गप्पप….गुलप…. गप…..!!”
कामिनी का मुंह रघु के गरम और सख्त मांस से भर गया।

जैसे ही वह लंड उसकी जुबान से टकराया, एक देसी, कच्चा, गंदा और कसैला स्वाद उसके मुंह में घुल गया।
यह स्वाद बासी पसीने, सस्ती शराब और मर्द की हवस का था।

आम औरत होती तो अभी उल्टी कर देती, लेकिन ये कामिनी थी, हवास के ज्वालामुखी पर बैठी हुई एक प्यासी औरत,
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उसे चूसना शुरू किया।
“स्स्स्लर्प… चप्प… चप्प… गलोक…”
उसके गाल पिचक गए। वह अपनी जीभ को लंड के नीचे की नस और उसके गंदे टोपे पर फिराने लगी।

वह रघु के गंदे लंड को किसी कुतिया की तरह चाट चाट के साफ कर रही थी, उसे पी रही थी।
रघु, जो अभी दर्द में कराह रहा था, इस अचानक मिले स्वर्ग-सुख से हक्का-बक्का रह गया।
उसे लगा वह सपना देख रहा है।

उसकी मालकिन… बड़े साहब की बीवी… उसके लंड को किसी लॉलीपॉप की तरह चूस रही है।
उसका दर्द, उसकी मार… सब हवा हो गया।
“आह्ह्ह… उफ्फ्फ्फ… मैडम … हाय राम…”
उसकी दर्द भरी कराहें अब कामुक सिसकारियों में बदलने लगीं।

“मा… मारे गए… उईईई… क्या सुख है…”
कामिनी पागलों की तरह अपना सिर ऊपर-नीचे कर रही थी। उसकी चुत कांप रही थी, होंठो के किनारे से लार चु रही थी.

उसके बाल रघु के पेट और जांघों पर बिखर गए थे।
उसने रघु के अंडकोषों (Balls) को अपने हाथ में पकड़ लिया और उन्हें जोर से दबाया, जबकि उसका मुंह लंड को गले (Throat) तक उतार रहा था।

हर बार जब लंड उसके गले में टकराता, कामिनी को उबकाई आती, लेकिन वह रुकती नहीं।
वह उस कसैलेपन को, उस गंदगी को अपने अंदर उतार लेना चाहती थी।
बगल में रमेश खर्राटे ले रहा था।
और यहाँ उसकी पत्नी, उसके नौकर की गंदगी को अपने मुंह से साफ़ कर रही थी।
कामिनी का यह रूप “चरम गिरावट” और “चरम सुख” का अद्भुत संगम था।

रघु के लंड को अपने मुंह की लार और थूक से लथपथ करने के बाद कामिनी का सब्र जवाब दे गया।
उसने रघु के उस काले, खड़े और चिपचिपे लंड को एक आखिरी बार अपनी जीप से चाटा और फिर झटके से खड़ी हो गई।
उसका मुंह गीला था, होंठ सूजे हुए थे, और आँखों में वहशीपन तैर रहा था।
अब उसे और कोई रुकावट नहीं चाहिए थी। न कपड़ों की, न शर्म की।
कामिनी ने आव देखा न ताव।
उसने अपनी साड़ी का पल्लू, जो पहले से ही गिर रहा था, उसे पूरी तरह खींचकर ज़मीन पर फेंक दिया।
उसके हाथ बिजली की रफ़्तार से चले।
उसने ब्लाउज़ के बचे-खुचे हुक नोच डाले। ब्लाउज़ उतरकर दूर जा गिरा।

फिर पेटीकोट की डोरी खोली और उसे अपने पैरों से ठोकर मारकर अलग कर दिया।

कमरे की ट्यूबलाइट की रौशनी में कामिनी बिल्कुल नंगी खड़ी थी।
उसका दूधिया जिस्म (Milky White Body) पसीने और उत्तेजना की वजह से किसी संगमरमर की मूरत की तरह चमक रहा था।
उसके विशाल स्तन, जो अब आज़ाद थे, उसकी भारी सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उनके काले और खड़े निप्पल सामने रघु को घूर रहे थे।
उसकी गहरी नाभि, उसकी चौड़ी कमर, और उसकी भरी हुई जांघें…
और उन जांघों के बीच… उसका कामुक त्रिकोण जो की बिल्कुल बाल रहित था, अपने पुरे शबाब पर था।

उसकी गुलाबी चुत से निकलता पानी उसकी जांघों पर चांदी की लकीर की तरह बह रहा था।
रघु ने अपनी सूजी हुई आँखें खोलीं।
दर्द और नशे के धुंधलके में उसे लगा जैसे वह मर चुका है और सामने स्वर्ग की अप्सरा खड़ी है।

उसे शमशेर की मार का ऐसा कामुक ईनाम सात जन्मों में नहीं मिल सकता था।
कामिनी ने रघु को घूरते हुए देखा, लेकिन शर्माने के बजाय उसने अपनी जांघें थोड़ी और चौड़ी कर दीं।
“देख ले…” कामिनी मन ही मन बोली। “जी भर के देख ले…तेरी ही है।”
कामिनी बिस्तर पर चढ़ गई।
गद्दे पर उसके घुटने टिके और वह रघु के ऊपर आ गई।
उसने अपने दोनों पैर रघु की कमर के दोनों तरफ (Straddle) जमा दिए।

अब वह रघु के ऊपर विराजमान थी, एक देवी की तरह, लेकिन हवस की देवी।
कामिनी ने नीचे झांका।

रघु का काला, नसों वाला और थूक से चमकता हुआ लंड सीधा उसकी गीली चुत की तरफ तना हुआ था।
वह भाला अपने लक्ष्य को भेदने के लिए तैयार था।
कामिनी की योनि, जो कादर और शमशेर की वजह से अधूरी रह गई थी, उस नज़ारे को देखकर फड़क उठी।

“अब और नहीं…” कामिनी बड़बड़ाई। “अब बर्दाश्त करना मुश्किल है।”
कामिनी ने अपने घुटनों को मोड़ा।
वह धीरे-धीरे, बहुत ही सधे हुए अंदाज़ में नीचे बैठने लगी।
उसने अपने एक हाथ से रघु के लंड को पकड़ा और उसके मोटे टोपे (Head) को अपनी योनि के गीले और खुले हुए मुहाने (Opening) पर सेट किया।
“स्लप…”
गीले मांस के टकराने की आवाज़ आई।
रघु का लंड कामिनी की चुत के बाहरी होठों (Labia) से रगड़ खाया।
कामिनी की आत्मा सिसकार उठी।
वह स्पर्श ही इतना बिजलीदार था कि कामिनी का पूरा बदन कांप गया।
“आह्ह्ह… माँ…”
कामिनी ने अपनी कमर को और नीचे किया।
रघु का गंदा और देसी टोपा कामिनी की मखमली गुफा में रास्ता बनाने लगा।

“पछह… पचक…!!”
योनि इतनी गीली थी कि लंड मक्खन की तरह फिसलने लगा।
कामिनी ने अपनी सांस रोकी और अपना पूरा वजन छोड़ दिया।
“आआहहब… मा…. इसससससस……”
कामिनी चित्कार उठी।
जैसे किसी ने गर्म तवे पर पानी के छींटे मारे हों— “छनन्नnn…” वैसी ही आग उसके जिस्म में लगी।
रघु का मोटा लंड उसकी योनि की दीवारों को चीरता हुआ, फैलाता हुआ अंदर समाता चला गया।
वह कसाव, वह फैलाव (Stretch)… यही तो वह चाहती थी।
कामिनी को महसूस हुआ कि रघु का लंड उसकी बच्चेदानी (Cervix) तक दस्तक दे रहा है।
वह पूरी तरह उसके ऊपर बैठ गई थी।
रघु का पूरा जड़ तक (Balls deep) लंड कामिनी के अंदर गायब हो चुका था।

दोनों के पेट और पेडू (Pelvis) आपस में टकरा गए।
“धप्प…”
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना सिर पीछे की तरफ फेंक दिया।
उसके खुले बाल हवा में लहराए।
“उफ्फ्फ्फ… रघूऊऊऊ…”
यह सिर्फ़ सेक्स नहीं था। यह अधिकार था।
आज कामिनी चुद नहीं रही थी, वह एक मर्द को चोद रही थी।
उसने अपनी हवास को आज सारे आम उजागर कर दिया था।

उसने रघु की छाती पर अपने दोनों हाथ जमाए।
उसकी योनि ने रघु के लंड को अंदर जकड़ लिया (Clench किया)।
“अब देख तेरा क्या करती हूँ…”
कामिनी ने अपनी कमर को हिलाना शुरू किया।
धीरे-धीरे… गोल-गोल… जैसे वह उस लंड को अपने अंदर मथ (Churn) रही हो।

कामिनी रघु के ऊपर पूरी तरह जम चुकी थी।
रघु का काला, देसी और सख्त लंड उसकी योनि की गहराइयों में जड़ तक (Root deep) समाया हुआ था।
कामिनी को महसूस हो रहा था कि रघु का वह ‘हथियार’ उसकी बच्चेदानी के मुंह को चूम रहा है।

यह अहसास, यह भराव (Fullness) ही तो वह चाहती थी, जिसके लिए वह दिन भर से तड़प रही थी।
शुरुआत में कामिनी ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की।
उसने अपनी आँखें बंद कीं और एक गहरी सांस ली।
“उफ्फ्फ्फ… रघूऊऊ…”
उसने अपनी कमर को बहुत ही धीमे-धीमे, गोल-गोल (Circular Motion) घुमाना शुरू किया।

जैसे कोई पुराने ज़माने की चक्की पीस रहा हो।
उसकी योनि की दीवारें, जो लंड के स्वागत में गीली और सूजी हुई थीं, रघु के लंड के चारों तरफ लिपट गईं।
कामिनी अपनी अंदरूनी मांसपेशियों को सिकोड़ रही थी और छोड़ रही थी.

वह रघु के लंड की नसों को अपने अंदर निचोड़ रही थी, उसे मसाज दे रही थी।
“स्लप… चप… स्क्विश…”
कमरे में सिर्फ़ गीले मांस के रगड़ने की आवाज़ें गूंज रही थीं।
रघु नशे मे कभी आंखे खोलता तो कभी बंद करता, वो स्वर्ग मे था आज.
उसका लंड कामिनी की गीली चुत पा कर ओर भी फल फूल रहा था.

कामिनी का दूधिया बदन पसीने से नहाया हुआ था।
ट्यूबलाइट की रौशनी में उसकी पीठ, उसके कंधे और उसके स्तन तेल की तरह चमक रहे थे।
अब कामिनी ने रफ़्तार बदली।
उसने अपने दोनों हाथों को रघु की छाती पर जमाया, जहाँ बाल थे और पसीना था।

उसने अपने घुटनों पर जोर दिया और खुद को थोड़ा ऊपर उठाया।
रघु का लंड उसकी योनि से आधा बाहर आया…
और फिर कामिनी ने अपनी भारी कमर को धप्प से नीचे पटक दिया।
“पछहहहहक….पचक…. आआककक…..!!”
एक गूंजने वाली, गीली आवाज़ आई।
कामिनी की रसीली और भरी हुई जांघें रघु की जांघों से टकराईं।
“आह्ह्ह… मैडम… ये क्या कर रही है आप…” भारी नशे और दर्द मे भी रघु के मुंह से सिसकी निकल गई।
कामिनी ने उसे घूर कर देखा। उसकी आँखों में नशा था।
“चुप कर…” कामिनी फुसफुसाई।
“इलाज चल रहा है।” कामिनी खुद की बात पर ही मुस्कुरा दी, कितना बदल गई थी वो ग्रहणी.

कामिनी अब सवारी के लेय में आ गई थी।
ऊपर… और नीचे… थप… थप… ठप ठप…
ऊपर… और नीचे… पच… ओच… फच… गच… फाचक..

जैसे-जैसे कामिनी की रफ़्तार बढ़ रही थी, नज़ारा और भी मादक होता जा रहा था।
कामिनी के विशाल और भारी स्तन हवा में आज़ाद होकर उछल रहे थे।
जब वह ऊपर उठती, तो स्तन तन जाते…
और जब वह धप्प से नीचे बैठती, तो वे स्तन धक्के के साथ हिलते और झूल जाते।
उनका वह “बाउंस” रघु को पागल कर रहा था।

काले, खड़े निप्पल हवा को चीर रहे थे। कभी-कभी कामिनी के बाल उसके स्तनों पर गिरते और चिपक जाते।
कामिनी का चेहरा देखने लायक था।
उसने अपने निचले होंठ को दांतों तले दबा रखा था।
सिर पीछे की तरफ झुका हुआ था, गर्दन तनी हुई थी।
पसीने की एक बूंद उसकी गर्दन से लुढ़कती हुई, उसके स्तनों के बीच की घाटी (Cleavage) से होती हुई, सीधे उसके पेट पर जा गिरी।

वह आज चुद नहीं रही थी, वह सचमुच एक मर्द को चोद रही थी।

वह अपनी मनमानियाँ कर रही थी।
हर बार जब वह नीचे बैठती, रघु का मोटा टोपा उसकी उस ‘G-Spot’ को रगड़ता, जिसे शमशेर अधूरा छोड़ गया था।

कामिनी को अपनी टांगों के बीच करंट महसूस हो रहा था।
उसकी योनि से पानी की बाढ़ आ गई थी।
वह पानी रघु के लंड को, उसके अंडकोषों को और कामिनी की जांघों को भिगो रहा था।

“पच… पच… पच… पच…”
यह आवाज़ अब तेज़ हो गई थी।
बगल में रमेश ने करवट ली।
“हहूं… उं…” रमेश ने नींद में कुछ बड़बड़ाया।
कामिनी का दिल एक पल के लिए थमा, उसकी रफ़्तार रुकी।
उसने डरते-डरते रमेश की तरफ देखा।
रमेश ने बस अपना हाथ हिलाया था, वह अभी भी गहरी नींद में था।
लेकिन इस डर ने कामिनी की उत्तेजना को और भड़का दिया।
‘पति के बगल में… उसके नौकर के ऊपर चढ़कर…’
इस विचार ने कामिनी को पागल कर दिया।
उसने रघु की तरफ देखा और अपनी रफ़्तार दोगुनी कर दी।
“ले… और ले…”
कामिनी अब पागलों की तरह उछल रही थी।
बिस्तर “चर्र-चर्र” कर रहा था।
कामिनी के स्तन बेतहाशा नाच रहे थे।
उसका योनि का मुख रघु के लंड को निगल रहा था और उगल रहा था।
“आह्ह्ह… रघू… मैं गई… मैं गई…”
कामिनी हांफने लगी।
उसे महसूस हुआ कि वह किनारे पर है।
उसने रघु के सीने को अपने नाखूनों से नोच लिया।
“भर दे मुझे… अपनी गंदगी से भर दे…”

कामिनी अब किसी घुड़सवार की तरह बेकाबू हो चुकी थी।
उसकी रफ़्तार अब तुफानी थी।
वह रघु के लंड पर सिर्फ़ बैठ नहीं रही थी, बल्कि उसे जड़ से उखाड़ने की कोशिश कर रही थी।
“धप्प… धप्प… धप्प…”
बिस्तर की स्प्रिंग और मांस के टकराने की आवाज़ें एक होकर गूंज रही थीं।

कामिनी की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था।
उसकी बच्चेदानी (Cervix) पर रघु के मोटे टोपे की हर चोट, उसके दिमाग में धमाके कर रही थी।
“आह्ह्ह… और… और ज़ोर से…”
कामिनी ने अपने दांत किटकिटाए। उसने रघु के कंधों को अपने नाखूनों से बुरी तरह नोच लिया।
उसकी चुत के अंदर एक ज्वालामुखी फटने को तैयार था।

उसे अपनी नाभि के नीचे एक असहनीय दबाव महसूस हुआ—वही दबाव जो शमशेर ने अधूरा छोड़ दिया था, आज रघु उसे पूरा कर रहा था।
अचानक कामिनी का पूरा जिस्म अकड़ गया।
उसकी कमर हवा में ही थम गई।
उसने अपना सिर पीछे फेंका और मुंह खोल दिया।
उसकी योनि की मांसपेशियां (Vaginal Walls) रघु के लंड के इर्द-गिर्द किसी अजगर की तरह कसने लगीं।
इतना कसाव, इतनी जकड़न कि रघु को लगा उसका लंड अब कट जाएगा।
और फिर… विस्फोट हुआ।

“आआआआआहहहहह…… ईईईईईई……!!”
कामिनी एक लंबी, दर्दभरी और मदहोश कर देने वाली चीख के साथ चरम (Climax) पर पहुँच गई।
उसका शरीर कांपने लगा।
और उसी पल… उसके अंदर के दबाव ने अपना रास्ता बना लिया।
“सर्रररर…… पिच…… छनन्नन्न……!!”
कामिनी की योनि से पेशाब और उत्तेजना के पानी (Squirting) का एक तेज़ और गरम फव्वारा छूट गया।
वह धार इतनी तेज़ थी कि उसने रघु के पेट और छाती को भिगो दिया।
कामिनी लगातार झड़ रही थी।
उसका शरीर झटके खा रहा था, और हर झटके के साथ पानी की एक नई धार रघु के ऊपर गिर रही थी।
बिस्तर, रघु, और कामिनी की जांघें… सब जलमग्न हो गए।

इधर रघु, जो पहले से ही कामिनी की उस कातिलाना जकड़ (Grip) में फंसा हुआ था, कामिनी के इस “बाढ़” और कसाव को बर्दाश्त नहीं कर पाया।
कामिनी की योनि उसे चूस रही थी, निचोड़ रही थी।
रघु की आँखों के सामने तारे नाच गए।
“आआआआआह्ह्ह्ह्ह…… मालकिन्नन्न…… मर गया……!!!”
रघु के मुंह से भी एक गगनभेदी चीख निकल गई।
उसने अपनी कमर को ऊपर की तरफ झटका दिया और कामिनी के अंदर ही फट पड़ा।
उसका गाढ़ा, गरम और देसी वीर्य की पिचकारियां कामिनी की बच्चेदानी के मुंह पर छूटने लगीं।
एक… दो… तीन… लगातार धक्के।
रघु ने अपनी ज़िन्दगी का सारा निचोड़, अपनी सारी गर्मी कामिनी के अंदर भर दी।
कामिनी, जो अभी भी झड़ रही थी, उसने गरम लावा को अपने अंदर महसूस किया।

वह अहसास… वह भरने का सुकून…
कामिनी की टांगों में अब जान नहीं बची थी।
उसका पूरा शरीर पसीने और पानी से लथपथ होकर ढीला पड़ गया।
वह धीरे-धीरे, किसी कटी हुई पतंग की तरह, रघु के ऊपर ही ढेर हो गई।
उसका सिर रघु की गीली छाती पर टिक गया।
उसके बाल रघु के चेहरे पर बिखर गए।
कामिनी की दिन भर की तपस्या सफल हुई थी, आखिरकार कामदेव उसपर मेहरबान बुए, उसकी चुत ने हवास के लावे को बहार उगल ही दिया,
इफ्फ्फ्फफ्फ्फ़…. उईफ़्फ़्फ़… आअह्ह्ह… क्या सुकून था, अभी तक चुत मे जो जलता अंगारा फसा हुआ था वो पानी मे घुल के निकल ही गया.

दोनों के जिस्म एक-दूसरे से चिपके गए —पसीना, पेशाब, वीर्य और काम-रस सब एक साथ मिल गए थे।
कमरे में सिर्फ़ उन दोनों की हांफने की आवाज़ें थीं।
और बगल में…
रमेश ने एक लंबी सांस ली और करवट बदलकर दूसरी तरफ मुंह कर लिया, इस बात से पूरी तरह अनजान कि उसकी पत्नी ने अभी-अभी उसके बिस्तर पर क्या “तूफ़ान” मचाया है।
रघु और कामिनी की सांसे आपस मे मिलने लगी, कामिनी की आंखे थकान और वासना की अधिकता से बंद होने लगी, उसका सर रघु के सीने लार झुकता चला गया, दोनों नींद के आगोश मे समा गए थे.
लेकिन रघु का लंड अभी भी कमीनी की चुत मे धसा हुआ था.

दीवार घड़ी की ‘टिक-टिक’ ने अचानक कामिनी की नींद में खलल डाला।
कामिनी की आँखें झटके से खुलीं।
कमरे में अभी भी ट्यूबलाइट जल रही थी, लेकिन खिड़की के बाहर हल्का-हल्का नीलापन (भोर) दिखाई दे रहा था।
कामिनी का दिमाग कुछ पल के लिए सुन्न था, उसे समझ नहीं आया कि वह कहाँ है।
लेकिन जैसे ही उसे अपनी छाती के नीचे बालों वाली सख्त छाती और अपने पैरों के बीच गीलापन महसूस हुआ, उसकी रूह कांप गई।
उसने हड़बड़ाकर घड़ी देखी— सुबह के 4:30 बज रहे थे।
“हे भगवान…” कामिनी का दिल गले में आ गया।
वह पूरी तरह नंगी, पसीने और वीर्य से लथपथ, अपने नौकर रघु के ऊपर औंधे मुंह लेटी हुई थी।

और ठीक बगल में… बमुश्किल एक हाथ की दूरी पर… उसका पति रमेश अभी भी खर्राटे भर रहा था।
कामिनी ने एक गहरी, राहत की सांस ली।

“बाल-बाल बची…” वह मन ही मन बुदबुदाई।
अगर रमेश मुझ से पहले उठ गया होता तो…. ये सोच के ही कामिनी की रूह कांप गई। इस नज़ारे की कोई सफाई नहीं हो सकती थी।

कामिनी ने रघु के ऊपर से उठना चाहा।
उसने अपने हाथों को गद्दे पर टिकाया और जोर लगाया।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी कमर उठाई…
“आआहहहह…. इस्स्स्स….. माँ……”
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई, दर्दभरी कराह निकल गई।

उसका पूरा निचला हिस्सा— गांड और चुत—आग की तरह जल रहा था।
शमशेर ने पीछे के रास्ते (गांड) को तोड़ा था, और रघु से उसने खुद अपनी चुत को कुचलवाया था.

उसकी जांघों की मांसपेशियां अकड़ गई थीं।
लेकिन उठना ज़रूरी था। खतरा अभी टला नहीं था।
कामिनी ने होंठ भींचे और अपनी कमर को ऊपर उठाया।
“पूछह… पुच… पॉप…”
एक बहुत ही गीली और गंदी आवाज़ आई।

जैसे कीचड़ में फंसा पैर बाहर निकलता है, वैसे ही रघु का ढीला पड़ा लंड कामिनी की योनि से बाहर फिसला।
हवा का एक बुलबुला अंदर से बाहर आया।
और लंड के निकलते ही…
कामिनी की योनि का मुंह जो पूरी रात खुला रहा था, खुला ही रह गया।
और वहां से रघु के गाढ़े, सफ़ेद वीर्य और कामिनी के पानी का मिश्रण बह निकला।

वह वीर्य रघु के पेट और नाभि पर एक सफ़ेद तालाब की तरह जमा हो गया।
“आआबबबब…..” कामिनी सिसक उठी।
वह वीर्य अभी भी ठंडा नहीं हुआ था।
कामिनी को महसूस हुआ जैसे पिघला हुआ सीसा (Molten Lead) उसकी चुत से रिसकर बाहर आ रहा है।
वह जलन, वह भारीपन… यह सबूत था कि रघु ने उसे कितना अंदर तक भरा था।
कामिनी लड़खड़ाते हुए बिस्तर से नीचे उतरी। उसकी टांगें कांप रही थीं।

उसने रघु के कंधे को पकड़ा और उसे झिंझोड़ा।
“उठ… रघु… ए रघु… उठ जल्दी…” कामिनी ने फुसफुसाते हुए कहा, डर के मारे उसकी नज़रें बार-बार रमेश पर जा रही थीं।
रघु ने अपनी भारी पलकें खोलीं।
“अअअ… क्या… क्या हुआ…?”
उसकी आँखें लाल थीं। सब कुछ धुंधला था।
उसे पहले तो कुछ समझ नहीं आया। बदन में शमशेर की मार का दर्द था।

लेकिन फिर… धीरे-धीरे यादें लौटीं।
शमशेर की बेल्ट… कामिनी का नंगा बदन… और फिर वह तूफानी सवारी।
रघु की नींद एक झटके में उड़ गई।
डर ने उसके चेहरे पर वापस जगह बना ली।
उसने अपनी गर्दन घुमाई—बगल में बड़े साब (रमेश) सो रहे थे।
और उसके ठीक ऊपर…
उसकी मैडम कामिनी बिल्कुल नंगी खड़ी थी। उसके बाल बिखरे थे, स्तन लटक रहे थे, और जांघों के बीच से ‘दोनों का प्रेम रस’ बह रहा था।

“कक्क…. मै.. मै… मैडम… आ.. आप….” रघु का गला सूख गया। उसे लगा अब उसकी जान गई।
वह हड़बड़ाकर उठने की कोशिश करने लगा, पजामा अभी भी घुटनों तक था।
कामिनी ने उसकी हालत देखी। वह जानती थी कि अगर रघु पैनिक (Panic) हुआ तो गड़बड़ हो जाएगी।
उसने तुरंत अपना ‘मालकिन’ वाला रौब ओढ़ लिया।
उसने रघु के मुंह पर हाथ रखा।

“श्श्श्श… चुप!” कामिनी ने उसकी आँखों में देखा।
“डरो मत… तुम घर पर ही हो। शमशेर गया ”

कामिनी ने उसे सहारा देकर बिस्तर से नीचे उतारा।
“अभी जाओ… जल्दी यहाँ से। कोई देखे नहीं।”
हवस उतरने के बाद पकडे जाने का डर अच्छो अच्छो को होने लगता है.
कामिनी ने उसका पजामा ऊपर खींचने का इशारा किया।
“बाकी बात… बाद में करती हूँ।”
रघु ने जल्दी-जल्दी अपना नाड़ा बांधा।
उसके हाथ कांप रहे थे। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह ज़िंदा है और उसने अभी-अभी क्या किया है।

उसने एक डरी हुई नज़र रमेश पर डाली और फिर कामिनी के नंगे पैरों को देखा।
वह नींद, नशे और दर्द में लड़खड़ाता हुआ, किसी चोर की तरह पिछले दरवाज़े से बाहर निकल गया।
कामिनी ने दरवाज़ा बंद किया और वहीँ दीवार के सहारे टिक गई।
उसकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
रात का खेल ख़त्म हो चुका था… लेकिन निशान अभी बाकी थे।
बिस्तर गीला था, बदन टूटा हुआ था, और एक नया राज़ इस घर की दीवारों में दफ़न हो गया था।
*************

समय: सुबह के 8:30 बजे | डाइनिंग टेबल पर

रात के तूफ़ान के बाद सुबह की धूप खिड़की से छनकर आ रही थी, लेकिन घर का माहौल अभी भी भारी था।
डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा पसरा हुआ था। चाय की प्यालियाँ भाप छोड़ रही थीं, लेकिन किसी ने उन्हें उठाया नहीं था।

कामिनी, जो रात भर की हवस, बेचैनी, चुदाई के बाद अभी भी अंदर से टूटी हुई थी (शारीरिक रूप से), बाहर से पूरी तरह “कड़क पत्नी” बनी हुई थी।
उसने साड़ी को बहुत सलीके से पहना था, ताकि उसकी चाल का लंगड़ापन और गर्दन पर लगे रति-चिन्ह छुप जाएं।

“आपको पता भी है कल रात क्या-क्या हुआ?” कामिनी ने चाय का कप मेज़ पर पटकते हुए कहा।
उसकी आवाज़ में वही कड़वाहट थी जो एक इज़्ज़तदार बीवी की होती है।

“कितनी बदनामी होती हमारी? पुलिस घर के अंदर तक आ गई थी! और वो कमिश्नर… उफ्फ!”
कामिनी रमेश पर बरस रही थी। यह गुस्सा असली नहीं था, यह उसकी अपनी ग्लानि (Guilt) और डर को छुपाने का एक नकाब था।
“ये कैसे दोस्त बना लिए हैं आपने? वो शमशेर… वो तो गुंडा है वर्दी में!”
रमेश, जिसका नशा अब पूरी तरह उतर चुका था और सर दर्द से फटा जा रहा था, एक अपराधी की तरह सिर झुकाए बैठा था।
उसे कल रात का कुछ भी याद नहीं था—सिवाय इसके कि वह बेहोश हो गया था। पूरी घटना बंटी ने सुबह-सुबह उसे (मिर्च-मसाला लगाकर) सुना दी थी।

“वो… वो…” रमेश हकलाया। “शमशेर के कुछ पुराने अहसान हैं मुझपर कामिनी… इसलिए उसकी बातों में आ गया। मुझे नहीं पता था वो बैग… और वो ड्रग्स…”
रमेश ने एक गहरी सांस ली। रमेश मासूम बनने का भरसक प्रयास कर रहा था.

“खैर, जो हुआ सो हुआ। लेकिन अब रिस्क नहीं ले सकते,” रमेश ने फैसला सुनाया।
“मैं आज ही कादर को कहीं और शिफ्ट करने का बोलता हूँ। यह सब उसी की वजह से हुआ है। वो यहाँ रहेगा तो पुलिस फिर आएगी।”

कादर के जाने की बात सुनते ही कामिनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसका वह “नकली गुस्सा” पल भर में ही ठंडा पड़ गया।

कामिनी का दिल धक से रह गया। वो उसकी तरफ आकर्षित थी, कामिनी अब पहली जैसी ग्रहणी नहीं रह गई थी, उसने पराये मर्द का रस पी लिया था, शेरनी को खून लग चूका था….
कामिनी ने तुरंत अपनी टोन बदली। उसने चाय का कप उठाया और धीरे से कहा,
“रहने दीजिये…”
रमेश ने चौंककर देखा।
“इंसान ही इंसान की मदद करता है,” कामिनी ने एक संत जैसी आवाज़ में कहा। “बेचारा गरीब है, अच्छा आदमी है कहाँ जाएगा? और वैसे भी…”
कामिनी ने बंटी की तरफ देखा। बंटी मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।
“वैसे भी वो कमिश्नर विक्रम सिंह… बंटी के दोस्त रवि के पापा हैं। अब उनका ध्यान कभी यहाँ नहीं जाएगा कि हम गलत लोग हैं।”
आप तो मिले ही हुए है विक्रम जी से”

“मामला शांत हो जाये तो चला जायेगा”
कामिनी ने बात संभाल ली थी।

बंटी अपनी माँ की इस चालाकी पर मुस्कुरा दिया। उसने नोटिस किया मेरी माँ अब बेचारी नहीं रही, वो इस समाज मे रहने का नियम सीख गई है,

जवाब में कामिनी ने भी उसे एक तिरछी नज़र से देखा और मुस्कुरा दी।
माँ-बेटे के बीच अब छुपाने जैसा कुछ था भी नहीं। एक मूक समझौता हो चुका था।
तभी रमेश को कुछ याद आया।
“और वो बैग…?” रमेश ने धीरे से पूछा, इधर-उधर देखते हुए। “वो ड्रग्स वाला बैग कहाँ है? अगर पुलिस दोबारा आ गई तो?”
कामिनी ने प्रश्नवाचक नज़रों से बंटी की तरफ देखा। उसे भी नहीं पता था कि रात को बंटी ने बैग का क्या किया।

“आप चिंता मत करो पापा,” बंटी ने पराठा तोड़ते हुए बेफिक्री से कहा।
“वो बैग एकदम सेफ है। जिस दिन कादर यहाँ से जाएगा, या मामला ठंडा हो जाएगा, मैं उसे वापस दे दूंगा। अभी किसी को जानने की ज़रूरत नहीं है कि वो कहाँ है।”

रमेश और कामिनी अपने बेटे की समझदारी और आत्मविश्वास पर हैरान थे।
बंटी वाकई बहुत बड़ा हो गया था, जिम्मेदार हो गया था।
रमेश ने राहत की सांस ली, नाश्ता ख़त्म किया और अपना ब्रीफ़केस उठाकर ऑफिस के लिए निकल गया।

जैसे ही मुख्य दरवाज़ा बंद हुआ और रमेश की गाड़ी की आवाज़ दूर हुई…
कामिनी ने तुरंत कुर्सी घुमाई और बंटी को घूरकर देखा।
“अब तो बता दे… कहाँ है वो बैग?” कामिनी की जिज्ञासा सातवें आसमान पर थी।
“कल रात क्या किया तूने उस बैग का? तूने इतने कॉन्फिडेंस से विक्रम जी को अंदर बुला लिया… अगर मिल जाता तो हम सब जेल में होते!”
बंटी अपनी कुर्सी से उठा। उसके चेहरे पर एक विजेता की मुस्कान थी।
“माँ… वो देखो…” बंटी ने उंगली से इशारा किया।
कामिनी की नज़रें उस दिशा में गईं।
डाइनिंग टेबल के ठीक सामने… जहाँ वाशबेसिन लगा था…
वहां नीचे ज़मीन पर घर के गंदे कपड़े (लॉन्ड्री) का ढेर पड़ा था। कुछ मैली चादरें, पुराने तौलिये और घर की फटी हुई चप्पलें।
और उसी कचरे और गंदे कपड़ों के बीच… वो 50 लाख का ड्रग्स से भरा काला बैग लापरवाही से पड़ा था।
सामने देखते ही कामिनी का दिमाग घूम गया।

“हे भगवान…” उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
50 लाख का माल… यूँ ही कचरे में? सबके सामने?
कामिनी सकपका गई। “बंटी… तू पागल है? वहां?”

बंटी हंसा। “ढूंढा उसे जाता है माँ जो छुपा हो। जो चीज़ सबके सामने होती है, उसे कोई कैसे ढूंढ़ सकता है।”
बंटी कामिनी के पास आया।

“ये तो यहीं था, सबके सामने। विक्रम अंकल छुपी हुई चीज ढूंढने आए थे… कचरा नहीं। हेहेहेहेहे….”

कामिनी हैरान थी। बंटी की तेज़ बुद्धि और उसकी समझदारी ने उसे कायल कर दिया था।
“बंटी… मेरा बेटा…” कामिनी का दिल ममता और गर्व से भर गया।

“कितना समझदार हो गया है तू…”
कामिनी अपनी सीट से उठी और ममता के आवेश में बंटी को गले लगा लिया।
बंटी ने भी अपनी माँ को अपनी बांहों में भर लिया।
लेकिन यह मिलन सिर्फ़ ‘ममता’ का नहीं था।

बंटी के हाथ कामिनी की पीठ को सहलाने लगे।
उसका स्पर्श बहुत ही कोमल लेकिन मज़बूत था।
कामिनी की पीठ (Back) पर बंटी की उंगलियां रेंगने लगीं… नीचे की ओर।

और धीरे-धीरे… बंटी का हाथ कामिनी की कमर से फिसलता हुआ… उसकी विशाल और भारी गांड (Buttocks) के उभार पर जाकर रुक गया।
कामिनी को एक झुरझुरी सी हुई।

एक कोमल सा, लेकिन स्पष्ट अहसास।
यह स्पर्श ‘बेटे’ का नहीं, एक ‘मर्द’ का था।

“क्या कर रहा है…” कामिनी ने धीमी आवाज़ में पूछा, लेकिन उसने बंटी का हाथ नहीं हटाया।
“कादर पसंद है मतलब आपको?” बंटी ने धीरे से, उसके कान के पास फुसफुसाया।
जवाब में बंटी ने सवाल दाग दिया।
कामिनी सकपका कर अलग हुई। उसका चेहरा शर्म और घबराहट से लाल हो गया।

“ये.. ये…. क्या बोल रहा है तू?” कामिनी हकलाने लगी। उसकी चोरी पकड़ी गई थी।

“हॉस्पिटल में…” बंटी ने उसकी आँखों में देखा।
“जब आपने कादर को देखा था… आपकी नज़रें… तभी मैं समझ गया था। हाहाहाहा….” बंटी हंस पड़ा।
उस हंसी में कोई मज़ाक नहीं, बल्कि एक स्वीकृति थी।

कामिनी को समझ नहीं आया कि वह क्या कहे। उसे शर्म आ रही थी, लेकिन बंटी के सामने अब पर्दा रखने का कोई मतलब नहीं था। वो तो बहुत पहले ही गिर चूका था.
बंटी अपनी माँ का राज़दार था.

“बहुत बदमाश हो गया है तू…” कामिनी ने बनावटी गुस्सा दिखाया और वापस से बंटी के गले जा लगी।
इस बार उसने खुद को बंटी के सीने में भींच दिया।

“आपका ही बेटा हूँ माँ… बदमाश तो होना ही था।”
दोनों इस बार ऐसे गले लगे जैसे बिछड़े हुए प्रेमी हों।
माँ-बेटे का यह रिश्ता कुछ अलग ही था।
इसमें वासना नहीं थी, लेकिन कुछ तो था ही जिसे दोनों ही नहीं समझ सकते थे,… एक सूक्ष्म खिंचाव था, जिसे इस समाज मे कभी भी खुल कर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

बंटी माँ को खुश देखना चाहता था, चाहे वह खुशी कादर से मिले या किसी और से।

दोनों गले लगे आपस में खो गए।
बंटी ने अपनी नाक कामिनी की गर्दन के पास गड़ा दी।
वह अपनी माँ के पसीने, उसकी महक, और उस ‘कामुक गंध’ (Scent of Sex) को अपनी सांसों के साथ पी रहा था, जो रात भर के खेल के बाद अभी भी उसके बदन से आ रही थी।
कामिनी ने आँखें मूंद लीं। उसे बंटी की बांहों में एक अजीब सा सुरक्षा कवच महसूस हो रहा था, जो रमेश या किसी और मर्द के पास नहीं था।
ये वो अहसास था “हाँ मै यहाँ सुरक्षित हूँ, दुनिया खत्म भी हो जाये ये आगोश मुझे संभाल लेगा ”
********************

घड़ी 11 बजा रही थी
घर में सन्नाटा था। घड़ी की टिक-टिक के अलावा कोई आवाज़ नहीं थी।
बंटी स्कूल जा चुका था और रमेश ऑफिस।
कामिनी ने चैन की सांस ली। रात का तूफ़ान थम चुका था, लेकिन उसके अंदर की हलचल अभी भी बाकी थी।
उसने किचन में दो स्टील की प्लेटों में गरमा-गरम पराठे और सब्जी परोसी।

उसकी चाल में एक अजीब सी मस्ती थी। कल रात रघु के साथ हुए सम्भोग ने उसकी रूह को तृप्त कर दिया था। कामिनी मुस्कुरा रही थी, चेहरे पे कोई सिकन नहीं थी.
सब कुछ सही था….
कामिनी थालियां लेकर पीछे के आंगन से होती हुई स्टोर रूम की तरफ बढ़ी।
धूप खिली हुई थी, लेकिन कामिनी का मन उन अंधेरे कोनों की तरफ भाग रहा था जहाँ उसके ‘खास मेहमान’ छुपे थे।
उसने दरवाज़े पर धीरे से नॉक किया।
“खट… खट…”
अंदर से कुंडी खुलने की आवाज़ आई।
दरवाज़ा कादर खान ने खोला।
जैसे ही दोनों की नज़रें मिलीं, एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
कल रात की यादे कादर के साथ मटन पकाना, उसका अधूरा प्यार, और कामिनी की तड़प—सब कुछ ताज़ा हो गया।

कामिनी की नज़रों में हल्की सी शर्म थी। अक्सर रात के अंधेरे में किए गए बेशर्म काम, दिन के उजाले में औरत को नज़रें झुकाने पर मजबूर कर देते हैं।

लेकिन कादर… उसकी आँखों में शर्म नहीं, बल्कि एक सवाल और भूख थी।
“आइये… आइये मैडम…” कादर पीछे हट गया।
उसकी नज़र सबसे पहले कामिनी के चेहरे पर नहीं, बल्कि उसके हाथों पर गई, और फिर उसकी आँखों में।

“वो… उस बैग का क्या हुआ?” कादर की आवाज़ में बेचैनी थी।
उसकी जान उस काले बैग में अटकी हुई थी। होती भी क्यों ना? 50 लाख का माल था, इसी वजह से तो पुलिस से भागा फिर रहा था,

कामिनी बेफिक्री से स्टोर रूम में दाखिल हुई।
अंदर अंधेरा था और एक अजीब सी पुरुष-गंध (Male Scent) थी—बासी पसीने, बीड़ी और मर्दानगी की मिली-जुली महक।
कोने में खटिया पर रघु पड़ा था। वह भी जाग चुका था, लेकिन शमशेर की मार और कल रात की ‘सवारी’ ने उसे तोड़ दिया था। वह सुस्त सा पड़ा था।

“ममम… मैडम… आप?” रघु हड़बड़ाकर उठने की कोशिश करने लगा।
कामिनी ने कुछ नहीं कहा। उसने बस थालियां आगे बढ़ा दीं।
“पहले खा लो। भूखे होगे।”
कादर और रघु, दोनों ने थालियों पर ऐसे झपट्टा मारा जैसे बरसों के भूखे हों।
पराठे खाते-खाते कादर ने फिर पूछा, “मैडम… माल… मतलब बैग?”
कामिनी ने दीवार से टेक लगा ली और इत्मीनान से कहा,
“बैग सेफ है कादर। ये मामला निपट जाने दो, फिर ले लेना।”
कादर ने राहत की सांस ली। “शुक्र है अल्लाह का… और आप का, अपने मुझ पर बहुत बड़ा अहसान किया ।”

तभी कामिनी का चेहरा सख्त हो गया। वह रघु की तरफ मुड़ी।
“और तुम रघु…” कामिनी की आवाज़ में हल्की डांट थी।
“शमशेर जो कल रात कह रहा था… वो सच है? तुमने ही दारू पीकर बताया था कि कादर खान यहाँ है?”

रघु के हाथ से निवाला छूट गया। वह डर गया।
“मममम… मैडम मुझे सच में नहीं पता…” रघु ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। “मैं तो बस ठेके पर दारू पीने बैठा था… मुझे क्या पता वो साला मुखबिर था। गलती हो गई मैडम।”

कादर, जो मज़े से खा रहा था, एकदम से गुस्से में आ गया।
“जाने दो मैडम… इन शराबियों का ऐसा ही है,” कादर ने रघु के सिर पर एक ज़ोरदार चपत (Slap) रसीद की।
“चटाक!!”
“साले को कुछ याद ही नहीं रहता। कब क्या करना है, कब मूतना है, कब बकना है… कोई होश ही नहीं रहता।”
कादर ने रघु को घूरा, “शुक्र मना मैडम का, वरना आज तू शमशेर के डंडे खा रहा होता और मैं जेल में चक्की पीस रहा होता।”

फिर कादर ने कामिनी की तरफ देखा। उसकी आँखों में कृतज्ञता थी।
“थैंक यू कामिनी जी… कल आप ना होती, तो मैं गया था काम से।”
कामिनी मुस्कुरा दी।
उसकी मुस्कान में एक राज था।
“जाने दो… तुम दोनों बच गए, वो ही काफी है।”

एक अजीब सी सिहरन उसके बदन में दौड़ गई।
कामिनी जाने के लिए पलटी ही थी कि कादर की आवाज़ ने उसे रोक लिया।
“मैडम… एक बात और…”
कामिनी रुकी और मुड़ी। “क्या?”
कादर ने हिचकिचाते हुए खुद की तरफ इशारा किया।
“वो… कुछ कपड़े मिल जाते तो… बहुत गंदे हो रहे हैं।”
कामिनी की नज़रें कादर के बदन पर गईं।
कादर की हालत वाकई खराब थी।
उसने एक कसी हुई, गंदी और मैली टी-शर्ट पहन रखी थी, जो पसीने से चिपक गई थी और जिसमें से उसकी छाती के बाल झांक रहे थे।
और नीचे…
उसने रमेश की एक पुरानी, चेकदार लुंगी लपेट रखी थी।
कादर खटिया के किनारे बैठा था, और लुंगी उसके घुटनों से ऊपर चढ़ी हुई थी।
और उस लुंगी के बीचो-बीच…
कादर के विशाल, भारी-भरकम लंड का उभार (Bulge) साफ़ दिख रहा था।
लुंगी का कपड़ा वहाँ तंबू की तरह तना हुआ था।
साफ़ पता चल रहा था कि अंदर कोई ‘अजगर’ कुंडली मारकर बैठा है, जो कामिनी को देखते ही जागने लगा है।
कामिनी की नज़रें उस उभार पर अटक गईं।

वह उभार उसे याद दिला रहा था कि कल रात यह ‘औज़ार’ उसके मुंह तक आया था, लेकिन अंदर नहीं जा पाया था।
वह प्यास अभी भी बाकी थी।
कादर ने कामिनी की नज़रों को अपने लंड पर टिके हुए देख लिया। उसने बेशर्मी से अपने पैर थोड़े और चौड़े कर दिए।
कामिनी ने अपने होंठों पर जीभ फेरी।
उसने अपनी नज़रों को वापस कादर के चेहरे पर उठाया।
उसकी आँखों में अब मालकिन वाला रौब नहीं, बल्कि एक ‘प्यासी औरत’ का निमंत्रण था।

“ठीक है…” कामिनी की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई।
“नाश्ता करके घर के अंदर आ जाना…”
उसने ‘अंदर’ शब्द पर जोर दिया।
“मैं तुम्हारे लिए कुछ कपड़े निकालती हूँ।”
कामिनी ने एक कामुक और तिरछी मुस्कान दी।

कामिनी पलटी और अपनी भारी कमर को मटकाती हुई, धीरे-धीरे वहां से निकल गई।
कादर उसके पीछे उसकी हिलती हुई गांड को देखता रह गया, और लुंगी के अंदर उसका लंड और भी अकड़ गया।
“साला यहाँ पड़े पड़े दम घुट रहा है मेरा ” कादर रघु की तरफ बड़बड़या..
इन शब्दों को जाती हुई कामिनी ने बखूबी सुना…
**************

नाश्ता ख़त्म करके कादर ने दोनों झूठी प्लेटें उठाईं और दबे पांव घर के पिछले दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
उसके दिल में अजीब सी हलचल थी। पेट तो भर गया था, लेकिन मन में एक अलग ही भूख थी।
उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।
“ठाक… ठाक… ठक…”
दरवाज़ा खुला।
सामने कामिनी खड़ी थी।
लाल रंग की शिफॉन की साड़ी, गले में चमकता हुआ मंगलसूत्र, और मांग में भरा हुआ गहरा लाल सिंदूर।

सुबह की ताज़ा धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी त्वचा सोने की तरह दमक रही थी। वह मुस्कुरा रही थी—एक ऐसी मुस्कान जो कादर ने आज तक किसी औरत के चेहरे पर अपने लिए नहीं देखी थी।
“ममम… मैडम…” कादर खान पल भर को कामिनी की इस खूबसूरती को देखकर सकपका गया।
उसके हलक में आवाज़ जाम होने लगी। वह नज़रें झुकाकर खड़ा हो गया, जैसे कोई मुजरिम अदालत में खड़ा हो।
कामिनी ने मुस्कुराते हुए कादर के हाथ से प्लेटें ले लीं और उन्हें सिंक में रख दिया।
फिर वह मुड़ी और एक छोटा सा बॉक्स कादर की तरफ बढ़ा दिया।
“ये लो…”
कादर ने झिझकते हुए वह बॉक्स थाम लिया।
“ययय… ये क्या है मैडम?”
“शेविंग किट है…” कामिनी ने अपनी कमर पर हाथ रखते हुए कहा। “ऐसे ही बाहर जाओगे क्या? कोई पहचान लेगा तो मुसीबत हो जाएगी।”
कामिनी ने कादर की बढ़ी हुई, बेतरतीब दाढ़ी और मूछों की ओर इशारा किया।

“बबब… बाहर क्यों जाना है?” कादर के चेहरे पर आश्चर्य था। उसे लगा था उसे यहीं कैद रहना है।
“अभी तुमने ही तो कहा था कि यहाँ दम घुट रहा है,” कामिनी की आँखों में चमक थी। “चलो, तुम्हारे लायक कुछ कपड़े ले आते हैं। रमेश के कपड़े तो तुम्हें आएंगे नहीं, उनका सीना तुमसे आधा है।”

कादर हैरान था। वह अवाक रह गया।
आज तक किसी ने उसकी इतनी परवाह नहीं की थी।
जब से उसने होश संभाला था, उसका पाला सिर्फ़ गली-गलौज, शराबी, गँजेड़ियों और पुलिस के डंडों से ही पड़ा था।
लोग उसे ‘कादर भाई’ या ‘गुंडा’ कहते थे। लोग उससे डरते थे, नफरत करते थे।
उसने अपना रौब, अपना यह डरावना लुक (बढ़ी दाढ़ी, मैलै कपड़े) सिर्फ़ लोगों को डराने-धमकाने के लिए ही बनाया था। यह उसका कवच था।
लेकिन आज… यह औरत… यह शरीफ घर की मालकिन उससे डर नहीं रही थी।
उल्टा, वह उसकी परवाह कर रही थी। उसकी छोटी सी इच्छा (दम घुटने) को तवज्जो दे रही थी।
कादर भाव-विभोर हो उठा। उसका कठोर दिल पिघलने लगा।
आँखें भर आईं, लेकिन वह साला गुंडा ही था… कमज़ोर कैसे पड़ता?
उसने अपनी भावनाओं को दबाया। मजाल है कि आँखों में आंसू आने दे।
“ठ.. ठ… ठीक है मैडम…” कादर ने भारी आवाज़ में कहा।
वह कामिनी के हाथों से शेविंग बॉक्स लेकर डाइनिंग हॉल में लगे वाशबेसिन की ओर बढ़ गया।

“मैं अंदर से कुछ सामान और पर्स ले लेती हूँ,” कामिनी ने कहा और उसे वहीं छोड़कर अपने बेडरूम की तरफ चली गई।
डाइनिंग हॉल में लगा बड़ा आईना कादर का इंतज़ार कर रहा था।
कादर ने लुंगी को कसकर बांधा और शेविंग क्रीम निकाली।
उसने बरसों बाद खुद को आईने में गौर से देखा।
आज वह इस “नकाब” को उतारने जा रहा था।
करीब 5-8 मिनट गुज़र गए।
कामिनी अपने बेडरूम से तैयार होकर, पर्स लटकाए बाहर आई।
वह कुछ गुनगुना रही थी।
जैसे ही वह डाइनिंग हॉल में दाखिल हुई, उसके कदम अपने आप रुक गए।
सामने का नज़ारा देखकर वह दंग रह गई।
उसके हाथों ने मजबूती से पास पड़ी डाइनिंग टेबल की कुर्सी के हत्थे (Handle) को जकड़ लिया। उसकी पकड़ इतनी तेज़ थी कि पोर सफ़ेद पड़ गए।

उसके सामने वाशबेसिन के पास कोई ‘गुंडा’ नहीं, बल्कि एक ग्रीक देवता (Greek God) खड़ा था।
अर्ध-नग्न अवस्था में… कमर के नीचे सिर्फ़ वही रमेश की पुरानी चेकदार लुंगी थी।
लेकिन कमर के ऊपर?
कामिनी की साँसें अटक गईं।

कादर का वह मैला-कुचैला रूप गायब हो चुका था।
उसके सामने एक सम्पूर्ण मर्द खड़ा था।
उसकी चौड़ी छाती (Broad Chest) किसी चट्टान की तरह मज़बूत थी, जिस पर काले, घने बालों का जंगल था। वे बाल पसीने और पानी की बूंदों से चमक रहे थे, जो उसकी मर्दानगी की गवाही दे रहे थे।
उसके कंधे (Shoulders) विशाल थे।
उसकी बाहों के डोले (Biceps) किसी लोहे के गोले की तरह फूले हुए थे।
और पेट? पेट पर कोई चर्बी नहीं थी, बल्कि सख्त मांसपेशियां (Abs) थीं जो लुंगी के नाड़े (V-line) में गायब हो रही थीं।

लेकिन असली झटका तो तब लगा जब कादर ने तौलिये से मुंह पोंछकर कामिनी की तरफ देखा।
ये… ये क्या?
कादर का चेहरा… जहाँ कल तक घनी, जंगली दाढ़ी-मूंछें थीं, और भागमभाग की धूल-मिट्टी जमी थी…
वह अब बिल्कुल गोरा-चिट्टा, उजला और चमकता हुआ निकल आया था।
दाढ़ी का कोई नामोनिशान नहीं था। गाल एकदम चिकने (Clean Shaven) थे।
उसकी तीखी नाक, मज़बूत जबड़ा (Jawline) और काली गहरी आँखें अब साफ़ दिखाई दे रही थीं।

कोई कह ही नहीं सकता था कि यह वही वांटेड मुजरिम कादर खान है।
कामिनी के सामने किसी बॉलीवुड फिल्म का हीरो खड़ा था—सख्त, मादक और बेइंतहा खूबसूरत।
उसका वह “रफ एंड टफ” (Rugged) शरीर और वह “मासूम” सा चिकना चेहरा—यह कॉन्बिनेशन जानलेवा था।
कामिनी की योनि में एक बिजली कौंध गई।
उसने अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाया।
“इईईस्स्स्स…..”
कामिनी के मुंह से न चाहते हुए भी एक कामुक सिसकी निकल गई।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उसे लगा जैसे उसने किसी छुपे हुए खज़ाने को खोज लिया है।
कल रात तो सिर्फ़ अंधेरे में टटोला था, लेकिन आज उजाले में देख रही थी कि वह किस “हीरे” को अपने घर में पनाह दे रही है।
कादर ने तौलिया कंधे पर डाला और अपनी मज़बूत छाती को फुलाते हुए कामिनी की तरफ देखा।
उसकी आँखों में अब शर्म नहीं, बल्कि एक नया आत्मविश्वास था।
“कैसा लग रहा हूँ मैडम?” कादर ने अपनी गहरी, मर्दाना आवाज़ में पूछा।
कामिनी के पास कोई शब्द नहीं थे।
उसकी आँखें कादर की छाती के बालों से होती हुई, उसके पेट की मांसपेशियों पर, और फिर उस लुंगी के उभार पर जा टिकीं।

कामिनी जानती थी कि यह वक़्त अभी सही नहीं है। बंटी कभी भी आ सकता था,
सामने खड़ा कादर, अपने नए और चिकने अवतार में, उसे चुम्बक की तरह खींच रहा था। उसका मन कर रहा था कि अभी इसी वक़्त उस चौड़ी छाती से लिपट जाए और उन गोरे गालों को चूम ले।

उसने एक गहरी सांस ली और न चाहते हुए भी कादर के उस आकर्षक और मांसल जिस्म के सम्मोहन से खुद को बाहर खींचा।
“तुम… तुम स्कूटर चला लेते हो ना?” कामिनी ने अपनी आवाज़ को संयमित करते हुए पूछा।
उसने पास पड़ी टेबल से चाबी उठाई और हवा में उछाल दी।
कादर ने हवा में ही चाबी लपक ली। उसके रिफ्लेक्सेस (Reflexes) बहुत तेज़ थे।
“जी मैडम… स्कूटर क्या, ट्रक भी चला लेता हूँ,” कादर मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में अब वहशीपन नहीं, एक मासूमियत थी।

कामिनी अपने साथ रमेश की एक पुरानी, थोड़ी ढीली-ढाली टी-शर्ट निकाल लाई थी,
“ये पहन लो…” कामिनी ने वह टी-शर्ट कादर की तरफ बढ़ा दी।
उसने वह टी-शर्ट अपने सिर से डाली और नीचे खींची।
टी-शर्ट रमेश के नाप की थी, और कादर का शरीर रमेश से कहीं ज्यादा चौड़ा और गठीला था।

जैसे ही टी-शर्ट उसके बदन पर चढ़ी, वह उसकी छाती और बांहों पर बुरी तरह कस गई।
उसके डोले और छाती के उभार कपड़े के नीचे से साफ़ झलक रहे थे। वह टी-शर्ट उसे और भी ज्यादा हॉट बना रही थी।

दो मिनट बाद, दोनों घर के बाहर थे।
कादर ने बंटी का स्कूटर स्टार्ट किया।
“डुग-डुग-डुग…”
इंजन की आवाज़ के साथ स्कूटर कांपने लगा।
कादर आगे बैठा, अपनी मज़बूत बाहें हैंडल पर जमाए।
और कामिनी…
कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और पीछे की सीट पर बैठ गई।
उसने झिझकते हुए अपने दोनों हाथ कादर के कंधों पर रखे, लेकिन फिर धीरे से नीचे खिसका कर उसकी कमर के दोनों तरफ जमा लिए।
“चलें मैडम?”
“हम्म्म…”
कादर ने एक्सीलरेटर दिया और स्कूटर हवा से बातें करने लगा।
शहर की सड़कें थोड़ी ऊबड़-खाबड़ थीं। ट्रैफिक भी था।
जैसे ही पहला चौराहा आया, कोई सामने आ गया।
कादर ने अनजाने में ब्रेक दबा दिए।
“चiiiक…..!!”
स्कूटर के रुकते ही, पीछे बैठी कामिनी का भारी शरीर, गती के कारण आगे की तरफ झुका।
और… “धप्प…”
कामिनी की विशाल, नरम और गद्देदार स्तन कादर की सख्त और चौड़ी पीठ से जा टकराये.

कादर को लगा जैसे किसी ने उसकी रीढ़ की हड्डी में बिजली का नंगा तार लगा दिया हो।
वह स्पर्श… वह नरमी…
कामिनी के स्तनों के निप्पल, जो ब्लाउज़ के अंदर तने हुए थे, कादर की पीठ में चुभ गए।
कादर का पूरा शरीर सनसना उठा। उसके रोंगटे खड़े हो गए।
कामिनी तुरंत पीछे नहीं हटी।
उसने उस दबाव को महसूस किया। उसे मज़ा आ रहा था।
कादर की पीठ की गर्मी उसके स्तनों को सेंक रही थी।
उसने अपनी पकड़ कादर की कमर पर और कस दी।

“धीरे चलाओ…” कामिनी ने उसके कान के पास फुसफुसाया, लेकिन उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं, मस्ती थी।
कादर का दिल बाग-बाग हो रहा था।
उसे आज नया जीवन मिला था।
कल तक वह इस सहारा का गुंडा था, एक बदनाम ढाबा चलाता था, उसका रोज़ का काम था गुंडे मावली, दो टके के शराबीयो से निपटना, और आज… आज वह शहर की सड़कों पर एक खूबसूरत औरत के साथ घूम रहा है।

हवा उसके बालों को उड़ा रही थी।, उसके चेहरे को छू कर निकल जा रही थी, उसे याद भी नहीं लास्ट टाइम उसने कब अपने मुँह पर ऐसी ठंडी हवा का झोंका खाया था,.
सही मायनो मे कादर खान, गुंडा बदमाश खुद को ही नहीं पहचान पा रहा था.
उसे लगा जैसे वह कोई हीरो है और कामिनी उसकी हीरोइन।
“जी मैडम… वो ब्रेक लग गया था,” कादर ने शीशे में कामिनी को देखते हुए कहा।
“मैडम…” कामिनी ने उसे टोक दिया।
हवा के शोर के बीच कामिनी ने अपना चेहरा कादर के कंधे पर रखा।
“कादर…”
“जी?”
“मुझे मैडम मत कहो…” कामिनी की आवाज़ गंभीर लेकिन मीठी थी।
“सिर्फ कामिनी कहो ”
कादर के हाथ कांप गए। स्कूटर थोड़ा लहराया।

“लेकिन… मैडम… आप…”

“तुम मेरे नौकर थोड़ी हो, कुछ दिन के मेहमान हो मेरे घर मे, मुझे सिर्फ कामिनी कहो।”

कामिनी पूरी तरह से मोहित हो चुकी थी कादर पर, अपने यौवन के सबसे खूबसूरत पलो को जी रही थी.
वो कभी रमेश के साथ ऐसे नहीं बैठी, उसने कभी इस तरह खुली हवा मे सांस नहीं ली.

“ठीक है… कामिनी जी…” कादर ने शर्माते हुए कहा।
कामिनी खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसकी हंसी हवा में संगीत की तरह गूंज गई।
कादर ने कभी इस प्यार, इस भावना को महसूस नहीं किया था, बचपन से ले कर अब तक सिर्फ गलियां, मांस कटाई, नशा यही सब बेचा, यही देखा.
ये प्यार क्या होता है उसे कोई इल्म ही नहीं था.
लेकिन आज एक पत्थर दिल, जानवर, गुंडा इंसान उस मोहब्बत को महसूस कर रहा था, एक स्त्री का होना कितना जरुरी है ये अहसास कादर को हो चला था.
कादर के रोंगटे खड़े थे, हवा उसे सुखद अहसास दिला रही थी,

दिन का समय था। बाज़ार में भीड़-भाड़ थी।
कादर ने स्कूटर पार्क किया और दोनों पैदल चलने लगे।
लोग उन्हें मुड़-मुड़ कर देख रहे थे।
एक तरफ कादर—लंबा, चौड़ा, मज़बूत, टी-शर्ट में कसे हुए डोले।
और दूसरी तरफ कामिनी—लाल साड़ी में दमकती हुई, भरी हुई जवानी।
वे दोनों किसी सम्पूर्ण प्रेमी युगल की तरह लग रहे थे।

कादर भीड़ में कामिनी को बचाकर चल रहा था।
जैसे ही कोई पास से गुज़रता, कादर अपना मज़बूत हाथ कामिनी की पीठ के पीछे लगा देता, उसे सुरक्षा देता।
कामिनी को यह अधिकार (Possessiveness) बहुत पसंद आ रहा था।

रमेश तो कभी बाज़ार में उसका हाथ भी नहीं पकड़ता था, और यह “पराया मर्द” उसे दुनिया से बचा रहा था।
उन्होंने एक कपड़े की दुकान में प्रवेश किया।

“भैया, इनके लिए कुछ अच्छे कपड़े दिखाओ,” कामिनी ने दुकानदार से कहा। “जीन्स और शर्ट… एकदम बढ़िया वाले।”
कादर चुपचाप खड़ा था, बस कामिनी को निहार रहा था।
कामिनी उसके सीने पर शर्ट लगाकर नाप ले रही थी। उसकी उंगलियां बार-बार कादर की छाती को छू रही थीं।
दुकानदार को भी लगा कि यह “नई-नई शादीशुदा जोड़ी” है।

“भैया पर यह रंग बहुत जंचेगा भाभीजी,” दुकानदार ने एक नीली शर्ट दिखाई।
“भाभीजी” सुनकर कामिनी और कादर ने एक-दूसरे को देखा।
कामिनी ने नकारा नहीं।
उसने बस मुस्कुरा कर कादर की आँखों में देखा।

“हाँ… जच तो रहा है।” कामिनी ने कादर की आँखों मे देख मुस्कुरा दिया.
कादर उस पल मर मिटने को तैयार था।
उसने कामिनी के प्यार, इज़्ज़त और उस “स्पर्श” को पाकर खुद को दुनिया का सबसे खुशनसीब मर्द मान लिया था।
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बाज़ार से लौटते वक़्त स्कूटर के झटकों ने कामिनी की हालत ख़राब कर दी थी।
स्कूटर जब भी किसी गड्ढे में गिरता, कामिनी की गांड और चुत में एक तीखी लहर दौड़ जाती। कल रात रघु और शमशेर ने उसके निचले हिस्से को इतना तोड़ा था कि अब वहां सूजन और दर्द था।
“कादर… प्लीज, किसी मेडिकल स्टोर पर रोक लेना, कमर मे दर्द हो रहा है, दर्द की दवाई लेनी है,” कामिनी ने कादर के कंधे को भींचते हुए अपनी असली दर्द की जगह को छुपा लिया।

कादर ने शीशे में देखा। कामिनी के चेहरे पर दर्द साफ़ था।
“दवाई से कुछ नहीं होगा कामिनी जी,” कादर ने अपना पुराना नुस्खा बताया। “मेरे दादाजी हकीम हुआ करते थे। मेरे ढाबे पर एक खास तेल रखा है। उसे जहाँ लगाओगे, दर्द चुटकियों में गायब हो जाएगा।”

कामिनी को याद आया, जब उसने पहली बार रघु ने उसे चोदा था, तब भी रघु उसके लिए वही तेल लाया था। पल भर मे दर्द उड़नछू हो गया था.

कादर ने स्कूटर को शहर के बाहरी इलाके में अपने पुराने ढाबे की तरफ मोड़ दिया।
लेकिन वहां पहुँचते ही देखा कि ढाबे के सामने पुलिस की जीप खड़ी है और दो हवलदार चाय पी रहे हैं।
कादर रिस्क नहीं ले सकता था।
उसने स्कूटर को घुमाया और ढाबे के बिल्कुल पीछे वाले सुनसान रस्ते पर ले गया।
“कामिनी ने विरोध करना चाहा, कहाँ पीछे से जाना?
मेडिकल की दवाई ही ले लेनी चाहिए थे ” लेकिन कादर के साथ ने उसे कुछ कहने से रोक लिया.

वहां झाड़ियां थीं, टूटी हुई दीवारें थीं और कचरे के ढेर थे। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था।

“आप यहीं रुकिए,” कादर ने स्कूटर खड़ा किया। “मैं दीवार फांदकर अंदर से वो तेल की शीशी ले आता हूँ। बस दो मिनट।”

कादर ने दीवार पर चढ़ाई की और फुर्ती से दूसरी तरफ कूद गया।

कामिनी अब वहां अकेली खड़ी थी।
दोपहर के 3 बज रहे थे। सूरज सिर पर था और धूप बहुत तेज़ थी।
कामिनी का लाल साड़ी में लिपटा हुआ बदन पसीने से भीग रहा था।
स्कूटर के इंजन की गर्मी और सूरज की तपिश ने उसका बुरा हाल कर दिया था।
उसके ब्लाउज़ के अंदर पसीने की बूंदें रेंग रही थीं।
यह गंदा और सुनसान इलाका उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।

“मैं भी पागल हूँ… कहाँ आ गई इस कादर के चक्कर में,” कामिनी खुद को कोस रही थी।
“छी कितनी गंदी जगह है, चारो तरफ गंदगी ”
उसकी गांड में स्कूटर की ‘धरधराहट’ की वजह से अभी भी टीस उठ रही थी। वह अपनी साड़ी को बार-बार ठीक कर रही थी।

तभी झाड़ियों के पीछे से सूखे पत्तों के कुचलने की आवाज़ आई।
“खड़-खड़…”
कामिनी चौंकी।
सामने से दो आदमी, जो शक्ल से ही मवाली और नशेड़ी लग रहे थे, लड़खड़ाते हुए बाहर निकले।
शायद अपना नशे का काम निपटा कर वापस गली की तरफ आ रहे थे.
उनके कपड़े मेले थे, आँखें लाल थीं और मुंह में गुटखा भरा था।
सुनसान में खड़ी ऐसी मादक और सजी -धजी औरत को देखकर उनके ईमान डोल गए।
“अरे वाह…” एक ने अपनी गंदी हंसी हंसी। उसके दांत पीले थे।
“देख साला… क्या माल है। यहाँ सुनसान में क्या कर रहा है?”
दूसरे ने अपनी लुंगी को ठीक किया, उसकी नज़रें सीधे कामिनी की छाती पर गड़ गईं।

“चल देखते हैं… आज तो मज़ा आ जाएगा। लगता है भगवान ने छप्पर फाड़ के दिया है।”
कामिनी का दिल धक से बैठ गया।
वह पीछे हटने लगी, लेकिन पीछे स्कूटर और दीवार थी।

“क्या हुआ मैडम? कोई समस्या है?” एक आदमी ने पास आते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में एक गंदा इशारा था।
कामिनी का गला सूख गया।

“मममम.. मममम.. मै…. ” वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन डर के मारे सिर्फ हवा निकली।
उन दोनों आदमियों के पास से सस्ती शराब और पसीने की भयंकर बदबू आ रही थी। तेज़ भभका कामिनी की नाक में घुस गया।

“लगता है कुछ हेल्प चाहिए मैडम को,” दूसरा आदमी थोड़ा और पास आया और उसने अपना हाथ बेशर्मी से स्कूटर की सीट पर रख दिया, कामिनी की कमर से बस कुछ इंच दूर।

कामिनी बुरी तरह घबरा गई।
उसे कुछ नहीं सूझा। वह कादर का नाम नहीं ले सकती थी।
उसने अपनी छोटी ऊँगली उठा दी, पेशाब वाली।
उसे लगा शायद ये लोग शर्म करके चले जाएंगे।

“वो… वो… मै… मै… पेशाब…” कामिनी हकला रही थी।
गुंडों ने एक-दूसरे को देखा और ठहाका मार कर हंस पड़े।

“अच्छा… तो मूतने आई है?”
पहले वाले ने अपनी जीभ होंठों पर फेरी।

“तो… मूत लो ना… हम भी देखें आप जैसी खूबसूरत और गोरी औरत का पेशाब किस रंग का होता है।”
दूसरा आदमी कामिनी के बिल्कुल नज़दीक आ गया।

“सुना है अमीर घरों की औरतों का मूत भी खुशबूदार होता है…”
कामिनी बुरी तरह फंस गई थी।
भागने का रास्ता नहीं था। चिल्लाने की हिम्मत नहीं थी।
लेकिन जब उसे लगा कि अब ये उसे छूने वाले हैं, उसने अपनी पूरी ताकत जमा की।
उसने चिल्लाने के लिए अपना मुंह खोला—
“काद……”
लेकिन आवाज़ निकलने से पहले ही…
सामने खड़े आदमी ने अपना गंदा, बदबूदार और खुरदरा हाथ कामिनी के मुंह पर जमा दिया।

“गु… गु… गु….!!”
उसकी चीख उसके गले में ही घुट गई।
उस आदमी की हथेली से तंबाकू और पसीने की गंध आ रही थी।
उसी वक़्त, पीछे खड़े दूसरे आदमी ने कामिनी को कमर से जकड़ लिया।
उसने कामिनी को हवा में उठा लिया।

“जल्दी कर… उधर झाड़ी में ले चल।”
कामिनी हाथ-पैर मार रही थी। उसकी लाल साड़ी और पेटीकोट ऊपर उठ गए थे।
उसकी टांगें हवा में चल रही थीं।
लेकिन उन दोनों की ताकत के आगे वह बेबस थी।
वे दोनों कामिनी को लगभग घसीटते हुए, स्कूटर से दूर, पीछे की घनी और कांटेदार झाड़ियों की तरफ ले जाने लगे।
कामिनी की आँखों से आंसू बह निकले।
उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था।
उसकी इज़्ज़त… उसकी जवानी… आज इन दो गंदे जानवरों का शिकार बनने वाली थी।
दीवार के उस पार कादर तेल ढूंढ रहा था, और इस पार उसकी ‘कामिनी’ लुटने जा रही थी।

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कादर के हाथ में तेल की पुरानी, धूल भरी शीशी थी। उसके चेहरे पर एक सुकून वाली मुस्कान थी। बहार आते आते उसने अपने दो पठानी कुर्ते पाजामे भी उठा लिया थे, आखिर उसे ऐसे ही कपडे पसंद थे, वो तो कामिनी का मन रखने के लिए उसने जींस t-shirt ले लिए थे.

उसने फुर्ती से दीवार पर हाथ रखा और एक ही झटके में शरीर को हवा में उछालकर दूसरी तरफ कूद गया।
“धप्प…”
उसके मज़बूत पैर ज़मीन पर टिके।

“कामिनी जी… मिल ग…”
कादर के शब्द हवा में ही जम गए।
सामने स्कूटर खड़ा था, इंजन अभी भी गर्म था और ‘टिक-टिक’ कर रहा था।

लेकिन स्कूटर के पास… कामिनी नहीं थी।
वहां सन्नाटा था। सिर्फ दोपहर की गरम हवा चल रही थी।
कादर का दिल एक पल के लिए रुक गया।
“कामिनी जी?” उसने इधर-उधर देखा।

तभी उसकी नज़र ज़मीन पर गई।
स्कूटर के ठीक पास, धूल भरी ज़मीन पर…
लाल कांच की चूड़ियों के टूटे हुए टुकड़े बिखरे पड़े थे।
और वहां की मिट्टी खुदी हुई थी, जैसे किसी ने एड़ियां रगड़ी हों। घसीटने के ताज़ा निशान झाड़ियों की तरफ जा रहे थे।

कादर का खून खौल उठा। उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
उसका गोरा, चिकना चेहरा अब लाल अंगारे की तरह दहक उठा।
उसकी नसों में दौड़ता हुआ खून किसी लावे का रूप ले चूका था।
उसने तेल की शीशी और अपने कपडे की थैली को स्कूटर की सीट पर पटका और किसी भूखे शेर की तरह, बिना आवाज़ किए, उन झाड़ियों की तरफ लपका।

घनी झाड़ियों के बीच, एक पुराने पेड़ की आड़ में कामिनी ज़मीन पर चित पड़ी थी। उसकी लाल साड़ी और पेटीकोट घुटनों से ऊपर तक उठ चुके थे।
एक गुंडा उसके ऊपर चढ़ा हुआ था, और अपने गंदे घुटनों से कामिनी के हाथों को ज़मीन पर दबा रहा था।

“साली… बहुत फड़फड़ा रही है…” वह गुर्राया।
दूसरा गुंडा कामिनी के पैरों के बीच घुसने की कोशिश कर रहा था, वह उसकी साड़ी को फाड़ने के लिए खींच रहा था।
“छोड़ो… हरामखोरों… भगवान के लिए..plz….छोड़ दो ” कामिनी रो रही थी, उसका गला बैठ चुका था।
औरत कितनी ही कामुक क्यों ना हो, कितनी ही प्यासी कई ना हो वो सम्भोग सिर्फ अपने पसंदीदा मर्द के साथ ही करती है वो भी अपनी मर्ज़ी से, जबरजस्ती सम्भोग उसे कतई पसंद नहीं होता.
कामिनी की हालात भी ऐसी ही थी.
कल रात वो तीन तीन लंडो से हो कर गुजरी थी, लेकिन वो उसकी मर्ज़ी थी, ये बदबूदार शराबी उसे बर्दाश्त नहीं थे.

उसकी आँखों से आंसू बहकर कानों में जा रहे थे। उसने आँखें बंद कर लीं, अपनी नियति को स्वीकार करते हुए।
तभी…
हवा का रुख बदला।
झाड़ियों के पत्तों में सरसराहट नहीं हुई, बल्कि एक तूफ़ान आया।

कामिनी के पैरों के पास खड़े गुंडे को अचानक लगा जैसे सूरज की रौशनी छुप गई हो।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
उसके ठीक पीछे… कादर खान खड़ा था।
6 फुट का विशाल शरीर, टी-शर्ट में तनी हुई मांसपेशियां, और आँखों में साक्षात यमराज।

इससे पहले कि वह गुंडा कुछ समझ पाता…
कादर ने अपना लोहे जैसा भारी हाथ उस गुंडे के जबडे पर दे मारा।
“कड़क़क़क़…..कदाक्क्क…..!!”
जबरजस्त हड्डी टूटने की सूखी आवाज़ आई।
गुंडा चीख भी नहीं पाया। वह किसी कटी हुई पतंग की तरह वही कामिनी के पैरो के पास धाराशाई हो गया,

कामिनी के ऊपर चढ़ा दूसरा गुंडा हड़बड़ा गया।
“कौन है बे…”
जैसे ही उसने सिर उठाया, कादर ने उसकी गिरेबान पकड़ी और उसे कामिनी के ऊपर से ऐसे खींचा जैसे कोई मरियल कुत्ता हड्डी चूसने के कोशिश कर रहा हो, और अचानक से बब्बर शेर ने कुत्ते की गार्डन दबोच ली हो।

कादर ने उसे हवा में उठाया और पास खड़े पेड़ के तने पर दे मारा।
“धड़ाम!!”
कादर रुका नहीं।

उसका “सभ्य” इंसान वाला नकाब उतर चुका था।
उसने उस गुंडे को ज़मीन पर गिरने से पहले ही दोबारा दबोच लिया।
“साला तुम जैसे लोग शरीफ बनने कहाँ देते हो…. मादरचोद…!!”
हर शब्द के साथ कादर का भारी मुक्का उस गुंडे के चेहरे पर पड़ रहा था।
“धुम… धुम… खचाक…”
गुंडे का नाक, जबड़ा, दांत… सब कादर के लोहे जैसे मुक्कों के नीचे चकनाचूर हो रहे थे।
“सोचा था सब कुछ छोड़ के शरीफो वाला जीवन जीऊंगा, अब कोई गुंडा गर्दी नहीं…
लेकिन नहीं… धड… धड… धाम… धाम…. लेकिन नहीं तुम जैसे सूअर कादर खान को गुंडा ही बनाये रखोगे.”

कादर खान गुस्से मे बड़बड़ाए जा रहा था, उसकी नस नस फड़क रही थी, शायद पल भर मे ही उसने कामिनी के प्यार को महसूस कर अच्छे जीवन की कल्पना कर ली थी,
लेकिन इस वारदात ने उसके अंदर का हैवान, कसाई वो गुंडा फिर से जगा दिया था.
कामिनी आँखों मे आंसू और हैरानी लिए कादर की एक एक बात को सुन रही थी, उसे देखे जा रही थी.
कादर का चेहरा गुस्से से लाल था.

धाम… धम… धाड़.. धाड़…. हर एक मुक्के के साथ खून की पिचकारियां कादर की उस नई, साफ़-सुथरी टी-शर्ट पर उड़ रही थीं, लेकिन उसे कोई परवाह नहीं थी।

वह गुंडा अब बेहोश हो चुका था, उसका चेहरा मांस का लोथड़ा बन गया था, लेकिन कादर का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था।
वह उसे जान से मार देता, अगर…
“कादर…!!”
पीछे से एक कांपती हुई, रोती हुई आवाज़ आई।
कादर का हाथ हवा में रुक गया।

उसने भारी सांसों के साथ पीछे मुड़कर देखा।
कामिनी उठी हुई थी।
वह पेड़ के सहारे बैठी थी, अपनी फटी हुई साड़ी को छाती से लगाए हुए।

वह कादर को देख रही थी—डर से नहीं, बल्कि अविश्वास और राहत से।
उसने पहली बार कादर का ये रूप देखा था, गुंडा गर्दी क्या होती है कामिनी ने महसूस किया..
ये सब फिल्मो मे ही देखा था आजतक कामिनी ने, लेकिन… ये… ये… आज सच था, एक गुंडा, जो बमुश्किल दो दिन पहले ही उस से मिला था, वो उसकी इज़्ज़त बचाने के लिए कसाई बना हुआ था.

कादर का चेहरा खून के छींटों से सना था, मुट्ठियाँ लाल थीं, छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
कादर ने उस अधमरे गुंडे को कचरे की तरह फेंक दिया।
वह लंबे डग भरता हुआ कामिनी के पास पहुँचा।
उसका गुस्सा पल भर में चिंता में बदल गया।

वह कामिनी के सामने घुटनों के बल बैठ गया।
“कामिनी जी… आप… आप ठीक हैं?”
कादर ने अपने गंदे हाथ कामिनी से दूर रखे, उसे डर था कि कहीं उसका खून कामिनी को न लग जाए।
कामिनी ने कुछ नहीं कहा।
उसने बस झपटकर कादर को गले लगा लिया।

“कादरررر….!!”
वह फूट-फूट कर रो पड़ी।
उसने अपना चेहरा कादर की उस खून से सनी, पसीने से भीगी टी-शर्ट में छुपा लिया।

“मैं डर गई थी… मुझे लगा आज सब ख़त्म…”
कादर ने धीरे से, बहुत ही नाजुकता से अपने मज़बूत हाथ कामिनी की पीठ पर रखे।

“मैं हूँ ना..मै आपको यहाँ लाया था, मुझे माफ़ कर दो मेरी गलती से हुआ ये सब.” कादर ने उसकी पीठ सहलाई।

धूप तेज़ थी, लेकिन उस झाड़ी की छांव में, दो जिस्म एक-दूसरे से लिपटे हुए थे।

कादर की टी-शर्ट पर लगा गुंडों का खून और कामिनी के आंसुओं ने मिलकर आज उनके रिश्ते पर पक्की मुहर लगा दी थी।

कादर खान की सांसें अब सामान्य हो रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी खून उतरा हुआ था। दोनों चलते हुए स्कूटर तक आ गए थे, जो शांत गली मे खड़ा था.
उसने एक नज़र अपनी उस नई नीली टी-शर्ट पर डाली जो अब गुंडों के खून के छींटों से ‘लाल’ हो चुकी थी।
“साला… आपकी पसंद की पहली चीज़ ही ख़राब हो गई,” कादर अपने मे बड़बड़या।

उसने एक झटके में वह टी-शर्ट उतार कर वही धूल में फेंक दी।
उसका गठीला, पसीने से भीगा नंगा बदन धूप में चमक रहा था।
उसने थैले से अपना पठानी कुर्ता निकाला—वही काला कुर्ता जो उसकी पहचान था।
जैसे ही उसने वह कुर्ता पहना, उसका ‘शरीफ’ वाला रूप फिर से ढक गया और वह पुराना, रौबदार कादर खान वापस आ गया।

कामिनी अभी भी सहमी हुई थी। उसकी कीमती खूबसूरत साड़ी कहीं कहीं से फट गई थी, जिसे उसने जैसे तैसे ढँक लिया था।

“बैठिये…” कादर ने अपनी आवाज़ को नरम करते हुए कहा।
दोनों बिना कुछ कहे स्कूटर पर बैठ गए।
कादर ने किक मारी, और स्कूटर धूल उड़ाता हुआ वहां से निकल गया।
सुहाना प्यार भरा सफर यूँ ऐसे दुःखद खत्म होगा किसी ने उम्मीद नहीं की थी.
हालंकि दोनों ही कुछ कहना चाहते थे, लेकिन शायद समय ही ठीक नहीं था.
कामिनी ने डर के मारे कादर की कमर को कसकर पकड़ रखा था, जैसे वह उसकी ज़िंदगी की आखिरी डोर हो।

स्कूटर की आवाज़ दूर होते ही ढाबे के पीछे गली मे फिर से सन्नाटा छा गया।
वहाँ से थोड़ी दूर धूल और गर्मी के बीच, ज़मी पर दो लाशें जैसी चीज़ें पड़ी थीं।

लकी, जिसे कादर ने पेड़ पर मारा था, वह तो बेहोश था, मरने की हालात मे लग रहा था।
लेकिन बिट्टू, जिसका जबड़ा कादर के लोहे जैसे मुक्के से टूट चुका था, अभी भी होश में था।

वह दर्द से तड़प रहा था। उसका मुंह खून से भरा था।
तभी उसकी जेब में वाइब्रेशन हुआ।
“ट्रिन… ट्रिन… ट्रिन…!!”
पुराने नोकिया फ़ोन की घंटी उस सन्नाटे को चीर रही थी।
बिट्टू ने कांपते, खून से सने हाथों से जेब टटोली और फ़ोन निकाला।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था— “बड़ा भाई”।
बिट्टू की रूह कांप गई। कादर की मार से ज्यादा डर उसे इस फ़ोन का था।
उसने बड़ी मुश्किल से हरे बटन को दबाया और फ़ोन कान पर लगाया।
“ह… ह… हाँ… भाई…”
उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी। टूटा हुआ जबड़ा शब्दों को चबा रहा था।
उधर से एक भारी और कड़क आवाज़ आई, “बोल बिट्टू! क्या खबर है? मिला वो हरामखोर कादर?”

“बबबब.. भाई… भाई…. बड़ा भाई….” बिट्टू दर्द से कराह उठा। “वो… कककक.. कादर… वो अभी यहाँ अपने ढाबे पर आया था।”
बिट्टू ने थूक निगला, जिसमें खून का स्वाद था।
“साले ने… बहुत मारा हम लोगों को भाई। यमराज बन गया था वो।”
“क्यों?” उधर से आवाज़ में गुस्सा बढ़ा।
“उसके साथ… एक औरत भी थी भाई। बहुत खूबसूरत… अमीर घर की मालकिन लगती थी। उसी औरत के लिए मारा हमें। वो उसे बचाने आया था।”

**********************

शहर के एक पॉश इलाके में, एक आलीशान ऑफिस के अंदर घुप अंधेरा था।
सिर्फ़ टेबल लैंप की पीली रौशनी जल रही थी, और हवा में सिगार का धुआं तैर रहा था।
उस धुएं के पीछे एक शख्श अपनी रिवॉल्विंग चेयर पर बैठा था। चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था, बस उसके कंधे पर चमकते सितारे से कुछ दिख रहे थे।

ये “बड़ा भाई” (उस्ताद) था। शहर के ड्रग माफ़िया का बेताज बादशाह।
इसे कभी किसी ने नहीं देखा था, चोर पुलिस सब इसका नाम भी जानते थे, नाम ही काफ़ी था.
कादर खान इसी की दी हुई ड्रग को ढाबे की आड़ मे सप्लाई करता था,

लेकिन 50 लाख का माल लेकर भागने की वजह से अब वह इनका दुश्मन बन गया था।
बिट्टू की बात सुनकर बड़े भाई का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।

“क्या बक रहा है?” बड़ा भाई दहाड़ा ।
“अबे दो आदमी होकर उसे काबू ना कर सके? शर्म करो हरामियों!”
उसने टेबल पर मुक्का मारा।
“बड़ा भाई हमारी मति मारी गई थी जो उस औरत को उठा लिया ” बिट्टू गिड़गिड़ाया।

“अभी तो उठने की हालत में भी नहीं हूँ। ये लकी मर गया या ज़िंदा है पता नहीं…”
“साले तुम किसी काम के नहीं। वहीं सड़ो तुम दोनों!”
बड़ा भाई ने फ़ोन काट दिया और उसे टेबल पर पटक दिया।
“खटाक!!”
अंधेरे में बैठे उस शख्श ने अपने दांत पीसे।
“कटक… कटक…”
“साला इस कादर का पता क्यों नहीं चल रहा…” बड़ा भाई बुदबुदाए।
“आज तक तो इसने ऐसा नहीं किया। शेर आदमी चूहों की तरह बिल में क्यों छुपा है?”

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि कादर, जो कभी औरतों के चक्कर में नहीं पड़ता था, आज एक औरत के साथ क्या कर रहा है?
कौन है वो औरत? क्या कादर ने माल उस औरत को दे दिया?
पास ही अँधेरे में खड़ा उसका राइट हैंड (Right Hand), शेरा, आगे आया। उसने लाइटर जलाकर बड़े भाई का बुझा हुआ सिगार जलाया।

“बड़े भाई… कब तक छुपेगा चूहा,” शेरा ने चापलूसी करते हुए कहा, उसकी आँखों में कमीनापन था।
“शहर छोटा है। अगर उसके साथ कोई औरत है, तो यह हमारी जीत है।”
शेरा ने एक कुटिल मुस्कान दी।
“मर्द को ढूंढना मुश्किल होता है भाई… लेकिन औरत की खुशबू और इज़्ज़त… आदमी को बिल से बाहर खींच ही लाती है। अब हम कादर को नहीं… उस औरत को ढूंढेंगे।”

बड़े भाई के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई।
“सही कहा शेरा… पता लगाओ कौन है वो रंडी जिसके पल्लू में कादर छुपा बैठा है। एक बार वो मिल जाए… तो कादर और मेरा 50 लाख, दोनों मेरे कदमों में होंगे।”
***********************

स्कूटर की आवाज़ गेट के बाहर ही थम गई।
कादर खान समझदार था। उसने अपनी खून से सनी हालत और कामिनी की फटी हुई साड़ी का लिहाज़ किया।
उसने कामिनी को गेट पर उतारा और बिना एक शब्द कहे, अपनी गर्दन झुकाकर चुपचाप पीछे के रास्ते से स्टोर रूम की तरफ चला गया।
कादर ने कामिनी की ओर देखा भी नहीं, उसे लगा सब उसकी वजह से हुआ उसे बहार निकलना ही नहीं चाहिए था.

तेल की शीशी कामिनी के हाथो मे थमी हुई थी.

कामिनी लड़खड़ाते कदमों से पोर्च पार करके मुख्य दरवाज़े तक पहुँची।
उसका पूरा शरीर कांप रहा था। साड़ी जगह-जगह से फटी हुई थी, पल्लू धूल से भरा था, और बाल बिखरे हुए थे।
उसने कांपते हाथों से डोरबेल बजाई।
“ट्रिन… ट्रिन…”
अंदर से कदमों की आहट आई।
“खट…” दरवाज़ा खुला।
सामने बंटी खड़ा था। स्कूल यूनिफॉर्म उतारकर वह घर के कपड़ों में था।
जैसे ही बंटी ने दरवाज़े पर अपनी माँ को देखा, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

“माँ…?” बंटी की आवाज़ हलक में अटक गई।
सामने खड़ी कामिनी किसी युद्ध के मैदान से लौटी हुई लग रही थी—घबराई हुई, बिखरी हुई और दहशत में।
कामिनी ने बंटी को देखा।
उसकी आँखों में जो आंसू रुके हुए थे, बंटी का चेहरा देखते ही बांध तोड़कर बह निकले।
“बंटी…!!”

कामिनी आगे बढ़ी और बंटी के गले लग गई।
वह फूट-फूट कर रोने लगी।
“उहूँ… उहूँ… बंटी… आज… आज तो मैं…”
उसका रोना दिल चीर देने वाला था। वह बंटी की छाती में अपना मुंह छुपाकर सिसक रही थी, जैसे कोई छोटी बच्ची अपने पिता से लिपटकर रोती है।
बंटी एक पल के लिए सन्न रह गया, लेकिन अगले ही पल उसका दिमाग काम करने लगा।
उसने अपनी माँ को बांहों में संभाला।

“माँ… शांत हो जाओ… मैं हूँ ना… क्या हुआ? ”
बंटी ने दरवाज़ा बंद किया और कामिनी को सहारा देकर ड्राइंग रूम के सोफे तक ले गया।
उसने उसे बिठाया। कामिनी अभी भी कांप रही थी।
बंटी दौड़कर फ्रिज से ठंडा पानी लाया।

“लो माँ… पियो इसे। सांस लो।”
कामिनी ने दो घूंट पानी पिया। उसके दांत गिलास से टकराकर ‘कटक-कटक’ बज रहे थे।

थोड़ी देर बाद, जब उसकी सांसें काबू में आईं, तो उसने टूटे-फूटे शब्दों में सारी कहानी कह सुनाई।
ढाबे के पीछे जाना… उन दो गुंडों का आना… उनकी गंदी बातें… और फिर…
कादर खान का तांडव।
कामिनी की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई जब वह कादर के बारे में बताने लगी।

“तूने देखा नहीं बंटी… वो इंसान नहीं, साक्षात काल था। वो उन्हें मार डालता, इतना खून…. उउउफ्फ्फ्फ़…. सुबुक सुबुक….”
कामिनी ने अपनी मुट्ठियाँ भींची।
“उसने उन दोनों को कुत्तों की तरह नोच डाला। एक ही मुक्के में जबड़ा तोड़ दिया। अगर वो नहीं होता… तो आज तेरी माँ…”
कामिनी की आवाज़ फिर से रुंध गई।
बंटी सब सुन रहा था। उसका चेहरा शांत था, लेकिन दिमाग तेज़ चल रहा था।
वह कादर का शुक्रगुज़ार था कि उसकी माँ की इज़्ज़त और जान बच गई।
लेकिन साथ ही उसे कादर की असली ताकत का अंदाज़ा भी हो गया।

“आप जाओ… अच्छे से नहा लो। ये धूल-मिट्टी और डर सब धुल जाएगा। मैं आपके लिए बढ़िया अदरक वाली चाय बनाता हूँ।”
कामिनी ने बंटी को एक कृतज्ञ भरी नज़र से देखा।
“तू सच में बहुत समझदार है बंटी…”
कामिनी अपनी फटी हुई साड़ी समेटती हुई धीरे-धीरे बाथरूम की तरफ बढ़ गई।
उसके चेहरे पर अभी भी उदासी और थकान थी, लेकिन चाल में एक सुकून था कि वह अपने घर में है।

**********************

बाथरूम का दरवाज़ा खुला और भाप का एक भभका बाहर आया।
कामिनी बाहर निकली।
उसने अपने बदन पर सिर्फ़ एक सफ़ेद तौलिया लपेटा हुआ था, जो उसके भारी और गद्देदार शरीर को ढकने के लिए नाकाफी साबित हो रहा था। तौलिया उसकी छाती से शुरू होकर बमुश्किल उसकी जांघों के ऊपर तक ही आ रहा था।
नहाते वक़्त साबुन का पानी जब उसकी चुत और गांड के रगड़ खाए हुए हिस्सों पर लगा था, तो उसे ऐसी जलन हुई थी जैसे किसी ने मिर्ची लगा दी हो।

उसकी चाल में वह दर्द साफ़ दिख रहा था। वह अपने पैरों को थोड़ा चौड़ा करके, धीरे-धीरे चल रही थी। उसके हर कदम पर उसके नितंब और जांघें दर्द से सिहर रहे थे।
तभी उसकी नज़र सामने पड़ी।
बंटी पहले से ही बेडरूम में मौजूद था। उसके हाथ में एक ट्रे थी, जिसमें से अदरक वाली चाय की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी।
अपने जवान बेटे को बेडरूम में देखकर, और खुद को इस अर्ध-नग्न हालत में पाकर कामिनी एक पल के लिए सकपका गई।

उसने झट से अपने दोनों हाथों को अपनी छाती पर क्रॉस कर लिया, जैसे अपनी उभरी हुई जवानी को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही हो।

“अरे… बबब.. बंटी तू?” कामिनी ने हड़बड़ाते हुए कहा।
बंटी की नज़रें अपनी माँ के उस धुले हुए, निखरे हुए और तौलिये में लिपटे बदन पर टिक गईं। पानी की बूंदें उसके कंधों से फिसलकर उसकी छाती की घाटी में समा रही थीं।

“रहने दो माँ…” बंटी के चेहरे पर एक शरारती और समझदार मुस्कान थी।
“मुझसे क्या छुपाना? मैं तो पहले ही सब कुछ देख चूका हूँ ”
बंटी ने अपनी माँ के हुस्न को देखकर मुस्कुरा दिया। उसकी नज़रों में बेटा कम और प्रशंसक ज्यादा था।

“हट बदमाश…” कामिनी ने बनावटी गुस्सा दिखाया, लेकिन उसके चेहरे पर लाली आ गई। “माँ पर बुरी नज़र रखता है?”
वह लंगड़ाती हुई बिस्तर के पास आई।
जैसे ही वह पास आई, बंटी की नज़र उसके नंगे कंधों और बांहों पर गई।
वहां लाल-लाल लकीरें उभरी हुई थीं—गुंडों के नाखूनों और झाड़ियों की खरोंचें। गोरे बदन पर वो निशान साफ़ चमक रहे थे।

बंटी का चेहरा सख्त हो गया।
“हरामियों ने नोच दिया आपको…” उसने धीरे से कहा, आवाज़ में गुस्सा था। “मैं अभी दवाई लाता हूँ।”
बंटी पलटने ही वाला था।

“रुक…” कामिनी ने उसे रोका। “दवाई है मेरे पास।”
कामिनी ने ड्रेसिंग टेबल की ओर इशारा किया, जहाँ कादर की दी हुई वह पुरानी तेल की शीशी रखी थी।

“ये तेल लगा दे… बहुत राहत देता है।”
“आप चाय पियो, मैं लगा देता हूँ,” बंटी ने ट्रे साइड टेबल पर रखी और तेल की शीशी उठा ली।
कामिनी बिस्तर के किनारे पर बैठ गई।
बैठते ही तौलिया उसकी जांघों से और ऊपर खिसक गया, जिससे उसकी मोटी, चिकनी और दूधिया जांघें पूरी तरह अनावृत हो गईं।

कामिनी ने चाय का कप उठाया और एक घूंट भरा।
बंटी उसके ठीक सामने खड़ा हो गया। उसकी आँखों के लेवल पर कामिनी की छाती थी। तौलिये की गांठ ढीली थी, जिससे उसके स्तनों का ऊपरी उभार (Cleavage) और गोलाई साफ़ झांक रही थी।

बंटी ने अपनी हथेली पर तेल उंडेला।
उसने अपनी दोनों हथेलियों को रगड़ा ताकि तेल गर्म हो जाए।
और फिर… उसने अपने गर्म और मज़बूत हाथ कामिनी के नंगे कंधे पर रख दिए।
“इस्स्स…. आअह्ह्ह….”
कामिनी के मुंह से एक तीखी सिसकी निकल गई।
तेल लगते ही ज़ख्मों में तेज़ जलन हुई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और गर्दन पीछे झुका दी।

“दर्द हुआ क्या माँ?” बंटी ने धीरे से पूछा।
वह अपनी उंगलियों को बहुत ही हल्के हाथों से, गोलाकार घुमाते हुए (Circular motion) उसकी खरोंचों पर फिरा रहा था।

उसकी नज़रें नीचे ही थीं—सीधे माँ के स्तनों की घाटी में।
सांस लेने पर कामिनी की छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, और वह नज़ारा बंटी को सम्मोहित कर रहा था।

“थोड़ा सा…” कामिनी ने गहरी सांस ली। “अब राहत है।”
कामिनी ने अपनी आँखें खोलीं और सीधे बंटी की नज़रों में देखा। उसने पकड़ लिया कि बंटी कहाँ देख रहा है।

“क्या देख रहा है?” कामिनी ने अपनी भौंहें चढ़ाईं, लेकिन आवाज़ में डांट नहीं थी।
बंटी ने नज़रे उठाईं। वह झिझका नहीं।

“आप इतनी सुंदर हो माँ…” बंटी ने कामिनी के गाल पर गिरे एक गीले बाल को पीछे करते हुए कहा। “थोड़ा बच के रहा करो। दुनिया की नज़र खराब है।”

बंटी ने फिर कामिनी को छेड़ा, एक हक जताते हुए।
“हट पागल…. तुझसे क्या बचना…” कामिनी मुस्कुरा दी।
उसने चाय की एक और चुस्की ली— “सुडप… सुडप…”
गरम अदरक वाली चाय गले से नीचे उतरी और बंटी के हाथों की गरमाहट कंधों पर महसूस हुई।

कामिनी को एक अजीब सा नशा और सुकून महसूस होने लगा।
दर्द गायब हो रहा था, और उसकी जगह एक मीठी सी सिहरन ले रही थी।
बंटी अब उसके दूसरे कंधे और गर्दन के पिछले हिस्से पर मालिश कर रहा था।
“और कहाँ दर्द है माँ?” बंटी ने बड़े कौतूहल और मासूमियत से पूछा, जैसे वह हर दर्द मिटा देना चाहता हो। “लगा दूँ?”

कामिनी ठिठक गई।
असली दर्द तो वहां था जहाँ तौलिया लिपटा था—उसकी जांघों के बीच और पीछे।
वह दर्द मीठा भी था और तीखा भी।
कामिनी ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ बंटी को देखा।

“जहाँ दर्द है… वहां तू नहीं लगा सकता बंटी।”
बंटी के हाथ रुके नहीं। वह तेल को उसकी पीठ पर नीचे की तरफ ले जा रहा था, तौलिये के बॉर्डर के पास।
“अच्छा?” बंटी भी मुस्कुरा उठा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।

“ऐसा कहाँ दर्द है? मुझसे कुछ छुपा भी है अब?”
बंटी का इशारा साफ़ था, क्यूंकि वो कितनी ही बार अपनी माँ को नंगी देख चूका था, कल शाम आग के पास गार्डन मे कादर का लंड चूसते देखा था.

कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी नज़रे झुका लीं और चाय के कप में अपनी परछाई देखने लगी।

कमरे में चाय की भाप और तेल की महक के बीच एक अजीब सा सन्नाटा था।
बंटी के हाथ कामिनी की गर्दन और कंधों से होते हुए अब नीचे की तरफ फिसल रहे थे।
उसने कामिनी की नंगी पीठ पर तेल मला। उसकी हथेलियाँ कामिनी की रीढ़ की हड्डी (Spine) के दोनों तरफ दबाव डाल रही थीं।
कामिनी ने अपनी आँखें मूंद ली, उसने एक हाथ से अपने स्तन पर तौलिये को कस कर पकड़ लिया.

बंटी का स्पर्श उसे सुकून दे रहा था, लेकिन साथ ही उसके अंदर एक अजीब सी आग भी लगा रहा था।
वह जानती थी कि बंटी अब बच्चा नहीं रहा। उसके हाथों में एक मर्द की ताकत और समझ है।

बंटी का हाथ फिसलते-फिसलते नीचे आया…
कमर के उस गड्ढे (Curve) तक, जहाँ से कामिनी के कूल्हे शुरू होते थे।
तौलिया वहीं ढीला हो गया था।
बंटी की उंगलियां तौलिये के किनारे (Edge) को छू रही थीं।
बस एक इंच और… और उसका हाथ कामिनी की उस “वर्जित जगह” पर होता जिसे उसने कल रात रघु के नीचे मसलते हुए देखा था।
बंटी का हाथ वहीं ठिठक गया।
उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।
सामने माँ की गोरी, विशाल और नंगी गांड का ऊपरी हिस्सा हल्का सा झांक रहा था।
बंटी का मन किया कि वह तौलिया खींच ले। मन किया कि उन ज़ख्मों पर भी तेल लगा दे जो रघु ने दिए हैं।
लेकिन…
उसकी हिम्मत जवाब दे गई।
उसे अपनी माँ की “ना” का डर नहीं था, उसे डर था कि कहीं यह महीन पतली डोर टूट ना जाए।
वह अपनी सीमाओं को लांघना नहीं चाहता था, वह बस उस सीमा पर खड़ा होने का सुकून लेना चाहता था।
कभी कभी खेल मे खिलाडी होने से ज्यादा मजा दर्शक होने मे होता है, बंटी वही दर्शक था.

इधर कामिनी की सांसें भी अटक गई थीं।
उसे महसूस हुआ कि बंटी का हाथ उसकी कमर के सबसे निचले हिस्से पर रुका हुआ है।
वह इंतज़ार कर रही थी…
क्या वह आगे बढ़ेगा?
क्या वह अपनी माँ की इज़्ज़त पर हाथ डालेगा?
कामिनी के अंदर एक द्वंद्व (Conflict) चल रहा था, एक तरफ मर्यादा, दूसरी तरफ हवस।
लेकिन बंटी ने अपनी उंगलियां वापस खींच लीं।
उसने झुककर कामिनी के कान के पास, बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में कहा:
“नीचे का दर्द… आप खुद ठीक कर लेना माँ। अभी बहुत काम है”
कामिनी ने एक झटके से अपनी आँखें खोलीं।
उसने मुड़कर बंटी को देखा।
बंटी के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि एक सम्मान, समझदारी और एक खूबसूरत मुस्कान थी।

कामिनी की आँखों में आंसू और मुस्कान दोनों आ गए।
“तू… तू सच में बहुत समझदार है बंटी…” कामिनी ने राहत की सांस ली।

कामिनी वाकई दुविधा मे थी, जिसका फैसला उसने किस्मत पर छोड़ दिया था, कामिनी की जीत हुई.
उसका विश्वास जीत गया.
ये भावनाये भी ना…. कुत्ती चीज होती है, रिश्ता का रूप बदल देती है.
खेर कामिनी अभी भी माँ ही थी, उसने अपना रिश्ता कायम रखा.

“मै आता हूँ माँ रवि के घर से.” बंटी लम्बे कदम भरते हुए बहार आया, वाश बेसिन के पास पड़े ड्रग के बेग को उठाया बहार निकल गया.
“साला ये जब तक यहाँ रहेगा, मुसीबत कभी भी आ सकती है ”

कामिनी धममम… हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़…. से गहरी सांस लेती हुई बिस्तर पर पीठ के बल जा गिरी

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