कामिनी मेरी माँ मादक जिस्म की मालकिन 6

माँ बेटा

छत से नीचे उतरते वक्त कामिनी के पैर अब लड़खड़ा नहीं रहे थे, बल्कि उनमें एक नई धमक थी। उसके मुँह में अभी भी वह कड़वा स्वाद बाकी था, लेकिन अब वह उसे ‘गंदगी’ नहीं, बल्कि अपनी ‘आज़ादी का इनाम’ समझ रही थी। उसने कमरे मे पहुंच आईने में खुद को देखा—चेहरा लाल था, आँखें चढ़ी हुई थीं और होंठों पर एक अजीब सी कुटिल मुस्कान थी।
उसे आज कोई शर्मिंदगी नहीं हो रही थी, रघु का गन्दा लंड चूस के हिकारात नहीं महसूस हो रही थी.
यहाँ तक की उसने बाथरूम मे आ कर ना कुल्ला किया, ना ही पानी से मुँह धोया… वो अपने मुँह का स्वाद बरकरार रखना चाह रही थी.
गजब का परिवर्तन आया था कामिनी ने या फिर वो रघु की तरफ से पूरी तरह निश्चिन्त थी.

उसने टेबल पर रखा फोन उठाया और रमेश को डायल किया।
“सुनो, आज शाम जल्दी आ जाना। रवि और उसकी माँ सुनयना को मैंने खाने पर बुलाया है।”

फोन के दूसरी तरफ रमेश की जैसे लॉटरी लग गई हो। इसका मन सुनयना को सोच कर झूम उठा “काम तो बहुत है, लेकिन ठीक है मै आ जाऊंगा।”

कामिनी फोन रख बड़बड़ाई ” जैसे मुझे पता नहीं, मेरे एक बार कहने पर जल्दी आ जाओगे ”
कामिनी के चेहरे से जलन साफ महसूस हो रही थी,
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छत के उस वहशी मंजर के बाद कामिनी अपने कमरे में दाखिल हुई। कमरे का सन्नाटा उसे डरा नहीं रहा था, बल्कि उसे किसी पुरानी याद की तरह लग रहा था। उसने दरवाज़ा बंद किया और सीधा आईने के सामने खड़ी हो गई।

आईने में जो औरत उसे दिख रही थी, वह ‘बंटी की मम्मी’ या ‘रमेश की पत्नी’ नहीं थी। उसकी आँखें नशीली और चढ़ी हुई थीं, चेहरा उत्तेजना और धूप की तपिश से तमतमाया हुआ था। कामिनी ने अपने होंठों पर अपनी उंगली फेरी—वह कड़वा, खारा और तीखा स्वाद अभी भी वहां मौजूद था। उसने बाथरूम की ओर देखा, पर उसके पैर नहीं बढ़े। उसने तय कर लिया था कि वह रघु की उस ‘मर्दानगी’ को अपने मुँह से साफ़ नहीं करेगी। वह स्वाद उसे याद दिला रहा था कि उसने एक नौकर की हस्ती को अपने मुँह के अंदर कुचल दिया था।

“वो डर कर भाग गया… शराबी कहीं का, ” कामिनी बुदबुदाई। रघु की वह दहशत, उसका वीर्य छोड़ते ही कांपना और फिर 200 रुपये लेकर वहाँ से खिसक लेना, कामिनी को एक अजीब सी जीत का अहसास करा गया।

कामिनी ने अपनी अस्त-व्यस्त साड़ी और ब्लाउज को बदन से अलग कर दिया। दोपहर की सुनहरी धूप खिड़की से छनकर उसके दुधिया बदन पर पड़ रही थी। उसने अपनी नग्नता को आईने में बारीकी से निहारा।

उसके गोरे स्तनों पर उसके खुद के हाथो की छाप पड़ी हुई थी, उसने उत्तेजना मे कस के अपने स्तनो को भींचा था, ये निशान किसी अनमोल जेवर की तरह उभर आए थे।

उसकी जांघों पर खरोंचें थीं, जो की कल रात का सबूत थी, की उसने किस वहसी तरीके स रघु को हलवा खिलाया था, चुत का ऊपरी हिस्सा गर्म पूड़ी जैसा फूल के बहार को आ गया था, जिसे छूने की हिम्मत भी नहीं कर पा रही थी.

कामिनी को अपनी जांघों के बीच एक तीखी और रसीली जलन महसूस हो रही थी। रघु का वह खुरदरापन उसके नाजुक अंगों को छील चुका था। हर बार जब वह अपनी जांघें हिलाती, तो उसे एक ‘करंट’ सा लगता। यह जलन उसे दर्द नहीं दे रही थी, बल्कि उसे और भी ज़्यादा कामपिपासु (Sexually Hungry) बना रही थी। उसकी चूत अभी भी पानी छोड़ रही थी, जैसे रघु की वह वहशत उसे तृप्त करने के बजाय और ज़्यादा भूखा छोड़ गई हो।

उसने अलमारी खोली और अपनी सबसे महँगी और पारदर्शी काली शिफॉन की साड़ी निकाली। आज वह कुछ भी ‘साधारण’ नहीं पहनना चाहती थी।

उसने अपनी नग्न देह पर सिर्फ़ वह काला झीना कपड़ा लपेटा। उसने जानबूझकर ब्लाउज के नीचे ब्रा नहीं पहनी। वह चाहती थी कि उसके स्तनों का वह भारीपन, स्तनो पर उभरी नीली नसे साड़ी के पतले कपड़े से साफ़ झलकें।

उसने अपनी कमर पर साड़ी को इतना नीचे बांधा कि उसकी गहरी नाभि और कमर का गोरा घेरा, उसकी ढलान जो सीधा चुत रुपी खाई मे गिर जाती थी,
साफ देखी जा सकती थी.

उसने अपने बालों को खुला छोड़ दिया। आँखों में गहरा काजल लगाया और माथे पर एक बड़ी लाल बिंदी सजाई। आईने में अब वह एक अप्सरा या यूँ कहिये प्यासी अप्सरा सी दिख रही थी।

काली साड़ी ने उसके गोरे बदन को ऐसे जकड़ रखा था जैसे कोई काला साया चाँद को अपनी आगोश में ले ले।

आज एक नयी कामिनी का उदय हुआ था.

उसने अपनी गर्दन पर इत्र लगाया और खुद से कहा—
घरेलु हूँ तो क्या हुआ, मै किसी से कम हूँ क्या? मै आज भी सुन्दर हूँ।”
खुद को घरेलु कहने से मतलब सजायाद सुनायाना का मॉर्डन होना था, औरतों की बात ही अलग है, वो दूसरी औरत का खूबसूरत होना बर्दाश्त नहीं कर सकती.
जबकि मर्द चाहता है की दुनिया की सभी औरते खूबसूरत हो…
अजब गजब नियति है.
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शाम 6 बज गए थे, कामिनी जब आंगन मे आई तो बंटी भी अपनी माँ को देख चौंक गया,
“क्या बात है माँ आज मस्त लग रही हो” बंटी बेबाक बोल गया.
जबकि वो ही एकमात्र राजदार था अपनी माँ का.
“वो सुनयना जी और रवि आने वाले है तो सोचा पहन लेती हूँ, मुझे कहाँ मौका मिलता है नये कपडे पहनने का ” कामिनी के मन मे वो हताशा थी जो एक घरेलु औरत ही समझ सकती है, कहने को वो आज़ाद होती है लेकिन उसकी कैद उसका ये घर ही होता है, जिम्मेदारी की छत उसे दबाये रखती है

“आप हमेशा ऐसे ही रहा करो, अच्छी लगती हो, कोई तारीफ करे या नहीं मै तो हूँ ना ” बंटी अपनी माँ का दर्द समझता था
कामिनी बंटी के बड्डपन पर हैरान रह गई, उसने कभी बंटी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था की वो भी बड़ा हो चूका है, जवान हो रहा है, और मेरी फ़िक्र करता है.
“थैंक्स यू बेटा ” कामिनी की एक आंख बह निकली.
उसे इसी प्यार, इसी परवाह की तो तलाश थी, जो की उसके पास ही था लेकिन ये अभागान बाहरी दुनिया मे प्यार ढूंढ़ रही थी.
ना जाने कामिनी को क्या हुआ उसने आगे बढ़ बंटी को गले लगा लिया.
कामिनी के स्तन बंटी के सीने मे जा धसे….
“तु बड़ा हो गया है बेटा ” कामिनी का गला रुंध आया.
“क्या माँ…. आप तो हमेशा से सुन्दर हो, मेरी कितनी परवाह करती हो, आप जो हो जैसी हो, मेरी माँ हो और हमेशा रहोगी, मुझे आप हर रूप मे अच्छी लगती हो ”
बंटी के हाथ कामिनी की कमर पर कसते चले गए, एक मीठी सोंधी, स्त्री की सुलभ खुसबू बंटी के नाक मे घुसने लगी, उसे अपनी माँ की खुसबू अच्छी लगी.
ये पहला मौका था जब वो इस कद्र अपनी माँ से गले लगा था, वो जो महसूस कर रहा था उसे बताने के किये शब्द नहीं थे.
शायद बंटी और कुछ भी कहता, लेकिन क्या कहता? क्यों कहता? उसे खुद नहीं पता था? वो तो बस अपनी माँ के साथ साथ खुद भी सीख रहा था.

कामिनी की आँखों से सिर्फ आंसू बह रहे थे, शायद उसके पाप को समझने वाला उसे मिल गया था, उसने जाना वो पाप है ही नहीं, बस ये भावना आंसू का ही रूप होती है.
“बड़ी बाते करनी आ गई है तुझे ” कामिनी ने और कस के बंटी को अपने आगोश मे भींच लिया.
ये शुद्ध माँ बेटे का प्यार था, उनकी आपसी समझ थी.
जिसे सिर्फ महसूस किया जाता है, ये सब बताने के लिए कोई भाषा, कोई शब्द बने ही नहीं है.

पो… पो…पी… पी… धड… धड… धड…..
तभी बहार से बुलेट बाइक के धडधड़ाने उसके हॉर्न की आवाज़आई.

कामिनी जैसे अपनी नर्क सी जिंदगी मे लौटी हो…
“तेरे पापा आ गए शायद, दरवाजा खोल दे ”
कामिनी किचन मे चल दी, बंटी दरवाजा खोलने…
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रात के गहराते साये और घर के अंदर जलते मध्यम बल्बों की रोशनी ने माहौल को किसी भारी नशे की तरह बोझिल बना दिया था।

कामिनी अपनी काली शिफॉन की साड़ी में रसोई से बाहर आई। “नमस्ते शमशेर जी ” कामिनी ने रमेश की तरफ देखा तक नहीं, उसकी चाल में वह पुराना संकोच नहीं था, बल्कि एक ऐसी मादकता थी जो सीधे पुरुषों के दिमाग पर वार कर रही थी।
शमशेर हॉल में सोफे पर पसरा हुआ था, कामिनी ने उसे पानी का गिलास दिया, लेकिन आज उसने कोई शर्म नहीं थी, वो आगे को झुकी लेकिन उसने अपने जिस्म को बेबाकी से दिखाया, उसे ढकने की कोई कोशिश नहीं की.

शमशेर पानी पीता कामिनी के एक-एक घुमाव को अपनी खूंखार नज़रों से टटोल रहा था। कामिनी के बिना ब्रा वाले स्तनों की भारी गोलाई काली साड़ी के झीने कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रही थी।
तभी दरवाजे की घंटी बजी— टिंग टोंग!

जैसे ही दरवाज़ा खुला, हॉल की हवा में एक तेज़ और मादक इत्र की खुशबू घुल गई। सामने सुनयना और रवि खड़े थे।
सुनयना ने आज अपनी ‘मर्यादा’ को पूरी तरह ताक पर रख दिया था। उसने गहरे लाल रंग की एक ऐसी नेट (जालीदार) साड़ी पहनी थी जो साड़ी कम और जिस्म पर लिपटा एक पारदर्शी साया ज्यादा लग रही थी।

साड़ी का पल्लू इतना बारीक था कि उसके विशाल स्तनों का गोरापन, उनकी गहरी घाटी (Cleavage) और उनके मुहाने का उभार साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था।

उसका ब्लाउज सिर्फ़ नाम मात्र का था—पीछे से सिर्फ़ दो डोरियों पर टिका हुआ और आगे से इतना गहरा कि उसकी सांसों के साथ उसके अंगों का हिलना किसी को भी पागल कर दे।
रमेश, जो पहले से हलके नशे मे था, सुनयना को देखते ही जड़ हो गया। उसके हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। उसकी आँखें सुनयना की कमर के उस खुले हिस्से और उसकी भारी जांघों पर जाकर चिपक गईं जो साड़ी के कट से रह-रह कर झाँक रही थीं।

असली हालत तो शमशेर की थी। वह किसी भूखे सांड की तरह कभी कामिनी के काले शिफॉन के पार झाँकते उन ‘नीली उभरी नसो’ को देखता, तो कभी सुनयना की लाल जालीदार साड़ी से छलछलाते उस ‘गोश्त’ को।
शमशेर के लिए यह किसी ‘जन्नत’ से कम नहीं था.

कामिनी: एक दबी हुई आग, जिसका स्वाद उसने अभी तक नहीं चखा था, लेकिन जिसकी ‘काली शिफॉन’ ने उसे बेकाबू कर दिया था।

सुनयना: एक खुली हुई किताब, जिसका हर पन्ना हवस से लिखा गया था। उसकी बेबाकी और उसके अंगों की नुमाइश शमशेर के खून की गर्दिश बढ़ा रही थी।

शमशेर का लंड झटके लेने लगा,
“नमस्ते रमेश जी ”
“आइये आइये… सुनयाना जी, कामिनी ने बताया आप डिनर पर आने वाली है ” रमेश ने दाँत निपोरते हुए उसे अपने सामने सोफे पर बैठे को कहाँ.

सुनयना ने अंदर आते ही अपनी नशीली नज़रों से पूरे कमरे का मुआयना किया। उसकी नज़र जब कामिनी पर पड़ी, तो उसने एक कुटिल मुस्कान दी।
कामिनी को इस रूप मे देख के वो भी हैरान थी, उसका गोरा जिस्म किसी भी मायने मे उस से कम नहीं था.

“नमस्ते कामिनी जी! सुबह आप अलग रही थी… और अभी तो…..,” सुनयना ने अपनी खनकती आवाज़ में कहा और जानबूझकर अपना पल्लू कंधे से थोड़ा और सरका दिया।
रमेश तो जैसे अपनी सुध-बुध खो चुका था। वह हकलाते हुए बोला, “आ… आइये सुनयना जी, बैठिये ना।”
“सुनयना शमशेर के सामने वाले सोफे पर बैठे को हुई, उसकी नजर शमशेर पर पड़ी, रोबदार चेहरा, चौड़ी छाती, चोड़े कंधे….
सुनयना की आंखे शमशेर से मिली.
“ये.. ये… मेरा खास दोस्त शमशेर, पुलिस मे है ” रमेश ने परिचय दिया…
“जी नमस्ते शमशेर जी ” सुनयाना ने झुक के नमस्ते किया…
नमस्ते क्या थी, यहाँ तो शमशेर के जिस्म मे आग लग गई, सुनायाना के बड़े भरी स्तन खुल के शमशेर के सामने आ गिरे, जिसे उसने छुपाने की कोई कोशिश नहीं की,
“नमस्ते सुनायाना जी….. ”
शमशेर के रोबदार आवाज़ और उसके वजूद से सुनायाना प्रभावित होती दिखी.
रवि बंटी के साथ उसके कमरे मे जा चूका था.

रमेश का घर काम वासना का अड्डा बनता जा रहा था..
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हॉल में अब चार जवान जिस्म और चार अलग-अलग तरह के वहशी दिमाग मौजूद थे। शमशेर सोफे पर टांग पर टांग रख कर बैठा था, उसकी वर्दी की बेल्ट और उसका रौब सुनयना को अंदर तक झकझोर रहा था। वहीं रमेश, सुनयना की लाल जालीदार साड़ी के पार झाँकते हुए उसके गोश्त को अपनी नज़रों से ‘पी’ रहा था।
कामिनी चाय और नाश्ता लेकर आई। उसने झुककर मेज पर ट्रे रखी। जैसे ही वह झुकी, उसकी काली शिफॉन की साड़ी के ढीले पल्लू से उसके बिना ब्रा वाले स्तनों का भारी उभार शमशेर की आँखों के ठीक सामने आ गया।

शमशेर ने अपनी सांसें रोक लीं। वह साफ देख पा रहा था कि कामिनी के गोरे स्तनों पर नीली नसें उभरी हुई है,

सुनयना ने देखा कि शमशेर का ध्यान कामिनी पर है, तो उसे जलन महसूस हुई। उसने जानबूझकर अपनी आवाज़ में रस घोला और चाय का कप उठाने कर लिए शमशेर की तरफ झुकी।

“शमशेर जी, पुलिस की नौकरी तो बहुत थका देने वाली होती होगी? आप जैसे मज़बूत लोग ही इसे संभाल सकते हैं।”
शमशेर ने सुनयना की आँखों में देखा। सुनयना की लाल साड़ी का गला इतना गहरा था कि उसके विशाल स्तनों की घाटी (Cleavage) शमशेर को निमंत्रण दे रही थी। शमशेर मुस्कुराया, एक ऐसी मुस्कान जिसमें दरिंदगी और हवस का मेल था।

“काम तो थका देने वाला है सुनयना जी, लेकिन रात को जब ऐसा ‘सुकून’ मिले, तो सारी थकान मिट जाती है। सुदक…. सुडक….” शमशेर ने चाय सुढकते हुए कहाँ.

सुनयना का चेहरा गुलाबी हो गया। उसे अहसास हुआ कि शमशेर सिर्फ़ पुलिसवाला नहीं, बल्कि एक ‘खुला सांड’ है, उसके जिस्म और आवाज़ से मर्दानगी साफ झलक रही थी, सुनयना शमशेर से काफ़ी प्रभावित दिख रही थी.

शमशेर ने रमेश के कान में कुछ फुसफुसाया, जिसे सुनकर रमेश की आँखों में एक कुटिल चमक आई। “कामिनी, हम ज़रा मूड बनाकर आते हैं… तुम लोग चाय-नाश्ता करो,” रमेश ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा।
रमेश और शमशेर सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर के कमरे में चले गए। दरवाजा बंद होते ही वहां बोतलों के खुलने और गंदी बातों का दौर शुरू हो गया।

शमशेर ने सोडा मिलाते हुए कहा, “साले रमेश… क्या माल है यार ये सुनयना! साड़ी के नीचे से जो उसका गोरापन चमक रहा है ना, उसने मेरा ‘लोहा’ लाल कर दिया है।”

रमेश ने एक ही घूँट में आधा गिलास खाली किया और हांफते हुए बोला, “सिर्फ़ सुनयना ही नहीं भाई… आज तो मेरी कामिनी भी किसी कयामत से कम नहीं लग रही। वो काली शिफॉन… उफ्फ! मेरा तो मन कर रहा है कि दोनों को इसी कमरे में खींच लाऊं।” रमेश अपनी बीवी के बारे मे ऐसी बात करते हुए जरा भी नहीं कतराया, जैसे वो नुमाइश की ही चीज हो.

शमशेर की हालत वैसी ही थी। उसकी एक आँख सुनयना के उस जालीदार पल्लू पर थी, तो दूसरी कामिनी की उस भीगी-भीगी और नशीली चाल पर।

दोनों शराब के नशे में उन दोनों औरतों के जिस्म को अपनी गंदी कल्पनाओं में ‘नोच’ रहे थे। शराब के जाम और गंदी बाते बढ़ती गई,

नीचे डाइनिंग टेबल पर दृश्य बिल्कुल अलग था। बंटी और कामिनी मेज के एक छोर पर बैठे थे, जबकि दूसरी तरफ सुनयना और रवि एक-दूसरे से चिपके हुए बैठे थे।

कामिनी यह देखकर सन्न रह गई। सुनयना का हाथ रवि की जांघ पर था और रवि का कंधा अपनी माँ के स्तनों के उभार से रगड़ खा रहा था। उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वे माँ-बेटा हैं; वे किसी प्रेमी जोड़े की तरह लग रहे थे। कामिनी के मन में घृणा और कौतूहल का एक साथ ज्वार उठा।

कामनी और सुनयना औपचारिक बातें कर रही थीं, लेकिन कामिनी का ध्यान बार-बार उनकी उस ‘अजीब नज़दीकी’ पर जा रहा था।
“कामिनी जी, चाय बहुत अच्छी बनी है,” सुनयना ने अपनी आँखों को मटकाते हुए कहा।

कामिनी ने चाय का घूँट भरा ही था कि रवि ने अपनी नज़रें कामिनी की गहरी नाभि और काली साड़ी के पार झाँकते उसके बदन पर गड़ा दीं।
“उउउउफ्फ्फ्फ़…. बहुत गरम है!” रवि ने चाय का प्याला होंठों से लगाते हुए कहा, लेकिन उसकी नज़रें कामिनी के सीने पर अटकी थीं।

कामिनी का दिल धक से रह गया। वह समझ गई कि रवि का इशारा चाय की तरफ नहीं, बल्कि उसके सुलगते हुए जिस्म की तरफ है। कामिनी ने मन ही मन तय किया था कि वह आज रवि को अकेले में समझा देगी। उसे कहना था— “कल रात जो हुआ, वह महज़ एक उत्तेजना थी… एक गलती थी। अब ऐसा दोबारा नहीं होगा।”

लेकिन कामिनी की ‘मर्यादा’ और उसकी ‘सोच’ उस वक्त धरी की धरी रह गई जब मेज के नीचे रवि ने अपनी चाल चली।
कामिनी अपनी चाय का प्याला रखने ही वाली थी कि उसे अपने नंगे पैर पर एक गरम और सख्त स्पर्श महसूस हुआ। रवि ने अपने पैर का अंगूठा कामिनी की कोमल जांघों के निचले हिस्से और पैरों के बीच बड़ी बेबाकी से फंसा दिया।

कामिनी का पूरा शरीर बिजली की तरह कौंध गया। दोपहर में रघु के साथ जो हुआ था, उसकी वजह से उसके अंगों में अभी भी एक अजीब सी संवेदनशीलता और जलन बाकी थी। उसके जिस्म की अधूरी प्यास रवि के उस स्पर्श से सुलगने लगी,

रवि कामिनी की आँखों में सीधे देख रहा था, उसे अपनी माँ के पास होने का डर भी नहीं था,

सुनयना पास ही बैठी थी, बंटी सामने था, और ऊपर रमेश और शमशेर शराब पीते हुए शबाब के ख्याब देख रहे थे।
लेकिन मेज के नीचे, कामिनी की काली शिफॉन के साये में, रवि का पैर उसकी मर्यादा को धीरे-धीरे ‘कुचल’ रहा था।
कामिनी का हाथ कांपने लगा। उसे गुस्सा करना चाहिए था, पैर पीछे हटाना चाहिए था… लेकिन वह पत्थर बनकर वहीं बैठी रह गई। उसकी जांघों के बीच से फिर से एक गीली लहर दौड़ गई।

“माँ 9 बज गए है, भूख लगी है ” बंटी की आवाज़ ने कामिनी को धरातल पर पटक दिया,
रवि ने भी सकपाकते हुए पैर पीछे खिंचा.
“हाँ कामिनी जी भूख तो लग आई है अब ” सुनयना ने भी बंटी का समर्थन किया.
“आअह्ह्ह… हाँ… हाँ… अपने पापा को बुला ला मै खाना लगाती हूँ ” कामिनी सकपाकती सी कुर्सी से नजर चुराती सीधा रसोई मे जा घुसी.
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थोड़ी ही देर मे सभी लोग डिनर टेबल पर जमे हुए थे, जहाँ सन्नाटा सा पसरा हुआ था, लेकिन नज़रों का शोर बहुत तेज़ था।
वही शमशेर खाना खाते वक्त भी अपनी आँखों से सुनयना की लाल जालीदार साड़ी के पार झाँकते उस ‘गोश्त’ को नोच रहा था।

रमेश नशे में इतना धुत्त हो चुका था कि उसे अपनी थाली का होश नहीं था। खाना खत्म होते ही वह लड़खड़ाते हुए बेडरूम की ओर बढ़ गया और बिस्तर पर गिरते ही खर्राटे भरने लगा।
खाना खत्म हुआ… कामिनी जी खाना बहुत लजीज बना था, हहहहुउउउ…. शमशेर ने बेशर्मो को तरह डाकर मारते हुए कहाँ.
“जी… जी.. धन्यवाद ” कामिनी ने एक नजर भर शमशेर को देखा
वाकई बलिष्ट जिस्म का मलिक था, चौड़ी छाती, रोबदार चेहरा, बड़े बड़े हाथ.
बालो से भरी छाती… वाकई मर्द था शमशेर.
एक पल को कामिनी शमशेर को अंगड़ाई लेती देखती रह गई.
“आइसक्रीम भी लीजिये ना शमशेर जी ” सुनयाना ने शमशेर की तरफ आइसक्रीम का कटोरा बढ़ाया.
“मुझे गर्म चीज़े पासंफ है सुनायाना जी ” शमशेर ने सुनायाना की आंख मे गहराई से झाँकते हुए अपनी जेब से सिगरेट निकालते हुए कहाँ.
और बिना पीछे मुडे छत की सीढिया चढ़ गया.
दोनों औरते शमशेर की मर्दानगी, उसकी अदा की कायल होती जा रही थी.

रात का सन्नाटा गहरा रहा था, लेकिन कामिनी के लिए यह सन्नाटा किसी भारी शोर से कम नहीं था। रसोई की पीली रोशनी में बर्तनों को समेटते हुए कामिनी का ध्यान बार-बार अपनी जांघों के बीच की उस तीखी जलन की ओर जा रहा था, जो रघु के जंगलीपन की याद दिला रही थी।
सभी लोग खाना खा चुके थे, बंटी अपने कमरे मे जा चूका था, सुनयना फ़ोन पर किसी से बात करने मे व्यस्त थी, कामिनी बर्तन समेट कर रसोई मे आ गई थी, घरेलु औरत को बहुत काम होते है.

रसोई की स्लैब पर हाथ टिकाए कामिनी गहरी साँसें ले रही थी, कामिनी बर्तनों को धोने के लिए जैसे ही झुकी, उसे अपने पीछे एक आहट सुनाई दी।
वह संभलती, उससे पहले ही एक गरम और जवान जिस्म की गर्माहट उसकी पीठ से आकर सट गई। रवि उसके ठीक पीछे खड़ा था।

रवि ने कोई दूरी नहीं रखी। उसके शरीर की सोंधी महक कामिनी के नथुनों में समा गई। कामिनी का हलक सूख गया।
जब रवि ने धीरे से कहा, “आंटी, मैं हेल्प करता हूँ,” तो उसकी भारी आवाज़ सीधे कामिनी की गर्दन पर टकराई। रवि की साँसें कामिनी की खुली गर्दन और उसके कान के पीछे वाले कोमल हिस्से पर आग की तरह गिर रही थीं।

कामिनी की मुट्ठियाँ कस गईं। उसने बर्तन पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे।

“त-तुम रहने दो रवि… मैं कर लूंगी,” उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, पर उसके पैरों ने हिलने से मना कर दिया।

कामिनी ने आज काली शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जिसके नीचे उसने ब्रा नहीं पहनी थी। रवि के हाथ धीरे से कामिनी की कमर के उस नंगे हिस्से पर रेंगने लगे जो साड़ी के झीने कपड़े से बाहर था।
रवि की उंगलियां ठंडी नहीं थीं, वे उत्तेजना से दहक रही थीं।
जैसे ही उसने कामिनी की मखमली और गोरी कमर को छुआ, कामिनी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उसकी जांघों के बीच का वह ‘काम-रस’ फिर से रिसने लगा।
वह रघु के ‘मेल और पसीने’ वाले स्वाद से अभी तक उबर नहीं पाई थी कि अब रवि की कोमल लेकिन मज़बूत मर्दानगी उसे अपनी आगोश में ले रही थी।

“र-रवि… रुको… कुछ… कुछ बात करनी है तुमसे,” कामिनी ने जैसे-तैसे अपनी सांसों पर काबू पाते हुए कहा।
रवि नहीं रुका। उसने अपनी नाक कामिनी के बालों में गड़ा दी और उसकी खुशबू लेते हुए फुसफुसाया, “हाँ बोलो ना आंटी… क्या बात करनी है?”

कामिनी की मनोदशा इस वक्त एक युद्ध क्षेत्र जैसी थी। उसका मन उसे धिक्कार रहा था— “यह लड़का तेरी सहेली का बेटा है, तेरे बेटे जैसा है।” लेकिन उसका शरीर, जो वर्षों से रमेश के हाथों तरसा था, आज पूरी तरह विद्रोह कर चुका था। उसे रवि का वह स्पर्श, उसकी वह बेबाकी और उसकी जवानी अपनी ओर खींच रही थी।
उसे डर था कि नीचे सुनयना या बंटी उनकी फुसफुसाहट सुन न लें। उसने रवि का हाथ अपनी कमर से हटाने की कोशिश की, जो अब उसकी नाभि के करीब पहुँच रहा था।

“तुम… तुम छत पर चलो… मैं आती हूँ 5 मिनट में। हमें बात करनी होगी,” कामिनी ने एक आख़िरी कोशिश करते हुए कहा।

रवि मुस्कुराया। उसने कामिनी के कंधे पर एक छोटा सा चुंबन लिया और पीछे हट गया। “ठीक है आंटी… इंतज़ार रहेगा।”

रवि के जाने के बाद कामिनी कुछ पल तक वहीं खड़ी हांफती रही। उसने अपने चेहरे पर पानी के छींटे मारे, पर आग अंदर लगी थी जिसे पानी नहीं बुझा सकता था।

5 मिनट बाद वह दबे पाँव रसोई से बाहर आई।
बरामदे में सन्नाटा था। बंटी अपने कमरे में जा चुका था और सुनयना भी कहीं नज़र नहीं आ रही थी। कामिनी को लगा शायद वह भी आराम कर रही होगी।
कामिनी अब दबे पाँव सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। हर कदम के साथ उसकी काली शिफॉन की साड़ी उसके बदन से रगड़ खा रही थी। उसे लग रहा था कि वह सीढ़ियाँ नहीं चढ़ रही, बल्कि अपनी मर्यादा की चिता की ओर बढ़ रही है। उसे रवि से माफ़ी मांगनी थी, उसे समझाना था…

कामिनी के कदम सीढ़ियों पर भारी पड़ रहे थे। हर पायदान चढ़ते हुए उसका दिल कह रहा था— “वापस लौट जा कामिनी, यह रास्ता तबाही की ओर जाता है।” लेकिन उसका प्यासा जिस्म उसे ऊपर खींच रहा था। उसे रवि से बात करनी थी… नहीं, उसे रवि को ‘महसूस’ करना था।
काली शिफॉन की साड़ी हवा में सरसरा रही थी। उसके बिना ब्रा वाले स्तनों के निप्पल ठंडक और उत्तेजना से पत्थर की तरह कड़े हो चुके थे।
वह छत पर पहुंची। रात का सन्नाटा पसरा हुआ था। ठंडी हवा के थपेड़े कामिनी कर जिस्म को जला रहे थे, हवा मे गीली मिट्टी की महक थी। कामिनी का दिल धाड़ धाड़ कर बज रहा था.

कामिनी की नज़रें अंधेरे में रवि को तलाश रही थीं।
“रवि…?” उसने धीरे से पुकारा।

कोई जवाब नहीं मिला।
तभी… छत के कोने में बने उस छोटे कमरे (जहाँ शाम को रमेश और शमशेर पी रहे थे) से एक अजीब सी आवाज़ आई।
चप… चप… सुड़प… फच… फचम…
आवाज़ गीली थी, लिसलिसी थी। जैसे कोई दलदल में चल रहा हो, या कोई जानवर पानी पी रहा हो।
कामिनी ठिठक गई।

यह आवाज़ जानी-पहचानी थी। आज दिन मे उसने ये आवाज़ सुनी थी वो भी खुद के मुँह से ह, जब वह रघु का लंड चूस रही थी, तब ठीक ऐसी ही आवाज़ें गूंज रही थीं।

“ये… ये यहाँ कौन है?”
एक अनजाना डर और उससे भी बड़ी जिज्ञासा (Curiosity) उसे उस कमरे की ओर खींच ले गई।
कमरे की खिड़की का एक पल्ला हल्का सा खुला था और पर्दा हवा में उड़ रहा था। अंदर की पीली रोशनी बाहर छनकर आ रही थी।
कामिनी ने अपनी सांसें रोक लीं। वह दबे पांव खिड़की के पास गई और अंदर झांका।
और जो नज़ारा उसने देखा, उसने उसकी रूह को झकझोर कर रख दिया। उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।

कमरे के अंदर…
बिस्तर पर रमेश बेसुध पड़ा था। शराब के नशे में वह दुनिया-जहान से बेखबर होकर मुंह खोले सो रहा था।

लेकिन असली ‘खेल’ बिस्तर के नीचे फर्श पर चल रहा था।
शमशेर खड़ा था। उसकी खाकी वर्दी की पैंट घुटनों तक नीचे लटकी हुई थी और बेल्ट ज़मीन चाट रही थी।
उसकी टांगें चौड़ी थीं और उनके बीच से उसका विशाल, काला और नसों वाला खूंखार लंड किसी मुगदर की तरह तना हुआ था।
और उस लंड के सामने…
सुनयना—रवि की वो ‘हाई-फाई’, मॉडर्न और अमीर माँ—ज़मीन पर उकड़ू (Squatting) बैठी थी।
उसकी लाल जालीदार साड़ी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त थी। उसका पल्लू गिरकर फ़र्श पर पड़ा था, जिससे उसके भारी-भरकम, गोरे और विशाल स्तन पूरी तरह से आज़ाद होकर लटक रहे थे।
वह किसी भूखी कुतिया की तरह शमशेर के लंड पर टूटी हुई थी।
“स्लर्रर्ररप…. गप… गप…. चप… चप…”
सुनयना के दोनों हाथ शमशेर की जांघों पर थे। उसने अपना मुंह पूरा खोल रखा था और शमशेर के उस मोटे मुसल्ल को जड़ तक निगल रही थी।
कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं।

यह वही औरत थी जो शाम को ‘मैनर्स’ और ‘स्टेटस’ की बातें कर रही थी?
यह वही औरत थी जिसके सामने कामिनी खुद को ‘गंवार’ और ‘छोटा’ महसूस कर रही थी?
आज वह औरत एक पुलिसवाले के लंड के सामने अपने घुटने टेककर, अपनी इज़्ज़त का जनाज़ा निकाल रही थी।
कामिनी ने देखा कि सुनयना की तकनीक (Technique) कितनी सधी हुई थी। एक लय मे इत्मीनान से शमशेर के बड़े भरी लंड को पूरा मुँह मे के कर बहार उगल दे रही थी,
वह कामिनी की तरह अनाड़ी नहीं थी।

सुनयना अपनी जीभ को शमशेर के लंड के सुपारी पर लट्टू की तरह घुमा रही थी। उसके गाल पिचक गए थे। वह इतनी शिद्दत से चूस रही थी कि शमशेर का पूरा लंड उसकी लार से चमक रहा था।
“आह्ह्ह… साली कुत्तिया… क्या चूसती है…” शमशेर ऊपर से गुर्रा रहा था।
वह अपने भारी हाथ से सुनयना के सिर को पकड़कर उसे अपने लंड पर ठूंस रहा था।

“ले… पूरा ले अंदर… गले तक उतार ले…”
सुनयना की आँखों से पानी बह रहा था (गैग रिफ्लेक्स की वजह से), उसका काजल फ़ैल गया था, लेकिन वह रुकी नहीं।
उसने अपनी गर्दन ऊपर उठाकर शमशेर को देखा।उसकी आँखों में एक अजीब सी ‘हवस’ और ‘समर्पण’ था।
उसने अपना मुंह लंड से हटाया।
“पॉप…” एक गीली आवाज़ आई। लंड और होंठों के बीच लार का एक लंबा तार खिंच गया।
सुनयना ने अपनी जीभ से उस लार को चाटा और शमशेर की तरफ एक कामुक मुस्कान फेंकी।

“कैसा लग रहा है शमशेर जी? मेरी ‘सेवा’ पसंद आ रही है?” सुनयना ने अपनी खनकती, वेश्याओं वाली अदा में पूछा।
“साली… तुझे देख के कौन कह सकता है तु बड़े अधिकारी की बीवी है, ऐसा तो आज तक किसी रंडी ने भी नहीं चूसा मेरा आअह्ह्ह… इस्स्स. स….”

शमशेर ने उसके लटकते हुए विशाल स्तनों को एक हाथ से कसकर दबोच लिया।
“आह्ह्ह… धीरे… दबा के मार दोगे क्या?” सुनयना मचल गई, लेकिन उसने शमशेर का हाथ नहीं हटाया।

“तुम्हारे जैसा मर्द मिले तो रंडी बनने में क्या बुराई है?” सुनयना ने बेशर्मी से कहा और दोबारा उस काले लंड को अपने मुंह में भर लिया।

“ग्लक… ग्लक… ग्लक…”
खिड़की के बाहर खड़ी कामिनी का जिस्म थर-थर कांप रहा था।
उसका गला सूख गया था, लेकिन उसकी जांघों के बीच बाढ़ आ गई थी।
यह नज़ारा उसके लिए सिर्फ़ ‘शॉकिंग’ नहीं था, यह उसके लिए एक ‘परमिशन’ (अनुमति) जैसा था।
कामिनी का अंतर्मन, जो अब तक उसे ‘पापी’ और ‘गिरा हुआ’ महसूस करा रहा था, अचानक शांत हो गया।

लेकिन कहीं ना कहीं ईर्ष्या की भावना भी पनपने लगी, ना जाने क्यों? कामिनी को महसूस हो था था जैसे शमशेर पर उसका हक़ है लेकिन सुनयना पहले बाजी मार गई.
औरत भी अजीब होती है, अभी जिस आदमी से भाग रही थी, अब उसे दूसरे के साथ देख जलन भी महसूस हो रही है.

कामिनी की नज़रें सुनयना के नंगे, लटकते हुए स्तनों पर थीं, जो उसके चूसने की रफ़्तार के साथ हिल रहे थे।
फिर उसकी नज़र अपने पति रमेश पर गई, जो पास ही बिस्तर पर मरे हुए जानवर की तरह पड़ा था।
कामिनी के अंदर नफरत और हवस का एक ज्वालामूखी फट पड़ा।
‘सब नंगे हैं यहाँ… सब हवसी हैं। सिर्फ़ मैं ही क्यों मर्यादा की बेड़ियाँ पहनकर मरूँ?’
उसकी काली साड़ी के नीचे, उसकी चूत फड़फड़ाने लगी।
सुनयना को लंड चूसते देख, कामिनी को अपने मुंह में रघु के लंड का वह कसैला स्वाद फिर से याद आ गया।
उसका हाथ अनजाने में अपनी साड़ी के ऊपर से ही अपनी चूत पर चला गया।
वह खिड़की की ग्रिल को दूसरे हाथ से कसकर पकड़े हुए, सुनयना का वो ‘नंगा नाच’ देखती रही और अपनी चूत को मसलती रही।
‘हाँ… चूस साली… और जोर से चूस…’ कामिनी मन ही मन सुनयना को बढ़ावा दे रही थी।
उसे लग रहा था कि सुनयना नहीं, वह खुद वहां बैठी है।
कामिनी भूल गई थी वो यहाँ क्या करने आई है? क्यों आई है?
वो जैसे अंदर चलते खूबसूरत नज़ारे मे खो गई थी, कामवासना ने उसे अपने आगोश मे जकड लिया था, उसकी उंगलियां अपनी जांघो के बीच कुछ टटोल रही थी.

तभी…
ईईस्स्स…… आअह्ह्ह….. एक कड़क मजबूत हाथ आ कर उसके कूल्हे पर जा चिपके. कामिनी के मुँह से आह निकली जैसे किसी गर्म तवे पर ठंडा पानी पड़ा हो.
कामिनी बुरी तरह चोंकि

“अंदर क्या देख रही हो आंटी?”
पीछे से एक गर्म सांस उसके कान से टकराई।
कामिनी का दिल उछलकर हलक में आ गया। वह चीखने ही वाली थी कि एक मजबूत हाथ ने उसका मुंह कसकर दबा दिया।
कामिनी की पीठ एक सख्त, चौड़ी छाती से जा टकराई।
उसे पीछे मुड़ने की ज़रूरत नहीं थी। वह उस खुशबू को पहचानती थी। वह उस स्पर्श को जानती थी।
रवि।
रवि उसके ठीक पीछे खड़ा था। वह भी खिड़की से अंदर अपनी माँ का ‘कांड’ देख रहा था।
और अब… वह कामिनी के साथ खड़ा था।
एक हाथ कामिनी के मुंह पर, और दूसरा हाथ… कामिनी की काली शिफॉन साड़ी के ऊपर से उसकी पेट और नाभि को टटोल रहा था।
********************

छत पर रात का अंधेरा और गहरा हो गया था, लेकिन उस अंधेरे कोने में जो उजाला हो रहा था, वह कामिनी की बरसों से बंद पड़ी आँखों को खोल रहा था।
कामिनी रवि की बाहों में जकड़ी हुई थी।

उसका शरीर उत्तेजना से तप रहा था, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी एक सवाल था, एक गहरा आश्चर्य। वह खिड़की से अंदर देख रही थी जहाँ सुनयना—रवि की अपनी सगी माँ—एक पराये मर्द के लंड को चूस रही थी। और रवि? वह उसके पीछे खड़ा होकर बड़े इत्मीनान से यह सब देख रहा था, जैसे कोई फिल्म चल रही हो।

कामिनी का मन द्वंद्व में फंसा था। ‘कैसा बेटा है ये? अपनी माँ को ऐसे देख रहा है और इसे शर्म नहीं आ रही?’ वह कुछ बोलना चाहती थी, पूछना चाहती थी, लेकिन रवि ने उसके मन की उथल-पुथल को बिन बोले ही पढ़ लिया।
उसने अपने होंठ कामिनी के कान से सटा दिए और बहुत ही धीमी, मखमली आवाज़ में फुसफुसाया—
“हैरान मत होइये आंटी… मेरी माँ सिर्फ ‘माँ’ नहीं है, वह एक औरत भी है। एक जिन्दा, हाड़-मांस की औरत।”
कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।

रवि के शब्द उसके संस्कारों की बेड़ियों पर हथौड़े की तरह बज रहे थे।
रवि ने अपनी बात जारी रखी, “मेरे पापा ने हमें सब दिया—दौलत, शोहरत, बड़ा घर, समाज में इज़्ज़त। लेकिन वो भूल गए कि एक औरत के जिस्म की भी अपनी भूख होती है। एक ऐसी ज़रूरत जिसे नोटों की गड्डियों से नहीं भरा जा सकता। मेरे पापा काम में इतना व्यस्त रहे कि माँ की रातों को ठंडा छोड़ दिया।”q
उसने कामिनी की कमर को कसकर भींचा।

“तो क्या करती मेरी माँ? घुट-घुट कर मर जाती? या अपनी जवानी को सूखने देती? नहीं आंटी… अपनी इच्छा पूरी करना कोई पाप नहीं है। यह तो कुदरत की मांग है। मैं बेटा हूँ, लेकिन मैं एक मर्द भी हूँ। मैं समझता हूँ कि जब एक औरत के शरीर मे आग लगी हो, तो उसे पानी से नहीं बुझाया जा सकता।”

रवि का यह ‘काम-ज्ञान’ कामिनी के कानों में पिघले हुए शहद की तरह उतर रहा था। उसके दिल का बोझ, जो ‘पाप’ के नाम पर बरसों से जमा था, पिघलने लगा।

उसके दिमाग़ विचारों का तूफान कोंधने लगा,— ‘रमेश ने मुझे क्या दिया? सिर्फ़ रसोड़े का धुआं और बिस्तर पर अपमान। मार-पीट और गालियां। अगर सुनयना अपने हक़ के लिए बाहर जा सकती है, तो मैं क्यों घुट रही हूँ?”

रवि ने कामिनी के कान की लौ को अपने दांतों से हल्का सा काटा।
“देखिये आंटी… देखिये मेरी माँ को। कितना खुलकर जी रही है वो। वो शमशेर अंकल का लंड नहीं चूस रही, वो अपनी ज़िंदगी का रस पी रही है। क्या आपमें इतनी हिम्मत नहीं है? क्या आप अपनी खुशियों का गला घोंटती रहेंगी?”

रवि के इन शब्दों ने कामिनी को ललकार दिया, उसकी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी।
अंदर कमरे में दृश्य बदल रहा था।
सुनयना ने अपना मुंह शमशेर के लंड से हटाया। उसका चेहरा लाल था, आँखें चढ़ी हुई थीं।

“आह्ह्ह… शमशेर जी… अब रहा नहीं जाता,” सुनयना ने मचलते हुए कहा, “जल्दी कीजिये… टाइम कम है, कोई आ जाएगा।”
उसने तुरंत अपनी साड़ी को ऊपर समेटा और बिस्तर के किनारे को पकड़कर झुक गई।
उसने अपनी भारी-भरकम, गोरी और विशाल गांड को शमशेर की तरफ कर दिया।
उसकी कमर में इतना गहरा लचक (Arch) था कि उसकी गांड के दोनों पट्टे किसी पहाड़ की तरह अलग-अलग और तने हुए दिख रहे थे।
शमशेर, जो अब तक खड़ा था, जानवर की तरह गुर्राया।
“साली घोड़ी बन गई… रुक आज तेरी गर्मी निकालता हूँ।”
शमशेर ने अपनी पैंट को पूरी तरह उतार फेंका। बड़े ही तसल्ली बक्श तरीके से सुनयना की गोरी बड़ी गांड पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे कोई कसाई बकरी काटने से पहले प्यार कर रहा हो,.
आअह्ह्ह…. शमशेर जी…. सुनयना सिसक उठी, उसे अब अपनी चुत मे लंड चाहिए थे, उसने एक बार अपनी गांड को हिला स्वकृति दे दी.

शमशेर ने थूक लगाकर अपना काला मुसल्ल गीला किया और निशाना साधा।
पच… फच…
एक ही झटके में शमशेर ने अपना विशाल लंड सुनयना की चूत की गहराई में उतार दिया।
“आआईईईईईई………… माँअअअअ….” सुनयना ने तकिये में मुंह देकर चीख दबा ली।
शमशेर ने रहम नहीं किया। वह मशीन की तरह धक्के मारने लगा।
धप… धप… धप…
हर धक्के के साथ सुनयना की भारी गांड और उसके लटकते हुए विशाल स्तन जेली की तरह हिल रहे थे। शमशेर उसके जिस्म को मसल रहा था, उसके नितम्बों पर चांटे मार रहा था। सुनयना दर्द और मज़े में पागल होकर “और ज़ोर से… और ज़ोर से…” की रट लगाए हुए थी।

बाहर खड़ी कामिनी की हालत पतली हो गई थी।
उसकी चूत से काम-रस की ऐसी बाढ़ आई थी कि उसकी जांघों पर चिपचिपाहट महसूस हो रही थी।
रवि समझ गया कि लोहा गरम है। अब हथौड़ा मारने का वक्त आ गया था।
रवि के हाथ, जो अब तक कामिनी के पेट पर थे, नीचे फिसलते हुए उसकी साड़ी के पल्लू तक पहुंचे।
उसने धीरे-धीरे कामिनी की काली शिफॉन साड़ी को ऊपर उठाना शुरू किया।
कामिनी ने कोई विरोध नहीं किया। वह खिड़की की ग्रिल को कसकर पकड़े हुए अंदर सुनयना की चुत मे फिसलते मोटे लंड को’ देख रही थी, और रवि उसे बाहर नंगा कर रहा था।
रवि ने साड़ी और पेटीकोट को एक साथ समेटकर ऊपर किया।
पहले कामिनी की सुडौल पिंडलियां नंगी हुईं, फिर उसकी मलाईदार जांघें, और अंत में… उसकी पूरी गांड हवा में आज़ाद हो गई।

रवि ने कपड़े को उसकी कमर तक समेट दिया।
कामिनी खिड़की पर झुकी हुई थी, जिससे उसकी पीठ में एक गहरा मोड़ आ गया था और उसकी भारी, चिकनी गांड पूरी तरह बाहर को निकल आई थी।
रात की ठंडी हवा का एक झोंका आया और सीधे कामिनी की नंगी, गरम गांड से टकराया।
“सीईईईई…..” कामिनी सिहर उठी।
उसके बदन के रोएं खड़े हो गए। एक अजीब सी आज़ादी का अहसास हुआ—भीगी चूत, खुली गांड और ठंडी हवा।
रवि की नज़रें उस नज़ारे पर जम गईं।
कामिनी की गांड… दो बड़े, गोल और एकदम चिकने मटके जैसी थी। उस पर एक भी दाग नहीं था। गोरी, बेदाग और मांसल।
रवि ने अपना हाथ बढ़ाया।
उसने अपनी उंगलियों को कामिनी की चूत की दरार में डाला।
वहाँ बाढ़ आई हुई थी।
“उफ्फ्फ आंटी… आप तो पूरा तालाब बहा रही हैं,” रवि ने कामिनी के कान के पास फुसफुसाया।
उसने अपनी बीच की उंगली को कामिनी की गीली फांकों में फिसला दिया।
पच…
“आह्ह्ह…. र-रवि….” कामिनी की गर्दन पीछे मुड़ गई।
रवि की उंगली अंदर-बाहर होने लगी। वह बहुत प्यार से, बहुत कोमलता से कर रहा था।
रघु की तरह खुरदरापन नहीं था, शमशेर की तरह वहशियत नहीं थी। रवि का स्पर्श मखमल जैसा था।
वह अपनी उंगली से कामिनी के ‘दाने’ (Clitoris) को गोल-गोल सहला रहा था।

कामिनी को लगा जैसे वह हवा में उड़ रही है।
तभी रवि ने अपना हाथ हटाया।
कामिनी को लगा शायद वह रुक गया। लेकिन अगले ही पल, उसे अपनी गांड पर कुछ गीला और गरम महसूस हुआ।
रवि उसके पीछे घुटनों के बल बैठ गया था।
रवि ने कामिनी की दोनों जांघों को पकड़कर थोड़ा और चौड़ा कर दिया। अब कामिनी की रसीली चूत और उसकी गांड का तंग छेद रवि के चेहरे के ठीक सामने था।
रवि ने एक गहरी सांस ली, कामिनी की खुशबू को अपने अंदर भरा, और फिर…
उसने अपना मुंह कामिनी की चूत में गाड़ दिया।
स्लर्रर्रप….
“हायययययय राम….. उफ्फ्फ्फ….” कामिनी के मुंह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली।
रवि की जीभ किसी कलाकार की तरह चल रही थी।
उसने पहले कामिनी की चूत के बाहरी होठों को चाटा, सारा रस पिया। फिर उसने अपनी जीभ को नुकीला करके योनि के अंदर डाल दिया।
वह अंदर की दीवारों को चाट रहा था, रस को चूस रहा था।
कामिनी की टांगें कांपने लगीं। उसे खिड़की की ग्रिल का सहारा लेना पड़ा वरना वह गिर जाती।
अंदर शमशेर “धप-धप” करके सुनयना को चोद रहा था, और बाहर रवि “चप-चप” करके कामिनी को चाट रहा था।
रवि ने अपना खेल बदला।
उसकी जीभ नीचे फिसली… चूत से होती हुई, पेरिनयम (Perineum) को पार करती हुई… सीधे कामिनी की गांड के छेद (Anus) पर।
जब रवि की गरम जीभ ने कामिनी के उस ‘वर्जित’ छेद को छुआ, तो कामिनी को लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी में बिजली दौड़ गई हो।
“नहीं… रवि… वहां नहीं… गंदा है…” कामिनी ने कमजोर विरोध किया।
लेकिन रवि नहीं रुका।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी की गांड के पट्टों को फैला दिया (Spread) और अपनी जीभ को उस तंग, गुलाबी छेद पर घुमाना शुरू कर दिया (Rimming)।
लप… लप… लपाक…
रवि कामिनी की गांड को ऐसे चाट रहा था जैसे वह दुनिया की सबसे स्वादिष्ट आइसक्रीम हो।
वह अपनी जीभ की नोक से गांड के छेद को कुरेद रहा था।
कामिनी के लिए यह सुख असहनीय था। उसने आज तक अपनी गांड को सिर्फ शौच के लिए इस्तेमाल किया था। उसे पता ही नहीं था कि वहां भी इतना सुख छुपा हो सकता है।
“आह्ह्ह…. र-रवि…. मार डालोगे…. उफ्फ्फ…. कितना प्यार करते हो…. आह्ह्ह…”
कामिनी का सिर हवा में झूल रहा था।
इस चाटने में एक अजीब सा प्यार और कोमलता थी।

रवि कोई जानवर नहीं था। वह एक पुजारी की तरह कामिनी के जिस्म की पूजा कर रहा था।
वह कभी उसकी गांड के छेद को चूमता, कभी उसकी चूत के दाने को चूसता।
कामिनी को लग रहा था जैसे वह बादलों पर है।
ठंडी हवा उसकी नंगी कमर और गांड पर लग रही थी, और नीचे रवि का गरम मुंह आग लगा रहा था।

अंदर शमशेर की “आह्ह्ह” और सुनयना की “उईईई माँ” की आवाज़ें आ रही थीं।
बाहर रवि की “सुड़प-सुड़प” और कामिनी की “सिसकियाँ”।
कामिनी अब पूरी तरह से रवि के वश में थी।
उसका दिमाग, उसके संस्कार, उसकी शर्म—सब उस छत पर हवा में विलीन हो चुके थे।
उसे सिर्फ़ एक चीज़ महसूस हो रही थी—रवि की जीभ और अपनी आज़ादी।
“हाँ रवि… और अंदर… मेरी जान… चाट ले मुझे… मैं तेरी हूँ… आअह्ह्ह…”
कामिनी अपनी गांड को पीछे धकेल रही थी, रवि के मुंह पर रगड़ रही थी।
वह भूल गई थी कि वह छत पर है, भूल गई थी कि अंदर उसका पति है।
आज वह सिर्फ़ एक औरत थी—तृप्त, कामुक और आज़ाद।
उसका रस बहकर रवि की ठुड्डी पर गिर रहा था, और रवि उसे अमृत समझकर पी रहा था।

हवा में काम-रस, पसीने और हवस की गंध घुली हुई थी।

रवि कामिनी के पीछे घुटनों के बल बैठा था, और उसका चेहरा कामिनी की टांगों के बीच पूरी तरह धंसा हुआ था।
“सुड़प… सुड़प… चप… चप…”
रवि की जीभ किसी भूखे बछड़े की तरह कामिनी की चूत को पी रही थी। वह सिर्फ़ चाट नहीं रहा था, बल्कि अपनी जीभ को फावड़े की तरह इस्तेमाल कर रहा था, कामिनी की चूत की गहराई से रस निकाल रहा था।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी की भारी गांड के पट्टों को पकड़कर चौड़ा कर रखा था, ताकि उसकी चूत का गुलाबी, सूजा हुआ दाना (Clitoris) पूरी तरह उभर कर सामने आ जाए।
रवि ने अपने होंठों को उस ‘दाने’ के चारों तरफ कस लिया। उसने वैक्यूम बनाया और…
“सुउउउड़प…. !!”
उसने उस संवेदनशील दाने को अपने मुंह में भरकर जोर से चूस लिया।
“आह्ह्ह्ह्ह्ह……. र-रवि…. उउउउफ्फ्फ….. नोच ले…. खा जा मुझे…. आह्ह्ह….”
कामिनी का सिर पीछे की तरफ झूल गया। उसकी आँखों की पुतलियाँ पलट गईं।
रवि की जीभ उस दाने पर बिजली के झटके दे रही थी।
कामिनी के हाथ अब ग्रिल पर नहीं थे। वे अपने ही जिस्म पर रेंग रहे थे।
उसने अपने दोनों हाथों से अपने भारी, लटकते हुए स्तनों को साड़ी के ऊपर से ही दबोच लिया।
वह पागलों की तरह अपने स्तनों को मसल रही थी, भींच रही थी। अपनी उंगलियों को ब्लाउज के अंदर घुसाकर अपने तने हुए, कड़क निप्पलों को मरोड़ रही थी।

उसे दर्द चाहिए था। उसे वो वहशियत चाहिए थी जो अंदर चल रही थी।
खिड़की के उस पार, सुनयना की हालत और भी खराब थी।
शमशेर उस पर पूरी तरह हावी हो चुका था। वह सुनयना के पीछे खड़ा था और सुनयना बिस्तर के किनारे पर झुकी हुई थी।
“धप… धप… धप… फच… फचम…”
शमशेर का विशाल काला लंड किसी पिस्टन की तरह सुनयना की गीली चूत में अंदर-बाहर हो रहा था।
वह रहम नहीं कर रहा था। वह पूरी ताकत से जड़ तक ठूस रहा था।
बिस्तर “चर्रर्र… चर्रर्र…” करके चीख रहा था।
हर धक्के के साथ शमशेर के भारी, लटकते हुए टट्टे (Balls) सुनयना की गोरी, थुलथुली गांड और जांघों से टकरा रहे थे।
“थप… थप… थप…”
मांस से मांस के टकराने की आवाज़ें गूंज रही थीं।
सुनयना का बाल शमशेर की मुट्ठी में था। वह उसका सिर पीछे खींच रहा था।

“आअह्ह्ह… शमशेर जी… फाड़ दो…. उफ्फ्फ…. मेरी चूत फाड़ दो…. आअह्ह्ह….” सुनयना मज़े और दर्द में चीख रही थी। वह अपनी गांड को खुद पीछे धकेल रही थी (Pushing back) ताकि लंड और गहराई तक जाए।

बाहर खड़ी कामिनी यह सब देख रही थी।
रवि की कोमल जीभ उसे स्वर्ग का सुख दे रही थी, लेकिन उसकी आँखों में ‘नर्क’ की आग थी।
उसे सुनयना से भयानक जलन हो रही थी।
‘साली कुत्तिया… कैसे मज़े ले रही है। कैसे उसका पति वही बिस्तर पर खर्राटे भर रहा है, और शमशेर उसे जानवरों की तरह चोद रहा है।’

कामिनी को रवि का प्यार कम लग रहा था। उसे शमशेर जैसी वहशियत चाहिए थी।
उसका मन कर रहा था कि कोई उसे भी ऐसे ही बालों से पकड़े, उसे भी ऐसे ही घोड़ी बनाए और उसकी चूत को फाड़कर रख दे।
“रवि… और जोर से… मुझे चूस …. चाट अंदर तक जोर से चाट .” कामिनी फुसफुसा रही थी, अपने स्तनों को नोचते हुए।

अंदर शमशेर की रफ़्तार अब तूफानी हो गई थी।
“फच-फच-फच-फच…”
सुनयना का जिस्म कांपने लगा। उसके पैर मुड़ गए।
“आअह्ह्ह…. मैं गई…. शमशेर जी…. निकालो मत. और जोर से अंदर और अंदर.. आअह्ह्ह……. मैं गई…. आआआआईईईईईई…. माँअअअअअ….”
सुनयना की एक लंबी, तीखी चीख निकली। उसका शरीर अकड़ गया। वह बुरी तरह से झड़ रही थी।
उस चीख ने बाहर बारूद में चिंगारी का काम किया।
जैसे ही रवि ने अपनी माँ की वह कामुक चीख सुनी, उसका संयम टूट गया।
उसने अपना मुंह कामिनी की चूत पर लगाए रखा और अपने दाहिने हाथ की दो उंगलियाँ (Middle & Ring finger) कामिनी की योनि के मुहाने पर जमाईं।
और एक ही झटके में…
पच…
उसने दोनों उंगलियाँ कामिनी की गीली, फड़फड़ाती चूत में जड़ तक घुसा दीं और उन्हें अंदर टेढ़ा करके (Hook motion) तेज़ी से चलाने लगा।
जीभ की चाट और उंगलियों का वो गहरा घर्षण… कामिनी बर्दाश्त नहीं कर पाई।
“आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह………. !!”
कामिनी की रीढ़ की हड्डी में विस्फोट हुआ।
उसकी चूत के अंदर की मांसपेशियों ने रवि की उंगलियों को जकड़ लिया।
उसका पेट अंदर की तरफ पिचक गया।
और फिर…
सर्रर्रर्रर्र………… पिच…. पिच….
कामिनी की चूत से काम-रस का एक फव्वारा (Squirt) छूट पड़ा।
वह इतना तेज़ था कि उसने रवि के पूरे चेहरे को नहला दिया।
रवि की आँखें, नाक, गाल… सब कामिनी के उस गरम, नमकीन पानी से भीग गए।
रवि ने मुंह नहीं हटाया। वह उस बाढ़ को पीता रहा, चाटता रहा।

उसी पल, अंदर शमशेर भी अपनी हद पार कर गया।
सुनयना के झड़ने के साथ ही शमशेर ने अपना लंड बाहर खींचा।
वहशीपन में उसने अपना लंड सुनयना की नंगी, कांपती हुई गांड के ऊपर हिलाया।
पिच… पिच…
गाढ़ा, सफ़ेद वीर्य सुनयना के कूल्हों पर, उसकी पीठ पर और बिस्तर की चादर पर गिरने लगा।
शमशेर “हम्म्म्म्म…. आह्ह्ह…” करके गुर्राया और वहीं सुनयना के पास ढह गया।

सब कुछ शांत हो गया।
बाहर कामिनी की हालत पतली हो चुकी थी।
उस भयानक ऑर्गेज्म (Orgasm) ने उसके पैरों की जान निकाल ली थी।
उसकी जांघें कांपना बंद नहीं कर रही थीं। घुटने मुड़ गए।
वह खुद को संभाल नहीं पाई।
धड़ाम…
वह वहीं छत के गीले फर्श पर, रवि के बगल में गिर पड़ी।
उसकी साड़ी कमर तक उठी हुई थी। उसकी नंगी, गीली चूत आसमान की तरफ खुली थी, जिससे अभी भी रस की आखिरी बूंदें टपक रही थीं।
वह बेसुध होकर आसमान को घूर रही थी। छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।

मुंह से सिर्फ़ “हंफ… हंफ…” की आवाज़ आ रही थी।
रवि, जिसका चेहरा कामिनी के पानी से भीगा हुआ था, उसके बगल में बैठा हांफ रहा था। उसने अपनी जीभ से अपने होंठों पर लगा कामिनी का रस चाटा और एक विजयी मुस्कान दी।
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छत के उस तूफ़ान के बाद, कामिनी और रवि एक-दूसरे से नज़रें चुराते हुए, कपड़े ठीक करते हुए नीचे हॉल में आ गए। कामिनी ने जल्दी से बाथरूम में जाकर अपना चेहरा धोया और बालों को ठीक किया, ताकि कोई शक न कर सके।
दीवार घड़ी पर 11 बज रहे थे।
हॉल में सन्नाटा था, लेकिन कामिनी के अंदर शोर मचा हुआ था। वह अभी भी अपनी जांघों के बीच रवि की उंगलियों और जीभ का स्पर्श महसूस कर रही थी।
थोड़ी ही देर बाद सीढ़ियों पर आहट हुई।
सुनयना नीचे उतर रही थी।

उसकी चाल बदल चुकी थी। जो औरत शाम को किसी नर्तकी की तरह इठलाती हुई आई थी, अब वह सीढ़ियों की रेलिंग पकड़कर, पैर फैलाकर (waddling) धीरे-धीरे उतर रही थी।
उसके चलने का ढंग बता रहा था कि उसकी दोनों टांगों के बीच ‘कुछ’ बहुत भारी गुज़रा है। उसकी गांड के दोनों पट्टों में शायद अभी भी शमशेर के धक्कों का दर्द और वो मीठी टीस बाकी थी।

लेकिन उसका चेहरा?
चेहरा ऐसा खिला हुआ था जैसे अमावस की रात में पूनम का चाँद निकल आया हो। उसके गालों पर एक प्राकृतिक लाली थी, बाल थोड़े बिखरे थे जिन्हें उसने समेटने की कोशिश की थी, और होंठ थोड़े सूजे हुए लग रहे थे (शमशेर के लंड को चूसने की वजह से)।

उसकी आँखों में एक गहरी संतुष्टि (Satisfaction) थी। कोई माई का लाल उसे देखकर यह नहीं कह सकता था कि यह औरत अभी ऊपर एक पुलिसवाले के नीचे ‘घोड़ी’ बनकर और उसका लंड चूसकर आ रही है। यह एक ‘तृप्त औरत’ का नूर था।

सुनयना नीचे आई और अपना पर्स उठाया।
“अच्छा कामिनी जी… रात बहुत हो गई है। अब हमें चलना चाहिए,” सुनयना ने अपनी उसी खनकती, लेकिन अब थोड़ी भारी और कामुक आवाज़ में कहा।

उसने ऊपर की तरफ एक नज़र डाली (जहाँ शमशेर और रमेश थे) और एक रहस्यमयी मुस्कान दी।
“आप और रमेश जी आना कभी हमारे घर… वैसे आज का ‘खाना’ (डिनर) बहुत अच्छा था। मज़ा आ गया।”
सुनयना ने ‘खाना’ शब्द पर इतना जोर दिया और अपनी जीभ को होंठों पर ऐसे फेरा कि कामिनी सब समझ गई। वह खाने की नहीं, शमशेर के ‘लंड’ की तारीफ कर रही थी।

“थैंक यू सुनयना जी… ज़रूर आएंगे,” कामिनी ने एक औपचारिक और फीकी मुस्कान दी। अंदर ही अंदर उसे सुनयना की इस बेशर्मी और किस्मत पर जलन हो रही थी।
“चलें रवि?” सुनयना ने रवि के कंधे पर हाथ रखा।
“हाँ माँ… चलो,” रवि ने कहा।
जाते-जाते रवि ने दरवाजे से मुड़कर कामिनी को देखा। उसकी आँखों में एक चमक थी, एक आश्वासन था— ‘फिक्र मत करो आंटी, आपका और मेरा राज़, राज़ ही रहेगा।’

कामिनी ने हल्की सी पलकें झपका कर उसे विदा किया।
सुनयना और रवि गार्डन पार करते हुए मुख्य गेट की तरफ बढ़े।
रात की हवा में ठंडक थी। सुनयना अपनी साड़ी का पल्लू कसते हुए गेट तक पहुंची। रवि ने आगे बढ़कर गेट का सिटकनी खोली।
चरररर…. चररररर…
भारी लोहे का दरवाज़ा चीखते हुए खुला।
और तभी…
सामने से शराब की एक तेज़ और सड़ी हुई बदबू का भभका आया।
“हिच…. हिचह्ह्ह्हह्म…..”
अंधेरे में से एक साया लड़खड़ाता हुआ गेट के बीचो-बीच आ गया।
यह रघु था।
वह पूरी तरह नशे में टल्ली था। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे, लुंगी ढीली थी और वह झूम रहा था।
सुनयना, जो महंगे इत्र में नहाई हुई थी, इस अचानक आई बदबू से तिलमिला गई।

“छी…!” सुनयना ने तुरंत अपनी नाक पर रुमाल रख लिया और पीछे हट गई। “यह कौन है? कितनी गंदी बदबू आ रही है।”
रघु को कोई होश नहीं था। वह अपनी धुन में था।
“थोड़ी सी जो पी ली है…. चोरी तो नहीं की है…. हिच… हिचम्म..”
वह गाना गाते हुए, सुनयना से लगभग टकराते-टकराते बचा और अंदर घुस गया।

रवि ने अपनी माँ को सहारा दिया।
“कोई नहीं माँ… यह यहाँ का नौकर है, रघु। रमेश अंकल ने दया करके इसे स्टोर रूम में रहने की जगह दी हुई है। शराबी है बेचारा।”
सुनयना ने घृणा से रघु को देखा।

“उफ्फ… कैसे लोग हैं। चलो रवि,” सुनयना ने तेज़ कदमों से अपनी कार की तरफ रुख किया। उसे अपनी ‘रईस’ दुनिया में वापस लौटना था, जहाँ गंदगी छुपायी जाती है, दिखाई नहीं जाती।

“अच्छा कामिनी जी… बाय!”
कार स्टार्ट हुई और रवि और सुनयना चले गए।
बँगले में अब गहरा सन्नाटा छा गया था।
कामिनी दरवाज़े पर खड़ी थी।
उसकी नज़रें उस जाते हुए शराबी, रघु पर टिकी थीं।
रघु लड़खड़ाता हुआ, गिरता-पड़ता गार्डन के अंधेरे में बने स्टोर रूम की तरफ जा रहा था।

उसका गठीला, काला शरीर गार्डन की पिली रोशनी में चमक रहा था।
कामिनी ने अभी-अभी रवि के साथ चरम सुख (Orgasm) पाया था। रवि का स्पर्श कोमल था, प्रेमी जैसा था। उसने उसे ‘देवी’ की तरह पूजा था।
लेकिन….

रघु को जाते देख, कामिनी की चूत में एक अजीब सी कुलबुलाहट होने लगी।
उसे महसूस हुआ कि रवि के प्यार में ‘मिठास’ तो थी, लेकिन ‘नमक’ कम था।

उसकी चूत रवि की उंगलियों और जीभ से शांत तो हुई थी, लेकिन उसकी आत्मा?
उसकी आत्मा को शायद उस ‘दर्द’ की तलाश थी जो उसे रमेश देता था। रमेश की मार, उसकी गालियां, उसका जानवरों जैसा बर्ताव—कामिनी का शरीर अनजाने में उस ‘कठोरता’ (Roughness) का आदी हो चुका था।

रवि ‘मक्खन’ था, लेकिन कामिनी को अब ‘खुरदरे पत्थर’ की रगड़ चाहिए थी।
उसे वहशीपन चाहिए था। उसे वो चाहिए था जो शमशेर ने सुनयना को दिया था—बालों से पकड़ना, गालियां देना और जानवर की तरह चोदना।
और रघु?
रघु वही ‘जानवर’ था।
उसकी गंदी लुंगी, उसकी पसीने और शराब वाली बदबू, उसका काला लंड और उसका वो अनगढ़पन…
कामिनी को रवि की कोमलता के बाद अब रघु की ‘गंदगी’ आकर्षित कर रही थी।

रघु स्टोर रूम के अंधेरे में गायब हो गया।
“हिचहह…. हिचहहहह….”
दूर से उसकी हिचकियों की आवाज़ आ रही थी।
कामिनी ने अपनी जांघों को आपस में भींचा। वहाँ अभी भी गीलापन था।
उसने एक गहरी सांस ली, जिसमें रात की रानी की खुशबू और रघु की छोड़ी हुई शराब की बदबू मिली हुई थी।
“शायद अभी रात बाकी है…”
उसने मैंने लोहे का दरवाज़ा बंद किया। और गार्डन पार करती मुख्य घर मे चली गई.

रात का सन्नाटा गहरा चुका था। घर का मुख्य दरवाज़ा भेड़का कर, कामिनी ने अपने कांपते कदमों को स्टोर रूम की तरफ बढ़ाया। उसके हाथों में स्टील की थाली थी, जिसमें रघु के लिए खाना था। लेकिन उसकी चाल बता रही थी कि वह सिर्फ़ खाना देने नहीं, बल्कि अपनी उस “मीठी खुजली” का इलाज करवाने जा रही है जो रवि के अधूरे स्पर्श ने छोड़ दी थी।

स्टोर रूम का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। अंदर पीले बल्ब की मद्धम और मैली रोशनी जल रही थी।
कामिनी अंदर दाखिल हुई।

हवा में देशी शराब, बीड़ी के धुएं और सीलन की वही चिर-परिचित गंध थी। खटिया पर रघु बेसुध पड़ा था। उसका मुंह खुला था और वह भारी सांसें ले रहा था। उसकी लुंगी अभी भी बेतरतीब थी, और उसका काला बदन पसीने में चमक रहा था।

कामिनी खटिया के पास खड़ी हो गई।
उसकी जांघों के बीच अभी भी गीलापन था। वह रघु को देखती रही।
‘ये तो सोया पड़ा है… जानवर कहीं का,” हालांकि कामिनी के चेहरे पे एक कुटिल मुस्कान भी आ गई, क्यूंकि वो उस रात की तरह रघु के मुँह पर बैठ कर अपनी मनमानी कर सकती थी.
लेकिन दूसरे ही पल, उसके अंदर की संस्कारी घरेलु औरत ने उसे दुत्कारा
“तु तो फिर आ गई एक शराबी का फायदा उठाने”

दुविधा ने उसके पैर जकड़ लिए।
“‘नहीं… मुझे चले जाना चाहिए। यह पागलपन है।, मै सुनयना नहीं हूँ, मै एक घरेलु औरत हूँ”

उसने थाली को पास पड़े स्टूल पर रखा और वापस मुड़ने लगी।
लेकिन जैसे ही वह पलटी…
पीछे से एक भारी, नशे में डूबी और लड़खड़ाती आवाज़ आई।
“आ गई तू सुगना…?”
कामिनी के कदम वहीं जम गए।

“मैं जानता था तू आएगी… खाना लाई है मेरे लिए?”
कामिनी का दिल गले में आ गया। वह धीरे से पलटी।
रघु ने अपनी लाल, नशीली आँखें खोल दी थीं। वह कामिनी को नहीं देख रहा था, वह नशे के धुंधलके में अपनी मरी हुई बीवी ‘सुगना’ को देख रहा था।

कामिनी को एक अजीब सी राहत महसूस हुई, जैसे किसी गवाह से भरी अदलात मे उसे पहचानने से मना कर दिया हो.

“हां… खा लो…” कामिनी ने धीरे से कहा।
लेकिन रघु को खाना नहीं चाहिए था।
अचानक, रघु का हाथ बिजली की रफ़्तार से आगे बढ़ा।
उसने कामिनी की कलाई को अपने लोहे जैसे सख्त पंजों में जकड़ लिया।

“ह्ह्क…आअह्ह्ह…” कामिनी की चीख निकलते-निकलते रह गई।
रघु की पकड़ में वहशियत थी।
“कहाँ जा रही है? मुझे छोड़ के मत जा…”
रघु ने एक झटका दिया।
कामिनी संभल नहीं पाई।
उसका संतुलन बिगड़ा। वह रघु के ऊपर गिरने ही वाली थी कि रघु ने दूसरा हाथ बढ़ाकर कामिनी की साड़ी का पल्लू पकड़ लिया।

चर्रर्रर्रर्र………. !
सन्नाटे में कपड़ा फटने की तीखी आवाज़ गूंज गई।
रघु ने इतनी जोर से खींचा था कि कामिनी की काली शिफॉन की साड़ी उसके बदन से उधड़ती चली गई। पल्लू कंधे से हटकर कमर तक आ गिरा।

“आह्ह्ह… रघु…”
कामिनी अब सिर्फ़ अपने टाइट ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी थी। पीली रोशनी में उसका गोरा, भरा हुआ जिस्म सोने की तरह दमक रहा था। उसके ब्लाउज से बाहर छलकते हुए स्तन और गहरी नाभि रघु की आँखों के सामने थे।

“कितनी सुंदर लग रही है तू सुगना… हिच… हिचह्ह्हब….” रघु की आँखों में हवस की आग जल उठी।
“आजा मेरे पास…”
उसने कामिनी की नंगी कमर को पकड़ा और एक ही झटके में उसे खटिया पर खींच लिया।
धड़ाम!
खटिया चरमरा उठी। कामिनी सीधे रघु के ऊपर आ गिरी।
उसका नरम, भारी जिस्म रघु के सख्त, पसीने से भीगे सीने से टकराया।
इससे पहले कि कामिनी संभल पाती, रघु ने उसे दबोच लिया।
उसने कामिनी को अपने नीचे दबा लिया (Overpowered) और उसके ऊपर चढ़ बैठा।

रघु के दोनों हाथ कामिनी के भारी स्तनों पर कस गए।
ब्लाउज के कपड़े के ऊपर से ही उसने कामिनी के वक्षों को किसी आटा गूंथने वाले की तरह भींचना शुरू कर दिया।

“उफ्फ्फ्फ…. आअह्ह्ह…. मर गई….”
कामिनी दर्द से बिलबिला उठी।
रवि का स्पर्श कोमल था, लेकिन रघु? रघु कसाई था।
वह स्तनों को मसल नहीं रहा था, उन्हें कुचल रहा था। उसकी खुरदरी उंगलियां कामिनी के कोमल मांस में धंस रही थीं।
“दबाने दे… बहुत दिन हो गए… हिच… तेरे ये आम नहीं चूसे…”
रघु नशे में बड़बड़ा रहा था और पागलों की तरह कामिनी के स्तनों को मरोड़ रहा था।
कामिनी को दर्द हो रहा था, लेकिन यह दर्द उसकी चूत में आग लगा रहा था। उसे यही चाहिए था—यह जानवरपन, यह अधिकार, यह वहशियत।

तभी रघु ने अपना चेहरा नीचे झुकाया।
कामिनी की नाक में सड़ी हुई शराब, बीड़ी के धुएं और बासी पसीने की एक भयंकर बदबू का भभका लगा।
उसे उबकाई आने लगी। उसने अपना चेहरा फेरने की कोशिश की।

“नहीं… हटो… बदबू आ रही है…” कामिनी का ‘इज़्ज़तदार’ मन जागने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन रघु सुनने के मूड में नहीं था।
उसने अपने एक हाथ से कामिनी के जबड़े को कसकर पकड़ लिया और उसका चेहरा अपनी तरफ सीधा कर दिया।
और फिर…
उसने अपने मोटे, काले और बदबूदार होंठ कामिनी के गुलाबी, मखमली होंठों पर थोप दिए।
गप… म्च्च्च…. स्लर्रर्रप….
यह कोई फिल्मी किस नहीं था। यह एक हमला था।
रघु उसके मुंह को चूस नहीं रहा था, वह उसे खा रहा था।
कामिनी घुट रही थी। वह छटपटा रही थी। वह रघु की छाती पर मुक्के मार रही थी।

“मम्मम्म…. छोड़… उम्मम्म्म…”
रघु की जीभ—मोटी, खुरदरी और शराब से सनी हुई—जबरदस्ती कामिनी के बंद होंठों को खोलकर अंदर घुस गई।
कामिनी के मुंह में रघु की लार का स्वाद फैल गया।
कड़वा। कसैला। गंदा।
शराब और थूक का वह मिश्रण कामिनी के हलक में उतरने लगा।
कामिनी को लगा वह उल्टी कर देगी।

लेकिन…
जैसे ही वह शराब मिली लार (Saliva) उसके पेट में गई… एक चमत्कार हुआ।
उस कड़वाहट में एक अजीब सा नशा था।
वह ‘गंदगी’ कामिनी के दिमाग पर चढ़ने लगी, एक नशा सा छाने लगा,
रघु उसे इतनी बेदर्दी से चूम रहा था, उसके बालों को नोच रहा था, उसके स्तनों को मसल रहा था कि कामिनी का विरोध पिघलने लगा।

सर हल्का सा घूम रहा था, रघु का बदबूदार गन्दा थूक उसे अब अच्छा लग रहा था.

उसकी छटपटाहट बंद हो गई।
उसके हाथ, जो रघु को धक्का दे रहे थे, धीरे-धीरे रघु की गर्दन के पीछे चले गए।

कामिनी ने अपनी नाक बंद कर ली और उस बदबू को ‘मर्द की खुशबू’ मानकर स्वीकार कर लिया।

उसने अपना मुंह पूरा खोल दिया।

रघु की जीभ उसके मुंह के अंदर तांडव कर रही थी।

कामिनी का चरित्र आज पूरी तरह गिर चुका था। वह एक शराबी नौकर के मुंह की गंदगी को अमृत समझकर पी रही थी।
कामिनी ने अपनी जीभ बाहर निकाली। दोनों की जीभ एक दूसरे से भीड़ गई, एक दूसरे से जितने की कोशिश करने लगी,
उसने अपनी जीभ को रघु के मुंह के अंदर धकेल दिया।
अब दोनों की जीभें एक-दूसरे से लड़ रही थीं।
लप-लप… चप-चप…
कामिनी रघु के दांतों को चाट रही थी, उसके मसूड़ों को चूस रही थी। वह उस शराब के हर कतरे को अपने अंदर ले लेना चाहती थी।

“हाँ रघु… चूस मुझे… खा जा मुझे…” कामिनी के गले से एक दबी हुई, कामुक घुरघुराहट निकली।
उसका शरीर रघु के नीचे मचलने लगा। वह अपनी जांघों को रघु की जांघों से रगड़ने लगी।
घृणा अब हवस बन चुकी थी। गंदगी अब नशा बन चुकी थी।

रघु इतना मदहोश था कि उसे अपने मुंह पर काबू नहीं था। उसके मुंह में लार (Saliva) की बाढ़ आई हुई थी।
वह कामिनी को पागलों की तरह चूम रहा था, रघु के मुंह से निकलती हुई गाढ़ी, चिपचिपी और बदबूदार लार कामिनी के मुंह के किनारों से बह निकली।

“स्लर्रर्रर्रप…. पिच-पिच….”
वह लार कामिनी की गोरी ठुड्डी से होती हुई, उसकी सुराहीदार गर्दन पर फिसलने लगी।
वह थूक ठंडा नहीं था, वह रघु की शराब वाली गर्मी से उबल रहा था।
वह गाढ़ा, लिसलिसा थूक कामिनी की गर्दन से नीचे सरका, तो कामिनी को लगा जैसे किसी ने उसके बदन पर पिघला हुआ ‘लावा’ डाल दिया हो।

कामिनी का ब्लाउज पूरी तरह से कसा हुआ था, स्तन उत्तेजना मे गर्व से फूल गए रहे, लगभग 70% हिस्सा ब्लाउज के बहार से झाँक रहा था,
रघु का मुंह कामिनी के मुंह पर चिपका था, और उसकी लार की एक मोटी धार (String of saliva) कामिनी की ठुड्डी से टपककर सीधे नीचे गिरी।

“टप… टप…”
वह गंदा, नशीला थूक सीधा कामिनी के नंगे, गोरे स्तनों के बीच बनी उस गहरी घाटी (Cleavage) में जा गिरा।
कामिनी सिहर उठी।

वह थूक वहां रुका नहीं। वह उसकी छाती की गर्मी पाकर और पतला हो गया और तेल की तरह फिसलते हुए उसके दोनों स्तनों की गोलाई पर फैल गया।
रघु की गंदगी अब कामिनी के स्तनों को ‘पॉलिश’ कर रही थी।
उसके गोरे स्तन ब्लाउज मे रघु के थूक से सनकर चमक रहे थे। वह लिसलिसा पदार्थ उसके निप्पलों के पास जमा हो रहा था, उन्हें और भी गीला और उत्तेजक बना रहा था।

कामिनी को अपनी छाती पर वह गीलापन महसूस हो रहा था। उसे पता था कि यह रघु का थूक है, एक शराबी नौकर की गंदगी है।
लेकिन उसे पोंछने के बजाय, कामिनी ने अपनी छाती को और ऊपर उठा दिया। जैसे वो अपने स्तनों को इस गंदगी मे पूरी तरह भीगा लेना चाहती हो,

उसे मज़ा आ रहा था। उसे लग रहा था जैसे रघु अपने थूक से उस पर अपनी ‘मोहर’ लगा रहा है।
वह गर्म थूक उसकी त्वचा के रोमछिद्रों में समा रहा था, उसे जला रहा था, उसे और भी ज्यादा कामुक बना रहा था।

“उम्मम्म…. रघु…. चूस…. पूरा गंदा कर दे मुझे….” कामिनी के मुंह से दबी हुई आवाज़ निकली, क्योंकि रघु ने उसके होंठों को छोड़ने से मना कर दिया था।
रघु की जीभ अब कामिनी के मुंह के अंदर उसके तालू (Palate) को चाट रही थी।
कामिनी ने भी अपनी सारी हदें पार कर दीं।
उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और रघु के मुंह से टपकते हुए उस थूक को चाट लिया जो उसके होंठों के कोने पर जमा था।
उसने रघु की खुरदरी जीभ को अपने मुंह में चूसना शुरू कर दिया।
वह रघु की लार को पी रही थी।

“गटक… गटक…”
शराब और थूक का वह मिश्रण उसके गले से नीचे उतर रहा था, और साथ ही उसकी छाती पर बहता हुआ थूक उसके स्तनों के बीच की खाई को भर रहा था।
उस गंदगी में, उस बदबू में, और उस थूक की चिकनाई में कामिनी को वो ‘कच्चापन ‘ (Rawness), वो उत्तेजना मिल रही थी, जो उसे किसी महंगे बिस्तर पर नहीं मिला।

यह शुद्ध मिलावट रहित हवस थी—गीली, चिपचिपी और बदबूदार।
कामिनी ने अपनी जांघों को रघु की कमर से रगड़ना तेज़ कर दिया।
उसकी चूत अब उतनी ही गीली थी जितना उसका थूक से सना हुआ चेहरा और छाती।
“और थूक मुझपे…. नहला दे मुझे अपनी गंदगी से…” कामिनी का मन चीख रहा था।

तभी रघु को कामिनी के बेचैनी महसूस हुई, उसकी भूखी नज़रें नीचे सरक गई थीं, जहाँ कामिनी के भरे-पूरे वक्षस्थल ब्लाउज की कैद दोनों के थूक से सने हुए फड़फड़ा रहे थे।

रघु को उन हुक और बटनों को खोलने का धैर्य नहीं था। वह एक जानवर बन चुका था जिसे सिर्फ़ मांस चाहिए था।
उसने अपने दोनों काले, खुरदरे हाथों से कामिनी के ब्लाउज के गले को पकड़ा।
“तड़ाक…. चर्रर्रर्रर्र…………!”
सन्नाटे को चीरती हुई कपड़ा फटने की आवाज़ गूंज उठी।
रघु ने एक ही झटके में कामिनी के टाइट ब्लाउज को बीच से फाड़कर दो टुकड़े कर दिया।
ब्लाउज के फटते ही, कामिनी के विशाल, दूधिया और भारी-भरकम स्तन किसी बाढ़ के पानी की तरह आज़ाद होकर बाहर छलक पड़े।
कामिनी ने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी, लिहाज़ा, ब्लाउज हटते ही उसकी नंगी जवानी रघु की आँखों के सामने उछलकर आ गई।

उस पीली रोशनी में कामिनी के स्तन किसी संगमरमर के तराशे हुए कलश (Pitcher) जैसे लग रहे थे। 36 इंच का वह घेरा, एकदम गोल, भरा हुआ और गुरुत्वाकर्षण (Gravity) को चुनौती देता हुआ तना खड़ा था।
उस गोरे मांसल पहाड़ के बीचो-बीच, उसके निप्पल (Nipples) किसी ज्वालामुखी के मुहाने की तरह उभरे हुए थे।
अत्यधिक कामवासना और डर के मिश्रण से उसके एरिओला (Areola) सिकुड़ गए थे और निप्पल बेर (Berry) की तरह सख्त, डार्क कत्थई और नुकीले हो गए थे। वे इतने कड़े थे कि लग रहा था छूने पर उंगली कट जाएगी।
स्तनों पर नीली नसें साफ़ झलक रही थीं, जो बता रही थीं कि उनमें कितना रक्त-प्रवाह और गर्मी दौड़ रही है।
सबसे कामुक नजारा कामिनी के सम्पूर्ण स्तन लिसलिसे गीले थूक से सने हुए थे, ये थूक कामिनी और रघु के मिलन से पैदा हुआ था.

रघु की लाल आँखें उन नंगे, तने हुए निप्पलों को देखकर चौंधिया गईं।
“ह्ह्क… सुगना… तेरे आम…” रघु के मुंह से लार टपक पड़ी।
वह खुद को रोक नहीं सका। वह किसी भूखे भेड़िये की तरह उन पर टूट पड़ा।
उसने अपना पूरा चेहरा कामिनी के दाहिने स्तन में गाड़ दिया।
“स्लर्रर्रप… चप… गप…”
उसने कामिनी के पूरे स्तन को अपने बड़े मुंह में भरने की कोशिश की, जैसे कोई बच्चा माँ का दूध पीता है, लेकिन यह बच्चा नहीं, एक राक्षस था।
उसने स्तन को चूसा नहीं, बल्कि दबोच लिया।
और फिर…
“कच्च्च….!”
रघु ने कामिनी के उस पत्थर जैसे तने हुए निप्पल को अपने पीले, गंदे दांतों के बीच दबा दिया और जोर से काट लिया।
“आआईईईईईई……… माअअअअअ….. उफ्फ्फ्फ….. मर गई…..”
कामिनी का शरीर खटिया पर कमान की तरह मुड़ गया। उसकी पीठ हवा में उठ गई।
एक असहनीय पीड़ा की लहर उसके स्तन से होती हुई सीधे उसकी बच्चेदानी तक पहुंच गई।
दर्द तीखा था। रघु के दाँत उसकी कोमल त्वचा को छील रहे थे।
लेकिन…
यही तो वह दर्द था जिसके लिए वह तरस रही थी।
जैसे ही रघु ने काटा, कामिनी की चूत ने जवाब दिया।
पच… पचक….
उसकी योनि के अंदर के स्नायु (Muscles) सिकुड़ गए और वहां से चिकने पानी की एक तेज़ धार छूट पड़ी।

दर्द ने उसे गीला कर दिया था। वह जन्नत में थी। उसे लगा जैसे उसकी आत्मा उस दर्द में मोक्ष पा रही है।
रघु रुक नहीं रहा था। वह पागल हो गया था।
वह कभी दायें स्तन को चूसता, तो कभी बाएं स्तन को अपने खुरदरे, काले हाथों में लेकर आटे की लोई की तरह मसल देता।

उसके काले हाथ कामिनी के गोरे, मलाईदार स्तनों पर ऐसे लग रहे थे जैसे चाँद पर ग्रहण लगा हो। वह गोरे मांस को इतनी जोर से भींच रहा था कि उसकी उंगलियों के लाल निशान कामिनी की त्वचा पर छपते जा रहे थे।
रघु का मुंह लार और शराब से भरा था।
वह चाट रहा था, थूक रहा था, चूस रहा था।

“सुड़प… लप… लप…”
कामिनी का गला, उसकी गर्दन (Neckline), उसके दोनों स्तनों की घाटी (Cleavage) और उसके निप्पल… सब रघु के उस बदबूदार, चिपचिपे और लिसलिसे थूक से सन गए थे।
कामिनी का गोरा बदन अब रघु की लार से चमक रहा था।
उस बदबू से कामिनी का दम घुट रहा था, लेकिन वह नशा… वहशीपन का नशा उसे चढ़ता जा रहा था।
कामिनी ने अपने हाथ रघु के पसीने से भरे, गंदे बालों में डाल दिए।
उसने उसे धक्का देने के बजाय, उसका सिर अपने सीने पर और जोर से दबा दिया।

“हाँ… और जोर से… काट ले मुझे… नोच ले… जानवर बन जा…” कामिनी सिसक रही थी, “पी ले मेरा खून… आह्ह्ह…”
वह अपनी कमर को खटिया पर रगड़ रही थी। पेटीकोट के अंदर उसकी जांघें आपस में घर्षण कर रही थीं।
रघु का एक हाथ नीचे फिसला।
उसका हाथ कामिनी के पेट पर आया।
कामिनी का पेट सपाट था, लेकिन हल्का सा मांसल और बेहद नरम।
उसकी साड़ी फटने और ब्लाउज के चिथड़े उड़ने के बाद, अब उसकी गहरी नाभि (Navel) पूरी तरह उजागर थी।
वह नाभि किसी गहरे कुएं जैसी थी, गोल और रहस्यमयी। कामिनी की सांसों के साथ उसका पेट ऊपर-नीचे हो रहा था, जिससे वह नाभि किसी भंवर की तरह डोल रही थी।
रघु ने अपनी उंगली उस नाभि में घुसा दी और उसे बेरहमी से कुरेदने लगा।
“उह्ह्ह्ह… गुदगुदी हो रही है… मत कर… आह्ह्ह…” कामिनी मचल उठी।
ऊपर वह निप्पल काट रहा था, बीच में नाभि को रौंद रहा था।
रघु का जंगलीपन अपनी चरम सीमा पर था।
उसने कामिनी के स्तन को मुंह से छोड़ा।
“पॉप…”
निप्पल उसके मुंह से आज़ाद हुआ, लेकिन वह अब लाल-सुर्ख हो चुका था और उस पर दांतों के गहरे निशान थे। वह थूक से लथपथ था।
रघु ने अपनी जीभ से कामिनी की छाती पर गिरे अपने ही थूक को चाटा और फिर अपनी लाल आँखें कामिनी की आँखों में गड़ा दीं।
“मज़ा आ रहा है सुगना? अभी तो और मज़ा आएगा…”
उसने अपना हाथ नीचे, कामिनी के पेटीकोट के नाड़े की तरफ बढ़ाया।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
उसका जिस्म थूक से सना हुआ था, स्तनों में टीस थी, और चूत पानी-पानी थी।

रघु का जंगलीपन अब कपड़ों की बाधा बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। कामिनी के स्तनों को अपनी लार से नहलाने के बाद, उसका हाथ नीचे फिसला—सीधे कामिनी के पेटीकोट के नाड़े पर।
रघु की उंगलियां नशे में सुन्न थीं और कामिनी की कमर का घेरा पसीने से भीगा हुआ था। वह हड़बड़ाहट में गांठ खोलने की कोशिश करने लगा।
“खुल जा साली…” रघु गुर्राया।
लेकिन उसकी मोटी और कांपती उंगलियों ने कामिनी के सूती पेटीकोट की गीली गांठ को खोलने के बजाय और कस दिया।
उसने जोर लगाया।
“उह्ह्ह्ह….” कामिनी के मुंह से सिसकी निकली।
गांठ पत्थर की तरह टाइट हो गई और नाड़ा कामिनी की मुलायम, मांसल कमर में धंस गया। पेट की चर्बी नाड़े के ऊपर और नीचे उभर आई। दर्द हुआ, लेकिन उस कसाव ने कामिनी को एक अजीब सा सुख भी दिया।
रघु का सब्र जवाब दे गया।
“भाड़ में जा…”
उसने गांठ खोलने की कोशिश छोड़ दी।
उसने अपने दोनों लोहे जैसे मज़बूत हाथों को पेटीकोट के कमरबंद (waistband) के अंदर घुसाया। उसकी खुरदरी उंगलियों ने कामिनी की नंगी कमर की त्वचा को छील दिया।
उसने अपनी पूरी ताकत लगाई और दोनों हाथों को विपरीत दिशा में झटका दिया।
“तड़ाक….. चर्रर्रर्रर्रर्र…………!”
एक जोरदार आवाज़ के साथ कामिनी का पेटीकोट ऊपर से नीचे तक फटता चला गया।
रघु ने उस फटे हुए कपड़े को किसी बेकार चीथड़े की तरह नोचकर कामिनी के बदन से उखाड़ फेंका और दूर ज़मीन पर दे मारा।
और फिर…
स्टोर रूम की उस मैली, पीली रोशनी में एक ऐसा नज़ारा उभरा जिसने वक़्त को थाम दिया।
कामिनी… उसकी मेमसाब… अब पूरी तरह, शत-प्रतिशत नंगी (Stark Naked) थी।
खटिया पर लेटी हुई कामिनी का जिस्म किसी पिघले हुए सोने की तरह चमक रहा था।
ब्लाउज फटा हुआ था, पेटीकोट जा चुका था।
उसके शरीर पर अब सिर्फ़ रघु का थूक, पसीना और उसके अपने जिस्म की चमक थी।
कामिनी की भारी, मांसल और मक्खन जैसी चिकनी जांघें (Thighs) डर और शर्म के मारे आपस में कसकर चिपकी हुई थीं।
घुटने जुड़े हुए थे।
जांघों के इस मिलन की वजह से, उसका सबसे निजी अंग—उसकी जादुई गुफा—छुपी हुई थी। जांघों के बीच सिर्फ़ एक गहरा, फुला हुआ ‘त्रिभुज’ (Triangle) दिख रहा था, कामिनी की चुत का ऊपरी हिस्सा चमक रहा था, वहाँ किसी भी रोये का कोई नामोनिशान नहीं था, लेकिन वह ‘हवा महल’ अभी बंद था।

कामिनी ने अपनी खूबसूरती को छुपाने के लिए अपने हाथ आगे नहीं किए।
वह निडर होकर लेटी रही, अपनी नग्नता को रघु की भूखी नज़रों के सामने परोसती रही। उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था, और नंगी नाभि सांसों के साथ डोल रही थी।

रघु इस दृश्य को देखकर पागल सा हो गया। उसकी आँखों में खून उतर आया।
“हे भगवान… सुगना… तू तो पूरी की पूरी मलाई है…”
वह खटिया के पायदान (Foot of the bed) की तरफ खिसका।
वह कामिनी के जुड़े हुए घुटनों और जांघों को देखकर और भी ज्यादा उत्तेजित हो गया,
वह झुक गया।
उसने अपना मुंह कामिनी की बंद जांघों पर लगा दिया।
“स्लर्रर्रप… चप… चप…”
रघु पागलों की तरह कामिनी की चिकनी जांघों को चाटने लगा।

उसकी जीभ जांघों की उस दरार (Crevice) में घुसने की कोशिश कर रही थी जहाँ दोनों पैर जुड़े हुए थे।
जब उसे लगा कि जीभ काफी नहीं है, तो उसने थूकना शुरू किया।
“थू…. थू….!”
उसने अपना गाढ़ा, गरम थूक कामिनी की जांघों पर गिराया और उसे अपने हाथों से मलने लगा।
कामिनी की जांघें अब रघु के थूक से गीली और फिसलन भरी हो गई थीं।

“खोल इसे… मुझे देखना है… खज़ाना देखना है…” रघु बड़बड़ा रहा था।
उसने अपने दोनों मज़बूत हाथों से कामिनी के घुटनों को पकड़ा।
उसने धीरे-धीरे, लेकिन दृढ़ता से उन्हें अलग करना शुरू किया।
कामिनी की जांघें कांप रही थीं, लेकिन उसने प्रतिरोध नहीं किया। उसने अपने जिस्म को ढीला छोड़ दिया।
जैसे-जैसे रघु उसके घुटनों को फैलाता गया… नज़ारा बदलता गया।
बंद कली खिलने लगी।
गोरी, मांसल जांघें दूर होती गईं और उनके बीच का वह गहरा राज़ उजागर होता चला गया।
और आखिर में…
कामिनी की टांगें पूरी तरह चौड़ी हो गईं।
रघु की आँखों के सामने अब कोई पर्दा नहीं था।
कामिनी की ‘महारानी’—उसकी चूत—अपनी पूरी भव्यता के साथ रघु का स्वागत कर रही थी।

कामिनी की गोरी जांघों के बीच एक गुलाबी, मांसल और रसीला ‘गुलाब’ (Rose) खिला हुआ था।
कामिनी की योनि के होंठ (Lips) सूजे हुए थे (दिन भर की उत्तेजना से), और हल्के खुले हुए थे।
वह दरार गहरी गुलाबी थी, और उसके अंदर से पारदर्शी काम-रस (Nectar) की एक बूंद मोती की तरह चमक रही थी।

वह एकदम बेदाग थी। साफ़-सुथरी। मांसल।
जैसे ही कामिनी की टांगें खुलीं और वह ‘गुलाब’ हवा के संपर्क में आया…
सूंघ…. ! सिंफ्फफ्फ्फ़…. शनिफगगगग….
एक तेज़, मादक और नशीली खुशबू ने पूरे स्टोर रूम पर कब्ज़ा कर लिया।
यह खुशबू किसी इत्र की नहीं थी।

यह एक उत्तेजित, प्यासी और पूर्ण रूप से तैयार औरत के “फेरोमोंस” (Pheromones) की गंध थी—कच्ची, सौंधी, और मछली जैसी हल्की सी नमकीन महक (Musky scent)।
उस गंध ने स्टोर रूम की शराब और बीड़ी की बदबू को एक पल में खत्म कर दिया।
रघु ने एक गहरी सांस ली।

“आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह……….!”
उस गंध ने उसके दिमाग की रही-सही नसें भी फाड़ दीं। वह उस खुशबू में डूब गया। सामने पड़ा वह ‘मांस का फूल’ उसे दावत दे रहा था।

स्टोर रूम की वह हवा, जो कामिनी के स्त्रीत्व की मादक गंध से भर चुकी थी, अब एक तूफ़ान की गवाह बनने वाली थी। रघु की लाल आँखें कामिनी की खुली हुई, गुलाबी और रसीली चूत पर टिकी थीं। वह नज़ारा किसी प्यासे के सामने रखे अमृत के कलश जैसा था।

रघु ने अब एक पल की भी देरी नहीं की।
उसने अपने दोनों मज़बूत, खुरदरे हाथों से कामिनी की मांसल नितम्बों (Buttocks) को नीचे से जकड़ लिया और उन्हें थोड़ा ऊपर उठा दिया।
और फिर… एक भूखे, जंगली जानवर की तरह उसने अपना पूरा चेहरा कामिनी की टांगों के बीच उस ‘गुलाबी दरार’ में दे मारा।

“धप… फच…!”

रघु का मुंह सीधा कामिनी की योनि के मुहाने पर जाकर लगा। उसकी नाक कामिनी के ‘दाने’ (Clitoris) में धंस गई और उसकी ठुड्डी कामिनी के निचले छेद (Vaginal opening) पर जम गई।
उसने सांस ली…
“स्निफ़फ़फ़फ़…. आअह्ह्ह…. क्या महक है सुगना…”
उसने कामिनी की चूत की उस कस्तूरी गंध को अपने फेफड़ों में भरा और फिर अपनी जीभ का हमला शुरू कर दिया।

“स्लर्रर्रर्रप…. चप… चप… चप…!”
रघु ने अपनी चौड़ी, खुरदरी जीभ को फावड़े की तरह बाहर निकाला और कामिनी की चूत को नीचे से ऊपर तक एक ही बार में चाट लिया।
उसकी जीभ ने कामिनी के योनि-छिद्र से लेकर, उसके होठों की परतों को खोलते हुए, ऊपर तने हुए दाने तक का सफ़र तय किया।
कामिनी का शरीर खटिया पर उछल पड़ा।

“आईईईईई…….. रघघघघुउउउउ…….. !!”
रघु की दाढ़ी (Beard) के छोटे-छोटे, कड़े बाल कामिनी की नाजुक, भीगी हुई जांघों और चूत के आसपास की त्वचा को रेगमाल की तरह रगड़ रहे थे।
वह खुरदरापन कामिनी को पागल कर रहा था।

जब वह चाटने के लिए अपना सिर हिलाता, तो उसकी वह सख्त दाढ़ी कामिनी की भीगी हुई, संवेदनशील जांघों और चूत के बाहरी हिस्से पर रगड़ खाती।
“खर्रर्र… खर्रर्र…”
वह रगड़ कामिनी को एक साथ दर्द और मज़ा दे रही थी। उसकी कोमल त्वचा छिल रही थी, लाल हो रही थी, लेकिन उस जलन ने उसकी उत्तेजना को आग बना दिया था।
“आह्ह्ह…. रघघघु…. गड़ रहा है…. छिल रहा है…. और रगड़…. उफ्फ्फ्फ…. मेरी खाल उधेड़ दे….” कामिनी सिसक रही थी।
रघु चाट नहीं रहा था, वह उस चूत को ‘पी’ रहा था।
वह अपनी जीभ को चूत के होठों (Labia) के बीच फंसाकर उन्हें चूसने लगा।

“सुड़प… सुड़प…”
वह उन गुलाबी पंखुड़ियों को अपने मुंह में भरकर ऐसे चबा रहा था जैसे कोई रसीला फल खा रहा हो।

अचानक, रघु ने अपना निशाना बदला। उसने अपनी जीभ की नोक को सख्त किया और सीधे कामिनी के ‘दाने’ (Clitoris) पर हमला बोल दिया।
वह दाना, जो उत्तेजना से सूजकर एक छोटे बेर के आकार का हो गया था,रघु की जीभ की लपेट में आ गया।
रघु उसे चाटने लगा… गोल-गोल, तेज़ रफ़्तार में।
“लप-लप-लप-लप…”
कामिनी की रीढ़ की हड्डी में 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया।
“आह्ह्ह…. मार डाला…. उफ्फ्फ्फ…. जानवर…. खा जा…. चबा जा उसे…. आह्ह्ह…”
कामिनी ने अपने दोनों हाथ रघु के सिर पर रख दिए। वह उसके बालों को नोच रही थी, उसका सिर अपनी चूत में और जोर से दबा रही थी।

रघु ने उस दाने को अपने होंठों में कैद किया और “वैक्यूम” बनाकर जोर से चूस लिया।

वह उन गुलाबी पंखुड़ियों को खोल रहा था, उनके अंदर छिपे मैल और रस को चाट रहा था। उसकी जीभ कामिनी की चूत की दीवारों (Vaginal walls) को खुरच रही थी।

कामिनी बर्दाश्त की हद पार कर गई।
रघु की जीभ की कारीगरी और उसकी दाढ़ी की रगड़ ने कामिनी के मूत्राशय (Bladder) और बच्चेदानी पर एक साथ दबाव बनाया।
“रघघघु…. मैं… मैं…. आ रही हूँ…. आह्ह्ह….”
कामिनी का पेट अंदर पिचक गया। जांघें पत्थर की तरह सख्त हो गईं।
और फिर…
“सर्रर्रर्रर्र………… !!”
कामिनी की चूत से काम-रस और पेशाब की एक मिली-जुली, गरम और तेज़ धार (Squirt) छूट पड़ी।
वह फव्वारा सीधा रघु के मुंह के अंदर गया।
रघु हटा नहीं।
उसे तो प्यास लगी थी। उसे नशा चाहिए था।
उसने अपना मुंह पूरा खोल दिया।
“गटक… गटक… गटक… !!”
कामिनी का वह गरम, नमकीन और कसैला पानी रघु के हलक में उतरने लगा।
रघु उसे ऐसे पी रहा था जैसे वह कोई सालों पुरानी महंगी शराब हो।
उसके गाल फूल गए, उसका गला चलने लगा।
कामिनी का पानी उसके मुंह से बाहर छलककर उसकी ठुड्डी और गर्दन पर बहने लगा।
“पी ले…. पूरा पी जा हरामखोर…. पी का मेरा गरम पेशाब…” कामिनी हवस में चीख रही थी।

लेकिन रघु रुका नहीं।
पहला पानी पीने के बाद, उसकी प्यास और भड़क गई।
वह अब और भी जंगली हो गया। उसने अपनी दो उंगलियाँ कामिनी की चूत के छेद में घुसा दीं और उन्हें अंदर-बाहर (Finger-fucking) करने लगा, जबकि उसकी जीभ अभी भी ऊपर दाने को चाट रही थी।
“पच-पच… लप-लप…”

अंदर उंगलियाँ कामिनी की दीवारों को खुरच रही थीं, और बाहर जीभ दाने को बिजली के झटके दे रही थी।
कामिनी का शरीर अभी पहले झटके से उभरा भी नहीं था कि दूसरा तूफ़ान आ गया।

उसका बदन ऐंठने लगा।
“नहीं… नहीं… रघु… फिर से…. उईईईई माअअअअ…..”
उसकी चूत ने फिर से पानी छोड़ा।
“पिच…. सर्रर्रर्र….. !!”
इस बार धार और तेज़ थी। कामिनी का पेशाब पूरी ताकत से निकला।
रघु ने अपनी जीभ बाहर निकालकर उस धार को लपक लिया।
वह चाटता रहा… पीता रहा… थूकता रहा… और फिर चाटता रहा।
स्टोर रूम में अब सिर्फ़ “सुड़प-सुड़प” और “गटक-गटक” की आवाज़ें आ रही थीं।
कामिनी की चूत अब सूजकर लाल टमाटर जैसी हो गई थी।
रघु का पूरा चेहरा कामिनी के रसों से भीगा हुआ था। उसकी पलकों पर, उसकी नाक पर, उसकी दाढ़ी में… हर जगह कामिनी का पानी चमक रहा था।
वह किसी नाली के कीड़े की तरह कामिनी की गंदगी में लोट रहा था।
कामिनी अब बेसुध होने की कगार पर थी। उसकी टांगें हवा में झूल रही थीं।
उसने हार मान ली थी।
“बस… बस…. मर जाऊंगी…. उफ्फ्फ….”
लेकिन रघु के लिए यह दावत अभी शुरू हुई थी।
उसने अपना सिर उठाया। उसका चेहरा कामिनी के पेशाब और रस से लथपथ था। उसने अपनी जीभ से अपने होंठ चाटे।
“बड़ा नशा है तेरे पानी में सुगना… साली पूरी बोतल चढ़ा दी तूने तो…” रघु नशे में हँसा।
और फिर उसने दोबारा अपना मुंह उसी गीली, बदबूदार और रसीली जगह में घुसा दिया।

रघु का चेहरा कामिनी के पेशाब और काम-रस से पूरी तरह भीगा हुआ था, वह किसी इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक ‘पिशाच’ की तरह व्यवहार कर रहा था।
उसने कामिनी की चूत से मुंह नहीं हटाया।
नशे और उत्तेजना के चरम पर, रघु ने अपने दाहिने हाथ की तीन उंगलियाँ (तर्जनी, मध्यमा और अनामिका) एक साथ कामिनी की योनि के मुहाने पर जमाईं।

कामिनी की चूत पहले से ही दो बार की बाढ़ से गीली और खुली हुई थी।
“फच…!”
रघु ने एक ही झटके में तीनों उंगलियाँ कामिनी की बच्चेदानी के मुंह तक घुसा दीं।

“आआईईईईईई………… माँअअअअ….” कामिनी की आँखें पलट गईं। उसका शरीर धनुष की तरह मुड़ गया।
रघु ने उन तीनों उंगलियों को अंदर टेढ़ा किया और बेरहमी से अंदर-बाहर (Pumping) करने लगा।
साथ ही, उसका अंगूठा कामिनी के सूजे हुए ‘दाने’ (Clitoris) पर जम गया। उसने उसे कुचलना और मसलना शुरू कर दिया।

मुंह से चाट, अंदर तीन उंगलियों का घर्षण और बाहर अंगूठे का दबाव।
कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया।
“रघघघघु…. बस…. मार डालेगा…. उफ्फ्फ्फ…. रुक जा मै मर जाउंगी, ऊँगली बहार निकाल…न…. आह्ह्ह….आउच… उफ्फ…”
कामिनी का शरीर खटिया पर पागलों की तरह पटकने लगा। अपने बालो को पकड़ नोंचने लगी,
और फिर…
“सर्रर्रर्रर्र…………पप्पीस्स्स….. पीस्स्स्स…. !!”
कामिनी तीसरी बार झड़ गई।

इस बार का ऑर्गेज्म (Orgasm) इतना भयानक था कि कामिनी की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। उसका शरीर अकड़ गया, पैरों की उंगलियां मुड़ गईं और मुंह से लार टपकने लगी। वह किसी लाश की तरह खटिया पर निढाल पड़ गई। उसकी जांघें थर-थर कांप रही थीं, जैसे उनमें जान ही न बची हो।

कामिनी का रस पीते-पीते रघु के शरीर ने भी जवाब दे दिया।
शराब का नशा, कामिनी का पेशाब और अत्यधिक उत्तेजना—इन सबने मिलकर रघु के दिमाग की बत्ती गुल कर दी।
वह कामिनी के ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका संतुलन बिगड़ गया।
“धड़ाम…!”
वह खटिया से नीचे लुढ़क गया और ज़मीन पर ओंधे मुंह गिर पड़ा।
उसका शरीर एक बार फड़फड़ाया और फिर शांत हो गया।
वह बेहोश हो चुका था। गहरा नशा उसे अपनी आगोश में ले चुका था। अब वह सिर्फ़ मांस का एक बेजान लोथड़ा था जो ज़मीन पर पड़ा खर्राटे ले रहा था।

कमरे में सिर्फ़ कामिनी की उखड़ी हुई सांसों की आवाज़ थी।
करीब 15 मिनट तक कामिनी उसी अवस्था में खटिया पर पड़ी रही—नंगी, चिपचिपी और बेसुध।
धीरे-धीरे उसकी धड़कनें सामान्य हुईं। दिमाग से हवस का कोहरा छंटने लगा।
उसने अपनी आँखें खोलीं।
सामने पीला बल्ब जल रहा था। नीचे ज़मीन पर रघु पड़ा था।
कामिनी हड़बड़ा कर उठ बैठी।

“हे भगवान… यह मैं कहाँ हूँ? मैंने यह क्या किया?”
उसने अपने जिस्म को देखा।
वह पूरी तरह नंगी थी।
उसका महंगा ब्लाउज फटकर चिथड़े हो चुका था। उसका पेटीकोट दूर कोने में पड़ा था। उसकी साड़ी के टुकड़े ज़मीन पर बिखरे थे।
उसका गोरा बदन रघु के थूक, लार, पसीने और उसके खुद के रसों से सना हुआ था। जगह-जगह रघु के दांतों के लाल निशान थे।
अचानक, एक ठंडी सिहरन (Chill) उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गई।

“डर…!”
कामवासना उतरते ही हकीकत का खौफनाक चेहरा सामने आ गया।
‘अगर कोई आ गया तो? अगर रमेश या शमशेर की नींद खुल गई और वो नीचे आ गए तो?’
‘मैं घर के अंदर कैसे जाऊंगी? मेरे पास तो तन ढकने के लिए एक कपड़ा भी नहीं है।’

कामिनी का गला सूख गया। वह घबराहट में कांपने लगी। एक ‘चोर’ की तरह उसकी नज़रें चारों तरफ भागने लगीं।
उसने फटे हुए पेटीकोट को उठाया, लेकिन वह इतना फट चुका था कि उससे कुछ नहीं ढक सकता था।
उसकी हालत उस मुजरिम जैसी थी जो कत्ल करने के बाद लाश के पास खड़ा हो और पुलिस सायरन की आवाज़ सुन ले।

कामिनी ने खुद को संभाला। उसने सोचा कि अंधेरे का फायदा उठाकर वह दौड़कर घर के पिछले दरवाज़े से घुस जाएगी।
उसने धीरे से स्टोर रूम का दरवाज़ा खोला।
बाहर गहरा अंधेरा था और सन्नाटा पसरा हुआ था।
कामिनी ने अपना नंगा बदन सिकोड़ लिया। उसने अपने दोनों हाथों से अपने स्तनों और योनि को ढकने की नाकाम कोशिश की।
उसने एक कदम बाहर रखा।
उसकी धड़कनें कानों में हथौड़े की तरह बज रही थीं।
उसने पहला कदम बढ़ाया ही था कि…
अंधेरे में से, स्टोर रूम की खिड़की की दीवार से सटकर खड़ा एक साया उसके सामने आ गया।
कामिनी की चीख गले में ही घुट गई। उसका दिल बंद होने को हो गया।
सामने कोई खड़ा था।
चांदनी की हल्की रोशनी उस साये के चेहरे पर पड़ी।
वह बंटी था।
कामिनी का बेटा।
वह वहां कब से खड़ा था? उसने क्या देखा? उसने क्या सुना?
कामिनी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वह अपने ही बेटे के सामने, घर के बगीचे में, पूरी तरह नग्न (Stark Naked) खड़ी थी। उसके बाल बिखरे थे, जिस्म पर काटने के निशान थे और जांघों पर काम-रस, वीर्य और थूक की परतें चढ़ी थीं।

वह भागना चाहती थी, लेकिन उसके पैर ज़मीन में गड़ गए थे। वह मर जाना चाहती थी।
बंटी के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, कोई हैरानी नहीं थी। उसका चेहरा भावहीन (Expressionless) था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी।
उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए।
उसके हाथों में कामिनी का वही सिल्की गाउन था जो कामिनी अक्सर रात को पहनती थी।
बंटी कामिनी के बिल्कुल पास आया।
उसने वह गाउन कामिनी की तरफ बढ़ाया और बहुत ही शांत, लेकिन कड़क आवाज़ में कहा—
“ये लो माँ… इसे पहन लो। ठंड लग जाएगी।”
कामिनी की रूह कांप गई।
उसका बेटा… उसके लिए कपड़े लेकर बाहर खड़ा था, जबकि वह अंदर नौकर से चुदवा रही थी। इसका मतलब साफ़ था—बंटी सब जानता था। वह खिड़की के पास खड़ा सब सुन रहा था, शायद देख भी रहा था।
कामिनी ने कांपते हाथों से वह गाउन थाम लिया। उसकी नज़रों में शर्म, डर और एक अंतहीन सवाल था।
बंटी वहीं खड़ा था, अपनी नंगी माँ को ऊपर से नीचे तक निहारता हुआ।

रात का सन्नाटा गहरा था, लेकिन कामिनी के मन में जो तूफ़ान चल रहा था, वह किसी भी शोर से ज्यादा भयानक था। वह अपने जवान बेटे के सामने, घर के आंगन में, पूरी तरह निर्वस्त्र खड़ी थी। उसके हाथ में बंटी का दिया हुआ वह गाउन था, लेकिन उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि वह उसे पहन नहीं पा रही थी।

उसका गोरा बदन, जो अभी कुछ पल पहले हवस की आग में तप रहा था, अब शर्म और डर के मारे बर्फ जैसा ठंडा पड़ गया था। उसके स्तनों पर रघु के दांतों के लाल-नीले निशान चाँदनी रात में साफ़ चमक रहे थे।

उसकी जांघों पर वीर्य और काम-रस की सूखी हुई लकीरें गवाही दे रही थीं कि वह किस ‘नर्क’ से होकर आई है।
बंटी ने देखा कि उसकी माँ बुत बनी खड़ी है।
उसने कोई शब्द नहीं कहा। उसने धीरे से कामिनी के हाथों से वह गाउन ले लिया।
बंटी एक कदम आगे बढ़ा।
कामिनी की सांसें अटक गईं। उसे लगा बंटी उसे धिक्कारेगा, शायद थप्पड़ मारेगा या चीखकर सबको इकट्ठा कर लेगा।

लेकिन नहीं, बंटी ने ऐसा कुछ नहीं किया।
उसने बड़े ही सलीके और सम्मान से उस गाउन को खोला और कामिनी के नंगे कंधों पर डाल दिया।
जैसे कोई रक्षक किसी अबला को ढक रहा हो।

बंटी के हाथ कामिनी के नंगे बाज़ुओं से छू गए। वह स्पर्श गर्म था, जीवित था।
“हाथ डालो माँ…” बंटी ने बहुत ही धीमी और शांत आवाज़ में कहा।
कामिनी ने मशीनी अंदाज़ में (Mechanically) अपनी बाहें गाउन की आस्तीन में डाल दीं।
बंटी ने उसे पलटाया नहीं, वह उसके सामने खड़ा रहा।
गाउन अभी भी आगे से खुला था।
बंटी की नज़रें कामिनी के खुले हुए सीने पर थीं, जहाँ रघु ने वहशियत से काटा था। उन निशानों को देखकर बंटी की आँखों में एक पल के लिए अंधेरा छाया, लेकिन फिर एक समझदारी भरी चमक आ गई।

उसने अपने हाथों से गाउन के बटन लगाने शुरू किए।
उसकी उंगलियां कामिनी की छाती के पास हरकत कर रही थीं।
पहला बटन… दूसरा बटन…
जब वह बीच के बटन लगा रहा था, तो उसकी उंगलियां कामिनी के स्तनों के बीच की घाटी (Cleavage) से रगड़ खा गईं, जहाँ रघु का थूक अब सूखकर पपड़ी बन चुका था।

कामिनी सिहर उठी। उसने अपनी नज़रें झुका लीं।
“ब-बंटी… मैं…” उसका गला रुंध गया। वह बोलना चाहती थी, सफाई देना चाहती थी।
“शश्श्श…” बंटी ने उसके होंठों पर उंगली रख दी।
“कुछ मत बोलो माँ। चलो अंदर चलते है, ठण्ड बहुत है ।”
बंटी ने उसका हाथ पकड़ा। एक बेटे की तरह नहीं, एक मर्द की तरह—मज़बूत और अधिकार भरा।
वह उसे पिछले दरवाज़े से, अंधेरे गलियारे से होते हुए, सीधे उसके बेडरूम में ले आया।

कमरे में एसी की ठंडक थी, लेकिन माहौल भारी था।
बंटी ने कामिनी को बिस्तर के किनारे बिठाया। कामिनी सिर झुकाए बैठी थी, आंसू उसकी आँखों से टपक कर उसकी गोद में गिर रहे थे।

बंटी उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
उसने कामिनी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“रो क्यों रही हो माँ?” बंटी ने पूछा।

“म-मैंने… मैंने पाप किया है बंटी… मैं बहुत गंदी हूँ… मुझे मर जाना चाहिए…” कामिनी सिसकते हुए फूट पड़ी। “अपने बेटे के सामने… उफ्फ्फ…”
बंटी ने उसके हाथों को कसकर दबाया।

“पाप?” बंटी की आवाज़ में एक कड़वी हंसी थी। “पाप तो इस घर में रोज़ होता है माँ, बस देखने वाला कोई नहीं था।”
कामिनी ने चौंककर सिर उठाया। बंटी की आँखों में एक अजीब सी परिपक्वता (Maturity) थी, जो उसकी उम्र से कहीं ज्यादा थी।

“तुम्हें क्या लगता है माँ? मुझे कुछ पता नहीं है?” बंटी ने बोलना शुरू किया, और उसके हर शब्द के साथ कामिनी की रूह कांपती गई।

“मैं बच्चा था जब मैंने पहली बार पापा को तुम्हें बेल्ट से मारते हुए देखा था। मैं तब डर गया था, रजाई में छुपकर रोता था। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ… मैंने सिर्फ़ मार नहीं देखी माँ, मैंने तुम्हारी वो ‘घुटन’ देखी है।”
बंटी की आवाज़ भारी हो गई।

“मैंने देखा है तुम्हें… कैसे तुम रसोई में काम करते-करते अपनी कमर पकड़कर खड़ी हो जाती हो। कैसे तुम पापा के ऑफिस जाने के बाद घंटों आईने के सामने अपने खालीपन को घूरती हो। मैंने तुम्हारी आँखों में वो प्यास देखी है माँ… जो पापा कभी बुझा नहीं पाए।”
कामिनी सन्न रह गई। उसका बेटा उसे इतना गौर से देखता था?

“पापा… वो तो तुम्हें सिर्फ़ एक ‘चीज़’ समझते हैं। दिन में नौकरानी, और रात को…” बंटी रुका, फिर कड़वाहट से बोला, “रात को अपनी हवस मिटाने का ज़रिया। वो तुम्हें प्यार नहीं करते माँ, वो तुम्हें इस्तेमाल करते हैं। और जब उनका मन भर जाता है, तो वो तुम्हें ऐसे छोड़ देते हैं जैसे कोई निचोड़ा हुआ नींबू हो।”

कामिनी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। यह सच था। कड़वा सच।
बंटी ने कामिनी के घुटनों पर हाथ रखा।
जब से रघु घर मे आया है, आपको जीने की उम्मीद दिखी, मैंने आपको बदलता देखा, आपके चेहरे का नूर वापस लौटने लगा है माँ.
मुझे नहीं पता रघु आपको कैसा लगता है, वो गन्दा है या अच्छा मुझे नहीं पता, मै औरत नहीं हूँ, शायद आप की नजर मे मर्द रघु होता है, एयर मर्द सिर्फ चेहरे से सुंदर हो जरुरी नहीं”

“और आज… आज मैंने तुम्हें छत पर रवि के साथ देखा।”
कामिनी का दिल धक से रह गया।
“घबराओ मत,” बंटी ने तुरंत कहा। “मैंने देखा कि तुम खुश थी। सालों बाद मैंने तुम्हारे चेहरे पर वो चमक देखी थी। तुम रवि के साथ ‘जिंदा’ लग रही थी माँ।”
बंटी ने कामिनी की आँखों में गहराई से झांका।
“और अभी… रघु के पास…”
बंटी ने कामिनी के गाउन के ऊपर से, उसके स्तन पर लगे उस नीले निशान को हल्के से छुआ।

“ये निशान… ये दर्द नहीं है माँ। ये तुम्हारी आज़ादी का सबूत है। तुम्हें ये चाहिए था ना? वो वहशीपन? वो पागलपन? पापा सिर्फ दर्द देते है आपको, दर्द के साथ जो प्यार सुकून चाहिए शायद वो आपको रघु से मिला”

कामिनी कांप उठी। उसका बेटा उसके जिस्म की सबसे गहरी और गंदी ज़रूरत को पढ़ रहा था। वो हैरान थी की इसका अपना बेटा बंटी उसे कितनी अच्छी तरह से जनता है, वो तो कभी खुद को अवस्था को किसी को बतला भी नहीं पाती, इन सब के लिए शब्द ही कहाँ होते है.

“हाँ…” कामिनी के मुंह से अनजाने में निकल गया। “हाँ बंटी… मैं थक गई थी… घुट-घुट कर…, जब से रघु आया, मैंने उसके… उसके… कामिनी कुछ कहना चाहती थी
“लंड को देखा ” बंटी ने बड़ी ही बेबाकी से कामिनी के गले मे फसे शब्द को पूरा किया.
“अअअ… हाँ… गड़ब…. उस दिन से मेरे जिस्म मे कुछ होने लगा, एक आग सी जलने लगी, वो शराबी है, गन्दा है लेकिन पता नहीं क्यों मुझे आकर्षक लगा, पता नहीं मै कैसी औरत हूँ ” कामिनी ने आंख उठा बंटी को देखा उसकी आँखों मे आंसू थे.

“इसमें रोना कैसा माँ?, आप अच्छी माँ हो मेरे लिए बस इतना ही काफ़ी है ” बंटी खड़ा हो गया।

उसने कामिनी के चेहरे को अपने हाथों में ले लिया और उसके आंसू पोंछे।
“तुम सिर्फ़ एक ‘माँ’ नहीं हो। तुम एक औरत भी हो। हाड़-मांस की बनी एक औरत, जिसकी अपनी जरूरतें हैं, अपनी भूख है। अगर पापा वो भूख नहीं मिटा सकते, और तुम बाहर उसका इलाज ढूंढ रही हो… तो इसमें कोई पाप नहीं है माँ।”
बंटी के ये शब्द कामिनी के ज़ख्मों पर मरहम की तरह लगे।

उसे लगा था कि उसका बेटा उसे ‘कुलटा’ कहेगा, उसे घर से निकाल देगा, रमेश को सब बता देगा, लेकिन यहाँ तो उसका बेटा उसका वकील बन गया था। वह उसे समझ रहा था।

कामिनी की आँखों में जो आंसू थे, अब वे शर्म के नहीं, बल्कि एक अजीब सी ‘राहत’ के थे। उसे लगा जैसे उसका कोई अपना है, जो उसे उसके ‘काले सच’ के साथ भी स्वीकार कर रहा है।

“बंटी…” कामिनी का गला भर आया।
वह बिस्तर से उठी और बंटी के गले लग गई।
उसने अपने बेटे को कसकर भींच लिया।
उसका गाउन अभी भी पतला था, और उसके नीचे उसका बदन नंगा और गीला था।
जब उसने बंटी को गले लगाया, तो उसके भारी, आज़ाद स्तन बंटी की छाती में दब गए।

रघु की लार और कामिनी का पसीना बंटी की टी-शर्ट में समाने लगा।
लेकिन न बंटी पीछे हटा, न कामिनी।

“तू… तू इतना बड़ा कब हो गया रे?” कामिनी बंटी को अपने सीने मे दबा रोने लगी। “तूने अपनी माँ को पहचान लिया…”
बंटी ने अपने हाथ कामिनी की पीठ पर फेरे।
“मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ माँ,” बंटी ने उसके कान में फुसफुसाया। “चाहे तुम कुछ भी करो… चाहे तुम किसी के भी साथ रहो। अगर तुम्हें खुशी मिलती है, तो मुझे मंजूर है।”

कामिनी को एक अजीब सा सुकून मिला। माँ बेटे के बीच समझादरी का रिश्ता पनप चूका था,

बंटी ने कामिनी को अलग किया।
कामिनी ने अपने अस्त-व्यस्त बालों और कपड़ो को ठीक किया, उसके स्तन गाउन से बहार सरक आये थे, जिसे जल्दी से ठीक करना चाहा.
“मै तो देख ही चूका हूँ माँ, मुझसे क्या छुपाना ” बंटी ने चुटकी लेते हुए कहाँ.
“हट बदमाश… माँ पर बुरी नजर रखता है ” कामिनी ने बंटी के कान पकड़ लिए.
“स… Sorry… माँ लेकिन आप जैसी सुंदरी हो तो देखने मे क्या बुराई है ”
“बिगड़ गया है तु बहुत ” कामिनी ने कान ऐंठ दिए, लेकिन गाउन को ठीक नहीं किया, उसके स्तन बंटी के सामने ही झूल थे,

“अच्छा.. अच्छा…अब जाओ… नहा लो,” बंटी ने उसकी नाक को प्यार से छुआ। “बहुत गंदी हो रही हो। रघु की बदबू आ रही है तुमसे।”
उसकी आवाज़ में कोई घिन नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा ‘रोमांच’ था।
“मैं… मैं अभी नहाती हूँ,” कामिनी ने सिर हिलाया।
वह बाथरूम की तरफ मुड़ी।

बंटी की नज़रें अपनी माँ के गाउन के नीचे से हिलती हुई गांड पर टिक गईं, और हाथ पैंट मे बने उभार को सहलाने लगा.
बंटी दुनियादारी की बात तो कर गया, लेकिन अभी भावना खुल के नहीं बता सका.
बंटी खुद के सर पर टल्ली मार के हस पड़ा, उसे अपने दिल मे एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई, अब उसे चोरी छिपे अपनी माँ को देखने की जहमत नहीं उठानी होगी.
बंटी बिस्तर के आगोश मे समा गया.
*******************

सुबह के 10 बज चुके थे। रमेश और शमशेर नाश्ता करके अपने-अपने काम पर निकल गए थे। घर में अब सिर्फ़ कामिनी और बंटी थे।
कामिनी आज सचमुच दमक रही थी। लाल साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज मे कामिनी कामदेवी लग रही थी,
कल रात की थकान के बावजूद, उसके चेहरे पर एक अजीब सा निखार था। यह निखार शायद इसलिए था क्योंकि बरसों बाद घर में कोई ऐसा था—उसका अपना बेटा बंटी—जो उसकी फ़िक्र करता था, जो उसे जज नहीं कर रहा था।
कामिनी रसोई में काम कर रही थी, लेकिन उसका ध्यान बार-बार खिड़की से बाहर स्टोर रूम की तरफ जा रहा था।

दरवाज़ा अभी भी बंद था। रघु बाहर नहीं आया था।
कामिनी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। ‘इतनी देर तो कभी नहीं सोता वो… कहीं कल रात ज्यादा…’
उसने चाय का कप ट्रे में रखा और हॉल में बैठे बंटी को आवाज़ दी।
“बंटी… अरे बंटी… सुन तो।”
बंटी टीवी देख रहा था, उसने मुड़कर देखा।
“क्या हुआ माँ?”
“वो रघु… अब तक उठा नहीं। देख तो ज़रा, घर पर है भी या नहीं? यह चाय उसे दे आ।”
बंटी ने बिना कोई सवाल किए ट्रे उठाई और स्टोर रूम की तरफ चल दिया।
कामिनी उसे जाता देखती रही।
बंटी स्टोर रूम के पास पहुंचा। दरवाज़ा हल्का सा खुला था (जो कामिनी ने रात को छोड़ा था)।
उसने पैर से दरवाज़ा धकेला और अंदर कदम रखा।
लेकिन जैसे ही उसकी नज़र अंदर के नज़ारे पर पड़ी…
“छनन्न….!!”
उसके हाथ से चाय का कप छूटकर ज़मीन पर गिर गया। गरम चाय और कांच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए।
स्टोर रूम का नज़ारा किसी क्राइम सीन से कम नहीं था।
ज़मीन पर कामिनी की काली साड़ी के टुकड़े, फटा हुआ ब्लाउज और पेटीकोट के चीथड़े बिखरे पड़े थे—कल रात की वहशियत के सबूत।

लेकिन बंटी को जिस चीज़ ने चौंकाया, वह यह नहीं था।
उसने देखा कि रघु… वह हट्टा-कट्टा इंसान… अभी भी उसी जगह, खटिया के नीचे नंगा फ़र्श पर ओंधे मुंह पड़ा था।
बिल्कुल वैसे ही जैसे रात को गिरा था।
उसके शरीर में कोई हरकत नहीं थी।
बंटी का दिल ज़ोर से धड़का। वह तुरंत पीछे मुड़ा और घर की तरफ भागा।

“माँ… माँ…!”
कामिनी रसोई से दौड़कर बाहर आई। “क्या हुआ? क्यों चिल्ला रहा है?”
“माँ… वो… वो रघु…” बंटी की सांस फूल रही थी।
“वो उठ नहीं रहा। बिल्कुल हिल भी नहीं रहा।”
कामिनी का दिल धक से बैठ गया।

दिमाग में बुरे ख्यालों का तूफ़ान आ गया।
‘कहीं… कहीं वो मर तो नहीं गया? कल रात की शराब… या फिर मेरे साथ जो हुआ…’
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। “क्या बोल रहा है?”
बिना एक पल गंवाए, दोनों माँ-बेटे नंगे पैर स्टोर रूम की तरफ भागे।
कामिनी सबसे पहले अंदर घुसी।
उसने बिखरे हुए कपड़ों पर ध्यान नहीं दिया, वह सीधे रघु के पास घुटनों के बल बैठ गई।
रघु बेहोश पड़ा था। उसका विशाल शरीर पसीने में लथपथ था।
कामिनी ने कांपते हाथों से रघु के माथे को छुआ।
“ह्ह्क…!”
कामिनी ने झटके से हाथ पीछे खींच लिया।
“हे भगवान… बंटी… इसका जिस्म तो तवे की तरह तप रहा है! इसे तो बहुत तेज़ बुखार है।”
रघु की सांसें तेज़ चल रही थीं। वह कोमा जैसी हालत में था, लेकिन उसका दिमाग अभी भी कहीं और ही अटका था।
वह बुखार की तपिश में बड़बड़ा रहा था।
“सुगना… पानी… सुगना… मत जा… सुगना…”
उसकी आवाज़ फटी हुई और दर्दनाक थी। वह अभी भी अपनी मरी हुई बीवी को पुकार रहा था, या शायद कामिनी को, जिसे उसने रात भर ‘सुगना’ समझा था।

कामिनी की आँखों में आंसू आ गए। एक अजीब सी ममता और डर उसके दिल में उमड़ आया। यह आदमी, जिसने कल रात उसे जानवरों की तरह नोचा था, आज एक बेबस बच्चे की तरह पड़ा था।
“माँ… क्या करें?” बंटी भी घबरा गया था। “पापा को फोन करें?”

“नहीं!” कामिनी ने लगभग चीखते हुए कहा। “पापा को क्या बोलेंगे, उल्टा इसे बहार फेंक देंगे, उनमे दया नाम की चीज होती तो ये सब थोड़ी ना होता!”

कामिनी ने एक पल सोचा। उसे एक फैसला लेना था।
“बंटी… जल्दी जा,” कामिनी ने आदेश दिया। “बाहर से ऑटो बुलाकर ला। हम इसे हॉस्पिटल लेकर चलेंगे।”

“लेकिन माँ… पापा?”
“पापा की चिंता मत कर, मैं देख लूंगी। तू बस ऑटो ला… जल्दी!”

कामिनी की आवाज़ में एक नई ताकत थी—एक मालकिन की नहीं, एक ऐसी औरत की जो अपने ‘मर्द’ (भले ही वो नौकर हो) को मरते हुए नहीं देख सकती थी।

बंटी सिर हिलाकर गेट की तरफ दौड़ पड़ा।
कामिनी ने मुड़कर रघु को देखा। उसने अपना हाथ फिर से रघु के तपते हुए माथे पर रखा और उसके पसीने से भीगे बालों को सहलाया।
“कुछ नहीं होगा तुझे… मैं हूँ ना,” वह धीरे से फुसफुसायी।
रघु ने उसकी ठंडी हथेली महसूस की और नींद में ही अपना गाल कामिनी के हाथ पर रगड़ दिया।
“सुगना…”
****************


दोपहर के 12:15 हो रहे थे। अस्पताल के जनरल वार्ड में हल्की खामोशी थी, बस पंखे की चरमराहट और मशीनों की “बीप-बीप” की आवाज़ आ रही थी।
रघु के बिस्तर के पास लोहे के स्टैंड पर ग्लूकोज़ की बोतल टंगी थी, जिससे बूंद-बूंद करके दवा उसकी नसों में उतर रही थी।

बिस्तर के एक तरफ कामिनी स्टूल पर बैठी थी, और दूसरी तरफ बंटी खड़ा था। दोनों के चेहरों पर थकान थी, लेकिन सुकून भी था कि रघु खतरे से बाहर है।

करीब एक घंटे बाद, रघु के शरीर में हरकत हुई।
उसकी पलकें भारी थीं, जैसे अभी भी नींद का नशा बाकी हो। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।
उसे सबसे पहले अस्पताल की सफ़ेद छत दिखाई दी, फिर दवाइयों की तीखी गंध नाक में गई।
रघु का दिमाग सुन्न था। ‘मैं कहाँ हूँ? क्या हुआ था?’
उसने अपना सिर घुमाया।
और जैसे ही उसकी धुंधली नज़र साफ़ हुई, उसने अपने बगल में कामिनी और बंटी को देखा।
कामिनी… उसकी मालकिन… जो किसी देवी की तरह उसके सिरहाने बैठी थी। उसकी आँखों में चिंता थी।
और बंटी… छोटा मालिक… जो संजीदगी से उसे देख रहा था।
रघु की आँखों में एकदम से पानी भर आया।
एक गरीब नौकर के लिए यह बहुत बड़ी बात थी। मालिक लोग तो नौकरों के मरने पर भी नहीं आते, और यहाँ ये दोनों उसे अस्पताल लेकर आए, उसके सिरहाने बैठे रहे।
रघु का गला भर आया। उसे अपनी औकात और उनका अहसान दोनों याद आ गए।
वह उठने की कोशिश करने लगा।
“म-मालकिन… छोटे मालिक…” उसकी आवाज़ फटी हुई और कमज़ोर थी।
उसने हाथ जोड़ने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ में कैनुला (दवा की सुई) लगी थी।
“अरे… अरे… लेटे रहो,” कामिनी ने तुरंत झुककर उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे वापस लिटा दिया।
“बंटी जा थोड़ा जूस ले आ ”

उसका स्पर्श…
जैसे ही कामिनी का हाथ रघु के कंधे पर लगा, रघु के दिमाग में बिजली कौंध गई।

रघु की आँखों के सामने कल दिन की घटना और रात की धुंधली तस्वीर चलने लगी.
स्टोर रूम… शराब… सुगना…
नहीं! वो सुगना नहीं थी।
रघु की नज़रें कामिनी के चेहरे पर टिक गईं।
वही खुशबू… वही मखमली त्वचा… वही भारी स्तन…
रघु का दिल जोर से धड़का।
उसे याद आया कि कल रात उसने जिसे “सुगना” समझकर बाहों में भरा था, जिसके होठों को जानवरों की तरह चूसा था, जिसके स्तनों को काटा था और जिसकी चूत का पानी पिया था…
वह कोई और नहीं, यही कामिनी मालकिन थीं!

रघु का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया। कृतज्ञता (Gratitude) की जगह अब दहशत ने ले ली।
‘हे भगवान! मैंने मालकिन के साथ… मैंने उनका ब्लाउज फाड़ा… अपना लंड चूसने पर मजबूर किया..’

उसे लगा अब उसकी खैर नहीं। अब पुलिस आएगी, या कुछ बुरा होने वाला है.
वह कांपने लगा। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे।
“माफ़ कर दो मालकिन… मुझसे पाप हो गया… मुझे नहीं पता था… मैं शराब और हवास के नशे में था… मुझे पुलिस को दे दो…” रघु सिसकने लगा।

कामिनी ने रघु की घबराहट को समझा।
उसने इधर-उधर देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा। फिर उसने रघु का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
“शांत हो जा रघु… शांत,” कामिनी ने बहुत ही प्यार से कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सा अपनापन था।

रघु ने हैरान होकर कामिनी को देखा।
कामिनी की आँखों में कोई शिकायत नहीं थी। बल्कि, एक गहरी चमक थी—वही चमक जो कल रात स्टोर रूम में थी जब वह अपनी टांगें फैलाकर लेटी थी।

“तूने कुछ गलत नहीं किया रघु,” कामिनी ने धीरे से कहा, ताकि सिर्फ़ रघु और बंटी सुन सकें। “तू बीमार था… नशे में था। और कल रात… कल रात जो हुआ, वो हम दोनों की रज़ामंदी थी।”

रघु के आंसू बहे जा रहे थे, उसने ऐसा अपनापन कभी महसूस नहीं किया था,

“अब चुपचाप आराम कर। डॉक्टर ने कहा है कमज़ोरी है। जब ड्रिप खत्म हो जाएगी, हम घर चलेंगे।”

तब तक बंटी भी जूस ले आया था, जिसे रघु एक सांस मे पी गया, जूस का पेट मे जाना था की राहत महसूस हुई.
रघु बिस्तर पर पड़ा छत को घूरने लगा।

उसकी नसों में ग्लूकोज़ के साथ-साथ अब एक नई वफादारी भी दौड़ रही थी.
उसने मन ही मन कसम खाई— ‘मालकिन ने कभी जान भी मांगी , तो दे दूंगा।”
*****************

हॉस्पिटल के जनरल वार्ड में दोपहर की सुस्ती छाई हुई थी। ग्लूकोज़ की बोतल खाली हो चुकी थी और नर्स ने रघु के हाथ से सुई निकाल दी थी।
कामिनी ने राहत की सांस ली। उसने अपने पर्स से दवाइयों की पर्ची निकाली और बंटी की तरफ बढ़ाया।

“बंटी, तू डिस्चार्ज के पेपर साइन कर दे, मैं रघु को लेकर गेट पर आती हूँ,” कामिनी ने कहा।
रघु अभी भी कमजोरी महसूस कर रहा था, लेकिन मालकिन का साथ पाकर उसके चेहरे पर सुकून था। वह धीरे-धीरे बिस्तर से नीचे उतर रहा था। कामिनी नीचे रखा बैग कपड़े पकड़ाने ही वाली थी कि तभी…

वार्ड के सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी, कर्कश और मर्दाना आवाज़ गूंज उठी।
“अबे साले… क्या हो गया तुझे? आज दिन में ठेके पर नहीं आया? मैं साला पूरी दुनिया में ढूंढ रहा हूँ और तू यहाँ एसी की हवा खा रहा है?”
कामिनी और बंटी दोनों चौंक गए। उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा।
वार्ड के दरवाजे को लगभग धकेलते हुए एक हट्टा-कट्टा, लगभग 6 फीट लंबा इंसान धड़-धड़ाता हुआ अंदर घुस आया।

उसका हुलिया किसी भी शरीफ इंसान जैसा नहीं था।
उसने एक मैला-कुचैला सफ़ेद (जो अब मटमैला हो चुका था) कुर्ता-पाजामा पहन रखा था। कुर्ते की आस्तीन ऊपर मुड़ी हुई थी, जिससे उसकी कलाई पर बंधा काला धागा और बाज़ुओं के घने बाल दिख रहे थे।

सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके कुर्ते पर जगह-जगह ताज़े और सूखे हुए लाल छींटे (खून के धब्बे) लगे थे—जैसे वह अभी-अभी किसी बकरे को काट कर आ रहा हो।
रघु उसे देखते ही हड़बड़ा गया। उसने शर्मिंदा होकर अपनी नज़रें झुका ली।

“क-कादर भाई… तुम?”
वह शख्स, कादर खान, रघु के बिस्तर तक डग भरता हुआ आया। उसके चलने में एक अजीब सी लचक और गुंडागर्दी थी।
पास आते ही एक अजीब सी तीखी गंध ने कामिनी को घेर लिया।

यह गंध थी—कड़क तंबाकू, मीठे पान, सड़ी हुई देसी शराब और पसीने की।
कादर के मुंह में पान का बीड़ा ठुंसा हुआ था, जिससे उसके होंठ लाल हो रहे थे।
कादर ने रघु की पीठ पर एक जोरदार धौल (Thump) जमाई।

“साले… मैंने सुना बंगले वाली मैडम तुझे उठा के लाई हैं,” कादर ने अपनी लाल आँखों को नचाया।
और फिर… उसकी नज़र रघु से हटकर बगल में खड़ी कामिनी पर जा टिकी।
कामिनी उस वक़्त थोड़ी झुकी हुई थी, रघु का सामान समेट रही थी। उसका पल्लू कंधे से हल्का सरका हुआ था।
कादर की नज़रें कामिनी के चेहरे से शुरू होकर सीधे नीचे फिसलीं और उसके ब्लाउज के डीप नेक (Deep Neck) पर जाकर अटक गईं।

कामिनी के गोरे, भरे हुए स्तनों की घाटी वहां से साफ़ झांक रही थी।
कादर ने पान को मुंह के एक कोने में दबाया और एक गंदी, कामुक मुस्कान दी।

“सलाम मैडम जी…”
उसकी आवाज़ में इज़्ज़त कम और हवस ज्यादा थी।
उसने कामिनी को सिर्फ़ देखा नहीं, बल्कि अपनी नज़रों से ‘चाटा’। उसकी आँखें कामिनी के ब्लाउज के कपड़े को भेदकर अंदर के मांस को तौल रही थीं।
कामिनी को लगा जैसे किसी ने उस पर चिपचिपा कीचड़ फेंक दिया हो। वह सिहर उठी।

“रघु…” कादर ने कामिनी के स्तनों से नज़रें हटाए बिना कहा, “यही हैं क्या तेरी मालकिन?”

रघु घबरा गया। “हहह… हाँ.. कादर भाई। मालकिन, ये कादर खान है… पुराना दोस्त है मेरा। गोश्त (Meat) का काम करता है।”

कामिनी ने कादर खान को ऊपर से नीचे तक देखा।
एक जंगली जानवर जैसा मर्द। कुर्ते पर खून के धब्बे, गले में काला ताबीज़, और वो बदबू…
कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर अपने सीने पर लपेटा और अपनी नाक सिकोड़ ली।

“स… ससससस…लल्ल….. नमस्ते,” कामिनी ने बहुत मुश्किल से कहा। उसे उस आदमी से घिन आ रही थी, लेकिन साथ ही उसके पेट के निचले हिस्से में एक अजीब सी गड़बड़ाहट भी हो रही थी। उसकी वो घूरती हुई आँखें कामिनी को नंगा कर रही थीं।
कादर समझ गया कि मैडम असहज हो रही हैं, और उसे इसमें मज़ा आया।

उसने रघु की तरफ देखा जो अभी भी बिस्तर पर बैठा था।
“उठ बे… क्या लेटा है मुर्दे की तरह?”
“पर भाई… डॉक्टर ने…” रघु ने विरोध करना चाहा।
“अबे हटा डॉक्टर को…” कादर ने ज़ोर से कहा, जिससे पान की कुछ बारीक छींटे उड़कर फर्श पर गिरे।

“इन अंग्रेजी दवाइयों से कुछ नहीं होगा तेरा। तू मर्द है, तुझे मर्दो वाला इलाज चाहिए।”
कादर ने रघु का हाथ पकड़ा और उसे एक ही झटके में बिस्तर से खड़ा कर दिया।

रघु, जो अभी कमज़ोर लग रहा था, कादर की ताकत के आगे तिनके जैसा लगा।
“चल मेरे साथ… तेरा इलाज मेरे पास है,” कादर ने एक आँख दबाई।
“तुझे मटन-पाया का सूप पिलाऊंगा और अपनी वाली ‘स्पेशल फ्रूटी’ दूंगा। रात तक घोड़े की तरह हिनहिनाएगा तू।”

कादर ने ‘घोड़े’ शब्द बोलते वक़्त फिर से कामिनी की तरफ देखा, मानो कह रहा हो—’घोड़ा तैयार कर रहा हूँ तेरे लिए।’

रघु के चेहरे पर एक चमक आ गई। कादर की संगत और ‘देसी इलाज’ के नाम से ही उसकी आधी बीमारी गायब हो गई।

“ममम.. मै आता हूँ मालकिन….. कादर भाई के साथ जा रहा हूँ,” रघु ने जल्दी-जल्दी कहा। वह भूल गया कि वह बीमार था।

“लेकिन रघु…” कामिनी कुछ कहती, उससे पहले ही कादर ने रघु के कंधे पर हाथ रखा और उसे लगभग घसीटते हुए वार्ड से बाहर ले जाने लगा।

जाते-जाते कादर खान एक बार फिर पलटा।
उसने अपने कुर्ते की जेब से एक छोटी डिब्बी निकाली, उसमें से पान का बीड़ा उठा मुंह में डाला और कामिनी को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए बोला—
“फिक्र मत करो मैडम जी… आपका रघु रात तक एकदम ‘कड़क’ होकर लौटेगा। मशीन में तेल-पानी डालकर भेजूंगा।”

और एक भद्दी हंसी हंसते हुए वह रघु को लेकर बाहर निकल गया।
वार्ड में सन्नाटा छा गया।
कामिनी और बंटी एक-दूसरे को उल्लू की तरह देखते रह गए।

कामिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। कादर की वो बदबू अभी भी उसकी नाक में बसी थी और उसकी वो गंदी बातें उसके कानों में गूंज रही थीं।
‘मशीन में तेल-पानी…’ कामिनी का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो गया।

“इन लोगों का ऐसा ही है माँ,” बंटी ने शांति से कहा, जैसे उसे सब पता हो।

“ये लोग डॉक्टर से ज्यादा अपनी देसी दारू और खाने पीने पर भरोसा करते हैं।”

बंटी ने कामिनी के कंधे पर हाथ रखा।
“चलो घर चलें। रघु रात तक आ जाएगा।”
कामिनी ने बंटी की तरफ देखा, फिर खाली हुए बिस्तर की तरफ।
उसने अपना पर्स उठाया।
“हम्म्म… चलो,” कामिनी बुदबुदाई।
लेकिन जब वह हॉस्पिटल से बाहर निकल रही थी, तो उसके दिमाग में रघु नहीं, बल्कि खून के छींटों वाला कादर खान और उसकी भूखी नज़रें घूम रही थीं।

कामिनी ने रास्ते से दो जोड़ी नये t shirt और पाजामे ले लिए थे रघु के लिए.
घर पहुंचते हुए 4बज गए थे
ऑटो में पूरे रास्ते कामिनी चुप रही, लेकिन उसका दिमाग शोर मचा रहा था।
हॉस्पिटल के उस वार्ड में, जहाँ उसे रघु की चिंता होनी चाहिए थी, वहाँ उसके जेहन में कादर खान का चेहरा घूम रहा था।
उसका वो मैला-कुचैला कुर्ता, जिस पर शायद खून के छींटे थे (शायद वह कसाई का काम करता था)। उसके मुंह से आती सड़ी हुई शराब और तीखे पान की गंध। और सबसे बढ़कर… उसकी वो बेबाक, नंगी नज़रें।
कामिनी ने घर के सोफे पर बैठते हुए अपनी साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़ा।
उसे याद आया कि कैसे कादर की नज़रें सीधे उसके ब्लाउज के अंदर झांक रही थीं। उसने कोई शर्म नहीं की थी, कोई लिहाज़ नहीं किया था। रघु तो फिर भी “मालकिन” बोलकर डरता था, लेकिन कादर? उसकी आँखों में तो जैसे कामिनी को वहीं नंगा कर देने की हवस थी।
“छी… कितना गंदा आदमी था,” कामिनी ने बुदबुदाते हुए खुद को समझाने की कोशिश की।

लेकिन…
उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी ‘मीठी टीस’ उठी।
उस “छी” के पीछे एक “आह” छुपी थी।
कामिनी को हैरानी हुई कि उसे घिन आने के बजाय, अपने निप्पल खड़े होते महसूस हो रहे थे।
‘मैं कैसी औरत बन गई हूँ? पहले नौकर रघु, और अब वो मवाली जैसा कादर… मुझे ये गंदे मर्द ही क्यों अच्छे लग रहे हैं?’

बंटी, जो किचन से पानी पीकर आया, उसने कामिनी को ख्यालों में खोया देखा।

“क्या सोच रही हो माँ? रघु आ जाएगा,” बंटी ने सहजता से कहा।

कामिनी हड़बड़ा गई। “नहीं… मैं तो बस… वो आदमी कितना अजीब था ना बंटी? कैसे घूर रहा था मुझे।”
बंटी ने पानी का गिलास रखा और कामिनी के पास सोफे के हत्थे पर बैठ गया।

“मर्द है माँ… और तुम इतनी खूबसूरत हो। कोई अंधा ही होगा जो तुम्हें नहीं घूरेगा।”
बंटी ने कामिनी के कंधे पर हाथ रखा।
“और सच बताऊँ माँ? मुझे लगा तुम्हें उसका घूरना बुरा नहीं लगा।”
कामिनी का चेहरा लाल हो गया। बंटी फिर से उसकी चोरी पकड़ रहा था।
“बकवास मत कर…” कामिनी ने नज़रें चुराईं।

“अच्छा?” बंटी हँसा। “तो फिर तुम्हारे ये…” उसने अपनी नज़रें कामिनी के ब्लाउज पर गड़ा दीं, जहाँ उसके निप्पल ब्लाउज के अंदर से ही तने हुए दिख रहे थे। “…ये गवाही क्यों दे रहे हैं?”

कामिनी ने झट से पल्लू से अपना सीना ढक लिया।
“जा अपने कमरे में… बड़ा आया जासूस,” कामिनी ने डांटने का नाटक किया।
बंटी मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चल दिया। ”

बंटी के कमरे में जाने के बाद, हॉल में फिर से सन्नाटा छा गया। कामिनी ने एक गहरी सांस ली और अपनी नज़रें फिर से अपने सीने पर झुका लीं।
बंटी सही कह रहा था।
उसकी साड़ी के रेशमी कपड़े के नीचे, उसके ब्लाउज की कैद में, उसके निप्पल (Nipples) सचमुच पत्थर की तरह सख्त हो चुके थे। वे कपड़े को भेदकर बाहर आने के लिए मचल रहे थे।
कामिनी ने कांपते हाथों से अपने ब्लाउज के ऊपर से ही अपने स्तन को मुट्ठी में भरा।

एक बिजली सी उसके बदन में दौड़ गई।
“उफ्फ्फ्फ…”
यह उत्तेजना सामान्य नहीं थी। यह रघू की वहशीयत वाली उत्तेजना नहीं थी। यह कुछ और था… उस से भी ‘गंदा’।

कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
अंधेरे में उसे रघू का चेहरा नहीं, बल्कि कादर खान का चेहरा दिखाई दिया।
वह पान से रंगे लाल होंठ… वह गंदी हंसी… कुर्ते पर लगे वो खून के धब्बे… और उसके शरीर से आती वह तीखी, मर्दाना बदबू।
सामान्य तौर पर किसी भी सभ्य औरत को उबकाई आ जाती।
लेकिन कामिनी? कामिनी सामान्य औरत रही ही कहाँ थी, वो तो कुछ ओर ही हो चुकी थी.
कामिनी को अपनी जांघों के बीच नमी महसूस होने लगी।
‘क्या हो गया है मुझे?’ उसने मन ही मन खुद से सवाल किया।

कामिनी को याद आया कि कादर ने उसे ‘मालकिन’ नहीं, बल्कि एक ‘औरत’ की तरह देखा था। उसकी नज़रों में कोई इज़्ज़त नहीं थी, सिर्फ़ नंगा कर देने वाली हवस थी।
और यही बात… यही “अपमानित होने का डर” और “भोग की वस्तु समझे जाने का रोमांच” कामिनी को अंदर ही अंदर पिघला रहा था।

बरसों तक वह रमेश की ‘ट्रॉफी वाइफ’ बनकर रही, साफ़-सुथरी, महकती हुई गुड़िया।
लेकिन रघू के साथ उस स्टोर रूम की गंदगी में लोटने के बाद, उसके अंदर की ‘जानवर’ जाग चुकी थी।

उसे अब एहसास हो रहा था कि उसे सिर्फ़ प्यार नहीं चाहिए… उसे रौंदा जाना है। उसे वहशीपन चाहिए।
और कादर खान उस ‘वहशीपन’ का जीता-जागता पुतला था।
कामिनी का हाथ अनजाने में सरककर उसकी साड़ी के अंदर, उसकी जांघों के बीच चला गया।
पैंटी गीली हो चुकी थी।
उसने अपनी उंगली से उस गीलेपन को छुआ।

“हाँ..आअह्ह्ह… इस्स्स…..” कामिनी ने खाली कमरे में अपनी ही सिसकी सुनी। “बंटी सच कह रहा था… मुझे वो गंदा आदमी पसंद आया। मुझे उसका घूरना पसंद आया।”

एक अजीब सी थरथराहट उसके जिस्म में दौड़ गई।
कामिनी ने झटके से अपना हाथ बाहर निकाला। उसे खुद पर शर्म भी आ रही थी और गर्व भी।
उसने रघू के लिए लाए गए कपड़ों (टी-शर्ट और पाजामा) के थैले को देखा जो पास ही पड़ा था।
उसका ध्यान वापस से रघु की तरफ चला गया, अभी तक आया नहीं.
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शाम गहरा चुकी थी। घर के लैंडलाइन फ़ोन की घंटी बजी, जिससे ख्यालों में खोई कामिनी चौंक उठी।
फ़ोन रमेश का था।
“हेलो… सुनो, आज मुझे आने में देर हो जाएगी। शमशेर के साथ हूँ, कुछ काम है। तुम और बंटी खाना खाकर सो जाना।”
रमेश की आवाज़ में जो लड़खड़ाहट थी, वह साफ़ बता रही थी कि ‘काम’ नहीं, बल्कि ‘जाम’ चल रहा है।
“जी ठीक है,” कामिनी ने छोटी सी बात कहकर फ़ोन रख दिया।
फ़ोन रखते ही उसने राहत की एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई।

करीब 8 बजे के आसपास, पीछे के गेट से आहट हुई।
रघु घर आ गया था।
कामिनी ने किचन की खिड़की से झांककर देखा। आज रघु की चाल में वो शराबी वाली लड़खड़ाहट नहीं थी। उसके कदम ज़मीन पर मज़बूती से पड़ रहे थे।

रघु सीधा अपने स्टोर रूम की तरफ बढ़ा।
जैसे ही उसने स्टोर रूम का दरवाज़ा खोला और बत्ती जलाई, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
हमेशा कबाड़खाने जैसा दिखने वाला उसका कमरा आज बदला हुआ था।
उसकी पुरानी, चरमर करती खटिया पर एक साफ़-सुथरी, सफ़ेद चादर करीने से बिछी हुई थी। और खटिया के सिरहाने, एक थैले में दो नई टी-शर्ट और पाजामे रखे थे।
रघु का दिल भर आया। वह समझ गया कि यह सब मालकिन ने किया है।
उसने उन कपड़ों को हाथ में लिया, उन्हें अपनी नाक से लगाकर सूंघा। उनमें से कामिनी की महक आ रही थी।

“मालकिन…” रघु बुदबुदाया। उसके मन में कामिनी के लिए जो हवस थी, उसमें अब एक गहरा ‘एहसान’ और ‘कर्तव्य’ (Duty) भी जुड़ गया। उसने तुरंत अपने मैले कपड़े उतारे और कामिनी के लाए हुए नए कपड़े पहन लिए।

उधर शहर के बाहर, एक ढाबे पर:
हाईवे के किनारे बने एक छोटे ढाबे के बाहर धूल उड़ाती हुई पुलिस की जीप आकर रुकी।
जीप के बोनट पर ‘पुलिस’ लिखा था और अंदर रमेश और शमशेर बैठे थे, जो पहले से ही फुल टुन्न थे।

“यहाँ का मटन शानदार होता है भाई, कल की कसरत के बाद ये खाना ज़रूरी है,” शमशेर ने जीप से उतरते हुए अपनी बेल्ट ठीक की। उसकी आँखों में कल रात सुनैना के साथ बिताए पलों की चमक थी।
रमेश भी लड़खड़ाते हुए उतरा।
“अबे कितना जलाएगा मुझे? साला मैं जोश-जोश में ज्यादा पी गया, वरना मैं भी पेल लेता उस रंडी को,” रमेश ने कुंठा में अपने ढीले-ढाले लंड को पैंट के ऊपर से ही टटोला। उसे अभी भी मलाल था कि सुनयना जैसी औरत उसके हाथ से निकल गई।

“हाहाहाहा…. कहाँ जाएगी?” शमशेर ने रमेश के कंधे पर ज़ जोर से हाथ मारा। “अब तो वो फंस गई समझ। हम दोनों से कोई बचा है आखिर?”
दोनों ने एक वहशी ठहाका लगाया और ढाबे की एक खाली खटिया की तरफ बढ़ गए।

“हाँ भाई कादर… लगा दे दो स्पेशल थाली!” शमशेर ने अपनी रौबदार आवाज़ में आर्डर दिया।
आवाज़ सुनते ही, ढाबे के अंदर से कादर खान मुँह में पान चबाते हुए भागता हुआ आया।
“अरे आइये साब… आज बड़े दिन बाद दिखे!” कादर ने झुककर सलाम ठोका।
“काम था बे,” शमशेर ने अकड़ दिखाई। “ये रमेश साब हैं, खास दोस्त मेरे। इनको अपना वो ‘स्पेशल मटन पाया सूप’ पिला… ऐसा कि जवानी फिर से भड़क जाए। इनका इंजन ठंडा पड़ा है।”

रमेश ने कादर को देखा। यह वही शख्स था जो आज दोपहर कामिनी को हॉस्पिटल में मिला था। उसका हुलिया अब भी वैसा ही था—कुर्ते पर खून और मसालों के दाग, और पान की लाली।
कादर की यहाँ कसाई की दुकान भी थी और पीछे यह ढाबा भी।
“फिक्र मत करो साब,” कादर ने रमेश को घूरते हुए एक गंदी हंसी हंसी। “ऐसा मटन खिलाऊंगा कि मुर्दे में भी जान आ जाए। सुबह तक आपका तंबू खड़ा रहेगा।”

“छोटू… जल्दी लगा थाली!” कादर ने अपने नौकर को चिल्लाया।
“और कोई दिक्कत?” शमशेर ने अपने बाजु (Side pocket) से व्हिस्की का एक क्वार्टर निकालकर स्टील के गिलास में डाला।

“आपके रहते क्या मुसीबत मालिक,” कादर ने हाथ जोड़े।
दरअसल, कादर सिर्फ़ मटन नहीं बेचता था। कसाई के धंधे की आड़ में वह ड्रग्स (गांजा-अफीम) की पुड़िया भी सप्लाई करता था, और शमशेर उसे पुलिस से बचाकर रखता था। यह उनका पुराना धंधा था।

“जा तू… माल बढ़िया होना चाहिए,” शमशेर ने इशारा किया।

वापस घर पर:
घड़ी में 9 बज रहे थे। कामिनी और बंटी अपना खाना खा चुके थे।
“आओ माँ… रघु के हाल-चाल जान लें। वो भूखा भी होगा,” बंटी ने कहा।

उसने दो मोटी रोटियां और सब्ज़ी एक स्टील की थाली में रखी।
कामिनी ने अपना पल्लू ठीक किया और बंटी के साथ पीछे के आंगन में बने स्टोर रूम की तरफ चल दी।
दरवाज़ा खुला था।
अंदर रघु खटिया पर बैठा था। उसने कामिनी की दी हुई नीली टी-शर्ट और पाजामा पहन रखा था। साफ़ कपड़ों में वह अब नौकर कम और घर का सदस्य ज्यादा लग रहा था।
“क्या बात है रघु… अच्छे लग रहे हो,” बंटी ने अंदर घुसते ही कहा।
रघु हड़बड़ा कर खड़ा हो गया। “जी… छोटे मालिक।”
“अब तबियत कैसी है?” कामिनी ने बड़े प्यार से पूछा। उसकी नज़रें रघु के चौड़े सीने पर थीं जो टी-शर्ट में उभर रहा था।

“दिख नहीं रहा माँ? तरोताज़ा दिख रहा है,” बंटी ने रघु की बांह पर रखा थपकी दी।
“देसी दवाई का असर है।”

रघु ने शर्म से नज़रें झुका लीं। वह कामिनी से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
“जी.. जी… छोटे मालिक.. वो आदत है, बिना देसी के बीमार हो जाता हूँ।”

“ये लो खाना खा लो,” बंटी ने खाने की थाली रघु के हाथ में पकड़ा दी।
रघु वापस खटिया पर बैठ गया। कामिनी और बंटी सामने खड़े रहे।
रघु ने सब्ज़ी की कटोरी से एक निवाला तोड़ा।
अभी वह निवाला उसके मुंह तक पहुंचा भी नहीं था कि बंटी ने अचानक एक ऐसा सवाल दागा जिसने कमरे का माहौल बदल दिया।

“वैसे रघु… ये ‘सुगना’ कौन है?”
बंटी की आवाज़ शांत थी, लेकिन सवाल किसी बम धमाके से कम नहीं था।
रघु का हाथ हवा में ही जम गया।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया। नशा, बीमारी, हवस… सब एक पल में गायब हो गए।
“खट…” उसके हाथ से रोटी का टुकड़ा छूटकर थाली में गिर पड़ा।
कामिनी भी सकते में आ गई। उसका दिल ज़ोर से धड़का।
‘सुगना…?’ उसे याद आया कि रघु बुखार में यही नाम बड़बड़ा रहा था। और कल रात… कल रात उसने कामिनी को भी ‘सुगना’ ही बुलाया था।

कामिनी ने घबराकर बंटी को देखा। ‘ये क्या पूछ लिया इसने?’
लेकिन बंटी के चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी।
उसने कामिनी की तरफ देखा और धीरे से एक आँख झपका दी (Winked)।
बंटी धीरे से फुसफुसाया — “घबराओ मत माँ…. आखिर हमें ये तो मालूम हो जो हमारे घर मे रह रहा है “आखिर वो है कौन?”

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। रघु की सांसें अटक गई थीं। वह चोर की तरह कभी बंटी को तो कभी कामिनी को देख रहा था।
“ब… ब… वो… वो सुगना…” रघु हकलाने लगा.

स्टोर रूम में एक भारी सन्नाटा छा गया था। रघु के हाथ से रोटी का निवाला छूट चुका था। उसकी आँखों में वो पुराना, दबा हुआ दर्द किसी सैलाब की तरह उमड़ आया था।
उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों को अपनी मुट्ठी में भींचा और सिर झुका लिया।
“सुगना…” रघु की आवाज़ किसी गहरे कुएं से आती हुई महसूस हुई।
“सुगना मेरी पत्नी थी, छोटे मालिक।”
कामिनी और बंटी चुपचाप खड़े रहे, रघु के अगले शब्दों का इंतज़ार करते हुए।
रघु ने अपनी गीली आँखें ऊपर उठाईं और दीवार की तरफ घूरते हुए बोलना शुरू किया।

“मेरी शादी को अभी सिर्फ़ 2 साल हुए थे। मैं किशनगंज नाम के एक छोटे से गाँव का रहने वाला था। तब मैं ऐसा नहीं था… मैं एक हट्टा-कट्टा, 22 साल का मेहनती गबरू जवान था। मेरे पास अच्छी-खासी पुश्तैनी ज़मीन थी, खूब खेती होती थी। मुझे किसी का डर नहीं था।”

रघु के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई।
“मैं अपनी सुगना के साथ बहुत खुश था। वो बहुत खूबसूरत थी… बिल्कुल…” रघु की नज़र एक पल के लिए कामिनी पर गई और फिर झुक गई। “…बिल्कुल मालकिन जैसी भरी-पूरी। उस वक़्त वो गर्भवती थी। हमारे घर में किलकारी गूंजने वाली थी। हमारा भविष्य बहुत सुनहरा लग रहा था।”

रघु की आवाज़ भारी होने लगी।
“लेकिन फिर हमारी खुशियों को नज़र लग गई। सरकार का आर्डर आया कि हमारे गाँव से हाईवे निकलेगा। मेरी ज़मीन रोड के नक़्शे में आ गई। हमें बताया गया कि ज़मीन के बदले करोड़ों का मुआवज़ा मिलेगा।”

“कुछ दिनों बाद, नपाई-जोखाई करने के लिए शहर से एक ‘सिविल इंजीनियर’ आया।”
रघु की मुट्ठी कस गई, उसकी नसों में गुस्सा दौड़ने लगा।
“मुझे अपनी पुश्तैनी ज़मीन जाने का गम था, लेकिन आने वाले बच्चे और पैसे की खुशी भी थी। वो इंजीनियर कई बार मेरे घर आया। वो कागज़ात देखने के बहाने आता, लेकिन मैं… मैं मूर्ख समझ ही नहीं पाया कि उसकी गिद्ध जैसी नज़र ज़मीन पर नहीं, मेरी बीवी सुगना पर थी।”

“पूरे गाँव वालों को मुआवज़ा मिल गया, बस मेरा ही पैसा अटक गया। जब मैंने उस इंजीनियर से शिकायत की, तो वो बोला—’तेरी ज़मीन बड़ी है रघु, वक्त लगेगा’।”

रघु की आँखों से आंसू टपक कर उसकी जांघों पर गिरने लगे।
“एक काली रात… वो इंजीनियर नशे में धुत मेरे घर आ धमका। वो सीधा मेरे पास आया और बोला—’तुझे पैसे चाहिए ना? तो अपनी बीवी को एक रात के लिए मेरे पास छोड़ दे’।”

कामिनी के मुंह से एक सिसकी निकल गई। उसने अपने मुंह पर हाथ रख लिया।

रघु बोलता रहा, “वो मेरी बीवी का दीवाना था। सुगना का भरा हुआ बदन, उसके बड़े स्तन और गर्भावस्था में उभरा हुआ उसका पेट… वो राक्षस उस हालत में भी मेरी बीवी को भोगना चाहता था। मेरा खून खौल उठा। मैंने आव देखा न ताव, उस इंजीनियर के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया और उसे धक्के मारकर घर से निकाल दिया।”

“जाते-जाते वो अपनी लाल आँखों से मुझे घूरते हुए बोला—’बहुत गर्मी है तुझमें? तेरी ये गर्मी मैं निकालूंगा’।”

“मैं अगले दिन शहर जाकर बड़े अफ़सरों से शिकायत करने वाला था, लेकिन…” रघु का गला रुंध गया।

“अगली ही रात वो वापस आ गया। इस बार वो अकेला नहीं था। उसके साथ एक बड़ी मूंछों वाला पुलिस वाला भी था।”
“उस पुलिस वाले ने आते ही मुझे दबोच लिया। उसने मुझे रस्सी से कुर्सी पर बांध दिया। मैं चीखता रहा, हाथ-पैर मारता रहा।”

“और फिर… उस इंजीनियर ने मेरे सामने… मेरी आँखों के सामने मेरी इज़्ज़त, मेरी सुगना को बालों से पकड़कर घसीटा।”
रघु अब फूट-फूट कर रो रहा था।

“उस राक्षस ने मेरी गर्भवती बीवी के कपड़े फाड़ दिए। उसने उसे नंगा कर दिया। वो जानवर उसके जिस्म को आटे की तरह मसलने लगा। वो खुद भी नंगा हो गया।”
“लेकिन शायद भगवान का श्राप था या ज़्यादा नशा… उस नामर्द का लंड खड़ा नहीं हो रहा था।”

रघु की आवाज़ में घृणा और दर्द का तूफ़ान था।
“वो पागल हो गया था। ‘साली खड़ा कर इसे… चाट… चाट इसे…’ वो चिल्ला रहा था। वो मेरी सुगना को मार रहा था, उसके नाज़ुक स्तनों को दांतों से काट रहा था, उसके पेट पर घूंसे मार रहा था। सुगना दर्द से रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी, लेकिन उसे सुगना के आंसुओं में मज़ा आ रहा था।”

“मैं उस पुलिस वाले से दया की भीख मांगता रहा, लेकिन वो मुझे जूतों से मारता रहा।”
“जब उस इंजीनियर का लंड खड़ा नहीं हुआ, तो वो वहशीपन की सारी हदें पार कर गया। उसने गुस्से में आकर अपना पूरा हाथ… मेरी बीवी की नाज़ुक योनि के अंदर घुसा दिया।”
“धाओ… धप… धप…” रघु ने अपनी छाती पीट ली।

“वो अपना हाथ अंदर-बाहर करने लगा, पागलों की तरह उसे चाटने लगा। मेरी बीवी की चीखें आसमान चीर रही थीं, लेकिन उस शैतान का दिल नहीं पसीजा। थोड़ी देर में… बिना कुछ किए ही वो झड़ गया। उसकी वीर्य की पिचकारी बाहर ही निकल गई।”

“अपनी नामर्दी पर वो और भड़क गया। उसकी नज़र पास पड़े एक लोहे के सरिये (Iron Rod) पर गई।”
रघु की आँखें दहशत से फैल गईं, जैसे वो मंज़र अभी भी उसके सामने हो।

“वो चिल्लाया—’साली लंड भी खड़ा नहीं कर सकती! किस काम की औरत है तू!’… और…”
रघु कांपने लगा।
“और उसने वो लोहे का सरिया… मेरी फूल जैसी बीवी की योनि में पूरी ताकत से घुसा दिया।”

“आआआहहहह…… !!!”
कामिनी की चीख निकल गई। बंटी भी सिहर उठा।

“मेरी सुगना के मुंह से खून की उल्टी निकली। उसकी आँखों की पुतलियां पलट गईं। एक ही झटके में सब खत्म हो गया… मेरी बीवी… मेरा अजन्मा बच्चा… सब मार दिए गए।”
रघु ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।

“मैं वो नज़ारा देख नहीं सका… मैं बेहोश हो गया।”
“जब सुबह मेरी आँख खुली… तो मेरे घर के बाहर पुलिस खड़ी थी। वही पुलिस वाला, जो रात को उस राक्षस के साथ था, मुझे कॉलर से घसीटता हुआ बाहर ले जा रहा था।”

“गाँव वाले जमा थे। पुलिस वाला चिल्ला रहा था—’साले, अपनी ही बीवी को मार डाला! ऐसा कोई करता है क्या!'”

“वो इंजीनियर भीड़ में खड़ा होकर मगरमच्छ के आंसू बहा रहा था। मुझे ही मेरी बीवी और बच्चे का हत्यारा बना दिया गया।”

“मैं जेल गया, सब कुछ बिक गया, और जब छूटा… तो यहाँ, इस शहर में एक ज़िंदा लाश बनकर आ गया।”
कमरे में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ रघु की सिसकियाँ गूंज रही थीं।
कामिनी की आँखों से आंसू बहकर उसके गालों को भिगो रहे थे। बंटी, जो हमेशा सख्त बनने का नाटक करता था, उसकी आँखें भी नम थीं।
उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस इंसान को वे सिर्फ़ एक ‘नौकर’ या गन्दा शराबी समझ रहे थे, उसके सीने में कितना गहरा ज़ख्म और कितना खौफनाक अतीत दफ़न था।

रघु की वहशियत, उसका पागलपन… सब उस एक रात की देन थे।
कामिनी ने आगे बढ़कर रघु के सिर को अपनी छाती से लगा लिया।
आज उसे रघु पर वासना नहीं, बल्कि एक माँ जैसी ममता और एक औरत जैसा गहरा दुख महसूस हो रहा
था।

वही दूसरी तरफ
स्थान: कादर खान का ढाबा

रात के सन्नाटे में जीप का इंजन गूंजा। रमेश और शमशेर, मटन और शराब के नशे में आकंठ डूबे हुए, कादर के ढाबे से उठ खड़े हुए। उन्होंने पैसे देने की ज़हमत नहीं उठाई। कादर तो वैसे भी उनका ही पाला हुआ गुंडा था, उसकी क्या मजाल कि वह शमशेर साहब से पैसे मांगता। वह दूर खड़ा बस सलाम ठोकता रहा।
रमेश लड़खड़ाते कदमों से जीप की अगली सीट पर धंस गया। उसका नशा गहरा था, लेकिन हवस का नशा उससे भी ज्यादा था। उसका दिमाग अभी भी उस सुनैना (जिसके साथ कल छत पर कांड हुआ था) पर अटका हुआ था।
“हरामी…” रमेश ने शमशेर के कंधे पर मुक्का मारा, “तूने मुझे जगाया भी नहीं? कम से कम उसकी चूत ही चाट लेता मैं… साली हाथ से निकल गई।”
शमशेर ने जीप स्टार्ट की और एक कमीना ठहाका लगाया।
“हाहाहाहा… अबे कितना रोएगा उसके लिए?” शमशेर ने गियर बदलते हुए कहा, “तुझे वो ‘सुगना’ याद है? वो किशनगंज वाली?”
रमेश की धुंधली आँखों में एक चमक आ गई।
“किशनगंज…?” रमेश ने अपनी जीभ होठों पर फेरी, जैसे किसी पुराने शिकार का स्वाद याद आ गया हो। “हाँ, याद है… क्या माल थी साली। उसका तो रोना भी बड़ा सेक्सी लगता था। लेकिन उसका क्या?”
शमशेर ने स्टीयरिंग पर उंगलियां नचाईं। “तेरी एक खासियत है रमेश… तेरी नज़र एक बार जिस औरत पर पड़ गई, उसका बचना नामुमकिन है। याद है उस सुगना का क्या हश्र किया था हमने? बस समझ ले, अब ये सुनैना भी गई।”
दोनों दोस्त उस सुनसान हाइवे पर जोर-जोर से हंस पड़े। उनकी हंसी में कोई पछतावा नहीं था, सिर्फ़ शैतानी अहंकार था।
“सही कह रहा है,” रमेश ने अपनी सीट पीछे की। “चुपचाप देगी तो रानी बना के रखूँगा… वरना…” उसका चेहरा सख्त हो गया, “वरना उसका भी वही हाल होगा जो उस गँवार की बीवी का हुआ था।”

जीप धूल उड़ाती हुई अंधेरे में गायब हो गई, लेकिन उनकी पाप भरी बातें हवा में ज़हर घोल गईं।

स्थान: कामिनी का घर (स्टोर रूम)

स्टोर रूम में मौत जैसा सन्नाटा पसरा था। रघु की कहानी खत्म हो चुकी थी, लेकिन उसका दर्द अभी भी कमरे की हवा में तैर रहा था।
कामिनी की आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस आदमी को वह शराबी और गिरा हुआ समझती थी, उसकी ज़िंदगी इतनी बड़ी त्रासदी है।

कामिनी ने खुद को संभाला। उसके अंदर एक गुस्सा उबलने लगा।
“रघु…” कामिनी ने भारी आवाज़ में पूछा, “तुम्हें उस इंजीनियर की शक्ल याद है? तुमने उसे ढूंढने की कोशिश नहीं की? और वो पुलिस वाला… उसका चेहरा तो याद होगा?”

कामिनी रघु के करीब आई, मानो उसे अभी इन्साफ दिला देगी।
रघु ने एक गहरी, हताश सांस ली और कामिनी के हाथों से अपना हाथ छुड़ा लिया।.

“मालकिन…” रघु की आवाज़ में जीवन की कोई उम्मीद नहीं बची थी।
“मैं 10 साल जेल में रहा। कालकोठरी का अंधेरा, रोज़ की मार, पुलिस वालों की गालियां… वो सब सहते-सहते मेरा दिमाग सुन्न हो गया। मुझे अब कुछ याद नहीं। उस इंजीनियर का चेहरा, उसका नाम… सब धुंधला हो गया है। और पुलिस वाला ? पुलिस वाले तो अब मुझे सब एक जैसे ही लगते हैं—वर्दी वाले राक्षस।”

रघु ने अपनी सूजी हुई आँखों को रगड़ा।
“जेल में मुझे कादर भाई मिला था। उसका आना जाना लगा रहता था जेल मे। बस उसी ने मेरा दर्द समझा, मुझे जिन्दा रखा। जब मैं वहां से छूटा, तो मेरे पास जाने को कोई जगह नहीं थी।

मैं इसी शहर में आ गया। कुछ दिन कादर भाई के ढाबे पर रहा, लेकिन कब तक अहसान लेता? छोटा-मोटा काम करने लगा, कबाड़ा बेचता, मजदूरी करता, फिर रात मे जहाँ जगह मिलती वहाँ थक के सो जाता, ऐसे ही आपके बँगले के बहार आ कर सोने लगा था मै”

रघु ने दीवार की तरफ देखा, जहाँ उसका पुराना जीवन कहीं खो गया था।
“लेकिन ये ग़म… सुगना की याद… ये मुझे जीने नहीं देती थी। इसलिए ये शराब… बस यही अब मेरा सहारा है, मेरा अंतिम लक्ष्य है। अब किसी से बदला नहीं लेना मालकिन… बस मौत का इंतज़ार करना है। यही मेरी ज़िंदगी है।”

रघु के आंसू अब सुख चुके थे। उसकी आँखों में एक वीरान रेगिस्तान था। उसने अपनी बात खत्म की और सिर झुका लिया।
कामिनी का दिल पसीज गया। वह आगे बढ़ी और रघु के सिर पर हाथ फेरने लगी, उसे मूक सांत्वना देती हुई। वह रो रही थी, एक औरत होने के नाते सुगना का दर्द और एक इंसान होने के नाते रघु की तड़प उसे अंदर तक बेध गई थी।

लेकिन… कमरे के दूसरे कोने में खड़ा बंटी रो नहीं रहा था।
बंटी का दिमाग किसी कंप्यूटर की तरह तेज़ी से चल रहा था। रघु की बातों ने उसके अंदर शक की एक चिंगारी सुलगा दी थी।
“किशनगंज…”
यह शब्द बार-बार बंटी के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था।
उसे याद आया… बचपन में जब दादाजी ज़िंदा थे, तो वो अक्सर बातों-बातों में बताते थे— “तेरा बाप जब नया-नया इंजीनियर बना था, तो उसकी पहली बड़ी पोस्टिंग किशनगंज में हुई थी। हाईवे प्रोजेक्ट था।”
बंटी की मुट्ठी अपने आप भींच गई।
इंजीनियर… हाईवे प्रोजेक्ट… पुलिस वाला दोस्त (शमशेर अंकल)… और किशनगंज।
सारे तार जुड़ रहे थे।

रघु ने जिसे ‘राक्षस’ कहा, जिसे ‘वहशी’ कहा… क्या वो कोई और नहीं बल्कि उसका अपना बाप रमेश था?
और वो पुलिस वाला… क्या वो शमशेर था?

बंटी का खून जमने लगा। उसे अपने बाप की असलियत पता थी, वह जानता था कि रमेश घर में कैसा है, लेकिन क्या वह इतना गिर सकता है? क्या वह किसी की बीवी के प्राइवेट पार्ट में लोहे की रॉड डाल सकता है?

बंटी के जबड़े आपस में इतनी जोर से भिंचे कि दांतों के पीसने की आवाज़ आई।
उसने रघु को देखा—यह बदनसीब आदमी, जिसकी ज़िंदगी बर्बाद हो गई, आज उसी कातिल के घर में नौकरी कर रहा है? उसी कातिल के बेटे और बीवी के सामने रो रहा है?

बंटी की आँखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक ठंडी आग थी।
‘मुझे पता लगाना होगा, मुझे शक को यकीन में बदलना होगा। और अगर यह सच निकला… तो पापा, आपका हिसाब अब मैं करूँगा।’

स्टोर रूम में रघु की दर्दनाक दास्तां और बंटी के दिमाग में चल रही उधेड़बुन के बीच, बाहर से आती गाड़ी की तेज़ आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया।
“पूँ… पूँ… पूँ…!”
हॉर्न की कर्कश आवाज़ लगातार बज रही थी।
कामिनी और बंटी एक झटके में हकीकत में लौटे।

“पापा आ गए,” बंटी ने कड़े स्वर में कहा।
कामिनी ने हड़बड़ाकर अपनी साड़ी ठीक की और अपने आंसुओं को पोंछा। “चल बंटी, देख तो…”

दोनों माँ-बेटे स्टोर रूम से निकलकर तेज़ कदमों से आंगन पार करते हुए पोर्च की तरफ भागे।
लोहे का बड़ा गेट खुला हुआ था और शमशेर की पुलिस जीप हेडलाइट जलाए अंदर घुस रही थी।
जीप पोर्च में आकर एक झटके के साथ रुकी।
बंटी और कामिनी पास पहुंचे ही थे कि पैसेंजर सीट का दरवाज़ा खुला और…
“धड़ाम…!”
रमेश किसी बोरी की तरह लुढ़कता हुआ जीप से बाहर निकला और ज़मीन पर गिरने ही वाला था कि उसने दरवाज़ा पकड़ लिया। वह नशे में इतना धुत था कि अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पा रहा था।

“उफ्फ्फ… रमेश…” कामिनी दौड़कर आगे बढ़ी और रमेश का एक हाथ अपने कंधे पर रखकर उसे संभालने की कोशिश की। रमेश का पूरा भार कामिनी के नाजुक कंधों पर आ गया।

“बंटी… आ ना, मदद कर… गिर जाएंगे ये,” कामिनी ने पलटकर बंटी को आवाज़ दी।
लेकिन बंटी अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला।
उसकी आँखों में अपने बाप के लिए घृणा का ज्वालामुखी धधक रहा था।

अभी कुछ पल पहले उसने सुना था कि एक इंजीनियर और पुलिस वाले ने कैसे रघु की ज़िंदगी बर्बाद की थी। उसे अपने बाप के हाथों में खून नज़र आ रहा था।

“मैं हाथ नहीं लगाऊंगा इस आदमी को,” बंटी ने धीरे से अपने आप मे गुर्राया,

बंटी ने एक बार शमशेर को घूरा, जिसने वर्दी पहन रखी थी (वही वर्दी जिसे रघु ने ‘राक्षस’ कहा था), और फिर पैर पटकता हुआ गुस्से में घर के अंदर चला गया।
इधर शमशेर, जो खुद भी नशे में झूम रहा था, ड्राइविंग सीट से उतरा।

“अरे… छोड़ो उस लौंडे को भाभीजी… इस उम्र मे लड़के अपने बाप को कहाँ कुछ समझते है,” शमशेर ने अपनी बेल्ट ठीक करते हुए एक कुटिल मुस्कान दी।

“चल मैं चलता हूँ अब,” शमशेर ने लड़खड़ाते हुए कहा।
“इन्हे अंदर तक तो ले चलो ” कामिनी ने निरीह आवाज़ मे कहाँ, उसे अब भी अपना पत्नी होने का इल्म था.

शमशेर ने एक पल कामिनी को देखा। रात के साये में, कामिनी की अस्त-व्यस्त साड़ी और सांस फूलने से ऊपर-नीचे होता उसका सीना शमशेर की हवस को न्योता दे रहा था।

शमशेर ने कामिनी की आँखों में झांकते हुए कहा, “रुको भाभीजी, मैं मदद करता हूँ।”

शमशेर रमेश की दूसरी तरफ आया।
अब रमेश बीच में था, एक तरफ कामिनी और दूसरी तरफ शमशेर।
“एक… दो… तीन… उठाओ,” शमशेर ने इशारा किया।
दोनों ने रमेश को टांग लिया और बेडरूम की तरफ बढ़ने लगे।
गलियारा संकरा था। रमेश का भारी शरीर बीच में झूल रहा था।
चलते-चलते शमशेर ने मौके का फायदा उठाना शुरू किया।
उसने रमेश की कमर को पकड़ने के बहाने अपना मोटा, खुरदरा हाथ कामिनी की कमर के पीछे फैला दिया।

उसकी उंगलियां कामिनी के ब्लाउज के नीचे, उसकी नंगी, मुलायम कमर को छूने लगीं।
कामिनी सिहर उठी। वह जानती थी कि यह गलती से नहीं हुआ।

“उफ्फ… भारी बहुत हैं…” शमशेर ने बहाना बनाया और अपनी पकड़ मज़बूत कर दी।
उसका हाथ कामिनी की कमर को कसकर दबाने लगा। वह सिर्फ सहारा नहीं दे रहा था, वह कामिनी के मांस को ‘मसल’ रहा था।

जैसे-जैसे वह बेडरूम की तरफ बढ़े, शमशेर का हाथ और नीचे सरकने लगा।
कामिनी की सांसें तेज़ हो गईं।
शमशेर का हाथ उसकी कमर से फिसलता हुआ नीचे आया और…
“दब…!”
शमशेर ने चलते-चलते कामिनी के भरे हुए कूल्हे (Buttock) को अपनी हथेली में भर लिया और उसे जोर से भींच दिया।
यह स्पर्श… यह पकड़… एकदम कड़क और मर्दाना थी।
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई।
“आह्ह…”
उसे गुस्सा आना चाहिए था। उसे शमशेर का हाथ झटक देना चाहिए था।
लेकिन…
उसकी आँखों के सामने कल रात का मंज़र घूम गया।
छत पर… यही शमशेर था… और उसके सामने सुनैना घोड़ी बनी हुई थी।
कामिनी ने देखा था कि शमशेर ने कैसे सुनैना को जानवरों की तरह रौंदा था, शमशेर का भारी मोटा काला लंड कामिनी की आँखों के सामने घूमने लगा,
आज वही ‘जानवर’ उसे छू रहा था।
कामिनी का शरीर उस स्पर्श के विरोध में अकड़ने के बजाय ढीला पड़ गया।

शमशेर की उंगलियां उसकी साड़ी के ऊपर से उसकी गांड के मांस में धंस रही थीं।
उस पुलिस वाले की वर्दी की रफनेस, उसके पसीने और शराब की गंध…
कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया और जिस्म जाग उठा।
उसकी जांघें आपस में रगड़ खाने लगीं।

‘ये हाथ… इसी हाथ ने कल सुनैना की चूत को…’ कामिनी का दिमाग गंदे ख्यालों में डूब गया।
जैसे ही वे बेडरूम के दरवाज़े तक पहुंचे, शमशेर ने एक बार फिर उसकी गांड को पूरी मुट्ठी में भरकर मसला।
इस बार कामिनी की चूत ने जवाब दे दिया।
“पच…”
उसकी योनि के अंदर एक मीठी टीस उठी और काम-रस की एक गरम धार (Pre-cum) निकलकर उसकी पैंटी को भिगो गई।

कामिनी का चेहरा लाल हो गया। वह एक पराये मर्द, अपने पति के दोस्त के स्पर्श से, अपने पति को टांगते हुए ही… गीली हो गई थी।

उन्होंने रमेश को बिस्तर पर ‘धड़ाम’ से पटक दिया।
रमेश तुरंत बेहोश होकर पसर गया।
कामिनी और शमशेर अब बिस्तर के दोनों तरफ खड़े थे, बीच में बेहोश रमेश था।
कामिनी की सांसें फूल रही थीं, उसका पल्लू कंधे से गिर गया था और उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
शमशेर की लाल, शराबी आँखें कामिनी के उभरे हुए स्तनों पर गड़ी थीं।
“बहुत थक गई हो भाभी…” शमशेर ने एक कामुक मुस्कान के साथ कहा, “सांस चढ़ गई है।”
कामिनी ने अपनी जांघों को कसकर भींच लिया, जहाँ चिपचिपापन बढ़ता जा रहा था।

“माँ दरवाजा लॉक कर देना पापा अंदर आ गयें हो तो ” अचानक बंटी की आवाज़ ने कामिनी को धरातल पर पटक दिया.

शमशेर भी झंझना गया, क्यूंकि बंटी की आवाज़ मे वो मासूमियत नहीं थी, गुस्सा था वो चिल्ला के बोला था.
“अअअ… अच्छा भाभीजी मै चलाता हूँ रात काफ़ी हो गई है ”
शमशेर ऐसे निकला जैसे उसकी शामत आने वाली हो.
कामिनी खुद की सोच पर अफ़सोस करती रमेश को बिस्तर पर पड़ा देखती रही.

कामिनी ने झुककर रमेश के जूतों को खोलना चाहा, रमेश को टटोलते ही वो नशे में बड़बड़ाने लगा,

“सुनैना… उफ्फ्फ… क्या माल है तू…”
कामिनी का खून खौल गया। पति के मुंह से दूसरी औरत का नाम सुनकर उसे घिन आई, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। जैसे-तैसे उसके जूते खोल इसे साइड किया, उसकी किस्मत ही यही थी.

कामिनी कपडे चेंज करने के लिए पलट के जाने ही वाली थी कि रमेश ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ में नशे के बावजूद एक अजीब सी ताकत थी।

“कहाँ जा रही है साली…?” रमेश ने अपनी लाल, सूजी हुई आँखों से कामिनी को घूरा।
“सो जाइये, आप नशे में हैं,” कामिनी ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की। “मैं पानी लाती हूँ।”
रमेश ने उसे जोर से अपनी तरफ खींचा। कामिनी बिस्तर पर उसके ऊपर गिरते-गिरते बची।
“पानी नहीं चाहिए…” रमेश गुर्राया। “मुझे ‘तू’ चाहिए।
तुझे क्या लगा मै नशे मे हूँ तो तुझे छोड़ दूंगा, तुझे तो चोदुँगा आज.

रमेश बिस्तर से उठकर लड़खड़ाते हुए खड़ा हो गया। उसने बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया।
“खटक…”
चिटखनी की आवाज़ सुनकर कामिनी का दिल बैठ गया।
रमेश उसकी तरफ पलटा। उसकी आँखों में हवस नहीं, बल्कि एक हिंसक पागलपन था।

“कपड़े उतार…” रमेश ने आदेश दिया।
कामिनी सन्न रह गई। “क्या?”
“सुना नहीं तूने?” रमेश चिल्लाया। “साड़ी उतार अपनी… नंगी हो जा। मुझे देखना है तुझे।”

कामिनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
शर्म के कारण नहीं, बल्कि डर के कारण।
उसे याद आया कि उसके ब्लाउज के नीचे, उसके स्तनों पर रघु के दांतों के गहरे, नीले निशान हैं। उसकी जांघों पर कल रात की खरोंचें हैं।
अगर रमेश ने वो निशान देख लिए… तो उसे पता चल जाएगा कि उसकी बीवी किसी और के साथ मुंह काला करके आई है।
कामिनी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने अपने पल्लू को कसकर पकड़ लिया।

“नहीं… आज नहीं,” कामिनी गिड़गिड़ाई। “मेरी तबियत ठीक नहीं है। और… और बंटी जाग रहा है, आवाज़ जाएगी बाहर।”

“बंटी की ऐसी की तैसी!” रमेश ने चीखकर कहा। “मैं पति हूँ तेरा… मेरा हक़ है तुझ पर।”
कामिनी पीछे हटती गई, दीवार से जा लगी। “प्लीज़… ज़िद्द मत कीजिये। लाइट बंद कर दीजिये, ऐसे ही…” वह अंधेरे में बात को रफा-दफा करना चाहती थी।

लेकिन रमेश का पारा चढ़ गया। उसे लगा कामिनी उसे मना करके उसकी मर्दानगी को ललकार रही है।

“साली रंडी!” रमेश ने गाली दी। “इतनी हिम्मत आ गई तुझमें? मेरी बात मानने से मना कर रही है?”

“लगता है बहुत दिनों से ‘खुराक’ नहीं मिली तुझे।”
रमेश ने अपने पैंट के हुक खोले और एक झटके में अपनी चमड़े की बेल्ट खींचकर निकाल ली।

हवा में बेल्ट लहराने की आवाज़ आई— “सर्रर्र…!”
कामिनी डर के मारे कांप उठी। यह बेल्ट उसने पहले भी कई बार सही थी, लेकिन आज डर मार का नहीं, राज़ खुलने का था।
रमेश बेल्ट को अपने हाथ में लपेटते हुए आगे बढ़ा।

“उतार रही है या मैं खाल उधेड़कर उतारूँ?” उसकी आवाज़ में दरिंदगी थी..

“नहीं… नहीं… मत मारिये…” कामिनी रो पड़ी।
रमेश ने हाथ उठाया।

“सटाक…..!!”
बेल्ट हवा को चीरती हुई कामिनी की कलाई पर लगी, जिससे उसने अपना बचाव करने की कोशिश की थी।
“आह्ह्ह…!” कामिनी की चीख निकल गई।
रमेश अब रुकने वाला नहीं था। वह कामिनी को नंगा करके ही दम लेने वाला था, चाहे इसके लिए उसे मारना ही क्यों न पड़े।

उधर कामिनी सोच रही थी— ‘हे भगवान! अगर इसने मेरा ब्लाउज फाड़ दिया और वो निशान देख लिए… तो आज मेरी लाश ही निकलेगी इस कमरे से।’

कमरे में फिर से चमड़े की बेल्ट हवा चीरने की आवाज़ गूंज रही थी।
“सटाक….. सटाक…..!!”
रमेश के अंदर का जानवर पूरी तरह जाग चुका था।
कामिनी डर के मारे कमरे के कोने में दुबक गई,

उसने अपनी साड़ी को अपनी छाती से कसकर भींच रखा था, लेकिन रमेश की ताकत के आगे उसकी एक न चली।
बेल्ट के वार उसकी नाजुक पीठ और नंगे कंधों पर पड़ रहे थे, जिससे वहां लाल लकीरें उभर आई थीं।

“आह्ह्ह… मत मारिये… उफ्फ्फ्फ…” कामिनी सिसक रही थी।
रमेश नशे और हवस में अंधा हो चुका था। उसने झपट्टा मारा और कामिनी की साड़ी का पल्लू पकड़कर पूरी ताकत से खींच लिया।
“चर्रर्र…..”
साड़ी कामिनी के जिस्म से अलग होकर फर्श पर गिर गई। अब वह सिर्फ़ अपने पेटीकोट और ब्लाउज में थी।

“नंगी हो… साली रंडी नंगी हो!” रमेश चिल्ला रहा था।
उसने फिर बेल्ट हवा में लहराई।
“सटाक…!”
“आह्ह्ह… रुकिए… रुकिए… मैं… मैं उतारती हूँ,” कामिनी की हिम्मत टूट गई। उसे लगा आज अगर उसने कपड़े नहीं उतारे, तो रमेश उसकी खाल उधेड़ देगा।

कामिनी कांपते हुए खड़ी हुई। उसने दीवार की तरफ मुंह कर लिया, ताकि रमेश उसकी छाती के वो ‘निशान’ न देख सके।

कांपते हाथों से उसने अपने पेटीकोट का नाड़ा खोला।
रेशमी पेटीकोट सरकता हुआ उसके पैरों में गिर गया।
ट्यूबलाइट की तेज़ सफ़ेद रोशनी में, कामिनी की गोरी, मखमली और भारी गांड (Buttocks) जगमगा उठी।

उसकी कमर की ढलान और नीचे फैले हुए वो दो मांसल गोले… किसी कलाकृति से कम नहीं लग रहे थे।
सिर्फ़ एक पतली सी पैंटी थी जो को गांड की बीच की दरार मे दफ़न थी।

रमेश की आँखों में हवस की चमक आ गई। वह लार टपकाने लगा।
“उफ्फ्फ… क्या गांड है रंडी तेरी…” रमेश ने अपनी जीभ होंठों पर फेरी। “साली… आज तेरी इसी गांड को मारूंगा।”

कामिनी की रूह कांप गई।
रमेश ने आदेश दिया— ” ब्लाउज भी खोल… पूरा नंगा देखना है मुझे।”

कामिनी के पास कोई चारा नहीं था। उसने पीठ पीछे हाथ ले जाकर हुक खोले। ब्लाउज ढीला होकर गिर गया।
अब उसकी पूरी पीठ नंगी थी।

“घूम साली… मेरी तरफ घूम,” रमेश गुर्राया। “तेरे वो ‘आम’ देखने दे मुझे।”
कामिनी का दिल हलक में आ गया।
अगर वह घूमी, तो उसके स्तनों पर रघु के दांतों के वो नीले निशान साफ़ दिख जाएंगे। उसकी चोरी पकड़ी जाएगी।

“घूमती है या मारूँ?” रमेश ने बेल्ट उठाई।
कामिनी मजबूरी में धीरे-धीरे पलटी।
लेकिन उसने तुरंत अपने दोनों हाथों को क्रॉस करके अपने भारी स्तनों को ढक लिया।

वह सिकुड़कर खड़ी थी, जांघें आपस में कसकर भिंची हुई थीं, और हाथ छाती पर थे।

“हाथ हटा…” रमेश ने हुंकार भरी।
“नहीं… प्लीज…” कामिनी रो पड़ी।
“साली हटा हाथ!”
“सटाक…..!!”
रमेश ने एक बेल्ट सीधा उसके नंगे पेट पर जड़ दिया।
“आआईईईई…… !” कामिनी दर्द से दोहरी हो गई, लेकिन उसने हाथ नहीं हटाए। उसके गोरे पेट पर एक लाल निशान उभर आया।

अब रमेश पागल हो चुका था। वह आगे बढ़ा और कामिनी के हाथों को झटकने ही वाला था कि…
अचानक दरवाजे पर एक जोरदार धमाका हुआ।
“धड़ाकककक…..!!”
बेल्ट की आवाज़ और कामिनी की चीखें बाहर तक जा रही थीं।
दरवाज़े की चिटखनी दबाव नहीं झेल पाई और लकड़ी के फ्रेम से उखड़कर गिर गई। दरवाज़ा झटके से खुला।
सामने रघु खड़ा था।

उसकी आँखों में अंगारे थे। उसका चेहरा गुस्से से लाल था और मुट्ठी भिंची हुई थी।

“बस हरामी ….. बहुत हुआ!” रघु की आवाज़ में एक शेर जैसी दहाड़ थी।

रात गहरी हो चुकी थी। बंटी, जो दिन भर की दौड़-भाग और मानसिक तनाव से चूर था, अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके गहरी नींद में सो चुका था। एसी की हमिंग साउंड ने बाहर की आवाज़ों को उसके कानों तक पहुँचने से रोक दिया था।
उधर आंगन में, रघु दबे पाँव रसोई की खिड़की की तरफ बढ़ा। वह अपनी खाने की खाली थाली वापस रखने आया था, ताकि सुबह मालकिन को काम न करना पड़े।
लेकिन जैसे ही वह खिड़की के पास पहुँचा, उसके कान खड़े हो गए।

अंदर से किसी के रोने की और चमड़े की बेल्ट चलने की आवाज़ आ रही थी।
“सटाक….. सटाक…..!”
“आह्ह्ह… नहीं… मत मारिये…”
यह आवाज़ कामिनी की थी।
रघु का दिल दहल गया। उसने धीरे से खिड़की की झिरी से अंदर झांका।
बेडरूम की खिड़की का दरवाज़ा शायद हवा से हल्का सा खुल गया था या ठीक से लगा नहीं था। रघु को अंदर का नज़ारा साफ़ दिखाई दिया।

उसने देखा—उसकी मालकिन, कामिनी, दीवार से सटी खड़ी थी।
वह पूरी तरह नंगी थी, बस कमर पर पैंटी की बारीक़ लाइन दिख रही थी,
उसने अपने दोनों हाथों से अपने भारी स्तनों को ढक रखा था, जैसे कोई अनमोल खज़ाना छुपा रही हो।
और सामने रमेश, हाथ में बेल्ट लिए शैतान की तरह खड़ा था।

“हाथ हटा… मुझे सब देखना है!”
रघु की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
उसकी धुंधली मेमोरी मे यादें हिलोरे मारने लगी, फिर से वही मंज़र याद आ गया—किशनगंज की वो रात, जब इंजीनियर उसकी बीवी को ऐसे ही नंगा करके धमका रहा था।
उस दिन रघु बंधा हुआ था, बेबस था।
लेकिन आज? आज नहीं वो आज़ाद था, खोने के लिए उसके पास कुछ नहीं था.

“नहीं… आज नहीं… आज कोई और “सुगना” नहीं बनेगी,” रघु की आँखों मे खून उतर आया.
रघु ने थाली वहीं छोड़ी और चीते की रफ़्तार से मुख्य दरवाज़े की तरफ भागा।
किस्मत थी की शमशेर खुला गेट छोड़ के गया था, और कामिनी उसे बंद करने जा नहीं पाई थी,

रघु तूफ़ान की तरह हॉल को पार करता हुआ बेडरूम के दरवाज़े पर पहुँचा।
अंदर रमेश फिर से बेल्ट उठाने ही वाला था।
रघु ने अपनी पूरी ताकत लगाकर दरवाज़े को टक्कर मारी।
“धड़ाम…..!!”
दरवाज़ा दीवार से जा टकराया।
रमेश चौंककर पलटा। “कौन…?”
इससे पहले कि रमेश कुछ समझ पाता, रघु ने एक सांड की तरह दौड़ते हुए अपना पूरा शरीर रमेश से भिड़ा दिया।

“भक्क…..!!”
रघु का चौड़ा सीना रमेश से टकराया। रमेश, जो पहले ही नशे में झूल रहा था, इस टक्कर को झेल नहीं पाया।
वह हवा में लहराता हुआ पीछे की तरफ गिरा और सीधा बिस्तर पर चित हो गया।

“धप्प!”
सिर के बल गिरने और अत्यधिक नशे के कारण, रमेश की आँखों के आगे अंधेरा छा गया। उसने एक बार “उ हूं…” किया और वहीं बेहोश होकर पसर गया। उसके हाथ से बेल्ट छूटकर फर्श पर गिर गई।

कमरे में अचानक शांति छा गई।
कामिनी, जो अभी भी कोने में दुबकी थी, इस अचानक हुए हमले से सन्न रह गई। उसने देखा—सामने रघु खड़ा था।
उसका सीना धौंकनी की तरह चल रहा था, आँखों में खून था, और मुट्ठी भिंची हुई थी।
वह आज नौकर नहीं, एक ‘रक्षक’ लग रहा था।
“रघु…” कामिनी के मुंह से सिसकी निकली।
उसने अपनी शर्म, अपनी नग्नता की परवाह नहीं की। वह दौड़कर आई और सीधे रघु के सीने से लग गई।
“थप…”
कामिनी का मखमली, नंगा बदन रघु के खुरदरे कपड़ों और सख्त जिस्म से चिपक गया।

रघु ने महसूस किया कि कामिनी के भारी, मुलायम स्तन उसके सीने में धंस गए हैं।
उसकी त्वचा की गर्मी और डर रघु के गुस्से को पिघलाने लगी।

रघु ने अपने दोनों मज़बूत हाथ कामिनी की नंगी पीठ पर रख दिए, जहाँ अभी-अभी बेल्ट के वार पड़े थे।
“शश्श्श… मैं हूँ मालकिन… मैं आ गया हूँ,” रघु ने उसके बालों को सहलाया।
कामिनी बुरी तरह रो रही थी, लेकिन अब ये आंसू राहत के थे।
रघु ने कामिनी को बांहों में उठाया।
सामने बिस्तर पर रमेश बेहोश पड़ा था, खर्राटे ले रहा था।
लेकिन रघु ने परवाह नहीं की। उसने कामिनी को उसी बिस्तर पर, रमेश के ठीक बगल में लेटा दिया।
दृश्य बेहद अजीब और कामुक था।

एक तरफ पति नशे में बेहोश पड़ा था, और दूसरी तरफ उसकी पत्नी, पूरी तरह नंगी (सिर्फ़ एक गीली पैंटी पहने हुए), अपने नौकर के सामने लेटी थी।
ट्यूबलाइट की रोशनी में कामिनी का बदन चमक रहा था।

रघु बिस्तर के किनारे खड़ा होकर उसे निहारने लगा।
उसने देखा—कामिनी के पेट और जांघों पर बेल्ट के ताज़े लाल निशान थे।
लेकिन…
जब कामिनी ने हाथ हटाए, तो रघु ने देखा कि उसके स्तनों पर और जांघों के अंदरूनी हिस्सों में नीले निशान थे।
ये वो निशान थे जो कल रात रघु ने दिए थे।
रघु का दिल भर आया। वह समझ गया।
‘मालकिन ने मार खाई… बेल्ट सही… लेकिन मेरे दिए निशानों को मालिक से छुपाए रखा। उन्होंने अपनी इज़्ज़त दांव पर लगा दी मेरे लिए।’
रघु धीरे से बिस्तर पर झुका।
उसने कामिनी के चेहरे को अपने गंदे, खुरदरे हाथों में भरा।
“माफ़ कर दो मालकिन…” रघु की आवाज़ भर्रा गई। “ये सब मेरी वजह से हुआ। मैं… मैं बहुत पापी हूँ।”
कामिनी ने उसकी गीली आँखों में देखा।
उसे रघु के शरीर से आ रही सस्ती शराब, पसीने और मटन की गंध आ रही थी।

लेकिन इस वक़्त, उसे यह गंध दुनिया की सबसे महंगी परफ्यूम से ज्यादा अच्छी लगी। यह गंध एक ‘मर्द’ की थी, जिसने उसे बचाया था।
कामिनी ने कुछ नहीं कहा।
उसने धीरे से अपना सिर उठाया और अपने नाज़ुक, गुलाबी होंठ रघु के रूखे, बीड़ी, शराब की बदबू से सने होंठों पर रख दिए।

“म्मम्म…”
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और रघु की उस ‘गंदगी’ को, उसके स्वाद को अपने अंदर उतारने लगी।
उसने रघु की गर्दन में बाहें डाल दीं और उसे अपनी तरफ खींच लिया, रघु के होंठ भी खुल गए, दोनों की जीभ एक दूसरे के गर्म थूक को चाटने लगी…

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