कामिनी मेरी माँ मादक जिस्म की मालकिन 9

कुँवारी चूत

कामिनी ने बंटी के जाने के बाद अपनी गांड और चुत पर वह तेल अच्छी तरह से रगड़ लिया था।
कादर खान का दिया वह तेल वाकई कोई साधारण तेल नहीं था।
लगाते ही एक मीठी सी गर्माहट ने उसके रोम-रोम को सेक दिया। वह जलन, वह टीस, जो कल रात की बर्बरता और आज दिन के स्कूटर के झटकों से हुई थी… वह किसी चमत्कार की तरह गायब होने लगी।

मांसपेशियों में जो अकड़न थी, वह पिघल गई।
जिस्म में वापस से एक स्फूर्ति (Agility) छा गई।
दिन भर की थकान, डर और फिर उस तेल की नशीली राहत ने अपना असर दिखाया।

कामिनी बिस्तर पर, तौलिये के ऊपर ही औंधे मुंह लेटी और कब नींद के आगोश में समा गई, उसे पता ही नहीं चला।

कमरे में सन्नाटा था, और कामिनी के सपने में अब दर्द नहीं, बल्कि कादर की वह मज़बूत बाहें थीं।
अचानक…
“टिंग… टोंग… टिंग… टोंग….”
घंटी की कर्कश आवाज़ ने घर की शांति और कामिनी का ध्यान तोड़ा।
कामिनी झटके से उठी। उसकी आँखें एकदम से खुल गईं।
उसने दीवार घड़ी की तरफ देखा, शाम के 7 बज रहे थे।
खिड़की के बाहर सूरज ढल रहा था और कमरे में हल्का अंधेरा छाने लगा था।

“हे भगवान… मैं कब तक सोती रही?” कामिनी बुदबुदाई। “रमेश के आने का वक़्त हो गया है, और मैंने अभी तक कपड़े भी नहीं बदले!”
कामिनी बिस्तर से किसी हिरणी (Doe) की तरह फुदक कर खड़ी हो गई।

हैरानी की बात थी—उसके पैरों में, उसकी कमर में या उसके नीचे… कहीं कोई दर्द नहीं था।
वह तेल अपना जादू दिखा चुका था। उसका बदन अब कल रात की तरह ही ताज़ा और तैयार था।
घंटी लगातार बज रही थी।
हड़बड़ाहट में कामिनी ने कमर पर लिपटा हुआ वह सफ़ेद तौलिया एक झटके में निकालकर फेंक दिया।
एक पल के लिए वह शाम के धुंधलके में पूरी तरह नग्न खड़ी थी।

उसका भरा हुआ बदन, भारी स्तन और चौड़ी कमर… सब कुछ आज़ाद था।
समय नहीं था।
उसने पास पड़े कुर्सी से अपना सिल्क का गाउन उठाया और उसे अपने जिस्म पर टांग लिया।

जल्दबाज़ी में उसने न तो ब्रा पहनी और न ही पैंटी।
गाउन का कपड़ा बहुत ही मुलायम और फिसलन भरा था।

जैसे ही गाउन उसके बदन से नीचे फिसला, वह उसके उभरे हुए अंगों से चिपक गया।
अंदर से वह सम्पूर्ण नग्न थी, और यह बात गाउन के बाहर साफ़ झलक रही थी।
ठंडक और हड़बड़ाहट की वजह से उसके स्तनों के निप्पल (Nipples) तनकर खड़े हो गए थे, जो गाउन के कपड़े को भेदकर बाहर की तरफ अपनी हाज़िरी लगा रहे थे।

कामिनी दौड़ती हुई बाहर आई।
उसके गाउन की ज़िप बस गले तक बंद थी, लेकिन चलते वक़्त उसके स्तन हिल रहे थे और गाउन की रेशमी सरसराहट उसके नंगे बदन को गुदगुदा रही थी।
उसने कांपते हाथों से दरवाज़ा खोला।
“खट…”
सामने बंटी और उसका दोस्त रवि खड़े थे।
बंटी के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी, लेकिन रवि…
रवि की हालत देखने लायक थी।

रवि, जो पहले से ही कामिनी के हुस्न का दीवाना था, आज उसे इस अवतार में देखकर मंत्रमुग्ध हो गया।
शाम की हल्की रौशनी कामिनी के पीछे से आ रही थी, जिससे उसके गाउन का ‘सिलहूट’ (Silhouette) बन गया था।
रवि की नज़रें सीधे कामिनी की छाती पर जा टिकीं।
वहाँ, गाउन के कपड़े के नीचे… दो नुकीले उभार (Nipples) साफ़ दिख रहे थे।

रवि का गला सूख गया। उसे लगा जैसे उसने साक्षात् मेनका को देख लिया हो।
“न… नमस्ते आंटी…” रवि ने बड़ी मुश्किल से हाथ जोड़े, लेकिन उसकी आँखें जुड़ने को तैयार नहीं थीं।
वह कामिनी को ऊपर से नीचे तक ‘स्कैन’ कर रहा था।
उसे साफ़ पता चल रहा था कि अंदर कुछ नहीं पहना गया है।
कामिनी ने रवि की उस ‘X-Ray’ नज़र को महसूस कर लिया।
एक औरत की छठी इंद्री (Sixth Sense) उसे बता देती है कि सामने वाला मर्द उसकी आँखों में देख रहा है या जिस्म में।
और रवि… रवि तो उसे अंदर तक देख रहा था।
“ननन… म… नमस्ते बेटा…” कामिनी हकला गई।
उसे अपनी गलती का अहसास हुआ।
ठंडी हवा का झोंका आया और उसके गाउन को उसकी टांगों के बीच चिपका गया, जिससे उसकी जांघों की गोलाई और योनि का उभार (Camel toe) हल्का सा उभर आया।

कामिनी ने तुरंत अपने दोनों हाथों को अपनी छाती पर बांध लिया।
“आओ… अंदर आओ…”
उसने अपनी नंगता को छुपाना चाहा, लेकिन वह जानती थी कि तीर कमान से निकल चुका है।
रवि ने वह देख लिया था जो उसे नहीं देखना चाहिए था।
बंटी, जो यह सब देख रहा था, पीछे से मुस्कुराया।
उसने रवि को कोहनी मारी।
“चल भाई… अंदर चल।, खा जायेगा क्या मेरी माँ को?।”

ड्राइंग रूम में चाय का दौर चल रहा था। कामिनी सोफे पर एक तरफ पैर सिकोड़कर बैठी थी। उसने अपना गाउन बदला नहीं था। रेशमी कपड़ा उसके शरीर के उतार-चढ़ाव को पूरी तरह पकड़ रहा था। उसे पता था कि रवि की नज़रें बार-बार उसकी ढीले गले और गाउन के नीचे बिना किसी सहारे के आज़ाद झूलते उसके भारी स्तनों पर टिक रही हैं। ताज्जुब की बात थी कि कामिनी को अब इससे शर्म नहीं, बल्कि एक अजीब सा आत्मविश्वास महसूस हो रहा था। उसे अपनी देह की इस नुमाइश में एक तीखा मज़ा आने लगा था।

बंटी ने चाय की चुस्की ली और मुद्दे पर आया। “हाँ तो माँ, बात ये है कि रवि के घर में कुछ पेंटिंग और सफ़ाई का काम है। आंटी (सुनैना ) परेशान हो रही हैं, कोई भरोसे का आदमी नहीं मिल रहा। तो मैंने कहा कि रघु को दो दिन के लिए वहां भेज देते हैं।”

रवि ने तुरंत बात को आगे बढ़ाया, “हाँ आंटी, मम्मी ने बहुत कोशिश की। हम रघु को एक्स्ट्रा पैसे भी दे देंगे।”

बंटी खिलखिलाकर हंसा, “अबे क्या एक्स्ट्रा पैसे! बस दो बोतल एक्स्ट्रा दारू दे देना, साला तेरी माँ का सारा काम चुटकियों में कर देगा।”

बंटी का यह मज़ाक कामिनी के सीने में सुई की तरह चुभा। ‘काम कर देगा…’ इस जुमले के पीछे जो कामुक अर्थ था, वह कामिनी से बेहतर कौन जानता था? उसे तुरंत कल रात का वो मंजर याद आ गया जब इसी रघु ने उसे बिस्तर पर बुरी तरह कुचला था। रघु भले ही शराबी और गरीब था, लेकिन उसके ‘देसी औजार’ ने कामिनी को वो सुख दिया था जो रमेश कभी नहीं दे पाया।

कामिनी को अचानक सुनैना से जलन होने लगी। साथ ही एक अजीब सी गुदगुदहट भी महसूस हुई, सुनैना की छुवन मे एक अजीब सा अहसास था जो कामिनी को सुकून दे रहा था, लेकिन ये भावना उसकी समझ से परे थी.

कामिनी को याद आया कि कैसे शमशेर ने इसी छत पर सुनैना की इज़्ज़त के परखच्चे उड़ाए थे। अगर रघु वहां गया, तो क्या प्यासी सुनैना उसे बख्शेगी?

“क्या हुआ आंटी? रघु को नहीं भेजना क्या?” रवि ने कामिनी के चेहरे पर छाई गहरी सोच को भांपते हुए पूछा। उसकी नज़रें अभी भी कामिनी के गाउन के उस हिस्से पर थीं जहाँ से उसके निप्पल का उभार कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब था।

“वो… वो… नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं है,” कामिनी ने हकलाते हुए अपनी नग्नता को छुपाने के लिए गाउन को ऊपर से भींचा। “बस… वो शराबी है, कहीं तुम्हारे घर में कोई उल्टी-सीधी हरकत ना कर दे। पुलिस का घर है तुम्हारा…”

“अरे आंटी, बस दो दिन की बात है। कौन सा दूर है हमारा घर? कुछ गड़बड़ हुई तो तुरंत बता देंगे,” रवि ने एक ललचाई हुई मुस्कान दी,

कामिनी बेबस थी। वह मना नहीं कर सकती थी क्योंकि बंटी पहले ही हाँ कह चुका था। “ठीक है… ले जाओ। पर ध्यान रखना, उससे ज़्यादा भारी काम मत करवाना,” कामिनी ने भारी मन से कहा। उसके शब्द रघु के लिए उसकी ‘ममता’ नहीं, बल्कि उसकी मलिकियत (Ownership) जता रहे थे।

“टिंग… टोंग…”
तभी बाहर की घंटी बजी। बंटी ने दरवाज़ा खोला और सामने रघु खड़ा था। वही पुराना रघु—मैले कपड़े, उलझे बाल और आँखों में कल रात की मार का खौफ़।
“लो, शैतान का नाम लिया और शैतान हाज़िर!” रवि ने चुटकी ली।

“हट बदमाश, उसे शैतान मत कह,” कामिनी ने रवि को हल्का सा डांटा, लेकिन उसकी आवाज़ में एक रेशमी गर्माहट थी जो सिर्फ रघु के लिए थी। “क्या हुआ रघु?”

रघु ने अपनी फटी हुई आवाज़ में कहा, “ममम… मैडम… वो बात करनी थी… वो कल रात…”

‘कल रात’ सुनते ही कामिनी के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। उसे लगा रघु सबके सामने वो सब उगल देगा कि कैसे मालकिन नंगी होकर उसके ऊपर चढ़ी थी, कैसे उसने मालकिन की चुत में अपना गर्म लावा भरा था।

कामिनी का चेहरा डर और शर्म से तमतमा उठा।
“क्या कल रात!” कामिनी चिल्ला उठी। उसे अपनी इज़्ज़त नीलाम होने का डर सताने लगा। एक औरत भले ही सौ मर्दों के साथ सो जाए, पर वह कभी नहीं चाहेगी कि एक की खबर दूसरे को हो।

“वो… कल रात… शमशेर साब… ने… मुझे मारा…” रघु ने रोते हुए अपना दर्द सुनाना चाहा।
“कौन शमशेर? क्या हुआ?” रवि ने कामिनी की तरफ सवालिया नज़रों से देखा।

कामिनी को तुरंत वो मंजर याद आया जब शमशेर ने सुनैना को चोदा था। “हाँ… वही… कल रात पुलिस आई थी ना, उसी में इसने मार खाई।”
रवि ने रघु के कंधे पर हाथ रखा और उसे बाहर की तरफ अपने साथ खिंचा। “अबे रोता क्या है मामूली बात पर? शमशेर को हम देख लेंगे। अभी चल मेरे साथ, घर पर बहुत काम है। मम्मी इंतज़ार कर रही हैं।”

रवि ने रघु को कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया, उस गरीब की सिसकियों में रईसज़ादे को कोई दिलचस्पी नहीं थी। रवि ने बंटी की स्कूटर की चाबी ली और रघु को पीछे बिठाकर रवाना हो गया।

कामिनी बरामदे की दहलीज़ पर खड़ी, एकटक रघु को जाते देखती रही। स्कूटर की आवाज़ जैसे-जैसे दूर हो रही थी, कामिनी के दिल की धड़कनें तेज़ हो रही थीं। उसे अपनी जांघों के बीच फिर से वही टीस महसूस हुई। उसे गुस्सा आ रहा था सुनैना पर।

जैसे रघु उसकी चुत से निकल कर दूर जा रहा हो.

बंटी पीछे से आया और अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखा। “चिंता मत करो माँ, रघु ठीक रहेगा। छोटा मोटा काम है बस ”
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रात के 8:30 बज रहे थे। घर में सन्नाटा पसरा था,
कामिनी किचन मे काम निपटा रही थी, आज शमशेर नहीं आया था, वही रमेश हमेशा की तरह नशे मे धुत्त बैडरूम मे पड़ा हुआ था,

कामिनी के दिमाग में दोपहर की वो घटना घूम रही थी। उन दो गुंडों का उसे नोचना, उसकी साड़ी खींचना और उसे घसीटना… उस समय वह डर से कांप रही थी, लेकिन अब अकेले में उन यादों ने उसके अंदर एक अजीब सी वहशी उत्तेजना भर दी थी।
कादर के तेल ने उसके जख्मो को, दर्द को छूमंतर कर दिया था.
अब फिर से उसकी उत्तेजना लौट आई थी, कामिनी अजीब सा महसूस कर रही थी, आज दिन भर से उसने कादर को देखा नहीं था, पता नहीं उसने खाना खाया भी होगा या नहीं.

कामिनी की नजर बात बार खिड़की से बहार झाँक लेती, उस नल को देखती जहाँ कादर रात मे नहा रहा था.
लेकिन हर बार निराशा ही पल्ले आती.
कामिनी शाम से ही उसी रेशमी गाउन में थी। गाउन के नीचे उसका बदन अभी भी कादर की छुवन और बंटी की मालिश की गर्माहट महसूस कर रहा था।

रमेश शराब के नशे में धुत होकर घर लौटा था। उसकी आँखों में लाल डोरे थे और जुबान लड़खड़ा रही थी, हमेशा की तरह नशे ने उसके दिमाग में एक झूठी मर्दानगी भर दी थी।

जैसे ही कामिनी बेडरूम में दाखिल हुई, रमेश ने किसी भूखे जानवर की तरह उस पर छलांग लगा दी।
रमेश की आँखों में शराब का नशा था, लेकिन आज कामिनी को उससे डर नहीं लगा।
उल्टा, रमेश का यह वहशीपन, उसका यह खुरदरा व्यवहार कामिनी के अंदर की दबी हुई आग को हवा दे रहा था।

दोपहर में जब गुंडों ने उसे नोचा था, तब वह डरी हुई थी। लेकिन अब, घर की चारदीवारी में, वही ‘नोचना-खसोटना’ उसे एक अजीब सी उत्तेजना दे रहा था।
“आज… आज तो तुझे कच्चा चबा जाऊंगा…” रमेश गुर्राया।

उसने कामिनी को बांहों में जकड़ लिया और उसकी गर्दन पर अपने दांत गड़ा दिए।
“आअह्ह्ह….”
कामिनी कसमसा उठी। दर्द हुआ, तीखा दर्द।
लेकिन आज उसने रमेश को धक्का नहीं दिया। उसने अपनी गर्दन और पीछे झुका दी, जैसे वह उस दर्द को आमंत्रित कर रही हो।

उसे मज़ा आ रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि वह सिर्फ़ एक मांस का टुकड़ा है जिसे कोई जानवर नोच रहा है। यह अहसास उसकी योनि को गीला कर रहा था।
रमेश ने आव देखा न ताव, कामिनी के रेशमी गाउन को कंधों से पकड़ा और एक ही झटके में नीचे खींच दिया।
“चर्रर्र…”
गाउन उसके पैरों में गिर गया।
कामिनी रमेश के सामने सम्पूर्ण नग्न खड़ी थी। उसके भारी स्तन, चौड़ी कमर और भरी हुई जांघें—सब कुछ उस शराबी के सामने परोसा हुआ था।

रमेश ने उसे धकेल कर बिस्तर पर गिरा दिया।
वह उसके ऊपर चढ़ गया और पागलों की तरह उसके स्तनों को मुंह में भरकर काटने लगा, चूसने लगा।
कामिनी की आँखें बंद थीं। वह अपनी मुट्ठियों में चादर भींच रही थी।

उसके दिमाग में रमेश नहीं था।
अंधेरे में उसे लग रहा था कि वह दोपहर वाले गुंडे हैं जो उसे झाड़ियों में घसीट रहे हैं। यह ‘बलात्कार जैसा अहसास’ (Rape Fantasy) उसे पागल कर रहा था।

रमेश ने अपनी लुंगी हटाई और कामिनी की टांगें फैलाकर बीच में आ गया।

वह कामिनी के ऊपर लेटा, अपना लंड उसकी गीली चुत पर रगड़ने लगा।
लेकिन…
हकीकत कड़वी थी।
कामिनी का जिस्म आग की भट्टी बना हुआ था, लेकिन रमेश का लंड… वह एक मरा हुआ सांप था।

शराब ने रमेश की नसों को इतना सुन्न कर दिया था कि लाख कोशिशों के बाद भी उसका लंड खड़ा नहीं हो रहा था। वह बस एक मांस का लोथड़ा था जो कामिनी की जांघों के बीच लटक रहा था।
कामिनी को गुस्सा आया, लेकिन हवस उससे ज्यादा तेज़ थी।

उसने झटके से रमेश को पलटा और खुद उसके ऊपर चढ़ गई।
“लाओ… मैं करती हूँ…” कामिनी ने फुसफुसाते हुए कहा।

कामिनी ने ये बदलाव अचानक नहीं आया था, ये परिणाम था अब तक की कामिनी की कहानी का, उसके जीवन मे आये मर्दो का.

कामिनी ने रमेश के उस छोटे, सिकुड़े हुए और ढीले लंड को अपने हाथ में ले लिया।
कामिनी हैरान थी, उसने कभी रमेश के लंड पर इतना ध्यान नहीं दिया था, रमेश का लंड इतना छोटा और मुरझाया हुआ था की वह उसकी हथेली में ही खो गया।

कामिनी ने उसे अपनी मुट्ठी में भरकर रगड़ना शुरू किया। दो तीन बार झटके दिए, जैसे उसे जगा रही हो, होश मे ला रही हो.
लेकिन… कोशिश नाकाम रही. रमेश ना जाने जिस उत्तेजना मे, या फिर नशे मे ही कल्पना कर रहा था, उसका सर मजे से इधर उधर हो रहा था.

कोशिश नाकाम होते देख कामिनी झुकी और उस बेजान चीज़ को अपने मुंह में भर लिया।
“स्लप… चप… चप…”
वह उसे चूसने लगी, चाटने लगी।
वह अपनी जीभ से उसकी सुपारी को गुदगुदा रही थी, उसे खड़ा करने की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी।
कामिनी की आँखें बंद थीं।

बंद आँखों में वह कल्पना कर रही थी कि उसके मुंह में रमेश की ‘लुल्ली’ नहीं, बल्कि कादर खान का वह 8 इंच का काला, सख्त और नसों वाला मुसल लंड है।
वह उस ख्याली लंड को गले तक उतार रही थी।

लेकिन हकीकत में, उसके मुंह में सिर्फ़ रमेश का ढीला मांस था जो बार-बार उसके होंठों से फिसल रहा था।

जब बहुत देर तक चूसने के बाद भी रमेश का लंड खड़ा नहीं हुआ, तो कामिनी हताश हो गई।

उसकी चुत इतनी गीली हो चुकी थी कि वहां से पानी बहकर रमेश के पेट पर गिर रहा था।
उसने हार मानकर रमेश के लंड को सीधा किया और अपनी गांड उठाकर उसके ऊपर बैठ गई।
उसने निशाना साधा और अपनी गीली चुत को उस ढीले लंड पर रख दिया।

वह धीरे-धीरे नीचे बैठी।
रमेश का लंड अंदर जाने की बजाय मुड़ गया और कामिनी की जांघों के बीच दब गया।
लेकिन कामिनी को परवाह नहीं थी।
वह पागलों की तरह रमेश के पेट और पेडू (Groin) पर उछलने लगी।

“चप… चप… चप… चप…”
उसकी भारी गांड रमेश के जांघों से टकरा रही थी।
कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।
वह एक मानसिक भंवर (Mental Vortex) में फंस गई थी।
वह उछल रही थी, अपनी चुत रगड़ रही थी, और उसका दिमाग अलग-अलग मर्दों की तस्वीरों में उलझ गया था।

कभी उसे लगता कि वह रघु के ऊपर बैठी है, वही रघु जिसने कामिनी की हवास और उत्तेजना को जगा दिया था, उसके निरस जीवन मे उन्माद घोल दिया था, उसे रघु के धक्के महसूस होने लगते।

अगले ही पल चेहरा बदल जाता। उसे शमशेर की वर्दी और उसकी बेल्ट याद आती। उसे लगता शमशेर उसे अपनी ताकत से दबा रहा है।

फिर अचानक कादर खान का चेहरा सामने आता, उसका नंगा बदन, तेल लगा शरीर और वहशीपन। कामिनी की रूह कांप जाती।

और कभी-कभी उसे वो दो गुंडे दिखते, जो उसे नोच रहे थे।
कामिनी का दिमाग स्थिर नहीं था।
वह दुविधा में थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे किसका लंड चाहिए।
उसे सबका चाहिए था।
वह एक साथ उन सभी मर्दों को भोगना चाहती थी।
वह रमेश के पेट पर अपनी चुत रगड़ते हुए सिसक रही थी,
“आह्ह्ह… कादर… रघु… मारो… और ज़ोर से…”
वह अपनी हवस में इतनी अंधी थी कि उसे पता ही नहीं चला कि नीचे लेटा रमेश सो चुका है।

उसका लंड अभी भी ढीला और छोटा सा पड़ा था, जिस पर कामिनी अपनी चुत घिस-घिस कर लाल कर रही थी।
रमेश के खर्राटे गूंज रहे थे, और कामिनी अपनी अतृप्त प्यास के साथ उसके ऊपर उछल रही थी, पसीने से लथपथ, और अंदर से बिल्कुल खाली।
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कामिनी किसी मशीन की तरह रमेश के ऊपर उछल रही थी। खाली मशीन जो सिर्फ चल रही थी, होना जाना कुछ नहीं था.
उसका दिमाग सुन्न था, लेकिन जिस्म सुलग रहा था।
कमरे में सिर्फ़ दो ही आवाज़ें गूंज रही थीं—रमेश के भारी खर्राटे और कामिनी की गीली चुत के रमेश के पेट से टकराने की आवाज़।
“पच… पच… पच… चप… चप…”
उसकी चुत से निकला हुआ कामरस और तेल मिलकर एक लसलसा कीचड़ बना चुके थे, जिसमें रमेश का वह ढीला और बेजान लंड पिस रहा था।

कामिनी की आँखें बंद थीं, वह ख्यालों में कभी रघु तो कभी कादर के नीचे दबी हुई थी।
तभी…
अचानक कामिनी की आँखें एक झटके से खुल गईं।
बाहर के सन्नाटे में एक जानी-पहचानी आवाज़ ने उसके कानों में दस्तक दी।
“छपाक… छप… छप… छपाक…”
पानी गिरने की आवाज़!
वही आवाज़… जब उसने पहली बार कादर को आंगन में नंगा नहाते देखा था।

कामिनी का दिल “धक्” से रह गया। उसकी चुत जो अब तक सिर्फ़ रगड़ खा रही थी, अचानक उम्मीद से फड़कने लगी।
बिना एक पल गंवाए, कामिनी बिजली की रफ़्तार से रमेश के ऊपर से उतरी।
वह सम्पूर्ण नग्न थी। उसके भारी स्तन पसीने से चमक रहे थे, और जांघों के बीच चिपचिपापन था।

कामवासना में भीगी हुई कामिनी ने नंगे पैर खिड़की की तरफ दौड़ लगा दी।
उसने कांपते हाथों से परदा हटाया और बाहर अंधेरे में झांका।
सामने का नज़ारा देखकर कामिनी के मुंह से एक दबी हुई चीख निकल गई।
वहां, आंगन की पीली और धुंधली रोशनी में… कादर खान जा रहा था।
वह नहा चुका था और अपने स्टोर रूम की तरफ बढ़ रहा था।

वह बिल्कुल नंगा था।
कामिनी को उसका चेहरा नहीं दिखा, लेकिन जो दिखा उसने कामिनी की बची-खुची सांसें भी छीन लीं।
कादर का पिछला हिस्सा किसी राक्षस जैसा विशाल और मज़बूत लग रहा था।
उसकी चौड़ी पीठ पर पानी की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं।
नीचे… उसकी पतली कमर और उसके नीचे…
पत्थर जैसे सख्त और मांसल कूल्हे।
चलते वक़्त उसके कूल्हों की मांसपेशियां थिरक रही थीं, “मटक… मटक…”
हर कदम के साथ उसके जांघों और कूल्हों का वह कसाव साफ़ दिख रहा था।

रमेश की ढीली त्वचा को छूने के बाद, कादर का यह कसा हुआ, फौलादी बदन कामिनी के लिए किसी दावत से कम नहीं था।
कामिनी उस हसीन दृश्य को देखकर चित्कार उठी।
वह खिड़की के कांच पर अपनी हथेलियां और नंगे स्तन दबाकर खड़ी हो गई।

“हाय… काश थोड़ी देर पहले आती…”
कामिनी का मन मसोस कर रह गया।
अगर वह थोड़ी जल्दी आती, तो शायद कादर को सामने से देख पाती। वह उस ‘अजगर’ को झूलते हुए देख पाती जिसके लिए वह अभी बिस्तर पर तड़प रही थी।

सिर्फ़ कादर की पीठ देखकर ही उसकी चुत में बाढ़ आ गई। उसे लगा जैसे कादर का लंड उसकी कल्पना में उसके अंदर घुस रहा है।
कादर स्टोर रूम का दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया।
अंधेरे ने उस ‘देवता’ को निगल लिया।

कामिनी ने एक गहरी, हताश सांस छोड़ी।
वह मुड़ी और बिस्तर की तरफ देखा।

वहां रमेश बेसुध पड़ा था।
मुंह खुला हुआ, टांगें फैली हुईं।
और उसके पैरों के बीच… वह छोटा सा, सिकुड़ा हुआ लंड पड़ा था।
उसके सुपारी के छेद पर दो बूंद गाढ़ा, चिपचिपा पानी लगा हुआ था।
वीर्य के नाम पर… बस एक थका हुआ, पानी जैसा डिस्चार्ज।
कामिनी ने घिन से मुंह फेर लिया।
“नपुंसक…” उसने मन ही मन कहा।

कहाँ वो दो बूंद पानी, और कहाँ कादर के जिस्म की वो आग। ज़मीन-आसमान का फर्क था।
कामिनी की नज़र वापस खिड़की की तरफ गई।
कादर अब वहां नहीं था। स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद हो चुका था।

लेकिन तभी कामिनी के दिल में हवस के साथ-साथ एक और जज़्बा जागा— ममता और फ़िक्र।
“बेचारा… दिन भर से भागा-दौड़ा है। दोपहर में गुंडों से भी लड़ा। पता नहीं कुछ खाया भी होगा या नहीं?”
कामिनी का दिल पसीज गया।

“शायद भूखा हो…”
यह सिर्फ़ भूख की चिंता नहीं थी, यह कादर के पास जाने का एक बहाना भी था।
कामिनी ने फ़ौरन ज़मीन पर पड़े अपने उसी रेशमी गाउन को उठाया।
उसने उसे अपने पसीने और कामरस से भीगे नंगे बदन पर डाला।
ज़िप ऊपर खींची, जो उसके स्तनों को कसती हुई गले तक आ गई।

अंदर कुछ नहीं था—न ब्रा, न पैंटी। बस उसकी नंगी प्यास थी।
उसने अपने बालों को एक झटके से पीछे किया और नंगे पैर ही बेडरूम से बाहर निकल गई।
उसके कदम अब किचन की तरफ बढ़ रहे थे।
भूख तो दोनों को ही लगी थी.

रात के 9:00 बजे

किचन की लाइट बंद करके कामिनी जब बाहर निकली, तो घर में मौत जैसा सन्नाटा था। रमेश बेसुध सो रहा था, और बंटी अपने कमरे में था।
कामिनी के नंगे पैर ठंडे फर्श पर पड़ते हुए स्टोर रूम की तरफ बढ़ रहे थे।

उसके हाथ में खाने की थाली थी, लेकिन हथेलियां पसीने से भीग रही थीं। दिल पसलियों से टकरा रहा था— “धक्… धक्…”
यह सिर्फ़ एक भूखे को खाना देने जाना नहीं था।
उस थाली में सिर्फ़ रोटियाँ नहीं थीं… उसमें कामिनी का समर्पण, उसकी बरसों से दबी हुई वासना, घर की मर्यादा और एक औरत की “प्यास”—सब कुछ सजा हुआ था।

उसे महसूस हो रहा था कि वह एक लक्ष्मण रेखा पार कर रही है, लेकिन उस पार खड़ा “रावण” उसे अपने “राम” (पति) से ज्यादा अपना लग रहा था।
धड़कते दिल से उसे मुख्य घर से स्टोर रूम तक का फैसला तय कर लिया, गला सूखने को था, लेकिन उन्माद, उत्तेजना उसे होशला दे रहे थे.
कामिनी ने स्टोर रूम के पुराने, दीमक लगे लकड़ी के दरवाज़े को अपनी कोहनी से धीरे से धकेला।
“चर्रर्र…”
जंग लगी कब्जों की आवाज़ सन्नाटे में गूंजी और दरवाज़ा खुल गया।

अंदर एक जीरो वॉट का पीला बल्ब जल रहा था। उस मद्धम, बीमार सी रौशनी ने कमरे में एक तिलिस्मी और रहस्यमयी माहौल बना रखा था। हवा में सीलन, पुराने सामान और कादर के पसीने की मर्दाना गंध घुली हुई थी।
सामने कादर खान बैठा था।
वह ज़मीन पर बिछी एक पुरानी, मैली दरी पर दीवार से पीठ टिकाए अधलेटा सा था।
उसने सिर्फ़ एक पुरानी चेकदार लुंगी पहन रखी थी, जो उसकी कमर पर ढीली बंधी थी।

ऊपर का बदन… बिल्कुल नंगा था।
कामिनी की नज़रें थाली से हटकर सीधे कादर के उस विशाल और भव्य सीने पर जा टिकीं।
रमेश के ढीले और सफाचट सीने के मुकाबले, कादर का सीना किसी चट्टान जैसा था।
उसकी चौड़ी छाती पर काले, घने बालों का जंगल था, जो पसीने और नहाने के पानी से चमक रहा था।

उसके मज़बूत कंधे किसी योद्धा की तरह तने हुए थे।
और पेट? पेट की वो सख्त मांसपेशियां (Abs) साँस लेने पर एक लय में ऊपर-नीचे हो रही थीं।
उसकी सांवली त्वचा पर अभी भी नहाने के बाद की ताज़गी और नमी थी। वह साबुन और अपनी निज की गंध (Pheromones) छोड़ रहा था, जो कामिनी की नासाछिद्रों में घुसकर उसे मदहोश कर रही थी।

दरवाज़े पर आहट सुनते ही कादर ने सिर उठाया।
और सामने कामिनी को देखकर… उसकी सांसें गले में अटक गईं। पलकें झपकना भूल गईं।

कामिनी एक पतले, रेशमी सिल्क गाउन में खड़ी थी।
पीले बल्ब की रौशनी कामिनी के पीछे से आ रही थी, जिससे वह गाउन लगभग पारदर्शी हो गया था।

कादर की अनुभवी और बाज़ जैसी नज़रों ने एक पल में भांप लिया कि अंदर कुछ नहीं है।
गाउन का कपड़ा उसके बदन से चिपका हुआ था। उसके भारी स्तनों की गोलाई, उनका वजन और ठंडक से तन चुके निप्पल्स का तनाव साफ़ झांक रहा था।

कादर के लिए वह किसी अप्सरा जैसी लग रही थी—पवित्र भी, और पापपूर्ण भी। एक ऐसी देवी जिसे पूजा भी जा सकता था और भोगा भी जा सकता था।
कामिनी ने अंदर आकर दरवाज़ा पीछे से बंद किया और कुंडी लगा दी।
“खटक…”
लोहे की चिटकनी की उस आवाज़ ने कमरे में बाहरी दुनिया को रोक दिया। अब यहाँ कोई समाज, कोई पति, कोई मान मर्यादा नहीं थी .. सिर्फ़ एक मर्द और उसकी दबी कुचली इच्छा थी,
कामिनी दरी पर, कादर के बिल्कुल सामने, घुटनों के बल बैठ गई।
उसने थाली बीच में रखी।
कादर की नज़रें शर्म और झिझक से झुकी हुई थीं। वह कामिनी के चेहरे को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, क्योंकि उसकी नज़र बार-बार उसके खुले गले और गाउन के अंदर लटकते उन रसीले फलों पर फिसल रही थी, जिन्हें वह अपनी मुट्ठी में भरने के लिए तड़प रहा था।
खामोशी बहुत भारी हो गई थी। सिर्फ़ दोनों की साँसों की आवाज़ आ रही थी।

कादर ने चुप्पी तोड़ी। उसकी आवाज़ भारी, गहरी और भर्राई हुई थी।
“मुझे माफ़ कर दीजिये कामिनी जी…”
कादर ने अपनी मुट्ठियाँ अपनी लुंगी पर भींच लीं। नसों का जाल उसकी बांहों पर उभर आया।

“मेरी वजह से… आज आपके साथ वो सब हुआ। उन गुंडों ने आपको हाथ लगाया… आपको तकलीफ दी। मैं गुनहगार हूँ आपका। मुझे बहार नहीं जाना चाहिए था …”
कामिनी ने कादर की आँखों में देखा।
वहां सिर्फ़ और सिर्फ़ पश्चाताप था। एक गुंडे की आँखों मे नमी?
कामिनी कुछ नहीं बोली।
बोलती भी क्या?
उसे खुद नहीं पता था कि जो हुआ वो गलत था या सही।
उस दर्द ने, उस घसीटने ने, उस नोंचने ने एक अलग सा अहसास और सिंहरन पैदा कर दी थी उसके जिस्म मे,
रमेश तो बिस्तर पर पड़ा एक लाश था, लेकिन यह कादर… यह जिन्दा आग था। कादर की ताकत उसकी हिम्मत, उसका रोन्द्र रूप कामिनी को भा गया था, उसके दिल मे उतर चूका था.

और वैसे भी, गुंडों ने तो सिर्फ़ छुआ था… उसकी असली इज़्ज़त और जान तो इसी “गुनहगार” ने बचाई थी।
कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने थाली में रखी रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा।
उसे सब्जी में अच्छी तरह डुबोया।
और धीरे से अपना गोरा, नाज़ुक हाथ कादर के खुरदरे मुंह की तरफ बढ़ा दिया।

कादर सन्न रह गया।
वह हैरान था। उसकी आँखों में अविश्वास था।
उसने अपनी नज़रें उठाईं।
कामिनी की आँखों में न गुस्सा था, न डर, न नफरत।
वहां सिर्फ़ अपनापन था… एक अजीब सी ममता और प्यास का मिश्रण।
वह बड़े घर की रोबदार औरत नहीं लग रही थी, वह एक प्रेमिका लग रही थी जो अपने रूठे यार को मना रही हो।
कादर, जो बचपन से अनाथ था, जिसने गलियों की खाक छानी थी, जिसे लोगों ने सिर्फ़ दुत्कारा था, पुलिस ने पीटा था, या डरकर “कादर भाई” कहा था…
आज उसे कोई इज़्ज़तदार घर की औरत अपने हाथों से खाना खिला रही थी।

यह खाना नहीं, यह प्रेम का निवाला था।
कादर का दिल भर आया। गला रुंध गया।
उसका कठोर, पत्थर जैसा सीना पिघलने लगा। उसे लगा जैसे उसका कोई वजूद ही नहीं, वह बस इस औरत के चरणों की धूल है।

उसे लगा जैसे वह कोई छोटा बच्चा है और सामने उसकी माँ बैठी है।
उसने कांपते होंठों से अपना मुंह खोला।
कामिनी ने वह निवाला उसके मुंह में रख दिया।
कामिनी की उंगलियां कादर के होठों से छू गईं।
“झन्न्न्न्….”
एक बिजली का करंट सा दौड़ा दोनों के बदन में।
कादर ने निवाला चबाया, लेकिन उसे रोटी का स्वाद नहीं आ रहा था… उसे सिर्फ़ कामिनी की उंगलियों की महक और उसके स्पर्श की गर्माहट महसूस हो रही थी।

उसका मन किया कि वह दहाड़ मारकर, फूट-फूट कर रो दे। कामिनी के पैरों में गिर जाए।
वह कादर खान… जिसे पुलिस के थर्ड डिग्री टॉर्चर नहीं रुला सके, आज एक निवाले ने उसे अंदर से तोड़कर रख दिया था।

लेकिन वह मर्द था… साला गुंडा था… रोता कैसे?
उसने अपनी भावनाओं को हलक में ही दबा लिया। उसकी आँखें नम हो गईं, किनारों पर पानी तैरने लगा, लेकिन उसने आंसू गिरने नहीं दिए।

कामिनी उसे खिलाती रही। एक के बाद एक निवाला।
कामिनी की नज़रें कादर के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं।
वह उसकी मज़बूत गर्दन को देख रही थी जहाँ निवाला निगलते वक़्त कंठ (Adam’s apple) ऊपर-नीचे हो रहा था।
वह उसके चबाते हुए मज़बूत जबड़े को देख रही थी।
इस वक़्त कादर उसे सिर्फ़ एक प्रेमी या रक्षक नहीं लग रहा था।
उसमें कामिनी को रति (कामदेव की पत्नी) और ममता की मूरत (अन्नपूर्णा)… सब एक साथ दिखाई दे रहा था।
उसे लग रहा था कि वह किसी भूखे शेर को पाल रही है,

जो बाद में उसी को शिकार बनाएगा… और वह शिकार बनने के लिए तैयार थी।
कादर खाते-खाते, अनजाने में, कामिनी की उंगलियों को अपने होंठों से हल्का सा चूमने लगा।
निवाला लेते वक़्त उसके होंठ कामिनी की पोरों (Fingertips) को स्पर्श कर रहे थे।
यह जानबूझकर नहीं था, यह बस उस समर्पण का इज़हार था।
कामिनी ने हाथ नहीं खींचा।
उसे कादर के गीले, गर्म होंठ और उसके होंठो पर क्लीन शेव के बाद उग आगे कड़क रोये अपनी उंगलियों पर महसूस हो रही थी।

यह स्पर्श… रमेश के उस मरे हुए, ठंडे स्पर्श से लाख गुना ज़्यादा जीवंत और उत्तेजक था।
थाली खाली हो रही थी।
स्टोर रूम की हवा में तनाव इतना बढ़ गया था कि एक चिंगारी से विस्फोट हो सकता था।

थाली कब एक तरफ सरका दी गई पता ही नहीं चला, खाना तो कबका खत्म हो गया था,
लेकिन कादर अभी भी कामिनी की उंगलियों को अपने मुंह में भरे हुए था।
वह किसी भूखे बच्चे की तरह नहीं, बल्कि एक समर्पित भक्त की तरह उसकी उंगलियों को चूस रहा था।
“सुडप… सुडप…”
उसकी खुरदरी जीभ कामिनी की पोरों के बीच, नाखूनों के किनारों पर और हथेली के मांसल हिस्सों पर फिर रही थी।
जैसे वह कामिनी के शरीर का सारा स्वाद, सारी महक अपनी आत्मा में उतार लेना चाहता हो।
कामिनी की आँखें मदहोशी में बंद हो रही थीं और फिर झटके से खुल जातीं।
जब भी उनकी नज़रें मिलतीं, हवा में एक अदृश्य बिजली कौंध जाती।
कामिनी का जिस्म सिसक रहा था।
कादर का यह गीला और गर्म स्पर्श उसकी उंगलियों से होता हुआ सीधे उसकी नसों में आग लगा रहा था।
उसकी योनि में एक मीठा सा दर्द और भारीपन आ गया था। वहां से रिसता हुआ कामरस (wetness) अब बेकाबू हो रहा था, जैसे किसी बांध के दरवाज़े खुल गए हों।

अचानक, कादर ने उसकी कलाई पकड़ी और उसे अपनी तरफ खींचा।
कामिनी, जो पहले से ही उस जादू की गिरफ़्त में थी, किसी चुंबक की तरह खिंचती चली गई।
दोनों के चेहरे एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए। गर्म सांसें आपस में टकराने लगीं।
और फिर… जुड़ गए।
दोनों के होंठ एक-दूसरे पर टूट पड़े।
यहाँ कोई शब्द नहीं बोले गए, क्योंकि इन हालातों के लिए कोई शब्द बने ही नहीं थे।

कादर ने कामिनी के निचले होंठ को अपने दांतों और होंठों के बीच दबा लिया और उसे चूसने लगा।
कामिनी ने अपनी उंगलियां कादर के घने बालों में फंसा दीं और उसे अपने और करीब खींच लिया।
मुंह के अंदर जीभों की लड़ाई शुरू हो गई। एक-दूसरे की लार, एक-दूसरे की सांसें… सब एक हो रहा था।
कमरे में सिर्फ़ चूसने और भारी सांसों की आवाज़ें गूंज रही थीं— “म्मम्म्म… उम्म्म्म…”

कामिनी की उत्तेजना अब बर्दाश्त से बाहर हो रही थी।
उसे कादर के और करीब जाना था। इतना करीब कि हवा भी बीच से न गुज़र सके।
चुंबन को तोड़े बिना, कामिनी ने अपने घुटने उठाए और कादर की कमर के दोनों तरफ अपने पैर फैला दिए।
वह कादर की गोद में आ बैठी।
जैसे ही कामिनी की भारी और मांसल गांड कादर की जांघों पर टिकी…
एक धमाका हुआ।
कामिनी के पतले रेशमी गाउन के नीचे उसकी नंगी, गीली और गर्म योनि… कादर की लुंगी के नीचे तने हुए उस विशाल और पत्थर जैसे सख्त मुसल लंड से टकरा गई।

कपड़े की दो पतली परतें थीं, लेकिन अहसास ऐसा था जैसे नंगी बिजली का तार छू लिया हो।
कादर का लंड, जो लुंगी के अंदर फन उठाए खड़ा था, कामिनी की दरार के ठीक बीचों-बीच सेट हो गया।
वह इतना मोटा और सख्त था कि कामिनी को अपने नितंबों के बीच एक लोहे की रॉड महसूस हुई।
कामिनी की रूह कांप गई।

रमेश के जिस मांस के लोथड़े पर वह कुछ देर पहले कूद रही थी, उसके मुकाबले यह चट्टान थी।
कामिनी पागल हो गई।
उसने अपने होंठ कादर के होंठों में उलझाए रखे और नीचे…
अपनी कमर को हिलाना शुरू कर दिया।
वह गाउन के ऊपर से ही अपनी गीली चुत को कादर के लंड पर रगड़ने लगी।

“घिस… घिस…”
लुंगी का खुरदरा कपड़ा उसकी संवेदनशील चुत को रगड़ रहा था, और नीचे कादर का मुसल उसकी हर रगड़ का जवाब दे रहा था।
दोनों के जिस्म पसीने से भीग चुके थे।
कादर के मज़बूत हाथ कामिनी की कमर और पीठ पर कस गए थे, उसे और जोर से नीचे दबा रहे थे।
ऊपर होंठों का युद्ध चल रहा था, और नीचे जिस्मों का घर्षण।

कादर और कामिनी के होंठ एक-दूसरे से ऐसे चिपके हुए थे जैसे ज़िंदगी और मौत का सवाल हो।
यह सिर्फ़ चूमना नहीं था, यह एक-दूसरे की “प्राणवायु” को चूस लेना था।
कामिनी ने अपनी जीभ कादर के मुंह के अंदर इतनी गहराई तक धकेल दी थी कि वह कादर के तालू (Palate) को गुदगुदा रही थी।
कादर ने जवाब में कामिनी की जीभ को अपने दांतों और होठों के बीच जकड़ लिया और उसे किसी लॉलीपॉप की तरह चूसने लगा।
“स्लप… चप… सुडप…”
कमरे में सिर्फ़ गीली आवाज़ें गूंज रही थीं। दोनों के मुंह से लार (Saliva) का अत्यधिक रिसाव हो रहा था, जो उनके होठों के कोनों से बहकर उनकी ठुड्डी और गले को भिगो रहा था।

कामिनी पागलों की तरह कादर के होंठों को चूस रही थी, काट रही थी।
उसने अपनी जीभ कादर के मुंह के अंदर पूरी ताकत से घुसा दी थी, जिसे कादर ने बड़े ही चाव और लगन से अपनी जीभ से लपेटा और चूसना शुरू कर दिया।

मुंह के अंदर एक अलग ही युद्ध चल रहा था—दोनों की जीभें आपस में गुत्थमगुत्था हो रही थीं, दोनों एक-दूसरे की लार को पी रहे थे । कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था, जैसे बरसों की प्यास एक ही पल में बुझा लेना चाहते हों।

“हम्मफ़्फ़्फ़… हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़….”
थोड़ी देर में ही, साँस की कमी ने कामिनी को हार मानने पर मजबूर कर दिया। उसका दम घुटने लगा था, फेफड़े हवा के लिए तड़प उठे।
एक झटके से उसने अपना सिर पीछे खींचा।
दोनों के होंठ अलग हुए, लेकिन उनके बीच थूक और लार की एक लंबी, चिपचिपी तार खिंच गई जो टूटकर कामिनी की ठुड्डी पर गिर गई।

“हम्मफ़्फ़्फ़.. हमफ़्फ़्फ़… कादर…”
कामिनी हांफ रही थी। उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
लेकिन ऊपर की सांसें भले ही रुक गई हों, नीचे का काम जारी था।
कामिनी की कमर अभी भी, अपनी ही लय में, धीरे-धीरे कादर के पत्थर जैसे लंड पर रगड़ खा रही थी।
“घिस… घिस…”

लुंगी और गाउन के कपड़े के बीच से वह रगड़ ऐसी लग रही थी जैसे कामिनी कादर के हथियार को धार दे रही हो। वह अपनी योनि की गर्मी उस तक पहुँचा रही थी।
कादर मदहोश होकर अपनी गोद में बैठी इस काम-पिपासु औरत को देख रहा था।

कामिनी के होंठ सूजकर लाल हो गए थे, दोनों कोनों से लार टपक रही थी।
लेकिन कादर की नज़रें चेहरे पर नहीं टिकीं।
इस हाथापाई और रगड़ में, कामिनी के गाउन की ढीली ज़िप और खुल गई और रेशमी कपड़ा उसके कंधों से फिसलकर नीचे लटक गया था.

उसके बड़े, भारी और उन्नत स्तन (Breasts) अब पूरी तरह से आज़ाद थे।
पसीने और उत्तेजना से कामिनी की त्वचा गुलाबी पड़ गई थी।
उसके स्तनों के निप्पल्स, जो ठंडक और रगड़ से पहले ही खड़े थे, अब हवा के स्पर्श से और भी सख्त और नुकीले हो गए थे,

वे साँस लेने की वजह से तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहे थे— “धौंकनी की तरह।”
पसीने से भीगे हुए वो गोरे-चिट्टे मांस के गोले बल्ब की पीली रौशनी में चमक रहे थे। उनके ऊपर तने हुए काले-भूरे निप्पल्स कादर को सीधे चुनौती दे रहे थे।

कादर का लंड लुंगी के अंदर एक ज़बरदस्त झटका खा गया।
वह इस हसीन और उत्तेजक मंज़र को और बर्दाश्त नहीं कर सका। उसका सब्र टूट गया।
कादर ने एक जानवर की तरह गुर्राते हुए कामिनी के स्तनों पर हमला बोल दिया।

उसने बाएँ स्तन को नीचे से हथेली का सहारा दिया और ऊपर से मुंह खोलकर पूरे एरियोला (Areola) सहित निप्पल को अपने मुंह में भर लिया।
“गप्पप… भप…”
उसने एक ज़बरदस्त वैक्यूम (Vacuum) बनाया और गाल पिचका कर चूसने लगा।
कामिनी की रीढ़ की हड्डी में बिजली दौड़ गई।
कादर की खुरदरी जीभ निप्पल के छेद पर गोल-गोल घूम रही थी, और उसके दांत निप्पल की जड़ को हल्का-हल्का कुतर रहे थे।
यह दर्द और मज़े का ऐसा संगम था कि कामिनी की आँखें पलट गईं।
उसी वक़्त, कादर के दाहिने हाथ ने कामिनी के दूसरे स्तन पर कब्जा कर लिया।
उसने अपनी मज़बूत, गुंडों वाली उंगलियों को उस नरम, मखमली मांस में गड़ा दिया।
वह उसे आटे की लोई की तरह मसल रहा था, अपनी मुट्ठी में भरकर निचोड़ रहा था।
कभी वह उसे ऊपर उठाता, कभी दबाता।
“आअह्ह्ह.. माआआं… उउउफ्फ्फ्फ़…. कादर… निचोड़ ले…”
कामिनी सिसक उठी, उसका जिस्म धनुष की तरह तन गया।
उसने अपने दोनों हाथों से कादर के सिर को जकड़ लिया और उसे अपनी छाती में और ज़ोर से भींचने लगी।
वह चाहती थी कि कादर उसके स्तनों को खा जाए, पी जाए।

“आअह्ह्ह.. आउचम्म… उउउफ्फ्फ्फ़…. कादर…”
कामिनी के मुंह से एक तीखी, कामुक सिसकी निकल गई।
दर्द और मज़े की एक लहर ने उसके जिस्म को अकड़ा दिया।
कादर के दांतों का हल्का सा दबाव और उसके हाथ की वहशी पकड़… यह वही तो था जिसके लिए वह तरस रही थी। रमेश ने कभी उसे ऐसे नहीं छुआ था। रमेश उसे नोचता था, लेकिन कादर उसे पी रहा था।

कादर एक स्तन को छोड़ता और दूसरे पर टूट पड़ता।
“चप… चप… चप…”
कमरे में सिर्फ़ चूसने की गीली आवाज़ें और कामिनी की भारी आहें गूंज रही थीं।
कादर कामिनी के निप्पल्स को अपनी जीभ से गुदगुदाता, फिर दांतों से हल्का काटता, और फिर चूसकर उसे लाल कर देता।
कामिनी की योनि अब पूरी तरह से बाढ़ की चपेट में थी। उसका पूरा गाउन नीचे से गीला हो चुका था।
वह कादर की गोद में उछलना चाहती थी, लेकिन कादर ने उसे अपनी पकड़ में जकड़ रखा था।

नीचे, कामिनी की योनि अब बाढ़ की तरह बह रही थी।
गाउन का रेशमी कपड़ा उसकी जांघों के बीच पूरी तरह गीला होकर पारदर्शी हो चुका था।
कादर का लुंगी में कैद लंड उस गीलेपन और गर्मी को महसूस कर रहा था।
कामिनी जानबूझकर अपनी पेल्विस (Pelvis) को गोल-गोल घुमा रही थी— “मथनी की तरह।”
वह अपनी गीली चुत की रगड़ से कादर के लंड को लुंगी के अंदर ही पागल कर रही थी।

लंड की टोपी लुंगी के कपड़े से रगड़ खा रही थी, और ऊपर कादर के मुंह में कामिनी का निप्पल खिंच रहा था।
कामिनी बड़बड़ाई, “और जोर से कादर… मेरे दूध के कटोरे हैं ये… पी जा इन्हें… मुझे खाली कर दे…”
यह सुनते ही कादर ने चूसने की रफ़्तार बढ़ा दी।
“सुडप… सुडप… स्लर्प…”
वह एक निप्पल छोड़ता और दूसरे पर लपकता, जैसे बरसों का प्यासा बछड़ा अपनी माँ के थनों पर टूट पड़ा हो।

कादर की गोद में बैठी कामिनी पूरी तरह से बेसुध हो चुकी थी।
उसका रेशमी गाउन सरककर उसकी कमर पर इकट्ठा हो गया था, जैसे किसी पुराने पर्दे को हटा दिया गया हो।

बल्ब की पीली, मद्धम रौशनी में कामिनी की विशाल, गोरी और नंगी गांड पसीने से भीगी हुई चमक रही थी।
कादर के दोनों मज़बूत और खुरदरे हाथ उस मलाई जैसे मुलायम मांस पर जम गए।

वह कामिनी के कूल्हों (Buttocks) को सिर्फ़ पकड़ नहीं रहा था, बल्कि उन्हें बेदर्दी से मसल रहा था। उसकी उंगलियां मांस में धंस रही थीं, उसे दबा रही थीं, और फिर अपनी तरफ खींचकर अपने लोहे जैसे सख्त लंड पर कस रही थीं।

“आअह्ह्ह…. आअह्ह्ह… सस्सियस… उउउफ्फ्फ्फ़….”
कामिनी का सिर पीछे की तरफ लुढ़क गया था।
ऊपर, कादर का मुंह अभी भी उसके स्तन से चिपका हुआ था। वह एक निप्पल को वैक्यूम की तरह चूस रहा था, जबकि उसका एक हाथ दूसरे आज़ाद स्तन को पकड़कर रगड़-रगड़ कर लाल कर चुका था।
कामिनी उत्तेजना और हवस के भंवर में फंसकर कादर के घने बालों को अपनी मुट्ठियों में जकड़ रही थी, उन्हें खींच रही थी, जैसे वह उस दर्द और मज़े को संतुलित करने की कोशिश कर रही हो।

लेकिन असली कयामत तो नीचे हो रही थी।
कादर का लंड लुंगी के अंदर फन उठाए खड़ा था, और कामिनी की गीली चुत गाउन के कपड़े के ऊपर से ही उस पर रगड़ खा रही थी।
कादर का एक हाथ कामिनी की गांड के एक हिस्से (Butt cheek) को कसकर दबोचे हुए था, जबकि उसका दूसरा हाथ…
वह दूसरा हाथ कामिनी की गांड की गहरी और पसीने से भीगी दरार (Cleft) में खेल रहा था।
कादर की मोटी और सख्त उंगली कामिनी की उस दरार में ऊपर-नीचे नाच रही थी।

वह उंगली धीरे-धीरे फिसलती हुई नीचे जाती… और जैसे ही वह कामिनी के गांड के संकरे छेद (Anus) को छूती…
“इइइस्स….उउउफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ग…”
कामिनी के बदन में बिजली दौड़ जाती।
उसकी कमर अपने आप आगे की तरफ झटका खाती, जिससे उसकी गीली योनि कादर के खड़े लंड से और ज़ोर से चिपक जाती।

यह एक लय बन गई थी।
जैसे ही लंड की रगड़ और चाहत उसे महसूस होती, कामिनी अपनी कमर पीछे करती, ताकि वह रगड़ और गहरी हो।
लेकिन जैसे ही वह पीछे आती, कादर की उंगली फिर से उस गीले, कामुक और वर्जित छेद पर रगड़ खाने लगती, उसे गुदगुदाने लगती।
कामिनी मरे जा रही थी।
पीछे गांड में उंगलियों की शैतानी, और आगे चुत पर लंड की सख्ती।
ऊपर स्तन मसले जा रहे थे, निप्पल चूसे जा रहे थे।
उसका पूरा शरीर एक कामुक यंत्र बन गया था जिस पर कादर अपनी धुन बजा रहा था।

कामिनी का सब्र का पैमाना अब छलक चुका था।
उसे अपनी पिछली सारी अधूरी रातें याद आ गईं।

हर बार जब भी वह अपनी हवस मिटाने की दहलीज पर होती, कोई न कोई अड़चन, कोई न कोई मुसीबत आ ही जाती थी।
आज वह ऐसा नहीं चाहती थी। उसे डर था कि कहीं फिर कोई आ न जाए, कहीं यह नशा उतर न जाए।
कामिनी ने कादर के बालों को झकझोरा और उसका चेहरा अपने स्तनों से हटाया।
उसकी आँखों में आंसू और हवास दोनों थे।
वह हांफ रही थी, उसकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
“हमफ़्फ़्फ़… हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़…. कादर… प्लीज…”
कामिनी की आवाज़ टूटी हुई और भारी थी।
“अब और नहीं… प्लीज कादर… सब्र नहीं होता अब…”
उसने अपनी कमर को कादर के लंड पर ज़ोर से पटका।
“मुझे भर दो… मैं मर जाउंगी ऐसे… मेरी चुत मे दर्द हो रहा है, मिटा दो ये दर्द, .. इसे अंदर ले लो कादर… अभी… इसी वक़्त…”
कामिनी दुहाई मांग रही थी।
ना जाने सभ्य कामिनी ऐसे शब्द कैसे बोल गई, हमेशा अपनी इच्छा, अपनी भावनाओं को दबाये रखने वाली औरत आज लंड लेने की चाहत को चिल्ला कर बता रही थी.
कुदरत का निज़ाम भी गजब है, कब किसको क्या बना दे.

कामिनी बेइंतहा पागल हुए जा रही थी। उसकी कामुकता ने शर्म और हया के सारे बांध तोड़ दिए थे।
उसकी चुत से निकल रहे निरंतर पानी के रिसाव ने कादर की जांघों और उसकी लुंगी के उस हिस्से को पूरी तरह गीला कर दिया था जहाँ वह बैठी थी।
वहाँ एक “बाढ़” आई हुई थी।

कामिनी ने अपनी कांपती हुई, गोरी और भारी जांघों को थोड़ा ऊपर उठाया।
उसने अपनी नज़रें नीचे झुकाईं।
गाउन और लुंगी की रगड़ में, कादर का लंड तो कबका बाहर आ चुका था।
बल्ब की पीली रौशनी में वह बिल्कुल नंगा था, और सबसे उत्तेजक बात यह थी कि वह कामिनी की ही चुत के रस से सना हुआ था।
वह विशाल, काला और नसों वाला मुसल कामिनी के कामरस की वजह से शीशे की तरह चमक रहा था।
उसका टोपा (Supari), जो एक बड़े मशरूम जैसा था, लाल होकर धधक रहा था और उस पर कामिनी की योनि का चिपचिपा पानी लगा हुआ था।

कामिनी का मन किया कि झुक जाए और इस हसीन, गीले और रसीले लंड को प्यार करे।
उसे अपनी जीभ से साफ़ करे, उसे चाटे।
लेकिन उसकी प्राथमिकता अभी अलग थी।
उसके अंदर, उसकी चुत के मुहाने पर जो मीठी खुजली और खालीपन था, उसे मिटाना सबसे ज़रूरी था। वह उस लंड को अपने अंदर महसूस करने के लिए मर रही थी।

कामिनी ने एक बार अपनी नशीली आँखों से कादर की ओर देखा।
उसकी आँखों में एक मूक प्रश्न था, जैसे अनुमति मांग रही हो— “क्या मैं इसे ले लूं?”
कादर ने उसकी आँखों में झांका। उसने कामिनी की तड़प को महसूस किया।
उसने अपने भारी होंठ हिलाए और धीरे से, लेकिन अधिकार के साथ फुसफुसाया:
“तेरा ही है…कामिनी… पूरा ले लो इसे…”
कादर के इन शब्दों ने कामिनी के कानों में पिघला हुआ सोना डाल दिया।

कामिनी का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल होकर जलने लगा।
उसने एक गहरी सांस ली।
उसने अपनी दोनों टांगे कादर की कमर के दोनों तरफ और चौड़ी कर दीं।
संतुलन बनाने के लिए उसने अपने दोनों गोरे हाथ कादर के मज़बूत कंधों पर रख दिए, जैसे कोई घुड़सवार अपनी सवारी को थाम रहा हो।

कादर जानता था कि उसका हथियार कितना बड़ा है और कामिनी कितनी नाज़ुक।
इसलिए उसने तुरंत अपने दोनों मज़बूत हाथ कामिनी के भारी कूल्हों (Buttocks) के नीचे लगा दिए।
उसने उसकी गांड को अपनी हथेलियों में भर लिया, ताकि वह कामिनी के वजन को संभाल सके और उसे अचानक गिरने से रोक सके।

अब… मिलन का क्षण आया।
कामिनी धीरे-धीरे, बहुत संभलकर नीचे बैठने लगी।
उसने अपनी कमर को सेट किया।
उसकी योनि का गीला और खुला हुआ मुंह कादर के लंड के टोपे (Head) पर आकर टिक गया।

“आआआआहहहह….. आउच…. उइइइ….”
कादर का वह मोटा, गर्म और लोहे जैसा सख्त टोपा जैसे ही कामिनी की गीली और संवेदनशील त्वचा से छूआ…
कामिनी कांप उठी।
एक ठंडे बर्फ जैसी लहर ने उसके पूरे जिस्म को अपनी आगोश में ले लिया।
यह अहसास इतना तीव्र था कि उसकी रीढ़ की हड्डी में झनझनाहट हो गई। ये अहसास भी क्या गजब होता है, लंड चुत दोनों ही गर्म होते है लेकिन उनका मिलन ठंड़ाई देता है.

कामिनी ने अपनी आँखें फाड़कर नीचे देखा।
वह दृश्य अविश्वसनीय था।
उसकी गोरी-चिट्टी, फूली हुई योनि के गुलाबी होंठ (Labia) कादर के उस काले, विशाल लंड के टोपे को चूम रहे थे।

कादर का लंड इतना मोटा था कि वह कामिनी की चुत के मुहाने पर ही अटक गया था।
हालाँकि कल रात रघु के साथ चुदने से उसकी योनि में थोड़ी जगह और लचीलापन बन गया था, लेकिन रघु का लंड एक आम इंसान का लंड था… और यह?
यह कादर खान का “अजगर” था।

इसे अंदर लेने के लिए कामिनी को अपनी आत्मा तक का दरवाज़ा खोलने की जरुरत पड़ने वाली थी.

कामिनी रुकी नहीं।
उसने कादर के कंधों पर अपनी पकड़ मज़बूत की और अपनी गांड को ढीला छोड़ा।
कादर ने भी नीचे से हल्का सा धक्का दिया।
और फिर… एक गीली, लसलसी आवाज़ गूंजी।

“पच… पच… फस्स्स…”
उस आवाज़ के साथ, कादर का वह विशाल, गुलाबी और नंगा टोपा कामिनी की तंग योनि की दीवारों को चीरता हुआ अंदर धंस गया।
मांस ने मांस को रास्ता दिया। कामिनी की योनि की दीवारें फैल गईं, उस मोटे घेरे को अपने अंदर समाने के लिए खिंच गईं।

“आआआह्ह्हः… कादर….. हाआआए…. मै मर गई…”
कामिनी लगभग चीख ही उठी।
उसकी गर्दन पीछे लुढ़क गई।
यह दर्द नहीं था, यह पूर्णता (Completion) का अहसास था।
उस मोटे टोपे के अंदर घुसते ही कामिनी को लगा जैसे उसके पेट के निचले हिस्से में कोई ज्वालामुखी भर गया हो।
राहत और उस अजीब से, भरे-भरे अहसास की वजह से कामिनी ने अनजाने में अपनी गांड के छेद (Anus) और योनि की मांसपेशियों को कसकर सिकोड़ लिया।

उसकी भीतरी दीवारों ने कादर के टोपे को जकड़ लिया, जैसे कह रही हों— “अब तुझे जाने नहीं दूंगी।”
कादर ने भी सिसकारी ली। कामिनी की वो गर्म, भींचने वाली पकड़ (Grip) उसे पागल कर रही थी।

वह जकड़ इतनी तेज़ थी कि कादर की आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
“उफ्फ्फ्फ… कामिनी…” कादर बुदबुदाया।
कादर के होश भी उड़ गए थे, पहली बार किसी औरत ने उसके मुँह से सिस्कारी निकली थी, वो कादर जो ना जाने कितनी रंडियो औरतों को मसल चूका था, चुत को फाड़ चूका था, लेकिन आज?
आज एक घरेलु औरत ने उसके लंड को ऐसे जकड़ा हुआ था मानो उसके लंड का गला दबोच लिया हो.
टोपा अंदर था… लेकिन अभी 8 इंच का लंबा सफर बाकी था।
8इंच कहने सोचने मे छोटा है, लेकिन ये फैसला 8किलोमीटर से कम का तो कतई नहीं लग रहा था, कामिनी को ये फैसला तय करना ही था आज.

कादर का बाकी बचा हुआ 8 इंच लंबा और कलाई जैसा मोटा तना बाहर लुंगी के ऊपर अकड़ा हुआ था, जिस पर मोटी-मोटी नसें (Veins) सांप की तरह लिपटी हुई थीं।
कामिनी ने एक गहरी सांस ली।

उसने अपने फेफड़ों में हवा भरी, और अपने दोनों हाथों से कादर के मज़बूत कंधों को कसकर जकड़ लिया। उसके नाखून कादर के मांस में गड़ गए।
उसने अपनी कमर को ढीला छोड़ा और धीरे-धीरे… नीचे उतरना शुरू किया।
“फस्स्स… सर्रर्र…. पच…”
जैसे ही कामिनी नीचे खिसकी, कादर का मोटा लंड उसकी तंग गुफा को चीरता हुआ (Stretching) ऊपर चढ़ने लगा।

कामिनी को महसूस हुआ कि सिर्फ़ मांस नहीं, बल्कि कोई गर्म लोहे की रॉड उसके अंदर डाली जा रही है।
वह रॉड बिल्कुल चिकनी नहीं थी।
कादर के लंड पर उभरी हुई सख्त नसें कामिनी की योनि की नाज़ुक और रसीली दीवारों को रगड़ती हुई (Scraping), उन्हें सहलाती हुई अंदर घुस रही थीं।
हर इंच के साथ कामिनी की आँखें फटी जा रही थीं।

“आआआह्ह्ह… उइइइ माँ… कितना बड़ा है… उफ्फ्फ्फ…”
कामिनी सिसक रही थी, लेकिन रुक नहीं रही थी।
आधा लंड अंदर जाते ही कामिनी की साँसें अटक गईं।
उसे लगा उसका पेट भर गया है। उसे लगा अब और जगह नहीं बची।
रमेश का लंड तो कभी चुत के मुहने से आगे बढ़ा ही नहीं था, लेकिन कादर का लंड? यह तो अभी आधा भी नहीं गया था और कामिनी को “भरने” (Fullness) का अहसास हो रहा था।
कैसी बेहया हो गई थी कामिनी हर वक़्त रमेश से तुलना किये जा रही थी, खेर करती भी क्यों नहीं… इस अंजाम तक लाने वाला भी तो वही था.

कामिनी एक पल के लिए रुकी।
उसकी योनि की दीवारें उस मोटाई के साथ तालमेल बिठाने (Adjust) के लिए फैल रही थीं।

उसकी चुत का रस (Lubrication) उस काले लंड को गीला और फिसलन भरा बना रहा था, ताकि वह और गहराई तक जा सके।
कादर ने नीचे से कामिनी की कमर पकड़ी और हौसला दिया—
“क्या हुआ अभी से हार मन ली क्या कामिनी जी?” कादर मुस्कुराता हुआ फुसफुसाया.

कादर की इस कामुक चुनौती ने कामिनी के अंदर आग लगा दी।
उसने अपनी आँखें बंद कीं, दांत भींचे और एक ही झटके में अपनी पूरी ताकत से नीचे बैठ गई।

“धप्प!!”
मांस से मांस टकराने की एक भारी आवाज़ गूंजी।
कामिनी के भारी और गोरे कूल्हे कादर की सांवली और सख्त जांघों से पूरी ताकत से टकराए।
और उसी पल…
कादर का वह विशाल मुसल कामिनी की योनि की आखरी गहराई (Cervix) तक, उसकी बच्चेदानी के मुंह तक जा पहुंचा।
उसने कामिनी को जड़ तक (Balls deep) भेद दिया था।
“आआआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!!!!”
कामिनी का सिर पीछे की तरफ झटक गया।
उसका मुंह खुला रह गया, लेकिन आवाज़ गले में ही घुट गई।
उसकी आँखें पथरा गईं।
यह दर्द था? या मज़ा?
यह दोनों का विस्फोटक मिश्रण था।
उसे लगा जैसे कादर ने उसके शरीर के आर-पार कोई खंभा गाड़ दिया हो।

उसकी नाभि (Navel) तक उसे कादर की मौजूदगी महसूस हो रही थी।
वह पूरी तरह से “भरी” (Filled) हुई थी। इतनी भरी हुई कि उसे लगा अगर वह हिली तो फट जाएगी।
कामिनी वहीं, उस चरम स्थिति में, कादर के कंधों पर लटक गई।

उसका सीना तेज़ी से धड़क रहा था।
नीचे… दोनों के जननांग (Genitals) एक-दूसरे में लॉक (Locked) हो चुके थे।
कादर के लंड की जड़ कामिनी की चुत के बाहरी होंठों को कुचल रही थी।
अंदर… कादर का लंड कामिनी की हर नब्ज़, हर धड़कन को महसूस कर रहा था।
कामिनी की भीतरी दीवारें उस घुसपैठिये को चारों तरफ से जकड़े हुए थीं, उसे “लभ… लभ… लभ…” करते हुए दबा रही थीं।

कादर ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी, संतोषजनक गुरराहट छोड़ी—
“हम्मम्म… आअह्ह्ह….. अब गई ना म्यान मे तलवार ”

कामिनी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं।
नशा, दर्द और हवस से भरी आँखों से उसने कादर को देखा।
और उसके कान में, एक पत्नी नहीं, बल्कि एक रखैल की तरह फुसफुसाया

“हाय… उउउफ्फ्फ्फ़…कादर… आअह्ह्ह…… तुमने तो मेरी आत्मा तक को छू लिया… आज तक मैं खाली थी… अब भरी हूँ…”।

कामिनी एक पल के लिए रुकी रही, उस भराव (Fullness) को महसूस करती रही। उसे लगा जैसे उसके पेट में, उसकी नाभि के नीचे, कादर ने अपना घर बना लिया है।

कादर का लंड कामिनी के अंदर स्थापित हो चुका था। लेकिन कामिनी को सिर्फ़ ‘रखा’ हुआ लंड नहीं चाहिए था, उसे वो रगड़ चाहिए थी जो उसकी आत्मा को झकझोर दे।
कामिनी ने अपने दोनों हाथ कादर के पसीने से भीगे, मज़बूत कंधों पर जमाए।
उसने एक गहरी सांस खींची और अपनी भारी, गोरी और मांसल गांड को हवा में ऊपर उठाना शुरू किया।
“स्लुप्प… सर्रर्र…”
एक गीली और कसी हुई आवाज़ के साथ, कादर का वो विशाल, काला और नसों वाला मुसल कामिनी की तंग गुफा (योनि) से फिसलते हुए बाहर आने लगा।

यह अहसास कामिनी के लिए पागल कर देने वाला था।
कादर के लंड पर उभरी हुई मोटी-मोटी नसें (Veins) कामिनी की योनि की भीतरी, रसीली दीवारों को रगड़ती हुई (Scraping), उन्हें खुरचती हुई नीचे उतर रही थीं।
हर इंच के साथ कामिनी को अपनी गुफा के अंदर एक खालीपन महसूस होने लगा, जो उसे बेचैन कर रहा था।
जब कामिनी लगभग पूरी ऊपर उठ गई, तो कादर का लंड सिर्फ़ अपने टोपे (Supari) के सहारे उसके योनि-द्वार पर टिका रह गया।

बाकी पूरा 8 इंच का गीला, चमकीला और फौलादी तना बाहर हवा में नंगा हो गया था, जो कामिनी के कामरस से सना हुआ बल्ब की रौशनी में चमक रहा था।
कामिनी ने एक पल के लिए उस खालीपन को महसूस किया।
उसने अपनी कमर को हवा में ही रोका।
उसकी योनि का मुंह कादर के टोपे को जकड़े हुए था, जैसे उसे वापस अंदर बुला रहा हो।
कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कीं, अपने होंठों को दांतों तले दबाया।

और फिर… अपनी पूरी ताकत, अपना पूरा वजन और अपनी बरसों की प्यास को एक साथ समेटा।
“धप्प….!!!!”
कामिनी ने अपनी कमर को एक झटके से, पूरी निर्दयता के साथ नीचे पटक दिया।
यह कोई प्यार भरा मिलन नहीं था, यह एक हमला था।
कामिनी के भारी-भरकम कूल्हे कादर की सख्त जांघों से किसी हथौड़े की तरह टकराए।

“पच… फस्स्स…फटाक..”
हवा और मांस के टकराने की आवाज़ स्टोर रूम के सन्नाटे को चीर गई।
कादर का वो पत्थर जैसा लंड एक ही झटके में, बिना रुके, कामिनी की योनि को चीरता हुआ, उसकी गहराई को रौंदता हुआ, सीधा उसकी बच्चेदानी (Cervix) के मुंह से जा टकराया।

उसने कामिनी को जड़ तक (Balls Deep) भर दिया।
“आआआआह्ह्ह्ह…. माआआ…. उफ्फ्फ्फ मर गई…”
कामिनी का सिर एक झटके से पीछे लुढ़क गया।
उसका मुंह खुल गया, आँखें चढ़ गईं।
उस धक्के की तीव्रता (Impact) इतनी ज़बरदस्त थी कि कामिनी को लगा जैसे कादर का लंड उसके पेट को फाड़कर नाभि तक पहुंच गया है।
उसके अंदर का कोना-कोना उस मोटे मांस से भर गया।

रमेश के साथ जो ‘खालीपन’ उसे महसूस होता था, वह आज इस एक झटके में हमेशा के लिए मिट गया।
कामिनी वहीं, उस गहराई में रुक गई।
उसने अपनी गांड को कादर की जांघों पर दबाए रखा।
वह उस “फुलनेस” (Fullness) को महसूस कर रही थी।

नीचे कादर भी इस वार से हिल गया था।
“उफ्फ्फ्फ… कामिनी जी.. क्या कर रही है?…” कादर गुर्राया।
कामिनी के गोरे जांघों का मांस कादर की सांवली त्वचा पर फैल गया था।

यह अहसास उसे सम्पूर्ण कर रहा था।
कामिनी ने वापस से धीरे से अपनी जांघों पर जोर दिया।
उसने अपने कूल्हों को हवा में 2-3 इंच ऊपर उठाया।
“स्लुप्प…”
एक गीली, सक्शन (Suction) वाली आवाज़ के साथ कादर का मोटा लंड कामिनी की भीतरी दीवारों से रगड़ खाता हुआ थोड़ा बाहर निकला।

कामिनी को अपनी योनि के अंदर उन मोटी-मोटी नसों की रगडन महसूस हुई। वह रगडन इतनी सुखद थी कि उसकी आँखें पलट गईं।
जैसे ही लंड का टोपा बाहर आने को हुआ, कामिनी ने वापस अपनी कमर नीचे पटक दी।
“धप्प… पच!!”
कादर का लंड फिर से एक झटके में जड़ तक (Deep) अंदर धंस गया।
कामिनी की गांड कादर की जांघों से टकराई।
और बस… यहाँ से लय (Rhythm) शुरू हो गई।
कामिनी 5 सेकंड इस अहसास को महसूस करती फिर ऊपर उठती…. उठने ही खालीपन को महसूस करती फिर पूरी ताकत से अपनी भारी गांड को कादर के लंड से टकरा देती…
कादर जजसा मर्द भी उसकी टक्कर से हिल के रह जाता.
हर टक्कर के साथ कामिनी चीखती… कादर के सीने कंधो मे नाख़ून गाढ़ाती, लेकिन मजाल की रूकती…
फिर से ऊपर उठती फिर… नीचे… धम.. धमममम…ठप…
फिर ऊपर…. फिर नीचे… ठप… धप….
अब ये सिलसिला चल पड़ा, कामिनी की चुत इतनी काबिल हो गई की वो कादर के लंड को झेल सके…

कामिनी अब रुक नहीं रही थी, वो कमर उठती, और झट से नीचे बैठ जाती…
आअह्ह्ह…. ऊफ्फफ्फ्फ़… ठप… धप….
ऊपर… नीचे… पच…. धप….
ऊपर… नीचे… पच…. ठप….
कामिनी अब सवारी कर रही थी।
वह किसी मदमस्त घोड़ी की तरह कादर के लंड पर उछल रही थी।
हर बार जब वह नीचे आती, कादर का सख्त मुसल उसकी योनि की गहराइयों को खंगाल देता।

“चप… चप… चप… धप्प… धप्प…”
स्टोर रूम में अब सिर्फ़ गीलेपन और मांस के टकराने की आवाज़ें गूंज रही थीं।
कादर नीचे लेटा, एक घरेलु औरत के इस रूप को देख पागल हो रहा था।
ऊपर बल्ब की रौशनी में कामिनी के खुले, भारी और पसीने से भीगे स्तन आज़ाद होकर हवा में झूल रहे थे।

जब कामिनी उछलती (Bounce), तो उसके स्तन भी “धप… धप…” करते हुए ऊपर-नीचे होते।
उनके काले निप्पल हवा को काट रहे थे।
कादर ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए और कामिनी के उछलते हुए स्तनों को मुट्ठी में भर लिया।
वह उन्हें नीचे से दबाने लगा, मसलने लगा, जिससे कामिनी की उत्तेजना और बढ़ गई।

“आआआह्ह्ह… कादर… फाड़ दो.. चिर दो… उफ्फ्फ्फ… ऐसे ही…”
कामिनी अपनी सुध-बुध खो चुकी थी।
उसकी योनि अब लंड के आकार में ढल चुकी थी।
कादर का लंड उसके अंदर एक मथनी (Churner) की तरह चल रहा था।
कामिनी अपनी कमर को गोल-गोल घुमाने लगी।

वह कादर के लंड को अपनी दीवारों से चारों तरफ से निचोड़ रही थी।
उसकी योनि का रस (Lubrication) इतना ज़्यादा बह रहा था कि कादर का लंड और जांघें पूरी तरह से चिकनी हो गई थीं।

“पच… पच… पच…” की आवाज़ें अब तेज़ हो गई थीं।
कादर से अब सिर्फ़ लेटे रहना बर्दाश्त नहीं हुआ।
उसने नीचे से ठुकाई (Thrusting) शुरू कर दी।
जब कामिनी नीचे आती, कादर अपनी कमर ऊपर उछालता।
दोनों का मिलन एक विस्फोट जैसा होता।
“ठक… ठक… ठक…”
कादर का पेडू (Pelvic bone) कामिनी के नितंबों से टकरा रहा था।
हर टक्कर पर कामिनी का मुंह खुल जाता और एक लंबी, गहरी आह निकलती— “हाआआए राम… मर गई…”
यह रमेश का बिस्तर नहीं था। यह कोई नपुंसक खेल नहीं था।
यह असली हमबिस्तरी थी।
कामिनी को पहली बार पता चला कि एक औरत को ‘भरा’ जाना क्या होता है।

उसका गोरा बदन पसीने से नहाया हुआ था, बाल बिखर कर चेहरे पर आ गए थे, और वह किसी रणचंडी की तरह कादर के ऊपर तांडव कर रही थी।

कादर का काला, मज़बूत लंड उस गोरी गुफा के अंदर-बाहर हो रहा था।
दृश्य ऐसा था जैसे काली नाग किसी गोरे बिल में बार-बार फन मार रहा हो।
कामिनी अब रुकने वाली नहीं थी।
वह अपनी मंज़िल (Orgasm) के करीब थी।
उसने अपनी गति और बढ़ा दी।
“और ज़ोर से कादर… मुझे तोड़ दो आज… मुझे अपना बना लो…”

कामिनी किसी भूखी शेरनी की तरह कादर के लंड पर ऊपर-नीचे हो रही थी।
उसकी साँसें तेज थीं, आँखें चढ़ी हुई थीं, और वह अपने चरम (Climax) के बिल्कुल करीब थी।
उसकी योनि की दीवारें कादर के लंड को कसने लगी थीं (Spasms), जो इस बात का संकेत था कि वह अब झड़ने वाली है।

लेकिन कादर एक पुराना खिलाड़ी था।
इतनी जल्दी खेल ख़त्म करना उसे मंजूर नहीं था। उसे कामिनी की इस प्यास को और भड़काना था, उसे तड़पाना था।
अचानक…
कादर ने एक झटके में कामिनी की पीठ को अपनी मज़बूत बांहों में जकड़ लिया और उसे अपनी छाती से चिपका लिया।
“दब…!चपक..!”
कामिनी के पसीने से भीगे, भारी और नंगे स्तन कादर के पत्थर जैसे सीने में पिस गए।
कादर की छाती के घने, कड़े और पसीने से लथपथ बाल कामिनी के संवेदनशील निप्पल्स पर रगड़ खाने लगे.

वह खुरदरी गुदगुदी और दबाव कामिनी के लिए एक अजीब सा करंट ले आया।
कामिनी की नशीली आँखों में एक सवाल था, जिसे कादर ने बखूबी पढ़ लिया।
कादर ने उसके कान के पास अपने होंठ ले जाकर, एक शिकारी की तरह फुसफुसाया:
“कामिनी तेरा हो गया.. अब मेरी बारी है…”

कामिनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही उसकी आँखें और दिमाग आश्चर्य से फट गए।
कादर ने अपनी टांगों पर जोर दिया और एक ही झटके में खड़ा हो गया।
हैरानी की बात यह थी कि उसने कामिनी को गोदी में उठा रखा था, और उसका 8 इंच का मुसल लंड अभी भी कामिनी की चुत में जड़ तक धंसा हुआ था।

कामिनी का भारी-भरकम, भरा हुआ जिस्म… लेकिन कादर ने उसे ऐसे उठा लिया जैसे वह कोई फूल हो।
कादर की यह अमानवीय जिस्मानी ताकत देखकर कामिनी का दिल दहल गया।

गिरने के डर से कामिनी ने तुरंत अपने दोनों हाथ कादर के गले में डाल दिए और उसे कसकर पकड़ लिया।
कादर कामिनी को हवा में उठाए-उठाए पलटा।
उसने दो कदम बढ़ाए और कामिनी की नंगी पीठ को स्टोर रूम की ठंडी, सीलन भरी दीवार से सटा दिया।

“आअह्ह्ह… इस्स्स…. उउउईईई….”
कामिनी की गर्म पीठ जैसे ही दीवार की बर्फीली ठंडक के संपर्क में आई, वह बुरी तरह सिसक उठी।
उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
पीछे दीवार की ठंडक, और आगे कादर के जिस्म की भट्टी जैसी गर्मी कामिनी इन दो एहसासों के बीच सैंडविच बन गई थी।

कादर ने कामिनी के दोनों पैरों को घुटनों के नीचे से पकड़ा और उन्हें चौड़ा (Spread) कर दिया।
अब कामिनी का पूरा जिस्म कादर के सामने नंगा और खुला हुआ था।
उसके हाथ कादर के गले में टंगे थे, पीठ दीवार से चिपकी थी, और टांगें हवा में खुली हुई थीं।
उसकी योनि कादर के लंड को निगले हुए साफ़ दिख रही थी।
और फिर… तूफ़ान आया।
कादर ने अपनी कमर को थोड़ा पीछे खींचा और फिर पूरी ताकत से दे मारा।

“धड़… धाड़… धड…!!”
बिना किसी चेतावनी के, कादर ने ताबड़तोड़ कामिनी की चुत को पेलना (Pounding) शुरू कर दिया।
“फच… फच… फच… पच… पच…”
आवाज़ें बदल गईं।
अब यह रगड़ की आवाज़ नहीं थी, यह गीले मांस पर हथौड़े बजने की आवाज़ थी।

कादर अपनी पूरी ताकत से ठुकाई कर रहा था।
हर धक्के के साथ कामिनी का सिर पीछे दीवार से टकराता, और उसके स्तन हवा में बुरी तरह हिलते।

“आअह्ह्ह… आअह्ह्ह… उउउफ्फ्फ्फ़…. कादर… मर गई…. हाआआए…”

कामिनी की चीखें स्टोर रूम में गूंजने लगीं।
उसे आज समझ आ गया कि खुद लंड पर कूदना और एक मर्द द्वारा टांगकर चोदे जाना—इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।

कूदने में ‘कंट्रोल’ उसके पास था, लेकिन यहाँ?
यहाँ वह पूरी तरह से बेबस थी। कादर उसे रौंद रहा था, उसकी गहराइयों को खोद रहा था।
कादर रुका नहीं।
“फच… फच… फच…”
रफ़्तार और बढ़ गई।
कामिनी की योनि इतना ज़्यादा रस छोड़ रही थी कि हर धक्के (Thrust) के साथ, लंड और चुत के संगम से कामरस और शायद उत्तेजना में निकली पेशाब की बूंदें फव्वारे की तरह बाहर निकल रही थीं।

वे बूंदें हवा में तैरतीं, और फिर कादर के पेट और कामिनी की जांघों पर गिरतीं।
“छपाक… छप…”
कादर का लंड कामिनी की बच्चेदानी (Cervix) पर हथौड़े बरसा रहा था।

कामिनी को लगा जैसे उसका अस्तित्व ही मिट जाएगा।
वह दर्द… वह मज़ा… वह बेबसी…

कादर की रफ़्तार अब तूफानी हो चुकी थी।
दीवार से कामिनी की पीठ टकराने की आवाज़— “धप… धप…” और जांघों के टकराने की आवाज़— “फच… फच…” मिलकर एक उन्मादी संगीत बना रहे थे।

कामिनी का सिर पीछे लुढ़का हुआ था, बाल पसीने से चिपक कर चेहरे पर आ गए थे।
उसका पूरा शरीर ऐंठन (Spasm) ले रहा था।
उसकी योनि की दीवारें कादर के लंड को ऐसे जकड़ रही थीं जैसे उसे निचोड़ लेंगी।

“आआआह्ह्ह… कादर… मैं गई… उफ्फ्फ्फ… बस… बस…”
कामिनी की आवाज़ फट गई।
उसे लगा जैसे उसके पेट के निचले हिस्से में हज़ारों बिजलियाँ एक साथ गिर गई हों।

उसकी टांगें कादर की कमर के इर्द-गिर्द कस गईं। पंजों ने कादर की पीठ को नोच लिया।
और फिर… बाढ़ आ गई।
कामिनी का शरीर अकड़ गया।
उसकी योनि से कामरस का एक विशाल फव्वारा (Squirt) छूट पड़ा।
वह इतना तेज़ था कि उसने अंदर जाते हुए कादर के लंड को नहला दिया।
कामिनी कांपती रही, सिसकती रही, झड़ती रही।
उसका हर अंग, हर नस ढीली पड़ गई।
लेकिन कादर अभी रुका नहीं था।

कामिनी की योनि के उस भींचने (Clamping) ने कादर के सब्र का बांध भी तोड़ दिया।
उसने कामिनी को दीवार से और जोर से दबाया।
उसने एक गहरी साँस भरी, अपने जबड़े भींचे और…
“धप्प…!!!”
एक आखिरी, जानलेवा धक्का मारा।
उसने अपने 8 इंच के मुसल को कामिनी की बच्चेदानी (Womb) के मुंह में पूरी ताकत से गाड़ दिया और वहीं रुक गया।

“आआआआह्ह्ह्ह्ह…..!!!!”
कामिनी की एक दबी हुई चीख निकली, और कादर ने गुर्राते हुए अपनी आँखें बंद कर लीं।

“अब भरी है तु कामिनी……”
कादर का लंड अंदर ही अंदर फटने लगा।
उसके लंड के छेद से गाढ़े, गर्म और सफ़ेद वीर्य (Sperm) की पिचकारियां छूटने लगीं।

“पिच… पिच… पिच…”
गर्म लावा… सीधा कामिनी की कोख में उड़ेला जा रहा था।
कामिनी को अपनी नाभि के नीचे, बहुत गहराई में, उन गर्म फव्वारों की थपकियाँ महसूस हो रही थीं।
एक… दो..तीन… चार…… दस…
कादर खाली हो रहा था, और कामिनी भर रही थी।
वह उसे “गर्भवती” करने वाले अंदाज़ में भर रहा था।
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस गर्मी को अपने अंदर सोख लिया।

“भर गई… आज मैं सच में भर गई…” उसने मन ही मन सोचा।

कुछ पल तक दोनों वैसे ही खड़े रहे।
कादर का लंड अभी भी अंदर था, लेकिन अब वह शांत हो रहा था।
दोनों की साँसें लोहार की धौंकनी की तरह चल रही थीं।
पसीना दोनों के शरीरों से मिलकर ज़मीन पर टपक रहा था।
धीरे से… कादर ने कामिनी को नीचे उतारा।
कामिनी के पैर ज़मीन पर पड़े, लेकिन वे कांप रहे थे। उनमें खड़े होने की ताकत नहीं थी।
वह कादर के सहारे खड़ी रही।
कादर ने धीरे से, बहुत संभलकर अपना लंड बाहर निकाला।
“प्लप.. पुककक….”
जैसे ही वह विशाल डाट (Plug) बाहर निकला, कामिनी की योनि का मुंह खुला रह गया।
और वहां से… कादर का दिया हुआ सफ़ेद, गाढ़ा वीर्य और कामिनी का अपना पानी मिलकर कामिनी की जांघों से नीचे बहने लगा।

“टप… टप…”
कामिनी ने नीचे देखा।
उसकी गोरी जांघों पर वह सफ़ेद लकीर चमक रही थी।
यह रमेश की दो बूंद नहीं थी… यह एक बाढ़ थी।
कादर ने झुककर अपनी लुंगी उठाई और कामिनी के पैरों को साफ़ करने लगा।

“रहने दो कादर…” कामिनी ने उसे रोका। उसकी आवाज़ में एक नशा था।
“इसे रहने दो… ये सुकून देता है।”
कामिनी कादर की बाहो मे लुढ़क गई जैसे बेहोश हो गई हो,उसमे चलने या खड़े रहने की ताकत नहीं बची थी.
कामिनी की आत्मा उसके चुत के रास्ते बहार निकल गई थी.
बस सांस के साथ उठते गिरते स्तन उसके जिन्दा होने के सबूत थे.

कादर कामिनी को बाहो मे ले कर नीचे फर्श पर बिछि फटी पुरानी डदरी पर लेट गया.
कामिनी को जो सुकून इस नंगे फर्श पर मिल रहा था वो मखमली बिस्तर पर भी नहीं था.
कामिनी की आंखे बंद होती चली गई, कादर ने भी उसके बालो को सहलाते हुए आंखे बंद कर ली.
उसने अपने जीवन मे पहली बार प्यार को महसूस किया था.

सुबह 6:00 बजे, स्टोर रूम

बाहर हल्का-हल्का उजाला फूटने लगा था।
स्टोर रूम की छोटी सी खिड़की से सुबह की पहली सर्द किरण अंदर आई और दरी पर सो रहे दो नंगे, पसीने और कामरस में लिपटे शरीरों पर पड़ी।

रात भर का वह जंगली तांडव अब शांत हो चुका था।
कामिनी की नींद खुली।
उसने करवट लेनी चाही, लेकिन उसके मुंह से एक तीखी, आधी सोई हुई सिसकारी निकल गई— “सीइइइइ… उफ्फ्फ्फ…”
उसके जिस्म का रोम-रोम दुख रहा था।
लेकिन सबसे ज़्यादा दर्द… उसकी जांघों के बीच, उसकी चुत की गहराइयों में था।

वहां एक भारीपन, एक मीठी सी टीस और सूजन थी, जो उसे याद दिला रही थी कि कल रात उसके साथ क्या बीता था। वह कोई सपना नहीं था, कादर का वह 8 इंच का फौलादी मुसल सचमुच उसके जिस्म के आर-पार हो चुका था।
कामिनी ने आँखें खोलीं।

उसके नीचे कादर लेटा था। बिल्कुल नंगा। उसका विशाल, सांवला सीना धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था।
कामिनी को कल रात की वो सारी बातें याद आ गईं, उसका कादर के ऊपर उछलना, दीवार पर टंगना, और फिर अपनी नाभि तक उस गर्म वीर्य को महसूस करना।
अचानक कामिनी को भयानक शर्म आने लगी।

कल रात वो एक घरेलु संस्कारी औरत नहीं, बल्कि एक सस्ती ‘रंडी’ की तरह कादर से ‘और ज़ोर से’ चोदने की भीख मांग रही थी।

अब, सुबह की इस रौशनी में, वह कादर से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।
उसने हड़बड़ाहट में अपने नंगे, भारी स्तनों को हाथों से छुपाया और ज़मीन पर पड़े अपने सिल्क के गाउन को ढूंढने लगी।

उसी हड़बड़ाहट में कादर की नींद खुल गई।
उसने कामिनी को अपने कपड़े समेटते और छुपते हुए देखा।
कादर के होंठों पर एक विजेता जैसी मुस्कान आ गई।
कल रात की उस डरी-सहमी औरत और इस सुबह की ‘शर्माती हुई’ औरत में बहुत फर्क था।

कामिनी ने जैसे-तैसे गाउन उठाया और उसे अपने सिर के ऊपर से पहन लिया।
ज़िप बंद करने के लिए वह खड़ी हुई।
लेकिन जैसे ही उसने अपने पैरों पर वजन डाला… उसकी टांगें कांप गईं।
कल रात जांघें फैलाकर जो तूफानी ठुकाई हुई थी, उसकी वजह से उसकी जांघों की मांसपेशियां (Inner thighs) पूरी तरह अकड़ चुकी थीं।

कामिनी का संतुलन बिगड़ा और वह पीछे की तरफ गिरने लगी
“आह्ह…!!”
इससे पहले कि वह ज़मीन पर गिरती, कादर बिजली की रफ़्तार से उठा।
उसने अपने मज़बूत हाथों से कामिनी की कमर को जकड़ लिया और उसे अपनी तरफ खींच लिया।
“धप्प…”
कामिनी की पीठ कादर के चौड़े, नंगे सीने से जा टकराई।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
पीछे कादर खड़ा था… बिल्कुल नंगा।
और सुबह की अंगड़ाई के कारण कादर का विशाल लंड (Morning Wood) पूरी तरह खड़ा होकर फन काढ़े हुए था।

कामिनी के पतले गाउन के ऊपर से ही, कादर का वह गरम, पत्थर जैसा सख्त और मोटा लंड कामिनी की सूजी हुई और दर्द करती चुत की दरार पर सटीक तरीके से सेट हो गया।
लंड की वह सख्त ठोकर लगते ही कामिनी के शरीर में करंट दौड़ गया।
रात की बची-खुची उत्तेजना फिर से ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ी। उसका जिस्म एकदम से गीला हो गया।

“ईईस्स्स… आअह्ह्ह… कादर…” कामिनी दर्द और बेपनाह उत्तेजना में सिसक उठी।
वह उससे दूर हटना चाहती थी, लेकिन उस सख्त लंड की रगड़ ने उसे वहीं कादर के सीने से चिपकाए रखा।
कादर ने अपना चेहरा कामिनी के कानों के पास झुकाया। उसकी गर्म सांसें कामिनी की गर्दन को गुदगुदा रही थीं।

“दर्द हो रहा है कामिनी जी?” कादर ने अपनी भारी, मर्दाना आवाज़ में धीरे से पूछा।
उसकी आवाज़ में चिंता भी थी और अपने ‘काम’ पर घमंड भी।
कामिनी ने कादर की तरफ पलटने की हिम्मत नहीं की।
उसने बस अपना सिर झुका लिया, उसका चेहरा टमाटर की तरह लाल हो रहा था।

“हहहम्म्म…” कामिनी ने धीरे से हाँ भरते हुए शर्मा कर नज़रें नीचे कर लीं।
उसे अपने ही गाउन के नीचे अपनी योनि से रिसता हुआ कादर का गाढ़ा कामरस (वीर्य) महसूस हो रहा था, जो अभी तक पूरी तरह सूखा नहीं था।
कादर मुस्कुरा दिया। उसने कामिनी की कमर पर अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की।

“वो तेल लगा लेना नहाने से पहले… ठीक हो जाएगा।” कादर ने उस जादुई तेल की याद दिलाई जिसने कामिनी के पिछले दर्दों को मिटाया था।

कामिनी का दिल ज़ोर से धड़का।
उसने बिना कुछ कहे, बस अपना सिर हिलाया और कादर की पकड़ से आज़ाद होकर स्टोर रूम के दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
कामिनी ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकली।
कादर वहीं खड़ा रहा… पूर्ण नग्न, अपनी छाती चौड़ी किए, और अपने खड़े लंड पर हाथ फेरते हुए।

उसकी बाज़ जैसी नज़रें कामिनी की पीठ पर टिकी थीं।
बाहर लॉन में चलते हुए कामिनी की चाल पूरी तरह बदल चुकी थी।
वह पहले की तरह सीधे नहीं चल पा रही थी।
उसकी जांघों के बीच की सूजन और उस 8 इंच के मुसल के ‘अहसास’ ने उसे जांघें फैलाकर चलने पर मजबूर कर दिया था।

हर कदम पर उसकी गांड एक अजीब सी लय में मटक रही थी—एक ऐसी चाल जो सिर्फ़ एक औरत तब चलती है जब वह रात भर किसी असली मर्द के नीचे बुरी तरह रौंदी गई हो।

उसके कदम भारी थे, जांघों में टीस उठ रही थी— “सीइइ… आह्ह…”
हर कदम पर गाउन उसकी सूजी हुई योनि के होंठों (Labia) से रगड़ खा रहा था, जो दर्द के साथ-साथ एक मीठी सी कामुकता भी जगा रहा था।

पीछे खड़ा कादर, अपनी मोहब्बत की उस दर्द भरी और मदमस्त चाल (Waddle) को देखकर मुस्कुरा रहा था।

लॉन की ठंडी ओस से बचते हुए कामिनी घर के मुख्य दरवाज़े से अंदर दाखिल हुई।
घर में अभी भी मौत जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था। पर्दों से छनकर आती सुबह की नीली रौशनी डाइनिंग हॉल में एक अजीब सी शांति बिखेर रही थी।

कामिनी के कदम भारी थे। कादर के उस ‘8 इंच के फौलादी मुसल’ ने रात भर उसकी जो खदान खोदी थी, उसका असर अब उसके शरीर पर साफ़ दिख रहा था। उसकी जांघों के बीच एक मीठी सी सूजन थी, जिसकी वजह से वह अपने पैर सटाकर नहीं चल पा रही थी।

वह हल्का सा लंगड़ाते हुए, अपनी गांड को मटकाते हुए चल रही थी— “उफ्फ्फ… सीइइइ…” वह डाइनिंग हॉल की मेज़ के पास पहुँची ही थी कि अचानक पीछे से एक आवाज़ गूंजी…
“कैसी रही रात?”
उस खामोशी में यह आवाज़ किसी बम की तरह फटी।

कामिनी का दिल धक् से रह गया, कलेजा मुँह को आ गया। उसकी साँसें गले में अटक गईं।
“हे भगवान… रमेश उठ गया क्या?” वह कांपते हुए, घबराहट में पीछे पलटी।
लेकिन सामने… बंटी खड़ा था।
वह अपने पजामे में था और उसके चेहरे पर एक बहुत ही शैतानी, समझदार और रहस्यमयी मुस्कान तैर रही थी।
बंटी को देखते ही कामिनी की रुकी हुई साँस वापस आई। उसने एक गहरी, राहत की साँस छोड़ी और अपने सीने पर हाथ रख लिया।

“हट बदमाश…!” कामिनी ने बनावटी गुस्से से कहा, लेकिन उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था।
अब उसे बंटी से कोई हया, कोई शर्म नहीं बची थी। वे दोनों अब माँ-बेटे से ज़्यादा ‘एक जान, दो जिस्म’ जैसे बन चुके थे—एक-दूसरे के हर पाप के राज़दार।

“तूने तो मेरी जान ही निकाल दी थी… ऐसे डराते हैं क्या?” कामिनी ने अपनी भारी साँसों को काबू करते हुए कहा।
बंटी एक कदम आगे बढ़ा। उसकी नज़रें अपनी माँ के उस बिखरे हुए रूप को स्कैन कर रही थीं, सूजे हुए होंठ, बिखरे बाल, गले पर कादर के दांतों के हल्के निशान और गाउन के अंदर से झांकता हुआ वह तृप्त निखार।

“डरना तो चाहिए आपको…” बंटी ने आँख मारते हुए कहा, “रात भर गायब थीं आप?”
कामिनी के चेहरे पर एक पल के लिए भी झिझक नहीं आई। उल्टे, उसके होंठों पर एक नशीली, मदमाती मुस्कान आ गई। रात की उस भयंकर ठुकाई ने उसके अंदर के सारे संकोच को धो डाला था।

उसने अपनी कमर पर हाथ रखा और इतराते हुए बोली
“तो आकर देख लेता ना… कि कहाँ थी मैं और क्या कर रही थी?”
बंटी अपनी माँ की इस बेशर्मी और बेबाकी पर हैरान भी हुआ और खुश भी।

“आप बुलाती ही नहीं… मैं कैसे आता?” बंटी ने भी ठुड्डी सिकोड़कर बनावटी शिकायत की।
कामिनी ने एक हल्की सी कामुक हंसी (Giggle) बिखेरी।

“अरे चल झूठे! पहले भी कब बुलाया था मैंने तुझे? तू तो अपनी माँ को छुप-छुप के ही देख लेता था ना खिड़की से? कल रात भी देख लेता… मना किसने किया था?”

कामिनी की आवाज़ में कोई पछतावा नहीं था। उसकी आँखें चमक रही थीं। उसकी बातों से, उसके खड़े होने के अंदाज़ से साफ़ झलक रहा था कि वह कितनी खुश है, कितनी “संतुष्ट” है। बरसों की जो प्यास रमेश नहीं बुझा पाया था, वो आज एक असली मर्द ने बुझा दी थी।

बंटी अपनी माँ के चेहरे पर वह ‘औरत वाला निखार’ देखकर अंदर ही अंदर बहुत खुश था। वह जानता था कि उसकी माँ इस ख़ुशी की हक़दार थी।
बंटी की नज़रें कामिनी की टांगों पर गईं, जो अभी भी फैली हुई थीं।

“लगता है…” बंटी ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली, “कादर खान ने चाल बिगाड़ दी है आपकी? पैर सीधे नहीं पड़ रहे मैडम जी के…”

यह सुनते ही कामिनी का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो गया। कादर का नाम सुनते ही उसकी जांघों के बीच फिर से एक सिहरन दौड़ गई।
उसने झेंपते हुए गाउन को थोड़ा नीचे खींचा।

“ऐसी बात करते हैं क्या अपनी माँ से? बेशर्म कहीं का!” कामिनी ने उसे एक मीठी सी डांट पिलाई।
“जा अंदर अपने कमरे में… तेरे पापा उठने वाले होंगे। मैं नहा-धोकर फ्रेश हो जाती हूँ, फिर चाय-नाश्ता बनाती हूँ।”
कामिनी वहाँ से मुड़ी और अपने बेडरूम की तरफ चल दी।

बंटी वहीं खड़ा अपनी माँ की उस लंगड़ाती, मदमस्त चाल को देखता रहा। कामिनी के भारी कूल्हे हर कदम के साथ उस दर्द और मज़े की गवाही दे रहे थे। कामिनी के चेहरे पर एक विजेता वाली मुस्कान थी, और दिल में बंटी जैसे समझदार बेटे को पाने का गर्व।

कामिनी अपने कमरे में दाखिल हुई।
बिस्तर पर… रमेश अभी भी उसी मुर्दे जैसी हालत में पड़ा था। टांगें पसारकर, मुँह फाड़कर खर्राटे ले रहा था।
कामिनी को उसे देखकर एक पल के लिए सख्त घिन आई।

उसने रमेश को कोई अहमियत नहीं दी। वह सीधे ड्रेसिंग टेबल के पास गई।
वहाँ कादर का दिया हुआ वह “जादुई तेल” की छोटी सी शीशी रखी थी।
कामिनी ने वह शीशी अपने गोरे हाथों में उठाई।
तेल को देखते ही उसे कादर के वो खुरदरे, मज़बूत हाथ याद आ गए।

उसने एक नज़र सोते हुए रमेश पर डाली, एक व्यंग्यात्मक मुस्कान दी, और बाथरूम का दरवाज़ा खोलकर अंदर घुस गई।
“क्लिक…”
अंदर से कुंडी लग गई।
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सुबह के साढ़े सात बज चुके थे। घर में सब कुछ सामान्य लग रहा था।
कादर के उस ‘जादुई तेल’ ने अपना असर दिखा दिया था। रात की वह वहशी ठुकाई, जिसने कामिनी के जिस्म को तोड़ कर रख दिया था, उसका सारा दर्द अब उड़नछू हो गया था। उसकी चाल अब सामान्य थी।

हाँ, बस एक मीठी सी टीस और कादर के उस 8 इंच के फौलादी मुसल की ‘रगड़’ का अहसास वह अभी भी अपनी चुत की गहराइयों में महसूस कर रही थी। हर कदम पर उसे रात का वह तांडव याद आ रहा था।

नहा-धोकर कामिनी जब बेडरूम से बाहर निकली, तो जैसे पूरे घर में एक अलग ही उजाला छा गया।
उसने आज एक चटक लाल रंग की सूती साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी के साथ एक बेहद कसा हुआ, डीप-नेक स्लीवलेस ब्लाउज था, जो उसके भारी और उन्नत स्तनों को मुश्किल से कैद कर पा रहा था। ब्लाउज के गहरे गले से उसकी गोरी क्लीवेज साफ़ झांक रही थी।

नंगे गोरे बाजू, मांग में गहरा लाल सिंदूर, माथे पर बड़ी सी बिंदी, कलाइयों में खनकती लाल चूड़ियाँ और गले में लटकता मंगलसूत्र… उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे।
रमेश चाय का कप हाथ में लिए अखबार पढ़ रहा था। उसने नज़र उठाई और अपनी पत्नी के इस दहकते हुए रूप को देखकर ठिठक गया।

“अरे वाह… क्या बात है कामिनी! आज तो सुबह-सुबह ही दमक रही हो। कोई खास बात?”
“वो… बस… बस ऐसे ही…” कामिनी ने अपनी पलकें झुका लीं और एक नशीली सी मुस्कान उसके लाल होंठों पर तैर गई। उसे अब कहाँ किसी रमेश की फ़िक्र थी?

आज कामिनी किसी 38 साल की अधेड़ औरत जैसी नहीं लग रही थी। वह अपनी जवानी के 20 साल के यौवन को फिर से जी रही थी।

वह बिल्कुल किसी ‘नवविवाहिता’ (Newlywed) की तरह लग रही थी, अपितु वैसा ही महसूस भी कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई नई-नवेली दुल्हन रात में अपनी सुहागरात मनाकर, भयंकर चुदाई के सुख से तृप्त होकर, सुबह पहली बार अपने परिवार के लिए नाश्ता बनाने निकली हो। वही चमक, वही जज़्बा और वही लाली आज कामिनी के चेहरे पर थी।

बंटी खामोशी से टेबल पर ब्रेड-मक्खन खा रहा था, लेकिन वह अपनी माँ की इस ‘ख़ुशी’ को देखकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहा था।

तभी…
धड़… धाड़… धाड़…. दरवाज़े पर किसी की ज़ोरदार दस्तक हुई। दस्तक क्या थी, ऐसा लग रहा था जैसे कोई दरवाज़ा उखाड़ कर ही अंदर आ जाएगा।
बंटी ने कुर्सी छोड़ी और दौड़कर दरवाज़ा खोला।
सामने शमशेर खड़ा था। पुलिस की वर्दी में, माथे पर पसीना और चेहरे पर भयानक घबराहट।

“कादर खान कहाँ है…?” अंदर घुसते ही शमशेर का पहला और सीधा सवाल यही था।
लेकिन जैसे ही शमशेर की नज़र डाइनिंग टेबल के पास खड़ी कामिनी पर पड़ी, उसकी कड़क आवाज़ एक पल के लिए नरम पड़ गई।

साक्षात् ‘कामदेवी’ उसके सामने सजी-धजी खड़ी थी। छोटे स्लीवलेस ब्लाउज से छलकते उसके भारी स्तन और लाल साड़ी में लिपटा वह गदराया हुआ गोरा बदन… शमशेर एक बड़ा ठरकी था, लेकिन आज पहली बार ऐसा हुआ था कि वह कामिनी के इस हुस्न को ठीक से ‘ताड़’ नहीं पा रहा था।

वह अपनी ही किसी भयानक उलझन में फंसा हुआ था। उसके होश उड़े हुए थे।
“रमेश… कादर को यहाँ से कहीं और ले जाना होगा। उस हरामी कमिश्नर को शक हो गया है कि कादर यहाँ है। वो साला कभी भी यहाँ आ धमक सकता है!” शमशेर का शक जायज़ था, और उसके पास पक्की इन्फॉर्मेशन भी थी। वह पुलिस महकमे में कमिश्नर से हमेशा एक कदम आगे ही चलता था।

“अरे बैठ यार… चाय तो पी। ले जाना कादर को, हमें कौन सा उसका अचार डालना है,” रमेश ने शमशेर का हाथ पकड़कर उसे कुर्सी पर बिठाना चाहा।

“टाइम नहीं है यार रमेश, मुझे तुरंत उसे निकाल कर कहीं ओर ले जाना होगा!”
कादर खान के ‘वापस जाने’ का नाम सुनते ही कामिनी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
अभी जो चेहरा उत्तेजना, तृप्ति और ख़ुशी से लाल गुलाब की तरह दहक रहा था, वह एकाएक सूखे पत्ते की तरह मुरझा गया।
यह बिल्कुल वैसा ही दर्द था, जैसे किसी जवान फौजी की नई-नवेली दुल्हन को सुहागरात के अगले ही दिन सुबह पता चले कि उसके पति की छुट्टियां रद्द हो गई हैं और उसे वापस युद्ध पर जाना पड़ रहा है।

कामिनी ने अपनी सूनी, कांपती आँखों से कभी रमेश को देखा तो कभी शमशेर को। उसका दिल चीख-चीख कर कह रहा था— ‘नहीं… कादर को मत ले जाओ।’

“वो… स्टोर रूम की तरफ इशारा करते हुए रमेश बोला, “वही पड़ा होगा तेरा दोस्त .. ले जा।”
शमशेर तुरंत मुड़ा और स्टोर रूम की तरफ भाग गया।

करीब 15 मिनट बाद…
बाहर से पुलिस की जीप स्टार्ट होने की आवाज़ आई।
कामिनी से रुका नहीं गया। वह अपनी लाल साड़ी का पल्लू संभालती हुई, नंगे पैर भागती हुई रसोई में गई। उसने कांपते हाथों से रसोई की खिड़की का परदा हटाया और बाहर झांका।
शमशेर की जीप स्टार्ट खड़ी थी, पीछे से काला धुआं निकल रहा था। और जीप के अंदर… कादर खान बैठा हुआ था।
गाट… गट… गट… धड़… धड़… ढा… खर… खर…. गियर पड़ने और इंजन की भारी आवाज़ के साथ देखते ही देखते वह जीप, वह कादर, कामिनी की आँखों के सामने से घर के गेट के बाहर निकल गई।

कामिनी वहीं खिड़की की लोहे की ग्रिल पकड़े खड़ी रह गई। उसकी आँखों के बांध टूट गए और गरम आँसू उसकी गोरी गालों पर बह निकले।

उसका प्रेमी, उसका हमबिस्तर, उसका असली मर्द पल भर में उससे दूर जा रहा था। रघु तो कल शाम ही जा चुका था, और अब कादर भी चला गया।

रात भर जिस चुत से कामरस की बाढ़ बह रही थी, जो अभी कुछ देर पहले तक उस फौलादी रगड़ को याद करके गीली हो रही थी, वह अचानक से सूखने लगी। हवस और प्यार की जगह एक भयानक सूनेपन ने ले ली।

कामिनी की बेइंतहा इच्छा हुई कि वह रसोई से भागकर बाहर जाए, शमशेर की जीप के आगे खड़ी हो जाए और चीखकर कहे— “मत ले जाओ कादर को! मैं उसके बिना नहीं जी सकती!”

लेकिन… एक घरेलू औरत की मर्यादा, समाज का डर, और गले में पड़ा वह मंगलसूत्र… इन ‘सभ्य संस्कारों’ की बेड़ियों ने उसके पैरों को ज़मीन से जकड़ रखा था।
वह चीखना चाहती थी, पर होंठ सिले हुए थे।

“सुबुक… सुबुक…” कामिनी वहीं खिड़की से माथा टिकाए सुबकने लगी।
उसकी धुंधली, आंसुओं से भरी आँखें बस उस जीप के धुएं को सड़क पर दूर जाते हुए देखती रह गईं।
रात को जो औरत इस संस्कारी समाज से निकल कर अपनी इच्छाओ को जी रही थी, सुबह होते ही वह फिर से एक बेबस, प्यासी और अकेली घरेलु बन कर रह गई थी.
घर, उसका दिल वापस से सुनसान हो गए थे. चुत से निकलता वासना का झरना सुख गया था.
जैसे अचानक मौसम ने करवट बदलती हो,
पतझड़ का मौसम आ गया था…. खिड़की के बहार अम्लताश के पेड़ से पत्ते झड़ झड़ के जमीन पर गिर रहे थे, उसके साथ की कामिनी के आंसू भी.

सुबह के 9:00 बजे
रमेश अपना ब्रीफकेस लेकर ऑफिस चला गया था, और बंटी स्कूल।
घर के मुख्य दरवाज़े पर ताला लगने की ‘खट’ की आवाज़ गूंजी, और उसके साथ ही कामिनी के घर में एक ऐसा सन्नाटा पसर गया जो कानों के पर्दों को फाड़ रहा था।
कामिनी डाइनिंग हॉल के बीचों-बीच खड़ी थी।
वह पहले भी अकेली होती थी। रमेश के जाने के बाद यह घर रोज़ ही खाली हो जाता था।

लेकिन आज का यह अकेलापन… यह बिल्कुल अलग था। यह उस बंजर ज़मीन का अकेलापन नहीं था जिसने कभी बारिश देखी ही न हो। यह उस हरी-भरी फसल का अकेलापन था, जिसे एक रात की बारिश ने सींचा तो ज़रूर, लेकिन सुबह होते ही कोई उस पूरी ज़मीन को ही लूट कर ले गया।

मिलन के बाद बिछड़ने की यह बेला कामिनी के लिए किसी ‘मौत’ से कम नहीं थी।
वह धीरे-धीरे, अपने भारी और दर्द करते कदमों को घसीटती हुई बेडरूम में आई।
बिस्तर की सिलवटें उसे चिढ़ा रही थीं। उसने आईने में खुद को देखा। मांग में सिंदूर था, लाल साड़ी थी, लेकिन चेहरे का वो सुहागन वाला नूर अब आंसुओं की लकीरों में बह चुका था।

कामिनी का रोम-रोम सुलग रहा था।
रात भर कादर के उस फौलादी और गर्म जिस्म ने कामिनी के अंदर दबी हुई उस ‘ज्वालामुखी’ को फोड़ दिया था। उसकी नस-नस में हवस और प्यार का जो ज़हर कादर ने घोला था, वह अब अपना असर दिखा रहा था।

कामिनी ने कांपते हाथों से अपने स्तनों को छुआ। उसे अभी भी अपने निप्पल्स पर कादर के गर्म होंठों और खुरदरी जीभ का अहसास हो रहा था। उसे लग रहा था जैसे कादर की उंगलियां अभी भी उसकी कमर को दबोचे हुए हैं।

लेकिन सबसे भयानक आज़ाब (दर्द) तो नीचे था।
उसकी जांघों के बीच, उसकी योनि में एक अजीब सी भट्टी जल रही थी। रात को जो गुफा कादर के 8 इंच के मुसल से ‘पूरी तरह भर’ गई थी, वह आज सुबह फिर से खाली हो गई थी। वह खालीपन अब कामिनी को खाए जा रहा था।

उसकी चुत के होंठ सूजे हुए थे, उनमें एक मीठी-मीठी टीस उठ रही थी। वह टीस उसे हर पल याद दिला रही थी कि कल रात वह कितनी गहराई तक भेदी गई थी। अंदर ही अंदर कामिनी का जिस्म कादर के वीर्य की उस गर्मी को फिर से महसूस करने के लिए तड़प रहा था।

“उफ्फ्फ्फ… हे भगवान… क्या करूं मैं…” कामिनी बिस्तर पर गिर पड़ी और सिसकने लगी।
चुत जल रही थी, लेकिन प्यास बुझाने वाला कोई नहीं था। समंदर कल रात उसके पास था, और आज वह फिर से एक रेगिस्तान में तड़प रही थी।

कामिनी उठकर पागलों की तरह घर में घूमने लगी।
वह आंगन के उस नल के पास गई जहाँ कादर नहाता था।

उसने उस ठंडी ज़मीन को छुआ जहाँ कादर के पैरों के निशान हुआ करते थे। उसे वहां अभी भी कादर के पसीने और मर्दानगी की वह ‘कच्ची महक’ आ रही थी।
फिर उसके कदम अपने आप उस ‘तीर्थ’ की तरफ बढ़ गए स्टोर रूम।
उसने स्टोर रूम का दरवाज़ा खोला।
अंदर वही पुरानी दरी बिछी थी। कामिनी घुटनों के बल उस दरी पर बैठ गई। दरी के बीचों-बीच एक बड़ा सा गीला धब्बा सूख चुका था, यह उनके प्यार, कामिनी के कामरस और कादर के गाढ़े वीर्य का मिला-जुला निशान था।
कामिनी ने अपना चेहरा उस दरी पर रख दिया।
वह उस निशान को चूमने लगी, उसमें से कादर की महक को अपने फेफड़ों में भरने लगी।

“कामिनी जैसी संस्कारी, घरेलु औरत वासना की तड़प मे क्या क्या हरकत करने लगी थी…” कामिनी के आँखों से गिरी उस दो बून्द ने उस धब्बे को फिर से गिला कर दिया।

उसका लाल ब्लाउज आंसुओं से भीग गया।
वह दरी पर उसी जगह लेट गई जहाँ कल रात कादर ने उसे जम के चोदा था। उसने अपनी दोनों टांगें मोड़कर अपने सीने से लगा लीं।

उसका जिस्म आग की तरह तप रहा था। एक 38 साल की औरत, जिसने अभी-अभी जवानी का असली स्वाद चखा था, वह अब विरह की इस आग में ज़िंदा जल रही थी।
यह वीरानगी, यह सूनापन उसे अंदर से खोखला कर रहा था। आज का दिन उसके लिए किसी युग से भी ज़्यादा लंबा और दर्दनाक होने वाला था।

खुद को इस विरह की आग और खालीपन से बचाने के लिए कामिनी ने खुद को घर के कामों में व्यस्त कर लिया।
वह मशीन की तरह काम कर रही थी। उसने बेडरूम का बिस्तर साफ़ किया, आंगन में झाड़ू लगाई। हालांकि हर कदम पर उसकी जांघों के बीच की वह मीठी टीस उसे रात के तांडव की याद दिला रही थी, लेकिन उसने अपना ध्यान काम में लगाए रखा।

घड़ी देखी तो 2 बजने वाले थे। बंटी के स्कूल से लौटने का वक़्त हो चला था।
कामिनी ने हड़बड़ाहट में रसोई में जाकर फटाफट दोपहर का खाना तैयार कर लिया। उसका शरीर रसोई में था, लेकिन दिमाग अभी भी उस पुलिस की जीप के धुएं के पीछे भाग रहा था।

“डिंग-डॉन्ग…”
ठीक दो बजे दरवाज़े की घंटी बजी।
कामिनी ने जाकर दरवाज़ा खोला। सामने बंटी स्कूल यूनिफॉर्म में, कंधे पर बैग लटकाए खड़ा था।

सुबह जो माँ एक ‘नवविवाहिता’ की तरह दमक रही थी, जिसकी आँखों में एक नशीली चमक थी, वह अब बिल्कुल बुझ चुकी थी। कामिनी ने बड़े ही औपचारिक और रूखे तरीके से दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, आँखें सूनी थीं।
बंटी ने तुरंत अपनी माँ के चेहरे का यह बदलाव भांप लिया।

“माँ… क्या हुआ?” बंटी ने कुछ पूछना चाहा, लेकिन कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस बिना कुछ कहे पलटी और भारी कदमों से वापस रसोई की तरफ चली गई।

थोड़ी देर बाद, डाइनिंग टेबल पर लंच तैयार था।
बंटी और कामिनी आमने-सामने बैठे थे। बंटी की थाली में गरम रोटियां और सब्ज़ी थी, और कामिनी के सामने भी उसकी थाली परोसी हुई थी। लेकिन कामिनी निवाला तोड़ने के बजाय बस अपनी थाली को उदास आँखों से घूरे जा रही थी। उसका रोम-रोम उस ‘फौलादी मुसल’ के बिना सूना पड़ा था।

बंटी ने चुपचाप रोटी का पहला निवाला तोड़ा, सब्ज़ी में डुबोया और मुंह में रखा।
निवाला चबाते ही बंटी के चहरे के भाव बदल गए।
“ये क्या माँ…. नमक कहाँ है इसमें?” बंटी ने हैरानी से पूछा।
बंटी की आवाज़ सुनकर कामिनी जैसे अपनी गहरी सोच से एकदम से चौंक कर बाहर आई।
“हैं…? क्या…?”
उसने हड़बड़ाहट में सब्ज़ी की कटोरी की तरफ देखा और फिर अपनी कांपती उंगलियों को आपस में रगड़ा।

“वो… वो… लगता है भूल गई…” कामिनी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हताशा और बेबसी थी। जिस औरत की ज़िंदगी से ‘कादर’ नाम का नमक ही चला गया हो, उसे सब्ज़ी के नमक का होश कहाँ रहता।

बंटी समझ गया कि बात क्या है।
बंटी ने बिना कुछ कहे अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई। वह उठा और मेज़ का चक्कर काटकर अपनी माँ के पास आकर खड़ा हो गया।

उसने अपने दोनों हाथ कामिनी के कंधों पर रखे और धीरे से उसे अपने करीब खींचा।
कामिनी कुर्सी पर बैठी थी और बंटी उसके पास खड़ा था। कामिनी का उदास सिर बंटी के पेट पर आकर टिक गया। बंटी ने बड़े ही प्यार से अपने दोनों हाथ अपनी माँ के बालों में डाल दिए और उसके सिर को सहलाने लगा।

“वापस आ जाएगा माँ… कादर। इसमें इतनी उदासी वाली क्या बात है?” बंटी ने वो बात कह दी जो कामिनी किसी से नहीं कह सकती थी।
कामिनी ने झटके से अपना सिर ऊपर उठाया।
उसने बंटी की आँखों में देखा। उसे लगा शायद बंटी मज़ाक उड़ा रहा है या ताना मार रहा है। लेकिन नहीं… बंटी की नज़रों में अपनी माँ के लिए अथाह प्यार, एक पक्का भरोसा और इत्मीनान था। वह अपनी माँ को खुश देखना चाहता था, चाहे वह ख़ुशी किसी गैर मर्द से ही क्यों न मिले।

बंटी की वो समझदार आँखें देखकर कामिनी के अंदर का टूटा हुआ हौसला वापस आने लगा।
“चलो, अब चुपचाप खाना खा लो,” बंटी ने कामिनी के गाल को हल्का सा थपथपाया।

फिर उसके चेहरे पर एक बहुत ही शैतानी और कामुक मुस्कान आ गई। उसने अपनी एक आँख मारी और धीमे से बोला
“और वैसे भी माँ… आपको थोड़ा ब्रेक ले ही लेना चाहिए। मशीन थोड़ी हो… अभी कल रात ही तो…” यह सुनते ही कामिनी के उदास चेहरे पर अचानक से ‘शर्म’ की एक लालिमा दौड़ गई।

“हट बदमाश…!” कामिनी ने अपने आंसू भरी आँखों के बावजूद एक मीठी सी डांट पिलाई। “क्या कल रात को? कुछ भी बोलता है तू…”

“अच्छा जी…?” बंटी ने हंसते हुए अपनी माँ को चिढ़ाया। “आपकी सुबह वाली ‘चाल’ चीख-चीख कर बता रही थी कि उस ‘कुछ भी’ का मतलब क्या था। पैर तो सीधे रखे नहीं जा रहे थे मैडम से…”

बंटी की इस बेबाक और बेशर्म बात ने कामिनी के दिल का सारा बोझ हल्का कर दिया।
कामिनी ने कुर्सी पर बैठे-बैठे ही अपने दोनों हाथों से बंटी की कमर को जकड़ लिया और उसे कसकर अपने से चिपका लिया (Hug)।

“तू ना… बहुत बिगड़ गया है बंटी!” कामिनी ने प्यार से उसकी पीठ पर हल्का सा मुक्का मारते हुए कहा।
बंटी भी अपनी माँ के गले लगकर हंस रहा था।

“अच्छा… चलो अब मैं इतना बिगड़ ही गया हूँ, तो बताओ ना… क्या-क्या हुआ था रात को?” बंटी ने कामिनी के कंधे पर ठुड्डी रखते हुए एक आशिक़ की तरह पूछा।
कामिनी ने बंटी को खुद से थोड़ा दूर किया। उसने अपनी नशीली आँखें बड़ी कीं, भौहें सिकोड़ीं और एक बनावटी गुस्से से बंटी को घूरते हुए बोली

“अपनी माँ से कोई ऐसा सवाल पूछता है बेशर्म?”
बंटी ने मासूमियत से कंधे उचका दिए। “राज़दार से तो सब शेयर किया जाता है ना।”

कामिनी के होंठों पर अब एक इत्मीनान और मदहोशी भरी, धीमी सी मुस्कान खिल उठी थी। वह अपने इस ‘अजीब’ लेकिन प्यारे बेटे को देखकर अंदर से जुड़ रही थी।

उसने बंटी के गाल को प्यार से खींचा और फुसफुसाते हुए बोली
“बताऊंगी… कभी फुरसत में तसल्ली से बताऊंगी। अभी बहुत काम पड़ा है घर का। तू चुपचाप बैठकर खाना खा ले फ़िलहाल।”

कामिनी उठी और किचन से नमक की डिब्बी लाने चल दी।
अब उसकी चाल में वो पहले जैसी भारी उदासी नहीं थी। हालांकि जांघों के बीच का वो दर्द अब हल्का था, लेकिन बंटी के इस प्यार और ‘शरारत’ ने उसके उस दर्द को एक मीठी याद में बदल दिया था।

**********************

रात के 9:00 बजे

दिन का वो सूनापन और उदासी अब एक घुटन भरे माहौल में बदल चुकी थी।
रात के 9 बज चुके थे। घर का बेडरूम, जो एक पति-पत्नी का सबसे निजी कमरा होता है, आज एक ‘कसाईखाने’ जैसा लग रहा था। हवा में सस्ती शराब, सिगरेट के धुएं और पसीने की बदबू तैर रही थी।

बिस्तर के बीचों-बीच रमेश और पुलिस इंस्पेक्टर शमशेर बैठे थे। दोनों के सामने कांच के गिलास रखे थे और शराब का दौर चल रहा था। रमेश आज कुछ ज़्यादा ही पी चुका था। उसकी आँखें लाल थीं और जबान लड़खड़ा रही थी। शमशेर हमेशा की तरह अपनी ‘शिकारी’ मुद्रा में था, शराब पी रहा था, लेकिन उसके होश पूरी तरह कायम थे।
“अरे… ओ कामिनी! चखना कहाँ रह गया?” रमेश ने नशे में धुत होकर अपनी कर्कश आवाज़ में चिल्लाया।

रसोई में खड़ी कामिनी का दिल इस आवाज़ से कांप उठा। उसने एक गहरी सांस ली, अपने साड़ी के पल्लू को ठीक किया और नमकीन-सलाद की प्लेट लेकर भारी कदमों से बेडरूम की तरफ बढ़ी।
जांघों के बीच कादर की दी हुई वो ‘सूजन’ अभी भी थी। हर कदम पर उसे उस दर्द का अहसास हो रहा था, लेकिन इस वक़्त उसके दिमाग पर एक अनजाना सा डर हावी था।

कामिनी बेडरूम में दाखिल हुई। उसने नज़रें नीची रखीं।
उसने चुपचाप, बिना कोई शब्द कहे, चखने की प्लेट दोनों गिलासों के बीच बिस्तर पर रख दी। शराब की सड़ांध से उसका जी मिचला रहा था। वह बस किसी तरह उस कमरे से बाहर निकलना चाहती थी।

जैसे ही प्लेट रखकर कामिनी पलटी और दरवाज़े की तरफ जाने लगी… पीछे से रमेश की ज़हरीली और नशे में डूबी आवाज़ ने उसके कदमों को जकड़ लिया।

“अबे कहाँ जा रही है रंडी… बैठ यहाँ पर हमारे साथ!”
यह शब्द… “रंडी”।
रमेश के मुँह से निकली इस गाली ने कामिनी के बदन में सनसनी फैला दी। उसके पैर ज़मीन पर ही जम गए।
यह गाली रमेश ने नशे में अपनी नामर्दी की भड़ास निकालने के लिए दी थी, लेकिन कामिनी के लिए यह शब्द एक बम की तरह फटा।

कल रात कादर के नीचे उछलते हुए उसने खुद को यही तो महसूस किया था, वो किसी सस्ती रंडी की तरह कादर खान के लंड पर उछल रही थी,

“लेकिन वो हवस की मज़बूरी थी, प्यार था। और रमेश के मुँह से यह शब्द एक नंगी तलवार की तरह उसके सीने में उतर गया।
“कभी तो अपने पति के काम आ…” रमेश ने अपना खाली गिलास हिलाते हुए बदतमीज़ी से कहा, “बस सारा दिन घर में महारानी की तरह घूमती रहती है।”
“देखो साली के कपडे, इतनी महंगी चमचमाती साड़ी पहन के घूमती है, पता नहीं कौन सा यार आता है इसे चोदने ”
कामिनी सन्न रह गई। उसका खून जम गया।

उसका दिल पसलियों को तोड़कर बाहर आने को हो रहा था। उसके दिमाग में एक ही खौफनाक ख्याल बिजली की तरह कौंधा
“हे भगवान… कहीं… कहीं शमशेर ने रमेश को सब बता तो नहीं दिया? क्या उसने रमेश को भड़का दिया है?”

कामिनी का पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा। उसकी साँसें भारी हो गईं।
उसने अपनी डरी हुई, फटी-फटी आँखों से धीरे से मुड़कर बिस्तर की तरफ देखा। रमेश तो नशे में झूल रहा था, लेकिन उसकी नज़रें सीधे शमशेर पर जाकर टिक गईं।
शमशेर साला एक नंबर का हरामी और घाघ पुलिसवाला था।
वह बिस्तर पर टेक लगाए बैठा था। उसके हाथ में शराब का गिलास था। कामिनी की उन डरी हुई, कांपती आँखों को देखकर शमशेर समझ गया कि कामिनी के मन में क्या चल रहा है।

शमशेर ऐसा मौका कहाँ जाने देता? वह एक भूखे भेडिये की तरह कामिनी के उस खौफ, उसकी उस बेबसी का रस पी रहा था।
उसने कामिनी के सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उसने कुछ नहीं बोला।
बस… उसके काले, मोटे होंठों पर एक बहुत ही कमीनी, रहस्यमयी और शैतानी मुस्कान रेंग गई। वह मुस्कान चीख-चीख कर कह रही थी कि वह कामिनी की हर रग, हर राज़ से वाकिफ है।

शमशेर ने अपने गिलास से शराब का एक घूंट भरा। उसने कामिनी के थरथराते हुए गोरे बदन को, उसकी गहरी क्लीवेज को अपनी हवस भरी नज़रों से ऊपर से नीचे तक घूरा और फिर एक बहुत ही ‘चिकनी’ लेकिन खौफनाक आवाज़ में बोला

“बैठ जाओ ना भाभीजी… रमेश कह रहा है तो।”
शमशेर की इस एक लाइन ने कामिनी के रोंगटे खड़े कर दिए।
“भाभीजी” शब्द में कोई इज़्ज़त नहीं थी, बल्कि एक ऐसा नंगापन था जिसने कामिनी को अंदर तक नंगा कर दिया।
शमशेर की आँखों में एक सीधा ‘ब्लैकमेल’ और ‘हवस’ का न्यौता था। वह रमेश की आड़ में कामिनी को अपने जाल में फंसा रहा था।

कामिनी वहीं दरवाज़े के पास खड़ी रह गई। उसके पैर जेली की तरह कांप रहे थे।
भागने का कोई रास्ता नहीं था। अगर वो नहीं बैठती है, तो रमेश हंगामा करेगा, गलियां देगा, मरेगा पिटेगा। और अगर बैठती है… तो शमशेर की वो ठरकी नज़रें उसे ज़िंदा नोच खाएंगी।
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बेडरूम की हवा अब पूरी तरह से ज़हरीली हो चुकी थी।
कामिनी दरवाजे के पास बुत बनी खड़ी थी। रमेश शराब के नशे में इतना अंधा हो चुका था कि उसे यह भी होश नहीं था कि सामने उसका ही एक दोस्त बैठा है।

उसे इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि वह अपनी ही बीवी के साथ एक गैर मर्द के सामने कैसे पेश आ रहा है।
वैसे भी, रमेश की नज़रों में कामिनी कभी उसकी ‘बीवी’ या ‘प्रेमिका’ थी ही नहीं, वह बस उसके घर की एक इज़्ज़त, एक नौकरानी और उसके बच्चे की माँ भर थी।

“खड़ी क्या है वहाँ मुँह लटकाए? बैठ ना… ये खा थोड़ी जाएगा तुझे?” रमेश ने अपनी लड़खड़ाती ज़बान और भद्दे अंदाज़ में हाथ नचाते हुए कहा।
रमेश का नशा अब उसके सिर चढ़कर बोल रहा था। वह अपनी सारी नामर्दी, अपनी सारी कुंठाओं (Frustrations) का ठीकरा कामिनी के सिर फोड़ रहा था।

“वैसे तुझे आता भी क्या है?” रमेश ने एक घूंट मारा और शमशेर की तरफ देखकर भद्दी सी हंसी हंसा।
“बिस्तर पर बिल्कुल बर्फ की तरह ठंडी पड़ी रहती है। साला, मर्द को कैसे लुभाते हैं, उसे कैसे खुश करते हैं… तुझे पता ही नहीं है!”

रमेश कामिनी को लगातार सुनाए जा रहा था। वह अपनी नामर्दी का पूरा इल्ज़ाम कामिनी के ‘ठंडेपन’ पर डाल रहा था।

लेकिन बिस्तर के दूसरी तरफ बैठा शमशेर… वह मन ही मन अपनी एक शैतानी और कमीनी हंसी हंस रहा था।
शमशेर कामिनी का सच जानता था। वह जानता था कि यह लाल साड़ी में लिपटी हुई औरत कोई ‘ठंडी बर्फ ‘ नहीं, बल्कि आग का एक दहकता हुआ गोला है।

इतनी गर्म कि अगर रमेश को उसकी असलियत पता चल जाए, तो वह साला जलकर राख हो जाए। शमशेर रमेश का बहुत पुराना दोस्त था, वह रमेश की औकात, उसकी कमज़ोरी और उसके ढीलेपन से वाकिफ था।

“आ ना साली… यहाँ बैठ!” अचानक रमेश गुरराया उसने आगे बढ़कर कामिनी का गोरा, नाज़ुक हाथ कसकर पकड़ लिया।

इससे पहले कि कामिनी कुछ समझ पाती या विरोध कर पाती, रमेश ने उसे एक ज़ोरदार झटका दिया और खींचकर बिस्तर पर अपने और शमशेर के ठीक बीच में बिठा दिया।

“धप्प…”
कामिनी बिस्तर पर गिरते ही संभली।
रमेश नशे में बुरी तरह झूम रहा था। उसकी आँखें शराब के नशे में बार-बार बंद हो रही थीं और फिर झटके से खुल रही थीं।

कामिनी का पूरा जिस्म खौफ और अपमान से कांप रहा था, उसके माथे और गर्दन पर पसीने की बूंदें चमकने लगी थीं। वह लाल सूती साड़ी, जो सुबह उसके सुहागन होने का प्रतीक थी, इस पसीने और घबराहट में उसके बदन से चिपक कर और भी मादक लग रही थी।

और कामिनी की बायीं तरफ बैठा शमशेर…
उसकी भूखी नज़रे कामिनी के उस पसीने से नहाए, कांपते हुए गोरे जिस्म को ऐसे निहार रही थीं जैसे कोई गिद्ध मांस के लोथड़े को ताड़ता है। शमशेर को कामिनी की इस बेबसी में अपना ‘शिकार’ नज़र आ रहा था।

कामिनी का दम घुट रहा था। वह दो दरिंदों के बीच सैंडविच बन गई थी।
उसने अपना हाथ रमेश की पकड़ से छुड़ाने की कोशिश की और कांपती हुई आवाज़ में गिड़गिड़ाई

“छ… छ… छोड़िये ना… क्या कर रहे हैं आप… बंटी यहीं है बाहर, वो आ जाएगा…”
कामिनी की यह बात सुनकर रमेश का पारा और चढ़ गया।

“बच्चा नहीं है साला वो अब…!” रमेश ने खूंखार तरीके से गुर्राते हुए कहा। उसकी आँखें लाल हो गई थीं।

“अभी भी दूध पिला कर सुलाती है क्या उसे तू… हैं?”
रमेश ने गंदी नीयत और गुस्से में अपना हाथ आगे बढ़ाया और कामिनी की छाती पर पड़ा उसकी लाल साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया और एक ही झटके में सरका दिया।

“सर्रर्र…!!”
साड़ी का कपड़ा कामिनी के कंधे से खिसक कर उसकी कमर पर जा गिरा।
कामिनी की सांसें गले में ही अटक गईं। उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती को छुपाने के लिए आगे किए, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

कमरे की दूधिया ट्यूबलाइट की तेज़ रौशनी में कामिनी का वह भरा हुआ, गदराया हुआ हुस्न शमशेर के बिल्कुल सामने पूरी तरह उजागर हो गया।

कामिनी ने जो डीप-नेक, कसा हुआ स्लीवलेस ब्लाउज पहना था, वह उसके विशाल और भारी स्तनों को संभालने में पहले ही नाकाम था। अब पल्लू हटने के बाद… उसके गोरे, पसीने से चमकते हुए स्तन हद से ज्यादा बाहर की तरफ उफन रहे थे।

ब्लाउज के गहरे गले के बीच बनी वह गहरी घाटी (Cleavage) इतनी नशीली थी कि किसी भी साधु का ईमान डगमगा जाए।

शमशेर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
कल रात कादर की ठुकाई के बाद कामिनी के स्तनों पर जो एक अजीब सा भारीपन और निखार आ गया था, वह शमशेर की हवस को भड़काने के लिए काफी था।
कामिनी के स्तन आज ज्यादा ही फुले हुए लग रहे थे, उस पर कादर के हथेलियों के हलके लाल निशान अभी भी मौजूद थे.

कामिनी के उस बेपर्दा हुस्न, उसके कांपते हुए सीने और पसीने की महक ने शमशेर के अंदर के जानवर को जगा दिया।
शमशेर की साँसें भारी होने लगीं। पैंट के अंदर… उसका लंड एक झटके में अकड़ने लगा। सामने रमेश नशे में धुत्त होकर अपनी बीवी की बेइज़्ज़ती कर रहा था, और बगल में शमशेर का हथियार रमेश की ही बीवी के इस नज़ारे को देखकर फौलाद बन रहा था।

कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसकी आँखों से अपमान के दो आंसू छलक कर उसके लाल गालों पर गिर पड़े।

रमेश का सिर नशे में बुरी तरह झूल रहा था। उसे सामने की चीज़ें भी अब धुंधली (Blurry) और दो-दो दिखाई दे रही थीं।
अपनी ही बीवी का पल्लू गिराकर, उसके दूधिया हुस्न को अपने दोस्त के सामने नंगा करके भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसकी नामर्दी और शराब का नशा उसे अंदर से खा चुका था।
लेकिन शमशेर… शमशेर की भूखी आँखें तो जैसे कामिनी के उन बाहर उफनते हुए, पसीने से चमकते स्तनों पर फेवीकोल की तरह चिपक गई थीं। उसके पैंट में खड़ा फौलाद अब रगड़ खाकर दर्द करने लगा था।

शमशेर ने इस मौके का पूरा फायदा उठाने की ठान ली। वह रमेश का बहुत पुराना दोस्त था और उसकी एक-एक कमज़ोरी से वाकिफ था। वह अच्छे से जानता था कि रमेश जब इतनी पी लेता है, तो उसे अगले दिन कुछ याद नहीं रहता उसका दिमाग पूरी तरह से ब्लैकआउट (Blackout) हो जाता है।

यही सोचकर शमशेर के शैतानी हौसले बुलंद हो गए।
शमशेर ने अपना दाहिना हाथ धीरे से आगे बढ़ाया और कामिनी की लाल साड़ी से ढके हुए घुटने पर रख दिया।

शमशेर का वह चौड़ा, कड़क और मर्दाना हाथ जैसे ही कामिनी के घुटने पर पड़ा, कामिनी के बदन में 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया।

“इस्स…!!” कामिनी की साँस गले में ही अटक गई।
नियम और एक ‘संस्कारी पत्नी’ की मर्यादा के हिसाब से उसे तुरंत शमशेर का हाथ झटक देना चाहिए था। उसे चीखना चाहिए था।
आज से पहले उसने रमेश के जागते हुए कभी ऐसी जुर्रत करने की सोची भी नहीं थी।
लेकिन… आज वह ऐसा नहीं कर पाई। वह बुत बनी बैठी रही।
सुबह से जो कादर की जुदाई का खालीपन उसे अंदर से नोच रहा था, जो भयंकर प्यास उसकी जांघों के बीच सुलग रही थी, उस आग को शमशेर के इस एक स्पर्श ने हवा दे दी थी।

कामिनी की चुत, जो कादर के जाने के बाद सूखने लगी थी, वह अचानक से फड़कने (Throbbing) लगी। अपने ही पति के सामने, उसी के बगल में बैठकर, एक गैर मर्द के हाथ का अपनी जांघों पर होना… इस ख्याल मात्र (Thrill of the Taboo) ने ही कामिनी के जननांगों में गीलापन ला दिया। वह डर और चरम उत्तेजना के एक अजीब भंवर में फँस गई।

जब कामिनी ने शमशेर का हाथ नहीं हटाया, तो शमशेर समझ गया कोयला सुलग रहा है, वैसे भी शमाशेर घाघ पुलिस वाला था, उठता धुआँ देख के समझ जाता था आग कब और कैसे जलेगी.

उसने रमेश की तरफ देखा। “भाभीजी जैसी मेरी बीवी होती तो रोज़ इसकी गांड मारता मै….,” शमशेर ने जानबूझकर रमेश को कुरेदा।
कामिनी शमशेर की बात सुन सन्न रह गई, एक अजीब सी उत्तेजना ने उसे घेर लिया, गांड मारने के अहसास से ही कामिनी ने अपनी गांड को कस के सिकोड लिया.. उसे याद आया, लास्ट टाइम शमशेर ने उसकी गांड को ही पेला था.
कामिनी ने रुआसी आँखों से शमशेर को देख, उसने ना मे गर्दन हिलाई… जैसे समझा रही हो plz भगवान के लिए ऐसी बात मत करो…

रमेश ने अपनी भारी, नशे में डूबी पलकें उठाईं “अच्छा है ये तेरी बीवी नहीं है वरना मेरा जैसा नामर्द बन जाता तु भी… हिचहम्म्म… हीच…..” उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसके बिल्कुल बगल में उसकी बीवी के साथ क्या खेल शुरू हो चुका है।

“क्यों क्या करती है भाभीजी ” शमशेर पूरी तरह से कामिनी की इज़्ज़त उतारने पर उतर आया था.
बीच मे बैठी कामिनी अपनी बेबसी, अपने अपमान पर सिहर के रह जा रही थी.
आंखे नम थी, लेकिन साथ ही चुत भी नम थी उसकी चुत कामिनी के अपमान, बेइज़्ज़ती मे अलग मजा ढूढ़ रही थी, उसकी चुत इस अपमान मे आंसू बहा रही थी लेकिन वासना के आंसू.

“शमशेर… ये इतनी ठंडी है कि… कि मेरा लोड़ा भी नहीं खड़ा कर पाती। साला कोई आग ही नहीं है इसमें… बिल्कुल मरी हुई लाश है।”
रमेश अपनी नामर्दी का सारा ठीकरा कामिनी पर फोड़ रहा था, उसे दुनिया की सबसे बेकार औरत साबित कर रहा था।
और यहाँ… रमेश के ठीक बगल में…
शमशेर का हाथ कामिनी के घुटने से सरकता हुआ, उसकी लाल साड़ी के ऊपर से ही उसकी गोरी, मांसल जांघों (Thighs) की तरफ ऊपर बढ़ने लगा था।
“क्या भाभीजी आप ऐसी है क्या, मेरे दोस्त का लंड भी नहीं खड़ा कर पति ” शमशेर किसी लकड़बग्घा जैसे हस रहा था, उसका इशारा अपनी पैंट मे बने उभार की तरफ था.

शमशेर की मोटी-मोटी, गुंडों वाली उंगलियां कामिनी की जांघों के नरम मांस को हल्के-हल्के मसल (Squeeze) रही थीं।

यह एक बहुत ही खौफनाक और कामुक विरोधाभास था। पति सामने बैठकर उसे ‘ठंडी’ और ‘बेकार’ बता रहा था, और उसी का दोस्त उसके भरे हुए जिस्म की गर्मी से पागल होकर उसे नोच रहा था।

कामिनी इस स्थिति से पागल होने लगी।
रमेश के वो कड़वे ताने और शमशेर की वो गुदगुदाती, मसलती हुई उंगलियां… कामिनी की योनि से अब कामरस छलकने लगा था। साड़ी के नीचे उसकी पैंटी गीली होने लगी थी।

वह कसमसा कर रह जाती। जब उसे रमेश का ख्याल आता और पकड़े जाने का भयानक डर सताता, तो वह सहम कर अपनी जांघें आपस में सिकोड़ लेती। लेकिन जैसे ही शमशेर की उंगलियां उसकी जांघों की अंदरूनी मुलायम त्वचा (Inner Thighs) को रगड़तीं और ऊपर की तरफ बढ़तीं, कामिनी उत्तेजना की लहर में अपनी आँखें कसकर बंद कर लेती और अपने दांतों तले अपना निचला होंठ दबा लेती।

“उफ्फ्फ… मम्म…” कामिनी के मुँह से एक बहुत ही धीमी, ना सुनाई देने वाली सिसकी निकल गई।
शमशेर का हाथ अब कामिनी के घुटनों का सफर तय करके, साड़ी की सिलवटों के बीच से उसकी गहरी और भरी हुई जांघों की जड़ तक पहुँचने वाला था।

कामिनी की छाती, जो आधे ब्लाउज़ से नंगी बाहर झांक रही थी, अब साँसों की तेज़ी और हवस की वजह से धौंकनी की तरह ऊपर-नीचे हो रही थी। शमशेर की मंजिल अब वो जगह थी, जहाँ सुबह कादर अपना ‘लावा’ छोड़ कर गया था।

रमेश बिस्तर पर झूल रहा था। उसकी आँखें आधी बंद थीं, सिर भारी होकर सीने की तरफ गिर रहा था, लेकिन वह बेहोश नहीं था। नशे ने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया था, लेकिन उसकी बकवास अभी भी चालू थी।

वह अपनी ही नामर्दी का गुस्सा कामिनी पर निकाल रहा था।
और ठीक उसी के बगल में… शमशेर का वो चौड़ा, खुरदरा हाथ कामिनी की लाल साड़ी को नीचे से पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ खिसका रहा था।
कामिनी की सांसें अटक गईं। उसने हिम्मत जुटाकर अपने कांपते हुए गोरे हाथ को शमशेर की कलाई पर रख दिया। उसने शमशेर की आँखों में एक बेबस, भीख मांगती हुई नज़र से देखा और लगभग रोते हुए फुसफुसाई
“छो… छोड़िये ना… कम से कम इनके (रमेश) सामने तो ऐसा मत करो… प्लीज़…”
लेकिन शमशेर कोई इंसान नहीं, एक भूखा भेड़िया था। कामिनी का यह डर, यह गिड़गिड़ाना उसे और भी ज़्यादा मज़ा दे रहा था। उसने कामिनी के हाथ को कोई अहमियत नहीं दी, बल्कि उसे एक खौफनाक और शातिर नज़रों से घूरा।

शमशेर जानता था कि इस ‘ठंडी’ दिखने वाली औरत के अंदर कितनी ‘गर्म’ आग छुपी है। उसने कामिनी की उस आख़िरी बगावत को तोड़ने के लिए अपना सबसे बड़ा पत्ता फेंका।
शमशेर ने अपना चेहरा थोड़ा घुमाया और नशे में झूमते हुए रमेश की तरफ देखकर, एक बहुत ही दोहरे मतलब (Double meaning) वाली आवाज़ में कहा—
“क्यों रमेश… उस दिन का ‘मटन’ कितना गर्म और टेस्टी था ना?”
यह शब्द सुनते ही कामिनी का दिल जैसे धड़कना भूल गया। उसके बदन का सारा खून जम गया।

“मटन… गर्म और टेस्टी…” शमशेर का इशारा साफ़ था। वह रमेश से बात कर रहा था, लेकिन उसका निशाना कामिनी का वह ‘गर्म जिस्म’ था जिसे कल रात कादर ने खाया था। कामिनी बुरी तरह सहम गई। उसकी मुट्ठी जो शमशेर की कलाई पर कसी थी, एकदम ढीली पड़ गई।

रमेश ने नशे में अपना सिर उठाया। उसे शमशेर के इस ‘मास्टरमाइंड’ खेल की रत्ती भर भी भनक नहीं थी।
“हिच… ह्ह्हम्म… हाँ… साला… मटन … साला कादर क्या बनाता है…” रमेश अपनी लड़खड़ाती ज़बान से बड़बड़ाया और फिर से अपनी आँखें मींच लीं।

रमेश के मुँह से ‘कादर’ का नाम सुनते ही शमशेर के होंठों पर एक शैतानी, विजयी मुस्कान आ गई।
उसने अपना चेहरा कामिनी के कान के बिल्कुल करीब लाया। कामिनी को उसकी शराब और सिगरेट से सड़ी हुई सांसें अपनी गर्दन पर महसूस हो रही थीं। शमशेर ने फुसफुसाते हुए, सीधे कामिनी की रूह पर वार किया

“कादर का मटन कैसा था भाभीजी?”

“धक्…!!”
कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका दिमाग सुन्न पड़ गया।

शमशेर का यह शातिर ब्लैकमेल कामिनी को अंदर तक तोड़ रहा था। कादर का ज़िक्र, पकड़े जाने का डर और अपने ही पति के सामने बेइज़्ज़त होने का खौफ… इस सबने कामिनी को पैरालाइज़ (Paralyze) कर दिया।

उसका सारा विरोध, सारी छटपटाहट एक ही पल में खत्म हो गई। वह एक बेजान गुड़िया की तरह बिस्तर पर सुन्न पड़ गई।
कामिनी के इस समर्पण को देखते ही शमशेर के हौसले आसमान छूने लगे।
उसने बिना किसी डर के, कामिनी की लाल साड़ी को उसके घुटनों से उठाया और सीधे उसकी गोरी, भारी जांघों (Upper Thighs) तक सरका दिया।

ट्यूबलाइट की रौशनी में कामिनी की वो मलाई जैसी गोरी, नंगी जांघें पूरी तरह उजागर हो गईं। और उन जांघों के बीच… कामिनी ने लाल रंग की कच्छी पहनी हुई थी।

कामिनी के भारी स्तन खौफ और एक अनजानी हवस से तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।

शमशेर की एक मोटी, खुरदरी ऊँगली साड़ी के नीचे घुसी।
उसने कामिनी की जांघों के नरम मांस को छुआ और फिर धीरे-धीरे फिसलते हुए… कामिनी की कच्छी की इनर लाइन (Elastic edge) को टटोलने लगी।

“सस्ससीइइ…”
जैसे ही शमशेर की ऊँगली ने उस वर्जित (Forbidden) जगह को छुआ, कामिनी की सांस गले में ही अटक गई।
कादर के जाने से जो चुत सुबह से प्यासी और सूखी पड़ी थी, इस खौफनाक और बेशर्म स्पर्श ने उसे अचानक से गीला करना शुरू कर दिया।

रमेश बगल में आँखें बंद किए अपनी ही दुनिया में बड़बड़ा रहा था— “साली… ठंडी लाश…”
और वहीं… शमशेर की ऊँगली कामिनी की पैंटी के किनारे को रगड़ रही थी, यह चेक कर रही थी कि यह ‘ठंडी लाश’ कितनी गर्म और गीली हो चुकी है।

कामिनी डर, ब्लैकमेल और अपने ही जिस्म की इस बागी उत्तेजना के बीच फँसकर रह गई थी। वह चाह कर भी रमेश को आवाज़ नहीं दे सकती थी, और शमशेर को रोक भी नहीं सकती थी। उसे बहकाया जा रहा था, उसे तोड़ा जा रहा था… और सबसे खौफनाक बात यह थी कि उसके जिस्म को इस ‘पाप’ में मज़ा आने लगा था।

शमशेर की मोटी और खुरदरी ऊँगली कामिनी की लाल कच्छी के इलास्टिक किनारे पर रेंग रही थी।

कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर ली। उसका पूरा गोरा बदन पसीने से भीग चुका था। वह बस यही दुआ कर रही थी कि शमशेर यहीं रुक जाए, लेकिन एक ‘शिकारी’ खून का स्वाद चखने के बाद कहाँ रुकता है?

शमशेर ने अपनी नज़रे तिरछी करके नशे में झूलते रमेश को देखा। रमेश की आँखें बंद थीं और वह अपने ही लार टपकाते हुए मुँह से बड़बड़ा रहा था— “साली… सूखी लकड़ी… कोई रस नहीं…”

रमेश की इस बात ने शमशेर के होंठों पर एक शैतानी मुस्कान ला दी।
उसने बिना पलक झपकाए, अपनी बीच वाली ऊँगली को कामिनी की पैंटी के इलास्टिक के नीचे धकेल दिया।

“सस्ससीइइ… उइइइ… मम्म…”
कामिनी का शरीर धनुष की तरह तन गया।
शमशेर की खुरदरी ऊँगली सीधे कामिनी की योनि के उन नाज़ुक, सूजे हुए होंठों (Labia) से जा टकराई, जो कल रात कादर के 8 इंच के मुसल की रगड़ से अभी तक पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे।

वो दर्द, वो टीस और अब इस अजनबी, वर्जित स्पर्श का खौफ… कामिनी के जिस्म ने एक भयानक ‘करंट’ महसूस किया।

रमेश उसे ‘सूखी लकड़ी, बर्फ की सिल्ली ‘ कह रहा था, लेकिन शमशेर की ऊँगली जैसे ही उस गहरी दरार में फिसली, उसे वहाँ बाढ़ का अहसास हुआ।

उसने पैंटी के अंदर ही अपनी ऊँगली को कामिनी की उस गीली, धड़कती हुई दरार पर हल्का सा रगड़ा।

“घिस…”
यह रगड़ इतनी जानलेवा थी कि कामिनी का मुँह खुल गया। एक चीख उसके गले तक आ गई थी, लेकिन अगर वह चीखती, तो बगल में बैठा रमेश जाग जाता।

कामिनी ने अपनी जान बचाने के लिए अपने ही बायीं तरफ के निचले होंठ को अपने दांतों के बीच कसकर दबा लिया। उसने इतनी ज़ोर से होंठ काटा कि खून की एक हल्की सी बूंद छलक आई, लेकिन उसने अपनी आवाज़ को बाहर नहीं निकलने दिया।

शमशेर ने कामिनी के उस तड़पते हुए चेहरे को देखा। उसने अपनी गीली ऊँगली पैंटी से बाहर निकाली और कामिनी के चेहरे के बिल्कुल करीब ले जाकर फुसफुसाया

“रमेश तु तो खामखा भाभीजी पे इल्जाम लगा रहा था की वो सुखी लकड़ी है, बर्फ है, मै कैसे मान लू?”
शमशेर कामिनी की बेबसी उसकी मज़बूरी का भरपूर फायदा उठा रहा था.

शमशेर के इन ज़हरीले शब्दों ने कामिनी को अंदर तक नंगा कर दिया।
उसे खुद पर घिन भी आ रही थी और अपने ही जिस्म पर गुस्सा भी, जो एक गैर मर्द और अपने ब्लैकमेलर की ऊँगली से इतना ‘गीला’ हो चुका था।
अचानक…
बिस्तर पर झूल रहे रमेश ने अपना सिर झटके से उठाया।

उसकी लाल, नशे में डूबी आँखें आधी खुलीं और उसने शमशेर और कामिनी की तरफ देखा।

“क्या… हिच… अबे तुझे अब दिखाना पड़ेगा क्या? अपने दोस्त की बात पर विश्वास नहीं तुझे, रुक दिखता हूँ तुझे ”
रमेश ने अपनी बेल्ट खोली और एक झटके मे अपनी पैंट को उतार फेंका रमेश नीचे से पूरा नंगा हो गया, उसका 2इंच का झांटो से घिरा लंड दूधिया रौशनी मे उजागर हो गया.
“चल साली रंडी… खड़ा कर के दिखा इसे ” रमेश ने नशे मे झूमते हुए कामिनी का हाथ पकड़ अपने लंड पर रख दिया.

कामिनी का दायाँ हाथ रमेश के उस ठंडे और बेजान मांस के टुकड़े पर था।
वह बिना किसी भाव के, बस अपनी दो उँगलियों (अंगूठे और तर्जनी) के बीच उस 2 इंच के ‘केंचुए’ को पकड़े हुए थी।

रमेश नशे में बड़बड़ा रहा था— “हिला… खड़ा कर इसे…” और कामिनी मजबूरी में अपनी उँगलियों से उसे सहला रही थी, जिसके छूने से वह बस हल्का सा अकड़ने की नाकाम कोशिश कर रहा था।
लेकिन असली ‘तूफ़ान’ तो कामिनी के बायीं तरफ उठ रहा था।
शमशेर, जिसकी उँगलियाँ अभी भी कामिनी की साड़ी के नीचे उसकी गीली चुत की दरार को घिस रही थी, लेकिन अंदर घुसने की कोई इच्छा भी नहीं दिखा रही थी, शमशेर मांझा हुआ खिलाडी था.

उसने अपनी ठरकी आँखों से कामिनी के हाथ में रमेश के उस 2 इंच के लंड को देखा। शमशेर के होंठों पर एक बहुत ही नीच और घमंडी मुस्कान आ गई।
“ज़िप्पप…”
अचानक बायीं तरफ से पैंट की ज़िप खुलने की आवाज़ आई।
शमशेर ने अपने दूसरे हाथ से अपनी खाकी पैंट की ज़िप नीचे खींच दी थी। और अंदर से जो बाहर उछल कर निकला… उसे देखकर कामिनी की साँसें वहीं की वहीं रुक गईं।

एक विशाल, काला, नसों से भरा हुआ 8 इंच का खूंखार मुसल!
यह किसी भी मायने में कादर खान के उस ‘हथियार’ से कम नहीं था। शमशेर का वह लंड हवस और गर्मी से एकदम पत्थर की तरह सख्त हो चुका था, और उसका लाल मुंडका (Head) गुस्से से फन काढ़े हुए था।

“और इसका क्या करना है भाभीजी…?” शमशेर ने अपनी भारी, शैतानी आवाज़ में कामिनी का ध्यान अपनी खुली पैंट की तरफ खींचा।

इससे पहले कि कामिनी कुछ समझ पाती या अपनी नज़रें हटा पाती, शमशेर ने आगे बढ़कर कामिनी का आज़ाद बायाँ हाथ कलाई से पकड़ा और उसे सीधा अपने उस खौलते हुए, धड़कते लंड पर जमा दिया।
“धक्…!!”
जैसे ही कामिनी के गोरे, मुलायम हाथ ने शमशेर के उस गर्म और विशाल मुसल को छुआ, उसके पूरे बदन में 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया।
कादर का सुपाडा नंगा था, लेकिन शमशेर के लंड ने पल्लू ओढ़ा हुआ था.

एक ‘घरेलू औरत’ होने के नाते कामिनी को तुरंत अपना हाथ झटक देना चाहिए था। उसे चीखना चाहिए था। लेकिन… हवस, जिस्म की प्यास और उस वर्जित (Taboo) खेल के नशे ने उसके दिमाग पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था।

उत्तेजना के इस खौफनाक बवंडर में, कामिनी ने बायाँ हाथ शमशेर के लंड से हटाने के बजाय… अपनी मुट्ठी उस 8 इंच के मोटे फौलाद पर कस ली।
अब बिस्तर का नज़ारा दुनिया का सबसे खौफनाक और कामुक नज़ारा था।
कामिनी अपने दोनों हाथों से… दो अलग-अलग मर्दों के लंड एक साथ हिला रही थी।

एक तरफ, उसके दायें हाथ की सिर्फ दो उँगलियों के बीच रमेश का वह 2 इंच का सिकुड़ी हुई लुल्ली थी, और दूसरी तरफ, उसकी बायीं मुट्ठी शमशेर के उस 8 इंच के नसों वाले लंड से पूरी तरह भरी हुई थी। वह इतना मोटा था कि कामिनी की उँगलियाँ आपस में जुड़ भी नहीं पा रही थीं।

कामिनी सच में पागल हुए जा रही थी।
उसका दिमाग फट रहा था। उसकी नशीली, पसीने से भीगी और आधी खुली आँखें किसी पेंडुलम की तरह घूम रही थीं।
वह कभी घिन और तरस खाकर अपने दायें हाथ में पकड़े रमेश के उस मरे हुए लंड को देखती… और फिर खौफ, हैरानी और बेपनाह हवस के साथ अपने बायीं मुट्ठी में भरे शमशेर के उस ‘काले मुसल’ को घूरती। यह ज़मीन-आसमान का फर्क कामिनी के अंदर की ‘रंडी’ को पूरी तरह आज़ाद कर रहा था।

और कोढ़ में खाज (Cherry on top) यह थी कि…
इन दोनों हाथों की कशमकश के बीच, शमशेर का जो दायाँ हाथ कामिनी की साड़ी के नीचे था, वह एक पल के लिए भी नहीं रुका था।
शमशेर की खुरदरी उँगलियाँ लगातार कामिनी की गीली, सूजी हुई चुत के होंठों को कुरेद रही थीं। “घिस… घिस… घिस…” पैंटी के अंदर वह चिपचिपी रगड़ कामिनी को पागल कर रही थी।

“आह्ह्ह… उफ्फ्फ… मम्म…”
कामिनी के मुँह से सिसकियाँ अब रोकी नहीं जा रही थीं। उसके भारी स्तन बाहर उफनते हुए बुरी तरह कांप रहे थे।

कामिनी अब बेहद उत्तेजित हो रही थी, लगता था जैसे किसी ने उसे तंदूर मे झोंक दिया है, कुछ ही पल पहले जिस इंसान की शक्ल देखकर उसे नफरत हो रही थी, अब उसके उस काले, नसों से भरे लंड के सामने उसका जिस्म पूरी तरह बेबस हो चुका था।

कामिनी का हाथ शमशेर के लंड पर इतनी कड़ाई से कस गया था और इतनी तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था… मानो वह उत्तेजना के पागलपन में उसे नोच ही लेगी। उसका हर स्ट्रोक शमशेर की साँसों को भारी कर रहा था।
और इस कशमकश के बीच… शमशेर का दायां हाथ अभी भी कामिनी की साड़ी के नीचे था।
शमशेर की मोटी-मोटी उंगलियां कामिनी की लाल कच्छी के ऊपर से ही उसकी चुत को बेदर्दी से सहला रही थीं। कामिनी की कच्छी कामरस की बाढ़ से पूरी तरह से भीग चुकी थी, इतनी कि साड़ी के नीचे शमशेर की खुरदरी उंगलियां भी उस चिपचिपे पानी में लथपथ हो गई थीं।
“घिस… घिस… घिस…”
शमशेर ने उंगलियों की रगड़ तेज़ करते हुए, नशे में झूलते रमेश की तरफ देखकर मज़े लेने वाले अंदाज़ में पूछा

“कैसा लग रहा है रमेश… खड़ा हुआ?”
रमेश, जिसकी आँखें शराब के नशे में लाल सुर्ख हो रही थीं, उसने अपना सिर झटके से मोड़ा और अपनी 2 इंच की सिकुड़ी हुई ‘लुल्ली’ को कामिनी के दायें हाथ में बेजान पड़ा देखकर दहाड़ा

“साली… ठंडी औरत है बे ये… हिचहह… हिचहह…. इससे कुछ नहीं होगा!” रमेश अपनी ही नामर्दी का गुस्सा कामिनी पर निकाल रहा था।

रमेश की इस बात ने शमशेर को अपना ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेलने का मौका दे दिया।
शमशेर ने एक बहुत ही गंदी, नीच और ठरकी हंसी हंसते हुए अपनी चाल चली
“तो भाभीजी को बोल ना… कि मुँह में ले के खड़ा कर दे!”
कामिनी की हालत अब सच में खराब हो रही थी। एक ‘संस्कारी’ घरेलू औरत के लिए इससे बड़ी बेबसी क्या होगी? अपने ही पति के सामने वह मजबूर थी, ज़लील हो रही थी, और एक गैर मर्द उसकी साड़ी के नीचे उसकी गीली चुत में ‘चप्पू’ चलाकर उसे हवस से पागल कर रहा था।

रमेश को शमशेर का यह आईडिया जम गया। उसने अपनी लड़खड़ाती ज़बान से कामिनी को घूरती आँखों से देखा और उलाहना दी
“हाँ… रंडी… आज तो मुँह में ले कर खड़ा कर ही दे इसे… दिखा दे कि तू भी कोई औरत है”

क्या करती कामिनी? ब्लैकमेल का डर, और साड़ी के नीचे शमशेर की उंगलियों से भड़क रही वो अंधी आग… कामिनी टूट चुकी थी।
उसने कांपते हाथों से शमशेर के लंड को छोड़ा। वह पलंग पर धीरे-धीरे घूमी और घुटनों के बल आ गई।

कामिनी ने अपना सिर झुकाया और अपने कांपते हुए गुलाबी होंठों को रमेश के उस 2 इंच के, शराब और पसीने की बदबू मारते हुए लंड की तरफ ले गई।
लेकिन… इस पूरी प्रक्रिया का नतीजा वो निकला, जिसके लिए शमशेर ने यह खौफनाक जाल बिछाया था।
शमशेर के तो होश ही उड़ गए। उसकी साँसें सीने में अटक गईं।

जैसे ही कामिनी घुटनों के बल झुककर रमेश के लंड की तरफ मुड़ी, शमशेर के बिल्कुल सामने कामिनी का पिछला हिस्सा आ गया।

लाल साड़ी में लिपटे हुए… दो विशाल, भरे हुए, मादक और खूबसूरत ‘पहाड़’ (गांड) शमशेर के चेहरे के ठीक सामने तन गए थे।
कामिनी की कमर का वह घुमाव और साड़ी के पतले कपड़े से छलकती उसकी भारी गांड की गोलाई इतनी कातिलाना थी कि शमशेर का अपना 8 इंच का मुसल पैंट के बाहर और भी ज़्यादा फड़फड़ाने लगा।

“श्लोप… चप… श्लोप… चप चप…”
आगे से आवाज़ आने लगी।
कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर ली और रमेश के उस छोटे से, ढीले मांस के टुकड़े को अपने होंठों के बीच दबा लिया था। वह बेमन से, लेकिन रमेश के ताने और शमशेर के डर से उसे चूसने मे लगी थी।

मुँह में रमेश का लंड लेने के बाद, उसे चूसने के लिए कामिनी को अपना सिर और कमर आगे-पीछे करनी पड़ रही थी।
और इसी मूवमेंट ने शमशेर के सामने स्वर्ग का दृश्य दिखा दिया था।
जैसे-जैसे कामिनी आगे की तरफ रमेश के लंड को चूसती… पीछे शमशेर की आँखों के सामने उसकी वो कामुक, मदमस्त और कड़क गांड साड़ी के अंदर ही एक गज़ब की लय (Rhythm) में हिलने लगी।

“बाउंस… बाउंस…”
कामिनी के भारी कूल्हे दाएँ-बाएँ मटक रहे थे। साड़ी का कपड़ा उसकी गांड की गहरी दरार के बीच हल्का-हल्का धंस रहा था।
रमेश नशे में आँखें बंद करके अपनी नामर्दी को भूलने की कोशिश कर रहा था, और कामिनी का सिर उसकी जांघों के बीच ऊपर-नीचे हो रहा था।
लेकिन असली दावत शमशेर उड़ा रहा था।
उसकी आँखें कामिनी की उस हिलती हुई, कातिलाना गांड पर फेवीकोल की तरह चिपक गई। उसके मुँह से राल टपकने लगी। कामिनी की गांड का हर झटका, हर मटक शमशेर की रगों में हवस का लावा भर रहा था।
कामिनी अपनी बेबसी में रमेश का लंड चूस रही थी, अनजान कि उसके पीछे उसकी हिलती हुई गांड ने एक भूखे भेडिये को किस कदर पागल कर दिया है।

रमेश नशे में पूरी तरह अंधा हो चुका था। वह बस अपनी गर्दन पीछे लुढ़काए, आधी खुली लाल आँखों से छत को घूर रहा था और नशे में अजीब सी सिसकियाँ ले रहा था “हिच… आह्ह… हाँ साली… और… हिच…” लेकिन शमशेर इस धीमी रफ़्तार से खुश नहीं था। वह कामिनी को पूरी तरह से उकसाना और उसकी उस दबी हुई ‘जंगली औरत’ को बाहर निकालना चाहता था।

शमशेर ने बगल में रखी शराब की बोतल उठाई और गिलास में एक ‘नीट’ (बिना पानी का) पेग बनाया।
“ऐसे नहीं होगा रमेश… ले, एक पेग और पी!” शमशेर ने वो नीट पेग रमेश के कांपते हाथों में थमा दिया और फिर एक बहुत ही शैतानी, उकसाने वाली आवाज़ में कामिनी की तरफ देखकर बोला

“अच्छे से चूसो भाभीजी… आज मेरा दोस्त पूरे मूड में है। साबित कर दो कि आपमें कितनी आग है…!”

शमशेर के इन शब्दों ने कामिनी के अंदर एक अजीब सी झनझनाहट पैदा कर दी। वह अपने पति का लंड चूस रही थी, लेकिन उसके दिमाग में और उसकी रगों में शमशेर के शब्द गूंज रहे थे।
और इसी बीच… शमशेर ने अपना असली खेल शुरू कर दिया।
कामिनी का ध्यान पूरी तरह से आगे रमेश पर था, और उसकी मदमस्त, भारी गांड पीछे शमशेर के बिल्कुल सामने तनी हुई थी।
शमशेर ने अपना खुरदरा हाथ आगे बढ़ाया और कामिनी की लाल साड़ी के निचले हिस्से को पकड़ लिया।
“सर्रर्र… सर्रर्र…”
बिना कोई आवाज़ किए, शमशेर ने बहुत ही धीरे-धीरे, एक कातिलाना रफ़्तार से कामिनी की साड़ी को नीचे से उठाना शुरू कर दिया।
साड़ी कामिनी की पिंडलियों से उठी… फिर उसके गोरे, भरे हुए घुटनों के पीछे से होती हुई… उसकी भारी जांघों को नंगा करती हुई… सीधे उसकी कमर तक आ गई।
आअह्ह्ह….. उफ्फ्फफ्फ्फ़…. शमशेर लगभग चीख पड़ा, स्वर्ग का दरवाजा खुल गया था, बस एक कच्छी रुपी पर्दा ही रह गया था,

ट्यूबलाइट की तेज़ दूधिया रौशनी में… कामिनी की वो विशाल, गोरी और गदराई हुई गांड एक छोटी सी लाल रंग की कच्छी में फंसी हुई बुरी तरह चमक रही थी।

कामिनी के भारी कूल्हों ने उस छोटी सी कच्छी को लगभग निगल ही लिया था।
लेकिन शमशेर की आँखें उस गांड से फिसलकर नीचे उस जगह पर जाकर टिक गईं, जहाँ से अभी भी कामिनी की हवस बह रही थी।
कामिनी की चुत का वो पूरा हिस्सा… कच्छी के बीचों-बीच… एक गहरे, चिपचिपे गीलेपन से सना हुआ था।

उस गीलेपन की वजह से कामरस की एक-दो बूंदें रिसकर उसकी जांघों पर चू रही थीं । उस नज़ारे और उस जगह से उठती हुई एक औरत की ‘कच्ची, मदमाती महक’ ने शमशेर को पागल कर दिया।

शमशेर ने अपना चेहरा कामिनी की उस नंगी, कांपती हुई गांड की गहरी दरार के बिल्कुल करीब ले जाकर… एक बहुत ही लंबी और गहरी सांस (Deep Inhale) भरी। “सुंघघघ… संन्नीफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ग्ग ससससम्म्म्म….आह्ह्ह…”
उसने कामिनी की चुत से उठ रही उस कामुक महक को अपने पूरे फेफड़ों में भर लिया।

जैसे ही शमशेर की वह गर्म सांस कामिनी की नंगी जांघों और उसकी गीली कच्छी पर पड़ी…
“सस्ससीइइ…!!” कामिनी का पूरा जिस्म एक झटके में सिहर उठा। उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसके मुँह से रमेश का लंड पल भर के लिए छूट गया।

अपनी ही साड़ी का यूं कमर तक उठ जाना, अपनी गांड का एक अजनबी के सामने पूरी तरह बेपर्दा हो जाना, और उसकी सांसों का अपनी गीली चुत पर महसूस होना… यह सब कामिनी के लिए बिल्कुल नया था।

ज़िंदगी में पहली बार वह ऐसा कोई ‘गंदा’ और ‘वर्जित’ काम कर रही थी। अपने ही पति के सामने वह किसी और के लिए नंगी हो रही थी।

उसे शर्म से मर जाना चाहिए था। उसे रोना चाहिए था।
परन्तु… अगले ही पल कामिनी ने अपने अंदर एक खौफनाक सच का अनुभव किया।
उसे इस बेइज़्ज़ती में, इस नंगेपन में और एक दूसरे मर्द की हवस का शिकार बनने में… एक ऐसा भयानक मज़ा (Extreme Pleasure) आ रहा था, जिसे वह शब्दों में बयान ही नहीं कर सकती थी।

डर और हया की जगह अब एक ‘पागलपन’ ने ले ली थी।
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कीं, एक गहरी आह भरी, और अपनी उस नंगी, बेपर्दा गांड को हल्का सा पीछे की तरफ मटकाते हुए… वापस रमेश के लंड को अपने मुँह में भर लिया।

शमशेर ने एक बार तिरछी नज़रों से रमेश की तरफ देखा। रमेश नशे में पूरी तरह झूल रहा था, उसकी आँखें लाल होकर पलट रही थीं और गर्दन ढलक गई थी। वह किसी भी पल बेहोश हो सकता था।
वैसे भी शमशेर को रमेश का रत्ती भर भी डर नहीं था। अगर वो इस वक़्त अपनी आधी खुली आँखों से शमशेर की हरकतें देख भी लेता, तो भी उसे सुबह ‘घंटा’ कुछ याद नहीं रहने वाला था।

यही बात शमशेर को इस कमरे का सबसे निडर और खूंखार जानवर बना रही थी।
कामिनी आगे झुकी हुई थी, उसके होंठों में रमेश का ढीला लंड था।
शमशेर ने पीछे से एक गंदी सी मुस्कान बिखेरी और बोला
“क्या भाभीजी… ऐसे थोड़ी ना चूसते हैं? बताओ, मेरे दोस्त का लंड तो अभी तक खड़ा ही नहीं हुआ!”
और यह कहते ही… शमशेर ने कामिनी की कमर पर फंसी उस छोटी सी लाल कच्छी के किनारों को अपने दोनों खुरदरे हाथों से कसकर पकड़ा।
बिना किसी चेतावनी के… “सर्रर्रर्र… झटाक!”
शमशेर ने एक ही झटके में उस गीली, कामरस से लथपथ कच्छी को कामिनी की भारी गांड से नीचे सरका दिया और सीधे उसके घुटनों तक ले जाकर छोड़ दिया।
अब कामिनी का निचला हिस्सा पूरी तरह से,सम्पूर्ण नंगा था।

कमरे के सीलिंग फैन की हल्की सी ठंडी हवा का झोंका जैसे ही कामिनी की उस नंगी, पसीने से चमकती हुई गांड और उसकी गहरी दरार से टकराया… कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।

इस अचानक हुए नंगेपन के अहसास से कामिनी ने पल भर के लिए डर और उत्तेजना में अपनी गांड के छेद (Sphincter) को एकदम कसके सिकोड़ लिया… और फिर धीरे से ढीला छोड़ दिया।
यह एक प्राकृतिक शारीरिक प्रतिक्रिया थी, लेकिन इस एक हरकत ने कमरे का पूरा माहौल ही बदल दिया। कामिनी की गांड के सुकड़ने और ढीला होने से… एक औरत के बदन की वो कसीली, पसीने और कामरस में सनी हुई ‘कच्ची और मदमाती गंध’ (Musky Scent) एक झटके में कमरे की हवा में फैल गई।

शमशेर, जो बिल्कुल पीछे बैठा था, वह साक्षात् इस गंध को सूंघ रहा था।
“सुंघघ… सससन्नीफ्फफ्फ्फ़…. उउउफ्फ्फ्फ़…आआह्ह…”
कामिनी की चुत के गीलेपन और गांड के पसीने की उस नशीली महक ने शमशेर के दिमाग की नसें फाड़ दीं। वह इस हसीन और ‘वर्जित’ नज़ारे को देखकर पूरी तरह पागल हो गया।

शमशेर की पैंट के बाहर निकला उसका 8 इंच का काला मुसल अब बेकाबू होकर फड़फड़ाने लगा, वह इतना तन गया था कि लग रहा था जैसे अभी उछल कर सीधा कामिनी की गांड को चीरता हुआ अंदर घुस जाएगा।
लेकिन शमशेर कोई नौसिखिया नहीं था। वह इस पल को धीरे-धीरे पीना चाहता था।

उसने अपने धड़कते हुए लंड को अपने ही हाथ से कसकर पकड़ा और उसे अपनी जांघ पर नीचे की तरफ दबा दिया।
“रुक भाई… सब्र कर… तेरा नंबर भी आएगा,” शमशेर ने अपने ही हथियार से फुसफुसाते हुए कहा।
और फिर… शमशेर ने अपना सिर आगे बढ़ाया और कामिनी की उस नंगी, चमकती हुई गांड पर टूट पड़ा।
यहाँ कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। शमशेर ने अपनी मोटी, खुरदरी और गीली जीभ बाहर निकाली।

“स्लर्प…”
शमशेर की जीभ की पहली छुअन कामिनी की गांड की दरार के बिल्कुल निचले हिस्से (जहाँ से चुत की शुरुआत होती है) पर पड़ी।

वह गीलापन, जो कामिनी की चुत से रिसकर उसकी गांड की दरार तक आ गया था, शमशेर ने उसे अपनी जीभ से चाटना शुरू किया।
शमशेर की जीभ बहुत ही हौले-हौले (Slowly), एक सांप की तरह रेंगती हुई… कामिनी की गांड की गहरी दरार के बीचों-बीच ऊपर की तरफ बढ़ने लगी।
“चप… चप… स्लर्प…”
कमरे में सिर्फ़ शमशेर के चाटने की गीली आवाज़ें गूंज रही थीं।

वह उस पूरी दरार को किसी आइसक्रीम की तरह चाट रहा था। पसीने का नमकीन स्वाद और कामिनी के कामरस की मिठास… शमशेर सब पी रहा था।
और फिर… शमशेर की जीभ कामिनी के उस कसे हुए, गुलाबी ‘गांड के छेद’ (Anus) पर आकर रुक गई। शमशेर ने अपनी जीभ की नोक को हल्का सा नुकीला किया और उस छेद के चारों तरफ गोल-गोल घुमाने लगा।

“सस्सीइइ… उइइइ… मम्मम…”
कामिनी का शरीर करंट खाकर धनुष की तरह तन गया।
जब शमशेर ने उस छेद पर अपने होंठ रखे और उसे धीरे-धीरे चूसना शुरू किया… तो कामिनी के दिमाग की सारी नसें सुन्न हो गईं। यह एक ऐसा चरम सुख था जो उसने ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं किया था।
अत्यधिक उत्तेजना के पागलपन में… कामिनी अपनी गांड के छेद को कभी शमशेर की जीभ के इर्द-गिर्द कसकर बंद करती (Clenching), तो कभी और मज़ा लेने के लिए उसे ढीला छोड़ देती। उसकी वो भारी गांड शमशेर के चेहरे पर एक अजीब सी लय में थिरक रही थी।

आगे… रमेश का लंड चूसना तो कामिनी कब का बंद कर चुकी थी। वह बस घुटनों के बल झुकी हुई थी और रमेश का वह ढीला, 2 इंच का मांस का टुकड़ा बस उसके खुले होंठों के बीच बेजान पड़ा था। कामिनी के मुँह में कोई हरकत नहीं थी, क्योंकि उसकी रूह तो पीछे से शमशेर चाट रहा था।

वह बस अपने पति का लंड मुँह में लिए… एक गैर मर्द से अपनी गांड चटवा रही थी।
“उउउफ्फ्फ्फ… क्या सुकून था… क्या आनंद था…”
कामिनी की आँखें पलट गई थीं। उसके जिस्म का रोम-रोम एक मीठी आग में जल रहा था।

“आअह्ह्ह…” कामिनी के मुँह से सिसकियाँ निकल रही थीं। इन सिसकियों में कोई डर नहीं था। अब उसे न तो रमेश की कोई फ़िक्र थी, न पकड़े जाने की चिंता, और न ही समाज की मर्यादा का खौफ।
वह पूरी तरह से शमशेर की जीभ की गुलाम बन चुकी थी, वह इस नर्क जैसी रात में भी ‘स्वर्ग’ का अनुभव कर रही थी,

बेडरूम के उस पलंग पर कामिनी का जिस्म अब पूरी तरह से हवस की भट्टी बन चुका था।
पीछे से शमशेर की खुरदरी जीभ उसकी गांड की दरार और उस कसे हुए छेद पर जो कहर ढा रही थी, उसने कामिनी के अंदर की सारी मर्यादाओं को जलाकर राख कर दिया था।
कामिनी गांड चटवा कर इतनी बुरी तरह तड़प रही थी कि उसकी आगे की घाटी, उसकी सूजी हुई, प्यासी चुत पूरी तरह से कामरस की बाढ़ छोड़ रही थी।

वह रस इतना ज़्यादा था कि उसकी जांघों से बह-बह कर बिस्तर की चादर पर टपक रहा था, और वहां एक बड़ा सा गीला धब्बा बन गया था।

लेकिन… शमशेर ने उस बहती हुई चुत की तरफ एक बार भी ध्यान नहीं दिया। उसका मुद्दा वो था ही नहीं; वो तो कामिनी को तड़पाना चाहता था, उसकी गांड का दीवाना था,
कामिनी अब हवस से सचमुच पागल हो रही थी।
गांड के मज़े ने उसकी चुत की प्यास को हजार गुना बढ़ा दिया।
उसे लगने लगा था कि अब शमशेर की वो लपलपाती जीभ उसकी चुत के होंठों पर भी फेरे लागए, उस कामरस को चाटे, या फिर अपना वो 8 इंच का खौलता हुआ फौलाद एक ही झटके में उसके अंदर उतार दे।

इस बेकाबू उम्मीद में… कामिनी घुटनों के बल झुकी-झुकी ही अपनी भारी कमर को थोड़ा और ऊपर की तरफ (हवा में) उठाती, अपनी गांड को मटकाती, ताकि शमशेर की जीभ फिसलकर सीधा उसकी गीली चुत तक आ जाए।
लेकिन शमशेर साला एक नंबर का हरामी और घाघ खिलाड़ी था।
जैसे ही कामिनी अपनी चुत को उसकी जीभ से छुआने के लिए कमर उठाती… शमशेर भी जानबूझकर अपना सिर थोड़ा और ऊपर कर लेता। उसकी जीभ बस गांड के छेद तक ही रहती। कामिनी एक दर्द भरी सिसकी के साथ वापस नाउम्मीद लौट जाती। उसकी चुत हवा में ही फड़क कर रह जाती।

“उफ्फ्फ… मम्म… आअह्ह्ह…” कामिनी तड़पकर चादर नोच रही थी।
और तभी… अचानक शमशेर ने कामिनी की गांड से अपना मुँह हटा लिया।
कामिनी का शरीर झटके से सूना पड़ गया।
शमशेर ने अपनी जीभ पर लगा कामिनी का रस चाटा और नशे में झूल रहे रमेश की तरफ देखकर ज़ोर से बोला
“क्यों भाई रमेश… सो गया क्या? भाभीजी की चुत नहीं मारेगा क्या?”
शमशेर की इस भारी और गंदी आवाज़ ने कमरे का सन्नाटा चीर दिया।
“चुत मारने का नाम” सुनते ही रमेश के अंदर का वो सोता हुआ, नामर्द और शराबी जानवर जैसे अचानक होश में आ गया।
“हिच… ह्ह्हम्म… हाँ… हाँ… क्यों नहीं!” रमेश नशे में दहाड़ा।
उसने अपनी लाल, सूजी हुई आँखें खोलीं और कामिनी को घूरते हुए अपना हुक्म सुनाया

“चल रंडी… कपड़े खोल पूरे… नंगी हो जा और आ जा… मेरे लंड की सवारी कर!” रमेश ने आदेश दिया, जैसे वह दुनिया का सबसे बड़ा सिकंदर हो।
यह सुनकर शमशेर के होंठों पर एक विजयी, नीच मुस्कान तैर गई।

शमशेर पलंग पर पीछे खिसका और बिस्तर के सिरहाने (Headboard) से अपनी चौड़ी पीठ टिका कर बैठ गया। उसकी दोनों टांगें फैली हुई थीं। उसने साइड टेबल से शराब की बोतल उठाई और इत्मीनान से अपने लिए एक और पेग बना लिया।

वह एक हाथ में शराब का गिलास लिए और दूसरे हाथ से अपनी पैंट के बाहर निकले उस 8 इंच के नसों वाले, धड़कते हुए लंड को सहलाने लगा।
उसका अंदाज़ बिल्कुल ऐसा था जैसे कोई सामने लाइव ‘पॉर्न फ़िल्म’ शुरू होने का इंतज़ार कर रहा हो, और उसे वीआईपी (VIP) सीट मिल गई हो।

रमेश का हुक्म सुनकर कामिनी बिस्तर से धीरे-धीरे उठ खड़ी हुई।
और जैसे ही कामिनी अपने पैरों पर सीधी खड़ी हुई…
“स्प्लैट…”
वह लाल रंग की छोटी सी कच्छी, जो पहले से ही कामिनी के घुटनों तक सरकी हुई थी और कामरस के भारीपन से पूरी तरह लथपथ थी… वो सरक कर सीधा कामिनी की एड़ियों पर आ गिरी।
कामिनी अब नीचे से सम्पूर्ण नंगी थी। उसकी साड़ी भी कमर पर आधी उलझी हुई थी और ब्लाउज़ से उसके भारी स्तन लगभग पुरे ही बाहर उफन रहे थे।

कामिनी की आँखों में अब कोई शर्म या हया नहीं थी। उन आँखों में सिर्फ प्योर हवस (Pure Lust) तैर रही थी, एक ऐसी आग जो किसी को भी भस्म कर दे।
कामिनी ने अपनी नशीली आँखों से पलंग का नज़ारा देखा।
एक नज़र उसने शमशेर की तरफ डाली… जो सिरहाने टिका हुआ, अपने विशाल, काले और फौलाद जैसे सख्त 8 इंच के लंड को मुट्ठी में भरकर सहला रहा था। वह मुसल इतना बड़ा था कि शमशेर के हाथ से भी बाहर निकल रहा था।

और फिर… कामिनी की नज़रें नीचे बिस्तर पर पड़े अपने पति रमेश की तरफ गईं।
रमेश टांगें फैलाकर चित पड़ा था। और उसकी जांघों के बीच… वो 2 इंच का सिकुड़ा हुआ, मरा हुआ लोड़ा उल्टी करके पड़ा था। उस पर ज़रा सी भी जान नहीं थी। वह बिल्कुल एक मरी हुई छिपकली जैसा लग रहा था।
यह विरोधाभास देखकर कामिनी का दिमाग भन्ना गया।

उसका वो सुलगता हुआ, आग से तपता हुआ जिस्म… जो अभी-अभी शमशेर की जीभ से एक भयंकर बाढ़ छोड़ चुका था, उसे अब इस ‘मरे हुए केंचुए’ की सवारी करनी थी?
कामिनी के होठों पर एक कड़वी, घिन और हवस से भरी मुस्कान आ गई।
वह मन ही मन कुलबुला उठी, उसके अंदर की वो ‘रंडी ‘ चीख उठी—
“इस से… इस से चुत मारेगा मेरी? .!”
***********************

बेडरूम की हवा में अब साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था। कमरे में सस्ती शराब, सिगरेट के धुएं और एक औरत के पसीने में घुली हुई हवस की ऐसी गाढ़ी महक थी, जो किसी भी मर्द का ईमान डिगा दे।

रमेश के उस भद्दे आदेश के बाद कामिनी पलंग से उठी।
कुछ घंटों पहले तक जो औरत एक संस्कारी पत्नी के खोल में छुपी थी, आज रात शमशेर की उस खौफनाक और लपलपाती हवस ने उसके अंदर की सारी बेड़ियाँ तोड़ दी थीं। कामिनी अब महज़ मजबूर नहीं थी; उसकी आँखों में एक अजीब सी बगावत, एक नशीला ‘जंगलीपन’ उतर आया था।

उसने बिस्तर पर बेसुध पड़े अपने पति की तरफ एक बार भी नहीं देखा। उसकी वो बड़ी-बड़ी, सुलगती हुई आँखें सीधा पलंग के सिरहाने बैठे शमशेर की आँखों में गड़ गईं। शमशेर एक दम ढीठ और बेखौफ बना हुआ था।

वह अपनी जगह पर पीछे पीठ टिकाए, टांगें फैलाए बैठा था। उसके एक हाथ में शराब का आधा भरा गिलास था और उसकी दरिंदगी भरी, वहशी नज़रें कामिनी के जिस्म के हर एक इंच को किसी भूखे लकड़बग्घे की तरह चाट रही थीं, दूसरा हाथ उसके लंड को तसल्ली दे रहा था.

“क्लिक…”
कमरे के सन्नाटे में कामिनी के ब्लाउज़ का पहला हुक खुलने की आवाज़ गूंजी।
कामिनी ने शमशेर की आँखों में देखते हुए ही अपने दोनों हाथ पीछे किए । यह कोई मजबूरी में उतारे जा रहे कपड़े नहीं थे; यह कामिनी का शमशेर को रिझाना, उसे चिढ़ाना और उसकी उस 8 इंच की अकड़ती हुई हवस को सीधे चुनौती देना था।

“क्लिक… क्लिक…”
उसकी उंगलियां बहुत ही धीमी, कातिलाना रफ़्तार से एक-एक हुक खोल रही थीं। जैसे-जैसे हुक खुल रहे थे, कामिनी की भारी और उफनती हुई छाती आज़ाद होने के लिए मचल रही थी।

ब्लाउज़ पूरी तरह खुला और कामिनी ने अपने गोरे कंधों को हल्का सा झटका दिया।
वह लाल रंग का कसा हुआ कपड़ा उसके कंधों से फिसलता हुआ सीधे फर्श पर जा गिरा।
ब्लाउज़ गिरते ही, कामिनी के वो भारी, गदराये हुए और पसीने से चमकते हुए स्तन आज़ाद होकर हल्का सा झूल गए।

उनकी वो गोलाई, वो भारीपन और उन पर उभरी हुई हल्की-हल्की नीली नसें दूधिया रौशनी में चमक रही थीं।
कामिनी मे स्तनों मे ज्यादा लचक नहीं थी, वो चट्टान की तरह कड़क और ताने हुए थे, शमशेर ने यह नज़ारा देखकर शराब का एक बड़ा घूंट अपने गले के नीचे उतारा। उसकी साँसें भारी होने लगी थीं।

इसके बाद कामिनी के हाथ अपनी कमर पर गए।
साड़ी की बची-खुची सिलवटों को उसने अपनी उंगलियों में फंसाया और एक ही झटके में खोल दिया। रेशमी लाल साड़ी सरसराती हुई उसकी भारी जांघों को चूमती हुई ज़मीन पर एक लाल ढेर की तरह गिर पड़ी।

अब कामिनी सम्पूर्ण नंगी थी। एक 38 साल की औरत का वो परिपक्व, भरा हुआ और मादक जिस्म किसी संगमरमर की मूरत जैसा लग रहा था, जिसमें अभी-अभी हवस की आग फूंक दी गई हो। उसकी चौड़ी कमर, बाहर की तरफ निकले हुए उसकी भारी गांड और पसीने से चमकती उसकी गोरी त्वचा… शमशेर बिना पलक झपकाए उस ‘तिलिस्म’ को निहार रहा था।

कामिनी ने बिल्कुल देर नहीं की, मदमस्त चाल, चेहरे पे कामुकता लिए धीरे से पलंग पर चढ़ी।
वह किसी शेरनी की तरह घुटनों के बल चलते हुए आगे बढ़ी। उसकी भारी गांड हर एक मूवमेंट शमशेर को पागल कर रहा था। उसकी गांड के दोनों हिस्से आपस मे टकरा के दूर हो जाते, फिर वापस चिपक जाते.

कामिनी ने अपने दोनों पैर रमेश की कमर के अगल-बगल रख दिए। रमेश नशे में पूरी तरह धुत्त था, आँखें बंद किए बस अपनी भारी और बदबूदार साँसें ले रहा था।
कामिनी अब रमेश के बिल्कुल ऊपर थी।
लेकिन नीचे बैठने से पहले, उसने अपनी गर्दन मोड़कर पीछे शमशेर की तरफ देखा। शमशेर के ठीक सामने कामिनी की वो भारी, कातिलाना गांड और कमर का वो गहरा घुमाव पूरी तरह से उजागर था। कामिनी ने शमशेर की आँखों में देखते हुए अपनी जांघों को धीरे-धीरे…

बहुत ही धीरे-धीरे और चौड़ा किया। शमशेर के सामने वो नज़ारा अब पूरी तरह खुल रहा था जिसके लिए वो तड़प रहा था।
कामिनी की गांड के दोनों पल्ले एक दूसरे से दूर होने लगे, गांड की गोलाईया बहार को आने लगी, साथ ही दिखा उस दरार से बहार झाँकते दो गीले छेद.

और तभी… कामिनी ने अपने घुटने मोड़े और अपने पूरे शरीर का भारी वज़न नीचे की तरफ छोड़ दिया।
“धप्प…!!”
एक बहुत ही भारी, मांस के मांस से टकराने की आवाज़ कमरे में गूंजी।
कामिनी बहुत ही जानबूझकर, पूरी ताकत और एक नफरत भरे झटके के साथ रमेश के ऊपर बैठी थी।

“आअह्ह्ह… उफ्फ्फ…” रमेश के मुँह से दर्द और घुटन से भरी एक कराह निकल गई। उसका सिर झटके से पीछे की तरफ पलट गया। कामिनी की उस भारी, गदराई हुई गांड और जांघों के वज़न के नीचे रमेश का वो सिकुड़ा हुआ लंड और टट्टे बुरी तरह दब कर कुचल गये, कामिनी अब रमेश की बेइज़्ज़ती (Humiliation) करने पर उतारू थी।
कामिनी ने एक बार फिर अपनी गर्दन घुमाकर पीछे शमशेर को देखा।
उसकी आँखों में एक शैतानी और हवस से भरी चमक थी। उसने शमशेर को देखते हुए ही अपनी गांड को हल्का सा ऊपर उठाया… और वापस पूरी ताकत से रमेश पर पटक दिया।
“स्मैक… स्मैक…धप.. धप…”
वह जानबूझकर बार-बार ऐसा कर रही थी। दोनों के जिस्मों के बीच चुत रस और पसीने की वजह से इतनी फिसलन हो गई थी कि कामिनी की गोरी, भारी गांड रमेश की काली टांगों पर बुरी तरह रपट रही थीं।

वो उस बेजान, मरे हुए मांस के टुकड़े पर अपना मदमास्ता हुआ जिस्म रगड़ कर शमशेर को दिखा रही थी कि उसकी आग कितनी भयंकर है।

लेकिन शमशेर… शमशेर अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ।
वह सिर्फ मुस्कुरा रहा था। एक बहुत ही नीच, विजयी और शैतानी मुस्कान। उसने अपने गिलास से शराब का आख़िरी घूंट भरा और बर्फ के टुकड़ों को चबाते हुए बोला
“चोदो भाभीजी… और ज़ोर से चोदो मेरे दोस्त को! दिखा दो आप मे कितनी आग है, तु कितनी बड़ी रंडी है ”

शमशेर ने अपनी भारी और खुरदरी आवाज़ में उसे और उकसाया। शमशेर आप से सीधा तु पर आ गया था, भाभीजी से सीधा रंडी पर आ गया था.
कामिनी ने इस बात का कोई बुरा नहीं मना, उल्टा ये शब्द उसे उकसा रहे थे, उत्तेजित कर रहे थे,.

कामिनी दिखा भी रही थी कि वह कितनी गर्म है।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने दोनों हाथों से अपने भारी, नंगे स्तनों को बेदर्दी से मसलना शुरू कर दिया। उसका सिर पीछे की तरफ लुढ़क गया था, काले बाल उसकी नंगी पीठ पर झूल रहे थे। वह रमेश के उस मरे हुए, बेजान हिस्से पर अपनी गांड को किसी मशीन की तरह आगे-पीछे घिस रही थी। उसकी साँसों की तेज़ी और उसके गले से निकलती धीमी सिसकियाँ पूरे कमरे में गूंज रही थीं।

लेकिन यह गर्माहट, यह जंगलीपन, यह नंगा नाच… वह रमेश के लिए नहीं कर रही थी। रमेश तो नशे में दर्द से कराहता हुआ बस एक गद्दा बना हुआ था।

कामिनी की यह सारी आग, उसकी यह सारी मादकता, और उसके जिस्म का वो हर एक कतरा सिर्फ़ और सिर्फ़ पलंग के सिरहाने बैठे उस ढीठ पुलिसवाले, शमशेर के लिए था। यह उन दोनों के बीच एक ऐसा खौफनाक और हवस भरा ‘साइकोलॉजिकल खेल’ बन चुका था, जिसमें पति सिर्फ एक तमाशा बनकर रह गया था।

कमरे का सन्नाटा अब सिर्फ कामिनी की भारी साँसों और रमेश के कराहने की आवाज़ों से टूट रहा था।
कामिनी अब पूरी तरह से मदहोशी और एक अजीब सी उत्तेजना में डूब चुकी थी। वह आगे की तरफ रमेश के सीने पर झुक गई। उसके बिखरे हुए काले बाल रमेश के पसीने से भीगे चेहरे पर गिर रहे थे। कामिनी की आँखें बंद थीं, और वह एक मादक महिला की तरह रमेश के बेसुध जिस्म पर हावी थी। लेकिन उसका पूरा ध्यान, उसके जिस्म की हर एक नस, पीछे पलंग के सिरहाने की तरफ खिंची हुई थी।

कामिनी का नंगी, तपती, चिकनी गांड शमशेर के बिल्कुल सामने एक खुली किताब की तरह हिल रही थी,
पलंग के सिरहाने बैठा शमशेर, जो अब तक खुद को एक बहुत बड़ा ‘कंट्रोलर’ और ढीठ शिकारी समझ रहा था, उसका सब्र अब जवाब दे चुका था। कामिनी की खुलती बंद होती गांड की दरार और कमरे में फैली उस मदमाती महक ने शमशेर के दिमाग की नसें सुन्न कर दी।

तभी… कमरे के सन्नाटे में एक आवाज़ गूंजी।
“ससससररर….. खट…”
चमड़े की बेल्ट के बकल (Buckle) के खुलने और कपड़ों के ज़मीन पर गिरने की आवाज़।

यह आवाज़ सुनते ही कामिनी के होठों पर एक बहुत ही रहस्यमयी, विजयी और कामुक मुस्कान तैर गई। उसने अपनी गर्दन धीरे से पीछे की तरफ घुमाई।

शमशेर अब कमर के नीचे पूरी तरह से नंगा हो चुका था। उसका वो गुरूर, वो शिकारी वाला नकाब अब पूरी तरह से उतर चुका था। शमशेर की आँखें हवस से लाल हो चुकी थीं और उसकी साँसें किसी जंगली जानवर की तरह धौंकनी खा रही थीं।

कामिनी बस मंद-मंद मुस्कुरा दी।
आज इस बेडरूम में, अपने ही नामर्द पति के ऊपर बैठकर, उसने वो कर दिखाया था जो वो करना चाहती थी। वह पूरी तरह से सफल हुई थी। जैसे किसी युग में स्वर्ग की अप्सरा ‘मेनका’ ने अपने हुस्न के तिलिस्म से तपस्वी विश्वामित्र की सदियों की तपस्या भंग कर दी थी… ठीक वैसे ही आज कामिनी के इस नंगेपन ने शमशेर जैसे घाघ और पत्थर दिल पुलिसवाले का सारा गुरूर चकनाचूर कर दिया था।

शमशेर कामिनी की गांड की तरफ खिंचा चला जा रहा था, बल्कि कामिनी के हुस्न का गुलाम बन चुका था।
शमशेर से अब एक पल भी और दूर नहीं रहा गया।

वह पलंग पर घुटनों के बल रेंगता हुआ, किसी भूखे भेडिये की तरह कामिनी के बिल्कुल पीछे आ पहुँचा। शमशेर के भारी जिस्म की गर्मी और उसकी वो शराब से सनी हुई गर्म साँसें कामिनी को अपनी नंगी पीठ पर महसूस होने लगीं।

शमशेर का लंड कामिनी की गांड की दरार से लगभग सट गया। उसका वहसी नसो से भरा लंड कामिनी की पीठ और गांड की उस गहरी दरार को छूने लगी, रेंगने लगा, जैसे सांप अपने बिल का रास्ता ढूंढ़ रहा हो.

“आअह्ह्ह.. इस्स्स…..”
लोहे जैसे सख्त और गरम लंड को महसूस करते ही कामिनी के मुँह से एक गहरी, कांपती हुई सिसकी निकल गई।
कामिनी ने आने वाले उस खौफनाक पल की प्रतीक्षा में अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसने अपनी गांड हलकe से उठाया दिया, उसे अपनी चुत देखने का पूरा मौका दिया, ताकि शमशेर उसकी चुत मे समा सके.

उसके दोनों हाथों ने रमेश के सीने के पास पड़ी बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में पूरी ताकत से जकड़ लिया। उसकी रगों में खून किसी तूफ़ान की तरह दौड़ने लगा.
नीचे उसका पति रमेश बेसुध पड़ा था, और ठीक उसके पीछे शमशेर एक खूंखार साये की तरह उस पर छा चुका था।

कमरे की दूधिया रौशनी अब कामिनी को किसी भट्टी की तरह चुभ रही थी।

जैसे ही शमशेर के जिस्म की वो धधकती हुई ‘आग’, उसका लंड कामिनी की गांड से टकराया, उसके मुँह से एक कांपती हुई, बेबस सिसकी निकल गई। वह तपती हुई छुअन इतनी जानलेवा थी कि कामिनी के रोंगटे एक झटके में खड़े हो गए।

शमशेर ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। एक मंझे हुए शिकारी की तरह, उसने अपने दोनों चौड़े और खुरदरे हाथ आगे बढ़ाए और कामिनी की उस गोरी, पसीने से चमकती हुई गांड को दोनों तरफ से कसकर अपनी मुट्ठियों में जकड़ लिया।

शमशेर की उंगलियां कामिनी की कमर के मांस में धंसने लगीं। वह कामिनी को अपने और करीब खींच रहा था, ताकि दोनों के नंगे जिस्मों के बीच हवा गुज़रने की भी कोई जगह न बचे।

पीछे से शमशेर का वो सख्त, फौलादी और आग उगलता हुआ लंड कामिनी की गांड की उस गहरी, कामरस से भीगी हुई दरार पर पूरी तरह से टिका हुआ था। वह अंदर जाने के लिए बेताब था, फड़फड़ा रहा था, लेकिन शमशेर ने उसे वहीं रोक रखा था।

यह ‘इंतज़ार’ (Anticipation)… यह एक-एक सेकंड का फासला कामिनी के दिमाग की नसें फाड़ रहा था।
वह जानती थी कि अगले ही पल क्या होने वाला है। वह जानती थी कि यह इंसान उसके जिस्म को किस कदर चीरने वाला है।

उसने अपना चेहरा कामिनी के कान के बिल्कुल करीब लाया और एक बहुत ही भारी, कांपती हुई और वहशी आवाज़ में फुसफुसाया
“तैयार हो जाओ भाभीजी… जो रमेश ना दे सका उसका दोस्त होने के नाते मेरा फर्ज़ बन गया है, की वो सुख आपको मिले…”

कामिनी का पूरा गोरा, गदराया हुआ जिस्म किसी सूखे पत्ते की तरह कांपने लगा। चादर में दबी उसकी मुट्ठियां और भी कस गईं। उसने आने वाले उस खौफनाक ‘प्रहार’ के लिए अपने पूरे बदन को ढीला छोड़ दिया और अपनी आँखें हमेशा के लिए मींच लीं…
*********************

शमशेर की वो गर्म, वहशी फुसफुसाहट कामिनी के कान में घुसते ही उसके पूरे जिस्म में एक बिजली सी दौड़ गई।
“तैयार हो जाओ भाभीजी…

कामिनी की साँसें एक पल के लिए थम सी गईं। उसकी आँखें कसकर बंद थीं। दोनों मुट्ठियाँ रमेश की चादर को इतनी ज़ोर से नोच रही थीं कि नाखून चादर के अंदर तक धंस गए थे। नीचे रमेश बेसुध पड़ा था, उसकी छाती पर कामिनी का भारी, पसीने से तर बदन लहरा रहा था। लेकिन कामिनी का पूरा ध्यान, उसकी सारी रूह… पीछे गांड के छेद पर टिकी हुई थी।

शमशेर ने एक गहरी, भूखी साँस ली। उसका चौड़ा, काला, नसों से पटा हुआ 8 इंच का लंड कामिनी की गांड की गहरी दरार में बिल्कुल सटकर फड़फड़ा रहा था। लंड की गरमाई, उसकी नब्ज़, उसकी कठोरता… कामिनी हर चीज़ महसूस कर रही थी। शमशेर ने अपना दाहिना हाथ कामिनी की कमर से हटाया, थूक की एक मोटी लार अपने लंड के मुंडके पर थूकी और धीरे-धीरे उसे फैलाने लगा।

“स्लर्प… स्लर्प…”

लार की चिकनाई लंड पर चमकने लगी। फिर शमशेर ने लंड का सिरा कामिनी की गांड की दरार में ऊपर-नीचे रगड़ना शुरू कर दिया।बहुत ही धीरे… बहुत ही सुस्त… जैसे बकरी काटने से पहले चाकू मे धार लगा रहा हो.

कामिनी की गांड के दोनों भारी, गोरे पल्ले थर-थर काँप रहे थे। हर बार जब शमशेर का गरम मुंडका उसके कसे हुए, गुलाबी गांड-छेद को छूता, कामिनी का पूरा बदन सिहर जाता।
“इस्स्स्स… उफ्फ्फ…”
एक बहुत ही धीमी, दबी हुई सिसकी उसके होंठों से फिसल गई।

शमशेर मुस्कुराया। उसने लंड का सिरा ठीक उसी छेद पर टिका दिया। हल्का-हल्का दबाव डाला। बस सिरा ही… बस थोड़ा सा।

कामिनी की गांड का छेद पहले तो कसकर बंद हो गया, जैसे कोई डरी हुई छोटी सी लड़की राक्षस देख कर दरवाज़ा बंद कर ले। लेकिन शमशेर रुका नहीं। उसने अपनी कमर को सिर्फ़ एक इंच आगे किया।

“आआआह्ह्ह्ह्ह…!! पूककक….. पचमममममम…”

कामिनी की आँखें चौड़ी हो गईं। दर्द… एक तीखा, जलता हुआ दर्द। जैसे कोई मोटा, गरम लोहे का सलाख उसके अंदर घुस रहा हो। उसका sphincter पहले तो पूरी ताकत से विरोध कर रहा था, लेकिन शमशेर का मुंडका इतना मोटा, इतना कठोर था कि धीरे-धीरे… बहुत धीरे-धीरे… वह अंदर सरकने लगा।

“स्लो… स्लो… बस थोड़ा सा भाभीजी… बस गया ही समझो…” शमशेर की आवाज़ में शैतानी मिठास थी।

कामिनी के मुँह से लगातार सिसकियाँ निकल रही थीं—
“उफ्फ्फ… मम्म… आह्ह… धीरे… प्लीज़… धीरे… उइइइइ…मै मर जाउंगी ”

हर इंच के साथ उसकी गांड फैल रही थी। वह मोटा, काला लंड उसके अंदर घुसता जा रहा था। दर्द के साथ-साथ एक अजीब सी भराई… एक अजीब सी तृप्ति भी महसूस हो रही थी।
सुबह से जो खालीपन कादर के जाने के बाद उसके अंदर था, वह अब भर रहा था… लेकिन कहीं ज़्यादा गहराई से, कहीं ज़्यादा बेशर्मी से।

शमशेर ने एक पल रुककर कामिनी की कमर सहलाई।
“देख बे रमेश ऐसे मारते है औरतों की गांड प्यार से,”
सामने से रमेश का कोई रिस्पांस नहीं था, बस नशे मे सर हिला कर वापस ढह गया, हालांकि उसने कोशिश की सर उठाया के देख ले, लेकिन सब नाकाम… शराब ने उसे अपाहिज बना दिया था.

शमशेर ने फिर से दबाव डाला।

अब आधा लंड अंदर था। कामिनी की आँखों से आँसू बहने लगे, नहीं नहीं दर्द के नहीं, जिस्मानी दर्द की तो वो आदि हो चुकी थी, रमेश लगभग हर रात ही उसे मारता पीटता था, परन्तु उस अजीब से सुख की।
इतने बरसो की मार पिट का अंजाम था की कमीनी को इस दर्द मे सुख मिल रहा था, उत्तेजना का अहसास हो रहा था.

उसकी गांड अब पूरी तरह फैल चुकी थी। शमशेर का लंड उसके अंदर धड़क रहा था। हर धड़कन के साथ कामिनी को लग रहा था जैसे उसके अंदर कोई ज्वालामुखी फटने वाला हो।

“अब… पूरा… ले लो…” शमशेर ने फुसफुसाया।

और फिर… एक ही धीमा, लेकिन अटल झटका।

“धप्प…!”

“आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह…!! मम्मा… मर गई… उफ्फ्फ्फ्फ…!!”
हालांकि रमेश ने ये काम बड़े ही इत्मीनाना से किया था.

फिर भी कामिनी का पूरा बदन एक झटके से तन गया। शमशेर का पूरा 8 इंच का फौलादी लंड एक ही बार में उसके गांड के सबसे गहरे हिस्से तक उतर गया था।

उसकी गांड के दोनों पल्ले अब पूरी तरह शमशेर की जांघों से चिपक गए थे। कामिनी की सांसें फूल रही थीं। उसकी गोरी पीठ पसीने से लथपथ थी। बाल बिखरे हुए थे।

शमशेर ने दोनों हाथों से कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और धीरे-धीरे अपनी कमर पीछे खींची…
कामिनी को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका पेट ही बहार को खिंच रहा हो,
पूररररर….. पचंम्म्म्म….. अंदर की हवा लंड के साथ खिंच के बहार आने लगी.

तभी… धप…. फाट….फिर वापस अंदर…पीरा जड़ तक अंदर, शमशेर के टट्टे कमीनी की गीली चुत से टकरा गए,

“चुप… चुप… चुप…”
शमशेर ने धीमे धीमे धक्के शुरू कर दिए.
धीमे, गहरे, लयबद्ध धक्के। .

हर धक्के के साथ कामिनी की भारी गांड हिलती। दोनों पल्ले आपस में टकराते, फिर अलग होते। चिकनाई, लार और कामिनी के अपने रस की वजह से आवाज़ें बहुत ही गंदी और मादक हो रही थीं।

“प्लप… प्लप… प्लप…”

कामिनी अब पूरी तरह टूट चुकी थी। दर्द अब सुख में बदल चुका था। वह खुद अपनी कमर हिलाने लगी, पीछे की तरफ धकेलने लगी, जैसे शमशेर के लंड को और गहरा चूसना चाहती हो।

“हाँ… हाँ… और… उफ्फ्फ… और गहरा… आह्ह्ह… शमशेर… तुम… तुम… बहुत… बहुत मोटा है… उइइइइ…”

रमेश नीचे बिल्कुल बेसुध था। उसकी छाती पर कामिनी का बदन बार-बार पटक रहा था। उसकी चुत से बहता कामरस रमेश की जांघों पर टपक रहा था। लेकिन कामिनी को अब रमेश की कोई परवाह नहीं थी।

वह पूरी तरह शमशेर की थी।
उसकी गांड पूरी तरह शमशेर के लंड की गुलाम बन चुकी थी।

शमशेर ने अब रफ़्तार थोड़ी बढ़ाई। लेकिन अभी भी हर धक्के को महसूस कराते हुए। वह हर बार पूरा लंड बाहर निकालता, मुंडके तक… फिर एक ही जोरदार लेकिन धीमा धक्का मार के अंदर कर देता।
थाप… ठप… की कामुक आवाज़ से कमरा गूंज उठता.
आआआहहहह…. आउच…. कामिनी अपनी चुत पर पढ़ते भारी टट्टो को महसूस कर के चीख उठती.

कामिनी की गांड अब पूरी तरह खुल चुकी थी। हर बार लंड बाहर निकलते ही उसका छेद थोड़ा सा खुला रह जाता, फिर वापस कस जाता। यह नज़ारा शमशेर को पागल कर रहा था।

“देख रमेश क्या गांड है तेरी बीवी की…..कितनी टाइट… कितनी भूखी है, मेरा लंड खा रही हैं..”
शमशेर कामिनी ओर ज्यादा उकसा रहा था.
जिसका असर कामिनी के चेहरे पे साफ दिख रहा रहा, वो अपने नीचे पड़े रमेश के चेहरे को हिकारात से देख रही थी, जो उसे करना चाहिए था वो उसका दोस्त कर रहा था.

कामिनी सिर्फ सिर हिला रही थी। बोलने की हिम्मत नहीं थी। बस सिसकियाँ निकल रही थीं
“हाँ… हाँ… तुम… तुम सबसे बड़े… सबसे मोटे… आह्ह्ह… फाड़ दो… फाड़ दो मेरी गांड… उफ्फ्फ…”

शमशेर ने एक हाथ आगे बढ़ाकर कामिनी के बाल पकड़ लिए। हल्का सा खींचा। कामिनी का सिर पीछे झुक गया। उसकी आँखें आधी खुलीं। मुँह खुला। लार टपक रही थी।

और धक्के जारी रहे… धीमे… गहरे… लगातार…

कामिनी की गांड अब पूरी तरह शमशेर के लंड की आदी हो चुकी थी। हर धक्के के साथ वह खुद पीछे धकेल रही थी। उसकी भारी गांड शमशेर की जांघों से टकरा-टकरा कर लाल हो रही थी।

“प्लप… प्लप… प्लप… चुप… चुप…”

कमरे में सिर्फ यही आवाज़ें गूंज रही थीं।
रमेश की बेसुध साँसें… कामिनी की तड़पती सिसकियाँ… और शमशेर की भारी, विजयी हुंकार…
धड… धड…. ठप.. ठप…. चप… चप….

शमशेर अब पूरी तरह कामिनी के ऊपर सवार हो चुका था।
उसका भारी, पसीने से तर बदन कामिनी की पीठ से चिपका हुआ था। उसकी चौड़ी छाती कामिनी की पीठ को दबाए हुए थी। दोनों हाथों से उसने कामिनी की कमर को कसकर जकड़ रखा था, जैसे कोई जंगली जानवर अपनी मादा को पकड़े हो। उसका 8 इंच का काला, नसों वाला लंड कामिनी की गांड के अंदर पूरी तरह समाया हुआ था—गहरे तक, जड़ तक।

“पचा… पच… पचा… पच…!”

हर धक्के के साथ शमशेर की मोटी, बालों वाली जांघें कामिनी की गोरी, भारी गांड से टकरा रही थीं। वह आवाज़… वह मधुर, कामुक संगीत… कमरे की हवा में गूंज रही थी। गांड के मांस का वह नरम-गरम टकराव, पसीने की चिकनाई, कामरस की फिसलन… सब मिलकर एक ऐसी धुन बना रहा था जो किसी चुदाई के राग की तरह थी।
“इसे ही कहते है चुदाई की धुन ”
इसे वही औरत समझ सकती है, जिसने ऐसी चुदाई झेली हो.
कामिनी आज नया म्यूजिक सीख रही थी.

कामिनी का पूरा जिस्म थर-थर काँप रहा था।
आज उसने वो अहसास महसूस किया जो कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
गांड चुदाई का आनंद… अलग ही था।
हर धक्के के साथ पूरा जिस्म हिल रहा था। रोम-रोम खड़ा हो गया था। उसकी उँगलियाँ चादर नोच रही थीं। उसके भारी स्तन रमेश की छाती पर रगड़ खा रहे थे। उसकी चुत… जो अभी भी खाली थी, प्यास से तड़प रही थी… लेकिन बोल नहीं पा रही थी।

“आअह्ह्ह्ह… हाह्ह्ह… उउफ्फ्फ्फ… जोर से… आह्ह्ह… और अंदर…!”

कामिनी खुद अपनी गांड पीछे ले जा रही थी।
हर बार जब शमशेर पीछे खींचता, कामिनी अपनी कमर उठाकर गांड पीछे धकेल देती। जैसे उसका लंड और गहरा उतर जाए। उसकी आँखें आधी बंद थीं। मुँह खुला था। लार टपक रही थी। सिर पीछे झुका हुआ था।

शमशेर ने रफ्तार बढ़ाई… लेकिन अभी भी धीमी… अभी भी गहरी… अभी भी एक एक इंच महसूस कराते हुए।
वह पूरा लंड बाहर निकालता—सिर्फ मुंडका अंदर रहता फिर एक जोरदार, लेकिन सुस्त धक्का। पूरा 8 इंच एक ही बार में अंदर।

“पचाक्क… पचाक्क… पचाक्क…!”

कामिनी की गांड अब पूरी तरह लाल हो चुकी थी। दोनों गोल पल्ले हर टकराव के साथ हिलते, लहराते। शमशेर का लंड अंदर-बाहर होते ही उसका गांड-छेद थोड़ा खुलता, फिर कस जाता। वह दृश्य शमशेर को पागल कर रहा था।

कामिनी के दिमाग में एक ही ख्याल घूम रहा था—
“चुत… मेरी चुत भी… प्लीज… कोई मेरी चुत भी तो मारे… इतनी प्यासी है… इतनी गीली है… लेकिन… आह्ह्ह… बोल नहीं सकती… उफ्फ्फ… बस आहें ही निकल रही हैं…”

वह बोलना चाहती थी, चीखना चाहती थी,
“शमशेर… मेरी चुत में भी डाल दो… लंड ना सही उंगलियां ही डाल दो… ये खालीपन… सहन नहीं हो रहा…”
लेकिन उसके मुँह से सिर्फ सिसकियाँ निकल रही थीं।

“आआह्ह्ह… हाँ… हाँ… और… और जोर से… उइइइइ… फाड़ दो… मेरी गांड फाड़ दो… आह्ह्ह्ह!”

शमशेर ने एक हाथ आगे बढ़ाया और कामिनी के बाल पकड़कर हल्का सा खींचा। दूसरा हाथ उसकी कमर से हटाकर आगे आया और उसके एक स्तन को बेदर्दी से मसलने लगा। निप्पल को उँगलियों में दबाया, खींचा।

कामिनी की चुत अब बेकाबू हो रही थी।
हर गांड-धक्के के साथ उसकी चुत फड़क रही थी। कामरस की बूँदें रमेश की जांघों पर टपक रही थीं। वह चाहती थी कि शमशेर का हाथ नीचे आए… उसकी चुत को सहलाए… उँगलियाँ अंदर डाले… लेकिन शमशेर जानबूझकर सिर्फ गांड पर ही ध्यान दे रहा था।

रफ्तार अब तेज़ हो गई थी।
“पच… पच… पच… पचा… पचाक्क…!”

शमशेर पूरी ताकत से ठोक रहा था। उसका पसीना कामिनी की पीठ पर गिर रहा था। उसका साँस कामिनी के कान में गरम हवा की तरह फूँक मार रहा था।

“ले रंडी… ले पूरा लंड खा जा… कितनी टाइट है तेरी… कितनी भूखी है… कादर ने भी इतनी नहीं चोदी होगी ना… बोल… बोल ना… रंडी ?”
शमशेर उत्तेजन मे गुर्रा रहा था, दाँत भींच कर लंड को पूरी ताकत से अंदर मार रहा था.

कामिनी सिर्फ सिर हिला रही थी। बोलने की शक्ति नहीं बची थी। उसका पूरा जिस्म अब चरम सीमा पर था।
गांड के अंदर शमशेर का लंड बार-बार प्रोस्टेट के पास टकरा रहा था। हर टकराव के साथ उसके जिस्म में बिजली दौड़ रही थी। उसकी चुत बिना छुए ही सिकुड़-फैल रही थी।

शमशेर का 8 इंच का काला, नसों वाला लंड कामिनी की गांड के सबसे गहरे हिस्से तक धँसा हुआ था। हर धक्के के साथ लंड की जड़ तक की मोटाई कामिनी की गांड को फैला रही थी, और उसकी चुत के अंदर से एक-एक ठोकर महसूस हो रही थी। जैसे कोई अंदर से उसकी चुत को मुक्के मार रहा हो।

“पचाक्क… पचाक्क… पचाक्क…!”

कामिनी की गोरी, भारी गांड अब पूरी तरह लाल हो चुकी थी। दोनों पल्ले शमशेर की जांघों से बार-बार टकराने की वजह से चमकदार लाल रंग के हो गए थे। शमशेर लगातार रगड़ रहा था, रोंद रहा था। बाहर निकालता, फिर पूरी ताकत से अंदर ठोंकता। उसके मोटे टट्टे हर बार कामिनी की सूजी हुई, गीली चुत पर सीधे चटाक-चटाक टकरा रही थीं।

“धड़… धड़… पाव्ह… पच… पचाक्क…!”

कामिनी का पूरा जिस्म हिल रहा था। उसके भारी स्तन रमेश की छाती पर रगड़ खा रहे थे। उसकी आँखें आधी बंद। मुँह खुला। लार टपक रही थी।
हर धक्के के साथ उसकी चुत के अंदर से एक अजीब सी ठोकर लग रही थी। गांड के अंदर लंड की मोटी जड़ चुत की दीवार को दबा रही थी, सहला रही थी। कामिनी की चुत बिना छुए ही पागल हो रही थी।

“आह्ह्ह… आह्ह्ह… उफ्फ्फ… अंदर… बहुत अंदर… आह्ह्ह… मेरी चुत… मेरी चुत भी… उइइइइ…”

वह बोल नहीं पा रही थी। सिर्फ आहें निकल रही थीं। लेकिन अंदर से उसकी चुत चिल्ला रही थी—
“प्यासी हूँ… भर दो… लेकिन… आह्ह्ह… बोल नहीं सकती…”

अचानक कामिनी का पूरा बदन तन गया।
उसकी गांड शमशेर के लंड को जकड़ ली। उसकी चुत सिकुड़ी… फिर फैली… और फिर…

“आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह… मम्मा…!!”

एक जोरदार झटके के साथ कामिनी झड़ गई।
उसकी चुत से पेशाब की एक गरम धार फूट पड़ी। वह बर्दाश्त नहीं कर सकी। पेशाब और कामरस मिलकर रमेश की जांघों पर, चादर पर फव्वारे की तरह छूटने लगा।“फुश्श्श… फुश्श्श…”

कामिनी की आँखें उलट गईं। उसका पूरा जिस्म काँप रहा था। गांड के अंदर शमशेर का लंड अभी भी ठोक रहा था, और हर ठोकर के साथ उसकी चुत और ज़ोर से फड़क रही थी।

लेकिन शमशेर नहीं रुका।
वह और ज़ोर से पेलने लगा। तीन मिनट… लगातार… बिना रुके… बिना साँस लिए।

“धड़धड़धड़… पचाक्क… पचाक्क… फच… फच… फाचक…!”
हर धक्के के साथ उसकी गांड हिल रही थी, लहरा रही थी। शमशेर का पसीना उसकी पीठ पर बह रहा था। उसकी साँसें कामिनी के कान में गरम हवा की तरह फूँक मार रही थीं।

कामिनी लगातार सिसक रही थी—
“आह्ह्ह… नहीं… और… उफ्फ्फ… फाड़ दो… आह्ह्ह… मैं… मर रही हूँ… आह्ह्ह्ह…”

तीन मिनट बाद शमशेर की रफ्तार और तेज़ हो गई।
उसने कामिनी की कमर को और कसकर पकड़ा। आखिरी 10-12 धक्के… पूरी ताकत से… गहरे तक…

“फच… फच… फाचक… फाचक… फााााचक्…!!”

और फिर… गहरे तक अंदर घुसकर रुक गया।
शमशेर का गाढ़ा, गरम, मोटा वीर्य कामिनी की गांड की सबसे गहराई में, आंतों तक छूटने लगा।
“उफ्फ्फ्फ… ले रंडी… ले मेरा पूरा माल… भर ले अपनी गांड मे … पी ले मेरे रस को…!”

कामिनी को लगा जैसे उसके अंदर गर्म लावा बह रहा हो।
उसकी आंतों की गहराइयों में वह जलता हुआ, चिपचिपा वीर्य फैल रहा था। गर्मी… भयानक गर्मी… हर जगह फैलती जा रही थी।

“अअअअअअअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह…!!!!”

कामिनी ने एक जोरदार, लंबी चीख मारी।
उसकी आँखें बंद हो गईं। पूरा जिस्म रमेश के ऊपर निढाल होकर गिर गया। उसके हाथ ढीले पड़ गए। सिर रमेश की गर्दन में छिप गया।

लेकिन वीर्य की उस गर्मी ने फिर से उसकी चुत को झकझोर दिया।
कामिनी एक बार फिर झड़ गई।
इस बार और ज़ोर से। उसकी चुत से कामरस और पेशाब का एक मोटा फव्वारा छूटा। “फुश्श्श्श… फुश्श्श्श…!”
चादर पूरी तरह भीग गई। रमेश की जांघें, पेट… सब तर हो गया। कामिनी का बदन लगातार काँप रहा था। उसकी गांड अभी भी शमशेर के लंड को चूस रही थी, हर स्पास्म के साथ और वीर्य अंदर खींच रही थी।

दोनों का बदन एक साथ थर-थर काँप रहा था।
कमरे में सिर्फ उनकी भारी साँसें और चादर पर टपकते रस की आवाज़ गूंज रही थी।

कामिनी की आँखें बंद थीं। चेहरा आनंद और थकान से लाल।
उसकी गांड अभी भी शमशेर के लंड से भरी हुई थी… और उसकी चुत… अब पूरी तरह संतुष्ट… लेकिन अभी भी हल्के-हल्के फड़क रही थी।

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