कामिनी मेरी माँ मादक जिस्म की मालकिन 10

नंगा बदन

शमशेर का भारी, पसीने से तर बदन अभी भी कामिनी की पीठ से पूरी तरह चिपका हुआ था।
उसका 8 इंच का काला, नसों वाला लंड कामिनी की गांड के सबसे गहरे हिस्से में जड़ तक धँसा हुआ था, पूरी तरह अंदर, अभी भी धड़क रहा था। दोनों के साँसें एक साथ चल रही थीं। कमरे में सिर्फ उनकी भारी हाँफ और चादर पर टपकते रस की ‘टप… टप…’ की आवाज़ गूंज रही थी।

कामिनी रमेश की छाती पर बिल्कुल लेटी हुई थी।
उसका पूरा गोरा, गदराया बदन थकान और आनंद से निढाल पड़ा था। उसके भारी स्तन रमेश की छाती पर दबे हुए थे। बाल बिखरे हुए रमेश के चेहरे पर गिर रहे थे। लेकिन उसका ध्यान… उसकी सारी रूह… सिर्फ पीछे थी।

उसकी गांड अंदर से बार-बार संकुचित हो रही थी।
जैसे कोई भूखी, प्यासी मुंह वाली मछली शमशेर के लंड को चूस रही हो। हर संकुचन के साथ उसकी गांड की दीवारें लंड को जकड़ लेतीं, फिर हल्का छोड़तीं। शमशेर का गाढ़ा वीर्य अंदर ही अंदर फैला हुआ था, गरम, चिपचिपा, भारी। हर बार जब कामिनी की गांड सिकुड़ती, एक-एक बूँद को अंदर खींच लेती।

“हम्म्म्म… उफ्फ्फ…”
कामिनी की आँखें आधी बंद थीं। होंठों से सिर्फ दबी हुई सिसकियाँ निकल रही थीं। उसका गुदा द्वार अभी भी पूरी तरह फैला हुआ था, लंड को अपने अंदर समेटे हुए।

थोड़ी देर बाद… शमशेर का जिस्म हिला।
उसने अपनी कमर को हल्का सा पीछे खींचा।

“आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ब्ब्ब्ब्… उउउउफ्फ्फ्फ्फ्फ़्फ़्…!!”

कामिनी की चीख फुट पड़ी।
उसे लगा जैसे उसका पूरा गुदा द्वार उलटकर बाहर आ जाएगा। शमशेर का मोटा लंड अभी भी अंदर था, जब वह बाहर खींचा, कामिनी की गांड भी उसके साथ बाहर को खिंचने लगी। गोरे, लाल, सूजे हुए पल्ले बाहर की तरफ मुड़ने लगे।

“पुककक… प्लम्ब्ब्ब्…!!”

एक जोरदार, गीला, चिपचिपा झटका।
शमशेर का पूरा लंड एक ही बार में बाहर निकल आया।
और उसी पल… कामिनी की गांड से वीर्य की भारी, गाढ़ी धारा भलभला कर बाहर निकलने लगी।

“फ़फ़फ़फ़ऊऊऊरररररर… पच… पच… फुश्श्श…”

सफेद, गाढ़ा, गरम वीर्य उसकी गांड से फव्वारे की तरह छलक उठा। हवा के साथ मिलकर ‘फुर्र्र…’ की आवाज़ आई। कुछ बूँदें रमेश की जांघों पर गिर गईं, कुछ चादर पर फैल गईं। कामिनी की गांड का छेद अब पूरी तरह खुला था, एक बड़ा, गुलाबी, लाल, वीर्य से सना हुआ गड्ढा जो अभी भी हल्का-हल्का सिकुड़-फैल रहा था।

“हह्म्म्म्म्म्म… उउउफ्फ्फ्फ्…!!”

कामिनी की जान में जान आई।

एक लंबी, राहत भरी सांस निकली। उसका पूरा बदन ढीला पड़ गया। गांड से निकलते वीर्य की गर्मी अभी भी अंदर महसूस हो रही थी, लेकिन अब बाहर का ठंडा स्पर्श… उसे अजीब सा सुकून दे रहा था।

शमशेर बिना कुछ बोले उठ खड़ा हुआ।
उसका लंड अभी भी आधा खड़ा था, वीर्य और कामिनी के रस से चमक रहा था। उसने पैंट उठाई, जांघों पर चढ़ाई, बेल्ट कसी। फिर सिगरेट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट मुँह में दबाई, लाइटर जलाया।

‘क्लिक…’

सिगरेट जल गई। धुआँ छोड़ता हुआ वह बेडरूम के दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

फिर अचानक रुका।
पीछे मुड़ा।

उसके काले, शैतानी चेहरे पर एक बहुत ही वाहियात, नीच मुस्कान थी।

“भाभीजी… रमेश को बता देना कि उसकी बीवी कितनी गर्म है…”
“हाहाहाहाहाहा…!!”

वह खुलकर, घिनौने अंदाज़ में हँसा। हँसी की गूंज कमरे में गूँजी। फिर बिना रुके दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया।

‘धड़… धड़… धाड़…!’

बाहर पुलिस की बुलेट की स्टार्ट होने की आवाज़ आई।
इंजन गरजा। फिर धीरे-धीरे आवाज़ दूर होती चली गई… और पूरी तरह गायब हो गई।

कामिनी अकेली रह गई।

वह अभी भी रमेश की छाती पर लेटी हुई थी।
उसका नंगा, पसीने से तर, वीर्य और कामरस से सना बदन थकान से भरा हुआ था। गांड का छेद अभी भी खुला ही था जो की धीरे-धीरे सिकुड़ रहा था, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुआ था। उसमें से हल्की-हल्की वीर्य की बूँदें अभी भी रिस रही थीं।

उसके मन में दर्द था… ग्लानि थी… शर्म थी।
“मैं… मैं क्या कर गई… अपने पति के ऊपर… उसके दोस्त से… गांड मरवा ली… और वो भी इतनी बेशर्मी से…”

लेकिन इन सबके बीच… एक परम संतोष था।
एक अजीब सा, गहरा आनंद था।
जैसे उसकी आत्मा को आज पहली बार असली तृप्ति मिली हो।

उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होती चली गईं।
शरीर पूरी तरह ढीला पड़ गया।
गांड का खुला छेद अभी भी हल्का-हल्का फड़क रहा था… जैसे अभी भी शमशेर के लंड की याद में सांस ले रहा हो।

*******************

रात के उस भयंकर तूफ़ान के बाद की सुबह एकदम शांत और उजली थी।
कामिनी नहा-धोकर बेडरूम से बाहर निकली। उसके चेहरे पर एक अजीब सा नूर, एक ऐसी दमक (Glow) थी जो आज से पहले कभी नहीं देखी गई थी। उसके अंदर सालों से जो वासना का ज्वालामुखी सुलग रहा था, वो कल रात शमशेर ने अपनी हैवानियत से पूरी तरह बुझा दिया था।

आज उसके मन में कोई हवस, कोई आग नहीं थी… सिर्फ एक गहरी और ‘परम संतुष्टि’ थी।
लेकिन इस संतुष्टि की कीमत उसके जिस्म ने बहुत भारी चुकाई थी। कामिनी की चाल पूरी तरह से बिगड़ चुकी थी।
उससे ज़मीन पर ठीक से पैर नहीं रखा जा रहा था। उसकी जांघें, गांड और कमर इतनी बुरी तरह से सूज कर अकड़ चुके थे कि एक-एक कदम बढ़ाना उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था। वो बस यही चाहती थी कि आज दिन भर अपने बिस्तर पर निढाल पड़ी रहे और इस मीठे दर्द के साथ आराम करे।

डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लग चुका था।
सामने कुर्सी पर रमेश बैठा चाय सुड़क रहा था। साला एकदम चूतिया और बेखबर! रात भर जो शराब का तांडव उसने किया था, उसकी वजह से उसके दिमाग की स्लेट एकदम कोरी थी। उसे रत्ती भर भी याद नहीं था कि कल रात उसी की छाती पर उसकी बीवी ने शमशेर के साथ क्या-क्या ‘लीला’ रची थी।

कामिनी दर्द से कराहती हुई, बहुत ही आहिस्ता से डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर टिक कर बैठी। उससे सीधा बैठा भी नहीं जा रहा था। रमेश ने एक नज़र अपनी बीवी की उस लंगड़ाती चाल पर डाली, लेकिन अपने भारी सिरदर्द की वजह से उसने कुछ पूछने की ज़हमत नहीं उठाई।

कमरे में सिर्फ चाय की चुस्कियों और बर्तनों की खटपट की आवाज़ थी। सुबह के ठीक 8 बज रहे थे।
तभी… मेज़ पर रखा रमेश का मोबाइल वाइब्रेट करते हुए चीख उठा।
“ट्रिन…. ट्रिन….”
रमेश ने झुंझलाते हुए फोन की स्क्रीन की तरफ देखा। लेकिन स्क्रीन पर चमकता हुआ नाम देखते ही… रमेश बुरी तरह सकपका गया। उसके चेहरे की हवाइयां उड़ गईं।
स्क्रीन पर फ्लैश हो रहा था— “ताऊजी… किशनगंज”
किशनगंज से इस वक़्त फोन? रमेश का दिल किसी अनजाने डर से धड़क उठा। उसने कांपते हाथों से झट से फोन उठाया।
“ह… हेलो… हाँ… हेलो ताऊजी…”
रमेश की आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट थी। कामिनी भी अपना दर्द भूलकर रमेश के उतरे हुए चेहरे को देखने लगी।
सामने से एक बूढ़े आदमी के फूट-फूट कर रोने की आवाज़ आई। वो आवाज़ इतनी तेज़ थी कि कामिनी को भी हल्की-हल्की सुनाई दे रही थी।

“बिटवा… रमेश बिटवा… गज़ब हो गया रे… तेरी ताई मर गई रे…” यह सुनते ही रमेश के हाथ सुन्न पड़ गए। मोबाइल उसके पसीने से भीगे हाथों से फिसलते-फिसलते बचा। रमेश का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया, जैसे किसी ने उसके बदन का सारा खून निचोड़ लिया हो। उसकी आँखें नम हो गईं और होंठ कांपने लगे।

कामिनी और बंटी दोनों हैरानी से उसे देख रहे थे।
“मेरी ताईजी नहीं रहीं…” रमेश ने फ़ोन को डाइनिंग टेबल पर पटकते हुए कहा,

“हमें अभी निकलना होगा ”
बंटी, जो हमेशा से बहुत तेज़ दिमाग का था, उसने तुरंत सवाल किया, “ताईजी? पापा, आपने और दादाजी ने तो कभी नहीं बताया कि आपकी कोई ताईजी भी हैं। हम तो कभी उनसे मिले भी नहीं।”

रमेश ने एक गहरी सांस ली और अपनी नज़रों को चुराते हुए बोला, “बेटा… काम ही इतना रहता है। और वैसे भी रिश्तेदारों में रखा क्या है? साले सब पैसों के भूखे हैं, गिद्ध की तरह नोचने को तैयार रहते हैं। बस ये एक ताईजी ही थीं, जो पापा के जाने के बाद मेरी अपनी थीं। बहुत दूर, एकांत गांव में रहती थीं। तो कभी वहाँ जाने का मौका ही नहीं लगा”

रमेश वाक़ई दुखी लग रहा था। लेकिन इस दुख के पीछे एक बहुत बड़ा, काला और खौफनाक सच छुपा हुआ था।
सच ये था कि जिस ज़मीन और खेत पर रमेश ने कब्ज़ा जमाया था, हाँ, वही ‘किशनगंज’, जो रघु का पुश्तैनी गाँव था, वहाँ रघु की 5बीघा जमीन पर रमेश ने एक शानदार फार्महाउस खड़ा कर रखा था। वो फार्महाउस रमेश की काली कमाई, उसकी अय्याशियों का अड्डा और उसके काले कारनामों की सबसे बड़ी तिजोरी था।

उसके बाप की मौसी की बहन (वही तथाकथित ‘ताईजी’) बहुत गरीब और बेसहारा थीं। रमेश ने उनका फायदा उठाते हुए, उस फार्महाउस की देखरेख के लिए उन्हें वहीं रख छोड़ा था, ताकि गाँव वालों और दुनिया की नज़रों में कोई शक पैदा न हो और वो बेशकीमती संपत्ति उसके कब्ज़े में सुरक्षित रहे।

रमेश ने अभी भी अपनी बीवी और बेटे को अंधेरे में रखा हुआ था। उसने ये नहीं बताया था कि वो आलीशान फार्महाउस असल में उसी की ‘बेनामी’ संपत्ति है।

लेकिन बंटी… बंटी का राडार बहुत तेज़ था।
जैसे ही रमेश के मुँह से जगह का नाम ‘किशनगंज’ निकला, बंटी के कान खड़े हो गए। किशनगंज… रघु का गाँव? मौका बड़ा अजीब था, ये मात्र संयोग तो नहीं हो सकता?
बंटी का दिमाग़ कुलबुलाने लगा, किशनगंज तो जाना ही होगा।
कामिनी ने आनाकानी शुरू कर दी। “कहाँ अचानक से रिश्तेदार निकाल लिए और वहाँ जाने को बोल रहे हो? मेरी तबीयत भी कुछ ठीक नहीं लग रही…” उसके जिस्म का निचला हिस्सा अभी भी उस भयंकर दर्द और सूजन से जूझ रहा था, ऐसे में गाँव का लंबा सफर करना उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था।

“कभी तो अपने पति का साथ दिया कर ” रमेश ने जहर बुझी आँखों से कामिनी को देखा.
“मै तैयारी करता हूँ ” रमेश मोबइल उठाया कर नंबर दर्ज करने लगा.

“माँ, चलते हैं ना। इतने दिनों से घर में ही हो, कुछ दिन का चेंज मिल जाएगा। और पापा को भी इस वक़्त हमारे सपोर्ट की ज़रूरत है।” बेटे की इस बात के आगे कामिनी को झुकना ही पड़ा।
रमेश जो भी था, था तो उसका पति ही, उसके दुख मे साथ देना ही पत्नी का कर्तव्य होता है.
कामिनी को अपनी सोच पर निराशा हुआ, वो अपने सुख के लिए पत्नीव्रता धर्म त्याग रही थी.

बंटी ने उसका नारित्व, उसका संस्कारी पत्निव्रता रूप कायम रखा.

कोई एक घंटे मे सारी तैयारी हो गई, घर के बहत एक टैक्सी आ कर खड़ी थी.
बंटी ने एक, दो बैग लोड किये.
रमेश ड्राइवर के साथ आगे बैठ गया, पीछे बंटी और कामिनी.

टैक्सी चल पड़ी… हर झटके के साथ कामिनी की जांघों और कमर में एक चुभन सी हो रही थी। वो खिड़की के बहार पीछे छूटता अपना शहर, अपना घर देख रही थी, अभी तो उसने जीवन जीना सीखा था,

अब अचानक से आने वाला वो अनजान गाँव… उसे नहीं पता था कि किशनगंज की वो ज़मीन उसके लिए कौन सा नया तिलिस्म लेकर खड़ी है।

टैक्सी जब हाइवे पर रफ़्तार पकड़ चुकी थी, तब रमेश ने पीछे मुड़ बंटी को देखा आज वो एक ‘बाप’ के मोह में थोड़ा भावुक हो रहा था। अपनी उस छिपी हुई रियासत की तरफ बढ़ते हुए, उसकी दबी हुई इच्छा जुबां पर आ ही गई।

“किशनगंज पहुँच कर उसे अपना ही घर समझना, बेटा बंटी…” रमेश ने बहुत ही गर्व और रहस्यमयी अंदाज़ में मुस्कुराते हुए कहा, “समझो… सब तुम्हारा ही है।”
रमेश ने साफ-साफ तो नहीं बोला कि वो काली कमाई और कब्ज़े से बनाई गई संपत्ति उसी की है, और उसके बाद बंटी की होगी। लेकिन बंटी की तेज़ आँखों ने अपने बाप के उस घमंड और राज़ को बहुत बारीकी से पढ़ लिया था।

किशनगंज का वो फार्महाउस अब कई नए चेहरों, दबे हुए राज़ों और हवस के एक बिलकुल नए अध्याय का गवाह बनने वाला था।
टैक्सी दौड़ रही थी…
पीछे मिल के पत्थर पर लिखा था….

किशनगंज
100km
*******************

शहर की दौड़-भाग के बीच पुलिस कमिश्नर का आलीशान और ठंडा ऑफिस एकदम शांत था। टेबल पर रखी फाइलें शहर के बढ़ते क्राइम का सबूत थीं।
तभी… डेस्क पर रखे लैंडलाइन की घंटी ने सन्नाटा चीर दिया।
“ट्रिन… ट्रिन…”
कमिश्नर विक्रम ने अपनी भारी उंगलियों से रिसीवर उठाया।
“हाँ, विक्रम स्पीकिंग…”
दूसरी तरफ से पुलिस के एक बहुत ही खास और गुप्त खबरी की कांपती हुई आवाज़ आई।
“साब… एक बहुत बड़ी खबर है। सुना है किशनगंज के इलाके में कोई नया और खतरनाक गैंग पनप रहा है जो ड्रग्स की बहुत बड़ी सप्लाई कर रहा है। वो साले लोकल किसानों को डरा-धमका कर उनके खेतों के बीच में बिना परमिशन अफीम (Opium) की खेती करवा रहे हैं… मामला बहुत बड़ा है साब!”
यह सुनते ही कमिश्नर विक्रम का चेहरा गुस्से से लाल सुर्ख हो गया। उसकी कनपटी की नसें तन गईं।
उसने रिसीवर को पूरी ताकत से टेबल पर दे मारा— “ठहाक्क!”
प्लास्टिक का रिसीवर चटक गया।
“साले ये ड्रग माफिया शहर में कुकुरमुत्ते की तरह पनप रहे हैं!” विक्रम गुर्राया। उसने अपनी जेब से सिगरेट निकाली, उसे सुलगाया और खिड़की के बाहर देखते हुए धुएं का एक गहरा छल्ला छोड़ा। किशनगंज… यह नाम अब विक्रम की हिट-लिस्ट में सबसे ऊपर आ चुका था।

वही कहीं किसी गुप्त स्थान पर
शहर के एक पुराने, जंग खाए पब्लिक टेलीफोन बूथ पर दो टूटे-फूटे, शराबी किस्म के लड़के रिसीवर पकड़े खड़े थे। उनके चेहरों पर चोट के पुराने निशान थे और आँखों में एक अजीब सी सनक।

“बड़ा भाई… मैं… लकी…!” फोन पकड़े हुए लड़के ने हड़बड़ाहट में कहा।
तभी पीछे से किसी कार्टून जैसी, चिढ़ाने वाली आवाज़ आई— “अबे… मैं भी तो हूँ, बता ना… बड़ा भाई मैं बिट्टू… हीहीही…”
फोन के दूसरी तरफ… शहर के एक अनजान, घुटन भरे और अँधेरे कमरे में कोई बैठा था। कमरे में सिर्फ सिगरेट का धुआँ उड़ रहा था और एक बहुत ही खौफनाक, भारी वजूद कुर्सी पर टिका था।

“ज़िंदा हो… अभी भी तुम लोग?” ‘बड़ा भाई’ की वो कर्कश और रूह कंपा देने वाली आवाज़ फोन के स्पीकर से गूंजी। इस आवाज़ में कोई भावना नहीं थी, सिर्फ मौत की ठंडक थी।
फोन बूथ पर खड़े लकी और बिट्टू अपनी होशियारी पर झूम रहे थे। आख़िरकार उन्होंने अपने उस दुश्मन का पता लगा लिया था, जिसने उन्हें जानवरों की तरह पीटा था।
“बड़ा भाई… बहुत ज़बरदस्त खबर है! उस मादरचोद कादर खान का पता लग गया है…” लकी उत्साह में चिल्लाया।
पीछे से बिट्टू फिर बड़बड़ाया “अबे ये भी बता ना कि मैंने पता लगाया है… हीहीही… साले को अब हम काटेंगे!”
अँधेरे कमरे में बैठे ‘बड़ा भाई’ की भौहें तन गईं।

“सालों… किसी दिन गोली मार दूंगा तुम दोनों को! आपस में ही मरोगे या सीधा मुद्दे पर आओगे? कहाँ छुपा है वो कादर खान?”
लकी ने थूक गटका और घबराते हुए बोला “बड़ा भाई… वो किशनगंज गाँव है ना… यहाँ से 100 किलोमीटर दूर। वो साला वहीं कहीं छुपा हुआ है। और सुनने में आया है कि वो आजकल किसी और नए ड्रग माफिया के लिए काम कर रहा है!”
अँधेरे कमरे में एक पल के लिए भारी सन्नाटा छा गया। ‘बड़ा भाई’ के दिमाग में कई समीकरण एक साथ घूमने लगे। नया माफिया? और वो भी उसके इलाके के आस-पास?
“बहुत अच्छे…” बड़ा भाई की आवाज़ अब एक ठंडे ज़हर जैसी हो गई थी। “मुल्ला के पास जाओ… उससे ज़रूरत का सारा सामान (हथियार, पैसा) लो और तुरंत निकल जाओ किशनगंज के लिए। मुझे वहाँ की पल-पल की खबर चाहिए।”

“ठाक्क…!”
बड़े भाई ने ज़ोर से फोन का रिसीवर क्रैडल पर पटक दिया।
कमरे के अँधेरे में सिर्फ उसकी सुलगती हुई सिगरेट की लाल टिप चमक रही थी। ‘बड़ा भाई’ ने अपनी लाल आँखों को सिकोड़ा और एक खौफनाक आवाज़ में खुद से फुसफुसाया
“मेरा नाम ही है ‘बड़ा भाई’… मुझसे बड़ा कौन आ गया इस खेल में?”

उसने सिगरेट का एक बहुत ही ज़ोरदार और लंबा कश खींचा… और फिर अचानक, उस आधी सुलगती सिगरेट को फर्श पर पूरी नफरत और हिकारत से ऐसे फेंक दिया, जैसे उसे नशे से सख्त नफरत हो। उसने अपने भारी जूतों से उस सिगरेट को कुचल कर बुझा दिया।

टैक्सी किशनगंज की तरफ दौड़ती चली जा रही थी, और आगे बैठे रमेश की आंखे धुंधला रही थी.

साल 1990

दिसंबर की कड़ाके की ठंड थी। किशनगंज गाँव के उस पुराने सरकारी घर के आँगन में कोहरा और अलाव का धुआँ आपस में लिपट रहे थे।
आँगन में बिछी एक पुरानी चारपाई पर रमेश और सब-इंस्पेक्टर शमशेर बैठे शराब के जाम टकरा रहे थे। रमेश को इस सरकारी नौकरी में आए अभी मुश्किल से एक साल ही हुआ था, लेकिन इस एक साल में ही उसने इलाके में अपना खौफ और काली कमाई का ऐसा जाल बिछा लिया था कि बड़े-बड़े ज़मींदार भी उसे सलाम ठोकते थे। और इस पाप की दुनिया में उसका सबसे पक्का जोड़ीदार था शमशेर। दोनों की दोस्ती ऐसी थी जैसे हवस और लालच ने ही उन्हें जन्मों का साथी बना दिया हो।

दोनों हम उम्र थे, कोई 25,26 साल के, नया नया जोश, नयी जवानी.
लेकिन दोनों मे ही वो इच्छा थी जिसका अंत नहीं था, काम वासना और पैसो का लालच, यही वो वजह थी की थोड़े से टाइम मे दोनों पक्के दोस्त और एक दूसरे के राजदार बन गए थे.

“हिच… ह्ह्हम्मम्म्म्म….. हिचहम्म्म्…”
रमेश ने नशे में झूलते हुए, कांच के गिलास को चारपाई के पाये पर पटका। उसकी आँखें लाल सुर्ख हो रही थीं।

“यार शमशेर… क्या करूँ मैं? उस राघव की लुगाई ने मेरा जीना हराम कर रखा है। साला, सारा गाँव मेरी मुट्ठी में है, लेकिन वो साली सुगना… वो सेट ही नहीं हो रही!” रमेश ने एक गहरी, हवस भरी साँस छोड़ते हुए कहा।

शमशेर ने इत्मीनान से अपना दूसरा पेग बनाया। उसने रमेश की इस बेकरारी पर एक तिरछी नज़र डाली और बोला
“अबे साले, मुझे तो समझ ही नहीं आता कि उस सुगना में तुझे ऐसा क्या नज़र आता है? ऊपर से पेट से है वो… 8 महीने का गर्भ लेकर घूम रही है। और तू साला उसके पीछे पागल हुआ जा रहा है?”
रमेश की आँखों में एक अजीब सा पागलपन और वहशीपन तैर गया।

“अबे वही तो… वही तो पसंद है मुझे उसका!” रमेश अपने दोनों हाथों से हवा में कुछ टटोलते हुए बोला, “उसका वो निकला हुआ, गोरा और चिकना पेट… उफ्फ्फ! तूने देखा है साले उसे सुबह सरकारी नल पर पानी भरते हुए?”

शमशेर बस सिगरेट फूंकता रहा, और रमेश अपनी गंदी कल्पनाओं में डूबता चला गया।
“साली की उम्र मुश्किल से 22 साल होगी, लेकिन बदन देख उसका… एकदम कसा हुआ। 8 महीने का बच्चा पेट में है, फिर भी जब वो घाघरा-चोली पहन कर मटकती हुई नल तक आती है ना… साला, उसके वो बड़े-बड़े, भारी स्तन चोली को फाड़ कर बाहर आने को मचलते रहते हैं। उसकी गहरी घाटी पसीने से चमकती है। और जब वो घड़ा उठाकर वापस मुड़ती है… आय हाय!

उस भारी घाघरे के अंदर उसकी वो बड़ी-बड़ी, गोल गांड क्या गोते लगाती है यार! मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ शमशेर… पक्का साली अंदर कुछ नहीं पहनती। उफ्फ्फ्फ़… उसकी चुत की वो कच्ची खुशबू क्या होगी… गज़ब!”
रमेश सुगना की मादकता का बखान करते-करते अपने छोटे लंड को सहला रहा था.

“क्या यार… तू भी बड़ा अजीब आदमी है!” शमशेर ने पेग गटकते हुए कहा और हँस पड़ा।
“अजीब क्या है? क्या करूँ यार… मेरा लंड उसे देख के सब्र ही नहीं कर पाता। ये देख… उसके बारे में सोचते ही साला खड़ा होने लगा है।” रमेश ने नशे में बेशर्मी से अपनी पैंट की ज़िप के पास बने उस छोटे से, 2 इंच के उभार की तरफ इशारा किया।

शमशेर ने अलाव सेंकते हुए अपनी आँखें सिकोड़ीं और एक बहुत ही चुभता हुआ सवाल दागा, “अबे साले रमेश… एक बात बता। तू उस सुगना के पीछे एकदम पागल कुत्ता बना हुआ है, लेकिन घर पर तेरी अपनी लुगाई भी तो है! कामिनी भी तो पेट से है… उसका क्या? अपनी घर की खेती छोड़कर तू साला दूसरे के खेत में मुँह क्यों मार रहा है?”

कामिनी का नाम सुनते ही रमेश के चेहरे पर एक अजीब सी खीझ और नफरत उभर आई। उसने ज़मीन पर थूकते हुए कहा, “थू!

अरे काहे की खेती साले? वो साली तो एकदम ठंडी औरत है। मुर्दा है साली मुर्दा!”
रमेश ने गिलास को ज़ोर से चारपाई पर पटका। उसकी नई-नई शादी हुई थी, लेकिन कामिनी में उसे रत्ती भर भी कोई दिलचस्पी नहीं थी।

“अबे शमशेर… तूने देखा है उसे? साला, 22 साल की उम्र है उसकी, लेकिन बदन देख उसका… किसी सूखी लकड़ी जैसी है। बाउजी ने भी ना जाने क्या देख शादी करा दी उस गरीब घर मे, उसे देख लगता है कभी कुछ ढंग का खाने को ना मिला हो,
ना छाती में उभार है, ना गांड में गोलाई। और जब से वो पेट से हुई है… साला उसका चेहरा एकदम पीला पड़ गया है। आँखें गड्ढे में धंस गई हैं, जैसे खून ही ना बचा हो बदन में। एकदम मुरझा गई है। उसे देखकर तो मेरा जो थोड़ा बहुत मूड बनता भी है, वो भी मर जाता है।

रमेश ने पास पड़ी बोतल को मुँह से लगा लिया गुटक… गटक.. ” हट साला कैसा दोस्त है तु, पूरा नशा ख़राब कर दिया मादरचोद “.
“हाहाहाहां… शमशेर हस पड़ा उसे रमेश की टांग खींचने मे मजा आ रहा था.

“बड़ी हसीं आ रही है तुझे, तेरा कुछ काम बना?” रमेश ने भी शमशेर की दुखती रग पर हाथ रख दिया.
“अब आया तु काम की बात पर, सुन मेरे पास एक प्लान है, जिससे तुझे सुगना भी मिल जाएगी और मुझे वो हाइवे वाली जमीन ”
शमशेर रमेश के कान मे कुछ फुसफुसाने लगा…. औरत को चोदना है तो पहले उसके पति को मजबूर करना पड़ेगा…. उस राघव की गोटी सेट करनी पड़ेगी.
जैसे जैसे रमेश बोलता गया रमेश की आंखे चौड़ी होती गई, उसने नशे मे सर झटका.
“क्या भाई… सच.. ऐसा कर सकते है?”
“हाँ… भाई… पुलिस वाला हूँ आखिर मै ”
दोनों मे कुछ खिचड़ी पक गई थी, गुनाह की नीव रख दी गई थी.
रमेश ने एक पेग और बना लिया, “साला मेरे से भी तेज़ दिमाग़ चला दिया तूने तो ”
हाहाहाबा… हाहाहाबा…. दोनों राक्षसी हसीं हस पड़े.

तभी… अलाव के पास गूंजते इन गंदे ठहाकों के बीच, अंदर से एक मीठी सी आवाज़ आई।
“छम… छम… छम…”
पैरों में पहनी चांदी की भारी पायलों की आवाज़।
रमेश और शमशेर दोनों की नज़रें दालान के दरवाज़े की तरफ घूम गईं।
दरवाज़े की चौखट पर, अँधेरे को चीरता हुआ एक बहुत ही भारी, गदराया हुआ साया उभर कर आया। अलाव की पीली रौशनी उस साये के चेहरे पर पड़ी।
वो रमेश की ताईजी (सुगंधा ) थीं।
ताईजी… (रमेश के पिता की मौसी की लड़की)। बेचारी गरीब थी, बच्चा पैदा ना कर सकी तो उस ज़ालिम समाज और पति ने उसे दर-दर की ठोकरें खाने के लिए निकाल फेंका था। लेकिन दुनिया की नज़रों में रमेश उनके लिए एक ‘देवदूत’ बनकर आया था जिसने उन्हें पनाह दी थी। वो घर का सारा काम करती थीं और रमेश का ध्यान रखती थीं।
लेकिन शमशेर जानता था कि इस ‘पनाह’ के पीछे रमेश का क्या स्वार्थ था।
ताईजी की उम्र 40 साल थी, लेकिन असली देसी खान-पान और मेहनत की वजह से वो दिखने में किसी 30 साल की गदराई, रसभरी जवान औरत जैसी लगती थीं। उनका जिस्म जैसे एक पका हुआ मीठा फल था। उन्होंने एक सूती साड़ी पहनी हुई थी, जिसे उन्होंने गाँव की औरतों की तरह थोड़ा ऊपर करके बांधा था।
साड़ी के पल्लू के नीचे से उनके वो विशाल, भारी और ढलके हुए स्तन साफ़ नज़र आ रहे थे, जो उनके हर कदम के साथ हल्के-हल्के हिलते थे। उनकी कमर चौड़ी थी और मांस से पूरी तरह भरी हुई थी। जब वो चलती थीं, तो उनकी उस भारी, मटकी जैसी गांड का घुमाव किसी भी सन्यासी का ईमान डिगा सकता था। चेहरे पर एक अजीब सी मासूमियत थी, लेकिन जिस्म में एक ऐसी ‘ठहरी हुई आग’ थी जो किसी को भी जला दे।
शमशेर की वो ठरकी, घाघ और भेड़िये जैसी नज़रें ताईजी के उस भारी और मादक जिस्म पर फेवीकोल की तरह चिपक गईं। वो बिना पलक झपकाए ताईजी की उस गहरी नाभि और साड़ी से झांकती गोरी कमर को घूर रहा था।

“रमेश… खाना बन गया है बिटवा।” ताईजी ने अपनी मीठी, देहाती आवाज़ में कहा।
रमेश, जो अभी भी सुगना के ख्यालों में अपनी पैंट रगड़ रहा था, उसने बिना ताईजी की तरफ देखे हाथ हिलाते हुए कहा

“आप खा लो ताईजी… यहाँ बहुत ज़रूरी बात चल रही है। हम बाद में खा लेंगे।”
ताईजी ने अपना सिर हिलाया और पलट कर वापस रसोई की तरफ जाने लगीं।

जैसे ही वो मुड़ी, शमशेर ने अलाव की रौशनी में सुगंधा की उस विशाल, मटकती हुई कमर और भारी गांड को देखा… शमशेर ने शराब का एक बड़ा घूंट गले के नीचे उतारा। उसकी आँखें लाल हो गई थीं।

बाहर रमेश 22 साल की सुगना की जवानी का भूखा था, और यहाँ आँगन में शमशेर की हवस 40 साल की इस सुगंधा के गदराये बदन को चीरने के लिए मचल रही थी। दोनों ही इस गाँव की औरतों को नोचने के लिए तैयार बैठे थे।

बाहर आँगन में कड़ाके की ठंड थी और रमेश शराब के नशे में चारपाई पर बेसुध पड़ा था। लेकिन रसोई के अंदर… एक अलग ही किस्म की आग सुलगने वाली थी।

रसोई में सिर्फ मिट्टी के चूल्हे में जल रही लकड़ियों की धीमी-धीमी, लाल आंच चमक रही थी। उस पीली और कांपती हुई रौशनी में सुगंधा (ताईजी) एक छोटे से पीढ़े पर बैठी, अपने लिए सूखी रोटी और गुड़ का निवाला तोड़ रही थी। दिन भर की थकान से उसका भारी, गदराया हुआ बदन चूर था। सूती साड़ी का पल्लू उसकी भरी हुई छाती से थोड़ा सरक गया था, घाघरा जांघो के जोड़ तक सिमटा हुआ था, और चूल्हे की आंच में उसके गोरे जिस्म पर पसीने की हल्की-हल्की बूंदें चमक रही थीं।

वो सालों से बेसहारा थी। समाज ने उसे एक बाँझ और अभागी औरत मानकर त्याग दिया था। उसके जिस्म ने मुद्दतों से किसी मर्द की छुअन, किसी मर्द की वो गर्माहट महसूस नहीं की थी। बाहर से वो एक ‘सीधी-सादी ताईजी’ थी, लेकिन अंदर ही अंदर… एक औरत की वो स्वाभाविक प्यास उसे हर रात जलाती थी।
तभी… रसोई की चौखट पर एक भारी साया आकर खड़ा हो गया।

“क्या ताईजी… अकेले-अकेले खाएगी क्या?” एक भारी, खुरदरी और नशे में डूबी हुई आवाज़ रसोई के सन्नाटे में गूंजी।

सुगंधा ने चौंक कर अपना सिर ऊपर उठाया। उसके हाथ में रोटी का निवाला वहीं रुक गया।
दरवाज़े पर शमशेर खड़ा था।
उसने अपने बदन से वो पुलिस वाली खाकी शर्ट उतार कर फेंक दी थी। ऊपर के जिस्म पर एक भी कपड़ा नहीं था, वो सिर्फ अपनी पैंट में खड़ा था।

चूल्हे की लाल रौशनी शमशेर के उस 26 साल के जवान, चौड़े और गठीले सीने पर पड़ रही थी। उसके डोले और सीने के बाल पसीने से हल्के-हल्के चमक रहे थे। उसकी लाल आँखों में एक भूखे भेड़िये जैसी चमक थी।
सुगंधा की साँसें अचानक भारी हो गईं।
उसकी नज़रें शमशेर के उस लोहे जैसे मज़बूत बदन पर जाकर अटक गईं। जो औरत सालों से एक मर्द की गर्माहट के लिए तरस रही थी, उसके सामने आज एक जवां और हट्टा-कट्टा मर्द आधा नंगा खड़ा था। सुगंधा के अंदर दबी हुई वो बरसों पुरानी आग अचानक ज्वालामुखी की तरह फटने को बेताब हो उठी।

उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी, गर्म झुरझुरी दौड़ गई… उसका जिस्म शमशेर की उस ‘खूंखार मर्दानगी’ को देखकर अंदर ही अंदर पिघलने लगा।
उसकी जांघो के बीच बना उभार बता रहा था, वो किस हद तक अंदर जा सकता है,
वो चाह कर भी अपनी नज़रें शमशेर के उस नंगे सीने से नहीं हटा पा रही थी।

शमशेर ने मुस्कुराते हुए रसोई के अंदर कदम रखा। उसने वो चौखट पार नहीं की थी, बल्कि उसने सुगंधा की इज़्ज़त की वो आख़िरी लकीर पार कर ली थी।

वो धीरे-धीरे चलकर सुगंधा के बिल्कुल करीब आ गया। सुगंधा डरी हुई थी, लेकिन उस डर से कहीं ज़्यादा उसके अंदर एक ‘पापी हवस’ जाग चुकी थी।
शमशेर ने नीचे झुककर, सुगंधा के कांपते हुए हाथ से वो रोटी का टुकड़ा लिया और उसे दूर फेंक दिया।

“भूख तो मुझे भी बहुत ज़ोरों की लगी है ताईजी… लेकिन रोटी की नहीं।” शमशेर ने अपनी भारी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा।
उसने अपना भारी, गरम और खुरदरा हाथ सुगंधा के उस गदराए, नंगे कंधे पर रख दिया। शमशेर की उस एक छुअन ने सुगंधा के पूरे जिस्म में 440 वोल्ट का करंट दौड़ा दिया। उसकी आँखें बंद हो गईं और मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई “आह्ह्ह… श… शमशेर बाबू… क्या कर रहे हो… रमेश बाहर है…” लेकिन उसकी आवाज़ में कोई विरोध नहीं था, सिर्फ एक मीठा सा आमंत्रण था।

शमशेर ने अपने दूसरे हाथ से सुगंधा की चुन्नी को पकड़ा और उसे झटके से नीचे गिरा दिया। सुगंधा के वो भारी, उफनते हुए और पसीने से चमकते स्तन अब सिर्फ एक पतले से सूती ब्लाउज़ में कैद थे, जो उनके भार से फटने को तैयार था।

शमशेर की आँखें उस मांसल खज़ाने को देखकर चौड़ी हो गईं। उसने बिना कोई और बात किए, अपने दोनों मज़बूत हाथों से सुगंधा की उस चौड़ी और मांस से भरी कमर को दबोचा और उसे झटके से खींच कर अपने उस नंगे, गठीले सीने से चिपका लिया।

सुगंधा का पूरा बदन शमशेर की उस वहशी ताकत के आगे ढह गया। उसने अपने दोनों हाथ शमशेर की नंगी पीठ पर रख दिए और अपनी बरसों की वो प्यास बुझाने के लिए खुद को शमशेर के हवाले कर दिया।
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दिसंबर की सर्द सुबह की गुनगुनी धूप खेतों पर बिछी हुई थी। रात भर रमेश की ताईजी (सुगंधा) की जिस्मानी आग बुझाने के बाद शमशेर एकदम तरोताज़ा था, और रमेश के दिमाग पर अभी भी सुगना की हवस का बुखार चढ़ा हुआ था।

खेत में राघव (रघु) फावड़ा चला रहा था। सर्दियों में भी मेहनत की वजह से उसका गठीला और मज़बूत बदन पसीने से तर-बतर था।

तभी… पगडंडी पर धूल उड़ाती हुई पुलिस की एक सरकारी जीप आकर रुकी। जीप से रमेश और शमशेर बाहर निकले और सीधे राघव की तरफ बढ़ने लगे।

“क्यों भाई राघव… कैसा चल रहा है सब?” रमेश ने पास आकर एक झूठी, मीठी मुस्कान के साथ पूछा। उसकी गिद्ध जैसी नज़रें आस-पास किसी और को ही ढूंढ रही थीं।
अपने सामने ‘बड़े बाबू’ (रमेश) और थानेदार को देखकर राघव ने जल्दी से फावड़ा नीचे रखा और हाथ जोड़ लिए।
“बड़े बाबू, सब आपकी ही कृपा है। फसल तो ठीक है, बस… बस वो मेरी ज़मीन के पैसे भी मिल जाते तो धन्य हो जाता मैं। घर में नया मेहमान आने वाला है…” राघव ने बहुत ही खुशामद और उम्मीद भरी नज़रों से कहा।
“मिल जाएंगे… तेरे पैसे भी आ जाएंगे।” शमशेर ने अपनी खाकी पैंट की बेल्ट कसते हुए कहा। “आ… यहाँ बैठ।” शमशेर ने मेड़ (खेत की मुंडेर) की तरफ इशारा करते हुए उसे वहीं अपने पास बैठा लिया।
रमेश ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली और सुलगाते हुए बोला, “तेरी इस ज़मीन के 5 करोड़ मिलेंगे। तू जानता भी है साले… 5 करोड़ कितना होता है?”
राघव ठहरा एकदम अनपढ़, सीधा-सादा गाँव का किसान। उसे 5 हज़ार और 5 लाख का ही ठीक से अंदाज़ा नहीं था, 5 करोड़ तो उसके लिए किसी दूसरी दुनिया की बात थी। उसे क्या पता था कि ये कीमत रमेश अपनी जेब से नहीं दे रहा था। असल में राघव की वो 5 बीघा ज़मीन एक बड़े सरकारी प्रोजेक्ट के बीच में आ गई थी, जहाँ से एक 4-लेन हाईवे निकलना था, और सरकार उसका भारी मुवाअज़ा दे रही थी।
“साब… आप जो दे दें, वही सही है। हमें क्या पता ये सब,” राघव ने मासूमियत से सिर खुजाते हुए कहा।
“अबे इतना है कि तेरी आने वाली सात पुश्तें भी बैठकर खाएं, तो पैसा कम नहीं पड़ेगा!” शमशेर ने धुएं का छल्ला छोड़ते हुए उसे समझाया।
“क्या… सच साब? इतना होता है 5 करोड़?” राघव की आँखें फटी की फटी रह गईं।
“अब समझा ना तू? लेकिन…” शमशेर ने अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और ज़हरीला करते हुए कहा, “ऐसे ही ले लेगा क्या सूखा-सूखा? बाकी के किसानों को तो पैसा मिल भी गया है।”
“मतलब… कैसे लूँ? मुझे क्या करना होगा साब?” राघव कुछ समझ नहीं पा रहा था।
“अबे कुछ ‘देना’ पड़ता है, इतने रुपयों के लिए। बिना कुछ दिए सरकार पैसे थोड़े ही दे देगी?” शमशेर ने तिरछी नज़रों से रमेश की तरफ देखा।
“क्या दूँ साब? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है सिवाय इस ज़मीन के…” राघव बेचैनी से बोला।
तभी… रमेश की लाल और भूखी आँखें अचानक चौड़ी हो गईं। उसके चेहरे पर एक वहशी मुस्कान तैर गई।
खेत की दूसरी पगडंडी से सुगना खाना लेकर आ रही थी।
8 महीने का वो निकला हुआ गोरा पेट, सूती ब्लाउज़ से झांकते हुए वो भारी, दूध से भरे स्तन, और उस लाल घाघरे के अंदर मटकती हुई वो बड़ी और गोल गांड… सुगना हर कदम के साथ रमेश के दिमाग की नसें फाड़ रही थी।
“साब को वो पसंद आ गई है…” शमशेर ने सीधा सुगना की तरफ इशारा करते हुए कहा।
राघव अभी भी नहीं समझा। “मतलब…?”
“अबे तू गधा है क्या?” शमशेर ने अपनी आवाज़ में कड़कपन लाते हुए सीधा बम फोड़ा, “तेरी बीवी साब को पसंद है। एक रात साब के क्वार्टर पर भेज दे, अगले दिन 5 करोड़ तेरे हाथ में!”
यह सुनते ही राघव के कानों में जैसे किसी ने खौलता हुआ सीसा डाल दिया। एक पल के लिए सब कुछ सुन्न हो गया।
“साब… ये कैसी बात कर रहे हैं आप? ठीक तो हो?” राघव ने अपने ग़ुस्से पर किसी तरह काबू रखा, हालांकि उसकी वो मज़बूत, किसान वाली बाजुएं फड़क उठी थीं। मुट्ठियां कस गई थीं।
उधर सुगना लचकती हुई चाल से पास आ रही थी।
“समझ यार राघव…” रमेश ने उसे ऐसे समझाया जैसे कोई बहुत मामूली बात हो, “ये औरत, बच्चे तो फिर भी वापस मिल जाएंगे। दूसरे आ जाएंगे… और सब तेरा ही तो है आख़िर में। बस एक रात की कीमत तुझे 5 करोड़ दे रहा हूँ। सौदा बुरा नहीं है।”
“ख़बरदार बड़े बाबू…!” राघव की आँखों में खून उतर आया। “वापस से मेरी बीवी का नाम अपनी उस गंदी ज़बान से लिया तो… आपकी गाँव में इतनी इज़्ज़त है और आप ऐसी नीच सोच रखते हैं?”
“साले… ग़ुस्सा किसे दिखा रहा है बे तू?” शमशेर अपने असली रौद्र और गुंडे वाले रूप में आ गया। उसने आगे बढ़कर एक ही झटके में राघव की गर्दन उसके कुर्ते से दबोच ली।
सुगना अब बस कुछ ही कदम की दूरी पर थी।
“छोड़ बे शमशेर… वो आ रही है,” रमेश ने फुसफुसाते हुए कहा। उसे अपना खेल खराब नहीं करना था।
शमशेर ने ग़ुस्से से ज़मीन पर थूका और राघव की गर्दन छोड़ते हुए उसके कान में फुसफुसाया, “आज रात तक का वक़्त है तेरे पास… सोच लेना। वरना ये ज़मीन भी जाएगी, और तेरी लुगाई भी!” “नमस्ते बड़े बाबू… नमस्ते दारोगा जी…” सुगना की वो मीठी, मनमोहक आवाज़ गूंजी।
एक ही सेकंड में सब कुछ सामान्य हो गया। शमशेर और रमेश के चेहरों पर झूठी और शातिर मुस्कान आ गई। सुगना के हाथ में पानी का लोटा और एक पोटली में खाना था।
“क्या हुआ बड़े बाबू… कोई बात है क्या?” सुगना ने अपने भारी स्तनों को पल्लू से हल्का सा ढकते हुए पूछा।
रमेश तो सुगना की उस नशीली खुशबू और उसके रूप का दीवाना हो चुका था। साला एकदम बावरा हो गया।
“ज… जी… जी नहीं… वो कुछ नहीं। बस वो… पैसे कैसे देने हैं, वही बात करने आए थे।” रमेश की नज़रें सुगना के चेहरे से फिसल कर बार-बार उसके ब्लाउज़ के उस गहरे गले और उसके मटकते हुए कूल्हों को ताड़ रही थीं।
“चलें भाई…” शमशेर ने रमेश का हाथ पकड़ा और उसे लगभग ज़बरदस्ती खींचते हुए बोला। शमशेर जानता था कि अगर रमेश वहाँ एक पल और रुका, तो वो खुद पर काबू नहीं रख पाएगा।
रमेश तो वहाँ से हिलने को तैयार ही नहीं था। उसकी आँखें सुगना के जिस्म से फेवीकोल की तरह चिपकी थीं।

“बड़े बाबू, खाना तो खा कर जाते,” सुगना ने अपनी मनमोहक आवाज़ में बड़ी मासूमियत से पूछा।
“खाएंगे… राघव के घर का खाना ही तो पसंद है बड़े बाबू को!” शमशेर ने एक गहरा ‘डबल मीनिंग’ डायलॉग मारा और रमेश को घसीटता हुआ जीप की तरफ ले गया।
सुगना शमशेर की इस बात का मतलब नहीं समझ सकी। लेकिन राघव समझ गया था। उसका खून खौल रहा था, लेकिन सिस्टम और पुलिस की इस ताकत के आगे वो अपने ही खेत में एक बेबस गुलाम की तरह खड़ा रह गया।
“घुर्रर… घुर्रर्ररर…” जीप स्टार्ट हुई और धूल उड़ाती हुई सड़क पर दौड़ पड़ी।
जीप में बैठे रमेश की साँसें लोहार की धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसकी आँखों में एक पागलपन और खौफनाक चिंगारी साफ़ दिख रही थी।
उसने शमशेर की तरफ मुड़कर अपने दाँत पीसते हुए कहा—
“भाई शमशेर… सुगना मुझे चाहिए। अगर वो मुझे नहीं मिली ना… तो साला पूरा किशनगंज जला दूंगा मैं!” और ये कोई खोखली धमकी नहीं थी। रमेश के पास पैसा था, पावर थी, और शमशेर जैसा वर्दी वाला गुंडा दोस्त। राघव की बर्बादी की स्क्रिप्ट अब लिखी जा चुकी थी।
****************

दिसंबर की सर्द शाम धीरे-धीरे काली और कंपा देने वाली रात में बदल रही थी।
घर के दालान (आँगन के पास वाला बरामदा) में एक पीला सा बल्ब टिमटिमा रहा था। एक पुरानी खटिया पर रमेश बैठा हुआ था और उसके हाथ में शराब का आधा भरा हुआ गिलास था। वहीं नीचे ज़मीन पर एक पीढ़े पर बैठी ताईजी (सुगंधा) सब्ज़ी छील रही थीं।
शराब के नशे में रमेश की ज़ुबान सिर्फ एक ही नाम रट रही थी।
“ताईजी… वो साली सुगना… बस एक बार वो मेरे नीचे आ जाए, तो साला इस गाँव में नौकरी करने का असली मज़ा आ जाए।” रमेश ने गिलास को होंठों से लगाते हुए एक गहरी और हवस भरी आह छोड़ी।

ताईजी सब्ज़ी छीलती रहीं और बिना सिर उठाए बस बीच-बीच में “हूँ… हाँ बिटवा… सही कह रहे हो,” करती रहीं।
यहाँ ताईजी पूरी तरह से रमेश के एहसानों तले दबी हुई थीं। वो रमेश की सिर्फ एक रिश्तेदार नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी राजदार और वफादार थीं। उनकी नज़र में रमेश की हर बात, हर हवस जायज़ थी। और वो ऐसा करती भी क्यों नहीं? ‘सही और गलत’ के मायने उनके लिए बहुत पहले ही बदल चुके थे।

जिस ‘सही’ समाज ने उन्हें सिर्फ इसलिए दुत्कार कर कूड़े में फेंक दिया था क्योंकि वो एक बाँझ औरत थीं और बच्चा पैदा नहीं कर सकती थीं… उसी समाज के बीच ‘गलत ‘ रमेश ने छत, दो वक़्त की रोटी और ‘ताईजी’ का सम्मान दिया था। रमेश का वो एहसान ताईजी के लिए किसी भगवान के वरदान से कम नहीं था।

सब्ज़ी छीलते-छीलते ताईजी ने अचानक एक सवाल पूछ लिया।
“अच्छा बिटवा… एक बात बताऊँ। कामिनी बहु भी तो गर्भवती है। तुझे क्या चाहिए? लड़का या लड़की?”
यह सवाल सुनते ही रमेश के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उसने शराब का गिलास खटिया पर रखा और अपनी छाती चौड़ी करते हुए अकड़ कर बोला

“क्या-क्या होता है ताईजी? अरे रमेश का खून है… लड़का ही होगा! मैं कोई नामर्द थोड़े ही हूँ।” उसका पुरुष-अहंकार एकदम से फन काढ़ कर खड़ा हो गया।

ताईजी ने चाकू को टोकनी में रखा और बड़ी मासूमियत से पूछा, “हाँ बिटवा, वो तो है। पर मान ले… भगवान की मर्ज़ी… और नहीं हुआ लड़का तो?”
इतना सुनना था कि रमेश की आँखें लाल सुर्ख हो गईं। वो किसी पागल जानवर की तरह तमतमा उठा और आगबबूला होकर चिल्लाया
“ताईजी… अपनी ये मनहूस बकवास बंद करो!” ताईजी सहम कर पीछे खिसक गईं।
रमेश की आँखों में एक सनक सवार थी। “ये जो इतना पैसा कमाया है… ये काली कमाई, ये रुतबा, ये रसूख… मेरे बाद इस बाप की दौलत को कौन देखेगा? एक लड़की? मेरे घर में कोई लड़की पैदा नहीं होगी!”

रमेश का नशा और उसका पागलपन अब उसके सिर चढ़ कर बोल रहा था। उसने अपने दाँत पीसते हुए एक ऐसी खौफनाक बात कही जिसने ताईजी की रूह कंपा दी

“और सुन लो कान खोलकर… अगर धोखे से भी उस कामिनी के पेट से लड़की हुई ना… तो पैदा होते ही उस साली कामिनी और उसकी उस मनहूस औलाद को इसी आँगन की ज़मीन में ज़िंदा गाड़ दूंगा!” रमेश के इस खौफनाक पागलपन और बेटे की उस सनकी चाहत को देखकर ताईजी अंदर तक सिहर गईं। उन्हें समझ आ गया कि रमेश किसी के सगे बाप का नहीं है।

ताईजी तुरंत नरम पड़ गईं। उन्होंने हड़बड़ाहट में रमेश की बोतल उठाई और जल्दी से गिलास में शराब डालते हुए बोलीं
“अरे शांत हो जा बिटवा… शांत हो जा। मैंने तो बस ऐसे ही पूछ लिया था। रमेश बाबू के घर तो शेर ही पैदा होगा। ले, एक घूंट और मार ले।”
रमेश हाँफ रहा था। उसने ताईजी के हाथ से गिलास लिया और एक ही साँस में गटक गया।
अभी दालान में सन्नाटा पसरा ही था कि तभी… बाहर की कच्ची सड़क से एक भारी और जानी-पहचानी आवाज़ गूंजी।
“धड़… धड़… धड़… धाड़…”
रमेश के क्वार्टर के आँगन में पुलिस की एक बुलेट आकर रुकी। इंजन बंद हुआ और भारी जूतों की आवाज़ दालान की तरफ बढ़ने लगी।
वो शमशेर था।
शमशेर ने अपनी पुलिस वाली जैकेट उतारी और दालान में कदम रखा। रमेश की तरफ देखने से पहले, शमशेर की वो ठरकी और शिकारी नज़रें सीधे ज़मीन पर बैठी ताईजी (सुगंधा) पर जाकर टिक गईं।

ताईजी ने भी नज़रें उठाईं। कल रात रसोई की उस मद्धम आंच में शमशेर के नंगे सीने और उसकी उसकी मर्दानगी के जो नज़ारे उन्होंने देखे थे और जो दर्द भरा मीठा सुख महसूस किया था… वो याद आते ही ताईजी की जांघें फिर से कस गईं।

उनके होंठों पर एक बहुत ही दबी हुई, कामुक और ‘राजदार’ वाली मुस्कान तैर गई।
सुगंधा ने अपना साड़ी का पल्लू हल्का सा ठीक किया और घुटनों पर हाथ रखकर उठते हुए अपनी नशीली आवाज़ में बोली

“मैं… मैं शमशेर बाबू के लिए पानी लाती हूँ…”
और वो अपनी भारी, मटकती हुई गांड को लचकाते हुए वापस उसी रसोई की तरफ चल दीं, जहाँ कल रात उनका जिस्म शमशेर की हवस का शिकार हुआ था।

शमशेर की नज़रें तब तक ताईजी की उस कमर को घूरती रहीं जब तक वो अँधेरे में ओझल नहीं हो गईं।
फिर शमशेर मुड़ा और रमेश के पास खटिया पर बैठ गया।

ताईजी पानी का गिलास रखकर अपनी उस मटकती हुई चाल से वापस रसोई के अँधेरे में गुम हो चुकी थीं। अब उस दालान में सिर्फ रमेश का गुरूर और शमशेर की गुंडागर्दी बची थी।
शमशेर ने अपनी भारी पुलिस वाली बेल्ट ढीली की, खटिया पर रमेश के बगल में बैठा और खुद ही बोतल उठाकर अपने लिए एक कड़क पेग बना लिया।

उसने रमेश की तरफ एक तिरछी और ठंडी नज़र डाली।
“भाई… दूसरा प्लान आज़माना पड़ेगा।” शमशेर ने बर्फ के टुकड़ों को गिलास में घुमाते हुए कहा। “साला वो राघव सीधी उंगली से घी निकालने नहीं दे रहा… वो नहीं मान रहा, साले देहाती को पता ही नहीं है 5 करोड़ कितना होता है।”
वरना इतने रुपये के लिए तो आदमी अपना खानदान चुदवा लेता है ”

यह सुनते ही रमेश के अंदर का वो घमंडी भेड़िया तिलमिला उठा। उसका पुरुष-अहंकार और सुगना को पाने की वो अंधी हवस दोनों एक साथ भड़क उठे।

“तो… क्या?” रमेश ने अपनी लाल सुर्ख आँखें फाड़कर शमशेर को घूरा। उसकी कनपटी की नसें तन गई थीं। “याद रखना साले शमशेर… अगर वो सुगना मुझे नहीं मिली, तो इस पूरे गाँव में आग लगा दूँगा मैं!” गुस्से में पागल रमेश ने अपना खाली गिलास ज़मीन पर दे मारा और सीधे शराब की बोतल को ही मुँह से लगा लिया।

“गट… गट… गट…” कच्ची शराब सीधे उसके हलक से नीचे उतरने लगी।
शमशेर ने अपना गिलास होंठों से लगाया और एक भयानक, कमीना ठहाका मार कर हँस पड़ा।

“हाहाहाहा… अरे रमेश बाबू! मुझे तो अपने खबरी से यह भी सुनने में आया है कि वो राघव हमारी शिकायत करने कल सुबह शहर जाने वाला है… बड़े अफसरों के पास! हाहाहा…” शमशेर अपनी ही बात पर शैतानों की तरह हँस रहा था।

रमेश ने झटके से बोतल मुँह से हटाई। शराब की कुछ बूंदें उसकी ठुड्डी से टपक कर उसके सीने पर गिर रही थीं।
“साले… मादरचोद! शिकार हमारे हाथ से निकल रहा है, तेरी वर्दी और मेरे इस रुतबे पर बात आ रही है, और तू यहाँ दाँत फाड़ कर हँस रहा है?” रमेश घबराहट और गुस्से के मिक्सचर में गुर्राया।

शमशेर ने अपना गिलास नीचे रखा। उसकी आँखों की वो हँसी एक ही सेकंड में गायब हो गई और वहाँ एक खूंखार, मौत का सन्नाटा छा गया। उसने रमेश के कंधे पर अपना भारी हाथ रखा और एक ऐसी बर्फीली आवाज़ में बोला जिसने रमेश के नशे को भी एक पल के लिए उतार दिया

“वो शहर तो तब जाएगा ना रमेश… जब उसके लिए कल की सुबह होगी!”
रमेश की आँखें फटी की फटी रह गईं।
शमशेर थोड़ा आगे झुका और रमेश के कान के एकदम पास अपना मुँह ले गया।

“फुस… फुस… फुस…” अँधेरे दालान में सिर्फ उन दो भेड़ियों की फुसफुसाहट गूंज रही थी। शमशेर उसे राघव को रास्ते से हटाने का वो खौफनाक और अचूक जाल समझा रहा था।

जैसे-जैसे शमशेर अपना वो काला प्लान रमेश के दिमाग में उतार रहा था, दालान के उस पीले बल्ब की रौशनी में दोनों के चेहरों के रंग बदल रहे थे।

शमशेर के चेहरे पर एक शुद्ध, रूह कंपा देने वाली हैवानियत (Pure Evil) नाच रही थी। वो एक ऐसा कसाई लग रहा था जो किसी बकरे की गर्दन पर छुरी रखने से पहले मुस्कुराता है।

वहीं दूसरी तरफ रमेश… उसका चेहरा उस खौफनाक ‘मौत’ के प्लान को सुनकर भी सिर्फ एक ही चीज़ से चमक रहा था, सुगना के उस भारी, 8 महीने के गर्भवती जिस्म को अपने बिस्तर पर पटकने की वो अंधी और पागल हवस (Pure Lust)!

रमेश के चेहरे पर हवस का वो गंदा रस टपक रहा था। उसे राघव की जान जाने से कोई मतलब नहीं था, उसे बस सुगना की वो ‘कच्ची खुशबू’ चाहिए थी।
प्लान पूरा होते ही रमेश के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान फैल गई। उसने अपनी बोतल आगे बढ़ाई।
शमशेर ने अपना गिलास उठाया और रमेश की बोतल से ज़ोर से टकराया।
“सुगना के नाम…”
“चियर्स!”
कांच टकराने की उस “क्लिंक” आवाज़ के साथ ही, उस अभागे किसान राघव की मौत और सुगना की बर्बादी के परवाने पर हमेशा के लिए मोहर लग गई।
दोनों आदमखोर जानवर अपनी-अपनी जीत के नशे में चूर होकर अपना जाम पीने में बिजी हो गए। और अंदर रसोई में बैठी ताईजी, इस पूरी साजिश की एक खामोश और अंधी गवाह बन गई।
********************

(रात 11:45 बजे | शहर में रमेश का पुश्तैनी घर)

रात का सन्नाटा गहरा हो चुका था। जहाँ एक तरफ किशनगंज गाँव में मौत का जाल बुना जा रहा था, वहीं शहर के उस पुश्तैनी घर में भी ‘कालचक्र’ ने अपना खेल शुरू कर दिया था।
8 महीने की गर्भवती कामिनी को अचानक ज़ोरों की प्यास लगी थी। उसका कमज़ोर, पीला पड़ चुका शरीर थकान से चूर था। वो बहुत ही आहिस्ता से, दीवार का सहारा लेते हुए सीढ़ियां उतर रही थी। घर में एकदम अँधेरा था।

अचानक… कामिनी का पैर एक सीढ़ी से फिसला।
“आआआह्ह्ह…!!” कामिनी के मुँह से एक दर्दनाक चीख निकली और उसका कमज़ोर शरीर सीढ़ियों पर लुढ़क गया।
वो सीधे पेट के बल तो नहीं गिरी, लेकिन सीढ़ियों से टकराने के उस ज़ोरदार झटके ने उसके पेट में एक भयंकर, जानलेवा दर्द पैदा कर दिया। सर पर ऐसी चोट लगी की कामिनी वहीं फर्श पर गिरकर तड़पने लगी। उसकी जांघों के बीच से एक गर्म तरल पदार्थ रिसने लगा।

कामिनी की वो चीख सुनकर रमेश के बाबूजी (कामिनी के ससुर) हड़बड़ा कर नींद से जाग गए। उन्होंने भागकर बत्ती जलाई और जब सीढ़ियों के नीचे अपनी गर्भवती बहू को खून और दर्द से तड़पते हुए देखा, तो उनके होश उड़ गए।

“अरे बहू… हे भगवान! कोई है… गाड़ी निकालो जल्दी!”
बाबूजी ने घबराहट में कांपते हाथों से अपनी तड़पती हुई बहू को उठाया। रमेश का अपना खून, उसका अपना वारिस इस वक़्त खतरे में था और मौत से लड़ रहा था, लेकिन उस जाहिल रमेश को इसकी कोई खबर नहीं थी। बाबूजी तुरंत कामिनी को लेकर शहर के अस्पताल की तरफ भाग खड़े हुए।

ठीक उसी वक़्त… रात के 12:00 बजे | किशनगंज, रमेश का क्वार्टर
“धड़… धड़… धड़… धाड़…!!”
सरकारी क्वार्टर के सन्नाटे को चीरते हुए शमशेर की पुलिस वाली बुलेट का इंजन किसी भूखे जानवर की तरह गरजा।
अलाव बुझ चुका था, लेकिन उन दोनों आदमखोरों के अंदर की हवस और हैवानियत पूरी तरह से भड़क चुकी थी। शराब ने उनके दिमाग से इंसानियत का आख़िरी कतरा भी धो डाला था।

“चल बे शमशेर…!” रमेश ने बुलेट के पीछे बैठते हुए एक शैतानी और नशे में डूबी हुई आवाज़ में कहा, “आज शिकार किया जाए! आज की रात सुगना मेरी है!” शमशेर ने एक कमीनी मुस्कान के साथ एक्सीलेटर मरोड़ा। बुलेट के पिछले टायर ने धूल उड़ाई और वो भारी मशीन उस घने अँधेरे में गाँव की कच्ची सड़क की तरफ दौड़ पड़ी।

बुलेट के साइलेंसर की उस कानफोड़ू आवाज़ से अंदर रसोई के पास सो रही ताईजी (सुगंधा) की नींद अचानक टूट गई।

वो हड़बड़ा कर उठ बैठीं। बाहर बुलेट दूर जा चुकी थी, लेकिन ताईजी के दिल की धड़कनें बेतहाशा तेज़ हो गई थीं। एक अनजानी सी घबराहट, किसी बहुत बड़ी और मनहूस अनहोनी का खौफनाक अंदेशा उनके सीने को निचोड़ने लगा।

कल रात की अपनी उस पापी हवस को बुझाने के बाद, आज वो शमशेर और रमेश का असली, खूंखार रूप समझ चुकी थीं। शाम को दालान में रमेश का वो पागलपन और शमशेर के साथ उसका वो ‘चियर्स’ करना…
ताईजी को समझ आ गया था कि ये दोनों खून के प्यासे भेड़िये अब किस दिशा में निकले हैं।

“हे राम… अनर्थ हो जाएगा आज…” ताईजी के मुँह से बरबस ही निकल पड़ा।
उन्होंने बिना एक भी पल गँवाए, कांपते हाथों से अपनी सूती साड़ी को समेटा। अपने भारी पल्लू को खींचकर कसकर अपनी कमर में खोंसा और बिना चप्पल पहने, नंगे पैर ही उस कड़ाके की ठंड में क्वार्टर से बाहर भाग खड़ी हुईं।

हवा में कोहरा था और रास्ता एकदम सुनसान। ताईजी का भारी, गदराया हुआ शरीर तेज़ चलने के कारण हाँफने लगा था, लेकिन उनके कदम रुके नहीं। वो उस घने अँधेरे में गाँव की उसी पगडंडी पर भाग रही थीं जिस पर कुछ मिनट पहले वो बुलेट गई थी।
आज की रात किशनगंज के इतिहास की सबसे खौफनाक रात होने वाली थी… क्योंकि नशे में धुत उन दो शैतानों की बुलेट और पीछे-पीछे नंगे पैर भागती ताईजी…
दोनों की मंज़िल एक ही थी— राघव का घर!
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रात 12:00 बजे | किशनगंज, राघव का घर

घने अँधेरे में डूबे राघव के मिट्टी के घर में सब कुछ शांत था। अंदर चारपाई पर राघव और सुगना एक-दूसरे की बाहों में इत्मीनान से सो रहे थे। सुगना का सिर राघव के चौड़े सीने पर टिका था और वो अपने आने वाले बच्चे के सुनहरे सपने देख रहे थे।
तभी… उस सन्नाटे को चीरती हुई मौत उनके दरवाज़े पर आ पहुँची।
“धड़… धाड़… धाड़…..!!”
लकड़ी का दरवाज़ा इतनी ज़ोर से पीटा गया कि पूरा घर कांप उठा।
“खोल बे दरवाज़ा… तेरे बाप आए हैं!” बाहर से शमशेर की वो नशे में डूबी, खुरदरी और हैवानों जैसी आवाज़ गूंजी।
इस भयानक आवाज़ से सुगना बुरी तरह सिहर उठी। वो घबराकर राघव से चिपक गई। लेकिन राघव… वो एक सच्चा और बहादुर किसान था। उसकी आँखों में नींद की जगह अब एक खूंखार गुस्सा आ गया था। उसने सुगना को पीछे किया और बिना किसी खौफ के आगे बढ़कर दरवाज़े की सिटकनी खोल दी।

दरवाज़ा खुला ही था कि अँधेरे को चीरता हुआ लोहे का एक भारी रॉड हवा में लहराया…
“भननननन…. धड़ाक्क….!!”
राघव के सिर पर एक बहुत ही ज़ोरदार और जानलेवा वार हुआ।
राघव का मज़बूत शरीर एक ही झटके में लड़खड़ा गया। उसकी आँखों के सामने सैकड़ों तारे चमक उठे और दुनिया गोल घूमने लगी। सिर से खून का एक गर्म फव्वारा फूटा और उसकी आँखों को लाल कर गया। वो घुटनों के बल ज़मीन पर आ गिरा… लेकिन उसने अपना होश पूरी तरह से नहीं खोया।

“सालों… आ गए ना अपनी असली औकात पर!” खून से लथपथ राघव ने ज़मीन से ही गुर्राते हुए कहा।
लेकिन इससे पहले कि वो उठ पाता, शमशेर ने अपने भारी पुलिस वाले जूते से उसकी छाती पर वार किया और एक हाथ से उसकी गर्दन दबोच कर उसे ज़मीन पर दबा दिया।

इसी बीच… पीछे खड़ा रमेश किसी भूखे और पागल कुत्ते की तरह घर के अंदर घुसा।
उसने चीखती हुई सुगना के बाल पकड़े और उसे बेदर्दी से घसीटता हुआ घर के बाहर आँगन की उस ठंडी ज़मीन पर ला कर पटक दिया.

सुगना दर्द और खौफ से रो रही थी। उसका वो 8 महीने का गदराया हुआ जिस्म पसीने और डर से कांप रहा था। वो इस वक़्त सिर्फ एक लाल घाघरे और एक छोटी सी सूती चोली में थी। चाँद की मद्धम रौशनी में सुगना के उस भारी और उफनते हुए बदन को देखकर रमेश के अंदर का वो शैतान पूरी तरह से आज़ाद हो गया।

“साला इंसानियत नाम की चीज़ ही नहीं है तुम जैसों में! कहा था ना मान जा… 5 करोड़ कोई कम नहीं होते इस चुत के बदले!” रमेश पागलों की तरह चिल्लाते हुए सुगना के ऊपर टूट पड़ा।
एक ही झटके में रमेश ने सुगना को ज़मीन पर पटक दिया।
सामने ज़मीन पर पड़ा राघव अपनी खून से सनी आँखें कभी खोल रहा था, तो कभी दर्द से बंद कर रहा था। उसकी आँखों के सामने सब कुछ धुंधला हो रहा था। वो चाह कर भी अपनी चीखती हुई बीवी को उन दरिंदों से नहीं बचा पा रहा था।

सुगना ने अपनी पूरी ताकत से चीखना चाहा, “बचाओ… कोई बचाओ…!” लेकिन रमेश ने अपना भारी, खुरदरा हाथ सुगना के मुँह पर कसकर दबा दिया। उसकी लाल आँखों में एक भयानक हवस नाच रही थी।

“साली हरामज़ादी… ये चीखें बचा कर रख! जब मैं आज तेरी चुत मे लंड डालूंगा, तब जी भर कर चीखना!”

रमेश ने अपने दाँत पीसते हुए कहा और अपने दूसरे हाथ से अपनी पैंट की बेल्ट खोल दी।
राघव की आँखों से खून और आंसू एक साथ बह रहे थे…

राघव के आँगन में चाँद भी डर के मारे छुप गया था।
सुगना ज़मीन पर पड़ी चीख रही थी। उसका 8 महीने का गर्भवती पेट ऊपर-नीचे हिल रहा था। लाल घाघरा फटा हुआ, चोली के बटन टूट चुके थे। दोनों भारी, दूध से भरे स्तन बाहर झूल रहे थे।

रमेश उसके ऊपर चढ़ गया। उसकी आँखें शराब और हवस से लाल।
“साली… आज तुझे चोद के ही मानूँगा!”

उसने दोनों हाथों से सुगना के स्तनों को नोच लिया। उँगलियाँ दबाकर मांस में धंस गईं। दूधिया गोरा मांस उँगलियों के बीच से फूट पड़ा।
रमेश के दबाव इतना तेज़ था की सुगना के स्तनो से दूध की धार फुट पड़ी…
“आअह्ह्ह…. साली दूध छोड़ने लगी बे ये तो.. ” चुप… चप… सरलप…. स्सदररर… करता रमेश ने अपना मुँह सुगना के निप्पल पर दे मारा, उसे चूसने लगा, उसके बच्चे के हिस्से का दूध वो पीने लगा.

“आआआह्ह्ह्ह… दर्द हो रहा है… छोड़ दो… हे राम!” सुगना चीखी।

रमेश ने पुरे स्तन को सक कर मुँह में भर लिया और इतना जोर से काटा की दाँत त चूचुक में घुस गए। खून की एक पतली धार निकल आई।
लाल एयर सफ़ेद रंग एक होने लगा.

सुगना तड़प रही थी। उसकी जांघें काँप रही थीं। रमेश ने एक हाथ नीचे ले जाकर अपने लंड को टाटोला, आश्चर्य घर से निकलते वक़्त उसका लंड खड़ा था लेकिन अब **बिल्कुल ढीला**। शराब की अधिकता ने उसके लंड से उसकी शक्ति छीन ली थी,

रमेश ने उसे सहलाया, थूका, रगड़ा… लेकिन लंड खड़ा ही नहीं हो रहा था।
“मादरचोद… खड़ा हो साले!” वो चिल्लाया।

सुगना रोते हुए बोली, “बड़े बाबू… रहम करो… बच्चा है पेट में…”

रमेश का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
“हरामज़ादी! ठंडी औरत… मेरा लंड भी नहीं खड़ा कर सकती!”

उसने पूरा जोर लगाकर सुगना के गाल पर दो जोरदार थप्पड़ मारे।
थाड्… थाड्!
सुगना का सिर घूम गया।
रमेश अपनी नामर्दानगी का गुस्सा सुगना पर उतार रहा था,
फिर उसने मुट्ठी भींचकर सुगना के 8 महीने के निकले हुए पेट पर एक भयानक घूँसा मार दिया।
धमाक्का..धममम…

“आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह…!!” सुगना की चीख आसमान फाड़ गई। पेट के अंदर बच्चा हिल उठा। दर्द से उसकी आँखें उलट गईं।

राघव ज़मीन पर पड़ा था। सिर से खून बह रहा था। वो कुछ बोलना चाहता था, हाथ उठाना चाहता था… लेकिन चोट बहुत गहरी थी। दिमाग में सब कुछ घूम रहा था। आँखों के सामने धुंधला हो रहा था। सिर्फ फुसफुसाहट निकली
“सु… सुगना… बचा… लो…”

रमेश अब पूरी तरह हैवान बन चुका था। उसे सुगना की चुत मे कुछ तो घुसाना ही था,लंड ने तो साथ दिया नहीं…
उसने आस-पास देखा। आँगन में पड़ी एक मोटी लोहे की रॉड नज़र आई, शायद वही थी जिस से रघु पर वार किया गया था.

“मादरचोद देहाती… खुद को क्या समझती है!”

वो रॉड उठा ली।

शमशेर चौंक गया।
“नहीं रमेश… ये प्लान नहीं था… रुक!”
शमशेर ने राघव को छोड़ा और रमेश को पकड़ने दौड़ा।

लेकिन देर हो चुकी थी।

रमेश ने सुगना की जांघें ज़ोर से फैलाईं। उसकी फूली हुई, गर्भवती चूत पूरी तरह खुली थी। रमेश ने रॉड का मोटा सिरा चूत के मुहाने पर रखा… और धह्ह्ह्हह्ह… धच…पूरे जोर से अंदर धकेल दिया।

धड्ड… धप्पप्प… फच… फााााचक्!!!

लोहे का सरिया सुगना की चूत में 8-9 इंच तक घुस गया। पेट के अंदर तक।

“अअअअअअआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह…!!!”

सुगना की आँखें बाहर निकल आईं। मुँह से खून का फव्वारा निकला। उसका पूरा शरीर एक बार जोर से काँपा… फिर ढीला पड़ गया।

रमेश हाँफ रहा था। “हंफ… हंफ… ले साली… अब चीख!”

सुगना की चूत से खून और पानी का मिश्रण फूट रहा था। पेट फट चुका था।

राघव ये हृदय-विदारक दृश्य देख नहीं पाया। उसकी आँखें उलट गईं और वो बेसुध ज़मीन पर लुढ़क गया।

शमशेर ने रमेश के गाल पर दो जोरदार थप्पड़ जड़ दिए..
थाड्… थाड्!
“होश में आ मादरचोद! ये क्या कर दिया?!”

रमेश जैसे नींद से जागा। सामने का नजारा देखकर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
खून… खून… खून चारों तरफ खून। सुगना का पेट फटा हुआ था, आँखें खुली हुई उसे ही देख रही थी,

“अ… अबे… ये… ये क्या हुआ?” रमेश काँपते हुए पीछे हटा।

शमशेर का दिमाग अभी भी तेज चल रहा था।
“चल… अभी निकल यहाँ से! मैं सब संभालता हूँ। मादरचोद… तू नशे में सब भूल जाता है!”

उसने रमेश को घसीटकर बुलेट पर बिठाया। बुलेट की आवाज़ दोबारा गूँजी और दोनों अँधेरे में गायब हो गए।
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रात के 1:30 बजे | शहर का अस्पताल

अस्पताल के उस ठंडे और शांत गलियारे में सिर्फ एक पुरानी घड़ी की ‘टिक-टिक’ गूंज रही थी। रमेश के बाबूजी (कामिनी के ससुर) हताश और परेशान से बाहर बेंच पर बैठे थे।
ऑपरेशन थियेटर की लाल बत्ती बुझी और डॉक्टर बाहर आया।
बाबूजी तुरंत अपनी जगह से उठ खड़े हुए। “डॉक्टर साहब… क्या हुआ? मेरी बहू और पोता ठीक तो हैं ना?”
डॉक्टर ने मास्क नीचे किया और एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “मुबारक हो ज़मींदार बाबू… आपकी बहू ने एक बच्ची को जन्म दिया है। घर में लक्ष्मी आई है। सीढ़ियों से गिरने की वजह से माँ के सिर पर गहरी चोट है और उन्हें अभी होश नहीं है, इसलिए हमें तुरंत ऑपरेशन करके बच्ची को बाहर निकालना पड़ा। लेकिन दोनों सुरक्षित हैं।”

“लड़की…?”
ये शब्द सुनते ही बाबूजी का चेहरा ऐसे लटक गया जैसे किसी ने उनकी सारी दौलत छीन ली हो। उनकी आँखों में खुशी की एक किरण भी नहीं थी, सिर्फ एक गहरी हताशा और निराशा थी।
“साला… रमेश एक लड़का भी पैदा ना कर सका!” बाबूजी बड़बड़ाए और वहीं उस ठंडे फर्श पर धम्म से बैठ गए। रमेश के उस खानदान में जहाँ बेटों का गुरूर आसमान पर था, वहाँ कामिनी ने एक लड़की को जन्म दिया, उसका भविष्य पैदा होते ही अंधकार में डूब गया था।

(ठीक उसी वक़्त… किशनगंज, राघव का घर)

गाँव के उस कच्चे घर में अब मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था। शमशेर और रमेश अपना खौफनाक काम करके और राघव की ज़िंदगी तबाह करके अपनी बुलेट से वहाँ से फरार हो चुके थे।
तभी… हाँफती और कांपती हुई ताईजी (सुगंधा) उस घर के आँगन तक पहुँचीं।
वहाँ का नज़ारा डरावना था। अँधेरा इतना था कि कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन ताईजी को उस हवा में किसी अनहोनी और खौफ की गंध आ रही थी।

उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो चौखट के अंदर कदम रखें।
फिर भी… एक औरत का भारी कलेजा था। उनके कदम धीरे-धीरे आगे बढ़े। जैसे ही उन्होंने अंदर झांका…
“हे भगवान…!” ताईजी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई।

ज़मीन पर राघव और सुगना बेसुध पड़े थे। ताईजी का कलेजा कांप गया। उन्हें लगा कि यहाँ अब कुछ नहीं बचा है। वो डर के मारे वापस बाहर की तरफ पलटने ही वाली थीं कि तभी…
“उंवा… उंवा… उंवा…”
सन्नाटे को चीरती हुई एक बहुत ही धीमी, लेकिन स्पष्ट नवजात बच्चे के रोने की आवाज़ ने ताईजी के कदमों को ज़मीन पर जकड़ लिया।
ताईजी तुरंत पलटीं और भागते हुए उस अँधेरे कोने तक पहुँचीं।
वहाँ ज़मीन पर, उस खौफनाक मंज़र के बीच… एक नवजात बच्चा रो रहा था। ताईजी ने अपने कांपते हाथों से उस बच्चे को उठाया और अपनी सूती साड़ी के पल्लू में लपेट लिया।

उन्होंने अँधेरे में टटोल कर देखा… वो एक लड़का था!
उसी एक पल में, ताईजी के अंदर की वो बरसों पुरानी, सूखी हुई ममता ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी। एक औलाद पाने का सुख, जिसके लिए समाज ने उन्हें ताने मारे थे, जिसके लिए उन्होंने रमेश की हर ज़्यादती बर्दाश्त की थी… आज नियति ने वो औलाद खुद उनके हाथों में सौंप दी थी।
उन्होंने उस नवजात लड़के को अपने सीने से लगा लिया। उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली।
इस एक पल में रमेश का खौफ, दुनिया का डर, सब पीछे छूट गया। ममता ने अपना असर दिखाया और एक ‘राजदार’ के अंदर की ‘माँ’ जीत गई।

“जाको राखे साइयां… मार सके ना कोय…” ताईजी ने बुदबुदाते हुए उस बच्चे को अपने गले से और कसकर लगा लिया।

ताईजी जानती थीं कि अगर रमेश को इस बच्चे के ज़िंदा होने की भनक भी लग गई, तो वो इसे भी नहीं छोड़ेगा। उन्होंने एक आखिरी बार उस वीरान घर को देखा और फिर उस बच्चे को अपनी साड़ी में छुपाकर, घने अँधेरे में विलीन हो गईं।
कालचक्र ने अपना खेल खेल दिया था।

शहर में रमेश की असली औलाद (बेटी) जन्म ले चुकी थी,
और गाँव में, राघव का खून (बेटा) ताईजी की ममता की छाँव में इस अँधेरी रात मे चला जा रहा था,

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“साब किशनगंज आ गया, किधर मुड़ना है अब ” टैक्सी ड्राइवर की आवाज़ से रमेश एक दम से चौंक गया…
किशनगंज के रास्तो ने उसकी याद को ताज़ा कर दिया था.

“वो सामने से लो, गांव के बहार बहार से, गांव के अंदर जाने की जरुरत नहीं नहीं..”
जैसे जैसे टैक्सी आगे बढ़ रही रही, बंटी और कामिनी की आंखे चका चौघ होती जा रही थी.
सामने एक बड़ा सा खुला दरवाजा था, अंदर खेत खलिहान पसरे हुए रहे, इसके कली 1km दूर एक सफ़ेद सी ईमारत दिख रही थी.
“बेटा ये फार्म हाउस पुरे 5बीघा जमीन पर फैला गए है, जहाँ तक नजर जाये समझो तुम्हारा ही है ” रमेश गर्व से बोल उठा
टैक्सी आगे बढ़ती गई….

धूल उड़ाती हुई टैक्सी किशनगंज के उस विशाल लोहे के गेट से अंदर घुसी। फार्महाउस की आलीशान बनावट, ऊँची दीवारें और वो शाही रुतबा देखकर बंटी और कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। रमेश ने शहर में रहकर जो दौलत कमाई थी, उसका असली रूप आज इस गाँव में दिख रहा था।

टैक्सी आँगन में आकर रुकी।
आँगन के बीचों-बीच ताईजी की लाश सफ़ेद कफ़न में लिपटी हुई ज़मीन पर रखी थी। आस-पास गाँव की औरतों की भीड़ थी।

रमेश जैसे ही कार से उतरा, उसके पैर लड़खड़ा गए। वो शहर का खूंखार और बेरहम आदमी, जो किसी की जान लेने, मारने पीटने से पहले दो बार नहीं सोचता था, आज ताईजी की लाश को देखकर एक छोटे बच्चे की तरह टूट गया। वो भागकर लाश के पास गया और घुटनों के बल गिरकर फूट-फूट कर रोने लगा।

वाकई, रमेश आज अंदर तक दुखी था। ताईजी उसके लिए सिर्फ एक रिश्तेदार नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी राजदार, उसकी ढाल और उसके हर पाप की गवाह थीं। उनके रहते रमेश को कभी अपने घर या अपने काले कारनामों की फ़िक्र नहीं करनी पड़ी थी। ताईजी ने 1990 की उस खौफनाक रात से लेकर आज तक सब कुछ बखूबी संभाला था। बंटी ने आगे बढ़कर अपने रोते हुए बाप के कंधे को सहारा दिया।

लेकिन… कामिनी की नज़रें रमेश पर नहीं थीं।
उसकी नज़र लाश के दूसरे छोर पर बैठी एक 18-19 साल की लड़की पर जाकर अटक गई। वो लड़की रमेश से भी ज़्यादा बेतहाशा रो रही थी और ताईजी की लाश से ऐसे लिपटी हुई थी जैसे उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई हो।

उसने एक बहुत ही सादा सा सलवार-सूट पहना हुआ था, लेकिन उस सादेपन में भी उसका जिस्म अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा भरा हुआ और गदराया सा लग रहा था।

कामिनी उस लड़की को जानती तक नहीं थी, लेकिन उसे इस तरह तड़पता हुआ देखकर कामिनी के अंदर कुछ ऐसा टूटा, जिसे वो खुद भी समझ नहीं पाई। ना जाने क्यों, अनजाने में ही कामिनी के कदम उस अनजान लड़की की तरफ खिंचते चले गए। एक अजीब सी कशिश थी, जैसे कोई अदृश्य धागा उसे अपनी तरफ खींच रहा हो।
कामिनी ने पास जाकर धीरे से अपना हाथ उस लड़की के कांपते हुए कंधे पर रखा।

जैसे ही कामिनी ने उसे छुआ… धड़क! कामिनी का दिल जैसे एक पल के लिए धड़कना भूल गया। उसे एक ऐसा अनजाना और गहरा एहसास हुआ जैसे उसने किसी गैर को नहीं, बल्कि खुद के ही किसी हिस्से को छू लिया हो।

ताईजी की मौत का कामिनी को कोई खास दुख नहीं था, लेकिन इस अनजान लड़की की सिसकियाँ सुनकर कामिनी की आँखों में भी आँसुओं का समंदर उमड़ आया।
“चुप हो जा बेटा… होनी को कौन टाल सकता है,” कामिनी ने रुंधे हुए गले से उसे सांत्वना दी।
वो लड़की जैसे किसी सहारे की तलाश में थी। वो तुरंत पलटी और कामिनी के गले से लिपट गई।

“उउउफ्फफ्फ्फ़…!” जैसे ही उन दोनों के जिस्म एक-दूसरे से टकराए, कामिनी के पूरे बदन में रोंगटे खड़े हो गए। एक ऐसा ‘अपनापन’, एक ऐसी ‘ममता’ की भयानक लहर कामिनी के सीने में उठी जो उसने इतने सालों में बंटी को पालते हुए भी शायद कभी इतनी शिद्दत से महसूस नहीं की थी।

खून अपनी ही रगों को पहचान रहा था, बस दिमाग इस सच से अनजान था। कामिनी ने उस लड़की को अपने सीने से और कसकर लगा लिया और उसकी आँखों से बेतहाशा आँसू झरने लगे।
मातम के इस सन्नाटे और उन दोनों के इस अनकहे मिलन के बीच… एक बहुत ही भारी, खुरदरी और रोबदार आवाज़ गूंजी।

“बस कर रमेश… शाम होने वाली है। जल्दी चलो…”
65 साल के ताऊजी की आवाज़ गूंज उठी.

ताऊजी के आदेश पर ताईजी की अर्थी को कंधा दिया गया। “राम नाम सत्य है” की गूंज के साथ रमेश और बंटी अर्थी के पीछे-पीछे श्मशान की तरफ चल दिए। आखिर रमेश उसका बाप था और इस वक़्त वो सच में सदमे में था।

मर्द सारे श्मशान की तरफ जा चुके थे। पीछे फार्महाउस के उस बड़े से आँगन में अब सिर्फ औरतों की भीड़ रह गई थी… और उसी भीड़ के बीच, वो नाज़ुक सी लड़की अभी भी कामिनी के सीने से लिपटी हुई सुबक रही थी।
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सूरज ढल चुका था और किशनगंज के उस आलीशान फार्महाउस पर एक वीरान, उजड़ा हुआ सा सन्नाटा पसर गया था। श्मशान से लौटने के बाद सब लोग अपने-अपने घर जा चुके थे। आँगन में अब सिर्फ रमेश का परिवार और गाँव की वो दो-चार महिलाएँ बैठी थीं, जो शायद इन्हीं के खेतों में काम करती थीं।

मातम वाले घर में आज चूल्हा नहीं जलना था।
तभी एक अधेड़ उम्र की महिला ने बंटी की तरफ देखते हुए कहा, “छोटे बाबू… आज हमारे घर आ जाना खाना खाने। बच्चा है, भूखा कैसे रहेगा रात भर?”
बंटी, जो इस देहाती माहौल और इस अजीब सी हवेली में खुद को एकदम फंसा हुआ महसूस कर रहा था, उसने बिना कुछ बोले बस धीरे से हाँ में सिर हिला दिया।

कामिनी भी यहाँ एकदम अनजान और गुमसुम सी बैठी थी।
तभी रमेश ने पास ही एक बड़ी सी चारपाई पर बैठे उस भारी-भरकम इंसान की तरफ इशारा किया।
“कामिनी… ये ताऊजी हैं।”
कामिनी एक घरेलू और संस्कारी औरत थी। उसने अपने आँसुओं को पोंछा और उठकर ताऊजी के पैर छूने के लिए आगे बढ़ी। कामिनी जैसे ही उनके खुरदरे पैरों को छूने के लिए नीचे झुकी… शाम के उस मद्धम अँधेरे में उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरक कर थोड़ा नीचे गिर गया।

कामिनी के वो गोरे, उन्नत और सुडौल स्तन उस गहरे गले वाले ब्लाउज़ से एकदम छलक कर ताऊजी की नज़रों के सामने आ गए।
65 साल के उस घाघ ताऊजी की भूखी आँखें एक ही सेकंड में कामिनी की उस गहरी घाटी (Cleavage) में उतर गईं। मातम का घर था, सामने लाश जल कर आई थी, लेकिन ताऊजी के अंदर का वो ‘ठरकीपना’ कामिनी के उस भरे हुए जिस्म को देखकर जाग उठा था।

ताऊजी ने आशीर्वाद देने के बहाने अपना भारी, लोहे जैसा खुरदरा हाथ कामिनी की गोरी, नंगी पीठ पर रखा… और उसे बहुत ही अजीब और मादक तरीके से सहला दिया।
“खुश रहो बहू…” ताऊजी की खुरदरी आवाज़ में एक अजीब सी हवस थी।

कामिनी के बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई। वो अचानक बहुत असहज (Uncomfortable) हो गई। उस छुअन में बड़ों वाला आशीर्वाद नहीं, बल्कि एक मर्द वाली ‘पकड़’ थी। लेकिन कामिनी ने खुद को सँभाला और उस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उसने सोचा कि शायद पत्नी (ताईजी) के गुज़र जाने के गम में ये बुज़ुर्ग होश में नहीं हैं।

कामिनी वापस आकर पलंग पर बैठ गई। उसकी नज़रें अभी भी उस लड़की पर अटकी थीं, जो एक कोने में गुमसुम सी बैठी थी।

“त… तुम कौन हो बेटा?” कामिनी ने बेहद प्यार से पूछा।
रमेश ने एक ठंडी साँस छोड़ते हुए कहा, “ये फागुन है। अनाथ थी बेचारी… ताईजी को कहीं खेत मे बेसहारा मिली थी ये नवजात.

आगे बात ताऊजी ने बढ़ाई ” तेरी ताईजी ने ही इसे सहारा दिया, इस घर में रखा और पाला-पोसा। ताईजी ही इसकी माँ-बाप, सब कुछ थीं।”

कामिनी ने जी भर के एक बार फागुन के उस मासूम, लेकिन गदराए हुए चेहरे को देखा।
“कितना सुंदर नाम है तुम्हारा… फागुन। बिल्कुल तुम्हारी तरह।” कामिनी के मुँह से बेतहाशा प्यार छलक रहा था।
फागुन कुछ ना बोली। वो बस अपनी नम आँखों से कभी कामिनी को देखती, तो कभी हवेली के ऊपर उस खुले, सूने आसमान को… जैसे ताईजी के जाने से उसका पूरा जहान उजड़ गया हो।

तभी ताऊजी की भारी आवाज़ ने उस सन्नाटे को तोड़ा।
“जा बेटा बंटी… रात हो जाएगी। यहाँ गाँव में सब जल्दी खाना खा कर सो जाते हैं। कमला के घर जा और खाना खा आ।”

बंटी हैरान रह गया। वो शहर का लड़का क्या जाने कि कमला कौन है, उसका घर कहाँ है, और गाँव की इन भूलभुलैया जैसी कच्ची पगडंडियों पर कैसे जाना है?

बंटी घबराहट में कभी कामिनी को देखता, तो कभी ताऊजी को।
तभी… उस सन्नाटे में एक बहुत ही सुरीली आवाज़ गूंजी।
“छोटे बाबू… मैं ले चलती हूँ आपको।”
ये फागुन थी। आज के दिन उसने पहली बार अपना मुँह खोला।
उफ्फ्फ्फ़…! कामिनी तो जैसे सुन्न रह गई। फागुन की आवाज़ में इतनी मिठास, इतनी नज़ाकत और इतनी कशिश थी कि कामिनी का ध्यान फागुन के चेहरे से हट ही नहीं रहा था। लगता था जैसे कोई माँ अपनी ही बेटी की आवाज़ सुन रही हो, कामिनी का दिल अंदर ही अंदर मोम की तरह पिघल रहा था।

फागुन अपनी जगह से उठी और हवेली के भारी लोहे के गेट की तरफ चल दी। बंटी चुपचाप उसके पीछे-पीछे हो लिया।

“आइए ताऊजी… छत पर चलते हैं।” रमेश ने ताऊजी की तरफ इशारा किया। दोनों मर्द हवेली के अंदर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गए। आज रात छत पर शराब के साथ कई पुराने राज़ और नए पाप खुलने वाले थे।

अब नीचे आँगन में कामिनी अकेली रह गई थी।
रमेश के जाते ही, आस-पास बैठी गाँव की वो महिलाएँ खिसक कर कामिनी के बिल्कुल पास आ गईं और उन्होंने कामिनी को चारों तरफ से घेर लिया।
शहर की इतनी गोरी, खूबसूरत और भरे-पूरे जिस्म वाली औरत को वो पहली बार इतने करीब से देख रही थीं। उनकी आँखों में एक अजीब सा कौतूहल (Curiosity) था।

“कैसी है? कौन है? इतने सालों में पहले कभी गाँव क्यों नहीं आई?” औरतों की वो कानाफूसी और उनके चुभते हुए सवाल अब कामिनी को घेरने वाले थे।

***********

हवेली के बाहर कच्चे रास्ते पर सिर्फ चाँद की ठंडी रौशनी बिछी हुई थी और दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे खेतों का सन्नाटा था। फागुन आगे-आगे चल रही थी और शहर का पला-बढ़ा बंटी उसके ठीक पीछे।
चाँदनी रात में फागुन की वो भरी हुई, मटकती हुई देहाती चाल बंटी के दिमाग की नसें ढीली कर रही थी। फागुन के हर कदम के साथ उसकी चौड़ी गांड की वो गोलाई एक अजीब सी लय में हिल रही थी। बंटी की नज़रें फागुन के उस गदराए हुए पिछले हिस्से से हट ही नहीं पा रही थीं। वो मन ही मन इस गाँव की आबोहवा और फागुन के इस कुदरती हुस्न को सराह रहा था। आज बंटी के जिस्म में एक अजीब सी बिजली दौड़ रही थी, कुछ ऐसा जो उसने शहर की मॉर्डन लड़कियों को देखकर भी कभी महसूस नहीं किया था।

अपनी इस हवस और दिमाग में उठ रही उलझन को सुलझाने के लिए बंटी ने अचानक पूछा
“अच्छा फागुन… तुम हो कौन? मेरा मतलब… इस फार्महाउस में कैसे?”
फागुन के कदम एकदम से ठिठक गए। वो अचानक से चौंक गई, जैसे किसी गहरी सोच से बाहर आई हो।
“वो… वो… छोटे बाबू…” फागुन बोलते-बोलते रुक गई, जैसे उसे अपने वजूद का कोई बहुत गहरा खालीपन याद आ गया हो।

“मैं बचपन से ही यहाँ हूँ। इसी गाँव की हूँ,” फागुन ने बिना पलटे, एक बहुत ही सीधा और छोटा सा जवाब दिया।
“मतलब तुम्हारे माँ-बाप कौन हैं? और ताईजी तुम्हारी क्या लगती थीं?” बंटी भी अपनी जगह पर रुक गया। दोनों अब उस सुनसान पगडंडी पर आमने-सामने खड़े थे।
बंटी जानना चाहता था फागुन ताईजी की क्या लगती है?

ताईजी का नाम सुनते ही फागुन के चेहरे के भाव एकदम बदल गए। उसका दिल रुआंसा हो गया।
“सुबुक… ताईजी ही तो सब कुछ थीं मेरा… मेरे माँ-बाप, मेरा जहान, सब वही थीं…” फागुन फूट-फूट कर रोने लगी।
उसने रोते हुए अपनी चुन्नी (दुपट्टे) को उठाया और अपने आँसू पोंछने लगी। चुन्नी हटने की वजह से उसके वो उन्नत और सुडौल स्तन उस सादे से कुर्ते को फाड़कर बाहर झांकने को बेताब हो गए।

चाँद की रौशनी में उन भारी गोलाइयों का वो उभार देखकर बंटी की साँसें अटक गईं। बंटी के दिल और दिमाग में फागुन का वो मासूम, रोता हुआ चेहरा और उसका वो कातिलाना, कामुक जिस्म गहराई तक उतरता जा रहा था।
फागुन ने आँसू पोंछे और वापस आगे की तरफ चल दी। बंटी ने फिर से उसे कुरेदना शुरू किया।

“तो… इसका मतलब ये फार्महाउस, ये ज़मीन… ये सब कुछ तुम्हारा है?” बंटी कुछ और ही राज़ जानना चाहता था।
फागुन पलटी और एक अजीब सी बेबसी के साथ मुस्कुराई।
“क्या छोटे बाबू… पहले खाना तो खा लो, बहुत सवाल करते हैं आप। मुझे क्या पता ये ज़मीन किसकी है? पता है… मैंने तो आज तक शहर देखा ही नहीं है। बस इसी हवेली की चारदीवारी, यहाँ के खेत, और ताईजी की सेवा… यही मेरा सब कुछ था।”

फागुन के चेहरे पर अचानक एक गहरी चिंता की लकीर तैर गई… ना जाने कल क्या होगा? हवेली में अब ताईजी नहीं थीं, और ताऊजी की वो गंदी नज़रें फागुन को भी डराती थीं। बंटी ने फागुन के चेहरे पर वो डर साफ़ महसूस किया।

बंटी शायद आगे कुछ और पूछता कि फागुन ने सामने इशारा किया।

“लो… कमला काकी का घर आ गया। वो सामने…”
सामने ही एक कच्चा-पक्का मकान था जिसके बाहर दालान में एक पीला सा बल्ब जल रहा था। दोनों जैसे ही पास पहुँचे…
“फागुन… मेरी बहन… तू ठीक तो है ना?” घर के अंदर से एक जवान लड़की आँधी की तरह भागती हुई आई और सीधा फागुन के गले से जा लगी।
उन दोनों लड़कियों के आपस में टकराते ही, उनके भरे हुए स्तन एक-दूसरे से कसकर दब गए और उनकी गोलाइयाँ कुर्ते के बाहर की तरफ उछल पड़ीं। बंटी की आँखें फटी की फटी रह गईं।

“साला… इस गाँव की तो हर लड़की एकदम माल है बे!” बंटी ने मन ही मन खुद से बात करते हुए अपने पैंट के ऊपर से ही अपने उस कड़े हो चुके लंड को थोड़ा एडजस्ट किया। गाँव के इस नंगे यौवन ने बंटी का सारा शहरी गुरूर चूर-चूर कर दिया था।
“मैं ठीक हूँ प्रमिला…” फागुन ने अपनी सहेली को गले से लगाया।

फिर उसने मुड़कर अपनी चहकती हुई, सुरीली आवाज़ में कहा, “आइए छोटे बाबू… ये मेरी पक्की सहेली है प्रमिला। और प्रमिला, ये हैं छोटे बाबू… शहर से आए हैं, रमेश बाबू के बेटे।”

पीले बल्ब की उस मद्धम रौशनी में बंटी को फागुन की कोई बात सुनाई नहीं दे रही थी। उसकी नज़रें सिर्फ फागुन के उन लाल, रसीले होंठों पर जमी हुई थीं।
असल में… बंटी के दिमाग में एक भयानक साइकोलॉजिकल खेल चल रहा था। वो हमेशा से अपनी ‘माँ’ कामिनी की उस गदराई हुई जवानी और उसके चौड़े जिस्म की तरफ आकर्षित था। और आज, वही मादकता, वही कशिश और कामिनी का वही अक्स उसे फागुन में साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था। फागुन बिल्कुल कामिनी की ही परछाई लग रही थी।

उसी हवस और सम्मोहन में डूबा हुआ बंटी, किसी चाबी भरे रोबोट की तरह फागुन के पीछे-पीछे उस देहाती झोपड़ी के अंदर चला गया।
************

हवेली की उस चौड़ी और अँधेरी छत पर सिर्फ चाँद की मद्धम रौशनी और हवा की सनसनाहट थी। छत के एक कोने में रमेश और ताऊजी बैठे थे। बीच में कच्ची शराब की बोतल और दो गिलास रखे थे।
“सुबुक… मेरी सुगंधी… मेरी बीवी चली गई…” 65 साल का वो भारी-भरकम ताऊजी अपने हाथों में मुँह छुपाकर घड़ियाली आँसू बहा रहा था।
“गुटूक… गटक… आआह्ह…” रमेश ने बिना पानी मिलाए शराब का एक कड़वा घूंट सीधे हलक के नीचे उतारा और गिलास ज़मीन पर पटक दिया।

“अबे बस कर अपना ये ढोंग… साले मादरचोद!” रमेश की आँखें नशे और गुस्से से लाल सुर्ख हो गईं। “साले ताऊ… क्या मैं तुझे जानता नहीं हूँ? जब ताईजी को तेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, जब वो बच्चा पैदा नहीं कर पाई थी, तब तो तूने और तेरे खानदान ने उसे धक्के मार कर घर से निकाल दिया था! मरने के लिए छोड़ दिया था उसे सड़कों पर… और आज साले रो रहा है?”

ताऊजी ने डरते हुए अपना रोना बंद किया और कांपते हाथों से अपना पेग बनाते हुए बोला, “रमेश बेटा… ऐसा मत बोल। सच में दुख तो बहुत हो रहा है… आख़िर बीवी थी मेरी वो।”
“हट साले! बीवी थी…?” रमेश ने ज़मीन पर थूकते हुए कहा।

रमेश के सामने ताऊजी की हैसियत इस हवेली के एक मामूली नौकर से ज़्यादा कुछ नहीं थी। वो जो चौड़ा सीना, सफेद मूंछें और भारी आवाज़ थी… वो सब सिर्फ गाँव वालों को डराने के लिए एक खोखला दिखावा था। असलियत में ताऊजी एक बुज़दिल चूहा था।

सालों पहले, जब ताऊजी एकदम कंगाल और बेसहारा हो गया था, तब उसे कहीं से भनक लगी थी कि उसकी वो निकाली हुई बीवी सुगंधा (ताईजी) अब कोई बेचारी औरत नहीं रही। उसने सुना था कि किशनगंज में उसका एक आलीशान फार्महाउस है और उसके पास बहुत माल आ गया है। ये सुनकर वो लालची कुत्ता अपनी दुम दबाकर इस हवेली तक उसे ढूंढता-खोजता चला आया था।

लेकिन ताईजी अब वो पुरानी, भोली-भाली सुगंधा नहीं रह गई थी। 1990 की उस खौफनाक रात के बाद से ताईजी का जीवन पूरी तरह बदल गया था।

रमेश और शमशेर के साथ मिलकर उन्होंने जो दौलत और रुतबा कमाया था, उससे ताईजी का गाँव में बहुत बड़ा नाम हो गया था। सरपंच से लेकर गाँव का हर बड़ा आदमी ताईजी को इज़्ज़त की नज़र से देखता था। सब यही मानते थे कि ताईजी बाहर से आई कोई बहुत बड़ी हस्ती हैं।
जब आज से 4 साल पहले ताऊजी इस हवेली की चौखट पर भिखारी बनकर आया था, तो रमेश उसे देखकर आगबबूला हो गया था। वो तो उसे उसी वक़्त गोलियों से भून देना चाहता था। लेकिन वो ताईजी की ही विनती और उनका बड़कपन था कि उन्होंने अपने उस पापी पति को इस हवेली के एक कोने में टुकड़े तोड़ने के लिए रख लिया था।

रमेश ने सिगरेट सुलगाई और ताऊजी को घूरते हुए बोला, “तेरी ये गंदी नज़रें शुरू से ही उस फागुन पर हैं ना? साले बुड्ढे… भूल गया कि ताईजी ने तुझे क्या चेतावनी दी थी?”

ताऊजी का सिर शर्म और डर से झुक गया।
पूरा गाँव जानता था कि ताईजी को फागुन से कितना विशेष प्रेम था। फागुन इस हवेली की जान थी और ताईजी ने उसे एक ढाल की तरह छुपा कर रखा था।

किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि फागुन की तरफ एक गलत नज़र भी उठा ले। लेकिन अब… अब ताईजी नहीं रही थीं। ताऊजी के अंदर का वो भूखा भेड़िया आज़ाद हो चुका था और फागुन का वो डर एकदम जायज़ था।

“अच्छा… अब ये पुरानी बकवास बंद कर और काम की बात सुन बे ताऊ…” रमेश ने अपनी आवाज़ को एकदम खूंखार और नीचा करते हुए एक कड़क आर्डर मारा।
“वो तहखाने की चाबी कहाँ रखी है!”

तहखाने का नाम सुनते ही ताऊजी के चेहरे का वो बचा-खुचा रोब भी मुरझा कर झड़ गया।
“ये… ये ले बाबू… मेरे पास ही है।” ताऊजी ने कांपते हुए अपनी धोती की डब (कमर) से एक पुरानी, भारी और जंग लगी लोहे की चाबी निकाली।

“आज सुबह ही… तेरी ताई ने मरने से पहले मुझे दी थी… ताकि मैं तुझे दे सकूँ।”

रमेश ने चील की तरह झपट्टा मारा और उस चाबी को अपने कब्ज़े में ले लिया। चाबी मुट्ठी में आते ही रमेश के चेहरे पर एक शैतानी और लालची मुस्कान तैर गई। उसने फिर से शराब की बोतल मुँह से लगा ली।
वो रोबदार, भारी-भरकम ताऊजी अब सच में रमेश के सामने एक भीगी बिल्ली बना बैठा था। हवेली के नीचे बने उस अँधेरे ‘तहखाने’ में ऐसा कौन सा पाप, ऐसा कौन सा राज़ दफ्न था… जिसकी चाबी ताईजी आख़िरी साँस तक अपने सीने से लगा कर रखती थीं?
***************

फार्महाउस के विशाल आँगन से गाँव की वो इक्का-दुक्का औरतें भी अब धीरे-धीरे अपने घरों की तरफ लौट चुकी थीं। पूरे फार्महाउस पर एक वीरान, उजड़ा हुआ और काटने वाला सन्नाटा पसर गया था। बंटी और फागुन पहले ही जा चुके थे, और रमेश छत पर ताऊजी के साथ शराब में डूबा था।

नीचे आँगन में अब कामिनी बिल्कुल अकेली थी।
दिन भर की गहमागहमी और अर्थी के उस मातम में कामिनी का दिमाग भटका हुआ था, लेकिन अब… जैसे ही वो सन्नाटा छाया, कामिनी के पूरे जिस्म की नसें ढीली पड़ने लगीं। कल रात शमशेर के उन वहशी धक्कों और उस जानवर जैसी चुदाई की वो ‘मीठी और गहरी टीस’ अब लौट आई थी।

कामिनी उसी पलंग पर बैठी थी। जैसे ही उसने थोड़ा हिलने की कोशिश की, उसके बदन के निचले हिस्से और उसकी भारी गांड के पोर-पोर में एक ऐसा दर्द उठा कि उसके मुँह से सिसकी निकल गई “आह्ह… उफ्फ्फ!”

कल रात शमशेर ने उसके उस भरे हुए जिस्म को जिस बेदर्दी से रौंदा था, गांड खोल के रख दी थी, उसका एहसास अब इस सन्नाटे में उसे पूरी तरह जकड़ रहा था।
नाभि के नीचे उसे भारीपन महसूस हो रहा था, सुबह से वो पेशाब करने ही नहीं जा पाई थी.
कामिनी को बहुत तेज़ पेशाब करने की तलब महसूस हुई।

उसे इस हवेलीनुमा बिल्डिंग के बाथरूम का कुछ अंदाज़ा नहीं था, कौन चीज कहाँ है, मालकिन तो मर गई, ये रमेश छत पे उस बूढ़े के साथ बैठा है.

कामिनी को ताऊजी की याद आते ही वो स्पर्श भी याद गया जब वो पैर छूने झुकी थी, तब ताऊजी उसके स्तनों को घूर रहे थे, उसे अजीब तरिके से छुवा भी था.
कामिनी के चेहरे पे अजीब सी मुस्कान तैर गई.
चूरररर…. चरररर…. उसने चारपाई से उठकर आँगन के चारों तरफ नज़र दौड़ाई।
उफ्फ्फ्फ़… चत.. कमर को सीधा किया और आस पास का जायजा लेने लगी.

हवेली के ठीक पीछे की तरफ एक हल्की सी ढलान थी, जहाँ हरी-हरी जंगली घास उगी हुई थी और उसके आगे घने खेत शुरू हो जाते थे। वहाँ एकदम घुप्प अँधेरा और सुनसानपन था।

“कोई नहीं है… जल्दी से यहीं ढलान के पास फारिग हो लेती हूँ,” कामिनी ने मन ही मन सोचा।
वो अपने दर्द को दबाते हुए, भारी कदमों से उस ढलान की तरफ बढ़ गई। रात की ठंडी हवा उसके पसीने से भीगे चेहरे को छू रही थी। घास पर पहुँचकर कामिनी ने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा हवेली की तरफ से कोई रौशनी या आवाज़ नहीं आ रही थी।

फार्महाउस के पीछे वो ढलान एकदम सुनसान और घुप्प अँधेरे में डूबी हुई थी। रात की सर्द हवा खेतों की लंबी-लंबी जंगली घासों के बीच से सरसराती हुई गुज़र रही थी।
कामिनी अपने जिस्म के उस भारीपन और कल रात के उस खौफनाक दर्द को सहते हुए ढलान के पास पहुँची। उसने चारों तरफ देखा कहीं कोई आहट नहीं थी, बस दूर झींगुरों की आवाज़ें गूंज रही थीं। शहर की वो सुरक्षित चारदीवारी अब बहुत पीछे छूट चुकी थी, और इस अजनबी गाँव का ये अँधेरा उसे अंदर तक डरा रहा था।

खुद को उस अँधेरे में पूरी तरह सुरक्षित मानकर, कामिनी ने कांपते हाथों से अपनी सूती साड़ी को थोड़ा ऊपर किया और उस लंबी घास के बीच बैठ गई। चाँद की वो बहुत ही मद्धम, पीली सी रौशनी बादलों के पीछे से छनकर आ रही थी। उस धुंधली रौशनी में कामिनी का वो गोरा, भरा हुआ अक्स उस हरी घास के बीच बिल्कुल अलग ही चमक रहा था।

कामिनी ने आँखें बंद कर लीं। ठंडी हवा के झोंके उसके पसीने से भीगे चेहरे और खुली गर्दन को छू रहे थे। वो इस पल दुनिया से बेखबर, अपनी उस टीस और दर्द को हल्का कर रही थी।
*************

थोड़ी देर पहले हवेली की छत पर

“गुटूक… गटक…” रमेश अपनी बोतल में मगन था।
तभी ताऊजी अपनी उस खुरदरी कुर्सी से उठा। उसने अपनी धोती को थोड़ा ढीला किया और अपनी भारी आवाज़ में रमेश से बोला
“रमेश बाबू… हम आते हैं ज़रा। बहुत तेज़ पेशाब लगा है।”
रमेश ने बिना देखे बस हाथ हिला दिया।
ताऊजी अपने भारी, खुरदरे कदमों से हवेली की सीढ़ियां उतर कर नीचे आँगन में आ गया। आँगन पूरा खाली था।
ताऊजी ने अपनी धोती का एक सिरा पकड़ा और वो उसी दिशा में मुड़ गया जहाँ से ताज़ी हवा आ रही थी… फार्महाउस के पीछे वाली उसी ढलान की तरफ!

ताऊजी की वो लालची, शिकारी आँखें अँधेरे को चीरने की आदी थीं। जैसे ही वो ढलान के पास पहुँचा, उसके कदम अचानक रुक गए।

सामने, कुछ ही मीटर की दूरी पर… हरी घास के बीच कामिनी खड़ी थी, बेचैन सी… उसने गर्दन इधर उधर घुमाई लेकिन हाय रे जल्दबाज़ी पीछे ना देख सकी.

कामिनी धीरेधीरे अपनी साड़ी उठाने लगी, पीछे ताऊजी की तो सांसे ही अटक गई, वो मूर्ति की तरह जड़ हो गया था, कामिनी ने अपनी साड़ी पूरी एक बार मे कमर तक उठाया ली,

उसकी वो नंगी, गोरी और भारी जांघें चाँदनी में किसी सफेद संगमरमर की तरह चमक रही थीं।

एक 65 साल का वो घाघ और ठरकी बूढ़ा, जो अभी कुछ देर पहले ही कामिनी की पीठ पर अपना गरम हाथ फेर चुका था… अब अपनी ही बहू को इस आधी रात में, इस हालत में देख रहा था।
इसकी नजरें पिंडलियो से शुरू हो कर ऊपर चढ़ने लगी, चढ़ती गई सांसे और नजरें दोनों.
नजरें वहाँ रुकी जहाँ जांघो के ठीक ऊपर दो सुडोल गोल गांड के हिस्से एक छोटी सी चड्डी मे कसे हुए तड़प रहे थे.
“उउउफ्फफ्फ्फ़…. ” कामिनी कर मुँह से एक हलको सी सिस्कारी निकली, उसके दोनों हाथ के अंगूठे, पैंटी के इलास्टिक मे फसे….
और फिर गया…. सररररररररर…… चड्डी घुटनो पर जा टिकी.
और कामिनी झुकती चली गई, गांड के पाट एक दूसरे से दूर जाने लगे….

कामिनी पैरो के बल बैठ गई… कोई 2सेकंड बाद ही चरररररर… छररररर…. ससससर.. पिस्स्स्स… की तेज़ सिटी उस सुनसान मे ऐसे गुंजी जैसे ट्रैन ने छूटने से पहले संकेत दिया हो.
पीछे ताऊजी मरने की हालात मे जा चूका था, ऐसा करिश्मा ऐसी खूबसूरती उस गवार ने कभी ना देखी थी.
शराब ना पिया होता तो पक्का दिल की धड़कन रुक ही जाती.
कामिनी की चुत से निकलता पीला पेशाब चांदनी रौशनी मे पिघले सोने की तरह चमक रहा था.

हवा के झोंके के साथ कामिनी की चुत से निकली वो नशीली, कच्ची खुशबू सीधा ताऊजी के नथुनों से टकराई।
ताऊजी के अंदर का वो जानवर पूरी तरह से बौखला गया। उसने अपनी धोती को आगे से अपनी मुट्ठी मे बुरी तरह जकड लिया.
कामिनी आंखे बंद किये मूत्र विसर्जन का आनंद ले रही थी.
इस्स्स्स…. उउउफ़फ़फ़फ़…. क्या राहत थी, पेशाब की हर एक बून्द के साथ उसका जिस्म खाली हो रहा था, हल्का महसूस कर रही थी.

1,2 मिनिट तक कामिनी मूतती ही रही, सिटी बजती ही रही… चुत से निकले पेशाब ने जमीन को तृप्त कर दिया था.
कुछ ही देर बाद कामिनी उठी, पैंटी ऊपर चढाई और पलट जर चल दी.
अँधेरे मे बूढ़ा ताऊ कहाँ गया पता ही नहीं, कामिनी जिस रास्ते गई थी, वापस उसी रास्ते आ कर आंगन मै बैठ गई…
“अरे बहु रानी कहाँ चली गई थी ” आंगन मे गांव की ही रखा औरत बैठी थी.
“वो… ववो… कामिनी ने छोटी ऊँगली दिखा दी.
“ये लीजिये गांव का शुद्ध दूध पी लीजिये, भूख मे राहत मिलेगी ”
कामिनी को वाकई भूख लगी थी.
गट… गट… गटक… दूध पीने लगी.
गला सूखा था, भूख थी, लेकिन दिमाग कहीं और भटक रहा था। कल रात शमशेर की वहशी चुदाई की टीस अभी भी उसके निचले हिस्से में थी,

अभी थोड़ी देर पहले ढलान पर पेशाब करके आई थी तो बदन में कुछ राहत तो हुई थी, मगर अंदर ही अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी।

दूसरी तरफ उसी ढलान पर… वहाँ अब अंधेरे से एक भारी-भरकम साया निकला।

ताऊजी।

65 साल का वो घाघ बूढ़ा, धोती को कमर से ढीला करके, आँखें लाल-लाल, साँसें फुली हुई। उसकी भारी तोंद हिल रही थी।

ताऊ ठीक उसी जगह खड़ा था, जहाँ कामिनी के पेशाब से जमीन मे खड्डा बन गया था, चाँदनी की हल्की रोशनी में उसका चेहरा विकृत हो चुका था।

उसने एक हाथ से अपनी धोती का आगे वाला हिस्सा उठाया। उसके लंड पहले से ही पूरा खड़ा था मोटा, काला, नसों वाला, सिरा चमकता हुआ। उसने अपनी मुट्ठी में उसे कसकर पकड़ लिया और धीरे-धीरे मसलने लगा।
“उफ्फफ्फ्फ़… बहू रानी…” वो फुसफुसाया।

अचानक ताऊ घुटनों के बल बैठ गया। उसकी हथेली उस गीली मिट्टी पर गई जहाँ कामिनी का पेशाब अभी भी ताज़ा था। हरी घास और मिट्टी दोनों जगह गीली-गीली, चमकती हुई। ताऊजी ने अपनी भारी हथेली भर ली मिट्टी, पानी, कामिनी की चूत का वो गर्म तरल… सब कुछ।

और फिर…

सिंफ्फ्फ्फ्फ्फ़… शनिफ्फ्फ्फ्फ़… कस-कस कर…

उसने उस गीली मिट्टी को अपनी नाक से चिपका लिया और जोर-जोर से सूंघने लगा। आँखें बंद कर उस मिट्टी से निकलती कामिनी के पेशाब और उसकी चुत की खुसबू को महसूस करने लगा, अपने जिस्म मे उतारने लगा.

“आअह्ह्ह्ह… बहू रानी… क्या खुशबू है तेरी चूत की… उफ्फ्फ्फ़…..”

उसकी आवाज़ काँप रही थी। एक हाथ में मिट्टी पकडे सूंघ रहा था, तो दूसरे हाथ से अपना लंड कस-कस कर हिला रहा था..

“आअह्ह्ह…. बहुरानी… आअह्ह्ह….. उउफ्फफ्फ्फ़…. अगर तेरी चूत का ये पानी पीने को मिल जाए… तो… तो पक्का स्वर्ग नसीब हो जाये”

आअह्ह्ह…. बहुरानी… आअह्ह्ह….. उउफ्फफ्फ्फ़…. उस पर उत्तेजना इस कद्र हावी हो गई की हाथ मे पकड़ी मिट्टी अपने चेहरे पर पोतने लगा,
वहसी दरिंदा था ताऊ एक नंबर का, आज ही उसकी पत्नी मरी थी और वो अपनी बहु की चुत चाटने का सपने देख रहा था.

 

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