मुझे प्यार करो 8

माँ बेटा

गर्मी की छुट्टियों में दोपहर के समय सुगंधा के घर मेंअंकित की आंखों के सामने जो कुछ भी हो रहा था जो कुछ भी उसे दिखाई दे रहा था उसे नजारे में मदहोशी और नशा ही नशा था जो कि इस नशे को अंकित अपनी आंखों से पी रहा था,,, इस अद्भुत नशे को पीने के लिए होठों की नहीं आंखों की जरूरत थी और इस नशे को अंकित अपनी आंखों से पीकर मस्त हो रहा था अपनी आंखों के सामने इतने अद्भुत और मदहोश कर देने वाला दृश्य देखकर उसके छक्के छूटने लगे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी आंखों के सामने कोई गंदी फिल्म चल रही है उसका हर एक दृश्य कामुकता और मदहोशी से भरा हुआ था एक औरत को नहाते हुए देखना शायद हर एक मर्द का सपना और उसकी चाहत होती है,,,, लेकिन औपचारिक रूप से नहाते हुए एक औरत को देखना भी हर मर्द के लिए मदहोशी और वासना का सबब बन जाता है। और यही हाल अंकित का भी हो रहा थालेकिन यहां दृश्य जो कुछ भी उसकी आंखों के सामने भजा जा रहा था वह कोई औपचारिक नहीं था यह सुगंधा की तरफ से अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने का एक जाल साज युक्ति थी जिसे उसका बेटा पूरी तरह से फंसता चला जा रहा था।

और वैसे भी अंकित अपनी मां के इस माया जाल में पूरी तरह से फंस जाना चाहता था,,, इसमें कोईकिसी भी प्रकार का दबाव नहीं था बस एक दूसरे के प्रति आकर्षण था जो धीरे-धीरे वासना में तब्दील होती जा रही थी और एक दूसरे को पाने की चाहत बढ़ती जा रही थी,,,, इसमें ना तो सुगंध की तरफ से कोई जोर जबरदस्ती थी कि नहीं तु मुझे नहाते हुए देख और ना ही अंकित की तरफ से कोई ऐसा दबाव था कि उसे यह दृश्य देखना ही पड़ेगा अपनी मां को नहाते हुए देखना ही पड़ेगा ऐसा बिल्कुल भी नहीं था जो कुछ भी हो रहा था इसमें दोनों की सहमति थी,,,सुगंधा नहाते हुए अपने अंगों का प्रदर्शन करना चाहती थी अपने बेटे के सामने उसे दिखाना चाहती थी और उसका बेटा अपनी मां को नहाते हुए देखना चाहता था उसके खूबसूरत अंगों को देखना चाहता था,,, अपनी मां के मदमस्तजवानी से भरी हुई पिछवाड़े को देखकर जो की पेटिकोट कमर तक उठ जाने की वजह से उसकी आधी गांड एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, इस अद्भुत नजारे को देखकरअंकित का लंड जवानी से फूलने लगा था और उसे इस बात का डर था कि कहीं उसके लैंड पीने से फट न जाए,,,अंकित को ऐसा लग रहा था कि उसकी मां को मालूम नहीं है कि वह कपड़े छत पर डालकर नीचे आ गया है उसकी आंखों के सामने खड़ा है उसे ऐसा ही लग रहा था कि उसकी मां अनजान है तभी इस अवस्था में नहा रही है जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था अंकित के आने की भनक उसकी मां को पहले ही लग चुकी थी,,, जिसके चलते उसने अपनी पेटीकोट को अपनी आधी गांड तक चढ़ा ली थी। क्योंकि वह अपने बेटे को अपनी गांड दिखाना चाहती थी और अपने बेटे के सामने अपनी भरी हुई जवान परोस चुकी थी जिसका भोग लगाने के लिए अंकित बेताब नजर आ रहा था,,,।

कुछ क्षण तक अंकित इस अद्भुत नजारे को देखकर पूरी तरह से पागल हुआ जा रहा था और पेंट के ऊपर से अपने लंड कोजोर-जोर से दबा रहा था मसल रहा था ऐसा लग रहा था की इस अद्भुत नजारे को देखकर वह पेंट के ऊपर से अपने लंड को दबा दबा कर तोड़ डालेगा,,,, लेकिन तभी अपने बेटे को यह जताते हुए सुगंधा उसकी तरफ घूम गई की उसके आने की भनक उसे लग गई है वह एकदम से अपने बेटे की तरफ घूमते हुए बोली,,,।

तू कपड़े डाल कर आ गया बेटा,,,,(और उसका ऐसा कहते हुए उसकी तरफ घूमने था कि अपनी आंखों के सामने के नजारे को देखकरअंकित की आंखें फटी की फटी रह गई वह पूरी तरह से मदहोशी के सागर में डूबने लगा वह फटी आंखों से अपनी मां की मस्त-मस्त जवानी को देखने से अपने आप को बिल्कुल भी नहीं रोक पाया,,,और शायद उसकी जगह कोई भी बेटा होता तो अपनी मां के इस रूप को देखने से शायद अपने आप को बिल्कुल भी नहीं रोक पाता भले ही वह कितना ही संस्कारी और मर्यादा से भरा हुआ हो वह इस नजारे को देखने से अपने आप को बिल्कुल भी नहीं रोक पाता क्योंकि उसकी आंखों के सामने का नजारा ही कितना अद्भुत और मदहोशी भरा था कि अपनी मां के सामने भी वह उसे नजारे को देखता ही रह गया था,,,, जिस तरह से सुगंधा अपने बेटे के आने की भनक पातें ही तुरंत अपनी पेटीकोट को अपनी आधी गांड तक उठा दी थी उसी तरह से जब अंकित ठीक उसके पीछे खड़ा होकर उसे नहाते हुए देख रहा था उसकी गांड की दर्शन कर रहा था उसी समय नहाते हुए सुगंधा अपने पेटिकोट को आगे से क्योंकि उसके बदन से पानी में बिकने से पूरी तरह से चिपक गया था अपने उसे किले पेटीकोट को इस कदर हल्का सा ऊपर की तरफ उठा दीजिए उसकी बुर एकदम साफ दिखाई दे रही थी और यह वह जानबूझकर अपने बेटे को दिखाना चाहती थी,,, और अंकित अपनी मां की बुर देखकर पूरी तरह से पागल हो गया था उसकी सांसें उखड़ने लगी थीऔर सुगंधा इस तरह से अपने ऊपर पानी डाल रही थी मानो कि जैसे वह पूरी तरह से अनजान होगी उसके बदन का कौन सा हिस्सा पूरी तरह से उजागर हो गया है।

तू आ गया बेटा बस इतना कहकर बात पूरी तरह से नहाने में मशगूल हो गई थी या यूं कह लो की अपने बेटे को अपनी बुर दिखाने में पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी,,,,अंकित फटी आंखों से अपनी मां के उस रूप यौवन का रस अपनी आंखों से पी रहा था जो कि इस समय पावरोटी की तरह पूरी तरह से फूल चुकी थी,,,, तकरीबन 2 मीटर जितनी दूरी पर अंकित खड़ा था और यहां से सुगंधा के खूबसूरत बदन का अंग अंग उसे साफ दिखाई दे रहा था,,,लेकिन इस समय अंकित को अपनी मां के खूबसूरत बदन का कुछ और दिखाई नहीं दे रहा था बस उसकी बुर दिखाई दे रही थी जो की उत्तेजना के मारे पावरोटी की तरह भूल चुकी थी और उसके बदन सेगिरने वाला पानी उसकी दोनों टांगों के बीच के उसे पतली दरार से होकर गुजर रही थी जिस पर हल्के हल्के बाल उगे हुए थे वैसे तोउसकी मां की बुर पूरी तरह से चिकनी ही थी लेकिन बस हल्के हल्के बाल आने की शुरुआत हुई थी और उसे पर पानी की बूंदे का इकट्ठा हो जा रही थी जो की और ओस की बूंद की तरह दिखाई दे रही थी,,,, और उस औस की बूंद पर अपने होंठ रखकर अंकित उस रस को पीना चाहता था अपनी मां की बुर को चाटना चाहता था जैसे राहुल की मां की बुर को जाता थावैसे तो एक बार अपनी मां की बुर पर होठ रखने का उसे मौका मिल चुका था लेकिन राहुल की मां की तरह उसकी बुर चटाई करने का मौका अभी हाथ नहीं लगा था,,,।

कुछ देर तक सुगंधा अपने बेटे को अपनी बुर दिखाती रही और अंकित अपनी मां की बुर देखता रहासुगंध को अच्छी तरह से मालूम था कि उसके बेटे की हालात पूरी तरह से खराब हो चुकी है उसकी बुर देखकर पहले वह अपनी गांड दिखाइए औरअपने बेटे की हालत को पूरी तरह से खराब कर दी और जैसे ही वह थोड़ा समझने की कोशिश किया तो उसे उसकी तरफ घूम कर उसे अपनी बुर दिखा दी शायद इस दोहरे हमले को उसका बेटा चल नहीं पाया था इस बात का एहसास सुगंधा को अच्छी तरह से हो रहा था क्योंकि वह उसके पेट में तंबू की हालत को देख रही थी जो की पूरी तरह से फटने की कगार पर आ चुका था,,, सुगंधा को इस बात का भी डर लग रहा था कि कहीं देखकर ही उसके बेटे का पानी निकल जाए,,,,नहाते हुए अपने ऊपर पानी डालते हुए वह नजर नीचे करके अपने बेटे की हालत और उसकी हरकत को देख रही थी उसकी हर एक हरकत सुगंधा के तन-बाद में आग लग रहे थे क्योंकि इस समय उसके बेटे कहां से उसके लंड पर था जो की पेंट के ऊपर से ही वह जोर-जोर से दबा रहा था वह अपने बेटे की ईस स्थिति को अच्छी तरह से समझ सकती थी,,,वह समझ सकती थी कि उसे इस रूप में देखकर उसके बेटे पर क्या गुजर रही होगी उसके बारे में क्या सोच रहा होगा,,,,इस बात को सोचकर उसके मन में गुदगुदी सी होने लगी कि जिस गुलाबी छेद को उसका बेटा अपनी आंखों से देख कर पागल हो रहा है उसी गुलाबी छेद में वह अपना लंड डालने के लिए तड़प रहा होगा,,, और उसकी यह सड़क देखकर सुगंधा को मन ही मन प्रसन्नता हो रही थी,,, उसे इस बात की भी खुशी थी कि उसका जवान बेटा उसकी जवानी देखकर पागल हो रहा है इसका मतलब साफ था कि उसमें अभी बहुत कुछ बचा हुआ था उसकी जवानी बरकरार थी,, जवानी की आग बरकरार थी,,, अपनी जवानी की गर्मी में वह किसी भी मर्द को पिघलाने में वह अभी भी पूरी तरह से सक्षम थी।

अंकित की बोलती बंद हो चुकी थीउसकी फटी आंखें आश्चर्य से भरा चेहरा उसके मन में क्या चल रहा है सब कुछ बयां कर रहा था और इस स्थिति में अपने बेटे को देखकर सुगंधा मन ही मन खुश हो रही थी और फिर वह धीरे से बोली,,,,।

अंकित तू भी जाकर नहा ले तेरे कपड़े भी गीले हो चुके हैं,,,,(लेकिन इस दौरान वह अपने पेटिकोट के कपड़े को नीचे करने की बिल्कुल भी शुध नहीं ली,,,अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां की बुर अनजाने में एकदम साफ दिखाई दे रही है या जानबूझकर उसकी मां उसे अपनी बुर दिखा रही है,,, इसका जवाब अंकित के पाससंजोया हुआ था क्योंकि कुछ देर पहले ही उसे इस बात का एहसास हो गया था कि जो कुछ भी हो रहा था उसकी मां सब कुछ सोची समझी साजिश के तहत कर रही थी वह उसे सबको दिखाना चाहती थी क्योंकि पंखा साफ करते हुए उसकी मां पेंटी नहीं पहनी थी और कुछ देर पहले जब वह अपनी मां को बिस्तर पर लेकर गिरा था सबसे अच्छी तरह से एहसास हुआ था कि उसकी मां चड्डी पहनी हुई थी जिसका मतलब साथ था कि उसकी मां खुद उसे अपनी बुर दिखाना चाहती थी,,, वह अपने मन में यही सब सो रहा था कि उसे इस तरह के ख्यालों में खोया हुआ देखकर उसकी मां फिर से बोली,,,)

क्या हुआ क्या सोच रहा है तू भी आकर नहा ले तेरे कपड़े भी गिले हो गए हैं,,,।(अपनी मां की बात सुनकरअंकित की तंद्रा भंग हुई और ऐसा लगा कि जैसे वह नींद से जागा हो वह एकदम से हडबडाते हुए बोला,,,)

ककककक,,,,,ममममम,,, मैं तुम्हारे साथ,,,,, कैसे नहा सकता हूं,,,,।

(अपने बेटे की हड़बड़ाहट पर सुगंधा को हंसी आ गई और वह हंसते हुए बोली,,,,)

इसमें क्या हो गया क्या तू मेरे साथ नहीं नहा सकता मेरे साथ तो मेरा हाथ बंटा सकता है कपड़े धो सकता है घर की सफाई कर सकता है तो नहा क्यों नहीं सकता,,,,,,,।

लेकिन,,,, एक मां के साथ एक बेटा कैसे नहा सकता है,,,।

अरे नहा सकता हैऔर वैसे भी घर में हम दोनों के सिवा तीसरा तो कोई है नहीं अगर तीसरा कोई होता तो शायद ऐसा संभव नहीं होता कि उसकी हाजिरी में एक मां बेटे खुलकर ना आएइस समय कोई नहीं है तो तू आराम से मेरे साथ नहा सकता है देख तो सही मौसम कितना अच्छा है आसमान कितना खुला हुआ है,,,,,,,(अपनी मां के कहने पर अपने आप ही अंकित की नजर आसमान की तरफ चली गई जो कि वाकई में एकदम आसमानी रंग का एकदम साफ दिखाई दे रहा था गर्मी के महीने में आसमान एकदम साफ दिखाई देता है और घर के पीछे से यह नजारा कुछ और भी अद्भुत नजर आता था,,,अंकित इधर-उधर नजर घुमा कर देखने लगा उन दोनों को देखने वाला इस समय वहां कोई नहीं था और वैसे भी घर के पीछे वाले भाग पर वह दोनों खड़े थे जहां पर किसी के देखने की आशंका बिल्कुल भी नहीं थी उसके पीछे मैदानी मैदान था और वह थोड़ा निचले स्तर पर था जहां से कोई अगर गुजर कर जाए तो भी इस और देखने की उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी,,, अंकित कुछ बोल नहीं रहा था बस अपनी मां की बात को सुन रहा था और सुगंधा को अपनी बेटे की नजर का अच्छी तरह से पता था वह जानती थी कि उसकी नजर अभी तक उसकी बुर पर ही टिकी हुई थी अभी तक वह उसकी चूची की तरफ नहीं देखा था इसलिए वह अपनी बेटी को अपनी चूची दिखाना चाहती थी जवानी से भरी हुई दोनों चूचियों के दर्शन करना चाहती थी भले ही वह पेटिकोट के अंदर कैद थीं लेकिन पेटिकोट के भीगने की वजह से वह पूरी तरह से पेटिकोट के ऊपर अपनी आभा बिखेर रही थी,,, इसलिए वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,) जल्दी से आजा अब देर मत कर,,,(मग से पानी अपने ऊपर डालते हुए और दूसरे हाथ को अपनी चूची के ऊपर से नीचे की तरफ लाते हुए यह एक तरफ सेअपने बेटे की नजर को अपनी चूचियों पर लाने का इशारा था,,,) बहुत ठंडा पानी है ऐसी गर्मी में नहाने में और भी ज्यादा मजा आएगा,,,,.

और वाकई में जैसा सुगंधा चाहती थी वैसा ही हुआ उसके हाथ के इशारे को उसका बेटा अच्छी तरह से देख रहा था और उसकी नजर एकदम से उसकी चूचियों पर पड़ गई,,,,जो की पेटिकोट की पूरी तरह से गीले हो जाने की वजह से उसके खरबूजे जैसी चूचियों पर एकदम से चिपक सी गई थीऔर उत्तेजना के मारे उसकी दोनों निप्पल छुहारे के दाने की तरह एकदम कड़क हो चुके थे और पेटीकोट के ऊपर पूरी तरह से ऊपरी सतह पर साफ दिखाई दे रहे थे और ऐसा लग रहा था कि जैसे पेटिकोट फाड़कर दोनों बाहर आ जाएंगे,,, अंकित वाकई मे इस अद्भुत नजारे को अधूरा ही देख रहा था,,,अभी तक वह अपनी मां की बुर को देख रहा था जो कि हर एक मर्द का सपना होता है एक औरत की खूबसूरत बुर को अपनी आंखों से देखना और अंकित ने इस अद्विक नजारे को अपनी आंखों से देखा भी जिसकी तुलना वह कर नहीं सकता था जिसे अपने शब्दों में बयां नहीं कर सकता था लेकिन वह इस बात को भी अच्छी तरह से जानता था कि औरत के खूबसूरत बदन का हर एक अंग मर्दों की उत्तेजना को चरणक्षम शिखर तक ले जाता हैऔरत के हर एक खूबसूरत अंग वाकई में मर्दों को अपनी तरफ आकर्षित करने में पूरी तरह से सक्षम होते हैं और इसी में उसकी मां की चूचियां भी इजाफा कर रही थी। अंकितपानी में भीगी हुई पेटीकोट में उपसी हुई अपनी मां की गीली चूचियों को देखकर उत्तेजना के परम शिखर पर पहुंच चुका था,,,, अंकित की हालत एकदम से खराब होने लगी अंकित अपने हाथों में अपनी मां की दोनों चूचियों को लेकर से जोर-जोर से दबाना चाहता था रगड़ देना चाहता था एक अद्भुत सुख के एहसास में डूब जाना चाहता था इसलिए वह अपनी मां के प्रस्तावको ठुकरा नहीं पाया और वैसे भी ठुकराने लायक कोई कारण उसके पास बिल्कुल भी नहीं था क्योंकि वह खुद अपनी मां के साथ नहाने का सुख भोगना चाहता था इसलिए वह तुरंत अपने कदम आगे बढ़ने लगा लेकिन तभी उसकी मां उसे रोकते हुए बोली,,,,)

अरे पहले अपने कपड़े तो उतार दे,,,, कपड़े उतार कर नहाने में और भी ज्यादा मजा आता है,,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर अंकित के बदन में गुदगुदी होने लगी औरउसके मन में हुआ कि वह अपनी मां से कह दे की फिर तुम पेटिकोट क्यों पहनी हो इसे भी उतार दो नहाने में मजा आएगा लेकिन ऐसा कहने की उसकी हिम्मत नहीं हुई और वह मुस्कुराते अपनी मां की आंखों के सामने अपने कपड़े उतारने लगा वह जानता था कि उसके पेट में तंबू बना हुआ है और पेट के उतरते ही अंडरवियर एक अद्भुत जाकर लिया हुआ उसकी मां की आंखों के सामने नजर आने लगेगा लेकिन इस समय उसके बदन में मदहोशी छाई हुई थी अपनी मां की मदमस्त जवानी देखकर वासना चाहिए हुई थी इसलिए वह अपने अंडरवियर में बने तंबू को छुपाने की कोशिश बिल्कुल भी ना करते हुए अपने पेंट का बटन खोलने लगा,,,,जिसे देखकर सुगंधा के तन-बदन में आग लग रही थी उसके दिल की धड़कन बढ़ती चली जा रही थी वह अपने बेटे को अंडरवियर में देखना चाहती थी अपने बेटे के घटीले बदन को देखना चाहती थी,,,,वह देखना चाहती थी कि पेट के ऊपर से दिखने वाला तंबू उसके बेटे के अंडरवियर में किस तरह का दिखाई देता है और इस बात को सोचकर ही उसकी बुर पानी छोड़ रही थी,,,,और देखते-देखते उसकी आंखों के सामने ही अंकित अपना पेट भी उतार कर एक तरफ रख दिया और अंडरवियर में बना हुआ तंबू सुगंधा की आंखों के सामने दिखाई देने लगा सुगंधा के मन की लालच बढ़ने लगीउसके तन बदन में गुदगुदी होने लगी और उसका मन कर रहा था कि अभी इसी समय आगे बढ़कर अपने हाथों से अपने बेटे के बदन से उसका अंडरवियर भी निकाल कर उसे पूरी तरह से नंगा कर दे,,,,,लेकिन यह सिर्फ सुगंधा के मां का ख्याल था जिसे हकीकत का शक्ल देने में काफी हिम्मत की जरूरत थी जो कि इस समय उसमें नहीं थी भले ही वह किसी भी तरह से अपने बेटे को अपनी नग्नता के दर्शन कर रही थी लेकिन इस तरह की हरकत करने में उसकी हिम्मत गवाही नहीं दे रही थी,,,,,।

अंडरवियर में खड़ा अंकित अपनी कमर पर हाथ रखकर इधर-उधर चारों तरफ नजर घुमा कर देख रहा था वह ऐसा औपचारिक रूप से जानबूझकर कर रहा थाखास करके वह अपनी मां को अपनी अंडरवियर में बना तंबू दिखाना चाहता था मन तो उसका इस समय कर रहा था कि अंडरवियर में बने छेद में से अपने लंड को बाहर निकाल कर एकदम से लटका ले और अपनी मां को जी भर कर उसका दर्शन कराए,,,, लेकिन यह भी सिर्फ अंकित की सोच थी,,,वैसे ज्यादा कुछ कर सपना की स्थिति में नहीं था वैसे भी अपनी मां की मधुमक से जवान देखकर उसकी गर्मी का एहसास उसके बदन को पूरी तरह सेअपनी आगोश में लिया हुआ था उसके माथे से पसीना टपक रहा था उसका पूरा बदन पसीने से तार बात था एक तो जेठ की गर्मी ऊपर से उसकी मां की जवानी की गर्मी दोनों अंकित की हालत खराब कर रही थीऔर दूसरी तरफ अपने बेटे के पेट में बने तंबू को देखकर सुगंधा की हालत खराब हो रही थी और वह अपने बेटे के सामने ही अपनी बर को जोर-जोर से अपनी हथेली में दबा दबा कर मसल देना चाहते थे और इशारों ही इशारों में उसे बता देना चाहती थी कि उसे क्या चाहिए,,,, लेकिन इस दौरान अभी भी उसकी बुर झलक रही थी दिखाई दे रही थीऔर अंकित भारी-भारी से अपनी मां के जवान के दोनों केंद्र बिंदु पर नजर दौड़ा ले रहा था तभी उसकी चूचियों की तरफ तो कभी उसकी बुर की तरफ देख कर वह पूरी तरह से पागल हुआ जा रहा था,,,, सुगंधा को भी एहसास हो रहा था कि उसका बेटा अपने अंडरवियर में बने तंबू को छुपाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रहा था मतलब साफ था कि आप दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी वह भी अपनी बुरे दिख रही थी और उसका बेटा भी अपने अंडरवियर में बने तंबू को दिखा रहा था और शायद उसका बस चलता है तो अपने अंडर बियर को निकाल कर अपना लंड उसे दिखा देता,,,लेकिन इतना कुछ होने के बावजूद भी दोनों अभी मर्यादा की हल्की डोर में बने हुए थे जो किसी भी वक्त टूट सकती थी।

आजा देख कितना ठंडा पानी है,,,, आ मैं तुझे नहला देती हुं,,,,,,,(सुगंधा का इतना कहना था कि उसका बेटा मुस्कुराता हुआ अपनी मां के करीब पहुंच गया एक अद्भुत एहसास का अनुभव हो रहा था अपनी मां के बेहद करीब पहुंचकर क्योंकि उसकी मां इस समय कुछ अलग ही रूप में थी वह इस समय जवानी की मादकता को अपने बदन से टपका रही थी और उसे रस को पीने के लिए अंकित तड़प रहा था मचल रहा थाबेहद करीब से अपनी मां की दोनों बड़ी-बड़ी चूचियों को देखकर वह पागल हुआ जा रहा था चूचियों के बीच की निप्पल पेटीकोट से एकदम साफ दिखाई दे रही थी मन तो उसका इस समय कर रहा था कि अपना दोनों हाथ आगे बढार अपनी मां की चूचियों को थाम ले और उन्हें जोर-जोर से दबाए,,,,, और उसे पूरा यकीन था कि उसकी हरकत से उसकी मां पूरी तरह से मस्त हो जाएगी और हो सकता है कि अपने हाथों से अपनी चूची पकड़ कर उसके मुंह में डाल दे,,, लेकिन फिर भी वह अपने मन में उठ रहे इस ख्याल को हरकत की शक्ल देने में सक्षम नहीं था,,,,। अपनी मां के खूबसूरत चेहरे की तरफ देखते हुए वह बोला,,,)

सच में तुम मुझे नहला दोगी,,,,।

हां क्यों नहीं जब तू छोटा था तब मैं ही तो तुझे नहलाती थी,,,,,(ऐसा क्या करूं अपने मन में ही बोली अभी तक तुझे अपनी जवानी के पानी में नहला तो रही हूं,,,)

तब तो बहुत मजा आएगा,,,, वैसे भी मेरी पीठ पर मैल जम सी गई है,,,, शायद तुम उसे मलमल कर साफ कर सकती हो,,,,।

हां हां क्यों नहीं तू नीचे बैठ जा,,,,,।

(और अपनी मां की बात मानते हुए अपनी मां की तरह पीठ करके वह नीचे बैठ गया,,,सुगंधा अपने बेटे को देख रही थी उसकी मासूमियत पर वह मुस्कुरा रही थी उसे अच्छा लग रहा था और वह अपने बेटे के ऊपर पानी डालना शुरू कर दी देखते ही देखते वह पूरी तरह से पानी में भीग गया और फिर इसके बाद वह बदन करने वाला ब्रश लेकर उसे जोर-जोर से अपने बेटे की पीठ पर रगड़ने लगी हालांकि अभी तक वह साबुन नहीं लगाई थी,,,,थोड़ी ही देर में उसे अपने बेटे की पीठ साफ नजर आने लगी वैसे साफ तो थी ही बस गर्मी की वजह से उसे पर मैल जम गई थी और इसके बाद वहां अपने बेटे के बदन पर साबुन रगड़ना शुरू कर दी बरसों के बाद अपनी मां के हाथ से नहाने में उसे मजा आ रहा था,,, यह मजा औपचारिक या स्वाभाविक नहीं था,,,, कि आज वह अपनी मां के हाथ से नहा रहा है तो उसे अच्छा लग रहा है।उसे अच्छा इसलिए लग रहा था कि वह एक खूबसूरत औरत के हाथों से नहा रहा था और इस बात की खुशी और भी ज्यादा दुगुनी हुई जा रही है कि वह खूबसूरत औरत उसकी मां थी उसकी मां की जवानी का जलवा वह अपनी आंखों से देख चुका था इसलिए उसकी खुशी फूल ही नहीं समा रही थी,,,, तभी साबुन लगाते हुएअंकित को अपनी मां की चुचियों का एहसास अपने सर पर होने लगा उसकी दोनों चुचियों का वजन उसे अपने सर पर महसूस होने लगा था जो की सुगंधा जानबूझकर अपनी चूचियों को उसके सर पर सटाकर उसके पेट और छाती में साबुन लगा रही थी,,,,अपनी मां की हरकत से अंकित के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी उसके बदन में गुदगुदी होने लगी,,,।

सुगंधा आज अपने बेटे को नहला रही थी,,,घर के पीछे एक अद्भुत और मादकता से भरा हुआ नजारा देखने को मिल रहा था लेकिन इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए मां बेटे के सिवा तीसरा वहां कोई नहीं था,,, अंकित केतन बादल में उत्तेजना की लहर हिलोरें मार रही थीवह पूरी तरह से मादकता के नशे में डूबता चला जा रहा था वह इस समय इसलिए नहीं खुश था कि उसकी मां उसे आज बरसों के बाद नहला रही थी बल्कि इसलिए खुश था कि यह खूबसूरत औरत उसे अपने हाथों से नहलारही थी और वह खूबसूरत औरत कोई और नहीं उसकी खुद की मां थी जिसके खूबसूरत बदन को देखकर वह हर बार उत्तेजित हो जाता था,,, आज वही खूबसूरत औरत की हथेलियां को अपने बदन पर महसूस करके वह उत्तेजना से फुला नहीं समा रहा था,,, उसकी उत्तेजना मदहोशीतब और ज्यादा बढ़ गई जब उसे एहसास हुआ कि उसकी मां की बड़ी-बड़ी चूचियां उसके सर पर अपना वजन बढ़ा रही थी,,,यह एहसास ही उसे पूरी तरह से मदहोश किए जा रहा था वह पागल हो जा रहा था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें।

ऐसा नहीं था कि अनजाने में सुगंधा की बड़ी-बड़ी चूचीया उसके बेटे के सर पर दबाव बढ़ा रही थी वह ऐसा जानबूझकर कर रही थी अपनी चूचियों के भारीपन का एहसास वह अपने बेटे को करना चाहती थी वह दिखाना चाहती थी कि उसकी खूबसूरत बड़ी-बड़ी चूचियां उसके सर पर है,,,,,,सुगंधा इस तरह से अपने बेटे के पेट पर साबुन लगा रही थी जिसके झाग में वह पूरी तरह से डुबती चली जा रही थी,,, साबुन लगाते समय भी सुगंधा का ध्यान अपने बेटे के अंडर बियर में बने तंबू पर टिकी हुई थी,,,जिसमें उसका हथियार पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था और अपने होने का एहसास अंडर बियर के बाहर तक करा रहा था,,, सुगंधा के मुंह में पानी आ रहा था,,,,वह अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड को अपने हाथों से पकड़ना चाहती थी उसे पर साबुन लगाना चाहती थी और उसे अपने मुंह में लेकर उसकी जी भरकर चुसाई करना चाहती थी,,,, उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थीठंडे ठंडे पानी से नहाने के बावजूद भी उसे अपने बदन में गर्मी का एहसास हो रहा था,,,वह साबुन को वापस पीठ पर ले जाकर के रगड़ रगड़ कर अपने बेटे की पीठ पर साबुन लगा रही थी,,, और साबुन लगाते हुए बोली,,,।

कैसा लग रहा है अंकीत तुझे आज मेरे हाथों से नहा कर।

सच कहूं तो ऐसा लग रहा है कि जैसे आज मेरा बचपन फिर से लौट आया हो,,,, आज बरसों के बाद तुम्हारे हाथों से नहाने में मुझे बहुत मजा आ रहा है,,,।

तो इसमें क्या हो गया तू कहे तो मैं रोज तुझे अपने हाथों से नहला दूं क्योंकि तू मेरे लिए आज भी वही छोटा सा अंकित है जिसे अपने हाथों से नंगा करके में नहलाती थी,,,(सुगंधा जानबूझकर नंगा शब्द पर भर देते हुए बोल रही थी और इस शब्द का असर अंकित पर भी पढ़ रहा था वह एकदम से अपनी मां की बात सुनकर बोला,,,)

पहले में और अब में बहुत फर्क हो चुका है अब तो मुझे नंगा करके नहीं नहीं ला सकती क्योंकि अब मैं बड़ा हो गया हूं,,,(और मेरा लंड भी बड़ा हो गया है अपने मन में ही इस शब्द को वह बोला उसकी मां उसकी बात सुनकर बोली,,)

मैं जानती हूं तू अब बड़ा हो गया है लेकिन एक मां के लिए उसका बेटा हमेशा छोटा ही होता है समझ रहा है ना तू,,,,,(लेकिन तेरा लंड अब छोटा नहीं रहा वह मेरी बुर में घुसकर खलबली मचाने के लायक हो गया हैइस बात का सुगंधा अपने मन में बोलकर मुस्कुरा रही थी क्योंकि अपनी बेटी के सामने इस तरह की बात एकदम से खुले शब्दों में नहीं बोल सकती थी,,,, अपनी मां की बात सुनकर अंकित बोला,,,)

मुझे मालूम है मां के लिए उसका जवान बेटा भी छोटा सा बच्चा ही होता है लेकिन वक्त के साथ बेटे मे बहुत से बदलाव आ जाते हैं,,,।

कैसे बदलाव,,,(अपने बेटे की बात को वह समझ रही थी इसलिए एकदम से तपाक से बोली,,, और लगातार उसकी पीठ पर साबुन लगा रही थी।)

अरे बहुत तरह के बदलाव आ जाते हैं तुम्हें तो मालूम ही है की उम्र के साथ-साथ शरीर भी बढ़ने लगता है एकदम मेरी तरह हो जाता है,,,,(वैसे तो अंकित भी अपनी मां के सामने बोल देना चाहता था कि शरीर के साथ-साथ लंड भी बड़ा हो जाता है लेकिन ऐसा कहने में उसे डर लग रहा था,,,,)

वह तो मैं अच्छी तरह देख रही हूं एकदम मर्द बन चुका है तो मर्द की तरह गठीला कसरती बदन हो चुका है,,,(मर्द शब्द बोलने में सुगंधा की उत्तेजना बढ़ जाती थी और उसकी बुर उत्तेजना के मारे फुलने पिचकने लगती थी।)

अब कसरत करता हूं तो शरीर तो मजबूत बनेगा ही ना,,,,।

सच में तेरा बदन एकदम आकर्षक है सच पूछो तो औरतों को मर्द का कसरती बदन ही आकर्षक लगता है,,,।

क्या तुम्हें भी ऐसा शरीर अच्छा लगता है,,,।

मैं बोली तो हर एक औरत को अच्छा लगता है मुझे भी अच्छा लगता है मरियल सा पतला सा दुबला सा शरीर औरत को थोड़ी अच्छा लगता है,,,।

बात तो सही है जैसे हम मर्दों को औरत का गदराया बदन आकर्षित करता है,,,(अंकित एकदम से बेशर्मी दिखाते हुए बोल गया था उसकी बात सुनकर सुगंधा मन ही मन खुश हो गई थी लेकिन फिर भी जानबूझकर अनजान बनते हुए वह अपने बेटे से बोली,,,)

गदराया बदन में कुछ समझी नहीं,,,।

अरे मेरा मतलब है कि तुम्हारे जैसा बदन भरा हुआ,,,,तुम्हारे जैसी औरत हर एक मर्द को अपनी तरफ आकर्षित कर सकती है,,,,(अंकित हिम्मत दिखाते हुएअपनी मां को एक औरत की शक्ल दे रहा था उससे ऐसी बात कर रहा था मानों जैसे उसका बेटा ना हो कर वह उसका प्रेमी हो और यही बात सुगंधा को अच्छी लग रही थी वह अपने बेटे की बात सुनकर प्रसन्न हो रही थी,,,, अपने बेटे की बात सुनकर वह एकदम से खुश होते हुए बोली।।)

क्या सच में मेरा बदन एकदम गदराया हुआ है,,,,!

तो क्या,,,?

लेकिन तू यह शब्द कहां से सीखा,,, गदराया,,,,(कंधों पर साबुन लगाते हुए वह बोली,,,)

वही सुबह जब अलमारी साफ करते हुए किताब मिली थी उसी में इस तरह के शब्द का प्रयोग किया हुआ था,,, गराया बदन ,,,,गदराया जिस्म,,, ग़दराई घोड़ी,,,,इस तरह के शब्द में पहली बार पढ़ रहा था किताब में पहले तो मुझे समझ में नहीं आया इन शब्दों का मतलब क्या होता है,,,।

फिर तुझे कैसे पता चला कि यह शब्द औरत के बदन के लिए उपयोग किया जाता है,,,।

क्योंकि इस तरह के शब्द के सामने ही छोटे-छोटे चित्र बने हुए थे और उन चित्रों मेंतुम्हारी जैसी ही औरत थी उसका भी बदन तुम्हारे जैसा ही था मैं समझ गया कि इस तरह के शब्दों का प्रयोग इस तरह की औरतों के लिए किया जाता है,,,,।(उत्तेजना के मारे अंकित गहरी सांस लेते हुए बोला उसकी बात सुनकर सुगंधा मंद मंद मुस्कुरा रही थी उसे बहुत अच्छा लग रहा था अपने बेटे के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर फिर वह भी गरम आहे भरते हुए बोली,,,)

चलो उस गंदी किताब से कुछ तो सीखने को मिला तुझे,,,,।

तुम सच कह रही हो मम्मी वह गंदी किताब एकदम जादुई किताब की तरह है,,,,

जादुई किताब में कुछ समझी नहीं,,,,।

अरे एक बार पढ़ना शुरू करो तो बिना पढ़े मन नहीं मानता,,,।

तेरा भी मन नहीं मान रहा था क्या,,,?

अब क्या करूं किताब ही कुछ ऐसी थी मेरी जगह कोई भी होता तो उसकी भी यही हालत होती,,,।

बिल्कुल तेरे जैसे ही तेरे पिताजी की भी हालत हुई थी तेरे पापा भी सारी रात जागकर वह किताब पढे थे,,,,।
(सुगंधा एक बार फिर से अपने बेटे के सर पर अपनी चुचियों का भार देकरउसके पेट पर साबुन लगाने लगी थी और उसके पेंट में बने तंबू को देख रही थी जिसकी हालत पूरी तरह से खराब हो चुकी थी,,, ऐसा लग रहा था कि अंकित का लंड चड्डी फाड़ कर बाहर आ जाएगा,,,)

क्या कह रही हो मम्मी क्या सच में,,,।

हां मुझे तो नहीं मालूम मैं तो सो गई थी सुबह तेरे पापा ही बताएं की सारी रात जाग कर वह किताब खत्म किए थे,,,, इसीलिए तो उनकी याद के तौर पर वह किताब रखे रह गई,,,,,, अच्छा चल अब खड़ा हो जा तुझे ठीक से साबुन लगा देती हुं,,,,,,।
(अपनी मां की बात सुनते ही अंकित अपनी जगह पर उठकर खड़ा हो गया और सुगंधा ठीक उसके पीछे खड़े होकर उसके बदन पर साबुन लगाने लगी उसे इस तरह से पीछे खड़े होकर साबुन लगा रही थी मानो जैसे उसे पूरी तरह से अपनी बाहों में भर ली हो,,,उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां अंकित की पेट पर रगड़ खा रही थी जिसका एहसास अंकित के तन बदन में आग लग रहा था उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो चुकी थी अपनी मां की हरकत पर उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वह अपने आप पर काबू नहीं कर पा रहा था मन तो उसका कर रहा था कि अपनी मां की आंखों के सामने चड्डी में से अपने लंड को बाहर निकाल ले और जोर-जोर से हिलाना शुरू कर दे,,,, लेकिन बड़ी मुश्किल से वह अपनी भावनाओं पर काबू किए हुए था।

सुगंधा जानबूझकर अपने बेटे को पूरी तरह से उत्तेजित कर रही थी अपनी चूचियां जो की पेटीकोट में कैद थी जिस पर पेटिकोट की डोरी बंधी हुई थी उस अधनंगी चूची को अपने बेटे की पीठ पर रगड़ रगड़ कर उसके अरमानों को जगा रही थी,,, और उसके अरमान मचल भी रहे थे,,,एक बेटा होने के नाते वह अपनी मां के साथ इस तरह की हरकत करने से अपने आप को रोक रहा था अपनी भावनाओं पर काबू किए हुए था अगर उसकी मां की जगह कोई और औरत होती तो अब तक शायद उसका मोटा तगड़ा लंड उसकी बुर में घुस गया होता,,,, लेकिन फिर भी जो कुछ भी हो रहा था वह मां बेटे दोनों के सब्र के बांध को तोड़ने के लिए काफी था,,, लेकिन मां बेटे दोनों जिस तरह से अपनी भावनाओं पर अपनी उत्तेजना परअपनी जरूरत पर काबू किए हुए थे वह बेहद काबिले तारीफ थी और शायद इसी में अत्यधिक आनंद की प्राप्ति भी हो रही थी वरना अब तक दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो चुका होता तो शायद इस तरह का आनंद उन्हें प्राप्त नहीं होता या फिर इस तरह के कामुक खेल में उन्हें इस तरह का आनंद कभी नहीं मिलता।सुगंधा धीरे-धीरे अपने बेटे के बदन पर साबुन लगाकर पूरी तरह से उसे झाग से नहला दी थीऔर खुद उसकी पीठ पर अपनी चूची रगड़ रगड़ कर अपने बदन पर भी अपने बेटे के बदन का झाग लगाकर मस्त हो रही थी,,,,।

अब कैसा लग रहा है बेटा,,,?

पूछो मत मम्मी बहुत अच्छा लग रहा है क्या बचपन में भी तुम इसी तरह से मुझे नहलाती थी,,,।

नहीं अब थोड़ा नहलाने का तरीका बदल गया है क्योंकि अब तु बड़ा हो गया है,,,,(ऐसा कहते हुए अपने बेटे के तंबू की तरफ देखने लगी,,,,, अंकित अपनी मां के कहने के मतलब को समझ रहा था,,, वह जानता था कि दोनों के बीच एक पतली सी मर्यादा की रेखा पर हैऔर उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ना जाने यह मर्यादा की रेखा कितनी मजबूत है कितना कुछ होने के बावजूद भी वह टूट नहीं रही है बस उसके टूटने की देरी बाकी दो जिस्म एक जान हो जाते ,,,, अपनी मां की बात सुनकर अंकित मदहोश होता हुआ बोला,,,)

तुम्हारे इस तरीके में मुझे बहुत मजा आ रहा हैकाश जिंदगी भर तुम इस तरह से मुझे नहलाती तो नहाने का मजा ही कुछ और होता,,,।

सच कह रहा है रे तूमुझे भी ऐसा ही लग रहा है कि काश में जिंदगी भर तुझे अपने हाथों से नहलाती तू भी मुझे अपने हाथों से साबुन लगा लगा कर नहलाता तो कितना मजा आता,,,।

तृप्ति के आने तक ऐसा हो सकता है हम दोनों एक दूसरे को नहला सकते हैं,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा मुस्कुराने लगी वह जानती थी कि उसका बेटा अच्छी तरह से जानता है कि इस तरह नहलाना धुलानाकिसी तीसरी के सामने नहीं कर सकते और तृप्ति तो उसकी बहन थी उसकी बेटी थी,,भला उसकी आंखों के सामने एक मां बेटा इस तरह के हालात में कैसे उपस्थित हो सकते थे,,, और वह भी एक साथ नहाने के लिए,,, अपने बेटे की बात सुनकर पूरी तरह से उसे अपनी बाहों में कसते हुए साबुन लगाने के बहाने,,,, वह अपने बेटे के नितंबों पर अपनी बुर वाला हिस्सा एकदम से सटा दी,,, अपनी मां की ही हरकत से अंकित पूरी तरह से गर्म हो गया,,,,, और सुगंधा उसकी मोटी मोटी जांघो तक अपना हाथ ले जाकर के उसे साबुन लगाते हुए बोली,,)

बिल्कुल ठीक कह रहा है तू त्रप्ति के आने तक हम दोनों एक दूसरे को इसी तरह से नहला सकते हैं,,,, वैसे मैं साबुन तो ठीक से लगाई हुं ना तु इसी तरह से नहाता है ना,,,।

हां लेकिन थोड़ा सा रह गया है लाओ में साबुन लगा देता हूं,,,(अपनी मां की बात सुनकर वह थोड़ा सा विचार करने के बाद बोला उसके मन में गुदगुदी हो रही थी वह इतना कहते हुए बेहद उत्तेजना का अनुभव कर रहा था क्योंकि उसके मन में अब कुछ और चल रहा था,,,,)

अरे कहां रह गया है मुझे तो बता मुझे तो नहीं लग रहा है कि कहीं साबुन लगाना रह गया हो,,,,(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा ठीक उसके सामने जाकर खड़ी हो गई और इधर-उधर देखने लगी,,,)

अरे रहने दो ना मैं लगा देता हूं,,,(साबुन के लिए हाथ बढ़ाते हुए मुस्कुराते हुए अंकित बोला उसके चेहरे पर शर्म की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी,,, उसके चेहरे को देखकर सुगंधा समझ गई कि कुछ तो बात है इसलिए वह फिर से बोली,,,)

अरे क्या बात है मुझे तो बताकहां रह गया है साबुन लगाना में लगा देता हूं और वैसे भी आज मैं ही तुझे नहलाऊंगी,,,,।

मैं मना थोड़ी ना कर रहा हूं लेकिन लाओ में साबुन लगा लूं,,,,,।

देख अब मुझे अच्छा नहीं लग रहा है,,, बता दे कहां साबुन लगाना रह गया है जहां तू अपने हाथ से लगाना चाहता है,,,(बार-बार सुगंधा की नजर अपने बेटे के चड्डी में बने तंबू पर चली जा रही थी वाकई में उसके तंबू का आकार ऐसा लग रहा था थोड़ा और बढ़ चुका था जिसे देखकर बार-बार सुगंधा की बुर पानी छोड़ रही थी।अंकित जी अपनी चड्डी में बने तंबू को अपनी मां की नजर से छुपाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रहा था ऐसा लग रहा था कि वह जानबूझकर अपनी मां की नजर को अपनी चड्डी के अंदर तक लाना चाहता था,,,इसलिए तो रह रह कर वह अपनी कमर को हल्का सा गोल-गोल घुमा दे रहा था जिसके चलते उसके चड्डी में बना तंबू लहराने लगता था,,,, अपनी मां की बात सुनकर वह शर्माने का नाटक करते हुए बोला,,,)

क्या बोलूं कैसे बोलूं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है मुझे थोड़ा शर्म महसूस हो रहा है,,,।

देख मेरे सामने शर्माने की जरूरत तुझे बिल्कुल भी नहीं है इसलिए बता कहां साबुन लगाना रह गया है,,,,।

चड्डी के अंदर,,,(अंकित एकदम से बोल पड़ा)मुझे वहां भी सफाई पसंद है क्योंकि अगर वहां साबुन लगाकर अच्छे से साफ ना करो तो खुजली होने लगती है,,,,।

ओहहहह यह बात है,,,, बरखुरदार को सफाई पसंद है,,,, तू सच में तेरे बाप पर ही गया है,,,,।

ऐसा क्यों,,,?

क्योंकि तेरे पापा को भी सफाई पसंद थी वह भी चड्डी में हाथ डालकर साबुन लगा लगा कर साफ करते थे,,,,।
(अपनी मां की आवाज सुनकर अंकित मजाकीया अंदाज में बोला,,,)

तुम देखती थी मम्मी पापा को नहाते हुए,,,,।

तो इसमें कोई बड़ी बात थोड़ी थी ज्यादातर हम दोनों साथ में रहते थेक्योंकि सब कोई बच्चे नहीं थे और हम दोनों घर पर अकेले ही रहते थे इसलिए नहाते समय में कपड़े धोती थी और वह नहाते थे वह मुझे देखते थे मैं उन्हें देखती थी,,,(सुगंधा जानबूझकर यह बात बोली थी,,,,, वह यह जताना चाहती थी की नहाते समय उसके और उसके पति में कितना खुलापन था,,,, और फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) तभी तो आज तेरे साथ नहा कर मुझे तेरे पापा याद आ गए,,,, अच्छा हुआ तु बता दिया,,,, ला मैं साबुन लगा देती हूं,,,,,

( अपनी मां की बात सुनक अंकित के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी वह मदहोश होने लगा वह जानता था कि उसकी मां क्या कह रही थी उसका ऐसा कहने का मतलब था कि उसकी चड्डी में हाथ डालकर साबुन लगाना जिसमें उसकी मां की हथेलियां का स्पर्श उसके लंड पर भी हो सकता है यह सोचकर ही अंकित का लंड उत्तेजना के मारे ठुनकी मारने लगा,,,, और फिर भी जानबूझकर अपनी मां को ऐसा न करने के लिए बोला,,,)

रहने दो मम्मी में लगा लेता हूं वहां पर लगाना ठीक नहीं है,,,।

क्यों ठीक नहीं है,,,! बचपन में मैं तेरे पूरे बदन में साबुन लगा कर तुझे नहलाती थी,,,।

फिर वही बात मैं फिर से कह रहा हूं की बचपन की बात कुछ और थी अभी तुम वहां पर अपने हाथ से साबुन नहीं लगा सकती,,,,।

क्यों नहीं लगा सकती तो तब भी मेरे लिएवही अंकित था और आज भी मेरे लिए वही छोटा सा अंकित ही है मुझे मत सीखा मैं जानती हूं कि तेरा अब वह बड़ा हो गया है,,,(चड्डी में बने तंबू की तरफ देखते हुए,,,)

अंकित अपनी मां की मादक नजर और इस तरह की बात से एकदम से सनसना गया था,,,, वह कुछ बोल नहीं पाया और उसकी मां उसकी आंखों में देखते हुए मुस्कुराते हुए आगे बढी और धीरे से बोली,,,,।

तु चिंता मत कर मैं अपनी आंख बंद कर लूंगी,,,,।

(अपनी मां की यह बात सुनकर अंकित मन ही मन में तड़प उठा,,,,और अपने मन में ही खुल ऐसा क्यों मम्मी आंखें क्यों बंद करोगे आंखें खोल कर मेरी चड्डी में हाथ डालकर साबुन लगाओ मेरे लंड को अपने हाथ से पकड़ो,,,,आहहहहह मम्मी,,,,,, अंकित मन ही मन में उत्तेजित हुआ जा रहा था और वह कुछ बोल पाता है इससे पहले ही सुगंधाअपना साबुन वाला हाथ अपने बेटे की चड्डी में डाल दी और वादे के मुताबिक वह अपनी आंखों को बंद कर ली थी,,,, क्योंकि सुगंधा जानती थी कि आंखें खोल कर तो वह खुद अपने बेटे से नजर नहीं मिल पाएगी इस तरह से साबुन लगाते हुए आंखें बंद करके वह अपनी बेटी के लंड को अच्छी तरह से टटोल तो लेगी,,,, पल भर में ही अंकित के बदन में मस्ती की लहर उठने लगी वह मदहोश होने लगा,,,, अपनी चड्डी में अपनी मां की हथेली महसूस करते ही वह सातवें आसमान पर पहुंच गया। एक अजब सा एहसासमैं वह पूरी तरह से डूबने लगा वह कभी सोचा नहीं था कि उसके जीवन में ऐसा भी पल आएगा कि उसकी मां पूरी तरह से जवान हो जाने पर उसे अपने हाथों से नहलाएगी उसकी चड्डी में अपना हाथ डालकर साबुन लगाएगी,,, इसलिए अंकित को यह सब किसी सपने से कम नहीं लग रहा था।

अंकित से भी ज्यादाहालत खराब सुगंधा की हो रही थी अपने बेटे की छुट्टी में हाथ डालते ही उसे जल्दी एहसास हो गया कि उसकी चड्डी में किस तरह का हथियार है अपनी हथेली पर उंगलियों पर अपने बेटे के गम लंड का रगड़ उसका स्पर्श महसूस करते ही सुगंधा की बुर से पानी झड़ने लगा,,,,और पल भर में उसे एहसास हो गया कि वाकई में अगर उसके बेटे का लंड उसकी बुर में घुस गया तो तबाही मचा देगा,,, बरसों की प्यास को एक ही बार की चुदाई में बुझा देगा,,,,, सुगंधा गहरी गहरी सांस ले रही थीअपनी आंखों को बंद किए हुए वह अपने बेटे की चड्डी में हाथ डालकर उसके मोटे तगड़े लंड का एहसास कर रही थी,,,, और अंकित भी अपनी मां की नरम नरम उंगलियों का स्पर्श अपने गरम लंड पर पाकर घबरा सा गया था की कहीं उसका लंड पानी न छोड़ दे।
घर के पीछे का माहौल पूरी तरह से गरमा चुका था, मां बेटे दोनों पूरी तरह से मत हुए जा रहे थे ठंडे-ठंडे पानी में होने के बावजूद भी दोनों के बदन में अत्यधिक गर्मी का एहसास हो रहा था,,, अंकित इस अद्भुत और रोमांचक पल में पूरी तरह से डूबने लगा था यह वह पल था जिसे जीने के लिए शायद हर एक बेटा केवल अपने मन में कल्पना कर सकता है लेकिन ऐसा पल वह वास्तविक रूप से जी नहीं सकता,, और ऐसा तभी संभव हो सकता है जब मां बेटे दोनों के बीच किसी तरह का आकर्षक हो दोनों के बीच अत्यधिक शारीरिक आकर्षण के साथ-साथ शारीरिक संबंध स्थापित हो या फिर शारीरिक संबंध स्थापित होने की संभावना हो, इसलिए अंकित अपने आप को पूर्ण रूप से भाग्यशाली समझ रहा था बचपन में तो सभी लड़के अपनी मां के हाथों से नहाते हैं लेकिन जवानी का हाल ही कुछ और होता है,,, जवानी में बेटा पूरी तरह से मर्द बन चुका होता है उसके अंगों का उभार उसकी शारीरिक क्षमता को दर्शाता है,,, जवान होने पर वह किसी भी औरत को अपनी तरफ आकर्षित करने में सक्षम होता है और इन सब में सबसे अहम भूमिका होती है उसकी दोनों टांगों के बीच के लटकते हथियार की जिसके बारे में औरतें अत्यधिक सोच विचार करती हैं,,, और इसीलिएअंकित अपने आप को भाग्यशाली समझ रहा था क्योंकि अब वह पूरी तरह से जमाना चुका थाउसके शारीरिक विकास पूरी तरह से उसे मर्द साबित कर रहे थे और साथ ही उसका लंडजिसे सिवा किसी भी औरत को संतुष्ट करने की क्षमता रखता था वह पूरी तरह से अपने उफान पर था,,।

ऐसे में उसकी मां उसे नहलाते हुए उसकी चड्डी में हाथ डालकर साबुन लगा रही थी जिससे जाहिर सी बात थी कि उसकी उंगलियों और हथेलियों का स्पर्श उसके मोटे तगड़े लंड पर होना लाजिमी था,, और ऐसा हो भी रहा था जिसके चलते मां बेटे दोनों पूरी तरह से गर्म हो चुके थे दोनों की हालत खराब होती चली जा रही थी,,,अंकित अपनी आंखों को बंद कर लिया था क्योंकि वह जानता था कि वह इसे अत्यधिक उत्तेजना को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा और उसे इस बात का डर था कि कहीं उसका लंड पानी न छोड़ दे,,,लेकिन इन सबके बावजूद तो वह अपनी मर्दाना ताकत को आजमाना चाहता था वह देखना चाहता था कि इतनी अत्यधिक उत्तेजना ऊर्जा का संचार लंड के इर्द-गिर्द होने से उसका लंड कितनी देर तक टिक पाता है, और वास्तविक रूप यही अपने आप को देर तक टिका पानी की क्षमता को ही औरतों पसंद करती है वरना तो बुरे में लंड कोई भी सामान्यमर्द भी डालकर अपनी कमर हिला सकता है लेकिन सबसे ज्यादा अहम भूमिका इस मर्द की होती है औरत इस मर्द की गुलाम बन जाती है जो अत्यधिक देर तक धक्के पर धक्का लगाकर औरत को बुरी तरह से झाड़ देता है और वह भी बिना झड़े, और अंकित अपनी मर्दाना अंग पर पूरा विश्वास रखता थाउसे पूरा यकीन था कि वह किसी भी औरत को संपूर्ण रूप से संतुष्ट करने की क्षमता रखता है जिसका एहसास उसे दो औरतों की चुदाई करके हो चुका था एक अपनी ही नानी की और सुमन की मां की उनकी चुदाई करते समयएक क्षण के लिए भी अंकित को नहीं लगा था कि उसकी चुदाई से वह दोनों औरतें संतुष्ट नहीं है दोनों के चेहरे पर संतुष्टि के भाव एकदम साफ दिखाई देते थे और यह देखकर अंकित भी पूरी तरह से गदगद हो जाता था,,,,।

इसी तरह से साबुन लगाता है ना अंकित तु,,,,।

हां मम्मी,,,(मदहोशी भरे श्वर में हालांकि अभी भी उसकी आंखें बंद थी, और यह देखकर सुगंधा के चेहरे पर मुस्कान तैर रही थी,,,) बिल्कुल ऐसे ही रगड़ रगड़कर साबुन लगाना पड़ता है मुझे क्योंकि अगर इस जगह की सफाई ना करो तो पसीने की वजह से खुजली हो जाती है और खुजली हो जाती है तो परेशानी हो जाती है इसलिए मैं इस जगह को बराबर और रोज साफ करता हूं,,,।

अच्छा हुआ तूने मुझे बता दिया वरना मैं तो ऐसे ही तुझे नहलाने वाली थी,,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा की हालत खराब होती चली जा रही थीबार-बार उसकी उंगलियों से उसकी हथेलियां से उसके बेटे का लंड पूरी तरह से स्पर्श खा जाता था रगड़ खा जाता था और तो और लंड की लंबाई इतनी थी कि चड्डी की इलास्टिक आगे की तरफ खींच जाती थी जिसकी वजह से लंड की जड़ एकदम साफ नजर आती थी जिसे देखकर सुगंधा की बुर पानी पानी हो रही थी,,,, सुगंधा अच्छी तरह से जांघों के ऊपरी हिस्से पर कोने की तरफ साबुन लगा लगा कर झाग से तर-बतर कर दी थी,,,,,सुगंधा का मन तो कर रहा था कि इसी समय अपने हाथों से अपने बेटे की चड्डी उतार कर उसे पूरी तरह से नंगा करके उसके मोटे तगड़े लंड से खेलना शुरू कर दे क्योंकिइस तरह की उत्तेजना सुगंधा से भी बर्दाश्त नहीं हो रही थी उसे अपनी बुर फुलती हुई पिचकती हुई महसूस हो रही थी,,लेकिन फिर भी साबुन लगाते हुए वह अपने बेटे से इस बारे में जानकारी ले लेना चाहती थी इसलिए वह मुस्कुराते हुए बोली,,,)

इस पर भी साबुन लगाता है क्या,,,,?(इतना कहकर वहां अंकित की तरफ देखने लगी जो की मदहोशी में अपनी आंखें बंद करके आनंद लूट रहा था,,, अपनी मां की बात सुनकर वह आंखों को खोले बिना ही बोला,,,)

किस पर,,,,(आंखों को बंद किए हुए ही बोला)

अरे इस पर,,,(अपने बेटे की चड्डी में हाथ डाले हुए ही सुगंधा बोली,,,,)

अरे किस पर बोल रही हो बताओ तो सही,,,(अंकित समझ गया था कि उसकी मां किस बारे में बात कर रही है लेकिन फिर भी वह अपनी मां के मुंह से सुनना चाहता था जो कि अपने बेटे की बातें सुनकर बोली,,,)

अरे इसी पर समझ में नहीं आ रहा है क्या तुझे इस पर भी साबुन लगाता है कि नहीं,,,, आंखें खोल कर देखेगा तब ना तुझे समझ में आएगा,,,,।

मेरी आंख में साबुन लगा हुआ है मेरी आंखें नहीं खुल पाएंगी तुम थोड़ा खुल कर बताओ सब जगह तो साबुन लगा ली हो अब किस पर लगाना बाकी रह गया है,,,।

अरे बुद्धू मुझे भी मालूम है कि मैं पूरे बदन पर साबुन लगा दी हूं लेकिन,,,,(चड्डी में हाथ डाले हुए ही अपने अंगूठे और उंगली के सहारे से अपने बेटे के लंड की जड़ को पकड़ कर हल्के से हिलाते हुए,,,) इस पर भी साबुन लगाता है कि नहीं,,,,।

(इस हरकत को करते हुए सुगंधा के तन बदन में अजीब सी लहर उठ रही थी वह पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी,,,, और तो और सुगंधा से भी ज्यादा हालत खराब अंकीत की हो गई थी अपनी मां की हरकत से अंकित पूरी तरह से आश्चर्यचकित हो गया था,,,जिस तरह से उसने अपनी उंगलियों का सहारा लेकर उसके लंड को पकड़ कर हल्के से हिला कर पूछी थी अपनी मां की हरकत पर अंकित पूरी तरह से चारों खाने चित हो गया था उसका दिमाग काम करना बंद हो गया था पल भर के लिए उसे ऐसा लगा कि उसके लंड से पानी की पिचकारी फुट पड़ेगी । उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या जवाब दे,,,, वह अपने मन में बन चुका था कि हां बोल दे लेकिन न जाने कैसे उसके मुंह से निकल गया,,,)

नहीं इस पर नहीं लगाता,,,,,(अंकित यह शब्द बोलकरबुरी तरह से पछता रहा था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसके मुंह से यह शब्द कैसे निकल गए शब्दों के बाण उसके मुंह से निकलते ही वह अपने आप पर ही गुस्सा हो गया था,,,मुंह से निकलने वाला शब्द भी किसी बाण से कम नहीं होता एक बार निकल गया तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता,,,, एक पल कोअंकित को लगा कि वह बोल दे कि हां इस पर भी साबुन लगता है लेकिन वह इस समय ऐसा कहना उचित नहीं समझ रहा था क्योंकि उसकी मां ऐसा ही समझे कि जानबूझकर वह पकडाने के लिए उसे ऐसा बोल रहा है,,,, इसलिए वह मन होने के बावजूद भी नहीं बोल पाया,,, ऐसा नहीं था कि अंकित की बात से उसकी मां को निराशा नहीं हुई थी,,उसे लगा था कि उसका बेटा हां बोलेगा लेकिन उसे भी बड़ा दुख हुआ जब उसके बेटे ने उसे पर साबुन लगाने से इनकार कर दिया थाऔर अंकित की तरह उसके मन में भी हुआ था कि वह अपने मुंह से बोल दे कि इस पर भी साबुन लगाकर में साफ कर देता हूं लेकिन ऐसा करना वह भी उचित नहीं समझ रही थी क्योंकि उसके मन में भी ऐसा हो रहा था कि अगर वह ऐसा बोलेगी तो उसका बेटा यही समझेगा कि उसकी मां उसका लंड पकड़ने के लिए ऐसा बोल रही है,,, इसलिए वह भी अपने मन में आए इस ख्याल को जाने दे और थोड़ी देर इस तरह से साबुन लगाने का मेकअप करते हुए अपने बेटे के लंड की रगड़ को अपनी हथेली पर महसूस करके अपनी बुर से पानी बहाती रही,,,, और फिर थोड़ी देर बाद अपना हाथ अपने बेटे की चड्डी में से बाहर निकाल ली,,,।

देख तुझसे भी बढ़िया में साबुन लगा दी हुं,,,,।

मुझे भी ऐसा ही लग रहा है,,,(इस दौरान भी चड्डी में तंबू बना हुआ था उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में खड़ा था और उसके चड्डी की इलास्टिक आगे को तनी हुई थी जिसमें से उसके लंड की जड़ एकदम साफ दिखाई दे रही थी जिसे देखकर सुगंधा पानी पानी हो रही थी,,,,पल भर के लिए सुगंधा के मन में यह ख्याल आता था कि वह किस लिए रुकी है किस लिए अपने आप पर इतना काबू करके बैठी है आखिरकार अपने आप पर संयम रखने में उसे क्या मिल जाएगा उसकी आंखों के सामने कुएं का ठंडा पानी है और वह प्यासी तड़प रही है,,, इतना कुछ तो हो चुका है दोनों के बीच बस लंड को बुर में जाने की दे रही है,,,, फिर उसके बाद जो अद्भुत सुख प्राप्त होगा जो कलेजे को ठंडक मिलेगी उसका वर्णन करना संभव हो जाएगाऔर उसके बाद सब कुछ सामान्य तौर पर चलता रहेगा किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा चार दिवारी के अंदर मां बेटे के बीच क्या हो रहा है भला किसी दूसरे को कैसे पता चल सकता है,,,,लेकिन कैसे शुरुआत की जाए कैसे मैं अपने बेटे को कह दूं कि अब अपने लंड को मेरी बुर में डाल दीसाला यह भी तो निकम्मा है इतना कुछ होने के बावजूद भी नहीं समझ पा रहा है अगर उसकी जगह कोई और लड़का होता तो अब तक शायद मुझे पटक कर मेरी चुदाई कर दिया होता,,, सब कुछ तो उसकी आंखों के सामने हैएक जवान लड़के को भला एक खूबसूरत मां इस तरह से क्यों नहीं लेगी क्यों उसकी चड्डी में हाथ डालेगी क्यों उसे इस तरह की असलियत सवाल पूछे कि यह सब भी तो यह निकम्मा बिल्कुल भी नहीं समझ रहा है,,, हाय रे मेरी फुटी किस्मत,,,, अपने हाथ को अपने बेटे की चड्डी में से बाहर निकालते हुए सुगंधायह सब सो रही थी और अपने आप पर भी और अपने बेटे पर भी मन ही मन क्रोधित हो रही थी,,,,।

अंकित की आंखें अभी भी बंद थी चड्डी में बना तंबू उसके मन में क्या चल रहा है सब कुछ बयां कर रहा था,,, बस उसके मन की बात उसकी तरफ से किसी भी प्रकार की हरकत में नहीं बदल रही थी हालांकिवह इतना तो बेशर्म हो चुका था कि अपनी चड्डी में बने तंबू को छुपाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रहा था इतना तो उसे एहसास ही हो रहा था कि जब उसकी मां उसे सब कुछ दिखाने पर आतुर है तो वह भला अपनी तरफ से मर्यादा में रहने का ढोंग क्यों करें,,, घर के पीछे कुछ पल के लिए पूरी तरह से सन्नाटा छा चुका था दोपहर का समय था आज पड़ोस में भी सन्नाटा छाया हुआ था दीवार के पीछे की तरफ मैदान ही मैदान था दोपहर में वहां से किसी के गुजरने की भी आशंका नहीं थी इसलिए मां बेटे पूरी तरह से निश्चिंत थे,,,,गहरी सांस लेते हुए अपनी बेटी के चड्डी में बने तंबू को और उसके लंड की जड़ को जो की चड्डी में से एकदम साफ तौर पर बाहर की तरफ झलक रहा था उसे देखकर वह कुछ सोच कर बोली,,,,।

अब तेरी बारी है,,,,।
(इतना सुनते ही अंकित के तन बदन में ससुराल सी तोड़ने लगी उसे अपनी मां की बात का मतलब अच्छी तरह से समझ में आ रहा था लेकिन फिर भी उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था इसलिए वह फिर से तसल्ली करने के लिए अपनी मां से बोला,,)

मेरी बारी मतलब मे कुछ समझा नहीं,,,,,,!

अरे बुद्धू जिस तरह से मैं तुझे साबुन लगाई इस तरह से तू भी मेरे बदन पर साबुन लगा,,,।

सच में,,,(एकदम उत्साहित होता हुआ वह बोला,,)

हां सच में,,,,(सुगंधा जानती थी कि उसका बेटा ऐसा क्यों पूछ रहा था और वह अपने बेटे की मनुस्थिति को भी अच्छी तरह से समझ रही थी उसके चेहरे की रौनक उसके चेहरे पर आए बदलाव उसके मन कीबातों को बयां कर रहे थे वह समझ गई थी कि एक औरत के बदन पर साबुन लगाने की खुशीसे उसका चेहरा कितना लाल हो चुका है उसके मन में कितनी उमंगे उठ रही हैं इसलिए अपने बेटे की हालत को देखकर वह भी खुश हो रही थी और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)

चल अब जल्दी से साबुन ले और मेरे बदन पर लगा अच्छी तरह से लगाना जैसा मैंने तेरे बदन पर लगाई हूं एक भी कोना बाकी नहीं रहना चाहिए,,, तेरी ही तरह मुझे भी सफाई पसंद है,,,,।(इतना कहते हुए सुगंधा लकड़ी की पाटी पर गांड रख कर बैठ गई,,,, और अंकित एकदम उत्साहित होकरजल्दी से पानी के छिंटे अपनी आंख पर मरने लगा क्योंकि साबुन के लगने की वजह से उसकी आंख में जलन हो रही थी और वह इस समय अपनी मां के बदन के हर एक कोने को देखना चाहता था हर एक कोने पर अपना हाथ फिराकर उसपर साबुन लगाना चाहता था,,, अंकित का उत्साह एकदम से बढ़ गया था अभी भी उसके बदन पर साबुन का झाग लगा हुआ था और वह इस समय अपने बदन पर पानी बिल्कुल भी डालना नहीं चाहता था,,,, और ना ही समय गंवाना चाहता थाक्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी मां अगले ही पल कुछ सोच कर उसे ऐसा करने से रोक देइसलिए वह तुरंत अपने हाथ में साबुन ले लिया था और अपनी आंखों को साफ करके वह ठीक अपनी मां के पीछे खड़ा हो गया था जहां से उसकी मां की मदमस्त कर देने वाली चूचियां एकदम से दिखाई दे रही थी उसे पर बनी हुई डोरी ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी मां की बेलगाम जवानी पर लगाम कसे हुए हैं,,,, और इसी लगाम को उसे छुड़ाना था,,,, हाथ में साबुन लिए हुए वह अपनी मां की मदमस्त कर देने वाली चूचियों को देखकर वह धीरे से अपनी मां के कंधों पर साबुन लगाना शुरू कर दिया,,,।

लगभग यह उसका दूसरा मौका था जब वह अपनी मां के बदन पर साबुन लगा रहा थाइस तरह से वह अपनी मां के बदन पर पहले भी साबुन लगा चुका था जब उसकी मां की तबीयत खराब थी लेकिन आज का यह दिन और उसे दिन में जमीन आसमान का फरक था,,,उसे दिन की बात उसे दिन का माहौल कुछ और था और आज का माहौल पूरी तरह से मदहोश कर देने वाला था,,,, उस दिन उसकी मां की तबीयत खराब थी,,,, इसलिए अंकित चाह कर भी उस अवसर का लाभ नहीं ले सकता था,,, लेकिन आज की बात कुछ और थी आज मौका भी था और दस्तूर भी था आज उसकी मां पूरी तरह से होशो हवास में थी और अपने ओशो हवास में होने के बावजूद भी उसे बदहवास कर रही थी अपने ही बेटे का होश उड़ा रही थी,,,,अंकित अपनी मां की कंधों पर धीरे-धीरे साबुन लगा रहा था और उसकी तेज नजरे पेटिकोट की डोरी से अंदर की तरफ झांक रही थी पानी में भीग जाने की वजह से च की निप्पलतने हुए भाले की नोक की तरह पेटिकोट फाड़कर बाहर आने के लिए आतुर नजर आ रही थी,,,, और इस मादकता भरे नजारे को देखकर खुद अंकित का लंड अंडरवियर फाड़ कर बाहर आने के लिए मचल रहा था।

अंकित बार-बार अपनी मां की चूचियों की तरफ और अपने चड्डी में बने तंबू की तरफ देख रहा था जिस तरह से उसकी मां अपनी चुचियों का भर उसके सर पर लादकर उसे साबुन लगा रही थी उसी तरह से वह अंडरवियर में तने हुई अपने लंड को अपनी मां की पीठ पर रगड़ते हुए उसे साबुन लगाना चाहता था ताकि उसकी मां को भी एहसास हो कि उसके बेटे पर क्या गुजर रही है,,,, सुगंधा मदहोश हो रही थी अपने जवान बेटे के हाथों से अपने बदन पर साबुन लगवा कर वह पूरी तरह से उत्तेजना के चरम शिखर पर विराजमान हो चुकी थी,,, वह अपने मन में यही सोच रही थी कि शायद वहपहली ऐसी मां है जो अपने जवान बेटे से अपने नंगे बदन पर साबुन लगा रही है और उसे अपने बदन का हर एक अंग देखने की पूरी छूट दे रही है,, ऐसा करने में उसे शर्म भी महसूस हो रही थी,,,,रह रहे कर उसके मन में यही ख्याल आता था कि यह वह क्या कर रही है अपने ही जवान बेटे के साथ उसे ऐसा नहीं करना चाहिए अपने बेटे को इस तरह से नहीं लुभाना चाहिए और वह भी अपना ही बदन दिखाकर,,, उसके जेहन मेंरह रहे कर यही सवाल पूछता रहता था कि क्या ऐसा करना उचित हैकहीं यह सब के दौरान उसका बेटा पूरी तरह से मदहोश होकर जवानी के जोश में उसके साथ कुछ कर बैठा और उसे पछतावा होने लगा तो वह क्या करेगी,,, भले ही उसे भी एक पुरुष संसर्ग की जरूरत है लेकिन हद से गुजरने के बाद जब होश में आएगी तो क्या वह अपने आप से नजर मिल पाएगी अपने बेटे से नजर मिल पाएगी।

इस तरह के सवाल से उसका खुद का मन उसे झकझोर देता थाकुछ देर के लिए बस सोचने पर मजबूर हो जाती थी कि क्या वाकई में वह कुछ गलत कर रही हैएक मां होने की नाते वह एक मां की मर्यादा से निकलकर अपने बेटे के सामने पूरी तरह से निर्लज्ज वेश्या की हरकत क्यों कर रही है क्यों अपने बेटे की मां ना बनकर उसके सामने एक औरत बन जा रही है,,, क्या हर एक मां मे एक औरत होती है जो अपने ही अक्स से बाहर निकल कर अपनी जरूरतों को पूरा करती हैक्या उसकी तरह दूसरी भी औरतें ऐसा करती होगी अपने ही बेटे के साथ इस तरह की हरकत करके उन्हें मस्त करती होगी और उन्हें मजबूर करती होगी अपनी ही मां के साथ संबंध बनाने के लिए,,,, यह सब सवाल उसके मन में चल ही रहा था कि तभी उसे नूपुर की याद आ गई और तुरंत उसकी आंखों में चमक वापस लौट आई,,,पर अपने आप से ही बोली नूपुर भी तो ऐसा करती है अपने ही बेटे के साथ सारी संबंध बनाकर अपनी जरूरत को पूरा कर रही है अपनी संतुष्टि को भोग रही है जब वह ऐसा कर सकती है तो मैं क्यों नहीं कर सकतीउसके पास तो उसका पति भी है लेकिन उसके पास कौन है बरसों से वह इसी तरह क्या जीवन तो जी रही है अगर वह अपने बेटे के साथ सारी संबंध बनाना चाहती है और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाकर अपनी जरूरत को पूरा करना चाहती है तो इसमें हर्ज ही क्या है,,,,,। और भला किसी को क्या पता चलने वाला है की मां बेटे के बीच किस तरह का रिश्ता है,,,,,,, बहुत कुछ सोचने के बाद वह फिर से आगे बढ़ाने को अपने आप को तैयार कर ली और मन ही मन प्रसन्न होते हुए अपने बेटे से बोली,,,।

देख अंकित अच्छी तरह से साबुन लगाना मुझे अच्छी तरह से साबुन लगाकर नहाना पसंद है,,,।

तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मम्मी मैं शिकायत का मौका नहीं दूंगा,,,(अपने हाथों को धीरे-धीरे कंधों से नीचे की तरफ ले जाते हुए अंकित बोला)

अंकित के पसीने छूट रहे थे,,, वह अपनी मां के कंधों पर समान लग रहा थावैसे तो उसका मन कर रहा था कि अपने हाथों से अपनी मां की बुर पर साबुन लगा लगा कर रगड़ रगड़ कर उसे धो डालें, लेकिन इस समय अपनी तरफ से इस तरह की हरकत करना उसे उचित नहीं लग रहा था। लेकिन जब उसकी मां ने उसे यह कहा कि अच्छी तरह से बदन के हर एक कोने पर साबुन लगाना है तो यह सुनकर अंकित के बदन में उत्तेजना भरी कंपन होने लगी और वह धीरे-धीरे अपनी हथेलियों को कंधे से नीचे की तरफ ले जाने लगा,,, जिस तरह के हालात से सुगंधा गुजर रही थी उसी तरह के हालात से उसका बेटा अंकित भी गुजर रहा था,,, दोनों का दिल जोरो से धड़क रहा था दोनों के बदन में उत्तेजना भरी कंपन हो रही थी,,,

सुगंधा को अच्छी तरह से मालूम था कि वह जिस तरह से बैठी हुई थी और उसका बेटा जिस तरह से उसके पीछे खड़ा होकर उसे साबुन लगा रहा है ऐसे में उसकी चूचियां उसके बेटे को अवश्य नजर आती होगी और उसका बेटा उसकी चूचियां देखने से बिल्कुल भी चुकता नहीं होगा,,, इसलिए सुगंधा के बदन में अत्यधिक सुरसुराहट महसूस हो रही थी और खास करके दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में तो आग लगी हुई थी,,, सुगंधा का सोचना बिल्कुल ठीक था लगातार अंकित की नजर अपनी मां की चूचियों पर घड़ी हुई थी पेटिकोट की रस्सी से बंधी होने के बावजूद भी अच्छा खासा चुचियों का हिस्सा उसे नजर आ रहा था,,, अंकित अपने मन में सोच रहा था कि काश अपने हाथों से पेटिकोट की डोरी खोलकर चूचियों को आजाद करना होता तो कितना मजा आता ,, यही सब सोच कर उसके चड्डी के अंदर का हथियार गदर मचाने को तैयार था। अंकित की उत्तेजना उसके काबू में बिल्कुल भी नहीं थी वह अपनी मां की मदहोश कर देने वाली जवानी के आगे पूरी तरह से लाचार हो चुका था।

उसकी मां की बदमाशी करने से बिल्कुल भी पीछे नहीं है रही थी वह किसी भी तरह से अपने बेटे को अपनी जवानी के जाल में फांस लेना चाहती थी,,, वह बैठे हुए ही अपनी दोनों टांगों को खोल दे रही थी जिससे उसकी मोटी मोटी जांघें अंकित को आराम से दिखाई दे रही थी जो की केले के तने के समान चिकनी थी,,,अपनी मां की मोटी मोटी जांघों को देखकर उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो चुकी थी,,,और उसे पूरा यकीन ताकि जिस तरह से उसकी मां दोनों टांगों को खोलकर बैठी है ऐसे में उसकी बुर जरूर दिखाई देती होगी और इसीलिए वह थोड़ा साआगे की तरफ अपना कर करके अपनी मां की टांगों के बीच देखने की कोशिश कर रहा था लेकिन नाकाम हो जा रहा था क्योंकि पीछे से उसे अपनी मां की बुर नहीं दिखाई दे रही थी,,,, और अंकित तड़प जा रहा था। बार-बार अंकित चड्डी के ऊपर से अपने लंड को दबा दे रहा थाअगर कोई और मौका होता तो शायद वह अपनी मां की खूबसूरत बदन को देखते हुए मुठ मार कर अपनी गर्मी को शांत कर लिया होता,,, लेकिन इस समय ऐसा करना उसे उचित नहीं लग रहा था क्योंकि उसे डर था कि कहीं उसकी मां की नजर उस पर पड़ गई तो गजब हो जाएगा,,,,।

मां बेटे के बीच के हालात पूरी तरह से नाजुक होते चले जा रहे थे,,, मां बेटे दोनों की उत्तेजना परम शिखर पर थीधीरे-धीरे अंकित अपने दोनों हथेलियां को कंधे से नीचे की तरफ ले आ रहा था और बराबर साबुन लगा रहा था,,, जैसे-जैसे अंकित की हथेली चूचियों की तरफ आगे बढ़ रही थी वैसे-वैसे सुगंधा का दिल जोरो से धड़क रहा था अंकित की तरह ही उसका भी दिल कर रहा था कि उसका बेटा,,, अपने हाथों से उसकी चूची पकड़ कर उस पर साबुन मलमल कर लगाए,,,लेकिन यह उसकी मां की इच्छा थी और उसके मन की इच्छा उसके होंठों पर नहीं आ सकती थी क्योंकि वह एक मां थी भले ही सारे सिर्फ अपनी बेटी को सब कुछ दिखानी और समझने की कोशिश कर रही थी लेकिन अपने मन में उठ रहे मांगों को वह अपने होठों पर नहीं ला पा रही थी।गहरी सांस लेता हुआ अंकित धीरे-धीरे साबुन को नीचे की तरफ ले जाते हुए अपनी मां की चूचियों के उभार की शुरुआत पर ले आया और उसे पर साबुन लगाना शुरू कर दिया यह बेहद अद्भुत पल था,,,, जहां घर में एक तरफ मां अपने बेटेखास करके अपने जवान बेटे को अपनी चूची का हल्का सा हिस्सा भी दिखाना नहीं चाहती या वह देखना ले इसलिए हमेशा ढकी रहती है वहीं पर सुगंधा अपने बेटे से अपनी चूची पर साबुन लगवा रही थी। चड्डी में बना हुआ तंबू किसी भी वक्त सुगंधा की पीठ पर रगड़ खा सकता था। और इसके लिए अंकित पूरी तरह से तैयार भी था लेकिन अभी उचित समय नहीं आया था। गहरी सांस लेते हुए सुगंधा अपने बेटे को फिर से दिशा निर्देश करते हुए बोली।

अच्छी तरह से साबुन लगाना बेटा,,,, कहीं पर रह ना जाए,,,।
बिल्कुल मम्मी तुम चिंता मत करो,,,,,(ऐसा कहते हुए वहां अपनी मां की चूची हो के आधे भाग पर साबुन को रगड़ रगड़ कर लगने लगा उसका मन बहुत मचल रहा था कि पेटिकोट के अंदर हटाकर अपनी मां की बड़ी-बड़ी चूचियों पर साबुन लगाई लेकिन ऐसा करनाउसके लिए अपने आप से उचित नहीं लग रहा था क्योंकि इसमें भी उसकी मां की आज्ञा का होना बेहद जरूरी था और कुछ देर तक वह इसी तरह से अपनी मां की आधी च पर साबुन लगाता रहा और आधी चूची पेटीकोट से ढकी हुई थी,,,,ऐसा लग रहा था कि जैसे अपने बेटे की मां की बात को सुगंधा अच्छी तरह से समझ रही है इसलिए वह खुद ही बोली,,,)

अरे पूरा लाइफ बोय यहीं पर खत्म कर देगा कि आगे भी बढ़ेगा,,,,।

लेकिन मम्मी तुम्हारी पेटिकोट,,,,(अंकित का इतना कहना था कि उसकी मां एकदम से तपाक से बोल पड़ी)

अब क्या तेरे से साबुन लगवाने के लिए पेटिकोट उतार दूं नंगी हो जाऊं,,,,(यहां पर सुगंधा थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोल रही थी,,,क्योंकि वह अपने बेटे को आगे बढ़ाने के लिए इतना इशारा कर रही थी फिर भी उसका बेटा ज्यो का त्यों ही था,,,बार-बार उसका यह कहना कि उसके बदन की हर एक कोने पर अच्छी तरह से साबुन लगाना इसका मतलब वह समझ नहीं पा रहा थासुगंधा का मतलब साफ था कि जैसे भी करके वहां पेटिकोट के अंदर हाथ डालकर उसकी चूची पर साबुन लगाई लेकिन फिर भी वह अपनी जगह से आगे नहीं बढ़ रहा था इसलिए सुगंध को थोड़ा गुस्सा दिखाना पड़ा,,, और अपनी मां की बात सुनकर वह बोला,,,)

अरे मम्मी में ऐसा नहीं कह रहा हूं लेकिन पेटिकोट की वजह से ठीक से साबुन नहीं लगा पा रहा हूं,,,,।
(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा मुस्कुराने लगी,,, जहां एक तरफ अपने बेटे के बुद्धूपन की वजह से उसे गुस्सा आ रहा था वही अपने बेटे के भोलेपन की वजह से वह सोचने पर मजबूत हो जा रही थी कि उसका बेटा दूसरे लड़कों की तरह बिल्कुल भी नहीं था वह सीधा-साधाऔर संस्कारी लड़का था अगर दूसरे लड़कों की तरह आवारा होता तो शायद उसे इतना भी सारा करने की जरूरत ना पड़ती इसलिएजिस तरह से उसने अपने बेटे से अभी जोर से गुस्से में बोली थी अपने आप को अपना लहजा एकदम से बदलते हुए वह मुस्कुराते हुए बोली,,,)

कोई बात नहीं,,,मैं पेटिकोट की डोरी को खोल देती हूं लेकिन उतरूंगी बिल्कुल भी नहीं,,,, तो उसमें हाथ डालकर साबुन लगा देना अब तेरे सामने नंगी होकर साबुन लगवाने में मुझे बहुत शर्म आती है,,,।

सच कहूं तो मुझे भी शर्म आ रही है इस तरह से साबुन लगाने में,,,,।

ओहहह यह बात है,,,, चल कोई बात नहीं मैं अभी पेटिकोट की डोरी को ढीली कर देती हूं,,,(और इतना कहकर सुगंधा अपनी पेटिकोट की डोरी को नाजुक उंगलियों का सहारा लेकर ढीला करने की कोशिश करने लगी,,,लेकिन तभी उसके मन में एक युक्ति सूची वह बड़े आराम से अपने पेटिकोट की डोरी को खोल सकती थी लेकिन ऐसा वह नहीं की और अपने बेटे से बोली,,,)

बाप रे यह तो कस के गिठान लग गई मुझे तो खुल नहीं रही है जरा तू ही खोल दे,,,,,(अपने बेटे से ऐसा कहती है उसके तन-बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी वह मदहोश हो रही थी वह अपने बेटे को कुछ और दिखाना चाहती थी,,,,और अपनी मां की बात सुनकर अंकित एकदम से उत्साहित हो गया भलाई जवान लड़का अपनी मां के इस तरह के निमंत्रण को कैसे स्वीकार कर सकता था पेटिकोट की डोरी खोलने के चक्कर मेंअंकित जानता था कि उसकी उंगलियां उसकी मां की चूचियों से स्पर्श होंगी ऐसे में उसे कितना आनंद आएगा यह सोचकर ही वह गदगद हुआ जा रहा था,,,, फिर भी थोड़ा हडबढ़ाने का नाटक करते हुए वह बोला,,,)

ममममम,,,, में,,,,, खोल दुं,,,,,!

हां तु ,,मुझसे खुल नहीं रही है तुझे ही खोलना पड़ेगा,,,,,,।

ठीक है मम्मी,,,,,।

चल आगे आज पीछे से नहीं खोल पाएगा,,,(सुगंध को इस बात का डर था कि कहीं उसका बेटा पीछे खड़े-खड़े उसके पेटिकोट की डोरी को खोलना शुरू न कर दे और कहीं ऐसा हो जाएगा तो उसकी युक्ति असफल हो जाएगी इसीलिए वह पहले से ही उसे दिशा निर्देश करते हुए बोली,,, और यह सुनकर अंकित के बदन में मदहोशी छाने लगी और वह अपनी मां की बात मानते हुए ठीक अपनी मां के सामने आकर खड़ा हो गया,,, वह थोड़ा झुका हुआ था।क्योंकि उसकी मां बेटी हुई थी और बिना झुके वह अपनी मां की पेटिकोट की डोरी को खोल नहीं सकता था लेकिन झुकाने की वजह से उसकी आंखों के सामने जो दिखाई दिया उसे देखकर उसकी आंखों की चमक बढ़ गई उसके बदन में उत्तेजना की लहर तूफान मचाने लगे उसके अंदर की हालत एकदम से खराब होने लगी उसकी अकड़न बढ़ने लगी,,,, अौर सुगंधा जो दिखाना चाहती थी उसमें कामयाब हो गई थी,,,,ठीक सामने आने पर अंकित को अपनी मां की बुर एकदम से साफ दिखाई देने लगी जो पानी में भीगी हुई थी और कचोरी की तरह फुल चुकी थी,,,जिसकी गुलाबी पत्तियां हल्की सी बाहर निकली हुई थी और उसकी खूबसूरती में चार-चार लगा रही थी,,,,,,कुछ पल के लिए अंकित अपनी मां की दोनों टांग के बीच उसे गुलाबी क्षेत्र को देखता ही रह गया,,,,। वह अपनी मां के जिस अंग को उसके पीछे खड़े होकर देखने की कोशिश कर रहा था और उसमें नाकाम होगया था वही खूबसूरत अंग उसकी मां की वजह से उसे एकदम साफ दिखाई दे रहा था जिसे देखकर उसकी आंखें एकदम से चौंधिया गई थी।

सुगंधा समझ गई थी कि उसकी युक्ति कामयाब हो चुकी है और अपनी युक्ति पर वह मन ही मन गर्व कर रही थी उसे हिसाब दिखाई दे रहा था कि उसका बेटा पागलों की तरह उसकी बुर को देख रहा था,,,, इस अद्भुत नजारे को देखकर खुद सुगंधा की हालत खराब हो रही थी और उसकी बुर से नमकीन रस टपक रहा थाकुछ देर तक अंकित अपनी मां की बुर को देखता रहा और सुगंधा अपने बेटे को अपनी बुर दिखाती रही,,, फिर खुद से ही अपने बेटे का ध्यान किधर है यह जताने की कोशिश करते हुए वह बोली,,,।

अरे क्या देख रहा है,,,? पेटिकोट की डोरी तो खोल तुझे क्या काम बोली हुं और तु क्या देख रहा है,,,,।(सुगंधा एकदम से मुस्कुराते हुए बोली तो अपनी मां की बात सुनकर जैसे वह एकदम से नींद से जगा हो वह एकदम से हडबड़ा गया और घबराहट भरे स्वर में बोला,,,)

ककककक,,,,, कुछ नहीं अभी खोल देता हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही वहअपने दोनों हाथ जाकर पढ़कर अपनी मां की पेटिकोट की डोरी को खोलना शुरू कर दिया और ऐसा करते हुए उसकी हथेली बड़े आराम से उसकी मां की बड़ी-बड़ी चूचियों पर स्पर्श हो रही थी जिसका एहसास उसे मदहोशी के समंदर में ले डूब रहा थाइतना अद्भुत एहसास उसे पहले कभी नहीं हुआ था वैसे तो उसके जीवन में ऐसे पल बहुत बार आ चुके थे लेकिन आज का यह पल कुछ खास था बेहद उन्माद से भरा हुआ था,,,,,पेटिकोट की डोरी खोलते हुए अंकित के मन में आ रहा था कि पेटिकोट के ऊपर से ही अपनी मां की चूची को जोर-जोर से दबा दें लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं था,,,,वह धीरे-धीरे पेटिकोट की डोरी को खोलने लगा और बढ़िया आराम से अपनी मां की पेटिकोट की डोरी को खोलकर ढीली कर दियामन तो उसका कर रहा था कि पेटीकोट को एकदम से नीचे खींच दे ताकि उसकी मां की दोनों चुचिया एकदम से नंगी हो जाए और वह बडे आराम से उस पर साबुन लगा सके,,,, लेकिन यह उसके मन का ख्याली पुलाव था जो इस समय उसकी थाली में आने वाला नहीं था,,,,, वैसे तो सुगंधा भी यही चाहती थी कि उसका बेटा,,,उसकी पेटिकोट की डोरी को खोलते हुए उसका पेटीकोट भी अपने हाथों से उतर कर उसे नंगी कर दे लेकिन वह जानती थी कि उसका बेटा ऐसा नहीं कर पाएगालेकिन फिर भी जितना कुछ कर रहा था उतना भी काफी था उसकी उत्तेजना उसकी मदहोशी को बढ़ाने के लिए,,,,क्योंकि सुगंध भी इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि भला ऐसी कौन सी मैन होगी जो अपनी बेटी को अपनी पेटिकोट की डोरी को खोलने के लिए बोलेगीऐसी बात वह सिर्फ अपनी प्रेमी या पति से ही कह सकती थी अपने बेटे से तो बिल्कुल भी नहीं या फिर ऐसी अवस्था में अपने बेटे से कह सकती थी जब मां बेटे दोनों के बीच कुछ खिचड़ी पक रही हो या पक चुकी हो,,,, और इस समय अंकित और सुगंधा के बीच खिचड़ी पक रही थी पकी नहीं थी। पेटिकोट की डोरी जैसे ही खुली सुगंधा मुस्कुराते हुए अपने बेटे की तरफ देखी और बोली,,,)

खुल गई अब रुक जा में इसे सही से कर लेती हूं,,,,(और इतना कहने के साथ ही वह अपने दोनों हाथों की उंगलियों का सहारा लेकर दोनों तरफ से अपनी छाती पर कई हुई पेटीकोट को वहां धीरे से ढीला करने लगी लेकिन ढीला करते हुए आगे वाले पेटिकोट के भाग को थोड़ा आगे की तरफ खींच दी जिससे उसके बेटे को उसकी चूची एकदम साफ दिख सके और ऐसा ही होगा जैसे ही वह पेटीकोट को आगे की तरफ खींची अंकित की नजर अपनी मां की पेटीकोट में चली गई और उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां देखकर वह एकदम से मस्त हो गया,,,इस तरह की हरकत करने में खुद सुगंधा की हालत खराब हो रही थी उसकी बुर बार-बार पानी छोड़ रही थी,,,, पेटिकोट को ढीला कर लेने के बाद वह इस अवस्था में पेटीकोट को अपनी चूचियों के ऊपर टिका दी,,,,बड़ी-बड़ी खरबूजे जैसी चूचियां और भीगी हुई पेटिकोट होने की वजह से बड़े आराम से उसकी चूचियों के ऊपर उसकी पेटिकोट टिक गई,,, और वह फिर से मुस्कुराते हुए बोली,,,।

अब जल्दी से अच्छी तरह से साबुन लगा दे,,,,(सुगंधा का इतना कहना था कि अंकित एक बार फिर से अपनी मां की टांगों के बीच उसके गुलाबी छेद की तरफ देखने लगा यह देखकर सुगंधा गदगद होने लगी और अंकित गहरी सांस लेता हुआ भारी मन से फिर से पीछे की तरफ आ गया,,,, और सुगंध अपने हाथ में साबुन लेकर पीछे हाथ करके उसकी तरफ साबुन बढ़ा दी,,,,एक बार फिर से अपनी मां के हाथ में से साबुन लेकर वह फिर से साबुन लगाना शुरू कर दिया छातियों पर साबुन फिर से लगाने के बाद वह धीरे-धीरे पेटिकोट के अंदर अपना हाथ डालने लगा,,, यह पल बेहद अद्भुत और उत्तेजना से भरा हुआ था वह अपनी मां की पेटिकोट के अंदर हाथ डाल रहा था,,,, और उसकी ईस हरकत पर सुगंधा की बुर पानी छोड़ रही थी और देखते ही देखते अंकित का साबुन वाला हाथसुगंधा की चूचियों पर जम गई और यह एहसास अंकित को पूरी तरह से ले डूब रहा था वह पागल हुआ जा रहा थावह एक हाथ से अपनी मां की चूची पर साबुन लगाना शुरू कर दिया साबुन क्या लग रहा था वह एक हाथ से अपनी मां की चूची को दबा रहा था,,,,और उसकी हरकत से सुगंधा की हालत खराब होने लगी उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी उसे आनंद आने लगा वह भाव भीबोर होने लगी,,,,उन्माद का नशा सुगंधा की आंखों में एकदम साफ दिखाई दे रहा था अंकित पागलों की तरह साबुन लगाने के बहाने अपनी मां की दोनों चूचियों को एक ही हाथ से दबा दबा कर रहा था औरसुगंधा के मन में चल रहा था कि कहां से उसका बेटा दोनों हाथों से उसकी दोनों चूचियों को मसाला था तो कितना मजा आ जाता इसलिए वह एक बहाने से बोली,,,,।

अच्छे से साबुन लगाकर दोनों हाथों से रगड़ रगड़कर मल,,,,, तभी इसकी मेल छूटेगी,,,,।

(फिर क्या था अंकित को खुला दो और मिल चुका था वह बराबर से दोनों चुचियों में साबुन लगाकर अपना दूसरा हाथ भी धीरे से पेटिकोट के अंदर डाल दिया और दोनों हाथों से अपनी मां की चूचियों को दबाना शुरू कर दिया रगड़ना शुरू कर दिया उसके हाथ से साबुन कब गिर के नीचे उसकी मां के पैरों के लग पहुंच गया था उसे पता ही नहीं चला वह अबदोनों हाथों से अपनी मां की चूची को जोर-जोर से दबा रहा था मसल रहा था रगड़ रहा था और यह एहसास सुगंधा के तन बदन में आग लग रहा था वह पागल हुए जा रही थी अपनी आंखों को बंद करके गहरी गहरी सांस लेते हुए अपने बेटे की हरकत का मजा ले रही थी,,,, सुगंधा की बुर कचोरी की तरह फुल चुकी थी उसमें से मदन रस लगातार बह रहा था अंकित अपनी मां की चूची पर साबुन नहीं बल्कि स्तन मर्दन कर रहा था औरऔरतों को स्तन मर्दन से कितना आनंद आता है यह औरतें ही बता सकती हैं और इस समय सुगंध का चेहरा साफ बयां कर रहा था कि वह पूरी तरह से आनंदित हो चुकी थीयहां तक कि वह इतनी मस्त हो चुकी थी कि अपने हाथों से दोनों पेटीकोट को पकड़े हुए थे और मस्ती के आलम में कब उसके हाथ से पेटिकोट छूट गई उसे पता ही नहीं चला और धीरे-धीरे उसकी पेटीकोटउसकी चूचियों से फिसलते हुए चूचियों के नीचे तक चली गई और उसकी चूची एकदम आजाद हो गई,,,,,।

यह देखकर अंकित की हालात पूरी तरह से खराब हो गई अंकित पागलों की तरह अपनी मां की चूची को दबाए जा रहा था मसले जा रहा था,,,, लेकिन तभी सुगंधा को अपनी पीठ पर कुछ चुभता हुआ महसूस हुआऔर पीठ पर चुभने वाली चीज कोई और नहीं बल्कि उसके बेटे का लंड था और उसकी आंख एकदम से तुरंत खुल गई,,,,उत्तेजना से उसकी हालत खराब हुए जा रही थी और अपनी पीठ पर अपने बेटे के लंड की रगड़ को महसूस करके वह पागल हुए जा रही थी,,,,, उसे एहसास हुआ कि उसकी पेटिकोट नीचे सरक गई है और अपनी चूचियों की तरफ अपने बेटे का ध्यान लाते हुए जो कि इस समय भी अंकित का ध्यान उसकी मां की चूचियों पर तो था ही बल्कि उसके दोनों हथेलियां भी उसकी चूचियों को दबा रहे थे उन दोनों कबूतरों को अपनी हथेली में लेकर जोर-जोर से उनका गला घोट रहे थे सुगंधा एकदम से बोल पड़ी,,,,)

हाय दइया मेरी तो पेटिकोट सरक गई,,,,,(इतना कहते हुए सुगंधा अपनी पेटीकोट को वापस अपनी चूचियों के ऊपर तक ले आई लेकिन अभी भी उसके बेटे के दोनों हाथ उसकी चूचियों पर मटरगश्ती कर रहे थे,,,,तभी सुगंधा की नजर पर के पास पड़े साबुन पर गई तो वह मुस्कुराते हुए साबुन को उठा ली और अपने बेटे से बोली,,,)

बिना साबुन से ही मेरी चूची को रगड़े जा रहा है,,,(मस्ती के आलम में सुगंधा के मुंह से अपने अंग का नाम निकल गया था जिसकी वजह से अंकित पूरी तरह से वासना से लिप्त हो चुका था वह आनंदित हो चुका था और अपनी मां की बात सुनकर वह बोला,,,)

ओहहह मेरा तो बिल्कुल भी ध्यान नहीं किया मुझे लगा कि मेरे हाथ में ही साबुन है देखो तो सही तुम्हारी पेटिकोट के अंदर कितना झाग ही झाग है इसलिए कुछ दिखाई नहीं दिया,,,,।

चल कोई बात नहीं लेकिन तूने बहुत अच्छे से साबुन लगाया लेकिन ले साबुन अब नीचे की तरफ ले जा अच्छे से लगा,,,,,।

(अंकित अपनी मां के सारे को अच्छी तरह से समझ रहा थाउसे पूरा यकीन था कि उसकी मां अब किस जगह साबुन लगवाने के लिए कह रही है भले ही अपने मुंह से नहीं कह रही थी लेकिन उसके इशारे से समझ में आ रहा था कि साबुन कहां लगाना है इसलिए मुस्कुराते हुए अंकित अपनी मां के हाथ से साबुन ले लिया और फिर साबुन को फिर से धीरे-धीरे नीचे की तरफ ले जाने लगा अपनी मां की सपाटपेट पर साबुन लगाते हुए वह अपनी मां की नाभि पर हल्के हल्के उंगली फेर कर उसकी गहराई नाप रहा था और उसकी हरकत सुगंधा को पल-पल तड़पा रही थी,,,,,,,क्योंकि सुगंध अच्छी तरह से जानती थी की औरत की नाभि भी मर्दों की उत्तेजना में काफी इजाफा कर देती हैं और इस समय उसका बेटा उसकी मां भी से खेल रहा था वह अपनी दोनों टांगों को खोलकर बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही थी कि उसके बेटे की हथेली कब उसकी बुर तक पहुंचेगी,,,,कुछ देर तक अंकित इसी तरह से पेट पर ही साबुन लगाता रहा तो उसकी मां को बोलना ही पड़ा,,,)

पेट पर साबुन लगाते लगाते लगता है शाम ढल जाएगी अरे बेवकूफ नीचे की तरफ तो जा वहां भी साबुन लगा,,,,,,।

(अंकित अपनी मां की तड़प उसकी बेबसी को अच्छी तरह से समझ रहा था और वह भी यही चाहता था,,,,इसलिए अपनी मां की बात मानता हुआ बिना कुछ बोलेगा अपनी हथेली को साबुन के साथ नीचे की तरफ ले जाने लगा और अगले हीपाल उसकी हथेली उसकी मां की दोनों टांगों के बीच थी उसके गुलाबी बुर पर जिसका एहसास अंकित को बड़े अच्छी तरह से हो रहा था उसकी गर्माहट ठंडे पानी में भी उसे अच्छी तरह से महसूस हो रही थी,,,, पल भर के लिए लगा कि बुर पर हाथ रखने से कहीं उसका पानी न निकल जाए,,,,लेकिन जिस तरह से वह आगे की तरफ झुका हुआ था जाहिर तौर पर उसकी चड्डी में बना तंबू उसकी मां की पीठ से रगड़ खाने लगा था उसे पर दबाव बनाने लगा था और यह एहसास सुगंधा को और भी ज्यादा मदहोशी के आलम में डुबोए लेता चला जा रहा था।अपने बेटे की हरकत से अपने बेटे की हथेली को अपनी बर पर महसूस करके सुगंधा भी तिल चलने लगी वह एकदम से मदहोश होने लगी अपनी आंखों को बंद करके वह मदहोशी भरे स्वर में बोली,,,)

अच्छे से साबुन लगाना बेटा अच्छे से साबुन नहीं लगाएगा तो यहां खुजली होने लगेगी,,,।

मैं जानता हूं मम्मी तुम चिंता मत करो मैं अच्छी तरह से साबुन लगाऊंगा,,,,(और इतना कहने के साथ ही वह अपनी मां की बुर पर जोर-जोर से साबुन लगाना शुरू कर दिया थोड़ी ही देर में उसकी मां की बुर झाग से भर गई,,,,, अंकित को मजा आ रहा था वह पूरी तरह से उतेजना मैं डूब रहा था वह पागल हुआ जा रहा था,,,,इस समय अंकित का मन कुछ और करने को कर रहा था इसलिए वह अपने हाथ से साबुन को नीचे रख दिया और फिर अपनी नंगी हथेली को अपनी मां की बुर से चिपका दिया,,,, सुगंधा को भी अच्छी तरह से एहसास हो गया कि उसका बेटा कौन सी हरकत कर रहा है लेकिन वह अपने बेटे को बिल्कुल भी रोकने की कोशिश नहीं की क्योंकि उसके हरकत से सुगंधा मस्त हो रही थी,,,,,अपनी मां की बुर पर बहुत जोर जोर से हथेली लग रहा था अपनी मां की नंगी बुर पर हथेली रगड़ने का उसका यह पहला अनुभव था और इस अनुभव में पूरी तरह से खो चुका था,,,, सुगंधा की आंखों में चार बोतलों का नशा दिखाई दे रहा था उसे पर दोहरा प्रभावपड़ रहा था नीचे से अंकित अपनी हथेली से उसे गर्म कर रहा था और ऊपर पीठ पर अपनी लंड पर रगड़ रहा था भले हुए चड्डी के अंदर था लेकिन अपनी अकड़ को वहां बराबर पीठ पर महसूस करवा रहा था।इसलिए सुगंधा कुछ बोल नहीं पा रही थी और अपनी मां के मन की बात को जानने के लिए अंकित बोला,,,,।)

अब कैसा लग रहा है मम्मी,,,,!

बहुत अच्छा लग रहा है बेटा लेकिन अच्छी तरह से साबुन लगा कोने कोने से मैल को साफ कर दे,,,,,सहहहहहहह,,,,,,,।
(अपनी मां की बात और उसके मुंह से निकलने वाली गरमा गरम से शिसकारी की आवाज सुनकर अंकित समझ गया कि उसकी मां पूरी तरह से गर्म हो चुकी है,,,,अंकित अपने मन में सोच रहा था कि जब इतना कुछ हो गया है तो अपनी तरफ से थोड़ी हरकत को बढ़ाना चाहिए क्योंकि उसे पूरा यकीन था कि उसकी हरकत पर उसकी मां बिल्कुल भी उसे रोकने की कोशिश नहीं करेगी क्योंकि उसे भी मजा आ रहा था और अपनी हरकत को करने के लिए अंकित मन ही मन तड़प रहा था और इस समय अपने हरकत को अंजाम देना उसका मुख्य ध्येय था,,,इसलिए वह अपनी मां की स्थिति और उसकी हालत को देखकर बहुत धीरे से अपनी एक उंगली को अपनी मां की बुर के अंदर प्रवेश कर दिया यह अंकित की तरफ से पहला मौका था और पहले हरकत थी जो वह खुद अपनी तरफ से कर रहा था और उसको पूरा विश्वास था कि उसकी हरकत पर उसकी मां मस्त हो जाएगी उसे कुछ नहीं कहेगी,,,,,और ऐसा ही होगा अंकित की हरकत पर उसकी मां के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकले उसे रोकने के लिए लेकिन जिस तरह की आवाज उसके मुख से एकाएक निकली थी वह उसकी तरफ से पूरी तरह से सहमति दर्शाती थी उंगली के बुर में प्रवेश करते हुए सुगंधा के मुंह से एकदम से सियकारी की आवाज निकल गई,,,)

सहहहहहह,,,,,आहहहहहहहह,,,,।

(अंकित के लिए इतना काफी था अपनी मां की हालत को जानने के लिए वह धीरे-धीरे अपनी उंगली को अपनी मां की बुर के अंदर बाहर करना शुरू कर दिया क्योंकि वह समझ गया था कि अब साबुन से नहीं कुछ और से ही उसकी मां को नहलाना पड़ेगा और सुगंधा भी जानती थी कि उसके बेटे के हाथ में साबुन नहीं था और उसकी हरकत उसे नहलाने वाली नहीं थी बल्कि उसे मदहोशी के सागर में डुबो देने वाली थी,,,,, पहली बार और बरसों के बादकिसी गैर मर्द की ऊंगली उसकी बुर के अंदर प्रवेश की थी और वह गैर मर्द कोई और नहीं उसका सगा बेटा था,,,अंकित धीरे-धीरे अपनी उंगली को अंदर बाहर करना शुरू कर दिया था और ऐसा करते हुए अपनी मां से धीरे से उसके कान में बोला,,,)

कैसा लग रहा है मम्मी मेरे हाथ से साबुन लगवा कर,,,,,।

सहहहहहह,,,,,पूछ मत अंकित बहुत मजा आ रहा है मुझे तो लगता है कि मैं इस तरह से कभी नहीं नहाई हूं आज बरसों के बाद मुझे लग रहा है कि मैं सही तरीके से नहा रही हूं,,,,,।

(अपनी मां किस तरह की बातें अंकित के हौसले को बना रही थी वह पूरी तरह से पागल हुआ जा रहा था और धीरे-धीरे अपनी मां की बुर में उंगली को अंदर बाहर कर रहा था अब तो सुगंधा के मुंह से संस्कारी की आवाज निकालना शुरू हो गई थी वह अपनी आंखों को बंद करके इस मदहोशी भरे आलम में पूरी तरह से खो चुकी थी,,,,अपनी मां की हालत देखकर अंकित की भी हिम्मत बढ़ने लगी और वह धीरे से अपनी चड्डी को नीचे की तरफ सरका कर घुटनों तक कर दिया और अपने नंगे लंड को एक हाथ से पकड़ कर उसे हिलाना शुरू कर दिया था,,,, घर के पीछे का माहौल पूरी तरह से गरमा चुका थाअंकित साबुन लगाने के बहाने अपनी मां की बुर में उंगली को अंदर बाहर कर रहा था और पीछे से अपने लंड को हिला कर मुठ मार रहा था,,,,, वह भी पूरी तरह से मस्त हो चुका था लेकिन तभी उसके मन में आया किजब उसके सामने इतनी खूबसूरत औरत है तो फिर वह मुठ क्यों मार रहा है आज किसी और तरीके से पानी निकाला जाए,,, और ऐसा मन में सोच कर वहां अपने नंगे लंड को अपनी मां की पीठ से सटा दिया,,,, लंड का गरम एहसाससुगंधा के समझाने के लिए काफी था कि उसके बेटे का लंड अ उसकी चड्डी में बिल्कुल भी नहीं था उसके बेटे ने चड्डी से बाहर लंड को निकाल लिया था,,,,,, यह एहसास ही सुगंधा के झड़ने के लिए काफी था लेकिन फिर भी वह अपने आप को टीकाए हुए थी,,,,।

अंकित धीरे-धीरे अपनी कमर को खिलाना शुरू कर दिया था वह अपने लंड को अपनी मां की नंगी चिकनी पीठ पर रगड़ रहा था वह जानता था कि उसकी मां की नंगी चिकनी पीठ भी बुर जितना ही मजा देगी,,,, मां बेटे पूरी तरह से मस्त हो चुके थे गर्म हो चुके थे अंकित की हरकत परकुछ पल के लिए सुगंधा के मन में आया कि अब शर्म करने से कोई फायदा नहीं है इसी समय और यही सही मौका भी है अपने बेटे के लंड को अपनी बुर में लेने का,,,, लेकिन कुछ देर सोच विचार करने के बाद वह अपने मन में आए इस ख्याल कोपीछे छोड़ दी और अपने बेटे के लंड की रगड़ और उसकी उंगली का अंदर बाहर करने की हरकत का पूरी तरह से आनंद लेने लगे मोटा तगड़ा लंड सुगंधा की पीठ पर पूरी तरह से हरकत कर रहा था,,,अपनी मां की चिकनी पीठ पर लंड का रगड़ना उसे बेहद उत्तेजित कर रहा था और वह जानता था कि इस तरह से उसका पानी जरूर निकल जाएगा,,,, आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी,,,, अंकित की उंगली लगातार सुगंधा की बुर के अंदर बाहर हो रही थीऔर पीछे से वह अपने लंड की हरकत को जारी रखे हुए था उसका भी मन कर रहा था कि इसी समय अपनी मां को घोड़ी बनाकर पीछे से उसके गुलाबी छेद में लंड डाल दुं लेकिन फिर भी वह किसी तरह से अपने आप को संभाले हुए था।लेकिन अब बर्दाश्त के बाहर हो रहा था सुगंधा की हालत खराब हो रही थी सुगंध जानती थी कि अब वह अपने चरम सुख के करीब बढ़ती चली जा रही है,,,,सुगंधा अपनी आंखों को नहीं खोल रही थी उसे इस बात का डर था कि कहीं आंखें खोलने सेउसकी नजर उसके बेटे की नजर से टकरा गई तो कहीं उसका बेटा अपनी हरकत को रोक ना दे इसलिए वह अपनी आंखों को बंद करके इस पल का मजा ले रही थी,,,,।

अपनी मां की स्थिति को देखकर और जिस तरह से हो अपने लंड को अपनी मां की पीठ पर रगड़ रहा था इससे वह पूरी तरह से मदहोश हो चुका था मादकता से भर चुका था और अगले ही फलको अपने दूसरे हाथ को अपनी मां की पेटीकोट में डाल दिया,,, और उस हाथ से अपनी मां की चूची को थाम लिया,,,, अपने बेटे की इस हरकत पर उत्तेजना के मारे सुगंधा का गला सूखने लगा,,,वह एकदम से मचल उठी क्योंकि उसका बेटा अपनी तरफ से आज तो हरकत कर चुका था एक तो उसकी बुर में उंगली अंदर भर कर रहा था और दूसरा यह कि उसकी चूची को दबाना शुरू कर दिया था इससे वह काफी प्रभावित हो रही थी और मन ही मन प्रसन्न हो रही थी अपने बेटे के बदलते रवैया को देखकर उसे आशा की किरण नजर आ रही थी,,,,।एक हाथ से चुची को दबाता हुआ दूसरे हाथ की उंगली को अपनी मां की बुर के अंदर बाहर करते हुए अंकित पीछे से अपनी मां की नंगी चिकनी पीठ पर अपने लंड को बार-बार रगड़ रहा था,,,,सुगंधा मदहोश में जा रही थी अपने बेटे की हरकत और जिस तरह का नजारा घर के पीछेहो रहा था इस तरह का नजारा तो उसने गंदी फिल्मों में भी नहीं देखी थी,,,,चरम सुख के करीब पहुंच चुकी सुगंधा की सांस ऊपर नीचे हो रही थी उसका ऊदन अकड़न भरा हो रहा था और यह हालत अंकित की भी थी अंकित भी जानता था कि उसका लंड पानी फेंकने वाला है,,,।

और अगले ही पल हल्की सी सिसकारी की आवाज के साथ ही सुगंधा की बुर से पानी झड़ने लगा,,,और चार-पांच सेकेंड के बाद ही अंकित के लंड से पिचकारी फूट पड़ी और सीधा जाकर उसकी मां की चिकनी पीठ पर गिरने लगी,,,, सुगंधा को इस पिचकारी का अहसास बड़ी अच्छी तरह से हो रहा था और वह समझ गई थी कि उसका बेटा झड़ रहा है,,,, वह एकदम से मस्त हो गई अभी सुबह ही पंख साफ करते हुए ही वह अपने बेटे की हरकत से अपनी बर से नमकीन रस का पानी टेबल पर टपका दी थी और उसका बेटा उसे उंगली से लगाकर बड़े चाव से अपने होठों के बीच रखकर उसका स्वाद चख रहा था।इस समय सुगंधा का भी मन कर रहा था कि अपने बेटे के लंड से निकलने वाली पिचकारी को अपने मुंह में लेकर उसे गले तक गटक जाए। लेकिन ईस समय ऐसा करना उचित नहीं था। मां बेटे दोनों का काम हो चुका थालेकिन इस बात को दोनों अच्छी तरह से जानते थे कि यह पूर्ण कार्य नहीं था यह अधूरा ही कार्य था लेकिन शुरुआत बड़ी अच्छी तरीके से हुई थी तो अंजाम भी बेहद रसप्रद होगा इस बात का एहसास दोनों को मदहोश कर रहा था।

अपनी मां को अपनी उंगली से झाड़ लेने के बाद,,, अंकित धीरे से पेटीकोट में से अपने दोनों हाथ को बाहर निकाल दिया और अपने आप को व्यवस्थित करते हुए अपनी चड्डी को कमर तक खींचते हुए वह धीरे से बोला,,,)

अच्छी तरह से साबुन लग गया ना मम्मी,,,।

बहुत अच्छी तरह से,,,,(धीरे से अपनी आंख को खोलते हुए वह बोली,,,, वासना का तूफान गुजर जाने के बाद सुगंधा को शर्मिंदगी का एहसास हो रहा था वह अपने बेटे से नजर नहीं मिला पा रही थी वह शर्म से पानी पानी हुए जा रही थीक्योंकि उसे अच्छी तरह से संस्था की जो कुछ भी हो रहा था उसका बेटा इतना भी नादान नहीं था कि उसे कुछ समझ में ना आता हो इसलिए वह अपने बेटे से नजर नहीं मिल रही थी औरबैठे-बैठे ही नहाना शुरू कर दी थी उसका बेटा भी कुछ बोला नहीं और वह भी अपने तरीके से नहाना शुरू कर दिया लेकिन दोनों पूरी तरह से मस्त हो चुके थे,,, इस बात से दोनों मां बेटे इनकार भी नहीं कर सकते थे,,, नहा लेने के बाद सुगंधा पास में पड़ा टावल अपने बदन पर लपेट ली औरधीरे-धीरे पेटीकोट को नीचे की तरफ सरका कर पैरों के सहारे से उसे अपनी बदन से अलग कर दी,,,, वह अपने बेटे की तरफ देखने से भी डर रही थी उसकी आंखों में आंख मिलाने से घबरा रही थी इसलिए जल्दबाजी में वह पेटिकोट इस तरह से लपेटी थी कि उसकी गांड एकदम साफ दिखाई दे रही थी और वह इस बात को महसूस नहीं कर पाई थी और वहां सेअपने कमरे की तरफ जाने के लिए अपना पैर आगे बढ़ाई और अपने बेटे से सिर्फ इतना ही बोली,,,।

नहा कर कपड़े छोड़ देना मैं बाद में धो दूंगी,,,,(और इतना कहकर वह हाथ से टावल पकड़े हुए अपने कमरे की तरफ जाने लगी,,,,अंकित अपनी मां को जाते हुए देख रहा था और उसकी नंगी गांड को देखकर एक बार फिर से उसके बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी थी वह मुस्कुराने रखा था और देखते ही देखते उसकी मां अपने कमरे में चली गई और वह भी नहा कर वही कपड़े छोड़कर अपने कमरे में चला गया।

घर के पीछे जो कुछ भी हुआ था वह बेहद अद्भुत था,,, जिसकी शायद ही मां बेटे ने कल्पना की थीकपड़े धोने के बाद नहाने के दौरान साबुन लगाते हुए जिस तरह से अंकित ने अपनी मां की पेटीकोट में दोनों हाथ डालकर उसकी गुलाबी फूलों के गुलाबी छेद में उंगली डालकर अंदर बाहर करते हुए उसका पानी निकला था यह बेहद काबिले तारीफ था,,, इसके बारे में सुगंधा कभी सोची भी नहीं थी,,, उसे उम्मीद नहीं थी कि उसका बेटा इतनी हिम्मत दिखाएगा और अपनी उंगलियों से उसका पानी निकाल देगा,,, अपने बेटे के द्वारा दिखाई गई यह हिम्मत सुगंधा को गर्व से गदगद किए जा रहा था। लेकिन जो कुछ भी हुआ था यह सुगंधा के सूझबूझ का ही नतीजा थावह जानती थी कि धीरे-धीरे अब उसे ही अपने बेटे के सामने खुलना होगा और अपने बेटे को उसके सामने खोलना होगा जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब होती हुई नजर आ रही थी,,,, एक दूसरे के बदन पर साबुन लगाने की युक्ति उसी की ही थी,,।जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब हो चुकी थी वह जानती थी की साबुन लगाने के बहाने उसका बेटा उसके अंगों पर जरूर हाथ फेरेगा,,, लेकिन यह नहीं जानती थी कि हाथ फेरने से भी ज्यादा बढ़कर वह उसकी बुर में उंगली करना शुरू कर देगा,,, इसलिए तो अपने बेटे की हरकत से काफी उत्साहित थी।

टावल लपेटकर वह जिस तरह से अपने कमरे की तरफ गई थी उसे नहीं मालूम था कि उसकी गांड पूरी तरह से नग्न होकर उसके बेटे को फिर से दिखाई दे रही है,,, वह तो पूरी तरह से असहज थी वासना का तूफान गुजर जाने के बाद,,, वह अपने बेटे सेआंख मिलाने में भी शर्म महसूस कर रही थी इसलिए जल्द से जल्द अपने बेटे की नजर से वह ओझल हो जाना चाहती थी और इसी अफरा तफरी मेंवह ठीक तरह से टॉवल अपने बदन पर नहीं लपेट पाई और अपने बेटे को अपनी नंगी गांड दिखाते हुए अपने कमरे में चली गई और यह नजारा देखकर अंकित के बदन में फिर से सुरसुराहट होने लगी,,,, वह अपनी मां कोतब तक देखता रहा जब तक की उसकी मां अपने कमरे में चली नहीं गई आज एक अद्भुत सुख का अनुभव उसने किया था,,, जिसका एहसास जिसकी अनुभूति उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी उत्तेजना और मदहोशी में उसका चेहरा लाल हो चुका था,,,,उसे इस बात की खुशी थी कि जो कुछ भी उसने किया था उसको लेकर उसकी मां के मन में कोई ऐसी बात नहीं थी अंकित को अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उसकी हरकत से उसकी मां को आनंद ही आया था इसलिए वह भी खुश नजर आ रहा था।

जाते-जाते सुगंधा अपने बेटे को उसके बदन का कपड़ा जो कि मात्र केवल उसका अंडरवियर ही था उसे वहीं छोड़कर आने के लिए बोली थी,,, अंकित की उंगलियों में अभी भी उसकी मां की बुर की गर्मी का एहसास बराबर हो रहा था वह कैसे इतनी हिम्मत कर गया यह सोचकर वह खुद हैरान था अपनी मां की गुलाबी बुर पर अपनी हथेली रखकर उसमें उंगली अंदर बाहर करने का जो मजा उसे प्राप्त हुआ था उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल था,,, और ऐसा करते हुए जिस तरह से उसने अपने अंडर बियर को नीचे करके अपने टनटनाए लंड को निकाल कर जिस तरह से हिला रहा था और उसके बाद पूरी तरह से उत्तेजित होकर अपनी मां की नंगी चिकनी पीठ पर ही उसे रगड़ रहा था वह बेहद अद्भुत प्रयास था जिसमें वह पूरी तरह से सफल हो चुका था,,,वह इस बात से हैरान था कि उसकी मां को उसके लंड की रगड़ का एहसास तो अच्छी तरह से हुआ होगा लेकिन वह उसे बिल्कुल भी रोकने की कोशिश नहीं कीउसे एक बार भी मन नहीं कर पाया पूछने की जेहमत नहीं की की है क्या चीज है जो उसकी पीठ पर रगड खा रही है चुभ रही है,,, उसे अच्छी तरह से मालूम था कि उसकी मां को जरूर इसका एहसास हुआ होगा कि उसकी पीठ पर रगड़ने वाली मोटी तगड़ी चीज उसके बेटे का कौन सा अंग है।इस बात को सोचकर अंकित के मन में इस बात की प्रबलता और ज्यादा बढ़ती चली जा रही थी कि जैसा वह चाहता है उसकी मां भी वैसा ही चाहती है,,,

इस बात का अहसास होते ही सिर्फ अपने बदन परफिर से पानी डालने लगा और कुछ ही देर में नहा कर वहां अपनी मां के कहे अनुसार अपनी चड्डी वहीं छोड़कर टॉवल अपनी कमर पर लपेट लिया,,,, एक बार झड़ जाने के बावजूद भीअपनी मां की नंगी गांड के दर्शन करके फिर से उसका लंड अपनी औकात में आ चुका था और इसीलिए टावल में तंबू बनाया हुआ था और वह उसी अवस्था में चलता हुआ अपने कमरे में चला गया,,, और कमरे में जाते ही एकदम नंगा हो गया,,,,वह आज बहुत खुश था क्योंकि आजसाबुन लगाने के बहाने उसने अपनी मां की बुर में उंगली डालने का सौभाग्य जो प्राप्त किया था और अपनी उंगली अंदर बाहर करते हुए उसे अद्भुत सुख की प्राप्ति भी कराया था और खुद झड़ गया था,,,खुद के झड़ जाने पर उसे अच्छी तरह से इस बात का एहसास हो रहा था कि उसकी मां की चिकनी नंगी पीठ उसकी गुलाबी बुर से कम नहीं थी,,,अपनी मां की नंगी चिकनी पीठ की रगड़ पाकर भी वह पूरी तरह से मस्त हो चुका था। यही सब सोचता हुआ वह नग्न अवस्था में ही अपने बिस्तर पर बैठ गया और अपनी दोनों टांगों के बीच खड़े हथियार को देखने लगा,,, आज इस तरह की उसके ही हथियार ने मैदान-ए-जंग में बहादुर दिखाया था उसे देखकर वह अपने हथियार से बेहद खुश था। वह उसे हल्के हल्के सहला रहा था उसे दुलार रहा था,,, और उसे अपनी मुट्ठी में भरते हुए अपने आप से ही बोला,,,।

हाए मेरे राजा,,,, कब घुसेगा मेरी मां की गुलाबी बुर में बताना,,, मुझसे रहा नहीं जा रहा है,,,, मैं अच्छी तरह से जानता हूं की मां की गुलाबी बुर देखकर तेरी क्या हालत होती हैतुरंत तो खड़ा हो जाता है उसमें घुसने के लिए उस पर स्पर्श होने के लिए उसे छुने के लिए,,,, तेरी अकड़ देखकर मेंसमझ गया हूं कि तू मेरी मां की बुर में घुसने के लिए कितना देता है मैं जानता हूं कि जिस दिन पर तुझे मौका मिलेगा मां की बुर में घुसने के लिए तो तबाही मचा देगा मम्मी की हालत खराब कर देगा लेकिन यह मौका कब तो प्राप्त करेगा मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है लेकिन आज तूने जो बहादुरी दिखाया है उससे मैं बहुत खुश हूं आधा काम तो तूने कर दिया है लेकिन थोड़ी ओर हिम्मत दिखा आगे बढ़ और घुस जा मेरी मां की बुर मेंमैं अच्छी तरह से जानता हूं कि एक बार तो हिम्मत करके उसमें घुस गया तो फिर मम्मी कभी भी तुझे बाहर निकलने नहीं देगी और तुझे इतना मजा देगी और खुद इतना मजा लेगी कि पूछो मत तू भी मस्त हो जाएगा और मम्मी भी मस्त हो जाएगी,,,(अंकित अपने लंड को हल्के हल्के सहलाते हुए अपने आप से ही वह इस तरह की बातें कर रहा था,,,,और धीरे-धीरे उसका लंड पूरी तरह से फिर से अकड़ में आ चुका था और वह अपने आप से इस तरह की बातें करके पूरी तरह से मदहोश हो चुका था,,,कुछ देर पहले जिस तरह से उसके और उसकी मां के बीच हालात पैदा हुए थे और जिससे वह दोनों झडे थे और इस समय अपने ही कमरे मेंअपनी मां के बारे में गंदी बातें सोचकर वह पूरी तरह से ग्नावस्था में पूरी तरह से मदहोश हो चुका था और मजबूर हो चुका था अपने हाथ से ही अपने लंड को हिलाने के लिए,,,, और अपनी आंखों को बंद करके अपनी मुट्ठी को अपने लंड के इर्द-गिर्द कस केवह पूरी तरह से कल्पना में खोने लगा और घर के पीछे जिस तरह का दृश्य दोनों मां बेटे के बीच दृश्य मान हुआ थाउसे दृश्य में वह अपनी कल्पना के रंग भरने लगा और जिस तरह से वहां अपनी मां की पेटीकोट में अपने दोनों हाथ डालकर उसे साबुन लगाते हुए उसकी बुर को मसल रहा था दबा रहा था उसमें उंगली अंदर बाहर कर रहा था,,, उस दृश्य में वह पूरी तरह से खोने लगा,,,।

उसे अद्भुत दृश्य में अपनी कल्पना के रंग भरते हुए वहां अपने मन में कल्पना करने लगा कि वह धीरे से अपनी मां की पेटीकोट में से अपने दोनों हाथ को निकाल कर अपने दोनों हाथ को पीछे सेअपनी मां की बेटी कोर्ट को पड़कर धीरे से अपनी मां की पेटीकोट को उसकी कमर के ऊपर तक सरकार दिया और उसकी नंगी गांड के नीचे अपनी दोनों हथेलियों को रखकर उसे हल्के से ऊपर की तरफ उठाने लगा,,, और उसकी इस हरकत पर उसकी मां मदहोश नजरों से उसकी तरफ नजर घुमा कर देखने लगी मानो के जैसे कह रही हो कि जो कुछ भी तु कर रहा है वह एकदम ठीक है,,, और खुद ही अपनी बड़ी-बड़ी गांड को हवा में लहराते हुए घोड़ी बन गई और अपने बेटे की तरफ देखकर मुस्कुराने लगे,,अपनी मां की मुस्कुराहट देखकर अंकित समझ गया कि उसकी मां को क्या चाहिए और फिर वह ढेर सारा थुक अपने लंड के सुपाड़े पर लगा कर अपनी मां के गुलाबी छेद में धीरे-धीरे प्रवेश कराने लगा,,,और देखते ही देखते हैं वह पूरा अपनी मां की बुर में डाल चुका था और अपनी मां की कमर पकड़कर अपनी खुद की कमर हिलाना शुरू कर दिया था,,, कल्पना में उसका घोड़ा बड़ी तेजी से दौड़ रहा था,,,, और फिर थोड़ी ही देर में उसके लंड से पिचकारी निकली और नीचे जमीन पर गिरने लगी,,,, उसकी आंखें खुल चुकी थीवह थोड़ी देर में सामान्य हुआ और फर्श को साफ करके अपने कपड़े पहनने लगा,,,।

दूसरी तरफ से सुगंधा भी अपने बदन से टावल उतार कर आईने के सामने पूरी तरह से नंगी खड़ी थी,,,, शर्म और उत्तेजना के मारे उसका पूरा बदन लाल टमाटर की तरह हो गया था,,,, वह आईने में अपने नंगे बदन को देख रही थी और मन ही मन मुस्कुरा रही थी और गर्व महसूस कर रही थी। अपने बेटे की हरकत से वह काफी उत्साहित नजर आ रही थीवह बार-बार अपनी दोनों टांगों के बीच अपनी पूरी हुई कचोरी को देख रही थी जिसमें कुछ देर पहले उसके बेटे की उंगली पूरी तरह से घमासान मचाए हुए थी,,, वह यह सोच कर और भी ज्यादा मदहोश हुए जा रही थी कि वह अपने बेटे को बुद्धू समझ रही थी,,,, लेकिन आज जिस तरह से उसने हरकत किया था इतना तो तय था कि वह इतना भी बुद्धु नहीं था। औरतों के अंगों के बारे में वह समझने लगा था तभी तो उसने इस तरह की हरकत किया था,,,, इस तरह की बातें सोचकर वह अपने मन में गदगद हुए जा रही थी। फिर वह अपने मन को समझाते हुए बोली,,,आज जो कुछ भी हुआ है वह उसकी ही बेशर्मी का नतीजा है वही पूरी तरह से बेशरम बनाकर उसे अपने बदन का हर एक अंग दिखाती रही अपनी गांड अपनी बुर अपनी चूची सब कुछ दिखाती रही,,,और यही सब देखकर उसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि आज वह अपनी ऊंगली उसकी बुर में डालकर उसका पानी निकाल दिया,,,, और उसकी जगह कोई और होता तो वह भी यही करता बार-बार जवान लड़के को एक खूबसूरत औरत अपना नंगा बनी दिखाइए तो आखिरकार कब तक जवान लड़का अपने आप को काबू में कर सकेगा कब तक अपने आप को संभाल पाएगा यह तो एक ना एक दिन होना ही था यह सब अपने मन में सोचते हुए वह आईने में देख कर मुस्कुराते हुए मानो अपने आप से ही बोली।

यही तो मैं चाहती हूं मैं यही तो चाहती थी कि मेरा बेटा हिम्मत दिखाएं मेरे खूबसूरत अंगों को देखकर वह पागल हो जाए मदहोश हो जाए गुलाम बन जाए,,,, और आज जो कुछ भी हुआ मेरे बेटे की हिम्मत देखकरमैं आज बहुत खुश हूं लेकिन मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा अपनी हिम्मत को थोड़ा और बढ़ाएं उसे पता होना चाहिए की औरत की बुर में उंगली से नहीं लंड से पानी निकाला जाता है। यह सब अपने मन में सोचती हुई वह अपनी हथेली को अपनी दहकती हुई बुर पर रख दी और उसे हल्के से मसलते हुए एक लंबी आह भरने लगी,,, और बिस्तर पर पीठ के बाल पसर गईऔर हल्के हल्के अपनी बुर को सहलाते हुए अपने बेटे के बारे में सोचते हुए वह,, कब नींद की आगोश में चली गई उसे पता ही नहीं चला।

बाहर बर्तन की आवाज के साथ ही उसकी नींद खुली तो दीवार पर टंगी घड़ी में देखी तो 5:00 बज रहे थे,,, और अपनी स्थिति को देखी तो वह शर्म से पानी पानी हो गई अपनी स्थिति को देख कर वह मुस्कुराने लगी लेकिन पल भर के लिए उसके मन में आया कि आज इसी अवस्था में दरवाजा खोलकर बाहर निकल जाए ताकि उसका बेटा देखे तो सही की उसकी मां कितनी बड़ी बेशर्म हो चुकी है,,, लेकिन फिर अपने मन से यह ख्याल वह निकाल दी और अपने कपड़े पहनने लगी तभी उसे याद आया गेहूं पीसाने के लिए रखा हुआ है,,,वह तुरंत कपड़े पहनकर अपने कमरे से बाहर आई तो देखिए उसका बेटा अपने हाथ पैर धो रहा थावैसे तो जो कुछ भी घर के पीछे हुआ था उसको लेकर वहां अपने बेटे से नजर मिलाने में शर्मा रही थी लेकिन फिर अपने मन में सोची कि अगर वह खुद इतना शर्मा आएगी तो कैसे मंजिल तक पहुंच पाएगी,,, इसलिए वह पूरी तरह से अपने आप को सहेज कर ली और अपने बेटे की आंख से आंख मिलाते हुए बोली।

अरे अंकित घर में आंटा नहीं है गेहूं पीसाना है,,,(अपने पल्लू को ठीक करते हुए वहां बोली लेकिन इसके बावजूद भी इसकी भारी भरकम छातियां अंकित की नजर में आ चुकी थी और वह मन ही मन मुस्कुराते हुए बोला,,,,,)

कोई बात नहीं मम्मी मैं गेहूं ले जाता हूं पिसवाने के लिए,,,,।

शर्म से आंखें झुकी हुई होने के बावजूद भी, सुगंधा को अपने बेटे से गेहूं पिसवाने के लिए बोलना पड़ा,,, क्योंकि इसके बिना चलना भी नहीं थापर वैसे भी सुगंध अच्छी तरह से जानती थी कि जब वह खुद इस तरह के हालात से शर्मा जाएगी तो फिर आगे कैसे बढ़ेगी इसलिए अपने आप को सहज करके वह अंकित से गेहूंले जाने के लिए बोली थी और अंकित भी गेहूं ले जाने के लिए तैयार हो गया था,,,,सुगंधा दूसरे कामों में लग गई थी और अंकित गेहूं की बोरी लेकर अपने कंधे पर उठाकर वह घर से निकल गया था,,,।

गेहूं पीसने की घंटी कुछ ज्यादा दूरी पर नहीं थी,,, 5 मिनट पैदल चलने के बाद ही घंटी आ जाती थी,,, अंकित अपने ही ख्यालों में पैदल चलता हुआ घंटी की ओर आगे बढ़ता चला जा रहा थाजो कुछ भी उसके साथ घर में हो रहा था वह उसके लिए बेहद अनमोल पल था जो वह कभी भी भूल नहीं सकता था घर में इतना आनंद आता है आज उसे पहली बार एहसास हो रहा था वैसे तोथोड़ा बहुत पहले से ही वह घर में आनंद लेता आ रहा था लेकिन अब आनंद की सीमा बढ़ती जा रही थी,,, धीरे-धीरे भाई इस खेल में माहिर होता चला जा रहा था,,,,वह अपनी हरकत के बारे में सोच कर मदहोश हो रहा था जब वह अपनी मां को साबुन लगा रहा था वह कभी सोचा नहीं था कि वह अपनी मां के साथ इस तरह की हरकत कर बैठेगा और वह भी उसकी मां की जानकारी में,,,, उसे पूरा यकीन था कि उसकी हरकतका एहसास उसकी मां को जरूर हो रहा था और उसे मजा भी आ रहा थालेकिन वह कुछ बोल नहीं रही थी इसका मतलब साथ था कि वह इस खेल में आगे बढ़ना चाहती थीऔर अंकित भी इस खेलने आगे बढ़ना चाहता था लेकिन वह नहीं समझ पा रहा था कि क्यों वह पहल नहीं कर पा रहा है,,,,।

जबकि सुमन की मां के साथ वह एकदम से खुलकर खुद आगे कदम बढ़ाकर उसकी अपने ही घर में चुदाई कर दिया था,,, इस बारे में सोचकर अंकित खुद हैरान हो रहा था कि वह सुमन की मां के साथ इतनी जल्दी कैसे खुल गया और अपनी खुद की मां जो खुदकिसी न किसी बहाने अपने अंगों का प्रदर्शन कर रही थी उसे ललचा रही थी और वह उसके साथ आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा था,,, और जो कि आज तो पूरी तरह से हद हो चुकी थी साबुन लगाने के बहाने वह अपनी मां की बुर में उंगली अंदर बाहर करने लगाजिसका एहसास उसकी मां को भी अच्छी तरह से हो रहा था यह सब जानते हुए भी सूरज अपनी उंगली की जगह अपने लंड का उपयोग नहीं कर पाया यह उसकी नादानी थी या वह इस खेल में पूरी तरह से ऐसा सफल हो गया था या फिर आगे बढ़ने से उसे मां बेटे के बीच का पवित्र रिश्ता रोक रहा था काफी सोच विचार करने के बाद उसे ऐसा ही लग रहा था कि शायदवह सुमन की मां के साथ जैसा किया था वह अपनी मां के साथ इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि उसके साथ उसकी मां बेटी का रिश्ता था और इसीलिए वह अपने आप को आगे बढ़ाने नहीं दे पाया यही शर्म और झिझक और संस्कार उसे रोक रहे थे अब संस्कार तो कुछ रह ही नहीं गया था क्योंकि उन दोनों के बीच काफी कुछ हो चुका था,,,।

लेकिन इतना तोवह अच्छी तरह से जानता था कि उसकी हरकत का मजा उसकी मां पूरी तरह से ले रही थी ऐसा नहीं था कि वह अपनी मां की बुर में उंगली कर रहा था साबुन लगाने के बहाने और उसकी मां को इसकी भनक तक नहीं थीवह अच्छी तरह से जानता था कि औरत का सबसे संवेदनशील अंग उसकी बुर होती है गहरी नींद में भी अगर उसे हल्के सेहाथ रख दो तो औरत की नींद खुल जाती है और ऐसे में उसकी उंगली उस बुर के अंदर बाहर हो रही थी तो उसकी मां को भला पता कैसे नहीं चला होगा,,, अंकित समझ गया था कि उसकी मां को मजा आ रहा था,,, अपनी मां के बारे में इस तरह से सोचने पर उसे राहुल की बात याद आ गईजिसने उसे बताया था कि औरत काफी समय से अगर मर्द की बगैर रह रही हो या पति के बगैर रह रही हो तो ऐसे में वह मजबूर हो जाती है सारी संबंध बनाने के लिए उसमें चुदस की लहर कुछ ज्यादा ही उठती है,,,,राहुल की बात सोच कर उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव में सेहराने लगे और तुरंत राहुल और उसकी मां के बीच के संबंध के बारे में सोने में अच्छी तरह से जानता थाकी रात में भी सारी संबंध थे और वह अपनी आंख से देख कर चुका था लेकिन इस संबंध के पीछे का राज यह था कि राहुल के पिताजी का शरीर और उम्र दोनों साथ नहीं दे रहा था और ऐसे में राहुल की मां पूरी तरह से जवानी से भरी हुई थीऔर उन्हें मोटे तगड़े लंड की जरूरत थी ऐसे में राहुल उनका सबसे बड़ा सहारा बना और उसके साथ चुदवा कर मां बेटे दोनों रोज तृप्ति का एहसास ले रहे थे,,,।

कंधे पर गेहूं की बोरी लिए हुए वह घंटी की तरफ आगे बढ़ रहा था और अपने मन में सोच रहा था कि वह भी अपनी मां का सहारा बनेगा बरसों से जो उन्हें खुशी और शरीर सुख नहीं मिला है अब वह उन्हें देगा लेकिन कैसे उसे समझ में नहीं आ रहा था आगे से पहल करने में उसे डर लगता था जबकि वह अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां भी इसके लिए तैयार है लेकिन फिर भी न जाने कौन सी झिझक उसे रोक रही थी,,,, यही सब सोचता हुआ वह थोड़ी ही देर में घंटी पर पहुंच चुका था घंटी पर कोई नहीं था केवल घंटी का मालिक ही था जिसे अंकित अच्छी तरह से जानता था और उन्हें अंकल कहता था उनका नाम पुरन था,,, और अंकित उन्हें पूरन अंकल कहता था,,,, गेहूं की बोरी लेकर जैसे ही वह दुकान पर पहुंचा घंटी का मालिक पूरनतुरंत ही उसके पास आया और अपने हाथों से उसके कंधे पर रखी हुई पूरी उठाकर तराजू पर रखकर उसका वजन देखने लगा,,,, और जब वह गेहूं तौल रहा था तब अंकित इधर घर देखते हुए बोला।

क्या बात है पुरन अंकल आज कोई नजर नहीं आ रहा है,,,।(कंधे पर बोरी का वजन रखने की वजह से वह थोड़ा थक गया था इसलिए गहरी सांस लेते हुए बोल रहा था उसकी बात सुनकर गेहूं का वजन ले रहे उस घंटी के मालिक ने बोला)

अरे अंकित बेटा आज सुबह में ही सबका गेहूं पीस दिया हूं बस कुछ लोग ही रह गए हैं,,,, देख रहे हो गेहूं की बोरी और डिब्बा भी कितना कम है,,, आज जल्दी काम खत्म हो जाएगा,,,,(इतना कहते हुए वहतराजू पर से गेहूं की बोरी को उतार कर एक तरफ रख दिया और उसकी चिट्ठी बनाने लगा,,,और चिट्ठी बनाते हुए वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

अरे अंकित तुम्हें कहीं जाना तो नहीं है ना,,,,।

नहीं पुरन अंकल मुझे कहीं नहीं जाना है,,, क्यों कोई काम था क्या,,,,!?

काम तो था मेरी तबीयत थोड़ा सा नादुरस्त नजर आ रही है,,,, मैं सोच रहा था कि 20-25 मिनट आराम कर लो तब तक तुम गेहूं पीस लो,,,।

लेकिन मुझे तो गेहूं पीसना आता नहीं है,,,।

अरे इसमें कौन सी बड़ी बात है आओ मैं तुम्हें बताता हूं,,,(इतना कहकर वह अंकित को घंटी के करीब ले गया,,, और घंटी के ऊपर वाले हिस्से को दिखाते हुए जिसमें गेहूं भरा जाता था वह बोला,,,)

देख रहे हो गेहूं अपने आप घंटी के अंदर जा रहा है बस तुम्हें इतना करना है कि थोड़ा ऊंगली से चला देना है ताकि गेहूं आराम से अंदर जा सके और कुछ करना नहीं है,,,,

ओहहहह यह तो बहुत आसान है अंकल जी,,,।

तो क्या तुम्हें लग रहा था कि जैसे पहाड़ चढ़ना है कुछ खास नहीं है और यह देखो गेहूं खत्म हो गया है,,, रुको मैं तुम्हें बता देता हूं,,,(इतना कहकर वह गेहूं की उस बोरी को वहां से हटा दिया और अंकित से बोला,,,)

तुम अपनी गेहूं की बोरी उठा कर लाए मैं बताता हूं कैसे क्या करना है,,,,(इतना सुनकर अंकित तुरंत अपनी गेहूं की बोरी लेकर आया और बोला)

अब क्या करना है अंकल,,,,

बस अभी से उठाकर इसमें डाल दो,,,,(अंकित वैसा ही किया) अब देखो गेहूं आराम से नीचे गिरता चला जाएगा और पिसता चला जाएगा,,,(इतना कहकर वहां गेहूं की बोरी को जहां से आटा निकलता था वहां लगा दिया,,,, ताकि आटा उसमें इकट्ठा हो सके,,) देख लिया ना कैसे क्या करना है,,,

जी अंकल,,,,।

बस ख्याल रहे इसके अंदर देखते रहना कहीं गेहूं रुक ना जाए बस उसे उंगली से चला देना बाकी सारा काम अपने आप हो जाएगा,,,,।

ठीक है अंकल जी अब आप जाइए आराम करिए,,,।

लेकिन ध्यान से बेटा इतने में तो आधा घंटा निकल जाएगा तब तक मैं आ जाऊंगा,,,, अब मैं जाता हूं,,,,(उसका इतना कहना था कि तभी सामने से सुषमा भी गेहूं की बोरी लेकर वहां पहुंच गई उस पर नजर पड़ते ही अंकित का चेहरा खिल उठा और यही हाल सुषमा का भी हो रहा था,,,,वह भी अंकित को देख रही थी और उसे दिन की याद एकदम से ताजी हो गई थी उसके लगाए गए हर एक धक्के उसे अच्छी तरह से याद थे,, और इसीलिए उसकी बुर में सिरहन सी दौड़ने लगी,,, लेकिन इस बीच सुषमा को देखकर घंटी का मालिक थोड़ा सा नाराजगी दिखाते हुए बोला,,)

लो इनको भी अभी आना था,,,,। आई भाभी जी बहुत देर कर दी हो आप,,, कोई जल्दबाजी तो नहीं है,,,।

अरे यह क्या कह रहे हो भाई साहब जल्दबाजी न होता तो मैं यहां क्यों आती आराम से नहीं भेज देती वह क्या है कि सुमन घर पर है नहीं इसलिए मुझे आना पड़ा और अगर गेहूं नहीं पिसा जाएगा तो रोटी नहीं बन पाएगा,,,

चलो कोई बात नहीं,,,,

क्या कहीं जा रहे हो क्या भाई साहब,,,

कहीं जा नहीं रहा था लेकिन आराम करने जा रहा था क्योंकि आज तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही थी।

तो मेरा गेहूं,,,!

अरे चिंता मत करिए भाभी जी अंकित है ना यह पीस देगा,,,,

क्या ये,,,,(आश्चर्य से अंकित की तरफ देखते हुए)

क्यों आंटी जी तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है क्या,,,?(अंकित मुस्कुराते हुए बोला,,)

विश्वास तो मुझे उसे दिन भी नहीं हो रहा था,,,

किस दिन भाभी जी,,,

अरे कुछ नहीं ,,,, क्या यह सच में गेहूं पीस देगा,,,।

अरे बिल्कुल भाभी जी चिंता मत करिए मैं सबकुछ सिखा दिया हूं,,, अंकित भाभी जी का गेहूं वजन कर दे तो,,,।

ठीक है अंकल,,(और इतना कहकर अंकित तुरंत सुषमा आंटी के करीब है और मुस्कुराता हुआ उनकी गेहूं की बोरी को उठाकर तराजू पर रख दिया और खुद ही दौड़ने लगा थोड़ी ही देर मेंवह गेहूं का वजन ले चुका था और चिट्ठी अपने हाथ से बना रहा था यह देखकर सुषमा मुस्कुराते हुए बोली)

अरे वाह रे अंकित तु तो बहुत चालाक हो गया है,,,.

सच में भाभी जी यह बहुत होशियार लड़का है,,, एक ही बार बताने पर सब कुछ सीख गया,,,।

अरे यह बहुत शैतान भी है,,,,।

तो ठीक है भाभी जी आप जाएंगी की रुकेगी,,,।

रुकना तो पड़ेगा ही,,,,तुम जाओ आराम करो मैं यही रुकती हूं इसके बाद मेरा ही नंबर है ना,,,।

हां भाभी जी आपका ही नंबर है,,,, और हां,,,(इतना कहकर वहां दरवाजे पर गया और लकड़ी के दरवाजे को बंद कर दिया और बोला) यह ठीक रहेगा कोई अगर आएगा अभी तो वह दुकान बंद समझ कर चला जाएगा क्योंकि थोड़ी भी गड़बड़ हो गई तो नुकसान हो जाएगा,,,.

में
यह तुमने बहुत ठीक किया भाई साहब,,,(अंदर ही अंदर एकदम प्रसन्न होते हुए) दूसरा कोई गेहूं लेकर आएगा तो दिक्कत हो जाएगी,,,, अंकित इतना भी होशियार नहीं हो गया है कि एक साथ इतने लोग को संभाल लेगा,,,।

सही कह रही हो भाभी जी अब आप बैठिए मैं आराम करने जा रहा हूं,,,(और इतना कहकर वह आराम करने के लिए दूसरे कमरे में चला गया,,, अंकित भी मन ही मन खुश हो रहा था,,, वैसे तो सुषमा सिर्फ गेहूं की बोरी देने के लिए आई थी लेकिन अंकित को यहां देखकर उसका यहां रुकने का मन हो गया था। घंटी के मालिक के जाते ही सुषमा मुस्कुराते हुए अंकित की तरफ अच्छी और बोली,,,)

क्या रे क्या करने आया है यहां पर,,,।

वही जो तुम यहां करवाने आई,,हो,,,,।

करवाने आई हूं,,,,, तुझे क्या लगता है कि मैं यहां करवाने के लिए आती हुं,,,,

अब क्या पता देख कर तो मुझको ऐसा ही लगता है,,,, क्योंकि उस दिन भी तो घर पर सिर्फ चीनी लेने आई थी लेकिन करवा कर गई,,,,।

क्यों उस दिन तुझे मजा नहीं आया क्या,,,,?(सुषमा एकदम मस्त होते हुए दोनों हाथ को आगे बढ़करअंकित के कंधे पर रखते हुए बोली और वह इस तरह से अपनी भारी भरकम चुचियों का प्रदर्शन भी उसके सामने कर रही थी,,,,और उसका यह प्रदर्शन रंग ला रहा था क्योंकि उसकी यह अदा अंकित को मदहोश कर रही थी,,,, क्योंकि रास्ते भर वह अपनी मां के बारे में सोच कर मदहोश हो रहा था उत्तेजित हो रहा था और इस समय उसकी आंखों के सामने सुमन की मां थी जिसकी चुदाई वह कर चुका था और उसे लगने लगा था कि आज हाथ से हिलाकर गर्मी शांत नहीं करना पड़ेगा बल्कि आज बुर के अंदर डालकर ही गर्मी शांत हो जाएगी। सुषमा की बात सुनकर वह भी मुस्कुराते हुए बोला,,,)

मजा तो इतना आया था कि आंटी पूछो मत,,,,,। और तुम्हें,,,।

उसे दिन पता नहीं चला सब कुछ जल्दबाजी में हुआ था ना इसलिए,,,,(अंकित के कंधे पर से अपने दोनों हाथ हटाते हुए वह बोली)

लेकिन तुम्हारी आवाज सुनकर तो लग नहीं रहा था कि तुम्हें मजा नहीं आ रहा था,,,,, तुम भी बहुत मजा ली थी,,,,।
(अंकित की बात सुनकर सुषमा मुस्कुराने लगीपर वह बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही थी जिसे बंद करके घंटी का मालिक कमरे के अंदर आराम करने के लिए गया था और इन दोनों को एक बहुत अच्छा मौका देकर गया था,,,,)

तुझे क्या लगता है,,,,,?

अब मुझे क्या लगता है मैं कैसे बता सकता हूं मुझे तो बहुत मजा आया था और मेरी पूरी कोशिश की कि तुम्हें भी बहुत मजा दूं क्या सच में मैं तुम्हें मजा नहीं दे पाया,,,,,,।

उस दिन अधूरा ही रह गया मुझे लग रहा है,,,(इतना कहने के साथ ही एकदम से वह अंकित के पेट के आगे वाले भाग पर अपनी हथेली रखकर दबा दीऔर महसूस करने लगी कि वाकई में इस समय भी अंकित का लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था और उसकी हथेली में गर्माहट प्रदान कर रहा था,,,,सुषमा की हरकत को देखकर अंकित भी मदहोश होने लगा उसे भी लगने लगा कि आज घंटी के अंदर ही कुछ ना कुछ जरूर होने वाला है वह अंदर ही अंदर खुश होने लगा और उत्तेजित होने लगा और वैसे भी वह सुमन की मां के साथ कुछ ज्यादा ही खुल चुका था और एक बार मजा भी ले चुका था इसलिए उसे यह कहते हुए बिल्कुल भी झिझक नहीं हुआ और वह बोला,,,)

तो क्यों ना उस दिन का अधूरा काम आज पूरा कर लेते हैं,,,, मौका भी है दस्तूर भी है और ऐसा लग रहा है की घंटी का मालिकआज हम दोनों के लिए बीमार हुआ है और हम दोनों को एक अच्छा मौका देकर आराम करने के लिए चला गया है,,,,।

मुझे भी ऐसा ही लग रहा है,,,(अंकित के पेंट के आगे वाले भाग को अपनी मुट्ठी में एकदम कसके दबोचते,, हुए,,,, और उसकी हरकत पर अंकित बोला,,,)

आराम से आंटी मुझे तो लग रहा है कि तोड़ डालोगी,,,।

मेरा बस चले तो सच में इसे तोड़ डालुं,,

अगर तोड़ डालोगी तो अपनी बुर में क्या लोगी,,,।

(अंकित के मुंह से बुर शब्द सुनकर वह एकदम से मदहोश होते हुए बोली)

कितना हारामी है तू और घंटी वाला तुझे सीधा लड़का समझ रहा है,,,।

तुम भी कितनी छिनार हो और घंटी वाला तुम्हें भाभी-भाभी कहकर इज्जत दे रहा है,,,।

इज्जत तो दे रहा है ना तेरी तरह ले तो नहीं रहा है,,,।

अगर इज्जत लेने पर आ जाऊंगा तो यही पटक कर चोद डालूंगा,,,,।

बहुत घमंड है ना तुझे अपने लंड पर ,,,, मैं भी देखती हूं कि आज कितनी देर तक दिखता है आज बीना चोदे ही तेरा पानी निकाल देती हुं (और इतना कहने के साथ ही तुरंत बैठ गई औरमौके की नजाकत को समझते हुए जल्दी-जल्दी अंकित के पेट की बटन खोलने लगी और देखते ही देखते वह पेंट को और अंडरवियर को दोनों को एक साथ खींचकर उसके घुटनों तक नीचे कर दी और उसके लहराते हुए लंड को अपने हाथ में भी नहीं ली,, सीधा उसे अपने लाल लाल होठों के बीच लेकर चूसना शुरू कर दी,,, सुषमा की इस हरकत पर अंकित पूरी तरह से मदहोश होने लगा और अपनी आंखों को बंद करके इस पल का मजा लूटने लगा,,,,अंकित को बहुत मजा आ रहा था अंकित पागल हुआ जा रहा था और सुषमा इतने मोटे तगड़े लंबे लंड को अपने मुंह में लेकर गदगद हुए जा रही थी इस उम्र में भी उसे एक जवान मोटे तगड़े लंड का सहारा जो मिल चुका था वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी,,,,,वह गप्प गप्प करके अंकित के लंड को अपने गले तक ले रही थी और बाहर निकाल रही थी,,,,अंकित भी मजा लेते हुए अपने कमर पर हाथ रख कर धीरे-धीरे अपनी कमर को आगे पीछे करके अपने लंड को सुषमा के लाल-लाल होठों के बीच अंतर बाहर करते हुए उसके मुंह को ही चोदना शुरू कर दिया,,,, और ऐसा करते हुए अपने मन में सोचने लगा कि वह सुषमा आंटी के साथ यह सब बड़े आराम से कर लेता है तो अपनी मां के साथ ऐसा करने में वह क्यों झिझक रहा है,,,जबकि उसे यकीन हो चला था कि उसकी इस तरह की हरकत का उसकी मां बिल्कुल भी विरोध नहीं करेगी बल्कि उसकी हरकत का पूरी तरह से मजा लुटेगी।

सुषमा घुटनों के बल बैठकर अंकित के लंड को गले तक लेकर चूस रही थी,,,, उसे बहुत मजा आ रहा था,,, सुषमा बराबरअंकित के लंड की चुसाई कर रही थी क्योंकि वह देखना चाहती थी कि उसका लंड कितनी देर तक टिक सकता है,,, वह पागलों की तरह चूस रही थी उसे ऐसा लग रहा था कि ऐसा चुसाई करने पर उसका लंड पानी फेंक देगा तो उसके बाद चुदवाने में कुछ ज्यादा ही मजा आएगा, लेकिन उसके सोचने के मुताबिक बिल्कुल भी नहीं हो रहा था,,,,सुषमा को ऐसा लग रहा था कि उसका लंड अपनी फेंकेगा लेकिन वह तो मुझे लेकर अपनी कमर हिला रहा था यह देखकर वह भी अंदर ही अंदर खुश हो रही थी,,,,, तकरीबन 10 मिनट की चुसाई के बाद वह अंकित के लंड को अपने मुंह से बाहर निकाली वह गहरी गहरी सांस ले रही थी,,,यह देखकर अंकित प्रसन्न होने लगा और वह अपने लंड को पड़कर ऊपर नीचे करके हिलाने लगा जो कि उसके थूक और लार से सना हुआ था,,,। वह जिस तरह से ऊपर नीचे करके हिला रहा थासुषमा यह देखकर मदहोश हो रही थी उसकी बुर पानी फेंक रही थी,,, वह तुरंत ही उठकर खड़ी हो गई और अपनी साड़ी कमर तक उठाकरअपनी चड्डी को अपने हाथों से उतारने लगी और अपनी चड्डी उतारने में उसे एक पल की भी देरी नहीं लगी,,,,सुषमा की हालत और उसकी हरकत देखकर अंकित की उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच चुकी थी और वह सुषमा की नंगी गांड पर अपना हाथ घुमा रहा था यह देखकर सुषमा बोली,,,।)

अब तेरी बारी है,,,,( और इतना कहकर सुषमा पास में हीं पड़े टेबल पर गांड टीका कर बैठकर अपनी दोनों टांगों को खोल दी,,,यह देखकर अंकित के मुंह में पानी आ गया और वह अच्छी तरह से समझ गया कि सुषमा क्या करवाना चाहती है और वह भी सूचना की तरह ही घुटने के बल बैठकर उसकी दोनों जांघों पर अपने दोनों हाथ रखकर उसे उत्तेजना में मसलते हुए अपने प्यासे होंठों को उसके गुलाबी बुर पर रख कर चाटना शुरू कर दीया,,,,सुषमा एकदम से मत हो गई और अपनी आंखों को बंद करके अपना एक हाथ अंकित के सर पर रख दी और उसे अपनी बुर पर दबाने लगी,,, अंकित पागलों की तरह सुषमा की बुर को चाट रहा था उसे बहुत मजा आ रहा थाऔर कभी सोचा भी नहीं था की घंटी पर उसे इस तरह से मजा लूटने का मौका मिल जाएगा और ना ही सुषमा ने यह कभी सपने में भी सोची थी,,,। अंकित वैसे तो उसे बुर चाटने का कुछ ज्यादा अनुभव नहीं था लेकिन फिर भी सुमन राहुल की मां नूपुर और सुमन की मां सुषमा के साथ और सबसे ज्यादा अपनी नानी से या हुनर सीख चुका थाजिसे उसे इतना तो पता चल ही गया था कि औरत को किस क्रिया में ज्यादा आनंद प्राप्त होता है और वह इस समय वही क्रिया कर रहा था,,,

सुषमा अपने गरमा गरम सिसकारी की आवाज को दबा नहीं पा रही थी,,,बड़ी मुश्किल से वह अपने आप पर काबू कर पा रही थी लेकिन फिर भी उसके मुंह से मदहोश कर देने वाली आवाज बाहर निकल ही जा रही थी क्योंकि अंकित मजा ही कुछ ऐसा दे रहा थाअब सुषमा की बुर में आग लग चुकी थी वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी,,,वह जल्द से जल्द अंकित के लंड को अपनी बुर में लेकर अपनी बुर की खुजली मिटा लेना चाहती थी। इसलिए उसके कंधे पर हथेली से थपथपी लगाकर उसे उठने के लिए बोली,,,, अंकित इतना तो समझ गया था कि अब सुषमा को क्या चाहिए,,,, इसलिए वह भी जल्दी से उठकर खड़ा हो गया और अपने लंड को हाथ में लेकर पिलाना शुरू कर दिया यह देखकर सुषमा की हालत खराब होने लगी उसकी बुर से पानी निकालने लगा,,,, और वह जल्दी से बोली,,,)

देर मत कर किसी भी वक्त घंटी का मालिक आ जाएगा तो बना काम बिगड़ जाएगा।

मैं भी यही करने वाला था आंटी,,,(और इतना कहने के साथ ही टेबल पर वह पहले से भी अपनी दोनों टांगें खोल कर रखी हुई थी उसकी गुलाबी छेद बड़े आराम से दिख रही थी और अंकित अपने टनटनाए लंडउसके छेद पर रखकर एक जोरदार धक्का मारा और एक साथ पूरा का पुरा लंड सुषमा की बुर में समा गया चश्मा पूरी तरह से मस्त हो गई और जिस तरह से अंकित ने प्रहार किया था उसके मुंह से सीख निकलने वाली थी लेकिन किसी तरह से वह अपने आप को संभाल ले गई थी,,, अंकित अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया था अंकित को भी बहुत मजा आ रहा है उस दिन जल्दबाजी में वह सुमन की मां की जिस तरह की चुदाई किया था उसे पूरी तरह से मजा तो नहीं मिल पाया था लेकिन आनंद बहुत आया था,,, उस दिन की कसर आज अंकित निकाल लेना चाहता था,,, वह बड़ी तेजी से अपनी कमर हिला रहा था और जोर-जोर से धक्के लगा रहा था जिससे सुषमा बार-बार टेबल पर सेलुढ़क जा रही थी लेकिन अंकित उसकी कमर में दोनों हाथ डालकर उसे संभाले हुए था,,,,, जोर-जोर से धक्के लगाते हुए वह बोला,,,।

आज कैसा लग रहा है आंटी,,?

आहहहह आहहहहहह,,,, बहुत मजा आ रहा है ऐसा लग रहा है कि उस दिन की कसर तू आज पूरी कर देगा,,,।

बिल्कुल आंटी उस दिन तुम्हें लगता है अच्छी तरह से एहसास नहीं हुआ आज तुम्हें अच्छी तरह से एहसास कराऊंगा,,,,, अब संभालो अपने आप को,,,( इतना कहने के साथ ही अंकित का प्रहार और तेजी से होने लगा अंकित पागलों की तरह सुषमा की चुदाई कर रहा था हमसे बहुत मजा आ रहा था और कुछ देर तक टेबल पर ही सुमन की मां की चुदाई करता रहा और अपने मन में सोच रहा था कि यह वक्त भी क्या खेल खेलता है मौका तो सुमन को चोदने को था लेकिन सुमन नहीं चुदी लेकिन उसकी मां अनजाने में ही चुद गई,,,, लेकिन अंकित को तो मजा आ रहा था अंकित को कुछ सीखने को मिल रहा था ,,,, मसला अब यह नहीं था कि कौन चुद रहा है,,,,अंकित को इन सब से कुछ सीखने को मिल रहा था यदि उसके लिए बहुत था जो कि आगे चलकर उसकी मां के साथ उसका अनुभव काम आने वाला था,,,, थोड़ी देर इसी तरह से चुदाई करने के बाद सुषमा खुद टेबल पर से उठकर खड़ी हो गई हो घोड़ी बन गई पीछे से अंकित उसकी गुलाबी बुर में लंड डालकर जोर-जोर से अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया और तकरीबन 15 मिनट की चुदाई के बाद वह पानी पानी हो गई और एकदम से झड़ गई और थोड़ी देर बाद अंकित भी झड़ गया,,,,

अपने कपड़े दुरुस्त करने के बाद वह घंटी की तरफ देखा तो उसका गेहूं खत्म हो चुका था वह जल्दी से दौड़ता हुआ गया और अपने गेहूं की बोरी हटाकर सुषमा की बोरी का गेहूं घंटी में पलट दिया ,,, तब तक सुषमा भी मुस्कुराते हुए अपने कपड़े को व्यवस्थित कर ली,,,, थोड़ी देर बैठने के बाद सुषमा का भी गेहूं पिसा गया था,,,, और थोड़ी ही देर में घंटी का मालिक भी नीचे आ गया था,,,, और दोनों आटा लेकर अपनी-अपने घर की तरफ आने के लिए घंटी से निकल गए,,,।

गेहूं पीसने की घंटी पर जो कुछ भी हुआ था वह बेहद अविस्मरणीय और आवरणीय था सुषमा और अंकित दोनों के लिए क्योंकि दोनों ने यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि गेहूं पीसने की घंटी पर दोनों इस तरह से सुख भोग पाएंगे वैसे तो वह दोनों इसी तरह से पल भर में ही मर्यादा की दीवार लांघ कर एक दूसरे में समा गई थी और इस अद्भुत रिश्ते को देखते हुए दोनों के बीच एक बार फिर से शारीरिक संभोग का होना कोई नई बात नहीं थी लेकिन इस तरह से होगी वह दोनों ने कभी नहीं सोचा था,,,। गेहूं पीसने की घंटी पर हमेशा लोगों की भीड़ लगी रहती है,,, ऐसे में ना तो अंकित और नहीं सुमन की मां सुषमाएक दूसरे से इस तरह से आनंददायक की स्थिति के बारे में सोच सकते हैं लेकिन,, ऐसा लग रहा था कि जैसेदोनों के बीच पहले से ही इस तरह का रिश्ता तय कर दिया गया था तभी तो घंटी के मालिक कोउसी दिन बीमार पडना था उसी दिन लोगों की भीड़ बिल्कुल भी नहीं थी,,,उसी दिन घंटी के मालिक को कुछ देर के लिए आराम करने के लिए और घंटी अंकित को सौंप कर जाना था सब कुछ बेहद अद्भुत था।

एक बार फिर से अंकित नेअपनी मर्दानगी का परिचय सुमन की मां को कर दिया था और सुमन इस अद्भुत संसर्ग सेपूरी तरह से मदहोश होकर गेहूं की घंटी से घर वापस जा चुकी थी वह कभी सोची नहीं थी की उम्र के इस दौर पर उसे एक ऐसा जवान लड़का मिलेगा जो उसकी जवानी का रस अपने मोटे तगड़े लंड से निचोड़ कर बाहर निकाल देगा,,,और अंकित के लिए हर एक चुदाई हर एक संभोग कुछ सीख देकर जा रहा था ऐसा लग रहा था कि जैसे अंकित का अभ्यास चल रहा हो किसी अंतिम पड़ाव तक पहुंचाने के लिए और उसमें सफल होने के लिए और वह अंतिम पड़ाव था सुगंधा की दोनों टांगों के बीच की लप-लपाती हुई गुलाबी बुर जिसमें अंकित को अपनी मर्दानगी का झंडा गाडना था। और धीरे-धीरे अंकित पूरे आत्म विश्वास से भरता चला जा रहा था। उसे अब पूरा यकीन हो चुका था कि वहजिस दिन भी अपनी मां को चोदने का मौका मिलेगा वह उसे पूरी तरह से संतुष्टि का अहसास कराएगा,, और उसे पूरी तरह से पानी पानी कर देगा,,। और उसकी ऐसी चुदाई करेगा की दिन रात हुआ सिर्फ उसके लंड के लिए तड़पेगी,,, और यह कोई उसके मन की बनी बनाई बात नहीं थी इसमें तर्क था क्योंकि उसने अभी तक अपनी नानी और सुमन की मां की चुदाई किया था,,, दोनों उम्र दराज थी। दोनों अनुभव से भरी हुईऔर ऐसे में ऐसी औरतों को संपूर्ण संतुष्टि का एहसास करना है मर्द की प्राथमिकता हो जाती है और जिसमें अंकित पूरी तरह से खरा उतरा था।

सुमन की मां अपने घर पहुंच चुकी थी और अंकित भी गेहूं खुद ही पीसकर अपने घर आटा लेकर आ गया था शाम ढल चुकी थी,,,छुट्टी का दिन था इसलिए कहीं आने-जाने की बिल्कुल भी फिक्र नहीं थी वैसे तो जब घर में तृप्ति होती थी तो इस समय अंकित घर से बाहर पहनने के लिए निकल जाया करता था लेकिन वह इस समय एक-एक पल की महत्व को समझ रहा थावह जानता था कि जितना देर वह अपनी मां के साथ गुजरेगा उतना ही उसे अधिक मौका मिलेगा उसके करीब आने काइसलिए वह अब घर से बिल्कुल भी बाहर नहीं निकलता था बिना काम के अगर निकलता भी था तो ज्यादातर अपनी मां के साथ निकलता था लेकिन आज सिर्फ गेहूं पिसवाने के लिए अकेला घर से निकला था और उसका काम बन गया था।घर पर पहुंचते ही उसने देखा कि उसकी मां कुर्सी पर बैठी हुई थी और दरवाजे की तरफ ही देख रही थी इसका मतलब साफ था कि वह उसका इंतजार कर रही थी वह अपनी मां को इस तरह से बैठा हुआ देखकर मुस्कुराते हुए बोला।

ऐसा लग रहा है कि जैसे मेरा ही इंतजार कर रही थी,,,।

वह तो जरूरी ही था क्योंकि तेरे आए बिना तो खाना बनने वाला था नहीं आटा जो तेरे पास है,,,।
(सुगंधा मुस्कुराते हुए बोले लेकिन उसकी बात का अलग मतलब निकालते हुए अंकित अपने मन में ही बोला आंटा के साथ-साथ मेरे पास लंड भी है जिसके बिना तुम्हारी रात अधूरी है,,,, और अपनी मां की बात सुनकर वह मुस्कुराते हुए बोला,,,)

थोड़ा देर हो गईवह क्या है ना कि दो-तीन लोग पहले से ही वहां पर खड़े थे इसके लिए,,,।

चल कोई बात नहीं आ तो गया मुझे तो लगा कि आज लगता है रोटी बन ही नहीं पाएगी।

तो क्या हो जाता दाल चावल खा लेते,,,।

यह भी सही है,,,, चल काम कर इस रसोई में रख दे मैं भी जल्दी-जल्दी खाना बना लुं,,,।

ठीक है,,,,( इतना कहकर अंकित आटे की बोरी को रसोई घर में लेकर चला गया और उसे निश्चित जगह पर रख दिया तब तक अपनी साड़ी के पल्लू को अपनी कमर में खोंसते हुए उसकी मा भी रसोई घर में दाखिल हो चुकी थीअंकित अपनी मां को इस तरह से साड़ी के पल्लू को अपनी कमर में डालते हुए देखा तो मन ही मन उत्तेजित होने लगाक्योंकि ऐसा करने पर उसके साड़ी के आगे वाला भाग उसकी चूचियों से काश जाता था और ऐसे में उसके ब्लाउज में छुपा हुआ उसके दोनों कबूतर पंख फड़फड़ाने लगते थेबाहर आने के लिए ऐसा लगता था कि जैसे उसकी हरकत पर दोनों कबूतरों की सांस उखड़ने लगती थी,,,, आटा रख देने के बाद वह अपनी मां से बोला,,,,)

अब कोई काम है,,,?

काम तो बहुत है लेकिन क्या तु कर पाएगा,,,(सुगंधा अपने बेटे की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए बोली उसके कहने का मतलब कुछ और था जिसे अंकित अच्छी तरह से समझ रहा था और अपनी मां की बात का मतलब समझते हुए वह उसकी ही जुबान में जवाब देते हुए बोला,,,)

करने को तो मैं बहुत कुछ कर लूंगा करना क्या है वह तो बोलो,,,(इतना कहकर वह अपने मन में फिर से बोला चुदवाना है तो अभी बोलो इसी समय टांग उठा कर तुम्हारी बुर में लंड डाल दूंगा,,,लेकिन ऐसा वह अपने मन में कह सकता था इस बात को अपने मन की बात को अपने होठों पर ला नहीं सकता था अगर वह अपने होठों पर इस तरह की बात ला भी देता तो शायद इसी समय उसका काम बन जाता क्योंकि उसकी मां भी यही सुनना चाहती थीलेकिन इस समय दोनों लाचार थे मां बेटे का पवित्र रिश्ता दोनों को आगे बढ़ने से रोक रहा था हालांकि दोनों के बीच काफी कुछ घट चुका था दोनों के बीच आकर्षण का ऐसा अद्भुत गुच्छा बना हुआ था कि जिसमें से निकल पाना दोनों के लिए नामुमकिन सा बन चुका था। अपनी बेटी की बात सुनकर सुगंधा फिर से मुस्कुराते हुए दाल को स्टॉव पर चढ़ाते हुए बोली,,,)

ज्यादा कुछ करना नहीं है सिर्फ यह दुधी काटनी है,,,(इतना कहते हुए पास में पड़ी हुई दुधी को अपने हाथ में लेकर अंकित की तरफ आगे बढ़ा दी,,, अंकित पल भर के लिए अपनी मां के हाथ में ली हुई दूधी को देखने लगा जो की छोटी-छोटी थीलेकिन उसके लंड के बराबर थी और जिस तरह से उसकी मां अपनी मुट्ठी में उसे दबोची हुई थी अंकित को ऐसा ही लग रहा था कि जैसे उसकी मां दूधी नहीं बल्कि उसके लंड को अपनी मुट्ठी में दबोची हुई है,,,, इसलिए अंकित शरारत भरे अंदाज में बोला,,,)

लगता है तुम्हें मोटी मोटी और लंबी-लंबी दूधी कुछ ज्यादा ही पसंद है,,,,।(हाथ बढ़ाकर अपनी मां के हाथ में से दुधी को लेते हुए वह बोला,,,)

तो सही कह रहा है मुझे लंबी-लंबी और मोटी दुधी बहुत पसंद है लेकिन यह कम मोटी है थोड़ी और मोटी होती तो ज्यादा मजा आता,,,,(इतना कहकर वह थोड़ा अपने सुर को बदलते हुए बोली,,) खाने में,,,

तुम्हें अच्छा लगता होगा लेकिन मुझे तो,,,,(अंकित अपनी बात को आगे बढ़ा पाता इससे पहले ही उसकी मां उसे बीच में ही रोकते हुए बोली,,(

मालूम है तुझे कद्दू पसंद है,,, न जाने क्यों तुम लड़कों को गोल-गोल वाली चीज ही ज्यादा पसंद आती है,,,(सुगंधा एकदम से मुस्कुराते हुए बोली और उसके कहने का मतलब को अंकित समझ गया था इसलिए वह भी मुस्कुराते हुए अपनी मां को जवाब देते हुए बोला,,,)

और तुम औरतों को लंबी-लंबी और मोटी मोटी सब्जियां ही पसंद आती है,,,,।

हां तो बात तो सही हैहम लोगों का लंबी-लंबी और मोटी मोटी चीज के बगैर काम चलने वाला थोड़ी है,,,,

ऐसा क्यों है क्या इससे ज्यादा ताकत मिलती है क्या,,,?(चाकू से सब्जी को काटते हुए अंकित बोला)

प्रोटीन के साथ-साथ संतुष्टि भी मिलती है और हम औरतों को क्या चाहिए सिर्फ संतुष्टि अगर संतुष्टि ना मिले तो यह सब का कोई मतलब नहीं निकलता,,,

और हम मर्दों को,,,!

तुम मर्दों को गोल गोल सब्जी हीं पसंद आती है फल से लेकर सब्जी तक से अनार कद्दू गोभी आलू गोभी,,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा अपनी चूचियों की तरफ देख ले भी रही थी मानो कि जैसे अपने बेटे को इशारा कर रही थी कि वह किस बारे में बात कर रही है और उसका बेटा अपना दान भी नहीं था वह अपनी मां के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था इसलिए तो सब्जी काटते हुए मुस्कुरा रहा था और ज्यादातर वह अपनी मां से बात करते हुए अपनी मां की चूचियों को ही घुर रहा था। और अपनी मां की बात सुनकर एकदम से तपाक से बोला,,,)

हां सच कह रही हो तुम्हें केला बहुत ज्यादा पसंद है और लंबा वाला जो ज्यादा मोटा हो,,,।

सच कह रहा है तू हम औरतों कोमोटे तगड़े के लिए ज्यादा संतुष्टि मिलती है पेट भरा भरा सा लगता है,,,,।

(मां बेटे दोनों की दो अर्थ वाली बातें दोनों को मदहोश कर रही थी,,,, जहां एक तरफ अपनी मां की इस तरह की बातें सुनकर अंकित का लंड अपनी औकात में आ रहा था वहीं दूसरी तरफ अपने बेटे के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर सुगंधा की बुर पानी छोड़ रही थी,,,, मां बेटे दोनों का मजा आ रहा था,,,इसलिए तो अंकित अपनी बहन की गैरमौजूदगी में ज्यादा से ज्यादा समय अपनी मां के साथ गुजारना चाहता था। क्योंकि वह जानता था कि जितना जितना ज्यादा हुआ अपनी मां के साथ रहेगा उसे उतना ज्यादा आनंददायक देखने को औरसुनने को मिलेगा और इस समय भी सब्जी काटते हुए उसके साथ ऐसा ही हो रहा था,,,सुगंधा अपने बेटे से बात करते हुए भी अपने अंगों को उभार ले रही थी आगे से अपनी चुचियों को उचका देती तो पीछे से अपनी गांड को बाहर की तरफ निकाल देती,,,ऐसा करने से उसकी खूबसूरती से भरी हुई आंखों का प्रदर्शन बहुत अच्छी तरह से उसके बेटे के सामने हो रहा था,,, जिसका मजा उसका बेटा अच्छी तरह से ले रहा था,,,,कसी हुई साड़ी में अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड देखकर उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आ चुका था,,।जिसे बार-बार वह अपनी मां की आंखों के सामने ही व्यवस्थित करने की कोशिश करता था और उसकी मां उसकी हरकत को देखकर एकदम से गदगद हुए जा रही थी,,,,।

सब्जी कट चुकी थी दाल पक रही थीऔर सुगंधा बोरी में से आटा निकालने के लिए नीचे झुकी हुई थी ,,,उसकी बड़ी-बड़ी गांड अंकित की तरफ थी और ऐसा हुआ जानबूझकर की थी वह चाहती तो एक तरफ से होकर वह आटा निकाल सकती थी लेकिन वह अपने बेटे को अपनी जवानी के दर्शन करना चाहती थी वह अच्छी तरह से जानती थी किउसका बेटा इस समय क्या देख रहा होगा और वह यही देखने के लिए नजर को मां के पीछे की तरफ देखी तो अपने बेटे को अपनी गांड की तरफ ही देखता हुआ पाकर वह मदहोश होने लगी,,,, अंकित अपनी मां की कई हुई गांड को देख रहा था जो कि उसकी मां का यह औपचारिक और सहज रूप था लेकिन नजर बदलने पर मर्द का नजरिया पूरी तरह से बदल जाता हैइस समय भले ही उसकी मां साड़ी पहनी हुई थी लेकिन अंकित अपने मन में अपनी मां की नग्नता का कल्पना कर रहा था वह अपने मन में यही सोच रहा था कि अगर उसकी मां बिना कपड़ों के आटा निकालने के लिए झुकी होती तो कैसी नज़र आती,,,, यही सोचता हुआ वह अपनी मां की नंगी गांड की कल्पना करते हुए पेंट के ऊपर से अपने टनटनाए लंड को दबा रहा था। और इस हरकत को भी सुगंधा देख चुकी थी इसलिए तो उसकी बुर कचोरी की तरह फुल चुकी थी,,,, देखते ही देखते सुगंधा उचित मात्रा में आटा बड़े से थाली में लेकर वापस अपनी जगह पर आ चुकी थी और उसमें पानी डालकर आता गुंथने लगी थी,,, सुगंधा के मन में ढेर सारे ख्यालचल रहे थे भावनाएं उमड़ रही थी और यही हालत अंकित की भी थी।

सब्जी कर चुकी थी लेकिन रसोई घर से बाहर निकलने का उसका मन बिल्कुल भी नहीं हो रहा था क्योंकि वह जानता था कि जो मजा रसोई घर में है वह अपने कमरे के एकांत में भी आने वाला नहीं है,,,, कुछ देर के लिए खामोशी पूरे रसोई घर में छा चुकी थी केवल सुगंधा की चूड़ियों के झांकने की आवाज आ रही थी और यह आवाज वातावरण में मदहोशी का रस घोल रही थी,,,,सुगंधा अपने मन में आगे की युक्ति के बारे में सोच रही थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आगे क्या करें,,, लेकिन तभी उसे एहसास होने लगा कि उसके पैर पर कुछ चढ़ रहा है वह कसमसाने लगी वह धीरे-धीरे अपने पैर को आगे पीछे ऊपर नीचे करने लगी,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है,,, अपनी मां के चेहरे पर बदलते हवाओं को देखकर उसकी असमंजस्ता के बारे में अंकित को कुछ-कुछ समझ में आ रहा था इसलिए वह बोला।

क्या हुआ मम्मी,,,?

पता नहीं ऐसा लग रहा है कि कुछ पैर पर चढ़ रहा है,,,(अपनी कमर कोगोल-गोल आगे पीछे करके वह अपने आप को व्यवस्थित करने की नाकाम कोशिश करते हुए बोली और उसकी कोशिश को देखकर अंकित के मन में प्रसन्नता के भाव नजर आने लगे उसे लगने लगा था कि कुछ ना कुछ देखने को जरूर मिलेगा इसलिए वह अपनी मां से बोला,,,)

लेकिन क्या चढ़ रहा है बताओ तो सही,,

पता नहीं लेकिन कुछ रेंग रहा है,,,,।

चूहा तो नहीं है,,,,

नहीं चूहा तो नहीं लग रहा है,,,,(सुगंध को कुछ समझ में नहीं आ रहा था उसके दोनों हाथ में आटा लगा हुआ था वह अपनी साड़ी को ऊपर भी नहीं उठा सकती थी,,,, और नाही उस चीज को बाहर निकाल सकती थी जो इस समय उसे परेशान कर रही थी,,,,)

कहीं छिपकली तो नहीं,,,,,।

(छिपकली का नाम सुनते ही सुगंध एकदम से घबरा गई और अपने बेटे से बोली)

ऐसा मत बोल मेरी तो जान ही निकल जाएगी अगर ऐसा हो गया तो,,,,(उसका इतना कहना था किउसके पैर पर वह चीज ऊपर की तरफ जाने लगी और आप सुगंधा की हालत एकदम से खराब होने लगी वह अपनी जगह पर ही उछल कूद मचाने लगी,,,,)

हाय दइया यह क्या हो रहा है,,,,आहहहहह ,,,,ऊईईईई मां,,,, कहीं सच में तो छिपकली नहीं है,,,,(वह दोनों पैर पर उछलते हुए बोले जा रही थी,,,,उसकी हालत एकदम से खराब हो रही थी और अंकित भी अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया था क्योंकि उसे लगने लगा था कि वाकई में उसकी मां की साड़ी के अंदर कुछ घुस गया है,,,, अपनी मां की सहायता करने हेतु वह अपनी मां से बोला)

जोर-जोर से सारी झटकों शायद निकल जाए,,,,।

अरे बुद्धू मेरे हाथ में आटा लगा हुआ है,,,।

तो क्या हो गया जान प्यारी है कि आटा,,,,,।

मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है,,,(इस तरह से उछलते हुए) तू ही कुछ कर नहीं तो मेरी हालत खराब हो जाएगी यह चीज तो ऊपर ही चढ़ती चली जा रही है भगवान,,,,आहहहह ,,,,,आ,,,,,,।
(जैसे ही सुगंधा ने उसे कुछ करने को बोली यह सुनकर तो आपकी का चेहरा प्रसन्नता के भाव से एकदम से खिल उठा,,,वह तुरंत अपनी मां की मदद करने के लिए उसके पास चला गया और अपने हाथ से उसकी साड़ी पकड़ कर झटकाके लगा अभी तक अंकित अपनी मां की साड़ी ऊपर उठने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं किया थावह सोच रहा था कि शायद ऐसे ही निकल जाए जो चीज हो लेकिन ऐसा नहीं हुआ वह चीज ऊपर की तरफ धीरे-धीरे उसकी जांघों के करीब आ गई थी और जांघ पर उसका रेंगना एकदम साफ महसूस हो रहा था और सुगंधा को उसका एहसास बड़ा अजीब लग रहा था,,, अंकित लगातार साड़ी जोर-जोर से झटका रहा था लेकिन उसका ऐसा करना भी कोई काम नहीं आ रहा था इसलिए उसकी मां बोली,,,,)

इस तरह से नहीं निकल रहा है अंकित,,,आ,,,,,ऊईईईई,,,, मां,,,,, मैं तो मर जाऊंगी मुझसे रहा नहीं जा रहा है,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा अपने दोनों हाथ को अपने बेटे के कंधे पर रखकर इसका सहारा ले लिया और जोर जोर से उछलने लगी,,,,, यह देखकर अंकित बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी निकला क्या,,,?

नहीं यह तो और ऊपर की तरफ चला जा रहा है,,,,।(अभी तक सुगंधा सिर्फ कह रही थी कि ऊपर की तरफ जा रहा है लेकिन उसका सही स्थान नहीं बता रही थी कि कहां पर इसलिए अंकित बोला,,)

लेकिन कहां पर चला जा रहा है यह तो बताओ,,,,(अपनी मां की साड़ी को दोनों हाथ से पकड़े हुए वह बोला,,,,)

मेरी जांघ के ऊपर की तरफ जा रहा है,,,,(एकदम से सुगंध और और उसके मुंह से जांघशब्द सुनकर अंकित की आंखों के सामने उसकी मां की नंगी जान नजर आने लगी मोटी मोटी एकदम चिकनी केले के वृक्ष की तरह,,,, सुगंधा कसमसाते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,) कुछ कर अंकित,,,,।

क्या करूं,,,,, क्या करूं,,,,,(अंकित भी कुछ देर तक सोचने लगासुगंधा जिस तरह से उसके सामने खड़ी होकर उसके कंधे पर हाथ रखी हुई थी और वह भीहाथ में लगे आटे से अपने बेटे के कपड़े को गंदे होने से भी बचा रही थी,,,,ऐसे में उसके दोनों हाथों के बीच अंकित था एकदम आमने-सामने और उसके हाथ में उसकी मां की साड़ी थी जो कि हलके से उसके घुटनों के नीचे तक उठी हुई थी अंकित अच्छी तरह से जानता था कि अब उसे क्या करना है,,,, लेकिन फिर भीअपने मन में आई बात को पूरा करने से पहले वह पूरी तसल्ली कर लेना चाहता था इसलिए अपनी मां से बोला,,,)

थोड़ा जोर-जोर से कूदो हो सकता है जो अंदर हो वह गिर जाए,,,,।

लगता तो बिल्कुल भी नहीं है,,,(ऐसा कहते हुए भी वह अपने बेटे के कंधों का सहारा लेकर जोर-जोर से उछलने लगी और उसके ऊंचा लेने के साथ ही उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां ब्लाउज में हा कर मचाने लगे ऐसा लग रहा है ताकि अभी ब्लाउज का बटन तोड़कर एकदम से बाहर आ जाएगीअपनी मां की बड़ी-बड़ी चूचियों को उछलते हुए देखकर अंकित की हालत और ज्यादा खराब होने लगी और वह कुछ देर कोशिश करने के बाद मायूस होते हुए बोली,,,)

नहीं हो रहा है अंकित कुछ कर अब तो और ऊपर की तरफ जा रहा है,,,,(सुगंधा घबराए हुए शब्दों में बोल रही थी अंकित को अब तक ऐसा ही लग रहा था किउसकी मां यह सब जानबूझकर कर रही है उसे अपना अंग दिखाना चाहती है लेकिन अब अंकित को भी लगने लगा था कि नहींकुछ तो जरूर उसकी मां यह सब जानबूझकर नहीं कर रही थी क्योंकि घबराहट उसकी मां के चेहरे पर एकदम साफ दिखाई दे रहा था और उत्तेजना उसके खुद के बदन मेंमदहोश कर रही थी उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था क्योंकि वह अपनी मां के बेहद करीब था और उसकी साड़ी अपने हाथ में पड़े हुए था ऐसा लग रहा था कि जैसे वह अपनी मां को चोदने के लिए एकदम तैयार है और उसकी साड़ी कमर तक उठाने जा रहा है। अपनी मां की हालत को देखकर वह अपनी मां को दिलासा देते हुए बोला,,,)

रुको शांत रहो मैं कुछ करता हूं,,,,, लेकिन मैं जो करने जा रहा हूं तुम नाराज मत होना,,,।

तुझे जो करना है कर लेकिन जल्दी से बाहर निकाल,,,,,उईईई,,आआआहहहहह,,, यह तो,,,आहहहहह ,,,,,,,(सुगंधा की सांसों पर नीचे हो रही थी और जिस तरह से वह बोल रही थी अंकित को लगने लगा था कि वह जो कुछ भी चीज है वह उसकी मां की बुर के इर्द-गिर्द ही घूम रही हैइस बात का एहसास अंकित को होते ही उसके तन-बदन में भी अजीब सी हाल चढ़ने लगी अपनी मां की तरफ से पूरी तरह से इजाजत पाकर अंकित अपनी मां को कंधे का सहारा देते हुए अपनी मां की साड़ी को ऊपर की तरफ उठने लगाऔर ऐसा करने में इस समय अंकित को जो उत्तेजना का एहसास हो रहा था उसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके कंधों का सहारा लेकर खड़ी औरत उसकी मां नहीं बल्कि यह खूबसूरत औरत है और वह उसकी साड़ी ऊपर की तरफ उठाकर उसके साथ जवानी के मजे लेने जा रहा है,,,,)

अभी निकाल देता हूं चिंता मत करो बस एकदम से शांत रहो,,,,(अंकित अपनी मां की साड़ी को घुटनों तक उठा दिया था और अपनी मां को स्थिर रहने के लिए बोल रहा थाऔर वह भी अपने बेटे की बात मानकर अपने बेटे के कंधों का सहारा लेकर एकदम स्थिर होकर खड़ी हो गई थी लेकिन जिस तरह का एहसास उसे अपनी दोनों टांगों के बीच के ऊपरी सतह पर हो रहा था उसे अपने आप को संभाले नहीं जा रहा था लेकिन फिर भी जैसे तैसे करके वह अपने आप को स्थिर किए हुए थी,,,,धड़कते दिल के साथ अंकित अपनी मां की साड़ी को घुटनों के ऊपर तक उठा दिया था और धीरे-धीरे उसे जांघों के ऊपर की तरफ ले जा रहा था और बीच-बीच में अपनी मां से पूछ भी ले रहा था)

अब कहां पर है,,,?

तो पूछ मत अंकित कहां पर है बस जल्दी से उसे बाहर निकाल दे,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर अंकित को समझते देर नहीं लगी की उसकी मां क्यों बताना नहीं चाहतीऔर इस बात की खुशी अंकित के चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी वह भी जल्द से जल्द अपनी मां की साड़ी कमर तक उठा देना चाहता था लेकिन फिर भी वह अपने आप पर काबू किए हुए था ऐसी स्थिति में भी वह उत्तेजित हुआ जा रहा था क्योंकि इस समय भले ही सुगंध के लिए थोड़ी मुश्किल भरी घड़ी थी लेकिन अंकित के लिए तो यह मौका था अपनी मां के खूबसूरत अंगों का दीदार करने के लिए,,,, और देखते ही देखतेअंकित अपनी मां की साड़ी को एकदम से जाम हो तक उठा दिया था उसकी मोटी मोटी चिकनी जांघें ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में और ज्यादा चमक रही थी,, अंकित का मन तो ईस समय अपनी मां की जांघों को चूम लेने का कर रहा था,,, लेकिन किसी तरह से अंकित अपने आप पर काबू किए हुए था,,,, और अपनी मां को दिलासा भी दे रहा था,,,,आखिरकार वह घड़ी आ चुकी थी जब वह पूरी तरह से अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठाने वाला था,,,।अंकित अच्छी तरह से जानता है कि आप उसे क्या दिखाई देने वाला है लेकिन यह पूरी तरह से निश्चित नहीं था कि किस तरह से दिखाई देगा उसकी मां अंदर साड़ी के के नीचे पैंटी पहनी होगी कि नहीं पहनी होगी अगर पहनी होगी तो थोड़ाजरूर मलाल रह जाएगा कि इतना कुछ होने के बावजूद भी वह अपनी मां की गुलाबी बुर को देख नहीं पाया और अगर बिना पैंटी की होगी तो समझ लो आज तो उसके हाथ में खजाना लग गया है,,,, इसी उधेड़बुन में अंकित एकदम से अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया,,,,और उसके बाद उसकी आंखों के सामने जो नजारा दिखाई दिया उसे देखकर उसकी आंखें फटी के फटी रह गई उसके होंठ खुले के खुला रह गए)

अंकित के सोच के अनुसार ही उसकी मां साड़ी के अंदर पेटी नहीं पहनी थी वह पूरी तरह से नंगी थी इसलिए उसकी आंखों के सामने उसकी मां की गुलाबी पर थी जो कि एकदम गीली नजर आ रही थी,,,,, अंकित तो देखता ही रह गया,,,,, अंकित की सांस ऊपर नीचे होने लगी वह थोड़ा झुक जाना चाहता था ताकि अपनी मां की बुर को बढ़िया आराम से देख सके वह खड़ा था और उसके कंधों पर उसकी मां के दोनों हाथ थे इसलिए वह नीचे झुक नहीं पाया था वह नजर नीचे करके अपनी मां की टांगों के बीचों-बीच देख रहा था,,,, उसकी मां भी अपनी दोनों टांगों के बीच ही देख रही थी और उसके साथ दिखाई दे रहा था कि उसकी नंगी बुर उसके बेटे की आंखों के सामने थी लेकिन इस समय उसकी बुर वाली सतह पर कोई कीड़ा था जो रेंग रहा था,,, जिसकी वजह से उसे थोड़ा अजीब लग रहा था सुगंधा दबे हुए स्वर में बोली,,,,।

तुझे दिखाई दे रहा है,,,,

(अपनी मां के इस सवाल पर अंकित गहरी सांस लेते हुए बोला,,,)

दिखाई दे रहा अब कुछ मत बोलो मैं हटा देता हूं,,,,,
(अंकित के दिमाग में अब कुछ और चल रहा था अंकित को उसकी मां की पूरे एकदम साफ दिखाई दे रही थी उसकी पतली दरार उसका फुला हुआ कवच सब कुछ एकदम साफ दिखाई दे रहा था,,,, जिसे देखकर उसका खुद का लंड अपनी औकात में आ चुका था,,,,,जिस तरह से उसकी मां के दोनों कंधों पर हाथ रखकर इसका सहारा ली हुई थी उसे देखकर अंकित जानता था कि वह नीचे झुक नहीं सकता और इसी अवसर का वह लाभ भी उठाना चाहता था,,,, वह धीरे से अपनी मां की साड़ी को आगे की तरफ कर दिया था कि उसकी मां को उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली तरह दिखाई ना देऔर खुद थोड़ा सा अपनी गर्दन को नीचे की तरफ झुका दिया जहां से उसकी मां की बुर उसे एकदम ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में चमकती हुई दिखाई दे रही थी उस पर लगे हुए उसके मदन रस मोती के दाने की तरह चमक रहे थे,,,, उत्तेजना के मारे अंकित का गला सूख रहा था और वह अपने थुक सेअपने सूखे गले को गिला करने की कोशिश करते हुए वह अपने हाथ की उंगलियों को अपनी मां की बुर की तरफ आगे बढ़ने लगा ऐसा करने में उसकी उंगलियां कांप पर रही थी उत्तेजना के मारे उसकी हालत खराब हो रही थी।

आज सुबह ही अपनी मां की बुर पर साबुन लगाते हुए उसकी बुर मेंअपनी उंगली को अंदर बाहर करके उसका पानी निकाल दिया था लेकिन फिर भी इस समय एक नए एहसास के साथ वह फिर से शुरुआत करने जा रहा था और उसे अपनी मां के बुरे के ऊपर हिस्से पर चिपके हुआ वह छोटा सा कॉकरोच भी दिखाई दे रहा था जिसे उसे हटाना था लेकिन इस समय वह,,, लेकिन इस समय उसके मन मेंअपनी मां की बुर को स्पर्श करने की लालच जाग रही थी जिसे वाहन रोक नहीं पा रहा था,,, बहुत हीरे से अपनी मां की खुली हुई बुर पर अपनी उंगली रख दिया,,,,सहहहहहह सुगंधा एकदम से सिहर उठी,,,, पल भर में ही कीड़े का डर उसके मन से जाता रहा,,,और इसी मौके का फायदा उठाते हुए उनकी अपनी मां की बुर की पतली दरार पर अपनी उंगली को ऊपर से नीचे तक घूमाना शुरू कर दियाऐसा करने में उसकी हालत एकदम खराब होती चली जा रही थी उसके पेट में तंबू बन चुका था जिसे उसकी मां देख रही थी और मन ही मन में मदहोश हुए जा रही थी बदन में खुमारी छा रही थी,,,,

अब मां बेटे के मन से अंदर घूमने वाला कीड़ा एकदम से जा चुका था अंकित अपनी मां की बर को देख रहा था उसमें से मदन रस बार-बार बाहर निकल रहा था और उसकी उंगली से लग जा रहा था जिसे अंकित ऊपर से नीचे तक अपनी उंगली से लग रहा था मानो कि जैसे तेल की मालिश कर रहा हो अच्छी तरह से तेल लगा रहा होअंकित को अपनी मां की बुर की गर्मी का एहसास अपनी उंगली पर बड़ी अच्छी तरह से हो रहा था मन तो उसका इस समय कर रहा था कितनी मां की बुर में उंगली डाल दे लेकिन वह ऐसा करने से अपने आप को रोक रहा था,,,, वह छोटा सा कॉकरोच तो अंकित के बुर पर उंगली रखने से ही कब का जा चुका था लेकिन अब दूसरा खेल शुरू हो गया थादेखते ही देखते अंकित अपनी मां की बुर पर अपनी पूरी हथेली रखकर उसे हल्के हल्के सहलाने लगा उसे बहुत मजा आ रहा था और उसकी मां की तो हालत खराब होती चली जा रही थी उसकी आंखें एकदम से बंद हो चुकी थी,,, अपनी मां की हालत को देखकर उसके मन में अपनी मां की बुर में उंगली डालनेका ख्याल आने लगा और वह ऐसा करने ही जा रहा था कि तब कुकर की सीटी एकदम से बज गई और दोनों एकदम से चौक गए,,,,,, सुगंधा तो एकदम मदहोश हो चुकी थी कुकर की सीटी से एकदम से वह होश में आ चुकी थी,,,, और वह एकदम से होश में आते हुए बोली।

क्या हुआ कीड़ा,,,,

(उसका इतना कहना था कि अंकित उसकी बात पूरी भी नहीं होने दिया और बीच में ही बोल पड़ा)

हटा दिया मैंने अब निश्चिंत रहो,,,(और इतना कहने के साथ भी अपनी मां की साड़ी को एकदम से कमर से ही छोड़ दिया और उसकी साड़ी एकदम से नाटक के प्रति की तरह उसके अविस्मरणीय खूबसूरत नजारे पर परदा पड़ गया,,,,,)

अच्छा हुआ मैं तो एकदम परेशान हो गई और इसी के चक्कर में दाल भी पक गई,,,,,।

(और थोड़ी ही देर बाद सुगंधा खाना बना चुकी थी)

अद्भुत मदहोशी भारी मादकता और रोमांचकता के बाद खाना बनकर तैयार हो चुका था,,, रसोई घर में जो कुछ भी हुआ थाइससे मां बेटे दोनों की उत्तेजना एकदम से बढ़ चुकी थी,,,सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि आप उसके बेटे से उसके बाद उनका कोई हिस्सा छुपा नहीं रह सकता है उसके बेटे ने हर तरीके से उसके हर अंग को देख चुका था बस उसका सही उपयोग अभी तक नहीं कर पाया था लेकिन इस बात से भी सुगंधा को अचंबा हो रहा था कि वह खुद अभी तकअपने बेटे के साथ आगे नहीं बढ़ पाई थी इतने में दूसरी कोई औरत होती तो कब से अपनी प्यास बुझा ली होती बार-बार रिश्तो की मर्यादा उसे रोक ले रही थी,,,इस बात से उसे भी अपने आप पर गुस्सा आ रहा था की चारदीवारी के अंदर कैसी मर्यादा कैसा संस्कार या मर्यादा संस्कार भावनाएं चारदीवारी के बाहर ही अच्छे लगते हैं चार दिवारी के अंदरकेवल औरत और मर्द की जरूरत ही प्राथमिकता होती हैजो इस समय मां बेटे दोनों की प्राथमिकता थी लेकिन मां बेटे के बीच की पवित्र डोर अभी भी दोनों को भावनाओं से बंधी हुई थी हालांकि अब मां बेटे दोनों एक दूसरे को मर्द और औरत की नजर से देखने लगे थे लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं यह है डोर उन दोनों को मां बेटे के पवित्र रिश्ते से दूर होने से रोक रही थी और यही बात सुगंधा को हैरान भी कर रही थी,,।
सुगंधा बार-बार अपने बदन पर अपने बेटेकी उंगलियों के हाथों का स्पर्श उसका मर्दन अच्छी तरह से महसूस कर रही थी यहां तक की सुबह नहाते हुए उसकी उंगली को अपनी बुर के अंदर बाहर भी अच्छी तरह से अनुभव कर चुके थे लेकिन फिर भी एक ऐसी झिझक थी जो आगे बढ़ने से उसे रोक रही थी,,, यह सब क्या था यह क्यों हो रहा था यह सब सुगंधा के भी समझ के परे था,,, लेकिन सुगंधा आप सारी दीवारों को तोड़कर आगे बढ़ना चाहती थी क्योंकि यह तड़प यह प्यास यह मदहोशी अब उसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी और शायद जितना सुगंधा बर्दाश्त कर रही थी ऐसा कोई भी औरत नहीं बर्दाश्त कर पाती और अपनी प्यास की तृप्ति पूर्ण कर ली होती,,,उसे रह रहकर अपने बेटे पर भी गुस्सा आ रहा था क्योंकि वह तो एक मर्द था और मर्द औरत के साथ ज्यादातर मनमानी ही करते हैं और जब बात इतनी आगे बढ़ जाए तो कोई भी मर्द अपने आप पर काबू नहीं कर पता है औरत के अंदर अपने औजार को जानकर अपनी प्यास बुझाने सेलेकिन अंकित ना जाने कौन सी मिट्टी का बना था कितना कुछ हो जाने के बावजूद भी वह आगे नहीं बढ़ पा रहा थाइतना तो वह अगर किसी गैर मर्द को मौका दी होती तो आप तक न जाने कितनी बार एक औरत होने का सुख प्राप्त कर ली होती।लेकिन जैसी मां वैसा बेटा दोनों बस अपने-अपने तरीके से मजा लूट रहे थे आगे बढ़ने में दोनों की हीम्मत नहीं हो रही थी,,, सुगंधा खुद एकांत पाने के लिए ही अपनी बेटी को अपनी मां के वहां गांव भेज दी थी ताकि दोनों मां बेटे को एकांत मिल सके और एकांत में दोनों अपने मन की कर सकें,,,, लेकिनअभी तक कुछ नहीं हो पाया था और आप बेहद जरूरी था कि दोनों के बीच कुछ ऐसा हो कि दोनों मां बेटे के रिश्ते से बाहर आ सके,,,, वरना ऐसा ही चला रहा तोतृप्ति भी घर आ जाएगी और दोनों के बीच कुछ हो भी नहीं पाएगा यही सोचकर सुगंध हैरान हो रही थी और खुद ही को कुछ करना पड़ेगा यह सोचकर अपने आप को अगले पल के लिए तैयार कर रही थी।

आज गर्मी कुछ ज्यादा ही थी,,, खाना तैयार हो चुका था और सुगंधा खाने की दो थाली लग रही थी और अपने मन में आगे की युक्ति के बारे में सोच रही थी कि आगे की युक्ति पर कैसे अमल करना है वैसे तो जब-जब वह अपनी युक्ति पर अमल करने की सोचती थी तब तक उसके बदन में थरथराहट सी होने लगती थी और उत्तेजना से पूरा बदन मदहोश हो उठता था,,, अब तो आलम यह था कि हर पल उसकी बुर पानी छोड़ती थी इतनी उत्तेजनावह अपने पति के होने के दौरान भी नहीं महसूस की थी बार-बार उसकी बुर का पानी छोड़ने उसकी पेंटि को बार-बार गीली कर देता था इसी के चलते अब तो घर पर वह पेंटि पहनना ही छोड़ दी थी,,, क्योंकि उसे मालूम था कि उसके बेटे की मौजूदगी मेंउसकी बुर लगातार पानी बहती थी और ऐसे में उसकी पेंटि गीली हो जाती थी जिसे पहनने में उसे भी असहज महसूस होता था,,, वैसे भी घर में बिना पेंटि के कपड़े पहनने में उसे भी अच्छा लगने लगा था,,, पहले उसके जैसी आदत बिल्कुल भी नहीं थी पहले वह हमेशा स्कूल में हो या घर में हमेशा पैंटी पहन कर रखती थी लेकिन जब से मां बेटे के बीच का नजरिया बदला था तब से सुगंधा को घर पर बिना पेंटिंग के रहने की आदत बन चुकी थी बस कभी कभार वह पहन लेती थी। सुगंधा थाली लगाकर अपने बेटे को बुलाने के लिए उसके कमरे की तरफ गई कमरे का दरवाजा खुला हुआ था वहहल्के से खुले दरवाजे में से कमरे के अंदर झांक कर देखी तो दंग रह गईक्योंकि सामने बिस्तर पर अंकित पीठ के बल लेटा हुआ था और उसके पेंट में अच्छा खासा तंबू बना हुआ था,,, और वह कोई किताब पढ़ते हुए बार-बार अपने तंबू को सहला ले रहा था,,,, यह देखकर सुगंधा की बुर में भी खिंचाव होने लगावह मदहोश होने लगी मन तो उसका कर रहा था किसी समय अपने बेटे के कमरे में घुस जाए और अपने हाथों से उसकी पेंट उतार कर उसके टनटनाए हुए लंड पर अपना गुलाबी छेद रख दे,,, लेकिन यह सिर्फ उसके मन में उठ रही भावनाएं थी जिस पर वह अमल नहीं कर सकती थी इसके पीछे सिर्फ मां बेटे का पवित्र रिश्ता ही जो उसे इस तरह की मनमानी करने से रोक रहा था जबकि मन तो उसका हवाओं में उड़ रहा था,,,।

अपने मन में उठ रही भावनाओं पर काबू करते हुए वह हल्के से दरवाजे पर दस्तक देते हुए बोली,,।

अंकित खाना लग गया है आकर खा ले,,,(सुगंधा यह कहकर देखना चाहती थी कि उसका बेटा अपनी स्थिति पर कैसे नियंत्रित करता है और जैसे ही उसके कानों में उसकी आवाज पहुंची वह तुरंत बिस्तर पर रखी अपनी टावल को अपने तंबू पर रखकर उसे छुपाने की कोशिश करने लगा,,, यह देख कर सुगंधा मन ही मन में प्रसन्न होने लगी और अपने आप से ही बोली,,, ऐसा करने की अब जरूरत नहीं है अब तो जरूरत है उसे बाहर निकालने की क्या तुझे नहीं समझ में आ रहा है कि तेरी मां कितना तड़प रही है हरामजादे,,,, अनायास ही अब मन में ही अपने बेटे के लिए इस तरह की गाली निकल गई और वह वापस रसोई घर की तरफ चल दी,,, अंकित बिस्तर पर बैठ चुका था और अपने लंड को नियंत्रित करने हेतु वह कुछ देर तक वहीं पर बैठा रहा था कि उसके पेट में बना तंबु शांत हो सके और थोड़ी ही देर मेंउसके लंड पर नियंत्रण आने लगा और वह धीरे-धीरे शांत होने लगा और देखते ही देखते उसके पेंट में बना तंबू एकदम सपाट मैदान हो गया। और फिर धीरे से वह अपने कमरे से बाहर निकल गया और फिर पानी से हाथ मुंह धो कर वह भी अपने मां के पास बैठ गयालेकिन अभी तक उसकी मां खाना शुरू नहीं की थी वह अंकित का इंतजार कर रही थीऔर यह भी देखने की कोशिश कर रही थी कि क्या अभी भी उसके पेंट में तंबू बना हुआ है लेकिनऐसा कुछ भी नहीं था तो अपने मन में समझ गई कि कमरे में उसके बेटे को इतना देर क्यों लगा कमरे से बाहर आने में और वह मन ही मन में मुस्कुराने लगी,,,,।

अंकित उसके ठीक सामने बैठ चुका था सुगंधा का दिल जोरो से धड़क रहा था उसके मन में कुछ और चल रहा था,,, अंकित खाना खाने लगा और यह देखकर सुगंधा भी निवाला हाथ में लेते हुए बोली,,, आज कुछ ज्यादा ही गर्मी है अंकित,,,।(और ऐसा कहते हुए वह एक तनु को मोड़कर जमीन पर सटा दी और दूसरे पर को घुटनों से मोड कर उठा रही जिससे उसकी साड़ी टांगों के बीच से एकदम से खुल गई,,, लेकिन अभी तक अंकित की नजर दोनों टांगों के बीच बना रही जगह पर बिल्कुल भी नहीं गई थी,,, वह दूसरा नहीं वाला भी मुंह में डालकर खाने लगा लेकिन तभीगर्मी की बात सुनकर उसकी नजर अपनी मां पर पड़े तो वह अपनी मां को देखकर दंग रह गया क्योंकि जिस तरह से वह अपनी टांगों को खोल रखी थीउसकी साड़ी भी बीच से एकदम से खुल गई थी जिससे उसकी दोनों टांगों के बीच का नजारा हल्का-हल्का देखने लगा था और यह देखकर उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी और अपनी मां की बात का जवाब देते हुए वह बोला,,,)

तुम सही कह रहे हो मम्मी आज कुछ ज्यादा ही गर्मी है मुझसे भी आज बर्दाश्त नहीं हो रहा है,,,,(ऐसा कहते हुए वहां अपनी नजरों को अपनी मां की दोनों टांगों के बीच उसके त्रिकोण आकार पर ले जाने की कोशिश करने लगा जो हल्का-हल्का नजर आ रहा था,,,, अपने बेटे की नजर देख कर सुगंधा भी मन ही मन में खुश होने लगीऔर अपने आप को ही शाबाशी देते हुए बोली की कर चाहे जैसे भी अपनी युक्ति को अमल में ले ही आती है,,,, सुगंधा को अच्छी तरह से मालूम था कि जिस तरह से वह बैठी है उसके बेटे को उसकी बुर की झलक जरूर दिखाई दे रही होगी,,,,और ऐसा ही था लेकिन पूरी तरह से तो नहीं लेकिन हल्की-हल्की बुर की झलक उसके बेटे को जरूर मिल रही थी लेकिन अंकित के लिए इतना भी काफी था खाना खाते समय इतना मदहोश कर देने वाला दृश्य देखकर खाने का मजा दुगना होता जा रहा था। सुगंधा भी उसी स्थिति में खाना खा रही थी,,,,, अपने बेटे की बात सुनकर वह खाना खाते हुए बोली,,)

अब गर्मी के आगे कर भी क्या सकते हैं,,,, मजबूरी बस इसे झेलना ही है,,,।

हां सच कह रही हो इसके आगे कर भी कर सकते हैं पंखा देखो इतना तेज चल रहा है फिर भी पसीना टपक रहा है,,,, लेकिन हम लड़कों का तो ठीक है किकिसी भी तरह से बैठ जाते हैं घूम लेते हैं लेकिन औरतों को ज्यादा दिक्कत आ जाती है,,,,।

क्यों औरतों को ज्यादा दिक्कत आ जाती है,,,?(निवाला मुंह में डालते हुए अंकित की तरफ देखते हुए बोली)

अरे मेरा मतलब यह था की औरतों को तोसाड़ी पहनना पड़ता है और इतने सारे कपड़े पहनने पड़ते हैं,,,,,,, अब औरतें तो उन सबको उतार नहीं सकती ना,,,, और हम लोग तोशर्ट भी उतार सकते हैं पेंट भी उतार सकते हैं एक छोटा सा टावल लपेटकर भी रह सकते हैं,,,।

मन करे तो नंगा भी रह सकते हैं,,,,(हंसते हुए सुगंधा बोली तो उसकी बात पर अंकित भी हंसने लगा लेकिन मौका देखकर वह तपाक से जवाब देते हुए बोला)

वैसे तो देखा जाए तो तुम औरतें भी अपने सारे कपड़े उतार कर घर में नंगी घूम सकते हैं गर्मी के दिनों में या चाहे जब भी,,,(अंकित यह बात बहुत हिम्मत करके बोला था,,,लेकिन इस दौरान भी उसकी नजर अपनी मां की दोनों टांगों के बीच पर ही टिकी हुई थी जो कि ट्यूबलाइट की रोशनी में एकदम साफ नजर आ रही थी अपनी बेटी के मुंह से उसकी बात सुनकर सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी और वह आंखों को नचाते हुए बोली,,,)

अच्छा तो तुझे क्या लगता है कि मैं अपने सारे कपड़े नंगी होकर घर में घूमु क्या मुझे कभी ऐसे देखा है क्या गर्मी में,,,,(सहज रूप से मुंह में निवाला डालते हुए वह बोली वह एकदम सहज होकर अपने बेटे से बातें कर रही थी ताकि उसका बेटा इसी तरह से खुल सके अपनी मां की बात सुनकर वह बोला)

नहीं ऐसा नहीं कह रहा मैं तो बता रहा हूं कि अगर ज्यादा गर्मी महसूस हो तो इस तरह से औरतें घर में रह सकती है लेकिन सबके मौजूदगी में नहीं,,,,।

फिर,,,,?

मतलब कि जब वह अकेले में रहे या फिर ऐसे इंसान के सामने जिसके सामने वह अपने आप को सहज महसूस करती हो जैसे की,,,,(इतना कहकर वह थोड़ा सा सोचने लगा तो उसे इस तरह से ख्यालों में खोया हुआ देखकर सुगंधा बोल पड़ी,,)

जैसे,,,?

जैसे अपने पति के सामने,,,,

वो,,,,,हहहहह,,, बात तो सही कह रहा है भले ही यह सब बातें मेरे सामने बोलने वाली नहीं है लेकिन फिर भी बात एकदम पक्की है औरतें अपने पति के सामने बिना कपड़ों के रह सकती हैं,,,,(सुगंधा भी रंग में रंग भर रही थी अपने बेटे की बात से वह मदहोश हो रही थी और बार बार अपनी टांगों को हल्का-हल्का इधर-उधर घूम कर अपने बेटे को उचित तरीके से अपने बुर के दर्शन करा रही थी,,,, अपनी मां की बात सुनते ही अंकित को मौका मिल गया और वह एकदम से अपनी मां से बोल बैठा,,,)

तो क्या मम्मी तुम भी पापा के सामने बिना कपड़ों के रहती थी,,,,,।
(अपने बेटे का सवाल सुनकर सुगंधा मुस्कुराने लगी और कोई पल होता तो वह शायद अपने बेटे को इस सवाल पर उसे थप्पड़ लगा दी होती लेकिनदोनों के बीच की दूरी जिस तरह से कम हो रही थी दोनों के बीच इस तरह का आकर्षण बढ़ता जा रहा था और दोनों के मन में जिस तरह की उमंगेउठ रही थी उसे देखते हुए सुगंधा अपने बेटे के सवाल पर गुस्सा करने की जगह मुस्कुरा रही थी और उसे भी मौका मिल गया था अपने बेटे से इस तरह से बातें को आगे बढ़ाने का वैसे तो उसके जीवन में ऐसा कोई पल नहीं आया था जो इस मुद्दे को सही साबित कर सके क्योंकि वह अपने पति के सामने अकेले होने के बावजूद भी बिना कपड़ों की कभी नहीं थी केवल अपनेबिस्तर को छोड़कर जब दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित होता था लेकिन फिर भी वह अपने बेटे की बात सुनकर झूठी कहानी बनाते हुए बोली,,,)

चल अब जाने दे इन सब बातों को कोई मतलब नहीं है,,,,(ऐसा हो जानबूझकर बोल रही थी क्योंकि उसे पूरा यकीन था कि उसका बेटा इस मुद्दे को यहीं खत्म नहीं करेगा वह बात गहराई को जानने की पूरी कोशिश करेगा,,, और ऐसा कहकर वह खाना खाने लगी और उसके सोने के मुताबिक ही उसका बेटा तुरंत बोल पड़ा,,)

नहीं नहीं मुझे बताओ ना क्या तुम भी पापा के सामने बिना कपड़ों के घूमती थी,,,।

अपनी मां से इस तरह का सवाल करते हुए तुझे शर्म नहीं आती,,,(यह बात वह एकदम मुस्कुरा कर बोली थी ताकि उसके बेटे को जरा भी एहसास ना हो कि वह गुस्से में है,,,, या इस तरह की बात नहीं करना चाहती वह जानबूझकर मुस्कुरा कर कह रही थी ताकि बात आगे बढ़ सके,,,, अपनी मां की बातें सुनकर वह अपनी मां की टांगों के बीच झांकते हुए बोला,,,)

हां शर्म तो आनी चाहिए लेकिनजिस तरह की बातचीत हम दोनों के बीच हो रही है मुझे नहीं लगता कि यह सवाल पूछने में किसी शर्म का एहसास होना चाहिए यह तो बात निकल पड़ी है तो इसका समाधान होना भी बेहद जरूरी है,,,। बताओ ना मम्मी,,,

अब क्या बोलूं मैं तुझे वैसे तो एक मां होने की नाते अपने बेटे से इस तरह की बात मुझे नहीं करना चाहिए लेकिन,,, जब पूछ ही लिया है तो बता देता हूं,,,,।

इसी तरह की गर्मी का महीना चल रहा था और शुरू शुरू का दिन था जब मैं शादी करके यहां पर आई थी सिर्फ मैं और तेरे पापा ही रहते थे और मुझे गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी तो उन्होंने ही मुझे बोला था कि दरवाजा बंद कर लो और घर में बिना कपड़ों के रहा करो तब गर्मी से राहत रहेगी,,,,।

क्या सच में पापा ने ऐसा कहा था,,,!

हां बिल्कुल क्योंकि मैं एकदम पसीने से तरबतर हो जाती थी मुझसे बर्दाश्त नहीं होती थी गर्मी,,,,।

तो तुमने क्या किया,,,?

करना क्या था तुम्हारे पापा की बात मुझे सही लगी और वैसे भी मेरे और तुम्हारे पापा के सिवा तो कोई रहता नहीं थाऔर मैं तुरंत दरवाजा बंद करके अपने सारे कपड़े उतार कर ऐसे ही घर में रहती थी खाना बनाना चाय बनाना करके सफाई करना सब कुछ में बिना कपड़ों के ही करती थी और मुझे अच्छा लगने लगा था शरीर एकदम हल्की लगती थी,,,।

शरीर तो एकदम हल्की लगती थी लेकिन पापा की तो हालत खराब हो जाती होगी,,,(अपनी आंखों में शरारत भरते हुए अंकित बोला तो उसकी बात सुनकर सुगंधा भी शरमाते हुए बोली,,,)

धत् बहुत शैतान हो गया है तू,,,,(और शर्म के मारे निवाला मुंह में डालकर खाने लगे तो उसकी हालत को देखकर अंकित भी खामोश नहीं रहा वह फिर से बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी शर्मा क्यो रही हो बताओ ना,,, तुम्हें बिना कपड़ों के देख कर पापा की खराब हो जाती थी ना,,,,।

(सुगंधा को समझ में नहीं आ रहा था कि अपने बेटे का इस सवाल का क्या जवाब देंअपने बेटे के सवाल प्रभात शर्मा से पानी पानी हो जा रही थी और खास करके उसकी बुर की हालत खराब हो रही थी वह तवे पर रखी गरम रोटी की तरह एकदम से फूल चुकी थी और गर्मी की वजह से वह पसीने से तरबतर भी हो रही थी और साथ ही उसमें से मदन रस का रिसाव भी हो रहा था,,,,जोकि अंकित को साफ दिखाई दे रहा था अंकित भी अपनी मां की पानी से भरी हुई बुर को देखकर खुद पानी पानी हो रहा था उसका मन तो कर रहा था कि अपनी मां की दोनों टांगों के बीच मुह डालकर उसके मदन रस का रसपान कर ले,,, लेकिन यह भी उसके मन का ख्याली पुलाव था।सुगंधा कुछ बोल नहीं रही थी लेकिन अपनी टांगों को हल्का सा और खोल दी थी ताकि ट्यूबलाइट की रोशनी में उसके बेटे की नजर उसकी कचोरी जैसी फुली हुई बुर पर आराम से पड सके,,,,अंकित भी नजर भर कर अपनी मां की बुर को देख रहा था ऐसा मौका वैसे तो इस समय बार-बार आ रहा था कि वह अपनी मां की खूबसूरत बदन का कोई ना कोई अंग देख ले रहा था,,, लेकिन फिर भी अंकित हो या उसकी जगह कोई भी मर्द औरत की बर देखने का वह एक भी मौका छोड़ नहीं सकता भले ही वह उस बुर से बार-बार अपनी प्यास बुझाया हो,,,, अपनी मां को खामोश देखकर अंकित फिर से बात को छेड़ते हुए अपनी बात को दोहराया,,)

क्या हुआ मम्मी बोलो ना तुम बार-बार शर्मा जाती हो,,,।

तू बात ही ऐसी करता है कि शर्म तो आ ही जाएगी मैं क्या मेरी जगह कोई भी औरत होगी तो उसे शर्म आ जाएगी क्योंकि यह सब बात कोई अपने बेटे से थोड़ी ना करता है,,,।

तो क्या हो गया अपना दोस्त समझ कर बता दो,,,।

औरत का कोई लड़का दोस्त हो सकता है क्या औरत का दोस्त नहीं हो औरत की सहेली होती है और तू तो मरते हैं इस तरह की बात तेरे से करूंगी तो,,,, थोड़ा अजीब नहीं लगेगा,,,,।

हम दोनों तो दोस्त की तरह है अब मुझे सहेली समझो या दोस्त,,,,

बहुत चालाक है तू,,,,,चल अच्छा ठीक है तू पूछ रहा है तो बता देता हूं लेकिन यह सब बातें तो किसी को बताना नहीं कि हम दोनों के बीच इस तरह की बातें होती हैं,,,, तुझ पर भरोसा कर सकती हुं ना,,,।

बिल्कुल मैं भला यह सब बातें दूसरे को थोड़ी ना बताऊंगा,,,,।

(गहरी सांस लेते हुए,,,) सच कहूं तो मैं तोअपनी परेशानी की वजह से अपने सारे कपड़े उतार कर घर में रहते थे लेकिन यह बात सच है कि मुझे देखकर तेरे पापा की हालत खराब हो जाती थी और यहां तक कि वह दो-तीन दिन तक ऑफिस जाते ही नहीं थे..

तो क्या वह भी तुम्हारे साथ बिना कपड़ों के रहते थे,,,,(मौका देखकर चौका करने हेतु से अंकित बोल पड़ा इतना तो वह समझ सकता था कि अगर एक औरत घर में बिना कपड़ों के दिन भर रहती है तो भला मर्द कुछ किए बिना कैसे रह सकता है,,,,अंकित की बातें सुनकर वैसे तो सुगंधा शर्म से पानी पानी होने लगी लेकिन फिर भी वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)

पहले तो नहीं लेकिनमुझे जिस तरह से देखते थे उनसे रहा नहीं जाता था और वह भी अपने सारे कपड़े उतार कर बिना कपड़ों के ही घर में इधर-उधर घूमते थे,,,।

ओहहहहहहह,,,,, अगर तुम दोनों को कोई देख लेता तो,,,।

कौन देखता दरवाजा बंद करके रहते थे ऐसा थोड़ी ना कि दरवाजा खुला छोड़ कर घूमते थे,,,,

बाप रे मम्मी सच में तुम और पापा बहुत रंगीन मिजाज के थे,,,,, लेकिन अब बिना कपड़ों के नहीं रह सकती ना,,,।

पागल हो गया है क्या,,, अब क्या तेरे सामने कपड़े उतार कर घूमु,,,।

उतार दो,,,(एकदम से हंसते हुए अंकित बोल पल भर के लिए तो अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा को लगा कि यही उचित समय है अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी हो जाने का लेकिन फिर वह कुछ सोच कर अपने आप को रोक ली लेकिन गहरी सांस लेते हुए अपने बेटे को अपनी दोनों टांगें खोलकर अपनी बुर का भरपूर दर्शन कराते हुए बोली,,,)

एकदम बेशर्म हो गया है तु,,,,,।

(दोनों खाना खा चुके थे और एक अद्भुत मादकता भरे वार्तालाप के साथ-साथ एक मदहोश कर देने वाले दृश्य पर भी पर्दा पड़ चुका था अपने आप को व्यवस्थित करके सुगंधा दोनों थाली उठा ली थी और सफाई करने लगी थी,,,, जिसमें अंकित भी अपनी मां का हाथ बंटा रहा था,,, थोड़ी ही देर में सफाई हो चुकी थी और दोनों बिस्तर और चटाई लेकर छत पर पहुंच चुके थे मां बेटे दोनों के मन में बहुत सारी भावनाएं उमड़ रही थी ,,,,)

कुछ देर पहले जो कुछ भी हुआ था उससे दोनों के उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच चुकी थी,, दोनों की बातचीत निरंतर मादकता का रूप ले रही थी किसी न किसी बहाने मां बेटे दोनों दो अर्थ वाली बातें कर रहे थेजिसका मतलब कुछ और ही निकलता था और इस तरह की बातें करके दोनों मस्त हो रहे थे। मां बेटे के बीच इस तरह की वार्तालाप वाकई में दोनों के पानी छुड़ा दे रही थी लेकिन जिस तरह से दोनों का पानी निकालना चाहिए था उसे तरह का अभी ऐसा कोई भी कार्यक्रम नहीं हुआ था,,, सिर्फ ऊपर ऊपर से हीबातों का सहारा लेकर या एक दूसरे के अंगों को किसी न किसी बहाने से छूटकर दोनों अपना पानी छोड़ दे रहे थे लेकिन दोनों को जरूरत थी एक घमासान चुदाई की,,, पलंग तोड़ ठुकाई की जिसमें अंकित पूरी तरह से सक्षम भी था लेकिन अंकित की मां अभीअगले पल के लिए शायद तैयार नहीं थी वैसे तो मां बेटे दोनों ही एक दूसरे में समा जाने के लिए आतुर थे,,, फिर भी दोनों के बीच अभी भी मर्यादा की दीवार बरकरार थी संस्कार का पर्दा लगा हुआ था लेकिन अब ऐसा लगने लगा था कि किसी भी पल यह मर्यादा की दीवार ढह जाएगी और संस्कार का पर्दा अपने आप उठ जाएगा बस दोनों को उसी पल का इंतजार था।

मां बेटे दोनों छत पर पहुंच चुके थे अंकित छत पर चटाई बिछा रहा था और सुगंधा छत की दीवार का सहारा लेकर रात का नजारा देख रही थी ठंडी ठंडी हवा उसके बदन का ठंडक प्रदान कर रही थी इस तरह की गर्मी में यह हल्की रेशमी एहसास कराने वाली शीतल हवा उसके बदन को मदहोश कर रही थी रात का नजारा देखते हुए वह अपने मन में यही सोच रही थी कि किस तरह से अपने बेटे के साथ आगे बढ़ा जाए,,, अब उससे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था या यूं कह लो की अब उसका खुद पर काबू नहीं हो रहा था जिस तरह से उसकी बुर बार-बार पानी छोड़ रही थी उसे देखते हुए ऐसा लग रहा था कि उसकी बुर में बाढ़ आने वाला था,,, सुगंधागर्मी में भी शीतल हवा का आनंद लेते हुए अपने बेटे के बारे में ही सोच रही थी और अपने आप से ही बात करते हुए अपने मन में बोल रही थी कि यह कैसा लड़का है इतना कुछ होने के बावजूद भी आगे नहीं बढ़ पा रहा है इतने में तो कोई भी संभोग सुख प्राप्त करके पूरी तरह से मर्द बन जाता है लेकिन यह न जाने किस मिट्टी का बना है इतनी खूबसूरत जवानी से भरी हुई औरत पास में होने के बावजूद भी बस छूकर ही मजा ले रहा है,,, इस तरह का खयाल सुगंधा को परेशान कर रहा था,,, क्योंकि वाकई में अब उसके भी बर्दाश्त के बाहर हो रहा था।

कभी-कभी तुम अपने मन में यही सोचती थी कि यह सब शुरू न हुआ होता तो कितना अच्छा होता हुआ आराम से अपनी जिंदगी गुजर रही थी और अपने बेटे के साथ किसी भी प्रकार का आकर्षक और गंदी भावनाएं उसके मन को बिल्कुल भी विचलित नहीं करती थी,,, सब कुछ एकदम सामान्य था दोनों के बीच मां बेटे वाला ही रिश्ता था दोनों एक दूसरे को सम्मान देते थे और गंदी भावनाओं से कोसों दूर थे,,,, लेकिन फिर उसके मन में दूसरा ख्याल आया कि वह भी क्या जिंदगी थी बरसों से तो ऐसे ही गुजार रही थी अब बचा हुआ जीवन इसी तरह से गुजार देती तो इतना खूबसूरत जिस्म में किस काम का,,,सुगंधा अपने मन में सोच रही थी कि उसकी तरह दुनिया में लाखों होते हैं जो इस तरह से घर में ही सुख ढूंढ़ लेते हैं और ऐसी भी औरतों से समाज भरा हुआ है जो पति के होने के बावजूद भी दूसरे मर्द के साथ संभोग सुख प्राप्त करके अपनी संतुष्टि में डूब रही है,,, आखिरकार उन्हें किस बात की कमी है पति है जो उन्हें शरीर सुख दे सकता है और उसके पास तो उसका पति भी नहीं है बरसों से अपनी गदराई जवानी का बोझ लिए जीवन गुजारते चली जा रही है। लेकिन अब इस जवानी का बोझ उठाया नहीं जा रहा है,,, आखिरकार क्या कमी है उसमें सर से लेकर वहां तक पूरी तरह से जवानी के नशे में डूबी हुई है बदन का हर एक अंग मदन रस टपका रहा है और ऐसे कितने लोग होंगे जो उसका मदन रस का स्वाद चखना चाह रहे होंगे। जिसमें उसका खुद का बेटा भी शामिल हैजिसे तो वह उसके एक इशारे पर अपना सब कुछ दे सकती हैं,,।
इन सब बातों को सोचते हुए वह अपने आप से ही मन में बात करते हुए बोली जिस तरह का रिश्ता वह चाह रही है इस तरह से तो न जाने कितने घरों में मां बेटे के बीच अनैतिक रिश्ता कायम हो गया होगा नूपुर को ही देख लो उसका उसके बेटे के साथ जरूर जिस्मानी तालुका थे और ऐसा न जाने कितने घरों में रोज होता ही होगा और इस समय भी न जाने कितने मां बेटे आपस में लगे हुए होंगे बस चार दीवारी के अंदर चार दिवारी के बाहर वह लोग फिर सेसमाज के सामने मां बेटी बन जाते हैं और कमरे में आते ही पति-पत्नी वाला सुख भोगते हैं बस किसी को पता नहीं चलता और ऐसाउसके साथ भी हो सकता है अगर वह अपने बेटे के साथ जिस्मानी तालुका बना लेती है तो भला इस बारे में कहां किसी को पता चलने वाला है,,, वह खुद तो किसी को बताने वाली नहीं है और नहीं उसका बेटा किसी को यह सब बताएगा आखिरकार उसे भी तो मजा मिलेगा जवानी का,,, और फिर जिस लड़के को जवानी का मजा मिल रहा हो चुदाई का सुख मिल रहा हो,,, दिन रात रोज एक खूबसूरत औरत को चोदने को मिल रहा हो और भले ही क्यों ना हो वह उसकी खुद की सगी मां क्यों ना हो तो भला ऐसा लड़का अपने इस खूबसूरत राज को किसी दूसरे को क्यों बताएगा,,,, सब बातों के बारे में सोचकर सुगंधा की बुर पानी छोड़ रही थी।वह बार-बार अपने बेटे की तरफ प्यासी नजर से देख ले रही थी जो इस समय बिस्तर लगाने में पूरी तरह से व्यस्त था और यह देखकर उसे ऐसा लग रहा था कि अभी उसका बेटा बिस्तर लगाने के बाद उसे अपनी गोद में उठाकर बिस्तर पर ले जाएगा और फिर उसकी जमकर चुदाई करेगा, ऐसा मन में सोचते हुए वह मदहोश हुए जा रही थी।

बिस्तर लगा चुका था,, और दो तकिया भी अंकित रख चुका था और खुद बिस्तर पर बैठकर अपनी मां की तरफ देखते हुए वह बोला,।

आ जाओ मम्मी बिस्तर लग चुका है,,,,।
(अपने बेटे की बात सुनकर वह अंकित की तरफ देखते हुए बोली)

बिस्तर तो लग चुका है लेकिन नींद नहीं आ रही है,,,।

नींद क्यों नहीं आ रही है आकर लेट जाओ धीरे-धीरे नींद आ जाएगी,,,,।

फिर भी नहीं आएगी,,,

वह क्यों भला,,,

ऐसी बहुत सी बातें हैं जो मुझे परेशान कर रही है,,,,।
(सुगंधा के मन में बहुत कुछ चल रहा था उसके मन में ढेर सारे सवाल थे और वह इन सब सवालों का जवाब अपने बेटे से प्राप्त करना चाहती थी और वह जानती थी कि इन सवालों में ही उसके मंजिल तक पहुंचने का रास्ता भी छुपा हुआ है,,, अपनी मां की बात सुनकर वह थोड़ा गंभीर होता हुआ बोला)

कौन सी बातें मुझे तो बताओ,,,,

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा अपनी जगह से चलती हुई अपने बेटे के करीब आने लगी जो इस वक्त चटाई पर बैठा हुआ थारात के सन्नाटे में सुगंधा की खनकती हुई चूड़ियां वातावरण में मदहोशी भर रही थी,, उसकी चाल में इतनी मादकता थी कि अंकितअपनी मां की कमर वाले हिस्से को भी देख रहा था क्योंकि कमर के नीचे चला हिस्सा उसके नितंबों के किनारे वाली भाग एक अद्भुत जाकर लिए हुए था जो साड़ी में भी एकदम साफ दिखाई दे रहा था,,, वैसे तो रात का अंधेरा बरकरार था लेकिन चांदनी रात होने की वजह से रात भी चांदनी में नही हुई नजर आ रही थी जिसमें सबकुछ साफ नजर आ रहा था,,, सुगंधा धीरे से आकर अपने बेटे के पास बैठ गई और वह अपनी बड़ी-बड़ी गांड को तकिया पर रख कर बैठे तकिए पर गांड का वजन पड़ते ही तकिया पूरी तरह से फैल गई,,, और यह अंकित बराबर देख रहा था,,, और जिस तरह से तकिया पूरी तरह से उसकी मां की गांड के वजन से फैल चुकी थी उसे देखकर अंकित अपने मन में सोचा कि,, जब तक किया कि यह हालत है तो अगर किसी दिन उसकी मां अपनी भारी भरकम गांड लेकर उसके लंड पर बैठेगी तब क्या हालत होगी,,,, यह ख्याल पल भर के लिए उसके मन में उत्तेजना और थोड़ी बहुत घबराहट को पैदा कर दिया था लेकिन तभी वह अपने मन में सोचा कि जब मां की मां की जमकरचुदाई कर सकता है उसकी बड़ी-बड़ी गांड पर दोनों हाथों से पकड़ के चोद सकता है तो फिर उसकी बेटी को भी आराम से चोद लेगा यह ख्याल मन में आते ही उसे थोड़ी राहत महसूस हुई,,, सुगंधा बड़े आराम से तकिया पर बैठते हुए बोली,,)

अब क्या बताऊं तुझे कैसे बताऊं मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है,,।

अरे ऐसी कौन सी बात है जो तुम्हें मुझसे कहने में समझ में नहीं आ रहा है बताओ जो कहना है,,,।

मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि मैं तुझे कैसे कहूं कि मेरे मन में किस तरह के सवाल मुझे परेशान कर रहे हैं,,,।

देखो मम्मी,,,(धीरे से कहते हुए वह अपनी मां के हाथ को अपने हाथ में लेकरहल्के से दबाते हुए उसे पकड़ लिया जिससे सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी और वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)इस समय घर में मेरे और तुम्हारे सिवा कोई नहीं है हम दोनों एक दूसरे को समझ सकते हैं तुम्हारे मन में क्या चल रहा है मेरे मन में क्या चल रहा है अगर हम एक दूसरे को बता दें तो शायद इसका निराकरण हो सकता हैअगर तुम बताओगे नहीं तो पता कैसे चलेगा कि कौन सा सवाल तुम्हें परेशान कर रहा है शायद हो सकता है कि इसका जवाब मेरे पास हो,,,.

मैं समझ सकती हूं बेटा तू मेरी परेशानी दूर करना चाहता है लेकिन जिस तरह के सवाल का जवाब में ढूंढ रही हूं वह शायद वह तेरे पास भी नहीं है,,,।

क्या बात कर रही हो मम्मी स्कूल में कैसा भी सवाल हो सबसे पहले में ही हल करता हूं इसलिए तो मुझे बताओ कौन सा सवाल है मैं तुरंत हल करके बता दूंगा और तुम्हारी परेशानी दूर कर दूंगा,,,।

(अपने बेटे की यह बात सुनकर सुगंधा हंसने लगी उसे हंसता हुआ देखकर अंकित बोला)

क्या हुआ हंस क्यों रही हो क्या मुझ पर विश्वास नहीं है स्कूल का रिजल्ट तो तुम देखती ही हो अपने क्लास में सबसे प्रथम नंबर मेरा आता है फिर क्यों हंस रही हो।

मैं तेरी बेवकूफी पर हंस रही हूं बेटा,,,क्योंकि जिस तरह का सवाल मुझे परेशान कर रहा है वह कहीं किताब का सवाल स्कूल का सवाल नहीं है वह जीवन का सवाल है एक औरत और मर्द के बीच का सवाल है,,,,।

औरत और मर्द के बीच का सवाल,,, मे कुछ समझा नहीं,,,,,(अंकित इतना तो समझ रहा था की बात कुछ और है और वह अपनी मां के मुंह से सुनना चाहता थालेकिन फिर भी नादान बनते हुए वह बोल रहा था ऐसी बातें कर रहा था जैसे वाकई में उसे जरा भी एहसास नहीं है कि उसकी मां किस बारे में बात करना चाहती है,,,)

अब क्या बताऊं,,,,, जब अलमारी की सफाई हो रही थी इतना तो तुझे मालूम है ना,,,।

हां क्यों क्या हुआ,,,?

अलमारी में से कौन सी किताब तेरे हाथ लगी थी यह भी तुझे मालूम होगा,,,।

अलमारी में से,,,(कुछ देर सोचने का नाटक करते हुए) अरे हां पापा की किताब वही गंदी कहानी वाली,,,,

हां वही किताब लेकिन क्या तुझे पता है कहानियों में भी वही होता है जो हकीकत में होता है जो किसी के साथ गुजरा होता है,,, जो जिस पल को जिया होता है वही अपने अनुभव को वह कहानी के जरिए दूसरों को बताता है,,,,।

तो क्या मम्मी उसे किताब की कहानी क्या सच में हकीकत में किसी के साथ हुई होगी,,।

जरूर हुई होगी तभी तो वह लिखा है,,,

तो क्या उसमें लिखा हुआ एक-एक शब्द सब कुछ हकीकत था किसी का अनुभव था किसी का एहसास था,,,।

हां बिल्कुल ,,वह हकीकत ही है ,,, सच्ची कहानी है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता।,,,,( उसे गंदी किताब में लिखी हुई कहानी को अपने बेटे के सामने सच साबित करनेकी कोशिश करते हुए सुगंधा के चेहरे पर एक अद्भुत आत्मविश्वास झलक रहा था वह उसे कहानी के माध्यम से अपने बेटे को बता देना चाहती थी कि जो कुछ भी उसे कहानी में लिखा हुआ है वह किसी के साथ घटित हुआ है वह उसका अनुभव है,,, उसमें एक-एक शब्द जो लिखा हुआ है वह हकीकत में किसी के साथ हो चुका हैअपनी मां की बात सुनकर अंकित की हालत खराब हो रही थी पेट में उसका लंड अपनी औकात में आ रहा था और दूसरी तरफ सुगंधा की बुर भी पानी छोड़ रही थी,,,, अंकित हैरान होने का नाटक करते हुए बोला।)

बाप रे मैं तो समझ रहा था सिर्फ मनोरंजन के लिए लिखी गई कोई कहानी है,,,।

है तो मनोरंजन के लिए ही लेकिन हकीकत है जिसे पढ़कर वाकई में किसी भी बेटे के मन में या किसी भी मा के मन में,, हलचल पैदा होने लगे,,,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर अंकित के तन बदन में मदहोशी छा रही थीपर वह अपने मन में यही सोच कर मत हो रहा था कि उसकी मां ने बातचीत करने का अच्छा मुद्दा ले ली थी और वह फिर से अपनी मां की बात पर हैरान होने का नाटक करते हुए बोला)

मैं तो सोच कर ही परेशान हुआ जा रहा हूं उसमें लिखा हुआ एक-एक शब्द वाकई मे ऐसा लग रहा है जैसा की कोई फिल्म चल रही है जैसा कि सब कुछ आंखों के सामने हो रहा है देखने वाले ने भी क्या खूब लिखा था,,,।

तभी तो मैं भी हैरान हूं और यही सब सवाल मेरे मन को खा जा रहा है की कहानी में लिखा है एक-एक शब्द वाकई में हकीकत है तो क्याहर एक बेटे के मन में अपनी मां को उसे अवस्था में देखकर वही सब ख्याल आता है जो कहानी में उस नायक के मन में चल रहा था,,,।

(अपनी मां के मुंह से इतना सुनते ही अंकित की हालत खराब होने लगी वह समझ गया था कि अब मुद्दा पूरी तरह से मदहोशी में डूबने वाला हैअभी जब उसकी यह हालत है तो यह मुद्दा जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा तब उसकी हालत क्या होगी और वह अपने मन में यही सोच रहा था कि जब उसकी हालत है तोनिश्चित तौर पर उसकी मां की भी हालत खराब हो रही होगी जिस तरह से उसका लंड खड़ा हो गया है इस तरह से उसकी मां भी अपनी बुर से पानी बहा रही होगी,,,,अब ईस वार्तालाप को बढ़ाने के लिए अंकित पूरी तरह से आतुर हुआ जा रहा था।

मां बेटे दोनों के बीच एक अद्भुत मुद्दे पर बातचीत की शुरुआत हो चुकी थीइसके बारे में सोच सोच कर ही अंकित पूरी तरह से उत्तेजना से भर चुका था और उसकी मां की भी यही हालत थी,,, गंदी किताब की कहानी वाले मुद्दे पर बात करने कासुगंधा का उद्देश्य इतना ही था कि वह अपने बेटे को बताना चाहती थी की किताब में जो कुछ भी लिखा हुआ था वह सही था हर बेटे के मन में अपनी मां को देखकर की उत्सुकता और उत्तेजना जागरूक होती है वह सब जता कर अपने और अपने बेटे के बीच की दीवार को पूरी तरह से गिरा देना चाहती थी और इसके लिए अंकित भी आतुर था।

रात का समय चारों तरफ अंधेरा लेकिन चांदनी रात होने की वजह से सबकुछ साफ दिख रहा थाअंकित अपनी मां को हर एक रूप में देखकर उत्तेजित हो जाता था पहले वह कपड़े में हो या कपड़े बगैर हो उसका हर एक रूप से उत्तेजक और मादकता भरा लगता था उसके बदन की बनावट बेहद गठीला और बेहद नशीला था जिसके नशे में वह महीनों से डूबा हुआ था,,, इस समय जिस तरह के हालात थे उसे देखते हुए अंकित को ऐसा ही लग रहा था कि शायद आज की रात दोनों के बीच कुछ हो जाएबार-बार अंकित तकीए को देख रहा था जो उसकी मां की भारी भरकम गांड का वजन शायद झेल नहीं पा रही थी और एकदम से छीतरा गई थी। अंकित का दिल जोरो से तड़प रहा था तभी उसकी मां अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,,।

तुझे क्या लगता है अंकित जिस तरह से कहानी में उसका बेटा बाथरूम में अपनी मां को देखा था और उसे देखने के बाद जो भावनाए उसके मन में जाग रही थी क्या वहां किसी के भी मन मैं जाग सकती है,,,..

मैं थोड़ा सा सोच नहीं पा रहा हूंकहानी में क्या था मैं थोड़ा भूल गया हूं थोड़ा बता दो तो मुझे याद आ जाए,,,,(अपनी मां की बात सुनकर अंकित भी यहां पर थोड़ा साअपनी युक्ति लगाते हुए बोला क्योंकि कहानी में जो कुछ भी लिखा हुआ था वह खुद पढ़कर अपनी मां को सुनाया था और उसे सब कुछ मालूम था लेकिन वह अपनी मां के मुंह से सुनना चाहता था इसलिए थोड़ा चलाकी दिखा रहा था,,,,,, और सुगंधा भी अपने बेटे की बात सुनकर कहानी वाले दृश्य को कहानी के ही शब्दों में बताते हुए बोली,,,)

तू सच में भूल गया,,,

हां मुझे कुछ उतना खास याद नहीं है,,,,

अच्छा ठीक है मैं ही बता देती हुं,,,,,कहानी में कहानी के नायक को बड़े जोरों की पेशाब लगी हुई थी और वह बाथरूम में पेशाब करने के लिए गया था लेकिन जैसे ही बाथरूम के पास पहुंचा तो अंदर का दृश्य देखकर वह एकदम सेपागल हो गया क्योंकि अंदर उसकी मां साड़ी कमर तक उठाकर पेशाब करने के लिए बैठी हुई थी और शायद यह उसके लिए पहली बार था जब अपनी मां को पेशाब करते हुए देखा था लेकिनपहली बार में ही वह पूरी तरह से अपनी मां को पेशाब करते हुए देखकर मस्त हो गया था,,,।

(अपनी मां के मुंह से इस तरह से खुले शब्दों में कहानी का वर्णन सुनकर अंकित का दिल जोरो से धड़क रहा था और पेट की हालत खराब होती जा रही थी क्योंकि ऐसा लग रहा था कि अंकित का लंड पेंट फाड़ कर बाहर आ जाएगा,,,, अपनी मां की बात सुनते ही वह एकदम से बोल पड़ा,,,)

हां हां मुझे याद आया,,,वह पहली बार अपनी मां को पेशाब करते हुए देख रहा था और उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर उसकी हालत खराब हो गई थी,,,, माफ करना मैं यहां पर थोड़ा सा कहानी के लहजे में बोल गया,,,,,(बड़ी-बड़ी गांड शब्द बोलने पर वह जानबूझकर उस शब्द पर अपनी मां से माफी मांग रहा था और उसकी बात सुनकर उसकी मां बोली,,)

कोई बात नहीं किताब में जो लिखा हुआ था वही तो बताना है,,,,।

तो क्या सच में वह अपनी मां को पेशाब करते हुए देखकर पागल हुआ जा रहा था,,,!(अंकित यहां पर अपनी मां के सामने प्रश्न उठाते हुए बोला)

कहानी में तो ऐसा ही लिखा हुआ था,,,,,

हां मम्मी तुम सच कह रही हो कहानी में तो ऐसा ही लिखा हुआ था उस लड़के का पहली बार था लेकिन पहली बार होने के बावजूद भी वह वहां से हटा नहीं जबकि अपनी मां को इस हालत में देखकर उसे वहां से हट जाना चाहिए था,,,।

यही तो मैं भी सोच रही हूंअगर अनजाने में भी कोई बेटा अपनी मां कोई हालत में देख लेता है तो उसे वहां से हट जाना चाहिए ना की आंखें फाड़ कर उसे देखना चाहिए,,,, लेकिन शायद वह कर भी क्या सकता था,,,।

कर भी क्या सकता था मैं कुछ समझा नहीं तुम क्या कहना चाह रही हो,,,,।

अरे बुद्धू यह उम्र ही कुछ ऐसी होती है बढ़ती उम्र मतलब कि जब बच्चे जवान हो रहे होते हैं तो इस तरह की तरह से देखकरउनका दिमाग काम करना बंद कर देता है उनके लिए तो यह सब कुछ नया नया रहता है इसलिए वह लोग चाहते हुए भी अपनी नजर वहां से हटा नहीं पाते,,,।

क्या बात कर रही हो मम्मी कोई बेटा अपनी मां को पेशाब करते हुए देखेगा तो क्या वहां से उसे हट नहीं जाना चाहिए,,,।

अब जैसा तू बोल रहा है वैसा होना तो चाहिए लेकिन कहानी में तो वैसा बिलकुल भी नहीं हुआ,,,,(तकिए पर ही कसमसाते हुए सुगंधा बोली,,,, अपनी मां की बातें सुनकर वह बोला,,,)

इससे आगे भी लिखा हुआ था कहानी में ,,

हां तु कुछ और भी पढ़ कर बता तो रहा था लेकिन मुझे याद नहीं है,,,,।

चलो अब जाने दो याद नहीं है तो,,,

नहीं नहीं ऐसे कैसे तुझे तो मालूम है तू बता,,,, वैसे भी जानना जरूरी है कि क्याजिस तरह से कहानी में लिखा हुआ था वह हकीकत में भी होता है और मैं तुझे बसई भी तो की हकीकत में हुआ है तभी तो कहानी में लिखा है लेकिन फिर भी थोड़ा अजीब तो लगता है,,,।

बात तो सही है मम्मी थोड़ा अजीब तो लगता है लेकिन एक बात भी है कि इस तरह की कहानी पढ़ने में पता नहीं कैसा महसूस होने लगता है,,(एक बहाने से अंकित अपने मन की बात बता रहा था और उसकी बात सुनकर उसकी मां बोली)

कैसा महसूस हो रहा था मुझे तो बता,,,।

अरे अब क्या बताऊं जब एक कहानी पड़ रहा था तो भजन में अजीब सी हलचल हो रही थी औरकिताब बंद करने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं हो रहा था मन कर रहा था पूरी किताब बैठकर पढ़ डालु,,,

हां तो सच कह रहा है तू तो पढ़ रहा था और मैं सुन रही थी लेकिन सुनने में भी मुझे भी बड़ा अजीब लग रहा था सच कहूं तो न जाने क्यों अच्छा लग रहा था,,,, लेकिन कहानी वाली बात है तो बहुत गंदी लेकिन पढ़ने में और सुनने में बेहद रोचक लग रही थीमैं तो यह सोच रही हूं कि जब हम लोग को पढ़ने में इतनी हालत खराब हो रही है तो उसे नायक की क्या है कोई होगी जो अपनी मां को उसे अवस्था में देखा होगा और न जाने क्या-क्या सोच रहा था अपनी मां को पेशाब करते हुए देखकर,,,,।

उसकी सोच तो बहुत गंदी थी मम्मी सुनी थी ना कहानी में क्या लिखा था अपनी मां को देखकर उसका एकदम से खड़ा हो गया था,,,(मौके की नजाकत को समझते हुए अंकित एकदम से खुलते हुए बोलालेकिन लंज शब्द को जानबूझकर अपने होठों पर नहीं आने दिया था वह देखना चाहता था कि उसकी मां क्या बोलती है,,,,)

क्या एकदम से खड़ा हो गया था,,,( सुगंधा भी अनजान बनते हुए बोली)

अरे वही,,,,

क्या वही बता तो सही,,,।

धत् मुझसे तो नाम भी नहीं लिया जा रहा है पता नहीं उसने कैसे कहानी लिखा होगा,,,

लड़का होकर शर्मा रहा है और उसने पूरा अपना अनुभव जो उसकेऊपर बीत चुकी थी वह सब कुछ शब्दों में ढालकर किताब बना दिया था मुझसे अब शर्माने की जरूरत नहीं है,,, हम दोनों अब दोस्त की तरह है,,,,

फिर भी मम्मी एकदम खुले शब्दों में बोलने में शर्म तो आती है ना,,,,(अपनी मां की उत्सुकता देखकर अंकित मन ही मन प्रसन्न हो रहा था लेकिन जानबूझकर नाटक कर रहा था उसकी बात सुनकर उसकी मां बोली)

शर्माने की जरूरत नहीं है यह तो ज्ञान की बातें हैं,,, हम दोनों को पता चलना चाहिए कि दुनिया में चार दिवारी के अंदर क्या-क्या हो रहा है,,,,।

तुम एकदम ठीक कह रही हो मम्मी,,, न जाने कितने ऐसे घर हैं जिसकी चार दीवारी के अंदर इसी तरह से न जाने क्या-क्या चल रहा होगा।(अंकित को एकदम से राहुल की याद आ गईवह अपनी मां से बताना चाहता था कि राहुल और उसकी मां के बीच की शारीरिक संबंध है जिसे वह अपनी आंखों से देख चुका था उसे समय तो वह राहुल को अपनी मां को चोदते हुए देखकर एकदम से सन्न रह गया उसे वह बात हजम नहीं हो रही थी लेकिन नूपुर का मदमस्त यौवन देखकर उसकी भरी हुई जवान देखकर उसे एहसास होने लगा था कि वाकई में जब घर में इतनी खूबसूरत जवानी से भरी हुई औरत हो तो किसी भी मर्द का मन उसे चोदने को तड़प उठेगा फिर भले ही वहां उसका बेटा क्यों ना हो,,, लेकिन इस समय वह अपनी मां के सामने राहुल का जिक्र नहीं छेड़ना चाहता था क्योंकिउसके मन में इस बात का शंका था कि कहीं उसकी मां को ऐसा ना लगे कि उसका बेटा जानबूझकर राहुल की बात बता कर उसे चोदने के फिराक में है,,,अपने बेटे की बात सुनकर गहरी सांस लेते हुए दोनों हाथों को पीछे की तरफ ले जाकर के अपनी छाती को उभार कर वह बोली,,)

तो सही कहना है ऐसे ना जाने कितने घर होंगे जिसकी चार दिवारी के अंदर मां बेटे के बीच इस तरह का रिश्ता इस तरह की चाहत और इस तरह की ताका झांकी चल रही होगी,,,(इस बात को कहते हुए सुगंधा अपने और अपने बेटे के बीच जिस तरह की तांका झांकी चल रही है उसका भी जिक्र कर देना चाहती थी लेकिन किसी तरह से अपनी भावनाओं पर वह काबू कर ले गई थी,,,,, फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,,) और हांतो कुछ कहानी में आगे बता रहा था कि वह नायक अपनी मां को बाथरूम में पेशाब करते हुए देखकर पागल हो गया था और उसका एकदम से खड़ा हो गया था,,,, तु बताया नहीं क्या खड़ा हो गया था।

अब जाने देना मम्मी तुमको तो पता ही होगा कि क्या स्थिति हो जाती होगी लड़कों की,,,(जानबूझकर शर्माने का नाटक करते हुए अपना नजर नीचे करते हुए अंकित बोला उसकी हालत देखकर उसकी मां मन ही मन मुस्कुरा रही थी और उसकी हालत देखकर एकदम से तपाक से बोल पड़ी,,,)

तेरी भी उसी तरह की हालत हो जाती है क्या तेरा भी कुछ ऐसा ही खड़ा हो जाता है क्या,,,,,।

(अपनी मां की बात सुनते ही अंकित एकदम से अपनी मां की तरफ देखने लगाअंकित की आंखों में वासना एकदम साफ दिखाई दे रहा था और उसकी मां की इस तरह की बातें उसे पूरी तरह से पागल कर रही थी और आगे बढ़ने को प्रेरित कर रही थी,,,, लेकिन किसी तरह से वह अपने भावनाओं पर काबू किए हुए था और अपनी मां की बात सुनकर बोला,,)

धत् कैसी बातें कर रही हो मम्मीमैंने कभी तुम्हें उसे अवस्था में थोड़ी ना देखा है और ना हीं देखने की कोशिश किया हूं,,,,।

हां बात तो सही है,,,, तू तो मेरा अच्छा बेटा है,,,,(सुगंधा जानबूझकर यह बातें कर रही थी वह एक तरह से अपने बेटे की बातें सुनकर उस पर कटाक्ष कर रही थी क्योंकि वह अपने बेटे की हरकत से भली भांति परिचित थी,,,, वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) अच्छा उसके आगे भी तो था जो कहानी में उसे बेटे के मन में बहुत कुछ चल रहा था अपनी मां को उसे अवस्था में देखकर बता तो सही,,,

हां इसके आगे का विचारतो उसे लड़के का बहुत ही ज्यादा गंदा था अपनी मां को पेशाब करते हुए देखकरऔर शायद पहली बार उसके मन में इस तरह का ख्याल आ रहा होगा,,, कहानी पढ़कर तो ऐसा ही लग रहा था,,,,,(ऐसा कहते हुए अंकित भी अपने पेंट में बना तंबू अपनी मां को दिखाने के लिए वह भी अपनी मां की तरह हाथ पीछे की तरफ करके अपनी दोनों टांगें फैला दिया था और वाकई में उसकी यह युक्ति काम कर गई थी उसके पेंट में बना तंबू एकदम साफ उसकी मां को दिखाई दे रहा था जिसे देखकर उसकी मां की बुर कचोरी की तरह फूलने लगी थी,,,, और अपने बेटे के तंबू को देखकर वह अपने मन में सोच रही थी कि उसके बेटे की भी हालत कहानी के नायक वाली की तरह हो रही थी जिसका मतलब साफ था कि वह भी उसे चोदना चाहता था वरना उसका लंड इसमें खड़ा ना होता,,, अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,) अपनी मां को पेशाब करते हुए देखकर उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर उसका लं,,,ल,,लंड एकदम से खड़ा हो गया था,,(बड़ी हिम्मत करके अपनी मां के सामने इस शब्द का प्रयोग कर रहा था जिसे सुनकर उसकी मां के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी थी)और वह अपने मन में ही बोल रहा था कि उसकी मां की गांड कितनी मस्त है गोरी गोरी एकदम बड़ी-बड़ी और कहानी में लिखा हुआ था कि उसका मन तो कर रहा था कि इसी समय बाथरूम में घुस जाऊं और पीछे से अपनी मां की बुर में पूरा लंड डालकर चुदाई कर दुं,,,,।

हाय दईया,,,, कितना हरामी लड़का है अपनी मां के बारे में ऐसा सोच रहा है,,,,(सुगंधा जानबूझकर ऐसा बोल रही थी और उसकी बात सुनकर अंकित भी अनजान बनता हुआ बोला,,,)

क्या सच में एक बेटा अपनी मां के बारे में ऐसा सोच सकता है,,,?

क्यों नहीं सोच सकता कहानी का नायक तेरी उम्र के आसपास का ही लग रहा है तभी तो कहानी में लिखा था कि वह पहली बार किसी औरत को पेशाब करते हुए देख रहा था और अपनी मां को ही,,,,और ऐसा होता है तेरी उम्र के लड़के जब औरत के अंगों को देखते हैं पहली पहली बार तो उनके मन में ऐसी ही जागरूकता और जिज्ञासा जगाती हैं उनका मन भटकने लगता है भले ही उनकी आंखों के सामने रिश्ते में कोई भी हो,,,।

तो क्या वह लड़का सच में अपनी मां के बारे में ऐसा सोच रहा था,,,।

तूने ही तो पढ़ा था एकदम साफ-साफ वह बाहर खड़ा होकर देख रहा था और उसके मन में ढेर सारी बातें चल रही थी अपनी मां को पेशाब करते हुए देख कर पर तू ही तो बताया था कि अपनी मां को पेशाब करते हुए उसका वह खड़ा हो गया था,,,, और तू शायद नहीं जानता कि तुम लड़कों का वो,,,(उंगली से अंकित के पेट में बने तंबू की तरफ इशारा करते हुए) क्यों खड़ा होता है कब खड़ा होता है…

अपनी मां का इशारा देख कर अंकित एकदम से शर्मा गयाऔर अपने पैर को घुटनों से मोड़कर अपने पेंट में बने तंबू को छुपाने की कोशिश करने लगा तो उसकी मां मां ही मां अपने बेटे की हरकत को देखकर मुस्कुराने लगी,,,, अपनी मां की बातें सुनकर वह भी अपनी मां से पूछ बैठा।
कब और क्यों खड़ा होता है,,,,!(उत्तेजित स्वर में अंकित बोला उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी क्योंकि अब यह मुद्दा पूरी तरह से गरमाहट पैदा कर रहा था और यही हाल सुगंधा का भी था उसकी बुर बार-बार पनिया रही थी,,,,,अपने बेटे की बात सुनकर उसे यही सही मौका लग रहा था खुले शब्दों में बोलने के लिए और वह गहरी सांस लेते हुए बोली,,,)

देख मैं तुझे बता तो देती हूं लेकिन मुझे गलत मत समझना मैं सिर्फ तेरे ज्ञान के लिए बता रही हूं,,,, तू भले ही बड़ा हो गया है लेकिन अभी नादान ही है इसलिए तुझे बताना जरूरी है,,,,। एक मर्द का लंड,,,,(एकदम मदहोशी भरे स्वर में गहरी सांस लेते हुए और लंड शब्द बोलते हैं उसकी हालत एकदम से खराब हो गईअंकित का भी हो रहा था अपनी मां के मुंह से इस तरह की अश्लील शब्द सुनकर वह पूरी तरह से मदहोशी के सागर में डूबने लगा थावह सिर्फ मां बेटे की मर्यादा को देखकर रुका हुआ था वरना इसी समय चटाई पर लेटा कर वह अपनी मां की चुदाई कर देता,,,,फिर भी वह अपनी उत्तेजना से सूखने हुए गले को अपने थूक से गिला करने की कोशिश करके अपनी मां की बात सुनने लगा,,, और उसकी मां भी एकदम मस्त होते हुएअपने बेटे से नजर मिलाए बिना ही आसमान की तरफ देखते हुए बोली,,,) तभी खड़ा होता है जब वह पूरी तरह से किसी औरत पर मदहोश हो जाता है और उत्तेजित हो जाता है उसे पर पूरी तरह से आकर्षित हो जाता है और सच कहूं तो खुले शब्दों मेंवैसे तो मैं तेरे सामने ही शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहती लेकिन फिर भी तुझे बताना जरूरी है,,,,, लेकिन मुझे शर्म आ रही है,,,।

(अपनी मां किस तरह की बातों को सुनकर अंकित का दिल जोरो से धड़क रहा था,, अपनी मां की उत्सुकताऔर उसके मुंह से निकला हुआ लंड से अभी तक उसके बदन में उत्तेजना का संचार कर रहा था वह अपने आप को काबू में नहीं कर पा रहा था,,,,लेकिन जिस तरह से उसकी मां बताते हुए रुक गई थी और शरम का जिक्र कर रही थी उसे देखकर अंकित अपनी मां को समझाते हुए बोला,,,

हम दोनों में कैसे शर्म अभी कुछ देर पहले तुम ही तो मुझे समझ रही थीफिर अभी शर्मा क्यों कर रही हो मैं भला किसी और से बताने वाला थोड़ी ना हूं हम दोनों के बीच जो भी बातें हो रही है आपस में राज रहेगी उसके बारे में किसी को भी पता नहीं चलेगा यहां तक की तृप्ति को भी नहीं,,,,

(तृप्ति का जिक्र आते हीसुगंधा के होठों पर मुस्कान आ गई थी क्योंकि जिस तरह से उसका बेटा इस राज को राज रखने के लिए बोल रहा था और अपनी भी बड़ी बहन से भी यह राज राज रखने के बारे में बोल रहा था यह देखकर सुगंध को अच्छा लगा था क्योंकि वह चाहती थी कि जो कुछ भी उसके और उसके बेटे के बीच में बातचीत हो रही है क्रियाकलात हो रही है वह राज्य ही रहे इसके बारे में किसी को भनक तक ना लगे लेकिन अपने ही बेटे के मुंह से इस तरह की बातों को राज रखने के लिए बोलता हुआ सुनकर उसे राहत महसूस हो रही थीऔर जिस तरह से उसका बेटा उत्सुकता दिख रहा था आगे की बात जानने के लिए उसे देखकर सुगंधा भी आतुर थी आगे की बात बताने के लिए इसलिए वह बोली,,)

तू कहता है तो मैं तुझे बता देता हूं लेकिन अपने वादे से मुकरना नहीं यह राज, राज ही रहना चाहिए,,,।

तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मम्मी मैं किसी से कुछ भी नहीं कहूंगा और मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि ईस तरह की बातें किसी से भी बताई नहीं जाती,,,।

बहुत समझदार हो गया है तु,,,, तेरे कहने पर मैं बता रही हूं सच कहूं तो मर्द का लंड तभी खड़ा होता है जब वह पूरी तरह से चोदने के लिए तैयार होता है,,,,।

(इतनी सी बात कहने के लिए सुगंधा के पसीने छूट गए थे और उसकी बुर का पानी भी निकलने लगा वह जानती थी कि अपने बेटे के सामने इस तरह की बातें करने में एक मां के लिए कितनी मस्सकत करनी पड़ती है,,,, यहां तक की अपने संस्कार मर्यादा मां बेटे के बीच के रिश्ते को एक तरफ रख देना पड़ता हैऔर वाकई में इस तरह की बात करते हैं उसकी सांसे ऊपर नीचे हो गई थीऔर यह हालत अंकित की भी थी आज अपनी मां के मुंह से एक औरत और मर्द के बीच के चार दिवारी के अंदर के संबंध को खुले शब्दों में सुनकर अंकित की हालत एकदम से खराब हो गई थी उसके लंड की अकड़ एकदम से बढ़ने लगी थी वह इस कदर उत्तेजित अवस्था में आकर फूल रहा था अंकित को तो इस बात का डर था कि कहीं उसकी नसें फट ना जाए,,,,अपनी मां की बात सुनकर उसके मुंह से कुछ निकल नहीं पाया बस आशचर्य से उसका मुंह खुला का खुला रह गया था वह एक शब्द बोल नहीं पा रहा थाउसकी मां उसकी हालत को अच्छी तरह से समझ सकती थी क्योंकि वह लोहा गरम देखकर हथोड़ा मारी थीवह अच्छी तरह से जानती थी कि एक औरत के मुंह से एक जवान लड़का इस तरह की बातें सुनकर किस तरह से मचल उठेगा किस तरह से उसकी भावनाएं बेकाबू हो उठेंगी वही हालत इस समय अंकित की भी थी,, कुछ पल के लिए दोनों एकदम खामोश हो गए एकदम से खामोशी छा गई लेकिन यह खामोशी एक इशारा था आने वाले बदलाव काक्योंकि अभी बात खत्म नहीं हुई थी रात भी बाकी थी और बात भी बाकी थी,,,,)

सुगंधा के लिए अपने मुंह से लंड शब्द का प्रयोग करनाबेहद असर कारक साबित हो रहा था वह अच्छी तरह से जानती थी कि एक औरत के मुंह से इस तरह की असली शब्दों का प्रयोग करना मर्दों को कितना लुभावना और मदहोश कर देने वाला लगता है इसका असर वह अपने बेटे के चेहरे पर देख रही थी जो कि अपनी मां के मुंह से लंड शब्द सुनकर एकदम मदहोश हुआ जा रहा था,,, वैसे तोअंकित कभी सपने में नहीं सोचा था कि उसकी मां इस तरह से उसके सामनेइस तरह के खुले शब्दों का प्रयोग करेगी एक मर्द के अंगों का नाम लेते समय औरत वाकई में एकदम छिनार लगती है और इस समय अंकित को भी ऐसा ही लग रहा था उसकी आंखों के सामने उसकी मां नहीं बल्कि कोई छिनार औरत बैठी है,,,, कुछ पल की खामोशी दोनों के मन मस्तिष्क को मदहोशी से भर दे रही थी सुगंध तो लंड शब्द का प्रयोग करके ऐसा लग रहा था जैसे सातवें आसमान में पहुंच गई हो,,,,इस तरह के शब्दों का प्रयोग होगा अपने पति के साथ भी कभी नहीं की थी भले ही वह इस लं से दिन रात अपने पति से छोड़ रही थी लेकिन अपने पति का अंग का नाम कभी नहीं ली थी,,।

शायद उसे इसकी कभी जरूरत ही नहीं पड़ी थी लेकिन पति के देहांत के बाद जिस तरह से उसने इतना लंबा समय गुजरा था और अब जाकर उसे एहसास होने लगा था कि औरत का जीवन बिना मर्द के कितना कठिन और निष्प्राण सा हो जाता है,, अब वह उसी निष्प्राण जीवन में मदहोशी का रंग भरना चाहती थी और अब उसे जरूरत पड़ने लगी थी कि अब वह उन्हें मर्दों के अंगों का नाम अपने मुंह से ले जिनके बिना उसका जीवन अब अधूरा सा लगने लगा था अब वह अपने जीवन को उसे अधूरेपन से भर देना चाहती थीइसलिए वह किसी की तरह से अपने बेटे को अपने बस में करना चाहती थीउसे मजबूर कर देना चाहती थी उसके बेटे को कि वह उसके साथ संबंध बनाएं और उसके खाली जीवन को रंगीनियों से भर दे,,,और अपने इस मंजिल को पाने के लिए वह अग्रसर हुए जा रही थी धीरे-धीरे वह इस खेल में आगे बढ़ती चली जा रही थी अभी भी वह अपने बेटे से एक कदम आगे थी,,,क्योंकि अभी तक अंकित अपने तरीके से अपनी तरफ से एक भी हरकत नहीं किया था शुरुआत सुगंधा को ही करना पड़ता था और बाद में अंकित अपनी मां के नक्शे कदम पर आगे बढ़ता था खैर जैसे भी हो सुगंधा को तो अपनी मंजिल तक पहुंचने से मतलब था किसी की तरह से वह रास्ते में आगे बढ़ जाना चाहती थी,,, धीरे-धीरे यह खेल बेहद उत्तेजक और लुभावना होता जा रहा था,,,सुगंधा की नजर अपने बेटे के पेट में मैं तंबू पर थी जिस तरह से उसने मर्द के लंड के खड़े होने का व्याख्यान करी थी इस समय वह व्याख्यान उसके बेटे पर एकदम सटीक लागू हो रहा था,,,लेकिन वह अपने बेटे से यह नहीं कह सकती थी कि तेरा लंड भी बुर में जाने के लिए तड़प रहा है,,, और तेरे पास केवल एक ही बुर उपस्थित है और वह भी तेरी मां की,,, सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि उसके बेटे को इस बारे में बता देना उसकी मंजिल तक पहुंचने की राह को एकदम आसान कर सकती थी,,, लेकिन ऐसा कहना खुले तौर पर उसे छिनार साबित कर सकता था यह भी साबित कर सकता था कि उसकी मां को लंड की जरूरत है इसीलिए अपने बेटे से इस तरह की बातें कर रही है,,, लेकिन अब बाकी भी तो कुछ नहीं रह गया था,,,,।

कुछ देर की खामोशी के बाद,,,, अंकित धीरे से बोला,,,,।

क्या सच में ऐसा होता है,,,,!(अंकित के सवाल में उसका खुद कासपना और भावना दिखाई दे रहा था वह यह सवाल पूछ कर अपने लिए रास्ता चुनना चाहता था वह देखना चाहता था कि उसकी मां क्या कहती है,,, क्योंकि उसे भी इस बात का एहसास था कि उसकी मां भी उसके तंबू की तरह देख रही थी जो कि इस समय पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा हो चुका था,,, अपने बेटे की बात सुनकर गहरी सांस लेते हुए सुगंधा बोली )

ऐसा ही होता है जब जब मर्दों के मन में औरत के प्रति नजदीकी बढ़ने लगती है तो मर्दों की हालत ऐसी ही होती है तभी तो पता चलता है कि मर्द क्या चाहता है,,,,,

लेकिन मुझे तो कभी ऐसा एहसास नहीं हुआ,,,,!

क्योंकि तुम अभी नादान है तुझे औरतों के बारे में नहीं मालूम है,,,,

तब मुझे कैसे पता चलेगा,,,

जब तेरी शादी हो जाएगी एक खूबसूरत सी बीवी आएगी वही तुझे सब कुछ सिखाएगी,,,,,(ऐसा कहते हुए भी सुगंधा का दिल जोरो से धड़क रहा था,, अपनी मां की इस बात पर अंकित अपनी मनोदशा बताना चाहता था कि इस समय उसका भी तो खड़ा हो गया है उसका क्या उपाय है,,, लेकिन ऐसा कहने की उसकी हिम्मत नहीं हुई,,,, सुगंधा ही अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,,,) गंदी कहानी के उसे नायक का भी मन उसकी मां को पेशाब करते हुए देखकर उसे चोदने को कर रहा था,,,,।

तुम्हारे मुंह से इस तरह के शब्द सुनकर मुझे ना जाने क्या हो रहा है,,,।

कौन सा शब्द,,,लंड और चोदना यह वाला शब्द,,,

हां यही वाला पहले तो मैं तुम्हारे मुंह से इस तरह के शब्द कभी नहीं सुना था,,,।

तो पहले हम दोनों के बीच इस तरह के नजदीकी अभी तो नहीं थी हम दोनों अपने मन की बात एक दूसरे को बताते भी तो नहीं थे लेकिन अब माहौल बदल चुका है हालात बदल चुके हैं हम दोनों दोस्त जैसे हो चुके हैं इसलिए अपने मन की बात एक दूसरे को बताना बेहद जरूरी हो चुका है इसलिए मैं तुझे इस शब्दों का प्रयोग करके बोल रही हूं तुझे अच्छा नहीं लग रहा है तो मैं इस तरह का शब्द नहीं बोलूंगी,,,।

नहीं नहीं ऐसा नहीं है,,,खराब नहीं लग रहा है लेकिन सुनकर बदन में झुनझुनी सी होने लगती है।

तेरी बात बिल्कुल सही है बोलते समय मेरी भी हालत थोड़ी खराब हो जा रही है,,,, तू भी तो हम औरतों के अंगों का नाम तो जानता ही होगा,,,।

जानता तो हु लेकिन देखा नहीं हुं,,,,।(अंकित जानबुझ कर झूठ बोल रहा था ऐसा कोई भी औरत काम नहीं था जो उसने अपनी आंखों से ना देखा है,,, और इस बात को उसकी मां की अच्छी तरह से जानती थी बस वह अंजान बनने की कोशिश कर रही थी। इसलिए उसकी मां भी एकदम सहज होते हुए बोली,,)

अच्छा यह बता,,,, इसे क्या कहते हैं,,,(अपने दोनों हथेलियां को अपने दोनों चूचियों के एकदम करीब लाकर गोल स्थिति में दिखाते हुए अपने बेटे से बोली,,,, अपनी मां का इशारा देखकर अंकित की नजर अपनी मां की गोलाकार चूचियों पर स्थिर हो गई,,,उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी मां के सवाल का जवाब कैसे दिन कैसे अपने मुंह से चुची शब्द का प्रयोग करें,,,, फिर भी वह अपनी मां की बात सुनकर बोला,,)

क्या सच में तुम जानना चाहती हो कि मुझे मालूम है कि नहीं,,,,

तो क्या इसलिए तो पूछ रही हूं,,,,

लेकिन अच्छा नहीं लगता इस तरह के शब्दों का प्रयोग करना,,,।

अरे बुद्धू तेरे सामने मैं भी तो लंड और चुदाई जैसे शब्दों का प्रयोग कर रही हूं मैं तुझे पहले ही बता चुकी हूं कि हम दोनों में कोई भी बात छुपी नहीं रहनी चाहिए,,, इसलिए तो मेरे सामने बिल्कुल भी मत शर्मा,,,, और बोल दे जिस शब्द में बोलते हैं,,,(सुगंधा अपने बेटे को उकसा रही थीक्योंकि जानती थी कि इसी तरह से उसका बेटा उसके सामने एकदम से खुल जाएगा और फिर दोनों एकाकार हो जाएंगे,,,, अंकित अपनी मां की बात सुनकर बेहद प्रसन्न हो रहा थाउसे इस तरह की बातें और वह भी अपनी मां से करने में बहुत अच्छा लग रहा था और वह भी अपनी मां की तरह ही इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि इस तरह की बातें ही उन दोनों के बीच की मर्यादा की दीवार को तोड़ सकती है इसलिए वह भी अब शर्म नहीं करना चाहता था और अपनी मां की चूचियों की तरफ देखते हुए बोला,,,)

चचचच,,,चुची,,,,,, कहते हैं इसे,,,,,

अरे वह तू तो बहुत समझदार निकला,,,,,(अपने बेटे की बातों पर हंसते हुए वह बोली क्योंकि वह घबराहट भरे स्वर में बोला था और फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) लेकिन तु इतना घबरा क्यों रहा है,,, ऐसा लग रहा है कि जैसे भूत देख लिया हो,,, अच्छा चल पहली परीक्षा में तो तू पास हो गया,,,, अब यह बता,,,,इसे,,(उंगली से अपनी नाक की तरफ इशारा करते हुए) क्या कहते हैं,,

नाक,,,,,

और इसे,,,(अपनी आंख की तरफ इशारा करके)

आंख कहते हैं,,,,,

और इसे,,,(अपने गाल को अपनी उंगलियों से हल्के से सहलाते हुए)

गाल,,,,,,

औ,,,,,,र,,,,, इसे,,,(एकदम से अपने दोनों टांग फैला कर अपनी साड़ी के पल्लू को अपने चिकनी और सपाट पेट से हटाते हुए ) क्या कहते हैं,,,,

नाभि,,,,,, इसे नाभि कहते हैं,,,,,,(अपनी मां की हरकत पर अंकित पूरी तरह से उत्तेजित हुआ जा रहा था और वह जिस तरह से बड़ी उत्सुकता से उसे अपने अंग इशारे को दिखाकर उससे पूछ रही थी यह देखकर अंकित का दील जोरों से धड़क रहा था और उसके मन में कैसा हो रहा था कि कहीं ऐसा ना हो कि उसकी मां साड़ी उठाकर अपनी बुर दिखा दे और पूछे यह क्या है,,,,ऐसा सोचकर ही अंकित मदहोश हुआ जा रहा था और उसके लंड की हालत खराब होती जा रही थी,,,, अपने बेटे का जवाब सुनकर सुगंधा मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

अरे वह अंकित तू तो औरत के अंगों के बारे में बहुत कुछ जानता है मुझे तो लग रहा था कि तू इसके बारे में नहीं बता पाएगा,,,।

क्यों नहीं बता पाऊंगा आखिरकार टीचर का बेटा जो हूं,,,।

यह बात तो है,,,, धीरे-धीरे तू पास होता चला जा रहा है,,,,, अच्छा यह बता,,,,इसे,,,,(अपनी कमर पर हथेली रखते हुए) क्या कहते हैं,,,

कमर,,,,,,,,,, कहते हैं,,,(ऐसा कहते हुए अंकित जानबूझकर अपने पेंट में बने तंबू पर हाथ रखकर उसे व्यवस्थित करने की कोशिश करने लगा औरतुरंत वहां से हाथ हटा भी लिया वह सिर्फ अपनी मां का ध्यान वहां पर लाना चाहता था और ऐसा हुआ भी उसकी मां का ध्यान अपने बेटे के तंबू पर चला गया और मन ही मन वह मदहोश होने लगी,,सुगंधा अपने बेटे की हरकत और उसके जवाब से काफी प्रभावित हो रही थी लेकिन उसके मन में भी आगे की जो प्रक्रिया चल रही थी उसे सोचकर ही उसकी बुर पानी छोड़ रही थी,,,, और यही हाल अंकित का भी था धीरे-धीरे उसकी मां अंगों का नाम पूछते हुए अपने बदन के नीचे पहुंचती चली जा रही थी,,,,,सुगंधा कुछ देर तक अपने बेटे को देखते रही उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था और फिर एकदम से वह धीरे से पलट गई और पेट के बल लेट कर अंकित की तरफ देखते हुए मुस्कुराने लगी और आंख के इशारे से ही अपने नितंबों की तरफ देखते हुए अंकित से बोली,,,)

अब बता इसे क्या कहते हैं,,,,,?

(अपनी मां की कामुक हरकतों से अंकित काफी प्रभावित हुआ जा रहा था इस समय उसकी मां गंदी फिल्म की कोई बेहद खूबसूरत हीरोइन लग रही थी जो अपनी हरकतों से हीरो को रीझा रही थी,,,जिस तरह से सुगंधा ने आंख के इशारे से अपने नितंबों के बारे में पूछी थी उसे देखते हुए अंकित का दिल तड़प रहा था और उसके मन में हो रहा था,,,काश उसकी मां की है सवाल अपनी साड़ी कमर तक उठाकर अपनी बड़ी-बड़ी गांड दिखाते हुए पूछती तो सवाल का जवाब देने में मजा ही आ जाता,,,, फिर भी गरम आहें भरते हुए वह एकदम ठंडे लहजे में अपनी मां की गांड की तरफ देखते हुए बोला,,,)

तुम्हारे इस बड़े-बड़े खूबसूरत अंग को,,,गांड,, कहते हैं,,,,,,।

अरे वाह मैं तो तुझे बेवकूफ समझती थी लेकिन तु तो एकदम होशियार निकला,,,,(एकदम प्रसन्न होते हुए सुगंधा बोली और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,)तुझे मालूम है इसे शुद्ध हिंदी में क्या बोला जाता है यह तो सिर्फ आपस में बोलने चालने की भाषा में बोलते हैं,,,, शुद्ध हिंदी में बता क्या बोलते हैं,,,,?

हिंदी में,,,(अपनी मां की गांड की तरफ देखते हुए अपने दिमाग पर जोर लगाते होवह सोचने लगा था लेकिन सोचते हुए भी वह अपने मन में यही सोच रहा था किचाहे से कुछ भी बोलते हो लेकिन मार दो के बड़े काम की चीज है यह प्यार करने में और गांड मारने में दोनों में मजा आता है,,,, कुछ देर तक सोचने के बाद उसे समझ में नहीं आया तो अपनी मां से बोला,,,)मुझे तो कुछ याद नहीं आ रहा है कि इस शुद्ध हिंदी में क्या बोला जाता है जो कुछ भी सुना था वह मैंने बता दिया और यही शब्द का प्रयोग सब करते हैं,,,

यह तो मुझे भी मालूम है कि सभी लोग इसी शब्द का प्रयोग करते हैं लेकिन शुद्ध हिंदी में इसे क्या कहते हैं तुझे नहीं मालूम,,,,?

नहीं,,,,

शुद्ध हिंदी में इसे नितंब कहते हैं,,,,,।

नितंब,,,,,,,, वाह यह तो बहुत खूबसूरत शब्द हैबोलने से ही आवाज हो रहा है कि जैसे किसी गोल गोल बड़ी-बड़ी चीज के लिए बोला जा रहा है,,,,,

हां तो सही कह रहा है इन शब्दों में ही इस अंग का आभास हो जाता है,,,,।

लेकिन मम्मी सही कहूं तो गांड शब्द बोलने में ही ज्यादा मजा आता है,,,।

बात तो तेरी सही हैबोलने में गांड सबसे ज्यादा अच्छा और आकर्षक लगता है वह तो किताब में लिखने के लिए नितंब शब्द का प्रयोग किया जाता है ताकि भद्दा ना लगे,,,,,,।

लेकिन जिस किताब के बारे में हम लोग बात कर रहे हैं उसमें तो कहानी का नायक अपनी मां के पिछवाड़े को देखकर गांड शब्द का ही प्रयोग किया था,,,।

हां तो वह तो गंदी किताब थी ना,,, गंदी कहानी की गंदी किताब तभी तो उसमें नायक औरत और उसके खुद के अंग के बारे में खुलकर बोला था दूसरे शब्दों का प्रयोग नहीं किया था,,,,।

ओहहह यह बात है,,,,लेकिन सच कहूं तो शुद्ध हिंदी का प्रयोग करने में कुछ मजा नहीं आता जैसे कि अगर मुझे तुम्हारे इसकी,,,(अपनी मां की गांड की तरफउंगली से इशारा करती है जो कि अभी भी सुगंधा इस स्थिति में लेटी हुई थी और अपने पैर को हीला रही थी ताकि उसके भारी भरकम गांड में थिरकन हो,,,,, और ऐसा हो भी रहा था) तारीफ करना हो तो सोचो शुद्ध हिंदी में मैं कैसे कहूंगा,,,,

कैसे कहेगा,,,?

कि तुम्हारे नितंब पर कितने खूबसूरत हैं,,,, सोचो इस तरह से तारीफ करना तुम्हें भी अच्छा लगेगा क्या,,,?

(अपने बेटे की बातें सुनकर सुगंधा हंसने लगीवह अपनी हंसी को रोक नहीं पाई और कुछ देर तक इस तरह से हस्ती रहे और उसके हंसने के साथ उसकी गांड कुछ ज्यादा हिल रही थीऔर अपनी मां की हिलती भी गांड को देखकर अंकित के मन में हो रहा था किसी से मैं अपने दोनों हाथों से अपनी मां की गांड पकड़ ले और उसमें नाक लगाकर उसकी खुशबू को अपने सीने में उतार लेलेकिन किसी तरह से वह अपनी भावनाओं पर काबू की है बैठ रहा और अपनी मां को हंसते हुए देखता रहा जब वह खामोश हुई तो वह खुद ही बोली,,,)

बात तो सही कह रहा है सच में थोड़ा अजीब लग रहा है और अच्छा यह बात की तुझे सामान्य शब्दों में तारीफ करना हो तो कैसे कहेगा,,,,

तब तो बहुत आसान है एकदम साधारण भाषा में तुम्हारी गांड कितनी खूबसूरत है सोचो नितंब की जगह गांड खाने में कितना मजा आता है और सुनने वाले को भी एकदम गदगद हो जाता है तुम्हें कैसा लगा बताओ सुनकर,,,,

मुझे भी अच्छा ही लगा तेरी बात में दम है,,, सामान्य भाषा का प्रयोग जगह-जगह पर करते रहना चाहिए वरना तारीफ में मजा नहीं आती,,,,(इतना कहकर वह फिर से उठ कर बैठ गई और एकदम सामान्य हो गईअपने बाल को जो उसके गाल पर आ रहे थे उसे अपनी उंगली का सहारा देकर वापस अपने कान के पीछे ले गईशीतल हवा बह रही थी जो गर्मी में ठंडक प्रदान कर रहा था और इस समय दोनों मां बेटे को छत पर बहुत ही राहत महसूस हो रही थी लेकिन जिस तरह की वार्तालाप दोनों के बीच हो रही थी उस दोनों के बदन में एक अजीब सी गर्मी छाई हुई थी,,,, अपने आप को सामान्य करके सुगंधा फिर से अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)अच्छा धीरे-धीरे तू सारी परीक्षा में पास होता चला जा रहा है औरतों के अंगों के बारे में तुझे अच्छा ज्ञान है अब आखरी बार और आखिरी अंग के बारे में तुझसे पूछती हुं,,,,।

(अंकित का तो सुनकर ही लंड फटने को तैयार हो गया था,,,क्योंकि वह अपनी मां के कहने का मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था वह जानता था कि उसकी मां आखिरी अंग के बारे में बोल रही है और वह आखिरी अंग कौन सा है,,,,अपनी मां की बातें सुनकर उसके मन में एक जिज्ञासा और एक आशा सी जलने लगी थी उसे ऐसा लग रहा था कि उसकी मां अपनी साड़ी उठाकर उसे अपनी बुर दिखाते हुए पुछेगी की यह क्या क्या है,,,,,और इसके लिए वह अपने आप को तैयार करना था हमसे इस बात का डर था कि कहीं उसकी मां सच में ऐसा कर दी तो कहीं जिस तरह से वह उत्तेजना का अनुभव कर रहा है कहीं अपनी मां की कचोरी जैसी फुली हुई बुर को देख कर उसके लंड से पानी का फव्वारा ना फूट पड़े,,,, और बड़ी उत्सुकता के साथ गहरी सांस लेते हुए वह अपनी मां से बोला,,,)

पूछो कौन से अंग के बारे में पूछना चाहती हो,,,

अरे वाहइतने हाथ में विश्वास के साथ बोलते इशारा है कि जैसे एकदम खिलाड़ी बन चुका है औरतों के मामले में,,,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर अंकित अपने मन में ही बोला ,,,पूरी तरह से खिलाड़ी तो नहीं लेकिन एक अच्छा खिलाड़ी जरूर बन चुका हूं क्योंकि अभी तक मैं तुम्हारी मां की भी चुदाई कर चुका हूं और पड़ोस वाली सुषमा आंटी की भी दोनों की चुदाई करके मुझे इतना तो आत्म विश्वास हो चुका है कि अगर मैं एक बार तुम्हारी बुर में लंड डालकर बिना तुम्हें मस्त के बाहर नहीं निकालुगा,,, बस एक बार डालने का मौका तो दो,,,, इतना अपने मन में ही बोलकर वह एकदम सहज होते हुए बोला,,,)

नहीं नहीं ऐसी बात नहीं हैलेकिन जिस तरह से अभी तक बताते आ रहा हूं आगे भी बता दूंगा इतना तो मुझे विश्वास है,,,।

अच्छा तो तुझे अपने आप पर पूरा विश्वास है तो बता,,,,(साड़ी में ही अपनी दोनों टांग खोलकर हालांकि साड़ी कोसुगंधा ने ना तो अपने ऊपर तक खींची थी और ना ही हल्के से भी उसे हटा रही थी बस एक इशारा भर अपने बेटे के सामने की थी और अपने दोनों हाथ की उंगलियों को अपने दोनों टांगों के बीच दिखाते हुए) इसे क्या बोलते हैं जिससे पेशाब किया जाता है,,,,,.?

(इस सवाल का जवाब देने में अंकित की हालत खराब हो रही थी अपनी मां के सामने बुर शब्द का प्रयोग करने में उसके पसीने छूट रहे थे हालांकि वह अपनी मां के सामने इस शब्द का प्रयोग करने के लिए उत्सुक भी था,,,,वह अपनी मां की दोनों टांगों के पीछे देख रहा था हालांकि साड़ी में होने की वजह से उसे कुछ नजर तो नहीं आ रहा था लेकिन कल्पना में उसे सब कुछ नजर आ रहा था क्योंकि वह पहले भी अपनी मां की बुर को देख चुका था वह जानता था कि उसकी मां की कचोरी जैसी फुली हुई बुर कितनी खूबसूरत दिखती है,,,, अपने बेटे को अपनी दोनों टांगों के बीच देखता हुआ पाकर सुगंधा के तन बदन में हलचल सी मच रही थी,,,, अपने बेटे की प्यासी नजरों को देखकर उसके मन में भी हो रहा था कि इस समय अपनी साड़ी कमर तक उठाकर अपने बेटे को जी भर कर अपनी बुर के दर्शन कर दे,,,, लेकिन इतना कुछ हो जाने के बावजूद भी उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी वह बस उसी तरह से बैठी रह गई लेकिन अपने बेटे को खामोश देखकर वह फिर से बोली,,,)

क्यों क्या हुआ बोलती बंद हो गई मुझे मालूम था इसके बारे में तुझे नहीं मालूम होगा कि इसे क्या कहते हैं,,,,

मालूम है लेकिन बोलने में शर्म आ रही है,,,

आप क्यों बोलने में शर्म आ रही है चुची गांड सब कुछ तो बोल चुका,,, फिर इसे भी बता दे क्या कहते हैं,,,,, घबरा मत शर्मा मत मैं तुझे कुछ बोलने वाली नहीं हूं यह तो सामान्य ज्ञान है,,,,,

बता दुं,,,,,

मालूम है तो बता दे,,,,

बबबबब,,,,,बुर कहते हैं इसको,,,(अपनी मां की दोनों टांगों के बीच देखता हुआ और बुर की कल्पना करते हुए बोला,,,, अपने बेटे के मुंह से बुर शब्द सुनकर सुगंध एकदम से गदगद हो गई,,,, वह प्यासी नजर से अपने बेटे की तरफ देखना और उसे देखते हुए बोली,,,)

हाय दईया तुझे तो यह भी पता है लेकिन तू एक बात झूठ बोल रहा है,,,,

कौन सी बात ,,,,,

यही कि तू देखा नहीं है बस नाम जानता है,,,,

हा तो में सच कह रहा हूं देखा नहीं हूं बस नाम जानता हूं,,,,

तो अभी भी झूठ बोल रहा है याद है जब मेरी तबीयत खराब हुई थी तु मुझे डॉक्टर के पास लेकर गया था और वहां पर यूरिन टेस्ट के लिए बाथरुम में तू ही मुझे लेकर गया था,,, याद है तुझे की सब कुछ मैं बताऊं तू ही तो मुझे सब कुछ बताया था,,,बुखार इतना तेज था कि मुझे कुछ पता नहीं चल रहा था यूरिन टेस्ट के लिए और तू ही मेरी साड़ी कमर तक उठाकर मेरी पैंटी को नीचे सरकाया था और जांच के लिए दी गई परखनली को मेरी बुर से सटाकर,,, मुझे मुतने के लिए बोला था,,,, याद है कि नहीं,,,,(सुगंधा अपने बेटे की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोली और अपनी मां की बातें सुनकर अंकित भी मुस्कुरा रहा था क्योंकि उसकी मां सच कह रही थीअपने बेटे को मुस्कुराते हुए देखकर करवा अपनी बात को आगे बढाते हुए बोली,,,,,)बेवकूफ बना रहा था ना सब कुछ देखने के बाद भी बोलता है कि मैं कुछ देखा नहीं हूं बस जानता हूं,,,

क्या मम्मी तुम भी पहले उस समय के हालात तो देखो तुम कितनी बीमार थी उसे समय कुछ दूसरा सुझ नहीं रहा थातुम ठीक से चल नहीं पा रही थी बोल नहीं पा रही थी तुम्हें खुद होश नहीं था जैसे तैसे करके मैं तुम्हारा यूरिन का सैंपल लिया था पता है।

तो यूरिन का सैंपल लेते हुए तूने मेरी बुर नहीं देखा था,,,।

(सुगंधा उत्तेजित अवस्था में एकदम से छीनरपन पर उतर आई थी,,,, और अपनी मां की छीनरई देखकर अंकित का लंड पूरी तरह से गदर मचाने के लिए तैयार हो गया था,,,, पल भर के लिए उसका मन कर रहा था ईसी समय चटाई पर लेटा कर पैलाई कर दुं,,,,उत्तेजित अवस्था में इसका गला सूख रहा था और अपने सूखे हुए गले को अपने थूक से गिला करते हुए वह बोला,,,)

देखा तो था लेकिन उस समय मेरे मन में कुछ चल नहीं रहा था इसलिए उसका आकार मुझे ठीक से पता नहीं है,,,,,।

ओहहहहह यह बात है,,,,,।

(सुगंधा इतना तो जानती थी कि उसका बेटा सरासर झूठ बोल रहा है जाने अनजाने में वह अपना सब कुछ अपने बेटे को दिखा चुकी थी यहां तक कि उसेअच्छी तरह से मालूम था कि जब वह कमरे में नंगी होकर लेटी हुई थी तब उसका बेटा कमरे में उसे जगाने के लिए आया था और उसे नंगी देखकर उसकी गुलाबी बर को देखकर वह अपने आप को रोक नहीं पाया था और अपने होठों से उसकी बुर को चाटा भी था.. उसे हर एक रुप में देख चुका था। और आनंद भी ले चुका था,,,,,, सुगंधा को सबकुछ पता था,,, लेकिन वह कुछ बोल नहीं रही थी क्योंकि आप उसे मजा आ रहा था धीरे-धीरे बात को बाहर निकालने में आधी रात हो चुकी थी अभी आधी रात बाकी थी और ऐसा लग रहा था कि दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला होने वाला नहीं है अभी भी बहुत कुछ था दोनों के मन में,,,,)

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