यह कहानी तब शुरू हुई जब मैंने दिल्ली की एक डीडीए कॉलोनी में किराए पर ग्राउंड फ्लोर पर फ्लैट लिया। उसी समय मेरा तबादला लखनऊ से दिल्ली हुआ था। मैं एक आंतरराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करता था। जब मैंने पहली बार उस फ्लैट को देखा और मालिक मकान से किराया बगैरह तय किया तब मेरी मुलाक़ात हमारे होनेवाले पडोसी सेठी साहब और उनकी पत्नी सुषमा से हुई।
उस समय उन दोनों से मिलकर मुझे बड़ा ही अपनापन महसूस हुआ। सेठी साहब का नाम था सतीश सेठी। वह पंजाबी थे पर उनका जनम और परवरिश ओडिशा में ही हुई थी। सेठी साहब की करीब एक साल पहले दिल्ली में नौकरी लग गयी थी। वह एक अर्ध सरकारी यात्रा कंपनी में मैनेजर थे। कंपनी में उनका बड़ा ओहदा और रुसूख़ था। उनके घर बाहर पार्किंग में हमेशा एक दो लक्ज़री कारें खड़ी होती थीं।
सेठी साहब का फ्लैट हमारे बिलकुल सामने वाले ब्लॉक में था। हमारे दोनों के फ्लैट ग्राउंड फ्लोर पर ही थे। दोनों फ्लैट के बिच का फासला कुछ पच्चीस तीस कदम होगा।
सेठी साहब और उनकी पत्नी सुषमा के व्यवहार में एक अद्भुत सा अपनापन था जो मैंने बहुत ही कम लोगों में देखा था। एक ही पंक्ति में कहूं तो वह दोनों पति पत्नी जरुरत से ज्यादा भले इंसान थे। फ्लैट का कब्जा लेते समय सेठी साहब ने मुझे कहा की अगर मैं उनको घर की चाभी दे दूंगा तो वह हमारे आ जाने से पहले घर में साफसूफ बगैरह करवाकर रखेंगे। मैंने फ़ौरन उनको घर की चाभी देदी और उनका फ़ोन नंबर ले लिया। वापस लखनऊ जा कर मैंने उन्हें हमारे दिल्ली पहुँचने का दिन और अंदाजे से समय भी बता दिया।
हम (मैं, मेरी पत्नी टीना और मेरा छोटा बेटा) लखनऊ से सुबह निकल कर करीब शाम को चार बजे दिल्ली हमारे फ्लैट पर पहुंचे। फ्लैट पर पहुंच कर जब हमने चाभी लेकर घर खोला तो घर एकदम साफ़ सुथरा पाया। हमारा घर गृहस्थी का सामान उसी दिन सुबह ही ट्रक में दिल्ली पहुँच चुका था। सेठी साहब ने पहले से ही दो मजदूरों का प्रावधान कर वह सामान को ट्रक में से निकलवाकर घर में रख रखा था।
हम से बात करके ट्रक का बचा हुआ किराया भी उन्होंने अपनी जेब से चुकता कर दिया था। यह एक अनहोनी घटना थी। कोई पडोसी आजकल के जमाने इतना कुछ करता है क्या? हमें वहाँ पहुँच कर बस अपना सामन खोल कर घर को सजाना ही था। हमारी पड़ोसन श्रीमती सुषमा सेठी वहाँ पहुंची और मेरी पत्नी टीना से मिली और उन्होंने अपना परिचय दिया। साथ में ही उन्होंने हमारे लिए नाश्ता, रात के डिनर का और एक कामवाली का भी प्रबंध कर दिया था।
टीना तो उनके इस उपकार से बड़ी ही कृतज्ञ महसूस करने लगी। शाम को करीब साढ़े सात बजे जब हम दो कमरों को पूरी तरह सजा कर घर में कुछ देर विश्राम कर रहे थे तब सेठी साहब हमारे घर हमें भोजन के लिए बुलाने आ पहुंचे।
सेठी साहब अच्छे खासे हैंडसम और ऊँचे तगड़े नौजवान थे। वह हर हफ्ते शनिवार और इतवार को जरूर जिम में आधे घंटे से एक घंटे तक कसरत करते थे जिसके कारण उनके कंधे, छाती, बाजू, पेट, जाँघें, आदि सख्त और मांसल थे। सेठी साहब ने अपनी डिग्री के अलावा फ़िजिओथेरपी में भी डिप्लोमा कर रखा था। वह कुछ समय के लिए फिजियोथेरपी की प्रैक्टिस भी करते थे। उन्हें दुर्गा माँ में अटूट श्रद्धा थी और वह हर साल एक बार वैष्णोदेवी की यात्रा जरूर करते थे।
उस समय दिल्ली में एक यात्रा कंपनी में सेठी साहब काफी जिम्मेवार ओहदे पर थे और स्वभावतः गंभीर लगते थे। पर जैसे उनसे परिचय और करीबियां बढ़ीं तब मुझे लगने लगा की उनमें भी बचपन की चंचलता और जवानी का जोश काफी मात्रा में था जो सेठी साहब आसानी से नहीं उजागर होने देते थे। यह मेरी नज़रों से नहीं छिप पाया की मेरी कमनीय पत्नी टीना को पहली बार देखते ही उनकी नजरें मेरी पत्नी के बदन का मुआइना करते हुए टीना की छाती पर एक पल के लिए जैसे थम सी गयीं। पर फ़ौरन औचित्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपनी नजरें निचीं कर लीं और हम औपचारिक बातों में जुट गए। मेरी चालाक बाज शिकारी जैसी पैनी नजर ने वह एक पल के सेठी साहब के मन के भाव भाँप ने में देर नहीं की।
पहले दिन से ही मैंने सेठी साहब की आँखों में जो भाव देखे तो मैं समझ गया की टीना उनको भा गयी थी। जैसे जैसे बादमें परिचय बढ़ता गया और एक दूसरे से नजदीकियां बढ़ने लगीं और औपचारिकतायें कम होती गयी वैसे वैसे मेरा यह विचार दृढ होता गया। मौक़ा मिलते ही सेठी साहब जिस तरह चोरी छिपी कुछ पल के लिए टीना के पुरे बदन पर नजरें घुमा कर देख लेते थे, लगता था शायद वह टीना को अपनी आँखों से ही कपडे उतार कर नंगी देख रहे हों।
टीना भी शायद सेठी साहब की आँखों के भाव समझ गयी होंगी। पर सेठी साहब ने कभी भी टीना को अपनी नजर या व्यवहार से शिकायत का कोई अवसर नहीं दिया। और फिर वैसे भी उससे पहले करीब करीब हर मर्द से सेठी साहब से कहीं ज्यादा बीभत्स नज़रों की टीना को आदत हो चुकी थी। सेठी साहब के मीठे और प्यार भरे वर्तन के कारण टीना भी शायद उनकी सराहना भरी नजर से नाराज होने के बजाय उन्हें पसंद करने लगी थी।
उस रात को जब हम सेठी साहब के वहाँ से डिनर कर वापस आये तब मैंने चुटकी लेते हुए टीना से कहा, “सेठी साहब वैसे तो बहुत ही भले इंसान हैं पर मुझे लगता है अपने जमाने में वह काफी रोमांटिक रहे होंगे। ख़ास कर तुम पर ख़ास मेहरबान लगते हैं। जब भी मौक़ा मिलता है तुम्हें ध्यान से देखना नहीं चूकते।”
मेरा कटाक्ष समझने में मेरी पत्नी को ज़रा भी देर ना लगी। टीना ने तपाक से पलटवार करते हुए कहा, “क्यों नहीं? अरे सेठी साहब जरूर मुझे देखते हैं, पर तुम क्या करते हो? मैं देख रही थी की तुम तो बेशर्मों की तरह सुषमाजी को घूरने से बाज ही नहीं आते। जहां तक सेठी साहब का सवाल है, बेचारे नजरें चुरा कर ही देखते ही हैं, तुम्हारी तरह बेशर्म बनकर आँखें फाड़ फाड़ कर वह मेरी नंगी कमर के निचे तो नहीं घूरते। और फिर मैं तो इतना जानती हूँ की आज एक ही दिन में हमारा घर उन्हीं के कारण सेट हो गया। शादी के बाद अभी तक हमारी इतनी ट्रांसफर हुई, पर क्या ऐसा कभी हुआ है की हमारा घर पहले ही दिन सेट हो गया और हमें कोई परेशानी भी नहीं हुई?”
टीना ने तो मेरी बोलती ही बंद कर दी। एक ही झटके में उसने मुझे दो नसीहत दी। पहली यह की मैं सेठी साहब के बारे में उलटी सीधी टिपण्णी ना करूँ और दूसरे यह की उसने मेरा सुषमा को ताड़ना पकड़ लिया था। यह सच था की सुषमाजी ने पहली नजर में ही मुझे घायल कर दिया था।
ना चाहते हुए भी मैं उनकी साड़ी ब्लाउज के बिच के नंगे हिस्से को घूर कर देखे बिना रह नहीं सकता था। बार बार मेरी नजर वहाँ जाती और मन में यह इच्छा होती की काश उनकी साड़ी जो नाभि के काफी निचे तक पहनी हुई थी, थोड़ी निचे की और खिसके। यह बात बीबियों से कहाँ छिपती हैं? जब कोई खूबसूरत औरत आसपास हो तो वह तो अपने पति की नजर पर कड़ी निगरानी रखती हैं।
वह बात वैसे तो वही ख़तम हो गयी, पर वास्तव में हमारी पहली रोमांटिक अंदाज वाली बात वहाँ से
शुरू हुईं।
मेरी बीबी टीना करीब ३२ साल की थी। उसकी जवानी पूरी खिली हुई थी। उसके काले घुंघराले लम्बे बालों की लट उसके कानों पर लटकती हुई उसकी खूबसूरती में चारचाँद लगा देती थी। टीना के खूबसूरत स्तनमंडल उसके ब्लाउज में समा नहीं पा रहे थे। स्तनोँ का काफी उभरा हुआ हिस्सा गर्दन के निचे से दिखता था जिसे टीना सलवार या पल्लू से ढकने की नाकाम कोशिश करती रहती थी।
टीना की कमर बड़ी ही लुभावनी लगती थी। ख़ास कर उसकी नाभि के आसपास का उतार चढ़ाव। साडी नाभि से काफी नीची पहनने के कारण टीना की नाभि के निचे का उभार और फिर एकदम ढलाव जो दिखता था वह गजब का होता था। टीना बिलकुल सही कद की थी। ना उसका जीरो फिगर था ना ही वह तंदुरस्त लगती थी। टीना के कूल्हे काफी आकर्षक थे। गोल माँसल थे पर ज्यादा भी उभरे हुए नहीं की भद्दे लगे।
सेठी साहब की पत्नी सुषमा टीना से थोड़ी कम लम्बाई की थी पर नाक नक़्शे में वह टीना से बिलकुल कम नहीं थी। थोड़ी कम ऊंचाई के कारण वह उम्र में भी एकदम छोटी लगती थी। सुषमा का चेहरा भी जिसे बेबी डॉल कहते हैं, ऐसा था। बदन पतला पर स्तन भरे हुए, कमर पतली पर कूल्हे आकर्षक, धनुष्य से लाल होंठ, लम्बी, गर्दन और पतली मांसल जांघें, किसी भी मर्द की की नजर में देखते ही समा जाती थीं। सुषमाजी की बोली मीठी थी। कभी हमने उनको किसी की निंदा करते हुए या इधर उधर की बात करते हुए नहीं सुना। पर हाँ, वह कोई लागलपेट के बिना एकदम सीधा बोलती थी।
अगर उनको कुछ कहना है तो वह साफ़ साफ़ बहुत ही सीधी पर शिष्ट भाषा में बोल देती थी। पहली बार ही जब मैंने सुषमा को देखा तो मुझे अनायास ही सेठी साहब से मन ही मन इर्षा होने लगी। ऐसी नक्शेकारी की मूरत जिसके साथ रोज सोती हो वह मर्द तक़दीर वाला ही कहलायेगा।
वैसे ही दिन बीतते गए और सेठी साहब और सुषमा के साथ हमारे रिश्ते दिन ब दिन करीबी होते चले गए। मेरी नौकरी में मुझे काफी टूर करना पड़ता था। मैं महीने में कई दिन घर से दूर रहता था। टीना को जब भी कोई समस्या होती या काम होता और सेठी साहब को पता लगता तो बगैर समय गँवाए सेठी साहब फ़ौरन उसे हल कर देते।
मध्यम वर्ग और सिमित आय वाली गृहिणीं को रोज कई समस्याओं से झूझना पड़ता है। पानी, दूध, गैस, बिजली, कामवाली, सफाई, बच्चे, स्कूल, और पता नहीं क्या क्या नयी नयी समस्याएं रोज होती हैं। अगर कोई इन्हें भाग कर सुलझाले तो जिंदगी काफी आसान हो जाती है। टीना सेठी साहब के ऐसे व्यवहार से उनकी कायल हो गयी। जब कोई कामाकर्षक मर्द आपके लिए इतना सब कुछ ख़ुशी ख़ुशी करे तो कोई भी औरत उस मर्द की लोलुप नजरों को बुरा नहीं मानती।
सुषमा और सेठी साहब का स्वभाव ही कुछ ऐसा था की हम चाहते हुए भी उनसे अछूते नहीं रह सकते थे। उनकी रसोई में अगर कुछ भी नयी वानगी बनी तो सुषमाजी जरूर एक छोटे से पतीले में वह हमें भिजवातीं। वैसे ही टीना भी करती। सेठी साहब और सुषमा हमारे पडोसी नहीं एक तरह से फॅमिली जैसे ही बन गए। कई बार उनका लंच या डिनर हमारे यहां होता तो कभी हम उनके यहाँ लंच या डिनर कर लेते। जब मैं घर पर होता था तो मैं और सेठी साहब अक्सर ड्रिंक हफ्ते में एक बार जरूर साथ में बैठ कर करते। या तो हमारे घर या फिर उनके घर।
मैं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बड़ा ही शौक़ीन हूँ। मेरे घर में दीवारों पर कई जानेमाने शास्त्रीय संगीत के उस्तादों की तस्वीर देख कर एक दिन सुषमाजी काफी उत्तेजित हो कर मुझसे शास्त्रीय संगीत के बारे में पूछने लगीं। सुषमाजीका पूरा खानदान शास्त्रीय संगीत में रचापचा था। सुषमा के पिता शास्त्रीय संगीत के जाने माने गायक थे। उनके खानदान में कई बड़े कलाकार हुए थे।
उस दिन हम करीब एक घंटे तक टीना और सेठी साहब से अलग बैठ कर शास्त्रीय संगीत के बारे में चर्चा करते रहे। सुषमाजी शास्त्रीय संगीत में मेरी रूचि देख कर और मेरी बातें सुन कर इतनी खुश हो गयीं की उन्होंने मुझसे वादा किया की अगर मौक़ा मिला तो वह मुझे एक दिन उनके मायके जरूर ले जायेगी और उनके पापा, चाचा बगैरह से मिलवायेगीं। टीना ने बिज़नेस मैनेजमेंट किया था, सो उस समय दरम्यान टीना भी सेठी साहब के साथ बैठ कर बिज़नेस और फाइनांस के बारे में बात करती रही।
कई बार मैं कुछ ना कुछ बहाना कर सेठी साहब के घर चला जाता और अगर सेठी साहब ना होते तो सुषमा के साथ गपशप मारने की कोशिश करता रहता। सुषमा मेरी नियत से वाकिफ थीं या नहीं, मुझे नहीं पता; पर जब भी मैं जाता था तब सुषमाजी भी कामकाज छोड़कर मुझसे बात करने बैठ जाती और हमारी बातें चलती रहतीं। सुषमाजी मेरी लोलुप नज़रों का जवाब हँस कर देतीं। मुझे पूरा सपोर्ट देतीं।
जब भी मैं सुषमाजी को ताड़ते हुए पकड़ा जाता तो सुषमाजी ही उसे कुछ शरारत भरी मुस्कान दे कर नजर अंदाज कर देतीं। इससे मेरे मन में कई बार विचार आया की क्यों नहीं इस बात को आगे बढ़ाया जाए। मैं और आगे बढ़ने से झिझकता था क्यूंकि मुझे पक्का भरोसा नहीं था की अगर मैंने कुछ आगे कदम बढ़ाया तो कहीं सुषमाजी या सेठी साहब बुरा ना मानें और हमारे संबंधों में कोई दरार ना पैदा हो।
एक बार मैं वैसे ही एक छुट्टी के दिन सुबह कुछ जल्दी उठ गया। मौसम सुहाना था सो मैं बाहर ताज़ी हवा खाने निकला। सुबह होने में थोड़ा वक्त था। मैंने देखा की सेठी साहब के ड्रॉइंग रूम की बत्तियां जल रहीं थीं। उसके अगले दिन ही सुषमाजी उनके ताऊ के घर गयीं थीं। सुषमाजी के ताऊजी और बुआ दिल्ली में ही रहते थे। महीने दो महीने में एकाध बार सुषमाजी उनसे मिलने चली जातीं थीं।
उस दिन सेठी साहब घर में अकेले ही थे। मैं उनके घर के नजदीक पहुंचा तो सूना की अंदर से कुछ आवाजें आ रही थीं। मैंने उत्सुकता से सेठी साहब के घर की घंटी बजाई। पर शायद बेल काम नहीं कर रही थी। मैंने दरवाजे को धक्का मारा तो पाया की दरवाजा खुला था। शायद दूध वाले से दूध लेने के बाद सेठी साहब दरवाजा बंद करना भूल गए होंगे।
मैं अंदर जैसे ही दाखिल हुआ और जो दृश्य मैंने देखा तो मेरी आँखें फटी की फटी ही रह गयीं। सेठी साहब सिर्फ निक्कर पहने हुए टीवी देख रहे थे। टीवी पर कोई पोर्न वीडियो चल रहा था। सेठी साहब अपना लण्ड निक्कर में से निकाल कर हिला रहे थे। सेठी साहब का लण्ड देख कर मैं भौंचक्का सा रह गया। छे सात इन्च से तो ज्याद ही लंबा होगा और काफी मोटा सख्त खड़ा चिकनाहट से लिपटा हुआ उनका लण्ड देख कर मुझे विश्वास नहीं हुआ की किसी इंसान का इतना बड़ा लण्ड भी हो सकता है। सेठी साहब का बदन पसीने से तरबतर था। लगता था जैसे अभी वह सुबह का व्यायाम कर फारिग हुए हों।
मेरे आने की आहट होते ही सेठी साहब ने मुड़कर मुझे देखा तो एकदम झेंप गए। मैं सेठी साहब को इस हाल में देख कर खुद बड़ा ही शर्मिन्दा हो गया।
मैंने पीछे घूम कर कहा, “सेठी साहब आई ऍम सॉरी, बेल शायद बजी नहीं और दरवाजा खुला था तो मैं अंदर चला आया। मुझे नोक करके आना चाहिए था। मैं बाद में आता हूँ।” यह कह कर मैं जब बाहर निकलने लगा तो सेठी साहब ने खड़े हो कर मेरा हाथ थाम लिया और मुझे घर के अंदर खिंचते हुए बोले, “चलो अब तुम आ ही गए हो और तुमने सब देख ही लिया है तो अब आओ और बैठो। अब मुझसे क्या शर्माना?”
उस समय बड़ी ही अजीब सी स्थिति थी। सेठी साहब ने टीवी बंद कर दिया। मैं बिना कुछ बोले चुपचाप बैठ सेठी साहब को देखता रहा।
कुछ देर चुप्पी के बाद सेठी साहब धीरे से बोले, “देखो अब तुमने तो मुझे देख लिया है तो तुमसे कुछ भी क्या छिपाना? बात यह है की तुम्हारी भाभी सुषमा और मेरी आजकल ठीकठाक पटती नहीं है।” यह कह कर सेठी साहब ने अपनी दास्तान सुनाई।
सेठी साहब ने जो कहा वह सुनकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। सेठी साहब ने कहा की वह पहले से ही सेक्स में काफी आक्रमक रहे हैं। उनकी शादी हुई तो सुषमाजी के साथ वह दिन रात लगे रहते थे। सेठी साहब के अनुसार, वह सुषमाजी को २४ घंटे में कम से कम चार बार रगड़ते थे। दिन में दो बार और रात में दो या तीन बार।
शुरू में तो सुषमाजी ने उनका काफी साथ दिया और खूब चुदवाया, पर वह थक जाती थी। उनके लिए सेठी साहब की ताकत और जोश के साथ कदम से कदम मिलाना कठिन था। धीरे धीरे वह तंग होने लगी। सुषमाजी चुदाई एन्जॉय तो करती थी पर इतनी रफ़ नहीं। वह चाहती थी की चुदाई प्यार से धीरे से होनी चाहिए। पर सेठी साहब को रफ़ चुदाई के बगैर चैन नहीं पड़ता था।
सेठी साहब जब चिपक पड़ते थे तो चाटना, काटना, गाँड़ पर चपेट मारते रहना इत्यादि किये बगैर उन्हें संतुष्टी नहीं होती थी। सुषमाजी बेचारी जब फारिग होती थी तब गाल, स्तन, पेट, हाथ, जांघें आदि लाल लाल हो जाते थे और उन पर सेठी साहब के दांतों के निशान होते थे। कई बार तो बेचारी सुषमाजी चलने की हालात में भी नहीं होती थीं।
सेठी साहब ने कहा, “अब यह हाल है की सुषमा मुझे रातको पलंग में अवॉयड करने की कोशिश करती है। आजकल हमारे बिच कुछ ऐसा पेंच फँसा हुआ है की पता नहीं कैसे निकलेगा।” यह कह कर कुछ देर सेठी साहब चुप हो गए। फिर मेरी और देख कर बोले, “हो सकता है तुम मेरी कुछ मदद कर सको।” सेठी साहब ने बिना बताये की क्या पेच फंसा है बात को वहीँ ख़त्म कर दिया।
मैंने पूछा, “सेठी साहब, ऐसा क्या पेंच फँसा हुआ है और मैं आपकी कैसे मदद कर सकता हूँ? बताइये ना, प्लीज?”
सेठी साहब ने कहा, “तुम्हारा कहा सुषमा मानती है। मैंने देखा है की तुम्हारी संगीत, कला बगैराह बातों से उसका मूड काफी अच्छा हो जाता है। कई बार वह मुझे तुम्हारी मिसाल देती है। तुम्हारे प्रति वह काफी सम्मान की नज़रों से देखती है। तुम जब कुछ कहते हो तो वह तुम्हारी बात ध्यान से सुनती है। पर हमारे साथ कुछ उलटा ही है। मैं कुछ कहता हूँ तो सुषमा उसका उलटा ही अर्थ निकलती है और हमारे बिच में वाद विवाद शुरू हो जाता है। मैं भी सुषमा की बेतुकी बात से गुस्सा हो जाता हूँ और कुछ ना कुछ उटपटांग बोल देता हूँ और फिर बात का बतंगड़ बनने में देर नहीं लगती। कई दिनों तक आपस में हम बोलते नहीं।”
मेरी समझ में यह नहीं आया की सेठी साहब मुझसे क्या चाहते थे। मैंने पूछा, “सेठी साहब बताइये ना मैं क्या कर सकता हूँ?”
सेठी साहब ने कहा, “कुछ ख़ास नहीं, बस तुम रोज थोड़ी देर सुषमा से बातचीत कर कोशिश करो की उसका मूड ठीक रहे। उसे ड्राइविंग सीखना है। मैंने पहले भी उसे सिखाने की कोशीश की थी। पर वह ऐसी बेवकूफी भरी गलतियां करती है की मैं गुस्सा हो जाता हूँ और उसे डाँट देता हूँ। इसके कारण हमारे बिच लड़ाई हो जाती है..
आप मेरी कार ले जाओ और थोड़ा समय निकाल कर सुषमा को ड्राइविंग सिखाओ। इसके बारे में अगर आपको लगता है की टीना कुछ कहेगी तो मैं टीनाजी से बात करूंगा की मैंने आप को कहा है। आजकल मेरे दफ्तर में कुछ टेंशन चल रहा है। थोड़ा तनाव में रहने के कारण ज़रा ज़रा सी बात में मैं सुषमा से उलझ पड़ता हूँ और बात बिगड़ जाती है।”
सेठी साहब की बात मुझे बड़ी मीठी लगी। मैं तो सुषमाजी के करीब जाने की लिए बहाने ढूंढता था। फ़ौरन सेठी साहब का हाथ थाम कर कहा, “सेठी साहब ऐसा हर कपल के बिच होता है। हमारा भी यही हाल है। टीना और मैं भी अक्सर भीड़ जाते हैं। आप को रिक्वेस्ट करने की कोई जरुरत नहीं। आखिर दोस्त होते किस लिए हैं? मैं जरूर सुषमाजी के साथ कुछ समय बिताऊंगा और उन्हें ड्राइविंग भी सिखाऊंगा। पर बदले में आप टीना को सम्हालियेगा। टीना भी आपकी बड़ी इज्जत करती है। वह भी मुझे आपकी मिसाल देती है।”
इस तरह पता नहीं अनायास ही मुझे और सेठी साहब हम दोनों को एक दूसरे की बीबी के करीब जाने की बिना मांगे ही इजाजत मिल गयी।
उन दिनों मेरा टूर पर जाना अक्सर हुआ करता था। मैं मार्केटिंग डिवीज़न में था और काफी बड़ा एरिया मेरे अंडर में था तो महीने में कम से कम पंद्रह दिन तो मैं बाहर ही रहता था। मेरी गैर हाजिरी में सेठी साहब दिन में एक बार जरूर घर आकर टीना को पूछते की कोई दिक्कत तो नहीं। वैसे अक्सर सुषमा जी और टीना दोनों एक दूसरे के घर करीब रोज आते जाते ही रहते थे।
जैसे जैसे आपसी परिचय बढ़ता गया, वैसे वैसे सेठी साहब टीना को कभी कबार टीना के करीब जाकर टीना के कानोंमें या कई बार तो हमारे सामने ही, “हाय, ब्यूटीफुल! हेलो जानेमन”, बगैरह बोल देते थे। मेरी पत्नी शुरु शुरू में ऐसी खुली तारीफ़ तारीफ़ सुनकर कुछ अजीब महसूस करती थी।
एक बार ऐसे ही इतवार दोपहर को लंच के समय जब हम इकठ्ठा हुए तब अचानक ही सेठी साहब ने टीना की नंगी कमर में हाथ डाल कर अपने करीब खिंच लिया और उसे एकदम करीब खिंच कर हम सब के सामने ही टीना के गालों को चुम कर बोले, “हाय माय ब्यूटीफुल गर्ल फ्रेंड! आई लव यू।”
सेठी साहब का इस तरह अचानक ही ऐसा व्यवहार देख मेरी बीबी के चेहरे पर तोते उड़ने लगे। शादी के बाद किसी गैर मर्द ने पहली बार सबके सामने उसे इस तरह उसे गर्ल फ्रेंड कह कर बुलाया था और खुला खुला प्यार का इजहार किया था।
टीना के चेहरे का बिगड़ा हुआ हाल देख कर सुषमा आगे आयी और टीना से बोली, “सेठी साहब हैं ही ऐसे। कोई खूबसूरत औरत देखि की शरू हो गए लाइन मारने।”
फिर वह अपने पति की और घूम कर बोली, “अरे बेचारी को थोड़ा वक्त तो दीजिये आपको पहचानने का! इस तरह उस पर टूट पड़ोगे तो टीना आपके बारे में क्या सोचेगी?”
फिर मेरी और घूम कर सुषमा बोली, “वैसे राजजी, आप अपनी खूबसूरत बीबी को मेरे पति से जरूर बचा कर रखिये। सेठी साहब बड़े माहिर हैं, खूबसूरत औरतों का दिल जितने में। पता नहीं कब आपकी बीबी को उड़ा कर ले जाए! फिर यह मत कहना की भाभी आपने सावधान नहीं किया।”
मैंने भी हँसते हुए कहा, “भाभीजी मुझे टीना की कोई चिंता नहीं। अगर सेठी साहब ने इधर उधर कुछ किया तो आप तो हैं ही मेरा इन्शुरन्स। मैं फिर आपको उड़ा कर ले जाऊँगा।”
सुषमा ने वही शरारती अंदाज में कहा, “राजजी ऐसी कोई ग़लतफहमी में मत रहियो। मैं कोई आसानी से फंसने वाली चिड़िया नहीं हूँ।”
तब मैंने कहा, “मुझे आजतक कहाँ जिंदगी में कुछ आसानी से मिला है?
मैंने बौखलाई हुई टीना का हाथ थाम कर कहा, “अरे जानेमन क्या हुआ? ऐसे घबरा नहीं जाते। यह तो एक मिलने का अंदाज है। वैसे आज कल इन चीजों का कोई बुरा नहीं मानता। तुम भी उनको उसी लहजे में जवाब दो ना? बोलो थैंक यू। शुक्रिया!”
टीना ने मेरी और मुस्कुरा कर देखा और सेठी साहब की और घूम कर कुछ शर्माते हुए बोली, “शुक्रिया सेठी साहब। सुषमाजी कह रही हैं, आप मुझे उड़ा कर ले जाओगे? मेरे पति ने मुझे आज तक कोई हवाई जहाज में बिठाया नहीं। आप मुझे उड़ा कर ले जाओगे तो इसी बहाने मुझे उड़ने का मौक़ा तो मिलेगा।”
सेठी साहब थोड़ा सा सहम गए और कुछ क्षोभित से बोले, “टीना मुझे माफ़ करना। क्या करूँ? रूमानी दिल है। खूबसूरत लड़की को देख कर आपे से बाहर हो जाता हूँ।”
सेठी साहब की सख्सियत से मेरी पत्नी टीना तब तक काफी वाकिफ हो चुकी थी। उनका जो स्वाभाविक ही अपनेपन का अहसास दिलाने का स्वभाव टीना बहुत पसंद करती थी। इसी कारण सेठी साहब और शर्मिंदा ना हो इस उद्देश्य से टीना ने कहा, “चलिए सेठी साहब इस बहाने आप जैसे हैंडसम मर्द ने मेरे जैसी एक बच्चे की माँ को गर्ल फ्रेंड बनाया और मुझे खूबसूरत तो समझा। चाहे वह मुझे दिलासा देने के लिए की गयी मिथ्या प्रशंषा ही क्यों ना हो।”
मेरी पत्नी ने कहने के लिए तो यह कह दिया पर उसे इस घटना की चिंता होने लगी, क्यूंकि कोई भी पत्नी अपने सामने ही अपने पति से किसी परायी स्त्री की ऐसी भुरीभूरी प्रशंशा आसानी से बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। सुषमा जी क्या सोचती होंगी? यह चिंता टीना को खाये जा रही थी। उस के मन में सेठी साहब और सुषमाजी के बिच में जो मनमुटाव जैसा दिख रहा था उसकी गहराई में जाने की स्त्री सहज जिज्ञासा भी थी जिसे वह रोक नहीं पा रही थी।
उस दिन सुबह मेरा सेठी साहब से जो सामना हुआ था उसके बारे में मैंने टीना को नहीं बताया था। और दूसरे उसे चिंता थी की जिस तरह सेठी साहब उसे सुषमा के सामने ही ताड़ रहे थे, लाइन मार रहे थे और कुछ ज्यादा ही रोमांटिक रुख अपनाये हुए थे उससे कैसे निपटे। कहीं इसके कारण टीना और सुषमाजी के बिच कोई मनमुटाव पैदा ना हो।
उस चिंता से निजात पाने के लिए टीना ने तय किया की वह सुषमाजी से सीधी बात करेगी और अपनी समस्या बताएगी। दूसरे दिन दोपहर सारा काम निपटा कर टीना सेठी साहब के घर पहुंची।
शुरुआत की औपचारिक बातों के बात टीना ने सुषमाजी को अपनी उलझन बतायी। टीना ने कहा की वह सेठी साहब की बड़ी इज्जत करती है, पर जब सेठी साहब उसके साथ कुछ ज्यादा ही छूट ले लेते हैं तो टीना को समझ नहीं आता वह क्या करे? उनकी रंगीली हरकतों और छेड़खानी से टीना कैसे निपटे? कहीं ऐसा ना हो की सुषमाजी इन से आहत हों। कहीं टीना तो उनके मनमुटाव का कारण नहीं थी?
टीना की बात सुनकर सुषमाजी हँस पड़ीं। उन्होंने टीना को बड़े प्यार से अपने पास बैठाया। सुषमा और टीना के बिच काफी लम्बी और सौहार्दपूर्ण बात हुई।
सुषमाजी ने टीना से कहा, “देखो टीना, यह तुम्हें सोचना है की तुम सेठी साहब का छेड़ना पसंद करती हो या नहीं। अगर तुम्हें यह पसंद नहीं की सेठी साहब तुमसे कोई छूट लें, तो तुम सेठी साहब को साफ़ साफ़ बतादो की तुम्हें उनका छेड़छाड़ करना पसंद नहीं। मैं तुम्हें गारण्टी देती हूँ की वह आगे से तुमसे कोई छेड़छाड़ नहीं करेंगे। अगर तुम्हें सेठी साहब की छेड़छाड़ से ज्यादा कोई परेशानी नहीं तो फिर तुम मेरे पास क्यों आयी हो? मुझे सेठी साहब तुम्हारे साथ क्या छूट लेते हैं नहीं लेते हैं उससे कोई मतलब नहीं।”
टीना का दुसरा सवाल जो सुषमाजी और सेठी साहब के बिच में कुछ मनमुटाव के बारे में था उसका जवाब देते हुए सुषमाजी ने फिर अपने दाम्पत्य जीवन की बात करते हुए टीना को बताया की शादी के बाद सुषमाजी का दाम्पत्य जीवन एक पत्नी की चाह होती है ऐसा ही सुखपूर्ण था। सेठी साहब सुषमा से चिपके ही रहते थे। छुट्टी के दिन सेठी साहब सुषमा से कम से कम दिन में तीन बार और रात में दो बार सेक्स करते थे।
शादी के कुछ दिनों में तो सुषमाजी सेठी साहब की दिनरात चुदाई से जैसे ऊब सी गयी थीं। सेठी साहब का स्टैमिना इतना तगड़ा था की बिना झड़े सुषमाजी को वह परेशान कर देते थे। हालांकि सेठी साहब सुषमा को अपनी तगड़ी चुदाई से थका देते थे पर इसके बावजूद, सुषमाजी के लिए वह उनके जीवन का स्वर्णिम समय था। सुषमाजी से “चुदाई” शब्द सुनकर टीना चौंक पड़ी।
टीना के चेहरे का भाव देख कर सुषमाजी ने टीना को अपने पास खींचा और धीमे से बोली, “देखो यार, अब जब हमारी बात शारीरिक संबंधों, मतलब सेक्स के बारे में ही हो रही है तो बेहतर है हम यह औपचारिकता का मुखौटा फेंक कर साफ़ साफ़ बिना लागलपेट के खुल्लमखुल्ला बात करें। अब हम इतने करीब आ चुके हैं और हमें एक दूसरे पर इतना विश्वास हो गया है की समय आ गया है की हम एक दूसरे से अपना असली चेहरा ना छिपाएं।”
बात जारी रखते हुए सुषमाजी ने टीना को कहा की एक साल तक तो वह फॅमिली प्लानिंग करते रहे। एक साल बाद उन्होंने बच्चे का प्लान बनाया। करीब तीन साल तक बिना गर्भ निरोधक के वह मैथुन करते रहे। पर गर्भ तो दूर सुषमाजी का पीरियड में भी कोई देरी नहीं हुई।
कई डॉक्टर को दिखाने के बाद जब सब डॉक्टरों ने एक ही सुर में कहा की सुषमाजी और सेठी साहब दोनों में से किसी में कोई कमी नहीं है। पर बच्चा क्यों नहीं हो रहा इसका जवाब कोई नहीं दे पा रहा था।
कई डॉक्टर, वैद, हकिम और साधू संतों को दिखाने के बाद एक स्पेशलिस्ट गाइनोकोलॉजिस्ट डॉक्टर जिसने इस मामले में काफी रिसर्च की थी, सेठी साहब को कहा की कई लाखों में कोई एक केस ऐसा होता है जब पुरुष के शुक्राणु किसी एक स्त्री के बीज से मेल नहीं खाते और स्त्री का बीज उस पुरुष के शुक्राणु से फलीभूत नहीं होता। हो सकता है किसी और स्त्री से संगम करने से वह फलीभूत हो। या फिर किसी और पुरुष के शुक्राणु से सुषमाजी का बीज फलीभूत हो।
लाखों में से एकाद केस ऐसा होता है की कोई ख़ास मर्द के वीर्य का बीज (क्रॉसमोज़ोम) किसी ख़ास औरत के बीज को फलीभूत नहीं कर पाता है। ऐसा क्यों होता है यह शारीरिक विज्ञान समझ नहीं पाया है। पर ऐसा कभी कभी होता है। वह डॉक्टर के अनुसार सेठी साहब और सुषमा के केस में भी ऐसा ही हुआ था।
अगर सेठी साहब किसी और औरत से सम्भोग करे तो उस औरत को या सुषमाजी किसी और मर्द से सम्भोग करे तो सुषमाजी को माँ बनने में कोई दिक्क्त नहीं होगी ऐसा उस स्पेशलिस्ट डॉक्टर का ओपिनियन था। इसका मतलब तो यह हुआ की सेठी साहब के वीर्य से सुषमाजी गर्भ धारण नहीं कर सकती। जब से सेठी साहब और सुषमाजी को यह पता चला तब से जैसे उनके जीवन में एक अँधेरा सा छा गया। या यूँ कहो की उनके दाम्पत्य जीवन में एक उदासीनता आ गयी।
वैसे ही शादी के कुछ सालों बाद पति पत्नी के बिच सेक्स की नवीनता कम हो जाती है। परन्तु डॉक्टर की बात सुन कर जैसे दोनों में एक दूसरे से सेक्स करने की इच्छा ख़तम सी हो गयी। सेठी साहब और सुषमाजी दोनों ही बच्चे पाने के लिए बड़े बेकरार थे पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।
सुषमाजी ने कहा की वह दोनों किसी भी बच्चे को गोद लेने के पक्ष में नहीं थे। सुषमा जी का कहना था की जबतक या तो सुषमाजी का या सेठी अपना खुद का बच्चा ना हो तो वह प्यार आ ही नहीं सकता। जब से उनको समस्या इस बात का पता चला तब से सुषमा जी बड़ी गहराई से सोच में डूब गयी की इस को कैसे सुलझाया जाए।
सेठी साहब की दूसरी शादी का सवाल ही पैदा नहीं होता। एक रास्ता यह था की सेठी साहब किसी और औरत से बच्चा पैदा करे और वह बच्चा वह दोनों गोद ले ले। पर वह औरत कौन होगी और क्या वह ऐसी सौदेबाजी के लिए राजी होगी? यह बड़ा मुश्किल सवाल था। दुसरा रास्ता यह था की सुषमाजी किसी और मर्द से सम्भोग करे और फिर जो बच्चा हो वह उसे रख ले।
किसी और मर्द से सम्भोग करना यह एक बड़ी दुविधा थी जिसके लिए सुषमाजी राजी नहीं थी। हाँ, अप्राकृतिक गर्भधारण से किसी और मर्द का वीर्य सुषमाजी के गर्भ में स्थापित कर वह सुषमाजी गर्भ धारण कर सकती थी। यह एक विषय था जिस पर सेठी साहब और सुषमाजी विचार कर रहे थे। पर सेठी साहब किसी भी अनजाने मर्द के वीर्य से बच्चा हो यह नहीं चाहते थे। मामला काफी जटिल बनता जा रहा था। अब किया जाए तो क्या किया जाए?
जहां तक की सेठी साहब का टीना को छेड़ने और लाइन मारने का सवाल था तो सुषमाजी ने टीना को शादी और विवाहेतर सेक्स के बारे में कुछ बातें खुलकर बतायीं।
सुषमाजी ने कहा, “देखो टीना, यह जिंदगी छोटी सी है। उसमें भी अपनापन महसूस हो, ऐसे कपल कहाँ मिलते हैं? बड़ी मुश्किल से आप दोनों हमें मिले हैं जिनसे हम खुले दिल से मिल सकते हैं, सारी बातें शेयर कर सकते हैं। जब हमारी शादी हुई थी तब सेठी साहब को मैंने अपनी शादी से पहले हुए अफेयर्स के बारे में बताना चाहा। तब सेठी साहब ने मुझे एक बात कही..
उन्होंने कहा की मर्द और औरत किसी नाजुक घडी में जोश में आकर एक दूसरे से अगर सेक्स कर बैठे तो उसे बुरा नहीं मानना चाहिए। जरुरी सवाल यह है की क्या आप एक मर्द से जिन्दगी भर सुखदुख में साथ रहने का वादा करने के लिए तैयार हो? सेठी साहब ने शादी के समय मुझसे शादी करने के लिए एक शर्त रखी थी। उन्होंने मुझसे वचन लिया था की हम जिंदगी भर एक दूसरे पर पूरा विश्वास रखेंगे और एक दूसरे को कभी नहीं छोड़ेंगे..
अगर कभी ऐसा हुआ की मेरा किसी गैर मर्द से या उनका किसी गैर औरत से कोई शारीरिक सम्बन्ध हो भी गया तो हम एक दूसरे को ताना टोका नहीं करेंगे, ना ही रोकेंगे और ना ही कोई सवाल करेंगे। सेठी साहब ने मुझे वचन दिया की वह कभी भी किसी गैर औरत को घर में नहीं घुसाएँगे और अपनी पत्नी का ओहदा किसी गैर औरत को नहीं देंगे। उसी तरह से उन्होंने मुझसे भी वचन लिया की मैं भी किसी गैर मर्द से किसी भी हद तक जाऊं, पर मैं सेठी साहब को छोड़ उसके साथ नहीं जाउंगी और सेठी साहब को नहीं छोडूंगी।”
सुषमाजी की बात सुनकर टीना के होश उड़ गए। सेठी साहब और सुषमा में इतना तालमेल? टीना ने कभी सोचा भी नहीं था की पति और पत्नी के बिच इतनी स्पष्ट अंडरस्टैंडिंग हो सकती है। सुषमाजी टीना को जैसे शादीशुदा जीवन का फलसफा समझा रही थी। टीना ने सुषमा जी की बात ध्यान से सुन रही थी।
सुषमाजी ने बात जारी रखते हुए कहा, “मुझे नहीं पता की तुम चुदाई को कितना एन्जॉय करती हो। मैं तो बहुत एन्जॉय करती हूँ। जब मैं और सेठी साहब चुदाई करते हैं तो खुल कर सब कुछ करते हैं। कोई पाबंदी नहीं होती। क्या तुम लोग भी खुल कर चुदाई एन्जॉय करते हो?”
सुषमाजी का सवाल सुनकर टीना कुछ घबड़ा सी गयी। उसने सोचा नहीं था की सुषमाजी ऐसा कोई सवाल करेंगी। टीना ने कुछ हिचकिचाते हुए कहा, “जी, वैसे हम लोग वैसे ही सेक्स करते हैं जैसे होता है।”
सुषमाजी ने कहा, “अरे चुदाई के नाम से क्यों घबड़ा जाती हो? अंग्रेजी शब्द सेक्स बोल सकती हो तो देसी शब्द चुदाई क्यों नहीं बोल सकती? बात तो एक ही है। चुदाई हर मर्द और औरत के जीवन का एक अहम् हिस्सा होता है। चुदाई करना कोई पाप नहीं, बशर्ते की वह जबरदस्ती ना किया जाए। तुम्हारी बड़ी बहन होने के नाते मैं कह रही हूँ की अगर तुम चुदाई के समय खुल कर पूरा एन्जॉय नहीं करती तो समझो की जिंदगी का एक अद्भुत सुख गँवा रही हो। सेठी साहब तो इस बात में कुछ ज्यादा ही माहिर हैं..
उन्होंने ने ही मुझे यह सब सिखाया है। मेरे सेठी साहब इतने हैंडसम और रोमांटिक हैं। मैं जानती हूँ की तुम सेठी साहब को बहुत पसंद करती हो। सेठी साहब तो तुमको पसंद करते ही हैं। और यार हर मर्द को दूसरे की बीबी अच्छी लगती है। तुम तो वैसे ही इतनी खूबसूरत, समझदार और अगर तुम बुरा ना मानो तो कहूं की सेक्सी हो। तुम मानो या ना मानो, पर हम सब को शादी के एक दो साल के बाद एक दूसरे से चुदाई में वह मजा नहीं आता जो शादी के बाद शुरूशुरू में आता है। और जिंदगी का यही वक्त है लाइफ एन्जॉय करनेका..
तो मुझे तुम एक दूसरे से करीब आओ उसमें कोई बुराई नजर नहीं आती। मुझसे छिपाने या डरने की कोई जरुरत नहीं है। मुझे कुछ कहने की भी जरुरत नहीं है। सेठी साहब मेरे पति हैं और हमेशा रहेंगे। जब तुमसे सेठी साहब कुछ ज्यादा छेड़खानी करते हैं तो घरमें रातको मेरे साथ भी वह ज्यादा रोमांटिक हो जाते हैं। यह मेरे लिए बहुत अच्छी बात है।”
सुषमाजी की बात सुनकर टीना की आँखें चौड़ी फ़ैल गयीं। उसकी आँखों में अचम्भे का भाव देख कर सुषमाजी बोलीं, “देखो टीना। मैंने तुम्हें कहा है ना, की अब जब हम सेक्स के बारे बात कर ही रहे हैं तो बेहतर है हम कोई लागलपेट के बिना एकदूसरे से खुल्लमखुल्ला अपनी सारी सीक्रेट शेयर करें। मेरे साफ़ और खुल्लमखुल्ला चुदाई, लण्ड बगैरह शब्दों का प्रयोग करना और हमारी निजी बातें बताना इस लिए है की मैं और सेठी साहब तुम्हें और राजजी को पराया या दुसरा नहीं मानते। तुम दोनों को हम अपना मानने लगे हैं..
हमारी जिंदगी का यह राज़, आज तक मैंने किसी से शेयर नहीं किया। तुम इसका बुरा मत मानना। मैं और सेठी साहब एकदूसरे से खुल्लमखुल्ला बातें ही करते हैं। अब तो आप लोगों से भी यह पर्दा नहीं रहा। अगर तुम भी मुझसे बिना घुमाये फिराए सारी बातें खुल्लमखुल्ला करोगी तो मुझे अच्छा लगेगा।”
टीना ने कुछ झिझकते हुए कहा, “सुषमाजी मैंने कभी इस तरह से किसी से बात नहीं की। पर यह सच है की हम भी आप दोनों को अपना मानते हैं। जहां तक मैं जानती हूँ, मेरे पतिमेरे मुकाबले काफी खुल्लमखुल्ला बातें करते हैं। हम पति पत्नी भी आपस में खुल्लमखुल्ला ही बात करते हैं। मेरे लिए यह अनुभव कुछ नया है इस लिए मुझे मेरी उलझन के लिए क्षमा करना।”
सुषमाजी ने टीना को कहा की वह ज़माना चला गया जब पति और पत्नी सिर्फ एक दूसरे से ही सम्भोग करके खुश रहते हैं। अब जो कपल कुछ एक्सट्रा एन्जॉय करना चाहते हैं, उन पति पत्नी में एक ऐसी अंडरस्टैंडिंग हो रही है की पति और पत्नी एक दूसरे ही सहमति से दूसरे मर्द या औरत के साथ शारीरिक सम्भोग का आनंद लेने के लिए तैयार रहते हैं।
अक्सर ऐसे कपल दूसरे ऐसे कपल को ढूंढते रहते हैं जो एक ही मानसिकता वाले, मीठे स्वभाव के और विश्वास पात्र हों। ऐसे माहौल में एक पति का किसी और की पत्नी से मिलने पर काफी निजी तरीके सम्बोधन करना जैसे की “डिअर, डार्लिंग” बगैरह तो आम बात है। जब एक दूसरे के पति पत्नी से सम्भोग करने की बात हो तब पति के सामने ही उसकी पत्नी की कमर में हाथ डालकर उसे करीब खिंच कर लिपट कर आलिंगन करना कोई अजूबा नहीं गिना जाता।
आज कल मोबाइल और इंटरनेट के कारण पति का पत्नी के अलावा दूसरी औरतों से और पत्नी का पति के अलावा दूसरे मर्दों से करीबी संपर्क काफी बढ़ गया है। इसके कारण परस्पर जातीय आकर्षण हो ही जाता है।
इस हालात में यह आवश्यक हो गया है की शादी के बंधन को बनाये रखने के लिए शादी के नियमों में कुछ आमूल परिवर्तन किये जाएँ। शादी का बंधन किसी साधारण औरत मर्द की चुदाई से कहीं बढ़कर है। औरत मर्द का प्यार साधारण तया शारीरिक भूख के अलावा भावुकता से भी जुड़ा हुआ होता है। पर शादी के बंधन में कई और मसले जुड़ जाते हैं जो शादी के बंधन को बनाये रखने में कारगर साबित होते हैं। बच्चे, समाज, परिवार, लोकलाज, आर्थिक सम्बन्ध इत्यादि इनमें प्रमुख हैं।
इसीलिए सुषमाजी ने कहा की उन्होंने और सेठी साहब ने मिलकर यह तय किया था की दोनों ही एक दूसरे के विजातीय संबंधों के बारे में एक दूसरे से कोई छानबीन नहीं करेंगे और ना ही कोई ज्यादा दिलचश्पी रखेंगे। यदि दोनों में से किसी को भी किसी और से जातीय सम्भोग करने की कामना हो तो वो करे। परन्तु उस व्यक्ति से ऐसे अधिक भावुक सम्बन्ध ना बनाये जिससे की वैवाहिक जीवन में कोई बाधा पैदा हो।
सुषमा ने टीना से कहा की सेठी साहब ने जब से टीना से छेड़खानी करनी शुरू की है तब से सेठी साहब और सुषमा के संबंधों में भी कुछ सुधार होता नजर आ रहा है। जरुरी ना होने पर भी सेठी साहब सुषमाजी से कुछ छिपाते नहीं बल्की सारी बातें बता देते हैं।
सुषमाजी की बात सुनकर टीना को एक तगड़ा झटका लगा। सुषमाजी और सेठी साहब के सम्बन्ध इतने खुले और घनिष्ठ होंगे उसकी टीना ने कल्पना तक नहीं की थी।
सुषमाजी से बात कर टीना को काफी अच्छा लगा। वह काफी तनावमुक्त महसूस कर रही थी। टीना ने मुझे इस चर्चा के बारे में जब बताया तो मैं भी अचंभित सा सोचता ही रह गया। सुषमाजी ने टीना को जो शादीशुदा कपल का फलसफा सिखाया था वह सब टीना ने मुझे अक्षरसः कहा। सुषमाजी के स्पष्ट विचारों के बारे में सुनकर तो मैंने भी दांतों तले उंगलीयाँ दबालीं।
हकीकत में तो सुषमाजी को सेठी साहब और टीना का एक दूसरे के करीब आना अच्छा लगा। उनके मन में आस जगी की अगर टीना और सेठी साहब के सम्बन्ध और गहरे हुए तो हो सकता है की टीना को मनाया जा सके और शायद कुछ बात बन जाए। टीना और सेठी साहब का एक दूसरे के प्रति जो आकर्षण पैदा हो रहा था वह मुझसे भी अछूता नहीं था।
पर जलन होने के बजाय मुझे भी सेठी साहब और टीना का इस तरह करीब आना अच्छा लगने लगा। एक कारण यह भी था की शादी की पांच सालों के बाद की पति और पत्नी के नीच में विजातीय आकर्षण की नीरसता से शायद टीना ऊब चुकी थी। चुदाई के समय वह पहले जैसी सक्रियता नहीं ला पा रही थी जो शादी के बाद होती थी।
मुझे लगा की शायद टीना के लिए भी सेठी साहब का उसकी जिंदगी में आना और इस तरह टीना के लिए उसकी सुंदरता, सेक्सीपन और कमनीयता की सराहना पाना एक अच्छा सौपान था जिसे टीना कहीं न कहीं एन्जॉय कर रही थी। मेरे मन में एक आस जगी की शायद हमारी यह घनिष्ठता आगे चल कर कुछ रंग ला सकती थी। काश ऐसा हो की सेठी साहब मौक़ा पाकर टीना की चुदाई करे और टीना भी उनसे सहर्ष चुदवाये।
अगर ऐसा हो तो टीना की चुदाई सेठी साहब साहब कैसे करते हैं, टीना के मन के भाव सेठी साहब से चुदवाते समय कैसे होंगे, टीना चुदाई को कैसे एन्जॉय करेगी यह सब सोच कर मेरा लण्ड भी मेरे पायजामे ने खड़ा हो गया। मैं टीना और सेठी साहब की चुदाई के बारे में सोचने लगा। अब विधाता को क्या मंजूर था वह तो विधाता ही जाने।
उधर टीना और सेठी साहब की कहानी पनप रही थी तो मुझे सुषमा के बदन को हासिल करने की लालसा सता रही थी। सुषमा का चेहरा बेबी फेस कहते हैं, वैसा था। सुषमा की छाती उनकी कमर के नाप को चुनौती देने वाली थी। उनकी गाँड़ भी बड़ी सुआकार थी। मेरी रातों की नींद सुषमा की गाँड़ के बारे में सोच कर गायब हो जाती थी।
सुषमाजी के बदन की खुशबु पाने के लिए मैं हरदम बेचैन रहता था। हर बार जब भी सुषमा मेरी नज़रों से नजरें मिलाकर देखती थी तो पता नहीं मुझे ऐसा लगता था जैसे उनकी आँखें मुझे चुनौती दे रही हो की “आओ और मुझे अपनी बाँहों में ले लो।” हो सकता है की वह मेरे मन की लालसा ही थी या फिर हकीकत में वह ऐसा कुछ चाह रही थी।
एक दिन हम चारों मेरे घर में बैठ कर गपशप मार रहे थे। टीना कुछ नाश्ता लेने अचानक जब उठ खड़ी हुई तो उसे चक्कर आने लगे और लड़खड़ा कर वह टेबल का सहारा ले कर डाइनिंग कुर्सी पर लुढ़क कर बैठ गयी। उसका यह हाल देख हम सब सावधान हो गए तब टीना ने कहा की उसे काफी चक्कर आ रहे थे और गर्दन में सख्त दर्द हो रहा था।
टीना की बात सुन कर सेठी साहब फ़ौरन उठखड़े हुए और टीना जिस कुर्सी पर बैठी थी उसके पीछे जाकर उन्होंने टीना को आराम से बैठने को कहा। फिर अपने दोनों हाथों की हथेलियां टीना के दोनों कंधे पर रख कर अपनी उंगलियां और अंगूठे के दबाव से टीना के कंधे के कालर की हड्डियों की मांसपेशियों को दबा कर उनका मसाज करने लगे।
कुछ ही देर में जब वह फारिग हुए तब टीना ने अपनी गर्दन इधरउधर मोड़ कर देखि, फिर एकदम उठखडी हुई। थोड़ा चलने के बाद उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे और ख़ुशी भरी मुस्कान थी। टीना ने मेरी और मुड़कर मुझे कहा, “कमाल है! सारा दर्द एकदम गायब हो गया। ना कोई चक्कर और ना ही कोई दर्द! सेठी साहबके हाथों में तो जादू है!”
मैंने एक राहत की सांस ली, क्यूंकि पिछले कुछ दिनों से टीना को अक्सर ऐसा दर्द होता रहता था और कुछ देर तक, जब तक वह दर्द अपने आप ख़तम नहीं हो जाता, टीना बड़ी परेशान रहती थी।
टीना की बात सुनकर सेठी साहब ने कहा, “टीना, तुम्हें ब्लड सर्कुलेशन की कुछ दिक्कत है। अगर तुम यह मसाज एक महीने तक करवाती रहोगी और साथ में कुछ दवाइयां और कुछ आसान एक्सरसाइज करोगी तो सब ठीक हो जायेगा। इस मसाज में थोड़ी ताकत से मांसपेशियों को जोर से दबाने की जरुरत है। इस बिमारी को हलके में मत लेना। इसे अगर अभी नजर अंदाज किया तो आगे चल कर बड़ी प्रॉब्लम हो सकती है। मैं भाई साहब को यह मसाज कैसे करना वह सीखा दूंगा। वह रोज यह मसाज कर देंगे। बाकी एक्सरसाइज बगैरह मैं आपको समझा दूंगा।”
टीना ने मेरी बात सुन कर मेरी और देखा और बोली, “इनको कहाँ फुर्सत है? यह तो कल से चार दिन के लिए फिर से टूर पर जा रहे हैं।”
मैंने कहा, “सेठी साहब, वैसे भी आप करीब रोज घर तो आते ही हो, हमारा हालचाल पूछने। तो आप ही टीना को शाम को घर आ कर रोज मसाज कर दिया करना। अगर आपको तकलीफ ना हो तो। और ट्रीटमेंट बगैराह तो आप ही करना क्यूंकि मुझे दवाइयां और डॉक्टर से दूर रहना ही अच्छा लगता है।”
उस रात मैंने सोते ही मेरी बीबी की टाँग खींचनी शुरू की। मैंने कहा, “टीना, सेठी साहब तो वैसे ही तुम्हें छूने का कुछ ना कुछ बहाना ढूंढते रहते हैं। तुमने तो उन्हें बढ़िया मौक़ा दे दिया मसाज करने का। अब तो ना सिर्फ वह तुम्हारा कंधा बल्कि पुरे बदन का मसाज कर देंगे।“
टीना ने टेढ़ी नजर से मेरी और देखा और बिना कुछ बोले रजाई में सर घुसा कर सो गयी। सोते सोते बोली, “तुमने क्यों मना कर दिया मसाज सिखने से? इसका मतलब तुम चाहते हो की सेठी साहब ही मेरा मसाज करे। ऊपर से मुझे दोष देते हो?”
मैंने मेरी बीबी को मनाते हुए कहा, “अरे तुम तो बुरा मान गयी। मैं तो वैसे ही मजाक कर रहा था। हम बात कर रहे थे ना की सेठी साहब काफी रोमांटिक लगते हैं। अगर वह रोमांटिक हैं और अब उन्हें मौक़ा मिला है तुम्हारा मसाज करने का तो अच्छी बात है ना? वैसे ही बेचारे इतने सालों के बाद सुषमाजी से बोर हो गये होंगे। तुम्हारे जैसी सेक्सी औरत अगर उनसे मसाज कराये तो वह खुश तो होंगे ही? इसमें कौनसी बुरी या गलत बात है?” मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है।”
रजाई में टेढ़ी हो कर घुसी हुई टीना ने कहा, ” देखो तुम ना सेठी साहब के बारे में उलटिपुलटि बात मत किया करो। मैं मानती हूँ की सेठी साहब बातचीत करने में कुछ ज्यादा ही रोमांटिक लगते हैं, पर वह हमेशा मेरे साथ बड़ी इज्जत से पेश आये हैं। अगर वह मालिश भी करेंगे तो कभी मेरा फायदा नहीं उठाएंगे, इसका मुझे पूरा यकीन है।’
मैंने कहा, “देखो तुम्हारी बात गलत नहीं है। पर मर्द आखिर मर्द होता है। जब किसी औरत से उसका शारीरिक आकर्षण बहुत ज्यादा हो जाता है तब नाजुक परिस्थिति में समझदार से समझदार आदमी भी अपना आपा खो बैठता है। वह अच्छा बुरा सोच नहीं पाता है। उसमें भी जो मर्द काफी शशक्त और वीर्यवान होता है उसका लण्ड उसके दिमाग पर हावी हो जाता है..
सेठी साहब वाकई में समझदार हैं, पर उनका लण्ड उन पर भारी पड़ सकता है क्यूंकि उनका लण्ड वैसे भी बहुत लंबा, मोटा और तगड़ा है और आसानी से सतुष्ट नहीं होता। तुम ज्यादा इत्मीनान से मत रहना। मैं तुम्हें बता रहा हूँ की सेठी साहब बहुत ज्यादा सेक्सी हैं। जब वह उकसा जाते हैं तो उनका अपने आप पर नियत्रण रखना भी बड़ा ही कठिन हो जाता है।”
टीना मेरी बात सुन कर कुछ गुस्से में बिस्तर में बैठ गयी और बोली, “तुम क्या बकते रहते हो? तुमने सेठी साहब का लण्ड कब देखा? तुम ऐसे ही फ़ालतू की बकवास कर मेरा दिमाग खराब मत करो।”
मैंने मेरी बीबी को शान्ति से समझाते हुए कहा, “कुछ दिन पहले सुषमाजी उनके चाचाजी के यहां गयी थी ना, उस की अगली सुबह की बात है। मैं जब सुबह घूमने निकला तो सेठी साहब के ड्रॉइंगरूम में लाइट देख कर मैं उनके दरवाजे पर पहुंचा……” मैंने फिर मेरी पत्नी को उस सुबह की पूरी दास्तान सुनाई।
मेरी सारी बात सुन मेरी बीबी की नींद ही उड़ गयी। मैंने जब कहा की सेठी साहब का लण्ड वास्तव में सात से आठ इन्चा लंबा और करीब दो से तीन इंच मोटा था तो जैसे मेरी बीबी की सांसे थम सी गयीं। पता नहीं उसके मन में उस समय क्या विचार आ रहे होंगे?
वैसे तो कोई भी औरत किसी मर्द के ऐसे तगड़े लण्ड के बारे में सुन कर यही सोचने लगेगी की अगर ऐसा तगड़ा मर्द उसकी चुदाई करे तो क्या हाल होगा उसका? ख़ास तौर से जब मैंने मेरी पत्नी को कहा की जब सेठी साहब सुषमाजी को चोदते हैं तो सुषमाजी को नानी याद दिला देते हैं बिना थके या झड़े सुषमाजी को चोदते ही रहते हैं। सुषमाजी बेचारी त्राहिमाम त्राहिमाम हो जाती है।
टीना ने जब यह सूना तो टीना के चेहरे पर और ख़ास कर उसकी आखों में आतंक और आश्चर्य दोनों के ऐसे मिश्रित भाव मैंने देखे जो कोई भयानक हॉरर फिल्म में फिल्म की हीरोइन के चेहरे पर खुनी का सामना होने पर आते हैं।
बड़ी मुश्किल से अपने आप को सम्हालते हुए जैसे वह अपने आप को ही नसीहत दे रही हो वैसे बोली, “मुझे क्या लेनादेना? सेठी साहब जाने और सुषमाजी जाने।”
फिर कुछ रुक कर बोली, “पर एक बात तो है की जब चुदाई हो तो तगड़ी ही होनी चाहिए। तुम तो कई बार शुरू होने से पहले ही झड़ जाते हो। तो सारा मजा ही किरकिरा हो जाता है। खैर मुझे क्या? पर तुम यह सब मुझे क्यों सूना रहे हो?”
मैंने एक गहरी साँस लेते हुए कहा, “बेचारी सुषमाजी।”
मेरी बात सुन कर टीना गुस्सा करती हुई अपना मुंह बना कर बोली, “अगर सुषमाजी पर इतना ही रहम आ रहा है तो तुम जाओ और आंसूं पोंछो बेचारी सुषमाजी के।”
मैंने धीरे से कहा, “सेठी साहब चाहते हैं की मैं सुषमाजी को कार चलाना सिखाऊं।”
टीना ने कुछ रूखी आवाज में कहा, “तो जाओ,सिखाओ सुषमाजी…… को कार चलाना। मुझे तो तुम कार चलाना सीखा नहीं पाए और चले सुषमाजी…… को कार सिखाने!” जब मेरी पत्नी अपना मुंह बना कर “सुषमाजी” बोली तो बीबी के अंदर से जलन की बू आ रही थी।
उस हालात में मैंने चुप रह कर सो जाना ही ठीक समझा।
शादी से पहले
मेरी पत्नी टीना शादी से पहले काफी दबंग सी लड़की थी। दबंग से मेरा मतलब है उसे लड़कों के साथ घूमने में कोई झिझक नहीं होती थी। पर यह भी सच है की कोई लड़का उसके साथ नाजायज छूट की भी उम्मीद नहीं रख सकता था। टीना ने दो तीन लड़कों की ऐसी पिटाई की थी की टीना के पीछे पुरे कॉलेज में “मर्दानी” के नाम से मशहूर थी।
कॉलेज में पढ़ाई में टीना हमेशा अव्वल या दूसरे नंबर पर आती थी। हालांकि वह पढ़ाकू या किताबी कीड़ा नहीं थी। वह खेलकूद में, डांस गाने में काफी रूचि रखती थी और ऐसे कार्यक्रम में हिस्सा भी लेती थी। पुरे कॉलेज में टीना के बारे में काफी चर्चे होते रहते थे।
टीना के माँ बाप टीना को पूरा सपोर्ट करते थे। घर में भी जब टीना पढ़ती थी तो इतनी एकाग्रता से पढ़ती थी की उसे खाने पिने का भी ध्यान नहीं रहता था। टीना की एक छोटी बहन और एक बड़ा भाई था। टीना घर में सब को आँख के तारे के समान प्यारी थी। एक जमाने में टीना के पुरखे बहुत बड़े जमींदार हुआ करते थे। पर अब वह सब ठाठ ख़तम हो चुका था।
कॉलेज के समय में टीना ने कॉलेज के ही एक शिक्षक के घर में एक्स्ट्रा क्लासेज ज्वाइन की थीं। शुरू में तो चार पांच लड़के लडकियां थीं पर बादमें आखिर में सिर्फ टीना ही रह गयी थी। पढ़ाई कराने वाले शिक्षक शादीशुदा थे पर उनकी बीबी और बच्चे गाँव में रहते थे और शिक्षक शहर में अकेले ही रहते थे और बच्चों को पढ़ाते थे।
टीना ने मुझे शादी के पहले ही साक्षात्कार में कबुल किया था की वह कुवारी नहीं थी। जाने अनजाने में उस शिक्षक के साथ तत्कालीन शारीरिक सम्बन्ध हुआ था। वह शिक्षक की टीना को पूरी एकाग्रता से पढ़ाने की लगन से इतनी प्रभावित हुई की एक कमजोर पल में दोनों युवा बदन एक दूसरे से सम्भोग करने से रोक नहीं पाए।
उनका वह अफेयर कुछ महीनों चला। एकदिन अचानक टीचर की बीबी गाँव से सर से मिलने आयी और उसे टीना और उसके पति के नाजुक संबंधों के बारे में पता लगा। टीचर की पत्नी ने अकेले में टीना से बात की और दो हाथ जोड़कर टीना से बिनती की की वह उसके पति से दूर चली जाए। टीना को इस बात का काफी गहरा सदमा पहुंचा और उसके बाद वह टीचर से कभी नहीं मिली।
यह सारी हकीकत टीना ने मुझे हमारी पहली मुलाक़ात में अकेले में ही साफ़ साफ़ बता दी, जब मैं मेरे माँ बाप के कहने के अनुसार लड़की देखने के लिए टीना के घर गया था। जब मैंने टीना के मुंह से यह सूना तो फ़ौरन मैंने टीना से कहा की यह टीना के लिए अयोग्यता नहीं पर सुयोग्यता का प्रतिक है।
मुझे इस बात से कोई शिकायत नहीं थी की शादी के समय मेरी पत्नी का कौमार्यभंग हो चूका था। बल्कि अगर मेरी होने वाली बीबी शादी से पहले सेक्स कर चुकी है तो मैं मानता हूँ की वह वाकई में प्यार करना जानती है और शारीरिक सम्भोग की कदर कर सकती है।
मेरी बात सुनकर टीना पहले ही साक्षात्कार में बिना कुछ सोचे समझे मुझसे लिपट गयी और बोली, “आप भले ही मुझे पसंद करें या ना करें, मैंने आपको पसंदकर लिया है। अब तय आपको करना है की मैं आपको पसंद हूँ या नहीं।” मेरा तो टीना को नापसंद करने का कोई सवाल ही नहीं था। और इस तरह हमारी शादी हो गयी।
आज की तारीख में
मैं महसूस कर रहा था की टीना के ह्रदय में सेठी साहब के लिए बड़ी इज्जत थी और वह सेठी साहब से बड़ी ही प्रभावित थी। शायद टीना के मन में कहीं ना कहीं सेठी साहब के लिए कुछ नरम भाव जरूर पैदा हुआ था जिसे मैं देख रहा था। इसका ख़ास कारण था सेठी साहब टीना से हमेशा प्यार भरी बातें करते थे हालांकि जब भी मिलते थे तो सेठी साहब टीना को जफ्फी देते थे और उसे डार्लिंग, हनी कह कर बुलाते थे पर टीना उनसे जफ्फी के समय भी उचित दुरी बनाये रखती थी। सेठी साहब ने कभी टीना से नाजायज छूट नहीं ली। वह टीना को बहुत सम्मान की नजर से देखते थे।
टीना जानती थी की सेठी साहब उसको लाइन भी मार रहे थे। पर टीना यह भी जानती थी की उसकी सहमति के बिना सेठी साहब उसका कोई फायदा नहीं उठाएंगे। सेठी साहब और सुषमा के साथ हम कई बार रंगीन सा मजाक भी कर लेते थे।
सेठी साहब कई बार हमें पूछते, “आजकल रातको आप लोग ओवरटाइम तो नहीं कर रहे हो न?” कभी अगर हम दरवाजा खोल ने में देर करते तो कहते, “यार अंदर से ही कह देते की हम ज़रा चिपके हुए हैं तो हम बादमें आ जाते।”
तब टीना भी उनको कह ही देती, “सेठी साहब अब इतने साल हो गए शादी को। चिपकना चिपकाना तो दूर, अब तो साहब से बात करने में भी हफ़्तों लग जाते हैं। अब वह चिपकने का दौर ख़तम हो गया है।”
एक दिन शाम को जब मैं ऑफिस से घर पहुंचा तो दरवाजा खोलते ही टीना मुझसे लिपट गयी और जोर शोर से रोने लगी। दर असल कुछ ही देर पहले टीना के पापा का फ़ोन आया की टीना के बड़े भाई का एक गंभीर एक्सीडेंट हुआ था और वह हॉस्पिटल में एडमिट थे। उनकी हालत नाजुक थी। टीना के भाई की माली हालत कोई ख़ास ठीक नहीं थी।
टीना का भाई उस समय दिल्ली से करीब ३५० किलो मीटर दूर राजस्थान में जयपुर से करीब ५० किलोमीटर दूर एक छोटे शहर में रहता था और कोई छोटीमोटी नौकरी करता था। वहाँ जाने के लिए कोई सीधी ट्रैन नहीं थी। हमारी पुरानी कार उतनी दुरी उन रास्तों पर बिना दिक्कत तय कर पाएगी उसका भरोसा मुझे नहीं था। हमने फ़ौरन तय किया की हम सराई कालेखां बस अड्डा चलेंगे और जो भी बस मिल जायेगी वह पकड़ कर टीना के भाई के पास सुबह तक पहुंचेंगे।
टीना ने सुषमा जी को यह समाचार दे दिया और कहा की हम कुछ दिनों के लिए जा रहे थे और घर की चाभी उनको दे कर जाएंगे। अगर वापस आने में देर हुई तो एकाद हफ्ते बाद घर की साफ़ सफाई करवा देना। सुषमा ने जब सेठी साहब को बताया तो फ़ौरन वह दोनों हमारे घर पहुंचे। मुझसे पूरी हकीकत समझने के बाद सेठी साहब ने मुझे पांच मिनट रुकने को कहा। सेठी साहब और सुषमा अपने फ्लैट में गए। उन्हें गए हुए मुश्किल से पंद्रह मिनट लगे होंगे की सेठी साहब वापस आ गए।
आते ही सेठी साहब ने कहा, “तुम्हें बस में जाने की कोई जरुरत नहीं है। मैं तुम्हारे साथ मेरी टोयोटा कार भेज रहा हूँ। तुम्हें कार चलाने के भी जरुरत नहीं। मैं मेरे ड्राइवर को भी तुम्हारे साथ भेज रहा हूँ। वह कार चला लेगा। तुम अपनी कार मुझे दे दो। मैं दिल्ली में ऑफिस जाने के लिए तुम्हारी कार यूज़ कर लूंगा।”
मैं कुछ आगे बोलता इसके पहले सेठी साहब ने मुझे एक तरफ ले जा कर कहा, “देखो मामला एक्सीडेंट का है। हॉस्पिटल आजकल बहुत महंगे हो गए हैं। तुम्हें कुछ रुपयों की जरुरत पड़ेगी।” सेठी साहब ने मेरे हाथ में दो हजार रुपयों के १०० नोटों का एक बंडल पकड़ा दिया और बोले, “रखलो तुम्हारे काम आएंगे।”
मुझे पता था की टीना के पिता और भाई की आर्थिक हालत कोई ख़ास ठीक नहीं थी और वह रुपये जरूर काम आएंगे। एक्सीडेंट के समाचार मिलते ही टीना ने सबसे पहले मुझे यही पूछा था की क्या हम कुछ रुपये ले कर जा सकते हैं? हमने घर में जो पचीस तीस हजार रुपये के करीब थे वह ले लिए थे। पर मैं जानता था की उससे काम नहीं चलेगा।
मैंने सेठी साहब से वह नोटों का बंडल वापस करते हुए कहा, “सेठी साहब यह मामला टीना की रिश्तेदारी का है, इसमें मैं कुछ बोल नहीं सकता। आप सीधे टीना से बात कीजिये।”
सेठी साहब ने टीना को पास बुलाया और वही बंडल टीना को पकड़ा कर बोले, “देखो टीना, मामला एक्सीडेंट का है। हॉस्पिटल आजकल बहुत महंगे हो गए हैं। तुम्हें कुछ रुपयों की जरुरत पड़ेगी। इन्हें रखलो तुम्हारे काम आएंगे। अगर जरुरत ना पड़े या बच जाए तो वापस कर देना। देखो मना मत करना।”
टीना ने मेरी और देखा। टीना की आँखों में आंसू उभर आये वह दर्शाता था की वह रुपयों की जरुरत कितनी थी। पर टीना ने रुपयों का बंडल सेठी साहब के हाथ में वापस देते हुए बोली, “यह मैं कैसे ले सकती हूँ? वैसे ही आपके हम पर बड़े एहसान हैं। मैं इन्हें ले नहीं सकती। हम लोगों ने कुछ रुपयों का इंतजाम किया है, बाकी देख लेंगे। वहाँ से भी कुछ ना कुछ इंतजाम हो जाएगा।”
सेठी साहब ने कहा, “देखो टीना जिद मत करो। अभी इसे ले लो बाद में बेशक वापस कर देना।”
टीना ने अपनी जिद पर अड़े रहते हुए कहा, “सेठी साहब मैं किस अधिकार से इन्हें लूँ? आप हमारे पडोसी हैं और पडोसी सबसे पहला और सबसे बड़ा होता है यह सच है पर आखिर हम एक दूसरे के क्या लगते हैं? आपने यह पैसे कुछ ना कुछ काम के लिए रक्खे होंगे। मैं नहीं चाहती की हमारी वजह से आपको कोई परेशानी हो। नहीं सेठी साहब मैं यह नहीं ले सकती।”
सेठी साहब ने जब यह सूना और महसूस किया की टीना ज़िद पर अड़ी हुई है और पैसे नहीं लेगी, तो एकदम भावुक हो गए। वह रुपयों का बंडल टीना से ले कर वह हमारे घर से बाहर निकलते हुए बोले, “टीना, राज मुझे माफ़ करना। टीना, में जानता हूँ की आप को मतलब आपके मायके वालों को इन पैसों की जरुरत है। मेरे पास यह रुपये रखे हुए हैं और मुझे अभी इनकी जरुरत नहीं है..
अगर ऐसे वक्त में अपने काम नहीं आये तो वह अपने कहाँ से हुए? मैंने आप दोनों का इतना करीबी और इतना अपना समझा था की टीना को तो मैं एक अधिकार से अपनी गर्ल फ्रेंड की तरह समझता था और उसको गर्ल फ्रेंड कह कर छेड़ता रहता था। पर आज मुझे पता चला की वह सब कही सुनाई बातें थी। ठीक है, अगर आप हमारे कुछ भी नहीं लगते और अगर आपको लगता है की हमारा आप पर और आपका हम पर कोई अधिकार नहीं है तो फिर तो आज से हमारा रिश्ता ख़तम..
जिस रिश्ते में अपनापन ना हो वह रिश्ता किस कामका? मैं तो वाकई में बेवकूफ था की समझ रहा था की हमारा एकदम करीब का रिश्ता है और आपका मुझ पर और मेरा आप पर एक विशेष अधिकार है। मैं सोचता था की हम एक दूसरे के सुख, दुःख, धन, प्यार सब कुछ शेयर कर सकते हैं। आज टीना ने यह पैसे लेने से मना कर यह जता दिया की हमारे रिश्ते की वाकई में कोई भी अहमियत नहीं है।”
टीना ने और मैंने देखा की इतने सख्त दिखने वाले सेठी साहब की आँखों में उस वक्त आंसू उमड़ पड़े। मैंने उससे पहले सेठी साहब को इतना भावुक होते हुए नहीं देखा था। जब सेठी साहब निराश और हताश हो कर हमारे घर से जाने लगे तो भाग कर टीना सेठी साहब के पास पहुंची। सेठी साहब से लिपट कर टीना बोली, “सेठी साहब आप क्या बात करते हैं? आप का हम पर पूरा हक़ है। मैंने आपका दिल दुखाया हो तो माफ़ करना।”
सेठी साहब के हाथ में से रुपयों का बंडल लेते हुए टीना बोली, “सेठी साहब, यह क्या कह रहे हैं आप? आगे से ऐसे शब्द मत बोलियेगा। आप का मुझ पर बल्कि हम दोनों पर पूरा हक़ है। आप मुझे गर्ल फ्रेंड कहते हैं ना? हाँ, मैं आपकी गर्ल फ्रेंड हूँ और हमेशा रहूंगी। मुझे आपकी गर्ल फ्रेंड होनेका गर्व है। आपका अधिकार है की बॉय फ्रेंड होने के नाते आप मुझसे जो चाहे जब चाहे कह सकते हैं और कर सकते हैं। पर प्लीज ऐसा मत कहिये की आपका हम पर कोई हक़ नहीं है। आपका हम पर पूरा हक़ है। मुझे मेरे कड़वे शब्दों के लिए माफ़ कर दीजिये प्लीज।”
सेठी साहब ने टीना की गीली आँखों से आंसू पोंछते हुए हंसने की कोशिश करते हुए कहा, “यह हुई ना गर्ल फ्रैंड वाली बात। चलो अब और कुछ मत बोलो और निकलो। ज्यादा पैसों की जरुरत पड़े तो मुझे फ़ोन करना। तुम्हारे या भाई साहब के अकाउंट में जमा करवा दूंगा। तुम जितने दिन रहो रहना। कार की चिंता मत करना।”
फिर सेठी साहब फिर मेरी और मुड़ कर हंस कर बोले, “जब वापस आओगे तो मैं मेरी कार ले लूंगा और तुम्हारी कार वापस कर दूंगा। तब तक तुम्हारी कार मेरे पास सिक्योरिटी के एवज में जमा रहेगी।”
सेठी साहब की बात सुन कर मेरी आँखों में से भी बरबस आंसू निकल पड़े। मैं उनके गले लग गया और बोला, “आपने तो आज हम को खरीद लिया। आप क्या बात करते हैं सेठी साहब। मेरा सब कुछ आपका ही तो है!”
करीब एक घंटे के बाद खाना खा कर हम सेठी साहब की कार में निकल पड़े। सेठी साहब के दिए हुए पैसे हॉस्पिटल का बिल चुकाने में और सेठी साहब की कार और ड्राइवर घर से हॉस्पिटल और हॉस्पिटल से दवाई इत्यादि लाने में, आने जाने में बहुत ही काम आ गए। टीना के भाई का ऑपरेशन कामयाब रहा और पांच दिन बाद हम वापस दिल्ली आ गये।
पर वापस आने पर हमारे और सेठी साहब के रिश्तों में आमूल परिवर्तन आ चुका था। आते ही टीना सुषमा के गले से लिपट गयी और रोती हुई बोली, “दीदी अगर तुमने हमारी यह ऐन मौके पर मदद नहीं की होती तो पता नहीं क्या हो जाता।”
सुषमा ने टीना को अपने से अलग कर सेठी साहब की और धकेलते हुए कहा, “शुक्रिया मेरा नहीं सेठी साहब का अदा करो। यह सब इन्हीं के कारण हुआ है। मैं तो सिर्फ उन्हीं के कहने के अनुसार कर रही थी।”
टीना मुड़कर सेठी साहब के पास गयी और सेठी साहब के हाथों को अपने हाथों में ले कर बोली, “सेठी साहब आप दोनों हमारे लिए दोस्त नहीं फ़रिश्ते साबित हुए हो। आप दोनों के कारण मेरे भाई की जान बच गयी। मैं पैसे तो चुकता कर दूंगी, पर इस एहसान का ऋण कभी चुका नहीं सकती।” उस समय मैंने मेरी बीबी की आँखों में सेठी साहब के लिए सच्चे प्यार और एहसानमंदी का इजहार देखा।
सेठी साहब के दिए हुए पैसे तो हमने चुकता कर दिए पर उस हादसे के बाद सेठी साहब से हमारी नजदीकियां तेजी से बढ़ने लगीं। जब मैं टूर पर नहीं होता था, तब करीब करीब हर हफ्ते या दो हफ्ते में एक बार, या तो हमारे घर में या उनके घरमें हम एक मूवी साथ में मिलकर जरूर देखते थे। उस दिन ड्रिंक्स और खाने का प्रोग्रम भी हो जाता था। ज्यादातर हम दोनों कपल अपनी अपनी बीबियों के साथ या तो ड्राइंग रूम में फर्श पर गद्दा बिछा कर उस पर लेट कर या तो बैडरूम में पलंग पर लेट कर मूवी देखते थे।
टीना के गाँव से वापस आने के एक या दो हफ्ते बाद एक बार ऐसे ही हम चारों मेरे घर के ड्राइंग रूम में गद्दे पर लेटे हुए थे की अचानक ही मेरे मुंह से निकल पड़ा, “सेठी साहब यार एक बात मेरी समझ में नहीं आयी। आपने इतनी कम जान पहचान में अपनी कार और इतने सारे पैसे हमें सौंप दिए, ऐसा कोई करता है क्या? आप कौनसी मिटटी से बने हो?”
मेरी बात सुन कर सेठी साहब उठ खड़े हुए। “अभी एक मिनट में आता हूँ” कह कर वह हमारे घर का दरवाजा खोल कर बाहर निकले। हम सब एक दूसरे का मुंह देखते ही रहे की सेठी साहब अपने घर से दुर्गा माँ की एक फोटो ले कर हमारे सामने उपस्थित हुए। देवी माँ की तस्वीर सामने एक स्टूल पर रख
देवी माँ को प्रणाम करते हुए सेठी साहब बोले, ” यह माँ दुर्गा हमारी कुलदेवी है। देखो भाई, मेरे लिए यह देवी माँ से कोई ज्यादा नहीं। मैं इस देवी माँ के सामने यह सौगंध खा कर कहता हूँ की आज इसी वक्त से तुम दोनों को मैं अपना क़बूल करता हूँ। इसका मतलब यह हुआ की मेरा जो भी कुछ है वह तुम्हारा है। तुम्हें उसे मांगने की जरुरत नहीं। तुम उसे बगैर मांगे ले जा सकते हो।”
हम तींनों सेठी साहब की यह बात स्तब्ध से सुनते रहे। यह अचानक सेठी साहब को क्या हो गया? कमरे में वातावरण एकदम गंभीर हो गया। माहौल को कुछ हल्का करने के लिए सेठी साहब की बात सुन कर टीना कुछ शरारती मूड में मुस्कुराती हुई बोली, “सेठी साहब, आप बगैर सोचे समझे ऐसे सौगंध मत खाओ। आप मेरे पति को नहीं जानते। वह बड़े चालू हैं। कहीं आपसे वह ऐसी चीज़ ना मांगलें जो आप दे ना पाओ।”
टीना की बात सुन कर सेठी साहब टीना की और मुड़ कर बोले, “टीना मैं जानता हूँ, तुम्हारा इशारा तुम्हारी भाभी सुषमा की और है।” फिर हलका सा हँसते हुए बोले, “भाई साहब जब चाहें सुषमा की सहमति ले कर उसे उड़ा ले जाएँ। मुझे कोई शिकायत नहीं होगी। मैं जो कह रहा हूँ उसमें सुषमा की भी सहमति है। क्यों सुषमा, क्या मैं गलत कह रहा हूँ?”
सुषमाजी यह सुन कर ताली बजाते हुए टीना का हाथ थाम कर बोली, “टीना यह बढ़िया है। तुम्हारे पति मुझे और मेरे पति तुम्हें उड़ा लेजाने का प्लान करने में लग गए। चलो ऐसे ही सही, इस बहाने में हम दोनों को हवाई जहाज में घूमने का अवसर तो मिलेगा।”
तब सेठी साहब ने कुछ गंभीर आवाज में ख़ास कर टीना की और देख कर कहा, “देखो मुझे गलत मत समझना। यह बात मैंने अपनी तरफ से कही है। मैंने यह कहा है की हमारा सब कुछ सांझा है। मतलब मेरा जो है वह तुम्हारा है। पर इसका मतलब यह नहीं की मेरी नजर में तुम्हारा सब कुछ मेरा है। यह भूल कर भी मत सोचना की मैं तुम पर या जो तुम्हारा है उस पर कोई अधिकार जमाने की कोशिश कर रहा हूँ।“
सेठी साहब की बात सुन कर टीना ने मेरी और तीखी नजर से देखा। मैं टीना का इशारा समझ गया। मैंने खड़े हो कर सेठी साहब के हाथ थाम कर माँ दुर्गा को प्रणाम किया और कहा, “क्या सेठी साहब, यह आप क्या कह रहे हो? एक तरफ आप माँ दुर्गा की कसम खा कर कहते हो की हमारा सब कुछ सांझा है, और दूसरी तरफ तेरा मेरा करते हो? देखो सेठी साहब, माँ दुर्गा की कसम खा कर मैं भी कहता हूँ की जैसा आप सोचते हैं बिलकुल वैसा ही हम भी सोचते हैं..
यह सच है की हमारे पास उतना धन नहीं जितना भगवान् ने आपको दिया है। पर मेरा और टीना आपके हैं और हमारा सब कुछ आपका है और अगर हम लोग आपके लिए कुछ भी काम आये तो उससे ज्यादा ख़ुशी हमें और कुछ नहीं होगी। टीना पर आप का भी उतना ही हक़ है जितना मेरा। आप उसे परायी मत समझना। क्यों टीना, क्या मैंने कुछ गलत कहा?” मैंने टीना की और मुड़कर टीना से पूछा।
टीना ने मेरी बात का जबरदस्त समर्थन करते हुए कहा, “बिलकुल सेठी साहब, सिर्फ हमारा सब कुछ ही नहीं, मैं और राज हम दोनों भी आपके ही हैं। आप ने हमें अपने प्यार और अपनापन से खरीद लिया है।”
सुषमाजी ने उसी हंसी मजाक के टोन में कहा, “टीना अगर तुम सेठी साहब की हो तो मैं कहाँ जाउंगी?”
मैंने हँसते हुए कहा, “सुषमाजी, अगर टीना सेठी साहब की हुई तो आप मेरी हुई। क्यों सेठी साहब आप को कोई एतराज तो नहीं?”
सेठी साहब हंस कर बोले, “वाह भाई यह तो कमाल ही हो गया। हमारी बीबियाँ तो सांझा हो गयीं? जब आप लोगों ने मिल कर यह तय कर ही लिया है तो मैं बिच में बोलने वाला कौन हूँ?”
ऐसे ही हंसी मजाक, छेड़छाड़ और हंसी मजाक में ही इशारों ही इशारों में कुछ गंभीरता का सिलसिला हम दोनों कपल के बिच शुरू हो चुका था। एक बार हमारे बेटे की स्कूल में पैरेंट टीचर मीटिंग में टीना और मुझे जाना था। स्कूल घर से थोड़ा दूर था। उस समय मैं टूर पर गया हुआ था। जब टीना को पता चला तो टीना ने मुझे फ़ोन किया की क्या मैं उस दिन आ सकूंगा?
मैंने कहा की मैं नहीं आ पाऊंगा पर अगर सेठी साहब फ्री हों तो उन्हें ले कर टीना जा सकती है। मैंने भी सेठी साहब को फ़ोन करके पूछा की अगर वह जा सकें तो टीना को जाने आने में दिक्कत नहीं होगी और स्कूल में भी अच्छा लगेगा। जब टीना ने सेठी साहब से बात की तो सेठी साहब फ़ौरन जाने के लिए राजी हो गए।
स्कूल में पहुँचते ही हमारा मुन्ना सेठी साहब को देख कर भाग कर उनसे लिपट गया। सेठी साहब टीचर से मुन्ना के प्रोग्रेस के बारेमें बात करने लगे। टीना बेचारी सेठी साहब के साथ बैठी हुई उन्हें देखती ही रही।
टीचर भी सेठी साहब को ही मुन्ना के पापा समझ कर सारी बातें करते रहे। जब मीटिंग खतम हुई तो टीचर ने टीना को मुबारकबाद देते हुए कहा की अक्सर माँ ही अपने बच्चों के बारे में बात करतीं हैं। पापा को बच्चों के बारे में ज्यादा मालुम नहीं होता। पर तुम्हारे हस्बैंड तो बेटे के स्टडी बारे में कितना इंटरेस्ट ले रहे हैं। उस समय टीना की टीचर को यह कहने की हिम्मत नहीं हुई की सेठी साहब दर असल मुन्ना के पापा नहीं एक पडोसी थे।
स्कूल से बाहर निकलते हुए जब टीना ने सेठी साहब से यह बात कही तो सेठी साहब ठहाका मार कर हंस पड़े और बोले, “चलो, भले ही गलत फहमी में कुछ देर के लिए ही सही पर इस बहाने मेरा तुम्हारे बॉय फ्रेंड से हस्बैंड में प्रमोशन हो गया।” सेठी साहब की बात सुन कर टीना के गाल शर्म के मारे लाल हो गए।
टीना कहाँ चुप रहने वाली थी? टीनाने कहा, “सेठी साहब बॉयफ्रेंड बनकर रहने में ही फायदा है। पूछो कैसे?”
सेठी साहब ने पूछा, “कैसे?”
टीना ने कहा, “बॉयफ्रेंड के पास गर्लफ्रेंड को एन्जॉय करने का अधिकार तो होता है पर कोई जिम्मेदारी नहीं होती। जब की हस्बैंड के पास अधिकार के साथ साथ बड़ी जिम्मेदारी भी होती है। तो आपको तो बॉयफ्रेंड बनकर रहने में ही फायदा है। बोलो आप क्या बनोगे?”
सेठी साहब ने टीना का हाथ अपने हाथ में लिया और टीना की आँखों में आँखें डाल कर बड़ी गंभीरता से बोले, “टीना तुमने मुझे शायद अब तक ठीक तरहसे नहीं समझा। मैं जिम्मेदारियों से भागनेवालों में से नहीं हूँ। बॉयफ्रेंड या हस्बैंड का तुम्हें एन्जॉय करने का अधिकार जो तुम मुझे देना चाहती हो उसके बिना भी मैं तुम्हारी सारी जिम्मेदारियां लेने के लिए तैयार हूँ। तुम एकबार आजमा कर तो देखो।”
सेठी साहब की बात सुन के एक बार टीना शर्म के मारी पानी पानी हो गयी। अपनी नजरें झुका कर कुछ दबी सी आवाज में जवाब देते हुए टीना ने कहा, “मैंने एक बार नहीं कई बार आजमा कर देखा है आपको सेठी साहब। हरबार आप अव्वल नंबर से पास हुए हो। आप मेरे सिर्फ हस्बैंड ही नहीं, आप मेरे सब कुछ बनने के लायक हो। पर हाँ, आपने मुझे कभी आजमाया नहीं सेठी साहब। मुझे आपके लिए कुछ करने का मौक़ा ही नहीं मिला। इसका मुझे अफ़सोस है।”
सेठी साहब ने टीना का हाथ थाम कर कहा, “देखो समय समय की बात है। आज मैं आपके काम आया, कल क्या पता मुझे आपकी जरुरत पड़े? वक्त का किसी को पता नहीं होता।”
टीना ने गाडी चला रहे सेठी साहब की जांघ पर एक हाथ रख कर कहा, “सेठी साहब, अगर कोई ऐसा वक्त आया की आप को हमारी मदद की जरुरत पड़े तो मैं आपको वचन देती हूँ की मेरी कोई भी चीज़ तो क्या, मेरी जान भी देनी पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगी।”
सेठी साहब ने भावुक टीना का हाथ थामा और अपने हाथ में रखा। स्कूल से वापसी के दरम्यान टीना अपना एक हाथ सेठी साहब के हाथ में रखे हुए सेठी साहब के हाथ को अपने दूसरे हाथ से सँवारती रही। शायद उसका सेठी साहब को सम्पूर्ण आत्मीयता का संदेश देने का यह एक तरिका था।
जब टीना ने मुझे उसकी सेठी साहब से हुई इस बातचीत के बारे में बताया तो मैंने टीना को खिंच कर बाँहों में ले लिया और उसके के होँठों को चुम लिया और कहा, “वाकई में तुमने बहुत ही अच्छा किया। मैं आज तुमसे बहुत खुश हूँ।”
मेरी बात सुन कर मेरी बीबी के गाल शार्म से लाल हो गए। अपने आप को सम्हालते हुए हलका सा मुस्कुराती हुई वह बोली, “मैं मेरे पति की पसंद नापसंद अच्छी तरह जानती हूँ।”
एक बार नेट पर मैंने एक पोर्न मूवी देखि। वैसे स्टोरी का तो कोई ख़ास प्लॉट नहीं था पर वीडियो का टॉपिक मेरे मतलब का था। उसमें एक बीबी को उसका पति अपने दोस्त से कैसे चुदवाता है वह बताया था। वीडियो में खुली चुदाई के सिन थे। मेरे मन में आया की इसे टीना को तो जरूर दिखाना चाहिए।
उसी दिन रात को मैंने टीना से कहा की एक पोर्न मूवी है और उसे देखेंगे। टीना ने कोई जवाब नहीं दिया। इसका मतलब था की वह देखने के लिए तैयार थी। सोने के वक्त मैंने ड्राइंग रूम में टीना को ले जा कर टीवी स्क्रीन पर वह वीडियो की लिंक क्लिक की और वीडियो शुरू हो गया।
उस पोर्न मूवी में कोई ख़ास कहानी तो थी नहीं। बस एक अमेरिकन फौजी दोस्त जो अफ़ग़ानिस्तान के लड़ाई के मैदान से छुट्टी पर वापस आया होता है तब अपने एक ख़ास करीबी दोस्त के घर जाता है वहाँ वह दोस्त की बीबी को कैसे चोदता है उसके बारे में वीडियो था।
शाम को जब दोस्त, दोस्त की पत्नी और फौजी साथ में ड्रिंक करने बैठते हैं तब दोस्त के बार बार कहने पर फौजी, दोस्त को अपनी कहानी सुनाता है। फौजी की एक सुन्दर गर्ल फ्रेंड थी जिससे फौजी बड़ा ही प्यार करता था। जब फौजी कुछ दिनों की ट्रेनिंग के बाद गर्ल फ्रेंड के पास वापस लौटता है तो अपनी गर्ल फ्रेंड को किसी और से चुदते हुए देख लेता है।
जब फौजी यह देखता है तो उसे बाड़ा आघात पहुंचता है और वह अफ़ग़ानिस्तान की पोस्टिंग ले लेता है। वहाँ अपनी जान की परवाह किये बिना वह खूब वीरता से लड़ कर कई दुश्मनों के सैनिकों को मार कर वह अनेक मैडल पाता है। पर गर्लफ्रेंड से धोखा खाने के कारण फौजी को जिंदगी से कोई लगाव नहीं रहा था और उसने दोस्त को कहा की अगली लड़ाई में वह अपनी जान देश के लिए कुर्बान करना चाहता था।
ऐसी करुणा भरी कहानी सुन कर बीबी का मन पसीज जाता है। फौजी का दोस्त भी अपनी बीबी को बार बार फौजी की विडम्बना का हवाला दे कर उसे फौजी के पास जा कर फौजी को सांत्वना देने के लिए कहता है। फौजी वैसे भी बड़ा शशक्त और तगड़ा मर्द था जिससे पत्नी भी आकर्षित हुई थी।
कुछ शराब का असर और कुछ अपने पति के उकसाने पर पत्नी वह फौजी दोस्त से आकर्षित हो कर फौजी के पास बैठ कर उसका हाथ ले कर सहानुभूति जताती है तो फौजी अपने दोस्त की पत्नी को खिंच कर अपनी बाँहों में ले लेता है।
फौजी और दोस्त की पत्नी कमर से कमर मिलाकर चिपक कर कामुक डांस भी करते हैं और आखिर में शर्माती, मुस्काती पत्नी फौजी की बाँहों में चली जाती है। धीरे धीरे दोस्त के बार बार उकसाने पर फौजी अपने दोस्त के सामने ही दोस्त की पत्नी के साथ छेड़खानी करते हुए एक के बाद एक कपडे उतार कर दोस्त की पत्नी को दोस्त के सामने ही चोदने लगता है।
कुछ ही देर में दोस्त भी नंगा हो कर अपनी पत्नी को फौजी के साथ मिलकर चोदना शुरू करता है। इस तरह रातभर फौजी और पति दोनों मिलकर बीबी की खूब चुदाई करते हैं।
जब मैंने वह मूवी टीना के साथ हमारे ड्राइंगरूम में फर्श पर गद्दा बिछा कर उस पर लेटे हुए पूरी देखि तो टीना का हाल देखने लायक था। टीना मुझसे चिपक कर कोई भयानक डरावनी मूवी देख रही हो ऐसे बड़ी बड़ी आँखें खोल कर बड़े ध्यान से देख रही थी। देखते हुए वह इतनी उत्तेजित नजर आ रही थी जैसा मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।
मूवी देखने के बाद टीना मुझसे बार बार पूछ रही थी, “क्या ऐसा वाकई में होता है? क्या ऐसा हकीकत में हो सकता है? क्या कोई पति अपनी पत्नी को दूसरे मर्द से चुदवाते हुए देख सकता है? क्या कोई पत्नी अपने पति के सामने किसी गैर मर्द से चुदवाने के लिए राजी हो सकती है?”
तब मैंने मैंने मेरी बीबी टीना को अपनी बाँहों में उठा कर बैडरूम में ले जा कर उसे पलंग पर रखते हुए टीना की आँखों में आखें डाल कर कहा, “अगर तुम किसी मर्द से चुदवाना चाहो तो मैं तुम्हें किसी और मर्द से चुदती हुई देख सकता हूँ। पति पत्नी में सही अंडरस्टैंडिंग हो, पत्नी को पति में पूरा विश्वास हो और अगर पत्नी अपने मन पसंद किसी गैर मर्द से चुदवाना चाहे तो क्यों नहीं चुदवा सकती? तुम चुदाई के नाम से इतनी डरती क्यों हो? जानेमन तुम कौनसी दुनिया में जी रही हो? आज कल तुम देखती नहीं? टीवी पर और कई जगह खुले आम मर्द और औरत सेक्स के सिन करते हैं? इतना ही नहीं, वह अपनी शक्ल भी नहीं छिपाते। बल्कि कई तो अपना नाम भी जाहिर करते हैं। जो पोर्न फ़िल्में करते हैं वह काफी फेमस हो जाते हैं..
हिंदी फिल्मों में भी तो पोर्न फिल्म के कलाकार काम करके खूब पैसे कमाते हैं। खैर पैसों की बात छोडो, अपनी मर्जी से भी अगर पत्नी किसी मर्द से आकर्षित होती है और उससे चुदवाना चाहती है और पति अगर पत्नी के मन की बात समझता है तो उसे ख़ुशी से अपनी पत्नी को उस मर्द से चुदवाने इजाजत देनी चाहिए। वैसे ही पत्नी भी पति को सहमति देती है। चोदने चुदवाने के कारण उन पति पत्नी में मन मुटाव नहीं होना चाहिए बल्कि उन अनुभवों को याद कर, उन की बात कर पति पत्नी अपनी चुदाई को ज्यादा एन्जॉय करना चाहिए।”
मेरी बात सुनकर टीना ने कहा, “अच्छा? पर वह तो सब तो हाई सॉसाइटी में होता होगा। मध्यम क्लास के परिवार में ऐसा कहाँ होता है?”
तब मैंने मेरी बीबी को कहा, “सुषमाजी यही तो कह रही थीं तुम्हें? और देखो हमारे पड़ोस में ही शादीशुदा मर्द और औरतों के आपसी में गैरों से सम्बन्ध के कई किस्से हैं जो मैं अगर सुनाने बैठ गया तो डार्लिंग,तुम हैरान रह जाओगी। करते सब हैं, पर चोरी चुपके। कोई मर्द या औरत जाहिर थोड़े ही करेंगे की मैं फलां फलां को चोदता हूँ या उस से चुदवाती हूँ?”
मेरी बात सुनकर वह दांतो तले उंगली दबा गयी, और बोली, “बापरे! यह सब तो मुझे पता ही नहीं था।”
मेरी बात सुनकर टीना कुछ हैरानगी से मुझे देखती रही। मैंने कहा, “देखो मैं एक एक्ज़ाम्पल के तौर पर बात कर रहा हूँ। सेठी साहब के साथ आज हम इतना घुलमिल गए हैं तो क्या तुम्हें नहीं लगता की हमारे बिच भी ऐसा कुछ कभी हो सकता है? क्या तुम्हें नहीं लगता की कभी कोई नाजुक वक्त में मसाज करवाते हुए सेठी साहब तुम्हें अपनी बाँहों में ले लें और तुम भी उस समय एक इमोशन के बहाव में बह कर उनको रोक ना पाओ..
और फिर एक से दो और दो से तीन होते हुए बात यहां तक बढ़ जाए की बदन और कपड़ों का कोई होशोहवाश ही ना रहे और जो हम सोचते हैं नहीं हो सकता वह हो जाए? क्या यह असंभव है? देखो मैं कोई इल्जाम नहीं लगा रहा। पर मुद्दा यहाँ यह है की क्या ऐसा हो सकता है या नहीं। मैं कहता हूँ हो सकता है। तुम बोलो, क्या ऐसा नहीं हो सकता?”
मैने देखा की मेरी बात पूरी तरह सुनकर मेरी बीबी मुझ से आँखें चुराती हुई नज़रे नीची कर बोली, “होने को तो कुछ भी हो सकता है, पर क्या ऐसा होना ठीक है?”
मैंने कहा, “क्यों ठीक नहीं है? अब ज़माना बदल गया है। आखिर जब जवाँ मर्द औरत एक दूसरे के इतने करीब हों और कुछ ऐसा माहौल बन जाए तो सेक्स हो ही जाता है। अगर तुम्हारे और सेठी साहब के बिच में क्या ऐसा नहीं हो सकता? और अगर ऐसा हो जाए तो कौनसा आसमान टूट पडेगा? अरे जब तुमने शादी से पहले एक मानसिक बहाव में बह कर उस शिक्षक से शारीरिक सम्बन्ध जोड़े तो कौनसा आसमान टूट पड़ा था? आज हम उस बात के बारे में कहाँ कुछ सोचते हैं?”
मेरी बात सुन कर टीना जैसे कुछ देर तक सन्न सी मुझे बड़ी बड़ी आँखों से देखती रह गयी। कुछ बोल नहीं पायी। कुछ देर बाद जब मैं भी टीना के जवाब की उम्मीद करता हुआ उसे देख रहा था तब मेरी बात का सीधा जवाब देने का बजाय मुझ पर बिगड़ती हुई टीना बोली, “वह शादी के पहले की बात थी। अब मैं शादीशुदा हूँ।”
मैंने कहा, तो क्या हुआ? शादी के बाद तुम्हारे सींग निकल आये हैं क्या? तुम तो वही हो जो पहले थी। खैर तुम्हारी बात भी गलत नहीं है। पहले तुम्हें अकेले ही ऐसा डिसिशन लेना होता था। अब तुम्हें पति का भी ख्याल रखना पड़ता है। पर जब मैं तुम्हारे साथ हूँ और अगर मुझे कोई एतराज नहीं हो और मैं ही तुम्हें सेठी साहब से चुदवाने के लिए कहता हूँ तो फिर तुम्हें परेशानी किस बात की? सच तो यह है की जवानी चार दिन की है।
जिंदगी में ऐसे साथीदार बड़ी ही मुश्किल से मिलते हैं जिन पर पूरा भरोसा किया जा सकता है, जिन से चुदाई के सम्बन्ध हो सकते हैं। मैं तो मानता हूँ की सही साथीदार हो तो एन्जॉय करने का ऐसा मौक़ा छोड़ना नहीं चाहिए। देखो तुम्हीं कह रही थी की सुषमा और सेठी साहब इस वक्त बच्चे को लेकर एक अजीब सी उलझन में फंसे हुए हैं..
अगर इस वक्त हमने उनका साथ दिया तो उनकी समस्या भी सुलझ जायेगी। वैसे ही उनके हम पर बड़े अहसान हैं और अगर हम थोड़ा कुछ कर सकें तो उनकी जिंदगी बन जायेगी, और हम एन्जॉय भी करेंगे। मैं तुम्हें वादा करता हूँ की अगर ऐसा कुछ भी हुआ तो तुम्हें चिंता करने की जरुरत नहीं।
ऐसा देख कर मुझसे ज्यादा खुश और कोई नहीं होगा। यह मेरा तुम्हें वचन है। अभी हम मिले हैं, अगर कहीं हमारा अथवा उनका ट्रांसफर हो गया तो फिर बिछड़ जाएंगे। यह जिंदगी छोटी है। पता नहीं कितनी देर हम साथ में रहेंगे। तुम मानती तो हो ना की उनसे से हम सब कुछ शेयर कर सकते हैं?”
टीना ने मुंह टेढ़ा कर कटाक्ष में कहा, “ठीक है यार, बस भी करो। देखो यह सारी बातें हमारे बस में नहीं। जैसा तुमने कहा माहौल और मूड़ पर सब आधारित है। जो होगा जब होगा होगा। अब मैं यह समझ गयी की तुम क्या चाहते हो। तुम्हें मौक़ा मिला तो सुषमाजी को चोदने की इजाजत मैं तुम्हें देती हूँ बस? यार जो करना है करो पर इसका ढंढेरा पीटने की क्या जरुरत है?”
मैंने कहा, “मैं ढंढेरा नहीं पिट रहा बस सिर्फ यही कह रहा हूँ की जब सेठी साहब ने डार्लिंग कहा तब तुम जैसे बिदक गयी वैसे अगर सेठी साहब और कोई मरदाना हरकत करे या तुम्हें जकडले, बूब्स सेहला दे या किस करले तो बिदकना मत। अब तो हम ने सब शेयर करने की बात मानी है तो तुम भड़क मत जाना या पीछे मत हट जाना। तुम जानती हो सेठी साहब कितने सेंसिटिव हैं।”
टीना ने कुछ आत्मविश्वास दिखाते हुए कहा, “तुम बेकार परेशान हो रहे हो। उसकी चिंता तुम मत करो। यह बात मैं तुमसे ज्यादा अच्छी तरह जानती और समझती हूँ और सेठी साहब को भी मैं अच्छी तरह से हैंडल कर सकती हूँ। सेठी साहब का मेरे साथ मरदाना हरकतें करना मेरे लिए कोई नयी बात नहीं है। पर हाँ मुझे एक बात बताओ, मानलो अगर सेठी साहब ने मेरे साथ कोई ऐसी वैसी हरकत की और कुछ इधरउधर हो गया तो तुम्हें जलन तो नहीं होगी ना? फिर बाद में शिकायत मत करना।”
टीना की जुबान से जब यह निकल ही गया तब मुझे तसल्ली हो गयी की आखिर बात आगे बढ़ सकती है, अगर सेठी साहब कुछ करें तो। मैंने कहा, “कमाल है, मैं ही तुम्हें कह रहा हूँ की आगे बढ़ो और मुझसे ही तुम सवाल कर रही हो? मुझे कोई शिकायत नहीं, मुझे तो बल्कि ख़ुशी होगी।”
इस बात के तीन चार दिन के बाद की बात है। एक दिन ऑफिस से घर लौटते हुए मुझे टीना का फ़ोन आया। उसे फिर से वही पीठ में दर्द और चक्कर आ रहे थे। मैंने फ़ौरन सेठी साहब को फ़ोन किया और टीना के दर्द के बारे में बताया और कहा की वह टीना को फ़ौरन अटेंड करें। तक़दीर से सेठी साहब अपने घर पहुंचे ही थे। मेरा फ़ोन पाते ही वह टीना के पास जा पहुंचे।
मुझे घर पहुँचते काफी देर हो गयी। मैं जब घर पहुंचा तो सेठी साहब घर से टीना का मसाज कर बाहर निकल रहे थे। मैंने दरवाजे की बेल बजाई। कुछ ही देर में टीना ने दरवाजा खोला। टीना के पीछे सेठी साहब भी दिखाई दिए। सेठी साहब ने आपने दोनों हाथ उठाते हुए कहा, “तुम्हारी पत्नी की मैंने जो सेवा करनी थी की। अब वह एकदम ठीक है।”
उस रात को सब काम निपटा कर जब टीना सोने को आयी तो मैं बड़े आश्चर्य से उसे देखता ही रहा। टीना की आँखों में मुझे वह उन्माद और कामवासना का शुरुर नजर आ रहा था जो शादी के बाद कुछ महीनों तक मैंने एन्जॉय किया था। टीना के चेहरे के भाव से और उसके पहनावे से यह साफ था की उस रात उस पर काम वासना का उन्माद छाया हुआ था। जाहिर था उस रात वह मुझसे बेतहाशा चुदवाना चाहती थी। टीना ने एक छोटी सी नाइटी पहन रक्खी थी और अंदर कुछ भी नहीं पहना हुआ था।
बैडरूम की बत्ती बुझा कर जब मेरी बीबी मेरे करीब आयी तो लेटने के बजाए वह मुझ पर चढ़ गयी और बड़ी शिद्दत से मुझसे लिपट कर पागल की तरह मुझे चूमने लगी और बड़े प्यार से बहकी बहकी आवाज में अश्पष्ट शब्दों में मेरे कान में कभी मुझे “जानू’ तो कभी “माय डार्लिंग” “माय बेबी” कह कर मुझे उकसाने लगी। जाहिर था की मसाज के दरम्यान कुछ ऐसा हुआ था जिसके कारण मेरी बीबी काफी उत्तेजित हो चुकी थी और उसे अपनी चूत की खुजली को कैसे भी जल्द से जल्द शांत करना था।
मेरी बीबी की नाइटी को उसके बदन से फारिग कर मेरी बीबी के नंगे बदन को मैं अपने हाथों से महसूस करने लगा। टीना ने भी मेरे पाजामे का नाड़ा खोल मेरे खड़े सख्त लण्ड को अपनी उँगलियों में लिया और उसे सहलाने लगी।
टीना एक चुदासी कुतिया की तरह मुझसे चुदवाने के लिए बेताब हो रही थी। यही मौक़ा था की मैं मेरी बीबी की उत्तेजना को और भड़काऊं और टीना को सेठी साहब से चुदवांने के बारे में बात करके मेरी बीबी के मन की बात समझने की कोशिश करूँऔर यह भी जानने की कोशिश करूँ की उस शाम कुछ हुआ की नहीं?
मैंने मेरी बीबी की टाँगीं चौड़ी कीं और उनके बिच मेरा सर डालकर मैं अपनी जीभ से टीना की चूत की पंखुड़ियों के बिच से रिस रहे स्त्री रस का आस्वादन करने लगा। मेरी जीभका स्पर्श महसूस करते ही टीना बोल उठी, “क्या करते हो? ऊपर चढ़ जाओ और मुझे चोदो प्लीज?”
मैंने पूछा, “क्या बात है? आज मेरी तक़दीर अचानक ही कैसे खुल गयी? आज मेरी रानी चुदाई के लिए इतनी बेताब कैसे है जी? कुछ बात तो है।”
टीना कुछ शर्माती हुई बोली, “हाँ, बात तो है। बात ही कुछ ऐसी है जी। पर तुम पहले मुझे मत तड़पाओ। अंदर डालो और चोदो मुझे तो बताऊँ। सुनोगे तो तुम्हारा जोश भी बढ़ जाएगा।”
मैंने पूछा, “अच्छा? बताओं ना जानेमन ऐसी क्या बात हुई?” हालांकि मुझे शायद कुछ आईडिया था की मेरी बीबी मुझे क्या कह सकती है।
टीना ने मुझे लिटा कर मेरी टांगों के बिच में जा कर मेरे लण्ड को अपने हाथों में पकड़ा और मेरे लण्ड को अपने मुंह में ले कर वह बड़ी शिद्दत से चुसने लगी। अपना मुंह ऊपर निचे कर वह मेरे लण्ड को उस रात जबरदस्त वी.आई.पी. ट्रीटमेंट दे रही थी। मुझे इतना ज्यादा सुख बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मैंने पूछा, “री, अब बताओ भी आखिर क्या हुआ?”
टीना एकदम मेरे पास आयी और मेरे लण्ड से मुंह सटाकर बोली, “तुम कहते थे ना, की आखिर सेठी साहब भी एक मर्द हैं। आज उन्होंने अपनी मर्दानगी दिखा दी।”
टीना की बात सुनकर मेरी जान हथेली में आ गयी। मैंने आश्चर्य से पूछा, “क्या कहती हो? क्या सेठी साहब ने तुम्हें चोद दिया?”
टीना एकदम गुस्से में बोली, “क्या बकवास करते हो? ऐसा कुछ नहीं हुआ। अरे उन्होंने अपनी मर्दानगी मतलब मर्दों वाली हरकतें की आज मेरे साथ।”
मैंने पूछा, “अच्छा? क्या किया उन्होंने?”
टीनाने मुझे उस शाम हुई सारी कहानी शब्दशः सुनाई। मेरी पत्नी की कहने से मुझे यह महसूस हुआ की उसने कुछ भी नहीं तोडा मरोड़ा और सारी कहानी जैसे हुई थी वही मुझे कही।
टीना ने कहा, “आज जब मैंने तुम्हें फ़ोन किया तब मुझे बड़ा जबरदस्त दर्द हो रहा था। मुझसे बैठा नहीं जा रहा था। मेरी हालत बहुत खराब थी। तुमने फ़ौरन फ़ोन कर सेठी साहब को बताया और वह दो ही मिनट में आ पहुंचे। तुम तो जानते ही हो की जब मुझे दर्द होता है तो मैं कैसे तड़पती हूँ। सारे कपडे निकाल फेंकने का मन करता है।“ आगे टीना ने कहा उसे सुनकर मेरा लण्ड भी खड़ा हो गया।
सेठी साहब ने आते ही टीना की हालत देखि। टीना कभी लेट जाती तो कभी आधी बैठती थी। पीठ कमर और छाती में शूल की तरह जो दर्द हो रहा था उससे तंग आकर अपनी साडी उसने निकाल दी थी, की शायद उससे कुछ आराम मिले।
टीना के बाल बिखरे हुए थे, कपाल और गर्दन से पसीने की धार जैसे बह रही थी। ब्लाउज और ब्रा गीले होने के कारण टीना के खूबसूरत मम्मे (स्तन मंडल) की झाँखी हो रही थी। टीना के स्तनोँ के निप्पल की श्यामल रूपरेखा दिखाई दे रही थी। सेठी साहब ने आते ही सबसे पहले ही टीना के स्तनोँ को और निप्पलों को जब इतने साफ़ अंदाज में पहली बार देखा तो उनके भी पसीने छूट गए।
यह शायद पहली बार हो रहा था की सेठी साहब किसी सुन्दर औरत को फिजियोथेरपी करते हुए इतने अधिक उत्तेजित हुए हों। पर टीना का उस समय के रूप का दर्शन अद्भुत्त था। ऐसा लगता था जैसे कोई कामपीड़ित स्त्री किसी कामदेव के सामने कामातुर होकर रतिक्रीड़ा की इच्छा से बल खाती हुई उपस्थित हुई हो। पसीने के कारण टीना का ब्लाउज भी गिला हो रहा था।
टीना को देखते ही बरबस सेठी साहब का लण्ड उनकी निक्कर में हलचल करने लगा। बड़ी मुश्किल से उसे सम्हालते हुए सेठी साहब ने टीना को अपनी दोनों बाँहों में उठा लिया और पहले बैडरूम में खुद पलंग पर बैठे और फिर टीना को अपने करीब आगे बिठाया। ऐसा लगता था जैसे सेठी साहब ने टीना को अपनी गोद में बिठाया हो।
मैंने पूछा, “क्या बात करती हो? सेठी साहब ने तुम्हें अपनी गोद में बिठा दिया?”
टीना ने मेरी आँखों में आँखें डाल कर जैसे कहीं मैं कोई शक तो नहीं कर रहा हूँ ऐसे मेरी और देखा और बोली, “हाँ यार, जब गर्दन और पीठ पर मसाज करना होता है तो ऐसे ही बैठना पड़ता है ना? एकदम गोद में नहीं पर लगभग ऐसे ही जैसे गोद में हूँ। मेरा पिछवाड़ा बिलकुल उनके उसके ऊपर टिका हुआ था।”
मैंने मेरी बीबी को उकसाते हुए पूछा, “तुम्हारा पिछवाड़ा उनके उसके ऊपर टिका था, मतलब?”
टीना ने हवा में हाथ उठाकर अपनी हताशा जताते हुए कहा, “अरे यार, तुम तो मुझसे खुल्लमखुल्ला बुलवा कर ही रहोगे! मेरे कहने का मतलब था की मेरी गाँड़ उनके लण्ड पर टिकी हुई थी।”
मैंने कहा, “ओके, चलो आगे बढ़ो। फिर क्या हुआ?”
टीना ने जारी रखते हुए कहा, “राज इतना दर्द होते हुए भी जब ऐसा हुआ तो मैं वाकई में घबड़ा गई, क्यूंकि मेरे गोद में बैठते ही उनका वह एकदम खड़ा होने लगा।”
मैंने टीना को चिढ़ाने के लिए पूछा, “वह कौन? कौन खड़ा हो गया?”
टीना ने घूंसा मारते हुए चिढ कर कहा, “तुम जानते नहीं क्या खड़ा हो गया? मुझे चिढ़ाओ मत। मैं वैसे ही परेशान हूँ तुम और मत परेशान करो मुझे।”
मैंने कहा, “तो ठीक है, बोलो ना की सेठी साहब का लण्ड खड़ा हो गया? उसमें कौनसी शर्म है? जैसे मेरा लण्ड वैसे उनका लण्ड है। वैसे तो तुम मुझसे एकदम खुल कर बात करती हो।”
टीना ने नजरें चुराते हुए कहा, “तुम कितने गंदे हो! जब तक मैं गन्दी गन्दी बात नहीं करुँगी तुम मेरा पीछा छोड़ोगे नहीं। ठीक है भाई, सेठी साहब का लण्ड खड़ा हो गया और जैसे ही मैं उनकी गोद में बैठी तो उनका लण्ड मेरी गाँड़ की दरार में घुसने लगा। मैंने घाघरा पैंटी बगैरह पहना था उस समय। सेठी साहब ने भी पयजामा पहना था। फिर भी।”
मैंने कहा, “मैंने तो तुम्हें पहले ही बता दिया था की सेठी साहब का लण्ड कोई आम मर्द की तरह नहीं है। इतने कपडे बिच में होती हुए भी अगर सेठी साहब का लण्ड को तुमने अपनी गाँड़ की दरार में महसूस किया तो फिर तुम्हें भी मानना पडेगा की वह लण्ड अच्छा खासा लम्बा और मोटा तो होगा।”
मैंने पूछा, “फिर क्या हुआ?”
टीना ने फिर अपनी नजरें नीची कर कहा, ‘खैर तुम तो जानते हो की जब मुझे यह दर्द होता है तो मेरा क्या हाल होता है। मैंने सेठी साहब से कहा की मुझे चक्कर आ रहे हैं, मेरी पीठ, कमर और साइड पर एकदम शूटिंग पैन हो रहा है और मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही हूँ। उन टाइट कपड़ों में मुझे साँस लेने में भी दिक्कत सी लग रही है।”
टीना ने कहा की सेठी साहब ने उसकी बात सुनकर फ़ौरन कहा, “तुम्हें एतराज ना हो तो ब्लाउज और ब्रा निकाल दो। फिर मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहते हैं की अगर तुम्हे दिक्कत है तो मैं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध दूंगा।”
जब टीना ने यह सूना तो टीना क्या कहती? टीना ने कहा, “सेठी साहब, कहावत है की डॉक्टर से पेट नहीं छिपाते। अब मैं आपसे क्या छिपाऊं? मुझे आप पर पूरा भरोसा है। अब मैंने अपने आपको आपको सौंप दिया। अब आपको जैसा ठीक लगे ऐसे करो।”
टीना से इजाजत मिलते ही सेठी साहब ने आगे झुक कर पहले टीना के ब्लाउज के बटन खोल दिए। बटन खोलते ही टीना ने स्तनोँ का बोझ कुछ हल्का महसूस किया। टीना ने पीछे मुड़कर सेठी साहब की और देखा और राहत की एक गहरी सांस ली। सेठी साहब ने महसूस किया की टीना पीड़ा से वाकई परेशान थी। सेठी साहब ने फ़ौरन ब्रा का हुक भी खोल दिया। टीना के पके हुए बड़े खड़भुजा जैसे दोनों स्तन सख्त बन्धन से आजाद होते ही बाहर कूद पड़े।
सेठी साहब की नजर बचाते हुए बाजू में रखे तौलिये से टीना ने उन्हें फुर्ती से ढकने की कोशिश की। पर चूँकि तौलिया कुछ दुरी पर रखा हुआ था तो टीना को उसे हासिल करने में कुछ मशक्क्त करनी पड़ी और थोड़ा सा खिसक कर उसे ले कर स्तनोँ को ढ़कने में कुछ समय भी लगा। उस अंतराल में सेठी साहब को टीना के गोरे गोरे अल्लड़ मस्त फुले हुए पर फिर भी सख्ती से खड़े स्तनों के और उसके ऊपर गुब्बारे की बाहर की और खींची हुई चॉकलेटी रंग की निप्पलों के भी दर्शन की अच्छी खासी झांकी तो हो ही गयी।
टीना के गोरे गोरे कोमल से पर सख्त खींचे हुए स्तन देख कर सेठी साहब अपने हाथों को बड़ी ही मुश्किल से उन्हें मसल ने से रोक पाए। स्तन इतने भरे और फुले हुए थे जैसे वह दूध से भरे हुए हों। स्तनों के ऊपर बिच में स्थित उद्द्ण्ड चॉकलेटी रंग की निप्पलेँ जैसे सेठी साहब के हाथों और होठों को चुनौती से रहीं थीं की “आओ मुझे जोर से मसलो और खूब चुसो और काटो।” उन्हें देख कर भी कुछ ना कर पाने के कारण सेठी साहब के मन में जैसे भीषण अन्तर्युद्ध चल रहा था।
एक तो टीना के दो अल्लड़ स्तनोँ को उनकी पूरी छटा में देखना और फिर टीना की गाँड़ का सेठी साहब के लण्ड से रगड़कर छूना सेठी साहब तो जैसे तैसे झेल गए पर सेठी साहब का लण्ड कहाँ से बर्दाश्त कर पाता? जैसे ही सेठी साहब टीना के ऊपर से कंधे पर मसाज करने के लिए झुके तो सेठी साहब के काफी कण्ट्रोल करते हुए भी उनका लण्ड सेठी साहब के कण्ट्रोल के बाहर हो गया। सेठी साहब के ढीले से पयजामे में से फुला हुआ सख्त नारियल के पेड़ की तरह खड़ा सेठी साहब का लण्ड टीना ने अपनी गाँड़ की दरार पर महसूस किया।
अनायास ही टीना ने पीछे मुड़कर देखा तो सेठी साहब का लण्ड सेठी साहब के स्लैक्स में से अपनी लम्बाई दिखाता हुआ कपडे के अंदर लटकता हुआ पयजामे का एक बड़ा तम्बू बनाया हुआ दिख रहा था। अपने पूर्व रस रिसने के कारण सेठी साहब की दो जाँघों के बिच में पयजामे पर लण्ड ने बनाया हुआ तम्बू चिकनाहट से गीला भी हो चुका था।
टीना ने सेठी साहब के तनाव भरे चेहरे को देख कर यह भी महसूस किया की उस समय वह टीना को इस हालत में देख कर बड़ी ही विवशता की विकत स्थिति में से गुजर रहे थे। शर्म और व्याकुलता के मारे टीना बेचारी कुछ बोल नहीं पा रही थी।
सेठी साहब ने महसूस किया की टीना की नजर जो उनके दो जाँघों के बिच में लटके हुए तम्बू पर पड़ी थी तो घभराहट और अटपटाहट के मारे उन्होंने अपनी दोनोँ जाँघों को जोड़ कर कोशिश की टीना उनके लण्ड की वह स्थिति देख ना पाए। वह समझ गए की उनका लण्ड टीना की गाँड़ की दरार को कौंच रहा था और उसे टीना ने महसूस किया था।
वह बोल पड़े, “सॉरी, टीना, वैरी सॉरी यार” कहते हुए वह अचानक उठ खड़े हुए और अपनी निक्कर और उसमें उनका खड़ा हुआ लण्ड एडजस्ट कर ठीक करने में लग गए। टीना ने पीछे मुड़कर सेठी साहब को यह गुत्थमगुत्थी करते हुए देखा। सेठी साहब अपनी निक्कर में लण्ड को कैसे ठीक करते? वह तो जैसे जैसे सेठी साहब कण्ट्रोल करने की कोशिश कर रहे थे और बड़ा होता जा रहा था और सेठी साहब के कण्ट्रोल में नहीं आ रहा था।
तब अचानक सेठी साहब झुंझला कर एकदम दबी आवाज में बोल पड़े, “ससुरा, कुत्ते की औलाद, कण्ट्रोल ही नहीं हो रहा! साले चुपचाप दब के बैठ, इतना उछलता क्यों है?” टीना समझ नहीं पायी की सेठी साहब किसे गालियां निकाल रहे थे। शायद उनसे अपने आपको सम्हाला नहीं जा रहा था। सेठी साहब का हाल देख कर टीना ना चाहते हुए भी मुस्कुरा पड़ी। खैर टीना भी समझती थी की इस हालात में कैसे कोई मर्द अपने आपको सम्हाले?
टीनाको पीठ का इतना ज्यादा दर्द हो रहा था की उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। टीना ने सेठी साहब से कहा, “सेठी साहब छोड़िये उसको। उसकी चिंता मत कीजिये। उसको तो मैं झेल लुंगी, पर यह दर्द नहीं झेला जा रहा। पहले मुझे इस दर्द से फारिग कीजिये प्लीज।”
टीना ने जब यह कहा तब सेठी साहब अपने लण्ड को कण्ट्रोल करने की चिंता से कुछ हद तक निश्चिन्त हुए और अपने काम पर ध्यान देने लगे। सेठी साहब ने टीना को अपने आगे छाती पर लेटने को कहा जिससे वह टीना की पीठ और कन्धों पर अच्छी तरह मसाज कर सके। सेठी साहब के पास कुछ हर्बल तेल था जिसे उन्होंने टीना की पीठ पर काफी मात्रा में गिराया।
बहते हुए तेल की धारा में हाथ डालकर उसे टीना की पूरी पीठ पर हल्के से हथेली में लेकर पूरी पीठ पर फैलाने लगे। धीरे धीरे अपना अंगूठा टीना के कन्धों के पीठ वाले हिस्से पर रख कर अपनी अंगूठे की बाजू वाली उंगली से सही पॉइंट पर दबाकर सेठी साहब एकक्यूप्रेशर की तकनीक से दबाव देने लगे। धीरे धीरे दबाव बढ़ता गया और टीना के मुंह से हलकी सी सिसकारी भी निकल पड़ी।
टीना के हाल भी बड़े ही अजीब थे। एक और सेठी साहब के खड़े सख्त लण्ड का टीना की गाँड़ के ऊपर रगड़ना, दूसरे सेठी साहब के टीना के स्तनों को देख लेना और फिर मालिश करते हुए उनके हाथ अनायास ही कई बार टीना के स्तनोँ को छूने से टीना की सिसकारियां अक्सर कामुकता की कराहट जैसे निकल जाती थीं।
तेल को निचे फ़ैल कर गिरने से रोकने के लिए बार बार सेठी साहब को टीना की छाती तक अपनी हथेली ले जानी पड़ती थी। कई बार इसके कारण सेठी साहब का हाथ टीना के स्तनों को छू लेते थे। सेठी साहब ने डरते हुए पूछा, “टीना, देखो मालिश करते हुए कई बार मेरा हाथ तुम को इधर उधर छू सकता है। प्लीज इसे गलत मत समझना। तुम कहोगे तो मैं हाथों को दूर ही रखूंगा।”
टीना की हालत तो वैसे ही खराब थी। टीना ने दबी हुई आवाज में कहा, “सेठी साहब, आप भी कमाल हो! हाथों को दूर रखोगे तो मालिश कैसे करोगे? मैंने कोई शिकायत की क्या? आप इतने क्यों परेशान हो रहे हो? मैं समझ सकती हूँ। आप चिंता मत करो। आप अपना काम करो। प्लीज बेकार में हिचकिचाओ मत।”
टीना की इस तरह खुली इजाजत मिलने पर सेठी साहब ने राहत की गहरी साँस ली। अब वह कुछ हद तक निश्चिंत हो गए। सेठी साहब ने टीना की पीठ, कंधे और कमर पर अच्छी तरह से मालिस की और ऐसा करते हुए हालांकि सेठी साहब ने टीना के स्तनोँ पर मसाज तो नहीं किया पर कई बार उन्हें टीना के स्तनोँ को छूना पड़ा।
सेठी साहब का लण्ड भी पूरी मसाज के दरम्यान खड़ा का खड़ा ही रहा और अक्सर टीना की गाँड़ की दरार में ठोकर मारता रहा। पर सेठी साहब ने यह ध्यान रखा की उनसे कोई ऐसी हरकत ना हो जिससे टीना को कोई शिकायत का मौक़ा मिले।
कुछ ही देर में टीना का दर्द गायब हो गया। सेठी साहब ने जब टीना के बदन के ऊपर से अपना वजन हटा लिया तो टीना ने एक गहरी राहत की साँस ली। तौलिये को अपनी छाती पर ही रखे हुए टीना सेठी साहब की और मुड़ी और उनकी बाँहों में जा कर उनसे लिपट कर बोली, “सेठी साहब आपने मुझे नयी जिंदगी दे दी। यह दर्द मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गया था। आपका बहुत बहुत शुक्रिया। मेरी समझ में नहीं आ रहा की मैं इसका बदला कैसे चुकाऊँगी।”
यह कह कर टीना ने अनायास ही सेठी साहब के गाल पर एक उन्माद पूर्ण चुम्मी की और उठ कर दूसरे कमरे में कपडे पहनने चली गयी। उस समय सेठी साहब किंकर्तव्यमूढ़ बनकर बैठे हुए टीना के बारे में सोचने लगे।
बीबी से यह कहानी सुन कर मेरा लण्ड भी अपना रस रिसने लगा। टीना उसे सहलाती रहती थी और कभी कभी झुक कर उसे चुम भी लेती थी। इस बात को कहते कहते टीना भी काफी उत्तेजक दशा में थी यह मैं अनुभव कर रहा था।
मैंने टीना से पूछा, “क्या तुम्हें पता है की सेठी साहब कुत्ता बगैरह कह कर किसे कोस रहे थे?’
टीना ने मेरी तरफ प्रश्नार्थ भाव में देखा। मैंने कहा, “वह अपने शैतान लण्ड को कोस रहे थे। वह उसे बैठने के लिए जबरदस्ती कर रहे थे।”
टीना अपनी बड़ी बड़ी आँखें फुलाते हुए मेरी और देख कर बोली, “अरे बापरे! ओह….. तुम क्या कह रहे हो? वह अपने लण्ड को कण्ट्रोल करने की कोशिश कर रहे थे? मतलब अगर आज सेठी साहब अपने आप पर कण्ट्रोल ना कर पाते तो मेरी तो बजा ही दी होती उन्होंने।”
मैंने कहा, “बिलकुल, मैं तो बड़ा हैरान हूँ। कोई भी मर्द कितना भी संयम रखे, ऐसे मौके पर अपना नियत्रण कर ही नहीं सकता। ऐसा मौक़ा कोई मर्द छोड़ता है? एक खूबसूरत औरत अपने आधे कपडे निकाले तुम्हारे सामने ऐसी लेटी हुई है की तुम्हारा लण्ड उसकी चूत से रगड़ रहा है, बस देर है तो उसका घाघरा ऊपर करने की और पैंटी निकालने की। तो कौन मर्द ऐसी औरत को चुदाई किये बगैर छोड़ेगा?”
मेरी बात सुन कर टीना की साँसें फूलने लगीं। उसे महसूस हो रहा था की मैं जो कुछ कह रहा था वह सब सच था। टीना खुद जानती थी की दरअसल बात तो यह थी की उस समय का जो माहौल था उसमें सेठी साहब से कहीं ज्यादा टीना खुद उस समय की उत्तेजना और उन्माद का शिकार थी।
सेठी साहब को ज्यादा कुछ करने कीजरूरत नहीं थी। एक खूबसूरत औरत आधी नंगी उनके लण्ड से सट कर औंधी लेटी हुई थी। सेठी साहब को तो सिर्फ उसका घाघरा ही उठाना था और पैंटी को निचे करके अपना लण्ड उसकी चूत में घुसेड़ देना था।
अगर सेठी साहब ने एक क़दम और आगे बढ़ा कर टीना के सारे कपडे निकाल दिए होते और मसाज करते हुए टीना को नंगी कर अपनी बाँहों में ले लेते तो टीना उन्हें चोदने से रोक ना पाती। बल्कि एक अभिसारिका की तरह टीना सामने चलकर अपने आप को सेठी साहब को सौंप देती। सेठी साहब को टीना का नंगा बदन पाने के लिए ज्यादा कुछ संघर्ष नहीं करना पड़ता।
टीना ने कहा, “राज, अब आगे बहुत सम्हालना पडेगा। यह एक जबरदस्त अनुभव है। कभी आगे से मैं ऐसा नहीं करुँगी। आज तो वाकई में मैं खुद ही पागल हो रही थी। सेठी साहब की गरम गरम साँसें, उनके तगड़े लण्ड का मेरी गाँड़ और चूत से टकराना और कभी कभार उनका मसाज करते हुए मेरी चूँचियों को छू जाना मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। अगर आज सेठी साहब ने अपने आप पर संयम ना रखा होता और उन्माद में आ कर अगर मेरे सारे कपडे उतार दिए होते तो तुम्हारी बीबी उनको रोक ना पाती और सेठी साहब से चुद जाती।”
मैंने कहा, “बेबी, तुम इतनी चिंता क्यों करती हो? चुद जाती तो चुद जाती। तुम अगर सेठी साहब से चुद जाती तो क्या हो जाता?”
तगड़ी चुदाई के बाद थकी हुई मेरी बीबी आधी नींद में थी। टीना ने अपनी आँखें मूँदे हुए आधा सोते और आधा जागते हुए कहा, “नहीं राज, तुम जितना इजी ले रहे हो यह बात उतनी आसान नहीं है। तुम मर्द लोग सेक्स को एक खेल की तरह समझते हो। एक औरत के लिए वह मानसिक रूप से एक बड़ा मकाम है।
औरत के लिए वह एक स्वाभिमान की बात है और जिंदगी भर उसे याद दिलाया जाता है की एक बार वह फलांफलाँ से चुदवा चुकी है। खैर आज तो मैं उस दाग लगने से बच गयी पर अब आगे मुझे सम्हालना है। मुझे सेठी साहब का धन्यवाद देना पडेगा की यह जानते हुए भी की मैं बड़ी ही कमजोर स्थिति में थी, उन्होंने मेरा गलत फायदा उठाने की कोशिश नहीं की।”
मैंने कहा, “बेबी तुम्हारी बात गलत नहीं है। पर तुम इसे नकारात्मक दृष्टि से देख रही हो। अगर सेठी साहब ने तुम्हें वाकई में ही चोद दिया होता तो क्या तुम्हें ऐसा लगता है की भविष्य में वह तुम्हें इस बात को ले कर कभी बदनाम करते? या क्या मैं कभी तुम्हारा दोष निकालता की तुमने सेठी साहब से चुदवाया था?”
टीना की आँखों में तब तक गहरी नींद सवार हो रही थी। टीना ने ऊपर उठ कर मुझे होंठों पर चूमते हुए लचङती आवाज में कहा, “खैर यह तो मैं जानती हूँ की तुम दोनों में से कोई भी मेरी बदनामी नहीं करोगे।”
मैंने टीना के होँठों को चूसते हुए कहा, “तो फिर तुम सेठी साहब से चुदवाने से क्यों डरती हो? जाओ मौक़ा मिलते ही जी भर के चुदवा लो सेठी साहब के तगड़े लण्ड से। मैं तुम्हारा पति तुम्हें कहता हूँ।”
मुझे पता नहीं मेरी बात मेरी बीबी ने सुनी की नहीं क्यूंकि उसी समय टीना लुढ़क पड़ी और खर्राटे मारने लगी। शायद वह मुझे यह जताना नहीं चाहती थी की उसने वह सूना और अच्छी तरह समझ भी लिया।
उस वाकये के फ़ौरन बाद करीब एक हफ्ते तक मैं बाहर रहा। बिच में मेरी सेठी साहब से और टीना से फ़ोन पर बात होती रहती थी।उस दरम्यान मैंने महसूस किया की दोनों उस हादसे के बारे में काफी सोचने लगे थे। अब शायद मामला कुछ गंभीरता पकड़ने लगा था। मैं जब वापस आया तब मैंने महसूस किया की अब जब भी टीना और सेठी साहब मिलते तो दोनों एक दूसरे से कुछ ज्यादा ही धीर गंभीरता से बरतने लगे। वह बचपना और शरारत कुछ हद तक कम हो गयी थी। टीना जब भी सेठी साहब के सामने होती तो अपनी नजरे शर्म से निची करने लगी।
टीना का भाई अब हॉस्पिटल से घर आ चुका था। टीना का मन कर रहा था की वह उसके मायके एक बार और जाए और कुछ दिन वहाँ रहे। पर टीना बच्चे के साथ कैसे जायेगी बगैरह हम तय नहीं कर पा रहे थे। मैं छुट्टी ले नहीं सकता था। एक शाम को हम टीना के जाने के बारे में बात कर ही रहे थे की सेठी साहब हमारे घर आ पहुंचे।
जब उन्होंने सूना की टीना मायके जाना चाहती है तो उन्होंने ताली बजाते हुए कहा, “अरे भाई वाह, क्या बात है! मेरा कल जयपुर जाने का प्रोग्राम बन रहा है। मुझे कुछ ऑफिस का काम है। वहाँ मैं तीन दिन रहूंगा। टीना का घर जयपुर के नजदीक ही है। अगर टीना आना चाहती है तो मैं टीना को उसके घर छोड़ कर जयपुर चला जाऊंगा और अगर टीना तीन दिन में वापस आना चाहती है तो उसे वापस भी ले आउगा। हम यहां से जल्दी सुबह निकालेंगे और दुपहर तक टीना को उसके घर पहुंचा कर मैं जयपुर चला जाऊंगा।”
सेठी साहब की बात सुनकर टीना ख़ुशी से उछल पड़ी। फ़ौरन हमने सेठी साहब का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और दूसरे दिन सुबह पांच बजे टीना और सेठी साहब के निकलने का प्रोग्राम फाइनल हो गया। रात को जब हम सोने गए तो टीना बहुत खुश थी। बिस्तर में पहुँचते ही वह मुझसे लिपट गयी और बोली, “मेरे जाने की बड़ी ही अच्छी व्यवस्था तो हो गयी पर तुम्हें घर में अकेला छोड़ कर जाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। खैर, सुषमाजी तो यहीं है, तो तुम्हारे खाने पिने बगैरह का इंतजाम तो हो ही जाएगा।”
मैंने मेरी बीबी को चिढ़ाते हुए पूछा, “यह खाने पिने के साथ बगैरह लगाने से तुम्हारा क्या मतलब है? तुम कहीं कुछ उलटपुलट तो नहीं सोच रही हो ना?”
टीना ने आँखें मटकते हुए कहा, “यह ‘बगैरह’ तो तुम पर निर्भर करता है। तुम भी अकेले, सुषमाजी भी अकेली, आगे क्या करना है वह तो तुम ही जानो। वैसे और कुछ नहीं कर पाए तो तुम इस दरम्यान सुषमाजी को कार चलाना सिखाने के लिए तो जा ही सकते हो। कार के साथ साथ अगर और कुछ भी सिखा पाए तो और भी अच्छा है।”
मेरी बीबी के तीखे ताने सुन कर मेरे पुरे जहन में आग लग गयी। मैंने पूछा, “क्या तुम मुझे चुनौती दे रही हो?”
टीना ने मेरी नजर से नजर मिलाकर कहा, “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं जानती हूँ की आप मुझे मिस करोगे। पर देखो मैं कुछ दिन नहीं हूँ तो आपको सिर्फ यही कहना चाह रही थी की आपको कोई रोक टोक करने वाला नहीं है। बाकी आपकी जैसी मर्जी।”
बातों बातों में मेरी बीबी ने मुझे इशारा किया की मैं चाहूँ तो सुषमाजी को फाँसने की की कोशिश कर सकता हूँ। उसका रास्ता भी उसने बता दिया की मैं इस समय दरम्यान सुषमा को ड्राइविंग सिखाने के बहाने अपना मकसद साध सकता था। मुझे मेरी बीबी पर गर्व हुआ। जो उस दिन तक मुझे किसी और औरत को ताड़ने के लिए टोकती रहती थी, वह मुझे गैर औरत को फाँसने का रास्ता दिखा रही थी। टीना की बात सुन कर मुझे भी जोश आया।
मैंने कहा, “मेरी बात छोडो, सुनो मैं एक बड़ी ही जरुरी बात कह रहा हूँ। सेठी साहब तुम्हारे घर आ रहे हैं। यह देखना की उनका सही तरीके से स्वागत हो और जयपुर से तुम्हारे गाँव का रास्ता बड़ी मुश्किल से आधे से पौने घंटे का है तो उनको जयपुर में जा कर होटल में रुकने के बजाये अगर अपने घर में रखोगे तो वह सुबह निकल कर जयपुर जा कर शाम को काम निपटा कर आपके गाँव वापस आराम से आ सकते हैं। तुम्हारा घर काफी बड़ा है और कई कमरे वैसे ही खाली पड़े हैं..
एक बात और, सेठी साहब की आवभगत का जिम्मा तुम खुद उठाना ताकि सेठी साहब को कोई दिक्कत ना हो। और हाँ अगर सेठी साहब रुक जाते हैं तो उनको ऊपर वाली मंजिल के जो दो अलग कमरे हैं उनमें से एक कमरा देना जिसमें मैं ठहरा था। तुम और मुन्नू उसके साथवाले दूसरे कमरे में रुकना जिससे तुम रातमें भी अगर सेठी साहब को किसी चीज़ की जरुरत पड़े तो बिना किसी की नजर में आये सेठी साहब के कमरे में जा सकती हो। ड्राइवर को घर के आँगन में जो सर्वेंट का कमरा है उसमें रखना।”
मेरी बीबी ने मेरी और टेढ़ी नजर से देखा। वह शायद समझ गयी थी की मैं चाहता था की इस ट्रिप में वह सेठी साहब से चुदे। मुझे डर लगा की कहीं टीना मेरी बात सुन कर भड़क ना जाए। पर टीना चुप रही। शायद मेरा सुझाव टीना को अच्छा लगा। टीना ने अपने भाई का फ़ोन मिलाया और सेठी साहब के साथ आने के बारे में बताया और जो भी बात मैंने कही थी सब भाई को कही। टीना ने भाई को ऊपर के दोनों कमरे भी तैयार करवाने को कहा..
भाई यह सुन कर बड़े खुश हुए। सेठी साहब ने मुश्किल वक्त में जो बड़ी मदद की थी उसके बारे में टीना ने भाई को सब कुछ बता दिया था। भाई ने टीना और मुझे भरोसा दिलाया की वह सेठी साहब की आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और उनको रोकने की पूरी कोशिश करेंगे और ऊपर वाले कमरे को अच्छी तरह सजा कर रखेंगे।
उस रात को टीना ने मुझे मुझसे ऐसी चुदाई करवाई की मैं क्या कहूं? वह बार बार मेरे ऊपर चढ़ कर मुझे चोद रही थी। सबसे पहले तो टीना ने मेरा लण्ड इतनी शिद्द्त से चूसा की मैं अगर सही समय पर टीना के मुंह से मेरा लण्ड निकाल नहीं लेता तो मैं उसके मुंह में ही झड़ जाता।
फिर वह बार बार झुक कर मेरा लण्ड चूमती और बार बार यह कहना नहीं चुकती की वह मुझसे बहुत ज्यादा प्यार करती है और वह मुझे पूरी जिंदगी साथ देगी। जब मं उसको चोद रहा था तो वह बार बार अपने करारे स्तनोँ को मुझसे मसल ने के लिए कहती और उस रात करीब पूरी चुदाई के दरम्यान वह मेरे होंठों को चूमती ही रही।
मैं उसका आवेग और उसकी उत्तेजना समझ सकता था। मैंने उसे सेठी साहब का स्वागत करने का जो रास्ता दिखाया था उसके द्वारा मैंने उसे अपरोक्ष रूप से रात को बिना किसी की नजर में आये सेठी साहब के कमरे में जाने के लिए कह दिया था, क्यूंकि उनके घर के ऊपर के दोनों कमरे आपस में बाथरूम के द्वारा जुड़े हुए थे।
दोनों कमरों के बिच में एक बाथरूम था। मैंने अपनी तरफ से बीबी को इशारा कर दिया की अगर सेठी साहब उनके वहाँ रुक गए तो रात को बिना किसी को पता लगे वह दोनों एक दूसरे के कमरे में बाथरूम के रास्ते जा सकते थे।
दूसरे दिन जल्दी सुबह ही टीना सेठी साहब के साथ कार में निकलने के लिए तैयार हो गयी थी पर सेठी साहब ने आकर माफ़ी मांगते हुए कहा की उन्हें कुछ अर्जेंट काम से ऑफिस जाना पडेगा और उसके बाद दोपहर को ही वह निकल पाएंगे।
करीब दो बजे सेठी साहब ऑफिस से आये और ढाई बजे कार में टीना के मायके जाने के लिए निकल सके। मुन्ना ने जिद पकड़ी की वह आगे की सीट पर ही बैठेगा। इसके कारण आगे की सीट पर मुन्ना और ड्राइवर और पीछे टीना और सेठी साहब बैठे। दिल्ली से टीना के मायके का रास्ता करीब ६ घंटे का था।
मुन्ना ने मुझसे पहले से ही यह शर्त रखी थी की वह आगे की ड्राइवर के बाजू वाली सीट पर बैठेगा और ड्राइवर अंकल से कार चलाने के बारे में बात करेगा और समझेगा की कार कैसे चलाते हैं। तो पुरे रास्ते मुन्ना ड्राइवर से कार चलाने से लेकर कार पानी में क्यों तैर नहीं सकती और क्या कार हवा में उड़ सकती है? ऐसे कई अजीबोगरीब सवाल करता रहा और ड्राइवर भैया उसे बड़े ही धैर्य से सारे प्रश्नों के उत्तर देने में लगे रहे।
मुझ में एक कमी है की जब जब भी मैं कार मैं थोड़ा सा भी लंबा सफर करती हूँ तो मुझे अक्सर नींद आ जाती है। इस बार मैंने तय किया की मैं कोशिश करुँगी की कार के सफर दरम्यान ना सोऊँ। मैं सेठी साहब के अनुभव और उनके विचारों की परिपक्वता की बड़ी ही प्रशंशक थी।
मेरी इच्छा थी की सेठी साहब के जीवन के अनुभवों से मैं कुछ सिख लूँ। सो सफर में समय भी पास हो और नींद भी ना आये इस लिए मैंने सेठी साहब से पूछा, “सेठी साहब आप अपने जीवन का कोई ऐसा अनुभव या वाक्या बताइये जो आपके लिए बड़ा ही यादगार एवं रोमांचक रहा हो।”
मेरी बात सुनकर कुछ देर सोचते रहे फिर मेरी और देख कर बड़े ही शांत और गंभीर स्वर में बोले, “तुम तो जानती ही हो की मैं माँ दुर्गा को बहुत मानता हूँ। माँ ने मेरे जीवन में अद्भुत चमत्कार किये हैं। मैं उनमें से एक चमत्कार के बारे में बताता हूँ जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता।”
यह कह कर उन्होंने मुझे अपने जीवन के एक अद्भुत रोमांचक अनुभव के बारे में बताया जिसे सुनकर मेरे भी रोंगटे खड़े हो गए। सेठी साहब उन दिनों पहाड़ों में एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट की कंपनी में काम कर रहे थे। उनको एक पहाड़ी पर ही सर्किट हाउस में एक कमरा मिला था जिसमें वह रहते थे।
वह हर रोज सुबह काम पर जाने के पहले स्नान के बाद माँ की पूजा, ध्यान और आरती करना नहीं भूलते थे। एक दिन जब वह सुबह उठ कर पूजा ध्यान कर रहे थे तब अचानक उनके कानों में उन्हें एक लड़की की हलकी मधुर सी आवाज सुनाई पड़ी, “सावधान रहना।”
सेठी साहब ने चारों तरफ देखा की किसने बोला, पर कोई भी आसपास नहीं था। अपने दिमाग का भ्रम होगा यह सोच कर सेठी साहब पूजा आरती बगैरह कर काम पर निकल गए। पर यह आवाज उनके कानों में गूंजती रही। उनदिनों सेठी साहब के पास एक जीप थी। उस जीप में वह रोज लंच के समय वापस सर्किट हाउस पर आकर दोपहर का खाना खाकर फिर काम पर निकल जाते थे। सर्किट हाउस एक पहाड़ी पर था और जीप से काफी चढ़ाई और घुमाव वाला रास्ता पार कर उस सर्किट हाउस पर पहुंचा जा सकता था।
रोज की तरह उस दिन भी सेठी साहब दोपहर का लंच करने सर्किट हाउस अपने कुछ साथीऒं के साथ जीप को पहाड़ी पर चढ़ाई और घुमाव वाले रास्ते से चलाते हुए पहुंचे। अपने साथिओं को सर्किट हाउस के आंगन में उतार कर जब वह जीप को पार्क करने के लिए पहाड़ी के किनारे जाने के लिए जीप को रिवर्स कर रहे थे तब अचानक उनके कानों में फिर वही आवाज सुनाई दी “सावधान रहना”।
आवाज सुनते ही सेठी साहब ने जब ब्रेक लगाई तो जीप निचे खाई की और लुढ़क कर गिर रही थी। जीप के पीछे जो सीमेंट की दीवार को एक छोटा सा खम्भा रोके रखा था वह टूट कर गिर गया था। उसी समय सेठी साहब ने माँ को याद किया और एक धमाके के साथ जीप निचे गिरने से रुक गयी। सेठी साहब ने निचे उतर कर देखा तो जीप एक टूटे पेड़ के मूल के सहारे रुकी ना होती तो सेठी साहब के साथ निचे कम से कम एक हजार फ़ीट से भी गहरी खाई में गिर जाती और जीप के साथ सेठी साहब का पता भी नहीं चलता।
सेठी साहब ने कहा, “मैं समझ गया की माँ ही मुझे वह आवाज देकर सावधान कर रही थी। और उस दिन माँ ने ही मुझे बचा लिया।” यह बात कहते कहते सेठी साहब की आंखौं में पानी भर आया। मैं भी कहानी सुनकर काफी भावुक हो गयी थी। मैंने पहले तो माँ की एक फोटो जो कार के डैशबोर्ड पर रखी थी उस को हाथ जोड़े और फिर सेठी साहब की और देख सेठी साहब का हाथ थामा।
अनायास ही उस संवेदनशील घडी में मैंने उनका हाथ मेरे हाथ में लिया और मेरी जाँघ पर साड़ी के ऊपर रखा। मेरी आँखों में भी आंसूं आ गए। मेरी भावुक स्थिति और मेरी आँखों में आंसूं देख सेठी साहब अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाए। थोड़ा सा सीट से खिसक कर, ताकि ड्राइवर हमें उसके सामने लगे आयने में देख ना सके, उन्होंने मेरा सर बाँहों में ले कर मुझे गले लगा लिया। मैं अपना सर उनकी चौड़ी छाती पर रख कर अपने आपको बड़ा महफूज़ महसूस कर रही थी। सेठी साहब भी उस भावुक अवस्था में बिना बोले मेरे बालों को सहलाते रहे।
उस बात के बाद हम में से कोई कुछ भी बोल नहीं पाए। कार के चलते चलते मैं कब गहरी नींद सो गयी पता ही नहीं चला। जब करीब तीन चार घंटे बाद आधे रास्ते में नाश्ते और चाय के लिए ड्राइवर ने कार रोकी तब मैंने पाया की मेरा सर सेठी साहब की जाँघों पर टिका कर मैं पीछे की सीट पर लम्बी हो कर सो रही थी।
सेठी साहब बेचारे मुझे आराम से सोने देने के लिए खिड़की की और खिसक कर थोड़ी सी जगह में मेरा सर अपनी जाँघों पर लिए हुए बैठे थे। सेठी साहब कभी मेरा सर तो कभी मेरी बाँहों को सेहला कर बड़े दुलार से चुपचाप बैठे हुए मुझे देख रहे थे। नींद में सोते हुए मुझे पता नहीं मेरा पल्लू कब खिसक गया होगा और मेरे ब्लाउज और ब्रा के भी बाहर फैले हुए मेरे बड़े बड़े मम्मे सेठी साहब को इतने करीब से नजर आ रहे होंगे।
सेठी साहब के मेरी बाँहें हिला हिला कर मुझे जगाने पर मैं हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई और अपने पल्लू को ठीक करते हुए चाय नाश्ते के लिए निचे उतरी। चाय नाश्ता ख़त्म होने के बाद मुन्ना और ड्राइवर बातें करते वापस कार की और जा रहे थे तब मेरी चाय ख़तम नहीं हुई थी। सेठी साहब हमारे बिल का भुगतान कर मेरी चाय ख़तम होने का इंतजार का रहे थे!
तब मौक़ा देख कर मैंने सेठी साहब से कहा, “सेठी साहब, जब तक हम मेरे मायके पहुंचेंगे तब तक तो रात हो जायेगी। भाई ने आपके और ड्राइवर के खाने और रहने का पूरा इंतजाम कर दिया है। हमारा घर काफी बड़ा है। ड्राइवर के लिए आँगन में एक बाथ रूम अटैच्ड कमरा है और हमारे लिए ऊपर की मंजिल पर दो कमरे खाली हैं और हर तरह से रहने के लिए तैयार हैं।आप प्लीज अपने होटल को फ़ोन कर दीजिये की आप नहीं आएंगे और वह आपकी बुकिंग कैंसिल कर दे। अगर आप हमारे साथ रुकेंगे तो हमें बड़ी ही ख़ुशी होगी।”
मेरे काफी आग्रह के बाद सेठी साहब ने मेरी बात मान कर फ़ोन कर के अपनी होटल के रूम की बुकिंग सिर्फ उस दिन के लिए कैंसिल की। जब सेठी साहब ने अपनी बुकिंग कैंसिल की तब मैंने सेठी साहब का हाथ अपने हाथ में लेकर दबाया और अपनी आँखों से और आभार युक्त मुस्कान से उनको “शुक्रिया” कहा।
दुबारा जब हमारा सफर शुरू हुआ तो जागने की मेरी लाख कोशिश करने पर भी मुझे नींद की झपकियां आतीं रहीं। मैं हमेशा यह देखती रही की मेरी वजह से सेठी साहब को कष्ट ना हो। पर पता नहीं कब मैं फिर से गहरी नींद सो गयी और लुढ़क कर सेठी साहब के ऊपर जा गिरी।
सेठी साहब ने कार के बिलकुल एक कोने में खिसक कर मुझे पीछे की सीट पर लम्बी हो कर लेटने दिया और पहले की तरह ही मेरा सर फिर अपनी जाँघों के ऊपर ले लिया। इस बार एक बार मैं जग गयी तो मैंने पाया की मेरा सर सेठी साहब की जाँघों के ऊपर था। सेठी साहब का एक हाथ मेरी एक बाँह को सेहला रहा था। मैंने थोड़ा ऊपर की और खिसक कर सेठी साहब की गोद में अपना सिर रख दिया।
शाम का समय हो चूका था, कुछ कुछ अन्धेरा सा छा रहा था। उस वक्त मेरा मन बड़ा ही चंचल हो रहा था। एक और इतने हैंडसम और तगड़े सेठी साहब जो मेरे लिए इतना सब कुछ कर रहे थे, और एक मैं थी जो उनके लिए कुछ भी नहीं कर रही थी।
लास्ट टाइम जब वह मेरी मालिश कर रहे थे तब अगर मैं उन्हें थोड़ा सा भी सपोर्ट करती तो वह मेरे स्तनों को मसल कर खुश होते। मेरा क्या जाता? मेरे पति तो यह सुन कर बड़े खुश होते। मेरे पति ने तो बल्कि मुझे लगभग स्पष्ट शब्दों में ही इशारा कर दिया था की मैं सेठी साहब से चुदवा लूँ तो वह बहुत खुश होंगे। पर उस टाइम मैंने कुछ किया नहीं और उतना बढ़िया माहौल बेकार चला गया।
मेरा बड़ा मन हुआ की अभी कार में जाते जाते मैं सेठी साहब को ऐसे इशारे दूँ की वह समझ जाएँ की अगर वह मेरे साथ आगे बढ़ेंगे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं और उन्हें चाहिए की वह हिचकिचाएं नहीं। अगर वह समझ गए तो शायद सेठी साहब पुरे तीन दिन हमारे घर में ही रुकने के लिए राजी हो जाएँगे और जयपुर होटल में रुकने की जिद नहीं करेंगे। पर मुझे सावधानी रखनी होगी की ड्राइवर जो आगे बैठा गाडी चला रहा था उसको कोई शक नहीं होना चाहिए।
मैंने सेठी साहब को कोई ना देखे ऐसे धीरे से उनकी जांघ के ऊपर हलकी सी चूँटी भर के उन्हें इशारा किया की मैं शरारत के मूड़ में थी। मेरे चूँटी भरने से सेठी साहब अपनी सीट पर कुछ इधरउधर तो खिसके पर शुक्र था की वह कुछ बोले नहीं। सेठी साहब समझ गए की मैं जाग रही थी।
वैसे ही कार चलती रही और मैं पहले ही की तरह सेठी साहब की गोद में मेरा सर रख कर पीछे की सीट पर लम्बी हो कर सो रही थी। पर इस टाइम मैंने चुन्नी से अपने सर और छाती अच्छी तरह से ढक लिए। मैंने चुन्नी के निचे अपना एक हाथ अपने सर पर और दूसरे हाथ को सेठी साहब की जाँघ के निचे जाँघ और सीट के बिच में रखा हुआ था।
जब सेठी साहब ने भी कार के चलते अपना एक हाथ आदतन मेरी बाँह पर चुन्नी के ऊपर रखा तो मैंने धीरे से चुन्नी को हटा कर सेठी साहब का हाथ चुन्नी के निचे मेरे हाथ में लिया। चुन्नी से ढके हुए ही मैंने अपना हाथ मेरी छाती पर मेरी कमर तक सीधा कर लिया। उस समय मेरी बाँह मेरी छाती पर थी।
सेठी साहब ने भी चुन्नी से ढके हुए अपने हाथ को मेरी बाँह पर रखा और वह मेरी बाँह को अपने हाथ से हलके से प्यार से सहलाने लगे। अँधेरे में और चुन्नी के निचे ढके हुए होने के कारण सेठी साहब का हाथ कहाँ है कोई देख नहीं सकता था। सेठी साहब समझ गए थे की मैं उस वक्त जाग रही थी।
मैंने धीरे से जानबूझ कर मेरी बाँह हटा दी और सेठी साहब का हाथ सरक कर मेरी छाती पर फिसल ने दिया। फिर मैंने हलके से अपने हाथ से सेठी साहब के हाथ को थामे रखा जिससे सेठी साहब अपना हाथ मेरी छाती को छूने के डर के मारे वापस ना खिंच लें।
मैंने मेरी छाती पर टिके हुए हमारे हाथ मेरे पल्लू से अच्छी तरह ढक दिए ताकि अगर ड्राइवर या मुन्नू पीछे देखें तो उन्हें हमारे हाथ नजर ना आये। सेठी साहब का हाथ मेरे स्तनोँ पर ब्रा को को छूने से जैसे मेरे रगों में खून तेजी से बहने लगा।
कुछ देर बाद जब मुझे तसल्ली हो गयी की सेठी साहब उनका हाथ मेरी छाती से नहीं हटाएंगे तब धीरे से मैंने अपना हाथ वहाँ से खिसका लिया। मैंने सेठी साहब का हाथ मेरी छाती के ऊपर ही रहने दिया। मैंने महसूस किया की मेरी इस हरकत से सेठी साहब में भी कुछ हिम्मत आयी और वह धीरे से अपनी उँगलियों को मेरे ब्लाउज के ऊपर से मेरे स्तनोँ के ऊपर फिराने लगे।
मैं चाहती थी की उस अँधेरे का फायदा उठा कर सेठी साहब मेरे ब्लाउज और ब्रा को खोल कर मेरे नंगे स्तनोँ को खूब मसलें और सहलाएं और जो उनकी अधूरी इच्छा थी वह उसे पूरी करें।
कुछ देर मेरे स्तनोँ को ब्लाउज के ऊपर से सहलाने के बाद भी जब सेठी साहब ने कुछ किया नहीं तो मुझे वाकई में गुस्सा आ गया। यह कैसा आदमी है? इतनी लिफ्ट देने के बाद भी कुछ करता नहीं। गुस्से में मैंने सेठी साहब की जॉंघ पर एक तगड़ी चूँटी भरी। इस बार सेठी साहब काफी तगड़ा दर्द हुआ होगा, क्यूंकि उनके मुंह से हलकी सी सिसकारी निकल गयी।
सेठी साहब शायद मेरा इशारा समझ गए होंगे, क्यूंकि सेठी साहब ने मेरी चूँटी के जवाब में मेरे एक स्तन पर निप्पल पिचका कर इतनी जोर से चूँटी भरी की मेरे मुंह से भी सिसकारी निकल गयी। इतनी सख्त चूँटी भर कर सेठी साहब क्या सन्देश देना चाहते थे? शायद सेठी साहब इशारा कर रहे थे की जो भी करना है वह बाद में करेंगे, उस वक्त नहीं क्यूंकि कार में मुन्ना और ड्राइवर हैं। पर साथ साथ में यह सन्देश भी दे ही दिया की वह भी अब मेरे साथ सेक्स का खेल खेलने के लिए तैयार थे।
उस वक्त मुझे सेठी साहब पर इतना प्यार उमड़ रहा था की मैं इंतजार के मुड़ में नहीं थी। मैं चाहती थी की सेठी साहब के साथ मेरी सेक्स की दास्तान उसी समय कार में ही शुरू हो, ताकि जब रात को हम आजुबाजु के कमरे में रुकें तो सेठी साहब के दिमाग में मेरी नियत के बारे में कोई असमंजस ना हो।
मैं सेठी साहब का हाथ मेरे हाथ में ले कर मेरे गालों पर धीरे से रगड़ने लगी। फिर उनके हाथ की हथेली को मेरे होँठों पर रख मैं उन्हें प्यार से चूमती रही। मेरी चूमने का जोश मेरी मानसिक स्थिति का अंदेशा देता होगा।
जब मैंने महसूस किया की शायद ड्राइवर ना देखे इस डर के मारे सेठी साहब फिर भी आगे बढ़ने से कतरा रहे थे तब मैंने अपने हाथ सेठी साहब की गर्दन के आसपास लपेट कर अपने आपको हलके से थोड़ा ऊपर उठाया और सेठी साहब का मुंह निचे कर मेरे होँठ पर सेठी साहब के होँठ चेप दिए।
तब कहीं जाकर सेठी साहब का धैर्य का बाँध टूटा। फिर तो सेठी साहब मेरे होँठों को ऐसे जकड कर मुझे इतने प्यार से चुम्बन करने लगे की मेरा दिनाग घूमने लगा। कार के अंदर अन्धेरा छाया हुआ था, इसलिए ड्राइवर हमारी करतूतें देख नहीं सकता था।
सेठी साहब बार बार अपनी जीभ मेरे मुंह में देकर उसे चूसने के लिए दे रहे थे और मैं भी पुरे जोश से सेठी साहब की जीभ चूस कर उनकी लार को निगल रही थी।
सेठी साहब हलके से मेरे कान में अपने होँठ लगाकर बोले, “टीना, मैं तुम्हें बेतहाशा चाहता हूँ। मैं तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूँ। क्या तुम मुझे……?” सेठी साहब ने वाक्य वैसे ही आधा लटकता हुआ छोड़ दिया। मैं समझ नहीं पायी की सेठी साहब आगे क्या कहना चाहते थे।
क्या वह कहना चाहते थे की “तुम भी मुझे अपनाओगी?” वैसे मैं जानती थी की सेठी साहब की आदत थी की जो कुछ भी कहना चाहते थे उसे वह घुमा फिरा कर नहीं सीधा कह देते थे। तो फिर क्या वह एकदम सीधी चुदाई की ही बात करना चाहते थे और पूछना चाहते थे की “क्या तुम मुझे चोदने दोगी?”
मैं उस वक्त चिल्ला चिल्ला कर कहना चाहती थी की “सेठी साहब मैं तुम्हारी हूँ, मेरा यह बदन तुम्हारा है और मैं तुमसे खूब सख्त तरीके से चुदने के लिए सिर्फ तैयार ही नहीं, बल्कि बेसब्र हूँ।” उस समय मेरी चूत पूरी तरीके से गीली हो चुकी थी। मेरा बस चलता तो उसी वक्त मैं नंगी हो कर सेठी साहब को कार में ही मुझे चोदने के लिए मजबूर कर देती।
सेठी साहब का मुंह मरे छोटे होँठों को पुरे तरीके से अपने कब्जे में रखे हुए था। वह कभी मेरे होँठ चाटते तो कभी अपने होँठों के अंदर मेरे होँठों को चूस कर जैसे मेरे होँठों को खा ही जाएंगे इतनी शिद्दत और जोश से चूस, चुम और काट रहे थे। वह कुछ ही पलों का चुम्बन मेरे जीवन का सबसे यादगार चुम्बन था। हमारी कार उस समय मेरे मायके के गाँव से करीब एक घंटे की दुरी पर थी।
सेठी साहब ने जैसे वह मेरा दिमाग पढ़ रहे हों, एक हाथ मेरी पीठ पीछे रख कर अपनी उँगलियों से एक के बाद एक मेरे ब्लाउज के बटन खोल दिए। मैंने भी मेरी पीठ ऊपर कर उनको मेरे ब्लाउज के पट और मेरे ब्रा के हुक खोलने दिया। मेरे अल्लड़ स्तन अब ब्रा और ब्लाउज के बंधन से मुक्त हो चुके थे।
थोड़ा भी समय ना गंवाते हुए सेठी साहब मेरी और थोड़ा घूम कर, दोनों हाथों से मेरे गोरे भरे हुए मांसल स्तनोँ को सहलाने और मसलने लगे। मेरा पूरा बदन और ख़ास कर मेरा मन, मेरा दिमाग उस समय उत्तेजना की अद्भुत सुनामी में झूम रहा था। मेरे स्तनोँ की निप्पलेँ सख्त हो गयीं थीं और सेठी साहब की उंगलियों से पिचकवाने के लिए बेताब थीं।
अनायास ही मेरा एक हाथ मैंने सेठी साहब की जाँघों के बिच रख दिया और पतलून के ऊपर से ही मैंने सेठी साहब के लण्ड को सहलाने की कोशिश की। उस समय मुझे एहसास हुआ की सेठी साहब का लण्ड उनके पतलून में लोहे के छड़ की तरह सख्त हो चुका था।
मेरे लिए उस समय इतनी संकड़ी जगह में सेठी साहब के लण्ड को देख पाना या ठीक से महसूस करना भी नामुमकिन था। पर जो कुछ भी मुझे महसूस हुआ उससे मुझे लगा, बापरे! वाकई में जो मैंने अपने पति से सूना था शायद वह सच ही लग रहा था।
मेरे सेठी साहब के लण्ड को सिर्फ पतलून के ऊपर से छूते ही मुझे महसूस हुआ जैसे सेठी साहब के लण्ड में से उसका वीर्य रिसने लगा, क्यूंकि चन्द पलों में ही उसके ज़िप का हिस्सा चिकनाहट से भर गया। शायद वह वीर्य नहीं पर उनके लण्ड का पूर्व रस था जो उत्तेजित होते हुए ही किसी भी मर्द के लण्ड के छिद्र से रिसने लगता है और जो मर्द की उत्तेजना को दर्शाता है।
मैंने सेठी साहब के लण्ड के ऊपर हाथ फिराते हुए सेठी साहब की और देखा। हालांकि उनका ध्यान उनके लण्ड के ऊपर ही होगा पर उनकी आँखें सीधा देख रहीं थीं। उस समय मुझे सेठी साहब के ऊपर बेतहाशा प्यार आ रहा था।
सेठी साहब के गाढ़ चुम्बन करने से और बड़ी गर्मजोशी से मेरे स्तनोँ को मसलने के कारण मैं इतनी ज्यादा गरम हो चुकी थी की मेरी चूत में से मेरा स्त्री रस थमने का नाम नहीं ले रहा था। मेरी चूत और मेरी गाँड़ तक गीली हो रहीं थीं। मैंने सेठी साहब के पतलून के ऊपर से ही सेठी साहब के लण्ड को सहलाना शुरू किया।
अब मैं सेठी साहब से चुदवाने के लिए पागल हो रही थी। मैंने मेरे पति और सुषमाजी से सेठी साहब की तगड़ी और आक्रमक चुदाई के बारे में सूना था। मेरे पति ने तो सेठी साहब के लण्ड का भी काफी विस्तार से वर्णन किया था। मेरे लिए अब वह लण्ड को अपनी चूत में डलवा कर चुदवाना जैसे मेरे जीवन का एक ध्येय सा बन गया था।
मैंने सेठी साहब के पतलून की ज़िप खोल कर उनके लण्ड को अंदर से सहलाने की कोशिश की। पर सेठी साहब के बैठने के कारण ज़िप तो खुल गयी पर निक्कर से लण्ड निकालना नामुमकिन था। मैं सेठी साहब का लण्ड चूमने और चूसने के लिए बेताब थी। सेठी साहब ने मेरी बेसब्री को महसूस किया।
उन्हें भी शायद अपना लण्ड चूसवाने की इच्छा होगी, पर क्या करें उस समय, जगह और हालात में वह सब संभव नहीं था। मैंने सेठी साहब के लण्ड के फूल जाने से जो बड़ा सा गुब्बारा जैसा तम्बू बना था उस पर अपनी उंगलियां फिरा कर ही अपने आप को तसल्ली दी। उस वक्त सेठी साहब मेरे सर पर हाथ फिरा कर शायद मुझे यह तसल्ली देने की कोशिश कर रहे थे की जब समय आएगा तो वह अपने आप ही मुझसे अपने लण्ड का सामना करा देंगे।
अब ज्यादा समय नहीं बचा था। कार को घर पहुंचने में आधे घंटे का समय रह गया था। कुछ देर तक मैंने सेठी साहब की जाँघों के बिच उनकी ज़िप को चूमा। सेठी साहब इस अनुभव से काफी बेबाक से आगे की सड़क को देख रहे थे। शायद उनके मन में जगह और समय ना होने का अफ़सोस रहा होगा क्यूंकि उन्होंने कुछ देर के बाद हलके से मेरे मुंह को हटाया और हलके से मेरे कानों में बोले, “रुको, अभी पूरी रात बाकी है। कार जल्द ही घर पहुँचने वाली है।”
मैंने फटाफट ड्राइवर ना देख पाए ऐसे लगभग सेठी साहब की गोद में बैठ कर सेठी साहब का सर अपने हाथों में पकड़ा और अपनी और खिंच कर सेठी साहब कुछ बोल या समझ पाएं उसके पहले यह बोलते हुए की “सेठी साहब आई लव यू वैरी मच” उनको होठोँ पर एक जोश भरा चुम्बन किया। मेरे इस जोशखरोश भरे चुम्बन से स्तब्ध हो कर सेठी साहब मेरी और देखते ही रह गए।
कार हमारे गॉंव में पहुँच चुकी थी। मैंने ड्राइवर को घर जाने का रास्ता दिखाते हुए मार्गदर्शन किया। घर पहुंचने पर मेरे मायके वालों ने जब हमारी कार के हॉर्न की आवाज सुनी तो घर के दरवाजे में पुरे घर के सभी सदस्य बनठन कर हाजिर हो गए। मेरी भाभी के हाथों में एक थाल था जसमें आरती जल रही थी। सेठी साहब के दरवाजे के करीब पहुँचते ही भाभी ने सेठी साहब की आरती उतारी और कपाल पर तिलक किया और गले में फूलों की माला पहनाई। सेठी साहबने उनकी इस तरह की आवभगत की कल्पना भी नहीं की होगी।
सेठी साहब का सामान उनके ऊपर की मंजिल में एक कमरे में रख दिया गया और मेरा सामान उसके बाजू वाले के कमरे में रख दिया गया। सेठी साहब के सामने मेरे पिताजी ने हाथ जोड़ कर आग्रह किया की वह चाहते थे की सेठी साहब हमारे यहां पुरे तीन दिन रुकें जब तक उनका जयपुर में काम है। काफी जद्दोजहद के बाद आखिर में सेठी साहब को मानना ही पड़ा।
फ्रेश होने के लिए जब मैं सेठी साहब को उनके कमरे में ले गयी तो मैंने देखा की उनके कमरे में व्हिस्की की एक बोतल और कुछ गिलास रखे हुए थे। एक आइस बॉक्स में बर्फ के टुकड़े भी रखे हुए थे। मेरे भाई को शायद मेरे पति ने बता दिया था की सेठी साहब ड्रिंक करते हैं। सेठी साहब ने मेरी और आश्चर्य से देखा। मैंने कंधे हिलाकर उनको जताया की मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मैंने सेठी साहब से अनुग्रह किया की अगर वह चाहें तो डिनर से पहले एकाध ड्रिंक ले कर निचे भोजन के लिए आ सकते हैं। हम सब उनका निचे इंतजार करेंगे।
सेठी साहब ने मुस्कुराते हुए कहा कहा, “मुझे ड्रिंक करने की कोई जल्दी नहीं है। अगर तुम मेरा साथ दोगी तो डिनर के बाद हम साथ में ड्रिंक करेंगे।”
मैंने कहा, “सेठी साहब, यह मेरा मायका है। यह कोई दिल्ली नहीं, जो हम हमारी मन मर्जी का करें। हमें कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है।यह शहर नहीं, एक छोटा सा गाँव है। यहां तो मेरी साड़ी का पल्लू अगर थोड़ा सा भी हट गया या मेरी साड़ी कमर से कितनी निचे है यह भी देख कर टिपण्णी की जाती है, ड्रिंक करना तो दूर की बात है। “
मेरी बात सुन कर सेठी साहब को जैसे भारी सदमा पहुंचा हो ऐसे उनका चेहरा फीका पड़ गया। शायद उन्होंने उम्मीद रखी होगी की मैं अपने मायके में उनके साथ अकेले में कुछ समय बिता पाउंगी। अपने आप को सम्हालते हुए मेरे सामने खिसियानी नजर कर बोले, “ओह…. मैं समझ सकता हूँ। आई ऍम सॉरी। आपकी बात सही है। चलिए डिनर के लिए चलते हैं। मुझे ड्रिंक का कोई क्रेज नहीं। ड्रिंक तो दिल्ली जा कर भी कर लेंगे।” यह कह कर सेठी साहब उठ खड़े हुए और चल दिए।
सेठी साहब का उतरा हुआ चेहरा देख मुझे बहुत बुरा लगा। कार मैं प्यार भरी हरकतें कर सेठी साहब के मन में लालसा तो मैंने ही जगाई थी ना? अब गाँव आ कर मैं पलट गयी ऐसा शायद उनको लगा होगा।
डिनर के दरम्यान सेठी साहब मेरे भाई, भाभी और पापा से बड़ी विनम्रता पूर्वक बातें करते रहे पर मैं जानती थी की उनकी बातों में जान नहीं थी। मेरे पापा बार बार उनको हमारे घर में पुरे तीन दिन रुकने के लिए कहते रहे पर सेठी साहब का मन जैसे उठ गया हो, वह उस बात को टाल कर साफ़ हाँ कहने से बचते रहे। कार में जब मैंने सेठी साहब से मेरे मायके में तीन दिन पुरे रुकने के लिए कहा था तब वह रुकने के लिए काफी उत्सुक लग रहे थे, पर हमारी बात के बाद उनमें वह उत्साह गायब था।
डिनर के बाद सेठी साहब उठ खड़े हुए और मेरे पापा और भाई, भाभी से हाथ जोड़ कर औपचारिकता पूर्वक बात करते हुए बोले की वह थक गए हैं और उन्हें अगले दिन काफी काम है सो वह रात को जल्दी सोना चाहेंगे। यह कह कर वह सीढ़ी चढ़ कर ऊपर की मंजिल जहां उन्हें रुकना था, चले गए। मैं ड्राइवर को देखने बाहर आँगन वाले कमरे की और गयी की मैं खुद देखूं उसके रुकने और खाने की सही व्यवस्था हुई या नहीं। मुन्ना पुरे समय भाई की बेटी के साथ बातें करने, टीवी देखने और खेलने में लगा रहा।
गाँव में सब जल्दी सो जाते थे। जब मैं फारिग हुई तब करीब १० बज चुके थे। मैं ड्राइवर से मिल कर वापस आयी तो सब अपने अपने कमरे में जा चुके थे। सिर्फ माँ डाइनिंग टेबल पर बैठी मेरा इंतजार कर रही थी। मुन्ना ड्राइंग रूम में सोफे पर सो गया था। माँ और पापा के कमरे में जा कर मैंने सब की कुशलता बगैरह के बारे में बात की।
कुछ समय बात कर मैं मुन्ने को ले कर ऊपर की मंजिल पर अपने कमरे में जाने लगी तो माँ ने हिदायत दी की ऊपर जाते समय मैं सीढ़ी का दरवाजा पीछे से बंद कर दूँ। ऊपर की मंजिल पहुंचते ही मैंने देखा की सेठी साहब बाहर झरोखे में खड़े हुए हमारे घर के पीछे खेतों में जैसे कुछ देख रहे हों। हम औरतें हमारे मर्दों को काफी अच्छी तरह जानती हैं। जब वह रूठ जाते हैं तो हम औरतों की तरह वह अपनी फीलिंग्स छिपा नहीं सकते। मैं समझ गयी थी की सेठी साहब मुझसे कुछ हद तक रूठे हुए थे।
मुन्ने को अपने कमरे में पलंग पर अच्छी तरह सुला कर मैं वापस झरोखे में आयी। मेरे मायके में सब निचे की मंजिल के कमरों में ही रहते थे। ऊपर की मंजिल में दो कमरे मेहमान के लिए खाली रखे हुए थे। अक्सर ऊपर की मंजिल जाने के दरवाजे पर रातको ताला लगा हुआ होता था ताकि रात को ऊपर से झरोखे पर चढ़ कर कोई चोर निचे ना आ सके। गॉंव में चोरियों का डर होता है। मैंने ऊपर आते हुए सीढ़ी के दोनों दरवाजे, एक निचे वाला और एक ऊपर वाला, को मेरे पीछे बंद कर दिया था। ऊपर की मंजिल पर उस समय मैं, मुन्ना और सेठी साहब के अलावा और कोई नहीं था।
उस समय सेठी साहब के मन में क्या चल रहा होगा यह मैं अच्छी तरह जानती थी। उनका दिल मैंने मेरी रूखी बातों से आहत कर दिया था। मुझे उनके चेहरे पर फिरसे वही शरारत और शौखियाँ लानी थी। मेरे आने की जब सेठी साहब ने आहट सुनी तो पीछे मुड़े और मुझे देख कर हलके से मुरझाये हुए शायद औपचारिकता दिखाने के लिए मुस्काये। पर उनकी फीकी सी मुस्कान में उनके मन के भाव स्पष्ट दिख रहे थे।
मैंने झरोखे की बत्ती को बुझा दिया और सेठी साहब के पास जा कर पूछा, “क्या बात है? आप तो थक गए थे न? अब यहां बालकनी में ऐसे मुंह फुला कर क्यों खड़े हो?”
सेठी साहब ने मेरी और नहीं देखा और मुझसे थोड़ी दूर हट कर रिसियानी शकल बना कर खड़े हो गए। मेरी बात का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं सेठी साहब के पास जा कर उनसे कस कर लिपट गयी और फिर उनके कानों में धीमी आवाज में फुसफुसाती हुई बोली, “मोरे सैय्याँ मोसे रूठ गए, अब उनको मैं मनाऊं कैसे?”
सेठी साहब ने मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फिराया और कुछ दुखी मन से झुंझलाते हुए बोल पड़े, “क्यों अब क्यों मुझसे लिपट रही हो? तुम्हारे नियम पालन का क्या हुआ? अभी भी तो हम गांव में ही हैं।“
मैं सेठी साहब का कटाक्ष समझती थी। झरोखे में अन्धेरा था। मैंने सेठी साहब के सिर को खिंच कर निचे की और झुकाया और उनके होँठों को मेरे होँठ पर चिपकाते हुए कहा, “ओय होय! मेरे सैय्यांजी रूठ गए रे! सेठी साहब अब हम गाँव में नहीं अँधेरे में हैं। अँधेरे में गाँव में भी सब कुछ होता है।”
मेरी बात सुन कर सेठी साहब का मुरझाया हुआ चेहरा अचानक खिल उठा। सेठी साहब ने निचे झुक कर मेरी दोनों घुटनों के निचे बाँहें डालकर मुझे अपनी बाँहों में उठा कर मेरे होँठों को जोर से चूमते हुए कहा, “अच्छा? अँधेरे में गाँव में और क्या क्या होता है? बताओ तो?” फिर वह बोले, “तुम नहीं, अब मैं बताता हूँ की गाँव में अँधेरे में क्या क्या होता है।”
मैं उस वक्त कुछ भी बोलने की हालत में नहीं थी। मैं सेठी साहब की गर्दन के इर्दगिर्द अपनी बाँहों की माला बनाकर उनकी बाँहों में बड़े सकून के साथ ऊपर उठे हुए उनके होँठों में अपने होँठों को चुसवाते हुए सेठी साहब के मुँह को बड़े प्यार से चूसती रही। सेठी साहब ने अपनी फौलादी बाँहों में मुझे ऐसे ऊपर हवा में उठा रखा था जैसे मैं कोई औरत नहीं कोई हलकी सी फूल की लड़ी थी।
सेठी साहब के होंठ और मुंह मेरी जीभ को ऐसे चूस रहे थे जैसे वह मेरे बदन से सारा पानी निकाल देंगे। मैं भी सेठी साहब की जीभ को अपने मुंह में लेकर उनकी लार बड़े ही प्यार से पिने लगी। आसमान के तारों के हलके से प्रकाश में मैं सेठी साहब के चेहरे को देख रही थी। उनकी आँखें जैसे नशे में डूबी हुई हों इस तरह वह कभी आँखें मूँद कर तो कभी मेरी आँखों में आँखें डालकर बेतहाशा जोशखरोश से मेरे होँठ चुम रहे थे।
एक बार जब सेठी साहब ने जोश में आकर मेरे होँठ काटे तो मेरे मुंह से ना चाहते हुए भी हलकी सी सिसकारी निकल गयी। मैंने सेठी साहब के मुंह से मुंह हटा कर कहा, “सेठी साहब प्लीज हमारी आपसी करतूतों का कोई निशान दिखे ऐसा अभी मत करना। वरना मेरी बदनामी हो जायेगी। आप नहीं चाहोगे ना की मैं बदनाम होऊं?”
मेरी बात सुनकर सेठी साहब ने मुझे अपनी बाँहों में उठा कर सीने से चिपकाए हुए अपने कमरे की और जाते हुए बोले, “बिलकुल नहीं। अब हम जो करेंगे अँधेरे में ही करेंगे और मैं अब सब कुछ करूंगा पर वादा करता हूँ की कोई खुला दिखे ऐसा निशान नहीं छोडूंगा जिससे तुम्हारी बदनामी हो। बोलो मंजूर है?”
मैंने सेठी साहब के गालों को चूमते हुए कहा, “मैंने तो आपको पहले ही सैय्यां कह कर अपनी मंजूरी दे दी है। जबसे आपने मुन्ने की स्कूल में मेरे हस्बैंड बनने की इच्छा जताई थी तब से मैंने तो आपको मेरा दूसरा पति माने उपपति मान लिया था। राज मेरे पति हैं और मेरा बदन उनके भोग मतलब आनंद के लिए है वैसे ही अब आपको मैंने अपना उपपति मान लिया है और मेरा यह बदन आप के भी भोग और आनंद के लिए प्रस्तुत है..
मैं अब पूरी रात के लिए आपकी पत्नी हूँ, आपकी प्रियतमा हूँ, दासी हूँ, रखैल हूँ, आपकी रंडी हूँ जो आप मुझे मानें। आप मुझसे जो चाहे करें और करवाएं। मुझे सब मंज़ूर है, मैं तैयार हूँ। आप के प्यार और बलिदान ने मुझे जित लिया है। आज मुझे मौक़ा मिला है की मैं आपने आपको आपके हवाले कर आपसे उत्कट प्यार का आदान प्रदान करूँ।”
मुझे कमरे में ले जा कर पलंग पर लिटाते हुए सेठी साहब बोले, “टीना मुझे तुम्हारी तरह इतने भारीभरकम शब्द नहीं आते। मैं तो सिर्फ इतना ही कहूंगा की मैं तुम्हारे पति बनने का सौभाग्य……”
मैंने सेठी साहब की बात को बिच में ही काटते हुए कहा, “सेठी साहब, मैं जानती हूँ की आप और सुषमाजी दोनों साफ़ साफ़ देसी भाषा में बोलना पसंद करते हैं। ख़ास कर सेक्स के सम्बंधित बातें। अब हमारे बिच ऐसे सम्बन्ध नहीं रहे की आपको मुझसे नापतोल कर बोलने की जरुरत है। आप बेशक आपकी मनपसंद और देसी भाषा में मुझसे जो कहना है वह बेबाक कह सकते हो। यह एक पल के लिए भी मत सोचना की मैं क्या सोचूंगी।”
सेठी साहब ने मेरे होँठ चूमते हुए कहा, “मेरी टीना रानी इतने कम समय में काफी सयानी हो गयी है। ठीक है मेरी रानी, अब मैं तुमसे देसी भाषा में ही बात करूँगा। टीना, तुम मेरी दासी, रखैल या रंडी नहीं, मेरी प्रियतमा हो, मेरे दिल की रानी हो। जैसे तुमने मुझे उपपति का ओहदा दिया है, मैं भी तुम्हें मेरी उपपत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ। मैंने सुषमा से शादी करते समय वादा किया था की मैं किसी भी और स्त्री की भले ही चुदाई करूँ, पर मैं उसे पत्नी का दर्जा नहीं दूंगा..
पर जैसे की सुषमा ने तुम्हें बताया है, हम मतलब, मैं और सुषमा, किस्मत के एक अजीब खेल में फंसे हैं। इसी समय माँ ने मतलब दुर्गा माँ ने तुम्हें और राज भाईसाहब को हमारे लिए देवदूत के रूप में भेजा है ऐसा मेरा मानना है। हमारे बिच जो सम्बन्ध उजागर हो रहे हैं शायद माँ उसके द्वारा हमारी समस्याओं को अपने तरीके से सुलझाना चाहती है अगर तुम और राज साहब राजी हों तो…….।”
मैंने जिंदगी में एक बात सीखी है। अगर आपको फूल चाहिए तो आप को कांटो को भी स्वीकारना पड़ेगा। आप सिर्फ फूल की अपेक्षा नहीं रख सकते। ऐसी अपेक्षा रखने से जिंदगी में निराशा ही प्राप्त होगी, क्यूंकि फूल तो हरेक को चाहिए।
जो कांटें ले कर उसकी कीमत चुकाएगा उसे फूल मिलेंगे। जिंदगी में मुफ्त में कुछ नहीं मिलता। जिंदगी में अगर कुछ चाहिए तो कुछ भोग देना ही पड़ेगा। अगर शादी करनी है तो पत्नी का ध्यान रखना पड़ेगा, उसकी बात माननी पड़ेगी, बच्चे चाहियें तो उनका बोझ उठाना ही पड़ेगा, अगर शादी के बाहर चुदाई करनी है तो चुदवाने वाली के नखरे भी सहन करने पड़ेंगे, बदनामी हो तो उसे भी झेलनी पड़ेगी बगैरह बगैरह।
मुझे सेठी साहब का लण्ड चाहिए था। मेरे पति ने मुझमें वह आग लगा दी थी। पर मुझे अगर सेठी साहब का लण्ड चाहिए तो मुझे मेरे पति को सुषमाजी की चूत दिलवानी पड़ेगी, और उन्हें क्या चाहिए उसका ध्यान भी रखना पड़ेगा।
मैं समझ गयी थी की सेठी साहब क्या कहना चाहते थे। पर उस समय मेरी चूत में ऐसी आग लगी थी की मुझे और कुछ सोचने की ताकत या इच्छा ही नहीं थी। पता नहीं क्यों, पर मुझे सेठी साहब से कुछ भी कहने में बड़ी शर्म आ रही थी।
वैसे तो मेरे और सेठी साहब के बिच बात करने में कोई बंदिश थी नहीं। पर उस समय, क्यूंकि मैं सेठी साहब से चुदवाने के लिए तड़प रह थी, तो मैं बात करने में शर्माती रहती थी। पता नहीं क्यों मेरा मुंह खुल ही नहीं रहा था।
मैंने सेठी साहब का हाथ पकड़ा और अपने स्तनोँ को उनके हाथों पर रगड़ते हुए सेठी साहब से लिपट गयी। मुझे सेठी साहब से आलिंगन कर पता नहीं कैसा अद्भुत सकून मिलता था। मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरी बरसों की प्यास यही मर्द बुझा सकेगा।
पर चूँकि मैं यह भी जानती थी की अक्सर चुदासी औरत के साफ़ साफ़ नहीं बोलने से कई बार उसके मन की बात मर्द समझ नहीं पाते हैं, मैंने सेठी साहब से कहा, “सेठी साहब, आपके मुंह से साफ़ साफ़ शब्द सुन कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। इसका मतलब है अब आप मुझे अपनी मानने लगे हो।
वाकई में मैं यह चाहती थी हम दोनों को अकेले में बिना कोई रोकटोक कुछ रातें मिलें जिन्हें हम एन्जॉय कर सकें। यह वक्त मेरे लिए बड़ा ही कीमती है। हमारे पास सिर्फ तीन रातें हैं और उसमें हमें नींद भी लेनी है। इन्हें हम औपचारिक बातों में गँवा कर बर्बाद ना करें। मेरे पुरे बदन में इस वक्त जबरदस्त आग लगी हुई है।
मैंने कहा ना की आप मुझसे जो कुछ भी करना और करवाना मतलब जैसे भी मुझे एन्जॉय करना चाहें वह मैं बिना कोई सवाल करे, बिना झिझक के करुँगी। कुछ भी मतलब कुछ भी। इसमें कोई भी किन्तु परन्तु नहीं होगा। यह मैं मज़बूरी में नहीं कह रही। यही मेरी इच्छा है। इन तीन रातों में हम सिर्फ एक दूसरे की बदन की भूख मिटायेंगे और अगर बातें भी करेंगे तो प्यार की ही बातें करेंगे, और कोई बात नहीं करेंगे। मुझे इन तीन रातों में आप से वह सब कुछ पाना है जो मैंने आज तक नहीं पाया।”
मेरे मुंह से ऐसी सीधी साफ़ साफ़ बात इतने सलीके सुन कर सेठी साहब मेरी और कुछ देर आश्चर्य से ताकते ही रहे। शायद किसी औरत ने उन्हें पहली बार इतने साफ़ शब्दों में कहा होगा की वह उनसे चुदवाने के लिए कितनी बेताब है। कहते तो मैंने कह दिया पर सेठी साहब की पैनी नजर देख कर मेरे गाल शर्म से लाल हो उठे।
सुषमाजी ने मुझे बताया था की सेठी साहब का प्यार काफी रफ़ माने आक्रमक सेक्स होता है और वह रफ़ सेक्स बहुत पसंद करते हैं। रफ़ सेक्स में स्तनोँ को खूब चूसना, निप्पल्स को चूसना और काटना, नंगे कूल्हे पर चपेट मारना, लण्ड और चूत खूब चूसना और अगर मौक़ा मिले तो गाँड़ में लण्ड डालकर चोदना मतलब गाँड़ मारना बगैरह होता है।
इसके मुकाबले मेरी मेरे पति से चुदाई काफी साधारण सी होती थी। अक्सर तो वह मेरे ऊपर चढ़कर मुझे चोदते थे, काई बार मुझे घोड़ी बनाकर भी चोदते थे। उन्होंने कई बार मेरी गाँड़ मारने का प्रस्ताव रखा था, पर मैंने उसे सिरे से खारिज कर दिया था। उसके बाद मेरे पति ने भी ज्यादा जोर नहीं दिया इस बात पर।
अब सेठी साहब मेरी कैसी चुदाई करेंगे, यह सोच कर मैं परेशान हो रही थी। कहीं वह मेरी गाँड़ मारने पर आमादा हो गए तो मैं उन्हें मना नहीं कर पाउंगी। मैंने उन्हें वचन जो दिया है की मैं वह जो कहेंगे, जैसे कहेंगे, करुँगी।
मुझे लण्ड चूसना भी ज्यादा पसंद नहीं है। मेरे पति का लण्ड जब भी मैंने चूसा है तो वह कोई बड़ा अच्छा अनुभव नहीं रहा। सुषमाजी ने तो साफ़ साफ़ कहा था की सेठी साहब को लण्ड चुसवाना बहुत पसंद है। अगर सेठी साहब मुझसे लण्ड चूसवाएंगे तो मुझे कहीं उलटी ना आ जाए। ऐसा अगर हुआ तो कहीं सेठी साहब बुरा ना मान जाए। यह सब विचार मेरे दिमाग में घूम रहे थे।
मैं पलंग पर लम्बी हो कर लेट गयी तो सेठी साहब मेरे ऊपर चढ़ने के बजाय खड़े हो कर पलंग पर सीधी लेटी हुई मुझे बड़ी ही बारीकी से निहारने लगे। मैंने उनकी लोलुप निगाहें जो मेरे पुरे बदन का मुआइना कर रहीं थीं, देख कर कुछ शर्माते हुए पूछा, “क्या देख रहे हैं आप? मुझे पहले कभी देखा नहीं क्या आपने?”
सेठी साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं कितना भाग्यशाली हूँ की तुम्हारे जैसी बेतहाशा आसमान से उतरी हुई हूर सी खूबसूरत औरत इस वक्त मेरे सामने लम्बी हो कर एक संगेमरमर की तराशी हुई अद्भुत खूबसूरत मूरत की तरह लेटी हुई मेरे जैसे एक साधारण आदमी को अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए इंतजार कर रही है?”
सेठी साहब के बात सुनकर मेरे गाल शर्म से लाल हो गए।
मैंने सेठी साहब से कहा, “सेठी साहब मेरी झूठी तारीफ़ मत करो। मुझे चने के पेड़ पर मत चढ़ाओ। मैं कोई सुन्दर नहीं हूँ। सुंदरता आपकी नज़रों में है। जिसे प्यार करते हैं, वह जैसी भी हो, सुन्दर लगती है। बल्कि मैं कहती हूँ की मैं बड़ी भाग्यशाली हूँ की आपकी नज़रों ने मुझे सुंदर माना और आपके भोग के लिए योग्य माना। अब मुझे ज्यादा इंतजार मत कराइये और आप मुझे जैसे चाहें एन्जॉय कीजिये और मेरे बदन का और मेरे प्यार का भरपूर आनंद लीजिये। आपके आनंद लेने से मेरे पुरे बदन में आनंद की लहरें दौड़तीं रहेंगी। वैसे मुझ में ऐसा क्या सुन्दर लगा आपको?”
हर औरत अपनी सुंदरता के बखान सुनना चाहती है। मैं कोई अपवाद नहीं। ना ना करते हुए भी आखिर में मैं सेठी साहब के मुंह से अपनी सुंदरता की तारीफ़ सुनंने की लालसा रोक नहीं पायी।
सेठी साहब ने मेरे अंग अंग को अपनी नज़रों से तराशते हुए कहा, “मैं किस किस की तारीफ़ करूं? तुम्हारी इतनी मधुर वाणी, तुम्हारा गुलाबी बदन, तुम्हारा चाँद सा चेहरा, तुम्हारी कमल की डंडी सी लम्बी भुजाये, तुम्हारे केले के वृक्ष के तने जैसी जाँघें, लम्बी खूबसूरत गर्दन, धनुष्य से तेज तर्रार होँठ, तुम्हारे पके हुए फल की तरह भरे हुए पर अति सुकोमल स्तन मंडल, पतली कमर और उसके निचे गिटार के आकार सामान तुम्हारी जाँघों का मिलन स्थान।”
मैंने मंद मंद मुस्काते हुए पूछा, “मेरी जाँघों का मिलन स्थान? अभी आपने देखा कहाँ है?”
सेठी साहब ने शरारत भरी मुस्कान देते हुए कहा, “तुम्हें क्या पता? मैंने तुम्हें इन आँखों से एक दो बार नहीं कई बार नंगी देखा है। कितनी बार तुम्हें मैंने सपनों में नंगी किया है। जब से मैंने तुम्हें पहली बार देखा तबसे मैं जब भी तुम्हें देखता हूँ तो तुम्हें अपनी नज़रों से तुम्हारे कपडे उतार पूरी नंगी कर देता हूँ। तुम्हारा हरेक अंग को मैंने जागते हुए और सपनों में देखा है।”
सेठी साहब की बात सुन मेरे रोंगटे खड़े हो गए। सेठी साहब की नज़रों का अंदाज देख कर पहले दिन से ही मैं समझ गयी थी की सेठी साहब मुझे अपनी नज़रों से नंगी कर जरूर देखते होंगे। औरतों में भगवान ने जन्मजात ही यह क्षमता दी है।
मैंने शरारत भरी मुस्कान देते हुए कहा, “अब आपको सपना देखने की या अपनी नज़रों से मुझे नंगी करने की जरुरत नहीं है। मै आपके सामने हाजिर हूँ। आप मुझे खुद अपने हाथों से नंगी कर मेरी जाँघों का मिलन स्थान देख सकते हो।”
सेठी साहब ने बिना कुछ बोले झुक कर मेरी गर्दन की आसपास अपनी बाँहें डालकर मेरा सर मुझे बिस्तर से थोड़ा ऊपर उठाया और अपने होँठों से फिर से मुझे चूमने लग गए। उनके साथ चुम्बन में मैं ऐसी खो गयी की मुझे पता ही नहीं चला की कब वह मरे ऊपर आ गए और मेरी पीठ के पीछे से मेरे ब्लाउज के बटन और मेरी ब्रा का हुक खोल दिया।
मैं बता नहीं सकती की सेठी साहब के छूते ही पता नहीं क्यों मेरी जाँघों के बिच में से मेरा स्त्री रस बहना शुरू हो जाता था। मैं पागल सी बेचैन हो जाती थी। मेरे पति के साथ चुदाई करवाते हुए मुश्किल से मैं एकाद बार झड़ती होउंगी। पर सेठी साहब के छूते ही मुझे लगता था जैसे मैं झड़ जाउंगी।
मेरे बूब्स तो सेठी साहब ने देखे और चूसे हुए ही थे। देखते ही देखते सेठी साहब ने मेरे ब्लाउज और ब्रा निकाल फेंके। मैंने सेठी साहब से लाइट बुझाने को कहा तो सेठी साहब बोले, “यहां तो कोई आने वाला नहीं है। अब तो लाज शर्म छोडो। मुझे तुम्हारे रूप के अच्छी तरह दर्शन तो करने दो टीना?”
मैं उनके सवाल के सामने लाजावाब थी। सेठी साहब मुझे ऊपर से नंगी कर पीछे हट कर मुझे अच्छी तरह निहारने लगे। मेरे अल्लड़ स्तनोँ की निप्पलेँ उनकी लोलुप नज़रों से एकटक देखने कारण एकदम सख्त हो कर भरे हुए स्तन मंडल पर मगरूर सी खड़ी हो गयीं।
शर्म के मारे मैं आधी नंगी उनकी नज़रों से नजरें मिला नहीं पा रहीं थीं। कुछ देर मेरे स्तनोँ को निहारने के बाद उन्होंने मेरे दोनों स्तनोँ को अपनी हथेलियों में भर लिया और उन्हें प्यार से सहलाने और मसलने लगे।
मैं देख रही थी की उनकी जाँघों के बिच उनका लण्ड उनके पाजामे में सख्त हो कर तन कर खड़ा हो चुका था। वह उस सिमित मर्यादा में रुक नहीं पा रहा था। मेरे स्तनोँ को मसलते हुए धीरे धीरे वह काफी जोरों से उन्हें दबाने लगे।
कुछ देर में उनकी माँसल बाँहों ने मेरे स्तनोँ को इतनी ताकत से मसलना शुरू किया की मुझे दर्द होने लगा। वह दर्द दुखद नहीं सुखद था पर दर्द तो था ही! मेरे मुंह से सिसकारी निकल गयी।
मैंने कहा, “सेठी साहब, थोड़ा धीरे से! मैं कहीं नहीं जाने वाली।”
सेठी साहब ने कहा, “सॉरी टीना। मेरा यह लण्ड जब खड़ा हो जाता है तो मेरा अपने आप पर नियंत्रण नहीं रहता। मैं एकदम उसके सामने बेबस हो जाता हूँ। इसी वजह से कई बार मेरी सुषमा से भिड़ंत हो जाती है। वह गुस्सा कर बैठती है। कई बार तो मेरी हरकतों से तंग आकर मुझे जंगली कह देती है वह। पिछले कुछ दिनों से तो सुषमा मेरे साथ में सोती भी नहीं है।”
बापरे! एक तो वैसे ही सेठी साहब की चुदाई तगड़ी होती है, और ऊपर से कुछ दिनों से अगर उन्हें सुषमाजी को चोदने का मौक़ा नहीं मिला तो मेरी तो उस रात शामत ही आने वाली थी। यह सोच कर मेरी हालत खराब हो रही थी। पर चाहे जो कुछ भी हो, मुझे किसी भी हाल में सेठी साहब पर कोई नियंत्रण करना नहीं था। यह मैंने पक्का तय किया था।
