पड़ोसन बनी दुल्हन 1

दोस्त की बीवी

मैंने सेठी साहब के बालों में उंगलियां फिराते हुए कहा, “कोई बात नहीं सेठी साहब। मुझे पता है। सुषमाजी ने भी मुझे इशारों इशारों में यह बात कही थी। मैं समझ सकती हूँ। आप मेरी सिसकारियां और चीखों की परवाह मत करो। यह दर्द मेरे लिए दुःखद नहीं सुख के अतिरेक के कारण होगा।

सेठी साहब, आपने अपने सच्चे प्यार, लगन और निस्वार्थ भाव से मुझे बिन मोल खरीद लिया है। आज रात से मैं पूरी तरह से आप की बन जाना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ की आप मुझे थोड़ी सी भी परायी ना समझें। मेरा यह बदन आपके भोग और आनंद के लिए पूरी तरह समर्पित है। आज की रात मैं आपसे खूब तगड़ी तरह रगड़वाना चाहती हूँ। आप चाहे जैसे मुझे रगड़ो। मुझे चिल्लाने दो, कराहने दो, पर प्लीज आप सॉरी मत कहो। प्यार में सॉरी और थैंक यू नहीं होते।”

फिर कुछ डरते हुए मैंने कहा, “पर फिर भी सेठी साहब, अब तो मैं आपकी हो चुकी हूँ और हमेशा रहूंगी। तो मेरी सेहत का भी ख़याल जरूर रखना।”

सेठी साहब ने मेरी बात को सूना अनसुना करते हुए अपने होँठ मेरे स्तनोँ के ऊपर चिपका दिए और मेरी निप्पलोँ को वह बेतहाशा जोर से चूसने लगे। उनका मुंह एक स्तन को चूसता तो उनका हाथ मेरे दूसरे स्तन को मसल ने में लगा हुआ रहता।

कई बार वह इतनी ताकत और जोर से चूमते की मुझे लगा की कहीं मेरी छाती से निकल कर मेरे स्तन उनके मुंह में ही ना चले जाएँ। अगर मेरे स्तनोँ में उस समय थोड़ा सा भी दूध होता तो उनके चूसने से फव्वारा बनकर फुट कर निकल पड़ता।

सेठी साहब के मेरे स्तनोँ को इतनी ताकत से चूसने के कारण सेठी साहब के दाँतों के निशान मेरे स्तनोँ पर अच्छी तरह से अंकित हो गए होंगे, उसमें मुझे कोई शक नहीं था। पर सेठी साहब से इस तरह मेरे स्तनोँ को चूसने से मेरे पुरे बदन में जैसे एक झनझनाहट सी होने लगी।

मेरी जाँघों के बिच में से मेरा स्त्री रस चुने लगा, मैं झड़ ने कगार पर पहुंच गयी। मेरा तन बदन मेरे नियत्रण में नहीं रह पा रहा था। मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आपको रोका।

यह दर्द मेरे लिए असह्य था। असह्य इस लिए नहीं की मैं उस दर्द को सहन नहीं कर सकती थी, पर असह्य इस लिए था की उस दर्द के कारण मेरी चूत में से पानी का फव्वारा सा छूटने लगा था।

मैं सेठी साहब का वह प्यार पाना चाहती थी जो सुषमाजी को खूब मिल रहा था पर शायद वह उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। मैं सेठी साहब का जीवन आनंद से भर देना चाहती थी। मैं चाहती थी की मुझे मेरे पति से जो प्यार नहीं मिल पा रहा था वह सेठी साहब से मिले और मेरा जीवन सम्पूर्ण हो।

मैंने सेठी साहब के पाजामे का नाडा खिंच कर इशारा किया की अब वह हमारे बीचमें से कपड़ों का आवरण हटा दे। मैं मेरे सेठी साहब को पूरा पाना चाहती थी।

सेठी साहब ने थोड़ा सा हट कर मेरे घाघरे का नाडा खोल दिया। साडी तो वह पहले से ही निकाल चुके थे। मैंने भी मेरे पाँव ऊपर निचे कर मेरा घाघरा निकाल दिया। सेठी साहब ने बिस्तर से निचे उतर कर अपना कुर्ता, पजामा और कच्छा निकाल फेंका। सेठी साहब का बलिष्ठ माँसल नंगा बदन पूरी तरह मेरे सामने प्रस्तुत हो गया।

सेठी साहब का लण्ड उनके बदन की मर्यादा को ना मानते हुए उद्दंड सा लोहे की छड़ की तरह उनकी जाँघों के बिच में खड़ा था। उसे सिर्फ लण्ड कहना शायद बेमानी होगी।

लण्ड मैंने मेरे पति का देखा था। हालांकि मेरे पति का लण्ड भी काफी तगड़ा था, पर सेठी साहब का लंड? किसी भी सेक्स की शौक़ीन औरत के सपनों का बादशाह कह सकते हैं उसे। गोरा, चिकनाहट से भरा, चमकता हुआ, पूरी गोलाई पर नीली नसों के बिछे हुए जाल से आच्छादित ऐसा लगता था जैसे चमड़े का लम्बा, मोटा, चिकना और सख्त रस्सा जिसके एक छोर पर लण्ड का चिकना टोपा था और जिसका दुसरा छोर सेठी साहब की जाँघों के बिच में चिपका दिया गया हो।

हालांकि मैंने सेठी साहब का लण्ड आते हुए कार में अँधेरे में महसूस किया था। पर साक्षात जब उसे खड़ा हुआ देखा तो मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ की सेठी साहब की पतली कमर, ऊपर का कसरती माँसल पेट, चौड़ी छाती और बाजू के सख्त स्नायु के साथ उस लण्ड इस लण्ड से कई अच्छी सोसाइटियों की खूबसूरत शादीशुदा या कँवारी लडकियां या औरतें सेठी साहब चुदवा चुकीं थीं या चुदवाने के लिए बेताब रहतीं थीं।

ऐसे पुरुष से भला कोई भी स्त्री अपने कौमार्य को भंग करवाने के लिए मजबूर कैसे ना हो? मेरा सेठी साहब से तगड़ी तरह से चुदने का निश्चय सेठी साहब के नंगे बदन और ख़ास कर उनका वह विशाल काय लण्ड को देख और दृढ हो गया। हालांकि मुझे उससे चुदवाने से होने वाले दर्द का भली भांति अंदाज था।

मैंने सेठी साहब का लण्ड मेरी उँगलियाँ में प्यार से सहलाया और झुक कर उसे बार बार चूमा। चूमते हुए सेठी साहब के वीर्य रस का स्वाद मुझे अच्छा लगा। मैं लण्ड चूसना तो दूर, चूमना भी पसंद नहीं करती थी। पर उस रात मुझे सेठी साहब पर इतना प्यार आ रहा था की मैं अपने आपको सेठी साहब का लण्ड चूसने से रोक नहीं पायी।

मैंने सेठी साहब के लण्ड को चूमते हुए धीरे धीरे से पहले उसका टोपा और उसके बाद जितना भी उस महाकाय लण्ड का हिस्सा अपने मुंह में ले सकती थी, उतना लेकर मैं सेठी साहब के लण्ड को चाटने और चूसने लग गयी। मैं तब पहली बार समझ पायी की अपने प्यारे मर्द का तगड़ा लण्ड चाटने और चूसने में कई औरतें कितना ज्यादा एन्जॉय क्यों करतीं हैं।

उस समय मुझे सेठी साहब का लण्ड चूसने में इतना सच्चा आनंद आ रहा था जो कहना मुश्किल है। पर मेरे लण्ड चूसने से सेठी साहब के पुरे बदन का बुरा हाल हो रहा था। उनका पूरा माँसल बदन मेरे उनका लण्ड चूसने से एकदम सख्त हो गया था। उनके मुंह से बारबार “आह… ओह…. हूँ….” की सिकारियाँ निकल रहें थीं।

जितना एक औरत को अपने प्यारे मर्द का लण्ड चूसने में आनंद आता है ऐसा ही आनंद एक मर्द को भी जब अपनी प्यारी औरत उसका लण्ड चुस्ती है तो आता है। उस समय वह औरत का मन अपने प्यारे मर्द का लण्ड उस की चूत के गहराईयों में घुस कर उन गहराइयों को कैसे अपना बनादेगा इसी सोच में खो जाता है।

सेठी साहब ने झुक कर मेरी छोटी सी पैंटी को भी निकलवा दिया और मैं उनके सामने पूरी नंगी हो गयी। सेठी साहब मुझे पूरी तरह निर्वस्त्र कर मेरे नंगे बदन को ऐसे घूरने लगे जैसे उन्होंने कोई स्त्री को नंगी देखा ही ना हो। कुछ देर तक स्तब्ध से देखते रहने के बाद वह बोले, “टीना, भगवान ने तुम्हें बना कर शायद वह ढांचा ही तोड़ दिया। तुम लाजवाब हो।”

मैंने सेठी साहब की बात पर कुछ शर्माते हुए मुस्कुरा कर कहा, “सेठी साहब अब मुझे और परेशान मत करो। अब तो हद ही हो गयी। मुझे पता है, मैं कितनी सुन्दर हूँ। कई बार मैं सुषमाजी को देखती हूँ तो इर्षा से जल उठती हूँ। उपरवाले ने कितना सुन्दर बनाया है उनको। मैं तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं। खैर, चलो अगर मैं सुन्दर हूँ तो अब यह सुंदरता पूरी तरह से आपकी है। मुझे अब आप पूरी तरह से एन्जॉय करो। मैं आपके प्यार के लिए कबसे तरस रही हूँ।”

सेठी साहब ने झुक कर मुझे प्यार से कपाल पर चुम्बन किया फिर मेरी टांगों को चौड़ी कर टांगों के बिच में अपना सर डालकर जीभ से मेरी चूत में से रिसते हुए रस को चाटने लगे। सेठी साहब की जीभ मेरी चूत में गजब कई हलचल मचा रही थी। मेरे पुरे बदन में सेठी साहब के मेरी चूत चाटने के कारण उन्माद की लहर दौड़ रही थी।

मेरी टाँगों के बिच पता नहीं जैसे मेरे स्त्री रस की धारा सी बह रही थी, जिसे सेठी साहेब बड़े चाव से चाटे जा रहे थे। मेरी चूत का हरेक स्नायु छटपटा रहा था। सेठी साहब की जीभ कहाँ कितना कुरेदना उसमें माहिर लग रही थी। मेरी छटपटाहट की परवाह किये बिना सेठी साहब मेरी चूत की हर पंखुड़ी और पंखुड़ियों के बिच की सतह को बड़े प्यार से चाटे और चूसते बाज़ नहीं आ रहे थे। मेरी कामाग्नि की ज्वाला सेठी साहब की जीभ के कुरेदने से बढ़ती ही जा रही थी।

कुछ ही देर के बाद सेठी साहब कुछ पीछे हट गए। पीछे हट कर अपनी जीभ की जगह उन्होंने अपनी दो उंगलियां मेरी चूत में घुसेड़दीं। उँगलियाँ का मेरी चूत में घुसते ही पता नहीं मेरे दिमाग में कैसा झटका लगा की मैं उन्माद और रोमांचित उत्तेजना से कराहने लगी। मेरा झड़ना अब रुका नहीं जा रहा था। मेरा पूरा बदन बिस्तर पर मचल रहा था जिसे सेठी साहब देख कर हैरान लग रहे थे।

मैंने सेठी साहब का हाथ पकड़ कर जोर से दबाते हुए कहा, “सेठी साहब, आह……. ओह…… मुझे चोदो। मैं झड़ रही हूँ। प्लीज अपना तगड़ा लण्ड मेरी चूत में पेलो, अब मुझसे रहा नहीं जा रहा।” ऐसा कहते कहते मैं झड़ पड़ी। मेरे दिमाग में ही नहीं मेरे पुरे बदन में जैसे एक बिजली की तीखा झटका दौड़ रहा था।

मैं जानती थी की जैसे ही सेठी साहब का मोटा लण्ड मेरी चूत में घुसने की कोशिश करेगा तो मेरे पर कहर ढाएगा। पर आखिर मुझे उसे तो लेना ही था तो फिर जब ओखल में सिर रख दिया है तो मुसल से क्या डरना?

मैंने सेठी साहब का सर पकड़ कर उठाया और कहा, “वैसे तो मुझे यह बहुत अच्छा लग रहा है, पर सेठी साहब आज अब मैं आपकी मर्दानगी को पूरा अपने बदन में अंदर लेकर जो सुख एक औरत को अपने प्रेमी से प्यार करके मिलता है, वह मैं महसूस करना चाहती हूँ। इस पल का मैं महीनों से इंतजार करती रही हूँ। अब मुझसे रहा नहीं जाता। अब प्लीज आइये और मुझे खूब प्यार कीजिये और मुझे अपना बना लीजिये। आज की रात मैं मैं ना रहूं और आप आप ना रहो। हम एक दूसरे में खो जाएं। मुझे खूब तगड़ा चोदिये प्लीज।“

सेठी साहब ने मेरी मुंडी पकड़ कर उसे हिलाते हुए कहा, “टीना, मुझे बहुत अच्छा लगा की तुम खुल्लम खुल्ला देसी भाषा में मुझे कह रही हो की तुम मुझ से चुदवाना चाहती हो।”

मैंने सेठी साहब के लण्ड को अपने एक हाथ में पकड़ कर उसे हिलाते हुए कहा, “सेठी साहब, मुझे मजबूर मत करिये। मुझे शर्म आती है। वैसे तो मैं अपने पति से खुल्लमखुल्ला सब बोलती हूँ, पर पता नहीं आपके साथ मुझे आपको मेरा सरगना बनाकर, अपना स्वामी बना कर बहुत अच्छा लगता है।

मेरी नजर में आपका लेवल कहीं ऊंचा है। मैं उसे निचे नहीं लाना चाहती। मैं आपकी औरत बन कर आपके निचे रहना चाहती हूँ। आप कह रहे हैं तो मैं कुबूल करती हूँ की आपकी कसम, आज मैं आपके इस तगड़े लण्ड से खूब चुदना चाहती हूँ। जिस दिन मेरे पतिने आपका यह लण्ड देखा तब से उन्होंने आप के इस लण्ड के बारे में बता बता कर मुझे पागल कर दिया है।

मैं दिन रात इसी के बारे में सोच कर परेशान हो जाती थी की अगर वाकई में आपका यह लण्ड ऐसा तगड़ा है तो उसको मैं अंदर लेकर अंदर में डलवा कर कैसा महसूस करुँगी। जब आपने उस दिन स्कूल में मेरे पति के हक़ की अपेक्षा ना रहते हुए, मेरे पति की जिम्मेदारियां निभाने की इच्छा जाहिर की थी तो मैंने तय किया की मैं आपसे जरूर अपने आप को समर्पण कर मतलब चुदवा कर आपको मेरे प्रेमी और पति होने का पूरा एहसास कराउंगी और अपनी जिम्मेवारी भी निभाऊंगी।

उस दिन से ही मैं आपके लण्ड से चुदने के लिए बेबस हो रही थी। आजकी रात मुझे मौक़ा मिला है। अब अगली तीन रातें आप बिलकुल सोओगे नहीं और यहीं मेरे साथ ही गुजारोगे, और मुझे खूब चोदोगे।”

मेरी बात सुनते ही सेठी साहब ने झुक कर मुझे होंठों पर चूमा और मुस्कुरा कर बोले, “टीना, मैंने कभी सोचा नहीं था की मेरे सपनों की खूब सूरत रानी तुम मुझ पर इतनी जल्दी मेहरबान हो जाओगी। मैं हमेशा तुम्हें अपनी बनाकर मेरे लण्ड से तुम्हें चोदना जरूर चाहता था, पर मैं यह सिर्फ तुम्हारी मर्जी नहीं, बल्कि तुम्हारी सक्रीय इच्छा से ही करना चाहता था। मैंने तय किया था की मैं तुम्हें तब तक नहीं चोदुंगा जब तक तुम मुझे सामने चल कर चोदने के लिए नहीं कहोगी। आज तुमने मेरी यह इच्छा पूरी कर दी।”

यह कह कर सेठी साहब उठ खड़े हुए। उनका तगड़ा लण्ड अल्लड़ सा बेखोफ उद्दंड सा खड़ा हुआ मेरी और ऐसे देख रहा था जैसे मुझे चुनौती दे रहा हो। मैं आश्चर्य से उनको देखती ही रही जब सेठी साहब खिसक कर एक स्टूल पर रखी अपनी सूट केस की पॉकेट टटोलने लगे।

मैं समझ गयी की वह शायद कंडोम ढूंढ रहे थे। यह देख कर मेरे ह्रदय में सेठी साहब के लिए सम्मान बढ़ गया। एक जिम्मेवार प्रेमी की भूमिका सेठी साहब निभा रहे थे। पर मुझे सेठी साहब के तगड़े लण्ड का मेरी चूत में पूरा पूरा मजा लेना था। यह मैंने पहले से ही तय किया था।

मैंने बैठ कर उनका हाथ पकड़ा और कहा, “अगर आप कंडोम ढूंढ रहें हैं तो मत ढूंढिए। वैसे तो इस वक्त मेरा फर्टिलिटी पीरियड हैं नहीं, पर अगर मुझे आपसे गर्भ रह गया तो मैं आपके बच्चे को जरूर जनम देना चाहूंगी। मैं ना सिर्फ आपकी बीबी बनना चाहती हूँ, मैं आपके बच्चे की माँ भी बनना चाहती हूँ।आज मैं आपके और मेरे बिच में कोई भी आवरण रखना नहीं चाहती चाहे वह गर्भ निरोधक कंडोम का पतला सा आवरण ही क्यों ना हो।“

सेठी साहब कुछ देर तक मेरी और आश्चर्य से एकटक देखते रह गए। वह उस समय उनकी अपने बच्चे की समस्या के बारे में शायद सोच रहे थे। मैंने उनका सर दोनों हाथों में पकड़ कर कहा, “सेठी साहब, अगर हमारे मिलन से कोई बच्चा रह गया, तो मैं उसे जरूर जनम दूंगी और मैं आपसे वादा करती हूँ की मेरे उस बच्चे को अगर आप और सुषमाजी चाहो तो गोद ले सकते हो। हो सकता है वह हमारा बच्चा आपकी और सुषमाजी की जन्दगी फिर से राह पर ला दे।

अगर आप और सुषमाजी चाहोगे तो वह बच्चा आपका होगा और ना मैं और ना ही मेरे पति उस बच्चे पर माँ बाप होने का दावा करेंगे। मैं चाहती हूँ की हमदोनों का यह मिलन ना सिर्फ मेरे और आपके लिए बल्कि आपके और सुषमाजी के लिए भी एक अद्भुत आनंद और वरदान का कारण बने और आप दोनों की जिंदगी में फिर से वही बहार लौट आये।”

सेठी साहब के चेहरे पर मेरी बात सुनकर जो आनद के भाव मैंने देखे उसको मैं कभी नहीं भूल सकती। शायद मेरे और सेठी साहब के मिलन की वह सबसे बड़ी विशिष्टता थी।

मैं ना सिर्फ सेठी साहब को मेरे बदन को सम्भोग और आनंद के लिए अर्पण कर रही थी पर साथ साथ में शायद उनकी वैवाहिक जीवन में फँसी हुई गाँठ को भी सुलझा ने की कोशिश कर रही थी। सेठी साहब के चमक उठे चेहरे से उनकी अपनी मनोदशा का अंदाज मुझे लग सकता था।

सेठी साहब ने झुक कर मेरे होंठों से अपने होंठ मिलाये और मुझे चूमते हुए बोले, “टीना, मेरा तुम पर कोई क़र्ज़ नहीं। बल्की अब मैं तुम्हारा कर्ज़दार बन गया हूँ। मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ, बशर्ते की सुषमा भी राजी हो। और मैं जानता हूँ की सुषमा ना सिर्फ राजी होगी, बल्कि यह बात सुनकर झूम उठेगी।“

हालांकि सेठी साहब ने मेरे मना करने पर कंडोम नहीं निकाला पर अपनी सूटकेस में से एक छोटी सी बोतल जरूर निकाली जिसमें शायद कोई जेल या ऐसा ही स्निग्ध पदार्थ होगा। क्यूंकि उन्होंने वह जेल या ऑइंटमेंट या कुछ हद तक तेल जैसा चिकना पदार्थ अपने लण्ड के चारों और अच्छी तरह से लगा कर उस बोतल में अपनी दो उंगलियां डुबो कर निकाल कर उन्होंने मेरी चूत को भी अंदर से काफी अच्छी तरह से चिकनाहट से लथपथ किया। उस अनुभव को याद करते समय आज भी मैं रोमांचित हो जाती हूँ की उनका ऐसा करने से उन्होंने मेरी कितनी यातनाएँ कम कीं।

मेरे बिस्तरे पर नग्न लेटे हुए सेठी साहब ने वह सब कार्यक्रम किया और फिर सेठी साहब आगे बढे और मेरे लेटे हुए बदन को अपनी टाँगों के बिच में रख कर मुझ पर सवार हुए। मैंने अपनी टाँगें ऊपर कर सेठी साहब के कंधे पर रख कर उन्हें अपने लण्ड को मेरी चूत के केंद्र पर रखने के लिए इशारा किया।

सेठी साहब का लण्ड जैसे ही मेरी चूत की सतह को छुआ तो मेरे पुरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ पड़ी। मेरे रोंगटे सेठी साहब के लण्ड के मेरी चूत को छूने से खड़े हो उठे। मैंने मेरे एक हाथ की उँगलियों में सेठी साहब का वह विशाल लगता हुआ लण्ड पकड़ा।

यह लण्ड मेरी चूत में कैसे और कितना घुसेगा यह सोच कर ही मैं कांपने लगी। सेठी साहब के लण्ड को देखते हुए मुझे ऐसा लगता था की मेरी पूरी चूत की नाली को पूरी तरह से अंदर तक भर जाने के बाद भी वह शायद आधा बाहर ही रह पायेगा। पूरा मेरी चूत में जा नहीं पायेगा। मुझे मेरे पति ने ऐसे वीडियो दिखाए थे जिसमें मर्द का लण्ड इतना लंबा होता था की औरत की चूत भर जाने के बाद भी आधा बाहर रह जाता था।

उस समय मुझे सेठी साहब के सामने नंगे अपनी दोनों टांगें सेठी साहब के कंधे पर रखी हुई चुदवाने के लिए तैयार होते हुए भी कोई शर्म का एहसास नहीं हो रहा था। क्यों की मैं अपने मन कर्म और वचन से सेठी साहब को अपना सर्वस्व मान चुकी थी और उन्हें अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए बेताब थी।

मैंने सेठी साहब के मोटे लण्ड को अपनी उँगलियों में मेरी चूत के केंद्र बिंदु पर सेट किया और सेठी साहब ने भी मेरी उँगलियों के पीछे ही अपने लण्ड को अपनी उँगलियों में पकडे हुए थोड़ा सा मेरी चूत की पंखुड़ियों की सतह पर चिकनाहट बढ़ाने के लिए रगड़ते हुए धीरे से अंदर घुसेड़ा।

मैं भली भाँती जानती थी की यह मेरे लिए बड़ी ही नाजुक संकट की घडी थी। सेठी साहब के उस तगड़े लण्ड के दाखिल होने से मेरी चूत की त्वचा के पूरी तरह खींचने और चौड़ा होने की क्रिया में मुझे असह्य दर्द का सामना करना पडेगा। शायद मेरी चूतमें से खून का भी कुछ स्राव हो। पर हर औरत को पहली बार चुदवाते हुए यह दर्द झेलना ही पड़ता है। मैं भी इतने बड़े तगड़े लण्ड से पहली बार ही चुदवा रही थी तो मेरे लिए भी यह दर्द झेलना अनिवार्य था।

सेठी साहब ने अपने लण्ड को मेरी चूत में दाखिल कराने के लिए दिया वह पहला धक्का मैं जिंदगी भर कभी नहीं भूल पाउंगी। वह धक्के के चलते हुए सेठी साहब के उस विशालकाय लण्ड के मेरी चूत में दाखिल होने के कारण मेरी चूत की नाली की त्वचा शायद कहीं ना कहीं से थोड़ी जरूर फट गयी होगी। क्यूंकि लण्ड के मेरी चूत में दाखिल होते ही मेरे पुरे बदन में इतने जबरदस्त दर्द की एक लहर दौड़ उठी की ना चाहते हुए भी मेरे मुंह से तीखी चीख निकल गयी।

मेरी चीख इतनी तेज थी की पास वाले दूसरे कमरे में लेटा हुआ मेरा बच्चा कुछ पल के लिए जाग उठा और रोने लगा। निचे सोये हुए सब लोग मेरी चीख सुन कर भाग कर ऊपर ना आ पहुंचे इस डर से मेरी जान निकल रही थी। मेरी चूत से शायद थोड़ा सा खून रिस रहा होगा, क्यूंकि सेठी साहब ने अपना लण्ड मेरी चूत में ही रखते हुए टेबल पर रखे हुए टिश्यू बॉक्स से एक टिश्यू निकाल कर मेरी चूत की पंखुड़ियों को पोंछा।

अगर सेठी साहब ने कुछ समय पहले जो क्रीम की बोतल में से वह जो चिकनाहट देने वाला पदार्थ अपने लण्ड की सतह पर और मेरी चूत की अंदरूनी दीवारों पर अच्छी तरह से ना लगाया होता तो मैं उस समय जब सेठी साहब का लण्ड मेरी चूत में पहली बार घुसा तो चीख तो निकल ही जाती पर उस भयानक दर्द से शायद मैं बेहोश भी हो जाती।

शायद मेरी चीख हमारे कमरे के बंद दरवाजे के बाहर नहीं गयी। बच्चे का ध्यान रखने के लिए मैंने हमारे दो कमरों के बिच का दरवाजा खुला रखा था इसी लिए बच्चा कुछ पलों के लिए जाग उठा पर गहरी नींद में सोये होने कारण वापस फ़ौरन सो भी गया।

सेठी साहब का तगड़ा लण्ड मेरी चूत में दाखिल हो चुका था। मैं उसे भली भाँती मेरी चूत की नाली में महसूस कर रही थी। वह दर्द और उस तगड़े लण्ड की चमड़ी का मेरी चूत में इतनी तगड़ी तरहसे जकड़े होने का अद्भुत मज़े का अनुभव अकल्पनीय और ना भूलने वाला था।

मैंने सेठी साहब को उसी पोजीशन में अपना लण्ड मेरी चूत में जकड़े हुए रखने के लिए कुछ देर के लिए आगे चुदाई करने से रोक दिया। मैं उस पल का पूरी तरह आस्वादन करना चाहती थी। मैं जानती थी की आगे चल कर सेठी साहब मुझे महीनों तक चोदेंगे और मुझे सेठी साहब से कई बार चुदना है। पर यह पहली बार का उस तगड़े लण्ड का मेरी छोटी सी चूतमें जकड़े रहने के एहसास का अवर्णनीय मजे का वह पल मैं पूरा अनुभव करना चाहती थी।

शायद सेठी साहब भी उस आनंद का आस्वादन करना चाह रहे थे या फिर मेरी उस इच्छा का सम्मान करते हुए आगे मुझे चोदने से अपने आपको कुछ समय के लिए रोके हुए थे।

मैंने कुछ समय उस लण्ड की सख्ताई को मेरी चूत में महसूस करने के बाद सेठी साहब को आगे चुदाई जारी रखने का इशारा किया। सेठी साहब से मेरी पहली बार की चुदाई बड़ी दर्दनाक होते हुए भी गजब की आनंद दायक थी। उस मोटे तगड़े लण्ड का मेरी चूत की नाली में रगड़ रगड़ कर अंदर बाहर जाने के मुकाबले में मेरी आजतक मेरे पति के द्वारा हुई चुदाई कुछ भी नहीं थी।

मुझे पहली बार मेरे पति की बारबार कही हुई बात याद आयी की एक शादीशुदा औरत के लिए गैर मर्द के तगड़े लण्ड से चुदाई करवाने का आनंद अद्भुत होता है। मैं मेरे पति की उस बात का उस वक्त कोई तबज्जोह नहीं दे रही थी। पर सेठी साहब से चुदवा कर मुझे मेरे पति की बात का तथ्य समझमें आया।

और यहां तो कोई ऐरागैरा गैर मर्द नहीं, मैं अपने चहिते मर्द सेठी साहब से चुदवा रही थी जो खुद भी गजब के इंसान थे और उनका लण्ड तो कमाल का था ही। तो उस चुदाई का आनंद तो गजब होना ही था।

सेठी साहब की इस पहली चुदाई और मेरे पति के चोदने के तरीके में एक बहुत बड़ा अंतर था। मेरे पति जब शुरू हो जाते थे तो एक तेज दौड़ती हुई रेलवे के स्टीम इंजन के पिस्टन की तरह चोदते ही रहते थे जब तक की वह फारिग नहीं हो जाते।

पर सेठी साहब मुझे भी चुदाई का पूरा मजा दिलाना चाहते थे और खुद भी पूरा लुत्फ़ उठाना चाहते थे। इस लिए पहलीबार लण्ड घुसेड़ कर वह रुके, फिर उन्होंने लण्ड थोड़ा और घुसेड़ा और फिर धीरे धीरे धक्के मार कर अपने लण्ड को जैसे रेलवे का स्टीम इंजन स्टेशन से गाडी छूटने के समय धीरे धीरे अंदर बाहर अंदर बाहर होता है वैसे ही मेरी चूत में अंदर बाहर करते रहे और उसके साथ होते हुए घर्षण का पूरा आनंद वह खुद भी उठा रहे थे और मुझे भी दे रहे थे।

क्या यह उनका मेरे लिए स्पेशल उपहार था मुझे नहीं मालुम, पर चुदाई करते हुए वह कभी सर झुका कर मेरे मम्मों को चूमते तो कभी मुझे मेरी रानी, तुम कितनी टाइट हो, तो कभी मेरे होँठों पर अपने होँठ चिपका कर जैसे वह होँठों को चूस कर मुझे पूरा निगल ही जाएंगे उस आक्रामकता के साथ प्यार किया करते।

इस कार्यकलाप में सेठी साहब का अजगर जैसा लंबा लण्ड मेरी चूत में पूरा का पूरा कब घुस गया मुझे पता ही नहीं चला नाही कोई ख़ास दर्द महसूस हुआ। मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ जब सेठी साहब ने मुझे दिखाया की उनका पूरा लण्ड मेरी चूत में घुसा हुआ है और मुझे महसूस हुआ की वह मेरी बच्चे दानी को ठोकर मार रहा था।

मेरे प्यारे प्रेमी का लण्ड पूरा अंदर ले कर मुझे भी बड़े ही गर्व का अनुभव हुआ। मुझे उस वक्त पता चला की स्त्री के चूत की सुरंग कितनी लचीली हो सकती है की पहली बार तो लण्ड घुसाते हुए काफी दर्द होता है पर धीरे धीरे धीरे जैसे जरुरत पड़ती है, आने आप को फैला कर बड़े से बड़ा लण्ड भी ले लेती है। बल्कि जब बच्चा पैदा होता है तो उसे भी जन्म दे पाती है।

वैसे तो मैं मेरे पति से पचासों बार चुदी गयी हूँ। पर सेठी साहब के साथ का वह पहला अनुभव कुछ अजीब ही था। मैं बिस्तर पर निष्क्रिय लेटी हुई आँखें मूँद कर सेठी साहब के उस महाकाय लण्ड को मेरी चूत की सुरंगों में अंदर बाहर होते हुए जो उन्माद महसूस कर रही थी, कोई भी मर्द उसकी कल्पना तक नहीं कर सकता। अपने प्यारे प्रियतम से चुदवाते हुए और ख़ास कर जब वह अपना अति प्यारा कोई गैर मर्द (पति ना हो कर कोई अतिरिक्त व्यक्ति) हो, तो एक स्त्री कैसा अनुभव कर सकती है वह मैंने उस समय अनुभव किया।

मैं शादीशुदा स्त्रियों से यह जरूर आग्रह करुँगी की अगर कोई स्त्री मेरे जैसी सदभागी हो जिसे सेठी साहब जैसे प्यारे प्रियतम से चुदवाने का मौक़ा मिले तो कम से कम एक बार तो उससे जरूर चुदवाये। यह मौक़ा गंवाने पर हम स्त्रियों को शायद यह ग़म रह जाए की जब मौक़ा मिला था तब चौका नहीं मारा, और सारी जिंदगी मन मसोस कर रहना पड़े। अगर वह प्रियतम कहीं सेठी साहब के जैसा तगड़े लण्ड वाला और तगड़ा चोदने वाला हो तो बात ही क्या।

सेठी साहब से चुदवाते हुए आँखें मूंदे हुए भी भी चोरी से पलकोँ के एक कोने से जब सेठी साहब मेरे अंदर अपना वह जबरदस्त लण्ड पेल रहे थे तब मैं सेठी साहब के चेहरे के भाव भाँपने की कोशिश कर रही थी। मुझे सेठी साहब के निचे लेटे हुए भी जब सेठी साहब अपना लण्ड सम्हाल कर घुसेड़ना निकालना यह कर रहे थे उनके चेहरे पर एक अजीब से उन्माद की छाया नजर आ रही थी।

मेरे लिए उनके जहन में जो प्यार था वह उनके चेहरे के भाव से स्पष्ट दिख रहा था। पुरुष और स्त्री के बिच की यह चुदाई की प्रक्रिया भी भगवान ने अजीब पैदा की है। जब तक चुदाई ना हो तब तक पुरुष और स्त्री एक दूसरे को मिलने के लिए तिलमिलाते रहते हैं। जब चुदाई शुरू हो जाती है तो फिर चुदाई के अलावा कुछ भी नहीं दिखता।

मैंने पहली बार किसी गैर मर्द से चुदवाया था। गैर मर्द से चुदाई के बारे में ज्यादा अनुभवी ना होने के कारण मैं यह तो नहीं कह सकती की सेठी साहब की वह चुदाई दूसरे मर्दों के मुकाबले कैसी थी, पर जो कुछ भी मैंने महसूस किया मैं इतना जरूर कह सकती हूँ की शायद ही कोई मर्द मुझे इतना आत्मसंतोष दे पाता जितना सेठी साहब ने मुझे उस पहली चुदाई में और उसके बाद हुई अनेकानेक चुदाईयों में दिया।

सेठी साहब के लण्ड घुसाने के फ़ौरन बाद जब मैं उस शुरू के तीखे मीठे दर्द से उभरी, तो मैंने महसूस किया की मैं झड़ चुकी थी। उस चुदाई के दरम्यान मैं सेठी साहब के लण्ड को थोड़ा सा भी महसूस करती और मेरा छूट जाता। उस रात सेठी साहब ने पहले राउंड में मुझे बिना रुके शायद आधे घंटे तक चोदा होगा। उस बिच मैं कम से कम चार बार झड़ चुकी थी।

पर सेठी साहब थे की थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मुझे सेठी साहब का यह टेम्पो बहुत ही भाया। मेरे पति तो एक बार शुरू करते तो फिर उन्हें खतम होने में समय नहीं लगता था। हर बार जब जब मैं झड़ती तो सेठी साहब रुक कर झुक कर अपना लण्ड मेरी चूत में से ना निकालते हुए मुझे खूब सारा लाड और प्यार करते। मुझे सेठी साहब से चुदवाने में जो गर्व और स्त्री होने का अभिमान महसूस हुआ मैं उसके लिए सेठी साहब की सदा सर्वदा ऋणी रहूंगी।

आधे घंटे के बाद भी सेठी साहब ने अपना वीर्य जस के तस ही रखा हुआ था। मेरी नजर अनायास ही कमरे में दिवार पर टंगी घडी पर जा पहुंची। रात के बारह बज रहे थे।

सेठी साहब ने मुझे घडी की और देखते हुए पकड़ लिया। उन्होंने ने मेरे चेहरे से देखा की मैं कुछ थक चुकी हूँ। सेठी साहब की पूरी चुदाई के दरम्यान जो एक बात हमेशा मौजूद थी वह थी उनकी आँखों में मेरे लिए अद्भुत प्यार के भाव।

अक्सर जब औरत एक मर्द से चुदवाती है तो मर्द और औरत, दोनों का ध्यान अपने लिंगों पर होता है। दोनों अंगों के बिच में चमड़ी के घर्षण से पैदा होता हुआ उन्माद का अधिक से अधिक आनंद वह दोनों उठाना चाहते हैं। ऐसा होना भी चाहिए। हम दोनों के दरम्यान भी ऐसा ही था।

पर सेठी साहब की प्यार भरी आँखें पूरी चुदाई के दरम्यान मेरी आँखों को बड़े प्यार से और अपनेपन से ताकती रहतीं थीं। उनकी आँखें मुझे पूरी चुदाई के दरम्यान शायद यह एहसास दिलाना चाहतीं थीं की वह सिर्फ मेरे बदन को नहीं पर मेरी पूरी हस्ती को बेतहाशा प्यार करते हैं।

मुझे थकी हुई महसूस कर वह बोले, “चलो थोड़ी देर आराम कर लो। चाय पीते हैं।”

मैंने यह दिखाने की कोशिश भी नहीं की की मैं थकी नहीं हूँ। मैंने कुछ बहादुरी का स्वांग करते हुए कहा, “सेठी साहब आज रात मुझे पूरी रात ही आपके साथ गुजारनी है। मैं एकदम तैयार हूँ। पर चलिए अगर आपकी चाय पिने की इच्छा है तो यह ही सही।”

मुझे बिना बताये मेरी भाभी ने पहले से ही सेठी साहब के कमरे के कोने में एक छोटे से प्लेटफार्म पर गैस स्टोव पर चाय का सारा सामान और कुछ बिस्कुट रखे हुए थे। मेरी भाभी बड़ी ही समझदार थी। पता नहीं पर शायद उसने ताड़ लिया होगा की सेठी साहब के साथ मेरी क्या सेटिंग थी।

जब हम सब रात का खाना खा कर फारिग हुए तब भाभी ने मुझे बाजू में बुला कर मेरे कानों में कहा, “ननदजी, तुम्हारे सेठी साहब कुछ उखड़े उखड़े से लगते हैं। तुम ऊपर जाओ और उन्हें मनाओ, वरना सुबह उठते ही कहीं वह भागने का ड्रामा शुरू ना कर दें। मैंने सेठी साहब के कमरे में चाय नाश्ते का भी इंतजाम कर रखा है। क्या पता शायद रातमें तुम्हें उन्हें मनाते हुए चाय बनाकर पिलानी ही पड़ जाए।”

भाभी की यह बात सुन कर मुझे बड़ा ही झटका सा लगा। मैं डर गयी की कहीं मेरी भाभी को मेरे और सेठी साहब के सम्बन्ध के बारे में पता ना चल जाए।

पर भाभी ने मेरे कन्धों पर हाथ रखते हुए मेरे कानों में कहा, “ननदजी, फ़िक्र ना करो। घर में किसी को कुछ भी पता नहीं है और ना ही पता चलेगा। मैं जो तुम्हारे साथ हूँ। अरे यही मौक़ा होता है हम वफादार बीबियों को मौके पे चौका लगानेका। वरना तो रोज वही मर्द, वही बिस्तर, दो धक्के मारे और सो गए। वही सब कुछ। समझ गयी ना? अभी आपको मौक़ा है, पूरी तीन रात। जाओ लगाओ मौके पे चौका। मैं जानती हूँ सब, तुम बिलकुल फ़िक्र ना करो। मैं भी तुम्हारी जात की ही हूँ। जब मौक़ा मिले तो चौका मारने से कतराती नहीं हूँ। अभी तुम्हारा मौका है, जाओ।”

मेरी भाभी की बात सुन कर मैं ठिठुर कर रह गयी। उस समय मुझे पता नहीं था की भाभी के कहने का क्या मतलब था। पर हाँ, मुझे यह यकीन तो हो गया की सब कुछ जानते हुए भी भाभी मेरे और सेठी साहब के बारे में कुछ नहीं बोलेगी। कहीं ना कहीं वह उलटा मुझे इशारा कर रही थी की मुझे क्या करना चाहिए। जब मैं चुप रही तो मुझे ऊपर भेजते हुए धक्का मारते हुए बोली, “हायरे! कितने हैंडसम हैं सेठी साहब! भाभी, आप कमालकी नजर रखती हो। मानना पडेगा! क्या हाथ मारा है!”

फिर भी मैं जब ना हिली तो कुछ तंग सी आकर भाभी झुंझलाहट में बोली, “आप जाती हो या आपकी जगह मैं चली जाऊं? आप के भाई को मैं समझा दूंगी। जरुरत पड़ी तो आजकी रात तुम्हारे भैया अकेले सो जाएंगे। फिर यह मत कहना की मैंने तुम्हारे मुंह से निवाला छीन लिया।” फिर मेरी और मुस्कुराती हुई नजर कर बोली, “अब ज्यादा ड्रामा मत करो, जाओ और फ़तेह करो। जाकर देखो कहीं मियाँ गुस्से में लाल पिले ना हो रहे हों की अब तक क्यों नहीं आयी?”

भाभी से बात करने के बाद मेरा इरादा और पक्का हो गया। भाभी ने मेरी हिम्मत बढ़ा दी थी। भाभी ने बातों ही बातों में इशारा कर ही दिया की शायद भाभी की भी कहीं ना कहीं अपनी सेटिंग चल रही थी। तब कहीं जा कर माँ और पापा से बात कर मैं मुन्ने को लेकर जब ऊपर की मंजिल की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी तो मैं पूरी तरह से अभिसारिका बन चुकी थी।

मैं अपने पीया से मिलने के लिए बेताब हो रही थी। मैं सेठी साहब से चुदवानेका पहला सोपान पार कर चुकी थी। भाभी की बात सुन कर मुझे लगा की मैं भी मेरी भाभी की टोली में शामिल होने जा रही थी।

एक शादीशुदा औरत ही जान सकती है की ऐसा सपोर्ट मिलने पर एक औरत जो किसी और मर्द से चुदवाने के लिए अपना मन बना रही हो उसे कितनी तसल्ली मिलती है। दूसरे दिन सुबह जब मैं अपनी भाभी से मिलूंगी तो वह मुझे चोरीछुप्पी मेरी रात की चुदाई के बारे में जरूर पूछेगी तब मैं उनको क्या कहूँगी, यह सोच कर ही मैं परेशान हो रही थी। आधी रात को चाय बनाते हुए यह सब खयालात मेरे जहन में दौड़ रहे थे।

चाय बनाने के लिए मैं जब उठ खड़ी हुई तो मैंने बिस्तरे के कोने में रखी मेरी साड़ी खिंच ली और आननफानन में अपने नंगे बदन के इर्दगिर्द लपेट ली। सेठी साहब चाहते थे की मैं नंगी ही उनके लिए चाय बनाऊं।

पर आखिर में उन्होंने मुझे साड़ी लपेटने दी। पर चाय बनाना और ऊलजलूल लिपटी हुई साड़ी को सम्हालना दोनों काम एकसाथ करने काफी मुश्किल होते हैं। मेरी साड़ी भी तो फिसलन वाली थी। कई बार मेरा पल्लू खिसक जाता और मेरे स्तन नंगे हो जाते।

सेठी साहब पलंग के एक छोर पर बैठे बैठे मेरी यह जद्दोजहद मुस्कुराते हुए देखते ही रहे। एक बार तो मेरी साड़ी मेरी कमर से खिसक कर पूरी निचे गिर गयी और मैं नंगी सेठी साहब के सामने खड़ी हो गयी। सेठी साहब ने उठ कर मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया और फिर से कुछ पलों के लिए प्यार करते रहे। पुरे नंगधंडंग सेठी साहब और उनका हवा में लहराता हुआ वह डरावना लण्ड जिसके ऊपर सेठी साहब ने मुझे अपनी गोद में बिठाया। यह सब मेरे लिए एक सपने के समान था। आज जब मुझे वह पल याद आते हैं तो मेरे रोंगटे रोमांच से खड़े हो जाते हैं।

चाय पिने के बाद सेठी साहब कुछ रोमांटिक मूड में दिखे। मैंने चाय बनाते हुए जो साडी आननफानन में मेरे नंगे बदन पर लपेटी हुई थी उस आधे नंगे बदन के हालात में मुझे अपनी लाज छिपाने की कोशिश करते हुए देख वह काफी उत्तेजित हो उठे।

मुझे पलंग पर खिंच सेठी साहब ने मुझे अपनी गोद में बिठा दिया और मुझसे अठखेलियां करने लगे। मेरी लिपटी हुई साडी के अंदर हाथ डाल कर वह मेरे स्तनोँ को प्यार से सहलाने लगे। स्तनों को सहलाते हुए मेरी आँखों में आँखें डालकर बोले, “टीना, मैं सच कह रहा हूँ, मैं तुमसे कभी दूर नहीं रह पाउँगा। सुषमा मेरी जान है पर तुम ने मुझे ऐसा प्यार दिया है की मुझे तुमने अपना ग़ुलाम बना दिया है।”

मैंने सेठी साहब के लण्ड को अपने हाथों में सहलाते हुए उनके होठों पर एक हलकी सी चुम्मी देकर कहा, “सेठी साहब, मैं आपकी दूसरी बीबी हूँ। सुषमाजी का आप पर पहला हक़ है। मेरे लिए और मेरे पति के लिए भी आप और सुषमाजी दोनों हमारी जान हैं। अभी जब हम दोनों यहां एक दूसरे से प्यार कर रहे हैं तो क्या पता सुषमाजी और राज भी शायद यही कर रहे हों?”

इधर सुषमाजी और राज की कहानी को भी पनपना ही था। चलिए सुनते हैं क्या हुआ सुषमाजी और मेरे पति के बिच।

सुषमा और राज की कहानी राज की जुबानी

जब सेठी साहब टीना को लेकर कार में निकले थे उस समय मैं ऑफिस में था। शाम को घर लौटते समय कुछ सब्जी फल इत्यादि सुषमाजी के लिए ले आया। जब तक टीना वापस नहीं लौटती, मेरा खाना अब उन्हीं के वहाँ होना था। पहुँचने के पहले ही मैंने फ़ोन कर बता दिया था तो सुषमाजी भी मेरा इंतजार कर रहीं थीं। मेरे पहुँचते ही मैंने पाया की सुषमाजी ने टेबल पर चाय नाश्ता तैयार रखा हुआ था।

सुषमाजी के बारे में एक बात कहनी पड़ेगी। हालांकि वह सेठी साहब के साथ रह कर बड़ी ही ज़मीनी बातें करतीं थीं, सुषमाजी का अंतर्मन बड़ा ही संवेदनशील था। मैंने उनके अंदर छिपा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील इंसान, जो एक कलाकार या कला को समझने और सराहने वाला होता है, पाया।

जब भी हम कोई कला या ऐसी ही कोई संवेदनशील बातें करते, सुषमाजी अक्सर भावुक हो जातीं। इसी कारण मेरा और सुषमाजी का स्वाभाविक तालमेल पहली ही मुलाक़ात से हो गया था। मैं संगीत और कला का दीवाना था। सुषमाजी संगीत और कला के संसार में पहले से ही डूबी हुई थीं।

सुषमाजी ने मुझे जल्दी फ्रेश होकर आने के लिए कहा। करीब आठ बजे फ्रेश होकर घर का कुछ काम निपटा कर मैं सुषमाजी के वहाँ जब पहुंचा तो सुषमाजी ने मेरे लिए ड्रिंक और कुछ नमकीन बगैरह रखे हुए थे। उन्हें मालुम था की सेठी साहब के साथ अक्सर मैं ड्रिंक करने का आदि था। सुषमाजी कभी एकाद ड्रिंक पी लेती थीं। मेरे आग्रह करने पर उन्होंने मेरा साथ देने के लिए अपना जाम भी थोड़ा सा भरा।

अक्सर सुषमाजी दिन में साड़ी या लंबा गाउन पहनी हुई होती थीं पर उस शाम चेक्स वाला स्कर्ट और ऊपर एक हल्कासा टॉप पहने हुए वह जब मेरे सामने बैठीं तो बरबस मेरी नजर बार बार उनकी खुली हुई जाँघों और टॉप में से बड़े ही अच्छी तरह उभरे हुए उनके स्तन मंडल पर जाकर अटक जातीं थीं जिन्हें उन्होंने जरूर देखा। मेरी नजर को देख कर वह शर्मा कर हँस देतीं और अपनी जाँघें कुछ कस कर जोड़ती हुईं फिर से बातों में लग जातीं।

सुषमाजी और मेरे बिच में वह बात नहीं थी जो सेठी साहब और टीना के बिच में हो सकती है। सेठी साहब की तरह मैं सेक्स में आक्रामक नहीं हूँ। पुरुष और स्त्री के बिच का विजातीय आकर्षण मुझ पर भी हावी होता है पर सेठी साहब की तरह व्हिस्की की किक की तरह एकदम धमाके से नहीं, बल्कि हलकी वाइन की तरह होले होले। शायद मेरी यह बात सुषमाजी को काफी अच्छी लगी थी।

मैं यह बात कतई नहीं मना करूंगा की मेरे मन में सुषमाजी के हर एक अंग को करीब से देख कर उसे छूने और उन्हें बड़ी शिद्दत से प्यार करने की बड़ी तगड़ी इच्छा थी। बल्कि उनको पहली बार देखते ही उनके बदन की नंगी छबि देखने के लिए मैं दिन रात तडपता रहता था। पर मैंने कभी उस बात को ना ही उजागर किया ना ही मेरे दिमाग पाए हावी होने दिया। सही मौका मिलते ही सब कुछ होगा यह मैं जानता था और सही मौके की तलाश में ही रहता था। जल्द बाजी से मामला बिगड़ सकता है यह मैं भली भाँती समझता था।

सुषमाजी भी सेठी साहब की तरह ही एक अच्छी मेजबान थीं। अपने मेहमान को कैसे प्रसन्न करना वह भलीभांति समझती थीं। मुझे बातों में उलझाए वह अपना गिलास वैसे ही भरा हुआ रखे हुए मेरे गिलास में एक के बाद एक ड्रिंक भरती जाती थीं। मैंने एक दो बार यह महसूस भी किया पर सुषमाजी की बातें इतनी मधुर और आकर्षक होती थीं की समय और शराब का कोई ख्याल ही नहीं रहा।

मैंने भी बातों बातों में सुषमाजी को उनका गिलास खाली करने पर मजबूर किया और एक और ड्रिंक उनके गिलास में भी डाली। शायद सुषमाजी मेरे आग्रह का इंतजार कर रहीं थीं। उस गिलास को खाली होने में पहले गिलास जितना समय नहीं लगा।

मैंने महसूस किया की माहौल काफी नाजुक सा हो रहा था पर वह बात नहीं बन पा रही थी जो मैं और शायद सुषमाजी भी चाहतीं थीं। कहीं ना कहीं कुछ कमी सी महसूस हो रही थी। अचानक मेरी नजर ड्राइंग रूम में दीवारों पर लगे बड़े शास्त्रीय संगीतकारों की तस्वीरों पर पड़ी। शायद सुषमाजी को खोलने की चाभी मुझे मिल गयी थी।

मैंने सुषमाजी के करीब जा कर उनका हाथ थाम कर कहा, “सुषमाजी, इस मीठे वातावरण को अगर संगीतमय बना दिया जाए तो सोने में सुहागा लग जाए।”

मैंने देखा की मेरी बात सुन कर सुषमाजी के मुंह की रौनक बढ़ गयी। उन्होंने फ़ौरन अपना मोबाइल उठाया और मेरी और बड़ी ही प्यार भरी नज़रों से देखते हुए कहा, “अब मैं समझी की टीना जैसी कामिनी सुंदरी को तुमने अपने चंगुल में कैसे फसाया। तुम्हें स्त्रियों की नाजुक संवेदनाओं को जगाने में महारथ प्राप्त है। मैं तुम्हारी संगीत में रूचि देख कर कभी से सोच रही थी की एक दिन मैं तुम्हें अपने प्यारे संगीतकारों की कला से ना सिर्फ परिचित कराउंगी बल्कि उनमें से कुछ के घरानों से जो हमारे परिवार के निजी ताल्लुकात थे उसके बारे में बात भी करूंगी।”

यहां मैं मेरे रसिक पाठकगण जो अपनी महबूबाओं को अपनी बनाना चाहते हैं अथवा अपनी प्यारी रूढ़िवादी पत्नियों को खुले सम्भोग की दुनिया में शामिल करवाना चाहते हैं उनसे निवेदन है की वह अपनी पत्नियों खुलने का पूरा अवसर दें। जो अपनी मेहबूबा या पत्नी को पसंद है वह बात करें, जैसा उनको पसंद है वैसा माहौल बनाएं।

एक बात पति या प्रेमी हमेशा ध्यान रखें की स्त्रियों में पुरुषों से कई गुना अधिक सेक्स कूट कूट कर भरा हुआ होता है। हम पुरुषों को यह बात नहीं मालुम। हम हमारी मेहबूबा या पत्नियों के सूखे रवैय्ये से यह सोचने लगते हैं की स्त्रियां सेक्स में ज्यादा रूचि नहीं रखतीं।

इसका कारण यह है की अक्सर पत्नियां बस पति के प्रति अपना फर्ज निभाने के लिए जब पति का मन करता है तब अपनी टाँगें खोल कर उन्हें अपने बदन को अर्पण कर पति को सम्भोग करने देतीं हैं। अपना योगदान यातो रखती ही नहीं या फिर पति को खुश करने के लिए एन्जॉय करने का ढोंग करतीं हैं।

पर वास्तविकता अलग है। स्त्रियों में भगवानने जन्मजात ही सम्भोग के मामले में पुरुषों से कहीं ज्यादा रूचि और उग्रता कूट कूट कर भरी है। पर समाज में अपयश के डर और पति पर अविश्वास के कारण पत्नियां उस उग्रता को बड़ी ही बखूबी छिपा कर अपने जहन के किसी अँधेरे कोने में गाड़ कर रख देतीं हैं।

अपने जन्म से ही रूढ़िवादी उपदेशों को सुनते रहने के कारण सामाजिक मर्यादाओं का सच्चे मन से पालन करते हुए कई बार पति के लाख मनाने पर भी विवाहिता अपनी सम्भोग की उग्रता वाली सख्सियत को अँधेरे कूप से बाहर निकालने में अपने आपको असमर्थ पातीं हैं।

रूढ़िवादी सामाजिक ग्रंथियों से बाहर निकालने के लिए हम पतियों को बड़े ही धैर्य और संवेदना से काम करना होगा ताकि हमारी पत्नियां हमारी संवेदना को समझ पाएं और संभोगिक प्रक्रिया में हमारा खुल कर साथ दे कर वह स्वयं भी उस अप्रतिम आनंद का आस्वादन कर सकें और हमें भी कराएं।

हरेक पति को अपनी पत्नी की यह मानसिकता और संवेदना की कदर करते हुए बड़ी नाजुकता और प्यार से उन जटिल ग्रंथियों को एक के बाद एक कर खोलना होगा। जब कोई धागा या रस्सि या हमारे पाजामे का नाडा भी उलझ जाता है तो उन गांठों को खोलने के लिए हमें बड़े ही धैर्य और हलके से उन्हें खोलना पड़ता है। उस वक्त जल्दबाजी या समय ज्यादा लगने के कारण होती झुंझलाहट का प्रदर्शन करने से पुरा मामला और ज्यादा उलझ सकता है।

इसी लिए पति को चाहिए की पत्नी की संवेदना का ध्यान रखें और पत्नी से सम्भोग करते समय उसे बार बार सम्भोग के आनंद के बारेमें बात करे और खुले सम्भोग के लिए उकसाता रहे। ऐसा करते हुए वह पत्नी के विरोध या अवहेलना को ज्यादा गंभीरता से ना ले और अपनी पत्नी में छुपी हुई वह सम्भोग की आक्रामकता को उस अँधेरे कूप से बाहर निकालने की कोशिश में बिना थके लगा रहे। साथ साथ में वह पत्नी को मौक़ा दे की वह दूसरे कोई आकर्षक पुरुष के साथ मौक़ा मिलने पर उसे आकर्षित करे या दूसरे पुरुष से आकर्षित हो कर मौक़ा पाकर उससे सम्भोग करे।

सुषमाजी के मामले में ऐसी कोई बाधा नहीं थी। टीना से सुषमाजी के बारे में मेरी बात के बाद मैं सुषमाजी की संवेदनाओं से भलीभाँति परिचित था। मैं जानता था की सम्भोग को सुषमाजी बहुत अच्छी तरह एन्जॉय करतीं थीं। जरुरत थी को एक सही माहौल की जो बन रहा था और फिर एक चिंगारी की जो उस माहौल को आग में बदल दे।

सुषमाजी ने अपने जाने पहचाने एक बड़े संगीतकार का एक कॉन्सर्ट में अपनी सितार पर बजाया हुआ राग ब्लूटूथ के द्वारा अपने साउंड सिस्टम पर बजाना शुरू किया। वातावरण एक रोमांचक और उन्मादक संगीत की ध्वनि से गूंज उठा। संगीत अत्यन्त मधुर और रोमांचक था और मैं सुषमाजी को देख रहा था जो संगीत की मादकता में झूम रही थी। मैं भी संगीत की मादकता का आस्वादन करते हुए सुषमाजी के साथ संगीत की लहरों में बहने लगा।

फर्श पर बिछाये हुए एक ही गद्दे पर हम दोनों एक दूसरे के करीब बैठ कर कभी आँखें मूंद कर उस मधुर संगीत का आस्वादन कर रहे थे तो कभी एक दूसरे की आँखों में देख एक दूसरे के मन के भाव पढ़ते हुए शायद सही मौके का इंतजार कर रहे थे जब हम दोनों अपने मन की बात को उसके अंजाम तक पहुंचा सकें। कौन पहला कदम आगे बढ़ाएगा शायद वही असमंजस में हम दोनों उलझे हुए थे।

थोड़े समय के बाद सुषमाजी ने संगीत का वॉल्यूम कुछ कम किया और मेरी और देख कर बोलीं, “तुम पूछ रहे थे ना की यह कौन है?”

मैंने सकारत्मक अंदाज में जब अपनी मुंडी हिलायी तो उन्होंने उस मशहूर उस्ताद सितार वादक उस्ताद एहसान अली खान का नाम लेकर अपने कानों को छूते हुए कहा, “उस्तादजी मेरे पिताजी के अच्छे खासे दोस्त थे और जब भी कभी उनका कोई बड़ा कॉन्सर्ट होता था तब वह हमें अवश्य बुलाते थे।”

सितार की धुन में मैं भी खो गया था। मैंने देखा की बात करते करते सुषमाजी की आँखें नम हो रहीं थीं। सही मौक़ा आ चुका था। मैंने सुषमाजी के करीब खिसक कर उन्हें अपनी बाँहों में भर दिया और उनके आंसुओं को हलके से पोंछते हुए बोला, “संगीत जीवन का अमृत है। संगीत की एहमियत का कोई हिसाब नहीं। संगीत प्यारों का प्यार है और भगवान की साधना है।”

सुषमाजी ने मेरी और नजर उठा कर देखा, थोड़ा मुस्कुरायी और बोली, “इस रिकॉर्ड से मुझे ज्यादा लगाव इस लिए है क्यूंकि यह गाना मेरे सामने बजाया गया था। उस्ताद एहसान अली खान मेरे पिताजी के समकालीन थे और उन्होंने मुझे भी संगीत शास्त्रीय नृत्य की तालीम दी है। यह गाना जब रिकॉर्ड हुआ तब मैं छोटी थी और उस्तादजी ने मेरे सामने ही इसे बजाया था। उस समय मैं उनके इस गाने पर नाच रही थी।उस समय मैं गुरूजी से शास्त्रीय नृत्य की तालीम ले रही थी।

मुझे इण्टर स्कूल कम्पटीशन में मेरे नृत्य के कई पारितोषिक मिले हुए थे। मुझे अपनी धून पर नाचते देख मेरे गुरूजी इतने भावुक हो गए की यह राग उन्होंने करीब एक घंटे तक बजाया और मैं उनकी धुन पर एक घंटे तक नाचती रही। उस माहौल को मैं आज तक भूल नहीं पायी हूँ। पर पिछले कुछ सालों से सांसारिक झंझट के चलते वह सब छूट गया।”

मैंने खड़े हो कर सुषमाजी को खिंच कर खड़े करते हुए कहा, “सुषमाजी, आज इतने सालों के बाद मैं आपका वह नृत्य उस्तादजी के संगीत की ले के साथ देखना चाहता हूँ। आशा है आप मुझे निराश नहीं करेंगी।”

सुषमाजी ने मेरी बात का यकीन नहीं करते हुए कहा, “यह स्कर्ट पहन कर तुम मुझे नाचने के लिए कह रहे हो? वह ज़माना अलग था। मैं छोटी सी दुबली पतली तरवराहट से भरी एक किशोरी लड़की थी। आज मैं एक शादीशुदा मोटी औरत बन गयी हूँ। अब वह चुलबुलाहट और जोश कहाँ?”

मैंने ज़िद करते हुए कहा, “सुषमाजी, आप क्या हैं, कितनी छोटी, बड़ी, पतली, मोटी, खूबसूरत इत्यादि हैं वह देखने वाले की नज़रों पर छोड़ दो। सवाल यह नहीं है की आप बचपन के मुकाबले कैसा नाचोगी। सवाल आपके प्रशंशक, यानीं के मैं आपको वही उस्तादजी के संगीत में वही नृत्य करते हुए देखना चाहता हूँ। सवाल कला और कला के चाहने वालों की फरमाइश का है। एक सच्चा कलाकार कभी अपने चाहने वालों की फरमाइश को नहीं टालेगा।”

सुषमाजी ने मेरी आँखों में आँखें मिलाकर यह जानने की कोशिश की कहीं मैं मजाक तो नहीं कर रहा। मेरी आँखों में गंभीरता का भाव देख कर वह बोलीं, “अरे बाबा, सालों बीत गए मेरे नाचे हुए। ऊपर से यह कपडे। मैं कैसे नाचूं? छोडो, जाने दो, बादमें कभी मैं तुम्हें जरूर वह नृत्य करने दिखाउंगी।”

मैंने जब जिद पकड़ी और सुषमाजी ने यह देखा की मैं नहीं मानने वाला, तब अपने हथियार डालते हुए उन्होंने कहा, “ठीक है, तुम इतनी ज़िद कर रहे हो तो मैं तुम्हें कुछ स्टेप्स दिखाती हूँ। पर अगर मेरा नृत्य ठीक ना हो तो मेरा मजाक मत करना।”

मैंने सुषमाजी की बात का कोई जवाब नहीं दिया और उनके नाचने का इंतजार करने लगा। सुषमाजी ने मोबाइल फ़ोन पर उस्तादजी का सितार वादन दुबारा शुरुआत सी शुरू किया और सीधे खड़े हो कर दोनों हाथों को और पॉंवों को सटा कर रखते हुए सरस्वती वन्दना करते हुए उस्तादजी की सितार की धुन के साथ नृत्य करना शुरू किया।

हालांकि मैं कोई नृत्य का निष्णात तो नहीं हूँ, पर उस शाम वह नजाकत और संजीदगी से सुषमाजी ने जो नृत्य किया शायद उसे देख कर बड़े बड़े उस्ताद भी उनके नृत्य का लोहा मान जाएंगे। जहां तक मेरा सवाल था तो मैं नृत्य के अलावा नाचते हुए सुषमाजी की स्कर्ट के ऊपर उठ जाने पर थिरकती हुई नंगी जाँघें और बड़े ही मादक तरीके से झूमते और कूदते हुए स्तन मंडल को देख कर पागल हो रहा था।

शराब के दो गिलास चढाने के बाद और नाच की थकान से कुछ देर बाद सुषमाजी के पाँव डगमगाने लगे। मैं देख रहा था की वह पसीने से तरबतर हो रहीं थीं। सुषमाजी के पाँव इधर उधर जा रहे थे। अचानक ही जैसे वह लड़खड़ा कर गिरने लगी तो मैंने उन्हें पकड़ तो लिया पर मैं भी लुढ़का और मैं और सुषमाजी दोनों बिस्तर पर जा गिरे। सुषमाजी निचे और मैं उनके ऊपर।

उधर साउंड सिस्टम पर संगीत की धुन ख़त्म हो चुकी थी। कमरे में मेरे और सुषमाजी की तेज चल रही साँसों के अलावा पूरा सन्नाटा छाया हुआ था। या तो शराब के नशे में या थकान की वजह से सुषमाजी गिर कर बेहोश सी मेरे निचे दबी हुई कुछ देर सोती रहीं। सुषमाजी का स्कर्ट उनकी जाँघों के ऊपर चढ़ कर उनकी करारी नंगी उन्मादक जाँघों के दर्शन करा रहा था।

स्कर्ट के अंदर सुषमाजी एक छोटी सी पैंटी पहने हुए थीं। मैं अपनी लोलुप नज़रों से उस पैंटी के पीछे छिपी हुई सुषमाजी की चूत को अपनी काल्पनिक नज़रों से देख रहा था। दृश्य इतना मादक था की मैं बड़ी मुश्किल से मेरे हाथ सुषमाजी की पैंटी में डालकर उनकी प्यारी सी शायद गीली हुई चूत की पंखुड़ियों को सहलाने से रोके हुए था। मेरा एक सिद्धांत था की नशे में धुत बेहोश महिला से कभी कोई हरकत नहीं करनी चाहिए। मेरी नज़रों मैं ऐसा करना उस महिला का बलात्कार करने जैसा होता है।

मैं कुछ देर तक सुषमाजी को बाँहों में लिए हुए उनके ऊपर उनको होश में आने का इंतजार करते हुए बिस्तरे पर आँखें मूंद कर लेटा रहा। अचानक मैंने तब अपनी आँखें खोलीं जब मेरे कानों में सुषमाजी की मीठी आवाज पड़ी।

उन्होंने कुछ उलाहना देते हुए कटाक्ष भरे स्वर में कहा, “एक मेरे जैसी स्कर्ट और उसके अंदर एक छोटी सी पैंटी पहनी हुई युवती को जिसे तुम कई बार खूबसूरत कह चुके हो, अपनी बाँहों में भर कर अपने निचे मैथुन करने की मुद्रा में लिटाए हुए हो और काफी समय से कुछ भी नहीं कर रहे हो। यह क्या बात है? कहीं तुम्हारी मर्दानगी पर शक करने की नौबत तो नहीं आ गयी?”

सुषमाजी की बात सुनकर मुझे एक अजीब सा झटका लगा। मेरी सज्जनता और शालीनता को यह औरत नामर्दगी कह रही थी?

मैं सुषमाजी को बेहोशी के हालात में कुछ करना नहीं चाहता था। पर यहां तो उसका कुछ गलत ही मतलब निकाला जा रहा था। मैंने फ़ौरन बिना समय गँवाए, सुषमाजी के स्कर्ट के निचे अपना हाथ डालकर सुषमाजी की छोटी सी पैंटी को निचे की और खिसका कर उनकी चूत की पंखुड़ियों के बिच में अपनी दो उँगलियों को डालकर उनकी चूत को अपनी उँगलियों से चोदना शुरू किया।

मैंने तब महसूस किया की सुषमाजी की चूत ना सिर्फ गीली हो चुकी थी बल्कि उनकी चूत में से उस समय जैसे उनके स्त्री रस की बुँदे थमने का नाम नहीं ले रहीं थीं जो सुषमाजी की चुदासी हालात को बयाँ कर रही थी। शायद पहले से ही सुषमाजी ने तय कर लिया था की वह उस रात मुझसे चुदेगी।

मैंने कहा, “मोहतरमा, किसी मर्द की सज्जनता और भद्रता को नामर्दानगी कहना आप जैसी सभ्य महिला को जंचता नहीं। जब आप नशे में करीब बेहोशी के हालात में थीं तब मैं आपसे कोई ऐसा कर्म नहीं करना चाहता था जिसे गलती से भी बलात्कार या जबरदस्ती की संज्ञा दी जा सके। जहां तक मर्दानगी का सवाल है तो मैं सेठी साहब के मुकाबले कितना सही उतरूंगा यह तो कह नहीं सकता पर इतना तो जरूर कह सकता हूँ की मैं आपकी इस रंगीन शाम को और रंगीन बनाने की पूरी कोशिश करूँगा। मैं कितना सफल होता हूँ वह आप मुझे बताएंगी।”

मैंने कुछ गुस्से और कुछ प्यार भरे लहजे में जब यह कहा तब सुषमाजी ने मुस्कुराते हुए अपनी पैंटी, जो उनके घुटनों के ऊपर तक खिसका दी गयी थी उसे पाँव ऊपर निचे कर निकाल फेंका। फिर मुझे अपने ऊपर खींचतीं हुई बोलीं, “अरे यार अगर मुझे बलात्कार जैसा लगता तो क्या मैं तुम्हारे निचे इस मुद्रा में इतने काफी समय से लेटी हुई थोड़ी होती?”

मैंने सुषमाजी की चूत को अपनी उँगलियों से और फुर्ती से चोदते हुए कहा, “सुषमाजी, मैं ही जानता हूँ की इस शाम का कई महीनों से मैं कितनी बेसब्री से इन्तेजार कर रहा था। आपके लिए ना सही पर मैं अपने लिए तो यह कह ही सकता हूँ। अब कहीं आज जा कर मुझे सही मौक़ा मिला है।”

सुषमाजी ने कुछ कटाक्ष भरे स्वर में कहा, “पता नहीं। हालांकि तुम मुझे लाइन तो मार रहे थे पर आगे बढ़ने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे। मुझे आखिर में यह लगने लगा था की शायद तुम्हें मुझमें कोई इंटरेस्ट नहीं है। तुमने मेरे करीब आने के लिए कोई भी ठोस कदम ही नहीं उठाये जब की तुम्हारे दोस्त ने तो तुम्हारी बीबी को सातवें आसमान की सैर भी करा दी”

मैंने सुषमाजी को खिंच कर थोड़ा बिठा कर उनके ब्लाउज के बटन को खोलते हुए कहा, “सुषमाजी, देर से ही सही पर दुरस्त तो आया हूँ ना?”

सुषमाजी ने अपनी उँगलियों को मेरे होँठ पर रख कर कहा, “अब बोलना बंद, काम चालु।”

मुझे कहाँ कोई समय गँवाना था? मैंने सुषमाजी के ब्लाउज और ब्रा को हटा कर उनको पहली बार साक्षात नग्न रूप में देखा। कामदेव की रति के समान सुषमाजी बिस्तर पर मेरी बाँहों में अपने दोनों स्तनोँ की सीधी सख्ती से खड़ी हुई निप्पलों को मेरे होंठों से लगाते हुए मेरी और देख कर मुस्करायीं।

सुषमाजी के स्तनोँ को एक के बाद मुंह में रख कर उनकी निप्पलों को चूसने का आनंद पाने की मेरी कामना कई महीनों की तपस्या के बाद पूरी हो रही थी। मैंने सुषमाजी की जाँघों के बिच स्थित उनकी गुलाबी चूत को देखा। मैंने कई स्त्रियों के गुप्तांग देखे थे पर सुषमाजी की चूत इतनी गुलाबी और सुकोमल सी दिख रही थी जैसे कोई दक्ष चित्रकार ने अपनी उच्चतम कल्पना से उनका चित्रण किया हो।

सुषमाजी की जाँघे ऐसी अद्भुत सुआकार और कमल की कोमल डंडी के समान निचे से ऊपर की और सुंदरता से सहज सी उभरती हुई थीं की देखने वाला देखता ही रह जाए। उभरती हुई जाँघें जहां जाकर एक दूसरे से मिल जातीं थीं वहाँ आगे और पीछे से तंत्र वाद्य गिटार जैसा बदन का मादक उभार अच्छे अच्छे मर्दों की मर्दानगी के धैर्य को जबरदस्त चुनौती देने वाला था। चूत को छिपाए हुए आगे का अग्रभाग और कूल्हों में परिवर्तित पीछे का उभार ऐसा सुआकार, रोमांचक और कामुक था की अगर उसे कोई नामर्द भी देखले तो उसका लण्ड भी खड़ा हो जाए।

मैंने सुषमाजी की नाभि के ऊपर कमर को सहलाते हुए कहा, “सुषमाजी आप भगवान की एक अद्भुत कलाकृति समान हो। मैंने आपके नग्न रूप की आजतक मात्र कल्पना ही की थी। आज मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं हो रही की नग्न रूप में आपका बदन मेरी कल्पना से भी कहीं ज्यादा आकर्षक और मादक है।”

सुषमाजी ने मेरी आँखों में आँखें मिलाकर मंद मुस्कुराते हुए कहा, “राजजी, मैं आपकी भोग्या प्रियतमा हूँ। मैं नहीं चाहती की आप मुझे सुषमाजी कह कर बुलाएं। भगवान ने हर स्त्री में इतनी कामुकता कूट कूट कर भरी है की अगर स्त्रियों पर मान मर्यादा और स्त्री सहज लज्जा का जबरदस्त घना पर्दा ना हो तो स्त्रियां चुदाई में इतनी बेबाक हो जाएँ की उनको सम्हालना भी मुश्किल हो जाए। स्त्रियों के मन में उसके साथ साथ एक और स्त्री सहज कामना होती है की जब स्त्री और पुरुष सम्भोग करते हैं उस समय पुरुष अपनी स्त्री को सम्मान पूर्वक पर साथ ही में आक्रामकता और उग्रता से सम्भोग करे माने चोदे। आपका मुझे सुषमाजी कहना मुझे इस समय नहीं जँच रहा। आप मुझे सुषमा कह कर ही बुलाएं और मुझे अब बेरहमी से खूब तगड़ा चोदें।“

मैं बिना बोले सुषमाजी को ताकता ही रहा। सुषमाजी उस समय अपने मन की बात को बयाँ कर रही थी और एक कामातुर स्त्री के मन के भाव को दर्शा रही थी।

सुषमाजी ने अपने मन की बात को जारी रखते हुए कहा, “आज आप इस समय सारे सम्मान को छोड़ मुझे अपनी रखैल, रंडी या छिनाल समझ कर मुझसे अपना प्यार जतायें। इससे मेरी स्त्री सुलभ कामनाओं की पूर्ति होगी। आपका लण्ड मेरी चूत को अपनी ही मालकियत समझ कर उसी अच्छी तरह रगड़े जिससे मुझे लगे की मैं आपकी निजी संपत्ति हूँ। आप मेरा अपनी मन मर्जी के अनुसार भोग करो और अपनी मन मर्जी के अनुसार मुझे चोदो।“

मैंने झुक कर सुषमा की चूत को चूमते हुए कहा, “सुषमा तुम्हारी बात बिलकुल सही है। प्यार में सम्मान अन्तर्निहित होता है। सम्मान ख़ास रूप से देने की जरुरत नहीं होती। मुझे तुम्हारी चूत और तुम्हारे स्तन मंडल को खूब चूमना है और प्यार जताना है।”

अनायास ही सुषमा का हाथ मेरे पाजामे के नाड़े पर जा पहुंचा। वह चाहती थी की मैं भी अनावश्यक आवरणों को त्याग कर अपने प्राकृतिक अवस्था में प्रस्तुत होऊं। शायद वह मेरे लण्ड को सहलाना चाह रही थी। मैंने फुर्ती से पाजामे का नाडा खोल कर पजामा और अंदर की निक्कर निकाल फेंकी।

मेरे पाजामे और निक्कर के हटते ही बंधन में जकड़ा हुआ मेरा लण्ड सख्ती से खड़ा हो गया। मेरा लण्ड का साइज शायद सेठी साहब के मुकाबले उन्नीस हो सकता है पर सुषमा के चेहरे से मुझे ऐसा कुछ लगा नहीं। सुषमा ने मेरे लण्ड के आझाद होते ही अपनी हाथों में ले लिया और बड़े ही प्यार से उसे अपने हाथों से सहलाने लगी।

अब माहौल कुछ ज्यादा ही निजी होने लगा था। सुषमा शायद मेरे मन के अंदर चल रही गुथम्गुत्थि को समझने की कोशिश कर रही थी। कुछ देर सुषमा चुप रहीं और आँखे मुंद कर कुछ सोचती रहीं। कुछ देर बाद मेरी और देख कर बोलीं, “राज तुम्हें पता है, मैंने सेठी साहब और टीना को क्यों भेज दिया तुम्हारे ससुराल एक साथ?”

मैंने सुषमाजी की और देखा। उन्होंने कहा, “मैं चाहती हूँ की तुम्हारा और हमारा परिवार एक हो। मतलब सेठी साहब और टीना के सम्बन्ध, सेठी साहब और मेरे बिच में हैं वैसे ही हों। समझे, मैं क्या कह रही हूँ?”

हालांकि मुझे काफी अच्छा आइडिया था की सुषमा क्या कहने जा रहीं थीं, मैं वह बात उनकी जुबानी ही सुनना चाहता था। शायद सुषमा भी यह समझतीं थीं। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, “मुझे पता है राज की तुम कई महीनों से मुझे पाने की कोशिश कर रहे थे।

शायद इसी लिए तुमने आगे चल कर टीना से सेठी साहब के संबंधों को काफी करीबी बनाने की कोशिश की और उनको साथ में टीना के मायके भेजा। शायद तुम भी वही चाहते हो जो मैं चाहती हूँ। मुझे तुम बहुत पसंद हो। तुम्हारी हर बात मुझे पसंद है।

राज आज मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ कर कुबूल करती हूँ की मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनना चाहती हूँ। राज मुझे एक बच्चा देदो। मैं जिंदगी भर तुम्हारी ऋणी रहूंगी।” यह कहते हुए सुषमा ने हाथ जोड़े और मैंने देखा की सुषमा की आँखों में आंसूं भर आये। शायद किसी मर्द से चुदवाने के लिए प्रार्थना करने की आदत नहीं थी उनको। शायद वह मुझ से एक बच्चा पाने के लिए बेबस थी।

मैंने सुषमा का हाथ अपने हाथों में लिया और बोला, “सुषमा, ऐसा मत कहो। मैं भी चाहता हूँ की तुम्हें बच्चा हो और तुम्हारी और सेठी साहब की जिंदगी में फिर से वही रौनक आये। मुझे टीना ने आपके और सेठी साहब के दर्द और अंतर्द्वंद के बारे में बताया था।

अब हमारे बिच औपचारिकता की जूठी दिवार या पर्दा नहीं है। हम एक दूसरे से बेझिझक अपने मन की बात कह सकते हैं। अगर मेरे वीर्य से आपका अंकुर फलीभूत हुआ तो यह मेरा सौभाग्य होगा। सुषमा मैं सिर्फ आपकी बाँहों में नहीं आपके मन में समा जाना चाहता हूँ।

हालांकि आप सेठी साहब की पत्नी हो, मैंने आपके तन और मन दोनों पाने की उम्मीद सेठी साहब के साथ और उनके विश्वास के कारण ही रखी। मैं आपको यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ की आप और सेठी साहब के जीवन में एक दूसरे के लिए हमेशा प्यार बना रहे इस लिए मैं सदासर्वदा प्रयत्नशील रहूँगा। पर तुम हमेशा मेरी तन और मन से पत्नी भी रहोगी। हमारा मिलन सिर्फ बच्चे के लिए नहीं होगा।”

सुषमा मेरी बाँहों में से निकलती हुई बोली, “राजजी अब ना तो तुम और टीना हमें छोड़ कर कहीं जा सकते हो और ना ही हम कहीं जाना चाहेंगे। अगर जाना भी पड़ा तो भी हमारे सम्बन्ध कम मजबूत नहीं होंगे क्यूंकि हमारी जान मतलब हमारे बच्चे एक दूसरे के पास होंगे।”

मैंने कहा, “सुषमा, अब हम एक होने वाले हैं। हमारा यह मिलन यादगार होना चाहिए।”

सुषमा ने मेरी बाँहों में मचलते हुए जवाब दिया, “हाँ, मैं चाहती हूँ की हमारा प्यार भरा मिलन प्यार भरे संगीत के वातावरण में ही होना चाहिए। सेठी साहब के साथ मेरा मिलन हमेशा तूफानी अंदाज में ही होता है। उनके साथ सिर्फ बदन की भूख प्यार के साथ मुकाबला करती है। पर आज मैं बदन की भूख को प्यार से संगीतमय माहौल में बुझाना चाहती हूँ।”

यह कह कर सुषमा बिस्तरे से उठ खड़ी हुईं और अपने म्यूजिक सिस्टम की और जाने लगी। नंगी सुषमा को कमरे में चलते हुए देख मेरा पूरा बदन रोमांच से भर गया। नंगी चलती हुई सुषमा के कूल्हों की लचक देखना किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी था। सुषमा की गाँड़ का रंग और उभार इतना ज्यादा मादक था की मैंने सुषमा को पास बुलाया और बुला कर सुषमाकी गुलाबी गोरी गाँड़ पर हाथ फिराते हुए उन्हें कभी बड़े प्यार से सहलाया तो कभी दो तीन चपेट मार कर और भी लाल किया।

चलते चलते सुषमा के स्तनोँ का उछलना किसी बिजली के गिरने से कम चमत्कारिक नहीं था। कुछ देर बाद जब मैं सुषमा की गाँड़ से फारिग हुआ तो सुषमा ने उनके चहिते सितार वादक की एक प्यार भरी धुन अपने म्यूजिक सिस्टम पर बजानी शुरू की और शुरू होते ही वापस लपक कर वह मेरी बाँहों में आ गयी।

सोचिये उस समय मेरी हालत कैसी रही होगी। मेरी प्यारी सुषमा को मेरी बाँहों में पाकर मेरे लिए अब अपने आप पर नियत्रण रखना बड़ा ही कठिन था। मैंने सुषमा की चूत में फिर से दो उंगलियां डाली और मैं बड़े ही प्यार से सुषमा की चूत में से उन उँगलियों को अंदर बाहर कर सुषमा को तैयार करने की कोशिश में लगा था।

सुषमा तो तैयार ही थी। शायद उसे भी महीनों से मेरे लण्ड की उम्मीद थी। एक तरफ म्यूजिक सिस्टम पर सितार वादन की लय और तबले की थाप माहौल को संगीतमय बना रही थी तो दूसरी तरफ मैं सुषमा की चूत को मेरी उँगलियों से चोदते हुए उसे चुदवाने के लिए तैयार कर रहा था। संगीत की मधुरता के साथ मेरी उँगलियों की चुदाई से सुषमा भी पलंग पर मचल मचल कर चुदाई के लिए तैयार होने के संकेत दे रही थी।

पर संगीतमय चुदाई के साथ साथ जीवन की एक ठोस सच्चाई भी मुझे नजर आ रही थी। शायद सुषमा और सेठी साहब ने यह मिलजुल कर फैसला लिया हो की वह दोनों मुझसे और टीना से जातीय सम्बन्ध बनाएंगे और उस संभोग से अगर बच्चे हुए तो हम सब आपस में मिलजुल कर उन्हें सांझा कर लेंगे। इस समझौते में मैं और टीना भी भागिदार थे यह तो मैं पहले पार्ट में बता ही चुका हूँ। सुषमा का बच्चा वह रख लेंगे और टीना का बच्चा हम। इस तरह कोई झगड़ा और मनमुटाव नहीं रहेगा।

मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। वैसे भी मैं और टीना दुसरा बच्चा प्लान कर ही रहे थे। अगर वह मेरे दोस्त सेठी साहब के वीर्य से भी होगा तो क्या हुआ? होगा तो हमारा ही। अगर दोनों बच्चे हो गए तो वह बच्चे हमारी दोनों फॅमिलियों को जोड़ कर रखेंगे। फिर तो सेठी साहब और सुषमा चाहे जहां कहीं भी हों, हमसे अलग नहीं होंगें। मैं चाहता था की टीना और सेठी साहब मिल कर बच्ची पैदा करे। हमारा एक बेटा तो था ही अब बेटी होने से हमारी फॅमिली पूरी हो जायेगी।

मेरी उंगली चोदन से सुषमा काफी उत्तेजित हो चुकी थी। वह बार बार दबी सी आवाज में, “राज, अब बस भी करो, मुझे अपने लण्ड से चोदो। देर मत करो। मुझे तुम्हारी उंगलियां नहीं, तुम्हारा मोटा तगड़ा लण्ड चाहिए।” कह कर अपनी उत्तेजना प्रदर्शित कर रही थी।

तब फिर मैं रुक गया। सुषमा को मैंने बिस्तर पर लिटाया और उसकी मादक टांगें मैंने अपने कंधे पर रखदीं। सुषमा की गुलाबी चूत की पंखुड़ियां एकदम गोरी गोरी सी मेरे लण्ड का इंतजार कर रही हों ऐसे फरफरा रहीं थीं। सुषमा खुद चुदवाने के लिए इतनी बेबस हो रही थी की बार बार वह अपनी चूत की पंखुड़ियों को अपनी ही उँगलियों से सेहला कर अपनी चुदवाने की इच्छा जाहिर कर रही थी।

अक्सर औरतें अपनी चुदवाने की इच्छा तीन तरीकों से जाहिर करती हैं। पहला वह अपने स्तनोँ को निचे से पकड़ कर अपनी हथेली में उठा कर अपनी बेबसता का इजहार करेगी, दुसरा वह अपनी चूत की पंखुड़ियों को सेहला कर अपनी इच्छा जाहिर करेगी और तीसरा तरिका है अपनी उंगलियां मुंह में डाल कर उस पर अपनी लार लिपटाती रहेंगी और आपकी और देख कर हल्का हल्का मुस्कुरा कर अपनी आँखों से इशारा करेगी की वह इच्छुक है।

सुषमा की चूत में से धीरे धीरे उसके स्त्री रस की बूंदें निकलती दिख रहीं थीं। सुषमा शायद मुझसे भी ज्यादा बेबाक थी चुदने के लिए। सुषमा ने मेरे लण्ड को पकड़ा और उसे सहलाते हुए बोली, “राज, मेरा बड़ा मन कर रहा है इसे चूसने के लिए। पर सबसे ज्यादा मेरी चूत फड़फड़ा रही है तुम्हारा लण्ड लेने के लिए। सेठी साहब से हमारी कुछ दिनों से अनबन चल रही थी तो कई दिनों से यह बेचारी भूखी है।”

सुषमा ने फिर मेरा लण्ड अपनी चूत की सतह पर रगड़ा। सुषमा के स्त्री रस और मेरे लण्ड से निकले हुए मेरे पूर्व रस की चिकनाहट के कारण मेरा लण्ड वैसे ही काफी स्निग्ध तो था ही। सुषमा ने मेरे लण्ड को पकड़ कर हिलाकर जगह बनाते हुए अपनी चूत की पंखुड़ियों के बिच घुसेड़ा।

मैंने एक हल्का सा धक्का दे कर मेरे लण्ड को सुषमाकी चूत में घुसेड़ दिया। सुषमाके मुंह से एक हलकी सिसकारी निकल गयी। काफी समय से उपयोग में ना आने के कारण शायद सुषमा की चूत का छिद्र कुछ सकुचा सा गया होगा। मेरे लण्ड ने घुसने के लिए जब जगह बनानी चाही तो कुछ तो दर्द होना ही था। खैर, सुषमा की चूत की सुरंग बड़ी लचीली और रसीली थी। मेरे लण्ड को सुषमाकी चूत की चमड़ी ने जकड के पकड़ लिया।

मैं सुषमा की चुदवाने की तड़प कितनी तगड़ी थी वह सुषमा की चूत के अंदर हो रही फड़कन से ही समझ गया था।

मेरे लण्ड के सुषमा के चूत की सुरंग में घुसते ही सुषमा जैसे थरथर्रा उठी। सुषमा के पुरे बदन में रोमांच की लहर दौड़ रही थी जो मैं उसके चेहरे के भाव पढ़ कर बता सकता था। मेरे लण्ड के पुरे अंदर घसते ही सुषमा ने मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया।

मेरे होँठों को अपने होँठों से चिपका कर सुषमा मुझे एक अत्यंत प्रगाढ़ चुम्बन देना चाहती थी। मैंने भी अपने होँठों को सुषमा के होँठों से चिपका कर मैं सुषमा के होंठ और उसकी जीभ को चाटने और चूसने लगा।

मेरी छाती में सुषमा की मदमस्त चूँचियाँ की निप्पलें कोंच रहीं थीं। कुछ देर बाद मैं अपने होँठ सुषमा के स्तनोँ पर रख दिए और उनको एक के बाद एक बारी से चूसने लगा। सुषमा के स्तन भी उत्तेजना से फुले हुए थे और मेरे होँठों में जाते हुए ही उनमें अजीब सी हलचल मैं महसूस करने लगा। स्त्रियों के स्तन स्त्रियों के सम्भोग में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। कहते हैं की अगर आप स्त्रियों के स्तनोँ को दक्षता से सेहलाओ तो स्त्रियां चुदवाने के लिए मजबूर हो जातीं हैं।

मेरा लण्ड सुषमा की सख्त चूत में जकड़ा हुआ था। सुषमाने मेरी कमर और कूल्हे को पीछे से अपने बाहुपाश में इतनी ताकत से खिंच कर अपने बदन से जकड़ा दिया था की उसके कारण मेरा पूरा का पूरा लण्ड सुषमा की चूत में जा घुसा था। मुझे मेरे लण्ड की सतह के ऊपर सुषमा की चूत की सुरंग में हो रही तेज कम्पन महसूस हो रही थी। सुषमा कई बार तगड़े लण्ड से चुद चुकी थी। पर फिर भी मेरे लण्ड से चुदने से सुषमा को इतनी उत्तेजना होगी थी की उसकी चूत में उत्तेजना के मारे ऐसी कम्पन होगी यह मैंने सोचा भी नहीं था।

सुषमा की चुदाई करते हुए मैं मेरी बीबी टीना की चुदाई की उसके साथ तुलना करने लगा। हालांकि मुझसे टीना पहले शुरुआत में काफी उग्रता और उत्तेजना से चुदवाती थी, पर शादी के कुछ सालों बाद वह गर्मजोशी नहीं रही थी। आखिर में तो मुझे उसे गरम करने के लिए सेठी साहब की कोई ना कोई कहानी बनानी पड़ती थी जिससे वह उत्तेजित हो कर चुदाई में रेस्पॉन्ड करती थी।

पर मैंने कभी टीना की चूत में जैसे सुषमा की चूत में स्पंदन हो रहे थे वैसे स्पंदन कभी भी अनुभव नहीं किये। शायद गैर मर्दों से चुदवाते हुए औरतों को कुछ अधिक ही उत्तेजना होती होगी जिसके कारण उनकी चूत में ऐसे स्पंदन हो रहे होंगे। या फिर सुषमा मुझसे चुदवा कर टीना से शायद ज्यादा ही एन्जॉय कर रही होगी।

हो सकता है अगर टीना सेठी साहब से चुदवाने के लिए राजी हो गयी तो टीना भी सेठी साहब से चुदवाते हुए अपनी चूत में ऐसे स्पंदन महसूस कर रही हो। वैसे मुझे यकीन था की जिस तरह से मैंने टीना को बार बार सेठी साहब की बात कर सेठी साहब से चुदवाने के लिए मानसिक रूपसे तैयार किया था, टीना अपने मायके में सेठी साहब से जरूर चुदवायेगी।

मुझे यह भी यकीन था की सेठी साहब टीना पर इतने फ़िदा हो गए थे की वह टीना को चोदे बगैर नहीं छोड़ेंगे। पर फिर भी मुझे चिंता थी की कहीं टीना लाज शर्म की वही घिसी पीटी पुरानी बात कर सेठी साहब का मुड़ ऑफ ना करदे। मैंने तो सुषमा को चोदने का रास्ता बना लिया था पर टीना को भी सेठी साहब से चुदवाना जरुरी था। मैंने तय किया की अगले दिन मैं फ़ोन कर पता करूंगा की रात को सेठी साहब से टीना की चुदाई हुई की नहीं।

मेरा खड़ा हुआ सख्त लण्ड सुषमा की रसीली चूत में अंदर बाहर जाता हुआ कमरे में “पिचक पिचक” की आवाजें पैदा कर रहा था। साथ साथ में मेरे सुषमा को जोरदार धक्के मारने से कई बार सुषमा “ओह….. आह….. ” इत्यादि सिसकारियां निकाल रही थीं।

मुझे मेरे लण्ड में एक अनूठा सुरूर महसूस ह रहा था। सुषमा की चूत टाइट होते हुए भी रसीली और चिकना थी। सुषमा की चूँचियाँ इतनी गोरी और लाल थीं की हाथ लगाने में भी डर लगता था की कहीं हाथ में लाल गुलाबी रंग ना लग जाए। जैसे जैसे मैं चोदते हुए सुषमा को धक्के पेल रहा था, सुषमा का पूरा बदन हिल जाता था और साथ में उसकी गोरी गुलाबी फूली हुई चूँचियाँ पूरी निप्पलों के साथ ऐसे हिलतीं थीं जैसे बारिस के समय हवाके तेज झोंके से पेड़ हिलते हों।

मुझे सुषमा को चोदने का ऐसा बढ़िया मौक़ा मिला था की मैं रुकने वाला नहीं था। सुषमा को चोदते हुए सुषमा का पूरा नंगा इतना खूबसूरत बदन देखते हुए मैं नहीं थक रहा था। सुषमा की गोरी चिट्टी चूत में मेरा तगड़ा चिकना लण्ड अंदर बाहर होते हुए देखने का मजा ही कुछ और था।

कई बार सुषमा अचानक ही सिसकारी लगा कर बोल उठती, “राज चोदो मुझे, फ़क मी, तुम बहुत अच्छा चोद रहे हो।” बगैरह बगैरह। काफी देर तक सुषमा को चोदने के बाद एक बार सुषमा बोल पड़ी, “अच्छा स्टैमिना है राज आपका। मानना पडेगा। आप सेठी साहब से कम नहीं हो। आप सेठी साहब को अच्छी खासी टककर दे सकते हो।” तब मुझे लगा की शायद सुषमा कुछ थकने लगी थी।

सब से ज्यादा उत्तेजना मुझे सुषमाकी उड़ती हुई चूँचियों को देख कर होती थी। जैसे ही मैं सुषमा की चूत में अपना लण्ड पेलता और एक धक्का मारता तब सुषमा की फूली भरी हुई मदमस्त चूँचियाँ फ़ैल कर हवा में उड़ने लगतीं। जो स्तन स्थिर होते हुए इतने भरे हुए सख्त और सुआकार दीखते थे वह धक्के से फ़ैल जाने के कारण एक अजीब सा आकार बनाते हुए वापस वही सख्त गोलाई और भरी हुई स्थिति में वापस आ जाते थे।

चुदाई की उत्तेजना के मारे सुषमा की चूँचियों की निप्पलें फूल कर कोई गुम्बज के शिखर के समान सुषमा के स्तनोँ पर अपना वर्चस्व स्थापित कर डटी हुई दिखती थीं।

उन कभी उड़ते तो कभी ठहरे हुए फुले हुए स्तनोँ को अपने हाथों में लेकर मसलना और निप्पलों को इतना दबाना की सुषमा के मुंह से दबी हुई सिसकारी निकल जाए उसका मजा ही कुछ और था। मैं झुक कर जब भी मौक़ा मिलता सुषमा की कोई एक चूँची की निप्पल को मुंह में ले लेता और जैसे ही दांतों से काटने लगता सुषमा चिल्लाती, “राज दर्द हो रहा है। बस करो।”

पर अब करीब पंद्रह बीस मिनट की चुदाई के बाद सुषमा के चेहरे पर थकान का भाव देख कर मैं थम गया। मुझे भी सर पर पसीना आ रहा था। मैंने झुक कर सुषमा के होँठ से अपने होँठ चिपका कर सुषमा को एक गहरा चुम्बन किया। सुषमा भी मेरे होँठों को चूसती हुई मेरी जीभ को अपने मुंह में ले कर मेरी लार चूस कर निगलने लगी। काफी समय के बाद इतना उत्तेजक और लंबा चुम्बन मैं कर रहा था।

सुषमा ने अपनी बाँहें फैलायीं और मैं सुषमा की बाँहों में सुषमा के बगल में लेट गया। सुषमा पलट कर मेरी आँखों में आँखें डालकर बोली, “कैसा रहा? अच्छा लगा मेरे साथ?”

मैंने सुषमा की नाक से अपनीं नाक रगड़ते हुए कहा, “सुषमाजी, अभी तो पिक्चर बाकी है। मुझे इतना अच्छा लगा की अब सेठी साहब का चांस नहीं लगेगा। मैं तुम्हें छोडूंगा ही नहीं। सेठी साहब को टीना के पास भेज दूंगा। अब तुम आसानी स मुझसे पिंड छुड़ा नहीं पाओगी।”

सुषमा ने भी मुस्कुराते हुए कहा, ” कौन साली पिंड छुड़ाना चाहती है? मैं तो चाहती हूँ की तुम मुझसे ऐसे ही चिपके रहो। सेठी साहब अगर टीना से चिपक कर रहते हैं तो फिर तो हमारी बल्ले बल्ले। पर अगर सेठी साहब नाराज हो गए तो तुम सम्हालना उनको।”

मैंने पट से जवाब दिया, “मैं क्यों सम्हालूं? टीना सम्हालेगी उनको।”

मेरी बात सुन कर टीना मुस्कुरायी और बोली, “अरे वाह रे मेरे टीना के हस्बैंड! एक ही रात में तुम तो बिलकुल पलट गए! पर यह तो पता करो की तुम्हारी बीबी और मेरे पति की सेटिंग हुई भी की नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं की हम यहां बैठे बैठे उनके मिलन के सपने देख रहे हों और वहाँ वह दोनों के बिच कुछ हुआ ही ना हो? वह रात को अपने अपने बेड में सो रहे हों।”

मैंने कहा, “कैसे पता करें? अगर टीना सेठी साहब के साथ है तो इस समय उसे फ़ोन करना ठीक नहीं होगा। कहीं वह भड़क नहीं जाए। हाँ एक काम कर सकता हूँ। मैं सालेजी को फ़ोन कर पूछता हूँ की टीना और सेठी साहब पहुँच तो गये ना ठीकठाक। उनकी बातों से पता चल जाएगा।”

सुषमा ने मेरी बात से सहमति जताई और मैंने मेरे साले साहब को रात के करीब ग्यारह बजे फ़ोन लगाया। कुछ देर घंटी बजने के बाद फ़ोन साले साहब की पत्नी अंजू ने उठाया। सुषमा सुन सके इस लिए मैंने फ़ोन को स्पीकर फ़ोन पर लगाया था।”

फ़ोन के दूसरे छोर से जब अंजू की आवाज सुनी तो मैंने पूछा, “कौन अंजुजी हैं?”

जब साले साहब की बीबी अंजू ने सूना की मैं बोल रहा हूँ तो फ़ौरन बोल पड़ी, “जी जीजा सा। मैं अंजू बोल रही हूँ। आपके साले साहब अभी वाशरूम में हैं। तब तक हम से ही बात कर लो जी! आपने तो हमारी ननद सा को आपके दोस्त के साथ भेज दिया! यह बात समझ में आयी को नी।

पर चिंता करना मति। जैसे की आपने कहा था इस वक्त हमारी ननद सा आपके दोस्त सेठी साहब के साथ ऊपर की मंजिल में सलामत है। मैंने उन दोनों की सलामती और प्राइवेसी का पूरा इंतजाम कर दिया है। मैंने आपके दोस्त के लिए ड्रिंक का तो इन्तिजाम किया ही है पर रात को अगर नींद ना आये और जरुरत पड़े तो ननद सा सेठी साहब को चाय पिला सके उसके लिए सेठी साहब के कमरे में चाय का सामान भी रख दिया है।”

अंजू की बात सुन कर सुषमा की आँखें चौड़ी हो गयीं। वह चौंक कर बोल उठी, “राजजी, आपके साले की बीबी तो कमाल है! बड़ी तीखी नजर और समझ है उसकी! वह तो आपकी चाल को भांप गयी लगती है!”

सुषमा को ध्यान नहीं रहा की फ़ोन को स्पीकर फ़ोन पर लगाने से उसकी हलकी सी आवाज भी अंजू को उस तरफ सुनाई पड़ रही थी।

सुषमा की आवाज सुन कर अंजू बोल पड़ी, “सुषमाजी, नमस्कार! मैं राजजी के साले साहब की पत्नी अंजू बोल रही हूँ। आप और जीजा जी इस समय साथ में है यह जान कर बहुत अच्छा लगा। अब मैं कुछ कुछ समझने लगी हूँ की आखिर यह सब माजरा क्या है। अब तक मैं समझी को नी की जीजा जी ने ननद जी को अकेली आपके पति सेठी साहब के साथ कैसे भेज दिया?

पर आपकी आवाज सुन कर अब सब ठीक समझ में आया। आप और जीजाजी निश्चिन्त रहें की तीन दिन तक ननद सा और सेठी साहब को यहां कोई आंच नहीं आने दूंगी। और वहाँ आप भी हमारे जीजाजी के साथ निश्चिन्त रहें। यह सारी कहानी हम तीनों के बिच में ही रहेगी। जीजाजी को कहना की यहां आपके साले साहब को या किसी और को ज़रा भी भनक नहीं लगने दूंगी की माजरा क्या है।

पर सुषमाजी, एक बात तो माननी पड़ेगी की आपके पति हैं बड़े हैंडसम। ननद सा वाकई खुश हो जाएंगी। और वैसे सुषमाजी, हमारे जीजा जी भी कुछ कम नहीं। आल धी बेस्ट सुषमाजी।”

मैंने फ़ौरन फ़ोन काट दिया। यह तो बड़ी गड़बड़ हो गयी! अंजू ने हमारी सारी प्लानिंग को भाँप लिया था। मरे चेहरे पर चिंता के छाये हुए बादल देख कर सुषमा हँस पड़ी और बोली, “अरे चिंता क्यों कर रहे हो? अंजू ने भले ही आप की प्लांनिंग को भाँप लिया हो पर उसने यह भी कहा ना की वह किसी को इसके बारे कुछ भी बताएगी नहीं।

जब वह सामने चल कर खुल्लमखुल्ला कह रही है तो निश्चिन्त हो जाओ। और फिर अगर मान भी लो की वह सब कुछ बोल देती भी है तो क्या होगा? जब हम चारों राजी तो क्या करेगा क़ाज़ी? अब रंग में भंग मत करो। अभी हमारा काम पूरा नहीं हुआ।”

यह कह कर सुषमा बिना कोई चिंता के मेरे ऊपर मरे बदन को अपनी नंगी करारी टाँगों के बिच में ले कर मेरे ऊपर सवार हो गयी और अपनी चूत को मेरे लण्ड के करीब लाकर मेरे लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत की पंखुड़ियों के केंद्र बिंदु पर सटा दिया।

सुषमा अब मुझे चोदने के लिए तैयार हो गयी। सुषमा के मस्त स्तन सुषमा की उस मुद्रा में भी थोड़ा सा भी झुके और लटके बिना फुले भरे हुए अपनी निप्पलों के सख्त शिखर को अपनी चोटी में रखे हुए उन्नत, अल्लड़ और उच्छृंखल से अपनी उद्दंडता दिखा रहे थे।

मैंने मेरे लण्ड को सुषमा की चूत में सेट करते हुए ऊपर की और एक धक्का दिया। सुषमा के बदन के वजन से और चिकनाहट से लथपथ मेरा लण्ड सुषमा की चूत में जैसे मक्खन के ब्लॉक में छुरी घुस जाती है ऐसे पूरा का पूरा अंदर घुस गया।

सुषमा की आँखों के मटकने से मैं समझ गया की उसे भी मेरे लण्ड के उसकी बच्चेदानी तक घुस जाने से एक रोमांचक भाव जरूर महसूस हुआ होगा। सुषमा की चूत की वही कम्पन तब मैंने कहीं ज्यादा महसूस की। सुषमा की चूत की त्वचा बार बार मेरे लण्ड को जकड रखे हुए इतनी तेजी से फड़फड़ा रही थी की मुझे यह महसूस होने लगा जैसे सुषमा मुझे चोदते हुए बारबार झड़ रही हो।

मेरे ऊपर सवार हुई सुषमा जैसे जैसे मुझे और ज्यादा से ज्यादा फुर्ती से चोदती रही उसकी चूत के अंदर का कम्पन मेरे लण्ड को अपने अंदर खिंच कर मेरे लण्ड के वीर्य की एक एक बूँद जैसे चूसना चाहती हो ऐसा मुझे महसूस होता रहा। हालांकि सुषमा मुझे चोद रही थी पर चोदते हुए वह बार बार काफी गर्म जोशीसे मुझे कह रही थी, “राज, और चोदो, और जोर से चोदो मुझे। फ़क मी हार्ड। बहुत अच्छा लग रहा है। तुम बहुत अच्छा चोद रहे हो।”

सुषमा की नन्हीं सी फ्रेम में इतनी जबरदस्त एनर्जी होगी यह मैंने नहीं सोचा था। जैसे ही मेरा लण्ड उसकी चूत में घुसाथा वह मुझ पर पूरी आक्रमकता से टूट पड़ीथी। उसके सर पर पता नहीं कैसा जनून सवार हो गया था। जैसे किसी इंसान के सर पर भूत सवार होता है ऐसे ही सुषमा के बिखरे हुए बाल उसके खूबसूरत चेहरे पर हर तरफ फैले हुए थे। हवा में उड़ रहे बिखरे हुए बालों को कभी मैं तो कभी सुषमा संवारते और एक जूथ सा बना कर उन्हें अपनी जगह रख देते, किन्तु शीघ्र ही वह फिर से बिखर जाते और फिर से वही सब। मुझे चोदते हुए सुषमा अपनी गाँड़ क्या अपना पूरा बदन जब ऊपर निचे करती तो उसकी चूँचियाँ भी चारों तरफ फ़ैल जातीं। मैं उनको अपने हाथोँ में पकड़ कर सेहला कर सम्हालता रहता तो कभी सुषमा को मेरे बदन से सटा कर उनको चूसता, चूमता और कभी कभी उनकी निप्पलों को काटता भी। मैं वाकई में अपने आप को बड़ा ही भाग्य शाली मान रहा था की इतनी सुन्दर औरत मुझे इतने प्यार से चोद रही थी जो मेरे लिए एक ख्वाब के समान था।

मुझे चोदते हुए सुषमा तो पता नहीं कितनी बार झड़ चुकी होगी पर तब मैं भी अपने आप को रोक नहीं पा रहा था। मैं जानता था की सुषमा तहे दिल से मेरे वीर्य की एक एक बून्द अपनी चूत में भर देना चाहती थी। पर मेरा वीर्य जब बाहर निकलने वाला था तब एक भद्र पुरुष की तरह मेरा कर्तव्य था की मैं अपनी प्रियतमा को पूछूं की क्या वह मेरा वीर्य अपनी चूत की गहराइयों में समा देना चाहती थी।

मेरा पूरा बदन सख्त होने लगा। मैं झड़ने के कगार पर था। मरे शारीरिक अंदाज से सुषमा समझ गयी की मैं झड़ने वाला हूँ। मैंने भी सुषमा के चोदने की फुर्ती को कुछ कम करने का संकेत जरूर दिया होगा। स्त्रियां कामक्रीड़ा में शायद पुरुष से कहीं ज्यादाही संवेदनशील होतीं हैं। वह हमारे बदन के सुरते हाल से ही समझ जातीं हैं की हमारे दिमाग में और बदन में उस समय क्या चल रहा है। सुषमा तो बड़ी ही ज्यादा संवेदनशील और अक्लमंद औरत थी। उसे समझने में देर नहीं लगी की मैं झड़ने वाला हूँ और शायद इस असमंजस में हूँ की अपना वीर्य सुषमा की चूत में खाली करूँ या नहीं।

सुषमा ने अपने चोदने की फुर्ती को और तेज करते हुए कहा, “राजजी, मैं आपके बच्चे को अपने गर्भ में रखना चाहती हूँ। मैंने यह बात टीना को भी कह दी थी। मुझे तुमसे बच्चा चाहिए। मैंने आप से भी पहले से ही यह शर्त रखी थी। प्लीज़ मुझे निराश मत करना। मुझे अपना सारा वीर्य देदो। मुझे गर्भवती बनाओ। मुझे बच्चा चाहिए। मैं माँ बनना चाहती हूँ” यह कह कर सुषमा मेरे बदन पर चढ़ी हुई मुझे फुर्ती से चोदते हुए फफक फफक कर रोने लगी।

उस समय मैं इतना अजीबोगरीब महसूस कर रहा था की आज मैं उस समय के मेरे मन के भाव का वर्णन करने में असमर्थ हूँ। एक इतनी सेक्सी, खूबसूरत चुदवाने के लिए बड़ी ही बेताब चुदक्क्ड़ औरत मुझे पूरी शिद्द्त से चोदते हुए रोते रोते कह रही थी की मैं उसको माँ बनाऊं। अक्सर औरतें किसी दूसरे मर्द से चुदवा तो लेती हैं पर उसके गर्भ से माँ बनाना नहीं चाहतीं। पर यहां तो उलटा ही था। सुषमा की आँखों में आंसूं देख कर मुझे बुरा लगा।

मैंने कहा, “मेरे मन की बात आप कैसे जान लेती हैं? खैर मैं बिलकुल नहीं रोकूंगा। अपना सारा वीर्य आपके अंदर उंडेल दूंगा पर प्लीज़ आप आंसूं मत बहाओ। मैं आपको बच्चा दूंगा। आप शान्त हो जाओ।”

मेरी बात सुनकर सुषमा के चेहरे पर मुस्कान लौट आयी। वह बोली, “सच में? मुझे तुम माँ बनाओगे? तुम जब कहोगे मैं तुमसे चुदवाउंगी। पर मुझे एक बच्चा दे दो।”

यह कह कर सुषमा मुझ पर लेट गयी और मेरा सारा वीर्य अपने अंदर लेते हुए वह मरे होंठों से अपने होँठ चिपका कर मुझे पागल की तरह चूमने लगी। एक औरत में माँ बनने की कितनी जबरदस्त इच्छा होती है यह मैंने पहली बार इतने सटीक तरीके से देखा।”

उस समय मैं मेरे वीर्य का फव्वारा रोक नहीं पा रहा था और रोकने वाला भी नहीं था। सुषमा की चूत की चमड़ी ने मेरे लण्ड को इतनी सख्ती से जकड़ा हुआ था और सुषमा की जबरदस्त चुदाई के कारण मैं वैसे भी अपने वीर्य को रोक नहीं पा रहा था। बिजली के कड़ाके से होते हुए धमाके की तरह मेरे लण्ड से मेरे गरम गरम वीर्य का जबरदस्त फव्वारा छूटा और सुषमा ने उसे जरूर अपनी चूत की सुरंगों में लावा सा गरमागरम प्रवाही बहता हुआ महसूस किया होगा।

मैं और सुषमा उसी पोज़िशन में काफी देर तक पड़े रहे। सुषमा मुझे होँठों पर चूमती रही। कुछ देर बाद इस डर से की कहीं मेरा वीर्य बाहर नहीं गिर जाए, सुषमा ने मुझे अपने ऊपर चढ़ा दिया और मेरा लण्ड अपनी चूत में रखे हुए वह मेरे निचे लेट गयी ताकि मेरे वीर्य की एक बून्द भी उसकी चूत में से बाहर ना निकले। मैं सुषमा की इस इच्छा का सम्मान करता था। मेरे सुषमा को चोद पाने में सुषमा की इस इच्छा का बड़ा योगदान था यह मैं भलीभाँती जानता था। वरना पता नहीं इतनी खूबसूरत औरत मिलना कोई सपने के साकार होने से कम नहीं था।

काफी देर के बाद मैं सुषमा के बगल में जा कर लेट गया। जैसे ही मेरी आँखें गहराने लगीं की सुषमा ने मुझे झकझोरते हुए कहा, “अभी तो रात का खाना और खाने के बाद पूरी रात का खेल बाकी है। अभी से कहाँ सोने का प्लान कर रहे हो? चलो उठो।”

मैं थका हुआ था और कुछ देर विश्राम करना चाहता था। मैंने सुषमा से कहा, “मैं कुछ देर विश्राम करना चाहता हूँ।” सुषमा ने जब देखा की मैं वाकई में थका हुआ था तो मेरे बदन पर एक सरसरी नजर फेंक मुस्कुराती हुई उठ खड़ी हुई और बोली, “ठीक है, कुछ देर विश्राम कर लो, तब तक मैं टेबल पर खाना गरम कर लगाती हूँ।”

मैं वहीँ फर्श पर बिछाये हुए गद्दे पर ही ढेर हो गया। पता नहीं कितना समय मैं सोया हुआ होऊंगा पर काफी देर बाद जब मुझे महसूस हुआ की सुषमा मुझे झकझोर कर जगा रही है तब मैंने आँखें खोल कर देखा तो मेरी प्रियतमा नाइटी पहन कर सजी हुई मुझे खाने के टेबल पर आने के लिए कह रही थी। मैंने उठ कर सुषमा ने रखा हुआ सेठी साहब का कुर्ता पजामा पहना। हम ने फुर्ती से खाना खाया और सुषमा ने बनायी हुई गरम कॉफ़ी पी। सारा टेबल चन्द मिनटों में साफ़ कर मेरी रात की रानी आयी और मेरा हाथ थाम कर मुझे पकड़ कर अपने बैडरूम में ले गयी।

हम जैसे ही बैडरूम में पहुंचे सुषमा ने मेरे पाजामे के नाडा खोल कर उसे उतार कर मेरे ढीले लण्ड को अपनी उँगलियों में लिया और उसे ले कर प्यार से सहलाते हुए बोली, “आज रात तो यहीं गुजारेंगे ना राज साहब?”

मैंने सुषमा को अपनी बाँहों में भर कर कहा, “ऐसी खूबसूरत अप्सरा अगर इस तरह प्यार से बुलाये तो कौन साला अपने घर जाएगा? पर मोहतरमा अब आगे क्या प्रोग्राम है?”

सुषमा ने अपने हाथ में मेरे लण्ड को सेहला कर उसे सख्त करते हुए कहा, “इसे अब अपनी जवानी में आ जाने दो। फिर तुम इसे तैयार करो।” यह कह कर सुषमा ने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी जाँघों के बिच में रख दिया।

मैंने सुषमा के गाउन की झिप खोल कर गाउन को निचे उतार कर सुषमा को ऊपर से नंगी कर दिया। सुषमा ने गाउन के अंदर और कुछ नहीं पहन रखा था। सुषमा के अल्लड़ मस्त स्तनोँ को अपने हाथों में मसलते हुए मैंने सुषमा के बदन से पूरा गाउन निकाल दिया। मत्स्यगंधा जल मछली सी अत्यंत खूबसूरत नंगी सुषमा अपने कपडे उतरते ही लाज से शर्माती हुई नजरें झुका कर मेरी छाती पर अपना सर रख कर आगे मैं क्या करता हूँ उसका इंतजार करने लगी। मुझसे करीब एक घंटे चुदवाने के बाद भी जब इस औरत को मैंने दुबारा नंगी किया तो लाज शर्म से वह पानी पानी हो रही थी। यही हमारी भारतीय महिलाओं की खूबसूरती है। लज्जा उनका आभूषण है।

मैंने अपना कुर्ता निकालते हुए सुषमा को अपनी गोद में बिठा दिया। मेरा लण्ड सख्त हो चुका था। मैं सुषमा की चूँचियों को सहलाते हुए और उसकी निप्पलों को उँगलियों में पिचकते हुए अपने घुटनों पर बैठ खड़ा हुआ और सुषमा को भी अपने घुटनों पर आधा खड़ा करने लगा। सुषमा समझ गयी की मैं उसे घोड़ी बना कर पीछे से चोदना चाहता था। सुषमा ने थोड़ा आतंकित नज़रों से मुझे देखा। शायद उसे लगा की कहीं मैं उसकी गाँड़ मारना तो नहीं चाह रहा था?

पर वह कुछ नहीं बोली और अपनी गाँड़ मेरी और कर घोड़ी की पोजीशन में हो गयी। मैंने फ़ौरन सुषमा के पीछे उसकी मस्त गुलाबी गोरी चिट्टी, बड़े ही कामुक घुमाव वाली भरी हुई गाँड़ पर एक सख्त चपेट मारी। मेरी चपेट उतनी तेज नहीं थी पर शायद सुषमा को ऐसी चपेट की अपेक्षा नहीं थी।

सुषमा के मुंह से सिसकारी निकल गयी। उसने घूम कर पीछे देख कर कुछ मुस्कुराते हुए कुछ कटाक्ष से और कुछ असहायता भरे स्वर में कहा, “क्या करते हो?” और चुपचाप वैसे ही घोड़ी की पोजीशन में बनी रही। शायद वह अपने मन में असमंजस में थी की अब मैं क्या करूंगा? उसकी गाँड़ मारूंगा या पीछे से उसकी चूत चोदूंगा।

मैंने सुषमा की गाँड़ पर अपनी हथेली फिराते हुए उसकी गाँड़ के गालों को दबाकर उनसे खेलते हुए उसकी गांड के बिच की दरार में उंगली डाली। सुषमा की गाँड़ सेठी साहब कई बार मार चुके होंगे। इसके कारण वह उतनी टाइट नहीं थी जितनी की टीना की थी। सुषमा ने पीछे मुड़कर देखा और बोली, “उसमें डालोगे क्या? उसको छोडो यार आगे डालो। मैं बेसब्री से इंतजार कर रही हूँ।”

मैंने बिना बोले पीछे से मेरा लण्ड सुषमाकी चूत की पंखुड़ियों में सेट किया। सुषमा ने फिर एक बार पीछे मुड़कर देखा और और अपनी उँगलियों को बारबार अपने मुंह में डाल कर अपनी लार से मेरे लण्ड को और अपनी चूत की पंखुड़ियों को चिकना किया। फिर थोड़ा पीछे हट कर मेरे लण्ड को अपनी चूत पर थोड़ा दबाव डलवा कर मुझे मेरे लण्ड को उसकी चूत में अंदर घुसाने का संकेत दिया।

मेरा लण्ड तो तना हुआ सुषमा की चूत में घुसने के लिए बेताब था ही। मैंने एक जोरदार धक्का मार कर मेरा लण्ड सुषमा की चूत में घुसेड़ दिया। शायद चिकनाहट कम थी या सुषमा की चूत मेरे लण्ड को अंदर लेने के लिए तैयार नहीं थी, पर सुषमा के मुंह से दर्द के मारे हलकी सी चीख निकल पड़ी।

मैं थम गया। सुषमा ने अपनी गाँड़ से पीछे की और धक्का मार कर मुझे निर्देश दिया की मैं बिना रुके सुषमा की चुदाई जारी रखूं। मैंने मेरी रानी की आज्ञा का पालन करते हुए पीछे से सुषमा की चूतमें मेरे लण्ड को पेलना शुरू किया।

मैं यहां यह कुबूल करता हूँ की मुझे मेरी प्रेमिका को पिछसे चोदना बहुत पसंद है। जब मैं चोदते हुए मेरी प्रेमिका की सुन्दर नशीली गाँड़ देखता हूँ तो मुझ में और जोश भर जाता है। और एक नशीला दृश्य होता है माशूका की चूँचियों का झूल कर चुदवाते हुए हिंडोले की तरह झूलते हुए देखना। जो चूँचियाँ सख्ती से गुरुत्वाकर्षाण के नियम को तोड़कर भी अपना आकार बना कर रखती हैं, वह पीछे से चुदवाते हुए सख्त तेज तगड़े धक्के पेलने के कारण लटकते हुए हिंडोले की तरह झूलने लगतीं हैं। उनको पीछे से पकड़ कर दबाना, मसलना, उनकी निप्पलों को जोर से पिचकाने का मजा ही कुछ और है।

खूबसूरत परी जैसी सुषमा की चूत में बिना थके मैं मेरा लण्ड काफी देर तक पेलता रहा। शायद सुषमा भी बहुत ज्यादा एन्जॉय कर रही होगी, क्यूंकि कई बार बिच में ही चुदवाते हुए वह झड़ रही थी। जब वह झड़ती थी तब उसके मुंह से हलकी सी सिसकारी या “उँह….” जैसी आवाज निकल जाती थी। अगर मैं थम जाता तो सुषमा मुझे चुदाई जारी रखने के लिए कहती।

चोदते हुए मुझे सुषमा की चूत में लण्ड अंदर बाहर होते हुए देख बड़ी ही अजीब सी फीलिंग होती थी। मैं ऐसी खूबसूरत औरत को चोदने का मौक़ा पाकर अपने आप को बड़ा ही भाग्यशाली समझ रहा था। सुषमा एक बड़ी ही संवेदनशील प्रेमिका थी। सेठी साहब बड़े भाग्यशाली थे की उन्हें ऐसी खूबसूरत, समझदार और संवेदनशील बीबी मिली।

जो भी पति मेरी कहानी पढ़ रहे हैं उनको अनुरोध है की अपनी बीबी को भी दूसरे मर्दों से चुदवाने का मौका दें, बल्कि उनको दूसरे मन पसंद मर्दों से चुदवाने के लिए प्रोत्साहित करें। कई बार बीबियाँ किसी दूसरे से चुदवाने के लिए मना कर देतीं हैं। इससे निराश मत होइए। अपनी कोशिश जारी रखिये। जब पत्नी को यह यकीन हो जाएगा की वाकई में आपको आपत्ति नहीं है और आपको जलन नहीं होगी तो बीबियाँ भी मान सकती हैं।

साथ में मेरा पत्नियों से भी अनुरोध है की अगर आपके पति आपको दूसरे मर्दों से चुदवाने के लिए कहते हैं तो आप इनसे लड़ाई झगड़ा ना करें। अक्सर जो पति अपनी पत्नियों से प्यार करते हैं वह अपनी पत्नी को कैसे ज्यादा से ज्यादा सुःख दे सकें उसकी चिंता में रहते हैं। वह चाहते हैं की उनकी पत्नी भी बाहर के दूसरे मर्द से चुदवा कर उसकी जो उत्तेजना और आनंद है उसे अनुभव करें। जो युगल इस तरह एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं वह वाकई में बड़े सुखी होते हैं।

कई बार पति चाहते हैं की उनकी पत्नी किसी और मर्द से उनके सामने ही चुदवाये। इस बात में भी पत्नियों को आश्चर्य करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अक्सर जो पति पत्नियों को बेतहाशा प्यार करते हैं वह ऐसा करना चाहते हैं। पत्नी और पति दोनों मिलकर साथ में बैठ तय करें की पत्नी किस से इस तरह चुदवाये।

पत्नियों को भी चाहिए की पति को भी किसी दूसरी औरत को चोदने की इजाजत दे।जो पति अपनी पत्नियों को दूसरे मर्द से अपने सामने चुदवाना चाहते हैं उन्हें नामर्द समझने की गलती ना करें। वह पति चाहते हैं की उनकी पत्नी दूसरे मर्दों से चुदवाते हुए जो आनंद और जो उत्तेजना महसूस करती है उसमें वह भी भागिदार बनें और पत्नी की ख़ुशी से वह भी खुश हों।

सुषमा को चोदते हुए कई बार मेर मन किया की एक बार तो मैं मेरा लण्ड सुषमा की इतनी खूबसूरत गाँड़ में पेलकर देखूं तो सही की कैसा फील होता है। पता नहीं कैसे पर सुषमा को इसकी भनक लगी होगी, क्यूंकि मुझसे चुदवाते हुए एक बार मौक़ा मिलते ही सुषमा ने पीछे मुड़कर मेरी और देख कर कहा, “मेरी गाँड़ मारने का मन तो नहीं कर रहा? मैं जरूर मौक़ा दूंगी। पर मैं चाहती हूँ की पहले आप अपना सारा माल मेरे गर्भाशय में डालकर मुझे गर्भवती बनादो। इसके बाद आप को जो करना है करो। मैं नहीं रोकूंगी।”

सुषमा की मजबूरी और उसके मन की वेदना मैं समझने लगा था। अक्सर हम मर्द स्त्रियों के मन के भाव नहीं समझ पाते हैं। ज्यादातर स्त्रियों में या यूँ कहिये की लगभग सारी स्त्रियों में ही भगवान ने माँ का जो भाव स्थापित किया है जिसके कारण यह सारी दुनिया चल रही है, वह अद्भुत है। सबसे पहले माँ बनने का और माँ बनने के बाद अपने बच्चे की जी जान से रक्षा और लालन पालन करने का जो भाव है वह मात्र स्त्रियां ही महसूस कर सकती हैं।

सुषमा को पीछे से चोदते हुए मैं बहुत ज्यादा देर टिक नहीं पाया। हालांकि मैं अपने आप को झड़ने से रोक सकता था। पर सुषमा की वीर्य को पाने की प्रबल इच्छा देख मैंने अपने आप को नहीं रोका। दूसरे सुषमा की इतनी सेक्सी गाँड़ देख कर ही मेरे लण्ड में पता नहीं क्या हो जाता था।

मेरी चुदाई के कारण सुषमा तो कई बार झड़ी, पर मैं टिका रहा था। आखिर में करीब दस या पंद्रह मिनट चोदने के बाद मैं झड़ने के कगार पर पहुंचा तब मैं सुषमा की खूबसूरत गाँड़ के गालों को जोर से दबाते हुए बोला, “सुषमा मैं झड़ने वाला हूँ। मैं तुम्हार अंदर मेरा सारा माल छोड़ता हूँ।”

यह कह कर मैंने उस रात दूसरी बार सुषमा की चूत में मेरे वीर्य का गरमागरम फव्वारा छोड़ा। मैं सुषमा की चूँचियाँ दोनों हाथों में पकड़ कर सुषमा की चूत में पीछे से लण्ड डाले हुए वैसे ही खड़ा रहा जब तक मेरे वीर्य की आखिरी बून्द सुषमा की चूतमें ना चली जाए। सुषमा भी वैसे ही घोड़ी बनकर मेरे वीर्य को स्वीकार करके शायद अपने इष्ट को प्रार्थना कर रही होगी की वह मेरे वीर्य से गर्भवती हो।

कुछ समय के पश्चात मैं और सुषमा थकान से त्रस्त हो कर पलंग पर लुढ़क पड़े। सुषमा काफी थकी हुई थी। नंगे बदन पर कपड़ा भी ढकने की उसमें ताकत नहीं थी। मैंने सुषमा को पलंग पर ठीक से सुलाया और मैं सुषमा से लिपट कर उसकी गोरी गाँड़ से मेरा ढीला पड़ा हुआ लण्ड सटा कर सो गया।

पता नहीं कितने बजे होंगे। खिड़की के घने परदे के पीछे से सूरज की किरणों का आभास हो रहा था। उसी समय मेरे फ़ोन पर मैसेज आने का नोटिफिकेशन सूना। मैंने व्हाट्सप्प खोला तो टीना का डराने वाला मैसेज आया हुआ था जिसे पढ़कर मेरे पाँव तले से जमीन खिसक गयी।

टीना ने लिखा था। “प्यारे राज, मैं जानती हूँ इस समय शायद तुम बिजी होंगे या थके हुए होंगे। (टीना भी जानती थी की उसके निकलते ही मैं सुषमा को पकड़ लूंगा, नहीं छोडूंगा) पता नहीं कैसे मेरी भाभी को हमारे राज़ का अंदेशा हो गया है।

कल रात को भाभी ने मुझे मुन्ने को सुलाकर सेठी साहब के कमरे में जाने के लिए बारबार आग्रह किया और कहा की मैं बेशक पूरी रात सेठी साहब के साथ रहूं और खूब एन्जॉय करूँ। बल्कि मैं जब आनाकानी कर रही थी तब उन्होंने मुझे धक्के मार कर भेजा और कहा की अगर मैं नहीं गयी तो वह खुद रातभर सेठी साहब के साथ सोयेगी, तो मेरे भाई को भी पता चल जाएगा। मैं बहुत डरी हुई हूँ की कहीं भाई को पता चल गया तो मेरी मट्टी पलित हो जायेगी।”

मैं मैसेज पढ़ कर कुछ देर सुन्न सा सोचता रहा फिर मैंने टीना को मैसेज किया, “डार्लिंग, चिंता मत करो। चिंता करने से कुछ नहीं होगा। तुम इस समय काफी थकी हुई होगी। चिंता की कोई बात नहीं है। अभी तुम कुछ देर विश्राम करो। सुबह उठ कर शान्ति से रोज की तरह ही वर्तन करना। देखो भाभी क्या कहती है। घबड़ाने की कोई जरुरत नहीं। मुझे लगता है भाभी सिर्फ हमारी परिस्थिति का मजा ले रही है। वह भाई को यह सब नहीं कहेगी। तुम निश्चिन्त रह कर सब काम सामान्य तरीके से करो। जैसे ही कुछ विशेष बात हो मुझे मैसेज करना या बात करना।”

सुषमा पलंग पर गहरी नींद सो रही थी। मैं उठा और तैयार होने लगा। सुबह दूधवाला, अखबार वाला, कामवाली यह सब आने लगते हैं। अगर उन्होंने सेठी साहब की अनुपस्थिति में मुझे इस घर में देख लिया तो मेरी कहानी सारी कॉलोनी में फ़ैल जायेगी। मैंने सुषमा को उठा कर कपडे पहन कर फिर सोने को कहा। मने कहा की कहीं दूध वाला, कामवाली बगैरह आ ना जाएँ।

सुषमा ने कहा की उसने कामवाली को तीन दिन की छुट्टी दे रखी थी, दूध सुषमा ने पिछले दिन ही ले रखा था। अखबार वाला तो बाहर अखबार डालकर चला जाता था, तो उसे कोई चिंता नहीं थी। यह कह कर जब वह सोने लगी तो मैंने उसे कहा की मैंने यह सब इंतजाम नहीं किया था सो मुझे जाना पड़ेगा। यह कह कर मैं अपने फ्लैट में जा पहुंचा और टीना के मेसेज या फ़ोन का इंतजार करने लगा।

लगभग पूरी रात जागने के बाद भी टीना का मेसेज पढ़ कर मेरी नींद हवा हो चुकी थी। मुझसे अब और इंतजार नहीं हो रहा था। पर सुबह दूध वाला, काम वाली सब के आते जाते रहने के कारण मैं टीना से बात नहीं कर पाया। मैंने करीब साढ़े आठ टीना को फ़ोन मिलाया। पर फ़ोन टीना ने नहीं टीना की भाभी अंजू ने उठाया।

अंजू ने फ़ोन उठाते ही हँसी मजाक के लहजे में पूछा, “जीजू सा, प्रणाम! ननद सा से बात किये बगैर चैन नहीं पड़ता क्या आपको? ननदसा अभी बाथरूम में है। जीजू, एक बात तो माननी पड़ेगी। आपके और दीदी के बिच में जो अंडरस्टैंडिंग है उसका जवाब नहीं। आप यहां की बिलकुल फ़िक्र मत करना। मैं हूँ ना। सब सम्हाल लुंगी।

सुबह दीदी काफी देर से उठी है। लगता है दीदी की तबियत थोड़ी ठीक नहीं। चिंता की कोई बात नहीं। दीदी एक्चुअली तो बहुत ज्यादा थकी हुई हैं। पूरी रात बेचारी सो नहीं पायी। उनको पूरी रात मच्छरों ने या पता नहीं खटमलों ने काटा और परेशान किया।

वैसे हमारे यहां अभी एक भी मच्छर या खटमल नहीं है, पर पता नहीं शायद कहीं से कोई एक मच्छर या खटमल ने दीदी की नींद हराम कर दी है। दीदी का खून कुछ ज्यादा ही मीठा होगा। दीदी के बदन पर कई जगह लाल लाल निशान हैं। कुछ तो ऐसी जगह हैं की किसीको दिखा नहीं सकते। गरमी के कारण शायद रात में दीदी ने कपडे निकाल दिए होंगे। वैसे उनके और सेठी साहब के कमरे में तो ए.सी. लगा हुआ है और बढ़िया काम कर भी रहा है।

खैर, मैं अभी ननदसा को निचे नहीं जाने दूंगी। पापा या मम्मी ने ननदसा को अगर इस हाल में देख लिया और बदन के निशान देखे तो वह कुछ और सोचेंगे। मैं सब को कह दूंगी की ननदसा की तबियत थोड़ी ठीक नहीं है। मुन्ना सेठी साहब के साथ निचे खेलने गया है।

सेठी साहब नाश्ता करके अपने काम पर जयपुर के लिए निकल चुके हैं। वह भी थके हुए दिख रहे थे। शायद वह भी रात भर सो को नी पाए। उनको भी रात भर मच्छरों ने परेशान किया लगता है। रात को वापस आएंगे। दीदी के भाई आज दफ्तर के काम से तीन दिन के लिए बाहर गए हैं। जीजू, आप ननदसा की बिलकुल चिंता मत करना, मैं सब सम्हाल लुंगी। यहां सब कुछ ठीक है। दीदी बाथरूम से निकलेगी तो आपसे बात करेगी।”

यह सब कह कर अंजू ने फ़ोन रख दिया। अंजू की इतनी बात से मैं समझ गया की अंजू ने सब कुछ भाँप लिया था और फिर भी वह किसी को कुछ नहीं बताएगी। अंजू यह भी समझ गयी थी की इस सारे तामझाम में मैं और टीना मिल कर सब कुछ एक दूसरे की सहमति से कर रहे थे। क्यूंकि वरना अंजू मुझसे इतनी ऐसे बात नहीं करती। यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी। पर एक बात अच्छी थी की सिचुएशन नियंत्रण में थी।

कुछ ही देर में टीना का फ़ोन आया। टीना कुछ घबड़ायी हुई थी। टीना ने कहा, “अंजू भाभी बड़ी शरारती और शातिर है। वह सेठी साहब और मेरे बिच की बात भाँप गयी है। उसने मुझे निचे पापा और मम्मी के पास जाने से मना किया है। वैसे उसकी बात भी ठीक है।

मैं उस हालात में नहीं की मैं निचे जा सकूँ। अब मैं आपको क्या बताऊँ? आप तो आप के दोस्त सेठी साहब का नेचर जानते हो। भाभी ने आपको सब कुछ बता ही दिया है। पर वैसे चिंता की कोई बात नहीं। मुझे लगता है भाभी मजे ले रही है वह किसी से कुछ कहेगी नहीं। मैं भाभी को सम्हाल लुंगी। लगता है भाभी सेठी साहब से बड़ी इम्प्रेस हुई है। रात को मुझे धमकी दे रही थी की अगर मैं सेठी साहब के पास नहीं गयी तो खुद चली जायेगी। पता नहीं सेठी साहब के पास क्या जादू है की हर लड़की उनके पास जाना चाहती है।”

मैंने टीना से मजाक में कहा, “हाँ भाई, ऐसा क्यों नहीं कहती की सेठी साहब की पर्सनालिटी ही कुछ ऐसी है की लडकियां उनसे इतनी इम्प्रेस्सेड हो जाती हैं की जो लड़की सेठी साहब से मिलती है वह उनसे चुदवाना चाहती है?”

टीना ने कुछ रिलैक्स्ड होते हुए कहा, “लगता है तुम्हें सेठी साहब से जलन हो रही है।”

मैंने कहा, “वह तो होगी ही। अरे मेरी खूबसूरत कमसिन बीबी को ही जिन्होंने वश में कर लिया हो उनसे जलन नहीं होगी क्या?”

टीना ने कटाक्ष का जवाब कटाक्ष में देते हुए कहा, “अच्छा? बड़ी तत्वचिंतन की बात करने लगे हो! मेरा मुंह मत खुलवाओ। तुमने जो उनकी देवलोक की अप्सरा जैसी खूबसूरत बीबी को अपने निचे पूरी रात दबा के रखा उसका क्या?”

मैंने टीना की बात को काटते हुए कहा, “अरे हम कहाँ बेकार में झगड़ने लगे। यहां बात तो तुम्हारी अंजू भाभी को सेट करने की है, और हम आपस में ही लड़ने लग गए।”

अचानक मेरे दिमाग में बत्ती हुई। मैंने टीना को कहा, “अगर तुम्हारी भाभी सेठी साहब से बहुत इम्प्रेस हुई है और सेठी साहब से रातको मिलने के लिए भी तैयार हो गयी थी तो तुम क्यों ना उसे आधी रात को चुपचाप अकेले सेठी साहब के कमरे में ले जा कर उसे सेठी साहब से मिला दो और ऐसा कुछ जुगाड़ करो की सांप भी मरे और लाठी भी ना टूटे?” मैं जैसे तैसे अंजू को मामला शांत करना चाहता था।

मेरी बात सुनकर कुछ झुंझलाती हुई टीना बोली, “क्या बकते हो? मैं भाभी को सेठी साहब से रात को मिलाऊँ? भाभी तो वैसे ही उनसे मिलने के लिए बड़ी बेताब है। वह तो फ़ौरन तैयार हो जायेगी। भाभी बड़ी बेशरम, शरारती और शातिर है। अगर मैंने सेठी साहब से उसे रात को मिला दिया तो समझो हो गया काम तमाम। अगर मैंने ऐसा कुछ किया तो भाभी का कोई भरोसा नहीं। वह तो सारे कपडे निकाल कर सेठी साहब से लिपट ही जायेगी। इतना झंझट कम है की एक और झंझट पैदा करूँ? मतलब? तुम कहना क्या चाहते हो?”

मैंने बड़ी ही शांति से कहा, “थोड़ा ठंडे दिमाग से सोचो। अगर अंजू भाभी सेठी साहब से इतनी ज्यादा इम्प्रेस्सेड है और रात को वह उनके कमरे में जाने के लिए भी तैयार हो जाती है और जैसे तुम कह रही हो की वह तो अपने कपडे निकाल कर सेठी साहब से भी लिपट सकती है तो मतलब की तुम्हारी भाभी सब तरह से तैयार है। तुम समझ गयी ना मैं क्या कहना चाहता हूँ? तुम्हारे भाई कहीं टूर पर गए हैं।

वह है नहीं तो उन्हें कुछ भी पता चलेगा नहीं। तो तुम्हारी अंजू भाभी को अगर तुम सेठी साहब से रातमें मिला देती हो, तो जो होता है होने दो। भाभी भी खुश, सेठी साहब भी खुश, तुम्हारे भाई को भी पता नहीं चलेगा और उसमें हमारा क्या जाता है? अब हम तुम को ऐसी जलन से ऊपर उठ जाना चाहिए।

अंजू भाभी खुश होंगी और चुप रहेगी। वैसे भी अंजू भाभी तुम्हारे और सेठी साहब के बारे में जान ही गयी है। तो तुम भाभी को भी सेठी साहब से अच्छी तरह से मिला दो। तुम सोचो और जैसे ठीक लगे करना। यह तो मेरे दिमाग में एक बात आयी तो मैंने बतायी। बाकी आप भी सोचो की भाभी को कैसे शांत किया जाए।”

सामने से टीना का कोई जवाब नहीं आया। शायद वह मेरी बात को ध्यान से सुन कर उसके बारे में गंभीरता से सोच रही थी। कुछ देर बाद टीना ने अकुलाते हुए कहा, “पता नहीं यह भाभी बिच में कहाँ से आ टपकी? खैर, आपने कहा इसके बारे में मैं सोचती हूँ। अभी तो मेरा दिमाग बिलकुल काम नहीं कर रहा। मैं बाद में फ़ोन करती हूँ।” टीना ने यह कह कर फ़ोन काट दिया।

मैं टीना की उलझन समझ सकता था। एक तो जिंदगी में पहली बार मेरी बीबी किसी गैर मर्द से चुदवा रही थी ऊपर से कहते हैं ना की “प्रथम ग्राशे मक्षिका” (खाना खाने बैठे और पहले ही निवाले में मछली दिखी तो कैसा हाल होगा?) वैसे पहले ही अनुभव में टीना को भाभी की शरारत का सामना करना पड़ रहा था तो टीना का झल्लाना स्वाभाविक था। पर कहते हैं ना की फूलों के साथ साथ काँटों को भी स्वीकार करना पड़ता है। मैंने अपना काम कर दिया था। अब क्या मेरी बीबी मेरे आइडिया पर अमल करेगी? अगर करेगी तो देखना यह था की टीना मेरे आइडिया को अमली जामा कैसे पहनाती है।

अब मेरा ध्यान टीना इस नयी चुनौती का कैसे सामना करती है उस पर था।

रात की चाय पिने के बाद सेठी साहब ने मुझे फिर अपनी बाँहों में उठा कर पलंग पर लिटाया और खुद मेरी टांगें अपने कंधे पर रख कर फिर उसके बाद उस रात उन्होंने मुझे ऐसे चोदा ऐसे चोदा की बिना रुके और बिना रेस्ट किये रेलवे के स्टीम इंजन की तरह मैं लगभग आधे घंटे तक सख्ती से उनके निचे लेटी हुई चुदती रही, चुदती रही।

मैं मेरी चूत में कुछ अजीब सी तीखी फीलिंग महसूस कर रही थी। वह दर्द था या उत्तेजक नशा यह कहना मुश्किल था। पर पूरी चुदाई के दरम्यान इतना जबरदस्त उत्तेजक नशा मेरे दिमाग पर छाया हुआ था की मैं उस आधे घंटे में कम से कम छे सात बार झड़ गयी और बार बार मैं चुदवाते हुए सेठी साहब से और जोर से चोदने के लिए कहती रही। जो रहम और दया सेठी साहब ने पहली चुदाई में दिखाई थी वह गायब थी।

हाँ वह बार बार झुक कर मुझे कभी होँठों पर तो कभी गाल पर तो कभी मेरे स्तनों पर चूमते, चूसते और काटते रहते और मुझे “टीना तुम बहुत अच्छे से चुदाई करवाती हो। तुम्हें चोदने में जो मजा आता है किसी के साथ भी नहीं आया आज तक।” यह सब कहते रहते थे।

आधे घंटे की नॉनस्टॉप चुदाई के बाद मुझे लगा की अगर सेठी साहब को मैंने नहीं रोका तो कहीं मैं बेहोश ना हो जाऊं। मैंने बड़ी ही धीमी आवाज में सेठी साहब से वाशरूम जाने का इशारा किया। सेठी साहब रुक गए और लण्ड निकाल कर मुझे जब खडा किया तब मुझे पता चला की मेरी टांगें लड़खड़ा रहीं थीं। सेठी साहब का लण्ड मैंने देखा तो वह तो वैसे का वैसे कोई चमड़े का बड़ा पाइप हो ऐसे उनकी टांगों के बिच पहले जितनी ही सख्ती से खड़ा ही था। मैं जैसे तैसे वाशरूम गयी और वाशरूम में ही फर्श पर लुढ़क पड़ी। कुछ देर वाशरूम में फर्श पर पड़े रहने के बाद मैं खड़ी हुई।

मैंने सेठी साहब से पूरी रात वह जैसे चाहें मुझे चोदना चाहें चोदे, यह वचन दिया था इस लिए मैं अब पीछे नहीं हट सकती थी। मुझे लगता था की सेठी साहब की भी कहीं ना कहीं कोई लिमिट तो होगी ही जब वह भी थक जाएंगे। मुझे उसी का इंतजार करना पड़ेगा। तब मुझे सुषमा जी की हालत समझ में आ रही थी।

मैं वाशरूम से धीरे से उठ कर चलती हुई वापस सेठी साहब के कमरे में पहुंची। मैंने मेरी चाल में कृत्रिम फुर्ती लायी जिससे सेठी साहब को यह ना लगे की मैं थक गयी थी। मैं पलंग पर पहुंच कर सेठी साहब के गले लिपट पड़ी। मैंने सेठी साहब के होँठों से अपने होँठ चिपकाते हुए कहा, “सेठी साहब जो सुख और आनंद मुझे आज रात में आपसे मिला है, मैंने जिंदगी में सोचा भी नहीं था की सेक्स में ऐसा सुःख मिल सकता है।”

सेठी साहब ने मेरी आँखों में आँखें डालकर पूछा, “टीना सच सच बताना मेरी चुदाई से तुम्हें दर्द या कष्ट तो नहीं हो रहा?”

हालांकि मुझे मेरी चूत में कुछ दर्द सा महसूस हो रहा था पर उससे अधिक उस दर्द में मुझे इतनी उत्तेजना और मादकता महसूस हो रही थी की उसे दर्द कहना बेमानी होगी। मैंने सेठी साहब की आँखों में उतने ही आत्मविश्वास से आँखें डाल कर कहा, सेठी साहब मुझे दर्द नहीं आनंद और उत्तेजना का अतिरेक हो रहा है।

अब मुझे समझ में आ रहा है की क्यों आपके पीछे लडकियां हाथ धो कर पड़ी रहतीं हैं। मेरी भाभी भी आप को देख कर आप पर फ़िदा हो गयी है। शायद वह हमारे बारे में समझ गयी है। वह मुझसे आपकी बड़ी तारीफ़ कर रही थी। वह मुझे कह रही थी की मैं बड़ी लकी हूँ। उसके कहने का मतलब था आप इतने मजबूत और मरदाना हैं। मुझे उसकी बातों और नज़रों से ऐसा लगा की काश उसे अगर मौक़ा मिला तो वह आपको छोड़ेगी नहीं।”

मेरी बात सुन कर सेठी साहब हँस पड़े और बोले, “तुम्हारी भाभी तो बड़ी खूबसूरत है। तुम्हारे भैया बड़े ही लकी हैं की उन्हें तुम्हारी भाभी जैसी बीबी मिली हैं। तुम्हारे भैया भी बड़े तगड़े दीखते हैं। भाभी भैया से खुश नहीं है क्या?”

मैंने कहा, “सेठी साहब मेरी और भाभी की अच्छी जमती है। वह मुझसे बड़ी खुली हुई है। वह मुझसे सारी बातें खुल्लमखुल्ला कहती हैं। यहां तक की मेरा भाई उसे कैसे चोदता है वह भी मुझे कह देती है। पहले तो भाई इतना बिजी रहता है की उसे भाभी के लिए समय ही नहीं है।

दुसरा यह की भाभी तो यहां तक कह रही थी की आप इतने हैंडसम हो की अच्छी से अच्छी लडकियां आपके सामने नंगी हो जाएँ। मैंने उन्हें हंसी मजाक में पूछा की भाभी आप भी सेठी साहब के सामने नंगी हो जाओगी? तो वह बेशरम सी बोली की अगर तुम्हें एतराज नहीं हो तो वह हो जायेगी। मतलब सेठी साहब वह आपके और मेरे बिच की अंडरस्टैंडिंग के बारे में सब कुछ समझ गयी है।”

मेरी बात सुनकर सेठी साहब की आँखों और चेहरे पर चिंता के बादल छा गए। उन्होंने मुझे बाँहों में ले कर कहा, “यह तो गड़बड़ हो गयी। मेर्री वजह से तुम्हारी बदनामी हो यह मैं नहीं चाहता। अब क्या करें?”

मैंने कहा, “सेठी साहब आज आपको मुझे रात भर चोदना है। अभी तो आधी रात ही हुई है। सेठी साहब कहीं ऐसा तो नहीं की मेरी भाभी की बात सुनकर आप उसी के बारे में सोचने लग गए हैं और आपका मुझ में इंटरेस्ट कम हो गया है?”

सेठी साहब ने मेरी और तीखी नज़रों से देखा और बोले, “क्या बात करती हो? वह खूबसूरत है, ठीक है। वैसे तो मुझे कोई और सिचुएशन में मिली होती तो उन्हें चोदने में ख़ुशी होती। पर वह आपकी भाभी है और मैं यहां कुछ काम से आया हूँ। मेरे कारण आपकी बदनामी हो यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैं सुबह ही यहां से चला जाऊंगा जिससे बात आगे ना बढे।”

मैंने सेठी साहब का हाथ थाम कर कहा, “सेठी साहब जल्द बाजी मत कीजिये। आप अगर यहां से जाएंगे तो उलटा असर भी हो सकता है। भाभी नाराज हो जाएंगी। वह शायद आपसे अकेले में मिलना चाहती हैं। वह कुछ मजाकिया है। आपसे हंसी मजाक कर सकती है। आप उसे मिल लीजिये। हो सकता है यह प्रॉब्लम वहीँ सुलझ जाए।”

मैंने इतना कह कर फ़ौरन अपना गाउन निकाल फेंका और सेठी साहब के सामने नंगी हो गयी। मैंने कहा, “अब मेरी भाभी को नहीं मुझे देखिये।”

सेठी साहब ने मुझे घोड़ी बनाते हुए कहा, “तुम्हारी भाभी जब आएगी तब देखेंगे। अभी तो मैं तुम्हारी गाँड़ देख रहा हूँ। तुम्हारी गाँड़ बड़ी तगड़ी और गोरी चिट्टी है। मैं तुम्हें पीछे से तुम्हारी गाँड़ देखता हुआ तुम्हें चोदुँगा। डरो मत, मैं तुम्हारी गाँड़ नहीं मारूंगा।” यह कह कर सेठी साहब ने मेरी निचे की और लटकी हुई चूँचियों को अपनी हथेली में लेकर खूब प्यार से जोरसे दबाया और उन्हें मसलने लगे।

फिर दो तीन धक्के मार कर उन्होंने अपना लण्ड मेरी चूत में पेल दिया। मेरी चूत में मुझे एक तेज सी टीस महसूस हुई। पर उसके बाद सेठी साहब के फौलादी बदन में जकड़ी हुई मैं उनके लण्ड का तगड़ा मार मेरी चूत में झेलती रही। मेरी गाँड़ पर बार बार कुछ सख्ती से सेठी साहब जब चपेट मारते तो मेरी गाँड़ लाल हो जाती होगी। उस दर्द में भी मुझे बड़ी ही उत्तेजना महसूस हो रही थी।

सेठी साहब ने मुझे उसी घोड़ी पोज़ में फिर ४५ मिनट से ज्यादा तक चोदा होगा। वह अपना लण्ड पेलते ही गए, पेलते ही गए। मुझे समझ में नहीं आता की कैसे सेठी साहब का लण्ड इतना चोदते हुए छील नहीं जाता होगा क्या? और इस बार तो इतना तगड़ा और इतना सख्ती से चोद रहे थे वह की मैं बार बारझडती ही रही और वह बिना रुके पीछे से लण्ड पेलते रहे। मुझे जिंदगी में मेरे पति ने कभी इस तरह नहीं चोदा। मेरी जिंदगी एक अद्भुत दौर से गुजर रही थी।

सेठी साहब ने करीब ४५ मिनट के बाद फिर मुझे विश्राम का मौक़ा दिया। मैंने सेठी साहब के लिए फिर चाय बनायी। उसके बाद सेठी साहब तीसरी बार मेरे ऊपर सवार हुए और उन्होंने मुझे ऊपर चढ़ कर बड़े प्यार से एक के बाद एक तगड़े धक्के मार कर पर उतनी जल्द बाजी से नहीं पर धीरे धीरे चोदा।

उनके एक धक्के में मैं पूरा हिल जाती। उस बार सेठी साहब अपना वीर्य मेरी चूत में उंडेलना चाहते थे। मेरे झड़ने की तो कोई गिनती ही नहीं रही थी। आखिर में रात के करीब तीन बजे सेठी साहब के लण्ड से जबरदस्त गरम फव्वारा निकला और मेरी चूत के सारी सुरंग को भर दिया। निचे लेटी हुई मैंने सेठी साहब का सारा वीर्य अपनी चूत में भर लिया था।

मुझे समझ में नहीं आया की इस तरह कोई आदमी कैसे चोद सकता है। फारिग होते होते रात के तीन बज गए। सेठी साहब से फारिग हो कर मैं बाथरूम में से हो कर अपने कमरे में रात के लगभग तीन बजे पहुंची।

हालांकि मैं बहुत ज्यादा थक चुकी हुई थी पर मेरी भाभी की बातों ने मेरी नींद हराम कर रक्खी थी। मेरे लिए यह जरुरी था की मैं मेरे पति राज को इसके बारे में पूरी जानकारी दूँ। मैंने सोने की काफी कोशिश की और शायद कुछ देर सोई भी सही पर सपने में भी मेरी भाभी मुझे डराती धमकाती दिखाई पड़ रही थी की वह मेरे और सेठी साहब के संबंधों के बारे में सब को बता देगी।

ऐसे में ढंग की निंद आने का तो सवाल ही नहीं था। मैंने काफी सोच कर सुबह करीब छे बजे मेरे पति को पिछले दिन भाभी से हुई बातचीत के बारे में लिख कर एक लंबा सा व्हाट्सप्प सन्देश भेजा।

मुझे अच्छा खासा आइडिया था की मेरे पति रात भर सुषमा जी की बाँहों में ही होंगे और उस समय हमारे घर में वापस आकर बिंदास सो रहे होंगे। पर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ जब राज का फ़ौरन जवाब आ गया। जिससे मुझे कुछ ढाढस जरूर मिला। पर जब फ़ौरन जवाब आया तो मुझे मन में थोड़ी शंका भी हुई की ऐसा तो नहीं हुआ की कहीं यहां मैं उनकी पत्नी रात भर सेठी साहब से तगड़ी चुद रही हूँ और उधर मेरे पति को सुषमाजी ने बिना घास डाले भगा तो नहीं दिया?

औरतों का दिमाग भगवान ने कैसा बनाया है! अगर मेरा पति किसी औरत को चोदे तो भी शिकायत और अगर कोई औरत मेरे पति को बिना चोदे रिजेक्ट करके भगा दे तो भी शिकायत! पर मेरा दिमाग उस समय यह सब सोचने या पूछने की स्थिति में नहीं था।

मुझ से सारी बात जानने के बाद राज ने मेरे मेसेज के जवाब में लिखा वह पढ़ कर और मेरे पति से आश्वासन पाकर मुझे कुछ सकुन मिला और मैं बिस्तरे पर लेट गयी। जैसे ही मैं लेटी की फ़ौरन मेरी आँख लग गयी। मैं काफी देर तक सोती रही।

रात भर के जागने और परिश्रम से मैं थकी हुई थी। मुझे उठने में काफी देर हो गयी। जब मेरी आँख खुली तो सूरज तेज रौशनी डाले आसमान में काफी ऊपर चढ़ा हुआ था। जब मैं उठी तो सुबह के करीब ८ तो बजे ही होंगें। मुन्ना भाभी और मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने के लिए सुबह उठ कर जा चुका था।

रात भर जो सेठी साहब ने मेरी तगड़ी चुदाई की थी तो दूसरे दिन मेरा बुरा हाल तो होने वाला ही था। सिर्फ तगड़ी चुदाई ही हुई होती तो भी चल जाता। पर मैंने जब उठ कर आईने में देखा तो मेरी हवा ही निकल गयी। सेठी साहब ने मुझे कई जगह पर इतना चूमा, चूसा और काटा था उसके जो निशान सेठी साहब के दांतों ने और होँठों ने मेरे बदन पर कई जगह छोड़ रक्खे थे वह हमारी रात की चुदाई के सुबूत बन कर दुश्मन की तरह मेरे बदन पर चुगली खाते दिख रहे थे। ऐसे हालात में मैं कैसे बाहर निकलती?

हड़बड़ा कर मैं जब सेठी साहब के कमरे में गयी तो देखा की सेठी साहब अपना कमरा एकदम साफसूफ कर सारे कपडे सामान सलीके से सजा कर निकल चुके थे। मैंने खिड़की से झांका तो सेठी साहब की कार जा चुकी थी।

मेरी भाभी से हुई रात की बात मुझे बड़ी ही खटक रही थी। जो मुझे सरल सी राह लग रही थी उसमें मुझे बदनामी के कांटें दिखाई रहे थे। मेरा मेरे पति राज से बात करना बहुत जरुरी था। राज ने कहा था की वह जरूर कोई न कोई हल ढूंढ निकालेगा। मुझे मेरे पति पर पुर भरोसा था की वह जरूर इसे सुलझा देंगे। मेरे पति ने कहा था की वह फ़ोन करेंगे।

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