मुझे प्यार करो 3

माँ बेटा

तृप्ति का यह पहला प्रेम पत्र था जिसका एहसास उसे पूरी तरह से भिगोने लगा था,,, पत्र में लिखो एक-एक शब्द को वह बार-बार पढ़ रही थी,, ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे वह उसकी प्रेम पत्र नहीं बल्कि उसकी कुंडली हो जिसमें वह अपना भविष्य ढूंढ रही थी,,, वैसे तो ट्यूशन से आते समय संदीप ने जिस तरह की हरकत उसके साथ किया था उस हरकत को लेकर तृप्ति उससे काफी नाराज भी थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि संदीप इस तरह की हरकत करके उसकी नजर में गिर जाए,, और इस गलती के चलते संदीप ने उससे माफी भी मांग लिया था और तृप्ति ने उसे माफ़ भी कर दी थी,,,। और इस वजह से दोनों के बीच का रिश्ता टूटते टूटते बचा था,,,।

संदीप के द्वारा दिए गए प्रेम पत्र को पढ़ने के बाद तृप्ति उसे नोटबुक में वापस रख दी थी और उसे प्रेम पत्र के चलते अपने बदन में काफी उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,, क्योंकि वैसे तो वह प्रेम पत्र एकदम सीधे-सादे सरल भाषा में था लेकिन तृप्ति उस पत्र के एक-एक शब्द से काफी उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,, ऐसा लग रहा था कि पत्र में लिखें हर एक शब्द उसके बदन से उसके वस्त्र को उतार रहे हो और ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि तृप्ति उस पत्र को संदीप की हरकत से जोड़ रही थी जो कि वह भी अनजाने में एकाएक अपनी हरकत को अंजाम देने लगा था और इस समय भी यह पत्र भी अचानक ही उसे दे दिया था इसलिए अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,,।

बिस्तर पर लेटे-लेटे तृप्ति सलवार के ऊपर से ही अपनी गुलाबी बुर को मसल रही थी,,,। ऐसा नहीं था कि तृप्ति के दिलों दिमाग पर वासना का भूत सवार हो जाता हो वह ऐसी लड़की बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन कभी कबार उसके बदन में कामुकता की फुहार उठने लगती थी जिसकी नमी में वह अपनी दोनों टांगों के बीच की उस पतली गली को गीली कर लेती थी,,,, इस समय भी उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी और वह अपनी आंखों को बंद करके उसे पल को सोच रही थी,,जो उसके साथ घटीत हो चुका था,,, उसी दिन संदीप ने जो कुछ भी उसके साथ किया था वह काफी हैरान कर देने वाला था और काफी उत्तेजित कर देने वाला भी था क्योंकि धीरे-धीरे संदीप की हथेली उसकी सलवार के अंदर तक पहुंच चुकी थी,,, संदीप अपनी हरकत को अंजाम तक पहुंचाते हुए अपनी हथेली से तृप्ति की बुर को ढक लिया था और हथेली की गर्माहट तृप्ति को अंदर तक गर्म कर रही है वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी तृप्ति को ऐसा लग रहा था कि संदीप अब रुकने वाला नहीं है एक तरफ उसे मजा भी आ रहा था दूसरी तरफ वह घबरा भी रही थी क्योंकि उसके जीवन का यह पहला वाक्या था जब किसी मर्दाना हाथ को वह अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी,,,।

तृप्ति पूरी तरह से मदहोशी के आलम में डूबने लगी थी संदीप की हरकत की वजह से उसकी आंखों में खुमारी छा रही थी बदन में चार बोतलों का नशा होने लगा था,,, उसके पैरों में कंपन हो रहा था वह ठीक से अपना संतुलन नहीं बना पा रही थी उसे ऐसा लग रहा था कि आज उसका कौमार्य भंग हो जाएगा जिसमें वह खुद सहभागी बनेगी,,, क्योंकि संदीप पूरे जोश के साथ उसके खूबसूरत बदन से खेलना शुरू कर दिया था खड़े-खड़े ही वह उसकी बुर को गीली कर दिया था यहां तक की पेंट में उसका कठोर लंड अपनी कठोरता का एहसास उसके नितंबों पर दिला रहा था कुल मिलाकर तृप्ति संदीप की इच्छाओं और उपासना के जाल में पूरी तरह से लिप्त होने लगी थी वह किसी भी वक्त घुटने टेक देना चाहती थी लेकिन तभी पीछे से आ रही मोटर साइकिल की लाइट की वजह से उसकी तंद्रा एकदम से भंग हुई और वह एकदम से जमीन पर आकर गिर गई वह एकदम होश में आ चुकी थी और संदीप की हरकत का विरोध करते हुए गुस्से में वहां से चली गई,,,,।

और यही एहसास इस समय तृप्ति को अपने बिस्तर पर हो रहा था उसे दिन की तरह अपने कौमार्य को जिस तरह से उसने बचा ली थी आज भी बहुत तुरंत अपनी हथेली को अपनी सलवार में से बाहर निकली थी और गहरी गहरी सांस लेते हुए कुछ देर तक अपने आप को दुरुस्त करने लगी थी,,,, भले ही वासना का तूफान उसे अपने साथ ले जाने को उसे मजबूर कर देता था लेकिन इन मौके पर वह अपने आप को संभाल ले जाती थी क्योंकि तृप्ति दूसरी लड़कियों की तरह बिल्कुल भी नहीं थी हां दूसरी लड़कियों की तरह उसके भी अरमान मचल जाते थे बदन में मदहोशी छा जाती थी लेकिन वह इतनी कच्ची नहीं थी कि तुरंत घुटने टेक दे,,,,।

अपने आप को दुरुस्त कर लेने के बाद वह बिस्तर पर से उठी और एक गिलास ठंडा पानी पीकर वापस बिस्तर पर लेट गई और दूसरे दिन संदीप मिलने की आतुरता दिखाते हुए नींद की आगोश में चली गई,,,।

दूसरी तरफ सुगंधा एक मां से पहले एक औरत थी और एक औरत के मन में उसके तन में भी कुछ चाहत होती है और यही चाहत उसमें जाग चुकी थी जिसके चलते वह अपने ही बेटे को अपनी जवानी के जाल में फसाने की पूरी तरकट रच रही थी जिसमें उसका बेटा पूरी तरह से आ भी चुका था,,, और भला जब सुगंध जैसी खूबसूरत जवान से लदी हुई औरत हो तो ऐसा कौन सा मर्द होगा जो उसके चंगुल में फंसने के लिए आतुर ना हो उसके जाल में खुद आने के लिए व्याकुल ना हो,, शुरू शुरू में सुगंधा को अपनी हरकत पर शर्मिंदगी महसूस होती थी उसका मन उसे रोकने की कोशिश करता था,,, और वह भी अपने आप को आगे बढ़ने से रोकना चाहती थी इसलिए रोज कोई ना कोई कसम खाकर ऐसा गलती दोबारा न करने का वचन लेती थी लेकिन दूसरे दिन फिर उसका मन मचलने लगता था,,, और वह फिर से लाचार और निसहाय अपने आप को महसूस करने लगती थी,,, लेकिन अब तो उसे मजा आ रहा था मदहोशी में वह डूबने लगी थी उसे अपने बदन पर गर्व होने लगा था कि इस उम्र में विवाह किसी भी मर्द का पानी निकालने में पूरी तरह से सक्षम है,,।

दूसरे दिन अंकित पढ़ने जाने के लिए तैयार हो चुका था,,, उसकी मां रसोई घर में बाकी का काम निपटा रही थी तृप्ति पहले ही तैयार होकर कॉलेज के लिए निकल चुकी थी और वैसे भी उसे आज संदीप से मिलने की व्याकुलता कुछ ज्यादा ही थी इसलिए कुछ जल्दी ही वह घर से पढ़ाई का बहाना बना कर निकल गई थी,,, घर से निकलते निकलते अंकित को शरारत सुझ रही थी,,, वह रसोई घर के दरवाजे पर खड़े होकर अपनी मां को ही देख रहा था और खाना बनाते समय उसकी मां किसी काम देवी से काम नहीं लग रही थी क्योंकि उसने साड़ी को उठाकर कमर से खून रखी थी उसके नितंबों का उभार साड़ी के कसाव की वजह से और भी ज्यादा उभर कर दिखाई दे रहा था,,, और साड़ी का पल्लू उसने इस तरह से गोल-गोल घुमा कर अपने कंधे पर डाली थी कि उसके साड़ी का पल्लू उसकी दोनों चूचियों के बीच से होकर गुजर कर उसकी कमर तक आ रहा था जिसे वह कमर में खोंस रखी थी,,,।

अपनी मां को इस रूप में देखते हुए अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि उसकी मां को इस रूप में अगर कोई देख ले तो जरूर उसका लंड खड़ा हो जाए क्योंकि लड़कों को और क्या चाहिए एक खूबसूरत औरत उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां उसकी बड़ी-बड़ी गांड बस इतने से ही तो उनकी उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच जाती है जैसा कि उसकी खुद की उत्तेजना उसे मुठ मारने पर मजबूर कर देती थी,,, इस समय भी उसका यही हाल हो रहा था सादगी में भी उसकी मां कयामत लग रही थी,,, पर जिस तरह वह बर्तनों को इधर से उधर कर रही थी उसके साथ उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां भी लहर मार रही थी जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था,,,।

कुछ देर तक अंकित दरवाजे पर खड़ा होकर अपनी मां के रूप खूबसूरती को देखता ही रह गया,,, सुगंधा का ध्यान दरवाजे पर बिल्कुल भी नहीं था वह अपने काम में एकदम मशगुल थी लेकिन जैसे ही उसकी नजर दरवाजे पर गई तो दरवाजे पर अंकित को खड़ा देखकर मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,।

क्या हुआ अभी तक गया नहीं,,,

बस जा ही रहा था,,, मैं कह रहा था कि आते समय,,, तुम्हारे लिए लंबे-लंबे और मोटे केले लेकर आऊं क्या,,,।
(अपने बेटे के मुंह से इस तरह की बात सुनकर पल भर में ही सुगंध के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी उसे मार्केट में कहीं अपनी बात याद आ गई,,, और वह मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

क्यों तुझे पता है क्या कि मुझे कैसे केले पसंद है,,,

फिर क्या तुम ही ने तो कल बताई थी मार्केट में,,

वह तो ठीक है पर तुझे कैसे मालूम कि मुझे मोटे और लंबे केले पसंद है,,,,

अब मम्मी तुम्हें देखकर लगता ही नहीं की छोटे और पतले केले से तुम्हारा कुछ हो पाएगा,,,,,(इस बार अंकित दो अर्थ वाली बातें कर रहा था जिसे सुगंधा अच्छी तरह से समझ रही थी और अंदर ही अंदर उत्तेजित हो रही थी,,,)

तुझे कैसे पता कि पतले केले से मेरा कुछ नहीं हो पाएगा,,,

अब तुम्हारा शरीर देखो लंबी कद काठी की हो,,, कसा हुआ बदन है तुम्हारा,,, ऐसे में मरेला सा पतला सा केला तो तुम्हें कुछ एहसास ही नहीं दिला पाएगा,, ।

(अंकित। केले का नाम लेकर एक तरह से अपनी मां को लंड के बारे में बातें कर रहा था क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां की कद काठी बेहद उच्चस्तर किस्म की थी,,, ऐसे में उसके बदन की प्यास केवल मोटा तगड़ा लंड ही बुझा सकता था)

सही कह रहा है तू मुझे तो मोटा और लंबा लं,,, (इतना कहते ही उसकी जुबान एकदम से रुक गई,, आगे का शब्द उसके गले में ही अटक कर रह गया ,, और सुगंध जल्द ही अपने कहे शब्दों को सुधारते हुए बोली,,,) मेरा मतलब है कि मोटा और तगड़ा केला ही पसंद है,,,,,,(अपनी बातों को संभालते हुए वह पसीने से तरबतर हो चुकी थी उसके मुंह से अनजाने में भी लंड शब्द का आगे वाला शब्द निकल चुका था,,, जिसे उसके बेटे ने बखुबी सुन लिया था,,, अपनी मां के मुंह से इस तरह के शब्द सुनकर उसके भी होश उड़ गए थे,,, उसकी भी सांसों पर नीचे होने लगी थी और वह समझ गया था कि उसकी मां को क्या पसंद है,,,, लेकिन फिर भी ऐसा जताने लगा कि मानो जैसे वह अपनी मां के मुंह से अश्लील शब्द को सुना ही नहीं और बोला,,,।

ठीक है मम्मी में मार्केट से आते समय तुम्हारी पसंद का केला लेते आऊंगा,, (अपनी मां से दो अर्थ में बात करते हुए उसे भी बहुत मजा आ रहा था जिसका असर उसकी दोनों टांगों के बीच हो रहा था पेट का आगे वाला भाग उभरने लगा था जिस पर सुगंधा की नजर चली गई थी और वह मन ही मन उत्तेजित हो रही थी उसे भी अपनी बुर गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, और वह सहज होते हुए बोली,,,।

ठीक है लेते आना लेकिन पैसे तो लेता जा,,,

कोई बात नहीं मम्मी पैसे मेरे पास है मैं आते समय लेते आऊंगा,,,,(और इतना कहते हुए घर से बाहर चला गया और सुगंधा रसोई घर के दरवाजे तक आकर उसे जाते हुए देखते रह गई,,, और अपने मन में ही बोली,,, मुझे जिस तरह का केला पसंद है वह तो तेरे पास है,,,।)

अपनी मां से हुई बातचीत की वजह से अंकित अपने तंबदन में अजीब सी हलचल का अनुभव कर रहा था आज साफ-साफ उसकी मां के मुंह से लंड शब्द पूरा निकलते निकलते रह गया था,,, अपनी मां के मुंह से केवल लं,,,, शब्द सुनकर ही अंकित चारों खाने चित हो चुका था क्योंकि आज तक उसने अपनी मां के मुंह से एक भी शब्द अश्लीलता के नहीं सुना था यह पहली बार था कि अपनी मां के मुंह से अश्लील शब्द सुन रहा था जो कि वह पूरा बोल नहीं पाई थी अपने शब्दों को अपने होठों में ही दबा ले गई थी ,, लेकिन अंकित अपनी मां के मुंह से निकलने वाले शब्दों को अच्छी तरह से समझ गया था वह जानता था कि उसकी मां क्या कहना चाह रही थी इसीलिए तो उसका खुद का लंड एकदम से खड़ा हो गया था,,,। अभी भी उसकी सांसे उत्तेजना का एहसास दिला रही थी,,,।

रास्ते में फुटपाथ पर चलते हो गई वह अपनी मां के बारे में ही सोच रहा था,,, वह जानता था कि उसकी मां एक शिक्षिका थी,, और एक शिक्षिका के व्यवहार को लेकर वह अच्छा खासा परिचित था वह जानता था कि एक शिक्षिका का व्यवहार कैसा होता है क्योंकि वह बचपन से ही अपनी मां को देखता आ रहा था,, और आज तक उसने अपनी मां के मुंह से ऐसा कोई भी शब्द नहीं सुना था जो मोहल्ले की आम औरतें आपस में बात करते हुए करती है,, कहीं औरतों के मुंह से तो उसने गाली गलौज तक सुना था और वह भी मां बहन की और वह अपने मन में यही सोचता था कि अच्छा ।हुआ उसकी मां इस तरह के शब्दों का प्रयोग नहीं करती किसी से गाली गलौज नहीं करती,,, और दिल सेवा अपनी मां की इज्जत भी करता था लेकिन धीरे-धीरे अंकित का खुद का रवैया बदलता जा रहा था ,,, अपनी मां को लेकर उसकी सोच बदलती जा रही थी,,, अंकित अपने मन में सोच रहा था कि अच्छा ही हुआ कि उसने केले वाला जिक्र छेड़ दिया था उसे अकेले की वजह से पता तो चला कि उसकी मां को क्या पसंद है जो कि उसके मुंह से निकली गया था कि उसे मोटा तगड़ा लंड पसंद है भले ही इशारे में उसकी मां के लिए बोल रही थी लेकिन केले का बोलते समय भी उसके मुंह से उसके मन की बात निकल ही गई थी,, और अपनी मां के मन में क्या चल रहा है एहसास अंकित को होते ही उसके तन बदन में आग लग गई थी बात ही बात में उसे पता चल गया था कि उसकी मां को मोटा और तगड़ा लंड पसंद है,, जोकि दुनिया की हर औरतों को पसंद है और इसीलिए उसकी मां भी दूसरी औरतों से अपवाद बिल्कुल भी नहीं थी भले ही चरित्र दूसरों से अलग था लेकिन औरत की जरूरत दूसरी औरतों से बिल्कुल भी अलग नहीं थी,,,।

अंकित पूरी तरह से उत्तेजना का अनुभव कर रहा था वह अपने मन में ही चलते हुए कल्पना कर रहा था कि उसकी मां मोटे तगड़े लंड से चुदवाना चाहती है,,, वैसे भी उसकी गांड इतनी बड़ी-बड़ी है कि छोटा और पतला लंड उसकी जवानी की आपको बुझा ही नहीं सकता उसे मोटा तगड़ा लंड चाहिए एकदम मेरी तरह,,, यह सब सोचते हुए अंकित अपने आप से ही बात करते हो बोल रहा था कि स्कूल से छूटने के बाद वह मोटे और तगड़े केले खरीद कर घर ले जाएगा,,,।

जहां एक तरफ बेटे के मन में इस तरह के खयालात चल रहे थे वहीं दूसरी तरफ मां का भी बुरा हाल था रसोई का काम पूरा कर चुकी थी लेकिन फिर भी वह रसोई घर में ही थी किचन फ्लोर पर अपनी गांड टीकाकर वह कुछ देर पहले की बात चीत के बारे में ही सोच रही थी,,, वह अपने मन में सोच रही थी कि नूपुर के बेटे से मिलकर उसका बेटा भी उसकी तरह होता जा रहा है और यह उसके लिए अच्छा ही दिशा निर्देश करते हैं आज पहली बार उसका बेटा दो अर्थ में बातें जो किया था,,, और इस बात को सुगंधा अच्छी तरह से समझ गई थी क्योंकि आज से पहले उसने कभी भी घर में कुछ भी खरीद कर लाने की बात नहीं की थी ,,, और इसीलिए तो उसके खुद के तन बदन में आग लगी हुई थी क्योंकि आज अनजाने में ही केले की जगह उसके मुंह से लंड निकल गया था,,,।

वैसे भी औपचारिक रूप से किले को देखकर अक्सर औरतें एक मोटे तगड़े लंड की कल्पना करने ही लगती हैं,,, क्योंकि केले का आकार एकदम लंड के आकार से मिलता जुलता रहता है,,, इसीलिए अनजाने में केले की जगह आज उसके मुंह से लंड शब्द निकलते निकलते रह गया था,,, सुगंधा इस बात से हैरान थी कि उसका बेटा उसके कहे शब्दों को जरूर समझ गया होगा उसका बेटा समझ गया होगा कि उसकी मां क्या चाहती है,,, और इसी बात से जहां एक तरफ हुआ परेशान नजर आई थी वहीं दूसरी तरफ अनजाने में अपने मुंह से लंड शब्द निकल जाने की वजह से वह अपने बदन में मदहोशी का एहसास कर रही थी और अपने आप से बात करते हुए बोल रही थी कि अच्छा युवा की उसके मुंह से आज वह निकल गया जो वह चाहती है खास उसका बेटा उसके कहने का मतलब कुछ समझ जाता तो उसकी भी रातें रंगीन हो जाती,,, अपने मन में इस तरह की बातें सोचते हुए उसके तन बदन में आग लग रही थी उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी उसे भी स्कूल जाना था ,,, वरना बाथरूम में जाकर वह अपनी जवानी की प्यास अपनी उंगली से बुझाने की भरपूर कोशिश करती,,,,।

अपने मन को काबू में करके वह स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगी,,, और थोड़ी देर में वह भी स्कूल जाने के लिए निकल गई,,,,।

दूसरी तरफ,, त्रप्ती संदीप से मिलने के लिए व्याकुल नजर आ रही थी कॉलेज में पहुंच जाने के बावजूद भी उसे संदीप कहीं नजर नहीं आ रहा था,,, क्लास में बैठकर वह संदीप के बारे में ही सोच रही थी ,,वह जल्दी से जल्दी संदीप से मुलाकात करना चाहती थी और प्रेम पत्र के बारे में बातें करना चाहती थी,,, प्रेम पत्र को लेकर उसके मन में कोई शिकायत नहीं थी वह खुशी-खुशी संदीप से मिलकर इस बारे में बात करना चाहती थी इसीलिए उसका मन किसी काम में लग नहीं रहा था और जल्द से जल्द छुट्टी होने का इंतजार कर रही थी क्योंकि वह जानती थी कि संदीप अगर इस समय नहीं मिला है तो छुट्टी में जरूर मिलेगा क्योंकि वह भी इसी कॉलेज में पढ़ता था,,,, धीरे-धीरे समय अपनी रफ्तार से गुजर रहा था इस बीच तृप्ति कई बार संदीप के द्वारा लिखे गए प्रेम पत्र को चोरी-चोरी पढ़कर उसे बैग में रख ले रही थी,,, उससे रहा नहीं जा रहा था,,, आखिरकार अपने समय पर छुट्टी की घंटी बाज ही गई,,,।

एक तरफ छुट्टी की घंटी बज गई दूसरी तरफ तृप्ति के दिल की धड़कन बढ़ने लगी,,, संदीप से मिलने से पहले वह कभी सोची भी नहीं थी कि वह प्यार व्यार के चक्कर में पड़ जाएगी वह अपने आप से ही दृढ़ निश्चय कर चुकी थी कि वह दूसरी लड़कियों की तरह अपने कदम डगमगाने नहीं देगी प्यार व्यार के चक्कर में कभी नहीं पड़ेगी,,, लेकिन यह जो उम्र होती है यह बहुत ज्वलनशील होती है इस उम्र की जलन में जो जल गया तो समझो वह झुलस गया और जो इसकी तपन से बच गया तो वह आगे निकल गया वह अपना करियर बना ले गया क्योंकि यही उम्र होती है डगमगाने की,,, और जो बच गया सो बच गया वरना सब बर्बाद और यही इस समय तृप्ति के साथ हो रहा था,,,। वह अपने आप को संभालने में नाकामयाब साबित हो रही थी,,,,, वह कुछ समझ नहीं पा रही थी वह भूल गई थी कि इस उम्र का प्यार बिस्तर पर जाकर खत्म हो जाता है और संदीप उसे अपने बिस्तर पर ले जाना चाहता था,,, उसके रुप यौवन से खेलना चाहता था,,,, क्योंकि सुगंधा की तरह ही उसकी बेटी भी बला की खूबसूरत थी,,,।

आखिरकार दोनों का मिलन हो ही गया ,, संदीप थोड़ा त्रप्ती से घबरा रहा था क्योंकि पहले बार का अनुभव अच्छी तरह से जानता था,,, तृप्ति के रवैये से अच्छी तरह से वाकीफ था,, इसलिए घबरा रहा था कि कहीं फिर से वह नाराज ना हो जाए,,, इसलिए उससे मुंह छुपा रहा था,,, लेकिन तृप्ति बहुत खुश थी,,, वह संदीप से बोली,,,।

बगीचे में चलो तुमसे कुछ बात करना है वहीं बैठकर बातें करेंगे,,,

बगीचे में,,,(थोड़ा डरते हुए बोला)

हां बगीचे में हरकत जो तुमने इस तरह की किए हो की ,,

मैंने क्याकिया,,,

अब अनजान बनने की कोशिश मत करो यहां सड़क पर मैं कुछ कहना नहीं चाहती,,,

ठीक है चलो,,,(इतना कहकर संदीप आगे बढ़ गया तकरीबन 5 मिनट की दूरी पर ही बगीचा था जहां पर अक्सर लोग बैठकर बगीचे की ठंडक का एहसास करते हुए आपस में बातचीत करते थे और प्रेमी प्रेमिका प्रेमालाप करते थे,,, संदीप जानबूझकर बगीचे में सबसे पीछे वाली जगह पर गया जहां पर बड़े-बड़े पेड़ थे और यहां पर ज्यादा लोग आते भी नहीं थे,,, बड़ी-बड़ी घनी झाड़ियां होने की वजह से दूर से देखे जाने का डर भी नहीं था,,। दोनों टेबल पर अपना अपना बैग रख कर बैठ गए तृप्ति संदीप को ही देखे जा रही थी और संदीप डर के मारा अपनी नजर को नीचे झुका कर बैठा था वैसे तो लड़कियों से बातचीत करने में बिल्कुल भी घबराते नहीं था और ना ही तृप्ति से डरता था तृप्ति से इस बात से डरता था कि कहीं वह उसे नाराज होकर उससे दूरी न बना ले क्योंकि वह किसी भी कीमत पर तृप्ति का जिस्म पाना चाहता था,, उसे भोगना चाहता था,,,, कुछ देर की खामोशी के बाद बात की शुरुआत करते हुए तृप्ति बोली,,)

तुमने नोटबुक में क्या लिख कर दिए थे,,,।

क्या लिख कर दिए थे,,, मुझे क्या मालूम क्या लिख कर दिए थे,,,( संदीप जानबूझकर अनजान बनता हुआ बोला,,,)

अब बनने की कोशिश बिल्कुल भी मत करो,,, मैं सब जानती हूं,,, और तुम्हें पता होना चाहिए कि अगर किसी के हाथ लग जाता तो क्या होता,,,।

(संदीप तृप्ति की बात सुनकर कुछ बोला नहीं बस खामोश रहा तृप्ति संदीप की तरफ ही देख रही थी और संदीप की हालत देखकर मन ही मन खुश हो रही थी क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था कि संदीप घबरा रहा है जबकि वह घबरा नहीं रहा था बस नाटक कर रहा था,,, तृप्ति अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)

तुम मुंह से भी तो कह सकते थे,,,

मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी,,,

वैसे तो बहुत हिम्मत दिखाते रहते हो इतना कहने में हिम्मत नहीं हो रही है,,,

सच में मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं तुम्हारी बहुत इज्जत करता हूं और मैं कुछ ऐसा नहीं करना चाहता जिससे तुम्हें बुरा लग जाए और तुम मुझे छोड़ दो,,,

मुझे तुम्हारी बात का बुरा नहीं लगता,,,, मैं भी तुमसे बहुत प्यार करती हूं,,,,(इतना कहते हुए दोनों एक दूसरे की आंखों में देखने लगे तृप्ति मदहोश होने लगी क्योंकि संदीप धीरे-धीरे अपने होठों को उसके करीब ले जाने लगा उत्तेजना वश तृप्ति भी अपने होठों को हल्के से आगे की तरफ बढ़ा दी यह उसकी तरफ से संदीप के लिए आमंत्रण था और इस आमंत्रण को स्वीकार करते हुए,, संदीप अपने प्यासे होठों को त्रप्ती के लाल लाल दहकते हुए होंठों पर रख दिया,,, महीनों बाद तृप्ति फिर से मदहोश हो गई,,, संदीप इस खेल में माहिर था वह पल भर में ही तृप्ति के लाल लाल रस भरे होठों को अपने होठों के बीच रखकर उसका रसपान करने लगा संदीप का यह चुम्मन तृप्ति को पूरी तरह से मदहोश कर रहा था,,, तृप्तिकेतन बदन में आग लगने लगी,,,, और इस बार मौका देखकर संदीप ने फिर से अपनी हथेली को उसकी छाती पर रख दिया,,, उसके संतरे को अपनी हथेली में हल्के से लेकर दबा दिया और तृप्ति के मुंह से घुटी-घुटी सी आह निकल गई,,,।

तृप्ति को इस चुंबन में बहुत मजा आ रहा था इस बार तृप्ति खुद पागलों की तरह संदीप के होठों को भी अपनी होठों के पीछे लेकर चूसना शुरू कर दी थी कोशिश बात का अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि संदीप उसकी चूची को दबा रहा था और चूची को दबाने में जो मजा उसे प्राप्त हो रहा था उससे भी ज्यादा मजा तृप्ति को महसूस हो रहा था वह मदहोश हुए जा रही थी,,,। लेकिन यह चुंबन और स्तन मर्दन का क्रियाकलाप कुछ देर और चल पाता इससे पहले की किसी के आने की आहट दोनों के कानों में सुनाई दी और दोनों तुरंत अलग हो गए,,, क्योंकि वहां पर कुछ आवारा लड़के आ रहे थे और अब वहां पर ज्यादा देर तक ठहरना उचित नहीं था इसलिए दोनों अपनी जगह से खड़े हो गए और जल्दी से वहां जाने लगे लेकिन जाते-जाते ही उनमें से एक लड़का बोला,,,।

चुदाई का प्रोग्राम था क्या,,, हमसे गलती हो गई थोड़ी देर बाद आना चाहिए था ताकि चुदाई का खेल अपनी आंखों से देख लेते,,,,।

(उसे हमारे लड़के की बात को अनसुना करके दोनों वहां से निकल गए लेकिन भले बात को अनसुना कर गए थे लेकिन जो बात उस आवारा लड़के ने बोली थी चुदाई वाली,,, उसे बात का तृप्ति के मन पर बहुत गहरा असर पड़ रहा था उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी थी,,, उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वास्तव में वह बगीचे के कोने वाली जगह पर चुदवाने के लिए गई थी,,, दोनों बगीचे से बाहर निकाल कर कुछ देर साथ चलकर अपने-अपने रास्ते हो लिए,,,

वादे के मुताबिक अंकित स्कूल से छूटने के बाद वास्तव में मोटे तगड़े और बड़े-बड़े केले खरीद लिया था एकदम अपने लंड के साइज का क्योंकि वह समझ गया था कि उसकी मां को इस माप का ही जरूरत है,,। वह जानता था कि घर पर केला ले जाते ही उसकी मां की नजर जैसे ही कैला पर पड़ेगी उसकी मां की बुर पानी छोड़ने लगेगी,,, वह जल्दी-जल्दी घर पहुंच गया,,, शाम के 5:00 बजे रहते और इस समय घर पर उसकी मां के लिए रहती थी इसलिए अंकित मन ही मन खुश हो रहा था लेकिन जैसे ही घर पर पहुंचा तो घर पर तृप्ति भी मौजूद थी वह पढ़ाई कर रही थी,,, और घर पर तृप्ति को देखकर उसके अरमानों पर पानी फिर गया,,, तृप्ति की नजर जैसे ही अंकित के हाथों में केले के थैले पर गई तो मोटे-मोटे तगड़े केले को देखकर तृप्ति बोली,,,।

यह क्या उठा लाया तू,,,

क्यों दीदी तुम्हें पसंद नहीं है क्या,,,?

तूने कभी देखा मुझे केला खाते हुए,,,,

हां सही बात है देखा तो नहीं हुं,,,

फिर तु यह सब क्यों लेकर आया,,,

अरे दीदी तुम्हें नहीं पसंद है तो क्या किसी को पसंद नहीं आएगा मम्मी को तो पसंद है ना,,,,

तो यहां लेकर क्यों खड़ा जा मम्मी को दे दे,,,,

( ओर इतना सुनकर अपने कमरे से सुगंधा बाहर निकल कर आ गई,,, अपने बेटे के हाथ में केला देखकर उसकी साइज देखकर उसकी मोटाई देखकर मन ही मन उत्तेजित होने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

तु कितना ख्याल रखता है मेरा,,, और एक यह है जो आज तक कुछ नहीं लेकर आई,,,(तृप्ति की तरफ इशारा करते हुए बोली तो अंकित बोल पड़ा)

मां का ख्याल हमेशा हम लड़कों को ही रखना पड़ता है लड़कियों से थोड़ी ना कुछ होता है,,,,।
(अंकित दो अर्थ वाली बात कर रहा था जो कि उसकी मां अच्छी तरह से समझ रही थी और अपने बेटे के कहने के मतलब को समझ कर वह अंदर ही अंदर सिहर उठी,,,,,, वह जानती थी किसका बेटा मां का ख्याल लड़के रखते हैं ऐसा क्यों किया है क्योंकि लड़कों के पास लंड होता है जिनकी प्यास हर एक मां को होती है जिससे वह अपनी जवानी की प्यास बुझा सकती है,,,, यह सब सुनकर तृप्ति बोली,,,)

चलो कोई बात नहीं मैं जैसी हूं वैसी ही ठीक हूं अब मम्मी जल्दी से चाय बना दो,,,

को देखो महारानी के नखरे चालू हो गए,,,,।
(इतना कहकर सुगंधा रसोई घर में चली गई और पीछे-पीछे अंकित भी अकेला लेकर अपनी मां के पीछे चला गया और वही किचन फ्लोर पर रख दिया दोनों में और कुछ बात हो पाती से पहले तृप्ति भी वहीं आ गई और बोली,,,)

अच्छा लाओ मैं ही बना देती हुं,,,
(और तृप्ति चाय बनाने लगी तृप्ति की मौजूदगी में दोनों मां बेटे किसी भी तरह से दो अर्थ वाले संवाद नहीं कर पा रहे थे जिससे दोनों के अरमानों पर पानी फिर गया था,,,,।

रात को अपने कमरे में सुगंधा अपने बेटे के द्वारा खरीद कर लाए गए मोटे तगड़े केले को लेकर गई,, और बिस्तर पर लेट गई और अपने मन में कल्पना करने लगी अपने बेटे के लंड को लेकर उसके हाथ में लिया हुआ अकेला उसे अपने बेटे का लंड लग रहा था क्योंकि वह केला वाकई में बेहद दमदार और मोटा और तगड़ा और काफी लंबा था ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके बेटे ने केला नहीं बल्कि अपना लंड ही उसे खाने के लिए दे दिया हो वह उस केले को अपने हाथ में लेकर अपने अंगूठे और उंगली का छल्ला बनाकर उसके अंदर केले को धीरे-धीरे इस तरह से प्रवेश करने लगी मानव की जैसे वह उसकी उंगलियों के द्वारा बनाया गया छल्ला नहीं बल्कि उसकी खुद की गुलाबी बुर हो और वह केला उसके बेटे का लंड हो जिसमें वह धीरे-धीरे प्रवेश कर रहा हो,,,, सुगंधा को मन में कल्पना करते हुए बहुत मजा आ रहा था,,,।

अपने मन में कल्पना करते हैं वह धीरे-धीरे अपने वस्त्र उतारने लगी और देखते ही देखते वह बिस्तर पर पूरी तरह से नंगी हो गई उसके अरमान पूरी तरह से मचल उठे थे,,,, वह अपने दोनों टांगों को फैला कर उसके लिए को इसकी मोटाई को धीरे-धीरे अपनी गुलाबी पत्तियों पर रगड़ रही थी पर ऐसा महसूस कर रही थी कि जैसे यह क्रिया उसका बेटा उसकी दोनों टांगों के बीच जगह बनाकर अपने लंड को हाथ में पकड़ कर अपने गरम सुपाड़े को उसके गुलाबी पत्तियों पर रगड़ रहा हो,,, यह कल्पना बेहद मदहोश कर देने वाली थी वह पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में गोते लगाने लगी वह मदहोश होने लगी,,, उसकी कल्पनाओ के आज कुछ ज्यादा ही पर लग गए थे,,, वह केले को धीरे-धीरे अपनी बुर पर थपथपा रही थी,,, वह पागल हो जा रही थी और कल्पना कर रही थी कि जैसे उसका बेटा अपने लंड को हाथ में लेकर उसकी बुर पर उसकी चोट मार रहा हो ,,जिससे उसे दर्द तो हो रहा था लेकिन मजा भी बहुत आ रहा था।

सुगंधा से बिल्कुल भी रहा नहीं जा रहा था अपनी दोनों टांगों को खोल दी और फिर धीरे-धीरे उसकेले को जो कि उसके मदन रस से पूरी तरह से गिला हो चुका था धीरे-धीरे अपनी गुलाबी पत्तियों के बीच प्रवेश कराना शुरू कर दी,,, उसे बहुत मजा आ रहा था क्योंकि किला का साइज बहुत ज्यादा ही मोटा था और अपने मन में सोच रही थी कि काश ऐसा मोटा तगड़ा लंड मिल जाता तो उसकी तो जिंदगी बन जाती,,, और वह ऐसा सोचते हुए धीरे-धीरे केले को आधा से ज्यादा अपनी बुर में प्रवेश करा दी और उसे अंदर बाहर करने लगी और अपनी आंखों को बंद करके महसूस करने लगी की जैसे उसका बेटा उसकी दोनों टांगों के बीच जगह बनाकर उसकी बुर में अपना लंड डालकर उसे चोदना शुरू कर दिया है,,, उसे बहुत मजा आ रहा था वह मदहोशी में अपने सर को दाएं बाएं पाठक रही थी और अपने हाथ को जोरो से चला रही थी जैसे-जैसे अकेला अंदर बाहर हो रहा था वैसे-वैसे उसकी रगड़ का एहसास उसे पागल बना रहा था,,,।

उसकी आंखें पूरी तरह से बंधी थी वह कल्पनाओं की दुनिया में पूरी तरह से खो चुकी थी अपने बिस्तर पर संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में वह कामांध हो चुकी थी,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस अपनी कल्पनाओं में वह पूरी तरह से खो चुकी थी तेज चलते हैं हाथों के साथ-साथ उसकी कल्पनाओं का घोड़ा बड़ी तेजी से दौड़ रहा था वह अपने मन में यही सोच रही थी कि उसका बेटा उसे अपनी बाहों में लेकर जोर-जोर से अपनी कमर हिला कर धक्के पर धक्का लगा रहा है,,,, पल भर में उसकी सांसे बड़ी तेजी से चलने उखड़ने लगी वह पागलों की तरह अपने सर को इधर-उधर पटकने लगी पसीने से तरबतर उसका गोरा नंगा बदन पूरी तरह से ट्यूबलाइट की रोशनी में चमक रहा था वह चरम सुख के बेहद करीब पहुंच चुकी थी और देखते ही देखते उसके मुंह से हल्की सी चीज निकाली और उसकी कमर ऊपर उठ गई वह अपनी भारी भरकम गांड को पल भर के लिए ऊपर उठाकर झड़ना शुरू कर दी,,, और देखते ही देखते हैं उसकी बुर से गरम लावा पिचकारी का रूप धारण करके निकलना शुरू कर दिया,,,,।

वासना का तूफान शांत हो चुका था,,, वह अपनी बुर में से केला बाहर निकाली जो की पूरी तरह से उसके मदन रस में डूब चुका था और वह धीरे से उसे टेबल पर रख दी उसकी सांसे अभी भी ऊपर नीचे हो रही थी और थोड़ी ही देर बाद वह नींद की आगोश में चली गई,,,।

अपने बेटे के द्वारा ले गए मोटे तगड़े और लंबे केले से रात को अपनी जवानी की प्यास बूझाकर सुगंधा उस केले को वहीं टेबल पर रखकर गहरी नींद में सो गई
गई ,,, रात का अनुभव बेहद उत्तेजनात्मक था सुगंधा अपने बेटे के द्वारा ले गए मोटे तगड़े केले को अपने बेटे का लंड समझकर उसे अपनी गुलाबी छेद में डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझा ली थी लेकिन यह प्यास चाय किला कितना भी मोटा और लंबा क्यों ना हो पहले से बिल्कुल भी नहीं पूछने वाली हां कुछ पल के लिए यह गर्मी शांत जरूर हो जाती है लेकिन यह जो जवान की गर्मी है यह जो जवान की प्यास है वह केवल एक मर्द के मोटे तगड़े लंड से ही बुझती है,,,।

सुबह जब नींद खुली तो उसे उठने में 15 मिनट की देरी हो चुकी थी दीवार पर टंगी घड़ी में समय देखते ही वह तुरंत उठकर बैठ गई और बिस्तर से खड़ी हो गई,,, वह अभी भी हल्की-हल्की नींद में थी पूरी तरह से नींद से बाहर नहीं आई थी और वह चलकर दरवाजे तक पहुंच गई और दरवाजे की कड़ी पकड़ कर उसे खोलने वाली थी कि तभी उसे अपने दोनों टांगों के बीच बुर के ऊपर खुजली महसूस होने लगी और वह तुरंत अपना हाथ अपनी बुर पर ले गई और उसे खुजाने लगी,,, और उसे तुरंत एहसास हुआ कि उसने तो कुछ पहनी नहीं है और तुरंत वह एकदम से नींद से बाहर आगे और अपने आप को ऊपर से नीचे की तरफ देखने लगी तो उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में थी,,,, उसके बदन पर कपड़े का रेसा तक नहीं था,, तभी उसे याद आया कि रात को वह अपने सारे कपड़े उतार कर केले को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी शांत की थी और बिना कपड़े पहने ही सो गई थी,,, ।

अपनी स्थिति का अहसास होते ही तुरंत कड़ी पर से अपने हाथ को हटा ली,,, और सहज रूप से उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी,, लेकिन इस बात से वह काफी घबरा गई थी कि अगर एन मौके पर बुर पर खुजली ना आई होती तो वह कमरा का दरवाजा खोलकर नंगी ही कमरे से बाहर निकल गई होती और अगर ऐसे में तृप्ति देख लेती तो क्या होता,,, बाप रे वह मेरे बारे में क्या सोचती,,,, अपने मन में सुगंधा इस बारे में सोच रही थी लेकिन उसे अपने बेटे के द्वारा देखे जाने पर बिल्कुल भी अफसोस ना होता बल्कि वह अंदर ही अंदर बहुत खुश होती है अपने बेटे को अपनी नंगी जवानी दिखाकर और वह भी सुबह-सुबह,,, अपने मन में यह सब सोच कर वह तुरंत बिस्तर के करीब आई और अपने कपड़ों को जोकि नीचे फर्श पर फेक हुए थे उन्हें उठाकर पहनने लगी और थोड़ी ही देर में अपने कमरे से निकल कर बाहर आ गई,,,।

दूसरी तरफ अपनी मां के कमरे में जाने का अंकित को उसे दिन के बाद कभी मौका नहीं मिला था क्योंकि जब वह उड़ जाता था तब उसकी मां उससे पहले ही उठकर घर का काम करती रहती थी या अंदर से कमरा बंद रहता था,,, क्योंकि अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में देखने की उसकी इच्छा बेहद प्रबल हो गई थी पहली बार जब अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में देखा था तो उसकी कचोरी जैसी फुली हुई बुर को स्पर्श करने की अपनी इच्छा को दबा नहीं पाया था और अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए अपनी मां की बुर पर हल्के से अपनी उंगली रख दिया था जो कि इतनी मात्रा से ही उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो गई थी,,, उसे अनुभव के बारे में जब भी कभी अंकित सोचता था तो उसका लंड पूरी तरह से टनटना कर खड़ा हो जाता था ,,,।

सुगंधा कमरे से बाहर आते ही झाड़ू लेकर घर की सफाई करना शुरू कर दी थी और अंकित भी उठ गया था,,, तृप्ति भी गहरी नींद से जाग चुकी थी लेकिन जागते ही वह संदीप के बारे में सोचने लगी संदीप के दिए प्रेम पत्र के बारे में सोचने लगी और संदीप के साथ बगीचे में जो कुछ हुआ था उन सब के बारे में सोचने लगी,,, जिंदगी का पहला चुंबन बेहद रसीला और उन्माद भरा था,,, वह उसी चुंबन के बारे में सोच रही थी,,, और उसे चुंबन के बारे में सोचकर उत्तेजित हो रही थी पहली मर्तबा संदीप किस तरह की हरकत पर वह पूरी तरह से बिगड़ गई थी और संदीप से नाराज हो गई थी,,,, क्योंकि वह कभी सोची नहीं थी कि संदीप इस तरह से कोई हरकत करेगा और वह भी सड़क पर,,,,।

लेकिन कल जो कुछ भी हुआ था उसमें उसकी खुद की सहमति थी,,, से संदीप की तरफ ऐसे ही किसी हरकत की उम्मीद थी,,, संदीप ने अपनी हरकत की वजह से उसके बदन में हलचल मचा दिया था क्योंकि होठों का रस पीते हुए उसके हाथ उसने अपनी चूचियों पर महसूस कि थी,,, लेकिन उसे रोकने के बजाय उसकी हरकतों का वह खुद आनंद लेने लगी थी पहली मर्तबा उसे अच्छा तो लगा था लेकिन संदीप की हरकत से वह पूरी तरह से क्रोधित हो चुकी थी इसलिए उसे समय मिलने वाला मजा भी उसे जहर लग रहा था,,, लेकिन कल की बात कुछ और थी होठों के साथ-साथ संदीप के द्वारा स्तन मर्दन होते ही वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी और पिघलने लगी थी उसे अपनी दोनों टांगों के बीच थरथराहट से महसूस होने लगी थी,,, और संदीप उसे अपनी हरकत से पूरी तरह से मत किए हुए था।

लेकिन बगीचे में संदीप की हरकत कुछ और ज्यादा आगे बढ़ती इससे पहले ही कुछ अवारा लड़के वहां आ गए थे और वह दोनों उठकर वहां से जाने लगे थे लेकिन तभी उन्हें लड़कों में से एक ने जो बात कहा था वह अभी भी तृप्ति के दिलों दिमाग पर छप सा गया था,,, चुदवाने आई थी क्या,,,? उस लड़के के द्वारा कहे गए इस शब्द को सुनते ही उसके बदन में हलचल सी मचने लगी थी वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी,,, वह अपने मन में सोचने लगी की लड़की कितने बेशर्म होते हैं कुछ भी कह देते हैं ,, लेकिन फिर वह अपने मन में सोचने लगी कि अगर वाकई में उसे लड़के की कही बात सच होती तो कैसा होता,,, अगर वह सच में बगीचे के अंदर संदीप से चुदवाने गई होती तो कैसा महसूस करती,,,।

इस बारे में सोचते हैं उसके बदन में गनगनाहट होने लगी,,, पल भर में वह कल्पना करने लगी,,, कि अगर वह सच में चुदवाने ही गई होती तो क्या होता कैसे होता,,,, वह अपने मन में कल्पना कर रही थी कि वह संदीप को लेकर बगीचे के सबसे कोने वाली जगह पर जाती जहां पर ढेर सारी जंगली झाड़ियां होगी हुई थी जहां पर लोगों का आना-जाना बिलकुल नहीं होता था,,, संदीप के साथ वह उसे जगह पर पहुंचती तो वहां पर पहुंचते ही दोनों एक दूसरे को चुंबन करने लगते हैं एक दूसरे के होठों को अपने मुंह में लेकर उसका रस चूसने लगते हैं और इसी बीच संदीप के हाथ उसकी चूचियों पर आ जाते कुर्ती के ऊपर से ही वह जोर-जोर से उसकी चुचियों को दबाता,,,जिसका आनंद लेते हुए वह मदहोश हो जाती पागल हो जाती और पागलों की तरह उसके होठों को चुस्ती,,,,।

कुर्सी बीच संदीप का हाथ उसकी चूचियों से नीचे की तरफ आते हुए उसकी कमर पर आ जाता है और वह दोनों हाथों से उसकी कमर को कस के दबोच देता जिससे उसके बदन में सनसनी से दौड़ने लगती और फिर सलवार के ऊपर से ही संदीप उसकी बुर को जोर-जोर से मसलना शुरू कर देता ,, और संदीप की हरकत पर वह पूरी तरह से मस्त हो जाती मदहोश हो जाती एकदम चुदवासी हो जाती,,,और चुदासपन के चलते उसके खुद के हाथ अपने आप ही संदीप के लंड पर चला जाता, और वह पेंट के ऊपर से ही उसके लंड को जोर जोर से दबा दी उसे खेलती और फिर ना तो संदीप बर्दाश्त कर पाता और ना ही वह खुद इसके बाद संदीप उसे पेड़ की तरफ घूमर पेड़ पकड़ने के लिए बोलना और फिर अपने हाथों से उसकी सलवार की डोरी खोलकर उसकी सलवार को पेटी सहित खींचकर उसके घुटनों तक ले आता और फिर उसकी नंगी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर सहलाता,,,, और उसके इस क्रियाकलाप को वह खुद नजर पीछे की तरफ घूम कर देखती,,,।

और फिर दिन दुनिया से बेखबर वह अपनी गांड को थोड़ा बाहर निकाल कर संदीप के आगे परोस देती और संदीप अपने लंड को हाथ में लेकर धीरे-धीरे उसको गुलाबी छेंद में अपना लंड डालता और फिर उसे चोदना शुरू कर देता,,, यह सब सोचते हुए कल्पना करते हुए वास्तव में तृप्ति की सांस ऊपर नीचे हो रही थी वह पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी,,, सच में आंखों को बंद करके हुआ ऐसा ही महसूस कर रही थी कि वह इस समय बगीचे में है और अपनी सलवार को घुटनों तक नीचे करके अपनी नंगी गांड संदीप के सामने परोस कर उससे चुदाई का मजा लूट रही है लेकिन तभी एकदम से वह चौंक गई जब दरवाजे पर दस्तक होने लगी,,,।

तृप्ति,,,, अरे अभी तक सो रही है देर नहीं हो रही है कॉलेज जाना है,,,,।

(इतना सुनते ही उसके होश उड़ गए दीवार पर टंगे जब घड़ी में दिखी तो वह 10 मिनट लेट हो चुकी थी कल्पना करने में 10 मिनट गुजर चुके थे लेकिन 10 मिनट में वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी,, )

आई मम्मी,,,,,(इतना कहने के साथ ही वह जल्दी से बिस्तर से उठकर खड़ी हो गई और अपने कमरे से बाहर निकाल कर जल्दी-जल्दी तैयार होने लगी,,,, सुगंधा नाश्ता तैयार कर दी थी और तृप्ति जल्दी-जल्दी नाश्ता करके घर से निकल गई थी क्योंकि अब उसे संदीप से मिलने की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी थी,,,, लेकिन अंकित अभी भी घर में ही था क्योंकि उसके मोजे नहीं मिल रहे थे वह जूते को टेबल के नीचे रखकर अपने कमरे में मौजा ढूंढ रहा था,,, लेकिन जब उसे बहुत कोशिश करने के बावजूद भी नहीं मिला तो वह रसोई घर में गया और अपनी मां से बोला,,,।

मम्मी मेरे मोजे कहां रख दी हो मिल नहीं रहा है,,,

अरे वही तो रखी थी तेरे कमरे में,,,,(कढ़ाई में चमची चलाते हुए बोली,,)

मैंने अपना पूरा कमरा ढूंढ मारा हूं लेकिन कहीं मिल नहीं रहा है,,,, जल्दी बताओ मुझे देर हो रही है,,,,।

अरे कहां रख दी मुझे खुद याद नहीं आ रहा है,,,, अरे हां याद आया मेरे कमरे में टेबल के ऊपर ही रखा हुआ है कल रात को ही अपने कमरे में लेकर चली गई थी,,,।

शुक्र है तुम्हें याद तो आया,,,,(और इतना कहने के साथ ही अंकित अपनी मां के कमरे में चला गया और टेबल पर देखा तो वाकई में उसके मोजे रखे हुए थे,,,,)

यह रखा हुआ है और मैं ईसे कब से अपने कमरे में ढूंढ रहा हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही अंकित टेबल की तरफ आगे पड़ा और अपने मोजे को उठा लिया लेकिन तभी उसकी नजर टेबल पर रखे हुए मोटे तगड़े किले पर गई और केले को देखते ही उसकी आंखों के सामने उसकी मां की कचोरी जैसी फुली हुई बुर नजर आने लगी जिसे वह अपनी उंगली से छूटकर उसकी गर्मी को महसूस कर चुका था उसने तुरंत टेबल पर पड़ा कीड़ा उठा लिया और उसे गोल-गोल घुमा कर देखने लगा और कुछ देर के लिए हुआ उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया और अपनी उंगलियों का छल्ला बना हुआ देखने लगा जिसमें से उसका केलआ गुजर रहा था और वह अपनी मन में सोचने लगा कि अगर इतना मोटा लंड मम्मी की बुर में जाएगा तो क्या होगा,,, अपने मन में ऐसा कहते हुए वह तुरंत अपने दोनों टांगों के पीछे देखने लगा जहां पर थोड़ा-थोड़ा उठाव हो रहा था और वह अपने मन में सोचने लगा,,,, उसका तो अकेले से भी ज्यादा मोटा और लंबा है जब उसका लंड उसकी मां की बुर में जाएगा तब क्या होगा,,, अनायास ही उसके मन में एक ख्याल आया था और इस ख्याल से वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था,,,, तभी उसे केले पर कुछ चिपचिपा सा लगा हुआ महसूस होने लगा,,, लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लगा है और वह तुरंत केले को छिलना शुरू कर दिया,,,।

दूसरी तरफ,,, सुगंधा अपने मन में सोचने लगी कि पता नहीं अंकित को मिला होगा कि नहीं और वह रसोई घर से निकल कर अपने कमरे की तरफ जाने लगी और जैसे ही दरवाजे पर पहुंची तो अपने बेटे को केला खाता हुआ देखकर उसके एकदम से होश उड गए,,,, पल भर में उसे सब कुछ याद आने लगा रात को जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोच कर उसके होश उड़ गए थे क्योंकि वह अकेले को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करके केले को उसी स्थिति में टेबल पर रख दी थी और इस समय उसका बेटा उस केले को खा रहा था,,, पल भर में ही सुगंधा के माथे पर पसीने की बूंदे उपसने लगी,,, उसे यह सोचकर बेहद अजीब लग रहा था कि जिस केले को उसने अपनी बुर में डाली थी उसी केले को उसका बेटा खा रहा था,,,।

वह एकदम से कमरे में दाखिल होते हुए बोली,,,।

यह क्या कर रहा है अंकित इस केले को मैं अपने लिए रखी थी,,,।

अरे मम्मी दूसरा केला है खा लेना ना,,

नहीं मुझे यही खाना था तभी तो मैं टेबल पर लाकर रखी थी,,,

लगता है केले की मोटाई और लंबाई देखकर रखी थी,,,,(इस बार अंकित अपनी मां को नीचे से ऊपर की तरफ देखते हुए बोला था सुगंध तुरंत अपने बेटे के खाने के मतलब को समझ गई थी और अंदर ही अंदर अपने बेटे की बात सुनकर सिहर सी गई थी,,, और वह बोली)

नहीं मुझे इसी तरह का केला पसंद है इसीलिए तो लेकर आई थी,,,।

अरे मम्मी मेरे पास ऐसा ही केला है,,, मेरा मतलब है कि जब कहो गई तब खरीद कर ला दूंगा,,,(अचानक ही अंकित के मुंह से अपने मन की बात निकल गई थी जिसे सुनकर सुगंधा के तन बदन में आग लग गई थी और वह अपने मन में बोली तेरा ही केला तो मैं चाहती हूं नहीं तो इस्केले से इस जवानी की प्यास कहां बुझने वाली है,,, और अंकित पूरा केला खा लेने के बाद बोला,,,)

शाम को दूसरा खरीद कर ला दूंगा इससे भी ज्यादा लंबा और मोटा एक में ही खुश हो जाओगी,,,(अंकित अपनी मां से दूसरे शब्दों में बात कर रहा था और उसकी मां उसकी कहीं बात को समझ भी रही थी,,,, अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

लेकिन मम्मी केला एकदम चिपचिपा था,,,।
(अपने बेटे की इस बात से सुगंधा एकदम से चौक गई और उसे याद आया कि केले को वह इस हालत में टेबल पर रख दी थी जिस हालत में उसने अपनी बुर से बाहर निकाली थी उसे पर उसकी बुर का मदन रस लगा हुआ था या यू। कह लों की पूरा केला उसके मदन रस में डूबा हुआ था,,,, सुगंधा ज्यादा कुछ कह नहीं पाई बस इतना ही बोली,,,।)

धोकर खाना चाहिए था ना पता नहीं कहां-कहां से निकल कर आता है,,,।

कोई बात नहीं मुझे तो ऐसा ही बहुत स्वादिष्ट लग रहा था,,,,।

(इतना कहकर अंकित अपनी मां के कमरे से बाहर निकल गया और तैयार होकर स्कूल के लिए निकल गया सुगंध उसे देखते ही रह गई वह हमारे शर्म के पानी पानी हो रही थी क्योंकि उसके बेटे ने उसकी बुर से निकला हुआ केला पूरी तरह से गटक लिया था,,,।)

अंकित स्कूल के लिए जा चुका था,,,, लेकिन अपने पीछे अपनी मां को पूरी तरह से मदहोश कर चुका था अंकित नहीं जानता था कि उसने कौन सा केला खाया है उसे तो एहसास तक नहीं था कि उसे केले को उसकी मां ने किस उपयोग में लिया था वह पूरी तरह से अनजान था,,,,, वह तो उस केले को सामान्य केला समझ कर ही जल्दी-जल्दी छीलकर खा गया था,,,। लेकिन वह केला सामान्य बिल्कुल भी नहीं था,, क्योंकि उसके लिए नहीं एक बेहद खूबसूरत औरत की गुलाबी छेद की गुलाबी सुरंग के अंदरूनी भाग तक चक्कर लगा लिया था और एक खूबसूरत औरत के गुलाबी छेद की परिक्रमा कर लेने के बाद वह केला बिल्कुल असामान्य हो चुका था खास करके ऐसे लड़कों के लिए जो जवानी की दहलीज पर अभी-अभी कदम रखे हैं।

अगर कोई ऐसा व्यक्ति उसकेले के बारे में जनता की उसकेले को सुगंध जैसी खूबसूरत औरत अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझाई है तो शायद उसके लिए को लेकर पहले उसके छिलके को छिलका नहीं बल्कि सुगंधा की खूबसूरत बुर के मदन रस का स्वाद लेने के लिए,,, केले को पूरी तरह से जीभ से चाटता उसके मदन रस का खारा सवाद लेता,,, और जी भर कर उसका स्वाद लेता उसके बाद कहीं जाकर उसकेले को खाता,,,, और शायद इस बात को अगर अंकित जानता तो वह भी यही करता लेकिन वह जानता नहीं था इसलिए बेझिझक उस केले को छीलकर खा गया था,,, हालांकि उस केले को खाते हुए सुगंधा ने देख ली थी लेकिन जब उसकी नजर पड़ी तब तक उसका बेटा आधे से ज्यादा केला खा चुका था,, उसे रोकने का बिल्कुल भी फायदा नहीं था और क्या कह कर रुकते की यह केला मत था लेकिन क्यों मत खा यह बता सकने कि उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी,,,।

अंकित के स्कूल जाते ही,,, सुगंधा सोच में पड़ गई थी क्योंकि वह कभी सोचा नहीं थी कि अपनी ही बुरे में डाला हुआ केला वह अपने बेटे को खिला देगी,,, लेकिन वह जानबूझकर तो मिला ही नहीं थी उसका बेटा खुद ही अपने हाथ से लेकर खा गया था लेकिन फिर भी इस बात का अफसोस सुगंधा को हो रहा था,, लेकिन इस बात को लेकर उसके बदन में अजीब सी हलचल भी थी,,,। वह मदहोश हो रही थी,, क्योंकि उसके लिए भी यह पल बेहद अद्भुत और अतुलनीय था क्योंकि इस बारे में उसने कभी सोची भी नहीं थी,,, वह इस बात को सोच सोच कर हैरान थी कि वह केला पूरी तरह से उसकी बुर की गहराई नाप चुका था पूरी तरह से उसके मदन रस में डूबा हुआ था,,,, सुगंधा उसे केले को फेंक देना चाहती थी लेकिन उसे टेबल पर रखकर भूल गई थी उसे नहीं मालूम था कि उसका बेटा उसके कमरे में आ जाएगा और उसके लिए को खा जाएगा वरना वह सुबह ही उसे कूड़ेदान में फेंक देती,,,,।

सुगंधा इस बारे में सोच रही थी तभी उसे कह रहा है कि उसका बेटा इस बात को बोला था कि केला बहुत चिपचिपा है,, केले को धोई नहीं हो क्या,,,, इस बारे में सोचकर उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी क्योंकि वह जिसके लिए कोई चिपचिपा बोल रहा था उसकी चिपचिपाहट उसके मदन रस की वजह से थी,,, वह हैरान इस बात से थी कि उसका बेटा उसकी बुर से निकले हुए मदन रस को अपने हाथों से स्पर्श किया था भले ही अनजाने मे हीं,,, यह सोचकर उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी,,,, उसकी दोनों टांगों के बीच कंपन महसूस होने लगा लेकिन उसका भी स्कूल जाने का समय हो चुका था इसलिए वह भी जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्कूल चली गई,,,।

स्कूल में रिसेश के समय सुगंध और नूपुर लंच बॉक्स खोलकर खाना खा रहे थे,,,, पहले की अपेक्षा नूपुर के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव कुछ ज्यादा ही नजर आ रहे थे वह तरो ताजा और खीली हुई नजर आ रही थी,,, उसके चेहरे की ताजगी के कारण को सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी,,,, दोनों के बीच खाना खाते समय सामान्य रूप से चुपकी छाई हुई थी,, लेकिन इस चुपकी को तोड़ते हुए नूपुर बोली,,,।

अंकित बडा ही प्यारा बच्चा है,, तुम्हें मालूम है वह मेरे घर आया था,,,।

हां मुझे बता रहा था राहुल के साथ क्रिकेट खेलने गया था,,,।

हां सही कह रही हो बहुत ही जल्दी दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई दोनों ऐसे साथ-साथ बातें कर रहे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे दोनों के बीच पहले से ही गहरी दोस्ती हो,,,।

मुझे भी अच्छा लगा नूपुर कि मेरा बेटा तुम्हारे बेटे के साथ दोस्ती कर रहा है उसकी संगत में रहेगा तो कुछ अच्छा ही सीखेगा,,,,(सुगंधा जानबूझकर उसकी संगत में अच्छा सीखने वाली बात कर रही थी क्योंकि सुगंधा अच्छी तरह से जानती अच्छी नूपुर और उसके बेटे के बीच किस तरह था रिश्ता बना हुआ है और सुगंधा भी यही चाहती थी कि जिस तरह से नूपुर और उसके बेटे के बीच रिश्ता बना हुआ है इस तरह का रिश्ता उसके और उसके बेटे के बीच भी बन जाए। ,)

हां जरूर क्यों नहीं मेरा बेटा भी बहुत समझदार है,,, वक्त से पहले ही समझदारी और जिम्मेदारी के चलते बड़ा हो गया है,,,,।

(नूपुर की बात सुनकर सुगंध अपने मन में ही बोली राहुल बड़ा नहीं हुआ है बल्कि उसका लंड बड़ा हो गया है,,, तभी तो तेरी प्यास बुझा रहा है,,, इस बात को सुगंधा नूपुर से खुले शब्दों में बोल देना चाहती थी लेकिन ऐसा कहने की उसकी हिम्मत नहीं हुई लेकिन उसकी बात सुनकर खाना खाते हुए बोली।)

अक्सर घर का बड़ा लड़का जिम्मेदार हो ही जाता है अपने परिवार की हालत को देखकर,,, तुम्हारी परेशानियों को देखकर राहुल सही समय पर बड़ा हो गया,,,,।
(सुगंधा की बात सुनकर नूपुर प्रसन्न हो रही थी लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी की सुगंधा दूसरे शब्दों में उससे बात कर रही थी,,,,, अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सुगंधा बोली,,,)

पता नहीं कब अंकीत बड़ा होगा,,,,

हो जाएगा,,, सुगंधा,,, बच्चे संगत में ही सीखते हैं,,,

यह तो तुम सच कह रही हो नुपुर इसीलिए तो मैंने अंकीत को तुम्हारे बेटे के साथ दोस्ती बढ़ाने के लिए बोली हुं,,,,।

वह भी सब सीख जाएगा समझदार है तुम्हारा बेटा,,,,(पानी पीते हुए नूपुर बोली,,,, थोड़ी ही देर में दोनों खाना खाकर लंच बॉक्स रख लिए,,,,, नूपुर आगे आगे चल रही थी सुगंध पीछे-पीछे आगे चल रही नूपुर की मटकती हुई गांड देखकर सुगंधा अपने मन में सोचने लगी,,, वाकई में नूपुर पूरी तरह से चोदने लायक है,,,
बड़ी-बड़ी गांड बड़ी-बड़ी चूची एक मर्द को और क्या चाहिए यही देखकर या यह कह लो यह सब दिखाकर नूपुर अपने बेटे को पूरी तरह से अपनी जवानी के जाल में फंसा ली और फिर उसके साथ जवानी का सुख भोग रही है,,, लेकिन यह सब तो उसके पास भी है उससे बेहतर है फिर भी अंकित अभी तक राहुल नहीं बन पाया यह ऐसा भी हो सकता है कि खुद वही अभी तक नूपुर नहीं बन पाई,,,,,,,, उसके मन में तो आ रहा था कि इसी समय वह नूपुर से पूछ ले कि वह कैसे अपने बेटे को चोदने के लिए मनाई ताकि वह भी अपने बेटे को इस तरकीब से बना सके,,, लेकिन ऐसा पूछने की उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी,,,,।)

दूसरी तरफ कॉलेज से छूटने के बाद,,, तृप्ति संदीप के साथ चहल कदमी करते हुए चल रही थी,,, अभी कल ही वह संदीप के साथ चुंबन का अद्भुत रोमांच का अनुभव कर चुकी थी,,,,, इसलिए संदीप से आंख मिलाने में उसे शर्म महसूस हो रही थी,,, लेकिन संदीप मन ही मन बहुत खुश हो रहा था क्योंकि उसकी हरकत का तृप्ति ने बिल्कुल भी विरोध नहीं की थी बल्कि आनंद ने रही थी अपनी मंजिल तक पहुंचने की यह उसकी पहली सीढ़ी थी और उसकी मंजिल थी तृप्ति की दोनों टांगों के बीच पहुंचना,,, और कल हुई हरकत को देखकर वह समझ गया था कि बहुत ही जल्द तुम्हें तृप्ति की दोनों टांगों के बीच पहुंच जाएगा,,, दोनों टहलते टहलते बगीचे के पास आ गए तो संदीप बोला,,,।

चलो बगीचे में चलते हैं,,,

नहीं नहीं बगीचे में मैं नहीं जाऊंगी,,,

क्यों क्या हुआ कल तो तुम खुद बगीचे में लेकर गई थी,,,

हमें जानती हूं कल मैं तुम्हें खुद बगीचे में लेकर गई थी लेकिन देखे थे ना क्या हुआ था वह आवारा लड़के किस तरह से बातें कर रहे थे,,,

किस तरह से बातें कर रहे थे हम लोग तो उनके वहां आने से पहले ही उठकर जाने लगे थे,,,

हां तो जाते हुए ही उनमें से एक लड़का क्या बोला था कुछ याद है,,,(तृप्ति संदीप को याद दिलाते हुए बोल रही थी)

कहां,,, मुझे तो नहीं आते कि उनमें से किसी ने कुछ कहा था,,,

अरे पागल हो गए हो क्या उनमें से एक लड़के ने क्या बोला था नहीं मालूम,,,

तृप्ति सच में मुझे नहीं मालूम तुम ही बता दो,,,

नहीं मैं नहीं बता सकती मुझे शर्म आती है,,,,(शरमाते हुए तृप्ति बोली)

इसमें शर्माने जैसी कौन सी बात है अब मुझसे कैसी शर्म,,,

फिर भी,,, मुझे तो सोच कर ही शर्म आ रही है,,,(तृप्ति के चेहरे पर शर्म की लालिमा साफ नजर आ रही थी लेकिन वह कल वाली बात को बताना चाहती थी,,, लेकिन शर्म के मारे उसका बुरा हाल था,,,)

तब जाने दो नहीं बताना है तो चलो आगे चलते हैं,,,,।
(संदीप बहुत चला था वह जानता था कि कल उन आवारा लड़कों में किसी एक ने गंदे शब्दों का प्रयोग किया था और वह जानता था कि वह लड़के ने क्या-क्या बोला था लेकिन वह जानबूझकर अनजान बन रहा था और तृप्ति के मुंह से सुनना चाहता था,,, इसलिए वह चला कि दिखाकर आगे बढ़ने के लिए बोल रहा था,,, संदीप की बात सुनकर तृप्ति बोली,,,)

तुम तो सच में बहुत भुलक्कड़ हो,,,।

तृप्ति में माफी चाहता हूं मैं सच में भूल गया लेकिन तुम हो की बता भी नहीं रही हो,,,

बताना तो चाहती हूं लेकिन शर्म के मारे मेरा बुरा हाल है,,,।

क्या तृप्ति कल के बाद से तुम अभी भी मुझसे शर्म कर रही हो,,, कल याद है ना कितना गरमा-गरम चुम्मा लिया था तुम्हारा,,,।
(इस बात से तृप्ति एकदम से शर्मा गई,,,,,,, धीरे-धीरे बाद दोनों बड़े से पेड़ के नीचे पहुंच गए थे जहां पर कोई नहीं था इधर-उधर देखने के बाद तृप्ति बोली,,,)

कल उसे आवारा लड़कों में एक नहीं क्या कहा था,,,

अरे वही तो मैं भी पूछ रहा हूं,,,,

कैसे कहूं,,, अच्छा कह देती हूं,,,, जब हम वहां से उठकर जाने लगे तभी उनमें से एक लड़का बोला लगता है ,,चुद,,,,,चुद,,,,चुदवाने आई थी,,,(एकदम से हकलाहट और घबराहट भरे स्वर में बोली,,, पहली बार इस तरह के शब्द बोलकर उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी थी,,, और वह शर्म के मारे अपनी नजरों को नीचे झुका ली थी तृप्ति के मुंह से चुदवाने वाले शब्द सुनकर संदीप का लंड हरकत में आ गया था,,,।)

अच्छा यह बात तो इसमें गलत ही किया था आज नहीं तो कल हम दोनों जाने ही वाले हैं,,,।

(संदीप की आवाज सुनकर तृप्ति एकदम से गुस्से में उसे आंख दिखाने लगी तो घबराने का नाटक करते हुए संदीप बोला)

सॉरी मैं तो मजाक कर रहा था,,, चलो कहीं घूमने चलते हैं,,,(संदीप एकदम से बात बदलते हुए बोला)

कहां चले,,,, अभी तो मेरे पास समय नहीं है घर जाना है,,,,

अरे आज की बात नहीं कर रहा हूं तीन दिन बाद अपने मैडम का जन्मदिन है और उन्होंने हम सबको बुलाया ही है।

लेकिन मेरी मम्मी नहीं जाने देगी,,,

अरे उन्हें समझा देना ना,,,, कह देना मैडम का जन्मदिन है सबको बुलाई है उनकी क्लास के जितने बच्चे हैं सबको,,,

ठीक है,,, लेकिन चलेंगे कैसे,,,?

मैं हूं ना तुम बिल्कुल भी फिकर मत करना,,,

ठीक है,,,,(और इतना कहने के साथ ही दोनों मुस्कुराते हुए अपने-अपने रास्ते चल दिए)

सुगंधा का परिवार पूरी तरह से बदलाव के राह पर चल दिया था,,, एक तरफ मां बेटे थे जो एक दूसरे के आकर्षण में धीरे-धीरे एक दूसरे के सामने खुलते चले जा रहे थे और दूसरी तरफ तृप्ति थी जो अपने ही कॉलेज के सहपाठी के साथ,,, मर्यादा की सीमा लांघने के लिए तड़प रही थी,,, एक तरह से सुगंधा का पूरा परिवार जवानी के नशे में चूम रहा था तीनों की अपनी अपनी ज़रूरतें थी जो वह तीनों पूरा करना चाहते थे,,,, एक तरफ सुगंधा थी जो पति के देहांत के बाद अपने परिवार के पालन पोषण में एकाकी जीवन की रही थी लेकिन कुछ महीनो से उसके अंदर बदलाव आना शुरू हो गया था जवानी की तड़प बढ़ती जा रही थी अपने बदन की जरूरत को वह समझने लगी थी और अपनी जवानी की प्यास को अपने बेटे से बुझाया चाहती थी,,,।

दूसरी तरफ अंकित क्योंकि पूरी तरह से जवान हो चुका था औरतों के अंगों के बारे में जानने लगा था यहां तक की अपनी मां को कई बार वह अर्धनग्न अवस्था में संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में देख चुका था जिसे देखकर वह अपने लंड की कठोरता को शांत करने के लिए मूठ मारना भी शुरू कर दिया था,,,, भाभी अपनी मां की तरह ही अपनी मां के साथ हम बिस्तर होना चाहता था अपनी जवानी की प्यास को अपनी मां की जवानी से बुझाना चाहता था,,, और इन सबसे अलग की तृप्ति जिसका आकर्षक और झुकाव परिवार में नहीं बल्कि बाहर के लड़के में था शुरू-शुरू में उसे लड़के की हरकत से वह परेशान हो चुकी थी गुस्सा हो चुकी थी उसे इस तरह की हरकत अच्छी नहीं लगती थी लेकिन धीरे-धीरे उसे भी संदीप की हरकतें अच्छी लगने लगी चुंबन के साथ-साथ स्तन मर्दन उसकी दबी हुई ख्वाहिश को उभारने लगी थी,,, अगर संदीप अपनी तरफ से अपनी हरकत को आगे बढ़ते हुए उसकी दोनों टांगों के बीच पहुंच जाए तो इसमें अब तृप्ति को भी कोई दिक्कत नहीं थी,,,।

लेकिन तीनों में एक बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी मर्यादा और इज्जत,,,, सुगंधा भी अपने बेटे की हरकत को समझने लगी थी उसके अंदर की तभी ख्वाहिश को देखकर अपने बेटे की इच्छा को समझने लगी थी वह जानती थी कि उसका बेटा उसकी तरफ आकर्षित है लेकिन फिर भी वह इतनी ज्यादा अपने बेटे से खुल नहीं गई थी कि सामने से एकदम निमंत्रण दे दे संभोग करने का,,,, और यही बात सुगंधा में भी थी सुगंधा जवानी से भरी हुई थी खूबसूरत और हुस्न से लदी हुई थी वह चाहती तो एक ही साड़ी पर अपने बेटे को अपनी दोनों टांगों के बीच ले लेती लेकिन ऐसा करना किसी रंडी से कम ना होता वह नहीं चाहती थी कि उसका बेटा उसके कहने पर उसके साथ हम बिस्तर हो वह चाहती थी कि यह खेल धीरे-धीरे ऐसे कगार पर पहुंच जाए जहां पर दोनों एक दूसरे में समाने के लिए व्याकुल हो जाए जिसमें किसी भी तरफ से पल ना हो बस मौके और हालात की नजाकत पर निर्भर रखता हो,,,।

और दूसरी तरफ थी तृप्ति वह भी अपनी मां के दिए हुए संस्कारों से बड़ी बड़ी हुई थी लेकिन कॉलेज में पहुंच चुकी तृप्ति के बदन की भी कुछ ज़रूरतें थी दूसरी लड़कियों की तरह वह भी चाहती थी कि उसे भी कोई प्यार करने वाला हूं जो कि संदीप के रूप में उसे मिल गया था लेकिन वह संदीप की फितरत से वाकिफ नहीं थी संदीप उसके बदन को चाहता था उसे भोगना चाहता था लेकिन इसी में तृप्ति को प्यार नजर आता था और तृप्ति भी उसकी हरकत का आनंद ले रही थी जो कि किसी भी वक्त तृप्ति को उसके बिस्तर तक ले जा सकता था जिसके लिए वह अंदर ही अंदर तैयार भी हो रही थी,,,,।

संदीप से मिलने के लिए तृप्ती की बेचैनी हमेशा बढ़ने लगी थी,,,, लेकिन कॉलेज की मुलाकात से उसका मन नहीं भर रहा था,,, वह संदीप से एकांत में मिलना चाहती थी जैसा कि बगीचे में मिली थी लेकिन बगीचे में भी आवारा लड़कों के आवागमन से वह परेशान हो गई थी इसलिए वह संदीप से किसी और जगह मिलना चाहती थी उसे संदीप ने उसे मिलने का अच्छी जगह और बहाना भी बता दिया था,,, लेकिन वहां जाने के लिए उसे अपनी मां की इजाजत लेनी थी, इसलिए घर का काम कर रही है अपनी मां से वह धीरे से बोली,,,।

मम्मी तुमसे इजाजत लेनी है,,,,

मुझसे,,,, कैसी इजाजत,,,?(झाड़ू लगाते हुए एकदम से रुक कर वह तृप्ति की तरफ देखते हुए बोली)

अरे मम्मी हमारे कॉलेज की मेम का जन्मदिन है और उन्होंने सभी को इनवाइट किया है,,,।

जन्मदिन है,,,(ऐसा कहते हुए फिर से झाड़ू लगाने लगी)

हां उनका जन्मदिन है,,,

कहां पर आमंत्रण दी है,,,(एक बार फिर से झाड़ू लगाना रोक कर तृप्ति की तरफ देखते हुए सुगंधा बोली,,,)

उनके घर पर सुबह 10:00 बजे पहुंचना है और फिर शाम को वापस आ जाना है,,,

कौन-कौन जा रहा है,,,?

क्लास के सभी लोग हैं मेरी सहेलियों भी जा रही है,,,

सहेलियां भी जा रही है तो ठीक है,,,, लेकिन जाना कब है,,,,

कल ही जाना है,,,,

ओहहहह,,,, इसका मतलब है कि कल कॉलेज नहीं जाना है,,,,

नहीं मम्मी,,, जब सभी क्लास के लोग जाएंगे तो क्लास में कौन होगा,,,,

सही कह रही हो,,, लेकिन कल पहनोगी क्या,,,?

वो,,,, मम्मी दिवाली पर जो सूट सलवार खरीदी थी ना वही पहन लूंगी अच्छी भी लगती है,,,

हां यह ठीक रहेगा चलो कोई बात नहीं चली जाना लेकिन समय पर घर पर आ जाना वैसे भी लड़कियों का ज्यादा देर तक घर के बाहर रहना ठीक नहीं है,,,।

मम्मी हमारी मेम अच्छी तरह से जानती हैं इसीलिए तो दिन में बुलाएंगे ताकि शाम होते होते सब लोग अपने-अपने घर पहुंच जाए,,,

बहुत समझदार है तुम्हारी मैडम,,,,, अच्छा तो जल्दी से सब्जियां काट दे,,,, मैं तब तक सफाई कर देती हूं,,,

ठीक है मम्मी,,,(और इतना कहने के साथ ही वह भी खुशी-खुशी सब्जी काटने लगी वह इस बात से खुश थी कि मैडम के जन्मदिन पर जाने की वजह से कुछ देर से संदीप के साथ वक्त गुजारने को जो मिल जाएगा,,, वक्त गुजारने के साथ-साथ संदीप की हरकतों का आनंद लेने की उत्सुकता उसके अंदर बढ़ती जा रही थी वह जानती थी कि संदीप अगर उसके पास रहेगा तो उसकी हरकत भी जारी रहेगी वह एक नया एक बहाने से उसके अंगों को स्पर्श करेगा तब आएगा छूएगा चुंबन करेगा और यह सब उसे अच्छा लगेगा,,,,।

अपनी मां से इजाजत मिलने के बाद मैं बहुत खुश थी वह रात को ही पहनने के लिए अपना सूट सलवार निकाल ली थी जो की पीले रंग का शूट ओर ब्राउन रंग की सलवार उसके गोरे रंग पर बहुत अच्छी लगती थी,,,, सुबह जल्दी उसकी नींद खुल गई और वह तैयार होने के लिए बाथरूम में चली गई,,, बाथरूम में प्रवेश करते ही वह अपने बदन से एक-एक करके सारे कपड़ों को उतार कर एकदम नंगी हो गई और अपने नंगे बदन को ऊपर से नीचे नजर उठाकर घूमा कर देखने लगी,,,, अपने गोरे रंग पर और अपने बदन की बनावट पर तृप्ति को गर्व महसूस हो रहा था और अपनी चूची की तरफ देखकर तो अपने आप ही उसके गोरे गाल शर्म के मारे सुर्ख लाल होने लगे,,, उसे अपनी चूची देखकर संदीप की हरकत याद आ गई जो कुर्ती के ऊपर से उसकी चूची को जोर-जोर से दबा रहा था,,,, और अपनी चूची चाहिए बात करते हुए धीरे से बोली,,,।

बड़ा जालीम है ना संदीप,,, तुम्हें बहुत जोर से दबाता है ना,,, तुम कुछ कहती क्यों नहीं उससे कहना चाहिए ना कि दर्द होता है धीरे से दबाए,,,,(ऐसा कहते हुए अपने दोनों हाथों से अपनी चूची को थाम ली और अपने आप ही उसे दबाते हुए बोली,,) लेकिन कर भी क्या सकती हो तुम्हें दबाने से उसे मजा भी तो बहुत आता है,,,,सहहहह जालिम अगर हरामजादे को ना रोको तो उसका बस चले तो तुम्हें खा ही जाए,,,,(ऐसा कहते हुए उसकी नजर अपनी दोनों टांगों के बीच चली गई तो देखी कि उसकी बुर पर हल्के हल्के बाल उगे हुए हैं और अपने बुर पर उगे हुए हल्के बालों को देखकर उसे याद आया कि उसकी मम्मी बाथरूम में ही बीट क्रीम को छुपा कर रखती हैं,,, जिसका वह खुद कई बार उपयोग कर चुकी है बीट क्रीम का ख्याल आते हैं उसकी दोनों टांगों के बीच उस पतली दरार में हलचल मचने लगी,,,।

वह तुरंत बाथरूम के अंदर ही ऊपर की तरफ थोड़ी सी जगह थी उसे जगह में थोड़ा कपड़ा भरा हुआ था जब वह उसे कपड़े को हटाई तो अंदर बीट क्रीम पड़ा था और बीट क्रीम को अपने हाथ में लेकर उसके चेहरे पर मुस्कान करने लगी वह जल्दी से क्रीम निकाल कर उसे अपनी बुर के बालों पर अच्छी तरह से लगा ली,,, और 5 10 मिनट तक इंतजार करने लगे उसे अपनी बर पर क्रीम लगाने में आज बेहद शर्म और उत्तेजना का अनुभव हो रहा था वैसे तो उसे संदीप के साथ केवल वक्त गुजारना था लेकिन उसे खुद समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी बुर क्यों चिकनी कर रही थी,,, अपने मन में उठ गए इस सवाल का जवाब उसे खुद समझ में नहीं आ रहा तेरे कर उसके मन में अनजाने में ख्याल आ जा रहा था कि संदीप से चुदवाने जा रही है,, और अपने ही मन में आए इस तरह के ख्याल से वह शर्म से पानी पानी हो जा रही थी,,,,।

देखते ही देखते 10 मिनट गुजर जाने के बाद अपनी पेंटिं को हाथ में लेकर उससे बुर पर लगी क्रीम को साफ करने लगी जिसके साथ उसकी झांट के बाल भी एकदम साफ होते जा रहे थे और देखते ही देखते उसकी पूरे एकदम मलाई की तरह चीकनी हो गई अपनी बर देखकर खुद उसके मुंह में पानी आ रहा था और वह अपनी हथेली को अपनी बर पर रखकर अपनी गुलाबी पतली दरार को अपनी हथेली के नीचे छुपा ली और अपने मन में सोचने लगी की जब इस पर संदीप का हाथ स्पर्श करेगा तब उसकी क्या हालत होगी,,, यह सोचकर उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी,,,,, और फिर जल्दी-जल्दी नहा कर वह बाहर आ गई,,,।

उसकी मां भी उठ गई थी और वह झाड़ू लगा रही थी,,, झाड़ू लगाते हुए वह उससे बोली,,,।

तू छोड़कर तैयार हो गई है लेकिन अभी राजकुमार सो रही जाकर उन्हें भी तो जगा दो,,,,।

अभी अंकित उठा नहीं,,,!(आश्चर्य जताते हुए दीवार में टंगी घड़ी की तरफ देखते हुए तृप्ति बोली)

नहीं अभी नहीं उठा है जाकर जल्दी से जगा दे,,,,।

ठीक है मम्मी पहले कपड़े पहन लु,,,(वह केवल टावल में ही थी,,,,)

ठीक है लेकिन जल्दी करना देर हो रही है फिर जल्दी-जल्दी करेगा तो नाश्ता किए बिना चला जाएगा,,,,

ठीक है मम्मी मैं जल्दी से जगा देती हूं,,,(और इतना कहने के साथ ही तृप्ति अपने कमरे में चली गई और फिर जल्दी-जल्दी कपड़े पहन कर अंकित को जगाने के लिए उसके कमरे में जाने लगी दरवाजे पर पहुंची तो दरवाजे की कड़ी बंद नहीं थी क्योंकि दरवाजे पर हाथ रखते ही दरवाजा अपने आप खुल गया था और वह धीरे से कमरे में प्रवेश कर गई,,,, वह अपनी ही धुन में थी देखते देखते हो अपने भाई के बिस्तर के करीब पहुंच गई और जब वह अपने भाई को आवाज लगाने ही वाली थी तो उसकी नजर अंकित पर पड़ी और अंकित पर नजर पढ़ते ही उसके तो हो सके उसकी आंखें फटी की फटी रह गई और उसका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया,,,।

इसमें तृप्ति का दोष बिल्कुल भी नहीं था,,,,, नजर ही कुछ ऐसा था कि अगर उसकी जगह कोई और होती तो उसकी भी हालत तृप्ति की तरह ही होती,,,, तृप्ति की सांस ऊपर नीचे होने लगी थी क्योंकि बिस्तर में उसका भाई उनकी पूरी तरह से नग्न अवस्था में सोया हुआ था उसके बदन पर ना तो कपड़ा था और ना ही चादर और पूरी तरह से नंगा बिस्तर पर सोया हुआ था और इस हालत में उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर छत की तरफ मुंह उठाई खड़ा था,,, तृप्ति को अपने भाई के कमरे में इस तरह के नजारे की अपेक्षा बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए तो उसके होश उड़ गए थे और वह कभी सोचा नहीं थी कि वह अपने भाई को इस रूप में देखेगी,,,।

तृप्ति को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें बार-बार उसकी नजर ना चाहते हुए भी अपने भाई के खड़े लंड पर चली जा रही थी,,,, तृप्ति अपने जीवन में पहली बार एक जवान लड़के के लंड को देख रही थी और वह भी अपने ही भाई के,,, उसे तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था वह तो हैरान इस बात से थी कि क्या लंड ऐसा होता है इतना मोटा तगड़ा लंबा एकदम मुसल की तरह बाप रे,,, उसके मन में ही यह शब्द निकल पड़े वाकई में तृप्ति के लिए लड की लंबाई और चौड़ाई उसकी मोटाई सब कुछ हैरान कर देने वाली थी वह बड़ी गौर से अपने भाई के लंड को देख रही थी और दरवाजे की तरफ देख ले रही थी उसे इस बात का डर था कि कहीं उसकी मां दरवाजे पर न जाए,, वह खुद कमरे से बाहर निकल जाना चाहती थी लेकिन जवानी की कशिश उसे रोके हुए थी बार-बार वह अपने भाई के लंड को ही देख रही थी,,, और अनजाने में ही उसके मन में यह खेला गया कि संदीप का भी क्या ऐसा ही होगा,,,, इस ख्याल से उसके तन-बदन में अजीब सी हलचल होने लगी,,,।

तृप्ति को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें अगर इस अवस्था में वह अपने भाई को जगाती है तो उसके भाई के साथ-साथ वह खुद शर्मिंदगी से भर जाएगी और अगर बिना जगाए चली जाती है तो उसकी मां जगाने के लिए कमरे में आ जाएगी और अपने बेटे की इस हालत को देखकर वह भी न जाने क्या सोचेगी और वह भी समझ जाएगी की उसकी बेटी तृप्ति ने भी इस नजारे को अपनी आंखों से देख ली है,,,, इसलिए वह सोच समझ कर धीरे-धीरे कमरे से बाहर गई और दरवाजे को बाहर से बंद करके उसकी कड़ी को जोर-जोर से बजाने लगी,,,।

अंकित,,, कब तक सोता रहेगा ऊठ जा देर हो रही है,,, (तृप्ति के एक दो बार आवाज लगाने से अंकित की नींद खुल गई और वह अपनी हालत को देखा तो एकदम से घबरा गया रात को हुआ अपनी मां के ख्यालों में अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा हो गया था और अपनी मां को याद करके अपनी मां के बारे में गंदी कल्पना करके अपने लंड को हिलाकर मुठ मारा था उसे सब कुछ याद आते ही जल्दी से बिस्तर पर से उठा और बोला,,,)

हां दीदी आया,,,,।

(उसकी आवाज सुनकर तृप्ति अपने मन में ही बोली शुक्र है उठ तो गया,,,,)

चल जल्दी तैयार हो जा देर हो रही है,,,।

आया दीदी,,,,(इतना कहकर वह भी जल्दी से अपने कपड़े पहनने लगा,,,,,।

दूसरी तरफ नाश्ता करके तृप्ति जाने के लिए तैयार हो गई थी जाने से पहले वह रसोई घर में काम करिए अपनी मां से बोली,,,)

मम्मी में जा रही हूं सहेलियां इंतजार कर रही होगी,,,।

ठीक है समय पर आ जाना,,,,

जल्दी आ जाऊंगी मम्मी तुम चिंता मत करो,,,,
(और इतना कहकर वह घर से निकल गई,,,, संदीप ने उसे पहले ही बता रखा था कि कहां आना है इसलिए उसके बताएं अनुसार इस जगह पर तृप्ति पहुंच गई और थोड़ी ही देर में वहां संदीप भी आ गया अपनी मोटरसाइकिल लेकर,,,, मोटरसाइकिल को देखकर तृप्ति बोली,,,)

तुम्हारे पास मोटरसाइकिल भी है,,,।

दो है एक पापा ले जाते हैं एक ऐसे ही पड़ी रहती है जब कभी काम पड़ता है तो मैं ही चलाता हूं,,,

तब तो अच्छा है जल्दी जाएंगे जल्दी आ जाएंगे,,,,

हां इसीलिए तो मैं मोटरसाइकिल लेकर आया हूं और वैसे आज तो तुम एकदम माल लग रही हो,,,,(तृप्ति को ऊपर से नीचे की तरफ चलते हुए संदीप बोला तो अपने लिए माल शब्द सुनकर तृप्ति गुस्सा दिखाते हुए बोली,,,)

क्या बोले,,,,,?

कककक ,,, कुछ नहीं मैं तो यह कह रहा हूं कि आज तो तुम एकदम परी लग रही हो,,,(उसका इतना कहते हैं संदीप के साथ-साथ तृप्ति मुस्कुराने लगी और वह उसके पीछे मोटरसाइकिल पर बैठकर जल्दी मैडम के घर,,,)

तृप्ति घर से निकल गई थी एक नए सफर के लिए,,, यह पहली बार था जब वह कहीं जाने के लिए अपनी मां से इजाजत मांगी थी और उसकी मां भी खुशी-खुशी उसे जाने की इजाजत दे दी थी क्योंकि वह कहीं और नहीं बल्कि अपने ही कॉलेज की मैडम की जन्मदिन पर जा रही थी पर वह भी शाम तक वापस लौट आना था इसीलिए उसकी मां ने उसे इजाजत दे दी थी,,,, तृप्ति बहुत खुश थी पीले और ब्राउन रंग के सूट सलवार में वह परी लग रही थी,,,, और इस कपड़े में देखकर संदीप भी लार टपकाने लगा था,,, तभी तो वह तृप्ति को माल कहकर संबोधन किया था जिसका तृप्ति ने भी हंस कर स्वागत की थी,,,,। संदीप अपना मोटरसाइकिल लाया था यह जानकार तृप्ति बहुत खुश थी,,, क्योंकि खुद का मोटरसाइकिल होने की वजह से आने जाने का समय बच जाता,,,,।

तृप्ति मोटरसाइकिल के पीछे बैठ गई थी,,, यह उसका पहला मौका था जब वह कीसी लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर बैठी थी,,, वैसे तो आते जाते वह कई लड़कियों को इसी तरह से जवान लड़कों के पीछे बैठकर आते-जाते देखी थी और उन्हें देखकर वह भी अपने मन में यही सोचती थी कि उसका दिन कब आएगा जब वह अभी इसी तरह से मोटरसाइकिल पर बैठकर शहर घूमेगी,,, और ऐसा लग रहा था कि जैसे आज बहुत दिन आ गया था जब वह अपनी ख्वाहिश पूरी कर रही थी,,,,।

तर्प्ति बहुत खुश थी,,, लेकिन तभी उसे सुबह वाला वाक्या याद आ गया,,, और पल भर में उसके चेहरे पर सुर्ख लालीमा छाने लगी,,, उस पल के बारे में सोचकर,,, तृप्ति की सांसें ऊपर नीचे होने लगी, क्योंकि वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि अपने भाई के कमरे में उसे इस तरह के दृश्य देखने को मिलेगा,,, वह कभी सोची नहीं थी कि उसका भाई सारे कपड़े उतार कर नंगा होकर सोता होगा,,, तृप्ति इतना भी बर्दाश्त कर लेती लेकिन अपने भाई को नंगा देखने पर और उसके नंगे पन की चरम सीमा को देखकर खुद उसके होश उड़ गए थे,,,, जिंदगी में पहली बार वो किसी मर्दाना लंड को अपनी आंखों से देख रही थी और वह भी किसी गैर मर्द के नहीं बल्कि अपने ही भाई के लंड को,,,।

लंड की शक्ल सूरत और उसका भूगोल देखकर उसके होश उड़ गए थे,,, वह कभी सपने भी नहीं सोची थी कि मर्दों का लंड इतना बम पिलाट होता है,,, इतना मोटा लंबा और तगड़ा जिसमें बिल्कुल भी लचक नहीं थी और छत की तरफ मुंह उठाए खड़ा था,,, जवान लड़की के लिए यह दृश्य पूरी तरह से कामोत्तेजना से भरा हुआ होता है,,, लड़की के ही क्यों हर उस औरत के लिए जिनकी टांगों के बीच जवानी बरकरार रहती है,,, ऐसी हर एक औरत के लिए यह दृश्य,,, मादकता का काम करती है,,,, और वही मादकता तृप्ति के दिलों दिमाग पर छाया हुआ था,,,, वह मोटरसाइकिल पर बैठकर संदीप के साथ कॉलेज की मैडम के वहां जा रही थी लेकिन उसका दिमाग पूरी तरह से अपने भाई के लंड पर टिका हुआ था,,, कॉलेज में पढ़ने वाली पढ़ी लिखी लड़की होने के साथ-साथ तृप्ति, पूरी तरह से जवान हो चुकी थी,, मर्द औरत के बीच के रिश्ते को अच्छी तरह से समझती थी और वह यह भी जानती थी कि उत्तेजित होने पर ही मर्द का लंड खड़ा होता है,,, और यही जानकारी उसे अचंभित कर रही थी अपने भाई के पक्ष में,,, क्योंकि सुबह-सुबह उसका भाई तो पूरी तरह से गहरी नींद में सो रहा था उत्तेजित करने वाली एक भी वस्तु या स्त्री उसके भाई के समीप बिल्कुल भी नहीं थे तो उसका भाई किसी भी उत्तेजित हो रहा था और उसकी उत्तेजना का मापदंड तृप्ति उसके लंड के खड़े होने पर लगा रही थी और इसीलिए तो वह हैरान थी,,,।

लेकिन वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि सहज और प्राकृतिक रूप से सुबह-सुबह हर मर्द का लंड खड़ा ही रहता है,,, ज्यादातर पेशाब की तीव्रता की स्थिति मे,,, लेकिन ईस ज्ञान से तृप्ति पूरी तरह से अंजान थी,,,, अपने भाई का ख्यालों से पूरी तरह से उत्तेजित किए जा रहा था जिसका असर उसे अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में महसूस हो रहा था,,, उसे अपनी पेंटिं गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, क्योंकि उसकी बुर से कम रस टपक रहा था,,,, तृप्ति कुछ बोल नहीं रही थी,,, वह खामोश थी,, और उसे खामोश देखकर संदीप बोला,,,।

क्या हुआ तर्प्ति कुछ बोल क्यों नहीं रही हो,,,।

नहीं कुछ नहीं,,,बस ऐसै ही,,,,।

(तृप्ति अपनी और संदीप के बीच हाथ रख कर बैठी हुई थी और ऐसा लग रहा था कि जैसे वह अपनी और संदीप के बीच हाथ की दीवार खड़ी करके रखी हो ताकि दोनों का बदन आपस में स्पर्श न हो और संदीप बार-बार कोशिश भी कर रहा था ब्रेक लगा कर की झटका खाकर त्रप्ती का बदन उसकी पीठ से स्पर्श हो जाए,,, लेकिन तृप्ति के कारण ऐसा हो नहीं पा रहा था इसलिए संदीप बोला,,,)

कंधे पर हाथ रख कर बैठ जाओ,,,, तब आराम से बैठ पाओगी,,,,।
(संदीप जानबूझकर तृप्ति को अपने कंधे पर हाथ रखने के लिए बोल रहा था क्योंकि वह जानता था कि जब वह उसके कंधे पर हाथ रखेगी तो उसका हाथ ऊपर की तरफ हो जाएगा और ऐसे हालात में,,, जब भी ब्रेक लगाने पर उसका बदन उसकी पीठ से स्पर्श होगा तो उसकी चूचियां भी उसकी पीठ से रगड़ खा जाएंगी,,,, और ऐसा ही हुआ,,, संदीप के कहने पर तृप्ति अपना हाथ उसके कंधे पर रख दी थी,,, और जब जब संदीप ब्रेक लग रहा था तब तब उसके एक तरफ का संतरा उसकी पीठ से दब जा रहा था और उसकी नरमाहट संदीप को अपनी पीठ पर बहुत अच्छे से महसूस हो रही थी जिसके कारण वह अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रहा था,,, उसे बहुत मजा आ रहा था और इस बात का एहसास तृप्ति को भी हो रहा था तृप्ति को भी पता चल रहा था कि जब-जब संदीप ब्रेक लग रहा था तब तक वह एकदम से संदीप से सट जा रही थी,,, और उसकी चूची भी उसकी पीठ से दब जा रही थी,,,।

इन सबके बावजूद भी तृप्ति को बिल्कुल भी संदीप से ऐतराज नहीं हो रहा था बल्कि ना जाने क्यों उसके बदन में मदहोशी का आलम उबाल मार रहा था उसे संदीप के हरकत बहुत अच्छी लग रही थी जब जब ब्रेक लगाने पर उसकी चूची संदीप की पीठ से रगड़ खाती थी तब तब उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी,,,,,,एक तो अपने भाई के लंड का ख्याल और ऊपर से संदीप की हरकत की वजह से उसकी चुचियों का उसकी पीठ से रगड़ खाना कुल मिलाकर उसकी पेंटिं को पूरी तरह से गीली करने पर उतारू हो गए थे,,,,,,।

पहली बार इस तरह का एकांत दोनों को मिला था लेकिन फिर भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे क्योंकि दोनों अपने-अपने तरीके से एक दूसरे से मजा ले रहे थे,,,, तर्प्ति की चूची की रगड़ से संदीप का लंड खड़ा हो गया था,,, और इस एहसास से तृप्ति की बुर पानी छोड़ रही थी,,, और इसी आनंद की पराकाष्ठा में दोनों एक दूसरे से बात करना भूल गए थे नतीजन मैडम का घर आ गया था,,,, वैसे तो दोनों यही सोच रहे थे कि यह सफर कभी खत्म ना हो लेकिन एक दूसरे में दोनों इस तरह से डूब गए थे कि सफर की दूरी का पता ही नहीं चला,,,।

यही है मैडम का घर,,,,(संदीप एकदम बड़े से दरवाजे के आगे मोटरसाइकिल रोक दिया था जिससे तृप्ति अंदाजा लगाते हुए बोल रही थी और वाकई में जिस दरवाजे के आगे दोनों रुके थे वही घर मैडम का था,,,,,)

हां यही है,,,,।

लेकिन देख कर लग तो नहीं रहा है कि मैडम का जन्मदिन है,,,,

,,, हां,,, ऐसा भी हो सकता है कि हम दोनों सबसे पहले पहुंच गए हो,,,,चलो चलकर देखते हैं,,,,

(संदीप मोटरसाइकिल खड़ी करके गेट खोल के अंदर जाने लगा और पीछे-पीछे तृप्ति भी जाने लगी,,,, दरवाजे के आगे पहुंचकर संदीप डोर बेल बजा दिया,,, थोड़ी ही देर में दरवाजा खुला और दरवाजे पर मैडम खड़ी थी दोनों को देखकर मुस्कुराने लगी,,, मैडम को देखकर संदीपबोला,,,)

हैप्पी बर्थडे मैडम,,,, साथ में त्रप्ती भी मैडम को जन्मदिन की बधाई दी,,,।
(मैडम एकदम से खुश होते हुए बोली)

अच्छा हुआ संदीप तुम पहले आ गए,,,

पहले आ गए मतलब,,,,।

‌ मेरा मतलब है कि अभी बाकी बच्चों का आना बाकी है और अच्छा हुआ तुम आ गए,,, क्योंकि जल्दी आ गए हो तो काम में हाथ भी बंटा लोगे,,,।

यह तो हमारा सौभाग्य है मेडम,,(संदीप बोलता है इससे पहले ही तृप्ति बोल पड़ी,,, और तृप्ति,, की तरफ देखते हुए मैडम बोली,,,)

तुम्हारा नाम,,,,,,(कुछ सोचते हुए मैडम बोली)

मैडम इसका नाम तृप्ति है और यह भी अपनी ही कॉलेज में पढ़ती है,,,(संदीप मैडम से तृप्ति को मिलाते हुए बोला,,,,)

ओहहहह,,,,, तुम दोनों बाहर क्यों खड़े हो आओ जल्दी अंदर आओ,,,, और जल्दी से मेरे काम में हाथ बंटाओ,,,।

(इतना कहकर मैडम इन दोनों को घर में ले आई और उन दोनों को एक कमरे में लेकर गई जहां पर वह खुद सब्जी काटने बैठी हुई थी,,,, और वह संदीप और तृप्ति से बोली,,,)

बाकी का सब काम तो हो गया है लेकिन सब्जियां काटना रह गया है बस यही काम हो जाए तो छुटकारा हो जाए वैसे भी मेरे बच्चे केक लेने गए हैं,,, वैसे मैं ज्यादा लोग को बुलाई नहीं हूं लेकिन बहुत खास खास को बुलाई हुं ,,,,,(इतना कहकर मैडम वहीं पर बैठ गई और फिर से सब्जी काटने लगी मैडम को सब्जी काटता हुआ देखकर तृप्ति बोली,,,)

अरे अरे मैडम यह आप क्या कर रही है मेरे होते हुए आपको यह सब करने की जरूरत नहीं है,,,,।
(इतना सुनते ही मैडम तृप्ति की तरफ देखने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

तुम कर लोगी ना,,,,

जी मैडम मैं कर लूंगी मेरा तो रोज का काम है,,,,।

हां,,, हां,,,, मैडम हम दोनों यह काम कर लेंगे मैं भी सब्जी काटने में अपनी मां की मदद करता ही रहता हूं,,,,।

ओहहहह ,,, तुम दोनों कितने अच्छे हो,,,,,।

हम कर लेंगे मैडम आप चिंता ना करें आप दूसरा काम संभालो,,,,(इतना कहते हुए तृप्ति वहीं बैठ गई सब्जी काटने के लिए और तृप्ति की बात सुनकर मैडम बोली,,,)

तुम दोनों कितने अच्छे हो अच्छा हुआ तुम दोनों पहले आ गए वैसे तो अब कुछ काम बचा नहीं है बस मुझे नहाना है और अगर तुम दोनों यह काम कर लोगे तो हमें जल्दी से जाकर नहा लूंगी और फिर खाना तो जल्दी बनजाएगा,,,।

कोई बात नहीं मैडम आप जल्दी से जाकर नहा लीजिए तब तक हम दोनों सब्जी काट लेते हैं,,,,।

ठीक है,,,,(और इतना कहने के साथ ही मैडम नहाने के लिए चली गई,,,, मैडम के जाते ही तृप्ति बोली)

लो यहां तो अभी खाना ही नहीं बना है,,,, लगता है सारा काम हम लोगों को ही करना होगा,,,।

अरे वह बात छोड़ो लेकिन यह तो देखो मैडम हम दोनों को कमरे में अकेला छोड़ कर चली गई नहाने,,,,

तोक्या हुआ,,,?(सब्जी काटते हुए तृप्ति बोली,,,)

तो क्या हुआ,,,, समझ नहीं रही हो एक जवान लड़का और एक जवान लड़की कमरे में इस तरह से अकेले रहेंगे तो क्या होगा,,,,।

क्या होगा,,,,?(तृप्ति संदीप के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रही थी इसलिए संदीप की तरफ देखे बिना ही वह शर्म के मारे नजर नीचे झुकाए हुए सब्जी काटते हुए बोली)

यह पूछो क्या नहीं होगा,,,,,(और इतना कहने के साथ ही बैठे-बैठे ही संदीप अपने प्यास होठों को तृप्ति के देखते हुए होठों की तरफ आगे बढ़ने लगा संदीप की हरकत से तृप्ति के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी,, एक तो सुबह का नजारा और फिर बाइक पर चुचियों का रगड़ खाना यह सब पहले से ही तृप्ति के तन बदन में आग लगाया हुआ था,, और अभी यह कमरे में एकांत कुल मिलाकर तृप्ति को मदहोश कर रहा था और देखते ही देखते संदीप भी अपने होठों को एकदम उसके होठों के करीब ले गया इतना करीब कि दोनों की सांस एक दूसरे के गालों पर अपनी गर्माहट का एहसास दिलाने लगी,,,, संदीप की हरकत की वजह से तृप्ति के बदन में मदहोशी का नशा छाने लगा उसकी सांस उखड़ने लगी और उसकी आंखें अपने आप बंद हो गई यही मौका देखकर संदीप अपने प्यासे होठों को,,, तृप्ति के दहकते हुए होठों पर रख दिया,,, और मानो,,, तृप्ति भी इसी मौके का इंतजार कर रही हो वह तुरंत अपने होठों को खोल दी और गरमा गरम चुंबन में पूरा सहकार देने लगी दोनों पूरी तरह से पागल हो गए दोनों के हाथों से सब्जी काटने वाला चाकू छोड़कर नीचे गिर गया और दोनों एक दूसरे की बाहों में समाने लगी देखते ही देखते संदीप अपना हाथ आगे बढ़ाकर कुर्ती के ऊपर से ही,,, उसकी चूचियों को दबाना शुरू कर दिया।

संदीप की हरकत से तृप्ति के बदन में उत्तेजना और गर्माहट दोनों पूरी तरह से अपना असर दिखाने लगी,,, उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी वह पागल हुए जा रही थी देखते ही देखते संदीप उसके दोनों संतरों को पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया,,,, जिस उत्तेजना के साथ संदीप उसकी चूचियों को दबा रहा था उसे तृप्ति,, को दर्द का एहसास तो हो ही रहा था लेकिन आनंद भी बेहद मिल रहा था,,, दोनों का चुंबन इतना गहरा था कि दोनों के लार और थुक एक दूसरे के मुंह में आदान-प्रदान हो रहे थे,,, दोनों पूरी तरह से पागल हो जाएंगे उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं थी कि दरवाजा खुला हुआ है वह तो गनीमत था कि मैडम नहाने के लिए बाथरुम में चली गई थी,,,।

दोनों की हालत खराब हो गई थी इस तरह के एकांत में तृप्ति पूरी तरह से उत्तेजित हो गई थी उसकी बुर से मदन रस लगातार बह रहा था,,,, उसकी बाहों को पड़कर संदीप उसे खड़ी कर दिया और कुछ पल के लिए उसके होठों से अपने होठों को दूर करके उसके खूबसूरत चेहरे को देखने लगा पल भर में ही तृप्ति का गोरा चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया था,,, तृप्ति की सांस ऊपर नीचे हो रही थी साथ में उसकी चूचियां भी लहरा रही थी,,,।

संदीप,,, हमें यह नहीं ,,,, करना चाहिए,,,,(एकदम मदहोश होते हुए गहरी सांस लेते हुए वह बोली तो संदीप बोला)

ऐसा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा तृप्ति,,,,

लेकिन समझने की कोशिश करो मैडम भी इधर ही है,,,।
( खेला खाया संदीप,, तृप्ति की बातों से ही समझ गया कि उसका भी मन है,,,, इसलिए वह धीरे से दरवाजे को बंद करतेहुए बोला,,,)

मैडम की चिंता मत करो वह बाथरूम में है,,,,।

तो,,(गहरी सांस लेते हुए तृप्ति बोली)

तो,,, क्या,,, इस मौके का फायदा उठाना चाहिए,,,,(और इतना कहने के साथ ही फिर से अपने होठों को उसकी तरफ आगे बढ़ाने लगा और देखते ही देखते फिर से दोनों एक दूसरे के होठों को चूसना और चबाना शुरू कर दिए,,,, तृप्ति पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है बस वह संदीप की हरकतों का मजा ले रही थी और संदीप अपनी हरकत को धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहा था,,,, उसकी चूचियों पर से उसके दोनों हाथ नीचे की तरफ फिसलते उसकी कमर पर आ गए थे और कमर पर आते ही वह धीरे से अपने हाथों को उसकी गोल-गोल नितंबों पर रख दिया था नितंबों पर संदीप के हाथों का स्पर्श इसे पूरी तरह से मदहोश कर रहा था वह पागल हुए जा रही थी और पागलों की तरह संदीप के होठों को चूस रही थी संदीप भी अपनी हरकत को अनजान देते हुए उसके नितंबों को दोनों हथेलियां में कसकर दबा दबा कर मजा ले रहा था,,,,,।

संदीप समझ गया था कि तृप्ति चुदवाने के लिए तैयार हो गई है,,,, इसलिए उसकी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर उसे एकदम से अपने लंड पर सता लिया और ऐसा करने पर उसका लंड जो कि पेंट में तनकर खड़ा हो गया था वह सीधे-सीधे उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर उसकी बुर पर दस्तक देने लगा,,, तृप्ति को संदीप के लंड का एहसास अपनी बुर पर बहुत अच्छी तरह से हुआ था इसलिए उसके मुंह से हल्की सी शिकारी फूट पड़ी थी,,, और उसकी सिसकारी की आवाज सुनकर संदीप एकदम से चुदवासा हो गया और उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर उसे उठाते हुए पास में ही पड़े टेबल पर बैठा दिया,,,,।

संदीप से अब रख पाना बहुत मुश्किल था क्योंकि जवानी का पर पूरी तरह से पार कर गया था इससे अच्छा मौका संदीप को मिलने वाला नहीं था इस तरह का एकांत उसे फिर दोबारा मिलने वाला नहीं था ऐसा एहसास उसके मन में होते ही वह तुरंत तृप्ति के सलवार की डोरी को खोलने लगा,,,, संदीप को इस तरह से सलवार की डोरी खोलता हुआ देखकर वह अपना हाथ बढ़ाकर उसे रोकने की कोशिश करने लगी लेकिन वह उसका हाथ हटा दिया और दोबारा तृप्ति में उसे हटाने की रोकने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि अंदर से वह भी यही चाहती थी जो संदीप चाहता था देखते-देखते वह है तृप्ति की सलवार की डोरी खोलकर उसकी सलवार को ढीली कर दिया था और पेटी सहित उसे पड़कर उसके घुटनों तक खींच दिया था,,,,।

संदीप की हरकत से तृप्ति पानी पानी हो रही थी उसकी बुर लगातार पानी छोड़ रही थी,,, दोनों के बीच किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थी लेकिन पूरे कमरे में दोनों की गरमा गरम सांसो की आवाज ही गुंज रही थी,,,, संदीप की हर हरकत तृप्ति को बहुत ही अच्छी लग रही थी तृप्ति पूरी तरह से मदहोशी के आलम में हो गई थी,,, वह जवानी के नशे में डूब चुकी थी संदीप उसकी दोनों टांगों को उसके घुटनों से मोड कर उसकी गोल गोल गांड को देख रहा था और गांड की बीच उसकी गुलाबी बुर को देख रहा था,,, और उसकी बुर को देखकर उसके मुंह में पानी आ रहा था,,,, क्योंकि उत्तेजना के मारे उसकी बुर फुलकर कचोरी हो गई थी,,, संदीप की अनुभवी आंखें में तृप्ति की बुर को देखकर पहचान लिया था कि आज ही उसने क्रीम लगाकर उसे साफ की थी,,,, तृप्ति संदीप के हर हरकत को देख रही थी,,,,।

संदीप का मन तो कर रहा था कि तृप्ति की बुर को जीभ लगाकर चाटे,,, लेकिन वह जानता था कि इतना समय उसके पास बिल्कुल भी नहीं है वह तृप्ति की बुर में अपनी विजय पताका लहराना चाहता था,, इसलिए वह इस समय ज्यादा कुछ ना करते हुए अपनी हथेली को उसकी बुर पर रखकर उसे ज़ोर से मसलते हुए अपनी पेंट का बटन खोलने लगा,,,,।

संदीप के द्वारा हथेली से बुर को रगड़ने की वजह से उत्तेजना के चलते तृप्ति की आंखें एकदम से बंद हो गई थी,,,, और वह गहरी गहरी सांस लेने लगी थी लेकिन फिर वह अपनी आंखों को खोलकर संदीप की तरफ देखने लगी थी उसकी हरकतों को देखने लगी थी वह अपनी पेंट खोल रहा था और देखते-देखते वह अपनी पेट को घुटनों तक नीचे खींच दिया था लेकिन जैसे ही तृप्ति की नजर संदीप के लंड पर गई तो उसके होश उड़ गए,,,, वह अपने मन में ही सोचने लगी कि सुबह जो देखी थी उससे तो इसका आधा भी नहीं है,,,, तृप्ति,,, को कुछ समझ में नहीं आ रहा था,,, जब तक वह अपने भाई का नहीं देखी थी तब तक उसके मन में लड के आकार को लेकर वास्तव में संदीप के लंड के आकार का ही वास्तविक लंड नजर आता था,,, लेकिन सुबह अपने भाई के बम पिलाट लंड के दर्शन करने के बाद संदीप का लंड उसे बहुत छोटा लग रहा था,,,,।

लेकिन फिर भी उसकी उत्तेजना परम सीमा पर थी वह पूरी तरह से चुदवाने के लिए तैयार हो चुकी थी,,, और संदीप उसे चोदने के लिए तैयार हो गया था,,,, लेकिन जैसे ही संदीप ने थूक को लगा कर अपने लंड को गीला किया वैसे ही डोर बेल बजने लगी,,, उसके तो होश उड़ गए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,,, समय की सीमा रेखा को देखकर ही वह तृप्ति की बुर को चाटने का सुख छोड़कर एक बार उसने अपना लंड डालना चाहता है अपनी ख्वाहिश पूरी करना चाहता था और इसके लिए वह पूरी तरह से तैयार भी हो चुका था दरवाजे की घंटी बजाने के बावजूद भी वह एक हाथ में लंड पड़कर दूसरे हाथ से तृप्ति की दोनों टांगो को ऊपर उठाते हुए उसकी बुर में डालने जा रहा था कि लगातार डोर बेल बजाने की वजह से बाथरूम में से ही उसके मैडम ने आवाज लगाते हुए बोली,,,)

संदीप जल्दी से दरवाजा खोल दे बच्चे आ गए होंगे,,,,।

रहने दो संदीप,,,(लगातार डोर बैल और मैडम की आवाज सुनकर तृप्ति एकदम से घबरा गई और तुरंत टेबल पर से नीचे उतर कर अपनी सलवार की डोरी बांधने लगी,, संदीप भी समझ गया था कि अब उसके बस में कुछ भी नहीं है इसलिए वह भी अपने आप को व्यवस्थित करके दरवाजा खोलने के लिए चला गया,,, और तृप्ति वापस से सब्जी काटने लगी,,, देखते ही देखते घर में मेहमानों की संख्या बढ़ने लगी और फिर कब शाम हो गई पता ही नहीं चला,,,,।

रास्ते भर संदीप और तृप्ति एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे तृप्ति तो शर्म के मारे संदीप से बात नहीं कर पा रही थी और संदीप हाथ में आया । मौका चला गया था इसलिए कुछ बोल नहीं रहा था

हाथ को आया मुंह को ना लगा,,,, संदीप की हालात कुछ ऐसी हो गई थी,,,, जिस चीज को पाने के लिए उसने महीनो तक मेहनत किया,,, इतने पापड़ बेले,,, नखरे सहे,,, वह खूबसूरत चीज उसकी आंखों के सामने थी जिसे वह खुद कपड़े निकाल कर उजागर किया था,,,, लेकिन न जाने संदीप की किस्मत में क्या लिखा हुआ था की आंख के सामने बेस कीमती होश ना का दरिया होने के बावजूद भी वह उसमें डुबकी नहीं लगा पाया,,,, संदीप को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे उसकी किस्मत गधे के लंड से लिखी गई थी,,,, उसकी भाषा में कहे तो उसके अरमान लोड़े लग गए थे,,,, वह बहुत हताश हो चुका था निराश हो चुका था इसलिए तृप्ति को वापस लाते समय वहां निराशा के मारे उससे बात तक नहीं कर पा रहा था,,,।

वैसे भी जिस तरह की हालात बने हुए थे उसे देखते हुए किसी को भी उम्मीद न होती की सब कुछ आंखों के सामने होते हुए भी धरा का धरा रह जाएगा,,,, सब कुछ संदीप के पक्ष में था एकांत जगह एकांत कमरा किसी की भी मौजूदगी नहीं थी,,,, ऐसे में एक मर्द चाहे तो औरत के साथ कुछ भी कर सकता है और वही संदीप तृप्ति के साथ कर नहीं जा रहा था जिसमें तृप्ति की पूरी तरह से सहमति थी संदीप ने अपनी हरकत चतुर्थी को पूरी तरह से गर्म कर दिया था वह भी चुदवाने के लिए तैयार हो चुकी थी,, जिसके लिए संदीप ने उसकी सलवार की डोरी खोल कर उसकी पैंटी सहित उसे घुटनों तक खींच दिया था और उसकी दोनों टांगों को मोड़ दिया था ताकि वह उसके गुलाबी छेद में आराम से अपना लंड डाल सके जिसके लिए वह अपना लंड भी बाहर निकाल लिया था बस उसे डालने की देरी थी,,, लेकिन तभी दरवाजे की घंटी बज गई थी उसे समय संदीप को ऐसा ही लग रहा था कि दरवाजे की घंटी नहीं बल्कि कोई उसके दिल पर हथोड़ा मार रहा हो,,, उस समय घंटी की आवाज से वह पूरी तरह से घायल हो चुका था,,,।

घंटों सोच विचार कर बनाया हुआ प्लान फेल हो चुका था,,,,,, वैसे तो तृप्ति के साथ इस तरह की हरकत करने के लिए वह बीच रास्ते में जंगली झाड़ियां के बीच जगह तय कर लिया था लेकिन मैडम के घर पर ही उसे पूरी तरह से अवकाश मिल गया था लेकिन वह अवकाश नहीं था बल्कि उसके अरमानों का दमन था जो उसे दरवाजे की घंटी ने कर दी थी,,,। अनुभव से भरा हुआ संदीप तृप्ति की गुलाबी बुर को देखकर पागल हो गया था,,, वह समझ गया था कि तृप्ति की बुर अनछुई थी अनचुदी थी,,, जिस पर अभी तक किसी दूसरी मर्द का स्पर्श तक नहीं हुआ था ऐसी खूबसूरत गुलाबी छेद को देखकर संदीप के मुंह के साथ-साथ उसके लंड में भी पानी आ गया था वह अपने लंड को उसे गुलाबी छेद में डालकर अपने अरमान को पूरा करना चाहता था,,,। वह खुशी के मारे पागल हो गया था क्योंकि उसे उम्मीद नहीं थी कि इतनी आराम से त्रप्ती की बुर उसे मिल जाएगी,,, वैसे इतने आराम से तो मिले नहीं थी लेकिन फिर भी उसे उम्मीद नहीं थी कि सिर्फ इतनी जल्दी तैयार हो जाएगी चुदवाने के लिए,,, लेकिन सब कुछ बेकार हो चुका था,,,,।

ऐसा नहीं था कि इस असफलता से केवल संदीप ही परेशान था,,, तृप्ति भी निराश हो गई थी क्योंकि जिंदगी में पहली बार हुआ इस तरह का बड़ा कदम उठाई थी जिसके लिए वह पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी वह देखना चाहती थी कि संभोग में कितना सुख मिलता है वैसे तो वह इतना तो एहसास कर ही चुकी थी कि संभोग के पहले की क्रिया में बहुत मजा आता है इसलिए उसे इतना तो विश्वास था कि संभोग में भी बहुत मजा आता होगा जिसके लिए वह पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी लेकिन इन मौके पर उसके भी अरमानों पर पानी फिर गया था,,,,।

वैसे तो उस समय तृप्ति पूरी तरह से शर्म से पानी पानी हो गई थी जब संदीप ने अपने हाथों से उसकी सलवार की डोरी खोलकर सलवार को चड्डी सहित घुटनों तक खींच दिया था ऐसे हालात में उसकी बुर एकदम से साफ नजर आ रही थी,,, और ऐसे में संदीप को अपनी बर दिखने में उसे बेहद शर्म महसूस हो रही थी यहां तक कि वह शर्म से गड़ी जा रही थी लेकिन चुदाई का मजा लूटने की चाहत में वह इनकार नहीं कर पाई थी लेकिन संदीप के लंड को देखकर वह पूरी तरह से आहत हो चुकी थी वह समझ नहीं पा रही थी कि यह सब क्या है पहले तो संदीप के लंड के आकार की कल्पना उसके मन में रहती थी लेकिन जब से उसने अपने छोटे भाई के लंड के दर्शन की थी,,, उसके बाद जैसे ही संदीप के लंड का दीदार उसे हुआ वह पूरी तरह से आहत हो गई,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि मर्द में इतना बड़ा बदलाव कैसे एक का आधे से भी काम और दूसरे का बम पिलाट गधे का जैसा ,,,।

खैर जो भी हो मुंह लटकाए वह घर आ चुकी थी,,, सही समय पर घर पर पहुंचने पर उसकी मां भी बहुत खुश थी क्योंकि वह आजकल की लड़कियों के तेवर को उनकी हरकतों को अच्छी तरह से जानती थी क्योंकि इसी तरह से लड़कियां सहेली के घर जाने का बहाना करके अपने प्रेमी के साथ बाहर गुलछर्रे उड़ाया करती थी लेकिन सुगंधा को अपनी बेटी पर पूरा विश्वास था,,, वह जानती थी कि उसकी बेटी कभी भी दूसरी लड़कियों की तरह हरकत नहीं करेगी ना ही उसके कदम डगमगाएंगे,,,।

दूसरे दिन कॉलेज में संदीप और तृप्ति दोनों एक दूसरे से नजर मिलाने से भी घबरा रहे थे,,, तृप्ति इसलिए नजर नहीं मिल पा रही थी क्योंकि अब तक वह संदीप को इस तरह की हरकत करने से रोकते आ रही थी और नाराज भी थी,,, लेकिन एकाएक उससे अपनी जवानी का दबाव बर्दाश्त नहीं हुआ,,, और वह उसके सामने टांगे खोलें अपनी बुर उसे परोश दी थी,,, और संदीप इसलिए शर्मिंदा था कि जिस चीज के लिए उसने इतना मेहनत किया था वह चीज उसकी आंखों के सामने होते हुए भी उसमें लंड डालने की तो छोड़ो उसने अपनी उंगली भी नहीं डाल पाया था,,,,।

एक दो तीन ऐसे ही गुजर गए,,,, दोनों फिर से आपस में बात करने लगे लेकिन मैडम के घर पर जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में बात करने में दोनों कतरा रहे थे,,,, दोनों में धीरे-धीरे फिर से मामला सहज होने लगा था की तभी एक सप्ताह बीतने के बाद,,, संदीप ने फिर से एक चिट्ठी लिखा और उसे एक नोटबुक में करके उसे थमा दिया,,,, और उसे नोटबुक देते समय बोला,,,।

इस स्थिति में जो कुछ भी लिखा है उसे घर पर जाकर इत्मीनान से पढ़ना,,,,

क्यों अभी भी कुछ कहना बाकी रह गया है क्या जो कहना था वह तो तुम कह दिए हो,,,।

हां लेकिन जो मैं नहीं कहना चाहता था वह मुझे इस चिट्ठी में लिखना पड़ रहा है और मुझे पूरा भरोसा है कि तुम इस चिट्ठी को पढ़कर नाराज नहीं होगी बल्कि समझदारी से काम लोगी,,,।

ठीक है,,, लेकिन तुमने चिट्ठी में ऐसा क्या लिख दिया है कि इतना भाषण देना पड़ रहा है,,,।

मैं बात नहीं सकता अगर बता सकता तो तुम्हें चिट्ठी देने की जरूरत नहीं पड़ती ऐसे ही बता देता,,,, ठीक है मैं चलता हूं,,,,(इतना कहकर संदीप वहां से चला गया और तृप्ति उसे जाता हुआ देखते रह गई और सोचती रह गई कि आखिरकार चिट्ठी में ऐसा क्या लिखा है जिसे देते समय उसके चेहरे पर उदासी छा गई थी,,,, कहीं उसे दिन के लिए माफी तो नहीं मांग रहा है,,, लेकिन उसे दिन के लिए तो वह खुद नाराज नहीं है तो माफी किस बात की शेर जो भी हो यह तो चिट्ठी पढ़ने के बाद ही मालूम पड़ेगा कि क्या लिखा है,,,,,।

रात के 10:00 रहे थे और वह सब काम निपटाकर अपने कमरे में चली गई और अपना बैग खोलकर नोटबुक निकाल ली और उसमें रखी हुई चिट्ठी को पढ़ने लगी किसी को पढ़ते पढ़ते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगी वह एकदम से परेशान हो गई वह कुछ कर भी नहीं सकती थी किसी को बता भी नहीं सकती थी किसी को भी अपनी हालत बयां नहीं कर सकती थी,,,,, गुस्से में वह चिट्ठी को टुकड़े-टुकड़े करके फाड़ कर उसे कचरे के डिब्बे में डाल दी और तकिया को अपने सीने से लगाए बिस्तर पर लेट कर रोने लगी,,,।

ऐसा क्यों किया संदीप तुमने,,, जब जाना ही था तो मुझे दिल क्यों लगाया क्यों मेरे इतने करीब आए,,,,,(ऐसा कहकर वह रो रही थी,,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,, क्योंकि संदीप ने चिट्ठी में लिखा था कि,,,, आज तुमसे आखिरी मुलाकात है मेरे पापा का तबादला हो गया है दूसरे शहर ना चाहते हुए भी हमें जाना पड़ रहा है तुम तो जानती हो कि मेरे पिताजी सरकारी मूलाजीम है,,, जहां तबादला होता है वहां जाना ही पड़ता है,,,, तृप्ति मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं जिंदगी भर करता रहूंगा अगर किस्मत में लिखा रहेगा तो फिर मिलेंगे लेकिन मेरे जाने से तुम उदास मत होना तुम बहुत अच्छी लड़की हो,,,, तुम्हारा संदीप,,,,,।

तृप्ति,, कभी सोची भी नहीं थी कि संदीप इस तरह से उसे छोड़कर चला जाएगा वह तो अपने मन में जिंदगी भर का साथ का सपना देखने लगी थी जहां तक कि वह संदीप के साथ विवाहित जीवन का भी सपना देखने लगी थी लेकिन जल्द ही उसका सपना टूट गया संदीप उसे रोता हुआ छोड़ गया था,,,,, लेकिन तभी उसके मन में ख्याल आया कि अच्छा हुआ मैडम के घर पर कुछ हुआ नहीं अगर कुछ हो गया होता तो वह जिंदगी भर अपने आप को माफ नहीं कर पाती,, क्योंकि अगर उसे बारे में किसी को पता चल जाता तो वह बदनाम हो जाती उसकी इज्जत चली जाती है और वह फिर कभी भी समझ में सर उठाकर जी नहीं पाती,,,,।

एक तरफ जहां वह इस तरह के ख्याल से अपने मन को मनाने की कोशिश कर रही थी वहीं दूसरी तरफ वह संदीप के जाने से बहुत दुखी थी संदीप से वह आखरी बार मिल भी नहीं सकती थी क्योंकि वह लिखा था कि जब तक तुम यह चिट्ठी पड़ोगी तब तक मैं दूसरे शहर के लिए निकल गया होऊंगा,,,।

इस चिट्ठी को पढ़कर तृप्ति, पूरी तरह से टूट गई,, क्योंकि उसे संभालने वाला कोई नहीं था अपने प्यार की बात वह किसी से कह भी नहीं सकती थी,,, इसलिए इस दुख को अकेले झेल रही थी दूसरी तरफ संदीप को त्रप्ती से अलग होने का मलाल बस इतना था कि वह तृप्ति को चोद नहीं पाया था उसकी गुलाबी बुर का स्वाद नहीं चख पाया था,, तृप्ति से उसे बिल्कुल भी लगाव नहीं था उसे लगाव था तो सिर्फ तृप्ति के खूबसूरत बदन से,, और यही बात त्रप्ती समझ नहीं पा रही थी,,, उसे ऐसा ही लग रहा था की संदीप भी उससे दिलो जान से प्यार करता है,,,।

संदीप का काम उसे इतना सता रहा था कि दो-तीन दिन तक तो वह कॉलेज नहीं जा पाई,,, यहां तक कि उसे बुखार आ गया उसकी तबीयत खराब हो गई,,,,, उसकी मां ने उसे दवा दिलाई तब जाकर उसे आराम हुआ,,, लेकिन फिर भी वह संदीप के गम से बाहर निकल नहीं पाई थी,,, मोहब्बत का दर्द होता ही इतना गहरा है कि जिसमें से निकलने में बहुत वक्त लगता है,,,,, तृप्ति का कॉलेज आना जाना तो शुरू हो गया था लेकिन वह उदास रहने लगी थी,,, उसकी उदासी का कारण हमेशा सुगंध जानने की कोशिश करती थी और वह परीक्षा का तनाव बढ़कर बात को टाल जाती थी सुगंधा भी नहीं समझ पाती थी कि आखिरकार उसके बेटी को हुआ क्या है,,,।

जैसे तैसे करके महीना गुजर गया,,,, पिछले कुछ दिनों से सुगंधा और उसके बेटे में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जिससे दोनों केतन बदन में उत्तेजना की लहर उठे,,,,,,,,।

दो-चार दिनों से अंकित देख रहा था कि उसकी मां कुछ सुस्त नजर आ रही थी,,,, दो-चार बार वह पूछ भी की क्या हुआ है लेकिन वह ठीक से बता नहीं पाई,,, कि उसे क्या हुआ है उसे ऐसा ही लग रहा था कि जैसे बदन में आलस है जिसकी वजह से वह सुस्त नजर आ रही थी,,,,। दोपहर में जब अंकित घर पर पहुंचा तो देखा उसकी मां अपने कमरे में ही है कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और बिस्तर पर उसकी मां सो रही थी दरवाजे पर खड़े होकर वह अपनी मां की तरफ देख रहा था तो उसे केवल अपनी मां की उठती बैठती हुई चूचियां नजर आ रही थी जिसके चलते उसके बाद में उत्तेजना की लहर उठ रही थी,,, और वह धीरे-धीरे अपनी मां के करीब पहुंच गया उसकी मां सो तो नहीं रही थी लेकिन कुछ परेशान नजर आ रही थी अंकित को थोड़ा अजीब लगा तो वह अपनी मां के सर पर हाथ रख कर देखने लगा तो वह एकदम से चौंक गया क्योंकि उसका माथा एकदम गरम था उसे बहुत बुखार था,,,।

मम्मी तुम्हें तो बहुत तेज बुखार है दवाई नहीं ली क्या,,,,?

नहीं रे कुछ दिनों से ऐसा लग रहा था की तबीयत खराब है लेकिन आज कुछ ज्यादा ही तबीयत खराब लगने लगी चक्कर आया तो में सोने की कोशिश कर रही हूं लेकिन नींद नहीं आ रही है,,,,।

तुम्हें तो दवा दिलाना पड़ेगा चलो जल्दी से मैं तुम्हें दवा खाने ले चलता हूं,,,,,।

रहने दे मेडिकल पर से बुखार की गोली ले आ उससे आराम हो जाएगा,,,

मेडिकल से नहीं तुम्हें दवा खाने से दवा दिलाना पड़ेगा चलो मैं लेकर चलता हूं,,,।

सुगंधा को बहुत जोरों का बुखार चढ़ा हुआ था,,, अंकित को इसकी जानकारी होते ही हो अपनी मां को दवा खाना लेकर जा रहा था,,,,, बुखार कुछ ज्यादा ही था तभी तो सुगंधा को चलने तक की ताकत नहीं थी,,, त्रप्ती घर पर नहीं थी,,, वैसे भी कुछ दिनों से उसका घर पर होना ना होना एक बराबर था क्योंकि वह संदीप के ही ख्यालों में खोई रहती थी,,, संदीप सेवा बढ़ चुकी थी संदीप उसे छोड़कर दूसरे शहर जा चुका था लेकिन फिर भी तृप्ति थी कि उसकी याद में पागल हो रही थी,,,, लेकिन जैसे तैसे करके वह धीरे-धीरे इस दुख से निकलने की कोशिश कर रही थी,,,।

तृप्ति के गैर मौजूदगी में अंकित को ही अपनी मां को दवा खाना ले जाना पड़ा,,,, कुछ दूर तक चलने के बाद ऑटो रिक्शा देखते ही उसे हाथ देकर अंकित ने रोका,,,, और फिर दोनों उसमें बैठकर दवा खाने के लिए निकल गए,,,,, बार-बार अंकित अपनी मां के सर पर हाथ रखकर उसके बुखार की जांच पड़ताल कर रहा था वाकई में उसका माथा बहुत ज्यादा गर्म था,, लेकिन ऐसी हालत में भी अंकित की नजर अपनी मां की चूचियों पर चली जा रही थी जो की अस्त-व्यस्त हालत में उसकी चूचियों की दरार एकदम साफ नजर आ रही थी,,,। बहुत दिनों बाद घर में किसी की तबीयत इस तरह से खराब हुई थी,,,, इसलिए अंकित थोड़ा चिंतित भी था,,,।

थोड़ी ही देर में,,, दवाखाना आ गया था ऑटो वाला ठीक दवा खाने के सामने रोक दिया,,,, अंकित धीरे से अपनी मां को सहारा देकर नीचे उतरा और उसे ऑटो वाले का किराया देकर अपनी मां की बांह पकड़कर दवा खाने में ले जाने लगा दोपहर का समय होने की वजह से दवा खाने में कोई दूसरा मरीज नहीं था इसलिए तुरंत ही नंबर आ गया था,,,। यह दवाखाना घर के थोड़ी ही दूरी पर था और अक्सर सुगंधा यहीं से दवा ले जाया करती थी और उसे आराम भी हो जाया करता अंकित भी अपनी मां के साथ दो-तीन बार यहां पर आ चुका था इसलिए उसे मालूम था कि ऐसे हालात में उसकी मां को कहां ले जाना चाहिए,,,।

अंकित अपनी मां को सहारा देकर धीरे-धीरे डॉक्टर के केबिन में ले गया डॉक्टर अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ था जब अंकित अपनी मां को सहारा देकर कुर्सी पर बैठने जा रहा था तब उसकी मां की साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिर गया था और उसकी भारी भरकम छातियां एकदम से उजागर हो गई थी जिस पर डॉक्टर की नजर पड़ते ही उसकी लार टपकने लगी थी,,, डॉक्टर तो सुगंधा की मदहोश कर देने वाली छातिया को देखता ही रह गया,,,वह एकदम प्यासी नजरों से सुगंधा को देख रहा था,,, उसकी नजरों से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे आज तक कुछ नहीं थी खूबसूरत औरत देखा ही नहीं था,,,,।

और वैसे भी सुगंधा का गठीला बदन था ही इतना आकर्षक की कोई भी देखा तो बस देखता ही रह जाता था भारी भरकम,,, तो बिल्कुल भी नहीं कह सकते थे हां लेकिन पूरा बदन जवानी के गुच्छे से भरा हुआ था,,,, एक तरह से सुगंधा जवानी से लदी हुई थी,,,। अंकित भी डॉक्टर की नजर को अच्छी तरह से देख रहा था उसे भी पता था कि डॉक्टर उसकी मां की चूचियों की तरफ प्यासी नजरों से देख रहा है,,, लेकिन न जाने क्यों अंकित ने भी कुछ पल के लिए अपनी मां की साड़ी के पल्लू को ठीक करने की शुध नहीं लिया,,, अंकित जानबूझकर डॉक्टर को अपनी मां की जवानी के दर्शन करवा रहा था और मन ही मन प्रसन्नता के साथ गर्व का अनुभव भी कर रहा था,,, इसलिए की अभी भी उसकी मां की जवानी भरतार थी अभी भी उसकी मां किसी के भी लंड को खड़ा कर देने में पूरी तरह से सक्षम थी,,,। सुगंधा की हालत थोड़ी खराब थी उसे चक्कर भी आ रहा था इसलिए उसे अपने कपड़े की बिल्कुल भी शुध नहीं थी वरना वह कहीं भी जाती थी तो सबसे पहले अपनी साड़ी का पल्लू भी व्यवस्थित करती थी कि कहीं से कुछ दिख तो नहीं रहा है लेकिन आज उसकी बेसुधी का डॉक्टर पूरा फायदा उठा रहा था अपनी आंखों को सेंक रहा था,,,।

वैसे भी सुगंधा की चूचियां बड़े-बड़े खरबुजा की तरह थी,, जॉकी सुगंधा के ब्लाउज में ठीक तरह से समा नहीं पाती थी और पूरी तरह से उजागर हो जाती थी और यही आकर्षण मर्दों को पूरी तरह से सुगंधा का दीवाना बनाने में काफी होता था और इस समय डॉक्टर की भी यही हालत हो रही थी,,,, डॉक्टर के मुंह में पानी आ रहा था,,, अंकित को पूरा विश्वास था कि उसकी मां की बड़ी-बड़ी चूचियों को देखकर डॉक्टर का लंड खड़ा हो गया होगा,,,,,, चूचियों के दर्शन कि समय मर्यादा समाप्त हो चुकी थी,,, इसलिए अंकित अपनी मां के साड़ी के पल्लू को व्यवस्थित करने लगा अंकित को ऐसा करते देख डॉक्टर को भी जैसे होश आया हो वह धीरे से बोला,,,।)

क्या हुआ है इन्हें,,,,?

सर ,,, दो-तीन दिनों से थोड़ी तबीयत खराब थी आज जब मैं घर पर पहुंचा तो बदन तप रहा था तो मैं यहां लेकर आ गया,,,।

हममम,,,, रुको चेक कर लेते हैं,,,,(इतना कहकर इस डॉक्टर ने अपने गले में से आला निकाला,,,, और अंकित की तरफ देखने लगा,,,, अंकित की तरफ देखते हुए उसे डॉक्टर ने अाला को कान में लगाया और अंकित से बोला,,,)

बेटा थोड़ा पल्लू नीचे करना तो,,, बुखार चेक कर लु,,,,।

(डॉक्टर की बात सुनकर अंकित थोड़ा सदमे में था क्योंकि वह जानता था की औरतों को उनका बुखार चेक करते समय डॉक्टर अक्सर उनकी पीठ की तरफ आला लगाते हैं ,, लेकिन यह डॉक्टर तो छाती पर आला लगाना चाहता है इसी बहाने वह मां की चूचियों को देखना चाहता है और स्पर्श करना चाहता है,,,, कुछ पल के लिए अंकित के मन में आया कि डॉक्टर को ऐसा करने से इनकार करते और बोले की औरतों को तो पीठ पर अाला लगाकर चेक किया जाता है,,, लेकिन अंकित अपने मन में सोचा उसकी आंखों के सामने वह डॉक्टर भला इससे ज्यादा क्या कर पाएगा क्योंकि अंकित भी एक खूबसूरत जवान औरत के सामने एक मर्द की स्थिति कैसी होती है उसे अच्छी तरह से बाकी और अच्छी तरह से जान रहा था कि डॉक्टर की हालत खराब हो रही है और इसमें उसे गर्व महसूस हो रहा था इसलिए डॉक्टर की बात मानते हुए वह अपनी मां की साड़ी का पल्लू पकड़ कर थोड़ा सा नीचे किया,,,,। और ऐसा करने में अंकित भी पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था क्योंकि उसकी आंखों के सामने भी उसकी मां की भारी भरकम चूचियां ब्लाउज में कैद एक दम साफ नजर आ रही थी।।।

साड़ी का पल्लू एक बार फिर से नीचे होते ही डॉक्टर का दिल भी जोरों से धड़कने लगा उसकी भी हालत खराब होने लगे उसकी आंखों के सामने एकदम गोरा मक्खन जैसा बदन नजर आ रहा था जिसकी मादक चूचियों की भारी भरकम गहरी लकीर एकदम साफ नजर आ रही थी,,,, सुगंधा को तो जैसे मानो होश ही नहीं था,,,, वह आंखों को बंद करके बस गहरी गहरी सांस ले रही थी जिसकी वजह से उसकी चूचियां भी ऊपर नीचे उठ बैठ रही थी और यह देखकर तो अंकित के साथ-साथ उस डॉक्टर की भी हालत खराब हो रही थी,,,, सुगंधा की मदहोश कर देने वाली बड़ी-बड़ी चूचियों को ब्लाउज में कैद देखकर डॉक्टर तो जैसे होश ही खो बैठा वह बिना पलक झपके सुगंधा की छातियों को ही देख रहा था,,,, अंकित कभी डॉक्टर को तो कभी अपनी मां की छातियों की तरफ देख रहा था,,,, फिर धीरे से अंकित ने बोला,,,,।

आला लगाइए सर,,,,।
(अंकित की बात सुनते ही जैसे डॉक्टर होश में आया हो वह एकदम से हड़बड़ाते हुए बोला)

हं,,,,,हंंं,,,,,(और इतना कहने के साथ ही डॉक्टर में आला को हाथ में लेकर सुगंधा की छाती पर लगा दिया डॉक्टर इतना चालाक था कि वह आला को,,, चूचियों के गोलार्ध की सतह के ऊपरी हिस्से पर लगाने की जगह वह चूचियों के उभरे हुए हिस्से पर लगा रहा था और जानबूझकर अपनी उंगलियों को मोड़कर सुगंधा की चूचियों की नरमाहट को स्पर्श कर रहा था अंकित सब कुछ देख रहा था लेकिन कुछ बोल नहीं पा रहा था,,,,। अगर बोलना चाहता तो भी क्या बोलना क्योंकि डॉक्टर ऐसी वैसी हरकत तो कर नहीं रहा था चाहे जैसे भी वह उसकी मां का बुखार ही चेक कर रहा था,,,,, चूचियों को स्पर्श करने के बहाने लगभग 5 मिनट तक वह चूचियों पर आल्हा लगाकर उसके ऊपर नीचे होते हुए जाकर को अपनी आंखों से देखकर गर्म होता रहा और फिर धीरे से बोला,,,)

मलेरिया का असर दिखाई दे रहा है,,,, पेशाब की जांच पड़ताल करनी पड़ेगी,,,,,।
(पेशाब की जांच पड़ताल वाली बात सुनते ही,,, अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा,,,, अंकित डॉक्टर से बोला,,,)

सर पेशाब की रिपोर्ट के लिए तो पैथोलॉजी जाना पड़ेगा,,,।

नहीं उसकी कोई जरूरत नहीं है यहीं पर सब हो जाता है,,,, यहीं पर पेशाब और ब्लड का टेस्ट हो जाएगा,,,,।

ठीक है,,,, लेकिन जाना कहां है,,,,?

बाहर ही बाथरूम में,,,, वहीं पर परखनली भी होगी उसी में ले लेना,,,,।

ठीक है डॉक्टर ,,,, (इतना कहते ही अंकित अपनी मां का हाथ पकड़ कर उसे कुर्सी पर से उठाने लगा,,, सुगंधा को चक्कर जरूर आ रहा था लेकिन वह जानते थे कि डॉक्टर क्या कह रहा है इसलिए वह भी धीरे-धीरे अपने बेटे का सहारा लेकर दवा खाने में ही बने बाथरूम की तरफ जाने लगी,,, अंकित जैसे ही अपनी मां को डॉक्टर के केबिन से लेकर बाहर निकाला डॉक्टर लंबी सांस भरते हुए अपने लंड को पेंट के ऊपर से ही दबाने लगा,,, और अपने मन में ही बोला क्या औरत है यार,,,,।

अंकित धीरे-धीरे अपनी मां को सहारा देकर उसे बाथरूम में ले आया बाथरूम का दरवाजा खोलकर धीरे से वह अपनी मां को बाथरूम में लेकर आया वही पास में ही,,,, परखनली रखने के लिए ड्रोवर बना हुआ था उसमें से एक परखनली को ले लिया और उसे अपनी मां को देते हुए बोला,,,..

इसमें पैसाब का सैंपल लेना है जांच के लिए,,,,।

(सुगंधा अपने हाथ में उस परखनली को तो ले ली थी,,, लेकिन उसे चक्कर आ रहा था,,, और परखनली अपनी मां को थमा कर अंकित बाथरूम से बाहर जाने लगा तो उसे रोकते हुए सुगंधा बोली,,,)

तु मत जा मुझे चक्कर आ रहा है,,,,।
(और अपनी मां की यह बात सुनकर तो अंकित की हालत और ज्यादा खराब होने लगी उसका लंड खड़ा होने लगा यह सोचकर ही वह उत्तेजित हुआ जा रहा था की दवा खाने में बाथरूम में वह अपनी मां के साथ कैसे उपस्थित रह सकता है जब उसकी मां पेशाब कर रही हो,,, लेकिन वह भी अपनी मां की हालत को समझता था वह जानता था किसकी मां को चक्कर आ रहा है उसकी तबीयत खराब है ऐसे में वह लड खडा कर गिर सकती थी और चोट लग सकता था,,, इसलिए उसे वहां खड़ा रहना जरूरी था लेकिन एक बार वहां देख लेना चाहता था कि कहीं-कहीं देखा तो नहीं रहा है वैसे तो जब वह दवा खाने में आया था तो कोई भी नहीं था और इस समय भी कोई नहीं था लेकिन फिर भी वहां धीरे से दरवाजा खोलकर इधर-उधर देखने लगा लेकिन कोई नहीं डॉक्टर अपनी केबिन में बैठा हुआ था इसलिए जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया और ना चाहते हुए भी वह अपनी मां से बोला,,,)

जल्दी से कर लो,,,,,।

(अंकित की बात सुनते ही सुगंधा धीरे-धीरे अपनी साड़ी ऊपर की तरफ उठने लगी और जैसे-जैसे उसकी साड़ी ऊपर की तरफ पड़ रही थी उसकी गोरी चिकनी टांग मांसल जांघ सब कुछ उजागर होता चला जा रहा था और यह सब देखकर अंकित का लंड फटने के कगार पर आ गया था,,, एक हाथ से वह साड़ी कमर तक उठे खड़ी थी पीछे से सुगंध का पिछवाड़ा नजर आ रहा था वह आसमानी रंग की चड्डी पहनी थी जिसे वह एक हाथ से नीचे करने की कोशिश कर रही थी लेकिन कर नहीं पा रही थी,,,, सुगंधा बुखार की हालत में अपने होश में बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए जब अंकित ने देखा कि उसकी मां अपनी चड्डी नहीं उतर पा रही है तो खुद अपना हाथ आगे बढ़कर दोनों हाथों से अपनी मां की चड्डी को उतारने लगा यह बेहद अद्भुत संयोग था ऐसा वह कल्पना में कई बार कर चुका था लेकिन आज हकीकत में करना पड़ रहा था लेकिन घर के कमरे में नहीं बल्कि दवा खाने की बाथरूम में और वह भी इस स्थिति में जहां पर चाह कर भी अंकित मजा नहीं ले सकता था लेकिन फिर भी अपनी मां की नंगी गांड देखकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था वह अपने हाथों से अपनी मां की चड्डी को नीचे जांघों तक सरका दिया था,,,, और बोला,,,)

अब जल्दी से बैठकर पेशाब कर लो और परख नली में सेंपल ले लो,,,,।

(अंकित की बात सुनकर सुगंधा धीरे से बैठने लगी बैठने में भी उसे दीवाल का सहारा लेना पड़ रहा था उसका बदन पूरी तरह से टूट रहा था दर्द कर रहा था सर भी दर्द कर रहा था और चक्कर भी आ रहा था,,, सुगंधा पेशाब करने के लिए बैठ गई थी और थोड़ी देर में उसकी बुर से पेशाब की धार की सीटी की आवाज सुनाई देने लगी जिसे सुनकर अंकित की हालत खराब होने लगी उसका लंड एकदम से उबाल करने लगा हुआ पागल हुआ जा रहा था,,, वैसे तो वह अपनी मां को पेशाब करते हुए पहले भी देख चुका था लेकिन आज का हालात कुछ और था आज वह बाथरूम में जरूर अपनी मां के साथ था और उसकी मां ठीक उसके सामने बैठकर पेशाब कर रही थी लेकिन यह नजारा सहज नहीं था क्योंकि यह नजारा दवा खाने के अंदर था इसलिए चाहते हुए भी अंकित इस मौके का फायदा नहीं उठा सकता था लेकिन वह पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में डुबकी लगा रहा था मदहोश हुआ जा रहा था,,,।

जहां एक तरफ अपनी मां को पेशाब करता हुआ देखकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हुआ जा रहा था वहीं दूसरी तरफ उसके मन में घबराहट भी थी कि कहीं कोई आ ना जाए ,,, अंकित ठीक अपनी मां के पीछे खड़ा था और उसे एहसास हो रहा था कि उसकी मां उसे परखनली को अपनी बुर पर लगाई हुई थी जिसे पेशाब की धार गिर रही थी,,,, मौका होने के बावजूद भी अंकित ठीक तरह से अपनी मां की नंगी गांड को नहीं देख पा रहा था क्योंकि उसे जल्दी से बाथरूम से बाहर निकल जाना था क्योंकि अगर ऐसी हालत में कोई आ जाता तो वह क्या बताता एक औरत के साथ वह खुद बाथरूम के अंदर क्या कर रहा है भले ही वह इस समय बीमारी की हालत में अपनी मां के साथ था लेकिन फिर भी,,,, यह बिल्कुल भी सहज नहीं था।

सुगंधा परखनली में पेशाब का से,पल ले चुकी थी और धीरे से खड़ी होने लगी,,, लेकिन फिर से वह अपनी चड्डी पहनने में असहज थी और इस बार भी अंकित है उसकी मदद करते हैं चड्डी भी जैसे उतारा था वैसे ही पहना दिया,,, थोड़ी देर में परखनली को अपने हाथ में लेकर अंकित बाथरूम से बाहर आ गया और डॉक्टर के केबिन में चला गया डॉक्टर इशारे से उसे परखनली को एक कोने पर रखने के लिए बोला और अंकित ने ठीक वैसा ही किया तब तक धीरे-धीरे चलते हुए सुगंधा डॉक्टर के केबिन में आकर कुर्सी पर बैठ चुकी थी,,,,।

अपनी प्रिसक्रिप्शन बुक में मरीज का नाम लिखकर वह दवा लिख रहा था और बोला,,,,।

वैसे तो लक्षण मलेरिया के ही नजर आ रहे हैं और मेरा अनुमान है कि मलेरिया ही है तुम दो-तीन घंटे बाद आकर रिपोर्ट ले जाना मैं उसके हिसाब से दवा दे दूंगा लेकिन इस समय बुखार की दवा सुई लगा देता हूं थोड़ा आराम हो जाएगा और शाम को आकर रिपोर्ट ले जाना और दवा भी ले लेना,,,।

ठीक है डॉक्टर जैसा आप ठीक समझे,,,,।

लेट जाइए,,, (सुगंधा की तरह मुखातिब होता हुआ डॉक्टर बोला तो अंकित खुद अपनी मां का हाथ पकड़ कर उसे कुर्सी से उठने लगा और,,,, लंबे से टेबल की तरफ ले जाने लगा,,,, सुगंधा धीरे से टेबल पर बैठ गई वह सोच रही थी कि डॉक्टर उसे हाथ में सी लगाएगी तब तक डॉक्टर भी सिरिंज में दवा भरकर टेबल के पास आ चुका था लेकिन सुगंध अभी भी बैठी हुई थी इसलिए डॉक्टर बोला,,,,।

इंजेक्शन भारी है हाथ पर लगाऊंगा तो हाथ बहुत ज्यादा दर्द करेगा इसलिए कमर के नीचे लगाना पड़ेगा तुम लेट जाओ,,,,।

(डॉक्टर की चालाकी को अंकित अच्छी तरह से समझ रहा था अब उसका इरादा उसकी मां की गांड देखने को था उसको स्पर्श करने का था,,, लेकिन फिर भी मामला इलाज का था इसलिए अंकित अपनी मां को लेट जाने के लिए बोला उसकी मां धीरे से पेट के बल लेट गई,,,, अंकित को इस बात का डर था की कही डॉक्टर उसकी साड़ी कमर तक उठाकर उसकी मां की गांड पर इंजेक्शन ना लगे लेकिन ऐसा करना डॉक्टर को भी उचित नहीं लग रहा था क्योंकि ऐसा करने पर हो सकता था उसकी बदनामी हो जाए इसलिए वह धीरे से अपने हाथों से ही सुगंधा की कमर के नीचे वाली साड़ी और पेटीकोट के हिस्से को हल्के से अपनी उंगली को पेटिकोट के अंदर डालकर उसे पकड़ा और धीरे से नीचे की तरफ खींचने लगा जिससे नितंबों का उभारदार गोलाई नजर आने लगा,,, और एक खूबसूरत औरत की नंगी गोरी गोरी गांड देखकर डॉक्टर की हालत खराब हो गई और अंकित ने जब उसके पेंट की तरफ देखा तो उसके भी होश उड़ गए क्योंकि उसके पेट में तंबू बन रहा था, डॉक्टर की हालत को देखकर अंकित अपने मन में सोचने लगा कि अगर उसकी मां के लिए आई होती तो वह अब तक अपना लंड उसकी मां की बुर में डाल दिया होता इलाज करने के बहाने,,,,।

धीरे से डॉक्टर उस उभारदार गोलाई पर सुई लगाने लगा,, नितंबों में हल्के से सुई प्रवेश करने पर सुगंधा को हल्का सा दर्द महसूस हुआ और फिर धीरे-धीरे सिरिंज की सारी दवा उसके नितंबों में उतर गई,,, और फिर डॉक्टर आनंद लेने के हेतु सी वाली जगह पर अपनी हथेली रखकर उसे ज़ोर से गोल-गोल घूमाते हुए मसलने लगा जैसा कि अक्सर डॉक्टर सुई लगाने के बाद ऐसा ही करते हैं, ,,।

अब जा सकते हो लेकिन शाम को जरूर आ जाना,,,

ठीक है डॉक्टर,,,,।
(और फिर अंकित धीरे-धीरे अपनी मां को दवाखाने से बाहर ले गया और ओटो में बैठकर अपने घर आ गया,,,, डॉक्टर की दी हुई दवा खिलाकर वह अपनी मां को सोने के लिए बोल दिया और सुगंधा भी दवाई खाकर,,, सोने लगी।।)

दवाई का असर जल्द ही सुगंधा पर हुआ और वह धीरे-धीरे नींद की आगोस में चली गई,,,, कुछ देर तक अंकित अपनी मां के पास ही बैठा रहा बार-बार वह अपनी मां के सर पर हाथ रखकर उसके बुखार को देख रहा था जो की धीरे-धीरे उसका सर ठंडा हो रहा था इसका मतलब था कि उसका बुखार उतर रहा है और बुखार उतरने से अंकित को भी राहत मिल रही थी,,,,।

सुगंधा का तो बुखार उसका बुखार में तपता हुआ शरीर दवा खाकर धीरे-धीरे,, ठंडा होने लगा था लेकिन ,,, अपनी मां की मदहोश कर देने वाली गर्म जवानी देखकर,, अंकित के दिल और दिमाग पर अपनी मां की जवानी का बुखार चढ़ चुका था,,,, अपनी मां को गहरी नींद में सोता हुआ देखकर धीरे से अंकित बिस्तर पर से उठा और कमरे के बाहर आकर बैठ गया और अपनी मां के बारे में सोचने लगा जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोचने लगा उसे पल के बारे में सोचने लगा जो उसके जीवन में अभी-अभी आकर गुजर गया था,,,। लेकिन अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि जो पल अभी-अभी उसके जीवन में गुजरा था वह पल नहीं था बल्कि आंधी और तूफान था जो उसकी जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव करने के लिए आया था,,,,।

अपनी मां के साथ तो बहुत बार दवा खाने आया गया था लेकिन यह पहली बार था जब वह अपनी मां को दवा खाने लेकर गया था उसे दवा दिलाने के लिए और दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोच कर खुद अंकित की हालत खराब हुए जा रही थी,,,, पहले वाला अंकित होता तो शायद डॉक्टर की हरकत परवाह डॉक्टर को भला बुरा सुना देता या उसे पर हाथ भी उठा देता क्योंकि तब उसमें औरत को लेकर कोई समझदारी नहीं थी वह अपनी मां को एक मां के ही नजरिए से देखा था औरत के नजरिए से नहीं लेकिन अब हालात पूरी तरह से बदल चुके थे,,, क्योंकि अब वह अपनी मां को मां के नजरिए से नहीं बल्कि है जवानी से भरी हुई औरत के नजरिया से देखा था और इसीलिए शायद डॉक्टर की मनसा को अच्छी तरह से समझता था,,,,।

डॉक्टर के चेहरे को देखकर वह समझ गया था कि उसकी मां की गर्म जवानी उसके लावे को पिघलाने के लिए काफी थी,,, दवा खाने के अंदर गुजरा हुआ एक तरफ से किसी फिल्म के दृश्य की तरफ उसकी आंखों के सामने घूम रहा था जब अपनी मां को डॉक्टर के केबिन में ले गया उसे डॉक्टर के सामने कुर्सी पर बैठाया तो डॉक्टर उसकी मां को देखा ही रह गया था खास करके उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों की तरफ से तो उसकी निगाह हट ही नहीं रही थी,,, बुखार के चलते उसकी मां को बिल्कुल भी होश नहीं था और उसके साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे सड़क गया था जिसके कारण उसकी मां का भारी भरकम चूची वाला हिस्सा डॉक्टर दिखाई दे रहा था और यह देखकर डॉक्टर के मुंह के साथ-साथ उसके लंड में भी पानी आ रहा था इस बात का एहसास अंकित को बहुत अच्छे से था,,,,।

आला लगकर बुखार चेक करने के बहाने संजू को साड़ी का पल्लू हटाने के लिए बोलना और आला को चूचियों पर रखकर धीरे-धीरे दबाना उंगलियों से उसकी चूची का स्पर्श करना या सब हरकत अंकित को बहुत अच्छे से समझ में आ रहा था लेकिन अंकित कुछ बोल नहीं पा रहा था एक तरह से अंकित अपनी मां की जवानी के आगे डॉक्टर को पिघलते हुए देखने में मजा आ रहा था,,,,, उसके बाद डॉक्टर का सुई लगाना जहां अधिकतर डाक्टर औरत को उसकी मां पर सुई लगाते हैं वही वह डॉक्टर जानबूझकर उसकी मां के नितंबों पर सी लग रहा था एक बहाने से वह उसके गोरी गोरी नितंबों के उधर को देखना चाहता था,,, जिसमें वह सफल भी हो गया था यह सब सो कर अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि उसकी में जब डॉक्टर इस तरह की हरकत कर रहा था अगर वह नहीं होता उसकी मां डॉक्टर की क्लीनिक में अकेले ही होती तो डॉक्टर ना जाने कौन-कौन सी मनमानी उसकी मां के साथ करता,,,,।

यह सब याद करते हुए अंकित की हालत खराब हो रही थी यहां तक की उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था और वह अपनी मां के कमरे के बाहर से उठकर हुआ अपने कमरे में चला गया और दरवाजा बंद कर दिया और अपने कमरे में जाते हुए धीरे-धीरे अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा हो गया आखिरकार उसे पर भी अपनी मां की जवानी का नशा चढ़ा था और नशे के आधीन होकर अंकित मजबूर हो गया था अपने कपड़े को उतार कर निर्वस्त्र होने में देखते-देखते वह एकदम नंगा होकर अपनी बिस्तर पर लेट गया था पीठ के बाल लाकर वह अपनी मां के बारे में सोच रहा था और इसी बीच उसे बाथरूम वाला वाक्या याद आ गया,,, और इस दिल से को याद करके तो उसके लंड की नसें फटने जैसी हो गई वह पूरी तरह से अपने बदन में उत्तेजना का संचार होता हुआ महसूस कर रहा था वह मदहोश हो चुका था अपनी मां की गदराई जवानी को देखकर,,,।

अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां बुखार के नशे में थी बेशुध थी उसे बिल्कुल भी होश नहीं था,,,, अंकित को बहुत मौका मिला था अपनी मां की मदद कर देने वाली जवानी के अंगों को छूने को उसे स्पर्श करने को उसे अपने हाथों में लेकर दबाने को लेकिन हालात को देखते हुए अंकित ऐसा नहीं कर पाया था क्योंकि मौका और जगह दोनों अंकित की चाह से विपरीत थे,,,, बाथरूम वाला वाक्या याद करके अंकित अपने खड़े लंड को अपनी मुट्ठी में दबोच लिया और उसे धीरे-धीरे हिलाना शुरू कर दिया,,,। वह गहरी गहरी सांस ले रहा था और अपनी मां के बारे में सोच रहा था,,,।

वैसे तो उसके जीवन में अपनी मां को निर्वस्त्र देखने का सुनहरा मौका मिल चुका था और वह अपनी मां को पेशाब करता हुआ और बाथरूम में निर्वस्त्र होकर नहाते हुए पूरी तरह से वह देख चुका था लेकिन फिर भी हर एक बार उसकी मां का पेशाब करना निर्वस्त्र होना अंकित के नसों में उत्तेजना का संचार और बड़ी तेजी से बढ़ा देता था,,,। अंकित के लिए यह सब किसी कल्पना और खूबसूरत अपने जैसा ही था जिसमें से वह अपने आप को बाहर निकलना नहीं चाहता था क्योंकि वह जानता था कि यह सपना यह कल्पना उसके जीवन का अमूल्य पल है,,,। वह अपने मन में सोच रहा था कि काश ऐसा उसके जीवन में बार-बार हो तो जिंदगी का मजा ही बदल जाए,,,।

लंड की नसें पूरी तरह से फुल कर उभर गई थी अंकित अपने लंड को मुट्ठी में दबोच कर अपनी मर्दाना अंग के मर्दाना ताकत को महसूस कर रहा था और अपने मन में यही सोच रहा था कि अगर किसी भी तरह से अपने लंड को अगर वह अपनी मां की बुर में डालने में कामयाब हो गया तो उसकी मां पूरी तरह से मस्त हो जाएगी,,, लंड की नसों की रगड़ उसकी बुर की अंदरूनी दीवारों को पानी पानी कर देगी,,, ऐसा अपने मन में सोचते हुए,,, फिर से अंकित दवा खाने के बारे में सोचने लगा वह नहीं जानता था की दवा खाने ले जाने पर डॉक्टर पेशाब की जांच करने को रहेगा,,,, और ऐसा कह भी दिया था तो कोई दिक्कत की बात नहीं थी लेकिन जब,,, बाथरूम के पास पहुंचकर सुगंधा खुद अपने बेटे को अंदर आने के लिए बोली तो अंकित के बदन में कंपन होने लगा उसका रोम रोम पुलकित होने लगा वैसे भी वह बहुत बार अपनी मां के साथ बाथरुम में कल्पना कर चुका था लेकिन पहली बार हकीकत में उसे अपनी मां के साथ बाथरुम में जाने का मौका मिल रहा था इधर-उधर देखकर अंकित हिम्मत दिखाते हुए अपनी मां के साथ बाथरुम में प्रवेश कर गया था क्योंकि उसकी मां को चक्कर भी आ रहा था जहां एक तरफ उसे अपनी मां की फिक्र भी थी वहीं दूसरी तरफ बाथरूम में अपनी मां के साथ वक्त गुजारने की चाह भी बड़े जोरों की थी,,,।

और मौके की नजाकत को देखते हुए वह भी अपनी मां के पीछे-पीछे बाथरुम में प्रवेश कर गया और अपनी मां को परखनली भी थमा दिया,,,, अंकित स्थल को याद करके पूरी तरह से उत्तेजना में डूबने लगा था वह धीरे-धीरे इस पल को याद करके अपने लंड को हिलाना शुरू कर दिया था,,, उसे याद आया कि उसकी मां से उसकी चड्डी उतारी नहीं जा रही थी पटना जाने कैसे बुखार के नशे में वह अपनी चड्डी उतारने के लिए खुद अपने बेटे को ही बोल दी थी यह भी सोच रहा था कि अगर उसकी मां को बुखार ना चढ़ा होता है तो शायद ऐसा सुनहरा मौका उसके जीवन में न जाने कभी आता भी या नहीं और उसे मौके का फायदा उठाते हुए अंकित अपनी मां की चड्डी को दोनों हाथों से नीचे उतारा था बहुत कम लोगों को ऐसा मौका मिलता है जब उन्हें खुद अपनी मां की चड्डी उतारने का सुनहरा मौका प्राप्त होता है और उन भाग्यशाली में से अंकित था,,,।

अगर कोई और मौके पर इस तरह का सौभाग्य अंकित को प्राप्त होता तो शायद वह अपनी मां की चड्डी उतारने के साथ-साथ उसके गुलाबी छेद में अपना लंड भी डाल दिया होता लेकिन वह जानता था कि उसकी मां बीमार है उसे चक्कर आ रहे थे इसलिए वह ज्यादा कुछ सोच नहीं पाया लेकिन जो कुछ भी उसने अपनी आंखों से देखा था उसे याद करके वह जोर-जोर से अपने लंड को हिला रहा था और कुछ पल के लिए अपनी आंखों को बंद करके कल्पना करने लगा था दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था उसे विपरीत वह अपने मन में सोचने लगा कि परखनली को अपने हाथों में लेकर मुस्कुराते हुए उसकी मां बाथरूम के दरवाजे पर खड़ी और बाथरूम का दरवाजा खोलकर अंदर प्रवेश करते ही पीछे की तरफ देखकर अपने बेटे को भी अंदर आने का इशारा करती है,,,,।

इस तरह की कल्पना अंकित को किसी दूसरी दुनिया में ही लिए जा रही थी अंकित पूरी तरह से मस्त हो चुका था और वह जोर-जोर से अपने लंड को हिलाना शुरू कर दिया था,,,। आंखों को बंद करके उसकी कल्पना एकदम साफ नजर आ रही थी वह अपनी मां के इशारे पर तुरंत बाथरूम में प्रवेश कर गया और अपनी मां के हाथ से परखनली को ले लिया उसकी मां भी मुस्कुराते हुए अपने बेटे को परखनली दे दी और खड़े-खड़े अपनी दोनों टांगों को खोलते हुए अपनी साड़ी को कमर तक उठने लगी यह नजारा बेहद ही उत्तेजना से भरा हुआ था और इस नजारे की कल्पना करके अंकित स्वर्ग का सुख भोग रहा था देखते ही देखते सुगंध अपनी साड़ी को कमर तक उठाकर अपनी दोनों टांगों को खोलकर अपनी गुलाबी छेद में से पेशाब करने लगी और इशारे से ही अपने बेटे को परखनली को बर के छेद पर लगाने के लिए बोली और अपनी मां का आदेश पाकर तुरंत अंकित उसे परखनली को अपनी मां की गुलाबी छेद पर लगा दिया जिसमें पल भर में ही उसकी बुर से निकला हुआ नमकीन की धार से भर गया,,,,।

पेशाब से परखनली भर जाने से अंकित तुरंत परख नदी को हटा लिया और अपनी हथेली से अपनी मां की गुलाबी छेद को बंद करने की कोशिश करने लगा,,, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था क्योंकि उसकी बुर से पेशाब की धार इतनी तेजी से निकल रही थी कि उसकी बौछार इधर-उधर पूरे बाथरुम में फैल रही थी और देखते ही देखते अंकित अपने लंड को अपने पेंट में से बाहर निकाल लिया,,, अपने बेटे के खड़े लंड को देखकर,, सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी,,, और वह खुद अपने बेटे के लंड को पकड़ कर उसे अपनी गुलाबी छेद पर लगा दी,,, और उत्तेजना भरे स्वर में बोली,,,।

डाल दे मेरी बुर में बेटा,,,,।

(इतना सुनते ही अंकित से रहा नहीं गया और वह एक हाथ में परखनली को पकड़े हुए ही अपने लंड को अपनी मां की बुर में डालना शुरू कर दिया और देखते ही देखे उसका लंबा मोटा लंड उसकी मां के गुलाबी छेद में पूरी तरह से खो गया डूब गया और फिर एक हाथ में परखनली को पकड़े हुए दूसरे हाथ को अपनी मां के कमर में डालकर वह अपनी कमर को हिलाना शुरू कर दिया देखते ही देखते दोनों मां बेटे पूरी तरह से मदहोशी के आलम में बाथरूम के अंदर गहरी गहरी सांस लेते हुए शिसकारी की आवाज छोड़ने लगे,,,।

इस तरह की कल्पना करते हुए अपने ही बिस्तर पर निर्वस्त्र अवस्था में मस्ती करते हुए अंकित अपने लंड को जोर-जोर से हिलाते हुए वीर्य का फवारा छोड़ने लगा,,,, जो कि उसके ही ऊपर गिरने लगा उसे बहुत मजा आ रहा था ईस तरह की कल्पना करने में,,,, और जैसे ही उसके दिमाग से वासना का तूफान शांत होगा वह धीरे-धीरे होश में आने लगा और अपनी स्थिति को देखकर अपनी ही चड्डी से अपने ऊपर गिरी वीर्य को साफ करने लगा और फिर देखते ही देखते वह भी नींद की आगोस में चले गया,,,।

तकरीबन ढाई घंटे बाद जब उसकी नींद खुद ही तो अपनी स्थिति का भान होते ही वह जल्दी-जल्दी कपड़े पहनने लगा क्योंकि उसे याद था कि उसे रिपोर्ट लेने जाना है और घर में जिस तरह की शांति छाई हुई थी उसे देखकर वह समझ गया था कि अभी तक उसकी बहन घर पर वापस आई नहीं थी और उसकी मां भी सो रही थी वह धीरे से अपने कमरे से बाहर निकाला और अपनी मां के कमरे तक जाकर वह धीरे से दरवाजा खोल कर देखा तो उसकी मां गहरी नींद में सो रही थी और वह फिर हाथ में धोकर रिपोर्ट लेने के लिए दवा खाने पहुंच गया,,,,।

दवा खाने पहुंचकर डॉक्टर उसे रिपोर्ट देते हुए बोला कि।

कोई घबराने वाली बात नहीं है बस हल्का सा मलेरिया का असर था मुझे दवाई लिख देता हूं यह दवाई शुरू कर देना तीन दिन में सब ठीक हो जाएगा,,,।

धन्यवाद डॉक्टर,,,(डॉक्टर के हाथ से प्रिसक्रिप्शन लेते हुए अंकित बोला,,,अंकित डॉक्टर के चेहरे की तरफ देख रहा था और अपने मन में सोच रहा था कि इस समय डॉक्टर कितना मासूम लग रहा है उसका चेहरा एकदम मासूम है उसे देखकर कोई समझ ही नहीं पाएगा कि यह खूबसूरत औरत को देखकर डॉक्टर भी दूसरे मर्दों की तरह ही रंग,,, बदलता है,,, अंकित अपने मन में यह बात इसलिए सोच रहा था क्योंकि सुई लगाते समय उसने डॉक्टर के हालात को बड़ी-बड़ी की से निरीक्षण किया था वह साफ तौर पर देखा था कि जब डॉक्टर उसकी मां को सी लग रहा था उसकी साड़ी को थोड़ा नीचे की तरफ करके उसके नितंबों को उसकी गोरी गोरी गांड को देखकर डॉक्टर का भी लंड खड़ा हो रहा था और इस नजारे को अंकित देख लिया था,,,, लेकिन अंकित एक मर्द होने के नाते डॉक्टर की हालत को अच्छी तरह से समझ रहा था इसलिए कुछ बोला नहीं था,,,।

डॉक्टर के द्वारा लिखी गई दवा लेकर घर जाते-जाते शाम ढल चुकी थी अंधेरा होने लगा था घर पर जब पहुंचा तो तृप्ति भी घर पर आ चुकी थी तृप्ति अपनी मां के पास ही बैठी हुई थी और वह थोड़ा चिंतित नजर आ रही थी,,,, अपनी मां के पास पहुंचते ही अंकित अपनी मां से बोला,,,।

मम्मी ब्लू और पेशाब का रिपोर्ट आ चुका है,, और घबराने वाली कोई बात नहीं हल्का सा मलेरिया का असर है,,,,।

अच्छा हुआ अंकित कुछ ज्यादा गड़बड़ नहीं हुई नहीं तो मैं कब से परेशान हो गई थी मुझे तो मालूम ही नहीं था कि मम्मी की तबीयत खराब है घर पर आई तो पता चला,,,, दो-तीन दिन तक मम्मी तुम आराम करना मैं खाना बना देता हूं मैं पहले चाय बना देती हूं तुम चाय के साथ दवाई खा लेना,,,(इतना कहने के साथ ही तृप्ति अपनी मां के पास से उठकर खड़ी हो गई और किचन की तरफ जाने लगी,,,, लेकिन सुगंधा के चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था अंकित के रिपोर्ट वाली बात सुनकर उसके होश उड़ गए थे,,, और वह भी ब्लड और पेशाब का इन सब के बारे में तो सुगंधा को कुछ पता ही नहीं था इसलिए वह हैरानी से अंकित की तरफ देख रही थी,,,।

अंकित सही समय पर आकर अपनी मां को दवा खाने ले गया था और वहां से दवा दिला कर वापस घर पर ले आया था शाम के वक्त ब्लड और पेशाब का रिपोर्ट लेने जब दवा खाने गया तो वहां पता चला कि ज्यादा कुछ नहीं बस हल्का सा मलेरिया का असर था,,, रिपोर्ट के बारे में सुनकर अंकित को थोड़ी राहत हुई,,, और वह यह खबर जब घर पर पहुंच कर अपनी मां को दिया तो वह हैरान हो गई,,, अपने रिपोर्ट के बारे में सुनकर नहीं बल्कि ब्लड और पेशाब के सैंपल के बारे में सोचकर,,,।

तृप्ति जब रिपोर्ट के बारे में सुनी तो उसे भी राहत हुई और वहां अपनी मां से बोली की तीन दिनों तक वह बिल्कुल भी काम ना करें मैं दोनों टाइम पर खाना बना लूंगी और घर का काम कर लूंगी और चाय बनाने के लिए वह रसोई घर में चली गई,,, कमरे में केवल अंकित और उसकी मां थी,,,, अंकित इस बारे में बिल्कुल भी नहीं जानता था कि उसकी मां को ब्लड और पेशाब के सैंपल के बारे में कुछ भी पता नहीं है,, इसलिए वह आराम से अपनी मां के पास बैठ गया उसकी मां भी धीरे से उठकर दीवार का टेका लेकर बिस्तर पर बैठी रह गई,,, और पिछले चार-पांच घंटे के बारे में सोचने लगी जो कि उसके जेहन में बिल्कुल भी उसे पल की तस्वीर नहीं छपी हुई थी जिसके बारे में वह सोचने की कोशिश कर रही थी,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह पूरी कोशिश कर रही थी उन सब के बारे में सोने के लिए लेकिन उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था यह सब कैसे हुआ कब हुआ उसे कुछ मालूम नहीं था और अंकित था कि अपनी मां को सहज होता हुआ देखकर बहुत खुश नजर आ रहा था,,,।

वैसे भी आज बाथरूम में जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोचकर उत्तेजना की चिंगारी रह रहकर उसके तन बदन में जवानी के शोले को भड़का दे रही थी क्योंकि बाथरूम वाला नजारा ही कुछ गजब का था,, क्योंकि वह बार-बार अपने मन में यही सोच रहा था कि जिस तरह का मौका उसे दवा खाने के बाथरूम में मिला अगर वही मौका घर के बाथरूम में मिल जाए तो वह अपनी मां की बुर का भोसड़ा बना देगा,,,, अपनी मां की खूबसूरत चेहरे की तरफ देखते हुए अंकित बोला,,,।

अब कैसा लग रहा है मम्मी,,,?

अभी तो ठीक लग रहा है लेकिन बदन में थोड़ा-थोड़ा दर्द है,,,(अंकित के सवाल पर अंकित की तरफ देखते हुए सुगंधा बोली,,,)

मैं दवा लेकर आया हूं चाय पीने के बाद दवा पी लेना दर्द भी ठीक हो जाएगा,,,,।

वह सब तो ठीक है लेकिन ब्लड और पेशाब की सैंपल का क्या माजरा है,,।

अरे मम्मी तुम्हारी तबीयत ही कुछ ज्यादा खराब थी इसलिए डॉक्टर को ब्लू और पेशाब का सैंपल लेना पड़ा रिपोर्ट के लिए और यह तो अच्छा हुआ कि रिपोर्ट में ज्यादा कुछ निकला नहीं बस हल्का सा मलेरिया कस रही है जो की दवा खाने के बाद दो-तीन दिन में ही सब सही हो जाएगा,,,,।

अरे वह सब तो ठीक है लेकिन जो कुछ भी हुआ मुझे उसके बारे में कुछ भी याद नहीं है,,,।

मम्मी तुम्हारी तबीयत इतनी खराब थी कि मैं ही तुम्हें सहारा देकर घर के बाहर ले गया औटो किया और वहां से दवा खाने ले गया,,,,।

तु मुझे दवा खाने ले गया,,, तो तृप्ति कहां थी,,,,?(एकदम आश्चर्य जताते हुए सुगंधा बोली,,)

तृप्ति कहां थी वह तो ट्यूशन गई हुई थी मै हीं तुम्हें दवा खाने ले गया था,,,,।

मतलब तेरे साथ तृप्ति नहीं थी,,,(फिर से हैरान होते हुए बोली)

क्या मम्मी बता तो रहा हूं कि मैं ही तुम्हें दवा खाने ले गया था तृप्ति को घर पर थी ही नहीं तुम बीमार हो इस बारे में तो तृप्ति को घर पर आने पर पता चला,,, क्या तुम्हें सच में कुछ भी याद नहीं है,,,।

नहीं मुझे तो बिल्कुल भी याद नहीं है मुझे इतनी जोर का बुखार था कि होश ही नहीं था,,,।

तभी तो तुम्हारी हालत देखकर डॉक्टर ने रिपोर्ट निकालने के लिए बोला था,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा के होश उड़ने लगे क्योंकि उसे कुछ भी याद नहीं था,,,, उसके बेटे का घर से सवाल के लिए उसे लेकर जाना सहारा देकर दवा खाने पहुंचाना और वहां से घर लेकर आना यह सब तो ठीक था लेकिन पेशाब और ब्लड की रिपोर्ट के बारे में उसे कुछ भी याद नहीं था और यही सबसे ज्यादा परेशान कर देने वाली बात थी ब्लड की बात तक भी ठीक थी लेकिन पेशाब,,, पेशाब का सैंपल डॉक्टर ने कैसे लिया यही सोचकर परेशानी जा रही थी क्योंकि उसे तो कुछ पता ही नहीं था,,,, अपने बेटे की बात सुनकर,, सुगंधा हैरान होते हुए बोली,,)

सब तो ठीक है लेकिन ब्लड और पेशाब का सैंपल कैसे लिया इस बारे में भी मुझे कुछ भी याद नहीं है,,,।

(अपनी मां की बात सुनकर वह कुछ क्षण तक अपनी मां के खूबसूरत लेकिन आश्चर्य भरे चेहरे की तरह देखने लगा और फिर वह भी हैरान होते हुए बोला)

क्या तुम्हें नहीं मालूम है ब्लड और पेशाब का सैंपल कैसे लिया गया,,,,

मैं तभी तो हैरान हूं मुझे कुछ भी पता नहीं है,,,, तु मुझे शुरू से बता,, क्या हुआ,,,,?

(अंकित हैरान था क्योंकि घर से लेकर के दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था उसकी मां को बिल्कुल भी याद नहीं था अब उसे यह नहीं समझ में आ रहा था कि बाकी मैं उसकी मां को याद नहीं था कि वह जानबूझकर कुछ भी याद न होने का बहाना कर रही है लेकिन फिर वह अपने मन में सोचा कि आखिर उसकी मां ऐसा करेगी क्यों,,,, उसकी तबीयत वाकई में कुछ ज्यादा ही खराब थी बुखार से उसका बदन तप रहा था,,,,,,, यह सब सोते हुए अंकित अपने मन में सोचा हो सकता है वाकई मम्मी सच कह रही है,,,, और थोड़े ही देर में उसके दिमाग में चमक होने लगी उसे शरारत सुझने लगी,,, वह अपने मन में ढेर सारी बातें सोचने लगा और ऐसी बातें सोचने लगा जो उसे अपनी मंजिल तक ले जा सकते थे मां बेटे के बीच की दूरी को खत्म कर सकते थे वह समझ गया था कि वह ऐसी कहानी बनाएगा कि उसकी मां पानी पानी हो,,,, जाएगी,,,,,, अपने बेटे को इस तरह से सोच में डूबा हुआ देखकर सुगंधा बोली,।)

अब तू क्या सोचने लगा क्या तुझे भी कुछ भी याद नहीं है,,,,।

नहीं नहीं मुझे तो सब कुछ याद है लेकिन मैं इस बात से हैरान हूं कि वाकई में तुम्हें कुछ भी याद नहीं है दवा खाने में क्या हुआ कैसे वहां पहुंची डॉक्टर ने क्या कहा सैंपल के बारे में क्या कुछ भी याद नहीं है,,,,।(अंकित अपने मन में उठ रहे शक को दूर कर लेना चाहता था इसलिए पूछ रहा था,,)

अरे बुद्धू मुझे कुछ भी याद होता तो मैं तुझसे भला क्यों पूछती,,,,।

बात तो सही है मम्मी लेकिन फिर भी,,,, कोई बात नहीं बुखार ही इतना ज्यादा था कि इंसान होश में ही ना हो,,,, चलो कोई बात नहीं मैं शुरू से बताता हूं,,,,।

(अंकित का इतना कहना था कि तृप्ति चाय बनाकर तीन कप ट्रे में रखकर और कुछ बिस्किट लेकर अपनी मां के कमरे में दाखिल होते हुए बोली)

लो तैयार हो गई चाय,,,

(अंकित अच्छी तरह से जानता था कि उसकी बड़ी बहन की मौजूदगी में दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था वह बताना उचित नहीं था,,,, और शायद इस बात को सुगंधा भी अच्छी तरह से समझते थे इसलिए तृप्ति की मौजूदगी में उसने उस बात की जिक्र ही नहीं छेड़ी,,,)

लो मम्मी,,, एक कप उठा लो,,,,,(अंकित की तरफ ट्रे बढाते हुए,,) ले तु भी ले ले,,,,(अंकीत भी हाथ बढ़ाकर चाय का कप ले लिया,,, और ट्रे में से बिस्कुट लेकर खाने लगा और चाय पीने लगा,,,,, तृप्ति भी एक छोटा सा टेबल अपनी मां के बिस्तर के पास लाकर उसे पर बैठ गई और चाय पीने लगी और चाय पीते हुए बोली,,,,।

मम्मी तुम्हारी तबीयत खराब थी तो सुबह बोलना चाहिए था ना मैं कॉलेज नहीं जाती,,,, खामखा तुम्हे परेशान होना पड़ा,,,,,(चाय की चुस्की लेते हुए तृप्ति बोली,,,)

अरे मुझे अगर पता होता कि मेरी तबीयत इतनी ज्यादा खराब होने वाली है तो क्या मैं दवा नहीं ले लेती,,,, मुझे तो लगा आराम कर लूंगी तो ठीक हो जाएगा क्योंकि बदन में सिर्फ दर्द ही लग रहा था यह तो बाद में एकदम तेज बुखार हो गया और मुझे कुछ पता ही नहीं चला,,,,( सुगंधा भी चाय की चुस्की लेते हुए बोली,,,)

बात तो सही कह रही है मम्मी अगर हम दोनों को भी इस बात का पता चला की मम्मी की तबीयत खराब लग रही है तो क्या हम दोनों पढ़ने के लिए जाते नहीं ना,,,, यह तो एकाएक तबीयत खराब हो जाती है,,, मैं भी जब पढ़कर घर पर लौटा तो मुझे नहीं मालूम था कि मम्मी घर पर होगी लेकिन जब देखा,,, दरवाजा बाहर से खुला हुआ है ताला नहीं लगा हुआ है तो मुझे लगा कि शायद दीदी तुम होगी,,,, जब अंदर जाकर देखा तो तुम नहीं थी तो मम्मी के कमरे में गया और मम्मी बेसुध होकर सो रही थी,,,, सो क्या रही थी दर्द से कहर रही थी,,,, मैं दो बार आवाज भी लगाया मम्मी मम्मी की मम्मी तो कुछ बोल नहीं रही थी,,,, और जब मैं मम्मी के माथे पर हाथ रख तो मम्मी का माथा एकदम तप रहा था,,, और फिर मैं दवा खाने ले गया,,,,।

(तृप्ति के साथ-साथ,,, सुगंधा भी बड़े ध्यान से अंकित की बात को सुन रही थी लेकिन अंकित ने ब्लड और पेशाब के सैंपल के बारे में कुछ भी नहीं बताया और तृप्ति के सामने न जाने क्यों सुगंध भी खामोश रही और इस बारे में जिक्र नहीं की क्योंकि उसे अंदर ही अंदर ऐसा लग रहा था कि जरूर कुछ हुआ होगा इसलिए वह इस समय बिल्कुल भी जिक्र नहीं की और अंकित की बात सुनकर तृप्ति बोली,,,।)

अच्छा हुआ अंकित तू घर पर मौजूद था वरना मम्मी की तबीयत और ज्यादा खराब हो जाती सही समय पर तूने मम्मी को दवा खाने लेकर दवा दिलाया यही उनके सेहत के लिए अच्छी बात है,,,,।

(कुछ देर तक तीनों में इसी तरह से बातें होती रही,,, सुगंधा की तबीयत अब दुरूस्त थी,,, वह अंकित से जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सुनना चाहती थी लेकिन तृप्ति की मौजूदगी में ऐसा संभव बिल्कुल भी नहीं था इस बात को सुगंधा भी समझने लगी थी,,, क्योंकि सहज होता तो इसी समय अपनी बड़ी बहन की मौजूदगी में वह सब कुछ बता देता लेकिन अंकित खामोश रहा क्योंकि वह बात नहीं जा रहा था उसी समय तृप्ति चाय लेकर आ गई थी और अगर दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था वह सामान्य होता तो प्रीति के सामने भी बताने में अंकित को कोई हर्ज नहीं होता,,,, सुगंधा को थोड़ा आराम लगने लगा था,,, इसलिए वह अपने बिस्तर से उठने की कोशिश करते हुए बोली,,,)

खाना बनाने का समय हो रहा है मैं खाना बना देती हूं,,,(सुगंधा का इतना कहना था कि तृप्ति तुरंत अपना हाथ उसके कंधों पर रखकर उसे दबाते हुए बैठने का इशारा करते हुए बोली,,,)

बिल्कुल भी नहीं अब दो-तीन दिन तक तुम आराम करो मैं बना दूंगी बस मुझे बता दो बनाना क्या है,,,,।

अरे रहने दे मैं बना लुंगी,,,(फिर से उठने की कोशिश करते हुए सुगंधा बोली तो फिर से तृप्ति उसे रोक दी और बोली)

क्या मम्मी तुम भी दो-तीन दिन आराम करो मैं बना दूंगी ना बस बता दो क्या बनाना है,,,।

हां मम्मी बता दो ना दीदी बना देगी वैसे भी तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है तो दो-तीन दिन तक आराम ही करो,,,,।

अच्छा सुन दाल चावल ही बना दे,,,,।

ठीक है मम्मी,,,,(और इतना कहने के साथ ही खाली कप और ट्रे लेकर कमरे से बाहर निकल गई और उसके जाते ही सुगंधा बोली,,,)

अब बता क्या हुआ था दवा खाने,,,, में,,,,

(तृप्ति के जाते ही जिस तरह से सुगंधा उत्सुकता दिख रही थी दवा खाने के बारे में जानने के लिए उसे देखते हुए अंकित समझ गया था कि उसकी मम्मी भी कुछ और सुनना चाहती है वरना वह तृप्ति के सामने ही जानने की कोशिश करती की दवा खाने में क्या हुआ था,,,, इसलिए तो अपनी मां की उत्सुकता और उसका बेकाबू पन देखकर अंकित के तन बदन में हलचल होने लगी थी उसके लंड में हरकत होने लगी थी और वह धीरे से बोला,,,)

पता नहीं तुम क्या सोचोगी,,,, मेरी बात का यकीन करोगी कि नहीं मुझे समझ में नहीं आ रहा है,,,।

अरे समझना क्या है,,,, तू जो बोलेगा सच ही बोलेगा जो कुछ भी दवा खाने में हुआ है वही बताएगा ना,,,,

हां वह बात तो ठीक है,,,लेकीन,,,(अंकित का इतना कहना था कि तभी तृप्ति कमरे में दाखिल होते हुए बोली और उसके हाथ में पानी का गिलास था,,,)

अरे मम्मी तुमने तो दवा पी ही नहीं लो जल्दी से पी लो,,,।

हां दवा खाना तो मैं भूल ही गई,,,,।

ओहहह बात ही बात में मैं भी दवा देना भूल गया,,,(और इतना कहकर अंकित मेडिकल से लाई हुई दवा निकाल कर देने लगा सुगंधा चाहती थी कि जल्द से जल्द तृप्ति कमरे से बाहर चली जाए और अंकित दवा खाने के बारे में सब कुछ बताएं,,,, और थोड़ी देर में तृप्ति वापस चली गई उसके जाते ही सुगंध फिर से उत्सुकता दिखाते हुए बोली,,,)

अब बता क्या हुआ था,,,,?

मम्मी लेकिन तुम बुरा मत मानना और मेरे बारे में तो बिल्कुल भी गलत मत सोचना,,,,।

अरे मैं कुछ गलत नहीं समझुंगी तु बता तो सही,, ।

ठीक है मैं सब बताता हूं,,,,(उसका इतना कहना था कि फिर से तृप्ति दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई और बाली)

चल अंकित तू मेरी किचन में मदद कर,,,,,, बहुत दिन बाद खाना बना रही हूं इसलिए थोड़ी दिक्कत आ रही है,,,।

अरे मैं क्या करूंगा किचन में आकर,,,,।

किचन में तेरे लायक बहुत कम है चल जल्दी चल,,,,।

(अंकित समझ गया था कि अब उसे जाना पड़ेगा और उसकी मां भी मौके की नजाकत को समझ रही थी इसलिए कुछ बोल नहीं पाई और अंकित वहां से उठकर किचन में चला गया,,,,,,

खाना बनाकर तैयार हो गया था तीनों साथ में मिलकर खाना भी खाएं लेकिन आज तृप्ति सुगंधा और अंकित को अकेले नहीं छोड़ रही थी,,, इसलिए अंकित को मौका ही नहीं मिला सब कुछ बताने का।)

जिस मौके की तलाश में सुगंध थी इस मौके की तलाश में अंकित भी था,,,,। अंकित समझ गया था कि बुखार के बद हवासी में उसकी मां को कुछ भी नहीं मालूम है की दवा खाने में क्या हुआ था और वही वह जानना चाहती थी और इसीलिए अंकित का मन प्रसन्न हुआ जा रहा था क्योंकि वह अब दवा खाने वाली बात में नमक मिर्च लगाकर बताने वाला था लेकिन मौका नहीं मिल रहा था क्योंकि तृप्ति हमेशा साथ में रहती थी,,, सुगंधा की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी सुगंधा को ऐसा था कि रात में तृप्ति जब अपने कमरे में सोने के लिए चली जाएगी तब वहां अंकित को अपने कमरे में बुलाकर दवा खाने वाली घटना के बारे में पूछेगी,,, लेकिन ऐसा नहीं हुआ,,,, क्योंकि तृप्ति भी अंकित के साथ अपनी मां के कमरे में थी जब तक वह सो नहीं गई तब तक वह भी वहां से नहीं हटी,,।

दूसरे दिन सुबह तृप्ति की नींद जल्दी खुल गई क्योंकि वह जानती थी कि उसकी मां की तबीयत खराब है और उसे ही घर का सारा काम करना पड़ेगा,,, काम क्या करना पड़ेगा अपनी मां की तबीयत खराब होने की वजह से वह खुद ही अपनी मां को बिल्कुल भी काम करने देना नहीं चाहती थी,,, उसकी मां बिस्तर में ही थी और वह घर का सारा काम कर चुकी थी उसने अपने भाई अंकित को भी नहीं जागाई,,, उसे भी स्कूल जाना था लेकिन वह चाहती थी कि उसका भाई उसकी गैर मौजूदगी में घर पर उसकी मां का ख्याल रखे,,, अपने भाई को जगाने के ख्याल से उसे उसे दिन वाली घटना याद आ गई जब वह अपनी मां के कहने पर अपने भाई को जगाने के लिए उसके कमरे में गई थी और जिस अस्तव्यस्त हालत में उसे अपना भाई दिखाई दिया था,,, उसे बारे में सोच कर उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी एक पल के लिए तो उसे ऐसा लगा कि वह फिर से अपने भाई को जगाने के लिए उसके कमरे में जाए लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई क्योंकि अपने भाई के लंड को देखकर उसके मन में कुछ-कुछ होने लगा था,,,।उसे घटना को याद करके उसे संदीप याद आ गया और कॉलेज की मैडम के घर में जो कुछ भी हुआ था पल भर में उसकी आंखों के सामने किसी फिल्म की तरह घूमने लगा और एक बार फिर से वह हैरान हो गई थी संदीप के लंड को देखकर और सुबह-सुबह अपने भाई के लंड को देखकर दोनों के लंड की तुलना करना जमीन आसमान को एक करने जैसा था एकदम नामुमकिन जहां एक तरफ संदीप का लंड छोटा सा था वही उसके भाई का लंड एकदम बम पिलाट की तरह मोटा तगड़ा था,,,। और इसीलिए वह अपने भाई कमरे में नहीं जाना चाहते थे क्योंकि वह जानती थी अगर वह अपने भाई के कमरे में कहीं और एक बार फिर से उसके भाई के लंड के दर्शन उसे हुए तो वह अपना काबू खो बैठेगी,,,।

वह तब तक दोनों को सोने दी जब तक कि वह खाना बनाकर तैयार नहीं हो गई,,,, सब कुछ तैयार हो चुका था वह कॉलेज जाने के लिए तैयार हो गई थी और अपनी मां को जगाने के लिए उसके कमरे की तरफ जा ही रही थी कि अंकित अपने कमरे में से बाहर निकल गया वह बहुत हड़बड़ाहट में था क्योंकि उसे भी देर हो चुकी थी उसे हडबडाता हुआ देखकर तृप्ति बोली,,,।

अरे अरे इतना हड़बड़ा क्यों रहा है,,,?

मुझे देर हो गई है दीदी तुमने मुझे उठाया क्यों नहीं,,,

मैंने तो मम्मी को भी नहीं उठाई हूं और तुझे भी जान बुझ कर नहीं उठाई हूं,,,( तृप्ति अपनी कमर पर हाथ रखते हुए,,, और उसके ऐसा करने पर कमर और नितंबों का जो जोड़ होता है,,, वह एकदम से उभरकर दिखाई देने लगा और उसे पर नजर पडते ही अंकित अपने मन में ही बोला पूरी जवान हो गई है दीदी,,,,)

जानबूझकर मे कुछ समझा नहीं,,,।

अरे बुद्धू मम्मी की तबीयत खराब है कोई तो होना चाहिए घर पर उनका ख्याल रखने के लिए,,,।
(तृप्ति का इतना कहना था कि उसे सब कुछ एकदम से याद आने लगा कि उसे तो दवा खाने वाली बात उसकी मां को बताना है और यही मौका भी सही रहेगा जब उसकी दीदी घर पर नहीं रहेगी वह बड़े आराम से नमक मिर्च लगाकर वह बात बता सकेगा,,,, इसलिए तृप्ति की बात सुनकर वह बोला)

बात तो तुम ठीक कह रही हो दीदी,,, चलो कोई बात नहीं मैं घर पर रुक जाता हूं लेकिन खाना,,,।

उसकी चिंता तो मत कर मैं खाना और नाश्ता दोनों तैयार कर चुकी हूं मैं अब कॉलेज जा रही हूं तू ही मम्मी को जगा देना,,,।

ठीक है दीदी तुम जाओ मैं मम्मी को जगा दूंगा,,,,।

(इतना सुनते ही तृप्ति अपनी कॉलेज का बेग अपने हाथ में ले ली और घर से निकलते निकलते बोली,,)

मम्मी को सही समय पर दवाई खिला देना,,,।

ठीक है दीदी तुम जाओ,,,,,।

(तृप्ति कॉलेज के लिए निकल गई अंकित मन ही मन बहुत खुश हो रहा था वह जल्दी से जाकर दरवाजा बंद कर दिया था अब घर में केवल अंकित और उसकी मां ही थी जो खुद जानने के लिए बेताब थी की दवा खाने में क्या हुआ था अंकित भी इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां भी यह जानना चाहती है कि आखिरकार डॉक्टर को उसके पेशाब का सैंपल कैसे मिला,,,, और यह सब अपने मन में सोच कर अंकित बहुत प्रसन्न भी हो रहा था और तेजी भी हो रहा था क्योंकि वहां जानता था कि आप उसे अपनी मां को क्या बताना है आज उसके पास पूरा मौका था अपनी मां के सामने खुलने का,,, वह अपनी मां से इस तरह की बातें करना चाहता था जिस तरह की बातें एक प्रेमी प्रेमिका और पति पत्नी के बीच होती है,,,, इसलिए वह अपनी मां को बिना जगाए पहले खुद नहाने के लिए बाथरुम में चला कर और बाथरूम में जाते ही अपने सारे कपड़े उतार दिया,,,,।

आज उसके बदन में अजीब सी खुमारी छाई हुई थी,,, आज उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि घर में केवल वह और उसकी मां ही है एक अजीब सा है उसके तन बदन को रंगत से भर दे रहा था ऐसा एहसास के बाद उसने किसी से संबंध बनाने के लिए मचल उठता है और उसे इस बात का एहसास होता है कि कमरे में केवल वह और उसके साथी है लेकिन यहां मामला कुछ और था वह अपनी मां से सिर्फ बात करने की उद्देश्य से उत्तेजित और जानता था कि उसकी इतनी जल्दी उसके साथ हम बिस्तर होने वाली नहीं है,,,, क्या कभी ऐसा ना भी हो लेकिन फिर भी न जाने के मन में एक तरह की उम्मीद जगी रहती थी,,,।

इसी के चलते बाथरूम के अंदर उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में खड़ा था,,,, अंकित इस बात को बिल्कुल भी नहीं जानता था कि उसके नंगे लंड का दर्शन उसकी मां के साथ साथ उसकी बहन भी कर चुकी है,,, अगर यह बात वह जानता तो शायद उसकी कल्पनाएं और भी ज्यादा रंगीन हो जाती,,,, फिर भी नहाने से पहले अपनी मां के बारे में सोचकर अपने लंड को हिलाना शुरू कर दिया और थोड़ी ही देर में गरम फवारा झाड़ के वह गहरी गहरी सांस लेने लगा,,,।

अंकित नहा चुका था तैयार हो चुका था और रसोई घर में जाकर अपने लिए और अपनी मां के लिए चाय गरम कर रहा था उसकी बहन पहले से ही चाय बनाकर गई थी बस उसे गरम करने की देरी थी,,, थोड़ी देर में चाय गरम हो गई और वह ट्रे में दो कप चाय लेकर और बिस्किट लेकर अपनी मां के कमरे में पहुंच गया कमरे का दरवाजा पहले से खुला हुआ था क्योंकि रात को वह उसकी बहन कमरे से बाहर निकलते समय दरवाजे को खुला छोड़ रखी थी,,,।

अपनी मां के कमरे में अंकित पहुंचा तो देखा उसकी मां बिस्तर पर अस्त व्यस्त हालत में गहरी नींद में सो रही थी,,, साड़ी पूरी तरह से कमर के ऊपरी भाग से हट चुकी थी और उसका भारी भरकम और जवानी से भरा हुआ शरीर अपनी आभा बिखेर रहा था,,,, अंकित तो कुछ देर के लिए अपनी मां को देख नहीं रही क्या उसकी मदहोश कर देने वाली जवानी का रस अपनी आंखों से पिता ही रह गया,,,, उसकी मां पीठ के पास हो रही थी एकदम बेसुध होकर,,, नीचे से साड़ी घुटनों तक उठी हुई थी जिसकी वजह से उसकी मानसिक पिंडलियों एकदम साफ दिखाई दे रही थी उसकी गोरी चिकनी टांग देखकर और उसकी भरी हुई जवानी देखकर एक बार फिर से उसका लंड एकदम से खड़ा हो गया अभी कुछ देर पहले ही वह अपने हाथ से हिला कर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करके आया था लेकिन अपनी मां की गर्म जवानी देखकर एक बार फिर से वह गर्म हो चुका था,,,,।

जिस हालत में उसकी मां सो रही थी अंकित उसे जगाना नहीं चाहता था,,, ब्लाउज में कसा हुआ उसका पपाया जैसी चुचीया,,, सांसों की गति के साथ ऊपर नीचे हो रही थी जिसे देखकर अंकित की हालत खराब हो रही थी वह कुछ देर तक अपनी मां की जवानी को देखता ही रह गया घूरता ही रह गया,,, चिकना मांसल पेट और बीच में गहरी नाभि किसी गुलाबी बुर के क्षेंद से कम नहीं थी,,,, पल भर के लिए अंकित के मन में ख्याल आया कि क्यों ना अपनी उंगली अपनी मां की नाभि में डालकर देखा जाए की कितनी गहरी है और फिर उसे ख्याल आया कि क्यों ना जीभ से चाट कर अपनी मां की नाभि का स्वाद लिया जाए,,,,, और फिर उसके मन में ख्याल आया कि यह सब करने से अच्छा है कि क्यों ना एक बार अपने हाथ को अपनी मां की चूची पर रखकर उसकी गर्मी को महसूस किया जाए वैसे भी चूचियों की गहरी लकीर ब्लाउज से बाहर उभर कर सामने दिखाई दे रही थी गले में सोने की चेन उसकी खूबसूरती को चार चांद लग रही थी,,,,,,।

एक तरफ अपनी मां की मदद उसका देने वाली जवानी की लालच और दूसरी तरफ चाय ठंडा होने की फिक्र उसके दिलों दिमाग पर दबाव सा डाल रहा था,,, आखिरकार चाय ठंडी होने की फिक्र में वह अपनी मां को जगाने लगा,,,।

मम्मी मम्मी कह कर दो बार पुकारा लेकिन उसकी मां दवा के नशे में गहरी नींद में सो रही थी इसलिए वह एक हाथ में प्लेट लेकर दूसरे हाथ से अपनी मां के कंधे को पकड़कर उसे हिलाते हुए जगाने लगा,,,, उसके ऐसा करने पर उसकी मां की आंख हल्के से खुली,,, वह होश में आती इससे पहले ही अंकित बोला,,,।

लो मम्मी तुम्हारे लिए चाय लाया हूं,,,,।
(अंकित की बात सुनकर वहां अपनी दोनों आंखों को सिकुड़ कर खोलते हुए उसे बड़े गौर से अच्छी ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे पहचानने की कोशिश कर रही है,,, क्योंकि वह अभी भी नींद में थी लेकिन थोड़ी देर में उसे समझ में आने लगा और जल्दी से उठकर बैठ गई और इधर-उधर देखने लगी दीवार पर टंगी घड़ी में दिखी तो एक घंटा लेट हो चुका था वह एकदम से घबरा गई उसकी घबराहट हडबड़ाहट को अंकित अच्छी तरह से समझता था इसलिए,, जल्दी से अपने हाथ को उसके कंधे पर रख दिया और उसे समझाते हुए बोला,,,,)

आराम से मम्मी आराम से,,,,,।

अरे मुझे तो देर हो गई है,,,,।

तो क्या हो गया मैं ही तुम्हें जगाना नहीं चाहता था,,,।

लेकिन क्यों नहीं जगाना चाहता था,,,?(आश्चर्य से अंकीत की तरफ देखते हुए बोली,,,)

मम्मी तुम्हारी तबीयत खराब है और दो-तीन दिन तक तुम घर पर लेकर आराम करो तुम्हें कोई काम करने की जरूरत नहीं है जब एकदम ठीक हो जाना तब स्कूल जाना और घर का काम करना,,,,।

(अंकित का इतना कहना था कि सुगंधा की नजर अपनी हालत पर गए तो एकदम से उसके होश उड़ गए उसकी साड़ी एकदम बिस्तर पर बिक्री हुई थी कमर के ऊपर वह सिर्फ ब्लाउज में की बाकी उसका पूरा गदराया बदन एकदम से दिखाई दे रहा था,,, एकदम से शर्म से पानी पानी हो गई और तुरंत अपनी साड़ी को व्यवस्थित करने लगी अपनी मां का इस तरह से हडबढ़ाना और शर्माना,,, और शर्माने के साथ-साथ अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करना अंकित और भी ज्यादा उत्तेजित कर गया था,,,,।)

तुम मम्मी बिल्कुल भी चिंता मत करो खाना और नाश्ता दीदी तैयार करके कॉलेज चली गई है,,,।

क्या कह रहा है अंकीत,,,,!(एकदम आश्चर्य से अंकित की तरफ देखते हुए बोली)

हां मम्मी मै सच कह रहा हूं दीदी ने सब कुछ तैयार कर दिया घर की सफाई भी कर दि है,,, और सब कुछ करने के बाद कॉलेज के लिए चली गई,,,।

(अंकित की बात सुनते ही सुगंध मन ही मन बहुत खुश हो रही थी खुश इसलिए हो रही थी कि उसकी दोनों बच्चे उसका बहुत ख्याल रख रहे थे और यही तो चाहिए रहता है मां-बाप को अपने बच्चों से,,,,, सुगंधा अपने बेटे के हाथ में चाय के ट्रे को देख रही थी और अपना हाथ आगे बढ़कर चाय का कप उठा ली और बोली,,,)

वैसे तो तू जानता ही है कि बिना नहाए धोए में चाय नहीं पीती लेकिन आज मुंह बुखार की वजह से ठीक-था लग रहा है इसलिए पीना पड़ रहा है।(चाय के कप को होठो से लगाते हुए बोली,,,)

मैं जानता हूं मम्मी,,, तुम बिना नहाए चाय नहीं पीती लेकिन मैं जानता था कि बुखार की वजह से मन सही नहीं रहता,,, इसलिए मैं चाय गरम करके लेकर आया था,,,,।

तूने बहुत अच्छा किया,,, तू भी पी ले,,,।

हां मम्मी मैं पी रहा हूं,,,,(इतना कहने के साथ है यह अंकित भी चाय का कप हाथ में लेकर अपनी मां के पास ही बिस्तर पर बैठ गया और चाय पीने लगा,,,, और मर ही मन सोचने लगा कि उसकी मां दवा खाने में क्या हुआ था इस बात का जिक्र छेडे तो मजा आ जाए,,,, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था उसकी मां कुछ बोल नहीं रही थी वह सिर्फ अपने मन में यही सोच रही थी कि जब उसका बेटा कमरे में आया था तब वह कितनी अस्त व्यस्त हालत में थी जरूर उसके बेटे की नजर उसके चिकनी कमर उसका चिकना पेट और उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों पर गई होगी,,, उसकी नजर उसकी गहरी नाभि पर भी गई होगी,,, और गहरी नाभि को देखकर पता नहीं क्या सोच रहा होगा,,,, यही सब सो कर सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी वह अपने बेटे से कुछ बोल नहीं पा रही थी,,,,। थोड़ी देर में सुगंधा और अंकित दोनों चाय पी चुके थे,,, अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे बात की शुरुआत की जाए,,,, कुछ देर खामोश रहने के बाद वह बोला,,,,।)

मम्मी तुम दवा भी पी लो,,,, रुको मे देता हूं,,,(और इतना कहने के साथ ही अपनी मां के बिस्तर पर से उठकर खड़ा हो गया और सामने टेबल के ड्रोवर में से,, दवा निकालने लगा जो की रात को उसने ही रखा था,,,, टेबल पर ही मग भरकर पानी पड़ा था उसे धीरे से गिलास में डालकर दवा और पानी दोनों अपनी मां के पास लाया अपनी मां के हाथों में थमा दिया,,, सुगंधा अपने बेटे के हाथ में से दवा में पानी दोनों लेकर पीने लगी,,,, अंकित का मन मचल रहा था बात की शुरुआत करने के लिए लेकिन कैसे की जाए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि तभी उसे ख्याल आया और वह बोला,,,)

अरे मम्मी कल की रिपोर्ट कहां पड़ी है दोबारा दवा खाने जाओगी तो रिपोर्ट दिखाना पड़ेगा,,,,।

वही ड्रोवर में ही होगा,,,,(सुगंधा टेबल की तरफ देखते हुए बोली और तुरंत अंकित टेबल के पास गया और ड्रोवर में से रिपोर्ट निकाल कर अपने हाथ में ले लिया,,,, और फिर तुरंत अपनी मां के पास आ गया और दोनों रिपोर्ट को अपने हाथ में संभाल कर रखते हुए बोला,,,)

राहत की बात यह है की रिपोर्ट एकदम नॉर्मल है दो-तीन दिन में तो एकदम आराम हो जाएगा,,,,।
(जानबूझकर अंकित रिपोर्ट वाली बात कर रहा था ताकि उसकी मां को याद आ जाएगी उसे कौन सी बात करनी है और ऐसा ही हुआ रिपोर्ट की बात सुनते ही सुगंधा को भी एकदम से याद आ गया कि वह जानना चाहती थी की दवा खाने में क्या हुआ था,,, इसलिए दवा पीने के बाद वह तुरंत बोली,,,)

अरे हां मैं तो भुल ही गई थी,,, तूने बताया नहीं की दवा खाने में क्या हुआ था,,,,?

अरे हां मम्मी मैं तो भूल ही गया था,,, ठीक है तुम नहा धोकर तैयार हो जाओ तो तुम्हें भी तरोताजा लगने लगेगा,,,।

नहीं नहीं तु मुझे अभी बता दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था वह मुझे बिल्कुल भी याद नहीं है,,,।

अपनी बड़ी बहन के कॉलेज जाने के बाद अंकित नहा धोकर तैयार हो गया था और अपनी मां को चाय नाश्ता के साथ दवा भी दे दिया था तभी वह बार-बार अपनी मां को रिपोर्ट के बारे में याद दिला रहा था कि उसकी मां को सैंपल वाली बात याद आ जाए और ऐसा ही हुआ सुगंधा को सैंपल वाली बात याद आ गई थी,,,, और वह जिद करने लगी थी की दवा खाने में क्या-क्या हुआ था उसे बताएं क्योंकि उसे कुछ भी याद नहीं है,,, और ऐसा अंकित खुद चाहता था वह अपनी मां को क्लिनिक वाली बात नमक मिर्च लगाकर बताना चाहता था और वह भी तड़प रहा था अपनी मां को सब कुछ बताने के लिए उसके भी अरमान मचल रहे थे आज उसके पास बहुत ही बेहतरीन मौका था,,, एक औरत के साथ गुफ्तगु को करने का,,,,,, मां के साथ नहीं बल्कि एक औरत के साथ क्योंकि वह अपनी मां मैं मां नहीं बल्कि एक प्यासी औरत को देख रहा था,,,।

मम्मी तुम नहा धोकर तैयार हो जाओ फिर मैं बाद में बताता हूं,,,।

नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं वैसे भी मुझे अभी नहाने का मन नहीं कर रहा है तो मुझे पता क्या-क्या हुआ था मैं जाने के लिए बेकरार हूं क्योंकि मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि तू मुझे कब दवा खाने लेकर गया कब सैंपल दिया कुछ भी मुझे याद नहीं है,,,, ऐसा मेरे साथ पहले कभी नहीं हुआ था,,,।

अरे मम्मी में भागा थोड़ी जा रहा हूं,,, मैं सब कुछ बता दूंगा लेकिन पहले ना धोकर फ्रेश तो हो जाओ,,,।

और मैं भी तुझे बता दी हूं की अभी मैं नहीं नहाउंगी तुझे मेरी कसम सब कुछ सच-सच बता,,,।
(अपनी मां की बात सुनकर और उसकी दी हुई कम को सुनकर अंकित एकदम शांत हो गया कुछ देर के लिए कमरे में खामोशी छाई रही तो इस खामोशी को खुद सुगंध तोड़ते हुए बोली,,)

क्या हुआ तु चुप क्यों हो गया बताता क्यों नहीं,,,!

अब क्या बताऊं मम्मी मैं तुमको नहीं बताना चाह रहा हूं और तुम मुझे कसम दे रही हो सब कुछ सुनाने के लिए मैं नहीं चाहता कि क्लीनिक में जो कुछ भी हुआ मैं तुम्हें बताऊं वह सब तुम्हारा बुखार करना चाहता तुम्हें कुछ भी याद नहीं है और सही है की याद नहीं है वरना तुम ना जाने क्या सोचोगी,,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा को बिल्कुल शक होने लगा कि जरूर क्लीनिक में कुछ ना कुछ हुआ है और इसीलिए अंकित बात नहीं रहा है इसलिए वह पूरी तरह से अंकित को विश्वास में लेते हुए बोली,,,)

देख अंकित अगर मेरे मन में कुछ होता तो मैं तुझे बताने के लिए बोलती ही नहीं लेकिन मैं जानना चाहती हूं कि वहां पर क्या हुआ है इसलिए तो मैं तुझसे पूछ रही हूं और बिल्कुल भी चिंता मत करना कुछ बोलने वाली नहीं हूं,,,।

मम्मी तुम मुझे कसम देकर मजबूर कर रही हो,,,, मैं तुम्हें बताना नहीं चाहता हूं लेकिन अगर तुम मुझे मजबूर कर रही हो तो मैं भी तुम्हें बताने के लिए तैयार हूं लेकिन इससे पहले तुम्हें मेरी कसम खानी होगी,,,।
(ऐसा कहकर अंकित पूरी तरह से अपनी मां को अपनी कसम के दायरे में बांध लेना चाहता था ताकि वह जो कुछ भी बोले,,, उसे पर उसकी मां को विश्वास करने के सिवा और कोई रास्ता ना हो और उसकी बातों को सुनकर वह नाराज ना हो,,,,)

तेरी कसम,,,।

हां मम्मी मेरी कसम ताकि तुम मेरे बारे में कुछ उल्टा सीधा ना सोचो,,,,,।

अच्छा बाबा तेरी कसम खाती हूं मैं तुझे गलत नहीं समझुंगी,,,(कसम खाते हुए सुगंधा का अधिक जोरों से धड़क रहा था वह जल्द से जल्द अंकित के मुंह से सब कुछ सुनना चाहती थी और अंकित अपनी कसम दिल कर अपनी मां को पूरी तरह से अपनी विश्वास में लेकर अपनी बातों को नमक मिर्च लगाकर बताने के लिए अपने लिए अपने आपको तैयार कर चुका था,,, जैसे ही उसकी मां ने उसकी कसम खाई अंकित मन ही मन प्रसन्न होने लगा,,,, और अपनी बात की शुरुआत करते हुए बोला,,,,)

अब जब तुम मेरी कसम खा ही गई हो तो मैं तुम्हें सब कुछ बता देता हूं,,, , देखो दोपहर को जब मैं घर पर लौटा दो बाहर ताला नहीं लगा था तो मैं समझ गया घर पर कोई ना कोई तो आ ही गया है लेकिन यह नहीं मालूम था कि घर पर कौन है,,,,, मैं दरवाजे पर 10 तक दे नहीं बना था कि दरवाजे पर हाथ रखते ही दरवाजा अपने आप खुल गया और मैं धीरे से अंदर प्रवेश किया,,,,,।
(सुगंधा अपने बेटे की बात को बड़ी गौर से सुन रही थी)

ऐसा पहले कभी हुआ नहीं था कि दरवाजा खुला छोड़ा हो इसलिए मुझे थोड़ा अजीब लगा मैं घर में प्रवेश करके इधर-उधर देखने लगा लेकिन कोई नजर नहीं आया तो मैं दीदी के कमरे के पास गया कि दीदी का कमरा भी बंद था,,,,, और जब तुम्हारे कमरे के पास पहुंचा तो तुम्हारे कमरे का दरवाजा खुला हुआ था,,,, मुझे थोड़ा अजीब लगा मैं धीरे से तुम्हारे कमरे में प्रवेश किया तो तुम अपनी बिस्तर पर सो रही थी,,,, सो क्या रही थी मम्मी तुम दर्द से कंहर रही थी,,, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हुआ जब मैं तुम्हारे करीब पहुंचा तो देखा तुम बिस्तर पर बसु धोकर सो रही थी तुम्हारी साड़ी का पल्लू बिस्तर के नीचे लटक रहा था,,,,(अंकित ने जैसे ही साड़ी का पल्लू बिस्तर के नीचे लटक रहा था यह बात किया सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी और वह अपने मन में सोचने लगी की साड़ी का पल्लू जब नीचे लटक रहा था तो इसका मतलब है कि उसकी छाती एकदम साफ दिखाई दे रही होगी उसकी चूचियां उसकी सांसों की गति के साथ ऊपर नीचे हो रही होगी और यह सब अंकित अपनी आंखों से देख लिया होगा,,,, यह ख्याल उसके मन में आता है उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल होने लगी,,,,, अंकित की बात सुनकर सुगंधा बोली,,,)

तब तूनेक्या किया,,,,?

करना क्या था मेरे तो होश उड़ गए तुम्हारी हालत खराब थी तुम्हें बहुत दर्द हो रहा था और तुम दर्द से कहर रही थी,,, मुझे कुछ समझ में नहीं आया तो अपना हाथ तुम्हारे माथे पर रखकर देखने लगा तुम्हारा माथा तुम्हारा बदन बुरी तरह से गर्म था तुम्हें बड़े जोरों का बुखार था,,, तुम्हारी आदत देखकर मैं समझ गया की हालत गंभीर है मैं तुम्हें उठाने लगा लेकिन तुम अपने होश में नहीं थी,,,, मैं तुमसे बोला भी कितने बड़ी जोरों की बुखार है तुम्हें दवा खाने ले जाना पड़ेगा लेकिन तुम क्या बोली तुम्हें मालूम है,,,।

नहीं मुझे तो कुछ भी नहीं मालूम,,,,।

तुम मुझे बोली कि जाकर मेडिकल से गोली ला दे आराम हो जाएगा,,,,।

फिर तूने क्या किया,,,,?

करना क्या था मैं समझ गया था कि मेडिकल से दवा लाने से काम बनने वाला नहीं है इसलिए मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर उठाने लगा और बोला की दवा खाने चलना होगा,,,, लेकिन तुम तो उठने को तैयार ही नहीं थी तुम जाने को भी तैयार नहीं थी लेकिन मैं जानता था कि अगर इस तरह तुम्हें छोड़ दिया गया तो मामला ज्यादा बिगड़ जाता तुम्हारी तबीयत और ज्यादा खराब हो जाती और तुम्हें दवा खाने में एडमिट करना पड़ता,,,,।

बाप रे मेरी तबीयत इतनी ज्यादा खराब हो गई थी,,,(सुगंधा आश्चर्य जताते हुए बोली,,)

तो क्या मम्मी तुम्हारी तबीयत बहुत खराब थी तुम दवा खाने को जाने को तैयार नहीं घर में कोई था भी नहीं दीदी अगर होती तो शायद मुझे इतनी दिक्कत नहीं होती लेकिन वह भी नहीं थी और तुम्हें दवा खाने ले जाना बहुत जरूरी था मैं जबर्दस्ती तुम्हें उठाकर बिस्तर पर बिठाया,,,,एक तो तुम्हारे में बिल्कुल भी ताकत नहीं थी,,, बिस्तर पर बैठने के बावजूद तुम इधर-उधर लुढ़क जा रही थी तुम्हें संभालना मुश्किल हुआ जा रहा था,,,,, जैसे तैसे करके मैं तुम्हें सहारा देकर खड़ी किया,,,,,,।
(सुगंधा बड़ी गौर से अपने बेटे की बात सुन रही थी उसकी उत्सुकता और ज्यादा बढ़ती जा रही थी कि आगे क्या-क्या हुआ होगा,,, तभी अंकित ने ऐसी बात कह दी सुगंधा की तो बुर से पानीबहने लगा,,,,)

तुम्हें मैं कमरे से जैसे तैसे करके बाहर लेकर आया मैं अपना हाथ तुम्हारी बाहों में डालकर तुम्हें पकड़े हुए था ताकि तुम गिर ना जाओ लेकिन सबसे ज्यादा परेशान कर रहा था तुम्हारे साड़ी का पल्लू जो बार-बार तुम्हारे कंधे से नीचे गिर जा रहा था और सब कुछ दीख जा रहा था,,,,।
(
(सब कुछ दिख जाने वाली बात सुनकर सुगंधा के तन बदन में एकदम से आग लग गई सब कुछ दिख जाने का मतलब अच्छी तरह से समझ रही थी लेकिन फिर भी अनजान बनते हुए बोली।।)

सबकुछ दिख जा रहा था मतलब,,,,।

मतलब की मम्मी साड़ी का पल्लू नीचे गिर जाने से तुम्हारी छाती एकदम से दिखने लगती थी,,,,,, मुझे तो समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करु,,,,।

इसमें समझने वाली कौन सी बात थी साड़ी का पल्लू ठीक कर देता,,,।

ऐसा तो मैं बार-बार किया था लेकिन जब तक घर में थी तब तक तो ठीक था मैं सोच रहा था कि अगर बाहर तुम्हारे साड़ी का पल्लू नीचे गिर गया तो गजब हो जाएगा,,,,।

कैसा गजब हो जाएगा मैं कुछ समझी नहीं,,,।

तेरी मम्मी तुम तो एकदम पूरी हो तुम नहीं जानती बाहर मर्दों की नजर कैसी रहती है एक खूबसूरत औरत की साड़ी का पल्लू अगर कंधे पर से नीचे गिर जाए तो आने जाने वाले सब की नजर औरतों की छाती पर ही गड़ी रह जाए देखकर पागल हो जाए,,,,।

(अंकित बड़ी हिम्मत करके इतना कुछ भूल गया था और अपनी मम्मी का चेहरा देख रहा था उसे साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी कई बातों को सुनकर उसकी मम्मी का चेहरा शर्म के मारे सुर्ख लाल होने लगा है,,,, और सुगंधा भी अपने बेटे की बात सुनकर अंदर ही अंदर उत्तेजना से भर जा रही थी,,,, वह अपने बेटे के कहने का मतलब को अच्छी तरह से समझ रही थी वह यह भी जानती थी कि उसके खुद की बेटी की नजर उसकी छाती पर घूमती रहती है,,,,, अभी कुछ देर पहले ही उसने यह एहसास भी किया था जब वह सो रही थी और उसके साड़ी का पल्लू एकदम से अस्त्र-शस्त्र था और उसकी छाती एकदम से उजागर हुई नजर आ रही थी,,,,)

बाप रे क्या सच में मर्दों की नजर ऐसी होती है,,,।
(सुगंधा एकदम से अनजान बनते हुए बोली लेकिन अपनी मम्मी की बात से अंकित बिल्कुल भी सहमत नहीं था क्योंकि वह जानता था कि उसकी मम्मी भी बाहर मर्दों की नजर से अच्छी तरह से वाकिफ है लेकिन ऐसा जानबूझकर बोल रही है फिर भी वह अपनी मां की बात सुनकर बोला)तो क्या मम्मी सबकी नजर ऐसी ही होती है,,,।

लेकिन तुझे कैसे मालूम,,,,?

अरे यह सब मालूम हो जाता है मेरे कुछ दोस्त हैं जब भी उनके साथ इधर-उधर घूमने जाओ तो वह लोग औरतो को ही देखते रहते हैं,,,।

क्या कहते हैं तेरे दोस्त,,,,?

पूछो मत मम्मी बहुत खराब खराब बोलते हैं मुझे तो बताने में भी शर्म आ रही है,,,,,।

अरे बता भी दे मुझसे कैसा शर्माना,,,, वैसे भी मैं तेरी कसम खाई हूं तुझे कुछ बोलेगी नहीं,,,।
(अपनी मां की बात सुनकर और उसकी उत्सुकता देखकर अंकित का लैंड खड़ा होने लगा था उसी तरह की बातें करने में बहुत मजा आ रहा था और वह भी अपनी मां से पहली बार अपनी मां से इस तरह की बातें कर रहा था इसलिए वह भी थोड़ा खुल जाना चाहता था इसी बहाने वह भी एक औरत से किस तरह से अश्लील बातें की जाती है वह एहसास महसूस करना चाहता था,, इसलिए बोला,,,)

ठीक है तुम रहती हो तो बता देता हूं वैसे बताने लायक बात नहीं थी मेरे दोस्त हमेशा औरतों को देखकर वैसे तो कोई औरत आगे से आती रहती है तो उन लोगों की नजर औरतों की छाती पर ही जाती है और अगर पीछे से देखते हैं तो औरतों की गांड पर ही उनकी नजर जाती है,,,,,(अपने मुंह से औरतों की गांड शब्द का प्रयोग करके और अभी अपनी मां के सामने वह पूरी तरह से मदहोश होने लगा था,,, सुगंधा भी अपने बेटे के मुंह से औरत की गांड शब्द सुनकर मस्त हुए जा रही थी,,, कोई और समय होता तो शायद उसका बेटा इस तरह की बात नहीं करता लेकिन हालात और मौका दोनों बदल चुके थे सुगंध भी अपने बेटे को इस तरह से बात करने नहीं देती अगर कोई और समय होता तो लेकिन इस समय वह भी मजबूर थी अपनी बेटी के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर वह भी मस्त हो जा रही थी इसलिए वह उसे रोकी नहीं,,, और अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

मैं तो यह सब सुनकर उन लोगों से दूर हो जाता हूं,,,।

औरतों की गांड और छाती देखकर ऐसा क्या कहते हैं तेरे दोस्त जो तू एकदम से उन लोगों से दूर हो जाता है,,,,।
(सुगंधा भी गांड और छाती का प्रयोग बड़े खुलकर अपने बेटे के सामने कर रही थी,,, जिसे सुनकर अंकित का लंड हलचल महसूस कर रहा था,,,)अरे मम्मी वह लोग बहुत गंदा गंदा बोलते हैं,,, वह लोग इतने हारामी है कि कुछ भी बोल देते हैं बोलते हैं है इसकी चूचियां कितनी बड़ी-बड़ी है मेरे हाथ में आ जाए तो दबा दबा कर इसका दूध पी जाऊं,,,,।

हाय दैया ऐसा बोलते हैं,,,,(सुगंधा भी जानबूझकर हैरान होने का नाटक करते हुए बोली,,,)

तो क्या मम्मी और फिर किसी औरत की गांड देख लेते हैं बड़ी-बड़ी है तो बोलेंगे इसका आदमी कितना खुश नसीब होगा जो ऐसी औरत पाया है इतनी बड़ी-बड़ी गांड पाकर ना सोता होगा ना सोने देता होगा,,,,,,,।
(हाय दइया तेरे दोस्त इतने बेशर्म है,,,,)

तो क्या मम्मी मेरी तो हाथ खराब हो जाती है उन लोगों की इस तरह की बातें सुनकर ऐसे मम्मी मुझे समझ में नहीं आया कि वह लोग कहते हैं कि ना खुद सोते हैं ना सोने देते इसका मतलब क्या हुआ,,,,!(अंकित जानबूझकर अनजान बनते हुए अपनी मां से पूछ रहा था वह जानना चाहता था इसके मतलब को अपनी मां के मुंह से और यह बात सुनकर सुगंधा के चेहरे पर एकदम से हवाइयां उड़ने लगी और उसका चेहरा शर्म के मरे टमाटर की तरह लाल हो गया वह अपने बेटे की बात सुनकर गोल-गोल जवाब देते हुए बोली,,,)

अरे,,, कोई खूबसूरत औरत को देखकर किसी की नींद उड़ जाती होगी इसी बारे में बोल रहे होंगे,,,,।

हां यह भी हो सकता है,,,,,

अच्छा यह बता फिर तु कैसे ले गया मुझे,,,,(एक पल के लिए सुगंधा का मन कह रहा था कि अपने बेटे से सब कुछ बता डाले औरत और मर्दों के बीच के संबंध को लेकर वह बता दे की मर्द कब सोता नहीं और नहीं औरत को सोने देता है वह चुदाई के बारे में खुलकर अपने बेटे से बात करें लेकिन ऐसा करने से उसे अजीब सा लग रहा था वैसे तो वह अपने बेटे से एकदम से खुल जाना चाहती थी लेकिन न जाने क्यों वह इस तरह की बातें करने से और वह भी खुलकर थोड़ा घबरा रही थी,,,, इसलिए बात को एकदम से घूमाते हुए बोली,,,)फिर क्या मम्मी जैसे तैसे करके मैं तुम्हारी साड़ी के पल्लू को फिर से ठीक किया और तुम्हें सहारा देकर धीरे-धीरे घर से बाहर लेकर आया तभी ओटो को आवाज देकर बुलाया और उसमें,,, तुम्हें बिठाकर जैसे तैसे करके दवा खाने पहुंचा,,,,।

(जिस तरह की बातें मां बेटे के बीच हो रही थी अंकित की हालात पूरी तरह से खराब हो गई थी उसका लंड अपनी औकात में आकर खड़ा था और पेट में तंबू बनाया हुआ था और वह उसे छुपाने की कोशिश करते हुए बार-बार अपने हाथ से अपने लंड को दबा दे रहा था और उसकी यह हरकत उसकी मां से बिल्कुल भी छुपी नहीं होती सुगंधा भी अपने बेटे की हरकत को देखकर अंदर ही अंदर गर्म हो रही थी,,,,। वैसे उसकी खुद की बुर पानी छोड़ रही थी,,, फिर भी गहरी सांस लेते हुए वह बोली,,,)

फिर क्या हुआ,,,? दवा खाने में तो भीड़ होगी,,,!

नहीं मम्मी किस्मत अच्छी थी दवा खाने में उसमें कोई भी नहीं था और डॉक्टर का कंपाउंडर खाना खाने घर गया था,,।

फिर,,,,(सुगंधा की भी पेंटि गीली रही थी इसलिए वह भी,,, ना चाहते हुए भी अपने हाथ से अपनी पैंटी को सही करते हुए बोली और उसकी यह हरकत को अंकित भी बड़ी गौर से देख रहा था और उत्तेजित हुआ जा रहा था,,,,)

फिर क्या फिर से तुम्हें सहारा देकर में जैसे तैसे करके डॉक्टर के केबिन में पहुंच डॉक्टर अकेले ही आराम कर रहा था,,,,, और फिर मैं तुम्हें डॉक्टर के सामने वाली कुर्सी पर बैठा दिया,,,,।

फिर क्याहुआ,,,?

फिर डॉक्टर तुम्हारा चेकअप करने लगा,,,, वैसे मम्मी जब कभी भी मैं तुम्हारे साथ गया हूं तो डॉक्टर अपना आला तुम्हारी पीठ पर लगाकर चेक करता था ना,,,,।

हां और ऐसे ही डॉक्टर को चेक भी करना चाहिए औरतों के मामले में,,,,,।

हां मम्मी मैं भी तो यही सोच रहा था लेकिन डॉक्टर की आंखों के सामने तुम्हारी शाडी का पल्लू एकदम से नीचे गिर गया और साला डॉक्टर तो तुम्हारी छाती को देखता ही रह गया,,,,।

(जिस तरह से अंकित बता रहा था उसकी बात सुनकर सुगंध एकदम से हैरान हो गई और वह एकदम से हैरान होते हुए बोली)

क्या कह रहा है अंकित तु,,,

मैं सच कह रहा हूं मम्मी साड़ी का पल्लू गिरते ही डॉक्टर तुम्हारी छाती की तरफ देखने लगा उसकी तो आंखें फटी जा रही थी मुझे लगा शायद तुम्हारी तबीयत का कुछ जांच पड़ताल कर रहा है लेकिन जल्दी मुझे पता चल गया कि वह क्या देख रहा था,,,

क्या देख रहा था वह,,,,।

मम्मी मुझे तो बताते शर्म आ रही है,,, कोई और समय होता तो मैं उसका मुंह तोड़ देता लेकिन तुम्हारी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी इसलिए मैं कुछ बोल नहीं पाया,,,।

लेकिन क्या देख रहा था वो,,,(एकदम से उत्सुकता दिखाते हुए सुगंधा बोली)

मम्मी अब मैं क्या कहूं तुम्हारी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरते ही एक बार फिर से तुम्हारी छाती एकदम से उजागर हो गई और वह जो ब्लाउज के बीच में से लकीर दिखती ना गहरी गहरी,,,,,(हाथ की उंगली से अपनी मां के छाती की तरफ इशारा करते हुए और उसके इशारे को देखकर सुगंधा एकदम शर्म से पानी पानी हो गई उसके कहने के मतलब को सुगंधा अच्छी तरह से समझ गई,,, वह समझ गई कि उसका बेटा चूचियों के बीच की उभरी हुई लकीर के बारे में बात कर रहा है,,,,,)

हां,,,,, मैं समझ गई आगे बात,,,,।

हां मम्मी वहीं आंख फाड़े देख रहा था,,,, एक तो तुम इतनी बीमार थी कि अस्त-व्यस्त हालत में हो जा रही थी तुम्हारी साड़ी का पल्लू नीचे गिर जा रहा था कभी तुम्हारा सर इधर-उधर हो जा रहा था वह तो गनी मत था मम्मी के तुम्हारे ब्लाउज का बटन खुला हुआ नहीं था,,,।

तो क्या हो जाता,,,,?(एकदम से तिरछी नजर से अंकित की तरफ देखते हुए बोली)

अरे फिर तो डॉक्टर किसी न किसी बहाने छु देता,, और दबा भी देता,,,,।
(अपने बेटे की बात सुनकर तो सुगंधा के बदन में उत्तेजना की चिंगारी फूटने लगी वह अच्छी तरह से समझ रही थी कि उसका बेटा क्या कहना चाह रहा है लेकिन फिर भी अनजान बनते हुए बोली,,,)

अरे किसको दबा देता छु देता,,,।

अरे मम्मी तुम्हारी चू,,,(हाथ का इशारा अपनी मां की छाती की तरफ और अधूरा शब्द बोलकर एकदम से खामोश हो गया और अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा की बुर पानी छोड़ने लगी,,,, उसकी सांसे एकदम से ऊपर नीचे होने लगी क्योंकि उसका बेटा चुची शब्द कहते-रहते रह गया था,,,, फिर भी अपने आप को सहज करते हुए वह बोली)

अरे अगर बटन खुला होता तो क्या तू बंद नहीं करता मुझे तो बिल्कुल भी होश नहीं था तुझे तो बंद कर देना चाहिए था ना,,,।

मुझे तो करना ही पड़ता मम्मी क्योंकि मैं नहीं चाहता कि किसी और की नजर तुम्हारे पर पड़े लेकिन उसे समय में खामोश रहे गया था तुम्हारी तबीयत का जो मामला था,,,,।

इसके बाद तूनेक्या किया,,,?

डॉक्टर की नजर को पहचान कर मैं जल्दी से तुम्हारी साड़ी के पल्लू को ठीक कर दिया लेकिन बुखार नापने के बहाने उस हरामी डॉक्टर ने क्या किया पता है,,,।

क्या किया,,,?

हारामी ने मुझसे बोला कि अपनी मां की साड़ी के पल्लू को थोड़ा हटाओ,,,

फिर,,,,(सुगंधा धड़कते दिल के साथ बोली,,, उसके बदन में भी हलचल होने लगी थी वह जानती थी कि इस तरह की हरकत डॉक्टर करते नहीं है लेकिन उसका बेटा बता रहा था तो हो सकता है डॉक्टर ने इस तरह की हरकत किया हो,,,)

फिर क्या मैं भी हाथ आगे बढ़कर तुम्हारी शादी के पल्लू को तुम्हारी छाती से थोड़ा सा हटा दिया,,,, और डॉक्टर अपने आला को तुम्हारी उस पर,,(एक बार फिर से उंगली से इशारा करते हुए,,,, अंकित अपनी मां की चूची दिखाने लगा सुगंधा के सांस ऊपर नीचे हो रही थी उसकी हालत खराब हो रही थी वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए अपनी उंगली से अपनी चूची की तरफ इशारा करते हुए इशारे में ही बात की तो अंकित अपनी मां का इशारा देखकर बोला,,,)

इससे थोड़ा ऊपर,,,,।(अंकित का भी दिल जोरो से धड़क रहा था वह अपनी मां से एक तरह से अश्लील बातें ही कर रहा था ऐसी बातें जो मर्द और औरत के बीच ही मुमकिन होती है एक मां और बेटे के बीच नहीं लेकिन एक मां और बेटे दोनों अपनी मर्यादा को पार कर रहे थे,,, सुगंधा भी अंकित की बात सुनकर थोड़ी बेशर्मी दिखाते हुए अपने हाथ से साड़ी के पल्लू को अपनी छाती से थोड़ा सा हटाते हुए अपनी उंगली को अपनी चूची की गोलाई के ऊपरी भाग पर जहां से गोलाई का शुरूआत होती है वहां पर रख दी,,, अपनी मां की इस अदा पर तो अंकित की हालात पूरी तरह से खराब हो गई वह एकदम से उत्तेजित हो गया उसकी लंड की नशे एकदम से उभर आई,,, और वह एकदम से उत्तेजित स्वर में बोला ,,,)

बस बस मम्मी यहीं पर,,, यहीं पर वह डॉक्टर अपना आला,,, लगाकर तुम्हारा बुखार चेक करने लगा और एक बार नहीं बल्कि काफी बार उसने ऐसा किया,,,।
लगता है उसकी नियत खराब हो रही थी,,,,।

तो क्या मम्मी,,, क्योंकि मैं आज तक इस तरह से डॉक्टर को औरत का चेकअप करते नहीं देखा,,,,।

(अंकित की बातों को सुनकर दीवाल का सहारा लेकर वह ऊपर छत की तरफ देखने लगी और गहरी सांस लेने लगी उसका साड़ी का पल्लू अभी भी उसकी छाती से थोड़ा सा जाता हुआ था और वह जानबूझकर गहरी सांस ले रही थी ताकि सांसों के गति के साथ उसकी ऊपर नीचे हो रही छाती पर उसके बेटे की नजर जाए और ऐसा ही हुआ,,,, अंकित की नजर तुरंत अपनी मां की बड़ी-बड़ी छातियों पर चली गई,, और अपने बेटे की हरकत को,,, सुगंधा चोर नजरों से देख रही थी उसकी हरकत को देखकर मन ही मन उत्तेजित और प्रसन्न दोनों हो रही थी,,, कुछ देर की खामोशी के बाद वह फिर से अंकित की तरफ देखतेहुए बोली,,,।

इसके बाद क्या हुआ,,,,?

(सुगंधा की बातें सुनकर अंकित समझ गया था कि उसकी मां सबसे ज्यादा उत्सुक सैंपल वाली बात जानने के लिए है,,, इसलिए वह भी बोला,,,)

फिर क्या मम्मी डॉक्टर ने दवाई दिया और बोला ब्लड और पेशाब का सैंपल देना पड़ेगा,,,,।

फिर मुझे तो कुछ मालूम ही नहीं था यह सब कैसे लिया गया,,,,,।

वही तो बता रहा हूं मम्मी,,,, मैं तुम्हें सहारा देकर वापस डॉक्टर के केबिन से बाहर लाया वही दवा खाने में ही बाथरूम है बाथरूम में ही सब कुछ मौजूद था,,,, मैं धीरे-धीरे तुम्हें बाथरूम के पास लाया और तुम्हें सब कुछ बता दिया अंदर ही परखनली भी थी,,,, लेकिन तुम्हारी हालत देखकर मुझे लग नहीं रहा था कि तुम बाथरुम में अकेले जा पाओगी,,,।

(अपने बेटे की बात सुनते ही सुगंध के दिल की धड़कन एकदम से बढ़ गई उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में अजीब सी हलचल होने लगी उसे साफ महसूस हो रहा था कि अपने बेटे की बात सुनकर वह उत्तेजित हुए जा रही थी और उत्तेजना के मारे उसकी बुर कचोरी की तरह फुल रही थी पंचक रही थी,,,, वह और भी ज्यादा उत्सुक हो गई थी आगे की बात जानने के लिए इसलिए बोली ,,,)

फिर तूने क्या किया,,,,?

मैंने क्या किया मैं बाहर ही खड़ा रहा और तुम्हें अंदर जाने के लिए बोला जैसे तैसे तुम दरवाजा खोलकर अंदर जाने को भी लेकिन दरवाजे पर ही खड़ी रह गई तुम्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है मुझे भी घबराहट हो रही थी कि तुम भला कैसे पेशाब का सेंपल दे पाओगी तुम्हे तो खड़े रहने की भी ताकत नहीं थी,,,, कुछ देर तक मैं खड़ा रहा इधर-उधर देखता रहा लेकिन तुमसे कम भी आगे बढ़ने जा रहा था और तुमने खुद मेरी तरफ देखकर इशारा करते हुए मुझे भी अंदर आने के लिए बोली इतना सुनकर तो मेरी हालत खराब हो गई भला मैं कैसे एक औरत के साथ बाथरूम के अंदर जा सकता हूं अगर यह कोई देख लेता तो कितने शर्म की बात होती,,,,।

(अपने बेटे की बातों को सुनकर सुगंध का बदन उत्तेजना से कसमसा रहा था उसकी बुर लगातार पानी फेंक रही थी वह अपने बदन में अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव कर रही थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और फिर कांपते हुए स्वर मेंबोली,,,)

फिर क्या हुआ,,,,?

फिर क्या मम्मी मुझे ना चाहते हुए भी तुम्हारे साथ बाथरूम के अंदर जाना पड़ा तुम्हें सहारा देखकर मैं बाथरूम के अंदर लेकर और दरवाजा बंद कर दिया ताकि कोई देख ना ले और जल्दी से फर्क नाली को तुम्हारे हाथों में दे दिया और बोला कि तुम इसके अंदर पेशाब का सैंपल ले लेना,,,।

तू मेरे साथ बाथरुम मेंही था,,,,(एकदम से आश्चर्य जताते हुए सुगंधा बोली)

और क्या करता मम्मी मजबूरन मुझे भी अंदर रहना पड़ा तुम अपने हाथ से परखनली तो ले ली और धीरे-धीरे अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठाने लगी,,,।
(इतना सुनकर सुगंधा के बदन में उत्तेजना की चिंगारी फुट में रखें उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था उसे अजीब सा एहसास हो रहा था उसके बदन में मदहोशी जा रही थी उसे ऐसा लग रहा था कि इसी समय वह अपने बेटे के साथ कुछ कर बैठेगी,,, अपने बेटे की बात सुनकर सुगंध बोली,,,)

और तु मुझे ही देख रहा था,,,.

क्या करता मम्मी मजबूर था मुझे इस बात का डर था कि कहीं तुम बाथरुम में गिर ना जाओ तुम्हें चोट लगने का डर था इसलिए मुझे ना चाहते हुए भी तुम्हारी तरफ देखना पड़ा,,,

फिर मैंने क्या की,,?
तुम तो बुखार के नशे में थी तुम्हें तो बिल्कुल भी होश नहीं था जैसे तैसे करके तुम अपनी साड़ी को कमर तक उठा ली थी,,,।
(अपने बेटे की बातों में सुगंध को नशा महसूस हो रहा था वह उसकी बातों में पूरी तरह से खो चुकी थी और अपनी आंखों के सामने कल्पना करने लगी थी कि कैसा-कैसा बाथरूम में हुआ होगा वह मदहोश हो जा रही थी उत्तेजना उसके धीरे दिमाग पर पूरी तरह से हावी होती जा रही थी,,,,, और अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

तुम अपनी साड़ी कमर करके उठा लेती लेकिन तुम्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना है तुम उसी तरह से ऐसा लग रहा था कि जैसे नशे में झूम रही हो मैं तुम्हें आवाज देते हुए बोला,,,,।

मम्मी पेशाब का सैंपल लेना है,,,,।

मेरी बात सुनकर ऐसा लगा कि जैसे फिर से तुम्हें होश आया हो और तुम मेरी तरफ देखने लगी और अपने एक हाथ से अपनी चड्डी को नीचे करने लगी लेकिन तुमसे हो नहीं रहा था तुमसे अपनी चड्डी ठीक से पकड़ी नहीं जा रही थी तुम अपनी चड्डी नहीं उतर पा रही थी,,,,(अंकित जानबूझकर अपनी मम्मी के सामने चड्डी वाली बात कर रहा था बार-बार अपनी मां के सामने इस तरह चड्डी का प्रयोग करके वह अपनी मां को उत्तेजित कर रहा था और उसकी मां बार-बार अपने बेटे के मुंह से अपनी चड्डी का जिक्र सुनकर मदहोश हुए जा रही थी पागल हुए जा रही थी,,, और वह धीरे से बोली,,,)

फिर मैंने क्या की,,,?

फिर कुछ देर तक तुम कोशिश करती रही लेकिन तुमसे हुआ नहीं तो तुम मेरी तरफ देखते हो मैं तुम्हारी तरफ देखने लगा मुझे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर सैंपल मिलेगा तो कैसे मिलेगा,,,, और तुम मुझसे बोली,,,,।

तू ही उतार दे मुझसे नहीं हो रहा है,,,।(ऐसा कहते हुए अंकीत का लंड अपनी औकात में आ गया था,,,,,, क्योंकि वह अपनी मां के सामने उसकी ही चड्डी उतारने वाली बात कर रहा था और जिस तरह का सुरूर अंकित के ऊपर छाया हुआ था वही खुमारी उसकी मां के ऊपर भी छाने लगी थी,,, वह अपने मन में कल्पना करने लगी की बाथरूम में कैसा-कैसा हुआ होगा वह कहते हुए कैसा महसुस कर रही होगी वह पूरी तरह से पागल हुए जा रही थी,,, उसकी चड्डी पूरी तरह से गीली हो रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी चड्डी पर कोई पानी डाल दिया हो,,,, अपने बेटे की बात सुनकर वह अपने बेटे से नजर मिलाए बिना ही बोली,,,।)
करना क्या था मम्मी तुम जैसा कहीं मुझे करना ही था क्योंकि मुझे डर कहीं डॉक्टर अगर बाहर आ गया और हम दोनों को बाथरूम में देखेगा तो वह क्या सोचेगा उसे तो खुला मौका मिल जाएगा,,,,, इसलिए तुम्हारी बात मानते हुए मैं अपना हाथ आगे बढ़ाकर,,,,, तुम्हारी चड्डी को दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसे नीचे की तरफ खींचने लगा,,,, सच कहूं मम्मी तो मुझे बहुत खराब लग रहा था लेकिन मैं क्या करूं मैं मजबूर हो गया था तुम्हारे पेशाब का सैंपल जो लेना था और देखते ही देखते मैं तुम्हारी चड्डी को तुम्हारी घुटनों का खींच दिया था तुम अपनी साड़ी को कमर तक उठाए खड़ी थी,,,।

फिर,,,,(गहरी सांस लेते हुए सुगंधा बोली, देखते ही देखते कमरे का वातावरण पूरी तरह से उत्तेजना से गर्म हो चुका था मां बेटे दोनों जवानी के नशे में चूर हो चुके थे बस एक कदम आगे बढ़ाने की देरी थी और दोनों एक दूसरे में समाने की पूरी कोशिश में जुट जाते,,, लेकिन फिर भी दोनों अपने आप पर बहुत ही काबू रखे हुए थे,,,,, अपनी मां की बात सुनकर अंकित बनी बनाई खिचड़ी पकाते हुए बोला,,,)

फिर क्या मैं कुछ देर तक फिर से इस तरह से खड़ा रहा,,,, तुम पेशाब करने के लिए बैठ नहीं पा रही थी,,,, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं तुम बार-बार बाथरूम की दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो जा रही थी,,,, तुम्हारी हालत देखकर मैं समझ गया कि तुम बैठकर पेशाब नहीं कर पाओगी,,,।

(अंकित के एक-एक शब्द सुगंधा के कानों में नशा घोल रहा था,,, वह पूरी तरह से कामुकता के सागर में डूबती चली जा रही थी,,,,, अंकित जो कुछ भी कह रहा था सुगंधा अपने मन में उसकी कल्पना कर रही थी आज उसका पिता उसे बहुत खुलकर बातें कर रहा है,,, यही बदलाव तो वह अपने बेटे के अंदर चाहती थी,,,,,, यह बदलाव देखकर सुगंधा अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रही थी क्योंकि जैसा अंकित वह चाहती थी धीरे-धीरे उसका बेटा वही अंकित बनता जा रहा था अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा बोली,,,)

फिर तूने क्या किया,,,,?(गहरी सांस लेते हुए अंकित से बिना नजर मिलाए हुए सुगंधा बोली,,,)

फिर क्या मुझे मजबूरन वही करना पड़ा जो मैंने जिंदगी में नहीं सोचा था,,,।

क्या,,,?

मैंने परखनली तुम्हारे हाथ से ले लिया,,, और फिर मैं अपने मन को एकदम कठोर करके उस परखनली को तुम्हारी,,,(उंगली से अपनी मां की दोनों टांगों के बीच इशारा करते हुए) उस पर लगा दिया और तुम्हें मुतने के लिए बोला,,, और तुरंत तुम पेशाब करने लगी,,,।

खड़े-खड़े,,,,(एक दम हैरान होते हुए सुगंधा बोली,,)

तो क्या तुम बैठ नहीं पा रही थी इसलिए खड़े-खड़े करना पडा,, तब जाकर पेशाब का सैंपल मिला,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा एकदम स्तब्ध हो गई थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अपने बेटे से क्या बोले वह अपने बेटे से शर्म के मारे नजर तक नहीं मिल पा रही थी।।,)
सुगंधा के कमरे का वातावरण पूरी तरह से बदल चुका था,,, अंकित ने अपने बनावटी शब्दों से कमरे का माहौल पूरी तरह से गर्म कर दिया था,,, अंकित को पता था कि यही मौका है अपनी मां के सामने खुलने का और अपनी मां के साथ अश्लील बातें करने का क्योंकि इसमें दोनों की रजा मंदी नजर आ रही थी,,, अगर सुगंध चाहती तो वहां दवा खाने में क्या हुआ कैसे हुआ कैसे सैंपल दिया गया इस बारे में पूछती ही नहीं,, लेकिन उसका भी मन था अपने बेटे के मुंह से कुछ अलग सुनने का और इसी मौके का फायदा उठाते हुए अंकित भी अपने मन की कल्पनाओं को शब्दों में रच कर अपनी मां के आगे सुना दिया था जिसमें कुछ सच्चाई भी थी और कुछ सच्चाई से बिल्कुल परे था,,,।

जब सुगंधा को इस बात का पता चला कि बाथरूम के अंदर वह पेशाब करने के लिए बैठ नहीं पा रही थी,, और उसे खड़े-खड़े पेशाब करना पड़ा था और तो एक वह अपने हाथ में परखनली भी नहीं पकड़ पा रही थी जिसकी वजह से उसके बेटे को अपने हाथ से परखनली पकड़कर उसकी बुर के गुलाबी छेद पर लगाकर पेशाब का सैंपल देना पड़ा था यह सुनते ही वह एकदम स्तब्ध रह गई थी एकदम खामोश,, शुन्य मनस्क,,, उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें उसकी जहां से बड़ी तेजी से चल रही थी और सांसों की गति के साथ-साथ उसके दोनों दशहरी आम भी ऊपर नीचे हो रहे थे जो की ब्लाउज में कैद होने के बावजूद भी अपनी आभा को पूरी तरह से उजागर किए हुए थे,,, अंकित की नजर तो उसकी मां की छातियों पर ही चली जा रही थी,,, अपनी मां के सुर्ख लाल चेहरे को देखकर अंकित को समझ में आ रहा था कि उसकी बात का असर उसकी मां पर बहुत ही बुरा पड़ रहा है,,,,।

इस बात को वह अच्छी तरह से जानता था कि दवा खाने की आधी से ज्यादा कहानी उसने झूठ बोला था जिसमें सच्चाई भी थी लेकिन सच्चाई से ज्यादा झूठ था,,,, लेकिन इस झूठ में कितनी मादकता और कितना आनंद छुपा हुआ था इस बात को केवल वह खुद और उसकी मां समझ पा रही थी सुगंधा तो अपने मन में कल्पना कर करके पूरी तरह से गीली होती चली जा रही थी,,, बार-बार वह अपने मन में कल्पना करने लग रही थी कि वह बाथरूम के अंदर खड़ी होकर पेशाब कर रही है उसके गुलाबी छेद से पेशाब की धार टूट रही है और उसका बेटा हाथ में परखनली लेकर उसकी बुर के गुलाबी छेद पर लगाकर उसमें से पैसाब को इकट्ठा कर रहा है,,,,आहहहहह,,,, गजब का एहसास पूरी तरह से मदहोशी से सरोबोर हो चुकी थी सुगंधा,,,‌।

सुगंधा दीवार का सहारा लेकर बैठी हुई थी और छत की तरफ देख रही थी उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी उसके बदन में उत्तेजना का तूफान उठ रहा था जिसका असर उसे अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में बड़े अच्छे से महसूस हो रही थी ठीक उसके सामने बिस्तर पर अंकित बैठा हुआ था और अंकित मन ही मन बहुत खुश हो रहा था क्योंकि आज दवा खाने के बहाने उसने अपने मन की बहुत सारी बातें अपनी मां से कर दिया था वह अपनी मां के सामने लंड बुर और चूची जैसे शब्दों का प्रयोग करना चाहता था लेकिन अभी तक उसके मुंह से इस तरह के शब्द निकल नहीं पाए थे बस इशारे से ही वह अपनी मां को उन अंगों के बारे में बता रहा था,,,। और उसकी मां उसके इशारों को समझ जा रही थी,,। अंकित अपनी मां को ही देख रहा था उसके कहे गए एक-एक शब्द उसकी मां के बदन में उत्तेजना की चिंगारी को और ज्यादा भड़का रहे थे इस तरह की बात करते हुए अंकित खुद उत्तेजना के परम शिखर पर विराजमान हो चुका था,,,।

कुछ देर कमरे में पूरी तरह से खामोशी छाई रही,,, अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि अच्छा हुआ कि उसकी दीदी उसे घर पर रुकने के लिए बोल कर गई और उसे पूरा मौका मिल गया अपनी मां से अपने मन की बात बताने की दवा खाने के बारे में बनी बनाई बात बताने का और उसकी मां भी बड़ी गौर से उसकी एक-एक बात को सुन रही थी उसके हर एक शब्द उसके तन बदन में उत्तेजना का तूफ़ान पैदा कर रहे थे,,, जिस तरह से सुगंध को अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में गीलापन महसूस हो रहा था उसे डर था कि कहीं आज ही इसी समय अपने ही बिस्तर पर अपने बेटे के साथ हम बिस्तर न हो जाए,,,,। लेकिन वह जानती थी कि वह बेहद सुखद घड़ी होगी जब उसका बेटा बरसों से सूखी जमीन पर सावन की बूंदों की बौछार करेगा,,,,,,।

अपनी मम्मी को खामोश देखकर अंकित धीरे से बोला,,,,।

क्या हुआ मम्मी चुप क्यों हो गई,,,,,?

(अंकित की आवाज सुनकर सुगंधा एकदम से अपनी आंखों को खोल दे ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी ने उसे नींद से जगाया और वह अपने बेटे की तरफ देखने लगी,,,, तो अंकित फिर से बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी तुम नाराज तो नहीं हो क्या मेरी बात तुम्हें बुरी लगी,,,, मैं तो वही बता रहा हूं जो कल दवा खाने में हुआ है,,,,।

वही तो मैं सोच रही हूं रे,,, यह कैसा बुखार था कि मुझे बिल्कुल भी होश नहीं था मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है दवा खाने में जो कुछ भी हुआ उसके बारे में मुझे कुछ भी याद नहीं है तेरी कहीं एक एक बात मुझे अंदर ही अंदर चोट पहुंचा रही है,,।

कैसी चोट मम्मी तुम्हें मन छोटा करने की कोई जरूरत नहीं है वैसे भी हम दोनों दवा खाने में थे और दवा खाने में डॉक्टर के कहे अनुसार सब कुछ करना पड़ता है,,,।

वो सब तो ठीक है,,, लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मुझे कुछ याद क्यों नहीं है और मैं तो इस बात पर बेहद शर्मिंदा हूं कि बाथरूम में मैं बैठ नहीं पा रही थी,,,,।

(अपनी मां को बाथरूम वाली बात याद करते देखकर उसकी अधूरी बात को पूरा करते हुए जल्दी से अंकित बोला)

हां मम्मी बिल्कुल सच है तू पेशाब करने के लिए नीचे बैठ नहीं पा रही थी इसलिए तुम्हें खड़े-खड़े करनापड़ा था,,,,।

(फिर से अपने बेटे के मुंह से पेशाब शब्द सुनकर सुगंधा उसे आश्चार्य से देखने लगी,,, क्योंकि उसका बेटा है इस तरह के शब्दों का प्रयोग खास करके उसके सामने बिल्कुल भी नहीं करता था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अंकित इतना खुल कैसे गया शायद नूपुर के बेटे की संगत का कमाल है वरना वह जानती थी कि उसका बेटा किस तरह के शब्दों का प्रयोग उसके सामने बिल्कुल भी नहीं करेगा लेकिन इससे सुगंधा नाराज नहीं थी बल्कि अंदर ही अंदर खुश हो रही थी,,, अपने बेटे की बात सुनकर गहरी सांस लेते हुए सुगंधा बोली,,,,)

लेकिन अंकित तुझे बुरा नहीं लगा पैसाब का सैंपल लेते समय,,,।

नहीं मम्मी मुझे तो लेना ही था आखिर जांच जो करवाना था,,हां यह बात है कि,,, जब मैं परखनली को तुम्हारी बुर,,,,(इतना कहते हैं एकदम से अंकित घबरा गया और तुरंत अपने शब्दों को बदलते हुए बोला) मेरा मतलब है कि जब परखनली में पेशाब का सैंपल ले रहा था तो पेशाब के छींटें मेरे ऊपर आए थे और कोई दिक्कत नहीं,,,,।

(सुगंधा समझ नहीं पा रही थी कि उसके बेटे के मुंह से औरत का सबसे बेश कीमती अंग का नाम बुर अपने आप ही आ गया या जानबूझकर वह ईस शब्द का प्रयोग किया था,,,, अंकित जानता था कि उसके मुंह से निकले शब्द बुर को सुनकर उसकी मां हैरान हो जाएगी और इसीलिए वह खुद एकदम हैरान होने वाला हाव-भाव अपने चेहरे पर ला रहा था जिसे देखकर सुगंध को लगने लगा था कि उसके बेटे के मुंह से अनजाने में ही वह शब्द फूट पड़े थे लेकिन वह अपने मन में सोचने लगी कि उसका बेटा यह जानता है कि औरत की दोनों टांगों के बीच के पतली दरार को बुर कहा जाता है,,, अपने बेटे के इसी ज्ञान से सुगंधा अंदर ही अंदर खुश हो रही थी,,, पेशाब के छिंटे वाली बात सुनकर,,, सुगंधा अपने चेहरे का सहज करते हुए बोली,,,,)

तुझे कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन मेरा तो बुरा हाल हो रहा है मुझे तो बहुत शर्म आ रही है और मैं शर्मिंदा हूं कि तुझे इस तरह की तकलीफ झेलनी पड़ी,,,।

इसमें तकलीफ वाली कौन सी बात है मम्मी यह तो मेरा फर्ज था,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंध अपने मन में ही बोली हां यह तेरा फर्ज था ना मां को बाथरूम में ले जाकर खड़ी-खड़ी पेशाब करवाना परखनली को उसकी बुर पर रखकर उसके पेशाब का सैंपल देना यही सब फर्ज में आता है,,,,,, अपने आप से ही बात करते हुए सुगंधा के तन बदन में आग लग रही थी,,,, वह खामोश हो चुकी बोलने लायक उसके पास कोई शब्द नहीं बाथरूम में जो कुछ भी हुआ था वह उसकी कल्पना और सोच के बिल्कुल परे था,,, बार-बार उसकी आंखों के सामने उसके बेटे के द्वारा बताया गया दृश्य नजर आ जा रहा था जब वह बाथरूम में खड़ी खड़ी पेशाब कर रही थी और उसका बेटा परखनली को उसकी बुर के छेद से लगाया हुआ था,,,। यह दृश्य यह ख्याल किसी भी मा के लिए बेहद शर्मनाक है,,, क्योंकि कोई भी सीधी शादी ममता से भरी हुई मां यह नहीं चाहेगी कि उसका बेटा उसके साथ बाथरुम में आए ,, और किसी भी सूरत में एक मां अपने बेटे की आंखों के सामने ही अपनी साड़ी कमर तक उठा दे अपना पिछवाड़ा दिखा दे,,,, और तो और वह बिल्कुल भी नहीं चाहेगी कि उसका बेटा अपने हाथों से उसकी चड्डी उतारे उसे पेशाब करने के लिए बोले,,,, और ऐसा तो सपने में भी नहीं सोचेगी कि उसका बेटा दवा खाने में दवा खाने के बाथरूम में परखनली को लेकर खुद अपने हाथों से अपनी मां की बुर पर लगाए पेशाब का सैंपल लेने के लिए,,, यह सब एक मां के लिए बेहद शर्मनाक और शर्मिंदगी से भर देने वाला क्रियाकलाप है,,,,।

लेकिन एक सीधी साधी साधारण ममता से भरी हुई मां की जगह एक ऐसी मां हो जिसके तन बदन में जवानी उफान मारती हो उसकी आंखों में वासना के डोरे नजर आते हो और वह खुद अपने बेटे के साथ हम बिस्तर होना चाहती हो तो ऐसी मां के लिए यह सारे क्रियाकलाप आनंददायक और मदहोश कर देने वाले हैं,,,, और यही क्रियाकलाप का जहां एक तरफ सुगंधा पर बुरा असर पड़ रहा था वही वह अंदर ही अंदर इन सारे क्रियाकलाप से बहुत खुश हो रही थी क्योंकि एक तरह से उसके मन का ही हो रहा था वह अपने बेटे को नूपुर के बेटे की तरह बनना चाहती थी ताकि बेचकर उसका बेटा उसके अंगों से खेल सके,,,, और वह जानती थी किसी तरह की हरकत से उसका बेटा नूपुर के बेटे की तरह खुल जाएगा और फिर दोनों मिलकर जवानी का मजा लूटेंगे,,,, अपने मन में आए इस तरह के ख्याल से सुगंधा अंदर ही अंदर बहुत खुश हो रही थी लेकिन अपने चेहरे के भाव को एकदम औपचारिक रूप से गंभीर बनाए हुए थी,,,,, और वह धीरे से बोली,,,)

और फिर बाथरूम से निकलने के बाद क्या हुआ,,,?

बाथरूम से निकलने के बाद में धीरे-धीरे फिर से तुम्हें डॉक्टर के केबिन में लेकर आया,,, डॉक्टर तुम्हें इंजेक्शन लगाना चाहता था ताकि तुम्हें जल्दी आराम हो जिसके लिए उसने मुझे सहारा देकर तुम्हें टेबल पर बिठाने के लिए बोला था और मैं धीरे-धीरे तुम्हें टेबल के पास लेकर गया और सहारा देकर टेबल पर बैठा दिया,,, डॉक्टर अपने इंजेक्शन में दवा भरकर,,, तुम्हारे पास पहुंच गया मैं भी वही था मुझे लग रहा था कि वह तुम्हारे हाथ में सुई लगाएगा,,, लेकिन जब उसने तुम्हें लेट जाने के लिए बोला तो मेरा हैरान रह गया,,,।

क्या ,,,उसने मुझे लेट जाने के लिए बोला,,(हैरान होते हुए सुगंधा बोली,,)

हां मम्मी वाले जाने के लिए बोला और मैं जब उसे बोला कि हाथ में लगा दो तो वह बोला कि सुई भारी है हाथ दर्द करेगा,,,,। सच कहूं तो मुझे तो डॉक्टर की नियत कुछ साफ नहीं लग रही थी,,,,,।
(अंकित की बात को सुगंधा भी अच्छी तरह से समझ रही थी,,,, इसलिए वह बोली,,,)

मुझे भी ऐसा ही लग रहा है फिर क्या किया उसने,,,?

फिर क्या सहारा देकर मैं तुम्हें लिटा दिया क्योंकि वैसे भी तुम्हें होश नहीं था तुम पेट के बल लेट रही थी,,,, कुछ इस तरह से तुम लेती थी डॉक्टर तो तुम्हें देखता ही रह गया था,,,।

मैं कुछ समझी नहीं मैं कैसे लेटी थी,,,,,!

मतलब की मम्मी तुम पेट के बल लेटी हुई थी लेकिन तुम्हारा जो पीछे वाला भाग है,,,,(अंकित खुद से हाथ के सारे से अपना पिछवाड़ा दिखाते हुए बोला उसकी मां समझ गई थी) एकदम उभर कर सामने दिखाई दे रहा था एकदम बड़ी-बड़ी डॉक्टर की तो आंखें फटी की फटी रह गई थी वह हाथ में सी लिए हुए कुछ देर तक तुम्हारी कमर के नीचे वाले भाग को ही देखता रह गया,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा अंदर ही अंदर खुश हो रही थी क्योंकि वह डॉक्टर की हालत को समझ सकती थी डॉक्टर उसकी बड़ी-बड़ी गांड को ही देख रहा होगा ,,,पागलों की तरह देख रहा होगा,,, क्योंकि इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि उसकी खूबसूरती में चार चांद लगाने का श्रेय उसके नितंबों पर भी जाता है,,,,,)

फिर,,,,,,।

फिर न जाने उसके मन में क्या आया वह एक हाथ में इंजेक्शन लिए दूसरे हाथ से तुम्हारी साड़ी को ऊपर वाले भाग को पकड़ कर उसे नीचे की तरफ सरकाने लगा मैं तो उसकी हरकत देखकर एकदम हैरान था,,, लगभग लगभग तुम्हारी साड़ी को इतना नीचे की तरफ अपने हाथ से खींचा था कि तुम्हारे पिछवाड़े की ऊपरी लकीर दिखाई देने लगी थी,,,।

हाय दइया क्या कह रहा है तू,,,,(शर्म के मारे अपने मुंह पर हाथ रखते हुए सुगंधा बोली,,,)

हां मम्मी में सच कह रहा हूं,,,, डॉक्टर की नियत सच में साफ नहीं थी वह कुछ देर तक हाथ में इंजेक्शन दिए तुम्हारे पिछवाड़े को ही देखता रह गया जो की ट्यूबलाइट की रोशनी में एकदम दूध की तरह चमक रही थी,,,,।

क्यों तू भी देख रहा था क्या,,,,?

नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है मैं तो तुम्हारे पैर के पास तुम्हारे पैर को पकड़ के खड़ा था मुझे डर था कि कहीं तुम पलटने लगोगी तो नीचे गिर जाओगी,,,, डॉक्टर कैसा लग रहा था कि तुम्हें सुई लगाने के मूड में बिल्कुल भी नहीं था वह तो सिर्फ तुम्हारे पिछवाड़े को ही देख रहा था और उसने अपनी हथेली को तुम्हारी गोरी गोरी पिछवाड़े पर रख भी दिया था कुछ देर के लिए मुझे बहुत गुस्सा आया था लेकिन मैं जानता था कि कुछ कहूंगा तो यह इलाज करने से इनकार कर देगा इसलिए मैं खामोश रहा,,,, और फिर वह धीरे से तुम्हारे पिछवाड़े में सुई लगाने लगा,,,।

अच्छा एक बात बता तुझे कैसे पता चला कि उसकी नियत खराब है,,,,।

जब वह तुम्हें सुई लगाने जा रहा था तो मेरी नजर अचानक ही उसके पेट के आगे वाले भाग पर पहुंच गई थी,,,, पर मैंने देखा तो उसके पेंट में तंबू बना हुआ था,,,,,।

(अब तो अपने बेटे के मुंह से यह सुनकर सुगंधा के तो होश उड़ गए सुगंधा का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया,,, क्योंकि सुगंध पेट में तंबू बनाने के मतलब को अच्छी तरह से समझती थी वह जानती थी कि उसकी जवानी देखकर डॉक्टर का लंड खड़ा हो गया,,, था जहां इस बात से वहां एकदम हैरान हो रही थी वहीं दूसरी बात से वहां अपनी जवानी पर गर्व कर रही थी कि अभी भी वह किसी का भी लंड खड़ा करने में सक्षम है,,,,,,, अब उससे कुछ भी बोल नहीं जा रहा था और ना ही कुछ पूछने लायक वह बच्ची थी दवा खाने का सफर बेहद रोमांचक और उत्तेजना से भरा हुआ था इस बारे में उसे समझ में आ गया था,,, यह सब के बारे में सोच कर उसका दिमाग पूरी तरह से खराब हो रहा था वह अपने मन में सोच रही थी कि जब उसकी जवानी को देखकर डॉक्टर का इतना बुरा हाल था तब उसके बेटे के बदन में भी तो कुछ-कुछ हुआ होगा उसकी भी तो हालत खराब हो गई होगी लेकिन ऐसा पूछने की उसमें ताकत नहीं दे कुछ देर की खामोशी के बाद वह सिर्फ इतना बोली,,,)

अब मैं नहाना चाहती हूं,,,,।

ठीक है मम्मी मैं बाथरूम में तुम्हारे लिए पानी रख देता हूं,,,,,(और इतना कहने के साथ ही अंकित अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया और जैसे ही वह उठकर खड़ा हुआ उसके पेट में बना तंबू एकदम से सुगंधा की आंखों के सामने चमकने लगा हालांकि अंकित उसे पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया और तुरंत कमरे से बाहर निकल गया लेकिन सुगंधा को समझ में आ गया था जिस तरह से डॉक्टर की नियत उसकी जवानी देखकर खराब हो रही थी उसी तरह से उसके बेटे की भी नियत उसकी मदद कर देने वाली जवानी को देखकर खराब हो रही थी,,,,।)

दवा खाने में जो कुछ भी हुआ था उसमें से अधिकतर बातों को अंकित ने झूठ बताया था,,,, जो कुछ भी हुआ था उसे नमक मिर्च लगाकर बताया था और सुगंधा अपने बेटे की बात पर पूरी तरह से विश्वास कर ली थी और विश्वास के साथ-साथ उसके बातों की जो मादकता थी उसके हर एक शब्द को अपने अंदर उतार कर वह पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी,,,,, सुगंधा इस बात से भी बहुत खुश थी उसका बेटा उसके सामने काफी हद तक खुल चुका था और यही तो वह चाहती थी,,,, सुगंधा को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,, उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो चुकी है इतनी अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव तो उसने अपनी सुहागरात वाली रात को भी महसूस की थी जितना कि आज अपने बेटे की बातों को सुनकर वह उत्तेजित हुए जा रही थी,,,,।

उसे आज भी अपनी सुहागरात की पहली रात बहुत अच्छे से याद थी आखिरकार यह रात औरत के जीवन का सबसे अहम हिस्सा बन जाता है चाहे जितना भी भूलने की कोशिश अगर औरत करें तो भी इस रात को नहीं भूल सकती क्योंकि उसके जीवन की सुहागरात उसके कौमार्य भंग की पहली रात होती है,,, एक मर्द के साथ मिलन की पहली रात होती है इस रात को औरत बहुत कुछ सिखाती है और बहुत कुछ मर्दों को सिखाती भी है यही रात उसके समर्पण की रात होती है यही रात उसके विश्वास की रात होती है जिसमें मर्द ओर औरत दोनों जिंदगी भर के लिए विश्वास के धागे से बंध जाते हैं,,, या यू कह लो की वैवाहिक जीवन की शुरुआत ही सुहागरात के संभोग क्रिया से होती है संभोग सुख के अद्भुत एहसास से होती है,,,, और ऐसा ही कुछ सुगंधा के साथ भी हुआ था,,,,।

सुगंध को अपने वैवाहिक जीवन की पहली रात बड़ी अच्छे से याद थी जिसे सुहागरात कहा जाता है जब उसकी शादी तय हो चुकी थी तब सुहागरात का जिक्र अक्सर उसकी सहेलियां उसके सामने छेड़ देती थी,,, जिसे सुनकर उसके तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगती थी,,,, क्योंकि सुगंधा के सहेलियां में कुछ लोगों की शादी हो चुकी थी और उसकी सहेलियां शादी की रात के पहले अनुभव को उसे बताती थी जिनमें रोमांच भी भरा होता था,, और एक अजीब प्रकार का डर भी होता था,,, रोमांच तो उसे समझ में आता था लेकिन डर उसे इस बात से लगता था कि उसकी एक सहेली ने उसे बताई थी कि,,, देखना सुगंधा शादी की पहली रात को बचकर रहना और मेरी मां सरसों के तेल की शीशी अपने साथ रख लेना अगर तेरे पति का लंड मोटा हुआ तो पहली रात में ही तेरी बर फट जाएगी और उसमें से खून निकलने लगेगा तुझे दर्द भी बहुत होगा,,,।

उसकी इस बात को सुनकर सुगंधा पूरी तरह से डर गई थी उसे डर का एहसास उसे और ज्यादा परेशान करता था,,,, और वह नादानी भरे सवाल अपनी सहेली से पूछती थी,,,।

मोटा लंड (इस शब्द को कहने के लिए सुगंध पहले चारों तरफ नजर घुमा कर देख लेती थी कहीं कोई सुन तो नहीं रहा है लेकिन यह शब्द को बोलते हुए भी उसकी ज़बान लडखड़ा जाती थी,,,) मुझे कुछ समझ में नहीं आया इससे फटने वाली कौन सी बात है,,,.

(सुगंधा किस बात को सुनकर उसकी सहेली उसके नादानियत पर हंसने लगती थी और कहती थी,,,)

अरे बेवकूफ इसीलिए तुझे रहती हूं कि लड़कों को अपना दोस्त बना दे सबको सीख जाएगी लेकिन तू है कि एकदम सती सावित्री बनी रहना चाहती है अपने पति को अपनी बुर गिफ्ट करना चाहती है एकदम अनचुदी ,,,(और उसकी इस बात को सुनकर सुगंध नाराज होते हुए कहती थी)

चलिए सब रहने दे मुझे तेरे जैसा नहीं बना है आखिरकार शादी के बाद तो यह सब होना ही है तो दूसरों के साथ यह सब करके बदनामी क्यों मोल ले,,, लेकिन तू बताई नहीं जो मैं पूछ रही हूं,,,।

अच्छा बाबा बताती हूं देख सुगंधा इतना तो मैं जानती हूं कि तू किसी लड़के के साथ दोस्ती नहीं रखी है तो अब तक शारीरिक संबंध भी नहीं बनाई होगी और इसीलिए तेरी बुर का छेद बहुत ही शंकरा होगा,,, मतलब की बहुत छोटा और तूने तो अभी तक लंड भी नहीं देखी होगी देखी है कि नहीं,,,।

(उसके सवाल पर सुगंधा कुछ बोल नहीं पाई बस ना में सिर हिला दी वैसे भी उसकी ईस तरह की बातों को सुनकर उसके बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी वह मदहोश हुए जा रही थी,,,,,, सुगंधा का जवाब सुनकर उसकी सहेली मुस्कुराते हुए बोली,,,)

मुझे मालूम था,,,,देख ,,, तु ऐसे नहीं समझेगी,,, रुक तुझे समझाती हूं,,,(और इतना कहने के साथ एक बात अपनी जगह से उठकर खड़ी हो गई और सीधे रसोई घर में चली गई थोड़ी ही देर में वहां से एक मोटा तगड़ा बेगम लेकर के उसके सामने आई और उसे दिखाते हुए बोली,,,)

देख सुगंधा,,, ऐसा ही होता है मर्दों का दमदार लंड,,,(बैगन के आगे वाले मोटे हिस्से की तरफ उंगली रखकर बोली) अब तु यह बता ईतना मोटा बेगन तेरी बुर के छोटे से छेद में कैसे घुसेगा,,,,,,।

(सुगंधा को आज भी वह पल बड़े अच्छे से याद था,, उस बैगन के मोटे हिस्से को देखकर उसके तो होश उड़ गए थे,,, वह समझ गई थी की उसके बुरे के छोटे से छेद में इतना मोटा बैगन वाकई में नहीं घुस सकता,,,, अपनी सहेली की बात सुनकर वह बोली)

तू सही कह रही है मुझे तो बहुत डर लग रहा है,,,।

देख कर डरेगी तो सुहागरात का मजा नहीं ले पाएगी इसलिए तुझे समझा रही हूं कि अपने साथ सरसों के तेल की शीशी रखना,,,।

सरसों के तेल की सीसी क्यों,,,?

अरे बुद्धू सरसों के तेल को तू अपने पति के लंड पर लगा लेना एकदम चिकना कर लेना और थोड़ा सा तेल अपनी बुर पर भी लगा लेना,,,

इससे क्या होगा,,,?(सुगंधा फिर से नादानीयत भरा सवाल पुछी,,,)

तू सच मेंपागल है,,, अरे सरसों का तेल तेरी बर और लंड को एकदम चिकनाहट से भर देगा और उसके बाद तेरी बुर में जाने में आराम रहेगा,,,, तब तुझे मजा भी बहुत आएगा,,,,

(अपनी सहेली की बात सुनकर थोड़ी बहुत राहत उसे महसूस हुई थी लेकिन जल्द ही शादी की रात आ गई थी सुगंधा की शादी गांव में हुई थी उसके पति गांव में ही पढ़ाने का काम करते थे,,,,,,और शादी के बाद उनकी नौकरी शहर में लग गई एक अच्छे से स्कूल में जिसमें आज खुद सुगंधा भी पढाती है,,, शादी की पहली रात को ही इतनी खूबसूरत औरत पाकर सुगंधा का पति बहुत खुश था,,,,।

सुगंधा को आज भी याद है पहली रात को ही,, सुगंधा के पति ने ज्यादा कुछ किया नहीं था बस बातचीत ही किया था और फिर बातचीत के अंत में केवल साड़ी को कमर तक उठाकर,, और सुगंधा की चड्डी उतार कर उसकी दोनों टांगों के बीच जाकर सिर्फ थोड़ा सा थूक लगाकर सुगंधा के बुर में डालने की कोशिश करने लगा लेकिन सुगंधा की बुर का छेद छोटा होने की वजह से सुगंधा का पति एकदम असफल रहा और उसका वीर्यपात हो गया,,,, ।

अपने पति के असफल रहने से वह पूरी तरह से निराश हो गई थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें इस बात को किसी से का भी नहीं सकती थी ना ही अपने पति से बता सकती थी क्योंकि सुगंधा दूसरी औरतों की तरह नहीं थी उसे इस बात का डर था कि अगर वह इस बारे में अपने पति से बात करेगी तो उसका पति उसके बारे में गलत धारणा बांध लेगा उसे चरित्रहीन समझेगा इसीलिए वह इस बात को का भी नहीं सकती थी,,,, उसे अपनी सहेली की बात याद आ रही थी मोटा और लंबा लंड बुर फाड़ देगा लेकिन उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उसके पति लंड कुछ ज्यादा लंबा और मोटा नहीं था बस काम भर का था,,,।

दूसरे दिन वह फिर से अपने पति का इंतजार कर रही थी उसे बहुत डर लग रहा था,,,, क्योंकि जिस तरह का उसने अपने मन में सुहागरात को लेकर सपना संजोए थी वह पूरी तरह से चकनाचूर हो गया था,,, सब कुछ बिखरा हुआ सबसे नजर आ रहा था उसका इंतजार की घड़ी खत्म हुई और कमरे का दरवाजा खुला अपने पति को देखकर वह घबराने लगी थी,,, सुगंधा के चेहरे को देखकर उसके पति ने समझ लिया था कि सुगंधा क्या सोच रही है और वह उसके दर को दूर करके हुए बोला,,,।

मैं जानता हूं सुगंधा कल की मेरी हरकत की वजह से तुम डरी हुई हो,,, मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रहा था,,,(ईतना सुनकर सुगंधा आश्चर्य से अपने पति की तरफ देखने लगी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि उसका पति क्या बोल रहा है वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,) कल मैं जानबूझकर तुमसे प्यार किए बिना तुम्हारे साथ शारीरिक संबंध बनाया था और असफल होने का नाटक किया था क्योंकि मैं देखना चाहता था कि अगर तुम दूसरी लड़कियों की तरह होगी तो इस बारे में जरूर मुझे शिकायत करो कि लेकिन तुमने मुझे एक शब्द भी नहीं कहा नहीं घर वालों को कुछ बताया और मैं समझ गया कि तुम बहुत ही सीधी शादी हो चरित्रवान हो ,,, तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो तुम्हें संतुष्ट करने की ताकत मुझ में है,,,,।

(अपने पति की बातें सुनकर सुगंधा पूरी तरह से भाव भीबोर हो गई थी कल रात को जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोच कर वह सोच रही थी कि उसका जीवन पुरा तहस-नहस हो गया है इस तरह का पति पाकर,,, लेकिन उसके पति ने सब कुछ साफ कर दिया था और उसके बाद रात भर जमकर सुगंधा की चुदाई किया था और पूरी तरह से संतुष्ट किया था लेकिन एक बात का हिसाब सुगंध का हो रहा था कि उसके पति का लंड उसकी सहेली ने जिस तरह से बताया था मोटा और लंबा उसे तरह का बिल्कुल भी नहीं था लेकिन फिर भी वह अपने पति के लंड से पूरी तरह से संतुष्ट थी,,,,,।

अपने बिस्तर पर बैठी हुई सुगंध अपनी सुहागरात की रात के बारे में सोच ही रही थी कि तभी उसके कानों में उसके बेटे की आवाज सुनाई दी,,,।

क्या हुआ मम्मी नहाना नहीं है क्या तुम्हारे लिए बाथरुम में हल्का कुनकुना पानी रख दिया हूं क्योंकि अभी ठंडा पानी से नहाओगी तो तबीयत और खराब हो जाएगी ,,,।

(अपने बेटे की बात सुनकर वह एकदम से सपनों की दुनिया से वापस आ गई और अपने बेटे की तरफ देखने लगी,,,, गहरी सांस लेते हुए बोली,,,)

ठीक है तु चल मैं आती हूं,,,,।
(ईतना सुनते ही अंकित वहां से दूसरा काम करने के लिए चला गया था लेकिन उसकी जाते-जाते उसके पेट के आगे वाले भाग पर सुगंधा की नजर फिर से चली गई थी जिसमें अभी भी अच्छा खासा तंबू बना हुआ था उसे देखकर सुगंधा की बुर में हलचल होने लगी वह समझ गई थी कि उसका बेटा कितना ज्यादा उत्तेजित है,,,, थोड़ी देर बाद वह बिस्तर पर से उठी और बाथरूम की तरफ जाने लगी,,,,,,, और बाथरूम से पहले चलते समय उसके कदम थोड़े से डगमगा गए,,, अंकित बाथरूम में साबुन रख रहा था उसकी नजर अपनी मां पर पड़ी तो वह एकदम से उसे संभालने के लिए उठकर खड़ा हो गया लेकिन तब तक सुगंधा दीवाल पर हाथ लगाकर संभल चुकी थी,,,)

संभाल कर मम्मी लगता है अभी भी तुम्हें चक्कर आ रहा है,,,,,।

(चक्कर की बात सुनते हैं सुगंधा के तन-बाद में अजीब सी हलचल होने लगी और वह जानबूझकर बोली,,,)

मुझे भी ऐसा ही लग रहा है,,,,।

तब रहने दो मम्मी मत नहाओ,,,,

नहीं नहीं नहाना पड़ेगा मुझे अच्छा नहीं लग रहा है,,,,।

ठीक है लेकिन बाथरूम का दरवाजा खुला रखना ताकि कोई गड़बड़ हो तो मैं देख सकूं,,,,।
(अंकित के मन में दोहरे विचार चल रहे थे एक तरफ से वह अपनी मां की चिंता भी कर रहा था और दूसरी तरफ वह बाथरूम का दरवाजा खुला रखने पर अपनी आंखों को सेंक भी सकता था,,,, अपने बेटे की बात पर सुगंधा को कोई एतराज नहीं था,,, क्योंकि उसके मन में भी बहुत कुछ चल रहा था वह अपने बेटे से खुलना चाहती थी,,,। इसलिए वह दीवार का सहारा लेकर बाथरूम के दरवाजे तक पहुंच कर बोली,, )

ठीक है,,,,(बाथरूम का दरवाजा खुला हुआ था और वह धीरे से बाथरूम के अंदर प्रवेश कर गई,,, अंकित इतने में जल्दी से एक कुर्सी लेकर आ गया और ठीक बाथरूम के सामने किताब लेकर बैठ जा वह ऐसा जताना चाहता था कि वह पढ़ रहा है लेकिन वह अपनी मां पर ही नजर रखना चाहता था उसे देखना चाहता था नहाते हुए उसके खूबसूरत भजन को देखना चाहता था और इस बात का एहसास सुगंधा को भी था इसलिए उसके बदन में भी हलचल मची हुई थी,,,,।

कुछ देर तक सुगंधा बाथरूम में उसी तरह से खड़ी रही,,, जहां एक तरफ अपने बेटे की आंखों के सामने वह नहाने के लिए उत्सुक थी,,, वहीं दूसरी तरफ ना जाने क्यों उसे अपने बेटे की आंखों के सामने अपने कपड़े उतारने में शर्म महसूस हो रही थी जबकि उसके बेहोशी की हालत में उसके बेटे ने क्लीनिक के बाथरूम में उसकी चड्डी तक अपने हाथों से उतारा था ,,,,, फिर अपने मन में यह सोचकर की यही तो वह चाहती थी फिर अब क्यों शर्मा रही है अगर शर्माएगी तो जिंदगी का सुख नहीं ले पाएगी,,, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है और यही सही मौका भी है,,,, मर्दों का दिमाग औरत की खूबसूरत बदन को देख कर ही खराब होता है फिर वह भले ही चाहे उसका भाई हो बेटा हो या चाहे जो भी हो उसे सिर्फ औरतों में सिर्फ औरत ही नजर आती है ना ही कोई रिश्ता नजर आता है,,,।

सुगंधा ऐसा अपने मन में सोच कर धीरे से अपनी साड़ी का पल्लू अपने कंधे पर से नीचे गिरा दी,,, और उसके ऐसा करने से उसकी भारी भरकम छाती एकदम से उजागर हो गई,,,,,,, वह अंकित तरफ मुंह करके खड़ी थी,,,, अंकित उसे तिरछी नजर से देख रहा था अपनी मां को इस तरह से अपनी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिरा था वह देखकर उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी थी,,, अंकित किताब का पन्ना खोलकर भले ही किताब पढ़ने का नाटक कर रहा था जबकि हकीकत यात्रा की वह अपनी मां की खूबसूरत बदन के पन्ने को खुलता हुआ देखना चाहता था,,,, जिसकी शुरुआत उसकी मम्मी अपनी साड़ी का पल्लू नीचे गिरा कर कर चुकी थी,,,।

अंकित बहुत उत्साहित और उत्तेजित था,,,, बाथरूम के दरवाजे में बने छोटे से छेद से वह अपनी मां को पूरी तरह से नग्न अवस्था में नहाते हुए देख चुका था लेकिन फिर भी उसके बदन की प्यास अपनी मां को नंगी देखने की चाहत कम नहीं हुई थी यहां तक कि वह खुद अपनी मां की अंतर्वस्त्र को अपने हाथों से उतारा था लेकिन फिर भी उसके मन की ललक कम नहीं हुई थी,,,,।

बाथरूम के अंदर का माहौल धीरे-धीरे कम हो रहा था एक मां अपने बेटे के सामने अपने कपड़े उतार रही थी नहाने के लिए,,,सुगंधा ऐसा बिल्कुल भी ना करती है अगर उसके अंदर की एक औरत न जागी होती,,, क्योंकि उसके मन के चरित्र पर औरत का चरित्र को ज्यादा ही हावी होता जा रहा था जिसके चलते वह अपने बेटे के सामने कपड़े उतारने के लिए अपने आप को तैयार कर चुकी थी धीरे-धीरे वह अपने कमर पर भरी हुई साड़ी को खोलने लगी थी वह अपने दोनों हाथों से अपनी साड़ी को खोल रही थी और अंकित को ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे उसकी मां उसके लिए अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी होने जा रही है,,,। दोनों के बीच पूरी तरह से खामोशी छाई हुई थी आंखों ही आंखों में बहुत सी बातें हो रही थी अंकित बार-बार किताबों के पन्नों में अपनी आंखों को भरमाने की कोशिश करता था लेकिन उसका चित उसकी मां पर टिका हुआ था,,,, अपनी साड़ी को खोलकर सुगंधा अपनी साड़ी को बाथरूम में कोने में रख दी थी और वह बाथरूम में केवल ब्लाउज और पेटीकोट में थी ब्लाउज और पेटीकोट में उसका गदराया बदन और भी ज्यादा मादक लग रहा था,,,, जिसे देख कर अंकित का लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आ गया था,,,।

सुगंधा बाथरूम के अंदर धीरे-धीरे करके अपनी साड़ी अपनी खूबसूरत वतन से अलग करके बाथरूम के कोने में रख दी थी,,,, और अंकित उसकी मां को बिल्कुल भी तकलीफ ना हो इसलिए उसकी देखरेख के लिए बाथरूम के सामने ही कुर्सी रखकर बैठकर किताब पढ़ रहा था किताब क्या पढ़ रहा था किताब पढ़ने का वह बहाना बता रहा था उसकी नजर तो अपनी मां की खूबसूरत बदन पर ही थी तिरछी नजर से वह अपनी मां की एक-एक क्रियाकलाप को देख रहा था,,,,, सुगंधा भी कुछ कम नहीं थी,,,,,, अपने बेटे से वह जो चाहती थी धीरे-धीरे उसकी ख्वाहिश पूरी होती जा रही थी उसके बेटे में आए इस बड़े बदलाव से वह अंदर-अंदर बहुत खुशी और इसीलिए वह अपनी बीमारी का बहाना बनाकर एक बहाने से अपनी खूबसूरत बदन की नुमाइश करना चाहती थी अपने बेटे के सामने,,,।

सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि उसकी जवानी अभी भी बरकरार है,,, उसके बदन से अभी भी जवानी का रस टपकता है,,,, इस बात को भी अच्छी तरह से जानती थी कि मर्दों की सबसे बड़ी कमजोरी होती है औरत का नंगा जिस्म एक नंगी औरत जिसे देखकर मर्द पूरी तरह से अपने होशो आवाज होकर औरत का गुलाम बन जाता है इसीलिए सुगंधा अपने आप से अपने बेटे को अपना नंगा बदन दिखाना चाहती थी ताकि उसका बेटा पूरी तरह से उसके जवानी के आगे घुटने टेक दे,,,,,, जबकि वह ऐसा पहले भी अपने बेटे के सामने कर चुकी थी,,, लेकिन यह क्रियाकलात ऐसी होती है कि जितनी बार करो उतनी बार काम ही लगती है और हर एक बार एक नया उमंग और जोश से भर देती है इसीलिए सुगंध बेकरार थी अपने बेटे को अपना नंगा बदन दिखाने के लिए,,,।

वैसे तो दुनिया का हर एक मर्द जानता है कि औरत के बदन में उसके कौन-कौन से अंग होते हैं जिन्हें वह न जाने कितनी बार देखा है लेकिन हर बार उसे औरत का अंग देखने का मन करता है और हर बार देखकर मस्त हो जाता है,,, सुगंधा यह भी जानती थी कि उसका बेटा भले ही देखभाल के बहाने बाथरूम के बाहरी कुर्सी डालकर बैठा है लेकिन उसका असली मकसद तो दूसरे मर्दों की तरह ही है एक खूबसूरत औरत के खूबसूरत नंगे जिस्म को निहारना,,,,।

कार्यक्रम की शुरुआत हो चुकी थी बाथरूम के अंदर सुगंध अपनी साड़ी उतार कर बाथरूम के कोने में रखती थी और इस समय बाथरूम के अंदर वह केवल ब्लाउज और पेटीकोट में ही थी ब्लाउज और पेटीकोट में औरत का जिस्म पूरी तरह से मादकता से भर जाता है,,,, और इस समय सुगंधा भी स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा की तरह दिखाई दे रही थी,,,। कुछ देर तक सुगंधा इसी अवस्था में खड़ी रही,,, क्योंकि वह अपने मन में सोच रही थी कि अब क्या करें,,, और अंकित अपनी मां को इस तरह से बाथरूम में खड़ी देखकर कुछ बोलने वाला था कि उसकी मां तुरंत अपने दोनों हाथों को हरकत देते हुए अपने ब्लाउज के बटन पर अपनी उंगलियां रख दी,,,,, अपनी मां की हरकत को देखकर अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा क्योंकि वह समझ गया था कि उसकी मां उसके ब्लाउस को खोलने जा रही है,,, कुछ ही देर में ब्लाउज के अंदर छुपा उसकी मां का पका हुआ दशहरी आम देखने को मिलेगा लेकिन उसे भी देखने के लिए उसके ऊपर का छिलका मतलब की ब्रा उतारना पड़ेगा,,, और अंकित इस बात से दुविधा में था कि उसके सामने उसकी मां अपनी ब्रा उतरेगी कि नहीं उतारेगी,,,,।

लेकिन इसी बीच उसकी मां अपने ब्लाउज का बटन खोलना शुरू कर दी,,, सुगंधा का मुंह अंकित की तरफ था,,, सुगंधा जानबूझकर अपने बेटे की तरफ मुंह करके खड़ी थी ताकि उसका बेटा अपनी आंखों से सब कुछ देख सके,,,, वैसे भी बाथरुम का दरवाजा खुला छोड़कर वह अपने बेटे को एक तरह से इशारा दे दी थी कि जो कुछ भी होगा उसकी आंखों के सामने ही होगा,,,, सुगंधा धीरे-धीरे अपने ब्लाउज का एक-एक करके बटन खोलती चली जा रही थी और अंकित के दिल पर बिजलियां गिरा रही थी,,,, अपनी मां की हरकत पर अंकित का लंड पूरी तरह से फटने की स्थिति में आ गया था,,, औरत को और वह भी खूबसूरत औरत को कपड़े उतारते हुए देखना भी बहुत बड़ी किस्मत की बात है ऐसा मौका तो बहुत से लोगों के पास आता ही है लेकिन ऐसा मौका कम ही आता है जब एक मां अपने बेटे की आंखों के सामने ही अपने कपड़े उतार कर निर्वस्त्र होती हो और इसलिए अंकित इस समय बेहद खुश नसीब था,,,, एक तो उसकी मां बला की खूबसूरत थी,,, और ऐसे में खूबसूरत औरत के नंगे जिस्म को अपनी आंखों से देखना वाकई में किस्मत की बात थी इसलिए अंकित अपने आप को खुशकिस्मत समझ रहा था,,,।

देखते ही देखते सुगंध अपने ब्लाउज के सारे बटन को खोल देती और अपने ब्लाउज के दोनों पट को बंद कमरे के दरवाजे की तरह धीरे से खोलकर दोनों पट को अलग कर दी,,,, और जैसे दरवाजा के खुलते ही कमरे के अंदर का सब कुछ एकदम साफ नजर आने लगता है वैसे ही सुगंधा के ब्लाउज के दोनों पट खुलते ही उसके लाल रंग की ब्रा एकदम से साफ नजर आने लगी थी ब्रा में कसा हुआ उसका दशहरी आम बेहद आकर्षक लग रहा था,,,,,,, तिरछी नजर से अंकित सब कुछ देख रहा था उसे इस बात का एहसास भी हो रहा था कि उसकी मां अपनी चूचियों के साईज से कम नाप की ब्रा पहनी हुई थी जिसकी वजह से उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां उसके छोटे से ब्रा में किस तरह से समा नहीं पा रहे थे लेकिन एक नया समा बांध दे रहे थे जिसे देख पाना आंखों को गर्माहट प्रदान कर रहा था,,,, धीरे से सुगंधा अपनी बाहों में से अपने ब्लाउज को धीरे-धीरे उतारकर उसे भी साड़ी के ऊपर फेक दी,,,,।

अंकित का दिल जोरो से धड़क रहा था उसका पूरा ध्यान अपनी मां के ऊपर ही था भले ही वह किताबों के पन्ने पलट कर अपनी नजर को किताबों में उलझाया हुआ था लेकिन उसका पूरा ध्यान अपनी मां के ऊपर ही था और इस बात को सुगंधा भी अच्छी तरह से जानती थी,,,, अंकित के साथ-साथ सुगंधा भी अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,,, कुछ देर पहले उसके बदन में दर्द था ज्वर से उसका बदन तप रहा था लेकिन अब बदन का वातावरण पूरी तरह से बदल चुका था हालांकि उसका बदन अभी भी तप रहा था लेकिन ज्वर से नहीं उत्तेजना से,,, सुगंधा को अपनी बुर गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, वह मदहोश हो रही थी मस्त हो रही थी,,, और इस समय इस बात के लिए मन ही मन तृप्ति को धन्यवाद दे रही थी कि अच्छा हुआ कि वह उसकी देखभाल के लिए अंकित को छोड़कर गई अगर ऐसा ना होता तो शायद इस तरह का दृश्य बिल्कुल भी भजा नहीं जा सकता था,,,।

ब्लाउज को उतार देने के बाद सुगंधा अपने दोनों हाथ को पीछे की तरफ ले गई और अपने ब्रा का हुक खोलने की कोशिश करने लगी वैसे तो वह अपने ब्रा का हक बड़े आराम से खोल देती थी लेकिन इस समय केवल वह नाटक कर रही थी वह जानबूझकर अपने हाथ को अपने ब्रा के हक तक नहीं ले जा पा रही थी,,,,, और ऐसा करते हुए अंकित उसे देख रहा था और मन ही मन प्रसन्नता के साथ-साथ उत्तेजित हो जा रहा था कि कुछ ही देर में उसकी मां के दशहरी आम उसे देखने को मिल जाएंगे,,, और इस बात से तो और भी ज्यादा उत्साहित था कि उसकी मां बिना शर्माए बही जब उसके सामने अपने कपड़े उतारने के लिए तैयार हो चुकी थी और उतार भी रही थी बस इस बात की उत्सुकता उसके मन में अत्यधिक की उसकी मां नहाने से पहले अपने बदन से क्या-क्या उतारती है,,, और इसलिए अंकित अपने मन में प्रार्थना कर रहा था कि,,, कल की तरह उसकी मां के दिलों दिमाग पर बदहवासी छा जाए और उसे बिल्कुल भी होश ना हो और बेहोशी की हालत में वह खुद अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी हो जाए,,, ऐसा सोच कर वह अपनी मां से नजर बचाते हुए पेट के ऊपर से ही अपने लंड को जोर से मसल दिया,,,,,।

बार-बार सुगंधा ब्रा का हुक खोलने की कोशिश कर रही थी लेकिन जानबूझकर खोल नहीं रही थी,,, और दोनों हाथों को पीठ की तरफ ले जाने की वजह से उसके आगे की छाती पूरी तरह से निकाल कर बाहर की तरफ आ गई थी जिसे उसके दोनों खरबूजे ऐसा लग रहा था कि ब्रा फाड़ कर बाहर आ जाएंगे,,,, अंकित का मन तो कर रहा था कि,,, आगे बढ़कर बाथरूम में कोई चाय और अपनी मां के दोनों खरबूजा को अपने हाथ में लेकर दबा दबा कर उनका रस पी जाए,,, लेकिन ऐसा करने की हिम्मत उसमें अभी नहीं थी,,,,, क्योंकि भले ही वह अपनी बातचीत के जरिए अपनी मां से थोड़ा बहुत खुल चुका था लेकिन इतना नहीं खुला था कि वह अपनी मां की खूबसूरत बदन से खेलना शुरू कर दे या अपनी मां से गंदी हरकत करना शुरू कर दे क्योंकि वह जानता था कि इस तरह की हरकत से उसकी मां के बारे में क्या सोचेगी क्या बर्ताव करेगी यह अभी उसे नहीं मालूम था लेकिन जरा भी उसे इस बात का भनक लग जाए कि उसकी मां की उसके साथ एक जाकर होना चाहती है तो इसी समय अंकित बाथरूम में घुसकर अपनी मां की जवानी पर पूरी तरह से काबू पा ले,,,,, लेकिन अंकित नहीं जानता था कि उसकी मां क्या चाहती है इतना तो उसे एहसास हो गया था कि उसकी मां भी जिस अवस्था से गुजर रही है प्यार की भूखी है लेकिन यह जानकर भी अंकित ऐसा कुछ नहीं करना चाहता था जिससे आगे चलकर उसे ही तकलीफ हो वह इस खेल में धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहता था और इतना तो वह कामयाब हो ही गया था कि अपनी आंखों के सामने अपनी मां को वस्त्र उतारने के लिए मना लिया था,,,,।

कुछ देर और कोशिश करने के बाद उसे कुछ याद आया हो इस तरह से वह तुरंत बाथरूम के दीवार की तरफ मुंह करके खड़ी हो गई और पीठ को अंकित की तरफ कर ली और ऐसे में वह अपनी उंगलियों को अपनी तरह के होकर तक पहुंचाने की कोशिश करने लगी,,, वह अच्छी तरह से जानती थी कि अंकित तो सही देख रहा होगा और उसकी नाकाम हो रही कोशिश को देखकर जरूर कुछ करने की सोचेगा और कुछ देर तक यह दृश्य इसी तरह से चलता रहा,,, अंकित देख रहा था कि उसकी मां ब्रा कहो खोलना चाह रही थी लेकिन उसका हाथ उसकी उंगली ब्रा के हक तक पहुंच नहीं रही थी और अंकित अपने मन में सोच रहा था कि पहले भी तो उसकी मां इस तरह से अपना ब्रा उतरती होगी लेकिन तब तो किसी प्रकार की तकलीफ नहीं आती है लेकिन आज ऐसा क्यों हो रहा है,,,, अंकित के मन में यही सब चल रहा था वह अपने मन में सोच रहा था कि कहीं उसकी मां जानबूझकर तो यह नाटक नहीं कर रही है लेकिन तभी वह सोचा कि शायद बीमारी की वजह से वह अपने हाथ को ज्यादा पीछे की तरफ नहीं उठा पा रही है इसलिए अपनी मां को कोशिश करता हुआ देखकर वह खुद कुर्सी पर बैठा बैठा बोला,,,,।

क्या हुआ मम्मी,,,,?

अरे देखना,,,,(नजर घुमा कर अपने बेटे की तरफ देखते हुए) मेरा हाथ ब्रा की हुक तक नहीं पहुंच रहा है,,,,।

मैं मदद कर दूं क्या मम्मी,,,,।

हा रे अब तो तुझे ही मदद करनी होगी,,, बुखार की वजह से हाथ में दर्द हो रहा है और ऊपर की तरफ नहीं जा रहा है,,,,

(अपनी मां की बात सुनकर कुर्सी पर बैठे हुए ही अंकित तपाक से बोला)

तब तो अच्छा ही हुआ मम्मी की डॉक्टर ने तुम्हारे पिछवाड़े पर सुई लगाया अगर हाथ में लगाया होता तो शायद हिलाना भी मुश्किल हो जाता ,,,(अंकित अपनी मां की गांड के बारे में बात करने लगा था हालांकि गांड को बोलने का तरीका कुछ और था लेकिन इसका मतलब भी वही होता है,,, इसलिए तो अपने बेटे के मुंह से यह शब्द सुनकर सुगंधा के तन बदन में हलचल होने लगी और अपने आप ही उसकी नजर एकदम से झुक गई वह शर्म से पानी पानी हुई जा रही थी,,, क्योंकि वह देख रही थी कि उसका बेटा अब उसके सामने बिल्कुल भी शर्म नहीं कर रहा था,,, फिर भी अपने बेटे की बात सुनकर गहरी सांस लेते हुए वह बोली,,,।)

तू सही कह रहा है अंकित अगर हाथ में लगा देता तो शायद मेरा उठना बैठना भी मुश्किल हो जाता जब बीना सुई लगाए इतना दर्द कर रहा है तो सुई लगाने के बाद कितना दर्द करता ,,,,,, अब जरा मेरी ब्रा का हुक तो खोल दे,,,।

ठीक है मम्मी अभी खोल देता हूं,,,,,(अंकित के बदन में उत्साह के साथ-साथ उन्माद भी फैलने लगा इन शब्दों में कितना रस घुला हुआ था इस बात को केवल अंकित ही समझ सकता था एक औरत के द्वारा एक जवान लड़के को आजा देना कि जाकर उसके वस्त्र उतार दे भला एक मर्द के लिए दुनिया में इससे बड़ा तोहफा और क्या हो सकता है और वह भी एक खूबसूरत औरत के वस्त्र उतारने की बात हो तो बात ही कुछ और हो जाती है,,,,, अंकित अपने मन में सोच रहा था कि वक्त और हालत कितनी जल्दी बदल जाते हैं पता ही नहीं चलता,,, पहले मम्मी अपने इस अंतर्वस्त्र को हमेशा नजरों से छुपा कर रखती थी छत पर कपड़े सुखाने के लिए भी डालती थी तो उसे साड़ी के अंदर डालती थी ताकि उस पर मेरी नजर ना पड़ जाए,,,,,, भूल से भी अपने बदन का ऐसा हिस्सा कभी भी उजागर नहीं होने देना चाहती थी जिसे देखकर मन पर बुरा असर पड़े,,, लेकिन आज देखो हालात और वक्त कितना बदल चुका है कि आज वह खुद अपने ही बेटे को अपने कपड़े उतारने के लिए बोल रही थी,,,।

यह बदलाव शायद एक मां के अंदर औरतों के जागरूक होने पर आया था वरना जब तक मां का अस्तित्व था तब तक उसके अंदर की औरत कभी बाहर नहीं आई थी बरसों से एक तरह से एकाकी जीवन की रही थी लेकिन फिर भी अपने बदन की प्यास को वह अपने सीने में दफन कर चुकी थी लेकिन वह प्यास उबाल करने लगी थी एक मां के अंदर एक औरत का अस्तित्व छुपा हुआ था जो बाहर आने लगा था और जब एक औरत एक मां के अंदर से बाहर आती है तो फिर वह अच्छे बुरे का ख्याल अपने मन से निकाल देती है इसलिए तो वह अपने बेटे में भी एक मर्द को खोजने लगती है,,,, पर मर्दों का तो हमेशा सही रहा है खूबसूरत बदन पर आकर्षित हो जाना भले ही वह रिश्ते से कितनी करीबी क्यों ना हो उसे हर एक रिश्ते में केवल एक खूबसूरत औरत ही नजर आती है जैसा की अंकित की नजरे देख रही थी बाथरूम के अंदर उसकी मां थी लेकिन वह अपनी मां को नहीं बल्कि यह खूबसूरत औरत को देख रहा था,,,,।

अपनी मां की बात सुनकर अपनी मां की तरफ से आज्ञा पाकर ज्यादा देर तक अंकित अपनी जगह पर बैठा नहीं रह सकता था क्योंकि वह भी उतावला हो रहा था अपनी मां की ब्रा को अपने हाथों से चुने के लिए उसका हक खोलकर उसके जोड़ों को अलग करने के लिए ताकि उसकी मां अपने हाथों से अपनी ब्रा उतार कर अपने दोनों दशहरी आम को उजागर कर दे अपनी चूची को नग्न कर दे,,,, इसलिए जल्दी से अंकित कुर्सी पर से उठा और कदम आगे बढ़ते हुए बाथरूम के दरवाजे पर पहुंच गया उसकी मां दीवाल की तरफ मुंह करके खड़ी थी और शर्म के मारे वह अपनी नजरों को दीवार की तरफ फेर ली थी क्योंकि एक औरत के उजागर हो जाने के बावजूद भी अभी भी उसके अंदर मां का अस्तित्व बाकी था अभी भी उसमें शर्म और हया बाकी थी भले ही अपने बेटे को पूरी तरह से छूट दे रही थी लेकिन शर्म का घूंघट अभी भी उसके बदन पर बना हुआ था,,,,।

अंकित धीरे से अपना दोनों हाथ आगे बढ़ाया और जैसे ही उसकी उंगलियां उसकी मां की नंगी चिकनी पीठ पर इस पर से हुई एकदम से सुगंधा के बदन में मदहोशी छा गई और हल्का सा उसका बदन उचक गया मानव की जैसे उसके बदन में उन मादकता की लहर उठी हो,,, और यही हाल अंकित का भी हो रहा था अपनी मां की नंगी चिकनी पीठ का स्पर्श बातें ही उसकी दोनों टांगों के बीच की स्थिति बदलने लगी हालांकि उसका लंड पूरी तरह से टनटनाया हुआ था,,, लेकिन पीठ का स्पर्श बातें ही उसके अंदर इतनी अत्यधिक उत्तेजना का संचार होने लगा कि उसे अपने लंड में दर्द महसूस होने लगा था वह पूरी तरह से पागल हुआ जा रहा था उसे ऐसा लग रहा था कि उसके लंड में अद्भुत शक्ति का संचार हो रहा है और उसे इतना अत्यधिक विश्वास हो गया था कि अगर मौका मिले तो वह इसी समय अपनी मां की चुदाई कर दे,,,,, लेकिन फिर भी बड़ी मुश्किल से वह अपनी बेकाबू मां को काबू में रखे हुए था,,,,,।

दोनों पट्टीयों को एक दूसरे के सामने खींचना आराम से खुल जाएगी,,,,।

ठीक है मम्मी,,,,(अपनी मम्मी का दिशा निर्देश पाकर वह अपनी मां की ब्रा का हुक को खोलने की कोशिश करने लगा,,, लेकिन ऐसा करने में उसके पसीने छूट जा रहे थे ऐसा नहीं था कि वह अपनी मां के ब्रा का हुक खोल नहीं पा रहा था,,,, वह चाहता तो वह अपने हाथों की ताकत दिखाते हुए अपनी मां की ब्रा को खोले बिना उसे फाड़ कर उसके बदन से अलग कर सकता था,,,, लेकिन एक अद्भुत एहसास उसके तन बदन में नई उत्तेजना का संचार कर रहा था एक औरत का ब्रा खोलने में शुरू-शुरू में एक मर्द को कितनी मस्सकत करनी पड़ती है ,,, वही हाल इस समय अंकित का हो रहा था भले ही वह एक बार क्लीनिक में क्लीनिक के बाथरूम में अपनी मां की चड्डी अपने हाथों से उतर चुका था लेकिन इस समय वह पूरी तरह से उत्तेजित अवस्था में थोड़ा बहुत घबरा रहा था उसके हाथों में कंपन हो रहा था,,,, क्योंकि क्लीनिक के बाथरूम में तो उसकी मां बुखार की वजह से बेहोशी की हालत में थी लेकिन इस समय बाथरूम के अंदर वह पूरी तरह से होशो हवास में थी पूरी तरह से जगाती हुई और ऐसे में अंकित को उसकी ब्रा कहो खोलने में थोड़ी घबराहट हो रही थी जबकि वह अपनी मां से पूरी तरह से आज्ञा पा चुका था,,,।

कुछ देर तक अंकित को इधर-उधर करता देखकर सुगंधा बोली,,,।

क्या कर रहा है अंकित तुझसे ब्रा का हक नहीं खुल रहा है पता नहीं तुझे क्या होगा,,,?(सुगंधा एक तरह से यह बात कह कर अपने बेटे पर व्यंगय कस रही थी एक तरह से वह अपने बेटे की मर्दानगी को ललकार रही थी अंकित भी अपनी मां के कहने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था,,,, और वह अपने मन में बोला मम्मी,,, यह तो मैं बेटे की हैसियत से ब्रा की हुक खोलने की कोशिश कर रहा हूं,,, अगर पूरी तरह से मर्दानगी पर उतर गया तो ब्रा को खोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी फाड़ के अलग कर दूंगा,,,। फिर भी वह धीरे से बोला,,)

खोलने की कोशिश तो कर रहा हूं मम्मी लेकिन ब्रा की पट्टी एकदम कसी हुई है ऐसा लग रहा है कि तुम अपनी साइज से कम नाप की ब्रा पहनी हो,,, ।

अरे वह बेटा तेरी नजर तो बहुत तेज है,,,,(अपने बेटे की बात सुनकर खुश होते हुए सुगंधा बोली,,,, और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) लेकिन तुझे कैसे मालूम पड़ा की साइज से कम नाप की में ब्रा पहनी हूं,,,,।

क्योंकि पट्टी एकदम कसी हुई है अगर ना आपकी पहनती तो मेरी उंगली ब्रा की पट्टी में आराम से चली जाती और मैं आराम से खोल पाता,,,(ब्रा की पट्टीयों में अपनी उंगली को उलझाए हुए वह बोला,,,)

कोई बात नहीं बेटा अभी भी खुल जाएगी ,,रोज तो मै खोलते ही हूं आज मेरा हाथ ऊपर की तरफ नहीं पहुंच रहा है इसलिए दिक्कत आ रही है,,,।

ठीक है मम्मी थोड़ा रुक जाओ,,,(और इतना कहने के साथ ही वह थोड़ा सा दम दिखाया और पट्टी को एक दूसरे के सामने खींचा और हुक एकदम से खुल गया,,,)

काफी मशक्कत करने के बाद आखिर कर अंकित ने अपनी मां की ब्रा का हुक खोल ही दिया ,,,,, अंकित को इतने सही समझ में आ गया था कि औरत को नंगी होते हुए देखना और खुद अपने हाथों से उसके कपड़े उतार कर नंगी करने में कितना फर्क है,,,। अंकित को इसमें थोड़ी बहुत शर्मिंदगी का एहसास हुआ था,,, जब उसकी मां ने यह कहा था कि क्या कर रहा है तुझसे हुक नहीं खुल रहा,,, अपनी मां के मुंह से यह सुनकर उसे अपनी मर्दानगी पर थोड़ा गुस्सा आने लगा था पर वह अपने मन में यही सोचता था कि जब वह खूबसूरत औरत का ब्रा नहीं खोल सकता तो उसके साथ संभोग कैसे करेगा,,, लेकिन अंकित अपनी मरदान की साबित करते हुए अपनी मां का ब्रा का हुक खोल दिया था अभी भी उसके हाथों में ब्रा का हुक था,,,,।
बाथरूम के अंदर बेहद अद्भुत दृश्य की रचना हो रही थी और रचनाकार थी सुगंध जो अपनी जवानी के जंगलों में अपने बेटे को पूरी तरह से फांस रही थी,,, और अंकित अपनी मां की जवानी के चलते उसकी मदहोशी भारी जाल में फसता चला जा रहा था,,, औरजब सुगंधा जैसी जवानी से लदी हुई जाल साज हो तो दुनिया का कौन सा मर्द होगा जो ऐसे जाल में फंसना नहीं चाहेगा,,, इसलिए तो उनमें से अंकित भी बाकात नहीं था,,,वह भी अपनी मां की जवानी के रस में डूबने के लिए तैयार था,,,।बाथरूम में सुगंधा सामने की दीवार की तरफ मुंह करके खड़ी थी उसकी पीठ अंकित की तरफ थी और उसकी ब्रा खुली हुई थी उसे खोलने वाला था खुद अंकित जिसके हाथों में अभी भी उसके ब्रा की पट्टी थी,,,, अंकित का दिल बड़ी जोरों से धड़क रहा था,,, क्योंकि वह जानता था कि हुक खुल जाने की वजह से उसकी मां की चुचियों का कैसा हुआ ब्रा का कप एकदम से ढीला हो गया होगा उसकी मां की चूची आजाद हो गई होगी लेकिन वह देख नहीं पा रहा था,,,, उसका मन मचल रहा था अपनी मां की नंगी चूचियों को देखने के लिए पागल हुआ जा रहा था लेकिन आगे चलकर वह खुद से तो अपनी मां की चूची देख नहीं सकता था क्योंकि ऐसा करना उसे इस समय थोड़ा बहुत गलत लग रहा था,,,, क्योंकि इस समय उसकी मां बीमार थी भले ही उसे थोड़ा आराम होने लगा था बुखार उतर चुका था लेकिन फिर भी वह बीमारी ही थी और ऐसे हालात में फायदा उठाना अंकित को अच्छा नहीं लगना था,,,।

अगर बीमारी की हालत में वह अपनी मां का फायदा उठाना चाहता तो दवा खाने के क्लीनिक में ही उसके अंगों को दबा देता मसल देता अपनी मां की बुर पर हथेली रख देता या उसमें उंगली डाल देता कुछ भी कर सकने की स्थिति में वह था क्योंकि उसकी मां को बिल्कुल भी होश नहीं था,,, यहां तक कि जब दवा लेकर घर पर आया तब भी दवा खाने के बाद उसकी मां एकदम बेहोशी की हालत में सो रही थी उसे समय भी वह चाहता तो कुछ भी कर सकता था यहां तक की अपने जीवन की पहली चुदाई का सुख भोग सकता था और वह भी अपनी मां की खूबसूरत बदन के साथ लेकिन वह ऐसा नहीं किया और इसीलिए इस समय भी वह अपनी मनमानी नहीं करना चाहता था,,,।

फिर भी हालात पूरी तरह से नाजुक हो चुके थे अंकित के पेंट में तंबू बना हुआ था और ठीक उसके लंड के सामने उसकी मां की उभरी हुई गांड थी जो की पेटिकोट के परदे में कैद थी,,,, पेटीकोट में होने के बावजूद भी अंकित को अपनी मां की गांड का उभार और उसका कटाव एकदम साफ झलक रहा था मन तो उसका कर रहा था कि बस एक कदम आगे बढ़कर अपने लंड की रगड़ अपनी मां की गांड पर महसूस करा दे,,, लेकिन ऐसा करने से वह डर रहा था वह कोई भी काम बिगड़ता नहीं देना चाहता था वह नहीं चाहता था कि उसकी एक गलती से सब कुछ बिगड़ जाए उसे ऐसा लग रहा था कि उसकी मां नाराज हो जाएगी लेकिन वह तो खुद चाहती थी कि अंकित आगे बढ़े,,,, उसके साथ कोई हरकत करें उसके बदन से खेले,,, और वह ईसी इंतजार में थी,,,,,,और वह जानती थी कि,,,,,अगर वह थोड़ा सा भी पीछे अपनी गांड को ले गई तो तुरंत उसके बेटे का तंबू उसके नितंबों पर रगड़ खाने लगेगा और वह इस अनुभव के लिए तड़प रही थी और मन ही मन अंकित पर थोड़ा गुस्सा भी कर रही थी,,,।

और गुस्सा इस बात से कर रही थी कि,,, अंकित पूरी तरह से जवान होने के बावजूद भी दूसरे लड़कों की तरह हरकत करने वाला नहीं था नहीं तो उसकी आंखों के सामने इतनी खूबसूरत औरत और जिसे खुद अपने हाथों से ब्रा का हुक खोलना हो भला ऐसा लड़का ऐसी खूबसूरत औरत के बदन के साथ छेड़छाड़ किए बिना कैसे रह सकता है,,, कुछ देर तक सुगंध भी उसी अवस्था में खड़ी रही वह चाहती थी कि अंकित की तरफ से कोई हरकत हो अंकित उसके बदन पर अपना हाथ रखे या कोई ऐसा हरकत करें जिससे वह एकदम से मस्त हो जाए लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वह पागल की तरह अपने दोनों हाथों में उसकी ब्रा की पट्टी पकड़े खड़ा रहा,,,,,,,ऐसा नहीं था कि,, अंकित के मन में यह सब नहीं चल रहा था वह भी अपने लंड को अपनी मां की गांड पर रगड़ना चाहता था उसके नितंबों पर अपने तंबू को सहलाना चाहता था लेकिन ऐसा करने में उसे डर लग रहा था,,,, बार-बार अंकित की नजर अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड पर जा रही थी और वह ऊंचाई में थोड़ा अपनी मां से एक दो इंच बड़ा ही था इसलिए वहां ऊपर से ही अपनी मां की छातिया की तरफ देख रहा था लेकिन वह ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी,,, अगर वह एक कदम आगे बढ़ा देता तो उसे सब कुछ साफ-साफ नजर आने लगता लेकिन ऐसा करने से उसका तंबू उसकी मां की नितंबों पर एकदम से रगड़ खा जाता और उसे इस बात का डर था कि कहीं उसकी मां बुरा ना मान जाए,,,,।

जब कुछ देर तक दोनों की तरफ से किसी भी प्रकार की हरकत नहीं हुई तो सुगंधा ही गहरी सांस लेते हुए बोली,,,।

बस कर अब मैं उतार लूंगी,,,,।

ठीक है मम्मी,,,(इतना कहने के साथ ही बेमन से अंकित वापस अपनी जगह पर आकर बैठ गया उसका तो मन कर रहा था कि अपनी मम्मी से कह दे कि तुम रहने दो मेरी तुम्हें नहला देता हूं,,,,,,।

अंकित अपनी जगह पर आकर बैठ गया था और सुगंधा मन ही मां अपने बेटे पर गुस्सा कर रही थी,,, वह धीरे से अपने खुली हुई ब्रा को अपनी बाहों में से बाहर निकाली और उसे दूसरों कपड़ों के साथ रखदी,,, अंकित तिरछी नजर से अपनी मां की तर्पी देख रहा था ब्रा के उतरते ही वह समझ गया था कि उसकी मां कमर के ऊपर पूरी तरह से नंगी हो चुकी है,,, और अपने मन में यही सोच कर मस्त हो रहा था कि क्या मस्त लगती होगी उसकी मां इस समय,,, बड़ी-बड़ी खरबूजे जैसी चूचियां एकदम गोल गोल जिसे देखकर ही मुंह में पानी आ जाए,,,, अंकित की हालत खराब हो रही थी बाथरूम में खड़ी उसकी मां के बदन पर केवल पेटिकोट भर रह गई थी,,,,।

सुगंधा का दिल जोरो से धड़क रहा था उसका मन तो कर रहा था कि लगे हाथ अपनी पेटिकोट के उतार कर पूरी तरह से नंगी हो जाए लेकिन ऐसा करने में उसका बेशर्मी पन झलक सकता था क्योंकि इस समय वह पूरी तरह से होश में थी,,, बेहोशी की बात कुछ और थी,,, लेकिन आज ऐसी कोई बात नहीं थी आज वह पूरी तरह से होश में थी इसलिए ऐसा करना उचित नहीं था लेकिन फिर भी वह जिस तरह की अदाकारी दिख रही थी उसे पूरा विश्वास था कि उसके बेटे की हालत पल-पल खराब होती जा रही थी,,, सुगंधा इस बात को भी अच्छी तरह से जानती थी कि केवल उसकी देखभाल के बहाने उसका बेटा जानबूझकर बाथरूम के सामने बैठा हुआ है वह उसे कपड़े उतारते हुए देखना चाहता है उसे नंगी देखना चाहता है,,, ईसी बात का एहसास सुगंधा केतन बदन में उत्तेजना की फुहार उठा रहा था जो कि यह फुआ उसकी टांगों के बीच की पतली दरार के झरने में से बह रही थी,,,।

बाथरूम के इर्द-गिर्द का वातावरण पूरी तरह से मादकता से भरता चला जा रहा था अंकित की आंखों के सामने दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत धीरे-धीरे करके अपने बदन पर से कपड़े उतार रही थी,,, ब्लाउज ब्रा और पेटिकोट का नंबर था और यही देख देख कर अंकित पूरी तरह से मदहोश हुआ जा रहा था मस्त हुआ जा रहा था,,, लेकिन सबके बावजूद भी उसके मन में इस बात का मलाल था कि इतनी खूबसूरत औरत उसकी आंखों के सामने कपड़े उतार रही थी लेकिन वह कुछ कर नहीं पा रहा था,,,,। बस देखने के सिवा वह कुछ कर भी नहीं सकता था,,, अंकित के हालात इस कदर बिगड़ गए थे कि,,, उसे इस बात का डर लगने लगा था कि कहीं उत्तेजना की वजह से उसके लंड के नशे फट ना जाए,,,। इसलिए बार-बार पेट के ऊपर से अपने लंड को दबा दे रहा था,,,,।

बाथरूम के अंदर सुगंधा अपने पेटिकोट की डोरी खोलने लगी और अपनी मां की हरकत को देखकर अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा उसके मन में उमंग जगने लगी,,, वह अपने मन में सोचने लगा आज तो उसकी मां बिल्कुल होश में है तो बना हुआ उसकी उपस्थिति में इस तरह से अपने कपड़े कैसे उतार सकती है क्या ऐसा तो नहीं कि उसकी मां ही कुछ चाहती हो उसके मन में भी कुछ चल रहा हो जिस तरह से उसके दोस्त ने बताया था कि,, इस तरह के जीवन जीने वाली औरतें चुदवासी होती है,,, इनमें भी समय-समय पर कामाग्नि भड़कने लगती है,,, इस तरह की औरतों को भी समय-समय पर लंड की जरूरत पड़ती है,,, अपने दोस्त की कही बात याद आते ही अंकित के लंड की अकड़ और ज्यादा बढ़ने लगी,,,,,, उसके तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी,,,,,।

अंकित अपनी मां के जीवन के बारे में अच्छी तरह से जानता था वह जानता था कि बरसों से उसकी मां इस तरह की एकाकी जीवन की रही थी,,,, और इतना भी जानता था कि उसकी मां का चरित्र दूसरी गंदी औरतों की तरह बिल्कुल भी नहीं था वरना अप तक तो उसकी मां शादीशुदा जीवन व्यतीत करने लगती दूसरी शादी करके अगर ऐसा नबी होता तो अब तक न जाने कितने मर्दों के साथ संबंध बना ली होती लेकिन ऐसा भी बिल्कुल नहीं था,,,, जहां तक अंकित का ज्ञान था कुछ गंदी किताबों को देखकर और कुछ अपने दोस्तों से बटोर कर वह इतना तो समझ गया था कि उसकी मां भी चुदवासी है,,, क्योंकि इस समय उसके बदन में बुखार नहीं था वह पूरी तरह से होशो आवाज में थी तो भला एक मां अपने होशो आवाज में होने के बावजूद अपने ही बेटे के सामने और वह भी जवान लड़के के सामने अपने वस्त्र उतार कर नंगी क्यों होगी,,,, अंकित अपने मन में सोच रहा था कि कहीं उसकी मां जानबूझकर उसे अपना नंगा बदन तो नहीं दिखा रही है,,, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह खुद अपने बेटे को उत्तेजित कर रही है अपनी तरफ आकर्षित कर रही है संबंध बनाने के लिए,,,,ऐसा ख्याल उसके मन में आते ही वह पूरी तरह से रोमांचित हो उठा उसे लगने लगा कि उसकी मां उसके लिए ही यह सब सारा खेल रच रही है,,, उसे लगने लगा कि उसकी मां उसके साथ संबंध बनाना चाहती है और इसी बात की खुशी उसके चेहरे के साथ-साथ उसकी दोनों टांगों के बीच के हथियार में बड़े अच्छे से झलक रही थी जो कि इस समय पूरी तरह से लोहे के रोड की तरह एकदम कड़क हो चुका था अगर इस समय वहां मौका मिल जाने पर अपनी मां की बुर में अपना लंड डालता तो शायद पहली बार में ही वह अपनी मां की बुर का भोसड़ा बना देता इस कदर पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में डूबता चला जा रहा था,,,, लेकिन तभी उसके मन में ख्याल आया नहीं अगर ऐसा नहीं हुआ तो अगर उसकी मां सच में बीमारी की वजह से कहीं अकेले में चक्कर न आ जाए,,, इसलिए ना चाहते हुए भी उसके सामने अपने कपड़े उतार कर नहाने की तैयारी कर रही हो तो,,,, इतने वर्षों में तो उसने कभी अपनी मा में इस तरह के बदलाव नहीं देखे थे,,,।

और पहली बार ही तो मां इस तरह से बीमार हुई थी,,, बीमारी की वजह से ही वह मजबूर होकर इस तरह की हरकत कर रही है,,,, क्योंकि होशो हवास में भर ऐसी कौन सी मैन होगी जो अपनी बेटी के सामने अपने कपड़े उतार कर निर्वस्त्र होकर नंगी होकर बाथरूम में उसकी आंखों के सामने ही नहाएगी,,, नहीं नहीं मैं ही अपनी मां के बारे में कुछ गलत सोच रहा हूं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है अच्छा हुआ मैं किसी प्रकार की हरकत अपनी मां के साथ नहीं किया वरना लेने के देने पड़ जाते,,,,। अंकित अपने मन में यह सोच कर रहा की सांस ले रहा था क्योंकि वाकई में उसने अभी तक अपनी मां के साथ कोई गलत हरकत नहीं किया था जो कुछ भी किया था उसके होशो हवास में किया था और दवा खाने में तो मजबूर होकर किया था,,,।

वह यह सब सोच ही रहा था कि इसी बीच उसकी मां अपने पेटिकोट की डोरी एकदम से खोल दी और डोरी के खुलते ही उसकी कमर पर कसी हुई ,,, पेटिकोट एकदम से ढीली पड़ गई,,, और एक पल के लिए तो अंकित को लगा कि उसकी मां की पेटिकोट सड़क कर नीचे उसके कदमों में गिर जाएगी क्योंकि ऊपर वाला पेटीकोट का हिस्सा ढीला होकर उसके नितंबों के उभार पर नीचे लुढ़ककर टिक गया था और वह भी उसके नितंबो की गोलाकार उभरी हुई गांड की वजह से ही उसका पेटिकोट रुका हुआ था वरना वाकई में पेटिकोट की डोरी खुलते ही पेटिकोट उसके कदमों में जाकर गिर जाती और वह निर्वस्त्र हो जाती,,, इसलिए तो एक पल के लिए अंकित का दिल धक से करके रह गया था,,,, अंकित को ऐसा ही लग रहा था कि आज उसकी मां अपना पेटिकोट की उतार देगी लेकिन उसे इस बात कर सकता कि उसकी मां पेटिकोट के अंदर कुछ पहनी होगी कि नहीं ,,, इस बात के बारे में सोच ही रहा था कि तभी उसे याद आया कि कल ही तो वह अपने हाथों से ही अपनी मां की पेंटिं दवा खाने के बाथरूम में उतारा था,,, और अब तक उसकी मां ने अपने कपड़े बदले नहीं थे इसका मतलब पेटिकोट के अंदर उसकी मां चड्डी पहनी हुई है,,,,।

अंकित का दिल जोरो से धड़क रहा था उसे उम्मीद थी कि उसकी मां पेटीकोट भी उतार देगी और जल्द ही उसकी मां की चड्डी देखने को मिलेगी जिसे वह कल दवा खाने के बाथरूम में अपने हाथों से उतारा था और पहनाया था,,, और वह अपनी मां की चड्डी देखने के लिए व्याकुल हुआ जा रहा था जिस तरह से उसकी मां अपने बदन से एक-एक करके सारे कपड़ों को बाथरूम के कोने में उतर कर फेंक दी थी उसे ऐसा ही लग रहा था कि वह अपनी पेटीकोट भी उतार देंगी,,, और उसके सोच के मुताबिक है उसकी मां पेटिकोट के घेरे को अपनी कमर के घेरे से अलग करने लगी,,, अंकित बार-बार किताब हमेशा अपनी नजर उठा कर अपनी मां की तरफ देख ले रहा था अब वह तिरछी नजर से नहीं बल्कि अपनी नजर उठा कर देख रहा था क्योंकि उसकी मां की पीठ उसके ठीक सामने थी और उसका मुंह दीवाल की तरफ था,,,, ऐसे में उसकी मां का अंकित की तरफ एकदम से देख पाना नामुमकिन था इसलिए वह इसका फायदा उठा रहा था,,,,।

अंकित की नजर एकदम से अपनी मां के ऊपर खड़ी हुई थी लेकिन तभी उसके अरमानों पर पानी फिर गया जब उसकी मां पेटीकोट को दोनों हाथों से पकड़कर उसे नीचे ले जाने के बजाय ऊपर की तरफ ले जाने लगी और अपनी चुचियों तक लाकर उसे एकदम से रोक दी,,।,,, यह देखकर अंकित के दिल की धड़कन पढ़ने लगी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां ऊपर से पेटिकोट निकलेगी कि नीचे से नीचे से तो वह अब नहीं निकाल सकते थे क्योंकि वह पेटिकोट अपने हाथ में लेकर ऊपर की तरफ ले गई थी और चूचियों के पास आते ही उसे रोक दी थी,,,,, अंकित को कुछ-कुछ शक हो रहा था कि उसकी मां पेटीकोट को नहीं निकालेगी,,, वरना पहले प्रयास में ही वह पेटीकोट को नीचे सी सही ऊपर से ही उतार देती और उसका यह सब बिल्कुल सही निकला जब उसकी मां पेटिकोट की डोरी को चूचियों की ऊपर लाकर बांधने लगी,,, यह देखकर अंकित के अरमान पर पानी फिर गया था लेकिन इसके बावजूद भी सुकांता जानबूझकर अपनी बेटी को चूचियों के थोड़ा ऊपर की तरफ उठाई थी ताकि उसका पिछवाड़ा उसकी मदमस्त कर देने वाली गांड उसके बेटे को दिखाई दे और ऐसा ही हुआ वह जिस तरह से पेटिकोट की डोरी को बंद रही थी उसके पीछे का पेटीकोट ऊपर की तरफ उठ गया था जिसे नितंबों के नीचे की गोलाई एकदम साफ नजर आ रही थी,,, उसके बीच की गहरी दरार भी एकदम साफ दिखाई दे रही थी यह देखकर अंकित का हांथ अपने आप उसके लंड पर आ गया और वह जोर से दबा दिया,,,, भले उसकी मां पेटीकोट को पूरी तरह से नहीं निकली थी लेकिन फिर भी अपने बेटे को पूरी तरह से मदहोश कर गई थी,,,,,।

अंकित की मां पेटिकोट को बांधकर घूम गई लेकिन ना तो दीवाल की तरफ मुंह करके और ना तो अंकित की तरह वह सामने की तरफ मुंह कर ली,,,और बाथरूम में छोटा सा लकड़ी का पाटी रखा हुआ था उस पर बैठ गई,,, वह इस तरह से बैठी थी कि इतनी दोनों टांगें खोल दी थी,,,,, इस अवस्था को देखकर अंकित को इस बात का मलाल था कि उसकी मां अगर उसकी तरफ मुंह करके इस तरह से बैठती तो शायद उसके खूबसूरत बुर के या उसकी चड्डी के दर्शन हो जाते,,, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया था क्योंकि उसकी मां तिरछी बेठी हुई थी,,,। लेकिन फिर भी इस अवस्था में भी अंकित को उसकी मां की मोटी मोटी जांघें उसकी नंगी टांग एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, इतना ही अंकित के लिए काफी था वह पूरी तरह से उत्तेजना के परम शिखर पर पहुंच चुका था क्योंकि औरतों की चिकनी मोटी मोटी जांघें उनकी नंगी टांगें भी मर्दों के लिए उत्तेजना का प्रमुख कारण होती हैं,,,।

अंकित ने पहले से ही बाथरूम में पानी से भरा हुआ टब रख दिया था जिसमें से सुगंधा मग भरकर पानी को अपने ऊपर डालने लगी,,, इस स्थिति में ठंडा पानी सुगंधा को बेहद सुकून दे रहा था लेकिन अंकित की हालत खराब कर दे रहा था ,,,,, अंकित अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां लगभग अर्धनग्न अवस्था में ही थी और ऐसे हालात में एक खूबसूरत औरत को नहाते हुए देखना कितना उत्तेजनात्मक होता है और वही अंकित को भी हो रहा था अपनी मां की मादकता भरी जवानी में वह पूरी तरह से अपने आप को डुबोते चला जा रहा था,,, धीरे-धीरे सुगंधा अपने ऊपर पानी डाल डाल कर अपने पूरे बदन को भिगो डाली और उसके बाद साबुन लगाना शुरु कर दी,,,।

अंकित किताब खोलकर बस किताब के पन्ने को देख रहा था उन्हें पढ़ने की तस्दी बिल्कुल भी नहीं ले रहा था,,, और वैसे भी जब आंखों के सामने जवानी से भरी हुई किताब खुली पड़ी हो तो भला,, दुनिया का कौन सा मर्द होगा जो स्कूल की किताब में ध्यान लगाएगा,,,, अंकित बार-बार अपनी लंड पर अपना हाथ रख कर उसे ज़ोर से दबा दे रहा था,,,, धीरे-धीरे सुगंधा आपने पूरा बदन पर साबुन लगाने लगी साबुन के झाग में उसका गोरा बदन और भी ज्यादा खूबसूरत लगने लगा,,,, सुगंधा भी इस स्थिति में बेहद उत्तेजना महसूस कर रही थी क्योंकि वह अपनी बेटे की आंखों के सामने लगभग लगभग निर्वस्त्रावस्था में ही नहा रही थी क्योंकि उसके बदन का आधे से भी ज्यादा भाग उसके बेटे की आंखों के सामने उजागर था उसकी मोती-मोती जंग उसकी नंगी चिकनी टांग यहां तक की उसकी पेटीकोट भी एकदम कमर तक थी और जांघ की शुरुआत से ही उसकी पूरी टांग दिखाई दे रही थी,,,, यहां तक की उसकी चड्डी भी नजर आने लगी थी सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि उसका बेटा उसके अंगों के साथ-साथ उसकी चड्डी भी देख रहा होगा जिसे वह कल अपने हाथों से उसके बदन से उतारा था,,,,,, अनुभव से भारी होने के बावजूद भी सुगंधा चड्डी के मामले में निश्चित तौर पर नहीं कह सकती थी की औरतों की चड्डी देखकर मर्दों की उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच जाती है,,,, क्योंकि विवाहित जीवन की शुरुआत से ही वह अपने पति के मुंह से सुनती आ रही थी चड्डी ना पहना करें क्योंकि रात को उतारते समय उसे दिक्कत होती है,,, इसलिए सुगंधा को भी ऐसा ही लगता था कि सारे मर्द चड्डी के मामले में एक जैसी सोच रखते होंगे,,,।।

लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था एक उसका पति ही दूसरे मर्दों से अलग था जबकि सारे मर्द औरतों की चड्डी के मामले में जैसे ही होते हैं औरतों की चड्डी देखकर उनकी उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच जाती है औरतों के बदन से चड्डी उतारने में मर्दों को इतना आनंद आता है कि वह बार-बार इस क्रिया को दोहराते रहते हैं,,, यहां तक की लंड की सुसुप्तावस्था मैं जैसे ही औरतों की चड्डी के उतारने का कार्य करते हैं वैसे ही उनका लंड एकदम से टनटना कर खड़ा हो जाता है,,,, और इसीलिए इस समय अंकित की भी उत्तेजना अद्भुत तरीके से बढ़ती चली जा रही थी क्योंकि उसकी नजर में भी हुई उसकी मां की चड्डी दिखाई देने लगी थी वह जिस तरह से बैठी थी कमर और जानू के बीच की जोड़ होती है उसमें एक पतली सी हल्की सी दरार मांसलता लिए पेट से दोनों टांगों के बीच की तरफ जा रही थी जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था लेकिन वह कुछ भी कर सकते की स्थिति में नहीं था बस बार-बार अपनी मां को देखकर अपने लंड को दबा दे रहा था,,,,,।

वह अभी यह सब सोच ही रहा था कि,,, तभी उसकी मां बोली,,,,।

बेटा जरा मुझे साबुन लगा देना तो पीछे मेरा हाथ नहीं पहुंच रहा है,,,,।(सुगंधा अपने बदन के साथ-साथ अपने चेहरे पर भी साबुन लगा लेती जिसकी वजह से झाग उसकी आंखों तक पहुंच रही थी और अपनी आंखों को बंद की हुई थी वह जानबूझकर ऐसा कर रही थी,,,,, अंकित को तो अपने कानों पर भरोसा ही नहीं हुआ उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां वाकई में उसे साबुन लगाने के लिए बोली है या उसके कान बज रहे हैं इसलिए वह कुछ देर तक अपनी जगह पर ही बैठा रह गया और जब अंकित की तरफ से कोई हरकत नहीं हुई तो सुगंध फिर से बोली,,,,)

अरे सुन रहा है कि नहीं,,,,, मेरा हाथ पीछे नहीं पहुंच रहा है जरा साबुन लगा देना तो,,,,,।
(इस बार उसे यकीन हो गया कि उसकी मां वाकई में से साबुन लगाने के लिए बोल रही है उसकी मां के मुंह से कह गए एक-एक शब्द उसके कानों में मिश्री खोल रहे थे वह तुरंत किताब को एक तरफ रखकर कुर्सी पर से उठकर खड़ा हो गया और तुरंत अपनी मां के पास पहुंच गया उसके हाथ में साबुन था जो कि वह अंकित की तरफ हाथ करके उसे दे रही थी हालांकि वह उसे देख नहीं रही थी क्योंकि उसकी आंखों में साबुन लगा रहा था इसलिए अपनी आंखों को बंद की हुई थी जो कि यह औपचारिकता नहीं थी वह जानबूझकर ऐसी कर रही थी वह देखना चाहती थी महसूस करना चाहती थी कि उसका बेटा उसके साथ क्या-क्या हरकत करता है अंकित तुरंत अपनी मां के हाथ में से साबुन ले लिया और साबुन लगाने से पहले बोला,,,,)

कहां लगाना है मम्मी पीठ में,,,,

हां पीछे मेरा हाथ नहीं पहुंच रहा है गरदन से लेकर के नीचे तक साबुन लगा दे,,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा लकड़ी के पाटी पर ही दीवार की तरफ मुंह करके घूम गई क्योंकि जिस तरह से वह बैठी थी उसके पीछे खड़े होकर साबुन लगाने में दिक्कत आ सकती थी क्योंकि चौड़ाई बाथरूम की कम थी,,,,,,,, और जैसे ही वह दीवार की तरफ मुंह करके घूमी अंकित की नजर सीधे उसकी मां के नितंबों पर गई जो की पाटी पर एकदम दबी हुई थी एकदम जवानी से लदी हुई अपने विस्तार से बाहर निकलने के लिए तड़प रही थी,,,,, पेटिकोट पानी में भीग कर ऊपर हो जाने की वजह से उसके नीचे का अंग एकदम साफ दिखाई दे रहा था हालांकि चड्डी पहनी होने की वजह से ज्यादा तो नहीं लेकिन फिर भी नितम्बो के ऊपरी लकीर एकदम साफ दिखाई दे रही थी,, अंकित के लिए तो इतना भी बहुत था,,,

अब ऐसा लग रहा था कि अपनी मां को नहलाने की जिम्मेदारी अंकित ने अपने हाथों में ले लिया था अपने हाथ में साबुन लेकर वह अपनी मां की गर्दन पर साबुन लगाना शुरू कर दिया लेकिन पानी कम होने की वजह से चिकनाहट कम थी और वह मग जो कि उसके पास में ही पड़ा था और वहां पानी से भरा हुआ था उसे लेकर एक बार फिर से अपनी मां के गर्दन पर डालकर उसकी पीठ तक को भिगोने की कोशिश करने लगा और फिर साबुन लगाने लगा,,,,, यह उसका पहला अवसर था जब वह अपनी मां को अपने हाथों से नहला रहा था,,, इस बहाने उसे अपनी मां का खूबसूरत बदन स्पर्श करने का मौका मिल रहा था और वहां पर है तो भेजने का अनुभव कर रहा था उसके पेंट में अच्छा खासा तंबू बना हुआ था एकदम भाले की नौक की तरह,,,।

धीरे-धीरे अंकित अद्भुत सुख भोग रहा था औरत की दोनों टांगों के बीच उसके कोमल अंक में अपना कड़क अंग डालकर उसके साथ संभोग करना ही औरतों के साथ सुख भोगने नहीं होता उसके साथ अनेक क्रिया करके भी उसके साथ सुख भोगने का सौभाग्य प्राप्त किया जा सकता है ऐसा अंकित अपने मन में सोच रहा था क्योंकि इस समय उसे चुदाई से भी अधिक अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी,,, अंकित अपनी मां की पीठ पर साबुन लगाते लगाते हैं नीचे की तरफ बढ़ रहा था और देखते ही देखते हो एकदम कमर तक उसके साबुन लगाना शुरू कर दिया और वह अपने मन में सोच रहा था क्या करें उसकी मां खड़ी होती तो कितना मजा आता है वैसी बहाने अपनी मां की चड्डी में हाथ डालकर उसे साबुन लगाता,,, लेकिन फिर भी उसे बहुत मजा आ रहा था,,,,, लेकिन साबुन लगाने के दौरान वहां अपनी मां की छतिया की तरफ देख रहा था जो कि उसकी आधी चूची पर पेटिकोट की डोरी बंधी हुई थी,,, और आधी एकदम साफ दिखाई दे रही थी जिसे देखकर अंकित को पपाया का फल याद आ गया जो कि इसी आकार में होता है,,,,, अपनी मां की चूची देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था और अपने मन में सोच रहा था कि काश चूचियों पर साबुन लगाने का मौका मिल जाता तो कितना मजा आता है,,,,,, यही सब सोचते हुए वह गर्दन पर साबुन लगाने लगा लेकिन तब तक साबुन का झाग सूख चुका था इसलिए वह फिर से अपनी मां के बदन पर पानी डालने की सोचने लगा,,, और पानी का टब ठीक उसकी मां के सामने रखा हुआ था,,,, और वह हाथ में मग लेकर आगे की तरफ झुककर तब में से पानी लेने लगा लेकिन उसकी हरकत की वजह से उसके पेट में बना तंबू सीधे-सीधे उसकी मां की गर्दन हो के ऊपर से उसकी मां की गाल पर रगड़ खाने लगा और यह रगड़ महसूस करते ही सुगंधा की तो हालत खराब हो गई सुगंधा की आंखें एकदम से खुल गई वह इतना तो समझ गई थी कि उसके गाल पर और गर्दन पर रगड़ खाने वाली चीज और कुछ नहीं उसके बेटे का लंड है,,,।

यह एहसास सुगंधा को पूरी तरह से मदहोश कर गया,,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें उसका बेटा आगे की तरफ झुक कर प्लास्टिक के टब में से पानी लेने की कोशिश कर रहा था,,,, और लगभग वह पानी के पास पहुंच भी गया था,,,, और अंकित को इसका अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि पानी लेते समय उसके पेंट में बना तंबू उसकी मां की गर्दन के साथ-साथ उसकी गालों पर भी रगड़ खाएगा लेकिन जैसे ही उसे इस बात का एहसास हुआ पूरी तरह से मस्त हो गया,,,, उसे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे वहां अपने लंड को अपनी मां के मुंह में डालने के लिए आगे बढ़ रहा है,,,,, सुगंधा की खुद की हालत खराब होती जा रही थी पल भर के लिए उसे लगा कि अपना हाथ अपने बेटे के लंड पर रखकर उसे ज़ोर से दबा दे और कह दे कि मुझे तुझसे प्यार चाहिए मुझे जी भर कर प्यार कर मुझे प्यार कर,,, मुझे प्यार करो बेटा,,,आहहहहहहहह,,,,, ऐसा सोचकर सुगंधा अंदर ही अंदर तड़प रही थी बरसों की प्यास का जुगाड़ उसके गालों पर रगड़ खा रहा था लेकिन वह उसे अपनी प्यास बुझाने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं थी क्योंकि वहां उसका सगा बेटा था अगर इस वक्त ऐसे माहौल में अंकित की जगह कोई और होता है तो शायद सुगंधा अपना काबू खो बैठती,,, लेकिन अपने बेटे के साथ ऐसा करने में उसे डर लग रहा था घबराहट हो रही थी,,,,।

ज्यादा देर तक अंकित इस अवस्था में नहीं रह सकता था इसलिए पानी लेकर वह फिर से अपनी स्थिति में आ गया और फिर अपनी मां के गर्दन पर पानी डालने लगा और उसे पर साबुन लगाने लगा साबुन के छाव की वजह से उसके हाथ से साबुन एकदम से फिसल गया और सीधे जाकर उसकी मां की चूचियों के बीच जहां पर उसकी मां ने पेटिकोट की डोरी बांधी थी उसी में जाकर फंस गया,,,, यह देखकर अंकित के दिल की धड़कन बढ़ने लगी और सुगंधा के भी बदन में मदहोशी छाने लगी,,, क्योंकि उसके मन में एहसास होने लगा कि उसकी चूचियों के बीच से साबुन उसका बेटा अपने हाथों से निकालेगा,,,, इसलिए वह तुरंत दोनों हाथों से अपनी आंखों को मारने लगी यह जताने के लिए की साबुन का झाग उसकी आंखों में लग रहा है,,,, अंकित को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें तभी उसकी मां अपनी आंखों को मलते हुए बोली,,,)

अरे अंकित क्या किया जल्दी से साबुन लगाकर पानी डाल मेरी आंखों में जलन हो रहा है,,,,।

लेकिन मम्मी साबुन तो तुम्हारे,,,,,,(इतना कहकर आगे बोलने की उसकी हिम्मत नहीं हुई तो सुगंधा ही एकदम से बोली,,,)

जल्दी से साबुन ले लै मुझे बहुत जलन हो रही है,,,,।

ठीक हैमम्मी,,,,(अपनी मां की तरफ से इजाजत मिलते ही अंकित अपना हाथ आगे बढ़कर अपनी मां की चूचियों के बीच लेकर गया जहां पर पेटिकोट की डोरी बंधी हुई थी और साबुन लेने के चक्कर में उसके हाथ से साबुन पर थोड़ा सा दबाव पड़ा तो साबुन और नीचे से रखें उसकी दोनों चूचियों के एकदम बीचों बीच आ गया,,,,,, यह एहसास करके सुगंधा के तन बदन में आग लगने लगी उसे बहुत मजा आ रहा था आनंद आ रहा था वह फिर भी सहज होते हुए बोली ,)

अरे क्या कर रहा है अंकित तुझसे साबुन नहीं पकड़ा जा रहा है,,,

मम्मी साबुन छटक गया,,,,

अब जल्दी से साबुन ले मुझे बहुत जलन हो रही है,,,,,।

(फिर से प्रयास करते हुए अंकित धीरे से अपने हाथ को अपनी मां की चूचियों की तरफ लेकर और अपनी उंगली से साबुन को दोनों चूचियों के बीच से निकलने की कोशिश करने लगा लेकिन फिर भी फिसलते हुए साबुन अंदर की तरफ जाने लगा,,,,,, वजह से जैसे चुचियों के बीच से अंदर की तरफ फिसल रहा था वैसे-वैसे सुगंधा के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी और अंकित भी मदहोश होता चला जा रहा था,,,,, और अंकित धीरे-धीरे अपनी उंगली के साथ-साथ अपना आदि कलाई को अपनी मां की चूचियों के बीच डाल दिया था लेकिन साबुन फिर भी उसके हाथ में नहीं आया तो साबुन एकदम से फिसल कर उसकी दोनों टांगों के बीच उसकी पेंटिं के ऊपर जा गिरा,,,,, यह देखकर धड़कते दिल के साथ अंकित बोला,,,)

मम्मी यह तो नीचे फिसल गया,,,,।

तू सच में बुद्धू है अंकित एक साबुन तो उसे संभाल नहीं जाता जल्दी से निकाल साबुन मुझे रहा नहीं जा रहा है आंखों में जलन हो रही है,,,,।

(इतना सुनते ही अंकित इस बार हिम्मत दिखा कर अपनी मां की पेटिकोट के अंदर उसकी चूचियों के बीच एकदम से हाथ डाल दिया और उसे साबुन को टटोलने लगा,,,, साबुन को टटोलने के चक्कर में अंकित का हाथ उसकी मां के पेट के नीचे की तरफ आने लगा और एकदम से पूरा हाथ पेटिकोट की डोरी के अंदर डालते हुए वह एकदम जमीन पर अपने हाथ को स्पर्श करने लगा तभी उसे एहसास हुआ कि उसकी मां की दोनों टांगों के बीच साबुन चिपका हुआ है अब उसके दिल की धड़कन एकदम से बढ़ने लगी और सुगंध की भी हालत खराब होने लगी क्योंकि सुगंध को मालूम था कि उसका गिरा हुआ साबुन उसकी पेंटिं पर चिपका हुआ है,,, अब वह देखना चाह रही थी किसका बेटा क्या करता है हालांकि देखते ही देखते उसके बेटे ने उसकी दोनों चूचियों के बीच से होते हुए अपने हाथ को उसकी पेंटि के इर्द-गिर्द पहुंचा दिया था,,, जिसकी वजह से सुगंधा अंदर ही अंदर एकदम खुश हो रही थी,,,,,।

अंकित समझ गया था कि साबुन उसकी मां की पेंटी के ऊपर ही है,,, अंकित करती जोरों से ढक रहा था और यही मौका था उसे अपनी मां की पेटी पर हाथ रखने का अपनी मां की बुर को अपनी हथेली में पहुंचने का और इसीलिए वह साबुन पकड़ने का बहाना करके एकदम से अपनी हथेली को अपनी मां की पेंटिंग पर रखकर साबुन पकड़ने के बहाने अपनी मां की बुर को दबोच दिया ऐसा करने में उसे अद्भुत उत्तेजना और मदहोशी का एहसास होने लगा और यही हरकत सुगंधा के तन बदन में मदहोशी का रस घोलने लगी,,,, जिस तरह से उसके बेटे ने साबुन पकड़ने के बहाने उसकी बुर को अपनी हथेली में दबोचा था सुगंधा एकदम से चौंक गई थी और एकदम से मदहोश हो गई थी,,, और यह एहसास एकदम पल भर के लिए था ऐसा करते ही अंकित ने तुरंत साबुन पड़कर उसे वापस से अपनी मां की पेटीकोट से ही बाहर निकाल दिया और जल्दी-जल्दी साबुन लगाने लगा था कि इस बारे में उसकी मां उससे कोई शिकायत ना कर पाए,,,,,।

शिकायत करने की बात तो दूर उसकी मां अपने मन में यही सोच रही थी कि कुछ देर तक और उसका बेटा अपनी हथेली में उसकी बुर को दबोच कर रखा है तो शायद उसका पानी निकल जाता उसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो जाती,,,, बुर को दबोचने की शिकायत नहीं बल्कि वह तो अपने बेटे से इस बात की शिकायत करने वाली थी कि ज्यादा देर तक वह क्यों दबोच कर नहीं रखा,,,, अंकित जल्दी-जल्दी अपनी मां के बदन पर पानी डालने लगा था,,, आया था तो अंकित अपनी मां के बदन पर केवल साबुन लगाने के लिए लेकिन अब वह उसे नहला रहा था और सुगंध भी अपने बेटे के हाथों से नहाने में आनंद लूट रही थी उसे बहुत मजा आ रहा था उसकी पेटिकोट आगे से पूरी तरह से भेज चुकी थी जिसकी वजह से गिरी बेटी को उसकी चूचियों से चिपक गई थी और उसकी निप्पल कैडबरी चॉकलेट की तरह एकदम तनकर पेटीकोट से बाहर झांक रही थी,,,,।

सुगंधा नहा चुकी थी और अंकित बाथरूम से बाहर आकर खड़ा हो गया था सुगंध उठकर खड़ी हुई और अपनी पेटिकोट की डोरी को खोलकर पेटीकोट को दिल्ली करने लगी और एक हाथ आगे की तरफ डालकर अपनी चड्डी को बाहर निकलने लगी लेकिन जल्दी पानी में पूरी तरह से भी होने की वजह से उसकी कमर से नीचे की तरफ सरक नहीं पा रही थी,,, यह देखकर अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा उसे उम्मीद नजर आने लगी और वह अपनी मां से बोला,,,।

मैं निकाल दुं,,,,,।

(इतना सुनकर सुगंधा अपने बेटे की तरफ मुस्कुराते हुए देखने लगी और बोली,,,)

बिल्कुल नहीं,,,, आज मैं होश में हूं,,,,,(और इतना कहने के साथ ही सुगंध अपने बेटे की आंखों के सामने ही अपनी चड्डी को उतारने लगी और जैसे ही चड्डी उसके घुटनों के नीचे तक आई उसे पर नजर पड़ते अंकित के लंड की अकड़ बढ़ने लगी,,,, वह मस्त हो जा रहा था उसकी मां अपने पैरों के सहारे से घुटनों के नीचे से अपने चड्डी को अपने पैरों से बाहर कर रही थी यह नजारा बेहद देखने लायक था और अगले ही पल हुआ अपनी चड्डी को अपने बदन से दूर कर चुकी थी उसके बदन पर केवल उसका गिला पेटिकोट था जो उसके बदन से एकदम चिपका हुआ था और पेटिकोट की चुपके होने की वजह से उसकी चुचियों का आकार के साथ-साथ जांघों के ऊपरी हिस्से का त्रिकोण वाला जाकर एकदम साफ नजर आ रहा था,,, और उसकी बुर वाला हिस्सा कचोरी की तरह फुला हुआ नजर आ रहा था यह सब नजारा पूरी तरह से मादकता से भरा हुआ था इस नजारे को देखने पर से ही किसी भी मर्द का पानी छुट जाए लेकिन न जाने कैसे अंकित अपने आप पर काबू रखा हुआ था,,,,।

अब बारी थी पेटिकोट उतारते की अंकित अपने मन में सोच रहा था कि उसकी आंखों के सामने उसकी मां अगर पेटीकोट भी उतार देती तो कितना मजा आता है लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था हालांकि सुगंधा भी यही चाहती थी लेकिन वह अभी इतना नहीं खुली थी कि अपने बेटे के सामने सारी हदें पार कर देती,,, क्योंकि यह सब तो अंकित की जानकारी में हो रहा था अगर उसकी जानकारी में ना होता केवल सुगंध ही जानती तो शायद वह अपने बेटे के सामने नंगी होने में बिल्कुल भी देर ना करती क्योंकि ऐसा हुआ पहले भी कर चुकी थी लेकिन इस समय वह अपने बेटे की निगरानी में थी कुछ भी छुपा हुआ नहीं था उसका इस तरह से अपना पेटिकोट उतार कर नंगी हो जाना उसे भी दूसरी औरतों की श्रेणी में ला सकता था,,,,।

जरा टावल ला देना मैं भूल गई,,,,।

अभी लाया मम्मी,,,,(इतना कहने के साथ ही अंकित अपनी मां के कमरे की तरफ जाने लगा और सुगंध उसे जाते हुए देखने लगी हालांकि स्पीच वह अपने बेटे के पेट में बने तंबू को भी बड़े अच्छे से देख रही थी और मन ही मन प्रसन्न हो रही थी क्योंकि वह जानती थी कि उसका लैंड किस लिए खाना है एक मर्द का लैंड किस वजह से खड़ा होता है यह वह अच्छी तरह से जानती थी वह समझ रही थी कि इस समय उसका बेटा उसमें एक मन नहीं बल्कि एक औरत के दर्शन कर रहा है इसलिए उत्तेजित हुआ जा रहा हैं और यही तो वह चाहती थी,,,,।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *