हैलो दोस्तो,,एक बार फिर मैं आप लोगों के सामने एक नई कहानी लेकर आया हूं,,,,,
1सुगन्धा
2अंकीत
3 तृप्ति,,
4सुरज( अंकीत का दोस्त)
5रोनक(बिगड़ेल लड़का)
6 नुपुर (सुगंधा की सहअध्यापिका)
7 सुषमा ( सुगंधा की सहेली और उसकी पड़ोसन)
8 सुमन,,,( सुषमा की बेटी)
देख अंकित इस आखिरी ओवर में हमें जीतने के लिए 12 रन चाहिए,,,, और स्ट्राइक तेरी है इसलिए एक रन लेकर मुझे स्ट्राइक दे देना मैं जानता हूं कि तू नहीं मार पाएगा,,,,
ठीक है सूरज तू चिंता मत कर,,,,,।
(इतना कहने के साथ ही अंकित बल्लेबाजी करने के लिए,,,, तैयार हो गया,,,, यह कोई राष्ट्रीय या किसी उच्च स्तर पर खेले जाने वाली क्रिकेट नहीं थी बल्कि गली मोहल्ले की ही क्रिकेट थी जिसमें आखिरी ओवर में 12 रन चाहिए थे और स्ट्राइक पर अंकित था,,,,,, सूरज इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि अंकित बल्लेबाजी में कम लेकिन गेंदबाजी में अव्वल था वह जानता था कि अंकित से इतने रन लगने वाले नहीं है इसलिए वह उसे रन लेने के लिए बोल रहा था ताकि वह स्ट्राइक पर जा सके और फिर बल्लेबाजी करके अपनी टीम को मैच जीता सके वैसे भी वह टीम का कप्तान था,,,,, और 10 10 रुपए की मैच खेली जा रही थी,,,, और यह मैच मोहल्ले के पीछे खाली पड़ी मैदान में खेली जा रही थी,,,,,, जहां पर एक बड़ा सा तालाब भी था,,,,,,,,, मोहल्ले की ही दो टीम खेल रही थी और कुछ लड़के बैठकर मैच देख रहे थे तभी बॉलर ने गेंद फेंक और बड़ी चालाकी से अंकित ने बैट से कट लगाकर एक रन दौड़ गया इतने से ही अंकित बहुत खुश हो गया था क्योंकि उसे भी उम्मीद ही नहीं थी कि उसकी बेट पर गेंद बराबर आ पाएगी,,,,, लेकिन अंकित ने कर दिखाया था इसलिए टीम भी बहुत खुश थी सूरज के स्ट्राइक पर आते ही,,,, टीम के लोग सूरज सूरज कहकर उसका हौसला बढ़ाने लगे,,,,, सूरज को पूरा विश्वास था कि वह,,,, गेंद को बाउंड्री लाइन के पास पहुंचा देगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाया लगातार दोगे खाली निकल गई जिससे सूरज की टीम में तनाव बढ़ने लगा,,,,, और अंकित मन में यही सोचने लगा कि अच्छा हुआ कि वह सामने स्ट्राइक पर नहीं है वरना बदनामी हो जाती,,,,, पहली बॉल में सिंगल और बाकी के दो गेट खाली निकालने के बाद सामने की टीम पूरी तरह से जोश में आ गई थी और उनका कप्तान जोर-जोर से ताली बजाते हुए अपनी टीम का जोश बढा रहा था,,,, सूरज का दिमाग बड़े जोरों से घूमने लगा था एक तो उसकी टीम बाहर ने वाली थी और साथ में ₹10 भी जाने वाला था जिसकी उसे बहुत चिंता हो रही थी यह ₹10 भी टीम के सभी सदस्य से चंदा लेकर इकट्ठा किया गया था,,,,
कभी गेंदबाज ने अगली बार फेंका और सूरज ने पूरी ताकत के साथ बाला घुमाया लेकिन बोल बाउंड्री के बाहर नहीं जा पाई और फिर एक सिंगल लेकर सूरज दूसरी ओर पर पहुंच गया और अंकित फिर से बल्लेबाजी करने के लिए आ गया अब दोगेंदों में 10 रन चाहिए था,,,, लेकिन अंकित के लिए तो यह एकदम नामुमकिन था वह जानता था कि आप उसे लगने वाला नहीं है और बाकी की टीम भी समझ गई थी कि वह लोग हार चुके हैं सामने तो जश्न की तैयारी हो चुकी थी सभी लोग जोश में आ चुके थे और लगभग लगभग जीत की तैयारी में जश्न मनाना भी शुरू कर दिए थे,,,,,,
अंकित के माथे पर पसीने की बूंदे उपस थी,,,, सूरज जोकी टीम का कप्तान था वह समझ गया था कि अब वह हार चुका है क्योंकि अगर वह एक रन लेकर सामने पहुंच भी जाता है तो भी एक बॉल में 9 रन किसी भी कीमत में लगने वाले नहीं थे इसलिए वह एकदम उदास हो चुका था,,,,,, तभी सामने की टीम का गेंदबाज पांचवी बोल पूरी ताकत के साथ फेंका और अंकित का बदला घुमा अंकित का नसीब बहुत तेज था इस बार उसके बल्ले पर गेंद बराबर बैठ गई थी और अंकित पूरी ताकत के साथ बाला घुमाया था और इसी के साथ बल्ले के साथ ही गेंद हवा में लहराता हुआ बाउंड्री के पार चला गया था,,,,, टीम के साथ-साथ विरोधी दल भी इस प्रहार को देखकर चौंक गया था क्योंकि अंकित ने छक्का लगा दिया था जो कि उसके बस की बात बिल्कुल भी नहीं थी गेंदबाजी में वह कई कमाल कर दिखाया था लेकिन बल्लेबाजी में हुआ एकदम जीरो था लेकिन आज उसके बदले से छक्का निकल गया था जिसे देखकर सब लोग हैरान हो गए थे खुद अंकित भी चौंक गया था,,,,। उसके चेहरे पर तो आश्चर्य और खुशी दोनों के भाव नजर आ रहे थे,,,,, और यही हाल उसकी टीम का भी था सबके मुंह खुला को खुला रह गए थे अब एक बॉल में केवल चार रन चाहिए थे लेकिन हमेशा किस्मत साथ नहीं देता इस बात को भी सब जानते थे इसलिए ज्यादा खुश तो नहीं हुई लेकिन फिर भी अंकित का जोश बढ़ाते हुए जोर-जोर से उसका नाम पुकारने लगे,,,,, गेंदबाज ओवर की अंतिम बोल लेकर आगे बढ़ा और बड़ी तेजी से उसे अपने हाथ की कलाई मोड कर अंकित की तरफ फेंकते हुए आगे बढ़ा कि तभी एक बार फिर से अंकित ने कर से बाला घुमाया और फिर हवा में गेंद जाकर बाउंड्री के बाहर गिरा और यह दूसरा छक्का था और इसके साथ ही अंकित की टीम विजय घोषित कर दी गई थी अंकित के लगातार दो छक्के मारने पर उसकी टीम जीत चुकी थी जिसका अंदाजा ना तो अंकित की टीम को था ना अंकित को था और ना ही विरोधी टीम को सब लोग आश्चर्यचकित हो गए थे,,, सूरज तो दौड़ता हुआ गया और अंकित को उठा लिया था और सभी टीम जोर-जोर से अंकित का नाम लेने लग गए थे,,,,
जहां एक तरफ खुशी का माहौल था वहीं दूसरी तरफ विरोधी टीम में मायूसी निराशा छा चुकी थी उनकी टीम का कप्तान बॉलर को गंदी-गंदी गालियां देना शुरू कर दिया था क्योंकि वह लोग लगभग लगभग इस मैच को जीत चुके थे लेकिन अंकित के चमत्कार ने उनके हाथ में आई हुई बाजी को छीन ली दिया था जिसमें बॉलर की गलती बिल्कुल भी नहीं थी क्योंकि अंकित के हाथों से उसके बदले से लगातार दो चक्का लग जाना किसी चमत्कार से कम नहीं था अपने कप्तान से गाली खाने के बाद गेंदबाज पूरी तरह से क्रोधित हो चुका था और वह गुस्से में आकर अंकित को बोला,,,,।
मादरचोद,,,,।
देख रौनक खेल में जीत हार तो होती रहती है लेकिन तू इस तरह से गाली देगा तो बिल्कुल भी नहीं चलेगा,,,
दूंगा हजार बार दूंगा,,,,,।
देख रोनक अभी भी तुझे समझा रहा हूं,,,,, बदतमीजी मत कर,,,,
तेरी मां की बुर में लंड,,,,,।
(रौनक के मुंह से अपनी मां के लिए इतनी गंदी बातें सुनते ही अंकित एकदम क्रोध से भर गया और वह उसको करने के लिए आगे बढ़ा ही था कि उसके दोस्तों ने अंकित को रोक लिया और उसे समझाने की कोशिश करने लगे और रौनक को भी समझने की कोशिश करने लगे लेकिन रौनक अपनी गेंदबाजी में अपनी ओवर में लगे लगातार दो छकको की वजह से पूरी तरह से,,, बौखला गया था,,,,)
देख रौनक इस तरह से गाली मत दे मैं इस तरह के शब्दों का प्रयोग बिल्कुल भी नहीं करता मैं आज तक किसी को गाली नहीं दिया हूं इसलिए मैं नहीं चाहता कि मुझे भी कोई गाली दे,,,,
भाग भोंसड़ी के तेरे में हिम्मत कहां है गाली देने की वैसे भी तेरी मां कितनी मस्त है बड़ी-बड़ी गांड लेकर जब सड़क पर चलती है ना तो मेरा तो खड़ा हो जाता है,,,,(उसे कुछ लोग पकड़े हुए थे उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन फिर भी वह मन नहीं रहा था वह अपना अपमान सहन नहीं कर पा रहा था इसलिए अंकित को गाली देकर अपने मन की भड़ास निकाल रहा था और अंकित अपनी मां के बारे में इतनी गंदी-गंदी इतनी गंदे शब्दों का प्रयोग सुनकर एकदम से क्रोधित हो गया था) तेरी मां कितनी गोरी है उसकी बुर भी कितनी मस्त होगी फुली हुई एकदम कचोरी की तरह,,,,।
(अब अंकित से सहन कर पाना मुश्किल हुआ जा रहा था और वह सबको धोखा देकर आगे बढ़ा और रौनक का गिरेबान पड़कर उसके पेट में दो-चार घुसा जमा दिया और वह एकदम से दर्द से दिल मिला उठा एक बार फिर से अंकित को सभी लोग पकड़ कर दूर करने लगे और जैसे तैसे करके दोनों को अलग कर दीए,,,, रौनक अपने घर की तरफ चला गया और जीत की खुशी में सूरज अंकित और बाकी टीम के सदस्य को लेकर एक चाय की दुकान पर पहुंच गया और अंकित को अपने पास में बैठाता हुआ वह बोला,,,,)
जाने दे अंकित उसके मुंह लगने से कोई फायदा नहीं है कीचड़ में अगर पत्थर मारोगे तो कीचड़ अपने ऊपर ही आकर गिरेगा उसे कोई फर्क नहीं पड़ता उसे कोई गाली दे मारे पीटे वह तो एक नंबर का हारामी है,,,,
लेकिन यार देखा नहीं कितनी गंदी गंदी गाली दे रहा था,,,, मम्मी के बारे में,,,,,
चल जाने दे यार तूने उसको सबक सिखा दिया ना हिसाब बराबर हो गया यह सब दिल पर नहीं लेना चाहिए,,,, चल चाय पी,,,,,,(और फिर इतना कहने के साथ ही सभी टीम के सदस्य के लिए चाय आ गई और बोला वहीं बैठकर चाय पीने लगे,, चाय की दुकान पर रेडियो पर गाना बज रहा था धूप में निकला ना करो रूप की रानी कहानी गोरा रंग काला ना पड़ जाए, तभी सामने के सड़क पर एक खूबसूरत औरत अपने हाथ में सब्जी का थैला लिए अपने घर की तरफ जा रही थी उसे औरत को देखते ही सूरज के साथ-साथ उसके दोस्त लोग बोले,,,)
हाय हाय क्या मस्त ,,, चिकनी माल है यार,,,,
तू सच कह रहा है यार साड़ी में इसकी गांड और भी ज्यादा कसी हुई लग रही है,,,,,
कसम से साड़ी कमर तक उठा दे तो मजा आ जाए इसकी गांड देखने में,,,,
अरे पागल अगर अंदर चड्डी पहनी होगी तो गांड कैसे देख पाएगा,,,,
भले यार इसकी चड्डी देखने में भी बहुत मजा आएगा गोरे-गोरे बदन पर पता तो चले किस रंग की चड्डी पहनी है,,,,
तुम लोगों को गांड और चड्डी की पड़ी है जरा यह तो सोचो वह जब खुद इतनी गोरी है तो उसकी बुर कितनी गोरी होगी मेरा तो सोच कर ही खड़ा हो जाता है,,,,
कसम से यार वह किस्मत वाला होगा जो इसकी बुर में लंड डालकर चोदता होगा उसकी तो किस्मत खुल गई होगी,,,,
अरे यार मैं जानता हूं ,,,, भाभी को अपने नुक्कड़ के आगे तीसरी गली है ना उसी में तो रहती है मरियल सा आदमी है इसका मुझे तो नहीं लगता कि अपने आदमी से खुश हो पाती हो कि देखा नहीं रहा है इसकी शरीर इसके तो कोई मोटा सांड चाहिए जो अपना लंड इसकी बुर में डालकर इसका पानी निकल सके,,,,,।
(एक-एक करके सभी लोग उसे औरत के बारे में अपना विचार व्यक्त कर रहे थे लेकिन इन सब बातों को सुनकर अंकित को गुस्सा आ रहा था और वह गुस्से में बोला,,,)
यार तुम लोगों को शर्म नहीं आती,,, तुम लोग भी रौनक की तरह ही बातें कर रहे हो तुम लोगों में और उसमें फर्क क्या है,,,,?
अरे यार अंकित तू भी बेवजह गुस्सा हो रहा है,,,, हम तो सिर्फ बातें कर रहे हैं और वैसे भी जो सड़क पर औरत गई है वह हम में से तो किसी की कुछ लगते नहीं है ना इसलिए किसी की नाराजगी का कोई मतलबी नहीं होता लेकिन तू है कि खामखा गुस्सा दिखा रहा है,,,,
कुछ भी हो यार मुझे इस तरह की बातें पसंद नहीं है,,,,
(इतना कहने के साथ ही वह चाय खत्म करके चाय का कप वही टेबल पर रख दिया और अपना चलता बना उसे रोकने की कोशिश सूरज करता रहा लेकिन वह रुका नहीं बस अपने घर की ओर निकल गया उसे जाता हुआ देखकर सूरज बाकी अपने दोस्तों से बोला,,)
भोसड़ी का एकदम बेकार है औरतों को देखकर कुछ समझ में नहीं आता इस पर वैसे भी रौनक सच ही कह रहा था इसकी मां वाकई में बहुत मस्त है,,,,
अंकित गुस्सा कर अपने दोस्तों को चाय की दुकान पर छोड़कर अपने घर की तरफ निकल गया था क्योंकि उसे लगने लगा था कि अब वहां रुक कर भी कोई फायदा नहीं है क्योंकि उसके दोस्त लोग भी,,, रौनक की ही जुबान बोल रहे थे,,,, अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि आखिरकार किसी गैर औरत के बारे में अपने मन में इतनी गंदी भावनाएं लाकर क्या मिलता होगा वह भी तो किसी की मां होगी बहन होगी बेटी होगी और उनके खुद के घर में भी तो मां बहन है इनकी मां बहन के बारे में अगर कोई गलत गलत बात कर तो इन्हें कैसा लगेगा,,,,, अपने घर की ओर चले जाते समय अंकित के मन में रौनक की बातें घूम रही थी और उसे बहुत गुस्सा आ रहा था अगर उसके दोस्तों ने उसे पकड़ ना दिया होता तो वह रौनक का हाथ मुंह तोड़ दिया होता क्योंकि बात ही कुछ ऐसी कह दिया था हालांकि इस तरह की गाली गलौज तो दोस्तों में आम बात होती है,,,, दोस्त लोग आपस में ही मां बहन की गाली देते ही रहते हैं और इसमें कोई बुरा भी नहीं मानता लेकिन अंकित इन सभी में सबसे अलग था क्योंकि वह ना तो किसी को मां बहन की गाली देता था और ना ही किसी के मुंह से अपने लिए इस तरह की गाली सुनना पसंद करता था,,,,, सीधे-सीधे रौनक ने अंकित के मुंह पर कह दिया था कि तेरी मां कितनी मस्त है उसकी बुर कितनी कचोरी की तरह खुली हुई होगी एकदम गोरी गोरी मौका मिले तो वह उसकी बुर में अपना लंड डालकर उसकी चुदाई कर दे इन सब बातों को सोचकर अंकित का मन भरा जा रहा था वह गुस्से से पागल हुआ जा रहा था लेकिन किसी तरह से वह अपने आप को संभालने की कोशिश कर रहा था और अपना ध्यान दूसरी तरफ लगाने की कोशिश कर रहा था,,,,, की तभी चाय की दुकान पर उसके दोस्तों की बातें याद आने लगी कि वह लोग कैसे किसी भी औरत के बारे में गलत धारणा बांध लेते हैं,,,, औरत हट्टी कट्टी शरीर से भरी हुई हो और आदमी मरियल हो तो उससे क्या फर्क पड़ता है,,, लेकिन उसके दोस्तों ने इस कमी को भी लेकर उसे औरत का मजाक बना रहे थे,,,,।
बाकी सभी को औरतें किस तरह की बातें औरतों के बारे में गंदी बातें अच्छी लगती थी और इस तरह की बातें सुनकर उन लोगों के मन में उत्तेजना का भी अनुभव होता था लेकिन अंकित इन सबसे अलग था वह औरतों के मामले में उनसे दूर ही रहना पसंद करता था और औरतों की इज्जत करता था इसीलिए तो वह चाय की दुकान पर 1 मिनट भी ठहरना पसंद नहीं किया और वहां से चलता बना,,,,,,, बार-बार रोनक की कही गई बातों को याद करके वह क्रोध से भरा जा रहा था,,,, ऐसा नहीं था कि अंकित को इस बात का आवाज नहीं था कि उसकी मां कैसी दिखती है वह अच्छी तरह से जानता था कि,,, उसकी मां बेहद खूबसूरत थी लेकिन उसके दोस्तों की नजर में खूबसूरती का मतलब था वासना और वह लोग खूबसूरत चीज को गंदी नजरों से देखते थे और यही बात उसे अच्छी नहीं लगती थी,,,,, कई बार तो उसे ऐसा महसूस होता था कि अपने दोस्तों को छोड़ दे और अपने आप में ही मस्त रहे लेकिन खेलने के लिए कोई तो होना चाहिए था इसलिए वह अपने दोस्तों का साथ छोड़ भी नहीं सकता था,,,,,।
शाम ढलने वाली थी और सुगंधा खाना बनाने की तैयारी कर रही थी वह अपने खुले बालों का जुड़ा बनाकर अपने कमरे में गई और आईने के सामने खड़ी होकर अपनी साड़ी उतारना शुरू की अपने कंधे से साड़ी का पल्लू हटते ही आईने में विशाल वछ स्थल नजर आने लगा और सुगंधा एक नजर अपनी विशाल छतिया पर डालकर अपनी कमर में से साड़ी को खोलना शुरू कर दी और देखते ही देखते वह कुछ ही देर में अपने बदन से साड़ी को उतार कर एक तरफ रख दी और अब वह आईने के सामने केवल ब्लाउज और पेटीकोट में थी,,,,, शाम ढल चुकी थी इसलिए कमरे में अंधेरा था और इसीलिए वह कमरे में प्रवेश करते ही स्विच ऑन करके ट्यूबलाइट जला दी थी जिसकी दूधिया रोशनी पूरे कमरे में फैल चुकी थी और उसे दूधिया रोशनी में आदम कद आईने में उसे अपना अक्स एकदम साफ नजर आ रहा था,,,,,,, 40 की उम्र में भी सुगंधा का बदन एकदम कसा हुआ था वह पूरी तरह से जवानी से भरी हुई थी लेकिन अफसोस इस बात का था कि इस जवानी का मजा लेने वाला इस दुनिया से 5 साल पहले ही जा चुका था और तब से वह इसी तरह से अपने जीवन व्यतीत कर रही थी,,,, सुगंधा अपने पति के गुजरे 5 साल हो चुके थे लेकिन वह धीरे-धीरे अपने पति को भुला चुकी थी,,,, वह पूरी तरह से अपने बच्चों में व्यस्त हो चुकी थी,,,, अपने पति से उसे ज्यादा कुछ तो नहीं मिला था लेकिन दो बच्चे और रहने के लिए घर जो की तीन कमरों का था और छत के ऊपर वाला कमरा अभी भी खाली था,,,, जिसे वह किराए पर देना चाहती थी लेकिन जवान लड़की के चलते वह अपना कमरा किराए पर देना उचित नहीं समझ रही थी,,,,,,, पति शिक्षक थे इसलिए अपने जीवित रहते ही वह जुगाड़ लगाकर अपनी पत्नी को भी एक अच्छी सी स्कूल में शिक्षिका की नौकरी दिला दिए थे इसलिए उनके जाने के बाद घर चलाने में किसी भी प्रकार की दिक्कत सुगंध को महसूस नहीं हो रही थी वह बड़े आराम से अपने बच्चों का पालन पोषण कर रही थी,,,,,,,
पति के गुजर जाने के बावजूद भी 5 सालों में उसने कभी भी अपने कदम को देखने नहीं दी थी हालांकि वह बाला की खूबसूरत थी और सड़क पर आते जाते उसे इस बात का एहसास हो भी जाता था क्योंकि जब वह सड़क पर चलती थी तो उसके खूबसूरत बदन की थिरकन उसके नितंबों का उतार चढ़ाव और उसकी छातीयो के गोलापन को देखकर मर्दों की नजर उसके इन अंगों पर सकती रहती थी और कई बार तो उसने कई मर्दों को उसे देखने के बाद अपने लंड पर हाथ लगाते हुए भी देखी थी,,,, यह सबसे अच्छा नहीं लगता था लेकिन धीरे-धीरे इन सबकी उसे आदत हो गई और वह इन सबको अपने दिलों दिमाग से निकाल कर अपने काम में ध्यान लगाने लगी,,,,, इस बात का भी एहसास उसे अच्छी तरह से था कि उसकी उम्र की औरतों के बदन में ढीलापन आ जाता था बदन में चर्बी जम जाती थी लेकिन ऐसा कुछ भी उसके बदन में बदलाव आया नहीं था बल्कि उसके बदन की खूबसूरती और ज्यादा बढ़ गई थी,,,,
अपने आप को आदम कद आईने में देख कर सुगंधा के चेहरे पर अपने बदन की बनावट को देखकर एक गर्व की आभा नजर आती थी और वह मुस्कुराते हुए अपने ब्लाउज का बटन खोलने लगी,,,, एक औरत के द्वारा अपने ब्लाउज का बटन खोलने भी एक मादकता भारी क्रिया से कम नहीं होता अगर इस नजारे को कोई गैर मर्द देख ले तो शायद उसका पानी छूट जाए लेकिन यह सब औरतों के लिए एकदम सहज था जो की यही सब अंजान मर्द को असहज बना देता है,,,, औपचारिक रूप से सुगंध अपने ब्लाउज का बटन खोलने लगी और वह एक-एक करके अपनी नाजुक उंगलियों का सहारा देकर अपने ब्लाउज का बटन खोले जा रही थी और देखते-देखते वह अपने ब्लाउज के सारे बटन को खोल दी और ब्लाउज के दोनों पट को अपने हाथों से अलग करते हुए उसे अपनी बाहों से बाहर निकलने लगी ऐसा करते समय ब्रा में कैद उसकी बदमाशी कर देने वाली खरबूजे जैसी चूचियां एकदम आगे की तरफ आ गई और आईने में एकदम फुटबॉल की तरह नजर आने लगी जिसे देखकर खुद उसकी आंखें चौदिया गई थी,,,, अपने ब्लाउस को अपनी बाहों से अलग करते समय पल भर में उसे अपने पति की याद आ गई और वह सोचने लगी की खास उसका पति अगर जीवित होता तो वह अपनी जवानी का जलवा अपने पति पर पूरी तरह से बिखेर देती लेकिन अफसोस सब कुछ बदल गया था अपनी जवानी का जलवा वह अब नहीं भी कर सकती थी,,,,,,,, अपने पति का ख्याल आते ही उसके बदन में झनझनाहट से होने लगी थी क्योंकि उसे वह पल याद आ गया जब वह इसी तरह से अपने कपड़े बदलती थी तो तुरंत उसका पति उसके पीछे आकर अपनी बाहों में भर लेता था और अपने चुंबनों की बौछार उसके गर्दन पर करते हुए ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूची पकड़ कर दबाना शुरू कर देता था और उत्तेजित अवस्था में सुगंध अपने नितंबों पर अपने पति के टनटनाए लंड का स्पर्श पाते ही पूरी तरह से उत्तेजित हो जाती थी,,,, और फिर उसका पति आईने के सामने ही उसे घोड़ी बनाकर पीछे से उसकी बुर में लंड डालकर चोदना शुरू कर देता था और यह सब सुगंध को उसे समय बहुत अच्छा और संतुष्टि भरा लगता था जिसकी कमी उसे अब महसूस होती थी तो उसकी आंखों में आंसू आ जाते थे,,,,,।
अपने दोनों हाथों को पीछे की तरफ लाकर वह अपने ब्रा का हुक खोलने लगी उसके गोरे बदन पर लाल रंग की ब्रा बहुत ज्यादा खिल रहीं थी चूचियों के आकर से कम नाप वाला हुआ ब्रा पहनती थी ताकि उसकी खरबूजे जैसी चूचियां छोटे से ब्रा में एकदम कसी हुई रहे और वैसे भी उसकी चूचियां एकदम कसी हुई थी,,,, ब्रा की खेत से आजाद होते ही उसकी खरबूजे जैसी चूचियां रबड़ के गेंद की तरह छतिया पर उछलने लगी जिसे वह आईने में अच्छी तरह से देख रही थी और मंद मंद मुस्कुरा रही थी,,,, अपनी चूचियों की खूबसूरती देखकर उसे रहने की और वह अपना हाथ अपनी चूचियों पर रखकर उसके आकार को टटोलकर महसूस करने लगी और अपने मन में सोचने लगी की एक मर्द को इसी तरह की चुचीयां अच्छी लगती हैं,,, एकदम गोल गोल कसी हुई छतिया पर तनी हुई जिसमें बिल्कुल भी लक ना हो और बिल्कुल ऐसी ही चूचियां सुगंधा के पास थी जो कि उसकी खूबसूरती में चार चांद लग रही थी,,,,
अपने कमरे में सुगंधा एकदम निश्चिंत थी,,,, वह आईने में देखते हुए अपनी पेटिकोट की डोरी को उंगलियों में फंसा कर एक झटके से खींच ली और कमर पर कसी हुई पेटिकोट एकदम से ढीली हो गई,,,, बंद कमरे में सुगंधा की यह क्रियाकलाप बेहद मदहोश कर देने वाली थी लेकिन इसे देखने वाला कमरे में कोई भी स्थित नहीं था,,,,,, ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में सुगंधा का गोरा बदन और भी ज्यादा खूबसूरत और चमक रहा था,,,,, कमर पर ढीली पड़ी पेटीकोट को वह एक झटके से अपने हाथ से छोड़ दी और उसकी पेटिकोट कमर पर से भर भर कर एक झटके में उसके कदमों में जाकर गिर गई और आईने के सामने सुगंधा पूरी तरह से निर्वस्त्र हो गई केवल उसके उसके बदन पर एक पेंटिं भर रह गई थी उसके बेशकीमती खजाने को छुपाने के लिए,,,,,, अपने नंगे बदन को आईने में देखते ही सुगंधा ने गहरी सांस ली,,,, और तुरंत दरवाजा खुला और सुगंध एकदम से घबराकर दरवाजे की तरफ देखते हुए दोनों हाथों से अपनी छाती को ढकने की नाकाम कोशिश करने लगी,,,,।
क्या मम्मी तुम इधर हो,,,,,।
(दरवाजे पर तृप्ति को देखते ही सुगंधा की जान में जान आई और वह गहरी सांस लेते हुए बोली)
बाप रे तृप्ति तूने तो मुझे डरा ही दिया,,,,
क्या मम्मी तुम अभी कपड़े बदलने में लगी हो मुझे तो लगा था कि अब तक चाय बना ली होगी,,,,, और मम्मी दरवाजा बंद करके कपड़े उतार करो अगर किसी दिन ऐसे हालात में अंकित ने तुम्हें देख लिया तो गजब हो जाएगा,,,,,
धत् पगली तू भी ना अनाप शनाप बकती रहती है,,,(इतना कहने के साथ ही सुगंधा उसी अवस्था में ही केवल अपने बदन पर लाल रंग की पैंटी पहने वह अलमारी की तरफ गई और उसमें से एक गाऊन निकालने लगी पीछे खड़ी तृप्ति दरवाजे को बंद कर चुकी थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि अगर अंकित आ जाए तो इस तरह की दृश्य को अपनी आंखों से देखें वह अपनी मां की मदहोश कर देने वाली जवानी को देख रही थी और मंद मंद मुस्कुरा भी रही थी अपनी मां की खूबसूरती और इस उम्र में भी कैसे हुए बदन को देखकर खुद तृप्ति को भी अपनी मां पर गर्व होता था,,, तृप्ति इस घर की बड़ी लड़की थी और वह अपनी मां का पूरा ख्याल रखती थी क्योंकि वह अपनी मां के दुख को अच्छी तरह से जानती थी इसलिए अपनी बातों से अपने चुटकुले से वह अपनी मां को हमेशा खुश रखती थी और उसकी मां भी अपने बच्चों से बहुत खुश थी,,,,,,
सुगंधा अलमारी मे से एक खूबसूरत गाउन को निकाल कर पहन ली हालांकि वह अपनी चूचियों को नग्न नहीं रहने दी उसे पर ब्रा नहीं पहनी जिसकी वजह से गाउन के ऊपर उसकी खरबूजे जैसी चूचियां एकदम साफ झलक रही थी,,,, सुगंधा अपनी बेटी तृप्ति की तरफ घूमते हुए बोली,,,।
आज गर्मी बहुत है इसलिए हल्का कपड़ा ही ठीक रहेगा,,,,
ठीक है मम्मी,,, अब जल्दी से चाय बना दो,,,,, थोड़ा थका महसूस हो रही है फिर चाय पीकर मैं खाना बनाने में मदद करती हूं,,,,
नहीं तू रहने दे आराम कर खाना में बना लूंगी तू भी दिन भर थक जाती होगी,,,, कॉलेज फिर ट्यूशन,,,
अरे नहीं मम्मी इतना भी नहीं थकी हूं बस जल्दी से एक कप चाय मिल जाए तो ताजगी आ जाए,,,।
तू 2 मिनट रुक मैं अभी बना देती हुं,,,,।
(और इतना कहकर वह रसोई घर में चली गई,,,)
आईने के सामने वह एक बार फिर से नंगी हो चुकी थी उसके बदन पर कपड़े का रेशा तक नहीं था,,,, वैसे तो पति के देहांत के बाद उसके लिए सजना समझना सब कुछ बेकार ही था लेकिन वह स्कूल में पढ़ने का काम करती थी वह टीचर थी स्कूल में और भी टीचर थी जो सज धज कर ही आया करती थी और इसीलिए उसे भी एकदम अप टू डेट होकर ही जाना पड़ता था ऐसा कोई नियम तो नहीं था लेकिन फिर भी सुगंधा अपने मन को मनाने के लिए अपने पति के देहांत के बाद बस थोड़ा सा सज संवर लेती थी,,, जल्दी से उसने अलमारी में से अपने लाल रंग की ब्रा निकाल जो कि उसकी चूचियों की साइज से कम माप की थी,,, वह जानबूझकर अपनी चूचियों के साइज से कम माफ वाली ब्रा पहनती थी ताकि उसकी चूचियां और भी ज्यादा कसी हुई रहे,,,, जल्दी-जल्दी उसे अपनी बाहों में डालकर वहां पीछे से बरा का हक लगने लगी और दोनों कप को अपनी दोनों खरबूजे जैसी चुचियों में समाकर उसे कस ली गोरे बदन पर लाल रंग की ब्रा और भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी इसी तरह से वह लाल रंग की पहनती भी अलमारी से निकाली,,, और उसे उलट-पुलट कर देखने लगी पेंटिं में हल्का सा छेद था,,,, और उसे छेद को देखते हुए वह अपने मन में सोचने लगी कि इस बार तनख्वाह मिलेगी तो वह अपने लिए जरूर नई पेटी खरीदेगी,,, और ऐसा सोचते हुए वहां अपनी लंबी-लंबी टांगों को उसे पेटी के दोनों छेद में भारी-बड़ी से डालकर उसे ऊपर की तरफ उठाई और कमर टकला कर अपनी खूबसूरत खजाने को उसे लाल रंग की पेंटिं के परदे में छुपा ली,,,, पेटी को पहनते समय उसकी नजर अपनी बर पर गई थी जिस पर हल्के-हल्के बोल फिर से उग आए थे,,,, पति के न होने के बावजूद भी सुगंध अपने बदन की साफ सफाई की बहुत डरकर रखती थी इसलिए समय-समय पर वीट क्रीम लगाकर अपनी बर को साफ करती थी क्योंकि उसे अपनी बुर पर बाल बिल्कुल भी पसंद नहीं थे क्योंकि घने बाल हो जाने की वजह से उन्होंने खुजली होने लगती थी और स्कूल में पढ़ते समय वह खुजाने में शर्म महसूस करती थी,,, वैसे भी अक्सर मर्दों की नजर औरतों की इस तरह की हरकत पर जरूर रहती है कि वह कब अपना हाथ कौन से अंग पर लगती हैं खास करके जब उनकी हथेली उनकी दोनों टांगों के बीच आती है तो मर्द औरत की हरकत को देखकर तुरंत औरतों की दोनों टांगों के बीच की पतली दरार के बारे में कल्पना करने लगते हैं कि इसकी कैसी होगी इसकी बर पर बाल होंगे कि नहीं होंगे चिकनी होगी कैसी होगी गुलाबी होगी फूली हुई होगी इस तरह की कल्पना करके मन ही मन में आनंद लेते हैं,,,,।
साड़ी पहनने के बाद वह अपने आप को आईने में देख रही थी एकदम आसमान से उतरी हुई परी लग रही थी बदन भरा हुआ था लेकिन बेहद खूबसूरत चर्बी का कहीं भी ज्यादा जमावड़ा नहीं था जहां भी चर्बी थी अपने हिसाब से थी जिसे देखने पर कोई भी मर्द मदहोश हो जाता था,,,, वह जल्दी से कंघी लेकर अपने बालों को संवारने लगी और तुरंत ही उसका जुड़ा बनाकर पीछे एक बड़ा सा बकल लगा ली जिससे उसके खूबसूरत बाल और भी ज्यादा खूबसूरत नजर आने लगे वह तैयार हो चुकी थी मन में कोई गाना गुनगुनाते हुए वह अपना पर्स उठाई और घर से बाहर आ गई घर में ताला लगा कर वह स्कूल के लिए निकल गई स्कूल आने जाने के लिए उसे बस का सहारा लेना पड़ता था और कभी कभार तो वह पैदल ही आया जाया करती थी जब कभी ज्यादा देर होती थी तो वह बस का उपयोग करती थी,,, लेकिन आज कोई जल्दबाजी नहीं थी इसलिए वह पैदल ही स्कूल के लिए निकल गई थी इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि सड़क पर चलते समय आने जाने वालों की नजर उसे पर ही टिकी रहती थी क्योंकि एक तो उसका खूबसूरत बदन खूबसूरत चेहरा किसी फिल्म की हीरोइन से कम नहीं लगता था ऊपर से पीले रंग की साड़ी उसे पर तो और भी ज्यादा कयामत लगती थी आने जाने वालों की नजर भेज जब उसके ऊपर ही पड़ जाती थी आगे से आने वाला इंसान उसकी गोलाकार चूचियों को देखकर मस्त होता था और पीछे से आने वाला इंसान उसकी गदराई आई हुई मदमस्त कर देने वाली गांड को देखकर पागल हुआ जाता था,,,,, और अपने मन में यही सोचता था कि इसको छोड़ने वाला मर्द कितना खुश नसीब होगा जो रोज इसकी लेता होगा,,,,,,,,,।
शाम को अंकित घर पर पहुंचा तो उसकी मां पहले सही तैयार बैठी थी उसे मार्केट जो जाना था खरीदी करने के लिए क्योंकि घर में राशन खत्म हो रहा था,,,। अंकित जैसे ही घर में प्रवेश किया उसे देखकर उसकी मां बोली,,।
चल जल्दी से तैयार हो जा मार्केट जाना है खरीदी करने,,,
मेरे लिए नए जूते भी लोगी ना,,,
अरे बेवकूफ राशन की खरीदी करने जाना है नए जूते तुझे तनख्वाह मिलेगी तब खरीदूंगी बस,,,, आप जल्दी से तैयार हो जाओ वैसे भी बहुत देर हो चुकी है आते-आते शाम ढल जाएगी,,,,
अच्छा रुको बस 2 मिनट में आता हूं,,,,,
(इतना कहकर संजू बाथरूम में चला गया और उसकी मां वही कुर्सी पर बैठकर उसका इंतजार करने लगी और मन में सोचने लगी कि क्या-क्या खरीदना है क्या बाकी रह गया है वैसे तो वह राशन की लिस्ट तैयार कर ली थी लेकिन फिर भी सोच रही थी कि कुछ और लेना हो तो वैसे तो पति के देहांत की बात थोड़ी बहुत दिक्कत घर चलाने में हो रही थी लेकिन फिर भी टीचर होने के नाते उसे इतनी तनख्वा तो मिल ही जाती थी कि वह आराम से अपना घर चला सके,,,, सुगंधा ने बड़े सलीके से अपना घर संभाल ली थी,,,, थोड़ी ही देर में अंकित तैयार होकर आ गया था और उसकी मां कुर्सी पर से उठकर कमरे से बाहर आ गई संजू भी अपनी मां के पीछे-पीछे चल दिया वैसे तो जब कभी भी सुगंधा आगे आगे चलती थी तो हर मर्द की नजर उसकी गोल-गोल गांड पर ही टिकी रहती थी क्योंकि चलते समय उसकी गांड मटती बहुत थी और मटकनी हुई गांड देखकर हर मर्द का लैंड खड़ा हो जाता था लेकिन ऐसा कुछ भी अंकित के साथ नहीं होता था हालांकि उसके नजर अपनी मां की गांड पर जाकर जरूर थी लेकिन वह कभी भी अपनी मां के बारे में गलत भावना पैदा नहीं करता था और नहीं कभी अपने मन में गलत सोचता था,,,, बस उसकी सहज रूप से नजरे उसकी मां की गांड पर चली जाती थी और वह सहज रूप से अपनी नजरों को घुमा भी लेता था उसने कभी सोचा नहीं था कि उसकी मां की गांड दूसरी औरतों की तुलना में छोटी है या बड़ी है ढीली है या कसी हुई है,,,, चलते समय मटकती है कि सामान्य रहती है चुचियों का आकार कैसा है बड़ा है कि छोटा है ब्लाउज का बटन बंद करने पर उसकी दरार दिखती है कि नहीं दिखती है इन सब पर तो उसकी नजर जाती जरूरी थी लेकिन इन सबको देखकर उसके मन में गलत भावना नहीं आती थी इसीलिए वह आज तक दूसरे लड़कों से बिल्कुल अलग था,,,,।
दोनों बाजार के लिए निकल गए थे बाजार ज्यादा दूर नहीं था केवल 10 मिनट के रास्ते पर ही था इसलिए जल्द ही दोनों बाजार में पहुंच गए और राशन की दुकान पर जाकर खड़े हो गए राशन की दुकान पर थोड़ी बहुत भीड़ थी ज्यादातर औरतें ही खड़ी थी,,,, जो कि अपना राशन खरीद रही थी,,,, अंकित दुकान के एक तरफ खड़ा हो गया था जहां उसके आगे दो-तीन औरतें खड़ी थी और ठीक बगल में उसकी मां भी खड़ी हो गई थी हाथ मे राशन का लिस्ट लिए,,,,
दुकान वाला बारी-बारी से सब की लिस्ट लेकर राशन का सामान निकाल रहा था,,, अभी सुगंधा का नंबर है या नहीं था वह वहीं खड़ी होकर अपने नंबर का इंतजार कर रही थी और दुकान में इधर-उधर देखकर और भी चीजों को देख रही थी दुकान पूरी तरह से राशन से भरी हुई थी दोनों तरफ कांच के कपाट लगे हुए थे जिसमें महंगी महंगी चीज रखी हुई थी,,,, अंकित की नजर बार-बार कंप्लेन के डिब्बे पर चली जा रही थी,,, बहुत दिनों से उसकी मां कंप्लेन पीने का कर रहा था और इस बारे में उसने अपनी मां को भी कई बार कह चुका था लेकिन उसकी मां जानती थी कि वह महंगा आता है इसलिए बार-बार जानकारी देती थी लेकिन इस बार वह भी अपने मन में यही सोच रही थी की तनख्वाह पर अंकित के लिए जरुर कंप्लेन खरीदेगी,,,,।
अंकित के आगे जो औरत खड़ी थी उसका ब्लाउज पीछे से काफी खुला हुआ था और उसकी नंगी चिकनी पीठ दिख रही थी और वह काफी गोरी भी थी अंकित की जगह अगर कोई और लड़का होता तो अब तक वह उसे औरत को स्पर्श करने की बहुत कोशिश कर चुका होता क्योंकि अक्सर दुकानों पर यही स्थिति होती है या तो वह उसे औरत को स्पर्श करने की कोशिश करता है या तो अपने आगे वाले भागों को उसके नितंबों पर स्पर्श करने की कोशिश करता लेकिन इन सब में अंकित नहीं था वह दूसरों से अलग था उसकी आंखों के सामने भले यह खूबसूरत औरत खड़ी थी खुला ब्लाउज पहनकर लेकिन फिर भी उसकी खूबसूरती पर अंकित की नजर नहीं पड़ रही थी उसका ध्यान जा रहा था तो उसे खूबसूरत औरत के बदन से उठती हुई मादक खुशबू पर उसे औरत ने बहुत ही सुगंधित परफ्यूम लगाई हुई थी जिसकी खुशबू अंकित को बहुत ही अच्छी लग रही थी और वह अपने मन में सोच रहा था कि काश उसके पास भी इस तरह का परफ्यूम होता तो मजा आ जाता वह भी इतना सोच ही रहा था कि वह औरत जो सामान ले रही थी उसके हाथ से हाथ में लिया हुआ साबुन छूट कर नीचे गिर गया और उसे उठाने के चक्कर में वजह से झुकी उसकी गांड एकदम से पीछे हुई और सीधे जाकर अंकित के लंड से टकरा गई,,, उसे औरत की गांड अंकित के लंड के आगे वाले भाग के एकदम बीचो-बीच स्पर्श हुई थी कि ना चाहते हुए भी अंकित के लंड में अजीब सी हलचल होने लगी थी,,, जैसे ही उसे औरत की गांड अंकित के आगे वाले भाग पर स्पर्श हुई अंकित तुरंत अपने आप को संभालने की कोशिश करता हुआ पीछे होने लगा लेकिन तब तक उसे औरत की गांड अपना कमाल दिखा चुकी थी उसे औरत की गर्म जवानी और उसकी मदहोश कर देने वाली गांड का स्पर्श अंकित के तन बदन में अजीब सा हलचल पैदा कर गया था और वह औरत साबुन उठाने के बाद तुरंत खड़ी हुई और पीछे देखकर अंकित की तरफ मुस्कुराई और सॉरी बोल दी अंकित उसे औरत को देखा ही रह गया उसके चेहरे पर मुस्कान देखकर और उसके द्वारा सॉरी कहने पर एक अजीब सी हलचल अंकित ने अपनी तंबदन में महसूस किया और जवाब में अंकित ने भी मुस्कुराते हुए कोई बात नहीं कह कर बात को टाल दिया,,,, बगल में खड़ी सुगंधा उसे औरत की गांड और अपने बेटे के लंड का स्पर्श उसे औरत की गांड पर तो देख नहीं पाई थी लेकिन उसे औरत को सॉरी कहते हुए देख ली थी और जवाब में अपने बेटे का जवाब सुनकर वह सहज रूप से मुस्कुरा दी थी और वापस अपने नंबर का इंतजार करने लगी थी,,,,।
थोड़ी ही देर में वह औरत थैली में अपना सामान लेकर जाने लगी थी संजू ना चाहते हुए भी पीछे मुड़कर उसे औरत की तरफ देखने लगा और पहली बार उसने किसी औरत के नितंबों को बड़े ध्यान से देख रहा था उसका मटकना हो उसे बेहद लुभाने लग रहा था पल भर में उसके मन में अजीब सी हलचल होने लगी थी उसका मन बदल गया था,,, वह तब तक उसे औरत को देखता रहा जब तक कि वह औरत बाजार की भीड़ में गुम नहीं हो गई,,,, थोड़ी ही देर में उसकी मां वजन किया हुआ सामान अपने ठेले में रखना शुरू कर दी सूजी बेसन डाल गरम मसाले मिर्ची हल्दी थोड़ा-थोड़ा करके वह सब सामान थेले में भर चुकी थी,,, तभी उसकी मां नहाने का एक सामान्य साबुन लेने लगी तो अंकित बोला,,,,)
यह वाला नहीं मम्मी लीरील साबुन खरीद लो उसकी खुशबू बहुत अच्छी है,,,,
नहीं संजु यही ठीक है बार-बार साबुन बदल के नहीं लगना चाहिए वरना नुकसान करता है,,,
क्या मम्मी तुम भी,,,,
(साबुन खरीदने की बात टाल दी गई थी दुकान वाला बिल बना रहा था और भी ग्राहक खड़े थे,,, दुकान में काम करने वाला कारीगर बार-बार सुगंधा की तरफ देख रहा था खास करके उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों की तरफ उसकी निगाह जा रही थी पहले तो संजु इस तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता था लेकिन आज पहली बार उसे कम करने वाले की निगाह को देख रहा था जो कि उसकी मां की खूबसूरती और उसकी चूचियों पर घूम रही थी यह देखकर अंकित को गुस्सा आने लगा लेकिन वह कुछ कह नहीं सकता था क्योंकि दुकान पर बहुत से लोग थे अगर इस बारे में वह जरा सा भी कुछ कहता तो जिसकी नजर उसकी मां पर नहीं जा रही है उन लोगों की भी नजर उसकी मां पर पहुंच जाती थी और ऐसा अंकित बिल्कुल भी नहीं चाहता था,,, फिर भी वह अपनी मां से बोला,,)
जल्दी करो ना मम्मी बहुत देर हो रही है,,,
बस बेटा हो गया,,,,।
(अंकित बार-बार दुकान में काम करने वाले आदमी को ही देख रहा था उसकी नज़रें उसकी मां के बदन पर घूम रही थी और अंकित को तुरंत उसके दोस्तों की बात याद आ गई,,, जॉकी चाय की दुकान पर बैठकर सड़क पर जाती हुई औरत के बारे में गंदी-गंदी बात कर रहे थे और उसका वह दोस्त जिसके साथ लड़ाई हुई थी उसकी मां के बारे में गंदी बात कर रहा था उसे समझते देर नहीं लगी की सब मर्दों की नजर औरत की खूबसूरती पर ही उसके अंगों पर ही रहती है ,,, थोड़ी ही देर में सुगंधा पैसे देकर हाथ में थैला लेकर चलने लगी तो अंकित खुद अपनी मां के हाथ में से वजनदार थैला को ले लिया और चलने लगा,,,
बाजार के नुक्कड़ पर पानी पुरी का ठेला लगा हुआ था दूसरी औरतों की तरह सुगंधा को भी पानी पुरी बहुत पसंद था इसलिए वह तुरंत उसे ठेले के पास खड़ी हो गई और अपने बेटे के साथ मिलकर पानी पुरी खाने लगी पानी पुरी का चटकारा मसाला उसे बहुत पसंद था,,,,,,, अंकित को भी पानी पुरी अच्छी लगती थी इसलिए वह भी खाने लगा दोनों पानी पुरी खाने के बाद तृप्ति के लिए भी पानी पुरी पैक करवा दिए थे और घर पर पहुंचने के बाद तृप्ति को उसके हिस्से की पानी पुरी दे दिए थे जिसे देखकर वह बहुत खुश हुई थी,,,,।
रास्ते भर और घर पर पहुंचने के बात भी अंकित के मन में उसे औरत की छवि बस गई थी और वह उसे औरत के बारे में सोच रहा था उसके बदन से उठने वाली मादक को खुशबू को महसूस कर रहा था और फिर उसके नितंबों से अपने लंड का टकराना और फिर हाथ में थैला लिए बाजार के भीड़ में गुम हो जाना सब कुछ सोचते हुए उसे अजीब सा महसूस हो रहा था उसके तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी लेकिन जैसे-जैसे वह पढ़ने में मन लगने लगा वैसे-वैसे उसके दिमाग से औरत एकदम से खो गई और वह एकदम से सामान्य हो गया,,,।
लेकिन उसके कदम भी डगमगा चुके थे अपने कॉलेज में अपने सहपाठी संदीप नाम के छोकरे के प्रति वह आकर्षित हो चुकी थी या यू कह लो कि वह मन ही मन में संदीप से प्यार करने लगी थी और संदीप भी उसके पीछे पड़ा हुआ था लेकिन तृप्ति ने अभी तक अपने प्यार का इजहार उसे कि नहीं थी संदीप तो उसे अपने प्यार का इजहार कर चुका था,,,,, इस प्यार व्यार के चक्कर से वह अपने आप को हमेशा से बचाती आ रही थी लेकिन इस तरह के आकर्षण से बचने का भी एक सीमा एक उम्र होती है और जिस उम्र से वह गुजर रही थी वह जवानी से भरा हुआ था आकर्षण से भरा हुआ था इस उम्र में लड़के और लड़कियां अक्सर एक दूसरे से आकर्षित होते ही रहते हैं और किसी आकर्षण से तृप्ति भी बच नहीं पाई थी हालांकि उसने अभी तक संदीप को अपने बदन को छूने नहीं दी थी और ना ही उसे कोई छूट-छाट लेने दी थी जिससे उसकी मां बहकने लगे या इस बारे में किसी को पता चले तो वह बदनाम हो जाए,,,, धीरे-धीरे वह इस खेल में आगे बढ़ती जा रही थी लेकिन बहुत संभाल कर वह नहीं चाहती थी कि इस बारे में किसी को भी कानों कान खबर पड़े,,,,।
जिस दिन से अंकित का झगड़ा हुआ था उसे दिन से वहां अभी तक क्रिकेट खेलने के लिए नहीं गया था,,, क्योंकि ऐसे दोस्तों के साथ रहना उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं था जो उसकी मां के बारे में या किसी भी औरत के बारे में गंदी बातें करते हो और गंदी नजर रखते हो,,,, लेकिन रविवार को उसकी कुछ दोस्त घर पर आ गए उसे लेने के लिए क्योंकि आज फिर से क्रिकेट का मैच था,,,,।
सूरज और रौनक दोनों अंकित को लेने के लिए उसके घर आए थे अंकित रौनक को देखते ही अंदर ही अंदर क्रोधित होने लगा लेकिन वह अपने गुस्से को अपने चेहरे पर नहीं लाया क्योंकि वह अपने घर में था और उसकी मां रसोई घर में खाना बना रही थी,,,,,,,, सूरज जो कि अंकित का दोस्त था वह उसे समझाते हुए बोला,,,।
यार अंकित भूल जा जो कुछ भी हुआ रौनक तुझसे माफी भी मांग रहा है,,,।
हां यार अंकित माफ कर दे जो कुछ भी हो गुस्से में हुआ था और वैसे भी जो टीम हार जाती है वह थोड़ा बहुत तो गुस्से में रहती ही है,,, और तू खामखा बात का बतंगड़ बना रहा है,,,(रौनक अंकित से माफी मांगते हुए बोला)
मैं बात का बतंगड़ बना रहा हूं रौनक,,, तुझे सोच समझ कर बोलना चाहिए था आखिर खेल में हार जीत तो चलता रहता है लेकिन तू किसी की मां बहन की गाली देगा तो क्या हुआ उसे सहन कर पाएगा,,,,
चल जाने दे अंकित चल तू हम लोगों के साथ आज दूसरे मोहल्ले वाले के साथ क्रिकेट मैच है,,, और हमें यह मैच जीतना है क्योंकि वह लोग चैलेंज किए हैं कि तुम लोग कभी भी जीत नहीं पाओगे,,,,।
(दरवाजे पर हो रही शोरगुल की आवाज सुनकर तब तक सुगंध रसोई बनाते हुए हाथ में बेलन लिए रसोई घर से बाहर आ गई,,,, और देखी की दरवाजे पर अंकित और उसके दोस्त खड़े हैं,,,, वह उन्हें देखकर खुश हो गई और एक हाथ में बेलन लिए हुए ही साड़ी के एक छेड़ को आगे से ही अपनी साड़ी में अंदर की तरफ खोंसते हुए बोली,,,)
अरे बेटा तुम दोनों बाहर क्यों खड़े हो अंदर आओ चाय गरम है आकर चाय तो पी लो,,,,,
नहीं नहीं आंटी चलेगा,,,,,( सूरज और रौनक दोनों औपचारिक रूप से बोले लेकिन उनकी नजर सुगंधा की हरकत पर थी वह जिस तरह से अपनी साड़ी के किनारी को अपनी नाभि के बगल साड़ी के अंदर डाली थी ऐसी हालत में उन दोनों की नजर सुगंधा की गहरी नाभि पर थी और गड़रे बदन पर थी वह दोनों का लंड सुगंधा की हरकत पर नृत्य करने लगा था,,, वैसे भी औरतों की यह हरकत मर्दों के बदन में मदहोशी भर देती है उन्हें जोश से भर देती है और उनके मन को चुदवासा बना देती है ,,,, वह दोनों पूरी तरह से उत्तेजित हो गए थे और सुगंधा उन दोनों की बात सुनकर बोली,,,)
नहीं नहीं ऐसा कैसे चलेगा आखिरकार तुम दोनों अंकित के दोस्त हो इसलिए आज से तुम दोनों भी मेरे बेटे जैसे ही है आओ आप जल्दी से चाय पी लेना फिर उसके बाद जहां जाना हो चले जाना,,,,(और ऐसा कहते हुए सुगंधा वापस रसोई घर में चली गई लेकिन जाते समय उसके पिछवाड़े को देखकर रौनक और सूरज दोनों के तन बदन में उत्तेजना की लहर जोड़ने लगी उन दोनों के बदन में आग लगने लगी वह दोनों छुपी नजरों से सुगंधा के गदराए जिसमें को देखकर अंदर ही अंदर उत्तेजित हुए जा रहे थे,,,,। इस समय अंकित दोनों की नजरों से अनजान था,,,, उसे नहीं मालूम था कि क्रिकेट मैच खेलने के लिए उसे बुलाने के लिए आए हुए उसके दोनों दोस्त उसकी मां के भरे हुए बदन को देख कर ललचाई नजरों से उसे देख रहे हैं,,,, और मन ही मन में उसकी मां को लेकर कल्पना भी करने लगे हैं,,,, वैसे तो अंकित का मन बिल्कुल भी नहीं था उन दोनों को चाय पिलाने का लेकिन अपनी मां की बात को टाल नहीं सकता था इसलिए वह भी उन दोनों को अंदर आने के लिए बोला और जो कुर्सी निकाल कर दोनों को बैठने के लिए दे भी दिया और अंकित जैसे ही उन दोनों के लिए अंदर पानी लेने के लिए गया तो सूरज ही रौनक के कान में धीरे से बोला,,,)
बाप रे रौनक अंकित की मां तो एकदम धमाल है कितनी मस्त माल है,,,
हां यार तू सच कह रहा है इतने नजदीक से कभी उसे देखा नहीं था बस दूर से ही देखा था और आज तो मेरी हालत खराब हो गई है देख ले जरा,,,(अपने पेट के आगे वाले भाग को दिखाते हुए जो की पूरी तरह से उत्तेजना से फूल गया था) इसकी तो हालत ही खराब हो गई,,,.
मेरी भी हालत तेरी जैसी ही है कसम से अगर ऐसी औरत बिस्तर पर होना तो जिंदगी का मजा ही कुछ और है,,,,,
चुप चुप अंकित आ रहा है,,,।
(अंकित दोनों के लिए पानी लेकर आया और तभी उसकी मां चाय गरम करके प्लेट में दो कप और दो पराठे लेकर आई,,,, अंकीत चाय पी चुका था,,, इसलिए उसके लिए नहीं लेकर नहीं आई थी,,,, अंकित जल्दी से उन दोनों के सामने एक छोटा सा टेबल रख दिया था और सुगंधा चाय का प्लेट और परांठा लेकर उन दोनों के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई और धीरे से छुपाकर दोनों के सामने एक-एक चाय का कप और एक-एक पराठा रखने लगी लेकिन उसके झुकाने की वजह से उन दोनों की आंखों के सामने सुगंधा की बदमाशी कर देने वाली दोनों चूचियां नजर आने लगी जो झुकाने की वजह से आगे से ज्यादा तो बाहर निकली हुई थी और वह दोनों सुगंधा की मदमस्त कर देने वाली खरबूजे जैसी चुचियों का उभार देखकर एकदम मस्त हो गए उनके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी और वह सुगंधा को चोदने के लिए लालायित होने लगे,,, वह दोनों कुछ बोल नहीं पाए बस इतना ही बोले,,,)
इसकी क्या जरूरत थी आंटी,,,,
अरे खाओ बेटा मैं भी तुम्हारी मां की जैसी हूं।(इतना कहते सुगंधा मुस्कुराते हुए वापस रसोई घर में चली गई और वह दोनों तिरछी नजर से उसे जाते हुए देख रहे थे उसे जाते हुए नहीं बल्कि उसकी मटकती हुई बड़ी-बड़ी गांड को देख रहे थे जो कि कसी हुई साड़ी मैं और भी ज्यादा ऊभरी हुई और बड़ी-बड़ी लग रही थी,,,, दोनों गहरी सांस लेते हुए चाय और नाश्ता करने लगे और अपने मन में सुगंधा के साथ बिस्तर पर कबड्डी खेलने लगे वह दोनों अपने मन में कल्पनाओं के घोड़े दौड़ने लगे थे एक तरफ वह औपचारिक रूप से चाय और पराठा का आनंद भी ले रहे थे और दूसरी तरफ अपने दिल को दिमाग में सुगंधा को लेकर बिस्तर पर मजे लेने की कल्पना भी कर रहे थे रौनक तो अपने दिमाग में यही सोच रहा था कि वह अंकित की मां की साड़ी कोड अपने हाथों से उतर रहा है उसके बदन पर से हर एक कपड़ों को वह अपने हाथों से दूर करके उसे नंगी कर रहा है और नंगी कर लेने के बाद उसे अपनी गोद में उठाकर नरम-नरम बिस्तर पर पटक दे रहा है और फिर वह कल्पना में भी अपने आप पर काबू नहीं कर पा रहा है और तुरंत सुगंधा की दोनों टांगों के बीच आकर अपने लंड को उसकी गुलाबी छेद में डालकर उसे चोदना शुरू कर दे रहा है कल्पनाओं का घोड़ा इतना जबरदस्त था कि वह दोनों पूरी तरह से मस्त हुए जा रहे थे कल्पना में भी उन्हें हकीकत महसूस हो रहा था,,,,
सूरज तो रौनक से खत्म आगे था वह अंकित का एकदम खास दोस्त था लेकिन फिर भी उसकी मां की जवानी देख कर वह दोस्ती को एक तरफ रख कर अपने मन में अंकित की मां के लिए बहुत ही गंदी-गंदी ख्याल लता था वह अपने मन में चाय और पराठा का लुफ्त उठाते हुए अपने मन में सोच रहा था कि वह अपने दोस्त अंकित की मां को अपने कमरे में लेकर जा रहा है और उसकी मां तुरंत अपने हाथों से अपने सारे कपड़े उतार कर एकदम नंगी हो गई है और वह खुद सूरज के कंधों को अपने हाथ से पकड़ कर उसे नीचे की तरफ ले जाते हुए उसके मुंह को अपनी बु्र पर लगाकर उसे बुर चाटने के लिए मजबूर कर रही है और वह भी अंकित की मां की बुर पर अपने होंठ लगाकर उसे बड़ी लिज्जत के साथ चाट रहा है,,,, सुगंधा सूरज की हरकत पर पूरी तरह से पागल हुए जा रही है और अपनी कमर को आगे पीछे करके उसके मुंह को ही चोद रही है,,,, और कुछ देर बाद सूरज अपनी कल्पनाओं का घोड़ा और तेज दौड़ते हुए खुद खड़ा हो गया और उसकी मां को कंधों का सहारा लेकर नीचे की तरफ झुकते हुए अपने खड़े लंड को उसके मुंह में डालकर उसे चुसवा रहा है,,, और इसके बाद उसकी मां खड़ी होकर सूरज को धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दी और खुद अपनी नंगी बड़ी-बड़ी गांड उसके खड़े लंड पर रखकर पटकना शुरू कर दी दोनों की कल्पना इतनी जबरदस्ती की दोनों को हकीकत का आभास हो रहा था दोनों के पेट में तंबू बना हुआ था और दोनों चाय पराठा भी खा रहे थे इस बात से अनजान अंकित दोनों के चाय पी लेने का इंतजार कर रहा था क्योंकि वह भी क्रिकेट का शौकीन था और उसे भी क्रिकेट खेलने था बस गुस्से की वजह से वह घर में ही बैठा था लेकिन रौनक के माफी मांगने से वह मान गया था लेकिन उसे क्या मालूम था कि घर में बैठने के बावजूद भी वह दोनों उसकी मां के बारे में गंदी गंदी कल्पना कर रहे थे,,,,।
थोड़ी ही देर में दोनों चाय खत्म करके अंकित के साथ घर से निकल गए अंकित की मां तो दोनों को प्रेम भाव से चाय पराठा खिला रही थी क्योंकि वह दोनों अंकित के दोस्त भी थे और मोहल्ले के ही लड़के थे,,, इसलिए वह इस बात से अनजान थी कि उसके लड़के के हम उम्र होने के बावजूद भी और उसके लड़के के दोस्त होने के बावजूद भी उन दोनों के मन में उसके लिए इतनी गंदी-गंदी भावनाएं थी अगर वह जान जाती तो शायद उन दोनों को अपने घर में कभी प्रवेश करने ही ना देती और अंकित को भी उन दोनों के साथ रहने नहीं देती लेकिन अंकित और उसकी मां बिल्कुल अनजान थे अंकित तो फिर भी थोड़ा-थोड़ा समझता था क्योंकि उसका एक बार झगड़ा भी हो चुका था इसी बात को लेकर लेकिन रोनक के द्वारा माफी मांग लेने पर वह सब कुछ भूल गया था,,,।
अंकित क्रिकेट खेलने के लिए जा चुका था और तृप्ति भी ट्यूशन के लिए जा चुकी थी घर में केवल सुगंधा ही रह गई थी रविवार का दिन था खाना खाकर और घर की साफ सफाई करके वह बैठी थी कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई वह धीरे से उठकर दरवाजा खोली तो दरवाजे पर सुषमा खड़ी थी वह मुस्कुराते हुए बोली,,,।
क्या कर रही हो सुगंधा,,,
कुछ भी नहीं ऐसे ही बैठी थी रविवार का दिन था तो घर पर कोई है नहीं अंकित क्रिकेट खेलने गया है और तृप्ति ट्यूशन के लिए गई है और वैसे भी रविवार का दिन बहुत बड़ा लगने लगता है,,,,।
चल कोई बात नहीं मेरे घर पर भी कोई नहीं है मेरा भी समय नहीं बीत रहा था तो मैं सोची कि चल तुझे बुला लूं,,,
किस लिए,,,,
अरे किस लिए क्या चल मेरे घर में कोई फिल्म देखते हैं,,,,
हां हां यह ठीक रहेगा,,,(सुगंधा भी मुस्कुराते हुए बोली,, और वह जल्दी से दरवाजा बंद करके सुषमा के साथ उसके
घर पर जाने लगी,,,, पूरे मोहल्ले में केवल सुषमा के पास ही
बड़ा सा कैसे वाला सिस्टम था जो की 90 के दशक में लोग किराए पर लाकर मोहल्ले में देखा करते थे उसके पास अच्छा खासा फिल्म का कलेक्शन भी था सुगंधा कमरे में एक कुर्सी पर बैठ गई थी सुषमा ने दरवाजा बंद कर दी थी और वह कपाट में से एक अच्छी सी कैसेट ढूंढ रही थी,,,)
कोई अच्छी सी फिल्म लगाना मिथुन वाली,,,,।(कुर्सी पर बैठे-बैठे सुगंधा बोली)
अरे हां वही तो ढूंढ रही हुं,,,,,।
इस तरह की फिल्म को देखकर सुषमा का तो कुछ बिगड़ता वाला नहीं था बल्कि वह पूरी तरह से उत्तेजित होकर अपने पति के साथ अपनी जवानी की गर्मी को बुझ सकती थी लेकिन इस गंदी फिल्म का असर सुगंधा के ऊपर बहुत ही बुरी तरह से हो रहा था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वह जल्दी-जल्दी अपने घर में प्रवेश कर गई और दरवाजा बंद करके पंखा चालू करके कुर्सी पर बैठ गई,,, उसे गंदी गरम फिल्म का असर उसके बदन पर बुरी तरह से हो रहा था,,,, पंखा फुल स्पीड में चालू होने के बावजूद भी उसे गर्मी का एहसास हो रहा था उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह कुर्सी पर आराम से बैठकर उसे फिल्म के बारे में सोचने लगी,,, कितना गंदा काम कर रहे थे दोनों,,,क्या इस तरह की फिल्म बनाने के लिए मां-बाप इजाजत दे देते हैं,,, फिल्म की हीरोइन कितना गंदा काम कर रही थी मुझे तो सोच कर ही शर्म आती है पेशाब करने के लिए खुद दरवाजा बंद करके किसी की नजर ना पड़ जाए इस तरह से बैठती हूं,,, और कभी कभार बाहर पेशाब करना पड़ जाए तो भी जंगली झाड़ियां का सहारा लेकर या दीवार की ओट मैं भी बैठने से पहले 10 बार चारों तरफ नजर घुमा कर देख लेती हूं कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है लेकिन उस हीरोइन ने तो बेशर्मी की सारी हदों को पार कर दी,,, कितनी बेशरम बनाकर एकदम से वेट कर पेशाब कर रही थी और वह भी पेंटी को बिना उतारे,,,।
फिल्म की हीरोइन का पेशाब करता हुआ दृश्य जैसे ही सुगंध के दिलों दिमाग पर छाने लगा वैसे ही उसकी हालत खराब होने लगी,,, वह अपने मन में सोचने लगी कि वह जब भी पेशाब करती है तो बर से निकलने वाली सिटी की आवाज को जितना हो सकता है उतना दबाने की कोशिश करती थी लेकिन उसे हीरोइन ने तो ऐसा कुछ भी नहीं की बल्कि ऐसा लग रहा था की जान बुझ कर दिखा रही है तभी तो पेड़ के पीछे छुपा हीरो कैसी गंदी हरकत कर रहा था उसे देखकर और तो और अपना लंड बाहर निकाल कर हीला रहा था,,, पेड़ के पीछे छुपे हीरो का ख्याल आते ही उसका लंबा मोटा लंड उसकी आंखों के सामने तैरने लगा उसे यकीन नहीं हो रहा था कि किसी मर्द का इतना मोटा और लंबा भी होता है क्योंकि आज तक अपनी वैवाहिक जीवन में उसने अपने पति के ही लैंड के दर्शन किए थे जो कि उसे हीरो के लंड से आधा भी नहीं था और पतला सा था और ऊपर ना चाहते हुए भी अपने मन में यह सोचने लगी कि अगर इतना मोटा तगड़ा लंड उसकी बुर में जाता तो क्या होता इस बारे में सोचते ही उसकी बुर से पानी बहने लगा,,,।
सुगंधा के लिए यह पहला मौका था जब वह पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी वरना अपने पति के देहांत के बाद उसने अपनी अरमानों का गला घोट दी थी अपनी उत्तेजना पर काबू करके अपने जीवन में अपने बच्चों के साथ खुशी से जीना सीख गई थी लेकिन सुषमा की एक गलती ने उसके दिलों दिमाग को बदल कर रख दिया था ना चाहते हुए भी वह संभोग के बारे में सोच रही थी उसे हीरो के मोटे तकदीर लंड के बारे में सोच रही थी जो की बड़े आराम से उस हीरोइन की छोटी सी बुर में अंदर बाहर हो रहा था और वह हीरोइन भी बिना डरे बिना घबराए बिना दर्द के उस लंड को अपनी बुर में लेकर मजे लेकर चिल्ला रही थी,,,
सुगंध को एहसास होने लगा था कि उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में हलचल हो रही है,,, उसे अपनी बुर में झनझनाहट महसूस हो रही थी सुरसुराहट महसूस हो रही थी जो कि यह बरसों बाद हो रहा था,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वह बार-बार उसे फिल्म से अपना ध्यान भटकाने की कोशिश करती थी लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हो पा रहा था कि उसका ध्यान उसे दृश्य से उसे फिल्म से हट जाए,,,, जांघों के बीच की स्थिति बेहद नाजुक होती जा रही थी,,,, वह अपनी दोनों टांगों के बीच की स्थिति का जायजा लेना चाहती थी उसे देखना चाहती थी उसके बदलाव को परखना चाहती थी इसलिए,,,, धीरे से कुर्सी पर से उठकर खड़ी हो गई,,, और धीरे-धीरे अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठाने लगी,,,,,, बंद कमरे के अंदर अपने ही हरकत पर भी उसे शर्म महसूस हो रही थी और बार-बार वह दरवाजे की तरफ देखने की जोकी उसने खुद बंद कर दी थी,,,, देखते देखते वहां धीरे-धीरे अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठाते हुए अपनी कमर तक ले आई और अपनी नजरों को अपनी दोनों टांगों के बीच लाल रंग की पेटी पर डालते ही वह एकदम से चौंक गई क्योंकि पेंटी के आगे वाला भाग पूरी तरह से गिला हो चुका था मानो कि जैसे उस पर पानी गिरा दिया गया हो उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी बुर इतना पानी छोड़ रही है,,,, अपनी ही बुर से निकले हुए पानी से गीली हुई अपनी लाल रंग की पेंटिं को देख कर उसके तन बदन में हलचल होने लगी और औपचारिक वश वह अपना नीचे की तरफ ले गई और पेंटी के ऊपर रख दी और उसकी ईस हरकत पर उसकी बुर मानो उत्तेजना को बर्दाश्त नहीं कर पाई और पानी का तेज फवारा बुर से झटका मार मार के बाहर निकलने लगा,,, उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा को समझते देर नहीं लगी थी कि वह झड़ रही है,,, वह हैरान थी आश्चर्य से उसकी आंखें चौड़ी हो चुकी थी,,, बरसों से जिस गरम लावा को वह अपने अंदर दबा कर रखी थी वह उसकी एक नादानी से फूट पड़ा था मानो के जैसे पहाड़ में दबी हुई ज्वालामुखी फूट पड़ी हो,,,,, झड़ते हुए उसकी सांसे बड़ी तेजी से चल रही थी और अनजाने में ही उसकी हथेली एकदम से उसकी बुर पर चिपक गई थी और वह हल्के-हल्के पेंटी के ऊपर से ही उसे रगड़ रही थी मसल रही थी ऐसा करने में उसे झड़ने में और भी ज्यादा आसानी और मदहोशी का एहसास हो रहा था,,,, वह पूरी तरह से पागल हो गई थी उसका पूरा बदन पसीने से कर बदल हो चुका था आखिरकार देखते ही देखते हैं उसकी बुर से गरम लावा की एक-एक बुंद बाहर निकल गई,,,,।
झड़ने के बाद वह एकदम से कुर्सी पर धप्प से बैठ गई,,, अभी भी उसकी साड़ी कमर तक कटी हुई थी और वह कुर्सी पर बैठकर जोर-जोर से सांस ले रही थी और धीरे-धीरे अपनी सांसों को दुरुस्त कर रही थी अनजाने में ही हुई अपनी इस गलती से उसके बदन को इतना सुकून और आराम मिल रहा था कि पूछो मत ऐसा लग रहा था कि वह अपने ही अंदर के इस ठिकाने को भूल चुकी थी अनजान थी कभी भूले भटके भी इस जगह से गुजर नहीं रही थी इसीलिए तो इस मंजिल पर पहुंचने पर कितना आनंद और सुकून मिलता है वह भूल चुकी थी और आज अनजाने में ही उसे जगह पर पहुंचते ही उसके जीवन में पुराने ख्याल आने लगे वह मदहोश होने लगी उसे याद आने लगा कि किस तरह से उसका पति बिस्तर पर उसके साथ प्यार करता था भले ही उसे हीरो से उसके पति का लंड छोटा था लेकिन वह जी भरकर प्यार करता था और वह अपने पति के छोटे से लंड से भी बहुत खुश थी,,, पति के रहने पर बिस्तर पर तड़पना तो नहीं पड़ता था आज उसी तरह का सुख उसे अपने ही हाथों से मिला था हालांकि उसने अपनी बुर में अपनी एक उंगली तक को प्रवेश नहीं कराई थी लेकिन फिर भी वह इतनी ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी की पेंटिं के ऊपर से ही अपनी हथेली को बर पर रखते ही बुर अपनी खुद की उत्तेजना को संभाल नहीं पाई और भरभरा कर बहने लगी,,,,।
उसका पूरा बदन पसीने से तरबतर हो चुका था,,, गर्मी का महीना होने के नाते पसीने से तरबतर अपना बदन उसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था अभी अंकित और तृप्ति को आने में बहुत समय था इसलिए वह धीरे से कुर्सी पर से उठी और बाथरूम की तरफ जाने लगी नहाने के लिए वह अपने आप को ठंडा पानी से हल्का करना चाहती थी,,,, और फिल्म के शुरूर से अपने आप को बाहर निकालना चाहती थी,,,,,,।
घर में उसके सिवा और कोई नहीं था इसलिए बाथरूम में प्रवेश करते ही वह बाथरूम का दरवाजा बंद नहीं की,,,,,,, बाथरूम का दरवाजा खुला हुआ था और वहां अपने कंधे पर से साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दी,,,, उसकी सांसे अभी भी बहुत गहरी चल रही थी साड़ी का पल्लू उसकी छाती से नीचे गिरते ही वह नजर नीचे करके अपनी गोल-गोल छातियो की तरफ देखने लगी,,, वैसे भी उसकी छतिया बेहद आकर्षक थी और इस बात को वह अच्छी तरह से जानती थी क्योंकि सड़क पर चलते हुए वह मर्दों की नजरों को अपने बदन पर घूमती हुई देख लेती थी उसे समय तो उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी ,,, लेकिन कभी भी अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव नहीं की थी लेकिन आज वह अपनी ही छातिया को देखकर उत्तेजित हुए जा रही थी,,,, अपने आप ही उसकी दोनों हथेलियां ब्लाउज के ऊपर आ गई और वह फिल्म वाली हीरोइन की तरह अपने आप ही अपनी चूची को दबाना शुरू कर दी,,,, सुगंधा का दिमाग उसके काबू में नहीं था वह समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या कर रही है लेकिन अपनी हरकत पर उसे उत्तेजना का अनुभव हो रहा था उसे आनंद की प्राप्ति हो रही वह हल्के से अपनी आंखों को बंद करके अपने दोनों हथेलियां में अपने दोनों खरबुजो को भरकर दबा रही थी,,,, यहां पर उसके लिए आनंद से भरा हुआ था पहली बार वह अपने हाथों से अपने बदन को उत्तेजित कर रही थी,,,।
बाथरूम का दरवाजा खुला हुआ था दरवाजे पर सीटकनी कितनी लगी हुई थी,,, इसलिए वह बाथरूम का दरवाजा खुला होने पर भी निश्चित थी लेकिन उसके दिलों दिमाग पर जिस तरह का मदहोशी का बहुत छाया हुआ था उससे उसका चेता तंतु बिल्कुल भी काम नहीं कर रहा था सही गलत का फैसला करना अब उसके बस में बिल्कुल भी नहीं था,,,। उसका खुद की सांसों पर काबू नहीं उसकी सांसे बड़ी तेजी से चल रही थी और सांसों की गति के साथ-साथ उसकी बड़ी-बड़ी छतिया भी ऊपर नीचे हो रही थी जो कि उसकी हथेली के कैद में थी लेकिन वह अपने खरबूजा को अपने दोनों कबूतरों को,,, अपने ब्लाउज के कैद से आजाद कर देना चाहती थी इसलिए वह धीरे-धीरे अपने ब्लाउज का बटन खोलने लगी,,,, आज उसे बाथरूम के अंदर अपने ब्लाउज का बटन खोलने में भी अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था वह मस्त हुए जा रही थी ,,, देखते देखते वह अपने ब्लाउज के सारे बटन को खोल दी और उसके ब्लाउज के दोनों पट अलग हो गए,,,, और वह धीरे से अपने ब्लाउज को उतार कर नीचे फेंक दी,,,,, लाल रंग की ब्रा में उसकी खरबूजे जैसी चूचियां बेहद मादक लग रही थी जिसे देखकर उसके खुद की आंखों में नशा छा रहा था और पल भर में उसे अपने मन में यह ख्याल आने लगा कि अगर उसे इस हालत में कोई जवान मर्द देख ले तो उसकी हालत क्या होगी और वह उसके साथ क्या-क्या कर सकता है,,,, क्योंकि वह समझ सकती थी एक औरत होने की नाते एक मर्द की दशा को उसके अंदर के इंसान को अच्छी तरह से जानते थे और वह अच्छी तरह से जानती थी कि अगर ऐसी हालत में वह किसी भी मर्द की आंखों के सामने खड़ी हो जाए तो वह मर्द उसके साथ कुछ भी करने को तैयार हो जाए,,,,,,,
फिल्म का दृश्य उसके मानस पटल पर पूरी तरह से छप चुका था बार-बार उसकी आंखों के सामने वह फिल्म वाली हीरोइन नजर आ रही थी जो अपने हाथों से अपनी नंगी चूचियों को दबा रही थी और इसीलिए सुगंधा ब्रा के ऊपर से ही अपनी बड़ी-बड़ी चूची को पकड़ कर दबाना शुरू कर दी और देखते ही देखते वह खुद ही अपने ब्रा के दोनों कप को हाथों से पकड़ कर उसे ऊपर की तरफ खींच दी और रबड़ के गेम की तरह उसकी चूची एकदम से बाहर निकलते ही उछलने लगी,,, जिसे वह झट से अपने हाथों से पकड़ कर उसे काबू में कर ली,,,और जोर-जोर से दबाना शुरू कर दी मानो कि जैसे कोई मर्द उसकी चूची को हाथों में लेकर दबा रहा हो,,,,।
ससहहहह आहहहहहहह ऊमममममममम ,,,,,,,(उसके आश्चर्य के साथ उसके मुख में से गरमा गरम सिसकारी की आवाज फूटने लगी और वह अपनी आंखों को बंद करके उस आवाज में उस पल में खोने लगी,,,,,, उसे आनंद आने लगा और इससे उसका उत्साह और साहस दोनों बढ़ने लगा,,, वह तुरंत अपने दोनों हाथों को पीछे की तरफ ले गई और तुरंत ब्रा का हुक खोलकर पल भर में ही अपनी ब्रा को भी उतार कर नीचे जमीन पर फेंक दी,,,, कमर के ऊपर व पूरी तरह से नंगे हो चुके थे उसकी खरबूजे जैसी चूचियां एकदम तनी हुई थी जिसे देखकर उसके खुद के मुंह में पानी आ रहा था और वैसे भी उम्र के इस पड़ाव पर उसकी चूचियां इतनी कड़क और तनी हुई थी मानो की जैसे कोई जवान लड़की के हो,,,, अपनी जवानी पर उसे गर्व था,,, लेकिन गर्व के साथ-साथ उसे इस बात का अफसोस भी था कि उसकी भरी हुई जवानी से खेलने वाला अब कोई नहीं था,,,, और इस बात को भी अच्छी तरह से जानती थी कि उसके सिर्फ इशारे की देरी थी वह अपने बिस्तर पर मर्द की लाइन लगा सकती थी,,,,।
वह बड़े जोर-जोर से अपनी चूचियों को दबा दबा कर अपने हाथ से ही टमाटर की तरह लाल करती थी उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में हलचल मचने लगी थी वह एक हाथ से अपनी चूची को पकड़ कर दूसरे हाथ को साड़ी के ऊपर से अपनी बुर पर रखकर दबा रही थी,,,, वह जानती थी कि जिस तरह का तूफान उसके बाद में उठा हुआ है वह किस तरह से शांत होगा इसलिए वह धीरे-धीरे अपनी साड़ी को भी खोलना शुरू कर दी देखते-देखते वह अपनी साड़ी को खोलकर बाथरूम में नीचे गिरा दी,,,,। अब उसके बदन पर केवल पेटिकोट रह गई थी जिसकी डोरी को पकड़ कर वह गहरी गहरी सांस लेते हुए अपनी नाजुक उंगलियों का हरकत देते हुए उसे खींच रही थी पर देखते ही देखते वह अपने पेटिकोट की डोरी को भी खींचकर उसकी गिठन को खोल चुकी थी,,,, पेटिकोट की गिठान खुलते ही कमर पर कई हुई पेटिकोट एकदम से ढीली हो गई लेकिन उसके नितंबों के उभार की वजह से वह उसकी कमर पर टिकी हुई थी जिसे वह अपने दोनों उंगलियों से पकड़ उसे थोड़ा और ढीली करते हुए उसे अपनी कमर से ही नीचे छोड़ दी और उसकी पेटीकोट एकदम से किसी नाटक के परदे की तरह भर भर कर नीचे गिर गई लेकिन नाटक में और इस खेल में फर्क इतना था की नाटक का पर्दा गिरता है तो खेल खत्म हो जाता है लेकिन,,, एक खूबसूरत बदन का पर्दा जब गिरता है तो खेल शुरू होता है और अब खेल शुरू हो चुका था पेटिकोट के नीचे गिरते ही सुगंध के बदन पर की लाल रंग की चड्डी नजर आने लगी और सुगंधा अपनी चड्डी के गौर से देख रही थी जो कि आगे से पूरी तरह से भीग चुकी थी,,,,।
बरसों बाद इस बंजर जमीन पर सावन की बौछार पड़ी थी जिसे पूरी बंजर ज़मीन गीली हो चुकी थी अब इस पर हरियाली लगने की खुशी सुगंधा के चेहरे पर साफ झलक रही थी वह चड्डी के ऊपर से ही अपनी बुर वाली जगह पर अपनी हथेली रखकर उसे दबाते हुए रगड़ने लगी जिससे उसके बदन में अजीब सी फुहार उठने लगी और वह जैसे-जैसे अपनी हथेली को अपनी बर पर घूम रही थी वैसे अपने नितंबों को लचका भी रही थी,,, कमरे के अंदर का दृश्य पूरी तरह से गर्म चुका था अगर ऐसी हालत में उसका सीधा-साधा जवान लड़का देख लेता तो शायद अपने आप को अपनी मां को चोदने से रोक नहीं पाता,,, क्योंकि सुगंधा की हरकत ही इतनी मादकता भरी थी कि दुनिया का कोई भी मर्द देख ले तो या तो उसकी चुदाई करके पानी निकाल ले या तो हिला कर पानी निकाल दे,,,, कुछ देर तक अपनी आंखों को बंद करके चड्डी के ऊपर से ही अपनी बुर से खेलने के बाद सुगंधा अपनी नाजुक उंगलियों को हरकत देते हुए अपने चड्डी के दोनों छोर को अपनी नाजुक उंगलियों में फंसा ली,,, और पल भर में ही उसे फिल्म की हीरोइन की चड्डी उसकी आंखों के सामने नजर आने लगी उसकी चड्डी इतनी छोटी थी की बड़ी मुश्किल से उसकी 2 इंच की बुर उसमें छुपा रही थी बाकी सब कुछ नजर आ रहा था और सुगंधा ने जिस तरह की चड्डी को पहनी थी उससे उसकी पूरी कायनात पर्दे में कैद थी,,,।
धीरे-धीरे सुगंधा अपनी उंगलियों के सहारे अपनी चड्डी को उतारना शुरू कर दी,,,, जैसे-जैसे उसकी चड्डी कमर से नीचे की तरफ जा रही थी वैसे वैसे उसकी दील की धड़कन बढ़ती जा रही थी,,,, वह अपने ही काबू में नहीं थी वह पूरी तरह से बेकाबू हो गई थी उसकी नज़रें उसकी चड्डी के उतरने का इंतजार कर रहे थे वह भी अपनी नंगी बुर को देखना चाहती थी उसकी हालत को देखना चाहती थी तड़पती हुई उसकी बुर कैसी दिखती है वह देखना चाहती थी,,,, और देखते ही देखते सुगंध अपने हाथों से अपनी चड्डी को अपनी खूबसूरत दूर से नीचे कर दी और उसकी बुर जो की हल्की-हल्के बालों की झुरमुटों से घिरी हुई थी नजर आने लगी,,,,,,, उत्तेजना के मारे वह पतली सी दरार कचोरी की तरह फूल गई थी,,, जो कि इस समय बहुत ही खूबसूरत लग रही थी,,,, जिस नजर भर कर देखने के बाद सुगंधा अपनी चड्डी को और नीचे की तरफ ले जाने लगी और देखते ही देखते हो अपने घुटनों से नीचे लाकर पैरों के सहारे उतार फेंकी,,, चड्डी के उतरते ही बाथरूम के अंदर वह अब पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी,,,,, और ऐसा उसने पहली बार की आज तक उसने बाथरूम के अंदर अपने सारे कपड़े उतार कर नहाई नहीं थी,,,,,, लेकिन आज उत्तेजना बस मदहोशी के आलम में वह जो आज तक नहीं करी थी वह कर गुजर रही थी,,, बाथरूम का दरवाजा पूरी तरह से खुला हुआ था इस बात को भी अच्छी तरह से जानती थी वह खुद ही दरवाजा बंद नहीं कि थेटी क्योंकि वह जानती थी कि इस समय कोई घर पर कोई आने वाला नहीं था और वह भी मुख्य द्वार पर पहले से ही सिटकनी लगा चुकी थी,,,,।
उत्तेजना के मारा उसका गला सूख रहा था और वह अपने ही थूक से अपने गले को गिला करने की कोशिश कर रही थी उसकी नजर अपनी ही बुरेट पर टिकी हुई थी वह मदहोशी के आलम में प्यासी नजरों से अपनी ही बुर को देख रही थी,,, जो की अत्यधिक उत्तेजना के मारे फुल पिचक रही थी,,, अपनी बुर की इस प्रक्रिया से वह पूरी तरह से मस्त हुए जा रही थी,,, वैसे भी उसे अपनी बुर के बाल अच्छे नहीं लगते थे लेकिन इस बार उसने सही समय पर क्रीम लगाकर अपनी बुर के बाल को साफ नहीं की थी,,, और अपने मन में ही वह कहने लगी थी की बहुत ही जल्द वह अपने बुर के बाल को साफ करके अपनी बुर को एकदम चिकनी कर लेगी,,,,।
उसकी बुर से अभी भी मदन रस का बहाव हो रहा था,,,, वह अपनी हथेली को धीरे से अपनी बर पर रख दी और अपनी हथेली के नीचे अपनी छोटी सी बर को पूरी तरह से ढंक ली,,, बुर की गर्मी उसे अपनी हथेली में महसूस हो रही थी जिसकी गर्मी में उसकी जवानी का रस पिघल रहा था,,, उसे अपनी बुर की जवानी बर्दाश्त नहीं हो रही थी ,,और वह हल्के हल्के अपनी बुर को अपनी हथेली से रगड़ना शुरू कर दी,,, अपनी बर को हथेली से रगड़ने में उसे इतना अत्यधिक आनंद प्राप्त हो रहा था कि पूछो मत वह पूरी तरह से मस्त हुए जा रही थी यह वैवाहिक जीवन के बाद का उसकी पहली हरकत थी जो अपने ही अंगों से वह खेल रही थी,,,,
सुगंधा की हालत खराब होती जा रही थी उसके बदन में उत्तेजना पूरी तरह से अपना असर दिख रही थी और वह एक हाथ से अपनी चूची को दबा रही थी उसकी आंखों में अजीब सी अकड़न छा रही थी,, उसके चेहरे के भाव पल-पाचल बदलते जा रहे थे,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और इसी बीच उसने अपनी बीच वाली उंगली को धीरे से अपनी बुर के अंदर प्रवेश करा दी,,।
बरसों गुजर गए थे उसकी बुर में लंड घुसा नहीं था इसलिए वर्षों के बाद अपनी उंगली का प्रवेश बुर में करते ही उसे लंड का एहसास होने लगा वैसे भी,,, बरसों तक एक उंगली भी ना प्रवेश करने के कारण उसकी बुर कस चुकी थी,,, उसकी बुर का कसाव जवान लड़की की तरह हो चुका था,,, और इस एहसास से वह एकदम मस्त हुए जा रही थी,,, देखते ही देखते उसकी उंगली बुर के अंदर रफ्तार पकड़ ली थी और वह उत्तेजना के चलते अपनी उंगली को जल्दी-जल्दी अंदर बाहर कर रही थी और ऐसा करने में उसे अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी वह मस्त हुई जा रही थी उसकी आंखें बंद हो चुकी थी,,, एक हाथ से हुआ अपनी चूची को दबा रही थी बड़ी-बड़ी से दोनों चूचियों को अपनी एक हथेली में लेकर वह दबाते हुए मजा लूट रही थी,,,,।
और अपनी आंखों को बंद करते ही वह कल्पना की दुनिया में खोने लगी और उसके कल्पना में वही फिल्मों वाला हीरो उसकी आंखों के सामने उसकी हरकत देखकर अपने मोटे तगड़े लंड को हिलाना शुरू कर दिया उसकी यह कल्पना,, इतनी जबरदस्ती की वह अपनी ही कल्पना में पूरी तरह से खो चुकी थी उसके मुंह से गरमा गरम शिकारी निकल रही थी और वहां कल्पना में देख रही थी कि वह फिल्म वाला हीरो उसकी तरफ आगे बढ़ने लगा और देखते-देखते वह भी बाथरुम के अंदर प्रवेश कर गया लेकिन बाथरूम के अंदर प्रवेश करने से पहले वह अपने बदन के सारे कपड़े उतार कर एकदम नंगा हो चुका था उसकी ही तरह,,,,,,। और बाथरूम के अंदर प्रवेश करते ही वह तुरंत उसके लाल-लाल होठों को अपने होठों में भरकर उसे चुंबन करने लगा वह पागल होने लगी,,,, कल्पना की दुनिया में वह पूरी तरह से खो चुकी थी उसे फिल्म वाले हीरो का वह पूरी तरह से साथ दे रही थी कल्पना में वह हीरो उसका चुंबन करने के साथ-साथ उसकी दोनों चूचियों को अपने हाथ में लेकर दबा दबा कर मजा ले रहा था,,, बाथरूम के अंदर सुगंधा के मुंह से गरमा गरम संस्कारी की आवाज फूट रही थी वास्तविक रूप से उसकी एक ऊंगली उसकी बुर के अंदर बाहर हो रही थी और कल्पना में वह फिल्म वाले हीरो के साथ मजे लूट रही थी जिसके चलते उसका आनंद 2 गुना बढ़ता जा रहा था,,,,,,,
वह फिल्म वाला हीरो उसे चोदने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुका था वह अपने हाथ में अपने लंड को लेकर जोर जोर से मुठिया रहा था,,, सुगंधा कल्पना कर रही थी कि वह हीरो उसकी एक टांग को अपने हाथ से उठाकर अपनी कमर पर लपेट रहा है और हकीकत में वह खुद अपने आनंद को बढ़ाने के लिए अपने पैर को उठाकर नल के ऊपर रख चुकी थी और जैसे ही फिल्म वाला हीरो अपने लंड को उसकी बुर में प्रवेश करने लगा वैसे ही सुगंध अपनी दूसरी उंगली को भी अपनी बुर में डाल दी और कल्पना की दुनिया में हुआ फिल्म वाला हीरो अपने लंड को धीरे-धीरे उसकी बुर के अंदर पूरा का पूरा डाल दिया और उसकी कमर को पकड़ कर छोड़ना शुरू कर दिया और वह वास्तविक रूप से अपनी दोनों उंगलियों को अपनी बुर के अंदर बाहर करके मजा लूटने लगी,,,,।
सुगंधा की कल्पना इतनी जबरदस्त थी की वह पागल हुए जा रही थी,,, उसे ऐसा ही लग रहा था कि वह फिल्म वाला हीरो अपने मोटे तगड़े लंड से उसकी चुदाई कर रहा है लेकिन वास्तविक में वह अपनी दो उंगलियों से अपनी प्यास बुझाने में लगी हुई थी,,, देखते देखते उसे फिल्म वाले हीरो केलझटके बड़े तेजी से चलने लगे और सुगंधा की उंगलियां बड़ी तेजी से अपनी बुर के अंदर बाहर होने लगी देखते-देखते उसकी सांसे बड़ी तेजी से चलने लगी,,, और उसकी कल्पना में फिल्म वाला हीरो अपने मोटे तगड़े लंड को उसके बच्चेदानी तक पहुंचा करता के पर धक्के लगा रहा था,,,,।
सुगंधा की सांसे बड़ी तेजी से चल रही थी और वह उसे फिल्म वाले हीरो का साथ देते हुए खुद अपनी कमर हिला रही है और देखते ही देखते बड़ी तेजी के साथ उसका पानी निकलने लगा वह झड़ने लगी,,, और जब आंख खुली और वह कल्पना की दुनिया से बाहर आई तो बाथरूम में वह केवल अकेली थी और नीचे की तरफ देखी तो उसकी बुर में उसकी दो उंगली घुसी हुई थी जिसमें से उसका मदन रस फव्वारे की तरह बाहर निकल रहा था वह इस दृश्य को देख कर एकदम शर्म से पानी पानी हो गई,,,, वह अपनी स्थिति को देखते हुए शर्म के मारे बाथरूम के दरवाजे को बंद कर ले और फिर ठंडे पानी को अपने बदन पर डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश करने लगी लेकिन फिर भी भले ही वह इस समय अपनी हरकत की वजह से शर्म से पानी पानी हो रही थी लेकिन जो कुछ भी उसने अपने हाथों से की थी,, इसका एहसास उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था जो की संतुष्टि से परिपूर्ण था,,,।
चार-पांच दिन गुजर गए थे सुषमा से उसकी मुलाकात नहीं हुई थी सुषमा खुद उसकी आंखों के सामने आने से कतरा रही थी क्योंकि उसके मन में यही डर था कि सुगंधा क्या सोच की कि वह लोग इस तरह की फिल्में देखते हैं जबकि अनजाने में ही सब कुछ हुआ था इसमें सुषमा का भी कोई दोस्त नहीं था फिर भी शर्मिंदगी का एहसास उसे एक दूसरे से नजर मिलाने से कतरा रही थी,,,,,,, कुछ ही दिन में सब कुछ सहज हो गया था,,, सुगंधा अपना ध्यान दूसरे कामों में लगाकर रात को अपनी बिस्तर पर कोई अच्छी सी किताब पढ़ कर सो जाती थी वह किताब इसलिए पढ़ती थी ताकि उसका ध्यान दूसरी तरफ ना जाए और सब कुछ फिर से पहले जैसा ही चलने लगा था,,,।
लेकिन तृप्ति जो की पूरी तरह से जवान हो चुकी थी उसकी नजर संदीप नाम के लड़के से लड़ चुकी थी और आए दिन कभी कबार उससे मुलाकात हो जाती थी ऐसे ही एक दिन शाम ढल चुकी थी और वह ट्यूशन से घर की तरफ आ रही थी और रास्ते में संदीप उसका इंतजार कर रहा था,,, तृप्ति घर के पीछे वाले रास्ते से आ रही थी यहां पर भीड़भाड़ बहुत कम रहती है और यहां पर अंधेरा भी रहता है क्योंकि स्ट्रीट लाइट यहां पर नहीं रहती इस रास्ते से घर जल्दी पहुंच जाता था इसलिए तृप्ति कभी कबार जब देर हो जाती तो इस रास्ते का उपयोग करती थी,,,, वह बेफिक्र अकेले ही ट्यूशन से अपने घर की तरफ लौट रही थी शाम ढल जाने की वजह से अंधेरा छा चुका था लेकिन तृप्ति के मन में बिल्कुल भी भय नहीं था,,, लेकिन जैसे ही वह एक पतली गली से गुजरी की तभी उसका हाथ पकड़ कर संदीप ने अपनी तरफ खींच लिया और वह एकाएक संदीप की बाहों में चली गई,,, अपने साथ हुई इस तरह की एकाएक हरकत से तृप्ति एकदम से घबरा गई वह शोर मचाने ही वाली थी कि संदीप तुरंत उसके मुंह पर हाथ रखते हुए बोला,,,।
अरे मैं हूं संदीप,,,,
(एकाएक हुई हरकत की वजह से तृप्ति के तन-बदन में अजीब सी हलचल हो गई थी वह एकदम से घबरा गई थी उसकी सांसे बड़ी तेजी से चलने लगी थी,,,, और जैसे ही संदीप ने अपने हाथ को उसके मुंह से हटाया तृप्ति गुस्सा दिखाते हुए एक तमाचा उसकी गाल पर लगा दी और बोली,,,)
आइंदा इस तरह का मजाक मेरे साथ बिल्कुल भी मत करना,,,, तुम नहीं जानते कि मैं कितनी घबरा गई,,, अगर तुम्हारी जगह कोई और होता तो,,,
अरे पागल ऐसे किसी की हिम्मत है क्या की कोई इस तरह से लड़की को पकड़ ले,,,,(गाल पर पड़े तमाचे को भुलते हुए संदीप बोला क्योंकि वह जानता था कि जिस तरह की हरकत उसने किया था वह गलत था और ऐसे में किसी को भी गुस्सा आ जाएगा,,,,)
लेकिन संदीप तुम्हें इस तरह की हरकत शोभा नहीं देता इस तरह से अंधेरे में मुझे पकड़ कर गली में,,,छी,,,, मुझे तो सोच कर ही इतना गंदा लग रहा है अगर कोई नहीं देख लिया होता तो मैं तो बदनाम हो जाती,,,,
(तृप्ति घबराहट भरे श्वर में बोली अभी तक उसके दिल की धड़कन बड़ी तेजी से चल रही थी,,,)
अरे बाबा सॉरी बस मुझे नहीं मालूम था कि तुम इतना गुस्सा करोगी मैं तो तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था,,,,
सरप्राइज ऐसा होता है सरप्राइज,,,,
अरे बाबा सॉरी कहा ना,,, आते ही गाल पर तमाचा लगा दी लेकिन इतना भी नहीं सोच रही हो कि मैं इतनी दूर से चलकर तुमसे सिर्फ मिलने के लिए आया हूं,,,,।
(संदीप की बात सुनकर तृप्ति को जैसे होश आया हूं वह एकदम से सोचने लगी कि वाकई में संदीप को तकरीबन 3 किलोमीटर दूर रहता है और इतने दूर से चलते हुए वह यहां क्या करने आया था उससे सिर्फ मिलने के लिए अपनी गलती का अहसास होते हुए तृप्ति नरमी भरे स्वर में बोली,,,)
अरे बाप रे मैं तो गुस्से ही गुस्से में भूल गई कि तुम तो काफी दूर रहते हो और यहां क्या करने के लिए आए हो,,,
कहा तो सिर्फ तुमसे मिलने के लिए,,,,
बाप रे मुझसे गलती हो गई मैं माफी चाहती हूं,,,,
(तृप्ति को अपनी गलती का एहसास हो रहा था)
कोई बात नहीं गलती मेरी ही है जिस तरह की हरकत मैंने किया हूं एक तमाचा नहीं बल्कि चार-पांच तमाचा पडना चाहिए था मैं भी उत्साहित होकर कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गया,,,,,
एक बार फिर सोरी कहती हूं लेकिन मिलना ही था तो कॉलेज में मिल लिए होते इतनी दूर चलकर आने की क्या जरूरत थी,,
क्या करूं तृप्ति तुमसे मिलने का बहुत मन कर रहा था इसलिए बिना सोचे समझे इधर चलाया मैं जानता था कि तुम इधर से भी घर की तरफ जाती हो,,,, इसलिए यहां से अच्छी जगह मिलने के लिए और कोई हो ही नहीं सकती थी इसलिए तुम्हारा इंतजार कर रहा था और मेरी किस्मत देखा कि आज तुम इधर से ही आ रही थी,,,।
और अगर मैं इधर से ना आ रही होती तो,,,(तृप्ति थोड़ा सा इठलाते हुए बोली,)
तो फिर तुम्हारे घर पर मिल लिया होता किताब लेने के बहाने,,,,
नाना नाना ऐसा बिल्कुल भी मत करना मेरी मम्मी बहुत सवाल पूछता है और उसे समझते देर नहीं लगी की हम दोनों के बीच कुछ चल रहा है,,,,
क्या चल रहा है तृप्ति,,,(मौका देखते ही संदीप बोल पड़ा और अपनी बात का मतलब समझते ही प्रीति शर्मा गई और संजू एक कदम आगे बढ़ते हुए उसका हाथ पकड़ लिया वैसे तो वह तृप्ति के साथ इस तरह की हरकत बिल्कुल भी नहीं करना चाहता था लेकिन मौका और दस्तूर दोनों उसके पक्ष में थे क्योंकि चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था और वह दोनों एक पतली सी गली में थे और यहां से कोई गुजरा भी नहीं था चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था इसलिए संदीप का मन कुछ ज्यादा मचलने लगा,,, इस तरह से संदीप द्वारा अपना हाथ पकड़े जाने पर तृप्ति के बदन में अजीब सी हलचल होने लगी वह भी जानते थे कि जिस तरह का माहौल था जिस तरह से अंधेरा छाया हुआ था ऐसे माहौल में एक जवान लड़का एक जवान लड़की के साथ छेड़खानी जरूर करता है इसीलिए वह अंदर ही अंदर घबरा भी रही थी और न जाने क्यों उसकी मां उत्सव भी हो रहा था संदीप के द्वारा किसी तरह की हरकत के लिए,,,, संदीप के सवाल का जवाब देते हुए तृप्ति घबराते हुए बोली,,,)
ककककक कुछ नहीं कुछ नहीं चल रहा है हम दोनों के बीच,,,,
तुम झूठ बोल रही हो होठों पर कुछ और है और मन में कुछ और,,,
नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है,,,,
तुम झूठ बोल रही हो ,,,(ऐसा कहते हुए संदीप तृप्ति के बेहद करीब आ गया और तुरंत उसकी कमर में हाथ डालते हुए उसे अपनी तरफ एकदम से खींच लिया एक जवान लड़की के बेहद करीब रहने की वजह से संदीप का लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था और वह पेट में तंबू बनाया हुआ था और जिस तरह से उसने तृप्ति को अपनी तरफ खींचकर उसे अपने बदन से सताया था संदीप का तंबू सीधा उसकी दोनों टांगों के बीच दस्तक देने लगा पहले तो प्रीति को बिल्कुल भी समझ में नहीं आया कि उसकी दोनों टांगों के बीच कौन सी कड़क चीज चुभ रही है लेकिन जैसे ही उसे इस बात का एहसास हुआ वह एकदम से शर्म से पानी पानी होने लगी,,,, उसके सांसे पल भर में ही एकदम से तेज चलने लगी,,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,, और संदीप इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसका लंड तृप्ति की बुर के ऊपर ठोकर मार रहा है भले ही सलवार के ऊपर से क्यों ना लेकिन इस एहसास से संदीप के तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी एक अद्भुत संतुष्टि का एहसास हो रहा था उसे बहुत मजा आ रहा था क्योंकि वह इस बात को तो अच्छी तरह से जानता था कि तृप्ति उसे ज्यादा कुछ करने नहीं देगी लेकिन जितना भी इस समय वह कर रहा था उसके लिए तो मुंह मांगी मुराद थी उम्मीद से ज्यादा था और तृप्ति भी कभी सोची नहीं थी कि संदीप उसके साथ इस तरह की हरकत करेगा एक मोटे तगड़े लंड की ठोकर अपनी बुर पर महसूस करते ही वह पानी पानी हो रही थी साथ में उसकी बुर भी पानी छोड़ने लगी थी,,,,,, तृप्ति खामोश हो चुकी थी उससे कुछ कहा नहीं जा रहा था वह पूरी तरह से संदीप की बाहों में थी उसकी कमर पर संदीप का मजबूत हाथ था और इस समय तृप्ति को खामोश देखकर वह अपने दोनों हथेलियां को उसके उभरे हुए नितंबों पर रख दिया था और जैसे ही उसने अपनी हथेली को तृप्ति के नितंबों पर रखकर उसे हल्का सा तब पहुंचा था तृप्ति पूरी तरह से मदहोश हो गई थी उसके बदन में सुरसुराहट से दौड़ने लगी थी उसकी सांसे ऊपर नीचे हो गई थी वह कुछ बोल सकते में सक्षम नहीं थी और इसी का फायदा उठाते हुए संदीप धीरे से बोला,,,)
हम दोनों के बीच प्यार परत रहा है तुम मुझसे बहुत प्यार करती हो और मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं तृप्ति मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता,,,,।(और इतना कहने के साथ ही संदीप उत्साहित और उत्तेजित होकर तुरंत उसके लाल होठों पर अपने होंठ रख दिया और उसके होठों का चुंबन लेने लगा उसके होठों का रस पीने लगा जीवन में यह तृप्ति का पहला चुंबन था इसलिए उसके बदन में झटका सा लगने लगा था उसके बदन में सुरसुराहट से दौड़ने लगी थी,,, लेकिन संदीप कई बार लड़कियों के होठों का चुंबन ले चुका था इसलिए वह लड़कियों को होंठों का रस पीना अच्छी तरह से जानता था और ऐसे माहौल में लड़कियों के अंगों से खेलना भी जानता था,,, संदीप के चुंबन से तृप्ति पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है लेकिन जो कुछ भी हो रहा था उसे आनंद की अनुमति हो रही थी उसी का फायदा उठाते हुए संदीप दोनों हाथों से खसखस के उसकी गोल-गोल गांड को दबा रहा था इसे दबाने में उसे अद्भुत सुख की प्राप्ति हो रही थी तभी वह इस पल को पूरी तरह से जी लेना चाहता था और आगे से अपने लंड को जो की तंबू बना हुआ था वह सलवार के ऊपर से उसकी बुर पर रगड़ रहा था और ऐसा करते हुए वह एक हाथ ऊपर की तरफ ले आया और उसके संतरों को हाथ में लेकर दबाना शुरू कर दिया वह अपनी हरकतों से तृप्ति को पूरी तरह से मदहोश कर देना चाहता था और तृप्ति संदीप की हरकत से पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी उसकी आंखों में चार बोतलों का नशा छा रहा था उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है,, उसे अद्भुत शांति अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी वह मदहोश हुए जा रही थी संदीप अपनी हरकतों को पूरी तरह से जारी रखते हुए उसके अंगों से खेल रहा था,,,,।
तृप्ति की चूची दबाते हुए एक हाथ से उसकी गोल गोल गांड को दबाते हुए और साथ ही उसके लाल-लाल होठों का रसपान करते हुए नीचे से जो वह अपने तंबू से उसके बुरे पर हरकत कर रहा था वह पूरी तरह से एक जवान लड़की के लिए पागल कर देने वाली हरकत थी,,,, इस तरह की हरकत का एहसास तृप्ति को पहले बिल्कुल भी नहीं था इसलिए वह पूरी तरह से पानी पानी हो रही थी और उसकी बुर पानी छोड़ रही थी जिसके चलते उसकी पेंटिं गीली हो रही थी,,,,, तृप्ति को आनंद के सागर में डूबता हुआ देखकर संदीप की हिम्मत बढ़ने लगी और उसकी हरकत भी बढ़ने लगी वह धीरे से अपना हाथ उसकी सलवार के अंदर डालना शुरू किया लेकिन इस बार तृप्ति उसे रोकते हुए अपना हाथ उसके हाथ पर रखकर कस के पड़े दे लेकिन संदीप बहुत चालाक था वह जल्दी से अपनी हथेली को उसकी सलवार के अंदर डाल दिया और पेंटी के ऊपर से ही अपनी हथेली को उसकी बुर पर रखकर उसे कस के उत्तेजना के मारे अपनी हथेली में दबोच लिया,,,,, यह हरकत तृप्ति के लिए उत्तेजना से जानलेवा थी वह पूरी तरह से मस्त हो गई तृप्ति संदीप को इस तरह की हरकत करने देना नहीं चाहती थी लेकिन वह अपने बदन के जोश और उसमें आ रहे बदलाव के आगे पूरी तरह से मजबूर हो चुकी थी,,,, संदीप के हाथ में तो गुलाब जामुन आ गया था वह जोर-जोर से पेंटी के ऊपर से ही उसकी बुर को रगड़ रहा था मसल रहा था और उसकी गर्माहट का एहसास अपनी हथेली पर भी महसूस कर रहा था लेकिन संदीप अपनी हरकत को और आगे बढ़ता है इससे पहले ही दोनों के कानों में गाड़ी के होरन की आवाज गुंजने लगी जोकी दूर से आ रही थी ,,, और तृप्ति को जैसे एकदम से होश आया हो वह तुरंत संदीप से अलग होने लगी और संदीप भी मौके की नजाकत को देखते हुए उसे अपनी बाहों की कैद से आजाद कर दिया लेकिन मोटरसाइकिल के हेडलाइट का उजाला दोनों के चेहरे पर पड़ता है इससे पहले ही संदीप ने उसका हाथ पकड़ कर पतली गली में थोड़ा सा और अंदर लेकर चला गया और मोटरसाइकिल गुजर गई लेकिन साथ ही तृप्ति के दीलो दिमाग से वासना का भूत भी उतर गया,,, वह तुरंत संदीप से हाथ छुड़ाकर गली से बाहर निकली और बिना कुछ बोल जल्दी-जल्दी अपने घर की तरफ जाने लगी संदीप वहीं खड़ा उसे आवाज देकर है लेकिन वह पीछे मुड़कर देखी भी नहीं और अपने घर पहुंच गई,,,,।
अपने घर पर पहुंचते ही तृप्ति कोई इस बात का एहसास हुआ कि वह बहुत बड़ी गलती करने जा रही थी आज उसके साथ बहुत कुछ हो सकता था आज संदीप उसके साथ मनमानी कर सकता था क्योंकि वह भी उसका विरोध बिल्कुल भी नहीं कर रही थी संदीप की हरकत का वह भी मजा ले रही थी,,,, वह तुरंत बाथरूम के अंदर गई,,, और अपनी सलवार की थोड़ी खोल कर सलवार उतार कर अपनी पैंटी को देखने लगी जो की पूरी तरह से गीली हो चुकी है ऐसा उसके साथ पहली बार हुआ था कि उसकी पेंटिं इस तरह की हरकत से गीली हो गई थी वह तुरंत अपनी पेंटि उतार कर पेशाब करके अपनी बुर पानी से धोने के बाद बाथरूम से बाहर आ गई और अपनी मां के काम में हाथ बंटाने लगी,,,,,,।
कॉलेज में वह संदीप से बात भी नहीं करना चाहती थी क्योंकि उसे नजर मिलाने में उसे शर्म महसूस हो रही थी,,, उसके मन में इस बात की भी खबर आरती की अगर उसे दिन कोई उसे देख लेता तो फिर क्या होता वह बदनाम हो जाती है घर से निकलना मुश्किल हो जाता और उसकी मां का भी नाम खराब हो जाता इस बारे में अगर उसकी मां को पता चलता तो फिर क्या होता उसकी मां भी शर्मिंदा हो जाती घर से निकलने में उसे भी शरम महसूस होती,,, यही सब सो कर वह संदीप से दूरी बनाकर चल रही थी और संदीप उससे बात करना चाहता था लेकिन प्रीति उससे बात के लिए तैयार ही नहीं थी,,,
ऐसे ही एक दिन सब्जी लेते हुए सुगंधा की मुलाकात सुषमा से हो ही गई वैसे तो सुषमा उसकी पड़ोसी थी लेकिन फिर भी उसे दिन से वह दोनों एक दूसरे से मिले नहीं थे लेकिन आज सब्जी मंडी में दोनों का सामना होते ही सुगंधा नाराजगी दिखाते हुए सुषमा से बोली,,,।
सुषमा तूने तो एकदम हद कर दी वह तो सोच तेरे हाथ में वह कैसेट आ गया अगर जरा सोच वह कैसे अगर कुसुम के हाथ में आ गया होता तब क्या होता अगर वह भूल से भी उसे फिल्म को देख लेती तो कुछ समझ में आता है कि इसका असर उसके ऊपर कैसा होता,,,(सुषमा की लड़की का नाम कुसुम)
तू सही कह रही है सुगंधा मैं भी यही सोच कर हैरान हूं अच्छा हुआ कि कुसुम के हाथ में यह सब नहीं पड़ा वरना गजब हो जाता वैसे भी मैं कुसुम के पापा से पूछी थी कि इस तरह की केशट तुम क्यों लाए तो,,, बोलने लगे की हम दोनों को देखने के लिए लेकिन उन्हें समय नहीं मिला और मुझे बताना भूल गए और सच कहूं तो सुगंधा मैं जिस दिन उन्हें बताई उसी रात को उन्होंने फिर से वही फिल्म लगे और हम दोनों वही फिल्म देखें और उसके बाद तो कुछ उनके पापा ने रात भर मुझे जगा कर रखा मेरी तो कमर दुखने लगी,,,(सुषमा हंसते-हंसते बात भी रही थी और शर्मा भी रही थी लेकिन उसके हंसी में एक आनंद छिपा हुआ था जो उसने खुद महसूस की थी लेकिन उसकी हंसी उसका आनंद देखकर सुगंधा के दिल में शूल चुभने लगा ,,,, उसे सुषमा पर गुस्सा आने लगा और वह भी इस बात पर की इतनी गंदी फिल्म दिखा कर वह तो अपने पति के साथ मजा लूट रही थी लेकिन उसका क्या वह किसके साथ मजा लूट थी और इस फिल्म के चलते वहां बिस्तर पर करवट बदलकर रात गुजरने लगी थी और अपने हाथों की हरकत से अपने आप को संतुष्ट करने लगी थी वह तो अच्छा हुआ कि अपना ध्यान वह दूसरे काम में लगाकर अपनी गलती पर अपनी भावनाओं पर पर्दा डाल दी थी लेकिन आज सुषमा के मुंह से उसके आनंद की बात सुनकर ना जाने क्यों सुगंधा के मन में भी अजीब सी हलचल होने लगी और वहां से वह बिना कुछ बोले खरीदी करने के बहाने है गई क्योंकि न जाने क्यों सुषमा से नजर मिलाने में उसे शर्म महसूस होने लगी थी,,,। सब्जी खरीद कर अपने बच्चों के लिए समोसे और जलेबी खरीद कर वह घर पहुंच गई थी,,,।
अपने बेटे की गठीले बदन को प्यासी नजरों से देखने पर उसके मन में भी अभिलाषा जागने लगी थी,,, और औपचारिक रूप से अंकित के अंडरवियर में हो रही हलचल को उसके उभार को सुगंधा गलत नजरिया से देख कर उसका गलत ही अर्थ निकाल ली थी,,, सुगंधा को ऐसा ही लग रहा था कि उसकी उपस्थिति में उसका बेटा उत्तेजित हो रहा है और इसी के चलते वह अपने मां पर काबू नहीं कर पाई और छत से नीचे आते ही तुरंत बाथरूम में घुसकर अपनी साड़ी कमर तक उठाकर अपनी बुर में उंगली डालकर अपनी प्यासी बुर की प्यास बुझाने की भरपूर कोशिश करने लगी लेकिन अब यह प्यास पूरी तरह से भड़क चुकी थी,,, जोकी उंगली से बुझने वाली नहीं थी,,,,,
अब तो ऐसा लगता था कि जैसे सुगंधा को रात होने का ही बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता था,,, टीवी बंद होते ही वह अपने कमरे में चली जाती थी और कमरे में जाते ही अपने सारे वस्त्र उतार कर संपूर्ण रूप से नंगी हो जाती थी और बिस्तर पर अंगड़ाइयां लेते हुए अपने ही नाजुक अंगों से खेलती थी और अपनी बुर में एक उंगली नहीं बल्कि दो दो उंगली डालकर अपनी प्यास बुझाने की भरपूर कोशिश करती थी,,, लेकिन निरंतर यह प्यास बढ़ती जा रही थी इसका कोई हाल उसे नजर नहीं आ रहा था उसकी मन पुरुष संसर्ग के लिए तड़प रहा था,,, लेकिन वह दूसरी औरतों की तरह नहीं थी उन औरतों में से नहीं थी जो अपनी प्यास बुझाने के लिए किसी भी मर्द का सहारा ले लेती थी पैशे से वह शिक्षिका थी,,, अपनी स्थिति को देखते हुए सुगंधा अपने मन में आए इस तरह के विचार को रफा-दफा करते थे लेकिन बार-बार उसका मन उसी तरफ आकर्षित होता था इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी भरी जवानी में वह पति के सुख से वंचित हो चुकी थी फिर भी जैसे तैसे करके वह इतने बरस निकाल ली थी लेकिन अब बरसों से दबी हुई आज भड़क चुकी थी उसके बदन की चिंगारी अब शोले का रूप ले रही थी वह ऐसे मर्द की तलाश में थी जो उसकी प्यास बुझा सके उसकी आग को शांत कर सके,,, और जब इस तरह का ख्याल आता था तो न जाने क्यों उसकी आंखों के सामने उसका बेटा ही नजर आता था न जाने क्यों उसे ऐसा लगने लगा था कि उसकी जवानी कृपया बुझाने का सही हकदार उसका बेटा ही है,,,। लेकिन जब कभी भी उसके मन में इस तरह का ख्याल आता था तो उसके मन में बहुत ग्लानी होती थी उसे अपने आप पर ही बहुत गुस्सा आता था,,, वह अपने आप को धिक्कारने लगती थी वह अपने आप को कोसने लगती थी कि इस तरह का ख्याल भी उसके मन में क्यों आया,,, वासना उसके दिलों दिमाग पर पूरी तरह से छा चुका था लेकिन फिर भी वह वासना में इस कदर अंधी भी नहीं हो चुकी थी कि वह अपनी प्यास बुझाने के लिए अपने बेटे का सहारा ले,,, मां बेटे के बीच के पवित्र रिश्ते को वह तार तार नहीं करना चाहती थी,,,, इसलिए इस तरह के ख्याल पर वह पुर्णविराम लगा देती थी और दोबारा इस तरह का ख्याल अपने मन में ना आए इसलिए कम भी खा लेती थी लेकिन फिर दूसरे दिन जब भी उसके दिलों दिमाग पर वासना का भूत सवार होता था तब उसकी आंखों के सामने फिर उसके बेटी का अर्धनग्न शरीर नजर आने लगता था उसके अंडरवियर का उभार नजर आने लगा है पर वह अपने मन में सोचने लगती थी कि उसके अंडरवियर में उसका लंड कैसा दिखता होगा कैसा होगा खड़ा होने के बाद उसकी स्थिति क्या होती होगी कितने इंच का होगा क्या वह किसी औरत की प्यास बुझाने में सक्षम होगा कि नहीं यही सब सोचकर वह अपनी बुर को पूरी तरह से गीली कर लेती थी और फिर अपनी प्यास बुझाने के लिए अपनी उंगलियों का सहारा लेती थी,,,,।
और यही स्थिति तृप्ति की भी थी वह भी अब बेचैन रहने लगी थी संदीप की हरकत से जहां एक तरफ वह परेशान थी वहीं दूसरी तरफ उसे उसकी हरकत आनंददायक भी लग रही थी हालांकि उसने संदीप से बातचीत करना बंद कर दी थी उसे अब डर लगने लगा था संदीप के सामने आने में,,,, और संदीप इस बात से पूरी तरह से परेशान था,,,, वह किसी भी तरह से तृप्ति से बात करना चाहता था उससे माफी मांगना चाहता था,,, क्योंकि वह अपनी गलती की वजह से कीर्ति जैसी खूबसूरत लड़की को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहता था हालांकि उसका मकसद तृप्ति के खूबसूरत बदन को प्राप्त करना ही था लेकिन फिर भी वह दोस्ती दिनों के लिए अपने दिमाग से यह बात को निकाल दिया था और किसी भी तरह से वह तृप्ति से मिलकर माफी मांग कर उसे फिर से दोस्ती का रिश्ता आगे बढ़ना चाहता था क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि अगर एक बार फिर से तृप्ति उससे बातचीत करना शुरू कर देगी तो वह एक बार जरूर बातचीत के जरिए अपनी हरकतों की जरिए उसकी दोनों टांगों के बीच आराम से पहुंच जाएगा क्योंकि उसने भी तृप्ति की स्थिति को भांप लिया था ,,, वह भी समझ गया था कि उसकी हरकत से तृप्ति को भी आनंद प्राप्त हो रहा था,,,, और तृप्ति से बातचीत करने का मौका उसे जल्द ही प्राप्त हो गया,,,, वह ट्यूशन से लौट रही थी और रास्ते में संदीप उसका इंतजार कर रहा था और जैसे ही तृप्ति उसके पास से गुजरने लगी वह ठीक उसके साथ चलना शुरू कर दिया अपने करीब संदीप को इस तरह से चलता हुआ देखकर वह पल भर के लिए घबरा गई,,,, और एकदम से चौंकते हुए बोली,,,।
संदीप तुम,,, अप किस लिए मेरा पीछा कर रहे हो मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी है,,,
अरे तुम्हें मुझसे बात नहीं करनी लेकिन मुझे तो तुमसे बात करनी है ना,,,
किस लिए बात करनी है तुम्हारे मन में क्या है उस दिन मुझे पता चल गया,,,
अरे उसी बारे में तो मुझे बात करनी है,,,
क्या बात करनी है अब मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी है,,,
अरे यार सुनो तो,,,(सड़क पर एक जगह घने पेड़ के नीचे एकांत पाकर वह तृप्ति का हाथ पड़कर उसे रोक लिया और तृप्ति संदीप की हरकत पर एकदम से चौंक गई और इधर-उधर देखने लगी उसे इस बात का डर था कि कहीं संदीप इस समय भी वही हरकत करना शुरू न कर दे इसलिए वह अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली,,,)
देखो संदीप तुम्हारी यही बदतमीजी मुझे अच्छी नहीं लगती,,,
और इसीलिए तो मैं माफी मांगना चाहता हूं तुमसे,,,,(तृप्ति का हाथ उसी तरह से पकड़े हुए,,) मुझे मेरी गलती का एहसास है,,,, मुझे भी नहीं मालूम की वह सब कैसे हो गया इसलिए तो मैं तुमसे माफी मांगने के लिए तुम्हारी आगे पीछे घूम रहा हूं और तुम होगी मुझे नजर बचाकर हमेशा भाग जाती हो,,,
भाग ना जाऊं तो और क्या करूं,,,(संदीप के हाथ से अपना हाथ छुड़ाने हुए लेकिन वह संदीप से बिल्कुल भी दूर जाने की कोशिश नहीं की बल्कि वही खड़ी रही) तुम्हारी हरकत के बारे में सोच कर मुझे कितनी शर्म आती है तुम्हें पता है अगर हम दोनों को कोई ने देख लिया होता तो,,, तुम्हारा तो कुछ नहीं बिगड़ता संदीप लेकिन मेरी इज्जत मिट्टी में मिल जाती,,,,,,
मैं जानता हूं तृप्ति तुम जो कुछ भी कह रही हो उसमें सच्चाई है लेकिन इसमें भी सच्चाई है कि उसकी ना जाने मुझे क्या हो गया एकांत पाकर और तुम्हें अपने इतने नजदीक प्रकार मेरे होश उड़ गए थे मेरा दिमाग काम करना बंद कर दिया था,,, तुम्हारी खूबसूरती में मै पूरी तरह से डूब गया था,,,, तुम्हारा खूबसूरत चेहरा देखकर मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि मुझे क्या करना चाहिए और मैं भी वही किया जो प्रेमी प्रेमिका एकांत में करते हैं और सब कुछ अपने आप ही हो गया,,,,
अपने आप हो गया,,,, यह कहकर तुम अपनी गलती को छुपाने की कोशिश कर रहे हो संदीप,,,,
मैं अपनी गलती को छुपा नहीं रहा हूं बल्कि बता रहा हूं मेरी जगह कोई और लड़का होता तो वह भी वही करता जो मैंने किया हूं तृप्ति शायद तुम नहीं जानती कि तुम कितनी खूबसूरत हो तुम्हारी कद कट तुम्हारी बदन की बनावट किसी भी मर्द को अपनी तरफ आकर्षित करने में पूरी तरह से सछम में और मैं बहक गया उसे समय मुझे सही गलत किसी भी चीज का अंदाजा नहीं था बस में तुम्हारी खुशबू को अपने अंदर महसूस करना चाहता था और मुझसे गलती हो गई,,,,, बस मुझे कहना चाहता हूं और मैं इसके लिए तुमसे हाथ जोड़कर माफी मांगता हूं,,,(ऐसा कहते हुए संदीप सच में तृप्ति के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया,,,
(यह देखकर तृप्ति एकदम से हड़बड़ा गई वह अपने चारों तरफ नजर तोड़ा कर देखने लगी थी कहीं कोई देख तो नहीं रहा है और उसकी किस्मत अच्छी थी कि उसे समय वहां से कोई गुजर नहीं रहा था इसलिए वह संदीप से बोली)
यह क्या कर रहे हो संदीप अगर कोई देख लेगा तो क्या समझेगा तुम फिर से मेरी बदनामी करने पर लगे हुए हो,,,,
नहीं मुझे माफी मांग लेने दो मुझसे गलती हुई है,,,(संदीप इस तरह से हाथ जोड़े हुए उसे विनती करते हुए बोला)
प्लीज संदीप अपना हाथ सही से करो,,,,।
(तृप्ति संदीप के भोले भाले चेहरे पर पूरी तरह से मोह गई थी,,,,,, उसके जाल साज बातों में पूरी तरह से आ चुकी थी,,, इसमें तृप्ति की गलती नहीं थी,,, क्योंकि वह थी भी तो एक औरत ही और औरत का स्वभाव होता है अपनी खूबसूरती की तारीफ सुनकर प्रसन्न हो जाना और वह तारीफ भले ही कोई भी कर रहा हो कुछ देर पहले ही तृप्ति को अच्छी तरह से मालूम था कि संदीप ने उसके साथ जो कुछ भी किया था वह गलत था लेकिन उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आकर उसे लगने लगा था कि यह उसकी खूबसूरती का ही परिणाम था जो संदीप को,,,,,,, असली हरकत करने पर मजबूर कर दी थी तृप्ति को संदीप की बात सुनकर इस बात का एहसास हो रहा था कि वह वाकई में बहुत खूबसूरत है इसलिए मन ही मन संदीप की बातों से प्रसन्न भी हो रही थी और मन ही मन वह संदीप को माफ भी कर चुकी थी,,,, तृप्ति की बात सुनने के बाद भी वह उसी तरह से हाथ जोड़े खड़ा था तो खुद तृप्ति उसके हाथ पैर हाथ रखते हुए उसे नीचे कर दी तृप्ति की हरकत पर संदीप को इस बात से संतुष्टि महसूस हुई की तृप्ति ने उसे माफ कर दि है,,, लेकिन फिर भी वह इस तरह से उदास चेहरा बनकर खड़ा रहा तो तृप्ति कुछ देर शांत रहने के बाद बोली,,,)
चलो ठीक है इस बार तो मैं तुम्हें माफ कर देती हूं लेकिन आइंदा इस तरह की गलती नहीं होनी चाहिए,,,
क्या सच में तुमने माफ कर दी,,,(संदीप एकदम खुश होता हुआ)
हां मैं तुम्हें माफ करती लेकिन यह तुम्हारी आखरी गलती होगी अगर इसके बाद कोई भी गलती करे तो फिर मुझे कोई भी वास्ता नहीं होगा,,,,
बिल्कुल नहीं होगा तृप्ति,,, एक बार जो गलती हो गई मैं उसे दोहराना नहीं चाहता क्योंकि मैं तुम जैसी दोस्त को खोना नहीं चाहता,,,,,,(इतना सुनकर तृप्ति के चेहरे पर मुस्कान पर मिलेगी और उसे मुस्कुराता हुआ देखकर संदीप अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,) तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान देखकर मुझे अब जाकर खुशी मिल रही है और खुशी इस बात की कि तुम मेरे से फिर से दोस्ती कायम रख रही हो आज जाकर भगवान के दर्शन करूंगा,,,।
भगवान के दर्शन लेकिन क्यों ,,?(तृप्ति मुस्कुराते हुए बोली)
मैं भगवान से प्रार्थना किया था कि तुम अगर मान जाओगी तो में भगवान के दर्शन करने मंदिर जाऊंगा,,,,
(तृप्ति उसकी बात सुनकर हंसने लगी,,,, संदीप पूरी तरह से अपनी चिकनी चुपड़ी बाद में तृप्ति को बहला लिया था और उसकी अश्लील हरकत के बावजूद भी अब तृप्ति एक बार फिर से उसके साथ दोस्ती का रिश्ता रखने के लिए तैयार हो चुकी थी फिर दोनों मुस्कुराते हुए अपने रास्ते पर चले गए,,,,,,,.
रात को खाना बनाते समय सुगंधा के मन में अजीब सी हलचल हो रही थी और यह हलचल किसी और को लेकर नहीं बल्कि अपने ही बेटे को लेकर हो रही थी क्योंकि अब अपने बेटे को देखने की नजरिया उसकी पूरी तरह से बदल चुका था अब वह अंकित में अपना बेटा नहीं बल्कि एक मर्द तलाशती थी जो उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सके उसे संतुष्ट कर सके लेकिन इस बात से अंकित पूरी तरह से अनजान था उसे तो इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि उसकी मां किसी राह पर चल पड़ी है वह तो अपनी ही मस्ती में रहता था,,,, औरतों के प्रति उसने कभी भी अपना नजरिया गलत रखा ही नहीं वह औरतों को इज्जत की नजर से देखा था चाहे घर पर हो या चाहे घर के बाहर सिर्फ एक बार उसके मन में उसके तन बदन में अजीब सी हलचल हुई थी जब किराणा की दुकान पर अनाज लेते समय एक औरत अपने पैसे उठाने के लिए नीचे झुकी थी और झुकता समय उसका पिछवाड़ा पूरी तरह से अंकित के लंड से जाकर स्पर्श हो गया था उसी समय अंकित के तन बदन में एक चिंगारी से फूटी थी और वह उस औरत को अजीब सी नजर से देखता रह गया था जब तक कि वह उसकी नजर से ओझल नहीं हो गई थी,,,, लेकिन फिर भी अंकित के मन में उसे औरत के प्रति जिस तरह का पल भर का आकर्षण था उसके परिणाम स्वरुप उसके मन में किसी भी प्रकार की वासना और दुषणता अपना घर नहीं कर गई थी जिसके चलते उसे अपनी वासना की पूर्ति के लिए अपने हाथ का सहारा लेकर मूठ मारना पड़ जाता वह इस दुष्परिणाम से पूरी तरह से बचा हुआ था अपनी मां की तरह बिल्कुल भी नहीं की रोज रात को,,, अपनी वासना की पूर्ति के लिए अपने हाथ का सहारा लेकर अपनी बुर से पानी निकाले,,,,।
सारे काम निपटाकर सुगंधा तैयार होकर स्कूल जाने के लिए निकली वह अपना पर्स लेकर घर से बाहर निकली और घर बंद करके दरवाजे पर ताला लगा दी आज उसे थोड़ा देर हो चुकी थी वह जल्दी-जल्दी सड़क पर चलते हुए बार-बार अपने हाथ में बंधी हुई घड़ी में समय देख रही थी आज वह पूरा 10 मिनट लेट हो चुकी थी,,,, आज उसे कोई रिक्शा भी नहीं मिल रहा था तो थक हार कर वह बस स्टैंड पर पहुंची ही थी कि वहां पर तुरंत बस आ गई और वह बस में ही चढ़ गई,,,।
बस में भीड़ कुछ ज्यादा ही थी जिसे तैसे करके वह आगे की तरफ चलते हुए बीच में जाकर खड़ी हो गई तभी बस एक जगह पर रुकी और वहां पर दो-तीन लड़के बस में चढ़ गए और कुछ लोग नीचे उतर गए वह तीनों लड़के अंकित के ही उम्र के थे अब तक सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन देखते ही देखते वह लड़की एकदम सुगंधा के करीब पहुंच गए,,,, सुगंधा आगे की तरफ मुंह करके बस का हैंडल पकड़ कर खड़ी थी और बस जिस तरह से चल रही थी मुझे नीचे खड़े आते थे तब उसकी भारी भरकम गांड अजीब सा उछाल लेती थी जिसकी वजह से उसकी गांड में हलचल होने लगती थी और वैसे भी सुगंधा कमर पर साड़ी को थोड़ा कस के ही बांधती थी जिसकी वजह से उसकी गोल-गोल गांड कुछ ज्यादा ही उभरी हुई नजर आती थी,,,,, और ऐसे माहौल में तीनों लड़कों की नजर सुगंधा की खूबसूरती पर पड़ गई कोई उसकी चिकनी पीठ को देख रहा था तो कोई उसकी गोल-गोल गांड के उभार को,,, देखते देखते वह तीनों लड़के भीड़भाड़ का फायदा उठाते हुए,,, वह तीनों लड़के सुगंधा की बेहद करीब पहुंच गए थे उनमें से आगे वाला लड़का कुछ ज्यादा ही उत्साहित हो जाता था जब उसकी आंखों के सामने बस में ऐसी खूबसूरत औरत नजर आती थी और ऐसे माहौल में वहां ऐसी खूबसूरत औरतों के अंगों को छूने का आनंद लेता था और खास करके इसी सुख को प्राप्त करने के लिए तीनों बस का सफर करते थे,,,,।
उन तीनों में से आगे वाला लड़का बस का हैंडल पकड़ कर देखते ही देखते सुगंधा के बेहद करीब पहुंच गया था और वह दोनों लड़के भी उसके ठीक पीछे खड़े थे,,,, तभी उनमें से एक लड़का आगे वाले लड़के से बोला,,,।
बाप रे देख रहा है कितनी खूबसूरत है आज तो अपनी चांदी ही चांदी है मैंने आज तक ऐसी खूबसूरत औरत नहीं देखा,,,
हां यार तू सच कह रहा है इसके बदन की खुशबू ही मेरे दिमाग में नशा सा घोल रही है,,,
(तभी पीछे वाला लड़का बोला)
यार इसकी गांड तो देख मेरी तो हालत खराब हो रही है,,,,
(पीछे वाले लड़के की बात सुनकर वह दोनों एकदम से उत्साहित होते हुए बोले,,)
कसम से ऐसी औरत मिल जाए ना तो दिन भर कपड़े पहनने ना दु्,,,,
(वह तीनों आपस में धीरे-धीरे बातें कर रहे थे लेकिन इन तीनों की बात सुगंधा को अच्छी तरह से सुनाई दे रही थी,,, वह तीनों की बातों को सुनकर एकदम से घबरा गई थी उसे इतना तो समझ में आ गया था कि वह तीनों उसी के बारे में बातें कर रहे थे,,, लेकिन फिर भी सब कुछ जानते हुए वह अनजान बनी खड़ी रही क्योंकि वह जानती थी कि जल्द ही उसका स्टॉप आ जाएगा और वह उतर जाएगी ऐसे में वह उन तीनों से उलझना नहीं चाहती थी उसने तो अभी तक तीनों की तरफ देखा भी नहीं था कि वह कैसे थे किस उम्र के थे,,,,,,, लेकिन तभी तीसरे नंबर वाला लड़का बोला,,,)
यार सुमित मुझे तो यह तेरी मां की तरह लग रही है तेरी मां की उम्र कि भी है,,, बस यह तेरी मां से कुछ ज्यादा ही खूबसूरत है,,,
हां यार सुमित यह सच कह रहा है पीछे से बिल्कुल तेरी मां की तरह लगती है बस इसकी गांड कुछ ज्यादा बड़ी है,,,
(उन दोनों की बात सुनकर आगे वाला लड़का बोला,,,)
मादरचोद तुम लोग मेरी मा को देखते रहते हो क्या,,?
तू तो ऐसा कह रहा है जैसे कि तू हम लोगों की मां को नहीं देखता मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि तु सुबह-सुबह क्यों मेरे घर आ जाता है,,,,,, मेरी मां बिना कपड़ों के नहाती है इसके लिए ना उसे नंगी देखने के लिए आता है,,,,
तो क्या करूं तेरी मां को देखकर ही लंड खड़ा हो जाता है,,,
तो यही तो बात है जैसे तेरा लंड खड़ा होता है वैसे हम लोगों का भी तेरी मां को देखकर ही लंड खड़ा हो जाता है,,,,
(तीनों को आपस में इस तरह से एक दूसरे की मां के बारे में गंदी बातें करता हुआ देखकर सुगंधा के तो होश उड़ गए उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई इस तरह से अपनी मां के बारे में गंदी बातें सुन सकता है और कर भी सकता है,,,, वह हैरान थी की तीनों एक दूसरे की मां के बारे में गांधी से गंदी बातें कर रहे थे लेकिन फिर भी तीनों में से किसी को किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं थी तीनों आराम से एक दूसरे की बातें सुन रहे थे,,,, उन तीनों की बातें सुनकर सुगंधा के मन में अजीब सी उलझन पैदा हो रही थी उसके तार बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी ना चाहते हुए भी उसका बदन उत्तेजित हो रहा था,,, तभी उसके कानों में उसके पास में जो लड़का खड़ा था उसकी बात सुनाई दी और उसकी बात को सुनकर उसके एकदम से होश उड़ गए,,,)
तुम दोनों बकवास बंद करो इस समय तो इस मक्खन मलाई की गांड देखकर मेरा लंड खड़ा हो गया,,,,, अभी अपने लंड को इसकी गांड से सटाता हूं,,,,।
(इतना सुनते ही सुगंधा के रीड की हड्डी एकदम सुनना पड़ गई उसके माथे पर पसीने की बूंदे उपसने लगी उसे यकीन नहीं हो रहा था कि कोई इस तरह से बातें कर सकता है,,, और जो बात उसने कही थी उसके बारे में सोच कर ही उसकी हालत खराब हुए जा रही थी वह जाकर भी कुछ नहीं कर पा रही थी और मन ही मन मना रही थी कि जल्दी उसका स्टॉप आ जाए,,,, सुगंधा यही सब सो रही थी कि तभी बस वाले ने ब्रेक मारा और इसी का फायदा उठाते हुए उसके ठीक पीछे खड़ा लड़का एकदम से उसके बदन से सट गया और पेट में बना तंबू एकदम से उसके पिछवाड़े से सटा दिया और अपना एक हाथ उसकी कमर पर रख दिया वह लड़का भीड़ बाढ़ का बराबर फायदा उठाते हुए सुगंधा के खूबसूरत है जिसमें पर अपना हाथ रख दिया था उसकी कमर पर हाथ रख दिया था उसकी चिकनी कमर जो की मक्खन की तरह एकदम फिसलन भरी थी उसे अपनी हथेली में रखकर दबा दिया था,,, और अपने लंड को एकदम से उसकी गांड से सटाकर हल्का सा धक्का दे दिया था,,,, उसे लड़के ने पल भर में ही अपना काम कर दिया था अगर उसे लड़के के मुंह से सुगंधा उसकी गंदी बात सुनी ना होती तो शायद उसे इस पर ब्रेक करने की वजह से एहसास भी ना होता,,, लेकिन वह अपनी कानों से उसे लड़के की हरकत के बारे में सुन ली थी इसलिए उसकी हरकत उसे एकदम साफ महसूस हुई थी उसे साफ महसूस हुआ था कि उसकी गांड के बीचो-बीच में पीछे खड़े लड़के का लंड एकदम से धंस गया था,,, और उसे लड़के की हथेली उसे अपनी कमर पर महसूस हुई थी जिसे उसे लड़के ने कमर पर रखकर हल्का सा मसल दिया था मानों जैसे किसी औरत को खुश करते हुए उसके साथ संभोग करते हुए उसकी कमर को दबोच लिया हो,,,,,,, उसे लड़के की हरकत से पल भर में ही सुगंधा की बुर पानी पानी हो गई थी,,, उसकी सांस एकदम से गहरी चलने लगी थी और वह एकदम से घबरा भी गई थी,,,, लेकिन फिर भी सुगंधा उस लड़के की हरकत से थोड़ा बहुत नाराज थी हालांकि इसकी हरकत से उन तीनों की बातों से उसके बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी उत्तेजना महसूस हो रही थी और इसके चलते ही उसे लड़के की हरकत की वजह से उसकी बुर पूरी तरह से पानी पानी हो गई थी,,,,वह वैसे तो बहुत शर्मीली किस्म की थी राह पर चलते समय किसी गैर मर्द से बात करना भी उसके लिए गवारा नहीं था,,,, लेकिन फिर भी हिम्मत दिखाते हुए वह धीरे से अपनी नजर को पीछे की तरफ घूमाकर वह अपने पीछे वाले लड़के से बोली,,,।
देख कर बेटा,,,,(वैसे तो सुगंधा उस लड़के से थोड़ा शख्ती से पेश आना चाहती थी लेकिन जैसे ही उसकी नजर उस लड़के पर पड़ी थी उसे अंकित याद आ गया था,,, वह लड़का एकदम उसके बेटे जैसा था अच्छे घर का लग रहा था और यही वजह थी कि सुगंधा के शब्दों में नर्मी आ गई थी और सुगंधा की बात सुनकर वह पीछे वाला लड़का भी बोला,,)
सॉरी आंटी वह कहने की एकाएक ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया इसके लिए,,,।
(वह लड़का भी अपने आप को शरीफ पेश करता हुआ एकदम शांति से जवाब देता हुआ बोला और आगे कुछ हो पता है इससे पहले ही सुगंधा का स्टॉप आ गया और सुगंधा भी मन ही मन भगवान को धन्यवाद देने लगी थी उसकी स्कूल आ गई थी और वह तुरंत बस में से नीचे उतर गई,, और वह तीनों लड़के हाथ मलते रह गए,,,)
क्लास में पहुंच जाने के बावजूद भी उसके बदन में अजीब सी थरथराहट थी उसे ऐसा ही लग रहा था कि जैसे अभी भी वह तीन लड़के उसके पीछे खड़े हो क्योंकि बार-बार वह पीछे मुड़कर देख ले रही थी,,,,,,, वैसे तो सुगंधा इससे पहले भी मर्दों की नजर को अपने बदन पर फिसलने की आदत से वाकिफ थी,,, और आते जाते कभी कबार अपने लिए मर्दों के द्वारा गंदी टिप्पणियों को भी सुन चुकी थी,,, लेकिन वह सब टिप्पणियां दबे श्वर में थी,,, जिसके कुछ शब्द ही उसके कानों तक पडते थे,,,, और सुगंधा उन शब्दों के हिसाब से अंदाज़ा लगती थी कि वह टिप्पणियां उसके बारे में ही थी,,,, लेकिन आज ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई उसके बारे में खुलकर गंदे शब्दों का प्रयोग कर रहा था,,, और वह भी कोई आदमी नहीं बल्कि उसके बेटे के उम्र का लड़का,,,,, इसीलिए तो वह एकदम हैरान थी,,,, जो कुछ भी हुआ था वह सब कुछ सुगंधा के सोच के परे था,,,, उसे इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि बस में उसके साथ इस तरह की हरकत हो जाएगी हालांकि वह इससे पहले भी कई बार बस का उपयोग कर चुकी थी,,, लेकिन इस तरह का अनुभव उसे कभी नहीं हुआ था हां इतना जरूर था कि बस में भीड़भाड़ की वजह से लोग एक दूसरे के स्पर्श होकर निकल जाते थे लेकिन इतनी गंदी हरकत आज तक उसके साथ किसी ने नहीं किया था,,,।
सुगंधा अपनी क्लास में कुर्सी पर बैठी हुई थी और अपने विद्यार्थियों को पाठ पूरा करने के लिए दे दी थी आज उसका पढ़ने का मन बिल्कुल भी नहीं था,,,, बार-बार उसका ध्यान बस वाले लड़कों की तरफ ही चला जा रहा था,,,,, उनकी हरकत के बारे में सोचकर उसके बदन में जहां एक प्रकार का डर फैल जाता था वहीं ना जाने क्यों उसकी दोनों टांगों के बीच की हलचल बढ़ जाती थी सुगंधा ने बस में भी महसूस की थी कि उसे लड़के की हरकत की वजह से उसकी पेंटिं पूरी तरह से गीली हो चुकी थी,,, और यही सुगंधा को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है जबकि जो कुछ भी हो रहा था वह सब कुछ उसकी इच्छा के विरुद्ध था अनजाने में हो रहा था फिर भी उसके बदन में उत्तेजना अपना असर क्यों दिख रही थी,,,,, यही सोच सोच कर वह हैरान हुए जा रही थी,,,।
जैसे तैसे करके रिशेष की घंटी बज गई,,, सुगंधा को अपनी दोनों टांगों की बीच की स्थिति से असहजयाता महसूस हो रही थी,,, उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि उसकी पेंटिं पूरी तरह से गीली हो चुकी थी गीली होने की वजह से उसमें चिपचिपाहट हो रही थी जिससे वह बहुत असहज महसूस कर रही थी,,,, इसीलिए घंटी बजते ही विद्यार्थियों से पहले सुगंधा अपनी जगह से खड़ी हुई और क्लास से बाहर निकल गई,,,, वह जल्दी-जल्दी बाथरूम के पास पहुंच गई और बाथरूम का दरवाजा खोलकर बाथरूम में प्रवेश कर गई,,,, बाथरूम का दरवाजा अच्छे से बंद कर लेने के बाद वह अपने दोनों हाथों से अपनी साड़ी कमर तक उठा दी और अपनी दोनों टांगों के बीच नजर नीचे करके देखी तो उसके होश उड़ गए,,, उसकी पैंटी आगे से पूरी तरह से भीग चुकी थी उसकी बुर ने कुछ ज्यादा ही पानी निकाल दिया था,,, ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे उस पर पानी गिरा हो,,,, वैसे तो उसकी इच्छा हो रही थी की पेंटिं निकाल कर अपने पर्स में रख ले क्योंकि पेंटी पहने हुए उसे बहुत ही ज्यादा असहजता महसूस हो रही थी,,,, लेकिन वह अपने घर पर नहीं बल्कि स्कूल के बाथरूम में थी इसलिए ऐसा करना उचित नहीं था वह धीरे से एक हाथ से अपने पेटी के आगे वाले इलास्टिक वाले रबड़ को पड़कर आगे की तरफ खींची और अंदर की तरफ देखने लगी उत्तेजना के मारे उसकी बुर कचोरी की तरह फुली हुई नजर आ रही थी,,,, अपनी बुर पर नजर पडते ही वह एक गहरी सांस ली और फिर पेटी के अंदर मुआयना करने लगी,,, बुर से निकला मदनरस पूरी तरह से चिपचिपाहट भरा हुआ था सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि यहां पर वह कुछ नहीं कर सकती अगर वह उसे धोने की कोशिश करती है तो उसकी पेंटिंग पूरी तरह से गिली हो जाएगी और फिर उसे और असहजता महसूस होगी,,,,,,।
अपनी गीली और कचोरी की तरह फुली हुई बुर को देखकर सुगंधा का मन अपनी बुर में उंगली करने को कर रहा था लेकिन इस समय उसके संस्कार और स्कूल की मर्यादा उसके हाथ को रोके हुए थे,,,, वह गहरी सांस लेते हुए अपनी पेंटी के छोर को दोनों हाथों से पकड़ कर,,, उसे घुटनों तक नीचे खींच दी और फिर बैठकर पेशाब करने लगी पल भर में ही उसकी गुलाबी बुर के गुलाबी छेद से सिटी की मधुर ध्वनि के साथ खारे पानी का फवारा निकाला और फिर सुगंधा राहत की सांस लेने लगी बस वाली हरकत की वजह से ही उसे आज बड़े जोरों की पेशाब लगी हुई थी लेकिन वह अपने आप को रोकी हुई थी पेसाब की तीव्रता इतनी तेज थी कि उसकी बुर से पेशाब की धार निकल कर सीधे बाथरूम के दरवाजे पर गिर रही थी,,, एक तरह से सुगंधा अपने पेशाब की धार से बाथरूम का दरवाजा भीगो रही थी,,,, ठीक से पेशाब कर लेने के बाद सुगंधा अपनी जगह पर खड़ी हुई और पैंटी को ऊपर कमर तक चढ़ा दी अभी तक वह उसके गीलेपन से परेशान थी लेकिन वह कुछ भी कर नहीं सकती थी इसलिए धीरे से नीचे साड़ी छोड़कर वहां अपने कपड़ों को दुरुस्त करके बाथरूम से बाहर निकली,,,, और अपना लंच बॉक्स लेकर स्टाफ रूम में चली गई,,, जहां पर पहले से ही नूपुर उसका इंतजार कर रही थी,,,, वैसे तो अगले साल ही नूपुर ने शिक्षिका के रूप में पद ग्रहण की थी और दो-तीन महीने ही हुए उसे सुगंधा से दोस्ती किए हुए हालांकि दोनों के बीच केवल स्टाफ रूम तक ही रिश्ता सीमित था,,, दोनों केवल लंच करते समय ही आपस में बातचीत किया करते थे और एक दूसरे को अपने लंच बॉक्स में से लाया हुआ खाना शेयर करते थे और दोनों के बीच किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं होती थी दोनों एक दूसरे के बारे में कुछ जानती भी नहीं थी बस एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा देती थी बस इतना ही रिश्ता दोनों में था और जैसे ही सुगंधा स्टाफ रूप में पहुंची नूपुर ने आवाज देकर सुगंधा को अपने पास बुला ली और फिर दोनों एक साथ लंच करने लगे,,,,।
सुगंधा को स्कूल की छुट्टी होने का इंतजार था बहुत जल्दी से जल्दी घर पहुंच जाना चाहती थी क्योंकि उसके मन में अजीब सी हलचल हो रही थी और जैसे ही छुट्टी की घंटी बजी सुगंधा अपना पर्स लेकर स्कूल से बाहर निकल गई और ऑटो पकड़कर सीधा अपने घर पहुंच गई,,, घर पर पहुंचकर उसने जल्दी से दरवाजे पर लगा हुआ ताला खोला और फिर घर में प्रवेश करके दरवाजे को बंद कर दी और अपने पर्स को टेबल पर रखकर सीधा बाथरूम में घुस गई और बाथरूम का दरवाजा बंद भी नहीं की और अंदर घुसते ही अपने बदन से सारे कपड़े उतार कर एकदम निर्वस्त्र हो गई एकदम नंगी,,,,, अपनी आखिरी वस्त्र अपनी पेंटिं को उतारते हुए वह पेंटी को ही घूर-घूर कर देख रही थी वह अभी तक पूरी तरह से गीली थी वह अपने हाथ में लेकर इधर-उधर घूमर पेटी को देखने के बाद उसे बाथरूम में नीचे फेंक दी और फिर अपनी दोनों टांगें हल्के से खोलकर अपनी नितंबों को आगे की तरफ ले जाकर वह अपनी बर को बड़े गौर से देखने लगी वह पूरी तरह से गुलाबी हो चुकी थी और,,,,, उत्तेजना के मारे कचोरी की तरह फूल भी गई थी सुगंधा अपनी हथेली को पूरी तरह से अपनी बर पर रखकर उसे अपनी हथेली में छुपा ली और उसे अपनी आंखों को बंद करके ऊपर नीचे करके रगड़ना शुरू कर दि,,,,।
अपनी हरकत से ही पल भर में उसके मुख से सिसकारी की आवाज फूट पड़ी,,, वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी एक अद्भुत आनंद मिलता था उसे अपनी हरकत में वह अपनी हथेली को अपनी बर पर पूरी तरह से चिपक कर उसे पर दबाव बनाकर उसे ऊपर नीचे करके अपनी बुर की गुलाबी पत्तियों को रगड़ रही थी जिससे उसकी बुर पूरी तरह से गुलाबी हो चुकी थी और उसमें से मदन रस का बहाव निरंतर हो रहा था सुगंधा इतना तो समझ गई थी कि जिस तरह का खेल हुआ खेल रही है अब वापस कदम हटाना मुमकिन नहीं था क्योंकि उसकी जवानी की प्यास बुझ ही नहीं रही थी क्योंकि उसकी जवानी पूरी तरह से बेलगाम हो चुकी थी और यह लगाम किसी मर्दाना जोश से भरे हुए मर्द के हाथ में आने से ही उसकी प्यास बुझने वाली थी,,,,हांथ की उंगलियों से नही बल्कि टांगो के बीच लटक रहे मोटे मुसल से उसकी प्यास बुझने वाली थी और इस बात को भाभी अच्छी तरह से जानती थी लेकिन इस समय असहाय थी जवानी से भारी होने के बावजूद भी वह मोटे तगड़े लंड से वंचित थी वरना ऐसी जवानी प्रकार कोई भी औरतों मर्दों की लाइन लगाने में पूरी तरह से सक्षम थी,,, वैसे तो अपने लिए मर्दों की लाइन लगाना सुगंधा के लिए भी कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन संस्कार और मर्यादा भी कोई चीज होती है,,, वह अपने संस्कार और मर्यादा के विरुद्ध कोई कार्य करना नहीं चाहती इसीलिए तो वह अपनी जवानी की प्यास को अपनी उंगलियों का सहारा देकर बुझा रही थी,,,।
और इस समय भी वह एक साथ अपनी दो उंगलियों को अपनी कचोरी जैसी खुली हुई बुर में डालकर उसे अंदर बाहर करना शुरू कर दी उसकी आंखें पूरी तरह से बंद थी टांगे दोनों खुली हुई थी और नितंबों का झुकाव आगे की तरफ था जिसे वह हल्के-हल्के आगे पीछे करते हुए अपनी उंगली को ही लंड समझकर मजा ले रही थी,,, इस समय घर में कोई नहीं था दरवाजा भी बंद था इसलिए वह अपनी आंखों को बंद करके गरमा गरम में शिसकारी की आवाज लेते हुए वह संभोग के सुख को महसूस करते हुए अपनी इच्छा की पूर्ति कर रही थी और देखते ही देखते उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी और एक बार फिर से उसकी बुर से गरम लावा फूट पड़ा,,,।
उसके जीवन में सब कुछ बदल गया था रहन-सहन का तरीका देखने का तरीका यहां तक कि उसे अपने बेटे में भी एक मर्द नजर आने लगा था जो कि अंकित इस बात से पूरी तरह से अंजान था ,,,, वह तो अपने में ही मस्त रहता था उसे क्या पता कि उसकी मां के अंतर मन में किस तरह की हलचल मच रही है कई दिनों से वह किस तरह से अपने आप से ही जूझ रही है,,, और अगर शायद कोई जवान लड़का अपनी मां के अंतर्मन में हो रही हलचल को समझ लेता तो शायद बिस्तर पर वह कब का अपनी मां की दोनों टांगों के बीच होता ,,,
सुगंधा सब्जी काट रही थी,,,, शाम ढल चुकी थी और अंधेरा रोशनी को अपनी आगोश में लेकर चारों तरफ फैलने लगा था,,,, समय अपनी गति से चल रहा था लेकिन सुगंधा मानो स्थिर हो चुकी थी,,, अपने पति के गुजरने के बाद इस तरह से उसने अपनी जवानी को संभाल कर रखी थी और अपने अरमानों को दबाकर रखी थी एक गलती के चलते मन में दबी हुई जवानी की चिंगारी पूरी तरह से भड़क चुकी थी,,, निरंतर बार-बार अपने ही ख्यालों से वह अपनी पेंटिं को गीली कर ले रही थी,,,, वह अपनी बेटी के बारे में ही सोच रही थी कि तभी अंकित ठीक उसके सामने आकर बैठ गया और किताब खोलकर पढ़ने लगा अंकित को क्या पता था कि उसकी मां जवानी की लहरों में पूरी तरह से डूबती चली जा रही है वह अपने ख्यालों में खोया हुआ था और सुगंधा अपने ख्यालों में,,,, वह सब्जी काटते हुए अंकित को देख रही थी उसके भोले चेहरे को देख रही थी उसके गठीले बदन को देख रही थी,,,, उसका ध्यान और चित दोनों अंकित के ऊपर टिका हुआ था,,, अंकित इस बात से बेखबर था वह पढ़ाई कर रहा था और सुगंधा अपने मन की तपन को अपनी आंखों से सेंक रही थी,,, कि तभी हल्की सी दर्द है कि करहा की आवाज सुगंधा के मुंह से आई,,, अंकित की नजर तुरंत अपनी मां के ऊपर गई और उसने देखा तो दंग रह गया उसकी मां की उंगली और किसी कट गई थी वह तुरंत किताब एक तरफ रख कर अपनी जगह से खड़ा हुआ,,,
अरे यह क्या कर ली मम्मी तुमने,,,(इतना कहते हुए अंकित तुरंत अपनी मां के करीब आया और एकदम घुटनों के बल बैठकर अपनी मां का हाथ अपने हाथ में ले लिया और बिना कुछ सोचे समझे अपनी मां की कटी हुई उंगली को अपने मुंह में भर लिया,,,, और अपनी मां की उंगली से बह रहे खून को बंद करने की कोशिश करने लगा,,,, अंकित तो अपना काम कर रहा था वह पूरी तरह से परेशान हो चुका था वह जानता था कि उसकी मां को दर्द हो रहा होगा और एक बेटा होने के नाते अपना फर्ज निभा रहा था लेकिन सुगंधा जो उसकी मां थी अपने बेटे की यह हरकत पर पूरी तरह से रोमांचित हो उठी वह अपने बेटे की हरकत को एक मां के नजरिए से नहीं बल्कि एक औरत के नजरिए से देख रही थी,,,, अंकित की हरकत से वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी,,,,। जिस तरह से अंकित ने बिना कुछ सोचे समझे उसका हाथ पकड़ कर उसकी कटी हुई उंगली को अपने मुंह में डालकर चूस रहा था यह देखकर सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी थी,,, सुगंधा को इस समय अंकित में अपना बेटा नहीं बल्कि एक प्रेमी नजर आ रहा था जो उसका इतना ख्याल रखना था और यह ख्याल आते ही उसकी दोनों टांगों के बीच थरथराहट बढ़ने लगी वह मदहोश होने लगी सुगंधा की आंखों में खुमारी छाने लगी और वह मदहोश नजरों से अपने बेटे की तरफ देख रही थी,,,,,,।
अब तक अंकित की नजर अपनी मां की खूबसूरत चेहरे की तरफ नहीं गई थी वह उसकी उंगली को मुंह में लेकर चूस रहा था उसका खून बंद करना चाहता था किसी भी तरीके से और उसे इस समय यही उपाय सबसे उचित लग रहा था,,,,, अंकित अपनी मां की उंगली को मुंह में लिए हुए तिरछी नजरों से अपनी मां की तरफ देखा तो देखा ही रह गया उसकी मां मंद मंद मुस्कुरा रही थी उसके होठों पर मादक मुस्कान थी और अंकित औरत की इस तरह की मुस्कान को समझने में सक्षम नहीं था वह अपनी मां को मुस्कुराता हुआ देखकर उसके चेहरे की रौनक देखकर ऐसा ही समझ रहा था कि मानो जैसे उसकी मां को उसकी हरकत से राहत मिल रही थी इसलिए वह भी अपनी मां की तरफ देखने लगा था अपने बेटे को अपनी तरफ देखा हुआ प्रकार सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी वह मदहोश होने लगी उसे ऐसा लग रहा था कि उसका बेटा उसकी तरफ मदहोश नजरों से देख रहा है उसके बेटे की आंखों में उसे मदहोशी नजर आ रही थी वासना नजर आ रही थी जबकि उसका बेटा उसकी तरफ एक मर्द की तरह नहीं बल्कि एक बेटे की तरह ही देख रहा था,,,,।
अब कैसा लग रहा है,,,,(पल भर के लिए अंकित अपनी मां की उंगली को अपने मुंह में से बाहर निकाल कर बोला और फिर वापस उसे अपने मुंह में डाल दिया इस दौरान वह अपनी नजरों को अपनी मां की खूबसूरत चेहरे से बिल्कुल भी नहीं हटाया था और यही अदा अंकित की सुगंधा के तन बदन में मदहोशी भर रही थी सुगंधा को इस बात का एहसास हो रहा था कि उसकी बुर से पानी टपक रहा है उसकी पेंटि गीली हो रही थी,,, पल भर में ही सुगंधा की सांसे भारी होने लगी थी,,,, अपने बेटे के मुंह से आप कैसा लग रहा है सुनकर वह पूरी तरह से रोमांचित हो उठी थी उसके नस-नस में उत्तेजना पूरी तरह से असर दिख रही थी अगर इस समय उसका बेटा अपने होठों को आगे बढ़कर उसके होठों पर होंठ रखकर चुंबन करने लगता तो भी सुगंधा को ऐतराज ना होता,,,। सुगंधा मादक मुस्कान बिखरते हुए अपने बेटे को जवाब देते हुए बोली,,,)
बहुत अच्छा लग रहा है अंकित,,,,
तुम भी ना अपना बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखती,,,(अंकित फिर से अपनी मां की उंगली को अपने मुंह में से बाहर निकाल कर बोला और फिर उसे अपने मुंह में डाल लिया)
तू भी कहां रखता है मेरा ख्याल,,,(सुगंधा इतराते हुए बोली)
ख्याल ना होता तो मैं अभी यह न कर रहा होता,,,,(अंकित फिर से अपने मुंह में से उंगली निकालते हुए बोला,,, लेकिन वह इस बार अपनी मां की उंगली को वापस मुंह में नहीं डाला बस उसे पकड़ कर उसे देख रहा था,,,)
इतनी फिक्र करता है तू मेरी,,,(सुगंधा आंखों को थोड़ी चोडी करते हुए बोली,,,, अंकित औरतों के इस तरह के नखरे को बिल्कुल भी नहीं समझता था अगर औरतों के बारे में उसे जरा भी समझदारी होती तो उसे समझते देर ना लगती कि उसकी मां के मां के अंदर क्या चल रहा है उसकी मां क्या चाहती है इसलिए वह अपनी मां का सवाल का जवाब देते हुए बोला,,,)
फिक्र भला कैसे न होगी तुम ही तो हो सब कुछ,,,
तेरे लिए मैं सब कुछ हूं,,,,
तो क्या यह भी कोई कहने की बात है,,,,
(सुगंधा को अपने बेटे की हर एक बात रोमांटिक लग रही थी अपने बेटे की बात सुनकर उसके सामने ध्यान में उसकी बुर बार-बार गीली हो रही थी बार-बार पानी छोड़ रही थी,,,)
इतना प्यार करता है तु मुझसे,,,,(इतना कहने के साथ ही सुगंध अपना एक हाथ आगे बढ़कर अपने बेटे के गाल को सहलाने लगी और जवाब में अंकित भी अपना हाथ आगे बढ़ाकर अपनी मां के खूबसूरत गोरे-गोरे गाल पर रखकर सहलाते हुए बोला)
बहुत प्यार करता हूं,,,,
(सुगंधा अपने बेटे के स्वाभाविक और औपचारिक बातों को रोमांटिक तरीके से ले रही थी उसे ऐसा ही लग रहा था कि उसकी आंखों के सामने उसका बेटा नहीं बल्कि उसका प्रेमी बैठा है और उसे मीठी-मीठी बातें कर रहा है प्यार भरी बातें कर रहा है तभी सुगंधा की नजर अपनी उंगली पर गई जिस पर अभी भी हल्का सा खून निकल रहा था और वह इतराते हुए बोली,,,)
ऊममम अगर तू मुझसे प्यार करता तो मेरी उंगली को यूं ही ना छोड़ देता देख अभी भी खून निकल रहा है,,,।
कहां,,,?(इतना कहने के साथ ही अंकित फिर से अपनी मां की उंगली की तरफ देखने लगा जिसमें से अभी भी हल्का सा खून निकल रहा था और नटवह तुरंत फिर से अपने मुंह में अपनी मां की उंगली को डाल दिया और उसे चूसना शुरू कर दिया,,, अंकित जिस तरह से उसकी उंगली को चूस रहा था सुगंधा कल्पना कर रही थी कि जैसे उसकी बड़ी-बड़ी चूची उसके बेटे के मुंह में भरी हुई है और वह उसकी निप्पल को चूस रहा हो और यह एहसास करते ही उसे खुद की निप्पल कड़क होती हुई महसूस होने लगी और बुर से फिर से पानी निकलने लगा,,,,, यह बातचीत है थोड़ी और देर तक चलती है इससे पहले ही तृप्ति आ गई और तृप्ति दोनों को देखकर बोली,,,)
अरे यह क्या हो गया,,,?
मम्मी ने अपनी उंगली ही काट ली है,,,,(अपने मुंह से उंगली को बाहर निकलते हुए अंकित बोल तो यह देखकर तृप्ति हुआ भी थोड़ा सा घबराते हुए उन दोनों के पास बैठ गई और अंकित के हाथ में से अपनी मां का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोली,,,)
क्या मम्मी तुम भी बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता ऐसे कैसे सब्जी काट रही थी की उंगली काट ली ज्यादा लग जाता तो,,,, रुको मैं अभी बैंड एड लगा देती हुं,,,,(इतना कहते हुए तृप्ति अपने कमरे में गई और एक छोटा सा बॉक्स खोलकर उसमें से बांडेड लेकर आई और उसे अपनी मां की उंगली पर लपेट दी और बोली)
अब आगे से संभाल कर काम करना वरना रहने देना मैं कर दूंगी,,,,।
(इसके बाद बाकी का खाना तृप्ति अपनी मां को नहीं बनाने दी खुद ही बनाई लेकिन तृप्ति का इस तरह से बीच में आ जाना सुगंधा को अच्छा नहीं लग रहा था क्योंकि उसके और उसके बेटे के बीच अच्छी खासी बातचीत चल रही थी जिसकी वजह से सुगंध काफी उत्तेजित हो चुकी थी,,,)
दूसरे दिन सुगंधा रसोई घर में काम कर रही थी की तभी वह पीछे की तरफ नजर घुमा कर देखी तो उसके ठीक पीछे अंकित खड़ा था और वह चोर नजरों से उसकी बड़ी-बड़ी गांड की तरफ ही देख रहा था जो कि कई हुई साड़ी में कुछ ज्यादा ही कई हुई और उभरी हुई नजर आ रही थी यह देखते ही सुगंधा के तन-बड़ा अजीब सी हलचल होने लगी क्योंकि यह पहली मर्तबा था कि जब अंकित अपनी मां की गांड को घुर कर देख रहा था,,, पल भर में इस सुगंधा की सांस ऊपर नीचे होने लगी कुछ देर तक अंकित इस तरह से खड़ा रहा वह कुछ बोल नहीं रहा था बस पीछे खड़े होकर अपनी मां की गोल-गोल गांड को भी देख रहा था कुछ देर बाद जब सुगंधा से रहा नहीं गया तो वह पीछे नजर घुमा कर बोली,,,)
क्या हुआ वहां क्यों खड़ा है और ऐसे क्यों देख रहा है,,,
कुछ नहीं मम्मी मैं देख रहा था कि तुम खाना बना ली हो या नहीं मुझे बड़े जोरों की भूख लगी है,,,।
(अंकित की बात को सुनकर सुगंध मन ही मन बोल रही थी कि खाना खाने की भूख लगी है या कुछ और क्योंकि अपने बेटे की नजर को देखकर वह इतना तो समझ ही गई थी कि उसके बेटे के मन में क्या चल रहा है और वह थोड़ा सा घबरा भी गई थी क्योंकि इस तरह से वह अपने बेटे को कभी भी अपने आप को घूरते हुए नहीं देखी थी इसलिए वह बोली)
जा बाहर जाकर इंतजार कर में 5 मिनट में खाना लेकर आती हूं,,,,,
इंतजार ही तो नहीं होता मम्मी,,,(इतना कहते हुए अंकित अपनी मां की तरफ आगे बढ़ने लगा और उसे आगे बढ़ता हुआ देखकर सुगंधा का दिल जोरो से धड़कने लगा उसे अजीब सा महसूस होने लगा था उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल सी बढ़ने लगी थी वह कुछ बोल नहीं पा रही थी और संजू अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,) मुझे बड़े जोरों की भूख लगी है,,,,(ऐसा कहते हुए वह अपनी मां के बेहद करीब पहुंच गया उसकी मां घबरा सी गई थी और घबराहट भरे श्वर में बोली,,,।
का तो रही हूं बाहर जाकर इंतजार कर मैं 5 मिनट में गरमा गरम खाना लेकर आती हूं,,,
मुझे आज खाना नहीं खाना है कुछ और खाना है,,,,
,,, क्या खाना है,,,?(घबराहट भरे शवर में वह बोली,,,)
तुम्हारी जवानी,,,(और इतना कहने के साथ ही अंकित पीछे से अपनी मां को अपनी बाहों में भर लिया अंकित की हरकत पर सुगंधा पूरी तरह से घबरा गई उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था उसे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि अंकित इस तरह की हरकत करेगा क्योंकि आज तक वह अपने बेटे को सीधा-साधा लड़का ही समझते आ रही थी और वह अपने बेटे की बाहों में से छूटने की पूरी कोशिश करने लगी लेकिन अंकित पूरी तरह से जवान हो चुका था हट्टा कट्टा गठीले बदन का मालिक हो चुका था,,,, अंकित अपनी बाहों की कैद में से अपनी मां को जाने नहीं देना चाहता था इसलिए वह अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड को एक हाथ से पकड़ कर दबाना शुरू,, कर दिया,,,)
अरे अरे यह क्या कर रहा है तुझे जरा भी शर्म नहीं आ रही है,,,,
इसमें शरम कैसी मेरी जान तुम इतनी खूबसूरत हो कि मुझे रहा नहीं जाना है बहुत दिनों से मेरी नजर तुम्हारे ऊपर थी तुम्हारी जवानी का नशा मुझे पागल बना रहा है,,,(ऐसा कहते हुए अंकित अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठाना शुरू कर दिया और सुगंधा उसे रोकने की भरपूर कोशिश करते हुए बोली,,,)
नहीं नहीं ऐसा मत कर हम दोनों के बीच इस तरह का रिश्ता बिल्कुल भी नहीं है मैं तेरी मां हूं किसी को पता चल जाएगा तो गजब हो जाएगा,,,,
मैं जानता हूं कि तुम मेरी मां हो लेकिन मन से पहले तुम एक औरत हो खूबसूरत औरत जवानी से भरी हुई और तुम्हें एक मर्द की जरूरत है इस बात को तुम भी अच्छी तरह से जानती हो और रही बात दूसरे को जानने का तो सवाल ही नहीं उठता क्योंकि घर की चार दिवारी के अंदर क्या हो रहा है किसी को क्या पता,,,,
अंकित ऐसा मत कर मैं तेरे सामने हाथ जोड़ती हूं,,,
हाथ जोड़ने की जरूरत नहीं है मेरी रानी अपने हाथ को मेरे लंड पर रख दो मजा ही मजा आएगा,,,(ऐसा कहते हुए अंकित अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया था और उसकी गांड पर जोर से चपत लग रहा था,,,, उसकी गांड को छुपाने के लिए उसकी छोटी सी चड्डी नाकाम साबित हो रही थी उसकी गांड का ज्यादातर भाग नजर आ रहा था जो कि एकदम मक्खन की तरह चमक रहा था जिस पर अंकित की नजर पडते ही उसकी आंखों में वासना की चिंगारी फुटने लगी और वह अपनी मां की गांड को हथेली में लेकर जोर-जोर से मसलना शुरू कर दिया,,,, सुगंधा अपने बेटे की हरकत से पूरी तरह से हैरान थी परेशान थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि पल भर में ही उसे क्या हो गया वह उसके साथ ही गंदा व्यवहार क्यों कर रहा है उसके समझ के बिल्कुल पड़े था अंकित का व्यवहार और अंकित था कि अपनी मां के बदन से खेले जा रहा था और सुगंधा उसे रोकने की भरपूर कोशिश कर रही थी लेकिन वह रुकने का तैयार ही नहीं था,,,,)
ऐसा मत कर अंकित यह पाप है ऐसा नहीं करना चाहिए मैं तेरी मां हूं तू मेरा बेटा है और मां बेटे के बीच इस तरह का रिश्ता कभी भी संभव नहीं है,,,,
सब कुछ संभव है इस समय तुम एक औरत हो और मैं एक मर्द तुम्हारे पास खूबसूरत बुर हैं और मेरे पास मोटा तगड़ा लंड जो तुम्हारी बुर में जाकर तुम्हारा पानी निकलेगा बस यही रिश्ता होता है मर्द और औरत में,,,
यह तो क्या कह रहा है कहां से यह सब सीख कर आया,,,(सुगंधा पूरी तरह से हैरान थी अपने बेटे की इस तरह की अश्लील बातें सुनकर उसने अभी आज तक अपने बेटे के मुंह से एक गली तक नहीं सुनी थी और आज उसका बेटा सारी हदें पार करके औरत और मर्द के बीच के रिश्ते की दुहाई दे रहा था,,,, और अपनी हरकतों से पूरी तरह से उसे मदहोश कर रहा था उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें कैसे रोके अपने बेटे को अंकित पागलों की तरह अपनी मां की गोरी गोरी गांड पर चपत लगाते हुए उसे जोर-जोर से मसल दे रहा था ऐसा करने में उसे बेहद आनंद की प्राप्ति हो रही थी और कहीं ना कहीं अपने बेटे की हरकत से सुगंध को भी उत्तेजना का अनुभव हो रहा था और वह परेशान थी कि आखिरकार ऐसा क्यों हो रहा है क्यों अपने बेटे को रोक रही है वह भी तो यही चाहती थी वह भी तो अपने बेटे के साथ हम बिस्तर होना चाहती थी उसके मोटे लंड को अपनी बुर में लेकर अपनी जवानी की प्यास बुझाने चाहती थी तो फिर आज वह क्यों रोक रही है उसे क्यों से आगे नहीं बढ़ने देना चाहती इसमें उसकी भी तो भलाई है जो सुख अंकित को मिलेगा उससे कहीं ज्यादा सुख उसे भी तो मिलेगा बरसों से उसने अपनी जवानी को जिम्मेदारी की बोझ तले दबा रखी थी आज उसे बोझ को हटाने का मौका मिल रहा है तो क्यों उसे रोक रही है,,,,।
सुगंधा को अपने बेटे को इस तरह की हरकत करने से रोकना उसकी मजबूरी नहीं उसका फर्ज था क्योंकि वह एक मां थी और एक बेटे को इस तरह की हरकत करने से रोकना ही उसका फर्ज था क्योंकि दोनों के बीच मां बेटे का रिश्ता था और वह इस मां बेटे के रिश्ते को कलंकित नहीं होने देना चाहती थी पहले ही वह मन ही मन में संजू के साथ हम बिस्तर होने का कल्पना करती थी लेकिन हकीकत में हुआ ऐसा करने से कतराती थी,,,, इसी लिए वह फिर से अपने बेटे का हाथ पकड़ कर उसे अपने से दूर करने की कोशिश करते हुए बोली,,,)
(सुगंधा का ऐसा कहना था कि तभी संजू उसकी बांह पकड़कर उसे अपनी तरफ घुमा दिया और उसके लाल-लाल होठों पर अपने होंठ रख कर पागलों की तरह उसके होठों का रस पीना शुरू कर दिया,,, ईतने में सुगंधा का धैर्य जवाब दे गया,,,, वह एकदम से मस्त हो गई मां बेटे के बीच के पवित्र रिश्ते को वह भी एकदम से भूल गई,,, और बोलती भी कैसे नहीं वह भी तो यही चाहती थी बरसों बाद किसी मर्द की बाहों में वह थी इसलिए उसकी जवानी पिघलने लगी थी,,,,। अंकित को एहसास हो रहा था कि उसकी मां ढीली पड़ रही थी और इसी मौके का फायदा उठाते हुए वह तुरंत अपनी मां के ब्लाउज का बटन खोलने शुरू कर दिया और देखते ही देखते हो अपनी मां के ब्लाउज का बटन खोलकर ब्लाउज को उतार फेंका और ब्रा भी उतार फेंका,,, अपनी मां की नंगी चूचियों को देखकर वह पूरी तरह से पागल हो गया और तुरंत अपने दोनों हाथों में उसके दोनों कबूतरों को पकड़ कर उसका गला घोटने शुरू कर दिया वह पागलों की तरह अपनी मां की चूचियों को दबा रहा था क्योंकि पहली बार वह किसी औरत की चूची को अपने हाथ में लिया था और वह कोई और औरत नहीं बल्कि उसकी खुद की मां थी इसलिए उसे कुछ ज्यादा ही उत्तेजना का एहसास हो रहा था,,,,।
अंकित की हरकतों का सुगंधा भी मजा लेने लगी उसे मजा आने लगा था अपने बेटे के साथ जिस तरह से अंकित उसकी चूचियों को जोर-जोर से दबा रहा था वह पागल हुए जा रही थी और देखते ही देखते अंकित बारी-बारी से अपनी मां की दोनों चूचियों को मुंह में लेकर पीना शुरू कर दिया था कुछ देर तक वह अपनी मां की जवानी से इसी तरह से खेलता रहा और एक हाथ से वह अपने पेंट को उतार कर नीचे जमीन पर गिरा दिया था वह पूरी तरह से नंगा हो चुका था हालांकि उसकी मां अभी भी कपड़ों में थी,,, अंकित का लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आ चुका था और पागल हुआ जा रहा था अपनी मां की बुर में जाने के लिए,,,,।
अपने लंड की स्थिति से भली भांति परिचित होते ही अंकित अपनी मां के दोनों कंधों पर हाथ रखकर उसे नीचे की तरफ बैठाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते सुगंधा भी अपने घुटनों के बाल हो गई उसके चेहरे के सामने उसके बेटे का खड़ा लंड एकदम लहरा रहा था,,, जिस पर नजर पडते ही सुगंधा के मुंह के साथ-साथ उसकी बुर में भी पानी आ गया,,,, सुगंधा को मालूम था कि उसे क्या करना है वह तुरंत अपना हाथ आगे बढ़कर अपने बेटे के लंड को पकड़कर उसे मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दि,,, सुगंधा को भी मजा आने लगा था अपनी मां को लंड चूसता हुआ देखकर अंकित समझ गया था कि उसकी मां भी लाइन पर आ चुकी है इसलिए अपनी कमर को धीरे-धीरे हिलाना शुरू कर दिया था उसे बहुत मजा आ रहा था,,,,
कुछ देर तक अंकित इसी तरह से अपनी मां को मस्त करता रहा और खुद भी आनंद लेता रहा,,, लेकिन अब वह समझ गया था कि लोहा पूरी तरह से गर्म हो चुका है या हथोड़ा मारना जरूरी हो चुका है इसलिए अपनी मां की बाहों को पकड़ कर उसे उपर की तरफ उठाया और रसोई घर में रसोई के पत्थर की तरफ घूमाकर उसकी कमर को पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया,,, और फिर एक बार फिर से मैं अपनी मां की साड़ी को दोनों हाथों से पकड़ कर उठा कर कमर तक कर दिया एक बार फिर से सुगंधा की भारी भरकम गोल-गोल गांड अंकित की आंखों के सामने चमकने लगी और उसे पर से लाल रंग की चड्डी यह देखकर अंकित की जवानी पूरी तरह से जोड़ करने लगी वह तुरंत अपनी मां की चड्डी को दोनों हाथों से पकड़ कर नीचे खींच दिया और उसे घुटने तक लाकर उसे घुटनों में फंसा दिया अब अंकित के लिए रास्ता साफ हो चुका था उसकी मां भी तैयार हो चुकी थी चुदवाने के लिए,,,,।
अंकित की सांस बड़ी तेजी से चल रही थी उसका हल भी बुरा था अपनी मां की मदमस्त जवानी देखकर वह पूरी तरह से पसीने से तरबतर हो चुका था,,,, अंकित का यह पहली बार था वह पहली बार किसी औरत को चोदने जा रहा था,,, सुगंधा का दिल भी जोरों से धड़क रहा था,,, उसके माथे पर भी पसीना टपक रहा था वह एक तरफ है कि अंकित पहली बार कैसे उसकी चुदाई कर पाएगा और इस बात से उत्सुक थी की आज बरसों बाद उसकी बुर में लंड घुसने वाला था,,, अंकित ढेर सारा थुक अपने लंड के सुपाडे पर लगाया,,, और अपनी मां की बुर पर भी लगाकर जिला कर दिया वह तो पहले से ही पानी पानी से गीली हो चुकी थी और फिर अपने लंड को सुपाडे को जैसे ही अपनी मां की गुलाबी छेद पर रखा सुगंधा की बुर से सावन की फुहार बरसने लगी वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी और देखते ही देखते अंकित अपने लंड के सुपाडे को अपनी मां की बुर के अंदर डाल दिया,,, और फिर अपनी मां की कमर पकड़ कर उसे चोदना शुरू कर दिया,,,।
सुगंधा मदहोश हुए जा रही थी बरसों बाद उसकी बुर में लंड गया था और वह भी अपने ही बेटे का जो कि कुछ ज्यादा ही मोटा तगड़ा और लंबा था,,, सुगंधा एक तरफ पसीने से तरबतर हुए जा रही थी वहीं दूसरी तरफ उसकी बुर से बदन रस निकालकर पानी पानी हुए जा रही थी वह पूरी तरह से मस्त थी वह कभी सपने में भी नहीं सोचती थी कि वह अपने बेटे के साथ हम बिस्तर होगी अंकित का हर एक धक्का उसे स्वर्ग का सुख दे रहा था वह पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी पलंग चरमरा रही थी,,, अंकित के हर एक धक्के पर सुगंध लहर उड़ाती थी और उसकी भारी भरकम चुचीया पानी भरे गुब्बारे की तरह छाती पर लौटने लगती थी,,, देखते ही देखते सुगंधा की सांस ऊपर नीचे होने लगी वह गहरी गहरी सांस लेने लगी उसके बदन में अकड़न पढ़ने लगे और फिर वह बिस्तर की चादर को दोनों हाथों से कस के पकड़ कर गरम लावा बाहर निकलने लगी,,,, वह चरम सुख पर पहुंच चुकी थी और झड़ना शुरू कर दी थी कि तभी उसकी आंख खुल गई,,,, आंख खुलते ही उसकी नजर छत पर गई पंखा चोरों से चल रहा था वह इधर-उधर देखने लगी उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह अपने बिस्तर पर अकेली ही थी और एकदम निर्वस्त्र पूरी तरह से नंगी और उसकी हाथ की दो ऊंगली उसकी बुर में अंदर बाहर हो रही थी,,,, उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह सपना देख रही थी वह कल्पनाओं की दुनिया में इस कदर खो गई थी कि सपने में उसके बेटे ने उसकी चुदाई करके उसे तृप्त कर दिया था उसकी हाथ की उंगली अभी भी उसकी बुर के अंदर घुसी हुई थी उसे धीरे-धीरे याद आने लगा कि वह अपने कमरे में आई थी तो बिस्तर पर लेते ही वह धीरे-धीरे अपने सारे कपड़े उतार कर नंगी हो गई थी और जिस तरह से अपने बेटे से बातचीत करके रोमांचित हुई थी उसी के चलते वह अपने बेटे की कल्पना करके अपने साथ संभोग रत कर ली थी,,, जिसके चलते वह सपनों की दुनिया में पूरी तरह से खो चुकी थी और सपने में अपने बेटे के साथ चुदाई का सुख भोग रही थी हकीकत का भान होते ही वह एकदम से बिस्तर से उठकर बैठ गई और अपनी उंगली को अपनी बुर में से बाहर निकाली तो बुर से मदन रस का फव्वारा फुट पड़ा,,,, वह पूरी तरह से मत हो चुकी थी कल्पनाओं की दुनिया में ही सही वह मदहोश हो चुकी थी उसे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था,,,,। वह धीरे से बिस्तर पर से अपने दोनों पैरों को पलंग से लटका कर बैठ गई और अपनी सांसों को दुरुस्त करने लगी टेबल पर बड़ा पानी का गिलास उठाकर वह एक सांस में गटक गई,,, इस समय उसे बहुत हल्का महसूस हो रहा था वह कुछ देर तक किसी तरह से बैठी रही दीवार पर टंगी घड़ी पर नजर गई तो रात के 2:00 बज रहे थे सुबह होने में अभी बहुत समय था इसलिए वह इस तरह से निर्वस्त्र रही बिस्तर पर लेट गई और फिर से उसकी आंख लग गई,,,।
इन सब के बारे में सोचकर जहां एक तरफ उसका मन उत्तेजित हो जाता तो वहीं दूसरी तरफ उसका मन भरी भी हो जाता था क्योंकि वह ऐसा ख्वाब की दुनिया ढूंढ रही थी जिसमें उसका हम बिस्तर उसका ही बेटा था जो की दुनिया की नजर में गलत था और इन सब के बारे में सोच कर उसे दुख भी होता था लेकिन इस बात से उसे इनकार भी नहीं था कि अपने बेटे की कल्पना करके इस अत्यधिक आनंद की प्राप्ति भी होती थी,,,, कभी-कभी तो वह इस तरह के खयालात के बारे में सोच कर दुखी भी हो जाती थी और अपने आप को कसम देकर इस तरह की कल्पना में ना खोने का वादा भी करती थी लेकिन दूसरे दिन फिर शुरू हो जाती थी ऐसा हुआ कई बार कर चुकी थी लेकिन उसका खुद के मन पर बिल्कुल भी काबू नहीं था जिसकी वजह से उसके ख्याल आते और उसकी जवानी पूरी तरह से बेलगांव होती जा रही थी उसकी जवानी में खूबसूरती में और ज्यादा निखार आते जा रहा था जिसका घर में जवान बेटे को तो बिल्कुल भी पता नहीं चलता था लेकिन घर के बाहर सभी लोग की नजरे सुगंधा पर ही टिकी रहती थी सुगंधा के आते-जाते हंसने बोलने सब पर कई लोगों की नजर रहती थी,,, लोग सुगंधा के बारे में अपने मन में ही अत्यधिक मादकता भरे कल्पना में खुद को उसकी दोनों टांगों के बीच कल्पना करके आनंद लिया करते थे,,, लोगों को सुगंधा की भारी छातिया और गद्देदार गांड कुछ ज्यादा ही उत्तेजित कर जाती थी,,,, लेकिन इन सबसे अनजान था तो वह था सुगंधा का खुद का जवान बेटा अंकित क्योंकि आज तक कुछ नहीं अपनी मां को किसी गलत नजरिए से देखा ही नहीं था अपनी मां को क्या हुआ किसी भी औरत को कभी भी गलत नजरिए से देखता ही नहीं था,,,, इसीलिए मां बेटे दोनों के बीच जैसा सुगंधा के विचार थे उसे तरह से अंकित के विचार मिलते ही नहीं थे वरना जो कुछ भी स्वप्न में हुआ था उसे हकीकत की शक्ल देने में देर ना लगती,,,।
समय के साथ धीरे-धीरे सब कुछ आगे बढ़ता चला जा रहा था सुगंधा अपने मन में यही सोचती थी कि वह किस तरह से अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करें क्योंकि कई बार सोने के बाद उसने अपने मन में फैसला कर दी थी कि अगर उसे शारीरिक संबंध बनाना ही पड़ा तो वह अपने बेटे के साथ बनाएगी क्योंकि इसमें बदनामी का डर बिल्कुल भी नहीं था,,, और ना ही किसी के द्वारा बदनाम करने के दर से बार-बार शोषण करने का डर था घर की बात घर में ही रह जाती और मजा का मजा मिल जाता लेकिन अपने बेटे के चाल चलन और उसके संस्कार देखकर सुगंधा को लगता नहीं था कि उसका बेटा किसी भी तरह से उसके तरफ आकर्षित होगा,,, लेकिन एक औरत होने के नाते उसे अपने आप पर विश्वास था,,, कि वह अपनी नशीली जवानी के चलते अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने में कामयाब हो जाएगी क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि एक स्वर्ग की अप्सरा ने एक संत की तपस्या को भंग कर दी थी और इस समय वह संत था उसका बेटा और अप्सरा थी वह खुद,,,, बस उसे मौका नहीं मिल रहा था अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए हालांकि वह अपने मन में ठान चुकी थी कि अब वह अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करके अपनी मनमानी करके रहेगी लेकिन इसकी शुरुआत करने में उसके मन में भी झिझक हो रही थी क्योंकि उसे इसह बात का डर था कि अगर उसका बेटा बुरा मान गया तब क्या होगा उसकी नजर में तो वह बदनाम हो जाएगी और उसका बेटा फिर कभी उसकी इज्जत भी नहीं करेगा यह ख्याल मन में आता था तो वह थोड़ा डगम जाती थी लेकिन फिर उसे वही सपना याद आने लगता था जब वह सपने में उसका बेटा उसके साथ जबरदस्त संभोग कर रहा था और फिर इस कल्पना के जरिए वह अपने आप को आगे बढ़ने का दृढ़ विश्वास कराती थी,,,।
धीरे-धीरे सुगंधा अपने जीवन में आगे बढ़ रही थी वह रोज सही समय पर स्कूल पहुंच जाती है और सही समय पर घर पर भी आ जाती थी,, घर के बाहर अगर कोई उसकी सहेली थी तो वह थी नूपुर जिससे वह ज्यादा बातचीत भी नहीं करती थी लेकिन उसे लगता था कि एक वही है जो उसकी सही मायने में सहेली है क्योंकि वह रोज रिशेष पडते ही अपना लंच बॉक्स लेकर उसके पास पहुंच जाती थी और दोनों आपस में मिलकर एक दूसरे का लंच बॉक्स खत्म करते थे,,,, वैसे तो सुगंध को नूपुर के बारे में कुछ ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन धीरे-धीरे सुगंधा को उसी के द्वारा पता चला कि वह शादीशुदा और दो बच्चों की मां ठीक उसकी ही तरह लेकिन उसके दोनों बच्चे अंकित और तृप्ति की तरह जवान नहीं थे,,,,।
सुगंधा वैसे तो खास कुछ अपने बारे में नूपुर को बताती नहीं थी लेकिन उसके बारे में जानने की उत्सुकता उसकी हमेशा बढ़ती ही रहती थी नूपुर सुगंधा जितनी खूबसूरत तो नहीं लेकिन सुगंधा से काम भी नहीं थी दो बच्चों की मां भाभी थी और अपने बदन की देखरेख अच्छी तरह से रख कर वहां भी पूरी तरह से जवान बनी हुई थी पूरी तरह से गदराई जवानी की मालकिन थी नुपुर,,,,,,, वह भी स्कूल अक्सर रिक्शा से या बस तो कभी उसके घर से कोई छोड़ने आ जाता था अधिकतर सुगंधा ने तो एक उम्र दराज आदमी को ही देखी थी जिसकी तोंद कुछ ज्यादा ही निकली हुई थी और देखने में कुछ खास नहीं था स्कूटर पर उसके पीछे बैठकर वह कभी-कभी स्कूल आतीनथी स्कूटर वाले आदमी को देखकर उसके बारे में जानने की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही थी सुगंध को बचाना चाहती थी कि नूपुर जिसके साथ बैठकर आती है वह है कौन उसका पति है या कोई और या घर का कोई सदस्य,,,,,,।
और ऐसे ही एक दिन दोनों विशेष के समय लंच कर रहे थे तो बात ही बात में सुगंधा नूपुर से बोली,,।
नूपुर वह स्कूटर पर तुम जिसके साथ बैठ कर आती हो कौन है वो,,,,(नूपुर की तरफ देखे बिना ही सुगंधा उससे बोली,,, लेकिन नजर नीचे किए हुए भी वह नूपुर की तरफ कर नजरों से देख रही थी वह एक तरह से नूपुर के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी कि नूपुर क्या जवाब देती है,,,, सुगंधा के मुंह से इस बारे में बात की जिक्र छिड़ते ही नूपुर एकदम से शक पका गई नूपुर के चेहरे को देखकर ही लग रहा था कि वह जवाब देना नहीं चाह रही थी और उसके चेहरे पर आया यह भाव सुगंधा को अच्छी तरह से समझ में आ रहा था,,,, नूपुर यह सवाल सुनकर खामोश रही और लंच करने में ही अपने आप को व्यस्त करने की कोशिश में लगी रही तो सुगंधा अपने सवाल का जवाब न पाकर एक बार फिर से बोली,,,)
क्या हुआ,,, तुम बताई नहीं कौन है वो,,,,
वह मेरे पति हैं,,,( अपनी नजरों को नीचे करके अगल-बगल देखते हुए नूपुर ने यह जवाब दी और ऐसा लग रहा था कि जैसे नूपुर सुगंधा के सवाल का जवाब नहीं देना चाहती थी या अपने और उसके बीच के रिश्ते को बताना नहीं चाहती थी लेकिन एक बार तो सुगंधा को झटका सा लगा नूपुर के मुंह से यह सुनकर कि वह इंसान उसका पति है,,, जवाब देने के बाद अनूपपुर अपने आप को लंच करने में व्यस्त कर दी लेकिन पल भर में ही सुगंधा नूपुर के दर्द को अच्छी तरह से समझ गई,,, सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि नूपुर बहुत खूबसूरत औरत है कदकाठी और रंग रखाव में भी एकदम गोरी चिट्टी,,, बदन का भराव एकदम मादकता लिए हुए था,,, और ऐसे खूबसूरत बदन की मालकिन होने के नाते किसी भी सूरत में वह उस इंसान की बीवी नहीं लगती थी,,, इसीलिए तो सुगंध अपने मन में ही सोचने लगी कि कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली यह तो लंगूर के हाथ में अंगूर लग जाने जैसी बात थी लेकिन यह बात सुगंधा इस समय कहना नहीं चाहती थी लेकिन पल भर में ही भानपुर के दर्द को समझ गई थी कितनी खूबसूरत औरत भला उसे इंसान के साथ कैसी रहती होगी जो की उम्र में भी उससे बड़ा था और लगभग उसके ससुर की उम्र जैसा ही लगता था दोनों साथ में चलते समय किसी भी सूरत में पति-पत्नी लगते ही नहीं थे और यही प्रश्न सुगंधा के मन में भी था इसीलिए वह अपने मन की उत्सुकता को खत्म कर लेना चाहती थी इसीलिए सुगंधा ने नूपुर से यह सवाल पूछी थी,,,, सवाल जवाब के बाद कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही इस खामोशी को सुगंधा ही खत्म करते हुए बोली,,,)
नूपुर बुरा ना मानना लेकिन तुम्हें देखने के बाद किसी को यकीन ही नहीं होगा कि वह तुम्हारा पति है मुझे माफ करना मैं यह बात कहना नहीं चाहती थी लेकिन मुझे कहना पड़ रहा है क्योंकि तुम बहुत खूबसूरत हो मुझे लग रहा था कि शायद तुम्हारा पति तुम्हारी तरह ही होगा लेकिन सब किस्मत की बात है लेकिन यह सब हुआ कैसे वह तो उम्र में तुमसे भी ज्यादा बड़े हैं,,,,
मजबूरी,,,(कुछ देर खामोश रहने के बाद नूपुर बोली)
मजबूरी,,,, कैसी मजबूरी (आश्चर्य जताते हुए सुगंधा बोली,,)
गरीबों की और कैसी,,,(नूपुर थोड़ा सा चिढ़ते हुए बोली,,, उसकी बात से लग रहा था कि जैसे वह जवाब देना नहीं चाहती थी लेकिन फिर भी सुगंधा बोल पड़ी,,,)
गरीबी मैं कुछ समझी नहीं,,,
हम सात भाई बहन थे पांच बहन और दो भाई,,, मैं तीसरे नंबर की थी बहनों में दो बहनों की तो शादी जैसे तैसे करके मम्मी पापा ने कर दी है लेकिन उसके बाद पापा की नौकरी छूट गई कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी पैसे का जुगाड़ नहीं हो रहा था और मेरी शादी की उम्र हो चुकी थी मेरे पिताजी और मेरी गरीबी का फायदा उठाकर मेरे पति के पिताजी मेरे पिताजी से मिलकर शादी में की कर दिए शादी का सहारा खर्चा गहना कपड़े लगते सब कुछ का खर्चा उन्हीं लोगों ने दिया,,, मेरे पिताजी मजबूर थे और शादी तय हो गई,,,,
क्या कह रही हो नूपुर इसमें तुम्हारी मर्जी थी,,,
तुम्हें क्या लगता है मेरी जैसी औरत की मर्जी होगी क्या भला लेकिन मैं मजबूर थी ना चाहते हुए पर मुझे हां कहना पड़ा और नतीजा तुम देख रही हो,,,,
(इतना कहते हुए उसकी आंखें छलक आई जिसे वह अपने रुमाल से पोछने की कोशिश कर रही थी,,, सुगंधा तुरंत हाथ बढ़ाकर उसकी हथेली को अपने हथेली में लेकर दबा दी यह एक तरह से उसकी तरफ सांत्वना का इशारा था उसे शांत कराते हुए सुगंधा बोली,,,)
इंसान अपने मन में तो बहुत कुछ सोच कर रखता है अपने सपनों की दुनिया अलग ही बसा कर रखता है लेकिन हकीकत कुछ और होती है क्योंकि किस्मत में जो कुछ भी लिखा होता है वह तो होना ही है तुम्हें देखकर कोई नहीं कहेगा कि तुम्हारी पसंद ही की शादी हुई है लेकिन कर भी क्या सकती है किस्मत को मंजूर भी यही था,,,,।,,,
मेरे बारे में तो जान गई लेकिन अपने बारे में कुछ तो बताओ,,,(नूपुर बहुत ही ज्यादा अपने आप को स्वस्थ करते हुए बोली,,,,, नूपुर की बात सुनकर सुगंधा के भी चेहरे पर उदासी छाने लगी,,, वह गहरी सांस लेते हुए बोली,,,)
अपनी तो जिंदगी एकदम खुली किताब की तरह है मेरे दो बच्चे हैं और पति का देहांत हुए बरसों गुजर गए,,,,।
क्या,,,,?(सुगंधा के मुंह से इतना सुनते ही एकदम से आश्चर्य में नूपुर बोली क्योंकि उसे यकीन नहीं हो रहा था की सुगंधा जो कुछ भी कह रही है वह सही है,,,)
हा नुपुर यह सच है मेरे पति का देहांत हुए लगभग लगभग सात आठ साल गुजर चुके हैं मेरे दो बच्चे हैं बड़ी लड़की है छोटा लड़का है ,,,,
मुझे माफ करना सुगंधा मुझे मालूम नहीं था लेकिन तुम्हें देखकर कोई भी नहीं कह सकता कि तुम इतना बड़ा दुख हंसते-हंसते झेल रही हो,,,,
मैं तुमसे कहीं ना नुपुर कि इंसान सोचता कुछ और है होता कुछ और है,,,, मेरे पति भी इसी स्कूल में शिक्षक थे और यह अच्छा हुआ कि उन्होंने मुझे भी इस स्कूल में शिक्षिका के रूप में जोब दिल दिए थे वरना गुजारा करना मुश्किल हो जाता,,,
(सुगंधा के जीवन के बारे में सुनकर नूपुर को बहुत दुख हो रहा था क्योंकि नूपुर ने कभी सपने में नहीं सोची थी कि इतनी खूबसूरत और हंसते खेलते रहने वाली औरत इतना बड़ा दुख झेल रही है,,,, वह दोनों के बीच बातों का सिलसिला और बढ़ता इससे पहले ही रिशेष पूरी होने की घंटी बज गई और दोनों एक दूसरे की तरफ मुस्कुराते हुए देख कर अपना लंच बॉक्स बैग में रखकर अपनी अपनी क्लास की तरफ जाने लगी,,,,।)
रात को खाना खाने के बाद अपने कमरे में बिस्तर पर पडते ही फिर से वही सिलसिला शुरू हो गया,,,, बिस्तर पर जाते ही अपने सारे कपड़े उतार कर एकदम नंगी हो गई फिर वही अपनी उंगलियों का सहारा लेकर अपने जवानी की प्यास को बुझाने की कोशिश करने लगी,,,, और फिर गहरी निंद्रा में सो गई सुबह-सुबह जब दरवाजे पर दस्तक होने लगी तो उसकी आंख खुली और अपने आप को बिस्तर पर संपूर्ण रूप से नंगी देखकर वह जल्दी से उठकर बैठ गई वह जानती थी कि दरवाजे पर दूध वाला आया था वह अपने सारे कपड़े पहनने में असमर्थ थी इसलिए गाउन को जैसे तैसे करके पहन ले और फिर अपने कमरे से निकलकर और किचन में गई और एक पतीला लेकर मुख्य दरवाजे पर पहुंच गई और दरवाजा खोलकर दूध लेने लगी दूध वाला सुगंधा को देखकर रोज की तरह ही मुस्कुराया और बोला,,,)
बीबी जी थोड़ा जल्दी उठ जाया करो मुझे देर हो जाती है,,,,
माफ करना आंख लग गई थी,,,,(और इतना कहते हुए बात पतीला लेकर थोड़ा सा झुक गई दूधवाला साइकिल को स्टैंड पर लगाकर,,, दूध के कान में से नाप भरकर दूध निकाला और पतीला में डालने लगा,,, अभी तक तो वह केवल दूध की धार देख रहा था लेकिन उसकी नजर जैसे ही धार के ठीक सामने गई तो उसके होश उड़ गए,,, क्योंकि दूध लेने के लिए सुगंध झुकी हुई थी और झुकाने की वजह से उसके गांव में से उसकी मदमस्त कर देने वाली खरबूजे जैसी च एकदम साफ दिख रही थी और साथ ही उस चुचियों की शोभा बढ़ा रही उसकी कड़क निप्पल भी एकदम तनी हुई साफ दिख रही थी,,,, यह नजारा देख कर तो दूध वाले की हालत खराब हो गई और उसके पेट में तंबू बनना शुरू हो गया,,,। और इस बात से सुगंधा बिलकुल बेखबर थी क्योंकि अभी भी हल्की-हल्की नींद में ही थी ,, दूध वाला तो पहला नाप भरकर दूध पतीला में डाला,,, और उसके बाद उसे आधा ही नाप डालना था लेकिन इस बार भी वह पूरा नाप भर लिया था दूध से और पतीला में डालते हुए वह सुगंधा की गाउन में उसकी चूचियों को देखता रहा उसकी कड़क निप्पल को देखकर उसका लंड कड़क हो गया था,,, सुगंधा को अभी तक इस बात का अहसास तक नहीं हुआ था कि वह दूध वाला उसकी चूचियों को देख रहा था जो कि एकदम साफ नजर आ रही थी,,,,, उसका ध्यान तब गया जब पतीले में से दूध नीचे गिरने लगा हुआ एकदम से दूध वाले को बोली,,,।
अरे अरे भैया यह क्या कर रहे हो,,,,(इतना कहते हुए वह दूध वाले की तरफ देखी तो उसकी निगाहों की सिधान पर जब उसका ध्यान गया और वह नजर झुका कर अपनी छातियों की तरफ देखने लगी तो उसके होश उड़ गए वाकई में उसकी चूची एकदम साफ नजर आ रही थी उसे इस बात का एहसास हुआ कि उस गलती हो गई थी रात को वह नंगी ही सो गई थी वह सुबह उठते ही वह जल्दबाजी में केवल गाउन पहनकर बाहर आ गई थी जिसमें से उसका पूरा बदन एकदम साफ झलक रहा था,,,, अपनी गलती का अहसास होते ही सुगंधा तुरंत अपना एक हाथ अपने गाऊन के उपर सतह पर रखकर अपनी चूचियों के नजारे को छुपाने की कोशिश करने लगी,,,, सुगंधा की हरकत को देखकर दूध वाले को समझ में आ गया कि वह जान गई है इसलिए वह तुरंत बिना कुछ बोले साइकिल को स्टैंड पर से उतरा और तुरंत वहां से रवाना हो गया सुगंध को अपनी गलती का एहसास हो रहा था वह तुरंत दरवाजा बंद करके कमरे में आ गई और फिर रसोई घर में प्रवेश करते ही वह ट्यूबलाइट की स्वीच ऑन करके दूध के पतीले को किचन पर रखकर गहरी गहरी सांस लेने लगी शुरू शुरू में तो उसे एकदम से घबराहट महसूस होने लगी लेकिन जिस तरह से वह दूध वाला उसकी चूचियों को देख रहा था सुगंधा के बदन में अजीब सी हलचल होने लगी,,, वैसे तो सड़क पर आते जाते हर कोई उसके बदन को अपनी आंखों से नजर भर कर देखता ही रहता था लेकिन आज पहली बार था जब उसकी आंखों के सामने एक दूध वाला उसकी नंगी चूचियों को जी भर कर देख रहा था इस बात का एहसास उसके बदन में उत्तेजना की लहर पैदा कर रहा था वह दूध वाले के बारे में सोचने लगी तभी उसके मन में युक्ति सोचने लगी वह अपने मन में सोचने लगी कि जब दूध वाला उसकी चूची की झलक भर देख कर इस कदर पागल हो सकता है तो उसका बेटा क्यों नहीं,,,, और यही सोचकर उसके होठों पर मादक मुस्कान नाचने लगी,,,,।
और यही सोचकर उसके तन-बाद में अजीब सी हलचल हो रही थी दूध वाले के जाने के बाद वह पतीला लेकर रसोई घर में रख दी थी और वही खड़ी-खड़ी जो कुछ देर पहले हुआ था उसके बारे में सोच रही थी उसे तो अंदाजा भी नहीं था कि झुकाने की वजह से उसकी चूचियां एकदम साफ दूध वाले को नजर आ रही होगी वह तो हल्की नींद में ही थी,,, उसे तो इस बात का अहसास तक नहीं था कि वह गाऊन के अंदर कुछ पहनी भी है कि नहीं,,,,,,, वह रसोई घर में खड़ी-खड़ी रात की घटना के बारे में सोचने लगी जब वह टीवी बंद करके अपने कमरे में सोने के लिए आई थी,,,, कमरे में आते ही वह बिस्तर पर लेटने से पहले अपने सारे वस्त्र उतार कर एकदम नंगी हो गई थी और बिस्तर पर लेट कर अपनी दोनों टांगों को फैला कर अपनी हथेली को अपनी गरम बुर पर रखकर उसे जोर-जोर से रगड़ रही थी और अपने मन में अपने बेटे का ख्याल कर रही थी,,, एक बात का एहसास उसे भी अच्छी तरह से था कि जब भी वह अपने बेटे का ख्याल अपने मन में लाती थी और अपने अंगों से खेलने की कोशिश करती थी उसे कुछ ज्यादा ही उत्तेजना का एहसास होता था और मजा भी बहुत आता था,,,, और वह अपनी दोनों टांगें फैलाए अपनी गुलाबी बुर से खेल रही थी और अपने बेटे की कल्पना करते हुए अपने मन में यह सोच रही थी कि उसका बेटा उसकी दोनों टांगों के बीच झुक कर उसकी बुर को अपनी होठों से स्पर्श करके अपनी जीभ से चाट रहा है यह ख्याल उसके मन में आते ही वह पूरी तरह से मदहोश हो गई थी,,, और मदहोशी के आलम में अपनी दो उंगलियां अपनी बुर में डालकर उसे अंदर बाहर करते हुए अपने मन में कल्पना कर रही थी कि उसका बेटा उसकी दोनों टांगों को अपनी कमर पर लपेटकर उसकी बुर में अपना लंड डालकर उसे चोद रहा है यह एहसास यह कल्पना उसे पूरी तरह से मदहोश कर दिया था और वह बहुत ही जल्द झड़ गई थी,,, और फिर संतुष्टि का एहसास लिए नरम नरम तकीए को अपनी बाहों में समेटे वह कब नींद की आगोश में चली गई उसे भी पता नहीं चला,,,,।
रात वाली घटना के बारे में याद करके उसके होठों पर मुस्कान तैरने लगी और उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह नग्न अवस्था में ही सो गई थी और सुबह दरवाजे पर दूध वाले की दस्तक की आवाज सुनकर जल्दबाजी में केवल गाउन पहनकर दूध लेने के लिए आ गई थी और उसकी मदमस्त चूचियों को देखकर दूध वाला पागल हो गया यह सब सोचने के बाद उसे अपनी बुर गीली होती हुई महसूस होने लगी,,, उसे अपनी सांसे भी ऊपर नीचे होती हुई महसूस होने लगी वह दीवार पर टकली घड़ी की तरफ देखी तो 6:00 बजने में 20 मिनट की देरी थी इसलिए वह अपना ध्यान भर के काम में लगाकर झाड़ू लगाना शुरू कर दी और अपने मन में सोचने लगी कि किस तरह से अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करेगी हालांकि उसे दूध वाले से इशारा तो मिल ही गया था बस उसे पर अमल करने की देरी थी लेकिन अमल करने में भी इस घबराहट हो रही थी,,, मन में भले ही बड़े सहज रूप से इरादा बना ली थी कि वह अपने बेटे के सामने इस तरह से पैसा आएगी कि उसके बेटे को उसकी नंगी चूचियों का दर्शन हो जाएगा लेकिन हकीकत में उसे बहुत घबराहट हो रही थी अपने बेटे के सामने इस तरह की हरकत करने मे उसे शर्म भी महसूस हो रही थी,,,, लेकिन घर की सफाई करते हुए वह अपना इरादा बना ली थी वह अपने मन को पक्का कर रही थी कि आज वह किसी भी तरह से अपने बेटे को अपनी जवानी के दर्शन करा कर रहेगी,,,,
यही सब सोचते सोचते वह घर की सफाई कर ली थी पूरे घर में झाड़ू लगा लेने के बाद,,,,,,, वह दीवार के सहारे बैठ गई और अपने मन में सोचने लगी कि वह अपने बेटे के सामने जाए तो जाए कैसे और यह सोचती हो बार-बार अपने गांव के अंदर देख ले रही थी जिसमें से उसे खुद अपनी बड़ी-बड़ी चूचियां एकदम साफ नजर आ रही थी और उसकी छुआरे जैसी निप्पल एकदम कैडबरी चॉकलेट की तरह कड़क नजर आ रही थी,,,, यह सब देखकर उसकी खुद की हालत खराब होती नजर आ रही थी घड़ी पर नजर गई तो 6:00 बज गए थे,,,, उसके बच्चों के उठने का समय हो गया था लेकिन फिर भी 15 मिनट जैसा समय रह गया था वह अपने मन में सोचने लगी की यही 15 मिनट में जो कुछ भी करना है उसे करना है यही सोच कर वह अपनी जगह से खड़ी हुई और अपने बेटे के कमरे के पास जाकर कुछ देर तक वहीं खड़ी होकर सोचने लगी आखिरकार वह एक मां थी और भला कैसे अपने ही बेटे को अपनी ही नंगी चूचियों के दर्शन जानबूझकर करा सकती थी,,, एक औरत होने के नाते औरत किस क्रियाकलाप को अच्छी तरह से जानती थी उसे इस बात का भी एहसास था कि इस क्रियाकलाप में कुछ भी उंच नीच हो सकती थी,,, लेकिन वह मन बना ली थी इसलिए दरवाजे पर दस्तक देने के लिए जैसे ही वह अपना हाथ उठाकर दरवाजे पर रखी तो दरवाजा खुद ब खुद खुल गया,,,,,।
कभी कभार अंकित अपने कमरे के दरवाजों को खुला ही छोड़ देता था वैसे भी छुपाने लायक उसके पास कुछ भी नहीं था,,, और अपने बेटे के कमरे के खुले हुए दरवाजे को अपनी किस्मत का द्वार समझ कर वह प्रसन्नता के साथ अंदर की तरफ देखने लगी उसका बेटा एकदम गहरी नींद में सो रहा था,,,, अंदर डिम लाइट जल रहा था इसके लिए उसकी रोशनी बहुत कम थी जिसमें उसे कुछ साफ नजर नहीं आ रहा था वह धीरे से कमरे में प्रवेश की और हल्के से दरवाजे को बंद कर दी सुबह का समय हो चुका था इसलिए उसके पास एक बहाना था उसे जगाने का और कैमरा साफ करने का और वह अपने साथ में झाड़ू भी लेकर आई थी इसलिए वह ट्यूबलाइट की स्विच को ऑन कर दी और पूरे कमरे में दूधिया रोशनी फैल गई और अपने बेटे के बिस्तर की तरफ देखी तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न था उसका बेटा पीठ के बल लेटा हुआ था और चादर उसकी छाती हो तो खींची हुई थी लेकिन इस बीच उसकी दोनों टांगों के बीच का हिस्सा तंबू की शक्ल में ऊपर की तरफ उठा हुआ था जिसे देखकर सुगंधा की हालत खराब हो गई उसका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया क्योंकि जिस तरह का तंबू चादर में बना हुआ था उसे देखकर सुगंधा को एहसास हो गया था कि उसके बेटे का मर्दाना अंग कुछ ज्यादा ही ताकतवर है,,,,। ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में सब कुछ साफ नजर आ रहा था सुगंधा का दिल जोरो से धड़कने लगा था वह आई तो थी अपनी जवानी का जलवा भी खेलने लेकिन अपने बेटे की जवानी देखकर उसका खुद का पानी छूट रहा था उसकी बुर पिघल रही थी,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वह अभी भी अपने बेटे के बिस्तर से तीन-चार फीट की दूरी पर थी लेकिन फिर भी सब कुछ साफ नजर आ रहा था,,, वह अपने बेटे के चेहरे की तरफ देखी जो की बहुत ही मासूम लग रहा था और वैसे भी उसका बेटा बहुत मासूम था लेकिन सोते समय वह और भी ज्यादा मासूम नजर आता था वह धीरे-धीरे अपने कदमों को आगे बढ़ने लगी और अपने बेटे के बिस्तर के बेहद करीब जाकर खड़ी हो गई और बड़े ध्यान से अपने बेटे की दोनों टांगों के बीच चादर में बने तंबू को देखने लगी उसके सांस लेने के साथ-साथ उसके तंबू में हरकत होती थी जो की हल्का-हल्का हिल रहा था और उसे देखकर ना जाने क्यों सुगंधा के मुंह के साथ-साथ उसकी बुर में भी पानी आना शुरू हो गया था उसका मन तो कर रहा था कि अपना हाथ आगे बढ़कर अपने बेटे के लंड को पकड़ ले लेकिन उसकी हिम्मत गवाही नहीं दे रही थी हालांकि उसकी सांसों पर नीचे हो रही थी उसके बदन में उत्तेजना की लहर तोड़ने लगी थी वह गाऊन के अंदर पूरी तरह से नंगी थी,,,, वह अपने मन में सोच रही थी कि अगर उसके बेटे की तरफ से दूसरे मर्दों की तरह प्रतिक्रिया मिली होती या उसका बेटा उसकी तरफ आकर्षित होता तो इस समय वह बेझिझक होकर अपने बेटे के ऊपर से चादर हटाकर उसके खड़े लंड पर अपनी गुलाबी बुर रख देती और उसके लंड पर कूदना शुरू कर देती,,, क्योंकि वह जानती थी कि उसके और उसके बेटे के बीच केवल शर्म की ही दूरी थी,,,, और इस दूरी को सुगंधा पूरी तरह से कम कर देना चाहती थी लेकिन कैसे उसे समझ में नहीं आ रहा था,,,,।
सुगंधा का दिल जोरो से धड़क रहा था उत्तेजना के मरी उसकी बुर फुल पिचक रही थी बार-बार उसका हाथ अपने आप ही उसकी बुर पर चला जा रहा था आई तो थी वह अपने बेटे को अपनी चूची दिखाने लेकिन अपने बेटे की मर्दाना अंग की झलक पाकर ही उसकी बुर की हालत खराब होती नजर आ रही थी,,,, बरसों गुजर गए थे उसकी बुर में लंड प्रवेश नहीं कर पाया था अपने पति के देहांत के बाद तो वह लंड की गर्मी को अपनी बुर में महसूस करना ही भूल गई थी,,, इसलिए तो उसकी बुर तड़प रही थी एक मोटे तगड़े लंड को लेने के लिए,,,, सुगंधा का मन व्याकुल हो रहा था और अंदर ही अंदर वह तड़प रही थी वह अपने बेटे के लंड को स्पर्श करना चाहती थी पकड़ना चाहती थी देखना चाहती थी उसकी मोटाई को उसकी लंबाई को उसके अंदर की गर्मी को वह अपनी आंखों से अपने बेटे के लंड को पिघलता हुआ देखना चाहती थी अपने बेटे के लंड से निकलने वाली पिचकारी की धार को देखना चाहती थी और उस धार को अपनी बुर में महसूस करना चाहती थी बहुत कुछ था सुगंधा के अंदर लेकिन शर्म की दीवार के पीछे सब कुछ छुपा हुआ था,,,,
सुगंधा अपने बेटे की तरफ बड़े ध्यान से देख रही थी वह पूरी तरह से गहरी नींद में सो रहा था इसलिए वह अपने बेटे के नींद में होने का फायदा उठा लेना चाहती थी इसलिए हिम्मत बांधकर वह अपने हाथ को आगे बढ़ने लगी चादर के ऊपर से ही सही वह बरसों के बाद लंड को पकड़ना चाहती थी,,, इसलिए धीरे-धीरे अपने हाथ को आगे बढ़ा रही थी अपने बेटे के लंड की तरफ बढ़ते अपने हाथ की तरफ वह बड़ी गौर से देख रही थी जिसमें डर और उत्तेजना का कंपन साफ महसूस हो रहा था,,,, और देखते ही देखते उसकी हथेली उसके बेटे के लंड के बेहद करीब पहुंच गई थी और इसी के साथ उसके दिल की धड़कन भी एकदम तेज चलने लगी थी,,, वह अपनी हथेली को कुछ देर तक अपने बेटे के लंड के करीब ही स्थिर कर दी थी और अपने मन में सोचने लगी थी कि अगर उसके बेटे की आंख खुल गई और उसने अपनी आंखों से अपनी मां को इस तरह की हरकत करता देखा तो अपने मन में क्या सोचेगा,,, फिर वह अपने ही मन में उठ रहे सवाल का खुद से ही जवाब देते हुए अपने मन में अपने मन की तसल्ली के लिए बोली,,,।
कुछ नहीं होगा उसका बेटा भी आखिरकार एक मर्द ही तो है उसके बीच जज्बात है उसका भी लंड खड़ा होता होगा जैसा कि इस समय खड़ा है अगर एक औरत का हाथ उसके लंड पर स्पर्श होगा तो वह पूरी तरह से मस्त हो जाएगा मचल उठेगा औरत के प्यार को पाने के लिए,,, और अगर एक औरत के स्पर्श से उसके लंड में जरा भी अंगड़ाई आएगी तो वह उसे औरत के सुख के लिए तड़प उठेगा भले ही उसके लंड का स्पर्श करने वाला उसकी मां ही क्यों ना हो,,,, यह सब सोच कर सुगंध का दिन बड़े जोरों से धड़क रहा था,,, अपने बेटे के खड़े लंड को देखकर उसके मन में अपने बेटे को लेकर बड़ी जिज्ञासा हो रही थी वह अपनी मन में सोच रही थी कि उसका बेटा भी औरतों के बारे में जरुर सोचता है तभी तो उसका लंड खड़ा है,,,, जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था अंकित का लंड प्राकृतिक रूप से सुबह-सुबह पेशाब लगने के कारण अपने आप ही खड़ा हो गया था जिसका अर्थ उसकी मां गलत तरीके से ले रही थी चाहे जैसा भी हो सुगंधा को अपना उल्लू ठीक करने से मतलब था,, ।
एक बार अपने बेटे के लंड को अपनी हथेली में भरकर उसके परिणाम को देख चुकी थी पहली बार में ही वह अपने बेटे के लंड को अपनी हथेली में भरने पर ही झड़ चुकी थी और दूसरी बार वह फिर से यह गुस्ताखी करके देखना चाहती थी,,,, और वह फिर से अपना हाथ आगे बढ़ा कर एक बार फिर से अपने बेटे के तंबू को अपनी हथेली में भरकर हल्के से दबा दी और इस बार उसके बेटे के बदन में थोड़ी हरकत हुई और वह तुरंत अपनी हथेली को पीछे खींच ली,,,, इस बार सुगंधा की सांसे बड़ी तेजी से चलने लगी ऐसा लग रहा था कि जैसे वह बड़े जोर से भाग कर आई हो उत्तेजना के मारे उसकी चूचियों की निप्पल एकदम तन गई थी और उसकी बुर फूल पिचक रही थी,,,,, धड़कते दिल के साथ वह घड़ी की तरफ देखी तो 6:20 हो रहा था,,,,, समय हो गया था और उसे अपनी बेटी के कमरे से भी हल्की-हल्की आवाज आ रही थी इसका मतलब साफ था कि वह भी जाग गई थी अब अपनी युक्ति पर आगे बढ़ना उचित नहीं था,,, और जिस हालत में वह अपने बेटे के बिस्तर के बेहद करीब खड़ी थी उसे शर्म महसूस होने लगी थी वह धीरे से वापस दरवाजे की तरफ गई और ट्यूबलाइट बंद करके वापस दरवाजे को बाहर से ही दस्तक देते हुए अपने बेटे को उठने के लिए बोली दरवाजे पर हो रही दस्तक की आवाज सुनकर अंकित की नींद खुल गई और वह भी उठकर बैठ गया लेकिन उसे जरा भी एहसास नहीं हुआ कि उसकी मां दो बार उसके लंड को अपने हाथ में लेकर छोड़ दी थी वह पूरी तरह से सहज था असहज थी तो सिर्फ सुगंधा,,,, जब सुगंधा ने देखी कि उसका बेटा उठकर बैठ गया है तो वह खुद-ब-खुद वहां से हट गई और अपनी उत्तेजना को शांत करने के लिए बाथरूम में घुस गई जहां पर वह अपना गाउन उतार कर एकदम नंगी हो गई और फिर अपनी उंगलियों का सहारा लेकर अपनी जवानी की आग को बुझाने की कोशिश करने लगी,,,।
सुगंधा ने दूध वाले की तरह ही अपने बेटे को अपनी चुचियों का जलवा दिखाने की युक्ति को स्थगित कर दी थी क्योंकि उसे अपनी जवानी का जलवा दिखाने जितना समय ही नहीं था वरना वह अपने मन में तय कर चुकी थी कि आज झाड़ू लगाते समय वह अपने बेटे को अपनी उभरती हुई जवानी का जलवा जरूर दिखाएगी,,, लेकिन अपने बेटे के कमरे में प्रवेश करते ही उसकी आंखों के सामने जो नजर नजर आया था उसे देखकर उसके तन बदन में आग लग चुकी थी और वह अपने मां पर बिल्कुल भी काबू नहीं कर पाई थी चादर ओढ़ कर सो रहे अंकित के खुंटे को अपनी आंखों से देख कर उसे पकड़ने की अपनी इच्छा को सुगंधा दबा नहीं पाई थी और इसी के चलते वहां चादर के ऊपर से ही सही अपने बेटे के लंड को छूने की कोशिश की थी और जिसमें वह कामयाब भी हो चुकी थी एक नहीं बल्कि दो दो बार,,,, उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा को समझते देर नहीं लगी थी कि उसके बेटे के पास का हथियार बेहद दमदार है जो कि किसी भी औरत को पूरी तरह से तृप्त कर सकता है,,,
अपने बेटे के लंड को चादर के ऊपर से ही स्पर्श करने की खुशी में हो पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी थी,,, जिसका असर उसे अपनी बुर में बराबर महसूस हो रहा था और वह अपनी बुर की गर्मी को शांत करने के लिए बाथरूम में प्रवेश करके अपनी उंगलियों का सहारा लेकर वह अपने आप को शांत करने की कोशिश कर रही थी,,,।
सुगंधा का दिमाग पूरी तरह से उन्मादित हो चुका था उसमें अब सही गलत के सोचने की क्षमता नहीं रह गई थी पहले तो वह दूसरे लड़कों की दोनों टांगों के बीच की स्थिति का कल्पना में ही जायजा लिया करती थी लेकिन अब उसकी नजर अपने ही जवान बेटे पर थे जो की पूरी तरह से भला भला था उसे तो इस बात का अहसास तक नहीं हुआ था की चोरी से उसकी मां उसके कमरे में जाकर उसके खड़े लंड को चादर के ऊपर से पकड़ ली थी,,,। सुगंधा ने अपने मां पर बिल्कुल भी काबू न करके जिस तरह की हरकत अपने बेटे के साथ की थी उसे देखते हुए वहां अपने बेटे को चाय पानी खाना देने पर भी उससे,, नजर नहीं पिला पा रही थी क्योंकि उसने हरकत ही ऐसी कर दी थी पहले ही एक औरत होने के नाते वह अपने बेटे को उसे समय मर्द समझकर उसके खड़े लंड को अपने हाथों से पकड़ ली थी लेकिन आखिरकार थी तो वह उसे मर्द की मा ही,,, इसलिए सुगंधा के साहजिक होने पर उसमें की औरत दूर हो जाती थी और उसमें एक मां नजर आने लगती थी इसलिए वह अपने बेटे से नजर नहीं मिल पा रही थी लेकिन अंकित को तो कुछ पता ही नहीं था कि उसके साथ क्या हुआ था वह तो पूरी तरह से सहज था,,,,।
कभी-कभी सुगंधा को अपनी हरकत पर शर्मिंदगी महसूस होती थी और वह इस झमेले से निकलने की कोशिश करती थी लेकिन वह जितना भी इस झमेले से निकलने की कोशिश करती थी उतनी ही उसके अंदर डूबती चली जाती थी,,,, आखिरकार वासना का दरिया ही होता है इतना गहरा की सब कुछ अपने अंदर डूबा ले जाता है और ऐसा ही सुगंधा के साथ भी हो रहा था,,,,।
जैसे तैसे करके दिन गुजरने लगे सुगंधा अपने मन में बहुत चाहती थी कि वह अपने बेटे को अपनी जवानी का जलवा दिखाएं लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस तरह से अपने आप को तैयार करें अपने बेटे के सामने प्रदर्शन करने के लिए,,,,, क्योंकि जब भी वह कोशिश करती थी उसके अंदर घबराहट और शर्म एकदम साफ नजर आती थी वह इस बात से घबरा जाती थी कि अगर उसके बेटे को जरा भी इस बात का एहसास हो गया कि उसकी मां,,, जानबूझकर अपने अंगों की नुमाइश उसके सामने कर रही है तब क्या होगा तब उसका बेटा कैसा बर्ताव करेगा उसके बारे में क्या सोचेगा यही सब सोच कर उसका मन बैठ जाता था,,,, लेकिन जो काम हो घर में नहीं कर पाती थी वह खुद के लिए अद्भुत कार्य को अपनी क्लास में कर जाती थी अपने विद्यार्थियों के सामने,,,।
एक दिन वह अपने विद्यार्थियों को पढ़ा रही थी,,, और ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिख रही थी उसे इस बात का अहसास तक नहीं था कि उसके लिए एकदम सहज क्रिया को उसके जवान विद्यार्थी वासना भरी नजरों से देख रहे थे क्योंकि जिस तरह से वह अपना हाथ ऊपर करके ब्लैक बोर्ड पर चौक से कुछ लिख रही थी उसकी इस क्रिया पर उसके नितंबों का आकार कुछ ज्यादा ही उभर कर सामने नजर आ रहा था,,, और वैसे भी सुगंधा की आदत थी वह साड़ी को कमर पर एकदम कसकर बांधती थी जिसकी वजह से उसके नितंबों का आकार साड़ी के ऊपर से भी झलकता रहता था,,, और उसकी यही आदत मर्दों की कमजोरी बन जाती थी,,, और इस समय सुगंधा का यह रूप क्लास के कुछ आवारा लड़कों की आंखें सेंकने का काम कर रही थी,,,, अपनी टीचर की खूबसूरती और उसके अंगों का कटाव उभारओर मरोड़ देखकर विद्यार्थियों के मुंह से गर्म आ निकल जाती थी,,, और वह आवारा लड़के दूसरी बेंच पर बैठकर यही सब देखा करते थे उन लोगों को सुगंधा क्या पड़ता है इससे कोई मतलब नहीं था उन लोगों को मतलब था सिर्फ सुगंधा की खूबसूरती को अपनी आंखों से देखने का उसके खूबसूरत बदन के रस को अपनी आंखों से पीने का जो कि वह बखूबी कर रहे थे,,,।
जिस तरह से सुगंधा चौक से ब्लैक बोर्ड पर एक-एक शब्द को लिख रही थी उसके हाथ के झटका के साथ-साथ उसके बदन में भी लहर उठ रही थी उसके नितंबों में एक अद्भुत तरीके की थिरकन हो रही थी मानो कि जैसे कोई शांत नदी में कंकड़ फेंकने पर लहर उठती है ठीक उसी तरह से सुगंधा के नितंबों में भी लहर उठ रही थी जिसे देखकर आगे बेंच पर बैठे लड़कों का लंड खड़ा हो चुका था,,,, उनमें से एक लड़का धीरे से दूसरे के कान में बोला,,,।
बाप रे मैडम की गांड तो देख मेरा तो लंड खड़ा हो गया है,,,
मेरा भी यही हाल है यार बस एक बार डालने का मौका मिल जाए तो समझ लो जिंदगी सफल हो गई,,,।
(दोनों आपस में इस तरह से बात कर रहे थे और आगे ब्लैकबोर्ड पर लिख रही सुगंध को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था बस उसे इतना ही एहसास हो रहा था कि कोई बातें कर रहा है लेकिन क्या बातें कर रहा है किसके बारे में बातें कर रहा है यह उसे नहीं मालूम था तो वह धीरे से नजर घुमा कर उन दोनों की तरफ देखी तो उसके होश उड़ गए पहले तो उसे पता नहीं चला लेकिन जैसे ही उन लड़कों की नजरों का पता चला सुगंधा के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी क्योंकि वह लड़के प्यासी नजरों से उसके नितंबों के उभार को ही देख रहे थे,,,, उन लड़कों की नजरों को देखकर सुगंधा कुछ बोल नहीं पाई और वापस ब्लैक बोर्ड पर सहज होकर लिखने का नाटक करने लगी लेकिन अब उसके कान खड़े हो चुके थे वह उन लड़कों की बातों को सुनना चाहती थी क्योंकि उन दोनों की नजरे उसकी गांड पर ही टिकी हुई थी और इतना तो वह समझता ही थी कि ऐसा जवान लड़के कब करते हैं वह ब्लैकबोर्ड पर लिख रही थी तभी वह बड़े गौर से सुनने लगी और उसे हल्का-हल्का सुनाई देने लगा,,,)
कसम से मैडम की गांड कितनी बड़ी-बड़ी है,,,,,
(उनमें से एक लड़का बोला और सुगंधा को केवल गांड कितनी बड़ी-बड़ी है इतना ही सुनाई दिया लेकिन उसे समझते देर नहीं लगी कि वह दोनों किसके बारे में बात कर रहे थे वह जान गई थी कि वह लड़के उसके बारे में ही बातें कर रहे थे एकदम खुलकर,,, इतना सुनकर सुगंधा का दिल जोरो से धड़कने लगा जहां एक तरफ उसे थोड़ा अजीब लग रहा था वहीं दूसरी तरफ लड़कों की बातें और उन दोनों की नजरों को देखकर उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी उसके बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी,,,, वह धड़कते दिल के साथ हुआ ब्लैक बोर्ड पर इस तरह से लिखे जा रही थी और उन दोनों की बातें सुनी जा रही थी तभी उनमें से एक लड़का बोला,,,)
कसम से मुझे मिल जाए तो मैं तो मैडम की गांड दोनों हाथों से पकड़ कर अपने लंड को उसकी बुर में डालकर चोदना शुरू कर दुं,,,।
(उसे लड़के की पूरी बात एक-एक शब्द सुगंधा के कानों में एकदम साफ-साफ सुनाई दिया था और इसे सुनकर तो उसकी बुर का पूरा तालाब नमकीन खारे पानी से भर गया और उसमें से बहने भी लगा उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें सारे विद्यार्थी उसके बेटे की उम्र के थे उसका दिल जोरो से धड़कने लगा था,,,उन, लड़कों की बात सुनकर वह पूरी तरह से गर्म हो चुकी थी,,, तभी उसके मन में ख्याल आया कि क्यों ना वह जो युक्ति अपने बेटे पर आजमाना चाहती थी वही युक्ति अपने विद्यार्थियों पर आजमाए,,,, यह ख्याल उसके मन में आते ही उत्तेजना के मारे उसकी बुर फूलने पिचकने लगी और वह अपनी युक्ति को क्लास में ही आजमा लेना चाहती थी वह अपने विद्यार्थियों के चेहरे पर बदलते भाव को देखना चाहते कि वह देखना चाहती थी कि उसकी चूचियों को देखकर उसके विद्यार्थियों पर क्या प्रभाव पड़ता है और इसके लिए वह अपने आप को पूरी तरह से तैयार कर चुकी थी इसलिए जैसे ही वह विद्यार्थियों की तरफ घूमी वह अपने हाथ से चौक के टुकड़े को नीचे गिरा दी,,,, और उसे उठाने के लिए नीचे झुक गई और झुकाने की वजह से जवानी से भरी हुई लबालब उसकी दोनों चूचियां ब्लाउज फाड़ कर बाहर आने के लिए उतारू हो गई उसके साड़ी का पल्लू कंधे पर से नीचे गिर गया था जो की वह खुद ही जानबूझकर नीचे गिरती थी और कुछ सेकेंड के लिए वह चौक के टुकड़े को उठाने के लिए नीचे झुकी रह गई थी और इतना तो उन विद्यार्थियों के लिए बहुत था उन विद्यार्थियों की नजर से ही सुगंधा की जवानी से भरी हुई चूचियों पर गई उनके तो होश उड़ गए उनकी आंखें फटी के फटी रह गई और आश्चर्य से खुला का खुला रह गया,,,
सुगंधा उसे स्थिति में अपने आप को एक बार देखने लगी और नजर उठाकर उन विद्यार्थियों की तरफ देखने लगी जो कि वह विद्यार्थी उसी की तरफ देख रहे थे विद्यार्थियों की हालत को सुगंधा अच्छी तरह से समझ गई थी,,वह साफ तौर पर देख पा रही थी कि विद्यार्थियों के चेहरे का रंग उड़ चुका था उनकी आंखों में वासना की चमक एकदम साफ नजर आ रही थी वह एकदम भूल चुके थे कि जिसे देखकर वह इतना उत्तेजित हो रहे हैं वह सही मायने में उन लोगों की गुरु थी शिक्षिका थीं उन्हें शिक्षा देने वाली थी सही मार्गदर्शन करने वाली थी लेकिन जवानी से भरी हुई है खूबसूरत औरत अगर मर्दों की नजर में वासना भारी हो तो वह फिर किसी भी रिश्ते की रेखा में नहीं आती बल्कि वह केवल एक औरत ही बनकर रह जाती है और इस समय भी यहां भी यही हो रहा था वह एक शिकायत ही और क्लास में बैठे लड़के विद्यार्थी थे लेकिन शिक्षिका और विद्यार्थी के बीच का रिश्ता मानव खत्म हो चुका था वह लड़के वासना भरी नजरों से अपनी ही शिक्षिका की अपने ही मैडम की चूचियों को नजर भर कर देख रहे थे लेकिन इसका मलाल सुगंधा को बिल्कुल भी नहीं था बल्कि वह तो अंदर ही अंदर एकदम प्रसन्न नजर आ रही थी क्योंकि उसकी युक्ति एकदम सत प्रतिशत कम कर रही थी,,,, यह नजारा कुछ सेकंड का ही था हाथ में चौक लेकर वापस सुगंधा खड़ी हो गई और अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करने लगी और तिरछी नजर से उन लड़कों की तरफ देख भी रही थी चौकी अभी तक बदहवास नजरों से उसे ही देख रहे थे,,,, सुगंधा आगे कुछ बोल पाती या अपनी क्रियाकलाप का प्रदर्शन यहां पर कर पाती से पहले ही छुट्टी होने की घंटी बज गई,,,। और एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा गिर चुका था,,,।
रात को सुगंधा अपने बिस्तर पर क्लास वाली घटना के बारे में ही सोच रही थी और इस घटना के बारे में सोचकर वह पूरी तरह से उत्तेजित हुए जा रही थी वह अपने मन में यही सोच रही थी कि वह लड़के भी तो उसके बेटे की ही उम्र के थे लेकिन उन दोनों की सोच कितनी गंदी थी एक औरत को लेकर वह एक औरत को या तो किसी भी औरत के बारे में कितना गंदा सोच रखते थे जब वह लोग अपनी टीचर को ही इस नजर से देखते हैं तो घर में भी तो अपनी मां बहन को भी गंदी नजरों से देखते होंगे यही सब सोच कर सुगंधा अपने बेटे के बारे में सोच रही थी कि जब वह लड़के उसके बारे में इतना गंदा सोच सकते हैं तो उसका बेटा उसकी जवानी देखकर उसकी भरी हुई मदहोश कर देने वाली जवान देखकर उसके नितंबों का उभार और चूचियों की गोलाई देखकर क्यों नहीं उसकी तरफ आकर्षित होता,,,।
वह अपने मन में यही सब सो कर उत्तेजित हुए जा रही थी और धीरे-धीरे अपने कपड़ों को उतारती जा रही थी वह अपने मन में अपने आप से ही बात करते हुए बोल रही थी कि वह लड़के तो उसे छोड़ने के लिए बोल रहे थे उसकी बड़ी-बड़ी गांड देख कर उत्तेजित हो गए थे लंड खड़ा हो गया था उन लड़कों का तो उसके लड़के का क्यों नहीं खड़ा होता लंड उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर चुची देखकर क्यों उसका मन नहीं करता चोदने को अपनी मां को,,,, आखिरकार उन लड़कों की उम्र और उसके लड़के की उम्र एक ही तो थी तो उसके लड़के में यह सब बदलाव क्यों नहीं होता है एक औरत को देखकर एक खूबसूरत औरत को देख कर क्यों हुआ उत्तेजित नहीं होता कि उसका लंड खड़ा नहीं होता,,,, चोदने के लिए,,, ऐसा अपने आप से ही बात करते हुए वह धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार कर पूरी तरह से नंगी हो गई,,, और एक बार फिर से अपने बेटे की कल्पना करके अपनी दोनों टांगों को खोल दी और फिर अपनी उंगलियों को अपनी गुलाबी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश करने लगी,,,।
दूसरे दिन सुबह जब किचन में काम कर रही थी तब तृप्ति बालों में कंघी करते हुए अपनी मां से बोली,,,।
मम्मी मुझे कुछ किताबें चाहिए,,,।
हां तो पैसे ले ले जाकर खरीद लेना,,,
नहीं मम्मी तुम खरीद कर ले आना तुम उसे किताब वाली मार्केट चलाती हो ना जहां पर आधे कीमत में ही किताबें मिलती है,,, वहीं से खरीद लेना,,,,
हां यह तु ठीक कह रही है,,, लेकिन किताबें कौन सी लानी है,,,
मैं तुमको लिख कर दे देता हूं तुमको समय मिले तो खरीद लेना,,,,
तुझे चाहिए कब,,,,,
परसों ही चाहिए क्योंकि एग्जाम की तैयारी करना है ना,,,,
तो ठीक है मैं कल जाकर ले लेती हूं वैसे भी मुझे भी कुछ किताबें खरीदना है,,,,
ठीक है मम्मी मैं अभी लिखकर लाती हूं,,,,
(थोड़ी देर में तृप्ति एक कागज के टुकड़े पर उसे जो किताबें चाहिए थी उसका नाम लिखकर अपनी मम्मी के हाथ में थमा दी,,, तीन किताबें थी और सुगंधा जानती थी कि उस किताब वाली मार्केट में जरूर मिल जाएगी,,,, सुगंधा इस बात से भी खुश थी की उसकी बेटी बहुत समझदार हो गई है वह चाहती तो नहीं किताबें ले सकती थी लेकिन,,, जब वही किताबें आधे कीमत में मिलती हो तो नई किताबें लेकर क्या फायदा इस बात को तृप्ति अच्छी तरह से जानती थी और सुगंध भी अपने बच्चों के लिए वही से ही किताबें खरीद कर लाती थी,,,, थोड़ी देर में सुगंधा खाना बना कर नाश्ता तैयार करके खुद भी तैयार होने लगी,,,)
दूसरे दिन स्कूल से छूटने के बाद वह सीधा इस किताब के बाजार में चली गई चौकी उसकी स्कूल से तकरीबन 2 किलोमीटर और आगे था अपने स्कूल के बाहर ही वह रिक्शा पड़कर थोड़ी ही देर में किताब के बाजार में पहुंच गई,,, यहां पहुंच कर देखी की मार्केट में कुछ ज्यादा भीड़भाड़ था इसलिए वह धीरे-धीरे आगे जाने लगी वह अपने बच्चों के लिए किताबें एक ही दुकान से खरीदती थी और वह दुकान वाला सुगंध को अच्छी तरह से जानता था इसलिए किताबों पर अच्छा खासा डिस्काउंट भी दे देता था काउंटर पर पहुंच कर सुगंधा ने उसे दुकान वाले को परची थमा दी और वह दुकान वाला किताबें निकालने लगा,,,,। और सुगंधा इधर-उधर नजर घुमा कर देखने लगी,, उसे दुकान में किताब के साथ-साथ बहुत सारी स्टेशनरी के साथ-साथ दूसरी वस्तुएं भी मिलती थी जैसे की हेयर तेल साबुन वगैरह-वगैरह जो की काउंटर के पास में ही कांच वाले काउंटर में सजा कर रखा हुआ था तभी उसकी नजर,,,, एक छोटे से पूछ पर गई जिस पर कुछ गंदी तस्वीर छपी हुई थी जिसमें एक मर्द औरत आलिंगन होकर एक दूसरे के होठों का रस चूस रहे थे,,, पहले तो सुगंध को समझ में नहीं आया कि वह वस्तु क्या है जो इतना अश्लील चित्र होने के बावजूद कि उसे दुकान वाले ने उसे काउंटर में सजा कर रखा है लेकिन जब बड़े गौर से उसे पूछ के ऊपर लिखे हुए नाम को पढ़कर देखी तो उसके होश उड़ गए उसकी दोनों टांगों के बीच हलचल होने लगी वह कोहिनूर कंडोम था जिसे देखते ही उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी,,, उसके पति ने कभी भी कंडोम का उपयोग नहीं किया था इसलिए उसने आज तक कंडोम को अपनी आंखों से देखी भी नहीं थी लेकिन इतना जानती जरूर थी कि कंडोम एक ऐसा प्रोडक्ट है जिसे मर्द इस्तेमाल करते हैं जो कि गर्भ निरोधक के लिए काम आता है,,,
उसे प्रोडक्ट के बारे में सुगंधा और कुछ सोचती इससे पहले ही वह दुकान वाला किताबें लेकर काउंटर पर पहुंच गया और सुगंध भी अपनी नजरों को उसे कंडोम के पैकेट से हटा दी,,,,।
कितना हुआ भैया,,,,
रुकिए हिसाब करके बताता हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही वहां तीनों किताब की कीमत लिखकर उसे जोड़ने लगा लेकिन तभी सुगंधा ने उसे काउंटर वाले आदमी पर गौर की वह तिरछी नजरों से उसकी छतिया की तरफ देख रहा था जो की हल्की सी पारदर्शी साड़ी होने की वजह से उसकी चूचियों के बीच की पतली दरार काफी खूबसूरत नजर आ रहा था उसे देखकर वह मन ही मन उत्तेजित हो रहा था इस बात का अहसास होते ही सुगंधा एकदम से सचेत हो गई लेकिन वह उसे काउंटर वाले आदमी के सामने अपनी साड़ी को ठीक करना भी नहीं चाहती थी क्योंकि ऐसा करने पर उसे आदमी को एहसास हो सकता था कि उसने उसकी हरकत को देख ली है इसलिए वह एकदम सहज बनने की कोशिश करने लगी,,,, और वह भी तिरछी नजर से उसे आदमी की तरफ देखने लगी और इस तरह से इधर-उधर देखने लगी कि मानो जैसे कुछ हुआ ही ना हो वह आदमी अभी भी उसकी छातियों की तरफ घूर-घूर कर देख रहा था और बिल बना रहा था,,, उसे आदमी की हरकत को देखकर सुगंध अपने मन में सोचने लगी की दुनिया के सारे मर्द उसकी छाती की तरफ देखते हैं लेकिन उसका बेटा ही नहीं देखता,,,।
थोड़ी देर में बिल बनकर तैयार हो गया और उसे दुकान वाले ने बिल सुगंधा के हाथों में थमा दिया लेकिन बिल थमते समय अपनी उंगली से उसके हाथ की उंगली को स्पर्श कर लिया मानो इतने से ही वह पूरी तरह से सुगंधा को का गया हो वह अंदर ही अंदर एकदम उत्तेजित और प्रसन्न हो गया उसकी हरकत का एहसास सुगंधा को भी अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी क्योंकि यह सब बेहद सहज था लेकिन बिल देखकर वह उसे काउंटर वाले दुकानदार से बोली,,,)
भैया हम तो तुम्हारे पुराने ग्राहक है थोड़ा तो डिस्काउंट दीजिए,,,।
देखिए बहन जी जो बिल मैंने आपको दिया है वह डिस्काउंट काट कर ही है लेकिन आप हमारे पुराने ग्राहक हैं इसलिए ₹20 ऊपर के कम कर दीजिए,,,,(इतना कहते हुए वह सुगंधा की चूचियों की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा,,,, सुगंधा भी जल्दी से अपने पर्स में से ₹200 निकालकर उसे दुकानदार को थमा दी और फिर वह भी मुस्कुराते हुए दुकान की सीढ़ियां उतर गई,,,, और अपने मन में सोच रही थी कि वह उसे दुकानदार को भैया बोल रही थी और वह दुकानदार भी उसे बहन जी बोल रहा था लेकिन उसे मौका मिलता तो अपनी बहन पर चढ़ने से बिल्कुल भी नहीं शर्म करता,,,, इतने से ही सुगंधा को इस बात का ख्याल हो रहा था कि दुनिया में रिश्तेदारी कोई मायने नहीं रखती बस अपनी अपनी जरूरत पूरी होनी चाहिए,,,,
उस किताब के बाजार में सब्जी मार्केट भी थी तो सुगंधा घर के लिए सब्जियां भी खरीदने लगी,,,,,,, सब्जियां खरीदने खरीदे थे उसे थोड़ी देर होने लगी क्योंकि शाम धीरे-धीरे ढल रही थी उसे मालूम था कि आज देर हो चुकी है इसलिए वह सब्जी लेकर और बच्चों के लिए थोड़ा समोसा और जलेबी लेकर वह रिक्शा पकड़ने के लिए जल्दी-जल्दी आगे बढ़ने लगी वह फुटपाथ पर चल रही थी और फुटपाथ पर जगह-जगह पर किताबें बिक रही थी एक जगह पर स्ट्रीट लाइट के नीचे आकर वह रुक गई और बिछी हुई किताबों को देखने लगी जिसमें सारा शरीर मनोहर कहानियां और फिल्मों से संबंधित कुछ किताबें रखी हुई थी सुगंधा को किताबें पढ़ने का भी बहुत शौक था,,, खास करके सरस सलिल वह पढ़ा करती थी,,,, वह धीरे से नीचे झुक कर कुछ सरस सलिल की मैगजीन को इधर-उधर करने लगी और उनमें से दो मैगजीन निकाल कर उसे अपने हाथ में पकड़ लिया और तभी उसकी नजर मनोहर कहानियां पर गई तो वह एक मनोहर कहानी उठाकर उसे जैसे ही पढ़ने को हुई कि उसमें एक दूसरी किताब उसी नजर आ गई जिसके पृष्ठ पढ़ने पर लिखा था,,, मदहोश जवानी,,, सुगंधा पहली बार इस तरह की किताब को अपने हाथ में ली थी और लेखक का नाम था मस्तराम यह सब उसके लिए पहली बार था वह उत्सुकता में उसे किताब को,,, अपने हाथ में लेकर उसके पन्ने पलटने लगी,,,,,, तभी पहले पन्ने पर ही कहानी का शीर्षक उसे दिखाई दिया दूध का कर्ज़,,,,
कहानी के शीर्षक को पढ़कर सुगंधा को ऐसा ही लग रहा था कि जैसे कोई सामान्य कहानी होगी,,, सुगंधा इस तरह से खड़ी थी उसके हाथ में तो किताबें सरल सलीम की थी और दूसरे हाथ में मनोहर कहानी की थी और उसके बीच में एक दूसरी किताब थी जिसके पन्ने पलट रही थी पहले पन्ने का तो वह सिर्फ शीर्षक ही पड़ी थी,, लेकिन,दूसरा पन्ना पलट करवा उसकी दो-तीन लाइन पढ़ने की कोशिश करने लगी और पहले ही लाइन पढ़कर उसके होश उड़ गए जिसमें लिखा था अपनी मां की गुलाबी बुर देखकर संजय का लंड एकदम से खड़ा हो गया,,,, इतना पढ़ते ही सुगंधा के तो होश उड़ गए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि यह कौन सी किताब है वह एक लाइन पढ़कर ही अपने चारों तरफ देखने लगी कि कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा है लेकिन उसकी किस्मत अच्छी थी कि वहां दूसरा कोई भी नहीं था इसलिए उसकी हिम्मत बढ़ने लगी और बात दूसरी लाइन बिना पढ़े तीसरे पढ़ने की तरफ आगे बढ़ गई जिसमें लिखा था,,,, संजय अपनी मां की दोनों टांगों को खोलकर उसकी मोटी मोटी जांघों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसे अपनी जांघों पर खींच लिया,,, संजय की मां पूरी तरह से व्याकुल थी अपने बेटे के साथ हम बिस्तर होने के लिए वह अपने दोनों हाथों से अपनी चूची पकड़ कर जोर-जोर से दबा रही थी,,,, सुगंधा के तो होश उड़ गए उसकी बुर से पानी निकलने लगा हुआ पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी वह समझ नहीं पा रही थी कि यह कैसी कहानी है लेकिन उसका मन बिना पढ़े मचल रहा था वह आगे की लाइन पढ़ने लगी,,,,
संजय अपने लंड पर ढेर सारा थूक लगाकर उसे चिकना कर रहा था और थोड़ा सा तोक अपनी मां की बुर पर भी लगा कर उसे चिकनाहट दे रहा था और थोड़ी देर में अपने मोटे लंड के सूखने को अपनी मां की बुर के मुख्य द्वार पर रखकर जोर से धक्का मारा और उसका पूरा लंड एक ही बार में उसकी मां की बुर में घुस गया,,,,
अब तो सुगंधा से रहा नहीं जा रहा था सुगंध पूरी तरह से पागल हो चुकी थी केवल चार-पांच लाइन पढ़कर ही,,,,, उसका वहां ज्यादा देर तक खड़ा रहना उचित नहीं था,,,, वह उस किताब वाले से बोली,,,
कितना हुआ भाई साहब,,,
₹40 हुए बहन जी,,,,
लेकिन तीन किताबों के तो तीस ही रुपए हुए ना,,,
बहन जी मनोहर कहानी के अंदर एक और किताब है उसका लेकर 40 रुपए हुए,,,,
(उसे किताब वाले की बात सुनकर सुगंधा शर्मिंदा हो गई उसे लग रहा था कि अनजाने में ही वह किताब उसे मनोहर कहानी के अंदर है जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था उसका बेचने का यही तरीका था क्योंकि वह जानता था कि वह चीज किताब को मनोहर कहानी में रख रहा है अगर कोई भी खरीदने वाला एक बार पड़ेगा तो वह उसे पूरा पढ़े बिना नहीं रह पाएगा और इसके लिए उसे खरीदना ही होगा जैसा की सुगंधा को भी लग रहा था कि वह इस किताब को जरूर पूरा पढेगी,,,, वह अपने चारों तरफ नजर घुमा कर देखी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है और ऐसे भी यह जगह बहुत दूर थी और यहां पर उसकी पहचान वाला कोई नहीं था इसलिए वह निश्चिंत होकर लेकिन जल्दबाजी में वह किताब को अपने थेले में रख ली ताकि कोई देख ना ले और अपने पर्स में से ₹40 निकालकर उस किताब वाले को दे दी,,, और फिर थोडा आगे जाकर ओटो पकड़ के अपने घर पहुंच गई,,,,।
