माँ बेटा की कामुकता 1

माँ बेटा

मेरा मन ख़ुशी से झूम उठा.

मैंने माँ को अपने से चिपकाया और अपनी ऊँगली को माँ की चूत में आगे को धकेल कर पूरी तरह से उन की चूत में घुसा दिया और बोला

“माँ अपनी चूत को आगे को धकेल रही हो. क्या अपनी चूत में मेरी ऊँगली अच्छी लगी. क्या दूसरी ऊँगली भी आपकी चूत में घुसेड़ दूँ?”


माँ ने अपना सर न में हिलाया और कहा

“अरे नहीं.”


मैंने बोला “माँ क्या आपको अंदर घुसी हुई ऊँगली पसंद नहीं आयी ?”

माँ शर्माती हुई सी मेरे सीने में अपना मुँह छुपा कर बोली.


“अब तुमसे यह नया रिश्ता बन रहा है तो मैं अब ऊँगली को क्यों घुसवाना चाहूंगी। ऊँगली से तो मैं खुद ही पिछले १० साल से कर रही हूँ. क्या अब भी ऊँगली से ही काम चलाऊंगी ? अब तो मुझे तेरी ऊँगली नहीं बल्कि तेरा उन्गला चाहिए.”

मैं थोड़ा हैरान हो कर बोला.

“माँ ऊँगली तो मैं समझता हूँ. पुर तुम अपनी चूत में यह उन्गला क्या चाहती हो? उन्गला क्या होता है?”

माँ ने अपने हाथ में पकडे हुए मेरे लौड़े को मुठिआते हुए और प्यार से उस पर अपने हाथ फेरते हुए कहा

“एह् है तेरा उन्गला। अब मुझे अपने अंदर इसे लेना है. ऊँगली नहीं ”

मैं समझ गया की माँ की वासना अब बहुत बढ़ गयी है और वो चुदवाने के लिए पूरी तैयार है.

मैंने मस्ती से झूमते हुए माँ से कहा

“माँ बस आज के बाद तझे कभी अपनी ऊँगली प्रयोग नहीं करनी पड़ेगी. मेरा यह ७ इंच लम्बा और ३ इंच मोटा उन्गला आपकी चूत की सेवा करने के लिए तैयार रहेगा.

माँ के मुँह पर ख़ुशी की लहर दौड़ गयी और वो भी प्यार से मेरे से चिपक गयी पर इस सब में उसने मेरा लौड़ा अपने हाथ से न छोड़ा और उसे प्यार से सहलाती रही. माँ को १० साल के बाद एक हाड़ मांस का लौड़ा हाथ में आया था. लगता था की माँ उसे मन भर के प्यार किये बिना नहीं छोड़ेगी.

फिर माँ मेरे से बोली

“अच्छा एक बात बता। उस दिन तू मेरी कच्छी को क्यों सूंघ रहा था और क्यों चाट रहा था? तुझे शर्म नहीं आयी जो तू इतनी गन्दी जगह लगी हुई पैंटी को चाट रहा था.? “

मैं माँ को अपने से चिपकता बोला।

“माँ कौन कहता है कि वो गन्दी जगह है या उस को सूंघना ठीक नहीं है. आपकी चूत से तो बहुत ही अच्छी खुशबु आती है.

आपकी पैंटी के अगले भाग पर मुझे उसके चूत का रस महसूस हुआ और मैं बिना कुछ सोचे-समझे ही उसके रस को सूंघने और चाटने लगा था. पर आपकी चूत का रस तो शहदसे भी प्यारा था.”

मैंने उसके चेहरे के भावों को पढ़ते हुए महसूस किया कि वो कुछ ज्यादा ही गर्म होने लगी थी। उसके आँखों में लाल डोरे साफ़ दिखाई दे रहे थे। उसके होंठ कुछ कंपने से लगे थे.

मैंने बोला- “वाह माँ .. क्या महक थी आपकी चूत की .. इसे मैं हमेशा अपने जीवन में याद रखूँगा.. आई लव यू माँ “..

तो वो भी मन ही मन में मचल उठी और वो बोली- मेरा मज़ाक उड़ा रहे हो न..

मैं बोला- ऐसा नहीं है.. फिर मैंने उसकी चूत को अपनी गदेली में भरते हुए कामुकता भरे अंदाज में बोला- माँ.. इसे हिंदी में बुर और चूत भी बोलते हैं।

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मेरी इस हरकत से वो कुछ मदहोश सी हो गई और उसके मुख से ‘आआ.. आआआह..’ रूपी एक मादक सिसकारी निकल पड़ी।

मैंने उसकी चूत पर से हाथ हटा लिया इससे वो और बेहाल हो गई.. लेकिन वो ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती थी कि मैं उसकी चूत को छोड़ दूँ..

लेकिन स्त्री-धर्म.. लाज-धर्म पर चलता है.. इसलिए उस समय वो मुझसे कुछ कह न सकी और मुझसे धीरे से बोली- बेटा.. क्या इतनी अच्छी खुश्बू आती है मेरी चू… से..

ये कहती हुई वो ‘सॉरी’ बोली.. तो मैं तपाक से बोला- “माँ शर्माओ नहीं और खुल कर बोलो. चूत को चूत ही केहते है तो इसमें शर्माना क्या. सेंटेंस पूरा करो.. और वैसे भी अब.. जब तुम भी मुझे चाहती हो.. तो अपनी बात खुल कर कहो।

तो बोली- नहीं.. फिर कभी..

शायद वो वासना के नशे में कुछ ज्यादा ही अंधी हो चली थी.. क्योंकि उसके चूचे अब मेरी छाती पर रगड़ खा रहे थे और वो मुझे अपनी बाँहों में जकड़े हुए थी। उसके सीने की धड़कन बता रही थी कि उसे अब क्या चाहिए था।

तो मैंने उसे छेड़ते हुए कहा- तो क्या कहा था.. अब बोल भी दो?

तो वो बोली- क्या मेरी चूत की सुगंध वाकयी में इतनी अच्छी है…

तो मैंने बोला- हाँ .. सच में ये बहुत ही अच्छी है।

वो बोली- फिर सूंघते हुए चाट क्यों रहे थे?

तो मैंने बोला- तुम्हारे रस की गंध इतनी मादक थी कि मैं ऐसा करने पर मज़बूर हो गया था.. उसका स्वाद लेने के लिए..

ये कहते हुए एक बार फिर से अपने होंठों पर जीभ फिराई.. जिसे माँ ने बड़े ही ध्यान से देखते हुए बोला- मैं तुमसे कुछ बोलूँ.. करोगे?

तो मैंने सोचा लगता है.. आज ही माँ की बुर चाटने की मेरी इच्छा पूरी हो जाएगी क्या?

ये सोचते हुए मन ही मन मचल उठा.

मुझे लग रहा था की माँ भी अपनी चूत चटवाना चाहती है. पर शायद शर्मा रही है. या तो ये खुद ही मेरे साथ खेल कर रही है.. ताकि मैं ही अपनी तरफ से पहल करूँ। ( वो तो मेरे को बाद में माँ ने बताया की वो भी रोज मेरे पापा का लौड़ा चूसती थी और वीर्य चाटती थी.)

तो मैंने भी कुछ सोचते हुए बोला- क्यों क्यों लगता है की वो सूंघने की जगह नहीं है ?

माँ बोली- नहीं.. ऐसा नहीं है.. मैं तो इसलिए बोली थी.. क्योंकि वहाँ से गंदी बदबू भी आती है ना.. इसलिए।

मैंने बोला- अरे आप नहीं समझ सकती कि एक जवान लड़की की और एक जवान लड़के के लिंग में कितनी शक्ति होती है। दोनों में ही अपनी-अपनी अलग खुशबू होती है.. जो एक-दूसरे को दीवाना बना देती है।

तो वो बोली- मैं कैसे मानूं?

मैं बोला- अब ये तुम्हारे ऊपर है.. मानो या ना मानो.. सच तो बदलेगा नहीं..

तो वो बोली- क्या तुम मुझे महसूस करा सकते हो?

मैं तपाक से बोला- क्यों नहीं..

तो बो बोली “तो ठीक है मुझे महसूस करवाओ”.

शायद उस पर वासना का भूत सवार हो चुका था।

मैं भी देरी ना करते हुए बिस्तर से उठा और झट से माँ की सलवार खोल दी. माँ ने भी कोई इतराज न किया। बल्कि उसने तो खुद अपनी कमीज भी उतार दी.

अब मेरी माँ मेरे सामने बिलकुल नंगी थी.

मैंने भी फटाफट अपने कपडे उतरे और खुद भी माँ की तरह नंगा हो गया.

अब माँ बेटे का वासना का खेल शुरू होने ही वाला था. माँ अभी भी थोड़ा शर्मा रही थी. पर मैंने घुटनों के बल बैठकर उसकी मुलायम चिकनी जांघों को अपने हाथों से पकड़ कर खोल दिया.. ताकि उसकी चूत ठीक से देख सकूँ।

मैंने जैसे ही उसकी चूत का दीदार किया तो मुझे तो ऐसा लगा.. जैसे मैं जन्नत में पहुँच गया हूँ.. उसकी चूत बहुत ही प्यारी और कोमल सी दिख रही थी..

मेरी तो जैसे साँसें थम सी गई थीं.. क्योंकि ये मेरा पहला मौका था.. जब मैंने अपनी माँ की चूत को इतनी करीब से देखा था.

उसकी चूत बिल्कुल कसी हुई थी.. कुछ फूली-फूली सी.. और उसके बीच में एक महीन सी दरार थी.. जो कि उसके छेद को काफ़ी संकरा किए हुए थी।

इतनी प्यारी संरचना को देखकर मैं तो मंत्रमुग्ध हो गया था.. जिससे मुझे कुछ होश ही नहीं था कि मैं कहाँ हूँ.. कैसा हूँ। माँ की चूत पिछले १० साल से चूड़ी जो न थी.

खैर.. जब मैं उसकी चूत को टकटकी लगाए कुछ देर यूँ ही देखता रहा.. तो उसने मेरे हाथ पर एक छोटी सी चिकोटी काटी.. जो कि उसकी जाँघ को मजबूती से कसे हुए था।

तो मेरा ध्यान उसकी चूत से टूटा और मैंने ‘आउच..’ बोलते हुए उसकी ओर देखा.. उसकी नजरों में लाज के साथ-साथ एक अजीब सी चमक भी दिख रही थी।

ऐसी नजरों को कुछ ज्ञानी बंधु.. वासना की लहर की संज्ञा भी देते हैं।

वो अपनी आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए बोली- क्यों बेटा.. पक्का तुम यही सोच रहे होगे कि मैंने झूट क्यों बोला.. मैं कैसे किसी की गंदी जगह को सूंघ सकता हूँ.. अब फंस गए ना.. अभी तक मुझे बेवकूफ़ बना रहे थे.. चलो छोड़ो.. लेट जाओ मैं समझ गयी की तुम इसे सूंघ नहीं पाओगे .खैर अब ऐसा दोबारा ना करना।

तभी मैंने बोला- माँ .. तुम नहीं जानती कि आज मैंने अपनी पूरी जिंदगी में पहली बार इतने पास से आपकी चूत देखी है.. जिसे अक्सर ख़्वाबों में ही देखता था.. पर जब आज सच में सामने आई.. तो मैं देखता ही रह गया था?

मैं उसकी चूत की कसावट को देखते हुए बोला- ” रही बात सूंघने की.. तो मैं तो सोच रहा हूँ.. इसे चाट कर सूँघूं या सूंघ कर चाटूं.”।

तो माँ बोली- जो भी करना.. जल्दी करो..

मैंने तुरंत ही उसके नितंबों को पकड़ कर बिस्तर के आगे की ओर खींचा ताकि उसकी चूत पर मुँह आराम से लगा सकूँ।

फिर मैंने बिना देर किए हुए उसे बिस्तर के किनारे लाया और सीधा उसकी चूत पर मुँह लगा कर उसके दाने को अपनी जुबान से छेड़ने लगा.. जिससे उसके मुँह से मादक सिसकारियाँ फूट पड़ीं- ओह्ह..शिइई..

मैंने जब उसकी ओर देखा तो वो अपने चेहरे को अपने दोनों हाथों से ढके हुए थी.. पर जब उसने अपनी चूत पर मेरा मुँह नहीं महसूस किया.. तो अपनी आँख खोल कर मुझसे बोली- बेटा.. यार फिर से कर न.. मुझे बहुत अच्छा लगा.. मुझे नहीं पता था कि इसमें इतना मज़ा आता है।

तो मैं बोला- परेशान मत हो… अभी तो खेल शुरू हुआ है.. देखती जाओ.. मैं क्या-क्या और कितना मजा देता हूँ।

वो बोली- एक बात पूछू.. मज़ाक तो नहीं बनाओगे मेरा?

तो मैं बोला- हाँ.. पूछो..

वो बोली- बेटा मैं चाहती हूँ.. कि जो मज़ा तुम मुझे दे रहे हो.. वो मैं भी दूँ.. क्या ये एक साथ हो सकता है? मेरा मतलब तुम मेरी चूत को मुँह से प्यार करो और मैं तुम्हारे हथिआर को अपने मुँह से प्यार करूँ।

मैंने अपनी ख़ुशी दबाते हुए कहा- हो सकता है..

तो वो चहकते हुए स्वर में बोली- बेटा सच..

मैंने बोला- हम्म..

मैं मन ही मन बहुत खुश हो गया कि चलो अपने आप ही मेरा काम आसान हो गया।

मैंने तुरंत ही खड़े होकर अपने अंपने ‘सामान’ को हिलाने लगा।

मेरा लवड़ा देखकर माँ बोली- बेटा ये बताओ.. तुम्हारा ये हथिआर मेरे मुँह तक कैसे आएगा.. जब तुम नीचे बैठोगे तभी तो मैं कुछ कर पाऊँगी

तो मैं बोला- पहले तो इसे हथिआर नहीं लण्ड बोलो.. और अपना दिमाग न लगाओ.. जैसे मैं बोलूँ.. वैसे करो।

तो वो शर्मा कर बोली- ठीक है.. चलो अब जल्दी से अपना ल..लण्ड मेरे मुँह में डालो और अपना मुँह मेरी च..चूत पर लगाओ.. अब मुझसे और इंतज़ार नहीं हो सकता।


लण्ड-चूत कहने में वो कुछ हिचक रही थी.. बेचारी.. सच में एक माँ के लिए यह बहुत मुश्किल है की अपने ही बेटे के साथ सेक्स करना और फिर इस तरह खुले तौर से गुप्त अंगों के नाम लेना। पर अब यह सब तो करना ही था.

खैर.. मैंने उसे बिस्तर पर सही से लिटाया और हम 69 अवस्था में लेट गए।

यह देख कर उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और माँ खुश होते हुए बोली- बेटा वाकयी में तुम स्मार्ट के साथ-साथ होशियार भी हो.. क्या जुगाड़ निकाला है..

मैं हँसते हुए माँ से बोला “माँ। जिस की माँ तुम्हारे जितनी सुन्दर हो उस का बेटा तो अपने आप अकलमंद हो ही जायेगा. “

माँ खुश हो गयी।

मैं तुरंत ही उसकी चूत के दाने को अपनी जुबान से छेड़ने लगा

और वो मेरे लण्ड को पकड़ कर खेलने लगी और थोड़ी ही देर में उसने अपनी नरम जुबान मेरे लौड़े पर रखकर सुपाड़े को चाटने लगी.. जिससे मुझे असीम आनन्द की प्राप्ति होने लगी। माँ मेरे लण्ड के सुपाडे को ऐसे चूस और चाट रही थी जैसे वो लण्ड न हो कर कोई आइसक्रीम हो. माँ को बहुत सालों के बाद इक हाड मांस का लौड़ा मुँह में लेने का मौका मिला था तो माँ उस का पूरा फ़ायदा उठाने जा रही थी.

उसकी गीली जुबान की हरकत से मेरे अन्दर ऐसा वासना का सैलाब उमड़ा.. जिसे मैं शब्द देने में असमर्थ हूँ.. फिर मैंने भी प्रतिउत्तर में उसके दाने को अपने मुँह में भर-भर कर चूसना चालू कर दिया.. जिससे उसके मुँह से ‘अह्ह्ह ह्ह.. हाआआह… आआआ..’ की आवाज स्वतः ही निकलने लगी।


उसके शरीर में एक अजीब सा कम्पन हो रहा था.. जिसे मैं महसूस करने लगा।

चूत चुसवाने के थोड़ी ही देर में वो अपनी टाँगें खुद ही फ़ैलाने लगी और अपने चूतड़ों को उठा कर मेरे मुँह पर रगड़ने लगी।


अब मुझे एहसास हो गया कि माँ को इस क्रिया में असीम आनन्द की प्राप्ति हो रही है। फिर मैंने उसके जोश को और बढ़ाने के लिए अपनी उँगलियों के माध्यम से उसकी चूत की दरार को थोड़ा फैलाया और देखता ही रह गया.. चूत के अन्दर का बिलकुल ऐसा नज़ारा था.. जैसे किसी ने तरबूज पर हल्का सा चीरा लगा कर फैलाया हो.. उसकी चूत से रिस रहा पानी उसकी और शोभा बढ़ा रहा था।

मैंने बिना कुछ सोचे अपनी जुबान उसकी दरार में डाल दी.. और उसे चाटने लगा।

जिससे उत्तेजित होकर माँ ने भी मेरे लण्ड के शिश्न-मुण्ड को और अन्दर ले कर चूसते हुए ‘ओह.. शिइ… इइइइ.. शीईईई..’ की सीत्कार के साथ ‘अह्ह्ह.. अह्ह्ह्ह ह्ह..’ करने लगी।

तो मैंने वक्त की नज़ाकत देखते हुए अपनी एक ऊँगली उसकी चूत के छेद में घुसेड़ दी.. जिससे उसकी एक और दर्द भरी ‘आह्ह्ह्ह ह्ह..’ छूट गई और दर्द से तड़पते हुए बोली- बेटा ..तुम्हारी ऊँगली मेरे अंदर लग रही है ये.. क्या कर दिया.. अब तो अन्दर जलन सी होने लगी है..


मैंने बोला- बस थोड़ा रुको.. अभी सही किए देता हूँ।

फिर मैंने उंगली बाहर निकाली और उसकी चूत पर थूक लगाकर.. उसके छेद को चूसते हुए.. धीरे धीरे फिर से ऊँगली को अंदर करने लगा. .. जिससे उसका दर्द अपने आप ही ठीक होने लगा।

‘अह्ह्ह्ह.. अह्ह्ह ह्ह्ह्ह.. शिइइ… शहअह…’ की ध्वनि उसके मुँह से निकलने लगी।

सच में उस समय मेरी थूक ने उसके साथ बिल्कुल एंटी बायोटिक वाला काम किया और जब वो मस्ति के फिर से मेरा लण्ड चूसने लगी.. तो मैंने अपनी दूसरी ऊँगली भी अब माँ की चूत में डाल दी।


इस बार वो थोड़ा कसमसाई तो.. पर कुछ बोली नहीं.. शायद वो और आगे का मज़ा लेना चाहती थी.. या फिर उसे दोबारा में दर्द कम हुआ होगा।

अब मैंने धीरे-धीरे उसकी चूत में उंगली करते हुए उसके दाने को अपनी जुबान से छेड़ने और मुँह से चूसने लगा। मेरी इस हरकत से उसने भी जोश में आकर मेरे लौड़े को अपने मुँह में और अन्दर ले जाते हुए तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगी।

उसके शरीर में हो रहे कम्पन को महसूस करते हुए मैं समझ गया कि अब माँ झड़ने वाली है.. यही सही मौका है उंगली की स्पीड तेज कर दो.. ताकि छेद भी थोड़ा और फ़ैल जाए।


इस अवस्था में इसे दर्द भी महसूस नहीं होगा.. ये विचार आते ही मेरा भी जोश बढ़ गया और मैं एक सधे हुए खिलाड़ी की तरह उसकी चूत में तेजी से उंगली अन्दर-बाहर करने लगा।

अब माँ के मुँह से भी ‘गु.. गगगग गु.. आह्ह..’ की आवाज़ निकलने लगी.. क्योंकि वो भी मेरा लौड़ा फुल मस्ती में चूस रही थी.. जैसे सारा आज ही रस चूस-चूस कर खत्म कर देगी।


मैंने तुरंत ही अपनी उंगली अन्दर-बाहर करते हुए अचानक से पूरी बाहर निकाली और दोबारा तुरंत ही दो उँगलियों को मिलाकर एक ही बार में घुसेड़ दी..

माँ को शायद थोड़ा दर्द हुआ , जिससे उसके दांत मेरे लौड़े पर भी गड़ गए और उसके साथ-साथ मेरे भी मुँह से भी ‘अह्ह ह्ह्ह्ह..’ की चीख निकल गई।

सच कहूँ , हम दोनों को इसमें बहुत मज़ा आया था।

आज भी हम आपस में जब मिलते हैं तो इस बात को याद करते ही एक्साइटेड हो जाते हैं मेरा लौड़ा तन कर आसमान छूने लगता है और उसकी चूत कामरस की धार छोड़ने लगती है।

खैर.. जब उसका दर्द कुछ कम हुआ तो फिर से वो लण्ड को चचोर-चचोर कर चूसने लगी और अपनी टांगों को मेरे सर पर बांधते हुए कसने लगी।

वो मेरे लौड़े को बुरी तरह चूसते हुए ‘अह्ह्ह्ह ह्ह्ह्ह्ह ह्ह्ह..’ के साथ ही झड़ गई। माँ का पूरा शरीर कांप रहा था, और उसकी चूत से कम्पन मेरी जीभ पर भी अनुभव हो रहा था। माँ की चूत से उसके काम रस का बाहर आ रहा था जिसे मैं फटाफट चाट रहा था ताकि माँ के रस का एक भी कटरा बाहर न रह जाये. अपने बेटे से चूत चटवाने का माँ का यह पहला अनुभव था..


मैंने इस तरह उसके रस को पूरा चाट लिया और छोड़ता भी कैसे.. आखिर मेरी मेहनत का फल था। और आप तो जानते ही हो की मेहनत का फल मीठा होता है। सचमुच माँ की चूत का रस बहुत मीठा था.

उसकी तेज़ चलती सांसें.. मेरे लौड़े पर ऐसे लग रही थीं.. जैसे मेरे लौड़े में नई जान डाल रही हो.. और मैं भी पूरी मस्ती में उसकी बुर को चाट कर साफ करने लगा।

जब उसकी सांसें थोड़ा सधी.. तो वो एक लम्बी कराह ‘अह्ह्ह ह्ह्ह्ह..’ के साथ चहकते हुए स्वर में बोली- बेटा.. मुझे जिंदगी में पहली बार चुसवाने में इतना मजा आया है. .. मुझे तो तूने फुल टाइट कर दिया”

तो मैं बोला- माँ तुम्हारा डिस्चार्ज हो गया है और मेरा अभी नहीं हुआ है और असली मज़ा डिस्चार्ज होने के बाद ही आता है। प्लीज जल्दी से मेरा लौड़ा चूसो ताकि मेरा भी रस निकल सके.


उसने झट से बिना कुछ बोले- मेरे लण्ड को पकड़ा और दबा कर बोली- अच्छा.. और मेरे लौड़े को पकड़ कर अपने मुँह में डालकर चूसने लगी।

बीच-बीच में वो अपनी नशीली आँखों से मुझे देख भी लेती थी.. जिससे मुझे भी जोश आने लगा।

और यह क्या.. तभी उसकी बालों की लटें उसके चेहरे को सताने लगी.. जिसे वो अपने हाथों से हटा देती।

तो मैंने खुद ही उसके सर के पीछे हाथ ले जाकर उसके बालों को एक हाथ से पकड़ लिया।


हाय .. क्या सेक्सी सीन लग रहा था.. ओह माय गॉड.. एक सुन्दर परी सी अप्सरा जैसी मेरी माँ मेरे लण्ड के अधीन हो कर..आपका लण्ड चूसे .. तो आपको कैसा लगे.. बिलकुल मुझे भी ऐसा ही लग रहा था।

फिर मैंने दूसरे हाथ से उसकी ठोड़ी को ऊपर उठाकर उसकी आँखों में झांकते हुए.. उसके मुँह में धक्के देने लगा.. जिससे उसके मुँह से ‘उम्म्म.. उम्म्म्म.. गगग.. गूँ.. गूँ..’ की आवाजें आने लगीं।


इस तरह कुछ देर और चूसने से मेरा भी काम होने के पास आने लगा. मुझे मालूम था की किसी भी टाइम मेरा माल निकल सकता है तो मैंने माँ को मुह को जोर जोर से चोदना शुरू कर दिया. फिर एक जोर की आअह्ह के साथ मेरा माल उसके मुँह में ही छूट गया और वो बिना किसी रुकावट के सारा का सारा माल गटक गई।


हम दोनों माँ बेटा अपने पहले सेक्स से बहुत थक गए थे तो हम दोनों एक दुसरे के साथ लेट गए। हम दोनों ही बिलकुल नंगे थे. तो मैंने उसे छेड़ते हुए पूछा- अरे माँ तुम तो बहुत माहिर हो लण्ड चूसने में… कहाँ से सीखा?

तो बोली- और कहाँ से सीखूँगी… तुम्हारे पिता भी तुम्हारे तरह ही लण्ड चुसवाने के शौकीन थे. उन्ही से सब सीखा है. !

तो मैं बोला- माँ आप को मेरा आप की चूत को चूसना और चाटना कैसा लगा. ?

तो वो बोली- जैसे तुम अच्छे से बिना दांत गड़ाए मेरी चूत को अपने मुँह में भर भर कर चूस रहे थे तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, ऐसा लग रहा था कि तुम बस चूसते ही रहो… मुझे सच में बहुत अच्छा लगा और तुम्हारी उँगलियों ने तो कमाल कर दिया, जैसे तुमने अपनी उंगली नहीं बल्कि मेरे अंदर नई जान डाल दी हो! ठीक वैसे ही मैंने भी सोचा कि क्यों न तुम्हें भी तुम्हारी तरह मज़ा दिया जाये! बस मैंने तुम्हारी नक़ल करके वैसे ही किया और मुझे पता है कि तुम्हें भी बहुत मज़ा आया… पर तुमने मेरी हालत ही बिगाड़ दी थी, मेरी तो सांस ही फूल गई थी।

तो मैं बोला- फिर अभी क्यों किया?

माँ बोली – बेटा तुम्हारे पापा का लौड़ा काफी बड़ा था पर तुम्हारा लौड़ा तो उन से काफी बड़ा है. कम से कम तुम उनसे २-३ इंच लम्बे हो. पर असली चीज है तुम्हारे लण्ड की मोटाई। तुम्हारा लौड़ा तुम्हारे पापा से बहुत मोटा है.इसलिए मुझे उसे मुँह में लेने में समस्या हो रही थी। पर कोई बात नहीं। धीरे धीरे आदत हो जाएगी। अगली बार तुम्हे अधिक मजा आएगा.


मैंने कहा _ माँ तुम्हे लौड़ा चूसने में ज्यादा मजा आया या चूत चटवाने में ?

वो बोली- बेटा मुझे दोनों में मजा आया. पर एक बात बोलूं. तुम्हारा लौड़ा ही तुम्हारे पापा से बड़ा नहीं है. असली चीज है की तुम्हारी जीभ भी बहुत लम्बी है. तुम्हारे पापा मेरी चूत चाटते तो थे पर थोड़ा सा ही. असल में उन्हें चूत चाटना अच्छा नहीं लगता था. पर तुमने तो मुझे स्वर्ग में ही पहुंचा दिया. तुम्हारी जीभ लम्बी होने के कारण इतनी अंदर तक जा रही थी की आज तक कभी इतने आगे तक चुसाई नहीं हुई. यह मेरे लिए एक बहुत ही अलग अनुभव था। मैं तो आज बहुत खुश हूँ. क्योंकि तुमने मुझे इतनी मज़ा दिया था जिसे मैं अपने जीवन में कभी नहीं भुला सकती!

मैंने बोला- अच्छा अगर मैं इसी तरह तुम्हें मज़ा देता रहा तो क्या तुम भी मुझे मज़े देती रहोगी?

वो बोली- यह बाद की बात है पर तुमने अपने आखिर में तो मेरे मुंह में इतने जोर से धक्के मरे की सच में मेरे गले में दर्द होने लगा था!

मैंने बोला- अच्छा, अब आगे से ध्यान रखूँगा पर तुम्हें बता दूँ कि आने वाले दिनों में मैं बहुत कुछ देने वाला हूँ।

वो बोली- और क्या?

तब मैंने बोला- यह तो सिर्फ शुरुआत है, और अभी सब बता कर मज़ा नहीं खराब करना चाहता, बस देखती जाओ कि आगे आगे होता है क्या?

कहते हुए मैंने उसके होंठों को अपने होंठों में दबा कर उसके होंठों का रसपान करने लगा और वो भी मेरा पूर्ण सहयोग देते हुए मेरे निचले होंठ को पागलों की तरह बेतहाशा चूसे जा रही थी, मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे कि मैं जन्नत में हूँ,

सबसे ज्यादा ख़ुशी की बात तो यह थी एक अब माँ की शर्म पूरी तरह दूर हो चुकी थी और वो चूत लण्ड जैसे शब्द खुल कर बोल रही थी और पूरा मजा ले रही थी.

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