वहां से निकलते ही मेरे रौद्र रूप से स्तब्ध क्षितिज कुछ देर तक तो कुछ बोल नहीं पाया। उसके लिए मेरा यह रूप बिल्कुल नया था। कोमलांगी सी दिखने वाली मुझ जैसी स्त्री रणचंडी का रूप भी धर सकती है, यह उसे पता नहीं था। कहां एक दु:स्वप्न के कारण भय से थरथर कांपने वाली स्त्री और कहां आज की यह वीरांगना। असमंजस में पड़ा कुछ देर की चुप्पी के बाद क्षितिज अचंभित और प्रशंसात्मक शब्दों में बोला, “मॉम, आपने दो दो मुस्टंडों को इस तरह अकेले सरेआम पीट कर जमीन पर बिछा दिया, यकीन नहीं हो रहा है।”
“अपनी आंखों से देख लिया ना? यकीन कर ले। ऐसे लफंगों से निपटना मुझे बखूबी आता है।” मैं बोली।
“लेकिन मॉम, यह सुजीत बहुत बड़ा कमीना है। मैंने बताया था न, एक नंबर का छिछोरा। वह चुप नहीं बैठने वाला है।”
“अच्छा ऐसा? वह रहता कहां है?”
“लालपुर चौक के पास। आनंद विहार अपार्टमेंट में, क्यों?”
“तू कुछ मत पूछ, देखता जा, इनकी अच्छी खातिर करवाती हूं।” कहकर मैंने एस पी को फोन करके सुजीत और उसके साथी के साथ हुई घटना के बारे में बताया और कहा कि उसे दो दिन तक लॉकअप में बंद कर के बढ़िया से खातिर करवाएंं। S. P. साहब से मेरा ‘बहुत अच्छा’ परिचय था। (एस पी राठौर पहले हजारीबाग में थे। लंबे तगड़े, रोबदार लंबी मूंछों वाले राठौर साहब बड़े रंगीन मिजाज, बहुत बड़े रूप के रसिया और औरतखोर हैं। वहां से उनका तबादला हुआ रांची। स्थानीय गुंडों की रंगदारी से संबंधित केस के सिलसिले में मेरी मुलाकात उनसे हुई थी। मुझे देखते ही मुझ पर फिदा हो गए। उनकी नजरों को पहचानना मेरे लिए क्या मुश्किल था। वैसे भी मैं ठहरी एक नंबर की छिनाल। उन्होंने मुझे अपने सरकारी बंगले पर बुलाया, पहुंच गई मैं, रातभर उन्होंने मेरी कमनीय देह का रसपान किया और हो गया मेरा काम। उन गुंडों से स्थायी मुक्ति मिल गयी। उनके अपने रसूख के कारण अभी तक उनका तबादला रुका हुआ है। अभी भी यदा कदा वे मुझे बुला लिया करते हैं। वैसे थानेदार पांडे जी, भी एस पी साहब की वजह से मुुुझे अच्छी तरह पहचानते हैंं। मुुुझे मालूम था कि इन दो दिनों में हवालात में उनकी जो कुटाई होने वाली थी, उससे उनकी सारी हेकड़ी बाहर निकल जाने वाली थी।
“वाऊ मॉम, आप भी कमाल हो।” फोन पर एस पी साहब से मेरे वार्तालाप को सुनकर बोला क्षितिज। घर पहुंचते पहुंचते 10 बज गए, तबतक मैं सामान्य हो चुकी थी, क्षितिज के चेहरे पर चिंता की रेखाएं अबतक गायब हो चुकीं थीं, फिर भी उसे आश्वस्त करती और विषय बदलती हुई बोली, “हां वो तो हूँ, लेकिन तू भी क्या कम कमाल है? रात भर अपनी मां को चोदा, दिन को भी चोदा, अब आज फिर रात को चोदने की सोच रहा है, कमाल तो तू है मेरे प्यारे चोदू बेटे।”
“उफ्फ्फ मॉम, यू आर रियली ग्रेट, आज आपको चोदने का कुछ और ही मजा आएगा, वीरांगना लक्ष्मीबाई जी।” वह निश्चिंत होकर मुझे अपनी बांहों में ले कर चूम लिया।
“चल हट बदमाश कहीं के मेरे शरारती चुदक्कड़।” मैं उसकी बांहों से आजाद हो कर उसके गाल पर प्यार से चपत लगा कर बोली। दरवाजा हरिया ने खोला। घर के अंदर घुसते ही मैंने क्षितिज से कहा, “जा जल्दी फ्रेश हो कर खाने की मेज पर आ जा, बड़ी जोर की भूख लगी है।” खाना खाते वक्त क्षितिज मुझे देख देख कर मुस्कुरा रहा था।
“क्या बात है बेटा, बहुत मुस्कुरा रहे हो?” हरिया बोला।
“नानाजी, ये जो सामने बैठी मॉम शांति से खाना खा रही है ना, यह वास्तव में लक्ष्मीबाई है।”
“क्यों ऐसा कह रहे हो?”
“आज दो मुस्टंडों की मरम्मत की है इन्होंने।” फिर सारी घटना बता दिया उसने।
“उनकी किस्मत खराब थी बेटा जो इससे उलझ बैठे।” हरिया बोला।
“हां वो तो है, उनकी हालत देखकर तो ऐसा ही लग रहा था।” हंसते हुए क्षितिज बोला।
“बस बस बहुत हुआ तुम लोगों की बकबक, अब खाना खतम करो और सोने चलो। रात बहुत हो गई है।” कहकर मैंने उनके वार्तालाप को बीच में ही रोक दिया।
खाना खाकर हम अपने अपने कमरे में जाने लगे। मैं दरवाजे में घुस ही रहीथी कि मेरे कानों में क्षितिज की फुसफुसाहट सुनाई पड़ी, “आ रहा हूं मेरी जान तैयार रहना, दरवाजा अंदर से बंद मत कर लेना।” मेरे सारे बदन में चींटियां सी दौड़ गयीं। मैं तुरंत कर कमरे में दाखिल हुई और सोचने लगी, अंततः कपड़े तो उतरनी ही है फिर कपड़ों के बोझ से क्यों न कभी ही मुक्त हो जाऊं। हौले से दरवाजा सिर्फ उढ़का दिया और लाईट ऑफ करके नाईट बल्ब जला दिया। सारे कपड़ों से मुक्त हो कर मादरजात नंगी, एक पतली चादर ओढ़े बिस्तर पर औंधी लेट गयी। आज मेरे मन में कुछ नया करने की कामना थी। उस नादान आशिक के लिए एक नया तोहफा देने की। मेरा हृदय उसके इंतजार में धाड़ धाड़ धड़क रहा था। सहसा मुझे अहसास हुआ कि मेरे ऊपर से पतले चादर का आवरण हट रहा है। कब वह अंदर आया, मुझे पता ही नहीं चला। चादर मेरे पैरों की ओर से खींचा जा रहा था। अंतत: मेरे संपूर्ण निर्वस्त्र शरीर का पृष्ठभाग अनावृत हो गया। उफ्फ्फ भगवान, उसका अगला कदम क्या होगा, अपने अंदर के रोमांच, उत्कंठा, उत्तेजना को समेटे आंखें बंद किए लेटी रही।
“उफ्फ्फ मॉम, सामने से जितनी खूबसूरत हो उतनी ही पीछे से भी, वाऊ, ब्यूटीफुल बैक। ” यह प्रशंसात्मक उद्गार थे उसके। मैंने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा, मौन रही, सिर्फ कसमसा कर उसकी उसकी प्रशंसा को स्वीकार किया। सर्वप्रथम उसने मेरी सुराहीदार गर्दन का स्पर्श किया। उसकी उंगलियों का स्पर्श मेरी गर्दन से ले कर पीठ से होता हुआ मेरी कमर और और फिर, और फिर मेरे भरे भरे गोल गोल नितंबों पर आ कर रुका। मैं सिहर उठी। फिर मैं ने उसकी गरग गरम सांसें अपनी गर्दन पर महसूस की। उसके होंठों का स्पर्श मेरी गर्दन पर हुआ, उफ्फ्फ, सारा शरीर रोमांचित हो उठा। उसने एक बार चूमना शुरू किया तो फिर रुका नहीं, चूमता चला गया गर्दन से होते हुए मेरी पीठ पर, ओह भगवान, और नीचे और नीचे मेरी कमर पर आह्ह् मेरी मां, और नीचे और नीचे, हाय रा्आ्आ्आ्आ्आम, मेरे भरे भरे चिकने नितंबों पर ओह्ह्ह्ह्ह्ह अब और नहीं, बर्दाश्त की भी एक हद होती है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ। या खुदा, कैसा जालिम है यह, मेरी सहनशक्ति की परीक्षा ले रहा है क्या? धमनियों में रक्त का संचार इस तीव्रता से हो रहा था मानो फट पड़ने को बेताब हों।
“अपनी मुनिया को छुपा लो मॉम छुपा लो, देखता हूं कितनी देर छुपाओगी।” वह बेसब्र होता जा रहा था। उसने अब चूमना छोड़ कर चाटना आरंभ कर दिया था, हाय दैया उस निर्दयी के जीभ का स्पर्श ज्यों ही मेरे नितंबों पर हुआ, तड़प उठी मैं। चाटते चाटते उसकी जीभ मेरे नितंबों के बीच के दरार पर दौड़ने लगी। हाय रा्आ्आ्आ्आ्आम, उसकी जीभ का रुख मेरी गुदा द्वार की ओर थी। मेरी गुदा द्वार पर ज्यों ही उसकी जिह्वा का स्पर्श हुआ चिहुंक उठी मैं। बमुश्किल खुद को रोक पा रही थी। इस्स्स्स्स मां, कैसे एक नर खुद ब खुद अपनी आदमजात भूख मिटाने हेतु मार्ग तलाश लेता है? अचम्भा हो रहा था मुझे। थरथरा उठी आनंद के उस अनिर्वचनीय पलों में मैं। यदा कदा उसकी जिह्वा का स्पर्श मेरी पनिया उठी फकफकाती योनि पर भी हो रहा था। मेरे पैर अपने आप धीरे धीरे फैलने लगे।अब? आगे क्या? क्या करने वाला था वह अनाड़ी पागल? मेरी भी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। योनि मैथुन का स्वाद तो चख चुका था वह, आनंदित भी खूब हुआ वह। तो क्या अब मैं अपनी गुदा की ओर उसे आकर्षित कर सकी थी? शायद, या फिर निश्चित तौर पर। देखती हूं आगे क्या करता है यह पगला। उसकी इन उत्तेजक हरकतों से निहाल होती हुई अपने शरीर को उस अनाड़ी बच्चे के हाथों समर्पित कर चुकी थी। यह क्या? उसने यकायक मेरी गुदा द्वार के अंदर अपनी जिह्वा प्रविष्ट करा दी, उफ्फ्फ वह आहसास, असहनीय, अकथनीय, अवर्णनीय आनंद। उसके बाद तो मानो वह पागल हो गया। सटासट मेरी गुदाद्वार के अंदर डाल डाल कर कुत्ते की तरह चाटने लगा। मिल गया था उसे एक और स्वर्गीय सुख का मार्ग, बिन बताए।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह मेरे राजा, बहुत हो गया, ओ्ओ्ओह्ह्ह् मेरे चोदू, मेरे बर्दाश्त की और परीक्षा न ले पागल, अब चोद भी डाल हरामी।” अंततः मेरा धैर्य जवाब दे बैठा।
“वाह मॉम, ये हुई न बात। चोदूंगा जानेमन चोदूंगा, मगर आपकी मुनिया को तो बाद में देखूंगा, पहले इस दरवाजे को तो देख लूं। एक और दरवाजा मिला है अभी। आपके पीछे वाला दरवाजा, आपका हग्गू दरवाजा।” वह बोला। उसकी उत्तेजना उसकी आवाज में झलक रही थी।
हंसी आ गयी मुझे, “हग्गू दरवाजा नहीं रे मादरचोद, गुदा बोल, गांड़ बोल।”
“हां हां वही, गांड़। मस्त चिकनी है, लग भी रही है बहुत टाईट। आप बोलिए तो गांड़ चोदूं?” बह बेताब हो रहा था।
“चोद न रे हरामी, पूछ क्या रहा है। पूरी की पूरी मैं तुम्हारी हूं। जो चोदना है चोद, मगर जल्दी चोद, कहीं मर न जाऊं इंतजार में।” मैं तड़प कर बोली।
“वाऊ, गुड। यही सुनना चाहता था मेरी लंडरानी मॉम।” नंगा तो न जाने कब का हो चुका था। कूद कर आ गया मैदाने जंग में। मेरी कमर पकड़ कर उठा लिया और चौपाया बना दिया मुझे। बहुत जल्दी जल्दी सीख रहा था मेरा अनाड़ी बेटा। आश्चर्य हो रहा था मुझे, कैसे बिना बताए जीव जंतु नैसर्गिक तौर पर शारीरिक संबंधों को अंजाम देते हैं, आनंद का मार्ग खोज निकालते हैं। एक ही दिन में उसने मेरे मुख मैथुन से लेकर योनि मैथुन से होते हुए गुदा मैथुन तक का मार्ग तलाश लिया था। वाह रे प्रकृति।
बिना समय गंवाए उसने अपने आठ इंच लंबे लंड का सुपाड़ा मेरी गांड़ के मुहाने पर रखा और लगा दिया एक करारा प्रहार।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, फाड़ ही डालोगे क्या हर्र्र्र्र्र्र्रा्आ्आ्आ्आ्म्म्म्म्मी्ई्ई्ई्ई्ई, निर्दयी मां के लौड़े, हाय, ऐसी भी क्या बेसब्री, आराम से रे मादरचोद आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, एक ही बार में पूर्र्र्र्आ्आ्आ्आ्आ पेल दिया इतना मोटा लौड़ा।” उसके एक ही करारे प्रहार ने मेरे मुख से चीख निकालने पर मजबूर कर दिया। अनाड़ी चुदक्कड़ से गांड़ चुदवाना मतलब गांड़ की दुर्गति। कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ। एक ही झटके में उसने मेरी गांड़ के अंदर जड़ तक ठोंक दिया था अपना आठ इंच का मोटा हथियार। ऐसा कभी हुआ नहीं था मेरे साथ शायद। जिसने भी मेरी गांड़ चोदी, क्रमशः दबाव देते हुए आराम से डाला था अपना लंड मेरी गांड़ के अंदर। इसमें उस बेचारे को भी क्या दोष देना। खुद मैं भी तो मरी जा रही थी गांड़ मरवाने के लिए। उत्तेजना के आवेग में मैं बिना सोचे समझे उस नादान बच्चे को आमंत्रण दे बैठी और नतीजा मेरे सामने था। पीड़ा के मारे मेरा चेहरा विकृत हो गया। ऐसा लगा मानो किसी ने पूरा भाला घुसेड़ दिया हो मेरी गांड़ में, गांड़ चीरता हुआ सीधे मेरी अंतड़ियों को फाड़ डालने को आतुर। मेरी दर्दनाक चीख सुन कर घबराहट में एक ही झटके में उसने पूरा लंड बाहर खींच लिया। ऐसा लगा मानो मेरी गुदा मार्ग में अचानक शून्यता तारी हो गई। ऐसा लगा मानो उसके लंड ने मेरी अंतड़ी खींचने की पुरजोर कोशिश की हो। उफ्फ्फ, इस प्रकार का अहसास मुझे पहले कभी नहीं हुआ था।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” लंड निकलने पर भी पीड़ा। “लो, लंड डालो तो मुश्किल, निकालो तो मुश्किल, क्या करूं मैं?” क्षितिज बोला।
“धीरे धीरे डाल मेरे रसिया, धीरे धीरे निकाल चोदू, ढीला होने दे मेरी गांड़ को मादरचोद। फिर चोदना, जी भर के चोदना, रगड़ रगड़ के चोदना, पटक पटक के चोदना, गाली दे दे के चोदना, कुत्ते की तरह चोदना, कुतिया बना के चोदना, रंडी बना के चोदना, जैसी मर्जी वैसा चोदना, मैं खुद गांड़ उछाल उछाल के चुदवाऊंगी मेरे अनाड़ी बलमा।” मैं दर्द बर्दाश्त करती हुई बोली।
“ओके मेरी जान। वैसे बड़ी टाईट और रसीली है आपकी गांड़ मॉम। मस्त मस्त। चोदने के लिए आदर्श छेद। वाह क्या गांड़ है, आपकी गांड़ तो मुनिया से भी बढ़कर है। उफ्फ्फ, डाल रहा हूं मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” बोलते बोलते धीरे धीरे घुसाता चला गया अपना लंड।
“आह ओह हां हां ऐसे हीई्ई्ई्ई्ई उफ्फ्फ, अब अच्छा लग रहा है मेरे बच्चे।” उसके लिंग के प्रवेश से होने वाले घर्षण से मेरी गुदा मार्ग में स्थित स्नायु तंत्र तरंगित हो रहे थे। इसी तरह जब वह अपना लिंग बाहर निकाल रहा था, वही आनंदमय घर्षण। “आह्ह्ह् आह्ह्ह् आह्ह्ह्’ करता रह ओह मेरे बच्चे, करता रह ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे चोदू बेटे, चोदता रह अब मजा आ रहा है ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे बेटे” खुशी के उद्गार निकल रहे थे मेरे मुख से।
“हां हां मेरी मां, मेरी प्यारी बुरचोदी मां, मेरी प्यारी चूतमरानी मां, आह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह मजा आ रहा है उफ्फ्फ, ले मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में ओह मेरा पपलू पागल हो रहा है अहा ओहो” उसे पता चल गया कि अब मुझे भी मजा आ रहा है। अब वह बड़े आनंद से चोदने लगा, मजा ले कर चोदने लगा, मेरी कमर पकड़ कर बिल्कुल कुत्ते की तरह भकाभक मेरी गांड़ का भुर्ता बनाने लग गया।
“चोद मादरचोद, गाली दे मुझे मेरे चोदू बेटे, ओह गंदी गंदी गाली दे साले मां के लौड़े, मेरे लंडराजा, मेरे कुत्ते, मेरे रसिया, चोद मुझे लौड़े के ढक्कन, अपनी मां को रंडी बना दे हरामजादे कमीने आह्ह्ह् मेरे नादान चुदक्कड़।” मैं आनंदित हो कर बड़बड़ाती जा रही थी।
“ठीक है, ठीक है मेरी रंडी मां, मेरी कुत्ती मां, आह साली चूतमरानी मॉम, साली बुरचोदी मॉम, ओह मेरी रंडी, ओह मेरी कुतिया, ले मेरा लंड ओह्ह्ह्ह्ह्ह आह्ह्ह्,” दनादन दनादन चोदे जा रहा था, भकाभक, किसी जंगली कुत्ते की तरह पिल पड़ा था। अब वह मेरी चूचियों को दबोच कर मसल रहा था। मेरी गर्दन, कंधे पर किसी कुत्ते की तरह दांत लगा दे रहा था। उफ्फ्फ, वासना का वह सैलाब मुझे और मेरे बेटे को कहां बहाए जा रहा था होश ही नहीं था। मेरी शह पाकर पागल हो चुका था क्षितिज, जंगली जानवर बन चुका था। मैं कहां किसी कुतिया से कम थी, गांड़ उछाल उछाल कर चुदवाती जा रही थी। करीब चालीस मिनट तक उस युवा चुदक्कड़ ने मेरे जिस्म पर अपनी युवा मर्दानी शक्ति का भरपूर प्रदर्शन किया। उफ्फ्फ, मां बेटे के रिश्ते की मर्यादा को इतने घृणित तरीकों से तार तार करने में हमें जरा भी संकोच नहीं हो रहा था। पहले मैंने अपने नग्न देह से उसे खेलने दिया, उसके यौनांग से मैं खेली, चूसी, उसे मेरे यौनांगों से खेलने दिया, चाटने दिया, फिर अपनी चुदासी योनि में उसके कुवांरे लिंग को समाहित करने का जघन्य पाप कर बैठी, पाप या अपराध, जो भी था गया मेरी चूत में, उस आनंद के सामने क्या पाप क्या पुण्य, सब माफ उस सुख के समुंद्र में डूब कर, अब मेरे बेटे के साथ अप्राकृतिक मैथुन, ओह्ह्ह्ह्ह्ह हम कहाँ से कहाँ पहुंच गये थे। अप्राकृतिक ही सही, पाप या अपराध ही सही, भाड़ में गया सब, गांड़ में गया सब, उस आनंद के आगे हमें और कुछ नहीं सूझ रहा था। गुत्थमगुत्था होते रहे, आनंदित होते रहे। अंततः जब वह स्खलन के कागार पर पहुंचा, मेरी तो मानों पसलियां कड़कड़ा उठी हों। इतनी जोर से दबोचा था हरामी ने।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह् सा्आ्आ्आ्ली्ई्ई्ई्ई कु्त्त्त्त्ती्ई्ई्ई्ई, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह सा्आ्आ्आली्ई्ई्ई रंडी्ई्ई्ई्ई्ई,” कहते हुए झड़ने लगा, उफ्फ्फ गरमागरम लावा फचफचा कर मेरी गुदामार्ग को सराबोर करता रहा। मैं निहाल हो गई। मैं भी झड़ी तीन बार झड़ी। खूब डूब कर झड़ी। गांड़ मरवाते हुए तीन बार झड़ी, कमाल हो गया, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मजा, सुख, आनंद, अपने चोदू बेटे के सामर्थ्य की दाद देती हूं। आखिर है तो मुझ जैसी कामुकता की ज्वालामुखी का उपज, उन हरामी चुदक्कड़ मर्दों के सम्मिलित चुदाई का फल। मुझ कमीनी मां के दिल को सुकून मिला कि चलो मेरी अंतरात्मा की हां ना के झंझावत में डूबती उतराती अंततः मेरा बेटा सयाना हो गया।
“ओह मेरी रानी, स्वर्ग का सुख दे दिया तूने” स्खलन के सुख में डूबा, थक कर निढाल, मेरी नग्न देह को बांहों में भरकर चूम लिया और बोला।
“और तूने मुझे क्या कम सुख दिया मेरे चोदू अनाड़ी बलमा।” खुशी के मारे लिपट गई उससे और चुंबनों की झड़ी लगा बैठी उसके चेहरे पर। आखिर ठहरी रंडी की रंडी। अपने कोख जाए बेटे से संभोग का लुत्फ उठा कर मन में न कोई ग्लानि थी न ही रंचमात्र अपराधबोध।
मैं अपने बेटे क्षितिज, जो कि बिल्कुल अनाड़ी था स्त्री संसर्ग के लिए, संभोग सुख से अपरिचित, के साथ हमबिस्तर हुई। वह मेरे आकर्षण के वशीभूत वह सब कुछ कर बैठा जो हमारे समाज के लिए वर्जित है। इसमें मेरी भूमिका बेहद अहम थी। मैं सबकुछ जानते बूझते उसके इस कुकृत्य में सहभागी हुई। अगर मैं दृढ़ता पूर्वक मना कर देती तो बात यहां तक नहीं बढ़ती लेकिन मेरी खुद की कमजोरी के कारण यह सब संभव हुआ। मेरी वासना की अदम्य भूख के आगे सारी वर्जनाएं छिन्नभिन्न हो कर रह गयीं। पहले मैंने उसे मुख मैथुन का सुख दिया, उससे मुख मैथुन का सुख लिया, फिर योनि मैथुन के लिए प्रोत्साहित किया और हम दोनों ने बेशर्मी की हदें पार करते हुए योनि मैथुन का आनंद लिया। अंततः रही सही कसर पूरी हो गई गुदा मैथुन से। स्त्री की नग्न देह का किन किन तरह से उपभोग करना है, इससे वह बखूबी परिचित हो गया। स्त्री देह के विभिन्न अंगों से किस तरह आनंद लेना है यह वह बखूबी सीख गया था। स्त्री शरीर के विभिन्न महत्वपूर्ण उत्तेजक अंगों से परिचित हो गया था। एक तरह से कहूँ तो कामक्रीड़ा में दक्ष होता जा रहा था। अच्छा रूप रंग था, शरीर शौष्ठव अच्छा था, अच्छा लिंग था, संभोग के लिए उपयुक्त समुचित शक्ति थी उसमें, स्तंभन क्षमता गजब की थी। सिर्फ आवश्यकता थी तो कामक्रीड़ा को और आनंदमय बनाने हेतु विभिन्न कलाओं के प्रशिक्षण की, विभिन्न मुद्राओं, वभिन्न आसनों के जानकारी की। फिर तो पूरा कामदेव का अवतार ही बन जाना था उसे। उसकी मां होकर भी मैं ने जब उसे अपने शरीर के माध्यम से संभोग सुख का परिचय करा दिया तो अब आगे के प्रशिक्षण का दायित्व भी मुझे ही निभाना था। बेगैरत, बेहया, वासना की पुतली, कमीनी, कुलटा, छिनाल तो थी ही, मां बेटे के पाक रिश्ते की धज्जियां उड़ाने में जिसे तनिक भी झिझक नहीं हुई उसके लिए यह कार्य कौन सा मुश्किल था। मैं भी खुद चाहती थी कि वह इन सारी कलाओं में दक्ष हो जाए और कूप मंडूक न रह कर घर के बाहर की विस्तृत दुनिया में अपने मन मुताबिक अन्य नारियों के संसर्ग का लुत्फ ले। कामदेव सरीखा तो वह था ही, मुझे पूर्ण विश्वास था कि ऐसी लड़कियों, नारियों की कमी नहीं होने वाली थी उसके लिए, आखिर कब तक मैं उसे अपने पल्लू से बांध कर रखती। मैं खुद भी तो एक नंबर की आजादीपसंद चुदक्कड़ ठहरी, विभिन्नता पसंद, बेलौस, अदम्य वासना की भूखी कुतिया। एक पुरुष से बंध कर कैसे रह सकती थी भला। नित नये मर्दों से चुदवाने की चाहत में किसी भी हद तक जा सकती हूं। ऐसी ही हूं या परिस्थितियों वश ऐसी ही बना दी गई हूं।
गुदा मैथुन में क्षितिज एक नवीन आनंद से रूबरू हुआ था उस रात। नारी शरीर के विभिन्न अंगों से इतने विभिन्न तरीकों से आनंद लिया जा सकता है, यह उसे बहुत जल्द पता चल रहा था। गुदा मैथुन का दौर खतम होने के बाद हम एक दूसरे की नग्न देह से चिपके हुए कुछ देर उस आनंदमय सुखद आहसास में डूबे हुए थे। मेरी गांड़ का भुर्ता बन चुका था लेकिन मैं बेहद खुश थी। अब मुझे तलब हो रही थी मेरी भूखी चूत की भूख मिटाने की। फिर से कुतिया बनना चाहती, कुतिया बनकर चूत चुदवाना चाहती थी। मेरा हाथ उसके सीने से होता हुआ धीरे धीरे उसके पेट की ओर बढ़ने लगा। वह आंखें बंद किए मेरे हाथ के स्पर्श का आनंद ले रहा था। शनैः शनैः मेरा हाथ उसके पेट से होते हुए उसकी नाभी तक पहुंच चुका था। मैं और नीचे अपना हाथ ले गई, उसकी नाभी से नीचे, और नीचे, और नीचे, उसके रोयेंदार झांट को सहलाने लगी। अब वह तनिक कसमसाया।
“वाह मेरा राजा बेटा, मेरा लंड राजा, कितना मस्त लंड पाया है रे तू। सचमुच गधे जैसा लंड। हाय, लड़कियां और औरतें तो मर ही जाएंगी ऐसे लंड पर। ओह मेरे रसिया, जरा आंखें खोल कर देख दुनिया को चारों तरफ, एक से एक बढ़कर कितनी खूबसूरत लड़कियों और औरतों से भरी हुई है दुनिया, तेरे जैसे खूबसूरत मर्द पर मर मिटने को तैयार।” मैं भा्सनात्मक शब्दों के साथ क्षितिज के लिंग को सहलाती हुई बोलती जा रही थी। मैं किसी न किसी तरह उसके मन में एकमात्र मेरे प्रति आसक्ति और मोह को सामान्य पुरुषों की भांंति अन्य नारियों के प्रति पुरुषों के विपरीत लिंग के बीच वाले सामान्य आकर्षण में बदलने की कोशिश करने लगी ताकि मैं उसके मोहपाश से स्वतंत्र होकर यहां वहां मुंंह मार सकूं। आखिर कामुकता की साक्षात प्रतिमूर्ति मर्दखोर औरत जो ठहरी।
“मेरी जान देखूंगा देखूंगा, दुनिया भी देखूंगा। फिलहाल तो सिर्फ मुझे आप ही आप दिख रही हो मॉम, मेरी चूतमरानी, बुरचोदी, खूबसूरत, मस्त मस्त दुनिया की सर्वोत्तम मॉम, जो अपने बेटे की खुशी के लिए गर्लफ्रैंड बन सकती है, बेड पार्टनर बन सकती है, मन से भावनात्मक रिश्ते को निभाते हुए अपने शरीर को भी अर्पित कर सकती है। कमाल हो मॉम, आई रीयली लव यू।” उसने मुझे बांहों में भींच कर कहा।
“पागल कहीं का। तेरे भले के लिए कह रही हूं पागल। अभी तू जवान होता जा रहा है और मैं बूढ़ी। तेरी जवानी मुझ बुढ़िया पर बरबाद होते नहीं देख सकती मैं। मेरी खुशी चाहता है ना तू?”
“हां मॉम, आपकी खुशी के लिए मैं कुछ भी करने के लिए तैयार हूं।”
” तो मेरी खुशी के लिए ही सही, एक बार मेरे अलावे किसी और नारी को ट्राई कर के देख नारियों की भीड़ में। कसम से तू एक खोजेगा, तुझे दस मिलेंगी। चुनाव कर, स्थाई न सही अस्थायी ही सही, चख कर देख, चोद कर देख, जिंदगी खूबसूरत बन जाएगी तुम्हारी।” आप सोच रहे होंगे कितनी कमीनी हूं मैं। ऐसी ही हूं मैं। जानबूझकर उसे धकेल रही थी वासना के उस दलदल में जहां इस वक्त मैं थी। अरे क्या गलत क्या सही कौन जानता है, आपसी रजामंदी से जिंदगी का मजा लेते रहने में मुझे तो कोई गलती नजर नहीं आती है।
“ओके मॉम, आपने कह दिया और सोच लीजिए मैंने कर दिया। लेकिन इसकी शुरुआत मैं आपके जैसी ही किसी मैच्योर लेडी से करना चाहता हूं। जो आपकी जैसी समझदार और आजादख्याल हों।”
“ओह माई स्वीट सन, आई लव यू” खुश हो गयी मैं। चूम लिया मैंने उसे खुशी के मारे। “बस कुछ बातों का ख्याल रखना होगा तुझे। धूर्त औरतों से दूर रहना। जबर्दस्ती किसी से करना नहीं, अगर जबर्दस्ती करना भी हो तो उनसे करना जिसके बारे में तुम्हें विश्वास हो कि उसे तेरी चुदाई की दीवानी बना सको। कई ऐसी औरतें मिलेंगी जो पारिवारिक सेक्स से असंतुष्ट रहती हैं, ऐसी औरतों पर उपकार करने से परहेज न करना। कोई ऐसी बदचलन लड़की जिसे तुम पसंद नहीं करते अगर जबर्दस्ती तेरे गले पड़ना चाहे तो आरंभ में ही सख्ती से मना कर दो, कई बार ऐसी लड़कियां बाद में कैंसर बन जाती हैं। इन सबके अलावे भी कई ऐसी बातें हैं जिन्हें तुम समय के साथ अपने अनुभव से सीख लोगे, ऐसा मेरा विश्वास है। वैसे फिलहाल तुम्हारी सलाहकार मैं तो हूं ही, लेकिन अपने विवेक से काम लेना भी तुम सीख लोगे ऐसा मेरा मानना है।” मैंने देखा कि उसपर मेरी बात का असर हो रहा है। मैं कामयाब हो रही थी अपने मकसद में। उसका ध्यान अन्य स्त्रियों की ओर भटकाने में, अन्य स्त्रियों में उसकी रुचि जगाने में।
उसे वासना के दलदल में धकेलने की चिंता बिल्कुल नहीं थी मुझे। मुझे तो सिर्फ इस बात की चिंता खाए जा रही थी कि कब तक यह मेरे पल्लू से बंध कर रहेगा। उसकी मुझ पर आसक्ति की चिंता थी। कहीं वह सिर्फ मेरा होकर न रह जाए। इस तरह तो मैं भी बंध कर रह जाऊंगी, जबकि मुझ जैसी चुदक्कड़ औरत के लिए एक मर्द से बंध कर रहना निहायत ही कष्टकर था। मुक्त होना चाहती थी उसके बंधन से। इसके लिए मैं बेहद शातिराना तरीके से उसका ब्रेनवॉश कर रही थी। उसके मन में अन्य स्त्रियों के प्रति आकर्षण पैदा करना चाहती थी। एक बार उसे अन्य स्त्रियों में रुचि जाग जाए, अन्य स्त्रियों की देह का स्वाद चख ले, भिन्न भिन्न स्त्रियों की नग्न देह से संभोग के मजे से परिचित हो जाए तो निश्चित तौर पर ऐसी स्त्रियों से पटी पड़ी दुनिया में अपना शिकार तलाश कर शिकार करने लगेगा और मुझे भी अपने बेटे के बंधन से मुक्ति मिल जाएगी। स्वतंत्र हो जाऊंगी पुरुषों की भीड़ में घुस कर विभिन्न मर्दों से अपनी हवस की आग बुझाने के लिए।
“हां रे हां मेरे बच्चे, चोद ले अपनी रंडी मां की चूत मां के लौड़े।” अब हम बिंदास हो गये थे। इतना सुनना था कि तत्काल पोजीशन लेने लगा, लेकिन इस वक्त मैं कुतिया बनना चाहती थी, अपने बेटे की कुतिया, कुतिया की पोजिशन में अपनी चूत प्रस्तुत करना चाहती थी। अपने बेटे को कुत्ता बनाना चाहती थी। “नहीं ऐसे नहीं, फिर से मुझे कुतिया बना और खुद कुत्ता बन जा। कुत्ते की तरह मुझे चोद मेरे बेटे। कुत्ते की तरह मुझ कुतिया मां की चूत चोद मेरे कुत्ते बेटे, शाबाश, हां ऐसे ही, मेरे पीछे से मुझ पर सवारी गांठ मादरचोद बेटे।” मैं पूरी बेशरम रांड बन गयी थी इस वक्त। खुश हो रही थी कि अंततः मना ही लिया अपने बेटे को अन्य स्त्रियों की ओर भी ध्यान देने के लिए। एक बार उसे अन्य स्त्रियों का स्वाद चखने की देर थी कि वह स्वछंद तौर पर अपना शिकार ढूंढ़ ढूंढ़ कर चोदता फिरेगा, ऐसा मेरा मानना था और मैं भी स्वतंत्रता पूर्वक पूर्ववत अपने मनपसंद, भिन्न भिन्न मर्दों से चुदवाती फिरूंगी।
आनन फानन कुतिया बन गयी और वह कुत्ते की तरह मुझ पर पीछे से सवारी गांठने आ पहुंचा। “उफ्फ्फ मॉम, इस पोजीशन में तो मुझे सिर्फ आपकी खूबसूरत गांड़ ही आकर्षित कर ही है। क्या खूबसूरत गांड़ है आपकी।”
“अरे बेवकूफ़, मां के लौड़े मादरचोद, तुझे मेरी गांड़ ही दिखाई दे रही है गधे। गांड़ से नीचे की चूत नहीं दिख रही है शैतान? अबतक मेरी गांड़ के पीछे पड़ा है। हाय रे मेरी मुनिया को भूल ही गया क्या तेरा पपलू? अब और न तरसा मेरी मुनिया को। चल चोद कर निहाल कर दे, उद्धार कर मेरी मुनिया का, बेचारी न जाने कब से आंसू बहा रही है।” मैंने अपनी गांड़ और उठा दी, ताकि मेरी चूत अपने पूरे जलाल के साथ नुमाया हो जाय।
“वाह मॉम, ये हुई न बात। अब तेरी चूत सचमुच स्वर्ग का द्वार लग रही है”
“बकवास मत कर मां के लौड़े। शुरू कर चोदना बदमाश।”
“लो मेरी मां, यह गया मेरा लौड़ा, संभल जा बुरचोदी मॉम” कहते कहते अपने टनटनाए लंड के सुपाड़े को मेरी फकफकाती चूत के द्वार पर रखा और मेरी कमर को पकड़ कर एक करारे प्रहार से सरसराते हुए उतार दिया पूरा का पूरा लौड़ा मेरी चुदासी चूत के अंदर।
“आह आह्ह् आह्ह्ह् ओह ओह्ह ओह्ह्ह्ह्ह्ह हाय।” इस्स्स्स्स मां न जाने कितनी देर से तड़पती मेरी चूत ने खुशी खुशी उसके लंड को ग्रहण कर लिया। निहाल हो गयी मेरी चूत।
“क्या हुआ मां की चूत, साली कुतिया, आह ओह मत कर मेरी रंडी्ई्ई्ई्ई्ई मॉम, उफ्फ्फ इतनी गरम है भट्ठी की तरह, आह मेरे लौड़े को चूस रही है तेरी चूत, ओह्ह्ह्ह्ह्ह हां, चूस अपनी चूत से अहा ओहो” अब मेरा बेटा खुश हुआ। मेरा अनुभव काम आया अपनी चूत से लंड चूसने का। मैंने अपनी चूत को संकुचित कर उसके लिंग को जकड़ लिया।
“उफ्फ्फ मेरे चोदू बेटे, बड़ा शैतान है, बड़ा जालिम है तेरा लौड़ा, पहले रुलाता है फिर स्वर्ग का मजा देता है। ओह्ह्ह्ह्ह्ह चोद हरामी, मेरे प्यारे लौड़े के ढक्कन।”
“आह ओह मॉम गजब है तेरी चूत। जी करता है चोदता रहूं चोदता रहूं, उह अह उह अह।” शुरू हो गया कुत्ते की तरह दनादन, फचाफच, भच्च भच्च चोदने का अंतहीन सिलसिला। मेरी कमर छोड़ कर पीछे से मेरी चूचियों को पकड़ कर बेदर्दी से मसलता हुआ चोदने में मशगूल हो गया। उफ मां इतनी मस्ती, इतना सुखद। चूचियों के उस बेरहम मर्दन की पीड़ा आश्चर्यजनक रूप से मुझे आकंठ आनंद में डुबो रहा था। मैं अपनी चूतड़ उछाल उछाल कर उसके भीषण आघात का उत्तर दिए जा रही थी। चूत में बखूबी लंड खाने की कला तो कोई मुझसे सीखे। न जाने अबतक किस किस तरह का लंड खा चुकी थी अपनी चूत में। निराश नहीं हुआ कोई मुझे चोदकर आज तक। बड़े से बड़ा लंड सफलता पूर्वक खा चुकी थी और इसी कारण मेरा आत्मविश्वास बढ़ा था साथ ही अनुभव भी। चूत में लंड खाने की कला में मैं काफी कुशल हो गयी थी। छोटा लंड, लंबा लंड, मोटा लंड, पतला लंड, टेढ़ा लंड, सीधा लंड, न जाने कैसे कैसे लंड से पाला पड़ा था, जिससे मेरी चुदने की कला में निखार आता चला गया था। जो भी चोदा, दीवाना हो गया था मेरी चूत का। हो सकता है आपको यह मेरी आत्मप्रशंसा लगे, किंतु यह सच है। उसी अनुभव और कला का प्रदर्शन कर रही थी इस वक्त।
“आह्ह्ह् कमीने चोद अपनी मां को उफ्फ्फ मेरे बच्चे, हाय मेरे बेटे, निकाल ले अपनी पूरी कसर हाय मेरे चोदू, मेरे चुदक्कड़ बालक” मेरी बातों से और उत्साहित और उत्तेजित होकर जो धुआंधार ठोकने लगा, उफ्फ्फ, फचाफच, चटाचट, की आवाज और हमारी उह आह्ह्, हाय, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ, इस्स्स्स्स की सम्मिलित तार और उद्गारों से सारा कमरा गूंजने लगा, बड़ा ही कामुक दृश्य था।
“हां हां ओह मेरी रंडी मां, कुत्ती मां, बुरचोदी मां, लंडरानी मां, ले, और ले, और ले मेरा डंडा, मेरा खूंटा, मेरा मूसल, मेरा लौड़ा्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह” उत्तेजना के उत्कर्ष पर था, चोदने में महारत हासिल करता मेरा बेटा। चोदने की रफ्तार तूफानी हो गई थी और अंततः स्खलन के कागार पर पहुंच गया था वह, करीब पैंतीस मिनट की धींगामुश्ती, गुत्थमगुत्थी, एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद के पश्चात।
“आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह््आआ््आआ््हह्ह्” मैं भी झड़ने की कागार पर पहुंच चुकी थी। पहले मैं ही झड़ी, ओह्ह्ह्ह्ह्ह अंतहीन था वह अकथनीय स्खलन का अद्भुत सुख। इधर मेरी ढीली पड़ती काया को दबोचे, वह भी फचफचा कर झड़ने लगा, गरमागरम लावा उगलने लगा उसका लिंग।
“्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह््ह््ह््हह्््हह्हह” अपनी दानवी शक्ति से मेरी चूचियों को दबोचे झड़ने लगा वह। कोई और होती तो पीड़ा के मारे चीख पड़ती शायद, मगर मैं ठहरी एक नंबर की रांड, इस प्रकार की नोच खसोट से तो मुझे अलग ही लुत्फ मिलता था। निहाल कर दिया मुझे पगले ने। निढाल, थक कर चूर, पसीने से लतपत, लुढ़क गये हम दोनों एक दुसरे से चिपके हुए और लंबी लंबी सांसें लेने लगे मानो मीलों दूर दौड़ कर आज हों। बिस्तर के खूबसूरत कपड़ों का तो कबाड़ करके रख दिया था। मां बेटे के बीच के घिनौने कृत्य के मूकदर्शक समर्थक कपड़े, खुद भी अस्त व्यस्त होते, हमारी धींगामुश्ती के साथ नृत्य करते, मानो हमारी नग्न देह की कामुक हरकतों पर तालियां बजाते हुए ठहाके लगा रहे हों। पलंग भी कंपन के साथ नृत्य करता रहा। कमरे की एक एक निर्जीव वस्तु मानो जागृत हो कर उस अनैतिक रिश्ते में अपनी मोहर लगा दी हो।
“खुश कर दिया मेरे बेटे” मैं अपने सूखे होठों पर जीभ फिराते हुए बोली। गला भी खुश्क हो गया था। भयानक तौर पर रगड़ रगड़ कर चोदा था कमीने ने। पानी पी कर अपने गले की खुश्की दूर की और पुनः चिपक गयी उस कामदेव के अवतार मादरचोद बेटे की नग्न देह से।
“तूने भी तो कम खुशी नहीं दी मेरी प्यारी मॉम। आई लव यू मॉम। सच में मॉम मजा आ गया।” मुझे बांहों में लेकर चूम लिया।
“भूलना मत अब जो तुमने मुझसे कहा है। दूसरी स्त्रियों में भी रुचि लेने की।” मैंने उसे याद दिलाया।
“हां मेरी प्यारी बुरचोदी मां, तू पहली बार कोई ढंग की मैच्योर लेडी तो दिला फिर देख मेरा जलवा।” आत्मविश्वास से परिपूर्ण था उसका कथन। आश्वस्त हो गयी मैं। अंततः मैंने उसे राजी कर ही लिया था, अन्य स्त्रियों का शिकार करने के लिए। फिर उसी तरह नंग धड़ंग एक दूसरे से लिपटे चिपटे कब निद्रा की आगोश में चले गये पता ही नहीं चला।
मेरे कहने पर राजी तो हो गया था किंतु प्रथम बार किसी अन्य स्त्री को उसके बिस्तर तक लाने का जिम्मा उसने मेरे ही कंधे पर डाल दिया था। अब मैं किसी ऐसी व्यस्क स्त्री के बारे मे सोच रही थी, जो या तो रजामंदी से क्षितिज की हमबिस्तर बने या जिसे फंसा कर क्षितिज के बिस्तर की शोभा बना सकूं। इसके लिए मुझे अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
हमारे मोहल्ले के पूर्वी छोर पर एक महिला, श्रीमती रेखा सिन्हा को मैं जानती थी, जो करीब मेरी ही उम्र की, एक प्राईवेट फर्म में ऑफिस असिस्टेंट के पद पर कार्यरत थी। देखने में अच्छे भले घर की शरीफ औरत लगती थी, किंतु मैं जानती थी कि वह किस तरह की औरत है। काले रंग लेकिन तीखे नाक नक्श के कारण काफी आकर्षक थी। कद यही कोई पांच फुट चार इंच के करीब होगा। भरे बदन की होने के बावजूद पेट तनिक भी नहीं निकला था। उसके ब्लाऊज से छलक पड़ते अनुपात से काफी भरे भरे वक्ष लोगों का ध्यान बरबस अपनी ओर आकर्षित करते थे। मर्दों के दिलों पर तो मानो छुरियां चलती थीं। उसकी मदमाती चाल पर भारी, बड़े बड़े नितंबों की थिरकन का तो कहना ही क्या था। अपने काले रंग के बावजूद अपने शारीरिक गठन और खूबसूरत नयन नक्श से आकर्षक व्यक्तित्व की मालकिन होने के बावजूद अपने पति की बेरुखी झेल रही थी। उसका पति, 50 वर्षीय अलोक सिन्हा आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था। काफी दिलफेंक किस्म का बंदा था वह। अपनी पत्नी को छोड़ पराई औरतों पर लार टपकाने वाला। कद करीब साढ़े पांच फुट, गोरा रंग, सर के आधे बाल गायब हो चुके थे लेकिन फिर भी लंबोतरे चेहरे पर हल्की मूंछें आकर्षक ढंग से तराशी हुईंं उनके चेहरे पर खिलती थीं। अच्छा स्वास्थ्य, पेट तनिक निकला हुआ था। उनके रंगीन मिजाज को मुझसे ज्यादा भला कौन जान सकता था। उन लोगों से मेरा परिचय कैसे हुआ, पहले मैं उसे बता दूं।
यह एक साल पहले की बात है। सिन्हा जी की गिद्द दृष्टि मुझ पर न जाने कब से थी। एक दिन दुर्गा पूजा की छुट्टियों में रेखा मायके गयी हुई थी। पूजा के अवसर पर भी मैं ऑफिस के कार्य में काफी व्यस्त थी। पूजा के भीड़भाड़ वाले माहौल में मैं कार लेकर नहीं जाती थी। देर शाम के झुटपुटे में करीब साढ़े छ: बजे घर लौटते वक्त ऑटो देख रही थी तभी अपनी कार में न जाने कहाँ से मेरे पास आ टपके,
“अरे कामिनी जी?”
“ओह सिन्हा जी, आप?”
“हां मार्केटिंग के लिए आया था, लौट रहा हूं। आप ऑटो देख रही हैं क्या?” लार टपकाती नजरें मुझ पर गड़ी हुई थीं।
“जी हां, लेकिन लगता है पूजा के चक्कर में ऑटो वाले पूजा घूमने वालों को ही घुमाने में व्यस्त हैं।”
“अरे तो आईए ना, मैं छोड़ देता हूं। घर ही तो लौट रहा हूं।” उसकी भूखी नजरें मेरे वक्षस्थल पर गड़ी हुई थीं।
“ओके” बोलते हुए जैसे ही पिछले दरवाजे की ओर बढ़ी, तपाक से सामने के दरवाजे को खोलते हुए बोले, “अरे सामने की सीट पर बैठिए ना, आईए।” मैं सामने की सीट पर ही बैठ गयी। अपने ऑफिस के कार्य की थकान के बावजूद मेरे शरीर के अंदर वासना का कीड़ा कुलबुला रहा था।
जैसे ही भीड़ भाड़ से बाहर निकले, गियर चेंज करते करते उन्होंने मेरी बांयी जांघ को सहला दिया। गनगना उठी अंदर तक मैं। मैंने सप्रयास अपने चेहरे को निर्विकार रखा। रियर व्यू मिरर इस तरह से सेट था कि वह मेरे चेहरे को बखूबी देख सकता था। कोई प्रतिक्रिया न देख मन बढ़ गया उनका। दुबारा उन्होंने वही हरकत की। मैं पशोपेश में पड़ गई कि अपनी प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त करूँ। कामुकता का कीड़ा अंदर छटपटा रहा था, मनोवांछित मर्द भी उपलब्ध था किंतु शराफत का ढोंग करना भी आवश्यक था, खुद को इतनी सस्ती भी नहीं दिखाना चाहती कि किसी भी मर्द के आगे बिछ जाऊं। तीसरी बार उन्होंने यही क्रम दुहराया, इस बार कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गये वे। उनका हाथ तनिक और ऊपर तक आ गया था।
“यह क्या कर रहे हैं आप।” तनिक रोष में बोली। चेहरा इस वक्त भी निर्विकार था। उन्होंने झट से हाथ हटा लिया।
“सॉरी, गियर चेंज कर रहा था।” धूर्तता पूर्वक मुस्कुरा रहा था वह।
“अपना हाथ संभालिए। गियर लीवर उधर है।” मन तो पुलकित हो रहा था मेरा। करता रहे ऐसा, करता रहे, ऐसी इच्छा हो रही थी लेकिन उन्होंने फिर वैसी हरकत नहीं की। थोड़ा बुरा लगा, हां, यह भाव मेरे चेहरे पर आ गया। अब वह असमंजस में था, हाथ लगाने से मुझे बुरा लगा कि हाथ हटाने से। मैं उसकी मनोदशा समझ रही थी। सहसा एक सन्नाटा सा छा गया कार के अंदर। हम दोनों अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में हिचकिचा रहे थे। तभी कार रुकी। मैंने देखा यह तो सिन्हा जी का घर था।
“आपने कार यहां क्यों रोक दी?” चौंक पड़ी मैं।
“अरे कामिनी जी आईए न, चाय पी कर चली जाइएगा।”
“सिन्हा जी देर हो रही है, अभी नहीं।”
“प्लीज, एक कप चाय तो पी कर ही जाईए।” उनके पुरजोर आग्रह को टाल नहीं पाई मैं। शायद टालना चाहती भी नहीं थी।
“ठीक है लेकिन मैं जल्दी निकलूंगी, मौसम भी ठीक नहीं है। यह बेमौसम का बादल कहां से चला आया। शायद बारिश होने वाली है।” कहते हुए मैं कार से उतरी और उनके घर में दाखिल हुई। घर की आंतरिक सज्जा काफी आकर्षक थी। बड़ा सा ड्राईंगरूम था।
“आईए बैठिए” बड़े से गद्देदार सोफे की ओर इंगित करते हुए बोला। “मैं दो मिनट में चाय बना कर लाया।”
“अरे आप क्यों? घर में और कोई नहीं है क्या?”
“मैं अकेला हूं। रेखा पूजा मनाने मायके गयी हुई है। आप टेंशन मत लीजिए, मैं चाय अच्छी बना लेता हूं।” कहते हुए सीधे किचन में घुस गया। मैं धड़कते दिल से सोफे पर बैठ गई। मन में कई तरह के विचार आ रहे थे। मैं जान रही थी कि उनके मन में क्या चल रहा है। स्पष्ट बोलने की हिम्मत नहीं थी उनमे, शायद मेरी प्रतिक्रिया का असर था। मेरे मन में क्या चल रहा है यह तो मुझे भलिभांति पता था। एक अदृश्य दीवार सी थी, जिसके गिरने की भर देर थी, फिर तो सबकुछ अपनेआप होता चला जाता। कैसे होगा, कब होगा, या होगा भी कि नहीं।
“लीजिए, चाय आ गयी।” एक ट्रे में चाय और कुछ बिस्किट लिए हाजिर हो गये वे। उन्होंने चाय की ट्रे सेंटर टेबल पर रख दिया और सामने के सोफे पर बैठ गये। “लीजिए चाय लीजिए” मैंने चाय का कप उठाया तो वे बोल बैठे, “अरे बिस्किट भी लीजिए ना।” मैं ने उनका मन रखने के लिए बिस्किट भी उठा लिया। मन तो कुछ और चाह रहा था किंतु पहल कैसे करती। मन मसोस कर चाय खत्म कर उठने लगी।
“अच्छा तो मैं चलती हूं, चाय के लिए धन्यवाद।”
“ओके” मायूसी छाई हुई थी उनके चेहरे पर, जिसे वे चाह कर भी छिपा नहीं पा रहे थे। मैं उनकी मन:स्थिति से पूरी तरह अवगत थी, लेकिन मैं अपनी मनोदशा को कैसे व्यक्त कर सकती थी। उठ कर वे भी मेरे पीछे दरवाजे तक आए, मैं उनकी ओर मुड़ी और बाय कहने ही वाली थी तभी बड़े जोर की कौंध के साथ कानफाड़ू आवाज में बिजली कड़की। घबराहट और भयमिश्रित चीख के साथ मैं सामने खड़े सिन्हा जी से जा चिपकी। प्रत्यक्षत: यह स्वभाविक प्रतिक्रिया थी। मैं सिन्हा जी से चिपकी थरथर कांप रही थी। शायद इसी पल का इंतजार था, सिन्हा जी को। कस के अपनी बांहों में जकड़ लिया मुझे। उनके हिसाब से भगवान ने सुन ली उन के दिल की पुकार। उनके झिझक की दीवार ढह गई। मेरी बदहवासी के आलम में ही मुझे बांहों में जकड़े कमरे के अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया अंदर से। मैं जबतक अपने होशोहवास में आती, तबतक वे मुझे उस कमरे के बड़े वाले सोफे पर मेरे साथ लेट चुके थे। मैं नीचे थी और वे मेरे ऊपर। मुझ पर चुंबनों की बरसात करने लग गये थे। मेरी साड़ी का पल्लू एक तरफ हो गया था और मेरे उन्नत उरोज मेरे लो कट ब्लाऊज के ऊपर से आधा झांक रहे थे, फुदक कर बाहर आने को बेताब।
“यह क्या कर रहे हैं आप?” पूर्ण होशोहवास में आ कर मैं चौंक कर बोली।
“नया कुछ नहीं, कुछ भी नया नहीं। वही कर रहा हूं जो काफी देर से सोच रहा था, और देखिए भगवान ने खुद आपको मेरी झोली में डाल दिया।” उसकी आंखों में वासना की खुमारी अंगड़ाई ले रही थी।
“छोड़िए मुझे, प्लीज, मत कीजिए ऐसा मेरे साथ। जाने दीजिए मुझे।” उनके चंगुल से छूटने की असफल कोशिश करती हुई गिड़गिड़ाने लगी। सब नाटक। झूठमूठ के विरोध का दिखावा। चाहती तो मैं भी यही थी कब से। मन में तो लड्डू फूट रहे थे, अंततोगत्वा उनके झिझक का बांध तो टूटा।
“ऐसे कैसे छोड़ दूं कामिनी जी। इतने दिनों बाद तो आज मौका मिला है। अब आप मना मत कीजिए प्लीज, वरना मुझे जबर्दस्ती करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जो कि मैं नहीं चाहता हूं।” वह बेकरार हो रहा था। उनके पतलून के सामने के उभार का दबाव मेरी योनि के आसपास मैं महसूस कर पुलकित हो रही थी।
“नहीं, प्लीज, मैं वैसी औरत नहीं हूं जैसी आप मुझे समझ रहे हैं।”
“अब आप कुछ भी कहिए, मैं ऐसे तो आपको अभी जाने दे नहीं सकता।” मुझे बेहताशा चूमने चाटने लगा वह। उसने मुझे दबोचे हुए एक हाथ से मेरे उरोजों को मसलना शुरू कर दिया। “आह, आपकी चूचियों का जवाब नहीं। इतनी बड़ी बड़ी और टाईट? उफ मेरी जान, इतनी मस्त और खूबसूरत औरत को बिना चोदे कैसे छोड़ सकता हूँ भला।” अपने असली रंग में आ चुके थे वे। उनके हाथ का दबाव मेरी चूचियों पर बढ़ता ही जा रहा था। ब्लाऊज के ऊपर से ही बड़ी बेरहमी से मसलने लगे। उनकी आंखों में वहशीपन स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था।
“उफ्फ्फ, आह्ह्, छोड़िए, हाय हाय, ओह मां, बरबाद मत कीजिए मुझे उफ्फ्फ प्लीज।” छटपटाती हुई बोली मैं।
“छोड़ दूंगा जानेमन, छोड़ दूंगा। पहले चोद तो लूं। मेरे भूखे लंड की भूख मिटा तो लूं। आपको देख देख कर न जाने कितनी बार मूठ मार चुका हूं। आज जब मौका खुद भगवान ने दिया है तो भगवान की मर्जी का निरादर कैसे कर दूं।” जबर्दस्ती मेरे ब्लाऊज को खोल दिया उसने। मैं असहाय छटपटाती रही, मेरी ब्रा को भी नोच फेंका कमीने ने। उफ भगवान, मेरा ऊपरी भाग नग्न हो चुका था। “वाह, इतनी मस्त चूचियां, उफ्फ्फ मेरी रानी, मजा आ गया, जिंदगी में पहली बार ऐसी चूचियां देख रहा हूं। इतनी बड़ी बड़ी, सख्त और चिकनी, अब आप ही बताईये, कैसे छोड़ दूं इनका मजा लिए बिना?” मेरी चिरौरी विनती का तनिक भी प्रभाव उस पर नहीं पड़ रहा था, उसके विपरीत वह और अधिक उत्तेजित होता जा रहा था। वहशी जानवर बन चुका था अब तक। टूट पड़ा मेरे स्तन पर और मुह लगा कर चूसना आरंभ कर दिया।
“आह्ह् मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, ओह्ह्ह्ह्ह्ह भगवान, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” मैं बेबस छटपटाने का ढोंग करती रही। उत्तेजना के मारे मैं भी पागल हुए जा रही थी। मेरी योनि पानी पानी हो रही थी। उधर सिन्हा जी बेसब्री में मेरी साड़ी के अंदर हाथ डाल चुके थे। उनका हाथ सीधे मेरी पैंटी के ऊपर से ही फकफकाती योनि पर रेंगने लगा। चींटियां सी रेंगने लगीं मेरे पूरे बदन पर। योनि रस से भीगी पैंटी का आभास उन्हें हो गया था। अपनी सफलता पर खुश होते हुए वे कुछ अधिक ही उत्साहित हो उठे। मेरी चूचियों के निप्पल्स को चुभलाते हुए दांत गड़ा बैठे। “उई्ई्ई्ई्ई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” चिहुँक उठी मैं। अभी भी मैं छटपटा रही थी। मगर उनके शक्तिशाली बांहों में बंधी बेबस पंछी की तरह फड़फड़ा कर रह गई।
उत्तेजना के आवेग में सिन्हा जी ने इतनी जोर से मेरे चुचुक में दांत गड़ा दिया था कि दांत का लाल निशान उभर आया था। मेरी आंखों में आंसू आ गए थे। पीड़ा से चीख उठी मैं। मगर इतना सब कुछ होते हुए भी मैं बेहद आनंदित हो रही थी। उत्तेजना के मारे मैं थरथराने लगी थी। मेरी पनियायी योनि के ऊपर, भीगी पैंटी के ऊपर से ही उनका हाथ थिरक रहा था, मेरे अंतरतम को तरंगित कर रहा था। “नहीं, ननननननह्ह्ह्हहींईंईंईंई, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, बस कीजिए ना्न्न्न्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह।” निर्बल आवाज में बुदबुदाई मैं। जांघों को आपस में चिपका योनि रस को बाहर निकलने से रोकने की असफल कोशिश करने लगी लेकिन नाकाम रही। इधर इतने पर ही कहां रुकने वाले थे वे। देखते ही देखते मेरी साड़ी, पेटीकोट को ऐसे निकाल फेंका जैसे सूखे पत्ते हों। अब मैं सिर्फ पैंटी में थी। अभी भी मेरा नाटक बदस्तूर जारी था, दिखावे की बेबसी का, दिखावे के विरोध का, दिखावे की शराफत का। कब तक। आखिर कब तक। तिनके की तरह नोच फेंका मेरी पैंटी को भी उस वहशी दरिंदे ने। नंगी हो गई मैं, मादरजात नंगी। उफ्फ्फ मेरे भगवान। मेरी फकफकाती फूली हुई पनियायी चमकती चूत का दीदार करके पागल ही तो हो गये वे। भूखे भेड़िये सी चमक उनकी आंखों में आ गई।।
“उफ्फ्फ, नहीं, ओह्ह्ह्ह्ह्ह भगवान जैसा आप समझ रहे हैं ऐसा कुछ नहीं है। हाय ओह” मैं कम कमीनी थोड़ी न हूं। ढीठ एक नंबर की, इतनी आसानी से शराफत का चोला कैसे फेंक देती।
“चुप साली कुतिया।” मुझे पुर्णतय: नग्न करने के पश्चात कुछ पल मेरी तराशी हुई काया के सौंदर्य में खो गये। उनकी आंखों में किसी भूखे भेड़िए सी चमक आ गयी थी। अपने कपड़े उतार कर खुद भी मादरजात नंगे हो गये। ओह भगवान, अच्छे खासे मर्द थे वे। सीने, कंधों, हाथ और पैरों पर बाल ही बाल। तोंद थोड़ा निकला हुआ। मजबूत शरीर और उफ भगवान, उनके तनतनाए हुए लिंग का तो कहना ही क्या। ज्यादा लंबा तो नहीं था, करीब साढ़े छ: इंच का था लेकिन मोटा गजब का। कम से कम तीन इंच मोटा तो जरूर था। लिंग के चारों ओर काले घने बाल, उनका अंडकोश भी बाल से भरा हुआ। जब तक वे अपने कपड़े उतारते मैं नग्नावस्था में ही सोफे से उठ खड़ी हो गयी।
“नहीं प्लीज, सिन्हा जी, नहीं।”
“चुप बुरचोदी, अब ना नुकुर करने से कोई फायदा नहीं। देख तेरे नंगे जिस्म की खूबसूरती देखकर मेरा लौड़ा कैसे फड़फड़ा रहा है। तेरी चूत में घुसे बिना यह मानेगा थोड़ी ना। फूल कर तो आलूचॉप हो गयी है तेरी चूत, बेकार ड्रामा करके अपनी चूत को और क्यों रुला रही हो हरामजादी।” अब तू तड़ाक पर उतर आये थे वे। झपट कर मुझे पुनः अपनी बांहों में दबोच कर लिए दिए उसी सोफे पर आ गये। हाय राम, मेरे नंगे जिस्म का उनके नंगे जिस्म से चिपकना बेहद आनंददायक था उस वक्त मेरे लिए। यही तो कब से चाह रही थी मैं। उन्होंने मुझे सोफे पर पटक कर दाहिने हाथ की एक उंगली भच्च से मेरी लसीली चूत में भोंक दी।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह्,” सिसक उठी मैं। अब भी छटपटा रही थी, उनकी बांहों में कसमसा रही थी। उंगली मेरी चूत से निकाल कर मुझे दिखाते हुए चाटने लगे।
“वाह स्वादिष्ट है। मजेदार है।” कहते हुए फिर मेरी चूत में उंगली डाल कर तीन चार बार अंदर बाहर करके चूत रस से भीगी उंगली चाटने लगा। “वाह वाह यम्मी, तू खुद चाट कर देख,” मेरे मुह में भी डाल दिया, नमकीन स्वाद, वाकई स्वादिष्ट था। “कैसा लगा? अच्छा है ना?” मेरे उत्तर की प्रतीक्षा करने के बजाय खुद मेरी चूत चाटने के लिए मेरी चूत में मुह लगा दिया और कुत्ते की तरह चपाचप चाटने लगा।
“ओह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ” दीर्घ निश्वास मेरे मुह से निकला। उफ्फ्फ, झनझना उठी मैं। उसने मुझे इस तरह दबा कर रखा था, मेरी दोनों जांघों के बीच सिर घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह, मेरे नितंबों के नीचे हाथ डाल कर चिपका दिया था अपना मुह। चूत के अंदर भी जीभ घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह कर चाट रहा था कमीना, मेरे भगनासा को भी छेड़ता जा रहा था हरामी। उफ्फ्फ, बता नहीं सकती हूं कितना आनंदित हो रही थी मैं उस वक्त। 69 के पोजीशन में थे हम दोनों। उनका गधे जैसा मोटा लंड ठीक मेरे मुह के ऊपर डिंग डोंग कर रहा था। अपनी दोनों जांघों के बीच मेरे सर को दबोचे हुए था और अपनी कमर को भी हल्के हल्के जुंबिश देते हुए मेरे होंठों से स्पर्श करा रहे थे वे अपने लंड को। वे माहिर चुदक्कड़ थे। समझ गयी मैं। कैसे किसी औरत को गरम करके शिकार करना है, उन्हें बखूबी आता था।
“मुह खोल मां की लौड़ी लंडखोर कुतिया।” उनकी गुर्राहट भरी आवाज आई। आवेश भरा आदेश था। सर हिलाने में असमर्थ, मुह खोलने को विवश हो गई। उन्होंने पहले अपने लौड़े को थोड़ा नीचे किया तो उन्हें पता चल गया कि उनके आदेश का पालन हो चुका है। एक ही धक्के में सड़ाक से अपना गधे जैसा लंड मेरे हलक में उतार दिया। उफ्फ्फ भगवान, ऐसा लगा मानो मेरी सांसें रुक गयी हों। छटपटा उठी मैं। मगर वह भी कम बड़ा चुदक्कड़ नहीं था। हल्के से लंड बाहर निकाला, मैं किसी तरह खुद को संभाल कर उसी स्थिति में स्थिर थी। धीरे धीरे मेरी सांसें सामान्य हो पाई, तभी फिर भच्च से अंदर कर दिया अपना लंड। इसी तरह तीन चार बार करने के बाद जब उन्हें आहसास हो गया कि मैं अब आराम से उनका लंड मुह में ले पा रही हूं तो फिर शुरू हो गयी मेरे मुह की चुदाई। गचागच, फचाफच। मेरी चूत में जो आग लगी थी, उस उत्तेजना का परिणाम यह हुआ कि मैं भी पागलों की तरह गपागप उनका उतना मोटा डरावना लंड लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी। तभी मैं उत्तेजना के चर्मोत्कर्ष में पहुंच गई, थरथराने लगी और मेरा स्खलन शुरू हो गया। मेरे मुह से गों गों की आवाज निकलने लगी और कुछ ही पलों में मैं झड़ कर निढाल हो गयी। उन्हें सब पता था, होता भी क्यों नहीं, औरतखोर नंबर वन जो ठहरा मादरचोद कहीं का। चपाचप मेरी चूतरस को चाट कर साफ कर दिया और फिर मुझे उत्तेजित करने के लिए पोजीशन बदल कर मेरी चूचियों पर टूट पड़ा।
“हाय, उफ्फ्फ, इस्स्स्स्स, हो गया सिन्हा जी आह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह” मैं बोली।
“बंद कर बकवास कुतिया, फिर से तैयार हो जा मेरा लौड़ा खाने के लिए अपनी बुर में।” उसके लिए तो अभी तक कुछ नहीं हुआ था। लंड जस का तस मेरी थूक, लार से लसलसाया, मेरी चूत का भुर्ता बनाने को बेताब था। मिनट दो मिनट में ही मैं पुनः गरमा गयी। मेरी सांसे तेजी से चलने लगीं। शरीर अकड़ने लगा। समझ गया वह कि मैं तैयार हो गयी हूं चुदने के लिए। मेरे दोनों पेरों को उठा कर अपने कंधों पर रख लिया।
“नहीं नहीं प्लीज नहीं, ऐसा मत कीजिए मेरे साथ, मर जाऊंगी मैं ओह राम, बहुत मोटा है आपका।”
“क्या, क्या बहुत मोटा है।”
“लिंग आपका”
अबतक अपने लिंग का सुपाड़ा मेरी योनि द्वार पर टिका चुके थे वे, “लिंग नहीं हरामजादी, लंड बोल लंड, लौड़ा बोल लौड़ा, साली रंडी्ई्ई्ई्ई्ई।” भच्च, ठोंक दिया लंड उसने एक करारे झटके से मेरी योनि में। ककड़ी की तरह चीरता हुआ घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह, उफ्फ्फ।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह् ननननननह्ह्ह्हहींईंईंईंई, म्म्म््मर्र्र्र्र्र् गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” चीख उठी मैं।
“चीख मत बुरचोदी, ले और थोड़ा ले, हुम्म्म्म्म्म्म, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मस्त, आह्ह्ह् कितनी टाईट है साली कुतिया तेरी चूत, उफ्फ्फ, कितनी गर्म, भट्ठी है भट्ठी तेरी चूत उफ्फ्फ, देखने में भोंसड़ा मगर चोदने में सोलह साल की लौंडिया की चूत, उफ्फ्फ मजा आ गया रानी, अब आयेगा मजा चोदने का।”
“आह्ह्ह्, नन्न्न्न्ह्ह्ह्ही्हीं्ही्हींईंईंईं, आह्ह्ह् फट्ट्ट्ट्ट गई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ मेरी।” नाटक करना तो कोई मुझ से सीखे। मेरी चीख से उत्साहित हो उठे वे।
“क्या, क्या फट गई तेरी?”
“योनि”
“योनि नहीं साली बुरचोदी कुतिया, बुर बोल बुर, चूत बोल चूत, भोंसड़ा बोल भोंसड़ा हरामजादी” मुझे सिखा रहा था मादरचोद। मन ही मन हंस पड़ी मैं। मन ही मन बोल रही थी, साले मां के लौड़े तेरे जैसे न जाने कितनों का लंड खा चुकी हूं, तू किस खेत की मूली है।
“आह, दर्द हो रहा है सिन्हा जी, निकालिए ओह्ह्ह्ह्ह्ह, बहुत मोटा है आपका लंड। आपने बरबाद कर दिया मुझे, हाय।”
“बरबाद नहीं रे पगली, आबाद बोल, आबाद। थोड़ा सबर कर, दरद खतम हो जायेगा फिर देख कितना मजा आयेगा।” पहले धीरे धीरे, फिर थोड़ा तेज और फिर और थोड़ा तेज, धक्के पर धक्का, ठाप पर ठाप दनादन देने लगे वे। अब मैं भी पूरी मस्ती में आ गयी। अब और नाटक करना व्यर्थ था। मजा लेना चाहती थी। शराफत का चोला भी पहने रहना चाहती थी। सब कुछ सही हुआ। मेरी चूत का रंग ढंग देख कर उन्होंने जो भी सोचा, परवाह नहीं। मैंने अपना रोल बखूबी निभाया। अब समय आ गया था पूरे रंग में आने का।
“कर ली अपनी मनमानी आखिर आपने। कर ही दिया मुझे बरबाद ना। हाय, जब हो ही गयी बरबाद तो अब और क्या बचा मां के लौड़े।” मैं भी अब आप ऊप के आदरसूचक संबोधन को अपनी चूत में डाल कर रंडीपन पर उतर आई। अपनी कमर उछालने लगी मैं। “साले मादरचोद, चल अब खुल के चोद मुझे साले कुत्ते, आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह हरामी चोद मेरी चूत, बना डाल भोंसड़ा कमीने।” भौंचक्का रह गया वह मेरे इस रूप को देख कर। “अब मुह फाड़े देख क्या रहा है बुरचोद, फाड़ डाल मेरी चूत, लंड के लोढ़े, मेरी बुर का भुर्ता बना लौड़े के लोटे।” मैं बेहद उत्तेजित थी और आप लोगों को पता ही है कि उत्तेजना के चरम पर जब मैं होती हूं तो रंडी भी मेरे रंडीपन के आगे पानी भरने लगती है।
“वाह रे मेरी रानी, ये तो गजब हो गया। क्या यह मेरे लंड का कमाल है? पहले तो बड़ी शरीफजादी बन रही थी? अब तो बिल्कुल रंडी हो गयी।”
“तूने मुझे बरबाद किया, जबरदस्ती किया। मेरे मना करने के बावजूद मुझे चुदने के लिए मजबूर किया और अब जब मेरी चूत में आग लगी है तो लगे भाषण झाड़ने बहनचोद। अब रगड़ मुझे, रौंद मुझे, पीस डाल अपनी बांहों में साले चुदक्कड़ कुत्ते।” उसपर मुझे रंडी बनाने की तोहमत लगाते हुए मजा लेने लगी। खैर अब उसे इन बातों से क्या लेना देना था। चोदना था, चोद रहा था। मेरे खुलेपन से और उत्साहित हो कर सचमुच में जंगली जानवर बन गया। नोचने लगा, खसोटने लगा, पूरी शक्ति से भंभोड़ने लगा वह। मैं कहां पीछे रहने वाली थी। पूरी शक्ति से उनके शरीर से चिपकी गचागच लंड खाने में मशगूल हो गयी। “ओह्ह्ह्ह्ह्ह राजा, आह हरामी, हाय मेरे कुत्ते कमीने चुदक्कड़ स्वामी, आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह, हाय्य्य्य्य मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ” सिसकारियां निकालने लगी।
“ओह मेरी कुतिया, चूतमरानी, बुरचोदी, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह्ह्ह मजा आ््आआ््आआ रहा्आ्आ्आ्आ है ओह साली रंडी्ई्ई्ई्ई्ई अब तक क्यों नहीं चोदा रे तुम्हें।” इसी तरह हम दोनों एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद करते रहे, धकमपेल करते रहे, मस्ती के सागर में डुबकी लगाते रहे और अंततः आधे घंटे के इस घमासान चुदाई के पश्चात हम दोनों एक दूसरे के तन में आत्मसात होने की पुरजोर कोशिश करते हुए आनंद के सागर में सराबोर अंतहीन स्खलन में लीन हो गये। जब हांफते कांपते निढाल हुए तो पूर्णतया तृप्ति की मुस्कान थी हम दोनों के होठों पर।
“कमाल हो तुम कामिनी। तेरे जैसी इतनी मस्त और खूबसूरत औरत मैंने आज तक नहीं चोदा। जैसी तेरी सूरत, वैसा तेरा बदन। इस उमर में इतनी बड़ी बड़ी मस्त चिकनी चूचियां भी इतनी टाईट, कमाल है। बदन का कसाव गजब है। तेरी गांड़ इतनी मस्त है कि लंड अपने आप खड़ा हो जाता है। चूत का तो कहना ही क्या। देखने में भोंसड़ा, लेकिन चोदने में साली सोलह साल के लौंडिया की चूत जैसी टाईट, वाह, मजा आ गया चोदकर। इतने दिन से खाली देख देख कर मूठ मारता रहा, मैं कितना बड़ा गांडू था।”
“साले चोदू कहीं के, मुझे बरबाद करके मजा आ रहा है मादरचोद। चलो कोई बात नहीं, बरबाद किया तो किया, जबरदस्ती चोदा तो चोदा मगर मजा बड़ा दिया रे प्यारे चुदक्कड़ जी। क्या लंड पाया है सिन्हाजी। मस्त। दिल खुश कर दिया चोदकर।” मैं उसके नंगे बदन से चिपकते हुए बोली।
किसी तरह मना बुझा कर मैंने क्षितिज को इसके लिए तैयार किया कि कम से कम एक बार किसी अन्य स्त्री के साथ हमबिस्तर तो हो। फिर आगे देखा जाएगा। मेरा यह मानना था कि एक बार अगर अन्य स्त्रियों के संसर्ग का मजा चख ले तो खुद ब खुद ढूंढ़ ढूंढ़ कर शिकार करने लगेगा। पहली ऐसी स्त्री ढूंढ़ने का जिम्मा मेरे माथे था। मैंने ढूंढ़ भी लिया। रेखा सिन्हा नाम था उसका, मेरी ही उम्र की। काली थी मगर थी बड़ी खूबसूरत। उसके साथ मेरा परिचय कैसे हुआ, यही मैं पिछली कड़ी में बता रही थी। उसका पति अलोक सिन्हा जो एक नंबर का रंगीला औरतखोर था। अपनी पत्नी के अलावा सारी स्त्रियों पर लार टपकाता रहता था। ऐसे ही करीब साल भर पहले मैं उनकी शिकार बनी। मैं खुद भी उस दिन कुछ अधिक ही वासना की भूख से परेशान थी। कुछ परिस्थिति, कुछ उनका मौके के ताक में रहने की आदत और कुछ खुद मेरा समर्पण, इन सबका मिला जुला फल यह हुआ कि उन्होंने चटखारे ले ले कर मेरे जिस्म का रसपान कर लिया। उस दिन उनके घर में उनके अलावा और कोई नहीं था। ड्राइंग रूम के सोफे पर ही जी भर के मेरे शरीर को रौंदा, नोचा, खसोटा, भंभोड़ा और बुझाया अपनी वासना की भूख। न सिर्फ उसे औरतों का शिकार करना आता था बल्कि संभोग सुख देने की कला में पारंगत भी था। तभी तो उनके भीषण झिंझोड़ निचोड़ के बावजूद मैं सुखद तृप्ति का अनुभव कर रही थी। वासना के उस सैलाब के उतरने के बाद हम दोनों नंग धड़ंग एक दूसरे के तन से चिपके हांफ रहे थे। जब थोड़ी सांस में सांस आई तो मैंने पूछा,
“एक बात पूछूं मेरे चोदूजी?”
“इतनी खूबसूरत पत्नी के रहते आप पराई औरतों को चोदने की फिराक में क्यों रहते हो?”
“उंह, साली काली कलूटी कुतिया का नाम लेकर मूड खराब कर दिया।”
“काली ही ना है, लेकिन खूबसूरत तो है ना।”
“अब उसका जिक्र छोड़ो, मुह कसैला हो गया। मुझे पसंद नहीं तो मैं क्या करूं।”
“अच्छा ये बताओ चोदूजी, आपकी बेरुखी से अगर कहीं आपकी पत्नी आपसे बेवफाई करने लगे तो?”
“वो गांड़ मराए, मेरी बला से। मुझे क्या? अब मूड मत खराब करो मेरी जान, तेरी चूत चोद कर मेरा जन्म सार्थक हो गया। साली भैंस जैसी इतनी बड़ी चूत मैंने जिंदगी में नहीं देखी। इतनी बड़ी मगर साली इतनी चिकनी, गजब है। उससे भी गजब तो यह है कि इतनी बड़ी चूत होने के बावजूद इतनी टाईट! गजब तेरी चूत और गजब तू खुद मां की लौड़ी। अब यही देखो, इस उमर में भी इतनी बड़ी बड़ी चिकनी चूचियां इतनी सख्त कैसे?” मेरे नितंबों पर हाथ फेरते फेरते वे बोले, “तेरी गांड़? गांड़ कुछ कम है क्या? इतनी बड़ी बड़ी, चिकनी, उफ्फ्फ बड़ी जबरदस्त है, जबरदस्त। ऐसी गांड़ भी मैंने जिंदगी में नहीं देखी। साली जभी देखो तभी मेरा लौड़ा फनफना कर अपने आप खड़ा हो जाता है।”
“जो बोलना है साफ साफ बोलिए ना।”
“समझने वाले को इशारा ही काफी है।”
“ओह, तो मेरी गांड़ चोदने का खयाल है मेरे चुदक्कड़ जी को।”
“और क्या।”
“मतलब अब मेरी गांड़ फाड़ने का इरादा है।”
“गलत बात, फाड़ने का नहीं रे पगली, चोदने का।”
“एक ही बात है, आप तो चोदिएगा, लेकिन चुदवाने वाले की तो फटेगी।”
“एक बार ले कर तो देख, मजा न आए तो कहना।”
“ना बाबा ना, मेरी चूत का कचूमर निकाल दिया आपने अब मेरी गांड़ का मलीदा बनाना है क्या?” वे मेरी गांड़ को सहलाते जा रहे थे और बीच बीच में गांड़ की दरार में उंगली भी करते जा रहे थे। मजा आ रहा था मुझे मगर नाटक कर रही थी।
“मलीदा नहीं रे पगली, यह तो खुद ही स्वादिष्ट फालूदा है। चाटने का मन हो रहा है।”
“छि: गंदे”
“मक्खन है मक्खन”
“बात बनाना तो कोई आप से सीखे सिन्हा जी”
“लो, सच कह रहा हूँ। चाटूंगा भी, चोदूंगा भी। देख मेरा लौड़ा कैसे बमक उठा है फिर से।” उन्होंने मेरा हाथ अपने लंड पर रख दिया। वाकई, टन्न टन्न कर रहा था, तप रहा था गरम हो कर। झनझना उठी मैं। पुनः मेरी देह में कामुकता का सैलाब अंगड़ाई लेने लगा। इस बार उन्होंने मुझे पलट दिया, ऐसा पोजीशन लिया कि उनका मुह ठीक मेरे नितंबों पर था और उनका लिंग मेरे हाथ में। “खेल मेरे लंड से रानी, मन करे तो चाट, मन करे तो चूस, आह्ह्ह् हां ऐसे ही” और मैं समर्पित हो गयी। मेरी गुदा को प्रस्तुत कर दिया उनके सम्मुख, खेलने के लिए, चाटने के लिए और और और चोदने के लिए। मैं खुद भी भूखी कुतिया की तरह चाटने लगी, चूसने लगी उनके गधे सरीखे मोटे लिंग को, चपाचप, गपागप। उधर वे भी मेरी गुदा को बड़े प्रेम से चूमने लगे, चाटने लगे, मेरी गुदा के दरार में जीभ फिराने लगे, आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह, फिर मेरे गुदा द्वार में जीभ घुसाने लगे उफ्फ्फ मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, कितना मजा आ रहा था बता नहीं सकती। करीब तीन चार मिनट में ही हम दोनों पागलों की तरह व्यवहार करने लगे। वे मेरी गुदा को मसलते हुए गुदा मार्ग में जीभ घुसा घुसा कर सटासट चाट रहे थे, बीच बीच में मेरे भगांकुर को छेड़ते मेरी उत्तेजना की अग्नि में घी डालते जा रहे थे और मैं उनके नितंबों को कस के दबोचे पूरी शक्ति से उनका पूरा लिंग हलक में उतार कर निगलने का असफल प्रयास करने लगी। बदहवास हो कर अंततः हम दोनों ने पैंतरा बदला और लीजिए, मेरी गुदा के तिया पांचा होने की घड़ी आ पहुंची।
“मान गई, मान गई रे चोदू आपको, उफ्फ्फ पगली कर दिया मादरचोद, आह्ह्ह् अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” बड़बड़ करने लगी।
“आ गया आ गया मेरा लौड़ा्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह आ गया मेरी रानी।” पोजीशन तो सटीक थी, कूद कर टूट पड़ा, सीधा लंड मेरी थरथराती गुदा द्वार में टिका कर सट्ट्टाक से पेल दिया।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह मर गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई रे, फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई मेर्र्र्र्री्ई्ई्ई गां्आं्आं्आं्आंड़।” मेरी दर्दनाक चीख से पूरा कमरा दहल उठा। हलाल होती बकरी की भांती छटपटा उठी।
“चो्ओ्ओ्ओ्ओप्प्प्प्प मां की चूत। फटी नहीं है बुरचोदी। चिल्ला मत कुतिया। देख अब आयेगा मजा।” मेरी कमर को कुत्ते की तरह पकड़ कर दनादन ठोकने लगा, पेलने लगा, चोदने लगा, भच्च भच्च। सच में जंगली कुत्ता बन गया था वह।
“हाय हाय ओह ओह ओह मां, ओह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, उफ्फ्फ।” मेरी चीखों की परवाह किए बगैर पिल पड़ा था वह जालिम, जल्लाद, कसाई की तरह हलाल करने को मुझे, मेरी गांड़ का गूदा निकालने। मेरी पहली चीख सचमुच ही वास्तविक पीड़ा की चीख थी। आंखों से अश्रुधारा बहने लगी थी। बिना जाने खुद को समर्पित कर बैठी ऐसे कसाई के हाथों जिसे मेरी चीखों में आनंद आ रहा था। उत्साहित हो रहा था। लेकिन कुछ पलों के पश्चात वही पीड़ा आनंद देने लगी मुझे। मेरी संकीर्ण गुदा मार्ग हौले हौले ढीली होने लगी और फिर तो कहना ही क्या। उस घर्षण के सुखद आहसास में डूबती चली गयी। चीखें आनंदमय सिसकारियों में तब्दील हो गयींं। “आह इस्स्स्स्स, उफ्फ्फ ओह्ह्ह्ह्ह्ह, आह्ह्ह्, सी्सी्सी्सी्सी।” अपनी गांड़ उछाल उछाल कर चुदवाने लगी, “अहा, मजा, मजा आ रहा है राजा, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे चोदू डार्लिंग, चोद मेरी गांड़, निकाल मेरी गांड़ का गूदा, बना दे इसे फलूदा, आह मादरचोद, ओह बहन के लौड़े,” पागलों की तरह बोल निकलने लगे थे मेरे मुख से।
“आया, आया मजा आखिर मेरी कुतिया को साली रंडी्ई्ई्ई्ई्ई, रो रही थी, चिल्ला रही थी हरामजादी रंडी की चूत। अब बोल आह आह मेरी रानी ओह हुम हुम मजा आह आह हुंं हुंं हुंं आ रहा है कि नहीं हीं हीं हीं।”
“आह आह आ रहा है आ रहा है ओह ओह बहुत बहुत मजा आह आह आह आह आ रहा्आ्आ्आ्आ है राजा ओह आह चोदता रह चोदता रह ओह ओह मेरे चुदक्कड़, ओह मेरे चोदू, ओह मेरे गांड़ के लौड़े, ओह साले चोद मां के लौड़े, ओह मेरे ज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ्आन्न्न्न्नू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ,” चुदती रही मैं, नुचती रही मैं। वे अब वहशीपन पर उतर चुके थे। मेरे कंधों पर दांत गड़ा गड़ा कर लाल कर दिया। पीछे से मेरी चूचियों को दबोच दबोच कर आटे की तरह गूथने लगे। ओह मेरी मां। दर्द, बेहद दर्द, मगर दर्द में मजा, बेहद मजा मिल रहा था मुझे। झिंझोड़ झिंझोड़ कर चोद रहा था, निचोड़ निचोड़ कर चोद रहा था और मैं आनंदित हो रही थी, बेशुमार खुशी प्रदान कर रहा था हरामजादा। करीब बीस मिनट के इस नोच खसोट में मैंने मानो जन्नत की सैर कर ली हो, थरथर कांपती हुई झड़ने लगी मैं, ऐसा लगा मानो मेरा शरीर हल्का फुल्का हो कर हवा में उड़ रहा हो। ऑफिस की थकान के बाद इतनी थकान भरी चुदाई, ताज्जुब था, थकान की जगह हल्के पन का आहसास हो रहा था मुझे। थकान सारी मेरी चूत और गांड़ में घुस गई थी। “ओह मजा आ गया राजा।” मेरे मुह से निकला। बीस मिनट बाद वे स्खलित होकर मुझ पर लद गये। मेरी गांड़ में छरछरा कर वीर्य इतना भर दिया कि मेरी योनि से होता हुआ सोफे को चिपचिपा कर रहा था। मह उसी तरह नंगे बदन एक दूसरे से लिपटे चिपटे करीब दस मिनट तक पड़े रहे।
“वाह, तू तो बहुत बड़ी चुदक्कड़ है री”
“हट, जबरदस्ती चोद कर आपने ही न चुदक्कड़ बनाया मुझे। मैं तो मना कर रही थी।”
“चुप कर बुरचोदी, इतने मजे से चुदवाना और वो भी मेरे इतने मोटे लंड से पहली बार, किसी साधारण औरत के बस की बात नहीं है। जैसी भी है तू मगर मस्त है। कसम से आज से पहले ऐसा मजा कभी नहीं मिला। अब तो बार बार चोदूंगा तुझे कामिनी जी। दोगी न चोदने?”
“हां जी हां रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, मेरे मस्त मस्त चोदू जी।” तृप्ति और खुशी के मिले जुले भाव से उन्हें चूम बैठी। जब मैं वहाँ से निकली, उस वक्त रात साढ़े नौ बज रहा था। उस दिन के बाद हमारा मिलना जुलना बदस्तूर जारी रहा। आपस में घर आना जाना, परिवार वालों से मिलना जुलना चलता रहा। मुझे पता चल गया था कि उनकी पत्नी रेखा सिन्हा जी की बेरुखी झेलते हुए पत्नी धर्म निभाए जा रही है। मुझे इस बात का अंदाजा था कि ऐसी औरतें, जिन्हें परिवार में पति का प्यार, पति से पत्नी सुख नसीब नहीं होता है, प्यार और शारीरिक भूख के लिए आसानी से फंस सकती हैं। हो सकता है कहीं किसी से चक्कर चल भी रहा हो, कौन जानता है। पारीवारिक मेल जोल के चलते रेखा से मेरी घनिष्ठता भी हो गयी थी, यह और बात है कि उसे सिन्हा जी और मेरे बीच के अनैतिक संबंध के बारे मे बिल्कुल भी पता नहीं था। अब मैं योजना बना कर उसे क्षितिज के बिस्तर तक लाने की जुगत में भिड़ गयी, दूसरे ही दिन उसमें सफल भी हो गयी।
मैं वासना की भूखी, आजाद पंछी थी, मेरे लिए किसी एक पुरुष से बंध कर रहना बेहद कष्टकर था। मैंने किसी तरह क्षितिज को अन्य स्त्रियों की ओर ध्यान देने के लिए मना लिया। मेरी नजर रेखा सिन्हा पर केन्द्रित हो गयी। वह बिल्कुल उपयुक्त थी इस कार्य के लिए। उससे मेरा परिचय उनके पति आलोक सिन्हा जी के माध्यम से हुआ था। आलोक सिन्हा जी परस्त्रियों पर लार टपकाने वाले रंगीली तबियत के मालिक थे। एक दिन संयोग से मैं उनके रंगीन स्वभाव की शिकार हो गयी। शिकार क्या हुई, मैं खुद ही जानबूझ कर उन के हत्थे चढ़ी। संयोग, परिस्थिति, उनकी रंगीन मिजाजी और मेरी वासना की भूख, इन सबका परिणाम था कि मैं चुद गयी उनसे। उसके बाद यह सिलसिला चल निकला हम दोनों मिलते रहे, मौज करते रहे, जब मौका मिलता भिड़ जाते थे वासना के खेल में और एक दूसरे की शारीरिक भूख मिटा लिया करते थे। वे कमीने थे तो मैं भी एक नंबर की कमीनी चुदक्कड़ थी। इसी क्रम में एक दूसरे के घर आने जाने का सिलसिला शुरू हुआ। इसी क्रम में रेखा से मेरा परिचय हुआ। परिचय क्या हुआ घुल मिल गये एक दूसरे से और आपस में सहेलियां बन गये थे। उसे सिन्हा जी के साथ मेरे अंतरंग रिश्ते के बारे में पता ही नहीं था। वह अपने काले रंग के कारण पति से उपेक्षा का दंश झेलती पत्नी की भूमिका निभाए जा रही थी, हालांकि उसका चेहरा मोहरा, शारीरिक गठन काफी आकर्षक था। इतना तो निश्चित था कि अपने पति की उपेक्षा के कारण उसे पति के प्यार और शारीरिक सुख से वंचित रहना पड़ रहा था। उसके हाव भाव और बातों में यह झलकता भी था। इसी कारण मेरे लिए उसका शिकार करना बेहद आसान था। उसकी एक बेटी थी जो हॉस्टेल में रह कर कॉलेज की पढ़ाई कर रही थी। यह संयोग ही था कि सिन्हा जी भी एक हफ्ते के ऑफिशियल टूर में थे। स्वर्णिम अवसर था मेरे लिए।
क्षितिज के घर आने के अवसर पर मैंने तीन दिन की छुट्टी ले रखी थी। अभी यह दूसरा दिन था। दूसरे दिन हम दोनों मां बेटे रात भर रंगरेलियां मनाते रहे। तीसरे दिन मैं अपने पूर्व नियोजित योजनानुसार ठीक रेखा के दफ्तर से छुट्टी के समय उसके दफ्तर के सामने अपनी कार खड़ी कर उसका इंतजार कर रही थी। संध्या चार बजे ज्योंही रेखा दफ्तर से बाहर निकली, और सामने ऑटो स्टैंड की ओर बढ़ी, तभी मैंने उसे आवाज दी।
“अरे कामिनी!”
“क्या घर चल रही हो?”
“हां”
“तो आओ ना मेरी कार में, मैं भी घर ही चल रही हूं। ऑफिस में कुछ काम था, हो गया, लौट रही थी तो तुम्हें देख लिया।”
“ओह थैंक गॉड, मैं तो ऑटो देख रही थी।” वह सामने की सीट पर बैठी और हम चल पड़े।
“और सुनाओ, क्या हाल है?”
“हाल क्या रहेगा, वही, घर से ऑफिस और ऑफिस से घर। अभी घर पहुंच के घर का काम। गनीमत है कि सिन्हा जी टूर पर हैं, नहीं तो फिर वही रोज की चखचख” तनिक उदासी की छाया थी उसके चेहरे पर।
“अरे ऐसी ही है हम औरतों की लाईफ, ऑफिस का काम देखो, घर का काम देखो, जुते रहो। अब मुझे ही ले लो, क्षितिज छुट्टी में आया हुआ है और उसके चक्कर में मैं तीन दिनों की छुट्टी ले कर घर बाहर के कामों में ही उलझी हुई हूं।” “ओह, क्षितिज आया हुआ है? क्या हाल है उसका? कितने दिन की छुट्टी है?”
“एक हफ्ते की छुट्टी है। घाटशिला भी जाना है उसे, नाना नानी से मिलने, एक दो दिन रह कर आ जाएगा।”
इसी तरह बातें करते करते हम घर पहुंच गये। मैंने कार अपने घर की गेट के अंद घुसा दिया।
“अरे यह तुम अपने घर क्यों ले आई?”
“आ भी जाओ भई, चाय पीकर चली जाना, वैसे भी अकेली ही तो हो, कौन सी जल्दी है।”
“ओके बाबा, लेकिन जल्दी जाऊंगी, बहुत सारा काम पड़ा है घर में।”
“चली जाना, चली जाना, थोड़ी सांस तो ले लो। घर कहाँ भागा जा रहा है।” कॉलबेल बजाते ही हरिया ने दरवाजा खोला।
मेरे साथ रेखा को देख कर मुस्कुरा कर बोला, “अरे रेखा बिटिया कैसी हो?” पचहत्तर साल का बूढ़ा, इस उम्र में भी पराई स्त्रियों पर लार टपकाता रहता था हरामी। करीब पांच साल पहले तो बुढ़ापे की असमर्थता के कारण चोदना बंद किया था उसने और करीम चाचा नें मुझे, वरना मुझे चोदे बिना उनको चैन ही कहां मिलता था। धीरे धीरे उनकी चोदने की क्षमता घटती गयी और खीझ कर मैं ने ही उन्हें मना करना शुरू कर दिया था। खाली पीली मुझे गरम कर देते और आनन फानन झड़ कर मुझे बीच मझधार में तड़पती छोड़ देते थे कमीने। मेरे द्वारा घास नहीं डालने के बावजूद दूसरी औरतों पर नजरें गड़ाए रहते थे, मौका पाकर अभी भी यहां वहां मुह मारने से बाज नहीं आते थे दोनों। भाड़ में जाएं दोनों, मैंने उन्हें रोकना टोकना भी बंद कर दिया था। रेखा को देख कर वैसी ही मुस्कान थी हरिया के चेहरे पर।
“ठीक हूं अंकल” कहते हुए मेरे साथ अंदर आ गयी।
तभी क्षितिज बैठक में आ गया। “आ गयी मॉम? ओह नमस्ते आंटी।” मैंने आंखों के इशारे से उसे जता दिया कि यही है शिकार। समझ गया वह। “सो्ओ्ओ्ओ्ओ्ओ ब्यूटिफुल, यू आर लुकिंग ग्रेट आंटी। सो्ओ्ओ्ओ्ओ्ओ हॉ्हॉ्हॉट।” रेखा के लिए उसके प्रशंसात्मक शब्द थे और वैसा ही भाव चेहरे पर भी था। सिर्फ बरामूडा और टी शर्ट में था वह, चमक रहा था, खूबसूरत तो था ही। एकाएक उसकी खिलती जवानी और खूबसूरती को देखकर चमत्कृत रह गयी रेखा। उसके शब्दों और हाव भाव की ताब न ला सकी वह।
“चल हट, बड़ा शैतान हो गया है। अपनी आंटी को भी छेड़ने से बाज नहीं आ रहा है बदमाश।” रेखा तनिक शरमा गयी।
“कसम से आंटी, गजब की खूबसूरत हो गयी हैं आप तो। साल भर पहले तो आप ऐसी नहीं थीं। उमर के साथ आपकी खूबसूरती तो निखरती ही जा रही है।”
“हट बदमाश, मारूंगी हां।” लरज उठी रेखा।
“चल अब रेखा को छेड़ना बंद कर क्षितू। शुरू हो गया तू? इंजीनियरिंग कॉलेज जा कर बहुत बात बनाना सीख गया है,” क्षितिज से बोली मैं, फिर रेखा की ओर मुखातिब हो कर बोली, “लेकिन सच ही कहा क्षितिज नें, तू सच मे बेहद खूबसूरत है।”
“ले अब तू भी शुरु हो गयी।” काले रंग के बावजूद चेहरा उसका लाज से सुर्ख हो उठा। उसकी खूबसूरती और निखर गयी उस हालत में।
“अच्छा छोड़ इन सब बातों को और चल पहले हाथ मुंह धो कर फ्रेश हो जा, तबतक चाय आ जाएगी।” कहते हुए मैं उसका हाथ पकड़ कर मेरे बेडरूम में ले आई। क्षितिज वहीं बैठक में रुक गया। रेखा ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। हम दोनों फ्रेश हो कर मेरे बेड पर ही बैठ गये।
“वाऊ रेखा तू तो सचमुच दिन ब दिन और जवान होती जा रही हो।” मैंने उसके तरोताजा चेहरे को प्रशंसात्मक दृष्टि से देखते हुए कहा।
“हट, जवान काहे की, बेकार की बात मत कर।”
“सच कहती हूं, सूरत तो सूरत, तेरी फिगर देख कर तो मुझे जलन होती है।”
“अब तू भी लगी मुझे चिढ़ाने।”
“कसम से, सिन्हा जी तो बड़े किस्मत वाले हैं।”
“फिर बकवास। मुझ काली कलूटी से शादी करके तो वे पछता रहे हैं।” उदासी छा गयी उसके चेहरे पर।
“कैसे आदमी हैं वे? इतनी खूबसूरत पत्नी को पाकर भी कोई पछताता है क्या? तुम काली हो तो क्या हुआ, मुझसे पूछो, कितनी खूबसूरत हो तुम।”
“तुम्हारे मानने से क्या होता है।”
“झूठ नहीं बोल रही हूं मैं। मैं तो फिदा हूं तेरी खूबसूरती पर। काश मैं मर्द होती।”
“मर्द होती तो?”
“इतना प्यार करती, इतना प्यार करती कि…” कहते कहते मैंने उसे बांहों में दबोच लिया और भरपूर चुंबन उसके होंठों पर अंकित कर दिया।
“हट शैतान।” छिटक कर अलग होना चाहती थी वह किंतु मेरी पकड़ काफी मजबूत थी।
“कसम से सच कह रही हूं मैं। यू आर लुकिंग सो््ओओ ब्यूटीफुल, सो्ओ्ओ्ओ्ओ्ओ सेक्सी।” मैं उसे बांहों में भर कर तड़ातड़ उसके होंठों, गालों, आंखों को बेहताशा चूमने लगी। वह छटपटा रही थी लेकिन उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी।
“अरे यह क्या कर रही हो छोड़ो मुझे।” वह छूटने के लिए छटपटा रही थी मगर मेरी शक्ति के आगे बेबस थी। मैं उस पर हावी होती जा रही थी। मेरे चुंबनों से लगता है वह कमजोर होती जा रही थी। उसका विरोध धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगा। उसके विरोध की परवाह किए बगैर मैं ने उसे बिस्तर पर गिरा दिया और उधर मैं अपने चुंबनों से उसे बेहाल करती जा रही थी और इधर मेरा हाथ उसके वक्षस्थल पर रेंगने लगा। उसकी आंखें अधमुंदी हो गयीं। “ओह्ह्ह्ह्ह्ह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, ककककक्य्य्य््आ्आ कर रही हो आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह।” वह बुदबुदा रही थी। मैं खेली खायी वासना की पुतली, सब जानती थी कि स्त्री को वश में कैसे किया जाता है और खास कर रेखा जैसी अतृप्त, पति द्वारा उपेक्षिता स्त्री को वश में करना तो मेरे बांये हाथ का खेल था। उसके कामोत्तेजक अंगों से खेलते हुए मैं उसे मदहोश करना चाहती थी, उसकी कामाग्नि को भड़काना चाहती थी ताकि उसके अंदर दबी हुई वासना की चिंगारी ज्वालामुखी का रूप ले ले, जिसके वशीभूत वह नि:संकोच समर्पण को वाध्य हो जाय और क्षितिज के लिए शिकार करना सरल हो जाय, और मैं देख रही थी कि मेरा प्रयास रंग ला रहा था।
“उफ्फ्फ आह्ह्ह्, ककक्या्आ्आ ककककररररर रही हो तुम आह छछछछोड़ो आह।”
“करने दो रेखा ओह मेरी जान करने दो उफ्फ्फ तेरी खूबसूरती मुझे हमेशा आकर्षित करती रहती है, मुझे प्यार करने दे।”
“ननननहींईंईंईंईं, ओह नननननहींहींईंईंईं, तू औरत है पगली, ऐसे कोई औरत किसी औरत से कहीं प्यार करती है भला।”
“चुप कर, बस अब कुछ न बोल मेरी जान। करने दे मुझे, प्यार करने दे तेरे इस जिस्म को ओह्ह्ह्ह्ह्ह कितनी सख्त है तेरी चूचियां आह्ह्ह्।” उसके उरोजों को दबाती हुई कामोत्तेजक स्वर में बोली मैं। उसकी साड़ी के पल्लू को एक तरफ खिसका कर ब्लाऊज खोलने लगी।
“यह क्ककककक्या कर रही हो?” उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। मैं रुकी नहीं, चूमती रही, ब्लाऊज खोल कर ब्रा के ऊपर से ही उसकी चूचियां दबाने लगी। रहा नहीं जा रहा था मुझसे, खुद मैं भी उत्तेजित हो रही थी। बेसब्री में उसके ब्रा को भी खोल दिया मैंने। उफ्फ, कितनी बड़ी बड़ी चूचियां थी उसकी। कैसी कसी हुई सख्त चूचियां थीं उसकी। रहा नहीं गया तो मैं मुह लगा बैठी उसकी काली काली चिकनी गठी हुई चूचियों पर और लगी चूसने पागलों की तरह।
“आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह ओह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, पागल कहीं की उफ्फ्फ, मुझे भी पागल कर रही हो आह्ह्ह्।”
“हां मैं पागल हो गयी हूं। तू भी पागल हो जा। मैं विधवा, प्यार की भूखी, तू उपेक्षा की मारी प्यार की भूखी, मुझे प्यार करने दे पगली, उफ मेरी जान, जैसा तेरा चेहरा, वैसा तेरा तन और वैसी ही तेरी चूचियां।” चूसती जा रही थी उसकी विशाल गोल गोल चूचियां, चुभलाने लगी मैं खड़ी हो चुकी उसके चचुक। उत्तेजना के मारे अकड़ने लगी वह।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह्,” वह सिसक रही थी। मैं अब उसकी साड़ी के अंदर हाथ डाल चुकी थी। सीधे उसकी पैंटी के ऊपर ही से उसकी योनि का स्पर्श करने लगी। सहलाने लगी। चिहुंक उठी वह ,”उई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, हाय।” पैंटी गीली हो चुकी थी उसकी। चिहुँक जरूर उठी थी वह मगर विरोध करना छोड़ दिया था अब उसने। आनंदित हो रही थी मेरी हरकतों से।
“अब उतार भी दे अपने पूरे कपड़े रेखा डार्लिंग, उफ अब रहा नहीं जा रहा मुझसे। तेरे नंगे बदन की खूबसूरती देखने के लिए मरी जा रही हूं। तेरे नंगे जिस्म से प्यार करने को तड़प रही हूं मैं।” बोलते हुए उसके किसी उत्तर या प्रतिक्रिया का इंतजार किए बगैर मैं ने उसे पूरी तरह नंगी कर दिया।
“उफ्फ्फ पगली क्या कर दिया बेशरम, हाय औरत होकर मुझ औरत को नंगी कर के भला कैसे प्यार करोगी पागल। इस्स्स्स्स्स रे ऐसे तो मर्द करते हैं आह्ह्ह् भगवान” जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी वह। किसी कुशल शिल्पी के द्वारा तराशी गयी मूरत की तरह उसकी काया नें मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था। कमर में कोई बल नहीं था। चरबी का नामोनिशान नहीं था न ही उसके उसके पेट पर न ही कमर में। काली होने के बावजूद चमचमाती उसकी जंघाएँ और चिकने पांव, उफ्फ्फ भगवान ने बड़ी फुरसत से बनाया था उसे। पता नहीं कितने सालों से नहीं चुदी थी, काली होने के बावजूद दपदपा रही थी उसकी योनि किसी 20 – 21 साल की लौंडिया की तरह। पति द्वारा उपेक्षा के फलस्वरूप योनि के रख रखाव का ध्यान नहीं रखने के कारण योनि के ऊपर बेतरतीब घुंघराले झांट अलग ही छटा बिखेर रहे थे। कुछ पलों के लिए तो अपलक देखती रह गयी मैं। फिर अचानक ही मानो मेरी तंद्रा भंग हुई, टूट पड़ी मैं उसपर, पांवों से चूमते हुए उसकी जंघाओं तक पहुची, फिर जंघाओं से होते हुए दप दप करती चिकनी काली चूत पर। थरथरा रही थी वह, कांप रही थी जैसे बुखार चढ़ गया हो। जैसे ही मेरे होंठों का स्पर्श उसकी योनि पर हुआ, “उई्ई्ई्ई्ई्ई अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ,” सिसकारी निकल पड़ी उसकी, छटपटा उठी वह। “आह आग लगा दिया पगली तूने मेरे तन में ओह मां।” अब मैंने उसकी योनि पर अपना ध्यान केंद्रित किया। चूमते चूमत अब चाटने लगी मैं। मेरे दोनों हाथ उसके सख्त उरोजों से खेलने और मसलने में व्यस्त थे। इधर उसकी चूत से झांकता लाल लाल योनिद्वार और रक्तिम उभरा हुआ भगांकुर। पागलों की तरह चाटने लगी, चूसने लगी उसके भगांकुर को। थरथराने लगी वह और “आह््हहँ्ँ्हँ्हँ्हँ्हँइ्ई्ई्ई्ई्ईस्स्स्स्स् अम्म्म्म
म्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्,” एक दीर्घ विश्वास उसके मुख से निकला, स्खलन था वह उसका, पता नहीं कितने सालों बाद, स्वर्गीय स्खलन के सुख में डूबी, मेरे सर को अपनी दोनों जंघाओं से कस लिया और झड़ने लगी। उसकी योनि से निकलते प्रोटीनयुक्त रस को पी गयी मैं। करीब दो मिनट तक उसी स्थिति में रहे हम और रेखा निढाल हो गयी, पैर पसार कर।
जैसे ही वह दीर्घ निश्वास के साथ निढाल हुई और उसकी जंघाओं के बंधन से मुक्त हुई मैं, मेरी सांस में सांस आई और मैं बोली, “उफ्फ्फ, जान ही निकाल दिया था तूने तो।”
“आह्ह् बरसों बाद ऐसा सुख मिला। उफ्फ्फ, जादूगरनी कहीं की। काश तू मर्द होती, चुद गई होती।” वह लाज से दोहरी होती हुई बड़ी मुश्किल से बोली। “तू भी उतार न अपने कपड़े, तेरे नंगे जिस्म से प्यार कर, मैं भी तेरे जिस्म से प्यार करना चाहती हूं।” शरमाते हुए बोली वह।
“वाऊ, गजब, तू तो पूरी कामिनी है। मुझी को खूबसूरत बता रही थी शैतान की बच्ची।” अब वह खुल गयी थी मुझ से। अच्छा ही हुआ, उसकी झिझक खत्म हुई। अब मैं उसे दुबारा गरम करना चाहती थी ताकि मौके पर चौका जड़ने के लिए क्षितिज हाजिर हो जाय। सब कुछ पूर्वनियोजित षड़यंत्र था हम मां बेटे का। नंगी हो कर पुनः लिपट गयी मैं रेखा के नंगे जिस्म से। अब रेखा भी मेरे चुंबन का उत्तर चुंबन से दे रही थी। उसके हाथ भी मेरे जिस्म पर अठखेलियाँ कर रहे थे। हमारी चूचियां आपस में टकरा रही थीं, रगड़ खा रही थीं, घर्षण से उत्पन्न उत्तेजना के मारे वह पुनः जल उठी। मैं खुद जल रही थी। हमारी योनियों का मिलन और योनि का योनि के बीच का घर्षण वासना को और भड़का रहा था। भगनासा से भगनासा का टकराव हमारी उत्तेजना की अग्नि में घी का काम कर रहा था। हम दोनों कमर चला रहे थे ऐसे, मानो औरत और मर्द के बीच संभोग हो रहा हो। एक दूजे के तन में समा जाने की असफल चेष्टा करती रहीं। एक दूसरे की चूचियों को दबोच दबोच कर लाल कल दिया था हम दोनों ने। आखिर थीं तो औरतें ही ना। कब तक, आखिर कब तक चलता यह सब।
“काश तू मर्द होती कामिनी, चुद जाती अभी ही, ओह मेरी जान।” अंततः उसके मुह से यह उद्गार निकला।
“मेरी जगह कोई और होता तब भी चुद जाती क्या?” अपनी सांसों पर काबू पाते हुए मैं बोली।
“उफ्फ्फ, तूने जैसी आग लगाई है मेरे तन में, कोई भी होता चुद जाती।” बदहवासी के आलम में बोल उठी, “कोई भी, कैसा भी मर्द, उफ”
“लौंडा, जवान, बूढ़ा, कोई भी?”
“मर्द रे मर्द कमीनी, ओह लंड वाला कोई भी मर्द साली हरामजादी, आह्ह् लौड़ा वाला, लौंडा, जवान, बूढ़ा कोई भी जो मेरी चूत की आग बुझा दे।” इतनी पागल कर चुकी थी मैं उसे कि उसे कुछ समझ नहीं आ रहाथा कि वह क्या बोल रही थी।
“फिर से सोच ले तू क्या बोल रही है।”
“सोचूं? अब भी सोचूं? चूत में आग लगी है फिर भी सोचूं? सोचने लायक छोड़ा है क्या तूने हरामजादी? समझ नहीं आ रहा है तुझे मां की लौड़ी? चुदना है चुदना, साली मां के चूत की ढक्कन। मेरी चूत में आग लगी है आग।” मेरे बालों को जकड़ कर झिंझोड़ती हुई पागलों की तरह चीखी। मैं समझ गयी लोहा गरम है, कोई भी आकर ठोक सकता है। उसके सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो गयी है। वासना के भूख से बेहाल, बदहवासी के आलम में वह क्या प्रलाप कर रही है शायद उसका आभास भी नहीं था उसको। और लो, तभी, तभी किसी भूत की तरह अकस्मात क्षितिज दरवाजे के अंदर प्रकट हो गया। मैं जानबूझकर दरवाजा उढ़का रखी थी। दरवाजे के बाहर कान लगाकर हमारी सारी बातें सुन रहा था। उपयुक्त अवसर के इंतजार में था और लो, वह उपयुक्त अवसर आ पहुंचा था। एकाएक ऐसी स्थिति की कल्पना भी रेखा ने नहीं की थी शायद। किसी के मन की मुराद इस तरह से पूरी हो तो समझ लो आशातीत ढंग से भगवान ने दिया छप्पर फाड़ के। इक्कीस साल का छ: फुटा खूबसूरत हट्ठा कट्ठा युवक, मानो साक्षात कामदेव का अवतार बन कर प्रकट हुआ हो। हक्की बक्की रह गयी रेखा तो, तन पर चिंदी का भी नामोनिशान नहीं, मादरजात नंगी मेरे मादरजात नंगे जिस्म से चिपकी।
“यह क्या मॉम? ओह्ह्ह्ह्ह्ह आंटी? यह, यह क्या हो रहा है आप दोनों के बीच?” बनावटी आश्चर्य से आंखें फाड़े वह बोला। बनावटी ही तो था उसका आश्चर्य। उसके बरमूडा को विशाल तंबू की शक्ल में तब्दील किया हुआ उसका भीमकाय लिंग बरमूडा के अंदर कितनी देर से छटपटा रहा होगा इसे मुझसे बेहतर कौन जान सकता था भला।
“हाय राम, तू इस तरह अचानक, हमारे कमरे में?” मैं चौंकने और घबराने का नाटक करती हुई नंग धड़ंग अपने कपड़े उठाकर सीधे बाथरूम में घुस गयी। आग तो भड़का चुकी थी रेखा के अंदर कामुकता की। अब रेखा समझे और क्षितिज।
“वाऊ आंटी, गजब की खूबसूरत हैं आप तो। क्या शरीर पाया है आपने।” लार टपकाती नजरों से रेखा को नख शिख देखता हुआ क्षितिज बोला। मैं बाथरूम के अंदर से सुन रही थी सब कुछ। रेखा किंकर्तव्यविमूढ़ बिस्तर पर मादरजात नंगी, कामोत्तेजना की ज्वाला में धधकती पड़ी रही। “लगता है मैं गलत समय में आ गया।” रेखा को भौंचक्की हालत में देख कर बोला वह।
सहसा मानो नींद से जाग उठी वह, “नहीं नहीं, ठीक समय पर आये हो बेटे।” जल्दी से हड़बड़ा कर बोली रेखा, कहीं वापस न लौट जाए वह। उसका शरीर जल रहा था चुदने की चाहत में। मैं लगा चुकी थी आग और अब वह किसी से भी चुदने को मरी जा रही थी। चूत में ज्वाला धधक रही थी।
“ओह आंटी क्या बोल रही हो?”
“ठीक बोल रही हूं बेटे। ठीक समय पर आ गये तुम।”
“तो, तो क्या, तो क्या आपको मेरे इस तरह अचानक आने से वाकई बुरा नहीं लगा?”
“पागल, बुरा क्यों लगेगा? बिल्कुल सही समय पर आये हो।” वासना से ओतप्रोत आवाज थी।
“मगर आप मेरी मॉम के साथ नंगी होकर कर क्या रही थीं?” उसके नंगे जिस्म को खा जाने वाली नजरों से घूरता हुआ बोला।
“बेवकूफ, तू सचमुच जानना चाहता है कि अनजान बन कर मुझे सता रहे हो?”
“सता कहां रहा हूं?”
“देख नहीं रहे हो शैतान, सेक्स कर रहे थे।”
“औरत औरत के बीच सेक्स?”
“मर्द उपलब्ध नहीं रहे तो औरत क्या करे?”
“ओह्ह्ह्ह्ह्ह, तो मॉम क्यों भाग गयी?”
“अपने बेटे के सामने कौन मां नंगी यह सब करेगी बेवकूफ?”
“ओह, ऐसी बात है। तो अब?”
“अब क्या, तू आ गया है ना, अब जल्दी कर, और न तड़पा मुझे।” अपनी टांगें फैला कर अपनी चूत दिखाते हुए बोली। बेकरार हो रही थी चुदने के लिए।
“क्या करूं?” शैतान मजा ले रहा था।
“चोद मुझे हरामी, तब से छेड़ रहा था नादान।” खीझ उठी वह।
“कैसे?”
“ऐसे मां के लौड़े ऐसे।” खीझ कर उठी और झपट पड़ी क्षितिज पर। उसके टी शर्ट को नोच लिया रेखा ने। उसके बरमूडा को, जो इलास्टिक से कमर पर टिका हुआ था खींच कर उतार दिया झटके से रेखा ने। उत्तेजना का पारावार न था रेखा का।
हड़बड़ा ही तो गयी रेखा, जब उसका 8″ लंबा और वैसा ही मोटा लिंग फनफना कर उसके सामने उठक बैठक करने लगा। “बा्आ्आ्आ्आ्आ्आप्प्प्प्प्प् रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आ्आ्आप्प्प्प्प्प्, इत्त्त्त्त््त्त्आ्आ्आ्आ्आ लंबा ््आआ््आआ््आआ और इत्त्त्त्त््त्त्आ्आ्आ्आ्आ मोटा्आ्आ््आआ।”
“क्य इत्त्त्त्ता लंबा और मोटा?”
“लंड रे लंड। तेरा लंड, गधे जैसा लंड।”
“ओह, मेरा लौड़ा? मैं तो समझता था यह नॉर्मल साईज है लंड का।”
“न न न न, तू रहने दे। मरना नहीं है मुझे। मेरी चूत फट जाएगी। तू जा बाबा जा।” सचमुच घबरा गयी थी वह।
“कभी हां कभी ना, क्या आंटी आप भी ना। साफ साफ बोलिए ना।”
“क्या बोलूं मैं। तेरे लंड ने तो डरा ही दिया।”
“आखिर करना क्या है इस लंड से जो आप इतना डर रही हैं?” हाय कितना भोला बन रहा था।
“तुझे पता नहीं है क्या किया जाता है लंड से?” ताज्जुब से बोली रेखा।
“नहीं” अनजान बनता हुआ बोला।
“हाय मेरे भोले बच्चे। चूत में लंड डालकर चोदते हैं रे, चुदाई करते हैं।”
“तो चोदने दीजिए ना।”
“फट जाएगी रे मेरी चूत शैतान।”
“आप मुझे बना रही हैं। इतने साल से चुदाई नहीं हो रही है क्या आपकी? फटी क्या?” ताज्जुब से बोला वह।
“हां फटी, पहली बार फटी।”
“फिर और नहीं चुदी क्या आप?”
“चुदी, कई बार चुदी।”
“क्यों चुदी कई बार?”
“क्योंकि एक बार चुदने के बाद मेरी चूत फट कर बड़ी हो गयी, फिर मजा आने लगा।”
“आप ही बोल रही हैं कि पहली बार फट कर बड़ी हो गयी आपकी चूत फिर मजा आने लगा, तो अभी फिर फटकर थोड़ी और बड़ी हो जाएगी न आपकी चूत, फिर मजा आने लगेगा ना।” बड़ी मासूमियत से बोला वह।
“हां शायद तुम ठीक कह रहे हो। लेकिन तेरा लंड असाधारण रूप से बड़ा है, इसलिए डर रही हूं।”
“तो ठीक है मैं जाता हूं।” मायूसी से बोला।
“हाय मेरे बच्चे, मायूस मत हो। आजा बेटा आजा, चोद ले, फटेगी चूत तो फटने दे, झेल लूंगी मैं। ऐसी आग लगा दी है तेरी मां ने कि मैं जल रही हूं। खुद तो भाग गयी बदमाश और छोड़ गयी मुझे इस जलती आग में झुलसने के लिए।” जल्दी से बोल उठी वह। डर गयी थी कि कहीं आया हुआ इतना मस्त मर्द हाथ से निकल न जाए। दिल ही दिल में खुश हो गया वह। फंस गयी चिड़िया।
“यह हुई न बात। अब आगे क्या करूं?” शरारत पर उतर आया था वह।
“टूट पड़ मां के लौड़े। मुझ पर टूट पड़ मादरचोद। अब यह भी मैं बोलूं कि अपनी बांहों में ले ले हरामी। चोद मुझे, बुझा दे मेरे तन में लगी आग।” बेहद बेकरार हो रही थी साली कुतिया।
“वाह आंटी, बहुत खूब। सोच लीजिए, फट जाएगी आपकी चूत।”
“फटने दे साले कुत्ते।” वासना की आग क्या से क्या बना देती है इन्सान को।
“बहुत दर्द होगा।”
“होने दे कमीने, दर्द होने दे।” वाह, हिम्मत की दाद देती हूं रेखा की, अंधी हो गयी पगली।
“खून निकल आएगा।”
“अबे चोदू, फटेगी मेरी चूत, दर्द होगा मुझे, खून निकलेगी मेरी, तू काहे परेशान हो रहा है। बढ़कर दबोच ले मुझे लौड़े के ढक्कन।” हां विक्षिप्त हो गयी थी अब तक वह।
“मैं कहाँ परेशान हो रहा हूं? मुझे तो आपकी चिंता हो रही है।” अपनी शरारतों से बाज नहीं आ रहा था कमीना।
“मेरी चिंता मेरी चूत में डाल साले नादान चुदक्कड़। टूट पड़ मुझ पर, अब तो मेहरबानी कर मुझ पर बेदर्दी अनाड़ी चोदू। नोच मुझे, खसोट मुझे, भंभोड़ मुझे, रगड़ मुझे, निकाल दे मेरे शरीर की इस जालिम गरमी को, बुझा दे इस धधकती ज्वाला को हरामी।” पागलों की तरह चीख रही थी, इस बात से बेपरवाह कि कोई सुन भी लेगा।
बस और क्या चाहिए था क्षितिज को। बेकरार आमंत्रण का ही तो इंतजार कर रहा था वह। टूट ही तो पड़ा किसी भूखे भेड़िए की तरह। पटक दिया उसे और चढ़ गया उसके ऊपर। दनादन चूमने लगा रेखा के चेहरे को, होंठों को, चूसने लगा होंठों को, चूमने लगा उसकी गर्दन को, उसके सीने के खूबसूरत उभारों को अपने मजबूत पंजों में भर कर बेहताशा मसलने लगा। “आआआ्आआह्ह्ह्ह् ओओ्ओओ््ओओ््हह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ्फ” कामुकता के उस सैलाब में बहती जा रही थी जिस सैलाब के बीच मैं उसे छोड़ आई थी। जिस बर्बरतापूर्ण तरीके से क्षितिज उसकी चूचियां मसल रहा था, कोई और होती चीख चिल्ला रही होती, मगर जिस भयानक वासना की आग में वह झुलस रही थी, उसे यह बर्बरता भी आनंद प्रदान कर रहा था। वह तो भूल ही भूल गयी थी कि मैं बाथरूम में हूं। बाथरूम के दरवाजे को हल्के से खोल कर सारा नजारा देख रही थी मैं और उत्तेजना के मारे मैं खुद अपने हाथों से अपनी चूचियां मसलने लगी। अपनी चूत मसलने लगी।
“ओह माई ब्लैक डायमंड आंटी। आप बेहद खूबसूरत हो” अपनी मजबूत बांहों में दबोचे मसल डालने को तत्पर भूखे भेड़िए की तरह पिल गया था क्षितिज।
“ओह्ह्ह्ह्ह्ह आह्ह् अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, हां हां रे चोदू बेटे, समझती हूं आह, सब समझती हूं तेरी मस्कामारी, ओह रसिया।” पिसती हुई बोली रेखा।
“मस्का नहीं आंटी, सच में।” वह उसकी चूचियों को गूंथता हुआ, उसके पेट की ओर चूमने लगा, उसकी नाभी को चाटने लगा, और फिर नीचे, और नीचे उसकी दपदपाती योनि के ऊपर लंबे लंबे घने झांट तक पहुंचा, उसे भी चाटने लगा, और नीचे उसकी फड़कती चिकनी, किसी नवयौवना की तरह कसी काली काली चूत के ऊपर ज्योंही उसके होंठों का स्पर्श हुआ, तड़प ही तो उठी वह, किसी विक्षिप्त की तरह कमर उचकाने लगी।
“उफ्फ्फ्फ मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, हां हां, आह चाट मेरी चूत आह चूस ओह मेरे पागल बलमा, खा खा, खा ही जा आह रे हरामी, ओह हाय हाय” बेकरारी के वे शब्द, वासना से भरे वे शब्द, क्षितिज जैसे नये नये चुदक्कड़ को तो मानो और उत्साहित कर रहे थे। अपनी जीभ से सटासट चाटने लगा, चपाचप चूसने लगा। ऐसी चूत पहली बार देख रहा था वह। कहां मेरा भैंस जैसे चुद चुद कर फूला हुआ विशाल भोंसड़ा, और कहां रेखा की नयी नकोर कमसिन नवयौवना जैसी छोटी सी चिकनी चमचमाती चूत। काली थी तो क्या हुआ, ऐसी चूत क्षितिज की कल्पना से परे, बेहद खूबसूरत थी। अब उसे समझ आ रहा था कि नयी नयी, अलग अलग नारी, मतलब नयी नयी खूबसूरत नारी तन और खूबसूरत चूत। नया नया अनुभव और नये नये नारी तन से संभोग का नया नया स्वाद।
“उफ्फ्फ्फ आंटी, आपकी चूत तो गजब की खूबसूरत है। आह मेरी जान, इतनी मदमस्त चूत, गजब का स्वाद, चाटने में इतना स्वदिष्ट तो चोदने में कितना मजा आएगा।” पागलों की तरह चाटता हुआ बोला।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह मममममममेरीईईईईईईई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ मैं गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई रे गयी।” थरथराती हुई दूसरी बार झड़ने लगी “इस्स्स्स्स्स्स्स्स्…….” यह उसके अनिर्वचनीय सुख की अभिव्यक्ति थी। निढाल होते हुए उसके तन को छोड़ा नहीं क्षितिज ने और कुत्ते की चाटता हुआ उसके योनि रस को हलक से उतारता चला गया।
“वाह आंटी, वाह, गजब का स्वाद।” उसकी चूचियों को छोड़ कर क्षितिज ने उसके गोल गोल नितंबों को पूरी शक्ति से दबोच कर चाटते हुए प्रशंसात्मक लफ्जों में बोला। लेकिन असली खेल तो अभी बाकी था। रेखा की न जाने कितने सालों से अनचुदी चूत की धज्जियां उड़ने वाला खेल।
काफी देर से किस तरह क्षितिज ने खुद को संभाला हुआ था पता नहीं। कोई और होता तो अबतक रेखा के चूत की तिक्का बोटी करना शुरू कर चुका होता, लेकिन वाह भई वाह, कमाल का नियंत्रण था खुद पर। लेकिन कब तक। क्षितिज की कामुक हरकतों से पुनः बेकल होने लगी रेखा।
“ओके आंटी, चलिए अब तैयार हो जाईए।”
“तैयार ही हूं मां के लौड़े।”
इतना सुनना था कि क्षितिज ने रेखा के दोनों पैरों को उठा कर अपने कंधों पर चढ़ा लिया और अपने भीमकाय लिंग के सुपाड़े को उसकी नयी नकोर चमचमाती चूत के प्रवेश द्वार पर टिका कर मानो युद्ध की घोषणा कर बैठा, “लीजिए, संभालिए अपनी चूत में मेरा लौड़ा।” सिर्फ घोषणा ही नहीं किया, इससे पहले कि रेखा संभल पाती, भच्च से ठोंक भी दिया। “हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्”। इतने सालों से अनचुदी चूत, जो किसी नवयौवना की चूत सरीखी छोटी और संकीर्ण हो चुकी थी, ककड़ी की तरह फट गयी। क्षितिज का लिंग, रेखा की चूत के संकीर्ण मुख को फाड़ता हुआ एक तिहाई अंदर दाखिल हो चुका था।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, मममममर्र्र्र्र्र्र गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई रे ओओओओओओफ्फ्फ्फ, आह।” एक दर्दनाक चीख से पूरा कमरा दहल उठा। एक पल क्षितिज रुका लेकिन अगले ही पल एक और हौलनाक हमला कर बैठा बिना रेखा की चीख की परवाह किए।
“चीखिए आंटी, चिल्लाईए आंटी, मगर अब इतनी देर से तरसते मेरे लौड़े को मिल गयी आह्ह्, इतनी मस्त टाईट चूत मिल गयी ओह्ह्ह्ह्ह्ह, देखिए आधा घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह गया।” भूखे दरिंदे की तरह बेपरवाह आवाज थी उसकी और रेखा बेचारी छटपटा रही थी, कसमसा रही थी उसके जालिम बंधन में किसी परकटी पंछी की तरह।
“हाय्य्य्य्य हाय्य्य्य्य, फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई, ओह्ह्ह्ह्ह्ह जालिम, मार्र डाला रेएएएएएए।” चीखती रही चिल्लाती रही मगर क्षितिज को तो मिल गया था एक नयी कसी हुई चूत का स्वाद। उसकी नग्न देह को बेरहमी से दबोचे घप्प से एक और भीषण प्रहार कर बैठा वह। “आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह बस कर बस कर, निकाल अपना लंड आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मर जाऊंगी बाबा।” वह दर्द से बेहाल तड़प रही थी, किसी हलाल होती हुई बकरी की तरह। तीन चौथाई लंड उसकी चूत को चीरता हुआ दाखिल हो चुका था।
“चीख, और जोर से चीख, चिल्ला, जोर जोर से चिल्ला मेरी चूतमरानी आंटी, ताकि इस घर में सबको पता चल जाए कि एक आंटी चुद रही है अपने बेटे की उम्र के लड़के से। यही चाहती हो आप?” गुर्राहट निकली उसके मुख से। खून का स्वाद जो मिल गया था शेर को।
“ननननननह्ह्ह्हहींईंईंईंई, तू बस कर अब, छोड़ आंआंआंआंआंआ,” रोने लगी वह, आंसू आ गये उसकी आंखों में। हां आवाज अब मद्धिम थी।
“लीजिए, अब बस हो गया, छोड़ रहा हूं। हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्,” एक अंतिम प्रहार, और हो गया रेखा की चूत का काम तमाम। जड़ तक ठोक दिया क्षितिज ने।
“हा्हा्हा्आ्आ्आ्आ्य्य्य्य्य्य्य आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, साली कुतिया कामिनी कहां मर गयी तू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ आह।” मैं जानती थी कि मेरा बेटा किला फतह कर चुका है।
“आ गयी मैं, बोल।” मैं बाथरूम से उसी तरह नंग धड़ंग बाहर आ गई, अपने कपड़े समेटे।
“ओह मॉम यू आर ग्रेट। आंटी बड़ी मस्त है।” मुझे देख कर क्षितिज खुशी के मारे बोला।
“साले मां बेटे एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह, मुझे फंसा कर अपने बेटे से मरवा रही है आआआआ््ह््ह््हह्हह।” अब उसे सब समझ आ गया था। लेकिन चिड़िया तो खेत चुग गयी थी।
“समझ गयी ना। चलो अच्छा हुआ, अब चुद जा मेरे बेटे से। बोल रही थी न कोई भी मर्द, कैसा भी मर्द। मिल गया मर्द, तो रो काहे रही है साली बुरचोदी।” मैं कोई रहम दिखाने थोड़ी आई थी। मैं तो तमाशा देखना चाहती थी। मुझे मालूम था कि कुछ ही देर में रेखा दर्द भूल कर खूब मजे से चुदवाने लगेगी।
“आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह, मैंने मर्द बोला था हरामजादी, गधा नहीं। ओह मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” तड़प कर चीखी वह मुझ पर।
“जो समझना है समझ तू। क्षितिज बेटा, अब यह तेरे हवाले।” बोलती हुई मैं निकलने लगी।
“आप जा कहां रही हो मॉम? देख तो लो अपने बेटे की करामात।” तुरंत क्षितिज बोला।
“अब भाग कहां रही है कुतिया मुझे इस हाल में छोड़ कर? मर रही हूं रे हरामजादी, बाआआआआआआआप रेएएएएएए बाआआआआआप, अपने पागल कुत्ते को मुझे भंभोड़ने के लिए भिड़ा कर आह आह्ह् भागी कहां जा रही है साली बुरचोदी। रोक अपने लौंडे को, ओह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” रेखा कलपती हुई बोली।
“ठीक है बाबा ठीक है, नहीं जाती, मगर रोक भी तो नहीं सकती ना, तेरी ऐसी खूबसूरत नंगी देह को देख कर कोई भी पगला जाएगा, फिर यह तो ठहरा नया नया चुदक्कड़” बैठ गयी वैसी ही नंग धड़ंग बेशरम हो कर सामने कुर्सी पर, “अब रोना धोना बंद कर, हो गया तेरी इतने सालों से अनचुदी चूत का रास्ता साफ। कुछ देर सब्र कर पगली, फिर देख चुदाई का मजा।” मैं रेखा की हालत देख कर तनिक द्रवित हो उठी।
“लेकिन मॉम, रेखा आंंटी तो ऐसे रो चिल्ला रही है कि मैं इनको हलाल कर रहा हूं।”
” क्षितिज बेटे, न जाने कितने सालों से चुदी नहीं है बेचारी, थोड़ा आराम से चोद। कुछ ही देर में सब ठीक हो जाएगा। एक तो इसकी इतनी छोटी, नयी लौंडिया जैसी चूत, और ऊपर से तेरा यह गधे जैसा आठ इंच का लंबा मोटा लंड, शायद पहली बार ऐसे लंड से पाला पड़ा है, चिंता न कर, कुछ ही देर में सब ठीक हो जाएगा। फिर देखना यह खुद बोलने लगेगी, चोद राजा चोद।” मैं उसे आश्वस्त करती हुई बोली। “तू भी तो ठहरा एक नंबर का अनाड़ी, पहली बार में ही कोई ऐसा चोदता है क्या ऐसी किसी कमसिन चूत को? थोड़ा प्यार से बेटा, आराम से।” यह एक प्रकार से क्षितिज का प्रशिक्षण भी था।
“ठी है मॉम ठीक है” कुछ देर क्षितिज उसी स्थिति में स्थिर रहा, उसका पूरा आठ इंच का लंड रेखा की चूत के अंदर पैबस्त था। रेखा भी अबतक समझ गयी थी कि मेरे सामने भी उसका रोना कलपना कुछ काम नहीं आ रहा है, उल्टे मेरी रुचि अपने बेटे को चोदने का प्रशिक्षण देने में है। वह यह भी समझ गयी थी कि यह सब हम मां बेटे का पूर्वनियोजित षड़यंत्र है, जिसमें वह फंस गयी है। उसे इस बात का भी अवश्य ताज्जुब हो रहा था कि मैं कितनी बेशरम मां हूं जो खुद नंगे बदन रहते हुए पूरी बेशरमी के साथ न सिर्फ बेटे की चुदाई देख रही थी बल्कि उसे निर्देश भी दे रही थी। क्षितिज हौले हौले लंड बाहर निकालने लगा, आराम से, बिल्कुल आराम से।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” क्षितिज और रेखा, दोनों के मुख से सिसकारी निकली, जहां क्षितिज के मुख से आनंद की वहीं रेखा के मुख से राहत की। “चूस रही है मॉम चूस रही है, रेखा आंटी की चूत चूस रही है मेरा लौड़ा, आह्ह्ह्।”
“चूसेगी बेटा चूसेगी, टाईट चूत जो है। अब कैसा लग रहा है रेखा बोल?” मैं बोली।
“आआआआआह्ह्ह्ह्ह, अच्च्च्च्छ्छ्छा्आ्आ्आ, बहू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत अच्च्च्च्छ्छ्छा्आ्आ्आ।” एक दीर्घ निश्वास के साथ बोल उठी। क्षितिज अपने लंड के सुपाड़े को चूत के अंदर ही रहने दिया और कुछ पल स्थिर रहा। पुनः दबाव देने लगा अपने लंड का, हौले हौले, प्यार से, आराम से। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ई्ई्ई्ई्ईस्स्स्स्स्स” इस बार फिर रेखा सिसकी, लेकिन यह सिर्फ पीड़ा की नहीं थी, आनंद मिश्रित पीड़ा की सिसकी थी यह।
“आआआआआह्ह्ह्ह्ह, आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, उफ्फ्फ्फ आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, अब मत रोना, आह, अब मत चीखना।” कहकर चूमने लगा रेखा को, उसके रसीले होंठों को, उसके गालों को। रेखा अब दर्द पीड़ा सब भूलती जा रही थी। धीरे धीरे पूरा लंड डाल दिया क्षितिज नें।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” यह आह थी रेखा की, रेखा की आनंदय स्वीकृति की। क्षितिज ने फिर निकाला लंड और “फच्च्चा्आ्आ्आक” फिर भोंक दिया, “हू्ऊ्ऊ्ऊम्म्म्म।” “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” आनंद की सिसकारी रेखा के मुख से। ठीक हो रहा था, ठीक हो गया था, हमारी योजना कामयाबी के अंतिम चरण में थी। अब क्षितिज सहज हो कर पहले धीरे धीरे, फिर ठोकने की रफ्तार बढ़ाने लगा। रेखा भी अब मस्ती में आने लगी, सारी पीड़ा छूमंतर हो गयी थी उसकी, चूतड़ उछालने लगी। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह क्षितू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ बेटा्आ्आ्आ, ओह्ह्ह्ह्ह्ह चोदू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ, ओह्ह्ह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” मस्त हो गयी चुदने में और मेरे बेटे की तो मानो निकल पड़ी, खुश, मगन, चुदाई की गाड़ी चल पड़ी, सरपट दौड़ने लगी, निर्बाध, बेलगाम। शुरू हो गया वासना का वीभत्स तांडव।
वही रेखा जो कुछ समय पहले रो रही थी चिल्ला रही थी, अब क्षितिज के गठे हुए नंगे तन के नीचे पिसती हुई, छिपकली की तरह चिपकी हुई, अपनी चूतड़ उछाल उछाल कर गपागप, सटासट, चूत में पूरे आठ इंच का गधे जैसे लंड को खाती जा रही थी, चुदती जा रही थी। “ओह राजा आह राजा, उफ्फ्फ्फ बेटा, चोद हरामी चोद, अपने लौड़े की रानी बना ले मुझे आह चोदू ओह मेरी चूत के स्वामी आह।” बड़बड़ाती जा रही थी।
“ओह आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, उफ्फ्फ्फ आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, मस्त आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह क्या मस्त टाईट चूत है आपकी, ओह मेरी जा्आ्आ्आ्आन, मजा आ रहा है ओह आंंटी कहां थी आज तक आह। ओह मॉम, ऐसी मस्त चुदक्कड़ आंटी के लिए थैंक्स, आह ओह मॉम, यू आर ग्रेट, ओह मेरी बुरचोदी आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, चूतमरानी आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई,” क्षितिज भी मस्ती में भर कर चोदे जा रहा था। निचोड़े जा रहा था।
मैं खुश हो गयी। मेरी योजना सफल हो गयी। मैं उस घमासान चुदाई की दर्शक, मेरी क्या हालत हो रही थी बता नहीं सकती। मेरा एक हाथ मेरी चूचियां मसल रहा था, दूसरा हाथ मेरी चूत। मैं अपने पैर फैला कर पूरी बेशरमी के साथ अपनी योनि पर उंगली फिरा रही थी, योनि रगड़ रही थी, भगांकुर को मसल रही थी, अपनी उंगली योनि के अंदर डाल डाल कर हस्तमैथुन के आनंद में डूबी जा रही थी। भीषण चुदास के मारे मरी जा रही थी। उधर क्षितिज अब बिल्कुल पागल हो गया था। रेखा भी पगला गयी थी। एक दूसरे से गुत्थमगुत्थी हो कर जंगलियों की तरह एक दूसरे को नोच खसोट रहे थे। चूम रहे थे काट रहे थे। पलंग चरमरा रहा था, धमाधम कुटाई चल रही थी। वासना के सैलाब में बहते आपस में कामोत्तेजक शब्दों और बेहद गंदी गंदी गालियों की मानो प्रतियोगिता चल रही हो। करीब आधे घंटे की घमासान चुदाई चलती रही और अंततः एक दूसरे को भींचे स्खलन के स्वर्गीय सुख में खो गये।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह, इस्स्स्स्स्स आं्आं्आंह्ह्ह्ह गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई रेएएएएएए गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई मैं्मैं्ऐं्ऐं्ऐं्ऐं” रेखा क्षितिज की बांहों में पिसती हुई लंबी सुखमय चीख के साथ थरथरा उठी और झड़ कर निढाल हो गयी।
उसके निढाल होते हुए नग्न शरीर को क्षितिज ने भंभोड़ना जारी रखा, “ओह आह आह आह, ओह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह, ले, और ले, मां की लौड़ी ले बुरचोदी, आह मेरी चूतमरानी आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई”।” एक मिनट बाद ही क्षितिज भी छर्र छर्र झड़ने लगा। पूरी शक्ति से रेखा के तन को दबोच कर खल्लास हो गया और निढाल एक तरफ लुढ़क गया।
तभी, और तभी अचानक भड़ाक से मेरे कमरे का द्वार खुला। दरवाजे पर हरिया और करीम घबराए हुए, बदहवास खड़े थे। अंदर का दृश्य देख कर उनकी आंखें फटी की फटी रह गयीं। इधर हम सब भौंचक, इस आकस्मिक उत्पन्न परिस्थिति में, यथास्थिति अपने स्थान पर मूर्ति बन गये थे।
“हां चुदाई चल रही है, तो?” घबराने या शरमाने की बजाए हरिया की ओर बेशरमी से देखती हुई बोली। फिर क्षितिज की ओर देखते हुए बोली, “बेटे तू टेंशन न ले। चोद लिया न एक बार? मजा आया न? तू परवाह न कर इनकी, मजा लेता रह और रेखा रानी, इस तरह आश्चर्य से न देख मुझे। एक नंबर की चुदक्कड़ हूं मैं। सॉरी कि मैंने तुमसे झूठ बोला। झूठ न बोलती तो क्या करती। ऐसे तुम मेरे सामने खुल कर अपनी भावना रख पाती क्या? अब तू बता, मजा आया कि नहीं?”
“हाय दैया, इन्होंने हमें इस हालत में देख लिया, उफ मां।” शरम से पानी पानी होती हुई झपट कर बिस्तर से उठने लगी।
“पड़ी रह बुरचोदी। वहीं पड़ी रह। इन हरामियों को तो मैं देखती हूं। तू बता, मजा आया कि नहीं?” मैं बोली।
“छि: छिनाल कहीं की, इनके सामने इतनी बेशरमी से पूछ रही है, मजा आ गया कि नहीं।” रेखा बिस्तर से उठ कर अपने कपड़ों की ओर झपटी।
“हा हा हा हा, हमने देख भी लिया और सुन भी लिया। अब काहे की शरम रेखा बिटिया।” कामुक नजरों से रेखा की नग्न देह को घूरते हुए हरिया बोला।
“सुन लिया तूने? ये हैं हमारे घर के बेशरम बुजुर्ग। इनके सामने शरम लिहाज का कोई मतलब नहीं है। बेहतर है, लगी रह इनकी परवाह किए बगैर क्षितिज के साथ मस्ती करने में।” मैं बोली।
“लेकिन, लेकिन…..”
“क्या? क्या लेकिन वेकिन। कोई फर्क नहीं पड़ता है मेरी रेखा रानी। ये भी एक नंबर के औरतखोर हैं।” थोड़ी आश्वस्त हुई वह। “अब बता, मजा आया कि नहीं क्षितिज से चुद कर?”
“हाय राम, कैसे पूछ रही है हरामजादी? मजा काहे नहीं आयेगा भला। एक नंबर का चुदक्कड़ बेटा पाया है तूने तो। खुश कर दिया। सालों बाद ऐसी खुशी मिली है।” अब भी लाज के मारे पानी पानी हो रही थी।
“तो फिर भागी कहां जा रही है? जा बिस्तर पर। जितना मजा लेना है ले बिंदास। इन बुड्ढों को तो मैं देखती हूं।” मैं तुरंत बोली।
“लेकिन मॉम” क्षितिज कुछ बोलना चाहता था। इस अटपटे परिस्थिति में वह भी झिझक रहा था।
“बेटे तू लगा रह तेरी रेखा आंटी के साथ। मजे कर, बेशरम हो जा, ऐसे ठरकी खूसट बूढ़ों से तो मैं निपटती हूं।”
” लेकिन तू इन बूढ़े हरिया और करीम के साथ यह क्या करने जा रही है?” रेखा बोली।
“रेखा रानी, ये केवल देखने में बूढ़े हैं। हैं एक नंबर के औरतखोर चुदक्कड़। सारे मर्द, खास कर हमारे घर के, ऐसे ही हैं। ज्यादा न ही सुन तो अच्छा है। रेखा तू तो बस मजे ले क्षितिज से, चुदती रह, सारी कसर निकाल ले इतने सालों के उपवास परहेज का। मैं देखती हूं इन मां के लौड़ों को।” खीझ कर मैं बोली। आनंद में विघ्न की खिन्नता झलक रही थी मेरे शब्दों में।
“लेकिन मॉम इनके सामने?”
“तू मजे लेता रह बालक, बेहिचक खेलता रह, खुला खेल फरुक्काबादी मेरे बच्चे।” क्षितिज से बोली मैं और हरिया और करीम की ओर मुखातिब हो कर बोली, “हां आपलोगों ने तो देख ही लिया क्या हो रहा है यहां। अब खड़े खड़े सोच क्या रहे हैं? या तो जाईए यहां से, या अंदर आ कर दरवाजा बंद कर लीजिए। वहां खड़े मत रहिए।”
“साली हरामजादी रंडी, बेशरम खुद नंगी हो कर अपने बेटे को चोदना सिखा रही है मां की लौड़ी और खुद बेशर्मी के साथ देख भी रही है बेटे का चोदना अपनी आंखों से छिनाल। लाज शरम नाम का तो जमाना ही नहीं रहा।” हरिया बोला।
“ओह रे ओ शरीफों के लौड़ों, ज्यादा शरीफ बनने की जरूरत नहीं है। हां मैं अपने बेटे और रेखा की चुदाई का आनंद ले रही हूं हरामियों। हां बेशरम हूं मैं, रंडी हूं मैं, आप लोगों की वजह से मादरचोदों। मेरी शरम हया तो घुस गयी है मेरे भोंसड़े में, सिर्फ, और सिर्फ आप लोगों के और आप लोगों जैसे कमीने, बेगैरत, बेशरम मर्दों के काले करतूतों की वजह से। साले मादरचोद कुत्तों, पचास साठ साल की उम्र में मुझ सोलह सत्रह साल की लड़की को चोद चोद कर वासना की गुलाम बनाते वक्त शरम लिहाज क्या तुम लोगों की गांड़ में घुस गयी थी? बड़े आये लिहाज सिखाने। साले, जिसने मेरी नानी को चोदा, मेरी मां को चोद कर मुझे पैदा किया और मुझे, अपनी सगी बेटी को, चोदने में जरा भी आगा पीछा नहीं सोचा और अब देख लो, देख रहे हो ना, तुमलोगों द्वारा बनाई गयी छिनाल के सुपुत्र को, यह भी तु्म्हीं लोगों के सम्मिलित चुदाई का ही तो प्रतिफल है। यह मेरी ही सीख का नतीजा है कि इतने दिनों तक यह लड़कियों से दूर रहता था। दो दिन पहले तक इसे कोई और लड़की पसंद ही नहीं थी। शायद मेरे अत्यधिक प्यार का नतीजा था कि यह मुझी पर मरा जा रहा था। नतीजा यह हुआ कि दो दिन पहले मुझी को चोद दिया, और मैं भी पुत्र मोह और वासना के सैलाब में बहती चुदवाती चली गयी इससे। हां अपने बेटे से चुद गयी मैं। बेटे की प्यार भरी जिद के आगे झुक गयी। यह पागल तो मेरे अलावा किसी और स्त्री की ओर आंख उठा कर देखना भी पसंद नहीं करता था। एक बार हो गया, दो बार हो गया, पसंद होते हुए भी, प्यार होते हुए भी, आखिर कब तक चुदती रहती अपने ही बेटे से। आखिर समाज नाम की भी कोई चीज है कि नहीं?” मैं बिना रुके बोलती जा रही थी।
“समाज? साली कुतिया, इतनी गंदे पारिवारिक माहौल में वासना के दलदल में आकंठ डूबी, समाज का कब से लिहाज करने लगी रे तू।” रेखा बोल उठी। चकित थी मेरे रहस्योद्घाटन से। घृणा नहीं थी मेरे प्रति उसके शब्दों में। यही हाल क्षितिज का भी था। वह भी विस्मय से मुझे देख रहा था, सुन रहा था।
“लिहाज करना पड़ता है रेखा, करना पड़ता है, वरना इस समाज के तथाकथित सभ्य लोग हमें जीते जी मार देंगे। तुम दोनों इस तरह दीदे फाड़ कर मत देखो मुझे। आज मैं जो भी हूं, जैसी भी हूं, खुश हूं। मैं चाहती हूं कि तुम लोग भी अपने मन मुताबिक जीवन जीना और जीने का आनंद लेना सीख लो, शरीफों का चोला ओढ़े।” फिर हरिया और करीम की ओर मुखातिब हो कर बोली, “हां तो, क्या कह रहे थे आप लोग मां के लौड़ों? बेशरम हूं मैं? हां बेशरम हूं। नंगी हूं मैं? हां नंगी हूं मैं। और कुछ कहना है?” बोलती बंद हो गयी उन दोनों की। लेकिन मैं बोलती चली गयी, “अभी इस वक्त देख रहे हो मेरी हालत? जल रही हूं मैं, हवस की आग में। चुदाई के भूख की भीषण आग लगी है मेरे तन में। मरी जा रही हूं मैं वासना की आग में। अगर अभी भी आपलोगों का लंड खड़ा होता हो और चोदने की मनोकामना है, तो आ जाओ आपलोग मुझे चोदने और बुझा डालो मेरे तन के अंदर धधकती वासना की आग को।” कामुकता की आग में जलती हुई बोली मैं। किसी बेहया रंडी की तरह नंग धड़ंग खड़ी हो गयी।
“आते हैं साली कुतिया, हम भी आते हैं, कुछ ज्यादा ही बोल गयी हमारे बारे में। हम तो हैं ही एक नंबर के चुदक्कड़। चोदने के लिए आज तक हमने कभी औरतों में कोई फर्क नहीं किया। अब चाहे हमें गाली दो चाहे कुछ भी कहो। हरिया के बारे में तो बहुत बोल गयी तुम। अपने दादाजी, बड़े दादाजी, नानाजी, पंडित जी, हब्शी बॉस, सरदार जी और न जाने किन किन मर्दों के लंड खा चुकी हो, उनके बारे में भी तो बताओ अपने बेटे और रेखा को।” अब तक चुप खामोश करीम बोला।
“हां हां बोलूंगी। सब कुछ बताऊंगी। शर्म किस बात की। मेरी नादानी का फायदा उठा कर मुझे कामुकता की भट्ठी में झोंकने वाले मेरे खुद के बुजुर्गों को शर्म नहीं आई तो मैं क्यों शरमाऊं? साठ पैंसठ साल के मेरे नाना जी, दादाजी, बड़े दादा जी और तुम जैसे औरतखोर लोगों नें ही तो मुझे सोलह सत्रह साल की नादान उम्र में ही नोच खसोट कर, खींच तान कर, चोद चोद कर समय से पहले ही औरत बना दिया। अपनी हमउम्र सहेलियों के संग खेलने, मस्ती करने की कच्ची उम्र में ही मुझे चुदाई के आनंद से परिचित करा दिया तुम हरामियों ने। कभी न बुझने वाली आग भर दी मेरे अंदर वासना की। धधकती रहती हूं, जलती रहती हूं मैं अंदर ही अंदर। फिर भी मुझे अब कोई मलाल नहीं है कि उस नादान उम्र में मेरा शील भंग किया एक बूढ़े ने, अब मैं अपनी इसी अवस्था में खुश हूं।”
“क्या? तुझे सचमुच कोई दुख नहीं है उस बात का कि एक बूढ़े नें तेरा शील भंग किया?” करीम बोला।
“बिल्कुल नहीं। नादान जरूर थी लेकिन मां बाप के तिरस्कार का दंश झेलने वाली मुझ लड़की को खुशी प्राप्त करने का एक मार्ग तो मिला।” मैं बोली। “मेरे अंदर वासना की भट्ठी सुलगा कर बूढ़े तो मर खप गये लेकिन चुदाई को ले कर मेरे मन में अपने पराये का भेद मिटा कर एक प्रकार से अच्छा ही किया। आखिर मेरे मां बाप भी कौन से दूध के धुले थे। बाप गांडू मिला। मां मिली एक नंबर की छिनाल, जो हरिया से लेकर नानाजी, दादाजी और न जाने किस किस से चुदवाती रही। आखिर उन्हीं का खून तो दौड़ रहा है ना मेरी रगों में। उस कमसिन उम्र में पुरुष संसर्ग के सुख से परिचित क्या हुई, फिसलती ही चली गयी और वासना की धधकती ज्वाला ने मुझे आज यहां ला खड़ा कर दिया है। अब तो ले दे कर उन चुदक्कड़ों में से तुम दोनों बूढ़े ही बचे हो। अब जब अपनी धधकती वासना की आग को तुम बूढ़े लोग भी नजरअंदाज करोगे तो मैं क्या करूं बताओ? खोजूंगी न कहीं और, तुम जैसे मर्दों की कमी है क्या इस दुनिया में? हां हां चुदी हूं। बहुत सारे मर्दों से चुदी हूं। अपने तन की जलन मिटाने के लिए खुद अपनी खुशी से उस टैक्सी ड्राईवर रहीम से चुदी, जो हमें शॉपिंग के लिए लेकर गया था और शहर घुमाया था। बस में दादाजी, बड़े दादाजी और नानाजी, जिन्होंने मुझ कमसिन कली को मसल कर फूल बना डाला था, उस वक्त हिजड़े बने बैठे रहे जब उनकी उपस्थिति सरदारजी नें मुझे ब्लैकमेल करके चोदा और वे असहाय देखते रहे, उसके साथ साथ बस के बदशक्ल गंदे कंडक्टर नें भी चोद लिया। सरदारजी ने ब्लैकमेल करके अपने बॉस हब्शी से चुदवाया। अपने तन की हवस मिटाने के लिए तुम लोगों के सामने ही, तुम लोगों की रजामंदी से ही उस काले कलूटे भैंस पंडित जी से चुदी। जिस ऑफिस में मैं आज प्रबंधक के रूप में कार्यरत हूं, उसमें उसी हब्शी नें उस वक्त मुझे काम दिया, जब मैं अपने पैरों पर खड़े होने के लिए संघर्ष कर रही थी। मैं अहसानमंद, उस काले कलूटे मुस्टंडे हब्शी बॉस से न जाने कितनी बार चुदी। अपने ऑफिस के क्लाईंट्स से अनुबंध प्राप्त करने के लिए, उनकी गंदी कामेच्छाओं को पूरा करने के लिए न जाने कितनी बार वाध्य हुई और चुदी, कई बार चुदी। कुछ क्लाईंट्स की घटिया, विकृत सेक्स को भी झेलने को वाध्य हुई। सुन लिया? तुम ठरकी लोगों की काम वासना की भूख नें मुझे कहां से कहां पहुंचा दिया। और भी कुछ सुनना है? बड़े आए हैं मुझे शराफत का पाठ पढ़ाने।” वासना की आग में झुलसती, कमरे के अंदर चल रही कामुकतापूर्ण खेल के मध्य व्यवधान की खीझ और अपने ऊपर इन बूढ़ों के आक्षेप से उपजे क्रोध के आवेश में मैं क्या बोल रही थी पता ही नहीं चला मुझे। उस आवेश के पलों में सब कुछ तो उगल दिया था अपने बारे में। अचंभित और आवाक, स्तब्ध रह गये, क्षितिज और रेखा मेरी इन बातोंं को सुन कर।
“ओह मॉम, इतना कुछ झेला आपने।” क्षितिज उसी तरह नंग धड़ंग बिस्तर से उठ कर मेरे पास आया और मेरी नग्न देह को बांहों में भर लिया। उन सबके समक्ष हम मां बेटे आलिंगनबद्ध हो गये, इस बात से बेपरवाह कि वहां उपस्थित बाकी लोग क्या सोच रहे होंगे। रेखा सन्न थी, यह सब सुन कर। ऐसी भी जिंदगी किसी स्त्री की हो सकती है, उसकी कल्पना से परे थी।
“ओह कामिनी, मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या कहूं।” रेखा बोली।
“कहने सुनने की और कुछ सोचने की आवश्यकता नहीं रे रेखा रानी। मैंने कहा न कि मै अपनी इस जीवनशैली से खुश हूंं। मैं अब जानती हूं कि हर आदमी को अपने ढंग से जीने की कोशिश करनी चाहिए। अपने शर्तों पर, अपनी मर्जी से, स्वतंत्रता के साथ, जीवन का पूरा मजा लेते हुए, बस केवल इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे किसी भी कृत्य से किसी और का नुकसान न हो। अब तू अपनी ही बात ले ले, तेरा पति तुझ जैसी खूबसूरत औरत को छोड़ कर यहां वहां मुह मारता फिर रहा है और तू घुट घुट कर जीने को वाध्य है। ऐसा क्यों? अगर उसे परस्त्रीगमन में कोई झिझक या मलाल नहीं है तो तुझे क्यों हो? तू भी तो मानव है। तेरी भी इच्छाएं हैं, शारीरिक जरुरत है। तू क्यों घुट घुट कर जिए? मौज कर पगली, तू भी ऐश कर, मर्दों की कमी नहीं है इस दुनिया में।”
“सच कहा तूने। देख, सच में आज इतने सालों बाद क्षितिज से चुदते हुए मैंने मानो जीवन के एक अनोखे सुख का अनुभव किया। मुझे सुखद जीवन जीने का एक नया मार्ग तूने दिखा दिया। थैंक्स कामिनी और थैंक्स मेरे चोदू बेटे क्षितिज।” वह भी नंग धड़ंग बिस्तर से उठी और हरिया व करीम की उपस्थिति की परवाह किए बगैर आ कर मुझसे लिपट गयी। क्षितिज, मैं और रेखा, नंगे ही एक दूसरे से चिपक गये थे।
“थैंक्स किस बात की रे बुरचोदी? क्षितिज को चोदने के लिए एक स्त्री चाहिए थी और तुझे चुदने के लिए एक मर्द। तुझे मजा आया न पगली? कैसे रो चिल्ला रही थी साली कुतिया।”
“हां री हां मेरी कम्मो रानी, मजा आया, मगर इस क्षितिज के गधे सरीखे लौड़े नें तो पहले पहल रुला ही दिया था। मेरी चूत फाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ा था कमीने चोदू ने।”
“और तू रे चोदू बेटे? तू बता, कैसा लगा रेखा को चोदकर? कैसा लगा मेरा आईडिया? मजा आया कि नहीं?”
“आया मॉम, बहुत मजा आया। रेखा आंटी तो पूरी रसगुल्ला है। ओह मॉम, कमाल की खोज है आपकी। यू आर रीयली ग्रेट।” मुझे चूम लिया।
“बस, इसी तरह न जाने और कितनी लड़कियां, महिलाएं तेरे जैसे खूबसूरत गबरू जवान की बांहों में समा जाने को आतुर होंगी। जरा नजर उठा कर देखने की जरूरत है तुझे। समझा कि नहीं मेरे नादान बेटे?” मैं बेझिझक अपने बेटे को प्रोत्साहित कर रही थी बिंदास, अपना शिकार खुद खोज खोज कर शिकार करने के लिए।
“समझ गया मॉम सब समझ गया।”
“वाह, मेरा बेटा समझदार हो गया।” मैं लाड़ से उसके गाल पर थपकी देती हुई बोली।
“चलो ठीक है, हम सबके चरित्र का पर्दाफाश हो गया। सब के सब नंगे हो गये। एक यही कसर बाकी थी तुम्हारी अपने बेटे से चुदने की, वह भी हो गया। अपने बेटे को भी ले आई इस हमाम में, जहां हम सभी नंगे हैं। चलो अच्छा ही हुआ, कोई पर्दा नहीं रहा अब हमारे बीच। क्षितिज बेटे, सुन लिया न सब कुछ?” करीम नें कहा।
“हां नानाजी, सुन भी लिया, समझ भी लिया सब कुछ। सब एक से बढ़ कर एक हैं इस घर में।”
“और तू रेखा रानी, क्या ख्याल है तुम्हारा इस घर के लोगों के बारे में?”
“क्या कहूं मैं? ऐसी स्थिति की कल्पना भी मैंने नहीं की थी। अब सोच रही हूं, जो हुआ अच्छा ही हुआ। आप लोगों की बातें सुनकर मुझे अच्छा ही लगा। कामिनी के जाल में फंसने का अब कोई खेद नहीं है मुझे। ठीक जगह आ गयी हूं मैं। इतने सालों से मर मर कर जी रही थी। इतने खुले विचार वालों से पहले न मिल पाई, इस बात का मलाल है अब। मेरे मन के अंदर अब कोई अपराध बोध नहीं रहा। अब मैं खुल कर जी सकूंगी।”
“तो अब?” हरिया खिल उठा, सारे गिले शिकवे दूर।
“वाह, बहुत बढ़िया। हम तो चुदक्कड़ ठहरे एक नंबर के, क्षितिज को भी ले आई हो अब इस लाईन में, बढ़िया, बहुत बढ़िया। लगे हाथों रेखा भी शामिल हो गयी हमारी जमात में। क्षितिज बेटे, तूू जो चाहे कर रेखा रानी केे साथ, हम देेेखते हैैं तेेेरी मां को। बूढ़े हैं तो क्या हुआ, इतनी देर में हमारा लौड़ा भी फनफनाने लग गया है।” कहते हुए फटाफट अपने कपड़े उतार कर नंगे हो गये। सत्तर इकहत्तर साल के बूढ़े, देखने में शारीरिक रूप से स्वस्थ, लेकिन चोदने में कितने समर्थ हैं इसकी परवाह किए बगैर अपने कपड़ों से मुक्त हो कर मेरी ओर भूखे भेड़ियों की तरह बढ़े। तोंद निकले हुए थे दोनों के। उनके शरीर के सारे बाल सन की तरह सफेद हो चुके थे, यहां तक कि झांट भी। घनी झांटों के बीच बेलन की तरह झूल रहे थे उनके काले काले लंड। आश्चर्य से रेखा और क्षितिज यह नजारा देख रहे थे। मेरे पास पहुंच कर हरिया नेंं मुझे दबोच लिया और दनादन चूमने चाटने लगा। करीम कहाँ पीछे रहने वाला था। उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ लिया और मेरी चूचियों को बेदर्दी से मसलने लगा।
“हमारी प्यारी लंडखोर, देख हम अभी तेरा क्या हाल करते हैं।” कहते हुए दोनों मुझे सैंडविच बना कर पीसने लगे।। “आह्हह, ओह्ह रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, इतनी देर से आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मरी जा रही हूं्हूं्हूं्हूं्ऊंऊं्ऊं्ऊं।” वासना की ज्वाला में धधकती पिसती, उन दोनों जंगली बूढ़े भेड़ियों की नोच खसोट के आनंद में मग्न, क्षितिज और रेखा की उपस्थिति से बेखबर, डूबती जा रही थी कामुकता के सैलाब में। इन बूढ़े शेरों में अभी भी बहुत जान बाकी थी। जहाँ हरिया का टन टन करते टन्नाये हुए बेलनाकार लंड का गुलाबी सुपाड़ा मेरी ज्वालामुखी की तरह भभकती चूत के दरवाजे को फाड़ डालने को बेताब दस्तक पर दस्तक दिए रहा था वहीं करीम का विकराल गदा सरीखा लंड मेरी गांड़ के रास्ते मेरे अंदर समा जाने को आतुर ठोकरे पर ठोकरें मार कर ठकठकाता हुआ बंद गुदा के द्वार को क्षत विक्षत कर प्रवेश करने पर आमादा था। मैं कसमसा रही थी, सिसक रही थी, समर्पण के संकेत के साथ। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, हां्हां्आं्आं्आं हां्हां्हां्आं्आं्आआआआह्ह्ह्ह, मेरे रसिया आह, ऐस्स्स्स्स्स्आआआआ ही्ई्ई्ई्ई, हां हां उफ्फ्फ्फ चोद डालो मुझे मेरे बूढ़े चोदुओ, निका्आ्आ्आ्आ्आल दो मेरी सारी गरमी बुझा लो अपनी भूख प्यास।” मैं पगला गयी थी उस वक्त उनके नंगे बूढ़े तन से पिसती हुई, उनकी कामुक हरकतों से हलकान होती हुई। उन दोनों बूढ़े हवस के पुजारियों के हत्थे चढ़ी मेरे पागलपन में तड़पते तन को विस्फारित नेत्रों से देखते और मेरे होंठों से निकलते उत्तेजक उद्गारों को मंत्रमुग्ध सुनते देख मैं आवेश में क्षितिज और रेखा पर चीख पड़ी, “इस तरह देख क्या रहे हो बेवकूफों, शुरू हो जाओ।” सहसा मानो उनकी तंद्रा भंग हुई। दोनों पुनः भिड़ गये एक दूसरे से विक्षिप्तों की तरह। इस बार पहले से कुछ अधिक ही खौफनाक ढंग से टूट पड़े थे एक दूसरे पर, शायद हम तीनों के द्वारा सृजित उत्तेजक माहौल का असर था।
“उफ्फ्फ्फ रेखा आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, गांड़, आपकी गांड़, आपकी मस्त चिकनी गांड़ दीजिए मुझे।”
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं”
“नहीं क्या मेरी बुरचोदी आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, दीजिए।” उसकी चूचियों का मलीदा बनाता हुआ खूंखार लहजे में बोला क्षितू।
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, फाड़ दोगे।”
“चुप आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, बिल्कुल चुप्प्प्प्प्प। आपकी चूत फटी क्या?”
“नहीं”
“फिर?” उसने और कोई ना नुकुर सुनने की कोई जहमत नहीं उठाई, सीधे रेखा को पलट दिया और अपने लंड पर थूक लसेड़ कल उसकी गांड़ के छेद पर टिका दिया। जबरदस्ती, उसके पैरों को फैला कर, उस पर सवार था, पूरा बलात्कारी की मुद्रा में।
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, आह्ह्ह्ह्ह् नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज, रोक कामिनी रोक आह मार डालेगा ओह्ह्ह्ह्ह्ह।” कराह उठी वह जब क्षितिज दबाव देने लगा अपने लंड पर। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, फट रही्ही्ई्ई्ई्ई्ई है ओह्ह्ह्ह्ह्ह मां्आ्आं्आं्आं्आं।” दर्दनाक चीख पूरे कमरे में गूंज रही थी। न मुझे परवाह थी और न ही होश, न ही हरिया और करीम को परवाह थी, फटती है तो फटे, साली कुतिया, शुरू में रोती चिल्लाती बहुत है, हरामजादी, फिर जब मजा आना शुरू होता है तो चोद, और चोद, साली नौटंकी।
“लो घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह गया, पूरा घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह गया। अब आपकी गांड़ का दरवाजा खुल्ल्ल्ल गया। आह बड़ा टाईट है ओह आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई।”
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मार डाला, मार डाला, फाड़ डाला, चीर डाला ओ्ओ्ओह्ह्ह्।” रोने लगी। क्षितिज के मजबूत बदन के नीचे दबी, पिसती, छटपटा रही थी। क्षितिज अब तक ज्ञान हासिल कर चुका था ऐसी स्थिति से निबटने के लिए। कुछ पल स्थिर रह कर रेखा की चूचियों को मसलता रहा और उसकी गर्दन को, कंधों को चूमता रहा। धीरे धीरे रेखा का रोना कलपना शांत होता चला गया और क्षितिज समझ गया कि चिड़िया जाल में फंस चुकी है। आहिस्ते आहिस्ते लंड निकालने लगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” एक आह दोनों के मुख से निकली। रेखा की आह राहत की तो क्षितिज की आह आनंद की। गच्च, फिर से ठोक दिया क्षितिज ने, “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” यह आह रेखा की थी, आवाज कम, दर्द कम, आनंद का पुट था उसकी आवाज में। अब और क्या था। हौले हौले गच्च गच्च, रफ्तार बढ़ाता चला गया क्षितिज। रेखा कहां कुछ पलों पहले मर्मांतक चीखें निकाल रही थी, अब आनंदय सिसकारियां निकालने को वाध्य हो गयी। “आह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स्स, उस्स्स्स्, अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, आह चोद, आह्ह् चोद बेटे उफ्फ्फ्फ मां्आ्आं्आं्आं्आं।”
“ओह्ह्ह्ह्ह्ह आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई उफ्फ्फ्फ आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, मस्त मस्त गांड़ वाली आंआंआंआंआंआटी्ई्ई्ई। उफ्फ्फ्फ स्वर्ग है स्वर्ग आपकी गांड़ में आह्ह्ह्ह्ह् मेरी गांड़ मरानी आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई। इतनी टाईट आह मजा आ रहा है अह्ह्ह्ह् अह्ह्ह्ह्” मस्ती में भर कर क्षितिज चोदे जा रहा था, गचागच, फचाफच। धमाचौकड़ी मचा दिया फिर उन लोगों ने तो मेरे बिस्तर पर।
इधर इसी दौरान आव देखा न ताव, भच्चाक से हरिया ने एक करारे ठाप से अपना पूरा का पूरा लंड मेरी चूत के अंदर भोंक दिया। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” निकल गयी मेरे मुख से और जैसे ही मैं उसके धक्के से थोड़ी पीछे खिसकी, तभी घच्च से करीम का लंड मेरी गांड़ का दरवाजा चीरता हुआ पूरा समा गया अंदर। “ओह्ह्ह्ह्ह्ह,” मेरी चूत और गांड़, पूर्ण रुप से बिंध कर रह गयी। उफ्फ्फ्फ, पूर्णता के उस आहसास के लिए ही मैं इतनी देर से मरी जा रही थी। दोनों बूढ़े जता देना चाह रहे थे कि मैं उन्हें कमतर समझने की गलतफहमी में न रहूं। मैं खुद भी तो यही चाह रही थी। खड़े खड़े ही उन दोनों ने इस मशीनी अंदाज में मुझे चोदना चालू किया कि ओह मां, ओह मां, गजब का दम था उनका। इस बुढ़ापे में भी ऐसी चुदाई की क्षमता और वह भी खड़े खड़े? इतनी देर से वासना की तपिश मे झुलसती न जाने मैं अपने यौनांगों को मसलते, रगड़ते क्या हाल कर बैठी थी। सारे अंग तरंगित हो उठे और मिनट भर में ही मैं आनंद के अतिरेक में पागलों की तरह थरथराने लगी और झड़ने लगी, “ओह्ह्ह्ह्ह्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” बेहद सुखद थे वे पल। झड़ कर ढीली पड़ने लगी मैं। लेकिन वाह रे बूढ़े शेर, छोड़ा नहीं मुझे, उठा लिया हवा में मुझे, भुजाओं में अभी भी बहुत दम था। उसी तरह हवा में उठा कर हवाई फायर कर रहे थे। मैं हवा में हिचकोले खाती हुई चुदी जा रही थी, चूत और गांड़ का भुर्ता बनाने में तुले थे दोनों। मेरी चूचियों को इस बुरी तरह से मसल रहे थे मानो गूथ ही डालेंगे आटे की तरह। शायद, कुछ आक्रोश की अभिव्यक्ति थी, कुछ ललकार का प्रभाव था और शायद अपने उम्र को झुठला कर अपनी चोदन क्षमता को साबित करने का प्रयास। जो भी था, बेहद सुखद था। करीब बीस मिनट तक मुझे खड़े खड़े नोचते खसोटते रहे, फिर मेरी चूत में लंड फंसाए मुझे लिए दिए हरिया कुर्सी पर बैठ गया। पीछे से मेरी गांड़ में करीम का हमला जारी था। कूटे जा रहा था, कूटे जा रहा था भकाभक। उस स्थिति में करीब पांच मिनट तक मेरी चुदाई चलती रही।
“साली रंडी की चूत, ओह लंडखोर बुर्रा््रा्रा्आआ््आआट कुतिया आह्ह्ह्ह्ह्, तेरी चूत का आज भुर्ता बनाएंगे मां की लौड़ी।” हरिया मुझे झिंझोड़ता, चोदता हुआ बोलने लगा।
“आह्ह् अब भी तेरी गांड़ में वही मजा है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह गांड़ की गुद्दी, उफ्फ्फ्फ,” करीम कहने लगा। तभी उन्होंने पैंतरा बदला और अब करीम कुर्सी पर बैठा और उसके लंड पर बैठी मैं लगातार चुदी जा रही थी। हरिया अब मेरे ऊपर था, कुत्ते की तरह कमर चलाता। उफ्फ्फ्फ भगवान, अंतहीन चुदाई का वह दौर करीब आधे घंटे तक चलता रहा। पसीने से लतपत, हम तीनों चिपचिपे हो उठे थे। तभी उनके लंड और सख्त और बड़े होने लगे, मुझे लिए दिए फर्श पर आ गये और फर्र्र फर्र फौवारा छूटने लगा उनके लंड से, आह्ह्ह्, मेरी चूत और गांड़ में बेइंतहां वीर्य का मानो बाढ़ आ गया हो। मुझे इतनी सख्ती से जकड़ रखा था उस वक्त दोनों ने मानो मेरा दम ही घुट जाएगा। करीब दो मिनट तक झड़ते रहे, ओह ऐसा तो कभी पहले नहीं चोदा था मुझे पहले। निचोड़ कर रख दिया मुझे जालिमों ने। मैं बता नहीं सकती कि क्या हाल हुआ मेरा। तीन बार झड़ी मैं इस दौरान। एक ही चुदाई में मेरा सारा कस बल निकाल दिया था। वाह, खुश हो गयी मैं। दोनों से चिपकी, कभी हरिया को चूमती, कभी करीम को, “आह, खुश कर दिया रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह आप लोगों ने। दमदार चुदाई, मजा आ गया।”
“चोदना ही था, रगड़ के चोदना था, चैलेंज कर रही थी न बुर की ढक्कन।” हरिया हांफता हुआ बोला।
“हां, ठीक बोला तुमने हरिया। साली हमें चैलेंज कर रही थी। आया मजा न?” करीम भी हांफते हुए बोल पड़ा।
“हां बाबा हां। इस बुढ़ापे में भी बहुत दम है देख लिया। भुर्ता बना दिया मेरी चूत और गांड़ का। बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा आया। निचोड़ कर रख दिया तुम दोनों ने तो।” उधर बिस्तर पर कुछ और ही नजारा था। क्षितिज ने रेखा को कुतिया बना डाला था। रेखा कुत्ती की तरह चार पैरों पर झुकी कमर उछाल उछाल कर क्षितिज के लंड से गांड़ मरवाये जा रही थी। क्षितिज भी पूरा कुत्ता बना हुआ, रेखा के कंधों को पकड़ कर धकमपेल किए जा रहा था। वही रेखा जो कुछ समय पहले रो चिल्ला रही थी, मजे में आंखें बंद किए चुदाई के सुखद समुंदर में डूब उतरा रही थी। “आह, ओह, ओह रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, चोद मां के लौड़े मादरचोद, कुत्ते, आह” कहती जा रही थी चुदती जा रही थी। अब क्षितिज सीधे सामने से रेखा को ठोकने लगा। रेखा की दोनों टांगों को चढ़ा लिया अपने कंधे पर और, “हां हां हां हां, ले आंटी्ई्ई्ई्ई्ई्ई, ले मेरा लौड़ा्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, ले मेरा आ्््आआ््आआ््हह्ह,” एक लंबा निश्वास लेता हुआ इतनी जोर से लंड ठोका और जकड़ा रेखा को कि चिचिया उठी और खुद भी “उफ्फ्फ्फ रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” कहती हुई स्खलित होने लगी। क्षितज ने तो पूरी शक्ति से भींच लिया था रेखा को। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, इस्स्स्स्स्स,” कहते हुए क्षितिज भी झड़ने लगा। क्षितिज मानो रेखा की गांड़ में ही समा जाने की पुरजोर कोशिश कर रहा था वहीं रेखा मानो क्षितिज को अपनी गांड़ में निगल जाने हेतु ऐसे चिपकी जैसे छिपकली।
दोनों पूरी तरह संतुष्ट, निढाल एक दूसरे की बांहों में समाये पड़े रह गये करीब दस मिनट तक। हम सब ने जब होश हवास दुरुस्त कर समय देखा तो उस वक्त रात का नौ बज रहा था। कहां तो मैं रेखा को शाम की चाय पीने के लिए झांसा दे कर लाई थी और कहां डिनर का समय आ पहुंचा था।
“हाय राम इतनी देर हो गयी? अब मैं चलूंगी।” रेखा हड़बड़ा कर बोली।
“चुप कर। चलूंगी। कहां चलोगी। घर ही ना। कौन तेरा इंतजार कर रहा है वहां। पड़ी रह यहीं। रात का खाना खा कर जाओगी।” मैं बोली। मैं ने ऐसा कहते हुए हरिया के लंड को पकड़ा और आंख मार दी। हरिया समझ गया, आज रात ऐश करने का मौका है रेखा के साथ।
“हां हां, खाना खाकर जाना होगा बिटिया।” हरिया मेरी चूची पर चिकोटी काटता हुआ खुशी का इजहार कर बैठा।
“हां आंटी सब ठीक कह रहे हैं। रुक जाईए ना, डिनर करके ही जाईएगा।” क्षितिज बोला और रेखा मान गयी। मान क्या गयी, अपने तन को नोचने भंभोड़ने का आमंत्रण दे बैठी इन ठरकी बूढ़ों को। उन दोनों को क्या पता था कि रात में मैं और ये चोदू बूढ़े क्या धमाल करने वाले हैं।
“रेखा तू जा मेरे बाथरूम में, नहा धो कर तरोताजा हो जा, चुद चुद कर हलकान हो रही होगी। हरिया, आप जाईए हमारे खाने की व्यवस्था कीजिए। खाना विशेष होना चाहिए समझ गये ना। बाकी तुम सब भी चलो जाकर फ्रेश हो जाओ, फिर हम इकट्ठे डिनर टेबल पर मिलते हैं।” कहकर मैं नुच चुद कर बेहाल अपने शिथिल शरीर में शक्ति इकट्ठा कर थरथराते पैरों पर खड़ी हुई और अपने कपड़े पहनने लगी। अलसाए से सभी उठे और फ्रेश होने चले। कुछ समय पहले तक जो लंड शेर बने अकड़ रहे थे, इस वक्त भीगी बिल्ली बने लुल्ली नजर आ रहे थे। इस अवस्था में भी मैं मुस्कुरा उठी। रेखा तुरंत मेरे बाथरूम में घुस गयी। मैं हरिया और करीम के लुल्लियों को हाथ से थपकी देती हुई फुसफुसाई, “सो लो मेरे शेरों, रात को फिर शिकार करना है।” खुशी में मगन, मुस्कुराते हुए हरिया और करीम कमरे से रुखसत हुए। क्षितिज मेरा नादान बच्चा, हमारी कुत्सित योजना से अनजान, अपने कमरे में चला गया तरोताजा होने के लिए। उसके हिसाब से आज की चुदाई का कार्यक्रम का अंत हो गया था।
“कुछ नहीं, बस ऐसे ही।”
“क्या बस ऐसे ही?”
“इन लोगों ने भी मुझे उस हालत में देख लिया न, उफ्फ्फ्फ मां।” हरिया और करीम की ओर देखते हुए धीमे स्वर में बोली। चेहरा लाल हो उठा यह कहते हुए।
“ओह आंटी, तो क्या हुआ? क्या फर्क पड़ता है?”
“हा हा हा हा, फर्क पड़ता है बेटा। रेखा को फर्क पड़ता है। पहली बार किसी गैर मर्द से चुदी है न, वह भी ऐसे, इतने लोगों के बीच। पगली, ऐसे शरम करोगी तो कैसे चलेगा? यह तो शुरुआत है। आगे आगे देखती जा, खूब मजा करोगी।”
“छि: जंगली कहीं की।” लाज से दोहरी हो उठी।
“हाय मेरी लाड़ोरानी। तू रुक जा आज यहीं, तेरी सारी लाज शरम खतम हो जाएगी।”
“नहीं नहीं, मैं जाऊंगी अब।”
“पागल, देख नहीं रही है रात का ग्यारह बज रहा है। रुक जा न यहीं, मेरे कमरे में सो जाना। वैसे भी कल रविवार है। छुट्टी है। ऑफिस जाने की टेंशन तो है नहीं। सिन्हा जी भी नहीं हैं। क्या चिंता है?”
“हां आंटी, रुक जाईए न।” क्षितिज बोल उठा, उसके आग्रह में रेखा के लिए चाहत स्पष्ट झलक रहा था। अब उसका इनकार कमजोर हो गया।
“ओके बाबा ओके। रुक जाती हूं।”
“यह हुई न बात। चलो अब, काफी रात हो गयी है। सोने चलते हैं।” कहकर मैं उठ खड़ी हुई। रेखा और क्षितिज की मुद्राओं से लग रहा था कि वे अभी सोने के मूड में नहीं हैं।हरिया और करीम के दिमागी हालत भी मुझसे छिपी नहीं थी। एक मूक संदेश मैं उन्हें देकर रेखा को खींचती हुई अपने कमरे में दाखिल हुई।
क्षितिज आशा और शरारत भरी आवाज में बोल पड़ा, “मॉम, यह क्या? मुझे अकेले नींद नहीं आएगी।”
“आ जाएगी नींद, अभी तू अपने कमरे में जा। सोने का प्रयास कर। फिर भी नींद न आये तो आ जाना, मैं लोरी सुना कर सुला दूंगी।” मैं भी शरारत से बोली। हरिया और करीम को पता था क्या करना है, अत: वे चुपचाप चले गये अपने कमरों की ओर।
“रेखा, तू मेरी नाईटी पहन ले।” मैंने अपनी एक नाईटी उसे दे दी। रेखा कुछ अनमनी सी थी। जैसे ही वह मेरे बिस्तर पर आई, मैंने उसे बांहों में भर लिया। “हाय मेरी बन्नो, क्या बात है? इस तरह गुमसुम क्यों है?”
“हट साली शैतान की खाला। ज्यादा अनजान मत बन।” मेरी पकड़ से आजाद होने की कोशिश करती हुई बोली।
मैंने और सख्ती से उसे जकड़ लिया। “समझ गयी मैं।मर्द चाहिए, है ना?”
“तू बड़ी कुत्ती चीज है हरामजादी।”
“हां, वो तो हूं।” कहकर मैं उसे चूमने लगी। मैं अपने बायें हाथ से उसे कस कर दबोच लिया और दायें हाथ से जबर्दस्ती नाईटी के ऊपर से ही उसकी चूचियों को सहलाने लगी। ब्रा नहीं पहनी थी वह। “वाह मेरी रानी, ब्रा नदारद? जरा देखूं तो, पैंटी भी है कि वह भी नदारद?” मेरा हाथ उसकी जांघो के बीच जा पहंचा। “वाह साली, पैंटी भी गायब?” पैंटी भी नहीं पहनी थी वह। तो इसका मतलब चुदने हेतु तैयार। “साली चूत की ढक्कन, नाईटी से केवल बदन ढंक कर आई है, चुदने की पूरी तैयारी के साथ। वाह, मजा आ गया। अब नखरे छोड़ और उतार दे नाईटी भी, मुझसे भी शरम?”
“हट बदमाश।” नखरे करने लगी वह।
“चुप, अब बिल्कुल चुप। चुदवाने की चाह भी और नखरे भी? यही हाल रहा तो मरते रहेगी, कोई मर्द तेरे पास फटकेगा भी नहीं। चुदना है तो खुल के चुद।” कहते हुए जबर्दस्ती उसकी नाईटी को नोच फेंकी मैं। वाऊ, जितनी भी बार रेखा की नग्न देह का दर्शन करती हूं, जल उठती हूं उसकी खूबसूरती पर। आनन फानन मैं भी आदिम युग की नारी में परिवर्तित हो गयी, पूर्णतया नंगी और टूट पड़ी रेखा पर। उसके उन्नत उरोजों को दबाती हुई मुह लगा कर चूसने लगी।
“आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह, पागल, उफ्फ्फ्फ जादूगरनी कमीनी।” तड़फड़ा उठी वह उत्तेजना के मारे। मैं उसकी हालत की परवाह किए बगैर उसकी योनि सहलाने लगी जो क्षितिज के लिंग की बेरहम कुटाई से फूल कर कचौरी बन गयी थी। “उफ्फ्फ्फ, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मार ही डालोगी क्या?” उस पर वासना का खुमार चढ़ रहा था। मैं रुकी नहीं, उसकी पनिया उठी योनि में उंगली डाल बैठी। “हाय अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, मत कर मत कर हरामजादी, आह्ह्ह्ह्ह्, ऐसा मत कर, उफ्फ्फ्फ ओ्ओ्ओह्ह्ह् ओ्ओ्ओह्ह्ह् झड़ रही्ही्ई्ई्ई्ई्ई हूं्हूं्हूं्हूं्ऊंऊं्ऊं्ऊं मैं।” कहते कहते सचमुच में झड़ने लगी वह। लेकिन मैं भी कम कमीनी थोड़ी न हूं, छोड़ी नहींं उसे। उसके निर्जीव पड़ते शरीर से खेलती रही। मैं 69 के पोजीशन में आ गयी और उसकी योनि चाटने लगी। मेरी योनि ठीक उसके मुह के ऊपर थी। पुनः वह गरम हो गयी और उत्तेजना के मारे मेरे नितंबों को पूरी शक्ति से पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगी। मैंने भी अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और लो, वह तो पागलों की तरह मेरी चूत को चाटने और चूसने लगी।
“ओह्ह्ह्ह्ह्ह रेखा, ओह मेरी जान, आह्ह्ह्ह्ह्।” मैं सीत्कार निकालने को मजबूर हो गयी। रेखा मेरी चूत के अंदर जीभ डाल डाल कर पागलों की तरह चाट रही थी। मैं समझ गयी कि वह फिर से उत्तेजित हो गयी है। “आह्ह्ह्ह्ह् भगवान, तू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ भी सीख गयी आह्ह्ह्ह्ह्,” इस बार मैं थोड़ी जोर से बोली। यह सिग्नल था, दरवाजे के बाहर खड़े हरिया और करीम के लिए। पलक झपकते वे कमरे के अंदर थे।
“माल तैयार है?” हरिया बोला।
“हां हां बिल्कुल तैयार है।” मैं अपनी सांसों पर काबू पाते हुए बोली।
“कककक्या मतलब?” रेखा हड़बड़ा कर बोली।
“मतलब वतलब कुछ नहीं, तू चुदने के लिए तैयार हो जा।” मैं बोली।
“किनसे, इन बूढ़ों से?” रेखा भड़की।
“लंड लंड होता है री बुरचोदी। चुदासी चूत बूढ़े जवान लंड नहीं देखती। एक बार अनुभवी बूढ़ों से चुद कर देख, मजा न आए तो कहना।”
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, मैं रंडी नहीं हूं।”
“रंडी नहीं हो ना, चल आज तुझे रंडी बना ही देते हैं।” हरिया खूंखार लहजे में बोला।
“बूढ़ा बोलती है साली, अब देख हम बूढ़ों का जलवा।” करीम उसकी खूबसूरती पर लार टपकाता हुआ बोला। कुछ ही सेकेंड में दोनों नंगे हो गये। सन से सफेद झांटों से भरे दो दो आठ नौ इंच के फनफनाते मोटे लंड को देख कर रेखा तड़प कर बिस्तर से उठना चाहती थी लेकिन मेरे फौलादी बंधन से आजाद नहीं हो सकी, फड़फड़ा कर रह गयी।
“छोड़ मुझे कुतिया।” बेबसी में वह घिघियाते हुए बोली। तबतक हरिया और करीम ने उसे अपने कब्जे में ले लिया था। मैं उसे उन दरिंदों के रहमोकरम पर छोड़कर हट गयी। इससे आगे कि वह कुछ और बोलती, हरिया अपना लंड उसके मुह में ठूंसने लगा। रेखा ने सख्ती से मुह बंद कर लिया था।
“मुह खोल साली कुतिया। चूस इस बूढ़े का लंड साली मां की चूत। बेबस रेखा मुह खोलने को वाध्य हो गयी। जबरदस्ती, हरिया अपना गधे सरीखा लंड उसके मुह में घुसाता चला गया। रेखा छटपटा उठी। उसका दम घुटने लगा। रेखा की स्थिति को समझ कर हरिया अपने लंड को थोड़ा बाहर खींचा। रेखा की जान में जान आई। अभी वह राहत की सांस ले ही रही थी कि तभी पुनः हरिया ने भच्चाक से लंड घुसा दिया। अपनी बेबसी और दुर्दशा से रेखा की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। दम घुटने ही वाला था, तभी फिर से हरिया ने लंड बाहर खींचा। यही क्रम कुछ देर दुहराने के बाद आश्चर्यजनक रूप से रेखा हरिया का पूरा लिंग निगलने में सक्षम हो गयी। इधर करीम रेखा की चूचियों से खेल रहा था, दबा रहा था, चूस रहा था, एक हाथ उसकी चूत पर नृत्य कर रहा था, उसके भगांकुर को दो उंगलियों से मसल रहा था। बीच बीच में करीम उसके चूत रस से सने उंगलियों को रेखा की गांड़ में भी घुसाता जा रहा था। रेखा पागल हो उठी इन हरकतों से। गों गों की आवाज आने लगी उसके लंड भरे मुह से। उसकी कमर अपने आप ऊपर नीचे होने लगी, बदन अकड़ने लगा। साफ साफ संकेत था कि उसका विरोध खत्म हो चुका था और चुदने को बेकरार हो चुकी थी। कामुकता का ज्वालामुखी फट पड़ने के कागार पर पहुंच चुका था। इसे हरिया और करीम दोनों ने महसूस कर लिया था। अब उन्हें और क्या चाहिए था, हरिया, रेखा के लार से सने, चमचमाते अपने टनटनाए ठुनकते लिंग को रेखा के मुख से निकाल कर रेखा के पैरों को फैलाया और उसकी दपदपाती योनि के प्रवेश द्वार पर रख कर एक पल रुका। उफ्फ्फ्फ, यह पल रेखा के लिए कितना असह्य था। वासना की ज्वाला में धधकती रेखा अपनी कमर को उछाल ही तो बैठी, आमंत्रण दे बैठी उस बूढ़े के लंड को, जिसे कुछ देर पहले बूढ़ा कहते हुए चुदने से इनकार कर रही थी। उस बूढ़े तोंदियल, हवस के पुजारी को और क्या चाहिए था। रेखा के चूतड़ के नीचे हाथ लगा कर उसकी क्षितिज के लंड से चुद कर फूली कुप्पा हुई चूत को ककड़ी की तरह चीरता हुआ अपना लंड उतारता चला गया।
“लेएएएएएएए, ये लेएएएएएए मेरा बूढ़ा लंड अपने बुर में। आह हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्।” उस बूढ़े राक्षस का एक भीषण प्रहार था यह। एक ही वहशतनाक करारे धक्के से जड़ तक सरसरा कर ठोंक दिया था उसने और इस दर्दनाक प्रहार की पीड़ा से चीख निकल गयी रेखा की। अभी वह इस पीड़ा से संभल भी नहीं पाई थी कि हरिया अपना लंड घुसाए, रेखा को लिए दिए पलट गया, खखुद नीचे और रेखा उसके ऊपर। सख्ती से जकड़ रखा था रेखा को हरिया ने। रेखा पीड़ा से कराह रही थी लेकिन उसकी छूटने के लिए छटपटाहट को हरिया ने विफल कल दिया। तभी करीम, जो अपने लंड के लिए दूसरे छेद का बेसब्री से इंतजार कर रहा था, टूट पड़ा रेखा की नुमायां होती आकर्षक गांड़ पर। अपने खतना किये हुए लंड का चमचमाता विशाल सुपाड़ा रेखा की गांड़ के छेद के पास रखा।
तभी आने वाली मुसीबत से आतंकित रेखा चीख उठी, “नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज नहीं, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी गांड़ में नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं। इधर मेरी चूत फट रही है और उधर मेरी गांड़ का भुर्ता बनाने का इरादा है क्या? नहीं प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज नहीं।” मैं नंगी भुजंगी कुर्सी पर बैठी अपने यौनांगों से खेलती हुई उस चुदाई का आनंद ले रही थी।
रेखा की चीख को नजरअंदाज करते हुए करीम एक कसाई की तरह जबर्दस्ती घुसाता चला गया अपना लंड, रेखा की संकीर्ण गुदा मार्ग में। “ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए्ए आह मेरा्आ्आ्आ्आ्आ लौड़ा्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ्फ इतनी टाईट गांड़, क्षितिज का लंड खाने के बाद भी, उफ्फ्फ्फ।”
“आह्ह्ह्ह्ह् मार डाला जालिमों, हाय मेरी गां्आं्आं्आं्आंड़।” चीख उठी रेखा। दो बूढ़े भेड़ियों के बीच पिसती हुई आंसू बहाने लगी।
“बूढ़ा बोल रही थी ना कुतिया। ले हम दोनों के बूढ़े लंड, आह ओह इतनी मस्त औरत, अहा मजा आ गया अहा।” करीम बोला। “चल हरिया, शुरू हो जा।” ऐलान कर दिया करीम ने और फिर शुरू हुआ भीषण धकमपेल। उन दोनों बूढ़ों ने अपने लिए बूढ़े शब्द के लिए रेखा के शरीर को इस नृशंसता से नोचना खसोटना चालू किया कि रेखा प्रथमतः बेदम हो उठी। लेकिन कुछ समय पश्चात उन बूढ़ों के हर एक प्रहार से आनंद की सिसकारियां निकालने को वाध्य हो गयी। उनकी जालिमाना नोच खसोट से हलकान होने के बदले उनके तन से पिसती, दबती, कुचती, आनंद के सागर में गोते खाती हुई बोलने लगी, “आह ओह, चोदिए, ओह उफ्फ्फ्फ मेरी चूत और गांड़ का कचूमर निकाल दीजिए मेरे बूढ़े आशिकों। ओह ऐसा मजा आह स्वर्ग का मजा।”
“वाह रेखा रानी, बन गयी आखिर तू भी रंडी। बड़ी बोल रही थी रंडी नहीं हूं मां की लौड़ी, वाह मेरे शेरों, बना डालो इसे आज रंडी, बना डालो इसे बेशरम कुतिया, इसकी सारी लाज शरम, झिझक इसकी चूत में घुसा दो, ताकि आज के बाद इसे किसी से भी चुदने में कोई झिझक न हो।” मैं रेखा को तनिक चिढ़ाती, उन चुदक्कड़ बूढ़ों को उकसाती, मजा ले रही थी तभी भूत की तरह क्षितिज कमरे में दाखिल हुआऔर कमरे के अंदर का नजारा देख कर स्तब्ध रह गया।
“ओह मॉम, तो यह चल रहा है? मुझे छोड़ कर? मुझे भूल गयी मॉम आप भी।” क्षितिज नाराजगी से बोला।
“अरे नाराज न हो बच्चे, इधर आ मेरे पास। मैं बताती हूं ऐसा क्यों हुआ। तू सीख गया बाहर की औरतों का शिकार करना, है ना?”
“हां, तो?”
“लेकिन रेखा की झिझक पूरी तरह मिटाना भी तो आवश्यक था। देखो कैसे मजे से दो दो बूढ़ों से एक साथ चुदवा रही है। है ना? यह भी सीख गयी अब पराये मर्दों से किस तरह खुल कर मजा लेना है। देखो, मैं सच कह रही हूं न?” मैं क्षितिज को समझाती हुई बोली।
“हां मॉम वो तो है।”
“फिर दुखी क्यों है? आजा बच्चे अपनी मम्मी के पास। चोद ले मुझे, मैं अभी तेरे ही बारे में सोच रही थी। खोल कपड़े और ले ले मुझे अपनी बांहों में। अपने पपलू का मिलन मेरी मुनिया से करा दे।” मेरे इतना कहने की देर थी कि सारा गिला शिकवा भूल कर फटाफट नंगा हो गया और मुझे अपनी बांहों में उठा कर चूम लिया।
“ओह माई स्वीट मॉम, आई लव यू।” इतना कहकर मेरी नग्न देह को गोद में लिए दिए उसी कुर्सी पर बैठ गया जिस पर मैं बैठी रेखा और बूढ़ों की कामलीला देख रही थी। मैं अपने दोनों पैरों से उसकी कमर को लपेटे उसकी गोद में बैठ गयी। क्षितिज मेरे होठों को चूमते हुए मेरे स्तनों से खेलने लगा। कुछ ही मिनटों में क्षितिज का लंड बमक उठा और मेरी गुदा पर दस्तक देने लगा। मैं तनिक उठ कर उसके तने हुए लिंग को अपनी चुदासी योनि के मुहाने पर स्थापित किया और बैठती चली गयी, “ओ्ओ्ओह्ह्ह्, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” एक दीर्घ निश्वास निकली मेरे मुह से। सरसराता हुआ क्षितिज का पूरा लंड मेरी चूत में समा गया।
“ओह मॉम, आह्ह्ह्।” क्षितिज मस्ती में भर गया। उसके बाद क्षितिज मेरी कमर पकड़ कर उठा उठा कर चोदने लगा और मैं खुद भी उसके लंड पर उछल उछल कर मस्ती से चुदने लगी।
“आह मेरा्आ्आ्आ्आ्आ रज्जा बेटा। ओह मां के लौड़े, ओह मां की चूत के लौड़े, ओह मादरचोद, चोद अपनी मां को आह उह आह,” मैं चुदते हुए बड़बड़ा रही थी। उधर हरिया और करीम रेखा को मशीनी अंदाज में चोदे जा रहे थे। दोनों के बीच मानो चुदाई की प्रतियोगिता चल रही थी।
“हुम साली कुत्ती, हुम साली रंडी, हुम आह, हुम मां की चूत,” हरिया और करीम एक दूसरे के पूरक बने चोदने में मगन थे। रेखा तो मानो पगला गयी थी। इतने आनंद की शायद उसने कल्पना भी नहीं की थी। दो दो मर्दों से एक साथ चुदने का यह पहला अनुभव था और क्या खूबसूरत अनुभव था। खूब मस्ती में चुदे जा रही थी। “आह मेरे चोदुओं, ओह बड़ा सुख दे रहे हो आपलोग, आह्ह्ह्ह्ह्।”
करीब तीस मिनट तक यह नंगा नाच चलता रहा। स्खलन सबका एक साथ नहीं हुआ। करीब दस दस मिनट के अंतराल में रेखा तीन बार झड़ी, क्या खूब झड़ी, मस्ती के समुंदर में डूब डूब कर झड़ी। करीब पचीस मिनट बाद हरिया झड़ने लगा। “आह्ह्ह् मेरे लौड़े का रस ओह्ह मेरे लंड का पानी्ई्ई्ई्ई्ई निकल रहा्आ्आ्आ्आ है आह।” फच्च फच्च हरिया का लंड वीर्य उगलने लगा। करीब तीस मिनट बाद करीम भी झड़ा, क्या खूब झड़ा, रेखा की देह को भींच कर आनंदय सीत्कार के साथ झड़ा। रेखा उसी वक्त तीसरी बार झड़ने लगी, “ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” थक कर, तृप्त हो कर, सुखद अनुभव से दो चार होती हुई, प्रफुल्लित रेखा, चपाचप, दूध पीकर तृप्त बिल्ली की तरह हरिया और करीम डकारते हुए रेखा की कमनीय देह से चिपके निढाल हो गये।
इधर क्षितिज और मैं एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद कर रहे थे। हमारा तांडव भी करीब पचीस मिनट तक चला, फिर क्षितिज मुझे भींच कर अपना मदन रस मेरी चूत म़े भरता हुआ स्खलन के सुख में डूब गया। मैं इस दौरान दो बार स्खलित हुई। “बहुत बड़ा चुदक्कड़ हो गया रे तू। कितना मजा देना सीख गया है।” मैं नें क्षितिज को चूम लिया।
जब हम सबके सांस दुरुस्त हुए तो मैं रेखा से बोली, “आखिर बन गयी न रंडी तू।”
“हट बदमाश।” शरमा गयी।
“हाय, देखो देखो, इस रंडी को भी शरम आती है।” हा हा हा हा, सभी ठहाका मारकर हंस पड़े।
“अब बता हाल है मेरी लाड़ो रानी का?”
“मुह न खुलवा बुरचोदी। इन बुढ़ऊओं ने तो मुझे स्वर्ग ही दिखा दिया।”
“यह बोल कि स्वर्ग का द्वार खोल दिया।”
“हां हां वही।”
उसके बाद फिर एक और दौर चुदाई का चला। सवेरे देखा तो बुरी तरह नुच चुद कर रेखा की चूचियां लाल हो गयी थीं, चूत फूल कर गोलगप्पा बन गयी थी और गुदा द्वार का छल्ला फूल भी गया था और लाल भी हो गया था। कुल मिलाकर रेखा के तन का सारा कस बल निकल चुका था, मन की सारी झिझक, लाज लिहाज, शर्म, हया तार तार हो चुकी थी और अब इस दुनिया में एक नयी रेखा का अवतरण हो चुका था, बिंदास रेखा का। सवेरा एक नया सवेरा था। एक तीर से दो शिकार। क्षितिज के परस्त्रीगामी होने की की ओर अग्रसर होना और रेखा का परपुरूषों से शारीरिक सुख प्राप्त करने की कामना को जागृत करना। मैं इन दोनों प्रयासों में सफल रही।
सवेरे जब मेरी नींद खुली तो अपनी स्थिति देख कर बड़ी कोफ्त हुई खुद पर। मैं और रेखा सिर्फ नुची चुदी हालत में नंग धड़ंग बिस्तर पर फैली हुई थीं। तीनों मर्द रात भर हम दोनों स्त्रियों की नग्न देह को नोच चोद कर गायब थे। घड़ी के कांटे एक सीध में आठ बजकर बारह मिनट दिखाते हुए हमें मुंह चिढ़ा रहे थे। अलसाई सी टूटते बदन लेकर किसी प्रकार उठी और रेखा को उठाने लगी। “अरी रेखा, उठ।”
“उठ जा रेखा, देख सवा आठ बज रहा है।”
“उफ्फ्फ्फ, रात भर रगड़ घसड़ कर कचूमर निकालते रहे कुत्ते, और अब तू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ। थोड़ा और सोने दे ना््आआ््आआह्ह्ह।” एक कराह थी उसकी आवाज में। आंखें अभी भी बंद थी उसकी। पैर फैला कर सोई पड़ी थी। मैंने देखा, उसकी चूचियां लाल हो चुकी थीं। चूचियों पर, गर्दन पर और गालों पर कहीं कहीं दांतों के निशान उभर आये थे। चूत पूरी तरह खोल कर रख दिया था कमीनों ने। फुला कर कुप्पा कर दिया था। वहशियों की तरह भंभोड़ डाला था उसे। मैं तो चुदक्कड़ छिनाल, ठहरी इन सब की आदी। मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ा, सिर्फ रात भर की चुदाई और अनिद्रा से उपजा आलस मुझ पर तारी था। तरस आ रहा था रेखा की अवस्था पर लेकिन यह उसके हित में ही था। ऐसी परिस्थिति से गुजर कर ही उसे सीख मिलनी थी, जो मिली और क्या खूब मिली। कितने मुदित मन से चुदवाती जा रही थी साली कुतिया। इसी के लिए इतना ड्रामा। मैं उसे उसी हाल में छोड़ कर बाथरूम में घुस गयी। जब मैं तरोताजा होकर बाथरूम से निकरी, तबतक वह उसी तरह पड़ी थी।
“अरी अब तो उठ जा।”
“नहीं थोड़ा और सोने दे।”
“उठ जा हरामजादी, नहीं तो तुझे इस हाल में देखकर उन चुदक्कड़ों के सुबह का नाश्ता तेरा यह शरीर ही होगा।”
“कैसी जालिम है तू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ।” नींद कफूर हो गया मेरी बात सुनकर। झुंझला कर उठ ही रही थी कि लड़खड़ा कर गिरते गिरते बची, अगर मैंने उसे संभाल नहीं लिया होता तो वह औंधे मुह गिर ही पड़ी होती। उसके पांव थरथरा रहे थे। “उफ्फ्फ्फ, मेरे पांव जवाब दे रहे हैं। तोड़ कर रख दिया सारे शरीर को उन गधों नें।”
“तू चल मेरे साथ।” मैं उसे सहारा देकर दो कदम चली ही थी कि अपने को संभाल कर बोली, “नहीं नहीं, ठीक हूं मैं।” मैंने देखा, थोड़ा लड़खड़ा कर चल रही थी लेकिन थोड़ी बेहतर थी। जब हम फ्रेश होकर कमरे से निकले तो उस वक्त दस बज रहा था। थकान के बावजूद हमने अपना हुलिया काफी हद तक दुरुस्त कर लिया था लेकिन रेखा की चाल कुछ बदली बदली सी थी। थोड़ा पैर फैला कर चल रही थी। हमने डाईनिंग टेबल पर देखा, क्षितिज, हरिया और करीम बैठे गप्पें मारते हुए हमारा ही इंतजार कर रहे थे। रेखा की चाल देख कर अपनी हंसी बड़ी मुश्किल से छुपा पा रहे थे।
“आओ बिटिया, हम तुम लोगों का ही इंतजार कर रहे थे। जानबूझकर हमने तुमलोगों को नहीं उठाया, सोचा नींद पूरी हो जाए तो खुद उठ जाओगी, नींद में बाधा क्यों पहुंचाएं।” हरिया बोला। एक विजेता का भाव था उसके चेहरे पर। तृप्ति की मुस्कान थी होंठों पर। दृष्टि में हवस अब भी थी। यही हाल करीम का भी था। क्षितिज, नया नया नारी शरीर के स्वाद से परिचित पागल, अभी भी हमें ऐसे देख रहा था मानो, हमारे शरीर पर कपड़े ही न हों। उसका वश चलता तो अभी ही पटक कर चोद डालता, बेकली उसकी शक्ल पर छपी हुई थी और हरिया हरामी हमें बिटिया कह रहा था, साला बेटीचोद, रात को तो रंडी नजर आ रही थींं रेखा और मैं, साले औरतखोर, मन ही मन बोली मैं। स्पष्ट बोलती तो उनकी सारी खुशी, सारा उत्साह काफूर हो जाता। चुप ही रही।
“वाऊ मॉम और आंटी, बोथ आर लुकिंग गॉर्जियस।” प्रशंसात्मक शब्दों में बोल उठा। मैं उसके गाल नोचती हुई बोली, “बदमाश कहीं का।” फिर हम नाश्ता करने बैठे। हरिया फटाफट नाश्ता लगाकर खुद भी बैठ गया।
“तो? क्या प्रोग्राम है आज का?” क्षितिज बोला।
“मैं नाश्ता करके घर जाऊंगी। बहुत काम पड़ा है।” रेखा बोली।
“इसका तो घर ही भागा जा रहा है।” मैं बोली। “सवेरे इससे उठा नहीं जा रहा था, बड़ी आई काम करने वाली, काम करेगी अभी घर में।”
“अब ठीक हूं।” झेंपती हुई बोली रेखा, “जाकर घर को थोड़ा दुरुस्त कर लूं। सिन्हा जी की बहन आने वाली है, शायद शाम तक आएगी और कल सिन्हा जी भी आ रहे हैं ना।”
“जा बाबा जा, तू जा।”
“मैं आंटी को घर छोड़ आता हूं।” तुरंत क्षितिज बोला।
“ठीक है ठीक है, तू जा इसे छोड़ आ।” नाश्ता करके क्षितिज रेखा को घर छोड़ने चला गया।
@ मैं जानती थी कि रेखा को छोड़ने के बहाने क्षितिज रेखा की एक सवारी तो अवश्य कर आएगा। मैं खुद भी तो यही चाहती थी। मैं यूं ही टहलती हुई बाहर गेट तक आई। तभी सड़क पर चोर चोर, पकड़ो पकड़ो की आवाज सुनाई पड़ी। मैं फौरन गेट खोल कर बाहर निकली तो देखा एक उचक्का टाईप शख्स अपने हाथ में एक लेडीज वैनिटी बैग थामे सड़क पर तेजी से भागा चला आ रहा था। उसके पीछे एक तीस पैंतीस साल की खूबसूरत महिला चोर चोर चिल्लाती हुई दौड़ रही थी। मैं समझ गयी कि यह उचक्का उस स्त्री का वैनिटी बैग ले कर रफूचक्कर होने वाला है। ज्यों ही वह उचक्का मेरे सामने से गुजरने लगा, प्रत्युत्पन्न्मतीत्व का परिचय देते हुए मेरा बांया पांव चल गया। वह उचक्का मेरे पांव से उलझ कर अपनी ही झोंक में सड़क पर चारों खाने चित हो गया। इससे पहले कि वह संभल पाता, मैं उसके सर पर सवार थी। अगले ही पल वैनिटी बैग मेरे हाथ में था। वह उठने की कोशिश कर ही रहा था कि मेरे दायें पैर की ठोकर से पुनः धराशायी हो गया। इतनी देर में वह महिला वहां पहुंच गयी। उसके ठीक पीछे पीछे एक और व्यक्ति दौड़ा चला आया। मैं पहचान गयी। यह श्यामलाल था, वही ऑटो वाला, जिसकी मैं कई बार हमबिस्तर बन चुकी थी और उसके साथ साथ उसके मित्र बलराम और बलराम के तीन ड्राईवरों के साथ संसर्ग का लुत्फ उठाया था।
मैंने उस महिला का वैनिटी बैग उसके हवाले कर दिया। “थैंक्स बहन जी,” कृतज्ञ भाव से वह बोली।
“मैडम, इस कमीने को मेरे हवाले कीजिए, मैं देखता हूं इसे।” श्यामलाल बोला।
वह उचक्का पुनः उठ खड़ा हुआ और भागने ही वाला था कि मैंने उसका कॉलर पकड़कर अपनी ओर घसीटा और एक करारा मुक्का उसकी ठुड्ढी पर रसीद कर दिया, “साले, छिनतई करता है?” तक कुछ और लोग भी वहां एकत्रित हो गये थे।
“सॉरी बहन जी,” मेरी मार से पस्त हो हाथ जोड़ कर घिघियाते हुए वह उचक्का बोला।
“माफ कर दूं साले? श्यामलाल, पकड़ इस कमीने को। मैं पुलिस बुलाती हूं।” कहकर उसे श्यामलाल और भीड़ के हवाले कर दिया और पुलिस बुला लिया। अब मेरा ध्यान उस महिला की ओर गया। निहायत ही खूबसूरत औरत थी वह। तीस पैंतीस साल की गोरी चिट्टी, कमनीय काया की स्वामिनी।
“थैंक्यू वेरी मच बहनजी। आप नहीं होती तो न जाने क्या होता।” वह महिला मुझसे बोली।
“इट्स ओके बहन। यह श्यामलाल क्या कर रहा था वहां?” मैं श्यामलाल की ओर देखते हुए बोली।
“मैं इसी के ऑटो से तो आई हूं। पैसे देने के लिए बैग खोली, तभी यह लफंगा मेरा बैग छीनकर भागने लगा।”
“जैसे ही मैंने मैडम का चिल्लाना सुना, मैं भी इसके पीछे भागा। अच्छा हुआ आपने पकड़ लिया इसे।” श्यामलाल बोला। साला हरामी, चोर तो पकड़ नहीं पाया और अपनी सफाई देते हुए मुझे और उस स्त्री को ऐसे देख रहा था मानो मौका मिले तो अभी ही हमें पटक कल चोद डाले।
उसकी ओर घूर कर देखा और उसकी आंखों की हवस भरी नजरों को नजरअंदाज करती हुई बोली, “ठीक है ठीक है।” फिर उस स्त्री की ओर मुखातिब हो कर बोली, “हां तो आप बताईए, यहां किसके यहां आई हैं?”
“जी मैं सिन्हा जी के यहां आई हूं।”
“ओह्ह्ह्ह्, ये तो यहीं पास में हैं। आप उनकी रिश्तेदार हैं?”
“जी हां, मैं उनकी बहन हूं। कोलकाता से आई हूं।”
“ओह, मैं उन्हें बड़ी अच्छी तरह से जानती हूं। अभी तो वे ऑफिशियल टूर पर हैं। उनकी पत्नी रेखा है घर में।” तभी मुझे ध्यान आया कि क्षितिज भी तो अभी वहीं है। यह तो निश्चित था कि वहां रेखा के साथ कांड कर रहा होगा। मैं उनकी रंगरेली में व्यवधान नहीं पड़ने देना चाहती थी। “आप अंदर तो आईए।” मैंने उसे घर के अंदर आने का आमंत्रण दिया।
“नहीं नहीं, मैं वहीं जाती हूँ।” वह जल्दी से बोली।
“अरे ऐसे कैसे जाईएगा। आईए न, कमसे कम एक कप चाय तो पीकर जाईए। तबतक मेरा बेटा आ जाएगा, वह आपको रेखाजी के यहां छोड़ देगा।” मैं उसका हाथ पकड़ कर जबरदस्ती घर के अंदर ले आई। वह इनकार नहीं कर सकी। वह नीली जींस और पीले टॉप्स में बेहद आकर्षक दिख रही थी। करीब साढ़े पांच फुट कद था उसका। टाईट जींस में उसके गोल गोल नितंब गजब ढा रहे थे। गर्दन से काफी नीचे तक खुले हुए टॉप से झांकते उसके उन्नत गठे हुए उरोज किसी भी मर्द के मुह में पानी लाने के लिए काफी थे। कुल मिला कर काफी उत्तेजक शरीर की स्वामिनी थी वह।
“आईए, बैठिए।” मैं सोफे की ओर इशारा करके बोली। “हरिया!” हरिया को आवाज देकर बुलाया। वह किचन से ज्यों ही आया, मैंने चाय के लिए बोला। हरिया की दृष्टि जैसे ही उस महिला पर पड़ी, उसकी दपदप करती खूबसूरती को ठगा सा देखता रह गया। मैंने ज्यों ही उसे घूर कर देखा, उसने संभल कर किचन का रुख किया।
“हां तो बताईए, क्या नाम है आपका? क्या करती हैं? फैमिली?”
“बाप रे बाप, एक साथ इतने सवाल? मेरा नाम रश्मि सिन्हा है। मैं बैंक में जूनियर मैनेजर हूं। मैं कोलकाता में अकेली रहती हूं। तलाकशुदा हूं।”
“ओह, आप तलाकशुदा हो?” आश्चर्य हुआ मुझे। इतनी खूबसूरत स्त्री को कोई मर्द तलाक कैसे दे सकता है भला।
“जी हां।” बेझिझक बोली वह।
“एक बात पूछूं?”
“पूछिए न”
“बुरा मत मानिएगा”
“पूछिए न, बुरा क्यों मानूंगी।”
“आप इतनी खूबसूरत हो, फिर यह तलाक?”
“दरअसल तलाक मैंने ही लिया है। मेरा पति पहले से ही शादीशुदा था। झूठ की बिना पर हमारी शादी हुई थी।”
“ओह। आप तो इतनी खूबसूरत हो, दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेतीं?”
“दूसरी शादी? ना बाबा ना। एक शादी करके देख लिया। मैं ऐसे ही ठीक हूं। ऐसे ही खुश हूं।” तभी हरिया चाय ले कर आ गया। वह बार बार ललचाई नजरों से रश्मि को घूरता जा रहा था। रश्मि हरिया की नजरों में छिपे हुए भाव को समझ रही थी लेकिन उसके हाव भाव में कोई असहजता नहीं थी। मैंने फिर घूर कर हरिया को देखा तो वह हड़बड़ा कर झेंपता हुआ वहां से खिसक लिया, साला बुड्ढा चोदू ठरकी। मैंने देखा रश्मि मुस्कुरा रही थी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि रश्मि किस तरह की स्त्री है, आधुनिक तो अवश्य है लेकिन कितनी आधुनिक, कितने खुले विचारों वाली है, यह स्पष्ट नहीं था। हरिया की दृष्टि को पढ़ पाना मुश्किल नहीं था, फिर भी रश्मि की मुस्कान से मैं असमंजस में थी। तभी मेरे दिमाग में वही पुराना शैतानी कीड़ा सर उठाने लगा। फंसा लूं इसे भी? फंसेगी क्या आसानी से? अगर फंसी तो क्षितिज के लिए यह दूसरा शिकार। चलो कोशिश करने में हर्ज ही क्या है। चाय पीते पीते मैंने काफी कुछ जान लिया उसके बारे में।
“आप बहुत खूबसूरत हो।” मैं बोली।
“आप मुझे आप आप मत बोलिए।”
“क्यों?”
“मैं आपसे उम्र में काफी कम हूं।”
“कैसे मालूम? तुम्हारी उम्र क्या है?”
“34, और आपकी?”
“41”
“लीजिए, हुआ ना, मैं आपसे सात साल छोटी हूं। लेकिन फिर भी मानना होगा, आप इस उम्र में भी कम खूबसूरत नहीं हैं।” प्रशंसात्मक शब्दों में वह बोली।
“अब चढ़ाओ मत मुझे।”
“इसमें चढ़ाना क्या, जो सच है तो सच है।”
“अच्छा बाबा ठीक है। लेकिन अब तुम भी मुझे आप आप मत बोलो। तुम ही बोलो। अच्छा लगता है। अपनेपन का अहसास होता है।”
“ओके, जैसी आपकी मर्जी।” बातें करते करते कैसे एक घंटा बीत गया पता ही नहीं चला। अबतक हम दोनों आपस में काफी घुलमिल गई थीं। काफी कुछ जान गयी थी उसके बारे में। वह अपने शारीरिक सौष्ठव को बनाये रखने के लिए हर रविवार को जिम जाती थी। रोजाना योगासन करती थी। कपालभाति, प्राणायाम इत्यादि। सुनकर अच्छा लगा।
“ओह तभी”
“क्या मतलब?”
“तभी तो तुम इतनी खूबसूरत काया की मालकिन हो।”
“समय है इसलिए कर लेती हूं।”
“करना ही चाहिए। आजकल अपने स्वास्थ्य के साथ साथ कैरियर में तरक्की के लिए भी खुद को स्मार्ट रखने की बड़ी आवश्यकता है।”
“हां, वो तो है।”
“उम्र भी तुम्हारी 24 – 25 से अधिक नहीं लगती है।”
“तुम भी तो 41 की कहां लगती हो। 30 – 32 से ऊपर की तो बिल्कुल नहीं। तुम क्या करती हो खुद को फिट रखने के लिए?”
“कुछ नहीं, बस थोड़ी वर्जिश और मॉर्निंग वॉक।” अबतक क्षितिज नहीं लौटा था। समझ गयी, लग गया चस्का उसको भी, परस्त्रियों की चुदाई का चस्का, और रेखा? रेखा भी तो सीख गयी परपुरुषों से मजा लेना। क्षितिज के साथ साथ इन दो बुड्ढों से भी चुद गयी, चुद क्या गयी, खूब मजे ले लेकर चुदी साली कुतिया, बड़ी शरीफजादी बनी फिरती थी। परपुरुषों के लंड का स्वाद पाकर कितनी प्रसन्न थी छिनाल कहीं की। अभी भी, एक घंटा होने को है, किंतु क्षितिज का अता पता तक नहीं है। शतप्रतिशत रेखा के अंगमर्दन में व्यस्त होगा। तभी क्षितिज नामुदार हुआ। रश्मि जैसी खूबसूरत स्त्री को देख कर पल भर के लिए ठगा सा देखता रह गया।
“कहां रह गये थे इतनी देर?”
“कहीं नहीं मॉम, बस रेखा ऑंटी से थोड़ी गपशप की और चला आया।” मेरे सवाल पर उसकी तंद्रा भंग हूई और हड़बड़ा कर बोला वह। इतना बड़ा मादरचोद बन गया मगर झूठ बोलना भी नहीं आया।
“गपशप?”
“हां। उनका घर भी देख रहा था।” सब समझ रहा था वह भी। मैं भी जान रही थी कि घर तो क्या खाक देखा होगा बेडरूम को छोड़कर। बेडरूम की दुर्गति करने में कोई कसर छोड़ा होगा मेरा चोदू बेटा? इस दौरान मैंने देखा कि रश्मि भी अपलक देखे जा रही थी क्षितिज को। तंदुरुस्त, सुगठित, खूबसूरत, तरोताजा, आकर्षक युवा उसके सामने खड़ा था। प्रशंसा मिश्रित मोहभरी चमक थी उसकी आंखों में। उसकी आंखों में थी वही जानीमानी, पुरुषों के प्रति लोलुपता भरी, चाहत भरी, हवस भरी चमक।
“अरे मैं तो बताना ही भूल गयी, यह है मेरा बेटा क्षितिज और बेटे, यह रश्मि है, तेरे सिन्हा अंकल की बहन।” मैंने उसकी तंद्रा में विघ्न डाला। हकबका गयी वह मेरी बात सुनकर, तनिक झेंप भी गयी।
“ओह, नमस्ते आंटी।” क्षितिज बोला।
“आंटी? आंटी किसको बोला?” झट से रश्मि बोली।
“ओह सॉरी, रश्मि जी।” क्षितिज झेंपता हुआ बोला।
“वाह कामिनी, तुम्हारा बेटा तो शरमाता भी है।”
“ज्यादा हवा मत दे इसको नहीं तो”
“नहीं तो क्या?”
“नहीं तो आगे जो होगा उसकी जिम्मेदार तू खुद होगी।”
“आगे? आगे क्या होगा?” वह बोली। मैं सोचने लगी, इसके मन में चल क्या रहा है?
“अरे शैतान है एक नंबर का।”
“अच्छा तो है, बेचारा लड़का है, शैतानी ही तो करेगा ना, खा तो नहीं जाएगा।”
“इसके चेहरे की मासूमियत पर मत जा।”
“तो फिर किस पर जाऊं?” उसके लंड पर जा, मन ही मन बोली मैं। मुझे धीरे धीरे समझ आ रहा था रश्मि की बात करने के तरीके से कि वह क्षितिज को बढ़ावा देना चाह रही थी, लेकिन किस तरह का बढ़ावा, स्पष्ट नहीं था।
“उंगली पकड़ने दोगी तो पहुंचा पकड़ लेगा।”
“तो पकड़ने दे, मैं कहां डरती हूं।” क्या इरादा है इसका? इसके कहने का तात्पर्य क्या है? मन ही मन बोली, चोद डालेगा हरामजादी, नया नया चुदाई का चस्का लगा है, रगड़ के रख देगा। वैसे मुझे अच्छा ही लग रहा था उसके बात करने के तरीके से। क्षितिज इसे भी चोद ही डाले, पहले फंस तो जाय चिड़िया जाल में। क्षितिज का प्रशिक्षण भी होगा और अनुभव भी बढ़ेगा। वैसे मैं भी उसकी सुंदरता पर रीझ गयी थी। उसकी कमनीय काया का आकर्षण मुझे भी खींच रहा था। उसकी नग्न देह का दर्शन मैं भी करना चाह रही थी, उसकी देह को अनुभव करने की इच्छा बलवती होती जा रही थी। लेकिन कैसे होगा यह सब? पहले उसके मन की थाह तो ले लूं। कैसे फांसू इसे? एक विवाहेच्छु स्त्री, जिसकी उम्र निकली जा रही है, परित्यक्ता स्त्री, विधवा स्त्री तथा तलाकशुदा स्त्री के मन की व्यथा करीब करीब समान ही होती है। पुरुष संसर्ग की भूखी ऐसी स्त्रियों को फांसना अधिक कठिन नहीं होता है। तो क्या करूं? उसके मन को पढ़ने का प्रयास करूँ? उसकी मन:स्थिति समझूँ? अगर अनुकूल न हो तो योजना बना कर आक्रमण करूं? अगर अनुकूल हो तो उसकी कामुक भावनाओं को हवा दूं? फिर मनमानी कर गुजरूं और क्षितिज के सम्मुख परोस दूं जैसे रेखा के साथ हमने किया? हां हां, यही करती हूं, देखती हूं क्या होता है।
“सोच समझ कर बोल।”
“इसमें सोचना क्या? लड़का ही तो है।”
“तू नहीं जानती आजकल के लड़कों को।”
“मुझसे अच्छा भला और कौन जान सकता है इन लड़कों को।”
“जान बूझ कर आग से मत खेल।”
“ओह तो आग है आपका बेटा?”
“और नहीं तो क्या।”
“क्या मॉम आप भी? लगी मुझे खींचने इनके सामने।” क्षितिज तनिक रुष्ट हुआ।
“ओ मेरा बच्चा रुष्ट हो गया? इत्ता सा मजाक भी नहीं समझता? बुद्धू कहीं का। जाओ मैं मजाक भी नहीं करती तुझसे।” मैं बनावटी लाड़ भरी नाराजगी से बोली।
“ओ माई स्वीट मॉम, सॉरी।” आकर लिपट गया मुझसे।
“हट शैतान, इत्ता बड़ा हो गया और बचपना अब भी वैसा का वैसा ही है। बस बस हो गया, चल हट मुझे छोड़ अब।” बोली मैं। लेकिन मैं जानती थी यह उसका बचपना नहीं था। वह भी जानता था कि यह क्या था। बेचारी रश्मि को क्या पता कि हम मां बेटे एक दूसरे के लिए क्या थे। वह तो हम मां बेटे के बीच का वात्सल्य भरा प्यार समझ रही थी। उसके इस तरह लिपटने मात्र से ही मेरी योनि गीली हो गयी, तन तरंगित हो उठा, उरोज फड़फड़ा उठे।
“तू एक काम क्यों नहीं करती? रुक जा यहीं कुछ देर और, खाना खा कर चली जाना। क्षितिज छोड़ देगा तुम्हें।” मैं रश्मि से बोली। मेरे दिमाग में तो कुछ और चल रहा था।
“अरे लेकिन मैं तो भाई के यहां न आई हूं। भाभी क्या सोचेंगी?” उसकी आवाज में इनकार का भाव नहीं था।
“वह कुछ नहीं सोचेगी। रेखा मेरी सहेली है, बहन जैसी। तू चिंता न कर। अपने भाई का ही घर समझ इसे भी।”
“लेकिन……”
“लेकिन वेकिन कुछ नहीं, अब मैं तुम्हारी एक नहीं सुनूंगी। तू चल थोड़ा फ्रेश हो ले, तबतक खाना तैयार हो जाएगा, फिर खाना खा कर क्षितिज तुम्हें छोड़ आएगा।” कहकर उसे खींचती हुई अपने कमरे में ले आई। क्षितिज रश्मि के थिरकते नितंबों को हसरत भरी निगाहों से देखता रह गया। “जा, हाथ मुंह धो कर फ्रेश हो जा।” मैं ने बाथरूम दिखा दिया उसे। फिर हरिया से रश्मि के लिए भी खाना बनाने को कहकर किचन से बाहर निकली तो देखा, क्षितिज अबतक ड्रॉइंग रूम में बैठा याचना भरी दृष्टि से मुझे देख रहा था। मैं मुस्कुरा उठी।
“इस तरह क्या देख रहा है मुझे? रेखा के घर जा कर पेट नहीं भरा?” छेड़ रही थी मैं।
“ओ मॉम, आप तो बस….”
“क्या आप तो बस? जानती हूं, सब समझती हूं।”
“फिर भी?”
“तेरे मन में क्या चल रहा है, वह भी समझती हूं।”
“ओह मेरी अंतर्यामी मॉम, क्या चल रहा है बोलो?” उठ कर सीधे मेरे पास आया और मुझे अपनी बांहों में ले कर पूछा।
“बोलूं?”
“हां।”
“रश्मि को चोदने का ख्याल।” उसकी बांहों में बंधी, उसके कान में बोली।
“वाह मेरी लक्ष्मीबाई, लंडरानी माता श्री, तुम तो सचमुच अंतर्यामी हो।” मुझे चूमकर बोल उठा मेरा चोदू बेटा। मेरी योनि पर उसके तने हुए लिंग का दबाव स्पष्ट अनुभव कर रही थी।
“हो गया तुम्हारा? अब छोड़ मुझे, संभाल अपने पपलू को, शैतान मेरी मुनिया को ही ठोक डालने को फड़फड़ा रहा है।” मैं उसकी मजबूत बांहों की पकड़ से छूटने की कोशिश करती हुई बोली।
“तो क्या हुआ? दे ही दो न ठोकने।” ढिठाई पर उतर आया था वह।
“अरे कमीने, घर में ही नयी नयी शिकार हाजिर है और मुझ पर ही सवारी गांठने के पीछे मरे जा रहे हो?”
“ककककौन? रश्मि?”
“और नहीं तो कौन?
“तैयार हो जाएगी?”
“क्यों नहीं होगी? कोशिश तो कर।”
“पहले तुम जान लो ना मॉम, वह इस तरह की है क्या?”
“इसमें जानना क्या है? पटाना है फिर डुबकी लगा लेना है।”
“फिर भी।”
“अरे बेवकूफ, हर बार मैं ही रहूंगी क्या तेरे साथ? मुझे चोद लिया, रेखा को चोद लिया, अब भी मेरी जरूरत है क्या? भगवान की मेहरबानी देख, अब रश्मि हमारी गोद में आ गिरी।”
“प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज मॉम, बस यह आखिरी बार, फिर नहीं बोलूंगा।”
“ठीक है, ठीक है बाबा ठीक है, यह आखिरी बार है, इसके बाद तुझे खुद शिकार करना है।”
“ठीक है मॉम ठीक है, ओह माई स्वीट मॉम, आई लव यू।” मुझे बांहों में कस कर भींच लिया और प्रगाढ़ चुम्बन अंकित कर दिया मेरे होठों पर। खुशी न सिर्फ उसके चेहरे पर थी बल्कि उसका पपलू भी मानो खुशी के मारे उछल पड़ा था। ऐसा लगा मानो उसके चड्ढी और पजामे के साथ साथ मेरी कमीज, सलवार और पैंटी को भी फाड़ डालेगा।
“चल हट मां के लौड़े, मस्का मार रहा है। ठीक है मैं जाती हूं उसके पास, पच्चीस तीस मिनट बाद पहुंच जाना, बुड्ढे हरिया को लेकर।” कहते हुए मैं अपने कमरे में दाखिल हुई। रश्मि हाथ मुह धो कर तरोताजा दिख रही थी। खूबसूरती और निखर गयी थी।
“वाऊ, ब्यूटीफुल। गजब की खूबसूरत हो तुम तो।” प्रशंसात्मक स्वर में बोली मैं।
“हटो, तुम भी ना।”
“कसम से, मर्द होती तो टूट पड़ती तुम पर।”
“क्या मतलब?”
“तुम बहुत सेक्सी हो।” आगे बढ़ कर अपनी बांहों में भर कर बोल उठी मैं।
“अरे अरे ककक्या करती हो?” अकचका कर बोली वह।
“प्यार कर रही हूं पगली।” चूम उठी उसके मक्खन जैसे चिकने गाल को। दरअसल रेखा की नग्न देह के साथ खेलकर समलैंगिक संबंध का जो लुत्फ मैंने उठाया था उससे मेरे अंदर भी समलैंगिक संबंध में रुचि जाग गयी थी। इससे पहले मैंने किसी स्त्री की नग्न देह के साथ संपर्क करने के बारे में कभी सोचा भी नहीं था। किसी दूसरी स्त्री की खूबसूरती मुझे आकर्षित अवश्य करती थी, किंतु इस तरह अंतरंग संबंध बनाने के बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था। क्षितिज के लिए रेखा को पटाने के दौरान मैं रेखा के जिस्म से खेलते हुए जिस आनंदमय पलों से गुजरी वह अकथनीय था। अब रश्मि जैसी खूबसूरत स्त्री हाथ लगी तो मुझ से रहा नहीं जा रहा था। मेरे अंदर उसी कामक्रीड़ा की पुनरावृत्ति करने और यौनसुख प्राप्त करने की चाहत पुनः जागृत हो उठी थी।
“चल हट बदमाश।” वह मुझसे छूटने की असफल कोशिश करती हुई बोली। उसकी बोली में कुछ खास दम नहीं था और न ही उसके शारीरक विरोध में। पिघल रही थी मेरी बांहों में।
“कुछ न बोल, पगली तू नहीं जानती कितनी खूबसूरत और सेक्सी है तू।” मैंने उसके कमजोर पड़ते विरोध को ताड़ कर उसके चेहरे पर बेहताशा चुम्बनों की झड़ी लगा बैठी। उसे लिए दिए बिस्तर पर गिर पड़ी मैं। उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। “उफ्फ्फ्फ मेरी जान, तूने तो मुझे ही इतनी दीवानी बना दिया तो बाकी मर्दों का क्या होता होगा।” चूमती जा रही थी और उसकी कामुक भावनाओं को भड़काती जा रही थी। धीरे धीरे उसका वह कमजोर विरोध, जो शायद, शायद क्या, अवश्य दिखावटी विरोध भी खत्म हो गया।
“आह, आह, ओह ओह्ह्ह्ह्, यह तूने क्या कर दिया आह।” वह बेहद कमजोर स्वर में बोली। फिर पता नहीं क्या हुआ उसे, अकस्मात ही मुझसे बेसाख्ता लिपट गयी और मेरे चुम्बनों का प्रतिदान अपने चुम्बनों से देने लगी। अचंभित हो उठी मैं। उसने अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दिया और चुभलाने लगी। कहां मैं उसे उत्तेजित करना चाहती थी और अब मैं खुद उत्तेजना के मारे बेहाल होने लगी। उसकी पकड़ मेरे तन पर बेहद सख्त हो उठी। उसके सख्त उरोजों से मेरे उन्नत उरोज पिसे जा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो सारा नियंत्रण अब उसके हाथों में है और मैं उसके अधीन हूं। वह मेरे ऊपर सवार थी और मैं उसके नीचे। अब आगे जो कुछ करना था, वह खुद कर रही थी। कमान अब उसने खुद संभाल लिया था, अतः मैंने खुद को उसके रहमोकरम पर छोड़ कर उसके हर कृत्य में सहयोग करना ही मेरे लिए उचित जान पड़ रहा था। जितनी वह खुल कर खेले, मेरे लिए उतना ही सहूलियत भरा, आनंददायक होता। मैं खुद भी चाहती थी कि उसकी कामुक भावनाएं इतनी भड़क जाएं कि वह सारी वर्जनाओं और शर्म लिहाज को ताक पर रख कर अपनी कामुकता का खुल कर प्रदर्शन करे और मैं इस खेल का भरपूर आनंद उठा सकूं। वासना की ज्वाला इतनी धधक उठे कि न सिर्फ मैं, बल्कि क्षितिज भी इसकी कमनीय देह का खुल कर रसास्वादन कर सके। जितनी कमसिन, नाजुक मैं उसे समझ रही थी उतनी थी नहीं। उसने मेरे उरोजों को मेरी कमीज के ऊपर से ही दबोच लिया।
“उई मांं््आआ््आआ।” चिहुंक उठी मैं। इतने पर ही कहाँ रुकी वह, बड़ी बदहवासी के आलम में मेरे कमीज को उतार फेंका उसने। मैं कहां पीछे रहने वाली थी, उसके ढीले ढाले टॉप को पलक झपकते उसके तन से अलग कर दिया। अब हम दोनों के कमर से ऊपर का हिस्सा अर्धनग्न हो चुका था। हम दोनों सिर्फ ब्रा में थे। गजब की खूबसूरत काया थी उसकी। मैं ब्रा के ऊपर से ही उसके सख्त उरोजों को पकड़ कर दबाने लगी।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, इस्स्स्स्स्स मां्मां्आ्आ्आ्आ।” उसकी आनंदभरी सीत्कारों से कमरा गुंजायमान हो उठा। “जादूगरनी कहीं की, पागल कर दिया मुझे आआआआआह्ह्ह्ह्ह।” अब और रहा नहीं जा रहा था, शरीर तप रहा था। एक एक करके हमारे तन से कपड़े केले के छिलके की तरह उतरते चले गये और लो, हम दोनों मादरजात नंगे हो गये। इधर मैं उसके सुगठित कमनीय दपदपाती काया की छटा निहारती रह गयी, क्या शरीर था उसका। करीब पांच फुट पांच इंच लंबी छरहरी काया, जिस पर करीब 34″ साईज की फड़फड़ाती चमकती चूचियां गर्व से सर उठाये आमंत्रित कर रही थीं और उन पर खड़े निप्पल्स, वाह, करीब 26″ की चर्बी रहित चिकनी पतली कमर गजब की खूबसूरत और कमर से नीचे ताकरीबन 37″ की चूतड़, जांघें संगमरमर की तरह तराशी हुई, उफ्फ्फ्फ, जांघों के मध्य चकाचक, बाल रहित चिकनी योनि, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, कुल मिलाकर सुंदरता की जीती जागती प्रतिमूर्ति थी वह। इधर मैं चमत्कृत दीदार कर रही थी उसकी सुंदरता का, वहीं वह मेरी काया की खूबसूरती में मानो खो सी गयी थी। अगले ही पल जैसे ही हमारी तंद्रा भंग हुई, बदहवास, भूखी शेरनियों की तरह टूट पड़ीं हम दोनों एक दूसरे पर। मैं उसे अपनी बांहों में दबोचे उसकी बड़ी बड़ी चूचियों पर टूट पड़ी। सहलाने लगी, दबाने लगी और मुह में भर कर चूसने का असफल प्रयास करने लगी। वह भी मेरे सर को दोनों हाथों से पकड़ कर अपनी चूचियों से सटा कर सिसक उठी।
“आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी जान, उफ्फ्फ्फ, पी जा, चूस ले, आह” वह बोलती जा रही थी। अब इधर मेरा दायां हाथ उसके गोल गोल नितंबों पर नृत्य करने लगा था। मैं सहला रही थी, दबा रही थी उसके चिकने गोल गोल नितंबों को। बीच बीच में मैं उसकी योनी को सहलाती जा रही थी। उसकी योनि में रसलसापन आ चुका था। अब और इंतजार नहीं हो सका हमसे। हमने पैंतरा बदल कर 69 की पोजीशन ले लीं। मैं उसकी चिकनी योनि पर जीभ फिराने लगी। चाटने लगी, चूसने लगी उसके भगनासे को।
“ओह्ह्ह्ह्ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” सिसिया उठी वह। साथ ही वह भी मेरी फकफकाती योनि के भगांकुर को जीभ से चपाचप चाटने में मशगूल हो गयी।
“आह आआआआआह्ह्ह्ह्ह,” आनंदातिरेक में थरथर कांपने लगी मैं और तत्काल ही मेरा स्खलन होने लगा। उफ्फ्फ्फ बखान नहीं कर सकती उन पलों के आनंद के बारे में। मैं अपनी जांघों से उसके सर को दबोच कर स्खलन के सुख में डूब गयी। यही हाल रश्मि का भी था। वह भी उसी समय झड़ने लगी। उस प्रथम स्खलन से निवृत हो कर कुछ मिनट हम निढाल हो गये।
“इतना सुखद, इतना आनंद, आह्ह्ह् जादुगरनी चुड़ैल।” वह लंबी लंबी सांसें लेती हुई बोली। “औरत होकर इतना आनंद दे सकती हो, काश, काश तुम मर्द होती।”
“मर्द होती तो?” मैं उसके चिकनी चूत को सहलाते हुए बोली।
“चुद गयी होती, कमीनी।” वह मुझसे पुनः लिपट गयी और चूमते हुए बोली। उसके हाथ भी मेरी योनि को सहला रहे थे और लीजिए जनाब, कुछ ही देर में हम दोनों पुनः उत्तेजित हो उठे। उत्तेजना के मारे उसका शरीर अकड़ने लगा। मेरा शरीर के अंदर भी उत्तेजना का दावानल धधक उठा।
“लंड चाहिए, लंड चाहिए मुझे, ओह्ह्ह्ह्ह्ह,” बिस्तर से उठ गयी वह।
“कहां चली?” मैं वासना की अग्नि में झुलसती बोली।
“डिल्डो, मेरा डिल्डो, बैग से निकाल लूं।” वह बोली।
“बेजान लंड? साली जीवित लंड ले ले।”
“कहां है? कहां है जीवित लंड?”
“कैसा लंड चाहिए? जवान कि बूढ़ा।”
“हरामजादी, मुझे लंड चाहिए, जवान, बूढ़ा, कैसा भी, आई नीड कॉक, द फकिंग कॉक ईडियट।” तड़प कर बोली वह। मैं उसकी भड़क उठी वासना की तपिश महसूस कर विस्मित थी। इतनी भूख? इतना पागलपन? मानो जल रही हो कामोत्तेजना की धधकती ज्वाला में।
“लो आ गया लंड।” मेरे ताली बजाने की देर थी, जिन्न की तरह प्रकट हो गया क्षितिज और ठीक उसके पीछे पीछे हरिया।
रश्मि ने स्वप्न में भी इस बात की कल्पना नहीं की थी होगी। मन की मुराद इस तरह से इतनी जल्दी और तत्काल पूरी होगी, कल्पनातीत सा प्रतीत हो रहा था उसे। अचंभित रह गयी, अवाक्, अविश्वसनीय दृष्टि से देखती रह गयी। अचंभा तो उसे इस बात पर ही बहुत हो रहा था कि अपनी नंगी मां के सामने क्षितिज इतनी बेबाकी से खड़ा था। उसे क्या पता था कि हम मां बेटे के बीच, मां बेटे के तथाकथित पवित्र संबंध की पवित्रता को हम तार तार करके आम स्त्री पुरुष की तरह एक दूसरे के तन का रसास्वादन कर चुके हैं।
मैं रश्मि की दृष्टि का अर्थ समझती हुई बोली बेशरमी से बोल उठी, “चौंको मत, चकित भी मत हो, लंड चाहिए ना?”
“हां री हां, मगर तू इस तरह अपने बेटे के सामने?” आश्चर्यमिश्रित स्वर में बोली।
“तुझे इससे क्या? बोल किसका लंड चाहिए? क्षितिज का या हरिया का।” मैं सामान्य स्वर में बोली।
वह अब भी अविश्वास से कभी मुझे, कभी क्षितिज को देख रही थी। “लेकिन, लेकिन क्षितिज तो तुम्हारा कोखजाया बेटा है ना! अपनी मां को इस तरह नंगी अवस्था में देखकर भी? और तू? छिनाल कहीं की।”
“चुप हरामजादी, अभी लंड लंड चिल्ला रही थी, और अब मां बेटे का पचड़ा लेकर बैठ गयी।” खीझ कर मैं बोली। “मुझे छिनाल मत कह। शारीरिक भूख को लेकर मेरा दर्शन है, ‘लंड न चीन्हे मां, बेटी, बहन, साली, भाभी, चाची, मामी और भी रिश्ते नाते वाली स्त्रियों की चूत और उसी तरह चूत न चीन्हे बेटा, बाप, भाई, जीजा, देवर, चाचा, मामा, और भी रिश्ते नातों वाले पुरुषों के लंड। स्त्री सिर्फ स्त्री होती है चुदने के लिए, चाहे मर्द कोई भी हो और मर्द सिर्फ मर्द होता है चोदने के लिए, चाहे स्त्री कोई भी हो।’ जिंदगी का मजा लेना है तो रिश्ते नाते अपनी चूत में डाल।”
“डाल दिया।” अबतक मंत्रमुग्ध मेरा दर्शन सुनते अनायास उसके मुह से निकला, लेकिन तत्काल ही उसने जीभ निकाल कर दांतों से काट लिया। क्या उसकी जुबान फिसल गयी थी? शायद हां। शायद क्यों, अवश्य।अविश्वसनीय था मेरा कथन उसके लिए लेकिन अंदर ही अंदर खुश भी हो रही थी, क्यों? यह बाद में हमें पता चला।
“क्या?”
“कुछ नहीं, कुछ नहीं।” जल्दी से बोल उठी वह।
“कुछ तो है।”
“बाद में बताऊंगी।”
“तुम्हारी मर्जी। अब इतना जान गई हो तो यह भी जान लो कि क्षितिज न सिर्फ मेरा बेटा है, बल्कि मेरा बेड पार्टनर भी है और यह जो बूढ़ा हरिया, साला ठरकी, कम बड़ा चुदक्कड़ नहीं है। न जाने कितनी बार मुझे चोद चुका है, कितनी औरतों पर मुह मारता फिरता रहता है, फिर भी इस हरामी का पेट ही नहीं भरता है। अब आगे तेरी मर्जी।”
“मेरी मर्जी? साली मुझे इस हाल में पहुंचा कर मर्जी पूछती है? इस तरह गरम करने के बाद मर्जी पूछती है? अब मैं अपनी मर्जी बताने लायक हूं क्या?”
“तो चुन ले इनमें से।”
खिल उठी थी वह, किंतु अनिश्चय का भाव था चेहरे पर। उन दोनों के बीच चुनाव की दुविधा। निश्चित तौर पर प्राथमिकता क्षितिज को ही मिलनी थी, स्वस्थ, सुगठित, शारीरिक सौष्ठव की मिसाल था क्षितिज। हम दोनों की नग्न देह क्षितिज और हरिया को आमंत्रित कर रही थी। खास करके रश्मि की खूबसूरती, जिसे वे दोनों लार टपकाती नजरों से अपलक देखे जा रहे थे। मेरी दिली तमन्ना थी कि पहले क्षितिज को ही अवसर मिले रश्मि के तन से खेलने का, भोगने का। रश्मि को भी निर्णय लेने में देर नहीं लगी।
“क्षितिज। क्षितिज का लंड। देखूं तो मैं भी इस मां के लौड़े के लंड का दम।” व्यग्र हो रही थी, चुदने के लिए।
“आजा मेरे बच्चे, आजा। दिखा दे रश्मि की बच्ची को अपना जलवा।”
“आया मॉम, आया। जब से रश्मि जी की खूबसूरती को देखा है, मेरा लौड़ा टनटनाए खड़ा है, मान ही नहीं रहा है यह चूत का रसिया। गजब की खूबसूरत हो रश्मि जी। जैसा चेहरा, वैसा तन। वाह, मजा आ गया।” कैसे ललचाई नजरों से देखता हुआ बोल रहा था मेरा प्यारा हरामी मादरचोद। हवस का पुजारी बनता जा रहा था मेरा बेटा। फटाफट अपने कपड़े उतार कर तैयार पूरा कामदेव का अवतार लग रहा था। रश्मि उसकी सुंदर सुगठित देह को हसरत भरी नजरों से निहारती रह गयी। मुख्य आकर्षण था उसका आठ इंच लंबा, जो इस वक्त रश्मि की चित्ताकर्षक, कामोत्तेजक नग्न देह के दर्शन के असर से करीब नौ इंच लंबा और तीन की जगह चार इंच मोटा फनफनाता भीमकाय लिंग। एकबारगी तो रश्मि की घिग्घी बंध गयी। कहीं वासना की ज्वाला में धधकती उसने किसी मुसीबत को आमंत्रण तो नहीं दे डाला था? घबराहट उसके चेहरे पर परिलक्षित हो रही थी, किंतु आ बैल मुझे मार वाली कहावत को साक्षात चरितार्थ होते देखने के सिवाय उसके पास और कोई चारा भी तो नहीं था। क्षितिज अपने भीमकाय, लंबे तने हुए लिंग के साथ रश्मि की ओर बढ़ रहा था।
“ओ मांआ्आ्आ्आ, इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ।” विस्फारित नेत्रों एकटक क्षितिज के तने हुए भीमकाय लिंग को देखती रह गयी।
“क्या हुआ?” क्षितिज बोला।
“ओ बाबा, मर जाऊंगी मैं। आगे न आना।” भयाक्रांत स्वर से रश्मि बोली।
“चुप कर, अभी लंड लंड बोल रही थी अभी और लंड मिला तो डर रही है।” मैं बोली।
“लंड मतलब आदमी का लंड, किसी गधे का लंड नहीं बोली थी।” रश्मि बोली।
“क्या कहा? गधे का लंड? क्षितिज, रुक मत, चोद डाल हरामजादी को। कभी हां, कभी ना। मजाक समझ रही है?” खीझ कर बोली मैं।
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज।”
“अब क्या नहीं। मेरा पपलू आपकी मुनिया से प्यार किए बिना थोड़ी न मानेगा?” क्षितिज बोल उठा।
“फट जाएगी मेरी।”
“फटने दे, उसके बाद मजा आएगा।”
“बहुत दर्द होगा।”
“होने दे, उसके बाद मजा आएगा।”
“मर जाऊंगी।”
“मरने नहीं दूंगा, मजा दूंगा।”
“डायलॉग बाजी बंद कर, चोद डाल मां की लौड़ी को।” चीखी मैं।
……. मैं खुद भी चुदने के लिए मरी जा रही, मैं हरिया को ललकार बैठी। “उधर कहां देख रहा है बुड्ढे, इधर आ मेरी तरफ बेटीचोद, साले ठरकी बुढ़ऊ। कब से मरी जा रही हूं लंड खाने के लिए बूढ़े कुत्ते।” मैं जानबूझ कर उसकी वृद्धावस्था पर ताना कसते हुए और गाली देते हुए चिढ़ा रही थी, ताकि मुझ पर पूरे आक्रोश के साथ, पूरी बेदर्दी और जोश खरोश के साथ अपनी दरिंदगी भरी नोच खसोट पर उतर आए। निकाल दे अपने दिल की सारी भंड़ास।
“आया साली कुतिया, अभी आया, बुड्ढा बोलती है बुरचोदी, मां की लौड़ी।” मेरी बात उसकी मरदानगी को लग गयी, चिढ़ गया वह। मेरी बातों में उसके बुढ़ापे को चुनौती थी, मरदानगी पर तंज था। खूंखार दृष्टि से मुझे देखते हुए भंभोड़ डालने को आतुर अपने कपड़े उतार कर मादरजात नंगा हो गया और किसी बूढ़े किंतु भीमकाय बनमानुष की तरह मेरी नग्न देह पर झपटा वह बूढ़ा चुदक्कड़ भेड़िया। उसका शरीर अवश्य बूढ़ा था किंतु उसका आठ इंच लंबा लिंग फन उठा कर मुझे डंसने को उतावला हो रहा था। मुझे नोचने, निचोड़ने, झिंझोड़ने, कूद ही तो पड़ा मुझ पर और मुझे पटक कर मुझ पर चढ़ बैठा। मैं खुद भी तो इस वक्त यही चाहती थी, कोई मुझे नोच डाले, निचोड़ डाले, भंभोड़ डाले, रगड़ डाले, मेरी वासना की भभकती ज्वालामुखी को शांत कर दे। उत्तेजना के मारे मेरा बुरा हाल हो रहा था, चुद जाने को बेहाल, बदहवासी के आलम में, नुचने को ललायित, पगलाई हुई कुतिया की मानिंद। चाहती तो उसी वक्त हरिया का हुलिया दुरुस्त कर सकती थी, उसका सारा आक्रोश भरा जोश उसकी गांड़ में घुस जाता, लेकिन उस वक्त तो मुझे अपने तन की अगन बुझाने हेतु एक मर्द की बेकरारी से तलब हो रही थी। अभी इस भड़की कामुकता की ज्वाला में धधकती, अंधी हो चुकी अवस्था में मुझे कोई भी चोद सकता था, बूढ़ा, जवान, लंगड़ा, लूला, पागल, भिखमंगा, कोई भी लंड वाला मर्द।
उधर रश्मि की ना नुकुर और चीख पुकार की परवाह किए बिना मेरा आज्ञाकारी पुत्र चढ़ बैठा रश्मि के ऊपर और इधर मुझ पर कहर बरपाने हरिया चढ़ दौड़ा था।
“ओह्ह्ह्ह्, आह्ह्ह्ह्ह्,” मैं हरिया की देह से पिसती सिसक उठी। उस कमीने ने मेरी बड़ी बड़ी चूचियों को अपने पंजों में दबोच लिया औल मसलते हुए चुचुकों को मुह में भर भर कर चूसना, काटना आरंभ कर दिया। दर्द मिश्रित आनंद से कसमसा उठी मैं, “उई मा्ंंआ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।”
उधर रश्मि चीख रही थी, “आह्ह्ह्ह्ह्, न्न्न्न्ह्ह्ह्ही्हीं्ही्हींईंईंईं।”
क्षितिज अब कहां रुकने वाला था, “आह्ह्ह्ह्ह्, हां्हां्आं्आं्आं।”
“ओह मां्मां्आ्आ्आ्आ।”
“हां्हां्आं्आं्आं मां्मां्आ्आ्आ्आ।” उसके दोनों पैरों को फैला कर तैयार, लंड डालने को उसकी चिकनी चमचमाती चूत में।
“आह ना्न्न्न्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह।”
“आह हां्हां्आं्आं्आं।” चूत के द्वार पर अपने लंड को सटा चुका था।
“हाय आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।”
“चू्ऊऊ््ऊऊ््ऊऊप्प्प्प्प्प,” क्षितिज अब गुर्रा उठा।
“मर्र्र्र्र्र जाऊंगी बाबा।”
“ले बुरचोदी मर।” गुस्से में एक करारा ठाप मार दिया।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, फट्ट्ट्ट्ट गयी” दर्द से चीख उठी रश्मि।
“और ले हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्।” एक और करारा ठाप। उतार दिया पूरा का पूरा नौ इंच का लिंग, ककड़ी की तरह चीरता हुआ उसकी चूत में।
“ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह बाबा, मोरी जाबो गो, चीड़े दिलो मां गो्ओ्ओ्ओ्ओ।” (मर जाऊंगी, फाड़ दिया।)
“गया, आह पूरा घुस गया, उफ्फ्फ्फ मस्त टाईट चूत, ओह रश्मि रानी, आह।” क्षितिज ने किला फतह कर लिया था। रश्मि की चीख पुकार की परवाह किए बगैर दनादन दनादन उसकी गांड़ को दबोचे मशीनी अंदाज में लगातार कई
ठाप लगा बैठा वह, जानता था कि अब रुकना बेकार है, इसी तरह वह न न करती रहेगी और मैं मुह बाये देखता रहुंगा, जो कि इस वक्त उसे गंवारा नहीं था।
“ओ बाबा््आआ, ओ मां््आआ” चीखती रही चिल्लाती रही रश्मि, लेकिन अब क्षितिज के लंड को तो मिल गया था रश्मि की टाईट चूत का स्वाद, बाघ को खून का स्वाद मिल गया था। लगा रहा धकाधक, भकाभक, खचाखच, गचागच, ठाप पर ठाप लगाने। उसकी ठापों की वजह से और रश्मि की चूत से निकलते लसलसे रस की वजह से क्षितिज के लिए चोदना सुगम हो गया था, वहीं खुद रश्मि भी आरंभिक पीड़ा से निजात पा चुकी थी। वही रश्मि जो कुछ पलों पहले चीख चिल्ला रही थी, अब आंखें बंद किए सिसकियां ले रही थी, “आह ओह आह ओह इस्स्स्स्स्स, हाय, उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ, आह।” उसकी आंखों की अश्रु धारा सूख चुकी थी। अपने दोनों पैरों से क्षितिज की कमर को लपेटे मगन, चुदी जा रही दी। “ओह मां ओह मां एतो दारून, एतो आनोंदो, ओह्ह्ह्ह् बाबा, चोद बाबा चोद।” कमर उछाल उछाल कर चुदे जा रही थी।
“आह साली, ओह रश्मि डियर, आह आह मजा, बड़ा मजा आ रहा है, ओह उफ्फ्फ्फ ओह।” क्षितिज दनादन ठोके जा रहा था।
इधर हरिया मेरे दोनों पैरों को अपने कंधों पर चढ़ा कर अपना पूरा का पूरा लंड मेरी चूत में उतार चुका था।
“आह्ह्ह्ह्ह्”
“ले कुतिया््आआ।”
“आह हां कुत्ते््एए।”
“हरामजादी््ईई।”
“हां हरामजादे््एए।”
“साली बुरचोदी््ईई।”
“साले लौड़े के ढक्कन।”
“रंडी्ई्ई्ई्ई्ई्ई्ई, लंडखोर।”
“चूतखो्ओ्ओ्ओ्ओर।”
“और ले हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्।”
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” उसके हर ठाप में गुस्सा था, हर ठाप में खीझ थी, हर ठाप में झुंझलाहट थी, हर ठाप भीषण था, हर ठाप हौलनाक था। मुझे कुचल देने की जद्दोजहद, मुझे मसल देने की पुरजोर कोशिश थी, और मैं छिनाल, आनंदभरी सिसकारियों के साथ उसकी हर जालिमाना हरकत से हलकान होने की बजाय डूबी जा रही थी मस्ती के सागर में।
अबतक क्षितिज रश्मि की चूत को ढीली कर चुका था, सारा कस बल निकाल चुका था, “आह, ऐसे नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, ऐस्स्स्स्स्स्आआआआ नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, मुझे कुतिया बना हरामी, कुत्ती की तरह चोद मां के लौड़े, आह ओह, पीछे से आह मुझे कुतिया की तरह पीछे से चोद ओह ओह, हां हां हां ऐसे ही हां हां ऐसे ही आह।” रश्मि अब पूरी तरह मस्ती में भर कर चुदवा रही थी।
… .. क्षितिज ने तत्काल ही उसे चौपाया कुतिया बना दिया और खुद पीछे से उसके ऊपर चढ़ कर कुत्ते की तरह चोदने में मशगूल हो गया, “आह आह हां हां मेरी कुतिया, ओह हां ऐसे ही ओह मजा आ रहा है ओह रश्मि डियर उफ्फ्फ्फ मस्त,” पीछे से उसकी चूचियों को दबोच दबोच कर चोद रहा था। उधर छितिज रश्मि के शरीर का उपभोग कर रहा था और इधर हरिया मेरे तन को निचोड़ रहा था निहायत ही नृशंसता के साथ। रश्मि और मैं यही तो चाहते थे। खूब हंगामा खेज ढंग से हमारे तन की कुटाई होती रही करीब आधे घंटे तक। उफ्फ्फ्फ, मजा आ गया। जब हम स्खलित हो कर एक निढाल हुए, तृप्ति की मुस्कान थी हम दोनों के चेहरे पर। क्षितिज निहाल, रश्मि हलाल हो कर निहाल, मैंं भी हलाल हो कल निहाल और हरिया? हरिया तो अपनी मर्दानगी साबित कर निहाल।
“वाह मेरे बूढ़े शेर।” मैं हरिया से चिपटी गदगद, बोल उठी।
……..”आया मजा, हरामजादी, बूढ़े के लंड से?”
“हां राजा, ओह हां मेरे लंड राजा।”
“तो अब चैलेंज करोगी?”
“हां्हां्आं्आं्आं, बार बार करूंगी।”
“बार बार रगड़ूंगा।”
“बार बार रगड़ो राजा, मना कौन कर रहा है यहां।”
“आह क्षितिज, ओह्ह्ह्ह् राजा, स्वर्ग दिखा दिया तुने।” उधर रश्मि बोली।
. “स्वर्ग तो यहां है, आपकी चूत में, आह मजा आ गया रश्मि डार्लिंग।” खुशी से ओतप्रोत क्षितिज बोला।
“हां तो रश्मि रानी, अब क्या इरादा है? अब जाना नहीं है अपने भाई के घर?” मैं बोली।
“जाऊंगी बाबा जाऊंगी। भगा रही हो क्या?”
“अरे नहीं रे पगली, भगाऊंगी क्यों? यहीं रह जा।”
“ना बाबा ना, भाई भाभी को पता चला तो जान ले लेंगे।”
“ऐसे कैसे ले लेंगे जान। मैं हूं ना।”
“अरे नहीं, ऐसी बात नहीं है। आखिर आई तो उन्हीं के यहाँ ना।”
“ठीक है, ठीक है चली जाना, खाना खा कर।”
“खा चुकी।”
“हरामजादी, लंड खाना और खाना खाना एक ही बात है क्या? अच्छा यह बता, कैसा लगा?”
“हाय्य्य्य्य, दिल खुश कर दिया तेरे चोदू बेटे ने तो।”
“इधर यह बुढ़ऊ भी है। एक हमारा ड्राईवर भी है। सबके सब एक नंबर के चुदक्कड़ हैं। तू जितने दिन यहां रहेगी, मजे करेगी। कल से तो मैं ऑफिस जाऊंगी। तू आकर मजे लेती रहना इन लोगों से। ऑफिस से आने के बाद मैं भी साथ दे दूंगी। और भी लोग हैं यहां, तू चाहे तो लाईन लगवा दूंगी। अरे हां, एक बात पूछना तो भूल ही गयी, तभी तू क्या कह रही थी, बाद में बताऊंगी बोल रही थी?”
“ओह्ह्ह्ह्, अच्च्च्च्छ्छ्छा्आ्आ्आ, वो? बताऊंगी। खाना खाने के बाद बताऊंगी। उस समय थोड़ी झिझक रही थी, मगर अब कोई टेंशन नहीं है बताने में। खास कर तुम मां बेटे के बीच के खुले रिश्ते को देख कर अब कोई झिझक नहीं है।”
“ओके, तो अब खाने की तैयारी की जाय। हरिया साहब जी, मेरी चूत का बाजा बजाने के बाद अब बराए मेहरबानी लजीज खाने की व्यवस्था करने की जहमत उठाएंगे?”
“अवश्य हमारी बुरचोदी मलिका। बंदा अभी आपके हुक्म की तामिल करता है।” हमारे वार्तालाप के ढंग पर सभी ठठाकर हंस पड़े।
