नौकरानी के घर का दूध 1

नौकर नौकरानी

“पड़े रहो बाबूजी,
अभी थोड़े छ्चोड़ूँगी तुमको, घंटा भर चोदुन्गि, बहुत दिन बाद लंड मिला है
और वो भी ऐसा शाही लॉडा. और देखो मैं कहूँ तब तक झड़ना नही, नही तो मैं
आपकी नौकरी छ्चोड़ दूँगी” एस मीठी धमकी के बाद मेरी क्या मज़ाल थी झदाने
की. घंटे भर तो नही, पर बीस एक मिनिट मंजू बाई ने मुझे खूब चोदा, अपनी
सारी हवस पूरी कर ली. चोदने मे वह बड़ी उस्ताद निकली, मुझे बराबर मीठी
च्छुरी से हलाल करती रही, अगर मैं झदाने के करीब आता तो रुक जाती. मुझे
और मस्त करने को वह बीच बीच मे खुद ही अपनी चूंचियाँ मसल्ने लगती. कहती
“चुसोगे बाबूजी?” और खुद ही झुक कर अपनी चून्चि खींच कर निप्पल चूसने
लगती. मैं उठकर उसकी चून्चि मुँह मे लेने की कोशिश करता तो हंस कर मुझे
वापस पलंग पर धकेल देती. तरसा रही थी मुझे! दो बार झदाने के बाद वह मुझ
पर तरस खाकर रुकी. अब मैं वासना से तड़प रहा था. मुझसे साँस भी नही ली जा
रही थी. “चलो पिछे खिसक कर सिरहाने से टिक कर बैठ जाओ बाबूजी, तुम बड़े
अच्छे सैयाँ हो, मेरी बात मानते हो, अब इनाम दूँगी” मैं सरका और टिक कर
बैठ गया. अब वह मेरी ओर मुँह करके मेरी गोद मे बैठी थी. मेरा उच्छलता लंड
अब भी उसकी चूत मे क़ैद था. वह उपेर होने के कारण उसकी छाती मेरे मुँह के
सामने थी. पास से उसके सेब से मम्मे देखकर मज़ा आ गया. किशमिश के दानो
जैसे छ्होटे निप्पल थे उसके और तन कर खड़े थे. मंजू मेरे से लाड करते हुए
बोली “मुँह खोलो बाबूजी, अपनी मंजू अम्मा का दूध पियो. दूध है तो नही
मेरी चून्चि मेी, झुत मूत का ही पियो, मुझे मज़ा आता है” मेरे मुँह मे एक
घुंडी देकर उसने मेरे सिर को अपनी छाति पर भींच लिया और मुझे ज़ोर ज़ोर
से चोदने लगी. उसका आधा मम्मा मेरे मुँह मे समा गया था. उसे चूस्ते हुए
मैने भी नीचे से उचक उचक कर चोदना शुरू कर दिया, बहुत देर का मैं इस
च्छुरी की धार पर था, जल्द ही झाड़ गया. पड़ा पड़ा मैं इस मस्त स्खलन का
लुत्फ़ लेने लगा. मंजू उठी और मुझे प्यार भरा एक चुम्मा देकर जाने लगी.
उसकी आँखों मे असीम प्यार और तृप्ति की भावना थी. मैं उसका हाथ पकड़कर
बोला. “अब कहाँ जाती हो मंजू बाई, यहीं सो जाओ मेरे पास, अभी तो रात बाकी
है” वह हाथ छुड़ा कर बोली “नही बाबूजी, मैं कोई आपकी लुगाई थोड़े ही हूँ,
कोई देख लेगा तो आफ़त हो जाएगी. कुच्छ दिन देखूँगी. अगर किसी को पता नही
चला तो आप के साथ रात भर सोया करूँगी” मुझे पक्का यकीन था कि इस कालोनी
मे जहाँ दिन मे भी कोई नही होता था, रात को कोई देखने वाला कहाँ होगा!.
और उसका घर भी तो भी मेरे बंगले से लगा हुआ था. पर वह थोड़ी घबरा रही थी
इसीलिए अभी मैने उसे जाने दिया. दूसरे दिन से मेरा जीवन ऐसे निखर गया
जैसे खुद भगवान कामदेव की मुझ पर कृपा हो. मंजू सुबह सुबह चाइ बनाकर मेरे
बेडरूम मे लाती और मुझे जगाती. जब तक मैं चाइ पीता, वह मेरा लंड चूस
लेती. मेरा लंड सुबह तन कर खड़ा रहता था और झाड़ कर मुझे बहुत अच्छा लगता
था. फिर नहा धोकर नाश्ता करके मैं ऑफीस को चला जाता. दोपहर को जब मैं घर
आता तो मंजू एकदम तैयार रहती थी. उसे बेडरूम मे ले जाकर मैं फटाफट दस
मिनिट मे चोद डालता. वह भी ऐसी गरम रहती थी की तुरंत झाड़ जाती थी. इस
जल्दबाज़ी की चुदाइ का आनंद ही कुच्छ और था. अब मुझे पता चला कि ‘चुदाई’
किस चीज़ का नाम है. चुदने के बाद वह मुझे खुद अपने हाथों से प्यार से
खाना खिलाती, एक बच्च्चे जैसे. मैं फिर ऑफीस को निकल जाता. शाम को हम
ज़रा सावधानी बरतते थे. मुझे क्लब जाना पड़ता था. कोई मिलने भी अक्सर घर
आ जाता था. इसलिए शाम को मंजू बस कित्चन मे ही रहती या बाहर चली जाती. पर
रात को ऐसी धुआँधार चुदाई होती की दिन कि सारी कसर पूरी हो जाती. सोने को
तो बारह बज जाते. अब वह मेरे साथ ही सोती थी. एक हफ़्ता हो गया था और रात
को माहौल इतना सुनसान होता था कि किसी को कुच्छ पता चलने का सवाल ही नही
था. वीकेंड मे शुक्रवार और शनिवार रात तो मैं उसे रात भर चोद्ता, तीन चार
बज जाते सोने को. मैने उसकी तनखुवा भी बढ़ा दी थी. अब मैं उसे हज़ार
रुपये तनखुवा देता था. पहले वह नही मान रही थी. ज़रा नाराज़ होकर बोली
“ये मैं पैसे को थोड़ी करती हूँ बाबूजी, तुम मुझे अच्छे लगते हो इसीलिए
करती हूँ.” पर मैने ज़बरदस्ती की तो मान गयी. इसके बाद वह बहुत खुश रहती
थी. मुझे लगता है कि उसकी वह खुशी पैसे के कारण नही बल्कि इसलिए थी की
उसे चोदने को मेरे जैसा नौजवान मिल गया था, करीब करीब उसके बेटे की उमर
का. मंजू को मैं कई आसनो मे चोद्ता था पर उसकी पसंद का आसान था मुझे
कुर्सी मे बिठाकर मेरे उपेर बैठ कर अपनी चून्चि मुझसे चुसवाते हुए मुझे
चोदना. मुझे कुर्सी मे बिठाकर वह मेरा लंड अपनी चूत मे लेकर मेरी ओर मुँह
करके मेरी गोद मे बैठ जाती. फिर मेरे गले मे बाँहे डाल कर मुझे अपनी छाती
से चिपटाकर चोदति. उसकी चून्चि मैं इस आसान मे आराम से चूस सकता था और वह
भी मुझे उपेर से मन चाहे जितनी देर चोद सकती थी क्योंकि मेरा झड़ना उसके
हाथ मे था. उसके कड़े निपल मुँह मे लेकर मैं मदहोश हो जाता. शनिवार
रविवार को बहुत मज़ा आता था. मेरी छुट्टी होने से मैं घर मे ही रहता था
इसलिए मौका देखकर कभी भी उससे चिपत जाता था और खूब चूमता और उसके मम्मे
दबाता. जब वह किचन मे खाना बनाती थी तो उसके पिछे खड़े होकर मैं उससे
चिपेट कर उसके मम्मे दबाता हुआ उसकी गर्दन और कंधे चूमता. उसे इससे
गुदगुदी होती थी और वह खूब हँसती और मुझे दूर करने की झूठी कोशिश करती
“हटो बाबूजी, क्या लपर लपर कर रहे हो कुत्तों जैसे, मुझे अपना काम करने
दो” तब मैं उसके मुँह को अपने मुँह से बंद कर देता. मेरा लंड उसके साड़ी
के उपेर से ही चूतदों के बीच की खाई मे समा जाता और उसे उसकी गांद पर
रगड़ रगड़ कर मैं खूब मज़ा लेता. कभी मौका मिलता तो दिन मे ही बेडरूम मे
ले जाकर फटाफट चोद डालता था.

रे धीरे मेरे दिमाग़ मे उसके उन मस्त चूतदो
को चोदने का ख़याल आने लगा. उसके छ्छूतड़ थे तो छ्होटे पर एकदम गोल और
कड़े थे. चोद्ते समय मैं कई बार उन्हें पकड़ कर दबाता था. इसपर वह कुच्छ
नही कहती थी पर एकाध बार जब मैने उसकी गांद मे उंगली करने की कोशिश की तो
बिचक गयी. उसे वह अच्छा नही लगता था. कब उसकी गांद मारने को मिलती है इस
विचार से मैं पागल सा हो जाता. वह चुदेल औरत भी शायद जानती थी कि मैं
कैसे उसकी गांद को ललचाकर देखता था. इसीलिए मेरे सामने जान बूझकर वह मटक
मटक कर छ्छूतड़ हिलाकर चलती थी. लगता था कि अभी पटक कर उस छिनाल के
छ्छूतदों के बीच अपना लॉडा गाढ दूं. एक दिन मैने साहस करके उससे कह ही
डाला “मंजू बाई, अपने इस सैयाँ को कभी पिछे के दरवाजे से भी अपने घर मे
आने दो, सामने से तुम्हारे घर मे घुसने मे बहुत मज़ा आता है पर पिछे के
दरवाजे से आने मे बात ही और कुच्छ है” वह हंस कर टाल गयी “वाह बाबूजी,
बड़े शैतान हो, सीधे क्यों नही कहते की मेरी गांद मारना चाहते हो. बोलो,
यही बात है ना?” मैने जब थोड़ा सकुचा कर हामी भरी तो तुनक कर बोली “मैं
क्यों अपनी गांद मरवाउ, मेरा क्या फयडा उसमे? और दर्द होगा वो अलग!” वो
पैसे के फ़ायदे के बारे मे नही कह रही थी क्योंकि जब मैने एक बार हिचकते
हिचकते उसकी तनखुवा बढ़ा देने की बात की तो बेहद नाराज़ हो गयी. दो दिन
मुझे हाथ भी नही लगाने दिया. “मुझे रंडी समझा है क्या बाबूजी? कि पैसे
देकर गांद मार लोगे?” गुस्से से बोली. उसे समझाने बुझाने मे मुझे पूरे दो
दिन लग गये. बिल्कुल रूठी हुई प्रेमिका जैसे उसे मनाना पड़ा तब उसका
गुस्सा उतरा. मुझे समझ मे नही आता था की कैसे उसे मनाउ गांद मारने देने
को. एक बार मैने बहुत मिन्नत की तो बोली “तुम्हारा इतना मन है तो देखती
हूँ बाबूजी, कोई रास्ता निकलता है क्या. पर बड़े अपने आप को मेरा सैयाँ
कहते हो! मुझे कितना प्यार करते हो ये तो दिखाओ. मेरी ये रसीली चूत कितनी
अच्छि लगती है तुम्हे ये साबित करो. मुझे खुश करो मेरे राजा बाबू तो मैं
शायद मारने दूँगी अपनी गांद तुमको. मेरे सैयाँ के लिए मैं कुच्छ भी कर
लूँगी, पर मेरा सच्चा सैयाँ बन कर तो दिखाओ” पर यह नही बोलती थी की मैं
कैसे उसे खुश करूँ. मैं चोद्ता तो था उसे मन भर के, उसकी इच्छा के
अनुसार. पर वो और कुच्छ खुलासा नही करती थी की उसके मन मे क्या है. एक
रात मैं मंजू को गोद मे बिठाकर उसे चूमते हुए एक हाथ से उसके मम्मे मसल
रहा था और एक हाथ से उसकी घनी झांतों मेी उंगली डाल कर उसकी बर सहला रहा
था. ऐसा मैं अक्सर करता था, बड़ा मज़ा आता था, मंजू के मीठे मीठे चुममे,
उसका कड़क बदन मेरी बाँहों मे और उंगली उसकी घुंघराले घने बालों से भरी
बुर मे. उस दिन मैं उसकी चूत मे उंगली डालकर उसे हस्तमैथुन करा रहा था.
मैने उसे सहज पुच्छा था कि जब मेरा लंड नही था तो कैसे अपनी चुदासी दूर
करती थी तो हंस कर बोली “ये हाथ किस लिए है बाबूजी?” फिर मेरे आग्रह पर
उसने मेरी गोद मे बैठे बैठे ही अपनी उंगली से अपनी मूठ मार कर दिखाई.
सामने के आईने मे मुझे सॉफ दिख रहा था, मंजू अंगूठे और एक उंगली से अपनी
झांन्तें बाजू मे करके बीच की उंगली बड़े प्यार से अपनी बुर की लकीर मे
चला कर अपना क्लाइटॉरिस रगड़ रही थी और बीच बीच मे वह उस उंगली को अंदर
घुसेड कर अंदर बाहर करने लगती थी. उसका हस्तमैथुन देख कर मैं ऐसा गरम हुआ
की तभी उसे चोद डालना चाहता था. पर उसने ज़िद पकड़ ली कि अब मैं उसकी मूठ
मारु. मैने अपनी उंगली उसकी बुर मे डाल दी. वह मुझे सिखाने लगी की कैसे
औरत की चूत को उंगली से चोदा जाता है. जब वह झाड़ गयी तो मैने उंगली बाहर
निकाली. उस पर सफेद चिपचिपा रस लगा था. मैने सहज ही उसे नाक के पास ले
जाकर सूँघा. बहुत मादक सुगंध थी. मेरी यह हरकत देखकर वह इतरा कर बोली
“सिर्फ़ सूँघोगे बाबूजी, चाखोगे नही? बहुत मज़ा आएगा, असली देसी घी
निकलता है मेरी चूत से मेरे राजा. “खोबा है खोबा!” उसकी चमकती आँखों मे
एक अजीब कामुकता थी. अचानक मेरे दिमाग़ मे बिजली सी कौंध गयी की वह मुझसे
क्या चाहती है. अचानक मेरे दिमाग़ मे बिजली सी कौंध गयी की वह मुझसे क्या
चाहती है. इतने दीनो की चुदाई मे वह बेचारी रोज मेरा लंड चुस्ती थी, मेरा
विर्य पीती थी पर मैने एक दिन भी उसकी चूत को मुँह नही लगाया था. वैसे
उसकी रिस्ति लाल चूत देखकर कई बार मेरे मन मे ये बात आई थी पर मन नही
मानता था. थोड़ी घिन लगती थी कि इस नौकरानी की चूत ठीक से साफ़ की हुई
होगी की नही. वैसे वह बेचारी दिन मे दो बार नहाती थी पर फिर भी मैने कभी
उसकी चूत मे मुँह नही डाला था. आज उसकी उस रिस्ति बुर को देखकर मैने
निश्चय कर लिया कि चूस कर देखूँगा, खूब चाटूंगा कि कैसा है यह सफेद शहद.
मेरा लंड तन कर खड़ा था, उसके जोश मे मैने उसकी ओर देखकर अपना मुँह खोला
और अपनी उंगली मुँह मे लेकर चूसने लगा.

मेरी सारी हिचक दूर हो गयी. बहुत
मस्त खारा सा स्वाद था. मंजू मेरी गोद मे बिल्कुल चुप बैठी मेरी ओर देख
रही थी. उसकी साँस अब तेज चल रही थी. एक अनकही वासना उसकी आँखों मे उमड़
आई थी. मैं उंगली जीभ से सॉफ करके बोला “मंजू बाई, तेरी बुर मे तो लगता
है खजाना है शहद का. चलो चटवाओ, टाँगें खोलो और लेट जाओ. मैं भी तो चूत
चाट कर देखूं कि कितना रस निकलता है तेरी चूत मे से” यह सुनकर वह कुच्छ
देर ऐसे ही बैठी रही जैसे मेरी बात पर उसे यकीन नही हो रहा हो. फिर जब
उसने समझ लिया की मैं पूरे दिल से यह बात कह रहा हूँ तो बिना कुच्छ कहे
मेरी गोद से वह उठ कर बाहर चली गयी. मुझे समझ मे नही आया कि इसे क्या
हुआ. दो मिनिट बाद वापस आई तो हाथ मे नारियल के तेल की शीशी लेकर. मैने
पूछा “अरे ये क्यों ले आई हो मंजू रानी, चोदने मे तो इसकी ज़रूरत नही
पड़ती, तेरी चूत तो वैसे ही गीली रहती है हरदम” तो शीशी सिरहाने रखकर
बोली “अगर आज आपने मुझे खुश कर दिया बाबूजी तो मेरी गांद आपके लिए
नज़राने में पेश है. मार लेना जैसे चाहे. इसीलिए तेल ले आई हूँ, बिना तेल
के आपका यह मुस्टंडा अंदर नही जाएगा, मेरी गांद बिल्कुल कुँवारी है
बाबूजी, फट जाएगी, ज़रा रहम करके मारना” उसकी कोरी गांद मारने के ख़याल
से मेरा लंड उच्छलने लगा. मैने उसे कुर्सी मे बिठाया और उसकी टाँगें
उठाकर कुर्सी के हाथों मे फँसा दी. अब उसकी टाँगें पूरी फैली हुई थी और
बुर एकदम खुली हुई थी. मैने उसके सामने नीचे ज़मीन पर बैठ कर उसकी जांघों
को चूमा. मंजू अब मस्ती मे पागल सी हो गयी थी. उसने खुद ही अपनी उंगली से
अपनी झांन्तें बाजू मे की और दूसरे हाथ की उंगली से चूत के पपोते खोल कर
लाल लाल गीला छेद मुझे दिखाया. “चूस लो मेरे राजा मेरे जन्नत के इस
दरवाजे को, चाट लो मेरा माल मेरे राजा, माँ कसम, बहुत मसालेदार रज है
मेरी, आप चातोगे तो फिर और कुच्छ नही भाएगा. मैं तो कब से सपना देख रही
हूँ अपने सैयाँ को अपना ये अमरित चखाने का, पर आपने मौका ही नही दिया”
मैं जीभ निकालकर उसकी चूत पर धीरे धीरे फिराने लगा. उस चिपचिपे पानी का
स्वाद कुच्छ ऐसा मादक था की मैं कुत्ते जैसी पूरी जीभ निकालकर उसकी बुर
को उपेर से नीचे तक चाटने लगा. उसके घुंघराले बाल मेरी जीभ मे लग रहे थे.
चूत के उपेर के कोने मे ज़रा सा लाल लाल कड़ा हीरे जैसा उसका क्लिट था.
उस पर से मेरी जीभ जाती तो वह किलकने लगती. उसका रस ठीक से पीने के लिए
मैने अपने मुँह मे उसकी चूत भर ली और आम जैसा चूसने लगा. चम्मच चम्मच रस
मेरे मुँह मे आने लगा. “हाए बाबूजी, कितना मस्त चूस्ते हो मेरी चूत, आज
मैं सब पा गयी मेरे राजा, कब से मैने मन्नत माँगी थी की आप को मेरे बुर
का माल पिलाउ, मैं जानती थी की आप पसंद करोगे” कराहते हुए वह बोली. अब वह
अपनी कमर हिला हिला कर आगे पिछे होते हुई मेरे मुँह से अपने आप को
चुदवाने की कोशिश कर रही थी. अचानक वह झड़ी और अगले दो तीन मिनिट मैं
घूँट घूँट वह शहद पीता रहा. “बाई, सच मे तेरी चूत का पानी बड़ा जायकेदार
है, एकदम शहद है, फालतू में मैने इतने दिन गँवाए” मैने जीभ से चटखारे
लेते हुए कहा. “तो क्या हुआ बाबूजी, अब से रोज पिया करो, अब तो मैं सुबह
शाम, दिन रात आपको पेट भर कर अपना शहद चटवाउन्गि.” मंजू मेरे सिर को अपनी
चूत पर दबाकर बोली. मैं चूत चाट्ता ही रहा. उसे तीन बार और झड़ाया. वह भी
मस्ती मे मेरे सिर को कस कर अपनी बुर पर दबाए मेरे मुँह पर धक्के लगाती
रही. झाड़ झाड़ कर वो थक गयी पर मैं नही रुका. वो पूरी लास्ट होकर कुर्सी
मे पिछे लुढ़क गयी थी. अब जब भी मेरी जीभ उसके क्लिट पर जाती, तो उसका
बदन काँप उठता. उसे सहन नही हो रहा था. “छ्चोड़ो अब बाबूजी, मार डालोगे
क्या? मेरी बुर दुखने लगी है, तुमने तो उसे निचोड़ डाला है, अब किरपा करो
मुझपर, छोड़ दो मुझे, पाँव पड़ती हूँ तुम्हारे” वो मेरे सिर को हटाने की
कोशिश करते हुए बोली. मैने उसके हाथ पकड़ कर अपने सिर से अलग किए और उसकी
चूत को और ज़ोर से चाटने और चूसने लगा. उसके क्लिट को मैं अब जीभ से रेती
की तरह घिस रहा था. उसके तड़पने मे मुझे मज़ा आ रहा था. वो अब सिसक सिसक
कर इधर उधर हाथ पैर फेंक कर तड़प रही थी. जब आख़िर वो रोने लगी तब मैने
उसे छ्चोड़ा. उठ कर उसे खींच कर उठता हुआ बोला “चलो बाई, तेरा शहद लगता
है ख़तम हो गया है. अब गांद मराने को तैयार हो जाओ. कैसे मराओगि, खड़े
खड़े या लेट कर?” वह बेचारी झाड़ झाड़ कर इतनी थक गयी थी कि उससे खड़ा भी
नही हुआ जा रहा था. उसकी हालत देख कर मैने उसे बाँहों मे उठाया और उसके
मस्त शरीर को पलंग पर पटक कर उस पर चढ़ बैठा.

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