कामिनी की कामुक जीवन गाथा 12

चूत चाटना

उस दिन दास बाबू नें मेरे तन का जो स्वाद चखा तो दीवाना ही बन बैठा, पागल दीवाना। एकाध हफ्ते तो अपनी पसंदीदा रेजाओं, रूपा और सुखमनी को भूल ही बैठा था। ऑफिस से लौट कर घुसते न घुसते दास बाबू ही कामलोलुप दृष्टि से स्वागत करते मिलते। । वैसे भी बाकी सभी कामगर भी दीवाने ही बन बैठे थे। मैं भी कमीनी, कामुकता की मारी, उदारतापूर्वक अपने तन को परोसने में कोई कोताही नहीं बरत रही थी। यह सब निर्बाध चलता रहा। घर में तीन और नमूने मौजूद थे ही। रामलाल तो रम ही गया था। इन तीनों को भी निपटा दिया करती थी। हमारे भवन के निर्माण का कार्य काफी प्रगति पर था। छत की ढलाई हो चुकी थी। फर्श पर संगमरमर और टाईल्स का कार्य चल रहा था। दरवाजे और खिड़कियों का कार्य भी साथ ही साथ चल रहा था। दीवारों पर वॉल पुट्टी का काम भी साथ ही साथ चल रहा था।

इस दौरान एक के बाद एक घटनाएं घटती गयीं। नये नये मर्दों के संपर्क में आती गयी। मैंने अपनी वासना की भूख मिटाने का कोई भी ऐसा उपलब्ध मौका नहीं छोड़ा। मेरे शरीर की गरमी के आगे मैंने अपने मन से अंकुश लगाना बहुत पहले छोड़ दिया था। जब इतने सारे मर्द अपने ही परिसर में सहज उपलब्ध हों तो फिर चिंता किस बात की थी। इतना ध्यान अवश्य रखती थी कि हालात बेकाबू हो कर मेरे नियंत्रण से बाहर न चले जाएं। गिर तो चुकी ही थी मैं, लेकिन मेरा गिरना होता था सोच समझ कर, ठोक बजा कर।

उस दिन शनिवार था। हमारा ऑफिस शनिवार को सिर्फ आधे दिन का ही होता था। उस दिन मैं ऑफिस से आकर खाना वाना खाकर भवन निर्माण के कार्य की प्रगति का निरीक्षण करने गयी। सभी लोग बड़ी तन्मयता के साथ अपने अपने कार्य में मशगूल थे। जिन लोगों नें मुझ पर सवारी गांठी थी वे तो ललचाई दृष्टि से मुझे घूर रहे थे, जिनपर मैंने अपनी मादक मुस्कान फेंक कर आगे बढ़ गयी। बड़े से हॉल के उत्तर की ओर एक कमरा था, जिसपर दरवाजे का कार्य चल रहा था। दरवाजे का पल्ला लगाने की तैयारी चल रही थी। मेरी दृष्टि उस बढ़ई पर गयी, जो दरवाजे के पल्ले को तराश कर अंतिम रूप देने में व्यस्त था। वह उकड़ू बैठ कर काम कर रहा था। वह एक करीब पचास पचपन की उम्र का दुबला पतला, कोयले की तरह काला व्यक्ति था। लंबी बेतरतीब दाढ़ी और लंबे अधपके खिचड़ी बाल थे उसके। पूरे कद का तो अंदाजा नहीं था, किंतु उसकी लंबी पतली टांगें बता रही थीं कि अच्छे खासे कद का व्यक्ति था। दुबला पतला होने के बावजूद उसके हाथ पैर काफी मजबूत दिखलाई पड़ रहे थे। लगातार शारीरिक श्रम करने वाले ऐसे व्यक्तियों के अंग प्रत्यंग स्वभाविक तौर पर सशक्त व कठोर हो जाते हैं। हाथ पैरों की नसें उभरी हुई थीं।  वह फर्श पर बैठे लकड़ी की छिलाई में व्यस्त था। एक बनियान और हाफपैंट पहने हुए बड़ा अजीब लग रहा था। उसके बैठने का अंदाज बड़ा अटपटा था। मेरी नजरें उसके हाफपैंट से झांकते काले नाग पर पड़ी तो मैं सनसना उठी। अंडरवियर भी पहना था तो वही पुराने जमाने का धारीदार, गंदा सा, ढीला ढाला। अंडरवियर पहनना और न पहनना बराबर था। हे भगवान, कहां कहां से तूने ऐसे मर्दों को इकट्ठा किया था? इस भवन के निर्माण में लगे सारे मर्द एक से एक, सारे नमूने। सुशुप्तावस्था में भी इस बढ़ई का लिंग कम भयावह नहीं था। मैंने चोर नजरों से ईर्द गिर्द देखा कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा है। ऐसा लग रहा था मानो उसका लिंग उसके शरीर का अंग न हो, बल्कि एक स्वतंत्र काला नाग उसके हाफ पैंट के अंदर से मुझे झांक रहा हो। उस कमरे में और कोई नहीं था, सिवाय उसके। मैं बड़ी खामोशी से वहां आई थी, जिस कारण मेरे आने का आभास उसे नहीं हुआ। मैं दरवाजे से एक कदम अंदर थी, अपने स्थान पर मंत्रमुग्ध, बुत बनी उसके विशाल काले लिंग को चमत्कृत देखे जा रही थी। वह बढ़ई अपने ही धुन में था, मेरी उपस्थिति से बेखबर। तभी शायद उसे अपने गुप्तांग के पास खुजली होने लगी। काम करते करते अपना बायां हाथ हाफ पैंट के अंदर डालकर खुजलाने लगा। इस क्रम में उसका लिंग अपने पूरे जलाल के साथ मेरी आंखों के समक्ष प्रकट हो उठा। मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं। सिकुड़ कर लुंज पुंज अवस्था में भी उसका लिंग कम से कम छ: इंच तो अवश्य था। लिंग के सुपाड़े के ऊपर का चमड़ा पलटा हुआ था या कटा हुआ था स्पष्ट नहीं था, लेकिन गुलाबी सुपाड़ा बड़ा खूबसूरत दिख रहा था। जहां मेरी पैंटी भींगने लगी थी वहीं मेरे मुंह में भी पानी आ रहा था।

अनायास ही शायद उसे किसी की उपस्थित का अहसास हुआ और उसने सर उठा कर मुझे देखा। जहाँ मेरी दृष्टि जमी हुई थी, उसनें ताड़ लिया कि मैं क्या देख रही हूं। शर्मिंदा बिल्कुल नहीं हुआ, अपने लिंग को ढंकने का कोई प्रयास भी नहीं किया। उल्टे उसकी आंखें चमक उठीं। होंठों पर कुटिल मुस्कान नृत्य करने लगी।

खामोश दृष्टि से देख रहा था मानो पूछ रहा हो “अरे मैडमजी आप?”

“ह ह ह हां।” कुछ बोल नहीं पायी मैं। मेरी चोरी पकड़ी गयी थी। हड़बड़ा गयी मैं। फर्श पर टाईल्स लग ही चुका था, जिसपर लकड़ी का बुरादा पाऊडर के रूप में फैला हुआ था। हड़बड़ाहट में मैं एक कदम पीछे हटी कि उस सूखे टाईल्स पर ही लकड़ी के बुरादे रुपी पाऊडर पर मैं फिसल गयी। फिसली ऐसे कि सीधे उस बढ़ई पर ही गिरी। लकड़ी का पल्ला एक तरफ, बढ़ई दूसरी तरफ और लाख संभलते हुए भी उसके ऊपर मैं लद गयी। अकस्मात हुए इस दुर्घटना या सुखद घटना में बढ़ई नें मुझे रोकने की कोशिश की और इस कोशिश में या जानबूझ कर मेरे उन्नत स्तनों पर हाथ साफ कर लिया। जहां वह चौंका, वहीं मैं भी चौंक उठी। क्यों? क्योंकि मैंने ब्रा नहीं पहनी थी। सिर्फ एक ढीली सी कमीज पहनी थी। नरम, गुदाज स्तनों को बिना ब्रा के महसूस कर बांछें खिल गयीं थीं शायद उसकी। स्थिति बड़ी विचित्र थी। समझ ही नहीं पाई कि क्या बोलूं। किंकर्तव्यविमूढ़ कुछ पल मैं उसी अवस्था में पड़ी रही। अबतक बढ़ई का मन भी बढ़ गया। एक भरपूर मदमस्त जवान जिस्म की मालकिन खुद उसकी गोद में पके आम की तरह टपक पड़ी थी। मैंने महसूस किया कि मेरी जंघाओं के मध्य कोई कठोर वस्तु दस्तक दे रही है। समझते देर नहीं लगी कि यह वही सोया हुआ नाग है जो अब जाग रहा है। उसके ऊपर से हटना चाह रही थी लेकिन शरीर मेरे मस्तिष्क के आदेश की अवहेलना कर रहा था। मेरी स्थिति उस बढ़ई से छिपी नहीं थी। अब उसनें अपनी भुजाओं से मुझे बांध लिया। मैं झिड़क देना चाह रही थी लेकिन मेरे होंठों पर मानो ताला लग गया था। अब उसका दायां हाथ मेरी पीठ से होता हुआ मेरी कमर तक पहुंच चुका था। मेरा सारा शरीर सनसना उठा। मुझे यह बढ़ई बहुत अच्छी तरह से जानता था कि मैं यहां की मालकिन हूं, लेकिन इसकी हिम्मत तो देखो, यह धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था। इसका कारण भी स्पष्ट था, मेरी ओर से कोई प्रत्यक्ष विरोध भी तो नहीं था। यह बढ़ई दास बाबू के अधीन, उन्हीं के निर्देश में कार्य कर रहा था। आज तक हमारे बीच सीधा संवाद कभी नहीं हुआ था, न संबंधित कार्य के संबंध में और न ही किसी और कार्य के संबंध में। यह पहला मौका था जब मेरा इस बढ़ई से इस तरह एकांत में सामना हो रहा था और वह भी इतने अटपटे अंदाज में। अब तक हमारे बीच कोई संवाद नहीं हुआ था। अब जब महारे बीच आमना सामना हुआ और वह भी एकांत में, तब भी मैं संवाद विहीन थी। मेरे मुख से कोई अल्फाज नहीं निकल रहे थे। मेरी इस अल्पावधि के असमंजस की स्थिति में ही उस बढ़ई का मन काफी बढ़ गया था। उसकी हरकतों नें यह तो तय कर दिया था कि वह औरतखोर एक नंबर का था, स्त्रियों का रसिया, लेकिन उसकी हिम्मत तो देखो, मालकिन पर भी हाथ साफ करने के कुत्सित इरादे को छुपा नहीं पाया। जहां मेरा शरीर अवश था वहीं मेरे अंतरतम की विरोध क्षमता को भी मानो लकवा मार गया था। मन में नियंत्रण भी खोती जा रही थी। इधर बढ़ई अपनी हरकतों से मुझे धीरे धीरे अपने वश में करता जा रहा था। मैं मानो गूंगी हो गयी थी। मेरी इस स्थिति को शायद उसनें मेरी सहमति मान ली, हालांकि मैं अब भी अनिश्चितता की स्थिति में थी। अब उस बढ़ई के काले काले होंठ सिकुड़ कर मेरे रसभरे अधरों की ओर बढ़ रहे थे। साला खड़ूस दढ़ियल, मुझे चूमने वाला था। मन में वितृष्णा सी पैदा हो रही थी, किंतु अपनी इस असामान्य स्थिति में चाहकर भी अपने चेहरे पर इनकार का भाव नहीं ला पा रही थी। उसके बदन से उठते पसीने के दुर्गंध का भभका मेरे नथुनों से टकरा रहा था किंतु मेरे चेहरे पर कोई शिकन तक न थी। उस बढ़ई के काले काले होंठ अब मेरे रसभरे अधरों से चिपक चुके थे।

उफ्फ्फ, यह मुझे क्या हो रहा था। मैं इतनी कमजोर तो कभी नहीं थी। मेरे साथ क्या कुछ नहीं हुआ था, लेकिन सब कुछ मेरी मर्जी से हुआ था, एकाध घटनाओं को छोड़कर, लेकिन इस वक्त की तो बात ही कुछ और थी। मन में कोई समर्पण का भाव नहीं था, लेकिन मानो सम्मोहन की स्थिति थी। चेहरा निर्विकार, मानो मुझ पर जादू की छड़ी फिरा दी गयी हो। खैनी का आदी वह गंदा दढ़ियल अपने बदबूदार होंठों से मेरे होंठों का रसपान करने में मग्न हो गया। घिन आ रही थी मुझे, मगर न मेरे चेहरे पर कोई वितृष्णा थी न ही मेरे शरीर से कोई विरोध। आश्चर्य चकित थी मैं, खुद की इस अवस्था पर। बढ़ई का एक हाथ अब बड़ी बेशर्मी से मेरे वक्षस्थल पर खेल रहा था और दूसरा हाथ मेरे नितंबों के ऊपर पहुंच चुका था। चिहुंक उठी मैं, क्यों? क्योंकि मैंने सलवार के अंदर पैंटी पहनने की आवश्यकता नहीं समझी थी। कारण? कारण स्पष्ट था, पता नहीं कब किस कामगर पर मेरा दिल आ जाए या कोई कामगर उपयुक्त अवसर देख कर खुद ही मुझ पर चढ़ दौड़े, जिसके लिए मैं सदैव तैयार रहती थी। सलवार के ऊपर से मेरे चूतड़ों पर हाथ रखते ही उस बढ़ई को इस बात का आभास हो गया कि अंदर से मैं नग्न हूं। मन ही मन मुसक उठा होगा वह। अब उसका उत्साह बढ़ गया था। उसकी हिम्मत दुगुनी हो उठी। वह मेरे चूतड़ों को सहलाते सहलाते दबाने लग गया। मैं अंदर ही अंदर सुलग उठी।

“उं्उउंं््उउंं््उउंं््गग्ग्ग्गूं्गूं्गूं्गूं।” एक लंबी घुटी घुटी आह निकल पड़ी मेरी। शरीर से कोई विरोध नहीं, बल्कि अकड़ने लगा मेरा शरीर। मैं भीतर ही भीतर शर्मिंदा भी हो रही थी कि बिना ब्रा और पैंटी के मुझे अपनी बांहों में पाकर पता नहीं मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा। और क्या सोच रहा होगा? निश्चय ही समझ गया होगा कि मैं निकली हूं शिकार करने, मर्द का शिकार करने। लेकिन उसे क्या पता था कि इस वक्त मेरी क्या हालत हो रही है। यहां तो खुद ही शिकार हो रही थी, अपना सारा नियंत्रण खो कर असहाय पंछी की भांति। अनिश्चय की स्थिति अधिक देर नहीं रही मेरे अंदर, लेकिन इतनी ही देर में उस बढ़ई नें मेरे अंग प्रत्यंग, खासकर नाजुक, कामोत्तेजक अंगों को छेड़ दिया था। वासना की चिंगारी सुलगा दी थी उसने, जिसे शोले बनने में कितनी देर लगनी थी भला। सब कुछ खामोशी से हो रहा था। मैं नि:शब्द थी। बढ़ई को भी बातों में समय जाया करना नागवार लग रहा था। उसके होंठ अपने चुंबनों से बोल रहे थे, उसके हाथ अपनी कामुक क्रियाओं से बोल रहे थे और मैं? मेरी तो जुबान मानो तालू से चिपक गयी थी। उसके हाथों की कठपुतली बनी उसकी कामुकता भरी हरकतों से हलकान होती जा रही थी। पिघलती जा रही थी उस बूढ़े, गंदे, खुरदुरे, अटपटे, दढ़ियल बढ़ई की बांहों में। उसका दाहिना खुरदुरा हाथ मेरी कमीज के भीतर प्रवेश कर चुका था। ओह्ह्ह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं। उसकी खुरदुरी हथेलियों का स्पर्श ज्यों ही मेरे स्तनों पर हुआ, मैं सन्न रह गयी। दिमाग नें मानो काम करना बंद ही कर दिया, या यों कहें कि मेरा तन मस्तिष्क विहीन हो गया था, मात्र एक शरीर, वासना की अग्नि में धधकती एक बेबस पुतली। इधर बढ़ई को तो मानो कुछ भी कर गुजरने का पूर्ण अधिकार मिल गया हो। पूरे अधिकार के साथ मेरे तन से खेलने लगा। मेरे स्तनों को सहला रहा था, हौले हौले दबा रहा था और उत्तेजना के मारे मेरे बड़े बड़े चुचुक तन गये थे, जिन्हें वह अपनी चुटकियों से मसल भी रहा था। इस्स्स्स इस्स्स्स, ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ अम्माआ्आ्आ्आ, उस बढ़ई की हरकतों से मैं पगलाई जा रही थी।

मेरे अंदर अब भी अंतरद्वंद्व का झंझावत चल रहा था। समर्पण करूँ या मना। वैसे भी मना करने की हद तो पार हो चुकी थी, फिर भी उस गंदे आदमी के साथ यह सब? कामुकता का शैतान उकसा रहा था, “अब ये कैसी दुविधा?”

“न न, यह गंदा है।” मन के किसी कोने से आवाज आई।

“यह पहला गंदा आदमी है क्या?”

“गंदा शरीर।”

“पहला गंदा शरीर है क्या तुम्हारे लिए?”

“बदबूदार।”

“बदबू तो तेरी कामुकता बढ़ाती है ना?”

“ऐसी जगह।”

“और कैसी जगह चाहिए तुझे? ऐसी जगहों से परहेज तो नहीं तुझे?”

“फिर भी।”

“फिर भी क्या?”

“ऐसे खुले में?”

“एकांत तो है।”

“दरवाजा कहां है?”

“कोई नहीं आने वाला यहां।” शैतान आश्वस्त कर रहा था। मेरा हाथ यंत्रवत बढ़ई की जंघाओं के मध्य चला गया। चौंक उठी मैं। यह क्या है? लिंग? मानव का लिंग? नहीं, यह किसी मानव का लिंग तो कतई नहीं था। इतना्आ्आ्आ्आ विशाल? सख्त, गर्म और लंबाई, बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, कम से कम ग्यारह इंच तो अवश्य होगा। और मोटाई? उफ्फ्फ भगवान, पकड़ कर देखा मैंने, मेरी मुट्ठी काफी नहीं थी। भयभीत हो उठी मैं।

“नहींईंईंईंईंईंईंईंई।” मन ही मन बोली। विचलित हो उठी मैं।

“क्या नहीं?” शैतान मेरे मन के अंदर बोला।

“इतना्आ्आ्आ्आ बड़ा््आआ?”

“इससे पहले देखी नहीं? भूल गयी सरदार का लंड? भूल गयी हब्शी बॉस का लंड? क्या हुआ, चुदी ना?”

“हां हां, चुदी थी, मगर उनके भी लंड इस खड़ूस लिक्कड़ दढ़ियल से उन्नीस ही रहे होंगे। इतना्आ्आ्आ्आ बड़ा्आ्आ्आ्आ् लिंग! बाप रे बाप। यह तो बिल्कुल अविश्वसनीय तौर पर बड़ा है। एक मनुष्य का तो कत्तई नहीं। गधे से भी बड़ा।”

“बड़ा है तो क्या? तुझे तो लंड से मतलब है ना?”

“लंड से मतलब अवश्य है लेकिन इस तरह का दानवी लंड? न बाबा न। मुझसे न होगा।”

“क्यों न होगा?”

“मेरी तो क्या, किसी भी नारी की योनि में ग्रहण करना असंभव है।”

“कुछ असंभव नहीं है, सब कुछ प्रथम बार असंभव लगता है, फिर सब कुछ आसान हो जाता है, एक बार अभ्यस्त हो जाओ फिर आनंद न मिले तो कहना”

“प्रथम बार में ही प्राण निकल गयी तो?”

“कैसे निकलेगा प्राण? याद करो प्रथम बार उस हब्शी का लंड, याद करो उस सरदार का लंड, याद करो रामलाल का लंड।”

“यह तो उन सबसे बड़ा है।”

“हां बड़ा तो है, लेकिन तू चुद लेगी?”

“कैसे?”

“तेरी करामाती चूत के लिए सब संभव है”

“लेकिन यह तो असामान्य व्यक्ति है।”

“कैसे पता?”

“इतनी देर में कुछ बोल नहीं रहा।”

“पागल तो रामलाल भी है।” मेरी हर शंकाओं का निराकरण करता रहा मन का शैतान। उसके हर तर्क के आगे मैं निरुत्तर होती गयी।

“अच्छा बाबा अच्छा।”

“क्या अच्छा?” अपनी जीत पर शैतान मुसक उठा।

“मान गयी।”

“क्या मान गयी?”

“चुदने को, और क्या?”

“गुड, दैट्स लाईक अ गुड लेडी। चुद जा, चुद जा।” मेरी सारी आशंकाएं और दुविधा तिरोहित हो चुका था। अब मैं तैयार थी। बढ़ई मेरे नाजुक अंगोंं पर हाथ चला रहा था। जो कुुुछ हो रहा था उसपर मेरा कोई वश नहीं था, मेरे मनोनुकूल हो रहा था, शारीरिक मांग के अनुरूप हो रहा था, समर्पण, पूर्ण समर्पण और यही उस समय की मांग थी और मैं डूबती जा रही थी उस आनंदमय क्रीड़ा के सुखद समुंदर में। वह एक बेहद शातिर शिकारी की भांति मेरे मन के असमंजस का, मन के किसी भी कोने में छिपे विरोध का नामोनिशान मिटाता जा रहा था। मेरे तन पर से मन के नियंत्रण को चरणबद्ध तरीके से कमजोर करता जा रहा था, साथ ही साथ वासना की सुलगती भट्ठी को हवा देता जा रहा था। उसका बांया हाथ मेरे सलवार के नाड़े को न जाने कब खोल चुका था। सलवार मेरी कमर से नीचे सरकता जा रहा था। सरकता सरकता मेरे घुटनों तक पहुंच चुका था। अब मैं कमर से नीचे पूर्ण रुपेण नंगी थी। उसके बांये हाथ की जादुई खुरदुरी हथेलियां पहले मेरे चिकने मांसल नितंबों पर नृत्य करता रहा, फिर, फिर, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह मेरे ईश्वर, मेरी चिकनी, पनिया उठी योनि की तरफ आने लगा। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, ज्योंहि मेरी योनि पर उसकी उंगलियों का स्पर्श हुआ मैं चिहुंक कर अमरबेल की तरक्ष बेसाख्ता चिपट गयी उसके पसीने से लतपत, दुर्गंधयुक्त शरीर से। पसीने और उस दुर्गन्ध मेें एक नशा था। यही तो चाहता था वह कमीना। मैं अब पूरी तरह उसके हवाले थी। कर ले जो करना है। एक दस्तक मेरी चूत पर महसूस कर कंपकंपा उठी मैंं। यह दस्तक थी उसके भीमकाय लिंंग की जो तलाश रहा था प्रवेश द्वार। मेरी लंंडखोर योनि लसलसी हो चुकी थी। अबतक वह अपने पैंट से मुक्त नहीं हुआ था। मेरे हाथ मेरे नियंत्रण में नहीं थे। खुद ब खुद उसके पैंट को खोलने में जुट गये थे, यह सब अपने आप हो रहा था, नि:शब्द, खामोशी से। न वह बात करने में कोई रुचि दिखा रहा था, न मेरे मुंह से कोई अल्फाज निकल रहे थे। मैं तो मानो गूंगी ही हो गयी थी। मेरा अंग प्रत्यंग तरंगित हो रहे थे, बेकाबू हो रहे थे। बढ़ई का पैंट खिसक कर नीचे आ चुका था। अब कमर से नीचे हम दोनों नंगे थे। मेरी योनि और उसके बेलन जैसे लिंग के मध्य रही सही दीवार सरक चुकी थी। अब कोई व्यवधान नहींं था।

बेताबी दोनों तरफ थी, आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी। जहां बढ़ई बिल्कुल सोचे समझे तरीके से मुझ पर हावी हो रहा था वहीं मैं अवश उसके वश में आती जा रही थी और अब तो पूरी तरह से उसके वश में आ ही चुकी थी। एक तरफ था बढ़ई का अतिमानवीय बेताब लिंग, जिसे ग्रहण कर पाने में धधकती वासना की भट्ठी में झुलसती मेरी योनि कितनी समर्थ थी, इस बात से बेपरवाह लंडखोर मेरी फकफकाती यौन गुहा को शायद अपनी औकात का पता नहीं था, जिस बात का भय अब भी मेरे मन के किसी कोने में था, वह पल आ चुका था। मैं अब भी उसके ऊपर लदी थी। बढ़ई चाहता तो इसी स्थिति में हमला कर सकता था, किंतु उसने ऐसा नहीं किया। मुझे लिए दिए पलट गया, उस नीचे पड़े दरवाजे के पल्ले पर। अब मैं नीचे थी और वह मेरे ऊपर। मेरे पांव खुद ब खुद फैल गये थे, मेरी चमचमाती जंघाएँ खुल गयीं थीं, मेरी योनि ठीक उसके दानवी लिंग के निशाने पर, स्वागत हेतु प्रस्तुत थी। अब इससे उपयुक्त आसन की कोई आवश्यकता नहीं थी। अविश्वसनीय, वृहद, अमानवीय, पाशविक, हौलनाक लिंग ठीक मेरी योनि के ऊपर, सामने था, योनिद्वार स्वागत के लिए प्रस्तुत था, रसीली योनि, लसीले रस से नहाई हुई। मेरी कमर को उस खड़ूस बूढ़े के सख्त हाथ पूरी सख्ती से थामे हुए थे। उसकी कमर नीचे हो रही थी, ऐसे मानो मेरी चुंबकीय योनि खींच रही हो अपनी ओर और मैं निश्चल पड़ी थी आने वाले आक्रमण का सामना करने को तत्पर, दांतों को भींचे। उसके भीमकाय लिंग के सुपाड़े का संपर्क मेरी योनिद्वार पर हुआ और मैं सनसना उठी। शरीर का पोर पोर झंकृत हो उठा। भयमिश्रित रोमांच से कंपकंपा उठी मैं। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह, उसके लिंग का अग्रभाग मेरी योनिद्वार में प्रवेश कर रहा था, योनि मार्ग को फैलाता हुआ, फैलाता हुआ नहीं, फाड़ता हुआ, उफ्फ्फ आ्आआ््आआ््आआह, पीड़ा, असीमित पीड़ा में डूबी आर्तनाद मेरे हलक से उबलने वाली थी, किंतु कंठ नें साथ देने से इंकार कर दिया। बेआवाज, मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। आंखें फटी की फटी रह गयीं। बढ़ई का गधे सरीखा अमानवीय लिंग घुसता जा रहा था, घुसता जा रहा था, घुसता जा रहा था, मेरी योनि को चीरता हुआ। मेरी आंखों से अश्रु की धारा बह निकली। उस मर्मांतक पीड़ा से हलकान, छटपटाना चाहती थी, मगर शरीर सम्मोहित, नि:शक्त हो चुका था। पीड़ा का अनुभव कर रही थी किंतु विरोध करने में अक्षम, नि:शक्त था मेरा शरीर। ऐसी स्थिति में मैं पहले कभी नहीं पड़ी थी। ओह्ह्ह्ह्ह्ह लिंग के प्रवेश होने की वह अंतहीन क्रिया। जब थमा वह, पूरे जड़ तक घुस चुका था उसका वह अविश्वसनीय लंबा और मोटा बेलन। मैं पूरी तरह उसके कब्जे में थी, उसके लिंग से बिंधी, हिलने डुलने से लाचार। चीखना चाहती थी, पीड़ा से त्रस्त, कातर स्वर में आर्त विनय करना चाहती थी, किंतु हलक सूख चुके थे, जिह्वा तालू से चिपक चुकी थी, नि:शब्द, खामोशी से पीड़ा को पीती जाने को वाध्य थी। उसने अब मेरे उरोजों का मर्दन आरंभ किया। अपनी रुखड़ी हथेलियों में भर भर कर निचोड़ने लगा मेरे स्तनों को। अपने बदबूदार मुंह को पास लाकर अपने गंदे होंठों से मेरे रसीले होंठों का रसपान करने लगा। अपनी मोटी जिह्वा को मेरे मुंह में चुभलाने लगा। मेरी योनि के अंदर खलबली मची थी। गर्भाशय के अंदर तक पहुंच चुका था उसका लिंग। कुछ देर तक स्थिर रहा वह उसी स्थिति में और मेरी चूचियों का मर्दन करते हुए मेरे होंठों को चूसता रहा। लेकिन वाह रे मेरे तन में जाग उठी अदम्य शैतानी भूख, वासना की अग्नि में झुलसता अंग अंग, चुदास में तड़पता तन, जरा देखो तो कैसे शनैः शनैः मैं अपनी चूत का दर्द भूलने लगी। मुझमें वासना का शैतान हावी हो चुका था। उसका विकराल लंड मेरी क्षत विक्षत हो चुकी चूत में कसा हुआ था, मेरी योनि की सख्त गिरफ्त में था।

बढ़ई की विजय हो चुकी थी। किला फतह कर चुका था वह। मेरे अंतरतम का शैतान विजयी भाव से मुस्कुरा रहा था। चमत्कारी ढंग से मेरी पीड़ा गायब हो रही थी। मैं वासना के सागर में हिलोरें ले रही थी। इससे पहले कि वह बढ़ई अपनी कमर में और हरकत करता, मेरी अनियंत्रित कमर खुद ब खुद हरकत में आ गयी। मेरे पैर खुद ही उसकी कमर से लिपट गये। अब उस गलीज चुदाई के कीड़े को और क्या चाहिए था। कचकचा कर पिल पड़ा मुझ पर। धपा धप धक्कम धक्के में लीन मेरे तन की सारी गरमी उतार डालने में आमादा, मूक जंगली पशु की तरह चोदने लगा। मेरे होठों को चूसने के बदले अपने पीले पीले दांतों से काटने लगा। मैं विचलित हो उठी। जो बढ़ई इतनी देर सबकुछ बड़ी शांति पूर्ण ढंग से कर रहा था, यकायक वहशी दरिंदा बन गया। उसके दुबले पतले शरीर में मानो चीते सी फुर्ती आ गयी। उसके हाथों की लंबी लंबी उंगलियों में जो लंबे लंबे नाखून थे वे मेरे पीठ पर, कमर पर, सीने के उभारों पर लाल लाल निशान छोड़ते जा रहे थे, जिसका आभास उस कामुकता के तूफान में मुझे जरा भी नहींं हुआ। इन निशानों को तो बाद में अपने दर्पण में मैंने देखा। यही हाल उसनें अपने पीले पैने दांतों से मेरे होंठों का, मेरे गालों का, मेरी गर्दन का और मेरी चूचियों का कर दिया। वासना के नशे में डूब कर पूरे जंगलीपन पर उतर आया था। चोदते चोदते मेरी गुदा में भी उंगली करता जा रहा था। उफ्फ्फ उफ्फ्फ उस जानवर नें मुझे बड़ी बुरी तरह रौंदना आरंभ कर दिया था। दुबला पतला अवश्य था, किंतु शारीरिक श्रम नें मानो उसके पूरे शरीर को लोहे सदृश कठोर बना दिया था। जिस ताकत से मुझे चोद रहा था, जिस रफ्तार से मुझे चोद रहा था, मुझे आतंकित हो जाना चाहिए था, किंतु उसके विपरीत मुझे इन सब में एक अनजाना सा सुख प्राप्त हो रहा था। आज से पहले मैं ऐसी न चुदी थी। पांच मिनट में ही मैं झड़ गयी, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह और क्या झड़ी। कोई आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं, एक सुखद सिसकारी, एक सुखद नि:श्वास निकला मेरे मुंह से। चिपट गयी उसके शरीर से और स्खलन की गहरे सुखद समुंदर में डूब गयी। उधर उस बढ़ई की गाड़ी बड़ी तेज गति से फर्राटा भरती रही, गचागच, फचाफच, धपाधप। हम एक दूसरे से गुंथे उलट पलट होते रहे, इधर उधर लुढ़कते रहे, दरवाजे की पल्ले से फर्श पर, लकड़ी के बुरादों से सनते हुए लगे रहे। मेरे स्खलन से बेखबर, वह बढ़ई कूटता रहा मुझे, चोदता रहा मुझे, गुलाटियां खा खा कर, गुलाटियां खिला खिला कर, रौंदता रहा मुझे। करीब तीस चालीस मिनट की अथक चुदाई के दौरान मैं तीन बार स्खलित हुई। अंततः पूरी तरह मुझे निचोड़ कर जब उसका स्खलन आरंभ हुआ तो ऐसे दबोचा मुझे मानो मेरी सांसें थम गयी हों। पूरे दो मिनट तक फर्र फर्र अपने वीर्य की पिचकारी छोड़ता रहा सीधे मे गर्भ में।

आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ, गजब, अद्भुत, तृप्ति के सुख की अथाह गहराई में डूब कर ग्रहण करती रही उसके वीर्य का कतरा कतरा। चूत की गहराइयों में पीती गयी, जज्ब करती गयी एक एक बूंद। पसीने से लतपय, चोद चाद कर, थक कर कुत्ते की तरह हांफता हुआ मुझ पर ढल गया। उसका लिंग जबतक लुंज पुंज होकर फच्चाक से मेरी चूत से बाहर नहीं आया, तबतक लदा रहा वह मुझ पर। उस गंदे फर्श पर हांफती कांपती, पूर्ण तृप्ति के सुखद अहसास से परिपूर्ण थी, निहाल थी, इस बात से बेपरवाह कि मेरे तन के अलग अलग हिस्सों में कहीं दातों से काटे जाने के निशान बन गये थे तो कहीं कहीं नाखूनों के खरोंचों के निशान। आंटे की भांति गुंथे गये मेरे स्तनों में दर्द की कसक समा चुकी थी। अपनी वहशियाना नोच खसोट से मेरे शरीर के पोर पोर में मीठा मीठा दर्द भर दिया था उस कामुक जंगली जानवर नें। मेरी गुदा में उंगली घुसेड़ घुसेड़ कर चोदने के क्रम में मलद्वार को ढीला कर डाला था और मेरी योनि का? उफ्फ्फ भगवान, योनि तो फूल कर कचौरी बन गयी थी। रगड़़ घसड़ कर बड़ी बेरहमी से चोदा जो था। सब कुछ हुआ, दरिंदगी हुई, नोची गयी, भंभोड़ी गयी, निचोड़ी गयी, लेकिन उस रोमांचक चुदाई से जो आनंद मुझे प्राप्त हुआ, वह अकथनीय था। लकड़ी के बुरादों पर लोटपोट होकर अपने तन की दुर्गति कराते हुए भी मुझे मजा आ रहा था। मैं बेसाख्ता उस बढ़ई के शरीर से पुनः चिपक कर उसके पिचके दढ़ियल गालों पर चुंबनों की बौछार कर बैठी। बढ़ई बेचारा, गंदा गरीब मजदूर, इतनी खूबसूरत औरत जिस पर निछावर हुई जा रही थी, अपने स्वप्न में शायद इस बात की उम्मीद न थी। अबतक हमारे मध्य जो कुछ हुआ, बिना किसी संवाद के। हमारे बीच कोई वार्तालाप नहीं हुआ था। ऐसा लग रहा था कि हम एक दूसरे के मन को पढ़ रहे थे। एक दूसरे के मनोभावों को स्पष्ट समझ रहे थे और उसके अनुरूप सब कुछ अपने आप होता चला गया।

अब मुझे वहां से जाना था। मैं किसी प्रकार अपने आप को संभालती उठी। उस बढ़ई की आंखों में मैंने जो अहसानमंदी का भाव देखा, अपने प्रति आसक्ति देखी, मैं उसकी ताब न ला सकी। हां, जाते जाते मैंने अपने चेहरे के हाव भाव से जता दिया कि मैं भी उस पर फिदा हो गयी। एक नि:शब्द आश्वासन था मेरे चेहरे पर कि मैं फिर मिलूंगी, फिर चुदुंगी, गरीब ही सही, गंदा ही सही, मजदूर ही सही, आखिर मुझ जैसी कामुक औरत हेतु मनलुभावन, अविश्वसनीय विशाल लिंगधारी पुरुष जो ठहरा और चुदक्कड़ तो अव्वल दर्जे का। छि: छि: यह मैं कैसे गर्त मेेंं गिरती जा रही थी। एक संभ्रांत महिला ऐसी होती है क्या? होती है, होती है। मैं हूं ना, कामुकता की ज्वाला में धधकती, किसी भी मर्द की अंकशायिनी बनने को आसानी से बिछ जाने को उपलब्ध कामिनी।

जब मैं वहां से निकल कर घर की ओर बढ़ रही थी तो सारे मजदूर अजीब सी नजरों से मुझे घूर रहे थे। शायद उन्हें आभास हो चुका था कि अंदर मेरे साथ क्या हुआ था। लेकिन कौन था वह खुशनसीब, जिसनें मेरी यह हालत की थी? यह रहस्य था, लेकिन कब तक? कुछ ही देर में सबको पता चल ही जाना था। वही हुआ भी। इधर मैं अपने कमरे में दाखिल हो कर सीधे बाथरूम में घुसी। रगड़ रगड़ कर नहाई, लेकिन दर्पण में खुद को देख कर बड़ी कोफ्त हुई। गालों पर, होंठों पर, गले पर, स्तनों पर लाल लाल निशान उस हरामी बढ़ई की दरिंदगी चीख चीख कर बयां कर रहे थे। योनि तो सूज कर पावरोटी बन गयी थी। मैं खुद ही चकित थी कि यह सब इतना अचानक मेरे साथ कैसे हो गया। एक ऐसे अनाकर्षक गंदे आदमी से, जिस आदमी से पहले कभी मेरी बात तक नहीं हुई थी, किसी अबूझ सम्मोहन में बंधी यह सब कर बैठी, वह भी इतनी खामोशी के साथ। बेआवाज लुटती रही। ताज्जुब हो रहा था मुझे। अभी नहाने के बाद जैसे मैैं पूर्ण चेेेतन अवस्था मेें आई। ऐसा लगा मानो जो कुछ हुआ वह सब मेरे अर्धचेतन अवस्था मेेंं हुुुआ हो। खैर एक मीठी सी कसक तो भर गयी ही था मेेेरे तन मेें। नहा धो कर मैंने एक चमत्कारी लोशन अपने जख्मों पर लगाया, जिससे मुझे काफी राहत मिली। दो दिनों बाद उन निशानों से मुझे निजात मिली।

दूसरे ही दिन जब मैं ऑफिस के लिए निकल रही थी कि गेट के पास सलीम मिल गया। वह बड़े ही अर्थपूर्ण दृष्टि से मुझे घूरता हुआ धूर्तता से मुस्कुरा रहा था।

मैं उससे नजरें मिलाए बगैर बगल से निकल ही रही थी कि उसकी आवाज मेरे कानों से टकराई, “मैडम, ओह सॉरी, चांदनी, ओह नहीं नहीं चोदनी, कैसा रहा कल कोंदा का?”

थमक कर रुक गयी, “ककककौन कोंदा?”

“वही, गूंगा बढ़ई?”

“ओओओह, वह बबबबढ़ई?” तो पता चल गया इन सबको भी।

“हां हां वही।”

“गूंगा है?” चकित थी मैं। तो एक गूंगे से चुद गयी थी मैं।

“हां। गूंगा है कोंदा। मगर लंड तो है बड़ा मजेदार ना।”

“हट।” लाल हो गयी मैं।

“हट क्या? हम तो तेरी चाल देख कर ही समझ गये थे।” अबतक बोदरा भी पहुंच चुका था।

“फाड़ तो नहीं दिया ना?” बोदरा मुस्कान के साथ शरारत से बोला। हरामी कहीं का। बेशर्म। सवेरे सवेरे ये लोग मेरी खिंचाई कर रहे थे।

“चुप साले मां के ….।” मैं भी कम थोड़ी थी। अपने को कमजोर कैसे दिखाती।

“लो हम तो चुप हो गये, लेकिन तेरी चाल तो बोल रही है।” मैं सवेरे सवेरे उनसे उलझना नहीं चाहती थी। जल्दी से खिसक ली। वे दोनों मेरे पीछे खिलखिला कर हंस पड़े। भाड़ में जाओ तुम दोनों कुत्तों, मन ही मन खीझती हुई ऑफिस रवाना हो गयी। तो इसका मतलब कल जिस खड़ूस नें मुझे भोगा वह गूंगा है। ओह्ह्ह्ह्ह्ह, तभी वह कुछ बोल नहीं रहा था। नाम भी वैसा ही, कोंदा, यहां के आदिवासी लोग कोंदा गूंगे को बोलते हैं। मैं भी गूंगी बनी एक गूंगे से अपना शरीर लुटवाती रही, बड़े आनंदपूर्वक। कहां तो एक गरीब, गंदे, कुरूप बढ़ई को शायद ही कोई औरत उपलब्ध होती होगी या कोई उसे भाव ही नहीं देती होगी और कहां कल्पनातीत तरीके से एक सुखद, स्वर्णिम अवसर ऊपरवाले नें उसे प्रदान किया, मुझ जैसी खूबसूरत औरत को उसकी झोली में डालकर। मौका मिला और लपक लिया उस मौके को और क्या खूब लपका। शायद पहली बार, या फिर लंबे अरसे से दबी अपने अंदर की काम क्षुधा मिटाने टूट पड़ा मुझ पर। उसे तो शायद पता ही न था कि भगवान नें उसे इतने भीमकाय लिंग के रूप में किस अनमोल वरदान से नवाजा है। मुझ जैसी किसी मर्दखोर औरत के लिए तो ऐसा दुर्लभ लिंगधारी पुरुष किसी अनमोल वरदान से कम नहीं था। एक तो ऐसा मनभावन लिंग, ऊपर से उसकी दीर्घ स्तंभन क्षमता, मैं तो कायल हो गयी, पीड़ा हुई तो क्या हुआ, अविस्मरणीय था वह संभोग। फिर तो निर्बाध, निर्विघ्न, निर्द्वंद्व जुड़ते गये हमारे भवन निर्माण से जुड़े सारे लोग, मजदूर, मिस्त्री, ठेकेदार, बढ़ई, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, मेरे शरीर का उपभोग करने वालों की फेहरिस्त में। मैं भी सबको उदारतापूर्वक अपने तन का रसास्वादन कराती अपनी वासनापूर्ती करती रही, पूर्ण बेशर्मी के साथ, हर सुखद पलों में मुदित।

अब नये भवन के निर्माण का कार्य अपने अंतिम चरण में था। इसी दौरान एक दिन जब मैं ऑफिस से घर लौट रही थी, तो सिन्हा जी के घर के सामने से निकल ही रही थी कि मैंने रेखा (सिन्हा जी की पत्नी) को देखा। वह एक सुंदर से करीब अठारह वर्षीय युवक के साथ थी। उस युवक को मैं पहली बार इस मुहल्ले में देख रही थी। अच्छी खासी कदकाठी वाला गोरा चिट्टा, तीखे नाक नक्श, घुंघराले बालों वाला, चढ़ती उम्र का आकर्षक युवक था वह। रेखा से मिलने की उतनी उत्कंठा नहीं थी, किंतु उस आकर्षक युवक के आकर्षण नें मुझे हठात रुकने को वाध्य कर दिया। वे दोनों अपने गेट में घुस ही रहे थे कि मैंने आवाज दी,

“अरी रेखा।”

ठमक कर रुक गयी वह और मुझे देखकर खिल पड़ी, “अरे कामिनी दी।”

“क्या रेखा, तुम तो हमारे घर का रास्ता ही भूल गयी।” मैं शिकायत भरे लहजे में बोली।

“भूली कहाँ हूं, आती तो हूं।”

“मगर मुझसे मुलाकात कहां होती है? ओह समझी…”

“क्या?…..”

“बोलूं?….” मैं जान गयी कि यह मेरी अनुपस्थिति में हमारे घर अपनी तन की तृष्णा की तृप्ति हेतु आती होगी। भला अपने पति की अवहेलना से पीड़ित, अपनी प्यासे तन की कामक्षुधा की तृप्ति हेतु मेरे सुझाए सुलभ मार्ग को छोड़ जाती भी कहां। वैसे भी इसे चस्का भी तो लग गया था। हमारे यहां तीन तीन सुलभ औरतखोर मौजूद जो थे।

“न न न न…” वह घबरा कर उस युवक की ओर कनखियों से देखते हुए बोल उठी।

“ओह, ये जवान है कौन?” मैं उस युवक की ओर देखती हुई पूछी।

“यह मेरा बेटा पंकज है। कॉलेज में तीन दिन की छुट्टियां हैं, सो चला आया।”

“वाऊ, बड़ा खूबसूरत बेटा पाया है तूने तो। बिल्कुल पिता पर गया है। कहां पढ़ता है?”

“कोलकाता, संत जेवियर्स कॉलेज में। पंकज, ये हैं कामिनी आंटी।”

“नमस्ते आंटी।” पंकज मुझे गहरी नजरों से देखते हुए बोला। मैं लरज उठी। पता नहीं उसकी आंखों में क्या था, मैं सनसना उठी। कहां वह अठारह वर्ष का उभरता युवक, और कहां मैं चालीस पार की अधेड़ महिला, फिर भी उसके लिए मेरे मन में एक कुत्सित आकांक्षा जागृत हो उठी थी। आखिर ठहरी कामुक गुड़िया कामिनी।

“खुश रहो बेटा।” कह तो दी बेटा, लेकिन जो औरत अपने बेटे संग हमबिस्तर होने में गुरेज न करे, उसे इस पराये बेटे से परहेज क्यों हो भला। एक नजर में ही रच बस गया था यह मेरे मन मस्तिष्क में। इसकी अंकशायिनी बनने को ललायित हो उठी। नीली जींस और गोल गले के पीले टी शर्ट में कामदेव का अवतार लग रहा था यह। देखो तो जरा मुझे, क्या हो रहा था मुझे, स्तन फड़फड़ा उठे, चुचुक तन गये, योनि रसीली हो उठी, पैंटी के अंदर फकफका उठी। उसकी आंखें भी तो चमक उठी थीं मुझे देख कर। सर से पांव तक उसकी दृष्टि नें मानो मुझे नाप लिया। इस दृष्टि में छिपे अर्थ को समझना मेरे जैसी मर्दखोर औरत के लिए कोई मुश्किल नहीं था, किंतु आश्चर्य हो रहा था मुझे कि इस उम्र में ही उसके अंदर यह सब कहां से आया। क्या यह स्त्री संसर्ग के आनंद से परिचित था? उम्र का तकाजा तो था, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वभाविक था, किंतु जो कुछ मैं समझ पा रही थी वह तनिक चकित करने वाला था। उसकी नजरों में हवस थी, जो सामान्यत: मुझे औरतखोर मर्दों की नजरों में दिखती थी। मेरी नजर अनायास उसके जीन्स के अग्रभाग पर पड़ी, गनगना उठी यह देखकर कि वहां का उभार असामान्य रुप से वृहद था।

“कब आए बेटा?” लरजती आवाज को नियंत्रित करते हुए बोली। बेटा कहते हुए मेरी जुबान लड़खड़ा उठी थी।

“अभी ही तो।” सुनकर मन प्रसन्न हो उठा। मतलब पूरे तीन दिन। मन में कुटिल योजना का सृजन होने लगा। उसकी सशक्त भुजाओं के आगोश में समाने की कामना तीव्र हो उठी। उसकी भाव भंगिमाओं से अहसास हो रहा था यह कार्य अधिक मुश्किल होने वाला नहीं था। अब वह इस खेल में कितना माहिर है यह तो पता नहीं लेकिन इतना तो पता चल ही रहा था कि यह नारी तन का स्वाद चख चुका है। तभी तो मुझ जैसी चालीस पार की स्त्री पर भी लार टपका रहा था।

“रेखा, यह गलत बात है।” मैं रेखा से मुखातिब हुई।

“क्या गलत?” रेखा बोली।

“अरे बेटा आया है, तो मेरे यहां लेकर क्यों नहीं आई?” मैं शिकायत भरे लहजे में बोली।

“अभी ही तो आ रहा है। घर भी नहीं घुसा है।”

“तो एक काम करो ना, शाम को आ जाओ हमारे यहां।”

“देखती हूं।”

“देखती हूं नहीं, आना ही होगा।”

“चलते हैं न मॉम, शाम को, ऑंटी के यहां।” पंकज रेखा से बोला। वह बड़ी ललचाई नजरों से मुझे घूर रहा था।

“ओके बाबा ओके, चलेंगे चलेंगे।”

“दैट्स लाईक अ ग्रेट मॉम। ओके आंटी आते हैं शाम को।” कहते कहते उसने अपने जीन्स के सामने के फूले हिस्से को सहला दिया। हाय, कितना बेशर्म है यह तो। मैं भौंचक्की रह गयी। इस उम्र में ही ऐसा? जरा भी शर्म नहीं थी। अगर कोई और औरत होती तो अवश्य मार खाता। निश्चित ही यह सबके सामने तो ऐसा बिल्कुल नहीं करता होगा। फिर मेरे सामने? तो इसे मुझमें ऐसा क्या दिखा? इसे ऐसा क्यों लगा कि मैं उसकी ऐसी ओछी हरकत पर कुछ बोलूंगी नहीं? क्या इसे औरतों की पहचान है? कमाल है, इसी उम्र में! समझ गयी, इस उम्र में ही बिगड़ गया है यह। अब तो और आसान था इसकी अंकशायिनी बनना।

“आना जरूर, इंतजार करूंगी।” कहते समय मैं पंकज से नजरें मिला नहीं सकी।उसकी नजरों की ताब न ला सकी। कैसी भूखी नजरों से घूर रहा था मानों खा ही जाएगा।

“अब इतना बोल रही हो तो मना कैसे कर सकती हूं भला। आऊंगी, पंकज के साथ।” रेखा बोली। मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा। देखना था पंकज कितने पानी में है। हाव भाव तो मेरे मनमाफिक ही था, एकदम औरतखोर जैसा। मैं अधीर हो रही थी शाम के मुलाकात के लिए। किसी प्रकार स्वयं को संयत कर आगे बढ़ गयी। अब इंतजार था शाम का।

घर पहुंच कर मैंने देखा, दो तीन लोग ही दिखे काम करते हुए। प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन और दास बाबू। गूंगा बढ़ई लगता है भीतर कुछ काम कर रहा था। मैं उन सबको नजरअंदाज करते हुए अंदर की ओर बढ़ ही रही थी कि ठेकेदार दास बाबू की आवाज आई, “मैडम।” मेरे पांव जहां के तहां जम गये।

“हां दास बाबू, बोलिए।”

“आप तो हमें भूल ही गयीं।”

“नहीं तो।”

“फिर ऐसी बेरुखी, अपने कद्रदानों से?” कामुकतापूर्ण ढंग होंठ चाटता हुआ बोला वह।

“हट, ऐसा तो नहीं है।” मैं बोली।

“फिर इतनी जल्दी किस बात की?” अपने पैंट के अग्रभाग पर हाथ फेरते हुए बोला।

“संभालिए अपने पपलू को।”

“आपको देखकर संभलता ही तो नहीं यह हरामी। मौका तो दीजिए सेवा का, मेरा पपलू खुश हो जाएगा, आपकी मुनिया खुश हो जाएगी।”

“जानती हूं, जानती हूं, लेकिन अभी नहीं, फिर कभी, अभी मैं जल्दी में हूं।” मैं पीछा छुड़ाने के लिए बोली। वैसे दास बाबू के लिंग, उनकी कामकला और संभोग क्षमता से मैं कम प्रभावित नहीं थी।

“ठीक है, लेकिन यह फिर कभी कब आएगा?” उन्होंने पास आकर मेरी ब़ाह पकड़ ली। मैं हड़बड़ा गयी उनकी धृष्टता पर। इधर उधर देखा, सभी अपने काम में व्यस्त थे।

“हाथ छोड़ मां के लौड़े, वरना हाथ तोड़ के गांड़ में डाल दूंगी।” फुंफकार उठी मैं। मेरे इस रौद्र रूप की तो कल्पना भी नहीं की थी शायद उसनें। सहम कर छोड़ दिया मुझे।

“ओह सॉरी।” उसकी सहमी आवाज सुनकर मैं पसीज गयी।

“कोई बात नहीं, लेकिन ख्याल रखिएगा, मैंने ना कहा मतलब ना। वैसे भी मैं सिर्फ अभी न ना कह रही हूं। लेकिन शायद ऐसी बेरुखी से नहीं कहना चाहिए था। बुरा लगा?” मैं नरमी से बोली।

“नहीं, मेरी गलती है। मुझे ऐसे खुले में ऐसी गुस्ताखी नहीं करनी चाहिए थी।”

“छोड़िए अब इस बात को। हां बोलिए कब आऊं आपकी बांहों मेंं पिसने के लिए?” मैंने माहौल हल्का किया।

“ओके, तो परसों।” खिल उठा वह।

“वाह मेरे रज्जा, ये हुई न शरीफों की तरह बात। निकाल लीजिएगा सारी कसर। अगर मन में गुस्सा अब भी है तो वो भी निकाल लीजिएगा, मैं कुछ न बोलूंगी, ठीक है मेरे रसिया?” मैं मनमोहक मुस्कान फेंकती हुई तेजी से घर में दाखिल हुई। बैग वैग बिस्तर में ही फेंक फांक कर सीधे बाथरूम में घुस गयी। अच्छी तरह से नहा धोकर फ्रेश हो गयी। अच्छा सा परफ्यूम छिड़क कर तैयार हो गयी।

“क्या बात है, बड़ी चमक रही हो?” बैठक में आते ही हरिया बोला।

“अच्छा नहीं लग रहा है?” मैं बोली।

“बहुत अच्छा लग रहा है। मन कर रहा है…..”

“क्या मन कर रहा है?” इससे पहले कि मैं कुछ समझती, हरिया नें आगे बढ़ कर मुझे चूम लिया। “हट।” मैंने मीठी झिड़की दी। अबतक रामलाल भी आ पहुंचा।

“वाह, सुंदरी।” वह बोल उठा।

“हट, अब आप भी शुरू हो गये।”

“हें हें हें हें” हंसने लगा वह। “अब सुंदरी को सुंदरी न कहें तो और का कहें?”

“अभी एक और सुंदरी आने वाली है।” मैं बोली।

“कौन?” हरिया और रामलाल दोनों एक साथ बोल पड़े।

“रेखा।”

“वाह, कल ही तो आई थी। वाह, मस्त है। मजा आएगा।” रामलाल मासूमियत से राज पर से पर्दा फाश कर दिया।

“ओह, कल ही आई थी? मगर मुझसे तो मिली नहीं?” मैं चकित होने का दिखावा कर रही थी।

“वह हमसे मिलने न आई थी।”

“हां हां, हमसे काहे मिलेगी। मैं कोई मर्द थोड़ी न हूं। खैर छोड़ो यह सब बात। वह आने वाली होगी, नाश्ता पानी का व्यवस्था करो जा कर।” मैं बोली। हरिया तुरंत किचन में जा घुसा। रामलाल भी फ्रेश होने भागा। रेखा जो आने वाली थी। पांंच बजते बजते ही रेखा आ धमकी पंकज के साथ।

“वाऊ कामिनी, बड़ी खूबसूरत लग रही हो।” रेखा प्रशंसात्मक स्वर में बोली।

“हां आंटी, यू आर लुकिंग ग्रेट।” पंकज  मुझे ऊपर से नीचे ललचाई नजरों से देखता हुआ बोला।

“तुम दोनों मां बेटे भी ना। इतनी भी खूबसूरत नहीं हूं। तुम्हें देखो, तुम भी कम खूबसूरत लग रही हो क्या?” मैं रेखा से बोली। हल्की क्रीम कलर की शिफॉन की साड़ी में उसका सांवला रंग खूब खिल रहा था। कमनीय देह की मालकिन तो थी ही। उस पर लो कट ब्लाऊज से उसके छलक पड़ने को बेताब बड़े बड़े उरोज तो गजब ही ढा रहे थे। मर्दों के दिलों पर छुरियां चलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी उसनें। कितनी बदल गयी थी। कहां तो साल भर पहले तक पति की अवहेलना झेलती, मात्र एक घरेलू औरत बन कर घुट घुट कर जीने को वाध्य थी, उसी को अपना जीवन मानकर जीती रही, किंतु मेरी संगत में आकर उसनें जीना सीख लिया था। जीने का नजरिया ही बदल गया था उसका। पहनावा ओढ़ावा भी बदल गया था और उसका व्यक्तित्व काफी चित्ताकर्षक हो गया था।

“हट रे, चढ़ा मत मुझे।” झेंप गयी थी पगली।

“सच कह रही हूं।” मैं बोली।

“हां, यह सच है।” अबतक रामलाल भी आ गया था। दमक रहा था वह भी। तभी हरिया भी आ गया, और संयोग तो देखो, करीम भी न जाने कहाँ से जिन्न की तरह प्रकट हो गया।

“वाह रेखा जी, आज तो बिजली गिरेगी।” करीम बोला।

“कामिनी, इसी लिए बुलाया था? सब मिल कर मेरी खिंचाई किए जा रहे हैं।” तनिक झुंझलाहट के साथ रेखा बोली।

“बस बस, हो गया। हरिया चाचा, जाकर चाय की व्यवस्था कीजिए, लेकिन पहले पानी तो पिलाईए।” मैं बात बदलते हुए बोली। अबतक पंकज की नजर सिर्फ मुझी पर गड़ी थी।

“पानी मैं लाता हूं।”कहते हुए करीम चला। हरिया चाय की व्यवस्था करने किचन में जा घुसा। रामलाल वहीं सोफे पर बैठ गया। उसकी प्रशंसात्मक व कामुक दृष्टि रेखा पर ही टिकी हुई थीं। मेरे मन मेंं अपने तरीके से पंकज को हासिल करने की योजना बन चुकी थी, सबकुछ बड़ा आसान था। कुछ सी पलों में करीम पानी लेकर आ गया। कुछ मिनट पश्चात गरमागरम पकौड़े ले कर हरिया हाजिर हुआ। हम पकौड़े खाते हुए इधर उधर की बातें करने लगे।

“हां तो पंकज, कॉलेज में क्या सब्जेक्ट है?” मैं पंकज से मुखातिब हुई। पंकज अकस्मात हुए इस सवाल से हड़बड़ा गया। वह मेरी कमनीय देह पर ही खोया हुआ था।

” क क क क्या?”

“सब्जेक्ट्स।” उसकी हालत पर मैं मुस्कुरा उठी।

“ओह, साईंस।”

“ओहो, साईंक्टिस्ट साहब, आगे क्या करना है?”

“इंजीनियरिंग।”

“बहुत बढ़िया। किस फील्ड में?”

“आई टी।”

“बहुत बढ़िया। अच्छी तरह पढ़ रहे हो ना?”

“हां, तैयारी तो पूरी है।”

“गुड ब्वॉय।” इसी बीच चाय भी आ गयी। हम सभी चाय की चुस्कियां लेने लगे।

“आंटी, आपका कैंपस और घर तो काफी बड़ा है।” चाय पीते पीते पंकज बोला।

“हां वो तो है। दिखा दूंगी, पहले चाय खतम कर लो।”

“ओह श्योर।” गटागट चाय पी गया वह। मैं मन ही मन मुसक उठी, पागल, बेकरार लड़का। मुझे इस उम्र के लड़कों से इसी तरह की बेसब्री के कारण तनिक घबराहट होती है। इतने कम उम्र का यह पहला लड़का था जिस पर मेरा दिल आया था। देखती हूं, आगे क्या होता है।

“चलें।” खड़ा हो गया वह।

“अरे चाय तो खतम कर लूं।” मैं जानबूझकर कर धीरे धीरे चाय पी रही थी। मुझे उसकी बेकली देख कर मजा आ रहा था। “चल रेखा तू भी।” मैंने यूं ही बोल दिया। मैं जानती थी कि रेखा का मन नहीं था उठने का। तीन तीन मनपसंद मरदों के बीच बैठी जो थी। तीनों के मुंह से लार टपक रहे थे। अवसर का फायदा उठाने की फिराक में थे सभी। मैं जानती थी, लेकिन पंकज को समझ नहीं आया। वैसे भी उसके दिमाग में तो मेरी खूबसूरती का परदा पड़ा हुआ था।

“नहीं तुम ही लोग घूम आओ। मैं यहीं ठीक हूं।”

“पूरा कैंपस और घर देखने में समय लगेगा।”

“लगने दे।”

“देर होगा।”

“होने दे।”

“बोर हो जाओगी यहां बैठे बैठे।”

“नहीं होऊंगी बोर, यहीं ठीक हूं मैं। बातें करूंगी, ये लोग हैं न।” साली इनसे करेगी बात, जो लगाए बैठे हैं घात। दिखा दी अपनी जात, खेलेंगे तीनों हाथो हाथ। तीन तीन औरतखोर बूढ़े और एक अकेली औरत जात। समझ रही थी सब, इनसे मस्ती के मूड में थी। जब तीनों मिलके नोचेंगे तब समझ आएगा। समझ क्या आएगा, शायद इसकी अभ्यस्त भी हो चुकी हो। खैर मुझे क्या, मैं तो खुद अनजान हिरणी बनी इस उभरते, नवसिखुए, भूखे शेर का शिकार बनने की कल्पना में डूबी हुई थी। पता नहीं क्या करेगा? कैसे करेगा? रोमांच था, तनिक भय भी था इसकी बेसब्री से, किशोरावस्था की अपरिपक्वता से, खिलंदड़ मानसिकता से। खैर जो होगा देखा जाएगा। मुझे भी अनजाने, जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में संसर्ग का लुत्फ उठाने में अलग ही आनंद की अनुभूति होती थी। जोखिम था, किंतु परिस्थिति की बागडोर मुझे अपने हाथों में रखना बखूबी आता था, अत: सारी शंकाओं, दुश्चिंताओं को झटक कर खुद को पंकज के आगोश में झोंकने को तत्पर हो गयी। यही सोचते हुए मैं उठ खड़ी हुई।

“चलो बेटे, मैं तुम्हें घुमा लाती हूं।”

“चलिए आंटी।” उछल कर खड़ा हो गया और मेरे पीछे पीछे चल पड़ा। हम उस बैठक हॉल से निकले और बरामदे से होते हुए बाहर लॉन की ओर बढ़े।

“यह बांई ओर कौन सा बिल्डिंग बन रहा है आंटी?” पंकज अब मुझ से सट कर चल रहा था। मैं सनसना उठी थी।

“यह हमारा वृद्धाश्रम बन रहा है। देखना है?”

“हां हां चलिए।” अबतक सारे कामगर जा चुके थे। भवन करीब करीब तैयार था। फिनिशिंग का काम चल रहा था। ग्राऊंड फ्लोर तैयार हो चुका था। प्रथम तल्ले का काम भी खत्म होने को था। ग्राऊंड फ्लोर में एक बड़ा सा हॉल, छ: बड़े बड़े कमरे, एक बड़ा सा बावर्चीखाना और तीन टॉयलेट व बाथरूम थे। एक कमरे में संयुक्त टॉयलेट बाथरूम था। हम अभी उस कमरे में घुसने ही वाले थे कि पंकज बोला, “बहुत अच्छा और बड़ा बंगला है ये तो।”

“हां।”

“क्यों?”

“बन गया बस। पता नहीं कितने लोगों का आना होगा यहां। हो सकता है और बढ़ाना पड़े इसे।”

“ओह। एक बात बोलूं।” वह बिल्कुल सट गया था मुझसे।

“बोलो।”

“आप बड़ी खूबसूरत हैं।”

“ऐसा? मुझे तो नहीं लगता ऐसा।” मैं उस कमरे में घुसते हुए बोली। धीरे धीरे वह मुद्दे पर आ रहा था।

“सच कह रहा हूं।”

“हट झूठे।” मैं पुलकित हो कर बोली।

“झूठ नहीं, सच्ची।”

“अच्छा मान लिया, तो?”

“तो, आपको प्यार करने का मन कर रहा है।” वह ठीक मेरे पीछे खड़ा था, सट कर।

“हट, यह ककककक्या कह रहे हो तुम?” मैं चौंकने का नाटक करते हुए पलट कर बोली। जैसे ही पलटी, पंकज से टकराई और गिरते गिरते बची। पंकज नें मुझे अपनी मजबूत बांहों में थाम लिया था। अच्छा खासा छ: फुटा गबरू जवान था वह। “छोड़ो मुझे।” उसकी बांहों से छिटक कर बोली।

“ठीक तो कह रहा हूं।” दुबारा उसनें मुझे बांहों में जकड़ लिया।

“हाय राम, यययययह ककक्या कर रहे हो?” मैं बनावटी गुस्से में बोली।

“प्यार कर रहा हूं और क्या।” जबरदस्ती मुझ पर हावी होता जा रहा था।

“छि: छि: मैं तेरी मां की जैसी हूं। छोड़ो मुझे।” मैं कसमसाते हुए बोली।

“मां जैसी न हो, मां तो नहीं ना।” अब वह मेरी कमर को कस के पकड़ा और मुझे चूमने को सामने झुका। मैं पीछे कितना झुकती। मेरे बड़े बड़े स्तन उसके चौड़े चकले सीने से दब कर कुर्ते से छलक पड़ने को व्याकुल हो उठे। मैं अंदर ब्रा नहीं पहनी थी। नीचे मैं प्लाजो पहनी हुई थी। जिसकी कमर में इलास्टिक था।

“शर्म नहीं आती?”

“नहीं।” धृष्टता पूर्वक बोला वह। उसकी आंखों में वासना की चमक स्पष्ट देख पा रही थी मैं।

“ऐसा मत करो मेरे साथ बदमाश।”

“कैसा करूं?” शरारतपूर्ण ढंग से बोला। मै अपनी योनि के ठीक ऊपर  कठोर  दस्तक महसूस कर चुनचुना उठी।

“बेशरम।”

“हां मैं हूं बेशरम।”

“जंगली।”

“हां हूं मैं जंगली।”

“जानवर, छोड़ मुझे।”

“जानवर हूं, छोड़ कैसे दूं, इतने खूबसूरत शिकार को?” उसनें अपने तपते होंठ मेरे थरथराते होंठों पर धर दिया। मैं उसकी बांहों में पिघलने लगी। मैं इस जवान लड़के की बांहों में समाने को आतुर थी, किंतु इनकार का नाटक, शरीफ महिला का अभिनय करते हुए छटपटाती रही। एक हाथ से उसनें मेरी कमर थाम कर दूसरे हाथ से मेरे नितंबों को मसलना आरंभ कर दिया था। उसे शायद आभास हो गया था कि प्लाजो के अंदर मैं नंगी थी। पैंटी नदारद थी। उसके चुम्बनों से मैं अपने पर से नियंत्रण खोने लगी थी और उस पर उसके पंजों से मेरे नितंबों का मसला जाना, मैं पागल होने लगी।

ज्यों ही उसके होंठ मेरे होंठों से हटे, मैं अपने को संयंत करते किसी प्रकार बोली, “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, यह यह ककककक्या कर रहे हो मेरे साथ? उफ्फ्फ छोड़ो।”

“छोड़ने के लिए थोड़ी न पकड़ा है? अरे, अरे, आपने तो अंदर कुछ पहना भी नहीं है। वाह, इसका मतलब, इसका मतलब आप तो पहले से तैयार हैं।” अब वह पूरे औरतबाज की तरह बोल रहा था।

“तैयार? किस बात के लिए तैयार। छोड़ो मुझे। आह्ह्ह्ह।” मैं तड़पती हुई बोली।

“अब यह बताना पड़ेगा? क्या चुदवाने के लिए तैयार नहीं हैं बोलिए?” पक्के माहिर चुदक्कड़ की भांति बोल रहा था वह।

“छि: छि: यह क्या बोल रहे हो?” मैं विरोध दिखाने लगी।

“छि: छि: क्या? क्या मैं समझता नहीं? अंदर पैंटी नहीं पहनने का क्या मतलब?” वह छाता जा रहा था मुझ पर।

“हट हरामी, वह तो जल्दी बाजी में…..”

“जल्दी बाजी में, या चुदने की तैयारी में?” उसकी शिकारी नजरें मेरे चेहरे पर गड़ी थीं।

“यह तुम ककककक्या बोल रहे हो?”

“सच ही तो बोल रहा हूं।”

“छि:, यह सब करने के लिए तुझे मैं ही मिली थी हरामी? और भी तो हैं?” मेरा विरोध बदस्तूर जारी था।

“और भी हैं मगर आपकी जैसी नहीं।” उसनें अब मेरे नितंबों को मसलना छोड़कर मेरे उरोजों को मसलना शुरू कर दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई, आह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं, अपनी मां जैसी औरत से ऐसी हरकत क्यों कर रहा है रे? बरबाद हो जाऊंगी मैं।” मैं विरोध करती रही, मगर धीरे धीरे वह मुझे पीछे ढकेलने लगा। पीछे जाते जाते अचानक मेरा पैर कमरे में पड़े एक लकड़ी के तख्तपोश से टकराया और मैं पीछे की ओर गिरने लगी, लेकिन पंकज नें अपनी मजबूत पकड़ से आजाद नहीं किया, बल्कि हौले से मेरे असंतुलित शरीर को उस तख्तपोश पर लिटा दिया और मुझ पर झुक गया।

“बरबाद कौन कर रहा है आंटी आपको? वाह वाह, ब्रा भी नहीं, अब बताईए, मैं सच ही कह रहा था ना, आप चुदने के लिए लाई हो मुझे यहां?” धूर्तता से मुस्कुरा रहा था।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई।” मैं कलप कर बोली। लेकिन वह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। अब उसने कुर्ते के ऊपर से ही मेरे उरोजों को मसलना आरंभ कर दिया। “आह, ये ये ये ऐसा मत करो आह्ह्ह्ह।”

“बकवास, नाटक, सब नाटक। ऐसा क्यों न करूं? इतनी मस्त, दबवाने, चुसवाने को तैयार, पकी पकाई चूचियों को ऐसे कैसे छोड़ दूं? वाह वाह, बड़ी मस्त चूचियां हैं आंटी। आप तो बड़ी मस्त माल हो, मजा आ गया।” वह अब बेदर्द होता जा रहा था। मेरे स्तनों को दबाने में उसे बड़ा मजा आ रहा था। मैं पगलाई जा रही थी।

“देखो यह ठीक नहीं है। ओह बाबा, ओह, छोड़ो छोड़ो।” मैं गिड़गिड़ाने का नाटक करने लगी। हालांकि मैं समझ रही थी कि मेरे नाटक का परदा आहिस्ता आहिस्ता खुलता जा रहा था। फिर भी मैंने अपना अभिनय छोड़ा नहीं।

“ठीक है छोड़ दूंगा आंटी छोड़ दूंगा, बस एक बार देख तो लूं आपका नंगा बदन।” कहते कहते जबरदस्ती मेरे कुर्ते को उतार दिया। मैं नहीं नहीं करती रही, किंतु वह अब कहां रुकने वाला था। ब्रा तो पहनी नहीं थी, सो मेरे बड़े बड़े स्तन बेपरदा हो कर फड़फड़ा उठे। वह भूखे कुत्ते की तरह टूट पड़ा मेरे स्तनों पर और मुंह में भर कर चूसने लगा। उसका एक हाथ अब मेरी योनि पर पहुंच चुका था। वह मेरी योनि सहला रहा था। मेरी योनि पानी छोड़ने लगी, जिससे मेरे प्लाजो का अगला हिस्सा भीग गया। वह समझ गया कि मैं ताकरीबन तैयार हो गयी थी।

“नननननहींईंईंईं, प्लीज, प्लीज, ऐसा न करो। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, कितने खराब हो तुम। इतनी कम उम्र में यह सब, हाय रा्आ्आ्आ्आ्आम।” मैं उसकी बांहों में छटपटाती रही।

“मेरी उम्र पर मत जाईए आंटी।”

“क्यों? क्यों न जाऊं तेरी उम्र पर कमीने कुत्ते?”

“क्योंकि अबतक मैं आठ लौंडियों और दो औरतों को चोद चुका हूं। हां हा, ठीक कहा आपने, मैं सच में कमीना हूं, कुत्ता हूं। अब तक तो आपको समझ आ ही गया होगा। नहीं आया तो अब समझ आ जाएगा।” कहते हुए उसने अपने हाथ से मेरी प्लाजो को नीचे खिसका दिया। मेरी फकफक करती योनि खुली हवा के संपर्क में और आ कर फुदक उठी। यहीं कहां रुका वह। वह तो खींच खांच कर मेरे प्लाजो को उतारता चला गया। लो, हो गयी मैं नंगी, मादरजात नंगी।

“हाय राम ओह भगवान, यह ककककक्या किया?” मैं बनावटी गुस्से का इजहार करते हुए बोली।

“बस्स्स्स्स, हो गया, नंगी किया और क्या। देखना था आपका नंगा बदन। वाऊ आंटी, उफ्फ्फ, क्या बदन है आपका आह।” उसकी आंखों में अब वहशी पन अब मैं साफ साफ देख पा रही थी। संध्या का करीब छ: बज रहा होगा। मई के महीने में बैसे भी छ: साढ़े छ: बजे सूर्यास्त होता है यहां। प्रकाश पर्याप्त था मेरी कामुक देह का दर्शन करने को। मैं अपने को बेबस दिखा रही थी। उसके चंगुल में फंसी बेबस पक्षी की भांति फड़फड़ा रही थी। उसकी नजरें ज्यों ही मेरी योनि पर पड़ी, फटी की फटी रह गयी।

“उफ्फ्फ, इतनी फूली फूली चूत, माई गॉड, इतनी चिकनी, मक्खन जैसी, गजब आंटी। मान गया, आप भी क्या चीज हो।” वह अब बेसब्र हो चला था।

“हो गयी न तसल्ली?”

“किस बात की तसल्ली?”

“मुझे नंगी देखने की।”

“हाय रे मेरी भोली आंटी। ऐसे नंगे बदन को देखकर, ऐसी मस्त चूचियों को देखकर, ऐसी मस्त गांड़ को देखकर और ऐसी मक्खन जैसी चूत को देखकर भला बिना चोदे तसल्ली कैसे हो?” उसके होंठों पर वहशियाना मुसकान नाच रही थी।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई।”

“क्या नहीं?”

“यह गलत है।”

“गलत कुछ नहीं। औरत को चोदना मर्द की गलती नहीं।” वह अपना पैंट खोल चुका था। जल्दी से चड्ढी भी उतार फेंका उसनें। हाय रा्आ्आ्आ्आ्आम, इतना्आ्आ्आ्आ बड़ा लिंग? आज तो तू मरी रे कामिनी। उफ्फ्फ भगवान, इस 18 साल के लड़के का लिंग इतना्आ्आ्आ्आ बड़ा्आ्आ्आ्आ्। दस इंच तो अवश्य लंबा था और मोटा, बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, कम से कम तीन इंच तो जरूर था मोटा। उफ्फ्फ भगवान कहाँ कहाँ से ऐसे लौंडे दिलाते हो मुझे? मेरी क्षमता की परीक्षा तो नहीं ले रहे? भयभीत होना लाजिमी था। मैं कोई अपवाद नहीं थी।

“अपनी उम्र देखी है?”

“हां।”

“मेरी उम्र देखी है?”

“हां।” धृष्टता की पराकाष्ठा थी।

“फिर भी?”

“हां, फिर भी।”

“तेरी मां की उम्र की हूं।”

“क्या फर्क पड़ता है?”

“विधवा हूं।”

“आप नाम के लिए विधवा हैं। आपका सब कुछ हजारों सधवाओं से कहीं ज्यादा आकर्षक है।”

“फिर भी…..”

“फिर भी क्या?”

“बरबाद हो जाऊंगी।”

“कौन सी सती सावित्री हैं आप? सब कुछ तो दिख रहा है। अब ज्यादा नखरे मत कीजिए।” कहते हुए उसनें मेरे स्तनों को दोनों हाथों से मसलना आरंभ किया और मेरी योनि पर अपना मुंह रख दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई।” वह तो मानो बहरा हो गया था। मैं पागलपन में पैर पटकने लगी, लेकिन वह तो कुत्ते की तरह मेरी योनि को चाटने लगा, चूसने लगा, मेरे भगांकुर को दांतों से काटने लगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह इस्स्स्ई्ई्ई मांआंआंआंआं अर्र्र्र्र्रे्ए्ए्ए्ए्ए, उफ्फ्फ हर्र्र्र्रा्आ्आ्आ्आ्आमी्ई्ई्ई्ई्ई।” मैं थरथरा उठी। समझ गया वह कि अब मुझे बड़े आराम से चोद सकता था। अतः पोजीशन में आ गया। जबरदस्ती मेरे पैरों को फैला कर आ गया मेरी जांघों के बीच।

“अब तैयार हो जाईए।”

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई।”

“क्या नहीं?”

“मर जाऊंगी।”

“नहीं मरोगी।” अब आदरसूचक संबोधन भूल गया वह।

“फाड़ दोगे तुम।”

“हट, नहीं फटेगी।”

“बहुत मोटा है तुम्हारा।”

“मेरा क्या? मेरा क्या मोटा है?”

“ल्ल्ल्ल्ल्लिंग।”

“ओह ये्ए्ए्ए्ए्ए्ए, ये लिंग नहीं, लंड है, लौड़ा है।” बेशर्मी से अपना लिंग हिलाते हुए बोला।

“उफ्फ्फ, मत करो।”

“करूंगा तो जरूर, ये्ए्ए्ए्ए्ए्ए ले्ए्ए्ए्ए्ए।” कहते हुए मेरे इनकार, चीख पुकार को नजरअंदाज करते हुए घुसाता चला गया अपना विकराल लिंग मेरी योनि में।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं, मर्र्र्र्र गयी्ई्ई्ई्ई्ई्ई रे्ए्ए्ए्ए्ए।” मैं दर्द से बेहाल होने लगी। मेरी चूत फटने फटने को होने लगी। मगर उसे मेरी चीख पुकार से क्या मतलब था। उसे तो मिल गया था जो उसे चाहिए था।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, मस्त आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह। इतनी बड़ी चूत मगर इतनी टाईट? आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, मजा आ गया।” वह मस्ती में भर कर बोल उठा।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” मैं दर्द से छटपटा रही थी।

“चुप्प हरामजादी, थोड़ा बर्दाश्त कर, फिर मजा आएगा।” अब वह गुर्राने लगा।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई, मर रही हूं मैं्ऐं्ऐ्ऐं।”

“चुप्प साली कुतिया, न जाने कितना लंड खा चुकी है, अब नखरे कर रही है। हुं ््ऊऊंं््ऊऊंं। ये ले्ए्ए्ए्ए्ए। मजा ले” उसनें पूरा का पूरा भीमकाय लंड मेरी चूत में गर्भाशय तक ठोंक दिया। वह पूरी तरह अब जानवर बन गया था। फिर तो ताबड़तोड़ धक्के पे धक्का, बड़ी निर्ममतापूर्वक देने लगा और मैं हलकान होने का दिखावा करती रोने लगी।

“हाय, बरबाद हो गयी्ई्ई्ई्ई्ई्ई मैं।”

“साली शरीफजादी रंडी आंटी, बरबाद तो तू पहले से है। मुझे पता नहीं लग रहा है क्या। चुपचाप मजे से खाती रह मेरा लौड़ा बूरचोदी कुतिया आंटी।” बड़ी नृशंसता पूर्वक मुझ पर पिल पड़ा। मेरे गालों को चूमने लगा, होंठों को चूमने लगा, मेरी चूचियों को चूसने लगा, निप्पलों को दांतों से काटने लगा, और लगातार बड़ी तेज रफ्तार से कुत्ते की तरह दनादन दनादन अपनी कमर चलाता रहा। दर्द तो स्वभाविक था, लेकिन वह दर्द क्षणिक था, फिर तो आनंद ही आनंद। मजा ही मजा। मैं सुखद अहसास से सराबोर होती, उस बीस मिनट की भीषण चुदाई के दौरान दो बार झड़ी, उफ्फ्फ, और क्या खूब झड़ी। निहाल कर दिया उसनें मुझे। उस दौरान मैं भी मस्ती में भर कर कमर उछाल उछाल कर चुदवाने को वाध्य हो गयी।

“आह आह आह ओह ओह ओह।”

“आ रहा है न मजा?”

“हां रज्ज्ज्जा हां।”

“बोला था ना? ठीक बोला था ना?”

“हांं रे हां। साले चोदू मादरचोद हां। आह ओह चोद मां के लौड़े साले औरतखोर कुत्ते” मैं बोलते जा रही थी और चुदवाती जा रही थी। करीब बीस मिनट बाद उसनें मेरी कमर को ऐसे जकड़ा मानों तोड़ ही डालने पर आमादा हो।

“आह आह आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह ओह ओह ओह्ह्ह्ह्ह्ह।” उसका निश्वास निकला और साथ ही गरमागरम वीर्य की अंतहीन बौछार मेरी कोख में होने लगी।

“आह आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह मैं गयी्ई्ई्ई्ई्ई्ई रज्ज्ज्जा ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे चोदू बेट्टे्ए्ए्ए्ए।” मैं भी लगी झड़ने। यह मेरा दूसरा स्खलन था। मैं मानो हवा में उड़ रही थी। फिर धीरे धीरे हमारी उत्तेजना में मानों शीतल जल का फौव्वारा चलने लगा। शनैः शनैः हम दोनों एक दूसरे की बांहों में समाये शांत होते चले गये। मैं संतुष्ट थी, पूर्ण संतुष्ट, वह खुश था, संतुष्ट था, उसके होंठों की मुस्कान बता रही थी।

“वाह रानी आंटी, मजा आ गया। आज पहली बार तुम जैसी औरत को चोदकर दिल खुश हुआ।” वह तुम पर आ गया था। उम्र की दीवार ढह चुकी थी। ठीक ही था। ऐसा ही होना भी चाहिए था। अब तो मैं उसकी अंकशायिनी बन चुकी थी। हमबिस्तर हो चुकी थी। पूरे समर्पण के साथ, पूरी बेशर्मी के साथ अपनी देह सौंप चुकी थी, मैं पगली दीवानी। अपने बेटे से भी कम उम्र के इस नये आशिक को अपना सर्वस्व लुटा कर कोई ग्लानि नहीं थी।

“हां मेरे चोदू, मेरे लंडराजा बेटे, मेरे तन मन के मालिक, ओह रज्ज्ज्जा, बड़ा्आ्आ्आ्आ् सुख दिया रे्ए्ए्ए्ए्ए पागल आशिक। जितने दिन रहो चोदते रहो मुझे मेरी चूत के रसिया।” मैं उसके चोड़े चकले सीने में सर रख कर बोली। खुशी से चूम लिया मैंने उसके होंठों को। तभी, फच्च की आवाज से पंकज का लिंग मेरी योनि से भीगे चूहे की तरह बाहर निकला। हम दोनों हंस पड़े।

“अच्छा, चल अब यहां से।” कहते हुए मैं लड़खड़ाते हुए उठी और अपने कपड़े पहनने का उपक्रम करने लगी, लेकिन अब भी पंकज का वीर्य टप टप मेरी योनि से चू रहा था। वहीं कोने पर पड़े एक चीथड़े से पोछना चाह रही थी कि,

“अरे अरे, ये क्या कर रही हो, ये रहा मेरा रुमाल।” पंकज नें अपना रुमाल मुझे दिया, जिससे पोंछ पाछ कर मैंने अपनी योनि को, जो चुद कर लाल और फूल कर कुप्पा बन चुकी थी, सुखाया और साफ किया, फिर उसी से पंकज नें अपना लिंग साफ किया। हम अपने कपड़े पहन कर वहां से निकले।

“बड़ी जबर्दस्त चीज हो तुम आंटी।” पंकज बोला।

“हट। हरामजादा।” मैं इठलाई।

“सच। जिसनें भी चोदा होगा, दीवाना बन गया होगा।” छेड़ रहा था।

“चुप, छेड़ रहे हो?”

“लो, अब सच बोलना भी मुश्किल।”

“अच्छा अच्छा अब चलो।” मैं बोली। मैं जानती थी कि बैठक में भी रेखा उन तीनों ठरकियों से अवश्य मजे कर रही होगी, सिर्फ बीस मिनट में ही इस लड़के नें मेरी ऐसी की तैसी कर दी थी। गजब का लिंग था इसका और गजब की चुदाई। इतने ही समय में मेरा सारा कस बल निकाल डाला था, नस नस ढीली कर दी थी, इतनी कम उम्र में ही गजब का चुदक्कड़ निकला यह तो। खैर तीन दिन मजे लेनी थी। यह भी तो मुझ पर फिदा हो चुका था। मैं समय बिताने के लिए इधर उधर बेमतलब घूमाने लगी इसे। बेटे नें तो मजा ले लिया था, मैं भी भरपूर मजे ले चुकी थी, इसकी मां के मजे में क्यों व्यवधान डालूं, इतनी भी स्वार्थी नहीं थी मैं। करीब घंटे भर बाद जब हम बैठक में पहुंचे, सब कुछ सामान्य दिख रहा था मानो वहां कुछ हुआ ही न हो। लेकिन रेखा के चेहरे का भाव सब कुछ बयां कर रहा था, वहां आए तूफान का, वासना के तूफान का।

“हो गया गप सड़ाका?” मैं मुसकराते हुए रेखा से पूछ बैठी।

“हां, हो गया।” झेंपती हुई रेखा बोली।

एक सामान्य गृहिणी रेखा, पति की बेरुखी सहती रेखा, अपने जिस्म की दमित भूख से तप्त रेखा को परपुरूषों से अनैतिक विवाहेतर संबंध बना कर अपने तन की कामेक्षा शांत करने को प्रेरित करके वासना के दलदल में तो पहले ही घसीट चुकी थी, अपने तन की अदम्य भूख से त्रस्त, अब मैं उसके नादान पुत्र (हालांकि नादान कहना शायद गलत होगा, क्योंकि कामक्रीड़ा में जिस तरह की सिद्धहस्तता का परिचय मुझे दिया, वह बड़े बड़े औरतबाज मर्दों की तुलना में कहीं बेहतर था) को भी, उसकी औरतखोरी के नशे को हवा दे कर वासना के गर्त में घसीट लाने का सफल कुत्सित प्रयास कर चुकी थी और मुझ कामांध औरत द्वारा यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा यह निश्चित था।

पंकज को तो यह अहसास तक नहीं था कि उसे ऊपरवाले नें कितने कीमती उपहार से नवाजा था और वह अद्वितीय उपहार था उसका अविश्वसनीय रूप से दीर्घ और मोटा लिंग। उसका लिंग न केवल विशाल था, बल्कि उसका सौंदर्य भी चित्ताकर्षक था। भयभीत कर देने वाले उस लिंग के आकार के बावजूद उसकी सुंदरता मनमोहक थी। एक तो उसकी कद काठी, उसपर उसका मनमोहक व्यक्तित्व और तिस पर स्त्रियों का दिल धड़का देने वाला अकल्पनीय रूप से आकर्षक लिंग से लैस, उभरता हुआ नवयुवक था पंकज। तभी मैं सोचूं कि उसनें इतनी सी उम्र में आठ लड़कियों और दो औरतों को फंसाया कैसे। कितना आसान होता होगा लड़कियों को अपनी जाल में फंसा कर हवस का शिकार बनाना, जैसे मैं बनी। खैर मैं तो वैसे भी वासना की भूखी गुड़िया ठहरी।

मुझे कभी कभी खुद पर और खुद की किस्मत पर आश्चर्य होता है। मेरे जीवन में वासना के इस खेल का आरंभ जब से हुआ, तब से लेकर अब तक प्रायः सब कुछ खुद ब खुद होता गया और कुछ अवसरों पर मेरे थोड़े से प्रयास की आवश्यकता पड़ी, जिसपर ऊपरवाले की कृपादृष्टि सदैव बनी रही। उसने मेरी राह को सुगम बनाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा और मैंने मान लिया कि आनंदमय जीवन का उत्तम मार्ग, धारा के विरुद्ध न जा कर धारा की दिशा में बहते जाने में ही है। इसी को मैंने अपने जीवन का दर्शन बना लिया। जरूर इसमें मेरी खूबसूरती और कमनीय देह के आकर्षण का भी योगदान रहा है, लेकिन यह भी तो ऊपरवाले की कृपा ही थी मुझ पर। अब आज ही की बात को ले लीजिए, मेरे रूप लावण्य के कारण पंकज की कामलोलुप दृष्टि मुझ पर पड़ी, मेरी अधेड़ावस्था से उसे कोई फर्क नहीं पड़ा, सहज सुलभ एकांत भी प्राप्त हो गया और तुर्रा यह कि उस लगभग पूर्ण, निर्माणाधीन एकांत कमरे में ऊपरवाले नें एक लकड़ी के तख्तपोश की व्यवस्था भी कर रखी थी। कामगरों के उपयोग में आने वाला वह नंगा तख्तपोश भी उस वक्त शाही बिस्तर से कम आनंददायक नहीं लगा।

पंकज के साथ उस बीस पच्चीस मिनट के प्रथम संसर्ग वाले स्वर्गीय आनंदमय लम्हों को मन में संजोए उस कमरे से पंकज संग निकली तो प्रफुल्लित थी। पंकज प्रफुल्लित था। वह तो पूरा मुझ पर आसक्त हो गया, पागल कहीं का। वहां से जब हम निकले तो अधिक समय नहीं हुआ था और मैं जानती थी कि रेखा उन तीन खड़ूस लोगों से किस तरह की गप्पें मार रही होगी। तीनों तो थे औरतों के रसिया और रेखा जैसी रसीली औरत उनके हाथ लगी थी, ऐसे छोड़ कैसे देते? रेखा, जो खुद भी परपुरूषों से मजे लेने की अभ्यस्त हो चुकी थी, भला ऐसे अवसर का लाभ लेने में कहां पीछे रहती? यही सब सोच कर मैं पंकज के साथ इधर उधर बेमतलब घूमती समय व्यतीत कर रही थी, रेखा और उन ठरकियों को समय देना चाह रही थी। पंकज पर फिर मस्ती चढ़ रही थी। हम घूमते हुए घर के पिछवाड़े बगीचे की ओर बढ़े तो पंकज नें फिर से मेरी कमर पकड़ कर अपनी ओर खींचा,

“हाय आंटी, आप इतनी मस्त हो कि फिर मन हो रहा है।”

“हट शैतान, अभी ही तो लूटी मेरी….” छिटक कर अलग होने की कोशिश करने लगी।

“क्या लूटा मैं?” वह मुझे दबोच कर चूमने लगा।

“हट बेशरम।” मैं कसमसाते हुए बोली। उसके लिंग में तनाव मैं महसूस कर रही थी। मैं फिर अवश होने लगी।

“अच्छा, अब बेशरम हूं? चुदवाने के बाद तो बड़ी खुश थीं आप?” वह फिर से जोर जबर्दस्ती पर उतर आया था। चूमते हुए मेरे स्तनों को दबाने लगा।

“उफ्फ, मानोगे नहीं?”

“नहीं, आप जैसी औरत तो बड़ी किस्मत से मिली है। जो एक बार चोद ले, बार चोदना चाहेगा।” अब वह मुझे दबोचे वहीं चबूतरे पर बैठ गया। मैं विरोध करती रही किंतु मुझे भी खींच कर बैठा लिया अपनी बगल में। मुझे चूम रहा था, मेरे स्तनों को दबा दबा रहा था और मेरी योनि को सहला रहा था। उफ्फ उस पागल नें तो मुझे करीब करीब दुबारा गरम ही कर दिया था।

“अच्छा बाबा अच्छा, फिर कर लेना, लेकिन अभी नहीं।” मैं बोली।

“अभी क्यों नहीं?”

“तू पहले बता कि इतनी कम उम्र में यह सब कहाँ से सीखा?” मैं उसका ध्यान भटकाने की कोशिश करने लगी।

“बताऊंगा, मगर अभी नहीं, अभी तो चोदने दीजिए।”

“अरे पागल, अंदर तेरी मां बैठी इंतजार कर रही होगी।”

“करने दीजिए।”

“सोचेगी नहीं कि इतनी देर क्यों कर रहे हैं हम?”

“अच्छा अच्छा, अभी नहीं तो कोई बात नहीं, लेकिन सोच लीजिए, तीन दिन छुट्टी है मेरी, तीनों दिन चोदने दीजिएगा ना?”

“हां रे पागल हां। तू एक बार जिसे भोग ले, फिर वह मना कर पाएगी क्या? अभी तो तू ये बता कि यह सब तूने शुरू कब और कैसे किया?”

“ठीक है बताता हूं, लेकिन एक शर्त पर।”

“कैसी शर्त?” मैं शशंकित हो उठी।

“आप मेरा लंड पकड़ कर खेलती रहिए।”

“छि:”

“जाईए तब नहीं बताता।”

“अच्छा बाबा अच्छा, निकाल बाहर बदमाश।”

“क्या निकालूं?” शरारत से बोला।

“लंड हरामी, और क्या?” झुंझलाहट से बोली।

“ये हुई न बात।” कहते हुए उसनें पैंट की जिप नीचे कर अपना भीमकाय लिंग बाहर निकालने की नाकाम कोशिश की। फलतः उसे पैंट ढीली कर नीचे खिसकाने पर मजबूर होना पड़ा। पैंट नीचे खिसकते ही उसका विकराल लिंग फुंफकार मारता हुआ उछल पड़ा।

“बा्आ्आ्आ्आप रे बा्आ्आ्आ्आप, इत्तन्ना्आ्आ्आ बड़ा्आ्आ्आ्आ!” मैं सचमुच चौंक उठी। जब पंकज मेरे साथ जबर्दस्ती कर रहा था तो मुझे पता तो चला कि इसका लिंग सामान्य से काफी बड़ा है लेकिन अभी इस तरह फुर्सत में देखने का मौका मिला तो मेरा चौंक उठना स्वभाविक था। ग्यारह इंच से भी लंबा और मेरी एक मुट्ठी में भी समा न सकने जैसा कम से कम साढ़े तीन इंच मोटा लिंग अपने पूरे जलाल के साथ जुंबिश ले रहा था। तभी तो पहले पहल मैं तकलीफ का अनुभव कर रही थी।

“क्या इत्तन्ना्आ्आ्आ बड़ा? मजे में तो चुद रही थीं आप, बात करती हैं।” पंकज मेरे हाथ को अपने दर्शनीय लिंग पर रख दिया। पत्थर की तरह सख्त और गरम था वह, मगर था बड़ा प्यारा। चुदी थी ना इसी लिंग से। मैं उसके लिंग पर हाथ फेरने लगी। अंदर ही अंदर तो सुलग रही थी, किंतु खुद को काबू में रखना बखूबी आता था मुझे।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, हां्आं्आं्आं्आं, ऐसे ही सहलाती रहिए।” वह मस्ती में भर कर बोल उठा।

“अब बता।” मैं बोली।

“बताता हूं, बताता हूं। यह छ: महीने पहले की बात है।” अब उसनें अपनी हरकतें बंद कर दी थीं। मुझे तनिक राहत मिली, लेकिन वह अपनी बांयी हाथ से मेरी कमर पकड़ कर अब भी मुझे अपने से चिपकाए हुए था। इसपर मुझे कोई ऐतराज भी नहीं था। सांझ का झुटपुटा तनिक गहरा रहा था। एकांत भी था। इधर कोई आता जाता भी नहीं था। घर के अंदर तो सभी निश्चय ही व्यस्त होंगे, अतः मैं निश्चिंत उसकी बांह में सिमटी अपना सर उसके कंधे पर रख कर बैठी उसके विकराल लिंग को सहलाती जा रही थी। पंकज नें अपनी बात जारी रखी।

“””मैं प्लस टू के दूसरे साल में था। मेरे क्लास की लड़कियां मुझ पर आकर्षित थीं, लेकिन मैं सीधा सादा, पढ़ाकू किस्म का लड़का था, अतः उनपर ज्यादा ध्यान नहीं देता था। लड़कियों में एक, नैना नाम की लड़की तो मेरे पीछे ही पड़ गयी थी। वह सभी लड़कियों में ज्यादा स्मार्ट थी, बदमाश थी एक नंबर की। उमर भी हम लोगों से अधिक ही थी। पढ़ाई लिखाई में बाबाजी। दो बार एक ही क्लास में फेल हो चुकी थी। एकदम पकी पकाई जवान हो चुकी थी। खूबसूरत थी, भरा भरा गदराया बदन था उसका। एक दिन क्लास के बाद वह मेरे पीछे क्लास से निकली और मेरे पीछे पीछे चल पड़ी।

“पंकज, जरा रुक ना।” मैं रुका नहीं, और तेज चलने लगा। मैं लड़कियों के हॉस्टल को पार कर चुका था लेकिन वह अपने हॉस्टल में जाने की बजाए मेरे पीछे पीछे ही आ रही थी।

“अरे रुक ना।” मैं फिर भी रुका नहीं। उसने आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया। करीब सौ मीटर आगे लड़कों का हॉस्टल है। जहां उसनें मेरा हाथ पकड़ा, वहां सड़क के बगल में ऊंची ऊंची घनी झाड़ियां थीं।

“सुना नहीं? मैं तुम्हीं से कह रही हूं।”

“छोड़ो मुझे।” मैंने उसका हाथ झटकने की कोशिश की, लेकिन उसकी पकड़ मजबूत थी। मैं जोर जबर्दस्ती नहीं करना चाहता था।

“नहीं छोड़ूंगी।” जिद पर आ गयी।

“छोड़ो नहीं तो ठीक नहीं होगा।” मैं गुस्से से बोला।

“तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो ठीक नहीं होगा।”

“क्या करोगी तुम?”

“चिल्लाऊंगी।”

“क्या बोलोगी लोगों को?”

“यही कि पंकज मुझे छेड़ रहा है।” उसकी बात सुनकर मैं डर गया।

“बोलो, क्या बोलना है?”

“यहां नहीं, उधर चलो।” झाड़ियों की ओर इशारा कर रही थी। शाम का समय था। ठंढ के मौसम में पांच बजते बजते ही अंधेरा होने लगा था। मैं खिंचता चला गया। मुझे खींचते हुए झाड़ियों की बीच घुस गयी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, मैं झाड़ियों के उस पार था, नैना के साथ। नीचे हरी भरी घास थी। ऐसा लग रहा था मानो नैना वहां पहले भी कई बार आ चुकी है।

“यह कहाँ ले आई?”

“अरे आओ तो। आओ, बैठो यहां।”

“नहीं, जो बोलना है जल्दी बोलो। मुझे जाना है।”

“तू बैठ तो।” जबर्दस्ती खींच कर बैठने को मजबूर कर दी। मैं बेबसी में बैठने को मजबूर हो गया।

“बोलो, क्या बोलना है?”

“आई लव यू।” मुझ से लिपट कर बोली।

“हट, परे हट। यह क्या है?” मैं झल्ला कर बोला।

“यह प्यार है।” वह मुझे चूमने लगी।

“हट।” मैंने उसे झटक कर अलग कर दिया।

“चुपचाप पड़े रह, वरना मैं चिल्लाऊंगी।” वह धमकी देने लगी। मैं डर गया और चुपचाप बैठ गया। अब उसनें मेरा हाथ अपनी छाती पर रख दिया।

“देख क्या रहा है, दबा इसे।” उसनें हुक्म दिया। मैं डरते डरते उसकी कमीज के ऊपर से ही उसके बड़े बड़े सख्त चूचियों को धीरे धीरे दबाने लगा।

“आह, आह, अच्छा लग रहा है। ओह ओह।” कहते हुए उसनें मेरी जांघ सहलानी शुरू की। मेरे शरीर में सुरसुरी होने लगी। उसनें मेरा हाथ अपनी जांघ पर रख दिया और कहा, “सहलाओ मेरी जांघ को।” और मैं उसके सलवार के ऊपर से ही उसकी जांघ सहलाने लगा।

“और ऊपर।” उसनें कहा और मैं उसकी जांघों के और ऊपर सहलाने लगा।

“और ऊपर।” उसनें कहा और मैं और ऊपर सहलाने लगा। इस तरह धीरे धीरे मेरा हाथ उसकी जांघों के जोड़ तक पहुंच गया। जैसे ही मेरा हाथ वहां पहुंचा, वह मुझसे चिपक गयी। “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह पंकज, ओह्ह्ह्ह्ह्ह रज्जा। हां हां ओह्ह्ह्ह्ह्ह, वहीं, वहीं, सहलाओ रज्जा।” मैंने अपनी उंगलियों पर गीलेपन का अहसास किया। उस वक्त मुझे पता नहीं था कि यह उसकी चूत से निकलता हुआ संभोगपूर्व लसीला पानी है। मुझे लगा था उसका पेशाब निकल रहा है। मुझे थोड़ी घिन हो रही थी, फिर भी सहलाता जा रहा था। मुझे अब उसकी चूचियां दबाना और चूत सहलाना अच्छा लग रहा था। इस दौरान उसका हाथ मेरे पैंट के ऊपर से ही मेरे लंड के ऊपर नाच रहा था। मेरे शरीर में खून की रफ्तार तेज हो गयी थी। मेरा लंड सख्त हो रहा था ओर मेरे जंघिया के अंदर मानो मेरे लंड का दम घुटने लगा। मैं बेचैन हो उठा। मन हो रहा था पैंट और जंघिया उतार फेंकूं, लेकिन शर्म के मारे ऐसा करने में झिझक रहा था।

“आह आह, अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, रज्जा, अब चोद डाल मुझे।” वह अपने कपड़े उतारने लगी। मैं हतप्रभ देखता रह गया। देखते ही देखते वह नंगी हो गयी। मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं। बड़ी खूबसूरत लग रही थी। पहली बार किसी लड़की का नंगा बदन इस तरह मेरे सामने था। मेरे तन बदन में मानो आग लग गयी थी। मैं बेध्यानी में, अनजाने में ही, खुद को रोक पाने में असमर्थ, उत्तेजना के आवेश में उसे दबोच लिया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं करूं तो क्या करूं। मैं उसके नंगे जिस्म को अपनी बांहों में दबोच कर चूमने लगा। यहां तक तो अपने आप हुआ, लेकिन इसके आगे क्या? मैं उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को सहला रहा था, दबा रहा था। उसकी चूत के ऊपर हल्के रोयें उगे हुए थे। मेरा हाथ खुद ब खुद उसकी चूत पर पहुंच गया। मैं उसकी चूत पर हाथ फिराने लगा था। उसकी चूत से लसलसा द्रव्य निकल रहा था।

“आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह इस्स आह, चोद, आह अब चोद डाल मुझे आह।” वह तड़प उठी।

“कैसे? कैसे चोदूं?” मैं अनजान खिलाड़ी था। मुझे भी अपने शरीर के तनाव से मुक्त होना था लेकिन कैसे? यह मुझे पता नहीं था।

“अरे मूर्ख, उतार अपने कपड़े और अपना लंड मेरी चूत में डाल कर चोद गधे।” वह जल बिन मछली की तरह तड़पती हुई मेरे कपड़ों को उतारने में मदद करने लगी। मैं भी अपने कपड़ों से जल्द से जल्द मुक्त होना चाह रहा था। मेरे दिमाग में यह समझ नहीं आ रहा था कि उसकी चूत में अपना लंड कैसे डाल पाऊंगा। मुझे पता था कि मेरा लंड कितना बड़ा है लेकिन नैना को पता नहीं था। इतना तो निश्चित था कि नैना इस खेल की अभ्यस्त थी। मुझे लगता था कि मेरे लंड का आकार सामान्य लड़कों की भांति है और जब नैना खुद आमंत्रण दे रही थी तो मुझे लगा कि उसके लिए यह सामान्य बात है। उस वक्त माहौल बेहद गरम हो चुका था। मैं अब अपने नियंत्रण में नहीं रह गया था। आननफानन मैं भी अपने कपड़ों से मुक्त हो गया। एक पल तो वह मेरे गठे हुए शरीर की छटा देख कर नि:शब्द रह गयी। जैसे ही उसकी नजर मेरे फनफनाते लंड पर पड़ी तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गयीं।

“बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, इत्तन्ना्आ्आ्आ बड़ा्आ्आ्आ्आ लंड! न न न न नहींईंईंईंईंईंईंईंई।” बह घबरा गयी थी।

“क्या नहीं?”

“न न न न, तुम छोड़ो मुझे। छोड़ दो। रहने दो। मत चोदो।” वह डर गयी थी मेरा लंड देख कर।

“इतनी दूर तक आ कर अब कैसे छोड़ दूं।” अब मैं उसे छोड़ने के मूड में नहीं था। मुझे गरम उसी ने किया था और अब जब मेरा शरीर उस गरमी में झुलस रहा था तो उसका मना करना बहुत बुरा लगा मुझे। मैं अपने आपे में नहीं था। मैंने झपट्टा मारकर उसे दबोच लिया।

“छोड़ो मुझे।”

“अब नहीं छोड़ूंगा।”

“छोड़ो नहीं तो चिल्लाऊंगी।”

“चिल्लाओगी हरामजादी, अभी तक कह रही थी चोदो चोदो, अब क्या हुआ?” मैंने गुस्से मैं एक झापड़ लगा दिया। अब मेरा रौद्र रूप देख कर वह सहम गयी। मैं अपना नियंत्रण खो चुका था। मुझे पता नहीं कि यह चोदना क्या होता है। जैसा उसने बताया उसके अनुसार लंड को चूत में डालने का मतलब चोदना होता है। मेरे अंदर तनाव का आलम यह था कि उस तनाव से मुक्ति के लिए तड़प रहा था। नासमझी में ही सही, इतना तो पता चल ही गया था कि चोदने की इस क्रिया में अवश्य आनंद प्राप्त होता है, तभी तो नैना तब से चोदो चोदो की रट लगाए हुए थी। यह अलग बात है कि मेरे लंड के आकार से वह भयभीत हो उठी थी। मुझे तनाव से मुक्त होना था और मुझे महसूस हो रहा था कि अपने लंड के माध्यम से ही मुझे इस तनाव से मुक्ति मिलेगी। नैना के द्वारा चोदने के लिए उकसाये जाने के पीछे भी अवश्य यही कारण था। मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता था।

“चुपचाप चोदने दे।” मैं गुर्राते हुए बोला।

“नहीं।” वह अब भी मेरी पकड़ में छटपटा रही थी।

“मानोगी नहीं?”

“नहीं।”

“तो जबर्दस्ती चोदूंगा।”

“नहीं, तेरा लौड़ा बहुत बड़ा है। फट जाएगी मेरी चूत।”

“फटने दे।” चोदने के इतने करीब पहुंच कर अब मैं पीछे हटने वाला नहीं था। निर्दयता पूर्वक उसे नीचे पटक दिया। मैं जोश में अंधा हो चुका था, जानवर बन चुका था।

“नहीं, बहुत दर्द होगा।”

“तो मैं क्या करूं? तुम्हीं बोल रही थी चोदो चोदो। अब मेरा लंड इतना बड़ा है तो मैं क्या करूं।”

“डर लग रहा है।”

“तेरे डर की ऐसी की तैसी।” मैं उस पर चढ़ बैठा और वह छटपटाने से भी लाचार हो गयी थी। मैं जोश में आकर उसकी चूचियों को बेदरदी से मसलने लगा। मुझे बड़ा मजा आ रहा था। उसे चूमने लगा। उसकी चूत सहलाने लगा। इन सबका नतीजा यह हुआ कि धीरे धीरे उसका छटपटाना बंद हो गया। अब मैं और उत्साहित हो उठा। उसके पैरों को फैला कर उसकी लसलसी चूत पर अपना लंड रख दिया। उसे आभास हो गया कि अब हमला होने वाला है।

अंतिम बार मरी मरी सी आवाज में रोने गिड़गिड़ाने लगी, “मत करो ना, इतने जालिम न बनो प्लीज।”

“अरे रो काहे रही है? डर मत, कुछ नहीं होगा।” मुझे क्या पता था कि लंड जब घुसेगा तो उसका क्या होगा क्या नहीं होगा, मुझे तो बस चोदना था। मंजिल इतना करीब था, उत्सुकता और उत्तेजना के मारे मैं पागल हुआ जा रहा था। अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मैं अपने लंड पर दबाव देने लगा।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं।” वह रोते रोते बोली।

“रोना गाना बंद कर हरामजादी, चुपचाप पड़ी रह। घुसा रहा हूं लंड।” मैं उसके रोने से खीझ उठा था। बहुत टाईट थी उसकी चूत। चूत से निकले लसलसे रस और मेरे लंड से निकलते हुए रस के कारण फिसलते हुए मेरा लंड उसकी चूत को फैलाता हुआ घुसता चला जा रहा था। बहुत गरमी थी उसके चूत के अंदर।

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह मांआंआंई्ई्ई्ई्ई गे्ए्ए्ए्ए, मरी मैं मरी आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” वह दर्द से बेहाल हो रही थी लेकिन मुझे तो बस चोदने की पड़ी थी। उसकी चूत को फाड़ता हुआ घुसाता चला गया, घुसाता चला गया, पूरा जड़ तक घुसा बैठा।

“देख, हो गया न, पूरा घुस गया।” मैं बोला।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं ््ईंंईंईंईंईंईंईंईंई, ओह्ह्ह्ह्ह्ह फट गयी मेरी चूत ओह मांआंआंई्ई्ई्ई्ई।” वह चीख पड़ी।

“चुप साली, एकदम चुप।” मैं गुस्से से बोला। मैं कुछ देर वैसा ही पड़ा रहा। मुझे लगा मेरा लंड भट्ठी में घुसा हुआ है। मैं एक झटके में लंड बाहर खींच लिया। अंदर घुसा कर बाहर निकालने की इस क्रिया में मुझे बड़ा अच्छा लगा। जैसे ही मैं लंड बाहर निकाला, नैना नें राहत की लंबी सांस खींची, लेकिन मैं लंड बाहर निकाल कर बेचैन हो उठा, अतः दुबारा घुसाने को तत्पर हो गया। अब मैं और रहम दिखाने के मूड में नहीं था। मुझे मजा मिल चुका था। लंड घुसाने और निकालने में मेरे लंड पर चूत का जो घर्षण हुआ, उससे मुझे बड़ा मजा आया। मैं दुबारा लंड घुसा दिया।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” नैना फिर चीखी, मगर इस बार थोड़ी धीमे से। शायद मेरे डर से या फिर उसे तकलीफ कम हुई। फिर तो अब मैं शुरू हो गया। उसकी गांड़ के नीचे हाथ रख कर शुरू में थीरे धीरे अंदर बाहर करता रहा, फिर दनादन दनादन ठोकने लगा। अब नैना चीख चिल्ला नहीं रही थी। उसकी चूत भी थोड़ी ढीली हो गयी थी। मुझे तो मानों स्वर्ग मिल गया था। खूब जम के चोदने लगा। मुझे आश्चर्य और खुशी हो रही थी कि अब नैना भी मेरी कमर पकड़ कर अपनी कमर उछाल उछाल कर मेरे धक्के का जवाब देने लगी थी।

“आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह आह।” उसके मुंह से आनंद की आहें निकल रही थीं। उसकी आंखें बंद थीं। मैं और उत्साहित हो कर धमाधम चोदने लगा, तभी, “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह््ह््ह््हह्हह्ह्ह्ह म्म्म्म्म्आं्आं्आं्आं,” कहते हुए मुझसे जोर से चिपक गयी। उसका बदन थरथराने लगा। मुझे ऐसा लगा मानों उसकी चूत मेरे लंड को चूसने लगी हो। फिर उसका शरीर शिथिल हो गया। कुछ पलों के लिए मुझे समझ नहीं आ रहा था। लेकिन उन कुछ पलोंं की दुविधा भरे ठहराव से मेरे अंदर की आग और भड़क उठी। मैं फिर चालू हो गया, उसके शिथिल पड़ते शरीर का भुर्ता बनाने। फच फच चट चट की आवाज बढ़ गयी। मेरे दनादन ठुकाई से हलकान होने की बजाय पांच मिनट बाद ही वह फिर अपने रंग में आ गयी। “आह ओह पंक पंक पंकज्ज्ज्ज ओह राम ओह मांआंआंई्ई्ई्ई्ई ओह्ह्ह्ह्ह्ह, चोद चोद आह साले कुत्ते मादरचोद मां के लौड़े, चोद चोद आह।” ऐसे ही बड़ बड़ करती कमर उछाल उछाल कर मुझसे चिपकी जा रही थी। तभी, और तभी मेरे अंदर का ज्वालामुखी मानो फटने लगा। मेरा शरीर तनने लगा और मैं पूरी शक्ति से नैना को जकड़ कर चिपक गया। उफ वे पल। मैं कभी नहीं भूल सकता। मेरे लंड से फच्च फच्च लंड का रस निकलने लगा, “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह ई्ई्ई्ई्ई्ई ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ स्स्स्स्स्स्आ्आ्आ्आली्ई्ई्ई्ई्ई नै्ऐ्ऐ्ऐ्ऐ्ऐन्न्न्ना्आ्आ्आ्ह्ह्ह।” उफ, ये थे मेरे मुंह से निकलने वाले उद्गार। तभी दुबारा नैना भी थरथरा उठी और छिपकली की तरह चिपक गयी मुझ से। करीब तीन चार मिनट तक हम यूं ही एक दूसरे से चिपके रहे फिर हमारा शरीर ढीला पड़ गया। मेरे शरीर का सारा तनाव लंड के रास्ते बाहर आ गया। मेला लंड भी ढीला हो गया और फच्चाक की आवाज के साथ चूत से बाहर निकल आया। सफेदी और खून से लिथड़ा हुआ। मगर अब नैना को अपने चूत के फटने या खून निकलने की कोई परवाह थी। वह तो थकी मांदी, शिथिल पड़ी लंबी लंबी सांसें ले रही थी। उसके होंठों पर मुस्कान थी, संतुष्टि की, खुशी की। मैं बड़ा खुश था। उस दिन से पहले कभी पता ही नहीं था कि लड़की चोदने में इतना आनंद है।

“अब?” मैं बोला।

“अब क्या?” वह अलसाई सी बोली।

“चलना नहीं है क्या?”

“हां, चलना तो है।” बड़ी बेमन से बोली।

“तो कपड़े पहन मां की चूत।” मैं झल्ला उठा। मेरी शराफत का बेड़ा गर्क हो गया था उसी दिन।

“मन नहीं हो रहा जाने को।”

“तो पड़ी रह कुतिया।”

“ऐसे न बोल रज्जा।”

“तो कैसे बोलूं।”

“प्यार से बोल।”

“अच्छा मेरी लंडरानी अब उठ।”

“वाह यह अच्छा है, लंडरानी। वाह मेरे चूत के राजा। देखो तो, मेरी चूत का क्या हाल कर दिया तूने?” सच में उसकी चूत की हालत ऐसी हो गयी थी कि किसी गधे से चुदी हो। फूल कर कुप्पा हो गयी थी। खून और वीर्य से लिथड़ा।

“अरी छोड़ यह सब, कैसा लगा, ये बता।”

“आह राजा, यह भी पूछने की बात है? आज से पहले ऐसा मजा किसी से नहीं मिला।”

“ओह, मतलब तू पहले ही और लोगों से चुद चुकी है?”

“हां मगर तू पहला मस्त मर्द मिला।”

“अच्छा, कितने लोगों से चुदी है आज तक?”

“सात”

“कौन कौन हैं?”

“हमारे कॉलेज का साईंस फैकल्टी, सिंह बाबू, क्लास के चार लड़के, हमारे कैंटीन का कैटरर और एक ऑटोवाला।”

“बाप रे, मतलब तू एक नंबर की लंडखोर हो, फिर भी मेरे सामने रोना गाना कर रही थी साली रंडी।” मैं चकित था।

“तेरा लंड है ही इतना्आ्आ्आ्आ भयानक।”

“तो अब ठीक है न मेरा लंड?”

“हां बाबा हां, मस्त है।”

“तो अब चोदने दोगी रोज?”

“रोज? हां, मगर दो दिन तक तो नहीं। देख नहीं रहे, फाड़ के रख दिया मां के लौड़े। दो दिन तो आराम करने दे। सिकाई करनी होगी, मलहम लगाना होगा।”

“ठीक है ठीक है, मगर मेरे लंड का क्या होगा? चूत का मजा मिल गया है ना। अब बिना चोदे रहा नहीं जाएगा।”

“चूत क्या, पूरी लड़की, औरत मिलेगी। आखिर इतना मस्त लौंडा और इतना मस्त लंड कहाँ मिलेगा। जिसे मिलेगा उसकी तो किस्मत खुल जाएगी।”  कहकर वह उठी और कपड़े पहनने लगी। मैं आश्वस्त हो गया। हम दोनों वहां से करीब सात बजे निकले।

” बस उस दिन से शुरू हो गयी मेरी चुदाई यात्रा।””””

कहकर वह चुप हुआ लेकिन इतनी देर में मैं उसके लिंग को सहलाते सहलाते स्खलन के कागार पर ले आई थी। उसके लिंग का आकार भी अविश्वसनीय रूप से बढ़ कर विकराल रूप धर चुका था।

“आह आह मेरा लंड पानी छोड़ने वाला है आह। पी जाईए ओह मुंह में ले लीजिए आंटी आह।” वह उत्तेजना के मारे बोला।

“आंटी नहीं मां बोल, तब।” मैं बोली। हालांकि उतने बड़े लिंग को मुंह में लेना संभव नहीं था तथापि बोली।

“अरे हां मेरी मां, हां मम्मी चूस साली रंडी मम्मी।” वह मेरा सर पकड़ कर अपने लिंग के पास लाया। मैंने दोनों हाथों से उसका लिंग थामा और मुंह में लेने का उपक्रम करने लगी। तभी उसने एक जोर का झटका मारा और अपना लिंग मेरी हलक तक उतार दिया और छर्र छर्र अपना वीर्य छोड़ने लगा। मेरा तो दम घुटने घुटने को हो आया था। मैं गटागट उसका नमकीन वीर्य हलक से उतारती चली गयी। जैसे ही उसका स्खलन पूर्ण हुआ उसने मुझे मुक्त कर दिया। मेरी जान में जान आई। उसके लिंग से वीर्य अब भी टपक रहा था जिसकी कुछ बूंदें मेरी कुर्ती पर गिरीं मगर मुझ कोई गिला नहीं था।

“वाह आंटी। मजा आ गया।”

“आंटी नहीं मम्मी।”

“ओके मम्मी।”

“हां, यह ठीक है। तू भी कम नहीं है। एक नंबर का हरामी चुदक्कड़ बेटा। बड़ा सुख दिया रे।” मैं खड़ी होते हुए बोली।

“तो अब मम्मी को चोदने उसका बेटा आएगा।” वह खुश हो कर बोला।

“हां, मेरा मादरचोद बेटा।”

अब तक रात हो चुकी थी। हमारा बाहर निकले हुए करीब डेढ़ घंटे बीत चुके थे। पता नहीं क्या सोच रहे होंगे रेखा और तीनों चुदक्कड़ बूढ़े। यही सोचते हुए हम घर में दाखिल हुए।

रात गहरा चुकी थी। हम जल्दी से उठे और घर में दाखिल हुए। करीब डेढ़ घंटे हम घर हे बाहर थे। इस दौरान अवश्य यहां भी काफी कुछ हो चुका था। रेखा की थकी थकी मुद्रा, साड़ी की सलवटें, उसके गालों और गर्दन पर उभर आए निशान सब कुछ बयां कर रहे थे। हरिया तो किचन में घुसा हुआ था किंतु वहां उपस्थित रामलाल और करीम के चेहरे उन बिल्लियों की तरह थे जो दूध पीकर तृप्त और हो चुके हों। पता नहीं पंकज को अहसास हुआ या नहीं, मगर रेखा का लाल भभूका चेहरा चीख चीख कर वहां से गुजरे वासना की आंधी की चुगली कर रहा था।

“देर हो गयी ना?” मैं बोली।

“नहीं नहीं, देर कहाँ हुई।” रेखा नजरें चुराती हुई बोली।

“चल फिर ठीक है, मगर रात तो हो ही गयी। रात का खाना खा कर जाओ।” मैं बोली।

“हां मम्मी, यह ठीक है।” पंकज जल्दी से बोल उठा। सोच रहा होगा, रुकने से शायद एक बार और मुझ पर चढ़ने का मौका मिले।

“नहीं, तेरे पापा आने वाले होंगे। हमें चलना होगा अब।” कहकर खड़ी हो गयी वह।

“क्या मॉम?” मायूसी से बोला पंकज।

“कुछ नहीं, चल उठ।” रेखा बोली।

“ठीक है, मैं भी रोकूंगी नहीं। पंकज बेटे, छुट्टी तो है ही, आ जाया करना अपनी आंटी से मिलने।” मैं बोली।

“आंटी नहीं।”

“ओह, मम्मी।”

“हां, यह ठीक है। रेखा की तरह मैं भी तेरी मम्मी हूं।”

“मेरी मम्मी की तरह तो नहीं।” अर्थपूर्ण शब्दों के साथ बोला।

“क्या कहा? तेरी मम्मी और मुझमें क्या फर्क है?” मैं भी कम कमीनी थोड़ी न थी।

“फर्क तो है।”

“तू देखने का नजरिया बदल, फर्क नहीं दिखेगा।” अब पंकज नें रेखा की ओर गहरी नजरों से देखा। पता नहीं क्या था उसकी नजरों में। हाय राम यह मैं क्या कह बैठी। कहीं पंकज की नजरें रेखा में मुझे तो नहीं देख रहींं? अगर रेखा में वह मुझे देख भी रहा है तो मुझे क्या, मेरी बला से। लेकिन सवाल यह था कि अगर अपनी मां में वह मुझे देख रहा है तो क्या अपनी मां को मेरी तरह हमबिस्तर बनाने की सोच सकता है? सोच क्या सकता है, कर भी सकता है, आखिर कलयुग है। जैसे मैं कलयुगी मां अपने कोखजाए बेटे की बांहों में खो कर अपने तन की प्यास बुझा सकती हूं तो पंकज और रेखा के मध्य यह क्यों नहीं हो सकता है। आखिर पंकज ठहरा एक नंबर का औरतखोर और रेखा भी सती सावित्री का चोला उतार कर परपुरुषों के रसास्वादन की अभ्यस्त हो ही चुकी थी। अब सिर्फ एक उपयुक्त परिस्थिति और अवसर की आवश्यकता थी। फिर तो मां बेटे के बीच के दीवार को ढहने में कौन रोक सकता था। मेरे शैतानी दिमाग में कमीनगी भरी योजना बनने लगी।

“बस बस, नजरिया बदलते रहना, फिलहाल तो घर चलो।” रेखा चलने को तत्पर हो गयी।

“पंकज बेटे, घर जा के भी नजरिया बदल सकते हो।” मैंने इशारे इशारे में पंकज के अंदर की कामना को हवा दी, अगर मेरा अंदाजा सही था तो। पंकज कभी मुझे देखता कभी अपनी मां को। उसकी आखें चमक उठी थीं। मैं समझ गयी, तीर निशाने पर लगा है। मैं मुस्कुरा उठी।

“चलिए चलिए मॉम, अब घर में ही नजरिया बदलूंगा।” पंकज भी मुझे अर्थपूर्ण नजरों से देखते हुए अपनी मां के पीछे पीछे निकला। मेरी मुस्कान गहरी हो उठी।

“हां तो अब बताओ तुमलोग, क्या हो रहा था यहां?” उनके निकलते ही सोफे पर बैठती हुई करीम और रामलाल की ओर मुखातिब हो कर बोली।

“कब?” करीम बोला।

“जब मैं, पंकज को घर से बाहर कैंपस और नये घर को दिखा रही थी।” (दिखा क्या रही थी, पंकज के साथ रंगरेलियां मना रही थी)

“ओह उस समय।”

“हां हां उसी समय।”

“और क्या, वही।”

“वही क्या?”

“चोद रहे थे रेखा को, यही सुनना था?” हरिया किचन से बाहर आ चुका था अबतक।

“हां, यही सुनना था।” मैं बोली।

“और तू डेढ़ घंटे तक बाहर क्या कर रही थी?” अब करीम बोला।

“क्या मतलब? पंकज को घुमा रही थी, और क्या।”

“हां हां, वो तो तेरा हुलिया बता रहा है।” हरिया बोला।

“क्या बता रहा है?” मैं ढीठ बनी रही।

“साली बुरचोदी, हम अंधे हैं क्या?”

“अंंधे नहीं हो तो पूछ काहे रहे हो साले ठरकी?”

“क्या बोली?”

“ठरकी।” (ठरकी एक अश्लील शब्द है जो ऐसे व्यक्ति को संदर्भित करता है जिसकी बहुत गहन यौन इच्छाएं होती हैं)

“पकड़ साली को करीम, चल रामलाल बताते हैं इसे कि ठरकी किसे कहते हैं?” कहते न कहते करीम मुझ पर झपटा। मैं उठ कर भागी।

“अरे नहीं, मैं तो मजाक कर रही थी। बुरा मान गये मेरे रज्जा। माफ कर दो।” मैं बनावटी तौर पर बचते हुए माफी मांग रही थी। फिर भी करीम की पकड़ में आ ही गयी। पकड़ में क्या आई कि करीम तो शुरू ही हो गया। मेरे नितंबों की दबाते हुए चूमना आरंभ कर दिया। “आह, छोड़ो, छोड़ो मुझे।”

“ऐसे कैसे छोड़ दें?” करीम तो मुझ पर हावी ही होने लग गया था।

“अच्छा, अभी छोड़ दे करीम।” हरिया बोला।

“नहीं, देख मेरा लंड खड़ा हो गया है।”

“मेरा भी।” अब रामलाल भी पैजामे के ऊपर से अपना लिंग मसलते हुए बोला।

“अरे तो मैं क्या हिजड़ा हूं मादरचोदो?” हरिया खीझ कर बोल उठा।

“हमें क्या पता?” करीम मुस्कान के साथ बोला।

“साले कुत्ते, ठीक है, अभी पता चल जाएगा।” कहकर हरिया भी ताव में आ गया और मेरी ओर बढ़ा। उफ्फ, बड़ा मुश्किल है। ऐसे औरतखोरों के साथ रहना सचमुच किसी स्त्री के लिए जी का जंजाल है। अब मैं तीन तीन मर्दों की बीच फंसी फड़फड़ा रही थी।

“अरे बाबा बस बस, आह, अब माफ भी कर दो।” मैं उन तीनों के बीच पिसती हुई बोली।

“ऐसे नहीं। अब माफी से पहले सजा मिलेगी।” हरिया मुझे भूखी नजरों से देखते हुए बोला। तो इसका मतलब अब मेरी खैर नहीं।

“अब माफ कर ही दो ना?” मैं गिड़गिड़ाने का नाटक करने लगी।

“ऐसे नहीं।”

“तो कैसे?”

“सजा मिलेगी।”

“कैसी सजा?” जान बूझकर अंजान बन रही थी।

“वैसी ही।”

“कैसी?”

“साली रंडी, अभिए बताते हैं” कहते हुए हरिया मेरे स्तनों को मसलने लगा। उसे पता चल गया कि मेरी ब्रा नदारद है। “साली कुतिया, बिना ब्रा के उस लौंडे से चुदवाने गयी थी?”

“अरे ब्रा तो ब्रा, हरामजादी पैंटी भी नहीं पहनी है।” करीम मेरे नितंबों को मसलते हुए बोला।

“ओह, तो ये बात है। मतलब पूरी तैयारी के साथ उस लौंडे का शिकार करने गयी थी। साली, लंड की भूखी कुतिया, इतने कम उमर के लौंडे को भी नहीं छोड़ी।” हरिया मेरे स्तनों को बर्बरता पूर्वक भींचता हुआ बोला।

“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओ्ओ्ओह, उफ्फ, बस्स्स्स्स बस्स्स्स्स, तो क्या सब मेरी ही गलती है? तुम लोग भी तो रेखा के साथ यही कर रहे थे।” मैं अपने आप को किसी प्रकार संयंत करती हुई बोली। मगर मेरे बोलने न बोलने का फिलहाल कोई असर इन लोगों पर नहीं होता नजर आ रहा था। सच बोलूं तो इस वक्त मैं खुद भी यही चाह रही थी। पंकज की कहानी सुनने के दौरान मैं उसके अमानवीय विशाल किंतु मनमोहक लिंग से खेलती हुई खुद भी सुलग उठी थी। एक तो पंकज जैसे कामुक सांढ़ के आक्रामक संभोग से हलकान थी उस पर उस अल्प समय में दुबारा पंकज की बांहों में समा कर जल्दबाजी वाली नोच खसोट से अपनी दुर्दशा नहीं कराना चाहती थी, अतः पुनर्जागृत अतृप्त कामना के साथ पंकज और रेखा को विदा करने को विवश थी। वही अतृप्त कामना इस वक्त इन तीनों की हरकतों और संवादों से मेरे अंदर फट पड़ने को आतुर ज्वालामुखी का रूप ले चुका था। अब मैंं तैयार थी, मसले जाने के लिए, रौंदे जाने के लिए, भंंभोड़े जाने के लिए। फिर भी अपनी बेताबी को इतनी आसानी से प्रकट कर दूं तो मैं कामिनी किस बात की।

“हां हां कर रहे थे रेखा के साथ और रेखा जैसी थाली में सजा कर मिली, पराए मर्द की शौकीन, मस्त लंडखोर औरत को हम भला कैसे छोड़ देते।” हरिया अपने पजामे के नाड़े को ढीला करते हुए बोला। “चल बुरचोदी अब तेरा नंबर है। पंकज जैसे नये नकोर नौसिखिए लौंडे से ठोकवाने के लिए मरी जा रही थी ना साली रंडी, ऊपर से हमें ठरकी कहती है साली कुतिया। चल रे करीम, रामलाल के साथ मिलकर इस मां की लौड़ी का बाजा बजाते हैं।” देखते न देखते तीनों के तीनों मादरजात नंगे हो गये। तीनों भूखे भेड़िए की मानिंद, तीनों के फनफनाते लिंग और उनकी आंखों में वहशियाना चमक। उन्हें व्यर्थ समय जाया क्यों करना था, टूट ही तो पड़े तीनों नंग धड़ंग औरतखोर पशु। पल भर में मेरे वस्त्र फर्श चूम रहे थे।

“ओह भगवान ओह।” मैं उनकी बेताबी से बेहाल हो उठी।

करीम मुझे पीछे से पकड़े था। रामलाल मुझे सामने से। हरिया बोला, “पटक साली को यहीं जमीन पर, यहीं इसकी गरमी उतारते हैं।”

“नहीं ््ईईंं््ईईंं््ईईंं।” मैं उनके चंगुल में छटपटाने का नाटक कर रही थी। हरिया के कथनानुसार मुझे उन्होंने फर्श पर ही पटक दिया। मैंने पीछे नितंबों की दरार में करीम के लिंग की दस्तक को महसूस किया और इधर मेरी कंपकंपाती योनिद्वार पर रामलाल के लिंग की दस्तक।

“नहीं ््ईईंं््ईईंं््ईईंं ऐसे नहीं।” मैं अनावश्यक विरोध जता रही थी। इसके आगे और कुछ न बोल पायी। न जाने किस तरह अपना स्थान बना कर हरिया अपने लिंग को मेरे मुंह में ठूंसने की जुगत लगा बैठा।

“नहीं क्या? ऐसे नहीं तो कैसे? हम तीन हैं रे लंडखोर। एक साथ घुसेड़ेंगे लौड़ा। अब ये न पूछो कहाँ कहाँ।” हरिया पूरे अधिकार से बोला। मैं जानती थी कहाँ कहाँ, फिर भी विरोध व्यक्त कर रही थी।

“नहीं ््ईईंंईंईंईंईं…..”

“हां्आंआंआंआंआं….., एक, दो, तीन।” घप्प। और लो हो गया बंटाढार। रामलाल का लिंग सर्रर्र्र्र से मेरी योनि में प्रविष्ट हुआ और पीछे से मेरी गुदा का क्रियाक्रम करीम के लिंग के प्रहार से। चीखने का मौका मिला कहाँ, चीख तो हलक में घुट कर रह गयी। मुख में हरिया का लिंग जो पैबस्त था। सिर्फ “गों गों” की घुटी घुटी आवाज निकल रही थी मेरे हलक से। उफ्फ, वासना की आग में दहकती मैं और वासना की अदम्य अग्नि में झुलसते वे औरतखोर पशु। भूचाल ही तो आ गया वहां। गपागप, सटासट, चपाचप, संभोग में लिप्त धुआंधार धकमपेल के दौरान उन तीन कामुक पशुओं के बीच पिसती, नुचती, चुदती, हलाल होती रही। उनके लिंग के प्रहारों को अपने ऊपर झेलती, उनके बर्बर हाथों द्वारा मेरे उन्नत उरोजों का मर्दन और गालों, गर्दन पर चुंबनों की बौछार से हलकान होती रही।

“ले हुम्म, ले मां की चूत ले।” हरिया की आवाज।

“हुम्म हुं, बुरचोदी रंडी।” करीम की आवाज।

“ले ले और ले आह ओह हुं हुं हुम्म।” रामलाल की आवाज। तीनों मानो अपने अपने मन की भंड़ास मुझे निचोड़ झिंझोड़ कर निकाल डालने पर आमादा थे। फिर भी मैं मगन मस्ती की समुंदर में डूब उतरा रही थी। तीन तीन मर्दों के सम्मिलित कामुक धींगामुश्ती में पिसती, तीन तीन कामुक भेड़ियों की कामपिपाशा एक साथ शांत कर सकने की अपने सामर्थ्य से गौरान्वित होती, पूर्णता के अहसास में मुदित, उनके सम्मिलित संभोग में लिप्त, समर्पित, अखंड आनंद में डूबती उतराती जा रही थी। गों गों की आवाज, हरिया के लिंग पैबस्त, मेरे मुख से निकलती रही। मेरी आंखें ही बता रही थींं कि मैं इस वक्त कितने सुखद अहसास से गुजर रही थी। मुझे पता था कि मुख मैथुन के पश्चात हरिया मेरी योनि में डुबकी लगाए बिन कहां छोड़ने वाला था भला। मानसिक रुप से मैं इसके लिए तैयार भी थी। करीब दस मिनट बाद ही मैं बेहद सुखद स्खलन में डूब गयी। आह वे सुखद पल, अकल्पनीय आनंद। स्खलन के पश्चात शिथिल पड़ते मेरे तन को भंभोड़ने में वे कोई कोताही नहीं कर रहे थे, स्त्री तन के भूखे भेड़िए। लगे रहे घपाघप धकमपेल में। अंततः करीब पच्चीस मिनट बाद कुछेक मिनटों के अंतराल में करीम और रामलाल अपने मदन रस से मेरी योनि और गुदा को सराबोर करने लगे। इतनी जोर से उन्होंने मुझे अपने बंधन में जकड़ा कि मुझे सांस लेने में भी कष्ट हो रहा था। लेकिन वाह री मैं, ठहरी एक नंबर की लंडखोर, इस दौरान भी मैं अपने दूसरे स्खलन में मगन थी। जैसे ही इन दोनों नें मुझे निचोड़ कर छोड़ा, हरिया मुख मैथुन छोरिक्त स्थान की पूर्ति हेतु आ गया। इसने तो मानो सारी खुन्नस निकालने की ठानी थी। आव देखा न ताव,

“अब ले मेरा लौड़ा। हुम्म््म््म््मम्मम्आ्आ्आ्आह।” मेरे शिथिल शरीर को दबोच कर एक करारे प्रहार से अपने आठ इंच लंबे लिंग को मेरी गीली, चुदी चुदाई योनि में जड़ तक गप्प से घुसेड़ दिया। अब आरंभ हुआ इसका बेताबी भरा संभोग।

“आह, धीरे।” मैं मरी मरी आवाज में कराही।

“अब काहे का धीरे।” वह मुझे झिंझोड़ता हुआ दहशतनाक आवाज में बोला।

“उफ, थक चुकी हूं बाबा।”

“अभिए? गांड़ फट गयी? मेरी बारी आने से पहले ही थकी हरामजादी। लंडखोर कुतिया चोदने दे हमें आराम से।” मेरी हालत की परवाह किए बगैर गचागच शुरू हो गया। शुरू हो गयी पुनः मेरी कुटाई। उधर रामलाल और करीम वैसे ही नंग धड़ंग सोफे पर बैठे हम बाप बेटी के मध्य हो रहे रासलीला का लुत्फ उठा रहे थे।

“ले हुम, ले हुं हुं हुं हूंऊंऊंऊंऊ।” लगा रहा ठोकने।

“आ आ आ आ आह आह आह अम अम अम्मांआंआंआ।” मेरे थके शरीर में फिर से न जाने कहाँ से नवस्फूर्ति का संचार हो गया और मैं पुनः लीन हो गयी हरिया के संग संभोग के सुख में गोते खाने में। यह दौर सिर्फ पांच मिनट ही चला, लेकिन ये पांच मिनट भी हम दोनों के लिए काफी थे। इधर मेरा शरीर ऐंठने लगा, उधर हरिया का शरीर अकड़ने लगा, यह उसका पहला ही स्खलन था और इधर मेरा तीसरा। हम दोनों एक दूसरे से ऐसे चिपके मानो एक दूसरे में समा जाएं। कहाँ वह झुर्रिदार बूढ़ा, और कहां मैं उसके आधे उम्र वाली गदराई औरत, परवाह नहीं, छिपकली की तरह चिपकी, उसका रस निचोड़ कर अपनी योनि से पीने में मगन, कतरा कतरा चूसकर निढाल हो गयी। वह भी एक तरफ लुढ़क कर भैंसे की तरह हांफ रहा था। विजयी भाव से मुस्कुरा रहा था साला बेटीचोद और मैं उसकी बिटिया रानी, बेशरम छिनाल की तरह पुनः उससे जा चिपकी,

“आह मेरे चोदू पापा।” चूम उठी।

“ओह मेरी बुरचोदी बिटिया।” चुम्बन का प्रतिदान दिया उसने भी।

इतनी देर की घमासान धकमपेल से बेहाल थी मगर मेरा रोम रोम तृप्त हो चुका था। उसी अवस्था में वहीं पर थकी मांदी कब मेरी आंख लग गयी पता ही नहीं चला। जब आंख खुली तो देखा दस बज रहा था। अपने को संभालकर चारों ओर देखने लगी, कमरे में कोई नहीं था। मैं अकेली मादरजात नंगी, नुच चुदकर बेशरमों की तरह पसरी थी। मैं हड़बड़ा कर उठी। उठने के क्रम में लड़खड़ा उठी। किचन में खटर पटर की आवाज आ रही थी। समझ गयी कि हरिया खाना बनाने में व्यस्त है। मैं उठी और अपने कमरे में लड़खड़ाते हुए दाखिल हुई। मेरी योनि का तो भुर्ता बन चुका था। पहले पंकज, फिर रामलाल और हरिया। करीम तो कमीना मेरी गुदा का रसिया ठहरा। खैर, मेरे फ्रेश होते होते खाना तैयार था। करीब साढ़े दस बजे हम खाने की मेज पर थे। मैं चुपचाप खाना खा रही थी। मुझे चुप देख कर हरिया से रहा नहीं गया।

“क्या हाल है रानी?” हरिया बोला।

“तुम लोगों के रहते और क्या हाल रहेगा। चुपचाप खाना खाओ” मैं बनावटी रोष से बोली। फिर चुप्पी का आलम छा गया। खाना खत्म होते ही सन्नाटे को भंग करते हुए रामलाल नें कहा,

“जो कुछ हुआ, तुम्हें अच्छा नहीं लगा?”

“अच्छा क्यों नहीं लगेगा? ये कोई पूछने की बात है? चेहरा देख इसका।” करीम बोला।

“खुश लग रही है।” रामलाल बोला।

“हां हां चोद चोद के मार डालो मुझे तब तुम लोगों के कलेजे में ठंढक पहुंचेगी साले चुदक्कड़ों।” मैं झल्ला कर बोली।

“अरे बुरा मान गयी मेरी बिटिया।” यह हरिया था।

“ओह सॉरी, बिटिया, हम तो यूं ही….” करीम के चेहरे पर खेद था।

“यूं ही क्या?”

“अरे हम तो जाहिल गंवार बस ऐसे ही….”

“ऐसे ही क्या?” मैं भीतर ही भीतर मजा ले रही थी।

“सॉरी गलती हो गयी।” अब रामलाल मेरे तेवर को देखकर तनिक सहमा सा था।

“कैसी गलती?”

“बस बस हमें माफ कर दो।”

“नहीं करूंगी माफ।”

“माफी के लिए हम क्या करें?”

“पहले करते हो, फिर मेरी हालत का मजाक उड़ाते हो और बाद में माफी मांगते हो हरामियों।”

“अच्छा बाबा गलती हो गयी। अब गुस्सा थूक दो।”

“नहीं।”

“क्या करें हम जिससे तुम्हारा गुस्सा खत्म हो?” करीम बोला।

“जो बोलूंगी करोगे?”

“हां।”

“तो करते रहा करना।”

“क्या?”

“वही जो रेखा और पंकज के जाने के बाद मेरे साथ कर रहे थे, हा हा हा हा,” अब मैं अपनी हंसी रोक पाने में असमर्थ थी।

“ओ्ओ्ओ्ओ्ओह, हम तो हम तो….”

“हा हा हा हा क्या हम तो हम तो?”

“हम तो डर ही गये थे हे हे हे हे।” अब उनके चेहरे खिले।

“एक बात कान खोल कर सुन लो आपलोग, मैं  आपलोगों की हूं समझे? मुझ पर हक है आपलोगों का। लेकिन कुछ जिम्मेदारियां हैं मुझपर, उसके साथ साथ मेरी मजबूरियाँ भी हैं, व्यस्तता भी है। जब मैं फुर्सत में हूं, हक से बिंदास टूट पड़ो मुझपर, खुल कर खेलो, मैं मना नहीं करूंगी। मेरे बाबूजी हरिया और करीम चचा, आपलोगों को पता है, यह बात मैं इसलिए दुहरा रही हूं कि रामलाल जी भी अब इस परिवार के सदस्य बन चुके हैंं और इन्हें भी इस हक से वंचित नहीं रखना चाहती। अब आप तीनों मेरे…..” मैं रुकी।

“हम तीनों तुम्हारे?….।” रामलाल प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगा।

“यह भी बोल दूं मैं?” मैं नशीले अंदाज में बोली।

“अय हय, तेरी इन्हीं अदाओं के तो दिवाने हैं हम।” करीम बोला।

“हटिए, आपलोग बड़े वो हैं।”

“क्या हैं?”

“छि:, चोदू बलमा, और क्या।” बोलकर मैं उठ भागी।

“अरे अरे भागती कहाँ है? देख मेरा लौड़ा फिर खड़ा हो गया” रामलाल बोला।

“आप तो बस….” रामलाल की बात सुनकर जाग उठी कामना को दबा कर भागती गयी अपने कमरे में। इस वक्त अगर ये मेरा पीछा करते तो रात में भी मेरी दुर्दशा करते और मैं मना न कर पाती, छिनाल बनी वासना की आंधी में बहती रहती।

“छोड़ रामलाल, आज का हो गया। अब चला जाय सोने।” हरिया बोला और सभी अपने शयनकक्ष में समा गये। मैं धम्म से बिस्तर पर गिरी और निद्रा के आगोश में चली गयी, इस बात से बेखबर कि दूसरे दिन का सवेरा एक नयी घटना से मुझे रूबरू कराने वाला था। अकल्पनीय तो नहीं, अनपेक्षित भी नहीं, किंतु मेरी लगाई चिंगारी का इतना शीघ्र परिणाम निकलेगा, यह आश्चर्य करने वाला अवश्य था।

आज फिर एक नयी सुबह एक नये दिन की शुरुआत थी। खुशनुमा सुबह थी, शरीर में थकान का नामोनिशान नहीं था, प्रफुल्लित थी, तरोताजा थी। हर नये दिन के बारे में मेरी सोच बिल्कुल स्पष्ट है, हो सकता है हर दिन अच्छा न हो, लेकिन हर दिन में कुछ न कुछ तो अच्छा अवश्य होता है इसलिए मुझमें सदा ही सकारात्मक सोच के साथ धनात्मक उर्जा प्रवाहित होती रहती है। मेरी कामना यही है कि सभी नकारात्मक सोच को परे रख कर सकारात्मक सोच के साथ  आशावाद को अपना कर अपनी जिंदगी में खुशी के रंग भरते रहें।

अब मैं बताने जा रही हूं, यह इस दिन का एक मजेदार, चौंकाने वाला, अप्रत्याशित किंतु संभावित, (संभावित इस लिए क्योंकि जो चिंगारी कल मैंने दिखाई थी, उसकी परिणति यही होनी थी) समाचार था, लेकिन इतनी जल्दी यह सब कुछ हो जाएगा, यह मेरी कल्पना से परे था। आज रविवार था। मेरी छुट्टी थी, लेकिन मैं अपनी आदत के मुताबिक जल्दी उठ कर मॉर्निंग वाक में निकली थी। मैं रेखा के घर के पास से गुजर रही थी, तभी रेखा बेतरतीब हालत में बदहवास अपने गेट से बाहर निकली और मुझसे लिपट कर रोने लगी।

“अरे अरे क्या हुआ? रो क्यों रही हो?” मैं हकबका कर पूछ बैठी। मैंने देखा रास्ता सुनसान है। इतने तड़के वैसे भी सभी अपने घरों में दुबके रहते हैं।

“इस तरह रास्ते में नहीं रोते पगली। चल घर के अंदर और बता बात क्या है।” मैं उसे खींचते हुए घर के अंदर ले आई।

“क्या बताऊँ? बरबाद हो गयी मैं।” सोफे पर बैठते ही बोली।

“अरी हुआ क्या है, बताओ तो?”

“बेहद शर्मनाक।”

“ऐसा क्या हुआ?”

“कल रात…..”

“क्या हुआ रात में?”

“पंकज…..” रोती जा रही थी वह। दिल धड़क उठा मेरा। तो तो तो क्या वही हुआ जिसका अंदेशा था?

“क्या किया पंकज नेंं?”

“अपनी मां के साथ, छि:, बताने में भी शर्म आ रही है।”

“अरी बता तो।” मेरी जिज्ञासा चरम पर थी।

“लूट लिया हरामी नें, अपनी मां की इज्ज़त, मेरी इज्ज़त।” रोती जा रही थी।

“कककक्या?” मैं बनावटी आश्चर्य से बोल उठी।

“हां्आंआंआंआंआं, बरबाद कर दिया उसने मुझे।”

“अच्छा अच्छा अब चुप हो जा। समझ गयी मैं। अब जो हुआ सो तो हो गया। लेकिन यह सब हुआ कैसे?”

“उसकी जबर्दस्ती।”

“तूने विरोध नहीं किया?”

“किया, मगर तबतक देर हो चुकी थी।”

“क्या मतलब? मैं कुछ समझी नहीं।”

“अब क्या बताऊं? मैं नादानी में उसकी हरकतों को सामान्य मां बेटे का प्यार समझी थी। जबतक मैं उसकी असली नीयत समझ पाती, तबतक मैं बेबस हो चुकी थी।” उसका रोना अब बंद हो चुका था। उसे लग रहा था कि मैं पूरी हमदर्दी से उसकी बातें सुन रही हूं, किंतु सच्चाई यह थी कि मैं उत्सुक थी उसे चीर हरण की की कथा सुनने को। कैसे किया होगा पंकज नें यह सब?

“पंकज अभी है कहाँ?

“नाम न ले उस कलमुंहे का। कुल कलंक, रातभर मुझे नोच खसोट कर अब चैन से खर्राटे भर रहा है हरामी।”

“तू पूरी बात बता। कैसे हुआ यह सब?” मेरी उत्कंठा का पारावार न था।

“कैसे बताऊं ऐसी गंदी बात? बताने लायक अब बचा क्या है?” वह खुल कर नहीं बता रही थी।

“तू बताने में झिझक क्यों रही है?” मैं सुनने को उतावली हुई जा रही थी। “ठीक है, तू पहले सामान्य हो जा पहले, फिर बताना।”

“सामान्य कैसे हो जाऊं मैं?” झल्ला कर बोली वह।

“देख, अब मेरे सब्र का इम्तिहान न ले।” मैं भी तनिक झल्ला उठी।

“एक बेटे द्वारा मां की अस्मत लुटने की कल्पना मात्र से ही लोग छी छी थू थू करते हैं, ऐसी बात मैं खुल कर कैसे बता सकती हूं?”

“तो अब मुझ से सुन। मेरे बेटे क्षितिज के साथ हमबिस्तर होने में तुझे तो लाज नहीं आई? वह भी तो तेरे बेटे जैसा है। अब पंकज के साथ जब यह सब हुआ तो लगी मातम मनाने, साली लंडखोर।” अब मैं अपने पर उतर आई।

“क्या बोल रही हो? तनिक भी लज्जा है कि नहीं? अपने पैदा किये, कोखजाए बेटे में और क्षितिज में फर्क है कि नहीं?” वह गुस्से में बोली।

“अब और सुन, क्षितिज नें भी मेरे साथ यही किया है। लेकिन मैं तो तेरी तरह रो नहीं रही? सच पूछो तो मुझे इस बात का तनिक भी मलाल नहीं है। मुझे तो खुशी है कि मैंने अपने बेटे पर ममता लुटाने के साथ साथ उसकी खुशी के लिए अपने तन को भी लुटाने में कोई गुरेज नहीं किया। उसकी खुशी देख कर मुझे तो बड़ा संतोष प्राप्त हुआ। सच कहूं तो इसमें मुझे आनंद भी बहुत मिला।” अब मैं उसके सामने नंगी हो चुकी थी। इसके अलावा उसका मुंह खुलवाने का और कोई दूसरा मार्ग नहीं सूझा। वह आंखे फाड़ कर अविश्वास से मुझे घूर रही थी। उसका रोना धोना एकाएक थम गया।

“तो तो…..तुम अपने बेटे क्षितिज के साथ….” इतना ही बोल पायी वह, चकित, अविश्वास से मुझे आंखेँ फाड़े देखती रह गयी।

“हां हां हां्आंआंआंआंआं, क्षितिज से चुद गयी मैं। मगर तेरी तरह रोयी नहीं, बल्कि खुश हुई, आनंदित हुई। उसनें जो किया, प्यार से किया और मैं भी पुत्र के प्यार में डूब कर खुद को उसके हवाले कर दिया, कसम से बड़ा आनंद मिला। काश तुम समझ पाती।” मैं बेशर्मी से बोली। रेखा के चेहरे का रंग बदलने लगा।

“तो तुम्हें जरा भी खेद नहीं है?’

“नहीं, जरा भी नहीं।”

“बड़ी बेशरम हो।”

“इसमें शरम कैसी? वह बेटा अवश्य है मेरा, किंतु है तो एक मर्द, जिसे औरत के प्यार की जरूरत है। मैं उसकी मां हूँ, लेकिन हूँ तो एक औरत। हां दिया मैंने प्यार, एक औरत होने के नाते, औरत होने का फर्ज निभाते हुए, एक औरत वाला भरपूर प्यार, पूरी शिद्दत से प्यार। खेलने दिया उसे मेरे तन से, पूर्ण समर्पिता बन कर। बुझाने दिया उसे अपनी वासना की भूख। काश तुम देख पाती उसके चेहरे पर खुशी, परम संतोष। उसके चेहरे की खुशी देखकर मैं कितनी गदगद थी। उसे एक नादान युवक से मर्द बनाया मैंने। एक बार मर्द बन गया, स्त्री सुख से परिचित हो गया, फिर उसने मुझे तो निहाल ही कर दिया, इतना सुख दिया कि मैं बता नहीं सकती। लेकिन यह सब मैं तुम जैसी तथाकथित शरीफजादी से क्यों कह रही हूं? तुमने तो देखा भी नहीं होगा कि तेरा बेटा कितना खुश हुआ होगा। छाती पीट पीट कर रोती रह शरीफजादी, कोसती रह खुद को और अपने बेटे को। एक बात और, यदि तेरा बेटा तेरे साथ यह सब कर सका तो इसमें कहीं न कहीं तुम भी कमजोर पड़ी होगी। तुम्हारे इनकार में दृढ़ता नहीं रही होगी, या खुल के बोलूं तो तेरे मन के किसी कोने में चुदास अवश्य थी, वरना यह संभव नहीं होता।” मैं बोलती जा रही थी और वह मंत्रमुग्ध सुनती जा रही थी। पता नहीं मेरी बात का असर हो रहा था या कुछ और चल रहा था उसके मन में। या शायद अंतर्द्वंद्व, उथल पुथल। मैने उसकी इस स्थिति का लाभ उठा कर बोलना जारी रखा,

“कुछ देर के लिए सब कुछ भूलकर जरा कल्पना तो कर के देख, एक बच्चा, तेरी गोद में, तेरे स्तन से खेलता हुआ तेरे स्तन को चूसता रहता था। कैसा लगता था उस समय, बहुत अच्छा ना? ममत्व के साथ साथ भीतर ही भीतर कुछ और भी होता था ना? शायद कामोत्तेजना से धमनियों में रक्त प्रवाह बढ़ जाता था होगा, है ना? वही बच्चा बड़ा हो कर एक सुगठित, सुंदर युवक में तब्दील होता है और स्त्री संसर्ग हेतु सुलभ स्त्री के रूप में अपने सबसे करीबी अपनी मां की ओर आकर्षित होता है, अपनी मां में एक नारी को देखता है और मां में स्थित नारी के प्रति उसके अंदर प्राकृतिक तौर पर नर जनित काम भावना जागृत होती है। इसमें अस्वभाविक क्या है? यह तो स्वभाविक है ना। जरा सोच तो, जिस बच्चे को अपनी नग्न छाती से लगा कर तू दूध पिलाती रोमांचित होती थी, वही बच्चा खिल कर शारीरिक सौष्ठव से लैस आकर्षक युवा बन कर जब तेरी नग्न देह से चिपकता है, तो क्या वह रोमांचक नहीं रहा होगा? अवश्य रहा होगा। तुझे भी वह रोमांच हुआ होगा, जिसके आनंद से अपने अंदर के तथाकथित अनैतिक रिश्ते वाले अपराधबोध के कारण तू वंचित रह गयी। उस अपराधबोध को परे झटक कर जरा सोचकर देख।” मैं बोलती जा रही थी और वह मूक बने सुनती जा रही थी। उसकी जुबान मानो तालू से चिपक गयी थी। मेरी बातों का असर मैं साफ देख रही थी उसके चेहरे पर। चिंता और ग्लानी से मुक्त हो रही थी। मेरी बातें उसे आश्वस्त कर रही थी कि उसके साथ जो हुआ है वह गलत नहीं है। फिर भी मैं बोलती जा रही थी। मेरा इरादा था उसके मन के अंतर्द्वंद्व को समूल नष्ट करने का।

“ये जो तथाकथित नाते रिश्ते की मर्यादा मर्दों नें बनाई है हम औरतों को बंधन में रखने के लिए। खुद तो इधर उधर मुंह मारते रहते हैं, बाहर कोई न मिले तो, घर में ही रिश्ते नातों की मर्यादा को ताक पर रख कर अपनी मनमानी करते हैं, और उन्हें रोकने टोकने वाला कोई नहीं। उदाहरण दूं?”

“हां,” मंत्रमुग्ध सुनती वह बोली।

“सुन सकोगी”

“हां हां क्यों नहीं।”

“तो सुन, भाई बहन का रिश्ता पवित्र होता है ना?”

“हां।”

“रश्मि तुम्हारी कौन है?”

“ननद”

“मतलब, तेरे पति की बहन।”

“हां।”

“रश्मि यहां बार बार क्यों आती है, पता है?”

“हमसे मिलने, और क्या।”

“बड़ी भोली हो तुम।”

“क्या मतलब है तुम्हारा?”

“अरी पगली, अपने तन की भूख मिटाने।”

“हट, कुछ भी….”

“वह भी अपने भाई के साथ।” मानो धमाका कर दी मैं। अविश्वास से उसकी आंखें फटी की फटी रह गयीं।

“झूठ।”

“झूठ सच सब पता लग जाएगा। इस बार आएगी तो ध्यान देना।”

“लेकिन यह सब तुझे कैसे पता?”

“रश्मि नें बताया।”

“तुझे?”

“हां मुझे।”

“यह सब मेरी नाक के नीचे चल रहा था और मुझे भनक क्यों नहीं लगी?”

“क्योंकि तू भोली होने के साथ ही साथ बेवकूफ भी है।”

“तब तो तुझे यह भी पता होगा कि यह सब कब से चल रहा है।”

“हां।”

“कब से।”

“जब वह सोलह साल की थी तब से।”

“बाप रे। उस वक्त तो रश्मि को पता भी न था होगा, यह सेक्स वगैरह।”

“नहीं, वह तो बिल्कुल नादान बच्ची थी।”

“फिर?”

“फिर क्या, तेरा पति तो खेला खाया चुदक्कड़ है ना। उसनें उसे फंसाया अपने जाल में और नादान रश्मि अनजाने में चुद गयी, शील तुड़वा बैठी। एक हिसाब से वह बलात्कार था लेकिन एक बार चुदाई का मजा मिला तो उसी रात कुल मिलाकर तीन बार चुद गयी। और तो और, उस दिन के बाद से रश्मि को लंड का ऐसा चस्का लगा कि सिन्हा जी से चुदवाने का कोई मौका नहीं गंवाती थी। सिन्हा जी नें तो मानो सेक्स की गुड़िया ही बना डाला उसे। उसकी शादी के बाद भी यह सिलसिला जारी था। अब तो रश्मि तलाकशुदा भी है, अब तो वह पूरी तरह आजाद है।”

“ओ मां्आआ, ऐस्स्सा्आ्आ्आ्आ?” वह ताज्जुब से मुझे देख रही थी।

“ऐसे न देख मुझे। तुम्हारे सिन्हा जी नें मुझे भी नहीं छोड़ा। एक दिन घर बुलाकर मुझे भी जबर्दस्ती चोदा।”

“तू घर गयी क्यों?”

“ऑफिस से घर लौटते हुए उसने मुझे लिफ्ट दिया और घर के अंदर चाय पीने के लिए बुलाया और चढ़ गया मुझ पर।धोखे से मेरी इज्ज्त लूट ली, साला हरामी।”

“तुझे भी? मगर तू तो इतनी आसानी से किसी के काबू में आने वाली है नहीं। जरूर तेरी रजामंदी भी रही होगी।”

“मूल बात यह नहीं है कि मेरी रजामंदी थी या नहीं, मुख्य बात यह है कि सिन्हा जी एक औरतखोर मर्द हैं यह उन्होंने साबित किया। यही हाल सभी मर्दों का है। कल अखबार में दिया था ना, एक बाप अपनी बेटी का यौन शोषण करता पकड़ा गया। यही हाल सबका है। जो पकड़ा गया वह अपराधी और जो नहीं पकड़ा गया वह शरीफ। इसी लिए कहती हूं कि ये सामाजिक नियम कानून सिर्फ हम औरतों पर लगाम लगाने के लिए मर्दों द्वारा बनाए गये हैं। तुम खुद को देखो, सिन्हा जी तुम्हारे पति हैं लेकिन कभी पति का प्यार मिला उनसे? नहीं ना। क्या तुम शादी के बंधन में बंधकर पति के प्यार की हकदार नहीं हो? फिर? आखिर तुम्हारे तन की उस यौन क्षुधा का क्या? वो तो मैंने तुझे रास्ता दिखाया, बोल अब मजा आ रहा है की नहीं, जीने का?”

“आ रहा है।” सर झुका कर धीरे से बोली वह।

“फिर अब यह नैतिकता का ढोंग काहे। पंकज तेरा बेटा है तो क्या, मर्द है ना? बस नजरिया बदल, उसे मर्द समझ, फिर देख। तुझे तो अब पता चल ही चुका है कि क्षितिज मेरा बेटा होने के साथ साथ मेरा बेड पार्टनर भी है। मुझे तो कोई शरम झिझक नहीं, फिर तुझे क्या परेशानी है?”

“शायद तुम सही कह रही हो।” रेखा बुदबुदाई।

“शायद नहीं, शत प्रतिशत सही कह रही हूं।” मैं ने गरम लोहे पर हथौड़े का अंतिम प्रहार किया।

“ठीक है, तेरी बातें मेरी समझ में आ गयीं। अब मेरा भी नजरिया बदल गया।”

“कैसा नजरिया? किसका नजरिया?” तभी पंकज की आवाज सुनाई पड़ी। वह सोकर अभी ही उठा था शायद, और आखिरी शब्दों को सुनकर बोला था। मैंने देखा कितना सुंदर भरपूर मर्द सामने खड़ा था।

“तो तूने नजरिया बदल लिया।” मैं पंकज को ठगी सी देखती हुई बोली। उसे देखने मात्र से मेरी योनि थरथराने लगी और न चाहते हुए भी योनि रस का रिसाव आरंभ हो गया।

“ओह आंटी आप! हां, मैंने अपनी मम्मी के प्रति अपना नजरिया बदल लिया।” वह बेशर्मी के साथ अपनी मम्मी को देखता हुआ बोला।

“बहुत जल्दी नजरिया बदल लिया रे शैतान।” मैं शरारती लहजे में मुस्कुराते हुए बोली।

“आप ही नें तो कहा था, मम्मी के प्रति नजरिया बदलूं। बदल लिया और देखिए, हो गया।” पंकज रेखा की ओर बड़ी सेक्सी नजर से देखते हुए बोला।

“तो तो तो यह सब तेरा किया धरा है?” रेखा मुझे घूरती हुई बोली।

“आंटी को क्यों बोल रही हो मॉम, आप हो ही इतनी सेक्सी कि मुंह में पानी आ जाए, मगर कल तक तुझे मां की नजर से देखता, मन मसोस कर रह जाता था, आंटी नें तो सिर्फ नजरिया बदलने को कहा और देख लो, मैंने नजरिया क्या बदला, तुम्हें तथाकथित आदर्श मां से अपनी लंडरानी मां बना डाला। अच्छा हुआ कि नहीं?” पंकज अपनी औरतखोरी दिखा ही चुका था, अब अपनी मां का लिहाज भूल कर पूरी बेशरमी पर उतर आया था।

“हट बेशरम।” रेखा की झिड़क में अब तल्खी नहीं थी। चलो मामला निपट गया।

“अब इस तरह की बातें तो बेशरमी से ही की जाती हैं न।” पंकज शरारत से बोला।

“चुप बदमाश, किया सो किया, अब कामिनी के सामने तो कुछ लिहाज कर।” रेखा डांटने लगी।

“हा हा हा हा, गुस्सा क्यों करती हो मेरी छमिया माताश्री? मैंने कुछ गलत कहा क्या?” ढिठाई से हंसता हुआ बोला वह।

“पंकज अब तू मुंह बंद रख अपना। हां रेखा, अब बता, हुआ क्या था रात को? यह सब कैसे?” मैंने पंकज को रोक कर रेखा से सवाल किया।

“इस हरामी के सामने कैसे बताऊं?” रेखा झिझक उठी। चेहरा लाल हो गया उसका।

“पंकज, अब तू दफा हो जा यहां से।” मैंने पूरे अधिकार से हुक्म दिया।

“होता हूं होता ह़ू, दफा होता हूं, लेकिन एक शर्त पर।”

“कैसी शर्त?”

“देना होगा आपको आज।” हवस का पुजारी मुझसे मांग रहा था।

“क्या?” अनजान बन कर पूछी।

“वही, जो कल आपने दिया था।” एक नंबर का कामी बन चुका था वह।

“ठीक है, ठीक है, दफा हो जाओ अब हम औरतों के बीच से।” मैं नें पंकज को वहां से भगाया। उसकी बात सुनकर भीतर ही भीतर तो गनगना उठी थी। वह गया वहां से और अब हम दोनों अकेले थे। “हां अब बता, रात में कैसे हुआ ये सब?” मैं नें बेताबी से प्रश्न दागा।

“बताऊंगी, मगर पहले ये बता, क्या मांग रहा रहा था पंकज? क्या देने वाली हो उसे?” शशंकित दृष्टि से मुझे देखती रेखा नें पूछा।

“छोड़ो ये बात, तू अपनी बता।” मैं टालने लगी।

“टालो नहीं, बताओ।”

“अरे मैं दूंगी न, तुझे उससे क्या?”

“क्या दोगी? कल क्या दिया था तूने?” जिद पर उतर आई थी।

“उपहार।”

“क्या उपहार?”

“नहीं बताती।”

“बताना पड़ेगा।”

“जिद मत कर।”

“बताने में क्या जाता है तुम्हारा?”

“मत सुनो।”

“सुनूंगी, अब तो जरूर सुनूंगी।”

“तो सुन।”

“हां सुना।”

“चूत, मेरी चूत, साली मां की लौड़ी। कल उसनें नये सुनसान घर में मुझे चोदा, अब फिर मेरी चूत मांग रहा है हरामी।” मैं झटके में बोल पड़ी और रेखा आवाक, विस्फरित नेत्रों से मुझे देखती रह गयी। “अब हुई तसल्ली?”

“तो ये बात है। बाप बेटे दोनों एक ही थैले के चट्टे बट्टे हैं। जैसा बाप वैसा बेटा।” रेखा बोली।

“अब बता तू अपनी बात, कल रात वाली बात।”

अब रेखा बोलने लगी “तो सुन। कल रात को तुम्हारे यहां से लौट कर मैं किचन में खाना बना रही थी कि अचानक पंकज नें पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया। मैं हड़बड़ा गयी। मुड़ कर देखा तो पंकज था।

“क्या बात हे बच्चे, बड़ा प्यार आ रहा है मम्मी पर?” मैं बोली।

“न जाने कब से प्यार आ रहा था तुम पर मॉम, पर हिम्मत नहीं हो रही थी।” वह मुझे पीछे से जकड़े हुए बोला।

“इसमें हिम्मत की क्या बात है? मां बेटे में प्यार तो होता ही है। मैं तो तो तेरे पैदा होने के बाद से ही तेरे प्यार में पागल हूं।” उसकी नीयत समझे बिना बेटे के प्रति ममता दिखाती हुई बोली।

“वाह मम्मी, मेरी स्वीट मम्मी।” मेरी कमर को कस के जकड़ रखा था उसनें और मेरे गाल पर एक जोर की पप्पी दे डाली।

“यह क्या हो गया आज तुम्हें।” मैं उसकी बांहों में मचल कर बोली।

“यह तो मेरे प्यार की शुरुआत है मेरी सेक्सी मॉम।” अब उसके हाथ मेरे स्तन की ओर बढ़े। मैं चौंक उठी, उसकी बात सुनकर और उसके हाथों की नाजायज हरकत अनुभव करके।

“यह क्या बोल रहे हो और और कर क्या रहे हो। हटो, छोड़ो मुझे।” मैं उसके मजबूत बाजुओं में तड़प कर बोली।

“छोड़ने के लिए थोड़ी न पकड़ा है। आज तो जी भर के प्यार करूंगा मेरी माताश्री।” मेरे कान के पास सरगोशी हुई।उसकी आवाज में न जाने क्या था कि किसी अनिष्ट की आशंका से कांप उठी मैं। मेरे नितंबों की दरार पर किसी कठोर वस्तु के दबाव को अनुभव कर रही थी। मेरी आशंका क्या सही थी? मैं उस आशंका को मन से झटक देने का प्रयास कर रही थी, सच को झुठलाने की नाकाम कोशिश थी वह।

“अपनी मां से प्यार करने का यह क्या तरीका है?” मैं छटपटाती हुई बोली।

“प्यार प्यार होता है, तरीका कोई भी हो।” वह बोला। अब उसकी हरकतें बढ़ती गयीं। बांए हाथ से मेरी कमर को अपनी गिरफ्त में लेकर दांए हाथ की हथेली मेरे स्तन पर धर दिया। हाय राम, चिहुंक ही तो उठी थी मैं। यह तो मां बेटे के बीच का प्यार कत्तई नहीं था। स्त्री पुरूष वाला प्यार था। प्यार भी कहां, यह तो, हे भगवान, यह तो वासना थी।

“पागल हो गये हो? यह मां बेटे वाला प्यार नहीं है। छोड़ो मुझे।” मैं उसकी गिरफ्त में छटपटाने लगी। उसकी पकड़ और सख्त हो गयी। अब वह मेरे स्तनों को मसलने लगा।

“हां पागल हो गया हूं। तेरे प्यार में पागल हो गया हूं मॉम।” हे भगवान, ऐसा लग रहा था कि बस धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं। यह कैसा प्यार? अकल्पनीय, सर्वथा अपवित्र, वर्जित प्यार। मां बेटे के बीच अनैतिक प्यार। मैं छटपटाती रही और उसकी ज्यादती बढ़ती गयी। अब वह मेरी नाईटी के ऊपर से ही मेरे स्तनों को दबाने लगा।

“आआआह्ह्ह छोड़ो मुझे शैतान। यह गलत है।” मैं बेबसी में गिड़गिड़ाने लगी।

“प्यार करना गलत कब से हो गया?”

“यह मां बेटे वाला प्यार नहीं है।”

“मॉम, तू औरत और मैं मर्द, इसमें मां बेटे वाले प्यार की बेतुकी बात कहां से आ गयी।” वह अब मेरी नाईटी उठाने लगा। मेरी लाख कोशिशों के बावजूद उसे रोक पाने में बेबस थी। उसकी चेष्टाओं से साफ साफ ज्ञात हो गया था कि उसका उद्देश्य क्या है। बेबसी से मेरी आंखों में आंसू आ गये, आज रिश्तों में निषिद्ध संबंध, रिश्ते की पाकीजगी, मर्यादाओं का बंधन भंग होना तय था, हालांकि मेरा विरोध बदस्तूर जारी था। मेरे विरोध को बिल्कुल खारिज कर दिया था उसनें। जबर्दस्ती उसनें मेरी नाईटी को उतार फेंका फर्श पर। अब मैं सिर्फ पैंटी और ब्रा में थी।

“ओह भगवान, ऐसा मत करो, हाय राम, बेशरम, गलीज, कमीने, छोड़ मुझे।” गुस्सा भी था और अपनी बेबसी पर खीझ भी।

“ऐसा न करूं तो कैसा करूँ?” बेहयाई की पराकाष्ठा थी यह। मुझे अर्धनग्न कर चुका था लेकिन अपनी गिरफ्त में जरा भी ढील नहीं दी उसनें। “मॉम तेरी ऐसी काया पर तो कामदेव भी फिदा हो जाएगा, फिर मैं क्या चीज हूं। चुपचाप करने दे जो मैं करने जा रहा हूं। आखिर प्यार ही तो कर रहा हूं, कोई गलत तो नहीं कर रहा।”

“चुप बेशरम, ये प्यार है? सूअर का बच्चा।”

“ठीक मैं सूअर, और तू सूअर की मां।” मेरे नितंबों के बीच उसके पैजामे के अंदर का लिंग धंसा चला जा रहा था। मैं हलकान थी। कैसे बचूं? क्या करूं? कुछ सूझ नहीं रहा था। आज मां बेटे के बीच के पवित्र रिश्ते को कलंकित होने से सिर्फ भगवान ही बचा सकता था, लेकिन वह भी मौन तमाशबीन बना बैठा था। एक कामांध पुत्र के हाथों एक अबला असहाय मां की अस्मत तार तार होने को थी। पंकज तो मुझ पर छा गया। मैं किचन के स्लैब पर औंधी हो चुकी थी। सर्वथा बेबस। मेरी अनुनय विनय, विरोध, क्रोध, सब व्यर्थ हो रहा था। उसनें पीछे से ही मेरी ब्रा का हुक खोल दिया और लो, पलक झपकते मेरे स्तन ब्रा के बंधन से मुक्त, मोटे ताजे कबूतरियों की तरह फड़फड़ा उठे थे। हाय राम, ओह भगवान, यह क्या हो रहा था मेरे साथ।

“आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह, हर्र्र्र्र्रा्आ्आ्आम्म्म्मीई्ई्ई्ई कुत्ते कमीने सूअर के बच्चे, छोड़ मुझे, ऐस्स्सा्आ्आ्आ्आ अनर्थ न कर।” हिलने डुलने में असमर्थ सिर्फ मौखिक विरोध कर रही थी, जिसके लिए मैं स्वतंत्र थी और यह विरोध भी वहां की हवा में विलीन होता जा रहा था।

“देख मॉम, अब मेरे सब्र का इम्तिहान न ले, नहीं तो।” अब उसनें मेरे नंगे स्तनों को सहलाना आरंभ कर दिया।

“नहीं तो? नहीं तो क्या?” मैं थरथराते हुए बोली। मैं झूठ नहीं बोलूंगी मैं भी सनसना उठी थी। मां हूं तो क्या, आखिर स्त्री जो ठहरी।

“जबर्दस्ती करूंगा।” अब उसनें मेरे स्तनों पर अपनी हथेलियों का दबाव बढ़ा दिया था। “वाह वाह इतनी बड़ी बड़ी मस्त चूचियां, वाह मम्मी वाह, इस उम्र में भी जवान लड़कियां फेल।”

“आ्आआह्ह्ह्ह” अब मेरे शरीर में रक्त का प्रवाह तीव्र हो उठा था लेकिन फिर भी इस अनैतिक कृत्य में शामिल होने के लिए मेरा दिल गवाही नहीं दे रहा था। “जबर्दस्ती क्या करेगा जलील इन्सान?”

“प्यार करूंगा।” बड़े ही गंदे तरीके से बोला वह। अब तक संघर्ष करते करते मैं थक चुकी थी और वह मुझ पर पूरी तरह हावी हुआ जा रहा था।

“यह प्यार नहीं है, प्यार जबर्दस्ती नहीं होता है।” कांपते हुए बोली मैं लेकिन मेरे होशोहवास अब मेरा साथ छोड़ रहे थे। मेरी अनिच्छा के बावजूद मेरा शरीर अवश होता जा रहा था। छि:, यह मुझे क्या हो रहा था। मन ग्लानि से भरा था किंतु तन? इस पापी तन का क्या करूं मैं? तन में तो मादकता भरी तरंगें हिलोरें ले रही थीं।

“अगर कोई माने नहीं तो?” बेहयाई से बोला वह।

“यह बलात्कार है, वासना में अंधे हर्र्र्र्र्रा्आ्आ्आम्म्म्मीई्ई्ई्ई, यह तेरी कामक्षुधा है, कामपिपाशा है।” मैं रोकने के क्रम में समझाने का व्यर्थ प्रयास कर रही थी।

“जो भी है, मैं तो करूंगा।” ढिठाई से बोला। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, उसने अब मेरी पैंटी को पीछे से पकड़कर नीचे खींच दिया एक ही झटके में घुटनों तक। खुल गयी पैंटी, उतर गया आखिरी अंत:वस्त्र। अब मैं सर्वथा नंगी थी। मारे शर्म और अपनी विवशता की खीझ के मैं हलकान हो उठी।

“ओह जंगली जानवर, छोड़ मुझे, उफ्फ भगवान इस जलील कमीने से बचा मुझे ओह।” मैं तो बोल ही सकती थी। चीखना चिल्लाना खुद की बदनामी को आमंत्रण देना था। जो मैं कर सकती थी, विरोध, क्रोध, शारीरिक संघर्ष (हालांकि उसकी शारीरिक शक्ति के आगे नगण्य था), सब कुछ कर चुकी थी, कर रही थी, मगर नतीजा वही, ढाक के तीन पात। वह तो पूरी तरह मुझ पर हावी हो चुका था। तभी मैं चौंक उठी। मेरे बड़े बड़े नग्न नितंबों के मध्य दरार पर किसी मूसलाकार सख्त, गर्म सलाख के दबाव को साफ साफ महसूस कर रही थी। हिलने डुलने से लाचार थी, किंतु हाथ मेरा तो आजाद था, मैं बांये हाथ को अपने नितंबों की तरफ ले गयी और ज्योंहि उस सलाख से मेरे हाथ का संपर्क हुआ, ओह मेरे भगवान, मानो मुझे 440 वॉल्ट का करंट लगा। यह तो कठोर, गरमागरम गधे सरीखा विशालकाय लिंग था। हे भगवान, न जाने कब उसने अपने पैजामे को नीचे खिसका कर लिंग को मुक्त हवा में आजाद कर चुका था। उफ्फ, अब मैं क्या करूं? जल्लाद मुझे हलाल करने की पूरी तैयारी में था। पहले ही नैतिकता अनैतिकता के झंझावत से हलकान थी, अब यह दूसरी मुसीबत। देख तो नहीं सकी किंतु मेरे हाथ नें उसके अमानवीय लिंग के आकार का बखूबी आंकलन कर लिया था। असामान्य रूप से विशाल था उसका लिंग। पूरी उत्तेजना की अवस्था में दस इंच लंबाई से कत्तई कम न था। या फिर उससे भी ज्यादा। मोटाई का तो कहना ही क्या, पूरा मूसल था मूसल। उस लिंग से संभोग की कल्पना मात्र से मेरे शरीर में भय के मारे झुरझुरी दौड़ गयी।

“देख मॉम, अब मान भी जा।” प्रणय निवेदन था।

“नहीं।”

“प्यार ही तो करूंगा।”

“छि: जंगली, यह प्यार है?”

“खुशी से दो तो प्यार से करूंगा।”

“नहीं तो?”

“नहीं तो जबर्दस्ती।” वहशी दरिंदे की गुर्राहट थी यह। समझ गयी, अब कुछ नहीं हो सकता था। मैं नंगी, वह नंगा। किचन के स्लैब पर औंधी पड़ी एक कमजोर, बेबस नंगी औरत पर एक उत्तेजना के मारे पगलाया सांढ़ सरीखा नंगा मर्द। अब उसनें मेरे नितंबों को मसलना आरंभ कर दिया था। बीच बीच में उसके हाथ की उंगलियों से मेरी योनि को सहलाता जा रहा था और मैं? मेरा क्या हाल हो रहा था बता नहीं सकती। मन में वितृष्णा मगर तन में? इस कमीनी देह का क्या करती जिसमें वासना की लहरें हिलोरें मारना आरंभ कर चुकीं थीं। जैसे ही उसकी उंगलियों का स्पर्श मेरी योनि पर होता, झनझना उठती थी मैं।

“ऐसा अनर्थ मत कर प्लीज। तू दरिंदा बन चुका है। कामांध दरिंदा। होश में आ पागल।” मैं गिड़गिड़ाने लगी थी।

“हां, होश में आया तभी तो तेरी खूबसूरत काया मुझे दिखाई दी, वरना इतने दिन तो मैं अंधा था। अपने घर में ही इतनी मदमस्त जुगाड़ पड़ी है और मैं यहां वहां मुंह मार रहा था। वाह मॉम वाह। तू तो डायमंड है डायमंड, ब्लैक डायमंड। मेरी तो लॉटरी निकल पड़ी मॉम।” वह अब पूरी तरह अपने असली रंग में आ चुका था। पंकज के इस रूप की तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सारी मासूमियत न जाने कहां खो गयी थी उसकी। वह विशुद्ध औरतखोर मर्द की तरह व्यवहार कर रहा था। अब वह खुल कर खेलने लगा मेरे तन से। एक हाथ से जहां वह मेरे स्तनों को मसल रहा था वहीं दूसरे हाथ से मेरे चूतड़ों को मसलते हुए मेरी योनि को सहलाता जा रहा था। बीच बीच में मेरी योनि के भगनासे को भी उंगली से छेड़ता जा रहा था, जो कि किसी स्त्री का सबसे संवेनशील और कामोत्तेजक हिस्सा होता है और मेरे तन रुपी सितार के तार तरंगित होते जा रहे थे। उसकी गरम गरम सांसें और होंठों का स्पर्श मेरी गर्दन पर, मेरे अंदर की कामना को जगा रहा था। न चाहते हुए भी मेरे अंदर वासना का सैलाब अंगड़ाई लेने लगा। धीरे धीरे मेरे विरोध की हवा निकलती जा रही थी। अब मेरा विरोध कमजोर पड़ चुका था और इसका आभास शायद पंकज को हो चुका था। मौका ताड़ा उसनें और मेरी नग्न देह को गोद में उठा लिया।

“अब यह ककककक्या कर रहे हो?” अकचका कर मैं बोली।

“उचित जगह पर ले चल रहा हूं मेरी प्यारी मॉम।” वह मुझे लेकर बेडरूम में ले आया।

“छोड़ो मुझे बेशरम।” मैं छटपटा रही थी।

“लो छोड़ दिया।” सच में उसनें मुझे छोड़ दिया और मैं धड़ाम से बिस्तर पर गिर पड़ी। अब मैं आजाद थी। मगर शिकारी ठीक सामने खड़ा था, पूर्ण नंग धड़ंग, मादरजात। कद्दावर शरीर, मानो किसी कुशल शिल्पकार के हाथों तराशा गया सुगठित देह, कामदेव सरीखा आकर्षक चेहरा (हालांकि इस वक्त किसी भूखे भेड़िए की तरह कुछ हद तक विकृत हो चुका था) का दीदार करती कुछ पलों तक खो सी गयी थी, अपनी नग्न देह से बेखबर। ज्यों ही मेरी नजर उसके विकराल लिंग पर पड़ी, भय से मेरी रूह फना हो गयी। हे भगवान, यह तो किसी दानव का लिंग था। तना हुआ, कड़क, अमानवीय, भयावह रूप से ताकरीबन ग्यारह इंच लंबा और उसी के अनुपात में करीब तीन चार इंच मोटा, काले नाग की तरह फनफनाता हुआ। उसके लिंग के अग्रभाग में विशालकाय गुलाबी खुला सुपाड़ा, सुपाड़े के ऊपर का आवरण, चमड़ा, न जाने कब पलट गया था, मेरे सम्मुख पूरे जलाल के साथ भीमकाय लिंग के साथ झूम रहा था। उसका विशाल अंडकोश, न जाने कितनी मात्रा में वीर्य संजोए, लिंग के नीचे लटक रहा। भय से मेरी घिग्घी बंध गयी। बदन में झुरझुरी दौड़ गयी। जितनी देर मैं निश्चल, अवाक उसे निर्निमेष देखती रही, उतनी ही देर वह भी आंखें फाड़े, मेरी नग्न देह के हर उतार चढ़ाओं का भूखी नजरों से दीदार करता रहा। अचानक जैसे मेरी चेतना जागी, मैं हड़बड़ा कर बिस्तर से उठने लगी लेकिन पंकज ठहरा एक नंबर का चतुर शिकारी। बाज की तरह झपटा मुझ पर और मैं एक बेबस पंछी की तरह उसके चंगुल में पुनः फंस कर फड़फड़ा उठी।

“उफ्फ, छोड़ मुझे।”

“न न न न, मेरी सेक्सी मॉम, अब यहां तक पहुंच कर ऐसे कैसे छोड़ दूं। इतनी मदमस्त जुगाड़ को बिना चोदे छोड़ दूं? इतना बेवकूफ नहीं हूं मैं। इतने सालों बाद पहली बार तेरे इतने मर्दमार बदन को देखने के बाद देखो मेरे लंड की हालत क्या हो गयी।” अपने लिंग को हिलाता हुआ यह हवस का पुजारी बोला। अपने एक हाथ से मेरे दोनों हाथों को एक साथ मेरे सर से ऊपर की ओर करके मुझे सर्वथा असहाय कर चुका था।

“तुम गलत कर रहे हो।” मैं बोली।

“गलत क्या है इसमें?” बेहयाई से वह बोला।

“मां के साथ बेटे का यह सब करना पाप है, अनर्थ है।”

“पाप पुण्य, अर्थ अनर्थ, सब अभी मेरे लंड के साथ तेरी चूत में घुस जाएगी मॉम।” ऐसा बोल रहा था, एकदम सड़क छाप भाषा, एक मंजे हुए चुदक्कड़ की तरह। सन्न रह गयी मैं।

“और तू यह सब मुझे क्यों समझा रही हो मॉम। तेरी चूत देखकर कोई भी बता सकता है कि अच्छी खासी चुदाई हो रही है इसकी, वह भी एक मर्द से नहीं, कई मर्दों से। फूली हुई, इत्ती बड़ी, पावरोटी सी। कितने लंड खा चुकी हो मॉम? बताओ तो और अब यह देखो, तेरी चूत कैसे फकफका फकफका कर पानी छोड़ रही है। साफ है कि तू एक नंबर की लंडखोर है और अभी भी तुझे चुदवाने का मन कर रहा है लेकिन मेरे सामने नाटक कर रही है। सच है ना?” उसकी बातें सुनकर मैं अवाक रह गयी। निरुत्तर हो गयी। मेरे सारे तर्क व्यर्थ हो रहे थे।

“जो भी हो, लेकिन सच्चाई यह है कि तू मेरा बेटा है।” मैं भी ढीठ ही थी।

“सच्चाई यह भी है कि तू औरत है और मैं मर्द हूं। तू नंगी है और मैं नंगा हूं। मैं चोदने को बेकरार हूं और तू भी चुदने को बेकरार है, यह और बात है कि तू मुंह से न न न न कर रही है और मैं खुलकर अपनी इच्छा व्यक्त कर रहा हूं।” वह बोलते बोलते मेरी लसीली योनि में यकायक अपनी उंगली घुसेड़ बैठा।

“उई मांआंआंआंआ।” मैं चिहुंक उठी। अपनी जांघों को सटा लिया मैंने।

“जांघें खोल।”

“नहीं।” मेरी चूत तो लंड लेने के लिए पगलाई हुई थी, किंतु मैं इतनी भी बेशरम नहीं थी कि अपने मुंह से बोल दूं, आ बेटे चोद ले।

“जांघ खोलती है कि नहीं लंडखोर। अब मुझे गुस्सा आ रहा है साली मां की लौड़ी। समझ गया, तू ऐसे खुशी खुशी चोदने देगी नहीं।” बेकरार तो था ही, वह अब खूंखार हो उठा। उसनें मेरी जांघों को जबरदस्ती अलग किया और मेरी जांघों के बीच आ गया। अब उसके लिंग का सुपाड़ा मेरी योनि के मुहांने पर आ टिका था या उसनें टिका दिया था, मैं तो गनगना उठी, इस बात को भूलकर कि इस विशालकाय लिंग से मेरी योनि की क्या दुर्दशा हो सकती है। इस पल तो बस, मेरी प्यासी गरम चूत में कोई गरमागरम लंड समा जाए, यही एकमात्र कामना उमड़ रही थी कामदेव के वशीभूत मेरे तन में। मन तो सोचने समझने की स्थिति में नहीं था। कामुक शैतान के वशीभूत, वासना की अग्नि में तपते तन की भूख के आगे मन नतमस्तक हो चुका था। जो बाहरी विरोध था वह मात्र दिखावा था।

“हरामी कहीं का।” मैं रोष दिखाती बोली।

“हां, मैं हूं हरामी, लेकिन कहीं का नहीं, घर का।” ढिठाई से बोला वह।

“कमीने इन्सान, कुत्ते।” मैं गाली ही दे सकती थी, कर तो कुछ सकती नहीं थी।

“हां मैं कमीना हूं, कुत्ता हूं। कुत्ते की तरह भी चोदता हूं और अगर चाहता तो तुझे किचन के स्लैब पर औंधा करके तुझे कुतिया की तरह चोद लेता, मगर आदमी हूं, अभी आदमी की तरह चोदुंगा। कमीना हूं, पहले कमीनापन दिखा दूं, कुत्ता बाद में बन जाऊंगा। अभी तो कमीने इन्सान की तरह ही चोदूंगा साली, गाली देती है बुरचोदी मॉम।” पूरा वहशी जानवर बन चुका था वह। दनादन दनादन अपनी उंगली मेरी चूत में डालकर अंदर बाहर करने लगा और मैं उत्तेजना के मारे मानो पगला ही गयी। जी तो कर रहा था कि उसका लंड ही घुसा दे मेरी चूत में, मगर अपने मुंह से कैसे कहती यह सब। अब सबकुछ मुझे साफ साफ दिखाई दे रहा था। एक घृणित रिश्ते का सृजन होने से अब कोई नहीं रोक सकता था। मां बेटे के पवित्र रिश्ते की पवित्रता में एक कभी न मिटने वाला बेहद बदनुमा और अमिट दाग लगाने की कागार पर हम पहुंच चुके थे।

“ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह भगवान, आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह नहीं नहीं।” मैं बदहवासी के आलम में बोली।

“अब भगवान वगवान कुछ नहीं चलने वाला। चल अब तैयार हो जा, मेरा लौड़ा लेने के लिए।” कहते कहते उसनें अपना भीमकाय लंड के सुपाड़े को मेरी पनपनाती, पनियायी चूत के मुहांने पर रख कर रगड़ना आरंभ कर दिया। उफ, ओह, आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, यह क क क क्या हो गया था मुझे उन पलों में। मेरी बोलती बंद हो गयी थी। मूक, सन्न, सुन्न, शरीर तो तरंगित हो रहा था, उत्तेजना का झंझावत चल पड़ा था अंदर, किंतु मस्तिष्क अर्धचेतन, निष्क्रिय, सोचने समझने की स्थिति से विरक्त हो चुका था। वैसे भी अब मैं शारीरिक वासना की आग में झुलसने लगी थी। बेटा अब बेटा न रह कर मेरी वासना की दहकती अग्नि में धधकती काया को शीतलता प्रदान करने वाला एकमात्र सहारा बना पूरे जलाल के साथ उपस्थित था।

“सोच क्या रही है अब पगली, बुझा ले अपनी प्यास, बेटा वेटा भूल, मर्द समझ, एक माहिर, मस्त चुदक्कड़ मर्द, चुद जा, यही समय का तकाजा है।” मेरे अंदर सरगोशी सी हुई, मैं पिघलती चली गयी और अंततः समर्पित हो गयी। “ले, अब जो करना है कर मादरचोद, मगर जल्दी कर मां के लौड़े, चोद हरामी चोद,” मन ही मन बोली, खुल कर तो बोलने में अब भी मेरी किरकिरी हो जाती। उस औरतखोर को मेरे मौन समर्पण का आभास होते देर नहीं लगी। सब कुछ तो तय था, तैयार था, लंड रुपी भाले की नोक पर लक्ष्य, यानी मेरी फकफकाती चूत। चुदास से बेहाल, मगर विशाल लंड से भयभीत, मैं सांस रोके पड़ी रही और तभी, तभी हौले हौले पंकज के लंड का दबाव मेरी चूत पर बढ़ने लगा। वे पल मेरे लिए असहनीय थे। मेरी चूत अवश्य लसीली थी किंतु इतना विशाल लंड पहली बार जबर्दस्ती इसके अंदर प्रवेश करने की चेष्टा कर रहा था, मेरी चूत का प्रवेश मार्ग फैलता जा रहा था और आहिस्ता आहिस्ता पंकज के लंड का चिकना सुपाड़ा सरकते सरकते मेरी चूत में प्रवेश करता जा रहा था, उफ उफ, मानो कोई गरमागरम मोटा सरिया घुसा चला जा रहा हो। पीड़ामय वे पल वाकई मेरे लिए असहनीय थे।

“आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह ननननननहीं, आह मर गयी अम्मांआंआंआ, छोड़ मुझे ओह, मर गयी रेए्ए्ए्ए।” मैं पीड़ा से छटपटा रही थी और वह घुसाता चला जा रहा था।

“चुप मेरी रांड मॉम। ले, घुस तो रहा है आराम से, ख्वामख्वाह ही नखरे कर रही हो।” कहते कहते मेरी चीख पुकार की परवाह किए बिना घुसा ही तो दिया, पूरा का पूरा लंड, जड़ तक। उफ्फ आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, असहनीय पीड़ा, लग रहा था मेरी चूत फट गयी हो।

“निकाल ओह फट गयी मेरी…”

“क्या फट गयी तेरी…।” शरारत से बोला।

“मेरी चूत, मेरी बुर कमीने कुत्ते मां की अस्मत लूटने वाले लुटेरे।” दर्द और गुस्से से पगलाई मैं बोली, किंतु अश्लीलता से परे, एक सीमा तक ही उतरी थी।

“वाह मॉम, बहुत खूब, तो गाली भी आती है तुझे। थोड़ा और गंदी गालियां दो तो और मजा आए। दे गाली। खूब दे गाली साली कुतिया, हरामजादी रंडी मॉम। तेरी गाली सुनकर थोड़ा मजा आया। अब तू जितनी गंदी गालियां दे सकती है दे, तेरी गालियों से मुझे सच में दुगुना जोश चढ़ गया है।

अब तू देती रह गाली,

मैं चोदता रहूं साली।” मेरी गालियों से आनंदित होकर बोला वह, कितना गिर चुका था वह, यह उसकी बातों से जाहिर था। वैसे भी वह अपनी जीत का झंडा गाड़ने में सफल हो चुका था। रिश्ते की मर्यादा की धज्जियां उड़ गयीं थीं। यहां अब उन पवित्र रिश्तों की मर्यादा, सामाजिक वर्जनाओं, पाप पुण्यों की बातें मुझे मुंह चिढ़ा रही थीं। वैसे भी इतना हो चुकने के बाद अब बचा ही क्या था। चुदास की ज्वाला में धधकती, पंकज के विशाल, अमानवीय लंड को ग्रहण करने में अपने सामर्थ्य को आंके बिना खुद को समर्पित की ही थी कि पंकज नें मानो मुझ पर कहर ही ढा दिया। मुझे तो बेडरूम में तारे नजर आने लगे। इतना बड़ा लंड पहली बार मेरी चूत में घुसा था, पूरा का पूरा घुसा था, इतना लंबा, कि मेरी बच्चेदानी के द्वार में घुसने की दहलीज पर था, यह मैं स्पष्ट अनुभव कर सकती थी।

“आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, निकाल…., बाहर निकाल…” दर्द से कलकला कर बोली मैं।

“क्या निकालूं?”

“लंड मादरचोद लंड, अपना लौड़ा साले मां के चुदक्कड़।” अब मैं भी अश्लील गालियों पर उतर आई थी।

“ये हुई न बात, हां ऐसे बोलो, लंड, लौड़ा।” कहते न कहते उसनें सचमुच में अपना मूसल मेरी चूत से बाहर खींचा।उफ्फ, वह अहसास, सकून भरा अहसास, किंतु चूत के अंदर एक खालीपन का अहसास, आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह। फटी तो फटी मेरी चूत, ठोंक दे दुबारा ठोंक दे, यह मेरे अवश तन की अनियंत्रित कामना थी, जिसके वशीभूत मेरी कमर खुद ब खुद उछल पड़ी ऊपर की ओर और गप्प से निगल गयी उसका लंड, वही विशालकाय गधे सरीखा लंड, जिसके प्रथम प्रवेश की पीड़ा से मुक्त भी नहीं हुई थी। यह मेरे अनियंत्रित तन द्वारा की गयी एक अक्षम्य भूल थी, जिससे पंकज को खुली छूट मिल गयी, मेरे तन से खुला खेल फर्रुखाबादी खेलने की। मेरे दोनों स्तनों को अपने बनमानुषी पंजों से मसलते हुए, मेरे होंठों और गालों को चाटते हुए, चूमते हुए, अपने दांतों से काटते हुए किसी कुत्ते की रफ्तार से भकाभक भकाभक, मेरी चूत की जो कुटाई आरंभ हुई कि मैं अचंभित रह गयी। अचंभा मुझे इस बात का भी हुआ कि जो लंड दो मिनट पहले पीड़ा का कारण बना हुआ था, वही अब अद्भुत आनंद का श्रोत बन गया था।

“आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह, ओ मांआंआंआंआ ओ मांआंआंआंआ।” मेरे मुंह से निकलते उद्गारों से उसका जोश दुगुना हो गया और फिर जो धमाचौकड़ी मची, धकमपेल का दौर आरंभ हुआ, बता नहीं सकती। उसनें पूरी तरह मुझे अपने अनुसार ढाल लिया था और मैं पागल, होशोहवास खो कर उसके तन से एकाकार होने की जद्दोजहद में जुट गयी। ओह वह स्वर्गीय, अलौकिक, अनमोल सुखद कामुकता भरे पल। भूल गयी कि वह मेरे इसी चूत से पैदा हुआ मेरा बेटा है। आज इसी चूत की फसल का लंड पुनः इसी चूत में अंदर घुसता रहा, घुसता रहा, रगड़ रगड़ कर घुसता रहा, मचल मचल कर घुसता रहा, किलक किलक कर घुसता रहा।

“वाह मेरी रंडी मॉम, अब आई अपनी औकात में। साली कुतिया, ये ल्ल्ल्ले य्य्ये ल्ल्ल्ले्ए्ए्ए, हुम हुम हुम हुम हुम्म्म्आ्आःआ्आह्ह्ह्ह। उफ ऐसी मस्त लंडखोर चुदक्कड़ औरत आज तक मेरे लंड से बची कैसे। अहा, मजा आ रहा है ओह मेरी बुरचोदी मां।” बोलते बोलते भक्क भक्क ठोकता रहा ठोकता रहा, ऐसा लग रहा था कि यह दौर अनंत काल तक चलता रहेगा। करीब दस मिनट में ही आनंदातिरेक से मेरा तन ऐंठने लगा। थरथराने लगी मैं। उफ यह तो, यह तो शायद मेरा स्खलन था।

“आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह।” मैं झड़ रही थी।

“क्या हुआ?”

“गयी रे गयी मैंऐं्ऐं्ऐं्ऐं,” बोलती हुई चिपक गयी उससे।

“न न न न, अभी तो बहुत बाकी है मॉम, ये ये ये ले, ये ले, ये ले” कहते कहते मेरे शिथिल पड़ते शरीर को कस के दबोचे दे दनादन दे दनादन, दे गचागच दे गचागच, लगा चोदने, तूफानी रफ्तार से, नतीजा? दो तीन मिनट बाद मेरे शरीर में फिर जान आ गयी। इस बार मेरे अंदर की सारी ग्लानि समाप्त हो चुकी थी। अब मैं भी खुल्लमखुल्ला रांड बन गयी थी।

“आह्ह्ह्ह्ह्, आह आह चोद साले मादरचोद, ओह मां, ओह, बना डाल अपनी मां को अपनी रंडी आह आह हां हां ऐसे ही, ऐसे ही ले मेरी चूत मां के लौड़े हरामी कुत्ते, मुझे आह मुझे अपनी दासी बना ले आह ओह मेरी चूत के रसिया, ओह मेरे बुर के मालिक, इस्स्स्स्स हां हां हा,” और भी न जाने क्या क्या बके जा रही थी पागलों की तरह, म़ै अब रंडी बन चुकी थी, अपने बेटे की बेशरम रंडी मॉम। मैं उस वक्त उसके लंड और चुदाई की दिवानी बन गयी थी सारी लाज शरम को छोड़ कर।

“वाह मेरी बुरचोदी, आ रहा है न मजा अब? बहुत खूब। साली नौटंकी, नखरे कर रही थी।” न जाने और क्या क्या बोलता रहा, मुझे होश कहां था। मैं भी तो बड़बड़ा रही थी, अश्लीलता की सारी हदों को पार करते हुए बेशरमों की तरह न जाने क्या क्या बोलती हुई चुदी जा रही थी। करीब चालीस मिनट की अथक चुदाई के दौरान पंकज नें मेरे शरीर का सारा कस बल निचोड़ कर रख दिया। अंततः उसके स्खलन का समय आ पहुंचा। इतनी जोर से मुझे दबोचा मानो मेरी हड्डियों का चूरमा बना डालने पर आमादा हो। मेरी तो सांसें ही थम सी गयीं थीं। और लो, तभी मैं भी झड़ने लगी। गजब, यह मेरा तीसरा स्खलन था। एक मां अपने बेटे की नंगी देह में और एक बेटा अपनी मां की नंगी देह में समा जाने की पुरजोर कोशिश में एकाकार हो गये। मेरा गर्भ पंकज के, मेरे अपने कोखजाए बेटे के गरमागरम वीर्य से सिंचित होता रहा और मैं मानो हवा में उड़ने लगी थी, वह अहसास ही बेहद आनंददायक, सुखद, स्वर्गीय था। हम दोनों के झड़ते ही वासना का वह भयानक तूफान मानो यकायक थम सा गया। सन्नाटा सा पसर गया। सिर्फ हमारी लंबी लंबी सांसें चल रही थीं। हम दोनों तृप्ती के सुखद संसार में डूब गये थे। अब भी वह अपने पसीने से नहाए शरीर से मुझे चिपकाए हुए था। मैं शिथिल पड़ी उसकी नग्न देह से चिपकी रही। तभी फच्च की आवाज से पंकज का लिंग मेरी योनि से बाहर निकल पड़ा।

“वाह मॉम मजा आ गया।” वह मुझे चूम कर बोला। तब जाकर मेरी चेतना जगी। हाय, यह क्या हो गया। उत्तेजना के उन पलों में इस निहायत ही घृणित कृत्य में मैं खुद भी बराबर की भागीदार बन चुकी थी। पाप की भागीदार। ग्लानि से भर उठी।

“हट।” मैं छिटक कर अलग हुई। उसनें भी परवाह नहीं की, छोड़ दिया मुझे। आखिर उसे अपनी कुत्सित मनोकामना पूर्ति में सफलता तो मिल ही गयी थी ना।

“क्या हुआ?” अलसाए से स्वर में बोला।

“सब कुछ बरबाद कर के पूछ रहे हो क्या हुआ।” मैं अब बेड से उतर कर खड़ी हो चुकी थी, हालांकि मुझसे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। मेरे पैर थरथरा रहे थे। मेरी योनि से पंकज के वीर्य की कुछ मात्रा मेरी जांघों तक बह आई थी। “पाप हुआ पाप, महापाप, हमसे महापाप हुआ है।”

“फिर चालू हुआ तेरा उपदेश। हुआ तो हुआ, मजा तो आया ना? सच तो यह है कि तुझे भी बड़ा मजा आया है। इसे झुठलाने का कोई लाभ नहीं। अब जब जी चाहेगा हम चोदाचोदी खेलेंगे, हां कि ना?” बेशरम बोला।

“निश्चय ही ना। जो हुआ सो हुआ, अब आगे नहीं। जो हुआ सो गलत हुआ। इसे मैं सुधार तो नहीं सकती, मगर दुबारा दुहराने के खिलाफ हूं मैं।” मैं ढिठाई से बोली, हालांकि मेरा तन अब तक उसकी चुदाई की मस्ती से भरा हुआ था। मन ही मन सोच भी रही थी कि यदि दुबारा पंकज नें मुझे चोदने का प्रयास किया तो मैं क्या रोक पाऊंगी? शायद, या शायद कत्तई नहीं। खैर जो बोलना था बोल चुकी और किचन में पड़े अपने कपड़ों को पहनने चली।

“जाओ जाओ मॉम, सब समझता हूं। मन की बात छिपा नहीं पा रही हो, मैं जानता हूं, अब तू खुद आकर मेरे लंड पर बैठोगी।” पीछे से पंकज की आवाज आई। फिर मैं अपने को संभाल कल कपड़े वपड़े पहन कर पुनः अपने बेडरूम में आई, तबतक पंकज अपने कमरे में जा चुका था।

उसकी भीषण चुदाई के कारण मेरी योनि फूल गयी, मीठे मीठे दर्द का अहसास भी साथ था। थकान से टूटते शरीर को समेटते कब मेरी आंख लगी पता ही नहीं चला। सवेरे से परेशान हूं, कि इस कपूत के साथ और इस तरह अपराध बोध के साथ कैसे जी पाऊंगी।”

मैं पूरी तन्मयता से उसकी कहानी सुन रही थी। काफी उत्तेजक कहानी थी। मैं खुद उत्तेजित हो उठी थी उसकी कहानी सुनकर। क्या गलत हुआ? पंकज को संभोग का मजा लेना था, ले लिया। रेखा के विरोध का क्या अंजाम हुआ? आखिर चुद ही तो गयी। खुद ही स्वीकार भी कर रही है कि उसे भी मजा आया। बेवकूफ रेखा की बेवकूफी पर मुझे तरस आ रहा था। वैसे पहले ही मैं अपनी बातों से रेखा को काफी हद तक प्रभावित कर चुकी थी। अपने दो चार और लच्छेदार बातों से रेखा के अंदर की सारी रही सही ग्लानि, अपराधबोध, पाप पुण्य के झंझावत को धो पोंछ कर साफ करने में सफल हो गयी। अब रेखा का चेहरा तनाव रहित था।

“एक बात है खास तुझमें।” रेखा मुझसे बोली।

“क्या?”

“खूबसूरत होने के साथ साथ कितने सुलझे विचार रखती हो।” वह बोली। सुलझे! हा हा हा, घंटा सुलझे विचार, मेरी सोच साफ है, अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से जियो, पूरी तरह जियो, जिस बात में खुशी मिले, कर गुजरो, ताकि मनुष्य जन्म गुजरने के बाद कोई पश्चाताप न रहे।

“हां सो तो है।” अपनी पीठ थपथपा उठी। “वैसे तुम्हारा बेटा पंकज है बड़ा अच्छा।”

“मुझसे ज्यादा जानती हो उसे?” वह बोली।

“आज की तारीख में तो शायद तुमसे ज्यादा।” मैं बोली।

“कैसे?”

“जब तुम और पंकज हमारे घर आये थे, मैं पंकज को घुमाने बाहर ले गयी थी, इधर तुम हमारे बूढ़ों के साथ रंगरेलियां मना रही थी, उधर मैं पंकज के साथ क्या रामायण पाठ कर रही थी?” बाकी बातें तो पहले ही उसे बता चुकी थी।

रेखा अवाक, विस्फरित नेत्रों से देखती रह गयी और मैं उसे उसी हालत में छोड़ कर मुस्कुराते हुए उसके घर से निकली।

घर जैसे ही घुसी, हरिया और करीम, रामलाल के साथ सज धज कर कहीं बाहर जाने को तैयार थे, मेरे वापस आने का ही इंतजार कर रहे थे। ताज्जुब हुआ मुझे, अभी इतने सवेरे, अभी साढ़े सात ही तो बजे थे।

“कहां जा रहे हो आपलोग, इतने सवेरे?” मैं पूछ बैठी।

“लालपुर जा रहे हैं। बारह बजे तक वापस आ जाएंगे” हरिया बोला।

“समझ गयी।”

“क्या?”

“जाओ जाओ ऐश करो, संडे मनाओ।” मैं जानती थी कि इनकी मंजिल क्या है। वही, रबिया, शहला और सरोज, या फिर और, खैर, थे भी वे एक नंबर के औरतखोर, ओरतों की कमी तो थी नहीं। मगर मैं थोड़ी मायूस हुई। अंदर में कामाग्नि की ज्वाला धधक रही थी और सोच रही थी आज संडे को रंगीन करूं, तभी तीनों मर्द उड़न छू हो रहे हैं। “लेकिन मेरा नाश्ता खाना?” मैं पूछी।

“नाश्ता तैयार है और खाना, मैं आकर बना लूंगा, चिंता न कर मेरी बुलबुल।” हरिया पूरी मस्ती के मूड में था, आखिर मस्ती करने ही तो जा रहे थे तीनों।

“बहुत मस्ती चढ़ रही है, अब फूटो यहां से।” मैं झिड़कते हुए बोली।

“फूटते हैं फूटते हैं। दूधवाला अभी तक आया नहीं, दूध ले लेना।” जाते जाते हरिया नें मानो मेरे दिमाग की बत्ती जला दी। दूधवाला, वाह, मानो बिजली सी कौंधी मेरे दिमाग में। मर्द चाहिए था मुझे, मौके का तकाजा था।

“ठीक है, ठीक है, ले लूंगी।” प्रत्यक्षतः बोली किंतु और क्या क्या लूंगी यह तो सिर्फ मुझे पता था या ऊपरवाले को पता था। उधर ये तीनों रुखसत हुए, इधर मैं हड़बड़ा कर तैयार होने लगी। दूधवाला, उमेश यादव, एक करीब पचास पचपन साल का लंबा छरहरा मगर गठे शरीर वाला, ग्वाला था। बेतरतीब दाढ़ी और आधा गंजा। नाक नक्श बस कामचलाऊ सा, रंग काला, बड़ी बड़ी आंखें, नाक पकौड़े जैसी। अगर उसके चेहरे पर न जाऊं तो उसके शरीर की बनावट खास थी और इस वक्त मेरी कल्पना में उसी की छवी नाच रही थी। मेरे खुद की नग्न देह का उसके नंगे बदन से एकाकार होने की कल्पना मात्र से रोमांचित हो रही थी। छरहरा होने के बावजूद मजबूत कंधे, चौड़ा चकला सीना, पेट बिल्कुल सपाट था किंतु फिर भी प्रभावशाली कद काठी का मालिक धा वह। कद करीब छ: फुट। खैर अब तो मन में जो बैठ गया तो बैठ गया, मैं योजना बना बैठी, कैसे उसे फांस कर अपनी प्यास बुझानी है। मुझ पर आकर्षित था, इसका मुझे पता था, सिर्फ मेरी ओर से लिफ्ट मिलने की देर थी। उसकी लार टपकाती दृष्टि से मैं अनभिज्ञ नहीं थी। खूब पता था मुझे।लेकिन उसे लिफ्ट दूं तो कैसे, इतनी सस्ती भी खुद को दिखा नहीं सकती थी, जैसे कि मेरी आदत थी। मुझे याद आ रहा था मेरी मां वाला किस्सा, किस तरह उन्होंने एक दूधवाले को फांस कर अपनी हवस की आग ठंढी की थी। आज मैं उसी स्थिति में थी। अंदर वासना की आग धधक रही थी और मैं पागल हो रही थी एक मर्द के लिए, कैसा भी मर्द, जो मेरे जलते तन को ठंढक प्रदान कर दे।

मैं उस ग्वाले को फांसने के लिए वही उपाय करना चाहती थी जो कई  सालों पहले मेरी मां सफलता पूर्वक आजमा चुकी थी। मैं फटाफट नहा धो कर तैयार हो गयी। शरीर पर सुगंधित परफ्यूम का छिड़काव किया, तत्पश्चात मैंने अपनी नग्न देह पर मात्र एक पतले साटन के पिलपिले आसमानी नाईटी का आवरण चढ़ाया, जो पारदर्शी तो नहीं था किंतु अपने पिलपिले, मुलायमपन के कारण मेरे तन के हर उतार चढ़ाओं का साफ साफ आभास करा रहा था। अभी मैं तैयार होकर सोफे पर बैठी ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी। मेरा दिल धाड़ धाड़ कर रहा था। सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। धमनियों में रक्त प्रवाह तूफानी गति से प्रवाहित हो रहा था। आखिर इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं। वह पल आ चुका था जिसका इंतजार मैं बड़ी बेकरारी से कर रही थी।

ज्योंहि मैंने दरवाजा खोला, भक्क सी रह गयी। यह तो ग्वाला नहीं था। उसके स्थान पर मटमैली धोती और कुर्ते में करीब पचपन साठ की उम्र का, काला कलूटा, साढ़े छ: फुटा, मोटा ताजा, गंजा, बेतरतीब, शायद हफ्ते दो हफ्ते बिना शेव किये दाढ़ी, कंजी आंखें, पान खा खा कर लाल होंठ वाला, धोती कुर्ते में खड़ा, पीले पीले दांत दिखाता हुआ खींसे निपोर रहा था। मुझे ऊपर से नीचे देख कर उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गयी थी।

“अ अ आप क क कौन?” मैं तनिक घबराई सी बोली। यह मेरे लिए निहायत ही घटिया मजाक था ऊपरवाले का। मगर मैं भी कम कमीनी थोड़ी न थी, स्थित को अपने अनुकूल करना मुझे अच्छी तरह से पता था।‌‌‌‍

“हम रमेश हैं। उमेश के बड़के भैया। कल ही गांव से आए हैं। उमेश एक जरूरी काम से कल ही जमशेदपुर गया है सो हम दूध लेकर आए हैं।” वह अब भी ऊपर से नीचे तक मेरा मुआयना कर रहा था और उसकी मुस्कान गहरी होती जा रही थी। उसकी नजरें खास तौर पर, सीने और कमर से निचले हिस्से पर ही बार बार टिक जाती थीं, मानो मेरे कपड़े को भेदकर मेरे स्तन और योनि का दीदार कर रहा हो। इतनी अनुभवी और घाट घाट का पानी पी चुकने के बावजूद न जाने क्यों मैं लाज से दोहरी हुई जा रही थी। मगर अंदर की आग तो मानो ज्वालामुखी का रुप धरती जा रही थी। लाज की ऐसी की तैसी, कैसा भी था, मर्द था, देखने में जैसा भी था लेकिन साफ साफ दिख रहा था मुझे खा जाने को ललायित, अच्छा खासा ताकतवर मर्द,  इस वक्त आसमान से टपका मेरा तारणहार, मेरे जलते तन मन का एकमात्र सहारा।

“ठ ठ ठीक है रुकिए, मैं अभी दूध का बर्तन ले कर आई।” उसकी नजरों की ताब न ला सकी, जल्दी से मैं बर्तन लाने मुड़ी और कमर लचकाते हुए, कयामत ढाती, मदमस्त चाल के साथ किचन की ओर चली। मन ही मन सोच भी रही थी, चलो, कोई तो मिला, अच्छा खासा मर्द तो है, मुझ पर फिदा भी है, मेरी जलती काया की ज्वाला शांत कर सकने में पूर्णतः सक्षम भी दिख रहा था, मात्र सक्षम ही नहीं, देखने में तो मेरा कचूमर निकाल डालने जैसी शख्सियत थी उसकी। यह तो बाद में पता चलना था कि वह आखिर है क्या चीज़। देखती हूं आगे आगे होता है क्या, फिलहाल तो मुझे एक मर्द से मतलब था, जो कि यह है। खैर, यही सब सोचते सोचते मैं एक खाली पतीला ले आई। अब आगे बात कैसे बढ़े, यही मेरे दिमाग में चल रहा था। उसके दिमाग में क्या चल रहा था यह तो पता नहीं किंतु उसकी नजरें अब भी मुझी पर गड़ी हुई थीं।

मैंने दूध लेने के लिए पतीला आगे बढ़ाया और कहा,

“लाओ, इसमें डाल दो।” कहने को तो कह गयी मगर इस दोहरे अर्थ वाले दूसरे अर्थ को समझ कर खुद ही पानी पानी हो उठी। उसकी दृष्टि मेरे चेहरे के भाव पढ़ रही थीं, शायद पूछ रही थीं, क्या अर्थ है मेरे इस कथन का?

“हां हां, इस बर्तन में डालो।” मैंने पुनः कहा।

“ओह हां।” वह मानो निद्रा से जागा। उसने मेरे हाथों में थामे पतीले में दूध डालना आरंभ किया लेकिन उसकी दृष्टि मेरे तन पर ही घूम रही थी। कभी मेरे चेहरे, कभी मेरे सीने और कभी मेरी कमर के निचले हिस्से पर, नतीजा यह हुआ कि कुछ दूध पतीले से बाहर भी गिर गया, फर्श पर।

“अरे अरे, यह क्या कर दिया?” मैं ने झल्लाकर कहा। हालांकि मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि वह मुझ पर आकर्षित था। उसकी नजरें साफ बता रही थीं कि मुझपर लट्टू हो चुका था, झिझक थी तो सिर्फ हमारे बीच हैसियत, स्तर की।

वह चौंक उठा, “ओह माफ कीजिएगा मैडम। मेरा ध्यान कहीं और था। मैं अभी साफ कर देता हूं। जरा पोंछा दीजिएगा।” मगर उसके चेहरे पर शर्मिंदगी का भाव नहीं था। पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा था कि वह जल्दी में बिल्कुल नहीं था।

“नहीं नहीं, कोई बात नहीं, मैं खुद ही साफ कर लूंगी, तुम परेशान बिल्कुल न हो।” मैं जल्दी से बोली।

“नहीं जी, ऐसे कैसे। गलती मेरी थी, साफ भी हम ही करेंगे। पोंछा लाईए।” वह जिद करने लगा।

“ठीक है ठीक है, लाती हूं।” कहकर मैं पोंछा ले कर आई और उसे थमा दी। इस दौरान मैंने अपने ठसकों से उस पर बिजली गिराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही थी। नतीजा मेरे मनोनुकूल ही रहा। मैं समझ रही थी कि खुद को नियंत्रण में रखने में उसे कितना कष्ट हो रहा था होगा। वह पोंछा लगाने में समय ले रहा था।

“बस बस हो गया।” कहकर मैं उसके हाथ से पोंछा लेने को हाथ बढ़ाया, लेकिन इस क्रम में मेरा हाथ उसके हाथ से टकराया और उसे मानो 440 वॉल्ट का करंट लगा। पोंछा उसके हाथ से छूट गया और उसे उठाने के क्रम में मैं झुकी और तभी वह भी झुका। एक साथ झुकने से मेरा सर बड़ी जोर से उसके सर से टकरा गया। झन्न से झमाका सा हुआ मेरे सर में, पर भर के लिए दिमाग मेरा सुन्न सा हो गया था। दिन में तारे नज़र आ गये थे मेरे। मैं लड़खड़ा कर गिरने को हुई, तभी दूधवाले रमेश नें मजबूत बांहों में मुझे थाम लिया। सिर्फ थामा नहीं, जानबूझकर या अनजाने में उसनें मुझे अपने से सटा लिया। पर भर तो मैं स्तब्ध रह गयी, फिर मैंने खुद को संभाला और उसकी बांहों की कैद से मुक्त होने का प्रयत्न करने लगी, लेकिन मेरा यह प्रयास बेहद कमजोर था, या नगण्य था, या रमेश की पकड़ ही इतनी सख्त थी कि मैं फड़फड़ा कर रह गयी। मैं चाहती भी तो यही थी ना, लेकिन मैं इतनी आसानी से समर्पण करके खुद को इतनी सस्ती बनाना भी नहीं चाहती थी। अंदर से धधक रही थी, पुरुष संसर्ग के लिए मरी जा रही थी लेकिन विरोध का दिखावा करके शराफत का ढोंग भी करना था।

“आह, छोड़ो मुझे।” मैं बोली। मेरा शरीर उसके पहाड़ जैसे शरीर से चिपका हुआ था। मेरे स्तन उसके सीने से चिपके हुए थे। उसे भी शायद आभास हो चुका था कि नाईटी के अन्दर मेरे स्तन ब्रा बिना स्वतंत्र हैं। तभी मुझे अपनी नाभी के आस पास किसी कठोर वस्तु का आभास हुआ, समझते देर नहीं लगी कि यह रमेश का तना हुआ लिंग है। लेकिन इतना स्पष्ट आभास? तो क्या, तो क्या उसने चड्डी नहीं पहनी है? या शायद चड्डी के स्थान में उनका परंपरागत ढीला ढाला अंडरवियर? शायद, तभी तो उसका स्वतंत्र लिंग आजादी से अठखेलियां कर रहा था और अपनी उत्तेजित अवस्था का अहसास करा रहा था। सच में, मैं तो अंदर तक झनझना उठी। मन मयूर नाच उठा, नस नस तरंगित हो उठा, मगर अपनी भावनाओं को छुपा कर रखना तो कोई मुझ से सीखें। यथासंभव मैं भावनाओं को अभिव्यक्त होने से रोकने में फिलहाल तो सफल थी।

“ओह,” कहता हुआ उसनें मुझे अकस्मात अपनी बांहों से आजाद कर दिया, नतीजा? मैं असंतुलित हो पुनः गिरने को हुई लेकिन शुक्र हो उस दूधवाले का, थाम लिया मुझे और वो, सबकुछ तो पता चल गया उसे कि मैं नाईटी के अन्दर पूर्णतया नंगी हूं। इस बार उसका एक हाथ मेरे नितंबों पर था। समझते देर नहीं लगी उसे कि मेरी पैंटी भी नदारद है। असमंजस, अनिश्चय, दुविधा में पड़ा, वह शायद समझने की कोशिश कर रहा था कि मेरा इरादा क्या है। मैं ठहरी एक नंबर की ड्रामेबाज, मेरे चेहरे पर अब भी कोई भाव नहीं था, हालांकि मैं बड़ी बेकल थी कि वह टूट पड़े मुझ पर, मिटा डालने अपनी जिस्मानी भूख, रगड़ डाले, निचोड़ डाले मुझे, मगर अपने मुंह से एक दूधवाले को बोलूं तो बोलूं कैसे। सिर्फ देखती रही कि इस समय परिस्थितियां हमें कहां तक ले जाती हैं। वैसे भी इस वक्त मैं किसी भी परिस्थिति में कृत-संकल्प थी कि उस दूधवाले को हाथ से जाने न दूंगी। मुंह से भले न बोलूं, शारीरिक भाषा भी तो कोई चीज होती है। ज्यों ही उसनें मुझे थामा, मैं भी अनजाने में उससे चिपक गई, अपने दोनों हाथों से उसके पहाड़ जैसे शरीर को पकड़ कर। मेरे दोनों स्तन उसके चौड़े चकले सीने से पिसे जा रहे थे, मेरी योनि के ऊपर अब उसके सख्त होते लिंग का दबाव एकदम स्पष्ट था। उसकी उत्तेजना अब मैं साफ साफ समझ सकती थी। कुछ पल यूं ही निकल गये, अब मैं उससे अलग होना चाहती थी, यह देखने के लिए कि उसकी बेताबी का आलम क्या है, प्रयास भी किया, लेकिन यह क्या, अब उसे मेरे शरीर को छोड़ना गंवारा नहीं था। उसकी पकड़ और सख्त हो चुकी थी।

“यह क्या?” मैं बमुश्किल बोली।

“मैडम जी, अब का?” उसकी सांसें अब तेज चल रही थीं।

“क कक्या मतलब?” मैं अपनी सांसों को दुरुस्त करती हुई किसी प्रकार बोली।

“अब का, अब मतलब हम ही बतावें?” अब उसकी हिम्मत बढ़ रही थी। आरंभिक दुविधा समाप्त हो रही थी।

“मैं समझी नहीं।” मैंने उसके बदन को छोड़कर अलग होने की कोशिश की, लेकिन अब इस दिखावे का कोई मतलब नहीं था। वह दूधवाला अब मेरे मादक तन से उठते महक से मदहोश हुआ जा रहा था। उसका एक हाथ अब मेरे तन को बांधे खुद से चिपकाए हुए था और दूसरा हाथ अपनी हरकतों पर  उतर आया था। मेरे गुदाज नितंबों को सहला रहा था, हौले हौले दबा रहा था और मैं मदहोश हुई जा रही थी।

“अब इसमें समझने वाली का बात है। हमारी हालत खराब हो रही है। आपका भी तो यही हाल है, है ना?” वह अब खुल रहा था।

“यह यह क्या कर रहे हो,” उसके हाथों की हरकतों से मैं पगलाई जा रही थी फिर भी ढिठाई से बोली, “तुम्हारी बातें अब भी मेरी समझ से परे है। छोड़ो मुझे।”  मैं रोष दिखाती हुई बोली।

“न, न, अब न छोड़ेंगे। ऐसे तो नहीं छोड़ेंगे।” वह अब मेरा चुम्बन लेने के लिए सामने झुका, लेकिन मैं पीछे की ओर हटना चाहती थी, नतीजा यह हुआ कि कमर से ऊपर का हिस्सा तनिक पीछे की ओर झुका, लेकिन उसकी बांहों ने मुझे छिटकने न दिया। चुम्बन तो लिया ही उसनें, जबर्दस्ती लिया, वह एक लंबा चुम्बन था, उसके मोटे मोटे होंठ मेरे रसीले होंठों का रसास्वादन कर रहे थे। इस चुम्बन नें मेरे अंदर की कामुकता को भड़का दिया। स्थिति यह थी कि मैं पीछे की ओर झुकी थी, वह मुझ पर झुका हुआ था और इधर उसका तनतनाया हुआ लिंग ठीक मेरी योनि के ऊपर टहोका मार रहा था, बाप ये बाप, अब मैं बेकाबू होती जा रही थी।

“नहीं, नहीं, हटो, छोड़ो बदमाश।”

“छोड़ देंगे, हट जाएंगे, चले जाएंगे लेकिन आपका क्या होगा?” वह बोला।

“क्या मतलब?”

“यह क्या है, ब्रा नदारद, पैंटी नदारद, खाली ऊपर से पतली सी नाइटी, और और यह क्या, आपके जांघों के बीच नाईटी गीली क्यों है? सब समझते हैं, चुदवाने का मन है फिर भी ड्रामा।” मेरे झूठे नाटक का पर्दाफाश हो रहा था लेकिन मैं ही ढीठ की तरह अड़ी हुई थी। सच ही तो बोल रहा था वह और यह मेरी कंबख्त लंडखोर चूत, लंड खाने की बेताबी में जार जार आंसू बहा रही थी, संभोग पूर्व चिकने लसलसे द्रव का स्राव, जिस कारण मेरी नाईटी उस जगह गीले धब्बे के रूप में मेरी चुदासी स्थिति की चुगली कर रही थी।

“हाय राम,” अनायास ही मेरा हाथ मेरी चूत पर जा पहुंचा, गीला, चिपचिपा, लसलसा। शर्म से पानी पानी हो गयी मैं तो।

“सच कहे न हम?” वह मेरी प्रतिक्रिया देख कर मुस्कुरा कर बोला। उसकी आंखें चमक उठी थीं।

“यह तो, यह तो ऐसे ही।”

“ऐसे ही तो नहीं। अच्छा ई बताईए, अंदर आपने पैंटी ब्रा काहे नाही पहना है?”

“वह तो हड़बड़ी में।” क्या हालत थी मेरी। मेरे ही घर में मैं एक पराए मर्द को सफाई दे रही थी।

“ग़लत, आप बाथरूम से नहा के तो नहीं निकले हैं, कि पैंटी ब्रा पहने बिना हड़बड़ी में नाईटी डालकर आ गयी।”

“इस सबसे तुमको क्या मतलब।”

“मतलब तो है।”

“बोलो, मतलब बोलो।”

“आपको चुदवाने का मन है।”

“हां है, तो, तुम्हें इससे क्या?”

“तो क्या, इधर हम हैं, आपको चोदने के लिए।” वह अब मेरी नाईटी उठाने लगा।

“नहीं, नहीं, ओह नहीं।” मैं विरोध करती रही और वह मेरी नाईटी उठाता चला गया। कहां वह दानव और कहां मैं कमसिन औरत। दिखावे का ही सही, मेरा विरोध एक हास्यास्पद दृष्य पैदा कर रहा था। इसे विरोध की संज्ञा से विभूषित करना मतलब विरोध का अपमान होता, क्षीणतम, नाम मात्र का, नगण्य। वैसे भी, अगर पुरजोर तरीके से विरोध करती, तब भी उस पहाड़ जैसे दानव पर रत्ती भर भी प्रभाव न होता। हाय राम, उसनें मेरी नाईटी को सिर्फ उठाया नहीं, खींच ही निकाला मेरे तन से, उफ़ भगवान, एक ग्वाले के सम्मुख मैं पूर्णतः नंगी थी। एक हल्का सा धक्का दिया उसनें मुझे और मैं धम से सोफे पर गिर पड़ी। उसकी आंखें तो फटी की फटी रह गयीं मेरी कामोत्तेजक, कमनीय देह का दर्शन करके। मुंह खुला का खुला रह गया। पर भर को हम दोनों अपने अपने स्थान में जड़ रह गये। फिर जैसे हमें होश आया। मैं स्वभाव से जरूर बेशर्म हूं, लेकिन इस वक्त अपनी नग्नावस्था से तनिक संकोच कर रही थी, और खास करके उस ग्वाले की नजरों में जो कुछ मैं देख समझ रही थी उस कारण भी। अंतरतम की तृष्णा और जलते बदन की बेचैनी, संसर्ग की आकंठ इच्छा के बावजूद तनिक शर्म और झिझक पता नहीं क्यों मुझे परेशान कर रही थी।

“वा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, इत्तनी सुंदर! ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्, गजब।” यह थे उसके उद्गार। वह अब आगे बढ़ रहा था।

“ननननहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्।” मेरे मुंह से निकला।

“अब काहे की न न। मना करने का का फायदा अब।” वह बोला। मेरे संभलनेसे पहले ही बड़ी तेजी से सुनें अपने कपड़े खोल फेंके और मादरजात नंगा हो गया। अब विस्मित और भयभीत होने की बारी मेरी थी। जड़ हो गयी मैं, आंखें फटी की फटी रह गईं मेरी। उफ़ भगवान, पूरा दानव था दानव। पूरा शरीर रीछ जैसे बालों से भरा हुआ, लंबा तगड़ा, तोंदियल। और और और उसकी जांघों के बीच ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह भगवान, लंबे लंबे घने बालों से भरा, झूमता हुआ काला, विशालकाय, घोड़े जैसा लिंग, तना हुआ। भय से मेरी घिग्घी बंध गयी।

“नहीं, नहीं, प्लीज, मत आओ पास।”

“पास न आएं तो चोदेंगे कैसे।”

“प प प पहली बात, मैं वैसी औरत नहीं हूं।” झूठ, सरासर झूठ बोल रही थी मैं, जो कि आदत है मेरी।

“कैसी औरत?”

“वैसी, जैसी तुम समझ रहे हो।”

“कैसी समझ रहे हैं हम?”

“सस्ती, सेक्सी, मैं ऐसी हूं नहीं।” फिर झूठ।

“वो तो दिख रहा है। आप को बहुत बढ़िया से समझ गये हैं हम।” वह अब अपने पीली दंतपंक्तियों की नुमाइश करते हुए बेहद कामुकता भरी मुस्कान बिखेरते हुए बोला।

“ग़लत समझे हो।”

“सही समझे हैं।” मेरे उठने के प्रयास को व्यर्थ करते हुए बोला उठा। अब मैं सोफे में धंसी उसके चंगुल में थी। वह मुझ पर आ गया था। उसके तन से उठता दुर्गन्ध असह्य था। उफ़ कितनी गंदी गंध थी। उबकाई सी आ रही थी। लेकिन मैं चाह कर भी उस कैद से मुक्त नहीं हो सकती थी। उसके बनमानुषी खुरदुरी हथेलियां अब मेरे उत्तेजना से चुनचुनाते उन्नत चूचियों पर अठखेलियां करने लगे। “वाह वाह, करता मजेदार चूंचियां हैं और निप्पल तो गजब, इत्तने बड़े, वाह वाह मजा आ गया, हम तो चूसेंगे।” मेरी चूचियों को चुटकियों में भर कर बोला।

“आ्आ्आ्आ्आ्ह्हृह्, छ छ छ छोड़ो, ओह छोड़ो मुझे प्प्प्प्प्ली्ई्ई्ई्ईज।” मेरे चूचकों को चुटकियों में मसलना मुझे पीड़ा दे रहा था, साथ ही साथ एक अलग तरह का आनंददायक अनुभूति भी प्रदान कर रहा था।

“अब का छोड़ें और का पकड़ें, समझ ही नहीं आ रहा।” कहते हुए उसने अपने घिनौने मुंह में मेरी चूचियों को बारी बारी से ले कर चूसना आरंभ कर दिया।

“उफ्फ उफ्फ, न न न न, यह कककक्या्आ्आ्आ्आ करते हो, आ्आ्इ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” मैं पगलाई जा रही थी, फिर भी ड्रामा, सहमति अब भी नहीं दे रही थी, मगर मेरी सहमति असहमति की अब किसे परवाह थी, उसकी उंगलियां अठखेलियां करती हुई मेरी रसीली योनि तक पहुंच चुकी थीं और उसनें अपनी जादुई उंगलियों का जादू मेरी पनियायी, फकफकाती योनि पर चलाना आरम्भ कर दिया। चिहुंक उठी मैं जब उसकी उंगलियों का स्पर्श योनि छिद्र के ऊपरी हिस्से में स्थित भगनासे पर हुआ, “आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह अम्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ।”

“अब का हुआ, अब्भीए तो शुरू हुआ है।” उसने मेरी चूचियों को चूस चूस कर लाल करके मुंह उठा कर कहा। उत्तेजना के आवेग में मेरे चूचक तन कर खड़े हो चुके थे।

“उफ्फ, बस बस अब आगे नहीं।” तड़प उठी मैं।

“चुप, अब कुछ न बोल।”

“काहे न बोलूं।”

“अब समय आ गया।”

“काहे का समय।” सब समझती थी, अब वह किसी भी क्षण मेरी योनि की दुर्गति कर सकता है। घोड़े का लिंग, भय से सिहर उठी।

“चोदने का।” बोलने का अंदाज ऐसा कि रूह कंपकंपा जाए। मेरी रीढ़ में ठंडी लहर दौड़ गयी।

“चुप, एकदम चुप, चल अब देख हमारे लंड का जलवा।” कहते हुए उसनें मेरे पैरों को फैलाया और मेरी जांघों के बीच आ गया। एक हाथ से मुझे दबोचे हुए दूसरे हाथ से अपने मूसलाकार लिंग को थाम कर मेरी योनि के प्रवेशद्वार पर रखा। उफ्फ, भय से मेरी कंपकंपी छूट रही थी। अबतक इतने विशाल लिंग, जो अबतक पूरे आकार में आ चुका था, ताकरीबन साढ़े ग्यारह इंच लंबा और इतना मोटा कि मेरी मुट्ठी में भी न समाए, एकदम घोड़े के लिंग की तरह, से मेरा पाला पहली बार पड़ रहा था।

“आज तो गयी रे तू साली बुरचोदी, छिनाल कुतिया, बड़ी लंड की भूख लगी थी न, अब चूत फड़वाए बिना जाएगी कहां बच के” मन ही मन खुद को कोस रही थी। उस पहाड़ जैसे दानव का दानवी औजार अपने लक्ष्य के करीब था, दस्तक दे रहा था और मैं अगले पलों में जो कयामत बरपा होने वाला था उसकी कल्पना से हलकान हो रही थी। एकल सोफे के दाएं बाएं से निकल नहीं सकती थी, सामने और ऊपर से वह दानव मुझ पर छाया हुआ था, सत्य ही मैं असहाय थी, इस स्थिति से छूटने की कोई गुंजाइश रत्ती भर भी नहीं थी।

“तो, अब हो जा तैयार।” वह बोला।

“नहीं प्लीज। रहम करो।” गिड़गिड़ाने लगी मैं।

“नौटंकी कहीं की, बंद कीजिए अब ड्रामा, नहीं तो हमको गुस्सा आ जाएगा।”

“यह नौटंकी नहीं है।”

“चोओओओओओप्प्प्प्प्प मैडम चोप्प, एकदम चोप्प। दस साल से कोई औरत चोदने का मौका नहीं मिला। जो भी औरतें मिली, मेरा लंड देख कर भाग गयीं, अब किस्मत से आप जैसी इतनी खूबसूरत माल मिली और आप भी नौटंकी किए जा रही हैं। आखिर हम भी मर्द हैं, खाली मूठ मारते रहें? न न न न, अब नहीं।” तो इसका मतलब इस आदमी का लिंग औरतों के लिए कयामत है? वह औरतें सौभाग्यशाली रही होंगी जो इसके चंगुल से बच निकलीं। मगर मैं तो आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ कर बैठी। अवश्य आज यह मुझे मार ही डालेगा। रोंगटे खड़े हो गये मेरे। मगर अब पछताए का होत है जब चिड़िया चुग गई खेत। अंतिम प्रयास में भी मैं असफल रही और तभी, ओह भगवान, तभी,

“हुंआ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” उसनें अपने लिंग पर दबाव बढ़ाना आरंभ कर दिया। मेरी योनि ककड़ी की तरह चिरने लगी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह, ननननहीं्ईं्ईं्ईं्ईं् ओ्ओ्ओ, मर गयी मां्मां्आं्आं्आं।” उसका घोड़े जैसा लिंग मेरी योनि को जबरदस्ती फैलाता हुआ अंदर जाने लगा। “छोड़ो मुझे, निकालो निकालो आह मेरी चूत उफ़ भगवान फट रही है आह।” मेरी दर्दनाक आवाज का कोई असर उस ग्वाले पर न पड़ रहा था। मैं पीड़ा से हलकान हुई जा रही थी, उफ़, वह असहनीय पीड़ा, जान निकली जा रही थी मेरी। छटपटाने में भी तो असमर्थ थी। चुदने की चाह में यह मैं क्या कर बैठी थी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह मैया, मरी मैं मरी ओह छोड़ो कमीने, आह, मर जाऊंगी।” पीड़ा से मेरी आंखें बाहर को आ गयी थीं। चेहरा विकृत हो उठा। पसीने पसीने हो उठी मैं। ज़िंदगी में ऐसी स्थिति में पहली बार फंसी थी। सच में जिंदगी में पहली बार दहशत में आ गयी थी मैं। ऐसी पोजीशन थी जिसमें मैं बिल्कुल बेबस थी, कुछ कर सकना तो दूर, हिलने में भी असमर्थ थी। उसका जालिम लिंग हौले हौले चीरते हुए मेरी योनि में घुसा चला जा रहा था, सूत दर सूत, इंच दर इंच। उस राक्षस को तो कोई फर्क न पड़ा मेरे आर्त निवेदन का। घुसाता चला गया, घुसाता चला गया, ओह मां्आं्आं्आं्आं्इ, लंड की लंबाई मुझे मारे डाल रही थी। मोटाई जो थी वह तो थी ही जो मेरी योनि को उसके लचीलेपन की सीमा से बाहर फैला चुका था, फटने फटने के कागार पर थी मेरी योनि। हाय यह मैं क्या कर बैठी।

“धीरज रखो मैडम, फटेगी नहीं।” बेकार सा आश्वासन दे रहा था वह, फट तो चुकी ही थी शायद।

“चुप कमीने कुत्ते, फट तो गई, ओह मां।”

“नहीं, नहीं फटी।” वह आदमखोर पशु, अपने घोड़े के लिंग सदृश अमानवीय लिंग को पूरा का पूरा ठूंसने की जद्दोजहद में लगा था, शायद एकाध इंच की कसर रह गयी थी, तभी वह रुका, लेकिन इतने में ही उसका लिंग मेरे गर्भद्वार पर दस्तक दे चुका था।

“आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, बेरहम निर्दयी जानवर, निकाल निकाल अपना लंड ओह, फाड़ दिया, बर्बाद कर दिया मुझे। साले हरामी।” असहनीय दर्द से पागल हो रही थी, बदन पीड़ा से ऐंठ रहा था, मेरी आंखों से आंसू बह निकले।

“हो गया। अब काहे का रोना।”

“रोऊं नहीं तो क्या करूं। बर्बाद कर दिया मुझे हरामजादे, कुत्ते।”

“अब जो हुआ सो हुआ, अब ऐसे ही कैसे छोड़ दें। जो होना था हो गया। इतना होने के बाद अब हम तो न छोड़ेंगे। तू भी मना करके काहे अपना नुकसान कर रही है। फटना था फट गया। अब तो मजा लेने का टाईम है। इतना दर्द सहने के बाद जब मज़ा लेने का टाईम आया तो पीछे काहे हट रही हो।” कहते हुए अब उसनें आधा लिंग बाहर खींचा। ओह मेरे भगवान, अब थोड़ी राहत मिली। मगर मेरी चूत को तो एक छोटे सुरंग से बड़ी सी गुफा में तब्दील कर दिया था उसनें। अब बचा क्या था। जो होना था हो चुका था। वासना की आंधी में बह कर मैं अपनी चूत को बली चढ़ा बैठी थी। बली भी किस तरह, एक निर्दयी दानवाकार कसाई के हाथों, जिसने झटके से कत्ल नहीं किया, बल्की बड़ी बेरहमी से धीरे धीरे हलाल किया। उफ़ वे लम्हे, अब याद आती है तो झुरझुरी सी दौड़ जाती है सारे तन में। खैर, उस समय दांत भींच कर  उन पीड़ामय लम्हों से पार होने की दुआ कर रही थी।

“बहुत टाईट है, मजा आ गया।”

“मजा साले कुत्ते, तुझे मजा आ रहा है, इधर मेरी जान निकल रही है, ओह।” मैं कलकला कर बोली, अब मैं सचमुच का विरोध कर रही थी, मगर इस तरह फंसी थी कि, हिलने से भी मजबूर थी।

“अब तुमको भी मजा आएगा।”

“खाक मजा आएगा, फट गयी मेरी चूत हाय राम, आ्आ्आ।”

“तभी तो, अब ढीली हो गयी मैडम तेरी चूत। मेरे लंड का कमाल देखा, बना लिया रास्ता।”

“बना लिया कि बर्बाद कर दिया हरामजादे, आ्आ्आ।” तभी उसने भक्क से दुबारा घुसेड़ दिया लंड। “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नहींईंईंईंईंईंईं।” दर्द की लहर मेरी रीढ़ की हड्डियों में दौड़ गयी। इस धक्के नें रही सही कसर पूरी कर दी। उफ़ भगवान, ऐसा लगा मानो मेरे गर्भ के द्वार को भी खोल बैठा। उफ़, मेरी चूत का बंटाढार करने के बाद अब क्या यह मेरे गर्भ का भी वही हस्र करने वाला था? कांप उठी मैं। कहां से यह मुसीबत मोल बैठी थी मैं। कराह उठी।

“बस बस, घुसा, पूरा घुस्स गया, ओह मेरी रानी इतना गर्म है अंदर, ओह, आह, टाईट चूत, चिकनी चूत, मस्त चूत, गरमागरम चूत, मजा आ गया। अब रोना वोना बंद कर साली मैडम, चोदने दे। बहुत साल बाद किसी औरत की बुर में मेरा लौड़ा घुसा है, चोदने दे, ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ,” कहते कहते खींचा उसनें लंड और “हुम्म्म्म्म्म” दुबारा ठोका।

“आ्आ्आ्आ्आ,” मैं तड़प उठी। “ओह मादरचोद, मार डाला साला चूतिया, पागल हरामी।”

“अब जो बोलना है बोल, जो गाली देना है दे, हमको तो मिल गया, जो हमको चाहिए था। अब तेरा जो होगा सो होगा, हम तो चोदबे करेंगे। आराम से चुदवाना है तो चुदवा, नहीं तो जबर्दस्ती चोदेंगे।” वह अब मात्र एक कामान्ध नरपशु बन चुका था। मेरे दर्द पीड़ा से उसे अब कोई सरोकार नहीं रह गया था। उसे मुंहमांगी मुराद मिल चुकी थी। कामुकता के आवेग और अपनी जीत की खुशी में सब कुछ भूल चुका था। उसका विशाल शरीर मेरी टांगों के बीच समाया हुआ था और मैं अपनी हार मान कर अपने दोनों टांगों को अपनी पूरी क्षमता के अनुसार फैला कर उसके लंड को आत्मसात करने को तत्पर हो गयी, क्योंकि मेरे पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं था। मेरे समर्पण को समझ कर वह प्रसन्न हो गया।

“ये हुआ, ये हुआ न बात।” गच्च से ठोंका लंड।

“आह, अब क्या करूं मैं, बर्बाद तो हो गयी। अब मना करने का क्या फायदा। जबरदस्ती लूट लिया तूने मेरी इज्जत।” मैं रोने लगी। यह रोना जरूर एक दिखावा था। मैं इतनी कमजोर दिल वाली औरत नहीं हूं कि ऐसी परिस्थितियों में रोने बैठ जाऊं। पीड़ा तो थी अवश्य, किंतु अब धीरे धीरे वह पीड़ा असह्य न रहा। चूत का तो सारा कस बल निकल चुका था।

“एक और ले, उंह हुम्म, एक और ले, उंह हुम्म।” गच्च गच्च गच्च गच्च, एक मिनट की ठुकाई के पश्चात ही बड़े आराम से उस भयावह लंड को अपनी चूत में लेने में सक्षम हो गयी। जानती थी, अंततः यही होने वाला है, फिर भी उस प्रथम पीड़ामय पलों की भयावहता अब भी मेरे जेहन में तारी थी।

“इस्स इस्स इस्स अस्सी्ई्ई्ई्ई,” न चाहते हुए भी मेरी सिसकारी निकल पड़ी।

“अब? अब? लग रहा है न मजा? दर्द शरद तो नहीं है न अब?” वह चुदक्कड़ दानव मेरी चुतड़ों को अपने बनमानुषी पंजों से मसलते हुए भच्च भच्च मेरी चूत की कुटाई करते हुए कहा।

“दर्द नहीं है तो? तो इसका मतलब क्या? यह ठीक हुआ क्या? आह आह” उन पीड़ामय लम्हों से उबर कर, अपने अंदर की पुनर्जागृत वासना की आंधी से उत्तेजित होती कामुक कामिनी को सप्रयास नियंत्रित करती बोली, फिर भी न चाहते हुए मेरी आनंदमयी आहों नें मुझ में चढ़ी मस्ती की चुगली कर ही डाली।

“आह आह ओह ओह, हुं हुं हुं, ठीक हुआ कि गलत, अब सोच के क्या फायदा। अब तो हुम्म हुम्म हुम्म मजा ले और मजा दे मैडम।” वह घपाघप चोदने में मशगूल होते हुए भी बोला। उसके चोदने की रफ़्तार से मैं चकित थी। मोटा ताजा दानवाकार आदमी इतने बड़े लंड से मुझे चोद रहा था, फिर भी इतनी रफ़्तार? फच फच फच फच का तालबद्द स्वर, वह भी इतनी द्रुत लय में, सच, यह मेरे लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। सिर्फ पांच ही मिनट में मैं खुद की उत्तेजना को रोक पाने में असमर्थ हो गयी और लो, हो गया मेरा बेड़ा गर्क। मैं उत्तेजना के चरमोत्कर्ष में पहुंच गयी और मेरी कमीनी लंडखोर चूत नें मुझे दगा दे दिया। साली दगाबाज चूत, कहां तो कुछ देर पहले तक फटी जा रही थी और अब दर्द गायब तो मजा लेने की बारी आई तभी झरझरा कर मैदान छोड़ने का ऐलान कर बैठी।

“इस्स्स्स्स्स आ्आ्आ्आ्आ्ह, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मां्आं्आं्आं्आं, गय्यी्ई्ई्ई्ई्ई्ई,” मैं झड़ने लगी और क्या खूब झड़ी। उस मोटे, गंदे, गैंडे से जोंक की तरह चिपक कर थर-थर कांपती झड़ी। वह जानता था, मैं झड़ रही हूं लेकिन उसकी चोदने की रफ़्तार में रत्ती भर भी अंतर नहीं पड़ा। फचाफच, चटाचट, गचागच, मशीन की तरह लगा रहा।

“हुं हुं हुं हुं हुं हुं, अब्भी कहां गयी मैडम, अब्भी तो बहू्ऊ्ऊ्ऊत बाकी है, हुम्म।” वह अपनी सांसों को नियंत्रित करते हुए गैंडे की तरह हांफते हुए बोला।

“आ आ आ आ नहीं नहीं ओह ओह हा्आ्आ्आ्आ, बस्स्स्स्स्स्स आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह हो्ओ्ओ्ओ गय्या्आ्आ।” कहते हुए मैं ढीली पड़ गयी लेकिन वह लगा रहा।

“अभ्भिए से ऐसे ढीली न पड़ो रे चूतमरानी मैडम। अब्भी तो शुरूए हुआ है।” यह कहते हुए मेरे निर्जीव पड़ते शरीर को अपनी मजबूत बांहों में दबोचे चोदता रहा, चोदता रहा और नतीजा? मात्र दो तीन मिनट बाद ही पुनः मेरी देह में मानो नवजीवन का संचार होने लगा। इतने बड़े लंड को अपनी चूत में आसानी से आवागमन होते देख मैं रोमांचित हो उठी। अब मैं नये जोशो-खरोश के साथ उसके हर ठप्पे का उत्तर बाप से देने लगी, अपनी कमर उचका उचका कर, हां अलबत्ता मेरे मुंह से हाय हाय की आवाज बदस्तूर जारी थी।

“आह बप्पा, मर गयी, ओह मां, ओह मां, आह आह आह।” मैं बोलती रही। दिखावे की आहें भरती रही, पीड़िता होने का अभिनय करती रही, किंतु शारीरिक रूप से सहयोग करती रही, देती रही अपनी चूत, मजे ले ले कर खाती रही उसका मोटा लंड। वह पूरे जोशो-खरोश के साथ चोदने में मग्न था। करीब आधे घंटे तक तूफानी रफ्तार से मुझपर अपनी मर्दानगी दिखाता रहा। इस दौरान वह बड़ी बेदर्दी से मेरी चूचियों को दबाता रहा, चूसता रहा, मेरे सीने, गर्दन पर अपनी दांतों के दाग़ छोड़ता रहा और मैं उसकी हर जालिमाना हरकत को सहती रही, क्योंकि उसकी चुदाई से मुझे जो सुख मिल रहा था वह मेरे शरीर पर होते जुल्म से कहीं ज्यादा आनंददायक था। ओह, अत्यंत सुखदाई, आनंद की पराकाष्ठा, मेरा सारा धैर्य जवाब दे चुका था और मेरे मुख से आनन्द भरी सिसकारियां उबलने लगीं, जिससे उसका उत्साह चरम पर पहुंच गया था। अंततः उस कामुक खेल के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा वह। ओह उसका वह स्खलन अविस्मरणीय था। उसने़ं मुझे अपनी मजबूत भुजाओं में भींच कर अपने वीर्य का मानो बाढ़ ही ला दिया मेरी चुद चुद कर बेहाल, मगर निहाल चूत में। स्खलन के उन पलों में उसका लिंग अविश्वसनीय रूप से और बड़ा हो गया था। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसका लंड मेरे गर्भाशय में प्रविष्ट हो कर गरमागरम लावा भर रहा हो। और मैं क्या बताऊं, इसी समय मैं भी झड़ने लगी और सच तो यह था कि यह मेरा तीसरा स्खलन था। मैं दिवानी पूर्ण समर्पिता बनी आंखें मूंदे उसके दानवाकार शरीर से छिपकिली की तरह चिपक कर स्वर्गीय सुख में गोते खाने लगी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्हृह्ह्ह्ह” किसी भैंसें की तरह डकारता हुआ मुझ पर ढह गया। एक संतुष्टि की निश्वास छोड़ता हुआ बोला, “बहुत मस्त औरत हो तुम मैडम। इत्ते साल बाद मिली मगर मिली तो ज़िंदगी में पहली बार इत्ती मस्त माल मिली। रोज आवेंगे हम दूध देने और चोद के जाएंगे।” मुझ पर से उठते हुए बोला वह।

“नहीं नहीं” मैं हड़बड़ा कर बोली।

“क्या? क्या नहीं नहीं।” वह मुझे घूर कर देखने लगा।

“यही, यही जो हुआ हमारे बीच।” मैं खुद को संभालते हुए बोली। अब मुझे पता चल रहा था कि वास्तव में मेरी हालत क्या हो गयी है। चूत का भुर्ता बना चुका था। पूरे शरीर का कचूमर निकाल दिया था कमीने नें। चूचियों को ऐसी बेदर्दी से निचोड़ा था कि अब दर्द का अहसास हो रहा था, जिस पर चुदाई के वक्त चुदाई की मस्ती में डूबी, मुझे उस वक्त होश ही कहां था। अपने आपे में कहां थी मैं उस वक्त।

“क्या हुआ हमारे बीच?” बड़ी बेशर्मी से मुस्कुराते हुए बोला। इस वक्त उसके विशाल, मोटे ताजे, काले कलूटे, भालू जैसे नंगे शरीर को देखकर मैं अचंभित थी कि क्या इस वक्त जो मेरे शरीर को भंभोड़ कर उठा था, यही दानव था? उसका इस वक्त चोदकर सिकुड़ा लिंग अब शिथिल अवस्था में भी कम से कम सात इंच तो अवश्य था जो मेरी चूत के रस और खुद के वीर्य से लिथड़ा चमचमा रहा था।

“पता नहीं तुम्हें, कि क्या किया है तुमने मेरे साथ?” नाराजगी से बोली।

“पता है, पता है। चोदा है तुमको।” हंसते हुए बोला।

“नहीं, तुमने मेरी इज्जत लूटी है। बर्बाद कर दिया मुझे।”

“झूठ। हमने नहीं लूटी है कोई इज्जत विज्जत। पहली बात, तू कोई शरीफजादी तो है नहीं। जब मेरा लंड घुसा तभी सब पता चल गया। कोई और होती तो अभी खुन्नम खून हो गया होता। तुझे तो घोड़ा भी चोदेगा तो कुछ नहीं होगा। पता नहीं कितनों नें चोदा है तुमको। दूसरी बात, तू ने खुद लुटवाई है अपनी इज्जत। हमें ललचा कर चोदने के लिए हमें मजबूर किया। अब तेरे जैसी खूबसूरत औरत का निमंत्रण को कौन बेवकूफ मना करेगा। हमको तो बड़ा मज़ा आया, और हम जानते हैं कि तुमको भी खूब मज़ा आया है, अब तू माने या न माने। वैसे भी हमको इतने साल बाद इतना मस्त माल चोदने को मिला, हमारी तो किस्मत खुल गई। अब हम और आवेंगे।” वह मेरे शरीर को बड़ी ही भूखी नजरों से देखते हुए बोला।

वैसे सच कहूं तो मुझे भी बड़ा मजा आया इस संभोग में। इसमें मैंने बलात्कार का पुट देकर एक अलग तरह के आनंद का अनुभव किया था। ऐसे संभोग के लिए तो मैं लालायित रहती थी, लेकिन यहां तो मेरे साथ जो हुआ, मेरी आशा से कहीं अधिक आश्चर्यजनक रूप से रोमांचक और सुखद था। ऐसे ही तो रौंदे जाने की तमन्ना दिल में कुलांचे भर रही थी। ऐसे ही मर्दन की इच्छा थी। ऐसे ही नोच खसोट की ख्वाहिशमंद थी। यही तो मेरी रुचि थी, जो अब मेरे स्वभाव में शामिल हो चुकी थी। ओह क्या गजब की चुदाई थी। ओह अविश्वसनीय, अद्भुत, अविस्मरणीय एवं अवर्णनीय। पूर्णतया आनन्द से ओतप्रोत, स्वर्गीय सुख से भरपूर। किंतु उस औरत तन के भूखे, कामुक, मानव तन धारी पशु के सम्मुख अपनी मनोदशा को कैसे व्यक्त करती भला।

“हमको बड़ा मज़ा आया, इतने साल बाद एक औरत मिली चोदने को और वह भी इतनी मस्त माल, तबियत खुश हो गया, और हम जानते हैं कि तुमको भी खूब मज़ा आया है, अब तू माने या न माने। अब तो हम और आवेंगे।” जी भर के मेरे शरीर का उपभोग कर लेने के पश्चात पुर्ण संतुष्टि की मुस्कान उसके होंठों पर खेल रही थी। मैं ने अधमुंदी आंखों से सामने देखा, अब वह उसी तरह नंगी धड़ंग अवस्था में टांगें फैलाए, अपने चोद चोदकर आंशिक रूप से मुरझाए, झूलते लिंग के साथ सामने वाले सोफे पर बैठा बड़ी बारीकी से मेरे पसीने से लतपत, निढाल, थक कर चूर, लस्त पस्त शरीर का दर्शन कर रहा था। मेरी सांसों के साथ उठते गिरते उन्नत उरोजों के साथ साथ पूरे नग्न शरीर के उतार चढ़ावों को वह अब प्रशंसात्मक दृष्टि से मुआयना कर रहा था। शायद अपनी किस्मत पर रश्क भी हो रहा था कि बड़े भाग से ऐसी मदमस्त औरत पर हाथ साफ करने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। अब भी बड़ी ही हसरत भरी भूखी नजरों से देख रहा था। उसका सोया लिंग जाग रहा था, तनाव प्राप्त कर रहा था। तो, तों क्या अब भी उसका मन नहीं भरा था? इतनी बेरहमी से नोच खसोट के बाद भी?

“नहीं, और नहीं। आज जो हुआ सो हुआ, अब आगे से नहीं। बिल्कुल भी नहीं” हड़बड़ा कर उठने को हुई, खड़ी होने की कोशिश करते हुए बोली।

“आगे से नहीं मतलब? ठीक है ठीक है, समझ गया, अब आगे से नहीं, अब पीछे से, ठीक है?” वह बेशर्मी से बोला। इसकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गयी।

“क क क क्या मतलब?” मैं खुद को संभाल कर बमुश्किल सोफे पर से उठती हुई बोल उठी। दिल धाड़ धाड़ धड़कने लगा। पीछे से का मतलब क्या है, कहीं, कहीं उसका आशय गुदा मैथुन से तो नहीं? हाय दैया। अगर ऐसा है तो, हे भगवान, फाड़ ही तो डालेगा मेरी गांड़, नहीं, कदापि नहीं। वैसे भी सारा शरीर तोड़ कर रख दिया था उस कामान्ध पशु नें।

“अब मतलब भी हम ही समझावें?” बड़ी ढिठाई से बोला वह।

“मैं कककुछ समझी नहीं।” मैं खीझ उठी थी।

“अब ई भी समझा दें? अब्भिए समझा देते हैं?” वह सोफे से उठ कर फिर से मेरी ओर बढ़ता हुआ बोला। उसका दानवाकार लिंग मेरे सामने बड़ी हेकड़ी के साथ झूम रहा था, अपनी विजय के नशे में चूर। देख कर मेरा चंचल मन पुनः तरंगित होने लगा, किंतु मेरे क्लांत शरीर नें मन की तरंगों को खारिज कर दिया। मैंने नाहक ही पूछ लिया था। अभी तो जाने ही वाला था, बाद की बात बाद में देखी जाती। कहीं, कहीं, अनजाने में मैं उसे पुनः आमंत्रण तो नहीं दे बैठी।

“नहीं, मुझे नहीं समझना। तुम जाओ यहां से।” मैं अपनी आवाज में जबरदस्ती तल्खी लाते हुए बोल उठी। अबतक मैं अपने थकान के मारे थरथरा रहे पैरों पर किसी प्रकार खड़ी हो चुकी थी। मैं लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ कर फर्श पर पड़े मेरी नाईटी, जो मानो मेरी अवस्था की खिल्ली उड़ा रही थी, को उठाने का उपक्रम कर ही रही थी कि गिरते गिरते बची, बची क्या, रमेश नामक उस कामपिपाशु ग्वाले नें थाम लिया मुझे, साथ ही उसकी आवाज सुनकर चौंक उठी,

“न न न न, ऐसे नहीं मैडम। ऐसे ही थोड़ा आराम कर लीजिए, फिर आराम से कपड़े पहन लेना।” अपने मजबूत हाथों से थाम रखा था उसनें। मैंने विस्फारित नेत्रों से नीचे देखा, उसका लिंग पुनः जाग रहा था। मैं उसके हाथों से छूटना चाह रही थी किन्तु असमर्थ थी। उसकी मंशा क्या थी पता नहीं, उसनें न मुझे सोफे पर बैठने दिया न ही स्वतंत्र रूप से खड़ा रहने दिया, ऐसा लग रहा था मानो मैं पूरी तरह उसके कब्जे में हूं, एक तो नुची चुदी, निचुड़ी, थकान से चूर, उसपर उसकी अति मानवीय मर्दाना ताकत, नतीजा मैं उसके आगे बेबस, उसके रहमो-करम पर थी। मैंने उसकी आंखों में देखा, वही जानी पहचानी स्त्री तन की भूख नृत्य कर रही थी। तो क्या, तो क्या फिर से?

“छोड़ो मुझे।” बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए बोली मैं।

“न न न न, ऐसे कैसे छोड़ दें मैडम। देखिए, तेरी बात सुनकर मेरा लौड़ा फिर से खड़ा हो गया।” अपने लंड को हिलाते हुए बोला वह।

“मैंने ऐसा क्या कह दिया?” मैं जानबूझकर अनजान बनती हुई बोली।

“वही, पीछे वाली बात, पिछवाड़े वाली बात, मतलब गांड़ वाली बात। सही कहा ना?” वह मुझे दबोचे हुए बोला। ओह मां, यह तो मेरी गांड़ का भुर्ता बनाने की बात कह रहा था।

“ननननहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्, ऐसा मत करो मेरे साथ। पहले जबर्दस्ती मेरी इज्जत लूट कर मेरी दुर्गति कर दी और अब मेरी गुदा का भुर्ता बनाने की बात करते हो? आगे से मेरा मतलब आज के बाद से था, चूत से नहीं। अपने से मेरी बात का ग़लत मतलब निकाल कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हो? अब मेरी पिछाड़ी के पीछे पड़ गये हो? नहीं नहीं, बिल्कुल नहीं।” मैं विरोध करने लगी।

“ई न न न न नहीं चलेगा। गांड़ तो देना ही पड़ेगा। तुम मानो चाहे न मानो। गांड़ तो हम चोदबे करेंगे।” मुझे सख्ती से थामे थामे बोला।

“नहीं होगा यह मुझ से। छोड़ दो प्लीज़।” गिड़गिड़ाने लगी थी मैं।

“जरा समझो मैडम, तेरे बदन का सबसे सुंदर हिस्सा है तेरी गांड़। बड़ी बड़ी, गोल गोल, चिकनी चिकनी, एकदम मक्खन जैसी, मस्त है मस्त। अब बोलो भला, एक तो इतने सालों का भूखा आदमी और सामने इतनी खूबसूरत गांड़, न चोदें तो मेरे साथ साथ इस खूबसूरत गांड़ के साथ अन्याय ही न होगा। कैसे छोड़ दें। हमको भी तो जवाब देना होगा भगवान को। हमसे कहेगा, “साले मादरचोद, तेरी जरूरत देख कर इतनी खूबसूरत औरत दिया चोदने को और साले भड़वे, खाली चूत मार के छोड़ दिया, फिर इतनी सुंदर गांड़ वाली औरत दे कर फायदा क्या हुआ?” यह कहते कहते वह मेरी गांड़ पर हाथ फेरने लगा।

“न न न न नहीं।” बस इतना ही तो कह सकी थी मैं। मेरी न न से उसपर क्या फर्क पड़ना था। पहले भी कौन सा फर्क पड़ा था। मेरी न न को कैसे हां हां में तब्दील होते देखा था उसनें। वह तो अपनी मनमानी के लिए अब पूर्ण आश्वस्त था। बेशर्म, जलील, कमीना, अब पूरी बेबाकी से मेरी चूचियों को अपने पंजों से सहला रहा था, आहिस्ते आहिस्ते मसल रहा था, खेल रहा था, साथ ही साथ अपने गंदे होंठों से मेरे चेहरे पर चुंबनों की बारिश कर रहा था। मुझे घिन आनी चाहिए थी, किंतु नहीं, कोई घृणा नहीं थी अब। मेरी अवस्था मानो सम्मोहित मूक गुड़िया सी थी। हाय राम, इसने तो मुझे पूरी तरह अपने काबू में कर लिया था। बिल्कुल पराधीन हो गयी थी मैं। कुछ भी विरोध करने की इच्छा ही नहीं थी। वैसे भी जुबानी विरोध का कोई अर्थ नहीं रह गया था।

अब तो मुझमें भी भीतर ही भीतर नवजीवन का संचार होने लगा था। यह क्या हो रहा था मुझे? कुछ पलों पहले मैं विरोध में पूरी ताकत आजमाईश कर रही थी और अब वह विरोध शनै: शनै: मद्धिम होते होते तिरोहित हो गया था। उसकी कामुक हरकतों से मेरा मन झंकृत हो उठा था। मेरे अंदर वासना का सैलाब उफान मार रहा था। कामुकता मुझ पर पुनः हावी हो चुका था। मैं अब समर्पण की अवस्था में थी। “आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ, अब …..बस्स्स्स.” मेरे मुंह से निकले अल्फाजों नें जता दिया कि अब मेरे तन के साथ कामुकता भरा कोई भी खेल खेला जा सकता है। मेरी अवस्था से अनभिज्ञ नहीं था वह, खिल उठा।

“अब? अब का बस? एही समय का तो इंतजार कर रहे थे हम।” बड़ा खुश हो रहा था।

“ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह, भगवा्आ्आ्आ्आन।” मेरी आंखें मुंद गयी थीं। अब जो होना है सो हो। जो होना है जल्दी हो। उफ़ अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मेरी सिसकारी निकल पड़ी। वह भी बेताब था, न जाने कितनी देर से इस पल के इंतजार में था, उसे भी कब से तलब लगी थी। नहीं, अब और नहीं, उससे और रुका नहीं जा रहा था। इतनी देर की उसकी मेहनत जो रंग लाई थी। अब मैं पूरी तरह उसके कब्जे में थी। पूरी तरह उसके रहमो-करम पर। अपनी मर्जी पूरी कर लेने को अब कोई बाधा नहीं थी। पुलक उठा वह। आनन फानन उसने मुझे अपनी मजबूत भुजाओं में उठा लिया किसी गुड़िया की तरह और मुझे लिए दिए सोफे पर बैठ गया। हमारी स्थिति ऐसी थी मानो कोई बच्ची एक दानव की गोद में बैठी हो। मेरी पीठ उसकी ओर थी। एक हाथ से मुझे तनिक हवा में उठा लिया और आपनी दूसरी हथेली पर थूक ले कर अपने लिंग पर लिथड़ा दिया।

मेरी जुबान तालू से चिपक गई थी। मूक बनी खुद के तन से हो रहे कुकर्म हेतु मानो मेरी मौन सहमति दे बैठी थी। अंदर ही अंदर रोमांचित हो रही थी कि उसके विशाल, मोटे, लंबे लिंगराज को अपनी गुदा में ग्रहण जो करने वाली थी। भयभीत भी थी, सहमी हुई, उस पीड़ा की कल्पना से, जो मेरी योनि में समाहित करते वक्त हुई थी। फिर सोचने लगी, क्या हुआ जो पीड़ा हुई, उस पीड़ामय दौर के पश्चात जो अवर्णनीय सुखद संभोग से सराबोर हुई, उसकी तुलना में वह प्रारंभिक पीड़ा तो नगण्य था। लो, अब मैं भी कहां इस बेकार के पचड़े को लेकर बैठ गई। अब तो मैं उसकी गोद में पूर्ण समर्पण की मुद्रा में आ चुकी थी, अब काहे की हिचक, ऊखल में सिर दे चुकी थी, मूसल से क्या डर। डर गयी तो मर गयी।

तभी मुझे नीचे से अपने गुदा द्वार पर अहसास हुआ उसके मूसल के दस्तक की। चिहुंक ही तो उठी, थरथरा उठी। उसनें मेरी कमर पकड़ कर कुछ ऊपर उठा लिया और अपने तने हुए थूक से लिथड़े, लसलसे, चिकने लिंग को अपने लक्ष्य पर स्थापित किया। इन सब से मैं अनभिज्ञ नहीं थी और समझ रही थी कि किसी भी पल मेरी गुदा का बंटाधार होना तय है। जैसे ही मेरे गुदा द्वार पर उसके लिंग की दस्तक हुई, मैं भय और रोमांच की मिली-जुली भावना से सनसना उठी। दिल धाड़ धाड़ धड़क रहा था।

धीरे धीरे उसनें मेरे शरीर को नीचे उतारना आरंभ किया और वो, मेरी गुदा का द्वार खुलता चला गया। उफ़, उसके मोटे लिंग नें बड़ी ही बेदर्दी से मेरी संकुचित गुदा का दरवाजा खोलना आरंभ किया, खोलना क्या, चीरना आरंभ किया। उफ़, फैलने की भी एक सीमा होती है, यह तो सीमा से बाहर फैला रहा था, सीमा से बाहर मतलब मेरी गुदा की स्थति अब फटी तब फटी वाली हो गयी थी।

“आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह भगवा्आ्आ्आ्आ्आन, ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह, फटी फटी फटी, मेरी गांड़ फटी।” दर्द के मारे मेरे मुंह से निकला।

“नननननन नन, फटेगी नहीं, फटेगी नहीं, डर मत मैडम, देख देख, घुस्स्स गयाआआआआह।” और लो, उसके कहते न कहते उसका पूरा लंड सर्र से पूरा का पूरा समा गया मेरी गांड़ के अंदर।

“आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह फट्ट्ट्ट्ट् गयी, ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह मादर्र्च्च्च्च्चो्ओ्ओ्ओ्ओद, निका्आ्आ्आ्आल स्स्स्स्साले बहन के लौड़े, अपना लंड निकाल।” मैं दर्द से बिलबिलाती हुई चीखते हुए बोली।

“चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊप्प्प्प्प साली बुरचोदी मैडम, एकदम चुप्प्प्प। हर्र्र्र्र्रा्आ्आ्आ्आमजादी कुतिया चिल्लाती है लंबी। आराम से तो लंड घुसा है साली नौटंकीबाज, इतना भी काहे का चिल्लाना?” उसने मुझे कंधे से पकड़ कर पूरा जोर लगाया था ताकि मैं दर्द के मारे उठना चाहूं तब भी उठ न पाऊं। सचमुच मैं बेबस थी। उठना चाहकर भी उठ नहीं पा रही थी। उसका पूरा का पूरा मूसलाकार लंड मेरी गांड़ में धंस चुका था। ऐसा महसूस हो रहा था मानो मेरी गांड़ में किसी नें खंजर घोंप दिया हो। फट गयी थी क्या मेरी गांड़? शायद फट ही गयी थी या फटने फटने को हो रही थी मेरी गांड़। जो भी हो, असह्य पीड़ा से मैं छटपटा उठी थी। उसका विशाल लंड मेरी गांड़ के रास्ते को चीरता हुआ अंदर जा कर मेरी आंत को फाड़ डालने को आतुर था।

“छोड़ो, आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, फाड़ दिया मादरचोद। निका्आ्आ्आ्आ्आल साले कुत्ते, कमीने।” बिलबिलाती हुई चीखी मैं।

“अब चिचिया काहे रही हो मैडम, जो होना था हो गया। किला जीत लिया हमने। अब रोने और कुतिया जईसे किकियाने का कौनो फायदा नहीं। हमको जो चाहिए था मिल गया। ओह इतना मस्त, चिकना, गोल गोल टाईट गांड़ बड़ा तकदीर से मिला है, अब बिना चोदे छोड़ें कईसे, बताओ तो भला। अब तो चालू होगा असली मज़ा। देख साली चोदनी की, अब हमारे लौड़े का जलवा देख।” कहते कहते उस जल्लाद ने सर्र से अपना लंड बाहर किया और मुझ लंडखोर की गांड़ में भच्चाक से पुनः घुसेड़ दिया। उफ़ उफ़ उन आरंभिक पलों की कभी न भूल पाने वाली अवर्णनीय पीड़ा को कैसे मैंने पिया, यह मैं ही जानती हूं।

“छोड़ो छोड़ो, ओह मैं मर जाऊंगी, आह।” मैं बेबसी से विनय करने लगी।

“मरने देंगे तब न। अभी तो शुरूवे हुआ है, अभिए से मरने की बात काहे कर रही हो। ये ल्ल्ल्ले्ए्ए्ए्… ।” फिर एक हौलनाक धक्का लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” मेरी आह निकल पड़ी। लेकिन अब शायद मेरी गांड़ का सारा कस बल धीरे धीरे कम हो रहा था। फिर धक्का, फिर धक्का, फिर धक्का, फिर धक्के पे धक्का, धक्के पे धक्का, फिर तो धक्कों की झड़ी लग गयी। धकाधक धकाधक ठाप पे ठाप, और मेरा दर्द न जाने कहां छू मंतर हो गया। अब मुझे मजा आने लगा था, अब मैंने अपनी ओर से विरोध करने का सारा उपक्रम रोक कर सहयोग करने में ही अपनी भलाई देख ली थी, क्योंकि अब मुझे आनंद आने लगा था। मेरी हालत से वह अनभिज्ञ नहीं था। वह अपनी सफलता पर बड़ा खुश हो रहा था और आनंदपूर्वक मेरी गांड़ का बाजा बजाने में तल्लीन हो गया।

“अब? अब मजा मिल रहा है ना मैडम? कि अब भी मेरी जा रही हो।” चुदाई की धक्कमपेल में मशगूल कमीना बोला।

“आह ओह उफ़, अब पूछ कर क्या फायदा। गांड़ तो फट ही गयी। अब चोद मां के लौड़े, आह आह, ओह भगवान, मज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ आ रहा है रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” चुदाई की मस्ती में डूबी मैं बोली।

“वाह, बहुत खूब, अब आवेगा मजा।” कहते कहते वह दुगुने उत्साह के साथ जुट गया मेरी गांड़ का फालूदा बनाने। उफ़, जोश में आकर वह मुझे दिए सोफे से उठ गया और दुगुने रफ्तार से मेरी गांड़ की कुटाई करने लगा और मैं, मेरी हालत तो पूछिए ही मत। कमर से ऊपर का हिस्सा हवा में तैर रहा था। असहाय अवस्था में मैं हवा में ही हाथ लहरा रही थी। कुछ पलों बाद मेरी दोनों टांगें भी फर्श से ऊपर उठ कर हवा में थीं। मेरी कमर को सख्ती से उसनें थाम रखा था। चुदाई के नशे में उसे होश ही नहीं था कि मेरी स्थति क्या थी। धुआंधार धक्कों के बीच ही अति उत्साह में उसनें मुझे कुछ ज्यादा ही झुका दिया, परिणाम स्वरूप मैं दोनों हाथों को फर्श पर रखने में समर्थ हो पाई और अब मैं कुतिया थी और वह कुत्ता बना मेरी गांड़ में अपना मूसल भकाभक पेले जा रहा था। उसके विशाल अंकोश के थपेड़े मेरी चूत पर पड़ रहे थे जो मुझे और उत्तेजित किए जा रहे थे। तभी मैं असंतुलित हो गयी और मेरा सर फर्श पर टकराते टकराते बचा, मगर उसे क्या पड़ी थी, वह तो मेरी गांड़ कुटाई में तल्लीन था, दनादन दनादन, फचाफच, भच्चाभच्च। इसी बीच उसे मेरी स्थति का आभास हुआ और उसनें मुझे गुड़िया की तरह उठा कर सोफे पर पटक दिया। मेरा सर सीधे गद्देदार सोफे पर धप्प से टकराया। मेरे चेहरे को बचा लिया सोफे के गद्दे नें। अब मैं अपना सर सोफे पर रख कर चुद रही थी। करीब पच्चीस तीस मिनट तक मैं उस कुत्ते की कुतिया बनी, नुचती पिसती, चुदाई का आनंद लेती रही। उफ़ इतनी जबरदस्त कुटाई मेरी गांड़ की आजतक नहीं हुई थी।

अंततः, उस अंतहीन सी लगने वाली चुदाई के चरमोत्कर्ष में पहुंच ही गया वह चुदक्कड़ और जैसे मीलों दौड़ कर आया हो वैसे ही हांफता कांपता, छर्र छर्र अपने वीर्य के बाढ़ से मेरी गांड़ को सराबोर कर दिया। तभी मैं भी मस्ती के समुंदर में डूबी स्खलन के कगार पर पहुंच गयी और कंपकंपाने लगी, और लो, हो गया मेरा काम। झड़ने लगी और क्या झड़ी मैं उफ़। स्खलन के वे पल यादगार थे। उफ्फ, इतनी जोर से भींचा था मेरी चूचियों को कमीने नें, कि मेरी आह्ह्ह निकल पड़ी, लेकिन उस पीड़ा पर मेरा वह हहाकारी स्खलन भारी पड़ा।

“हुम्म्म्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह मैं गया ये साली्ई्ई्ई्ई रंडी्ई्ई्ई्ई्ई।” कहते कहते अपना वीर्य छोड़ रहा था। आनंद के उन यादगार पलों का कहना ही क्या था। इधर मैं झड़ी, उधर वह झड़ा। उसके वीर्य का कतरा कतरा अपनी गांड़ में जज्ब करने की असफल कोशिश करती रही, लेकिन वीर्य के उस बाढ़ को रोक पाना भला चुद चुद कर बेहाल हो चुकी गांड़ के वश में कहां थी, वह तो मेरी जांघों से नीचे तक बह चला था। जब चोद निचोड़ कर उसनें मुझे छोड़ा, धप्प से फिर मैं सोफे पर पड़ गयी। पसीने से लतपत, थक कर निढाल हो चुकी थी मैं।

“आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह, रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ, बड़ा मजा दिया रे मेरी गांड़ के रसिया।” अलसायी सी मेरे मुंह से निकला।

“हम कह रहे थे पहिले से और तू थी कि ड्रामा पे ड्रामा किये जा रही थी। आया न मजा?” वह मुस्करा कर बोला।

“हां जी हां, तुम्हारे लंड की दीवानी हो गयी मैं, बाप रे बाप, क्या लंड है! इतना बड़ा लंड! लंड तो लंड, चुदाई तो गजब मेरे लौड़े रज्ज्जा्आ्आ्आ।” अपनी अस्त व्यस्त हालत से बेखबर मैं बोली। मेरे तो रोम रोम के तार बज रहे थे।

“बढ़िया, बढ़िया, मेरे लंड के दम का हमें पता था। वैसे तेरी गांड़ का भी जवाब नहीं। अईसा मजेदार गांड़ हमने जिंदगी में पहली बार चोदा। अब क्या बतावें, सच में बड़ा मजा आया। अब तो जब मौका मिलेगा, हम दौड़े चले आवेंगे तुझे चोदने। जितना चोदो साला मन ही नहीं भरता। अबहिए देख लो, फिर चोदने का मन कर रहा है।” वह कमीना बोला।

“नहीं, फिर से अभी नहीं प्लीज। अभी का हो गया। मैं कहां भागी जा रही हूं मेरे रसिया। देख नहीं रहे मेरे शरीर की हालत? एक ही दिन में मार ही डालोगे क्या? कैसा निचोड़ के रख दिया। अभी तो बख्श ही दो।” मैं घबरा उठी, उसके फिर से चोदने की बात सुनकर।

“ठीक है ठीक है, आएंगे, फिर आएंगे। अब्भी तो हम जाते हैं। असल में बात क्या है ना, तुम्हारी गांड़ का मजा मिल गया है ई सुसरा हमारे लौड़े को, हम न भी चाहें तो हमारा लौड़ा हमको खींच लाएगा।” अपनी गंदी जुबान से होंठ चाटते हुए बोला। फिर फटाफट अपने कपड़े पहन कर वहां से रुखसत हुआ। किसी तरह अपने नुचे चुदे शरीर को संभाल कर उठी और फ्रेश होने बाथरूम में जा घुसी।

चलो बला टली फिलहाल के लिए। तो क्या सच में वह बला था? शायद नहीं। पीड़ामय किंतु संतुष्टि, पूर्ण संतुष्टि, भरपूर आनंद प्रदान किया था उसने। अगर फिर आएगा तो आए, अच्छा ही है, मेरे चाहने वालों में एक नाम और जुड़ गया था। अच्छा रविवार रहा, आज का दिन यादगार बना गया था वह। मैंने बाथरूम से निकल कर घड़ी देखा, ग्यारह बज रहे थे। यानी कि सवेरे आठ बजे से ग्यारह कैसे बज गया पता ही नहीं चला। अब हरिया और बाकी औरतखोरों का इंतजार था कि कब पहुंचें और खाने की व्यवस्था हो। खा पी कर एक बढ़िया नींद की जरूरत थी मुझे ताकि मेरे क्लांत शरीर को आराम मिल सके।

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