पड़ोसन बनी दुल्हन 4

बीवी की चुदाई

मेरी बात सुन कर माया चक्कर में पड़ गयी। माया ने कभी सोचा भी नहीं था की जिस घर में वह अपने आप को एक नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं समझती थी उसी घर में वह बड़ी बहु बन सकती है। वह लाज के मारे हाँ भी नहीं कह सकती थी।

माया मना भी कैसे कर सकती थी, चाहती जो थी वह जेठजी को? माया ने मेरी और देख कर कहा, “दीदी, आप यह क्या कह रहे हो? आप मेरे लिए इतनी बड़ी बात कर रहे हो? आप कहीं मेरा मजाक तो नहीं कर रहे हो? मैं एक छोटे घराने की आपके यहां नौकरी कर रही हूँ और आप मुझे आपकी जेठानी बनने के लिए कह रही हो? आप मुझे बड़ी ही उलझन में डाल रही हो।”

माया यह कहते हुए मेरे पाँव में गिर पड़ी और रोती हुई मेरे पाँव छूने लगी। मैंने माया को उठा कर अपने गले लगाया और उसके आंसूं पोंछते हुए बोली, “माया मैं क्या कहूं? तुम अगर मेरी जेठानी बनोगी तो मेरे लिए यह गर्व की बात होगी। तू बस एक बार हाँ कह दे। बोल, जो मैं कहूँगी क्या तुम करोगी?”

माया ने मुझसे लिपटते हुए कहा, “अंजू जी आप मेरी बहन से कम नहीं हो। जो आप कहोगे मैं करुँगी। बोलो, मुझे क्या करना होगा?”

मैंने कहा, ” तू भी जानती है की मेरे जेठजी बड़े ही जिद्दी हैं। वैसे हम कितनी भी कोशिश करें वह शादी करने के लिए मानेंगे नहीं। अगर तू अभी जायेगी और उन्हें अपना लण्ड हिलाते देख कर पूछना की भैया यह क्या कर रहे हो?

और फिर कुछ ना कुछ तिकड़म कर के जेठजी का लण्ड अपने हाथ में पकड़ लेना और कहना की लाइए मैं इसे हिला देती हूँ। फिर अगर मौक़ा मिले तो उसे चूस भी लेना तुम, ओके?

कोई भी मर्द का लण्ड अगर तेरे जैसी सुन्दर स्त्री पकड़ ले, उसे प्यार से हिलाने लगे और अगर उसे चूसने लगे तो अच्छे से अच्छा मर्द भी बेचारा लाचार हो जाएगा। फिर भले ही वह मेरे जेठजी जैसे सख्त इंसान ही क्यों ना हों? हाँ माया, यह ध्यान रहे की हो सकता है तेरे ऐसे करने से बात आगे बढ़ जाए।

देख माया यह भी हो सकता है की आवेश में आकर जेठजी तुझे पकड़ लें। हो सकता है तुझे जेठजी से चुदवाना भी पड़े। तू तो मेरे जेठजी के लिए जान तक देने की बात कर रही थी। अगर ऐसा कुछ मौक़ा हुआ तो बोल क्या तू मेरे जेठजी से चुदवा सकती है? तू अभी कह रही थी ना हम जवान औरतों को इसके लिए कुछ ना कुछ करना चाहिए? तो यह सुनहरा मौक़ा है।

अगर तू अभी चली जायेगी तो कुछ ना कुछ हो सकता है। अगर कुछ हुआ तब हम उन्हें तुम्हारे प्यार के चक्कर में घेर सकते हैं। ऐसा ही कुछ तुझे करना पडेगा तभी यह मामला सुलझ सकता है। फिर हो सकता है वह शायद शादी करने के लिए भी राजी हो जाएँ। अभी वह रोमांटिक मूड में है। तुझे बिकुल घबराना नहीं है। बोल तू यह सब कर सकेगी?”

मेरी बात सुन कर माया घबरा गयी। उसने कभी सोचा भी नहीं था की बात कभी यहां तक आ सकती थी। माया ने उलझन में मेरी और देखा और कुछ झिझकते हुए बोली, “दीदी, मुझसे यह सब कैसे होगा? काम तो मुश्किल है, पर उनके लिए मैं अपनी जान तक दे सकती हूँ।” फिर कुछ शर्माती हुई बोली, “दीदी, सच कहूं? आप मुझे गलत मत समझना। सपने में तो मैं कई बार आपके जेठजी से चुदवा चुकी हूँ। उनके लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ।”

मैंने माया की और शरारत भरी मुस्कान करते हुए माया की पीठ थपथपाते हुए कहा, “अरे वाह रे मेरी होने वाली जेठानी! अब तक तो तू मेरे जेठजी को बड़े भैया, बड़े भैया कहने से नहीं थकती थी। पर जैसे ही उनसे चुदवाने की बात आयी तो तू मेरे जेठजी को भैया कहने से ही कतराने लगी? ठीक है, तू जा अब और मेरे जेठजी को अपने वश में कर ले। अगर तूने आज रात मेरे जेठजी को अपने वश में कर लिया तो मैं तुझे मेरी जेठानी मान लुंगी।”

मेरे कहने पर माया ने चाय की केतली और कप बगैरह उठाये पर वह तब भी ऊपर सुदर्शन भाई साहब के कमरे की और जाने से हिचकिचा रही थी। मैंने माया को लगभग धक्के मारते हुए ऊपर भैया के कमरे में भेजा और मैं निचे क्या होता है उसका इंतजार करने लगी। बार बार मेरी और देखती हुई घबराती शर्माती माया आखिरकार सुदर्शन भाई साहब के कमरे में जा पहुंची। मुझे इंतजार करते हुए काफी समय बीत गया।

माया का आधा घंटा इंतजार करने के बाद भी जब वह वापस नहीं आयी तो मैं समझ गयी की शायद मेरा तीर निशाने पर लग चुका था। मैं अपने कमरे में जाने के लिए उठ खड़ी हो ही रही थी की मैंने अचानक जेठजी के ऊपर के कमरे में से माया की दबी हुई चीख सुनी। मैं ठिठक कर खड़ी हो गयी।

तब मुझे भरोसा हो गया की माया ने अपने स्त्री चरित्र द्वारा जेठजी को उसकी चुदाई करने के लिए राजी कर लिया था। जेठजी उसी समय माया की चुदाई करना शुरू कर रहे थे। मैं जानती थी की मेरे जेठजी का लण्ड कितना जबरदस्त तगड़ा था।

जेठजी हमेशा सुबह सुबह बाहर पार्क में सैर करने चले जाया करती थे। एक दिन मैं उसी समय यह सोच कर की जेठजी बाहर घूमने गए होंगे, उनके कमरे में कुछ काम के सिलसिले में गयी। मैंने देखा की जेठजी उस दिन सैर करने गए नहीं थे और पलंग पर धोती पहने सोये हुए थे।

अचानक मेरी नजर पड़ी तो मैंने देखा की उनकी धोती इधरउधर हो जाने से उनका लण्ड उनकी धोती के बाहर निकल गया था। मैंने उनके उस महाकाय लण्ड को जब देखा तो मेरे होश उड़ गए। मेरी उस उम्र में भी मैंने कई अच्छेखासे तगड़े लण्ड देखे थे और कुछ लण्डों से चुदवाया भी था।

पर जेठजी का लण्ड जैसे कोई इंसान का नहीं घोड़े का हो ऐसा लंबा और वाकई में बड़े टोपे वाला बहुत ज्यादा मोटा था। हालांकि उस समय वह ढीला शुषुप्त अवस्था में था फिर भी ऐसा महाकाय लग रहा था। कहीं मुझे ऐसे लण्ड से चुदवाना पड़ा तो मेरी तो चूत ही फट जायेगी।

अगर जेठजी ने उस लण्ड से माया को चोदना शुरू किया होगा तो माया की चीख तो निकलनी ही थी। खैर माया को तो उस रात जेठजी के उस लण्ड से चुदना ही था। माया की चीखें और कराहटें सुनते हुए खुश होती हुई मैं अपने बैडरूम की और चल पड़ी। मुझे पक्का भरोसा हो गया की माया की चूत तो उस रात फट कर ही रहेगी।

मैं चुपचाप माया के लिए अपने मन में उपरवाले से प्रार्थना करती हुई अपने बिस्तर में मेरे पतिदेव संजूजी के बगल में जा कर सो गयी। मेरे ख़याल से शायद दो घंटे से तो ज्यादा ही हो गए होंगे जब मैंने अपने बैडरूम के दरवाजे पर हलकी सी दस्तख सुनी।

मैं फ़ौरन चौकन्ना हो कर उठी और माया को देख उसे ले कर बाहर आँगन में आयी। मैं संजूजी को जगाना नहीं चाहती थी। उस समय माया का हाल देख कर मेरे मन में बचाखुचा शक भी गायब हो गया। माया बड़ी मुश्किल से चल पा रही थी।

यह साफ़ दिख रहा था की मेरे जेठजी ने उस रात माया की इतनी तगड़ी चुदाई की थी जैसी शायद माया ने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं करवाई होगी। मैंने जब माया को गौर से देखा तो माया के गाल पर भी निशान थे। माया बड़ी मुश्किल से खड़ी हो पा रही थी। माया मुझे देख कर शर्म के मारे लाल लाल हो रही थी। मैं समझ गयी की मेरा तीर बिलकुल निशाने पर लगा था।

मैंने माया का हाथ थाम कर उसे आँगन में एक चौखट पर बैठाया और उसे बड़े प्यार से पूछा, “क्या हुआ माया? तू इतनी शर्मा क्यों रही है? कुछ हुआ जेठजी के साथ?”

माया ने अपनी नजरें जमीन में गाड़े रखते हुए कहा, “अंजुजी, सब कुछ हो गया। यह पूछो की क्या नहीं हुआ।“

मैंने पूछा, “क्या मतलब सब कुछ हो गया? क्या हुआ यह तो बताओ?”

माया ने कहा, “अंजू जी क्या बताऊँ? जो एक मर्द और औरत के बिच जो कुछ भी हो सकता है वह सब कुछ हो गया।”

मैं माया का जवाब सुनकर झुंझला उठी। पर फिर भी संयम रखते हुए पूछा, “माया, मैं समझ सकती हूँ की क्या हुआ होगा। पर अब मुझे विस्तार से बताओ की एक्ज़ेक्टली क्या हुआ? देखो मुझ से शर्म मत करो। हम दो औरतें हैं। तुम्हें मुझसे शर्मा ने की जरुरत नहीं है। साफ़ साफ़ शब्दों में बताओ। मुझे घुमा फिरा के बात करना या सुनना पसंद नहीं है। क्या सुदर्शन भाई साहब ने तुम्हें चोदा?”

माया ने मेरी और अपनी आँखें बड़ी चौड़ी कर कुछ भयावह दृष्टि से देखा और बोली, “अंजू जी आप भी ऐसे बोल रहे हो?”

मैंने माया के कान पकड़ कर बोला, “वाह रे मेरी जेठानी! तू जेठजी से चुदवा कर आ गयी और मैंने चोदना शब्द बोला तो तुझे बुरा लग गया? अरे भोली बहन, चुदाई करना या उसके बारे में बोलना कोई गंदा नहीं होता। जो हम करते हैं उससे मुंह क्या छुपाना? देखो हमारा जनम ही हमारे माँ बाप के चुदाई करने से हुआ है ना? तो उसमें गंदा क्या है? तू मुझे स्पष्ट रूप से बता की क्या हुआ?

मैं और तुम दोनों औरतें हैं। मुझसे शर्म मत कर। देखो मेरे से अगर तूने गोल गोल बात की तो मेरी तेरे से नहीं बनेगी। इस लिए जो हुआ उसे साफ़ साफ़ बता। लण्ड चूत यह मर्द और औरत के अंग हैं। इस का नाम लेने में शर्म काहे की? जब तेरी शादी हुई तब तूने भी तेरे पति से चुदवाया ही था ना? और अब तू अभी अभी जेठजी से चुदवा कर ही आयी है ना? तो फिर मुझसे क्या छुपाना?”

माया मेरी बात सुन कर नजरें निचीं कर के स्तब्ध सी मुझे देखती रही। फिर कुछ हिचकिचाती हुई बोली, “दीदी, आपकी बात तो सही है। मेरे पति भी मुझे यही कहते थे जो आप कह रही हो। आपके जेठजी ने भी इसके लिए मुझे अच्छीखासी नसीहत दे डाली है। कमरे में घुसते ही मुझे आपके जेठजी से बड़ी तगड़ी डाँट पड़ गयी। आप के कहने से मैं आपके जेठजी के पास गयी। और फिर जो आप चाह रहे थे वह हो ही गया।

दीदी मेरे शरीर के इस हाल पर मत जाइये। जो हुआ इससे मैं बहुत खुश हूँ। मैं आपका बहुत बहुत शुक्रिया अदा करती हूँ की आपने मुझे सही रास्ता दिखाया। आज आपने मुझे जबरदस्ती उनके कमरे में भेजा और मेरी जिंदगी बन गयी। अगर मैं आज नहीं जाती तो पता नहीं मैं जीवन में यह सुख दे पाती या नहीं। अब आप को मैं बिना कुछ भी छिपाये सब बताती हूँ।”

मैंने माया को मेरे एकदम करीब बिठाया और उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए उसे पूछा, “अब तुम बिलकुल निश्चिन्त हो कर खुले दिल से मुझे साफ़ साफ़ बताओ की क्या हुआ। कुछ भी छोड़ना मत।”

माया ने अपनी मुंडी हिला कर अपना बयान शुरू किया। जो माया ने कहा उसे मैं अपने शब्दों में कह रही हूँ। मेरे धक्के मार कर माया को बड़ी मुश्किल के साथ जेठजी के ऊपर वाले कमरे में भेजने के बाद माया जब कमरे के दरवाजे पर पहुंची तो मैने नीचे से देखा की वह दरवाजे पर ही कुछ देर खड़ी रही और ऊपर से मुझे देखती रही। निचे से मैंने उसे बार बार इशारा किया की धक्का मार और दरवाजा खोल कर अंदर चली जा।

आखिर में माया घबराती हुई दरवाजे को धक्का मार कर कमरे में दाखिल हुई। जेठजी अपने कमरे का दरवाजा अक्सर अंदर से बंद नहीं करते थे। उनको दरवाजा बंद करने की जरुरत ही नहीं पड़ती थी क्यूंकि हम में से किसी की हिम्मत नहीं होती थी की कोई भाई साहब के कमरे में बिना बुलाये जाए। सिर्फ माया ही थी जो साफ़ सफाई बगैरह करने के लिए दिन के समय में जेठजी के कमरे में जाती थी।

जब माया कमरे में दाखिल हुई तो जेठजी बिकुल नंगे पलंग पर बैठे हुए थे। उनके पलंग पर उनके बाजू में एक किताब पड़ी थी। ऊपर पंखे के चलते हुए किताब के पन्ने फरफरा रहे थे। माया ने देखा की उसमें कई युवा सुन्दर लड़कियों के नग्न चित्र और नग्न पुरुष और स्त्रियों के मैथुन के दृश्य दिख रहे थे।

जेठजी की आँखें बंद थीं और वह एक हाथ में अपना लण्ड रखे हुए मुठ मार रहे थे। माया झिझकती हिचकिचाती हुई आगे बढ़ी। माया के क़दमों की आहट सुन कर जेठजी ने आँखें खोली और माया को कमरे में आते हुए देखा।

माया को देखते ही वह एकदम सकपका गए। हड़बड़ाहट में अपने बदन को चद्दर में ढकते हुए उन्हों बड़े ही आश्चर्य के साथ माया की और देखा। माया डरी हुई आतंकित नजरों से जेठजी के पलंग के पास आ कर कुछ समझ ना आने पर की वह क्या बोले, बोल उठी, “क्या मैं अंदर आऊं?”

जेठजी को समझ नहीं आया की माया का सवाल सुनकर क्या कहे। पर उनका गुस्सा अब उनके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था। जेठजी ने तीखी आवाज में कहा, “आ तो तुम गयी ही हो, कमरे में। अब क्यों पूछ रही हो? क्या तुम्हें पता नहीं की कमरे में बेवक्त आने पर दरवाजे पर दस्तक देते हैं? तुम इस वक्त मेरे कमरे में क्यों आयी?”

जेठजी का ग़ुस्सेलि डाँट सुनकर माया की सूरत रोनी सी हो गयी। वह डरी हुई बोली, “जी, आपकी तबियत ठीक नहीं थी तो मैं आपको चाय देने के लिए आयी थी और आपके हाल पूछने के लिए आयी थी।”

जेठजी का पारा यह सुनकर और ऊपर चढ़ गया। उन्होंने दहाड़ते हुए पूछा, “तो तुम्हें यही वक्त मिला था चाय के लिए और खबर पूछने के लिए? दिन में नहीं आ सकती थी क्या?”

जेठजी की ऊँची गरजती हुई आवाज सुनकर माया आतंकित सी हो कर डर गयी और अचानक से फफक फफक कर रोने लगी। उसने रोते हुए कहा, ” आज जल्दी सुबह यहां से कमरा साफसूफ करने के बाद जब मैं निचे गयी तब अंजू दीदी ने मुझे बताया की आपकी तबियत ठीक नहीं है। उन्होंने आज मुझे दिनमें कई बार कहा की मैं आपके हाल पूछूं और चाय दे कर आऊं।

पर दिन में आप कमरे में कुछ काम कर रहे थे तो मेरी हिम्मत नहीं हुई आपके कमरे में आने की। अब जब मैं रात की रसोई के काम से फारिग हुई तो दीदी ने मुझे जबरदस्ती आपके पास भेजा तो मैं आयी। मुझे देर हो गयी, तो आप ने मुझे इतनी डाँट लगा दी।” यह कह कर माया फर्श पर बैठ कर रोने लगी।

माया को रोते हुए देख जेठजी का दिल कुछ पसीजा। वह तो बिलकुल नंगे पलंग पर बैठे थे, जल्दी से आननफानन में उन्होंने एक चद्दर अपनी कमर पर लपेटी और उठ कर खड़े हुए और माया के पास जा कर उसके हाथ थाम कर उसे खड़ा किया और उसे अपने पास खींच कर ढाढस देते हुए माया की पीठ पर हाथ फिराते हुए बोले, “माया, ठीक है, कोई बात नहीं। पर अब रोना बंद कर। चुप हो जा। मुझे कोई महिला दुखी हो या रोये यह बिलकुल पसंद नहीं।

यह ध्यान रहे की हमेशा जब भी आना हो पहले दस्तक दे कर जब इजाजत मिले तब कमरे में आते हैं। देख तूने आज इस तरह अचानक आकर मुझे कितना जलील महसूस कराया। अब तू चाय यहां छोड़ दे और यहां से जा। बहु को कह देना मेरी तबियत अब ठीक है।“ फिर अपनी नग्नता और चद्दर की और इशारा करते हुए बोले, “पर खबरदार, जो इस सब के बारे में किसीको कुछ बताया तो।”

माया ने रोते हुए ऊपर नजरें उठा कर जेठजी की आँखों से आँखें मिलायीं और अपनी मुंडी हिला कर बोली, “जी, मुझे माफ़ कर दीजिये। आगे से ध्यान रखूंगी और ऐसी गलती कभी नहीं करुँगी। पर मुझे डाँटिए मत। मुझे डर लगता है।”

माया की भोली सरल बात सुन कर जेठजी का गुस्सा गायब हो गया। उनसे अपनी मुस्कुराहट रोकी नहीं गयी। उन्होंने कुछ मुस्काते हुए माया की और देखा। जब माया ने देखा की मेरे जेठजी गुस्से में नहीं थे तब उसकी हिम्मत बढ़ गयी। जब माया ने जेठजी से आँखें मिलायीं तो उसके स्त्री सहज स्वभाव ने जेठजी की आँखों में स्त्री के सहवास की अतृप्त छिपी हुई वासना देखि। हरेक स्त्री को भगवान ने यह जन्मजात क्षमता दी है की वह पुरुष की आँखों में झाँक कर कह सकती है की पुरुष की नजर में कामना या लोलुपता है या नहीं।

माया ने पहले भी कई बार जेठजी के कमरे में काम करते हुए उसकी पीठ के पीछे जेठजी की कामुक नज़रों को महसूस किया था। पर जैसे माया की नजर जेठजी पर पड़तीं, जेठजी फ़ौरन अपनी नजरें माया के बदन से हटा लेते। कई बार अचानक जब माया जेठजी को अपने बदन को झाँकते हुए देख लेती तो आँखें मिलने पर जेठजी खिसिया जाते और अपनी नजरें फेर लेते।

माया का बदन जवानी में पुरबहार खिला हुआ था। माया की बिना कपड़ों से ढकी हुई पतली कमर और माया के ब्लाउज और ब्रा के बाहर उसके भरे हुए स्तनोँ का कामुक उभार जो माया के काम करते हुए झुकने से और भी फुला हुआ नजर आता था, उसकी गाँड़ का उसकी कमर के निचे फैलाव, जब कमरे में घुटनों के बल बैठ कर अपनी साड़ी उठा कर कमरे में झाड़ू लगाती या पोछा करती तो माया की लम्बी सुआकार जांघें, यह सब जेठजी की नज़रों से माया छिपा नहीं पाती थी।

शायद कहीं ना कहीं माया यह छिपाना भी नहीं चाहती थी या यूँ कहिये की माया उन्हें जेठजी को शातिर तरीके से दिखाना चाहती थी पर वह इस तरह की किसीको ऐसा भी ना लगे की वह दिखा रही थी।

जैसे जेठजी ने माया को अपने पास लिया और माया की पीठ पर ढाढस देते हुए हाथ फिराने लगे तो माया को मेरी कही हुई बात याद आयी। जेठजी का उसकी पीठ पर हाथ फिराने से माया की कामुकता भी जागृत हो उठी थी। माया ने जेठजी की आँखों में भी वही कामुकता का भाव देखा था।

अब अगर यह मौक़ा गँवा दिया तो ऐसा मौक़ा दुबारा पता नहीं कब मिले। माया को यह भी पता था की अगर उसने कुछ नहीं किया और वैसे ही वापस आ गयी तो मैं उसे जबरदस्त डाँटूंगी और शायद मैं माया से बोलचाल भी बंद करदूँ वह भी माया जानती थी। बिना कुछ सोचे समझे माया तब जेठजी से लिपट गयी और रोते हुए बोली, “देखिये जी, मैं आपको ऐसे हाल में देख नहीं सकती। यह ठीक नहीं।”

माया को अपने से इस तरह सख्ती से लिपटते हुए देख जेठजी के होशोहवास उड़ गए। वह हैरान होते हुए बोले, “तुम क्या नहीं देख सकती? क्या ठीक नहीं? यह तुम क्या कर रही हो, माया?”

माया ने जेठजी के सवाल का कोई जवाब ना देते हुए चद्दर में छिपाए हुए जेठजी के लण्ड को चद्दर के ऊपर से ही अपनी हथेली में पकड़ कर कहा, “देखिये जी, मेरे होते हुए आपको अपने हाथ से इस तरह इसे सहलाने की क्या जरुरत पड़ गयी? क्या मैं मर गयी थी? मैं आपकी दासी हूँ। आप ने मुझ पर इतने एहसान किये हैं की आज मेरी यह जिंदगी, मेरा वजूद, मेरी इज्जत सब आपकी ही बदौलत है।

आप मुझे जैसे चाहें इस्तेमाल करें। ना तो मैं आपको मना करुँगी, ना मैं ज़रा सा भी बुरा मानूंगी और ना तो मैं आप के ऊपर कोई भी हक़ जताऊँगी। आपने मुझे नया जीवन दिया है। आपने मुझे बिना मोल खरीद लिया है। मुझे आप से कोई पद या अधिकार नहीं चाहिए। मैं अपना बचा खुचा जीवन आपके चरणों में आपकी रखैल बनकर गुजारना चाहती हूँ। आपको नजरें छिपा कर मुझे देखते रहने की क्या जरुरत है? आप मुझे पुरे अधिकार से मेरे कपडे निकाल कर या जैसे चाहे मुझे देखिये।

आप मुझे कहिये मैं आपके लिए क्या करूँ? मैं आपको मेरे पुरे बदन पर सम्पूर्ण अधिकार देती हूँ। बस मुझे आप अपनी सेवा का मौक़ा दीजिये। और आप यह विश्वास रखिये की मैं हमारे बिच की बात किसीको भी नहीं जाहिर करुँगी। जैसे मैं अब तक आपकी नौकरानी बन कर रह रही हूँ ऐसे ही रहूंगी।”

जैसे ही माया ने जेठजी के लण्ड को हाथ में लेने के लिए चद्दर पकड़ी तो बदन के ऊपर आननफानन में लपेटी हुई चद्दर खिसक कर निचे गिर पड़ी और जेठजी माया के सामने बिलकुल नंगे हो गए। जेठजी का कसरती सख्त बदन और लंबा कद माया के पतले कमसिन बदन के सामने एक छोटे से पतले पेड़ के सामने जैसे पहाड़ खड़ा हो ऐसा लग रहा था। जेठजी का तगड़ा मोटा लंबा लण्ड माया की नजर के सामने सख्ती से खड़ा हो गया।

माया ने जेठजी का लण्ड इतने करीब से पहली बार साक्षात रूप में जब देखा तो उसके होश ही उड़ गए। पहली बार उसने देखा था वह दूर से और साफ़ नहीं देखा था। नजदीक से देख कर माया को चक्कर आने लगे। माया ने कभी इतना बड़ा और इतना मोटा लण्ड देखा नहीं था।

वैसे माया ने अपने पति के आलावा किसी और का लण्ड ही नहीं देखा था। माया ने बिना कुछ सोचे समझे जेठजी के लण्ड को अपनी हथेली में लिया और उसे प्यार से सहलाने लगी। जेठजी की सख्ती और गुस्सा पल भर में गायब हो गया। माया के छूते ही जेठजी का लण्ड फुंफकारने लगा। जेठजी अपने आप पर काबू नहीं पा रहे थे।

जेठजी का बुरा हाल हो रहा था। जब माया जेठजी के कमरे में दाखिल हुई थी उस समय जेठजी किसी पोर्न किताब पढ़ रहे थे और पढ़ कर आँखें मूँद कर उसे याद कर अपना लण्ड सेहला रहे थे। उस उत्तेजना से वैसे ही जेठजी का लण्ड पुर बहार था।

जैसे जेठजी का लण्ड काफी लंबा और मोटा था वैसे ही उनके लण्ड के मूल पर स्थित लण्ड का अण्डकोष भी बड़ा मोटा, फुला हुआ, गोरा और गोलाकार था। जेठजी के ब्रह्मचर्य का पालन करने के कारण जेठजी के लण्ड का अण्डकोष वीर्य से लबालब भरा हुआ था। जेठजी का लण्ड कम से कम आठ इंच लंबा तो होगा ही और गोलाई में छः इंच से ज्यादा ही होगा।

माया के पति के लण्ड के मुकाबले तो जेठजी का लण्ड राक्षसी लण्ड ही कहा जा सकता था। जेठजी के लण्ड पर कई रक्तपेशियाँ कुछ गोरी और कुछ थोड़ी सी नीली लण्ड की गोलाई पर फैली हुईं दिख रहीं थीं।

माया जेठजी का गोरा, चिकना लण्ड देख कर मोहित सी कुछ देर तक टकटकी लगाए हुए उसे देखती ही रही। अचानक माया फर्श पर जेठजी की टाँगों के बिच अपने घुटनों के बल, निचे गिरी हुई चद्दर पर आधी बैठी और आधी खड़ी हुई। उसके पहले की माया को ढाढस देने के लिए आये हुए जेठजी कुछ समझ सकें, माया ने जेठजी की दोनों टाँगों को अलग किया और उनके बिच में अपने लिए जगह बनाने के लिए उनको अपने हाथों से खिसका दिया।

जेठजी को अपनी टाँगें फैला कर खड़ा कर माया उनके लण्ड के पास अपना मुंह ला कर अपनी जीभ से माया जेठजी के लण्ड का टोपा चाटने लगी। जब जेठजी ने माया को अपना लण्ड चाटते हुए पाया तो उनकी सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था की माया ऐसा कुछ करेगी।

माया ने धीरे धीरे फर्श पर अपनी टाँगों के बल आधे खड़े हुए जेठजी का जितना लण्ड मुंह में जा सकता था मुंह में लिया और उसे काफी शिद्दत से चूसने लगी। जेठजी अपने ऊपर का सारा नियंत्रण खो चुके थे। अब उनका सारा ध्यान उनके लण्ड पर था जो माया के मुंह में वी.आई.पी ट्रीटमेंट पा रहा था। जेठजी ने बगैर प्रयास किये अनायास ही माया के मुंह को अपने लण्ड से चोदना शरू किया।

उन्होंने यह सब कहानियों में जरूर पढ़ा था और वीडियो में देखा था। उससे पहले उनको ऐसा कोई अनुभव था ही नहीं। कुछ देर तक माया जेठजी का लण्ड उसी पोजीशन में चूसती रही।

माया ने देखा की जेठजी खड़े खड़े लण्ड चुसवाने में कुछ दिक्कत महसूस कर रहे थे तब उसने अपने मुंह से जेठजी का लण्ड निकाला और जेठजी को साथ में ले कर उन्हें पलंग के किनारे पर बिठा दिया और खुद बिलकुल उसी तरह घुटनों के बल जेठजी की दोनों टांगों के बिच में बैठ कर दुबारा जेठजी का लण्ड मुंह में लेकर इस बार बड़ी ही मशक्क्त से चाटने और चूसने लगी।

चूसते हुए वह अपने मुंह की चिकनी चिकनी लार को निकाल कर जेठजी के लण्ड पर चुपड़ती रही। वह लार जिसमें से धागे जैसे चिकनाहट निकलती है जिसे वह जेठजी के लण्ड के ऊपर चुपड़ रही थी। जेठजी का इतना तगड़ा लण्ड देख कर माया बहुत ज्यादा डरी हुई थी। वही लण्ड उसे अपनी चूत में डालना होगा यह एक भयावह प्रस्ताव था जिससे वह पीछे नहीं हट सकती थी और हटना भी नहीं चाहती थी।

माया इतनी दक्षता से जेठजी का लण्ड चूसने लगी की जेठजी अपने होशोहवास खो बैठे। उन्हें अब यह ध्यान ही नहीं रहा की क्या सही था और क्या गलत। जेठजी माया का सर अपने हाथों में पकड़ कर वह माया का मुंह आगे पीछे करवा कर अपने लण्ड से माया का मुंह चोद रहे थे। माया बार बार ऊपर जेठजी की और देख कर खुश हो रही थी की जेठजी उसके लण्ड चूसने से बड़े ही उत्तेजक स्थिति में खो गए थे।

कुछ देर बाद जब माया ने देखा की जेठजी कहीं उसके मुंह में अपना वीर्य ना छोड़ दें, माया ने जेठजी का लण्ड अपने मुंह से निकाला। माया जेठजी का हाथ थाम कर खुद पहले पलंग पर लेट गयी। जेठजी बेचारे नंगधडंग, चुपचाप माया के पास पलंग पर जब जा पहुंचे तब माया ने उनको अपने ऊपर खींचा और संकेत दिया की वह उसके ऊपर चढ़ जाएँ। जेठजी अब पूरी तरह माया के वश में आ चुके थे।

माया ने जेठजी को अपनी बाँहों में लिया और उनके होंठ से अपने होंठ चिपका दिए। अब जेठजी पूरी तरह से माया की माया में खो चुके थे। अब उनमें अपनी कोई समझ या विवेक बचा नहीं था। उनका पूरा ध्यान उस वक्त सिर्फ और सिर्फ अपने लण्ड के अलावा कहीं और नहीं था।

जैसे माया ने अपने रसीले होँठों को जेठजी के होँठों से चिपका दिए, जेठजी बेतहाशा माया के होँठों को पागल की तरह चूमने, चूसने और काटने लगे। अब उनके हाथ भी माया के पुरे बदन को खंगालना चाहते थे। वह माया के बदन के एक एक घुमाव, मोड़, उभार और दरार को महसूस करना चाहते थे।

उन्होंने उसके पहले माया को जरूर कुछ हद तक कामुकता की दृष्टि से देखा होगा, पर उस रात माया पूरी तरह से उनके कब्जे में थी और उन्हें कोई रोक या बंदिश नहीं थी। वह माया के साथ जो चाहे कर सकते थे। माया ने अपने आप को सौ फीसदी जेठजी के हाथों में सुपुर्द कर दिया था।

जेठजी बिना कुछ सोचे, माया के ब्लाउज के ऊपर से ही उसके फुले हुए मदमस्त स्तनोँ को सेहलाने और मसलने लगे। माया ने जेठजी की और देखा और हल्का सा मुस्कुरा कर बोली, “देखिये जी, आप मेरे मालिक हैं। आप ज़रा भी झिझकिये मत। आप मुझे जो चाहे कर सकते हैं। मैं आपकी रखैल हूँ और अबसे जीवन भर रहूंगी। आप अपने बदन की सारी भूख मिटा दीजिये।

आज के बाद आपको अपना यह (माया ने जेठजी के लण्ड की और इशारा करते हुए कहा) अपने हाथ से हिलाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। मैं उसे अपने मुंह से चूसूंगी और आप उसे मेरे यहां (माया ने अपनी चूत की और इशारा कर कहा) इसमें डाल कर अपनी सारी हवस पूरी कर सकते हैं। यह आज से आपकी ही है। आज से मेरा सब कुछ आपका ही है।” यह कह कर माया ने जेठजी के हाथ उस के ब्लाउज के बटनों के ऊपर रख दिए।

जेठजी अपनी हवस की ज्वाला में उन्मत्त, जल्दी से माया के ब्लाउज के बटनों को खोल कर माया के ब्लाउज को निकाल दिया। उसके फ़ौरन बाद उन्होंने ब्रा के हुक भी खोल दिए और माया की उद्दंड चूँचियों को ब्रा के बंधन से आझाद कर दिया।

शायद जेठजी ने उससे पहले किताबों, फोटो और वीडियो को छोड़ किसी भी औरत की नंगी चूँचियाँ प्रत्यक्ष नहीं देखीं होंगी। माया के उद्दंड स्तनों को देख कर जेठजी की आँखें फ़टी की फ़टी रह गयीं। ब्लाउज को पहने हुए माया की छाती का जो आकर्षक उभार जेठजी ने पहले देखा था वही स्तनोँ को उस रात नंगे देख कर जेठजी अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाए।

माया के गोरे चिकने स्तन उसकी छाती के ऊपर गुरुत्वाकर्षण के नियम की खिल्ली उड़ाते हुए निचे सपाट होने के बजाये फुले हुए दो छोटे टीले जैसे श्यामल एरोला से घिरे हुए दो उद्दंड निप्पलों का शिखर बनाये हुए ऐसे कामुक लग रहे थे की जेठजी को अपने आप पर गर्व महसूस हुआ की माया अब उनकी प्रेमिका बन चुकी थी। अब वही उद्दंड स्तन उनकी अपनी माशूका के थे जिन्हें वह जब चाहें उन्हें सेहला सकते थे, मसल सकते थे।

माया के दोनों स्तनोँ को अपने हाथों में पकड़ते हुए उनकी निप्पलोँ को पिचकते हुए जेठजी ने माया को बड़े प्यार से कहा, “माया, आज के तुम्हारे इस प्यार भरे समर्पण से मैं इतना अभिभूत हो गया हूँ की मेरे पास तुम्हारे इस आत्मसमर्पण के लिए कहने के लिए कोई शब्द नहीं है। तुम मेरी रखैल नहीं मेरी अंतरआत्मा हो और रहोगी। तुम कोई नीच जाती की या कोई पतित नहीं हो।

तुम मेरे दिवंगत जिगरी दोस्त की पत्नी थी। चूँकि तुम्हारे दिवंगत पति के स्वर्गवास के बाद तुम्हारा कोई ऐसा रिश्तेदार या समबन्धी नहीं था जो तुम्हें सहारा दे सके, मैंने उनके देहांत के बाद मेरा यह कर्तव्य समझा की उनकी पत्नी को मैं अनाथ ना होने दूँ। तुमने जब हमारे घर में काम करना शुरू किया तो हम सब आपको कोई नौकरानी नहीं, हम अपने घर का सदस्य ही मान कर उसी तरह का व्यवहार करते रहे हैं।

तुम मेरी रखैल नहीं मेरी जीवन साथी बनोगी। तुमने मेरे जीवन का अधूरापन देखा और अपने आत्मसमर्पण से उसे पूर्ण करना चाहा। उसमें तुमने अपना कोई स्वार्थ भी नहीं खोजा। मैं भी उसी तरह तुम्हारे अधूरेपन को पूर्ण करना चाहता हूँ, पर तुम्हें रखैल बना कर नहीं, तुम्हें अपनी जीवन संगिनी बनाकर।

और यह बात मैं कोई आवेश में अथवा उत्तेजना में आ कर नहीं, मैं अपने पुरे होशोहवास में पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ। मैं तुझसे एक और बात कहना चाहता हूँ की अब तू मुझसे और ज़रा भी शर्म ना करके मुझसे अपने मन की सारी बात खुले शब्दों में बोल दे। मेरा मतलब है अब मुझसे तू चुदाई, लण्ड, चूत गाँड़ आदि शब्दों को बोलने में परहेज ना कर।”

माया ने जेठजी का सर अपने स्तनोँ पर टिकाया और बोली, ” जी, आप मेरे स्वामी हो और सदा रहोगे। आप की इच्छा मेरे लिए आज्ञा है। मैं अब आपसे स्पष्ट शब्दों को बोलने में नहीं परहेज करुँगी। मुझे कोई भी दरज्जा नहीं भी देते तो भी आपने मुझे पहले ही इतना सारा कुछ दे दिया है की मुझे कुछ और की अपेक्षा नहीं। यह मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य होगा की आप मुझे इतना बड़ा दर्जा देना चाहते हैं।

मैं आपको इतना ही कहूँगी की मुझे आपसे मिलाने में अंजू भाभी का बड़ा ही जबरदस्त योगदान रहा है। मैं उनकी ही इच्छा से अभी यहां हूँ। मैं उनकी बड़ी ही कृतज्ञ हूँ। जी, मेरा यहां आपसे एक प्रश्न है। यदि आप इजाजत दें तो पूछूं?”

जेठजी ने कुछ आश्चर्य से माया की और देखते हुए अपना सर हिला कर उसे पूछने के लिए सहमति दी। माया ने अपनी नजरें निचीं कर जेठजी से पूछा, “जी, मेरे कहने का बुरा मत मानिये पर मैं जानती हूँ की आप मुझे कई महीनों से आप के कमरे में काम करते हुए ताड़ रहे थे।

मैं जब अपनी साड़ी का छोर जाँघों तक ला कर झाड़ू लगाती थी या पोछा करती थी तब आप मेरे बदन को चोरी चोरी ताड़ते हुए देख रहे होते थे। शायद उसी समय आपके मन में मुझे पाने की इच्छा थी। अगर वाकई आपके मन में उस समय मुझे पाने की या मुझे चोदने की इच्छा थी तो आपने क्यों मुझे एक बार भी कोई इशारा तक नहीं किया? आप के एक ही इशारे पर मैं आपके सामने सारे वस्त्र निकाल कर आपसे चुदवाने के लिए खड़ी हो जाती।”

माया का इस तरह का बिलकुल स्पष्ट और साफ़ साफ़ प्रश्न पूछने पर जेठजी कुछ समय के लिए बौखलाते हुए माया को देखते रहे। वह चाहते थे की माया उनसे स्पष्ट और खुली भाषा में बात करे। पर माया ने उनसे इतनी खुली भाषा में यह इतना स्पष्ट प्रश्न पूछा की जेठजी माया के प्रश्न से क्लीन बोल्ड हो गए।

फिर अपने आपको सम्हालते हुए बोले, “देखो माया, मैंने तुम्हारे पति के लिए और तुम्हारे लिए जो कुछ भी किया मैं अगर उस हाल में तुमसे ऐसी कोई ख्वाहिश जाहिर करता तो बेशक तुम मुझ पर अपना आत्मसमर्पण कर देती, अपना बदन सौंप देती। पर ऐसा करना एक व्यापार जैसा हो जाता।

मैंने जो कुछ भी किया मैंने वह मेरा कर्तव्य समझ कर किया। आज तुम मेरे पास अपने आप आत्मसमर्पण करने आयी इसमें तुमने अपना कर्तव्य निभाया और उसमें हमारी दोनों की मनोकामना की पूर्ति हो रही है तो इसमें मुझे कोई दोष नजर नहीं आया।”

माया जेठजी का हाथ पकड़ कर मुस्कुराती हुई बोली, “मतलब आप मुझे चोदना तो चाहते थे, पर ऐसी इच्छा मेरे सामने जाहिर करना आपके सिद्धांत के विरुद्ध था। सही है ना? तो अब तो मैं स्वयं आपके सामने नंगी हो रही हूँ और चुदवाना चाहती हूँ। अब आपको मुझे चोदने में कोई सैद्धांतिक आपत्ति नहीं होनी चाहिए। तो फिर मेरे स्वामी अब आईये और मुझे जी भर कर चोदिये।” मेरे जेठजी माया की बातें सुन कर हैरान रह गए।

माया पलंग पर लेटी हुई थी वहाँ से उठ बैठी और उसने अपनी साड़ी खिंच कर उतारना शुरू किया। जेठजी ने उसके साथ मिल कर माया की साड़ी उतार दी। उसके बाद माया ने स्वयं ही अपने घाघरे का नाडा खोल कर उसे भी अपनी जाँघों के निचे निकाल फेंका। औरतें जब तक शर्माती हैं तब तक शर्माती हैं। जब वह लाज शर्म का पर्दा उठा कर फेंक देती हैं तब वह चुदाई के बारे में इतनी प्रैक्टिकल हो जातीं हैं की मर्द भी उतना प्रैक्टिकल नहीं हो पाता।

जेठजी ने माया की पैंटी को खिसका कर निचे उतार दिया। उन्होंने जिंदगी में पहली बार किसी नग्न औरत के दर्शन किये थे। उन्होंने पहली बार किसी औरत की चूत को अपनी आँखों से देखा था। यह उनके जीवन का एक अद्भुत अवसर था। माया ने उन्हें यह मनुष्य जीवन का एक अद्भुत अवसर देकर कृतार्थ कर दिया था।

जेठजी ने बड़े प्यार से माया की जाँघों को चौड़ी फैलाकर उसके बिच में सर रख कर माया की गोरी, प्यारी, सालों की प्यासी कोमल चूत के ऊपर अपना मुंह टिका कर माया की चूत को चूसने लगे। माया की चूत में से जेठजी के सान्निध्य के कारण उसका स्त्री रस रिसने नहीं बहने लगा था।

माया जेठजी से इतनी ज्यादा प्रभावित और जेठजी के प्यार पाने के लिए इतनी पागल हो रही थी की जेठजी को इस हाल में देख कर बरबस ही माया की चूत से उसका स्त्री रस बहने लगा था। जेठजी बिना झिझक उस स्त्री रस को चाट चाट कर पिने लगे।

जेठजी को अपना स्त्री रस चाटते और पीते हुए देख कर माया का पूरा बदन रोमांच से और कामुक उत्तेजना से मचलने लगा। माया के रोम रोम में काम वासना की ज्वाला बड़ी ही तेजी से प्रज्वलित हो कर दहकने लगी।

पलंग पर माया अपने बदन को हिलने से रोक नहीं पा रही थी। जैसे जैसे जेठजी माया का स्त्री रस चाटते थे वैसे वैसे माया की सिकारियाँ और कराहटें बढ़ती ही जातीं थीं। जेठजी की जीभ के चूत को छूते ही माया के मुंह से बार बार, “आह….. रे माँ….. ओह…….. हाय….. उई माँ….. ओह….. ” की कराहटें और सिकारियाँ निकले जा रहीं थीं।

माया की चूत चाटते हुए जेठजी बिच बिच में अपना सर ऊपर कर पलंग पर लेटी नंगी माया के कामुक बदन के दर्शन करना नहीं चूकते थे। उनके हाथ हरदम माया के स्तनोँ को मसलने में लगे हुए होते थे। माया के स्तनों की सख्त फूली हुई निप्पलेँ अपनी उँगलियों के बिच में ले कर वह उसे पिचक कर स्तनोँ के अंदर तक घुसाते रहते थे और इस तरह वह अपनी काम वासना का एहसास माया को कराते रहते थे।

पलंग पर लेटी हुई माया की नग्न मूरत को देख जेठजी अपने आपको बड़ा ही भाग्यशाली समझ रहे थे। उनकी समझ में यह नहीं आया की पिछले बीते हुए सालों में क्यों उनको माया को अपनाने के बारे में कोई ख़याल नहीं आया। पलंग पर लेटी नंगी माया कोई अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।

जिस माया को कपड़ों में देख कर वह उतने पागल से हो रहे थे आज वही माया सारे कपड़ों का त्याग कर उनकी सेवा में नंगी उनसे चुदाई की उम्मीद करती हुई उनके ही पलंग पर लेटी हुई थी।

माया के लम्बे घने काले केश जेठजी के पलंग पर इस तरह बिखरे हुए थे जैसे बारिश के मौसम में आसमान में घने बादल छाए हों। पलंग पर माया के नग्न कमसिन बदन के इर्दगिर्द चद्दर नहीं हर जगह माया के बिखरे हुए बाल ही नजर आ रहे थे। उन बालों में घिरी हुई माया की नंगी लम्बी मूरत कोई जलपरी अभी अभी समंदर से निकल कर आ कर लेटी हुई हो ऐसा लग रहा था।

माया का खूबसूरत चेहरा, कमल की डंडी जैसी लम्बी गर्दन, माया की छाती पर विराजमान दो भरे हुए गुम्बज समान उसके फुले हुए उद्दंड स्तन मंडल, उसकी पतली कमर पर बड़ी ही कामुक नाभि और उसके निचे गिटार की तरह घुमाव लेता हुआ माया की गाँड़ का आकार और चूत का ढलाव और उभार कीसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी था।

माया की नंगीं जांघें देख कर पहले से ही जेठजी पागल थे। अब माया की वह दो जाँघों का मिलन स्थान देख कर जेठजी चकरा रहेथे। जेठजी के कई दोस्तों की पत्नियां बड़ी ही खूबसूरत थीं और जेठजी ने उन पतियों को देखा था की जब दूसरे मर्द लोग उन पत्नियों को चोरीछिपि नजर से ताकते थे तो वह पति कितने गर्वान्वित महसूस कर रहे थे।

शायद जेठजी को भी माया से शादी कर ऐसा सौभाग्य प्राप्त हो।

जेठजी भी यह समझते थे की उनको एक औरत के बदन की जरुरत थी वैसे ही माया को भी पुरुष से चुदाई करवाना आवश्यक था। जब से उसके पति का देहांत हो गया था उसकी भी जवानी बेकार जा रही थी और उसके बदन की भूख अतृप्त थी। पति के देहांत के बाद माया ने किसी भी पुरुष की और नजर उठा कर देखा नहीं। पर माया ने जेठजी के किये हुए एहसानों को सच्चे दिल से याद रखा और मौक़ा मिलने पर अपने आप को समर्पण करने में एक मिनट का वक्त भी नहीं लिया।

जरूर माया के बदन में भी अंगड़ाइयां उठती होंगीं, जरूर रात को सोते हुए माया भी अपनी चूत में उंगली डाल कर अपने आपको अपनी ही उँगलियों से चोदने की कोशिश करती होगी। चुदाई के लिए प्यासी औरतों के लिए यह एक आम प्रतिक्रया है। जेठजी को संतोष हुआ की वह जब माया को चोदेंगे तो वह खुद के लण्ड की भूख ही नहीं शमन करेंगे, वह माया की चूत की प्यास भी बुझाएंगे।

माया काफी गरम हो रही थी और जेठजी का लण्ड भी माया की चूत से मिलने के लिए बहुत ज्यादा बेताब था। जेठजी माया को अपनी दो टांगों के बिच रख कर माया के बदन पर उसे चोदने के लिए तैयार हो गए। जेठजी ने माया की चूत की पंखुड़ियों अपने लण्ड से रगड़ कर खोला।

जेठजी के लण्ड के चूत से स्पर्श करने पर माया के पुरे बदन में सिहरन फ़ैल गयी। साथ में उसका मन भी आतंकित हो उठा। जेठजी का लण्ड इतना माँसल, लंबा और सख्त था की माया उसको अपनी चूत में लेने की और बाद में उसके अंदर बाहर होने के कारण उसकी चूत की त्वचा पर जो खिंचाव होगा और उसके कारण उसको जो दर्द होगा उसकी कल्पना मात्र से माया को चक्कर आने लगे।

पर यह भी सत्य था की माया को उस लण्ड को ना सिर्फ अपनी चूत में लेना था बल्कि उसकी चूत को अब सालों साल तक उस लण्ड से चुदना है। इसमें माया को कोई संशय या कोई हिचकिचाहट नहीं थी। उ

से सिर्फ चिंता थी तो यही की उसकी चूत कैसे और कितनी जल्दी जेठजी के उस महाकाय लण्ड को अंदर ले सके और उससे चुदवाने में सक्षम हो सके। इस लिए हालांकि जेठजी से माया की चुदाई जरूर माया के लिए दर्द और आतंक का विषय थी पर फिर भी माया को कुछ भी सह कर जेठजी से चुदवाना है इसका कोई विकल्प ही नहीं था।

माया ने एक गहरी साँस ले कर अपने आपको जेठजी के विशालकाय लण्ड को अपनी चूत के मुख्यद्वार पर होते हुए चूत की नाली में दाखिल होने से जो मशक्कत उसे करनी होगी उसके लिए वह तैयार हो पाए और जो दर्द उसे सहना पडेगा उसे ख़ुशी ख़ुशी झेलने की क्षमता उसे मिले उस के लिए भगवान से प्रार्थना की और अपने होंठों को भींच कर वह जेठजी के लण्ड का उसकी चूत में घुसने के क्षण का इंतजार करने लगी।

जेठजी माया की चिंता समझ सकते थे। उन्होंने अपनी उँगलियों से माया की चूत की पंखुड़ियों को अलग कर माया की चूत के गुलाबी चिकने छिद्र को देखा था।

दिखने में जरूर वह छिद्र छोटा सा ही था, पर जेठजी जानते थे की स्त्री की चूत की नाली में गजब की लचक और फैलने की क्षमता होती है। वक्त आने पर वह अपने नाप से कई गुना फ़ैल सकती है। इसी चूत के द्वार से बड़े बड़े तगड़े और मोटे लण्ड औरत को चोदते हैं और इसी चूत के छोटे से छिद्र में से ही एक चूत के नाप से कई गुना बड़ा नवजात शिशु जन्म लेता है। हालांकि दोनों स्थिति में औरत के शरीर को काफी सेहन करना पड़ता है।

जेठजी ने अपना लण्ड बार बार माया की चूत की सतह पर रगड़ कर चिकना किया। माया ने भी अपनी लार उसके ऊपर चुपड़ कर उसे काफी स्निग्ध बनाया था। जेठजी ने अपने लण्ड को अपने हाथ में पकड़ कर उसके बड़े टोपे को माया की चूत के खुले हुए छिद्र में एक हल्का सा धक्का मार कर थोड़ा सा अंदर डाला।

जेठजी ने माया का चेहरा देखा। माया अपनी आँखें मूँद कर उस घडी के उन्माद को महसूस कर रही थी या फिर जेठजी के इतने तगड़े लण्ड के माया की चूत में घुसने से जो दर्द उसे सहना पडेगा उसके लिए वह अपने आपको मानसिक रूप से तैयार कर रही थी, यह कहना मुश्किल था।

जैसे ही जेठजी का लण्ड माया की चूत में दाखिल हुआ, माया के पुरे बदन में एक गजब की सिहरन फ़ैल गयी। माया को उतना ज्यादा दर्द महसूस नहीं हुआ। पर जेठजी ने भी अपने लण्ड का सिर्फ टोपा ही माया की चूत में घुसेड़ा था। अगला धक्का माया की चूत में जेठजी के लण्ड को और अंदर दाखिल करने के लिए लगाना होगा और वह सहन करने के लिए माया को तैयार होना था।

जेठजी अपने लण्ड को और घुसेड़ने के लिए झिझक रहे थे तब माया ने जेठजी से कहा, “अब आप ज्यादा मत सोचिये। अगर आपके लण्ड के घुसने से मेरी चूत फट भी गयी और मैं मर भी गयी तो मैं उसके लिए तैयार हूँ, पर आप रुकिए मत। मैं जानती हूँ की ऐसा कुछ भी नहीं होगा। हाँ दर्द जरूर होगा। काफी दर्द होगा।

मैं उस दर्द को आपका प्रसाद समझ कर हँस कर झेल लुंगी। पर अब मुझसे आपसे चुदाई करवाने के लिए और इंतजार नहीं होता। चुदाई के इंतजार का दर्द चुदाई से हो रहे दर्द से कहीं ज्यादा है। अब रुकिए मत, प्लीज, बस खुल कर चोदिये मुझे।”

जेठजी जानते थे की उन्हें माया को चोदने के लिए अपना महाकाय लण्ड माया की छोटी सी चूत में घुसाना तो पडेगा ही। और माया को दर्द भी सहना ही पडेगा। जेठजी ने एक और हल्का सा धक्का मार कर अपना लण्ड माया की चूत में थोड़ा और अंदर घुसाया। माया लण्ड के घुसने से सिकारियाँ भरने लगी।

उसके मुंह से दबी हुई “आह…. ओह…. ” निकलने लगी। जेठजी को लगा की आगे तो बढ़ना ही पडेगा, यह सोच कर जब उन्होंने अपनी कमर से एक थोड़ा और तेज धक्का मार कर अपना लण्ड माया की चिकनी चूत में घुसाया तो माया जोर से चीख पड़ी। उसके मुंह से बरबस निकल पड़ा, “मर गयी रे….. ओजी…… थोड़ा धीरे से डालो। मैं वादा करती हूँ की मैं ज़िंदा रहूंगी तो आप से चुदवाती रहूंगी। अगर मैं मर ही गयी तो आपसे और कैसे चुदवाउंगी? मेरी चूत फट रही है रे!”

फिर माया को ध्यान आया की जेठजी ने उसकी चीख और कराहट सुन कर चुदाई रोक दी और अपना लण्ड माया की चूत से बाहर निकाल दिया। माया को जरूर जेठजी के लण्ड बाहर निकालने से कुछ राहत महसूस हुई पर माया की चूत में जेठजी के महाकाय लण्ड घुसने से जो दर्द भरी उत्तेजना महसूस हो रही थी वह गायब भी हो गयी।

माया ने जेठजी की और देखा, कुछ कमजोरी से ही सही पर वह मुस्कुरायी और बोली, “आप रुक क्यों गए? मैं तो चीखती चिल्लाती रहूंगी। मुझे आपके इस तगड़े लण्ड घुसने से असह्य दर्द जरूर हो रहा है। पर यह तो होना ही था। पर उस दर्द के साथ साथ मुझे आप से अद्भुत दर्द के आवरण में लिपटी हुई प्यार भरी रोमांचक जो उत्तेजना मिल रही थी वह मत छीनो मुझ से।

मैं कोई मरने वाली नहीं हूँ। मुझे सालों तक जीना है और आप से चुदवाते रहना है। फिर भी अगर मुझे कुछ शारीरिक घाव जैसा महसूस हुआ तो आप यकीन कीजिये की मैं आपके लण्ड को धक्के मार कर मेरी चूत से बहार निकालने से नहीं कतराऊंगी। मुझे अब जीने का ठोस कारण आज आपने दिया है। मैं ज़िंदा रहूंगी और आपके जीवन को खुशहाल बनाते हुए आप का पूरा साथ जीवनभर निभाती हुई आपसे चुदवाती रहूंगी।”

जब जेठजी ने यह सूना तो उनके पूरा बदन रोमांच से अभिभूत हो गया। स्त्री में भगवान ने कितना प्यार, बलिदान और समर्पण का भाव कूट कूट कर भरा है वह उन्हें महसूस हुआ। जेठजी ने अपने लण्ड को एक और ज्यादा बड़ा धक्का मार कर जब माया की चूत में घुसेड़ा तो फिर से माया चीख उठी।

पर इस बार माया जेठजी को रोकने के लिए नहीं बल्कि उन्हें पूरा लण्ड चूत में घुसेड़ कर उसे अच्छी तरह चोदने के लिए आह्वान कर रही थी। माया चीख रही थी, “अजी चोदो जी मुझे। अब सिर्फ धक्के मत मारो, मेरीअच्छी तरह से चुदाई करो। मैं चीखती चिल्लाती रहूंगी। यही तो नारी जीवन का एक अनोखा पारितोषिक है की उसे तगड़ी चुदाई से हो रहे दर्द में भी अद्भुत, अनोखा, रोमांचपूर्ण, उत्तेजक सुख मिलता है।”

यह सुन कर जेठजी का लण्ड और सख्त हो गया। जब चुदाई कर रहे एक मर्द को अपनी साथीदार औरत से ऐसी जोशभरी सकारात्मक प्रतिक्रया मिलती है तो उसका लण्ड और भी जोशीला हो जाता है। जेठजी के लण्ड को अब रोकना नामुमकिन था। जेठजी ने एक आखिरी जोरदार धक्का मारा और उनका करीब आधा लण्ड माया की चूत में घुस गया तो माया की चूत पूरी भर गयी।

जेठजी का आधा लण्ड बेचारा माया की चूत में दाखिल ही नहीं हो पाया। पर माया के मुंह से चीख के बजाये गहरी गहरी आहें और कामुक सिकारियाँ अब थमने का नाम नहीं ले रही थी। पुरे कमरे में माया की, “हाय राम…. ओह……. आह…… हाय…… चोदो मुझे …….. और चोदो…….. मत रुको…….” यह और ऐसी कई कामुक शब्दों से भरी कराहटें और सिकारियाँ सुन कर जेठजी और जोर से चोदने लगते और उसके साथ साथ माया की कराहटें और भी बढ़ जातीं।

धीरे धीरे माया का चुदाई के कारण हो रहे दर्द की जगह जेठजी के लण्ड के घर्षण हो रहे उन्मादक रोमांच ने ले ली। माया के पति ने उनके दाम्पत्य जीवन दरम्यान माया की काफी चुदाई की थी। पर जेठजी की एक ही चुदाई उत्तेजना और रोमांच के पटल पर माया के पति की दो बरसों की चुदाई के ऊपर भी भारी पड़ रही थी।

माया ने कभी सोचा ही नहीं था की किसी औरत की इस तरह चुदाई हो भी सकती है जिस के कारण वह चुदाई इस कदर एक अजीब से रोमांच और उत्तेजना से इतना अद्भुत सुख दे सकती है।

जैसे जैसे जेठजी माया को चोदते रहे वैसे वैसे माया भी उस चुदाई से उत्पन्न सुख और आनंद का उन्माद का आस्वादन करती रही। जेठजी कभी माया के ऊपर चढ़े हुए अपने लण्ड को ऊपर से सीधे माया की चूत में घुसाते हुए उसे चोदते तो कभी माया के बदन को टेढ़ा घुमा कर माया की एक टांग अपनी जाँघों के बिच में रख कर अपना लण्ड माया की साइड में से घुसा कर उसे चोदते।

चोदते हुए वह माया की निप्पलोँ को मुंह में रख कर उसे चूसना और काटना भी नहीं चूकते। धीरे धीरे जैसे जैसे माया को चुदाई का दर्द कम महसूस होने लगा वैसे वैसे माया भी जेठजी को अपनी कमर के साथ अपनी चूत ऊपर की और उछाल कर उनकी चुदाइ की लय में लय मिलाती हुई जेठजी का लण्ड और अंदर घुसाने में जेठजी की सहायता करती।

माया की तगड़ी चुदाई करते हुए जेठजी के कमरे में उनकी जाँघों के माया की जाँघों से होते टकराव से पैदा होती “फच्च…. फच्च…. ” की कामुक उत्तेजक आवाज से कमरा गूंज रहा था। चुदाई के दरम्यान माया अपनी टांगें कभी जेठजी के कंधे पर तो कभी जेठजी की दोनों बगल के अंदर हवा में अद्धर उठाती हुई जेठजी से खूब प्यार से चुदवाने लगी थी। जेठजी ने जब एक तगड़ा धक्का मार कर अपना आधा लण्ड माया की चूत में घुसेड़ा था उसी समय माया झड़ गयी थी।

जेठजी का लण्ड माया की चूत में सिर्फ दर्द नहीं एक बड़ा ही उन्मादक सा पागलपन पैदा कर रहा था। माया की चूत में उस घुसे हुए लण्ड के अंदर बाहर होने से हो रहे घर्षण के कारण अजीब सी फड़फड़ाहट हो रही थी जिसे जेठजी अपने लण्ड के ऊपर हो रहे खिंचाव एवं चूत में बार बार हो रही कम्पन से महसूस कर रहे थे। इस चुदाई ने माया को इतना पागल कर दिया था की जेठजी के लण्ड के एक या दो धक्कों में ही माया का छूट जाता था और माया झड़ती रहती थी।

चुदवाते हुए माया हमेशा जेठजी के चेहरे को बार बार देखती रहती थी की उस चुदाई से जेठजी को सुख मिल रहा है की नहीं। जेठजी की भौंहों के उतार चढ़ाव से माया समझ जाती थी की जेठजी माया को चोदने में अनूठा आनंद महसूस कर रहे थे और माया को चोदते हुए उनका सारा ध्यान अपने लण्ड में हो रहे उत्तेजक घमासान पर ही रहता था।

लम्बे अर्से से ब्रह्मचर्य का पालन करने के कारण जेठजी का वीर्य जेठजी के लण्ड की इस तरह की चुदाई से उत्पन्न अति सुख मिलने के कारण अण्डकोष से बाहर निकलने के लिए व्याकुल हो रहा था।

जब माया ने जेठजी के साथ ताल से ताल मिला कर अपनी कमर उछाल कर चुदवाना शुरू किया तब जेठजी अपने वीर्यचाप को रोकने में अपने आपको असमर्थ महसूस करने लगे। जेठजी के चेहरे पर बल पड़ने से माया समझ गयी की जेठजी झड़ने वाले हैं।

शायद वह यही उलझन में होंगे की क्या वह अपना वीर्य माया की चूत में उँडेले या नहीं। माया जेठजी के वीर्य को अपनी चूत में लेना चाहती थी। वह जानती थी की जेठजी का वीर्य उसे गर्भवती कर सकता था।

माया ने बिना कुछ सोचे समझे जेठजी को कहा, “अजी आप भर दीजिये मेरी चूत को आपके वीर्य से। वैसे तो मेरा इस समय बीज फलीभूत होने का वक्त नहीं है। पर फिर भी अगर मेरा गर्भ रह गया और यदि आपको एतराज ना हो तो मैं आपके बालक को जनम देना चाहती हूँ। मैं आपके बच्चे की माँ बनना चाहती हूँ। फिर भी अगर आपको एतराज होगा तो मैं कल सुबह ही गोली खा लुंगी ताकि गर्भ ना रुके। आप जैसा कहोगे मैं करुँगी पर प्लीज आप अपना वीर्य मेरी चूत में ही जाने दें।”

यह सुनते ही जेठजी ने अपने वीर्य को माया की चूत भरने के लिए खुली छूट दे दी। जेठजी के मन के इशारे से ही एक फव्वारे के सामान जेठजी का गर्मागर्म गाढ़ा वीर्य जेठजी के लण्ड के छिद्र से निकलता हुआ एक पिचकारी की तरह माया की चूत की सुरंगों को भरने लगा। माया ने अपनीं चूत की नाली में जेठजी के गरम वीर्य को भारत हुए महसूस किया और वह एक अजीब से रोमांच से काँप उठी। उस रात उसका जीवन सार्थक हो गया था।

जिस मर्द को वह अपने प्राण तक देना चाहती थी वह माया के बदन के सुख को पाकर इतना रोमांच भरा सुख पा सका उसके कारण माया को अपना जीवन सार्थक हो गया था ऐसा महसूस हुआ।

उस चुदाई के बाद हालांकि माया की चूत जेठजी के लण्ड की तगड़ी चुदाई से काफी लाल हो गयी थी और दर्द कर रही थी, पर माया को उस रात जेठजी को पूरी तरह संतुष्ट करना था।

थकी हुई माया जेठजी के लण्ड निकालने के चंद मिनटों में ही जेठजी की बगल में आ कर जेठजी को अपने पीछे रख कर जेठजी की बाँहों में और उनकी टांगों के बिच में फंस कर सो गयी। जेठजी का ढीला लंड बार बार माया की गाँड़ के गालों से रगड़ता रहता था। जेठजी भी अपने दोनों हाथों में माया की चूँचियाँ दबाते हुए कुछ ही मिनटों में सो गए।

करीब आधे घंटे बाद माया ने महसूस किया की जेठजी का लण्ड फिर से सख्त होने लगा था और माया की गाँड़ के गालों को टोंचने लगा था। माया इस डर से की कहीं जेठजी माया की गोरी चिट्टी भरी हुई गाँड़ देख कर ललचा ना जाए और गाँड़ मारने की इच्छा ना प्रगट कर दे, एकदम पलट कर जेठजी की तरफ अपना मुंह करने के लिए करवट बदल ली।

जेठजी जाग चुके थे। माया ने अपना डर ना जाहिर करते हुए जेठजी के होँठों से अपने होँठों को चिपका दिए और जेठजी के मुंह में अपनी जीभ डाल कर माया जेठजी की लार चूसने लगी। जेठजी भी माया की जीभ और होंठों के साथ अपने मुंह और जीभ से खेलते हुए माया के साथ प्रगाढ़ चुम्बन में जुट गए।

कुछ देर तक माया को चूमने के बाद जेठजी ने माया को अपनी बाँहों में जकड़ा और अपने सख्त लण्ड को माया की चूत में घुसाने का खेल करने लगे। जेठजी इतने लम्बे और हट्टेकट्टे और बेचारी माया दुबली पतली और जेठजी के मुकाबले छोटी सी। जेठजी उस पोजीशन में माया की चूत में अपना लण्ड कैसे डाल पाते?

जेठजी ने माया को पूछा, “तुम थक तो नहीं गयी?”

माया ने जेठजी की आँखों में आँखें मिला कर पूछा, “और भी एक राउण्ड करना है क्या?”

जेठजी ने कहा, “अगर तुम तैयार हो तो।”

माया ने जेठजी के लण्ड को पकड़ कर बैठ कर उसे चूमते हुए कहा, “अगर मेरा यह दोस्त तैयार है तो उसकी दोस्त भी तैयार है।” माया ने अपनी चूत की और इशारा करते हुए कहा।

माया ने झुक कर जेठजी का लण्ड हाथ में पकड़ा और झुक कर उसे अपने मुंह में डाला। जेठजी की और देख कर माया बोली, “मैं इसे और तैयार कर देती हूँ।” यह कह कर माया ने जेठजी का लण्ड चूसना शुरू किया।

उस रात अगले एक घण्टे से ज्यादा समय तक माया जेठजी से चुदवाती रही। जेठजी ने माया को ऊपर चढ़ कर चोदा, साइड में रख कर चोदा, माया को आसानी से अपनी बाँहों में उठाकर अपनी कमर पर टिका कर चोदा, माया को घोड़ी बना कर चोदा, माया को पलंग पर औंधे मुंह सुला कर ऊपर चढ़ कर चोदा और और भी कई अलग अलग तरीकों से माया को अच्छी तरह से जेठजी ने उस रात चोदा।

माया ने भी जेठजी के ऊपर चढ़ कर उनका लण्ड अपनी चूत में लेकर ऊपर से जेठजी को खूब कूद कूद कर चोदा। माया ने कभी अपनी जिंदगी में ऐसी चुदाई कराई तो नहीं थी, पर ऐसा सोचा भी नहीं था की उसकी ऐसी चुदाई बह कभी होगी। माया के जबरदस्त मानसिक निश्चय के बावजूद भी जब उस रात माया को जेठजी ने चुदाई से फारिग किया और माया जब सीढ़ियों से उतर कर निचे आ रही थी तो सिर्फ माया की चूत ही नहीं सूज गयी थी, माया ठीक से चल भी नहीं पा रही थी।

यह सारी बातें माया ने मुझे बतायीं और तब मैंने माया को अपने गले लगा कर कहा, “माया तू आजसे मेरे लिए माया नहीं, मेरी जेठानी है। भले ही तू मुझे अपनी दीदी कहे, पर तूने आज जो काम किया है उससे तूने हम सब को तुम्हारा ऋणी बना दिया है। तुम्हारे इस ऋण का बदला हम चुका नहीं सकते।”

माया ने जब यह सूना तो उसकी आंखों में मेरी बात सुन कर आंसू छलक आये।

मेरा हाथ थाम कर वह बोली, “दीदी, मैंने कुछ नहीं किया। मैं तो खुद ही आप सब के एहसानों के बोझ के तले दबी हुई हूँ। आपने मुझे अपने घर में सहारा दे कर अनाथ से सनाथ बनाया। बल्कि आज आपने मुझे विधवा से सधवा बनाया। मैं आपकी जेठानी बनूँगी या नहीं, यह तो मैं नहीं जानती, पर आज आपने मुझे आपके जेठजी से चुदवा कर उनकी पत्नी ना भी बन पाऊं तो उनकी रखैल कहलाने का सम्मान तो दिला ही दिया है। आपके जेठजी की रखैल बनना भी मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।”

माया की बात सुन कर नतमस्तक होती हुई मैं कुछ ना बोल सकी। माया की उस विनम्रता के आगे अपनी आंसू भरी आँखों के साथ माया को अपने गले लगा कर मैंने अपना प्यार जताया।

मैंने जब मेरे पति संजयजी से यह सारी बातें कहीं तो उन्हें सुन कर मेरे पति इतने खुश हुए और उन्होंने आंसूं भरी आँखों के साथ मुझे गले लगा कर इतना प्यार किया की मैं बता नहीं सकती।

उसी सुबह उन्होंने अपने माता पिता (मेरे सांस ससुर) से बात कर माया और बड़े भैया का विवाह तय किया और जल्द ही उनकी शादी भी हो गयी। इस तरह माया ना सिर्फ हमारे घर की एक अग्रगण्य सदस्य हो गयी वह मेरी छोटी बहन से मेरी जेठानी बन गयी।

यह चार साल पहले की बात है। टीना की शादी को करीब डेढ़ से दो साल हो चुके थे। हमारी शादी को तीन साल होने को थे। पहले दो सालों में तो मैंने और मेरे पति संजूजी ने फॅमिली प्लानिंग किया पर उस के बाद हम लोगों पर बच्चे के लिए सब का दबाव बढ़ने लगा।

एक साल तक कोशिश करने पर भी जब मुझे गर्भ ना रुका तब हमने कई डॉक्टरों का संपर्क किया और कई परिक्षण भी हुए। सब में यही परिणाम आया की मुझ में कोई भी कमी नहीं थी पर मेरे पति संजूजी के शुक्राणुं में कुछ कमी होने के कारण उनसे कोई भी स्त्रीको गर्भ नहीं रुक सकता था।

पहले तो मैं इस परिणाम को स्वीकार करने के लिए बिलकुल ही तैयार ही नहीं थी, क्यूंकि मरे पति संजूजी मेरी बड़ी तगड़ी चुदाई करते थे और चुदाई में वह काफी आक्रामक और शशक्त थे। मैं मेरे पति की चुदाई से पूरी तरह संतुष्ट थी। तो मैं कैसे मानती की मेरे पति में कोई कमी थी?

पर जैसे जैसे एक के बाद एक सभी परीक्षणों में जब एक से परिणाम आने लगे तब मुझे और संजूजी को यह स्वीकार करना ही पड़ा की मेरे पति संजूजी में कमी है और मुझे चुदाई का सुख भले ही मिल रहा हो, पर मैं मेरे पति से बच्चा नहीं पा सकती। अब हमारे लिए यह समस्या थी की या तो हम इस बात को सब के साथ साझा करें की कमी मेरे पति में थी और सब को यह कह दें की अब कुछ नहीं हो सकता। या फिर कोई इसका व्यावहारिक हल ढूंढे।

मैं इसके बिलकुल ख़िलाफ थी की मेरे पति में जो कमी है यह बात किसी भी कुटुंब के व्यक्ति को पता लगे; क्यूंकि मैं नहीं चाहती थी की कोई भी मेरे पति को हलकी नज़रों से देखे। किसी को भी यह कहने का मौक़ा ना मिले की मेरे पति नपुंशक हैं। मेरे पति नपुंशक नहीं थे। नपुंशक पुरुष वह होता है जिसका लण्ड खड़ा नहीं होता और जिसके लण्ड के अंडकोष में वीर्य नहीं होता।

मेरे पति का लण्ड थोड़ी सी भी उत्तेजना होते खड़ा हो जाता था। कहीं कोई सुन्दर लड़की देख ली या कोई लड़की का चित्र भी देख लिया तब। हाँ उसे शांत करने के लिए मुझे बड़ी मशक्क्त करनी पड़ती थी। और वीर्य की तो पूछो मत। हमारी शादी के बाद शुरू शुरू में तो मेरे पति से चुदवा कर मैं इतनी डरती रहती थी की कहीं मुझे गर्भ ना रुक जाए; क्यूंकि जब मेरे पति झड़ते थे तो इतना गरम, गाढ़ा और ज्यादा वीर्य छोड़ते थे की मेरी चूत भर कर छलक जाती थी और चद्दर, कपडे बगैरह खराब हो जाते थे।

मैं एकदम हताश और मानसिक रूप से टूटने लगी थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था की करें तो क्या करें। हमारे पास तीन विकल्प थे। पहला विकल्प था की हम कोई बच्चे को दत्तक लें, दुसरा विकल्प था की हम आई.वी.एफ. का सहारा लें मतलब किसी मर्द का वीर्य आधुनिक तकनीक द्वारा मेरे गर्भाशय में डाला जाए और मुझे गर्भवती बनाया जाए और तीसरा और आखिरी विकल्प जो सबसे ज्यादा विचित्र था, वह था की मैं किसी दूसरे मर्द से चुदवाऊं और गर्भ धारण करूँ।

मेरी सबसे बड़ी चिंता यह थी की मैं नहीं चाहती थी की हमारे परिवार में किसी को भी यह पता चले की मेरे पति अनुपजाऊ या बाँझ थे। मतलब वह किसी भी औरत को गर्भवती नहीं बना सकते थे। मुझे यह बिलकुल गँवारा नहीं था की कोई उन पर उंगली उठाये। पति की बदनामी मतलब पत्नी की भी बदनामी।

हमने बच्चा दत्तक लिया अथवा आई.वी.एफ. कराया तो पूछा जाएगा की ऐसा करने की जरुरत क्यों पड़ गयी? जो तीसरा विकल्प था वह तो सब से कड़वा और मुश्किल विकल्प था।

तीसरा विकल्प था की मुझे किसी ऐसे आदमी से चुदवाना पडेगा जो हमारे परिवार को जानता ना हो या फिर ऐसा हो जो आगे चलकर कभी हमें ब्लैकमेल ना कर सके। जब मुझे उसके साथ में सो कर उससे चुदवाना ही था तो फिर वह आदमी मुझे भी तो पसंद होना चाहिए। हो सकता है एक ही चुदाई में गर्भ ना टिके। हो सकता है मुझे चार पांच दिन तक या एक हफ्ता या और ज्यादा बार चुदवाना पड़े।

मतलब वह आदमी ऐसा हो जो ना सिर्फ मुझे बच्चा दे सके बल्कि जो मर्द ऐसा हो जिससे मुझे बार बार चुदवाने में कोई हर्ज ना हो और यह व्यावहारिक दृष्टि से भी मुमकिन हो की मैं उससे बार बार चुदवा सकूँ। किसी भी बाहर के मर्द को घर में और ख़ास कर हमारे बैडरूम में कई रातों तक रखना जबरदस्त शक पैदा कर सकता था।

एक बात और भी थी की जो बच्चा हो वह तेजस्वी हो और अच्छा खासा तंदुरस्त और सुन्दर हो। उसके लिए मुझे चोदने वाला मर्द भी तो ऐसा ही होना चाहिए ताकि उसके वीर्य से पैदा होने वाला बच्चा भी ऐसा ही हो। अब ऐसा आदमी कहाँ से लाएं?

दूसरी बात यह भी थी की उसके लिए मेरे पति भी राजी होने चाहिए। खैर मेरे पति संजयजी ने खुद ही मुझे यह तीसरे विकल्प के बारे में बात की थी और बताया था की अगर मैं पहले दो विकल्प के लिए राजी नहीं हूँ तो वह मुझे आग्रह करेंगे की मैं मेरी पसंद के किसी और मर्द से चुदवा कर गर्भवती बनूँ। मेरे पति को उसमें कोई भी आपत्ति नहीं थी। अब तय मुझे करना था की मैं किससे चुदवाऊं?

ऐसा नहीं है की मैंने किसी गैर मर्द से पहले नहीं चुदवाया था। हमारे पड़ोस में मेरी एक सहेली रहती थी। वह कॉलेज में मुझसे दो क्लास सीनियर थी। वह बड़ी चुदक्क्ड़ थी। उसके कई बॉयफ्रैंड्स थे। मैं जब पहले साल में थी तभी उसने मेरी पहचान कुछ लड़कों से करवा दी थी। हमारा एक ग्रुप ही बन गया था।

पहले तो मैं बड़ी ही शर्मीली थी और लड़कों से ज्यादा करीबी नहीं रखती थी पर धीरे धीरे मेरी सहेली के जबरदस्त आग्रह पर मैं ढीली पड़ने लगी। उनमें से एक लड़का जो मेरी सहेली के क्लास में था वह तो मेरे पीछे ही पड़ गया। वह सुबह शाम मेरे इर्दगिर्द घूमता रहता, मेरी बड़ी चापलूसी करता था और था भी वह बड़ा प्यारा। वह लड़का मुझे पसंद भी था।

उस उम्र की हर युवा लड़की की तरह मेरा भी चुदवाने का बड़ा मन करता रहता था। पर माँ बाप के संस्कार के कारण और कुछ कुदरती भय के कारण मैं आखरी वक्त में पीछे हट जाती थी। मुझसे कुछ लड़कों ने थोड़ी हलकीफुलकी जबरदस्ती कर चुम्माचाटी कर ली थी। मैंने उन्हें हल्काफुल्का विरोध करते हुए मेरे बूब्स मसलने दिए थे।

पर मैं किसी लड़के को भी उससे आगे बढ़ने की इजाजत नहीं देती थी। अक्सर भीड़ में बस में या ट्रैन में कई लड़कों ने मेरी चूँचियाँ मसलीं थीं। मेरी पसंदीदा उस लड़के का तो लण्ड भी मैंने पकड़ा, सहलाया और दो बार चूसा भी था। उस लड़के ने मेरी चूत में उंगली डालकर मेरी चूत का रस चूसा था और मेरी चूत को उँगलियों से चोदा भी था। पर मैं उसे उसके आगे बढ़ने नहीं देती थी।

मैं उस लड़के के कई बार मिन्नतें करने पर भी उस को चोदने के लिए मना कर देती थी। मेरी सखी मुझे बार बार उलाहना देती रहती थी की अरे, मौक़ा है तो चौक्का मार ले और उससे चुदवाले वरना बादमें मौका नहीं मिलेगा तो पछताएगी। पर मैं पता नहीं क्यों, आखिरी समय में डर कर मना कर देती थी।

पर धीरे धीरे उस लड़के से मेरी दोस्ती बढ़ने लगी। मैं उसके बारे में, उससे चुदवाने के बारे में कई बार सोचती रहती थी। हमारी दोस्ती इस हद तक बढ़ गयी की एक दिन पिकनिक में उसने मुझे बाकी लड़के लड़कियों से अलग थलग कर के मौक़ा देख कर एक झरने में धक्का मार कर धकेल दिया। बाद में खुद भी उसमें कूद पड़ा।

फिर उसने मुझे प्यार करते हुए हम दोनों के कपड़ों को एक के बाद एक निकाल फेंका। मैं उसे मना करती रही, गिड़गिड़ाती रही पर उसने मेरी एक ना सुनी। कुछ देर बाद जब उसने मेरा ब्लाउज और ब्रा निकाल फेंका और वह मेरे बूब्स को चूसने लगा तब मेरा बचाखुचा अवरोध भी गायब हो गया।

उस दिन उस झरने में खेलते हुए नहाते हुए उस लड़के ने मुझे चोद डाला। उस दिन उसने मुझे पानी में और फिर बाद में किनारे ले जा कर रेत में चोदा। वह चुदाई मेरी पहली चुदाई थी जिसे मैं कभी नहीं भूलूंगी। उस साल उस लड़के ने मेरी काफी बार चुदाई की।

मैं उस लड़के के साथ प्यार करने लगी थी। सारा कॉलेज यह सब जानता था। वह उस साल के बाद कॉलेज छोड़ आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चला गया और बाद में उसने ना तो मेरे किसी ईमेल का जवाब दिया ना ही कोई फ़ोन से बात हुई। इस वाकये से मेरा दिल टूट गया।

उसी समय हमारे ही ग्रुप का एक लड़का जो उस लड़के से पहले मुझ से मेलजोल बढ़ाना चाहता था पर जिसे मैं टरका देती थी उसने मेरा उस मुश्किल समय में जबरदस्त साथ दिया। वह रईस घर का लड़का था। वह मुझे खुश करने के लिए कुछ ना कुछ तोहफे देता रहता था और मुझे हरदम दिलासा देता रहता था और अक्सर अपनी कार में घुमाने के लिए इधर उधर ले जाता था।

वह शरीफ भी लगता था क्यूंकि उसने उस दौरान कभी भी मेरा गलत फायदा उठाने की कोशिश नहीं की। मैंने ही उसे किस करना शुरू किया और फिर क्या था, ऐसे ही वक्त जाते हमने उसकी कार में कई बार चुदाई की। उसका लण्ड बड़ा तगड़ा था। मैंने उसके लण्ड को कई बार चूसा भी था। वह बहुत अच्छा चोदता था। पर उसके साथ भी वही हुआ। कॉलेज पास होने पर वह भी विदेश चला गया और फिर दुबारा वही अन्धेरा वक्त।

उसी समय मेरी पडोसी सहेली जो मेरी कॉलेज में थी उसकी शादी हो चुकी थी वह मुझे मिली। जब मेरी उससे दिल खोल कर बात हुई और मैंने उसे मेरा सारा वाक्या बताया तो वह ठहाका मार कर हँस कर बोली, “यार कॉलेज लाइफ ऐसी ही होती है। यहां सब लड़के लडकियां दिल खोल कर मौज करते हैं और बादमें वास्तविक जिंदगी में लड़के या लडकियां माँ बाप के बताये हुए लड़के या लड़की से शादी कर अपना घर बसा लेते हैं।

तू इस लफड़े में कहाँ अपना दिल जला बैठी? तू भी बिंदास मस्ती कर। तेरा यह साल आखरी साल है। खूब चुदवा, मौज कर और फिर पास होने के बाद आगे पढ़ना हो तो पढ़, वरना किसी अच्छे लड़के से शादी करके अपना घर बसाले।”

मुझे उसकी बात जँच गयी। बस और क्या था? तब से मैं बिंदास बन गयी। वहीँ पर मेरे दो बॉयफ्रेंड बन गए। मैंने दोनों से कह दिया था की वह दोनों ही मेरे बॉयफ्रेंड हैं। मैंने दोनों से खूब चुदवाया। उनके लण्ड चूसे, उनसे मेरी चूत चुसवाई और सब कुछ किया। मुझे कोई भी अटैचमेंट नहीं रखना था किसी के साथ।

बल्कि कुछ और लड़के भी मेरे पीछे पड़े हुए थे। उनके साथ भी मस्ती की चुम्माचाटी की और चुदाई के अलावा सब कुछ किया। आज तक वह सब मुझे मेरे बिंदास मेलजोल के कारण याद करते होंगे। वह सब लड़के अच्छे थे। उन्होंने मेरे साथ कोई धोखाधड़ी नहीं की। किसी ने भी मुझसे किसी भी तरह का कोई वादा नहीं किया और ना ही मैंने किसी लड़के से।

मुझे उसका कोई अफ़सोस नहीं है। वह मस्ती का ज़माना था और मैंने खूब मस्ती की। मेरे पति संजयजी को यह सब पता है। पर वह सब बात शादी के पहले की थी। शादी के बाद घरगृहस्थी के बोझ और व्यस्तता के कारण घर से ज्यादा बाहर निकलने का मौक़ा ही नहीं मिला तो किसी और से चुदाई के बारे में सोचना भी नहीं हुआ।

हालांकि मेरे पति संजयजी सेक्स के मामले में बड़े ही उदार दिल के हैं। वह मुझे कई बार उनके दोस्तों से जबरदस्ती मिलाते थे और उनके साथ मेलजोल बढ़ाने के लिए उकसाते रहते थे।

वह तो मुझे यहां तक कहते थे की अगर उनके मर्द दोस्तों में से कोई दोस्त मुझे ज्यादा ही पसंद आये और अगर मैं उससे चुदवाना चाहूँ तो वह ख़ुशी से मुझे इजाजत दे देंगे, बल्कि मुझे सपोर्ट भी करेंगे। पर मैं मेरे पति को इतना ज्यादा प्यार करती थी और उनसे इतनी ज्यादा खुश थी की मैंने और किसी पर ध्यान दिया ही नहीं।

जब मुझे यह पता चला की मेरे लिए एक ही विकल्प बचा है जिसमें मुझे किसी गैर मर्द से चुदवाना पडेगा तब मुझे कुछ हद तक रंजिश रही की अगर मैंने मेरे पुराने दोस्तों में से किसी के साथ संपर्क बनाये रखा होता अथवा मेरे पति की बात मानी होती और उनके दोस्तों में से किसी दोस्त से चुदवाया होता तो मैं उस दोस्त से दुबारा चुदवा कर गर्भधारण कर सकती थी।

मुझे चुदाई का विकल्प सबसे अच्छा इस लिए भी लगा की चुदाई गोपनीय तरीके से हो सकती है और मैं, मेरे पति और तीसरा मर्द जो मुझे चोदेगा, उसके अलावा किसी और को इसके बारे में जानने की जरुरत ही नहीं। अगर मैंने मेरे पति संजयजी के किसी दोस्त को या किसी और को पसंद किया तो उसे हम हमारे घर में हमारे बैडरूम में रात को चुपके से बुला सकते हैं और उस समय वह मुझे रात भर चोद कर जल्दी सुबह जा सकता है।

पर इसमें दो दिक्कते हैं। पहला यह की कार्यक्रम एकाध दो रात के लिए तो हो सकता है पर ज्यादा दिन नहीं हो सकता। दुसरा यह की मेरे ख़याल से कोई भी भद्र पुरुष इस तरह रात में आकर सुबह घर वापस चोर की तरह जाना पसंद नहीं करेगा।

दुसरा विकल्प यह भी हो सकता था की हम तीन लोग: मैं, संजयजी और वह मर्द जिससे मुझे चुदवाना है वह कहीं छुट्टियां मनाने के लिए बाहर चले जाएँ और कोई रिसोर्ट या होटल में तीन चार दिन या एक हफ्ते रुक कर उस मर्द से मुझे चुदवाने का कार्यक्रम बनाया जाए। पर इसके लिए भी हमें ऐसे आदमी को ढूंढना पडेगा, उसे तैयार करना पडेगा और प्रोग्राम बनाना पड़ेगा।

यह जरुरी नहीं की उस मर्द को बताया जाए की मैं उस मर्द से गर्भ धारण करने के लिए चुदवाउंगी। कुछ ऐसा तिकड़म चलाया जाये की जिसमें उस दोस्त को यह कहा जाए की संजयजी और मैं मिलकर उस आदमी के साथ एम.एम.एफ. करना चाहते थे।

जैसे जैसे समय बीतता गया, इस बच्चे की समस्या ने गंभीर रूप ले लिया। करीब करीब हर रोज एक या दुसरा रिश्तेदार हमें बच्चे के बारे में पूछने लगा। तब मुझे ऐसा कोई मर्द नजर नहीं आया जो मेरे काम आ सके। उस वक्त किसी मन पसंद हैंडसम मर्द को ढूंढना और इस तरह का कोई सामन्जस्य या कोई समीकरण बिठाने का समय ही नहीं था।

मेरी और संजयजी की समझ में ही नहीं आ रहा था की क्या किया जाए। यह सारी बातें हमारा दिमाग चाट रहीं थीं और दिन बीतते जा रहे थे। हमें कोई जल्दी नहीं थी, पर मेरे सांस ससुर और कुछ हद तक मेरी ननद सा टीना भी बच्चों के बारे में बार बार पूछते रहते थे। हमारे पास कोई ठोस जवाब नहीं था। हमारा दिमाग दिन ब दिन खराब होता जा रहा था।

धीरे धीरे यह समस्या हमारे दिमाग पर ऐसी हावी होने लगी की मुझे और मेरे पति संजयजी को दिमाग पर एक भारी बोझ महसूस हो रहा था। मैं भी कई बार इतनी चिंतित हो जाती थी की क्या काम करना है यह सब ध्यान ही नहीं रहता था।

एक दिन जब माया रसोई में आयी तो उसने देखा की मैं रसोई के प्लेटफॉर्म से सटे हुए खड़े कुछ गहराई से सोच रही थी और स्टोव पर रखा दूध उफान आकर बाहर गिर रहा था। तब माया ने मुझे झकझोरते हुए पूछा, “दीदी, क्या बात है? आप क्या सोच रहे हो? सब ठीक तो है?”

मैं माया के हिलाने से चौंक गयी और बात को टालने के लिए बोली, “कुछ नहीं रे! सब ठीक है।” पर माया ने देखा होगा की मेरा जवाब मेरे चेहरे के भाव से मेल नहीं खा रहा था।

माया ने मेरा हाथ थामा और उसे प्यार से सहलाते हुए कहा, “दीदी, तुमने मुझे अपनी जेठानी बनाया पर हकीकत में तो मैं तुम्हारी छोटी बहन ही हूँ। आप मेरी जिंदगी के सूत्रधार हो। आपने मेरी जिंदगी संवार ने के लिए क्या क्या नहीं किया। आपकी ही वजह से मुझे आपके जेठजी ने अपनाया और सुहागन बनाया। आपने मेरी जिंदगी के सबसे मुश्किल वक्त में मुझे सहारा दिया। अब जब मैं आपसे आपकी मुश्किल के बारे में जानना चाहती हूँ तब आप मुझे अपनी चिंता में भागीदार नहीं बना रहे हो और टालने की कोशिश कर रहे हो? यह तो गलत है न?”

मैंने माया का हाथ थाम कर कहा, “क्या बताऊँ माया, बात ही कुछ ऐसी है की इसका कोई इलाज नहीं नजर आता। बात कुछ निजी और नाजुक है।”

माया मुझे पकड़ कर मेरे ही बैडरूम में ले गयी। वहाँ पलंग पर माया ने मुझे बिठाया और बोली, “क्या बात है दीदी? तुम्हें मेरी कसम अगर तुमने मुझसे कुछ भी छिपाया तो। जब मैं उस रात आपके सामने कटघरे में थी तब जैसे आपने मुझे साफ़ साफ़ कहने के लिए बोला था, तो अब मेरी बारी है, मैं आपकी बहन ही नहीं, मैं आपकी जेठानी की हैसियत से भी आपको हिदायत देती हूँ की आप भी मुझे साफ़ साफ़ स्पष्ट भाषा में सब कुछ कहोगे और मुझ से कुछ भी नहीं छिपाओगे।”

माया ने मेरी आँखों में आँखें डालकर पूछा, “क्या आपकी बात मेरी बात से भी ज्यादा नाजुक है? आपके जेठजी से मुझे चुदवा ने से और ज्यादा नाजुक तो नहीं है ना?”

मैंने माया की आँखों में आँखें डालकर कहा, “उससे भी ज्यादा नाजुक बात है, माया।” मेरी बात सुनकर माया भौंचक्की सी हो कर मुझे देखने लगी। अब उसे लगा की बात काफी गंभीर है।

माया ने मेरे दोनों हाथ थाम लिए और उन्हें बड़े प्यार से सहलाते हुए बोली, “दीदी, आपको मेरी कसम, आपको आपके पति संजयजी की कसम, आपको आपके जेठजी की कसम, आप बताओ की क्या बात है। बात जितनी भी नाजुक हो या गोपनीय हो, हम दोनों के बिच में तो कुछ भी गोपनीय है ही नहीं न दीदी? जब आप जिस तरह आपके जेठजी मेरी चुदाई करते हैं उस के बारे में भी सब कुछ जानते हो तो फिर आपका भी कर्तव्य है की आप मुझसे कुछ भी ना छिपाओ। अगर आप ने नहीं बताया तो कसम से मैं आज से अनशन करुँगी।”

माया की बात सुन कर मुझे हँसी आ गयी। मेरी ही छोटी बहन, जैसे मेरी बड़ी बहन हो ऐसे मुझे ही नसीहत दे रही थी और मैंने जो जो उसे जेठजी के कमरे में भेजते समय कहा था वही वह मुझे कह रही थी। मैंने माया को हलकी सी जफ्फी देते हुए कहा, “रे पगली, मैं तुझसे क्यों छिपाऊंगी? मैं तुमसे सारी बातें तो करती हूँ। जब हम एक दूसरे की चुदाई के बारे में भी खुल्लमखुल्ला बात करते हैं तो फिर अब मैं तुझसे कुछ भी कैसे छिपा सकती हूँ?”

 

वैसे मेरे और माया के बिच में औपचारिकता की कोई दीवार नहीं थी। माया की जेठजी से जब पहली बार चुदाई हुई तबसे हम दोनों एक दूसरे से सारी बातें साँझा करते रहते थे। यहां तक की हमारी हमारे पतियों से चुदाई के बारे में भी हम कई बार एक दूसरे की चुटकी लेते रहते थे। कई बार जब माया सुबह सुबह टेढ़ीमेढ़ी चलती तो मैं उसे रात को चुदाई के बारे में ताने मारना ना चुकती थी तो कई बार माया भी मेरी संजयजी से पिछली रात को हुई चुदाई के बारे में खिंचाई कर लेती थी।

इसी लिए हमारी बातें माया को बताने में मुझे कोई झिझक नहीं थी। बस झिझक थी तो सिर्फ यही की मैं मेरे पति संजयजी की कमी को जाहिर नहीं करना चाहती थी। पर अब माया ने मुझे इतनी तगड़ी कसम जो दे दी थी तो मैंने मेरी बात माया से साँझा करना ही ठीक समझा।

तब फिर मैंने माया को हमारे बच्चा ना होने के बारे में सारी बातें बतायी। मैंने संजयजी के बाँझ होने की बात जब बतायी तब वह दंग रह गयी। क्यूंकि पहले मैं उसे संजयजी मेरी कैसी तगड़ी चुदाई करते थे उसके बारे में बताती रहती थी, और हम कैसे फॅमिली प्लानिंग कर रहे थे वह भी मैंने माया को बताया था।

मैंने जब माया को मेरी समस्या के बारे में बताया तब वह एकदम गंभीर हो गयी। वह मुझसे थोड़ा अलग हो कर बैठी और मुझे ताकती हुई गहरी सोच में डूब गयी। मैंने उसे मेरे सामने जो तीन विकल्प थे उन तीनों विकल्पों के बारे में भी बताया। मैंने माया को यह भी कहा की क्यों मुझे पहले दो विकल्प मंजूर नहीं।

मैंने कहा की मैं नहीं चाहती थी की हमारे घर में किसी को भी पता चले की मरे पति नपुंशक हैं। वह नपुंशक तो बिलकुल नहीं थे पर बच्चा पैदा नहीं कर सकते। अब यह सारी बातों का बड़ा ही झंझट वाला स्पष्टीकरण रिश्तेदारों से कैसे और कौन करे? इसी लिए मैं इस राज़ को राज़ ही रखना चाहती थी।

अब हमारे अलावा माया को भी इस बात का पता लग चुका था। पहले माया को भी मैं यह बात नहीं बताना चाहती थी पर चूँकि माया मेरे हर राज़ में भागीदार थी और मैं उसके हर राज़ जानती थी इस लिए मुझे माया से यह बात शेयर करने में कोई खास दिक्क्त महसूस नहीं हुई। पर अब किसी और से यह बात ना पहुंचे यही मेरा मकसद था।

मेरी बात सुन कर माया ने मुझे कहा, “दीदी, एक नारी होने के नाते मैं आपसे सहमत हूँ। अपने पति की जरासी भी कमी कोई पत्नी नहीं चाहेगी की किसी के सामने आये। यहां तो यह सामजिक दृष्टि से इतनी बड़ी बात है। इस लिए मैं भी मानती हूँ की आपने सही विकल्प चुना है। पर क्या आप और संजयजी आपको किसी और मर्द से चुदवाने के लिए तैयार हैं?”

मैंने तब माया को कहा की मैंने मेरे पति संजयजी से वह सब बात कर ली थी। मैंने माया को यह भी कहा की मेरे पति तो पहले से ही जब यह बच्चे का चक्कर नहीं था तबसे ही मेरे पीछे पड़े थे की मैं मौज करने के लिए किसी गैर मर्द से चुदवाऊं।

मैंने माया को मेरी कॉलेज लाइफ के बारे में भी बता ही दिया ताकि वह समझ जाए की मैं पहले भी और मर्दों से चुदवा चुकी थी और मुझे जाती तरीके से किसी और मर्द से चुदवाने में कोई बहुत बड़ी आपत्ति नहीं थी। समस्या यही थी की ऐसा मर्द कहाँ से ढूंढे जो हमारे मापदण्ड में ठीक तरह से फिट बैठ सके।

जब मेरी बात ख़तम हुई तो माया एकदम गंभीर थी। वह उठ खड़ी हुई और बिना कुछ बोले उसने मुझे गले लगा लिया। मैंने महसूस किया की उसकी समझ में नहीं आ रहा था की वह क्या बोले। मैंने देखा की उसकी आँखें नम हो गयीं थीं।

मुझसे बिना कुछ बोले, कुछ देर तक मेरे गले लगे रहने के बाद अपने भावावेश को नियंत्रण में रखने की कोशिश करते हुए माया चुपचाप धीरे धीरे चलते हुए मेरे कमरे से बाहर चली गयी। मैंने पहली बार इतने ठोस तरीके से महसूस किया की माया अब कोई बाहर की हस्ती नहीं, वह हमारे परिवार में एकरस हुई हमारे परिवार की ही एक बड़ी ही जिम्मेवार सदस्य बन चुकी थी।

मैं जानती थी की माया से अपना राज़ सांझा करने से मैंने अपने दिमाग का बोझ शायद जरूर कुछ कम किया होगा, पर उससे मुझे कोई सहायता मिलने की उम्मीद नहीं थी।

क्यूंकि उसके जाते जाते जब मैंने माया की आँखों में झाँक कर देखा तो मुझे इस समस्या में मेरी कुछ मदद न कर पाने के कारण उसकी की आँखों में असहायता के भाव दिखे। मैं उसमें उसका दोष कैसे दे सकती थी भला? जब मैं और मेरे पति संजयजी ही इसका समाधान कई महीनों से नहीं निकाल पाए तो माया क्या करेगी?

इस बात के दो दिन बाद दोपहर के खाने के बाद जब मेरे पति संजयजी और बड़े भैया ऑफिस गए हुए थे और माताजी और पिताजी अपने कमरे में विश्राम कर रहे थे तब माया मेरे कमरे में आयी और मेरे पास आ बैठी। मैं उस समय अपने बालों को सँवार रही थी।

माया का चेहरा काफी गंभीर सा लग रहा था। मैंने माया की और घूम कर प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा, क्यूंकि उस समय माया भी सामान्यतः अपने कमरे में कुछ ना कुछ काम में लगी हुई होती थी। माया ने पूछा, “दीदी, जो मैं बात करने जा रही हूँ उसे आप को कुछ सदमा लगे या बुरा भी लगे तो मुझे माफ़ करना और अगर ना जँचे तो उसे नजरअंदाज़ कर देना।”

मैंने कुछ ना बोलते हुए माया की और देखा। माया ने मेरी नज़रों से नजर ना मिलाते हुए जमीन की और नजरें करते हुए कहा, “दीदी, आपने जो मुझे दो दिन पहले बात की थी, मैं आपसे उसके बारे में बात करने आयी हूँ। अगर आप को भयंकर एतराज ना हो तो मैं इसके बारे में एक बड़ा ही व्यावहारिक सुझाव देना चाहती हूँ।”

माया क्या कहने वाली थी यह जानने की उत्सुकता मुझसे रोकी नहीं जा रही थी, मैंने फिर भी उस समय चुप रहना ही ठीक समझा। हालांकि माया की आँखों में एकटक मेरी जिज्ञासु आँखें गाड़े बैठना माया को मेरी उत्सुकता जरूर बयाँ कर रहा होगा।

माया ने मेरी आँखों में मेरी स्वीकृति देखि तब बोली, “दीदी, मैं चाहती हूँ की आप किसी बाहर के आदमी से नहीं, अपने जेठजी से ही चुदवाइये। मतलब आपको जो बच्चा हो वह किसी और के वीर्य से नहीं जेठजी के वीर्य से ही हो। इससे घर की बात घर में रहेगी और बच्चा दिखने में भी हम सब की तरह तंदुरस्त, लंबा, चौड़ा और हैंडसम होगा।” यह कह कर माया चुप हो गयी और मेरी सकारत्मक या नकारात्मक प्रतिक्रया के इंतजार में कुछ आशंकित नज़रों से मुझे देखने लगी।

जब मैंने माया ने जो कहा उसे सुना तो मेरे पाँव तले से जैसे जमीन खिसक गयी। मेरे दिमाग में यह बात आयी ही नहीं थी और मैंने दूर दूर तक भी सोचा नहीं था की ऐसा कुछ हो सकता है। माया की बात सुन कर मुझे चक्कर आने लगे। मेरी हवा निकल गयी। जो माया कह रही थी, मेरे हिसाब से वह नामुमकिन सा था।

हालांकि माया ने जो बात कही थी वह बात काफी तर्कसंगत थी। पर उसकी बात अगर मैंने मेरे पति से की तो उनकी आस्था और विश्वास पर क्या कुठाराघात होगा यह सोचने से भी मैं डर रही थी। मैं मेरे जेठजी से चुदवाने की बात तो दूर, मैं उन के सामने नंगी कैसे होउंगी यह एक जटिल प्रश्न था।

अगर जो माया कह रही थी वह बगैर कुछ झंझट से हो सकता होता तो उससे अच्छी तो कोई बात ही नहीं हो सकती थी। कुछ झुंझलाहट और कुछ नाराजगी से माया को मैंने कहा, “माया, यह तो वही बात हो गयी ना? अगर मैं अपने जेठजी से ही चुदवाती हूँ तो फिर जेठजी को तो पता लग ही जाना है की मेरे पति संजयजी बाँझ हैं इसी लिए मैं उनसे चुदवा ने के लिए तैयार हुई हूँ? यही तो हमें नहीं करना है।

मुझे जेठजी को यह पता नहीं लगने देना है की मेरे पति बाँझ हैं। उससे तो फिर आई.वी.एफ़. ही बेहतर विकल्प था। उसमें मुझे बड़े भाई साहब के सामने नंगी हो कर चुदवाना तो नहीं पड़ेगा।”

माया मेरी बात सुनकर कुछ देर चुप रही, फिर मेरी और देख कर बोली, “दीदी, आप क्या समझते हो, मैंने इसके बारे में नहीं सोचा? अगर आप आई.वी.ऍफ़. से ही राजी हैं तो फिर मेरे हिसाब से वह सबसे अच्छा विकल्प है। पर आप किसका वीर्य लोगे? और क्या किसी के भी वीर्य से बच्चा पैदा करना वह सही है या फिर अपने ही पति के ज्येष्ठ भाई से बच्चा पैदा करना बेहतर है? जरा सोचिये तो।”

माया की बात में दम था। जेठजी दिखने में मेरे पति संजयजी से काफी मिलतेजुलते थे। जेठजी काफी हैंडसम, अक्लमंद, शशक्त, बलशाली और स्वस्थ थे। जो भी बच्चा उनके वीर्य से होगा जाहिर है वह हमारे परिवार के संस्कारों से सिंचित होगा।

वह जेठजी का भी प्यारा होगा। यह सारी बातें अपनी जगह सही थी। पर सवाल यह था की शेर के गले में घंटी बांधे कौन? मतलब जेठजी से कैसे चुदवाया जाए?

मैंने माया का यह प्रश्न फिलहाल टालने के लिए कहा, “चलो ठीक है, देखते हैं। यह होगा, नहीं होगा, कैसे होगा? यह सब बाद में देखेंगे। पहले मैं संजयजी से तो बात करके देखूं। मेरे ख्याल से तो वह इसके लिए कतई भी सहमत नहीं होंगे।

उनके दिल में जेठजी के लिए कितना सम्मान है वह मैं जानती हूँ। वह ऐसा कुछ करके आगे चलके इस बात के कारण हमारे संबंधों में दरार हो ऐसा कभी पसंद नहीं करेंगे।

अब दिक्कत यह भी है की क्या मेरे पति इसके लिए तैयार होंगे? यह भी एक समस्या है। उनसे वह बात कैसे करूँ यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है।”

माया ने अपना सर हिलाते हुए मुझसे सहमति जताते हुए कहा, “दीदी आप की परेशानी मैं समझ सकती हूँ। पर बात तो करनी ही पड़ेगी। यह एक सबसे बढ़िया और मेरे हिसाब से तो सिर्फ एक ही रास्ता है जो आप को सही बच्चे की माँ बना सकता है।

जहां तक आपकी जेठजी को पता लगने की समस्या है उसका इलाज मैंने सोचा है। पर सबसे पहले आप देवरजी से बात कीजिये, फिर उस समस्या को भी सुलझायेंगे।”

मैंने कुछ भी और रास्ता ना सूझने के कारण माया की बात से सहमत होते हुए कहा, “मैं तुम पर भरोसा करती हूँ। मैं तुम्हारे देवरजी से बात करके देखती हूँ। पता नहीं वह मानेंगे या नहीं।”

माया का सुझाव अमल में लाने की कोशिश करने के अलावा आखिर मैं कर भी क्या सकती थी? ज्यादा सोचने का समय भी तो नहीं था। हर एक दिन हमारे लिए बड़े ही मानसिक दबाव का दिन होता जा रहा था। हमारी हालत ऐसी हो गयी थी की मैं और संजयजी हमारे माता पिता के सामने जाने से भी डरते थे की अगर उन्होंने हमें देख लिया तो वह हमें कहीं बच्चे के बारे में पूछ ना बैठे।

उस रात को जब हम डिनर कर हमारे बैडरूम में सोने गए तब बत्ती बुझाने से पहले मैंने संजयजी से बात छेड़ी। मैंने माया से बच्चे को ले कर हमारी परेशानी के बारे में दो दिन पहले जो बात हुई थी उसके बारे में उन्हें बताया। मेरी बात सुन कर मेरे पति संजयजी ने कोई प्रतिक्रया नहीं दी।

वह मुझे अच्छी तरह से जानते थे। वह जानते थे की माया को मैंने अपनी परेशानी के बारे में बता दिया था वह कोई बड़ी बात नहीं थी। माया के साथ मेरा कितना घनिष्ठ सम्बन्ध था वह भलीभाँति जानते थे।

वह चुपचाप रह कर मेरे सामने देखने लगे। संजयजी समझ गए थे की मैं उनसे कुछ जरुरी बात करने जा रही थी। मैं उनसे जो ख़ास बात कहने वाली थी वह उसका इंतजार कर रहे थे। मैं असमंजस के मारे कुछ बोल नहीं पा रही थी। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं कैसे उनको कहूं जो माया ने मुझे कहा था।

मेरे पति भी धीरज का समंदर हैं। वह चुपचाप मेरे बोलने का इंतजार कर रहे थे। मैंने झिझकते हुए लड़खड़ाती जुबान मैं कहा, “माया। …. यह कह रही थी की…….. दरअसल माया ने हमारी समस्या जो बच्चे ……. के बारे में कुछ……… हल…… सोचा हुआ है, वह आप…….. को बताने……… के लिए माया ने…….. मुझे कहा है। अब मेरी समझ में यह नहीं आ रहा की जो उसने कहा है वह मैं आपसे वह कैसे कहूं?” कह कर मैं चुप हो गयी।

आगे संजयजी से बात करने की मेरी हिम्मत नहीं थी। संजयजी ने मरे सामने देखा। मेरे पति ने मुझे अपनी बाँहों में लिया और मुझे चूमते हुए कुछ मुस्कुराते हुए बोले, “अंजू, तू मुझे बहुत प्यारी है। मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ।” फिर मेरी नाइटी में अपना हाथ डाल कर मेरे बूब्स को दबा कर सहलाते हुए उन्होंने मुझे पूछा, “मैं अपने अनुमान से बताऊँ की माया ने तुम्हें क्या सुझाव दिया होगा?”

मैंने संजयजी से कहा, “आपको कैसे पता? खैर, बताइये, क्या सुझाव दिया होगा माया ने मुझे?”

मेरी बात सुन कर संजयजी ने मुझे उठा कर अपनी गोद में बिठा दिया। मैं मेरे पति के सख्त लण्ड को मेरी गाँड़ को टोंचते हुए महसूस करने लगी। संजयजी ने मेरी नाइटी के ऊपर के बटनों को खोल कर मुझे ऊपर से नंगा कर दिया। वह कुछ उन्माद के अतिरेक में मेरे स्तनोँ की निप्पलोँ को मुंहमें ले कर चूसने लगे।

मेरी निप्पलेँ भी मेरे पति के इस तरह उत्तेजित हो कर मुझे कामातुर कराने के कारण फूल गयीं थीं। मेरे स्तनोँ के शिखर पर मेरी निप्पलोँ को बिच में रख कर गोलाई में फैली हुई मेरे स्तनों की गोल तश्तरी सी मेरी एरोलाओं के सतह पर मारे उत्तेजना और रोमांच के जगह जगह फुन्सियाँ उठ खड़ी हो गयीं थीं। मैं मेरे पति के इस कदर अचानक इतने उत्साहित हो जाने की वजह समझ नहीं पायी।

पर उस समय मैं अपने पति से कामक्रीड़ा करने से भी कहीं ज्यादा यह सुनने के लिए आतुर थी की मेरे पति क्या समझ गए थे। मैं उनकी और बड़ी उत्सुकता से देखते हुए चुप रह कर उनके जवाब का इंतजार करने लगी।

कुछ भी समय ना गँवाते हुए. मेरे स्तनोँ को बेरहमी से मसलते हुए मेरे पति ने मुझे कहा, “मैं माया से यही उम्मीद कर रहा था। आज मैं समझ रहा हूँ की माया के हमारे जीवन में आने से हमारा जीवन कितना सुखमय और शांतिप्रद हो गया है। एक समझदार औरत के घर में शामिल होने से घर कितना प्रफुल्लित हो सकता है, माया उसकी मिसाल है।

जो माया ने सोचा है वह मैं भी सोच रहा था पर मैं उसे अन्जामि जामा पहना नहीं सकता था जब तक की तुम या माया और ख़ास कर माया उसके लिए राजी हो। यहां तो यह सुझाव स्वयं माया ने ही दिया है। मैं उस सुझाव के लिए माया की जितनी प्रशष्ति करूँ कम है।”

मैं मेरे पति के इस कदर गोल गोल बात करने से चिढ उठी। मैंने अपनी आवाज में अपनी झुंझलाहट को कुछ हद तक कम करने की कोशिश करते हुए कहा, “वह सब तो ठीक है पर आपने यह तो बताया नहीं की आपके हिसाब से माया ने क्या सुझाव दिया होगा? यह तो बताइये?”

मेरी निप्पलोँ को चूमते, चूसते और उत्तेजित हो कर अचानक ही अपने दांतों में चबाते हुए मेरे पति ने कहा, “अरे पगली, मैंने इतने तो तुझे क्लू दे दिए, अब भी नहीं समझी? चल ठीक है, जो मैंने अंदाजा लगाया है वह मैं तुझे बताता हूँ।”

इसके बाद संजयजी ने जो मुझे बताया था लगभग वह सारा का सारा करीब करीब उसी क्रम में मुझे कह सुनाया, जो माया ने मुझे कहा था। मेरे पति की बात सुन कर मैं चौंक गयी। क्या माया ने मुझ से पहले मेरे पति से बात कर ली थी? उन्हें कैसे पता की माया से मेरी क्या बात हुई थी?

मैंने तय किया की दूसरे दिन मैं माया को अच्छे से लताडुंगी। अगर संजयजी को ही बताना था तो फिर मुझसे बात क्यों की और मुझे क्यों कहा की मैं संजयजी से बात कर लूँ? मैं भी फ़ालतू में इतनी ज्यादा परेशान हो रही थी की मैं मेरे पति से इतनी ज्यादा नाजुक बात कैसे करूँ? पर यहां तो माया ने पहले से ही सारा सस्पेंस ख़तम कर दिया था।

संजयजी ने मेरे सर को अपने हाथों में पकड़ा और मेरी आँखों में आँखें डाल कर बोले, “तुम माया से कुछ भी मत कहना। माया से मेरी इस बारे में कोई भी बात नहीं हुई है। यह सिर्फ और सिर्फ मेरा अनुमान था। अभी तुमने अपनी बातों से कन्फर्म किया की मेरा सोचना सही था।

कल सुबह तुम माया से कहना की मैं उस के सुझाव से पूरी तरह सहमत हूँ। मुझे उसमें कोई आपत्ति नहीं है। अब आगे उसे जो कार्रवाई करनी है करे।” मेरे पति की बात सुन कर मुझे चक्कर आने लगे। इतनी गंभीर बात जो मैं उनको कहने से इतना डर रही थी, उन्होंने मेरे कहे बगैर ही उसे भाँप लिया और उसे इतना सहज रूप में भी ले लिया और उसका जवाब भी दे दिया?

जब मेरे पति ने भी इस बात की स्वीकृति देदी तब मुझे आसमान में सितारे नजर आने लगे। अगर माया ने जो चुनौती उठाई थी अगर वह पूरी भी कर पाती है तो भी मेरी तो शामत आनी ही थी। माया उसे कैसे पूरी करेगी यह देखना था।

मैंने दूसरे दिन सुबह जब माया को यह बताया की मेरे पति संजयजी ने उसके सुझाव को पूरी तरह ना सिर्फ मंजूरी दे दी थी बल्कि उन्होंने माया की सूझबूझ की उसके कारण भुरभुरी प्रशंशा भी की थी तो माया का चेहरा खिल उठा।

माया ने फ़ौरन मुझे गले लगाया और कहा, “दीदी, मैं कह नहीं सकती की आप ने यह सुबह समाचार दे कर मुझे कितना प्रसन्न किया है। आप सब ने मेरे जीवन को इतना सफल बनाया था की मैं उस एहसान को कैसे कुछ कम कर पाऊं यह मेरे लिए एक बड़ी समस्या थी। अब आपकी गोद में जब बच्चा होगा तो उसे देख कर मुझे लगेगा की मेरा भी इसमें कुछ योगदान था।”

मैंने माया के बदन पर प्यार से हाथ फिराते हुए कहा, “अरे पगली, वह सब तो ठीक है, पर अब तू यह सब करेगी कैसे? जेठजी को पता ना लगे और फिर भी वह मुझे चोदे, यह दोनों बातें एक साथ तो नहीं हो सकती ना?”

मेरी बात सुन कर माया का चेहरा खिल उठा। वह मेरी और मुस्कुराते हुए देख कर मुझ से अलग होते हुए बोली, “दीदी, अब आपने मुझे हरी झंडी दे ही दी है तो अब यह मेरी जिम्मेवारी है की यह मैं कैसे करूँ। अब आप इसकी चिंता मुझ पर छोड़ दीजिये।”

तब माया ने मुझे कहा की वह उसका ऐसा रास्ता निकालेगी की साँप भी मरे और लाठी भी ना टूटे। माया ने मुझे भरोसा दिलाया की वह ऐसा तरिका निकालेगी की जेठजी को पता ही नहीं चलेगा की संजयजी बाँझ हैं। मेरी समझ में यह नहीं आया की माया ऐसा कैसे कर पाएगी।

पर जब मेरे पति ही इस बात से राजी हो गए तो फिर मैं क्या बोल सकती थी? मेरे दिमाग में यह घुस नहीं रहा था की माया यह सब कैसे कर पाएगी।

मेरी हैरानगी इस बात को लेकर थी की एक पत्नी किसी और औरत को, और ख़ास कर अपनी ही देवरानी को अपने पति से चुदवा कर और उसे अपनी (एक तरह से) सौतन बना कर ऐसे खुश कैसे हो सकती है? यह मेरी समझ से बाहर था।

यह बात तो जाहिर थी की अगर मैं जेठजी से एक बार चुदने के लिए राजी हो गयी और अगर मैंने उनसे एक बार चुदवा लिया तो कहीं ऐसा ना हो की मुझे जेठजी से बार बार चुदवाने का मन करे।

फिर तो बड़ी समस्या हो जायेगी। कहीं मैं सारी मर्यादाओं को तोड़ कर उनके पास बेशर्म बनकर चुदवाने के लिए चली ना जाऊं। फिर तो सारी गोपनीयता भी ख़त्म हो जायेगी। मुझे कोई दुबारा चुदवाने से रोक नहीं पायेगा। उसके बाद तो सारा भांडा ही फुट जाएगा। जेठजी को भी अगर मुझे चोदने का मन हुआ तो कोई उन्हें उस हाल में मुझे दुबारा चोदने से मना नहीं कर पायेगा।

उस हाल में मैं तो मेरे जेठजी की दूसरी बीबी ही बन जाउंगी। पुरे घर में हुड़दंग मच जाएगा। माया को यह बात झेलनी पड़ेगी और अपने पति को मुझ से शेयर करना पड़ेगा। खैर यह माया को सोचने का विषय था, पर यह सब सोच कर मेरा दिमाग खराब हो रहा था।

मैंने माया को पूछा, “माया, क्या तुम्हें पूरा यकीन है की तुम यह सब करना चाहती हो? देखो, मैं कोई सुपर इंसान नहीं हूँ। मानलो की तुम्हारे पति और मेरे जेठजीसे चुदवाने के बाद अगर मुझे उनसे बार बार चुदवाने का मन करेगा और अगर मैं उनसे चुदवाने के लिए इतनी बेबस और बेशर्म हो गयी तो मुझे भी आप लोग उनसे चुदवाने से रोक नहीं पाओगे।

क्यों की एक बार अगर तीर कमान से निकल गया तो फिर तो निकल ही गया, वह वापस कमान में नहीं जा सकता। एक बार अगर लाज शर्म की मर्यादा टूट गयी तो फिर दूसरी बार और तीसरी बार भी टूट सकती है। फिर तो सारा भांडा ही फुट जाएगा अगर ऐसा हुआ तो मैं तो जेठजी की दूसरी बीबी और तुम्हारी सौतन बन जाउंगी। फिर तो मेरे कारण ख़ास तौर से तुम पर तो बड़ा ही जुल्म हो जाएगा।”

माया ने जो मेरे प्रश्न जवाब दिया उस जवाब सुन कर मैं हैरान रह गयी। माया ने कहा, “दीदी तुम नहीं जानती की मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ। देखिये, तुमने मुझे अनाथ से सनाथ बनाया, तुमने मुझे अपनी नौकरानी से जेठानी बनाया। तुमने मुझे विधवा से सधवा बनाया।

अब मेरी बारी है तो मैं तुम्हें एक बच्चे लिए तड़पता देखने के बजाये माँ बनते हुए देखूं। क्या यह मेरा सौभाग्य नहीं है? दीदी, अगर आपने मेरे पति से चुदवाया तो आपके साथ तो मेरे सम्बन्ध और भी घनिष्ठ हो जाएंगे।

आप मेरी दीदी से मेरी देवरानी तो बन ही गयी हो, अब मेरी देवरानी से मेरी सौतन भी बन जाओगी। इसे मेरा दुर्भाग्य मत समझो। यह तो मेरा सौभाग्य होगा। अगर सौतन बनी तो फिर तो आप मेरी सगी बहन बन जाओगी। हमारे बिच में कुछ भी गोपनीय नहीं रहेगा।”

मैं माया को देखती ही रही। माया की आँखों में एक दृढ निश्चय और मेरे प्रति ममता का भाव साफ़ झलक रहा था।

माया ने मेरे और करीब आ कर मेरे कानों में फुसफुसाते हुए कहा, ” दीदी सच बताऊँ? मैं तो इंतजार कर रही हूँ की काश यह सब गोपनीयता ना हो और एक रात ऐसी आये जब मेरे पति और आपके जेठजी से चुदवाने के लिए मैं ही आपको हमारे बेडरूम में ले जाउं और आपके कपडे उतार कर आपको उनके सामने नंगी कर उनका लण्ड अपने हाथ में ले कर आपकी चूत पर रख कर मेरे पति से आपको चोदने के लिए कहूँ।

वह दिन मेरे लिए कितना सौभाग्य का दिन होगा? यह सोच कर ही मेरा अंग अंग रोमांच से काँप उठता है। अगर हो सके तो मैं आपको मेरे पति और आपके जेठजी से एक बार नहीं बार बार चुदवाकर आपको भी वही उन्माद भरा आनंद दिलवाना चाहती हूँ जिसे मैं आपकी बदौलत एन्जॉय कर रही हूँ। मैं आप दोनों की जोड़ी देख कर बड़ी ही खुश हो जाउंगी। मेरे पति के चोदने से आप अगर खुश होंगी, और वह भी खुश होंगे तो मेरा जीवन सफल हो जाएगा।”

माया की यह बड़ी बात सुन कर मेरा मन किया की मैं माया के पाँव छू लूँ। पर मैंने खड़े हो कर माया को अपनी बाँहों में भर लिया और कहा, “माया तुम मेरी बहन ही नहीं, मेरी जान हो। यह सब बात कह कर तुमने मुझे अपनी ग़ुलाम बना लिया है। मुझे नहीं पता की मैं क्या कहूं और कैसे मेरी कृतज्ञता जाहिर करूँ?”

माया ने मेरी बात को अनसुनी करते हुए कहा की अब मैं निश्चिन्त हो कर अपना काम करूँ। आगे जो करना है माया करेगी। माया ने कहा की उसको इस काम को अंजाम देने के लिए कुछ तैयारी करनी पड़ेगी। कुछ दिन चाहिए। हो सकता है एकाध हफ्ता लग जाए।

मुझे समझ नहीं आया की माया ऐसा क्या जादू करेगी की मैं जेठजी से चुद भी जाऊं और जेठजी को पता भी ना लगे। पर शायद कहीं ना कहीं मुझे माया की सरलता का जादू और उसके स्त्री चरित्र पर विश्वास था जिसके कारण मुझे लगा की हो सकता है माया यह नामुमकिन को मुमकिन कर पाए।

माया में एक खूबी थी जो हर पति या प्रेमी उसकी पत्नी या प्रेमिका में चाहता है की हो। हमारी सभ्यता में उसे रम्भागुण कहते है। आदर्श पत्नी के लिए संस्कृत में एक श्लोक है जो मैं निचे प्रस्तुत कर रहा हूँ।

कार्येषु दासी, करणेषु मंत्री, भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा ।

धर्मानुकूला क्षमया धरित्री, भार्या च षाड्गुण्यवतीह दुर्लभा ॥

गृहकार्य में दासी, कार्य प्रसंग में मंत्री, भोजन कराते वक्त माता, रति प्रसंग में रंभा, धर्म में सानुकुल, और क्षमा करने में धरित्री माने धरती सामान हो। इन छे गुणों से युक्त पत्नी मिलना दुर्लभ है ।

इस श्लोक में एक शब्द है “शयने शु रम्भा।” कहते हैं की देवलोक में रम्भा एक अप्सरा है। उसे हर कोई देवता चाहता है क्यूंकि वह जब किसी के साथ भी कामक्रीड़ा करती है तो वह अपनी अदाओं और कामुक कारनामों से अपने सहशैया पुरुष का मन जित लेती है। माया में भी यह खूबी थी।

माया मुझे बताती रहती थी की मेरे जेठजी को चुदाई में आनंद का अतिरेक मिले इस लिए वह नयी नयी अदाएं सीखती थी और नए नए तरीके ढूंढती रहती थी।

हमारे मोहल्ले में कुछ महिलायें थीं जिनके साथ मैं और माया कभी मंदिर तो कभी बाज़ार जाया करती थी, कभी त्यौहार भी करती थी। उनमें से एक दो से माया कुछ ज्यादा करीब थीं। कई बार लडकियां भी अपनी ख़ास सहलियों से अपने निजी अनुभव और मन की बात शेयर करतीं हैं।

माया उन सहेलियों से बातें करती रहती थी की एक मर्द की अपनी प्रेमिका से या पत्नी से चुदाई की रति क्रीड़ा में क्या अपेक्षाएं होतीं हैं। कैसे एक औरत ऐसा कुछ करे जिससे उसके प्रेमी को सबसे अधिक सुख मिले। माया मुझसे भी कई बार यह सब पूछती रहती थी।

मैं माया को कभी नेट में देख कर तो कभी मेरे अपने अनुभव से उसका मार्गदर्शन करती रहती थी। मुझे माया की वह बात बड़ी पसंद थी। अगर पति और पत्नी एक दूसरे को ख़ुशी दें और चुदाई में अलग अलग तरीके से उत्तेजना और उत्साह ला पाएं तो दाम्पत्य जीवन काफी रसमय और टिकाऊ हो सकता है।

जब मेरे जेठजी माया की कामुक अदाओं से उत्तेजित हो कर माया की ऐसी तगड़ी चुदाई करते जैसे वह उनकी सुहाग रात हो तभी माया ख़ुशी से झूम उठती और अगली सुबह मौक़ा मिलते ही मेरे पास आकर मुझे पिछली रात की कहानी बता देती। इस मायने में माया मुझे जैसे मेरी छोटी बहन या बेटी हो ऐसा कई बार महसूस होता।

चुदाई के पहले, चुदाई दरम्यान और जब भी एकांत और सही मौक़ा मिले तब कपल्स का एक दूसरे से चुदाई के बारे में अपनी कल्पनाएं, तृष्णाएं और तरंगी इच्छाएं सांझा करना भी कामशास्त्र का एक जरुरी अंग है। अपने पति या पत्नी की ह्रदय के कोने में दबी छिपी हुई कामुक इच्छाओं को जागरूक कर उनका इस्तेमाल कर उनसे अपने दाम्पत्य जीवन को रसमय बनाना एक कला है।

शादीशुदा कपल्स शादी के कुछ सालों बाद अपने पार्टनर से ऐसी और दूसरी रसिक बातें करने में या तो झिझकते हैं या फिर उसमें कोई दिलचश्पी नहीं लेते और दाम्पत्य जीवन धीरे धीरे नीरस और उबाऊ और बोरिंग हो जाता है। चुदाई भी एक आवश्यक आपदा समान बोरिंग हो जाती है।

कपल्स को दाम्पत्य जीवन की रक्षा करने के लिए एक दूसरे के प्रति संवेदनशील रहना और चुदाई की क्रिया को रसमय बनाना आवश्यक है। माया इस बात को भलीभाँति समझती थी।

वैसे तो मेरे जेठजी किसी पार्टी में जाते नहीं थे। पर माया को एक बार मेरे जेठजी एक पार्टी में ले गए। वास्तव में तो उस पार्टी में उनको मजबूरी में जाना पड़ा। वह पार्टी जेठजी के किसी पुराने दोस्त ने जेठजी के ही सम्मान में दी थी। जब माया जेठजी के उनके दोस्त और उसकी पत्नी से मिली तो उनकी बात सुन कर वह आश्चर्यचकित सी रह गयी।

पैसों की किल्लत होते हुए भी मेरे जेठजी ने उस दोस्त को उसके बुरे समय में ऐसी मदद की थी की अगर उस समय जेठजी ने वह मदद ना की होती तो वह दोस्त अपनी पढ़ाई नहीं कर पाता। उनका दोस्त आगे की पढ़ाई करने के लिए विदेश स्कालरशिप के सहारे चला गया था। वह पढ़ कर विदेश में ह्रदय का एक नामी सर्जन बन चुका था और बहुत सारे पैसे कमा रहा था।

जेठजी तो उस बात को भूल गए थे, पर जेठजी का दोस्त जेठजी का वह अहसान नहीं भुला था। जब वह विदेश से वापस आया तो उसने जेठजी के सम्मान में एक पार्टी रखी और मेरे जेठजी और माया को ख़ास न्यौता दिया।

जेठजी का दोस्त काफी रंगीले मिजाज़ का था। उस पार्टी में दोस्त ने कुछ और दोस्तों को बुलाया और कुछ बार डांसरों को बुला कर डिस्को डांस का भी प्रोग्राम रखा था। पार्टी में कुछ लडकियां कैबरे डांस कर रहीं थीं। जेठजी की इजाजत लेकर जेठजी के दोस्त ने माया को उसके साथ डांस करने के लिए आमंत्रित किया।

जेठजी के बार बार आग्रह करने पर मज़बूरी में शर्माती हिचकिचाती माया डांस करने के लिए तैयार हुई। जेठजी के दोस्त ने माया की कमर में हाथ डालकर माया को डांस के स्टेप्स सिखाये और कुछ देर माया के साथ डांस किया।

माया डरी हुई झिझकती बार बार जेठजी की और देखती रहती थी की कहीं जेठजी को बुरा ना लग जाये। पर बुरा लगना तो दूर, जेठजी तालियां बजा कर माया की हौसला अफजाई करते रहे। मेरे जेठजी को भी उस दोस्त की पत्नी ने अपनी कमर के इर्दगिर्द हाथ डलवा कर अपना हाथ जेठजी की कमर में डालकर डांस करना सिखाया। माया ने पहली बार अपने पति को किसी औरत के साथ डान्स करते हुए देखा था। शायद जेठजी पहली बार ही किसी औरत के साथ नाच रहे थे।

माया को कतई भी अंदाज नहीं था की उसके पति किसी ऐसे कार्यक्रम में इस तरह आज़ाद पंछी की तरह हिस्सा ले सकते थे। एक लगभग नग्न लड़की तो जेठजी की गोद में ही बैठ कर कामुक अदाए कर जेठजी को उकसा रही थी। यह अनुभव माया और जेठजी दोनों के लिए अनूठा था।

इस डांस ने जेठजी और माया के जीवन में एक अद्भुत परिवर्तन लाने का काम किया। जेठजी और माया रात को वापस आये तो जेठजी ने उस पार्टी में माया के डांस की भूरी भूरी तारीफ़ की।

जेठजी ने माया को कहा की उन्होंने जिंदगी में बड़ा ही संघर्ष किया था पर माया का उनकी जिंदगी में आने के बाद अब उन्हें माया के साथ जिंदगी को पूरा एन्जॉय करने की इच्छा थी। माया को तब यकीन हो गया की उसके पति चुदाई के मामले में उतने भी रूढ़िवादी नहीं थे जितना सब सोचते थे। माया को लगा की अगर मौक़ा मिले तो उसके पति चुदाई में अलग अलग तरिके के प्रयोग करने के लिए तैयार भी हो सकते थे।

माया के यह समझ लेने के बाद माया और जेठजी की काम क्रीड़ा में काफी परिवर्तन आने लगा।

उस पार्टी ने माया को भी कामक्रीड़ा के कुछ नए सोपान सिखाये। कभी हफ्ते के अंत में तो कभी जब दोनों का मूड रूमानी हो या फिर जब भी मौक़ा मिलता, जेठजी के सामने चुदाई से पहले माया अच्छी तरह बनठन कर, आभूषण पहने हुए संगीत लगा कर संगीत की लय पर थिरकते हुए एक कैबरे की नर्तकी की तरह कामुक अदाएं करते हुए, एक के बाद एक वस्त्र निकालते हुए अपनी पतली कमर, अपने कूल्हे, चूँचियाँ, घुंघराले घने बाल, अपनी जांघें बल्कि अपने पुरे कामुक बदन को इस तरह लचकाती, मटकाती और लहराती थी की कई बार तो जेठजी माया को निर्वस्त्र होते हुए देखते हुए ही झड़ जाते थे।

कभी इस तरह नृत्य और अदाएं करते हुए जेठजी की गोद में बैठ कर उनके लण्ड से खेलना या फिर जेठजी के कुर्ते में हाथ डाल कर उनके बदन को प्यार से सहलाना और ऐसी अनेकानेक कामकलाप कर माया जेठजी को इतना उन्मादित कर देती थी की जेठजी अपने सख्त खड़े हुए फौलादी लंड को सहलाते हुए बदहवास बन कर माया को ही देखते रहते थे।

इसके बाद नंगी हो कर जेठजी से चुदवाते हुए माया प्यार से अदाएं करते हुए अपनी आँखों की पलकों को मटकाती हुई जेठजी की और ऐसे कटाक्ष भरी नज़रों से देखती की जेठजी माया को इस कदर बेतहाशा चोदते जैसे माया किसी और की बीबी हो।

जेठजी से चुदवाते हुए भी माया अपने बदन को इस तरह मचलती रहती और इतनी कामुक कराहटें और सिसकारियाँ मारती रहतीं जिससे जेठजी को अहसास होता की उनके तगड़े लण्ड से हो रही तगड़ी चुदाई से माया कितना उन्माद भरा आनंद पा रही है। माया चुदवाते हुए हरदम जेठजी का हौसला बढ़ाती रहती थी।

माया ने जब मुझे यह बताया की मेरे जेठजी भी नए नए तरीके से माया को चोदने में काफी दिलचस्पी ले रहे थे तब मैं बड़ी खुश हुई की कहीं ना कहीं जेठजी के जीवन में जो कुछ एक नया आनंद, उत्तेजना और उन्माद माया के कारण आया था उसमें मेरा भी कुछ थोड़ासा योगदान था।

उस पार्टी के बाद माया को उसके पति (मेरे जेठजी) में कुछ और अजीबोगरीब परिवर्तन नजर आया। जेठजी कई बार माया से बात करते हुए पूछते रहते की क्या माया जेठजी से सतुष्ट है? कहीं ना कहीं मेरे जेठजी के मन में यह आश्चर्य जनक बात आयी की किसी भी कपल की चुदाई में कुछ ना कुछ नवीनता होनी चाहिए।

जेठजी ने इंटरनेट पर देखा था की कई कपल अपने पति अथवा पत्नी के अलावा पराये मर्द अथवा औरत से भी मैथुन माने चुदाई करते हैं और इस तरह वह एक दूसरे की सहमति से परपति या परपत्नी से चुदाई का आनंद लेते हैं।

उस पार्टी में भी माया को दूसरे मर्द के साथ डांस करते हुए देख जेठजी को इर्षा की बजाय उत्तेजना महसूस हुई थी। उसी तरह जब डांसर उन के साथ छेड़खानी कर रही थी तब जेठजी ने कुबूल किया की उनका लण्ड सख्त हो गया था। जेठजी भी दोस्त की पत्नी के साथ डांस करते हुए उत्तेजित हो रहे थे।

माया जेठजी की वासना की उस भड़की हुई आग में घी डालने का काम कर रही थी। मेरे जेठजी से चुदवाते हुए हमेशा माया जेठजी की चुदाई करने की क्षमता की तारीफ़ करते हुए नहीं थकती थी। वह यह एहसास दिलाती रहती थी की जेठजी चुदाई में आसानी से एक साथ दो औरतों को संतुष्ट करने की क्षमता रखते थे।

जेठजी के मन में कहीं ना कहीं चुदाई में नए नए परिक्षण करने की गुह्य इच्छा पनपने लगी थी। इस मायने में शायद धीरे धीरे मेरे जेठजी के सिद्धांतो की कठोरता क्षीण होती जा रही थी।

माया ने इसी को देखते हुए मौका भाँप लिया और मुझे माँ बनाने के लिए जेठजी से चुदवाने के बारे में सोचा। पर माया के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था की माया मुझे जेठजी से कैसे चुदवायेगी जिससे मेरे और जेठजी के बिच की जो सम्मान और औपचारिकता की दिवार है वह धँस ना जाये और मैं माँ भी बन सकूँ ।

माया का स्वभाव था की वह जब कोई बात अपने मन में ठान लेती है तो फिर उसका कुछ ना कुछ रास्ता निकाल ही लेती थी। माया पोर्न साइट पर जा कर चुदाई के अलग अलग तरीकों के बारे में रिसर्च करने लगी। वहाँ उसने देखा की कई बार पति पत्नी एक दूसरे की आँखों में पट्टी बाँध कर चुदाई करते थी।

माया ने एक वीडियो ऐसा देखा जिसमें एक पति अपनी पत्नी की आँखों पर पट्टी बाँध कर चुदाई करते हुए अपने किसी दोस्त को भी उसकी पत्नी को चोदने के लिए बुला लेता है और उसे मौक़ा देता है की वह उसकी पत्नी को चोदे। दोस्त पत्नी को अच्छी तरह से चोदकर चला जाता है और पत्नी को पता भी नहीं लगता की उसे किसी और मर्द ने चोदा था।

शायद ऐसे भी हो सकता हो की पत्नी को दूसरे मर्द की चोदने की अलग शैली से पता लग भी गया हो की उसे कोई दुसरा मर्द चोद रहा था; पर वह लज्जा या झिझक के मारे कुछ नहीं बोलती और चुपचाप दूसरे मर्द से चुदवा लेती है। इस तरह शर्मीली पत्नी को, जो वैसे किसी गैर मर्द से चुदवाने के लिए राजी नहीं होती उसे इस तरह धोखे में रख कर पति दूसरे मर्द से चुदवा लेता है।

माया ने उस वीडियो को देख कर अपना मन बना लिया की वह कैसे मुझे अपने पति (मेरे जेठजी) से चुदवायेगी।

उसी हफ्ते में एक रात जब मेरे जेठजी माया से चुदाई के मूड़ में थे तब माया ने मौक़ा देख कर पासा फेंका।

माया ने कहा, “आप कई बार मुझे कहते हैं ना, की हमें कुछ नए नए प्रयोग करने चाहिए? क्यों ना हम एक नया प्रयोग करें? मैंने एक साइट पर देखा था की एक पत्नी अपने पति की आँखों पर पट्टी बाँध कर अपनी चुदाई करवाती है और पति को ऐसा एहसास दिलाती है जैसे वह किसी और औरत की चुदाई कर रहा है।

मेरा मन कर रहा है की आप अपनी आँखों पर पट्टी बाँध कर मुझे चोदें और यह सोचें जैसे आप किसी और औरत को चोद रहे हैं?” माया की बात सुन कर जेठजी बहुत खुश हुए। वह माया की बात फ़ौरन मान गए।

उस माया ने मेरे जेठजी की आँखों पर सख्ती से पट्टी बाँध दी और फिर रात जैसे कोई दूसरी औरत मेरे जेठजी से पहली बार चुदवा रही हो उस तरह माया पलँग पर मचलती फुदकती और जेठजी की चुदाई से जैसे बहुत ज्यादा आतंकित हुई हो और उनके लण्ड से चुदवाने में उसे बड़ा ही कष्ट हो रहा हो ऐसे कराहती रही और मेरे जेठजी को चुदाई के आनंद के चरम पर ले जा कर चुदवाया आधी रात तक इतना बढ़िया तरीके से जेठजी का लण्ड चूसा, अपनी चूत जेठजी से चुसवाई और अलग अलग पोजीशन में इतना बढ़िया तरीके से चुदवाया की जेठजी माया पर न्यौंछावर हो गए।

जब माया ने मुझे यह प्लान बताया तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। माया ने जेठजी से मेरी चुदाई का रास्ता अब साफ़ कर दिया था। पर कहीं ऐसा तो नहीं होगा की मेरी चुदाई करते हुए जेठजी अपनी आँखों की पट्टी निकाल दें और मुझे देखलें?

या कहीं ऐसा तो नहीं होगा की मेरी और माया की चुदाई करवाने का अंदाज अलग होने के कारण जेठजी को शक हो जाए की वह वाकई में ही किसी और औरत को चोद रहे थे, और आँखों से पट्टी निकाल दें और मुझे देख लें?

खैर मैं और माया कद और बदन में एक दूसरे से काफी मिलती जुलती थीं। हालांकि मेरी चूँचियाँ माया की चूँचियों से कुछ बड़ी थीं और माया के कूल्हे मेरे कूल्हों से कुछ बड़े थे। पर आँख पर पट्टी बंधे जोरदार चुदाई करते हुए शायद ही जेठजी इसे भाँप पाएं। अब यह जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा। और कोई रास्ता भी तो नहीं था।

जेठजी के ऐसे तगड़े लण्ड से चुदवाने की बात सोचते हुए ही मेरी चूत से पानी रिसने लगा। कैसे मैं मेरे जेठजी का ऐसा तगड़ा लण्ड ले पाउंगी? खैर, माया की काफी अर्से से चुदाई करते हुए मेरे जेठजी का लण्ड कुछ तो नरम जरूर हुआ होगा यह ही मेरे लिए एक सांत्वना का विषय था। पर फिर भी जेठजी से चुदवाने के बारे में सोचते ही मेरे पुरे बदन में ना जाने क्या होने लगता था।

मैंने मेरे पति संजयजी को जब इसके बारे में बताया तो उनकी ख़ुशी का भी ठिकाना ना रहा। उन्होंने मुझे सजधज कर तैयार हो कर जाने को कहा। मैंने कहा, “सजने की क्या जरुरत है? जेठजी तो मुझे देख नहीं पाएंगे?”

तो मेरे पति संजयजी ने कहा, “जब मैंने तुम्हें शादी के लिए पसंद किया था तो मेरे मन में एक दबी हुई कामना थी की काश तुम्हारी सुहाग रात मैं तुम्हें चोद कर नहीं, मेरे बड़े भैया से चुदवा कर करवा पाता। काश हमारी वजह से उनके जीवन में जो सूखापन आया था उसे तुम मेरे जेठजी से चुदवा कर उनका जीवन हराभरा कर सकती।

उस समय तो वह नहीं हो पाया। फिर माया आयी और माया ने वह काम किया जो मैं तुमसे करवाना चाहता था। पर अब जब मौक़ा आया ही है तो मैं चाहता हूँ की तुम जेठजी के साथ वह सुहाग रात अब मनाओ। इसी लिए मैं चाहता हूँ की तुम जब बड़े भैया के कमरे में जाओ तो सजधज कर जाओ। क्या तुम इतना मेरे लिए करोगी?”

जब मैने माया से मेरे पति के मन की वह बात कही तो माया ने कहा वह उसकी भी व्यवस्था कर देगी।

तय किये अनुसार मेरी क़त्ल की रात आ गयी। उस रात मुझे माया ने नयी नवेली दुल्हन सा सजाया। जब संजयजी ने मुझे श्रृंगार करने के बाद देखा तो बोले, “अंजू, तू इतनी सुन्दर लग रही है की मेरा मन करता है की मैं अभी ही तुझे नंगी कर चोद डालूं। पर क्या करूँ, आज तेरी बड़े भैया के साथ सुहाग रात है। अगर मैंने ऐसा कुछ किया तो तेरा श्रृंगार बिगड़ जाएगा।”

माया ने जेठजी को बता रखा था की वह चाहती थी की उस रात माया नयी नवेली दुल्हन जैसा श्रृंगार कर मेरे जेठजी से चुदवाये।

दूसरी तरफ माया भी रात के ठीक दस बजे, मेरी ही तरह उसी लाल रंग की साडी और बाकी का सारा श्रृंगार कर तैयार हो चुकी थी। मुझे माया ने कमरे के किवाड़ के बाहर खड़े रहने को कहा था।

जब सब अपने अपने कमरे में जा चुके थे तब माया मेरी ही तरह सजी हुई अपने बैडरूम में मेरे जेठजी के पास पहुंची।

जेठजी ने नयी नवेली दुल्हन के रूप में सजी हुई माया को देखा तो उसे बुला कर अपनी बाँहों में लिया। अक्सर माया जेठजी को खुश करने के लिए कुछ ना कुछ नए प्रयोग करती रहती थी।

उस रात माया ने कहा, “आज की रात आप मेरे साथ नहीं किसी दूसरी नयी नवेली दुल्हन के साथ अपनी सुहाग रात मनाएंगे। आज रात मैं कुछ नहीं बोलूंगी। अगर मैं कुछ बोली तो फिर आप को पता चल जाएगा की वह कोई दूसरी नहीं मैं ही हूँ तो सारा मजा किरकिरा हो जाएगा। मुझे चोदते हुए आप यही सोचिये की आप मुझे नहीं किसी और औरतको चोद रहे हैं।”

यह कह कर माया ने मेरे जेठजी से लिपट गयी, उनको होँठों पर गालों पर, हर जगह चूमते हुए कुछ भावुक हो गयी। फिर अपने आप पर नियंत्रण रखते हुए माया ने जेठजी की आँखों पर सख्ती से एक काली पट्टी बाँधी।

माया ने फिर एक काली पट्टी ले कर जेठजी की आँखों पर सख्ती से बाँध दी।

जब चुदाई के लिए मन में तीव्रेच्छा होती है, जब हवस दिमाग पर हावी होता है तो सिर्फ एक औरत को चोद कर या एक ही मर्द से चुदवा कर मन नहीं भरता। हमें उसमें विविधता चाहिए। विविधता भी कई रूप में प्रगट होती है। अलग अलग मर्दों से चुदवाना या अलग अलग औरतों को चोदना।

इसके अलावा विविधताओं में अलग अलग तरीकों से चुदाई करना या करवाना; जिसमें गाँड़ मारना या मरवाना (जिसे कई लोग अप्राकृतिक मानते हैं), दो या ज्यादा मर्दों से एक औरत की चुदाई, या दो कपल के बिच में एक दूसरे की बीबी को चोदना, और इस तरह की अनेकानेक कई विविधताएं शामिल होतीं हैं।

कई बार औरतों या मर्दों की आँखों पर पट्टी बाँध कर या हाथ पाँव बाँध कर औरतों को चोदना ऐसे प्रयोग होते हैं। आजकल तो पूरी दुनिया में इस तरह के नए नए प्रयोगों की भरमार नेट पर देखने को मिलती है।

ऐसे प्रयोग अगर सावधानी से और कभी कभी किये जाएँ तो उचित है। यह भी ध्यान रहे की पति और पत्नी ऐसे प्रयोग एक हादसा समझ कर ही करें। क्यूंकि यह प्रयोग अगर ज्यादा नियमित रूप से किया जाए तो पति और पत्नी में परिपक्वता के अभाव से कई बार अविश्वास, इर्षा, मोह और अहंकार के कारण क्लेश पैदा हो सकता है।

उस समय यह धधकती हवस की ज्वाला के पागलपन को शांत करने के लिए अपार धीरज, सहनशीलता और अपने साथीदार के प्रति संवेदनशीलता भरा प्यार हमारे अंतर्मन में होना आवश्यक है। पति पत्नी को यह समझना होगा की ऐसे प्रयोग जिंदगी की राह में एक अनुभव के तौर पर ही करने हैं।

जिंदगी तो अपने साथीदार के साथ ही गुजारनी है। जिंदगी में ऐसे प्रयोग एक रोमांचक हादसा ही बन कर रह जाए, जिंदगी की राह ना बदलने की कोशिश करें तो ही बेहतर हैं। कभी कभार उत्तेजना में चोदना या चुदवाना एक आसान बात है पर पति पत्नी बनकर जीवन भर साथ निभाना मुश्किल है।

जैसा की मैंने बताया, मैं माया से एकदम खुली हुई थी। माया मुझे उसकी चुदाई मेरे जेठजी कैसे करते थे उसके बारे में सब कुछ बताती थी। तब तक मुझे नहीं मालुम था की मेरे जेठजी इतने रंगीले मिजाज के होंगे।

जब अचानक एक दिन मैंने सोते हुए जेठजी का लण्ड देखा और नींद में ही जेठजी को उसे सहलाते देखा तब मुझे एहसास हुआ की मेरे जेठजी को उन्हें प्यार करने वाली औरत की सख्त जरुरत है। उस समय मेरे मन में भी अजीब सी हलचल हो रही थी। पर मेरे जेठजी का दबदबा ही कुछ ऐसा हमारे दिमाग पर छाया हुआ था की उनके बारे में इधरउधर सोचना हमारे लिए नामुमकिन सा था।

पर आखिर में तो मैं भी एक औरत ही थी ना? और किसी भी औरत को अगर किसी मर्द का ऐसा तगड़ा लण्ड देखने को मिले तो उसके मन में हलचल होगी ही, यह स्वाभाविक था। खास तौर से मेरे जैसी औरत के लिए, जिसने चुदाई में विविधता का अनुभव किया हुआ था और चुदाई के बारे में जिसके विचार ज्यादा रूढ़िवादी नहीं थे, उसका मन तो ऐसे वाकये से हिल जाएगा ही। ।

कुछ देर मेरे मन में भी उलटपुलट ख़याल आते रहे पर मैं अपनी चूत में मेरे जेठजी के लण्ड को लेने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। फिर हमारे पास माया थी जो मेरे जेठजी की समस्या हल कर सकती थी। माया को भी एक मर्द की जरुरत थी।

जेठजी के साथ माया की सेटिंग कराना तर्कसुसंगत था। जेठजी का मन जानना जरुरी था इस कारण मैंने कुछ जोखिम मोल कर माया को किसी बहाने मेरे जेठजी के पास करीब आधी रात को अच्छी तरह समझा बुझा कर भेजा। जैसा की पाठक जानते हैं, माया जेठजी के पास गयी और फिर वही हुआ जो मैं चाहती थी और जो होना चाहिए था।

दोनों की वासना मर्यादाओं के बंधन तोड़कर बाहर आ गयी और पहली बार माया की मेरे जेठजी से तगड़ी चुदाई हुई और फिर उनकी शादी भी हो गयी। पहली रात की माया की तगड़ी चुदाई से ही मैं जान गयी थी (जब माया पूरी चुदाई के दरम्यान चीखती, चिल्लाती, कराहती और सिकारियाँ भरती रही थी) की मेरे जेठजी से चुदवाना किसी भी औरत के लिए एक ख़ास अनुभव होगा। अब मेरे जेठजी से चुदवाने की मेरी बारी आने वाली थी यह सोच कर ही मैं मन ही मन डर (या रोमांच?) के मारे काँप रही थी।

माया और मैं करीब करीब एक ही कद और काठी के थे। पर फिर भी मन में डर तो था ही की मुझे चोदते हुए मेरे जेठजी को कहीं शक ना हो जाए की मैं माया नहीं कोई दूसरी औरत थी। माया कई बार कह चुकी थी की मेरे जेठजी माया को कम ही बक्षते थे। जेठजी माया को करीब करीब हर रोज ही चोदते थे। माया भी तो बड़े उत्साह से चुदवाती थी।

यह तो साफ़ था की इतने समय में मेरे जेठजी माया के बदन के हरेक मोड़, हरेक उभार, हरेक ढलाव, हरेक छिद्र और हरेक कोने से वाकिफ हो चुके होंगे। भले ही दो औरतें बदन के नापदण्ड के हिसाब से एक दूसरे से मिलती जुलती हों, पर हर औरत के बदन में और चुदाई के समय की हरकतों में छोटामोटा फर्क तो होता ही है।

हालांकि माया ने मेरे साथ रह कर मुझे काफी टिप्स दिए थे की मुझे कैसे अपने आप को माया की तरह दिखाना है, पर फिर भी कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ गड़बड़ हो सकती थी। इस बात को ले कर मन में डर तो था ही।

माया की टिप्स सुन कर तो मैं और डर गयी थी। तब मुझे माया ने ढाढ़स देते हुए कहा था, “दीदी, देखो अगर आपके जेठजी को कोई फर्क महसूस भी हुआ तो वह यही समझेंगे की मैं ही दिखावा कर रही होउंगी, ताकि उनको दूसरी औरत का एहसास हो। हाँ, एक बात हो सकती है। अगर आप को मेरे सामने नंगी होने में और मेरे पति और आपके जेठजी से चुदने में एतराज ना हो तो अगर आप कहो तो मैं आप के पास ही रहूंगी ताकि वक्त आने पर अगर कुछ बोलना पड़ा तो मैं बोल दूंगी।”

माया की बात सुन कर मेरा माथा भी ठनक गया था। अब यही बाकी रह गया था! खैर, जब जेठजी से चुदवाना ही था और वह भी माया के कहने से तो फिर वैसे भी क्या शर्म और क्या लाज? माया ने भी तो मेरे कहने से मेरे जेठजी से चुदवाया था।

माया भी जेठजी की चुदाई के बारे में मुझे आकर कुछ भी छिपाए बिना सब कुछ साफ़ साफ़ बता देती थी। मैं इतने महीनों में माया से जेठजी कैसे चोदते थे, क्या क्या पोजीशन में चोदते थे, चोदते समय वह क्या क्या बोलते थे और माया क्या क्या बातें करती थी यह सारी बातें माया मुझे विस्तार पूर्वक बताती रहती थी।

कई बार ऐसा होता था की माया नहा रही होती थी और अगर मैं उसके कमरे में पहुँच गयी तो बेतकल्लुफ, माया मेरे साथ बातें करते हुए तौलिये से अपना बदन पोंछते हुए मेरे सामने ही कपडे बदलती थी और ऐसा करते हुए कई बार मुझे उसकी जाँघें, चूत, गाँड़, चूँचियाँ, निप्पलेँ सब कुछ दिख जाता था। वह उन्हें छिपा ने की कोशिश भी नहीं करती थी।

एक दो बार तो तौलिया गिर जाने से वह मेरे सामने बिलकुल नंगी भी हो गयी थी। बादमें जैसे कुछ हुआ ना हो वैसे माया तौलिया उठा कर लपेट लेती थी। एक बार तो उसने बगैर तौलिया लपेटे ही नंगी रहते हुए ही अलमारी में से कपडे निकाल कर पहन लिए थे। मैं जब उसे भौंचक्की सी देखने लगी तो मुझे देख कर वह बोली, “क्या हुआ दीदी? हम दोनों औरतें ही तो हैं? इस में क्या छिपाना?”

माया की बात सुनकर मैं तय नहीं कर पा रही थी की क्या मुझे माया के देखते हुए मेरे जेठजी से चुदवाना चाहिए या नहीं? सबसे पहली बार माया ने जब मुझे मेरे जेठजी से हुई तगड़ी चुदाई के बारे में सविस्तार बताया था तब से मेरे मन में पता नहीं क्या अजीबोगरीब भाव पैदा होने लगे थे। उस वक्त तो मेरी चूत इस कदर गीली हो गयी की शायद मेरी पैंटी भी भीग गयी थी। उसके साथ साथ ना चाहते हुए भी कहीं ना कहीं मेरे मन की गहराइयों में माया के लिए इर्षा के भाव हो रहे थे।

काश माया की जगह मैं मेरे जेठजी से चुदवा ने के लिए जा पाती। मेरे जहन में यह इच्छा एक ज्वाला की तरह भड़क उठी थी। पर जेठजी का दबदबा और मर्यादा के कारण इसे अमल में लाना तो दूर, इसके बारे में सोचना भी मेरे लिए लक्ष्मण रेखा को लांघने के समान अयोग्य था।

वही मेरे मन की प्रबल इच्छा छद्म रूप में ही सही पर अब पूरी होने जा रही थी। मैं मेरे जेठजी से चुदने वाली थी। मैंने माया को कहा, “जब सिर ही ओखल में रख ही दिया है तो अब मुसल के क्या डरना?”

मैंने अपने मन से सारे डर और झिझक को निकाल फेंका। मैं जेठजी से वैसे ही चुदवाने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गयी जैसे मैं अपने पति से या किसी और मनपसंद मर्द से चुदवाती। मैंने जेठजी को मेरे जेठजी के रूप में नहीं पर मेरे आशिक़ या प्रेमी के रूप में देखने का मन बना लिया।

अगर मैं मेरे जेठजी से चुदवाते समय उन्हें मेरे जेठजी के रूप में देखूंगी तो मेरे मनमें उनके लिए जो श्रद्धा रूपी आदर है उसके कारण मुझमें एक अजनबी सा भौतिक अंतर, हिचकिचाहट और झिझक रहेगी। वह भाव मुझे उनसे प्यार से चुदवाने नहीं देगा।

मैं यहां यह स्वीकार करती हूँ की मेरे मन में हमेशा मेरे जेठजी के लिए जो गाढ़ आदर और सम्मान के कारण प्यार का भाव था उसके चलते मैंने कई बार सपनों में जेठजी से बेतहाशा दबंगाई से खूब चुदवाया था।

हरेक स्त्री के मन में जो उसके अति प्रिय पुरुष रिश्तेदार, चाहे वह भाई, पिता, जेठ, देवर, ससुर, चाचा, ताऊ या कोई और हो; कहीं ना कहीं, कभी ना कभी उनसे चुदवाकर उनको बेतहाशा प्यार कर उनको सुख देने का भाव तो आता ही है। शायद इसी भाव पर लगाम देने के लिए समाज ने कुछ नियम बनाये और उनके द्वारा बंधन पैदा किये, जिनके कारण इस भावना पर नियंत्रण किया जा सके।

जब मुझे मेरे जेठजी से चुदवाने का अवसर मिला तो मेरा कर्तव्य बनता था की मैं उनको वह उच्छृंखल, उन्मत्त, उन्मादपूर्ण आनंद दे पाउं जो मुझे उनको एक प्यारी अभिसारिका के रूप में देना चाहिए। अगर भावान्तर बिच में आ गया तो फिर ना ही मैं स्वयं उनसे वह चुदाई का आनंद ले पाउंगी जिसके लिए मैंने इतना बलिदान किया था और ना ही मैं उनको वह आनंद दे पाउंगी जो मुझे उनको देना चाहिए।

यह सच था की मैं उनसे माँ बनने के लिए चुदवा रही थी। पर यह भी सच था की चुदवाते समय अगर स्त्री उन्छृंखल आनद से चुदवाती है तो उसका बच्चा भी आनंदी, शकुशल, कुशाग्र, समझदार और संतोषी पैदा होता है। अगर चुदवाते समय स्त्री के मन में चिंता, द्वेष, ग्लानि या दोष का भाव हो तो उसका नकारात्मक असर बच्चे पर भी पड़ता है।

मैंने माया को कहा, “माया, मैं सच कहती हूँ, जब तुमने मुझे मेरे जेठजी से चुदवाने का प्रस्ताव किया था तब तो मैं दिखावा कर रही थी की मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती थी। पर वास्तव में तो मेरे अंतर्मन से बहुत खुश हुई थी। मेरी समस्या यह थी की मैं मेरे जेठजी के सामने उनकी बहु बन कर कैसे चुदवा सकती हूँ? आज तुमने मुझे यह मौक़ा दिया है की मैं उनसे चुदवा भी लुंगी और हमारा भेद भेद ही रहेगा। तो अब हमें इस प्रयास को सफल बनाना है।

माया प्लीज यह देखना की मेरी इज्जत बनी रहे और यह भेद ना खुले। मैं तुम्हारे भरोसे यह रिस्क ले रही हूँ। मुझे पुरे स्वच्छंद तरीके से मेरे जेठजी से चुदवाना है। मैं चाहती हूँ की मैं भी तुम्हारे पति और मेरे जेठजी को वैसा आनंद दे सकूँ जैसा की तुम देती हो। इसके लिए बेहतर है तुम भी पास में ही रहो और जरुरत पड़ने पर इशारों से मुझे मार्गदार्शन करती रहो। मुझे तुम्हारे पति और मेरे जेठजी से तुम्हारे सामने ही चुदवाना होगा। मैं तैयार हूँ।”

मेरी बात सुन कर माया मुझसे लिपट गयी और बोली, “आपने मेरे सर पर बड़ी ही जिम्मेवारी दी है। मैं इसे दिलोजान से पूरी करने की कोशिश करुँगी। आपने पहले मुझे नौकरानी से जेठानी बनाया और अब जेठानी से आगे बढ़ कर सौतन बना दिया। सौतन शब्द बोलने में शायद बुरा लगता होगा, पर हम दोनों के परिपेक्ष में मुझे तो बड़ा मीठा लगता है। मुझे लगता है जैसे हम दोनों अलग नहीं एक ही हैं। आपने मुझे जब इतना ज्यादा सम्मान दिया तो आपका सम्मान रखना मेरा फर्ज बनता है।”

माया की बात सुन कर मैं उस माहौल में भी हंस पड़ी। कितनी प्यारी, सरल, परिपक्व और भोली थी मेरी माया! मैंने माया को बाँहों में भर लिया। कुछ देर तक उस संवदनशील माहौल में लिपट रहने के बाद, जब हम अलग हुए तो माया कुछ गंभीर सी हो गयी और उसने मुझे अपने पास बिठा कर उस शाम का प्रोग्राम समझाया।

उसके मुताबिक़, मुझे तैयार हो कर रात को माया के बैडरूम के बाहर रहना था और उसके बाद जब माया अपने सेल फ़ोन से मुझे मिस्ड कॉल करेगी तब मुझे उनके कमरे में दाखिल होना था। मुझे मेरे फ़ोन को वाइब्रेशन मोड़ पर रखना था जिससे घंटी ना बजे पर मुझे पता लग जाए की माया मुझे बुला रही थी।

बाहर किवाड़ के पीछे छिपी हुई मैं अंदर हो रहे सारे संवाद सुन पा रही थी। माया मेरे जेठजी को कह रही थी की वह जेठी की आँखों पर पट्टी बाँध कर कुछ बोले बिना ही चुदवायेगी। जैसे कोई बच्चा नए खेल के बारे में उत्सुकता से सुन रहा हो ऐसी जेठजी भी सुन कर बड़े खुश हुए और माया ने जेठजी की आँखों पर पट्टी बांध दी। पट्टी बाँध कर फ़ौरन माया जेठजी से लिपट गयी। अचानक मायाने जेठजी से एक सवाल पूछा, “सुनियेजी, आप हमारे साथ इस खेल में कोई बेईमानी तो नहीं करेंगे न?”

माया की बात सुन कर जेठजी ने कोई जवाब नहीं दिया। शायद वह माया को ही बात पूरा करने का इंतजार कर रहे थे। माया ने कहा, “देखिये जी, आज इस खेल को मैं बहुत गंभीरता से खेल रही हूँ। यह कोई खेल नहीं है। हम हमारे हर खेल को गंभीरता से खेलेंगे तभी तो हम उस खेल का पूरा लुत्फ़ उठा पाएंगे। आप अपनी काली पट्टी अपने आप नहीं हटाएंगे। मंजूर है?”

शायद उस समय मेरे जेठजी माया की तरफ़ बड़े ही आश्चर्य से देख रहे होंगे। वह बोले, “हाँ, बिलकुल, यह पट्टी नहीं खोलूंगा। पर तुम ऐसे क्यों पूछ रही हो? क्या बात है?”

माया ने जवाब में कहा, “आपके लिए यह खेल हो सकता है पर मेरे लिए यह जीवन मरण का और अपनी ममता और एक औरत की इज्जत का सवाल है। जिसे आप चोदेंगे वह मैं नहीं एक दूसरी औरत होगी, जिसको आप छाया नाम से बुलाएंगे। मैं नहीं चाहती की आप यह महसूस करें की आप के साथ मैं हूँ। मैं पूरी कोशिश करुँगी की आपको यह लगे की मैं कोई और हूँ। पर आप मुझे सच्चे मन से वचन दीजिये की आप पट्टी नहीं खोलेंगे। आप को मेरी कसम आपने अगर यह पट्टी खोली तो। मेरा मरा हुआ मुंह देखेंगे आप। खाइये मेरी कसम।”

उन दोनों की चर्चा सुन कर मेरी जान हथेली में आ गयी। उधर मेरे जेठजी कुछ समय के लिए एकदम चुप हो गए। शायद उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था की माया इस बात को इतना तूल क्यों दे रही थी? वह उसे क्यों इतनी ज्यादा गंभीर बना रही थी? पर फिर भी मेरे जेठजी का जवाब सुन कर मुझे काफी तसल्ली हुई। जेठजी ने कहा, “माया जब तुम इस खेल को इतनी गंभीरता से ले रही हो तो मैं भी इस बात को हलके में नहीं लूंगा। मैं तुम्हारी कसम खा कर कहता हूँ की यह पट्टी मैं अपने आप नहीं खोलूंगा। जब तुम खोलेगी तभी मैं देखूंगा। बस? अब तो खुश?”

जेठजी का जवाब सुन कर मुझे लगा की माया भी खुश हुई थी। माया ने कहा, “मैं बहुत खुश हूँ। मैं इस खेल को बड़ी ही गंभीरता से ले रही हूँ। यह अनुभव हम सबके लिए ना सिर्फ एक अनूठा, उन्मादपूर्ण और आनंदमय होगा बल्कि वह हमारी जिंदगी का एक बड़ा ही महत्त्व पूर्ण अनुभव होगा। मेरी आपसे करबद्ध प्रार्थना है की आप मुझ पर विश्वास रखें और मेरा कहा मानें।”

माया की बात सुन कर मेरे जेठजी ने शायद माया को अपनी बाँहों में भर लिया और माया को चूमते हुए बोले, “मरी रानी मुझे जो कहेगी मैं उसे कैसे ठुकरा सकता हूँ?”

जेठजी से उसी पोज़िशन में चूमते हुए एक हाथ से अपना सेल फ़ोन निकाल कर माया ने मुझे मिस्ड कॉल किया। मैंने मेरा फ़ोन वाइब्रेशन मोड़ पर रखा था। फ़ोन के आते ही मैंने धीरे से किवाड़ खोला और अंदर झाँका। मुझे देख कर माया ने मुझे एक हाथ से अंदर आ जाने का इशारा किया।

मैं घबराती, झिझकती कुछ क्षोभित सी नयी नवेली दुल्हन सी सजी हुई कमरे में दाखिल हुई। जब मैं जेठजी और माया के बैडरूम में दाखिल हुई तब माया जेठजी की बाँहों में कस कर जकड़ी हुई थी और उनके होठोंसे अपने होंठ चिपका कर उनसे प्रगाढ़ चुम्बन कर रही थी।

उसने मुझे देखा तो होँठ पर उंगली कर मुझे एकदम चुप रहने के इशारा कर मुझे अपने पास बुलाया। मैं माया मेरे जेठजो को कैसे चुम्बन कर रही थी वह देखने लगी। जेठजी माया के होंठों को बड़ी ही बेसब्री से चूस रहे थे और माया की जीभ को अपने मुंह में ले कर उसका रसास्वादन कर रहे थे। माया के मुंह में से निकली हुई लार को वह बड़े प्यार से लपालप निगल रहे थे। जेठजी उस समय बनियान और धोती पहने हुए थे।

उन दोनों का प्यार भरा चुम्बन देख कर मेरे मन में अजीब से हिंडोले से तरंग उठ रहे थे। माया को चूमते हुए मेरे जेठजी एक हाथ से माया की गाँड़ सेहला रहे थे। माया पूरी तरह से सजी हुई भारी भरखम साडी में बहुत सुन्दर लग रही थी। माया मेरे आते ही धीरे से जेठजी से अलग हो कर बिना कोई आवाज किये उठ खड़ी हुई और एक तरफ हो गयी। माया जहां बैठी थी ठीक उसी जगह मेरे जेठजी से सट कर मैं बैठ गयी।

मेरे लिए मेरे जेठजी के इस तरह इतने करीब बैठना अपने आप में ही एक अनूठा अनुभव था। जब से मैं शादी कर इस घर में आयी थी तब से आजतक कई बार मेरा मन करने पर भी मैं जेठजी के इतना करीब नहीं बैठी। चूँकि मेरे जेठजी मेरे लिए एक आदर्श पुरुष थे और एक तरह से देखा जाय तो वह हम सब के, पुरे घर के वटवृक्ष सामान थे।

कई बार मेरा मन करता था की मैं जाऊं और उनकी गोद में बैठ उनसे प्यार करूँ। पर उनकी बहु होने के नाते एक मर्यादा के कारण यह हो नहीं पाया। उस समय मेरे जहन में भावनाओं की कैसी कैसी मौजें उठ रहीं थीं यह कहना मुश्किल है। जिस जेठजी के चरणों की सेवा करने के लिए मेरे पति हमेशा लालायित रहते थे और मैं जिनको भगवान की तरह मानती थी मैं उस रात उनकी दुल्हन बन कर छलावा कर छद्म रूप से उनसे चुदवाने के लिए तैयार थी।

मैं मेरे मन में उठ रही सारी शंका कुशंकाओं को दरकिनार कर अपने मन को एकनिष्ठ कर जेठजी से लिपट गयी। उस समय मैं कितना रोकने पर भी मेरी आँखों से निकल पड़ते हुए आँसुंओं को रोक नहीं पायी। मैंने मेरे होँठ मेरे जेठजी के होँठों से चिपका दिए और उठ कर जेठजी को अपनी दो टाँगों के बिच में फंसाती हुई उनकी गोद में जा बैठी।

ऐसे बैठने से मेरी साड़ी और घाघरा मेरी जाँघों के ऊपर तक उठ गए। मैंने मुड़कर माया की और जब देखा तो माया ने अपने अंगूठे को ऊपर कर मुझे “ओके” का इशारा किया। मेरा यह उत्साह देख कर माया के चेहरे पर मुस्कान साफ़ दिख रही थी। मुझे इतना इमोशनल होते हुए देख माया की आँखों में भी आंसूं छलक आये। उसने मुझे बार बार अपने एक हाथ से अपने होठों को चूमते हुए फ्लाईंग किस की और हाथका अंगूठा ऊपर कर इशारा कर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

जेठजी ने अपने हाथ फिरा कर मेरा बदन महसूस किया। जब उनके गाल मेरे गाल को छू रहे थे तब उन्होंने मेरे आँसुंओं को महसूस किया। वह तब बोल पड़े, “क्या बात है? आज तुम इतनी ज्यादा भावुक क्यों हो? तुम्हारी आँखों में आंसूं क्यों?”

माया हमारे करीब आयी। वह भी तो काफी भावुक हालात में थी। उसने उसी भावुक अंदाज में धीरे से बोला, “देखिये जी आज मैं छाया आपसे एक दूसरी ही नयी नवेली दुल्हन बन कर आपसे चुदवाने के लिए आयी हूँ। आज आप माया को नहीं दूसरी औरत छाया को चोदेंगे। आज ना सिर्फ आप छाया को चोदेंगे, बल्कि आज आप अपनी छाया को आपके बच्चे की माँ भी बनाएंगे। आप अपने वीर्य से उसे गर्भवती भी बनाएंगे।

और मैं कोशिश करुँगी की आज मेरी हर अदा आपको नयी लगे। आपको महसूस हो की आप आज माया को नहीं दूसरी औरत छाया को चोद रहे हो। आप मुझे माया नहीं दूसरी औरत छाया समझ कर ही चोदेंगे और अपने वीर्य से गर्भवती बनाएंगे। अगर मैं आपको ऐसा करवा पायी तो मैं समझूंगी की मेरा जीवन धन्य हो गया। अब मैं चुप रहूंगी और बिलकुल बोलूंगी नहीं। ओके?”

मेरे जेठजी ने मेरा घूँघट उठाते हुए मेरे गालों को चुम कर मेरे आंसुओं को चाटते हुए कहा, “तू कैसी पागल औरत है रे? क्या तू मुझे इतना ज्यादा चाहती है?”

माया ने जेठजी की बात का कोई जवाब नहीं दिया। उस समय मेरा क्या हाल हुआ होगा? मेरी आँखों से झरझर आँसूं बह रहे थे। मैंने अपना सिर हिलाते हुए जेठजी को “हाँ” का इशारा किया। जेठजी के होंठ उस समय मेरे गालों के ऊपर से बह रहे मेरे आँसुओं को चाट रहे थे। जेठजी ने मेरी “हाँ” का इशारा महसूस किया और बोल पड़े, “मेरी पागल बीबी माया।”

मैंने मेरा सर आजुबाजु “ना” के अंदाज में हिलाकर जब “बीबी माया” शब्द का विरोध किया तो जेठजी समझ गए। वह फ़ौरन मुस्कुराते हुए बोले, “ठीक है बाबा। मेरी पागल बीबी माया नहीं मेरी पागल प्रेमिका छाया। ठीक है?”

मैंने अपना सिर हिला कर “हाँ” का जब इशारा किया तो मेरे जेठजी मुझ पर लपक पड़े और मेरे होँठों को बड़े जोश से चूमने और चूसने लगे। मेरे लिए यह अद्भुत रोमांचकारी अनुभव था। मेरे जेठजी को मैंने सपनों में कई बार चूमा था। आज वह सब सच में हो रहा था। जेठजी के हाथ मेरे स्तनोँ पर चिपक गए और वह उन्हें बेतहाशा मसलने लगे।

पहली बार मेरे जेठजी के हाथ मेरे स्तनों को हकीकत में छू रहे थे। मेरे पुरे बदन में एक जबरदस्त सिहरन फ़ैल गयी। रोमांच के मारे मेरे सारे रोंगटे खड़े हो गए। अभी तो जेठजी सिर्फ मेरे ब्लाउज के ऊपर से ही मेरे बूब्स मसल रहे थे।

मुझे काफी जोश से चूमने के बाद जेठजी मेरे सिर पर हाथ फिरा कर अपनी उँगलियों से मेरे बालों को संवारते हुए बोले, “छाया, मैं महसूस कर रहा हूँ की आज मैं वाकई में ही माया को नहीं छाया को प्यार कर रहा हूँ। तुम नयी नवेली दुल्हन सी सजी हुई कितनी सुन्दर लग रही हो?”

जेठजी की ऐसी प्यार भरी बात सुन कर मैं और भावुक हो गयी। मैंने माया की और देखा। माया मुझे प्यार भरी नज़रों से देख रही थी। मेरी आँखों से एक बार फिर आँसूं निकल पड़े।

मैंने अपना सिर जेठजी के सिने से लगा दिया और अपनी बाँहों में उनको भर लिया। मेरे बदन को सहलाते हुए मेरे जेठजी के हाथ जब मेरी नंगी जाँघों को छूने लगे तब मेरी महंगी भारी सी साड़ी मेरे बदन से हटाते हुए जेठजी बोले, “छाया तुम्हें मैं बिन देखे तुम्हारी सुंदरता महसूस कर रहा हूँ। तुम तो मेरी माया जैसी ही बहुत सुन्दर हो।”

अपने शरीर को इधरउधर कर मैंने जेठजी को मेरी साड़ी हटाने में सहायता की। जेठजी ने मेरी साड़ी निकाल कर एक तरफ कर दी। मैंने अपनी बाँहें जेठजी के गर्दन के इर्दगिर्द फैलायीं और उनके होंठों पर आने होँठ भींच कर मैं जेठजी के होँठ चूसने लगी। जेठजी मेरे मुंह में अपनी जीभ डालकर मेरी जीभ को चाटने और मेरी लार को चूस कर निगल ने में लग गए।

मैं भी मेरे जेठजी का पूरा साथ देते हुए उनसे मेरा मुंह, मेरे होँठ, मेरी जीभ चुसवा कर गजब रोमांच का अनुभव कर रही थी। मेरे लिए वह रात जैसे कोई सपनों की रात जैसी थी। मेरे पति ने सोने में सुहागा जैसे मुझे नयी नवेली दुल्हन जैसे सजधज कर तैयार होने के लिए कहा था।

थोडासा अफ़सोस यह था की मेरे जेठजी मुझे इस तरह सजी हुई देख नहीं पाएंगे। पर वह जरूर मेरी नई नवेली दुल्हन जैसे मेरे मन के भाव जरूर महसूस कर पायेंगे, उसका मुझे भरोसा था।

चुम्बन ख़तम होते है जेठजी ने मुझे प्यार से पलंग पर लिटाया। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी सुहागरात को मेरे प्रियतम ने मुझे प्यार करने के लिए पलंग पर लिटा दिया हो। जेठजी अपने हाथ से मेरे बदन को महसूस करने लगे। उनके हाथ पहले मेरे सिर से ले कर मेरे कपाल, मेरी नाक, मेरे होंठ, मेरी दाढ़ी से मेरी गर्दन पर होते हुए मेरे उरोजों पर कुछ देर टिक गए। मैं अपना हाल कैसे बयाँ करूँ?

रोमाँच के मारे मेरी चूत का बुरा हाल हो रहा था। मुझे लगा की मेरी चूत इतनी तेजी से पानी छोड़ रही थी की मुझे डर लग रहा था की कहीं मेरे कपडे ही गीले ना हो जाएँ। मुझे यह भी डर था की जेठजी का लण्ड डलवाने से पहले ही मैं कहीं झड़ ने ना लगूँ। कहीं जेठजी मेरी इस तरह की बेसब्री को भाँप ना ले और उन्हें शक ना हो जाए की मैं माया नहीं हकीकत में ही दूसरी औरत थी।

पर मैंने ठान ली थी की अब जो हो सो हो। मुझे जेठजी को खूब स्वछन्द भरा प्यार कर वह आनंद देना था जो मैं जब से इस घर में आयी थी तब से देना चाह रही थी। जेठजी अपनी जीभ से मेरे कपाल को चाट और चुम रहे थे। मेरे सर को चूमते हुए वह मेरी नाक, मेरे गाल और अपने सिर को घुमा फिरा कर जेठजी मेरी गर्दन को हर जगह चुम रहे थे। जैसे जैसे वह निचे की और आ रहे थे उनके हाथ फिर से मेरे स्तनोँ को ब्लाउज के ऊपर से मसलने लगे।

मैंने मेरे जेठजी के हाथ मेरे ब्लाउज के बटनों पर रख दिए। यह मेरा संकेत था की वह मेरे ब्लाउज के बटनों को खोल दें। जेठजी भी मेरे नंगे स्तनोँ को मसलने, चूमने, काटने और निप्पलोँ को चूसने के लिए उतने ही बेताब थे जितनी की मैं उनको यह सब करवाने के लिए थी।

मरे स्तनोँ की निप्पलेँ भी आने वाले अनुभव की अपेक्षा की उत्तेजना में एकदम सख्त हो कर नंगे होने का इंतजार कर रहीं थीं। जैसे ही जेठजी ने मेरे ब्लाउज के बटनों को खोल दिए, मैंने पीछे हाथ कर मेरी ब्रा के हूकों को खोल दिया।

मैंने जेठजी के हाथ पकड़ कर उनको मेरे स्तनोँ पर रख दिया। बड़े दिनों से मेरी गुह्य इच्छा थी के मेरे जेठजी मेरे स्तनों को अपने हाथों में पकड़ कर खूब सख्ती से मसले, खींचे, दबाये और चूसे।

मेरे स्तनों को छूते ही जेठजी के मुंह से”आह….” निकल गयी। वह बोल उठे, “ओह मेरी प्यारी प्यारी माया की छाया, तुम्हारे स्तन आज मुझे काफी भरे भरे और अलग ही महसूस हो रहे हैं। तुम बहुत मस्त हो रे!”

यह कह कर जेठजी ने झुक कर अपना मुंह मेरे नंगे स्तनोँ पर रख दिया और मेरी निप्पलोँ को दाँत के बिच में दबाते हुए वह मेरे स्तनोँ को बेतहाशा जोर से चूसने लगे।

मैंने जेठजी की जाँघों के बिच में अपनी उंगलियां डालकर जेठजी के लण्ड को सहलाना चाहा। जेठजी ने धोती हटा कर अपनी निक्कर निचे कर अपने लण्ड को बाहर निकाला। हालांकि मैंने जेठजी का लण्ड पहले भी अफरातफरी में देखा था पर उस रात को जेठजी का लण्ड मेरे इतने करीब पा कर मेरे मन में क्या भाव उठ रहे थे उनका वर्णन करना मेरे लिए नामुमकिन है।

जेठजी का लण्ड गोराचिट्टा और काफी चिकना चमक रहा था। मुझे माया ने बताया था की माया हर हफ्ते नियमित रूप से जेठजी के लण्ड के बाल साफ़ करती रहती थी। यह काम माया ने अपने हाथों में ले रखा था।

माया ने मुझे कहा था की वह जब जब भी जेठजी की जाँघों के बिच के बाल साफ़ करती थी तब वह हमेशा जेठजी के लण्ड की सरसों के तेल से अच्छी तरह मालिश करती थी। यह लण्ड के सर्विसिंग की प्रक्रिया करीब आधे घंटे तक चलती थी। उसके बाद जेठजी का लण्ड बढ़िया तरीके से चमका कर ही माया दम लेती थी।

माया की किसी सहेली ने बोला था की ऐसा करने से लण्ड लम्बे समय तक खड़ा रहता है और उसकी लम्बे समय तक चोदने की क्षमता भी बढ़ती है। माया यह कहते हुए शर्मा कर बोलती थी की उसके बाद माया को मेरे जेठजी के लण्ड को चूसने का बड़ा मन करता था, पर चूँकि उसे तेल से लगे हुए ही कुछ देर रख छोड़ना होता था इस लिए वह उसे उस समय चूस नहीं पाती थी।

जेठजी का लण्ड इसके कारण एकदम चिकना, गोरा और साफ़ दिख रहा था। लण्ड के ऊपर कई नसें फैली हुईं थीं। कुछ थोड़ी श्यामल रंग की नसें और कुछ थोड़ी लाल। जेठजी के लण्ड की मोटाई बापरे! मैंने इतना मोटा लंड सिर्फ पोर्न साइट में भी शायद ही देखा था।

मेरे किसी भी बॉय फ्रेंड का लण्ड मोटाई और लम्बाई में मेरे जेठजी के करीब नहीं होगा। मैंने जेठजी का लण्ड मेरी हथेली में लिया और मैं उसे सच्चे दिल से प्यार से हिलाने और सहलाने लगी। मेरे जेठजी का लण्ड देखते ही मेरा मुंह उसे चूसने के लिए बेताब हो रहा था। इसे चूसने की चाह जब से मैंने उसे पहली बार देखा था तब से मेरे जहन को झकझोर रही थी।

माया ने मेरी बगल में खड़े हुए मुझे इशारा किया की मैं जेठजी के लण्ड को चूसूं। वैसे भी मुझे इंतजार करने की कोई जरुरत नहीं थी। उस रात मेरे मन में जो भी कुछ छिपी हुई कामना थी, उन्हें पूरा करने का पूरा मौक़ा था।

मैंने भी अपने मन में ठान ली की अब जब मुझे मेरे जेठजी से चुदवाना ही था तो फिर मैं क्यों डरते, घभराते या हिचकिचाते चुदवाउं? जब मुझे चुदवाना ही है तो फिर क्यों ना मैं दिल खोल कर के ही चुदवाउं और चुदाई के पुरे मजे लूँ?

मैं अपनी जगह से बैठ खड़ी हुई और मैंने जेठजी को मेरी जगह लिटा दिया। मैंने धीरे से जेठजी की धोती और जांघिया निकाल दिए। जेठजी की सख्त सुडौल जाँघें मेरे सामने सादृश्य हो गयीं। जेठजी की जाँघों पार बाल थे ओर फिर भी उनकी जाँघों की सख्ती और सुदृढ़ता देखते ही बनती थी।

जेठजी का बड़ा मोटा लण्ड उनकी जाँघों के बिच काफी निचे तक लटकता हुआ देख कर मेरी चूत में ना जाने क्या हलचल हो रही थी। यह कैसा लण्ड है? ऐसा लगता था जैसे वह शरीर का अंग नहीं कोई लटकता लम्बा मोटा घण्टा हो।

वैसे सच कहूं तो हालांकि उस लण्ड को देख कर मेरी हालत खराब हो रही थी पर उससे कहीं ज्यादा मेरे पुरे बदन में और खासकर मेरी चूत में एक अजीब सा रोमांच और उत्तेजना थी। हर औरत की यह कामना होती है की जिंदगी में कम से कम एक बार वह ऐसे तगड़े लण्ड से चुदवाये।

पर ऐसा तक़दीर किसी किसी औरत को ही मिलता है। मेरी तक़दीर भी उस रात खुल गयी थी। अब ना सिर्फ वह लण्ड से मैं चुदने वाली थी पर मैं उस लण्ड से माँ भी बनने वाली थी।

मैं धीरे धीरे खिसक कर जेठजी के पाँव के पास पहुँच गयी। मैंने मेरे जेठजी की टाँगों के बिच में अपना सिर रखने के लिए उनकी टाँगे अपने दोनों हाथोँ से चौड़ी की और अपने हाथों में जेठजी का मोटा तगड़ा लण्ड लिया। उसे अपने हाथों में पकड़ कर और उठा कर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैंने अपने हाथोँ में सनी देओल का ढाई किलो का हाथ पकड़ा हो। खैर ऐसा कहना थोड़ी अतिशयोक्ति होगी पर मुझे वैसे ही महसूस हुआ।

मैंने अपनी उंगलियां मेरे जेठजी के लण्ड के इर्दगिर्द बड़े प्यार से घुमाई और फिर धीरे से जेठजी के लण्ड का टोपा मेरे होंठों के बिच रखा और उसे चूमने लगी। जेठजी मेरे होंठों को अपने लण्ड को छूते ही मचलने लगे।

उनके मुंह से निकल गया, “आह….. मेरी छाया….. तुम वाकई गजब हो। तुम्हारे होंठ कितने सुकोमल और भरे भरे हैं? वाकई में तुम मेरी माया नहीं मेरी माया की छाया ही हो।”

जैसे जैसे मैं जेठजी का लण्ड मेरे मुंह में लेने लगी, जेठजी पलंग के ऊपर और भी मचलने लगे। मैं अपना मुंह आगे पीछे करती हुई जेठजी का लण्ड चूसने लगी। मेरे पति का लण्ड मैंने कई बार चूसा था, पर जेठजी के लण्ड का स्वाद कुछ और ही था। मेरे मुंह की लार जेठजी के लण्ड के इर्दगिर्द चिपकाते हुए मेरी जीभ मैं जेठजी के लण्ड के चारों और घुमाती रहती थी।

मेरा जेठजी के लण्ड को चूसने का सपना पूरा हो रहा था और मेरे इस काम का पारितोषिक मुझे मेरे जेठजी की कराहटों और आहों से मिलता रहता था।

मुझे लगा की मेरे जेठजी मेरे होँठों से अपने लण्ड को चुसवाते हुए महसूस कर अद्भुत रोमांच अनुभव कर रहे थे। उनके मुंह से एक के बाद एक “आह…. छाया…… तुम कितना गजब चूसती हो…… हाय…….. ओह……” करते हुए मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे जेठजी मेरा सिर पकड़ कर जैसे मुझे दिल से आशीर्वाद दे रहे थे।

मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे इस कार्य से मेरे जेठजी वाकई बड़े ही प्रसन्न हुए थे। बार बार वह अचानक उठ बैठ जाते और मेरा सिर चुम लेते थे। मैं भी उनका लण्ड चूसते हुए इतनी भावावेश में डूबी हुई थी की मुझे यह भी होश नहीं था की उनका लण्ड मेरे गले में इतना घुस रहा था की मेरी साँसे घुट रहीं थीं।

यहां मैं यह स्वीकार करती हूँ की मेरे जेठजी के लण्ड को बड़ी ही शिद्द्त से चूसने में मेरा एक जबरदस्त निजी स्वार्थ था। मैं जानती थी की मेरे जेठजी का लण्ड कितना महाकाय और लंबा था। जब जेठजी उस लण्ड को मुझे चोदने के लिए मेरी चूत में डालेंगे तब मेरा क्या हाल होगा यह मैं भलीभाँति जानती थी।

जेठजी का लण्ड चूसते हुए मैं उनके लण्ड के ऊपर पूरी सतह पर मेरी लार की ख़ास चिकनाहट अच्छी तरह से लपेट कर जेठजी के लण्ड को पूरी तरह से स्निग्ध बना देना चाहती थी। मैं अपना प्लान बना रही थी जिससे जब वह लण्ड मेरी चूत में घुसे तब मेरी चूत में कुछ कम तकलीफ महसूस हो।

इस कारण से मैं जेठजी का लण्ड चूसती रही और बार बार उसके ऊपर मेरी लार की चिकनाहट लपेटती रही। इस तरह चिकनाहट की कई सतह बनाकर मैं जब चुदवाउंगी तब अपना दर्द कम हो यह सुनिश्चित करने की अपनी और से कोशिश कर रही थी।

जेठजी का लण्ड चूसते हुए मेरा जबड़ा जब दर्द करने लगा तब मैंने जेठजी का लण्ड मुंह से बाहर निकाला। मुझे लगा की जेठजी भी मेरे ऐसा करने से कुछ आश्वस्त हुए क्यूंकि उत्तेजना के मारे वह शायद डर रहे थे की कहीं वह मेरे मुंह में ही अपना वीर्य ना छोड़ दें।

मेरे जेठजी ने मुझे अपने ऊपर खिंच लिया और मेरे होँठों को बेतहाशा चूमते हुए बोले, “छाया, तुम मुझे इतना ज्यादा प्यार करती हो? तुम मुझे इससे पहले क्यों नहीं मिली?”

फिर उनकी काली पट्टी लगी हुई आँखें मेरी आँखों के सामने रख कर मेरी ठुड्डी पकड़ कर बोले, “देखो छाया मुझे देखो। मैं तुम्हें देख नहीं सकता पर तुम तो मुझे देख सकती हो। मैं पूछना चाहता हूँ की क्या तुम आज मुझसे सच्चे दिल से अपनी ख़ुशी से चुदवाओगी ना?”

मेरे जेठजी की बात सुन कर फिर से मेरी आँखों में आंसूं छलकने लगे। मैंने अपना सर जेठजी को महसूस हो ऐसे हिला कर “हाँ” कहा। और फिर मैं मेरे जेठजी के पुरे बदन को बेतहाशा चूमने और चाटने लगी। ऐसा करते हुए बार बार मेरी नजरें माया की और चली जातीं। मैंने माया का प्यार भरे भाव से मंदमंद मुस्काता हुआ चेहरा देखा। उसकी आँखें मुझे मेरे जेठजी को प्यार करते हुए देख छलक रहीं थीं।

जेठजी मेरे दोनों स्तनोँ को अपने दोनों हाथों में भर कर बोले, “छाया, मेरा मन करता है की मैं तुम्हारे स्तनोँ को खा जाऊं। कितने प्यारे और सख्त हैं यह।”

मैंने जेठजी का सर पकड़ा और उनका मुंह मेरे स्तनोँ पर रख दिया। जेठजी एक के बाद एक निप्पलेँ मुंह में लेकर उन्हें चूसने और चबाने लगे। एक बार तो उनके दांत लगने से मेरी धीमी चीख निकल गयी। पर जेठजी के मेरे स्तनोँ को चूसना मुझे बहुत ज्यादा उत्तेजित कर रहा था।

जेठजी को चूँचियाँ चूसने का महारथ था। जब जब वह एक स्तन चूसते थे तो मेरा पूरा का पूरा स्तन उनके मुंह में ही चला जाता था। जब मेरा स्तन जेठजी के मुंह में चला जाता था तब मुझे लगता था जैसे मेरे मेरे पिता समान मेरे जेठजी अचानक मेरे बच्चे जैसे हो गए हों।

उस समय मेरे जहन में उनके लिए इतना प्यार उमड़ता था की मेरा मन करता था जैसे मेरे जेठजी के लिए मैं अपना बदन क्या अपनी जान भी कुर्बान कर सकती हूँ।

जब जेठजी मेरे स्तनों को प्यार करते थे तो मेरी चूत का बुरा हाल होता था। मेरी चूत में से मेरा पानी रिसने लगता था। मेरे जेठजी की बाँहों में होते हुए मैं अपनी चूत कैसे सम्हालूं? यह मेरी समस्या थी। पर ना चाहते हुए भी मेरा हाथ मेरी जाँघों के बिच में चला जाता था।

जेठजी को महसूस हुआ की मेरी चूत काफी गीली हो रही थी और काफी पानी छोड़ रही थी। जेठजी ने अपना हाथ मेरे घाघरे के नाड़े पर रखा और और खिंच कर मेरे घाघरे का नाडा खोल दिया। फिर अपना मुंह निचे की और सरकाते पहले मेरे पेट को चाटने और चूमने लगे और फिर नाभि पर अपनी जीभ की नोंक को मेरी नाभि में कुरेद कुरेद कर मुझे और ज्यादा उत्तेजित कर रहे थे।

जेठजी इस कार्यकलाप से मेरा बुरा हाल हो रहा था। मैं जेठजी के नीची लेटी हुई मेरे बदन को इधर उधर करते हुए मचल रही थी। मेरी चूत में इतनी जबरद्त हलचल हो रही थी की मुझे लग रहा था की मैं जल्दी ही झड़ने वाली थी। जेठजी ने एक हाथ सरका कर मेरी पैंटी को निचे की और खिसका दिया।

उन्होंने अपनी उँगलियों से मेरी चूत की पंखुड़ियों से कुछ देर खेलने के बाद मेरी जाँघों के बिच मेरी तिकोनिया दरार पको बड़े ही प्यार से सहलाने लगे। बिच बिच में वह अपनी उँगलियों से मेरी पंखुड़ियों को खोल कर मेरी चूत की दरार को बेपर्दा कर देते थे।

उनकी उँगलियों से खेलने के कारण मेरी उत्तेजना इतनी बढ़ने लगी की मेरे लिए अपने आप को सम्हालना नामुमकिन हो गया। एक ऐसा जुवार आया की मैं उछल पड़ी और मेरे जेठजी को मेरी बाँहों में मैंने जकड कर पकड़ा और मैं झड़ पड़ी। मेरे झड़ ने क्रिया कुछ सेकंडों तक चलती रही।

मैं “ओह…… हाय…… आअह्ह्ह्हह…….” सी हलकी सिसकारियां भरती हुई कुछ देर के लिए निढाल हो कर पलंग पर शिथिल होकर शांत हो गयी।

जेठजी मेरे झड़ने से कहाँ रुकने वाले थे? बल्कि उसके कारण तो उनमें जोश और भी बढ़ गया। मेरी उत्तेजना की चाभी मेरे जेठजी के हाथ लग गयी थी। जेठजी ने मेरी चूत में अपनी दो उंगलियां डालकर उन्हें अंदर बाहर करना शुरू किया। साथ ही साथ झुक कर कभी वह मेरे होंठों को तो कभी मेरी निप्पलोँ को चूस लेते थे।

जैसे ही मैंने मेरे जेठजी की उँगलियों को मेरी चूत में महसूस किया तो बापरे, मैं अपने आप पर कण्ट्रोल नहीं रख पायी। मैं पलंग पर उछल पड़ी। मेरी उत्तेजना देख कर जेठजी और भी उत्साहित हुए। जेठजी ने अपनी उंगली मेरी गाँड़ की दरार में भी डाल दी।

जेठजी की कामुक करतूतों से मैं अपना आपा खो रही थी। अभी तो मेरी चुदाई भी शुरू नहीं हुई थी और मैं दो या तीन बार झड़ चुकी थी। जेठजी को जब भी मौक़ा मिलता, मेरी गाँड़ के गालों को दबाते और सहलाते रहते थे।

मेरे लिए वह रात मेरी जिंदगी की सबसे यादगार रात साबित हो रही थी। मेरे पति के साथ मेरी पहली सुहाग रात अब तक की मेरी सबसे यादगार रात थी। पर मेरे जेठजी के साथ मेरी सुहागरात उससे भी ज्यादा रोमांचक और उन्मादक साबित होने जा रही थी।

अचानक मैंने मेरे जेठजी की जीभ की नोंक को मेरी चूत की दरार को कुरेदते हुए पाया। जेठजी अपनी जीभ से वह कर रहे थे जो अब तक उनकी उंगलियां कर रहीं थीं। जीभ एक काम और कर रहीं थीं जो उंगलियां नहीं कर पा रहीं थीं। जेठजी की जीभ मेरे स्त्री रस को चाट रही थी।

जेठजी के सर को मेरी जाँघों के बिच में घुसने देने के लिए मुझे मेरी टांगें काफी फैलानी पड़ रहीं थीं। मेरी चूत की दरार में अपनी जीभ डालकर मेरे रिसते हुए स्त्री रस को ऐसे चाट रहे थे जैसे वह शहद को चाट रहे हों।

मेरे जेठजी मुझे इतना सुख देंगे उसकी मुझे कल्पना भी नहीं थी। मैं तो मेरे जेठजी की वह कामुक मस्त हरकतों से बिंदास मचलती हुई मेरी हवस के चरम को बार बार अनुभव कर रही थी और बार बार झड़ रही थी।

जेठजी मुझे अपनी जीभ से चाट कर ऐसे पागल कर रहे थे की मुझ से रहा नहीं गया। मैं मेरे जेठजी का लण्ड मेरी चूत में डलवाना चाहती थी। मैं जानती थी की उनका लण्ड जब मेरी चूत में घुसेगा तो अगर वह मेरी चूत फाड़ ना भी दे पर मुझे मेरी नानी की याद जरूर दिला देगा। पर यह भी सच है की हर औरत का यह ख्वाब होता है की कभी ना कभी एक बार ही सही उसे ऐसे बड़े तगड़े लण्ड से चुदने का मौक़ा मिले। मुझे यह मौक़ा मिल रहा था।

मैं उस समय मेर जेठजी से चुदवाने के लिए बेबस हो रही थी। पर साथ साथ मैं मेरी चुदाई को कुछ हद तक कम दर्द भरी बनाने के लिए फिर से एक बार मैंने बैठ कर जेठजी की जांघों के बिच अपनी जगह बना ली और आखिर में एक बार फिर मेरे जेठजी का महाकाय लण्ड चूसते हुए उस पर मेरी लार की चिकनाहट लपेटना शुरू किया।

मेरे जेठजी शायद मेरी उलझन समझ गए थे। वह शायद जो फॉर्मूला माया के साथ अपनाते होंगे (माया ने यह मुझे नहीं बताया था) उन्होंने वही किया। मैंने देखा की मेरे जेठजी ने अपने गद्दे के निचे अपना हाथ डाल कर टटोल कर एक छोटी सी बोतल निकाली। वह बोतल उन्होंने मेरा हाथ थाम कर मुझे पकड़ा दी। मुझे समझते देर नहीं लगी की वह शहद की बोतल थी।

मैंने उसे थामा और मैंने आगे बढ़कर मेरे जेठजी को चुम लिया। मेरे जेठजी मेरी उलझन समझ गए थे। मैंने उस शहद को जेठजी के लण्ड के ऊपर अच्छी तरह से चिपकाया। साथ में मं झुक कर उस शहद से चिपडे हुए लण्ड को चूसा भी। मुझे तब काफी तसल्ली हुई की मैं जेठजी से जरूर चुदवा लुंगी।

मैंने जेठजी का सर पकड़ा और उन्हें मेरे ऊपर खींचा। मैंने उनका लण्ड अपनी उँगलियों में पकड़ा और मेरी चूत के पास ले आयी ताकि वह समझ जाएँ की मैं उनसे चुदवाने के लिए कितनी चुदासी हो रही थी। मैंने उन्हें उनका लण्ड हिला कर इशारा किया की वह मुझ पर सवार हों, मेरी चूत से अपना लण्ड रगड़ें और मेरी चुदाई की शुरुआत करें। जेठजी जान गएँ की मैं उनसे चुदवाने के लिए कितनी बेबस थी।

मेरे जेठजी भी मेरी बेबसी समझ रहे थे। वह फ़ौरन मुझ पर सवार हुए। मैंने अपनी टांगें चौड़ी की और मेरे जेठजी को मेरी टांगों के बिच में आने दिया। मैंने अपनी टांगें ऊँची की। जेठजी अपने लण्ड को अपने एक हाथ में पकडे हुए उसे हिलाते उसे मेरी चूत के पास लाने की कोशिश करने लगे। क्योंकी उनकी आँखों के ऊपर पट्टी बंधी थी इस लिए वह ठीक से अपने लण्ड को पोज़िशन नहीं कर पा रहे थे।

मैंने उनका लण्ड अपनी हथेली में पकड़ा और प्यार से धीर से खिंच कर उसे मेरी चूत के केंद्र बिंदु के पास ले आयी। मेरे हाथ के खिंचाव से मेरे जेठजी भी खींचते हुए मेरी अद्धर चौड़ी की हुई टांगों के बिच में आ गए।

आप उस समय की मेरी मनोदशा को शायद ही समझ पाएंगे। एक बहु जो अपने जेठजी को अपने पिता या ससुर से भी ऊंचा दर्जा देती हो पर जिसके मन के कोई अँधेरे कोने में एक ऐसी अभिलाषा छिपी हो जो हर कोई कामुक स्त्री किसी अत्यंत हैंडसम, वीर्यवान, मन पसंद पुरुष को देख कर अपने मन में अनायास ही पालती हो; उसे जब उसी पुरुष से चुदवाना के मौक़ा मिले तो उसकी मनोदशा क्या होगी? वही मनोदशा उस समय मेरी थी।

इसे एक पुरुष के लिए समझना मुश्किल है और शायद एक औरत ही उसे समझ सकती है। मैं उस समय उम्मीद कर रही थी की हमारे करीब खड़ी माया जो मेरे नंगे बदन को बड़ी ही लोलुपता से देख रही थी, वह जरूर उस समय के मेरे मन के भाव समझ रही होगी।

मैंने जब नम आँखों से माया की और देखा तो माया ने हलकी सी सहानुभूति भरी मुस्कान दे कर मुझे आश्वस्त किया की मैं जो करने जा रही थी वह सदा सर्वदा योग्य था और मुझे अपने आप को उसके लिए लेशमात्र भी दोषी या गुनेहगार समझने की आवश्यकता नहीं थी।

मैंने देखा की माया भी जैसे कोई कामी लम्पट पुरुष किसी खूबसूरत नंगी औरत के बदन की तस्वीर या मूरत देख कर लोलुपता से प्लावित हो कर उस मूरत को अपने चेहरे पर असहायता का भाव लेकर उसे घूरता रहता है (क्यूंकि वह उस मूरत को कुछ कर नहीं सकता) वैसे ही भाव मुझे माया के चेहरे पर नजर आ रहे थे।

शायद माया के मन में भी कहीं ना कहीं मेरे कमनीय नग्न बदन से खेलने की और उसे एक औरत जैसे भी भोग सकती है वैसे भोगने की प्रबल इच्छा उस समय पनप रही होगी। मैंने मन ही मन यह तय किया की मैं माया की उस इच्छा को मौक़ा मिलते ही जरूर पूरी करुँगी। मेरे लिए यह मेरा कर्तव्य था और माया का अधिकार भी था।

मैंने अपना एक हाथ लंबा कर माया का एक हाथ थामा और मेरे मुंह से उसे चूम कर माया को मेरी कृतज्ञता का इजहार किया। माया ने भी थोड़ा करीब आ कर मेरी करारी जाँघ पर हाथ रख कर उसे प्यार से सेहला कर मूकदशा में ही मेरी सुंदरता और कामुक बदन की प्रशंशा की।

उस समय मेरे जेठजी मेरी चूत से अपना लण्ड हलके से रगड़ कर उसे चिकना करने की कोशिश कर रहे थे। वैसे ही जेठजी का लण्ड उस समय अपने पूर्व रस से लथपथ चिकना था और हलकी रौशनी में चमक रहा था।

मैंने जेठजी का लण्ड दुबारा अपनी उँगलियों से सही जगह पर रख कर मेरी चूत की पंखुड़ियों को अलग कर उस पर रगड़ कर और हल्का सा अपनी और खिंच कर उसे मेरी चूत की गहराइयों में प्रवेश करने की जैसे इजाजत देदी। मं आगे जो होने वाला था उसे आतंकित नहीं थी यह कहना गलत होगा।

पर मैं उस मीठे जबरदस्त दर्द को झेलने के लिए मानसिक रूप से तैयार थी। मैं जानती थी ऐसे मोटे तगड़े और महाकाय लण्ड से चुदने में दर्द तो होता है पर वह दर्द भी अपने आपमें एक ऐसा उन्मादभरा आनंद देता है वह कोई स्त्री जिसे ऐसा अनुभव नहीं हुआ हो वह समझ नहीं सकती। पुरुष के लिए तो खैर वह समझना नामुमकिन ही है।

उसी समय मेरे जेठजी ने कुछ ऐसा किया जिसे अनुभव कर मेरे धैर्य का बाँध टूट गया। जेठजी ने मेरा लण्ड मेरी चूत की सुरंग में थोड़ा घुसा कर, झुक कर मुझे अपनी बाँहों में कस कर जकड़ लिया और मेरे होँठों पर अपने होँठ कस कर भींच दिए और मेरे मुंह में अपनी जीभ डालकर मेरी लार को चूसने लगे।

फिर अपने होँठों को मेरे कानों के करीब ला कर मेरे कानों में फुसफुसाते हुए बोले, “मेरी कमसिन खूबसूरत छाया, काश मैं तुम्हारे इस कमसिन, खूबसूरत नंगे बदन को दख पाता। तुमने मेरी आँखों पर यह पट्टी बाँध कर मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है। पर फिर भी मैं यह कहना चाहता हूँ की तुमने आज मेरे साथ यह सुहागरात मनाकर मुझे जो सुख दिया है उसके लिए मैं तुम्हारा आजीवन ऋणी रहूंगा। मैं इस एहसान को चुकाने के लिए क्या करूँ यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ।”

मैंने कुछ ना बोलते हुए, मेरे जेठजी के होँठों से फिर अपने होँठ सख्ती से कस कर मिलाये और उनके मुंह में अपनी जिह्वा डालकर उनके मुंह की लार मैं चूसने लगी। मैंने उनका सिर ऐसे ताकत से पकड़ा जैसे मैं उसे आजीवन नहीं छोड़ने वाली थी। कुछ पलों के लिए मेरे जेठजी भी मेरी इस अचानक प्रतिक्रया से स्तब्ध और भावुक हो गए।

उन्होंने एक हल्का सा धक्का मार कर अपना लण्ड मेरी चूत में कुछ और घुसेड़ा और बोले, “छाया आज तुम्हारी चूत गजब की सख्त और साथ साथ में लचीली महसूस हो रही है। मुझे ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी चूत तुमसे भी ज्यादा खूबसूरत और प्यारी है।

मैंने पहले इतनी प्यारी सी चूत नहीं महसूस की।” मेरे जेठजी की बात सुन कर मेरी जान मेरी हथेली में आ गयी। कहीं उन्हें इस बात का अंदाज तो नहीं हो गया की मैं वाकई में माया नहीं दूसरी औरत थी?

मैंने अपना सिर हिलाते हुए जैसे मेरे जेठजी की प्रशंषा को स्वीकार किया। जेठजी का लण्ड घुसने से मेरी चूत में असह्य पीड़ा हो रही थी।  पर जेठजी के प्यारे शब्द और उनका प्यार भरा चुम्बन मुझे ऐसे मदहोश बना रहा था की जैसे मैं उस दर्द को दर्द नहीं उन्माद भरा मीठे स्वाद सा अनुभव कर रही थी।

जैसे कोई मरीज ऑपरेशन थिएटर में एनेस्थेसिया के इंजेक्शन के प्रभाव से अपने आपको मदहोश दशा में पाता है और उसकी चमड़ी को काटती हुई तेज छुरी से जो दर्द उसे वास्तव में हो रहा है उसे अनभिज्ञ वह उस उन्माद को अनुभव कर एक अजीब सी आनंद भरी दशा का अनुभव करता है; शायद मेरा भी उस समय वैसा ही हाल था। हालांकि ना चाहते हुए भी मरे मुंह से हलकी चीखें निकल रहीं थीं।

मैंने मेरे असह्य दर्द से यह अनुभव किया की मेरे जेठजी का महाकाय लण्ड मेरी चूत के आखिरी कोने में घुस चुका था और शायद मेरी बच्चेदानी को ठोकर मार रहा था। मैंने थोड़ा सा ऊपर उठकर देखा तो पाया की मेरे जेठजी का अजगर सा लण्ड तब भी मुझे आधा बाहर दिख रहा था।

बापरे अगर मेरे जेठजी ने अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में घुसेड़ने की कोशिश की तो मेरी चूत का फटना या मेरी बच्चेदानी का तहस नहस हो जाना तय था। मैं मन ही मन प्रार्थना कर रही थी की मेरे जेठजी मेरी इस करुणा भरी दशा को समझेंगे और उतना ही लण्ड मेरी चूत में रख कर मुझे धीरे धीर चोदेंगे।

जेठजी ने जरूर मेरी मनोदशा को भाँप लिया होगा, क्यूंकि उन्होंने उसके बाद अपना लण्ड धीरे से मुझे प्यार करते हुए वापस खिंच लिया और उसके कारण मुझे कुछ राहत का अनुभव हुआ। उन्होंने अपने दोनों हाथ में मेरे दोनों स्तनोँ को ऐसे जकड़ कर पकड़ रखा था जैसे अगर वह उन्हें छोड़ देंगे तो वह कहीं गायब ना हो जायें।

मेरे जेठजी से चुदवाने का पागलपन मेरे सिर पर सवार हो चूका था। जिसके बारे में पहले मैं सोच भी नहीं सकती थी वह करने के लिए मैं अब पागल हो रही थी। मेरे जेठजी कभी ना कभी तो यह जान ही जाएंगे की मैंने उनसे चुदवाया था। मुझे पता नहीं था की जेठजी मेरे बारे में इसके बाद क्या सोचेंगे। जिस बात के मैं सपने देखती रहती थी, अब हकीकत में वह होने वाला था।

मैं मेरे जेठजी से चुदने वाली ही थी। मैं मेरे जेठजी की तगड़ी चुदाई करने की क्षमता के बारे में भलीभाँति जानती थी। माया ने सब कुछ तो बता दिया था मुझे। मैं जानती थी की उनके लण्ड में वह दम था की वह अगर ठान ले तो ऐसी चुदाई करने की ताकत रखते थे की किसी भी औरत की चूत की ऐसी की तैसी कर सकते थे।

मुझे भी इस बात का डर तो था ही। पर साथ में मैं यह चाहती भी थी की मेरी भी ऐसी ही तगड़ी चुदाई हो। हर औरत की तमन्ना होती है की जीवन में एक बार तो उसे ऐसी चुदाई का अनुभव हो।

हर औरत को ऐसे मर्द से चुदवाना पसंद होता है जिसे वह बेतहाशा प्यार करती है। उस पर अगर ऐसा मर्द अपने लण्ड के दम पर उस औरत की तगड़ी चुदाई कर पाए तो फिर तो उसे सोने में सुहागा ही कहना होगा। ऐसा मौक़ा कम औरतों की तक़दीर में होता है।

मुझे ऐसा मौक़ा मिला था और मैं उस समय उस मौके का पूरा फायदा उठाना चाह रही थी। मैं उस वक्त मेरे जेठजी के महाकाय लण्ड से चुदवाने का उत्तेजना भरा मीठा दर्द महसूस कर रही थी।

मेरे जहन में जो भाव थे उनका वर्णन करना मेरे लिए बड़ा ही मुश्किल है। वह दर्द क्या जेठजी से चुदवाते हुए अगर मेरी चूत फट भी जाती और अगर मैं मर भी गयी तो मुझे मंज़ूर था। मेरे जेठजी के क़दमों में मेरा यौवन या मेरी चूत क्या मेरी जान भी कुर्बान थी। मैं जेठजी का लण्ड मेरी चूत में महसूस कर उस दर्द से कहीं ज्यादा मेरा जीवन धन्य महसूस कर रही थी।

पर मेरे जेठजी को मेरे दर्द का एहसास हो रहा होगा, क्यों की उन्होने कुछ समय के लिए मेरी चुदाई रोक दी थी। मुझे कुछ पलों की राहत देने के बाद जेठजी ने फिर से एक धक्का दे कर मेरी चूत में अपना लण्ड पेला। इस बार जेठजी के लण्ड ने मेरी बच्चेदानी को तगड़ी ठोकर मारी थी। मेरा दर्द असह्य बनता जा रहा था।

पर मैंने निश्चय किया था की कुछ भी हो जाए, मैं जो भी कुछ दर्द हो उसे सहन कर लुंगी। मैं इतनी आसानी से मेरे जेठजी के सामने हथियार नहीं डालूंगी, मतलब मैं उस समय चीख कर चिल्ला कर बना बनाया खेल नहीं बिगाड़ूँगी।

मुझे कुछ आश्चर्य हुआ जब मैंने मेरे जेठजी के चेहरे को देखा। हालांकि वह कस के बँधी हुई काली पट्टी के कारण मेरे चेहरे पर रेखांकित दर्द का प्रतिबिम्ब और कपाल पर बह रही पसीने की बूंदें देख नहीं पा रहे थे, फिर भी मैंने उनके चेहरे पर सहानुभूति की झलक महसूस की।

मेरे जेठजी के चेहरे पर मैं यह भी देख पा रही थी की वह मुझे चोदने से वाकई में बड़े ही उन्मादित लग रहे थे। वह माया को तो लगभग रोज ही चोदते थे पर फिर आज मुझे चोदने पर वह अलग अंदाज वाला उन्माद क्यों? अंतर्मन से तो वह जानते ही थे की मैं कोई और नहीं माया ही थी। पर फिर भी मुझे चोदते हुए जो भावभंगिमा उनके चेहरे पर दिख रही थी वह कुछ अलग ही थी।

जेठजी का लण्ड मेरी चूत में वह कर रहा था जो उस रात तक कोई लण्ड नहीं कर पाया था। उस रात मुझे महसूस हुआ जैसे मेरे जेठजी का लण्ड और उनका सारा बदन ही नहीं उनका सारा ह्रदय उनकी सारी सख्सियत मुझे चोदने में मग्न थी।

किसी ने सही कहा है की चुदाई सिर्फ तन की ही नहीं होती है, चुदाई में मन और भाव का भी बड़ा अहम् रोल होता है। हर बार मेरी चूत में अपना लण्ड पेलते वक्त मेरे जेठजी के चेहरे पर जो भाव प्रदर्शित हो रहे थे, मैं वह भावों का वर्णन नहीं कर सकती। मुझे उनके चेहरे के भाव देख ऐसे लगता था जैसे वह मुझे चोदते हुए कुछ असाधारण अनुभव कर रहे हों।

मुझे एक पोर्न वीडियो याद आया जिसमें जंगल मानव टारझन ने जंगल में जब पहली बार धरती पर लगभग बेहोश हालत में लेटी हुई जेन को देखा था। उस से पहले टारझन ने किसी भी मानव मर्द या औरत को नहीं देखा था। जब टारझन ने जेन के कपडे खुले हुए बदन को देखा तो वह आश्चर्य में डूब सा गया।

वह बड़े ही कौतुहल से जेन के स्तनोँ को और अपनी छाती को, जेन की साफ़ जाँघों को और अपनी बाल वाली जाँघों को, अपने लण्ड को और जेन की चूत को आश्चर्य चकित हो कर देख कर दोनों का अंतर समझने की कोशिश कर रहा था। उस वक्त नग्न जेन को देखते हुए जो भाव टारझन के चेहरे पर थे कुछ वैसे ही भाव मेरे जेठजी के चेहरे पर मुझे दिखाई दे रहे थे।

हालांकि जेठजी ना तो मेरा चेहरा, नाही मेरे स्तनोँ और नाही मेरी चूत देख पा रहे थे। जब जेन जाग उठी और जेन ने टारझन को उसका लण्ड अपनी चूत के साथ रगड़ते हुए देखा तो जेन ने टारझन का लण्ड अपने हाथ में पकड़ा और उसे अपनी चूत में डाल दिया। टारझन ने जब एक धक्का मारा तो टारझन का लण्ड जेन की चूत में घुस गया। फिर जेन ने टारझन की कमर पकड़ कर उसे आगे पीछे करते हुए टारझन को उसका लण्ड अपनी चूत में अंदर बाहर करने के लिए प्रेरित किया।

तब धीरे धीरे जेन को चोदते हुए जैसे कोतुहल, उत्सुकता और उन्माद के भाव टारझन के चेहरे पर दिख रहे थे वैसे ही कोतुहल, उत्सुकता और उन्माद के भाव मुझे मेरे जेठजी के चेहरे पर मेरी चूत में अपना लण्ड पेलते हुए दिखाई दे रहे थे।

और फिर अचानक मुझे एक सदमा सा लगा जब मैंने खुद यह समझा की मेरे मन के भाव भी तो बिलकुल वैसे ही थे जैसे उस समय जेन के रहे होंगे। मैं भी तो मेरे जेठजी के लण्ड से चुदवाते हुए मेरे जेठजी के लण्ड की एक एक इंच की लम्बाई मेरी चूत के अंदर जाते हुए और बाहर निकलते हुए मीठे मीठे दर्द को वैसे ही कौतुहल, उन्माद और रोमांच अनुभव कर रही थी।

मेरी में चूत एक अजीब सी टीस उठ रही थी। वह टीस कोई दर्द की नहीं, वह टीस मेरे जेठजी के लण्ड का मेरी चूत की दिवार से अंदर बाहर आते जाते जो जबरदस्त घर्षण हो रहा था उसके कारण थी। जेठजी का लण्ड अंदर जाते जैसे मेरी चूत के पंखुड़ियां समेत सारी चूत की बाहरी सतह पूरी तरह मेरे चूत की सुरंगों में घुस जाती थी। जब जेठजी का चिकना चमकता लण्ड मेरी चूत में से बाहर निकलता तब वह सारी त्वचा फिर से बाहर आती थी।

इस प्रक्रिया में मेरी चूत की त्वचा में हो रहे जबरदस्त खिंचाव के कारण जो मीठे दर्द का अनुभव मुझे हो रहा था वह दर्द मेरी चूत में एक अजीब सा कम्पन या वह टीस पैदा करता था जो शायद मेरे जेठजी भी अपने लण्ड की सतह के ऊपर महसूस कर रहे होंगे।

शायद इसी अनुभव के कारण मेरे जेठजी के चेहरे पर मुझे उस समय उस अजीब उन्माद की अनुभूति होते हुए दिख रही थी। मेरे उन्माद और उस अजीब सी टीस का एक और भी कारण था जो सिर्फ मैं ही जानती थी। स्वाभाविक था की उस कारण का मेरे जेठजी को नहीं पता था।

वह कारण था मेरा मेरे देवता समान पूजनीय और दिव्य तन वाले जेठजी से चुदवाना और उनको वह ख़ुशी देना जिसकी प्रबल कामना जबसे मैं हमारे घर में बहु बन कर आयी तब से मेरे अंतरात्मा में चोरी से पनप रही थी। यही मेरे ह्रदय के भाव मेरी चूत के अंदर चुदवाते हुए कम्पन के रूप में प्रकट हो रहे थे।

जब एक दूसरे को चोदते हुए पुरुष और स्त्री के मन में एक दूसरे के लिए बहुत अधिक प्यार, उत्तेजना, सम्मान और समर्पण का भाव हो तो वह चुदाई अकल्पनीय आनंद देती है। और जब उस भावों के साथ पुरुष का लण्ड ऐसा हो जो स्त्री की चूत की त्वचा को इतना खींचे, लम्बे समय तक चोदता ही रहे और ऐसा जबरदस्त उत्तेजना भरा घर्षण पैदा करे तो स्त्री तो बेचारी बार बार झड़ती ही रहेगी।

मेरे पति के समेत मुझे चोदने वाले मेरे सारे पुरुष मित्र मुझे चोदते हुए ऐसी उत्तेजना, ऐसा रोमांच और ऐसा आनंद नहीं दे पाए थे जैसा मेरे जेठजी उस समय उनकी चुदाई से मुझे दे रहे थे। मेरे झड़ने का तो यह हाल था की मेरे जेठजी के दो या तीन धक्के मारते ही मैं झड़ जाती थी। मैं जेठजी का आधा लण्ड जो मेरी चूत में जा नहीं पा रहा था उसे देखती तो मेरा पूरा बदन रोमांच और एक तरह के छिपे भय से काँपने लगता। पर उस भय में भी एक तरह की अनोखी उत्तेजना थी।

अगर जेठजी ने मुझे कहीं जोर का धक्का दे कर अपने पुरे लण्ड को मेरी चूत में पेलने की कोशिश की तो मेरी चूत में मेरी बच्चे दानी तो फट ही जाएगी और आतंरिक खून के जबरदस्त रिसाव से मैं तो मर ही जाउंगी। यह सोच कर ही मेरी हवा निकल जाती थी।

जब मैं ऐसा सोच कर डरने लगती थी तब मारे रोमांच और डर के पता नहीं कैसे और क्यों, मेरा पूरा बदन एक अजीब रोमांच, उत्तेजना, उन्माद और कामुकता से अजीब सी दशा अनुभव करने लगता था। मेरे पुरे बदन में इतनी तेजी से खून का चाप बढ़ने लगता था जिसे दिमाग में एक नशा सा फ़ैल जाता था। इस अजीबो गरीब भाव को सिर्फ स्त्रियां ही अनुभव कर सकती हैं। किसी पुरुष के लिए इस को समझ पाना असंभव है।

पर जितना प्यार मैं मेरे जेठजी को चुदवाते हुए देने की कोशिश कर रही थी मेरे जेठजी मुझे चोदते हुए उससे कहीं ज्यादा प्यार, संवेदना और ममता दिखा रहे थे। जेठजी ने मुझे चोदने की रफ़्तार तो जरूर बढाई थी, पर वह अपना लण्ड पूरा का पूरा अंदर तक घुसेड़ने की कोशिश नहीं करते थे। मेरी चुदाई करते हुए जेठजी ख़ास तौर से मेरी चूँचियों को कई बार बहुत ज्यादा उत्तेजना से मसल देते थे जिसके कारण मेरे मुंह से दर्द की टीस उठती थी और मैं सिसकारियाँ भरने लगती थी।

जेठजी ने अपनी पोजीशन बदली और मुझे चोदते हुए वह थोड़े टेढ़े हो गए। उनकी पोजीशन ऐसी हो गयी की मैं उनकी जाँघों के बिच और वह मेरी जाँघों के बिच हो गए। ऐसी पोजीशन में चुदवाते हुए मेरी चूत में वह मीठा दर्द और बढ़ गया।

मैं बार बार मारे उत्तेजना के झड़ जाती थी। पता नहीं जेठजी मुझे ४० मिनट से ज्यादा ही चोदते रहे होंगे। हालंकि मैंने कभी भी किसी मर्द से एक ही चुदाई में इतनी लम्बी देर तक मुझे चोदते हुए नहीं पाया और उस तरह की उत्तेजना नहीं अनुभव की पर मैं भी बार बार झड़ने से और इतनी तगड़ी चुदाई होने से थकने लगी थी।

मैंने माया की तरफ देखा। माया बड़ी ही तीखी नजर से मेरी चुदाई देख रही थी। सबसे अजीबोगरीब भाव तो मैंने माया के चेहरे पर देखे। अपने पति को किसी दूसरी औरत को चोदते हुए देख कर हुए कोई पत्नी कैसे अपने आप को सम्हाल सकती है? पर माया ना सिर्फ सम्हली हुई थी, वह तो मेरी उसके पति से होती हुई चुदाई देख कर काफी उत्तेजित दिखाई दे रही थी।

मैंने बार बार माया को अपनी साड़ी ऊपर कर अपनी चूत में अपनी उंगली डालकर उनको अंदर बाहर करते हुए देखा। मेरी समझ में नहीं आया की मैं उस पर कैसे प्रतिक्रया दूँ? बेचारी माया मुझे चुदवाते हुए देख कर शायद अफ़सोस कर रही थी की काश वह मेरी जगह होती।

इतनी बार, बार बार झड़ने के बावजूद भी मेरी उत्तेजना कम होने का नाम नहीं ले रही थी। मुझे पता नहीं क्या हो गया था। मेरे जेठजी से चुदवाने का पागलपन मुझ पर ऐसे सवार हो गया था की इतनी जबरदस्त चुदाई की थकान के बावजूद मैं चुदाई को रुकवाना नहीं चाहती थी। मैं और भी ज्यादा चाहती थी।

मैंने जेठजी को चोदने से बिना बोले रोका। उनका लण्ड मेरी चूत में ही रखे हुए मैंने जेठजी को पलंग पर लिटाया और मैं जेठजी के ऊपर चढ़ गयी। मैं जेठजी के ऊपर घुड़सवार की तरह चढ़ गयी और जेठजी को बेतहाशा पागल की तरह चोदने लगी। पहले के मुकाबले जेठजी का लण्ड मेरी चूत में और कहीं ज्यादा घुस रहा था। पर मुझे उसका होश कहाँ?

जेठजी ने जब मुझे उनको इस तरह पागल की तरह चोदते हुए महसूस किया तो उनसे शायद अपने वीर्यस्खलन पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया, क्यूंकि उस समय तक मैंने जेठजी को मुझे चोदते हुए हलकी फुलकी हुंकार करते हुए तो सूना था पर मैं जब उनके ऊपर चढ़ कर इनको चोदने लगी तो शायद उनकी उत्तेजना इतनी ज्यादा बढ़ गयी की मेरे जेठजी, “ओह……. अरे……. बापरे……. आह……. ओह……. उफ़…….. तुम क्या चोदती हो….. अब मुझसे रहा नहीं जाता……” की कराहटें निकलने लगीं।

मैं समझ गयी की जेठजी अपना वीर्य छोड़ने के कगार पर पहुँच गए थे। मैंने अपने चोदने की फुर्ती बढ़ा दी। मेरे चोदने के फुर्ती के बढ़ते ही मेरे स्तनों के दो भरे हुए खरबूजे भी मेरे अंकुश के बाहर हो गए।

मेरे ऊपर निचे होते मेरे दोनों बूब्स इस तरह फुदक फुदक कर कूदते हुए मेरी छाती पर हर तरफ फ़ैल रहे थे। आँखों पर सख्ती से बंधी हुई काली पट्टी के बावजूद भी जैसे मेरे जेठजी को मेरे बूब्स उड़ते हुए दिख रहे हों, वैसे उन्होंने अपनी दोनों हथेलियों में मेरे दोनों बूब्स भर लिए और उन्हें मसलते और पिचकाते हुए वह अपनी उत्तेजना का इजहार कर रहे थे।

माहौल इतना उत्तेजना भरा हो गया था की मेरे जेठजी से अब अपना वीर्य रोके रखना नामुमकिन था। मैंने माया की और देखा और उसे जेठजी के लण्ड की और देख कर आँखें मार कर इशारा किया। माया समझ गयी की वक्त आ गया था की उसके पति उनका सारा वीर्य मेरी चूत में उंडेल दें। माया ने मेरे जेठजी के करीब जा कर बोला, “जी सुनो, अब जाने दो अपना सारा माल मेरी चूत में।”

तब मेरे जेठजी ने जो जवाब दिया उसे सुनकर मेरी सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। जेठजी ने कहा, “तेरी चूत में क्यों? मैं तो छाया की चूत में मेरा सारा वीर्य छोडूंगा। मुझे उसे गर्भवती जो बनाना है।”

जेठजी के यह शब्द मेरे लिए वज्राघात से कम नहीं थे। मुझे डर लगा की कहीं जेठजी की आँखों से पट्टी निकल तो नहीं गयी थी। पर मैं पूरी चुदाई के दरम्यान अच्छी तरह से देख रही थी। आँखों पर सख्ती से बंधी पट्टी वैसी ही थी। जेठजी मुझे माया ही समझ रहे थे क्यूंकि उन्होंने शायद माया के डर से छाया शब्द का इस्तेमाल किया था।

मैंने मेरे जेठजी का गरम वीर्य मेरी चूत में एक सैलाब की तरह उनके लण्ड के छिद्र में से फुटकर निकलते हुए महसूस किया। मेरी चूत की पूरी सुरंग मेरे जेठजी के गाढ़े वीर्य से भर गयी थी। जेठजी का लण्ड मेरी चूत में ही रखते हुए मैं फुर्ती से जेठजी के निचे लेट गयी और जेठजी को मेरे ऊपर चढ़ा दिया। मैं जेठजी का एक एक बून्द मेरी चूत में भर लेना चाहती थी।

जेठजी भी शिथिल हो कर मेरे ऊपर लेटे रहे जब तक उनके वीर्य की आखिरी बून्द निकल कर मेरी चूत में नहीं गयी। उसके बाद मुझे बड़ी राहत महसूस हुई जब मेरे जेठजी का अच्छा खासा भारी बदन मेरे ऊपर से हटा। जब तक औरत मर्द से चुदवाती रहती है, तब तक उसे मर्द का वजन महसूस नहीं होता। पर जैसे ही मर्द अपना वीर्य औरत की चूत में छोड़ देता है वैसे ही औरत को अपने ऊपर लेटे हुए मर्द का वजन महसूस होने लगता है।

मेरे बाजू में लेटते ही मेरे जेठजी ने मुझे खिंच पर अपने ऊपर ले लिया। मुझे कस कर जेठजी ने अपनी बाँहों में भर लिया और मुझे बेतहाशा चूमते हुए बोले, “अंजू बेटी, अब तो तुम और माया मेरी आँखों से पट्टी खोलो। तुमने पट्टी इतनी सख्त बाँधी है की मेरी आँखों में बड़ा दर्द हो रहा है।”

मेरे जेठजी को सुन कर मैंने माया की और देखा। मुझे लगा की उस समय अगर मुझे या माया को किसी ने छुरी से काटा होता तो खून की एक बूँद भी नहीं निकलती। मुझे लगा जैसे मेरा खून मेरी रगों में जम कर थम गया हो। हम दोनों ही कुछ बोलने के लायक नहीं थे।

मेरा सिर फट रहा था। मेरे पिता समान जेठजी से चुदवा कर मैंने बड़ा भारी गुनाह किया था। मैं मन ही मन में कचोट रही थी। अब मैं मेरे जेठजी से कैसे नजरें मिला पाउंगी? मैं तो मेरे जेठजी के सामने ना सिर्फ पूरी नंगी थी बल्कि उनके नंगे बदन पर उनके लण्ड को मेरी चूत में डलवा चुकी थी, और उनका वीर्य मेरे बदन पर बह रहा था। मैंने माया की और देखा। माया ने अपने हाथ लम्बे कर जेठजी की आँखों से पट्टी खोली।

जेठजी को अपनी आँखों को खोलते हुए कुछ कष्ट हुआ और कुछ देर तक वह इधरउधर आँखे झपकाते हुए हमें देखने की कोशिश करते रहे। कुछ देर बाद जब उन्होंने मुझे देखा तो दुबारा मुझे अपनी बाँहों में समेटते हुए बोले, “अंजू बेटी, माया, तुम दोनों मेरे करीब आओ तो।”

माया डरती हुई मेरे जेठजी के बाजू मैं बैठ गयी। जेठजी ने मुझे तो अपनी बाँहों से अलग ही नहीं किया। मेरे स्तनों को अपने हाथों में जकड़ कर दबाते हुए जेठजी ने मेरी आँखों में आँखें मिलाते हुए कहा, “देखो, अंजू बेटी, तुम बच्चे लोग क्या समझते थे? मैं तुम्हारी चाल नहीं समझ पाउँगा? बेटे, तुम जिस कॉलेज में पढ़ रहे हो ना, मैं उस कॉलेज का प्रधान आचार्य हूँ। मैं तो तुम लोगों की चाल पहले से ही समझ गया था। मुझे माँ ने बताया था की वह संजू से बच्चे के बारे में बार बार कह रही थी।

जब माया ने मुझे आँख पर पट्टी बाँध ने की बात की और फिर बच्चे के लिए बगैर प्रोटेक्शन से सेक्स की बात की तो मुझे दो से दो जोड़ ने में देर नहीं लगी। हाँ संजू की दिक्कत के बारे में मुझे पता नहीं था और वह मुझे तुम्हारी हरकतों से ही अंदाज लगाना पड़ा।”

जेठजी की बात सुन कर मेरा और माया का सिर शर्म से झुक गया। मैंने आँखें झुकाते हुए कहा, “जेठजी, मुझमें हिम्मत नहीं थी ऐसी बात करने की। आखिर आपने हमें अपने बच्चों की तरह पाला है।”

जेठजी ने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ कर मेरे गाल पर एक हलकी चुम्मी देते हुए कहा, “देखो अंजू, जब तक हम लाज का पर्दा रखते थे हमारे बिच कुछ दूरियां थीं, वह ठीक भी था। पर जब हम पर कोई विपदा आन पड़ती है तो हमें हमारे बिच की सारी दूरियां, चाहे वह लज्जा के कारण हों या फिर बड़े छोटे होने के कारण हों, उन्हें तोड़ कर एक साथ मिलकर उनको दूर करनी होगी।

काश तुम में से कोई भी अगर मुझसे सीधे बात करता तो मैं ना क्यों कहता? आखिर एक बात समझो। हमारा परिवार एक जुड़ा हुआ परिवार है और किसी भी आपत्ति में हम सब एक साथ हैं। जब आप ने मुझसे यह खेल रचाया तो फिर मैं भी आप के साथ इस खेल को खेल कर मजे लेना चाहता था।”

मैं मेरे जेठजी की नजरें से नजरें मिला नहीं पा रही थी। मैं जेठजी के पाँव से लिपट गयी। मैं अपनी आँखों में से आंसूं रोक नहीं पा रही थी। जेठजी ने मुझे अपने सीने से लगा कर कहा, “अरे बेटी, तुम्हारी जगह मेरे पाँव में नहीं। तुम्हारा स्थान मेरे ह्रदय में है। तुम मेरी बहु हो। बहु बेटी जैसी होती है। तुम पूछोगी, बेटी है तो फिर मैंने सेक्स कैसे किया? सेक्स भगवान की दी हुई देन है। हमारे समाज में कुछ पाबंदियां जरूर हैं, पर वक्त आने पर उन्हें तिलांजलि भी दी जा सकती है।”

मैं हैरान सी मेरे जेठजी की बात बड़े ध्यान से सुन रही थी। जेठजी शायद मेरी उलझन को दूर कर मुझे तनाव मुक्त करने की कोशिश कर रहे थे।

जेठजी ने मेरी उलझन को समझते हुए अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “हमारे यहां एक गोत्र में शादी और चुदाई की मनाई है। मैं भी मानता हूँ की एक ही गोत्र में चुदाई नहीं होनी चाहिए।

तुम मेरे गोत्र की नहीं हो तो जो हमने किया वह परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए स्वीकार्य होना चाहिए। हम अगर एक दूसरे से प्यार करते हैं और हमारे बिच अगर कोई इर्षा, द्वेष का भाव नहीं है तो मैं मानता हूँ की अगर प्रबल इच्छा हो या जरुरत हो तो चुदाई करने में कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए। तुममें से कोई भी अगर मुझसे सीधा आ कर अपनी समस्या बताते तो मैं अपने आप ही तुम्हें यही रास्ता बताता जो तुम्हें माया ने बताया।”

माया ने देखा की मैं जेठजी के इतना सारा कहने पर भी काफी शर्मसार अनुभव कर रही थी। तब माया मेरे करीब आयी। मैं उस समय अपनी साड़ी के एक छोर को पकड़ कर अपने नंगे बदन को जेठजी से छिपाने की कोशिश कर रही थी। माया ने मेरी साड़ी को खिंच कर हटाई और दूर कोने में फेंक दी।

फिर मेरे हाथ में मेरे जेठजी के लण्ड को थमा कर बोली, “दीदी, अब मेरे पति आपके भी पति हैं। अब आपको मैं यहां से पूरी रात नहीं जाने देने वाली। आपको मैंने सौतन बना दिया है और मैं सौतन की तरह ही आपसे प्यार करुँगी। मेरे पति याने आपके जेठजी भी आपको अपनी पत्नी की तरह ही प्यार करेंगे और चोदेंगे भी।

आप भी जब तक उनके साथ सोती है तब तक उन्हें अपना पति ही समझो। जब आप यहां से जाओ तो वह फिर से आपके जेठजी बन जाएंगे। पर तब तक आप उनकी पत्नी और मेरी प्यारी सौतन ही रहोगी।”

माया की बात सुन कर जेठजी ने माया को अपनी बाँहों में भर लिया और बोले, “माया, ऐसा करना तो संजू के ऊपर अन्याय होगा। अगर अंजू आज रात मेरे साथ सोयेगी तो फिर तुम्हें आज रात संजू के साथ सोना पड़ेगा। आज रात तुम संजू के साथ सुहाग रात मनाओगी, आज रात तुम संजू से चुदवाओगी। बोलो तुम्हें मंजूर है?”

माया जेठजी की बात सुनकर आश्चर्य से उछल पड़ी। माया को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह अपनी बड़ी बड़ी आँखें पटपटाती हुई बोली, “क्या? आप क्या कह रहे हो जी? मुझे संजयजी के साथ सोना पड़ेगा? ऐसा क्यों?”

जेठजी माया की पीठ सहलाते हुए बोले, “क्योंकी अब जब तुम और अंजू मेरे लिए एक सी ही हो तो फिर तुम और अंजू संजू के लिए भी एकसी ही होनी चाहिए। मतलब अगर अंजू यहां मेरे साथ सोयेगी, मुझ से चुदवायेगी तो उधर संजू के साथ तुम्हें भी सोना पड़ेगा, संजूभी तुम्हें चोदेगा। तभी तो हिसाब बराबर होगा ना? मैं नहीं चाहता की जब अंजू मेरे साथ हो तो संजू अकेला हो। बोलो मंज़ूर है की नहीं?”

मैंने माया की और देखा। माया ने कुछ उलझन से मेरी और देखा। मैंने उसे आँख मटका कर “हाँ” का इशारा किया। तब माया ने अपने पति और मेरे जेठजी की और दिखा और शर्माती हुई बोली, “मैंने आपका कहना ना माना हो ऐसा हुआ है कभी? अगर आप कहते हैं और अगर संजयजी और दीदी को एतराज ना हो तो मैं तो आपके हुक्म की गुलाम हूँ। आप जो कहोगे मैं वही करुँगी।”

जेठजी ने माया की और तीखी नज़रों से देखा और बोले, “नहीं ऐसे जबरदस्ती नहीं। मैं तुम्हारी तरह कोई खेल नहीं खेल रहा हूँ। मैं सीधे से पूछ रहा हूँ, क्या तुम संजू से चूदवाओगी?”

माया ने फिर से उसी तरह दृढ़ता से कहा, “देखिये जी आप मेरे प्राणधन हैं। मैंने अपना सारा जीवन आपको समर्पण कर दिया है। मैंने आप को अपना प्राणनाथ माना है और दीदी को अपनी बड़ी बहन। अगर आप चाहते हैं की मैं संजयजी के साथ सोऊँ, उनसे चूदवाऊं तो यह मेरा सौभाग्य होगा। मुझे संजयजी अगर स्वीकार करेंगे तो अपने आपको उनको सौंपने में मुझे ख़ुशी होगी। बताइये मैं क्या करूँ?”

जेठजी ने माया को अपने गले लगा कर कहा, “तुम नईनवेली दुल्हन सी तो सजी हुई ही हो। अपने कपडे ठीक से दुबारा पहनलो और ठीक से सज कर अभी संजू के कमरे में उसके साथ सोनेके लिए जाओ और उससे चुदवाओ। अगर संजू मना करे तो मुझे बताना।”

मैं भी मेरे जेठजी की और देखती ही रह गयी। माया धीरे से अपनी साड़ी सम्हालती हुई उठ खड़ी हुई और कमरे से निकल गयी। मैंने जेठजी के गले में अपनी बाँहें डालकर उनके होँठों को हलके से चूमते हुए पूछा, “मैं यह तो जानती थी की आप न्याय पसंद हैं, पर आप इतनी हद तक अपनी न्याय की दृढ़ता को ले जाएंगे यह सोचा नहीं था।” यह कह कर मैं जेठजी के लण्ड को हिलाकर उसे दुबारा सख्त करने की कवायद में लग गयी।

जब माया संजयजी के कमरे में पहुंची तब संजयजी के कमरे का किवाड़ खाली बंद था। माया ने हल्का सा धक्का दिया तो किवाड़ खुल गया। कमरे में अन्धेरा था। माया ने जैसे कमरे प्रवेश किया तब कमरे में बत्ती जल उठी। संजयजी बिस्तर में से उठ गए और माया को देख कर चौंक कर बोल उठे, “माया, मेरा मतलब भाभीजी आप?”

माया बिना कुछ बोले हमारे पलंग के पास जा कर खड़ी हुई। संजयजी बड़े ही अचरज से माया की और स्तब्ध हो कर देखते रहे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था की माजरा क्या था। माया ने संजयजी का हाथ थामा और उन्हें खिंच कर पलंग के ऊपर से उठाकर संजयजी से लिपटते हुए बोली, “संजयजी, मैं आपके साथ आज सुहागरात मनाने के लिए आयी हूँ।”

संजयजी पूरी तरह आश्चर्यचकित हो कर माया को कुछ देर तक चुपचाप देखते रहे। फिर उन्होंने माया को अपनी बाँहों में भर कहा, “अच्छा! अब मैं समझा। आप लोगों का खेल भाई साहब ने पकड़ लिया लगता है। यह भाई साहब का न्याय है। तभी मैं सोचूं, की यह सब चक्कर क्या है।”

जैसे ही माया संजयजी की आहोश में लिपट कर उनको अपने होंठ चूमने के लिए दे बैठी, संजयजी ने माया को चूमते हुए कहा, “भाई साहब किसी का भी एहसान अपने ऊपर कभी रखते नहीं है। आज उन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया।”

कहने की जरुरत नहीं की मुझे और माया को समय चलते हुए बच्चे हुए। माया को एक सुन्दर बेटी हुई और मेरे एक स्वस्थ और लंबा चौड़ा बेटा हुआ। हमारे घर में फिर से उत्सव का माहौल बन गया। उसके बाद मेरे जेठजी का ट्रांसफर कहीं और हो गया और माया और जेठजी हम से दूर चले गए। पता नहीं शायद यह तबादला जेठजी ने ही करवाया था क्यूंकि शायद वह मेरे और उनके संबंधों की किसी को भनक ना लगे यह चाहते थे।

मेरे जेठजी जान गए थे की अगर हमारे दोनों के परिवार एक साथ रहे तो बार बार मेरा मन जेठजी से चुदवाने को करेगा। मैं अपने आप को रोक नहीं पाउंगी और जेठजी को डर था की कहीं वह बात खुल ना जाए। माता और पिता जी को इस बात की भनक ना लगे इसी के लिए जेठजी बड़े चिंतित थे। इसी के कारण शायद उन्होंने अपना तबादला करवा दिया था।

फिर भी जब हम जेठजी को मिलने जाते थे तब मैं जेठजी के साथ और माया मेरे पति संजयजी के साथ ही सोती थी। मैं और माया दोनों भाइयों की सांझा बीबियाँ बन गयीं थीं। हम उस व्यवस्था से बहुत खुश थे।

THE END

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