पड़ोसन बनी दुल्हन 3

बीवी की सहेली की चुदाई

तब साले साहब ने मुझे कहा, “जी हाँ, मैं अलवर टूर पर गया था। मेरा तीन दिन का काम था। पर दो ही दिन में खतम हो गया। मैं वापस जा ही रहा था की उसी समय मुझे अंजू का फ़ोन आया और उसने मुझे सेठी साहब और टीना के बारे में और आप और सुषमाजी के बारे में काफी विस्तार से बताया।

मुझे सारे समाचार सुन कर बड़ी ख़ुशी हुई। अंजू ने मुझे कहा की बेहतर होगा की मैं दिल्ली आपके पास पहुंचूं। सुषमाजी से तो मेरी बात होती ही रहती है। टीना कल आ जायेगी तो मैं उससे भी कल मिल लूंगा। जब मैं यहां यहां पहुंचा तो आप का घर बंद पाया। मैंने फिर सुषमा जी के घर का दरवाजा खटखटाया। सुबह से मैं यहीं हूँ। मैंने सोचा की आपको फ़ोन करूँ। पर सुषमा जी ने मना किया। उन्होंने कहा की शामको आपको सरप्राइज देंगे।”

मेरे साले साहब सरकारी दफ्तर में अच्छी खासी पोजीशन पर थे। दिखने में बड़े ही हैंडसम वह काफी फिट थे। वह हमारे घर जब भी आते थे सेठी साहब को मिलने जरूर जाया करते थे।

सेठी साहब के घरमें सुषमा जी से तो उनकी मुलाक़ात हुआ ही करती थी। जो भला सुषमाजी को एक बार मिल जाए उनको कैसे नजरअंदाज कर सकता है? साले साहब भी सुषमाजी से बड़े ही प्रभावित थे और वापस जाने पर भी फ़ोन से उनके संपर्क में रहते थे। हालांकि मामूली छेड़छाड़ और कभी कभी एक दूसरे की टांग खींचने को छोड़ उनकी बातचीत ज्यादातर औपचारिकता की सीमा में ही होती थी। एक दूसरे की सकुशलता और जन्म दिवस पर बधाई इत्यादि तक सिमित रहती थी।

वाकई में साले साहब का आना मेरे लिए एक सरप्राइज़ नहीं शॉक था। आश्चर्य नहीं एक झटका था जिसे मैं झेल ने की कोशिश कर रहा था। मेरे चेहरे के भाव देख कर साले साहब बोल पड़े, “लगता है जीजूजी मेरे आने से ज्यादा खुश नहीं लग रहे। जिजुजी अगर आपको मेरा आना ठीक नहीं लगा तो मैं वापस चला जाता हूँ।”

उतनी ही देर में सुषमा पीछे से दिखाई दीं। सुषमा ने मेरा बचाव करते हुए कहा, “संजू जी (मेरे साले साहब का नाम संजय था उसे प्यार से सब संजू कह कर बुलाते थे) राजजी आपके आने से बड़े ही खुश हैं। साले साहब के आने से कोई नाखुश हो सकता है भला? दरअसल राजजी हमारे सरप्राइज को हजम करने की कोशिश कर रहे हैं।”

सुषमा फिर आ कर ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठी और मुझे और साले साहब को अपने दोनों तरफ बैठने को कहा। सुषमा के दायीं तरफ मैं और बांयी तरफ साले साहब बैठे। सुषमा ने जब कहा की “हमारा सरप्राइज” तब मैं समझ गया की सुषमा को साले साहब के आने से कोई ख़ास शिकायत नहीं थी। यह मेरे लिए बड़े ही आश्चर्य की बात थी।

आजकी रात हमारी आखरी और चरम रात थी। और अब यह तय था की साले साहब हमारे रंग में भंग जरूर करेंगे। खैर जैसा भी हो मुझे अब इस बारे में कुछ भी नकारात्मक प्रक्रिया देना कोई फायदेमंद नहीं लगा। मैं चुपचाप रहा और सुषमा क्या कहेगी यह सुनने के लिए अपने आप को तैयार करने लगा। सुषमा ने मेरी और और संजू की और बारी बारी से देखते हुए जो बातें कहीं वह मेरे लिए आजतक एक अँधेरे में दिप जलाने के बराबर थीं।

सुषमा ने कहा, “राजजी, आप संजयजी के आने का ओछा मत लिजीयेगा। आज पुरे दिन मैंने और संजयजी ने बैठ कर उनके जीवन का वह अजीबोगरीब पन्ना खोला और समझा है जिसे सुन कर आपभी करुणा, उत्साह और उत्तेजना से अभिभूत हो जाएंगे।

विधाता हमारी जिंदगी में कैसे कैसे मोड़ लाती है और हम इंसान उन मोड़ों और घुमावों को किस नजरिये से देखते हैं और उन्हें कैसे पार करते हैं उससे यह तय होता है की हम जिंदगी में खुश रहेंगे या फिर जिंदगी से शिकायत ही करते रहेंगे।

संजयजी ने वह मोड़ और घुमाव पार किये हैं और आज उनका आना इस लिए है की जब मैं और सेठी साहब इस अजीबोगरीब मोड़ पर खड़े थे तब संजयजी ही थे जिन्होंने हमें अपने ही अनुभव से मार्गदर्शन दिया और अँधेरे में एक दिप जलाकर आगे का रास्ता दिखाया।”

सुषमा की बात मेरे लिए कोई पहेली से कम नहीं थी। मैं सुषमा से कुछ पूछने ने के बजाय सुषमा की और जिज्ञासापूर्ण नजरों से आगे बोल कर बात को समझाने के इंतजार में चुप रहा।

सुषमा ने कहा, “जब हम बच्चे के बारे में बड़ी ही जद्दोजहद में उलझे हुए थे उसी अर्से में एक दिन मुझे संजयजी का फ़ोन आया। बातों बातों में संजयजी ने ताड़ लिया की मैं कुछ चिंतित थी।

उनके बार बार पूछने पर भी जब मैं टालती रही तब उन्होंने मुझे सीधा पूछ लिया की क्या बात आपको बच्चा नहीं हो रहा उसको ले कर तो नहीं है? जब मैं उनकी बात का प्रत्युत्तर नहीं दे पायी तब वह समझ गए की वही बात थी।

उन्होंने मुझे साफ़ साफ़ अपनी समस्या बिना छिपाए बता ने के लिए कहा। उन्होंने बिना कोई लागलपेट के कहा की उनके जीवन में भी बिलकुल ऐसा ही मोड़ आया था और फिर उन्होंने मुझे बताया की उसे उन्होंने कैसे सुलझाया।

मतलब, पहले उन्होंने अपनी लम्बी कहानी कही जिसमें उन्होंने अपनी ही यह समस्या कैसे सुलझायी वह बताया। जब मैंने संजयजी को अपनी समस्या के बारे में बताया तब वह सोच में पड़ गए। उसके बाद उन्होंने कहा की वह सोच कर मुझे बताएँगे की उनका इस मामले में क्या सोचना है।”

अब मेरी जिज्ञासा हद के बाहर हो रही थी। मुझसे सुषमा से पूछे बिना रहा नहीं गया, “फिर उन्होंने क्या बताया?”

सुषमा ने कहा, “उन्होंने वही बताया जो हमने अमल किया है। आप और टीना के साथ मेरे और सेठी साहब के कितने अच्छे नजदीकी सम्बन्ध हैं वह तो संजयजी जानते ही थे।

उन्होंने मुझसे पूछा की अगर हम दोनों कपल के एक दूसरे की पति अथवा पत्नि के साथ सेक्सुअल सम्बन्ध हों तो इससे क्या किसीको कोई तकलीफ होगी? तब मैं उनकी बात सुनकर चौंक गयी। मेरा माथा ठनक गया। यह संजयजी क्या बात कर रहे थे? मेरी समझ में नहीं आ रहा था।

पहले तो मैं उनकी बात सुनकर काफी नाराज हुई की ऐसी उलटपुलट बात संजयजी क्यों कह रहे थे? पर फिर उनकी बातों में गंभीरता देखते हुए उसके बारे में सोचने लगी।“

सुषमा ने फिर मेरी और मुड़ कर मुझे देखा और बोली, “यह तब की बात है जब सेठी साहब टीना को हंसी मजाक में छेड़ते रहते थे पर तुम वहाँ होने के बावजूद भी उसे बुरा नहीं मानते थे।

मैंने सोचा की शायद कहीं ना कहीं तुम सेठी साहब को टीना को और छेड़ने के लिए प्रोत्साहन दे रहे थे। तुम उसी समय मुझ पर लाइन मार रहे थे यह तो हम दोनों जानते ही हैं। मैंने एक और एक दो किये और मैं समझ गयी की तुम टीना को सेठी साहब के करीब जाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हो ताकि सेठी साहब तुम्हें मेरे करीब आने से ना रोकें।

मेरे दिमाग में यह आया की अगर ऐसा कुछ है तो जो संजयजी कह रहे थे वह हो सकता था। मैंने संजयजी को कहा की इस बारे में हमने सोचा नहीं है। मैं तो सेठी साहब के टीना से सेक्सुअल सम्बन्ध को स्वीकार कर सकती हूँ। सेठी साहब भी शायद मेरे और राज के सेक्सुअल सम्बन्ध स्वीकार कर सकते हैं। पर यह बात हम दोनों को आपस में बैठ कर करनी पड़ेगी।”

मैं हैरान रह गया की मेरे पीछे इतनी बड़ी योजना बन रही थी और मैं उसमें सिर्फ एक मोहरा बन कर अपना रोल निभा रहा था। खैर मेरी जिज्ञासा मेरी इस शिकायत से ज्यादा मजबूत थी। मैंने सुषमा से ऐसे कहा जैसे एक बच्चा माँ से बड़ी ही रसीली कहानी सुन कर पूछता है। मैंने पूछा, “फिर क्या हुआ?”

सुषमा से अपनी मुस्कान छिपाई नहीं गयी। सुषमा ने मंद मुस्कान के साथ अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “उसी समय टीना मेरे पास आयी सेठी साहब की शिकायत ले कर। उसी समय आपने सेठी साहब को बिना कपडे पहने हुए देखा और उसके बारे में आपने टीना से भी बात की।”

साले साहब ने बिच में दखल देते हुए सुषमा से कहा, “सुषमाजी अब हम आपस में एक हो गए हैं। हमें अब एक दूसरे से कुछ भी छिपाना नहीं है। हमें एक दूसरे से साफ़ साफ़ बात करनी चाहिए। अब आप को जो भी कहना है खुल कर कहिये। यह बिना कपडे की बजाय नंगे देखा यह कहोगे तो बेहतर रहेगा। और सेठी साहब का तगड़ा लण्ड देख कर उसके बारे में जीजू ने टीना दी से बात की यह बोलिये प्लीज।”

सुषमा ने मेरी तरफ देखा और साले साहब से कहा, “हाँ जरूर मैं साफ़ साफ़ बात करुँगी, अगर आप मुझे सुषमाजी कह कर ना बुलाएं।”

साले साहब ने मेरी और देख कर कहा, “ठीक है।”

सुषमा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “हाँ तो मैं कह रही थी की उसी टाइम राज ने सेठी साहब का तगड़ा लण्ड अकस्मात ही देख लिया था और टीना को उसके बारे में बता कर टीना की भी उसे देखने की स्त्री सहज लोलुपता को जागृत कर दिया था। जब टीना ने कहा की मसाज करवाते हुए सेठी साहब का लण्ड टीना के बदन को छू रहा था और मसाज करते हुए सेठी साहब के हाथ टीना के स्तनोँ को छू रहे थे तब टीना को उसकी चूत में बड़ी ही अजीब सी हलचल महसूस हो रही थी तब राज ने टीना को यह कह दिया की अगर मसाज करते हुए सेठी साहब कोई सेक्सुअल हरकत करते हैं तो वह उन्हें ना रोके।

बल्कि अगर सेठी साहब टीना को चोदना भी चाहें तो टीना अगर उनसे चुदवा भी लेती है तो राज को कोई आपत्ति नहीं होगी बल्कि ख़ुशी होगी। टीना के लिए तो यह बात आग में घी डालने जैसी थी। यह सब बातें टीना ने मुझे बतायीं।”

जब टीना ने मुझे वह सारी बातें बतायीं तब मैंने भी टीना को कहा की मुझे उसके सेठी साहब से चुदवाने से कोई आपत्ति नहीं है। पहले तो टीना मेरी बात को सुन कर दंग रह गयी। मैंने टीना को मेरी बच्चे को लेकर समस्या को विस्तार से बताया।

जब संजू ने मुझे हम दो कपल के बिच में सेक्सुअल संबंधो के बारे में सुझाव दिए तब मुझे लगा की जिस तरह हमारे सम्बन्ध विकसित हो रहे थे तो यह मुमकिन था। टीना से मैंने सारी बातें खुल कर की। मैंने कुछ भी नहीं छिपाया। टीना ने मेरी बात को बड़ी ही सकारात्मक रूप में लिया और मुझे वचन दिया की अगर उसे सेठी साहब से बच्चा हुआ और अगर मुझे राज से बच्चा ना हुआ तो वह अपना बच्चा मुझे गोद में दे देगी।”

“आज मैं जब टीना के उस वचन को याद करती हूँ तो मेरी आँखें नम हो जाती हैं। टीना अपने कहे को निभाएगी उस पर मेरा पूरा विश्वास है क्यूंकि उसका सेठी साहब से चुदवाने का मुख्य कारण भी यही है की उसे सेठी साहब से बच्चा हो जिसे वह जनम दे कर मुझे दे सके।” यह कहते हुए सुषमा का गला भर आया।

सुषमा की आँखों में पानी छलकने लगा। सुषमा ने संजू से लिपट कर कहा, “यह सब तुम्हारे कहने से हुआ की हम आज एक दूसरे से चुदाई करके इतने खुश हैं। सेठी साहब और टीना की चुदाई भी इन्हीं के सुझाव से प्रेरित है। मुझे या टीना को या हम दोनों को अगर बच्चा होगा तो यह संजू के सुझाव के कारण ही होगा। मैं संजू का जितना भी एहसान मानु कम है।”

सुषमा की बात सुन कर हम तीनों की आँखें नम हो गयीं। सुषमा को बच्चे की ललक कितनी तगड़ी थी वह मैं जानता था। साले साहब के कारण ही आज हम आगे चल कर बच्चों को पा सकेंगे यह सोच कर मेर मन में भी साले साहब के लिए जो कड़वाहट थी उसकी जगह एक अजीब से अपनेपन ने ले ली। अब मेरे साले साहब सिर्फ मेरे लिए ही नहीं हम दोनों के लिए बल्कि अगर टीना और सेठी साहब को भी शामिल करें तो हम चारों के लिए एक आशीर्वाद के समान थे।

मैं साले साहब को धन्यवाद देने की बात सोच रहा था पर सुषमा ने मुझे रोकते हुए कहा, “राज, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है। आज जब संजू मेरे घर आये तो मेर मन में जो तुमने एम.एम.ऍफ़. की बात डाली थी वह उजागर हो गयी। पर मेरी उलझन यह थी की मैं सिर्फ तुम्हारे वीर्य से ही अपना बच्चा चाहती थी। और किसी के वीर्य से नहीं।

संजू मेरा बहुत अच्छा दोस्त है पर मैं उसके वीर्य को भी शामिल नहीं करना चाहती थी। आज वह प्रश्न भी संजू ने हल कर दिया। संजू ने मुझे कहा की उसके वीर्य में बच्चे पैदा करने वाले शुक्राणु है ही नहीं। इसी के कारण तो उनको सारे हथकंडे अपनाने पड़े। उन्होंने वह हथकंडे अपनाये जिसको वह जिंदगी के मोड़ और घुमाव कह रहे हैं।”

सुषमा की बात सुन कर मैंने सुषमा से पूछा, “तो फिर आज रात संजू क्या करेंगे?”

सुषमा ने कहा, “क्या करेंगे मतलब? संजू वह सब करेंगे जो तुम करोगे। मतलब वह मुझे चोदेंगे। संजू कहते हैं बच्चे पैदा नहीं कर सकते इसका मतलब यह नहीं है की वह किसी औरत को संतुष्टि नहीं दे सकते।”

मैंने पूछा, “क्या मतलब? ऐसा कभी होता है क्या?”

मेरे यह सवाल पूछते ही सुषमा ने संजू को इशारा किया। संजू ने फ़ौरन अपना पजामा उतारा और निक्कर हटा कर उसके लण्ड को हमारे सामने प्रस्तुत किया।

संजू का लण्ड देखते ही मेरी बोलती बंद हो गयी। संजू का लण्ड मेरे लण्ड से लंबा और मोटा था. उसके लण्ड पर उसका वीर्य उसकी धमनियों में दौड़ रहा था। सारी चुदाई की बातें सुन कर उसका लण्ड लोहे की छड़ के जैसे सख्त हो गया था।

सुषमा ने संजू के लण्ड को अपने हाथ की हथेली में लिया और उसे सहलाते हुए बोली, “हो गयी संतुष्टि? संजू का लण्ड काटने पर जहर भले ही उगलता ना हो (मतलब बच्चा भले ही पैदा कर पाता ना हो) पर काटने में किसी से भी कम नहीं (मतलब चोदने में ज़रा भी कम नहीं)।”

सुषमा शरारत भरी हंसी दे कर बोली, “कर देना मेरा वही हाल। मैं भी देखूं की मेरे दो मर्दों में कितना दम है। मैं फिर मेरे पति को कह तो सकती हूँ ना की देखो तुम्हारी बीबी का दो मर्दों ने मिल कर चोद चोद कर क्या हाल कर दिया है।

पर राज एक बात कहूं? मेरी तगड़ी चुदाई तो सेठी साहब करते ही रहते हैं। उनसे हलकी फुलकी चुदाई नहीं होती। मेरी तगड़ी चुदाई तो तुम करना ही, पर मुझे सच्चा एम.एम.एफ. का आनंद देने के लिए क्या करोगे? मुझे इतने बढ़िया प्यार करने वाले साथीदार मिले हैं तो क्यों ना हम आज वास्तव में जिसे एम.एम.एफ. कहते हैं वह एन्जॉय करें?”

मैं कुछ देर सुषमा की तरफ देखता ही रहा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था की सुषमा क्या कह रही थी। मैंने कुछ आश्चर्य से सुषमा की और देखा और पूछा, “वास्तव में एम.एम.एफ. से तुम्हारा क्या मतलब है? कहीं तुम वही तो नहीं सोच रही हो जो मैं सोच रहा हूँ?”

सुषमा ने मेरी और शरारत भरी नज़रों से दखा और पूछा, “तुम क्या सोच रहे हो?”

मैंने कहा, “ठीक है, जो मैं सोच रहा हूँ वह हम करेंगे, अगर तुम्हारी वही इच्छा है तो।”

सुषमा ने कहा, “तुम ठीक समझे हो। ओके।”

फिर मेरा और साले साहब का हाथ थाम कर सुषमा बोली, “पर देखो मैं एक बात और कहना चाहती हूँ। मेरे माताजी और पिताजी संगीत के बड़े शौक़ीन थे। वह बड़े ही इमोशनल भी थे। मैंने बचपन से ही देखा था की कई बार संगीत सुनते, बजाते या गाते दोनों बड़े ही भावावेश में आ जाते और उनकी आँखों में से आंसूं बहने लगते।

वह दोनों एक दूसरे को गले लगाते हुए संगीत की लय में डूब जाते और मैं अगर साथ में बैठी होती थी तो मुझे अपनी बाँहों में ले कर कहते, संगीत में डूब जाने में जो आनंद है वह अद्भुत है। संगीत, प्रेम और भक्ति यह हमें इस दुनिया से किसी और दुनिया में ले जाते हैं। मेरे पिताजी मेरी माँ से बहुत प्यार करते थे।

मैंने बचपन में मेरी माँ को मेरे पिताजी से संगीत सुनते हुए चुदवाते हुए देखा था। शादी से पहले मेरी माताजी को जिन्होंने पहली बार संगीत की शिक्षा दी थी उस शिक्षक से माताजी प्यार करने लगी थी और कुछ ऐसा हुआ की उनके साथ माँ के शारीरिक सम्बन्ध हो गए। शायद शादी से पहले माँ ने कई बार उनसे चुदवाया भी था।“

सुषमा की इस तरह अपनी माँ के बारे में बात सुन कर हम दोनों हतप्रभ रह गए। सुषमा ने हमारी और देखा। वह समझ गयी की हम इस बात को हजम नहीं कर पा रहे थे। सुषमा ने हमें दिलासा देते हुए कहा, “माँ उनसे शादी करना चाहती थी। पर उस शिक्षक की माली हालत और उनका सामजिक स्तर भी हमारे से निचा था इस कारण मेरे नाना और नानी उस शादी के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे।

माँ की शादी मेरे पिताजी से हो गयी। बाद में पिताजी को माँ से ही सारी बात का पता चला और यह भी पता चला की वह शिक्षक का तबादला संजोग से मेरे पिता के गाँव में ही हुआ था। जब पिताजी को यह सब पता चला तो नाराज होने की बजाय पिताजी ने उस शिक्षक को हमारे घर बुलाया।

उस समय मैं छोटी थी पर मैंने उन को देखा है। पिताजी ने उनके साथ अपने रिश्तेदार की तरह सम्बन्ध रखे, उनको बड़े सम्मान पूर्वक हमारे घर बुलाया और माँ को आग्रह कर कहा की माँ उनसे शारीरिक सम्बन्ध तोड़े नहीं बल्कि जारी रखे। पहले माँ ने साफ मना किया पर पिताजी के आग्रह के आगे माँ को झुकना पड़ा।

मैंने कई बार उन शिक्षक को प्यार से माँ की चुदाई करते हुए छिप कर देखा था। पिता जी ने मुझसे भी उन शिक्षक से अपने पिता की तरह ही प्यार भरा व्यवहार करने का आग्रह किया था जो मैंने किया भी। अफ़सोस वह शिक्षक का कम उम्र में ही देहांत हो गया।” यह कहते हुए सुषमा की आँखें नम हो गयीं।

मैंने सुषमा को बाँहों में भर लिया और कहा, “सुषमा यह जिंदगी बड़ी ही विचित्र है। जिंदगी कई बार कहानियों से भी ज्यादा रोमांचक और अजीब मोड़ लेती हैं। जीवन में कई अजीबोगरीब मोड़ और घुमाव आते हैं।

हमें चाहिए की उन मोड़ों से हम बड़ी ही संवेदनशीलता से और समझदारी से गुजरें और गुजरते हुए हमें या किसी और को किसी तरह की चोट या वेदना ना पहुंचे और कोई हमारे वर्तन के कारण आहत ना हो। हो सके तो हम हमारे और दूसरों के जीवन में मिठास और खुशियां बांटने की कोशिश करें। यही आपके पिताजी ने किया। यह आपके लिए गर्व का विषय है।”

मेरी बात सुन कर सुषमा और भी भावुक हो गयी और बोली, “राजजी, आप सच कह रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ की मेरी माँ की नजर में मेरे पिताजी के लिए इतना सम्मान बढ़ गया की माँ पिताजी को अनहद प्यार करने लगी और दोनों आज भी एक दूसरे के बगैर पल भर रह नहीं सकते।

हालांकि मैंने देखा नहीं पर मुझे पूरा यकीन है की पिताजी और उस शिक्षकजी ने मिल कर माँ को कई बार साथ में चोदा होगा। मुझे लगता है मेरे पिताजी ने उस जमाने में भी उन शिक्षकजी से मिल कर माँ की एम.एम.एफ. चुदाई की होगी।”

मैंने गंभीर माहौल को हल्का करने की कोशिश करते हुए मुस्कुराते हुए कहा, “ओह… अच्छा। इसी लिए आज मोहतरमा का एम.एम.एफ. चुदाई करने का मूड हुआ है!”

सुषमा ने मुझे कोहनी से धक्का मारते हुए कहा, “अरे छोडो, अब वह ज़माना गुजर गया। अब मेरी बारी है। मुझे यकीन है की उन्होंने एम.एम.एफ. चुदाई जरूर की होगी क्यूंकि हालांकि मैंने उसे अपनी नज़रों से नहीं देखा पर जल्दी सुबह कई बार शिक्षक अंकल को पिताजी और माँ के बैडरूम से कपडे पहनते हुए निकलते मैंने देखा था जब पिता जी भी उसी बैडरूम में सोये हुए थे।

मेरे पिताजी माँ को इतना चाहते थे, और मैं जानती हूँ की वह जब भी मौक़ा मिले माँ को चोदने के लिए इतने पागल रहते थे और उनकी चुदाई करने में हमेशा तैयार रहते थे की अगर शिक्षक अंकल माँ को पिताजी के सामने चोद रहे हों तो मेरे पापा के लिए यह नामुमकिन था की वह भी माँ को चोदे बगैर रह सकें।”

मैंने कभी सोचा नहीं था की कोई हिंदुस्तानी महिला चुदाई के बारे में इस तरह खुल कर बिंदास बात कर सकती है। ख़ास कर सुषमा को तो कतई नहीं। सुषमा मुझसे इतनी बेबाकी से बात करती देख मुझे बहुत अच्छा लगा। अक्सर दो तरह के मर्द होते हैं। एक टाइप के मर्दों को शर्मीली, अपने कपडे उतार ने में हिचकिचाती हुई, चुदवाते हुए भी नजरें नीची रखे, जो चुदवाते हुए कुछ ना बोलें ऐसी औरतें पसंद होतीं हैं।

पर दूसरी टाइप के मर्दों को वह औरतें पसंद हैं जो नंगी होकर बड़े प्यार से अपनी चूत चुसवाएं, बेझिझक मर्दों का लण्ड चूसें, मर्दों के साथ खुल्लम खुल्ला लण्ड, चूत, चुदाई ऐसे शब्द बोलें ऐसी औरतें पसंद होतीं हैं जो शर्माती नहीं और सामने चल कर मर्दों को चोदने के लिए उकसातीं हैं।

मुझे दोनों की मिक्स टाइप की औरतें पसंद हैं। ऐसी औरतें जो शर्मीली हैं, पर एक बार शर्म का पर्दा हट जाए फिर एक मर्द दोस्त की तरह खुल्लमखुल्ला बात करे। फिर चुदाई के बारे में बोलने में परहेज ना करे। और जो फिर बड़े प्यार से अपनी चूत चूसवाये लण्ड चूसे, और चुदाई में जो कुछ भी होता है वह खुले दिल से करे और करने दे।

सुषमा बिलकुल जैसी मेरी पसंद थी वैसी ही थी। जब तक एक औपचारिक सम्बन्ध होता है तब तक वह बड़ी ही शालीनता, गंभीरता और मर्यादा का परिचय देती है। पर जैसे उसके ऊपर से मर्यादा और लज्जा का पर्दा हट गया फिर वह बेबाक बिंदास चुदासी हो जाती है और बड़े प्यार से चुदवाती भी है और चोदने वाले मर्द को पूरा सपोर्ट करती है।

मैंने सुषमा के होँठों से अपने होंठ हटाते हुए साले साहब की और देखा। साले साहब ने सुषमा के सर को चूमना शुरू किया। उन्होंने मुझे इशारा किया की मैं सुषमा के पाँव से शुरुआत करूँ। सुषमा ने जीन्स की पतलून पहन रखी थी जिसमें उसके कूल्हे बड़े ही आकर्षक दिख रहे थे।

पर वह सुषमा के पाँव को पूरा ढके हुए थी। मैंने सुषमा के पतलून के बेल्ट के हूकों को खोला। सुषमा की पतलून कमर से ढीली हो गयी। सुषमा ने पाँव मार कर उसे टांगों से निचे की और खिसका कर निकाल दिया। अब सुषमा निचे सिर्फ पैंटी पहने हुए थी। सुषमा की करारी जांघें बड़ी ही आकर्षक लग रहीं थीं।

साले साहब ने पहली बार सुषमा की नंगी जाँघों का दर्शन किया था। वह तो उन्हें दखते ही रह गए। साले साहब ने जरूर कई लड़कियों की नंगी जांघें देखीं होंगीं। मुझे यकीन था की अंजू भाभी की जांघें भी बड़ी ही आकर्षक होंगीं, पर सुषमा की जांघें ऐसी लगतीं थीं जैसे कोई सोलह साल की कँवारी एकदम फिट लड़की की पतली सुआकार नंगी जांघें जैसे उन्हें कोई इंजीनियर ने या कलाकार ने फुट रूल से खींच कर सीधी बनायीं हो।

उनमें कहीं भी कोई बल या दाग नहीं था। सीधी जाँघों के मिलन स्थान से निकली हुई जाँघे जैसे कोई एथलीट या दौड़ने वाले की होतीं हैं। पर अक्सर एथलीट की जाँघों में उनके स्नायु बाहर सख्त निकले हुए दीखते हैं। सुषमा की जाँघों में एकदम सीधा चिकना आकार था जो मर्दों के दिल को छुरी से काटने की क्षमता रखता था। भला साले साहब का क्या दोष की वह सुषमा के पतलून निकाल फेंकने पर सुषमा को चूमना भूल कर सुषमा की पैंटी के निचे छिपी हुई चूत की मात्र कल्पना करते हुए उसकी जाँघों को देखते ही रह गए।

उन्हें तब अपने काम का ध्यान आया जब मैंने सुषमा के तलवों से शुरुआत कर सुषमा की टांगों की पिण्डियों को बारी बारी चूमना और चाटना शुरू किया। सुषमा की टांगों पर एक भी बाल का निशान तक नहीं था।

जैसे ही मैं सुषमा की जाँघों को चूमता गया वैसे वैसे साले साहब भी सुषमा के सर, उसकी गर्दन, उसके कंधे, फिर घुमा कर वह सुषमा के होँठों के पास पहुंचे। सुषमा ने अपने होँठ साले साहब की गर्दन पकड़ कर उनको अपने ऊपर खिंच कर उनके होँठों से अपने होंठ मिलाकर प्रस्तुत किये।

इस बार सुषमा के रसीले होँठों को चूमने, चूसने और काटने की साले साहब की बारी थी। मुझे लगा की मेरे साले साहब इस कला में काफी निपुण लग रहे थे। सुषमा के होँठों उन्होंने अलग अलग कोनों से अपने होंठों को घुमाते हुए और अपनी जीभ से सुषमा के होँठ, जीभ और मुंह को अंदर बाहर से चाटते हुए वह ऐसे व्यस्त हो गए की उन्हें बाहर की दुनिया का जैसे ध्यान ही नहीं रहा। इस बिच उनका एक हाथ और मेरा एक हाथ सुषमा के दोनों अल्लड़ स्तनोँ को उसके टॉप के ऊपर से ही बारी बारी से मसलने में व्यस्त हो गए।

सुषमा का टॉप और ब्रा हमारे मसलने से वैसे ही इतने अस्तव्यस्त हो गए की सुषमा के स्तनोँ की निप्पलेँ बाहर निकल आयीं। पर बटन नहीं खोलने से वह कभी दर्शन देतीं तो कभी ब्लाउज और ब्रा के अंदर छिप जातीं।

मैंने सुषमा के टॉप को निचे से ऊपर की और खींचने की कोशिश की तब सुषमा ने मेरी जांघों के बिच में हाथ डालकर मुझे इशारा किया की मैं भी अपने कपडे उतार कर मेर लण्ड के दर्शन दूँ। सुषमा का दुसरा हाथ साले साहब की जाँघों के बिच था। हम दोनों को हमारी रानी का बिना कुछ बोले अपने हाथों की हरकतों से आदेश हुआ की हम भी हमारे कपड़ों को उतार कर नंगे हो जाएँ।

हमारे द्वारा सुषमा के ब्लाउज को ऊपर सरका ने पर सुषमा ने अपने हाँथों को ऊपर कर अपना टॉप ऊपर की और खिसका कर निकाल दिया। सुषमा अब सिर्फ ब्रा और छोटी सी पैंटी में थी। तो हमारे साले साहब कौनसे कम थे? उन्होंने भी अपना कुर्ता उतार फेंका।

मैं उनका सपाट पेट, उसके ऊपर पड़े हुए बल और सख्त स्नायु देख कर काफी प्रभावित हुआ तो साफ़ बात है सुषमा तो हमारी उस रातकी शय्या भागिनी थी। वह साले साहब के इस तरह के बदन के प्रदर्शन से प्रभावित क्यों नहीं होगी?

सुषमा ने साले साहब के पेट पर जो बल पड़े थे उन पर हाथ फिरते हुए कहा, “संजू जी भाई वाह मानना पडेगा। आपने आपका शरीर अच्छा खासा फिट रखा है। कोई भी औरत आप पर आसानी से अपना दिल और बदन दे सकती है। यह विधाता का अन्याय है की आप के साथ यह अनुपजाउता या इनफर्टिलिटी का अभिशाप लगा है।”

साले साहब ने सुषमा की और देख कर मुस्कुराते हुए कहा, “सुषमा यह अभिशाप नहीं वरदान है। हाँ यह ठीक है की मेरी स्वयं की पत्नी के लिए यह अभिशाप है, पर मेरी और महिला शैय्या भागिनीओं के लिए तो यह वरदान है।

उनको मुझसे बच्चा होने का कोई डर ही नहीं। वह मुक्त मन से मेरे साथ बिना कंडोम अभिसार मतलब चुदाई कर सकती है। अक्सर मर्दों को और औरतों को भी अगर मर्द कंडोम पहनते हैं तो वह आनंद नहीं आता जो नंगे लण्ड से मिलता है। मुझे भी कंडोम पहन कर चोदने में मजा नहीं आता।

आज आप के साथ भी मेरा जो मिलन होगा वह बिना कंडोम के अवरोध से इसी कारण हो सकता है, क्यों की मैं शतप्रतिशत इनफर्टाइल हूँ। और शायद इसी लिए आपने भी मुझे आपकी शैया का साथीदार बनाने की अनुमति दी है।”

मैं साले साहब की व्याख्या से बड़ा ही प्रभावित हुआ। उनकी बात सच थी। अक्सर यह होता है की जिस मर्द को इनफर्टिलिटी होती है वह इस के कारण बड़े ही मानसिक तनाव में होते हैं। शायद इसकी वजह से उनका लिंग माने लण्ड भी खड़ा नहीं रह पाता। पर मेरे साले साहब को ऐसी कोई समस्या नहीं थी। वह बड़ी आसानी से यह इजहार कर रहे थे की वह इनफर्टाइल थे। और इसी के कारण उनके लण्ड पर इस बात का कोई भी असर नहीं होता था। वह चोदते हुए अपनी महिला साथीदार को चुदाई का आनंद दे सकने में पूरी तरह सक्षम थे। मेरी भाभी का हमेशा मुस्कुराते रहना इसका सुबूत था।

साले साहब की बात सुनकर सुषमा भी काफी खुश हुई। जो मर्द या औरत अपनी कमजोरी को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं वह मानसिक तनाव से मुक्त रहते हैं।

सुषमा ने साले साहब की बात सुन कर एक प्रश्न किया, “संजयजी फिर यह बताइये की भाभी जी को बच्चा कैसे हुआ?

इसका मतलब की या तो उन्होंने जो आजकल की नयी तकनीक आई वी ऍफ़ है उसका सहारा लिया या फिर किसी गैर मर्द से चुदवाया। जाहिर है आपने आ वी ऍफ़ का सहारा नहीं लिया। क्यूंकि ऐसा होता तो सबको पता लग जाता। तो फिर भाभीजी को किस गैर मर्द से चुदवाया?

मैं जानती हूँ की किसी गैर मर्द से चुदवाना किसी भी औरत और उसके पति के लिए भी आसान नहीं है। फिर यह कैसे हो पाया?”

सुषमा का प्रश्न सुन कर साले साहब कुछ देर गंभीर हो गए। साले साहब के चेहरे के भाव देख कर मैं भी सकपका गया। फिर हमारी और देख कर हल्का सा मुस्कुराये और फिर बड़े ही शरारती अंदाज में वह बोले, “सुषमा यह एक लम्बी कहानी है। बच्चा पाने के लिए हमें कितने पापड़ बेलने पड़े। हमारी जिंदगी हमारे बच्चे ने बदल डाली। पर वह कुछ भी आज नहीं। फिर कभी मौक़ा मिला तो बताऊंगा।”

मैं मन ही मन मेरे साले साहब को कोसने लगा। मैं जानता था की साधारणतः महिलायें अत्यंत जिज्ञासु होती हैं। ख़ास कर ऐसे मामले में। सुषमा भी कोई कम जिज्ञासु नहीं थी। साले साहब सुषमा को दुबारा चोदने का मौक़ा ढूंढ रहे थे। सुषमा इस कहानी का रहस्य जानने के लिए हो सकता है की साले साहब से दुबारा चुदवाने के लिए राजी हो जाए। शायद यही साले साहब का भी ध्येय था।

सुषमा ने साले साहब की निप्पलों पर हाथ फिराकर एक निप्पल को उंगलियों के बिच ले कर दबाते हुए कहा, “अब बता ही दो ना संजूजी।”

साले साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “सुषमा, मुझे बताने में कोई एतराज नहीं, पर मैं उस कहानी को बताने में सारी रात बर्बाद नहीं करना चाहता।” हालांकि सुषमा ने आगे फिर इस बात को नहीं छेड़ा पर शायद वह साले साहब से कुछ नाराज जरूर हुई।

मैंने समय की नजाकत को पहचानते हुए अपना कुर्ता निकालते हुए साले साहब से कहा, “ठीक है, आप अभी नहीं बताओगे पर आज सुबह से पहले बताना तो पडेगा। चलो अगर आप अभी अपना राज़ नहीं बताना चाहते हो तो कोई बात नहीं बाद में बताना, पर अभी अपना लण्ड तो निकाल कर दिखा दो साले साहब।”

साले साहब ने मेरी और देखते हुए कहा, “पहले आप।” मैंने सोचा पहले आप के चक्कर में कहीं गाडी ही न छूट जाए, मैंने अपना पतलून भी निकाल फेंका। मुझे देख साले साहब ने भी अपना पतलून निकाल दिया।

अब हम दोनों मर्द अपनी निक्कर में ही थे। हमारे लण्ड हमारी कामुकता भरी हरकतों से उत्तेजित अवस्था में तन कर कसे हुए अपनी निक्करों में बड़ा सा तम्बू बनाये खड़े हुए थे। यह पूरी बातचीत के दरम्यान मैं और साले साहब सुषमा की ब्रा के अंदर अपना हाथ डाल कर सुषमा की चूँचियाँ बराबर मसलते रहते थे।

सुषमा को उसकी टाइट ब्रा में हमारे हाथ घुसने के कारण बड़ी बेचैनी सी हो रही थी। सुषमा ने अपने हाथ पीछे कर अपनी ब्रा के हुक खोल दिए। मैंने सुषमा की ब्रा को एक हाथ में पकड़ा तो सुषमा ने उसको अपने बाजुओं से निकाल कर अपने दूसरे कपड़ों के ढेर के ऊपर फेंक दिया। अब वह ऊपर से टॉपलेस थी।

हमें अब सुषमा की मदमस्त चूँचियाँ जो उस हाल में भी निचे लटकती हुई झूली नहीं थी उन्हें अच्छी तरह से मसलने, चूमने और चूसने की पूरी आजादी मिल गयी थी। सुषमा की चूँचियाँ अपने भराव से और सख्त हुई अपनी निप्पलों और थोड़ी सी श्यामल एरोला की गोलाइयों को कामुकता से दिखाती हुई अल्लड़ और उद्दंड सी तन कर बिना झुके सर उठाकर खड़ी हुई थीं। लेटी हुई सुषमा की उन सख्त चूँचियाँ गजब की कामुक दिख रहीं थीं।

मुझे लगा की मेरी हाजरी में शायद मेरे साले साहब सुषमा से आगे बढ़ने में कुछ कतरा रहे थे। मैंने सोचा उन्हें कुछ मौक़ा देना चाहिए। मैं सुषमा और साले साहब को वाशरूम जाने का बहाना कर वहाँ से उठकर वाशरूम गया। वहाँ टॉयलेट की सीट पर बैठ कर मैंने उन्हें थोड़ा समय दिया।

करीब पांच मिनट के बाद मैं जब वापस बैडरूम में आया तब देखा की दोनों के बदन से कपडे निकल चुके थे। सुषमा पूरी नंगी हमेशा की तरह परी जैसी खूबसूरत लग रही थी। साले साहब सुषमा के ऊपर सवार हो कर उसके होँठों से अपने होँठ कस कर चिपका कर सुषमा के होंठ और मुंह चुम रहे थे।

मेरे सुषमा की दूसरी तरफ अपनी पोजीशन लेते ही सुषमा ने साले साहब से चुम्मा ख़तम किया और सुषमा मेरी और घूम गयी। सुषमा ने मुझे हलके से आँख मार कर कहा, “तुम्हारे साले साहब बडा अच्छा चुम्बन करते हैं। लगता है काफी अनुभव हैं उनको।”

मैंने कहा, “अगर वह फर्टाइल होते तो पता नहीं गाँव में कितनी आबादी और बढ़ जाती।”

सुषमा ने मेरा कच्छा निचे की और खिसकाते हुए कहा, “गाँव को छोडो, अपने घर की आबादी तो बढ़ाओ तुम।” मैंने भी अपना कच्छा निकाल फेंका।

मैंने सुषमा की चूँचियों पर मुंह रख कर उनको चूसते हुए कुछ मुस्कुरा कर कहा, “तुम्हारी चूँचियाँ कह रहीं है की वह काम तो कल ही होगया। देखो अब इनमें दूध भरने की शुरुआत हो चुकी है।”

सुषमा ने अपनी आँखें बंद करते हुए कुछ शरारत भरी मुस्कान देते हुए कहा, “चलो झूठे कहीं के। इनमें इतनी जल्दी थोड़े ही दूध भर जाता है? पर हाँ, हालांकि यह मेरे मन का वहम हो सकता है पर यह तुम्हारी बात मुझे सही लगती है। मेरा दिल यह बार बार कह रहा है जैसे मेरे पेट में तुम्हारा बीज पनपने लगा है।”

सुषमा की एक चूँची मेरे मुंह में थी और दूसरी साले साहब के। साले साहब बड़ी शिद्द्त के साथ सुषमा की चूँची को चूस रहे थे जैसे उनमे दूध आ ही गया हो।

साले साहब के दोनों हाथ सुषमा के गोरे चिकने बदन को ऊपर से नीची तक संवार रहे थे। जब उनका हाथ सुषमा की जाँघों के बिच उसकी चूत पर पहुंचता तो वहीँ थम जाता। वह अपने हाथ की उँगलियों से कुछ देर सुषमा की एक भी बाल से रहित साफ़ चूत की पंखुड़ियों से खेलते और फिर वहाँ से हट कर ऊपर की तरफ सुषमा के बदन के उतार चढ़ाव महसूस करने में खो जाते।

सुषमा एक हाथ से मेरा और दूसरे हाथ से साले साहब का लण्ड पकडे हुए हिलाती रहती थी। सुषमा के लिए एक साथ दो दो मर्द से प्यार पाना एक बड़ा ही रोमांचक अनुभव था। मैंने महसूस किया की सुषमा प्यार की भूखी थी और प्यार पाकर बड़े ही रोमांचक भावावेश में आ जाती थी।

हम दो मर्द उसे इतना प्यार कर रहे थे यह महसूस कर वह बार बार भावावेश में आ कर हमें कहीं भी चूमने लगती थी।

मैंने सुषमा से इशारा कर साले साहब से प्यार करने को संकेत दिया। मैंने कहा, “मैं तो तुम्हारे साथ ही हूँ। पर साले साहब चले जाएंगे। साले साहब बेचारे तरस रहे हैं तुम्हारे प्यार के लिए।”

सुषमा ने मेरी आँखों में आँखें डालकर का, “राज साहब, मेरे जहन में इतना प्यार है की मेरे पति को मिला कर तुम तीनों मर्दों को मैं प्यार की कोई कमी नहीं महसूस होने दूंगी। तुम देखते जाओ।”

सुषमा ने फिर झुक कर साले साहब को अपनी और खिंचा और उनका लण्ड अपने मुंह के पास लिया। कुछ देर तक सुषमा साले साहब के लण्ड का गोरा गोरा टोपा चाटती रही और फिर अपनी जीभ लम्बी कर सुषमा पुरे लण्ड को प्यार से चाटने लगी। संजू सुषमा का इस तरह प्यार से लण्ड चाटने पर ख़ुशी से अभिभूत हो कर आँखें बंद कर वह पलों को अपने दिल में जैसे संजो रहा हो ऐसे चेहरे पर भाव लिए उन लम्हों को एन्जॉय करता रहा।

लण्ड चूसते हुए सुषमा ने नजरें उठा कर मेरी और देखा। उसे लगा की कहीं मुझे उसके कारण कोई जलन तो नहीं हो रही? मैं बड़े प्यार भरी नज़रों से सुषमा को देखता रहा। सुषमा को तसल्ली हो गयी की मैं बिलकुल सुषमा के साले साहब के लण्ड चूसने से नाराज नहीं हूँ। तब सुषमा ने साले साहब के लण्ड को जोश से चूसना शुरू किया।

साले साहब का लण्ड काफी तना हुआ सख्त और लंबा था जिसे सुषमा ने पूरा मुंह में भर लिया। साले साहब का लण्ड चूसते हुए सुषमा के गाल फूल जाते थे। फिर कभी धीरे धीरे तो कभी कुछ ज्यादा फुर्ती से सुषमा उसे अंदर बाहर करते हुए चुस्ती और चाटती रही।

साले साहब सुषमा के इस कार्यकलाप से पलंग पर काफी मचल रहे थे। कुछ देर चूसने के बाद सुषमा ने उसे मुंह से निकाला और उस पर लगी चिकनी लार के साथ वह साले साहब के लण्ड को अपनी एक हाथ की हथेली में पकड़ उसे हथेली के अंदर बाहर करती हुई हिलाती रही।

सुषमा ने अपना मुंह फिर मेरे लण्ड की और घुमाया। मेरी और नजर कर सुषमा ने मेरे लण्ड का टोपा अपने मुंह में लिया और उसे बड़े प्यार से चाटने लगी। सुषमा की जीभ इतनी प्यारी और संवेदनशील थी की उसकी जीभ के मेरे लण्ड को छूते ही मेरा लण्ड फुंफकारने लगा।

मेरे लण्ड की धमनियों में मेरा वीर्य दौड़ने लगा। सुषमा की जीभ के मेरे लण्ड के चूसने मात्र से ही मेरा पूरा बदन सख्त हो गया। मुझे दर लगा की कहीं मैं सुषमा के मुंह में ही अपना वीर्य छोड़ ना दूँ। सुषमा अपना सिर इतनी दक्षता और कलाकारी से हिला कर मेरे लण्ड से अपना मुंह चुदवा रही थी की मैं भी अनायास ही अपना पेंडू हिला कर सुषमा के मुंह की गति के अनुसार मेरे लण्ड को सुषमा के मुंह के अंदर बाहर करने लगा।

वाकई में सुषमा लण्ड चूसने की कला में माहिर हो चुकी थी। पर मैं सुषमा से लण्ड चुसवाने के कारण उत्तेजना के मारे सिकारियाँ और आहटें भरता रहता था।

मेरा लण्ड चूसते हुए भी सुषमा के हाथ से साले साहब के लण्ड को भी बढ़िया से सहलवाने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था। सुषमा मेरा लण्ड चूसते हुए भी साले साहब के लण्ड को हिलाने में कोई कसर छोड़ नहीं रही थी। साले साहब भी सुषमा के लण्ड हिलाने से काफी उत्तेजित दिख रहे थे। उनके मुंह से आह….. ओह….. की आवाजें निकल रहीं थीं और वह वह पलंग पर लेटे हुए उत्तेजना के मारे मचल रहे थे।

जब सुषमा मेरे लण्ड चूसने से फारिग हुई तब साले साहब ने पूछा, “सुषमा, तुमने कहा था आज की पूरी रात हम संगीतमय वातावरण में प्यार भरी चुदाई करेंगे। तो सबसे पहले तो कुछ संगीत हो जाए।”

सुषमा ने यह सुन कर कुछ मुंह बिगाड़ते हुए कहा, “संजू, देखो अब हम छः एक दूसरे के हमदम और राज़दार बने हैं। मैं मेरे पति सेठी साहब, राज और टीना और तुम और अंजू।

अब हम छह के बिच में कोई गोपनीय राज़ नहीं होने चाहिए। पर तुमने हम सब के लिए एक बड़े राज़ का भंडाफोड़ नहीं किया और यह बात मुझे खाये जा रही है। तुम्हें अंजू ने बच्चा कैसे दिया?

यह तुमने राज़ ही रखा है अभी तक। मैं एक खुले दिल की इंसान हूँ। मैं प्यार के लिए अपना बदन तो क्या अपनी जान तक दे सकती हूँ। मैं आप सब से भी यही उम्मीद करती हूँ की हम सब अपने समाज में अपने अपने अलग अलग किरदार बेशक निभाते हुए भी एक दूसरे से कोई भी गोपनीय राज़ नहीं रखेंगे। मैं आज तुम दोनों से बड़े ही प्यार से चुदवाउंगी पर तुम्हें यह राज़ आज उजागर करना ही पड़ेगा।”

जब साले साहब ने सुषमा से यह सूना तो वह गंभीर हो गए। उन्होंने पहले मेरी और और फिर सुषमा की और देख कर अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “जीजू, मेरी आप दोनों से करबद्ध प्रार्थना है की आप दोनों मुझे यह राज़ उजागर करने के लिए मजबूर ना करें।

देखिये मेरे इस राज़ में हमारे संबंधों के बड़े ही नाजुक तानेबाने उलझे हुए हैं। गर हमारे निजी संबंधों के ताने बाने उलझे नहीं होते, तो मुझे यह राज़ उजागर करने में कोई आपत्ति नहीं होती।

देखिये जीजू, टीना आपकी पत्नी और मेरी बहन है। मेरे इस राज़ के उजागर होने से मुझे पता नहीं उस पर क्या गुजरेगी। मेरे इस राज़ में टीना की भावनाएं भी शामिल है, जो इस राज़ के उजागर होने से आहत हो सकतीं हैं। इस राज़ के बारे में टीना को कुछ भी नहीं मालुम। कई बार ‘बंधी मुट्ठी लाखकी और खुली तो प्यारे ख़ाक की’ जो कहावत है वह बड़ी ही सही और कारगर साबित होती है। कई बार राज़ को राज़ रखना ही अक्लमंदी होती है।”

मैंने साले साहब का हाथ थाम कर कहा, “साले साहब, टीना बेशक आपकी बहन है, पर आपने उसे इतने सालों में शायद ठीक से पहचाना नहीं। मैं उसके पति और अत्यंत निजी राज़दार होने के नाते यह दावे के साथ छाती ठोक कर कह सकता हूँ की उसे भी गोपनीय से गोपनीय राज़ निभाना आता है। वरना आजकल के जमाने में क्या कोई भी पत्नी सुषमा को टीना ने जिस तरह का वचन दिया है, दे सकती है क्या?

टीना सेठी साहब से चुदवाने के लिए तैयार हुई है उसमें उसके अपने सुःख की इच्छा कम और सुषमा और सेठी साहब के सुख की चिंता कुटकुट कर भरी हुई है। अगर टीना सारे समाज में हमारी बदनामी हो सकती है इस बात की ज्यादा परवाह ना करते हुए सेठी साहब से इस तरह अपने ही मायके में चुदवा रही है और सुषमा और सेठी साहब के साथ हमारे संबंधों के नाजुक तानेबाने को समझने, निभाने और उन्हें सुलझाने में सक्षम दिखती है तो टीना अपने मायके के नाजुक तानोंबानों को भी समझने, निभाने और सुलझाने में सक्षम होगी इसमें मुझे कोई शंका नहीं है।”

साले साहब ने मेरी बात बड़ी ही गंभीरता से सुनी। उनके चेहरे पर से गंभीरता के भाव फिर भी जा नहीं पाए थे।

उन्होंने सुषमा की और देखा और बोले, “सुषमा, ठीक है, मैं भी मानता हूँ की हम सब के बिच में कोई गंभीर गोपनीय राज़ नहीं होने चाहियें। चुदाई के छोटेमोटे राज़ हम एक दूसरे को ना भी बताएं तो चलता है। पर ऐसे राज़ जो निजी संबंधों की नाजुकता को आहत कर सकते हैं हमें गोपनीय नहीं रखने चाहिए।

मैं आपसे वादा करता हूँ की आज रात का सबेरा होने से पहले मैं आपको मेरे उस अति गोपनीय राज का राजदार जरूर बनाऊंगा। पर सुषमा की एम.एम.ऍफ़. चुदाई का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद। मैं नहीं चाहता की मेरे इस राज़ की गंभीरता का हमारी प्यार भरी चुदाई की रात पर कोई नकारात्मक असर पड़े।”

सुषमा यह सुनकर उठ खड़ी हुई और उसने अपने मोबाइल से ब्लूटूथ के साथ एक बहुत मधुर सी धुन बजानी शुरू की। यह हलके फुल्के शास्त्रीय संगीत पर आधारित धुन थी जिसकी लय पर सुषमा के पाँव थिरकने लगे। मैंने वैसे भी सुषमा को नाचते हुए नहीं देखा था। सुषमा ने एक पारदर्शी ओढ़नी अपने नंगे बदन पर डालदी। उस ओढ़नी के डालने से सुषमा के बदन की नग्न कामुकता का रूप कम होने के बजाये और निखर उठा।

लगभग नंगी सुषमा को संगीत की धुन पर इस तरह लयबद्ध तरीके से थिरकते देखना कोई भाग्य शाली के नसीब में ही होता होगा। पता नहीं सेठी साहब ने भी खूबसूरत सुषमा को इतनी कलालारी से इस तरह नग्न नाचते हुए शायद ही देखा हो।

मेरे साले साहब भी कितने भाग्यशाली थे की इतनी खूबसूरत सख्सियत जो इतना सुन्दर नृत्य कर सकती है, उसका सदृश्य लाइव परफॉरमेंस देखने का उन्हें मौक़ा मिला था।

सुषमा मुझे और साले साहब को स्तब्ध, निशब्द मंत्रमुग्ध से उसको नाचते हुए देख कर मुस्कुरायी। पर बिना रुके सुषमा ने कई तरह के अलग अलग स्टाइल में धीर ले बढ़ संगीत के साथ एक दक्ष नृत्यकार की तरह कामुक और रोमांचक डांस किये।

इससे पहले मैंने क्लबों में और पार्टियों में कई बार कैबरे नृत्यांगनाओं को डांस करते हुए देखा था। कई बार सुषमा होने उपर डाली हुई ओढ़नी कभी ओढ़ती फिर धीरे धीरे अपने बदन से एक के बाद एक अंग को दिखाती हुई मचलती उस अंग के ऊपर से वह ओढ़नी हटा कर अपने अंग का प्रदर्शन करती बड़ी ही कामुक और उत्तेजक लग रही थी।

उसके साथ साथ अपने कूल्हों, जांघें, चूँचियाँ और अपनी चूत को भी कभी मसलना, कभी हिलाना और कभी बड़े ही कामुक अंदाज से सहलाना कर हमारी उत्तेजना का पारा तेजी से बढ़ा रही थी। सुषमा ने अपनी बाँहें लम्बी कर मुझे और साले साहब को अपने साथ नाचने के लिए बुलाया। साले साहब ने शायद कभी डिस्को फ्लोर में या शादी में कभी कुछ हाथ पाँव टेढ़े मेढ़े किये होंगे।

उनका तो मुझे पता नहीं पर मैंने तो जिंदगी में कभी भी नाचना तो दूर, नाचने की कोशिश भी नहीं की थी। सुषमा संगीत की लय में खोयी हुई एक बैलेरिना की तरह बड़ी ही सरलता से संगीत की लय के साथ अपने खूबसूरत पारदर्शी ओढ़नी से और कामुकता से उजागर हो रहे नग्न बदन को लचकाती लहराती हमारे पास आयी।

सुषमा ने हमारे दोनों की जाँघों के बिच में हाथ डालकर हमारे लण्ड पकडे और हमें खिंच कर वह हमें उसके ड्राइंगरूम में ले गयी। अपने थिरकते पाँव के साथ बड़ी ही दक्षता से नृत्य करती सुषमा ने हमें भी उसके साथ नाचने पर मजबूर किया। जब हम दोनों के पाँव नाचने की कोशिश करते हुए लड़खड़ाने लगे तो हँसते हुए सुषमा ने हमें छोड़ दिया।

पर फिर सुषमा ने वह किया जिसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी। सुषमा ने थोड़ा सा कूद कर पहले अपनी एक टाँग ऊपर उठाकर मेरी कमर पर रक्खी। फिर मेरी गर्दन के इर्दगिर्द अपनी बाँहों का बाहुपाश बनाकर और अपने दोनों पाँव से मेरी कमर को सख्ती से जकड़ कर अपना हल्का फुल्का बदन मेरे बदन से चिपका कर वह कूदकर मुझसे इस तरफ लिपटी की उसकी रसीली चूत मेरे चिकनाहट से लथपथ लण्ड के साथ रगड़ने लगी।

नंगी खूबसूरत सुषमा मेरी कमर को अपनी टांगों में जकड़े हुए मुझे उसे हवा में मेरे गले से लटक कर मुझे चोदने का आह्वान कर रही थी।

मेरा सख्त लण्ड सुषमा की चूत के छूते ही फनफना उठा। मेरे लण्ड की रक्त पेशियों में मेरा वीर्य एक बार फिर दौड़ने लगा। मेरा गोरा चिट्टा चिकनाहट से लथपथ लण्ड सुषमा की चूत के संपर्क में आते ही उसे छिन्नविच्छिन्न करने पर जैसे आमादा हो गया।

सुषमा ने मेरी गर्दन का बंधन जरासा भी ढीला ना करते हुए एक हाथ से मेरे लण्ड को पकड़ा और उसे अपनी चूत की पंखुड़ियों के निकट ला कर उन से रगड़ा और दो पंखुड़ियों को अलग कर मेरे लण्ड को ऊसके प्यार भरे छिद्र में प्रवेश करने के लिए द्वार खोल दिया।

मैंने अपने पेंडू से ऊपर की और जब एक धक्का मारा तब सुषमा ने भी अनायास ही मेरी गर्दन की पकड़ कुछ ढीली कर अपनी चूत को थोड़ी नीची कर मेरे लण्ड को उसकी चूत में प्रवेश करने में सहायता की। मेरे एक ही धक्के में मेरा लण्ड सुषमा की चूत में दाखिल हो गया। सुषमा के चेहरे की भावभंगिमा देख कर मैं समझ गया की सुषमा मेरे लण्ड को अपनी चूत में बड़े ही अच्छी तरीके से महसूस कर रही थी।

सुषमा चाहती थी की मैं उसे मेरी कमर पर जकड़े हुए रख कर उसे हवा में ही रखते हुए चोदूँ। शायद सुषमा ने इस तरह की चुदाई किसी विदेशी कपल को किसी पोर्न साइट पर करते हुए देखा था और वह चाहती थी की हम दोनों भी सुषमा की चुदाई उसी तरह करें।

मैंने इससे पहले कभी की टीना या किसी और औरत की चुदाई इस तहा से नहीं की थी ना ही मैंने कभी कल्पना की थी की मैं कभी किसी औरत की चुदाई इस तरह जोरदार तरीके से कर पाउँगा। पर पता नहीं सुषमा की चूत में क्या जादू था और उसके सर पर कैसा जूनून सवार था की मैं एक के बाद एक जोरदार धक्के मार कर उस हालात में भी सुषमा की चूत को अद्धर हवामें चोदने लगा।

जैसे जैसे मेरा लण्ड सुषमा की चूत में घुसता, सुषमा “हाय… ओह…. हम्म्म…. चोदो…. वाह……. आह…. ओह… ” कराहती हुई मेरी चुदाई का भरपूर आनंद ले रही थी। जब किसी औरत की मन मर्जी और ख़ुशी से चुदाई होती है तो वह औरत उस चुदाई का भरपूर आनंद लेती है। उस समय उसकी कराहटें और सिसकारियाँ मर्द को भी और जोश से भर देतीं हैं और मर्द का भी चोदने का जोश बढ़ जाता है। सुषमा की कराहटें और कामुकता भरी सिसकारियों ने पुरे कमरे को कामुकता भरी आवाजों से भर दिया था।

मैंने सुषमा की चूत की ठुकाई करते हुए साले साहब की और देखा तो साले साहब अपने लण्ड को सहलाते हुए उसे शायद आश्वासन दे रहे थे की उसकी भी बारी जल्द ही आएगी जब सुषमा उसको भी अपनी चूत में दाखिल हो कर चोदने देगी।

हालांकि मैं कोई सेठी साहब या मेरे साले साहब की तरह कोई अभ्यस्त कसरतबाज तंदुरस्त आदमी नहीं था, पर सुषमा की चूत के जादू ने मुझे भी सुषमा को उस पोजीशन में चोदने की वह शारीरिक शक्ति दी जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था की मुझ में है। मैंने उस हाल में सुषमा को करीब पंद्रह मिनट तक चोदा होगा।

उस हालात में पंद्रह मिनट तक खड़े हो कर इतना वजन उठाते हुए चोदना कोई आसान काम नहीं होता। पर उस रात की उत्तेजना ही कुछ और थी। पर खैर मेरी भी अपनी शारीरिक क्षमता की मर्यादाएं थीं।

मैं कुछ ही देर में सुषमा को हवामें उठाकर चोदते हुए थक गया। मेरा सर और पूरा बदन पसीने से तरबतर हो गया। जब सुषमा ने यह देखा तो मुझे इशारा किया की मैं उसे निचे उतार दूँ। उस पोजीशन में चुदवाते हुए सुषमा तो कई बार झड़ चुकी थी पर मेरा वीर्य स्खलन होना बाकी था।

सुषमा मेरे वीर्य को अपनी चूत में फिर से लेना चाहती थी। सुषमा फ़ौरन मेरा और साले साहब का हाथ थाम कर हमें फिर से बैडरूम में ले आयी। सुषमा पलंग पर चढ़ कर लेट गयी और उसने मुझे उसके ऊपर चढ़कर उसे चोदने का मुझे इशारा किया।

जैसे ही मैं सुषमा के ऊपर सवार हुआ और सुषमा की टाँगे चौड़ी कर मेरा लण्ड उसकी चूत में डालने लगा तब सुषमा ने मुझे कहा, “अब मुझे खूब चोदो और अपना सारा वीर्य मेरी चूत में उंडेल दो।”

फिर सुषमा ने अपनी दोनों चूँचियाँ अपने दोनों हाथों में पकड़ कर ऊँची की और उसे जोर से दबाते हुए मुझे और साले साहब को अपनी चूँचियाँ दबाने, मसलने, चूसने और काटने का इशारा किया। साले साहब भी पलंग पर चढ़ कर सुषमा की दूसरी और लेट गए।

मैं सुषमा की चुदाई करते हुए सुषमा की चूँचियों को मसलने में भी कार्यरत हो गया और साले साहब सुषमा की चूचियों पर अपने होँठ चिपका कर उन्हें जोशखरोश के साथ चूसने, चाटने और काटने में लग गए। मेरे लण्ड की नसपेशियों में मेरा गरम वीर्य उफान में था।

जैसे ही मैं सुषमा के ऊपर चढ़ कर उसे जोर से धक्के पेल कर चोदने लगा की मेरा वीर्य भी मेरे लण्ड में से बाहर निकल कर सुषमा की चूत की सुरंगों में दाखिल होने के लिए जैसे बेताब हो रहा था। सुषमा भी मेरे एक के बाद एक तगड़े धक्कों से ऊपर निचे हिलती हुई “आह….. हाय रे! मार दिया रे! और चोदो रे! क्या चोदते हो! ओह….”

इस तरह कराहटें लगा कर वह खुद आनंद ले रही थी और साथ में मुझे और जोर से चोदने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी। मेरी जांघ के सुषमा की जाँघों के बिच में लगते हुए जोरदार थपेड़ों की “फच्च…. फच्च….. और थप्प…. थप्प…..” की आवाज से सारा कमरा गूंज उठा।

आखिर में जब एक धमाके साथ मेरे दिमाग को शून्य करता हुआ मेरा वीर्य जब मेरे लण्ड के छिद्र से निकल कर एक गरमागरम फव्वारे की तरह सुषमा की चूत की गुफाओं में दाखिल हुआ तो मुझे यह महसूस हुआ की सुषमा भी एक साथ ही झड़ने लगी।

सुषमा का पूरा बदन भी पलंग पर मचलने लगा और वह भी मुझे अपनी बाँहों में जकड कर “हाय…… क्या चोदा है रे! मजा आ गया…… मर गयी रे!” कहती हुई कराहने लगी। सुषमा ने मुझे झड़ते हुए इतनी ताकत से अपनी बाँहों में जकड लिया की सुषमा का पूरा बदन जैसे मेरे बदन से चिपक ही गया। उसी समय मैंने साले साहब से वह दोहा सूना जो टीना की भाभी ने सेठी साहब से चुदाई के बाद प्यार से टीना सेठी साहब से चिपकी हुई थी तब गाया था।

वह दोहा था

“लण्ड जकड़ गयो चूत में छोड़के अपणो माल, कहत कबीर लुगाई के होगो तगड़ो बाल।”

साले साहब ने सुषमा के होंठों को चूमते हुए कहा, “सुषमा, मैं तुम्हें गारंटी के साथ कहता हूँ की जीजू ने कल नहीं तो आज पक्का तुम्हारे पेट में हमारे छोटे सेठी साहब का बीजरोपण कर ही दिया है। भले ही वह जीजू साहब के वीर्य से बना हो, पर वह कहलायेगा भी और होगा भी तो छोटा सेठी साहब ही।”

सुषमा साले साहब की बात सुन मुस्कुराई। खुद झड़ने के बाद हम दोनों अलग हुए। सुषमा को साले साहब से भी जिस तरह मैंने सुषमा को चोदा था उसी तरह चुदवाने की कामना रही होगी; क्यूंकि मेरे सुषमा के ऊपर से हटते ही सुषमा उठ खड़ी हुई और पलंग से निचे उतर कर जैसे मुझसे लिपट गयी थी।

उसी तरह साले साहब की कमर को अपनी टांगों से जकड़ कर साले साहब की गर्दन पर अपनी बाँहों का हार बना कर उनके बदन से सख्ती से लिपट गयी और अपनी चूत को साले साहब के लण्ड से रगड़ कर साले साहब को चोदने के लिए तैयार होने का इशारा किया। साले साहब तो इसी का इंतजार कर रहे थे।

उन्होंने सुषमा को एक फूल की तरह अपन बाँहों में उठा लिया और जैसे मैंने सुषमा को चोदा था उसी तरह पर शायद मेरे से और जोश के साथ वह सुषमा को चोदने लगे। सुषमा भी साले साहब के तगड़े लण्ड को पहली बार अपनी चूत में ले रही थी।

साले साहब का लण्ड का आकार कुछ अलग ही था। लंबा और मोटा होने के अलावा वह थोड़ा सा मुड़ा हुआ ऊपर छत की तरफ अपने टोपे को किये हुए बड़ा ही कामुक दिख रहा था। उनका लण्ड उनके पूर्व रस की चिकनाहट से लथपथ चमक रहा था।

उस चिकने चमकते लण्ड को सुषमा की चूत में दाखील होते हुए और निकलते हुए देखना एक बड़ा ही अद्भुत एहसास था जो मैंने इसके पहले कभी अनुभव नहीं किया था। साले साहब ने भी सुषमा की काफी अच्छी खासी चुदाई की।

जैसे ही साले साहब सुषमा की चूत में अपने लण्ड को एक तगड़ा धक्का मार कर घुसाते, सुषमा कराह कर “आह…..” कर उठती। जब साले साहब अपना लण्ड तेजी से अंदर बाहर करने लगते, सुषमा भी उनके लण्ड की तेज फुर्ती भरी रफ़्तार से मैच करती हुई “आह….. ओह….. ” बोलती हुई कामुक सिसकारियां भरने लगती। साले साहब से सुषमा की चुदाई का वह कामुक दृश्य अद्भुत रोमांचक और रोंगटे खड़ा कर देने वाला था।

मैंने उस रात एम.एम.एफ. चुदाई का वह रोमांचक अनुभव किया जो मैंने पहले कभी नहीं किया था। मुझे एम.एम.एफ. चुदाई स्त्रियों के लिए कितनी रोमांचक होती होगी यह भी समझ में आने लगा। जब एक मर्द एक औरत को चोदता है तो मर्द चुदाई में मशगूल और उत्तेजना से भरा होने के कारण उसका लगभग पूरा ध्यान अपने लण्ड और अपनी साथीदार की चूत के बिच में हो रहे घमासान पर ही होता है।

वह उस समय अक्सर औरत के सारे अंगों को न्याय नहीं दे सकता। चुदाई में लीन औरत उसी समय चाहती है की उसे चोदते हुए उसका मर्द साथीदार उसकी चूँचियाँ खूब चूसे और मसले। औरत की बड़ी इच्छा होती है की उसका एक एकअंग जैसे की उसकी गाँड़, उसके होंठ उसका मर्द साथीदार चूमे, चाटे और काटे। यह सब एक साधारण मर्द एक साथ नहीं कर सकता।

दूसरे यह की औरत चाहती है की मर्द उसकी चुदाई लम्बे समय तक करे। पर किसी वैज्ञानिक ने कहा है की एक साधारण मर्द औरत को ज्यादा से ज्यादा सात मिनट तक चोद सकता है। एक औरत को सात मिनट सख्ती से चोदने के बाद वह झड़ जाता है और थक भी जाता है। झड़ने के बाद मर्द में वह शक्ति नहीं रहती की वह औरत को थोड़ी देर तक विश्राम किये बिना चोद सके। साधारणतः मर्द का मन ही भर जाता है और वह बिस्तरे में ही थक कर ढेर हो कर लेट जाता है और अक्सर सो ही जाता है।

इसके विपरीत, एक साधारण औरत मर्द की सख्त चुदाई से कई बार झड़ने पर भी और चुदाई के लिए आतुर रहती है और आसानी से थकती नहीं। कई बार तो मर्द की चुदाई करने के अज्ञान या अनाड़ीपन के कारण औरत को चुदाई के दरम्यान संतुष्टि नहीं होती। वह उतनी उत्तेजित नहीं हो पाती की वह झड़े।

अगर मर्द औरत को नापसंद हो या फिर औरत उस मर्द से उकता गयी हो (जैसे की सालों से चुदने के बाद अक्सर एक औरत अपने पति से उकता जाती है) तो भी औरत को उस चुदाई में आनंद नहीं आता बल्कि वह उसे शारीरक मजदूरी या मजबूरी समझ कर झेल तो लेती है पर झड़ नहीं पाती।

पर जब दो मर्द एक औरत की एम.एम.एफ. वाली चुदाई करते हैं तो फिर औरत की चुदाई भी लम्बे समय तक चलती रहती है, औरत को मर्द को खुश करने के लिए दो लंडों को सम्हालना पड़ता है।

दोनों मर्द बारी बारी से एक औरत को चोदते रहने के कारण मर्दों को तो आराम मिल जाता है पर औरत उस दरम्यान बड़ी ही व्यस्त रहती है और तीसरी बात यह की अगर दो मर्द औरत के आगे और पीछे (मतलब चूत और गाँड़) दोनों छिद्रों में अपना लण्ड एक साथ डालकर उसकी तगड़ी चुदाई करें (जिसे डी.पी. मतलब ड्युअल पेनिट्रेशन अथवा दोनों छिद्रों में एक साथ प्रवेश करना कहते हैं) तब तो औरत त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगती है, हालांकि उसकी तगड़ी चुदाई करवाने की इच्छा तब पूरी तरह फलीभूत होती है।

और सबसे बड़ी बात यह की ऐसी चुदाई कभी कभी ही हो पाती है। इस के कारण औरत और मर्द दोनों चुदाई के पहले, दरम्यान और बाद में भी उत्सुक, उत्तेजक और रोमांचित रहते हैं।

दो बार मेरे और साले साहब से चुदने के बाद सुषमा भी थकी हुई नजर आ रही थी। शायद साले साहब ने उसे महसूस किया और सुषमा की चुदाई रोक कर धीरे से सुषमा को निचे उतारा। निचे उतरते ही सुषमा वापस पलंग पर जा कर कुछ देर लेट गयी। मैं और साले साहब सुषमा के पास बैठ गए।

सुषमा ने थोड़ी सी पलके खोलीं, हमें देखा और हमें देख मंद मंद मुस्करायी और फिर आँखें बंद कर लेट गयी। मैं यह देखा कर बड़ा ही प्रभावित हुआ की साले साहब घर के काम में भी काफी माहिर लग रहे थे, क्यूंकि वह सुषमा के लेट जाने के बाद रसोई घर में गए और थोड़ी ही देर में हम तीनों के लिए गरमागरम चाय बना कर ले आये।

चाय की पियालियों की खटखटाहट सुनने पर सुषमा ने धीरे से आँखें खोलीं और अपने सामने चाय का कप रखते हुए साले साहब को देख कर वह सानंदाश्चर्य मुस्कुरायी और बड़ी ही नजाकत भरी अदा से बोली, “अंजू वाकई बड़ी ही तक़दीर वाली है की उसे आप जैसे पति मिले। आप यहां हमारे लिए चाय बना कर ले आये यह दिखाता है की आप अपनी पत्नी के लिए भी कितने संवेदनशील होंगे। भगवान सब पत्नियों को आप जैसा पति दे।”

सुषमा की इन कमसिन अदाओं और मधुर बातों से साले साहब और मैं हम दोनों का सुषमाजी के प्रति लगाव और प्यार पल दर पल बढ़ता ही जा रहा था। हालांकि हम भी थके हुए थे, पर हमारा मन सुषमा की चुदाई करने से भरा नहीं था। कई औरतों में यह काबिलियत होती है की वह अपनी नज़ाकत भरी अदाओं, मीठी बातों और मधुर स्मित से मर्दों का दिल लम्बे समय तक या कई बार जिंदगी भर अपने वश में रख पाती हैं। वाकई में सेठी साहब भी बड़े ही भाग्यशाली थे की उनको भी सुषमा जैसी पत्नी मिली थी।

चाय पीते हुए मैं और साले साहब सुषमा के इर्दगिर्द बैठ कर कभी उसकी चूँचियों तो कभी उसकी गाँड़ तो कभी उसके काले, घने घुंघराले केश के साथ खेल रहे थे जिससे सुषमा बड़ा ही एन्जॉय कर रही थी। सुषमा भी चाय की चुस्कियां लेते हुए बिच बिच में हमारे ढीले सोये हुए लण्ड को सेहला कर तो कभी कुछ फुर्ती से हिलाकर उन्हें जगाने की कोशिश कर रही थी।

सुषमा के हाथ के जादुई स्पर्श से हमारे लण्ड भी सख्त होने लगे थे। चाय ख़त्म करने के बाद सुषमा ने झुक कर पहले मेरा लण्ड मुंह में लिया और एक हाथ से हिलाते हुए वह उसे चाटने लगी। दूसरे हाथ से वह साले साहब का लण्ड हिला रही थी उनके लण्ड की त्वचा को पकड़ कर उसे ऊपर निचे कर रही थी।

धीरे धीरे सुषमा ने हमारे लण्ड को एक के बाद एक चूस कर और अपना मुंह बारी बारी हम दोनों के लण्ड से सांकेतिक रूप से चुदवा कर उन्हें एकदम सख्त तैयार कर दिया। कुछ देर बाद सुषमा ने पहले मेरी और और बाद में साले साहब की और शरारत भरी बड़ी ही मादक नज़रों से देखा। सुषमा की आँखों के मटकाव और कामुक भरे अंदाज़ से मैं समझ गया की सुषमा तब तक पूरी तरह संतुष्ट नहीं हुई थी। वह और ज्यादा चुदना चाहती थी।

सुषमा ने मेरी और अपनी नजरों से ही जैसे कुछ कह रही हो ऐसे देखा। मैं सुषमा के भाव शायद अच्छी तरह समझ नहीं पाया तब सुषमा ने शायद मजबूरी में (शायद सुषमा चाहती थी की उसे पहल न करनी पड़े। मैं ही उसके दिल के भाव समझूँ और पहल करूँ। पर मेरे नहीं समझ पाने के कारण सुषमा ने पहल की, और) मुझे पलंग पर लिटा दिया और खुद मुझ पर चढ़ गयी।

सुषमा अपनी चूत बार बार मेरे लण्ड से रगड़ने लगी। फिर धीरे से आगे पीछे होते हुए सुषमा ने मेरे लण्ड को अपनी पंखुड़ियों को हटा कर बिच में रख कर अपनी चूत की सुरंग में घुसने की इजाजत देदी।

मेरे साले साहब मेरे जितने अनाड़ी नहीं थे। जब उन्होंने देखा की सुषमा की आज्ञा से मैं सुषमा के निचे सोया था और सुषमा मेरे ऊपर चढ़ कर ऊपर सवारी करते हुए मुझे चोदने लगी थी तो वह सुषमा को शरारत भरी आँख मार कर मुस्कराये और जैसे जैसे सुषमा मेरे ऊपर सवार मुझे चोदने लगी तो धीरे से सुषमा के पीछे जा कर मेरी एक टांग को अपनी दोनों टांगों के बिच में रखते हुए अपने घुटनों को हल्का सा टेढ़ा कर घुटनों के बल पर ही आधे खड़े हुए।

सुषमा ने पीछे मुड़कर साले साहब की और देखा और मुस्कुरायी। सुषमा की आँखों में साले साहब की समझ जाने की क्षमता के कारण एक तरह का आत्मसंतोष झलक रहा था।

सुषमा ने बिना कुछ बोले हल्का सा मुस्कुरा कर और शायद कुछ घबराते हुए साले साहब को अपना सर हिलाते हुए इजाजत दे दी। जब साले साहब ने अपने लण्ड पर अपने मुंह से लार टपका कर उसे और चिकना किया तब सुषमा ने अपने हाथ लंबा कर साथ में मेज पर रखी हुई एक तेल की बोतल साले साहब के हाथों में थमाई।

तब कहीं जा कर मेरे दिमाग की ट्यूब लाइट जली। मैं तब समझा की सुषमा हम दोनों से एक ही साथ चुदना चाहती थी। मतलब वह चाहती थी की मैं उसकी चूत चोदूँ और साले साहब उसी समय उसकी गाँड़ मारे। सुषमा एक साथ मेरे और साले साहब का लण्ड अपने अंदर डलवा कर दोनों छिद्रों में चुदना चाहती थी।

शायद सुषमा ने कहीं पोर्न वीडियो में एक औरत की दुगुनी चुदाई के दृश्य देखे होंगे। आजकल तो यह आम हो गया है। हमारे देश की देसी पोर्न साइट पर भी अब ऐसे वीडियो खुल्लमखुल्ला चेहरा दिखाते हुए आते हैं और कई वीडियो में तो विदेशों में बनी पोर्न फिल्म जैसे प्रोडूसर, डिरेक्टर,अदाकार बगैरह के नाम भी आने लगे हैं।

उनको देख शायद कहीं ना कहीं उसके मन में भी यह इच्छा जगी होगी की उसकी चुदाई भी एक बार तो ऐसे हो जिससे वह ऐसी चुदाई का अनुभव करे।

साले साहब ने अपने लण्ड के उपर खूब तेल लगा कर उसे अच्छे से चिकनाहट से लथपथ किया। उस दरम्यान सुषमा मुझे बेतहाशा चोदे जा रही थी। फिर साले साहब ने सुषमा की गाँड़ पर हलकी सी चपेट मार कर उसे थमने का इशारा किया।

सुषमा ने पीछे देखा और साले साहब का संकेत समझ कर रुक गयी तब उन्होंने सुषमा की गाँड़ के छिद्र में उंगली डालकर अंदर से अच्छी तरह से उस तेल को लगा कर उसे तेल से पूरा लथपथ चिकना कर दिया, जिससे सुषमा को गाँड़ मरवाते हुए दर्द कम हो। साले साहब का लण्ड अच्छा खासा मोटा और लंबा था।

सुषमा की गाँड़ का छिद्र छोटा सा था। सुषमा को दर्द तो होना ही था। पर इंसान चुदाई के उन्मादक लुत्फ़ के आगे छोटा मोटा दर्द सह लेने से कहाँ रुकता है? शराब पिने वाला शराब की कड़वाहट के कारण शराब पिने से थोड़े ही रुकता है?

अच्छी तरह चिकनाहट लगा कर साले साहब ने धीरे से अपना लण्ड सुषमा की गाँड़ पर टिकाया और एक हाथ से उसे पकड़ कर अपने पेंडू से हलका सा धक्का मार कर अपने लण्ड को सुषमा की गाँड़ में थोड़ा सा घुसेड़ा। सुषमा के पुरे बदन में साले साहब के लण्ड के घुसने से सिहरन फ़ैल गयी। मैंने भी सुषमा की चूतमें और उसके बदन में फैलती हुई सिहरन को महसूस किया।

साले साहब ने जब अपना लण्ड थोड़ा और घुसेड़ा तब सुषमा दर्द के मारे चीख पड़ी। शायद सुषमा दर्द से कम और दर्द के डरके कारण ज्यादा आतंकित थी। सुषमा की पहले कभी हिम्मत नहीं हुई थी की वह सेठी साहब को गाँड़ मारने दे। पर हमारे लण्ड कम भयावह लगने के कारण सुषमा ने यह हिम्मत की।

साले साहब का और मेरा लण्ड कुछ छोटा जरूर था पर वह इतने भी ज्यादा छोटे नहीं थे की सुषमा की गाँड़ में घुसे और उसे दर्द ना हो। साले साहब सुषमा के चीखने से कुछ देर रुक गए। शायद उन्हें सुषमा के चीखने का अंदेशा तो था ही। इस लिए वह सुषमा की चीख सुनकर घबराये नहीं।

शायद उन्होंने पहले कुछ स्त्रियों की चीख निकलवाई होगी। जो भी हो। उन्होंने अपना लण्ड सुषमा की गाँड़ में से धीरे से निकाल दिया। वह कुछ देर थम गए फिर सुषमा की मुंदी हुई आँखों को देखते हुए उन्होंने एक धक्का और लगाया और इस बार अपना गाँड़ कुछ और सुषमा की गाँड़ में घुसेड़ा।

इस बार सुषमा ने दबी हुई आवाज में चीख लगाई, “हाय माँ…. रे! संजयजी मुझे पता नहीं था यह गाँड़ मरवाने से इतना ज्यादा दर्द होगा।”

“मैं इसे निकाल लूँ सुषमाजी?” साले साहब ने सुषमा से पूछा।

सुषमा आँखें खोल कर साले साहब की और मुस्कुराते हुए देख कर बोली, “तुम मर्द लोग, इतनी रसीली मजेदार चूत छोड़ कर गाँड़ को चोदने के पीछे क्यों लगे रहते हो यह बात समझमें नहीं आती।”

“पर हमने तो गाँड़ मारने की बात की ही नहीं आज?” साले साहब ने कुछ झिझकते हुए और कुछ उलझन भरी आवाज में कहा।

“तुम लोगों ने बात तो नहीं की पर मुझे मालुम है की यह हो ही नहीं सकता की तुम लोगों ने इसके बारे में सोचा ना हो। तुम्हारे दिमाग में यह बात जरूर रही होगी। मेरी सहेली रूपा कह रही थी की मर्द लोग औरत की गाँड़ के पीछे पागल रहते हैं। वह औरत के बूब्स और गाँड़ ही सबसे ज्यादा देखते रहते हैं। रूपा को इन मामलों का काफी अनुभव है। उसके पति बड़े ही रंगीन मिजाज हैं। रूपा कई बार अपने पति के साथ दो मर्दों से एम.एम.एफ. करवा चुकी है।

वह कहती है की शुरू शुरू में गाँड़ मरवाने में काफी दर्द होता है, पर बाद में ना सिर्फ इसकी आदत हो जाती है बल्कि गाँड़ मरवाने में काफी मजा भी आने लगता है। बच्चा होने के बाद औरत की चूत का छिद्र बड़ा हो जाता है। तो मर्द लोगों को और शायद औरतों को भी चूत चुदवाने में उतना मजा नहीं आता। गाँड़ का छिद्र छोटा होने से अगर उसे अच्छी तरह चिकनाहट से लथपथ किया जाए तो गाँड़ मारने और मरवाने में दोनों को बहुत मजा आता है।”

मैं सुषमा की बात सुन कर सोच में पड़ गया। औरतें भी चुदाई के बारे में इतना ज्यादा सोचती हैं यह अक्सर हम मर्द लोग नहीं जानते। ज्यादातर औरतें घरके काम, बच्चे, भाई बहन पति को सम्हालना इत्यादि काम में ही व्यस्त रहतीं हैं। चुदाई का भूत तो मर्दों के दिमाग में ही छाया हुआ होता है यही हम मर्द लोग मानते हैं। पर यह बात सच नहीं है। औरतें भी चुदाई के मामले में काफी सजग होती हैं। वह भी चुदाई करवाने के लिए लालायित रहतीं हैं।

बस वह अपने मन के भाव जाहिर नहीं करतीं। बल्कि जब चुदाई करवाने का मौक़ा होता है तो चुदाई के दरम्यान निकाले गए कपडे ठीक तरह तह लगा कर रखना, लण्ड और चूत को साफ़ करने के लिए कपडे तैयार रखना, चुदाई के बाद थक जाने पर पहले से ही कुछ खाने पिने की चीजों की व्यवस्था करना यह सब स्त्रियां चुदाई होने वाली है यह भनक लगते ही इंतजाम करके रखतीं हैं। वह मर्दों की तरह चुदाई का मौक़ा पाते ही आधी पागल या बाँवरी नहीं हो जातीं।

अब चुदाई का सबसे रोमांचक वक्त शुरू हुआ था। मुझे भी उस रात तक अंदाजा नहीं था की एम.एम.एफ. चुदाई इतनी मजेदार होती होगी। दो लण्डों के एक साथ चोदने से सुषमा का पूरा बदन रोमांच से मचल रहा था। सुषमा बार बार “है राम! मर गयी रे! ओह…. आह… हूँ…. ओहो….. उफ़….” इत्यादि सिसकारियां और कराहटें निकाल रही थी।

मैंने यह बखूबी महसूस किया की शायद उस रात की सुषमा की मेरे और साले साहब के लण्ड से हुई चुदाई सुषमा जिंदगी भर भूल नहीं पाएगी। जिस तरह सुषमा हम दोनों के बिच चिपकी हुई थी और जिस तरह वह बार बार हमें अपने बाहु पाश में जकड कर अपना प्यार जता रही थी, यह साफ़ जहीर होता था की वह उन्माद के चरम को छू रही थी।

सुषमा की इस तरह की दुगुनी चुदाई उतनी तेज़ रफ़्तार वाली नहीं थी। रफ़्तार बढ़ाने पर अक्सर दोनों में से एक लण्ड चूत या गाँड़ में से निकल पड़ता था। उसे फिर से अंदर डालना पड़ता था, जिससे रफ़्तार धीमी हो जाती थी।

पर वह धीमी रफ्तार में भी सुषमा उतनी ज्यादा उत्तेजित हो रही थी की चुदाई के दरम्यान मैंने किसी भी औरत को इतना ज्यादा उत्तेजक और उन्मादक हाल में नहीं देखा था। वह कभी काँपने लगती थी तो कभी कराहने लगती थी तो कभी सिसकारियां मारने लगती थी। मेरे ख्याल से सुषमा की कराहटें पूरी दुगुनी चुदाई के दरम्यान एक या दूसरे रूप में बगैर थमें चालु ही रही थीं।

यह तो हमें अंदाज था की एम.एम.एफ. चुदाई रोमांचक और उत्तेजना भरी होगी। पर इतनी उत्तेजक और रोमांचक होगी वह हम तीनों में से किसी ने भी सोचा नहीं था। हालांकि पहले की चुदाई के मुकाबले एम.एम.एफ. चुदाई उतनी तेज रफ़्तार वाली नहीं थी। पर फिर भी मेरे लण्ड में मेरा वीर्य इस कदर फनफना रहा था और मेरा पूरा बदन ख़ास कर मेरा दिमाग भी उत्तेजना से इतने जोश में था जैसा मैंने पहले किसी चुदाई में महसूस नहीं किया था।

मैं जल्द ही झड़ने के कगार पहुँच रहा था। मैंने महसूस किया की वही हाल साले साहब और सुषमा का भी था। साले साहब का बदन सख्त हो गया था और सुषमा मारे उत्तेजना से इतनी ज्यादा मचल रही थी की मुझे लगा की वह बार बार झड़ रही थी।

धीरे धीरे सुषमा की चुदाई एक और झटके साथ धीमी पड़गयी। सुषमा का पूरा बदन कंपकपाने लगा। वह अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। वह मुझे अपने बाहु पाश में जकड कर बोलने लगी, “राज चोदो मुझे और जोर से चोदो। मैं झड़ने वाली हूँ। संजू और जोर से गाँड़ मारो मेरी। गाँड़ में और जोर से डालो यार! आजकी रात मेरे लिए नहीं भूलने वाली रात बन जाएगी। आज तुम दोनों ने मुझे ऐसा बढ़िया तरीके से चोदा है की मैं इसे भूल नहीं पाउंगी।”

यह कह कर सुषमा झड़ने लगी। साथ ही साथ में मेरे लण्ड में से फर्राटे मारता हुआ मेरा वीर्य सुषमा की चूत की नाली में गरमा गरम उष्मा देता हुआ जोरशोर से मौजों के उफान की तरह बहने लगा। मेरा सारा वीर्य खाली होते ही सुषमा शिथिल हो कर लुढ़क पड़ी।

सुषमा के खिसक ने से मेरा ढीला हो चुका लण्ड अपने आप ही बाहर फिसल कर निकल पड़ा। साले साहब ने कब अपना वीर्य सुषमा की गाँड़ में खाली कर दिया और कब अपना लण्ड निकाल लिया और वह एक तरफ जा कर खड़े हो गए यह मुझे पता ही नहीं चला।

करीब पंद्रह मिनट तक हम तीनों थके हुए ऐसे ही लेटे रहे। मुझे लगा की मैं तो सो ही गया होऊंगा। शायद हम तीनों कुछ देर के लिए या तो सो गए थे या फिर तंद्रा में थे। कुछ देर के बाद जब मैंने आँखें खोलीं तब रसोई घर में से बर्तनों की खटखटाहट सुनाई दी। सुषमा शायद हमारे लिए कुछ बना रही थी।

कुछ ही देर में सुषमा हमारे लिए कॉफ़ी और बिस्किट्स ले कर हाजिर हुई। सुषमा ने नाइटी पहन ली थी। ढीलीढाली नाइटी सुषमा के नंगे बदन की सारी रूपरेखा उस ढीले कपडे में बयाँ कर रही थी। सुषमा की चूँचियाँ, और उसके सिरमौर दो निप्पलेँ मनमोहक लग रही थीं। सुषमा की गाँड़ पर एक मनहर आकार बनाती हुई नाइटी सुषमा के नंगे बदन से भी ज्यादा कामुकता के दर्शन करा रही थी।

सुषमा ने मेरी लोलुप नज़रों को देखा और कुछ सहमते हुए मेरी और देख कर बोली, “ऐ मिस्टर रोमियो, अब कुछ देर के लिए रूमानी अंदाज और चुदाई बंद। अब आपके साले साहब हमें यह बताएँगे की अंजू को बच्चा कैसे और किसने दिया।” फिर संजू की और घूम कर सुषमा ने पूछा, “संजू, अब समय हो गया है की तुम उस राज़ पर से पर्दा उठाओ।”

यहां मैं अपने उन पाठकों को कुछ पते की बात बताना चाहता हूँ जो शादीशुदा हैं और अपनी पत्नी के साथ मिल कर जिंदगी में सेक्स का कुछ और ज्यादा मजा लेना चाहते हैं। ज्यादा मजा से मेरा मतलब है, अपनी पत्नी को किसी गैर मर्द से चुदवाना, खुद किसी गैर औरत को चोदना, पत्नियों की अदलाबदली इत्यादि।

यह चुदाई में ज्यादा मजे लेने की जो सनक है वह दोधारी तलवार है। वह आपको बेशक उन्मादक आनंद का अतिरेक देती है, पर अगर इसे सम्हाल कर अमलीजामा ना पहनाया जाए तो जिंदगी में कुछ बड़ी दिक्कतें भी पैदा कर सकती हैं।

वैसे तो इसको कैसे अमलीजामा पहनाना यह हरेक कपल की व्यक्तिगत मानसिक समझदारी, एक दूसरे पर दृढ विश्वास, सहनशीलता और परिपक्वता पर आधारित है, परन्तु मेरा यह सुझाव है की इसको अमलीजामा पहनाने के पहले चाहिए की दोनों जीवन साथी इसके लिए मानसिक रूप से तैयार हों और एक दूसरे से इर्षा या ईगो की टक्कर ना हो। ख़ास कर पत्नियां इसके लिए तैयार ना होने का स्वाँग करतीं हैं या वाकई में तैयार नहीं होतीं।

इसका मुख्य करण यह होता है की पत्नियों को यह भय होता है की कहीं भविष्य में जब कभी पति और पत्नी का कभी किसी भी विषय पर आमनासामना हुआ तो पति पत्नी को बदनाम कर सकता है, इल्जाम लगा सकता है। पति को चाहिए की पत्नी को यह विश्वास दिलाये की ऐसा कभी नहीं होगा। पत्नी में अगर यह विश्वास पैदा हो गया तो समझो बेड़ा पार। उसके बाद तो पत्नियां कई बार पतियों से भी आगे निकल जाती हैं।

ऊपर लिखी हुई जो छोटी सी कविता है उन पंक्तियों में मैंने जीवन में जवानी को जो दो चार घड़ियाँ मिलतीं हैं उन्हें प्यार से चुदाई कर बिताने का जो आनंद है वह एक दूसरे से मेल मिलाप कर सांझा करने का सुझाव दिया है। जिंदगी में थोडी सी नवीनता एवं उत्तेजना लाने के लिए हो सके तो किसी प्यारे रिश्तेदार से, किसी आकर्षक दोस्त से, ऑफिस के साथीदार से या फिर किसी दोस्त के पति या पत्नी से या किसी चंद घंटों की पहचान वाले आकर्षक युवक या मोहतरमा से प्यार भरी चुदाई करने या करवाने की कोशीश करो।

यह बात हमें नहीं भूलनी चाहिए की वक्त बीतते और उम्र बढ़ते चुदाई की इच्छा क्षीण होती जाती है। उम्र बढ़ने के साथ साथ चुदाई के मौके भी कम होते जाते हैं। बाद में जब हम उम्र दराज हो जाते हैं और युवाओं को मस्तीसे चुदाई करते हुए देखते हैं तो हमें यह अफ़सोस खा जाता है की जब वक्त था, मौक़ा था तब हमने चुदाई क्यों नहीं की या करवाई? पर यह ध्यान रहे की उसके कारण जीवन में कड़वाहट ना हो बल्कि मिठास हो।

एक दूसरे से समझौता कर प्यार से इर्षा और कड़वाहट बिना चुदाई करो और करवाओ। जीवन में जोशीली जवानी ज्यादा देर नहीं टिकती। बादमें गृहस्थी की चिंता और बुढ़ापे की बिमारी और कमजोरी आपको छोड़ती कहाँ है?

यह तो हम जानते ही हैं की हमारी महिलाओं को अगर कोई गोपनीय वस्तु, ख़ास करके उनकी जान पहचान वालों में अवैध विजातीय सम्बन्ध कहीं पनप रहा है इसकी गंध भी आ जाये तो उनकी जिज्ञासा और उत्सुकता का लेवल एकदम बढ़ जाता है।

सुषमा यह जानने के लिए बड़ी ही बेसब्र और बेताब थी की पति संजू जब फर्टाइल थे ही नहीं तो फिर आखिर पत्नी अंजू ने अपने बच्चे को जनम दिया तो दिया कैसे? क्या उसने आई.वी.एफ. का सहारा लिया, या फिर किसी गैर मर्द से चुदवाया? अगर किसी गैर मर्द से चुदवाया तो वैसे भी किसी ज्वॉइंट फैमिली में यह कोई आसान काम तो होता नहीं? तो अंजू ने फिर चुदवाया तो किससे और कैसे चुदवाया? गैर मर्द से चुदाई करवाने के लिए उसे क्या क्या पापड बेलने पड़े?

संजू सुषमा का सवाल सुनकर काफी सोच में पड़ गए। उस गोपनीयता का रहस्य खोलने से जब वह कतराने लगे, तो सुषमा की उत्सुकता और बढ़ गयी। सुषमा अपनी एक दूसरे के प्रति दृढ़ श्रद्धा और विश्वसनीयता की दुहाई देते हुए दुराग्रहता की हद तक जा कर संजयजी पर दबाव डालने लगी की वह उस बातको ना छिपाए और उनसे उस रहस्य को सांझा करे।

आखिर में संजयजी को स्त्री हठ के आगे झुकना ही पड़ा और उन्होंने कहा की वह उस रहस्य के ऊपर से पर्दा हटा ही देंगे और फिर वह उस दौर में हुई वह लम्बी कहानी को संक्षिप्त में बताने की कोशिश करने के लिए तैयार हुए।

साले साहब मेरी और सुषमा की और देख कर हलके से मुस्कुराये और फिर काफी गंभीरता से बोले, “चूँकि हम लोगों में कोई भी ऐसा गंभीर गोपनीय रहस्य नहीं होना चाहिए जिसके कारण हम में से किसीके मन में भी कुछ शंका कुशंका हो। सिर्फ इसी के कारण मैं इस रहस्य पर से पर्दा खोलना चाहता हूँ।

यह जो कहानी है वह गोपनीय तो है ही पर उसके उपरांत बड़ी ही विचित्र है। वह हमारे समाज की एक विचित्र मानसकता को उजागर करती है। मेरे इस रहस्य को उजागर करने से ख़ास कर मेरी बहन टीना को कुछ मानसिक असुविधा हो सकती है। पर चूँकि हम छह साथीदारों ने एक दूसरे से सपूर्ण खुलेपन का संकल्प लिया है, मैं आशा करता हूँ की टीना भी इस पेचीदा मसले को समझेगी और स्वीकार करेगी। मुझे भरोसा है की चूँकि आप सब हमारी इस विचित्र मानसिकता से भलीभाँति परिचित हैं इस लिए यह कहानी सुनने के बाद उस को बुरा नहीं मानेंगे।”

मैंने सुषमा और साले साहब की और देखा और अपना सर हिला कर उनको भरोसा दिलाया की टीना जरूर इस बात को समझेगी। साले साहब ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए जो उसके बाद कहा वह मैं उन्हींके शब्दों में पेश कर रहा हूँ।

संजयजी की कहानी उन्हीं की जुबानी

मैं आगे की जो भी रोमांचक दास्ताँ हैं उसे आप सब से सांझा करूँ उसके पहले आप सब को हमारे परिवार का कुछ इतिहास जानना और समझना होगा। हमारे परिवार में मेरे माता पिता, मेरे बड़े भाई जिनका नाम सुदर्शन है, टीना, मैं और अंजू हैं। मरे पिताजी की अच्छीखासी नौकरी थी और जमाने के हिसाब से आमदनी भी ठीकठाक ही थी। पर उनकी शादी के कुछ सालों बाद युवावस्था में ही उन्हें ऐसी बिमारी ने घेर लिया की वह अपाहिज से हो गए।

उसकी वजह से उनकी नौकरी छूट गयी। हमारे घर में आमदनी की समस्या हो गयी। उन्हीं सालों में माँ भी काफी अस्वस्थ रहने लगी। उनकी बिमारी के कारण उनमें घरगृहस्थी सम्हालने की क्षमता नहीं रही। उस समय मैं शायद पाँचवी क्लास में पढता था और टीना शायद तीसरी क्लास में।

मेरे बड़े भैया उस समय ग्यारहवीं क्लास में थे। हमारी तक़दीर अच्छी थी की मेरे पिताजी को हमारे गाँव में ही उनके पिताजी की जायदाद में से वारिस में एक काफी बड़ा घर मिला था, जिसमें हम रहते थे। हम अभी भी उसी घर में रहते हैं। उस समय सुदर्शन भैया (जेठजी) ऊपर के एक कमरे में रहते थे। दुसरे कमरे में कुछ सामान पड़ा रहता था।

जब घरमें पैसों के लाले पड़ने लगे तब मेरे बड़े भाई सुदर्शनजी ने पिताजी से कहा की घर खर्चे की आपूर्ति के लिए वह पढ़ाई छोड़ कोई नौकरी कर लेंगे। वह पढ़ाई में काफी होनहार थे।

पिताजी ने उन्हें पढ़ाई छोड़ने से मना किया तब बड़े भैया ने उस छोटी सी उम्र में अपनी पढ़ाई के साथ साथ स्कूल के छूटने के बाद दोपहर दो बजे से रात के ग्यारह बजे तक एक दूकान में अकाउंटेंट की नौकरी करना शुरू किया। रात को ग्यारह बजे घर आकर खाना खा कर वह दो घंटे पढ़ाई .करते थे।

उस समय उनकी तनख्वाह कोई ख़ास ज्यादा नहीं थी, पर उसमें से जैसे तैसे जोड़तोड़ कर उनकी कॉलेज की फीस, मेरी और टीना की स्कूल और बाद में कॉलेज की फीस जमा हो जाती थी और हमारी किताबें, कपडे बगैरह का इंतजाम हो जाता था। जो कुछ बच जाता वह घर खर्च में लग जाता था।

उस सस्ताई के जमाने में हम बहुत ही करकसर करके जैसे तैसे गुजारा कर ही लेते थे। बड़े भैया मुझे और टीना के बचपन में जब हमारे माँ बाप हमारी देखभाल करने में असमर्थ थे तब हमारी सारी जिम्मेदारियां दिन रात, कभी खाया तो कभी भूखे रह कर, कभी सो पाए तो कभी सारी रात जाग कर उठाते थे।

हमें उन्होंने कभी हमारे माँ बाप के लाड प्यार और सेवा की कमी महसूस नहीं होने दी। जब हम कॉलेज में पहुंचे तब भैया को अच्छी जॉब मिल गयी थी। पर फिर भी महंगाई के कारण और हमारी जरूरतों के बढ़ने के कारण उनकी सारी कमाई हमारी पढ़ाई और घर चलाने में ही लग जाती थी।

उनकी इस सेवा और जबरदस्त बलिदान के कारण ही मेरे माता पिता ने घर में यह नियम बनाया था की हम दोनों भाई बहन, मैं और टीना, सुबह जैसे ही कहीं बाहर जाते या बाहर से घर में आते, सबसे पहले बड़े भैया के पाँव छूते और फिर ही हम कोई भी आगे का काम करते।

जब बड़े भैया की उम्र शादी के लायक हुई तब मैं और टीना हम पढ़ाई में लगे हुए थे। पढ़ाई का काफी खर्चा हो रहा था। सब के काफी आग्रह करने पर भी उन्होंने शादी करने से मना कर दिया क्यूंकि वह कहते थे की अगर घर में उनकी पत्नी आयी तो खर्चा तो बढेगा ही पर साथ साथ माँ, बाप और भाई बहन को सम्हालने में दिक्क्त हो सकती है। नयी बहु का मेरे और टीना के साथ सौतेला सा व्यवहार भी हो सकता था।

जब टीना की शादी हुई तब टीना की जीजू से शादी का सारा खर्चा सुदर्शन भाई साहब ने ही उठाया था। वक्त गुजरते मैं अच्छा खासा कमाने लगा था। तब घर में हमें पैसों की किल्लत नहीं रही थी। पर तब बड़े भाई साहब की उम्र करीब पैंतीस साल की हो चुकी थी और शादी के लायक कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बड़े भाई साहब हालांकि काफी स्वस्थ, आकर्षक और मजबूत थे।

हमारे पड़ोस में एक ब्राह्मण युवक रहते थे। उनका नाम रमेश था। उनके मातापिता नहीं थे। बड़े भाई साहब के साथ उनकी अच्छीखासी दोस्ती थी। सुदर्शन भैया की रमेशजी के साथ काफी उठक बैठक थी। रमेशजी ज्योतिष का काम करते थे पर कोई ख़ास आमदनी नहीं थी।

कई बार जरुरत पड़ने पर भाई साहब ने रमेशजी की काफी पैसा दे कर मदद की थी। रमेशजी की शादी का भी सुदर्शन भाई साहब ने ही सारा खर्च उठाया था। रमेशजी की शादी के बाद रमेशजी की पत्नी, जिसका नाम माया था, वह रमेशजी के कहने पर भाई साहब से लिया कर्जा उतारने के हेतु कहो या हमारी मदद के लिए कहो, सुदर्शन भाई साहब के मना करने पर भी, हमारे घर में काम करने लगी।

माया देखने में काफी सुन्दर थी। उसके नाक नक्श और फिगर आकर्षक थे। वह मेरे माता पिता की सेवा करती, घर का खाना बनाती और बड़े भाई साहब का ख़ास ध्यान रखती। विधाता की चाल भी अजीब होती है। शादी के दो साल बाद रमेशजी की एक एक्सीडेंट में मृत्यु हो गयी।

उनकी पत्नी अनाथ हो गयी। तब सुदर्शन भाई साहब ने माया को हमारे घर में काम करने के लिए उस की तनख्वाह तय की और हमारे घर के पीछले हिस्से में ही दो कमरे, बाथरूम, टॉयलेट के साथ उसे दे दिए। वह दिन भर हमारे घर में काम करती और रात अपने कमरे पर चली जाती।

उसी समय मेरी शादी अंजू से हो गयी। अब घर का खाना बनाने की और बाकी की कुछ और जिम्मेदारी अंजू ने अपने सर पर ले ली। माया के पास कोई ख़ास काम नहीं बचा। भाई साहब ने फिर भी माया को काम से नहीं निकाला और उसकी तनख्वाह में भी कोई कटौती नहीं की।

माया रोज आती और अंजू का हाथ बटाती और सुदर्शन भाई साहब का कमरा साफ़ सूफ करती और उनके खानपान, कपड़ों की धुलाई बगैरह का ध्यान रखती। अंजू और माया की अच्छी खासी दोस्ती हो गयी। हमारी शादी के बाद कुछ ही दिनों में अंजू को धीरे धीरे पता लगा की हमारे सुदर्शन भाई साहब ने हमारे लिए कितना बड़ा बलिदान दिया था। उन्होंने अपना सारा जीवन हमारे लिए कुर्बान कर दिया था, यहां तक की उन्होंने ने अपना घर भी नहीं बसाया था।

अब यहां जा कर अंजू का मेरे जीवन में जो बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है उसका अध्याय शुरू होता है। आगे की कहानी में मेरी अंजू ने एक बड़ी ही अनोखी भूमिका निभायी है और मैं चाहूँगा की मैं उसे अंजू के ही शब्दों में बयान करूँ। हालांकि यह मैं बोलूंगा पर शब्द अंजू के हैं। जैसे जैसे घटनाएं होती गयीं वैसे वैसे अंजू मुझे बताती गयी। वही शब्द मैं अंजू की जुबानी बयाँ कर रहा हूँ।

जब मैं संजू जी से शादी कर नयी नवेली दुल्हन बन कर मेरे ससुराल आयी तब मुझे पता चला की मेरे पति, ननदसा, मेरी सांस, ससुर सबके जीवन में मेरे पति संजयजी के बड़े भाई सुदर्शन भाई साहब (मेरे जेठजी) का कितना बड़ा योगदान था।

मेरे पति संजयजी तो मुझे यहां तक कहते थे की अगर वह अपनी चमड़ी उधेड़ कर उससे जूते बनाकर भाई साहब को पहनाएंगे तो भी वह उनका ऋण चुकता नहीं कर सकते। कई बार संजयजी बड़े भैया की बात करते हुए इतने भावुक हो जाते की उनकी आँखों में आंसू थमने का नाम नहीं लेते।

मेरे घरमें प्रवेश के समय, जब मैं नईनवेली दुल्हन बन कर आयी थी, मेरा घर के आँगन में स्वागत मेरी सांस के साथ साथ माया ने किया था। उसी समय मेरा परिचय माया से हुआ, जो आगे चल कर मेरे लिए मेरी बहन से भी ज्यादा करीबी हो गयी थी। मुझसे माया भी कई बार बड़े भैया के बारे में बड़े चाव से बात करती थी। मैंने महसूस किया की माया कुछ हद तक बड़े भैया से प्यार करने लगी थी।

माया को सुदर्शन भाई साहब से प्यार हो गया है यह सिर्फ मेरा अनुमान था जो मैं माया की सुदर्शन भाई साहब के बारे में प्यार भरी बातों से लगा सकती थी। पुरुष और स्त्री का एक दूसरे को कुछ ज्यादा ही निजी तरीके से पसंद करना शायद प्यार ही कहलाता है।

जब भी माया जेठजी के बारे में बात करती थी तब कई बार वह बहुत ज्यादा भावुक हो जाती थी। ख़ास कर माया जब उसके पति का निधन हो गया उस समय की अपने जीवन की बात करती थी तब उसकी आँखों में पानी झलझलाने लगता था। कैसे जेठजी ने माया को ना सिर्फ अनाथ होने से बचाया, बल्कि उसे घरमें सहारा दिया और एक छोटासा घर दे कर उसको सम्मान की जिंदगी दी।

माया को हमारे घर में काम करने के लिए मेरे जेठजी ने या किसी और ने मजबूर या प्रेरित नहीं किया था। वह स्वयं ही शादी के फ़ौरन बाद अपने पति के कहने पर और पति के निधन के बाद स्वतः ही अपनी जिम्मेवारी समझ कर घरमें आकर बिना किसी के कहे और जेठजी के मना करने पर भी घर के काम में लग जाती थी।

अक्सर माया मुझे यह कहती रहती थी की सुदर्शन भैया ने ना सिर्फ हमारे खानदान को गरीबी और भुखमरी से बचाया था बल्कि उसे भी अनाथ से सनाथ बनाया था। माया के लिए जितना सुदर्शन भैया ने किया था उस ऋण को वह अपना जीवन भी दे कर चुकता नहीं कर सकती।

जिस तरह माया जेठजी के बारे में बात करती थी, मुझे लगा की अगर माया को यह कहा जाए की उसे बिना कोई पारितोषिक के जेठजी के पास जा कर नंगी हो कर जेठजी से चुदवाना है तो मुझे कोई शक या संशय नहीं था की वह ऐसा कर सकती थी।

मैंने महसूस किया की माया अकेली थी और उसको पुरुष के संग की आवश्यकता थी तो जेठजी को स्त्री के सहवास की। मैंने यह भी महसूस किया की जेठजी (सुदर्शन भाई साहब) उस जवानी की उम्र में शायद एक औरत के प्यार की कमी महसूस करते रहते थे।

हालांकि सुदर्शन भाई साहब निति नियम के मामले में बड़े ही सख्त थे और उन्होंने कभी भी मेरे या माया से किसी भी तरह की नजदीकियां बनाने की कोशिश नहीं की। पर मैं एक औरत हूँ और नजर के अंदाज से पुरुषों के मन के भाव भाँप लेती हूँ। मैंने सुदर्शन भाई साहब की नजर में कई बार जवानी की भूख देखि थी।

कई बार जब माया जेठजी के कमरे में साडी और घाघरे का छोर अपनी जाँघों के ऊपर तक चढ़ा कर फर्श पर घुटनें टेढ़े कर झाड़ू लगाने बैठती थी या पोछा करती थी या फिर कुछ साफ़ सफाई करने आगे झुक कर घोड़ी जैसी पोजीशन में होती थी तब माया की जाँघें और उसकी गाँड़ का आकार इतना कामुक और मनमोहक होता था जिसे चोरी से छिप कर टकटकी लगा कर देखते हुए जेठजी को मैंने कई बार देखा था।

कई बार मैंने उन्हें ऐसे मौके पर अपने पयजामा में अपने लण्ड को सहलाते हुए भी देखा था। इस में मुझे कोई शक नहीं था की अगर जेठजी को किसी कमसिन औरत को चोदने का मौक़ा मिले और अगर किसी भी तरह का कोई निति नियम की बाधा बिच में ना आये तो जेठजी जरूर चोदने का ऐसा मौक़ा नहीं छोड़ते।

वैसे भी वह अपनी जवानी की चरम अवस्था में थे और उनका बदन स्वस्थ और तेज तर्रार था। मुझे कोई भी शक नहीं था की जेठजी किसी भी औरत को चुदाई कर पूरी तरह संतुष्ट करने की क्षमता रखते थे। यह सोचते हुए मेरे मन में कई बार माया का ख़याल आता था।

मुझे ऐसा मन ही मन में महसूस होता था की कहीं ना कहीं जेठजी माया के युवा कमसिन बदन पाने की मनोकामना रखते थे, पर उनके सख्त नैतिक और सैद्धांतिक रवैये के कारण वह माया से जान बुझ कर दुरी बनाये रखते थे। अगर जेठजी उन सिद्धांत से ऊपर उठ कर माया को चोदने के लिए राजी हो जाये तो मुझे कोई शक नहीं था की माया भी जेठजी से चुदवाने में पीछे नहीं हटेगी।

इसी के चलते मैंने सोचा की शायद माया और भाई साहब की जोड़ी बन सकती है हालांकि दोनों की उम्र में करीब दस साल का अंतर जरूर था। पर माया को सुदर्शन भाई साहब से प्यार जैसा हो गया था और अगर शादी की बात चलेगी तो मेरा मानना था की माया मना नहीं करेगी। तब मैं माया के और करीब जाकर उसकी राजदार बनने की कोशिश करने लगी।

मैं माया को उकसाती और उसे वक्त बे वक्त काम हो या ना हो; कुछ ना कुछ बहाना बना कर जेठजी के कमरे में भेज देती। ऐसे ही मैंने एक बार जब जेठजी की तबियत ठीक नहीं थी तब कुछ देर रात में माया से जेठजी का हाल पूछने और चाय देने के बहाने जेठजी के कमरे में भेज दिया।

माया को मैंने भेजा उसके दो या तीन मिनटों मैं ही वह दौड़ती हाँफती हुई वापस आ गयी। उसका हाल देखने वाला था। वह काफी घबराई हुई लग रही थी। जब मैंने उसे जेठजी का हाल पूछा तो वह रोनी सी सूरत बना कर कहने लगी, “दीदी मैं क्या बताऊँ? मैंने बड़े भैया को ऐसे कभी नहीं देखा। अरे बापरे उनको ऐसे हाल में देख कर मैं तो डर ही गयी।”

मैंने जब दुबारा माया को झकझोरते हुए पूछ की “क्या हुआ, बताओ तो सही? क्या देखा तूने? तुझे डर क्यों लग रहा है?”

तो वह बोली, “दीदी, मैं नहीं बताउंगी। मुझे शर्म आ रही है।”

मैं माया की बात सुनकर कुछ झुंझलाती हुई बोली, “अरे तुझे डर लग रहा है की शर्म आ रही है? अगर शर्म आ रही है तो मुझसे शर्म किस बात की? बोल क्या देखा तूने?”

जब मैं बार बार माया को बोलने के लिए कहने लगी तब झिझकते हुए तुतलाती हुई माया बोल पड़ी, “बड़े भैया बिस्तरे में पड़े हुए अपने उसको अपने हाथ से हिला रहे थे।”

अब मेरे दिमाग का पारा सातवे आसमान पर चढ़ गया। मैंने माया को हिलाते हुए पूछा, “तू क्या बक रही है? किसको बड़े भैया अपने हाथ से हिला रहे थे?”

माया ने अपनी नजरें नीची कर कहा, “वही जो मर्दों का होता हैं ना दीदी। बड़े भैया अपने उसको अपने हाथ में पकड़ कर हिला रहे थे।’

तब मेरी समझ में आया की जेठजी अपने लण्ड को अपने हाथ में पकड़ कर हिला रहे थे। मेरी शादी के बड़ी देर के बाद मुझे सुदर्शन भाई साहब मतलब जेठजी को औरत के प्यार में घेरने का एक अच्छा मौका नजर आया।

कुछ मुस्कुराते हुए मैंने माया से पूछा, “अरे मूरख, तो तू यूँ कह ना की तूने जेठजी का लण्ड देख लिया। क्या वह अपना लंड हिलाकर मुठ मार रहे थे? अगर ऐसा था तो तू उसके कारण इतनी घबराई हुई क्यों है? क्या तुम्हारे पति को अपना लण्ड हिलाते हुए नहीं देखा तूने? क्या तूने अपने पति का लण्ड अपने हाथों में पकड़ा नहीं?”

मेरी बात सुन कर माया चौंक गयी और कुछ झिझकती हुई बोली, “हाँ देखा तो है। पति का तो हमेशा सहलाना पड़ता था पति को तैयार करने के लिए। कई बार उसे मेरे मुंह से चूसा भी है मैंने।”

मैंने कहा, “यही तो हम स्त्रियों का काम होता है। तो फिर जब तूने जेठजी का लण्ड उनको अपने हाथ से हिलाते हुए देखा तो उसमें शर्म और डर की क्या बात है? कहीं जेठजी ने तुझे देखा तो नहीं ना?”

माया ने अपनी नजरें नीची रख कर कहा, “जी नहीं, बड़े भैया ने मुझे देखा नहीं क्यूंकि जब मैंने बिना आवाज किये उनके कमरे का दरवाजा धीरे से खोला उस समय उनकी आँखें बंद थीं और मैंने जब उनको इस हाल में देखा तो एक पल में ही बिना आवाज किये तुरंत दरवाजा बंद कर फ़ौरन उलटे पाँव भाग कर वापस आ गयी। दीदी एक बात कहूं? आप बुरा तो नहीं मानोगी?”

मैंने माया को मुंडी हिला कर इशारा किया की मैं बुरा नहीं मानूंगी। तब माया ने कहा, “क्या यह शर्म और अफ़सोस की बात नहीं है दीदी, की हम जवान औरतों के घर में रहते हुए बड़े भैया को अपने हाथ से यह सब करना पड़ रहा है। क्या हमें इसके लिए कुछ करना नहीं चाहिए?”

मुझे भी माया की बात में दम लगा। मैंने अपनी मुंडी हिलाते हुए माया से सहमति जताई और कहा, “हाँ तुम्हारी बात तो सही है।”

माया ने अपने भोलेपन में ही सही पर बात बड़ी पते की कही थी। जब माया ने मुझे यह कहानी सुनाई तब मुझे यकीन ही नहीं दृढ विश्वास हो गया की हालांकि जेठजी ने हमारे लिए इतना बड़ा बलिदान दिया था, पर उनके बदन में काम की आग तब भी उतनी ही जल रही थी। अब हमारा कर्तव्य था की उनके बदन की उस काम ज्वाला का शमन करने में हम जो कुछ हम से हो सके हम करें।

माया ने अपनी भोलीभाली जबान में अपने मन की बात कह डाली की हम जवान और खूबसूरत औरतों के घर में होते हुए भी हमारे जेठजी जिन्होंने हमारे सब के लिए इतना सब कुछ किया था उनको अगर मुठ मारनी पड़ती है तो वह हमारे लिए बड़े ही अफ़सोस की बात थी।

तब मैंने तय किया की मैं कोशिश करुँगी की माया और जेठजी की जोड़ी बन जाए। इससे उन दोनोंके बदन की काम की भूख तृप्त हो सकती थी और उन दोनों के जीवन को एक नयी दिशा भी मिल सकती थी।

मैंने माया से कहा, “माया मैं तेरी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। देख तु कहती है ना की मेरे जेठजी ने तुझ पर इतने एहसान किये हैं की तू मेरे जेठजी के लिए अपनी जिंदगी भी दे सकती है? तू अभी अभी यह नहीं कह रही थी की हम जवान औरतों के घर में रहते हुए जेठजी को अगर मुठ मारनी पड़े तो यह हमारे लिए कलंक है?

तो फिर तू एक काम कर। अभी की अभी जेठजी के कमरे में चाय लेकर वापस चली जा और कहना आपकी तबियत देखने आयी थी। फिर टेबल पर चाय रख कर बेझिझक उनके पास बैठ जाना। बोल तू कर सकती है यह?”

माया ने मेरी और देख कर अपने दांतों में ऊँगली दबा कर बोली, “दैया रे दैया! यह क्या कह रहे हो बीबीजी? जब भैया इस हालत में हों तो मैं कमरे में कैसे जाऊं? मुझे बड़े भैयाजी से बड़ा डर लगता है।”

मैंने अपना धीरज ना गँवाते हुए कहा, “देख माया, हमें कैसे भी कर के जेठजी का घर बसाना है। मैं चाहती हूँ की तू मेरे जेठजी से शादी करके जेठजी का घर बसाये। मैं चाहती हूँ की तू मेरी जेठानी बने। क्या तू जेठजी को चाहती है? सच सच बताना।”

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