कामिनी की कामुक जीवन गाथा 11

गांड की चुदाई

वासना के उस तूफान के पश्चात मैं, नुची चुदी, निचुड़ी, थकी मांदी, सीमेंट से नहाई, लड़खड़ाते कदमों से, सबकी नजरें बचाती बाथरूम में घुसी और नहाते हुए सोचने लगी, कामुकता के वशीभूत यह मैं क्या कर बैठी। एक गंदे, वासना के कीड़े राजमिस्त्री के साथ उस गंदे गोदाम में, गंदगी में लिसड़ती घिसटती, कैसे कुतिया की तरह चुदती रही। मेरे साथ यही समस्या है। शारीरिक भूख के आगे वासना की धधकती ज्वाला में मैं अंधी हो जाती हूं। अवसर, स्थान, व्यक्ति, मेरे लिए सब गौण हो जाते हैं, महत्वपूर्ण होता है बस षुरुष/पुरुषों का/के लिंग और उस/उन लिंग/लिंगों से मेरी योनि का मिलन, चाहे तरीका कैसा भी हो, कितनी भी जलालत भरी हो। अब उसी दिन की बात ले लीजिए, उसके गंदे शरीर से उस गंदे स्थान पर, गंदे तरीके से अपने शरीर की भूख मिटाना सच में बेहद रोमांचक और अत्यंत आनंददायक महसूस हो रहा था मुझे और सब कुछ लुटाने के पश्चात भी उस मिस्त्री की बातें सुनकर मेरे मन में अन्य मजदूरों के सम्मुख भी अपने तन को परोसने की आकांक्षा सिर उठाने लगी थी। मुझे साफ साफ महसूस हो रहा था कि इन मेहनतकश मजदूरों के गठे, कसरती शरीरों की दमदार कामक्षमता अतुल्य होगी। गंदे शरीर जरूर होंगे उनके, लेकिन मेरे जैसी कामपिपासु महिला के तन की अदम्य शारीरिक भूख उन मजदूरों से अच्छा शायद ही और कोई मिटा सकता था। वह औरतखोर मिस्त्री सलीम मियां तो एक उदाहरण था। मैं मन ही मन निश्चय कर चुकी थी कि उन कामगरों से इसी प्रकार मजा लूंगी।

मुझे उस समय तक पता नहीं था कि मजदूरों की सही संख्या क्या थी, फिर भी अनुमान के अनुसार लगभग दस की संख्या तो जरूर होगी। जिनमें कुछ औरतें रेजा थीं, कुछ कुली और दो या तीन मिस्त्री और उनके कार्य की देखरेख के लिए अभियंता सह ठेकेदार हर्षवर्धन दास जी नें एक स्थानीय, लगभग पचपन वर्षीय आदिवासी बुजुर्ग, छगना मुंडू को नियुक्त कर रखा था। दूसरे दिन मैं ऑफिस से थोड़ी जल्दी ही आ गयी थी। उस वक्त चार बज रहा था। मैं फटाफट अपना लैपटॉप अपने कमरे में रखकर भवन निर्माण स्थल में पहुंची। मैंने देखा, काम करन वालों में, तीन मिस्त्री, पांच कुली और चार रेजा थे। गोदाम के दरवाजे के बाहर छज्जे के नीचे कुर्सी पर छगना बैठा हुआ था। चूंकि मजदूरों के जाने का समय होने वाला था, इसलिए बचे खुचे मसाले को जल्दी जल्दी खपाने में सभी व्यस्त थे। सभी मजदूर स्थानीय आदिवासी ही थे। मिस्त्रियों में सलीम मियां के अलावे दो और लोग थे, एक करीब चालीस वर्षीय, अधपके बालों वाला हट्ठा कट्ठा काला ठिंगना, और दूसरा मझोले कद का करीब पचास वर्षीय, दुबला पतला गंजा, बेतरतीब दाढ़ीवाला व्यक्ति था। मजदूरों में उस अठारह वर्षीय काले चिकने लौंडे के अलावे बाकी सबकी उम्र बीस से तीस वर्ष के बीच रही होगी। एक लंबे कद का था, करीब छ: फुटा और बाकी सब औसत कद के गठीले शरीर वाले काले कलूटे आदिवासी थे। वहां काम करने वाली रेजाएं भी बीस से तीस की उम्र की थीं। देखने में तीन शादीशुदा लग रही थीं और एक कुवांरी। सभों की कद काठी ताकरीबन एक ही तरह की थी। करीब साढ़े चार से पांच फुट के बीच उनका कद रहा होगा। शादीशुदा रेजाओं का शारीरिक गठन भी काफी अच्छा था। सभी का रंग सांवला था। उनमें कम उम्र, बगैर शादीशुदा रेजा का नयन नक्श बाकी रेजाओं से अधिक आकर्षक था।  वह छरहरी काया की आकर्षक शारीरिक बनावट वाली सांवली सी युवती थी। शारीरिक अनुपात तथा उम्र के लिहाज से काफी बड़े बड़े उरोज थे उसके और नितंब भी काफी बड़े थे। कुल मिला कर बहुत ही सेक्सी युवती थी वह। कुवांरी होने के बावजूद काफी चंचल, वाचाल, चतुर और खेली खायी लग रही थी।

मैं घूमती हुई उनके सुपरवाइजर छगना के पास पहुंची।

“नमस्ते मैडम।” छगना खड़ा हो गया। सभी कामगरों का ध्यान अब मेरी ओर पड़ा। सलीम मियां मुस्कुरा रहे थे। उसके सहयोगी मिस्त्री भी मुझे घूर रहे थे। उसी तरह बाकी कामगर भी मुझे विचित्र नजरों से देख रहे थे।

“नमस्ते म़ुंडू जी, बैठिए बैठिए। और बताईए, कैसा चल रहा है सब काम?” औपचारिक तौर पर पूछ बैठी।

“सब ठीक चल रहा है मैडम।” उसने उत्तर दिया। मैंने पहली बार छगना को गौर से देखा। अजीब सा लगा मुझे उसके व्यक्तित्व में। उसकी शारीरिक बनावट अजीब थी, आम मर्दों से कुछ अलग, सीने के उभार उसकी शारीरिक बनावट के हिसाब से कुछ अधिक थे जो आम पुरुषों से मेल नहीं खाते थे। शारीरिक गठन तो बेहद सामान्य था लेकिन असामान्य थे उसके सीने के उभार और नितंब। तभी गोदाम के अंदर से एक और मजदूर, सिर्फ गंदे से पैंट पहने हुए पसीने से लतपत, बाहर निकला। चूंकि कमर से ऊपर वह नंगा था, उसका शारीरिक सौष्ठव देखते ही बन रहा था। कसरती शरीर, चौड़ा चकला सीना, बाहों की मछलियां फड़कती हुईंं। बाकी सभी मजदूरों से लंबा तगड़ा था, कद करीब करीब छ: फुट का होगा। उम्र करीब तीस बत्तीस का होगा। मुझे देखते ही तनिक हडझबड़ा सा गया। चेहरे का रंग तनिक उड़ गया था। मुझे लगा कुछ गड़बड़ है, दाल में कुछ काला अवश्य है। छगना भी तनिक घबरा सा गया था, फिर भी संभल कर बोला, “का रे मंगरू, काम होलौ (क्या रे मंगरू, काम हुआ)?”

एक बारगी तो नि:शब्द रहा फिर वह भी संभल कर बोला, ” ह ह हां होय गेलौ (हो गया)।”

“क्या कर रहे थे तुम?” मैं बोली।

“क क कुछ नहीं, बस अंदर का सामान सजा रहा था।” वह लड़खड़ाती जुबान से बोला।

“आज का काम खतम हो गया ना, तो मैंने सारा सामान को ढंग से सजा कर रखने को कहा था।” मुंडू तपाक से बोला। तभी अंदर से वही कल वाला चिकना लड़का बाहर निकला। वह भी सिर्फ एक गंदा सा पैंट पहना हुआ था। उपर का बदन नंगा बदन पसीने से लतपत था।

“और यह?”

“यह भी यही कर रहा था। का रे खोकोन, होलौ ना (क्या रे खोकोन, हुआ ना)?” मुंडू बोला।

“हां दादा होय गेलौ (हां दादा, हो गया)। वह धीरे से बोला और आगे बढ़ गया। उसकी चाल बिल्कुल लड़कियों की तरह थी, कमर मटका कर चल रहा था साला गांडू की औलाद। इस कमसिन उम्र में ही इन कामुक भेड़ियों के हत्थे चढ़ गया था और अब तो पूरा माहिर हो गया होगा। हो क्यों नहीं गया होगा, जब सलीम के जैसे इतने बड़े लिंग से आनंदपूर्वक गुदा मैथुन करवा सकता है तो, परिपक्व हो ही गया होगा। समझ तो मैं गयी थी कि अंदर क्या सजा रहे थे दोनों। निश्चित ही इस लौंडे की गुदा मेंं महेश अपना लिंग सजा रहा था। खैर मैं अनजान बन गयी। उधर सभी मिस्त्री और मजदूर मुस्कुरा रहे थे। उनकी रहस्यमयी मुस्कान से मुझे आभास हो गया था कि गोदाम के अंदर जो कुछ हो रहा था उससे वे अनभिज्ञ नहीं हैं। उनकी नजरें मुझ पर भी थीं। उनकी नजरों में मैं अपने लिए हवस की भूख स्पष्ट देख रही थी। पहले तो कभी मैंने उन्हें इस तरह मुझे देखते हुए नहीं देखा था। आज यह परिवर्तन क्यों था? तो क्या, तो क्या, कल वाली बात इन्हें पता चल गयी है? शायद, शायद क्यों, उनकी मुस्कान और नजरों में जो कुछ था, चीख चीख कर चुगली कर रहा था कि अवश्य उन्हें गोदाम में मेरे साथ हुए गंदे खेल का पता चल चुका है। सोच कर ही झुरझुरी सी दौड़ गयी मेरे तन में। हाय राम, यह क्या हो गया? मैं थोड़ी विचलित हो उठी। थोड़ी शर्मिंदा भी। क्या सोच रहे होंगे सब मेरे बारे में? मेरी मालकिन वाली गरिमा चिंदी चिंदी हो चुकी थी शायद उनकी नजरों में। एक संभ्रांत, सुंदर महिला अवश्य थी, मगर कामुकता के वशीभूत खुद को बड़ी सस्ती बना बैठी थी। अब हो भी क्या सकता था, जैसी करनी वैसी भरनी। भुगत अब, साली कमीनी कुतिया, देख तेरी लंडखोरी नें तुझे इन लोगों की नजरों में कहां ला खड़ा कर दिया है, मैं मन ही मन खुद को कोसने लगी। लेकिन अब चिड़िया तो खेत चुग चुकी थी, अब पछताये का होत। इस परिस्थिति से मुझे खुद निकलना था, लेकिन यहां निकलना किसे था। मैं खुद ही तो इस गड्ढे में कूदी थी। बड़ी अजीब मन:स्थिति से गुजर रही थी। एक तरफ अपने सस्ते होने की शर्मिंदगी, तो दूसरी तरफ इन मजदूरों से अपनी शारीरिक भूख मिटाने की अदम्य इच्छा। अंततः पहले की तरह जीत शैतान की हुई। मन के कोने में बैठा शैतान बोल रहा था, “अब सोच क्या रही है साली छिनाल, जा जा, आगे बढ़, इतने चुदक्कड़ मर्द तुझे चोदने को तैयार हैं और तू किस दुविधा में फंसी फड़फड़ा रही है? मजा ले ले। दुनिया में औरतें इसी लिए तो बनायी गयी हैं, वरना भगवान को औरत बनाने की क्यों सूझी। स्वर्ग नर्क किसने देखा है? यहीं स्वर्ग है पगली, यही स्वर्गीय सुख है। तेरे मन में ऐसा सुखद विचार डालने वाला और तुझसे करवाने वाला वही है, वही है, लूट मजा लूट, दे मजा दे, बांट मजा बांट।”  और बस, शैतान जीत गया। मैं मन ही मन ठान बैठी, उस स्थिति से निकलने की नहीं, उस स्थिति में डूब कर मजा लेने की। मुंडू की बात सुनकर खास कर उस कम उम्र चंचल रेजा की हंसी रुक ही नहीं रही थी।

“काहे रे कांता, बड़ा हंसी आवा थौ (क्यों रे कांता, बड़ी हंसी आ रही है)?” मुंडू बोला।

“अईसने ही, तोर बात सुईन के (ऐसे ही, तेरी बात सुनकर)।” वह हंसती हुई बोली।

“अईसन का बोलली हम (ऐसा क्या बोला मैं)? अपन काम से काम रख छमिया, नहीं तो….” आंखें तरेर कर मुंडू बोला।

“नहीं तो का?” कोई फर्क नहीं पड़ा कांता पर।

“तोर से सो बाते करेक बेकूफी हौ। चल छुट्टी कर, भाग हियां से (तुम से तो बात करना ही बेवकूफी है। छुट्टी करो और दफा हो जाओ यहां से)।” मुंडू नें हथियार डाल दिया।

“जा थी, जा थी, बड़ा आय हौ भगाएक वाला (जा रही हूं, जा रही हूं, बड़ा आया है भगाने वाला)।” कांता पैर पटकती हुई बोली और हाथ मुंह धोने चली। मुंडू खिसिया गया। अब सभी हंस पड़े। मैं उस नकचढ़ी छमिया को देखती रह गयी। अबतक सभी अपने काम समेट चुके थे और हाथ पांव धोने लगे। मुंडू भी अपना सामान समेटने लगा। एक एक कर सभी रुखसत होने लगे। मैने ध्यान दिया कि कल वाला मिस्त्री सलीम, अपने और दो साथी मिस्त्रियों के साथ धीरे धीरे हो रहा था।

“तो मैडम, अब हम चलते हैं।” मुंडू अपना बैग उठाते हुए बोला।

“ठीक है।” मैं सिर्फ इतना ही बोली।

“सलीम, सामान वगैरह देख लेना। कोई सामान बाहर न रहे।” कहते हुए वह निकला।

“हां जी, देख लेंगे।” संक्षिप्त सा उत्तर दिया उसने। उसकी आशा भरी निगाहें मुझी पर टिकी थीं। उन तीन मिस्त्रियों को छोड़ कर मुझे विचित्र निगाहों से देखते, मुस्कुराते हुए सभी जा रहे थे। चाहते हूए भी मुंह खोल कर तो बोल नहीं सकती थी कि, जा कहां रहे हो हरामियों, चुदने के लिए मरी जा रही इस लंडखोर को तड़पती छोड़कर। उन सबके निकलते ही मैं तनिक मायूस घर की ओर मुड़ी, लेकिन तभी, “मैडम जी।” सुनकर पांव जम गये मेरे। यह आवाज थी सलीम की।

“क्या है?” मन बल्लियों उछलने लगा।

“आज नहीं होगा?”

“क्या?”

“वही, कल वाला।”

“क्या कल वाला?”

“भूल गयीं, गोदाम के अंदर वाला?”

“क्या?”

“अब ड्रामा मत कीजिए। देखिए, आज रफीक मियां और बोदरा भाई भी हैं।”

“यह ककककक्या्आ्आ्आ्आ्आ बोल रहे हो?” मन ही मन खुश हो गयी।

“कुछ नया तो नहीं बोल रहा हूं।”

“तततततो तुमने इन्हें भी बता दिया?” तनिक नाराजगी से बोली।

“हां बता दिया, गलत किया क्या?”

“हां गलत किया। बहुत गलत किया। कल भी तुमने गलत किया। जो भी किया जबर्दस्ती किया।” मैं कम बदमाश थोड़ी न थी। इतनी आसानी से उन लोगों से चुद जाती क्या? मन तो कर रहा था कि ये लोग टूट पड़ें मुझ पर। बेवजह बातों में समय जाया क्यों कर रहे हैं।

“मजाक मत कीजिए मैडमजी। आपकी मर्जी न होती तो हमारी क्या मजाल कि आपको छू भी सकें।”

“सबको बता दिया?” मैं बोली।

“मैंने रफीक को बताया, रफीक नें बोदरा को बताया और बाकी को उस लड़के खोकोन नें बताया है शायद। वह भी तो कल वहीं था।” अभी हमारी बातें हो ही रही थीं कि रामलाल टपक पड़ा।

“अरे मैडम आप यहां हैं, मैं सब जगह आपको ढूंढ़ रहा था।” रामलाल आते ही बोला।

“क्यों ढूंढ़ रहे थे?” खीझ उठी मैं।

“ऑफिस से लौटने के बाद देखा नहीं ना।”

“अब देख लिया ना। जाईए अब, देख रहे हैं ना हम बात कर रहे हैं।”

“नहीं, आप बात कर लीजिए फिर चलिए मेरे साथ।” वह जिद करने लगा।

“आप भी ना, कैसी बात कर रहे हैं।” मैं नरम हो कर समझाने लगी, “मैं आ रही हूं ना।”

“नहीं, आप मुझसे आजकल दूर दूर रहती हैं। मैं नहीं जाऊंगा यहां से।” बच्चों जैसी जिद थी। तभी मेरी नजर हरिया पर पड़ी।

“हरिया चाचा, रामलाल को ले जाईए यहां से, करीम को बोलिए इन्हें कहीं घुमा लाए। तबतक मैं इनसे निबट लेती हूं। रामलाल जी अभी आप जाईए, फिर रात को मिलते हैं। मैं कहीं भागी जा रही हूं क्या?” किसी तरह रामलाल से पीछा छुड़ाया मैंने। समझ गयी कि आज रामलाल मुझे छोड़ेगा नहीं। रामलाल के जाने के बाद मैं सलीम और उसके सहयोगी मिस्त्रियों से मुखातिब हुई।

“हां तो क्या कह रहे थे तुम?”

“यही कि आज फिर……”

“लललललेकिन कल तुम अकेले थे और आज तुम तीन?” मैं घबराने का नाटक करने लगी।

“तो क्या हुआ?”

“क्या हुआ मतलब? मुझे क्या समझा है तुमने?” मैं रोष से बोली।

“जो समझना था कल ही समझ लिया। चलिए अंदर।” अरे यह तो हुकुम चला रहा था।

“नहीं जाती।” विरोध था मेरा।

“चल साली बुरचोदी अंदर।” मुझे संभलने का मौका दिए बिना अपनी मजबूत बांहों में दबोच कर गोदाम के अंदर ले आया जिसका दरवाजा खोले ठिंगना बोदरा बड़ी बेकरार मुद्रा में खड़ा था। हमारे साथ साथ वह दुबला पतला टकला दढ़ियल रफीक भी दाखिल हुआ। हमारे अंदर दाखिल होते ही भड़ाक से गोदाम का दरवाजा बंद हो गया।

“नह्ह्हीं्ई्ं्ईं्ईं्ईं्ईं, पपपपप्ली्ई्ई्ई्ई्ईज्ज्ज्ज। ऐसा मत करो।” मैं गिड़गिड़ाने का नाटक करने लगी। चाहती तो छूट सकती थी, मुक्त हो सकती थी और वे मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकते थे। लेकिन चाहती तब ना।

“कैसा न करें? न चोदें? छोड़ दें बिना चोदे? कल तो आह राजा, ओह राजा, चोद राजा बोल रही थी और आज क्या हुआ?” अब वह अपनी औकात पर आ गया था। मैं अंदर ही अंदर खुश हो रही थी।

“यह तुम क्या कर रहे हो?” मेरा नाटक बदस्तूर जारी था।

“वही जो कल किया था।”

“लेकिन कल तुम अकेले थे।”

“तो तुझे क्या फर्क पड़ता है?”

“फर्क पड़ता है। मैं अकेली और तुम तीन। मार डालोगे क्या?”

“तू? तू मरेगी नहीं साली नौटंकी बाज। अऊर तू लोग का देखाथा मादरचोद, पकड़ साली कुतिया के, खोल हरामजादी केर कपड़ा। (और तुमलोग क्या देख रहे हो मादरचोद, पकड़ो साली कुतिया को, खोलो हरामजादी के कपड़े)।” वह खूंखार लहजे में बोला। बस क्या था, पिल पड़े तीनों के तीनों मुझ पर और देखते ही देखते नंगी हो गयी मैं।

“हाय राम, नहीं नहीं। ओफ्फोह, मैं ऐसी नहीं हूं।” मैं न न करती रही।

“तू कैसी है, पता चल गया कल ही” वह फटाफट अपने कपड़े खोलने लगा। इस वक्त मेरा नंगा बदन फर्श पर बिछे सीमेंट के खाली बोरों के बिछौने पर गिरा पड़ा था। बल्ब की रोशनी में मेरा नंगा बदन चमक रहा था। मेरे दपदपाते नंगे जिस्म को देख कर उन तीनों के चेहरे की रंगत बदल गयी। अब तक झिझक रहे बाकी मिस्त्री, रफीक और बोदरा भी अब दुर्दांत भेड़िए की मानिंद दिख रहे थे। उनकी आंखों में वासना की चमक स्पष्ट देखी जा सकती थी। उन्होंने भी अपने कपड़ों से मुक्त होने में बिल्कुल समय नहीं गंवाया। साला चार फुटिया ठिंगना बोदरा तो कुछ अधिक ही बेकरार था। काला, ठिंगना बनमानुष जैसा आदमी, जिसका काले काले झांट से भरा अविश्वसनीय काला फनफनाता लिंग, करीब सात इंच लंबा बोदरा

“वाह सलीम भाई, खूब जबरदस्त माल पाईले (पाया) भाई। बड़ा किस्मत से अईसन (ऐसी) माल चोदे ले (चोदने के लिए) मिललक (मिला) भाई। अईज (आज) तक कहां करिया करिया (काली काली) रेजा मन केर बूर चोदत रहली अऊर अईज मिललक अईसन सुंदर जनी, वाह मजा आए गेलक (रेजा लोगों की चूत चोद रहे थे और आज मिली ऐसी सुंदर औरत, वाह मजा आ गया)।” कहते कहते  कूद कर चढ़ गया मुझ पर और सीधे मेरी चूचियों पर धावा बोला। जिस हड़बड़ाहट और बेदरदी से उन्होंने मेरे कपड़ों को नोच नाच के खोला था, मैं हलकान थी, संभलना चाह कर भी संभल नहीं पाई और गिर पड़ी थी उसी सीमेंट के खाली बोरों की बिछावन पर और अभी सांसें संभली भी नहीं थीं कि बोदरा रुपी बनमानुष का आक्रमण हुआ था। वह मुझ पर चढ़ा हुआ मेरी चूचियों को पहले तो सहलाने लगा, “अहा, केतई मस्त गोल गोल, बड़का बड़का चूची आहे रे (अहा, कितनी मस्त गोल गोल, बड़ी बड़ी चूची हैं रे)” कहते हुए दबाना शुरू कर दिया।

“ओह, नहीं, ओह बाबा छोड़ो मुझे। ओह इस तरह जलील मत करो मुझे।” मैं तड़प कर बोली।

“जलील? और तुझे? यही तो चाह रही थी ना?” सलीम हंसता हुआ बोल उठा।

“ऐसा तो नहीं चाह रही थी उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह।”

“अब कैसा चाह रही थी, उससे हमें क्या, अब तो तू नंगी, हम नंगे, नोचा नोची, ठेल्लम ठेल्ली तो होगा ही। तू मान न मान, चोदा चोदी तो होगा ही।” सलीम बेशर्मी पर उतर आया। इधर इतनी देर से चुप वह दुबला पतला टकला दढ़ियल भी नंगा भुजंगा मेरी चूत सहलाने लगा। मैं गनगना उठी।

“अरे अरे इकर बुर देख, सार हरामजादी बड़ा शरीफ दिखात रहे अपन के। एतई बड़का बुर में तो दू दू लौड़ा घुईस जातौ। चल सलीम, अईज हम दुन्नो मिल के चोदब ई रंडी के (अरे इसकी बुर देखो, साली हरामजादी बड़ी शरीफ दिखा रही थी खुद को। इतनी बड़ी बुर में तो दो दो लंड घुस जाएगा। चल सलीम, आज हम दोनों मिलके चोदेंगे इस रंडी को)।” वह दढ़ियल टकला, लिक्कड़ भी कम नहीं था। कांप उठी मैं उसकी बात सुनकर। छटपटाने लगी मैं छूटने के लिए।

“नहीं ओह नहीं, ऐसा मत करो मेरे साथ, मर जाऊंगी मैं।” मैं बेबसी में बोली।

“हट साली रंडी, तू मरेगी थोड़ी। तू तो मजे से चुदवाएगी। सब दिख रहा है। सब पता चल रहा है, तू कितनी बड़ी लंडखोर है। साली इत्ता बड़ा पावरोटी जैसा फूला हुआ भोंसड़ा बना के भी ड्रामा कर रही है। चल रे रफीक, दुन्नो मिल के चोदबई और तोंय बोदरा, का करबे बोल इकर संगे (चल रफीक, दोनों मिलकर चोदेंगे और तू बोदरा, इसके साथ क्या करोगे बोल)।” मेरी योनि खुद ही बता रही थी कि मैं कितनी बड़ी लंडखोर हूं और सलीम जैसे चुदक्कड़ों को भला कैसे पता नहीं चलता।

“अरे दिखाई नहीं देवथे, इकर गांड़ के देख, एतई सुंदर गोल गोल मक्खन जैसन गांड़ के कईसन छोईड़ देबौ, ई एक्के ठो गांडू खोकोन केर गांड़ तो खूब चोईद लेलों, अईसन सुंदर गांड़ बड़ा किसमत से मिल आहे, कईसन छोड़बौ। पहिले तुहिन चोदा, उकर बाद मोंय इकर गांड़ केर बाजा बजाबूं, तबतक चूस रे रंडी हमर लौड़ा। (अरे दिखाई नहीं दे रहा है, इसकी गांड़ देखो, इतना सुंदर गोल गोल मक्खन जैसा गांड़ कैसे छोड़ दूं। इस एक ही गांडू खोकोन की गांड़ तो खूब चोद लिया, ऐसा सुंदर गांड़ बड़ी किस्मत से मिला है, कैसे छोड़ूं। पहले तुमलोग चोद लो, उसके बाद मैं इसकी गांड़ का बाजा बजाऊंगा, तबतक चूसो रंडी मेरा लौड़ा)।” बोदरा मादरचोद, गांड़ का रसिया, लार टपकाती आवाज में बोला और अपना दुर्गंध युक्त लिंग मेरे मुंह में घुसेड़ने लगा।

“रुक बे लौड़े के ढक्कन, पहले हमें इसकी चूत में लंड तो फिट करने दे, बाद में चुसवाना अपना लंड।” सलीम बोला और खुद सीमेंट के बोरे पर बैठ गया और मुझे किसी गुड़िया की तरह उठा कर अपनी गोद में ऐसा बैठाया कि उसका मूसलाकार लिंग मेरी योनि को फैलाता हुआ सरसरा कर घुस गया।

“ये ले मां की चूत, ई गया मेरा लौड़ा।” सलीम की विजय घोषणा थी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्, ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।” बस यही आवाज निकली मेरे मुंह से। तभी रफीक सामने से मुझ पर चढ़ दौड़ा। करीब साढ़े छ: इंच ल़ंबा खतना किया हुआ लिंग, पहले से बिंधे मेरी योनि में घुसेड़ने लगा।

“अब ई ले मेरा लोड़ा्आ्आ्आ्आ आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।” जबर्दस्ती ठूंसता चला गया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् मां्आं्आं्आं, ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह्ह् बाबा्आ्आ्आ, फट्ट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यीई्ई्ई्ई्ई फट्ट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यीई्ई्ई्ई्ई।” मैं कलप उठी। लेकिन सलीम की सख्त पकड़ में बेबस पंछी की तरह छटपटा कर रह गयी। दो लंड मेरी चूत में, ओह्ह्ह्ह्ह मां्आं्आं्आं, पहले भी हो चुका था ऐसा मेरे साथ मगर आज की बात कुछ और थी। दोनों लंड खतना किए हुए। दोनों साले दढ़ियल चुदक्कड़। रफीक देखने में दुबला पतला था, लंड की लंबाई भी आम लंडों से कुछ ही ज्यादा थी लेकिन मोटाई, ओह्ह्ह्ह्ह भगवान, गधे जैसा मोटा। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह। खैर झेल गयी। फटी भी नहीं मेरी चूत, मगर फैल कर सचमें भोंसड़ा जरूर बन गयी। बस अब क्या था, गचागच, भचाभच, ठोंकने का मानो दौरा सा चढ़ गया उनपर। इधर बोदरा बेटीचोद हरामजादा, अपने दुर्गंधयुक्त लंड को मेरे मुंह में ठूंसता चला गया। अब तो हो गया मेरा बंटाढार। तीन लंड, मेरे अंदर। बड़ी मुश्किल से बोदरा का लंड मुंह में ले पा रही थी लेकिन वह कसाई तो मेरी हलक तक लंड ठोंके दे रहा था। बड़ी मुश्किल से सिर्फ घों घों की घुटी घुटी आवाज मेरे मुंह से निकल रही थी।

खैर जैसे तैसे करीब दो तीन मिनट की तकलीफदेह दौर के गुजरने के पश्चात मुझे आनंद मिलने लगा। उफ्फ वह रोमांच भरा आनंद, शब्दों में बयां करना मुश्किल है। दो आदमियों के मोटे मोटे लिंग का घर्षण मेरी योनि में, उफ्फ भगवान, पागल हो गयी मैं तो। तभी बोदरा मुझे छोड़ कर अलग हो गया। मेरी जान में जान आई।

“हट साला, अईसन लौड़ा चुसवाएक से मजा नी आवाथौ। पहिले तुहिने चोईद लेवा, उकर बाद मोंय इकर गांड़ चोदबौ, आराम से (हट साला, ऐसे लंड चुसवाने से मजा नहीं आ रहा है। पहले तुमलोग चोद लो, फिर मैं इसकी गांड़ चोदूंगा आराम से।)” बोदरा बोला।

“ठीक, ठीक, एखन हमिन के चोदेक दे (ठीक, ठीक, अभी हमें चोदने दे)। आह् ओह ओह आह, ले ले ओह सार रंडी, आह सार बुरचोदी” रफीक मेरी चूचियों को निचोड़ता हुआ चोदने में मगन बोला। मेरा मुंह अब खुला था। मस्ती भरी सिसकारियां निकल रही थीं। मैं चाह कर भी अपनी आहें, सिसकारियों को रोक नहीं पा रही थी। मैं इनकी स्थानीय भाषा न सिर्फ समझती थी बल्कि अच्छी तरह बोल भी सकती थी। मैं इस घटना में स्वभाविकता लाने के लिए अब उन्हीं की भाषा का इस्तेमाल करने जा रही हूं।

“आह् रे ओह रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए, हाय रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए, आ्आ्आ्आ्ह, मजा, एखन मजा आवाथौ रज्जा, आह हाय रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए हमर बुर, भोंसड़ा बईन गेलक रज्जा, आह्ह ओह्ह अब बड़ा मजा आवाथौ रे्ए्ए्ए्ए्ए मादरचोद, चोद चोद सार कुकुर मने ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए मोके रंडिए बनाए देवाथा आह ओह (अब मजा आ रहा है रज्जा, आह, हाय रे मेरी बुर, भोंसड़ा बन गया रज्जा, आह ओह बड़ा मजा आ रहा हे रे मादरचोद, चोदो चोदो साले कुत्ते लोग, ओह रे, मुझे रंडी ही बना दे रहे हो आह ओह)। मैं मस्ती मे भर के उछल उछल कर चुदवाने लगी। उन्हें समझ आ गया कि अब मैं मस्ता गयी हूं। उनमें दुगुना जोश चढ़ गया। हुम्मच हुम्मच के ठोंकने लगे मेरी योनि में। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, मेरी बातों, उद्गारों ने मानो आग में घी का काम किया, धमाधम कुटाई होने लगी, मानो एक सिलेंडर में दो दो पिस्टन।

“आ्आ्आ्आ्ह, मोंय गेलों, ओह मोंय गेलों (मैं गयी, मैं गयी)”  और मैं जड़ने लगी। झड़कर निढाल होने लगी लेकिन वे कसरती मिस्त्रि झड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे मेरे निढाल शरीर को बी नोचते रहे, निचोड़ते रहे, कूटते रहे कूटते रहे करीब घंटे भर कुटाई चलती रही और मैं झड़ती, निढाल होती, फिर जगती, फिर झड़ती, यह कःरम करीब तीन बार मेरे साथ हुआ। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह निचोड़ कर रख दिया उन दढ़ियल कुत्तों नें। फिर जब उनके झड़ने की बारी आई तो, “आ्आ्आ्आ्ह आ्आ्आ्आ्ह बुरचोदी माय केर बुरचोदी्ई्ई्ई्ई्ई् बेट्ट्टी्ई्ई्ई्ई्ई, सा्आ्आ्आ्आर रंडी्ई्ई्ई्ई्ई आ्आ्आ्आ्ह (आ्आ्आ्आ्ह बुरचोदी मां की बुरचोदी बेटी, साली ऱडी, आ्आ्आ्आ्ह)” ऐसे कस के मुझे दबोचा कि   मानो मेरी सांसें ही रुक गयीं। इतनी जोर से कसा था मेरे शरीर को मानो शरीर का सारा रस ही निचोड़ डालेंगे। थक कर निढाल, बदबूदार पसीने से लतपत, वहीं लुढ़क गये दोनों के दोनों और भैंसों की तरह डकारने लगे ,हांफने लगे, मानो मीलों दौड़ लगा कर आए हों। मेरी तो पूछो ही मत, जन्नत की सैर करते करते जैसे अचानक धम्म से जमीन पर गिर पड़ी थी। परवाह नहीं थी कि मैं वहां बिछे सीमेंट के बोरों में लगे सीमेंट से पुती जा रही थी।

अभी मेरी सांसें सामान्य भी नहीं हुई थीं कि इतनी देर से मेरी गांड़ चोदने को बेकरार बोदरा अपना लंड उठाए चढ़ बैठा मुझ पर। “ननननहीं्ई्ई्ई्ई्ईं्ईं्ई़,” मैं मना करने लगी लेकिन मेरे नि:शक्त शरीर में इतनी जान नहीं थी कि उसे रोक पाती। मेरे नितंब पर सीमेंट पुता हुआ था, मगर उसे क्या, उसे तो बस चोदना था, मेरी गांड़ चोदना था।

“चुप रंडी, चोदे दे, बहुत देरी से लौड़ा पकईड़ के खड़ा रहलों बुरचोदी, चोदबे करब़ूं, चोदे बिना कईसन छोईड़ देबूं (चुप रंडी, चोदने दे, बहुत देर से लंड पकड़ के खड़ा हूं बुरचोदी, चोदूंगा ही, चोदे बिना कैसे छोड़ दूं)” कहते हुए मेरे निश्प्राण से शरीर को पलट दिया और मेरी सीमेंट पुते गांड़ की छेद तलाश कर भिड़ गया अपना सात इंच का हथियार लेकर। घप्प, और लो, हो गया, मेरी गांड़ का बंटाढार। पता नहीं सीमेंट के पाऊडर समेत किस तरह उसने अपना लंड घुसाया मेरी गांड़ में।

“आ्आ्आ्आ्ह, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह, बथा थौ बथा थौ (दर्द हो रहा है दर्द हो रहा है)” मैं कराह उठी।

“एखन बथा थौ हरामजादी, तब्बे से बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा आवत रहौ नी, एखन हमर पारी आलौ तो बथा थौ (अभी दर्द कर रहा है हरामजादी, अभी मेरा नंबर आया तो दर्द कर रहा है)” कहते कहते बेरहमी से चोदना चालू कर दिया। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, दर्द, आरंभ में भयंकर दर्द हुआ, जिसे मैं जबड़ा भींच कर पी गयी, लेकिन दर्द के कारण मेरी गुदा के रास्ते थोड़ा पीला पीला मल निकल गया, जिससे सन कर सीमेंट का पाऊडर पेस्ट बन कर ग्रीस का काम करने लगा और एक बार जब गुदाद्वार फिसलन भरा हुआ तो फिर मजा आने लगा। न उसे परवाह थी कि मेरे मल लिथड़े गांड़ की ऐसी तैसी कर रहा है और न ही मुझे परवाह थी। वस पीछे से मेरी चूचियों को दबोच दबोच कर चोदने लगा और मैं अपनी चूतड़ उछाल उछाल कर अपनी गांड़ का मलीदा बनवाने लगी। यह क्रम करीब आधे घंटे तक चला। फिर झड़ा वह, हरामजादा कुत्ता झड़ा, एकदम कुत्ते की तरह हांफता हुआ झड़ा और मेरी गांड़ में अपने गंदगी भरे वीर्य का फव्वारा छोड़ बैठा। तीनों के तीनों चुदक्कड़ तो मुझे चोद कर मुदित थे, लेकिन मैं, मैं तो नुचे चुदे शरीर के साथ वहीं पड़ी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही थी। कर क्या सकती थी और। कामुकता के वशीभूत मुसीबत को आमंत्रण देने में भी मैं कहां पीछे रहती थी। कोई और होता तो इसे सजा समझता, मगर इतनी जलालत भरी चुदाई के बावजूद मैं तृप्ति के सुखद अहसास से भर उठी थी। खासकर इस तरह की जोर जबर्दस्ती भरी चुदाई मुझे बेहद संतोष प्रदान करता थी, वही हुआ भी मेरे साथ।

खैर जब मैं कुछ सामान्य हुई तो खुद की हालत पर बड़ी कोफ्त हुई। सलीम और रफीक तो मेरी हालत देख कर मुस्कुरा रहे थे। वे अपने कपड़े पहन भी चुके थे। इधर बोदरा भी उठकर अपने बदन को झाड़ रहा था, उसके लंड पर सीमेंट, मेरा मल और खुद का वीर्य लिथड़ा हुआ था। वैसे ही नंगे वह बाहर के नल में धोने चला गया। टूटते बदन के साथ मैं किसी प्रकार उठी। गोदाम के अंदर तो रोशनी थी, मगर बाहर शाम गहरा गयी थी। मैं भी नंग धड़ंग बेशरमी के साथ बोदरा के पीछे पीछे नल के पास गयी और वैसी ही नल के नीचे बैठ कर सर से पांव तक खुद को धोने लगी। धो धा कर जब फिर गोदाम में आयी, तबतक बोदरा भी तैयार हो चुका था।

“तो, कैसन लगलक? (तो कैसा लगा?)” सलीम बोला। मैं अबतक वैसी ही बेशरमी के साथ नंगी ही खड़ी थी उनके सामने। उनकी नजरें अभी भी मेरी धुली धुलाई नग्न देह पर चिपकी हुई थीं।

“हरामजादा मन, मोराईए देवेक कर बिचार रहे का? (हरामजादे लोग, मार ही डालने का इरादा था क्या?)” मैं  बेशरमी से मुस्कुरा उठी।

“मोरले का? (मरी क्या)” लार टपकाती नजरों से घूरता रफीक बोला।

“कोनो कसर छोईड़ रहा का? (कोई कसर छोड़े थे क्य?)” म़ै मीठी मुस्कान के साथ बोली।

“अच्छा ई सब बात छोड़, सच बताव, कईसन लगलक? (अच्छा यह सब छोड़ो, सच बताओ, कैसा लगा?” सलीम मेरे पास आया और मेरी नग्न देह को थाम कर चूचियों को सहलाता हुआ बोला।

“हट हरामजादा, अब ई भी पूछेक केर बात आहे का? (हट हरामी, अब यह भी पूछने की बात है क्या?)” मैं उसके सीने पर सर रख कर बड़ा लाड़ दिखाती हुई बोल उठी।

“हा हा हा हा,” सभी हंस पड़े।

“तो अब तोंय हमिन केर होय गेले। जे जे काम करेक आवेना, सोब के बोईल देबौ। तोंय हमिन केर मालकिन नहीं, बुरचोदी रानी अहिस। (तो अब तू हम लोगों की हो गयी। जो जो काम करन आते हैं सबको बोल दूंगा। तू हम लोगों की मालकिन नहीं, बुरचोदी रानी हो।)” मेरी चूचियां दबाते हुए बोला सलीम।

“हट रे बदमाश। ई का कहथिस? (हट रे बदमाश, यह क्या कह रहे हो?)” मैं उसके पैंट के ऊपर से ही लंड ऐंठते हुए बोली। फिर से टनटना उठा था उसका लंड।

“का गलत कहलक सलीम। ठीके तो कहलक। कईल से जेके मन करी, सेहे तोके चोदेकले आजाद होय जाबैं। तोके का फरक पड़ी, तोंय तो अहिसे अईसन, तोके तो लौड़ा से मतलब हौ ना। अब तो हम जईन गेली कि तोंय केतई बड़का लंडखोर जनी अहिस। पहिले तोर सुंदर काया के देईख देईख के हमिन केर लौड़ा खड़ा होय जात रहौ, मगर तोंय ठहरले बड़का घर केर इज्जतदार जनी, सो देईख के मन मसोस के रईह जात रही, मगर अब तो बाते कुछ और होय गेलौ। हमिन के का पता रहे कि तोंय इतई रंडी किसिम केर जनी रहिस, नहीं तो अईज तक हमिन में से एक्को जन बाकी नहीं रहतयं, सोभे तोके चोईद लेतैं अईज तक। (क्या गलत बोला सलीम। ठीक ही तो बोला। कल से जिसको मन होगा, वही तुम्हें चोदने के लिए स्वतंत्र होगा। तुम्हें क्या फर्क पड़ेगा, तुम तो हो ही ऐसी, तुम्हें तो लंड से मतलब है ना। अब तो हमें पता चल गया है कि तुम कितनी बड़ी लंडखोर औरत हो। पहले तुम्हारी सुंदर काया देख देख कर हमारे लंड खड़े हो जाते थे, मगर तुम ठहरी बड़े घर की इज्जतदार औरत, सो देख कर मन मसोस कर रह जाते थे, लेकिन अब तो बात ही कुछ और हो गयी है। हमें क्या पता था कि तुम इतनी रंडी किस्म की औऋत हो, नहीं तो आज तक हममें से एक भी बाकी नहीं रहता, सभी आजतक तुम्हें चोद लेते।)” रफीक मेरी गांड़ सहलाते हुए बोलता जा रहा था।

“अच्छा होलौ। जे होलो, ठीक होलौ। नहीं तो आईज तक मोके रंडी बनाए देता तुहिन। (अच्छा हुआ। जो हुआ ठीक हुआ। नहीं तो आज तक मुझे रंडी बना चुके होते तुम लोग)” मैं मेरी गांड़ सहलाते रफीक का हाथ पकड़ कर बोली।          “रंडी तो तोंय पहिले से हिकिस। (रंडी तो तुम पहले से हो।)” बोदरा बोला।

“चल हट कुत्ता कहीं का।”

“कुत्ता हैं तभी तो पीछे से चोदते हैं।”

“हां हां चोदते हो, चोदा ना, वो भी मेरी गांड़, बजा दिया बाजा मेरी गांड़ का, मेरे प्यारे कुत्ते।” मैं नंगी ही उन लोगों से घिरी, पैंट के ऊपर से ही रंडी की तरह बोदरा का लंड पकड़ कर बोली।

“तोहरा गांड़ हईए है अईसन मक्खन जैसन चीकन और गोल गोल की बस पूछ ही मत। (तेरी गांड़ है ही ऐसी मक्खन जैसी चिकनी और गोल गोल कि पूछो मत)” बोदरा बोला।

“अब हिंदी में बात किया करो मेरे साथ। नागपुरी में बात करने में दिक्कत होती है मुझे।” अबतक तीनों मेरी नंगी देह से सट गये थे और कोई मेरी चूची सहला रहा था, कोई मेरी गांड़ तो कोई मेरी चूत। मैं फिर से अवश होती जा रही थी, किंतु समय काफी हो चुका था।

“मगर हमको हिंदी में बात करने में दिक्कत होता है।”

“होने दो, जैसा आता है वैसा ही बोलो।”

“ठीक है। देख रानी, हमारा लौड़ा फिर से बमक रहा है। एक बार और देगी चोदने। मन न भरा है।” सलीम मेरा हाथ अपने लंड पर रखता हुआ बोला।

“नहीं, बस, अभी और नहीं, बहुत देर हो गयी है। अब जो करना है कल कर लेना।” मैं बोली।

“लेकिन कल तो एतवार है। हम लोगों का छुट्टी है। हम थोड़ी न आवेंगे काम करने।” रफीक मुझे दबोच कर बोला और चूमने लगा।

“ओह मां्आं्आं्आं, बस बस, आज का हो गया। अब कल, छुट्टी है तो क्या हुआ, आ जाना, घर बनाने के काम से नहीं, मेरा काम करने।” मैं रफीक से चिपकी एकदम रंडीपन पर उतर आई थी।

“का कहते हो भाई लोग?” सलीम उनसे पुछा।

“अब इसमें पूछने का का बात। आवेंगे भाई, आवेंगे, ऐसी सुंदरी औरत बुलाए और हम न आवें, ई तो हो नाही सकेगा। लेकिन एक्के ठो समस्या है।” रफीक बोला।

“ऊ का?” सलीम बोला।

“अरे भाई, कल छुट्टी है, घर में औरत को का बोलेंगे? अऊर अगर काम में जा रहे हैं बोलेंगे तो बगल में रहने वाली ऊ साली छमिया कांता का का करेंगे? हमरा घरवाली अऊर कांता में बहुत पटता है। उससे पता चला तो घरवाली हरामजादी पूछेगी कि कांता काहे नहीं गयी तो?” रफीक बोला।

“अबे चूतिया, तू भी एक नंबर का गधा है। कांता को भी ले आ। वो हरामजादी कम है का। इतना बार चोदा ऊ रंडी को और अब उसको भी बुलाने में का समस्या? बोल देना सबको कि कल भी काम है। सबके आने के बाद देखा जाएगा।” सलीम फट से बोल उठा।

“क्या? सबको? सबको मतलब?” मैं चौंक गयी।

“हम सबको पता है मैडम तेरे बारे में। सभी आ जाएंगे। खाली बोलने का देरी है।” कितनी आसानी से सलीम बोला।

“नहीं नहीं, ऐसे कैसे? कैसे होगा सब? साईट में काम तो होगा नहीं, सब के सब आ कर क्या करेंगे?” मैं घबराई।

“का करेंगे मतलब? वही करेंगे जिस काम के लिए आएंगे अऊर का।”

“त त त तो तुम्हारा मतलब……”

“हां हां, मेरा मतलब वही है जो तुम सोच रही है चोदाचोदी, और का?”

“नहीं नहीं, ऐसे में मत ही आओ।” मैं बोली। लेकिन एक गंदी सोच मेरे मन में सर उठाने लगी। क्यों न यह भी कर के देख लिया जाय? कितने मर्द होंगे? छ: कुली, जिनमें से एक कम उम्र का चिकना गांडू, तीन मिस्त्री तथा औरतों की तरह शरीर वाला सुपरवाइजर मुंडू, कुल मिला कर दस पुरुष। उनमें से दो नामर्दों को कम भी कर दिया जाय तो बचते हैं आठ। तो क्या मैं उन आठ पुरुषों को झेल पाऊंगी? शायद नहीं।

“ऐसा न बोलो मैडम।” बोदरा बोला।

“फिर कैसा बोलूं मै?”

“बुला ही लो ना, जब बात निकलिए गया है तो अब काहे का मना करना।” सलीम बोला।

“हट हरामी, मैं क्या कोई रंडी हूं?” मैं सलीम से छिटक कर अलग हो गयी।

“वईसे रंडी से कम तो हो नहीं, फिर भी, बताए दे रहे हैं, दू गो गांडू तो रहबे करेंगे, खोकोन अऊर मुंडू।”

“मुंडू सुपरवाइजर? वह भी गांडू है?” आश्चर्य तो नहीं हुआ सुनकर, फिर भी बोली मैं।

“हां, ऊ भी गांडू है। गांडू है तभी तो हम लोगों को रखा है काम में। काम तो होईए जाता है, काम के साथ साथ उसका गांड़ का भी काम हो जाता है।” रफीक मुस्कुराता हुआ बोला।

“अऊर साथ में बुरचोदी छमिया कांता तो हईए है। ऊ कम लंडखोर थोड़ी है। हम सबका लौड़ा खाती रहती है।” सलीम ने जोड़ा।

“और बाकी तीन रेजा?” मैं अब थोड़ी सहज थी।

“बाकी तीन रेजा में से एक सोमरी, उसका मरद मरियल, रेक्सा चलाता है। चुदवाती हमी लोगों से है।”

“और बाकी दो?” मैं बोली। अब मुझे उनकी बातों से मजा आ रहा था।

“बाकी दो, सुखमनी अऊर रूपा, ऊ दोनों को देखा नहीं तुमने? बड़ा बड़ा चूची अऊर बड़ा बड़ा गांड़। काली हैं तो का, चुदक्कड़ नंबर एक, इंजीनियर साहब का पसंद। हमलोग भी कभी कभी रगड़ लेते हैं ऊ लोग को। इंजीनियर साहब को पते नहीं है कि उसके लिए रिजर्व माल में भी हमलोग हाथ साफ कर लेते हैं।” सलीम फिर से मेरे नंगे बदन को बांहों में भर कर मेरी चूचियों को सहलाते हुए बोला। अब फिर रफीक और बोदरा भी मुझ से चिपक गये थे।

“आह्ह, छोड़ो मुझे। फिर से चालू हो गये तुम लोग? फिर से रगड़ने का इरादा है क्या? फिर से गरम कर दिया हरामी लोग। बस, अब टाईम नहीं है।” उनकी घेरेबंदी से अलग हो कर बोली। “समझ गयी, सब समझ गयी। मतलब यही कि तुम सब लोग कल यहां आने वाले हो। जितना सुनी, समझ गयी कि तुम सब लोग हरामी ठेकेदार के हरामी कामगार हो।” मैं मन ही मन सोचने लगी कि हरिया, करीम और रामलाल को किस बहाने से कल यहां से हटाऊँ ताकि कल यहां जो कुछ होने वाला है वह बेरोकटोक हो सके, बिना किसी व्यवधान के।

“हां, हम सब हरामी हैं और बिल्कुल आने वाले हैं कल यहां हम, लेकिन तुम्हारे यहां के ये तीन लोग?”

“इन तीनों को किसी तरह यहां से हटाऊंगी।” मैं बोली।

“तो पक्का? हम कल आ रहे हैं।” सलीम बोला।

“आओ, सब के सब आओ। मैदान खाली रखूंगी।”

“वाह, यह बात हुआ ना।” सबके सब एक स्वर में बोले और फिर से मुझे दबोच कर चूमने लगे। रफीक जहां मेरी चूचियां दबाने लगा था, वहीं बोदरा मेरी गांड़। मैं छिटक कर अलग हो गयी।

“छोड़ो मुझे हरामियों। गरम करके दुबारा चोदने का इरादा है क्या?” मैं बोली।

“हां, दे दे न, एक बार और चोदने।” सलीम कुत्ते की तरह लार टपकाती नजरों से मेरी नंगी देह को देखते हुए बोला।

“नहीं नहीं, अब कल, कल जितना चोदना है चोद लेना तुम लोग।” कहकर मैं अपने कपड़े पहनने लगी। मन मसोस कर सभी वहां से रुखसत हुए। मैं कल की योजना बनाने लगी।

मैं जानती थी कि हरिया, करीम और रामलाल को दूसरे दिन कैसे घर से बाहर रखा जाए। उन तीनों के जाने के पश्चात जब मैंने घर के अंदर कदम रखा, संध्या का साढ़े छ: बज रहा था। अबतक रामलाल वापस नहीं आया था। उसे लेकर करीम कहीं बाहर गया हुआ था। हरिया अकेले घर में था। हालांकि मैं बाहर नल में खुद को धो धा कर साफ सुथरी कर चुकी थी फिर भी जब मैं अपने कमरे में गयी और पुनः निर्वस्त्र होकर आदमकद दर्पण में खुद को देखकर लज्जित हो उठी। बिखरे बाल, शरीर के कई हिस्सों पर सीमेंट के दाग, खासकर मेरी चूतड़ पर, मेरी गर्दन पर और बालों पर भी कई जगह। मेरे उरोज लाल हो चुके थे, कई जगह तो दांतों के लाल लाल निशान उभर आए थे। दो दो लिंगों से कूट कूट कर मेरी योनि को मालपूए की तरह फुला कर रख दिया था कमीनों नें। कुत्तों से चुदी कुतिया की तरह उभर आई थी मेरी योनि। कुल मिला कर रंडी की तरह हालत कर दी थी मेरी, उन तीनों नें मिल कर। खैर, आज तो जो हुआ सो हुआ, मगर कल का क्या? अब कल के बारे में सोचना था। आज तो सिर्फ तीन लोग थे, कल पता नहीं कितने लोग होंगे? क्या क्या होगा? सब कुछ मेरे नियंत्रण में होगा या मेरे नियंत्रण से बाहर होगा? और किस तरह उन लोगों को निपटाऊंगी? खैर जो होगा देखा जाएगा, ऊखल में सर दिया है तो मूसल से क्या डरना। मुझे खुद पर पूरा विश्वास था। मैं यही सब सोचती हुई बाथरूम में घुसी और रगड़ रगड़ कर खुद को अच्छी तरह से साफ किया। जैसे ही मैं फ्रेश हो कर अपने कमरे से बाहर निकली, रामलाल भी करीम के साथ वापस आ गया। बहुत खुश नजर आ रहे थे दोनों।

“बहुत खुश लग रहे हैं आपलोग, क्या बात है?” मैं पूछ बैठी।

“हमलोग रबिया के यहां गये थे।” करीम मुस्कुराते हुए बोला।

“ओह, तो ये बात है? तभी इतने खुश हो। मां बेटी को कूट कर आ रहे हो?”

“हां।”

“दोनों?”

“हां।”

“वाह, और सरोज को?” मैं नें यूं ही पूछ लिया।

“छोड़ दिया उसको। रबिया और शहला ही काफी थी हमलोगों के लिए।” करीम बोला।

“सरोज को पता लगेगा तो?”

“तो क्या?”

“उसको बुरा नहीं लगेगा?”

“बुरा क्यों लगेगा? वैसे भी कल फिर हम जा रहे हैं। उससे भी मिल लेंगे।” वह बोला और मैं सोचने लगी, लो, मैं झूठ मूठ का परेशान हो रही थी कि इनको कल कैसे घर से बाहर रखूंगी।

“वाह रे बुढ़ऊ, कल फिर? आपने तो आज रबिया को ही निपटाया होगा?”

“नहीं नहीं, रबिया तो रामलाल से ही उलझी हुई थी। शहला मुझ पर मरी जा रही थी।”

“वाह, उस लौंडिया को बुढ़ऊ पसंद है? आप तो बड़े खुशकिस्मत निकले। उस लौंडिया को बुड्ढा पसंद आया, वाह, आपकी तो निकल पड़ी।” मैं बोली।

“बार बार बुड्ढा बोल कर मेरी बेईज्जती न कर। अभिए पटक के चोद दूंगा हरामजादी।” ताव में आ गया करीम।

“ज्यादा ताव खाने की जरूरत नहीं है। मैं तो यूं ही मजाक कर रही थी।” मैं मुस्कुरा कर बोली।

“कल भी जाएंगे। कल शहला की भी छुट्टी है ना।दिनभर का प्रोग्राम है।” करीम बोला।

“मैं भी जाऊंगा कल इनके साथ। कल सरोज को भी नहीं छोड़ेंगे।” हमारी बातों के बीच हरिया भी कूद पड़ा। वह भी वहां पहुंच कर हमारी बातें सुन रहा था। वाह रे ऊपर वाले, कैसी कैसी योजना बना लेते हो तुम? कहाँ तो मैं इन सबको कल घर से बाहर रखने के लिए जुगत सोच रही थी और कहाँ ऊपरवाले नें इसकी व्यवस्था खुद ब खुद कर दी।

अंदर की खुशी को किसी प्रकार छुपाती हुई प्रत्यक्षतः बोली, “हरामियों, छुट्टी के दिन तुमलोगों की मस्ती चढ़ रही है? कहीं नहीं जा रहे हो तुमलोग।”

“हम तो जाएंगे जरूर।” अब हरिया बोला।

“ठीक है, जाओ तुम सब भाड़ में, मरो सालो।” मैं रोष से बोली।

“हाय हाय, गुस्सा हो गयी हमारी छम्मकछल्लो मैडम?” रामलाल जो अबतक चुप था, मुझ से लिपट कर बोला।

“चलिए हटिए, बड़े आए हैं लल्लो चप्पो करने। छोड़िए मुझे” मैं नाराज होने का ड्रामा करती हुई छिटक कर अलग होने की कोशिश करने लगी।

“नहीं छोड़ता जा। क्या कर लोगी आप?” मुझे कस के दबोच कर चूमते हुए बोला वह। अब मैं उसकी बांहों में कसमसाती पिघलने लगी थी। फिर से उफान मारने लगीं मेरे अंदर की वासना की तरंगें।

“ओह, पागल, छोड़िए मुझे, उफ।” मैंने बड़ी मुश्किल से अपने अंदर की उफान मारती वासना की तरंगों पर नियंत्रण पाया और पूरी शक्ति लगा कर खुद को उसके चंगुल से मुक्त किया और कहा, “बड़े कमीने हो तुमलोग। अभी मुझे छोड़कर रबिया और शहला को नोचने गये थे, जी नहीं भरा जो अब मेरे पीछे पड़ गये हरामियों।”

“अरे मैडम जी, तुम तो देती ही बड़ी मुश्किल से हो, तो जाएं कहां? चले गये जहां हमें मिलने की गुंजाइश थी। अब इसमें हम क्या करें?” बड़ी मासूमियत से रामलाल बोला।

“तो वहीं रह जाते, सरोज को भी ठोक आते।” मैं तनिक रुष्ट दिखा रही थी अपने को।

“अच्छा छोड़िए गुस्सा। तरसाती भी हो और गुस्सा भी करती हो। चलिए अभी तुम्हारा गुस्सा शांत कर देता हूं। देखिए खड़ा हो गया मेरा।” अपने पैंट के अग्रभाग की ओर इंगित करते हुए बोला रामलाल।

“खाली तुम्हारा? मादरचोद, हमारा भी खड़ा हो गया।” हरिया बोला।

“तो मैं क्या करूं?” मैं कलप कर बोली।

“करना क्या है रानी बिटिया, बस, दे दे चोदने।” साला बेटीचोद ठरकी बुढ़ऊ हरिया बोला। “ये दोनों मुझे यहां अकेले छोड़कर गये और चोद आए मां बेटी को। यहां साला मेरा लंड इतनी देर से इनकी बकवास सुन सुन कर उठक बैठक कर रहा है।” मेरे पैर ठिठक गये उसकी बात सुनकर। उस चुदक्कड़ बुड्ढे बाप पर तरस आ गया मुझे।

“और अभी रात का खाना क्या तेरा बाप बनाएगा बेटीचोद?” मैं मुड़ कर वापस आई और हरिया से लिपट कर बोली।

“पहले अपनी चूत खिला दे मां की लौड़ी, खाना तो दो मिनट में बन जाएगा। मुंह से बाद में खा लेना, पहले चूत से मेरा लौड़ा तो खा मेरी रानी बिटिया।” खुशी से मुझे अपनी बांहों में समेट कर चूमते हुए बोला। इसी तरह कभी कभी मैं अपने तन को उन बुड्ढों के आगे बिछा देती थी, आखिर मेरी कमसिन उम्र में ही औरत बनाने वाले यही लोग तो थे। मेरे दादाजी, बड़े दादाजी तथा नानाजी के साथ मेरी उतनी कम उम्र में, अल्पविकसित कली से फूल बनाने वाले, एक नादान बाला से औरत बनाने वाले, सम्मिलित रूप से साझा भोग्या बना कर मेरे तन में कामुकता की आग जगा कर उसी अल्पव्यस्क उम्र में संभोग सुख प्रदान करन वालों में से ले दे कर यही दो तो बचे थे। हरिया और करीम। दादाजी, बड़े दादाजी और नानाजी तो कब के काल कवलित हो चुके थे। अपनी जवानी इन लोगों के हवाले करके मैं कितनी निर्द्वन्द्, निश्चिंत अपने कैरियर संवारती गयी और आज इस मुकाम पर पहुंची हूं। अपनी कमसिन देह लुटाने का तनिक भी मलाल नहीं था, बल्कि खुश थी, बेहद खुश थी, बेहद संतुष्ट तथा आभारी थी उनकी। आभार स्वरूप मैं अपना तन उन्हें सौंपती थी, हालांकि मुझे घर से बाहर मर्दों की कमी कहाँ थी। फिर भी चल रहा था सब कुछ निहायत आत्मीयता तथा भावनात्मक जुड़ाव सहित।

“तो? अभिए?” मैं हरिया से लिपटी बोली।

“हां, अभिए।” वह बूढ़ा बड़ी जल्दी बाजी में खड़े खड़े मेरी देह को निर्वस्त्र करने लगा। छिलके की तरह मेरी देह का आवरण हटता गया और वहां उपस्थित तीनों मर्दों की आंखों में वही पुरानी जानी पहचानी हवस भरी चमक नृत्य करने लगी। अंतिम आवरण, ब्रा और पैंटी के हटने की देर थी, टूट पड़े मुझ पर गिद्धों की तरह। कोई चूम रहा था, कोई मेरी चूचियां और नितंब दबा रहा था और कोई सीधे मेरी योनि पर अपनी उंगलियों के जादुई स्पर्श से मेरी कामुकता की ज्वाला धधका रहा था। उफ उफ, कुछ देर पहले की उन मिस्त्रियों के नोच खसोट से हलकान मेरे शरीर में मानों नवजीवन का संचार हो गया। पगला गयी मैं।

“ओह राजा, उई मां, आह आह, अब बस ओह बहुत हो गया आह सालों चुदक्कड़ों, आह ओह, अब चोद भी डालो आह।” मेरी धौंकनी की तरह चलती सांसों के साथ मैं बोली।

“हां हां रे हमारी बिटिया रानी, बस अब तैयार हो जा।” हरिया नें समय गंवाने की जहमत नहीं उठाई। अपने पैजामे के नाड़े को खोला, और लो, कमर से नीचे हो गया नंगा। अंदर कुछ नहीं पहना था मेरा बाप। फनफनाए लंड के साथ मुझे लिए दिए सोफे पर ही लंबा हो गया। मैंने खुद को समर्पित कर दिया था, जो करना है कर लो। उसने मेरी दोनों टांगें ऊपर उठा कर अपने कंधे पर चढ़ाया और अपने तने हुए लिं का सुपाड़े को मेरी यौनगुहा के प्रवेश द्वार पर ज्यों ही रखा, उफ ओह, भूल ही गयी कि कुछ देर पहले मैं तीन तीन कमीनों से चुद चुकी थी। बेताबी से अपनी कमर उछाल कर गप्प से उसके लिंग को खा गयी अपनी चुदी चुदाई चूत में।

“आ्आ्आ्आ्ह,”

“हां ओह रंडी बिटिया हां, खा खा मेरा लौड़ा, हुं हुं हुं हुं हुं हुं,” गपागप ठोंकने लगा मुझे।

“ओह रज्जा।”

“ओह मेरी बिटिया रानी।” इधर रामलाल और करीम मेरी देह के बाकी हिस्सों पर हाथ फिरा फिरा कर और भी पागल किए दे रहे थे।

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह मा्ं्मां्मां्आं्आं्आं आं आं आं, ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ गयी्यी्यी्ई्ई्ई्ई्ई” मैं पांच मिनट में ही खल्लास हो गयी, इतनी उत्तेजित हो चुकी थी मैं। लेकिन हरिया कहां, वह तो लगा हुआ था भका भक चोदने।

“गयी साली कुतिया, अभी कहाँ, खाती रह मेरा लौड़ा तेरी मां की चूत, मां की लौड़ी चूतमरानी रांड।”बोलते हुए चोदता रहा और मैं चुदती रही, उसकी कमर को अपनी टांगों से लपेटे।

“आह् हां हां हां हां आह्ह, नजरों के आगे नुनु नचा कर नानी को नोचते उसके भोंसड़े का भुर्ता बनाने वाले चोदू भालू, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, मेरी नानी की नाक के नीचे मेरी मां की मुनिया को मथने वाले मादरचोद मां के लौड़े, इस्स्स्स अपनी बेटी की चूत की चटनी बना चूत के चटोरे चूतिए बेटी चोद, चोद आह्ह, चोद ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे बा्आ्आ्आप, चोद बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद आ्आ्आआ्ह्ह्ह्ह।” मैं मस्ती में भर कर बेगैरत वेश्या की भांति बेहद घृणित अल्फाज निकालते हुए न जाने किस किस उपाधी से विभूषित कर रही थी हरिया को और बेशर्मी की हद को पार करती सड़क छाप आवारा कुतिया की भांति आनंद विभोर अपनी कमर उछाल उछाल कर हरिया के हर ठुकाई का प्रत्युत्तर दिए जा रही थी।

“वाह्ह्ह्ह्ह्ह वाह्ह्ह्ह्ह्ह, ये हुई ना रंडी वाली बात।” करीम मेरे गालों को नोचते हुए बोला। अबतक वे दोनों भी नंगे हो चुके थे और अपने खूंखार लिंगों का प्रदर्शन करते हुए हरिया के फारिग होने का बड़ी बेकरारी से इंतजार कर रहे थे।

करीब बीस मिनट बाद, आ््आआ््आआ््हह्ह्ह्ह्ह्ह स्स्स्स्स्साआ्आ्आ्आ्आली्ई्ई्ई्ई् रंडी्ई्ई्ई्ई्ई आ्आ्आ्आ।” आहें भरते, हांफते कांपते, मुझे निचोड़ते हरिया स्खलित हुआ।

“ओह रज्जा, आ्आ्आ्आ्ह,” मैं आनंदित मुद्रा में आंखें बंद किए स्खलन के सुख में डूबी हुई थी, तभी हरिया का स्थान करीम नें लिया। इधर हरिया का लिंग भींगे मुरझाए चूहे की तरह फुच्च से मेरी से मेरी योनि से बाहर निकला कि पल भर में करीम का टनटनाया खतना किया हुआ लिंग भच्चाक से घुस्स्स्स्स्स्स गया, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्ह। क्या करती मैं? छोड़ दिया खुद को उस कामुक बूढ़े के रहमो करम पर। फिर शुरू हुआ सटासट चुदाई का दूसरा दौर। मुझे नोचते खसोटते, रगड़ते घसड़ते, चोदता रहा अपने खतना किये लिंग से, कूटता रहा, भोगता रहा। करीब आधे घंटे की भीषण चुदाई से मुझे बेहाल कर दिया। उसने मुझे कुतिया की तरह चौपाया बना कर पीछे से चोदा। मेरी चूचियों को आटे की तरह गूंथता हुआ चोदा। मेरी गर्दन को कुत्ते की तरह काटते हुए चोदा। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, और मैं चुदती रही चुदती रही, लंडखोर कुतिया की तरह। मैं पगली उस चुदाई में भी मगन, मजा ले रही थी। जब उसने मुझे चोद कर छोड़ा, मैं थकान के मारे खुद को संभाल भी नहीं पायी और धम्म से सोफे पर ही मुंह के बल गिर पड़ी। अभी मैं सांसें संयमित भी नहीं हो पायी थी कि अधपगला रामलाल शिकारी कुत्ते की तरह मेरी थकान से निढाल शरीर पर टूट पड़ा।

“हां अब मेरी बारी।” प्रतिरोध में अक्षम, मेरे अधमरे नंगी देह पर छाता हुआ बोला। मेरा शरीर अभी भी सोफे पर औंधे मुंह पड़ा था। रामलाल नें मेरी कमर पकड़ कर उठाया और अपने साढ़े ग्यारह इंच का भीमकाय मूसल मेरी चुद चुद कर पावरोटी सरीखी योनि में ठूंसने का उपक्रम करने लगा।

“आ्आ्आ्आ्ह, ननननहीं्ई्ई्ई्ई्ईं्ईं्ई़।” मेरी मरी मरी आवाज थी।

“क्या नहीं नहीं, इतने दिन बाद तो ढंग से चोदने दो मैडम। रबिया, शहला और सरोज के मुकाबले हमारी परी मैडम, ले लीजिए हमारा भी लौड़ा। आपको चोदने का मजा ही और है। ले ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए आ्आ्आ्आ, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह ये गय्य्य्य्या्आ्आ्आ्आ्ह्ह््ह, ओह मेरी लंडरानी मैडम।” बोलता बोलता घुसाता चला गया, सर्र से। मैं इस तीसरे हमले से कलप उठी। मेरा सर अब भी सोफे पर टिका था, हाथों में इतनी शक्ति नहीं थी कि हाथों के बल चौपाया भी बन पाऊं। मेरी कमर रामलाल की मजबूत पकड़ में थी, चूतड़ हवा में। उसी अवस्था में लगा भकाभक चोदने। अजब दृष्य था। ऐसा लग रहा था मानो कोई भूखा शेर एक निर्जीव हिरण के शरीर को भंभोड़ रहा हो।

“आ्आ्आ्आ्ह धीरे, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह आराम से आ्आ्आ्आ्ह।” मैं कराहती हुई बुदबुदा उठी। लेकिन अब कहाँ धीरे और आहिस्ते, भूखा शेर अपनी काम ज्वाला में धधकता, नोचने खसोटने पर उतारू हो चुका था।

“हुम्म्म्म्म्म्म, हुम्म्म्म्म्म्म, हुम्म्म्म्म्म्म, क्या धीरे, हुम्म्म्म्म्म्म, क्या आहिस्ते, हुम्म्म्म्म्म्म, ले मेरा लौड़ा हुम्म्म्म्म्म्म, अह्ह्ह्हा अह्ह्ह्हा, चुद बुरचोदी मैडम हुम्म्म्म्म्म्म, कुत्ती मैडम हुम्म्म्म्म्म्म, रंडी मैडम हुम्म्म्म्म्म्म, हुं हुं हुं हुं।” किसी रोबोट की तरह भयानक रफ्तार से फचफच चोदने में तल्लीन, अनाप शनाप बके जा रहा था। उस अल्पबुद्धी नर को औरतों के तन का ऐसा चस्का लग चुका था कि चुदाई के वक्त औरतों का शरीर उसके लिए चुदने वाली गुड़िया से ज्यादा और कुछ नहीं थी, उस पर तुर्रा यह कि चुदाई के दौरान उपयुक्त गंदी गंदी गालियां भी सीख गया था। औरतों के मन की भावनाओं से उसे कुछ लेना देना नहीं था, औरत मतलब चूत और चूत मतलब चोदना, बस, और कुछ नहीं। अच्छा ही है, भावनात्मक जुड़ाव वाले ही दूरियां, अलगाव तथा बिछुड़न के गम में गमगीन रहते हैं। अपने में मस्त, बालसुलभ स्वभाव, किंतु औरतखोरी के वक्त भावनाशून्य पशु की तरह उसका व्यवहार। कुछ पलों तक हलकान होती रही, फिर जैसा कि आप सभी जानते हैं, शनैः शनैः मेरे शरीर में नवजीवन का संचार होने लगा और रामलाल के कामुक कृत्य से मुझ कमीनी के अंत:करण में स्थित कुत्सित कीड़े की कुलबुलाहट से कलकलाती हुई जैसे ही पूर्ण जागृत हुई, वहां का माहौल बद से बदतर कर बैठी मैं।

“चोद चूत के चटोरे चूतखोर चुदक्कड़, चोद आह लठ्ठधारी लठैत सरीखे लंड वाले लंडराज, मां के लौड़े, ठोंक आह ठीक से ठुकाई ठोंक मादरचोद, आ्आ्आ्आ्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह ससेट सटासट स्स्स्साले्ए्ए्ए सरिया ससेट, मार मार मेरी चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत, चोद मेरी बू्ऊ्ऊऊ्ऊ्ऊर, बना आह्ह, बना मेरी बू्ऊ्ऊ्ऊर का भोंसड़ा, कमीने, कुलकलंक, कुच्चड़ कुत्ते, कर कचकचा कर इस कुतिया का कचरा, आ आ आ आ  चुदक्कड़ रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आह।” मैं अपनी गांड़ उछाल उछाल कर चुदते हुए अपने गंदे कल्फाज से उस माहौल और भी गंदा करने लगी। करीब बीस पच्चीस मिनट की उस भीषण चुदाई के पश्चात लगा झड़ने वह चुदक्कड़ पागल।

“आ्आ्आ्आ्ह आ्आ्आ्आ्ह, आ्आ्आ्आ्ह, आ्आ्आ्आ्ह।” मेरी कमर को किसी कुत्ते की तरह जकड़ कर तीव्र वेग से लगा छर्र छर्र छर्रा छोड़ने अपने वीर्य का। गरमागरम लावा मेरी कोख में भरता रहा, भरता रहा और मैं आनंद के सागर में डूबती अपनी योनि में उसके वीर्य का कतरा कतरा जज्ब करती रही, बेशकीमती धरोहर की मानिंद। पूर्ण तृप्ति का अहसास रामलाल के चेहरे पर था और मुझ बेगैरत गलीज कुतिया के चेहरे पर भी। मेरे निढाल शरीर को उसी सोफे पर धम्म से छोड़ा रामलाल नें और मैं पूर्ववत मुंह के बल पड़ गयी। मेरे निष्प्राण से शरीर को उसी तरह छोड़ कर तीनों चुदक्कड़ खिसक लिए थे। मैं वहां उसी प्रकार नंगी भुजंगी, चुदी चुदाई, थकी मांदी पड़ी रही करीब घंटे भर। करीब घंटे भर बाद हरिया की आवाज सुनी मैं।

हरिया मुझे चोद चाद कर चल दिया था कब का और अपने काम में लग चुका था। खाना तैयार होते ही मेरे पास आ कर बोला, “इस तरह गोल गोल गांड़ दिखाती हुई पड़ी मत रह बुरचोदी बिटिया, नहीं तो अब तेरी चिकनी गांड़ में भी शुरू हो जाएंगे हम। उठ बुरचोदी, खाना तैयार है। इसी तरह नंगी खाने का इरादा है क्या? ऐसा है तो अपने लंड मेेंं बैैैठा कर खिलाएंगे हम।”

“साले बेटीचोद, बेटी की बुर चोद के पेट नहीं भरा, बात करता है गांड़ चोदने की।” मैं बड़बड़ाती हुई सोफे से उठी और सीधे बाथरूम में घुस गयी। बाथरूम में मैं ने सिर्फ हाथ मुंह धोया। शरीर के किसी और हिस्से में पानी तक लगने नहीं दिया, इसलिए इन तीनों मर्दों के शरीर के पसीने से तर मेरा तन वैसा का वैसा ही था। उनका पसीना मेरे तन पर सूख चुका था। उनका वीर्य मेरी योनि के मुहाने पर, नीचे मेरी जांघों पर बहकर सूख चुका था। उनके शरीर की मिली जुली गंध से मेरा तन महक रहा था। मैं इस दुर्गंध से मुक्त होना भी नहीं चाहती थी।  करीब आधे घंटे बाद मैं खाने की मेज पर थी। तीनों हवस के भूखे भेड़िए पहले से मौजूद थे और मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे।

“अब मुझे देख कर दांत मत दिखाओ तुमलोग, खाना खाओ चुपचाप।” मैं उनकी हंसी से झल्ला कर बोली। मैं वैसी ही गंदी हालत में खाना खा रही थी। हम सभी खाना खा कर अपने अपने कमरे में चले गये। मेरे मन में अगामी कल जो होने वाला था, उसकी सोच घूम रही थी। मैं एक गंदी सी चादर का बिछावन फर्श पर ही बिछा कर सोने की तैयारी करने लगी। संध्या करीब साढ़े चार बजे से लेकर करीब आठ बजे तक छ: मर्दों से मसली गयी थी किंतु फिर भी अब दूसरे दिन जो कुछ मेरे साथ घटने वाला था, उसके अनजाने रोमांच की कल्पना के साथ, इस बात से बेखबर कि कामुकता के इस दलदल में मैं कितनी अंदर धंस जाऊंगी, खुद को कितनी सस्ती बना बैठूंगी, कब निद्रा देवी के आगोश में समा गयी पता ही नहीं चला।

ऊपरवाले का करिश्मा तो देखिए, दूसरे दिन मेरी पूर्व निर्धारित योजना को सरल बनाने हेतु इन तीनों, हरिया, करीम और रामलाल को घर से बाहर रखने का उपाय भी कर दिया। छुट्टी के दिन उन औरतखोरों नें खुद ही दिनभर सरोज, रबिया और शहला के तन का भोग लगाने का निर्णय ले लिया। खुश हो गयी मैं कि दूसरे दिन जो घृणित खेल यहां होने वाला था, खुद ब खुद निष्कंटक हो गया।

दूसरे दिन का प्रभात एक नया प्रभात था। छ: बजे मेरी नींद खुली। मैं चाहती थी कि ये तीनों जितनी जल्दी यहां से दफा हों उतना अच्छा। कहीं ऐसा न हो कि इनके जाने के पहले ही ‘कामगरों’ के आने का तांता आरंभ हो जाय। ऊपरवाला भी कितना बड़ा अंतर्यामी है, मेरी मनोदशा को समझकर सब योजना तय कर चुका था। यथासमय ये तीनों औरतखोर नाश्ता करके गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गये। अब मैं निर्द्वंद्व, निश्चिंत, स्वच्छंद, स्वतंत्र थी अपनी कमीनी हरकत के लिए। मैंने मैदान साफ देख कर अपनी एक पूर्व परिचित मेकअप आर्टिस्ट को फोन करके फौरन बुला लिया और मेरा मेकअप करने को कहा। जैसा जैसा मैं कहती गयी वैसा ही करती गयी। मेरे चेहरे से लेकर गर्दन से काफी नीचे तक मेरे चमड़े का रंग सांवला हो गया। चेहरा मेरा एक देहातिन की तरह हो गया था। करीब घंटे भर में मैं काफी बदल गयी थी। बाल मेरे तनिक घुंघराले हो गये थे।

उस मेकअप आर्टिस्ट, रेहाना की जिज्ञासा, “क्या बात है कामिनी, आज इस तरह मेकअप का क्या अर्थ है?”

“कुछ नहीं, बस यूं ही मन किया।” मैं बोली।

“मैं जहां तक तुम्हें जानती हूं, तेरा कोई काम यूं ही नहीं होता है। बता ना।” वह तो पीछे ही पड़ गयी थी।

“बताऊंगी बाबा बताऊंगी, लेकिन काम होने के बाद।”

“क्या ऐसा काम है जरा मैं भी तो सुनूं।”

“बोली ना, काम होने के बाद बताऊंगी।”

“तुम जरूर कुछ खुराफात करने वाली हो।”

“हां करने वाली हूं खुराफात। अब हुई तसल्ली?”

“मुझे टाल रही हो तुम।”

“हां टाल रही हूं। अब तुम फूटो जल्दी यहां से।” रेहाना अच्छी मेकअप आर्टिस्ट तो थी ही, मेरी हम उम्र सहेली भी थी। कुछ हद तक हमराज भी थी। नामकुम में ही रहती थी। उसका एक ब्यूटी पार्लर था रांची मेन रोड में।

“कुछ तो गड़बड़ करोगी।”

“हां करूंगी। अब तुम भागो यहां से। कल बताऊंगी सब कुछ। ठीक है?”

“ठीक है ठीक है, अभी तो जाती हूं। कल मिलती हूं, बॉय। वैसे तुम बहुत गंदी महक रही हो।” जाते जाते वह बोली।

“साली तू भागती है कि नहीं। ओके, चल बॉय।” चलो पीछा छूटा। मेकअप समाप्त होते होते करीब आठ बज गये थे। अब मजदूरों के आने का समय हो चला था। जल्दी से रेहाना को रुखसत करके मैं अब तैयार होने लगी। आज मैं फ्रेश नहीं होना चाहती थी। गंदी ही रहना चाहती थी। शरीर पर गंदी महक बरकरार रखना चाहती थी। गंदे कपड़े पहनना चाहती थी। पुराने कपड़ों की ढेर से एक पुरानी सी साड़ी खोज निकाली और पुराना ब्लाऊज, पुराना पेटीकोट, अंत:वस्त्र भी फटे पुराने, मटमैली ब्रा, गंदी फटी पैंटी। सिर्फ ब्रश किया था सवेरे उठकर बस। बिना कंघी किए अपने घुंघराले हो चुके बालों को समेट कर यूं ही कामचलाऊ जूड़े की शक्ल दे दी थी मैंने। तैयार हो कर दर्पण के सम्मुख खड़ी हुई तो एकाएक खुद को ही पहचान नहीं पाई। परिधान और हुलिया किसी रेजा या कामवाली बाई से भी बदतर था। बस हो गयी मैं तैयार, आने वाले मुसीबत या होने वाले रोमांचक मजे के लिए। अब मैं क्या करूंगी, जो करना है वे करेंगे, मैं तो बस सहयोग करूंगी, आखिर सहमति तो दे ही चुकी थी अपनी। पता नहीं कैसे और क्या क्या होना था, यह तो उस समय की परिस्थिति और माहौल पर निर्भर था। जो भी होने वाला था, उसके लिए मानसिक रूप से खुद को तैयार कर चुकी थी। होना भी आखिर क्या था? अंकशायिनी ही तो बनना था मुझे उनकी, लेकिन किस तरह से, पता नहीं। खेली खाई तो थी ही मैं। न जाने किन किन परिस्थितियों से गुजर चुकी थी मैं, उनको निबटा नहीं पाऊंगी क्या? आत्मविश्वास की कमी भी नहीं थी मुझमें। अपनी क्षमता पर भी पूरा भरोसा था। बस यही था कि इस समय मैं कोई योजना नहीं बना रही थी। मेरी समझ से योजना तो ऊपर वाला बना चुका था। इस वक्त मैं ठान चुकी थी कि बिना किसी पूर्व योजना के यथा परिस्थिति अपने साथ जो होना है उसे होने दूं। ऊपरवाला परिस्थितियां पैदा करता जा रहा था, योजना बनाता जा रहा था तो मैं भला कौन होती हूं अपने दिमाग को व्यर्थ कष्ट देने वाली। अब जो होगा सो होगा। एक अनजाने रोमांच से रूबरू होने की कामना थी और उसी में नये किस्म के आनंद के प्राप्ति की जुगुप्सा थी। मन ही मन बोली, “ऊपरवाले, तू देख रहा है ना, अब आगे जैसी तेरी मर्जी।”

भीतर ही भीतर रोमांचित हो रही थी। धमनियों में रक्त का संचार तूफानी गति से हो रहा था। दिल की धड़कनें पल प्रतिपल बढ़ती ही जा रही थीं। मैं घर के सामने वाले बगीचे में फूलों के पौधों की कटाई छंटाई में व्यस्त थी।

“ओय।” तभी मुझे गेट पर से सलीम की आवाज सुनाई पड़ी।

“का है?” मैं गेट की तरफ देखती हुई बोली। मैं आवाज भी थोड़ी बदल कर बोल रही थी। बोलने का लहजा ठेठ देहाती। हुलिया तो खैर बिगड़ा हुआ था ही। एक बार में पहचान पाना थोड़ा मुश्किल था।

“गेट खोल।” सलीम बोला। सलीम के साथ रफीक और बोदरा भी थे। बाकी लोग नजर नहीं आ रहे थे।

“काहे?”

“अरे काम करने आए हैं।” रफीक बोला।

“ओ आप लोग ही यहां काम करने आते हैं?” मैं मजा ले रही थी।

“अरे तू है कौन? जा मालकिन के बुला ला।” बोदरा बोला।

“मालकिन नाही है। ऊ बाहर गयी है।”

“अईसे कईसे? ऊ हमको बुला के अईसे कईसे जा सकती है।” सलीम तनिक मायूस दिखने लगा था अब। वे तीनों अच्छे से, अपने हिसाब से बन ठन कर आए थे।

“अब कईसे जा सकती है ऊ हम का जानें। ठीक है, आपलोग आईए अंदर और मालकिन का इंतजार कीजिए।” मैं गेट खोलते हुए बोली। सलीम मुझे घूर घूर कर देख रहा था।

“तू है कौन?” सलीम से रहा नहीं गया।

“कामवाली, अऊर कौन? चांदनी नाम है मेरा।” मैं गेट बंद कर के कूल्हे मटकाती हुई उनके आगे आगे घर की ओर बढ़ी।

“इससे पहिले तो नहीं देखे तुमको?”

“आज ही तो आए हैं हम गांव से।”

“तू और मैडम में कोई रिश्ता है का?”

“काहे?”

“थोड़ी थोड़ी मैडम जैसी दिखती हो, इसी लिए पूछा।”

“हां, हम उसकी चचेरी बहिन हैं। गांव में रहते हैं। हमको बुलाई है घर का काम वास्ते।”

“ओह, इसी लिए। और बाकी लोग?”

“सब आज घूमने गये हैं। बोले कि सीधे शाम को आएंगे।” मैं बोली।

“ठीक है, ठीक है, मैडम कब आएगी?”

“पता नहीं।”

“तबतक हम का करेंगे रफीक?”

“अब हम का कर सकते हैं? इंतजार करेंगे और का।”

“हमारे बारे में कुच्छो नहीं बोली का?” सलीम मुझसे बोला।

“बोली थी। बोली थी, मिस्त्री, रेजा कुली लोग आएंगे, बैठाना और खातिर करना, ख्याल रखना। काम वाम तो आज करना है नहीं।” मैं आंखें मटकाते हुए बोली।

“का खातिर?” अब उनकी लार टपकाती नजरें मेरे तन पर टिकी थीं।

“यही, चाह पानी अऊर कौनो चीज जो चाहिए, आपलोग बईठिए तो, हम अम्भी आए।” सोफे की ओर दिखा कर बैठने को बोली और मैं कूल्हे मटकाती, लुभावने अंदाज में अपने नितंबों को हिलाती किचन की ओर बढ़ी। पानी ले कर आई और टेबल पर रख दी। अभी मैं वापिस मुड़ी ही थी कि बाहर गेट खड़कने की आवाज आई।

“जा के देख तो, बाकी लोग भी आए हैं का?” सलीम नें रफीक की ओर देखते हुए कहा। रफीक उठ कर गया और उसके साथ साथ मंगरू, मुंडू थे और साथ में छम्मकछल्लो छमिया कांता छमक छमक कर चली आ रही थी। उनके पीछे पीछे तीन और कुली रेजा सोमरी के साथ आ रहे थे।

“रूपा और सुखमनी का क्या हुआ?” सलीम बोल उठा।

“पता नहीं।” मंगरु नें संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

“खैर कोई बात नहीं। काम चल जाएगा। ई छम्मकछल्लो, सोमरी अऊर मुंडू तो हईए हैंं। मैडम आ जावेगी तो हो जावेंगे चार। हमलोग हैं सात। हिस्सा बट्टा करके काम चला लेंगे।” सलीम बोला। “हां तो तू का कह रही थी? जो हम चाहें मिलेगा का?” अब उसकी नजरें मेरे तन को ऊपर से नीचे तौल रही थीं। अंदर ही अंदर पुलकित हो उठी, इस अनाकर्षक चेहरे के बावजूद अपने तन के खूबसूरत बनावट पर। पता नहीं कि मेरे तन की खूबसूरती का ही आकर्षण था या मात्र एक सुलभ उपलब्ध भोग्या नारी तन का। इन औरतखोरों की नजरों में स्त्री के सौंदर्य का क्या महत्व है, इसका तो पता नहीं, किंतु स्त्री एक भोग्या है, यह महत्व तो अवश्य पता है उनको। खैर मुझे इससे क्या, इतना तो समझ गयी इनकी नजरों से कि मैं इनकी दृष्टि में आ चुकी हूं, एक शिकार।

“हां, मालकिन तो अईसा ही बोली। जो मांगेंगे दे देना।” मैं बोली।

“जो मांगेंगे वो दोगी तुम हमें?”

“अगर यहाँ है तो काहे न देंगे।” मैं बोली।

“यहाँ है वही मांगेंगे।”

“तो मिलेगा।” मैं बोली।

“ना तो नहीं करोगी?”

“हम भला काहे ना करेंगे। हम ना करेंगे तो दीदी भगा  न देगी हमको?” मैं बोली।

“सोच लो।”

“अब इसमें हमको का सोचना। दीदी सब कुछ सोच के ही ना अईसा बोली होगी?” मैं आंखें नचाती हुई बेधड़क बोली। मैं जानती थी कि उनके कथन का आशय क्या था, फिर भी अनजान बनी, नादान बाला बनी हुई थी। मैं जानती थी कि बात का रुख किधर जा रहा है, फिर भी अनजान बन रही थी।

“अच्छा ई बता, मैडम कब तक आवेगी।” रफीक बोला। अब वे लोग उतावले हो रहे थे।

“पता नहीं, शायद ना भी आवे। कह रही थी कि जरूरी काम से जा रही हूं।” मैं बोली।

वहां उपस्थित सभी लोग दुविधा में डूबे एक दूसरे को देख रहे थे। आंखों ही आंखों में बातें भी कर रहे थे। अंततः सलीम बाकी लोगों से मुखातिब हो कर बोला, “तो अब का इरादा है?”

“इरादा क्या है पता नहीं है का तुमको? हम यहां काहे आये हैं पता नहीं है का तुमको?” रफीक बेसब्र हो रहा था।

“ऊ बात नहीं, बात ई है कि, चांदनी……” सलीम रुक गया।

“ई तो बोल ही रही है, जो मांगेगे मिलेगा, फिर काहेका सोचना। वैसे भी यह अपनी दीदी से कम थोड़ी न है।” अब बोदरा बोला।

“हां तो चांदनी, जो मांगेंगे मिलेगा ना?” सलीम अब तसल्ली कर रहा था।

“कह तो रही हूं, सब कुछ मिलेगा।”

“बाद में मैडम को शिकायत तो नहीं करोगी?”

“काहे की शिकायत? दीदी ही तो बोली है।”

“ठीक है, तो तुम तैय्यार हो?”

“हां बाबा हां।”

“हम सब यहां अभी एक खेल खेलेंगे।”

“तो खेलो ना।”

“तुमको भी हमारे साथ खेलना होगा।” ललचाई नजरों से मुझे देखते सलीम बोला।

“कैसा खेल?” मैं अनजान बनती हुई पूछी।

“सब समझा देंगे। खेलोगी ना?”

“खेल में मजा आएगा तो?” उत्सुकता से पूछी।

“बड़ा मजा आएगा पगली।”

“ठीक है, खेलूंगी।” मैं धड़कते दिल से सहमत हो गयी। जानती थी कि इस खेल का मतलब क्या है, लेकिन जरा देखना था कि ये शुरुआत कैसे करते हैं। मेरी सहमति पा कर सभी की बांछें खिल गयीं। मेरी कमनीय देह का आकर्षण ही ऐसा था।

“बहुत बढ़िया, वैसे भी कामिनी मैडम और चांदनी में कोई खास फर्क भी नहीं है। मजा आएगा।” रफीक प्रसन्नता से बोला।

“तो ठीक है, चलो हम खेल शुरू करते हैं।”

“कौन सा खेल?” मंगरू अब बोला।

“अरे वही, जो हम बीते इतवार कांता के यहां खोकोन और मुंडू के साथ खेले थे।”

“हट हरामी।” कांता तुनक गयी।

“वाह, ताश लाए हो?” कांता की बात को नजरअंदाज करते हुए प्रसन्नता से रफीक बोल उठा।

“हां भाई, ये रहा ताश।” पॉकेट से ताश की गड्डी निकालते हुए बोला सलीम।

“तो चलो शुरू करते हैं।” सलीम बोला।

“पहिले खेल का नियम तो बताओ।” मैं बोली।

“ठीक है। तुम पहली बार खेल रही हो ना। बताते हैं। सुनो। अभी हम सबको पत्ते बांटेंगे। जिसको पहला गुलाम मिलेगा, वह हुकुम मानेगा और जिसको पहला बादशाह मिलेगा वह हुकुम देगा। बादशाह जो बोलेगा, गुलाम को वही करना होगा। इसके बाद यह चलता रहेगा।” मुझे खेल रोचक लगा। मैं जानती थी हुक्म क्या होगा, और यह खेल कहां जाकर खत्म होगा। उधर कांता मुझे घूरे जा रही थी।

“ठीक है, हमें मंजूर है।” मैं बोली। खुश हो गये सब।

“सोच ले।”

“सोच लिया।”

“पीछे नहीं हटना है।”

“नहीं हटूंगी। सब खेल में शामिल हैं तो हमें क्या दिक्कत?”

“ई अनाड़ी को बता काहे नहीं देते कि असल में का करने वाले हो तुमलोग।” कांता बोल पड़ी।

“बताने का क्या जरूरत है? और तू काहे परेशान हो रही है। यह खुद ही खेलने को राजी है। वैसे भी, इस खेल में इसे भी मजा आएगा।” सलीम बोला। उसे कांता की बात पसंद नहीं आई। अच्छी खासी शिकार फंस रही है और यह छमिया व्यवधान पैदा करने का प्रयास कर रही है। उसे भय था कि खेल के बारे में पूरा सत्य जानकर कहीं मैं मना न कर दूं। “अब तू ज्यादा पटर पटर न कर।” डांट दिया उसने कांता को।

“तो हम ही बता देते हैं।” कांता खिसिया कर बोली। उसे खुद का महत्व घटने का भय सता रहा था शायद, या फिर मुझसे ईर्ष्या हो रही थी। मैं उसकी मनोभावों को खूब समझ रही थी।

“क्या बताएगी? बता।” मैं बोली।

“यही कि ई सब यहां क्या करने वाले हैं।”

“अब घुमा फिरा के काहे बोल रही है, सीधे बोल ना।” मैं मजे ले रही थी।

“उल्टा सीधा काम करवाएंगे।”

“कैसा उल्टा सीधा। हमसे न होगा क्या?”

“बुद्धू, गंदा काम करवाएंगे।”

“कैसा गंदा काम?” मैं जानती बूझती अनजान बन रही थी।

“तुम समझ नहीं रही हो।”

“तू खेल रही है ना?” मैं उल्टा सवाल दाग बैठी।

“हां।”

“तुम्हें मजा आता है ना खेलने में?”

“हां, काहे कि हमें आदत है।”

“जब तुझे मजा आता है तो हमें काहे मना कर रही है?”

“छोड़ो, हमें क्या, झेलो खुद, बाद में हमें दोष न देना कि चेतायी नहीं थी।” झल्ला कर बोली वह। सभी हंस पड़े।

“मर साली कुतिया।” बुदबुदाई वह।

“कुछ बोली का हमसे?” मैं बोली।

“नहीं कुछ नहीं। समझ जाएगी सब।” वह बोली।

“अब तुमलोग बकबक बंद करो। सब आ जाओ सेंटर टेबुल के चारों तरफ। अब खेल शुरू करते हैं।” सलीम बोला।

वहां उपस्थित सभी लोग सेंटर टेबल के चारों तरफ बैठ गये। जैसे ही मैं उन लोगों के बीच बैठी, बगल वाला मंगरु नाक सिकोड़ कर बोला, “उंह, महक रही है यह तो।”

“साले महक रही है? गौर से देख इसे। वैसे भी जब काम के बीच में गंधाती, महकती रेजाओं और मुंडू, खोकोन के साथ गोदाम में ठेल्लम ठेल्ली करते हो तब महक नहीं लगती है साले?” रफीक मेरी कमनीय देह को ललचाई, लार टपकाती नजरों से देखते हुए बोला। मैं सकुचाने का नाटक करती हुई और थोड़ा सिकुड़ कर बैठ गयी।

“सच कहा तूने सलीम। चल बांट पत्ते, रहा नहीं जा रहा है अब।” बेकरार बोदरा बोला। अब सलीम नें पत्ते बांटना आरंभ किया। सबसे पहले गुलाम निकला मंगरू का। वह खड़ा हो गया।

“मंगरू बन गया गुलाम।” सलीम नें घोषणा की। फिर बादशाह निकला मुंडू को। मुंडू खड़ा हो गया।

“हां, तो मंगरू मेरा गुलाम। जो हम कहेंगे वही करेगा ना?” मुंडू बोला।

‘हां, करेंगे।” आज्ञाकारी गुलाम की भांति मंगरू बोला।

“चल उतार मेरे कपड़े।” मुंडू बोला।

“जो हुकुम मालिक।” कहते हुए मुंडू के कपड़े उतारने लगा मंगरू।

“यह यह क क क क्या हो रहा है?” मैं अनजान बन कर चौंकने का नाटक करती हुई बोली।

“यही तो खेल है। बादशाह गुलाम को हुकुम करेगा और गुलाम हुकुम का पालन करेगा।” सलीम बोला।

“त त त तो सभी के साथ ऐसा ही होगा क्या?” मैं बोली।

“हां, लेकिन बादशाह जैसा बोलेगा वैसा होगा।”

“हम नहीं खेलेंगे ऐसा खेल।” मैं विरोध करने लगी।

“खेलना पड़ेगा। तुम्हीं बोली थी।”

“हमें का पता कि ऐसा भी करना पड़ेगा। छि:।” मैं खड़ी हो गयी। अबतक मुंडू नंगा हो चुका था। पूरा नंगा। कोई शर्म नहीं थी चेहरे पर। स्त्रियों की तरह बदन था उसका। सीना किसी नवयुवती की तरह उभरा हुआ था। किसी नवयुवती की तरह अर्धविकसित उरोजों की तरह उसके सीने के उभार थे। कमर सामान्य था किंतु नितंब उसके सामान्य से काफी बड़े बड़े थे, किसी खेली खाई व्यस्क स्त्री से भी बड़े। सारा शरीर बाल रहित चिकना। सामने झूल रहा था मात्र तीन इंच का लिंग। अजीब व्यक्तित्व था उसका।

“अब कहां? चल बैठ। पहले कह रही थी तो समझ नहीं आया।” कांता की बात से मेरा ध्यान भंग हुआ।

“नहीं, हम नहीं खेलेंगे ई गंदा खेल।” मैं बोली।

“अब कोई उपाय नहीं है। बैठ जा।” सलीम हुक्म दे रहा था।

“नहीं।”

“मैडम को बता देंगे, तू हमारी बात नहीं सुनी।”

“दीदी को पता है क्या, कि ई सब भी करते हो तुम लोग?”

“और नहीं तो क्या। इसी लिए तो बुलाई है और आए हैं हम।”

“हाय दैया। दीदी भी?”

“हां मैडम भी। बुलाई तो है यही सब खेलने के लिए।”

“हाय रा्आ्आ्आ्आम ऐस्स्स्स्आ्आ्आ।” मैं बनावटी आश्चर्य से आंखें बड़ी बड़ी करके नादान बनने का ढोंग कर रही थी।

“हांआ्आ्आ्आ ऐस्स्स्स्आ्आ्आ। चल अब बैठ जा चुपचाप।” मेरी नकल उतारती हुई कांता बोली। मैं वापस बैठने को बाध्य हो गयी।

“लेकिन यह तो बड़ी बेशर्मी वाला खेल है।” मैं बोली।

“हां, लेकिन हम खेलते हैं। बड़ा मजा आता है। आगे आगे देख, और क्या क्या होता है।”

“हे भगवान, हमें लाज आती है।” मैं बोली।

“खतम हो जाएगी तेरी भी लाज। चलिए भाई मुंडू, आप बादशाह हैंं और मंगरू आपका गुलाम। आगे बोलिए मंगरू से क्या करवाना है।” सलीम बोला।

“खोल अपने कपड़े रे मंगरू।” मुंडू मंगरू से बोला। मंगरू आज्ञाकारी गुलाम की भांंति अपने कपड़े खोलने में व्यस्त हो गया। जैसे जैसे उसके कपड़े खुलते गये, एक एक करके उसके सुगठित शरीर के हिस्से बेपर्दा होते गये। उफ्फ, जब वह पूर्णतया नग्न हुआ, पूरा कामदेव का अवतार लग रहा था। रंग काला था तो क्या हुआ, उसका गठा हुआ छ: फुटा शरीर मेरी नजरों के आगे चमक उठा। रोम रोम सुलग उठा मेरा। धमनियों में रक्त का संचार द्रुत गति से प्रवाहित होने लगा। उसकी जंघाओं के मध्य झूमता तनतनाया तीन इंच मोटा और करीब नौ इंच लंबा दर्शनीय, खूबसूरत किंतु भयावह लिंग हमारी नजरों के सम्मुख नृत्य कर रहा था।

“अब का हुकुम है महाराज?” नंग धड़ंग मंगरू बोला।

“चल अब चाट हमारा गांड़।” मुंडू बोला और झुक गया।

“जो हुकुम महाराज।” मंगरू बोला और मुंडू की चिकनी गुदा को चाटने लगा, किसी कुत्ते की तरह, सटासट।

“अच्छी तरह से चाट गधे।” मुंडू आनंदित होता हुआ बोला, और मंगरू चपाचप चाटता रहा। मुंडू के नितंबों की दरार को फैला कर चाटने लगा। मलद्वार में जीभ घुसा घुसा कर चाटता रहा। मेरी नजर तो सिर्फ मंगरू के आकर्षक लिंग पर ही चिपकी हुई थी। काश मुंडू की जगह मैं होती, कितना मजा आता। मेरी मुखमुद्रा सलीम और रफीक की नजरों से छिपी न थी। सलीम तो मेरे वक्षस्थल को घूरे जा रहा था।

“इनको लगे रहने दो। चलो बाकी लोग खेल को आगे बढ़ाते हैं।” सलीम की घोषणा से मेरी तंद्रा भंग हुई। अगला गुलाम निकला रफीक और बादशाह निकला कांता को। अब? अब क्या होगा? बड़ी दिलचस्प स्थिति थी। मगर कांता ठहरी एक नंबर की खिलंदड़।

स्थिति को अपने काबू में ले कर बोली, “हां, तो हमारे गुलाम, चल जल्दी से उतार अपने कपड़े।”

“जो आज्ञा महारानी जी।” कहते हुए रफीक खड़े हो कर बड़ी बेसब्री और जल्द बाजी से अपने कपड़ों से मुक्त होने लगा। उसकी हालत देखकर सबकी हंसी छूट पड़ी। वह हरामजादी बेशरम कांता खड़ी देख रही थी। उसकी आंखों में वासना की खुमारी स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। चंचला, कामुकता की पुड़िया कांता की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। बेचैनी, बेसब्री, उसके चेहरे पर भी खेल रही थी।

“यही सब होगा क्या?” मैं बोल उठी।

“हां, यही सब होगा।” सलीम बोला।

“छि:, तुम सब गंदे हो।”

“तुम गंदी नहीं हो?” सलीम बोला।

“हूं, मगर ऐसी नहीं।”

“क्या फर्क पड़ता है?”

“पड़ता है।”

“कैसे?”

“तुम सब भीतर से गंदे हो और हम बाहर से।”

“भीतर बाहर में फर्क क्या है? गंदगी तो गंदगी है।”

“हम ई सब नहीं जानते।”

“जान जाओगी। भीतर बाहर में ही तो मजा है, जान जाओगी।”

“हमें नहीं जानना।”

“सिखा देंगे।”

“हमें नहीं सीखना।”

“खेल से हट नहीं सकती तुम।”

“हाय, हम कहां फंस गये।” मैं बेबसी का दिखावा करती हुई बोली। मेरी बातें सुनकर सभी हंस पड़े। अबतक रफीक नंगा हो चुका था। दिन की रोशनी में उस काले टकले दढ़ियल, लिक्कड़ पहलवान का शरीर बड़ा अजीब लग रहा था। उसकी जांघों के बीच उसका साढ़े छ: इंच लंबा काला, खतना किया हुआ लिंग उठक बैठक कर रहा था।

“अब का हुकुम है?” रफीक बोला।

“अब ई भी बताना होगा हरामी, उतार हमारे कपड़े और करले जो करना है।” पैर पटकती हुई कांता बोली। कहने की देर थी कि रफीक ने कांता पर ऐसा झपट्टा मारा जैसे बाज किसी चिड़िया पर। पलक झपकते कांता नंगी हो गयी। साली छटंकी सी दिखने वाली कांता कम सेक्सी नहीं थी। चेहरे से ज्यादा आकर्षक तो उसके तन का गठन था। सख्त उन्नत उरोज, पतली कमर, उभरे हुए नितंब और और और नाभी से नीचे, सामने काले काले झांट और नीचे चमचमाती चिकनी योनि। योनि चीख चीख कर उसके लंडखोर होने की चुगली कर रही थी। मैं अंदर ही अंदर गनगना उठी। उफ्फ, मेरा नंबर कब आएगा, इंतजार कुछ अधिक ही लंबा हो रहा था। मेरी योनि पनिया उठी थी अबतक।

“अब काहे चाट रहा है मादरचोद। ठूंस अपना लौड़ा मेरी गांड़ में। चोद हरामी चोद।” उधर उत्तेजित मुंडू के मुख से निकला। हमारा ध्यान उधर गया तो क्या देखते हैं, मंगरू, जिसे मुंडू की गांड़ चोदने का लाईसेंस मिल गया था, मुंडू की गुदा और अपने तनतनाए लिंग पर थूक लसेड़ कर अच्छी तरह से मुंडू की कमर धर के एक ही धक्के में सरसरा कर पूरा का पूरा लिंग धांस दिया।

“आ्आ्आ्आ्ह” मुंडू की आह निकल गयी। मुंडू गांडू, गांड़ मरवाने का अभ्यस्त, आराम से अपनी गांड़ में खा गया मंगरू का विशाल लिंग, आनंद से उसकी आंखें बंद थीं।

“ले स्स्स्स्स्आल्ल्ल्ले गांडू, हुम्म्म्म्आ्आ्आ्।” उसकी स्त्रियों समान उभरे सीने के उभारों को मसलते हुए मंगरू ठूंस दिया जड़ तक अपना लिंग उसकी गुदा में।

“चोद मेरे गांड़ के रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आह साले चोद।” मुंडू आनंदित हो कर बोला।

“हां महाराज, चोद रहे हैं, ले ले ले।” कहते हुए कुत्ते की तरह कचकचा कर चोदने लगा।

“अरे टकले दढ़ियल हलकट, उधर का देख रहा है, हमको कर ना। कब से मरे जा रहे हैं लंड खाने के लिए।” कमीनी, लंडखोर कांता कलकला कर बोली। और फिर क्या था, बिना किसी भूमिका के रफीक पिल पड़ा कांता पर। वहीं फर्श पर कांता को पटक कर चढ़ बैठा उस पर, उसके दोनों पैरों को सरका कर सट्टाक से अपना लपलपाता लिंग उसकी लसलसी योनि में उतार दिया।

“ले साली कुत्ती, ले आ्आ्आ्आ्ह।” रफीक की कमर नें जुंबिश ली और लो, हो गया कांता का उद्धार।

“आह मादरचोद, ओह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आह,” कांता मुदित हो कर अपनी अपने पैरों से रफीक की कमर को लपेट ली और संभोग के सुखद संसार में गोते खाने लगी। शुरू हो गयी उनकी छपाक छैंया।

“सबके सब हरामी, एक नंबर के हरामी हैं। हम नहीं खेलते यह गंदा खेल।” मैं बोली और उठने को हुई।

“जाती कहां है बुरचोदी अब। साली रंडी खेलने आई है, खेलना तो होगा ही। चल सलीम पत्ते फेंक।” बोदरा अब अपनी औकात पर आ चुका था, मुझे पकड़ कर जबरदस्ती बैठाते हुए बोला। अब बचे थे तीन कुली, जिनके नाम बुधुवा, हीरा, बोयो, मिस्त्री बोदरा, सलीम और रेजा सोमरी। सलीम पत्ते बांटने लगा। इस बार तीन गुलाम एक के बाद एक निकले। पता है? कौन कौन थे? बुधुवा, हीरा और मैं। तीन गुलाम।

“नहीं, हम नहीं।” मैं फिर विरोध करने लगी।

“चुप साली रंडी। एकदम चुप। चल, अब तू भाग नहीं सकती खेल के बीच में खेल छोड़कर। बुधुवा, हीरा और तू गुलाम। चल सलीम आगे बांट पत्ते, देखें तो बादशाह कौन है?” बोदरा डांट कर बोला। उत्तेजना के मारे बुरा हाल था उसका और यही हाल मेरा भी था। परिणाम निकलते ही मेरी योनि खुद ब खुद पानी छोड़ने लगी। सलीम नें पत्ता बांटा और बादशाह बना बोदरा, उसके मनोनुकूल परिणाम था। उछल ही तो पड़ा। न जाने कब से इसी ताक में था। तुरंत बोला, “चल, तीनों के तीनों अपने कपड़े उतारो।”

“नहीं, हम नहीं।” मैं बोली।

“चल रे बुधुवा और हीरा, धर साली को और उतार इस रंडी के कपड़े। कब से फड़फड़ा रही है, हम नहीं हम नहीं।” कहते हुए खुद अपने कपड़े खोलने में व्यस्त हो गया। इधर बुधुवा और हीरा मुझ पर टूट पड़े। दोनों के दोनों, काले कलूटे अठाईस तीस की उम्र के साढ़े पांच फुट कद वाले गठे मजदूर, मुझे दबोच कर पलक झपकते साड़ी ब्लाऊज से मुक्त कर दिया। पुरानी, गंदी साड़ी, पेटीकोट और ब्लाऊज, जल्दबाजी और खींच तान कर खोलने के क्रम में खुलते खुलते कई जगह चरचरा कर फटती चली गयी। उफ्फ्फ। खोलते खोलते वे हरामजादे, मेरे वक्षों को और नितंबों को दबाने से भी बाज नहीं आ रहे थे।

“नहीं, छोड़ो हमें।”

“हां हां, नहीं छोड़ेंगे। अईसे भी ई तो महाराज का हुकुम है। छि:, बहुत गंदी है रे तू, कैसी तो महक रही है, मगर है मस्त माल।” नाक सिकोड़ता बुधुवा बड़ा खुश नजर आ रहा था। इधर बोदरा को कहां सब्र, इससे पहले कि मैं पूर्ण वस्त्रविहीन होती, वह मादरजात नंगा हो चुका था। साला चुदक्कड़ बौना। बौना बनमानुष हरामी। मेरी फटी चड्ढी, जिससे मेरी फूली हुई योनि झांक रही थी और बमुश्किल पहनी गयी फटी ब्रा, जिससे मेरे उरोज छलक कर बाहर आने को बेताब, देख कर फटी की फटी रह गयीं उन सबकी आंखें।

“वाह वाह। साली छिनाल, इतने मस्त बदन को लेकर भिखमंगी बनी पड़ी है। सलीम भाई, लॉटरी निकली है रे, देख तो जरा, मैडम से एक पैसा कम नहीं है। एक नंबर की लंडखोर लग रही है और बड़ी शरीफजादी बन रही थी हरामजादी। लंडखोर मैडम की लंडखोर बहिन।” बोदरा मुझे ऊपर से नीचे लार टपकाती नजरों से देखते हुए बोला। उसका सात इंच का मोटा मूसल मेरे सामने सलामी दे रहा था। गनगना उठी मैं। मैं बुधुवा और हीरा की पकड़ में छटपटा रही थी।

“नहींंईंईंईंईंईंईंईं, हम अईसे नहीं हैं। छोड़ दो छोड़ दो हमें। बरबाद मत करो हमें।” मैं गिड़गिड़ाने लगी, लेकिन मेरी नजरें बोदरा के लिंग पर ही गड़ी थीं।

“अब क्या बरबाद? आबाद हो जाएगी रे। देख उधर मंगरू को, मुंडू को कईसे चोद रहा है। देख उधर रफीक को, कांता को कईसे चोद रहा है। देख के मजा नहीं आ रहा है? इधर मेरा लंड देख, इसी से देंगे, ऐसा ही मजा देंगे हम भी। अरे बेटीचोद बुधुवा और हीरा, अब बोलना पड़ेगा कि तुमलोग भी नंगे हो जाओ?” बोदरा भूखे भेड़िए की तरह मेरी ओर बढ़ता हुआ बोला।

“इसका चुचकसना और चड्ढी?”

“फाड़ दे, फटी तो हईए है।” कहने की देर थी कि पलक झपकते मेरी ब्रा और पैंटी की दुर्दशा हो गयी। पल भर में मेरी ब्रा और पैंटी चरचरा कर धूल चाटने लगी।

“हाय रा्आआ््आआम”, हो गयी मैं मादरजात नंगी। गंदे शरीर के बावजूद चमक उठी मेरी कमनीय काया। मेरे उन्नत, भरे भरे उरोज अपने पूरे शबाब पर दमक उठे। मेरी पनिया उठी फूली, फुदकती योनि चमक रही थी। मेरे गुदाज नितंबों की छटा से सम्मोहित हो उठे सब के सब। संभोगरत मंगरू और रफीक भी गर्दन घुमा कर मेरे चित्ताकर्षक जिस्म को ललायित नजरों से घूर रहे थे।

“गजब, साली के बदन को देखो तो, मैडम से कुछ भी अलग है का? चूची एकदम फुटबॉल है,  मां की लौड़ी बुरचोदी, तब से कैसे शरीफ बन रही थी। चूत को देखो, लगता है किसी गधे से चुदवाती रहती है, बड़ी सती सावित्री बन रही थी। इसकी चूत पर सूखी मलाई? ई का है? लगता है कल ही खूब चुदवाई है रंडी कहीं की, साली बुरचोदी। गोल गोल चिकना चर्बीदार गांड़ देख ई रंडी का।” कहते हुए मुझ पर किसी बाज की तरह झपट पड़ा साला बौना बनमानुष।

“ऊ रंडी को ही देखते रहोगे कि चोदोगे भी साले चूतखोर बेटीचोद मां के लंड।” कांता इस आनंदमय संभोग के पलों में रफीक के लिक्कड़ शरीर से गुंथी क्षणिक विराम से कलकला कर बोली। और जारी रहा उसके तन का मर्दन, नुचाई, चुदाई, घिसाई।

“और तू मादरचोद मंगरू, रुक नहीं, चोदता रह चोदता रह, आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह।” वासना के सैलाब में बहते व्यवधान से तड़पता मुंडू तिलमिला कर बोला। और धपाधप, फचाफच होती रही उसके गांड़ की कुटाई। इधर मुझे लिए दिए बोदरा सोफे पर चढ़ बैठा।

“बस बस, अब मैडम आए न आए, फरक नहीं। ई मैडम से किसी बात में कम नहीं है। समझ लेंगे मैडम ही को चोद रहे हैं। कल मैडम की गांड़ चोदा, आज समझ लेंगे कि मैडम की बुर को चोद रहे हैं। अब मैडम आए न आए, हमारे लौड़े से, यही है आज हमारी रंडी मैडम। साली कुतिया कितनी बुरी महक रही है, लग रहा है जैसे न जाने कितने दिन से नहीं नहाई है। हमारे रेजा लोग भी इतना नहीं महकते हैं। साली भिखमंगी कहीं की, मगर चलेगा, खूब चलेगा। साली भिखमंगी की तरह गंदी, मगर बदन तो देखो हरामजादी की, खूब मस्त पायी है। मजा आ गया, अहा ओहो।” किलक रहा था।

“हट, हट, नहीं नहीं। न करो, ओह मां, ओह कहां फंस गये हम, हाय हाय, मत करो ना, छोड़ दो आह्ह।” मैं उस बौने के नीचे पिसती हुई बेबस, रोने गिड़गिड़ाने का अभिनय करने लगी।

“छोड़ दें? ऐसे कैसे छोड़ दें। अभी तो तू मेरी गुलाम है। गुलाम को ऐसे कैसे छोड़ दें। हमारी मरजी। जो चाहे करेंगे। पहले हम चोदेंगे, फिर हमारे गुलाम हीरा और बुधुवा भी चोदेंगे। हम समझ गये हैं कि तू कितनी बड़ी लौड़ाखोर है। अब रोने चिल्लाने का कोई नाटक नहीं चलेगा हरामजादी।” बोदरा मेरे यौनांगों को मसलते हुए बोला।

“ठीक, ठीक, ई एकदम मैडम ही लग रही है। मैडम की तरह रंडी। तू चोद, फिर हम भी आते हैं इनको निपटा के।” सलीम बोल उठा और पत्ते बांटने लगा बचे हुए लोगों के बीच। बोयो और सलीम बने गुलाम और सोमरी बनी बादशाह, या यों कहें बेगम।

“बहुत देर से नंबर आया। अब देर काहे? चल रे सलीम, शुरू हो जा। तब से ई सबका तमाशा देख देख के बदन में आग लगा हुआ है। जल्दी कर मादरचोद। साड़ी उठा के चोद हमको। और तू बोयो, हमारा दूध पियो, लो।” कहते हुए खुद ही अपना ब्लाऊज खोल बैठी। बिना ब्रा के थी वह। थलथला कर उसके किलो किलो भर के बड़े बड़े थन बेपर्दा हो गये। कहने की देर थी कि बोयो टूट पड़ा उसके स्तनों पर और बारी बारी से चीपने लगा और चपाचप चूसने लगा। बिना पैंटी की झांटों भरी चर्बीदार चूत, साड़ी उठते ही नुमायां हो उठी। और फिर क्या था, सलीम नें भी कमीज उतारने की जहमत नहीं उठाई, चड्ढी समेत तुरंत ही पैंट नीचे सरका कर चढ़ दौड़ा सोमरी के काले गोल मटोल गठीले शरीर पर। ये तीनों अबतक न जाने कैसे अपने को नियंत्रण में रखे हुए थे। गुत्थमगुत्था हो गये और जंगली जानवरों की तरह नोच खसोट पर उतर आए। उफ पूरा ड्राईंग रूम कामुकता का अखाड़ा बन चुका था। उधर मंगरू मुंडू, कांता रफीक की धींगामुश्ती, इधर सलीम, बोयो और सोमरी के बीच धकमपेल और मैं?

“आ्आ्आ्आ्ह, ननननहीं्ई्ई्ई्ई्ईं्ईं्ई़,” चीख पड़ी मैं, जब बोदरा अपना मूसल मेरी योनि को चीरता हुआ घुसाता चला गया, घप्प से। आप लोगों को बताने की आवश्यकता नहीं कि यह मेरा नाटक था। बुधुवा और हीरा मेरे तन को नोचने खसोटने, रगड़ने घसड़ने, चूमने चाटने और और अपनी दरिंदगी भरी हरकतों से मुझे हलकान करने में पीछे नहीं थे।

“चिल्ला, खूब चिल्ला, हर्र्र्र्र्र्रा्आ्आ्आ्आमजादी। आ्आ्आ्आ्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह।” खूंखार भेड़िए की तरह गुर्रा उठा बोदरा और मेरी छाती में दांत गड़ा बैठा।

“आ्आ्आ्आ्आआ््आआ््आआ मां्आं्आं्आं।” मैं दर्द से बिलबिला उठी। “इस्स्स्स्स्स्स्स मर गय्य्य्य्य्यी्ई्ई्ई्ई। आ्आ्आ्आ्ह बरबाद हो गयी आ्आ्आ्आ्ह।” बोदरा के भीमकाय लिंग से बिंधी मैं रोने लगी, छटपटाने लगी।

“हो गया रे हो गया, बस बस अब तू मजा ले, देख कैसे मजा देते हैं तुम्हें।” बोदरा की आवाज में सहानुभूति कम वहशीयत ज्यादा थी। भूखे भेड़िए को अपना शिकार जो मिल गया था। उसके भीमकाय लिंग को उसकी मंजिल जो मिल गयी थी, स्वर्गीय सुख का मार्ग जो मिल गया था, समागम का, संभोग का, वासना के सुखद समुंदर में डूब डूब कर उतराने का, चुदाई का, कुटाई का। किसी मशीन की तरह मेरी चूतड़ को दबोच कर गचागच चोदने में मशगूल हो गया। दंगल शुरू हो गया और मैं हरामजादी, कमीनी, लंडखोर, गलीज, घटिया कुतिया, हर संभव अभिनय को अंजाम देती हुई मगन, मुदित, उस घृणित कृत्य के हरेक कामुक पलों का रसस्वादन कर रही थी। उसके बाद तो मेरी बेध्यानी में मेरी कमर खुद ब खुद चलने लगी थी। न चाहते हुए भी मेरी सिसकारी निकल पड़ी।

“आ आ आ आ उ उ उ इस इस इस सी्ई्ई्ई्। अम अम इस्स्स्ई्ई्ई।”

“आ रहा है हां हां हां हुम हुम हुम मजा आ रहा है ना है ना आह आह हुं हुं हुं।” धक्के पे धक्का, धकाधक कूटते हुए मेरी चूतड़ों को मसलते हुए हांफते हांफते बोला।

“न्न्न्न्न्नहीं्ईं्ईं्ईं।” मैं मचलते हुए बोली।

“झूठ।”

“नननननहींईंईंईं सच्च्च्च।”

“हट्ट्ट्ट्ट झूठी आह आह।”

“ननननहीं्ई्ई्ई्ई्ईं्ईं्ई़, सच्च्च्चीईईईई।”

“ले ले आ आ ओ ओ ले हुं हुं। झूठ चाहे सच, ले और ले साली रंडी, लौड़ा्आ्आ्आ्आ आह ओह मेरा लौड़ा ले ले ले हुं हुं हुं।”

“नई आह नई ओह नई”

“हां आह हां ओह हां।” करीब बीस मिनट तक बोदरा मुझे झिंझोड़ता रहा, निचोड़ता रहा। उस दौरान मैं हर दस मिनट में झड़ी। ओह और क्या खूब झड़ी। मेरी स्थिति को बखूबी समझ रहा था वह अनुभवी औरतखोर, ठिगना बौना, बनमानुष। मेरे शरीर का अकड़ना, फिर शिथिल होना, उसके कमर पर मेरे पैरों के बंधन का सख्त होना, फिर ढीला होना, मेरा उसके शरीर से चिपकना और निढाल होना, सब समझ रहा था वह औरतखोर। “बन गयी न बुरचोदी आह, बन गयी न रंडी, ओह बन गयी न चूतमरानी रंडी मां की चूत, साली आ्आ्आ्आ्ह आ्आ्आ्आ्ह आ्आ्आ्आ्ह,” कहते हुए मुझसे ऐसे चिपका मानो मेरी सांसें बंद करके ही दम लेगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” मैं उसके स्खलन से निहाल, उसके लिंग से उगलते लावे का कतरा कतरा अपनी योनि के अंदर जज्ब करती चली गयी। वह हटा मेरे निढाल शरीर पर से, लेकिन यह अंत नहीं था।

“अब तू का देख रहा है मादरचोद बुधुवा। चोद हरामजादी को।” बोदरा के मुंह से निकले अल्फाज अभी पूरे भी नहीं हुए थे कि या अल्ल्ल्ल्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह, बुधुवा सवार, वह चढ़ दौड़ा मुझ पर और इससे पहले कि मैं पल भर भी सुस्ता पाती, भचाक, और लो, मेरे निढाल जिस्म की चुदी चुदाई गीली चूत में दूसरा लंड। छ: इंच का लंड और औसत मोटाई का लंड घुसता चला गया मेरी चुदी चुदाई योनि में सर्र से। कुत्ते की तरह, बिल्कुल जैसे एक कुतिया के पीछे पड़े अपनी बारी का इंतजार करते कुत्ते की तरह लगा भकाभक चोदने, मूक पशु की तरह। यह कसरती चुदक्कड़ कुछ अधिक ही जोश में था। पंद्रह मिनट में ही निपट गया, छर्र छर्र झाड़ बैठा अपना वीर्य। मैं तड़प उठी, क्योंकि अभी मैं झड़ने वाली ही थी कि बुधुवा साला भड़वा, नामर्द फारिग हो गया, लेकिन अभी असली मर्द तो बाकी था।

“हीरा बेटीचोद, चढ़ जा रे चढ़ जा।” बादशाह बोदरा का हुकुम और हो गया मेरी चूत का बंटाधार। मुझे तनिक भी अंदाजा नहीं था कि हीरा सचमुच का हीरा है। काला कलूटा, कद तो करीब साढ़े पांच फुट, लेकिन लिंग? बाप रे बाप, ध्यान नहीं दिया था मैंने कि उसका लिंग करीब दस इंच तक लंबा हो चुका है, मेरी चूत को हलाल करने को।

“लीजिए महाराज, ये ये ये आया हीरा का खीरा।” कूद कर चढ़ा था मुझे भंभोड़ने। सचमुच उसके लिंग के स्थान पर एक भीमकाय खीरा लटक रहा था। किसी गधे के लिंग सरीखा। चुद तो चुकी थी रामलाल तथा अपने निग्रो बॉस के मोटे मोटे लंबे लिंग से, लेकिन आज का चुदना कुछ अलग था। इसे मैंने खुद पर बलात्कार का रुप दे दिया था। अपने ऊपर बलात्कार होते हुए चुदने का रोमांच अलग था।

“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई।” ज्योंहि हीरा के खीरे का संपर्क मेरी योनि पर हुआ, मैं भयभीत स्वर में चीख उठी।

“साली कुतिया, मेरी बारी आई तो नहीं।” हीरा डांटने लगा। वाह, यह तो कमाल हो गया। कहां तो कल तक मैडम का आदर पा रही थी, आज अचानक मेरे गरीब देहातिन जैसे परिवर्तित व्यक्तित्व को पहचान न पाने के कारण निकृष्ट व्यवहार का शिकार हो रही थी। खैर, यही तो चाहती थी मैं कि मेरे साथ वे बेखौफ, बेझिझक होकर, मनमाफिक व्यवहार करें। वही हो रहा था मेरे साथ। इधर मुझ अतृप्त लंडखोर को और क्या चाहिए था। लेती चली गयी उतना लंबा और मोटा लिंग अपनी अनबुझी वासना की अग्नि में झुलसती योनि में। थक चुकी थी मैं मगर शरीर ही थका था, मन नहीं भरा था। इधर उसका लिंग घुसा नहीं कि मैं तड़प उठी। यह तो पूरा जंगली था। नोच खसोट पर उतर आया। मेरी चूचियों का मलीदा बनाने लगा और मेरी गर्दन के नीचे जोश के मारे दांत गड़ा बैठा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नहींंईं्ईं्ईं्ईं्ईं” दर्द से चीख पड़ी मैं। सबकी नजरें मेरी ओर उठी और सभी मेरे तन की दुर्दशा होते हुए मजे से देख रहे थे। मंगरू और रफीक निपट चुके थे अपने अपने संगियों से। अब तक उधर सलीम और बोयो सोमरी की ऐसी की तैसी किये जा रहे थे और इधर मेरे ऊपर तीसरा चुदक्कड़ सवार था। उसके दस इंच लंबे मूसल का अंतहीन प्रहार झेलती मैं सिर्फ पांंच मिनट ही ठहर पाई। वह मुझ पर जिस ढंग से पिला हुआ था, जिस ढंग से ठापों का क्रम था उसका, भक भक भक भक भचाक, भक भक भक भक भचाक, इतना उत्तेजक था कि मैं तुरंत ही खल्लास होने को वाध्य हो गयी। रोक ही नहीं पाई खुद को, उफ्फ्फ, आनंद का पारावार न रहा। झड़ गयी, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह। मगर अभी कहाँ, वह तो डटा हुआ था, लगातार गचागच चोदना चालू था। मैं शिथिल हो रही हूं या डटी हुई हूं, क्या परवाह उसे। करीब आधे घंटे तक कूटता रहा मुझे। थका कर मुझे अर्धमूर्छित अवस्था में पहुंचा दिया उसनें मुझे। नहीं नहीं करती रही, मना करती रही, सिर्फ म़ुह से, शारीरिक भाषा कुछ और कह रही थी, मेरी कमर चल रही थी, खुद ब खुद ऊपर उछल उछल कर लंड खा रही थी। थक रही थी, निचुड़ रही थी, पिस रही थी किंतु चुदती रही, चुदती रही, चुदती चुदती निहाल हो गयी मैं। उस आधे घंटे में मैं तीन बार झड़ी और निर्जीव सी हो गयी। हीरा अंततः पसीने से लतपत, मेरे निर्जीव पड़े शरीर को कचकचा कर कसा और वीर्य का फौव्वारा छोड़ने लगा मेरी कोख में, “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह, गय्य्य्य्या।” फिर छोड़ा, अलग हुआ मुझ से। तोड़ कर रख दिया था उसने मुझे। मेरी आंखें बंद थीं। मैं लंबी लंबी सांसें ले रही थी। तभी कोई और मुझ पर सवार होने लगा।                         “उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, नननननहींईंईंईं, और नहीं।” मैं कलप उठी। बमुश्किल आंखें खोल कर देखी, यह मंगरू था। साला हरामी मुंडू की गांड़ चोद कर अब मुझ पर चढ़ दौड़ा था।

“क्या नहीं? तुमको नहीं चोदा तो क्या चोदा।” वह मुंडू को चोदने के बाद फिर तैयार हो चुका था। वह छ: फुटा दानव, मेरी निर्जीव देह पर सवारी गांठने का मानों इंतजार ही कर रहा था। “सोचा था मैडम को चोदने का मौका मिलेगा। कोई बात नहीं, मैडम न सही मैडम की बहिन ही सही। मैडम से कम थोड़ी न हो तुम।” बड़ा गंदा था वह। उसके शरीर से बेहद गंदी बास आ रही थी। उसके लिंग पर मुंडू की गुदा से निकला मल भी लिथड़ा हुआ सूख चुका था, वैसे ही गंदा लिंग मेरी चुद चुद कर बेहाल चूत में ठूंसने लगा।

“उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नननननहींईंईंईं, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” मैं कराह उठी। “यह तो खेल का हिस्सा नहीं है?” विरोध की शक्ति थी नहीं। कितनी गंदी बन चुकी थी मैं। अपनी हालत पर बड़ी घिन हो रही थी मुझे।

“हट रंडी्ई्ई्ई्ई्ई कुत्ती। नहीं बोलती है साली बुरचोदी, चुपचाप चोदने दे। खेल वेल भूल जा कुत्ती कहीं की। अभी तो बाकी लोग भी चोदेंगे तुमको।” कहते हुए मेरे बेजान से शरीर को नोचने खसोटने लगा। मैं बेहाल, नुचती रही चुदती रही। पूरा लिंग सर्र से मेरी योनि मेंं सरका कर सटासट लगा ससेटने। करीब पच्चीस मिनट तक नोचते खसोटते चोदता रहा और जब चोदकर अलग हुआ तो मेरी चूत का भोंसड़ा बन चुका था। मुंडू का सूखा मल अब भीग कर मेरी भोंसड़ा बन चुकी चूत के अंदर बाहर लिथड़ चुका था। छि:, मैं क्या बन चुकी थी। अब तो विरोध की कोई औपचारिकता भी नहीं कर सकती थी। अभी मंगरू हटा, कि रफीक आ चढ़ा। वह लिक्कड़ मादरचोद मेरे जिस्म को ऐसे भंभोड़ने लगा मानो किसी मरे हुए जानवर की लाश भंभोड़ भंभोड़ कर खा रहा हो। उसके निबटते निबटते बोयो आ धमका। बोयो कम कमीना नहीं था। सीधा सादा सा दिखने वाला लौंडा कम हरामी नहीं था। अभी अभी सोमरी को चोद रहा था, अब सोमरी की चूत के रस और खुद के वीर्य से सना लंड मेरे मुंह में ठूंसने लगा।

“नहीं।” मैं बुदबुदाई।

“मुंह खोल हरामजादी।” एक थप्पड़ लगा दिया मेरे गाल पर। बेबस, लाचार, मुंह खोलने में ही भलाई थी। बोयो का गंदा लिंग अब मेरे मुंह में था।

“चूस।”

“ऊं्ऊं्ऊं्ऊ।” यह मना था मेरा। एक झापड़ और पड़ा मेरे गाल पर, और मैं चूसने लगी उसका गंदा लिंग। उबकाई आ रही थी किंतु चूसने को वाध्य थी या ऐसा दिखा रही थी, लेकिन चूसने लगी। दिखा रही थी कि मैं बेबसी में चूसने को वाध्य हूं लेकिन मजा आ रहा था मुझे। वह हरामी इस गलतफहमी में था कि मुझपर जबर्दस्ती कर रहा है और इसमें खुश था वह। इधर अबतक सलीम भी आ पहुंचा था। वह बिना कुछ बोले, यंत्र चालित सा मुझ पर सवार हो कर मेरे भोंसड़ा बन चुके चूत का कचूमर निकालने में मशगूल हो गया। मेरी आंखों से अब बेबसी के आंसू बह निकले, मैं नौटंकीबाज कम थोड़ी न थी। मैं सोच रही थी कि अपनी इस जोखिम भरी अपनी कामुक यात्रा में यह मैं क्या बन गयी। रंडी से भी बदतर स्थिति थी मेरी। जानबूझकर आ बैल मुझे मार वाली कहावत चरितार्थ कर बैठी थी मैं। सिर्फ गों गों की आवाज निकल रही थी मेरे मुंह से। बीस मिनट तक सलीम नें चोदा मुझे और उसके हटते ही बोयो कूदकर चढ़ गया मुझ पर। बोयो ठीक हीरा की तरह ही था। वह भी जंगली कमीना मादरचोद, आव देखा न ताव, भक्क से भोंक बैठा अपना लंड और भकाभक भकाभक लगा चोदने। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, वे करीब चार घंटे, अंतहीन चार घंटे, करीब करीब मार ही डाला था उन्होंने मुझे। बोयो जब चोद कर हटा तो मैं हिलने डुलने के काबिल भी नहीं रह गयी थी। ऐसी कुतिया की तरह हालत हो गयी थी मेरी, जिसे मुहल्ले के सारे कुत्ते लाईन लगा कर चोद कर हटे हों।

“हो गया तेरा? बड़ी आई थी खेलने” कांता मजा लेते हुए बोल रही थी। मैं बड़ी मुश्किल से आंखें खोली। देखी, सभी मेरे चारों ओर खड़े संतुष्ट, मुस्कुरा रहे थे। नुच चुद कर बेहाल थी, मगर तृप्त थी और मैं मन ही मन हंस रही थी उनको बेवकूफ बनाते हुए अपनी मनोकामना पूर्ण करने में सफलता हासिल करने पर।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” मेरी कराह निकली। बोल नहीं पायी कुछ।

“हो गया रे चांदनी। अब तू चांदनी से हो गयी हमारी चोदनी।” सलीम बोला।

“हां, हम सबकी चोदनी।” बोदरा बोला।

“लेकिन मैडम अब तक नहीं पहुंची।” रफीक बोला।

“का फरक पड़ता है। मजा तो खूब किया। एक और चोदनी जो मिल गयी। देख इसकी चूचियों को, चूत को, गांड़ को, मस्त माल मिली चोदने को।” सलीम बोला।

“अरे एक बज रहा है। खाना का क्या होगा?” यह मंगरू था।

“अबे मादरचोद, तुमको खाने की पड़ी है साले पेटू।” रफीक बोला। मैं कराहती हुई दाहिने हाथ से टेबुल की ओर इशारा किया।

“क्या है?”

“मोओओबा्आई्ईल।” बड़ी मुश्किल से बोल फूटे मेरे मुंह से। कांता अजीब नजरों से देखती हुई टेबल से मोबाइल ले आई। मैंने एक रेस्टोरेंट का नंबर लगाया और सबके खाने का ऑर्डर दिया। सभी बड़े चकित थे। किंकर्तव्यविमूढ़ थे। क्या मैं अबतक उन्हें बेवकूफ बना रही थी? अपने अपने स्थान में वे जम से गये थे। ऑर्डर देकर मैं फिर लुढ़क गयी। करीब एक घंटे बाद मैं थोड़ी संभली। अबतक वे पशोपेश में थे। मैंने उन्हें इत्मीनान रखने का आश्वासन दिया हाथ के इशारे से और उन्हें बैठने का इशारा करते हुए लड़खड़ाते कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ी। जब मैं कमरे से बाहर आई, मैं बदल चुकी थी, अब मैं चांदनी नहीं, कामिनी थी। लेकिन मेरी चाल बदली हुई थी। चुदी जो थी कुतिया की तरह। चूत की चटनी जो बन चुकी थी। बुर का भुर्ता जो बन चुका था।

.      “अरे मैडम?”

“हां मैं, चांदनी।” सन्नाटा सा छा गया वहां। “क्या हुआ?”

“ककककुछ नननननहींईंईंईं।”

“अरे बेवकूफो, अगर मैं मैडम ही रहती तो तुमलोग खुलकर नहीं खेलते ना मेरे साथ।”

“हां, वो तो है।” सलीम खिसियानी हंसी हंस रहा था।

“तभी दरवाजे की घंटी बजी, खाना आ चुका था। अबतक ये लोग आधे अधूरे कपड़ों में थे, अतः मैं ही खाने के पैकेट्स को रिसीव करके अंदर आई। अब सभी खुल चुके थे। कोई झिझक शरम नहीं थी।

“कपड़े मत पहनो तो भी चलेगा।” मैं बोली। “बोलो तो मैं भी खोल देती हूं अपने कपड़े।” मैं उनके उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर नंगी हो गयी। अब मैं दमक रही थी लेकिन मेरी योनि फूल कर कुप्पा बनी हुई थी। मेरी देखा देखी वे भी नंगे हो गये।

“ठीक है, ठीक है, चलो शाम तक कोई कपड़े नहीं पहनेगा।” सलीम घोषणा कर बैठा।

“ठीक है।” सब सहमत थे। सब बेशरमों की तरह आदमजात नंगे, आपस में ठिठोली करते हुए खाने की मेज पर आए। मैं सोच रही थी, अपने हवस की आग बुझाने की नित नये प्रयोग नें मुझे कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया था। इन रेजाओं से बदतर हालत हो गयी थी मेरी। रेजाओं से क्यों, वेश्याओं से भी बदतर हो गयी थी मैं। पता नहीं क्या सोच रहे होंगे सब मेरे बारे में, लेकिन मैं  बेफिक्र थी। नुचती रही, पिसती रही, चुदती रही लेकिन जानती थी कि सबकुछ मेरे नियंत्रण में ही था। मैं कोई अतिरिक्त जोखिम में थी भी नहीं, यदि मुझे लगता कि मेरे नियंत्रण से बाहर जा रहा है सबकुछ, तो खुद की असलियत प्रकट करके बचने का मार्ग तो था ही। खैर उसकी नौबत नहीं आई। अच्छी बात हुई, रोमांच का रोमांच और मजा का मजा। तकलीफदेह ही सही, अपनी क्षमता का आंकलन तो कर ही चुकी थी। एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं, सात सात मर्द, बारी बारी से अपने अपने तरीके से भोगा मुझे, नोचा, रगड़ा, निचोड़ा लेकिन वाह रे मैं कंबख्त रांड, झेल गयी सफलतापूर्वक। गर्व की अनुभूति हो रही थी। सोमरी और कांता के लिए यह एक अविश्वसनीय दृष्य था। जलन और ईर्ष्या से मुझे घूर रही थीं। अब भी, सबके सम्मुख बेशर्मी से नंगी बैठी मजे में बेझिझक बातें कर रही थी। हमारे बीच की सारी दूरियां, झिझक खत्म हो चुकी थी। मैं उन्हीं मजदूरों के समकक्ष खुद को पेश करने में सक्षम हो चुकी थी। ऊंच नीच का भेदभाव खत्म हो चुका था। वे स्वतंत्रता पूर्वक मुझसे चुहल कर रहे थे।

खाना खाते खाते, सलीम बोला, “तो मैडम…..”

“न न न मैडम नहीं।” मैं बीच में ही बात काट बैठी।

“अच्छा, कामिनी जी।”

“नहीं, ‘जी’ नहीं।”

“अच्छा, कामिनी।”

“नहीं, कामिनी नहीं।”

“फिर?”

“चांदनी।” मैं बोली।

“नहीं।” बोदरा बोला, शैतानी उसकी आंखों में नाच रही थी।

“फिर?” मैं सशंकित हुई।

“चोदनी।” बोदरा बोला। सभी ठठाकर हंस उठे। हंसते हुए कांता और सोमरी की चूचियां हिल रहे थे। मैं हंस पड़ी।             “ठीक है, आज से मैं तुम लोगों की चोदनी।” मैं सहमत थी अपने नये नामकरण पर। “अरे तुमलोग भी कुछ बोलो ना। खुल के बोलो। जो मन में है बोल डालो।” कांता और सोमरी की ओर देखती हुई बोली।

“का बोलें? चोदनी कहीं की।” मेरी असलियत जानकर झेंपती, वाचाल कांता का अब मुह खुला।

“हां, ये हुई न बात।”

“लंडखोर।” अब सोमरी का भी मुंह खुला।

“कुत्ती, बुरचोदी।” अब कांता बिंदास हो गयी।

“और ये हरामजादे कौन हैं?” मैं मर्दों को दिखा कर हंसते हुए पूछी।

“ई सब कुत्ते हैं, औरतखोर कुत्ते। औरत देखा नहीं कि लंड खड़ा, सब के सब मादरचोद एक नंबर के।” अब सोमरी भी रंग में आ गयी।

“अच्छा यह बताओ, तुम सब एक तरह के लोग इस ठेकेदार के हाथ कैसे लगे?” मैं पूछ बैठी।

“ई हम बताएंगे, लेकिन खाना खाने के बाद।” इतनी देर से चुप गांडू मुंडू बोला।

अपने को पूर्णतः लुटा कर अंत में मैंने अपनी पहचान पर से पर्दा हटा दिया। सुनकर एकाएक वे सन्न रह गये, लेकिन यह समझ कर कि यह सबकुछ मेरी खुद की मर्जी से हुआ है, प्रसन्नता के मारे खिल उठे। अब हमारे बीच कोई बड़े छोटे का दीवार नहीं था। अब देखिए, हम सब बेशरमों की तरह बिल्कुल नंगे, खाना खाने में लीन थे। खाना खाते खाते, सलीम बोला, “तो मैडम…..”

“न न न मैडम नहीं।” मैं बीच में ही बात काट बैठी।

“अच्छा, कामिनी जी।”

“नहीं, ‘जी’ नहीं।”

“अच्छा, कामिनी।”

“नहीं, कामिनी नहीं।”

“फिर?”

“चांदनी।” मैं बोली।

“नहीं।” बोदरा बोला, शैतानी उसकी आंखों में नाच रही थी।

“फिर?” मैं सशंकित हुई।

“चोदनी।” बोदरा बोला। सभी ठठाकर हंस उठे। हंसते हुए कांता और सोमरी की चूचियां हिल रहे थे। मैं हंस पड़ी।             “ठीक है, आज से मैं तुम लोगों की चोदनी।” मैं सहमत थी अपने नये नामकरण पर। “अरे तुमलोग भी कुछ बोलो ना। खुल के बोलो। जो मन में है बोल डालो।” कांता और सोमरी की ओर देखती हुई बोली।

“का बोलें? चोदनी कहीं की।” मेरी असलियत जानकर झेंपती, वाचाल कांता का अब मुह खुला।

“हां, ये हुई न बात।”

“लंडखोर।” अब सोमरी का भी मुंह खुला।

“कुत्ती, बुरचोदी।” अब कांता बिंदास हो गयी।

“और ये हरामजादे कौन हैं?” मैं मर्दों को दिखा कर हंसते हुए पूछी।

“ई सब कुत्ते हैं, औरतखोर कुत्ते। औरत देखा नहीं कि लंड खड़ा, सब के सब मादरचोद एक नंबर के।” अब सोमरी भी रंग में आ गयी।

“अच्छा यह बताओ, तुम सब एक तरह के लोग इस ठेकेदार के हाथ कैसे लगे?” मैं पूछ बैठी।

“ई हम बताएंगे, लेकिन खाना खाने के बाद।” इतनी देर से चुप गांडू मुंडू बोला। इसी तरह चुहलबाजी करते हुए हमने खाना खाया। खाना खाने के बाद हम सब उसी तरह नंगे बैठ गये ड्राईंग रूम में। मैंने ही मना किया था कपड़े पहनने से। ऐसा लग रहा था मानों हम सब सभ्यता से कोसों दूर आदिम युग के मानव हों। पुरुषों की नजरें हम स्त्रियों की नग्न देह पर, खास कर यौनांगों पर ही चिपकी थीं। उसी प्रकार हम स्त्रियों की नजरें भी पुरुषों की नग्न देह पर, खासकर उनके यौनांगों पर जमी हुई थीं। स्पष्ट था कि कुछ विश्राम के पश्चात हम फिर गुत्थमगुत्था होने वाले थे। लेकिन अब कुछ हद तक कमान अब मेरे हाथों में थी। कुछ हद तक का मतलब यह था कि उनकी स्वतंत्रता मैं भी हनन नहीं करना चाहती थी वरना मैं अपने मकसद से शायद कुछ दूर ही रह जाती।

“हां, तो मुंडू, अब बोल, क्या बोल रहा था।” मैंने बात शुरू की।

“क्या बोल रहा था?”

“वही, तुम सब, एक जैसे कमीनों का समूह कैसे बना?”

“ओह, वह बात? तो सुनिए।”

“‘सुनिए’ नहीं, ‘सुन’।” मैं तत्काल बोली।

“अच्छा बाबा सुन। सबसे पहले हम मंगरू से मिले। यह आज से करीब दस साल पहले का बात है।”

“नहीं, एकदम शुरू से।”

“क्या मतलब?”

“मतलब, जब से तुझे गांड़ मरवाने की आदत लगी, तब से।” मैं बीच बोली और सभी हंस पड़े।

“हां हां, वहां से, वहां से।” सब एक स्वर में बोल उठे। एक पल को मुंडू रुका। फिर बोलने लगा:-

“ई सब शुरू हुआ स्कूल समय से। बीस साल पहले से। तब हम दसवीं में पढ़ते थे। हम क्लास में सबसे सुंदर थे। सब दोस्त हमको छेड़ते थे, मेरा छाती दबा देते थे, मेरा गांड़ दबा देते थे, मेरा गाल नोच लेते थे। हमको बहुत शरम लगता था लेकिन अच्छा भी लगता था। हमको लड़की लोगों के साथ खेलना अच्छा लगता था। हमारे क्लास में एक लड़का था रोहित। पढ़ने लिखने में एक नंबर का फंटूश। वह हम सबसे उमर में बड़ा था लेकिन एक नंबर का बदमाश था। नौवीं में फेल हुआ, फिर दसवीं में दो बार फेल होकर हमारे ही क्लास में था। हम उस समय पंद्रह साल के थे और रोहित करीब अठारह साल का था। वह हमेशा ही मेरे पीछे पड़ा रहता था।वह हम सबसे बहुत ज्यादा चलाक और गंदा था। गंदा गंदा किताब रखता था अपने पास।”

“गंदा किताब मतलब?” मैं पूछी।

“गंदा किताब मतलब औरत मरद का चोदा चोदी वाला कहानी किताब, फोटो वाला।”

“अच्छा, फिर?” हमारी उत्सुकता बढ़ गयी।

“हमारा घर स्कूल से ज्यादा दूर नहीं था। हम पैदल ही स्कूल जाते थे। एक दिन शाम को स्कूल से छुट्टी के बाद घर लौट रहे थे तो रोहित भी मेरे पीछे पीछे आ गया। स्कूल और घर के बीच एक बहुत पुराना बड़ा सा टूटा फूटा खंडहर था। जैसे ही हम उस खंडहर के पास से गुजरने लगे, रोहित पीछे से मेरे पास आया और बोला, “अरे कैलाश, रुक न।”

“काहे?” मैं बोला।

“चल तुझे एक चीज दिखाते हैं।” वह बोला। हम उससे पीछा छुड़ाना चाहते थे, इसलिए रुके नहीं। वह मेरी बांह पकड़ कर उस खंडहर की ओर ले चला।

“नहीं, हम घर जाएंगे।” मैं उसके हाथ से छूटने की कोशिश करने लगा। लेकिन वह हमसे दुगना ताकतवर था। हमें करीब करीब घसीट कर खंडहर में ले आया।

“चल बैठ यहां।” एक चबूतरे पर जबर्दस्ती बैठा दिया।

“नहीं हम जाएंगे।”

“अरे चले जाना, जरा बैठ तो।”

“जल्दी दिखाओ, क्या दिखाना है।” हम पीछा छुड़ाना चाहते थे।

वह अपना स्कूल बैग खोला और उसमें से एक किताब निकाला और हमें देते हुए बोला, “ले देख।” हम उसके हाथ से किताब लेकर जैसे ही पहला पन्ना खोले, देख कर शरम से पानी पानी हो गये। दो आदमी नंगे थे और एक दूसरे को चूम रहे थे।

“यह क्या है?” हम बोले।

“अरे आगे तो देख।” वह बोला। हम अगला पन्ना खोले। उसमें एक आदमी दूसरे आदमी का नुनु चूस रहा था।

“नुनू क्या?” मुझे और सभी को मजा आ रहा था।

“नुनू मतलब लौड़ा।” मुंडू बोला।

“ठीक है आगे बोलो।”

उस फोटो को देख कर हम बोले “छि:”, जबकि हमें देखने में मजा आ रहा था।

“छि: क्या, आगे तो देख।” कहते हुए रोहित मेरे बगल में बैठ गया। हमने अगला पन्ना खोला तो मेरा मुंह खुला का खुला रह गया। इसमें उनके लौड़े बड़े बड़े और खड़े थे, दोनों एक दूसरे के लौड़ों को पकड़े हुए थे। हमारे सारे शरीर मेंं सुरसुरी होने लगी। हमें शरम भी आ रहा थी।

“आगे देख।” रोहित बोला और पन्ना पलट दिया। हे भगवान, यहां देखा तो एक आदमी एक लड़के को गोद में उठा कर उसकी गांड़ में लौड़ा डाला हुआ था। हम आंखें फाड़े देखते रह गये। वह छोटा सा, करीब हमारी उमर का ही लड़का था, जिसकी गांड़ में एक पचास साठ साल के बुड्ढे का लंड घुसा हुआ था। उस लड़के को वह बूढ़ा चूम रहा था। वह लड़का आंखें बंद किये हुए खुश दिख रहा था। इधर हमें पता नहीं क्या हो रहा था, हम समझ नहीं पा रहे थे। हमारे सारे बदन में चींटियां दौड़ रही थीं। हमनें महसूस किया कि रोहित का दाहिना हाथ मेरी कमर से लिपट गया था और उसने धीरे से मेरा बांया हाथ अपने पैंट के ऊपर से ही ठीक अपने लौड़े के ऊपर रख दिया।

“ई का कर रहे हो?” हम बोले, मगर हाथ नहीं हटाए। हम शरमा रहे थे मगर मना नहीं कर पा रहे थे। ऐसा लग रहा था रोहित नें हमपर जादू कर दिया है और हम उसके काबू में चले गये थे। अब रोहित धीरे धीरे मेरी छाती दबाने लगा। हमें बड़ा अच्छा लग रहा था। वह मेरे गाल को चूमने लगा। हमें यह भी बहुत अच्छा लग रहा था।

“कुछ नहीं पगले, प्यार कर रहे हैं।” वह बोला। हमें लगने लगा कि उसके पैंट के अंदर कोई केला डाला हुआ है जो शुरू में चिनिया केला जैसा था, अब सिंगापुरी केला जैसा हो गया था। अब रोहित धीरे से अपने पैंट का हुक खोल कर चेन खोल दिया। अपने चड्ढी को सरका कर अंदर का सिंगापुरी केला बाहर निकाल लिया। बाप रे बाप, करीब सात इंच का उसका लौड़ा था वह। काला सांप जैसा। टाईट, मोटा सांप। हमारा दिल जोर से धड़कने लगा।

“ले, पकड़ इसे।” उसने मेरा हाथ अपने लौड़े के ऊपर रख दिया। हम तो उसके वश में थे, पकड़ लिए, जैसा वह बोला। बाप रे, कितना गरम था। घबरा कर जैसे ही हाथ हटाए, बोला, “डरो मत, सहलाओ इसको।” वह हमें चूमता जा रहा था और मेरी छाती दबाता जा रहा था। हमेंं बड़ा अच्छा लग रहा था यह सब। जैसा उसने कहा, हम सहलाने लगे उसका लंड। हमपर नशा चढ़ रहा था। अब वह हमारे कपड़े खोलने लगा।

“नननननहींईंईंईं, नननननहींईंईंईं,” बस इतना ही बोले धीरे से। रोके नहीं। रोकने का मन भी नहीं कर रहा था।

“हां हां,” बोलते हुए खोलता चला गया मेरे कपड़े।

“न न न न नहीं।” हम उससे लिपटते हुए, शरमाते हुए बुदबुदाए।

“शरमाओ मत मेरी रानी। खोलने दे। नंगी हो जा। दिखा तो अपना सुंदर बदन। बहुत दिन से तरस रहे हैं तेरे लिए।” वह हमसे इस तरह बात कर रहा था, जैसे कि हम कोई लड़की हैं। वह हमें पूरा नंगा कर दिया। वह किताब न जाने कब मेरे हाथ से छूट कर गिरा नीचे, हमें पता ही नहीं चला। हम लड़कियों के समान शरमा रहे थे। फिर खुद भी एक एक करके अपने कपड़े खोलने लगा और अंत में पूरा नंगा हो गया। हम ठहरे साढ़े चार फुटिये चिकने लड़के और वह पौने छ: फुट का लंबा तगड़ा जवान लड़का। हमारी छाती लड़कियों की तरह ही दिखती थी, जो कि अब भी है। बदन पूरा चिकना, और लौड़ा सिर्फ अढ़ाई इंच का सामने झूल रहा था, बिना झांट वाला। वहीं उसका बदन लंबा तगड़ा, सात इंच लंबा और करीब अढ़ाई इंच मोटा काला लंड सामने उठक बैठक कर रहा था। नाभी और लंड के बीच, और लंड के चारों ओर काले काले बाल भरे हुए थे। बड़े बड़े अंडू लंड के जड़ से नीचे झूल रहे थे। हम देखते रह गये उसका बदन। वह धीरे धीरे हमारेरे पास आया और हमसे सट कर खड़ा हो गया। उसका लंड हमारी नाभी को छू रहा था। हमें जैसे उसनें स्टैचू बना दिया था, ऐसा स्थिर खड़े रह गये थे हम। उसने हमें अपनी बांहों में भर लिया और हमें फिर से चूमने लगा। हम किसी बच्चे की तरह उसकी छाती से चिपक गये थे। हम पिघल रहे थे उसकी बांहों में। हमारी आंखें बंद हो गयी थीं। हमारा हाथ अपने आप उसके लंड पर चला गया और हम सहलाने लगे उसके लंबे मोटे लंड को। यह हमें क्या होता जा रहा था हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह धीरे से हमें अपनी बांहों में समेटे नीचे घास पर लेट गया।

“आई लव यू मेरी जान।” मेरे कान पर बड़े प्यार से बोला। हम तो अब अपने को लड़की ही समझ बैठे थे। आगे क्या होगा इसका अंदाजा भी नहीं था हमको। वह अब हमारे चिकने, गोल गोल गांड़ को सहलाने लगा। हमें बड़ा आनंद आ रहा था। होश ही नहीं था हमको। हमारे गांड़ को धीरे धीरे दबाने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” हम सिसक उठे। वह मुझे लिटा कर अब मेरी छाती को चूमने लगा, चूसने लगा। हम पागल होते जा रहे थे। धीरे धीरे वह और नीचे जाने लगा, और नीचे, हमारी नाभी तक चूमता चला गया। और नीचे, और नीचे, हमारे ढाई इंच के लंड तक। हमारे लंड को आईसक्रीम की तरह चूसने लगा, “ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” हम अपने आवाज को रोक नहीं पा रहे थे। इसके बाद वह मुझे धीरे से पलट दिया और हम उसके गुड़िया की तरह पलट गये। अब वह हमारे पीठ पर चूमने लगा, चूमते चूमते नीचे जाने लगा, और नीचे, और नीचे। वह हमारे गांड़ तक पहुंच चुका था। हमारे गांड़ को चूमने लगा, ओह भगवान, ओह भगवान, हम तो हवा में उड़ने लगे। वह हमारे गांड़ के बीच दरार को चाटने लगा। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, गजब, हम पागल हुए जा रहे थे। वह हमारे गांड़ के छेद में जीभ डाल चुका था और चाट रहा था।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, छि:, वहां नहीं वहां नहीं आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” हम तड़प कर बोले।

“बस बस, यहीं रे पगली, बस, यहीं।” वह चाटता रहा चाटता रहा, हमारे मना करने के बावजूद चाटता रहा और हम अपने आप अपने पैर फैला बैठे। अब वह हमें पलट कर उठा लिया अपनी गोदी में। हम किसी बच्चे की तरह उसकी गोद में थे। हमनें देखा वह मुंह से थूक निकाल कर मेरी गांड़ पर लगा रहा था। फिर और थूक लेकर अपने लंड पर लगा रहा था।

“यह यह क क क क्या कर रहे हो?” हम उसकी बांहों में सिमटे किसी प्रकार बोले।

“कुछ नहीं मेरी रानी, बस अब सबसे मजेदार खेल खेलेंगे।” हमें चूमता हुआ बोला। हमारे सोचने समझने की ताकत खतम हो गई थी। तभी उसनें हमें थोड़ा हवा में उठाया और हमें ऐसा लगा उसका लंड हमारे गांड़ के फांक के बीच फंस रहा है। हे भगवान, तो क्या, तो क्या अब यह हमारे साथ वही करने वाला है जो फोटो में हमनें देखा था। मतलब हमारे गांड़ में अपना लंड घुसाएगा क्या? घबरा गये हम।

“नहीं, नहीं ये मत करो।” हम डर के मारे बोले।

“काहे न करें।”

“ऐसा नहीं हो पाएगा हमसे।”

“काहे नहीं हो पाएगा, मेरी जान। सब हो पाएगा।” वह हमें चूमते चाटते हुए बोला। इससे पहले कि हम और कुछ बोल पाते, उसनें हमें अपने लंड पर बैठाना शुरू कर दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई,” उसके लंड का अगला हिस्सा हमारे टाईट गांड़ को चीरता हुआ घुस रहा था और हम दर्द से छटपटाने लगे और चिल्लाने लगे।

“चुप हरामजादी, चिल्लाओगी तो और लोग भी आ जाएंगे। फिर सब तेरी गांड़ चोदना शुरू कर देंगे।” एक थप्पड़ मेरे गाल पर मार कर डरावनी आवाज में बोला। हम डर गये लेकिन दर्द से हमारे आंखों से आंसू निकलने लगे थे। इधर हमारा गांड़ फटता चला गया और उसका उतना लंबा और मोटा लंड घुसता चला गया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नननननहींईंईंईं, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह फट गया गांड़।” हम रोते हुए बोले।

“कुछ नहीं हुआ, चुप रहो मेरी रानी। अब देखो, पूरा लंड घुस गया। अब तुम्हें मजा आएगा।” हमें बहलाने लगा।

“नहीं नहीं, बहुत दर्द हो रहा है।” हमारे आंख का आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। हम छटपटा कर हटना चाहते थे लेकिन वह बहुत ताकतवर था। हमें हिलने भी नहीं दे रहा था। कुछ देर तक वैसा ही स्थिर रहा। धीरे धीरे हमारे गांड़ का दर्द भी कम होने लगा। ताज्जुब लग रहा था हमको। उसका उतना बड़ा लंड हमारे गांड़ में थंसा हुआ था लेकिन अब दर्द कम हो रहा था। वह एक हाथ से हमारा कमर पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से मेरा लंड सहला रहा था। अब हमको अच्छा लग रहा था।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” हम सिसक उठे। वह समझ गया कि अब हमारा दर्द कम हो गया।

वह बड़े प्यार से हमें चूमता हुआ बोला, “ओह मेरी जान, अब ठीक लग रहा है ना?”

“हां, हां, अब ठठठठठीक हहहहैऐऐऐ।” हम शरमा के उसकी छाती पर सिर रख दिए।

“अय हय मेरी प्यारी रानी, ऐसे शरमाओगी तो हम मर ही जाएंगे।” वह मुझे चूमते हुए बोला। अब धीरे धीरे हमें ऊपर उठाने लगा, उसका लंड हमारे गांड़ से बाहर निकल रहा था। वह हमारे लिए एकदम नया अनुभव था। बड़ा अच्छा लग रहा था। अभी उसका लंड पूरा बाहर निकला भी नहीं था कि भचाक से फिर बैठा दिया अपने लंड पर।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” हम चीख पड़े फिर दर्द से। इस बार थोड़ा कम था दर्द। “दर्द हो रहा है आह।”

“बोला न, चिल्ला मत हरामजादी कुतिया।” एक झांपड़ और पड़ा मेरे गाल पर।

“मारो मत ना।” हम फिर रोने लगे।

“ओय ओय मेरी रानी। रो मत मेरी जान।” पुचकारते हुए हमसे बोलने लगा।

“तुम मारते हो तो।”

“अच्छा नहीं मारेंगे।” हमें चूमते हुए बोला। “मगर तुम चिल्लाओगी नहीं अब।” उसकी बातों से हमें थोड़ी राहत मिली।

“अच्छा नहीं चिल्लाएंगे।” हम सिसकते हुए बोले। अब धीरे धीरे वह अपना लंड हमारी गांड़ में अंदर बाहर करने लगा। थोड़ी देर में हमें मजा आने लगा। अब दर्द के जगह थोड़ा जलन हो रहा था, लेकिन फिर भी मजा आ रहा था। हम खुद को लड़की के समान समझने लगे अब। धीरे धीरे उसका स्पीड बढ़ने लगा। दनादन कमर चलाने लगा और हमारे गांड़ में गपागप लंड पेलने लगा।

“आह आह आह ओह ओह ओह अम्मा अम्मा, ओह राजा ओह राजा, चोद, चोद।” मह मस्ती में भर के बोलने लगे।

“आह आह अब आया न मजा मेरी रानी। अब देख हम कैसे चोदते हैं तुझे।” इतना कहकर अब हमें कुत्ती की तरह झुका दिया और पीछे से मेरी गांड़ में लंड डालने लगा। मेरी कमर पकड़ कर फिर से किसी कुत्ते की तरह मेरी गांड़ चोदना शुरू किया।

“आह मेरे रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आह, ओह ओह ओह चोद मेरी गांड़, ओह आह अपनी रानी बना ले मेरे रज्ज्ज्जा, चोद हमें चोद।” हम पगला गये थे उस समय। गांड़ उछाल उछाल के लंड खाने लगा। वह मेरा लंड भी पकड़ कर हिलाता जा रहा था। मेरी छाती भी दबाता जा रहा था। हमें बड़ा ही सुख मिल रहा था। करीब पंद्रह बीस मिनट तक चोदने के बाद वह मेरी छाती को जोर से दबा कर हमसे चिपक गया। ऐसा लगा हमारी सांस रुक जाएगी। तभी ऐसा लगा कि मेरी गांड़ में पिचकारी छूटा हो। गरमागरम पानी मेरी गांड़ में फर्र फर्र छूटने लगा।

“आह ओह आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह मेरी रानी्ई्ई्ई्ई्ई, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी रंडी्ई्ई्ई्ई्ई।” कहते हुए चिपका रहा हमसे। तभी मेरा लंड भी टाईट हो गया और हम कांपने लगे। हमारे ढाई इंच लंड से भी सफेद सफेद गोंद जैसा फचफचा के कुछ निकलने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” ऐसा लगा जैसे हम हवा में उड़ रहे हों। बहुत आनंद आ रहा था। कुछ ही सेकेंड में मेरा बदन ढीला हो गया। उधर हमारे ऊपर से रोहित भी लुढ़क गया।

“बहुत मजा आया मेरी रानी। बहुत मस्त गांड़ है रे तेरा। चोद के दिल खुश हो गया। आज से तू हमारी रानी हो गयी।” वह बहुत खुश था। हम भी जिंदगी में पहली बार इतने खुश हुए।

“हां मेरे राजा। तुम बड़े अच्छे हो। बहुत मजा आया। आज से हम तेरी रानी बन गये। बस तेरी हो गयी, अब तू हमें रंडी बना या कुत्ती बना।” हम उससे लिपट कर चूमने लगे। बड़ा प्यार आ रहा था हमें उस पर। उस दिन पहली बार गांड़ चुदवा कर जो मजा मिला कि हम फिदा हो गये उस पर।

“यह किताब हमें दे दो।” हम बोले।

“ले ले मेरी रानी, ले ले।” कहते हुए उसनें वह किताब हमारे बैग में डाल दिया। उसके बाद हम अपने कपड़े पहन कर उस खंडहर से निकले। चलने में थोड़ी तकलीफ हो रही थी। गांड़ जल रहा था लेकिन फिर भी अच्छा लग रहा था। हमारी जिंदगी बदल गयी थी उस दिन। उस दिन के बाद रोहित हमको रोज उसी खंडहर में ले जा कर चोदता रहता था। धीरे धीरे यह हमारा आदत बन गया। अब बिना गांड़ चुदवाए हमको चैन नहीं मिलता था।

एक दिन रोहित स्कूल नहीं आया तो हमको बहुत खराब लग रहा था। बड़ा बेचैन था। हमको कुछ सूझ नहीं रहा था। फिर हमारी नजर सबसे पीछे बैठने वाले हमारे क्लास के ही रोहित की उमर के ही आस पास का एक लड़के शाहिद पर पड़ी। वह मुसलमान था, रोहित की तरह ही मजबूत लड़का था। वह पांच फुट लंबा काला लड़का था। वह भी हमें छेड़ने में पीछे नहीं रहता था। अंतिम पीरियड में हम भी पीछे चले गये और शाहिद के बगल में बैठ गये।

“क्या बात है चिकने। आज हमारे साथ?” वह मेरे गाल को नोचता हुआ बोला।

“हां, सोचा आज पीछे बैठ के देखें।” हम उसके जांघ पर हाथ रखते हुए बोले। वह हमको देखा और मुस्कुरा उठा।

“अबे, यहां काहे हाथ रख रहा है, यहां रख।” कहकर उसने मेरा हाथ अपने पैंट पर ठीक लंड के ऊपर रख दिया। हमनें भी बेशरम होकर पैंट के ऊपर से ही उसके लंड को पकड़ लिया। उसका लंड टाईट होने लगा। वह मुस्कुरा उठा।

“स्कूल के बाद चल मेरे साथ।” वह मेरे कान में बोला। हम समझ गये, हमारा निशाना सही जगह पर लगा है। स्कूल के बाद जैसे ही हम निकले, पीछे पीछे शाहिद भी आ गया।

“अबे, कहां चला? क्लास में तो मेरा लौड़ा पकड़ रहा था? भाग कहां रहा है?” वह पीछे से आ कर हमसे बोला।

“भाग कहां रहे हैं?”

“तो चल कहीं अकेले में। दिखाता हूं अपना लंड।” हम गनगना उठे उसकी बात सुनकर।

“चल तो रहे हैं।”

“कहां?”

“उस खंडहर में।” हम खंडहर दिखाते हुए बोले।

“अबे, तू पहले कभी गया है वहां?”

“हां।”

“किसलिए?”

“उसी लिए, जिसके लिए हम जा रहे हैं अभी।”

“अरे साले, किसके साथ?” वह ताज्जुब से बोला।

“राहुल के साथ।” हम बेधड़क बोले।

“राहुल के साथ? वाह साले। वह तो बड़ा हरामी है, क्या किया तुम लोगों नें वहां?” वह जानने के लिए उतावला हो उठा।

“उसनें हमको एक किताब दिखाया।”

“कैसा किताब?”

“फोटो वाला।”

“अबे कैसा फोटो वाला?”

“मर्द मर्द वाला।”

“साले पहेली न बुझा मादरचोद।”

“नंगा फोटो, ऐसा, लो देखो।” कहते हुए हमने वह किताब निकाल कर उसके हाथ में थमा दिया। उसने झपट कर मेरे हाथ से वह किताब ले लिया। अबतक हम खंडहर तक पहुंच चुके थे। वह किताब खोलने ही वाला था कि हम बोले, “यहां नहीं, यहां नहीं, खंडहर के अंदर चलो, कोई देख लेगा तो बोलेगा, हमलोग स्कूल में यही सब सीखते हैं।” हम उसे खींचते हुए खंडहर में ले आए, उसी जगह पर जहां रोहित और हमारे बीच चोदा चोदी होता था। वहां पहुंचकर हम बैठ गये इतमिनान से और जैसे जैसे वह किताब के अंदर का फोटो देखता गया, उसका लंड खड़ा होता गया। वह अब मुस्कुरा रहा था।

“तो ये सब देखते हो यहां तुमलोग?”

“देखा तो सिर्फ एक बार।” हम बोले।

“फिर? उसके बाद?”

“उसके बाद से हम यह करते हैं।” हम बेशरमी से बोले। हम देख रहे थे कि शाहिद का पैंट आगे से फूल गया था और वह पैंट के ऊपर से ही लंड पर हाथ रख चुका था।

“क्या मतलब?” हैरानी से बोला वह। “करते हो?”

“हां।” हम मुस्कुरा रहे थे।

“तुम कि वह?”

“करता तो रोहित है मेरे साथ।”

“वाह बेट्टा, रोहित तो बड़ा हरामी है? अकेले अकेले तेरे साथ मस्ती किये जा रहा है और हमको पता ही नहीं। चल साले चिकने लंडखोर, हमारा लौड़ा भी खड़ा हो गया। अब तू मेरा लंड भी खाने के लिए तैयार हो जा। आज तक किसी लौंडे का गांड़ नहीं चोदा, आज चोदेंगे।” कहते कहते फटाफट अपने पैंट खोलने लगा। शर्ट नहीं खोला वह। इधर हम भी चुदवाने के लिए पूरे नंगे हो गये। हमारा बदन देखकर वह दंग रह गया।

“शर्ट भी खोल ना।” हम बोले।

“ले बे चिकने खोल दिया।” कहते हुए शर्ट भी उतार बैठा। हम भी उसके नंगे बदन को देख कर सनसना उठे। हमसे उमर में बड़ा, हट्ठा कट्ठा, कला भुजंगा, गजब दिख रहा था। इस उमर में भी एकदम जवान लग रहा था। पूरे बदन पर बाल ही बाल उगा हुआ था। छाती पर, पेट पर, जांघों पर, और लंड के चारों तरफ, बाल ही बाल। उसका लंड तो और ही गजब। लंबा करीब आठ इंच का, मोटा करीब ढाई इंच का। लंड के सामने का सुपाड़ा खुला हुआ था, चमड़ा था ही नहीं वहां। सुपाड़ा गोल, गुलाबी, चमचमा रहा था। एक बार तो डर ही गये हम।

” बाप रे, इत्ता बड़ा्आ्आ्आ्आ्।” मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।

“डर गया बे चिकना?”

“हां, मगर….”

“मगर क्या जल्दी बोल हरामी, चोदने के लिए मरा जा रहा हूं मां की चूत।”

“मगर कोशिश करूंगा।” डरते हुए हम बोले।

“तू कोशिश कर हम पूरा ठोकेंगे चिकने गांडू।”

“देख शाहिद, तू हमें चिकना नहीं चिकनी बोल, लड़की समझ ले हमें। अच्छा लगता है। रोहित भी ऐसा ही करता है।” हम शाहिद का लंड हाथ से पकड़ते हुए बोले। वैसे मेरा ढाई इंच का पतला नुनू भी टनक गया था, जिसे देखकर शाहिद मुस्कुरा उठा था। लेकिन मेरी छाती के उभार और बाल रहित चिकना, लड़कियों जैसा बदन और गोल गोल गांड़ देख कर उसके मुंह में पानी आ गया था।

“वाह, बहुत मस्त माल है रे तू तो। एकदम लौंडिया की तरह। लौंडिया भी फेल, तेरे सामने तो, खाली एक चूत बनाना भूल गया भगवान।” वह मुझे बांहों में भर कर बोला।

“हटिए जी, आप भी ना बस।” लड़कियों की तरह शरमाते हुए बोला।

“अय हय, ऐसे शरमाओगी तो मर ही जाएंगे हम।” अब वह हमें चूमने लगा। हम भी उसके नंगे बदन से चिपक गये। उसका आठ इंच का टनटनाया लंड ठीक मेरे नाभी के नीचे चुभ रहा था। उसने ज्यादा समय नहीं गंवाया। मेरी छाती को दबाते हुए बोला, “चल मेरी जान, अब हम शुरू करते हैं।”

“क्या जी?”

“और क्या, चुदाई, तेरी मस्त गांड़ की चुदाई।” वह मुझे ले कर उसी घास पर लिटा दिया। चित्त। वह मुझ पर चढ़ बैठा। मेरी टांगों को फैला कर उठा दिया। हम डर रहे थे कि उसका इतना मोटा और लंबा लंड ले सकेंगे कि नहीं, लेकिन अब हमारे लिए और कोई रास्ता भी नहीं था, बचने का। जानते थे कि थोड़ा मुश्किल होगा लेकिन अगर थोड़ा हिम्मत कर लें तो जरूर ले सकेंगे, यही सोच रहे थे हम। आखिर पहले पहल थोड़ा मुश्किल से ही सही, रोहित का लंड भी तो ले चुके थे हम। अब हमारे दोनों टांगों के बीच आ गया वह और जैसे लड़कियों को चोदा जाता है ठीक वैसे ही हम पर सवार था। अपने लंड पर थूक लगा कर मेरी गांड़ के दरवाजे पर टिका दिया। हमारा दिल बहुत बुरी तरह धड़क रहा था। शाहिद नें हमारे गांड़ के नीचे हाथ रखा और अपनी कमर से एक झटका मारा।

“आह्ह, धीरे, धीरे।” हम डर के मारे बोले। उसके लंड का सुपाड़ा फच से मेरी गांड़ में घुस गया था।

“हुम,”

दर्द नहीं हुआ। बेमतलब का डर रहे थे हम। शाहिद को रास्ता मिल गया था। समझ गया कि हमें दर्द नहीं हुआ, नहीं तो तड़प उठते हम। फिर वह धीरे धीरे अपना लंड मेरी गांड़ में उतारता चला गया।

“ले, आह थोड़ा और ले।” घुसता ही गया, घुसता ही गया। जब थोड़ा ही लंड घुसना बाकी था तब हमारी गांड़ के अंदर, अंतड़ियों में दर्द होने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, दर्द हो रहा है।” हम दर्द के मारे बोल पड़े।

“बस मेरी जान, थोड़ा ही रह गया। यह भी ले ले।” कहकर एक जोर का धक्का लगा कर पूरा लंड घुसा दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ हमारा अंतड़ी फट रहा है आह।” हम दर्द से छटपटाने लगे।

“बस हो गया रानी।” अब वह रुका। हमारा दर्द इस थोड़े समय रुकने से ही गायब हो गया और वह जीत गया, हमें जीत लिया। हम उससे चिपक कर एक बदन हो गये। अब कहां रुकने वाला था वह। हमें चोदने में मगन हो गया।

“आह राजा, ओह राजा, इस्स मेरे प्यारे चोदू, आह।” हमारे आनंदभरे आवाज से खुश होकर भच्च भच्च चोदने लगा।

“हां हां हां मेरी प्यारी रानी। आह हुं हुं हुं हुं।” हमारी छातियों के उभारों को मसल मसल कर चोदता रहा, चूमते हुए चोदता रहा, कमर पकड़ कर चोदता रहा, उछल उछल कर रगड़ रगड़ कर चोदता रहा। बाप रे बाप, पूरे आधे घंटे तक ठोकता रहा। इस बीच, “आ्आ्आ्आ्आ्आ इस्स्स्स,” हमारे लंड का पानी भी निकल गया। करीब आधे घंटे बाद हमें कस के दबाया और लंड से पानी छोड़ने लगा।

“आह्ह्ह्ह स्स्स्स्स्सा्आ्आ्आ्आली्ई्ई्ई् रंड्ड्ड्ड्डी्ई्ई्ई्ई्ई,” हांंफते, डकारते पूरी तरह झाड़ दिया अपने लंड का पानी और तब जा कर छोड़ा। पूरा निचोड़ कर छोड़ा हमें।

“आह रज्ज्ज्जा, बहुत अच्छे हो तुम।” हम उससे लिपट कर बोले।

“हां मेरी प्यारी रंडी, बड़ी प्यारी हो तुम। बड़ा मस्त है तेरा बदन, बड़ा मस्त है तेरी गांड़। दिल खुश हो गया। आज से तू मेरी रानी, मेरी रंडी।”

“हां रज्ज्ज्जा, हम तेरी हो गये आज से, हम तेरी रानी, तेरी रंडी, जो बोलो सब।” बड़ा प्यार आ रहा था हमें उस पर। पागलों की तरह उसके गालों, होठों को चूमने लगे। उसके बाद हम अपने कपड़े पहन कर अपने अपने घर चले गये। तब से यह सिलसिला चलता रहा। रोहित को भी पता चल गया कि शाहिद भी हमारा आशिक है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसे तो हमको चोदने से मतलब था, जब चोदने का मन होता चोद लेता था। बाकी हम और किससे चुदवा रहे हैं उससे उसको कोई मतलब नहीं था। इसी तरह हमें लगता है, हमारे क्लास के सभी लड़के हमें चोद चुके थे। हमारी हालत रंडी की तरह हो गयी। गांड़ मरवाते मरवाते, हमारा पढ़ाई में मन नहीं लगने लगा तो आगे नहीं पढ़ पाया। घरवालों ने देखा कि हमको पढ़ाना पैसा बरबाद करना है, सो पढ़ाई छुड़वा दिया। फिर हमारे बाप नें इस ठीकेदार, हर्षवर्धन दास, जो सिविल इंजीनियर भी है, के पास काम पर लगवा दिया। पढ़ना लिखना जानता था सो सुपरवाइजर बना दिया। हां, यह इंजीनियर भी हमारे स्कूली लड़कों की तरह ठीक पहचाना हमको। हमारा चेहरा और बदन के बनावट पर फिदा हो गया। वह भी हमारे जैसे लौंडों का रसिया है और बीच बीच में जब मर्जी हमारे साथ मस्ती कर लेता है। गांड़ मरवाने का जो आदत हमें उस समय लगा था, इस ठिकादार के साथ रहकर जारी रहा।”

इतना कहकर चुप हुआ। हम सब बड़ी तन्मयता से उसकी कहानी सुन रहे थे। काफी मजेदार था और उत्तेजक भी। मेरे अगल बगल सलीम और बोदरा बैठे थे। उधर कहानी चल रही थी और इन दोनों कमीनों के हाथ मेरी नग्न देह पर रेंग रहे थे। कभी मेरे उरोजोंं को सहला रहे थे तो कभी मेरी योनि। कहानी कामुक थी, इनकी हरकतें भी कम कामुक नहीं थीं।

“क्या बात है? फिर शुरू हो गये तुमलोग?” मैंनें इन्हें बनावटी झिड़की दी। उनके लिंग फिर तनतना चुके थे। कहा कुछ नहीं लेकिन मुझे गरम करके ही छोड़ा। उधर कांता और सोमरी का भी यही हाल था। मंगरू, रफीक और बाकी कुली भी उन दोनों के ईर्द गीर्द सिमटे उनके शरीरों से खेल रहे थे। कुल मिला कर माहौल फिर गरम हो चुका था। मैं सोच रही थी कि अब क्या करूं? फिर से पिस जाऊं या आगे की कहानी सुनूं। अंततः मैंने उनके आगे हथियार डाल दिया। “ठीक है, बाबा ठीक है, चोदे बिना मानोगे थोड़ी ना तुमलोग।चलो अब झाड़ ही दो अपनी गरमी।” मेरे कहने की देर थी कि जिसको जो हाथ लगा उसी पर चढ़ दौड़ा और हम महिलाओं और मुंडू को धर के रौंद डाला। जो गरम माहौल बन चुका था, उसमें हम खुद भी पसर जाने को बिल्कुल तैयार हो चुके थे। चुदाई का एक और दौर चला। हम रंडियां भी खुले दिल से चुदीं, उनके मनमाफिक ढंग से चुदीं। यह दौर अगले दो घंटे तक चला। सबकी गरमी उतरने के बाद मैं क्लांत स्वर में बोली, “हो गया?”

“हां हो गया,” हांफते हुए मंगरू बोला। मैंने देखा कि वासना के इस दूसरे दौर का तूफान शांत हो चुका था और सभी लस्त पस्त, अस्त व्यस्त इधर उधर लुढ़क कर अपनी सांसें दुरुस्त कर रहे थे।

“तू तो रुक मां के लौड़े। अभी तो आगे की कहानी सुनते हैं, फिर तेरे और बाकी लोगों के लंड का भी मजा लूंगी।” मैं भी दो कंबख्त औरतखोरों सलीम और बोदरा के बीच सैंडविच की तरह मसली जा कर हांफती, पूरी रंडी की तरह बेशरमी से बोली, “हां तो मुंडू, ये तो हुई तेरे गांडू बनने की कहानी। अब आगे बता, इन हरामियों को कैसे जमा किया एक साथ?”

“हां हां बताओ, बताओ।” सब एक स्वर में बोल उठे।

“ठीक है अब आगे सुनो।” मुंडू, जिसे दो कुलियों नें बुरी तरह रौंदा था, अपने को संयत करते हुए बोला। घड़ी का कांटा बता रहा था तीन बज रहा था इस वक्त। हमारे पास वक्त था अभी।

सर्वप्रथम उसनें बताया कि किस तरह उसके अंदर समलैंगिकता का भाव जागृत हुआ। उसकी शारीरिक बनावट और सौंदर्य से आकर्षित होकर सर्वप्रथम उसके सहपाठी रोहित नें एक दिन अपनी कुटिल चाल में फांसकर एक एकांत खंडहर के अंदर उसे गुदामैथुन के आनंद से परिचित कराया। एक गंदी चित्रों वाली पुस्तक दिखा कर मुंडू की कामेच्छा को जगाया और उसका कौमार्य भंग कर दिया। रोहित तो बदमाश था लेकिन उसकी बदमाशी नें मुंडू के अंदर समलैंगिक संबंध के प्रति आकर्षण का सृजन कर दिया। तत्पश्चात यह आकर्षण, लत में तब्दील हो गया। उसी लत के वशीभूत, उसनें दूसरे सहपाठी शाहिद को अपने आकर्षण पाश में बांध कर उससे भी गुदा मैथुन करवा बैठा। फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा और अपने क्लास के ताकरीबन हर लड़के से करवाता चला गया। इस चक्कर में उसकी पढ़ाई लिखाई का कबाड़ा हो गया, नतीजतन आगे नहीं पढ़ पाया और मजबूरन उसके पिता नें उसे अपने एक परिचित ठेकेदार के यहां काम पर लगवा दिया।

वह ठेकेदार एक आर्किटेक्ट हर्षवर्धन दास था, जिसनें उसके व्यक्तित्व से मोहित हो कर अपने यहां सुपरवाइजर के रुप में रख लिया। मुंडू के अन्य आशिकों की तरह दास बाबू भी उस पर हाथ साफ करते रहे। अब आगे:

“तो मुंडू बाबू, चल अब आगे बता। तूने तो सारे क्लास के लड़कों को बिगाड़ दिया।” मैं बोली।

“हमने कहां बिगाड़ा। सब खुद ही मेरे पीछे पहले से पड़े थे। पहले रोहित नें हमें बिगाड़ा फिर शाहिद तो खुद ही मेरे पीछे कुत्ते की तरह चला आया था।”

“चला आया कि कुतिया की तरह तू खींच लाया।”

“जो हो, आया तो! चोदा तो!”

“और बाकी?”

“बाकी लोगों के बीच बात फैली तो सभी कुत्तों की तरह मेरे पीछे पड़ गये।”

“पूरे क्लास में एक तू ही मिला था उन्हें?”

“नहीं ऐसा बात नहीं है। वे लोग आपस में भी ये सब करने लगे थे।”

“ओह, तो तूने यह बीमारी सबके बीच में फैला दी।” मैं बोली और सभी हंस पड़े।

“अब इसमें हमारी क्या गलती? हमेशा हम तो मिलते नहीं थे। उनको चोदने का चस्का लग गया था तो क्या करते? आपस में ही काम चलाने लगे।”

“वाह, तूने तो पूरे क्लास को गांडुओं का क्लास बना दिया।” सभी फिर ठठाकर हंस पड़े।

“लड़कियों की तरफ किसी लड़के का ध्यान नहीं जाता था क्या?” मैं पूछी।

“जाता था, जाता था, लेकिन लड़के क्या करते। लड़कियों पर बुरी नजर डालना खतरनाक भी तो था। छेड़ो तो फंसो। कुछ ऐसा वैसा बात बोलो तो फंसो। सबसे सुरक्षित हम लड़कों का आपसी संबंध ही था। सो हम लड़के आपस में ही मजे करते थे। हां, शाहिद दो लौंडियों को पटा कर चोद चुका था, असल में वे लड़कियां खुद ही बदमाश थीं। शाहिद नें खुद बताया था, मगर हमें क्या। हमें वह पहले से छेड़ता रहता था दूसरे लड़कों की तरह, लेकिन उस दिन पहली बार उसे पता चला कि हम किस तरह के लड़के हैं। उसके बाद उसे भी मेरा ही चस्का लग गया। उसके बाद बाकी दोस्तों की लाईन लगी सो अलग।”

“खैर, यह सब छोड़, अब बता, इन सारे नमूनों को कहां कहां से ढूंढ़ ढूंढ़ कर इकट्ठा किया?” मैं बोली।

“बताता हूं बताता हूं। सलीम और रफीक तो पहले से इंजीनियर साहब के साथ काम करते थे। इनको पता नहीं था कि हम मरदों में रुचि रखते हैं। इसी तरह रेजा सुखमनी और रूपा भी पहले से इनके साथ काम करते थे, असल में ठेकेदार साहब नें इन दोनों को पसंद किया था और चोदने के चक्कर में अपने यहां काम पर रखा था। क्या, सही कह रहे हैं न हम?” सलीम और रफीक की ओर देखते हुए बोला।

“हां हां सही बोल रहे हो। इससे हमको भी फायदा हो गया। बीच बीच में हम भी उनके साथ मस्ती कर लिया करते थे।” सलीम बोला।

“सोमरी बाद में हमारे साथ आई। असल में मंगरू इसको लाया हमारे साथ। मंगरू, बोदरा, खोकोन, बोयो और हीरा को हम लाए।” मुंडू आगे बोलने लगा।

“कैसे?”

“हमारे घर में टॉयलेट नहीं था। हम पास वाले तालाब के किनारे जाते थे। तालाब के एक तरफ ऊंची ऊंची झाड़ियां थीं। उन झाड़ियों के पीछे हम पैखाना करते थे। एक दिन हम वहीं झाड़ियों के पीछे छिप कर पैखाना कर रहे थे उसी समय झाड़ियों के पीछे से हमनें देखा, यह मंगरू तालाब में भैंसों को नहला रहा था। तालाब के आसपास कोई नहीं था। यह एक भैंस के पीछे खड़ा होकर उसकी पीठ रगड़ रहा था। भैंस पानी में आधा डूबा हुआ था। मंगरू भी कमर से ऊपर तक पानी में डूबा हुआ था। मंगरू ऊपर से नंगा था, उसका काला कलूटा बदन चमक रहा था। कमर में एक गमछा बांधा हुआ था शायद, जो कमर से ऊपर उठ कर पानी के ऊपर तैर रहा था। हमनें गौर किया कि भैंस के पीठ को रगड़ते हुए उसका हाथ आगे पीछे हो रहा था और वैसे ही ही इसका कमर भी आगे पीछे हो रहा था। हमें शुरू में समझ नहीं आया कि हाथ से रगड़ते हुए इसका कमर क्यों आगे पीछे हो रहा है। कुछ ही देर में सब समझ में आ गया जब मंगरू भैंस के पीछे चिपक कर उसकी पीठ पर सर रख कर लंबी लंबी सांसें लेने लगा। ओह, तो ये बात है, यह साला असल में पीछे से भैंस को चोद रहा था। इतनी देर में उसका गमछा खुल कर पानी के ऊपर तैरते हुए कुछ दूर तक चला गया था और मंगरू को होश ही नहीं था। देख कर हमें बड़ा मजा आ रहा था, साला और कोई नहीं मिली, भैंस ही मिली थी चोदने को। अब हम अपनी जगह से निकले और तालाब किनारे जा कर गांड़ धोने लगे। मंगरू को आभास हो गया कि तालाब किनारे कोई है। यह हड़बड़ा कर अपना गमछा देखने लगा। गमछा तो पानी में तैरता हुआ किनारे आ चुका था। वह हमारी ओर देखने लगा। शायद शरमा रहा था कि गमछा बिना वह पूरा नंगा था। उसका हाफपैंट, चड्ढी और बनियान तालाब के इसी किनारे था जहां हम थे। हम समझ गये कि नंगा मेरे सामने पानी से निकलने में शरमा रहा था।

“क्या हुआ?” उसे असमंजस में देख कर हम बोले।

“वो मेरा गमछा।” गमछे को दिखा कर शरमाते हुए बोला।

“ले ले आके।” हम बोले।

“नंगे हैं।”

“तो क्या हुआ, यहां कोई औरत नहीं है। आके ले ले।” हम बोले।

“तुम हो ना।”

“लड़का हो कर लड़के से शरमाते हो?” हम हंसते हुए बोले। यह झेंपता हुआ धीरे थीरे किनारे आया। जैसे ही उसके कमर का निचला हिस्सा पानी से बाहर आया, हम दंग रह गये उसके लंड को देखकर। सोया हुआ, सिकुड़ा हुआ लंड भी छ: इंच से कम नहीं था और वैसा ही मोटा। हे भगवान, यह सोया हुआ है तो इतना बड़ा, खड़ा होगा तो कितना बड़ा होगा? सोच कर ही हमारे बदन में सुरसुरी होने लगा। मरवाने को मन मचल उठा। बदन तो इसका मस्त था ही। वह अपने गमछे की ओर झपटा और फट से कमर में लपेट लिया। हमें हंसी आ गयी।

“क्या रे, तू भैंसी नहला रहा था की क्या कर रहा था?” हम मुस्कुराते हुए बोले।

“भैंसी ही तो नहला रहा था।” शरमाते हुए यह बोला।

“हम सब समझ रहे हैं क्या कर रहा था।”

“क्या कर रहे थे?”

“बताएं?”

“हां” ढिठाई से बोला वह।

“साले हम नहीं समझ रहे हैं? भैंसी को चोद रहा था ना?” अब क्या बोलता।

“नननननहीं तो। हम तो हम तो हम तो…..” हकलाने लगा।

“हम तो हम तो क्या?”

“भैंसी नहला रहे थे।”

“हाथ से भैंसी नहला रहे थे, और लंड से?” हम उसके लंड की तरफ उंगली दिखा कर बोले। उसका हाथ अनायास ही अपने लंड पर चला गया। शरमा गया वह।

“हें हें हें हें” झेंंपी सी हंसी हंस रहा था वह।

“हंसो मत, चलो दिखाओ अपना लंड, जरा देखें तो कितना बड़ा है?” हम बोले।

“नहीं।” वह बोला।

“साले, ग्वाला (भैंसी के मालिक) को बता देंगे।” हम धमकी देने लगे।

“नहीं, मत बताना।” डर गया मेरी धमकी से।

“तो दिखाओ।”

“यहां नहीं।”

“तो कहां?”

“उधर, झाड़ी के पीछे।”

“चलो।” हम घनी झाड़ियों के बीच चले गये, यह भी अपने कपड़े उठाकर मेरे पीछे पीछे आया। वहां सुनसान था और किसी के द्वारा देखे जाने का डर नहीं था। “चलो, अब गमछा हटाओ।” झिझकते हुए उसनें अपना गमछा हटाया तो हम अकचका गये। इतने पास से देख रहे थे, इसके लंबे चौड़े बदन को और इसके झुलते हुए लंड को। बाप रे बाप, इसका सोया हुआ लंड भी कम खतरनाक नहीं लग रहा था। हम तो ठहरे लंडखोर एक नंबर के, उसके लंड को पकड़ के देखने लगे।

“यह क्या कर रहे हो?” वह बोला।

“पकड़ के देख रहे हैं और क्या।” वास्तव में।

“हमको शरम लग रहा है।”

“साले, भैंस को चोदते समय शरम नहीं लग रहा था?”

“वह तो भैंस है ना?”

“और हम?”

“तुम तो आदमी हो ना।”

“चुप, इतना सुंदर लंड रखकर शरमा रहे हो हमसे? खा जाएंगे क्या?” कहकर उसके लंड को सहलाने लगा। इसे अब अच्छा लग रहा था। शरम धीरे धीरे खतम हो रहा था। उसका लंड भी खड़ा हो रहा था और उसका साईज बढ़ता जा रहा था। कुछ ही देर में इसका लंड पूरा टाईट हो गया। बाप रे, दस इंच के करीब लंबा हो गया और वैसा ही मोटा। करीब ढाई से तीन इंच मोटा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” यह मस्ती में आ गया था। मेरी गांड़ में खुजली होने लगी।

“मेरा गांड़ चोदो।” हम हुकुम देने लगे।

“नहीं।”

“ग्वाला को बता देंगे।”

“नहीं, मत बताना।”

“तो चोदो।” इतना कहकर हम अपने कपड़े खोलने लगे। जब हम पूरे नंगे हो गये तो हमारे बदन को देखकर इसकी आंखें चमकने लगीं। हम समझ गये कि मेरे बदन को देखकर ललचा गया है। “आओ।” हमनें इसको अपना बदन सौंप दिया। यह हमको अपने बांहों में भर लिया।

“बड़ा मस्त बदन है।”

“हां, है तो।” हम इसकी बांहों में मचलते हुए बोले।

“बड़ा मस्त गांड़ है।” हमारी गांड़ सहलाते हुए बोला।

“हां, है तो।”

“छाती लड़कियों जैसा है। चूची जैसा।”

“हां है तो। अब शुरू कर ना।” हम मरवाने के लिए मरे जा रहे थे। थोड़ा डर भी लग रहा था। पहली बार इतना बड़ा लंड से पाला पड़ा था। यह हमारी छाती दबाने लगा, गांड़ दबाने लगा और हम पगलाए जा रहे थे। अब इसने हमें वहीं घास पर उल्टा लिटा कर हम पर चढ़ गया। लंबा चौड़ा गबरू जवान, अपने लंबे मोटे लौड़े के साथ। यह अपना लंड हमारी गांड़ से सटा ही रहा था कि हम बोल उठे, “थूक लगा मादरचोद। हमारी गांड़ का कबाड़ा करना है क्या?” इसने जल्दबाजी में हमारी गांड़ पर थूका, और दुबारा चढ़ गया। हमारा डरना बेकार नहीं था। इसके बाद जब यह अपने लंड पर जोर लगाने लगा तो इसका लंड हमारी गांड़ का दरवाजा जबरदस्ती फैला कर घुसने लगा।

“आह आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” दर्द हो रहा था। हमारी गांड़ फटने फटने को होने लगी। हमारी सारी मस्ती हवा हो गयी। हम छूटने की कोशिश करने लगे, लेकिन इसे तो मिल गया था एकदम चिकने टाईट गांड़ का स्वाद। घुसाता चला गया, घुसाता चला गया और हमको लग रहा था जैसे कोई लंबा डंडा जबरदस्ती हमारी गांड़ में ठूंसे जा रहा हो। “आह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं।” हमारे मुंह से चीख निकल गयी।

“बंद कर चिल्लाना साले गांडू मादरचोद।” यह डांट रहा था। “साले, गांड़ मरवाने के लिए मर रहा था, अब चोद रहे हैं तो चिल्ला रहा है।” यह हमसे दुगुना ताकतवर जवान था, हमें कस के दबा रखा था, हिल भी नहीं पा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हमारी अंतड़ी भी फटी जा रही हो। हम तो खुद ही फंसे थे इस मुसीबत में, शिकायत करें तो किससे करें। गांड़ फटी जा रही थी, अंतड़ी फटी जा रही थी, जान निकली जा रही थी, आंख से आंसू बह निकले थे।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, धीरे, ओह्ह्ह्ह्ह्ह धीरे।” हम बेबस थे। अब चुदने से बच नहीं सकते थे।

“धीरे? अब धीरे?” कहते न कहते हमारी कमर पकड़ कर कुत्ते की तरह दनादन ठोकना शुरू कर दिया इस हरामी नें। कुछ देर तो हमारी जान निकलती रही, मगर थोड़ी देर बाद मेरी गांड़ ढीली हो गयी और मजे में लंड लेने लगे। मजा आ रहा था अब। यह तो एकदम कुत्ते की तरह गचागच चोदने में लगा था, लेकिन हम भी अब अपनी गांड़ इसके सामने परोस के मजे से चुदवाए जा रहे थे।

“अच्छा लग रहा है अब।”

“तो ले, हुं, हुं, हुं, आ आ आ ले और ले।” बाप रे बाप, इतना स्पीड? गच गच गच गच गच्चाक। पागल हो गया था यह और हम भी पागल। पता नहीं कितना देर चोदा, लेकिन जितना देर चोदा, बहुत मजा दिया। रगड़ के चोदा, दबा दबा के चोदा। फिर फरफरा के जब लंड का रस डालने लगा हमारे गांड़ में, हम तो स्वर्ग पहुंच गये थे। पूरा झड़ने के बाद जब हमको छोड़ा तो हम धपाक से घास पर गिर पड़े।

“बड़ा मजा आया राजा।”

“हमको भी।” हांफता हुआ बोला यह। “इतना टाईट होता है गांड़, हमको पता नहीं था। बहुत अच्छा लगा।”

“हमको भी। क्या नाम है तेरा?” हम पूछे।

“मंगरू।”

“क्या करते हो?”

“कुछ नहीं।”

“काम करोगे?”

“क्या काम?” शशंकित स्वर में बोला यह।

“अरे कुछ भी, जो तुम चाहो। हम घर बनाने का काम करते है। पगार देंगे। वैसे हमको तेरा लंड पसंद आया, इसी लिए बोल रहे हैं।”

“ठीक है। करेंगे काम। हमको भी तेरा गांड़ बहुत पसंद आया।” यह खुश हो कर बोला। पगार का पगार, गांड़ का गांड़।

“वाह रज्ज्ज्जा, ये हुआ न बात। तो कल से ही आ जाओ काम पर। लेकिन याद रखना, जब भी हमको चोदोगे तो औरत समझ के चोदना।”

“ठीक है।”

“सिर्फ ठीक है नहीं, ठीक है रानी बोल, लेकिन सबके सामने नहीं, अकेले में।”

“ठीक है मेरी रानी।”

“हां, अब ठीक है मेरे प्यारे चोदू जी।”

उस दिन के बाद मंगरू हमारे साथ काम करने लगा। इस तरह से हमारे यहां एक और चुदक्कड़ शामिल हो गया। सलीम और रफीक तो पहले से दास बाबू के साथ काम करते थे। दास बाबू नें हमको अपने यहां सुपरवाइजर रखा तो इसलिए कि उनको हम पसंद आ गये थे। वे तो हमारा गांड़ मारते ही थे, सलीम और रफीक भी समझ गये कि हम गांडू हैं। ये तो इससे पहले दास बाबू के पसंद की दो रेजा, रूपा और सुखमनी पर ये लोग हाथ साफ करते थे। हमको लगता है दास बाबू को पता है सब कुछ, लेकिन उससे क्या, उसे तो चोदने से मतलब है। हमको समझ आ गया था कि सलीम और रफीक एक नंबर के औरतखोर हैं, हमें इनसे भी चुदवाने का मन होने लगा। हमको मुश्किल नहीं हुआ। अपने आप हो गया। जहां कहीं हम घर बनाते हैं, वहां गोदाम तो बनता ही है।उसी गोदाम मेंं हमेंं मंगरू या दास बाबू चोद लेते थे। एक दिन मंगरू हमको चोद रहा था तो सलीम देख लिया। पहले यह हमको चोदा फिर रफीक को बताया, यह भी मेरा आशिक बन गया।

फिर फंसा बोयो। उसको हमारे बारे में बताया यही मंगरू। बोयो का दोस्त था हीरा। हीरा भी इसी तरह हमारे ग्रुप में आया।  यह पहले दूसरी जगह काम करता था। जब हीरा को मेरे बारे में बोयो से पता चला तो यह वहां का काम धाम छोड़ कर हमारे यहां आ गया। एक नंबर का चुदक्कड़ है हीरा और वैसा ही हरामी। हमारे चक्कर में हीरा आया और हमारा ही आदमी हो गया। यही सोमरी को फंसा कर हमारे यहां काम पर लाया। अब बता साले हीरा, कैैैसे फंसाया सोमरी को?” मुंडू हीरा की ओर देख कर बोला।

हीरा जो सोमरी के बगल में ही बैठा हुआ उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को सहला रहा था, बोला, “अब हम का बताएं?” धूर्त हीरा मुस्कुरा रहा था।

“हंस मत हरामी, बता, कैसे फंसाया सोमरी को?” मैं हीरा की ओर आंखें तरेरती हुई बोली।

“बताते हैं, बताते हैं।”

“ठीक है बता, लेकिन जल्दी बता। समय जा रहा है। इस मुंडू की कहानी सुनते सुनते समय भी निकल रहा है और…।” मैं अपनी जगह कसमसाते हुए जानबूझ कर रुकी।

“और?” सलीम प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए बोला।

“अब मेरा मुंह मत खुलवा मादरचोद।” मैं कलकलाते हुए बोली।

“बोल ही दो बुरचोदी।”

“तुमलोग हिजड़े हो क्या? कुछ हो नहीं रहा है ऐसी कहानी सुनकर तुमलोगों को?”

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह, साली कुत्ती, ऐसा बोल ना लंडखोर।” रफीक, जो मेरी देह से सटकर बैठा था, अब बोला। मैं उन सबके बीच उन्हीं के स्तर की हो गयी थी। बड़े छोटे का भेदभाव खत्म हो चुका था, तभी तो ये लोग इतने खुल्लमखुल्ला, बिंदास, बिना किसी झिझक और शरम के मुझसे ऐसी बात कर रहे थे। मुझे बड़ा आनंद आ रहा था। रफीक नें सिर्फ कहा नहीं बल्कि मेरे उरोजों को मसलना भी आरंभ कर दिया।

“हट साले।” मैं उसकी पकड़ में छटपटाती हुई बोली।

“न न न न, अब क्या हट? देख हमारी चोदनी, हमारे लौड़े भी बमक गये हैंं। चल एक बार और ठोकिए लेते हैं। क्या बोलते हो भाई लोग। हमारी चोदनी चुदना चाहती है रे।” रफीक मुझे अब चूमने लगा था।

“हां हां, ठीक ठीक। चलो एक बार और हो जाए।” सब रफीक के समर्थन में सुर में सुर मिला कर बोल उठे। जिसे जो शिकार मिला, उसी पर झपट पड़े। मुझ पर तो कहर ही टूट पड़ा। सबसे कद्दावर, ताकतवर, विशालतम भीमकाय लिंगवाला मंगरू न जाने कब से मुझ पर दृष्टि जमाए था, सिग्नल मिलते ही चीते की फुर्ति से मुझ पर झपट्टा मारा। इधर इतने निकट के शिकार को छिनते देख कर तड़प उठा रफीक और यही हाल सलीम का भी था। मंगरू मुझे गुड़िया की तरह गोद में उठा कर भागने लगा।

“भागते कहां हो लौड़े के ढक्कन?” सलीम और रफीक उसके पीछे भागे। उधर सोमरी, कांता और मुंडू पर बाकी लोग टूट पड़े।

“ओह भगवान, उधर कहां ले जा रहे हो मुझे?” मैं मंगरू की बांहों में छटपटाती हुई बोली।

“तो किधर ले जाएं रंडी?”

“इधर” मैं अपने बेडरूम की तरफ दिखाते हुए बोली।

मुझे गोद में उठाए मंगरू नें एक लात बेडरूम के दरवाजे पर मारा और सिर्फ उढ़का हुआ दरवाजा भड़ाक से खुला। उसनें बड़ी उतावली और बेदरदी से मुझे बेड पर पटक दिया और चढ़ बैठा मुझ पर।

“रुक बहनचोद, तू अकेले ऐसे नहीं चोद सकता। हम भी चोदेंगे।” रफीक और सलीम भी हमारे पास आ पहुंचे थे।

“नहीं नहीं, ऐसा कैसे?” मैं मंगरू के नीचे दबी बोली।

“एक साथ, बांट के खाएंगे चोदनी को।”

“कैसे?”

“तू उठा के भागा ई बुरचोदी को, तू जीता। बोल तू क्या करना चाहता है?”

“हम इसकी गांड़ मारेंगे। मस्त गांड़ है। बहुत मन था इसकी गांड़ चोदने का।” मंगरू बोला तो मैं सिहर उठी।

“नहीं, नहीं, फाड़ दोगे।” मैं बोली।

“फटेगी तो फटेगी, हम तो चोदेंगे गांड़ ही।” ढिठाई से मंगरू बोला।

“ठीक है तुम गांड़ चोदो, हम बुर में लंड ठोकेंगे।” सलीम बोला।

“और हम?” हम क्या गांड़ मरवाएं?” रफीक चिढ़ कर बोला।

“अबे भोंसड़ी के, तू लंड चुसवा तब तक।” सलीम बोला।

“हां यह सही है।” रफीक सहमत हो गया। अब क्या था, मंगरू नें मुझे तिरछा लिटा कर मेरी बांयी टांग उठा कर पीझे से मुझ पर हमला कर बैठा।

“आह्ह्ह्ह नहींईंईंईंईंईंईन।” मैं चीखी।

“हरामजादी चिल्लाती है? अभी तो घुसा ही नहीं है मेरा लंड।” मंगरु बोला। वह बिना किसी तेल या क्रीम के अपना लिंग मेरी गुदा से सटा कर दबाव बनाने लगा। इधर सलीम भी ठीक इसी वक्त सामने से अपना लिंग मेरी योनि के प्रवेश द्वार पर टिका कर घुसेड़ने का प्रयत्न करने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह नहीं।” मैं फिर चीखी।

“अबे रफीक, ठोंक इस छिनाल के मुंह में लंड। बहुत हल्ला मचा रही है रंडी कहीं की।” सलीम बोला और वही हुआ। रफीक अपना दुर्गंध युक्त लिंग मेरे मुंह के पास लाया। घृणा से मैं मुंह बंद कर दी।

.        “खोल मुंह कुतिया।” रफीक का एक जोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा। तभी मंगरू की दानवी शक्ति से उसका विशाल लिंग, मेरी सूखी गुदा को छीलता रगड़ता फाड़ता प्रविष्ट होता चला गया। पीड़ा से चीखने हेतु मेरा मुंह खुला, किंतु मेरी चीख हलक में ही रह गयी। रफीक का दुर्गंध युक्त लिंग मेरे खुले मुंह से प्रविष्ट हो कर हलक में जा फंसा। मेरी सांसें घुटने लगीं। मैं छटपटाने लगी। यह मुसीबत मानो कम था, सलीम पिल पड़ा था अपने लिंग का प्रहार मेरी योनि में करने। बड़ी मुश्किल से सांस ले पाने में सक्षम हो पायी मैं। फिर तो सब कुछ आसान होता चला गया। वास्तव में एक साथ तीनतरफे हमले से आरंभ में मैं संभल नहीं पायी थी, यही कारण था कि कुछ परेशानी हुई। लेकिन एक बार सबकुछ सज चुकने, व्यवस्थित और संयंत होने के पश्चात मेरे साथ जो भी नोच खसोट, गुत्थमगुत्थी, या जोर अजमाईश ये दरिंदे कर रहे थे वह सबकुछ मुझे आनंद प्रदान कर रहा था। मेरी योनि में सलीम लिंग की हलचल, गुदा में बाहुबली लिंग की खलबली और मुख में रफीक लिंग का जलवा, मैं मगन मन कामुकता के सैलाब में बहती रही, डूबती रही। मुझपर टूटा करीब आधे घंटे का कहर जब शांत हुआ तो मैं मेरे तन का सारा कस बल निकल चुका था। अपने मदन रस से सींच कर मेरी कामुक देह को सिंचित करके मुझे तृप्ति प्रदान करने के दौरान तीनों दरिंदे अपनी दरिंदगी के निशान मेरे तन के कई हिस्सों पर अंकित कर चुके थे। लेकिन प्राप्त सुख के आगे उन दरिंदगी के निशानों का मुझे रंच मात्र भी गिला नहीं था। वे तीनों भी मेरी रसीली देह का रसास्वादन करते हुए मुझ पर अपनी मरदानगी झाड़ कर तृप्त, लंबी लंबी सांसें ले रहे थे।

जब हम तनिक संभले तो निचुड़े, लस्त पस्त बेडरूम से बाहर आए। अबतक बाकी सब लोग भी आपस में निबट चुके थे। मर्द लोग तो चोद चाद कर संभल चुके थे लेकिन, सोमरी और कांता की चुदी चुदाई नग्न देह अस्त व्यस्त, अर्धमूर्छित अवस्था में अब तक पड़ी हुई थीं।

“क्या हाल कर दिया है साले कुत्तों, इन लोगों का?” मैं बोल पड़ी।

“क्या किया? वही किया जो तुमलोग कर रहे थे।” बोदरा बोला।

“हमलोग जो कर रहे थे, उसके बाद भी देख लो, मैं ठीक हूं। तुमलोगों नें तो इन्हें बेहाल कर दिया है।” मैं बोली।

“तू तो साली रंडी एक नंबर की है, तेरा क्या होने वाला है।” बोदरा बोला। मेरी नजर तभी घड़ी पर पड़ी। बाप रे बाप, छ: बज रहा था। कुछ ही देर में हरिया, रामलाल वगैरह के साथ पहुंचने वाला होगा।

“ठीक है, ठीक है। बस बस, ज्यादा बोलो मत। फटाफट कपड़े पहन कर तैया हो जाओ सब। हमारे घर के बाकी नमूने आने वाले होंगे। अगर इस हालत में उन लोगों नें हमें देख लिया तो गजब हो जाएगा। आज का प्रोग्राम खतम। अब बाकी फिर कभी। और हां बाकी कहानी, उनके आने तक बताएगा हीरा। ठीक है?” मैं बोली।

“ठीक है।” सब अपने कपड़े पहनने लगे। कांता और सोमरी बड़ी मुश्किल से खड़ी हो पायीं। उनके तन को भी इन लोगों नें बड़ी बेरहमी से कुत्तों की तरह नोचा था। बुर को को कर दिया था बदहाल, चूचियों को कर दिया था लाल। सभी व्यवस्थित हो कर पुनः अपने अपने स्थान पर आसीन हो गये।

भोजन के उपरांत सुपरवाइजर मुंडू, अपने समलैंगिक होने की कहानी से हमें अवगत कराया। फिर इन कामगरों के समूह के निर्माण के बारे में बताने लगा। सर्वप्रथम उसनें बताया कि किस तरह उसनें मंगरू को अपने आकर्षण में बांधकर समूह में शामिल किया। सलीम, रफीक तो पहले से ही ठीकेदार के मिस्त्री थे। ठीकेदार दास बाबू की पसंद बन चुका मुंडू इन मिस्त्रियों को भी अपने आकर्षण के जाल में बांंध चुका था। मंगरू के साथी बोयो और हीरा भी मुंडू के चक्कर में खुद ब खुद बंधे चले आए इस समूह में।

मुंडू के द्वारा जिस ढंग से कहानी बताया जा रहा था वह इतना कामोत्तेजक था कि हम सभी खुद को रोक नहीं पाए और परिणाम स्वरूप एक और दौर कामक्रीड़ा का चला। इस बार सलीम और बोदरा मेरी देह का उपभोग करने लगे थे और बाकी लोग कांता, सोमरी और मुंडू पर टूटे थे। यह दौर भी बहुत मजेदार रहा। फिर कहानी आगे बढ़ती गयी और फिर वही हुआ। फिर तीसरा दौर। जिसे जो हाथ लगा, उसी पर हाथ साफ करने लगा। जहां मैं मंगरू, सलीम और रफीक के हाथों फिर से मसली गयी वहीं बाकी लोग कांता, सोमरी और मुंडू के साथ लिप्त हो गये अपने अपने शरीर की गरमी उतारने में। इस तीसरे दौर के समाप्त होते होते हम स्त्रियों और मुंडू का कचूमर निकल चुका था। समय भी काफी बीत चुका था। संध्या के छ: बज रहे थे। अब एकाध घंटे बाद कभी भी हरिया, करीम और रामलाल आ धमकने वाले थे। हम सब अब अपने अपने वस्त्र पहन कर पुनः शरीफों की तरह से ऐसे बैठे थे मानो वहां कुछ हुआ ही नहीं हो।

“आज का तो हो गया।” मैं बोली।

“हां और क्या खूब हुआ।” रफीक बोला।

“अब तो समय है नहीं हमारे पास। जब तक हमारे घर के बाकी लोग नहीं आ जाते तबतक बाकी कहानी क्यों न सुन लें?” मैं बोली।

“हां हां क्यों नहीं।” सलीम बोला।

“तो अब कौन बताएगा आगे?”

“और कौन? यही हीरा और कौन?” मुंडू बोला।

“तो हीरा, चल बता। हां कहां थे हम?” मैं बोल उठी।

“यही, कि हीरा सोमरी को कैसे फंसाया।” मुंडू बोला।

अब आगे की कहानी हीरा की जुबानी सुन रहे थे हम।

“यह एक साल पहले की बात है। हम जहां काम कर रहे थे, उसके पास में ही सोमरी का घर था। इसका आदमी दुबला पतला, रिक्शा चलाने वाला है। इसके घर के पास ही एक छोटा सा मिट्टी जोड़ाई वाला, बिना छत का, ईंट के दीवार से नहाने का घर बना था। हम उसी के पीछे पेशाब करने जाते थे। एक दिन दोपहर खाना खाने के बाद हम पेशाब करने इसके नहाने का घर के पीछे गये। पेशाब करते समय हमें इसके नहाने के घर के अंदर से कुछ आवाज सुनाई पड़ा। हम कान लगा कर सुनने लगे।

“आह्ह, आह, आह आह।” यह कोई औरत की आवाज थी। क्या चक्कर है? दीवार ज्यादा ऊंचा था नहीं। हम पास से एक बड़ा पत्थर उठा लाए और उस पर खड़ा होकर दीवार के ऊपर से अंदर झांकने लगे। देखकर एक बार तो हम चकरा गये। सोमरी अपना साड़ी उठा कर बैठी हुई थी। इसकी बुर एकदम साफ साफ दिख रही थी। बुर के ऊपर काला काला झांट और दोनों मोटी मोटी जांघों के बीच काला चिकना बुर चमक रहा था। लेकिन यह कर क्या रही थी? अब समझ में आया, इसके बुर में बैंगन था, जिसको यह हाथ से पकड़ कर बुर में अंदर बाहर कर रही थी। इसकी बड़ी बड़ी चूचियां ब्लाऊज के बाहर झांक रही थीं। इसका बदन हिल रहा था, साथ ही साथ बिना ब्रेजियर की चूचियां भी थल थल हिल रही थीं। इसकी आंख बंद थीं। चेहरा लाल हो गया था। इसके मुंह से ,”आह, उह, आह, उह” निकल रहा था। अरे ये तो बैंगन से चुदवाए जा रही थी। लेकिन ऐसा भी क्या? आदमी तो था इसका? फिर ऐसा क्यों? ओह, अब समझ में आया, जरूर इसका मरियल मरद इसको ठीक से ठोंक नहीं पाता होगा। इतनी भरी पूरी गदराए बदन वाली औरत भी करे तो क्या करे। पेट की भूख तो मिटता होगा, लेकिन बुर की भूख? इस मस्त कमीनी मक्खन जैसी बुर की भूख का क्या करे। इसे तो लौड़ा चाहिए, हम मरदों का दमदार ल़ौड़ा। अब मेरा लौड़ा भी बमकने लगा। हम पैंट के ऊपर से ही लंड पकड़ कर दबाने लगे। बरदाश्त ही नहीं हो रहा था। इसके नहाने के घर के दरवाजे पर सिर्फ एक कपड़ा का पर्दा लगा हुआ था। इस समय किसी के आने का डर था नहीं, शायद इसी लिए अपने बुर की खुजली से परेशान यहीं पर शुरू हो गयी थी। इसको क्या पता कि हमारे जैसे बुर के रसिया इसे इस हालत में देख लेंगे। हमसे और बर्दाश्त नहीं हुआ। वहां से हटकर सीधे दरवाजे पर पहुंच गये। इधर उधर देखा, कोई नहीं दिखा। मतलब मैदान साफ था। इस दोपहर में और कौन आता?  चुपचाप पर्दा हटाकर अंदर चले आए। सोमरी को पता ही नहीं चला। उसी तरह बैंगन से बुर चुदवाने में लगी हुई थी। हम अपने पैंट उतारकर कमर से नीचे नंगे हो गये। मेरा लौड़ा अब आजाद हो गया था। अब बस बहुत हुआ, अब और नहीं, हमनें आगे बढ़कर सोमरी को दबोच लिया।

“कककक कौन?” सोमरी घबरा गयी, भूत के समान प्रकट हुए थे हम तो उसके सामने।

“हम हैं” सोमरी वैसे तो रोज ही हमें वहां काम करते हुए देखती थी। पहचान गयी।

“छोड़ो हमको।” छटपटाते हुए सोमरी बोली।

“छोड़ने के लिए नहींं पकड़ा है।”

“छोड़ो नहीं तो चिल्लाएंगे।” उसके इतना कहते ही हमनें उसका मुंह दबा दिया। वह वहीं पर बैठे बैठे लुढ़क गयी और हम उस पर चढ़ चुके थे। उसकी चूत में अभी भी बैंगन फंसा हुआ था।

“ई का है, बैंगन? हमारे रहते हुए बैंगन?” हम उसे अपने हाथों से कस के दबाए हुए थे। वह हिल भी नहीं पा रही थी। इसकी साड़ी तो कमर तक उठी हुई थी ही, हम इसके दोनों पैरों के बीच घुस चुके थे। थोड़ा बहुत पैर हिला पा रही थी और बस इधर उधर सिर पटक रही थी। हमसे छूटने की कोशिश कर रही थी। कुछ देर ऐसे ही छटपटाती रही, फिर समझ गयी कि हमसे पार पाना मुश्किल है, सो इसका छटपटाना रुक गया और आंख फाड़ कर हमें देखे जा रही थी। हम इसकी चूत के पास हाथ डालकर बैंगन निकाल लिये और बोले, “इतनी मस्त बुर में ऐसा सड़ियल बैंगन? ये देख, इस सड़ियल बैंगन से कई गुना मस्त लौड़ा।” हमने इसका हाथ पकड़ कर अपने लंड पर रख दिया। इसने घबरा कर अपना हाथ हटाने के लिए जोर लगाया लेकिन ऐसा कर नहीं पायी, हम इसके हाथ को पकड़ रखे थे। शायद मेरे लंड के साईज से डर गयी थी। डर के मारे इसकी आंखें और बड़ी बड़ी हो गयीं थीं।

“कैसा है मेरा लौड़ा?”

“उं उ़ उं उंग उंग।” यह बंद मुंह से बोलने की कोशिश कर रही थी। सिर हिला कर न कहना चाह रही थी शायद। हम जानते थे कि ऐसे यह मानेगी नहीं। डर जो था मेरे लंबे मोटे लंड का। वैसे हमें पता था कि इसे लंड तो चाहिए ही था। धीरे धीरे इसका छटपटाना कम हुआ, शायद हमसे छूटने की कोशिश करते करते थक गयी थी। एक तरह से इसनें हार मान ली थी। यह ढीली पड़ गयी थी। इसकी हालत देखकर हमें थोड़ा तरस आ गया। हम सोचे कि इसके मुंह से हाथ हटा ल़ेंं। हमनें इसके मुंह से हाथ हटाने से पहले पूछा, “अब चिल्लाएगी तो नहीं?” सिर हिला कर इसने बताया “नहीं”। हमने इसके मुंह से हाथ हटाया और यह लंबी लंबी सांस लेने लगी। इसके रसीले बदन से चिपके हमें बड़ा मजा आ रहा था।

“छोड़ो हमको।” यह बोली।

“नहीं। ऐसे नहीं। बिना चोदे तो बिल्कुल नहीं।” हम बोले।

“हम बरबाद हो जाएंगे।” यह रोने लगी थी।

“कैसे बरबाद हो जाएगी?”

“पराये मरद हो तुम।”

“अब ये अपना पराया क्या?”

“अपना मरद अपना होता है।”

“और लंड?”

“यह भी।”

“मगर लंड तो लंड होता है।”

“मगर हम शादी किए हैं तो मरद अपना हुआ ना।”

“तो फिर मरद के रहते बैंगन क्यों?”

“वो तो, वो तो….” आगे उसे सूझ नहीं रहा था कि क्या बोले।

“वो तो वो तो क्या? साफ साफ बोलो कि मरद की चुदाई से मन नहीं भरता।”

“तो तुझे इससे क्या?’

“हमें दुख हुआ, तुझे बैंगन से चुदवाते देख कर, तुझे तो लंड चाहिए ना, अच्छा दमदार लंड, ई बैगन वैगन अच्छा लगता है का?” हम फुसला रहे थे।

“हम कुछ भी करें, तुम्हें इससे क्या?”

“तेरी हालत से तरस खा कर बोल रहे हैं पगली।”

“हम ऐसे ही ठीक हैं।”

“नहीं, तुम ठीक नहीं हो।”

“तो तुम्हें इससे क्या।”

“बैंगन से चुदोगी तो हमें भला कैसा लगेगा? तुम औरत लोग हम मरदों के रहते हुए बैंगन से चुदोगी तो हमारे लंड का क्या होगा?” हम उसे धीरे धीरे बहला फुसला रहे थे। हमारा हाथ उसकी चूचियों तक पहुंच चुका था और धीरे धीरे उसकी चूचियों को ब्लाऊज के ऊपर से ही सहला रहे थे हम।

“यह क्या कर रहे हो?” हमारे हाथ को पकड़ कर बोली। दिखा रही थी कि हमें रोकना चाहती है लेकिन वास्तव में रोकने की इच्छा नहीं थी शायद।

“प्यार कर रहे हैं पगली।” हम सहलाते रहे इसकी किलो किलो भर चूचियों को। अब हम इसके गोल गोल गालों को चूमने लगे। यह सिर इधर उधर कर रही थी लेकिन अब मना नहीं कर रही थी।

“नहीं। यह ठीक नहीं है।” बड़ी कमजोर आवाज में बोली।

“यही ठीक है। तू हमारे रहते बैंगन से चुदवाओ, यह ठीक नहीं है।” हम इसे चूमते हुए बोले। धीरे धीरे इसका मना करना बंद हो गया।

“अब?” हमनें सवाल किया।

“अब क्या?”

“चोदें?”

“नहीं।”

“काहे?”

“बहुत बड़ा है तेरा।”

“क्या बड़ा है मेरा?” हम समझ गये अब यह रास्ते में आ रही है।

“यही।”

“क्या यही?”

“लंड।” कहकर शरमा कर हमारे सीने में मुंह छिपाने लगी।

“अय हय, ऐसे बोलोगी तो हम मर ही जाएंगे।”

“धत।”

“तो? अब चोदें ना?”

“नहीं, दर्द होगा।”

“थोड़ा होगा, लेकिन मजा आएगा।”

“मेरा फट जाएगा।”

“क्या फट जाएगा?”

“बुर,” कहकर फिर शरमा गयी।

“ओहो मेरी जान, नहीं फटेगी रे, हां थोड़ा फैल जाएगी।”

“फिर भी….” इसकी सांस बहुत जोर से चल रही थी। हम समझ गये थे कि यह गरम हो गयी है।

“अब कोई फिर विर नहीं, अब और कुछ बोलो नहीं।” अब हम बात करने के मूड में नहीं थे। मेरा लंड ठीक इसकी चूत के ऊपर टिका हुआ था। तवा गरम था। रोटी सेंकने का समय आ गया था। हम धीरे धीरे उसकी चूत पर दबाव देने लगा। इसकी चूत बैंगन खा खा कर पहले से पनियायी हुई थी। मेरा लौड़ा इसकी चूत का मुंह फैला कर घुस रहा था।

“आह्ह्ह्ह, नहीं।” दर्द हो रहा था शायद।

“हां्आं्आं्आं्आं।” हम उसकी बड़ी बड़ी गांड़ के नीचे हाथ डालकर घुसाते चले गये और मेरा लंड इसकी टाईट चूत को फैलाता हुआ घुसता चला गया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, छोड़ो, फट रहा है।” यह दर्द से परेशान थी।

“आह आह, बस बस थोड़ा और, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह” कहते हुए अब हम और जोर लगाने लगे। इसकी चूचियों को अब दबाने लगे हम। चूमने लगे इसको। यह छटपटाती रही और मेरा लंड घुसता चला गया, पूरा लंड घुसता चला गया। जब पूरा घुस गया तो रुके हम।

“आह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं, मर गयी्ई्ई्ई्ई्ई्ई।” यह दर्द से परेशान थी। हम रुक गये और जोर जोर से इसकी चूचियों को दबाने लगे। चूमने चाटने लगे। धीरे धीरे यह शांत हो गयी। इसका चेहरा बता रहा था कि अब इसे तकलीफ़ नहीं है। हमनें और देर करना ठीक नहीं समझा। लंड धीरे धीरे बाहर निकालने लगे। लंड का सुपाड़ा इसकी चूत में ही रहने दिया।

“आआआआआआआ,” यह आनंद से आंखें बंद किए हुए थी। हम फिर घुसाने लगे लंड। इस समय इसे कोई फर्क नहीं पड़ा। बड़े मजे से लंड लेने लगी। हमें समझ आ गया कि चिड़िया फंस गयी है। अब हम जीत गये थे। सोमरी को जीत गये थे। हम धीरे धीरे चोदते हुए स्पीड बढ़ाने लगे। सोमरी की हालत खराब। आग लग गयी थी इसके बदन में। हम चोदते हुए इसकी ब्लाऊज खोल बैठे। थल्ल से इसकी चूचियां बाहर। वाह, मजा आ गया। इतनी बड़ी बड़ी चूचियां पहले कभी नहीं देखा था। पहले दबाया, फिर चूसने लगा। बड़ा मजा आ रहा था। गचागच चोदने लगा।

“आह आह ओह ओह्ह्ह्ह्ह्ह, इस्स्स्ई्ई्ई, ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मांआंआंआंआं।” यह मस्ती मे भर के अपनी चूतड़ उछालने लगी और गपागप मेरा लंड खाने लगी। यह सब कुछ भूल गयी थी। लाज शरम, सब कुछ।

“आह चोदो, ओह चोदो, आह मां, चोदो चोदो चोदो हे रामजी चोदो।” बोलने लगी।

“हां हां हां हां, मगर हम राम नहीं, हीरा हैं, हीरा। हीरा का मोटा खीरा, ले बुरचोदी, लौड़ा ले हमारा, तेरी चूत को चीरा।” हम बोलते हुए गच्च गच्च चोदने लगे। “अब आ रहा है मजा?”

“हां्आं्आं्आं्आं हां्आं्आं्आं्आं।”

“दर्द हो रहा है?”

“ना्आ्आ्आ्आ ना्आ्आ्आ्आ, ना्आ्आ्आ्आ।”

“फटा?”

“ना्आ्आ्आ्आ, ना्आ्आ्आ्आ, ना्आ्आ्आ्आ।” यही सब आलतू फालतू बात बोलते रगड़ रगड़ के चोदते रहे। बीस मिनट में इसे तीन बार झाड़ दिया। फिर हम भी झड़ गये। यह तो इतनी खुश हो गयी कि छोड़ ही नहीं रही थी।

“जिंदगी में पहली बार ऐसा मजा मिला।”

“हमको भी।”

“फिर चोदोगे?” हमसे लिपट कर बोली।

“हां रे हां।”

“कब?” बड़ी बेकरार हो रही थी।

..       “रोज।”

“सच्च्च्चीईईईई?”

“हां बुरचोदी सच्च्च्चीईईईई।”

“लेकिन यहाँ का काम खतम होगा तो?”

“तो क्या, तू भी हमारे साथ काम कर, फिर जहां हमारा काम होगा, वहीं चोदाचोदी चलेगा।” हम इसे बांहों में भर कर बोले। इसके बाद हमने मुंडू से बात किया। मुंडू राजी हुआ और तब से सोमरी हमारे साथ काम कर रही है। हमारे साथ काम करने का फायदा इसे यह हुआ कि हम सबका लंड इसे मिलने लगा। यह खुश, हम सब खुश।”

“बहुत माहिर चुदक्कड़ है रे तू तो। औरत फंसाने में उस्ताद।” मैं बोली।

“इसमेंं उस्तादी क्या? इसको मस्त लंड वाला चुदक्कड़ मर्द चाहिए था, हम मिल गये इसे।”

“और ई कांता?”

सलीम बताने लगा, “कांता तो पहले से एक नंबर की लंडखोर लौंडिया है। यह बांग्लादेश से यहां आई थी काम करने। इसको मुर्शिदाबाद वाले ग्रुप में काम करते हुए रफीक देखा था। रफीक भी पहले उसी ग्रुप में था। जब यह हमारे ग्रुप में आया तो इसनें हमको इसके बारे में बताया। जब हम इसको देखे तो देखते ही समझ गये कि यह एक नंबर की लंडखोर है। हमें पसंद आ गयी। मुंडू से बात किया और बात बन गयी। यह भी हमारे ग्रुप में आ गयी। ऐसी लंडखोर हमने पहले कभी नहीं देखा। इसको लंड से मतलब है। छोटा लड़का से लेके बूढ़ा तक, जो मिल जाए, सब चलता है इसको। छोटा लंड, पतला लंड, मोटा लंड, लंबा लंड, सब चलता है इसको।”

“वाह, तो यह है तुमलोगों का ग्रुप। भगवान भी क्या सोचता होगा? कैसे कैसे लोग मैंने बनाए और लोग क्या से क्या बन गये।” मैं ऐसे ही बोली।

“क्या मतलब?” सलीम बोला।

“कुछ मतलब नहीं। ऐसे ही बोली। अरे जो होता है उसी की मरजी से तो होता है। ऐश करो, मस्त रहो, बिंदास जिय़, खुश रहो।” मैं बोल उठी।

“यह बोली साली चोदनी, और क्या खूब बोली साली बुरचोदी। भगवान सबको ऐसी समझदार मालकिन दे।” बोदरा बोला।

“मुझको मालकिन बोला हरामी मादरचोद।” मैं गुर्राई।

“माफी चोदनी माफी।” कान पकड़कर बोदरा बोला और सभी हंस पड़े।

इस समय सात बज रहा था और तभी गाड़ी आने की आवाज सुनाई पड़ी। हरिया एवं बाकी दो नमूने आ चुके थे।

इस दिन के बाद तो सारे कामगरों को मानो मेरे तन से खेलने का लाईसेंस मिल गया। मैं कमीनी कम थोड़ी न हूं। उन्हें कृतार्थ करने में जरा भी संकोच नहीं करती थी। मेरी मनोवांछित मुराद भी तो पूरी हो रही थी। अपने तन की भूख ऐसे भी मिटाने की नौबत आएगी, इस बात की कल्पना भी नहीं की थी मैंने। खैर, मैं संतुष्ट थी। इस रविवार के करीब एक हफ्ते बाद की घटना है।

उस दिन सोमवार था। शाम को ऑफिस से घर लौटी तो गेट से ठीकेदार, आर्किटेक्ट हर्षवर्धन दास साहब निकल रहे थे। मैं उनका अभिवादन करते हुए पूछी,

“और दास बाबू, सब ठीक चल रहा है न?”

“हां मैडम, और सब तो ठीक चल रहा है, लेकिन मुझे लग रहा है आप मुझसे नाराज हैं।” उनके चेहरे पर मायूसी छाई हुई थी।

“क्यों, आपको ऐसा क्यों लग रहा है?” मैं थमक कर खड़ी हो गयी।

“अब मैं क्या बताऊं, बाकी आप खुद समझदार हैं।”

“मैं कुछ समझी नहीं।” मैं बोली।

“अब इतनी भी भोली न बनिए।”

“सचमुच मैं समझी नहीं आपकी बात का मतलब।”

“कैसे बोलूं?” वे हिचकिचा रहे थे।

“खुल के बोलिए ना।” मेरा दिल धड़क रहा था। मैंने अपनी समझ से दास बाबू के साथ न तो कोई बदसलूकी की थी, न ही बदजुबानी। व्यवहार भी सामान्य था। फिर? उनकी नजरें ऊपर से नीचे मुझ पर दौड़ रही थीं। हसरत भरी नजरें।और सब कुछ धीरे धीरे स्पष्ट होता चला गया। मैंने भवन निर्माण स्थल की ओर दृष्टि फेरी, तो पाया कि सलीम और बोदरा हमारी ओर ही देख रहे थे। उधर कांता भी कुटिलता से मुस्कुरा रही थी। सब समझ गयी मैं, फिर भी अनजान बनी पूछ बैठी, “देखिए दास बाबू, अगर मुझसे अनजाने में कोई गलती हुई है तो मैं माफी चाहती हूं।”

“अनजाने में नहीं, जान बूझ कर।” उनकी नजरें अब मेरे उन्नत उरोजों पर टिक गयी थीं। मेरे तन में वही चिरपरिचित सनसनाहट तारी होने लगी।

“क्या?”

“आपने सबको बांट दिया और मुझे भूल गयीं। हमसे कोई गलती हो गयी है क्या?”

“क्या बांटी मैं?”

“सब बोल रहे हैं, खिलाई हैं आप उनको।”

“क्या खिलाई हूं?” अब सब कुछ स्पष्ट हो गया। इन कमीनों नें दास बाबू को भी बता दिया। फिर भी बनती रही।

“अब वो भी बता दूं?”

“हां।” देखती हूं क्या बोलता है?

“खुल के बोलूं? अगर गलत हूं तो सॉरी।”

“आप बोलिए तो।”

“सब लोगों को आपनी जवानी का प्रसाद खिलाया और हमें नहीं। यह तो सरासर अन्याय है। है ना?” अब उनके होंठों पर कामुकता नृत्य कर रही थी।

“हाय राआआआआम।” मैं आंखें बड़ी बड़ी कर शर्मिंदा होने का ढोंग करने लगी।

“तो यह सच है?” वे खुश हुए कि उनका कथन सत्य था।

“त त त त तो इन लोगों नें बता दिया आपको?” मैं नजरें झुका कर बोली।

“हां, तभी तो बोल रहा हूं। मुझसे ऐसी क्या गलती हुई कि मुझे भूल गयीं आप?” मेरी हालत देख कर उनकी आंखें चमक उठीं। फंसी यह चिड़िया जाल में।

“अ अ अ असल में, असल में, मममममुझे नननननहींईंईंईं पता था क क क कि आप इस तततततरह कके हैं।” मैं हकलाने लगी।

“अब पता चल गया ना?”

“हूं” मैं जमीन पर नजरें गड़ाए बोली।

“तो?”

“ततयतो कककक्या?”

“क्या इरादा है? खाने की उम्मीद करूं?”

“अब मैं क्या बोलूं? पता तो चल ही गया है आपको। मना करने की अवस्था में हूं क्या?” मेरी आवाज में लाचारी थी। छि:, क्या सोच रहा होगा मेरे बारे में? इतनी घटिया औरत हूं मैं? इतनी गिरी हुई, कि इन मजदूरों के समक्ष बिछ जाती हूं अपनी वासना की पूर्ति के लिए।

“ऐसी लाचारी भरी आवाज में मत बोलिए।”

“तो कैसे बोलूं?”

“खुले दिल से बोलिए।”

“बोली तो।”

“ऐसे नहीं।”

“फिर कैसे?”

“खुल के, खुशी खुशी।” वे कुत्सित मुस्कान के साथ बोले।

अब मुझे झल्लाहट होने लगी। ड्रामा करना मुश्किल होने लगा। मैं बेशरम छिनाल तो थी ही, बोलने पर आऊं तो रंडियां भी मुंह छुपाने लगें। फिर भी बमुश्किल नियंत्रण के साथ बोली, “हां बाबा हां। जब मन हो खा लीजिएगा। बस? या और तरीके से बोल़ू।”

“बस बस, इतना ही सुनना था। तो हमें प्रसाद मिलना पक्का ना?” पैंट के ऊपर से ही अपने लिंग को सहलाते हुए बोले।

“ओ बाबा हां तो बोल चुकी।” कहती हुई तेज कदमों से घर में दाखिल हुई। सभी कामगरों की नजरें मेरा पीछा करती रहीं। मन ही मन सभी हंस ही रहे होंगे हरामी। दिल मेरा धाड़ धाड़ धड़क रहा था। सबके सब एक ही थैले के चट्टे बट्टे हैं। हर्षवर्धन दास जी पचास पार के एक मोटे तोंदियल, लेकिन करीब पांच फुट ग्यारह इंच ऊंचे कद्दावर व्यक्ति थे। सामने ललाट से लेकर बीच के सारे बाल उड़ चुके थे। सिर्फ किनारे किनारे के बाल रह गये थे। वे भी आधे पके आधे सफेद। पतली, करीने से तराशी गयी मूछें थीं उनकी।सांवले रंग का आकर्षक व्यक्तित्व था उनका। उनको देखकर कोई भी नहीं सोच सकता था कि वे इस तरह के व्यक्ति होंगे। लेकिन आज तक मुझ जितने मर्दों से पाला पड़ा था उनमें से कई ऐसे व्यक्तियों को मैं जानती थी जिनकी शरीफ सूरत के पीछे हवस का दानव सर छुपाए पड़े थे। मौका मिला नहीं कि शरीफ चेहरों के नकाब उतार कर दानव प्रकट होने में तनिक भी देर नहीं करता था। दास बाबू भी उन्हीं में से थे। वैसे तो सलीम और उसके सहयोगी कामगरों के मुख से सुन चुकी थी कि रूपा और सुखमनी नामक रेजाएं उनकी पसंदीदा रेजाएं थीं जो उनकी रखैल की तरह थीं। लेकिन मुझपर भी उनकी कुदृष्टि पड़ेगी, यह मैं नहीं सोच पाई थी। औरतों के रसिया थे यह तो पता था लेकिन मुझ पर उनकी नीयत डोलेगी, यह नहीं सोचा था। शायद मन के किसी कोने में थी यह बात, जो इन हरामियों के द्वारा उस दिन वाली घटना और उसके बाद लगातार चलते हमारे बीच इन वासना के खेल का पता चलने से प्रकट हो गया। अब मैं सोच रही थी कि न जाने कब का कार्यक्रम था उनका।

अधिक उधेड़बुन में नहीं रहना पड़ा मुझे। मैं अभी फ्रेश हो कर चाय पी ही रही थी कि दास बाबू का कॉल आ गया।

“हल्लो जी।” दड़क उठा मेरा दिल।

“जी कहिए।” लरजती आवाज में बोली मैं।

“क्या हो रहा है?”

“कुछ नहीं।”

“फिर आज मिलते हैं।”

“कककककहां?” मैं इतनी जल्दी यह आशा नहीं कर रही थी।

“हमारे घर में।”

“कहां है आपका घर?” मैं आशंकित थी।

“लोआडीह।”

“लोआडीह में कहां?”

“ओके ओके मैं गाड़ी भेज देता हूं।”

“हहहहां यययह ठीक रहेगा। लेकिन मैं ज्यादा देर नहीं रुकुंगी।”

“आप आईए तो। नहीं रोकेंगे ज्यादा देर।” नहीं रोकेंगे मतलब? एक वचन से बहुवचन कैसे हुआ? और लोग भी हैं क्या? मैं सशंकित हुई। मगर पूछी नहीं। दस मिनट में ही एक कार आ लगी हमारे दरवाजे पर। कॉल बेल बजा। मैं हरिया को बोली,

“सुनिए”

“बोलो।” किचन से निकलते हरिया बोला।

“मैं जरा लोआडीह से होकर आ रही हूं।”

“लेकिन अभी?”

“हां, जरूरी काम है।”

“करीम को भेज दूं?”

“नहीं, उन्होंने कार भेजा है।”

“किसने?”

“क्लाईंट नें।” बता नहीं सकती थी कि कौन सा क्लाईंट। उधर दास बाबू मुझपर डुबकी लगाने को तैयार बैठे होंगे। क्या बताती, पसरने जा रही हूं? ऐसा लग रहा था मानो मैं कोई कॉलगर्ल हूं, जिसे ग्राहक नें बुलाया है। ड्राईविंग सीट पर एक मुच्छड़, दढ़ियल, मोटा आदमी बैठा हुआ था। मुझे देख कर खींसें निपोरने लगा।

“आईए मैडम।” वह कार के सामने वाला दरवाजा खोल कर बोला। मैं चुपचाप कार में बैठ गयी। कार चल पड़ी। लोआडीह चौक से कुछ आगे जाकर दाहिनी ओर एक छोटे से मॉल के बगल के खुले गेट में कार प्रविष्ट हुई। मैंने देखा कि वहां चार पांच ऊंचे ऊंचे फ्लैट थे। कार सीधे जाकर तीसरे फ्लैट के सामने रुकी। ड्राईवर नें कार का दरवाजा खोलते हुए कहा, “आईए मैडम।”

मैंने देखा यह एक आठ मंजिला फ्लैट था। कार पार्क करके ड्राईवर मेरे पास आया। वह करीब पचास साल का, खलीता पैजामा पहना हुआ काफी लंबा, मोटा तगड़ा, गुंडा टाईप व्यक्ति था। मैं तो उसके सामने बिल्कुल बच्ची लग रही थी। खैर मुझे उससे क्या लेना देना था। ड्राईवर ही तो था।

“चलिए।” उसने कहा। एक गंदी सी रहस्यमयी मुस्कान थी उसके होंठों पर। अब ड्राईवर था उसका तो इन सब बातों का राजदार तो अवश्य होगा। ऐसी बातें इन लोगों से छिपती कहां हैं। किसी दलाल की तरह माल सप्लाई करता होगा। मैं यंत्रचालित गुड़िया की तरह उसके पीछे पीछे चली। फर्स्ट फ्लोर पर ही सीढ़ियों की बांयी ओर सामने दो दरवाजे थे। उनमें से दाहिनी ओर के दरवाजे का डोर बेल बजाया उसने। तत्काल ही दरवाजा खुला और सामने कुत्सित मुस्कान लिए दास बाबू खड़े थे। एक काली टी शर्ट और पैजामे में थे वे।

“वेलकम मैडम।” दरवाजे से हटते हुए उसने कहा। मैं अंदर प्रविष्ट हुई। मेरे अंदर आते ही दास बाबू नें दरवाजा बंद कर दिया।

“आपकी फैमिली?” पूछी मैं। मैं पशोपेश में थी।

“नहीं है?”

“मतलब?”

“मायके गयी है बीवी। तभी तो जैसे ही आपके बारे में पता चला, बुला लिया।” वे बोले। साले, मानो मौका ही खोज रहे थे। अब आगे क्या? मैं सोचने लगी। वैसे आज मुझे मूड नहीं था, लेकिन मजबूरी थी। दास बाबू को मना करना ठीक नहीं लग रहा था। हमारे भवन निर्माण का कार्य उन्हीं की देख रेख में चल रहा था। जब यह राज खुल ही गया था कि मैं उनके मजदूरों संग रंगरेलियां मना रही हूं तो किस मुंह से मना करती। वासना की भूख नें मुझे कितनी सस्ती बना दिया, निकृष्ट, किंतु भगवान का दिया रूप लावण्य तथा आकर्षक देह, जिसमें वासना की अदम्य भूख नख शिख, छलछला कर भर दिया था ऊपरवाले नें। औरतों के रसिया मर्दों की दृष्टि में ऊपरवाले का नायाब तोहफा। तभी तो अब दास बाबू मुझे नोचने को ललायित हो उठे थे। जबतक उन्हें मेरे बारे में पता नहीं था, तबतक तो बड़े शरीफ बने फिर रहे थे। कमीने कहीं के।

खैर, अब तो चिड़िया खेत चुग गयी थी। अब जो होना है हो। मेरी नजरें फ्लैट का मुआयना करने लगीं। यह बड़ा सा, करीब चौदह बाई सोलह का बड़ा सा बैठक हॉल काफी सजा हुआ था। लंबाई उत्तर दक्षिण थी। सामने और बांयी ओर लंबे लंबे गद्देदार सोफे थे जिनके सामने एक बड़ा सा चौकोर सेंटर टेबल था। यही बैठक हॉल आगे जा कर अंग्रेजी का एल बनाता हुआ पश्चिम की ओर बढ़ कर डाईनिंग हॉल बन गया था। बैठक के पूरब की दीवार पर टीवी पैनल था जिसके बीचोबीच 53″ का टी वी लगा हुआ था। यह तीन बेडरूम वाला फ्लैट था, जिसका करीब क्षेत्रफल करीब 1800 वर्ग फीट होगा। पश्चिम की ओर एक बाल्कोनी थी।

“तो मेरी जान।” न जाने कब दास बाबू मेरे पीछे आ खड़े हुए थे, मुझे बांहों में भर कर बोले।

“ये ये ये क्या कर रहे हैं?” मैं उनकी मजबूत बांहों में छटपटाती बोली।

“वही कर रहे हैं जिसके लिए तू यहां आई है।” आप से सीधे तू पर आ गया वह।

“ददददेखिए मैं ऐसी नहींं हूं।” उनकी बांहों से छूटने की असफल कोशिश करती हुई खोखली आवाज में बोली।

“तो फिर कैसी हो? हां हां बताओ कैसी हो? हमारी रेजाओं जैसी? या फिर कोई रंडी, कॉलगर्ल? जो एक फोन आने पर ग्राहक के पास दौड़ी चली जाती हैं? ऐसा ही हुआ ना? बताओ बताओ।” बिना कपड़े उतारे ही मुझे नंगी कर चुका था और मैं शरम से पानी पानी हो गयी। मेरी हालत उससे छिपी नहीं थी। वह एक हाथ से मेरी कमर पकड़ा था और दूसरे हाथ से मेरे स्तनों को सहला रहा था। मैं निरुत्तर थी उसके कथन से। मैं सलवार कमीज में थी। मेरी चुन्नी फर्श पर कब गिरी पता नहीं। वह समझ चुका था कि चिड़िया हाथ में आ चुकी थी। फड़फड़ा तो सकती है लेकिन भाग नहीं सकती है।

“मगर फिर भी…..”

“अब यह अगर मगर न ही करो तो अच्छा है।” अब वह मेरी गर्दन को चूमने लगा था। मेरे तन बदन में शोला भड़कने लगा। कसमसा उठी मैं। मेरे नितंबों के मध्य सख्त डंडे की चुभन अनुभव कर रही थी।

“न न न नहींईंईंईंईंई।” बड़ी कमजोर आवाज थी मेरी।

“नहीं की बच्ची, सारे मिस्त्रियों और कुलियों के लंड खा कर मुझी को नहीं नहीं बोल रही है साली लंडखोर।” अब उसकी आवाज में तल्खी मिस्रित कामुक भेड़िए की गुर्राहट थी।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह,” उसके हाथों मेरे उरोज बुरी तरह मसले जा रहे थे। अबतक जो सुस्ती, आलस्य मेरे तन में थी, अनमना सा भाव मन में था, शनैः शनैः तिरोहित हो रहा था। मन मस्तिष्क में कामुकता के पिशाच की तंद्रा टूट चुकी थी। वासना का जहरीला सर्प फन उठा चुका था। मैंने खुद को उस वासना के तूफान में बहने के लिए छोड़ दिया। मेरी आंखों में वासना के लाल डोरे उभर आए थे। सारे शरीर में चिंगारियां सुलगने लगीं थीं। मेरे चेहरे के भाव दासबाबू को और उत्साहित कर रहे थे।

“उफ, अब और नहीं।” दास बाबू नें मुझे उठा कर सामने काऊंटर बेसिन के पास ला खड़ा किया। काऊंटर बेसिन के सामने एक बड़ा सा दर्पण था, जिसपर हमारे अक्स परिलक्षित हो रहे थे। मेरे कंधे से ऊपर दास बाबू का बेताब चेहरा झांक रहा था। भूखे भेड़िए सी शक्ल हो गयी थी उनकी। आंखों की लालिमा बता रही थी कि उनकी उत्तेजना चरम पर थी। मैंने दर्पण में देखा, मेरे कमीज के ऊपरी बटन खुल चुके थे और मेरे स्तन अपनी पूरी शिद्दत से कसी हुई ब्रा से छलक पड़ने को बेताब थे।

“हाय रा्आ्आ्आ्आम।” मैं उनकी बांहों में बंधी अपनी अस्त व्यस्त हालत को देख पानी पानी हो उठी। विरोध बेमानी था। समपर्ण के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। वह अपनी मनमानी किये जा रहा था और मैं पिघलती जा रही थी। तभी उन्होंने मेरी कमीज रुपी व्यवधान को अवांछित वस्तु की मानिंद क्षण भर में उतार फेंका। अब मैं कमर से ऊपर सिर्फ ब्रा में थी। उस हालत में मेरी खूबसूरत देह की छटा देख वह और बेकरार हो उठा।

“उफ, ये खूबसूरती। गजब। अब ये ब्रा क्यों? इसे भी हटा, देखूं तो, मेरे मजदूरों को क्या हाथ लगा है?” कहते हुए मेरे उन्नत उरोजों को ब्रा से मुक्त कर दिया। फटी की फटी रह गयीं उसकी आंखें। मुंह खुला का खुला रह गया।

“ओह, ये नजारा, ऐसी चूचियां, सुभान अल्लाह। ऐसे खूबसूरत बदन को उन घटिया कुत्तों नें चोदा? साली रंडी, हम मर गये थे क्या लंडखोर?” दास बाबू खुद पर खीझ रहे थे या मेरी चूचियों को दबोच कर खुन्नस निकाल रहे थे।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह, नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं्ई, आह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं, ऐसी जबरदस्ती तो न करो आह, दर्द होता है।” मैं दर्द से बिलबिला उठी।

“जबर्दस्ती कर रहा हूं? मां की लौड़ी दर्द होता है? रंडी की औलाद?”

“हाय दैया, ये क्या बोल रहे हैं?”

“ठीक ही तो बोल रहा हूं। इस खूबसूरती को चखने का पहला हक मेरा था। साली जूठन चूत।”

“गाली तो न दीजिए।”

“कुत्ती कहीं की, सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज को? गाली न दूं तो क्या करूं? आरती उतारूं तेरी?” गालियां देता हुआ मुझे नंगी करता चला गया। एक एक करके मेरे तन से वस्त्र केले के छिलके की तरह अलग होते गये और अंततः मैं नंगी हो गयी। पूर्णतः नग्न। मादरजात नग्न। दर्पण में खुद की नग्न देह को इस तरह एक कामुक भेड़िए के पंजों में देखकर मैं सचमुच लज्जा से दोहरी हुई जा रही थी। दास बाबू तो स्तब्ध रह गये मेरी नग्न काया की छटा देख कर। उनकी आंखों की चमक साफ साफ बता रही थीं कि उन्हें एक नायाब हीरा हाथ लग गया है।

“परी है रे परी तू। ये हूर कहाँ लंगूरों के बीच जा फंसी।” अब वे मेरी चिकनी योनि सहलाते हुए बोल रहे थे। चुम्बनों की झड़ी लगा बैठा था वह मेरी गर्दन पर, मेरे गालों पर और मंत्रमुग्ध मेरा चेहरा घूमा, चेहरा ऊपर उठा, संकेत स्पष्ट था, मेरे होठों से चिपक गये उनके होंठ। विभोर हो उठी, गनगना उठी मैं। तड़प उठी थी मैं। पागल हो रही थी। मेरी कमीनी फकफकाती योनि से रस का श्राव आरंभ हो गया था और इस तरह के संभोग हेतु तैयार शारीरिक संकेतों से ऐसे औरतखोर मर्द भला कैसे अनभिज्ञ रह सकते हैं? वासना के भड़कते शोलों की तपिश में तपती, तड़पती, बेसाख्ता एक लंबी आह निकल पड़ी मेरे मुंह से। सब समझ गया था वह, कि अब समय आ चुका है कामक्रीड़ा के अगले चरण का। उनकी भी उत्तेजना का पारावार न था। आनन फानन अपने कपड़े उतारने लगा वह। देखते ही देखते हो गया मादरजात नंगा। जैसे जैसे उसके कपड़े उतरते गये, उसका मर्दाना शरीर नामुदार होता गया। सीना और पेट घने बालों से अटा पड़ा था। जो तोंद पूरे वस्त्रों में ढंका छिपा था, वह छलक कर बाहर आकर मुझे मुंह चिढ़ा रहा था। भीमकाय शरीर बेपर्दा हो चुका था मेरे सम्मुख। मोटी मोटी सशक्त बांहें, चोड़ा चकला सीना, मजबूत कंधे, मोटी मोटी जंघाएँ और और और बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, तोंद के नीचे लटकता लिंग, नहीं नहींं, यह किसी सामान्य मानव का लिंग तो कत्तई नहीं था, या फिर मानव का था ही नहीं। पशु, वो भी गधे प्रजाति पशु के लिंग से भिन्न नहीं था। भय से मेरी घिग्घी बंध गयी।

“नहींईंईंईंईंईंईंईंई।”

“क्या नहीं?” दास बाबू समझ गये मेरे भय को।

“ये्ए्ए्ए्ए्ए्ए कककक्या्आ्आ्आ है?”

“क्या है? क्या मतलब? तुम्हीं बताओ क्या है?” चुटकी ले कर मजा ले रहा था।

“इतना्आ्आ्आ्आ बड़ा्आ्आ्आ्आ्?” मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं। बाप रे बाप, करीब चार इंच मोटा। लंबाई अवश्य नौ इंच के करीब होगी, लेकिन मोटाई? उफ्फ भगवान, कहां आ फंसी थी मैं? हलाल होना तय था।

“इतना बड़ा क्या?” वह मुस्कुरा रहा था मेरी हालत पर।

“ये।”

“ये क्या?”

“ल ल ल ल लं…..”

“हां हां बोलो बोलो।”

“लं लं लंड।” मैं मुंह छुपा कर बोली।

“वाह, बोली और क्या खूब बोली। हाय हाय मेरी छम्मकछल्लो, तेरे जैसी रांड भी ऐसे शरमाती है? वाह रे नौटंकीबाज लंडखोर औरत। ऐसा लंड नहीं देखी है कभी?”

“नननननहींईंईंईं।” हकला कर बोली।

“झूठ।”

“नहीं, ससससच्च।”

“मंगरू और हीरा का लंड लेकर भी ऐसा बोल रही है।” वह मेरे करीब आता हुआ बोला।

“नहीं, करीब न आना। मंगरू और हीरा का भी इतना मोटा नहीं था।” मैं एक एक कदम पीछे हटती हुई बोली। मेरी नजरें उसके तन्नाए हुए लिंग पर ही जमी थींं।

“मोटा हुआ तो क्या हुआ।” वह आगे बढ़ता जा रहा था।

“फट जाएगी मेरी।”

“तुम्हारी क्या?”

“मेरी चचचचू…..”

“हां हां बोलो बोलो चचचचू…. क्या?” वह मजा लेता हुआ बोला।

“धत”

“अय हय, बोल बोल।”

“चचचचचूऊऊऊऊत।” मैं पीछे हटती गयी और वह आगे आता गया। मैं पीछे हटते हुए सेंटर टेबल से उलझी और धप्प से टेबल पर ही उलट गयी। “आह, पास मत आईए।”

“आऊंगा आऊंगा, और करीब, और करीब आऊंगा, तू हटने के चक्कर थी न? बचने के चक्कर में थी न? क्या हुआ? गिरी न? पता है क्यों गिरी? मेरे लिए गिरी। चुदने के लिए गिरी।” उसकी वासना से ओत प्रोत नजरें मेरे नग्न जिस्म से चिपकी हुई थीं। इससे पहले कि मैं संभलती, बाज की तरह झपटा मुझ पर और अपनी बांहों में जकड़ कर चुम्बनों की बरसात कर बैठा।

“नननननहींईंईंईं प्लीज।”

“ऐसे दिल तोड़ने वाली बातें न बोल। डर मत पगली, बड़ा मजा आएगा।”

“नहीं, आपका बहुत मोटा है।”

“तो क्या हुआ?”

“दर्द होगा मुझे।”

“क्यों?”

“फट जाएगी मेरी।”

“फटेगी नहीं, फैलेगी।”

“दर्द तो होगा ना।”

“मजा भी तो आएगा।”

“नहीं, डर लगता है।”

“चुप हरामजादी, एकदम चुप नौटंकीबाज। चल चोदने दे। बहुत ड्रामा किए जा रही है तब से।” घुड़की दे बैठा मुझे और सेंटर टेबल से उठाया और घसीटकर फिर काऊंटर बेसिन के दर्पण के सामने ले आया।

“नहीं प्लीज। आपका लंड गधे जैसा है।” मैं गिड़गिड़ा रही थी।

“तो गधा ही जैसा चोदूंगा। तुझे अपनी गधी बनाऊंगा।”

“नहींईंईंईंईंईंईंईंई।” मगर मेरी आर्तनाद कौन सुनता वहां। उसनें मुझे पीछे से पकड़ रखा था। उसका दानवी लिंग मेरी गुदा पर दस्तक दे रहा था। उसनें मुझे जबरदस्ती काऊंटर बेसिन के स्लैब पर झुका दिया। अब इस स्थिति में मेरी गुदा के साथ साथ मेरी योनि भी उसके लिंग के प्रवेश के लिए उपयुक्त स्थिति में थी। इसी अवसर का तो इंतजार था उसे। मेरी ना नुकुर और विरोध को अनसुना करते हुए अपने गधे सरीखे लिंग के सुपाड़े को मेरी योनिद्वार पर साध दिया। स्पर्श मात्र से ही कांप उठी मैं। “नहीं प्लीज नहीं, मर जाऊंगी।” किसी भी पल हो सकता था हमला। वह पल बहुत करीब था

“मर साली कुत्ती, ले मर मां की चूत।” कहते कहते मेरी कमर को दबोचे एक करारा धक्का मारा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” मैं पीड़ा से चीखी।

“चिल्ला रंडी चिल्ला। खूब चिल्ला।” एक और धक्का मारा उसनें।

“ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह मांआंआंआंआं।” फट रही थी मेरी चूत। दर्द असहनीय था।

“चुप्प छिनाल चुप्प।” एक और धक्का, और हो गया काम तमाम। मेरी योनि को सीमा से बाहर फैलाता हुआ उसका विकराल लिंग पूरा का पूरा समा चुका था। जहां वह जीत की खुशी में मगन बेरहम दरिंदा बन मुझे दबोचे हुम्मच हुम्मच कर दे दनादन ठोंकने लगा, वहीं मैं असहनीय पीड़ा झेलती बेबसी की हालत में समर्पण को वाध्य, गपागप खाने लगी उसका असामान्य, आतंक का पर्याय लिंग। कुछेक मिनट उसी तरह पीड़ामय संभोग को झेलती झेलती कब अपनी पीड़ा भूल आनंद का अनुभव करने लगी पता ही नहीं चला। मेरी योनि पर्याप्त रूप में फैल कर उसके अविश्वसनीय वृहद लिंग हेतु सुगम मार्ग बन चुकी थी। सारी सुस्ती शरीर की, सारी अनिच्छा मन की, शनैः शनैः तिरोहित होती गयी और जैसे मेरे अंदर नवजीवन का संचार हो गया। तन मन तरंगित होने लगा। मेरे अंदर वासना की भूखी पिशाचिनी जागृत हो कर इस कामुक औरतखोर की कामक्रीड़ा में सक्रिय सहयोग को प्रोत्साहित करने लगी। खुद पर से मेरा नियंत्रण समाप्त होता जा रहा था और अंततः मैंने हां ना हां ना के इस झंझावत से मुक्त होने का निर्णय ले ही लिया। कुछ उनकी कामुक हरकतों का असर था और कुछ मेरे अंदर की सुषुप्त कामुक कामिनी की तंद्रा भंग होने का असर, मेरे तन पर से मेरे मन का नियंत्रण छूमंतर हो गया था। मैं खुल कर खेलने लगी। खुल कर मजा लेने लगी। खुल कर खाने लगी गपागप, उसके लिंग को अपनी योनि में। मेरी कमर खुद ब खुद चलने लगी, उछलने लगी।

“आह्ह, आह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, इस्स्स्स, इस्स्स्स, आह्ह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” ये सिसकियां और कामुकता से भरपूर आहें उबली जा रही थीं मेरे लबों से।

“आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, वाह वाह, अब आ रहा है, आ रहा है न मजा।” मुझे कुत्ते की तरह दबोचे, चोदने में मशगूल दास बाबू आनंदित हो कर बोले।

“हां, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, हां रज्ज्ज्जा, ओह मेरे रसिया, आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह, आ रहा है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह बड़ा मजा आ रहा है।” मैं अपनी असंयमित सांसों को संयमित करती बोली। दास बाबू को और भला क्या चाहिए था। मेरी चूचियों को पीछे से बड़ी ही बेदर्दी से अपने पंजों से दबोच कर गचागच चोदने लगे।

“नाईस, दैट्स लाईक अ गुड गर्ल (बढ़िया, यह एक अच्छी लड़की जैसी बात हुई), अब मजा दे और मजा ले, ले ले ले, आह, आह।” वे खुशी से बोले।

“अब नहीं आह, अब अच्छी लड़की नहीं उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, बुरी लड़की बोल बेटीचोद आह्ह्ह्ह, बुरी औरत बोल मादरचोद ओह मा्ं्मां्मां्आं्आं्आं, चोद ही डाला तो बुरचोदी बोल ओह्ह्ह्ह्ह्ह, कुत्ते की तरह चोदते समय कुत्ती बोल साले कुत्ते आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” अब मैं पूरे रंग में आ चुकी थी। दास बाबू नें शायद इसी की कल्पना की थी, जो साकार हो गया था।

“साली रंडी्ई्ई्ई्ई्ई, अब आई असली रंग में लंडखोर कुतिया, यही तो चाहता था हरामजादी। अब ले, ये ले, ये ले, हुं हुं हुं हुं हुं।” अब धमाल मच गया था।

“हां साले चोदू, चोद लौड़ू चोद, चोद चूत के चटोरे चोद, चोद झांट के झोले चोद।” मैं न जाने क्या क्या बोले जा रही थी। थपाक थपाक की आवाज आ रही थी। यह आवाज थी उसके झोले जैसे लटके बड़े बड़े अंडकोश के मेरी चूत के ऊपर पड़ने वाली थपेड़ों की। करीब आधे घंटे तक वह मुझे नोचता रहा, खसोटता रहा, झिंझोड़ता रहा, निचोड़ता रहा और मैं स्वर्गीय सुख में डूबी, नुचती रही, छिलती रही, झिंझुड़ती रही, निचुड़ती रही। उस भीषण चुदाई का अंत भी उतना ही आनंददायक था। उन्होंने मेरी चूचियों को पूरी शक्ति से भींच कर अपना मदन रस उंडेलना आरंभ किया। गरमागरम लावा का पान कर मेरी कोख निहाल हो उठी। मेरी योनि उनके विशाल लिंग को चूस रही थी। एक एक कतरा चूस कर ही मानी मेरी लंडखोर चूत।

“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह।” वह खलास होकर भैंस की तरह डकारने लगा।

“ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मांआंआंआंआं।” मैं भी गयी्ई्ई्ई्ई्ई्ई। ओह्ह्ह्ह्ह्ह क्या ही आनंददायक स्खलन था वह मेरा। थक कर निढाल हो गयी। तभी दास बाबू का लिंग भीगे चूहे की तरह सिकुड़ कर ‘फच्च’ की आवाज के साथ मेरी योनि से बाहर आया। मैं अपने स्थान में खड़ी न रह पायी। वहीं पास के सोफे पर लुढ़क कर निढाल हो गयी। दास बाबू भी किसी भैंसे की तरह लुढ़क गये।

“बड़ा मजा आया।” दास बाबू बोले।

“मुझे भी।”

“ऐसी औरत जिंदगी में पहली बार मिली।”

“मुझे भी ऐसा मर्द पहली बार मिला।”

“वाह रे रानी, सच?”

“हां राजा सच्ची।”

“तो अब तू मेरी लंडरानी बन गयी ना?”

“हां मेरे राजा, मेरे चूत के लौड़े।”

“हाय, तेरी इसी अदा को तो देखना चाहता था।”

“तो देख लिया?”

“हां। पसंद आया।” कहकर मुझे बांहों में भर कर चूम लिया। मैं भला कहाँ पीछे रहती। लिपट गयी अमर बेल की तरह उधकी मोटी, भैंस जैसी नग्न देह से और चुम्बन दे बैठी, तृप्ति की, प्रसन्नता की, समर्पण की। निहाल हो उठे दास बाबू। फिर मैं अपने कपड़े पहन, मुदित मन, पुनः मिलते रहने के वादे के साथ विदा हुई।

 

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