रश्मि का हाव भाव बता रहा था कि रामलाल के प्रस्ताव पर उसे कोई आपत्ति नहीं है, हालांकि दिखावे का उसका इनकार एक स्त्री सुलभ प्रतिक्रिया मात्र थी, जिसे सुनकर हम मुस्कुरा रहे थे। वैसे भी हम सबके सामने भला कैसे खुल कर अपनी सहमति दे देती वह। हम सब सभझ रहे थे।
“तो पहले पूरी कहानी खतम कीजिएगा कि…..” मैं आधा बोल कर चुप हो गयी, बाकी तो सब समझ ही रहे थे।
“पहले रश्मि मैडम।” रामलाल तुरंत बोला।
“छि:, नहीं, मैं नहीं।” उठकर जाने को हुई।
“अरे जाती कहां है मेरी छम्मक छल्लो।” मैं तुरंत उठी और रश्मि को अपनी बांहों में जकड़ ली।
“छोड़ मुझे साली कुतिया।” रश्मि छटपटाने लगी, दिखावे की छटपटाहट।
“हां मैं कुतिया हूं, मगर तू क्या कम है? मेरी अनुपस्थिति में इन बूढ़ों के लंड का मजा लेने के लिए तेरी चूत में खुजली नहीं मची थी क्या? बड़ी सीधी बन रही है। रामलाल जी, लीजिए पकड़ लीजिए इस कुतिया को और सच में कुतिया बना डालिए इसे। हरामजादी मुझे कुतिया कह रही है।” मैं रश्मि को जकड़े रामलाल को आमंत्रण दे बैठी। हरिया और करीम चुपचाप तमाशा देख रहे थे। उन्हें सब समझ आ रहा था कि यहां जो कुछ हो रहा है उसकी सूत्रधार मैं ही हूं और पूरी स्थिति में मेरा नियंत्रण है।
“ओह्ह्ह्ह्ह, नहींईंईंईंईंईंईंई, प्लीज नहींईंईंईंईंईंईंई।” रश्मि केवल मुंह से बोल रही थी। विरोध शारीरिक नहीं था।
“हां हां हांआंआंआंआंआं, रामलाल जी, आईए शिकार हाजिर है।”
“आया मैडम।” रामलाल भूखे भेड़िए की तरह रश्मि की ओर बढ़ा। उसकी आंखों में इतनी खूबसूरत शिकार को देखकर एक अलग तरह की चमक थी।
“नहींईंईंईंईंईंईंई…….” बेहद कमजोर ना। मुझे हंसी आ गयी।
“अब काहे की ना। सीधे सीधे बोल हां, हां हां हां।” मैं आगे बढ़ते रामलाल की ओर रश्मि को ढकेल कर बोली। रामलाल ने रश्मि को अपनी मजबूत बाजुओं में समेट कर आदमजात स्वभाव अनुसार उसके होंठों पर एक करारा और लंबा चुंबन अंकित कर दिया। उतने में ही तो पिघल गयी पगली। सारा विरोध, झिझक और हमारी उपस्थिति से उपजी शरमोहया कहां घुस गयी पता नहीं। अपने शरीर को उसकी बांहों में ढीला छोड़ समर्पित सी हो गयी रामलाल के सम्मुख। काम हो गया मेरा, अब तमाशा शुरू होने को था। बदहवासी के आलम में रामलाल और रश्मि एक दूसरे की बांहों में समाए चपाचप चुम्बनों का आदान प्रदान करने में मशगूल हो गये, इस बात से बेखबर कि अगले कुछ ही पलों में रामलाल के भीमकाय लिंग द्वारा रश्मि की चूत का क्रियाकरम होने वाला है। उनके शरीर से कपड़े एक एक करके छिलके की तरह उतरते चले गये। अद्भुत नजारा था। कहां रश्मि की खूबसूरत कमनीय काया और कहां रामलाल का गठा हुआ भीमकाय शरीर और उसका टनटनाया महा विकराल लिंग। उसके लिंग का आकार देखकर तो रश्मि भयाक्रांत हो गयी।
“ओ बाबा, एतो बोड़ो! ना बाबा ना। मोरी जाबो गो। छाड़ो छाड़ो।” घबराहट के मारे उसके मुह से निकला। इस वक्त रामलाल का लिंग कुछ अधिक ही बड़ा और भयावह दिख रहा था, काले नाग की तरह फनफनाता हुआ। हरिया और करीम ने भी इतने बड़े लिंग की कल्पना नहीं की थी शायद। करीब 11″ से भी लंबा और वैसा ही गधे सरीखा मोटा।
“चुप रहिए मैडम, कुछ नहीं होता है। चार चार औरतों को चोद चुका हूं, कुछ नहीं हुआ। कामिनी मैडम से पूछ लीजिए।” रश्मि के नंगे जिस्म को किसी गुड़िया की तरह दबोच कर बोला रामलाल।
“नहीं, ओ मां्आं्आं्आं, नहीं।”
“रामलाल, आप मत सुनिए इस कुतिया की बात। चोदिए साली हरामजादी को, बड़ी नखरे कर रही है। एक बार लंड अंदर लेने के बाद खुद बोलेगी चोद राजा चोद।” मैं बोल पड़ी। उत्तेजना मुझ पर भी हावी हो रही थी। “और तुम दोनों बेटीचोद बुड्ढे, खाली उधर ही देखोगे कि इधर भी देखोगे। देख नहीं रहे, मैं, जल रही हूं आग में, चुदास की आग में। अब बोलना पड़ेगा कि चोदो मुझे, या फिर रामलाल और रश्मि की चुदाई देख देख कर मूठ मारने का इरादा है।” रामलाल को उत्साहित करते हुए अपनी उत्तेजना की रौ में हरिया और करीम को आमंत्रण दे बैठी।
“साली कुत्ती, हमें ताव दिला रही है मां की चूत। मूठ काहे मारेंगे, चोदेंगे रे बुरचोदी, चल करीम, इस रंडी की चूत की खुजली मिटाते हैं। तेरी चूत का भोंसड़ा बनाते हैं अभी हरामजादी लंडखोर।” ताव आ गया हरिया को और करीम भी कम खिसियाया हुआ थोड़ी था। दोनों तनतनाए हुए मेरी ओर बढ़े भूखे भेड़ियों की तरह, मुझे नोचने खसोटने। मेरे पास आते ही मेरे कपड़ों को नोच नाच कर पल भर में मेरे तन से अलग कर दिया और मादरजात नंगी कर दिया।
“वाह, साली कुतिया, चुदने को बेताब, मां की लौड़ी, चूत देख हरामजादी की, कैसी गीली हो रही है, रंडी कहीं की।” बड़ी गलीज लफ्जों के साथ करीम मुझ पर टूट पड़ा और बेरहमी से मेरी चूचियों को मसलने लगा।
“ओह्ह्ह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, धीरे आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, मादरचोद, आहिस्ते।” मैं तड़प उठी, यही चाहती थी मैं, लेकिन ऐसी वहशियाना आक्रमण, बाप रे बाप, आफत को न्योता दे चुकी थी। अब भुगत साली कामिनी, चुदने के लिए मरी जा रही थी ना।
“धीरे? आहिस्ते? गाली दे रही है साली बुरचोदी? नोच साली कुतिया को। देख अभी हम तेरा क्या हाल करते हैं रंडी।” खूंखार लहजे में हरिया बोला और अपने कपड़े खोल कर जानवरों की तरह मुझ पर टूट पड़ा। बूढ़ा शेर। मेरी गीली चूत में भच्च से अपनी उंगली पेल कर उंगली से ही भचाभच चोदने लगा।
“आह आह आह आह ओह ओह ओह उफ्फ्फ्फ्फ्फ जानवर।” तड़प उठी मैं। मैं पिसी जा रही थी दो जानवरों के बीच। “आह ओह बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद।”
“हां हम बेटीचोद हैं साली कुतिया, तेरे जैसी बुरचोदी बेटी भगवान सबको दे।” हरिया, जिसकी चुदाई का फल थी मैं, वह कमीना बोला।
“ओ्ओओ््ओओह्ह्ह्ह्ह मा्आ्आ्आ्आद्द्द्द्द्दर्र्र्र्र्रचो्ओ्ओ्ओ्ओद।”
“हांआंआंआंआंआं हम तेरी मां को चोदे हैं, तेरी नानी को चोदे हैं। और कुछ बोलना है मां की लौड़ी।” वह वहशी जानवर की तरह व्यवहार कर रहा था मेरे शरीर के साथ। वह तो वह, करीम मेरी भी चूचियों का मलीदा बनाने पर तुला हुआ था। तड़प उठी मैं। यही तो चाहती भी थी मैं। जानवरों की तरह नोच खसोट में मुझे भी एक अजीब तरह का आनंद आ रहा था। व्यथा युक्त आनंद।
उधर रश्मि, उसकी तो पूछो ही मत। वह छटपटा रही थी, भयभीत हिरनी की मानिंद उस दानव सरीखे अर्द्धविक्षिप्त कामपिपाशु भेड़िए के चंगुल में फंसी। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, छोड़िए ना।”
“ऐसे कैसे छोड़ दूं, बिना चोदे।”
“मर जाऊंगी।”
“नहीं मरोगी।” कहते हुए उसने जबर्दस्ती उसे वहीं फर्श पर पटक दिया और चढ़ बैठा उसके ऊपर।
“ओह बाबा, रहम करो मुझ पर।” गिड़गिड़ाने लगी।
“हां कर रहा हूं रहम, परेशान मत हो। आराम से चोदूंगा।” जबर्दस्ती उसके पैरों को फैलाते हुए बोला। अधपगला था तो क्या हुआ, आखिर चूत का रसिया जो ठहरा। स्त्री तन और चूत की महक उसे पागल किए दे रही थी। एक अधपगला स्त्रीदेह के भूखे को मानवीय पीड़ा एवं भावनाओं की समझ कहां, उसमें और एक कामांध पशु में फर्क ही क्या था। जबर्दस्ती उसने रश्मि के पैरों को फैला कर अपना भयावह लिंग उसकी पनियायी योनि के द्वार पर टिका दिया।
“फट जाएगी मेरी।” रामलाल के चंगुल में फंसी रश्मि भयभीत स्वर में बोली।
“फटने दे। सबकी फटी। फटने के बाद सब बोली मजा आ गया।” चुदक्कड़ पागल अब और समय गंवाना गंवारा नहीं करना चाहता था। गच्च से अपनी कमर को एक जुंबिश दे बैठा और चीख ही तो उठी रश्मि, दर्दनाक चीख, मर्मांतक पीड़ा भरी चीख। थर्रा उठा पूरा घर उसकी चीख से। एक पल तो हम स्तब्ध रह गये, स्थिर, अपनी अपनी स्थिति में। मगर रामलाल तो मानो पगला ही गया था, कोई प्रतिक्रिया नहीं, बस पशु, जंगली, बहरा पशु, जिसे अपने शिकार के खून का स्वाद लग गया हो। बेरहमी से रश्मि की कमर पकड़ कर एक धक्का और लगा दिया।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, मा्आ्आ्आ्आ्आ्आर डा्आ्आ्आ्आला्आ्आ् रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए, ओ्ओ्ओह्ह्ह मां्आं्आं्आं।” रश्मि चीखती रही चिल्लाती रही मगर रामलाल तो अब आदमी कहां रह गया था।
“चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊप्प्प्प्प्प, एकदम चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊप्प्प्प्प। हो गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, बस हो गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, घुस्स्स्स्स्स्स गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, बस्स्स्स्स्स्स्स थोड़ा और उह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्हुम्म्म्म्म्म्आ्आ्आह।” एक और पाशविक धक्का और लो, पूरा का पूरा विशालकाय लिंग रश्मि की चूत को चीरता हुआ गुम हो गया चूत के अंदर। खुन्नम खून, हो गया रश्मि की चूत। रश्मि की आंखें फटी की फटी रह गयी। रामलाल के लंड से बिंधी हिलने डुलने से लाचार रश्मि।
“ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, मर गयी्ई्ई्ई्ई्ई रे मर गयी्ई्ई्ई्ई्ई मैं।” चीखती रह गयी रश्मि मगर रामलाल तो मानो अब चुदाई मशीन बन चुका था। बड़ी बेदर्दी से गचागच, फचाफच पेले जा रहा था पेले जा रहा था। पल भर को रहम आ गया मेरे दिल में उसकी हालत पर, लेकिन मुझे पता था, जो पीड़ा का दौर इस वक्त रश्मि पर बीत रहा है, कुछ समय की बात है, फिर तो उसकी फैल चुकी चूत खुद ब खुद रामलाल के लंड की मांग करने लगेगी। हुआ भी वही। सफलतापूर्वक, रामलाल के लंड को ग्रहण करने की पीड़ा के लम्हों के गुजर जाने के पश्चात खुद ही अपनी कमर उछालने लगी।
“आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स, आह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, ओह्ह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, चोद चोद चोद चोद आह्ह।” रश्मि मस्ती में भर कर चुदने लगी और रामलाल का तो कहना ही क्या था, गजब, कुत्ते की तरह इतनी तेजी से उसकी कमर चल रही थी कि ऐसा लग रहा था मानो रोबोट बन गया हो।
इधर उनकी जंगली जानवरों वाली धींगामुश्ती, गुत्थमगुत्थी तथा कामुक सिसकारियों से निस्पृह, हरिया और करीम मुझ पर अपनी दरिंदगी की इंतहां करने को पिले पड़े थे। उनके कपड़े कब उनके शरीर से अलग हुए पता ही नहीं चला। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, करीम ने मुझे गुड़िया की तरह उठा कर मुझे ले कर सोफे पर बैठ गया और मुझे अपनी गोद में इस तरह बैठाया कि उसका लंड सरसरा कर मेरी लसलसी चूत के अंदर चला गया। मेरे दोनों पैर फैले हुए थे और करीम की जांघों पर टिके थे। मेरी पीठ उसकी ओर थी, अर्थात उसका लंड पीछे से मेरी चूत में पैबस्त था।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,” एक लंबी आह निकली मेरे मुह से।
“अभी से आह, हरामजादी, अभी और आह करना है।” हरिया मेरी चूचियों को पीछे से पकड़कर बेरहमी से दबाता हुआ बोला। उनके मन में क्या चल रहा था इसका पता अगले ही पलों में चल गया। सामने से स्पष्ट दिख रहा था कि करीम का पूरा लंड मेरी चूत में समाया हुआ है लेकिन हरिया ने उसी अवस्था में अपना फनफनाता लंड लिए सामने से मेरी चूत को ही निशाना बनाने को तत्पर हो गया। तो क्या, तो क्या ये लोग मेरी एक चूत में दो दो लंड डालने का पागलपन करने वाले हैं?
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ मां्आं्आं्आं, नहींईंईंईंईंईंईंई।”
“नहीं क्या साली कुतिया, देख तेरी चूत में दो दो लंड कैसे घुसेड़ते हैं हम।” हरिया गुर्राया। मैं क्या करती। विरोध करती? कैसे? किस मुंह से? मुसीबत को न्योता तो मैं ने ही दिया था।
“हाय, फाड़ डालने का इरादा है क्या बेटीचोद?”
“हांआंआंआंआंआं।” कहते न कहते हरिया ने वही किया जिस बात से डर रही थी। अपने लंड का दबाव मेरी पहले से लंड ठुकी चूत की बची खुची संकरी छिद्र पर धीरे धीरे बढ़ने लगा। मैं दर्द से कराह उठी। ज्यों ही उसके लंड का अग्रभाग मेरी चूत को अतिरिक्त रूप से फैला कर प्रविष्ट हुआ, मैं छिनाल भी एकबारगी चीख ही उठी।
“आह्ह, मादरचोद, ऐसा नहीं, ओह्ह्ह्ह्ह हरामजादे, कहां से सीखा यह हरामीपन? छोड़ो, मार डालोगे क्या? एक चूत में दो लंड, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।”
“हमें पता है हम क्या कर रहे हैं रंडी। आज ही रश्मि ने वीडियो दिखाया है। हमें पता है किस पर ट्राई करना है। तुम्हें छोड़ कर और कौन रंडी ले सकती है दो दो लौड़ा अपनी चूत में। ले मां की लौड़ी ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, घुस्स्स्स्स्स्स गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” कहते कहते हरिया ने ठोंक दिया अपना लंड। मैं पीड़ा से तड़प उठी लेकिन यह मेरे लिए भी एक रोमांचक अनुभव था, अतः पीड़ा के बावजूद झेलने की पुरजोर कोशिश कर रही थी, फिर भी एक आह निकल ही गयी।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, कमीने बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद। बेटी पर भी रहम नहींईंईंईंईंईंईंई।”
“रहम? तुझ रंडी पर रहम? और बेटी? कैसी बेटी? तेरे जैसी रंडी बेटी? तुझे चुदवाने की मस्ती चढ़ी तो कुत्तों से भी चुदवाने में कोई हिचक नहीं होगी हर्र्र्रामजादी। आज तुझे दिखाते हैं हम बूढ़े लंडों का जलवा।” हरिया बिल्कुल जानवरों की भाषा बोल रहा था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, पीड़ा थी लेकिन दो दो लंडों को अपनी चूत में समा लेने का वह रोमांचक आनंद भी अद्भुत था।
“साली रश्मि कमीनी कुतिया, यह तूने क्या दिखा दिया इन कमीनों को? साले मुझी पर अजमाने लगे। आज फटी मेरी चूत आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।” मैं रश्मि को गाली बकने लगी।
“आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, साली बुरचोदी, आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, रामलाल जैसे पागल के हवाले करते हुए बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा आ रहा था ना, ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, अब आया मजा तुझे भी कि नहीं? चोदिए चचा चोदिए हरामजादी रंडी को जमकर, फाड़ डालिए साली रंडी की बुर, ओह्ह्ह्ह्ह अह भोंसड़ा बना दीजिए इस कुत्ती के बुर को, भुर्ता बनाईए भुर्ता बनाईए आह्ह ओह्ह्ह्ह्ह।” रश्मि मेरी ओर देखते हूए चीखी। वैसे अब रामलाल के मूसलाकार लंड से सक्षमता के साथ चुदती हुई आनंदमयी आहें भी निकाल रही थी हरामजादी।
“गया ना, दो दो लंड गया ना तेरी चूत में साली छिना्आ्आ्आ्आ्आल। अब देख हम कैसे चोदते हैं।” कहते हुए दनादन लगे चोदने। नीचे से करीम का लंड, ऊपर से हरिया का लंड। गजब का अहसास हो रहा था मुझे। उफ्फ्फ्फ्फ्फ उस प्रारंभिक पीड़ा के पश्चात जो आनंद मुझे प्राप्त हो रहा था वह अकथनीय था। मुझे खुद ही विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसी परिस्थिति को भी मैं सक्षमता पूर्वक झेल सकती हूं, झेलना ही सिर्फ थोड़ी था, आनंद भी लेना था, जो मैं बखूबी ले रही थी। सच कहूं तो इसमें रामलाल के मोटे लंड का भी योगदान था। उससे चुदकर मेरी चूत फैल भी तो गयी थी। रामलाल के लंड के कट सेक्शन का क्षेत्रफल अकेले ही हरिया और करीम के लंडों के सम्मिलित कट सेक्शन के क्षेत्रफल के बराबर होगा, ऐसा मेरा अनुमान था। तभी तो इन दो लंडों से चुदने में सक्षम हो पा रही थी। उस कमरे का पूरा वातावरण बिल्कुल गंदा हो चुका था। एक तरफ रश्मि सिसकारियां लेती हुई रामलाल जैसे अर्द्धविक्षिप्त जानवर की जंगलीपन भरी नोच खसोट से आनंदित उसके अकल्पनीय विशालकाय लंड से चुदती मगन थी और रामलाल, अधपगला औरत चूत का रसिया, पूरे वहशियाना ढंग से उसे किसी खिलौने की तरह रगड़ रगड़ कर मशीनी अंदाज में हूं हूं हूं हूं की आवाज हलक से निकालता चुदाई में मगन और इधर हरिया और करीम जैसे बूढ़े औरतखोरों की वहशियाना चुदाई में पिसती मैं लंडखोर, दो दो लंडों को अपनी चूत में गपागप खाती आनंदमुदित, इस्स्स्स्स्स्स्स उस्स्स्स्स्स की सिसकारियां भरती चुदी जा रही थी। दोनों औरत खोर बूढ़े हांफते हुए अपनी समझ से मुझे नोच रहे थे खसोट रहे थे, भंभोड़ रहे थे, निचोड़ रहे थे और गंदी गंदी गालियों की बरसात किए जा रहे थे। “मां की चूत, गली की कुत्ती, रांड, रंडी की औलाद, छिना्आ्आ्आ्आ्आल, मर्दखोर, लौड़े की ढक्कन, और न जाने क्या क्या।”
मैं भी क्या कम थी, बड़बड़ा रही थी पागलों की तरह, “मादरचो्ओ्ओ्ओ्ओद, बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद, भड़वे बुरचोद, कुत्ते कमीने, औरतखोर हराम के जने, जानवर, सूअरों की औलाद, खड़ूस चोदुओं के लौड़े और न जाने क्या क्या। चोद चोद मां के लौड़े, चोद।” लग रहा था मानो गालियों की प्रतियोगिता हो रही हो। यह सब चलता रहा अंतहीन। पता नहींं चला कि कैसे आधा घंटा बीत गया। इस दौरान मैं तो दो बार झड़ कर पसीने से लतपत अधमरी ही हो गयी। यही हाल रश्मि का भी था। अंततः उधर रामलाल किसी जंगली भैंसे की तरह डकारता हुआ रश्मि को भींच कर झड़ने लगा। “ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।” रश्मि बेचारी भी सीधे अपनी कोख में रामलाल के लंड के गरमागरम वीर्य का पतन अनुभव करती हुई झड़ कर अधमरी सी हो रही थी, “ई्ई्ई्ई्ई्ई्ई्ई मां्आं्आं्आं ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ बाबा्आ्आ्आ
आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।” निहाल हो गयी थी वह, ऐसा लग रहा था, पूर्ण संतुष्ट हो शिथिल हो रही थी। “आह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, जीवन का सर्वश्रेष्ठ सुख, आनंद दिया रे पगले तूने मुझे ओ्ओ्ओह्ह्ह कोखोनेऊ भूलते पारबो ना्आ्आ्आ्आ्आ्आ” छिपकली की तरह चिपकी ही रह गयी वह तो। रामलाल का शिथिल लंड अब भी रश्मि की चूत के अंदर ही था। आखिर शिथिल अवस्था में भी आठ इंच लंबा जो ठहरा।
इधर पहले हरिया झड़ते हुए मुझे निचोड़ने लगा, “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह साली्ई्ई्ई्ई्ई्ई बुरचोदी्ई्ई्ई्ई्ई्,” गया वह। झड़ गया कर वह तो अलग हो गया मगर करीम, वाह रे बुढ़ऊ, लगा रहा गच्च गच्च चोदने में। मुझे अब पलट दिया और सीधे सामने से हमला बोला। करीब और दस मिनट तक मेरी नग्न देह की तिक्का बोटी करता रहा और अंततः वह भी झड़ा और क्या खूब झड़ा। मुझे कस कर अपनी बांहों में भींच कर मानो मेरी जान ही निकाल देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा उस कमीने नें। मैं कितनी भी थकी थी, चर थी, लेकिन तीसरी बार मैं भी झड़ने लगी, “ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मां्आं्आं्आं।” अद्भुत, स्खलन। “वाह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे बूढ़े शेरों, निहाल कर दिया मुझे ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, क्या सुख प्रदान किया तुम दोनों ने, बता नहीं सकती।” सभी इधर उधर लस्त पस्त पड़े लंबी लंबी सांसें ले रहे थे। मैं चकित थी रश्मि की हालत पर। आरंभ में जो इतनी चीख चिल्ला रही थी, अब कितनी खुश, संतुष्ट दिख रही थी।
“साली रश्मि, बड़ी बदमाश है रे तू तो।” मैं बोली।
“जाने कैसी कैसी फिल्में देखती है और दिखाती है। ये खड़ूस बूढ़े मुझी पर आजमा बैठे और मेरी तो जान ही निकाल दी।”
“और रंडी, तू कम है क्या? इस जानवर के हवाले करके मुझे मार डालने में कोई कसर छोड़ी थी क्या?”
“चल कोई बात नहीं, हिसाब बराबर हो गया। हां तो रामलाल जी, कैसा लगा?”
“मजा आ गया। रश्मि मैडम को चोदने का तो मजा ही कुछ और है।” बड़ा खुश खुश लग रहा था।
“हाय मेरे चोदू राजा, आपने भी तो मुझे स्वर्ग दिखाया।” रश्मि उससे चिपकी, चूमते हुए खुशी से ओतप्रोत बोल उठी।
“ओह मेरी लाड़ोरानी, बन गयी न उसकी दीवानी। फालतू में नखरे कर रही थी।”
“फालतू में? ऐसे लंड को कोई औरत एक बार देख ले तो थरथरा जाएगी।”
“और अब जो उस लंड को चूत में लिए पड़ी है?”
“हाय हाय, मन ही नहीं कर रहा अलग होने को।”
“तो पड़ी रह ऐसे ही। रामलाल जी, चलिए अब आगे की कहानी बताईए।” मैं बोली। हम ऐसे ही नंग धड़ंग पड़े बेशरमी के साथ वार्तालाप कर रहे थे। कोई झिझक नहीं, शर्म नहीं। रामलाल बोलने लगा:-
“ठीक है आगे सुनिए। जब सरोज गर्भवती हो गयी और उसका पेट फूलने लगा तो सरोज मुझे चोदने से मना करने लगी। मैं परेशान हो उठा। एक दिन ऐसे ही सरोज दिन के करीब दो बजे, जब घनश्याम दुकान जा चुका था, घर में मेरे और सरोज के सिवा और कोई नहीं था, सरोज बावर्ची खाने में खड़ी खड़ी काम कर रही थी तो मैं ने पीछे से जाकर उसे पकड़ लिया और बोला, “चोदने दे न रानी।”
“नहीं”
“क्यों?”
“मेरे पेट का बच्चा खराब हो जाएगा।”
“लेकिन मेरा क्या होगा?” मेरा लंड बमक कर चोदने को परेशान था। मैं बेचैन हो उठा। मैं पीछे से उसकी चूचियों को दबाने लगा। मेरा लंड उसकी पिछाड़ी में घुसा चला जा रहा था। चौंक उठी वह।
“यह क्या कर रहे हैं आप?”
“क्या कर रहा हूँ मैं?”
“हमारी गांड़ फाड़ने का इरादा है क्या?”
“गांड़? ये क्या होता है?”
“अरे यही, जहां आपका लंड घुसा चला आ रहा है।” मेरी बांहों में छटपटाती हुई बोली सरोज।
“ओह्ह्ह्ह्ह, तो हग्गू को गांड़ बोलते हैं।”
“हां रे पागल जेठजी।”
“तो चूत नहीं तो गांड़ ही सही।”
“हटिए आप। छोड़िए मुझे।”
“नहीं, मान भी जाओ न।” मैं मनाने लगा उसे। मेरा लंड सख्त होकर दर्द कर रहा था। मुझे राहत चाहिए थी किसी भी तरह।
“नहीं, हटिए, छोड़िए ना।” मेरी बांहों में अब छटपटाने लगी।
“ऐसा नहीं होता है क्या?”
“होता है, मगर आप का लंड बहुत बड़ा है।” झल्लाहट से बोली।
“तुमने कभी गांड़ नहीं चुदवाया है क्या?”
“हां, घनश्याम नें हमारी गांड़ भी मारी है, लेकिन उसका लंड आपसे बहुत छोटा है। हो गया। मरवा ली गांड़। लेकिन आप तो फाड़ ही दीजिएगा। छोड़ दीजिए ना मेहरबानी करके।” अब गिड़गिड़ाने लगी थी वह। मुझे यह सुनकर अच्छा लगा कि गांड़ चुदवा चुकी है, मतलब उसकी गांड़ चोदी जा सकती है। उसकी गांड़ है भी बड़ी मस्त, चिकनी, गोल गोल और बड़ी सुंदर। आशा की किरण नजर आई मुझे।
“गांड़ चुदवा चुकी हो तो मुझसे चुदवाने में किस बात का डर।” मैं उसकी साड़ी उठाते हुए बोला।
“मेरी गांड़ फट जाएगी जेठजी। आपका लंड बहुत बड़ा है।” वह मेरी एक बांह में कसी हुई छटपटा रही थी।
“तेरी चूत चोदने से पहले भी तो यही कह रही थी तुम। फटी क्या? नहीं ना। फिर डर काहे रही हो?” मैं अबतक उसकी साड़ी कमर तक उठा चुका था। अंदर उसने कुछ नहीं पहना था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, उसकी चिकनी गांड़ देख कर मेरा लंड और टाईट हो गया। मैं परेशान हो उठा। उसी परेशानी की हालत से छुटकारा पाने के लिए मैंने अपने पजामे का नाड़ा और अंडरपैंट का नाड़ा ढीला कर दिया और नीचे गिरने दिया। मेरा लंड फनफनाता हुआ उसकी गांड़ के बीच धंसने लगा। जितना छटपटा रही थी उतना ही और घुसता जा रहा था। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। अबतक सिर्फ गांड़ की फांकों के बीच ही धंसा था मेरा लंड। हग्गू वाली छेद को छू रहा था। चिहुंक उठी वह।
“हाय राआ्आ्आ्आ्आ्आम। यह यह यह ककककक्या्आ्आ्आ्आ्आ कर रहे हैं आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह?” झल्लाहट में बोली वह।
“दे दे सरोज अपनी गांड़।”
“नहींईंईंईंईंईंईंई।” मगर मुझ पर तो भूत सवार हो चुका था। जबर्दस्ती पर उतर आया मैं।
“चोदे बिना तो मानूंगा नहीं।”
“मानिएगा नहीं?”
“हां” बेचारी तड़पती रही और मैं धीरे धीरे घुसाने की कोशिश करने लगा अपना लंड उसकी गांड़ की छेद में।
“आह नहीं, ओह बाबा्आ्आ्आ, सूखी सूखी गांड़ में जलन हो रही है जेठ जी, चोदना ही है तो प्लीज तेल लगा लीजिए अपने लंड पर।” अंत में थक हार कर बोली। मुझे और क्या चाहिए था, बोतल से बादाम का तेल लिया और लंड पर लसेड़ कर फिर टिका दिया उसकी गांड़ की छेद पर।
“हम फिर कह रहे हैं छोड़ दीजिए ना हमें। मर जाएंगे हम।” अतिम कोशिश करने लगी लेकिन अब मैं कहां रुकने वाला था, मुझे तो मुहमांगी मुराद मिल चुकी थी, वह रोने लगी, लेकिन मैंने परवाह नहीं की। मैंने उसकी चूचियों को मजबूती से दबोच कर एक जोर का धक्का लगा दिया। फच्च से एक ही बार में तेल चुपड़े लंड का आधा भाग उसकी गांड़ को चीरता हुआ अंदर समा गया।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, मा्आ्आ्आ्आ्आ्आ्र्र्र्र्र्र्र्र डाला्आ्आ्आ्आ्आ्आ रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए अम्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह।” दर्द से तड़प रही थी वह। सच में फट चुकी थी उसकी गांड़। बहुत टाईट थी उसकी गांड़। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, बड़ा मजा आ रहा था मुझे। कैसे अब रुक सकता था मैं। एक और जोर का धक्का लगाया और सर्र से पूरा लंड उतार दिया उसकी गांड़ में। इतना मजा पहले कभी नहीं मिला, इतनी टाईट गांड़ होती है मुझे पता नहीं था।
“ओ्ओ्ओह्ह्ह फट्ट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यीई्ई्ई्ई्ई मेरी गां्आं्आं्आं्आं्आं्ड़। ओह कुत्ते्ए्ए्ए्ए जेठ जी्ई्ई्ई्ई्।” चीख उठी वह। मगर मुझे अब होश कहाँ था। सटासट चोदना शुरू कर दिया उसकी टाईट गांड़। उफ्फ्फ्फ्फ्फ बहुत मजा आ रहा था। कुछ देर के दर्द के बाद अब उसकी गांड़ भी थोड़ी ढीली पड़ी और वह भी गांड़ उछाल उछाल कर अपनी गांड़ चुदवाने लगी।
“आह ओह हाय आह चोदिए जेठ जी, मजा आ रहा है ओह राजा, ओह बलमा ओह मेरे चोदू जेठ जी, चोदिए मेरी गांड़, आह।” मजे में चुदते हुए बोल रही थी। मैं भी जोश में आ कर दनादन चोदने लगा। उसे कुतिया की तरह पीछे से चोदने में मशगूल था। मेरे लंड के नीचे का अंडू वाला थैला थप थप उसकी चूत पर थपकियाँ दे रहा था। करीब बीस पच्चीस मिनट बाद मैं उसकी चूचियों को निचोड़ता हुआ अपने लंड का पानी उसकी गांड़ में भरता चला गया।
“आ्आआ््आआ््आआ््हह मां्आं्आं्आं,” कहती हुई वह भी थरथरा थरथरा कर ढीली पड़ गयी। वह बावर्ची खाने के स्लैब पर हाथ टिकाए झुकी हुई लंबी लंबी सांसें ले रही थी। मैंने उसकी चुत की तरफ हाथ लगाया तो देखा कि चूत से लसलसा पानी निकल रहा था। हम चुदाई करके अलग हुए तो देखा कि मेरे लंड पर खून लगा हुआ था। सरोज की गांड़ सचमुच में फट चुकी थी। उसका मलद्वार काफी बड़ा हो चुका था। मलद्वार का छल्ला लाल हो गया था।
“कैसा लगा?” मैं हांफता हुआ पूछा।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ, मार ही डाला था आपने तो हमें। दर्द से जान ही निकल गयी थी हमारी। हां, बाद में उफ्फ्फ्फ्फ्फ, बाद में तो स्वर्ग सा सुख मिला ओह्ह्ह्ह्ह राजा, मेरे बलमा जेठ जी, आप महान हैं। दीवानी बना डाला आपने तो हमें अपने लंड की। ऐसा लं, बाप रे बाप। अभी तक जल रही है मेरी गांड़। दर्द हुआ मगर मजा ओह ऐसा मजा जीवन में कभी नहीं मिला मेरे स्वामी। गांड़ में आपके मोटे लंड का धमाल, चूत में आपके अंडुओं की थपकी। निहाल हो गयी मैं तो।” कहते कहते मेरे लंड को, जो खून और हल्के हल्के गू से सना था, बिना किसी घिन के दोनों हाथों से पकड़ कर चूम उठी वह पगली। फिर लड़खड़ाते हुए सीधे पैखाने घर की ओर गयी। मैं उसे सहारा दे कर ले चला। पैखाने पर बैठते ही भर्र भर्र करके उसकी गांड़ से मल निकलने लगा। ऐसा लग रहा था मानो पूरा पेट खाली हो गया।
फिर गांड़ धो कर जब वह वापस आई तो मैं पूछा, “कैसी है तबीयत? ठीक तो हो?” घबरा रहा था मैं।
“ठीक हूं। लग रहा है पूरा पेट साफ हो गया। आपके लंड ने तो हमारी गांड़ का रास्ता ही खोल दिया।” मरी मरी सी आवाज में बोली वह। मेरी जान में जान आई। उसके बाद दो दिन तक ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। उसके बाद तो मेरी गाड़ी चल पड़ी। जबतक बच्चा नहीं हुआ, उसकी गांड़ ही चोदता रहा। बच्चा हुआ तो फिर वही शुरू हो गया। कभी चूत, कभी गांड़। खूब मजे से चुदवाती है वह।
इसी दौरान बच्चा होने के करीब दो साल बाद एक दिन मैं सरोज को बावर्ची खाने में साड़ी उठा कर खड़े खड़े चोद रहा था कि,
“अरे, अरे, यह क्या हो रहा है?” एक आवाज सुनकर हम चौंक उठे। यह रबिया की आवाज थी। वह चालीस साल की भरे भरे बदन वाली सांवली विधवा औरत हमारी पड़ोसन थी, जो लोगों के घरों में चौका बर्तन का काम करती थी। दूसरों के घर चौका बर्तन का काम करके अपना और अपनी बेटी, जो सत्रह बरस की हो चुकी थी और कॉलेज में पढ़ रही थी, का पेट पाल रही थी और बेटी को पढ़ा रही थी। शायद किसी काम से आई थी। असावधानी के कारण हम दरवाजा बंद करना भूल गये थे, इस कारण रबिया बेरोकटोक बावर्ची खाने में सीधे आ गयी थी और हमें इस हालत में देखकर चौंक उठी थी। मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन सरोज, वह तो घबरा ही गयी। हड़बड़ा कर अलग हो गयी और झेंपती हुई वहां से भागी। मैं वहीं अपने तनतनाए लंड के साथ खड़ा रह गया। मैं परेशान, अपने खड़े लंड की अनबुझी प्यास के साथ खड़ा रबिया को देखता रह गया। गुस्सा भी आ रहा था उसपर। औरत और वह भी रबिया जैसी भरे बदन वाली औरत, अच्छी खासी सेहत वाली, मेरे भूखे लंड के लिए बिल्कुल सही औरत, ऊपर से चुदाई के बीच में कूद पड़ने वाली औरत, मेरी समझ से जिसे शायद भगवान ने इसी वास्ते भेजा था कि बाकी की चुदाई उसी से पूरी कर लूं, देख कर मेरा भेजा ही फिर गया था। उधर मेरे लंड को देख कर रबिया बीबी की आंखें फटी की फटी रह गयी। अपनी जगह खड़ी की खड़ी रह गयी। उसके मुंह से निकला, “हा्आ्आ्आ्आ्आ्आय अल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ला्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह।”
“रबिया चालीस साल की भरे भरे बदन वाली सांवली विधवा औरत हमारी पड़ोसन थी, जो लोगों के घरों में चौका बर्तन का काम करती थी। दूसरों के घर चौका बर्तन का काम करके अपना और अपनी बेटी, जो सत्रह बरस की हो चुकी थी और कॉलेज में पढ़ रही थी, का पेट पाल रही थी और बेटी को पढ़ा रही थी। शायद किसी काम से आई थी। अचानक इस हालत में पकड़े जाने से मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन सरोज, वह तो घबरा ही गयी। हड़बड़ा कर अलग हो गयी और झेंपती हुई वहां से भागी। मैं वहीं अपने तनतनाए लंड के साथ खड़ा रह गया। मैं परेशान, अपने खड़े लंड की अनबुझी प्यास के साथ खड़ा रबिया को देखता रह गया। गुस्सा भी आ रहा था उसपर। औरत और वह भी रबिया जैसी भरे बदन वाली औरत, अच्छी खासी सेहत वाली, मेरे भूखे लंड के लिए बिल्कुल सही औरत, ऊपर से चुदाई के बीच में कूद पड़ने वाली औरत, मेरी समझ से, जिसे शायद भगवान ने इसी वास्ते भेजा था कि बाकी की चुदाई उसी से पूरी कर लूं, देख कर मेरा भेजा ही फिर गया था। उधर मेरे लंड को देख कर रबिया बीबी की आंखें फटी की फटी रह गयी। अपनी जगह खड़ी की खड़ी रह गयी। उसके मुंह से निकला, “हा्आ्आ्आ्आ्आ्आय अल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ला्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह।”
“क्या हुआ?” पूछ बैठा मैं, उसी तरह खड़े, अनबुझी आग में तपते हुए, खड़े तनतनाए लंड के साथ। मैं घूरता रह गया उसे, उसकी गोल मटोल, भरे पूरे गदराए बदन को भूखी नजरों से।
“क क क क कुछ नहीं, कुछ नहीं।” हड़बड़ा गयी वह। जैसे किसी नींद से जागी वह। वह पीछे मुड़ कर वापस जाने लगी। मैं ने लपक कर पीछे से उसे पकड़ लिया।
“जाती कहां हो रबिया बीबी?” मैं चुदास में पागल हुआ जा रहा था।
“छोड़िए मुझे भईया, ओह्ह्ह्ह्ह जंगली, छोड़िए मुझे, यह क्या कर रहे हैं?।” मेरी बांहों में छटपटाती हुई बोली वह।
“क्या कर रहा हूं? वही जो सरोज के साथ कर रहा था।”
“ओह्ह्ह्ह्ह भईया, बेशरम, छोड़िए ना।” वह साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी के ऊपर से ही मेरा लंड उसकी बड़ी बड़ी गांड़ में घुसा चला जा रहा था। वह मेरी बाहों में कसमसा रही थी। मैं पूरी तरह नंगा था और वह पूरे कपड़े में। मैं एक हाथ से उसकी कमर को सख्ती से जकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ से उसकी ब्लाऊज से बाहर छलक पड़ते, तरबूजों जैसी बड़ी बड़ी चूचियों को दबाना शुरू कर चुका था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, काफी बड़ी बड़ी और मुलायम चूचियां थीं उसकी। बड़ा मजा आ रहा था दबाने में, नरम बैलून की तरह। “ऐसे कैसे छोड़ दूं रबिया तुझे।”
“हाय अल्ल्ल्ल्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह, चिल्ला दूंगी मैं, आह्ह।”
“मत चिल्ला रबिया बहन। चोदने दे। मुझे अच्छा लगेगा, तुम्हें भी अच्छा लगेगा।” मैं मना रहा था उसे। उसका विरोध थोड़ा थोड़ा कम हो रहा था।
“बहन बोलते हैं और ऐसा करते हैं?” मुंंह से ही अब विरोध कर रही थी।
“बहन क्या औरत नहीं होती है?”
“मां बहनों के साथ यह सब नहीं किया जाता भाई साहब।” वह विरोध नहीं कर रही थी, उसकी सांसें तेज हो गयी थी, थोड़ी बहुत कसमसा जरूर रही थी। मुंह से ही मुझे समझाने की कोशिश कर रही थी। इधर मैं उसकी चूचियां दबाए जा रहा था। उसने ब्लाऊज के चूचकसना भी नहीं पहना था। मेरा तनतनाया हुआ लंड उसकी गांड़ में साड़ी समेत घुसा चला जा रहा था, जितना कसमसा रही थी उतना ही। मुझे ऐसा लग रहा था कि शायद उसे अब यह सब अच्छा लग रहा था।
“मां बहनें? मुझे क्या पता। सरोज को चोदने के बाद मुझे तो लगता है, हर औरत चुदने के लिए ही पैदा हुई है। चूत बनाया है भगवान ने तो चुदवाने के लिए ही ना। मुझे तो औरत से मतलब है। इस समय तो पता नहीं क्यों तुम्हें देखते ही सरोज भाग गयी, लेकिन तुम तो हो, वैसे भी तुम मेरी बहन थोड़ी न हो।” मुझे लग रहा था कि अब उसकी ओर से कोई मना नहीं था। मैं ने भी उसे ढीला छोड़ दिया था, लेकिन अब वह भागने की कोई कोशिश नहीं कर रही थी। मैंने उसकी चूचियां दबाना बंद नहीं किया, अब एक हाथ से उसकी साड़ी उठाने लगा। तुरंत ही उसकी साड़ी कमर से ऊपर उठा दिया। साड़ी साया के अंदर उसने कुछ नहीं पहना था। बाप रे बाप, इतनी मोटी मोटी गोल गोल गांड़, देखकर तो मेरे मुंह में पानी आ गया।
“हाय दैया, यह यह क्या कर रहे हैं? मानिएगा नहीं?” वह अब ढीली पड़ गयी थी। सिर्फ उसकी आवाज में थोड़ी शरम और डर थी।
“नहीं। चोदे बिना तो मानूंगा नहीं। तुम्हारी डर से सरोज चुदाई के बीच में ही भाग गयी। अब तुम ही बताओ, इस खड़े लंड का क्या करूं?” मैं अब उसकी गांड़ सहलाने दबाने लगा।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ आ्आ्आ्आ्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह, यह ककककक्या्आ्आ्आ्आ्आ कर रहे हैं आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह?” उसकी आंखें बंद हो गयी थीं और उसका सिर मेरी छाती पर टिक गया था। मैं समझ गया कि अब मैं उसे चोद सकूंगा। मैंने उसे अपनी ओर घुमा दिया। अब उसका चेहरा लाल हो चुका था। मैं उसके चेहरे को चूमने लगा। उसके ब्लाऊज को खोल दिया। बाप रे बाप, थलथला कर उसकी चूचियां सामने छलक उठी थी। मैं तो पागल ही हो गया। मैं अपने को रोक धहीं पाया और उसकी चूचियों को बारी बारी से चूसने लगा।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह,” उसके मुंह से सिसकारियां निकलने लगी। मैं और देर करना नहीं चाहता था। उसकी साड़ी को उठाए उठाए ही वहीं जमीन पर लिटा कर चोदने के लिए तैयार हो गया। ओह भगवान, उसकी चूत देख कर तो मैं अकचका गया। इतनी बड़ी, भैंस जैसी फूली हुई काली काली चूत और उसके ऊपर घुंघराले बाल भरे हुए थे। मस्त, बिल्कुल मेरे लंड के लिए ही बनी थी उसकी चूत। तभी उसने अपनी आंखें खोली और इतने सामने से मेरा लंड देख कर घबरा ही गयी।
“नहींईंईंईंईंईंईंई, बाप रे बाप, इतना बड़ा लौड़ा्आ्आ्आ्आ।” घबराहट म़े उसके मुंह से निकला।
“नहीं क्या? क्या नहीं? अब और काहे नहीं?”
“हाय, इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ लौड़ा्आ्आ्आ्आ। मर जाऊंगी मैं। फाड़ दीजिएगा आप तो या खुदा, रहम।” अब वह सचमुच में घबराई हुई थी। इस अंतिम क्षण में, जब मैं उसकी रसीली चूत पर हमला बोलने के बिल्कुल नजदीक था, यह सुनकर झल्ला उठा।
“चुप हरामजादी, चुपचाप चोदने दे। तब से नखरे किए जा रही है। एक तो सरोज की चुदाई के बीच में बाधा बन कर आई और अब मेरे लंड को तरसाए जा रही है।” मैं कड़क कर बोला और उसकी मोटी मोटी जांघों को फैला कर अपना लंड उसकी चूत में सटाने लगा।
“ओह्ह्ह्ह्ह भैय्या, रहम कीजिए।”
“रहम ही तो कर रहा हूं, नहीं तो अबतक जबर्दस्ती चोद चुका होता।”
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ अम्मी, ओह्ह्ह्ह्ह।” वह मरी सी आवाज में बोली, लेकिन उसकी चूत चुगली कर रही थी, चुदने को तैयार, पानी पानी हो चुकी थी।
“चल तैयार, ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह हुम्म्म्म्म्म्म।” भच्च से मैंने अपना लंड उसकी चूत में एक ही बार में सरसरा कर उतार दिया।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, मा्आ्आ्आ्आ्आर डा्आ्आ्आ्आला्आ्आ् अब्ब्ब्बू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ।” दर्द से तड़प उठी वह। लेकिन अब मैं कहाँ रुकने वाला था। गरमागरम चूत का स्वाद जो मिल गया था मेरे लंड को। बड़ी आराम से घुसा था मेरा लंड, लेकिन पता नहीं क्यों वह चीख उठी थी। उसकी चीख सुनकर सरोज भी दौड़ी चली आई। उसे देख कर रबिया रोते हुए बोली, “सरोज, बचा मुझे इस जानवर से ओह्ह्ह्ह्ह, मुझे मार डालेगा।”
सरोज क्या बोलती, उल्टे खुश हो कर बोली, “वाह जेठ जी, ठीक पकड़े हैं। चोद डालिए इसे भी, वरना यह हमारी पोल खोल कर रख देगी। रबिया दीदी, अब चुद भी जाईए, पूरा लंड तो घुस ही गया। वाह, कमाल कर बैठी आप तो। इतने बड़े लंड को अपनी चूत में खा लेने के बाद अब मजा लीजिए ना। रोने से क्या फायदा।”
“अरी कुतिया, इनका घोड़े जैसा लौड़ा मेरी कोख तक घुस गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह है। उफ्फ्फ्फ्फ्फ। दर्द से मरी जा रही हूं मैं और तू मजा लेने की बात कर रही है।” तड़प कर रबिया बोली। उनकी बातों की परवाह किए बगैर मैं अब उसकी चूतड़ के नीचे हाथ लगा कर गचागच चोदने लगा। थोड़ी ढीली हो गयी चूत उसकी और चीखना चिल्लाना उसका कम होने लगा। फच फच फच फच की आवाज निकलने लगी उसकी चूत से।
“ओह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, आह्ह, आह हाय हाय,” बोलती बोलती चुदते चुदते कुछ ही मिनटों में उसकी बोली में परिवर्तन होने लगा। अब वह, “आह आह आह आह ओह ओह ओह इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स,” की आवाज निकालने लगी और उसकी कमर अपने आप ऊपर की ओर उछल रही थी और गपागप मेरे उसी लंड को अपनी चूत में ले रही थी जिसे देखकर उसकी हवा गुम हो गयी थी और पहली बार चूत में घुसते समय चीख चिल्ला रही थी।
“अब आ रहा है न मजा, ओह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, ले ले ले और ले आह्ह ओह,” मैं जोश में आ कर चोदे जा रहा था और वह मोटी भैंस रबिया, अपनी टांग मेरी कमर पर चढ़ा कर बड़ी मस्ती से चुदवा रही थी।
“आह्ह भैया, ओह्ह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, उफ्फ्फ्फ्फ्फ अम्म्ई्ई्ई्ई्ई, ओह्ह्ह्ह्ह अब्ब्ब्बू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ, चोदिए भैय्या चोदिए, बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा्आ्आ्आ्आ आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह आ्आ्आ्आ रहा है्ऐ्ऐ्ऐ्ऐ।”
“अहा, अब आया मजा न दीदी, जेठजी का लंड लेने का मजा आ रहा है न। जेठ जी, अच्छी तरह से चोदिएगा इसे, ताकि आपके लंड की दीवानी बन जाए, हमारी पोल नहीं खोलेगी कभी जिंदगी में।” सरोज हमें आनंद से चुदाई करते हुए देख कर उत्साहित हो कर बोली। कुछ देर पहले जो पोल खुलने के डर से मुंह छिपा रही थी, खुशी के मारे खिल उठी थी।
“डरपोक कहीं की, मेरे लंड को प्यासा छोड़कर भागी थी, अब बड़ी हिम्मत दिखा रही है लंडखोर। आ, तू भी आ जा। रबिया बहना को चोदने के बाद तुझे भी चोदता हूं।” कहकर दनादन चोदने में जुट गया।
उसी समय रबिया मुझसे चिपक कर, “इस्स्स्स्स्स्स्स अम्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ,” कहते हुए ढीली पड़ने लगी। मिनट भर बाद ही वह सचमुच पूरी तरह ढीली पड़ गयी और लंबी लंबी सांसें लेने लगी। मैंने उसे वहीं जमीन पर छोड़ा और कूदकर सरोज को पकड़ लिया जो वहां खड़ी हमारी चुदाई देखने में खोई हुई थी। बिना कोई समय गंवाए, इससे पहले कि सरोज संभल पाती, मैंने उसकी साड़ी उठाई और वहीं बावर्ची खाने के स्लैब पर झुका कर पीछे से उसकी चूत में एक ही बार में लंड घुसेड़ दिया।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,” बस यही बोल पायी वह, इसके बाद मैंने उसकी चूत की जो चुदाई की कि वह हाय हाय कर उठी। करीब पंद्रह मिनट बाद मैंने उसे कस के दबोच कर अपने लंड का पानी छोड़ने लगा और तभी, ओह्ह्ह्ह्ह मैं झड़ी्ई्ई्ई्ई्ई झड़ गयी्ई्ई्ई्ई्ई रे अम्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” कहते हुए वह भी निढाल हो गयी।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ राजा, आप तो बड़े जबरदस्त चुदक्कड़ हैं भैया। पांच साल पहले शहला के अब्बू के इंतकाल के बाद से चुदने को बेकरार रहती थी, और कहती भी तो किससे, आज वह मौका मिला भी तो इतने जबरदस्त मर्द से। शहला के अब्बू का लौड़ा तो सिर्फ पांच इंच लंबा था। आपका तो बाप रे बाप, एक फुट का गधे जैसा। रुला ही दिया था पहली बार घुसा तो।” बड़ी खुशी झलक रही थी उसकी बोली में।
“हट, झूठी। रुला ही दिया था? तुझ मोटी को? तू तो घोड़े का लंड भी ले सकती है।” सरोज बोली।
“मोटी हुई तो क्या हुआ, पहली बार इतने बड़े लौड़े से चुदवाना मजाक है क्या?” रबिया बोली। मैं बड़ा खुश था। पहले सिर्फ सरोज थी जिसे चोदकर मैं संतुष्ट था। अब मुझे दो दो औरतों की चूत चोदने का मौका मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। खासकर रबिया को चोदने का मजा तो कुछ और ही था। उसकी गांड़ इतनी बड़ी थी कि पीछे से उसे देखकर ही मेरा लंड दन से खड़ा हो जाता था। गांड़ चोदना तो सरोज से सीख ही चुका था। रबिया की गांड़ चोदने का मजा ही कुछ और था। पहली बार जब मैं उसकी गांड़ चोदना चाहा तो साफ मना कर दी। लेकिन मैंने जबरदस्ती उसे पटक कर उसकी गांड़ चोद ही ली। बड़ी टाईट थी। बड़ी मुश्किल से घुसा था मेरा लंड। खूब रोने चिल्लाने लगी थी, लेकिन फिर उसे जब मजा मिलने लगा तो मजे से गांड़ चुदवाने लगी। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, बता नहीं सकता कितना मजा आया। उतनी बड़ी गांड़ आज तक मैंने नहीं देखी। दो गोल गोल, बड़े बड़े तरबूजों के बीच की फांक हो जैसे, उन्हें दबोच दबोच कर चोदने का मजा ही कुछ और मिला मुझे। जब मैं उसकी गांड़ चोद कर लंड बाहर निकाला तो देखा, मेरे लंड पर पीला पीला मल लिथड़ा हुआ था। रबिया तो बड़ी मुश्किल से किसी प्रकार उठकर सीधे पैखाने में घुस गयी और भर्र भर्र करके हगने लगी।
कुछ देर बाद पैखाने से निकली और बोली, “बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, मेरी गांड़ खोल कर रख दी आपने तो। पूरा पेट खाली हो गया।” फिर मेरे लंड को देख कर मुझे खींचते हुए नल के पास ले गयी और बड़े प्यार से लंड धोने लगी। उस दिन के बाद अब तो इनकार नहीं करती है गांड़ चुदवाने के लिए। प्रायः मैं उसके घर चला जाता हूं जब चोदने की इच्छा होती है और कभी कभी वह खुद चली आती है किसी न किसी बहाने चुदवाने के लिए। सब कुछ बड़े मजे से चल रहा था लेकिन एक दिन एक गड़बड़ हो गयी।”
“क्या गड़बड़?” मैं तुरंत बोली। बड़ी उत्तेजक कहानी के बीच में यह विराम खल गया मुझे।
“हां हां, जल्दी बोलिए ना।” रश्मि भी रामलाल के नंगे जिस्म से चिपकी उतावली से बोल उठी। रामलाल का हाथ अब भी रश्मि के नितंबों पर अठखेलियाँ कर रहा था।
“एक दिन जब मैं रबिया बीबी को उसके घर में चोद रहा था तो अचानक न जाने कैसे उसकी बेटी शहला आ पहुंची। शायद उसकी छुट्टी जल्दी हो गयी थी। रबिया तो घबरा गयी। गनीमत थी कि मैं सिर्फ उसकी साड़ी उठा कर चोद रहा था। जल्दी से उठ गयी, साड़ी ठीक की और मुझे अलमारी के पीछे छिपा कर दरवाजा खोलने चली गयी, यह कहते हुए कि वहीं छिपा रहूं, जबतक कि वह मुझे भागने का इशारा न करे। हड़बड़ी में हमने ध्यान नहीं दिया कि मेरे कपड़े वहीं बिस्तर पर पड़े थे। मैं अलमारी के पीछे नंगा ही छिपा हुआ था।” इतना कहकर वह फिर रुक गया।
“आगे?” उतावली से रश्मि बोली।
“अब आगे तेरी गांड़ चोदने के बाद।” रामलाल रश्मि को चूमकर पलटते हुए बोला।
“नहीं, गांड़ नहीं।” रश्मि घबरा गयी।
“तो जाओ, नहीं बताता। कहानी बताते बताते मेरा लंड आपकी गांड़ चोदने को तड़प उठा है। देखिए।” उसने अपने मूसल लंड पर रश्मि का हाथ रखते हुए बोला।
“हाय नहीं, प्लीज नहीं। फाड़ दीजिएगा आप।” रश्मि उसके बंधन से आजाद होने की कोशिश करने लगी। लेकिन रामलाल जैसे शक्तिशाली पुरुष के आगे वह कर भी क्या सकती थी। फड़फड़ा कर रह गयी।
“इतनी मस्त गांड़ पर तब से हाथ फेर रहा हूं, तब तक खुश थी। अब चोदने की बात पर नहीं? ऐसा कैसे होगा?” रामलाल गांड़ चोदने पर उतारू था और रश्मि राजी ही नहीं हो रही थी। इधर हम भी उत्तेजित, या तो रामलाल की आगे की कहानी, या एक दौर और चुदाई का।
“चोदिए रामलाल जी चोदिए। जल्दी चोदिए साली की गांड़ और इधर हम भी एक दौर चुदाई का चला लेते हैं। फिर कहानी बताते रहिएगा।” मैं उत्तेजना के आवेग में बोली, इस बात से बेखबर कि हरिया और करीम के मन में क्या चल रहा था।
आगे?” उतावली से रश्मि बोली।
“अब आगे तेरी गांड़ चोदने के बाद।” रामलाल रश्मि को चूमकर पलटते हुए बोला।
“नहीं, गांड़ नहीं।” रश्मि घबरा गयी।
“तो जाओ, नहीं बताता। कहानी बताते बताते मेरा लंड आपकी गांड़ चोदने को तड़प उठा है। देखिए।” उसने अपने मूसल लंड पर रश्मि का हाथ रखते हुए बोला।
“हाय नहीं, प्लीज नहीं। फाड़ दीजिएगा आप।” रश्मि उसके बंधन से आजाद होने की कोशिश करने लगी। लेकिन रामलाल जैसे शक्तिशाली पुरुष के आगे वह कर भी क्या सकती थी। फड़फड़ा कर रह गयी।
“इतनी मस्त गांड़ पर तब से हाथ फेर रहा हूं, तब तक खुश थी। अब चोदने की बात पर नहीं? ऐसा कैसे होगा?” रामलाल गांड़ चोदने पर उतारू था और रश्मि राजी ही नहीं हो रही थी। इधर हम भी उत्तेजित, या तो रामलाल की आगे की कहानी, या एक दौर और चुदाई का।
“ठीक है, ठीक है, चोदिए रामलाल जी चोदिए। जल्दी चोदिए साली की गांड़ और इधर हम भी एक दौर चुदाई का चला लेते हैं। फिर कहानी बताते रहिएगा।” मैं उत्तेजना के आवेग में बोली, इस बात से बेखबर कि हरिया और करीम के मन में क्या चल रहा था। मेरे कहने की देर थी कि उधर रामलाल टूट पड़ा रश्मि पर और इधर हरिया और करीम टूट पड़े मुझ पर।
“नहीं प्लीज, मर जाऊंगी मैं।” रश्मि गिड़गिड़ाने लगी। लेकिन रामलाल को रोक पाना उसके वश की बात तो थी नहीं, बलशाली, औरतखोर पशु की तरह कहर बन कर टूटा वह। उसे पलट कर जबर्दस्ती उस पर चढ़ गया। उसकी मदमस्त चिकनी गुदा की फांक पर अपना खूंखार लिंग टिकाकर पीछे से उसकी सख्त चूचियों को बेरहमी से दबोच कर दबाव देने लगा। उसके लिंग का अग्रभाग रश्मि के मलद्वार को फैलाता हुआ करीब करीब फाड़ता हुआ फच्च से प्रविष्ट हो गया। किले के द्वार को मानो ध्वस्त कर दिया उसके मूसल नें।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,” एक दर्दनाक चीख से गूंज उठा पूरा कमरा।
“चीखो मत, लो, घुस्स्स्स्स्स्स गया आ्आ्आ्आ्हुम्म्म्म।” रामलाल की विजयी आवाज गूंजी। एक बार उसके लिंग को रास्ता क्या मिला, घुसता ही चला गया सरसरा कर, उसकी गुदा को चीरता हुआ।
“ओ्ओ्ओह्ह्ह मां्आं्आं्आं, मर गयी रे्ए्ए्ए्ए्ए।” जिबह होती बकरी की तरह रो पड़ी बेचारी। लेकिन अब रामलाल कहां रुकने वाला था।
“आह ओह्ह्ह्ह्ह, मस्त, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, इतनी टाईट, अहा, मजा आ गया, लो पूरा घुस गया, अब रोने से क्या फायदा। चुपचाप चोदने दीजिए रश्मि मैडम। देखिए अब कितना मजा आएगा।” कहकर शुरू हो गया, गचागच चोदने लगा। कुछ देर तो रश्मि रोती कलपती रही, लेकिन कुछ लम्हों बाद उसके तेवर ही बदल गये। वचन और तन की भाषा ही बदल गयी।
“ओह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, आह्ह आह्ह, उम्म्म्म्मा्आ्आ उम्म्म्म्मा्आ्आ, इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स, उफ्फ्फ्फ्फ्फ चोद आमार रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, आमार गां्आं्आं्आं्आं्आं्ड़ के खूब मोजा निये चोद आमार चोदू स्वामी, आह की खूब आनोंदो दीच्छो गो, ओह रे ओह्ह्ह्ह्ह, भीषोण बांड़ा, ओह्ह्ह्ह्ह भोगोबान, भालो, भीषोण भालो लागछे गो्ओ्ओ्ओ्ओ, (मेरी गांड़ को खूब मजा ले कर चोदिए चोदू स्वामी, विशाल लंड, ओह भगवान, बहुत अच्छा लग रहा है)।
उधर रश्मि की गांड़ में रामलाल के भयावह लंड की मस्ती चढ़ी थी और इधर ये दोनों बूढ़े चुदक्कड़ इस बार मेरी गांड़ का बाजा बजाने पर उतर आए थे। हरिया ने मुझे अपने ऊपर खींच लिया और मैं भी भरभरा कर उस पर गिर ही पड़ी। इधर मैं उसपर गिरी कि आनन फानन में अपने लंड को मेरी गुदा पर टिका दिया।
“यह क्या?” चौंक उठी मैं।
“गांड़ रे पगली, गांड़ में ठोकूंगा लोड़ा्आ्आ्आ्आ।” कहते न कहते, सूखे सूखे ही जबर्दस्ती लंड घुसाने का प्रयास करने लगा। मुश्किल था, सूखे सूखे मुश्किल था, पीड़ादायक था, लेकिन उस हरामी बूढ़े को मेरी पीड़ा की क्या परवाह थी। पीड़ा देने के इरादे से ही शायद वह ऐसा कर रहा था। मैं भी ठहरी एक नंबर की रांड। दर्द के बावजूद उसके लंड को अपने में समाहित करने हेतु अपने शरीर को ढीला छोड़ दी।
“ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मां्आं्आं्आं,” पीड़ा को यथाशक्ति पीती हुई हरिया के लंड को अपनी गांड़ में ग्रहण करने में सफल हो गयी। इतने पर ही बस थोड़ी हुई। करीम को तो भूल ही गयी थी। वह कमीना कहाँ पीछे रहने वाला था। पीछे से मुझ पर सवार हो गया और मेरी चूचियों का मलीदा बनाने पर तुल गया।
“चीख रही है कुतिया? अभी तो मैं बाकी हूं।” तभी मुझे अहसास हुआ कि करीम का तनतनाया लंड हरिया के लंड से बिंधे गुदाद्वार पर दस्तक देने लगा। चिहुंक उठी मैं।
“तू भी मादरचोद? तुझे भी मेरी गांड़ ही मिली है? आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, नननननहींईंईंईंईं, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, फट्ट्ट्ट्ट्ट जाएगी मां के लौड़े।”
“फटने दे साली रंडी। आज तेरी गांड़ का गूदा निकाले बिना हम छोड़ने वाले नहीं हैं।” दबाव बढ़ाने लगा अपने लंड का मेरी गांड़ पर। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, दो दो लंड, मेरी गांड़ में? सिहर उठी मैं। छूटने की कोई गुंजाइश नहीं थी। छूटना चाहता भी कौन था। बस भयभीत थी उस पीड़ा की जो अब मुझे झेलना था। चूत में दो लंड एक साथ सफलता पूर्वक ले ही चुकी थी तो अब गांड़ की बारी थी। चलो असंभव तो नहीं ही था, ले ही लेती हूं। इस सोच नें मेरे अंदर हिम्मत का संचार किया और लो, तभी कचकचा कर करीम नें मेरी गुदा की संकरी गुफा को चीरते हुए अपना लंड उतार ही दिया। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, अकथनीय पीड़ा। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, पल भर को मेरे जैसी रांड की भी सांसे रुक गयीं थीं। मेरी गुदा की हालत अब फटी तब फटी वाली थी। आखिर एक छिद्र, वह भी गुदामार्ग के संकरे छिद्र में, एक नहीं, दो दो मोटे मोटे लिंग को एक साथ ग्रहण करना किसी महिला के लिए कोई आसान बात तो थी नहीं, चाहे वह मुझ जैसी रांड की गुदा ही क्यों न हो। कितनी बार गुदा मैथुन से गुजर चुकी थी, किंतु इस तरह? बाप रे बाप। खैर, येन केन प्रकारेण, मैं दांत भींच कर सफलतापूर्वक इस आक्रमण को झेलने में सक्षम हो ही गयी। अब आरंभ हुई मेरी गुदा की कुटाई। दोनों बूढ़ों में मानो होड़ लग गयी मेरी तंग गुफा को कूटने की। उफ्फ्फ्फ्फ्फ भगवान, जालिमों ने मेरे जिस्म को निचोड़ते हुए मेरी गुदा पर कहर ही ढा दिया। भकाभक, भचाभच लगे चोदने मेरी गुदा को। प्रारंभिक पीड़ा का दौर गुजरने के पश्चात, ओह्ह्ह्ह्ह मां्आं्आं्आं, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, आनंद, सुखद आनंद में मुदित, चुदने लगी।
“ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, चोद बेटीचोओ्ओ्ओ्ओ्ओदों, चोद बेटी की गां्आं्आं्आं्आं्आं्ड़, उफ्फ्फ्फ्फ्फ मजा आ रहा है साले कुत्तों, उफ्फ्फ्फ्फ्फ।” मैं जहाँ अनाप शनाप बड़बड़ाती कुतिया की तरह चुदने में मशगूल थी वहीं दोनो बूढ़े भी मुझे गंदी गंदी गालियों से नवाजते हुए चोदे जा रहे थे।
“हरामजादी कुतिया, रंडी की चूत, मां की लौड़ी, ले ले ले ले और ले आह्ह, ओह्ह्ह्ह्ह, लंडखोर बुरचोदी……” और न जाने क्या क्या। रामलाल की उत्तेजक कहानी का असर था यह। हम सभी कामुकता के सागर में डूब उतरा रहे थे। सभी अपने अपने ढंग से अपनी वासना की तृप्ति हेतु जी जान से प्रयासरत थे। एक दूसरे के तन से ऐसे लिपट चिपट रहे थे, बदहवासी, बेकरारी के आलम में डूबे ऐसे धकमपेल कर रहे थे मानो सारी कसर आज ही पूरी करने पर आमादा हों। करीब पच्चीस तीस मिनट के वासना की उस आंधी में हम सभी बेलगाम, पूरी बेशरमी से बहे जा रहे थे बहे जा रहे थे। उस आंधी के थमते ही मैं और मेरी गांड़ का कचूमर बनाने वाले दरिंदे बूढ़े इधर उधर लुढ़के अपनी सांसों पर नियंत्रण करने की कोशिश करने लगे। मुझे अहसास हो रहा था कि मेरा मलद्वार फैल कर गुफा में तब्दील हो चुका था जिसमें से इन बूढ़ों का वीर्य रिस कर बाहर आ रहा था। मैं बड़ी मुश्किल से उठी और बाथरूम की ओर चली, धुलाई करने, रोक पाने में अक्षम, अपनी गुदा से निकलते मल मिश्रित वीर्य की धुलाई करने। मेरे वापस आते आते रामलाल भी रश्मि की गांड़ का भुर्ता बना कर एक ओर लुढ़का भैंसे की तरह डकार रहा था। रश्मि की हालत तो देखने लायक थी। पेट के बल निढाल पड़ी, अपने गांड़ की बरबादी का दर्शन करा रही थी। थक कर चूर, पीले पीले मल लिथड़े नितंबों से बेखबर, आंखें बंद किए पता नहीं किस दुनिया की सैर कर रही थी।
“अरी रश्मि, उठ, जा कर अपनी गांड़ धो कर आ।” मैं बोली।
“ऊं्ऊं्ऊं्ऊं्ऊं्ह्ह्ह्ह्ह्ह,”
“उठ”
“क्यों ््ओओंं््ओओंं््ओओंं?”
“तेरी गांड़ गू से सनी है।”
“ओह्ह्ह्ह्ह भगवान, क्या हाल हो गया।” अपने हाथ के स्पर्श से यह महसूस करके कि मैं सच कह रही हूँ, बड़ी मुश्किल से अलसाई सी लड़खड़ाते हुए उठी और बाथरुम की ओर चली। उसका गुदाद्वार फैल कर संकुचन की क्रिया द्वारा पेट के अंदर मल के दबाव को रोक पाने में असफल सिद्ध हो रहा था, नतीजतन, बाथरूम जाते जाते उसकी गांड़ से टप टप मल और वीर्य का मिश्रित द्रव्य फर्श पर चूता चला गया, जिसे मुझे ही साफ करना पड़ा। रश्मि जब वापस कमरे में आई, तबतक हम सब सामान्य है चुके थे। शरीर लेकिन हम सबके अब भी नग्न ही थे।
“आया मजा?” मैं रश्मि से पूछी।
“आया, बड़ा मजा आया, लेकिन शुरु में रुला ही दिया था हरामी नें तो मुझे।” पूर्ण संतुष्टि का भाव था उसके चेहरे पर। लेकिन उसकी चाल बदली बदली सी थी। होगी भी क्यों नहीं, इतने मोटे और लंबे लंड से जो गांड़ मरवा बैठी थी।
“हां, सच बोल रही हो, इन खड़ूस बूढ़ों को देखो, इनके लंड कैसे अभी चूहे की तरह दुबके हुए हैं, कुछ देर पहले मेरी गांड़ के अंदर गरज बरस कर मेरी गांड़ का फालूदा बना रहे थे साले चुदक्कड़।” मैं बोली, और वे दोनों बूढ़े हमें देख कर खींसे निपोर रहे थे।
“तो अब?” मैं पूछी।
“अब क्या?” रश्मि बोली।
“अरी, शहला वाली कहानी।”
“ओह हां। तो मेरे प्यारे चुदक्कड़ जी, चलिए, शुरू हो जाईए।” रामलाल की ओर देखते हुए नंग धड़ंग सोफे पर बेशर्मी के साथ बैठती हुई बोली।
रामलाल अलसाई मुद्रा में उठते हुए बोला, “बताता हूं, बताता हूं।” फिर रश्मि को अपनी बांहों में दबोच कर बोलने लगा:… …..
“अरे ऐसे ही पड़े रहोगे कि उठोगे भी? आगे की कहानी सुननी नहीं है क्या?” मैं उन्हें संबोधित कर बोली।
“देख नहीं रही मां की लौड़ी, क्या हालत है?” रश्मि अलसाई सी बोली।
“देख रही हूं साली कुतिया, देख रही हूं। देख रही हूं तेरी गांड़ का गूदा निकल गया है। तेरी गांड़ से गू निकल गया हरामजादी, उठ और जा कर धो धा कर आ जा।” बड़े बेमन से रश्मि भी लड़खड़ाती हुई उठी और बाथरूम में घुस गयी। बाथरूम का दरवाजा भी बंद नहीं की और टायलेट पर बैठ गयी। भर्र भर्र करके उसने अपना पेट पूरा खाली कर दिया, उसकी गांड़ खुल जो गयी थी। मैं मुस्कुरा उठी। “क्यों री, गांड़ का फाटक पूरी खुल गयी है क्या?”
“साली रंडी, तू तो चुप ही रह। तेरे ही चक्कर में गांड़ फड़वा बैठी।” अंदर से ही रश्मि की आवाज आई। जब वह वापस आई तो बड़े प्यार से रामलाल को उठाने लगी, “उठिए मेरे रसिया, चलिए आपका लंड धो दूं।” अनिच्छा से रामलाल उठा और रश्मि के साथ बाथरूम चला।
“अबे ओ मादरचोदों, आपलोगों को अलग से बोलना पड़ेगा क्या? उठिए और जाकर लंड धोकर आईए।” मैं डांटती हुई हरिया और करीम से बोली। जब सभी फ्रेश हो कर बैठक में आए तो, मैंने ही कहा, “रामलाल जी, चलिए, अब आगे की कहानी, शहला वाली शुरू कीजिए।” रामलाल से अब भी चिपक कर बैठी थी रश्मि। हम सब अब भी बेशरमी के साथ नंगे ही अपने अपने स्थान में बैठे थे। मैं हरिया और करीम के मध्य सैंडविच बनी बैठी थी।
“ठीक है, अब आगे सुनिए : –
“उस दिन दोपहर को खाना खाने के बाद मेरा लंड बार बार खड़ा हुआ जा रहा था। मैं सरोज को चोदना चाह रहा था लेकिन वह चोदने नहीं दे रही थी।
“नहीं जेठ जी, अभी नहीं। बहुत काम है। पूरा बर्तन धोना है। अभी नहीं।”
“लेकिन मैं इस लंड का क्या करूं? खड़े खड़े दर्द कर रहा है।”
“तो जाईए न रबिया को चोद लीजिए।”
“ठीक है, यह भी ठीक है।” कहते हुए मैं खड़े लंड, रबिया के घर चला गया। दरवाजा बंद था उसका। “रबिया बहन, दरवाजा खोलो।” मैं बोला। लगता है उसे भी चुदने की पड़ी थी। तुरंत दरवाजा खुला और मैंने दरवाजे पर ही रबिया को पकड़ लिया।
“अरे अरे, दरवाजा तो बंद कर लूं।” रबिया बोली।
“छोड़ो छोड़ो, मैं बंद कर देता हूं।” कहकर मैंने दरवाजा बंद दिया और उसे उठा कर बिस्तर पर ले गया। पैजामा खोल फेंका, रबिया को बिस्तर पर पटक कर चढ़ बैठा उस पर। बिना किसी भूमिका के उसकी साड़ी उठा दी। अंदर कुछ पहनती तो थी नहीं, मैं भी अंदर कुछ पहना नहीं था। चोदना चाह रहा था सरोज को, अंडरपैंट घर में ही खोल चुका था, जल्दबाजी में वैसे ही आ गया था रबिया के घर। पीछे से कुतिया के माफिक अपना लंड घुसेड़ दिया उसकी चूत में और दनादन चोदने लगा। उसकी थलथल करती बड़ी बड़ी चूचियों को पीछे से दबोच कर चोदने में बड़ा मजा आ रहा था। रबिया भी मस्ती में डूबी चुदने में मगन थी। हम दोनों बड़े मजे में चुदाई में डूबे हुए थे कि अचानक हमें दरवाजे मेें दस्तक सुनाई पड़ी और उसी के साथ उसकी बेटी शहला की आवाज भी। इस असमय शहला के आगमन से हम दोनों झुुंझला उठे थेे। शायद आज कॉलेज की छुट्टी जल्दी हो गयी थी। रबिया हड़बड़ा कर मेरी पकड़ से छूट कर अपने को संंभालते हुए मुझे अलमारी के पीछे छुपाकर दरवाजा खोलने चली गयी। मैं नंगा ही अलमारी के पीछे छुपा रह गया था।
शहला घर में घुस कर सीधे सोने के कमरे में चली आई और धम्म से बिस्तर पर बैठ गयी। बिस्तर पर बैठते ही उसकी नजर मेरे कपड़ों पर पड़ी, जिसपर हड़बड़ी में न मैंने ध्यान दिया न ही रबिया नें।
“अम्मी, ये किसके कपड़े हैं?” शहला का सवाल था।
“यह यह यह ……” रबिया के मुंह से आगे बोल नहीं फूटा। शशंकित शहला इधर उधर देखने लगी।
“बताओ अम्मी।”
उसे चुप देख कर मैं खुद बाहर निकल आया, “मेरे कपड़े हैं।” मेरी आवाज सुनकर मेरी ओर मुड़ी और मुझे नंग धड़ंग अवस्था में देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गयी। इतनी देर में मेरा लंड आधा मुरझा चुका था। कभी ऊपर देखती, कभी नीचे।
“अ अ अ अंकल आ्आ्आ्आप?” उसके मुंह से निकला।
“हां मैं।” मैं अब उसके सामने आ चुका था। शहला अठारह साल की गदराए बदन की लड़की थी। अच्छी सेहतमंद, खूबसूरत, लड़की, चूचियां संतरे जैसी। मेरे लिए तो बस चोदने के लिए एक औरत थी, वह भी इतनी खूबसूरत जवान औरत। मेरा मुरझाया लंड फिर से टाईट होने लगा।
“अअअअअआप इस तरह हमारे घर में?” शहला की घबराई आवाज आई। वह सबकुछ समझ गयी थी। उसकी मां के चुप रहने से उसका शक पक्का हो गया था कि यहां क्या चल रहा था।
“हां, तो?” चोदने की तीव्र इच्छा हो रही थी। शहला नें बीच चुदाई में बाधा जो डाल दी थी। अधूरी चुदाई पूरी करने के लिए पागल हुआ जा रहा था। रबिया चाहे शहला, चूत तो चूत होती है। मुझे कहाँ कुछ पता था कि एक कुवांरी लड़की और एक चुदी चुदाई औरत को चोदने में फर्क क्या है। मैं सोच ही रहा था कि शहला चीख उठी, “गंदे, जंगली, सूअर के बच्चे, बेशरम।”
“चुप रह शहला।” अब भयभीत रबिया बोली।
“क्यों रहूं चुप?”
“अगल बगल के लोगों को पता चल जाएगा।”
“लगने दो पता।”
“बदनाम हो जाएंगे हम।”
“तुमने काम ही ऐसा किया है।”
“माफ कर दे हमें बेटी।” गिड़गिड़ाने लगी रबिया।
“क्यों करूं माफ, गंदी।” शहला का गुस्सा शांत ही नहीं हो रहा था। खड़ी हो गयी वह, और बाहर जाने लगी। तभी रबिया उसका रास्ता रोक कर खड़ी हो गयी।
“मान भी जाओ ना।”
“नहीं, सबको बता कर रहूंगी, क्या चल रहा है यहां।”
“तो तू नहीं मानेगी?” अब रबिया तनिक गुस्से में बोली।
“नहीं।”
“रामलाल भईया, पकड़िए इस लड़की को।” अब वह तैश में आ गयी थी। मैं ने तुरंत शहला को पीछे से अपनी बांहों में जकड़ लिया।
“छोड़िए मुझे, वरना मैं चिल्लाऊंगी।” शहला छटपटाती हुई बोली। उसके छटपटाने से मेरा लंड, जो अब खड़ा हो चुका था, शहला के सलवार समेत उसकी गांड़ में घुसा चला जा रहा था। बड़ी मस्त, सुंदर, जवान, भरी पूरी, गदराए शरीर की मालकिन शहला की चूचियों का स्पर्ष जब मेरे हाथों से हुआ, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, संतरे जैसी चूचियां, वह भी सख्त, मेरा लंड तो फनफना कर उसकी सलवार को फाड़ डालने के कागार पर पहुंच गया।
“मुंह बंद कीजिए इसकी।” रबिया फुंफकार उठी। मैंने एक हाथ से उसका मुंह बंद कर दिया।
“अब?” मैं सवालिया निगाहों से रबिया को देखा।
“अब क्या? चोद डालिए इसे भी। न किसी को मुंह दिखाने के काबिल रहेगी, न ही किसी को बताएगी।” रबिया ने बिना आगा पीछा सोचे कहा।
मुझे और क्या चाहिए था। इतनी देर से चोदने को मरा जा रहा था। उसका मुंह दबाए हुए खींच कर बिस्तर पर लाया और उसके सलवार का नाड़ा खोलने लगा। नहीं खुल रहा था तो एक झटके से तोड़ दिया नाड़ा और खींच लिया नीचे। शहला बड़ी जोर लगा रही थी मुझसे छूटने के लिए लेकिन मुझसे छूटना इतना आसान थोड़ी था। रबिया अबतक एक कपड़े का टुकड़ा ले आई थी और उससे शहला के मुंह को बांध दिया, ताकि वह चीख चिल्ला नहीं सके। रबिया यहीं नहीं रुकी, उसने शहला के कमीज को भी खींच कर उतार दिया और उसके चूचकसना को भी। इधर मैं उसके सलवार और चड्ढी को खोल चुका था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, इतनी मस्त जवान लड़की के नंगे बदन को मैं पहली बार देख रहा था। संतरे जैसी चूचियां। संगमरमर जैसा चिकना बदन। केले के थंभों जैसे उसकी जांघें। मक्खन जैसी उसकी चूत इतनी चिकनी कि मुंह में पानी भर आया। चूत के ठीक ऊपर हल्के रोयेंंदार बाल उगे हुए थे। मैं उसपर चढ़ गया और उसके पैरों को फैला कर उसकी जांघों के बीच घुस कर उसे बेबस कर दिया। उधर रबिया उसके दोनों हाथों को पकड़ कर विरोध करने से लाचार कर चुकी थी। शहला की आंखों से आंसू बह रहे थे। मुंह से गों गों की आवाज निकल रही थी। सर इधर उधर पटक रही थी लेकिन कुछ भी करने से लाचार थी। मैं बिना और कुछ सोचे अपने लंड का सुपाड़ा उसकी चिकनी चूत के फांक पर रखा और अपने शरीर का भार देने लगा। शहला की आंखें फटी जा रही थीं और इधर साथ ही उसकी चूत भी। घुस ही नहीं रहा था मेरा लंड, इतनी टाईट थी उसकी चूत।
“तेल लगा अपने लंड पर साले चुदक्कड़ मियां, चूत देखी नहीं कि सीधे लंड ससेटने को पागल हुए जा रहे हैं।” रबिया मेरी परेशानी, शहला की पीड़ा से विकृत होते चेहरे और छटपटाहट को भांप कर बोली।
“तो ला ना तेल की शीशी साली बुरचोदी, खड़ी खड़ी काहे मां चुदा रही है मां की चूत।” झल्लाहट में मेरे मुंह से निकला। यह सब गालियां मैंने उन्हीं लोगों से सीखी थी।
“मैं इसके हाथ पकड़ी हूं, छोड़ कैसे दूं मादरचोद?”
“हाथ ही न पकड़ी है लंड की ढक्कन, छोड़ इसे, मैं संभालता हूं इस कुतिया को।” उसने भागकर तेल की शीशी मेरे हाथ में थमाई और मैं अपने लंड पर तेल चुपड़ा, उसकी चूत पर तेल चुपड़ा और आ गया फिर से मैदान में। अहा, अब घुस रहा था, धीरे धीरे, उसकी चूत को फाड़ता हुआ, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, फिर भी टाईट थी, मगर घुस रहा था धीरे धीरे। शहला की हालत खराब थी, पैर पटक रही थी, सिर पटक रही थी, रो रही थी, गों गों की आवाज उसके नाक से निकल रही थी। आंखें फटी जा रही थी, मगर अब मैं कहां रुकने वाला था, मेरे लौड़े का अगला भाग घुस चुका था उसकी चूत में और घुसता ही चला जा रहा था। मैं रुका नहीं, ठूंसता गया, ठूंसता गया। शहला तड़प रही थी और अचानक उसका तड़पना रुक गया। शांत हो गयी वह। उसका शरीर ढीला पड़ गया। आंखें बंद हो गयीं। अबतक आधा से ज्यादा लंड घुस चुका था उसकी चूत में। उसकी हालत देखकर मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन रबिया डर गयी।
“रुकिए भाई साहब, लगता है यह बेहोश हो गयी है।”
“साली हरामजादी को अभी ही बेहोश होना था।” मैं भन्ना कर रुका। रबिया तुरंत पानी ले कर आई और शहला के चेहरे पर पानी के छींटे मारने लगी। कुछ ही पलों में शहला को होश आ गया, इससे पहले कि उसे पूरी तरह होश आता, मैंने लंड घुसाना जारी रखा। उसके पूरी तरह होश आते आते मैं पूरा लंड घुसा चुका था। किला फतह कर चुका था लेकिन शहला अब फिर दर्द के मारे हाथ पैर पटकने लगी। मैंने शहला के चूतड़ के नीचे हाथ लगाया कि अब चोदना शुरु करूँ लेकिन मेरा हाथ गीला हो गया। क्या पेशाब था शहला का? हाथ देखा तो खून से लतपत। खून देखकर मेरे होश उड़ गये।
“यह क्या? खून?”
“हो गया, काम हो गया, शहला के चूत की झिल्ली फट गयी। खून निकलता है, पहली बार खून ऐसे ही निकलता है। शाबाश रामलाल जी, आपने किला फतह कर लिया। शहला को भी होश आ गया। अब चोदिए जी चुदक्कड़ बादशाह। जहांपनाह, अब सब ठीक है।” रबिया चहक उठी। अब तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। शुरू हो गया। चूतड़ के नीचे हाथ डालकर गचागच चोदने लगा। उसकी सख्त चूचियों को दबाने लगा, चूसने लगा, जोश में उसकी चूचियों पर दांत भी गड़ा बैठा। करीब दस मिनट बाद तो चकित हो गया। शहला की कमर भी चल रही थी। पता नहीं, जानबूझकर या अनजाने में उसकी कमर अपने आप ऊपर की ओर उछल रही थी। अब उसकी आंखों से आंसू नहीं निकल रहे थे। उसकी आंखें बंद थीं। उसके चेहरे पर अब पीड़ा नहीं दिख रही थी। रबिया नें शहला के दोनों हाथों को कब का छोड़ दिया था। शहला के दोनों हाथ अब मेरी कमर पर आ कर कस गये थे। रबिया नें जब शहला की यह हालत देखी तो उसके मुंह पर बंधा कपड़ा खोल बैठी। कपड़ा खुलते ही, “आ्आ्आ्आ्आह, ओ्ओ्ओह्ह्ह, इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स” की आवाजें निकलने लगीं शहला के मुंह से। मैं समझ गया कि अब शहला को चुदने में मजा आ रहा है। मैं बड़ा खुश हुआ और दुगुने जोश से उसके नंगे बदन को मसलते हुए भच्च भच्च चोदने में लग गया।
“ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, अब आ रहा है न मजा?”
“आह्ह आह हां ओह ओह्ह्ह्ह्ह हां उफ्फ्फ्फ्फ्फ।” सर हिलाते हुए बोली शहला। उसने अपने पैरों को मेरी कमर पर चढ़ा कर जकड़ रखा था।
“ले, ओह ले मेरा लंड, ओह खा मेरा लौड़ा अपनी चूत में, अहा, इतनी मस्तानी चूत है तेरी, उफ्फ्फ्फ्फ्फ मेरी रानी बिटिया, आज से पहले ऐसी चूत नसीब नहीं हुई थी। आह्ह।” मैं बोले जा रहा था और चोदे जा रहा था।
“साली रंडी, अब बताएगी किसीको?” रबिया वहीं खड़ी हमारी चुदाई देखते हुए बोली।
“हांआंआंआंआंआं, आह्ह आह्ह हांआंआंआंआंआं।” शहला बोली।
“हरामजादी कुतिया, अब भी बोलेगी?”
“हां हांआंआंआंआंआं, बोलूंगी, अगर अंकल मुझे नहींईंईंईंईंईंईंई चोदेंगे तो बोलूंगी्ई्ई्ई्ई्ई।” शहला आनंदमुदित चुदते हुए बोली।
“हा हा हा हा तो ये बात है।” रबिया खुश हो गयी। करीब पंद्रह मिनट बाद शहला चिपक गयी मुझ से और, “ओह्ह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, आ्आ्आ्आ्आह,” कहते हुए खल्लास हो कर निपट गयी लेकिन मैं ने छोड़ा नहीं उसे और उसके ढीले पड़ते शरीर को रौंदता रहा, चोदता रहा। जीवन में ऐसा आनंद पहली बार मुझे मिल रहा था। करीब चालीस मिनट तक हमारे बीच यह चोदा चोदी का खेल चलता रहा। पता नहीं क्यों मेरे लंड से पानी निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था। इस बीच वह दो बार झड़ चुकी थी। खैर आखिर में मेरे लंड ने पानी छोड़ना शुरू किया, बाप रे बाप, करीब दो मिनट तक मेरे लंड से पानी निकलता रहा निकलता रहा। ऐसा लग रहा था जैसे शहला की चूत मेरे लंड का एक एक बूंद रस चूस कर रहेगी। उफ्फ्फ्फ्फ्फ ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ। बड़ा मजा आया उस दिन, पहली ही बार में एक कुवांरी लड़की की सील भी तोड़ी और दीवानी भी बना लिया। खुन्नम खून चूत और लंड। लेकिन चिंता कुछ नहीं। थक कर चूर, आनंद से आंखें बंद किए हुए मुझसे चिपटी ही रही काफी देर तक।
“आ्आ्आ्आह, मजा आ गया तुम्हें चोदकर। कैसा लगा तुम्हें?” मैं उसे अपनी बांहों में कसे हुए ही पूछा।
“हाय्य्य्य्य अल्ल्ल्ल्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह, अंकल, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, मा्आ्आ्आ्आर ही डा्आ्आ्आ्आला्आ्आ् था मुझे तो। एक बार तो लगा था कि मर ही जा रही हूं मैं।”
“मरी तो नहीं ना।” शरारत से बोला मैं।
“हाय दैया, जुल्मी कहीं के।” मेरे सीने पर सर रख कर बोली।
“बस बस, हो गया। चल उठ अब। बड़ी प्यार दिखा रही है चुदने के बाद अब।” रबिया बोली।
“नहीं, नहीं उठुंगी।” शहला मुझसे चिपकती हुई बोली।
“हरामजादी, उठती है कि नहीं। खून से लिथड़ कर भी मन नहीं भरा?”
“नहीं भरा, मन नहीं भरा।”
“साली कुतिया, अपनी अम्मी के सामने ऐसा बोलती है रांड।”
“अम्मी? काहे की अम्मी? खुद आपने ही तो चुदवाया मुझे ना? अब बड़ी आयी अम्मी बनकर।” उनकी बातें सुनकर मुझे बड़ा मजा आ रहा था। उस दिन पता नहीं मेरे लंड को क्या हो गया था, इतनी देर में ही फिर टनटना कर खड़ा हो गया। फिर वही चुदास जाग गयी मेरे अंदर। चूंकि मेरा लंड शहला की चूत से बाहर निकल चुका था, जैसे ही रबिया की नजर मेरे लंड पर पड़ी, उतावली हो गयी चुदवाने के लिए। हमारी चुदाई के दौरान ही वह पूरी नंगी हो चुकी थी। अपनी भरी पूरी मांसल मां को ऐसी बेहयाई से नंगी देखने की शायद उसने कल्पना भी नहीं की थी।
“रंडी, बेहया कुतिया।” उसके मुंह से निकला।
“चल हट, बेहया तू, बेहया तेरी चूत, बेहया तेरा भोंसड़ा।” उसने शहला को खींच कर मुझसे अलग कर दिया। शहला की नजर अब मेरे टनटनाए लंड पर पड़ी तो एकाएक विश्वास ही नहीं हुआ उसे कि यही लंड उसकी चूत में घुसा था।
“बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, एक फुट का बेलन मेरी बुर में घुसा था! उफ्फ्फ्फ्फ्फ।” किसी प्रकार उठी लड़खड़ाते हुए और आंखें फाड़े खून से सने मेरे लंड को देखती रह गयी।
“तू देखती रह मां की लौड़ी, अब मेरी बारी है, ख्वामख्वाह हमारे बीच में कूदी थी।” कहते कहते मुझ पर चढ़ गयी और मेरे लंड को गप्प से अपनी चूत में ले कर अपनी बेटी के सामने ही गपागप चुदवाने लगी। उस दिन उन दोनों मां बेटी को जी भर के चोदा। उस दिन के बाद मुझे तो जैसे शहला को चोदने का लाईसेंस मिल गया। जब मर्जी शहला को चोदता, जब मर्जी रबिया को चोदता और जब मर्जी सरोज को चोदता। इतना कहकर वह चुप हुआ।
“वाह जी वाह, चांदी हो गयी आपकी तो। उधर तीन, इधर दो, कुल पांच चूत का स्वाद चख लिया आपने तो।” मैं बोली।
“सिर्फ चूत का नहीं, गांड़ का भी।”
“ओके बाबा चूत और गांड़, पांच पांच चूत और गांड़।” मैं बोली। उसकी कहानी खत्म होते ही हम फिर एक दूसरे पर पिल पड़े। फर्क सिर्फ इतना था कि जो हालत रामलाल नें रश्मि की की थी, वही हालत अब वह मेरी कर रहा था ओर हरिया और करीम रश्मि के जिस्म को नोचने खसोटने लगे थे। यह सब करते करते कब शाम हो गयी हमें पता ही नहीं चला। थक कर चूर यहां वहां बेहद गंदे तरीके पड़े लंबी लंबी सांसें ले रहे थे।
रामलाल अपने घर वापस जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। हमारी लाख कोशिशों के बावजूद वह यहीं रहने पर आमादा हुआ था। तभी मेरे मन में यह विचार कौंधा। वृद्धाश्रम वाला। क्यों न रामलाल जैसे बुजुर्गों के लिए एक वृद्धाश्रम खोल दिया जाए, जिसमें ऐसे विकलांग बुजुर्ग, परिवार से परित्यक्त बुजुर्ग, बेसहारों के लिए एक सुरक्षित आश्रय मिल जाए। हमारे पास भूमि तथा धन का अभाव तो था नहीं। केवल योजना को अमलीजामा पहनाने की देर थी। बस, मैंने तत्काल निर्णय ले लिया उसे साकार करने का।
खैर फिलहाल तो मैं कल के बारे में सोच रही थी। कल की तैयारी करनी थी। दूसरे दिन यथासमय मैं ऑफिस पहुंची और दिन भर काफी व्यस्त रही। शिवालिंगम नायर के साथ मीटिंग का तो अब कोई और अर्थ नहीं था। मुझे सिर्फ फिक्र थी संध्याकाल में उनके साथ डिनर की। डिनर का अर्थ क्या था वह भी उन्होंने स्पष्ट कर दिया था। उस पचास वर्षीय अभियंता की निगाहें मेरी आकर्षक देह के उतार चढ़ाओं को नाप लौल रही थीं। चिरपरिचित वासना की भूख उसके नेत्रों पर खेल रही थी। मुंह से किसी कामपिपाशु दरिंदे भेड़िए की भांति लार टपक रहा था। पर मैं ठहरी एक नंबर की रांड, आदी थी इन सबकी, क्या फर्क पड़ना था, चुदना ही तो था। कल की जालिमाना नोच खसोट के बाद वैसे तो आज मुझे विश्राम लेना था, लेकिन मैं पूरी तरह पेशेवराना अंदाज में पिछले दिन की सारी घटनाओं को मन मस्तिष्क से झटक कर और तन की थकान को नजरअंदाज करके तत्पर हो गयी नायर साहब से मिलने को।
ऑफिस से चार बजे ही छुट्टी करके घर लौट आई। कुछ विश्राम किया। संध्या सात बजे के करीब पूर्वनिर्धारित समयानुसार मैं फ्रेश होकर बकायदा साड़ी ब्लाऊज में ही उनके बताए हुए हॉटल में पहुंची। नायर साहब हॉटल के रिशेप्शन में एक और अधेड़, दुबले पतले, कोयले की तरह काले अजनबी के साथ बैठे पाये गये। मुझे देखते ही उनकी बांछें खिल गयीं।
“आईए कामिनी जी, मैं आपका ही इंतजार कर रहा था। समय की बड़ी पाबंद हैं आप।” नायर साहब की आंखें चमक उठी थीं। उनके साथ बैठा व्यक्ति, किसी लोमड़ी की तरह लार टपकाती दृष्टि से मुझे सर से पांव तक घूर रहा था। मैं थोड़ी असमान्य स्थिति में खुद को पा रही थी। वह व्यक्ति मुझे बेहद घटिया टाईप शख्स दिख रहा था। पान खा खा कर लाल, मोटे मोटे होंठों से बाहर निकले हुए पीली दंतपंक्तियां, जिनमें से सामने के ऊपर वाले चार दांत अत्यंत अनाकर्षक रुप से बाहर की ओर निकले हुए थे, का प्रदर्शन करते हुए खींसें निपोर रहा था। जबड़े भी सामान्य से कुछ अधिक ही सामने उभरे हुए थे। उसकी ऊपरी दंतपंक्ती में दोनों ओर भेड़ियों की तरह एक एक दांत कुछ अधिक ही लंबे थे, आम लोगों से कुछ अधिक, दैत्यों की तरह या यों कहें ड्राक्यूला की तरह। उस व्यक्ति को देख कर मन वितृष्णा से भर उठा। मेरी दृष्टि और चेहरे की भाव भंगिमा को लक्षित कर नायर साहब नें मुझे आश्वस्त करते हुए उनका परिचय कराया, “इनसे मिलिए, ये हैं छेदीलाल चौबे। ये हैं यहां के हमारे डीलर, लोकल सप्लायर और आफ्टर सेल्स सर्विस के इंचार्ज।”
“नमस्ते मैडम।” छेदीलाल खींसें निपोरते हुए खड़ा हो गया। औसत कद का, करीब साढ़े पांच फुट, बेहद अनाकर्षक व्यक्तित्व था। अपने काले रंग के अलावा दुबला पतला, अधपके बेतरतीब घुंघराले बाल, लोमड़ी जैसी आंखें, लंबी नाक।
“नमस्ते।” अनिच्छा के बावजूद मैं उस कमीने के अभिवादन का उत्तर देने को वाध्य थी, सभ्यता की मांग के अनुसार।
“आईए, हम लाऊंज में चलते हैं। डिनर वहीं मंगा लूंगा।” कहते हुए होटल के लाऊंज की ओर बढ़े। मैं उनके पीछे और हमारे पीछे पीछे चौबे जी। हम तीनों के लिए पहले से एक टेबल और तीन कुर्सियां सजी हुई थीं। हमारे बैठते ही वेटर आ गया और खाने का ऑर्डर ले कर चला गया। वृत्ताकार टेबल के तीन ओर हम त्रिकोण बना कर बैठे थे। तीनों व्यवसाय से इतर, इधर उधर की बातें कर रहे थे। जब वेटर खाने से पहले स्टार्टर के रुप में कुछ हल्के फुल्के स्नैक्स ले कर आया और साथ में “जॉनीवाकर” का एक बोतल भी। मैं तनिक असहज हो गयी। नायर नें पूछा, “आप ड्रिंक्स वगैरह लेती हैं क्या?”
“नहीं, आम तौर पर नहीं।” मैं ने मना कर दिया।
“आम तौर पर ना, खास मौकों पर?” धूर्ततापूर्ण मुस्कुराहट के साथ चौबे जी बोले।
“अरे लीजिए ना आप भी। आजकल क्या आम और खास। क्या औरत और क्या मर्द, हमारे लेबल में सभी पीते हैं।” नायर जी ने कहते कहते तीन पैग बना ही डाला। उनके जोर देने पर मैं मना नहीं कर पायी। कई मौकों पर मैं मदिरा पान कर चुकी थी। मेरे लिए यह कोई नयी बात नहीं थी। मन ही मन मना रही थी कि चौबे जी खा पी कर जल्दी रुखसत हो जाएं।
“चीयर्स।” हमने पैग टकराया और छोटी छोटी चुस्कियां लेने लगे। बीच बीच में भुने हुए काजू, चिप्स और टुकड़ों में चिकन कबाब का स्वाद लेने लगे। चौबे जी की एक अजीब बात पर मैंने ध्यान दिया, बातों के बीच में उनका हंसना, हंसते हुए अपनी दैत्यों वाले दांतों का प्रदर्शन, पैग की चुस्की लेने के पश्चात अपने होंठों को चाटना। उसकी जीभ आम इन्सानों जैसी नहीं थी। काफी लंबी जीभ, कुत्तों जैसी लंबी। यह इन्सान है कि भेड़िया? मेरे शरीर को देखते वक्त उसकी छोटी छोटी कंजी आंखों में किसी शिकारी कुत्ते की तरह चमक आ जाती थी। उसकी हवस भरी नजरें, मेरे चेहरे और वक्षस्थल पर ही बार बार घूम रही थीं। दो पैग लेने के बावजूद मैं खुद को संयमित रखने की पुरजोर कोशिश कर रही थी। तभी वेटर भोजन सामग्री ले कर उपस्थित हो गया और टेबल पर सजाने लगा।
“एक और पैग?” प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखते हुए नायर जी बोले।
“नहीं, बस, हो गया।” मैं तुरंत बोल उठी।
“अरे ले लीजिए ना। कुछ नहीं होता।” चौबे जी बोले।
“नहीं बस।” मैं मना करने लगी।
“अरे लवली पैग।” कहते कहते मेरे इनकार को नजरअंदाज करते हुए नायर साहब मेरी खाली ग्लास में आधा पैग डाल ही दिए।
“इतने में ही नशा हो रहा है मुझे, बस बस।” मैं बोलती रह गयी।
“नशा में ही तो मजा है मैडम।” चौबे जी मेरी हालत को भांपते हुए बोले। नायर साहब बस मुस्कुरा कर रह गये।
“चौबे जी, यह आप क्या कह रहे हैं?” मुझे उसका इस तरह कहना तनिक भी नहीं भाया।
“क्या गलत कह रहा हूं मैं?” चौबे जी अपने होंठ चाटते हुए बड़े भद्दे ढंग से बोले।
“यह मजा, कैसे मजे की बात कह रहे हैं आप?”
“ओह मेरी नादान मुनिया, इतनी भी भोली न बनिए।”
“क क क क्या मतलब?”
“मतलब? अब भी मैं बताऊं मतलब?”
“मैं समझी नहीं।”
“यहां किस लिए आई हैं आप?”
“वह तो, वह तो, नायर साहब ने़ं डिनर के लिए बुलाया था।”
“नायर साहब किसी स्त्री को डिनर में किसलिए बुलाते हैं, मुझे ठीक पता है।”
“ओह्ह्ह्ह्ह, तो तो तो तो, आपको उससे क्या?” मैं हकला उठी।
“नायर साहब अब आप ही बता दीजिए कि मुझे इससे क्या।”
“देखिए मैडम, यहां का सारा बिजनेस यही डील करता है। हमारा पार्टनर ही समझ लीजिए। मैं अपने पार्टनर को ऐसे कैसे छोड़ सकता हूँ। बुला लिया इसे भी।” नायर साहब बोले। तो, तो क्या, तो क्या चौबे जी भी……? उफ्फ्फ्फ्फ्फ, तो क्या यह कमीना, गंदा, गलीज आदमी भी मेरे तन को नोचने की फिराक में है? आभास तो मुझे पहले ही हो गया था, फिर भी अपने मन को अबतक झूठी तसल्ली दे रही थी कि खाना खा कर यह यहां से रुखसत होगा, फिर नायर जी मेरे साथ जो करना हो करे। लेकिन अब तो बात ही कुछ और हो रही थी।
“चौबे जी, प्लीज, मैं ऐसी औरत नहीं हूं।” चिरौरी सी कर उठी मैं।
“फिर कैसी औरत हैं आप? अंधा हूं क्या मैं?”
“आपके घर में मां बहन नहीं हैं क्या?” तनिक रोष से बोली।
“मां नहीं है। बहन है।”
“मैं आपकी बहन जैसी हूं।”
“तभी तो। तभी तो आया हूं।”
“क्या मतलब?” चौंक उठी मैं।
“सुनना है तो सुन ही लीजिए मैडम जी। खुल कर ही बोल देता हूं। मैं बहनचोद हूं, अपनी एकलौती बहन का बहनचोद भाई। नायर साहब भी मजे करते हैं उसके साथ।” अब और क्या सुनना बाकी था। सन्न रह गयी मैं। साले, जहां देखो वहीं चुदक्कड़ों की भरमार है। जिसे देखो वही औरतों की चूत के लिए लंड लिए खड़ा मिलता है। वाह री दुनिया। जहां देखो वहीं भरे पड़े हैं कमीने। मैं समझ रही थी कि मैं और मेरे जैसे कुछ लोग ही ऐसे हैं इस दुनिया में। आगे और क्या बोलती मैं। नि:शब्द रह गयी कुछ पलों के लिए।
“नायर साहब, आपने ऐसा पहले मुझे क्यों नहीं बताया?” मैं नशे में होने के बावजूद तनिक रोष में बोली।
“गुस्सा मत हो मेरी जान, एक से भले दो। सब चलता है। खुश हो जाओगी तुम।” अब आप से तुम पर आ गये वे। हथियार। खैर किसी तरह मैंने खाना खत्म किया। इस तीसरे पैग से मुझे काफी नशा हो गया था।
“तो अब चलें?” नायर बोला।
“कहां?”
“कमरे में, और कहां।” चौबे जैसे गलीज आदमी को अपना तन सौंपने की कल्पना मात्र से ही मुझे उबकाई सी आ रही थी। मन वितृष्णा से भर गया था, फिर भी झेलना तो था ही। फंस गयी थी। मैं कुर्सी से उठी तो नशे के कारण तनिक लड़खड़ा गयी, नायर जी नें लपक कर मुझे थाम लिया। मुझे थामा क्या, उसी बहाने मेरे वक्षस्थल को हौले से दबा भी दिया। मादरचोद, अपनी जात अभी से दिखा रहा था। मुझे थामे हुए फर्स्ट फ्लोर के अपने कमरे में ले आया। पीछे पीछे चौबे जी भी कमरे में दाखिल हुए और कमरे का द्वार अंदर से बंद कर दिया। कमरा काफी बड़ा और सुसज्जित था। गद्देदार बड़ा सा बिस्तर, जिसपर मुझे एकाएक छोड़ दिया, मैं अनियंत्रित धम्म से बिस्तर पर गिर पड़ी। मेरी हालत देख कर उन दोनों की बाछें खिल उठी थीं। एक खूबसूरत गदराई कामुक काया उनके सम्मुख चुदने को उपलब्ध थी।
“It so nice to see a beautiful sexy lady on my bed, ready to be fucked. (यह देखना अत्यंत सुखद है कि एक सुंदर सेक्सी औरत मेरे बिस्तर पर है, चुदने को तैयार)
“सही कहा नायर साहब।” अपनी कुत्तों जैसी लंबी जीभ लपलपाते चौबेजी बोले मेरे सम्मुख आ कर बोले। इतनी देर से उनके रूप के प्रति मेरी वितृष्णा, उसकी लंबी जिह्वा को देख पता नहीं क्यों तिरोहित हो गयी। एक रोमांच सा भर गया मेरे अंदर। यह क्या हो रहा था मुझे? मैं समझ नहीं पा रही थी। मैं बिस्तर पर गिर जरूर पड़ी थी लेकिन तुरंत ही उठ बैठी।
“न न न न उठ मत मेरी जान, ऐसी ही लेटी रह। जरा देखने तो दे तेरी खूबसूरती को।” चौबे जी बोले। तो अब मुझे दो दो कामुक भेड़ियों को झेलना था। नशे में होने के बावजूद मैं काफी हद तक नियंत्रण में थी। मेरी मर्जी न होती तो इन दोनों के वश में नहीं आ सकती थी। लेकिन वक्त का तकाजा था। व्यवसायिक लाभ की बात थी। स्वेच्छा से आई थी। झेलना तो था ही।
“द द द देखिए मैं अकेली और आप द द द दो?”
“तो क्या हुआ?”
“पपपप्लीज, मेरे साथ ऐसा मत कीजिए।”
“कैसा न करें?”
“ययययही कि…..।” आगे की बात मेरे मुंह में ही रह गयी। चौबे जी मुझ पर चढ़ दौड़े और मेरे होंठों को अपने थूथन से बंद कर दिया। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, उस दुबले पतले गंदे आदमी की बांहों में भी काफी दम था। उसकी लंबी जीभ मेरे मुंह के अंदर नृत्य कर रही थी। मैं अवश हो रही थी। उधर नायर साहब कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने पीछे से आकर मुझे दबोच लिया। मेरे उन्नत उरोजों को अपनी हथेलियों से मसलना आरंभ कर दिया। हम सब अपने पूरे कपड़ों में थे। कुछ देर यूं ही चलता रहा, मैं उनकी बांहों में पिसती, उनकी कामुक हरकतों से हलकान होती, उत्तेजना के सैलाब में बही जा रही थी। चौबे जी ने अब मुझे बंधनमुक्त करके आजाद कर दिया किंतु नायर साहब मेरे पीछे से मेरे उरोजों को अब भी मसले जा रहे थे।
“उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह ओ्ओ्ओह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।” मेरे मुंह से आहें निकल रही थीं।
“तैयार हो गयी नायर साहब। मैडम जी, अब दिखा भी दीजिए अपने खूबसूरत बदन का जलवा, या हम ही उतारें” मेरी हिचकिचाहट देख कर चौबेजी पुनः बोले, “ओके, ओके, तू रहने ही दे, हम ही कर लेते हैं यह काम भी, चलिए नायर साहब, करते हैं इसे हम ही, मादरजात नंगी। जरा देखें तो इसकी मदमस्त देह। कब से मन मचल रहा है इसके नंगे बदन को देखने के लिए। फिर डुबकी तो लगाना ही है।” चटखारे लेता हुआ चौबे बोला।
“करेक्ट चौबे जी।” पुनः पिल पड़े वे दोनों मेरे कपड़ों को खींच खांच कर अलग करने, मेरी देह से।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ, ओह्ह्ह्ह्ह, इतने जालिम न बनिए, आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, यह यह ऐसे नहीं, ओह राम।” मुझे नंगी तो होना ही था, लेकिन ये दो कमीने कुछ अधिक ही हड़बड़ी में थे। मिनट भर भी नहीं लगा और लो, मैं हो गयी नंगी, मादरजात नंगी। “हाय्य्य्य्य दैय्या, उफ्फ्फ्फ्फ्फ।” मेरा एक हाथ मेरे स्तनों पर था और दूसरा हाथ योनि के ऊपर, जानती थी, असफल प्रयास था यह मेरा अपने यौनांगों को ढंकने का।
“अब क्या ढंक रही हो मेरी जान? चुदना तो हईए है, अब काहे का ड्रामा।” चौबे जी तनिक अधिक ही उतावले हो रहे थे। साला छटंकी कहीं का। उन्होंने मेरी नग्न देह का दर्शन क्या किया, फटी की फटी रह गयी दोनों की आंखें।
“गजब! क्या मस्त माल है नायर जी। मजा आ गया। अब आएगा मजा चोदने का।” कहते कहते चौबे जी फटाफट नंगे हो गये। उसके नंगे बदन को देख मुझे एकबारगी हंसी आ गयी, लिक्कड़, छटंकी, पसलियां दिख रही थीं उसकी। तभी मेरी नजर उसके लिंग पर पड़ी, आश्चर्यजनक रूप से लंबा और मोटा लिंग था उसका। शरीर के अनुपात में कहूं तो बेमेल विशाल। उस साढ़े पांच फुटे सूखे कंकाल सरीखे व्यक्ति का लिंग करीब आठ इंच लंबा और करीब तीन इंच मोटा था। अविश्वसनीय।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ भगवान,” मेरे मुंह के उद्गार से खिल उठा कमीना। इधर नायर साहब भी खामोशी से अपने कपड़े उतार रहे थे। उनके नग्न होने से पहले ही छटंकी कूदकर मेरी नग्न देह पर बेताबी से टूट पड़ा। पूरा भेड़िया लग रहा था। लाल कंजी आंखें, मोटे मोटे होंठों के बीच पीले दांत दिखाते, खींसें निपोरते, लंबी जीभ लपलपाते अपने चेहरे को ज्योंहि मेरे चेहरे के समीप लाया, एक बार तो लगा सचमुच का भेड़िया ही है। उसके कान भी आम इन्सान से बड़े थे। पूरा भेड़िया था भेड़िया। चूमने की जगह अपनी लंबी खुरदुरी जीभ से चाटने लगा मेरे चेहरे को, बिल्कुल कुत्ते की तरह। शुरू में मुझे बड़ी कोफ्त हो रही थी। सचमें मुझे आरंभ में ऐसा लगा मानो किसी गलीज, गंदे, लिजलिजे, कई दिनों के भूखे नरकंकाल, भेड़िये के हत्थे चढ़ गयी हूं। लेकिन उसकी लंबी जीभ से कुत्ते की तरह चाटना, मुझे अच्छा लगने लगा था। गनगना उठा मेरा तन बदन। सुरसुरी सी हो रही थी।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।”
“चढ़ रही है मस्ती, साली के शरीर में।” चौबे बोला। अबतक नायर जी भी नंगे होकर मेरे करीब आ चुके थे। उनका कद और सेहत काफी आकर्षक था। सिर्फ रंग काला था। उनके सारे शरीर पर बाल भरे हुए थे। उनका लिंग चौबे जी के लिंग के मुकाबले कम लंबा था, करीब छ: इंच का होगा लेकिन मोटाई चौबे जी की तरह ही थी।
“हां चौबे जी, वह तो दिख ही रहा है।” नायर जी मेरे हाथ को मेरी योनि पर से हटा कर मेरी फूल कर कुप्पा हुई बड़ी सी चिकनी चूत को देख कर बोले, “wow, so big and smooth cunt, soooo nice fucking hole I have ever seen in my life. (वाह, इतनी बड़ी और चिकनी चूत, मैंने अपनी जिंदगी में अबतक की इतनी अच्छी चुदाई छिद्र देखी है।)
“हां नायर जी। काफी चुदी चुदाई खूबसूरत चूत है इस मैडम की। देखिए तो, कैसी पावरोटी जैसी फूली हुई चूत है इसकी, साली मां की लौड़ी। बड़ी सीधी बन रही थी बुरचोदी। देखने से ही पता चल रहा है कितनी बड़ी लंडखोर है।” चौबे जी आ गये अपनी औकात पर। हाय राम, मेरी चूत नें तो मेरी सारी लंडखोरी का पर्दाफाश कर दिया।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ, आप ऐसे क्यों बोल रहे हैं।” तनिक शर्मिंदा हो उठी मैं।
“और कैसे बोलूं? रंडी बोलूं? लौड़े की छिनाल बोलूं?” गलीज आदमी गलीज लफ्जों पर आ गया था। बुरा तो लगा लेकिन अच्छा भी लगा कि अब ये खुला खेल फर्रुखाबादी खेलनेवाले हैं। मैं अब भी उन्हें यह नहीं जताना चाहती थी कि मैं इतनी सस्ती टाईप की स्त्री हूं।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ, प्लीज ऐसे न बोलिए ना।”
“चुप हरामजादी।” चोबे जी शुरु हो गये मेरी चूचियों को चूसने और चाटने। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, अपनी लंबी जीभ से सटा सट मेरी चूचियों को चाटते हुए मुझे उत्तेजना के चरम पर पहूंचा चुके थे।
“जो भी हो चौबेजी, it looks juicy (यह रसीली दिख रही है) इसकी चूत चोदने में बड़ा मजा आएगा।” नायर जी बोले।
“रुकिए, जरा मैं इसकी रसीली बुर चाट तो लूं।” कहते हुए मेरी चूत चाटने लगा। चप चप चप चप, किसी कुत्ते की तरह।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ मां्आं्आं्आं। आ्ह ओह उफ्फ्फ्फ्फ्फ,” न चाहते हुए भी मेरे मुख से सिसकारियां उबलने लगीं।
उफ, चौबे जी मेरी चूत के ऊपर ही नहीं, चूत के अंदर भी जीभ घुसा घुसा कर चाट रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो अपनी जीभ से ही चुदाई कर रहे हों। उनकी जीभ जब मेरी चूत के ऊपर फिरा रहे थे तो मेरी गांड़ तक उसकी जीभ सरपट दौड़ रही थी। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, मैं कामोत्तेजना के अतिरेक में तड़प उठी। जीवन में पहली बार इस तरह चूत की चटाई हो रही थी। नस नस तरंगित हो उठा मेरा। अद्भुत, अद्वितीय, चरम सुख में डूबी तड़प उठी मैं। सहसा मैं थरथराने लगी और लो, हो गया मेरा काम तमाम। उस रात्रि के प्रथम, अविस्मरणीय, सुखद स्खलन से सराबोर हो उठी। चौबे जी ठहरे एक नंबर के चुदक्कड़। समझ गये मेरी हालत। लेकिन चाटना छोड़ा नहीं कमीने नें। तबतक चाटते रहे जबतक मैं मेरी कामोत्तेजक सिसकारियां पुनः न सुनाई दी।
“लीजिए, अब चोदिए इस रंडी की चूत। कैसे चुदने के लिए तड़प रही है बुरचोदी।” चौबेजी मेरी चूत पर से हटे और तभी बिना किसी भूमिका के नायर जी मुझ पर सवारी गांठ बैठे। बस एक प्रयास, और हो गया मेरी चूत की खुजली का इलाज। घप्प से नायर जी का लौड़ा यों घुसा मेरी चूत में मानो मक्खन में घुसा हो।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।” मैं सिसक उठी और समर्पित हो गयी नायर जी की नग्न देह को अपने में आत्मसात करन हेतु।
“Oooooo my God, it’s sooooo nice, so hot, aaaaaah, take my cock my bitch. (ओह मेरे भगवान, यह बहुत अच्छा है, बहुत गर्म, आह, ले मेरा लंड मेरी कुतिया।” ये नायर साहब के अल्फाज थे। और मैं कमीनी कुतिया, अपने पैरों को नायर साहब के कमर पर लपेट कर अपनी कमर बेसाख्ता उछाल उछाल कर चुदवाने लगी। नायर साहब मेरे होंठों को चूसते रहे, मेरी चूचियों को निचोड़ते रहे, मेरी नग्न देह को हर संभव तरीके से भंभोड़ते रहे और मगन मन चोदते रहे चोदते रहे करीब बीस पच्चीस मिनट तक। तदोपरांत पूरी तरह मुझे निचोड़ कर तृप्त स्खलित होने लगे।
“ओ्ओ्ओह्ह्ह माई गॉड, आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।” कहते हूए मुझे जकड़े खल्लास हो कर मुझ पर से हटे।
उनके हटते न हटते चौबे जी बिना कोई पल गंवाए, मेरे निचुड़े नंगे तन पर सवार हो गये।
“अब आई मेरी बारी, साली रंडी।” कोई अनावश्यक पल गंवाए, सर्र से अपने आठ इंच लंबें लंड को मेरी चुदी चुदाई, लसलसी चूत में पैबस्त कर दिया चौबे जी नें। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, अपनी दुबली पतली काया के लचीलेपन से मुझे अचंभित कर बैठे। मेरे चेहरे को चाटते हुए किसी कुत्ते की तरह इतनी रफ्तार से चोदने लगे कि मैं पगला ही गयी। पुनः मेरी सारी इंद्रियां सक्रिय हो गयीं और अब मैं बन गयी सचमुच में रंडी।
“हुं हुं हुं हुं हुं हुं,” छिपकिली की तरह वह छटंकी सा लिजलिजा कमीना दनादन तूफानी रफ्तार से वे चोद रहा था।
“अह अह अह अह इह इह इह इह हं हं हं हं हं,” उसके धक्कों से हलकान, मेरे मुंह से कोई स्पष्ट अल्फाज भी नहीं निकल रहे थे, बस चुदी जा रही थी उस अंतहीन करीब चालीस पैंतालीस मिनट की चुदाई में। मैं अपनी कमर उछाल कर उसके हर ठाप का प्रत्युत्तर देने का प्रयास भी कर रही थी तो उसकी रफ्तार के आगे पराजित हो गयी। मैं ने अंततः अपने शरीर को उस लिक्कड़, मरियल से भेड़िए के सम्मुख समर्पित कर दिया और छोड़ दिया उसके रहमो करम पर। वह नोचता रहा, खसोटता रहा, अपनी नुकीली दांतों का निशान मेरी चूचियों पर छोड़ता, चोदता रहा चोदता रहा। उफ्फ्फ्फ्फ्फ भगवान, झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। कभी मेरी टांग उठा कर चोदता, कभी पलट कर कुतिया बनाता, कभी गोद में उठा कर चोदता। शक्ति तो काफी थी हरामजादे में, दिखने मे भर सिकड़ू सा था। अंततः वह भी झड़ा, क्या खूब झड़ा, अंतहीन झड़ा, बाप रे बाप, मुझसे किसी छिपकली की तरह चिपक कर छर्र छर्र ऐसा झड़ा कि मेरी चूत के संभाले नहीं संभल रहा था उसका गाढ़ा वीर्य। उन दो कामुक भेड़ियों की चुदाई के दौरान मैं गिन ही नहीं पाई कि कितनी बार झड़ी। मगर थक कर चूर निढाल सी पड़ गयी थी मैं। इतने पर ही बस कहां हुआ। बोतल मंगा लिया गया और पीते गये दोनों, पिलाते गये मुझे भी और चोदते रहे रात भर। गांड़ चोदा, लंड चुसवाया, पूरी कसर निकाल ली दोनों नें। मैं बेजान सी हो गयी थी सवेरे तक। चूचियां लाल, चूत का भोंसड़ा और तन का मलीदा बना डाला था। रंडी से भी बदतर हालत हो गयी थी मेरी। बाल बिखर गये थे, आंखें लाल हो गयी थीं, चेहरे की रंगत उड़ गयी थी।
सवेरे जब मुझे मुक्ति मिली तो मैं चलने फिरने के काबिल भी नहीं रह गयी थी। किसी तरह सारी शक्ति बटोर कर वापस जाने के लिए तैयार हुई। लड़खड़ाती हुई जब चलने लगी, नायर साहब मुझे सहारा देकर चौबे जी की कार तक लाए और फिर मेरे बेजान से शरीर को घर तक छोड़ गये, यह कहते हुए कि, “मैं फिर मिलूंगा, जब कभी आऊंगा। यू आर अ ग्रेट लेडी। आई लाईक यू वेरी मच।” मादरचोद, मां के लौड़े साले कुत्ते, चोद चोद कर जान निकाल दिया और कह रहा है आई लाईक यू, मन ही मन बोली। हालांकि इस रात भर की नोच खसोट में मुझे भी एक अलग तरह के आनंद की अनुभूति हुई। खासकर चौबे जी की लंबी जीभ से चाटे जाने का रोम रोम सिहराने वाला अनुभव अविस्मरणीय था। उनकी दमदार अंतहीन चुदाई का सुखद अनुभव भी कम यादगार नहीं था। उन पलों में कई बार तो मुझे लग रहा था मानो मैं किसी जंगली भेड़िए से ही चुद रही हूं। वह अहसास भी उस वक्त मुझे रोमांचित कर रहा था।
खैर यह सब तो चलता ही रहा मेरी जिंदगी में, अपने कई कामुक क्लाईंट्स से अनुबंध हासिल करने हेतु अपने तन को परोसती, मैं रंडी से भी बदतर हो गयी थी। यह अनुबंध भी हासिल हो गया। इसकी खुशखबरी को ऑफिस में देकर यह भी बोल बैठी कि मैं आज नहीं आ रही हूं। वैसे भी थकान के मारे सारा शरीर टूट रहा था। आराम चाहती थी। पर पता नहीं मेरी किस्मत में आराम था भी कि नहीं, यह ऊपर वाला ही जानता था। वैसे मेरी हालत खुद ही चीख चीख कर बता रही थी कि रात भर मुझ पर क्या क्या गुजरी है। हरिया की अनुभवी आंखों से ऐसे भी कहां बच सकती थी। समझ गया वह। मैंने उन्हें हिदायत दी कि मुझे कोई डिस्टर्ब न करे, रामलाल भी नहीं, चाहे इसके लिए उन्हें कुछ भी करना पड़े। फिर निश्चिंत अपने बिस्तर में दुबक गयी।
पिछली कड़ी में मैंने बताया था कि मंदबुद्धि रामलाल की जिद के कारण हम उसे अपने यहां रखने में मजबूर थे। दूसरे दिन भी उसने जाने से मना कर दिया। उसके घरवाले भी उसे वापस न ले जा सके। उसे वापस ले जाने की ज्यादा बेकरारी तो मुझे लगता था कि सरोज के अंदर थी। रामलाल के वापस न जाने का कारण शायद मुझे देख कर ही वह समझ गयी थी। उस औरत की मायूसी मुझसे देखी नहीं गयी।
जब वह निराश लौट रही थी तो मैं ने उसे टोक दिया, “सरोज बहन।”
“जी बोलिए।” वह थमक गयी।
“आप इतनी मायूस क्यों हैं? रामलाल जी यहां सही सलामत हैं, खुश हैं।”
“मगर अपना घर रहते हुए… यहां रहना…”
“तो क्या हुआ, इसे भी अपना ही घर समझ रहे हैं ये तो।”
“वहां अपने लोगों के बीच रहना अधिक अच्छा होता ना।”
“हमें भी ये अपना ही समझते हैं।” मैं अब मुस्कुरा रही थी। “वैसे एक बात बोलूं?” वह अब तनिक आशंकित हो प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगी। यह वार्तालाप सिर्फ हम दोनों के मध्य हो रहा था। आसपास कोई नहीं था।
“आप बीच बीच में आ सकती हैं हमारे यहां इनसे मिलने।” मैं बोली।
“लेकिन…..”
“लेकिन क्या?” अब वह दायें बायें देखने लगी।
“आप मत बोलिए, मगर मैं समझ रही हूं।”
“क्या समझ रही हैं?” तनिक लाल हो रही थी।
“मैं सब जानती हूं। बताऊं?” मुस्कुराते हुए बोली मैं।
“त त त त तो क क क क्या इन्होंने सब बता दिया?” हकलाते हुए बोली वह।
“हां, सब कुछ, इनके और तुम्हारे, रबिया और शहला के बीच वाला संबंध, सब कुछ।”
“हे रा्आ्आ्आ्आम।” शर्मसार हो उठी वह।
“इसीलिए मैं कह रही हूं, आ जाना, जब मन करे। रबिया, शहला या कोई भी।” बड़ी उदार बन रही थी मैं, बड़ी कमीनी मुस्कान के साथ बोली।
“तो ककक्या इन्होंने…..?”
“हां हां, इन्होंने मुझे भी नहीं छोड़ा।” अब मैं खुल कर बोली।
“हे भगवान!”
“क्या हे भगवान? अच्छे मर्द हैं। अच्छा खासा हथियार है। अच्छी तरह करते हैं। अच्छा लगा मुझे।”
“मगर इनका तो… बहुत बड़ा है!” वह आश्चर्य से मुझे ऊपर से नीचे देखती हुई बोली।
“तो? तो क्या? एक औरत को और क्या चाहिए? ऐसा ही दमदार हथियार वाला मर्द ही तो।” मैं अब आ गयी अपनी औकात पर। “तो अब? क्या इरादा है? यहीं आ जाया करो।” मैं उससे बोली। वह अब निरुत्तर थी। लेकिन अब उसके चेहरे से वह लज्जा तथा अपराधबोध तिरोहित हो गया था। खुल गयी थी मुझ से।
“मैं तो आ जाऊंगी, लेकिन बाकी?”
“बाकी कौन? रबिया, शहला? सबको बोल दीजिये, दरवाजा खुला है मेरा, सबके लिए।” मैं कमीनी कम थोड़ी थी।मुझे पता था, यह आएगी, रबिया, शहला या और जो भी, सब आएंगी, रामलाल के लंड के आकर्षण में बंधे और रामलाल ही क्यों, यहां चोदुओं की कमी है क्या, निकल पड़ेगी हरिया और करीम की भी, साले कमीने, सब के सब एक नंबर के चुदक्कड़। आश्वस्त सरोज लौट गयी। फिर क्या था, वही हुआ, जैसा मैंने सोचा था। आने लगी सब हमारे यहां, जब तब, चुदने। हरिया और करीम भी बहती गंगा में हाथ धोने में कहां पीछे रहते, साले बूढ़े औरतखोर, शहला को तो इस उम्र में ही रंडी बना डाला था कमीनों नें। हां मैं शहला से हमेशा से कहती रही कि अपनी पढ़ाई में कोई कोताही न बरते। तन की भूख मिटाना एक बात है और अपने कैरियर को संवारना एक बात है। शहला समझदार थी, समझ गयी।
जैसा कि मैंने निश्चय किया था, रामलाल जैसे लोग, परिवार से परित्यक्त बुजुर्ग, असहाय लोगों के लिए एक आश्रय की व्यवस्था करूंगी। हमारे यहाँ धन और स्थान की कमी तो थी नहीं, अत: जुट गयी इस योजना को अमलीजामा पहनाने हेतु। इस कार्य हेतु मैंने कई संबंधित लोगों से संपर्क साधा और एक आश्रम की रूपरेखा तैयार की। आश्रम के लिए आवश्यक कागजी कार्यवाही पूरी की, अनुमोदन हासिल किया और एक भवन निर्माण अभियंता श्री हर्षवर्धन दास से नक्शा बनवा कर उन्हीं को भवन निर्माण के कार्य का जिम्मा दिया। इस भवन का प्लान दुमंजिला, करीब पांच हजार आठ सौ वर्गफीट, अर्थात करीब साढ़े तेरह डिसमिल क्षेत्र का था। आनन फानन कार्य आरंभ भी हो गया। सर्वप्रथम एक स्टोर रूम का निर्माण हुआ, जिसमें निर्माण सामग्रियां रखी जाने लगीं। काफी बड़ा गोदाम था वह। एक तरफ सीमेंट की बोरियां और एक तरफ भवन निर्माण से संबंधित औजार सामग्रियां रखी जाती थीं। बीच में खाली स्थान पर खाली बोरे बिछे रहते थे, जिसपर मजदूर भोजनावकाश के समय थोड़ा सुस्ता लिया करते थे।
इधर भवन निर्माण कार्य आरंभ होने के करीब दो महीने बाद की बात है। एक दिन यूं ही संध्या बेला में, जब सभी मजदूर कार्य से निवृत होकर निर्माण स्थल से रुखसत हो चुके थे, ऑफिस से लौटकर भवन निर्माण की प्रगति के निरीक्षण हेतु मैं उस स्थान का मुआयना कर रही थी, तभी स्टोर रूम के बंद द्वार के अंदर से कुछ सुगबुगाहट सुनाई दी। मुझे कुछ आशंका हुई। उत्कंठा के कारण मैं दरवाजे के समीप गयी तो अंदर से पुरुष स्वर सुनाई पड़ा। इस समय कौन हो सकता है? सब तो चले गये हैं। गोदाम के दरवाजे पर ताला हम नहीं लगाते थे, क्योंकि गोदाम हमारे चहारदीवारी के अंदर थी। दरवाजे को हल्के से ठेलने पर वह खुद ब खुद खुल गया। शाम हो चुकी थी किंतु अंधेरा अभी इतना घना भी नहीं हुआ था कि अंदर की चीजें न दिखें। वहां जो कुछ मुझे नजर आया, विस्मित करने वाला था। बिछे हुए बोरे पर एक व्यक्ति नग्नावस्था में औंधे मुंह लेटा हुआ था और उसके ऊपर दूसरा व्यक्ति, वह भी नग्नावस्था में सवार, नीचे वाले व्यक्ति की कमर पकड़ कर धकमपेल में व्यस्त था। बताने की आवश्यकता नहीं कि वहां क्या हो रहा था। दोनों के मुंह से मस्ती भरी आहें निकल रही थीं।
“यह क्या हो रहा है यहां?” मैं बोल उठी। मेरी आवाज सुनकर दोनों हड़बड़ा गये। जल्दी से उठ कर ज्योंही उन्होंने मुझे देखा तो शर्म से पानी पानी हो उठे। दोनों ही यहां भवन निर्माण का कार्य करने वाले थे। नीचे वाला करीब सत्रह अठारह वर्ष का काला कलूटा चिकना, पांच फुटा, आदिवासी लड़का था और ऊपर वाला व्यक्ति करीब पैंतालीस वर्ष का, लंबा चौड़ा, करीब छ: फुट से कुछ ऊपर कद का, हट्ठा कट्ठा दाढ़ीवाले अधेड़ राजमिस्त्री, मुसलमान, सलीम मियां थे। मगर मेरी नजर तो उस राजमिस्त्री के भीमकाय लिंग पर ठहर गयी। बाप रे बाप, करीब नौ इंच लंबा और वैसा ही भयानक मोटा, काले नाग की तरह फनफना रहा था। उफ्फ्फ, एकाएक किसी स्त्री की नजर पड़ जाए तो आंखें फटी की फटी रह जाएं, मगर मैं तो ठहरी एक नंबर की लंडखोर, मेरे मुंह में तो पानी ही आ गया। मुंह में ही क्यों, मेरी योनि भी गीली होने लगी थी। इतने बड़े लिंग से वह चिकना लड़का इतनी मस्ती के साथ कैसे गुदा मैथुन में लिप्त हो सकता है भला? अवश्य गुदा मैथुन का आदी था।
मेरे अकस्मात आगमन से घबराए मिस्त्री की तो घिग्घी बंध गयी, फिर संभल कर बोलने की कोशिश करने लगा, “मैडम, वह वह वह…..” आगे कुछ बोल नहीं पाया।
“वह वह क्या? लौंडेबाज मिस्त्री मियां, यहां काम करने आते हैं कि यही सब करने?” मैं हड़काने लगी।
“मैडम जी, माफ कर दीजिए।” घिघियाते हुए बोला वह।
“क्यों?”
“ठीकादार को पता चलेगा तो हमको निकाल देगा।” ऐसा मैंने दिखाया मानो मुझे दया आ गयी, वास्तव में तो उसके आकर्षक लिंग नें मुझे मोह लिया था। बड़ा ही मनमोहक आकर था उसके लिंग का। विशाल सुपाड़े के ऊपर का चमड़ा कटा हुआ, अर्थात खतना किया हुआ लिंग। मन को मोह लेनेवाले गुलाबी रंगत लिए हुए चमचमाते, टेनिस बॉल सरीखे सुपाड़े की छटा देखते ही बन रही थी।
“लेकिन यह तो गलत है। आपलोग काम करने आते हैं कि यही सब करने? मैं बताऊंगी आप लोगों के ठेकेदार को।” झूठमूठ का धमका रही थी।
“ऐसा मत कीजिए मैडम। माफ कर दीजिए।” वह अपने कपड़े की ओर झपटा।
“नहीं, कोई माफी नहीं।” मैं बोली, कभी मैं उसके चेहरे को देखती, कभी उसके फनफनाए लिंग को। मुझे लगता है उसने मेरी नजर को पढ़ लिया था और मेरे चेहरे के भाव को भी। रुक गया, असमंजस में।
“आप की माफी के लिए हम और क्या करें? जो बोलेंगी करेंगे, मगर बताईगा मत ठीकादार को।” वह अपने कपड़े छोड़कर खड़ा हो गया, अब भय उसके चेहरे से गायब हो रहा था।
“क्या कीजिएगा आप बताईए तो, ताकि मैं आपके ठेकेदार को न बताऊँ?”
“आप बोलिए तो।” ताड़ गया था शायद मेरा इरादा।
“नहीं, पहले बताईए करना क्या है आपको?” मैं जानबूझकर इशारे में ही आमंत्रण दे रही थी।
“करके बताएं?” अब शायद वह समझ चुका था कि मैं क्या चाह रही हूं।
“हां।” यह मेरी सहमति थी। वह आदिवासी लड़का वैसे ही नंगा भुजंगा, चुपचाप खड़ा हमारी बातें सुन रहा था। मेरे अकस्मात आगमन से ज्यों ही वे दोनों अलग हुए और खड़े हुए तो उस आदिवासी लड़के का लिंग भी सख्त था, करी छ: इंच लंबा था उस वक्त, किंतु भय से इस वक्त सिकुड़ कर लुल्ली बन गया था।
“सचमें करें?” अंतिम सहमति चाह रहा था वह।।
“कर के दिखाईए?” उन्हें और क्या चाहिए था। झपट पड़ा मुझ पर। मैं सलवार कमीज में थी लेकिन जैसे ही वह मुझ पर झपट्टा मारा और अपनी मजबूत बांहों में कसा, ऐसा लगा मानो मेरी सलवार फाड़ डालने पर आमादा हो उसका तना हुआ मूसल। मैं गनगना उठी भीतर ही भीतर।
“उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, यह यह क्या कर रहे हैं?” मैं नौटंकीबाज हड़बड़ा कर बोली।
“वही, जो आपने कहा।”
“मैंने क्या कहा?” उसकी बांहों में छटपटाने का नाटक करती बोली।
“कर के दिखाने को।”
“यह करने तो नहीं।”
“बोलिए मत। हमको पता है क्या करने को कहा है आपने?” सेक्स के भूखे पुरुष का वही चिर परिचित अंदाज।
“उफ्फ भगवान, छोड़िए।”
“छोड़ कैसे दें बिना किए?” अब वह दढ़ियल मुझे चूमने लगा। खैनी पान खा खा कर बदबूदार मुंह। बदबू के बावजूद पिघल रही थी उसकी बांहों में।
“हाय हाय, छोड़िए, मैं ने ऐसा तो नहीं कहा था।” मैं बेवजह विरोध का दिखावा करने लगी।
“आपने क्या कहा, अब इसका कोई मतलब है क्या? हमको तो करना है बस।” वह इस मौके को गंवाने के मूड में नहीं था। वह भी शायद समझ रहा था कि मैं अगर सचमुच का विरोध करती तो अबतक चीख पड़ी होती। वह अब न सिर्फ मुझे चूम रहा था, बल्कि मेरे सलवार के नाड़े पर हाथ डाल चुका था।
“हाय राम, यह यह ककककक्या्आ्आ्आ्आ्आ कर रहे हैंं? छोड़िए।”
“छोड़ने के लिए थोड़ी न पकड़ा है?” खोल चुका था मेरी सलवार। सलवार नीचे गिर गयी। अब मैं नीचे सिर्फ पैंटी में थी जो गीली हो चुकी थी। अब उसने मेरी कमीज पर हाथ डाला।
“उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह भगवान, यह यह मेरी सलवार, आह्ह। ओह मेरी कमीज छोड़िए, ओह।” कहां रुकने वाला था वह कामांध कमीना। उतार ही डाला खींच खांच कर मेरी कमीज। इस खींच तान में पट गिर पड़ी मैं झपाक से, वहां पड़े सीमेंट के बोरों के ऊपर, गिरी भी कैसे, मुंह के बल, आधी खाली सीमेंट बोरी के ऊपर। चेहरा मेरा सीमेंट से सन गया। बंदरी बन गयी थी मैं। अब मैं सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी।
“अबे गांंडू मादरचोद, देख क्या रहा है खड़े खड़े। लाईट जला, जरा देखें तो मैडम का बदन, चेहरा तो देख लिए हैं, बंदरिया बन गयी साली।” उसकी आवाज में अब दहशतनाक गुर्राहट निकली, जंगली भेड़िए सी गुर्राहट। उत्तेजना के मारे पगला रहा था वह। वही हाल मेरा भी था लेकिन मैं जाहिर नहीं कर रही थी। बल्ब की रोशनी में नहा उठी मैं। मेरी भीगी पैंटी देख, सलीम मियां को समझते देर न लगी कि मैं अबतक बेमतलब का नाटक कर रही थी। “वाह मैडम, कमाल का जिस्म है आपका तो। अब ब्रा और चड्डी भी हम ही खोल दें कि आप खुद खोलिएगा।” जहां मैं गिरी थी वहां सीमेंट का एक खुला हुआ आधा बोरा पड़ा था। मेरे गिरते ही सीमेंट का गुब्बार सा उठा और मैं सीमेंट से नहा उठी।
“उफ्फफ ओह्ह्ह्ह्ह।” मैं ने इस हालत की कल्पना नहीं की थी। जबतक मैं संभलती, मिस्त्री सलीम मियां मेरी सीमेंट सने तन पर झपट पड़ा और पैंटी ब्रा से मुझे मुक्त कर दिया। अब मैं नंगी थी। पूर्णतया नंगी। पूरा शरीर तो सीमेंट सीमेंट हो चुका था लेकिन ब्रा और पैंटी के कारण सीमेंट पुतने से बची मेरी बड़ी बड़ी चूचियां और फकफकाती योनि चमचमा रही थीं। मेरी नग्न देह का यह आलम देख कर मिस्त्री की उत्तेजना का पारावार न रहा।
“मैडम जी, अब क्या कहती हैं? आप तो मना कर रही हैं और आपका भोंसड़ा चोदवाने के लिए आंसू बहा रहा है।” वही जानी पहचानी हवस भरी मुस्कान खेल रही थी उसके होंठों पर।
“नहीं तो बोल रही हूं ओह्ह्ह्ह्ह मां्आं्आं्आं।”
“केवल मुंह से।” अब उससे और बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मेरी फुदकती योनि उसे आमंत्रित कर रही थी। छा गया मेरे सीमेंट से सनी नग्न देह पर और एक हाथ से मुझे दबोच दूसरे हाथ से अपने भीमकाय लिंग के विशाल सुपाड़े को मेरे योनिद्वार पर टिका कर बिना आगा पीछा सोचे कचकचा के घुसेड़ दिया अंदर।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्,” एक दर्द की लहर सी दौड़ गयी मेरे तन में। था भी तो इतना मोटा लिंग। मेरी योनि को चीरता सर्र से प्रविष्ट हुआ था। उसके करारे धक्के से मेरे नितंब के नीचे से सीमेंट का गुबार उठ गया। मेरे शरीर पर सीमेंट का पाऊडर पुत गया था। अपनी इस हालत के लिए मैं खुद ही जिम्मेदार थी, तनिक कोफ्त तो हुई लेकिन मेरे सीमेंट पुते शरीर के साथ सलीम मियां जो कुछ कर रहा था वह भी कम रोमांचक नहीं था। कुछ पलों की उस पीड़ा को मैं पी गयी क्योंकि मुझे पता था कि इसके बाद के आनंद में मैं खुद ही डूब उतरा रही होऊंगी।
“अब काहे का आह ऊह। ससेट दिया मेरा लौड़ा।इतने बड़े भोंसड़े में इतना मोटा लौड़ा इतनी आसानी से खा लेने के बाद ई आह ऊह का ड्रामा काहे का? लंडखोर कहीं की, कोई और होती तो चिल्लाने लग जाती, लेकिन तू तो बहुत बड़ी रंडी है रे मां की बुर, खा ली एक्के बार में पूरा लौड़ा, वाह। अब तो चुदवाती जा बुरचोदी।” पहले धक्के में ही उसे पता चल गया था कि मैं कितनी बड़ी रंडी हूं।
“न न न नहीं नहींईंईंईंईंईंईंई, आह्ह, मैं ऐसी नहींईंईंईंईंईंईंई हूं।” मैं अब भी बाज नहीं आ रही थी नौटंकी करने में।
“चू्ऊ्ऊ््ऊ्ऊ्ऊ्प्प्प्प् साली भोंसड़ी की। देख लिया तेरा ड्रामा साली मां का भोंसड़ा।” अब वह मुझ पर बिंदास कहर ढाने लगा। सीमेंट से पुते मेरी चूचियों को दबोच दबोच कर गूंथ रहा था, साथ ही सटासट मेरी चूत का भुर्ता बनाने में जुट गया। उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, ओह अब मैं मस्ती में भर कर आहें भरने को मजबूर हो गयी।
“ओह्ह्ह्ह्ह रज्जा, ओह साले मादरचोद दढ़ियल, उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह, चोद हरामी चोद कमीने आह ओह आह।” अब मैं भी सीमेंट के बोरे पर अपनी चूतड़ पटक पटक कर उसके विशाल लंड को घपाघप खाये जा रही थी। इधर उधर लुढ़कते चुदाई के आनंद में इतने खो गये कि पूरा शरीर सीमेंट सीमेंट हो गया। हम भूतों की तरह गुत्थमगुत्थी में लीन हो गये थे। वह गांडू लौंडा वहीं खड़ा हमारी चुदाई को बुत बना आंखें फाड़े देख रहा था।
“हां हां बुरचोदी। ले, ये ले, और ले आह ओह, ऐसा मस्त बदन आज पहली बार मिला चोदने को। इतनी रेजाओं के पसीने और सीमेंट सने बदन को चोदा, खूब चोदा, मगर मैडम जी, तेरे को चोदने का ओह ओह मजा ही कुछ और है। सीमेंट से नहायी, तू भी कोई रेजा से कम नहीं लग रही हो, लेकिन वाह री चुदक्कड़ औरत, ओह साली कुतिया, आह बुरचोदी, ऐसा बुर पहली बार मिला आह इतना गरम चूत, उफ उफ बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा आ रहा है। हुम हुम हुम।” गंदी गंदी बातें बिंदास, बेधड़क, बेखौफ, बोलते हुए मुझे रगड़े जा रहा था, रगेद रगेद कर चोदे जा रहा था। हर धक्के से मेरे तन को सीमेंट से अट चुके खाली बोरों पर इंच इंच घसीटे जा रहा था। मैं बेहद जंगली तरीके से लुटती हुई, नुचती हुई, चुदती हुई, हलकान होने की बजाय खुद भी जंगली कुतिया बनी, रंडी की तरह उस गलीज, गंदे वहशी जानवर के, पसीने की बदबू से नहाये और पसीने से चिपचिपे तन से पिसती, उसके दमदार ठुकाई में सुख के अनंत समुंदर मे डूब उतरा रही थी। ऐसे चोद रहा था वह मानो मैं कोई मालकिन, कोई संभ्रांत महिला नहीं बल्कि उसके अधीन काम करने वाली कोई गंदी रेजा हूं, जिन्हें वह इसी तरह अपनी हवस का शिकार बनाता रहता है। इस तरह गंदे तरीके से चुदने का एक अलग ही रोमांच का अनुभव कर रही थी। बड़ा मजा आ रहा था।
गंदे आदमी से गंदे तरीके से चुदने का अनुभव था मुझे, लेकिन एक मेहनतकश मजदूर के गंदे, कसरती शरीर से अपने शरीर को इस गंदगी भरे स्थान पर गंदे तरीके से नुचवाने का यह बिल्कुल नया अनुभव था। अपनी सारी शराफत का चोला उतार फेंक कर, “चोद, आह चोद मादरचोद, चोद मां के लौड़े, चोद साले रेजाचोद, बना दे मुझे भी रेजा, बना दे ओह ओह मुझे रंडी साले कुत्ते हरामजादे चुदक्कड़,” बोलती हुई बिल्कुल रंडी की तरह बिंदास चुदी जा रही थी। करीब चालीस पचास मिनट तक वह मुझे, निचोड़ता रहा, रगड़ता रहा, घसीट घसीट कर भंभोड़ता रहा और अंतत: हुआ खल्लास, उफ्फो्ओ्ओ्ह्ह और क्या खल्लास हुआ, ओह फच्च फच्च मेरी चूत में फौव्वारा छोड़ने लगा अपने गंदगी भरे वीर्य का।
“ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए आ्आ्आ्आ आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्।” मुझे इतनी जोर से दबोचा कि मेरी सांस ही मानो रुक गयी थी। लेकिन जो भी हो, मैं निहाल हो उठी। बेसाख्ता खुद भी चिपक गयी आनंदमुदित। उस दौरान मैं तीन बार झड़ी, और वाह, क्या खूब झड़ी। कुश्ती के पश्चात जैसे दो पहलवान हांफते हैं, वैसे ही पसीने से लतपत, सीमेंट से पुते, पड़े हांफ रहे थे, पूर्णतयः तृप्त।
“आह रज्जा, बड़ा आनंद दिया रे चोदू, दीवानी बना दिया साले चूतखोर, चुदक्कड़ मियां, जवाब नहीं तेरे लंड का और तेरी चुदाई की।” मेरे उद्गार थे। बेसाख्ता चूम उठी उस हवस के पुजारी को। परवाह नहीं थी अपने शरीर की दुर्दशा की, यादगार जो था वह लंड, यादगार जो थी वह चुदाई, ठीक अपनों की नाक के नीचे, अपने ही परिसर में।
“तेरा भी जवाब नहीं रे लंडखोर रानी। यह तो शुरुआत है। अभी तो हमारे बीच एक से एक चुदक्कड़ बाकी हैं। इस लौंडे से पूछ ले, कैसे हम सबके लंड खाता रहता है अपनी गांड़ में, सब मिलेंगे, सब चोदेंगे, खुश हो जाएंगे सब, ऐसी मालकिन अल्लाह करे सबको मिलें।” वह मुदित मन रहस्योद्घाटन कर रहा था और मैं खुश हो रही थी कि बैठे बिठाए अपने परिसर में ही ऐसे चुदक्कड़ मिल रहे हैं। मिलूंगी, सबसे मिलूंगी, चुदुंगी, सबसे चुदुंगी, यह सोचते हुए अपने नुचे चुदे, थके, गंदे शरीर में सारी शक्ति एकत्रित कर सबकी नजर बचा कर अपने घर में दखिल हुई और सीधे अपने कमरे के बाथरूम में घुस गयी, फ्रेश होने।
