आपलोग पता नहीं मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे। दरअसल शुरुआत से मैं ऐसी नहीं थी। सोलह साल तक तो स्त्री पुरूष के बीच शारीरिक संबंधों से बिल्कुल अनजान थी। लेकिन सोलह साल की होते न होते उस कमसिन उम्र में एक बूढ़े की कामवासना की शिकार होकर मैं अपना कौमार्य गंवा बैठी। उस वक्त अवश्य मैं नादान थी। लेकिन उस नादान उम्र में उचित अनुचित की समझ न होते हुए संभोग सुख का जो अनुभव मुझे हुआ उससे मैं काफी प्रभावित थी। उसके उपरांत मेरे अपने बुजुर्गों ने मेरी नादानी का भरपूर लाभ उठाया और मेरे अंदर ऐसी कामाग्नि भर दी जिसके वशीभूत अपनी कामक्षुधा शांत करते करते कई मर्दों की अंकशायिनी बनती चली गयी। चूंकि आरंभ में मेरे शरीर से खिलवाड़ करके अपनी शारीरिक भूख मिटाने वाले मेरे अपने रिश्तेदार बुजुर्ग ही थे, अत: वासना की भूख मिटाने हेतु रिश्ते नातों की सारी वर्जनाएं उन्हीं शुरुआती दिनों से मेरे लिए महत्वहीन हो गयी थीं। दूसरी बात यह थी कि, चूंकि मेरे सेक्स जीवन के आरंभिक दौर में मेरा पाला सिर्फ बुजुर्गों से पड़ा था, इसलिए आजतक प्रौढ़ पुरुष ही मुझे अधिक पसंद आते हैं। कम उम्र युवाओं पर मैं आज भी बुजुर्गों को ही तरजीह देती हूं। हरिया और करीम, जो आज सत्तर साल से ऊपर के हो चुके हैं, आज भी मेरी देह के आकर्षण से बंधे यदा कदा मुझपर अपना मालिकाना हक जता दिया करते हैं। हां, यह और बात है कि इसके लिए मुझे उन पर बुढ़ापे का ताना मारते हुए उनकी मरदानगी को चुनौती देनी पड़ती है। उसके बाद मेरा ये लोग वह हाल करते हैं कि खुदा ही बचाए। मुझे बड़ा मजा आता है उनका यह सब करना। इनके अलावा भी बाहर के अधेड़ या बुजुर्ग मर्द जब मुझ पर लार टपकाती नजरें गड़ाते हैं, मेरी कामुकता धधक उठती है। कई मौकों पर मैं अवसर पा कर उनके सम्मुख बिछ जाने में गुरेज भी नहीं करती हूं, यह और बात है कि उन्हें लगता है कि उन्होंने मेरे साथ जबर्दस्ती कर ली है, जो कि मुझे बेहद पसंद है। शरीफजादी बनी रह कर बुजुर्गों द्वारा मेरा बलात्कार किया जाना।
“यह करीम चाचा हैं, हमारे ड्राईवर साहब।” मैं ने मुस्कुराते हुए रश्मि को परिचय दिया।
“ओह, नमस्ते चाचाजी।” रश्मि तनिक सकुचाई।
“अरे ये घर के ही सदस्य हैं। हम सब के बीच कोई पर्दा नहीं है। शरमाओ मत।” मैं उसे आश्वस्त करती हुई बोली। रश्मि चकित थी, कैसा घर है यह, सब एक से एक नमूने, एक ही थैले के चट्टे बट्टे। रश्मि थोड़ी असहज हो उठी थी। मैं अपना हाथ रश्मि के हाथ पर रखकर नजरों से आश्वस्त करती रही।
फिर हम सबने साथ ही खाना खाया और उसके बाद हम बैठक में ही बैठे बातें कर रहे थे।
“हां, तो अब बताओ, उस समय तू क्या बताना चाह रही थी।” मैं रश्मि से पूछ बैठी।
“कैसे बताऊँ समझ नहीं आ रहा है?” झिझक रही थी अबतक, शायद करीम की उपस्थिति का असर था।
“तू बोल पागल। यहां कोई पराया नहीं है।”
“ओके, तो सुन, दरअसल सिन्हा जी मेरे बड़े भाई जरूर हैं लेकिन हमारा संबंध भी तुम मां बेटे जैसा ही है।” धमाका सा कर दिया उसने तो। अवाक् रह गये हम। इतना बोल कर अपनी नजरें नीचे झुका ली उसने।
“ओह्ह्ह्ह् तो यह बात है।” चुप्पी मैंने तोड़ी।
“हां, यह सच है।”
“तो इसमें शरम कैसी पगली। क्या गलत है? वे मर्द, तू औरत, हो गया, बस, होता ही रहता है ऐसा। मेरे क्षितिज को ही देख लो।” मैं उत्सुक हो उठी पूरी बात जानने के लिए, इसलिए उसे उत्साहित करती हुई बोली।
“तुम लोगों के बीच जो कुछ है, उसी को जानकर यह बात बता सकी मैं।” थोड़ी आश्वस्त हुई, मेरी प्रतिक्रिया सुन कर। हम सभी उत्सुक हो उठे पूरी बात सुनने के लिए। करीम और हरिया के कान भी खड़े हो गये।
“पागल कहीं की। पूरी बात बता, यह सब शुरू कैसे हुआ?” हमारी उत्सुकता का पारावार न था। उसने पहले हम सबके चेहरे को देखा और फिर बोलना शुरू किया, (उसने जो कुछ बताया उसे रोचक ढंग से पेश करने के लिए मैं भाषा और वार्तालाप को सजा कर पेश कर रही हूं) –
“यह आज से करीब पंद्रह साल पहले शुरु हुआ था। तब मैं सोलह साल की थी। मैं यौवन की देहरी पर कदम रख चुकी थी। सुंदरता मुझे अपनी मां से विरासत में मिला था। अपने पिता और परिवार के बड़ों से मैंने सुना था, मां बेहद खूबसूरत थी। मां तो हमारी बचपन में ही गुजर गयी थी, जब मैं सिर्फ तीन साल की थी। सिर्फ पिताजी और बड़े भाई अलोक थे। भाई की शादी हो चुकी थी। भाई यहां रांची में घर बना कर यहीं रहने लगे थे। मैं मैट्रिक की परीक्षा लिख कर भाई के यहां आई हुई थी। तीन बेडरुम वाले भाई के घर में मैं मैट्रिक की परीक्षा के परिणाम निकलने तक रुकने वाली थी। एक बेडरूम पर मेरा कब्जा हो गया था। भाभी स्वभाव से बहुत अच्छी थी। मेरे साथ उनका संबंध काफी आत्मीयता भरा था। वह मेरी हर बात का बहुत ख्याल रखती थी। यहां आए हुए मुझे करीब हफ्ता भर ही हुआ था। इस दौरान मुझे पता चल गया था कि भाई, मेरी भाभी की ओर ध्यान नहीं देते थे। भाभी मेरे भाई की बेरुखी को चुपचाप सहते हुए एक सुघड़ गृहिणी की तरह घर और अपने ऑफिस की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही थी।
करीब हफ्ते भर यहां रहने के बाद एक दिन भाभी के घर से खबर आया कि उनके चाचा का देहावसान हो गया है, अतः खबर मिलते ही वह अपने ननिहाल जमशेदपुर चली गयी। उस रात खाना खाने के पश्चात करीब दस बजे मैं अपने कमरे में सोने चली गयी। बिना किसी दुश्चिंता और भय के मैं अपने कमरे का दरवाजा बंद किए बिना सोती थी।
उस रात मैंने बड़ा ही अजीब सपना देखा। सपने में एक खूबसूरत उपवन में मैं अकेली विचरण कर रही थी। वह उपवन मेरे लिए बिल्कुल अनजाना था किंतु वहां की मनमोहक सुंदरता में मैं खो सी गयी थी। हरी भरी पर्वत सृंखला से घिरा वह क्षेत्र, चारों ओर हरियाली, विभिन्न प्रकार के चित्ताकर्षक पुष्पों से लदी झाड़ियां और वृक्ष, जमीन पर हरे भरे नर्म घास कालीन की तरह बिछे हुए। अकस्मात ही मेरे सम्मुख एक निहायत ही खूबसूरत युवक प्रकट हुआ। मैं चौंक उठी। उस सुनसान स्थान में एक अजनबी युवक का इस तरह मेरे सम्मुख अकस्मात आगमन से मैं तनिक घबरा गयी थी। उसकी वेशभूषा प्राचीन काल के राजकुमारों की तरह थी। छ: फुटा सुगठित शरीर। कमर से नीचे खूबसूरत चमचमाती धोती और कमर से ऊपर का हिस्सा वस्त्र विहीन था। गले में सोने का मोटा हार, बांहों पर सोने के मोटे मोटे कड़े। सर के घने बाल कंधों तक लंबे थे। चौड़ा ललाट, गोरा रंग, भूरी आंखों में अनोखा सम्मोहन था।
“कौन हो देवी?” उसकी शहद घोलती आवाज से मेरा सम्मोहन भंग हुआ।
“जी मैं, जी मैं रश्मि, रश्मि सिन्हा।” घबराहट में मेरे मुख से निकला।
“आप यहां कैसे आयी हैं?”
“पता नहीं।”
“ओह, रास्ता भटक गयी हैं?”
“हां, शायद रास्ता भटक गयी हूं।”
“कोई बात नहीं देवी, हम आपको घर पहुंचाने की व्यवस्था कर देंगे।” उसकी आवाज में पता नहीं क्या जादू था, मैं लरजती जा रही थी। वह मेरे पास आया, और पास, और पास, उसकी आंखों के सम्मोहन में मैं खो सी गयी। “बहुत सुंदर हैं आप, अनिंद्य सुंदरी।” बिल्कुल पास आकर मेरी आंखों में देखता हुआ बोला। उसके रक्तिम होठों पर मुस्कुराहट थिरक रही थीं। चमकती, धवल, उज्ज्वल दंतपंक्तियां आकर्षण में चार चांद लगा रही थीं। उसके इतने पास आने से मैं लज्जा से गड़ी जा रही थी।
“ज ज ज जी?” घबराहट मेरी बढ़ती जा रही थी।
“मैंने कहा, बहुत सुंदर हैं आप।”
“ज ज जी आप भी।”
“क्या?”
“अअअआप भी तो।” लाल हो गयी थी मैं लाज से।
. “मैं भी क्या?” मुस्कुरा रहा था वह।
“आप भी तो ख ख ख खूबसूरत हैं।” हाय राम, यह क्या बोल गयी मैं। मेरा चेहरा सुर्ख हो उठा था।
“शरमाती हुई आप और भी खूबसूरत लग रही हैं।”
“हाय राम हटिए, आप भी….”
“आप भी क्या?”
“छेड़ रहे हैं मुझे।”
“लीजिए, इसे छेड़ना कहते हैं तो इसे क्या कहेंगे?” आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया उसने।
“छोड़िए।”
“क्या छोड़ूं?”
“हाथ मेरा।”
“लीजिए छोड़ दिया।” उसने मेरा हाथ छोड़ दिया। मन तो कर रहा था पकड़ा रहे। तनिक मायूसी छायी नहीं मेरे चेहरे पर कि उसने मेरी कमर पकड़ कर अपने पास खींच लिया।
“हाय राम।” उसके चौड़े चकले सीने से चिपकी पिघल उठी मैं। “हाय दैया, छोड़िए बेशरम।” बोली मैं। जी तो चाह रहा था चिपटी रहूं मैं उससे।
“नहीं।”
“प्लीज।”
“नहीं छोड़ता जाईए।” ढिठाई से बोला वह।
“कोई देख लेगा।”
“देखने दीजिए, मेरा राज्य है।” उसकी पकड़ मेरी कमर पर और सख्त हो गयी। उसके शरीर से भीनी भीनी खुशबू आ रही थी, जिससे मैं मदहोश होती जा रही थी। आंखें बंद हो रही थीं। नशा सा छाता जा रहा था मुझ पर। मुझे बांहों में लिए दिए वहीं नर्म घास के कालीन पर लिटा दिया मुझे।
“यह यह ककक्या कर रहे हैं?”
“कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं। बस थोड़ी सी कोशिश कर रहा हूं आपकी खूबसूरती से प्यार करने की।” मेरे थरथराते अधरों पर अपने रक्तिम अधरों का उष्मा से लबरेज चुंबन अंकित कर दिया उसने। उफ्फ्फ्फ, उस प्रथम चुंबन की उष्मा से पिघल उठी मैं। पुरुष संसर्ग तो दूर, पुरुष संपर्क तक से अनजान थी मैं तबतक। मेरा पूरा शरीर मानो मेरे वश में नहीं रह गया था, पूरी तरह उस युवक के वश में हो गया।
“ओ भगवान, आह यह आप क्या कर रहे हैं?”
“प्यार कर रहा हूं देवी, आप जैसी जीती जागती सुंदरता की प्रतिमूर्ति को।” मेरे होठों पर चूमकर, बोला वह। मेरे ललाट को चूमा वह।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” मेरी आंखों की पलकों को चूमा वह। मेरे गालों को चूमा। “ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊफ्फ्फ्फ्फ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह” आनंदभरी सिसकारी निकाल बैठी। मेरी गर्दन को चूमने लगा, “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” सबकुछ बड़ा ही सुखद था।
“क्या हुआ?” मेरी सिसकियों को सुन कर बोला।
“आह कुछ न्न्न्नहीं्ईं्ईं्ईं।”
“कैसा अनुभव हो रहा है?” जादूगर पूछ रहा था।
“अच्च्च्च्छ्छ्छा्आ्आ्आ, ओह्ह्ह्ह् बहू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत अच्च्च्च्छ्छ्छा्आ्आ्आ।” धीरे धीरे मेरे उरोजों को सहलाने लगा, “ओह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” बिजली की तरंगें मेरे तन में दौड़ने लगीं। मेरे ब्लाऊज को धीरे धीरे खोलने लगा वह। “ओह्ह्ह्ह् मां्मां्आ्आ्आ्आ, कककक्या कर रहे हैं? आह।”
“आपके इस खूबसूरत, पूरे शरीर को प्यार करूंगा देवी।” वासना से ओतप्रोत स्वर में बोला वह। मेरे ब्लाऊज को खोल कर अलग कर दिया उसने। मैं अबतक ब्रा पहनना शुरू नहीं की थी। हालांकि मेरे उरोज काफी विकसित हो चुके थे। कमर से ऊपर अब मैं नग्न थी। मेरे उन्नत उरोज सख्त थे, अबतक अछूते, चिकने, गोल गोल। अपलक देखता रह गया वह मेरी चूचियों की खूबसूरती को।
“उफ्फ्फ्फ, खूबसूरती की मिसाल हो आप देवी, कंचुकी रहित आपके उन्नत, चिकने, बड़े बड़े रसभरे सेब की भांति आकर्षक उरोजों की खूबसूरती मेरी आंखों को भा गयी हैं।” मेरी चूचियों को चूमने लगा।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” तड़प उठी मैं उत्तेजना के मारे। सब कुछ प्रथम बार हो रहा था मेरे साथ, सारा अनुभव, सारा अहसास कितना सुखद था मेरे लिए। चाटने लगा मेरी चूचियों को , चूसने लगा मेरी छोटी छोटी चुचुकों को। “ओह्ह्ह्ह् मां्मां्आ्आ्आ्आ।” धीरे धीरे उसका हाथ मेरे सपाट पेट से होते हुए नीचे की ओर सरक रहा था, और नीचे, और नीचे, और नीचे। “आह, ओह्ह्ह्ह्,” चिहुँक उठी मैं, जब उसका हाथ मेरी जंघाओं की संधी पर रुका। उफ्फ्फ्फ, क्या जादू था उन हाथों में। चींटियां रेंगने लगीं मेरे पूरे तन में। सहला रहा था मेरी योनि के ठीक ऊपर। उफ्फ्फ्फ, मैं कुछ भी विरोध क्यों नहीं कर पा रही थी, ओह भगवान, कोई प्रतिरोध नहीं, सिर्फ समर्पण की मुद्रा थी मेरे चेहरे पर। उसने मेरे स्कर्ट को भी खोल दिया। उफ्फ्फ्फ ओफ्फोह, आआआआआह्ह्ह्ह्ह, अब सिर्फ पैंटी थी मेरी योनि के ऊपर आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह। वह चूमता हुआ मेरे पेट से नीचे पहुंचा, उफ्फ्फ्फ, ठीक मेरी योनि के ऊपर जा ठहरा उसका मुह। ओह मां्मां्आ्आ्आ्आ, मैं जांघों को सटा क्यों नहीं रही थी, उसके उलट और खोल बैठी अपनी जांघों को। सब कुछ कितना उत्तेजक था। कहां मैं इन सबसे अनजान नादान बालिका और कहां वह इस खेल का माहिर खिलाड़ी, उसकी हरकतों से तो ऐसा ही आभास हो रहा था। शनैः शनैः उसने मेरी पैंटी की नीचे, और नीचे, और नीचे खिसकाना आरंभ किया, तबतक, जबतक मेरे पैरों से होती हुई मेरी पैंटी मेरे शरीर को त्याग कर उसके हाथ में मुझे मुह चिढ़ाने लगी। उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ। नंगी हो गयी मैं पूर्णतया नंगी। कपड़े की कोई चिंदी मेरे तन पर नहीं रह गयी थी। उस संध्या बेला में, सूर्य की लाल रक्तिम रोशनी में नहायी मेरी नग्न देह की छटा को देख चमत्कृत वह युवक एकटक निहारता ही रह गया। ओह मेरी मां, उत्तेजना और लाज के मिश्रित भाव सहित मैं थरथराती, कंपकंपाती, समर्पण की मुद्रा में पड़ी उसके अगले कदम की बेकली से इंतजार कर रही थी। क्या करेगा आगे? क्या करना चाहता है वह अब? मैं अनाड़ी नादान बाला, अवश पड़ी रही।
“सुंदर। अति सुंदर। कल्पना से परे सुंदरता की जीती जागती प्रतिमूर्ति हैं आप देवी, साक्षात रति की अवतार, परियों की रानी, अप्सरा सी।” कहते हुए अपनी धोती उतारने लगा। पल भर में वह भी पूर्णतया नग्न हो गया। धोती के अंदर कोई अंत:वस्त्र नहीं पहना था उसने। उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ बाबा, गजब, अद्भुत, अद्वितीय, दर्शनीय पुरुष तन का दर्शन हो रहा था मुझे। हृष्ट पुष्ट जंघाओं के मध्य भीमकाय लिंग अपने पूरे जलाल के साथ जुंबिशें दे रहा था। उफ्फ्फ्फ, यह मनमोहक दृश्य था मेरे लिए, तबतक, जबतक उस भीमकाय लिंग की क्रूरता से परिचित न हुई।
“लीजिए देवी, इस खिलौने से खेलिए।” अपने करीब आठ इंच लंबे और करीब चार इंच मोटे फनफनाते लिंग को मेरे हाथ में देते हुए बोला वह।
“खिलौना?” मेरे मुह से निकला।
“हां खिलौना। अबतक आपने निर्जीव गुड्डे गुड़ियों से खेला होगा। आज इस जीवित खिलौने से खेलिए।”
“यह तो आप पुरुषों के मूत्र विसर्जन का मार्ग है।”
“पगली, यह लिंग है। लोग इसे लंड या लौड़ा कहते हैं।”
“यह हमारे पास क्यों नहीं है?”
“क्योंकि आप स्त्री हैं। इसे योनि कहते हैं। लोग इसे चूत या बुर भी कहते हैं। इन्हीं का तो खेल है पगली। सृष्टि इन्हीं पर आधारित है। आनंदभरा खेल, जिसके द्वारा हम प्रजनन की क्रिया संपन्न करते हैं। आप खेलती रहिए इससे, मेरे लिंग से, लंड से लौड़े से” मेरी चमचमाती चिकनी, नयी नकोर, कमसिन योनि को सहलाते हुए बोला। मैं गनगना उठी। विक्षिप्तता की स्थिति में कसमसा रही थी।
“कैसे?” चमत्कृत सुनती रही, देखती रही।
“प्यार से सहलाईए इसे, दुलारिए इसे।” गरम था, बेहद गरम। सख्त था, कठोर, सूखे डंडे की तरह, चिकना, बेलनाकार। घबराहट में एक बार तो छोड़ बैठी मैं।
“डरिए मत, काटेगा नहीं।” दुबारा मेरे हाथ में थमा दिया उसने। इतना मोटा था कि मेरी हथेली में भी नहीं समा रहा था। अब भय तनिक कम हुआ। सहलाने लगी।
“आह आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, हां हां ऐसे ही आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह। ऊपर से नीचे तक, हां हां्हां्आं्आं्आं, ऐस्स्स्स्स्स्आआआआ ही्ई्ई्ई्ई” अब मुझे भी अच्छा लग रहा था। इधर वह मेरी योनि को सहला रहा था। मैं सिहर उठी। “लीजिए, इसे चूमिए, चूसिए, चाटिए।” मेरे हाथों से छुड़ा कर मुह की ओर बढ़ा दिया। उफ्फ्फ्फ, निकट से देखकर भयभीत हो उठी। सामने का हिस्सा गुलाबी था, चिकना, तनिक नुकीला। एक संकीर्ण छिद्र उस गुलाबी अग्रभाग के केंद्र में दृष्टिगोचर हो रहा था। झिझकते हुए मैंने उसके लिंग को मुंह में लेने का प्रयास किया, किंतु उस विशाल गोले को मुख में समाहित करने की क्षमता मुझमें नहीं थी। अत: चूमने और चाटने से ही संतोष करना उचित जान पड़ा। वही करने लगी। सुगंधित लिंग, स्वादिष्ट लिंग, मुझे चाटना भा गया। दोनों हाथों से पकड़ कर बड़े प्यार से चाटने लगी मैं। इधर वह युवक मेरी योनि को चूम रहा था चाट रहा था, “वाह, आकर्षक, अद्भुत, अद्वितीय, स्वादिष्ट,” बीच बीच में मेरी योनि के संकीर्ण छिद्र में अपनी जिह्वा प्रविष्ट भी करा रहा था।
“हाय हाय आह आह ओह ओह मां मां उफ्फ्फ्फ उफ्फ्फ्फ” पागल होती जा रही थी मैं। अब आगे? आगे क्या? क्या करने वाला था वह? उत्तेजना की पराकाष्ठा थी, जिज्ञासा भी।
तभी उत्तेजना के आवेग में वह बोला, “बस बस, अब मेरे लिंग को आपकी योनि में समाहित करने का यही स्वर्णिम अवसर है। आईए अब अपनी योनि में मेरे लिंग को ग्रहण करने हेतु तैयार हो जाईए।”
“ओह नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, ऐसा कैसे?” घबरा गयी मैं।
“ऐसा ही होता है देवी।”
“लेकिन आपका लिंग इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ और मेरी योनि इतनी छोटी। फट जाएगी। न बाबा ना।” डर से मेरा बुरा हाल था।
“नहीं फटेगी। भगवान ने इसे इतना लचीला बनाया है कि पूरा का पूरा लिंग समा लेने में सक्षम है यह।” अब बेकरारी उसकी झलक रही थी।
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं,”
“हां्हां्आं्आं्आं,” अब वह तनिक जोर जबर्दस्ती पर उतारू था। मेरे पैरों को जबर्दस्ती फैला कर मेरी लसलसी योनि के द्वार पर अपने भीमकाय लिंग के अग्रभाग को स्थापित कर दिया।
“उफ्फ्फ्फ नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, यह असंभव है।” भयमिश्रित स्वर में घिघियाते हुए बोली।
“सब संभव है। हिम्मत और धैर्य रखिए, यही इस आनंददायक खेल की परिणति है, यहींं आकर खेल के सबसे आनंददायक भाग में हम प्रवेश करते हैं। यह वह रतिक्रिया है, जिसके लिए स्त्री पुरूष की संरचना हुई है। इसके बिना हम मानव अधूरे हैं। लीजिए स्वीकार कीजिए मेरे भूखे लिंग को अपनी प्यासी योनि में” हिम्मत बढ़ाते हुए मेरी चूतड़ों के नीचे हाथ डालकर, “हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्” अपनी कमर को जुम्बिश दे बैठा। किसी धारदार खंजर जैसे चीरता उसका विशालकाय लंड मेरी कुवांरी चूत को ककड़ी की तरह फाड़ बैठा और एक तिहाई हिस्सा अंदर पैबस्त हो गया।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, मा्आ्आ्आ्आ्र्र्र्र्र्र डाला ््आआ््आआ रे्ए्ए्ए्ए्ए बप्प्आ्आ्आ्आह्ह्ह्।” दर्दनाक चीख उबल पड़ी मेरे मुख से, किसी हलाल होती बकरी की तरह और इसी के साथ मेरी निद्रा भंग हुई और साथ ही सपना भी। लेकिन, लेकिन यह क्या, वह अकथनीय पीड़ा अब भी थी, मेरी चूत में अब भी पैबस्त था वह विशालकाय लंड। नींद मेरी आंखों से काफूर हो चुका था। कौन था मुझ पर सवार? कौन? कौन? भयाक्रांत हो उठी मैं। किसी भीमकाय शरीर के नीचे दबी हिलने डुलने में असमर्थ, बेबसी और पीड़ा के कारण मेरी आंखों से अश्रु की धार बह निकली। कमरे की मद्दिम रोशनी में भी मैं पहचान गयी, “ओह्ह्ह्ह् मां्मां्आ्आ्आ्आ, दादा आ्आ्आ्आप?” आश्चर्य से मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं।
“चुप, बिल्कुल चुप। चिल्ला मत। चुपचाप चोदने दे।” गुर्राहट निकली उनके मुख से और साथ ही मेरे नथुनों से टकराया शराब की दुर्गंध का तीखा भभका। इसी के साथ एक और जुंबिश दे बैठे अपनी कमर को मेरे जल्लाद भाई ने। कचकचा कर मेरी चूत को फाड़ता हुआ दो तिहाई लंड गाड़ दिया मेरे अंदर। इसी के साथ मेरी चूत के कौमार्य की झिल्ली क्षत विक्षत हो गयी। रक्त की धार बह निकली मेरी चूत की संकरी गुफा से।
“उफ्फ्फ्फ मां्मां्आ्आ्आ्आ, मर गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई, मर गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई बाबा रेए्ए्ए, फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई, फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई, मेरी चूत फट्ट्ट्ट्ट गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई। ना दादा ना” दर्द से तड़प उठी मैं, कराह उठी।
“हां रानी हां।”
“मर जाऊंगी दादा।”
“मरने नहीं दूंगा रानी, मजा दूंगा, मजा लूंगा।”
“ओ दादा छोड़ो ना।”
“अभी छोड़ने में अच्छा लगेगा क्या? इतना भीतर घुस गया है, थोड़ा धीरज रख पगली, मजा तो ले ले।”
“मजा? यह कैसा मजा? दर्द से मरी जा रही हूं दादा”
“शुरू में ऐसा ही थोड़ा दर्द होता है पागल।”
“थोड़ा दर्द? यहां मेरी जान निकली जा रही है। आह आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” छटपटा भी तो नहीं पा रही थी। मेरी कमजोर आवाज में विरोध अब भी था।
“तू ऐसे नहीं मानेगी बुरचोदी, ले, पूरा का पूरा लौड़ा ले हरामजादी, हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्य।” किसी जल्लाद की तरह पूरी ताकत से झटका मारा और रोकते हुए भी मेरी दर्दनाक चीख से पूरा कमरा गूंज उठा। उनका पूरा लंड मेरी चूत में समा गया था।
“ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं।
“चीख मां की लौड़ी। चिल्ला साली चूतमरानी।” क्रूरता की हदें पार करता हुआ गुर्रा उठा मेरा भाई। उसकी गुर्राहट से मेरी घिग्घी बंध गयी। मेरी आवाज सुनने वाला भला वहां और कौन था। कहां वे हट्ठे कट्ठे सांढ़ और कहां मैं कमसिन बछिया। बेबसी पर रोने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकती थी। छटपटाने की कोशिश में मैंं खुद को और पीड़ा पहुंचा रही थी, अतः शांत रह कर चुदते रहने में ही मैंने अपनी भलाई समझ ली। कुछ पल उसी स्थिति में पूरा लंड डाले वे स्थिर रहे और धीरे धीरे रक्त रंजित लंड को मेरी चूत से बाहर निकालने लगे। मुझे लगा अब थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन लंड का एक चौथाई हिस्सा अंदर रखे रखे उन्होंने एक और करारा धक्का मारा। “हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्फ्फ्फ्फ।”
“उफ्फ्फ्फ ओफ्फोह, मार ही डा्आ्आ्आलिएग्ग्ग्गा क्या्आ्आ्आ्आ, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।”
“मरने थोड़ी न दूंगा साली मां की चूत, चोदूंगा, मजे से चोदूंगा, हो गया अब, मजा ले मेरी प्यारी बहना और मुझे भी मजा दे।” अब वे धीरे धीरे धक्के लगाने लगे। हर धक्के पर मेरी सांस ऊपर नीचे हो रही थी। मेरी चूतड़ के नीचे से उन्होंने अपना हाथ हटा कर अब मेरी चूचियों को पकड़ लिया। बेदर्दी से दबाने लगे मेरी चूचियों को।
“उई्ई्ई्ई्ई्ई उई्ई्ई्ई्ई्ई मां्मां्आ्आ्आ्आ।” उनकी वहशियत बढ़ती जा रही थी। नशे में तो थे ही, शायद उन्हें पता ही नहीं चल रहा था कि किस तरह मेरी दु्र्दशा कर रहे थे। मुझे खुशी देने का खोखला आश्वासन देकर सिर्फ अपनी हवस की पूर्ति ही उनका एकमात्र लक्ष्य था। इतने पर ही नहीं रुके वे। अपने मुह से मेरी चूचियों को चूसने और दांतों से काटने लगे। “ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह।” मैं चीखती रही चिल्लाती रही और वे मुझे नोचते रहे खसोटते रहे चोदते रहे। अब उनके चोदने की रफ्तार पहले से दुगुनी हो गयी थी। दनादन, धकाधक, भकाभक, भचाभच, मशीनी अंदाज में, यंत्र चालित जानवर की तरह चोदना जारी रहा, भंभोड़ना जारी रहा। उफ्फ्फ्फ वे लम्हें, प्रथमत: प्राणांतक पीड़ा को झेलती हुई चुदती रही, नुचती रही। शनैः शनैः वह पीड़ा कम होती गयी, गायब होती गयी और अंततः इस तरह गायब हुई मानो बरसों से चुदती आ रही हूं। अब जा कर मुझे राहत मिली, राहत ही नहीं, अब तो आनंद की अनुभूति होने लगी। मेरी चूत की संकीर्ण गुफा की अंदरूनी दीवारों में दादा के मोटे रक्तरंजित लंड के सर्र सर्र आवागमन से उत्पन्न घर्षण से मेरे शरीर में अदभुत रोमांचक, आनंदभरी विद्युत तरंगें बहने लगीं।
“उफ्फ्फ्फ दादा, ओह्ह्ह्ह्ह दादा, दारून, ओ््ओओह्ह्ह्ह्ह दादा केमोन भालो (कितना अच्छा) आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ गो, चोद दादा चोद, खूब आनोंदो (बहुत आनंद)।” मैं आनंदमग्न क्या बोल रही थी पता ही नहीं था।
“लागलो, एखोन लागछे भालो (लगा, अब अच्छा लग रहा है) साली हरामजादी। एई जोन्यो एतो ड्रामा (इसी के लिए इतना नाटक), साली बुरचोदी।”
“ओ दादा, ओह ओह्ह्ह्ह् रे आमार (मेरे) चोदू राजा।”
“हां रानी, ऐखोन देख आमी की रोकोम आनोंदो दीच्छी (अभी देखो मैं कैसे आनंद देता हूँ)।” कहकर मुझे हवा में उठा लिया और मैं उनकी गोद में थी। उनका दोनों हाथ मेरी चूतड़ के नीचे था। मैं खुशी खुशी, आनंद में डूबी, अपने दोनों पैरों से उनकी कमर को लपेटे, उनके लंड को अपनी चूत में समाये मगन, नीचे से भाई के धक्के झेलती हवा में हिचकोले खा रही थी। उफ्फ्फ्फ यही था वह स्वर्गीय आनंद? यही था वह सुखद अनुभव, जिसके बारे में स्वप्न वाले राजकुमार ने बताया था? मैं अपने दोनों हाथों का हार उनके गले में डाल कर आनंद के सागर में डूब गयी, हिचकोले खाती रही, चुदती रही।
“ओह्ह्ह्ह् राजा, आमार चोदू राजा, आमार चूतेर पेलू दादा, ओह्ह्ह्ह् रेएएएएएए ओह्ह्ह्ह्।” करीब तीस चालीस मिनट की घमासान चुदाई के पश्चात उन्होंने मुझे कस कर जकड़ लिया और अपने मदन रस से मेरी चूत को सराबोर कर दिया।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह््ह््ह््हह्हह, ओओ्ओओ््ओओ््हह्ह्ह्ह, र्र्र्र्आ्आ्न्नी्ई्ई्ई्ई्ई स्स्स्स्स्स्आ्आ्आ्आ्आली्ई्ई्ई्ई कुत्त्त्ती्ई्ई्ई्ई, तेरी्ई्ई्ई्ई चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह मस्त चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह टाईट चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत।” ऐसा लगा मानो मेरी पसलियों का चूरमा बना डाला हो।
“ओह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्,” तभी मैं भी, “ओह्ह्ह्ह्,” मैं भी थर्रा उठी, आह वह मेरी जिंदगी का प्रथम स्खलन, “ओह दादा ओह्ह्ह्ह् रज्जाआ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” जन्नत का सुख, अनिर्वचनीय, शब्दों में बयां करना असंभव था। खुशी और तृप्ति के मारे मैं अपने भाई से चिपट गयी, बेहताशा चूमने लगी भाई के चेहरे को और मेरा शराबी, हरामी चोदू भाई, बलात्कारी भाई मुझे चोद कर निहाल हुआ जा रहा था।
“वाह, इतनी अच्छी टाईट चूत चोदना आज नसीब हुआ। उफ्फ्फ्फ, बड़ा मजा आया रे मेरी रानी, मेरी बुरचोदी बहना। हरामजादी, इसी के लिए इतना हल्ला गुल्ला मचा रही थी कुत्त्त्ती्ई्ई्ई्ई।” गदगद हो कर दनादन चूमते हुए बोला। उस प्रथम चुदाई में मैंने जो खुशी प्राप्त की, दीवानी हो गयी भाई की। मेरे भाई ने उस रात मेरी देह से जो संतुष्टि और खुशी प्राप्त की, आसक्त हो उठे मुझ पर। उस रात हमने तीन बार वासना का नंगा खेल खेला, रात भर, खुल कर, भाई बहन के पवित्र रिश्ते को शर्मसार करते हुए। फिर तो यह सिलसिला चल निकला। तीन दिन बाद मेरी भाभी घर वापस आई, लेकिन तब तक भाई ने मुझे चुदाई में पूरी माहिर बना दिया था। उस सोलह साल की नादान उम्र में ही मेरे हवस के पुजारी चुदक्कड़ भाई नें ऐसा जलवा दिखाया कि मैं उनकी दिवानी बन बैठी।
एक दिन मैंने चुदते हुए भाई से पूछ लिया, “भाई?”
“हां बोल”
“भाभी के रहते आपको मुझे चोदना कैसे सूझा?”
“चुप हरामजादी।”
“क्यों चुप रहूं मैं दादा?”
“उस काली कुतिया की बात मत कर, घिन आती है।”
“काली है तो क्या हुआ, खूबसूरत तो है।”
“मैंने कहा ना उसकी बात करके मूड खराब मत कर।”
“इसमें मूड खराब करने वाली क्या बात है?”
“हट हरामजादी,” एक धक्का दिया मुझे और मुझे छोड़ कर उठ गये। मैं नंगी, उत्तेजना की आग में तपती, दौड़ कर उनसे लिपट गयी और बोली, “सॉरी दादा, गलती हो गयी। अब नहीं बोलूंगी भाभी के बारे में। मुझे इस तरह बीच चुदाई में छोड़कर मत जाईए।”
“फिर न बोलना।”
“ना दादा ना।”
“गुड गर्ल,” जहां मुझे छोड़ा था वहीं से फिर चोदने लगे मुझे। उस दिन के बाद फिर हमारे बीच कभी भाभी का जिक्र नहीं हुआ। यह थी मेरी चुदाई यात्रा की शुरुआत, जिसका उद्घाटन मेरे अपने भाई के हाथों हुआ।
इतना बता कर रश्मि ने जैसे ही विराम लिया, कुछ देर सन्नाटा छा गया। हम सब अपलक दृष्टि से रश्मि को देखते रह गये।। फिर मैंने ही सन्नाटे को भंग किया, “ओह, तो इस तरह तेरे भाई ने ही तेरा शील भंग किया, जिस तरह मेरे बड़े दादाजी ने मेरा।”
“तूने बताया कि उसके बाद यह सिलसिला चल निकला।”
“हां।”
“तुझे इस बात का मलाल तो जरूर होता होगा।”
“न, बिल्कुल नहीं। क्यों होगा दुख? हां, शुरुआत में उन्होंने मेरे साथ थोड़ी जबर्दस्ती अवश्य की, लेकिन आनंद भी तो दिया। उन्होंने ही तो मुझे औरत मर्द के बीच शारीरिक संबंध के आनंद से परिचित कराया, मुझ नादान बेवकूफ को तो पता ही नहीं था कि इस खेल में इतना आनंद मिलता है, फिर दुख क्यों होता भला, बल्कि इसके विपरीत मैं तो आभारी हूँ अपने भाई का।”
“वाह, ये हुई न औरतों वाली बात। उसके बाद यह सिलसिला कब तक चलता रहा? तेरी शादी तक?”
“शादी तक? अब तक।” वह अब सबके सामने खुल गयी थी।
“वाऊ रश्मि। फिर तुमने दूसरे पुरुषों को मौका दिया कि नहीं?”
“नहीं, आज तक तो नहीं। सिर्फ मेरा भाई और मेरा पति। पति से तलाक के बाद मैं अकेली रहती हूं। मेरे अकेलेपन का साथी मेरा डिल्डो है। कभी छुट्टियों में मैं भाई के यहां चली आती हूं या भाई मेरे यहां चले आते हैं अपनी शारीरिक भूख मिटाने। रेखा भाभी बेचारी को तो हमारे इस संबंध की भनक तक नहीं है। ” बेझिझक बोलती जा रही थी, इस बात से बेखबर कि मेरे बूढ़े आशिक हरिया और करीम भूखे भेड़ियों की तरह इस खूबसूरत शिकार को नोच खाने को बेताब हो रहे थे।
“ओह, पहले भैय्या बना सैंया, फिर सैंया से तलाक, फिर भैया बना सैंया। बस? भैया न हुआ तो डिल्डो। क्या रश्मि तुम भी ना, तुझ जैसी खूबसूरत औरत को मर्दों की कमी है क्या जो इस बेजान डिल्डो से काम चला रही है?”
“ऐसी बात नहीं है। दरअसल मर्दों के चेहरों पर तो लिखा नहीं है न कि कौन किस तरह का है? पता नहीं दूसरे मर्दों के चक्कर में कहीं गलत हाथों में पड़ गयी तो जिंदगी बर्बाद नहीं हो जाएगी क्या?”
“तुम्हारी बात सही है, लेकिन अगर खुद पर आत्मविश्वास हो, हिम्मत हो और चतुराई हो तो सब संभव है। अब मुझी को देख लो। किसी की मजाल नहीं कि कोई मेरी मर्जी के बगैर मुझे हाथ भी लगा सके। एक सरदार ने मुझे ब्लैकमेल करने की कोशिश की तो उसकी मैंने वो हालत की कि उसकी नानी याद आ गयी।”
“सब तेरी तरह थोड़ी न हैं।”
“हां, यह तो है। सब मेरी मॉम की तरह लक्ष्मीबाई तो हो नहीं सकती।” अबतक चुपचाप सुनता रहा क्षितिज बोल उठा।
“सही बोला बच्चे, हमने देखी है तेरी मां का रणचंडी रूप।” हरिया और करीम ने क्षितिज का समर्थन किया।
“बस बस बहुत हुआ तुमलोगों की मस्कामारी।” मैं बोल पड़ी। फिर रश्मि से बोली, “तो इसका मतलब हुआ कि तुम्हारी जिंदगी में क्षितिज तीसरा मर्द है।”
“हां, तीसरा मर्द और भई वाह क्या खूब मर्द।”
“अभी तुमने सिर्फ क्षितिज को ही देखा है ना। जरा हमें भी मौका दे कर देख बिटिया।” करीम इतनी देर से चुपचाप सुन रहा था, फौरन बोल पड़ा।
“साले हरामियों, खूबसूरत औरत देखी नहीं कि शुरू हो गये।” मैं उन्हें डांटती हुई बोली।
“अरे इन्हें क्यों डांटती हो। गलत क्या बोले करीम चाचा। अपने दिल की बात बोले हैं, क्या करें बेचारे।”
“बेचारे? तू अभी क्या जानती है इनके बारे में?”
“जानना क्या है? मर्द हैं, वह भी ऐसे परिवार के, जहाँ यह सब कुछ चलता है।” रश्मि बोली।
“एक नंबर के औरतखोर हैं।”
“हां, मुझे सुनकर आश्चर्य नहीं हुआ।”
“तुम मुसीबत को आमंत्रण दे रही हो।” मैंने चेतावनी दी।
“कैसी मुसीबत?”
“तू उंगली पकड़ने तो दे, फिर देख।”
“क्या देखूं और। इस परिवार के सदस्यों के बीच आपलोगों के खुले संबंधों से तो वाकिफ हो ही गयी हूं। समझती हूं सब कुछ।” रश्मि बोल उठी। इतनी देर की बातचीत में हम सबके अंदर पुनः कामुक कामनाएं सर उठा रही थीं और उसकी अभिव्यक्ति करीम चाचा और रश्मि की बातों में झलक रही थीं।
“ओह तो यह बात है, बहुत खूब। सच कहा तुमने हम सब ऐसे ही हैं। आपसी संबंधों में कोई लाग लपेट नहीं। ढंका छुपा कुछ नहीं। हमारे बीच जो शारीरिक संबंध है, उसमें शारीरिक भूख मिटाने की ललक के साथ ही साथ एक भावनात्मक जुड़ाव है, हम सब एक दूसरे की भावनाओं की, इच्छा आकांक्षाओं की कद्र करते है। भावनात्मक लगाव है लेकिन कोई बंधन नहीं है। हम सब स्वतंत्र हैं, अपनी मर्जी के मालिक। हम अपने अंदर की बात छुपाते नहीं। मुझे खुशी हुई हमारे बारे में तुम्हारे विचार जान कर।”
“हां यह मेरे दिल की गहराई से कहे गये इमानदार उद्गार हैं और यह निश्चय ही प्रशंसनीय है।”
“तो हम इसका मतलब क्या समझें?” करीम उतावला हो रहा था।
“क्या मतलब?” रश्मि जानबूझकर अनजान बनते हुए बोली।
“वही जो अभी अभी मैं कह रहा था।”
“क्या कह रहे थे?”
“हमें भी मौका देने की बात।” बेसब्र बुड्ढा, साला हरामी बेटीचोद। इतनी खूबसूरत औरत पास में बैठी खुले सेक्स पर खुल कर विचार दे रही थी और प्रशंसा कर रही थी, सुनकर तो दोनों बूढ़ों की बांछें खिल रही थी। सब समझ रही थी मैं उनकी हालत, खड़ूस चूतखोरों के लंड निश्चित तौर पर सिर्फ सिग्नल का इंतजार कर रहे थे, उधर हां हुआ नहीं कि बस एकदम से हल्ला बोल वाली स्थिति थी। तनिक पशोपेश में थी रश्मि, क्या हां बोलूं? क्या इन बूढ़ों से भी चुद कर देख लूं? इतनी देर में जिस तरह की बातें हो रही थीं, तन में वासना की आग तो सुलग ही चुकी थी। वैसे भी वह देख चुकी थी हरिया ने किस मर्दानगी का परिचय दिया था मुझे चोदते हुए। बूढ़े का दम देख चुकी थी। दमदार बूढ़ा। करीम को देखकर साफ साफ पता चल रहा था कि वह भी हरिया से किसी भी मायने में कम नहीं है। करीम के साथ साथ हरिया भी कितनी आशापूर्ण दृष्टि से देख रहा था। दोनों के दोनों की भूखी नजरें रश्मि के खूबसूरत देह पर टिकी हुई थीं। मैं और क्षितिज भी रश्मि के उत्तर की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। क्षितिज को चिंता नहीं थी कि रश्मि का उत्तर क्या होगा। अगर सहमत हुई बूढ़ों से चुदने के लिए, तो मैं तो थी ही उसकी चुदासी कामुक मां, अनुभवी, मस्त, चुदने हेतु सुलभ, उसकी अदम्य कामपिपाशा को बखूबी शांत करने में पूर्णतया सक्षम। और अगर ना हुई तो रश्मि की कमनीय देह का रसास्वादन करने का एक और अवसर मिलना तय था। मेरी हालत भी ठीक वैसी ही थी। उत्तेजित, चुदने को बेताब, लंड चाहे किसी का भी हो, बूूढ़ों का या जवान क्षितिज का।
“हां।” सन्नाटे को भंग करती हुई रश्मि की सहमति थी।
“वाह।” करीम तुरंत बोल उठा।
“यह हुई बात।” हरिया खुशी के मारे उछल पड़ा।
“दोनों?” रश्मि अकचका उठी।
“हां दोनों।” दोनों एकसाथ बोल उठे।
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, एक ही जन।” रश्मि हड़बड़ा उठी।
“नहीं, दोनों।” हरिया बोला।
“हां हां दोनों।” करीम बोला।
“यह क्या्आ्आ्आ्आ? प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज एक जन।”
“नहीं, दोनों। वह भी एक साथ।” हरिया बोला।
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, एक साथ नहीं।” तनिक घबरा उठी थी रश्मि।
“हम दोनों एक साथ खाना पसंद करते हैं।”
“नहीं प्लीज, एक एक करके।”
“हम दोनों साथ रहते हैं तो एक साथ ही करते हैं।” करीम बोला।
“पर मेरे साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।”
“पहले नहीं हुआ तो अब होगा।” वहशियाना अंदाज में बोला हरिया।
“कैसे?” घबराहट स्पष्ट दिख रहा था रश्मि के चेहरे पर।
“ऐसे।” दोनों बूढ़े टूट पड़े रश्मि पर।
“हाय राम, प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज छोड़िए मुझे।” उनकी सम्मिलित पकड़ से छटपटाती रश्मि घिघिया उठी।
“हाथ आई चिडिय़ा को ऐसे कैसे छोड़ दें रानी। हां बोली न।” करीम उसकी चूचियों को दबोच कर बोला।
“प्लीईईईईईईईज्ज्ज्ज ऐसे नहीं।” रश्मि उनके चंगुल में फड़फड़ा उठी।
“ऐसे नहीं तो और कैसे? ऐसे?” हरिया उसे चूमता हुआ बोला। दोनों के बीच रश्मि पिस रही थी।
“हाय मैं कहां फंस गयी।” रश्मि बेबस थी।
“फंसी नहीं पगली, स्वर्णिम अवसर मिला तुम्हें।” मैं उसकी हालत पर मुस्कुराते हुए बोली।
“हाय, यह कैसा अवसर? मार डालेंगे ये बूढ़े।” रश्मि रोनी सी आवाज में बोली।
“मरोगी नहीं बेवकूफ, बड़ा मजा आएगा।”
“ये कैसा मजा हरामजादी।” चिढ़ गयी वह।
“ये ऐसे नहीं मानेगी। जो करना है करो हरामी बूढ़ों। जबरदस्ती करो। दिखा दो इसे अपनी मरदानगी, और वह मजा दो कि यह खुद बोले, चोदो राजा चोदो।” मैं खीझ कर बोली। चुदने को मैं खुद मरी जा रही थी और इधर यह ड्रामा।
“क्षितिज बेटा, आ अपनी मां से खेल। उस रश्मि की बच्ची को उसके हाल पर छोड़।”
“वाऊ मॉम, आया, लो आ गया तेरा चोदू बेटा।” कहते कहते पूर्णतया निर्वस्त्र हो गया, गर्व से सर उठाए, विशालकाय, अकड़े, फनफनाते लिंग का प्रदर्शन करते हुए मेरे करीब आया और आनन फानन मुझे भी निर्वस्त्र कर दिया, मादरजात।
“उफ्फ्फ्फ, इतनी बेताबी!”
“हां्हां्आं्आं्आं मॉम, बहुत देर से मेरा पपलू बेकरार था।” मेरी नग्न देह को अपनी बांहों में समेट कर मेरी भरी भरी उन्नत चूचियों को बेरहमी से दबाता हुआ चूमने लगा वह। अबतक हरिया और करीम ने रश्मि की ना ना और छटपटाहट को नजरअंदाज करते हुए नग्न करने में तनिक भी समय नहीं गंवाया। अब रश्मि पूर्ण रूप से नंगी, बेबस, उन दो कामपिपाशु बूढ़ों के हाथों मसली जा रही थी। एक एक करके हरिया और करीम भी निर्वस्त्र आदीमानव बन गये। दोनों के तनतनाए लिंग, विभिन्न आकार प्रकार और बनावट के बावजूद आकर्षक थे। लंबाई और मोटाई ताकरीबन एक ही थे किंतु करीम का खतना किया लिंग, टेनिस बॉल सरीखे गुलाबी सुपाड़े का बेपर्दा स्वरूप दिखा रहा था। दोनों कामुक बूढ़ों के भीमकाय, तोंदियल, सलवटों की तरह झुर्रियों और सफेद बालों से भरे शरीर के मध्य रश्मि की कमनीय देह का बेदर्द मर्दन, लोमहर्षक दृष्य प्रस्तुत कर रहा था। करीम उसके पीछे था, उसके मजबूत हाथ उसकी सख्त चूचियों को बेरहमी से मसलने में व्यस्त थे। हरिया सामने से उसके चेहरे को चुंबनों से नहलाए दे रहा था, उसका एक हाथ उसकी चिकनी चूत पर अठखेलियाँ कर रहा था।
“उफ्फ्फ्फ, ओह्ह्ह्ह्, ननननहींईंईंईंईं।” रश्मि की आंखें बंद हो रही थीं। उसकी योनि रसीली हो उठी थी।
“नहीं क्या, हां्हां्आं्आं्आं बोल हां।” हरिया बोला।
“ओ मां्मां्आ्आ्आ्आ।”
“मां नहीं, बाप बोल।”
“ओओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह बाबा।”
“हां्हां्आं्आं्आं बेटी।” हरिया अपनी उंगली रश्मि की चूत में डालने लगा।
“उई्ई्ई्ई्ई्ई बाबा।” चिहुँक उठी वह।
“उई क्या बिटिया? पनिया उठी न तेरी चूत? चल अब ले ले मेरा लौड़ा, बिटिया रानी।” बड़े प्यार से फुसला रहा था हरिया।
“ओह्ह्ह्ह् बाबा। हाय हाय।” वह अभी भी कसमसा रही थी उनकी बांहों में। चेहरा लाल हो गया था उसका। गैर मर्दों से चुदा जाना, वह भी एक मर्द से नहीं, दो दो मर्दों से, उसपर तुर्रा यह कि दोनों बूढ़े। बिल्कुल नयी बात थी उसके लिए। घबराहट थी, झिझक थी। अकेले किसी एक मर्द से ढंके छुपे तौर पर चुदना अलग बात थी, लेकिन इस तरह खुल्लमखुल्ला इतने लोगों के सामने बेशरमों की तरह इस तरह चुदे जाने की तो उसने शायद कल्पना भी नहीं की थी होगी। फंस तो चुकी ही थी, चुदा जाना तय था। तो क्या, तो क्या वह कामुकता के वशीभूत बेशर्म रंडी बनती जा रही थी? शायद, शायद नहीं, निश्चय ही। अबतक दोनों बूढ़े मिलकर उसे इस हाल में पहुंचा चुके थे जहाँ से वापस होना उसके वश में नहीं रह गया था। हरिया उसकी चिकनी चूत में उंगली डालकर रुका नहीं, दनादन उंगली से ही चोदने लगा। खेला खाया चुदक्कड़ बूढ़ा था, एक औरत को गरम करके कैसे वश में करना है, बखूबी जानता था।
“ओह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह् आह्ह्ह्ह्ह् मां।” सीत्कार निकालने को वाध्य हो गयी वह। बेसाख्ता चिपकी जा रही थी उनके तन से। एक तरह से अपने विरोध और शर्म को तिलांजलि दे कर खुद को उन वहशी, कामुक दरिंदों के हवाले कर बैठी थी। उसे आभास भी नहीं था कि करीम का लिंग उसकी गुदा द्वार पर दस्तक देने ही वाला था। तभी “ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई रे अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” कहती हुई थरथराने लगी और उसका स्खलन आरंभ हो गया।
“अभी कहां गयी, अभी तो शुरु हुई।” कहते कहते उसने बड़ी चालाकी से उसके दोनों पैरों को फैला कर अपने अनुकूल अवस्था में लाया और आव देखा न ताव, उससे छिपकली की तरह चिपकी रश्मि की चूत के मुहाने पर अपना मूसलाकार लंड टिका कर एक करारा प्रहार कर दिया और एक ही झटके में पूरा का पूरा लंड उसकी चिकनी चूत की संकरी गुफा को चीरता हुआ उतार दिया।
“आ्आ्आ्आ” घुटी घुटी चीख निकल गयी उसकी। दर्द से नहीं, शायद कल्पनातीत आक्रमण से। उम्मीद नहीं थी उसे कि एक बूढ़ा आदमी इस तरह एकदम से हमला करेगा और अपने जोश का प्रदर्शन करेगा। उत्तेजित जरूर थी वह किंतु ऐसे भीषण प्रहार की उम्मीद नहीं थी उसे। तनिक पीड़ा तो होनी ही थी, पूरा जड़ तक एक ही प्रहार से अपना लंड जो उतार दिया था उस हवस के पुजारी नें। अपनी मजबूत भुजाओं से जकड़े, अपने भीमकाय लंड को उसकी चूत में फंसाए हरिया ने उसे उठा लिया हवा में। गजब की ताकत थी अब भी उस चुदक्कड़ बूढ़े में। करीम न जाने कब से इस मौके की तलाश में था। पीछे से आकर पुनः उसने रश्मि को दबोच लिया, इस बार पूरी तैयारी के साथ, अपने लिंग में थूक लसेड़े, उसकी मस्त गुदाज गांड़ के दरवाजे में अपने लंड ठोकने को। रश्मि की ललचाती गुदा के द्वार पर अपने लिंग का चमचमाता विशाल सुपाड़ा ज्यों ही सटाया, चिहुंक उठी रश्मि। घबरा ही तो गयी। समझ गयी उसका इरादा।
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, पीछे से नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, पपप्ल्ल्ली्ई्ई्ई्ईज्ज्ज।” चीख उठी घबराहट में। लेकिन करीम कम खेला खाया खिलाड़ी नहीं था। उसकी सख्त चूचियों को अपने मजबूत पंजों से दबोच कर एक करारा धक्का जो मारा, आधा लंड अंदर पैबस्त हो गया। “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह मर्र्र्र्र्र्र्र गय्य्य्यी्ई्ई्ई्ई्ई अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ।” पीड़ा के अतिरेक से चीख उबल पड़ी उसके मुंह से। आंखें फटी की फटी रह गयीं उसकी।
“चिल्ला, खूब चिल्ला, इतनी मस्त गांड़ का मजा जब तक न ले लूं, तबतक चिल्ला, मैं छोड़ने वाला नहीं हूं मां की लौड़ी।” कसाई बन चुका था वह, एक और करारा प्रहार, “हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्,” और लो, पूरा का पूरा लंड उसकी गांड़ के अंदर।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, छोड़ मादरचोद, ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह, फा्आ्आ्आ्आड़ दिया आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” दर्दनाक चीख से गूंज उठा पूरा कमरा।
“हो गया काम। बस मेरी गांड़मरानी, हो गया तेरी गांड़ का काम। अब बस तू मजे में चुदती रह, हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्, हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्,
हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्,
हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्” दनादन तीन चार बार अंदर बाहर हुमच हुमच के अपने लंड को करके बेरहमी से उसकी गांड़ को फैला कर सुगम मार्ग बना दिया।
“आह मां ओह मां्मां्आ्आ्आ्आ इस्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स, हा्हा्हा्आ्आ्आ्आ्य हा्हा्हा्आ्आ्आ्आ्य,” चीखती चीखती धीरे धीरे शांत पड़ गयी वह। अब शुरू हुई उसकी चूत और गांड़ की सम्मिलित कुटाई। दोनों बूढ़े रश्मि की नग्न देह को हवा में उछाल उछाल कर किसी डबल सिलेंडर इंजन की तरह अपने लंड रुपी पिस्टन से कूटते रहे, उसकी चूत और गांड़ का मलीदा बनाते रहे। जो रश्मि कुछ देर पहले तक दहशत में भर कर पीड़ामय चीखें निकाल रही थी, वही रश्मि अब आनंदभरी सिसकारियां निकाल रही थी, “आह आह आह ओह ओह ओह इतना मजा ओह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, चो्ओ्ओ्ओ्ओदि्ई
ईःई्ई्ए्ए्ए्ए्ए ओह ओह।” बेसाख्ता चिपकी जा रही थी, पिसती जा रही थी उन चुदक्कड़ भेड़ियों के मध्य और आंखें बंद किए आनंद के सागर में गोते खा रही थी। इधर क्षितिज कहां पीछे रहने वाला था। इसी दौरान उसने मुझे भी अपने लंड का जलवा दिखाना आरंभ कर दिया था। मुझे कमर से पकड़ कर उठाया और भच्चाक से अपने फुंफकार मारते लंड में ऐसा बैठाया कि उसका लंड सीधे मेरी चूत में जड़ तक समा गया। उसने भी खड़े खड़े मुझे हवा में उठा लिया और गचागच चोदते हुए हवा में ही झूला झुलाने लगा। उफ्फ्फ्फ, यह उन बूढ़ों और रश्मि के बीच की कामकेली का ही असर था शायद, क्षितिज पूरे जोश में था। उत्तेजना के मारे उसके लंड का आकार भी पहले से विकराल और खुंखार हो उठा था। मैं, मैं तो निहाल हो उठी, उसकी गोद में चिपकी चुदी जा रही थी, चुदी जा रही थी, मस्ती की तरंगें मेरे तन में हिलोरें मार रही थीं।
“मेरी प्यारी मॉम।”
“मेरे प्यारे चोदू बेटे।”
“मेरी बुरचोदी मॉम।”
“मेरे प्यारे मादरचोद।”
“ओह मेरी रंडी मॉम।”
“ओह मेरे चूत के रसिया, चोद, चोद मां के लौड़े।”
“ओह मेरी चूतमरानी मां, मेरे लंड की रानी।” इन्हीं उद्गारों के साथ हम मां बेटे जुटे हुए थे एक दूसरे के तन में समा जाने की जद्दोजहद में। यह दौर अन्य दिनों के बनिस्बत कुछ अधिक ही चला। क्या हो गया था हम सभी को उस वक्त, समझ नहीं आ रहा था। हम सभी पागलों की तरह एक दूसरे से गुथे जा रहे थे। जहां रश्मि के गालों और गर्दन पर हरिया अपने दांतों का निशान छोड़ता जा रहा था वहीं करीम उसकी चूचियों का मलीदा बनाता जा रहा था। अखाड़ा बन चुका था वह कमरा। कभी उठा कर, कभी लिटा कर, कभी कुतिया बना कर, धमाधम, गचागच, घमासान धकमपेल मचाए हुए थे तीनों मर्द। आह ओह हाय हाय इस्स्स्स्स्स उस्स्स्स् हुम हुम की आवाज के साथ साथ फच फच चट चट की सम्मिलित आवाज से पूरा कमरा गुंजायमान था। वासना का सैलाब आया हुआ था जो करीब एक घंटे तक निरंतर बहता रहा। फिर शुरू हुआ एक एक करके मर्दों का स्खलन, अंतहीन स्खलन। इस दौरान मैं तो तीन बार झड़ चुकी थी, वहीं रश्मि का तो पता नहीं। कितनी बार उसके झड़ने का आभास उसकी आहों से हमें होता रहा। सर्वप्रथम हरिया नें अपने वीर्य से रश्मि की चूत को सराबोर किया फिर करीम ने अपना मदन रस उसकी गांड़ के अंदर भरना चालू किया। इस दौरान उन्होंने रश्मि की नग्न देह को इस सख्ती से दबोचा था मानो उसकी पसलियों का चूरमा बना कर ही दम लेंगे, मगर वाह री बुरचोदी रश्मि, कमाल थी, मगन थी, मस्ती में डूबी हुई, आंखें बंद किए सिसकारियां निकाल रही थी। इधर क्षितिज मेरे तन का सारा कस बल निचोड़े जा रहा था। अंततः जब उसने भी अपने लंड का फौव्वारा मेरी चूत में छोड़ा, आह, मैं तो निहाल हो उठी। मर्द, जबरदस्त मर्द, मुकम्मल सांढ़ बन चुका था वह।अपने मदन रस का पान कराता मुझे इतनी जोर से जकड़ा मानो मेरी सांसें ही रुक गयी हों। कड़कड़ा उठी मेरी पसलियां और मैं उसके सुगठित तन से चिपकी आनंदित होती रही।
“ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह््ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ।”
“हां्हां्आं्आं्आं रानी।”
“गयी रे गयी मैं, झड़ी रे झड़ी मैं।”
“ले मम्मी मेरे लंड का रस्स्स्स्स्, अपनी दूध का कर्ज। आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” और फिर हम सब पसीने से लतपत, संतुष्ट, निढाल पड़ कर लंबी लंबी सांसें ले रहे थे।
जब हम थोड़े संभले, मेरा पहला सवाल रश्मि से, “कैसा रहा?”
“ओह्ह्ह्ह् कामिनी, पूछ मत।”
“कैसा लगा?”
“गजब, ऐसी हालत कर दी मेरी इन बूढ़े जालिमों ने कि पूछो मत।”
“मजा आया?”
“बहूऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत।” कहते हुए शरमा गयी बेचारी।
“हाय मेरी लाजो रानी। शरमा तो ऐसे रही है जैसे पहली बार चुदी है।”
“हां तो। पहली बार ही तो इन बूढ़ों से, वह भी एक साथ।” लाल भभूका हो उठी।
“और तुम बूढ़े चुदकड़ो?”
“बूढ़ा बोलती है बुरचोदी, रश्मि बिटिया से पूछ मां की लौड़ी।” हरिया बोला।
“उससे तो पूछ लिया, अपनी बता चूतखोरों।”
“वाह, यह भी पूछने की बात है री रंडी। ऐसी मस्त लौंडिया को चोदना किस्मत की बात है। मन ही नहीं भरा। देख फिर से मेरा लौड़ा सर उठाने लगा।” करीम बोला।
“तो देख क्या रहे हो कुत्तों, शुरु हो जाओ फिर से।”
“ना बाबा ना। अभी और नहीं। हालत खराब कर दिया इन हरामियों ने।” थकी थकी सी रश्मि बोली।
“ओके ओके, अभी का हो गया। अब बेचारी को घर भी जाने दो। कल देखते हैं। वैसे भी अभी तो दो चार दिन यह रहेगी ही। हमारे लौड़े का मजा लेने फिर आना इसकी मजबूरी है। है कि नहीं रे बुरचोदी?” हरिया बोल उठा।
“हां्हां्आं्आं्आं बाबा हां्हां्आं्आं्आं। चस्का जो लगा दिया हरामियों।” बोलने को तो बोल गयी, फिर शरम से दोहरी हो उठी। अबतक सांझ का पांच बज चुका था। अब रश्मि को छोड़ आने के लिए मैं क्षितिज से बोली। हम सब अपने अपने कपड़े पहनने लगे। रश्मि खड़े होते होते लड़खड़ा रही थी। हंसी आ गयी मुझे।
“हंस रही है कुतिया। तेरे कुत्तों ने इतनी बुरी तरह नोचा खसोटा कि बदन का एक एक जोड़ ढीला कर दिया।” हम सभी ठठाकर हंस उठे। उसकी आवाज में सिर्फ थकान थी, झोभ या पश्चाताप नहीं। फिर क्षितिज उसे सिन्हा जी के घर छोड़ आया।
जाते जाते दोनों बूढ़ों पर प्रशंसात्मक दृष्टि फेरती गयी, मतलब साफ था, इन दोनों बूढ़ों की तो निकल पड़ी। जब तक रहेगी, इन्हें और मौका मिलने वाला था उसे चोदने का। वैसे भी कल तो क्षितिज को वापस भी जाना था।
“तो क्षितिज बेटा, कल की तैयारी हो चुकी है ना?” जैसे ही क्षितिज रश्मि को छोड़कर वापस आया, मैंने पूछ लिया।
“धत पगले, जाओगे क्यों नहीं?”
“आदत खराब हो गयी है।”
“कैसी आदत?”
“औरतों की आदत।”
“मिलेगी पागल, बहुत मिलेंगी। पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, कैरियर बना। तेरा वादा याद है ना? औरतें तो मिलती ही रहेंगी। नहीं मिली तो मैं तो हूं ही तेरी बुरचोदी मां। आ जाना, इसी तरह बीच बीच में।”
“ओके मॉम, ओके। मैं भूला नहीं हूं अपना वादा। देख लेना मेरी पढ़ाई और कैरियर। आपका बेटा आपको कभी शर्मिंदा नहीं होने देगा। बस तुम इसी तरह मेरा साथ देते रहना।”
“इसी तरह मतलब?”
“मतलब क्या? हौसला अफजाई और चुदाई।”
“हौसला अफजाई तो ठीक है, मगर चुदाई के लिए इधर उधर भी नजर घुमा लिया कर मेरे बच्चे। मैं हमेशा थोड़ी न उपलब्ध रहूंगी। सीख तो गया है सबकुछ, खुद पटा कर मिटा लिया कर अपने लंड की भूख।” कोई सुनता तो कहता कितनी बड़ी छिनाल मां है जो अपने बेटे को ऐसी शिक्षा दे रही है। मगर मैं तो ऐसी ही थी उस वक्त और ऐसी ही हूं अब भी।
“वो तो ठीक है मेरी प्यारी बुरचोदी मां, लेकिन जाने के पहले आज की आखिरी रात तो जी भर के प्यार करने दोगी न।” क्षितिज बोला।
“हां रे पागल हां्हां्आं्आं्आं मेरे रसिया बेटे। जी भरके प्यार कर और प्यार दे मुझे।” कहने को तो कह गयी मैं, लेकिन नतीजा इतना भयानक होगा इसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। कयामत की रात थी वह। खाना खाने के बाद करीब दस बजे से लेकर सुबह पांच बजे तक क्या क्या नहीं किया वह मेरे साथ।
खाना खाकर हरिया और करीम तो अपने कमरों में चले गये, बूढ़े थे, एक जवान स्त्री को संतुष्ट करने की चुनौती स्वीकार करके अपनी औकात से बाहर शक्ति का प्रदर्शन कर बैठे थे। थके थके से लग रहे थे दोनों, नींद से बोझल आंखों के साथ जा दुबके अपने अपने बिस्तरों पर, लेकिन क्षितिज की आंखें तो मुझी पर ही गड़ी थीं, नींद से कोसों दूर। जानती थी अंततः नंगी होना ही है, सारे कपड़े खोलकर सिर्फ चादर ओढ़े बिस्तर पर लेटी थी। क्षितिज किसी भूखे शेर की तरह यथासमय मेरे कमरे में दाखिल हुआ, सिर्फ एक बरमूडा पहने। बरमूडा उसका विशाल तंबू की शक्ल अख्तियार किया हुआ था। बताने की जरूरत नहीं कि अंदर कुछ नहीं पहना था मेरा चोदू बेटा। आते न आते बरमूडा ऐसे निकाल फेंका उसने मानो शरीर पर कोई गंदी चीज पड़ी हो। उफ्फ्फ्फ मां, अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ अधिक ही खूंखार और भयावह आकार था उसके लंड का। एक झटके में मेरे ऊपर की चादर को ऐसे फेंका मानो कोई घृणित वस्तु मेरे शरीर पर पड़ी हो, और लो, मादरजात नंगा मेरा बदन, कमरे की दूधिया रोशनी में चमक उठा। क्षितिज की दृष्टि में मैं किसी भूखे भेड़िए सी चमक देखकर अंदर ही अंदर हिल उठी।
“वाह, मेरी चूतमरानी मां, वाह। यह हुई न बात।” बावला बेटा, मुझ पर टूट पड़ने को उतावलापन स्पष्ट दिख रहा था उसकी आवाज में और हावभाव में। बिना एक पल गंवाए कूद पड़ा मुझ पर और छा गया मेरी नग्न देह पर। उसके उतावलेपन से मैं घबरा ही गयी।
“ओह्ह्ह्ह्, इतनी उतावली?”
“निकाल लूंगा आज सारी कसर, उसी की उतावली है मेरी जान।”
“उफ्फ्फ्फ भगवान, सारी रात तो पड़ी है।”
“छुट्टी की आखिरी रात भी तो है मेरी प्यारी बुरचोदी मां। इसके बाद फिर अगली छुट्टी तक इंतजार करना पड़ेगा।” अपनी बांहों में मेरी नग्न देह को जकड़े चूमने लगा पागलों की तरह मुझे।
“आह आह पागल कहीं के, ओह्ह्ह्ह् आराम से।”
“आराम से? समय निकलता जा रहा है। एक एक पल कीमती है। हर पल का भरपूर इस्तेमाल करूंगा।” वहशियत उसकी आंखों में नाच रही थी। ऐसा तो नहीं था यह, अचानक इसे क्या हो गया?
“ओह्ह्ह्ह् भगवान, आज यह क्या हो गया है तुम्हें हरामी, जान निकाल दोगे क्या?” उसकी मजबूत पकड़ में पिसती हुई बमुश्किल बोल पाई। मैं दहशत में आ गयी थी उसकी पाशविकता देख कर। मेरी दोनों उरोजों को इतनी बेरहमी से मसल रहा था कि मैं बमुश्किल अपनी चीखें रोक पा रही थी। उसे धकेल कर अलग करना और उसकी दानवी पकड़ से छूटना मेरे लिए असंभव हो गया था। उसे चोट पहुंचा कर छूट सकती थी, लेकिन उसे चोट भी पहुंचाना नहीं चाहती थी। सिर्फ छटपटा कर रह गयी।
“मेरी जान की जान कैसे निकाल सकता हूँ”
“फिर यह क्या कर रहे हो आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह?”
“प्यार कर रहा हूं।”
“जानवरों की तरह? हाय ओ्ओ्ह्ह्ह्ह?”
“मैं जानवर लग रहा हूं मेरी लंडखोर मॉम?”
“हां्हां्आं्आं्आं, तू जानवर बन गया है साले मां के लौड़े।” मेरे उरोजों की बेरहमी से निचोड़े जाने की पीड़ा से गाली निकाल बैठी।
“हां मैं मां का लौड़ा हूं साली कुतिया।” वह अब और खूंखार हो उठा। गालियों पर वह भी उतर आया। मेरी चूचियों को चूसने लगा और दांतों से काटने लगा।
“ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ इस्स्स्स्स्स आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह। साले जंगली कुत्ते।” अपनी बेबसी पर सिसक पड़ी।
“हां मैं जंगली कुत्ता हूं।” मेरी चूचियों को नोच नोच कर लाल कर दिया। अभी मैं उस दहशतनाक परिस्थिति से गुजर ही रही थी कि उसने अचानक बड़ी बेरहमी से मेरी योनि में भक्क से उंगली भोंक दिया।
“उई्ई्ई्ई्ई्ई मां्मां्आ्आ्आ्आ।” चिहुंक उठी मैं। अचानक हुए इस हमले से मेरी चुदी चुदाई योनि भी त्राहिमाम कर उठी। “आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह कसाई, बेरहम, जानवर।”
“जो बोलना है बोल मेरी मां। मुझे बस खेलने दे बुरचोदी मॉम।” गुर्रा उठा वह। उसने सिर्फ उंगली घुसा कर ही बस नहीं किया, लगा भचाभच उंगली से ही चोदने।
“उफ्फ्फ्फ दरिंदे बन गये हो तुम।” तड़प कर बोली।
“हां्हां्आं्आं्आं हां्हां्आं्आं्आं, बन गया दरिंदा। सारी कसर निकालूंगा आज रात।” सुनकर कांप उठी। क्या क्या करना चाह रहा था मेरे साथ? कोई और होता तो उसकी ऐसी जालिमाना हरकत के लिए ऐसी सजा देती, जो उसे जिंदगी भर याद रहता। लेकिन यह तो मेरा बेटा था, प्रतिक्रिया में उसे तकलीफ भी नहीं दे सकती थी। सहती जा रही थी, सिर्फ मुह से बोलकर ही पीड़ा और विरोध जता रही थी, जिसका उस पर तनिक भी असर नहीं हो रहा था।
“आह ओह इतने कसाई मत बनो आह।”
“चुप, एकदम चुप, मां की चूत, कसाई लग रहा हूं?” कहते हुए सीधे अपने गधे सरीखे लिंग को मेरे मुह में ठूंस दिया और पलट कर खुद मेरी योनि से निकलते लसलसे द्रव्य को चपाचप चाटने लगा। चाटते चाटते मेरे भगनासे को दांतों से हल्के हल्के चबा भी रहा था। पीड़ा थी मगर उत्तेजना के मारे थरथरा उठी और उसी वक्त मेरा स्खलन आरंभ हो गया।
“ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” गजब का दीर्घ स्खलन था वह। पीड़ा भरे आनंद से मेरी आंखें बंद होने लगी। वह समझ रहा था सबकुछ, लेकिन छोड़ा नहीं मुझे। चाटता रहा, चाटने की इस क्रिया में उसकी जीभ मेरी गुदा द्वार को भी स्पर्श करने लगी। मेरे मुंह से गों गों की आवाज निकल रही थी। उसका लंड जो घुसा हुआ था मेरे मुह में। चोद रहा था मेरे मुह को अपनी कमर चलाते हुए, गपागप, सटासट और मैं सप्रयास उसके विशाल लिंग को मुंह में समाए चूसने को वाध्य थी। तभी उसके लिंग का आकार और बड़ा होने लगा। कठोर होने लगा, मेरा दम निकलने निकलने को हो रहा था लेकिन तभी फचफचा कर उसका लिंग वीर्य उगलने लगा। गटकती चली गयी उसके वीर्य का एक एक कतरा। जैसे ही उसका लिंग नरम पड़ा, मेरी जान में जान आई। “इस्स्स्स्स्स्स्स्स्, इस्स्स्स्स्स्स्स्स्।” राहत की लंबी लंबी सांसें लेने लगी मैं।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, पी जा, पी जा मेरे लंड का प्यार भरा रस मेरी रंडी मां्मां्आ्आ्आ्आ। दूथ का्आ्आ्आ्आ्आ कर्ज अदा कर रहा हूं्हूं्हूं्हूं्ऊंऊं्ऊं्ऊं।” कैसा हरामी बेटा है, मैं सोच रही थी। दूध का कर्ज, साला मादरचोद इसे दूध का कर्ज कह रहा है।
यह तो शुरुआत थी। चाटता रहा मेरी चूत और गांड़, भूखे कुत्ते की तरह। मैं मचलती रही, कुचली जाती रही उसके दानवी शरीर के नीचे। मैंने महसूस किया कि अब करीब दो तीन मिनट में ही पुनः उसका लिंग पूर्ववत सख्त हो रहा था। एक झटके में मुझे पलट दिया। उसके प्रयासों के परिणामस्वरूप मैं भी पुनः उत्तेजित हो उठी। वह जो कुछ भी कर रहा था उसमें साफ साफ पता चल रहा था कि उसे मेरी मर्जी या इनकार की तनिक भी परवाह नहीं है। सिर्फ उसे अपनी मर्जी चलानी थी, अपनी हवस की पूर्ति ही एकमात्र उद्देश्य था।
“तुझे सिर्फ अपनी मर्जी चलानी है हरामी?” मैं बोल ही पड़ी।
“हां, आज सिर्फ मेरी मर्जी चलेगी। कल तो मुझे जाना है, फिर अगली छुट्टी तक तेरे खूबसूरत तन से वंचित रहूंगा न।चुपचाप चुदती रह। करने दे मुझे अपनी मर्जी मेरी रानी मां।” कहते हुए मुझे कुतिया की पोजीशन में करके पीछे से सवारी गांठ ली उसने। मैं समझ गयी कुछ बोलना व्यर्थ है। जैसा कर रहा था वैसी होती जा रही थी। मां का प्यार भी कितना अजीब होता है। संतान की इच्छा को ठुकरा पाना कितना कठिन होता है। वैसे भी जो कुछ मेरे साथ हो रहा था, मेरे ही कर्म का फल था। झेलना ही था। रात भर कयामत की रात होनी थी। पीछे से अपने तने हुए लिंग को मेरी योनि छिद्र के द्वार पर साध कर मेरी चूचियों इतनी सख्ती से दबोचा कि मेरी चीख निकलते निकलते रह गयी और उसी पीड़ामय स्थिति में उसके तनतनाए लिंग का हौलनाक प्रहार हुआ मेरी योनि में। भक्क, और उस कसाई ने उसी झटके में सरसरा कर पूरा का पूरा लिंग मेरी योनि को ककड़ी की तरह चीरता हुआ जड़ तक उतार दिया।
“ओह्ह्ह्ह् माद्द्द्द्दर्र्र्र्र्रचोओ्ओ्ओ्ओ्ओद हर्र्र्र्र्रा्आ्आ्आ्आमजा्आ्आ्दे, कुत्ते्ए्ए्ए्ए। मर गयी रे््एए््एए््एए।” चुदी तो थी, कई बार चुदी थी, अलग लोगों से, अलग अलग तरीकों से, लेकिन ऐसी बेरहम चुदाई? बाप रे बाप, आज की बात तो कुछ और ही थी। अकस्मात लिंग के एक ही करारे वार को झेलना मानो कम था, उसके बाद के कहर बरपाते मशीनी अंदाज में भकाभक प्रहारों ने तो मुझे हलकान ही कर दिया। पागल कुत्ते की तरह लगा भंभोड़ने मुझे। लगा झिंझोड़ने मुझे। मेरी चूचियों को बेरहमी से निचोड़ते हुए कुत्ते की तरह तूफानी रफ्तार से लगा चोदने।
“मादरचोद बोलतीहै रंडी मां? हां मादरचोद हूं। हरामजादा बोलती है मां की चूत? हां हूं मैं हरामी, पता नहीं किस बाप की औलाद हूं। कुत्ता बोलती है साली कुतिया मॉम? हां मैं कुत्ता हूं, तुझ कुतिया मां की औलाद। अब ले, ओह ले, आह ले, मुझ कुत्ते का लंड ले, ओह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्।” बोलते हुए और क्रूर हो उठा। दे दनादन दे दनादन, नोचते खसोटते चोदता रहा, चोदता रहा, अंतहीन चुदाई में लीन। उसकी पाशविकता से मैं दहशतजदा थी, भयाक्रांत थी, लेकिन साथ ही साथ एक अलग ही रोमांच से भर उठी थी। एक अलग अनुभव, मानो किसी पागल बनमानुष से चुदी जा रही थी।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ्फ्फ्फ मां्मां्आ्आ्आ्आ।” पीड़ा और आनंद के मिश्रित उद्गार निकल रहे थे मेरे मुह से। यह अंतहीन चुदाई करीब पैंतालीस मिनट तक चलता रहा। इस दौरान चाहे अनचाहे मैं तीन बार झड़ी, ओह मां, और क्या खूब झड़ी। पसीने से सराबोर हो गयी थी। जब वह खल्लास हुआ, कहर ही ढा दिया था मुझ पर। मेरी मलीदा बन चुकी चूचियों को ऐसे निचोड़ते हुए खल्लास हुआ मानो चूचियों का सारा रस बाहर निकाल देगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ।” न चाहते हुए भी मेरी लंबी चीख निकल गयी।
“चीख मां की लौड़ी, चिल्ला हरामजादी बुरचोदी कुतिया मां्मां्आ्आ्आ्आ।” गुर्राता हुआ झड़ कर निढाल हो गया। मैं उसके बनमानुषी शरीर के नीचे दबी, कुचली, बेजान पड़ी रही। मगर यह कुछ ही मिनटों की राहत थी मेरे लिए। करीब दस मिनट बाद पुनः उसके निढाल शरीर में जान आने लगा। वह एक तरफ पलट जरूर गया था लेकिन मेरे थक कर चूर शरीर को अपनी बांहों की कैद से मुक्त नहीं होने दिया था। पुनः चूमने लगा मुझे।
“वाह रानी, जितना चोदो मन ही नहीं भरता।”
“चाहे इसमें मेरी जान ही चली जाय।” खीझ रही थी मैं।।
“जान जाए तेरे दुश्मनों की। तू मर नहीं सकती, हर हाल में मजा ले सकती हो और मजा दे सकती हो।” हवस की अबूझ प्यास अब भी उसकी आंखों में तैर रही थी।
“हट जंगली जानवर, ऐसा भी कोई नोचता है अपनी मां को?”
“नोचता है, कुत्ता किसी भी मादा कुतिया, चाहे उसकी मां ही क्यों न हो, नोचता है, सभी जानवर अपनी मां को भी इसी तरह नोचते खसोटते चोदते हैं, मैं कहां अपवाद हूं।”
“वाह हरामी, बहुत सीख गया है। सीख कर मुझी को सिखा रहा है कमीना।” कलपती हुई बोली।
“सिखाया किसने?” शरारत से बोला।
“ठीक है, ठीक है, अब छोड़ मुझे, हो गयी न तेरी इच्छा पूरी।”
“अभी कहां? अभी तो बाकी है, तेरी गुदा का गूदा निकालना बाकी है मेरी रांड मॉम। सबसे खूबसूरत तो तेरी गांड़ ही है। बिना चोदे कैसे छोड़ दूं?”
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं, बहुत हो गया।” कांप उठी उसकी अदम्य कामुकता को देख कर।
“हां्हां्आं्आं्आं, हां्हां्आं्आं्आं। चोदुंगा चोदुंगा, तेरी गांड़ चोदुंगा।”
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं।”
“चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊप्प्प्प्प् छिना्आ्आ्आ्आ्आल, दे दे गांड़।”
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं।”
“बोला न दे दे गांड़ चोदने।”
“नहीं्ईं्ईं्ईं्ईं्ईं।”
“साली तू ऐसे नहीं मानेगी।” बिल्कुल भूल गया था वह कि मैं उसकी मां हूं। अब तो मां भी नहीं बोल रहा था, सिर्फ, एक औरत, चुदने के लिए चूचियां और चूत लिए पैदा एक लंडखोर औरत। खीझ कर मुझे बेदर्दी से पलट दिया और दुबारा कुतिया बनने के लिए मजबूर कर दिया। मेरे पास और चारा भी क्या था, उसकी हर कुत्सित कामेच्छा को पूर्ण करने को मजबूर एक बेबस औरत बन चुकी थी।
“ओह्ह्ह्ह् बेदर्दी।”
“जो बोलना है बोल रंडी। गांड़ तो चोद कर रहूंगा।” अपने लंड के सुपाड़े को ज्यों ही मेरी गुदा द्वार से सटाया, आने वाली हौलनाक मुसीबत की आशंका से मेरा दिल बैठा जा रहा था। दम साध कर मन को कड़ा करने का प्रयास कर ही रही थी कि भच्चाक, आव देखा न ताव, बेताबी से पेल ही तो दिया अपना खंजर मेरी गुदा में। “ये ले्ए्ए्ए्ए्ए्ए्ए मेरा्आ्आ्आ्आ्आ पपलू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ अपनी गांआंआंआंआंआंड़ में हुम्म्म्म्म्म्म्मा्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्।”
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” पीड़ा, “उफ्फ्फ्फ्फ्फ,” अकथनीय पीड़ा, चीख निकालने को वाध्य हो गयी। सूखा सूखा जो ठूंस दिया था अपना लिंग उस कमीने नें। जहां मेरी दर्दनाक चीख निकली वहीं क्षितिज की खुशी भरी किलकारी गूंज उठी।
“हा हा हा हा, ओह ओह मेरी मां, मस्त मस्त गांड़, ओह्ह्ह्ह् मेरी मदमस्त गांड़ की मालकिन मॉम, स्वर्ग है स्वर्ग है तेरी गांड़ में। घुस गया घुस गया, चीखो मत मां, अब आएगा मजा गांड़ चुदाई का।”
“ओह्ह्ह्ह् राक्षस, मरी जा रही हूं मैं।”
“न न न, ऐसी अशुभ बात नहीं बोलते लंडखोर। देख मुझे कितना मजा आ रहा है, तेरी गांड़ मेरा लौड़ा चूस रही है, वाह।”
“तेरा लंड मेरा्आ्आ्आ्आ्आ गांड़ फाड़ रहा है मादरचोद।” अबतक पीड़ा से बेहाल थी।
“हट हरामजादी, फाड़ रहा है, ड्रामा कर रही है गांड़ की गुनिया। न जाने कितने लंड खा चुकी है इसी गांड़ में साली गांड़ चोदी।” दरिंदगी की पराकाष्ठा थी यह मेरे लिए। मेरी कमर को वहशी जानवर ने इतनी सख्ती से जकड़ा था कि मानो उसके पंजे मेरी चमड़ी के अंदर धंसे जा रहे हों। उसी पाशविक पकड़ के साथ उसने जो एक बार मेरी गांड़ की कुटाई शुरू की तो एकबारगी मैं दहल उठी।
“धीरे, धीरे रे कसाई। ओह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह्।” मै सचमुच परेशानी में थी। लेकिन वह तो जंगली जानवर बन चुका था। एक बार शुरू हुआ तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। रोबोट की तरह गचागच ठोके जा रहा था, कूटे जा रहा था मेरी गुदा का गूदा निकालने पर अमादा था वह।
“न न न न, अब कहां धीरे। ऐसे में बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा्आ्आ्आ्आ आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह रहा है। ले ले ले ले ले मेरा्आ्आ्आ्आ्आ लौड़ा खा अपनी गांड़ मे। ओह ओह आह आह आह। तू भी मजा ले।”
“मजा? आह्ह्ह्ह्ह् साले मजा? दर्द दे कर मजा?”
“अब चुप रह।” ओह अब कुछ ही मिनटों पश्चात मैं भी संभोग का लुत्फ उठाने में सक्षम हो गयी। दर्द काफूर हो गया। मीठा मीठा दर्द जरूर था, शायद मेरी गांड़ का अंदरूनी हिस्सा छिल गया था, इतने मोटे और लंबे सूखे सूखे लिंग को ग्रहण करने के प्रयास में। खैर जो भी हो, थोड़ी जलन के साथ लंड के घर्षण का अद्भुत आनंद आ रहा था।
“आह्ह्ह्ह्ह्, ओह्ह्ह्ह्, चोद मां के चोदू बेटे चोद, मेरी गांड़ का भुर्ता बना आह्ह्ह्ह्ह् मां के लौड़े।” अब आ रहा था मजा। ओह्ह्ह्ह्, पीड़ा के पश्चात स्वर्गीय सुख की अनुभूति। उत्तेजना के आवेश में मैं भी अपनी गांड़ उछालने लगी।
“देख, देख मेरी गांड़मरानी मां को भी आया जोश। वाह वाह, ये हुई चुदासी मां की असलीयत। हां हां हां, ऐसे ही चुदती रह मेरी कुतिया मां।” खुशी के मारे चहक उठा वह। और जोश खरोश के साथ मेरी गांड़ का तिया पांचा करने में लीन हो गया। बीच बीच में मेरी चूत में उंगली भी करता जा रहा था। आनंद देना सीख गया था मेरा चोदू बेटा। मैं अब निहाल थी, सुख के सागर में डुबी चुदी जा रही थी। यह चुदाई कुछ अधिक ही लंबा चला। कभी उल्टा करके, कभी सीधा करके, कभी गोद में उठा कर, चोदे जा रहा था मुझे। यह चुदाई विशेष कर मेरी गुदा पर ही केंद्रित थी, किंतु रह रह कर तीन बार झड़ चुकी थी इस दौरान। समय का हमें पता ही नहीं चला। मेरी गांड़ का फालूदा बनाने के बाद फचफचा कर अपने वीर्य से सराबोर कर दिया। उफ्फ्फ्फ्फ्फ वह रात, रात भर में मेरे जिस्म को निचोड़ कर रख दिया क्षितिज ने। सवेरे तक इसी तरह कामक्रीड़ा का दौर रुक रुक कर पांच बार चला। वह तो पता नहीं कहां से इतनी शक्ति पाया था, छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था मुझे। हर संभव तरीके से मेरे जिस्म का उपभोग करता रहा, करता रहा, अंततः मेरा शरीर अर्धबेहोशी की अवस्था में पहुंच गया। ऐसा लग रहा था कि तीन चार चुदाई के बाद मेरे निर्जीव शरीर को चोद कर अपनी कसर निकालने पर आमादा हो। थक कर चूर, नुची चुदी, निचुड़ी, मसली, बेजान सी, हिलने डुलने से भी लाचार वाली अवस्था थी मेरी। क्षितिज, उसकी चुदाई तो अंतहीन चलती ही चली सुबह तक। सांढ़ था सांढ़, पूरा चुदक्कड़ मशीन।
खैर, सवेरा हुआ, चुदाई बंद हुई, मेरी जान में जान आई। वह तो मुझे नोच खसोट कर, चोद चाद कर मदमस्त चाल में चल दिया। जाने के पहले मुझे चूम कर बोला, “आह्ह्ह्ह्ह् मॉम, यू आर रीयली ग्रेट। जाने का मन नहीं कर रहा है।”
“जाओगे क्यों नहीं?”
“हां जाना तो है ही।” मायूसी से बोला।
“हां, दैट्स लाईक अ गुड बॉय।”
फिर वह चला अपने कमरे में जाने की तैयारी करने के लिए। इधर मैं किसी प्रकार उठी, लड़खड़ाते कदमों से बाथरूम तक गयी और शॉवर चला कर उसके नीचे पसर गयी। पांच मिनट तक शॉवर के नीचे उसी तरह बेजान सी पसरी रही। फिर किसी प्रकार सारी शक्ति जोड़कर उठी और क्षितिज के जाने की तैयारी में व्यस्त हो गयी। नाश्ते के बाद वह जाने के पहले मुझे अपनी बांहों में कस कर जकड़ लिया और एक प्रगाढ़ चुम्बन मेरे होंठों पर अंकित कर दिया, हरिया और करीम के सम्मुख ही। बेशरम कहीं का। जितने दिन था, तूफान मचाता रहा और कल रात तो मानो पागल ही हो गया था। बिल्कुल निचोड़ कर रख दिया था मुझे।
इसके बाद फिर उसे किसी सहायता या निर्देश की आवश्यकता नहीं रही। पढ़ाई पूरी करने के पश्चात एक बड़ी गैर सरकारी इंजीनियरिंग संस्थान में सहायक अभियंता के पद पर पदस्थापित होने के दो साल बाद ही तरक्की पा कर वरीय अभियंता के पद पर आसीन हो गया। कई लड़कियां और औरतें उसकी जिंदगी में आई और गयीं, लेकिन शादी व्याह के लफड़े से दूर ही रहना पसंद था उसे, इसलिए आजतक वह आजाद पंछी बना रहा। अब भी जब जी चाहता, मेरी देह में डुबकी लगा लेता था, जो कि अबतक बदस्तूर जारी है।
उसके जाने के बाद मुझे दफ्तर भी जाना था। उसकी छुट्टी के कारण उसके साथ समय बिताने हेतु मैं भी छुट्टी में थी। निश्चित था कि काफी सारा काम मुह बाए मेरा इंतजार कर रहा होगा, उस पर रात भर के घमासान चुदाई से थक कर चूर, अनिद्रा के कारण लाल लाल आंखें लिए हुए, अलसाए शरीर के साथ मजबूरी में दफ्तर जाने को वाध्य थी। गयी मैं, और किसी तरह अपने को संभाल कर छुट्टी के दौरान जमा कार्यों को निबटाने हेतु भिड़ गयी। काफी सारे क्लाईंट्स के प्रोजेक्ट्स से संबंधित कागजातों का निरीक्षण करने के पश्चात उनमें से जिन प्रोजेक्ट्स का अंतिम स्वरूप सामने आया, उनके अनुबंध हेतु प्रारूप के कागजात तैयार करने हेतु निर्देश देने का काम संपन्न कर तनिक विश्राम की अवस्था में बैठी रही आंखें बंद किए हुए। पता ही नहीं चला कि कब मेरी आंख लग गयी। अचानक किसी की आवाज से मेरी आंख खुली। सामने कमलेश खड़ा था, मेरा सहयोगी, जो मेरे अंतर्गत मेरा कार्य देखता था। उपप्रबंधक शेखर सिन्हा जी आज नहीं थे, जो दफ्तर के कार्य से बाहर गये हुए थे, इसलिए कमलेश सीधे मेरे पास आया था। वह पैंतीस साल का सामान्य सा युवक था लेकिन अपनी प्रखर बुद्धिमत्ता की मैं कायल थी। व्यवहार कुशल और हर प्रकार के कार्यों (दफ्तर या दफ्तर के बाहर) में दक्ष था।
“नहीं, बस रात को ठीक से सो नहीं पायी, इस कारण थोड़ी आलस सी लग रही है।”
“कोई समस्या?”
“नहीं, कोई समस्या नहीं है। आज मेरे बेटे क्षितिज को वापस जाना था, उसी की तैयारी में व्यस्त थी।” कैसे बताती उसे कि क्षितिज की पाशविक कामपिपाशा को झेलती रही रात भर।
“ओके, चाय मंगा लेता हूं।”
“हां यह ठीक है।”
कमलेश ने पैंट्री में चाय का आर्डर दिया और बोला, “हां तो मैं यह कह रहा था कि चेन्नई वाला प्रोजेक्ट आपकी छुट्टी के कारण रुका हुआ है। आप बोलिए तो उनसे मीटिंग फिक्स करूँ?”
“ओह श्योर। लेकिन नायर साहब कब आ पाएंगे वह देख लो फिर बताना।” शिवालिंगम नायर, एक इंजीनियर प्रतिनिधि था उस फर्म का। सिर्फ मेल के द्वारा ही उनके प्रोजेक्ट का प्रस्ताव आया था। व्यक्तिगत तौर पर वे कभी हमारे दफ्तर नहीं आए थे।
“बताना क्या है, वे तो कब से आने की सोच रहे थे, सिर्फ आप के ज्वॉईन करने का इंतजार कर रहे थे।”
“ओह ऐसा? ठीक है फिर देख लो तुम, जैसा होता है मुझे इत्तिला कर देना।” चाहती तो थी आराम करना, लेकिन मजबूरी थी। मोटा आसामी था। बड़ा प्रोजेक्ट था। एक इजीनियरिंग फर्म की नयी शाखा खड़ी करने का प्लान था। इतनी देर में चाय आ गयी। चाय पी कर मैं थोड़ी तरोताजा महसूस कर रही थी। कमलेश भी मेरे साथ चाय पी कर नायर साहब से मीटिंग फिक्स करने अपनी कुर्सी पर चला गया। करीब बारह बजे के करीब कमलेश पुनः मेरे पास आया।
. “मैडम, कल सुबह की मीटिंग फिक्स हुई है। वैसे तो वे आज ही शाम फ्लाईट से आ जाएंगे। कल सुबह दस बजे का समय ठीक है?”
“हां हां यह ठीक है।” मैंने राहत की सांस ली। सोच रही थी कि आज जल्दी ही दफ्तर से रुखसत हो जाऊं। अगर आते ही नायर साहब मीटिंग के लिए हामी भरते तो मुझे थोड़ी परेशानी हो जाती। ऐसी मीटिंग में काफी समय निकल जाता है, क्योंकि कई सारी नयी नयी बातें निकल कर आती हैं और मीटिंग खिंचती ही चली जाती है। हमें हर पहलुओं पर गौर करना होता है और उससे संबंधित काफी सारी जानकारियों को रेकॉर्ड करना होता है, ताकि फूलप्रूफ प्लान तैयार हो सके। खैर शाम चार बजे तक मैं काफी हद तक पेंडिंग कार्यों को निबटा चुकी थी। दफ्तर से रुखसत हो कर जब मैं घर लौट रही थी तो लोआडीह चौक के पास मैंने देखा एक पागल जैसे दिखने वाले अधेड़ व्यक्ति को कुछ लोग बेरहमी से पीट रहे थे। उस पागल जैसे दिखने वाले व्यक्ति की तरफ से कोई विरोध नहीं था, चुपचाप मार खा रहा था। मैं सड़क के किनारे कार खड़ी की और उनके पास पहुंची।
“क्या बात है? क्यों मार रहे हो आपलोग इसे?” मैं उस आठ दस लोगों की भीड़ में से एक युवक से पूछी।
“यह बच्चा चोर है। बच्चा चोरी करने आया था।”
“तो पकड़ कर पुलिस को दे दो न, पीट क्यों रहे हो?”
“आप समझती नहीं हैं, जाईए अपना काम कीजिए।” दूसरा व्यक्ति बोल उठा। उस कथित बच्चा चोर की हालत बहुत बुरी थी। नाक मुह से खून निकल रहा था। बाल बिखरे हुए थे, शरीर पर अच्छे ही कपड़े थे। उसकी दयनीय अवस्था मुझ से देखी नहीं गयी।
“रुको। छोड़ो इसे।” मैंने उनसे कहा।
“नहीं छोड़ेंगे साले को। मार के यहीं लटका देंगे साले को। बच्चा चोरी करता है मादरचोद” एक आवारा टाईप युवक बोला। उसके बात करने के लहजे और लफ्जों से मुझे भी गुस्सा आ गया।
“क्या बोला?”
“बच्चा चोर बोला, मादरचोद बोला, और तुम हो कौन हमें रोकने वाली, जा अपना काम कर सा….” ढिठाई और अकड़ से बोल रहा था किंतु उससे आगे बोल नहीं पाया, मेरा एक जन्नाटेदार झापड़ उसकी बांयी गाल पर पड़ा, दिन में तारे दिख गये उसे।
“एक औरत से बात करने की तमीज नहीं और सजा देने चले हो हराम के जने। तुमलोग होते कौन हो किसी को सजा देने वाले? मैं पुलिस बुलाती हूं अभी।” गुस्सा आ गया था मुझे।
“पुलिस बुलाएगी मां की लौड़ी। अभी बताता हूं तुझे।” कहते हुए उसका साथी युवक मेरी ओर बढ़ा। मैंने आव देखा न ताव, उसके दाएं हाथ की कलाई को सख्ती से पकड़ा और पलक झपकत घूम गयी, इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, उसका शरीर हवा में उड़ता हुआ जमीन पर चारों खाने चित्त पड़ा था। यह धोबी पाट था, मेरी पीठ और कंधे के ऊपर से होता हुआ सीधा धड़ाम से जमीन पर गिर कर कराह उठा।
बाकी सभी लोग खुद ब खुद रुक गये।
“शराफत की भाषा तुम लोगों को तो समझ ही नहीं आती है। और कोई है?” मैं क्रोध से उनको घूरती हुई बोली। रणचंडी बन चुकी थी मैं। जो लोग मुझे जानते हैं उन्हें पता है कि ऐसी परिस्थिति में मैं क्या कर सकती हूं। उसके बाद फिर कोई आगे नहीं बढ़ा।
“लेकिन मैडम यह बच्चा चोर है।” सहमा हुआ सा उनमें से एक बोला।
“कैसे मालूम?”
“एक बच्चे को लेकर जा रहा था।”
“कहां है बच्चा?”
“वो रहा।” एक किनारे एक सात आठ साल का बच्चा खड़ा रो रहा था।
मैं उस बच्चे के पास गयी और बड़े प्यार से पूछी, “बेटा, क्या नाम है तेरा?” मेरे काफी आश्वस्त करने के पश्चात बोला, “जी हरीश।”
“ये कौन हैं?” मैं उस घायल व्यक्ति की ओर इशारा करके पूछी।
“बड़े पापा।” उसकी बात सुनकर सन्नाटा छा गया। वह आवारा टाईप लड़का और जमीन पर पड़ा उसका दोस्त भागने की फिराक में थे।
“पकड़ो सालों को,” मैं चीखी। बाकी लोगों ने उन्हें पकड़ लिया। “इन्हें पहचानते हो?” मैंने बच्चे से पूछा।
“हां, रमेश भईया और उसका दोस्त।”
“हूं्हूं्हूं्हूं्ऊंऊं्ऊं्ऊं, तो ये बात है।” मैंने पांडे जी को फोन करके बुला लिया और पूरी बात बता कर उन दोनों लड़कों को उनके हवाले कर दिया। बच्चे को भी पुलिस बल अपने साथ ले गयी। ये सब कांटा टोली के रहने वाले थे। उस घायल व्यक्ति के बारे में पता चला कि उसका नाम रामलाल था, पचपन साल का था। उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। शादीशुदा नहीं था, अपने पैतृक आवास पर ही छोटे भाई पर आश्रित था। पारिवारिक संपत्ति के विवाद के कारण उसके बड़े भाई और उनकी संतान उससे और छोटे भाई से बैर रखते थे। यह घटना उसी की परिणति थी।
“पांडे जी, मैं इसे हॉस्पिटल ले जा रही हूं। आप इनके घर में खबर कर दीजिएगा।” कहकर उपचार हेतु रामलाल को अपनी कार में लेकर हॉस्पिटल चली गई। हॉस्पिटल में आवश्यक जांच मे कोई गंभीर चोट नहींं पाई गयी, अतः प्राथमिक उपचार के पश्चात उसे छुट्टी मिल गयी। इतने में उसका छोटा भाई भी हॉस्पिटल पहुंच गया। उसका नाम घनश्याम लाल है। अपने भाई की कुशलता जानकर मेरा शुक्रिया अदा करने लगा।
“शुक्रिया मेरा नहीं, ऊपर वाले का कीजिए, जिस कारण मैं मौके पर पहुंची, वरना वे बदमाश इनकी क्या हाल करने वाले थे यह तो ऊपरवाला ही बेहतर जानता है।” कहकर मैं वहां से चलने लगी, लेकिन घनश्याम जिद करने लगा कि मैं उनके घर चलूं। मजबूरन मुझे उनके घर जाना पड़ा। चाय पी कर मैं वहां से निकल ही रही थी कि रामलाल मेरी चुन्नी पकड़ लिया।
“यह क्या रामलाल जी, छोड़िए मेरी चुन्नी।”
“नहीं, आप मत जाईए।” रामलाल बच्चों की तरह बोलने लगा।
“रामलाल जी, मुझे अपने घर जाना है।” बच्चे की तरह समझा रही थी मैं।
“नहीं, आप यहीं रुक जाईए ना।” किसी अबोध बालक की तरह ठुनकते हुए बोल उठा वह।
“ऐसे थोड़ी न होता है। मेरे घरवाले इंतजार कर रहे हैं ना।” मैं मनुहार करने लगी।
“तो मैं भी चलूंगा आपके साथ।”
“दादा, बहनजी से ऐसे जिद न कीजिए।” घनश्याम बोल उठा।
“जेठ जी, आप मत जाईए।” यह हरीश की मां की आवाज थी। वह मझोले कद की भरे पूरे शरीर और गेहुंए रंगत वाली खूबसूरत औरत थी। उसकी आंखों में एक अबूझ चिंता थी। उस वक्त मैं समझ नहीं पाई।
मैं पशोपेश में थी कि करूं तो क्या करूं। अंततः मैं घनश्याम जी से बोली, “घनश्याम जी, ऐसा करते हैं कि आप भी साथ चलिए, फिर मेरे घर से इन्हें वापस ले आईएगा। ड्राईवर आप दोनों को वापस छोड़ देगा।”
“नहीं प्लीज इन्हें मत ले जाईए।” हरीश की मां पुनः बोली।
“नहीं, मैं तो जाऊंगा, बस।” बच्चों की तरह जिद पर उतर आया वह। घनश्याम बेबस हो गया और मैं भी थक हारकर रामलाल को अपने साथ ले चलने को राजी हो गयी। फिर हम साथ ही घर आए। रात हो रही थी, सो करीब घंटे भर बाद घनश्याम जी लौटने की बात करने लगे, लेकिन रामलाल वापस लौटने को तैयार ही नहीं हो रहा था। अंत में हरिया ही बोला, “ठीक है, इन्हें आज यहीं रहने दो। कल करीम इन्हें छोड़ आएगा।” मन मसोस कर रामलाल को अकेले ही लौटना पड़ा।
रामलाल खुश हो गया। दिमागी तौर पर वह मासूम बच्चा लग रहा था किंतु शारीरिक तौर पर अच्छा खासा हट्ठा कट्ठा स्वस्थ पुरुष था। कद भी करीब छ: फुट था। बेतरतीब हल्की दाढ़ी और मूछें थीं। सर पे घुंघराले बाल थोड़े लंबे और बिखरे हुए थे।
“हरिया चाचा, आप इन्हें हाथ मुंह धुला कर डाईनिंग टेबल पर ले आईएगा। तबतक मैं भी फ्रेश हो कर आती हूं।” कहकर मैं अपने कमरे की ओर बढ़ी।
“नहीं, मैं आपके साथ चलता ह़ू।” उसके बचपने पर मुझे क्रोध नहीं आया, तरस आया।
“नहीं रामलाल, आप मर्द हैं न, मर्दों के साथ जाईए।” मैं समझाती हुई बोली।
“नहीं, मर्द मुझे परेशान करते हैं। मैं तो आपके साथ ही चलूंगा।” बच्चे की तरह ठुनकते हुए बोला वह।
“ओके बाबा ओके, चलिए।” मानसिक रूप से बच्चा ही तो था वह। मैं बिना कि सी आशंका के साथ उसे अपने कमरे में ले गयी। हाथ मुह धुला कर बोली, “अब आप चलिए खाना खाने। मैं फ्रेश हो कर आती हूं।”
“नहीं, मैं आपके साथ ही चलूंगा।”
“अरे बाबा मुझे कपड़े बदलने हैं। आप के सामने कैसे बदलूं। आप मर्द हैं और मैं औरत हूं ना। मुझे शर्म नहीं लगेगी भला?” मेरे समझाने पर बड़ी मुश्किल से वह बाहर गया। रात का खाना खाने के समय भी वह बच्चों की तरह ही खाना खाता रहा। खाना खाने के पश्चात अब सोने के लिए समस्या यह हुई कि वह हरिया के कमरे में सोने के लिए तैयार नहीं हो रहा था।
“ठीक है फिर आप उस कमरे में सो जाईए।” क्षितिज के कमरे की ओर ले गयी।
“अकेले?”
“हां तो?”
“डर लगता है मुझे अकेले में।”
“इतने बड़े होकर भी अकेले में डर लगता है? बहादुर बनिए अब तो।” हमने बड़ी मुश्किल से समझा बुझाकर उस कमरे में सोने के लिए राजी किया। सोने के पहले कपड़े बदलने के लिए उसके पास कपड़े नहीं थे, अतः हरिया की लुंगी उसे दे दी गयी। फिर हम सब अपने अपने कमरे में सोने चले गए।
मैं काफी थकी हुई थी, लेकिन बिस्तर पर पड़ने के बावजूद निद्रा पता नहीं क्यों मेरी आंखों से कोसों दूर थी। मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही कि किसी करवट नींद आ जाए, लेकिन सारा प्रयास व्यर्थ था। रात का करीब ग्यारह बज रहा था। अचानक मैं चौंक उठी। मेरे पैरों पर किसी मर्दाना हाथ का स्पर्श हुआ। मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी।
“कौन?”
“मैं हूं।” यह आवाज रामलाल की थी।
“अरे आप क्या कर रहे हैं यहां?” अकचका कर बोली मैं। लगता था मैं थकावट की अधीकता से बेध्यानी में शयनकक्ष का द्वार अंदर से बंद नहीं की थी।
“पैर दबा रहा हूं और क्या।” वह मासूमियत से बोला।
“नहीं, आप सोने जाओ और मुझे भी सोने दो।” समझाते हुए बोली मैं।
“आप सोईए ना। मुझे आपका पैर दबाना है।”
“लेकिन क्यों?”
“आपको नींद नहीं आ रही है ना? आप थकी हुई हैं। आपने मेरी रक्षा की है। मुझे आपकी सेवा करनी है।”
“नहीं, आप अपने कमरे में जाईए।”
“नहीं, मैं नहीं जाऊंगा। मैं आपका पैर दबाता रहूंगा, जबतक आपको नींद नहीं आती।” वह जबर्दस्ती मेरे पैर दबाने लगा। मेरे पैर दबाते दबाते धीरे धीरे मेरे घुटनों की ऊपर उसका हाथ बढ़ने लगा।
“हटिए, यह आप क्या कर रहे हैं?” मैं मना करने लगी। विरोध करने लगी, लेकिन यह सब मुझे अच्छा भी लग रहा था। शारीरिक थकान दूर होती महसूस हो रही थी। काफी राहत मिल रही थी।
“नहीं, आप आराम से सो जाईए। मैं तबतक पैर दबाता रहूंगा जबतक आपको नींद नहीं आ जाती।” वह जिद पर उतर आया।
“ठीक है बाबा ठीक है, लेकिन यह आप ऊपर क्यों दबा रहे हो? सिर्फ नीचे दबाईए।” मैं ने उसकी जिद देख कर हामी भर दी।
“नहीं, मैं ऊपर भी दबाऊंगा।” वह अब मेरी जांघों तक आ पहुंचा था।
“हाय राम, यह आप ऊपर क्यों दबा रहे हो?” मैं चौंक उठी।
“मुझे अच्छा लग रहा है।” दबाता रहा दबाता रहा और मैं मना करती रह गयी। वह मानने का नाम ही नहीं ले रहा था। वास्तव में अब मुझे भी अच्छा लग रहा था। सारी थकान छूमंतर हो गयी थी। नींद जो आ नहीं रही थी आंखों में, अब आंखें उनींदी हो गयींं और मुझे झपकी आने लगी। तभी मैं चौंक उठी। रामलाल के हाथ मेरी नाईटी के अंदर जांघों से होते हुए कब मेरी योनि तक पहुंचे, पता ही नहीं चला। पैंटी के ऊपर से मेरी योनि के ऊपर उसके हाथों के स्पर्श ने मुझे चौंकने पर मजबूर कर दिया।
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ, हट, वहां नहीं, वहां नहीं, ओह नीचे, नीचे।” मैं हड़बड़ाहट में उठ गयी। मैं अपने हाथ से उसके हाथ झटक देने की कोशिश करने लगी, लेकिन शायद मेरी कोशिश कमजोर थी या अंदर से इच्छाशक्ति का अभाव था, असफल रही। रामलाल की आंखों में अब मैं देख रही थी बचपने वाली मासूमियत नहीं थी।
“क्या आपको अच्छा नहीं लग रहा है?”
“छि:, औरत के शरीर पर उधर हाथ नहीं लगाया जाता है।” कमजोर आवाज में बोली।
“मगर हमारे घर में हरीश की मां सरोज तो बोलती है, बहुत अच्छा लगता है। हमारे बगल वाली महमूद की मां रबिया भी बोलती है बहुत अच्छा लगता है।” हतप्रभ रह गयी मैं यह सुनकर। समझ नहीं आ रहा था क्या बोलूं। तो ये स्त्रियां रामलाल की मासूमियत भरी मर्दानगी का खूब लुत्फ उठा रही हैं। वाह रे दुनिया, मैं तो समझ रही थी मेरे अलावा कुछ इक्के दुक्के लोग ही अनैतिक रिश्तों में लिप्त हैं। यहां तो ढंके छिपे, घर घर की कहानी है। हरीश की मां, मतलब रामलाल के छोटे भाई घनश्याम जी की पत्नी, मतलब जेठ और बहू के बीच यह चल रहा है। मैं उत्सुक हो उठी यह सब जानने के लिए। नींद काफूर हो गयी मेरी। कामुकता का नाग फन उठाने लग गया।
“लेकिन यह तो गलत है ना।”
“वे तो बोलते हैं इसमें गलत कुछ नहीं है।”
“बस यही या आगे भी कुछ करते हैं?” कामोत्तेजना मुझ पर हावी हो रही थी।
“हां, हां, आगे भी।”
“आगे क्या?” मेरी सांसे तेजी से चलने लगीं। अब उसने मेरी योनि को पैंटी के ऊपर से सहलाना शुरू कर दिया था।
“आगे? वे लोग अपने कपड़े उतार देते हैं।”
“फिर?”
“फिर मुझे भी लंगटा कर देते हैं।”
“फिर?” अब मेरी आवाज लरजने लगी थीं।
“फिर मुझसे कहते हैं मेरी बूर चाटो।”
“ओ्ह्ह्ह्ओओ, फिर? आपको पता है, बूर क्या है?
“हां, यही तो है बूर, सरोज इसे बूर कहती है और रबिया इसे चूत कहती है,” मेरी योनि को सहलाते हुए बोला। “आप भी कपड़े उतारिए ना।”
“हाय राम, नहीं नहीं, शरम आती है।” मैं झूठ मूठ ही बोल उठी।
“इसमें क्या शरम, वे लोग तो आराम से कपड़े उतार कर लंगटी हो जाते हैं और मुझे भी लंगटा कर देते हैं।”
“हे भगवान, फिर?” उसकी बातें सुन कर गनगना उठी थी।
“नहीं, ऐसे नहीं, पहले आप भी लंगटी हो जाईए, मैं भी लंगटा हो जाता हूं। फिर बताऊंगा।” उसकी आंखों में अब जानी पहचानी वासना की भूख स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थीं। यह क्या कह रहा था वह? क्या इसे स्त्री संसर्ग का अनुभव था? अर्धविकसित दिमाग वाला यह पुरुष क्या संभोग सुख से परिचित था? उसकी बातों से तो कुछ ऐसा ही लग रहा था।
“नहीं।”
“हां, होना पड़ेगा लंगटी आपको। देखिए मैं भी लंगटा हो जाता हूं।” इससे पहले कि मैं कुछ बोलती, इतना कह कर उसने अपना कुर्ता निकाल फेंका, लुंगी खोल फेंकी। ओह भगवान! विशाल दानवाकार गठा हुआ शरीर और उतना ही विशाल उसका लिंग। ताकरीबन आठ इंच लंबा गधे जैसा लिंग और वैसा ही मोटा, बिना उत्तेजना की अवस्था में, दोनों पहलवानी जंघाओं के मध्य बेहद डरावनी सूरत में झूलता हुआ, उत्तेजित अवस्था में इसका आकार क्या होगा, कल्पना से ही सिहर उठी मैं। नहीं, संभोग की लालसा जाग उठी थी लेकिन अब लग रहा था यह मुझसे नहीं होगा। दहशत में आ गयी मैं। इससे संभोग मतलब मुसीबत को आमंत्रण देना होता। लेकिन उसने अब मेरी नाईटी को खींचना आरंभ कर दिया, “हो जाईए आप भी लंगटी।”
“नहीं, बस हो गया, अब आप सोने जाईए।” मुझे महसूस हो रहा था घटनाक्रम किस तरफ जा रहा है। दरअसल मैं उसके भयावह लिंग को देखकर घबरा गयी थी।
“ऐसे कैसे? बताता हूं ना, फिर क्या होता है।”
“नहीं।” मैं अब सचमुच में डर गयी थी। उसका लिंग अब तनाव की स्थिति में आ रहा था।
“आप को बताए बिना मैं छोड़ूंगा नहीं।” अब जबर्दस्ती पर उतर आया वह। जोर जबर्दस्ती पर उतर आया वह। मैं उसकी शक्ति के आगे कुछ कर नहीं पा रही थी। स्थिति यहां तक पहुंचने के लिए वास्तव में दोषी मैं ही थी। न मैं उसे यहां तक पहुंचने की छूट देती न बात यहां तक पहुंचती। अब परिस्थिति मेरे नियंत्रण से बाहर हो चली थी।
“नहीं मुझे नहीं जानना।” विरोध करने लगी मैं।
“मगर मुझे बताना है।” जिद पर उतर आया वह।
“जबर्दस्ती?” भयभीत हो कर बोली।
“हां, जबर्दस्ती।” बचपने की जगह उसके चेहरे पर वासना की चिरपरिचित भूख दिखाई दे रहा था मुझे। यह उसकी पाशविक शक्ति थी, जिस कारण मुझ पर छाता जा रहा था। मुझे पता था कि पागलों की शक्ति के आगे आम इन्सान की एक नहीं चलती। भयभीत हो गयी मैं, अपनी दुर्गति की कल्पना मात्र से सिहर उठी थी।। मेरे मना करने का कोई असर नहीं हो रहा था उस पर। छीना झपटी करते करते पहले मेरी मेरी नाईटी को, फिर मेरी पैंटी और ब्रा को ऐसे मेरे तन से अलग किया कि मैं भौंचक्की रह गयी। पूर्णतः नग्न अवस्था में उसके दानवी तन के आगे परकटी पंछी की तरह फड़फड़ा कर रह गयी। चीख कर हरिया और करीम को बुला सकती थी, किंतु पता नहीं मैं ऐसा क्यों नहीं कर पा रही थी या करना नहीं चाह रही थी। उसके लिंग का आकार मुझे डरा भी रहा था और आकर्षित भी कर रहा था। दुविधा की स्थिति थी मेरे लिए। अब तक वह मेरी योनि को चाटना आरंभ कर चुका था। वह बिल्कुल किसी कुत्ते की तरह चपर चपर चाट रहा था। मेरा शरीर शनैः शनैः अवश होता जा रहा था।
“बस बस्स्स्स्स्स, हो गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह,” बड़ी मुश्किल से बोली मैं।
“नहीं, अभी तो शुरू हुआ है। फिर मुझे अपनी चूचियों को चुसवाते हैं, ऐसे।” कहकर मेरी चूचियों पर धावा बोला और चप चप चूसने लगा। मुह में भर कर चूसने लगा।
“न्न्न्न्न्नननहींईंईंईंईं, ओ्ओ्ओह्ह्ह। बस करो, उफ्फ्फ्फ्फ्फ।” मैं सिसक पड़ी।
“आगे तो सुनिए। पहले मेरा लंड पकड़ कर खेलिए। वे मेरा लंड पकड़ कर खेलते हैं।” कहते कहते मेरे हाथ में अपना भीमकाय लिंग थमा दिया। बाप रे बाप, उसका गरम और सख्त लिंग अब अपने पूरे शबाब पर था। करीब ग्यारह इंच लंबा हो चुका था और मोटा इतना कि मेरी मुट्ठी में भी नहीं आ रहा था। भयावह, दहशतनाक, आतंकित करने वाला आकार प्राप्त कर चुका था उसका लिंग।
“ओह मां्मां्आ्आ्आ्आ, यह क्या्आ्आ्आ्आ है?”
“लंड है लंड। सरोज इसे लंड कहती है और रबिया इसे लौड़ा कहती है।”
“तो यह भी पता है?”
“हां, जब वे मेरे लौड़े से खेलती हैं तो मुझे बड़ा मजा आता है।”
“उफ्फ्फ्फ्फ्फ, बस करो, आह्ह, मेरे बूर को चाटना बंद करो।” मैं तड़प कर बोली।
“मगर मुझे अच्छा लग रहा है। आपकी चिकनी चमचमाती चूत बड़ी है लेकिन बहुत सुंदर है, ठीक रबिया की बेटी शहला की तरह।” चौंक उठी मैं।
“तो, तो रबिया की बेटी को भी? कितनी उमर है उसकी?”
“पता नहीं, कॉलेज में पढ़ती है।” यह पागल तो बहुत आगे निकल गया है। मैं समझ गयी कि यह अर्धविक्षिप्त और अर्धविकसित दिमाग के बावजूद स्त्री संसर्ग सुख से खूब परिचित है। मेरी उत्तेजना और उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। उसकी असीमित विक्षिप्त शक्ति से बेबस मैं सिर्फ कसमसा पा रही थी, मेरे उरोजों को पकड़ कर भोंपू की तरह दबा रहा था और योनि को कुत्ते की तरह चाटता चूसता मुझे भी पागल किए दे रहा था। उत्तेजना के अतिरेक में मैं न चाहते हुए भी आनंद विभोर स्खलन में डूब गयी।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स्स्स्स ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊफ्फ्फ्फ्फ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह।” थरथर कांपती झड़ती चली गयी। लंबी लंबी सांसें लेने लगी।
“हां हां ऐसी ही होती हैं वे भी।” वह मेरी स्थिति को भांप कर बोला।
“फिर? फिर क्या करने को बोलती हैं?” अपनी सांसों पर काबू पाते हुई बोली।
“फिर चोदने को बोलती हैं।”
“चोदने?” चकित हो कर बोली।
“हां चोदने।”
“हाय, कैसे?” अनजान बनती हुई बोली।
“लंड को बूर में ठूंस कर चोदने।”
“बा्आ्आ्आ्आप रे बा्आ्आ्आ्आप, इतने बड़े्ए्ए्ए्ए्ए्ए लंड से?” भयभीत स्वर में बोल उठी मैं।
“हां, हां।”
“ऐसा कैसे संभव है?”
“आसान है।”
“विश्वास नहीं होता।”
“विश्वास हो जाएगा आपको।”
“कैसे?”
“अभी चोद कर दिखाता हूं।” कहते कहते मेरी टांगों को जबर्दस्ती फैला कर चोदने को तत्पर हो गया।
“नहींईंईंईंईंईंईंई।” आतंक के मारे घुटी घुटी चीख निकल गयी। हिलन डुलने में असमर्थ थी।
“हांआंआंआंआंआं।” अपने भीमकाय लिंग को मेरी योनि छिद्र के मुख पर किसी माहिर चुदक्कड़ की भांति स्थापित किया।
“नहींईंईंईंईंईंईंई” भय के मारे हलकान हो रही थी।
“हांआंआंआंआंआं, लीजिए, हू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊम्म्म्म्म।” बेदर्दी से उसका विशाल, गधे की तरह भयावह लिंग मेरी योनि को अपनी क्षमता के बाहर फैला कर चीरता हुआ, घुसाता चला गया। एक तिहाई तो एक ही धक्के में अंदर हो गया। बेइंतहा पीड़ा, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, मेरी आंखें फटी की फटी रह गयी।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, नननननहींईंईंईंईं।” मैं तड़प उठी दर्द के मारे। तड़प भी तो नहीं सकती थी। उस पीड़ा से अभी संभल भी नहीं पाई थी कि एक और हौलनाक धक्का लगा, और लो, मेरी योनिमार्ग को विशाल गुफा में तब्दील करता हुआ पूरा का पूरा लिंग उतार दिया।
“ओ्ओ्ओह्ह्ह मां्मां्आ्आ्आ्आ, मर गयी्ई्ई्ई्ई्ई।” दबी दबी दर्दनाक चीख निकल गयी। ऐसा लगा, फट कर बुर का भोंसड़ा बन गया हो।
“दर्द हुआ?”
“हां मादरचोद हां, दर्द से मरी जा रही हूं।” पीड़ा के अतिरेक से मेरी आंखें भर आई थीं। उसके लिंग से बिंध कर हिलने डुलने में भी असमर्थ हो गई थी। हिलने की कोशिश में मैं खुद को और पीड़ा दे बैठी। थक हार कर खुद को परिस्थिति के हवाले कर दिया।
“पहली बार सरोज, रबिया औल शहला भी ऐसा ही बोली थी। शहला तो बेहोश हो गयी थी।”
“मना नहीं किया किसी ने मां के लौड़े?” मैं किलकिला उठी।
“मना किया था। रोकने की कोशिश की थी, लेकिन मैं माना नहीं।”
“क्यों? हरामजादे क्यों साले बुरफाड़ू लंड वाले मादरचोद, क्यों? आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” दर्द से बेहाल मैं बोली।
“क्योंकि पहली बार सरोज की चूत चोदने में मुझे बड़ा मजा आया। सरोज पहले डरी, लेकिन उसी ने मुझे चोदने के लिए उकसाया था, सो चोदा, जम कर चोदा। पहले तो खूब रोई चिल्लाई, फिर थोड़ी देर बाद खूब मजे से चुदवाने लगी। फिर तो वह मेरे लंड से ही चुदवाने लगी। बोलती है बस, मेरी चूत आपके लंड के लिए ही है।” मेरी गालियों से बेपरवाह वह बोलता जा रहा था और मैं दर्द से बिलबिलाती सुनती जा रही थी। सुनने की इच्छा तो अवश्य थी लेकिन इस वक्त जो मरणांतक पीड़ा मैं झेल रही थी, वही मुझ पर हावी थी। झेलने के अलावे मैं कर भी क्या सकती थी। उंगली तो मैंने ही पकड़ाई थी, उसकी मासूमियत का लाभ लेने के लालच में। मुझे क्या पता था कि उंगली पकड़ कर पहुंचा पकड़ने लगेगा वह। मासूमियत के स्थान पर पुरुष जनित वासना की भूख उसकी आंखों में नाच रही थी। खैर अब पछताये क्या होत है जब चिड़िया चुग गई खेत। कुछ पलों की अकथनीय पीड़ा धीरे धीरे कम होने लगी थी अब। मुझे भी कुछ आराम मिलने लगा था। आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय, उसका ग्यारह इंच का उतना मेटा लंड मेरी चूत में पैबस्त था, और मैं धीरे धीरे पीड़ामुक्त होती जा रही थी। उसने धीरे धीरे लंड बाहर निकाला और फिर गप्प से ठोक दिया। हिल उठी मैं अंदर तक रोमांच से। धीरे धीरे उसने मेरी चूतड़ के नीचे हाथ डाल कर चोदना आरंभ किया और चोदते चोदते बोलता भी जा रहा था अपने चोदने का अनुभव। पीड़ा अब अद्वितीय आनंद में परिवर्तित हो रहा था। मैं उसकी चुदाई के अनुभव को सुनती, उत्तेजित होती चुदती जा रही थी। पीड़ा अब भी थी किंतु अब उस पीड़ा पर संभोग का सुखद अहसास हावी हो रहा था।
“आह ओह आपकी चूत का तो कहना ही क्या। अबतक की सबसे मजेदार चूत। बड़ा मजा आ रहा है चोदने में। ओह मैडम, आह मैडम।” गचागच चोदने में मगन था वह। मैं उसके दानवी लंड से चुदती आनंद मगन अपने को पूर्ण रूप से उसके लिए समर्पित हो गयी।
“आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह, पहले चुदाई खतम कर मां के लौड़े, फिर बताना बाकी किस्सा, ओह्ह्ह्ह्ह, आज पहली बा्आ्आ्आ्र इतने बड़े लंड से चुद रही हूं, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह। मजा्आ्आ्आ्आ आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, बहुत मजा आ रहा है।” अब मेरी चूत उस विकराल लिंग के आनुरूप फैल कर सुगमतापूर्वक गपागप खाए जा रही थी लोढ़ा सरीखा लौड़ा। “चोद हांआंआंआंआंआं हांआंआंआंआंआं चोद पागल चोद कमी्ई्ई्ई्ई्ईने्ए्ए्ए्ए, आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।” मैं बोल रही थी मस्ती में भर के।
“हां हांआंआंआंआंआं मैडम, मगर ऐसे नहीं ऐसे,” उसने मेरे दोनों पैरों को कंधे पर रख कर दनादन चोदना चालू किया तो उसका पूरा लंड जड़ तक मेरी चूत में घुसता निकलता रहा। ऐसा लगने लगा कि मेरा गर्भाशय भी अब फटी तब फटी हो रही थी। जो भी हो, बड़ा मजा आ रहा था। पागल तो था ही, जानवर भी बन गया था। पूरी ताकत से मुझे रौंद रहा था। मेरा बिस्तर तक चरमरा उठा था। मेरी चूचियों को मुंह में भर कर चूस रहा था, काट रहा था, मेरे शरीर को दबोच कर निचोड़ रहा था, भंभोड़ रहा था, चूत की चटनी बना रहा था, भच्च भच्च, फच्च फच्च, और मैं उस पागल की जंगली जानवरों की तरह चुदाई में आनंदमग्न थी। जीवन में पहली बार ऐसी भयानक चुदाई नसीब हुई। करीब घंटे भर किसी पागल कुत्ते की तरह चोदता रहा चोदता रहा। उस दौरान मैं कम से कम तीन बार झड़ी। उफ्फ्फ्फ्फ्फ क्या चुदाई थी वह। एक घंटे की अथक चुदाई के बाद जब वह झड़ने लगा, मुझे दबोच कर ऐसे चिपका लिया मानो मैं कोई छिपकली हूं। मेरी सांसें मानो कुछ पलों तक रुक गयी हों।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्,” हांफते हांफते मुझ पर ढह गया झड़ कर, किसी भैंसे की तरह डकारता हुआ। मजा आ गय्य्य्य्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह।
“बहुत बड़े चुदक्कड़ हो, मार ही डाला मुझे। सच्ची बड़ा्आ्आ्आ्आ मजा आया।” मैं पगली चूम उठी उसे।
“सब ऐसा ही बोलते हैं।”
“सब मतलब?”
“सरोज, रबिया और शहला।”
“ओह्ह्ह्ह्ह, ठीक है, कल सुनुंगी उनकी बातें, अब सो जाओ मेरे पगले चोदू राजा” मैं उनींदी आवाज में बोली।
उसके पश्चात मैं और वह एक दूसरे के नंगे जिस्म से से चिपके चिपके ही नींद के आगोश में चले गये।
सवेरे उठ ही नहीं पा रही थी। सारा बदन तोड़ कर रख दिया था उस पागल चुदक्कड़ नें। चूत को तो करीब करीब फाड़ ही दिया था। सारी शक्ति इकट्ठा कर उठ तो गयी, किंतु चलने की कोशिश में मेरे पांव थरथरा रहे थे। चूत फूल कर कुप्पा हो गयी थी और मीठा मीठा दर्द हो रहा था। हल्का सा मुझे पांव फैला कर चलना पड़ रहा था। वह पागल अब भी नंग धड़ंग भैंसे की तरह बिस्तर पर फैला खर्राटा भर रहा था। उसका सुषुप्त लिंग अब भी आठ इंच लंबा, बड़ी मासूमियत से सो रहा था। साला, चुदाई का यही भयावह औजार, जो रात को शेर बना मेरी चूत के अंदर तांडव कर रहा था, अभी देखो, कैसे चूहा बना हुआ था।
उस वक्त सुबह का सात बज रहा था। अमूमन मैं छ: बजे उठती हूं, आज सात बजे तक सोती रह गयी। हड़बड़ा कर रामलाल को उठाने लगी। “रामलाल जी, उठिए, सवेरा हो गया है।”
मैं उसके ऊपर गिर पड़ी, लेकिन संभल कर बोली, “नहीं, अभी नहीं, मुझे तैयार हो कर ऑफिस जाना है।”
“ऑफिस मत जाईए।”
“बच्चों की तरह बात मत कीजिए।”
“नहीं, चोदने दीजिए।”
“हटिए बदमाश, देखिए आपने मेरी क्या हालत कर दी है? पहली बार तो इतने मोटे और लंबे लंड से चुदी हूं, रात भर में थोडा़ आराम हुआ तो बड़ी मुश्किल से चल पा रही हूं, अब चुदी तो ऑफिस जा नहीं पाऊंगी। रात को चोद कर मन नहीं भरा क्या?”
“नहीं भरा। आप बड़ी खूबसूरत हैं, आपका बदन बहुत सुंदर है, आपकी बूर बहुत अच्छी है। मन करता है चोदता रहूं चोदता रहूं आपको।”
“छि: पागल। मुझे ऑफिस जाना जरूरी है मेरे लंडराजा। अब छोड़िए ना प्लीज।” उसे किसी बच्चे की तरह चूमते हुए समझा बुझा कर उठाई और अपने कमरे में भेजी। फिर मैं तैयार होने चली। ऑफिस जाते वक्त रामलाल फिर मेरे रास्ते में आ गया।
“मैं शाम को इंतिज़ार करूंगा।” उसकी आंखों में आग्रह और अबूझ तृष्णा परिलक्षित हो रही थी। तो क्या यह अपने घर नहीं जाएगा? कोई बात नहीं, ऑफिस से लौटकर उसे घर भेजने की कोशिश करूंगी। वैसे मुझे उसके साथ रात बिता कर यादगार अनुभव हुआ था, बड़ा रोमांचक, आनंददायक। गजब की चुदाई हुई थी मेरी। दर्दनाक शुरूआत के पश्चात अद्भुत आनंद। एक लालच मन में था मेरे। उसके सेक्स जीवन की कथा भी सुनने की इच्छुक थी।
ऑफिस पहुंचते ही कमलेश ने मुझे बताया कि चेन्नई वाले क्लाईंट, एंटरप्राइजेज का प्रतिनिधि शिवालिंगम नायर ठीक दस बजे ऑफिस पहुंचेंगे। मैंने घड़ी देखी, उस वक्त नौ बज कर पांच मिनट का समय हो रहा था। मेरे पास पचपन मिनट का समय था उनके प्रोजेक्ट से संबंधित दस्तावेजों और जानकारियों का पुनर्अवलोकन करने का। यथासमय नायर जी ऑफिस पहुंचे और कमलेश सीधे उन्हें मेरे कक्ष में लेकर आया। स्मार्ट, आकर्षक अधेड़ व्यक्ति थे वे, करीब पैंतालीस पचास की उम्र के, कद ताकरीबन पांच फुट दस इंच का होगा, चेहरा सांवला लेकिन परिपक्वता और बुद्धिमत्ता स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी, शालीन और शुद्ध व्यवसायिक आचार विचार के मालिक थे वे।
“गुड मॉर्निंग मैडम।”
“गुड मॉर्निंग, आईए नायर साहब, हैव अ सीट,” मैंने सामने की कुर्सी की ओर इंगित करते हुए कहा। “कमलेश तुम भी बैठ जाओ।”
“आई होप, आपने हमारा एक्सटेंशन प्लान तो देख लिया होगा।” सीधे मुद्दे पर आया।
“जी हां। आपकी कंपनी सुंदरम ऑटो प्राईवेट लिमिटेड तो काफी नामी कंपनी है, इस एक्सटेंशन की आवश्यकता क्यों पड़ी?”
“कस्टमर्स की डिमांड, हम चार ऑटो मान्युफैक्चरर्स को पार्ट्स सप्लाई करते हैं। आने वाले फाईनांन्शियल ईयर में उनका ऑटो प्रोडक्शन का टारगेट बढ़ गया है। अगर हम उनकी डिमांड नहीं पूरी कर सकेंगे तो वे दूसरे सप्लायर्स की तरफ भागेंगे, इसलिए हम पहले से उसके लिए तैयार रहना चाहते हैं ताकि हमारे कस्टमर हमें छोड़कर दूसरे सप्लायर्स की तरफ न भागें।”
“ओह आई सी। आपको अंदाजा है कि इस प्लान में कितना खर्च होने वाला है?”
“लगभग सौ करोड़।”
“लगभग सही है आपका अंदाजा। हमने आपके एक्सटेंशन प्लान पर काम शुरू कर दिया है। चूंकि यह बड़ा प्लान है, इसलिए थोड़ा टाईम लगेगा और साथ ही साथ आप लोगों के साथ मीटिंग्स होती रहेगी। आपके जो इंजीनियर्स इस प्लान में कार्य कर रहे हैं, उनसे हम संपर्क में रहेंगे।”
“कितना टाईम?”
“देखिए, वैसे तो हमने लगभग पूरे प्लान का खाका तैयार कर लिया है, फिर भी फाईनल टच देने के लिए आप लोगों के टेक्निकल एक्सपर्टीज की आवश्यकता होगी, हालांकि हमारी टीम में भी एक्सपर्ट्स हैं, लेकिन ज्वॉईंट कार्य करने से नतीजा बेहतर निकलेगा और कोई चूक होने से हम बचेंगे, जिससे प्रोजेक्ट का खर्च बजट से बाहर न भागे।”
“राईट, अच्छा सुझाव। I am impressed (मैं प्रभावित हूं)। हम एक टीम की तरह काम करेंगे। आई होप, दो हफ्ता काफी है फाईनल प्लान तैयार होने के लिए।”
“फाईनल प्लान तैयार होने के बाद भी काम शुरू होने से लेकर खत्म होने तक हम लगे रहेंगे।”
“सुनकर अच्छा लगा। आपलोग प्योर प्रोफेशनल हैंं।”
“हम ग्राहक की संतुष्टि ही नहीं, ग्राहकों की खुशी पर विश्वास करते हैं। हम बाद में भी फ्री ऑफ कॉस्ट सर्विस देते हैं।” इस प्रोजेक्ट में हमारी फीस बीस लाख थी, जिस पर वे रजामंद थे। सब कुछ तय होने के बाद हमारी मीटिंग समाप्त हुई।
“ओके, डन, थैंक्स, नाईस मीटिंग। मैं आज रुक कर कल सवेरे वापस जाऊंगा। लौट कर हम रेगुलर कॉंंटैक्ट में रहेंगे।” उसने खड़े होकर मुझसे हाथ मिलाते वक्त मेरा हाथ दबा दिया। मैं चौंक उठी। वह अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ बोला, “beauty with brain (बुद्धि के साथ सुंदरता)। सर्विस वाली बात भी अच्छी लगी। See you again (फिर मिलेंगे)।”
“ओह श्योर।” मैं असमंजस में थी उसके व्यवहार और अंतिम कमेंट से। प्रोजेक्ट के बारे में तो आश्वस्त थी लेकिन नायर का व्यक्तित्व एक पहेली था। जो भी था, नुकसानदेह तो कत्तई नहीं था। खैर मैं उन्हें छोड़ने बाहर तक आई।
बाहर निकलते वक्त उन्होंने फिर कहा, “I am interested in your service, more than the final deal. (मुझे अंतिम अनुबंध से ज्यादा आपकी सर्विस में रुचि है)।”
“क्या?” उसकी आंखों में वासना की चिरपरिचित भूख अब मैं स्पष्ट देख पा रही थी। भौंचक्की रह गयी इस तरह खुले प्रस्ताव पर।
“Yes pretty lady, I know about you very well (हां सुंदर महिला, मैं आपके बारे में अच्छी तरह से जानता हूं)।” अब वे खुल कर बोले। मैं घबरा कर इधर उधर देखी, कोई सुन तो नहींं रहा है। नहीं, आस पास कोई नहीं था।
“ओह्ह्ह्ह्ह”
“तो क्या आप आज मेरे साथ डिनर कीजिएगा?” मैं जानती थी उसका अर्थ क्या है। शराफत का नकाब ओढ़े यह भी उन कामुक भेड़ियों से अलग नहीं है।
“नहीं, प्लीज, मैं ऐसी औरत नहीं हूं।”
“मुझे पता है आप कैसी औरत हैं।” फंस गयी थी मैं। बड़ा डील था, खोना नहीं चाहती थी।
“लेकिन।”
“लेकिन क्या?” चेहरे पर उसकी नगवारी थी।
“आज मैं व्यस्त हूं। मैं फिर कहती हूं कि मैं ऐसी औरत नहीं हूं।।” मैं बोली।
“आप कैसी हैं, यह आपके कहने से बदल नहीं जाएगा। आप नहीं चाहतीं यह अलग बात है।”
“ओके, जैसी आपकी मर्जी, लेकिन आज नहीं, आज मैं व्यस्त हूं।” मुझे रामलाल को रुखसत करना था, रामलाल की कहानी सुनने की उत्कंठा थी। आज फिर से उसकी अंकशायिनी बनने की अभिलाषा भी थी।
“Ok, then we will meet tomorrow evening. I have some business deal tomorrow too. (ठीक है, हम कल शाम को मिलेंगे। मेरा कल भी कुछ व्यवसायिक डील है।) आशान्वित हो उठा वह। उसके जाने के पश्चात मैं सोचने लगी कि यह मेरे साथ क्या हो रहा है? क्या मैं रंडी बनती जा रही थी। एक ढूंढो मिलते हैं हजारों। सबके सब मर्द हवस के पुजारी।
खैर, कल की बात कल देखी जाएगी। मैं ऑफिस के बाद सीधे घर आई। अन्य दिनों की अपेक्षा करीब एक घंटे पहले ठीक साढ़े चार बजे दरवाजे पर जैसे ही पहुंची, रश्मि को अस्त व्यस्त हालत में निकलते हुए देखकर अचंभित रह गयी। वह भी मुझे देख ठिठक कर रुक गयी।
“अरे रश्मि, तुम यहां?” मेरे मुह से निकला।
“हां, मिलने आई थी तुम लोगों से।” चेहरे में झेंपी सी मुस्कान थी।
“कब आई थी?”
“यही करीब एक डेढ़ घंटा पहले।” उसकी आवाज में लड़खड़ाहट भांप गयी थी मैं।
“तो मुझसे बिना मिले लौट रही थी? ओह समझी, ‘मुलाकात’ तो लगता है हो गयी।” अर्थपूर्ण दृष्टि से उसकी अस्त व्यस्त हालत को सर से पांव तक देखती हुई बोली।
“क्या बोल रही हो?” झेंपती हुई बोली वह।
“क्या गलत बोल रही हूं? क्या मैं इतना भी नहीं समझ सकती? किसके साथ? हरिया?”
“नहीं, हरिया और करीम दोनों।” शरमा रही थी वह।
“वाह मेरी जान, आखिर भा ही गये वे दोनों बुढ़ऊ।”
“धत”
“क्या धत, सब समझती हूं। कोई और तीसरे से मुलाकात नहीं हुई?”
“तीसरा, तीसरा कौन?” कहते न कहते किसी भूत की तरह प्रकट हुआ रामलाल। हमारी बातें सुनकर वह सामने आ खड़ा हुआ था। बड़ी बेसब्री से लगता है मेरा ही इंतजार कर रहा था। उसके चेहरे पर मासूमियत अवश्य थी किंतु उसकी आंखों में मेरे लिए बेसब्र इंतजार स्पष्ट झलक रहा था।
“यह, यह है रामलाल। और रामलाल, यह है रश्मि।” मैंने परिचय दिया। अब रामलाल का ध्यान रश्मि की ओर गया। देखता ही रह गया वह रश्मि को। रश्मि भी रामलाल को देखती रह गयी। अधेड़ था तो क्या हुआ, लंबा तगड़ा, अच्छा खासा तंदरुस्त मर्द उसकी आंखों के सामने खड़ा, बड़ी मासूमियत से उसे निहार रहा था। मेरे मन में तो एक शैतानी कीड़ा काटने लगा। मैंने रश्मि को यह नहीं बताया कि रामलाल अर्धविक्षिप्त और अर्धविकसित मंदबुध्दि पुरुष है।
“तू जा रही है तो जा, तेरा मतलब तो निकल गया, और नहीं तो कुछ देर और रुक कर मेरे साथ चाय पी कर जाना।”
“ओके, ठीक है।” तनिक लज्जित महसूस कर रही थी, उसकी चोरी जो पकड़ी गयी।
“ठीक है मतलब? जा रही हो या रुक रही हो।”
“रुक रही हूं मेरी मां।”
“बढ़िया। हां, तो रामलाल जी, आप दिनभर क्या कर रहे थे?” मैं रामलाल की ओर मुखातिब हो कर बोली।
“कुछ नहीं, खाना खा कर कमरे में आराम करता हुआ आपके आने का इंतजार कर रहा था। आपकी आवाज सुनी तो आ गया।” उसने उसी मासूमियत से उत्तर दिया।
“ओह, ठीक है, मैं आ गयी, अब ठीक है?”
“हां, आपको देखकर अब चैन मिला।” वह बच्चे की तरह खुशी जाहिर करने लगा।
“छि:, अप भी ना, बच्चे ही हैं।” उसके गाल पर थपकी देती हुई बोली। रश्मि हैरानी से हमारे वार्तालाप को सुन रही थी।
“हरिया चाचा।” मैंने हरिया को आवाज दी। हरिया भी अस्त व्यस्त हालत में था। हरिया के साथ साथ करीम भी हरिया के कमरे से निकला। समयपूर्व, अकस्मात मेरे आगमन से हैरानी उनके चेहरे से टपक रही थी। वे रश्मि की ओर देख कर समझ गये कि उनकी चोरी पकड़ी गई थी। दोनों के चेहरे दो बिल्लियों की तरह थी जो अभी अभी दूध पीकर चटखारे ले रहे हों। झेंपी सी मुस्कान थी दोनों के चेहरों पर।
“ऐसे हैरानी से हमें क्यों देख रहे हो साले चूतखोरों। चलिए हमें चाय पिलाईए। रश्मि तू बैठ, मैं अभी फ्रेश हो कर आई” कहकर मैं फ्रेश होने अपने कमरे की ओर बढ़ी।
फ्रेश हो कर ड्राईंगरूम में आते ही मैं ने रामलाल से कहा, “हां और आप रामलाल जी, चलिए आप शुरू हो जाईए, अपनी कहानी शुरू कीजिए, वही, जो रात को बता रहे थे, सरोज, रबिया और शहला वाली।” मैं सोफे पर बैठते हुए रामलाल की ओर मुखातिब हो कर बोली। अबतक चाय भी आ गयी थी। “आप दोनों भी बैठ जाईए” मैंने हरिया और करीम से कहा।
“इन सबके सामने?” अकचका कर बोला वह।
“हां जी हां, शरमाईए मत, यहां सबके सब ऐसे ही हैं।”
“ठीक है तो सुनिए।” शुरू में वह झिझका किंतु धीरे धीरे खुल कर पूरी कहानी बताता चला गया।
रामलाल के सेक्स जीवन की कहानी सुनने को मैं बेहद उत्सुक थी। मेरे दिमाग मे रश्मि को लेकर एक खुराफाती ख्यालात उमड़ घुमड़ रहा था। मैं जानती थी कि रामलाल की कहानी ज्यों ज्यों आगे बढ़ेगी, यहां का माहौल गरम होता चला जाएगा और फिर हम सभी वासना के पुतलों के मध्य वासना का तूफान अवश्य उठेगा, जिस तूफान की चपेट से रश्मि अछूती नहीं रहेगी और संभवतः उत्तेजना के आवेग में भीमकाय लिंग वाले अर्धविक्षिप्त रामलाल की शिकार भी बन जाए। अगर ऐसा हुआ तो बड़ा मनोरंजक नजारा देखने को मिलना तय था। खैर देखते हैं आगे क्या होता है, यही सोचती हुई मैंने सबके सामने रामलाल को अपनी रासलीला से रूबरू कराने को प्रेरित किया।
रामलाल को मैंने आश्वस्त किया कि यहां सब अपने हैं, इनके सामने अपनी कहानियों को बताने में झिझकने की कोई आवश्यकता नहीं है। उसने जो कुछ अपने ढंग से बताया, उसे यहां पर उसी तरह पेश कर रही हूं।
“आह, आप देख क्या रहे हैं? हम फिसल कर गिर पड़े हैं। आह, हम उठ नहीं पा रहे हैं। उठाईए ना।” सरोज दर्द में कराहते हुए बोली। मैं आगे बढ़ कर उसे उठा कर खड़ा करने लगा तो वह कराह कर बोली, “आह, लगता है मेरे पैर में मोच आ गयी है, ओह हम खड़े नहीं हो पा रहे हैं।” मैंने सीधे उसे गोद में उठा लिया और लाकर बिस्तर पर लिटा दिया।
“दर्द ज्यादा है?”
“हां, आह, बहुत दर्द है।”
“मैं क्या कर दूं?”
“वहां टेबल पर मूव है। उसे लाकर दाहिनी एड़ी के जोड़ पर लगा दीजिए ना।” मैं मूव ला कर उसकी एड़ी के जोड़ पर लगाने लगा।
“आह, धीरे धीरे, दर्द हो रहा है।” मैं हल्के हल्के मूव लगाने लगा। करीब पांच मिनट बाद वह बोली, “थोड़ा और ऊपर।” मैं उसकी एड़ी से ऊपर मूव लगाने लगा। मूव लगाने के लिए उसकी साड़ी ऊपर उठा दिया। कुछ देर बाद वह फिर बोली, “और थोड़ा ऊपर।” मैं उसके घुटने के ऊपर तक पहुंच गया। “आह, हां, अब थोड़ा अच्छा लग रहा है। और ऊपर लगाईए ना।” ऐसा करते करते उसकी साड़ी जांघों से होते होते कमर तक उठ गयी थी। मैं मूव की मालिश करता करता उसकी जांघों के जोड़ तक पहुंच गया। बहुत सुंदर टागें थीं उसकी। गोरी गोरी, गोल गोल, केले के थंभों जैसी जांघें बहुत चिकनी थी। पता नहीं क्यों मुझे भी मूव लगाने में बड़ा मजा आ रहा था। साड़ी और पेटीकोट के अंदर उसने कुछ नहीं पहना था। बड़ा आश्चर्य हुआ देखकर कि उसका नुनु नहीं था। पेशाब करने की जगह थोड़ा फूला हुआ चिकना सा पेशाब का रास्ता था। उसके ऊपर काले काले बाल थे। जैसे ही मेरा हाथ वहां पहुंचा, सिसक पड़ी
वह, “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह।” मैं घबरा कर हाथ हटा लिया।
“आह्ह क्या हुआ? रुक क्यों गये जेठ जी?” तड़प कर वह बोली। उसकी आंखें बंद थीं। चेहरा लाल हो चुका था।
“यह, कककक्या है?” मैं चकित था।
“ओह बुद्धू जेठ जी, यह चूत है।” वह बोल पड़ी।
“चूत?”
“हां चूत। कैसा है?”
“बहुत सुंदर।”
“तो चूत की भी मालिश कीजिए ना।” वह जल्दी से बोली। मुझे भी मजा आ रहा था। मैं उसकी चूत की मालिश करने लगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, करते रहिए, ओह्ह्ह्ह्ह करते रहिए, बड़ा्आ्आ्आ्आ अच्छा लग रहा है।”
उसकी चूत के बीच वाले छेद से चिपचिपा सा कुछ निकल रहा था, यह पेशाब तो नहीं था।
“यह क्या है?”
“यह चूत का रस है बुद्धू जेठ जी, चुदाई के पहले निकलता है।” उसकी सांसें बड़ी तेजी से चल रही थीं।
“चुदाई? यह क्या होता है?” मुझको भी कुछ कुछ हो रहा था। मेरे शरीर में सनसनी हो रही थी। पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था। अजब तरह का आनंद आ रहा था। मेरे पैजामे के अंदर मेरा नुनु पता नहीं क्यों टाईट हो रहा था। लकड़ी की तरह सखत। मेरे अंडरपैंट के अंदर मेरा नुनु खड़ा हो रहा था। बेचैन हो रहा था, पता नहीं क्यों।
“बुद्धू जेठ जी, आह्हह्ह्ह, कैसे बताएं। औरत और मरद के लंड और चूत का मिलन जी।”
“चूत तो समझ गया, यह लंड क्या होता है?”
“आपके पैजामा के अंदर क्या है? लंड है लंड।”
“यह तो नुनु है।”
“पागल, यह नुनु नहीं, लंड है जेठ जी। आह मेरे बुद्धू, यही लंड मेरी चूत में घुसा कर चुदाई होगा।” वह मेरी नुनू, जिसे लंड बोल रही थी, पजामे के ऊपर से पकड़ कर बोली। “यहां हम चुदने के लिए मरे जा रहे हैं और आप अबतक कपड़े पहने हुए हैं। समझ ही नहीं रहे हैं।” वह पागल हो रही थी।
“लेकिन तेरे पैर में तो मोच है। दर्द नहीं होगा तेरे पैर में?” मैं पूछा।
“अरे पागल, दर्द तो बहाना था। असल में हमें आपको अपनी चूत दिखा कर आपसे चुदवाना है। हमें चोदकर मां बना दीजिए जेठ जी।” बेकरारी से बोली।
“लेकिन मेरा लंड तेरी चूत में घुसेगा कैसे?”
“घुसेगा, पूरा घुसेगा, पहले अपने कपड़े तो उतारिए मां के लौड़े।” वह बड़ी उतावली हो रही थी। मैं भी अपने लंड की सख्ती से परेशान था। मेरे अंडरपैंट के अंदर मेरा लंड दर्द करने लगा था। मैंने जल्दी से अपने कपड़े उतार डाले और पूरा लंगटा हो गया।
“बाआ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, इत्ता बड़ा्आ्आ्आ्आ लंड!” वह मेरे लंड को देख कर डर गयी। आंखें बड़ी बड़ी हो गयी थी उसकी।
“हां, यही तो लंड है मेरा।” मैं अपना टनटनाया लंड दिखाता हुआ बोला। कपड़े से आजाद हो कर मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था। मेरा लंड आजाद हो गया था।
“ना बाबा ना। यह तो गधा का लंड है।” घबरा गयी थी वह।
“मैं बोला था ना, तेरी चूत में लंड नहीं घुसेगा।” हालांकि मुझे अब उसकी चूत में लंड डालकर देखने का मन कर रहा था, कैसा लगता है? मुझे लग रहा था कि इससे मेरे लंड की परेशानी शायद कुछ कम होगी। मैं अब तनिक बेसब्र हो रहा था।
“आदमी का लंड घुसता है इसमें, गधे का नहीं।”
“मैं आदमी नहीं हूं क्या?”
“आपके भाई का लंड तो छ: इंच का है, आराम से घुस जाता है, मगर आपका तो दस इंच से भी ज्यादा लंबा है और गधे के लंड जैसा मोटा भी। फट जाएगी हमारी चूत। मर जाएंगे हम। ना बाबा ना।” बिस्तर से उठते हुए बोली।
“न न न न, उठो मत। जरा सा चोदने दे न। पहली बार किसी औरत के चूत को देख कर मेरा लंड खड़ा हुआ है। बहुत बेचैन है मेरा लंड। देखो, दर्द कर रहा है।” मैं बेचैनी से बोल उठा। रहम आ गया उसे मुझ पर।
“तो मैं क्या कर दें हम? डर लग रहा है हमारी चूत के लिए। लाईए हम आपके लंड का पानी निकाल दें।” कहकर मेरा लंड दोनों हाथों से पकड़ ली।
“आह बहुत अच्छा लग रहा है।” मैं बोला। गनगना उठा मैं। वह मेरे लंड को पकड़ कर ऊपर से नीचे तक सहलाने लगी।
“ओह्ह्ह्ह्ह मां्आं्आं्आं, पहली बार इत्ता बड़ा्आ्आ्आ्आ लंड देख रही हूं। आप तो चोद कर मार ही डालिएगा।” वह मेरे लंड को सहलाते हुए बोली। लेकिन अब उसकी आवाज में डर नहीं था। “हम आपसे चुदवा कर मां बनना चाह रही थी मगर……..।”
“मगर?”
“मगर इत्ता बड़ा लंड देखकर हमारी हिम्मत नहीं हो रही है।”
“चोदने से अगर मां बन सकती हो तो डर काहे रही हो?” मुझे अब चोदने का बड़ा मन कर रहा था। पहली बार मुझे यह मौका मिल रहा है और यह डर रही है, करूं तो क्या करूं। लेकिन उसके सहलाने से मेरे लंड को बड़ा सुकून मिल रहा था। सोच रहा था कि सहलाने से इतना अच्छा लग रहा है तो चोदने में कितना अच्छा लगेगा? “थोड़ा हिम्मत करके एक बार मुझसे चुदवा ही लो न।”
“हटिए जी, बड़े जालिम हैं आप। मार डालने का इरादा है क्या?” उसकी आवाज तनिक धीमी हो गयी थी। उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। मेरे लंड को सहलाते सहलाते वह लाल हो गयी थी। दो तीन मिनट बाद उसके मुंह से आवाज निकली, “आह्ह, बड़ा है मगर मस्त है, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, कोशिश करती हूं, मगर धीरे धीरे आराम से चोदिएगा।”
“ठीक है, ठीक है, आराम से चोदुंगा, तुम बताती जाओ, मैं वैसा ही करूंगा।” मैं खुश होकर जल्दी से बोला।
“पहले मेरे कपड़े तो उतारने दे पगले।” फटाफट अपने कपड़े उतार कर पूरी लंगटी हो गयी वह। मैं उसके लंगटे बदन को देख कर अचंभित रह गया, बहुत सुंदर बदन था उसका।
“वाह आपका थन तो बड़ा सुंदर है। बड़ा बड़ा, चिकना, गोल गोल।” मैं उसके थन को छू कर बोला। सखत था उसका थन।
“थन नहीं पागल, चूची। चूचियां हैं मेरी।”
“अच्छा अच्छा, चूचियां हैं। मैंने बचपन में मां का दूध पिया है। दूध निकलता है ना इससे?”
“हां जी हांआंआंआंआंआं, दूध निकलेगा, लेकिन अभी नहीं, बच्चा होने के बाद।”
“ओह, मुझे इनसे खेलने का मन कर रहा है।”
“तो खेलिए ना। मना कौन कर रहा है। आपका भाई भी खेलता है।”
“कैसे?”
“सहलाता है, दबाता है, चूसता है।”
“मैं भी ऐसा ही करूं?”
“हां बाबा हां, बकवास मत कीजिए, जो मर्जी कीजिए, जल्दी कीजिए।” कलप कर बोली। मैं उसकी सखत चूचियों को सहलाने लगा, दबाने लगा। बड़ा मजा आ रहा था मुझे। वह मेरे लंड को सहलाती जा रही थी।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, पागल जेठ जी, हां हां हां हां ऐसा ही ओह्ह्ह्ह्ह, मजा आ रहा है।” वह पगला रही थी। अब मैं मुह लगा कर उसकी चूचियों को चूसने लगा, वाह बड़ा आनंद आ रहा था। कुछ देर चूसने के बाद ही सरोज खुद ब खुद बोल उठी, “चोदिए, आह्ह अब चोद डालिए, अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा है आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह।” मेरे लंड की लंबाई और मोटाई से बेपरवाह बोल रही थी वह। मैं भी चोदने को बेकरार था। वह अपने पैर फैला कर चित्त लेटी मेरे लंड को अपनी चूत के छेद के पास खुद ब खुद ले आई और पागलों की तरह कमर उछाल बैठी। मैं समझ गया कि अब मुझे उसकी चूत में लंड घुसाना है। मेरे लंड का सामन वाला हिस्सा उसकी चूत के मुंह पर रख कर धीरे धीरे घुसाने का प्रयास करने रगा, लेकिन बार बार मेरा लंड फिसल कर इधर उधर चला जा रहा था। तंग आ कर सरोज खुद मेरा लंड अपनी चूत के छेद पर टिका कर अपनी कमर दुबारा उछाल बैठी। निशाना सही था, फच्च से मेरे लंड का अगला हिस्सा उसकी चुत के अंदर घुस गया।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,” दर्द से चीख पड़ी वह। ताव ताव में वह जो कुछ कर बैठी थी वह कितना दर्दनाक होगा, शायद उसे अब पता चला था। लेकिन अब मुझे मंजिल मिल गयी थी। मेरे लंड को रास्ता मिल गया था। मैं मौका गंवाना नहीं चाहता था। उसकी कमर को पकड़ कर एक धक्का लगा दिया।
“ऊं्ऊं्ऊं्ऊं्ऊं्ह्ह्ह्ह्ह्ह हुम्म्म्म्म्म्म।”
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, मर गयी रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए।” वह तड़प उठी दर्द के मारे। एक धक्के में ही मेरा लंड उसकी चूत को चीरता हुआ एक तिहाई अंदर चला गया। “छोड़िए, छोड़िए आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, फट्ट्ट्ट्ट्ट गयी मेरी चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊत।” दर्द के मारे चीख उठी वह। पसीना पसीना हो गयी। लेकिन अब मुझे आनंद आ रहा था। मुझे स्वर्ग जैसा आनंद आ रहा था। मेरा लंड गरम गरम गुफा में समाता जा रहा था। मैं एक और जोर का धक्का लगा दिया। करीब करीब पूरा लंड चला गया अंदर। एक इंच शायद बचा था। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मा्आ्आ्आ्आ्र्र्र्र्र्र डा्आ्आ्आलिएग्ग्ग्गा क्या्आ्आ्आ्आ? ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ मां्आं्आं्आं कहां आ फंसी रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए।” वह दर्द से तड़प रही थी लेकिन मैं अब जानवर बन चुका था।
“चो्ओ्ओ्ओ्ओ्प्प्प्प्प्प् हर्र्र्र्र्र्र्र्आ्आ्आ्आ्आमजादी। एकदम चो्ओ्ओ्ओ्ओ्प्प्प्प्प्प्।” मैं गुस्से में आ गया। सहम गयी वह मेरा जानवर वाला रुप देखकर। मुझे अब उसके चीखने चिल्लाने से गुस्सा आ रहा था। मेरे आनंद में खलल पड़ते देख मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। एक और धक्का मारा और पूरा का पूरा लंड उसकी चूत के अंदर चला गया। वह रो रही थी, सिसक रही थी, उसकी आंखों से आंसू निकल रहा था लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा। “हो तो गया, घुस तो गया, पूरा लंड तो घुस गया, अब रो काहे रही है हरामजादी।” खूंखार लहजे में मैं बोला।
“आह्ह, निकालिए ना्आ्आ्आ्आ्आ्आ। मेरी चूत को तो फाड़ दिया, अब मेरे बच्चादानी को भी फाड़ दीजिएगा क्या्आ्आ्आ्आ?” वह रोते रोते बोली। थोड़ा डर गया मैं। हड़बड़ा कर पूरा लंड बाहर निकाल लिया, लेकिन मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा। फिर घुसाने की बड़ी इच्छा हो रही थी। उधर सरोज को भी पता नहीं क्या हुआ, शायद पूरा लंड बाहर निकालने से उसे भी कुछ अच्छा नहीं लगा, अपने आप कमर उचका कर थोड़ा लंड अंदर ले बैठी। “पूरा निकाल दिया, ओह्ह्ह्ह्ह, अंदर पूरा खाली खाली लग रहा है, ओह यह हमें क्या हो रहा है, लंड अंदर तो तकलीफ, लंड बाहर तो तकलीफ। क्या कर दिया जेठजी आपने?”
“अब मैं क्या करूं? ऐसी चुदाई होती है क्या?” खीझ उठा मैं।
“डालिए, डाल ही दीजिए, अब रहा क्या? फट तो गयी हमारी चूत। चलिए, चोदिए। लंड धीरे धीरे अंदर डालिए, फिर बाहर निकालिए। आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह हां हां ऐसा ही ऐसा ही।” उसकी बात सुनकर मैं ऐसा ही करने लगा। धीरे धीरे अंदर घुसाने लगा। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ, ओह मां्आं्आं्आं, ओह बप्प्आ्आ्आ्आह्ह्ह्, हां हां हां यही है चुदाई, ओह दर्द है मगर मजा है आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, चोदते रहिए जेठ जी।” वह बोल रही थी और मैं उसकी कमर पकड़ कर लंड अ़दर बाहर करने लगा। उसकी आवाज में दर्द भी था और खुशी भी थी। मुझे बड़ा आनंद आ रहा था। कितनी टाईट थी उसकी चूत। उफ्फ्फ्फ्फ्फ बता नहीं सकता। चोदने में इतना आनंद। एक औरत की चूत में इतना स्वर्गीय सुख। धीरे धीरे मैं जोश के मारे उसकी कमर पकड़ कर दनादन चोदने में डूब गया। अब सरोज भी अपने दोनों पैरों को मेरी कमर पर लपेट कर बड़े मदे से मेरा लंड खा रही थी।
“आह्ह हमार राजा, ओह हमार सैंया, ओह हमार बलमा, आह हमार भतार, आह हमारे प्यारे चोदक्कड़ जेठ जी, हाय हमारे प्राणनाथ, आह ओह चोदिए राजाजी, ओह ओह स्वरग देखा रहे हैं। इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स।” उधर वह पागलों की तरह मुझसे चिपकी चुदी जा रही थी और मैं आनंद मगन भचाभच चोदे जा रहा था। धमाधम, धक्के पे धक्का, घपाघप। करीब पंद्रह मिनट बाद सरोज थरथर कांपती हुई मुझ से चिपक गयी। “ओ्ओ्ओह्ह्ह ओ्ओ्ओह्ह्ह हम गये, ओह हम झड़े रे झड़े मेरे जे्ए्ए्ए्ए्ए्ठ्ठ्ठ्ठ जी्ई्ई्ई्ई्।” और उसका पूरा शरीर ढीला पड़ने लगा लेकिन मैंने उसे छोड़ा नहीं, चोदता रहा चोदता रहा, फचाफच, चटाचट, भचाभच। आधे घंटे तक मैं उसे रगड़ रगड़ कर चोदा और तब मेरा शरीर थरथराने लगा। मेरा लंड और बड़ा होने लगा, ऐसा मुझे लगा और तभी मेरे लंड से कुछ निकलने लगा। उसी समय सरोज भी फिर से मेरे बदन से चिपट गयी।
“आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह यह क्या हो रहा्आ्आ्आ्आ्आ है?” मैं स्वरग सुख में डूब कर बोला।
“ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ पगले, आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह, आपके लंड का रस निकल रहा है ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ मैं भी ओह मैं भी झड़ रही हूं। मां बना दे ओह बलमा, मां बना दे हमें हरामी जेठ जी, हमा्आ्आ्आ्आ्आरे्ए्ए्ए्ए पिया, मां बना दे मां बना दे।” वह थरथराती हुई बोली। हम करीब तीन मिनट तक उसी तरह चिपटे रहे फिर हांफते हुए पूरे संतुष्ट, ढीले पड़ गये। ऐसा लग रहा था मानो मेरा बदन हल्का हो कर हवा में उड़ रहा हो। “ओह्ह्ह्ह्ह राजा, बहुत सुख दिया आपने हमें।” मुझे चूम कर बोली वह। उस दिन मैंने तीन बार चोदा और जम कर चोदा। सरोज भी बहुत खुश हुई, जबकि उसकी चूत फैल कर गुफा बन गयी थी। फूल गयी थी। मेरे लंड पर खून ही खून लिथड़ा हुआ था लेकिन फिर भी सरोज खुश थी। वह मेरी पहली चुदाई थी, बड़ा ही सुखद, आनंददायक अनुभव था। फिर तो मुझे चुदाई का चस्का ही लग गया। औरत देखी नहीं कि लंड अपने आप खड़ा हो जाता है, जैसा कि अभी रश्मि जी को देख कर हो रहा है।”
खुल्लमखुल्ला ऐसी बात सुन कर रश्मि हकबका गयी। उसकी कहानी हम बड़ी तन्मयता के साथ सुन रहे थे। ऐसी उत्तेजक कहानी सुनकर सब उत्तेजित भी हो गये थे। रश्मि की तो कनपट्टी लाल हो गयी। हम सभी मुस्कुरा कर रश्मि को देख रहे थे। “हट, यह क्या बोल रहे हैं आप?” रश्मि सुर्ख चेहरे के साथ बोली, लेकिन उसकी आवाज में रामलाल के कथन के प्रति, जिसमें छिपा हुआ प्रस्ताव भी था, कोई खास विरोध भी नहीं था।
मैं मुस्कुराते हुए बोली, “वाह मेरी लाड़ो, प्रतिवाद तो है मगर इनकार नहीं। देखो तो, कैसी लाल भभूका हो रही है। रामलाल जी, लगता है आपका जादू इसपर भी चल गया। खैर जो होगा, वो तो बाद की बात है, फिलहाल तो अपनी कहानी बोलिए।”
“नहीं, बाद में। रश्मि मैडम को चोदने का मन कर रहा है।” रामलाल सीधा मुद्दे पर आया।
“धत, ना बाबा ना। इस पागल से तो ना।” रश्मि बोली जरूर लेकिन उसका चेहरा चुगली कर रहा था कि वह झूठ बोल रही है।
“ठीक है बाबा ठीक है। रामलाल जी आगे देखा जाय क्या होता है। आप जल्दी से अपनी कहानी पूरी कीजिए।” मैं जानती थी कि तवा गरम है। केवल रामलाल को सिग्नल मिलने की देर है, टूट ही पड़ता वह रश्मि पर।
रामलाल अनमने ढंग से आगे बताने लगा, “उस दिन के बाद जब भी हमें मौका मिलता हम चुदाई में लग जाते थे। करीब दो महीने बाद ही पता चल गया कि सरोज मां बनने वाली है। सब बड़े खुश थे। घनश्याम तो सबसे अधिक खुश था। सरोज मुझसे बोली, “यह बात किसी को पता नहीं लगना चाहिए कि हम आपसे गर्भवती हुए हैं, नहीं तो बवाल हो जावेगा।”
“ठीक है मेरी रानी ठीक है। नहीं बोलुंगा, किसी से कुछ नहीं बोलूंगा।” मैं बोल उठा।
