पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि दादाजी के जन्मदिन पर पांच पांच बूढ़े मेरे द्वारा रचे गए कामुकता पूर्ण माहौल में वासना के भूखे भेड़ियों में परिवर्तित हो कर वहशी दरिंदों की तरह बेहद घिनौने और निर्ममता पूर्वक मनमाने तरीके से मेरे तन से अपनी अपनी हवस मिटाई और इस दौरान मेरे पूरे बदन को निचोड़ कर रख दिया। वासना का वह भीषण तूफान जो मुझ पर गुजरा, उसका उन नशे में चूर कामुक बूढ़ों को रत्ति भर भी अंदाजा नहीं था और न ही परवाह थी। वे तो अपने अपने ढंग से अपनी हवस मिटा कर मेरे चारों ओर नंग धड़ंग अवस्था में पड़े हुए थे। मैं उनके बीच नुची चुदी दोनों पैर फैलाए छत की ओर चेहरा उठाए आंखें बंद किए पड़ी हुई थी। मेरे उरोजों का उभार उनके दरिंदगी भरे नोच खसोट और मर्दन से सूज कर लाल हो गये थे। मेरे उभारों और सीने पर कई जगह दांतों के काटे जाने के लाल लाल निशान पड़ गये थे। उन भेड़ियों की जानवरों जैसी चुदाई से मेरी योनि सूज कर बड़े से कचौरी की तरह उभर आई थी। मेरी गुदा को सिर्फ करीम चाचा ने अपने लिंग से कूटा मगर अपने विशाल लिंग से ऐसी बेरहमी से कूटा कि मेरी गुदा का द्वार लाल हो कर सूज गया था। इतनी दरिंदगी को मैं कैसे झेल पाई यह सोच कर चकित थी। मुझे अभी भी हल्का हल्का नशा सा अनुभव हो रहा था। मुझे संदेह होने लगा कि कहीं इन दरिंदो ने मेरे शीतल पेय में कोई नशीला पदार्थ तो नहीं मिलाया था।
संदेह निवारण हेतु मैं ने उनसे सीधे पूछा, “किस ने मेरे कोल्डड्रिंक में दारू मिलाया था?”
“हमने” नानाजी ने बेहयाई से उत्तर दिया।
“साले हरामी मादरचोद, मुझे बेवकूफ बना कर शराब पिलाया और चोद चोद कर रंडी बना दिया, साले कुत्ते। मगर अच्छा ही हुआ। अगर मैं नशे में नहीं होती तो इतने मनमाने ढंग से मुझे चोद नहीं पाते तुम लोग। नशे में थी इसलिए मैं भी खूब मज़ा ले सकी। थैंक्स नानाजी। अब चूंकि आप पांच लोगों ने आपसी साझेदारी में मुझे सामूहिक रूप से चोद लिया तो मैं आप पांच लोगों की एकलौती भोग्या हुई, याने एक तरह से आप पांच पांडवों की एकलौती औरत द्रौपदी।” मैं बोली।
“बिल्कुल ठीक बोली हो मेरी रानी। तू हमारी द्रौपदी और हम पांच पांडव तेरे पति” दादाजी खुश हो कर बोले।
हमारे वार्तालाप के बीच ही अचानक नानाजी ने दादाजी की ओर मुखातिब हो कर पूछा, “लेकिन तू पहले ये बता कि कामिनी को चोदते समय इसे रंडी की औलाद क्यों कहा?”
दादाजी बोले, “देखो भाई, सच यही है कि कामिनी की मां रंडी से कम नहीं है। पूरी बात बताऊं?” प्रश्नवाचक दृष्टि से हमें देखा।
“बता भी दो भाई, अब हम सब इस एक ही हमाम में नंगे हैं।” नानाजी बोले।
“ठीक है बताऊंगा, लेकिन तू बुरा मत मानना, क्योंकि वह तेरी बेटी है, कहीं तुझे बुरा न लगे, लेकिन मैं जो बताऊंगा सच बताऊंगा।” दादाजी बोले।
“अरे बेटी वेटी कुछ नहीं। सच है तो सच है। अपनी नतनी को कुतिया बना कर चोदा तो क्या बेटी और क्या बहु। सब के सब पहले औरत हैं, जिनकी चूत है चुदने के लिए। आखिर चूत चाहे लौड़ा। लौड़ा चाहे किसी का भी हो। तू पूरी बात बता मादरचोद” बड़ी बेशर्मी से नानाजी बोले।
“तो ठीक है सुनो। यह सच है। इसकी मां सच में छिनाल ही थी। चाहे या अनचाहे वह रंडी बन गई। मेरा बेटा बच्चा पैदा करने के काबिल नहीं है यह बात मैं जान गया था, उस डॉक्टर से जिसने उसकी जांच की थी। उसका वीर्य बहुत पतला था। उसके वीर्य में शुक्राणु नहीं के बराबर थे या बहुत कमजोर थे जो लाइलाज था। फिर भी मेरी बहु गर्भवती हुई।
मैं चकित था और एक दिन मैं ने अकेले में, जब वह हमारे बेडरूम में सवेरे सवेरे चाय लेकर आई तो उससे पूछ ही लिया, “बहुत सच बताओ बहु, किसका बच्चा तेरे पेट में पल रहा है?” वह सन्न रह गई।
मैं बोला, “देखो मुझे पता है कि मेरा बेटा बाप नहीं बन सकता है। तूने किसके साथ मुंह काला किया है? मुझे सच बताओ तो मैं कुछ नहीं बोलुंगा, क्योंकि यह हमारे परिवार की इज्जत का सवाल है। तू गर्भवती हैं, सभी खुश हैं, हमारे खानदान का चिराग आने वाला है इस ख्याल से। मैं भी खुश हूं। अब बता कौन है वह आदमी?”
डरते डरते और रोते रोते उसने कहा, ” वह आदमी हरिया है बाबूजी”। मैं ने उसे कहा कि यह बात और किसी को पता नहीं चलना चाहिए। फिर उसने इस लौंडिया को जन्म दिया। हम थोड़े निराश जरूर हुए लेकिन एक संतान होने की खुशी परिवार में थी। मुझे इस बात की तसल्ली थी कि मेरी बहु मां बन सकती है।
मैं ने कामिनी के पैदा होने के एक साल बाद बहु से कहा, “अब हमें खानदान चलाने के लिए एक बेटे की जरूरत है। मैं नहीं चाहता कि तुम फिर से बाहर के किसी मर्द के बच्चे को जन्म दो, जब घर में ही मेरे जैसा मर्द उपलब्ध है तो क्यों नहीं मुझसे ही संभोग करके गर्भधारण करती हो?”
मेरे इस खुले प्रस्ताव से वह हत्प्रभ रह गई फिर बोली, “हाय राम, ससुरजी आप के साथ?”
“हां मेरे साथ। क्यों, मुझमें क्या खराबी है? चुपचाप मेरी बात मान लो वरना ठीक नहीं होगा।” मैं बोला। असल में जब से मुझे पता चला कि बहु लक्ष्मी बाहर के मर्द से चुद चुकी है, मैं उसे अलग ही नजर से देखने लगा था। उसके मस्त जवान नंगे बदन को अपनी बाहों में भर कर चोदने का ख्याल बार बार मेरे दिमाग में घूमता रहता था। उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां देख कर मेरे मुंह में पानी आ जाता था। जब वह चलती थी तो उसकी मोटी मोटी गांड़ थिरकते हुए मानो मुझे निमंत्रण दे रही हो। मेरा लौड़ा फनफना उठता था। मैं बड़ी मुश्किल से अपने को काबू में रख रहा था। उसको चोदने की बड़ी इच्छा होती थी लेकिन एक तो रिश्ते का ख्याल, समाज का डर और बहु द्वारा इनकार और उसके घृणा का पात्र बनने का भय, इन्हीं कारणों से मेरी हिम्मत नहीं होती थी। लेकिन मुझे अब यह सुनहरा मौका हाथ लग गया था। सौभाग्य से अशोक की मां भी दो हफ्तों के लिए मायके गई हुई थी। मैं तो मौके की ताक में था ही, बहु की कमजोर नस मेरी पकड़ में थी, जिसकी बदौलत मैं बड़ी आसानी से उसे चोद सकता था। मेरी बातों को सुनकर वह नजरें नीचे कर के बड़ी मुश्किल से कहा, “प्लीज बाबूजी मुझे खराब मत कीजिए, मैं आपके सामने हाथ जोड़ती हूं। मुझे माफ़ कर दीजिए।”
अब मेरा धीरज जवाब दे गया और सीधे सीधे शब्दों में उसे बोला, “साली हरामजादी कुतिया, जब तू बाहर के मर्द हरिया से चुदवा रही थी तो खराब नहीं हुई बोल? अब मैं घर का आदमी तुझे चोदना चाहता हूं तो खराब हो जाएगी?”
मेरे बात करना के लहजे से वह सहम गई और मरे हुए आवाज में बोली, “ठीक है बाबूजी, लेकिन प्लीज यह बात मेरे पति या घर के और किसी को पता नहीं लगने दीजियेगा।”
उसकी सहमति से मेरी बांछे खिल गईं और उसी समय मेरा लौड़ा फनफना उठा, मगर किसी तरह अपने को काबू में रखा और बोला, “बहुत बढ़िया, आज जब अशोक (मेरा बेटा) ऑफिस चला जाएगा तो दोपहर को खाना खिला कर कामिनी को सुला देना और मेरे कमरे में आ जाना।”
“ठीक है बाबूजी,” कहकर धीरे धीरे मेरे कमरे से बाहर निकली। पीछे से उसकी थरथराती गांड़ को देखते हुए मेरा लौड़ा पैजामा को तंबू बना दिया था। मैं बड़ी बेताबी से दोपहर का इंतजार करने लगा। खाना खाने के बाद मैं अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेटे बहु का इंतजार करने लगा। मैं सिर्फ पैजामे में था। ठीक एक बजे मेरे कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैं समझ गया कि बहु आ गई है, “आ जाओ दरवाजा खुला है” मैं बोला। वह झिझकते हुए कमरे में दाखिल हुई तो मैंने कहा, “दरवाजा भीतर से बंद कर दो बहु और आ जाओ बेड पर।” वह धीरे-धीरे चल कर बिस्तर के पास आई तो मैं बेसब्री से उसे बाहों में भर कर एक झटके में बिस्तर पर गिरा दिया और चूमने लगा। मेरे बेसब्रेपन से वह सहम गई और धीरे से बोली, “प्लीज बाबूजी, मुझ पर रहम कीजिए।”
“अब तू चुप रह बहु। रहम ही तो कर रहा हूं तुझ पर। अब मैं जो करने जा रहा हूं उसमें तू सहयोग कर, मुझे जबरदस्ती करने को मजबूर न कर।” मैं उसे चूमते हुए बोला। वह समझ गई कि मैं उसे चोदे बिना छोड़ने वाला नहीं हूं। चुपचाप आंसू बहाती हुई अपने आप को मेरे हवाले कर दिया। मुझे उसकी आंसुओं की कोई फिक्र नहीं थी। मैं ने उसकी साड़ी का पल्लू हटा कर उसके ब्लाऊज को खोल दिया और यह देख कर और उत्तेजित हो गया कि उसका ब्रा बहुत मुश्किल से उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को ढंका हुआ था। आधी चूचियां तो ब्लाऊज के बाहर ही थीं। मैं ने एक झटके से उसका ब्रा भी उतार फेंका। गजब की चूचियां थीं उसकी। बड़ी बड़ी चूचियां देख कर मेरे मुंह में पानी आ गया। जैसे ही उसकी चूचियों को हाथ लगाया, दंग रह गया, एक बच्ची की मां बनने के बाद भी एकदम टाइट थीं। मैं ने उसकी चूचियों को पहले सहलाया और उत्तेजना में आ कर कस के दबाना शुरू कर दिया।
जोश में आ कर इतनी जोर से दबा दिया कि वह आह आकर बैठी और बोली, ” आह बाबूजी, धीरे दबाईए ना, दर्द कर रहा है।”
“अभी देख तेरा दर्द कैसे गायब हो जाएगा,” बोलते हुए उसकी चूचियों को मुंह लगा कर चूसना शुरु कर दिया। कुछ ही देर में वह शरमाती हुई भी मस्ती में भर कर बेसाख्ता सिसकारियां निकालने लगी। मैं समझ गया कि अब मामला थोड़ा थोड़ा सलटने लगा है। फिर मैंने उसकी साड़ी को पेटीकोट समेत ऊपर उठा दिया। मैं उसकी पैन्टी के ऊपर से ही उसकी चूत को सहलाने लगा। वह अब मस्ती में भरती जा रही थी। वह इस्स्स् इस्स्स् करने लगी थी। कुछ ही देर में मैं ने महसूस किया कि उसकी पैन्टी गीली हो गयी है। मैं ने धीरे धीरे उसकी पैन्टी उतार दी। उसकी चिकनी चूत पर हाथ फेरा तो वह गनगना उठी।
“ओ््ओ्ओ्ओह्ह्ह, आ्आ्आ्आह” उसके मुंह से निकलने लगी। अब मैं भी बहुत गरम हो चुका था। बर्दाश्त से बाहर। मैं उसकी साड़ी पेटीकोट खोल कर पूरी नंगी कर दिया। आह, क्या नजारा था। मस्त मक्खन जैसी चूत के ऊपर हलकी हलकी झांट। गांड़ तो पूछो ही मत। बड़ी बड़ी फूली हुई चिकनी गांड़।
मैं ने झट से पैजामा खोल दिया और उसके ऊपर आ गया, मगर उसने जब टनटनाया हुआ मेरा लौड़ा देखा तो डर गई और बोली, “हाय बाबूजी मर जाऊंगी, प्लीज मुझे छोड़ दीजिए, आपका लौड़ा बहुत बड़ा है।”
मगर अब मैं कहां मानने वाला था, इतना मस्त माल चोदने को मिला था कि पूछो ही मत, “चुप साली रंडी, नखरा मत कर, चुपचाप पैर फैला और चोदने दे,” मैं बोला, मगर वह डर के मारे अपनी जांघों को सटाकर रखी थी। मुझे गुस्सा आ गया और मैं ने जबरदस्ती उसकी चिकनी जांघों को फैला दिया और अपने लौड़े को उसकी चूत पर टिका दिया। वह नहीं नहीं करती मेरे नीचे छटपटाती रही मगर मैं ने उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया और सीधे एक जोरदार धक्का लगाया, वह किसी हलाल होती बकरी की तरह चीखने के लिए मुंह खोला ही था कि मैं उसके मुंह को कस कर दबा दिया। उसकी आंखें फटी की फटी रह गई, मेरा लौड़ा एक ही झटके में उसकी टाईट चूत को चीरता हुआ आधा घुस गया। मैं ने दुबारा एक जोरदार धक्का लगाया और पूरा लंड उसकी चूत के अंदर ठेल दिया। वह छटपटा कर रह गई। कुछ देर तक उसी तरह उसे दबा कर रखा, जब उसका छटपटाना बंद हुआ तब उसके मुंह से हाथ हटाया। उसकी आंखों से आंसू बह रहा था। उसकी आंसुओं की परवाह किए बगैर मैं ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख कर चूमना चालू किया और धीरे धीरे लंड बाहर निकाला और दुबारा ठोंका, इसी तरह आठ दस बार लंड अंदर बाहर करने के बाद लक्ष्मी का रोना बंद हुआ और फिर वह मस्ती में भर गई और शरमाते हुए नीचे से धीरे धीरे अपनी चूतड़ उछालने लगी।
“अब आ रहा है ना मज़ा साली हरामजादी, इसी के लिए इतना रोना गाना कर रही थी बुर चोदी। अब देख कितना मज़ा आ रहा है।” मैं चोदते हुए बोला।
अब वह अपने दोनों पैरों को उठा कर मेरे कमर पर चढ़ा दी और अपनी चूत को खोल कर परोस दी और शरमाते हुए वह अब मस्ती में डूब कर बोल रही थी, “आह ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह, हां बाबूजी, अब बहुत मजा आ रहा है, आह आह ओह ओह, ससुरजी आप बड़े बदमाश हो। बड़े माहिर हो औरत फंसाने में। मुझे आखिर फंसा ही लिया अपने जाल में। आह ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह, आपका लौड़ा बहुत बड़ा है मगर आपका चोदना बड़ा अच्छा लग रहा है राजा। हाय राम मैं यह क्या बोल रही हूं।” शरमा कर आंखें बंद कर ली उसने। मुझे उसकी यह अदा बहुत पसंद आई।
मैं दुगुने उत्साह और जोश से दनादन चोदने लगा, “मेरी प्यारी बहु, साली कुतिया, आज के बाद तू मेरे लंड की रानी बन गई, तेरी मस्त चूची, मस्त टाईट चूत, मस्त चिकनी गांड़, मेरी तो किस्मत खुल गई।” मैं बोला।
अब वह पूरी खुल चुकी थी, शर्म हया कहां छू मंतर हो गया था पता नहीं, मस्ती में भर कर एकदम रंडी की तरह गन्दी गन्दी गालियां निकालने लगी थी, “मादरचोद बुढ़ऊ, मेरी बुर के रसिया, बहुचोद हरामी, लौड़े को तेरी बहु की चूत में डाल, चोद राजा चोद अपनी बहु को रंडी बना दे, लंड की रानी बना दे आह आह आह आह ओह।”
“हां रे कुतिया तुझे अपनी लंड की रानी बना लूंगा चूतमरानी, मेरे बच्चों की मां बना दूंगा, आज से तू मेरा ही लौड़ा खोजेगी रंडी, मजा आ रहा है।” बोलता हुआ उसे रगड़ रगड़ कर चोदा और करीब आधे घंटे बाद मेरा लंड पानी छोड़ने लगा, “आ्आ्आ्आ्आ स्स्स्स्साली्ई्ई्ई्ई कुत्त्त्त्त्ती” “हांआआआआ ओ्ओ्ओ्ओ्ओ ह राज्ज्ज्ज्ज्जाआ” कहती हुई वह भी छिपकली की तरह मुझ से चिपक कर झड़ने लगी। पूरा खल्लास होने के बाद वहीं बिस्तर पर हम पसर गये।
मैं बोला, “कैसा लगा बहु?”
“बहुत अच्छा लगा बाबूजी। आप बहुत मस्त चुदक्कड़ मर्द हैं। आपका लौड़ा भी बहुत जानदार है। अशोक का लंड तो सिर्फ साढ़े चार इंच लम्बा है और पतला है। मैं आपकी दीवानी हो गई राजा” कहते हुए मेरे सीने पर अपना सिर रख दी। उसी समय करीब दस मिनट बाद मैंने उसे फिर एक बार चोदा, इस बार उसे कुतिया की तरह पीछे से। वह बड़े मजे ले कर चुदवाई। उस दिन के बाद तो जब भी जहां कहीं मौका मिलता था मैं उसको पकड़ के चोद लेता था, कभी बाथरूम में, कभी किचन में खड़े खड़े और कभी दिनदहाड़े ड्राइंगरुम में। लक्ष्मी भी बहुत खुश थी। यह सिलसिला बिंदास चल रहा था कि एक दिन ऐसे ही ड्राइंगरुम में मैं चोदने में मशगूल था तभी यह केशव आ धमका, हम अबतक एक हफ्ते के अंदर बिल्कुल निर्भय होकर खुल्लमखुल्ला चुदाई करने लगे थे और तनिक लापरवाह भी हो गये थे, उस दिन करीब दो बजे दिन में सामने का दरवाजा सिर्फ उढ़का हुआ था, बिना खटखटाए सीधा अंदर आ गया और हमें इस हाल में देख लिया। कभी दरवाजा खटखटाना या कॉलबेल बजाना शुरू से उसकी आदत नहीं थी।
“रघु के बच्चे मादरचोद, यह क्या हो रहा है?” वह आंखें फाड़कर देखते हुए बोला। हम रंगे हाथ पकड़े गए थे। लक्ष्मी की हालत खस्ता हो गई थी। हम तो ठहरे एक ही थैली के चट्टे बट्टे, लक्ष्मी को अपने नीचे दबाए हुए उसी नंग धड़ंग अवस्था में मैं लापरवाही से बोल उठा, “देख नहीं रहे हो क्या हो रहा है? अपनी बहु को चोद रहा हूं साले।”
“हाय दैया, छोड़िए मुझे बेशरम, इनके सामने तो छोड़िए,” लक्ष्मी घबराकर बोली।
“तू चिंता मत कर बहु, बिना पूरा चोदे मैं तुझे छोड़ुंगा नहीं। इसके सामने शरमाओ मत। यह मादरचोद भी कम नहीं है। केशू, तू चुपचाप सोफे पर बैठ कर देख।” कह कर मैं धकाधक चोदने लगा और पांच मिनट बाद खल्लास हो गया, बहु भी समझ गयी थी कि ये दोनों एक नंबर के हरामी हैं, चुदती हुई मेरे ही साथ झड़ गई।
जैसे ही हमारी चुदाई खत्म हूई, बहु अपने कपड़ों की तरफ भागी, मगर यह क्या, इतनी देर में केशव भाई भी कपड़े उतार कर नंगे हो गए थे और बहु को दबोच लिया, “भागती कहां है बहु, अभी मेहमान की खातिरदारी नहीं करोगी क्या?”
लक्ष्मी का बुरा हाल था। छः फुट लंबे, काले कलूटे, बदसूरत, तोंदियल, पान खा खा कर काले दांतों को निपोरते हुए अजनबी की बांहों में छटपटा कर रह गई। “मुझे छोड़ दीजिए प्लीज़।” वह बोल उठी।
“छोड़ कैसे दें रानी। आज तक हम दोनों मिल बांट कर खाते आए हैं। आज कैसे छोड़ दूं। इतना मस्त माल साले रघु अकेले अकेले कैसे खा रहा था चूतिए? एक बार भी मेरा ख्याल नहीं आया?” केशव बोला।
“देख मैं तुझे बताने ही वाला था। पर पहले इसे राजी करना जरूरी था ना। अब यह राजी खुशी मुझसे चुदने को तैयार हो गई है। अब ठीक मौके पर तू आ ही गया है, अब बताने की क्या जरूरत। चल तू भी चोद ले। बहु, केशव को मना मत करो। अपना ही भाई है, जैसा मैं, वैसा ही यह है।” मैं लक्ष्मी को बोला।
“आपलोग बड़े जंगली हो। बाबूजी पहले अपने मुझे फंसाया और अब इनसे भी चुदने को बोल रहे हैं। आपको शर्म नहीं आती है।” लक्ष्मी केशव की बांहों में छटपटाती बोली।
“हम लोगों को शरम आती है लेकिन जब कोई औरत को चोदने का मौका मिलता है तो शर्म चली जाती है। अब भाषण मत दे। मेहमान की आवभगत कर।” मैं बेशर्मी से बोला।
केशव काफी दूर से आया था, इसलिए पसीने से लथपथ था। नंगा जानवर लग रहा था। शरीर से पसीने की बदबू आ रही थी इसलिए लक्ष्मी घिना भी रही थी। वह जंगली जानवर की तरह जबरदस्ती लक्ष्मी को फर्श पर गिरा कर उसके ऊपर चढ़ गया और अपने गन्दे होंठों से चूमने लगा। लक्ष्मी तब और ज्यादा छटपटाने लगी जब उसने अपने हाथ की एक उंगली उसकी गांड़ में घुसा दी।
“अहा कितना मस्त गांड़ है रानी तेरा। मुझे तेरी गांड़ बहुत पसंद है। मैं तो तेरी गांड़ चोदुंगा। तेरी शादी के समय से ही तेरी गांड़ देख कर मेरा लौड़ा खड़ा हो जाता था। आज मौका मिला है।” वह उसकी गांड़ में उंगली घुसा कर अन्दर बाहर करते हुए बोला।
“आह ओह नहीं नहीं प्लीज मेरी गांड़ में नहीं” वह रोती हुई बोली।
मैं जानता था कि केशव गांड़ का रसिया है। जहां मस्त गांड़ देखा कि उसके मुंह में पानी आ जाता था। इसने तो चिकने लड़कों को भी नहीं छोड़ा। बहला फुसलाकर लड़कों की गांड़ भी चोद लेता था। जहां कोई चिकना लड़का दिखा कि इसका लौड़ा फनफना उठता था। यहां तो इतना अद्भुत गांड़ फोकट में मिल गया था, कैसे छोड़ता भला।
“चुप रंडी कहीं की, चुपचाप अपनी गांड़ चोदने दे।” वह गुर्राया। लक्ष्मी समझ गई कि उसके बचने का कोई रास्ता नहीं है, अतः शांत हो कर अपनी गांड़ में होने वाले हमले के लिए सांस रोक कर तैयार हो गई। केशव ने उसे कुतिया की तरह झुका कर अपने लंड में थूक लगाया और उसकी गांड़ में एक ही झटके में सटाक से पूरा लंड पेल दिया जिसे वह अपनी उंगली से चोद कर ढीला कर चुका था।
“आ्आ्आ्आ्आ मर गई मेरी अम्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह् ््म्म्््म््म्््म््म्म््म््म्््म््म्म्म्मा, फट गई मेरी गांड़,” वह चीख पड़ी।
मैं घबरा गया कि कहीं कामिनी उठ न जाय। लेकिन किस्मत से वह उठी नहीं, सोती रही।
“चुप बुर चोदी, अभी देख कितना मज़ा आएगा” कहते हुए उसने उसकी चूचियों को पीछे से पकड़ कर दबाना शुरू किया और दनादन अपना लौड़ा उसकी गांड़ में ठोंकना चालू किया। थोड़ी ही देर में लक्ष्मी मस्ती में भर कर गांड़ उठा उठा कर चुदवाने लगी।
“आह राजा ओह रसिया, चोद मेरी गांड़, आह हरामी के पिल्ले बेटी चोद,” उसी तरह बड़बड़ाती हुई मस्ती में डूब कर अपनी गांड़ चुदवाने लगी।
“आह रानी ओह रंडी कुतिया साली हरामजादी गांड़ मरानी, अब आ रहा है ना मज़ा, ओह मस्त गांड है रे तेरा।” बोलता जा रहा था।
“हां साले कुत्ते, मुझे कुतिया बना कर खूब मज़ा दे रहे हो ओह ओह आह आह” वह भी बोले जा रही थी।
करीब पच्चीस मिनट बाद केशव ने अपना लौड़ा रस उसकी गांड़ में भरना चालू किया। पूरा खल्लास हो कर दोनों वहीं लस्त पस्त फर्श पर लुढ़क गए। उस दिन के बाद तो हम दोनों की चांदी हो गई। दोनों ने उसे खूब चोदा। केशव दो दिन के लिए आया था लेकिन एक हफ्ता तक रुका। फिर लक्ष्मी की सास आ गयी तो हम थोड़ा सावधान हो गये और बड़ी होशियारी से मौका खोज कर चोदने लगे। मैं चाहता था कि लक्ष्मी फिर से मां बने और बेटे को जन्म दे। भगवान ने हमारी प्रार्थना सुन ली और उसने एक बेटे को जन्म दिया। (बेटा तो हुआ मगर बेहद घटिया, जलील और कमीना। उसके कमीने पन की कथा मैं बाद में बताऊंगी)
“ओह दादाजी आप तो बहुत बड़े हरामी निकले। मेरी मां को भी रंडी बना दिया।” मैं बोली।
नानाजी भी बेसाख्ता बोल उठे, “साले मादरचोद मेरी बेटी को इस हरामी हरिया के साथ साथ तुम दोनों भी चोद लिए? बड़े कमीने हो साले हरामियों। कोई बात नहीं साले मादरचोद, सब चलेगा, हम सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। अब इसी कामिनी को देख लो। कौन है यह? जो भी थी पहले थी, मगर अब तो हमारी चूत मरानी रानी है ना। मेरी तो कुतिया है, बाकी सब की क्या है नहीं मालूम।”
“मैं आप सबकी द्रौपदी हूं साले कुत्ते। द्रौपदी तो एक एक करके चुदवाती थी। आप सभी ने तो एक साथ चोद कर मुझे द्रौपदी से भी महान बना दिया। आप सभी लोग आज से मेरे पांडव पति हो।” मैं उन नंगे भुजंगे वासना के पुजारियों के बीच नंगी ही लेटे लेटे बोल पड़ी।
“हां हां, तू हमारी पत्नी द्रौपदी और हम आज से तेरे पांच पति, पांडव हैं,” मेरे नंगे जिस्म पर हाथ फेरते हुए सब एक स्वर में बोल उठे।
इसके बाद की घटनाएं मैं अगले भागों में बताऊंगी। अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराते रहिएगा।
पिछले भाग में अपने पढ़ा कि किस तरह मेरे दादाजी और बड़े दादाजी ने मेरी मां को अपनी हवस का शिकार बनाया और मनमाने ढंग से मेरी मां को भोगा। अपनी गंदी सोच को कार्यरूप में परिणत कर दिया और रिश्ते की मर्यादा को तार तार करते हुए मेरी मां को एक बेटे की मां बना डाला। मेरी मां भी उनकी वासना की आग में झुलस कर कामुकता पूर्ण खेल में खुल कर भाग लेने लगी और रिश्तों की मर्यादा भूल गयी। पापा की कमजोरी भी उसकी एक वजह थी, इसलिए मेरी मां को क्या दोष दूं। खैर जो हुआ सो हुआ मगर इस तरह कामलोलुप मर्दों की भोग्या बन कर मेरी मां को पराए मर्दों का चस्का लग चुका था। हरिया, मेरे पापा, दादाजी और बड़े दादाजी के विभिन्नता भरे नित नवीन तरह की कामुकतापूर्ण खेल से मेरी मां के अंदर वासना का समुंदर हिलोरें लेने लगा जिसका पूरा फायदा मेरे दादाजी और बड़े दादाजी ने जी भर के उठाया। मेरे छोटे भाई के पैदा होने के बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति की खुशी में घर वाले जश्न मनाने लगे। इधर मेरी मां के साथ उनका अनैतिक संबंध ज्यों का त्यों चलता ही रहा। मेरा भाई रितेश ज्यों ज्यों वह बड़ा होता गया वह मां बाप के अत्यथिक लाड़ प्यार के कारण बिगड़ता चला गया। आवारा साथियों के सोहबत में वह 15 साल की उम्र से ही नशे का आदी हो गया। उसके आवारा दोस्त अक्सर हमारे घर आया जाया करते थे। उनकी कुसंगति में पड़ कर रितेश छिप छिपकर सिगरेट पीने लगा था। उसे अश्लील साहित्य और अश्लील फिल्मों का चस्का लग गया था। मैं ने मम्मी पापा से इसकी शिकायत भी की थी लेकिन उनकेे कानों में जूं तक नहीं रेंगी, डांटना तो दूर, एक शब्द भी उन्होंने उसे नहीं कहा, नतीजा यह हुआ उसका मन और बढ़ गया, स्कूल में बदमाशी करना, मारपीट करना, लड़कियों से छेड़खानी करना, क्लास से भागना उसकी आदत में शुमार हो चुका था। कहने का तात्पर्य यह है कि वह धीरे-धीरे हाथ से निकलता चला गया। मैं भी समझ गई कि कुछ कहना सुनना व्यर्थ है, अतः सिर्फ अपने काम से काम रखने लगी। उसके आवारा दोस्तों की गंदी नजर मुझ पर भी पड़ती थी किंतु किसी की हिम्मत नहीं हुई मुझसे कुछ कहने की क्योंकि सब जानते थे कि मैं किस तरह की लड़की हूं। सबकी नजरों में निहायत ही शरीफ मगर मुझसे ग़लत हरकत करने वालों के लिए उतनी ही कठोर थी जिसका एक दो नमूना मैंने दिखाया भी था।
खैर उसके बारे में विस्तार से बाद में बताऊंगी। फिलहाल तो उसी तरह नंगे पड़े दादाजी के मुख से मेरी मां की छिनाल पन की बातें सुनने में हम सब लीन थे। उनकी बातें सुन कर मुझे बीती बातें याद आने लगी। जब से मैं ने होश संभाला तब से कई बार मैंने अपनी मां को दादाजी के कमरे से अस्त व्यस्त हालत में निकलते देखा था किन्तु कभी मैं ने उनके बीच इस तरह के संबंध की कल्पना भी नहीं की थी। कभी दादाजी को किचन से निकलने के बाद मां के लाल चेहरे को किचन में देखा था। इधर दादाजी बता रहे थे, “लक्ष्मी को अब अलग अलग लंड का मज़ा मिल गया था। उसे भी जब मौका मिलता था आ जाती थी हमारे कमरे में और सीधे मेरा लंड पकड़ लेती थी। बीच बीच में हफ्ते दो हफ्ते में जब केशव आ जाता था तो लक्ष्मी लाज शरम छोड़ कर मेरे सामने ही इसका लंड पकड़ लेती थी और बोलती थी, “बाबूजी, इतने दिनों बाद आए हैं, मेहमान नवाजी का मौका दीजिए ना।” केशव ठहरा एक नंबर का चुदक्कड़, “वाह बिटिया वाह, यह हुई न बात, तुझे तो देखते ही मेरा लौड़ा फनफना जाता है। आजा मेरी मेहमान नवाजी कर।” फिर शुरू होता था धमाधम चुदाई। उसकी हालत ऐसी थी कि जब हममें से कोई नहीं मिलता था तो किसी से भी चुदवा लेती थी। इसका पता मुझे तब चला जब एक हफ्ते के लिए मैं गांव गया था और अचानक दोपहर में वापस आया तो दरवाजा के बाहर एक जोड़ा फटा पुराना मैला कुचैला चप्पल पड़ा था। दरवाजा अंदर से बंद था। मैं ने दरवाजा खटखटाया तो काफी देर बाद दरवाजा खुला और दरवाजे पर अस्त व्यस्त हालत में लक्ष्मी खड़ी थी बाल बिखरे हुए थे। वह सिर्फ एक नाईटी पहने हुए थी। साफ पता चल रहा था कि अंदर कुछ नहीं पहनी हुई थी। “अरे बाबूजी आप?” अपने होश संभालती हुई घबराए आवाज में बोली।
मुझे संदेह हुआ, मैं ने चारों तरफ नजर घुमाया, कोई नहीं दिखा। “इतनी देर क्यों लगा दरवाजा खोलने में बहु?” मैं पूछा।
“जी वो मैं बाथरूम में थी। आप बैठिए ना। मैं अभी पानी लाई,” कहते हुए किचन में गई। मैं तुरंत बाथरूम गया, बाथरूम सूखा था। फिर मैं हर कमरे में झांका, कहीं कोई नहीं था। जैसे ही मैंने बेडरूम में बेड के नीचे देखा तो भौंचक रह गया। बेड के नीचे इस इलाके का काला कलूटा पागल भिखारी नंगे बदन, सिर्फ फटा हुआ हाफ पैंट पहना हुआ छिपा हुआ था।
“बाहर निकल साले हरामी” मैं चीख पड़ा। इधर डरते डरते वह भिखारी बाहर निकला। उस दुबले पतले, करीब तीस पैंतीस साल का, साढ़े चार फुटिया नाटे गंदे भिखारी को देख कर मैं ताज्जुब कर रहा था कि भगवान जाने इस पागल भिखारी में लक्ष्मी ने क्या देखा था, जबकि लक्ष्मी अच्छी खासी साढ़े पांच फुट की बेहद सुंदर, गोरी और सेक्सी औरत थी। बिखरे गंदे खिचड़ी बाल और बेतरतीब झाड़ियों की तरह लंबी दाढ़ी के साथ पिचके गाल, अपने काले रंग के अनुसार उस पागल भिखारी का नाम कालू था। उसका हाफ पैंट सामने से तंबू बना हुआ था। एक तरफ उसका मैला कुचैला फटा पुराना बनियान फर्श पर पड़ा हुआ था। साफ साफ पता चल चल रहा था कि यहां चुदाई का कार्यक्रम शुरू होने वाला था।
“बहु, जल्दी इधर आ साली कुतिया।” मैं ने बहु को आवाज दी। लक्ष्मी डरते डरते बेडरूम में आई। “साली हरामजादी बुर चोदी, और कोई नहीं मिला चुदवाने के लिए। यही पागल भिखारी मिला?” मैं गुस्से से बोला।
रंगे हाथ पकड़ाने के बावजूद वह बड़ी बेशरमी से बोली, “और क्या करती मैं? आप लोगों ने ही तो मुझे रंडी बनाया है। मुझे लंड का चस्का लगा दिया। आप लोगों ने ही तो मेरी आदत खराब की है। अब आप लोग नहीं रहिएगा तो मैं अपने शरीर की गर्मी का क्या करूं, बताईए?”
मुझे उस पर तरस आया और बोला, “ठीक है बहु ठीक है, मगर तुझे यही पागल मिला था?”
मेरे नरम पड़ने पर वह थोड़ी हिम्मत से बोली, “बाबूजी, मुझे लगा कि इस पागल के साथ ये सब करना ज्यादा सुरक्षित है। यह किसी से कुछ बोलेगा भी नहीं।”
“तू तो बहुत चालाक हो बहु। पर तूने इसे फंसाया कैसे?” अब मैंने गुस्सा थूक कर मजा लेते हुए पूछा।
थोड़ी झिझकते हुए वह बोलने लगी, “बाबूजी यह रोज इधर भीख मांगने आता था। दिमागी तौर से यह पागल है मगर खतरनाक नहीं। आज तक इसने किसी को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया है। यह दरवाजे पर आकर बैठ जाता था और रोटी या खाने की कोई भी चीज मिलने पर यहीं बैठ कर खाता था और चला जाता था। इधर आप लोग नहीं रहने के कारण मैं तड़प रही थी और बड़ी परेशान थी कि अपने शरीर की गर्मी कैसे शांत करूं। आज जब वह रोज की तरह दरवाजे पर आया और आवाज लगाया, “मां जी कुछ खाने को मिलेगा?” मेरे दिमाग में एक आईडिया आया और मैं जोर से बोली, “थोड़ा रुको मैं अभी आती हूं,” और तुरंत अपना ब्रा और पैंटी उतार के नाईटी पहन ली। नाईटी के ऊपर के दो बटन खोल दी ताकि थोड़ा सा झुकने पर ही सामने से मेरी चूचियां नंगी हो कर दिखने लगे। इसी तरह कमर से नीचे के बटन भी खोल दी कि थोड़ा सा पैर फैलाने पर सामने से मेरी चूत भी दिखाई दे। फिर मैं दरवाजा खोल कर उसे अंदर आने को बोली। वह अंदर आया तो मैंने उसे बैठने के लिए कहा। जब वह बैठ रहा था तो मैंने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। वह चुपचाप नीचे फर्श पर बैठ गया। जब वह बैठा तो मेरी नज़र उसके पैंट से झांकते लंड पर पड़ी जिसे देखते ही मैं गनगना उठी। पैंट के अन्दर यह कुछ नहीं पहना था और इसका लंड स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। मैं रोटी ला कर उसके सामने प्लेट में डालने के लिए झुकी तो सामने से खुली नाईटी से झांकते मेरी चूचियों पर कालू की नज़रें पड़ीं और वहीं जम गई। मैं ने महसूस किया कि इसका लंड खड़ा होने लगा है। मैं अब अपने पांव थोड़ा फैलाई तो मेरी चूत के सामने से नाईटी का पर्दा हट गया और मेरी चूत भी सामने से साफ साफ दिखाई देने लगी। जब प्लेट में रोटियां देखने के लिए सिर झुका रहा था तो इसकी नजर मेरी खुली चूत पर पड़ी, इसकी नजरें मेरी चूत पर ही जम गयीं। मैं इसी के चेहरे की प्रतिक्रिया देख रही थी। इसका आधा तना लंड और तनने लगा। मैं समझ गई कि इसे पटाने में कोई समस्या नहीं होगी। फिर इसने सिर उठाकर मुझे देखा तो मैं मुस्कुरा उठी। पता नहीं इसने कभी किसी को चोदा था या नहीं। जितनी देर यह खाता रहा, मैं इसे अपनी चूचियां और चूत दिखाती रही।
खाना खाने के बाद मैं ने इसके हाथ धुुलवाया और पूछा “और कुछ चाहिए?” यह असमंजस में चुपचाप मुझे देख रहा था। मैं ने इसका हाथ पकड़ा और बोली, “चलो अंदर, मैं तुम्हें कुछ और भी दूूंगी।” यह यंत्र चालित पालतू कुत्ते की तरह मेरे साथ बेडरूम में आ गया। “बेेड पर आराम से बैठ जाओ।” मैं ने कहा। यह आराम से बेड पर बैठ गया। मैं भी आ कर इससे सटकर बैठ गई। पता नहीं कितने दिनों से नहाया नहीं था, इसके गंदे शरीर से पसीने की दुर्गन्ध भी आ रही थी मगर मुझे उसकी परवाह नहीं थी, मेरा उद्देश्य तो सिर्फ एक ही था, उसके लंड से अपनी चूत की आग बुझाना। उस समय इसके शरीर की बदबू भी मुझे अच्छी लग रही थी। मैं ने इसके हाथों को अपनी चूचियों पर रखा तो यह अपने आप मेरी चूचियों को सहलाने और दबाने लगा। नाईटी के ऊपर वाले बटन तो खुले ही थे, जिस कारण वह आसानी से हाथ घुसा कर मेरी चूचियों को मसलने लगा। मैं उसके फटे हुए हाफ पैंट में हाथ डाल कर उसके लंड को सहलाने लगी, तभी आपने दरवाजा खटखटा कर पूरा मजा किरकिरा कर दिया। मैं झट से कालू को बिस्तर के नीचे घुसा कर दरवाजा खोलने आ गई।”
“मतलब तू इससे चुदने को तैयार हो चुकी थी। चलो कोई बात नहीं। अब जब इतना कुछ हो चुका है तो बाकी काम भी कर ही लो। बेचारे कालू को क्यों तरसता छोड़ोगी। जहां से मैंने डिस्टर्ब किया वहीं से शुरू हो जा, मैं बैठ कर पहले देख देख कर मजा लूंगा फिर तुझे चोदूंगा।” मैं ने कहा और बेडरूम के कोने में रखी कुर्सी पर बैठ गया। मेरी ओर से हरी झंडी मिलते ही लक्ष्मी खुश हो गई और झट से कालू के साथ बिस्तर पर बैठ गयी। कालू भी खुश हो गया और दोनों हाथों से लक्ष्मी की नाईटी में हाथ डालकर चूचियों को पकड़कर दबाना शुरू किया। लक्ष्मी भी उसके पैंट में हाथ घुसा कर उसके लंड को सहलाने लगी। धीरे धीरे कालू का लंड टाईट होने लगा और उसका सोया हुआ लंड तनतना कर खड़ा हो गया। ऐसा लगता था कि कालू ने किसी औरत को आज तक नहीं चोदा था, इसलिए उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हुआ, वह बेचैनी से कसमसा रहा था। इतना तो जरूर था कि उसके लंड को सहलाने से उसे बहुत मज़ा आ रहा था, मगर उसके आगे क्या? वह जोश में आ कर अचानक लक्ष्मी की चूचियों को जोर जोर से दबाने लगा। लक्ष्मी आह ओह कर रही थी। कालू भी आह आह कर रहा था। लक्ष्मी पागल हो रही थी, उसने अपनी नाईटी पूरी तरह खोल कर फेंक दी। ऐसी नंगी औरत कालू ने पहले कभी नहीं देखा था। वह घूर घूर कर उसकी पनियायी चूत को देखने लगा। इधर गरमाई हुई लक्ष्मी बेकरारी से उसकी पैंट को खोलने लगी। कालू की कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन वह भी बेचैनी से अपनी पैंट से आजाद होने के लिए मचल उठा। जैसे ही कालू का पैंट खुला, लक्ष्मी का होश गुम हो गया। मैं भी चकित रह गया। कम से कम दस इंच लम्बा और चार इंच मोटा लंड काले नाग की तरह फनफना कर खड़ा था। मैं समझ गया कि आज लक्ष्मी की चूत का बाजा बजने वाला है। लक्ष्मी हड़बड़ा कर बिस्तर से उठ गई, “हाय राम इतना बड़ा लंड, नहीं नहीं मैं नहीं चुदवाऊंगी। ये तो मेरी चूत फ़ाड़ देगा।”
मगर मैं गुस्से से बोला, “साली हरामजादी, चुदवाने के लिए कालू को तू खुद लाई है और अब इसका लंड देख कर तेरी गांड़ फट रही है। कालू, छोड़ना मत इस कुतिया को, फाड़ दे इस बुर चोदी की बुर।” मैं उठा और लक्ष्मी को बिस्तर पर पटक दिया।
“नहीं नहीं छोड़ दीजिए मुझको प्लीज।” वह रोने गिड़गिड़ाने लगी।
“चुप साली चूत मरानी कुत्ती, अब देख क्या रहा है मादरचोद। चल इसकी चूत का बाजा बजाना शुरू कर।” मैं गुस्से में बोला। लेकिन कालू को क्या पता था कि चुदाई कैसे की जाती है।
मैं जबरदस्ती लक्ष्मी के पैरों को फैला कर उसकी चूत दिखा कर कालू से बोला, “ये है इस कुतिया की चूत और ये है तेरा लंड,” उसके लंड को पकड़ कर लक्ष्मी के ऊपर खींचा। “अब अपना लौड़ा इसकी चूत में घुसा” कहते हुए उसका लंड लक्ष्मी की चूत के मुहाने पर रखा। कालू लक्ष्मी के ऊपर चढ़ चुका था और लक्ष्मी की चूत में लंड घुसाने की कोशिश करने लगा। उसका सुपाड़ा छेद में नहीं घुस रहा था, इधर उधर फिसल रहा था। फिर अचानक ही उसके लंड का सुपाड़ा ठीक जगह पर टिका और जैसे जैसे कालू दबाव बढ़ाने लगा, लक्ष्मी की चूत फाड़ता हुआ उसका गधे जैसा लंड अंदर घुसने लगा। लक्ष्मी ने दर्द के मारे चीखने के लिए मुंह खोला तो मैं ने उसका मुंह बंद कर दिया।
“चीखना मत हरामजादी, वरना टेंटुआ दबा दूंगा।” उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उधर कालू को तो मानो स्वर्ग का द्वार मिल गया था। धीरे धीरे पूरा लंड पेल दिया और फिर तो वह जानवर बन गया। उसे चूत का स्वाद मिल गया था, ठीक उस बेजुबान कुत्ते की तरह जिसके लपलपाते लौड़े को किसी कुतिया की चूत मिल गई हो। फिर तो वह लक्ष्मी की गांड़ के नीचे हाथ डाल कर कुत्ते की स्पीड से दनादन चोदना चालू कर दिया। कुछ ही देर में जब दर्द कम हुआ तो लक्ष्मी भी नीचे से गांड़ उठा उठा कर मज़े से चुदवाने लगी और रोना गाना बंद कर के मस्ती में भर कर बोलने लगी, “आह कालू, ओह राजा, चोद राजा, आह्ह्ह्ह् ओह्ह्ह्ह।” कालू बिना कुछ बोले कुत्ते की तरह घपाघप मशीन की तरह चोदने में लगा रहा। करीब दस मिनट में ही लक्ष्मी झड़ने लगी, “आ्वा्हा्आ्आ्आह्ह्ह” करते हुए निढाल हो गई, मगर कालू कहां छोड़ने वाला था, जैसे ही वह निढाल होकर पलटने लगी, उसने उसके पलटते ही पीछे से पकड़ लिया और चूत के छेद का पता तो चल ही गया था, मजा भी जान गया था, पीछे से ही कुत्ते की तरह चढ़ कर जो चुदाई शुरू किया कि लक्ष्मी हाय हाय कर उठी और फिर से कुतिया की तरह गांड़ उठा उठा कर चुदवाने लगी। कालू तो मानो जंगली जानवर ही बन गया था। लक्ष्मी के गालों को अपने दांतों से काट काट कर पहले ही लाल कर दिया था, पीछे से चूचियों को निचोड़ने लगा। ताज्जुब की बात थी कि लक्ष्मी पागलों की तरह इस सबका मज़ा ले रही थी। करीब चालीस मिनट तक पटक पटक कर कुत्ते की तरह चोदने के बाद जिंदगी में पहली बार खलास होने लगा ओर ऐसा ज़ोर से लक्ष्मी को जकड़ लिया मानो उसके अंदर घुस ही जाएगा। एकदम किसी जानवर की तरह वह डकारते हुए पूरा एक मिनट तक अपने लंड का रस उसकी चूत में डालता रहा। इस पूरी चुदाई के दौरान लक्ष्मी कुल तीन बार झड़ी। लक्ष्मी का तो पूरा शरीर निचोड़ डाला था। कालू पूरा पसीने से लथपथ हांफते हुए खलास हो कर जैसे ही एक तरफ लुढ़का, मैं ने देखा कि लक्ष्मी की चूत फूल कर भैंंस की चूत जैसे हो गई थी। लक्ष्मी का पूरा शरीर खुद का और कालू का बदबूदार पसीने से भीग चुका था। मुझे अब उसकी चूत चोदने के बदले उसकी गांड़ चोदने की इच्छा होने लगी। मैं इनकी चुदाई के दौरान ही गरमा गया था और अपना कपड़ा खोल कर तैयार था कि जैसे ही कालू चोद कर हटेगा, मैं इस कुतिया पर चढ़ जाऊंगा। जैसे ही कालू हटा, बिना देर किए लक्ष्मी के पीछे से सवार हो गया और, लक्ष्मी मना करती रही मगर मैं सीधे अपना टन टन करता लंड उसकी गांड़ में एक ही बार में ठोक दिया और करीब बीस मिनट तक जम के उसकी गांड़ का भुर्ता बनाता रहा। इस बीस मिनट के अंदर ही कालू का लंड दुबारा टाईट हो गया और अब उसने देख लिया था कि उसकी गांड़ के छेद में भी लंड डाल कर चोदा जा सकता है, जैसे ही मैं खलास हो कर लक्ष्मी पर से हटा, कालू दुबारा उस पर चढ़ गया, मगर इस बार उसकी गांड़ का भुर्ता बनाने।
“नहीं कालू नहीं,” लक्ष्मी चीख पड़ी, “अरे मादरचोद मेरी गांड़ फाड़ डालोगे क्या?” कालू को क्या परवाह थी। वह तो भूखे भेड़िए की तरह टूट पड़ा और एक ही जोर के झटके में उसकी चुदी चुदाई गांड़ में अपना गधा लंड पेल दिया।
“अरे फाड़ दिया रे मादरचोद मेरी गांड़, ओह साले कुत्ते हट हाय हाय,” चीखती रही मगर उस पागल पर क्या असर पड़ने वाला था। एक बार लंड घुसाने की देर थी कि दे दनादन लक्ष्मी की गांड़ की कुटाई करने लगा। ठीक किसी कुत्ते की तरह कभी दाहिना टांग चढ़ा कर चोदता तो कभी बांया टांग चढ़ा कर चोदता रहा और इस बार तो और गज़ब ही कर दिया, पूरे पचास मिनट तक पागलों की तरह नोचते खसोटते रौंदते भंभोड़ते जो चोदा कि लक्ष्मी की हालत देखने लायक थी। जब वह उसकी गांड़ चोद कर अपना लंड निकाला तो कालू के लंड पर पीला पीला मल लिथड़ा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि लक्ष्मी की अंतड़ियों को साफ करते हुए बाहर आया था। उसकी गांड़ का छेद भी बढ़ कर खुला खुला दिखाई दे रहा था और गांड़ से होकर जांघों तक कालू के लौड़ा रस से भीगा पीला पीला मल बह निकला था। लक्ष्मी कालू का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बाथरूम में जा घुसी। जल्दी ही धो धा कर दोनों बाहर आए। इस पूरे नज़ारे को देख कर मुझे खूब मज़ा आया।
“शाबाश कालू, आज तूने कमाल कर दिया। साली रंडी की चूत और गांड़ का अच्छा बाजा बजाया। मजा आ गया,” मैं ताली बजाते हुए बोला।
लक्ष्मी को चिढ़ाते हुए बोला, “साली हरामजादी रंडी, तुझे ठीक ऐसा ही चुदक्कड़ चाहिए था। अब आया ना मज़ा?”
लक्ष्मी भी कम छिनाल थोड़ी थी, वह साली हरामजादी बुर चोदी थक कर चूर हो गई थी मगर मुस्करा कर बोली, “आह मजा आ गया बाबूजी। आज तक मुझे ऐसा मजा पहले कभी नहीं मिला था। क्या गजब का लंड है इसका। इतने सारे मर्दों में आज तक इतना जबरदस्त चुदक्कड़ नहीं मिला था।”
“इतने सारे मर्दों का क्या मतलब है? सच सच बता रे रंडी, अशोक, हरिया, केशव और मेरे अलावा और कितने लोग हैं जिन्होंने तुझे चोदा है।” मैं गुर्रा कर पूछा।
उसे तुरंत अपनी गलती का अहसास हो गया। उसने दांतों से अपनी जीभ काट ली। “हाय राम मैं यह क्या बोल उठी” उसके मुंह से निकला। फिर भी हिम्मत जुटा कर बोली, “आप लोगों ने ही तो मुझे बर्बाद किया। पहले हरिया ने मेरी नादानी का फायदा उठाकर मुझे चोदा। आप लोगों के लिए तो बस एक बहाना मिल गया और उसी का फायदा उठाकर मुझे चोदने लगे और पराए मर्दों के लंड का चस्का लगा दिया। असल में तो लड़का पैदा करने का सिर्फ़ बहाना था। सच तो यह है कि आप लोग मुझे चोदने की फिराक में ही थे। आप और बड़े बाबूजी ने मुझे रंडी बनाने में कोई कसर छोड़ी थी क्या? मुझे पराए मर्दों के लंड का चस्का आप ही लोगों ने लगाया था ना? मुझे तो आप लोगों से चुदने के बाद कामिनी के पापा के साथ चुदने की इच्छा ही मर गई थी। आप लोगों के नहीं रहने पर जब मुझे चुदने की इच्छा होती थी तो मैं पागल हो जाती थी। मैं क्या करती? आप ही बताईए? आस पड़ोस के भूखे मर्द मुझे खा जाने की नजरों से देखते रहते थे, मगर आप लोगों से चुदने के पहले मैं किसी और मर्द को घास भी नहीं डालती थी। मगर आप लोगों ने मेरे अंदर चुदाई की भूख को इतना बढ़ा दी थी कि मेरे लिए अब सभी मर्द बराबर हो गये थे।”
“अच्छा बाबा अच्छा, अब मुझे कुछ नहीं पूछना है। अगर तुझे बताना है तो बता, तेरी मर्जी, वरना कोई बात नहीं।” मैं नरमी से बोला।
अब वह थोड़ी खुल गई और बोली, “ठीक है, अगर आप सुनना चाहते हैं तो सुनिए। सच बात बोलूं तो मुझे खुद पता नहीं कि अब तक कितने लोगों नें मुझे चोदा है।”
“क्या मतलब, तुझे पता ही नहीं कि कितने लोगों ने तुझे चोदा है?” मैं अकचका गया।
“हां यह सच है” वह बोली।
अबतक हम सब उसी तरह नंग धड़ंग बैठे हुए थे, कालू भी चुपचाप उसी तरह पालतू कुत्ते की तरह नंग धड़ंग वहां खड़ा था और हमारी बातें सुन रहा था।
“अबे साले तू अब तक यहां खड़ा क्या कर रहा है। अपने कपड़े पहन और दफा हो यहां से।” मैं कालू को डांटा। लक्ष्मी तुरंत बोल उठी, “ठीक है कालू तू अभी यहां से जा। बहुत मजा दिया राजा। आज से तू भी मेरे तन का भोग लगाने आते रहना।” कालू आज्ञाकारी कुत्ते की तरह सिर हिलाता हुआ अपने कपड़े पहन कर चुपचाप चला गया। उसके चेहरे से साफ मालूम हो रहा था कि अभी उसका मन नहीं भरा है। लेकिन फिर आने के निमंत्रण को समझ गया था।
“हां, अब तू सुना।” मैं लक्ष्मी से बोला।
“तो मैं कह रही थी कि आस पड़ोस के मर्द मुझे भूखी नजरों से घूरते रहते थे। अब जबकि आप लोगों ने मुझ पर पराये मर्दों से चुदवाने का नशा भर दिया था तो मैं सोचने लगी कि ये जो मर्द मुझे भूखी नज़रों से घूरते रहते हैं, उन्हें क्यों वंचित रखूं, उनकी भूख मिटाते हुए अपनी भी भूख मिटाने में क्या हर्ज है। यह शुभ काम शुरू हुआ हमारे घर में दूध देने वाले ग्वाले से। वह पैंतीस चालीस साल का लंबा चौड़ा छः फुटा ग्वाला शंभू रोज़ सवेरे दूध देने आता था और मेरी बड़ी बड़ी चूचियों को घूरता रहता था। एक दिन ऐसा हुआ कि मैं रात भर चुदासी के मारे तड़पती रही। संयोग से उस दिन घर में न आप थे और न ही कोई और। ग्वाला शंभू थोड़ी देर से दूध देने आया, तब तक बच्चे स्कूल जा चुके थे और कामिनी के पापा भी औफिस जा चुके थे। मैं मौका अच्छा देख कर दूध का बर्तन लेने किचन में गई और फटाफट ब्रा पैंटी खोल कर आज की तरह ही नाईटी के ऊपर और नीचे के बटन खोल कर दरवाजे पर आई। ऊपर से मेरी चूचियां आधे से ज्यादा बाहर झांक रही थीं। शंभू जब मेरी बड़ी बड़ी चूचियों को इस तरह खुला देखा तो देखता ही रह गया। उसकी धोती के अंदर उसका लौड़ा खड़ा होने लगा। मैं समझ रही थी। दूध का केन नीचे रखा हुआ था। जब वह दूध निकालने के लिए झुका तो मैं ने अपने पैर जरा सा फैला दिया जिससे मेरी चूत भी दिखाई देने लगी। जैसे ही उसने सिर उठा कर मेरी चूत को इतने सामने से खुला देखा तो मेरे चेहरे की ओर देखा। मैं मुस्कुरा उठी। वह सब माजरा समझ गया और उसकी आंखें भूखे भेड़िए की तरह चमक उठी। बिना कुछ बोले मैं दूध लेकर पलटी और अंदर की ओर चली। मेरे पीछे पीछे शंभू भी अंदर घुस आया और धीरे से दरवाजा बंद कर दिया।
मैं किचन में दूध का बर्तन अभी रखी ही थी कि पीछे से आकर शंभू ने मुझे पकड़ लिया और बोला, “आज मौका मिला है रानी। बहुत तड़पाई हो।” कहते हुए मेरी चूचियां मसलने लगा और मेरी चूत सहलाने लगा।
मैं झूठ मूठ का ड्रामा करने लगी, “छोड़ हरामी, ये क्या कर रहे हो?”
“ड्रामा मत कर रानी। हम सब समझते हैं। आज तुझे अपने लौड़े का कमाल दिखाए बिना नहीं छोड़ेंगे।” कहते हुए मेरी नाईटी खोल कर किचन में ही नंगी कर दिया और अपनी धोती उतार कर खुद भी नंगा हो गया। उसका आठ इंच का लंड फनफना रहा था। वहीं पर मुझे झुका कर पीछे से मेरी चूत में अपना लंड ठोंक दिया।
“हाय हरामी मादरचोद, यह क्या किया। छोड़ मुझे, आह आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” मैं छटपटाने का नाटक कर रही थी।
“साली रंडी, चुप, आज तो मौका मिला है इतने दिन बाद। खूब तरसाई हो। चोदने दे।” कहते हुए उसी अवस्था में जो चुदाई चालू किया कि पूछो ही मत। मेरी बड़ी बड़ी चूचियों को जी भर के दबाता रहा, नोचता रहा, निचोड़ता रहा। करीब बीस मिनट तक खूब जम के चोदा और मुझे भरपूर मजा देकर चला गया। फिर तो जब भी वह आता और घर खाली पाता तो बिना चोदे नहीं छोड़ता है। मैं भी बहुत खुश होती हूं। उसी तरह हमारा पेपर वाला भी मुझे चोदने लगा। एक दिन पेपर का बिल पेमेंट के लिए आया था तो मैंने उसे दूसरे दिन आने को कहा क्योंकि उस वक्त घर में काफी लोग थे। मैं ने दूसरे दिन उसे तब बुलाया जब मुझे पता था कि उस वक्त घर में कोई नहीं होगा। मैं ने उसे ठीक उसी तरह ललचा कर फंसाया जिस तरह दूध वाले को फंसाया था। उसने पहली बार मुझे सोफे पर ही चोदा। उसके बाद तो जब भी मौका मिलता आ जाता और चोद कर चला जाता है। हमारे घर से कुछ दूर शर्मा जी रहते हैं, वे भी मुझे काफी दिनों से घूरते रहते थे। एक दिन मेरे पति से किसी काम के सिलसिले में मिलने आए थे तो मैंने मौका ताड़ कर उसे फंसाया। में ने उन्हें चाय पी कर जाने के लिए कहा और उसी तरह खाली नाईटी पहन कर चाय देने आई और फिसलने का बहाना करके उसकी पैंट पर ठीक लंड के ऊपर चाय गिरा दिया।
“हाय राम ये क्या हुआ” कहते हुए झट से चाय गिरने की जगह पर भीगे कपड़े से रगड़ने लगी। “इससेे कपड़े पर चाय का दाग नहीं रहेगा” कहते हुए मैं ने महसूस किया कि उनका लंड खड़ा हो गया है। फिर क्या था, मैं ने पैंट के ऊपर से ही उनका लंड पकड़ लिया। शर्मा जी तो कई दिनों से मेरी ओर से सिग्नल मिलने का इंतजार ही कर रहे थे। झट से मुझे दबोच लिया और लगे दनादन चूमने।
“हाय रानी, कई दिनों से तुझे चोदने की केवल कल्पना करता था। आज मौका मिला है। तेरी चूचियां गज़ब की हैं रानी। जब तू चलती है तो तेरी गांड़ दिल में छुरियां चला देती हैं रानी।” वह बोल रहा था।
“तो अब अपने मन की कीजिए ना राजा। मैं तो भी तो कई दिनों से इसी पल का इंतज़ार कर रही थी।” मैं बोली। मेरी बात सुनकर तो वह पागल हो गया। फटाफट पहले मुझे नंगी किया और खुद भी नंगा हो गया। मेरे नंगे बदन को देख कर वह पलक झपकाना भी भूल गया। फिर अचानक मानों जैसे नींद से जाग उठा और मुझ पर टूट पड़ा। मेरी चूचियों को चूसने लगा, मेरे चूत में उंगली डाल कर अंदर-बाहर करने लगा और चूत रस से सनी उंगली को मेरी गांड़ में भोंक कर रसीला कर दिया। फिर मझे झुका कर पीछे से मेरी गांड़ में अपना सात इंच का लंड एक ही झटके में उतार दिया। मैं मदहोशी के आलम में आंखें बंद किए आह आह करने लगी। वह उंगली से मेरी चूत चोद रहा था और मेरी गांड़ में लंड डाल कर दनादन अंदर-बाहर धकमपेल किए जा रहा था। मुझे चोद कर बहुत खुश हुआ और मुझे भी खुश कर दिया। अब जब भी मौका मिलता है, या तो वह आ जाता है और चोद लेता है या उसका घर खाली होने पर मैं किसी बहाने से वहां जाकर चुदवा लेती हूं।
एक बार तो गजब ही हो गया। आपको याद है, कि तीन साल पहले मेरी चाची की मृत्यु हो गई थी, जिसके यहां मैं अपने पति के साथ गई हुई थी। जब हम लौट रहे थे तो चूंकि पिछले पांच दिनों से मैं अपनी चूत की प्यास नहीं बुझा पाई थी इसलिए मैं चुदने के लिए तड़प रही थी। लौटते समय हम अंबाला स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करने लगे। इंतजार करते समय बार बार मेरा हाथ मेरी चूत की तरफ अनायास ही चला जाता था और मैं हल्के से चूत सहला देती थी। चल रही थी तो दोनों जांघों को आपस में रगड़ रही थी। बेंच पर बैठी थी तो टांग पर टांग चढ़ा कर कसमसा रही थी। सावन के महीने में कांवड़ियों की भीड़ में एक लंबा चौड़ा साधू बाबा हमारे पास खड़ा बार बार मुझे देख रहा था और मेरी स्थिति को समझ लिया था। मैं ने सर उठा कर जैसे ही उसकी ओर देखा तो वह बेहद अश्लील ढंग से मुस्करा उठा। उसकी आंखों में मैं ने वासना की भूख को पढ़ लिया था। मैं भीतर ही भीतर रोमांचित हो उठी। जब मैं पति के साथ अंबाला से ट्रेन में चढ़ी तो पलट कर देखा कि वह साधू बाबा देख रहा था मैं किस बोगी में चढ़ रही हूं। हम सेकेंड एसी बोगी में थे। ट्रेन में चढ़ने से पहले मैं ने देखा था कि जेनरल बोगी और नन एसी रिजर्व कंपार्टमेंट में लोगों की खचाखच भीड़ थी। रात करीब बारह बजे हमारी ट्रेन चल पड़ी। मैं नीचे बर्थ पर थी और ऊपर बर्थ पर मेरे पति। वे लेटते ही खर्राटे भरने लगे। मुझे पता नहीं क्या हुआ कि अचानक मेरे शरीर में चींटियां सी रेंगने लगी। पिछले चार दिनों से मैं किसी से चुदी नहीं थी। मुझे चुदाई का कीड़ा काटने लगा। समझ नहीं पा रही थी कि क्या करुं। उसी समय वही दाढ़ी वाला साधू बाबा जो प्लेटफार्म पर मुझे घूर रहा था हमारे बर्थ के पास आया और मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं चुदासी के आलम में बिना आगे पीछे सोचे उसे रुकने का इशारा किया और टायलेट में जा घुसी और फटाफट ब्रा और पैंटी उतार कर अपने पर्स में डाल कर बर्थ के सिरहाने रख उसके पीछे पीछे चल पड़ी। वह नन एसी रिजर्व बोगी की ओर चल पड़ा। बोगी के दरवाजे और बाथरूम के आस पास रात के एक बजे भी लोग खचाखच भरे हुए थे। सावन का महीना था और कांवड़ियों की काफी भीड़ थी। वहां सभी उम्र के मर्द एक दूसरे से सट कर कुछ खड़े थे और कुछ बैठे हुए थे। वह साधु उसी भीड़ में मेरा हाथ पकड़ कर खींच कर घुसा दिया और मुझसे सटकर खड़ा हो गया। वह साधु बाबा करीब पचपन साल का काला छः फुट लंबा मजबूत कद काठी का आदमी था। बोगी की मंद रोशनी में मैंने देखा कि मेरे दाएं बाएं कुछ जवान लड़के खड़े थे। मेरे पीछे भी अधेड़ उम्र के कुछ कांवड़िए गेरुए वस्त्र में मुझ से सट कर खड़े थे। मैं उन सबके बीच पिसती हुई वासना की आग में जल रही थी। कुछ ही पलों में मैं ने अपनी दाहिनी चूचि पर किसी के हाथ का स्पर्श महसूस किया। उसी तरह बांई चूची पर भी किसी के हाथ का दबाव महसूस करने लगी। मैं समझ गई कि मेरे दाएं बाएं खड़े लड़के मेरी चूचियों पर हाथ साफ कर रहे हैं। मैं यही तो चाहती थी, चुपचाप खड़ी रही और उनकी हरकतों का मजा लेने लगी। फिर मैंने अपनी चूतड़ पर किसी कठोर वस्तु का दबाव महसूस किया। मुझे समझने में देर नहीं लगी कि यह और कुछ नहीं, किसी का लंड है। उसी समय मेरे सामने भी मेरी चूत के ऊपर किसी के कठोर लंड के दस्तक को मैंने महसूस किया। सर उठा कर देखा तो सामने दाढ़ी वाला बूढ़ा मुस्कुरा रहा था। पीछे कौन है यह देखने के लिए सर घुमाई तो देखा एक गुंडा टाईप मोटा मुस्टंडा अश्लील भाव से मुस्करा रहा था। मैं समझ गई कि अब ये सारे लोग मुझे यहीं भीड़ का फायदा उठाकर मेरे शरीर से ऐश करेंगे, जिसके लिए मैं मानसिक रूप से तैयार थी और उत्तेजित भी। मेरी चुप्पी को उन लोगों ने मेरी स्वीकृति मान लिया। धीरे धीरे मेरे अगल बगल के लड़कों ने मेरे ब्लाऊज के बटन खोल दिए और बिना ब्रा की बड़ी बड़ी चूचियों को बेरहमी से दबाने लगे। “बड़ी मस्त माल है बे, क्या मस्त चूचियां हैं। देख कितने मज़े से चूचियां दबवा रही है,” लड़के आपस में फुसफुसाने लगे। मैं आह उह करने लगी। मेरे मुंह से सिसकारियां निकलने लगी थी। इधर पीछे वाला गुंडा धीरे धीरे मेरी साड़ी उठा कर जैसे ही देखा कि मैं बिना पैंटी की हूं, मेरी गांड़ को मसलना शुरू कर दिया और गांड़ में उंगली घुसा कर अन्दर बाहर करने लगा। “वाह तू तो पूरी तैयारी के साथ आई है रानी, क्या मस्त गांड़ है, चोदने में बड़ा मज़ा आएगा।” वह फुसफुसाया। सामने वाला बूढ़ा भी सामने से साड़ी उठा कर मेरी चूत सहलाने और उंगली घुसाने लगा। मेरे मुंह से आनन्द भरी सीत्कार निकल गई। उन लोगों ने देखा कि मैं मदहोशी के आलम में हूं तो अगल बगल वाले लड़कों ने पैंट का चेन खोल कर अपने गरमागरम टनटनाए लंड निकाल कर मेरे हाथों में थमा दिया। मैं उत्तेजना की अवस्था में उनके लंड को सहलाने और दबाने लगी। “ओह साली रंडी, जोर से दबा कुतिया, मूठ मार हरामजादी, आह ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” बुदबुदाने लगे। पीछे वाले गुंडे ने भी अपना लौड़ा निकाल कर मेरी गांड़ के छेद पर रखा और मेरी कमर पकड़ कर एक ही झटके में आधा लंड पेल दिया। मैं बड़ी मुश्किल से अपनी चीख को रोक पाई। इसी समय सामने वाला बूढ़ा भी अपनी धोती से अपना लौड़ा निकाला। मुझे उस भीड़ में पता ही नहीं चला कि उस साधु बाबा का लंड कितना बड़ा है। जब वह मेरी चूत में अपना लौड़ा डालने लगा तो मुझे अहसास हुआ कि उसका लंड गधे के लंड के जैसा मोटा है। मेरी चूत में उसका लंड जब घुसने लगा तो मैंने दर्द के मारे चीखने के लिए मुंह खोला तो साधु बाबा अपने बदबूदार मुंह से मेरे होंठों को दबा कर चूसने लगा और मेरी चीख निकल ही नहीं पाई। मैं घुट कर रह गई। उसका लंड तो घुसता ही चला जा रहा था, लग रहा था कि कोई लंबा बांस मेरी चूत में घुस रहा हो। पूरा मेरे गर्भाशय तक लौड़ा घुसा दिया था उस हरामी बाबा ने। मैं उन चुदक्कड़ों के बीच फंस कर छटपटा कर रह गई। पीछे वाला गुंडा दुबारा झटका मार कर पूरा लंड मेरी गांड़ में घुसा दिया। चूंकि सामने वाला बूढ़ा मुंह मेरे मुंह से सटा कर चूम रहा था इस लिए मेरी चीख दब गई थी। अब आगे पीछे से मेरी चुदाई होने लगी और मैं मस्ती में भर कर आंखें बंद किए आह आह आह करने लगी और अगल बगल के लड़कों का मूठ मारने लगी। करीब पन्द्रह मिनट बाद पीछे वाला गुंडा अपना माल मेरी गांड़ में झाड़ कर हट गया और मेरे बगल वाला लड़का सरक कर मेरी गांड़ में अपना लौड़ा घुसा दिया। इधर सामने वाला साधू बाबा भी अपना माल मेरी चूत में झाड़ कर जैसे ही हटा, दूसरी बगल वाला लड़का सरक कर मेरी चूत में अपना लौड़ा ठोंक कर दनादन चोदने लगा। अबतक आस पास के लोगों को भी पता चल गया कि यहां क्या हो रहा है। आस पास के लोग भी इस मौके का फ़ायदा उठाने के लिए मेरे समीप आ गये। मेरे पास खड़े जितने लड़के, जवान, बूढ़े थे, सभी मुझ पर टूट पड़े। कहां तो मैं मजा लेने के लिए आई थी, वहां जा कर फंस गयी। छटपटाती हुई मैं उन सबके बीच पिसती रही, सिसकती रही। कोई मेरी चूचियां मसल रहा था, कोई चूचियों को नोच रहा था, कोई चूचियों को चूस रहा था, अपने दांतों से काट रहा था, कोई होठों को चूस रहा था, कोई मेरे गालों को काट रहा था, एक एक करके बारी बारी से मेरी चूत और गांड़ को चोद रहे थे। सब फुसफुसा कर मुझे गंदी गंदी गालियां देते हुए चोद रहे थे, “छिनाल, रंडी मां की चूत, रांड, रंडी की बेटी, कुत्ती की औलाद,” और न जाने क्या क्या। मैं सिसक सिसक कर चुदती रही। मैं छटपटाती रही मगर वहां जितने खड़े लोग थे, लड़के, जवान, अधेड़, बूढ़े, जब सब ने जबतक मुझे चोद नहीं लिया छोड़ा नहीं। जैसे ही मैं उनके चंगुल से छूटी, थकान के मारे नीचे पड़ी एक बड़ी सी गठरी पर औंधे मुंह गिर पड़ी। मेरे उस तरह धम से गिरने पर आस पास बैठे ऊंघते यात्रियों की नींद टूटी तो वे एक पल को समझ नहीं पाये कि मामला क्या है, मगर आंखें मलते हुए जब अस्त व्यस्त परोसी हुई मेरे अधनंगे सेक्सी शरीर को देखा तो उन्हें भी वहशी जानवर बनने में देर नहीं लगी। फिर क्या था, मेरी हालत आसमान से गिरे तो खजूर में अटकी वाली हालत हो गई। आस पास बैठे सारे कांवड़िए, साधु और मैले कुचैले फटे पुराने कपड़े पहने गरीब गंवई सरकते हुए मेरे करीब आ गए और मुझे चारों ओर से घेर कर जिसे जिस तरह मन किया, मेरे शरीर को भंभोड़ना शुरु कर दिया। किसी किसी ने तो मेरे मुंह में भी लंड डाल कर चोदा। मुझे तो याद ही नहीं कि उस रात कितने लोगों ने मुझे चोदा। कुछ लोग मुझे चोद कर अपने अपने स्टेशन पर उतर गये और उन स्टेशनों पर चढ़े कुछ नये यात्रियों ने भी मौके का फायदा उठाकर मुझे रौंद डाला। मुझमें विरोध करने की शक्ति भी नहीं बची थी। मैं ने अपने आपको परिस्थिति के हवाले कर दिया। मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी क्योंकि अनजाने में अजनबी साधू से चुदने के चक्कर में खुद ही इस मुसीबत को निमंत्रण दे बैठी थी। उस वीभत्स और बेहद घृणित परिस्थिति में पड़ी वहशतनाक मुसीबत से छुटकारे की आशा में भूखे कुत्तों की कुतिया की तरह नुचती चुदती रही। करीब साढ़े चार बजे तक मैं नुच चुद कर अधमरी हो गई। सवेरा होने वाला था तब उन लोगों ने मुझे छोड़ा। मैं लस्त पस्त पड़ी नज़र घुमा कर देखा, सभी शराफत के पुतले बने मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे। मेरी चूत और गांड़ का कचूमर निकाल दिया था हरामियोंं ने। छोटा लंड, लंबा लंड, पतला लंड, मोटा लंड और पता नहीं किस किस तरह का लंड मेरी चूत और गांड़ में घुसा मुझे अर्द्धबेहोशी तल हालत में पता ही नहीं चल रहा था। जिस बेदर्दी से मेरी चुदाई हुई थी उस कारण मेरी चूत पावरोटी की तरह फूल कर कुतिया की तरह बाहर आ गई थी। गांड़ का सुराख बढ़ कर चूहे की बिल की तरह हो गया था। चूत और गांड़ से लसलसा वीर्य बह कर मेरी जांघों से होता हुआ मेरी एड़ियों तक आ चुका था। मेरी चूचियां खुले ब्लाऊज से बाहर निकली हुई थीं। मेरी साड़ी कमर तक उठी हुई थी। मेरी गांड़ और चूत बिल्कुल नंगी थी। मैं अपनी हालत देख कर बेहद शर्मिंदा हो गई और उन वासना के भूखे दरिंदों के वीर्य से सराबोर अपने शरीर की सारी शक्ति बटोर कर किसी तरह उठी और लड़खड़ाते हुए अपने कपड़ों को ठीक किया। फिर उसी तरह लड़खड़ाते हुए टायलेट में जा घुसी और अपने चूत, गांड़ और पैरों को धो कर किसी तरह अपने बर्थ तक पहुंची और धम से गिर कर थकान के मारे तुुंत ही गहरी नींद में सो गई।
“लक्ष्मी उठो, कब तक सोती रहोगी” कामिनी के पापा मुझे झंझोर कर जगा रहे थे। “देखो आठ बज गया है”
मैं थकान से चूर अलसाई सी उठी तो मेरे चेहरे के लाल लाल दागों को देख कर वह चौंक उठा और बोला, “अरे ये क्या हो गया है तेरे चेहरे और गर्दन पर?”
मैं समझ गई कि यह सब रात की निशानी है। “लगता है मुझे कोई एलर्जी हुई है। देखो मुझे हल्का बुखार भी है,” मैं बोली। सच में मुझे हल्का बुखार भी था।
“ठीक है तुम आराम से सो जाओ मैं अगले स्टेशन में देखता हूं कोई दवा” वे बोले। फिर मैं बारह बजे तक सोती रही। थकान उतरी तो बुखार भी उतरा मगर मेरी चूत, गांड़ और चूचियों में मीठा मीठा दर्द अभी भी उठ रहा था। टाटा पहुंचते पहुंचते मैं बिल्कुल नोर्मल हो गई थी। उस यात्रा के बाद तो मेरी चुदाई की भूख और बढ़ गई। अब आप ही देख लीजिए मैं क्या से क्या बन गई हूं।”
उसकी पूरी कहानी सुनकर मैं समझ गया कि लक्ष्मी अब पूरी तरह कुतिया बन गई है और चूंकि इसकी शुरुआत हरिया और हम लोग पहले ही कर चुके थे इसलिए मुझे कुछ कहते नहीं बना और हमने हालात से समझौता करने में ही भलाई समझी और लक्ष्मी से कुछ नहीं कहा। तब से अब तक ऐसा ही चल रहा है।”
हम सब भौंचक हो कर दादाजी के मुंह से मेरी मां की कुतिया बनने की कहानी सुनते रहे। मैं हरिया, दादाजी और बड़े दादाजी से बोल उठी, “साले हरामियों, आखिर में मेरी मां को रंडी बना ही डाला आप लोगों ने। खैर अब आप लोग भी कर भी क्या सकते हैं। यह सब ऊपर वाले की माया है। अभी आप लोग खुद देख लीजिए, मैं आप लोगों की बिनब्याही पत्नी बन ही गई ना। मुझे तो इस बात की बहुत खुशी है कि मैं आप लोगों की सामुहिक औरत बन गई हूं। फिर भी अब, जब हम सब जान गये हैं कि मेरी मां छिनाल बन चुकी है तो मैं चाहती हूं कि मेरी मां भी जान ले कि मैं उसकी बेटी, उसी के नक्शे कदम पर चल कर उसका नाम रोशन कर रही हूं।” मैं बेशर्मी से बोली। “मैं चाहती हूं कि आप सब उसके सामने मुझे चोदें और फिर मेरे सामने ही उसकी चुदाई करें।”
एक पल के लिए वे चुप रहे फिर सबने एक स्वर से मेरी बातों का समर्थन कर दिया।
फिर लक्ष्मी आगे बोलने लगी,
“एक बार तो गजब ही हो गया। आपको याद है, कि तीन साल पहले मेरी चाची की मृत्यु हो गई थी, जिसके यहां मैं अपने पति के साथ गई हुई थी। जब हम लौट रहे थे तो चूंकि पिछले पांच दिनों से मैं अपनी चूत की प्यास नहीं बुझा पाई थी इसलिए मैं चुदने के लिए तड़प रही थी। लौटते समय हम अंबाला स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करने लगे। इंतजार करते समय बार बार मेरा हाथ मेरी चूत की तरफ अनायास ही चला जाता था और मैं हल्के से चूत सहला देती थी। चल रही थी तो दोनों जांघों को आपस में रगड़ रही थी। बेंच पर बैठी थी तो टांग पर टांग चढ़ा कर कसमसा रही थी। सावन के महीने में कांवड़ियों की भीड़ में एक लंबा चौड़ा साधू बाबा हमारे पास खड़ा बार बार मुझे देख रहा था और मेरी स्थिति को समझ लिया था। मैं ने सर उठा कर जैसे ही उसकी ओर देखा तो वह बेहद अश्लील ढंग से मुस्करा उठा। उसकी आंखों में मैं ने वासना की भूख को पढ़ लिया था। मैं भीतर ही भीतर रोमांचित हो उठी। जब मैं पति के साथ अंबाला से ट्रेन में चढ़ी तो पलट कर देखा कि वह साधू बाबा देख रहा था मैं किस बोगी में चढ़ रही हूं। हम सेकेंड एसी बोगी में थे। ट्रेन में चढ़ने से पहले मैं ने देखा था कि जेनरल बोगी और नन एसी रिजर्व कंपार्टमेंट में लोगों की खचाखच भीड़ थी। रात करीब बारह बजे हमारी ट्रेन चल पड़ी। मैं नीचे बर्थ पर थी और ऊपर बर्थ पर मेरे पति। वे लेटते ही खर्राटे भरने लगे। मुझे पता नहीं क्या हुआ कि अचानक मेरे शरीर में चींटियां सी रेंगने लगी। पिछले पांच दिनों से मैं किसी से चुदी नहीं थी। मुझे चुदाई का कीड़ा काटने लगा। समझ नहीं पा रही थी कि क्या करुं। उसी समय वही दाढ़ी वाला साधू बाबा जो प्लेटफार्म पर मुझे घूर रहा था हमारे बर्थ के पास आया और मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं चुदासी के आलम में बिना आगे पीछे सोचे उसे रुकने का इशारा किया और टायलेट में जा घुसी और फटाफट ब्रा और पैंटी उतार कर अपने पर्स में डाल कर बर्थ के सिरहाने रख उसके पीछे पीछे चल पड़ी। वह नन एसी रिजर्व बोगी की ओर चल पड़ा। बोगी के दरवाजे और बाथरूम के आस पास रात के एक बजे भी लोग खचाखच भरे हुए थे। सावन का महीना था और कांवड़ियों की काफी भीड़ थी। वहां सभी उम्र के मर्द एक दूसरे से सट कर कुछ खड़े थे और कुछ बैठे हुए थे। वह साधु उसी भीड़ में मेरा हाथ पकड़ कर खींच कर घुसा दिया और मुझसे सटकर खड़ा हो गया। वह साधु बाबा करीब पचपन साल का काला छः फुट लंबा मजबूत कद काठी का आदमी था। बोगी की मंद रोशनी में मैंने देखा कि मेरे दाएं बाएं कुछ जवान लड़के खड़े थे। मेरे पीछे भी अधेड़ उम्र के कुछ कांवड़िए गेरुए वस्त्र में मुझ से सट कर खड़े थे। मैं उन सबके बीच पिसती हुई वासना की आग में जल रही थी। कुछ ही पलों में मैं ने अपनी दाहिनी चूचि पर किसी के हाथ का स्पर्श महसूस किया। उसी तरह बांई चूची पर भी किसी के हाथ का दबाव महसूस करने लगी। मैं समझ गई कि मेरे दाएं बाएं खड़े लड़के मेरी चूचियों पर हाथ साफ कर रहे हैं। मैं यही तो चाहती थी, चुपचाप खड़ी रही और उनकी हरकतों का मजा लेने लगी। फिर मैंने अपनी चूतड़ पर किसी कठोर वस्तु का दबाव महसूस किया। मुझे समझने में देर नहीं लगी कि यह और कुछ नहीं, किसी का लंड है। उसी समय मेरे सामने भी मेरी चूत के ऊपर किसी के कठोर लंड के दस्तक को मैंने महसूस किया। सर उठा कर देखा तो सामने दाढ़ी वाला बूढ़ा मुस्कुरा रहा था। पीछे कौन है यह देखने के लिए सर घुमाई तो देखा एक गुंडा टाईप मोटा मुस्टंडा अश्लील भाव से मुस्करा रहा था। मैं समझ गई कि अब ये सारे लोग मुझे यहीं भीड़ का फायदा उठाकर मेरे शरीर से ऐश करेंगे, जिसके लिए मैं मानसिक रूप से तैयार थी और उत्तेजित भी। मेरी चुप्पी को उन लोगों ने मेरी स्वीकृति मान लिया। धीरे धीरे मेरे अगल बगल के लड़कों ने मेरे ब्लाऊज के बटन खोल दिए और बिना ब्रा की बड़ी बड़ी चूचियों को बेरहमी से दबाने लगे। “बड़ी मस्त माल है बे, क्या मस्त चूचियां हैं। देख कितने मज़े से चूचियां दबवा रही है,” लड़के आपस में फुसफुसाने लगे। मैं आह उह करने लगी। मेरे मुंह से सिसकारियां निकलने लगी थी। इधर पीछे वाला गुंडा धीरे धीरे मेरी साड़ी उठा कर जैसे ही देखा कि मैं बिना पैंटी की हूं, मेरी गांड़ को मसलना शुरू कर दिया और गांड़ में उंगली घुसा कर अन्दर बाहर करने लगा। “वाह तू तो पूरी तैयारी के साथ आई है रानी, क्या मस्त गांड़ है, चोदने में बड़ा मज़ा आएगा।” वह फुसफुसाया। सामने वाला बूढ़ा भी सामने से साड़ी उठा कर मेरी चूत सहलाने और उंगली घुसाने लगा। मेरे मुंह से आनन्द भरी सीत्कार निकल गई। उन लोगों ने देखा कि मैं मदहोशी के आलम में हूं तो अगल बगल वाले लड़कों ने पैंट का चेन खोल कर अपने गरमागरम टनटनाए लंड निकाल कर मेरे हाथों में थमा दिया। मैं उत्तेजना की अवस्था में उनके लंड को सहलाने और दबाने लगी। “ओह साली रंडी, जोर से दबा कुतिया, मूठ मार हरामजादी, आह ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” बुदबुदाने लगे। पीछे वाले गुंडे ने भी अपना लौड़ा निकाल कर मेरी गांड़ के छेद पर रखा और मेरी कमर पकड़ कर एक ही झटके में आधा लंड पेल दिया। मैं बड़ी मुश्किल से अपनी चीख को रोक पाई। इसी समय सामने वाला बूढ़ा भी अपनी धोती से अपना लौड़ा निकाला। मुझे उस भीड़ में पता ही नहीं चला कि उस साधु बाबा का लंड कितना बड़ा है। जब वह मेरी चूत में अपना लौड़ा डालने लगा तो मुझे अहसास हुआ कि उसका लंड गधे के लंड के जैसा मोटा है। मेरी चूत में उसका लंड जब घुसने लगा तो मैंने दर्द के मारे चीखने के लिए मुंह खोला तो साधु बाबा अपने बदबूदार मुंह से मेरे होंठों को दबा कर चूसने लगा और मेरी चीख निकल ही नहीं पाई। मैं घुट कर रह गई। उसका लंड तो घुसता ही चला जा रहा था, लग रहा था कि कोई लंबा बांस मेरी चूत में घुस रहा हो। पूरा मेरे गर्भाशय तक लौड़ा घुसा दिया था उस हरामी बाबा ने। मैं उन चुदक्कड़ों के बीच फंस कर छटपटा कर रह गई। पीछे वाला गुंडा दुबारा झटका मार कर पूरा लंड मेरी गांड़ में घुसा दिया। चूंकि सामने वाला बूढ़ा मुंह मेरे मुंह से सटा कर चूम रहा था इस लिए मेरी चीख दब गई थी। अब आगे पीछे से मेरी चुदाई होने लगी और मैं मस्ती में भर कर आंखें बंद किए आह आह आह करने लगी और अगल बगल के लड़कों का मूठ मारने लगी। करीब पन्द्रह मिनट बाद पीछे वाला गुंडा अपना माल मेरी गांड़ में झाड़ कर हट गया और मेरे बगल वाला लड़का सरक कर मेरी गांड़ में अपना लौड़ा घुसा दिया। इधर सामने वाला साधू बाबा भी अपना माल मेरी चूत में झाड़ कर जैसे ही हटा, दूसरी बगल वाला लड़का सरक कर मेरी चूत में अपना लौड़ा ठोंक कर दनादन चोदने लगा। अबतक आस पास के लोगों को भी पता चल गया कि यहां क्या हो रहा है। आस पास के लोग भी इस मौके का फ़ायदा उठाने के लिए मेरे समीप आ गये। मेरे पास खड़े जितने लड़के, जवान, बूढ़े थे, सभी मुझ पर टूट पड़े। कहां तो मैं मजा लेने के लिए आई थी, वहां जा कर फंस गयी। छटपटाती हुई मैं उन सबके बीच पिसती रही, सिसकती रही। कोई मेरी चूचियां मसल रहा था, कोई चूचियों को नोच रहा था, कोई चूचियों को चूस रहा था, अपने दांतों से काट रहा था, कोई होठों को चूस रहा था, कोई मेरे गालों को काट रहा था, एक एक करके बारी बारी से मेरी चूत और गांड़ को चोद रहे थे। सब फुसफुसा कर मुझे गंदी गंदी गालियां देते हुए चोद रहे थे, “छिनाल, रंडी मां की चूत, रांड, रंडी की बेटी, कुत्ती की औलाद,” और न जाने क्या क्या। मैं सिसक सिसक कर चुदती रही। मैं छटपटाती रही मगर वहां जितने खड़े लोग थे, लड़के, जवान, अधेड़, बूढ़े, जब सब ने जबतक मुझे चोद नहीं लिया छोड़ा नहीं। जैसे ही मैं उनके चंगुल से छूटी, थकान के मारे नीचे पड़ी एक बड़ी सी गठरी पर औंधे मुंह गिर पड़ी। मेरे उस तरह धम से गिरने पर आस पास बैठे ऊंघते यात्रियों की नींद टूटी तो वे एक पल को समझ नहीं पाये कि मामला क्या है, मगर आंखें मलते हुए जब अस्त व्यस्त परोसी हुई मेरे अधनंगे सेक्सी शरीर को देखा तो उन्हें भी वहशी जानवर बनने में देर नहीं लगी। फिर क्या था, मेरी हालत आसमान से गिरे तो खजूर में अटकी वाली हालत हो गई। आस पास बैठे सारे कांवड़िए, साधु और मैले कुचैले फटे पुराने कपड़े पहने गरीब गंवई सरकते हुए मेरे करीब आ गए और मुझे चारों ओर से घेर कर जिसे जिस तरह मन किया, मेरे शरीर को भंभोड़ना शुरु कर दिया। किसी किसी ने तो मेरे मुंह में भी लंड डाल कर चोदा। मुझे तो याद ही नहीं कि उस रात कितने लोगों ने मुझे चोदा। कुछ लोग मुझे चोद कर अपने अपने स्टेशन पर उतर गये और उन स्टेशनों पर चढ़े कुछ नये यात्रियों ने भी मौके का फायदा उठाकर मुझे रौंद डाला। मुझमें विरोध करने की शक्ति भी नहीं बची थी। मैं ने अपने आपको परिस्थिति के हवाले कर दिया। मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी क्योंकि अनजाने में अजनबी साधू से चुदने के चक्कर में खुद ही इस मुसीबत को निमंत्रण दे बैठी थी। उस वीभत्स और बेहद घृणित परिस्थिति में पड़ी वहशतनाक मुसीबत से छुटकारे की आशा में भूखे कुत्तों की कुतिया की तरह नुचती चुदती रही। करीब साढ़े चार बजे तक मैं नुच चुद कर अधमरी हो गई। सवेरा होने वाला था तब उन लोगों ने मुझे छोड़ा। मैं लस्त पस्त पड़ी नज़र घुमा कर देखा, सभी शराफत के पुतले बने मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे। मेरी चूत और गांड़ का कचूमर निकाल दिया था हरामियोंं ने। छोटा लंड, लंबा लंड, पतला लंड, मोटा लंड और पता नहीं किस किस तरह का लंड मेरी चूत और गांड़ में घुसा मुझे अर्द्धबेहोशी की हालत में पता ही नहीं चल रहा था। जिस बेदर्दी से मेरी चुदाई हुई थी उस कारण मेरी चूत पावरोटी की तरह फूल कर कुतिया की तरह बाहर आ गई थी। गांड़ का सुराख बढ़ कर चूहे की बिल की तरह हो गया था। चूत और गांड़ से लसलसा वीर्य बह कर मेरी जांघों से होता हुआ मेरी एड़ियों तक आ चुका था। मेरी चूचियां खुले ब्लाऊज से बाहर निकली हुई थीं। मेरी साड़ी कमर तक उठी हुई थी। मेरी गांड़ और चूत बिल्कुल नंगी थी। मैं अपनी हालत देख कर बेहद शर्मिंदा हो गई और उन वासना के भूखे दरिंदों के वीर्य से सराबोर अपने शरीर की सारी शक्ति बटोर कर किसी तरह उठी और लड़खड़ाते हुए अपने कपड़ों को ठीक किया। फिर उसी तरह लड़खड़ाते हुए टायलेट में जा घुसी और अपने चूत, गांड़ और पैरों को धो कर किसी तरह अपने बर्थ तक पहुंची और धम से गिर कर थकान के मारे तुुंत ही गहरी नींद में सो गई।
“लक्ष्मी उठो, कब तक सोती रहोगी” कामिनी के पापा मुझे झंझोर कर जगा रहे थे। “देखो आठ बज गया है”
मैं थकान से चूर अलसाई सी उठी तो मेरे चेहरे के लाल लाल दागों को देख कर वह चौंक उठा और बोला, “अरे ये क्या हो गया है तेरे चेहरे और गर्दन पर?”
मैं समझ गई कि यह सब रात की निशानी है। “लगता है मुझे कोई एलर्जी हुई है। देखो मुझे हल्का बुखार भी है,” मैं बोली। सच में मुझे हल्का बुखार भी था।
“ठीक है तुम आराम से सो जाओ मैं अगले स्टेशन में देखता हूं कोई दवा” वे बोले। फिर मैं बारह बजे तक सोती रही। थकान उतरी तो बुखार भी उतरा मगर मेरी चूत, गांड़ और चूचियों में मीठा मीठा दर्द अभी भी उठ रहा था। टाटा पहुंचते पहुंचते मैं बिल्कुल नोर्मल हो गई थी। उस यात्रा के बाद तो मेरी चुदाई की भूख और बढ़ गई। अब आप ही देख लीजिए मैं क्या से क्या बन गई हूं।”
उसकी पूरी कहानी सुनकर मैं समझ गया कि लक्ष्मी अब पूरी तरह कुतिया बन गई है और चूंकि इसकी शुरुआत हरिया और हम लोग पहले ही कर चुके थे इसलिए मुझे कुछ कहते नहीं बना और हमने हालात से समझौता करने में ही भलाई समझी और लक्ष्मी से कुछ नहीं कहा। तब से अब तक ऐसा ही चल रहा है।”
हम सब भौंचक हो कर दादाजी के मुंह से मेरी मां की कुतिया बनने की कहानी सुनते रहे। मैं हरिया, दादाजी और बड़े दादाजी से बोल उठी, “साले हरामियों, आखिर में मेरी मां को रंडी बना ही डाला आप लोगों ने। खैर अब आप लोग भी कर भी क्या सकते हैं। यह सब ऊपर वाले की माया है। अभी आप लोग खुद देख लीजिए, मैं आप लोगों की बिनब्याही पत्नी बन ही गई ना। मुझे तो इस बात की बहुत खुशी है कि मैं आप लोगों की सामुहिक औरत बन गई हूं। फिर भी अब, जब हम सब जान गये हैं कि मेरी मां छिनाल बन चुकी है तो मैं चाहती हूं कि मेरी मां भी जान ले कि मैं उसकी बेटी, उसी के नक्शे कदम पर चल कर उसका नाम रोशन कर रही हूं।” मैं बेशर्मी से बोली। “मैं चाहती हूं कि आप सब उसके सामने मुझे चोदें और फिर मेरे सामने ही उसकी चुदाई करें।”
एक पल के लिए वे चुप रहे फिर सबने एक स्वर से मेरी बातों का समर्थन कर दिया।
“दादाजी, अब तो हम ने मां की कहानी सुन ली। मां के साथ वाला प्रोग्राम बनाईए।” मैं बोली।
“ठीक है, अभी काफी रात हो चुकी है। हम सब अभी खाना खा कर सो जाते हैं। कल प्रोग्राम बनाते हैं। मैं सोच रहा हूं कि चूंकि कामिनी खुद मान चुकी है कि यह हम सबकी बिनब्याही पत्नी है, हमें इसकी इच्छा का सम्मान करते हुए इससे ब्याह कर ही लेना चाहिए। बाहर वाले हमारे इस रिश्ते को गलत नजर से देखेंगे और हमारी बदनामी भी होगी, इसलिए हम घर में ही गुप्त रूप से यह शादी रचाएंगे। बकायदा यह हमारी दुल्हन बनेगी, हम सब इसके दूल्हे बन कर इसके साथ सात फेरे लेंगे। फिर शादी के बाद रात में सामुहिक सुहाग रात मनाएंगे, और यह शुभ कार्य कल ही हो तो बहुत अच्छा रहेगा।” दादाजी ने कहा।
“कल ही कैसे संभव है? पंडित कहां से आएगा? मेरा कन्या दान कौन करेगा? ” मैं बोल पड़ी, हालांकि दादाजी के विचार से मैं खुश हो गई थी, अब मैं अग्नि को साक्षी मानकर वास्तविक रूप से इन पांडवों की द्रौपदी जो बनने वाली थी।
“सब हो जाएगा हमारी प्यारी दुल्हन, तू बस देखती जा” दादाजी पूरे विश्वास से बोले।
“ठीक है तो कल का प्रोग्राम तय रहा। फिलहाल हमें खाना खा कर सोना चाहिए। कल सवेरे से हम दिनभर व्यस्त रहने वाले हैं।” नानाजी ने कहा। फिर हम सभी अपने अपने कपड़े पहन कर खाने की टेबल पर आए। खा पी कर सोने चले गए। उस समय रात के 11 बज रहे थे। कल के बारे में सोचते सोचते कब नींद की आगोश में चली गई पता ही नहीं चला। सवेरे करीब 6 बजे मेरी नींद खुली और अपने कमरे से बाहर आई तो देखा सभी बड़े व्यस्त नजर आ रहे थे।
“तू इतनी जल्दी क्यों उठ गई, जा कर आराम कर या नहा धो कर तैयार हो जा। फिर नाश्ता करके हम बाजार जाएंगे” नानाजी की आवाज़ सुनाई पड़ी।
मैं फ़ौरन वापस कमरे में लौट आई और मुदित मन से गुनगुनाते हुए तैयार होने लगी। मैं तैयार हो कर नाश्ते की टेबल पर आई तो देखा, सभी मुस्कुराते हुए बड़ी हसरत भरी नजरों से मुझे ही देख रहे। मैं उनकी नजरों की ताब न ला सकी और शरमाती हुई नजरें नीचे किए नाश्ता करने बैठ गई। “आ गई हमारी होने वाली दुल्हन।” बड़े दादाजी मुस्कुरा कर बोले।
इतनी बार इन सबकी अंकशायिनी बन चुकने के बाद भी आज मैं न जाने क्यों बड़े दादाजी के शब्दों को सुनकर शर्म से लाल हो गई। नाश्ता करने के पश्चात हरिया को छोड़कर सब बाजार जाने के लिए तैयार हो गये।
मैं बोली, “मैं नहीं जाऊंगी, मैं आराम करना चाहती हूं।”
“अच्छा ठीक है तू आराम कर, लेकिन तेरे लिए शादी के कपड़े कैसे लें? तू साइज़ वगैरह तो बता।” नानाजी बोले। मैं ने एक कागज पर अपनी पैंटी, ब्रा का साइज़ लिख कर उन्हें थमा दिया।
“लाल रंग का लहंगा चोली तो है ही, लाल चुनरी अपनी मर्जी से ले सकते हैं।” मैं शरमा कर बोली।
“हाय मेरी लाड़ो, तू शरमाती हुई बहुत सुंदर लग रही हो।” नानाजी बोले।
फिर जब वे सब बाजार के लिए निकले तो मैं सीधे अपने बिस्तर पर लंबी हो कर अपनी शादी की कल्पना करती हुई रोमांचित होती रही। फिर कब मेरी आंख लगी मुझे पता ही नहीं चला। करीब साढ़े ग्यारह बजे मेरी नींद खुली तो मैं अपने कमरे से बाहर निकली। हरिया खाना बनाने में व्यस्त था। मैंने ज्यों ही किचन में कदम रखा, हरिया ने तुरंत रोका, “अरे रुको, तुम अभी किचन में कदम नहीं रख सकती। शादी के बाद ही किचन में कदम रख सकती हो। शादी के बाद ही तुम हम सबकी पत्नी के साथ ही साथ इस घर की मालकिन भी बन जाओगी।”
मैं ने झट अपने पांव वापस खींच लिया। फिर मैं बाहर बगीचे में बेमतलब टहलने लगी। करीब साढ़े बारह बजे सब के सब कई सामानों से लदे फंदे बाजार से वापस लौट आए। नानाजी ने चार पैकेट मुझे थमाते हुए कहा, “यह तुम्हारे लिए है हमारी होने वाली पत्नी जी। शाम को पांच बजे हमारी शादी का मुहूर्त है। अभी हम खाना खा कर तैयारी में व्यस्त हो जाएंगे। तुम खाना खा कर अपने कमरे में चली जाना और आराम करना। तुझे तैयार करने के लिए तीन बजे दो महिलाएं आ जाएंगी।”
“जी ठीक है” इससे अधिक मैं कुछ बोल नहीं पाई। लाज, खुशी, रोमांच और तनिक भय के मिश्रित भाव मेरे अंदर उमड़ घुमड़ रहे थे। मैं सारे पैकेट अपने कमरे में रख कर खाने की टेबल पर आई। खाना खाते वक्त पूरे समय मैं नजरें नीची करके थी, मेरी सारी बहादुरी हवा हो गई थी और मेरे अंदर नारी सुलभ कोमल भावनाओं का तूफान चल रहा था। खाना खा कर मैं बिना किसी से कुछ बोले छुई मुई स्त्री की भांति अपने कमरे की ओर चली, तभी पीछे से दादाजी की आवाज आई, “हाय, तेरी इसी अदा पर तो हम मर गये रानी।” मैं ने हौले से पीछे मुड़कर उनकी ओर देखा और दौड़ कर अपने कमरे में घुस गयी। फिर मैं तब तक सोती रही जब तक कि मेरे दरवाजे पर दस्तक नहीं हुई। ठीक तीन बज रहा था। दरवाजे पर दो पैंतीस चालीस साल की दो खूबसूरत महिलाएं खड़ी मुस्कुरा रही थीं।
“ओह, तो तुम हो दुल्हन। तुम तो बहुत खूबसूरत हो।देखना, सजने के बाद तो तुम क़यामत ढा दोगी। दूल्हा तो पागल ही हो जाएगा।” उनमें से एक अश्लील मुस्कान के साथ बोली। शायद उन्हें असलीयत का पता नहीं था। करीब एक घंटे में ही उन्होंने मुझे पूरी तरह दुल्हन बना दिया और मेरा मेकअप करने लगीं। आधे घंटे में मेरा मेकअप पूरा हुआ। मैं अपने नये रूप को आईने में देख कर खुद ही शरमा गई। पूरी दुल्हन बन चुकी थी, मेरे दूल्हों पर बिजली गिराने के लिए तैयार। मुझे तैयार करने में उन्हें एक घंटा लगा, फिर वे नानाजी से अपनी फीस ले कर चली गईं। नानाजी नें ज्यों ही मुझे देखा, उनका बुलडोग जैसा मुंह खुला का खुला रह गया। मेरे सजे हुए दपदपाते यौवन को कुछ पलों तक अपलक निहारते रह गए। मैं उनकी नजरों की ताब न ला सकी और लाज से मेरी नजरें जमीन पर गड़ गई। नानाजी ने हिदायत दी कि जब तक मुझे लेने कोई नहीं आएगा, मैं कमरे से बाहर न निकलूं। तब से घड़कते दिल से पांच बजे का इंतजार करने लगी। जैसे जैसे समय निकट आ रहा था मेरे दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं।
ठीक पांच बजे मेरे कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई साथ ही एक स्त्री की आवाज सुनाई पड़ी, “बेटी, दरवाजा खोलो, विवाह मंडप में तुम्हारा बुलावा है। मैं तुम्हें लेने आई हूं।”
“जी दरवाजा खुला है, आ जाईए” मैं ने कहा।
करीब चालीस साल की एक मझोले कद की गेहुंए रंग की मोटी पर आकर्षक महिला मुस्कुराती हुई अंदर आई और मुझे ले कर ड्राइंग रूम में आई जो खूबसूरती से सजा हुआ था। वह बीच में मंडप था और एक पंडित बैठा मंत्रोच्चारण कर रहा था। देखने में लोमड़ी की तरह धूर्त काला कलूटा मोटा पंडित मुझे देख कर बड़ी अश्लीलता और भद्दे ढंग से मुस्करा रहा था। उसके सामने के ऊपर वाले चार पीले पीले दांत बड़े ही भद्दे ढंग से बाहर की ओर निकले हुए थे मैं समझ गई कि यह पंडित इन्हीं लोगों की जमात का है। मेरे पांचों दूल्हे धोती कुर्ते में सजे धजे मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे। मैं ने घूंघट सामने से और लंबा खींच लिया। पांचों के साथ मेरा गठबंधन हुआ और मैंने उनके साथ सात फेरे लिए। जो महिला मुझे लेकर मंडप तक लाई थी वह दूर के रिश्ते से मेरी चाची थी। उसी ने मेरा कन्यादान किया। जयमाला की रस्म हुई और पांचों ने मेरी मांग में सिंदूर डाला। करीम चाचा ने मुस्लिम होते हुए भी पूरे हिंदू रीति का पालन किया। अब मैं अग्नि को साक्षी मानकर पूरे विधि-विधान से उन पांचों की पत्नी बन चुकी थी। पंडित जी ने घोषणा की कि विवाह संपन्न हो गया और अब हम पति-पत्नी हैं। फिर हम सबने चाची के पांव छूकर आशीर्वाद लिया। तभी दरवाजे की घंटी बजी। उसी महिला ने दरवाजा खोला। दरवाजे पर मेरी मां खड़ी थी।
“अरे रमा तू यहां?” मेरी मां ने उस महिला, जो मेरी दूर के रिश्ते की चाची थी, से कहा।
“अरे लक्ष्मी तूने आने में थोड़ी देर कर दी।” चाची ने कहा।
“क्यों? क्या हुआ?” मेरी मां बोली।
“अरे अंदर तो आ, सब पता चल जाएगा।” बोलती हुई दरवाजे से हटीं। अंदर आते ही अंदर का माहौल देख कर चकरा गयी। मैं अब तक घूंघट में थी। मेरे पांचों दूल्हों का चेहरा सेहरे से ढंका हुआ था। हमारी शादी हो चुकी थी, अतः हम सभी आशीर्वाद लेने के लिए मेरी मां के पांव छूने को झुके तो वह हड़बड़ा कर एक कदम पीछे हटी।
तभी चाची बोली, “अपनी बेटी और दामादों को आशीर्वाद नहीं दोगी क्या?”
“मेरी बेटी? कौन? कामिनी?” आश्चर्यचकित हो कर मां ने पूछा।
“हां रे हां। तेरी बेटी कामिनी। अभी अभी तो उसकी शादी हुई। सामने देखो, कामिनी दुल्हन के वेश में और उसके पांच दूल्हे, तू ठीक मौके पर आई है। चल उन्हें आशीर्वाद दे दे।” चाची बोली।
“यह क्या तमाशा चल रहा है यहां पर? मैं इस शादी को नहीं मानती। मजाक बना कर रखा है।” गुस्से से मेरी मां बोली।
“तमाशा नहीं है लक्ष्मी। अब तो शादी हो चुकी है पूरे विधि-विधान से। तू मान न मान, तेरी बेटी अब ब्याहता है इन पांचों दूल्हों की।” चाची बोली।
“कन्या दान किसने किया?” मां बोली।
“मैं ने” चाची ने जवाब दिया।
“कामिनी, तुझे हामारे परिवार की इज्जत का जरा भी ख्याल नहीं आया? बिना हमारी इजाजत के और वो भी इन पांच पांच मर्दों के साथ शादी? छि, छिनाल कहीं की।” मां गुस्से में लाल पीली हो रही थी।
अब मैं और मेरे साथ साथ मेरे दूल्हे भी क्रोधित हो उठे। मैं ने अपना घूंघट हटाया और साथ ही मेरे दूल्हों ने भी चेहरे पर से सेहरा हटाया। हम सबके चेहरों को देखते ही मेरी मां के चेहरे का रंग उड़ गया। नानाजी और करीम चाचा को छोड़कर बाकी तीनों से तो खुद भी चुद चुकी थी।
मैं बोली, “मम्मी, मैं छिनाल नहीं हूं, छिनाल तो आप हैं। मैं तो इन सबसे शादी करके इनकी व्याहता बन चुकी हूं, द्रौपदी की तरह। आप तो कई जाने अंजाने मर्दों की हमबिस्तर हो चुकी हैं।”
“हमारी छिनाल सासू मां जी, चुपचाप हमें आशीर्वाद दे दीजिए, वरना सारी दुनिया को पता चल जाएगा कि आप कितनी बड़ी छिनाल हैं।” दादाजी बोले।
“सच में कितने हरामी लोग हैं आप लोग। मेरी बेटी को भी नहीं छोड़ा। कामिनी तो नादान है मगर आप लोग तो समझदार होते हुए भी इस बेवकूफ को पांच पांच बूढ़े पतियों की पत्नी बना लिया।” मेरी मां बोली।
“मैं बेवकूफ नहीं हूं। मैं इनसे प्यार करती हूं। इसलिए बकायदा शादी की है।” मैं बोली, “अब हमें आशीर्वाद देती हैं कि नहीं”? मेरी मां निरूत्तर हो गई। हम सभी ने मां के पैर छू कर आशिर्वाद लिया। नानाजी अर्थात मेरी मां के पिता ने भी अपनी बेटी, (अब सास) के पांव छुआ और आशिर्वाद लिया। मेरी मां ने यंत्रवत हमें आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात हमने साथ बैठ कर खाना खाया। पंडित और चाची ने भी विवाह भोज का आनंद लिया।
खाना खाते वक्त दादाजी ने मेरी मां के चिंतित चेहरे को देख कर कहा, “आप चिंता मत कीजिए सासू मां जी, हम आपकी चिंता समझ सकते हैं। अभी आप सास हैं, लेकिन हमारे लिए आप वही पहले वाली लक्ष्मी हैं। आपकी इच्छाओं का हम पूरा ख्याल रखेंगे। अगर आप चाहें तो आज रात के लिए पंडित जी से काम चला लीजिए, रमा भी आपका साथ देने को तैयार है। आप दोनों पंडित जी के साथ मजे कीजिए, हम आज कामिनी के साथ सुहागरात मनाएंगे और इसकी चिंता मत कीजिए कि हम पांच एक साथ किस तरह से सुहाग रात मनाएंगे। कामिनी आखिर आप की ही बेटी है, आप से कम नहीं है।” मेरी मां ने पंडित जी की ओर देखा, जिसकी आंखों में वहशियत नाच रही थी और बड़े ही अश्लील ढंग से मुस्करा रहे थे। रमा (मेरी चाची) भी मुस्करा रही थी। मेरी मां ने मायूस हो कर सिर झुका कर अपनी सहमति दे दी।
मैं बेहद रोमांचित थी, अपने सुहागरात की कल्पना में डूबी।
खाना खाने के बाद चाची मुझे ले कर नानाजी के मास्टर बेडरूम में आई, जिसे बड़ी खूबसूरती से सजाया गया था और उसी खूबसूरती से सुहाग सेज भी।
मुझे ले कर चाची ने सुहाग शैय्या पर बिठा दिया और मुस्करा कर बोली, “वाह बिटिया, तेरी हिम्मत की दाद देती हूं, पांच पांच मर्दों के साथ सुहागरात मुबारक हो।” फिर वह मेरे गालों पर चिकोटी काट कर बाहर निकल गई। मैं धड़कते दिल से अपने दूल्हों की प्रतीक्षा करने लगी। करीब 11 बजे कमरे का दरवाजा खुला और एक एक करके पांचों अंदर आए और सुहाग सेज पर मेरे सामने बैठ गये। चाची के निकलते ही मैं ने घूंघट और लंबा खींच लिया था।
“हाय हमारी दुल्हन, इतना लंबा घूंघट? सब कुछ तो हम पहले ही देख चुके हैं, शरमाती क्यों हो?” दादाजी घूंघट खोलते हुए बोले।
“हाय दैया, लाज लगती है जी।” मैं दोनों हाथों से चेहरा छुपाते हुए बोली।
“तेरी लाज की ऐसी की तैसी, आज तेरी सुहागरात है। शरमाओ मत। आज से तू हमारी धर्मपत्नी है। हम सब तेरे पति। तुझे तो पता ही है अभी हम तेरे साथ क्या करेंगे। चलो रे भाई लोगो, शुरू हो जाओ।” बड़े दादाजी ने सबको हरी झंडी दिखा दी।
मैं फिर भी उन्हें रोकने की नाकाम कोशिश करती रही। फिर मुझे याद आया कि मैं ने कहा था मां के सामने इन लोगों से अपनी वासना की आग बुझाऊंगी। इन्होंने भी हामी भरी थी। सुहाग रात था तो क्या हुआ, आज ऐसा आकस्मिक संयोग सौभाग्य से ही मिला था। मैं बोली, “रुकिए, आज मां भी यहीं है। क्यों न आज मां के सामने ही सुहाग रात मनाया जाए? आप लोगों ने खुद कहा था कि मेरी मां के सामने ही मेरे जिस्म का भोग लगाएंगे। आज सौभाग्य से ऐसा मौका मिल गया है। उन सबको यहीं बुला लीजिए ना, मेरी मां को भी तो पता चले कि उसकी बेटी भी उससे कुछ कम नहीं है।”
सब ने एक दूसरे को देखा और खुशी खुशी राजी हो गए। तुरंत ही उन्होंने हरिया को उन्हें बुलाने को भेजा।
“उन्हें तुरंत यहां बुला लाओ, जिस भी हालत में हों, वैसे ही।” दादाजी बोले। दो मिनट में ही सबके सब हमारे कमरे में थे। चाची और मेरी मां सिर्फ़ ब्लाऊज़ और पेटीकोट में थे और पंडित जी सिर्फ धोती में, कमर से ऊपर कुछ नहीं था। काले, मोटे तोंदियल शरीर पर पूरा बाल भरा हुआ था, काले भालू की तरह। ऐसा लग रहा था कि वे लोग बहुत जल्दीबाजी में थे। मेरी मां और चाची के बाल बिखरे हुए थे। चेहरा उनका लाल हो चुका था। लगता था उनकी काम क्रीड़ा शुरू हो चुकी थी। उत्तेजना और खीझ उनके चेहरे पर साफ साफ दिखाई दे रही थी।
“आओ तुम लोग भी इसी कमरे में। हमारी सुहागरात अपनी आंखों से देखो और खुद भी ऐश करो।” दादाजी बोले।
” हा हा हा, ये बढ़िया आईडिया है, क्यों, मेरी आज रात की दुल्हनों? आओ हम यहीं सोफे में बैठ कर इनका सुहाग रात देखेंगे और हम भी इसी सोफे पर चुदाई का खेल खेलेंगे।” काले कलूटे भैंस जैसे पंडित जी अपनी खींसें निपोरते हुए वासना से ओत-प्रोत आवाज में बोले और मेरी मां और चाची को अपने अगल बगल बैठा कर उन्हें अपने बनमानुषी बांहों में जकड़ लिया और मेरी मां और चाची भी कहां कम छिनाल थीं, जहां चाची पंडित जी की धोती में हाथ डाल कर उनसे चिपकी जा रही थी वहीं मेरी मां भी मेरी अनैतिकता और बेशर्मी भरी आकस्मिक विवाह से उत्पन्न नाराजगी और गुस्से को त्याग कर अपने असली रंग में आ गयी और पेटीकोट और ब्लाउज खोल कर सिर्फ ब्रा और पैंटी में पंडित जी के बेडौल और कुरूप शरीर से चिपक कर बैठ गई और बोली, “हां, यह ठीक है, इस कमीनी कामिनी और इन कमीने बूढ़ों की बेशर्मी आज हम अपनी आंखों से देखेंगे और इस बेगैरत लड़की की बरबादी का जश्न इन्हीं हरामियों के सामने मनाएंगे।”
मैं पहली बार अपनी मां को इस रूप में देख रही थी। उसे इस कामुकता पूर्ण मुद्रा में देख कर और उसकी बातें सुन कर मुझे मजा आ गया, मैं भी उत्तेजित हो उठी और बेहद कामुकता पूर्ण स्वर में बोल उठी, “आज तुम देखोगी मम्मी कि यह मेरी बर्बादी है या आबादी। मैं भी आखिर आप की ही बेटी हूं। तेरे सामने ही मैं दिखाऊंगी कि मैं यूं ही इन भिन्न भिन्न आकार प्रकार के पांच दूल्हों की दुल्हन नहीं बनी हूं। आईए मेरे पति देवताओं, मेरी छिनाल मां के सामने ही सब मिलकर मुझे पत्नी होने का वही स्वर्गीय व अनिर्वचनीय सुख प्रदान करके मुझे धन्य कर दो जिसके लिए एक नारी पैदा होती है।”
“अब तक हम सब देख क्या रहे हैं? चलो भाईयों शुरू हो जाओ।” दादाजी बड़ी बेसब्री से बोल उठे। फिर क्या था, इधर मैं नयी नवेली दुल्हन की तरह बनावटी लज्जा का दिखावा करती रही और उधर मेरी लाज भरी ना नुकुर की परवाह किए बगैर उन्होंने एक एक करके मेरे शरीर के सारे कपड़ों को उतार कर पूरी तरह नंगी कर दिया। एक एक करके मेरी चुन्नी, मेरा लहंगा, चोली, ब्रा, पैंटी, जैसे जैसे खुलते गये, वहां उपस्थित सभी लोगों की आंखें फटी की फटी रह गईं, खास कर के पंडित जी, मेरी मां और मेरी चाची की।
मेरे पूर्ण विकसित गदराए नंगे शरीर को वे लोग अपलक अविश्वसनीय नजरों से देख रहे थे। पंडित जी की आंखें तो मानो बाहर ही निकली जा रही थीं।
“गजब” वे बुदबुदाए।
“पूरी रंडी बन गई है हरामजादी” मेरी मां बुदबुदाई।
मैं लाजवंती का अभिनय करती हुई बोली, “हाय राम, लाज लगती है जी। देखिए न, मां, चाची, पंडित जी मुझे कैसे देख रहे हैं।”
“अब तू नखरे न कर रानी। हम इन्हें दिखाते हैं कि तू ऐसे ही हमारी बीवी नहीं बनी हो।” बड़े दादाजी बड़े अश्लील ढंग से मेरे तने हुए नग्न उरोजों को सहलाते हुए बोले।
“अरे देख क्या रहे हो, टूट पड़ो सालों। उतारो अपने कपड़े और बना लो हमारी कम्मो रानी को अपने लौड़ों की दासी।” दादाजी अब बेसब्र हो चुके थे।
आनन फानन में सब मादरजात नंगे हो गए और मुझ पर जंगली जानवरों की तरह टूट पड़े। हाय, वह अहसास, वह रोमांच, तीन दर्शकों के सामने, खास कर अपनी मां के सामने, इन पांच पांच कामुक बूढ़े पतियों की एकमात्र पत्नी बन कर अपने नग्न तन को उनकी वासना की भूख मिटाने हेतु समर्पित करने को तत्पर हो गई। विभिन्न आकार प्रकार के मेरे नंग धडंग पति एकाएक मुझ पर छा गए। करीम और हरिया ने मेरे उन्नत उरोजों पर एक साथ धावा बोला और दबा दबा कर चूसने और चाटने लगे।
“आह, ओह ओ्ओ्ओ्ओह, आराम से, आह, धीरे धीरे प्लीज”, मेरे मुंह से निकला। दादाजी ने मेरी फूली हुई चिकनी योनि पर आक्रमण किया और लगे चूसने और चाटने। आह अवर्णनीय आनंद। बड़े दादाजी जो गुदा मैथुन के रसिया थे, मेरी चिकनी गोल गोल चूतड़ को फैला कर गुदा द्वार में अपनी जीभ घुसा घुसा कर चाटने लगे।
नानाजी कहां पीछे रहने वाले थे, अपनी ही बेटी (मेरी मां) के सामने बड़ी ही बेशर्मी से अपना फनफनाता भीमकाय लिंग मेरे होंठों के सामने लाकर बोले, “ले मेरा लौड़ा चाट मेरी रानी, जीभ निकाल कर चाट, मुंह में ले कर चूस, आज तू अपनी मां को अपना दम दिखा दे कि तू एक साथ हम सब को कैसे खुश कर सकती है और हम सब बूढ़े पति भी दिखाते हैं कि तेरी जैसी एकमात्र खूबसूरत और जवान पत्नी को हम सब मिलकर कैसे खुश रख सकते हैं।”
“हां मेरे स्वामियों, जैसी आप लोगों की मर्जी, आज से मैं आप लोगों की सामुहिक पत्नी, वादा करती हूं कि आप लोगों की खुशी में ही मेरी खुशी होगी। आप लोग जो बोलिएगा मैं वैसा ही करूंगी।” मैं आज्ञाकरी पत्नी की तरह अपनी जीभ से नानाजी के लिंग को चाटने लगी, फिर आहिस्ता आहिस्ता पूरा लिंग मुंह के अंदर ले कर चूसने लगी। सब लोगों ने मिलकर मेरी चूचियां, चूत, गांड़ चूसने चाटने और मुख मैथुन में लग कर मेरे पूरे शरीर में कामाग्नी की ज्वाला को इस कदर भड़का दिया कि मेरा शरीर उत्तेजना के मारे थरथराने लगा, लंबी लंबी सांसें चलने लगी, सिसकारियां निकलने लगी। पागल हो उठी थी मैं। मैं ने इसी दौरान हल्के से किसी तरह तिरछी नजरों से अपनी मां के ओर दृष्टि दौड़ाई तो गजब का नजारा दिखा। अब तक मेरी मां और चाची पूर्णतय: नंगी हो चुकी थीं। दोनों की बड़ी बड़ी चूचियां थलथला रही थीं। झांटों से भरी हुई उनकी फकफकाती पूवे जैसी चूत दूर से ही पनियायी हुई स्पष्ट दिखाई पड़ रही थीं। दोनों की वासना भरी भूखी आंखें हमारी ओर ही थीं और पांचों पांडवों द्वारा मेरे साथ हो रहे कामक्रीड़ा को तन्मयतापूर्वक देख रहे थे मगर उनके हाथ पंडित जी के विशाल फनफनाए नाग सदृष्य लिंग पर अठखेलियां कर रही थीं। पंडित जी पूरे नंगे हो कर किसी जंगली भालू की तरह दिखाई दे रहे थे। बड़ा सा हंडी जैसा तोंद बाहर निकला हुआ था मगर उनके लिंग का तो कहना ही क्या था, पूरे शबाब पर था, डरावना था मगर था खूबसूरत। बड़ा सा चिकना गुलाबी सुपाड़ा दूर से भी चमक रहा था। लंबाई और मोटाई तो पूछो ही मत, गधे के लिंग की तरह। कुल मिलाकर ऐसा लिंग जिसे देखकर आम स्त्रियां भयभीत हो जाएं, मगर शायद मेरी मां और चाची उन आम स्त्रियों में नहीं थीं। साफ साफ दिखाई दे रहा था कि वे दोनों चुदने को बेताब हो चुकी थीं। कामपिपाशु पंडित भेड़िए जैसी आंखें फाड़कर हमारी कामलीला देखते हुए अपने बनमानुषी पंजों से चाची और मां की थलथलाती चूचियों को बड़ी बेरहमी से मसल रहे थे। उन तीनों के मुख से आनन्द भरी सिसकारियां निकल रही थीं।
मैं भी अब काफी गर्म हो चुकी थी और चुदने को तड़पने लगी, “अब चोद भी डालिए मेरे पति देवताओं” मैं पागलों की तरह बोल उठी।
“हां रानी, अब हम सब मिलकर तुझे ऐसा चोदेंगे कि यह सुहाग रात तुझे जिंदगी भर याद रहेगा। पहले आ जा केशव, तू शुरू कर इसकी चुदाई।” दादाजी बोले।
“नहीं, मुझे इसकी गोल गोल चिकनी गांड़ पसंद है। मैं तो इसकी गांड़ चोदुंगा।” बड़े दादाजी बोले।
“गांड़ चोदना है चोद लीजिए, मेरी गांड़ के रसिया स्वामी जी, मेरा सबकुछ अब आप लोगों का है, मगर वीर्य मेरी चूत में डालिएगा। मुझे आप सबके बच्चों की मां बनना है मेरे स्वामियों।” मैं बोली।
“हां हां बिल्कुल ऐसा ही होगा मेरी प्यारी बुर चोदी रानी।” बड़े दादाजी झट से बोल उठे और चाट चाट कर चिकने किये हुए मेरी गुदा द्वार पर अपना लौड़ा टिकाया “ले मेरी गांड़ मरानी” और सरसराते हुए एक ही बार में जड़ तक ठोक दिया।
“आआ्आ्आ्आ्ह्ह्ह” मेरी आह निकल पड़ी।
“अब मैं तेरी चूत में अपना लौड़ा डालूंगा मेरी चूतमरानी” कहते हुए दादाजी ने अपना आठ इंच का लौड़ा मेरी पनियायी चूत में घुसेड़ना चालू किया। धीरे धीरे उन्होंने पूरा का पूरा लंड मेरी चूत के अंदर डाल दिया।
“ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह” दोतरफे हमले से मैं सिसक उठी। मेरे मुंह में नानाजी का लौड़ा समाया हुआ था। मेरे दोनों हाथों में करीम और हरिया का लंड था जिन्हें मैं जोर से पकड़े हुए थी सहारे की तरह।
“पकड़े मत रह रानी, अपने हाथों से हम दोनों का मूठ मार” हरिया बोला, और मैं जरखरीद गुलाम की तरह उनके मोटे मोटे लौड़ों को बमुश्किल पकड़ कर हस्तमैथुन का मज़ा देने लगी।
वे दोनों “आह रानी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह रानी” करने लगे। अब शुरू हुई मेरे शरीर की कुटाई। दादाजी और बड़े दादाजी ने मेरे पैरों के बीच अपना स्थान बना कर मुझे कस कर दबोच लिया और गंदी गंदी गालियों के साथ मेरी चूत और गांड़ में अपने लौड़े पेल कर लंबे लंबे प्रहार करने लगे।
“ओह साली कुतिया, ले मेरा लंड, चूत मरानी छिनाल, तेरी चूत की चटनी बना दूंगा।” दादाजी बोल रहे थे।
“आह गांड़ मरानी रंडी, ओह रंडी की चुदक्कड़ कुतिया, मैं गांड़ का रसिया, आज तेरी गांड़ का गूदा निकाल दूंगा।” बड़े दादाजी बोलने लगे। मैं कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी। मेरे मुंह में अपना लौड़ा डाल कर नानाजी मुखमैथुन में व्यस्त थे। मेरी मां और चाची मेरे रंडीपन को कौतुहल, अविश्वास और आश्चर्य से आंखें फाड़कर कर देख रहे थे। तभी पंडित जी ने दोनों औरतों को अपने सामने कुतिया की तरह झुका दिया, दोनों के चेहरे हमारी ओर थे, फिर वे उनके पीछे गये और पहले चाची के पीछे किसी कुत्ते की तरह पोजीशन ले कर अपने फनफनाते गधे सरीखे लौड़े के सुपाड़े को चूत के मुहाने पर रख कर एक करारा धक्का मार दिया।
चाची चीख उठी। “आह मादरचोद पंडित, मेरी चूत फ़ाड़ दिया आह”
“चुप बुरचोदी, चुपचाप कुतिया बनी रह और मुझे चोदने दे हरामजादी”, बेहद वहशियाना अंदाज में पंडित जी गुर्रा उठे। इस समय वे किसी जंगली बनमानुष से कम नहीं लग रहे थे। उन्होंने एक हाथ की लंबी उंगली मेरी मम्मी की चूत में घुसा कर अन्दर बाहर करना शुरू किया और एक जबरदस्त धक्के से पूरा लौड़ा चाची की चूत में उतार दिया।
“आ्आ्आ्आह्ह्ह, मार डाला हरामी पंडित।” चाची किसी ज़बह होती बकरी की तरह चीखने लगी।
पंडित जी ने एक जोरदार झापड़ चाची के चूतड़ पर जड़ दिया और बोला, “साली कुतिया, अब तक चुदने के लिए मरी जा रही थी और अब हाय हाय कर रही है। तुम दोनों आज मेरी कुतिया हो समझ गई और मैं तुम दोनों का कुत्ता।” फिर चाची के चीखने चिल्लाने की परवाह किए बगैर बड़ी बेरहमी से दनादन धक्के पर धक्का लगाने लगे।
इधर दादा जी और बड़े दादाजी मिल कर मेरी चूत और गांड़ का भुर्ता बनाने में जुट गए अपनी पूर्वपरिचित जंगली जानवरों की तरह, गंदी गंदी गालियां निकालते हुए, “आह हमारी रंडी पत्नी, साली हरामजादी कुतिया, रंडी की औलाद, बुर चोदी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह” दे दनादन चोदने में मशगूल। मैं उनके हर प्रहार से आनंद में डूबती जा रही थी, अपने नारीत्व पर गौरवान्वित होती हुई। अचानक ही मैं उत्तेजना के चरमोत्कर्ष पर पहुंच कर झड़ने लगी और ठीक उसी समय दादाजी भी खलास होने लगे और मेरे झड़ने की अनिर्वचनीय सुख को दुगुना कर दिया। इसी समय चाची भी हांफती कांपती पागलों की तरह सर झटकती हुई झड़ने लगी “आ्वा्हा्आ्आ्आह्ह्ह राजा मैं झड़ रही हूं ओ्ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह”। ऐसा लग रहा था मानो जिंदगी में उसे पहली बार इस तरह की चुदाई का अनुभव मिला हो। मगर पंडित जी का लंड को तो लगता है अभी दूसरे चूत (मेरी मां की) की सुगंध ने अपनी ओर खींच लिया था। पंडित जी ने चाची को छोड़कर मेरी मां की चूत पर हमला बोला। ज्यों ही पंडित जी ने चाची को छोड़ा, वह निढाल हो कर धम से फर्श पर गिर पड़ी और लंबी लंबी सांसे लेने लगी। पंडित जी ने चाची के चूत रस से सने अपने मूसल सरीखे लौड़े को मेरी मां की फकफकाती चूत में एक ही बार में पूरा का पूरा उतार दिया और बेहद बर्बरता पूर्वक वहशियाना अंदाज में नोचते खसोटते हुए चोदना चालू कर दिया। मेरी मां रंडी जरूर थी मगर लगता है इस तरह के भयानक लंड से पाला नहीं पड़ा था।
बड़े दर्दनाक ढंग से चीख उठी, “हाय मार डाला रे आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह हरामी पंडित ओह माई गॉड आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह।”
“अब तू लगी नखरा करने साली कुत्ती, चुप रह हरामजादी।” पंडित जी मेरी मां के चीख पुकार की परवाह किए बगैर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और किसी कसाई की तरह मेरी मां की चूचियों को नोचते खसोटते कुत्ते की तरह धकाधक चोदने में मशगूल हो गए। मेरी मां की आंखों से आंसू बह निकले, चीखती रही, छटपटाती रही, मगर उस भीमकाय जालिम पंडित के चंगुल से बचाने की सारी कोशिशें व्यर्थ थी।
कुछ ही देर में मां रोना गाना छोड़ कर आनंद मिस्रित सिसकारियां भरने लगी, “आह राजा ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा, चोद साले हरामी पंडित मेरी बेटी को दिखा दे कि आखिर मैं भी उसकी मां हूं, आह ओ्ह्ह्ह्ह अम्म्म््माआ्आ्आ।”
“हां रे रंडी, आज तेरी बेटी को दिखा दे कि तू कितनी बड़ी रंडी है। ओह मजा आ रहा है आह साली देख तेरी बेटी कैसे पांच पांच मर्दों से चुद रही है, रंडी मां की रंडी बेटी।” पंडित जी मेरी मां को चोदते हुए बोल रहे थे।
इधर जैसे ही दादाजी मुझे चोद कर हटे, तुरंत ही बड़े दादाजी मेरी गांड़ छोड़ कर मेरी चूत में हमला कर बैठे। कुछ ही झटकों में वे भी फचफचा कर अपना वीर्य मेरी कोख में उंडेलने लगे “आ्आ्आ्आ्आह रंडी मां की छिनाल बेटी, ओ्ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह् गया मेरा लौड़ा रस तेरी चूत में,” भैंसे की तरह डकारते हुए जैसे ही वे खलास हो कर हटे, हरिया ने मेरी चूत में धावा बोला, इधर मेरी चूत में हरिया का लंड गया उधर मेरी गांड़ में करीम का लौड़ा घुसा। फिर दोनों ने जो घमासान मचाया कि मैं हाय हाय कर उठी। उनके इस धुआंधार चुदाई के दौरान मैं फिर एक बार झड़ गई “आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओ” अभी मैं झड़ ही रही थी कि हरिया ने मुझे कस कर दबोचा और अपने वीर्य से मेरी चूत को सराबोर कर दिया। ज्यों ही हरिया हटा, करीम मेरी गांड़ छोड़ कर मेरी बूर में आक्रमण कर दिया और एक ही झटके में अपना दस इंच का लौड़ा मेरी कोख तक ठोंक दिया। “आह” मेरी घुटी घुटी आह निकल पड़ी। करीम का लौड़ा था ही इतना विशाल कि जितनी बार भी चुदो, दर्द तो होना ही था, मगर उस दर्द के साथ जो आनंद था वह भी अद्भुत था। “आह मेरी जान, इतनी मस्त चूत, जो चोदे सो निहाल” वे बोले और मैं भी छिनाल की तरह बोल उठी, “ओह मेरे राजा, आपका लौड़ा इतना मस्त है कि जो चुदे सो निहाल।” कुछ ही देर में करीम ने मेरी चूत में अपना वीर्य भरना शुरू किया, ” ओह ओ्ओ्ओ्ओह, मैं गई मेरे स्वामी” कहती हुई तीसरी बार छरछरा कर झड़ने लगी। मेरे चार पति मुझे चोद कर आस पास पड़े थे और तब नंबर आया नानाजी का। मैं जानती थी कि अब मुझे कुतिया बनना है। बिना बोले ही मैं कुतिया की तरह उकड़ूं हो गई और नानाजी कुत्ते की तरह मुझ पर टूट पड़े। “वाह रानी, यह हुई ना बात। तू बहुत समझदार पत्नी है। हर पति की पसंद का बहुत ख्याल रखती है। हम सब तुझे अपनी पत्नी बना कर धन्य हो गये।” वे बोले। “अब ज्यादा मस्का मत मारिये मेरे पति देव जी, बना लीजिए मुझे अपनी कुतिया और मुझे अपनी कुत्ती पत्नी का दरजा प्रदान करने की कृपा कीजिए।” मेरे इतना कहने की देर थी कि दनादन किसी कुत्ते की तरह मुझे भंभोड़ना शुरु कर दिया। करीब पन्द्रह मिनट तक चोदने के बाद मुझे कुतिया की तरह अपने लंड से फंसा कर पलट गये। मेरी मां पंडित जी से चुदती हुई मुझे अपने पापा से चुदती आंखें फाड़कर कर देखती रही। जिंदगी में पहली बार उसने किसी मर्द के लंड से फंसी स्त्री को देख रही थी। हम दोनों मां बेटी एक दूसरे को देख रहे थे। मैं नानाजी के लंड से फंसी भालू जैसे विकृत शरीर वाले पंडित जी के भीषण चुदाई में भी आनंदित और मुदित मां को देख कर सोच रही थी कि सच में वह एक नंबर की छिनाल चुदक्कड़ है। शायद मेरी मां भी मेरे बारे में यही सोच रही थी। करीब दस मिनट बाद नानाजी ने अपने वीर्य से मेरी कोख सींच कर अपने लंड बंधन से मुक्त किया। इस दौरान मैं चौथी बार स्खलन सुख से विभोर हो गई। उधर पंडित जी भी मेरी मां के कमर को जोर से पकड़ कर भैंस की तरह डकारते हुए खलास होने लगे। मां ने अपनी आंखें बंद कर लीं और चरम सुख में झड़ते हुए बोली, “हाय हाय मां मैं गई राजा ओह पंडित जी ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरे चोदू,” और पंडित जी के साथ ही साथ चिपकी वह भी पसीने से लथपथ निढाल हो कर लुढ़क गई। मेरे चारों ओर मेरे पति लेटे हुए थे और उनके हाथ मेरे नग्न जिस्म पर थे।
कमरे में उपस्थित सारे लोग तृप्त हो गये थे, यह और कोई नहीं, खुद उनके चेहरों की मुस्कान बता रही थी। मैं खुश थी कि मैं ने अपनी मां को दिखा दिया कि मैं अपने पतियों को पाकर कितनी खुशनसीब हूं, साथ ही साथ मेरे पतियों ने भी दिखा दिया कि वे मुझे पत्नी के रूप में पा कर कितने खुश हैं।
सभी लस्त पस्त नग्नावस्था में अस्त व्यस्त हालत में पड़े हुए थे। मैं अपने पांचों पतियों की मनमानी में पूर्ण रूप से समर्पित सहभागी होकर उन्हें पूरी संतुष्टि और खुशी प्रदान करती करती खुद भी स्त्रीत्व का आनंद लेती रही और इस दौरान मेरे साथ जो धकमपेल हुआ, उसके उपरांत थकान से चूर निढाल हो गई थी। उधर पंडित जी ने भी मेरी मां और चाची को तो अपनी चुदाई से बेहाल कर दिया मगर इस धींगामुश्ती में खुद भी थक कर चूर लुढ़के पड़े थे। इसी दौरान मेरे दिमाग में यह कुत्सित विचार आया कि क्यों न अभी ही मेरी मां के रंडीपन को अपनी आंखों से देखूं। मैं ने दादाजी के कानों में यह बात डाल दी और साथ ही यह भी कहा कि यह आप लोगों की पत्नी की इच्छा है और ज्यों ही मेरे बाकी पतियों को मेरी ख्वाहिश के बारे में पता चला, आज्ञाकारी पतियों की तरह प्रत्यक्ष रूप से मुझे खुश करने के लिए (किंतु परोक्ष रूप से शायद वे भी यही चाहते थे) देखते ही देखते मेरे पांचों पतियों के लिंग टनटना कर पुनः खड़े हो गए, जैसे शिकार को देख कर भेड़ियों की आंखों में चमक आ जाती है, वैसे ही सब की आंखों में चमक आ गई और सब के सब टूट पड़ने को तैयार हो गये।
“ध्यान रखिएगा कि सबसे पहले नानाजी का लौड़ा अपनी बेटी की चूत में घुसना चाहिए, क्योंकि वे मेरी मां को पहली बार चोदेंगे, फिर करीम चाचा, उनका लंड भी मेरी मां की चूत में पहली बार जाएगा और उसके बाद बाकी सब, क्योंकि आप लोग तो मेरी मां को पहले भी कई बार चोद चुके हैं। जैसी मर्जी वैसा चोदिए, जरा मैं भी तो अपनी मां के रंडीपन को देखूं” मैं ने कुटिलतापूर्वक मुस्कुराते हुए फुसफुसा कर उन्हें हिदायत दी। सब सहर्ष अपनी सहमत हो गए।
“जैसी आपकी आज्ञा श्रीमती जी” सब एक स्वर में बोल उठे और फिर पंडित जी से नुच चुद कर बेहाल लस्त पस्त थकी निढाल मेरी मां के नग्न जिस्म पर किसी भूखे शिकारी कुत्तों की तरह टूट पड़े। मेरी मां अपने ऊपर हुए इस आकस्मिक आक्रमण से दहशत में भर गई और बदहवास चीख पड़ी, “छोड़ो हरामियों मुझे, आह, कमीनों, मेरी बेटी को चोद कर पेट नहीं भरा क्या? कामिनी रोक अपने चोदू पतियों को, हाय राम ओह।” छटपटाती हुई अपने आप को उन भेड़ियों के चंगुल से मुक्त होने की असफल कोशिश करने लगी, किंतु मेरे काम पिपाशु पतियों को भला अब कौन रोक सकता था, बेलगाम पशुओं की तरह लगे भंभोड़ने, नोचने खसोटने। बड़े दादाजी मेरी मां की मोटी मोटी गांड़ में मुंह डाल कर चाटने लगे, दादाजी मां की पावरोटी जैसी योनि को चूसने चाटने लगे, करीम और हरिया बड़ी थल थल करती स्तनों को बेरहमी से चीपने और चूसने लगे, इधर जैसे ही मेरे बुलडोग थूथन वाले काले तोंदियल पति नानाजी अपने टन्नाए हुए मूसल जैसे लिंग के साथ मां के मुंह के पास पहुंचे, मां गिड़गिड़ाने लगी, “नहीं पापा, प्लीज आप तो अपनी बेटी के साथ ऐसा मत कीजिए”।
नानाजी गुर्राहट के साथ बोले, “अभी पापा बोलती है साली हरामजादी कुतिया, जब सभी ऐरे गैरे नत्थू खैरे मर्दों के लंड से अपनी चूत की कुटाई करवा करवा कर हमारी नाक कटवा रही थी तब यह ख्याल नहीं आया? पहले तू हमारी बेटी थी, अब बेटी से हमारी सास बन गई, लेकिन हम सब जानते हैं कि तू एक औरत है, और वह भी एक छिनाल औरत, जिसे चोदने के लिए हमारे बीच कोई रिश्ता नाता मायने नहीं रखता है। सिर्फ इतना याद रख कि तू एक चुदासी चूत वाली चुदक्कड़ औरत और मैं चुदक्कड़ मर्द। चुपचाप चूस मेरा लौड़ा, बुर चोदी, फिर मैं तेरी चूत का भुर्ता बनाता हूं।”
मेरी बेबस मां समझ गई कि इनकी बात मानने के अलावा और उसके पास और कोई चारा नहीं है। चुपचाप नानाजी का लिंग चूसने लगी। कुछ ही देर में नानाजी ने अपना तनतनाया हुआ लिंग मेरी मां के मुंह से निकाला और पंडित जी के वहशीयत भरे संभोग से फूल कर कुप्पा हुई योनि का तिया पांचा करने मां को कुतिया की तरह झुकने का हुक्म दिया, “चल अब तू मेरी कुतिया बन जा, मां की लौड़ी।”
दादाजी और बड़े दादाजी ने अपना स्थान छोड़ कर नानाजी को जगह दिया। मां आज्ञाकरी गुलाम की तरह कुतिया की अवस्था में झुक गई और पीछे से नानाजी ने अपने लिंग को मां की योनि पर टिकाया और मां की कमर को जोर से पकड़ कर एक करारा धक्का लगाया, “ले बुर चोदी कुतिया अपनी बुर में मेरा लौड़ा,” कहते हुए पूरा का पूरा लिंग एक ही बार में अंदर तक घुसा दिया।
“आह पापा, ओह ओ्ओ्ओ्ओह” चीख पड़ी मेरी मां।
“चुप हरामजादी रांड, चुपचाप कुतिया की तरह पड़ी रह और मुझे चोदने दे।” नानाजी अब वहशी दरिंदे बन चुके थे। जंगली कुत्ते की तरह मेरी मां की कमर पकड़ कर मेरी मां की चीख पुकार को अनसुना करते हुए दनादन लगे चोदने। “आह ओह मेरी बुर चोदी बेटी, मेरे ही लौड़े से पैदा हो कर पता नहीं कितने लौड़े से चुद गई और मुझे पता ही नहीं चला। आज सारी कसर निकाल लूंगा। क्या मस्त चूत पाई हो, अपनी मां से भी मस्त है वाह वाह।”
इधर नानाजी मेरी मां की योनि की चटनी बना रहे थे और उधर बाकी लोग उसके बड़े बड़े स्तनों को बेरहमी से मसल मसल कर मलीदा बना रहे थे। उसकी चीखें धीरे धीरे आनंदमयी सिसकारियों में तब्दील हो गई थीं।
“आह ओ्ह्ह्ह्ह पापा, हाय चोदू पापा, चोद राजा, आज तक आपने मुझे चोदा क्यों नहीं ओह ओ्ओ्ओ्ओह” मेरी मां उत्तेजना के आवेग में पागलों की तरह बड़ बड़ करने लगी थी। दादाजी अपने लिंग को मम्मी के मुंह में डाल कर मुख मैथुन का मजा लेने लगे। बड़ा ही घिनौना मगर बेहद उत्तेजक नजारा था। मैं सुहाग सेज पर बैठ कर तन्मयता से उस दृश्य का लुत्फ उठा रही थी। उस कामुकता भरे माहौल का ऐसा असर होने लगा कि मुझ पर भी पुनः वासना का खुमार तारी होने लगा था। मेरी योनि में पानी आने लगा था। मेरी तंद्रा भंग हुई जब मैंने अचानक ही रमा चाची की चीख सुनी। मेरे साथ साथ सबकी नजरें चाची की ओर गयीं। यह देख कर सभी मुस्करा उठे कि पंडित जी जो इतनी देर शांत पड़े हुए थे, इस उत्तेजक दृश्य को देखकर गरमाई हुई चाची पर, जो आंखें फाड़े बैठ कर तन्मयता के साथ मेरी मां को चुदते देख रही थी, अचानक टूट पड़े थे और अनायास हुए इस हमले से सम्भल नहीं पाई और धड़ाम से फर्श पर गिर पड़ी। चाची, जो कुछ देर पहले ही इस वहशी पंडित की भीषण चुदाई को झेल कर सुस्ताती हुई मेरे पांचों पतियों से मेरी मां की चुदाई के उत्तेजक दृश्य का लुत्फ उठा रही थी, फिर से उसी कमीने चुदक्कड़ भेड़िए पंडित, जिसे चुदाई का मुफ्त लाईसेंस मिल चुका था, की बेबस शिकार की तरह छटपटाने लगी, मगर पंडित जी भी एक नंबर के हरामी चुदक्कड़ थे। पंडित जी के मूसलाकार लिंग की चुदाई के दहशत से अभी पूरी तरह उबर ही नहीं पाई थी कि दुबारा उस दर्दनाक दौर से गुजरने की कल्पना से सिहर उठी थी।
“नहीं पंडित जी नहीं प्लीज़ दुबारा नहीं। बहुत बड़ा है आपका लौड़ा।” घिघियाने लगी।
“अरी रमा रानी, पहली बार जो भी औरत मेरा लौड़ा लेती है, सब यही बात बोलती है। तू एक बार ले चुकी है ना, अब कुछ तकलीफ नहीं होगी। अब तुझे बहुत मजा आएगा। मुझे मालूम नहीं है क्या कि तू खूब खेली खाई औरत है? मुझे सब पता है, इस बस्ती के कई मर्दों का लंड ले चुकी है तू।” पंडित जी माहिर चुदक्कड़ की तरह बोले। वैसे तो मेरी चाची उस गांव के एक सरकारी उच्च विद्यालय की शिक्षिका थी, लेकिन इस उम्र में भी उनके व्यक्तित्व में गजब का आकर्षण था। मैं समझ गयी कि चेहरे से सौम्य दिखाई देने वाली चाची भी अंदर से कम छिनाल नहीं है, वरना पंडित जी इस प्रकार की बातें क्यों करते ही क्यों? इस बस्ती में अवश्य मेरी चाची के कई नाजायज रिश्ते होंगे। पंडित जी भी हो सकता है मेरी चाची के जिस्म का भोग लगाने की फिराक में कई दिनों से लगे होंगे और आज सौभाग्य से उन्हें यह सुनहरा मौका मिला होगा, जैसे बिल्ली के भाग से छींका टूटा हो। वैसे मेरी चाची को देख कर किसी भी मर्द के मुंह में पानी आ सकता है। अधेड़ उम्र और मझोले कद काठी की होती हुई भी उसका शारीरिक गठन आकर्षक था। तीखे नैन नक्श वाली, चेहरा मोहरा भी आम स्त्रियों से तनिक बीस ही थी। भारी थलथलाते स्तन और चलते समय भारी मोटे मोटे नितम्बों का हिलना खुद ब खुद किसी भी मर्द के लिंग में तनाव लाने के लिए काफी थीं। वह इलाका घनी आबादी वाला भी नहीं था, बस्ती भी कोई खास बड़ा था नहीं। इसलिए इस प्रकार की बातें ज्यादा दिन छुपा रहना असंभव था। पंडित जी अवश्य चाची के चरित्र के बारे में अवगत रहे होंगे। कुल मिलाकर मुझे यह समझ में आ गया था कि नानाजी ने शादी के प्रोग्राम में ऐसे ही लोगों का चुनाव किया था जिनके चरित्र के बारे में उन्हें अच्छी तरह से पता था। चाची के चीख पुकार की परवाह किए बगैर उन्होंने एक करारा ठाप मार दिया और एक ही झटके में आधा लिंग उसकी यौनगुहा में उतार दिया, “आह मादरचोद मार डाला रे आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह कुत्ते।” दर्दनाक चीख चाची के मुंह से निकला। पंडित जी को उसकी चीख से क्या मतलब था, दन से दूसरा धक्का लगा कर पूरा दानवी लिंग उसकी झांटों भरी फूली हुई यौनगुहा में पैबस्त कर दिया। भले ही कितनी बड़ी चुदक्कड़ रही हो मेरी चाची, दस इंच लंबा और वैसा ही मोटा लिंग किसी भी औरत की योनि के लिए काफी बड़ा है। एक बार नुच चुद कर ही वह बेहाल थी, पंडित जी ने अपनी चिकनी चुपड़ी बातों में फंसाकर दूसरी बार जब भोगना शुरू किया तो शुरू में तो ऐसा लगा मानो चाची की जान ही निकल जा रही हो, लेकिन वाह री चाची वाह, कमाल ही कर दिया जब कुछ ही देर में बोलने लगी, “आह पंडित और जोर से चोद साले, ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा चोद कमीने चोद आज तक ऐसा मजा पहले कभी नहीं मिला राजा ओह ओ्ओ्ओ्ओह”!
“हम बोले थे ना रंडी, मजा आएगा, अब देख लिया मेरे लौड़े का कमाल” पंडित जी दुगुने उत्साह के साथ खुश हो कर संभोग में लीन हो गए। सच में मुझे भी पंडित जी के दमदार लिंग ने अपने मोहपाश में बांध लिया था। उनके शारीरिक बनावट से क्या लेना देना था, चुदना तो लिंग से ही था। मस्त गधे जैसा बड़ा और बेहद खूबसूरत लिंग। ऐसा लग रहा था कि काश इस वक्त मैं चाची की जगह होती। खैर आज नहीं तो कल पंडित जी के लिंग का मज़ा तो ले कर रहूंगी। अब उधर चाची की चुदाई और इधर मां की चुदाई, बेहद कामुक दृश्य था, जिसकी मैं एकमात्र दर्शक। उत्तेजना के मारे मेरे गुप्तांग में पानी आ गया था।
अब तक नानाजी अपनी ही बेटी की कमर कुत्ते की तरह पीछे से पकड़ कर पागलों की तरह चोदने में मशगूल थे। करीब पन्द्रह मिनट बाद उनका लिंग मेरी मां के यौनांग में कुत्ते की तरह फंस गया। यह मेरी मां के लिए बिल्कुल नया अनुभव था। छूटने की कोशिश में उनकी चीख निकल गई। योनि के अन्दर नानाजी के लिंग के जड़ के पास बड़ी सी गांठ के कारण उनकी योनि अब फटी तब फटी हो रही थी। थक हार कर उसी अवस्था में स्थिर हो गई और नानाजी भी कुत्ते की तरह लिंग फंसाए पलट गये। इसी समय लंबे चौड़े छः फुटे बड़े दादाजी अपने लंबे लंबे पैर दोनों ओर फैला कर उनके बीच अपना स्थान बना कर मेरी मां की ओर मुखातिब हो कर पहले अपने तनतनाए लिंग पर थूक लसेड़ कर मेरी मां के गोल गोल चूतड़ों के फांक के मध्य गुदा द्वार पर टिकाया। मेरी मां के लिए यह कोई नई बात नहीं थी, जैसा कि दादाजी ने बताया था। लेकिन नया था तो कुत्ते कुतिया की तरह किसी का लिंग अपनी योनि में फंसाकर गुदा की कुटाई। मां बेबसी में अगले ही पल अपनी गुदा में होने वाले आक्रमण के लिए अभी तैयार ही हो रही थी कि बिना किसी पूर्वाभास के बड़े दादाजी ने एक जोरदार झटके से पूरा का पूरा लिंग मेरी मां की गुदा में समाहित कर दिया। उस 65 साल के बूढ़े की ताकत की दाद देनी पड़ेगी, मेरी मां की कमर को सख्ती से पकड़ कर फिर जो घमासान चुदाई चालू किया कि मां हाय हाय कर उठी। रफ्तार का तो कहना ही क्या था, जवान लड़के शर्म के मारे पानी पानी हो जाएं। “ले साली कुतिया मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में, ले रंडी लौड़े की, हुम हुम हुम गांड़ रानी,” उनके मुख से अल्फाज़ उबल रहे थे। प्राथमिक वेदना से बेहाल मेरी मां कुछ ही पलों में सारी वेदना भूल कर मस्ती के आलम में सिसकारियां निकलने लगी, “आह ओह राजा चोद मेरी गांड़ के रसिया, मेरी बेटी के भतार, बेटी चोद,आह ओह मेरी बेटी के सामने ही मेरी गांड़ का गूदा निकाल दे कुत्ते, साली कामिनी अगर रंडी है तो मैं भी उसकी मां हूं, उससे महा रंडी, आह ओह मैं गई ओह मैं झड़ रही हूं आ्आ्आ्आ्आह रज्ज्ज्जाआआ।” कहते हुए मां खलास होने लगी। नानाजी के लिंग पाश से बंधी, बड़े दादाजी के लिंग से अपनी गुदा की कुटाई करवाती हुई, अपने बड़ी बड़ी स्तनों को पापा और करीम के बेदर्द हाथों से मलीदा बनवाती हुई भी आनंद के अतिरेक में पागलों की तरह सर झटकती रही और सिसियाती रही। तभी नानाजी ने खलास हो कर मां की योनि को अपने लिंग पाश से मुक्त कर दिया। मेरी मां के मुंह से राहत भरी लंबी सांस निकल पड़ी। जब नानाजी का लिंग मेरी मां की योनि से निकला तो एक जोरदार फच्चाक की आवाज से पूरा कमरा गूंज उठा। निकलने के बाद भी हम नानाजी के लिंग के गांठ के आकार को देख कर चकित थे, टेनिस बॉल से भी बड़ा। इसका मतलब यह था कि योनि के अन्दर यह गांठ और भी बड़ा रहा होगा। मेरे साथ भी यही हुआ था मगर अभी मैं ने साक्षात दर्शन कर लिया। इधर नानाजी ज्यों ही मम्मी को चोद कर फारिग हुए, बड़े दादाजी मम्मी की गुदा में अपना लिंग डाले मम्मी को लिए दिए पलट गये। अब मम्मी की चुदी चुदाई योनि ऊपर की ओर हो गई थी, गजब का नजारा था, फूल कर कुप्पा हुई कुतिया की तरह बाहर की ओर निकल पड़ी थीं। करीम चाचा के लिए इससे बेहतर अवसर और क्या हो सकता था। तुरंत ही दस इंच का लिंग ले कर मैदाने जंग में कूद पड़े। मां लस्त पस्त बेहाल नीचे से अपनी गुदा में बड़े दादाजी के लिंग के भीषण आक्रमण को झेलती रही। करीम चाचा ने आव देखा न ताव मां के दोनों पैरों को फैला कर सटाक से पूरा का पूरा लिंग मां की यौनगुहा में उतार दिया और मां सिसक उठी, “उफ्फ आह्ह्ह्ह ओ्ह्ह्ह्ह”।
करीम चाचा बड़ी बेरहमी से पूरा मूसलाकार लिंग मम्मी की यौनगुहा में उतार कर दनादन चोदने लगा। दादाजी और नानाजी तो मेरी मां की योनि की अच्छी तरह कुटाई कर चुके थे और बड़े दादाजी अभी भी अपने मनपसंद छिद्र में लिंग डाले आनंदपूर्वक चोदने में मग्न थे, करीम चाचा अब चुद चुद कर बेहाल मां की योनि में लिंग डाले अपनी कसरत के दंड पेल के अंतिम दौर में थे, जबकि हरिया अपनी बारी का बेकरारी से इंतजार कर रहे थे। इस दौरान मां तीन बार झड़ी। पंडित जी और मां की चुदाई के कारण पूरा कमरा हांफना, सिसकारियां भरना और योनि में लिंग के अंदर बाहर होने से पैदा होती हुई फच फच की मिश्रित आवाज से भर कर अजीब सा माहौल पैदा कर रहा था। इधर इस माहौल में मेरी भी हालत खस्ता हो रही थी, फिर भी अपनी पनिया उठी योनि सहलाती हुई कामुकता से ओत-प्रोत दृश्य देखकर आनंदित हो रही थी। फिर शुरू हुआ करीम चाचा का लंबा स्खलन। इसी समय चार लोग स्खलन की प्रक्रिया से गुजरने लगे। बड़े दादाजी मां की गुदा मार्ग में फचफचा कर वीर्य भरने लगे, करीम चाचा मां की योनि में, मां और चाची भी हाय हाय करती हुई झड़ने लगी। अद्भुत था वह दृश्य। एक दूसरे से ऐसे चिपक गये थे मानों एक दूसरे में समा ही जाएंगे। मर्द डकारते हुए खलास हो रहे थे और चाची आह आह करती हुई आंखें बंद किए मानो दूसरी दुनिया में पहुंच गई थी। अब बारी थी हरिया की। जैसे ही थकी मांदी मां को निचोड़ निचोड़ कर भोगने के पश्चात बड़े दादाजी और करीम चाचा अलग हुए, वह वहीं लस्त पस्त पसर गई। हरिया जो काफी देर से इस पल का इंतज़ार कर रहा था, मेरी मां के अर्धचेतन शरीर पर भूखे कुत्ते की तरह टूट पड़ा, “साली हरामजादी रंडी, देख मैं तेरा क्या हाल करता हूं, बुर चोदी कुतिया, मां की लौड़ी, छिनाल, लौड़े की दीवानी, बेगैरत, गैर मर्दों की चूत, बनाता हूं तेरी बुर का भोंसड़ा, बहुत शौक है ना चुदवाने का, मिटाता हूं तेरी चूत की खुजली, अभी तुझे दिखाता हूं चुदाई साली रंडी चूत”, कहते हुए झपट पड़ा। मेरी मां के शरीर में इतनी भी शक्ति नहीं थी कि किसी भी प्रकार का विरोध प्रकट कर सके। आनन फानन मां के दोनों पैरों को फैला कर अपने कंधों पर उठा लिया और चुद चुद कर फूल चुकी मां की योनि में एक ही झटके में सरसरा कर अपना लिंग उतार दिया और लगभग बेजान से शरीर को लगा भंभोड़ने। सिर्फ एक मरियल सी आह निकली मेरी मां के मुंह से। आंखें बंद थीं। सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। हरिया को क्या परवाह थी मेरी मां की हालत की। मैं आज समझ सकती हूं उस वक्त की उनकी उसकी मानसिक स्थिति। जिसने मेरी मां को संभोग सुख से परिचित कराया था, भावनात्मक लगाव तो अवश्य रहा होगा, दादाजी के मुंह से उसी स्त्री के छिनाल पन के बारे में सुन कर और आज अपनी आंखों से उसकी छिनाल पन को देख कर जिस मानसिक स्थिति से गुज़र रहा था, सारा का सारा गुब्बार निकाल देने पर तुल गया। झिंझोड़ रहा था, बड़ी बड़ी चूचियों को निचोड़ रहा था, पागलों की तरह होंठों को, गालों को, गर्दन को चूम रहा था, चाट रहा था, दांतों से काट रहा था, चूतड़ के नीचे हाथ डाल कर किसी वहशी दरिंदे की तरह चोद रहा था मानो आज अपने दिल की सारी भंड़ास निकाल कर ही छोड़ेगा। मैं उस वक्त समझ नहीं पा रही थी कि हरिया इतनी दरिंदगी पर क्यों उतर आया था। मैं सहम गई थी मेरी मां की हरिया के हाथों होती हुई दुर्दशा को देख कर। करीब आधे घंटे तक मां के निढाल शरीर को कुत्ते की तरह रगड़ रगड़ कर चोदा और भैंसे की तरह डकारते हुए दीर्घस्खलन से मां की चूत को लबालब कर दिया। झड़ते समय उसने मां को इतनी जोर से भींचा कि अर्धचेतन अवस्था में भी मेरी मां के मुख से लंबी आह निकल पड़ी।
अब तक सब लोग चुदाई से निवृत्त हो चुके थे और थक कर चूर यहां वहां पसर गये थे सिवाय पंडित जी और मेरे। मैं तो उस माहौल की गर्मी से गरम हो अपनी उंगलियों से योनि रगड़ने लग गई थी। पंडित जी अभी तक चाची के ढीले पड़ चुके शरीर में पिले हुए थे।
“हमारी दुल्हन, और कुछ है तेरी इच्छा तो बोल दे।” दादा जी बोले। सब मेरी ओर देखने लगे। पंडित जी भी चोदना छोड़ कर मेरी ओर देखने लगे।
“हां, है, मगर सोच रही हूं बोलूं कि नहीं।” मैं झिझकते हुए बोली।
“अरी बोल रानी, तू बोल के तो देख, तू जो बोलेगी वही होगा” दादाजी बोल उठे।
“यह आप न बोल रहे हैं। सब लोग बोलेंगे तभी बताऊंगी।” मैं बोली।
सब एक स्वर में बोले, “हमारी प्यारी दुल्हन, हम वचन देते हैं कि तेरी खुशी की खातिर हम कुछ भी करेंगे”
झिझकते हुए मैं बोली, “आप लोगों को कुछ नहीं करना है। आप लोगों की इतनी देर की चुदाई ने मुझे फिर से गरम कर दिया है। मैं भी अभी अपनी गरमी शांत करना चाहती हूं। इसके लिए तुरंत कौन मर्द तैयार है?” मैं जानती थी कि दो दो बार झड़ चुकने के बाद मेरे बूढ़े पतियों का लिंग का अभी तुरंत खड़ा होना मुश्किल है।
इससे पहले कि कोई बोलता, पंडित जी झट से बोल उठे, “मैं तैयार हूं”
“साले पंडित तू हमारी बीवी को चोदेगा मादरचोद?” हरिया बोल उठा।
“अभी आप लोगों ने कहा कि कामिनी की खुशी के लिए कुछ भी करेंगे, फिर इतना गरम क्यों हो रहे हैं। पहले कामिनी बिटिया से तो पूछ लीजिए?” पंडित जी बोले। पंडित जी बहुत चालाक थे। शायद उन्होंने अपने लिंग पर मेरी हसरत भरी निगाहों को ताड़ लिया था।
“हां यह ठीक है” मेरे भोले भाले पतियों ने एक स्वर से कहा।
“बोल रानी तू क्या चाहती है?” दादाजी बोले।
“छि छि, कैसी बात करते हैं जी, अपने पतियों के सामने किसी गैर मर्द के साथ? अब मैं क्या बोलूं आप लोगों से? आप लोग भी तो दो दो बार इतनी कसरत कर के थक चुके हैं। वैसे भी हरिया को तो पंडित जी पसंद नहीं हैं। छोड़िए, चलिए मैं ऐसे ही सो जाती हूं।” मैं मायूसी से नंग धड़ंग बिस्तर पर पसरते हुए बोली।
“अरे इतनी मायूस क्यों होती हो हमारी जान? पंडित जी गैर मर्द जरूर हैं मगर हमारे परिवार के सदस्य जैसे ही है। अगर तुझे मंजूर हो तो हमें भी कोई ऐतराज नहीं है।” नानाजी से मेरी मायूसी देखी नहीं गई। “क्यों भाई लोग, क्या बोलते हो?” नानाजी बोले, उन्हें भी पता था कि चोद चोद कर थक चुके बाकी मर्दों में फिलहाल के लिए इतनी शक्ति नहीं बची है कि मेरी प्यास बुझा सकें। थके मांदे अलसाए मेरे बाकी पतियों ने भी नानाजी की बातों का समर्थन किया। मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा, मगर प्रत्यक्षतय: मायूसी का दिखावा करती हुई बोली, “नहीं जी, वैसे मैं इतनी गयी गुजरी नहीं हूं कि अपनी कामुकता पर काबू न रख पाऊं।” मैं फिर भी ढोंग करती रही।
“चुप, अब एक शब्द नहीं। तेरी इस छोटी छोटी सी खुशी के लिए (छोटी कहां, अपने सामने अपनी पत्नी को गैर मर्द से चुदते देखना छोटी बात तो कत्तई नहीं थी, किंतु शायद उन वासना के पुजारियों के लिए शायद यह कोई बड़ी बात भी नहीं थी) हम लोग इतना भी नहीं कर सकें तो लानत है हम पर। चल अब दिल में बिना कोई बोझ लिए पंडित जी से चुद ले, वरना हमें हमेशा के लिए दुःख रहेगा कि सुहागरात में अपनी पत्नी की एक छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सके।” दादाजी बोले।
मैं मन ही मन हंस पड़ी उनकी मासूमियत भरी बातें सुन कर। प्रत्यक्ष तौर पर झिझकते और लजाते हुए, पर पंडित जी के विशाल और खूबसूरत लिंग से चुदने की कल्पना से रोमांचित होती हुई बोली, “हाय राम, आप लोगों के सामने किसी गैर मर्द के साथ संभोग? नहीं बाबा नहीं। आप लोगों को कैसा लगेगा यह तो मुझे पता नहीं, मैं तो लाज से मर ही जाऊंगी। काश आप लोगों में से कोई होता?”
“देख रानी, हमें यह देख कर अच्छा ही लगेगा कि तू पूरी तरह संतुष्ट हो गई है। आज भर इस पंडित से काम चला ले, तू तो अब हमारी पत्नी है ही और हम भी तुम्हारे पति, हम कहीं भागे नहीं जा रहे हैं। जो कुछ होगा हमारे सामने और हमारी रजामंदी से ही होगा ना। न तू हमें धोखा दे रही है और न ही कोई बेवफाई कर रही है। चल अब तू बेझिझक और बेरोकटोक अपनी आग बुझा ले, बिल्कुल आजादी से, कोई रोक-टोक नहीं होगा।” बड़े दादाजी बड़ी उदारता और सहानुभूति पूर्वक बोल उठे।
“तो ठीक है। चलिए पंडित जी मैं फर्श पर बिछे कालीन पर ही आ जाती हूं, सुहाग सेज को पराए मर्द के साथ संसर्ग करके अपवित्र नहीं करना चाहती।” मैं नग्नावस्था में ही बिस्तर से उतर कर उनके सामने खड़ी हो गई और लाजवंती बनी हथेलियों से चेहरा छुपाते हुए बोली। दिल तो मेरा बल्ले बल्ले कर रहा था।
लाटरी तो मेरी भी निकल पड़ी थी। पंडित जी के आकर्षक विशाल लिंग से चुदने की कल्पना साकार होने जा रही थी। मेरे सारे शरीर में चींटियां रेंगने लगी। पंडित जी जंगली भालू की तरह लग रहे थे। उनका बड़ा सा लिंग सामने किसी काले नाग की तरह झूम रहा था। बाहर की ओर निकले बड़े बड़े पीले दांत दिखाते हुए अश्लीलता पूर्वक मुस्कुराते हुए खड़े हो गए और मेरे नग्न जिस्म को खा जाने वाली नजरों से देखने लगे। मेरे पास आकर मेरे चेहरे से हाथ हटाते हुए बोले, “बहुरानी, देख मैं आ गया हूं तेरी प्यास बुझाने।” इतने नजदीक से पंडित जी के वीभत्स रूप को देख कर एक बार तो मैं वितृष्णा से भर उठी। फिर मैं सोचने लगी कि मुझे इसके रुप रंग से क्या लेना देना है। चुदना तो उसके लिंग से है। मैं कुछ बोली नहीं, खामोशी से अपने नग्न जिस्म को उस कामुक भेड़िए के भोग के लिए समर्पित कर दिया। उसने अपने बदबूदार मुंह को पास ला कर गंदे होंठों से मेरे होंठों को चूम लिया। सांस लेने में मुझे घुटन सी महसूस हो रही थी, किंतु अपनी इस हालत के लिए तो मैं खुद ही जिम्मेदार थी, अतः बर्दाश्त करने को वाध्य थी। फिर उनके बनमानुषी पंजे मेरे उन्नत उरोजों पर नृत्य करने लगे।
उन्होंने एक हाथ से मेरा हाथ पकड़ा और अपने मूसल सरीखे काले लिंग पर रख दिया और कहा, “ले बहुरानी, मेरा लौड़ा को पकड़ के देख। इसी लौड़े से मैं तेरी चूत की प्यास बुझाऊंगा।”
“हाय दैया, इतना मोटा और लम्बा।” गनगना कर मेरे लबों से सिर्फ यही अल्फाज़ निकले। दर असल मैं घबरा गई थी। मेरी जिंदगी में इतना बड़ा लिंग पहले कभी नहीं देखा था। दूर से इसका आकार इतना बड़ा नहीं लग रहा था। इतने सामने से दस इंच लम्बा और करीब चार इंच मोटा लिंग देख कर और हाथ में लेकर लेकर वाकई मैं दहशत में आ गयी। सिहर उठी मैं, रोंगटे खड़े हो गए। मैं समझ गई कि पंडित जी के विशाल फनफनाए लिंग से चुदने की इच्छा ने मुझे अच्छी खासी मुसीबत में डाल दिया है। अब भुगतना तो था ही। दिल कड़ा करके मैं ने सोच लिया कि ऊखल में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना।
पंडित जी माहिर चुदक्कड़ थे। मेरी मानसिक स्थिति को समझ गये। पहले मेरे उन्नत उरोजों को सहलाने लगे। उनकी जादुई हथेलियों के स्पर्श से मुझ पर नशा सा तारी होने लगा। मेरी आंखें बंद होने लगीं। मैं बेख्याली में अपने हाथों से उनके मूसल लिंग को पकड़ कर सहलाने लगी। उनके लिंग के चारों ओर बेहद घने लम्बे लम्बे बाल भरे हुए थे। वैसे तो उनका बेहद मोटा तोंदियल कोयले की तरह काला शरीर पूरा ही बालों से भरा हुआ था किंतु लिंग के चारों ओर करीब तीन तीन इंच घने लंबे बाल लिंग को और भयानक रूप दे रहे थे। मोटे और पत्थर की तरह कठोर लिंग के बाहरी चमड़े पर ऊंची ऊंची उभरी हुई नसों के कारण लिंग और भी भयावह दिख रहा था। कुछ मिनटों पश्चात उन्होंने मेरे सख्त उन्नत उरोजों को चाटना और चूसना शुरू कर दिया। मैं मदहोश होने लगी और मुह से सिसकारियां उबलने लगीं। कुछ मिनटों पश्चात उन्होंने मुझे सीधा लिटा दिया और चूमते चाटते अपना मुंह मेरी नाभि से होते हुए मेरी चिकनी योनि तक ले आए। मैं उनके इन कामोत्तेजक हरकतों से उत्तेजना के मारे मेरी सांसें धौकनी की तरह चलने लगी और सीना फूलने पिचकने लगा, मेरे शरीर में कामोत्तेजक लहरें उफ़ान मारने लगीं, मैं थरथराने लगी। पंडित जी ऐसी स्थिति में थे कि उनका भीमकाय लिंग ठीक मेरे मुंह के पास झूलने लगा था। इधर वे मेरी योनि के भगांकुर को अपनी जादुई जिह्वा से छेड़छाड़ करने लगे।
“उफ्फ, आ्आह्ह्ह” मैं आहें भरने को विवश हो उठी। पंडित जी इतने चालाक थे कि धीरे धीरे अपने लिंग के सुपाड़े को मेरे खुले होठों के बीच ले आए और हल्के-हल्के अपनी कमर को जुम्बिश देते रहे, परिणाम स्वरूप धीरे धीरे उत्तेजना के मारे बेध्यानी में उनके विशाल सुपाड़े को होंठों के बीच ले कर चूसने लगी। जीभ से चाटने लगी। पंडित जी मेरी कामुकता को हवा दे कर भड़का रहे थे ताकि उनके विकराल लिंग का भय मेरे मन से विलुप्त हो जाए। पंडित जी की योजना सफल होती जा रही थी। अब मैं उनके लिंग का एक तिहाई हिस्सा मुंह में ले चुकी थी और आनंद के अतिरेक में आंखें बंद किए बदहवास, चूसने में लीन थी। शायद उससे ज्यादा ले भी नहीं सकती थी। पंडित जी जबरदस्ती अपना लिंग मेरे मुंह में ठोक कर मुझे भयभीत नहीं करना चाहते थे, लेकिन चाट चाट कर मेरी फक फक करती योनि में भयानक अग्नि भड़का चुके थे। मैं कसमसाने लगी। पंडित जी समझ गये कि लोहा गरम है और फौरन सीधे हो मेरे पैरों को फैला दिया और जांघों के बीच आ गये। मैं बेचैनी से सिसकारियां भर रही थी। तभी पंडित जी ने अपने लिंग का विशाल सुपाड़ा मेरी गीली योनि के द्वार पर टिकाया और आहिस्ता आहिस्ता दबाव बढ़ाने लगे। उनका चिकना सुपाड़ा मेरी योनि के द्वार को फैलाता हुआ अहिस्ता आहिस्ता अंदर सरकता जा रहा था। मैं इतनी उत्तेजित थी कि मेरी योनि को सीमा से बाहर फैलाता हुआ इतने मोटे लिंग के प्रवेश से होने वाली व्यथा पर, बेलनाकार लिंग के बाहरी भाग का मेरी योनि मार्ग की भीतरी दीवार पर हो रहे सरसराहट भरे घर्षण से उत्पन्न अद्भुत आनंद हावी हो गया और मैं आंखें बंद किए उस अनिर्वचनीय सुख के सागर में डूबती चली गई। कब उसका विकराल लिंग मेरी योनि के अंदर मेरे गर्भगृह तक पैबस्त हो गया मुझे अहसास ही नहीं हुआ। हां उसके लिंग के सुपाड़े की दस्तक को मैंने अपनी कोख में अवश्य महसूस किया। जब पंडित जी ने देखा कि उसने संभोग का प्रथम चरण सफलता पूर्वक तय कर लिया है तो एक पल रुका और धीरे धीरे कमर उठाते हुए लिंग बाहर निकालने लगा। उतना ही निकाला कि लिंग का सुपाड़ा योनि के अन्दर ही रहे।
“आह्ह्ह्ह्ह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” उसके विशाल लिंग के लिए संकीर्ण योनि मार्ग में वह चरम आनंद प्रदान करने वाला घर्षण, अनूठा था। लिंग के बाहरी चमड़े पर उभरे हुए नसों के कारण घर्षण का आनंद दुगुना हो गया था। मेरी योनि की भीतरी दीवार उसके लिंग पर कसी हुई मचल रही थी। ओह वह अहसास। शब्दों में बयां करना मुश्किल था। फिर वह पुनः धीरे धीरे लिंग मेरी योनि में अंदर धकेलने लगा। “ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” गज़ब का था वह अहसास, उसके मोटे लिंग पर अपेक्षाकृत मेरी संकीर्ण योनि का कसाव।
जब उसने देखा कि मैं उसके लिंग को सुगमतापूर्वक अपनी योनि में समाहित कर रही हूं, उसने मेरे दोनों पैरों को अपने कंधों पर चढ़ा लिया और मेरी कमर को दृढ़ता पूर्वक अपने दैत्याकार पंजों से थामा और बड़े ही भद्दे ढंग से मुस्कुराते हुए कहा, “तू तो बड़ी खेली खाई लौंडिया है बहु। मेरा लौड़ा पहली बार में ही आराम से ले ली। चल रानी अब तू देख मैं तेरी चूत की प्यास कैसे बुझाता हूं।” कहते हुए एक करारा ठाप मार दिया। “ले मेरा लौड़ा अपनी चूत में, ओह,” अबतक आराम से पंडित जी मेरे साथ पेश आ रहे थे किंतु अब उनकी पाशविक प्रवृत्ति जागृत हो गई थी। धीरे धीरे वे अपनी चोदने की रफ़्तार बढ़ाते चले गये। मैं उनके भैंस जैसे मोटे शरीर को अपनी बाहों से समेटने की असफल कोशिश करती रही। उनके शरीर के बालों का अपने नंगे जिस्म पर रगड़ना अलग ही मजा दे रहा था। ज्यों ज्यों उसकी रफ़्तार बढ़ती गई, मैं आनंद के अथाह समुद्र में डूबती गई।
“आह पंडित जी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह” मैं बुद बुदाने लगी।आराम से चुदने और इस तूफानी अंदाज में चुदने में बहुत फर्क था और वह भी इतने बड़े लंड से। आम स्त्रियों के लिए सच में भयावह था, किंतु मैं उन आम स्त्रियों की श्रेणी में नहीं थी। खेल कूद में सदैव अव्वल रहने वाली सुगठित देह की स्वामिनी थी मैं। पिछले कुछ ही दिनों में मैं इस प्रकार के वासना के खेल में अच्छी खासी महारत हासिल कर चुकी थी। रतिक्रिया में माहिर पंडित जी अब मेरी नग्न कमनीय मादक देह को अपने दानवी शरीर से पूरी पैशाचिकता के साथ संभोग में मशगूल हो गए और अपनी अदम्य संभोग क्षमता से मुझे दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया। मैं अपने पतियों और मां, चाची, सबकी उपस्थिति भूल गयी और मदहोशी के आलम में बेशर्मी पर उतर आई, “आह, ओह ओ्ओ्ओ्ओह चोदू पंडित जी, आह राजा ओह साले कमीने कुत्ते मेरी चूत के लौड़े, चोद मादरचोद, मां के चोदू, चाची की चूत के रसिया, हाय राजा, गधे के लौड़े, चोद राजा चोद साले मेरी चूत की चटनी बना दे आह आह मेरी बुर का भोंसड़ा बना डाल राजा, काले भैंसे, साले चोदू भालू” और न जाने क्या क्या बके जा रही थी।
मेरी बड़बड़ाहट से उत्साहित पंडित भी बड़बड़ाने लगा, “आह बहुरानी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह रानी ओह रंडी कुतिया आह हरामजादी, मस्त लौंडिया है रे तू, लौंडिया की चूत, आह हुमा,” और न जाने क्या क्या बोले जा रहे थे और मुझे करीब तीस पैंतीस मिनट तक नर पिशाचों की तरह नोचते खसोटते रौंदते भंभोड़ते रहे। फच फच की आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी। इस दौरान हम दोनों आनंदातिरेक में डूबे अपने अंदर की मनस्थिति व मनोभावों को खुल कर अपशब्दों और बेहद घृणित अश्लील शब्दों के द्वारा व्यक्त करते रहे। मैं उनकी पैशाचिक हरकतों से हलकान होने की जगह पूरी बेहयाई पर उतर आई और रंडियों की तरह खुल कर पूरी शिद्दत से प्रति पल प्राप्त होने वाले नवीनतम आनंद से विभोर होती रही। उनके दीर्घ स्तंभन क्षमता की मैं कायल हो गई। रतिक्रिया के दौरान मैं अपनी चूतड़ नीचे से ऊपर उछाल उछाल कर पंडित जी का पूरा साथ दे रही थी। अंततः पंडित जी के स्खलन का समय आ पहुंचा। चोदने की रफ़्तार इतनी बढ़ गई थी कि ऐसा लग रहा था मानो वे मानव नहीं कोई संभोग की मशीन हों। मैं समझ गई कि पंडित जी खलास होने के करीब पहुंच गये हैं। सच बात तो यह है कि मैं इस दौरान दो बार झड़ चुकी थी। अभी तीसरी बार झड़ने के करीब थी। अचानक ही उन्होंने मुझे पूरी शक्ति से जकड़ लिया और फिर शुरू हुआ उनका अंतहीन स्खलन। उसी समय मैं भी झड़ने लगी।
“ओह मां, ओह ओ्ओ्ओ्ओह आह्नेह्ह्” संभोग के सुख का वह चरमोत्कर्ष, मैं निहाल हो गई। थरथराती कांपती हुई आंखें बंद किए स्वर्गीय सुख से सराबोर होने लगी।
मेरे मुंह से बेसाख्ता सिसकारियां निकलने लगीं। “ले बुर चोदी बहुरानी मेरा माल अपनी चूत में आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह्ह” किसी जंगली भालू की तरह मुझ से चिपक कर अपने लिंग के वीर्य से मेरी कोख को सींचने लगे। ऐसा लग रहा था मानो मेरी कोख में वीर्य का बाढ़ आ गया हो। इस समय मेरी संकुचित योनि उसके लिंग से कस के चिपक गई थी। मेरी योनि ने एक तरह से उनके लिंग को जकड़ लिया था। जब तक उनका लिंग स्खलित हो कर शिथिल नहीं हो गया तब तक मेरी योनि की दीवारें उनके लिंग से चिपकी उनके लिंग से निकलते वीर्य का कतरा कतरा अनमोल मोतियों की तरह जज्ब करती रही। पूरी तरह झड़ चुकने के बाद पंडित जी ने मुझे अपने दानवी पाश से मुक्त किया और उनका निचुड़ चुका लिंग मेरे द्वारा योनि को सप्रयास संकुचित कर सख्ती से पकड़े रखने की कोशिश के बावजूद शिथिल हो कर फच्च की आवाज से बाहर निकल आया। उनका राक्षसी लिंग इस वक्त भीगे हुए मासूम चूहे की तरह दिखाई दे रहा था। मैं पूर्ण रूप से तृप्त हो चुकी थी। मेरा पूरा शरीर हल्का हो कर हवा में उड़ रहा था। मैं पगली दीवानी उस मोटे भैंस के बेडौल नंगे जिस्म से लिपट कर उनके कुरूप चेहरे पर चुम्बन जड़ दी। उनका घिनौना चेहरा और बेडौल तन मुझे बहुत प्यारा लगने लगा था।
“खुश कर दिया राजा। शुक्रिया मेरे पतियों, सुहागरात में इतना यादगार तोहफा देने के लिए।” मैं थकान से चूर बिस्तर पर लुढ़क कर लंबी-लंबी सांसें लेने लगी।
कमरे में उपस्थित बाकी सारे लोग खामोशी से तमाशबीनों की तरह हमारी कामलीला देख रहे थे। अब तक मेरी मां अपना होश संभाल चुकी थी। उनके मुख से निकला, “बना दिया ना मेरी बेटी को भी रंडी। पांच पांच मर्दों की पत्नी होने के बावजूद एक बाहर का आदमी मेरी बेटी को उनकी आंखें के सामने चोद रहा था और सारे के सारे नामर्द पति तमाशा देख रहे थे, साले मादरचोद कुत्ते।”
“चुप साली रंडी। हमारी पत्नी, तेरी बेटी, हमारी मर्जी से चुद रही थी, तेरे जैसी नहीं कि पति की आंख बचाकर किसी भी मर्द का लौड़ा लेने के लिए मरी जा रही है।” हरिया बोला।
“अच्छा तो मुझे रंडी कहने के पहले पहले ये बताओ हरामी, कि मैं आज दूसरे मर्दों से चुद रही हूं तो क्यों? क्योंकि मैं अंदर से बहुत चुदासी रहती हूं और इसके जिम्मेदार तुम, ससुर जी और बड़े ससुरजी हैं। तुम लोगों ने मेरी नादानी का फायदा उठाकर मुझे रंडी की तरह चोद चोद कर मुझे चुदाई का नशा चढ़ा दिया। मुझे इन बातों से अब कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि मैं इस तरह की जिंदगी में खुश हूं। मैं ने तो कभी मेरी इस स्थिति के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया, बल्कि उल्टे मैं तो खुश हूं कि आप लोगों ने मुझे जीवन जीने का आनंदमय मार्ग दिखा दिया। और तो और मेरे पति, कामिनी के पापा भी कम जिम्मेदार हैं क्या? वो नामर्द, कभी भी मुझे पत्नी का सुख नहीं दे पाया। दो मिनट में खलास हो कर हमेशा मुझे तरसती छोड़ कर सो जाता है।” बोलती जा रही थी “ऊपर से है समलैंगिक (गांडू), मर्दों से गांड़ मरवाने की आदत। हां, मेरे पति को स्त्रियों में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। चिकना है। अब आप लोग ही बताइए ऐसे मर्द की पत्नी क्या करे?” बड़े दादाजी की ओर देखते हुए बोली, “आप भी तो उनका गांड़ मारते हैं, अभी चुप क्यों हैं? बोलिए, सच है कि नहीं?”
“हां भाईयों यह सच है,” सर हिलाते हुए बड़े दादाजी बोले, “कामिनी का बाप चिकना तो है ही, ऊपर से उसको गांड़ मरवाने की आदत भी है। तुम सब लोगों को पता नहीं है क्या कि उसका गांड़ बिल्कुल औरतों की तरह है? मुझे वैसे भी गांड़ चोदने का शौक तो है ही। उसकी गांड़ देखने से ही मेरा लौड़ा खड़ा हो जाता है। पिछले दस सालों से मैं उसकी गांड़ मारता आ रहा हूं। मगर मैं जबरदस्ती कभी नहीं किया। वह खुद ही मुझे ललचा कर गांड़ मारने को तैयार किया। कई लोगों से उसका संबंध है। परिवार की इज्जत की खातिर मैं ने किसी को नहीं बताया, यहां तक कि रघु को भी नहीं। आज जब बात खुल ही गई है तो बता रहा हूं।”
हम सब को जैसे काठ मार गया था। कमरे में सन्नाटा पसर गया था। सब चुपचाप बड़े दादाजी की बातें सुन रहे थे। हे भगवान! यह कैसा परिवार था मेरा? नानाजी, दादाजी, बड़े दादाजी, पापा हरिया, करीम चाचा, मां सब एक से बढ़कर एक वासना के भूखे, कामुकता के दलदल में आकंठ डूबे। अब पिताजी के समलैंगिक होने का रहस्योद्घाटन। उन्हीं के नक्शे-कदम पर चलती अब मैं।
“तुम ठीक कह रही हो लक्ष्मी। मैं भी आज इस स्थिति में हूं तो इन्हीं के तरह के कामुक मर्दों की वजह से। सारे मर्द एक जैसे हैं। पहले हम जैसी स्त्रियों का शिकार करेंगे और खुद को पाक साफ दिखाएंगे, सारी बदनामी हम स्त्रियों के माथे मढ़कर।” अब तक चुप चाची भी बोल उठी।
“लो, अब तू भी बोल ले। अब तेरे छिनाल बनने में हमारा क्या दोष? तू तो पहले से बनी बनाई छिनाल है, हमने तो सिर्फ बहती गंगा में डुबकी लगाई है।” पंडित जी बोले।
“अच्छा तो सुनाऊं मैं आप मर्दों के किस्से? आप नहीं तो क्या हुआ, आप जैसे मर्दों की कमी है क्या हमारे समाज में? बताऊं मैं, शरीफों का नकाब ओढ़े हुए यहां के मर्दों के बारे में, जिन्होंने मुझे एक शरीफ घरेलू औरत से छिनाल बना कर रख दिया। मुझे चोद चोद कर किस तरह मेरे अंदर चुदास भर दिया है यहां के तथाकथित शरीफ मर्दों ने। अगर आप लोग सुनना चाहते हैं तो सुनिए।” चाची बोली।
“ठीक है ठीक है, तू भी अपनी रामकहानी सुना देना, मगर अभी नहीं, कल सवेरे। चलो अब सब सो जाओ।” दादाजी बोले।
मुझे भी बहुत सारी बातें जाननी थी। चाची की चुदाई यात्रा के बारे में और मेरे पापा के समलैंगिक होने के बारे में। और भी पता नहीं क्या क्या छिपा है हमारे परिवार के सदस्यों के बारे में। यही सब सोचते सोचते पता नहीं कब आंख लग गई।
पंडित जी के कानों में फुसफुसाते हुए मैंने अपनी भावनाओं का इजहार किया, “आई लव यू राजा, आपकी चुदाई की दीवानी हो गई मैं, मुझ पर ऐसी ही कृपा करते रहिएगा जी।”
पंडित जी मुस्कुरा उठे और फुसफुसा कर बोले, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह बहुरानी, तुझे चोद कर मुझे स्वर्ग मिल गया, कैसे भूल जाऊं। जब बोलो तब चोदूंगा रानी, जब भी मुझे चोदने का मन होगा, मैं बुला लूंगा, जरूर आना।”
“हां राजा हां, मैं आपकी दासी हो गई।” मैं निछावर होकर उनके कानों में फुसफुसाते हुए बोली।
सभी की वासना की भूख उस समय के लिए मिट चुकी थी। उस दीर्घ कामक्रीड़ा के पश्चात थककर चूर सभी लोग उसी कमरे में यहां वहां नंग धडंग पसर गये थे। उस वक्त रात का दो बज रहा था। प्रात: जब मेरी निद्रा खुली, मैं ने देखा नौ बज रहे थे। अब तक सभी जानवरों की तरह नंग धड़ंग बेतरतीब, पूरी बेशर्मी से दीन दुनिया से बेखबर खर्राटे भर रहे थे। मैं ने देखा कि सभी अब तक घोड़े बेच कर सो रहे हैं तो मैं अपने बगल में लेटे भैंस जैसे पंडित जी को देखने लगी। बड़े ही वीभत्स रूप रंग, आधे गंजे और बेडौल जिस्म के स्वामी। बड़ा सा तोंद फूल पिचक रहा था। मुह खुला हुआ और ऊपर के बड़े बड़े चार दांत बाहर की ओर निकले हुए उनकेे कुरूप चेहरे को और भी वीभत्स रूप प्रदान कर रहे थे। बड़े बड़े कानों में लंबे लंबे बाल। एक बार तो मैं वितृष्णा से भर गई, छि:, इसी जानवर ने कल रात को मेरे जिस्म को भोगा। फिर मेरी दृष्टि उनके लिंग पर पड़ी जिससे चुद कर मैंने अब तक के संभोग का सर्वश्रेष्ठ और स्वर्गिक आनंद की प्राप्ति की। मेरे अंदर से उनकी शारीरिक कुरूपता से उपजी पल भर की वितृष्णा गायब हो गई और उसके स्थान पर मेरे दिल में पंडित जी के लिए बेइंतहा प्यार उमड़ पड़ा और मैं उनके नग्न जिस्म से चिपक कर उनके मोटे मोटे होंठों को चूम उठी। पंडित जी ने आंखें खोली तो मुझे अपने ऊपर देख कर अपनी मजबूत बांहों में कस लिया और मेरे चुम्बन का प्रत्युत्तर प्रगाढ़ चुम्बन से दिया। उनके मुख से निकलते बदबूदार भभके से भी मुझे कोई घृणा नहीं हुई। फिर मैं उनकी बांहों से आजाद हो कर मीठी मुस्कान के साथ बाथरूम की ओर बढ़ी। पंडित जी भी मेरे पीछे पीछे बाथरूम में घुस गये और मुझे पीछे से पकड़ लिया। उनका मूसलाकार लिंग पूरी तरह सख्त हो कर मेरी गुदा में दस्तक दे रहा था। मैं घबरा कर अहिस्ते से बोली, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा, अभी नहीं बाबा, कोई उठ जाएगा तो? बाद में कर लीजिएगा ना। मैं कहीं भागी थोड़ी ना जा रही हूं।”
“ठीक है बहुरानी ठीक है। बाद में ही सही।” मायूसी से पंडित जी बोले और टनटनाए खड़े लिंग के साथ बाथरूम से बाहर निकल गये। मैं बाथरूम में फ्रेश होकर कपड़े पहन कर उन सबको उठाने लगी, “अरे उठ जाओ भई, नौ बज गए हैं।”
सब उठ गये और एक दूसरे को देखने लगे। सब के सब नंगे। मर्द तो बेशरम थे, इसलिए आराम से कपड़े पहनने लगे, किंतु मम्मी और चाची का तो शर्म से बुरा हाल था। झट से अपने कपड़े उठा कर बाथरूम की ओर भागी। रात की बात और थी। कामुकता का माहौल था और उस माहौल में कामुकता के मारे उन्होंने लाज शरम को ताक पर रख दिया था, किंतु अभी सवेरे सवेरे जब उन्होंने सामान्य माहौल में अपने नग्न देह को इतने नंगे मर्दों के बीच नुची चुदी पड़ी देखा तो लाज के मारे दोहरी हो गयीं। मैं उनकी हालत देख कर मुस्कुरा रही थी।
हरिया तुरंत फ्रेश हो कर किचन में चले गए और मैं भी पीछे पीछे किचन में कदम रखी। अब मैं उस घर की मालकिन थी। मैं ने पीछे से हरिया को बांहों से जकड़ कर बड़े प्यार से पूछा, “पतिदेव जी, अब तो मैं किचन में आ सकती हूं ना?”
“ओह रानी, बिल्कुल बिल्कुल।” कहते हुए पीछे पलटकर मुझे बांहों में भर कर चूम लिया और बोले, “अब तो तू इस घर की मालकिन है मेरी जान, जहां मर्जी जाओ” उनकी इस अदा पर मैं कुर्बान हो गई। हरिया और मैं ने सबका नाश्ता तैयार किया और करीब दस बजे हम सब नाश्ते के लिए इकट्ठा हुए। मां और चाची के चेहरे रात की बातों को सोच सोच कर लाल भभूका हो रहे थे। पंडित जी नाश्ता करने के उपरांत चले गए किंतु जाते जाते आशा और याचना भरी नजरों से मुझे देख रहे थे जिसके प्रत्युत्तर में मैं ने आंखों ही आंखों में जता दिया कि उनकी याचना को मैंने पढ़ लिया है और उनकी याचना व्यर्थ नहीं जाएगी। मैं उनसे मिलती रहूंगी।आश्वस्त हो कर पंडित जी प्रफुल्लित मन से चले गए।
नाश्ते की मेज पर ही नाश्ते के पश्चात दादाजी ने चाची, मम्मी और बड़े दादाजी की ओर मुखातिब हो कर बोले, “हां, तो अब बताओ तुम लोग अपने अपने किस्से जो रात को बोल रहे थे। कामिनी के बाप के बारे में और रमा तू बता अपने बारे में, कि तेरे साथ ऐसा क्या हुआ कि तू इतनी बड़ी चुदक्कड़ बन गई है? वैसे तुझे देख कर तो ऐसा नहीं लगता है कि तुझे कई मर्दों से चुदने का कोई दुःख है।”
“हां मुझे इस बात का कोई दुःख नहीं है कि मैं एक शरीफ घरेलू औरत से चुदक्कड़ औरत बन गई हूं। मैं अपने चुदक्कड़ पन से खुश हूं क्योंकि मुझे इसमें आनंद मिलता है और मैं जीने का पूरा मज़ा ले रही हूं। लेकिन आपलोग जब हमें छिनाल कहते हैं तो मुझे गुस्सा आता है। आप लोग किसी भी औरत को मना कर या जबरदस्ती चोद लेते हैं तो आप लोगों के लिए सब ठीक है, आप लोग शरीफों की गिनती में फिर भी रहेंगे, और हम औरतें अगर यही काम स्वेच्छा से या मजबूरी में करें तो हमें आपलोग छिनाल कहने लगते हैं, ऐसा क्यों?” चाची अपने मन की भंड़ास निकालने लगी थी।
“अरे नहीं रे पगली, तू तो ख्वामख्वाह नाराज हो रही है। चुदाई के वक़्त जब हम तुम औरतों को छिनाल कहते हैं तो वह सिर्फ वक्ती तौर पर दिल का उद्गार है, उत्तेजना के आवेग में निकलता हुआ महज उद्गार। उसे गंभीरता से मत ले। सिर्फ मजा ले। अब बता तेरी कहानी।” दादाजी बोले।
“ठीक है तो सुनिए। मैं शुरू में एक शरीफ घरेलू औरत थी। शादी के दस साल तक मैं एक वफादार पत्नि और एक बच्चे की अच्छी मां थी। मैं पास के सरकारी हाई स्कूल में टीचर हूं। आप लोगों को तो पता ही है कि एक दुर्घटना में मेरे पति, आपके भतीजे राकेश, की मौत आठ साल पहले हुई थी। उस समय मेरी उम्र तीस साल थी। आपके ममेरे भाई अर्थात राजेन्द्र सिंह जी, मेरे ससुर, गांव में रहते हैं। मैं अकेली, पति की मौत के बाद से विधवा मां की भूमिका निभा रही थी। लेकिन एक विधवा का जीवन कितना कठिन होता है यह तो आप सबको पता है खास कर के तब जब एक स्त्री की उम्र तीस साल की हो। मेरी जवानी मेरे लिए हर कदम में मुश्किलें पैदा करता रहता था। सारे मर्द मुझे ऐसी नज़रों से देखते थे मानों मौका मिले तो कच्चा ही चबा जाएं। स्कूल के आवारा लड़के भी कम नहीं थे। 16 – 17 साल के हमारे स्कूल के कई आवारा लड़कों का ध्यान क्लास लेते वक्त पढ़ाई में कम और मेरे तन पर ही ज्यादा रहता था। उनकी नजरों से ऐसा लगता था मानो वे मेरे कपड़े के अंदर भी मेरे नंगे जिस्म को देख रहे हों। ऐसा लगता था मानो उनका वश चलता तो क्लास रूम में ही मेरी चुदाई कर डालते। मैं हवश के भूखे ऐसे किसी भी मर्द को अपने पास फटकने नहीं देती थी। एक सीमा रेखा के बाद न कोई लड़का और न कोई व्यस्क मर्द मुझसे घनिष्ठता कर सकता था। लेकिन एक अकेली जवान औरत कब तक अपने आप को इस समाज की बुरी नजरों से बचा कर रख सकती थी।”
चाची ने आगे बताना शुरू किया, “यह पांच साल पहले की बात है। हमारे स्कूल के सालाना फंक्शन के लिए तैयारी के दौरान अभ्यास और रिहर्सल के कारण घर लौटने में सात आठ बज जाते थे। फाइनल रिहर्सल के दिन रात का नौ बज गया था। उस दिन बड़ी मुश्किल से एक ऑटो मिला। जैसे ही मैं ऑटो में बैठी, मुझे शराब की गंध आई। मैं समझ गई कि ऑटो वाला शराब पिए हुए है। मैं थोड़ी घबराई, किंतु मेरे पास लौटने के लिए उस ऑटो के अलावा और कोई दूसरा चारा नहीं था। मन ही मन भगवान का नाम लेती रही, मगर शायद भगवान की मर्जी कुछ और ही थी। ऑटो वाला करीब चालीस साल का अधेड़ आदमी था। नामकुम चौक और हमारे घर के बीच करीब डेढ़ किलो मीटर का फासला है और हाईवे से करीब दो सौ गज अंदर है। यह रास्ता घनी झाड़ियों के बीच से होकर गुजरता था। शाम होते होते यह रास्ता सुनसान हो जाता था। हाईवे से करीब सौ गज की दूरी पर अचानक ऑटो बाईं ओर घूमा और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, घनी झाड़ियों को पार कर एक खेत के पास रुक गया।
मैं घबराकर बोली, “अरे इधर कहां ले आए तुम?”
“मैं ठीक जगह ले आया हूं मैडम। चिंता मत कीजिए, मैं आपको सही सलामत घर तक छोड़ दूंगा लेकिन आधा घंटा बाद। तब तक थोड़ा मेरा साथ दीजिए।” नशे से लाल लाल आंखों से मुझे खा जाने वाली वहशी नजरों से देखते हुए बोला। मैं उसकी गंदी नीयत को समझ गई थी। उस सुनसान जगह इतनी रात को उस ऑटो वाले से मुझे बचाने कोई आने वाला भी नहीं था।
फिर भी हिम्मत जुटा कर मैं बोली, “तुम करना क्या चाहते हो?”
“कुछ खास नहीं मैडम जी, बस आपके साथ थोड़ा मजा करना चाहता हूं। आपको भी मजा आएगा, आप ऑटो से बाहर तो निकलिए” कहते हुए मेरी बांह पकड़ कर ऑटो से जबरदस्ती बाहर खींच लिया।
“छोड़ो मुझे, यह क्या कर रहे हो? मैं चिल्लाऊंगी।” मैं विरोध करती हुई खोखली धमकी दी।
“चिल्लाने से इतनी रात को कोई यहां नहीं आएगा मेरी जान। आपको पता है मैं क्या करने वाला हूं। चुपचाप मैं जो कर रहा हूं करने दीजिए। बहुत दिन से कोई औरत नहीं मिली है चोदने के लिए। आज किस्मत से आप मिल गई हैं। बिना चोदे कैसे छोड़ दूं।” वह बोल उठा।
फिर भी मैं चिल्लाई, “बचाओ बचाओ”
उस छः फुटे हट्ठे कट्ठे मर्द के सामने मेरे विरोध का कोई असर नहीं हुआ। उल्टे मेरे चिल्लाने से वह गुस्से के मारे पागल हो गया और खींच कर दो झापड़ मेरे गालों पर जड़ दिया और खूंखार आवाज में बोल उठा, “साली कुतिया चिल्लाती है। अब तक मैं इज्जत से पेश आ रहा था, हल्ला करेगी तो गला दबा दूंगा हरामजादी।”
अब मैं गिड़गिड़ाने लगी, रोने लगी, “छोड़ दो मुझे प्लीज।”
“छोड़ दूंगा, घर तक पहुंचा भी दूंगा, पहले मुझे चोदने तो दीजिए।” कहते हुए मुझे घास से भरे हुए जमीन पर पटक दिया और मेरे ऊपर चढ़ गया, ब्लाऊज के ऊपर से ही मेरी चूचियों को बेरहमी से मसलने लगा। मेरे रोने सिसकने का उस दरिंदे पर कोई असर नहीं हुआ। फिर मेरे ब्लाऊज और ब्रा को जल्दी जल्दी खोल कर खींच खांच कर अलग कर दिया। उस चांदनी रात में मेरी चमकती हुई नंगी चूचियों को देख कर तो मानो पागल ही हो गया। पान खा-खा कर काले दांत और लाल होंठों के कारण वह और भयानक दिख रहा था, ऊपर से देसी दारू की दुर्गन्ध के कारण मैं घृणा से भर उठी थी। उसने अपने मजबूत पंजों से मेरी चूचियों को बेरहमी दबोच लिया। मैं दर्द से बिलबिला कर कराह उठी। आंखों से आंसू बह निकले। मैं फिर भी उस दरिंदे के चंगुल से आजाद होने के लिए फड़फड़ाती रही छटपटाती रही, लेकिन उस पर तो चुदाई का भूत सवार था। एक हाथ से मेरी चूचियां मसलता रहा और दूसरे हाथ से मेरी साड़ी कमर तक उठा दिया और एक झटके में मेरी पैंटी को नीचे खींच लिया। अब मैं करीब करीब नंगी हो गई थी। मैं जबरदस्ती जांघों को सटाने की कोशिश करती रही मगर उसकी अमानुषि ताकत के सामने असफल रही। उसने जबरदस्ती अपनी उंगली सीधे मेरी सूखी और कसी हुई चूत में पेल दिया। पति के गुजरने के बाद पिछले पांच सालों से मैं किसी मर्द से नहीं चुदी थी, इस कारण मेरी चूत काफी कसी हुई थी। “आह” मैं पीड़ा के मारे कराह कर रह गई। मेरी कराहों को नजरंदाज करके उसने अपनी उंगली को मेरी चूत में अंदर बाहर करना शुरू किया। शुरू शुरू में मुझे काफी दर्द का अहसास होता रहा किन्तु कुछ ही देर में मेरी चूत पनियाने लगी और उसकी उंगली आराम से अन्दर बाहर होने लगी। अब दर्द के स्थान पर मुझे आनंद आने लगा और मेरी कराहट सिसकारियों में बदल गयीं। अब उसने मौका ताड़ कर फटाफट पैंट खोला और चड्डी समेत नीचे खिसका दिया। हां, इतना किया कि लंड निकाल कर मुझे उसका दर्शन कराया, “यह देख मेरा लौड़ा, कैसा है? अच्छा है ना? अब मैं इसी लौड़े से तुझे चोदुंगा।”
पांच साल बाद मैं किसी मर्द का लौड़ा इतने करीब से देख रही थी। चांदनी रात में सब कुछ साफ़ साफ़ दिख रहा था। काले घने झांटों से भरा, सात इंच लंबा और कम से कम तीन इंच मोटा, काला काला सांप के जैसा। मैं घबरा कर बोली, “नहीं, प्लीज, मत चोदो मुझे प्लीज, मैं मर जाऊंगी।”
“चुप रह साली कुतिया, तू मरेगी नहीं, तू खुद बोलेगी चोद राजा चोद, और चोद।” वह बेहद घटिया तरीके से बोल उठा। फिर धीरे धीरे मेरे पैरों को फैला कर मेरी चूत के मुंह पर लौड़ा टिकाया और बिना किसी पूर्वाभास के एक ही झटके में पूरा का पूरा लंड मेरी चूत में उतार दिया। “आह्ह्ह् ओह्ह्ह मर गई, आह मा्म्म्म्मा्आ्आ” मेरी दर्दनाक चीख निकल पड़ी। मैं दर्द के मारे छटपटाने लगी, किंतु उस जालिम दरिंदे को तो खून का स्वाद मिल गया था, मेरी चीख पुकार की परवाह किए बगैर दनादन लंड अंदर बाहर करने लगा और बड़ी बेरहमी से मेरी चूचियों को मसलते हुए चोदने में मशगूल हो गया। अब सोचिए, पांच साल से किसी का लंड मेरी चूत में नहीं गया था, इतना मोटे और लम्बे लंड से एकदम टाइट मेरी छोटी हो चुकी चूत की चुदाई से मेरा क्या हाल हुआ होगा। मैं दर्द से बिलबिला उठी थी। वैसे भी मेरे पति का लंड सिर्फ करीब पांच इंच लम्बा और दो इंच मोटा रहा होगा। एक तो इतने लंबे अरसे के बाद और दूसरे मेरे पति से करीब डेढ़ गुना बड़ा लंड, तकलीफ तो होनी ही थी। लेकिन कुछ ही देर की दर्दनाक चुदाई के पश्चात धीरे धीरे मेरी चूत ढीली होने लगी और दर्द भी धीरे-धीरे गायब होने लगा और कुछ ही मिनटों के बाद मैं आराम से चुदने लगी। वह अब अपने गंदे मुंह से मुझे चूमने लगा और मेरी गांड़ के नीचे हाथ लगा कर कस कस के ठाप पर ठाप लगाने लगा। अब मुझे भी मज़ा आने लगा था और मैं भी उत्तेजित हो कर नीचे से चूतड़ उछाल उछाल कर चुदवाने लगी।
“आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह मां, आह आह अम्मा ऊऊऊऊऊऊऊऊफ्फ्फ्फ आ्आ्आ्आ रज्ज्जा्आ्आ्आ ओह ओ्ओ्ओ्ओह आह,” आंखें बंद कर के आनंद के मारे मेरे मुंह से भी उद्गार निकले लगा।
“हां रानी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह अब आ रहा है ना मज़ा, मैं बोला था ना, मजा आएगा, ओह मस्त चूत है तेरी मैडम, उफ्फ” वह मस्त हो कर बोले जा रहा था और चोदे जा रहा था। करीब आधे घंटे तक चोदने के बाद मुझे कस के दबोच लिया और फचफचा के अपने लंड का पानी मेरी चूत में डालने लगा। आनंद में मग्न खुद के और उसके झड़ने के सुख में डूब गयी और उसके गठीले शरीर से चिपक गई। जैसे ही हम दोनों खलास हुए, तुरंत ही अपने कपड़े पहन कर चुपचाप चलने को तैयार हो गये। मैं किसी तरह अपने फटे चिटे ब्रा और ब्लाउज से अपने तन के ऊपरी हिस्से को ढंक कर साड़ी वगैरह ठीक की। अंदर ही अंदर खुश हो रही थी, इतने सालों बाद लंड नसीब हुआ और चुदाई का मज़ा मिला, मगर उसके सामने प्रकट नहीं होने दी।
“आखिर बर्बाद कर ही दिया मुझे” प्रकट तौर पर बोली।
“झूठ मत बोलिए मैडम, आपको चोदने में मुझे तो बहुत मजा आया, लेकिन आपने भी कम मज़ा थोड़ी लिया है, कैसे आप बोल रही थीं आह राजा ओह राजा और कैसे मुझसे चिपक रही थीं आप।” वह बोल पड़ा।
मैं शर्मिंदा हो कर सर झुका कर रह गई। शुरू मेरे बलात्कार से हुआ मगर अंत सुखद अहसास के साथ हुआ। मेरे अंदर दबी हुई इतने सालों की चुदास फिर से जाग उठी थी।
उस ऑटो वाले ने मुझे घर तक छोड़ा और जाते जाते बोला, “मैडम, हम गरीब लोगों पर इसी तरह मेहरबानी करते रहिएगा।” मैं कुछ नहीं बोली, सिर झुका कर चुपचाप घर के अंदर चली गई। हमारे घर की नौकरानी ने बेटे को खाना खिला दिया था। मैं भी खाना खा कर बेटे को सुला कर सोते सोते सोचती रही कि वैसे भी मैं अकेली औरत कब तक अपने आप को बचाती रहती। कभी न कभी यह तो होना ही था। ऐसे भी एक अकेली विधवा औरत को किसी पराए मर्द से चुद कर अगर सुख हासिल होता है तो इसमें हर्ज क्या है। सिर्फ हमारी बस्ती के लोग ही नहीं, बाहर भी ऐसे मर्दों की कमी नहीं है जो मुझ जैसी औरतों को मौका मिलते ही चोद डालने की फिराक में रहते हैं। बस इस तथाकथित शरीफ लोगों से भरे सभ्य समाज में बदनामी न हो, इसी बात से हम डरते हैं ना? तो बदनामी का डर किसे नहीं है? इस तरह का जो भी काम होता है गुपचुप ढंग से ही तो होता है। मैं ने उसी समय ठान लिया कि अब मैं भी अपने अंदर की आग को और दबा कर नहीं जिऊंगी। शराफत का चोला ओढ़कर चुदाई का मजा लेने के लिए ऐसे बहुत तथाकथित शरीफ मर्द आसानी से मिल जाएंगे। फिर मैं ने अपने अंदर से परपुरुष के संसर्ग की ग्लानि को झटक कर दूर फेंक दिया और निश्चिंत हो कर नींद की गोद में चली गई। दूसरे दिन सवेरे जब मैं उठी, मैं दूसरी औरत बन चुकी थी। मेरे सामने नया सवेरा, नया दिन, नयी दुनिया थी। मुझमें नये आत्मविश्वास का संचार हो चुका था। जब मैं अपने विद्यालय के लिए घर से निकली तो मैं सर झुका कर नहीं, सर उठा कर चल रही थी। अपनी ओर देखते वासना की भूखी नजरों से नजरें मिला कर देखने में मुझे कोई झिझक नहीं महसूस हो रही थी। विद्यालय में भी मेरा आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्तित्व मेरे सहयोगी शिक्षकों तथा विद्यार्थियों के लिए बिल्कुल नया था।
