सुबह जब मंजू चाय लेकर आई तो साथ मे गीता भी थी. दोनो सुबह सुबह नहा कर
आई थी, बाल अब भी गीले थे. मंजू तो मादरजात नंगी थी जैसी उसकी आदत थी,
गीता ने भी बस एक गीली साड़ी ओढ़ रखी थी जिसमे से उसका जोबन झलक रहा था.
“ये क्या, सुबह सुबह पूजा उजा करने निकली हो क्या दोनो?” मैने मज़ाक
किया. गीता बोली “हां बाबूजी, आज आपके लंड की पूजा करूँगी, देखो फूल भी
लाई हूँ” सच मे वह एक डलिया मे फूल और पूजा का समान लिए थी. बड़े प्यार
से उसने मेरे लंड पर एक छ्होटा टीका लगाया और उसे एक मोगरे की छ्होटी
माला पहना दी. उपेर से मेरे लंड पर कुच्छ फूल डाले और फिर उसे पकड़कर
अपने हाथों मे लेकर उस पर उन मुलायम फूलों को रगड़ने लगी. दबाते दबाते
झुक कर अचानक उसने मेरे लंड को चूम लिया. मैं कुच्छ कहता इसके पहले मंजू
हँसती हुई मेरे पास आकर बैठ गयी. मेरा ज़ोर का चुंबन लेकर अपनी चून्चि
मेरी छाति पर रगड़ते हुए बोली. “अरे ये तो बावरी है, कल से आपके गोरे
मतवाले लंड को देख कर पागल हो गयी है. बाबूजी, जल्दी से चाय पियो. मुझे
भी आप से पूजा करवानी है अपनी चूत की. आप मेरी बुर की पूजा करो, गीता
बेटी आपके लंड की पूजा करेगी अपने मुँह से.” मेरा लंड कस कर खड़ा था. मैं
चाय की चुस्की लेने लगा तो देखा बिना दूध की चाय थी. मंजू को बोला की दूध
नही है तो वह बदमाश औरत दिखावे के लिए झूठ मूठ अपना माथा थोक कर बोली “
हाय, मैं भूल ही गयी, मैने दूध वाले भैया को कल ही बता दिया कि अब दूध की
ज़रूरत नही है हमारे बाबूजी को. अब क्या करे, चाय के बारे मे तो मैने
सोचा ही नही. वैसे फिकर की बात नही है बाबूजी, अब तो “घर का दूध” है, ये
दो पैरों वाली दो थनो की खूबसूरत गैया है ना यहाँ! ए गीता, इधर आ जल्दी”
गीता से मेरा लंड छ्चोड़ा नही जा रहा था. बड़ी मुश्किल से उठी. पर जब
मंजू ने कहा “चल अब तक वैसे ही साड़ी लपेटे बैठी है, चल नंगी हो और अपना
दूध डाल जल्दी, बाबूजी की चाय में” तो तपाक से उठ कर अपनी साड़ी उतार कर
वह मेरे पास आ गयी. उसके देसी जोबन को मैं देखता रह गया. उसका बदन एकदम
मांसल और गोल मटोल था, चूंचियाँ तो बड़ी थी ही, चूतड़ भी अच्छे ख़ासे
बड़े और चौड़े थे. गर्भावस्था मे चढ़ा माँस अब तक उसके शरीर पर था.
जांघें ये मोटी मोटी और पाव रोटी जैसी फूली बुर, पूरी बालों से भरी हुई.
मैं तो झदाने को आ गया. “जल्दी दूध डाल चाय मे” मंजू ने उसे खींच कर कहा.
गीता ने अपनी चून्चि पकड़ कर चाय के कप के उपेर लाई और दबा कर उसमे से
दूध निकालने लगी. दूध की तेज पतली धार चाय मे गिरने लगी. चाय सफेद होने
तक वह अपनी चून्चि दूहति रही. फिर जाकर मेरी कमर के पास बैठ गयी और मेरे
लंड को चाटने लगी. मैने किसी तरहा चाय ख़तम की. स्वाद अलग था पर मेरी उस
अवस्था मे एकदम मस्त लग रहा था. मेरा सिर घूमने लगा. एक जवान लड़की के
दूध की चाय पी रहा हूँ और वही लड़की मेरा लंड चूस रही है और उसकी माँ इस
इंतजार मे बैठी है की कब मेरी चाय ख़तम हो और कब वह अपनी चूत मुझसे
चुस्वाए. मैने चाय ख़तम करके मंजू को बाँहों मे खींचा और उसके मम्मे
मसल्ते हुए उसका मुँह चूसने लगा. मेरी हालत देख कर मंजू ने कुच्छ देर
मुझे चूमने दिया और फिर मुझे लिटा कर मेरे चेहरे पर चढ़ बैठी और अपनी चूत
मेरे मुँह मे दे दी. “बाबूजी, अब नखरा ना करो, ऐसे नही छ्चोड़ूँगी आपको,
बुर का रस ज़रूर पिलाउन्गि, चलो जीभ निकालो, आज उसीको चोदून्गि” उधर मंजू
ने मुझे अपनी चूत का रस पिलाया और उधर उसकी बेटी ने मेरे लंड की मलाई
निकाल ली. गीता के मुँह मे मैं ऐसा झाड़ा कि लगता था बेहोश हो जाउन्गा.
गीता ने मेरा पूरा विर्य निगला और फिर मुस्कराते हुए आकर माँ के पास बैठ
गयी. मंजू अब भी मुझ पर चढ़ि मेरे होंठों पर अपनी बुर रगड़ रही थी.
“क्यों बेटी, मिला प्रसाद, हो गयी तेरे माँ की?”
“अम्मा, एकदम मलाई
निकलती है बाबूजी के लंड से, क्या गाढ़ी है, तार तार टूटते है. तू तो तीन
महीने से खा रही है तभी तेरी ऐसी मस्त तबीयत हो गयी है अम्मा. अब इसके
बाद आधी मैं लूँगी हां!” गीता मंजू से लिपटकर बोली. एक बार और मेरे मुँह
मे झाड़ कर सामने से सी सी करती मंजू उठी. “चल गीता, अब बाबूजी को दूध
पीला दे. फिर आगे का काम करेंगे” गीता मेरे उपेर झुकी और मुझे लिटाए
लिटाए ही अपना दूध पिलाने लगी. रात के आराम के बाद फिर उसके मम्मे भर गये
थे और उन्हें खाली करने मे मुझे दस मिनिट लग गये. तब तक मंजू बाई की
जादुई जीभ ने अपना कमाल दिखाया और मेरे लंड को फिर से तन्ना दिया. गीता
के दूध मे ऐसा जादू था की मेरा ऐसा खड़ा हुआ जैसे झाड़ा ही ना हो. उधर
गीता मुझसे लिपट कर सहसा बोली “बाबूजी, आप को बाबूजी कहना अच्च्छा नही
लगता, आपको भैया कहूँ? आप बस मेरे से तीन चार साल तो बड़े हो” मंजू मेरी
ओर देख रही थी. मैने गीता का गहरा चुंबन लेकर कहा “बिल्कुल कहो गीता
रानी, और मैं तुझे गीता बेहन या बहना कहूँगा. पर ये तो बता तेरी अम्मा को
क्या कहूँ? इस हिसाब से तो उसे अम्मा कहना चाहिए” मंजू मेरा लंड मुँह से
निकाल कर मेरे पास आ कर बैठ गयी. उसकी आँखों मे गहरी वासना थी. “हां,
मुझे अम्मा कहो बाबूजी, मुझे बहुत अच्च्छा लगेगा. आप हो भी तो मेरे बेटे
जैसी उमर के हो, और मैं आपको बेटा कहूँगी. समझूंगी मेरा बेटा मुझे चोद
रहा है. आप कुच्छ भी कहो बाबूजी, बेटे या भाई से चुदवाने मे जो मज़ा है
वो ओर कहीं नही” मुझे भी मज़ा आ रहा था. कल्पना कर रहा था कि सच मे मंजू
मेरी माँ है और गीता बहन. उन नंगी चुदैलो के बारे मे यह सोच कर लंड
उच्छलने लगा. “अम्मा, तो आओ, अब कौन चुदेगा पहले, मेरी बहना या अम्मा?”
“अम्मा, अब मैं चोदु भैया को?” उस लड़की ने अधीर होकर पुचछा. मंजू अब तैश
मे थी “बड़ी आई चोदने वाली, अपनी अम्मा को तो चुदने दे पहले अपने इस
खूबसूरत बेटे से. तब तक तू ऐसा कर, उनको अपनी बुर चटा दे, वो भी तो देखें
की मेरी बेटी की बुर का क्या स्वाद है. तब तक मैं तेरे लिए उनका सोंटा
गरम करती हूँ” मुझे आँख मार कर मंजू बाई हँसने लगी. अब वह पूरी मस्ती मे
आ गयी थी. गीता फटाफट मेरे मुँह पर चढ़ गयी. “ओ नलायक, बैठना मत अभी भैया
के मुँह पर. ज़रा पहले उन्हे ठीक से दर्शन तो करा अपनी जवान गुलाबी चूत
के” गीता घुटनो पर टिक गयी, उसकी चूत मेरे चेहरे के तीन चार इंच उपेर थी.
उसकी बुर मंजू बाई से ज़्यादा गुदाज और मांसल थी. झांतें भी घनी थी. चूत
के गुलाबी पपोते संतरे की फाँक जैसे मोटे थे और लाल छेद खुला हुआ था
जिसमे से घी जैसा चिपचिपा पानी बह रहा था. मैने गीता की कमर पकड़कर नीचे
खींचा और उस मिठाई को चाटने लगा. उधर मंजू ने मेरा लंड अपनी बुर मे लिया
और मुझपर चढ़ कर मुझे हौले हौले मज़े लेकर चोदने लगी. अपनी बेटी का
स्तनपान देखकर वह बहुत उत्तेजित हो गयी थी, उसकी चूत इतनी गीली थी की
आराम से मेरा लंड उसमे फिसल रहा था. गीता के छ्छूतड़ पकड़कर मैने उसकी
तपती बुर मे मुँह च्छूपा दिया और जो भाग मुँह मे आया वह आम जैसा चूसने
लगा. उसका अनार का कड़ा दाना मैने हल्के से दाँतों मे लिया और उस पर जीभ
रगड़ने लगा. दो मिनिट मे वह छोकरि सुख से सिसकती हुई झाड़ गयी. मेरे मुँह
मे रस टपकने लगा. “अरी अम्मा, भैया कितना अच्च्छा करते है. मैं तो घंटे
भर अपनी चूत चुस्ववँगी आज.” मैं एक अजीब मस्ती मे डूबा हुआ उस जवान
छ्छोकरी की चूत चूस रहा था, वह उपेर नीचे होती हुई मेरे सिर को पकड़कर
मेरा मुँह चोद रही थी और उसकी वह अधेड़ अम्मा मुझपर चढ़ कर मेरे लंड को
चोद रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे मैं साइकल हूँ और ये दोनो आगे पिछे बैठकर
मुझपर सवारी कर रही है. मैं सोचने लगा कि अगर यह स्वर्ग नही है तो और
क्या है. गीता हल्के हल्के सीतकारियां भरते मंजू से बोली “अम्मा, चुचियाँ
कैसी हल्की हो गयी है, भैया ने पूरी खाली कर दिन चूस चूस कर. तू देख ना,
अब ज़रा तन भी गयी है नही तो कैसे लटक रही थीं.” मेरी नाक और मुँह गीता
की बुर मे क़ैद थे पर आँखें बाहर होने से उसका शरीर दिख रहा था. मैने
देखा की मंजू ने पिछे से अपनी बेटी के स्तन पकड़ लिए थे और प्यार से
उन्हें सहला रही थी. “साची बेटी, एकदम मुलायम हो गये है. चल मैं इनकी
मालिश कर देती हूँ, तुझे सुकून मिल जाएगा.” मंजू बोली. मुझे दिखाते हुए
उसके हाथ अब गीता के स्तनो को दबाने और मसल्ने लगे. फिर मुझे चूमने की
आवाज़ आई. शायद माँ ने लाड से अपनी बेटी को चूम लिया था. मुझे लगने लगा
की ये माँ बेटी का सादा प्रेम है या कुच्छ गड़बड़ है? दस मिनिट बाद उन
दोनो ने जगह बदल ली. मैं अब भी तन्नाया हुआ था और झाड़ा नही था. मंजू बाई
एक बार झाड़ चुकी थी और अपनी चूत का रस मुझे पिलाना चाहती थी. गीता दो
तीन बार झड़ी ज़रूर थी पर चुदने के लिए मरी जा रही थी.
गतान्क से आगे………… मंजू तो सीधे मेरे मुँह पर चढ़ कर मुझे बुर
चुसवाने लगी. गीता ने पहले मेरे लंड का चुम्मा लिया, जीभ से चाता और
कुच्छ देर चूसा. फिर लंड को अपनी बुर मे घुसेड कर मेरे पेट पर बैठ गयी और
चोदने लगी. मेरे मन मे आया की मेरे लंड को चूस्ते समय अपनी माँ की बुर के
पानी का स्वाद भी उसे आया होगा. गीता की चूत मंजू से ज़्यादा ढीली थी.
शायद माँ बनने के बाद अभी पूरी तरह टाइट नही हुई थी. पर थी वैसी ही मखमली
और मुलायम. मंजू ने उसे हिदायत दी “ज़रा मन लगा कर मज़े लेकर चोद बेटी
नही तो भैया झाड़ जाएँगे. अब मज़ा कर ले पूरा” गीता ने अपनी माँ की बात
मानी पर सिर्फ़ कुच्छ मिनिट. फिर वह ऐसी गरम हुई की उच्छल उच्छल कर मुझे
पूरे ज़ोर से चोदने लगी. उसने मुझे ऐसे चोदा की पाँच मिनिट मे खुद तो
झड़ी ही, मुझे भी झाड़ा दिया. मंजू अभी और मस्ती करना चाहती थी इसीलिए
चिढ़ गयी. मेरे मुँह पर से उतरते हुए बोली “अरी ओ मूरख लड़की, हो गया काम
तमाम? मैं कह रही थी सबर कर और मज़ा कर. मैं तो घंटो चोदती हूँ बाबूजी
को. अब उतर नीचे नलायक” मंजू ने पहले मेरा लंड चाट कर साफ किया. फिर
उंगली से गीता की बुर से बह रहे वीर्या को सॉफ करके उंगली चाटने लगी “ये
तो पर्शाद है बेटी, एक बूँद भी नही खोना इसका. तू ज़रा टांगे खोल, ठीक से
साफ कर देती हूँ” उसने उंगली से बार बार गीता की बुर पुंच्ची और चॅटी.
फिर झुक कर गीता की जाँघ पर बहे मेरे वीर्या को चाट कर सॉफ कर दिया. मेरे
मन मे फिर आया कि ये क्या चल रहा है माँ बेटी मे. दोपहर का खाना होने के
बाद गीता ने फिर मुझे दूध पिलाया और चुदाई का एक और दौर हुआ. शाम को उठकर
मैं क्लब चला गया. रात को वापस आया तो खाने के बाद फिर एक बार गीता का
दूध पिया और फिर माँ बेटी को पलंग पर आजू बाजू सुलाकर बारी बारी चोदा.
गीता के दूध की अब मुझे आदत होने लगे थी. दूसरे दिन रविवार था. मैने
थोड़ा अलग प्रोग्राम बनाया. सुबह गीता का दूध पिया और फिर दोनो माँ बेटी
की चूत चूस कर उन्हे खुश किया. बस मेरे लंड को हाथ नही लगाने दिया. मैं
दोपहर तक उसे और तना कर खड़ा करना चाहता था. मंजू बाई मेरे दिल की बात
समझ गयी, क्योंकि ये हर रविवार को होता था. अपने छूतदों को सहलाती हुई
अपनी बेटी से बोली “गीता बिटिया, आज दोपहर को मेरी हालत खराब होने वाली
है” गीता ने पुचछा तो कोई जवाब नही दिया. मैं भी हंसता रहा पर चुप रहा.
मंजू की आँखों मे दोपहर को होने वाले दर्द की चिंता सॉफ दिख रही थी.
दोपहर को हम नंगे होकर मेरे बेडरूम मे जमा हुए. मेरा लंड कस कर खड़ा था.
गीता ललचा कर मेरे सामने बैठ कर उसे चूसने की कोशिश करने लगी तो मैने रोक
दिया. “रुक बहना, तुझे बाद मे खुश करूँगा, पहले तेरी इस चुदैल माँ की
गांद मारूँगा. हफ़्ता हो गया, अब नही रहा जाता. चल अम्मा, तैयार हो जा”
मंजू चुपचाप बिस्तर पर ओंधी लेट गयी “अब दुखेगा रे मुझे, देख कैसे खड़ा
है बाबूजी का लंड मूसल जैसा” गीता समझ गयी कि उसकी माँ सुबह से क्यों
घबरा रही थी. बड़े उत्साह से मेरी ओर मूड कर बोली “भैया, मेरी मार लो,
मुझे मज़ा आएगा. बहुत दीनो से सोच रही थी की गांद मरवाने का मज़ा मिले.
उंगली डाल कर और मोमबत्ती घुसेड कर कई बार देखा पर सुकून नही मिला. आप से
अच्च्छा लंड कहाँ मिलेगा गांद मरवाने को?” मैं तैयार था, अंधे को क्या
चाहिए दो आँखें! नई कोरी गांद मे घुसने की कल्पना से ही मेरा लंड और
उच्छलने लगा था. मंजू जान छ्छूटने से खुश थी “अरे मेरी बिटिया, तूने मेरी
जान बचा ली आज. चल मक्खन से मस्त चिकनी कर देती हूँ तेरी गांद, दुखेगा
नही” गीता को ओँदा लिटा कर उसने उसकी गुदा मे और मेरे लंड को मक्खन से
खूब चुपद दिया. मैं गीता पर चढ़ा तो मंजू ने अपनी बेटी के छ्छूतड़ अपने
हाथ से फैलाए. उसके भूरे गुलाबी छेद पर मैने सुपाड़ा रखा और पेलने लगा.
सुपाड़ा सूज कर बड़ा हो गया था फिर भी मक्खन के कारण फ़चाक से एक बार मे
ही गांद के अंदर घुस गया. गीता को जम कर दुखा होगा क्योंकि उसका शरीर ऐंठ
गया था और वह काँपने लगी थी. पर छ्छोकरी हिम्मत वाली थी, मुँह से अफ तक
नही निकाली. उसे संभालने का मौका देने के लिए मैं एक मिनिट रुका और फिर
लंड अंदर घुसेड़ने लगा. इस बार मैने कस के एक धक्के मे लंड सत्त से उसके
छ्छूतदों के बीच पूरा गाढ दिया था. अब वह बेचारी दर्द से चीख पड़ी.
सिसकते हुए बोली “माँ मेरी, मर गयी मैं, भैया ने गांद फाड़ दी. देख ना
अम्मा, खून तो नही निकला ना!” मंजू उसे चिढ़ाते हुए बोली “आ गयी रास्ते
पर एक झटके मे? बातें तो पाटर पाटर करती थी की गांद मरवौन्गि. पर रो मत,
कुच्छ नही हुआ है, तेरी गांद सही सलामत है, बस पूरी खुल गयी है चूत जैसी.
बेटा, तूने भी कितनी बेरहमी से लंड डाल दिया अंदर, धीरे धीरे पेलना था
मेरी बच्ची के चूतदों के बीच जैसे मेरी गांद मे पेला था.” “अरे अम्मा, ये
मरी जा रही थी ना गांद मराने को! तो सोचा की दिखा ही दूं असली मज़ा. वैसे
गीता बहना की गांद बहुत मोटी और गुदाज है, डन्लोपिलो की गद्दी जैसी है,
इसे तकलीफ़ नही होगी ज़्यादा” मैने गीता के चूतड़ दबाते हुए कहा.<
