कामिनी मेरी माँ मादक जिस्म की मालकिन 4

माँ बेटा

शाम ढल चुकी थी। रघु अपना काम खत्म करके कबका चला गया था, वो शाम को वापस पैसे मांगने भी नहीं आया था, ना जाने शर्म या ग्लानि से कह नहीं सकते.

कामिनी अपने कमरे में बैठी, अभी भी उस ‘अधूरेपन’ की टीस महसूस कर रही थी जो रघु उसे देकर गया था। उसका शरीर शांत था, जिस्म मे कहीं कोई दर्द नहीं था, लेकिन मन में एक तूफ़ान था।
तभी बाहर गेट पर पॉम-पॉम की आवाज़ नहीं, बल्कि एक भारी बुलेट (Bullet) मोटरसाइकिल की गड़गड़ाहट सुनाई दी।
कामिनी चौंक गई। यह आवाज़ रमेश के स्कूटर की नहीं थी। ” फिर कौन आया है? ”
कामिनी ने रसोई की खिड़की से बहार झांका,
रमेश आज अकेला नहीं आया था।
उसके साथ एक और आदमी था।
रमेश स्कूटर से उतरा और उसने हंसते हुए उस आदमी का स्वागत किया।
“आ जा भाई… देख ले मेरा आशियाना।”
वह आदमी बुलेट से उतरा।
कद 6 फुट से ऊपर, चौड़ा सीना, और चेहरे पर घनी, ऊपर को मुड़ी हुई रोबदार मूंछें। उसने पुलिस की खाकी वर्दी पहन रखी थी, लेकिन ऊपर के दो बटन खुले थे, जिससे उसकी बालों वाली छाती झांक रही थी। उसकी आँखें लाल थीं—शराब से भी, और फितरत से भी।
उसका नाम था शमशेर सिंह।

शहर का नामी पुलिस इन्स्पेक्टर और रमेश का पुराना ‘जिगरी’ यार। दोनों की दोस्ती का आधार सिर्फ़ एक था—शराब, शबाब और अय्याशी।
शमशेर ने गार्डन पर नज़र डाली।
“वाह रमेश बाबू… मकान तो खूब बड़ा बना लिया, बड़ा चकाचक रखा है,” शमशेर की आवाज़ में एक भारी गूंज थी, “साफ़-सफाई तो बढ़िया है।”
“भाई तेरे जैसा यार नहीं होता तो ये सब नहीं होता मेरे पास, बल्कि जेल की रोती तोड़ रहा होता” रमेश हस पड़ा.

“अरे अभी तो तूने सिर्फ़ मकान देखा है… रुक तुझे इस मकान की असली ‘रौनक’ से मिलवाता हूँ,” रमेश ने एक गंदी हंसी के साथ कहा।
वे दोनों घर के अंदर दाखिल हुए।
शराब की महक और बूटों की ठक-ठक से हॉल गूंज उठा।
“कामिनी… ओ कामिनी…” रमेश ने रौब से आवाज़ लगाई, “बाहर आ ज़रा, देख कौन आया है।”
पापा की आवाज़ सुन बंटी भी बहार आया, रमेश बंटी के सामने कोई बदतमीज़ी नहीं करता था.
“Hello बोलो बेटा अंकल को, आज पापा जो है सब इनकी दोस्ती की बदौलत है, ”
“Hello अंकल ”
“Hello बेटा… कैसे हो, लास्ट टाइम देखा था, तब अपने दादा की गोदी मे खेल रहे थे तुम, उनपे ही गए हो, क्यों रमेश?
शमशेर ने बंटी की हेल्थ hight की तारीफ की.

तभी कामिनी भी रसोई से हाथ पोंछती हुई बाहर आई। लेकिन सामने खाकी वर्दी में खड़े उस ‘दैत्य’ को देखकर उसके कदम ठिठक गए। साला था ही राक्षस की औलाद.
शमशेर की नज़र जैसे ही कामिनी पर पड़ी, वह जड़ हो गया।
कामिनी ने घर की साधारण साड़ी पहनी थी, लेकिन रघु के इलाज के बाद उसके चेहरे पर जो एक थकावट और मादकता का मिश्रण था, उसने उसे और भी नमकीन बना दिया था।
उसकी भरी हुई 36 की छाती, पतली कमर और चौड़े कूल्हे… शमशेर की हवसी आँखों ने एक ही पल में कामिनी का पूरा मुआयना कर लिया।
उसकी आँखों में सिर्फ़ तारीफ नहीं थी, एक नंगापन था। ऐसा लग रहा था जैसे वह अपनी नजरों से कामिनी के कपड़े फाड़ रहा हो।
उसने अपनी मूंछों पर ताव दिया और जीभ से होंठ गीले किए।

“भाभी जी… नमस्ते,” शमशेर ने कहा, लेकिन उसकी नज़रें कामिनी की छाती पर चिपकी हुई थीं।
कामिनी ने पल्लू ठीक किया और नज़रें झुका लीं। उसे इस आदमी से एक अजीब सी घिनौनी ‘वाइब’ आ रही थी।

“ये मेरा दोस्त है, शमशेर। पुलिस में बड़ा अफ़सर है। किसी काम से इस शहर आया हुआ था, तो मैंने कहा चल घर पर ही महफ़िल जमाते हैं,” रमेश ने गर्व से परिचय दिया।

“नमस्ते,” कामिनी धीरे से बोली।
“जा, जल्दी से चखना और सलाद काट ला… और बर्फ भी ले आना। आज भाई के साथ पुरानी यादें ताज़ा करेंगे,” रमेश ने हुक्म दिया।

अब तक बंटी भी जा चूका था, उसे भी शमशेर कुछ खास पसंद नहीं आया था,
कामिनी मुड़ी और रसोई की तरफ जाने लगी।
शमशेर की नज़रें उसकी पीठ और चलते हुए कूल्हों की लचक पर गड़ गईं।
उसकी आंखे फट गई, ऐसी गांड, ऐसी मादक कड़क गांड उसने आज से पहले नहीं देखी थी, एक एक उभार, तक साफ दिखाई पढ़ रहा था, मादकता उसके चलने से ही झलक रही थी.

“कयामत है बे…” शमशेर ने रमेश के कान में फुसफुसाते हुए कहा, लेकिन आवाज़ इतनी तेज़ थी कि कामिनी ने सुन लिया।

“साले रमेश… तूने कभी बताया नहीं कि तेरी बीवी इतनी बड़ी ‘माल’ है? उफ्फ्फ… क्या कसा हुआ बदन है।”
कामिनी के कान लाल हो गए। एक पराया मर्द उसके घर में, उसके पति के सामने उसे ‘माल’ बोल रहा था।
और रमेश?
रमेश गुस्सा होने के बजाय, खीसें निपोर कर हंस रहा था।
“हाहाहाहा… नसीब है भाई अपना। तू तो जानता है, तेरे भाई की चोइस हमेशा टॉप रहती है।”
रमेश के लिए उसकी बीवी इंसान नहीं, एक ‘ट्रॉफी’ थी जिसे वह अपने दोस्तों को दिखाकर अपनी मर्दानगी साबित कर रहा था।
दोनों डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। व्हिस्की की बोतल खुल गई।
कामिनी रसोई में थी। रसोई का दरवाज़ा डाइनिंग टेबल के ठीक सामने था।
रमेश की पीठ रसोई की तरफ थी, लेकिन शमशेर ठीक सामने बैठा था।
यह जानबूझकर किया गया था या इत्तेफाक, पता नहीं। लेकिन शमशेर के पास अब एक सीधा ‘व्यू’ (View) था।
कामिनी गैस के पास खड़ी सब्जी चला रही थी।
शमशेर गिलास में दारू डालता, और फिर अपनी लाल, हवसी आँखों से सीधे रसोई में कामिनी को घूरता।

कामिनी को अपनी पीठ पर, अपनी कमर पर शमशेर की नजरों की जलन महसूस हो रही थी। वह बार-बार पल्लू ठीक कर रही थी, खुद को सिकोड़ रही थी, लेकिन रसोई में छुपने की कोई जगह नहीं थी। ऊपर से रसोई की गर्मी उसके जिस्म पर पसीने के रूप मे बहने लगी थी.
आगे झुकने से कामिनी की मादक गांड अपने पुरे शबाब पर थी, जिसका लुत्फ़ शमशेर उठा रहा था.

एक पैग खत्म हुआ। नशा चढ़ने लगा।
शमशेर की जुबान और गंदी हो गई।
“यार रमेश…” शमशेर ने मूंगफली चबाते हुए, ऊँची आवाज़ में कहा, “तेरी बीवी की कमर देख रहा है? बिलकुल मलाई जैसी है। कसम से, अगर ऐसी औरत मेरे पास होती ना…”
उसने अपनी गंदी हंसी के साथ बात पूरी की, “…तो साली को घर में नंगा ही रखता। कपड़े पहनाने की ज़रूरत ही क्या है ऐसी खूबसूरती को?”
रसोई में खड़ी कामिनी के हाथ से करछी छूटते-छूटते बची।

उसकी आँखों में आंसू आ गए। अपमान का घूंट पीकर वह रह गई।
“हाहाहाहा… तू नहीं सुधरेगा शमशेर,” रमेश जोर-जोर से हंसा, “तू तो शुरू से ही ठरकी है।”

पास ही के कमरे में, बंटी किताब खोले बैठा था।
लेकिन उसका ध्यान पढ़ाई में नहीं था। बाहर से आ रही वहशियत भरी हंसी और अपनी माँ के लिए बोले गए वो गंदे शब्द उसके कानों में पिघले शीशे की तरह उतर रहे थे।
उसकी मुट्ठी इतनी जोर से भिंची कि पेन टूट गया।
“पापा… आप इतने गिर सकते हो?” बंटी की आँखों में अपने बाप के लिए नफरत की आग जल रही थी।
उसे मन कर रहा था कि बाहर जाकर उस पुलिस वाले के सिर पर बोतल फोड़ दे, लेकिन वह अपनी लाचारी और उम्र की वजह से मजबूर था।
बाहर टेबल पर, शमशेर ने अपना गिलास खाली किया और रमेश की तरफ झुककर बोला, “भाई, आज रात का क्या प्रोग्राम है? भाभी जी खाना खिलाएंगी या…”
उसने एक अश्लील इशारा किया
रमेश ने नशें में चूर होकर कहा, “अरे तू बैठ तो सही… चिकेन बन रहा है,
कामिनी रसोई में, गैस की आंच और शमशेर की हवस की आंच के बीच जल रही थी।
उसे रघु याद आ गया।
रघु, जो अनपढ़ था, मजदूर था, लेकिन उसने “दर्द” समझा था।
और ये… ये “पढ़े-लिखे साहब” और “कानून के रखवाले”… ये उसे नोच खाने को तैयार बैठे थे।
आज कामिनी को समझ आ गया था कि असली जानवर जंगल में नहीं, आलीशान कोठियों में रहते हैं।
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घड़ी की सुइयां 11 बजा रही थीं। हॉल में व्हिस्की की तीखी महक और मर्दाना हंसी गूंज रही थी।
रमेश और शमशेर, दोनों नशे में धुत थे।
कामिनी रसोई से चिकन की प्लेट लेकर बाहर आई।
उसके कदम भारी थे, लेकिन उसकी धड़कनें तेज़ थीं। उसे उस वर्दी वाले ‘भेड़िये’ के सामने जाने से डर लग रहा था, लेकिन पति का हुक्म था।
वह डाइनिंग टेबल के पास पहुँची।

शमशेर ठीक सामने बैठा था, अपनी टांगें फैलाए। उसकी लाल, हवसी आँखें कामिनी के जिस्म को ऐसे स्कैन कर रही थीं जैसे कोई एक्स-रे मशीन हो।
“अरे भाभी जी… लाइए, आज तो आपके हाथ का स्वाद चखें,” शमशेर ने अपनी मूंछों पर जीभ फेरते हुए कहा।
कामिनी को शमशेर की प्लेट में चिकन परोसना था।
प्लेट शमशेर के बिल्कुल सामने रखी थी।
कामिनी, जो टेबल के बगल में खड़ी थी, उसे झुकना पड़ा।
और यही वह पल था जिसका शमशेर इंतज़ार कर रहा था।
जैसे ही कामिनी आगे झुकी… गुरुत्वाकर्षण (Gravity) ने अपना काम किया।
उसका ब्लाउज, जो उसकी भारी-भरकम 36 इंच की छाती को मुश्किल से थामे हुए था, झुकते ही ढीला पड़ गया।

उसकी साड़ी का पल्लू, जो उसने कंधे पर डाल रखा था, हवा में थोड़ा सा सरक गया।
शमशेर की आँखों के सामने जन्नत का नज़ारा था।
ब्लाउज के गहरे गले से कामिनी के दोनों गोरे, मलाईदार स्तनों की गहरी घाटी (Cleavage) साफ़ झांक रही थी। पसीने की एक पतली लकीर उस घाटी में चमक रही थी।
शमशेर की नज़रें वहां गड़ गईं। वह पलक झपकाना भूल गया।
कामिनी को एहसास था कि वह झुक रही है और उसका बदन नुमाइश के लिए खुला है।
शमशेर का चेहरा उसके स्तनों से मुश्किल से 6 इंच दूर था।
शमशेर की गर्म, शराब से लदी हुई सांसें (Breath) सीधी कामिनी के खुले हुए सीने और उसकी नंगी गर्दन पर टकराईं।
वह हवा का झोंका नहीं, बल्कि भाप जैसा गर्म था।
उस गर्म सांस के स्पर्श से कामिनी के बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गई।
उसके रोंगटे खड़े हो गए।
और न जाने क्यों… न चाहते हुए भी… ब्लाउज के अंदर कैद उसके निप्पल (Nipples) तन कर सख्त हो गए।
कामिनी का दिमाग चीख रहा था— ‘हटो यहाँ से… यह गंदा आदमी है… यह मुझे नंगा कर रहा है अपनी नजरों से।’
उसे शमशेर से नफरत थी। उसे घिन आ रही थी।
लेकिन…
उसका जिस्म?
उसका जिस्म एक अलग ही खेल खेल रहा था।
सालों से रमेश की मार, गालियां और ‘रंडी’ जैसे शब्द सुनते-सुनते कामिनी के अवचेतन मन में एक अजीब सी वायरिंग हो गई थी।
उसे ‘अपमान’ में एक अजीब सा, दबा हुआ नशा आने लगा था।
जब शमशेर की वो भूखी नज़रें उसके स्तनों को खा रही थीं, तो उसे शर्मिंदगी महसूस हुई, लेकिन उसी शर्मिंदगी ने उसकी योनि में एक मीठी सी झुनझुनी पैदा कर दी।
उसे खुद पर हैरानी हुई— ‘ये मुझे क्या हो रहा है? यह आदमी मुझे बेइज़्ज़त कर रहा है और मैं… मैं गीली हो रही हूँ?’
“उफ्फ्फ्फ…” शमशेर के मुंह से एक आह निकली। उसने जानबूझकर एक गहरी सांस खींची, जैसे कामिनी की खुशबू को अपने फेफड़ों में भर रहा हो।
“कयामत है भाभी जी… क्या खुशबू है,” शमशेर ने धीरे से कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में कामिनी के लिए एक गंदा इशारा था।
कामिनी हड़बड़ा कर सीधी हो गई। उसने जल्दी से पल्लू ठीक किया। उसका चेहरा लाल हो गया था—आधा गुस्से से, और आधा उस अजीब सी उत्तेजना से।
वह मुड़कर रसोई की तरफ भागना चाहती थी, लेकिन शमशेर के अगले शब्दों ने उसे वहीं रोक दिया।
शमशेर ने अपना गिलास उठाया और रमेश की तरफ देखकर बोला,
कितना किस्मत वाला है तु, खूब दबा दबा के चूसता होगा तु तो भाभी के….

शमशेर ने अपने हाथों से हवा में कामिनी के स्तनों का आकार बनाया।
कामिनी के कान जल उठे।
रमेश जोर से हंसा। “हाहाहा… नसीब है भाई अपना। मैंने कहा था न, मेरी चीज़ हमेशा एक नंबर होती है।”
शमशेर ने फिर एक घूंट भरा और कामिनी की पीठ को घूरते हुए बोला,
“मेरी बीवी ऐसी होती तो साली के दूध रोज़ रात को पीता, रोज़ गांड मारता, नामर्द ही होगा जो ऐसी गांड ना मारे ”

यह वाक्य कामिनी के कानों में पिघले शीशे की तरह उतरा। उसका जिस्म छलनी सा हो गया, उसने वाकई मे अपनी गांद को भींच लिया जैसे शमशेर अभी उसकी गांड मे लंड डाल देगा….

“साली की रोज़ गांड मारता …” इससससससस…. ना जाने क्यों उसके मुँह से एक दर्दभारी सिस्कारी सी फुट पड़ी.
ये क्या था उसे भी नहीं पता….
कामिनी को याद आया, रमेश ने उसकी गांड मरने की बहुत कोशिश की थी, लेकिन वो कभी चुत भी ठीक से ना मार सका तो गांड तो दूर की बात थी.
शमशेर की बात सच ही थी, रमेश वाकई नामर्द ही था.

यह घोर अपमान था। उसे एक वेश्या की तरह ट्रीट किया जा रहा था।
लेकिन हैरान कर देने वाली बात यह थी कि कामिनी को रोना नहीं आया।
बल्कि, ‘दबा दबा कर पीने, गांड मारने ‘ की दर्द भरी कल्पना मात्र से उसकी जांघों के बीच एक सिहरन दौड़ गई।
उसे लगा जैसे सैकड़ों चींटियाँ उसके बदन पर रेंग रही हों।
यह नफरत और हवस का एक ऐसा गंदा मिश्रण था जिसे वह खुद समझ नहीं पा रही थी।
वह रसोई में घुस गई और सिंक का सहारा लेकर खड़ी हो गई।

उसकी सांसें फूल रही थीं।
उसने अपना हाथ अपने ब्लाउज के ऊपर रखा… उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था और निप्पल अभी भी पत्थर की तरह खड़े थे, कपड़े को चीरने की कोशिश कर रहे थे।
“मैं… मैं पागल हो रही हूँ,” कामिनी ने खुद से कहा। “मुझे घिन आनी चाहिए… और मुझे… मुझे मज़ा आ रहा है?”
उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन उसकी चूत गीली थी।
आज कामिनी को अपनी ही एक काली सच्चाई का पता चला था—कि वह सिर्फ़ ‘प्यार’ की भूखी नहीं थी, शायद वह ‘ज़िल्लत’ की भी आदी हो चुकी थी।
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रमेश और शमशेर ने जमकर पी।
खेर शमशेर जाने को हुआ। रमेश ने चाहा कि वो रुक जाये, “काफ़ी रात हो गई है, सो ले यही।”
लेकिन शमशेर ने एक आँख दबाई “हर किसी के पास तेरी जैसी बीवी नहीं होती ना बे, हमें तो जाना पड़ता है लेने ” बोल कर मुस्कुरा दिया। रमेश समझ गया।

रमेश और शमशेर लड़खड़ाते हुए बाहर को गए।
बाहर चबूतरे पे रघु बैठा हुआ था।
जैसे ही उसकी नजर वर्दी वाले शमशेर पर पड़ी, वह सन्न रह गया।
स्ट्रीट लाइट में शमशेर का चेहरा चमक रहा था।
रघु के जिस्म से डर का पसीना छूट गया। साथ ही चेहरे पे गुस्सा था, मुठी भींच गई।
शायद वो शमशेर को जनता था.
शमशेर अपनी बुलेट पर बैठकर निकल गया, बेखबर कि उसका एक पुराना शिकार उसे अंधेरे में घूर रहा है।
रमेश वापस अंदर आया।

कामिनी हॉल में खड़ी थी, उसका चेहरा तमतमाया हुआ था।

“क्या लगा रखा है आपने ये सब?” कामिनी फट पड़ी, “आपकी बात अलग है, आप पति हैं… लेकिन आपके सामने ही वो मुझे बोल रहा था… गंदी बातें कर रहा था।”
रमेश ने लड़खड़ाते हुए कामिनी को देखा।

“तो क्या हुआ? तू खूबसूरत नहीं है क्या? कोई तारीफ कर रहा है तो क्या दिक्कत है?”

कामिनी बिदक गई, “तारीफ? वो मेरी बेइज़्ज़ती कर रहा था।”
रमेश गुस्से से पास आया और कामिनी का जबड़ा पकड़ लिया।
“तुझे खा नहीं गया वो। देख भी लिया, कुछ बोल भी दिया तो घिस नहीं गई तू।”
उसने कामिनी को धक्का दिया। ” उसके बहुत अहसान है मुझ पर ”
कामिनी को छोड़ वो बिस्तर पर गिर पड़ा ना जाने मया बड़बड़ता सो गया, रोज़ की बात थी….

कामिनी वहीं खड़ी रह गई।
“घिस नहीं गई तू…” ये शब्द उसके दिमाग में गूंज रहे थे।
बेइज़्ज़ती की आग में जलते हुए भी, उसे अपनी जांघों के बीच वही ‘झुनझुनी’ महसूस हो रही थी जो शमशेर की नज़रों ने दी थी।
बाहर रघु भी अब अंदर आ गया था। वह गार्डन में, जामुन के पेड़ के नीचे पीठ के बल सिमटा पड़ा था।

रात का सन्नाटा गहरा हो चुका था।
घर के अंदर और बाहर, दो अलग-अलग दुनियाएं बसी थीं, लेकिन दोनों में आग एक ही लगी थी।
बाहर गार्डन में, जामुन के पेड़ के नीचे रघु लेटा था।
उसकी खुली आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। उसकी पुतलियों में एक अजीब सा “कोलाज” चल रहा था।
कभी उसे शमशेर का वहशी चेहरा और वर्दी दिखाई देती, जिससे उसका खून खौलने लगता। पुरानी यादें—सुगना की चीखें, जलता हुआ घर—उसे बेचैन कर रही थीं। एक धुंधली लेकिन गर्म आग उसके सीने में धधक रही थी।
लेकिन अगले ही पल… उस आग पर कामिनी की नंगी, सूजी हुई चूत की तस्वीर हावी हो जाती।
उसने दोपहर में जो स्वाद चखा था—शराब, खून और औरत के रस का वह नशीला कॉकटेल—वह अभी भी उसकी जुबान पर चिपका हुआ था।
रघु को एकतरफ जीने की रह दिख रही थी तो दूसरी तरफ वही नीरस जीवन, शराब का सहारा, उसे खुद नहीं पता था वो यहाँ क्या कर रहा है? क्यों कर रहा है?

वही अंदर…
कामिनी अपने पति रमेश के बगल में लेटी थी, जो बेशर्मों की तरह खर्राटे ले रहा था।
कामिनी की आँखों में आंसू सूख चुके थे, लेकिन उसकी जांघों के बीच की नमी बढ़ती जा रही थी।
वह छत को घूर रही थी, और उसका दिमाग एक भंवर में फंसा हुआ था।
आज दिन भर में उसके साथ जो हुआ, उसने उसकी आत्मा को झकझोर दिया था।
एक तरफ रघु का वह ‘दिन वाला प्यार’ था—वह मरहम, वह जीभ का स्पर्श, और रोटी खिलाना। जिसने उसे ‘औरत’ होने का अहसास कराया था।

और दूसरी तरफ… शाम को शमशेर की वो ‘भूखी, नंगी नजरें’ थीं। वह ‘माल’ कहना, ‘नंगा रखने’ की बात करना, गांड मारने की बात करना और रमेश का उसे ‘रंडी’ कहकर धत्कारना।
कामिनी को खुद से डर लग रहा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था, वो कौन है सच मे रंडी है, औरत है वो क्या है? क्यों है?
समझ से बहार था की इसका जिस्म किस बात पर ज्यादा उत्तेजित हुआ था,
रघु के प्यार भरे स्पर्श पर?
या शमशेर और रमेश द्वारा दी गई उस गंदी बेइज़्ज़ती पर?
क्या उसे सच में बुरा लगा था जब शमशेर उसे नंगा करने की बात कर रहा था? गांड मरने की बात कर रहा रहा था? अगर बुरा लगा था, तो फिर उसके निप्पल तन क्यों गए थे? उसकी चूत में यह अजीब सी झुनझुनी क्यों हो रही थी?
क्या वह सच में एक रंडी बन गई है जिसे अपनी बेइज़्ज़ती में ही मज़ा आने लगा है?
कामिनी ने रजाई के अंदर अपना हाथ अपनी जांघों के बीच डाला।
उसकी चूत गीली थी… बहुत गीली। लिसलिसी।
यह नमी सिर्फ़ रघु की याद की नहीं थी, यह उस अपमान की भी थी जिसने उसके अंदर की दबी हुई ‘कामुक स्त्री ‘ को जगा दिया था।

उस रात चाँद गवाह था।
एक तरफ ‘प्रेमी’ (रघु) था।
और दूसरी तरफ अपनी ही बेइज़्ज़ती से उत्तेजित ‘प्रेमिका’ (कामिनी) थी।
खेर औरत को कौन समझ पाया है.

अगली सुबह, रमेश तैयार होकर, नाश्ता करके और रघु को सख्त हिदायत देकर ऑफिस जा चुका था।
“सुनो कामिनी… यह साला कामचोर है, ध्यान रखना कि स्टोर रूम पूरा साफ़ हो जाए,” यह रमेश का आखिरी हुक्म था। हालांकि उसका लहजा हल्का ही था, दारू उतरने के बाद रमेश से सभ्य, मीठा बोलने वाला कोई दूसरा आदमी शायद ही दुनिया मे हो.

रमेश के स्कूटर की आवाज़ जैसे ही दूर हुई, घर में एक भारी सन्नाटा छा गया।
कामिनी हॉल में खड़ी थी। उसके बदन में एक अजीब सी बेचैनी थी।
कल दोपहर रघु ने जो ‘इलाज’ किया था—शराब की बोतल और अपनी जीभ से उसकी चुत के घाव को भरा था, —उसकी याद कामिनी को अंदर ही अंदर शर्मिंदा भी कर रही थी और उत्तेजित भी।

“मैं कैसे जाऊं उसके सामने?” कामिनी ने अपना पल्लू ठीक किया। “कल मैंने उसके सामने अपनी टांगें खोली थीं… आज किस मुँह से उससे बात करूँगी?”
उसके मन में भारी दुविधा थी। एक संस्कारी औरत की शर्म उसे रोक रही थी, लेकिन एक प्यासी औरत की तलब उसे खींच रही थी।
आखिरकार, “काम तो करवाना ही था उस से” का बहाना बनाकर उसने स्टोर रूम की ओर कदम बढ़ा ही दिए।

वह धीरे-धीरे चलते हुए घर के पीछे की तरफ गई, जहाँ पुराना स्टोर रूम (कबाड़खाना) था।
वहाँ सन्नाटा था। स्टोर रूम का दरवाज़ा खुला था।
कामिनी ने दरवाजे पर खड़े होकर अंदर झाँका।
“रघु…?”
अंदर कोई नहीं था। सिर्फ़ धूल और कबाड़।
कामिनी की धड़कन बढ़ गई। “कहाँ गया यह?”
उसने स्टोर रूम से बाहर निकलकर, पीछे बाउंड्री वॉल की तरफ देखा। वहां थोड़ी झाड़ियां और खाली जगह थी।
और तभी उसकी नज़र उस पर पड़ी।
रघु घर की पिछली दीवार की तरफ मुंह करके खड़ा था।
वह कामिनी की तरफ पीठ किए हुए था, इसलिए उसे देख नहीं पाया।
कामिनी ने जो देखा, उसने उसके पैरों को ज़मीन में गाड़ दिया।
रघु ने अपनी लुंगी को घुटनों से ऊपर उठा रखा था और अपने दोनों पैरों को चौड़ा करके खड़ा था। उसका बायां हाथ कमर पर था और दायां हाथ आगे… अपनी जांघों के बीच।
एक तेज़ ‘शर्रर्रर्रर्र………..’ की आवाज़ सन्नाटे को चीर रही थी।
वह दीवार पर मूत रहा था।
कामिनी को तुरंत अपनी नज़रें फेर लेनी चाहिए थीं। एक पराये मर्द को पेशाब करते देखना किसी भी शरीफ औरत के लिए पाप होना चाहिए,
लेकिन नहीं, कामिनी की गर्दन मुड़ी ही नहीं। उसकी आँखें चुंबक की तरह वहीं चिपक गईं। दिल तेज़ धड़कने लगा था, मन मे एक अजीब सा तूफान हिलोरे मारने लगा था,
रघु का दायां हाथ मुट्ठी में बंद था, और उस मुट्ठी से बाहर झांक रहा था… वही काला, मोटा और लंबा ‘मूसल’ जिसे कामिनी ने आज से एक दिन पहले छुआ था।
धूप में वह काला लंड किसी भयानक हथियार जैसा लग रहा था।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
पेशाब की वह मोटी धार, जो प्रेशर के साथ दीवार पर गिर रही थी, यह बता रही थी कि उस अंग में कितनी ताकत और जवानी भरी है।
कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया।
उसे कल का वह दृश्य याद आ गया—जब यही रघु उसकी टांगों के बीच था और अपनी जीभ से उसकी चूत चाट रहा था।
उस याद ने कामिनी के अंदर दबी हुई आग में घी डाल दिया।
उसकी चूत, जो सुबह से शांत थी, अचानक कुलबुलाने लगी।
और फिर… कामिनी के दिमाग में एक ऐसा ख्याल आया जिसने उसे खुद ही चौंका दिया। एक ऐसा गंदा, कामुक ख्याल जो शायद किसी ‘रंडी’ को ही आ सकता था

वह उस मोटे, काले लंड को देखते हुए सोच रही थी—
“हे भगवान… इतना मोटा… क्या यह मेरे मुंह में भी जा सकता है?”
क्या जैसे इसने कल मेरी चूत चाटी थी… क्या मैं इसे चूस सकती हूँ?
इस ख्याल के आते ही कामिनी का दिल पसलियां तोड़कर बाहर आने को हो गया।
उसका गला सूख गया। वह अपनी ही बेशर्मी पर हैरान थी। वह एक पेशाब करते हुए आदमी के लंड को अपने मुंह में लेने की कल्पना कर रही थी?
तभी रघु का काम खत्म हुआ।
उसने अपने हाथ को हिलाया।
झट… झट…
उसने पेशाब की आखिरी बूंदें झाड़ने के लिए अपने लंड को दो-तीन बार हवा में जोर से झटका दिया।
वह झटका रघु ने अपने लंड को दिया था…
लेकिन कामिनी को लगा जैसे वह झटका उसकी चूत के अंदर लगा हो।
“आह्ह्ह…” उसके मुंह से बिना आवाज़ की सिसकी निकली।
उस झटके को देखकर, कामिनी की योनि ने अपनी पकड़ खो दी।
एक गर्म, चिपचिपा पानी उसकी चूत से रिसकर उसकी जांघों पर बहने लगा।

रघु ने अपनी लुंगी नीचे गिराई और नाड़ा कसने लगा।
कामिनी अभी भी दीवार की आड़ में छिपी, अपनी साड़ी को मुट्ठी में भींचकर खड़ी थी। उसकी टांगें कांप रही थीं और पैंटी गीली हो चुकी थी।

कामिनी की टांगें जाम हो गई थीं।
वह दीवार की आड़ से भागना चाहती थी, लेकिन उसके कदम ज़मीन से चिपक गए थे। उस मुसल जैसे लंड और उसके झटको ने उसे सम्मोहित कर दिया था।

तभी रघु मुड़ा।
वह अपनी लुंगी ठीक करता हुआ वापस स्टोर रूम के दरवाजे पर आया।
और जैसे ही उसने सामने कामिनी को खड़ा देखा, उसकी बांछें खिल गईं।
सामने उसकी ‘मेमसाब’ खड़ी थी—भरा-पूरा, पसीने में भीगा हुआ जिस्म, और चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट। रघु की आँखों में चमक आ गई।

“अरे मेमसाब… आप?”
कामिनी को तो जैसे सांप सूंघ गया था, मुँह तो खुला कुछ बोलने के लिए, लेकिन सिर्फ हवा ही निकली, शब्द तो गले मे ही कहीं फसे रह गए थे,

रघु ने थोड़ा शर्माते हुए अपना हाथ उठाया और अपनी छोटी ऊंगली (Little Finger) दिखा दी। जैसे समझ गया हो मेमसाब क्या पूछना चाह रही है,
“वो… मेमसाब… ज़रा पेशाब करने चले गए थे… जोर की लगी थी।”
रघु ने अपनी छोटी ऊंगली दिखाई थी—यह बताने के लिए कि वह ‘लघुशंका’ के लिए गया था।
लेकिन कामिनी की नज़र उस छोटी सी ऊंगली पर टिक गई।

और फिर…
एक चुंबक की तरह उसकी नज़रें वहां से फिसलकर सीधे रघु की लुंगी के बीचो-बीच चली गईं।
कामिनी का दिमाग अपने आप एक ‘तुलना’ करने लगा।

उसने रघु की उस पतली सी छोटी ऊंगली को देखा… और फिर उसे याद आया वह विशाल, काला और मोटा लंड जो उसने अभी-अभी देखा था।
‘हे भगवान… इशारा कितना छोटा कर रहा है, और माल कितना बड़ा रखता है…’
कामिनी का अंतर्मन उसे कचोट रहा था।

‘छि कामिनी… तू क्या सोच रही है? तू उसकी ऊंगली और लंड का नाप ले रही है? तू इतनी गिर गई है?’
वह कुछ बोलने लायक नहीं बची थी। उसका गला सूख चुका था और दिल हथौड़े की तरह बज रहा था।

शायद रघु ने कामिनी की उस चोरी-छुपे डाली गई नज़र को पकड़ लिया।

उसने धीरे से, एक गहरी और मतलब भरी आवाज़ में पूछा—
“अब दर्द तो नहीं है ना मैडम?”
उसने जानबूझकर कल दोपहर वाली बात छेड़ी।
यह सवाल सुनते ही कामिनी पानी-पानी हो गई।
दर्द?
कैसा दर्द?
रघु उसे याद दिला रहा था कि कल उसने अपनी जीभ से कैसे उसका दर्द मिटाया था।
कामिनी को लगा जैसे वह रंगे हाथों चोरी करते पकड़ी गई हो।

“हाँ… हाँ… मतलब… नहीं… नहीं, अब नहीं है,” वह हकलाने लगी। उसके शब्द आपस में उलझ रहे थे।
उसे लगा कि अगर वह एक पल भी और यहाँ रुकी, तो फिर रुक नहीं पायेगी, उसकी जाँघे जवाब दे देगी, चोरी पकड़ी जाएगी.

“वो… वो साहब ने बोला है आज काम खत्म कर देना,” कामिनी ने जल्दी से कहा, अपनी मालकिन वाली हैसियत का सहारा लेते हुए।
वह वहां से भागने को हुई, जैसे किसी ने उसे चोरी करते देख लिया हो।
लेकिन जाने से पहले, उसने अपने पल्लू में दबा हुआ 100 का नोट निकाला।
उसने रघु के हाथ में देने की हिम्मत नहीं की।
पास ही पड़े एक पुराने लकड़ी के बक्से पर उसने वह नोट रख दिया।

“ये… ये एडवांस है तुम्हारा… कुछ खा-पी लेना,” कामिनी ने बिना सांस लिए कहा।
उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसके अंदर रघु से नज़रें मिलाने की हिम्मत ही नहीं बची थी।
वह खुद से भाग रही थी, अपनी गंदी सोच से भाग रही थी।
वह वहां से भागी… और खूब भागी।
गार्डन से होते हुए, बरामदा पार करके, वह सीधे अपने बेडरूम में आकर रुकी।
उसने धम्म से दरवाज़ा बंद किया और वहीं दरवाजे से पीठ टिकाकर खड़ी हो गई।

उसकी सांसें फूली हुई थीं। छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। बाल बिखर गए थे और साड़ी का पल्लू गिर गया था।
सब कुछ अस्त-व्यस्त था—उसका कपड़ा भी, और उसका चरित्र भी।
वह अपनी बंद आँखों में अभी भी वही देख रही थी—रघु का सटाक सटाक अपने लंड को झटका देना, और अपनी जांघों के बीच बहता हुआ पानी।
हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़….. हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़….. हंफ….

कामिनी अभी दरवाजे से टेक लगाकर अपनी सांसें काबू करने की कोशिश ही कर रही थी कि अचानक…
ट्रिंग… ट्रिंग…
बगल में पड़े फोन की तेज़ आवाज़ ने उसे चौंका दिया। वह ख्यालों की दुनिया से हड़बड़ा कर बाहर आई।

उसने देखा स्क्रीन पर ‘रमेश जी” नाम चमक रहा था।
उसने जल्दी से गला साफ किया, पल्लू ठीक किया और कांपते हाथों से फोन उठाया।

“ह… हाँ… हेलो?” कामिनी की आवाज़ अभी भी लड़खड़ा रही थी, जैसे वह दौड़ कर आई हो।
“अरे कहाँ थी? कितनी देर से फोन कर रहा हूँ, उठाती क्यों नहीं?” उधर से रमेश की आवाज़ आई।
“वो… वो… काम… काम था… सफाई कर रही थी,” कामिनी ने झूठ बोला और खुद को कण्ट्रोल करने की कोशिश की। उसका दिल अभी भी पसलियों से टकरा रहा था।

“अच्छा सुनो,” रमेश को रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि उसकी पत्नी क्यों हड़बड़ा रही है या उसकी सांसें क्यों फूली हुई हैं। उसे बस अपने मतलब की बात करनी थी।

“शमशेर भाई को तुम्हारे हाथ का खाना बहुत पसंद आया है। उन्होंने कहा है कि अब से रात का खाना वो हमारे साथ ही खाएंगे। होटल का खाना उन्हें पचता नहीं।”
“शमशेर…”
जैसे ही यह नाम कामिनी के कानों में पड़ा, उसका जिस्म एक बार फिर से धोखा दे गया।
कल रात की वो गंदी तारीफें… वो नंगी निगाहें…
शमशेर का नाम सुनते ही कामिनी की जांघों के बीच एक बाढ़ सी आ गई।
रघु को देखकर जो नमी बनी थी, शमशेर के नाम ने उसे सैलाब में बदल दिया।

उसकी आँखों के सामने शमशेर का वो रोबदार चेहरा, वो चौड़ी, बालों वाली छाती और वर्दी से आती वो कड़क, मर्दाना खुशबू का अहसास छा गया।
उसे फिर वही झुनझुनी महसूस हुई—घिनौनी, लेकिन उत्तेजक।
उसकी पैंटी पूरी तरह गीली होकर चिपक गई।
ना जाने क्यों कामिनी ने कोई आपत्ति नहीं जताई की शमशेर रोज़ रात को यही खाना खायेगा, या उसमे अपने पति के फैसले का विरोध करने की हिम्मत ही नहीं थी.

“क… क्क… क्या… क्या लाऊँ?” कामिनी का गला पूरी तरह सूख गया। उसे लगा अगर वह और बोली तो उसके मुंह से आह निकल जाएगी।

“अरे कुछ भी ले आना, तुम तो सब अच्छा बनाती हो,” रमेश ने बड़ी मिठास से कहा।
बिना दारू के रमेश कितना सज्जन, कितना शरीफ लगता था। उसके मुंह से शहद टपक रहा था। कोई कह ही नहीं सकता था कि रात को यही आदमी जानवर बन जाता है।

“ठीक है…” कहकर कामिनी ने फोन काट दिया और बिस्तर पर फेंक दिया।
उसने दीवार घड़ी पर नज़र डाली। दोपहर के 12 बज रहे थे।
बंटी के स्कूल से आने में अभी एक घंटा बाकी था।
कामिनी की जाँघे कांप रही थी, उस से सम्भला नहीं गया, धम्म से बिस्तर पर जा गिरी.
सुनी आँखों से ऊपर चलता पंखा देखे जा रही थी, शायद वो वो खुद घूम रही थी.
वो पंखा तो रुका हुआ था.

फोन काटने के बाद कामिनी बिस्तर पर निढाल होकर गिर पड़ी, उसकी जाँघे कांप रही थी, उनमे अब इनती क्षमता नहीं बची थी की उसका जिस्म संभाल सके.

रघु का वो ‘झटका’, उसकी ‘छोटी ऊंगली’ वाला इशारा और फिर रमेश का फोन… दिमाग और जिस्म दोनों थक चुके थे। पंखे की हवा में उसे कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला।
उसकी आँख तब खुली जब डोर बेल की तेज़ आवाज़ ने घर की शांति तोड़ी।
टिंग-टोंग… टिंग-टोंग…
कामिनी हड़बड़ा कर उठी। उसने दीवार घड़ी पर नज़र डाली—दोपहर के 1:30 बज रहे थे। वह काफी देर सोती रही थी।
“उफ्फ्फ… बंटी आ गया होगा,” वह बड़बड़ाई।
नींद और थकान की वजह से उसे अपने कपड़ों का होश नहीं रहा। साड़ी का पल्लू एक कंधे से ढलक कर नीचे लटक रहा था, और ब्लाउज के हुक (जो उसने सोने के लिए ढीले किए थे या पसीने से खिंच गए थे) उसकी भारी छाती को बमुश्किल रोके हुए थे।
उसने उसी अस्त-व्यस्त हालत में जाकर दरवाज़ा खोल दिया।
सामने बंटी खड़ा था, स्कूल यूनिफार्म में।
लेकिन बंटी अकेला नहीं था।
उसके ठीक पीछे एक हट्टा-कट्टा, गठीले बदन वाला लड़का खड़ा था।

माँ यह रवि है। मेरा पक्का दोस्त। आपको एक बार पहले बताया भी था, आज इसके मम्मी-पापा बाहर गए हैं, तो कुछ दिन यही रहेगा।”

कामिनी ने अपनी नींद भरी आँखों को मलते हुए रवि को देखा।
रवि मुस्कुराया।
“नमस्ते आंटी जी,” रवि की नजर कामिनी के ब्लाउज से बहार झाँकते स्तनों पर ही टिकी थी. उसकी आवाज़ भारी और मर्दाना थी।
रवि बंटी के साथ ही पढ़ता था, लेकिन देखने में वह बंटी से काफी बड़ा लग रहा था। उम्र करीब 20 साल।
असल में वह पढ़ाई में कमजोर था और एक ही क्लास में 2-3 साल फेल हो चुका था। कारण था उसकी आवारागर्दी और ‘शौक’। वह एक शरीफ बाप की बिगड़ी हुई औलाद.
रवि के पाला एंटी कर्रेंऑप्शन विभाग मे अधिकारी थे, एक दम ईमानदार, काम के पक्के इंसान.
ना जाने रवि ही कैसे आवारा निकला, उसके माँ बाप उस से अक्सर परेशान ही रहते थे, लेकिन एकलौती औलाद था तो क्या ही कर सकते थे, उसकी हक़ डिमांड पूरी होती थी.
इसी लाड प्यार ने उसे बिगड़ दिया था.

रवि ने एक टाइट टी-शर्ट पहन रखी थी, जिससे उसके जिम वाले बाइसेप्स और चौड़ी छाती साफ़ झलक रही थी।
रवि ने नमस्ते करने के लिए हाथ जोड़े, लेकिन उसकी नज़रें कामिनी के चेहरे पर नहीं थीं।
उसकी गिद्ध जैसी नज़रें सीधे कामिनी के ब्लाउज के उस हिस्से पर गड़ी थीं जहाँ से उसका पल्लू हटा हुआ था।
कामिनी की भारी, सुडौल छाती, जो नींद में दबने के कारण और भी उभरी हुई लग रही थी,

कामिनी ने तुरंत उस नज़र को भांप लिया।
एक औरत की छठी इन्द्रिय उसे बता देती है कि मर्द की नीयत क्या है।

कामिनी को एक अजीब सी असहजता हुई, लेकिन साथ ही एक झुरझुरी भी।
उसने जल्दी से अपना पल्लू उठाया और छाती को ढक लिया।
“ज… जीते रहो बेटा… आओ अंदर आओ,” कामिनी ने हड़बड़ाते हुए रास्ता दिया।

दोपहर के 3 बज रहे थे।
डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा था। बंटी, रवि और कामिनी खाना खा रहे थे।
रवि बड़े चाव से खाना खा रहा था, और बीच-बीच में कनखियों से कामिनी को देख रहा था।
“बेटा, तुम्हारे पापा क्या करते हैं?” कामिनी ने माहौल हल्का करने के लिए पूछा।
“जी, वो एंटी-करप्शन (Anti-Corruption) विभाग में बड़े अफ़सर हैं,” रवि ने चबाते हुए कहा।

रवि की बातों और नजरों से साफ़ पता चल रहा था कि वह उतना ‘शरीफ’ नहीं है। ना जाने बंटी और इसमें कैसे इतनी बनती है.
कामिनी हैरान थी इनकी दोस्ती पर, क्यूंकि उसका बेटा निहायती शरीफ था, और ये रवि दिखने मे ही चलाक और बिगड़ैल लगता था.
बंटी सीधे साधे कपडे पहनता, छोटे बाल, और ये रवि जीन्स टीशर्ट लम्बे बिखरे बाल.
और बोल चल का ढंग भी बंटी से बिल्कुल अलग.

खेर खाना खत्म हुआ।
कामिनी को याद आया कि शाम को शमशेर आ रहा है और उसे मार्किट से सामान लाना है।

“बंटी, मुझे ज़रा मार्किट जाना है। ऑटो पकड़ना पड़ेगा, देर हो जाएगी,” कामिनी ने हाथ पोंछते हुए कहा।

तभी रवि ने अपना गिलास नीचे रखा और बोला—
“अरे आंटी, ऑटो के धक्के क्यों खाओगी? मेरे पास बाइक है ना। मैं ले चलता हूँ ना आपको।”

कामिनी ठिठक गई।
इस लड़के के पास बाइक भी है?
“तुम्हारे पास बाइक है? किसने दिलाई ” कामिनी अनायास ही पूछ बैठी क्यूंकि बंटी बेचारा तो एक स्कूटर के लिए भी तरस रहा था.

“पापा ने दिलाई पिछले बर्थडे पर” रवि ने अपने पापा पर गर्व करते हुए कहा.
वही बंटी का चेहरा बुझा हुआ था, कामिनी को समझ आया की उसे स्कूटर की चाहत कहाँ से हुई होंगी.

“नहीं… नहीं बेटा… मैं चली जाउंगी,” कामिनी ने संकोच किया। उसे रवि के साथ जाने मे अजीब लग रहा था, क्यूंकि रवि की नजरें कुछ ठीक नहींअगर रही थी,

लेकिन बंटी ने बीच में ही बात काट दी।
“अरे हाँ मम्मी, रवि की बाइक से चली जाओ। ऑटो मिलने में टाइम लगेगा। आधे घंटे का ही तो काम है, हो आओ जल्दी।, अच्छी बाइक चलाता है रवि ”
बंटी ने दलील दी.

“हहह…. मममम…. मेरी ही गलती है, जवान लड़का है, अब ऐसे उसके सामने जाउंगी तो देखेगा ही ना ” कामिनी को अपनी गलती का अहसास हुआ, की वो किस हालात मे दरवाजा खोलने गई थी.
ये रवि की नहीं उस की गलती थी,

“अब सामने ऐसी चीज दिख ही जाये तो कौन नहीं देखेगा, जवान होता लड़का है ” कामिनी अपने मे मुस्कुरा दी.

“मैं तब तक पीछे स्टोर रूम देख लेता हूँ, वो रघु काम कर रहा है या सो गया,” बंटी ने कहा और पीछे के दरवाज़े की तरफ चल दिया।

अब कामिनी के पास ना करने का कोई बहाना नहीं था।
“ठीक है..तुम बैठो आती हूँ तैयार हो कर .” कामिनी बैडरूम मे चल दी.
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कामिनी तैयार होने के लिए अपने कमरे में गई।
शीशे के सामने खड़ी होकर उसने खुद को निहारा। आजकल उसके चेहरे पर एक अलग सी सिकन आ गई थी, उसे अपने चेहरे पर वो रंगत नहीं दिखती थी, उसे लगता था जैसे कुछ अधूरा सा है.

उसने एक गहरे लाल रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी, जिसका पल्लू उसने जानबूझकर थोड़ा ढीला रखा। माथे पर एक बड़ी सी लाल बिंदी लगाई, मांग में सिंदूर भरा और हाथों में कांच की खनकती चूड़ियाँ पहनीं। हल्का सा इत्र लगाया।

जब वह तैयार होकर बाहर निकली, तो वह सिर्फ़ ‘बंटी की माँ’ नहीं, बल्कि कामुकता की साक्षात् मूरत लग रही थी। एक भरी-पूरी, पकी हुई भारतीय नारी, जिसके हर अंग से मादकता टपक रही थी।
हॉल में इंतज़ार कर रहा रवि उसे देखते ही सन्न रह गया।
उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
उसने सोचा था कि ‘आंटी’ बस ठीक-ठाक होंगी, लेकिन सामने तो अप्सरा खड़ी थी।
रवि की नज़रें कामिनी की गहरी नाभि, कसा हुआ ब्लाउज और साड़ी में लिपटी चौड़ी कमर पर फिसलती रहीं।

उसे यकीन नहीं हो रहा था कि एक 38 साल की औरत, एक दोस्त की माँ, इतनी सुंदर और मादक भी हो सकती है। उसके मन में गुदगुदी सी होने लगी, हालांकि वो कामिनी मतलब की उसके पक्के दोस्त की माँ मे लिए कुछ गलत नहीं सोचा था, लेकिन जो सामने था उसकी प्रशंसा करने से खुद को रोक भी नहीं सकता था.

कामिनी ने रवि की उस अजीब सी नज़रों को देख लिया।
और सच तो यह था कि कामिनी भी रवि से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।
20 साल का वो हट्टा-कट्टा लड़का, टाइट टी-शर्ट में कसे हुए उसके डोले, और चेहरे पर वो बेफिक्र जवानी।
रघु का अपना आकर्षण था (देसी और जंगली), लेकिन रवि में एक “शहरी और मॉडर्न” खिंचाव था। एक जवान लड़का उसे ऐसे देख रहा है, यह सोचकर कामिनी के गालों पर लाली आ गई।
“क्या हुआ बेटा? क्या देख रहे हो? चले मार्किट?”
कामिनी को खुद पर गर्व हो रहा था की उसके बेटे की उम्र का लड़का उसे घूर रहा है मुँह खोले.

“वो… वोओओओ… हाँ आंटी चलो चलते है ” रवि सकपाकता हुआ उठा.
“चलो तो फिर ” कामिनी मुस्कुराती थैला लिए आगे चल दी.
पीछे रवि किसी घनचक्कर की तरह कामिनी की मादक चाल को निहारे जा रहा रहा.
रवि आज मिला था असली कयामत से.

लेकिन बहार आते ही एक मुसीबत हो गई.
“ये क्या है? इसपे कैसे बैठूंगी?” कामिनी सकपाकती हुई बोली.

बाहर रवि की स्पोर्ट्स बाइक खड़ी थी। पिछली सीट काफी ऊँची थी।
“क्यों अंकल ने कभी आपको सवारी नहीं कराई क्या?” रवि ने मजे लेते हुए कहाँ.
“उनके ज़माने मे ऐसी चीज़े नहीं थी ”

“तो आंटी जी कभी कभी आज के ज़माने मे भी जी लेना चाहिए ” रवि ने बाइक पर बैठे हुए कहा
कामिनी जैसे तैसे पीछे की सीट पर बैठ गई, उसके हाथ रवि के कंधे पर थे,
रवि ने बाइक स्टार्ट कर दी, बुरम्म्म्म…. भरररररर….. भररररररररर….. बाइक बुरी तरह कांपती हुई आवाज़ करने लगी.
“पता नहीं आजकल के लड़को को क्या मजा आता है इन सब मे, ऐसा लग रहा है जैसे हवा मे बैठी हूँ ” कामिनी बड़बड़ाई.
“नये ज़माने के लोग हवा मे ही उड़ाते है ”
रवि ने रेस को जोर का झटका दिया… बुरममममम…. बुररररर….. बुरमममममम…..

सीट ऊँची होने की वजह से कामिनी का पूरा ऊपरी हिस्सा रवि की पीठ की तरफ झुक गया।

“पकड़ लीजिये आंटी… बाइक तेज़ भागती है,” रवि ने शरारत से कहा और अचानक क्लच छोड़ दिया।
धुक…
बाइक को झटका लगा।
कामिनी का संतुलन बिगड़ा और वह धड़ाम से रवि की पीठ से जा टकराई।
उसके भारी, नरम स्तन पूरी ताकत से रवि की सख्त, चौड़ी पीठ पर दब गए.

“उफ्फ्फ्फ… क्या कर रहे हो, गिराओगे क्या?” कामिनी के मुंह से निकला।
लेकिन कामिनी को अपने जीवन का ये नयापन अच्छा भी लग रहा था.
उसे याद ही नहीं वो कब इस तरह से रमेश के पीछे स्कूटर ओर बैठी थी, ऐसी बचकानी हरकत कब की थी.
उसके नीरस जीवन मे ये बाइक का झटका एक नयी उम्मीद लिए बैठा था.

रवि को अपनी पीठ पर वह मखमली, नरम दबाव महसूस हुआ। उसे लगा जन्नत मिल गई हो। उसके बदन में एक सिहरन दौड़ गई।

कामिनी भी सिहर उठी। रवि की सख्त पीठ की गर्माहट उसके स्तनों के ज़रिये पूरे बदन में फ़ैल गई।
“मैंने कहा था ना आंटी, गिर जाओगी… मुझे पकड़ लो,” रवि ने शीशे में कामिनी का घबराया चेहरा देखते हुए कहा.

कामिनी के पास कोई चारा नहीं था।
डर और मजबूरी (और दबी हुई चाहत) में उसने अपना एक हाथ आगे बढ़ा रवि के पेट पर लपेट दिया.

उसने रवि को अपनी बांहों के घेरे में जकड़ लिया।
उसका सीना अब पूरी तरह रवि की पीठ से चिपका हुआ था।
बाइक चल पड़ी।
रास्ते में रवि जानबूझकर कभी ब्रेक मारता, तो कभी रेस देता।
हर ब्रेक पर कामिनी के स्तन रवि की पीठ पर और जोर से भिंच जाते, पिचक जाते।
बाइक की इंजन की गड़गड़ाहट सीट के ज़रिये सीधे कामिनी की जांघों के बीच पहुँच रही थी।
उसकी चूत, जो सुबह से ही संवेदनशील थी, रिस रही थी, उस कंपन से गुदगुदाने लगी। एक मीठी-मीठी खुजली और गीलापन फिर से लौटने लगा।
कामिनी ने आँखें मूंद लीं। उसे अपनी जवानी लौटती सी महसूस हुई, जैसे वो कोई 18 साल की लड़की हो और अपने बॉयफ्रेंड के साथ बाइक पर चिपकी बैठी है.

रवि ने एक झटका लिया… वो अपनी जवानी से वापस 30साल की उम्र मे आ गई.

‘रघु… शमशेर… और अब रवि…’ वह सोच रही थी, ‘आजकल मुझे क्या हो गया है? यह तीसरा मर्द है,
“ललललललल…. लेकिन ये तो मेरे बेटे का दोस्त है, मेरे बेटा जैसा ही है ”
कामिनी की सोच को गहरा धक्का लगा, वो आजकल पता नहीं क्या क्या सोच रही थी.

थोड़ी ही देर मे वो लोग मार्किट पहुंचे। वहां शाम की भीड़ थी।
रवि ने बाइक खड़ी की। कामिनी सब्जी लेने आगे बढ़ी।
भीड़ बहुत ज्यादा थी। लोग धक्का-मुक्की कर रहे थे।
रवि एक ‘बॉडीगार्ड’ की तरह कामिनी के ठीक पीछे सटकर चलने लगा।

सब्जी वाले के ठेले पर भीड़ बढ़ी। कामिनी सब्जी छांटने के लिए झुकी।
उसकी चौड़ी, मटकती हुई गांड रवि के ठीक सामने थी।
भीड़ का एक धक्का लगा, और रवि आगे को जा सरका,

वह कामिनी के बिल्कुल पीछे चिपक गया।
और तभी… कामिनी को अपनी गांड की दरार के पास कुछ सख्त और गरम चीज़ महसूस हुई।
वह रवि का लंड था।
जींस के कपड़े के बावजूद, वह इतना सख्त था कि कामिनी को साड़ी के पार भी उसका लोहे जैसा कड़कपन महसूस हो गया।
रवि का लंड उसकी गांड के मांसल हिस्से में धंस रहा था।
कामिनी का जिस्म सुलग उठा।
कामिनी हैरान थी, ये बड़ा सा क्या लगा उसकी गांड की दरार के बीच आ कर,
उसे हटना चाहिए था, रवि को डांटना चाहिए था।
लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वह वहीं जमी रही। वह उस सख्त दबाव को महसूस करने लगी,

‘इतना कड़क… बंटी का दोस्त होकर भी इतना बड़ा…’ कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया था।

रवि ने भी मौके का फायदा उठा धीरे से अपना लंड उसकी गांड पर रगड़ दिया।, शयाद वो भी कामिनी की गांड की गर्मी को महसूस कर रहा था. उसके जीन्स मे कसाव बढ़ता जा रहा था.

कामिनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकली, लेकिन उसने सब्जी छांटना जारी रखा, मानो कुछ हुआ ही न हो।
कोई 1मिनिट ही ये सब हो पाया, आने जाने वाले लोगो ने रवि को एक जगह टिकने ही नहीं दिया.

सब्जी लेकर जब वे वापस बाइक के पास आए, तो दोनों के चेहरों पर एक अलग ही रंग था। दोनों एक दूसरे से आंखे चुरा रहे थे,
वापसी में…
रवि ने कुछ नहीं कहा। शायद वो शर्मा रहा था या ग्लानि मे था की उसने अपने पक्के दोस्त की माँ के साथ ये क्या किया.
वो भी दुविधा मे था कामिनी की तरह.

लेकिन कामिनी ने बाइक पर बैठते ही, बिना रवि के कहे, अपने हाथ को आगे बढ़ा रवि को कसकर पकड़ लिया।
इस बार उसकी पकड़ और भी मजबूत थी, और उसका सीना रवि की पीठ से और भी ज्यादा चिपका हुआ था।
हवा तेज़ थी। दोनों के बीच पुरे रास्ते कोई बातचीत नहीं हुई।

कभी कभी कुछ कहने के लिए बोलने के जरुरत नहीं होती, उस पल को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, उसके लिए कोई शब्द दुनिया मे बने ही नहीं है, जैसे कामिनी अपनी जवानी को महसूस कर रही थी, अब ये क्या है? क्यों है? इसे बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है..
कामिनी ही जाने…. वही रवि अपनी मचलती जवानी को छुपाने की कोशिश कर रहा था.

शाम के 6 बज रहे थे।
घर के गेट पर रवि की स्पोर्ट्स बाइक आकर रुकी।
घर्रर्रर्र….
इंजन बंद हुआ, लेकिन कामिनी के दिल की धड़कनें अभी भी रेस लगा रही थीं।
पीछे बैठी कामिनी ने रवि की कमर से अपनी पकड़ ढीली की और धीरे से नीचे उतरी। उतरते वक़्त जानबूझकर या अनजाने में, उसका भारी वक्षस्थल एक बार फिर रवि की पीठ से रगड़ खा गया।
“थैंक यू रवि बेटा…” कामिनी ने साड़ी ठीक करते हुए कहा। उसके चेहरे पर अभी भी हवा और उत्तेजना की लाली थी।
“अरे थैंक यू कैसा आंटी… सवारी में तो मुझे भी बड़ा मज़ा आया,” रवि ने हेलमेट उतारते हुए, अपनी बालों में हाथ फेरते हुए कहाँ.
कामिनी समझ गई कि वह ‘बाइक की सवारी’ की बात नहीं कर रहा। वह शरमा कर मुस्कुरा दी। कामिनी का अंतर्मन ख़ुश था, उसे जवान महसूस करवा रहा था.
उसे गर्व हो रहा था की एक 20 साल का लड़का उसे भाव दे रहा है.
वरना उसका अब तक का जीवन अवहेलना मे ही बिता था.

कामिनी आगे बड़ी उसकी नजर स्टोर रूम की तरफ गई, वहाँ कोई खास साफ सफाई नहीं हुई थी, स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद था।
कामिनी की नज़रें बंटी पर गईं जो बरामदे में खड़ा था।
“रघु कहाँ गया?” कामिनी ने हैरानी से पूछा।
“वो तो चला गया मम्मी,” बंटी ने बताया, “मैंने उसे पैसे दे दिए थे। कह रहा था— आज मन ठीक नहीं है, कल आऊंगा
ना जाने क्यों कामिनी को एक शराबी, देहाती मजदूर की चिंता हुई “क्या हुआ रघु को?”

खेर कामिनी कपड़े बदलने और रात के खाने की तैयारी करने अपने कमरे और फिर रसोई में चली गई।
उधर रवि और बंटी अपने कमरे में आ गए।
रवि बिस्तर पर पसर गया। उसकी आँखों में अभी भी मार्किट वाला मंजर था—कामिनी की गांड पर अपना लंड रगड़ना।
“भाई बंटी…” रवि ने छत को घूरते हुए कहा, “तेरी मम्मी बहुत… बहुत अच्छी हैं। मतलब, घर भी संभालती हैं और खुद को इतना ‘फिट’ भी रखा है। आजकल ऐसी औरतें कम देखने को मिलती हैं।”
रवि की आवाज़ में तारीफ थी, लेकिन दिमाग में कुछ खुराफ़ात चल रही थी,

बंटी, जो अपनी माँ की मज़बूरी एयर उसका बदलता स्वभाव महसूस कर रहा था, सिर्फ़ मुस्कुरा दिया। “हाँ भाई, मम्मी बहुत मेहनत करती हैं।”
****************

रात के 9 बजे:
घर के बाहर बुलेट की भारी आवाज़ गूंजी। डुग-डुग-डुग…
रमेश और शमशेर आ गए थे।
हॉल में शराब की महक और भारी जूतों की आवाज़ गूंज उठी।
बंटी और रवि अपने कमरे से बाहर आए।
उसने रवि का परिचय रमेश से करवाया, रमेश ने कोई खास रिस्पांस नहीं किया, उसे तो दारू पीने से मतलब था, घर मे कौन है कौन नहीं इस से कोई मतलब नहीं.

शमशेर ने भी बस औपचारिका ही की क्यूंकि उसकी नजर तो कामिनी को तलाश रही थी.
लेकिन वो आज रसोई से बहार नहीं आई,

रमेश ने माहौल भांप लिया। उसे लगा बच्चे सामने हैं, तो खुल के पी नहीं पाएंगे।
“कामिनी…” रमेश ने आर्डर दिया, “सुन, हम लोग छत वाले कमरे में बैठ रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई डिस्टर्ब नहीं होनी चाहिए।”
उसने रवि और बंटी की तरफ देखकर एक फीकी मुस्कान दी।

“और सुन, कुछ चखना—काजू, चने और सलाद, और बर्फ… सब ट्रे में सजाकर ऊपर ले आ। जल्दी करना।”

रमेश और शमशेर सीढ़ियाँ चढ़कर छत की तरफ चले गए। जाते-जाते भी शमशेर ने मुड़कर एक बार पीछे देखा, उसे लगा शायद कामिनी बहार आई हो,
लेकिन कामिनी ने आज पूरी तरह से उसके मनसूबो पर पानी फेर दिया.
*************

छत पर बैठे रमेश ने आर्डर दिया था— “कामिनी, गिलास और चखना लेकर ऊपर आ जा।”
शमशेर की आँखें चमक उठी थीं। वह फिर से कामिनी को घूरने और उसे छेड़ने के लिए तैयार बैठा था।
लेकिन कामिनी रसोई में सब्जी छौंकने में व्यस्त थी, और हाथ सने हुए थे।
“बंटी बेटा… ज़रा यह ट्रे पापा को दे आ,” कामिनी ने बंटी को आवाज़ दी।
बंटी ट्रे लेकर ऊपर चला गया।
जैसे ही शमशेर ने बंटी को ट्रे लाते देखा, उसका मुंह उतर गया। वह ‘शिकार’ का इंतज़ार कर रहा था, और सामने ‘बेटा’ आ गया। उसने बेमन से गिलास उठाया।
रसोई का दृश्य:
नीचे रसोई में गर्मी अपने चरम पर थी।
गैस पर चढ़ी कढ़ाई और बंद हवा की वजह से तापमान बढ़ा हुआ था। कामिनी पसीने में तर-बतर थी।

उसकी साड़ी का पल्लू पसीने से गीला होकर उसके वक्षस्थल से चिपक गया था। गर्दन से पसीने की बूंदें रेंगती हुई उसकी पीठ की गहराई में समा रही थीं।
वह पूरी शिद्दत से खाना बनाने में मशगूल थी कि तभी उसे अपने पीछे किसी की आहट महसूस हुई।
“आंटी… कुछ हेल्प कर दूँ?”
कामिनी पलटी। रवि खड़ा था।
कामिनी के चेहरे पे मुस्कान आ गई, जैसे वो जानती हो रवि यहाँ क्यों आया है.

वह रसोई के दरवाजे पर टेक लगाए, अपनी भूखी नज़रों से कामिनी की भीगी हुई हालत का मुआयना कर रहा था।
“अरे नहीं बेटा… तुम क्यों करोगे? तुम मेहमान हो, जाकर बैठो,” कामिनी ने पल्लू से माथा पोंछते हुए कहा।
“अरे मुझे आता है आंटी… मैं घर पर अपनी मम्मी की हेल्प करता हूँ,” रवि ने बहुत ही मासूमियत से झूठ बोला और सीधे अंदर आ गया।
रवि कामिनी के बिल्कुल पास आकर खड़ा हो गया।
किचन का स्लैब छोटा था। रवि ने धनिया उठाया और उसे काटने लगा।
दोनों के बीच मुश्किल से 2-3 इंच का फासला था।
रसोई की गर्मी में कामिनी के जिस्म से उठती पसीने की एक मादक गंध रवि की नाक से टकराई।
यह किसी इत्र की खुशबू नहीं थी, यह एक पकी हुई औरत के फेरोमोंस (Pheromones) की गंध थी—कच्ची, नमकीन और नशीली।
रवि ने एक गहरी सांस ली। उसे लगा जैसे वह किसी नशे में डूब रहा है।
वह कनखियों से कामिनी को देख रहा था—पसीने से भीगा ब्लाउज, चिपकी हुई लटें और सांस लेते हुए ऊपर-नीचे होता उसका सीना।
‘उफ्फ्फ… क्या चीज़ है यार… पसीने में तो और भी नमकीन लग रही है,’ रवि मन ही मन बड़बड़ाया।
सब्जी में नमक डालना था।
कामिनी ने इधर-उधर देखा। नमक का डब्बा ऊपर वाली शेल्फ (Shelf) पर रखा था।
कामिनी ने डब्बा उतारने के लिए अपना हाथ ऊपर उठाया।
उसकी हाइट थोड़ी कम पड़ रही थी।
उसने अपने पंजों पर जोर दिया और अपनी एड़ियां उठा दीं।

जैसे ही कामिनी ने हाथ ऊपर खींचा, उसका ब्लाउज भी ऊपर खिंच गया।
उसकी साड़ी कमर से थोड़ी नीचे खिसक गई, जिससे उसकी गोरी, चिकनी कमर और गहरी नाभि का एक हिस्सा रवि की आँखों के सामने आ गया।
लेकिन रवि की नज़र कहीं और अटक गई।
कामिनी के हाथ ऊपर करने से, उसकी साड़ी का पल्लू हट गया था और उसकी कांख (Armpit) पूरी तरह रवि के सामने उजागर हो गई थी।
वह कांख एकदम साफ़-सुथरी, गोरी और पसीने से भीगी हुई थी। वहां पसीने की एक छोटी सी बूंद चमक रही थी।
रवि के बिल्कुल चेहरे के पास से एक कड़क और उत्तेजक गंध का झोंका आया।

उस गंध ने रवि के दिमाग के तार हिला दिए।
कामिनी का पूरा बदन तना हुआ था, वह डब्बे तक पहुँचने की कोशिश कर रही थी, उसका जिस्म एक धनुष की तरह मुड़ा हुआ था।
कामिनी की उंगलियां डब्बे को छू रही थीं, लेकिन पकड़ नहीं पा रही थीं। लेकिन इस प्रयास मे गांड बहार को निकल कर साड़ी मे और ज्यादा कस गई थी,

“उह्ह्ह…” कामिनी ने और जोर लगाया।
तभी रवि, जो ठीक उसके पीछे खड़ा था, अचानक आगे बढ़ा।
उसने कामिनी के पीछे से अपना हाथ बढ़ाया और आसानी से नमक का डब्बा उतार लिया।
लेकिन इस प्रक्रिया में…
रवि का पूरा शरीर कामिनी की पीठ से सट गया।
रवि की छाती कामिनी की पीठ से चिपकी थी, और उसका निचला हिस्सा (Groin) कामिनी के कूल्हों के बिल्कुल बीचो-बीच जाकर दब गया।

उस एक पल के लिए… रसोई में समय थम गया।
रवि की जींस का सख्त कपड़ा और उसके अंदर का तनाव कामिनी की साड़ी के पार उसकी कोमल त्वचा को चुभ गया।
“सीईईईईई…………”
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई।
नमक का डब्बा रवि के हाथ में था, लेकिन करंट कामिनी के पूरे बदन में दौड़ गया।
उसकी कमर रवि की कमर से चिपकी हुई थी। पीछे से मिल रही उस मर्दाना गर्माहट ने उसकी टांगों को कमजोर कर दिया।
वह चाहती तो हट सकती थी, लेकिन उसका जिस्म उत्तेजना से कसमसा गया।
पसीने से भीगे हुए दो जिस्म एक-दूसरे की गर्मी सोख रहे थे।
“ये लीजिये आंटी… नमक,” रवि ने उसके कान के बिल्कुल पास फुसफुसाते हुए कहा। उसकी गर्म सांस कामिनी की गर्दन पर लगी।
कामिनी ने कांपते हाथों से डब्बा लिया।
“थ… थैंक यू…”
वह रवि से अलग हुई, लेकिन उस एक पल के रगड़ ने उसकी चूत में फिर से वही आग लगा दी थी जो सुबह से सुलग रही थी।
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रात के 11 बज चुके थे।
“खाना ले आना ऊपर ” रमेश के चिल्लाने की आवाज़ से कामिनी चौंक गई.
वो शांति से कमरे मे बैठी थी, आज उसका दिन शांति से बिता था और उम्मीद थी की रात भी शांति से ही गुजरेगी.

कामिनी ने जल्दी से दो थालियों में खाना लगाया और भारी कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ रही थी।

उसके दिल में धक-धक हो रही थी। उसे लगा था कि इतनी देर हो गई है, शायद दोनों सो गए होंगे या नशा चढ़ गया होगा।
उसने छत के कमरे का दरवाज़ा धीरे से धक्का देकर खोला।
अंदर का नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए।
उसका अंदाज़ा गलत था।
रमेश सोया नहीं था। वह बिस्तर पर बैठा था, लेकिन उसकी हालत बहुत खराब थी। आँखें एकदम चढ़ी हुई थीं, बाल बिखरे थे और वह नशे में झूल रहा था।
और उसके ठीक सामने कुर्सी पर शमशेर बैठा था।
शमशेर ने अपनी वर्दी उतार दी थी। वह सिर्फ़ अपनी एक छोटी सी, टाइट चड्डी में बैठा था। चौड़ी छाती पर बालो का झुरमुत चमक रहा रहा,

कामिनी को देखते ही रमेश का पारा चढ़ गया।
“साली अंदर आ…” रमेश गुर्राया।
“कहाँ गांड मरा रही थी इतनी देर से? खाना लाने में इतना टाइम लगता है?”

कामिनी को गहरा धक्का लगा। उसका पति एक पराये मर्द के सामने उसे इतनी गंदी गाली दे रहा है,
“वो… वो… गर्म कर रही थी…” कामिनी ने सफाई देनी चाही।
“चुप! बहस मत कर,” रमेश चिल्लाया।
कामिनी की आँखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने डरते-डरते थाली टेबल पर रख दी।

तभी उसकी नज़र शमशेर पर गई।
शमशेर अपनी टांगें चौड़ी करके बैठा था।
उसकी उस छोटी सी चड्डी के अंदर एक विशाल उभार साफ़ दिख रहा था। उसका लंड पूरी तरह खड़ा था, मोटा और लंबा… नसों से भरा हुआ। वह चड्डी के कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब था।
कामिनी की नज़रें उस उभार पर चिपक गईं।

“कोई नहीं अब खाना आ ही गया है तो खा ही लेंगे ” शमशेर ने कामिनी की भूखी नज़रों को भांप लिया। उसने जानबूझकर अपनी जांघों पर हाथ फेरा और एक कुटिल मुस्कान दी।

“चल बैठ मेरे पास,” रमेश ने बिस्तर की तरफ इशारा किया।
“साला नशे में खूंखार हो जाता है,” शमशेर ने हंसते हुए कहा, जैसे उसे मजा आ रहा था मियां बीवी के बीच.

कामिनी डरते-डरते बिस्तर के किनारे, रमेश के पास बैठ गई।
रमेश ने कामिनी को घूरा।
“साली आज बड़ी चमक रही है… किसके लिए सज के घूम रही है?”
बोलते-बोलते रमेश ने अपनी पैंट की जिप खोली।
उसने अपना हाथ अंदर डाला और अपना लंड बाहर निकाल लिया।
वह छोटा सा, सिकुड़ा हुआ और ढीला था। नशे की वजह से उसमें जान नहीं थी।

“हिला इसे…” रमेश ने हुक्म दिया।
“खड़ा कर इसे… साली इतनी सुंदर बनी फिरती है तु आजकल।
कामिनी सकपका गई। अचानक से ये क्या हुआ? उसे रमेश के इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं थी.

“क्या? यहाँ? इनके सामने?” उसने शमशेर की तरफ देखा।

शमशेर कुर्सी पर बैठा, यह सब देख रहा था।
कामिनी की बेबसी और रमेश की बेशर्मी देखकर शमशेर की उत्तेजना बढ़ गई। उसने अपना हाथ अपनी चड्डी के ऊपर रखा और अपने लोहे जैसे सख्त लंड को सहलाने लगा।
कामिनी ने देखा कि शमशेर का लंड रमेश के लंड से कितना बड़ा और ताकतवर लग रहा था।
“तू खड़ा कर मेरा लंड… उधर क्या देख रही है?” रमेश ने कामिनी की नज़र शमशेर की तरफ जाते देख ली।
चटाक!
एक जोरदार थप्पड़ कामिनी के गाल पर पड़ा।
“आह्ह्ह…” कामिनी का गाल सुन्न हो गया। आँखों से आंसू टपक पड़े। गाल पर रमेश की उंगलियों के निशान छप गए।
“जल्दी कर रंडी… वरना आज यही खाल उधेड़ दूंगा,” रमेश ने धमकी दी।
कामिनी के पास कोई चारा नहीं था, पता नहीं कामिनी की ऐसी क्या मज़बूरी थी की वो रमेश से इतना ख़ौफ़ खाती थी.

उसने अपने कांपते हाथ रमेश के लंड की तरफ बढ़ाए।
उसने उस छोटे, ढीले मांस के टुकड़े को अपनी मुट्ठी में पकड़ा। वह इतना छोटा था कि कामिनी की एक मुट्ठी में ही गायब हो गया।
कामिनी उसे हिलाने लगी।
खन-खन-खन…
कमरे में सिर्फ़ कामिनी की चूड़ियों की आवाज़ गूंज रही थी।
जैसे-जैसे उसका हाथ चल रहा था, उसके ब्लाउज में कैद उसके भारी स्तन हिल रहे थे।
शमशेर की नज़रें उन हिलते हुए स्तनों पर गड़ी थीं। वह अपनी चड्डी के ऊपर से अपने लंड को ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रहा था। उसका उभार और बड़ा होता जा रहा था।
कामिनी एक अजीब सी दुविधा में थी।
शर्म और अपमान से वह मरी जा रही थी—पति के दोस्त के सामने मुठ मारना?
लेकिन साथ ही… एक गंदी उत्तेजना भी उसे महसूस हो रही थी।
उसकी नज़र बार-बार शमशेर के विशाल ‘उभार’ पर जाती, और फिर अपने हाथ में पकड़े रमेश की ‘लुल्ली ‘ पर।
तुलना साफ़ थी।
एक तरफ ‘पहाड़’ था, और दूसरी तरफ ‘कंकड़’।
कामिनी मन ही मन सोच रही थी— ‘हे भगवान… मेरे पति के पास कुछ नहीं है… और वो सामने बैठा आदमी… वो तो पूरा घोड़ा है।’
यह सोचकर उसकी चूत गीली होने लगी। उसे अपनी इस बेइज़्ज़ती में, इस बेहयाई मे एक अलग सा अहसास हो रहा था, उसे उत्तेजना के साथ साथ शर्मिंदगी भी महसूस हो रही थी,

रमेश नशे में गालियां बके जा रहा था।
“आअह्ह्ह…. हिला इसे…. जोर से…”
लेकिन उसका लंड खड़ा ही नहीं हो रहा था। वह बिल्कुल मरा हुआ था।
“उफ्फ्फ्फ़…. इसससस…. साली रंडी…. हिलाना भी नहीं आता तुझे? किस काम की है तू?”
रमेश ने कामिनी के बाल पकड़ लिए और उसे झकझोर दिया।
“देख शमशेर… देख इस कुलच्छनी को… अपने खसम का लंड खड़ा नहीं कर पा रही।”
******************

कामिनी की कलाई दुखने लगी थी।
वह पिछले दस मिनट से रमेश के उस छोटे, ढीले और बेजान मांस के टुकड़े को अपनी मुट्ठी में रगड़ रही थी। लेकिन नतीजा सिफर था। वह लंड खड़ा होना तो दूर, हिल भी नहीं रहा था।
रमेश की बर्दाश्त की हद पार हो गई।
“हट्ट साली…” रमेश ने कामिनी के हाथ को झटक दिया।
“बताओ साली… तू एक मर्द का लंड भी नहीं खड़ा कर सकती? कैसी औरत है तू? तेरे अंदर वो कशिश ही नहीं है जो मुर्दे में जान डाल दे।”
चटक…. चाटक….. रमेश ने कामिनी के स्तनों पर जोरदार चाटा मारा…..
कामिनी के स्तन लाल पड़ गए “आआआहहहह….. क्या कर रहे है आप?”
चुप साली…..
रमेश अपनी नामर्दी का सारा ठीकरा कामिनी पर फोड़ रहा था। वह उसे जलील कर रहा था, गालियां दे रहा था।
पास बैठे शमशेर ने यह तमाशा देखा और एक कुटिल मुस्कान दी।
उसने व्हिस्की की बोतल उठाई और एक और कड़क पेग बनाया।
“ले भाई… मूड ठीक कर,” शमशेर ने गिलास रमेश को थमाया।
फिर उसने अपनी चड्डी के ऊपर से अपने उभरे हुए लंड को सहलाते हुए सुझाव दिया—
“यार रमेश… हाथ से तो यह खड़ा होने से रहा। इसे मुंह की गर्मी चाहिए। इसे चूसने को बोल… देख शायद खड़ा हो जाये।”
रमेश ने एक ही घूंट में आधा गिलास खाली किया और कामिनी को घूरा।
“सुना नहीं तूने? मुंह में ले इसे…”
कामिनी की रूह कांप गई। पति का लंड चूसना?
इस से पहले भी उसने ऐसी कोशिश की थी, उसे घिन आती थी।

वह चुपचाप बैठी रही, सिर झुकाए।
“अबे, इसे तो चूसना भी नहीं आता,” रमेश ने हताशा में कहा, “साली गांव की गंवार है।”

“अरे यह क्या बात हुई?” शमशेर ने हैरानी जताई, “शादी के इतने साल हो गए और लंड चूसना भी नहीं आता?”
शमशेर ने अपनी जांघों को और चौड़ा किया।

“तू कहे तो मैं सीखा दूँ?” शमशेर ने बेशर्मी से ऑफर दिया।
रमेश, जो नशे और हताशा में अंधा हो चुका था, उसे इसमें कोई बुराई नहीं लगी। उसे बस अपना काम बनवाना था, चाहे तरीका कोई भी हो।
“सिखा यार… तू ही कुछ सिखा इसे। तेरे पास तो तजुर्बा भी बहुत है रंडियों का।”
रमेश की ‘हाँ’ मिलते ही शमशेर की आँखों में शैतान जाग उठा।
वह अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ।
कामिनी बिस्तर के किनारे बैठी थी, उसका चेहरा शमशेर के पेट के बराबर था।
शमशेर ने एक हाथ अपनी कमर पर रखा और दूसरे हाथ से अपनी चड्डी को पकड़ा।
सर्रर्र…
एक झटके में उसने अपनी चड्डी नीचे खींच दी।
धप्प…
जैसे कोई भारी-भरकम चीज़ हवा में आज़ाद हुई हो।
कामिनी को तो जैसे सांप ही सूंघ गया।
उसकी आँखों के ठीक सामने, मुश्किल से 4 इंच की दूरी पर…
शमशेर का विशाल, काला और खूंखार लंड हवा में लहरा रहा था।
करीब 9 इंच लंबा। कलाई जितनी मोटाई।
उस पर उभरी हुई हरी-नीली नसें किसी नक्शे की तरह दिख रही थीं। उसका मुंड किसी मशरूम की तरह फैला हुआ था और गहरा लाल था।
वह रमेश के लंड जैसा नहीं था। उसमें जीवन था, ताकत थी, और क्रूरता थी।
जैसे ही वह बाहर आया, कामिनी की नाक में एक अजीब सी गंध का भभका लगा।
यह गंध पसीने, वीर्य, मूत्र और एक मर्द की कामुक गंध का मिश्रण थी। वह गंध तीखी थी, कड़वी थी… लेकिन कामिनी के नथुनों से होते हुए सीधे उसके दिमाग और फिर उसकी चूत तक पहुँच गई।

कमरे में हवा भारी हो गई थी, सिर्फ कामिनी की भरी साँसो की आवाज़ गूंज रही थी, उसे लगा जैसे उसका बलात्कार ही हो जायेगा.
कुछ भी हो एक औरत ऐसी स्थति मे फसना कभी नहीं चाहती.
उसके पति का ये extrim रूप था, वो इतना नीचे भी गिर सकता है उसे ये अहसास आज हुआ.

रमेश ने कामिनी की कलाई को लोहे की तरह जकड़ लिया, “साली रंडी… नखरे मत कर,” रमेश गुर्राया, उसकी आँखों में नशा और हैवानियत थी।

“वो मेरा दोस्त है… उसके बहुत अहसान हैं मेरे ऊपर। अगर वो खुश नहीं हुआ तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा। पकड़ उसका लंड!”
रमेश ने पूरी ताकत लगाकर कामिनी का हाथ खींचा और शमशेर के तने हुए, विशाल लंड पर रख दिया।
कामिनी के बदन में 440 वोल्ट का झटका लगा।
उसकी स्थिति किसी भी विवाहित स्त्री के लिए नरक से बदतर थी।
उसके एक हाथ में उसके पति का छोटा, ढीला और बेजान लंड था।
और दूसरे हाथ के नीचे… शमशेर का फौलादी, गरम और धड़कता हुआ लंड।
उसकी हथेली शमशेर के लंड की नसों पर फिसली। वह इतना गरम था कि कामिनी की उंगलियां जलने लगीं।
उस स्पर्श से उसकी चूत एक पल के लिए कुलबुला उठी—यह उसके जिस्म की गद्दारी थी।
लेकिन अगले ही पल… उसके दिमाग में एक विस्फोट हुआ।
“नहीं!”
कामिनी की अंतरात्मा चीख पड़ी।
‘मैं क्या कर रही हूँ? मैं रंडी नहीं हूँ… मैं एक पत्नी हूँ, एक माँ हूँ। मैं अपने पति के सामने किसी और मर्द का लंड नहीं पकड़ सकती।’
आत्मग्लानि के एक भारी पहाड़ ने उसे कुचल दिया।
उसे अपने पति पर, शमशेर पर और सबसे ज्यादा खुद पर घिन आई।
उसका दम घुटने लगा। उसे लगा कि अगर वह एक पल भी और इस कमरे में रही, तो वह मर जाएगी या पागल हो जाएगी।
उसने झटके से अपने दोनों हाथ खींचे।
रमेश और शमशेर कुछ समझ पाते, इससे पहले ही कामिनी किसी घायल हिरनी की तरह उछलकर खड़ी हो गई।
उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली।
“छिः… छिः…” उसके मुंह से बस यही निकला।
वह मुड़ी और दरवाजे की तरफ भागी।

“अरे रुक साली… कहाँ जा रही है?” रमेश पीछे से चिल्लाया, लेकिन वह उठ नहीं पाया।
शमशेर भी हड़बड़ा गया, “अरे भाभी…”
लेकिन कामिनी रुकी नहीं।
वह नंगे पाँव सीढ़ियों से नीचे भागी।
उसका पल्लू गिर रहा था, बाल बिखर गए थे, लेकिन उसे किसी चीज़ की होश नहीं थी।
वह बदहवास होकर हॉल में आई, फिर आंगन में…
घर की दीवारे जैसे उसे काटने को दौड़ रही थीं। उसे खुली हवा चाहिए थी। उसे सांस लेनी थी।

उसने पीछे का दरवाज़ा खोला और सीधे गार्डन की तरफ भागी।
अंधेरे में ठोकर खाते हुए वह उसी जामुन के पेड़ के पास पहुंची।
वही जगह… जहाँ अक्सर रघु बैठा करता था।
कामिनी वहां पहुँचकर हांफते हुए रुक गई।
उसने चारों तरफ देखा। उसकी आँखें अंधेरे में रघु को तलाश रही थीं।
शायद उसे लगा था कि वह यहाँ होगा… शायद वह उसे बचा लेगा… या कम से कम उसकी बात सुन लेगा।
लेकिन आज… वहाँ कोई नहीं था।
गार्डन वीरान था। सन्नाटा पसरा हुआ था।
सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ थी और कामिनी की सिसकियाँ।
कामिनी उसी पेड़ के नीचे, सूखी घास पर घुटनों के बल गिर पड़ी।
उसने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी।
“ये… ये क्या हो गया?” वह हिचकियों के बीच बुदबुदाई।
“मेरा पति… मेरा सुहाग… वो मुझे दूसरे मर्द के हवाले कर रहा था? वो मुझे उसके सामने ‘रंडी’ बोल रहा था.
कैसा इंसान है ये? अकेले कमरे मे की गई हरकत अलग बात थी…. लेकिन… लेकिन…. ये…
सुबुक…. सुबुक…. कामिनी बर्दाश्त ना कर सकी उसका दिल रो पड़ा.

*************
कामिनी गार्डन में पागलों की तरह टहल रही थी।
उसके नंगे पैर गीली घास और कंकड़ों पर पड़ रहे थे, लेकिन उसे कोई होश नहीं था। उसका दिमाग अभी भी उसी छत वाले कमरे में अटका था।
“साली रंडी… मर्द का लंड भी खड़ा नहीं कर सकती… गांव की गंवार है, चूसना भी नहीं आता।”
रमेश के वो शब्द, उसकी वो घिनौनी हंसी, और शमशेर का वो नंगापन… सब कुछ उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था।
वह वापस अंदर नहीं जा सकती थी। वहां वो दो दरिंदे थे।
चलते-चलते उसके कदम अनजाने में ही घर के पीछे बने स्टोर रूम की तरफ मुड़ गए। शायद उसका अवचेतन मन उसे वहीं ले आया था जहाँ उसे सुकून (या शायद एक अलग तरह की आग) मिलती थी।
स्टोर रूम का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर एक मद्धम, पीली रौशनी जल रही थी।
कामिनी ने दरवाज़ा धकेला और अंदर दाखिल हुई।
अंदर का दृश्य देखकर उसके होश उड़ गए। पैर ज़मीन पर जम गए।
सामने एक पुरानी खटिया पर, रघु पड़ा हुआ था।
वह पूरी तरह नंगा था।
शायद गर्मी की वजह से या नशे की वजह से उसने अपनी लुंगी उतार फेंक दी थी।
वह चित लेटा था, टांगें थोड़ी फैली हुई थीं। उसका सांवला, गठीला और पसीने से चमकता बदन उस पीली रौशनी में किसी सोये हुए योद्धा जैसा लग रहा था।
उसका साँवला, गठीला बदन पसीने की एक पतली परत से चमक रहा था। छाती धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी।

लेकिन कामिनी की नज़रें उसके चेहरे पर नहीं रुकीं।
वे सीधे नीचे फिसल गईं… रघु की दोनों फैली हुई, मांसल जांघों के बीच।
वहाँ… काले, घुंघराले बालों के जंगल के बीच… उसका विशाल पौरुष निढाल होकर पड़ा था।
वह अभी सोया हुआ था, लेकिन फिर भी वह इतना बड़ा और भारी लग रहा था कि कामिनी की सांसें अटक गईं।
वह एक तरफ लुढ़का हुआ था, उसका मुंड जांघ से सटा हुआ था।
कामिनी वहीं, दरवाजे पर जमी रह गई।
उसे लगा जैसे वह कोई सपना देख रही है।
ऊपर उसका पति उसे ‘नामर्द’ साबित करने पर तुला था, और यहाँ नीचे कुदरत का एक ‘विशाल नमूना’ बेहोश पड़ा था।
कामिनी की चूत, जो अपमान से गीली थी, इस नज़ारे को देखकर बाढ़ की तरह बह निकली।
एक अजीब सी सम्मोहन शक्ति उसे खटिया की तरफ खींचने लगी।
वह दबे पाँव, किसी बिल्ली की तरह आगे बढ़ी।
खटिया के पास जाकर वह घुटनों के बल बैठ गई। उसकी रेशमी साड़ी स्टोर रूम की धूल भरी ज़मीन पर फ़ैल गई, लेकिन उसे होश नहीं था। वो क्या कर रही है, क्यों कर रही उसे होश ही नहीं था.
उसका चेहरा अब रघु के लंड के बिल्कुल समानांतर था।
उसने गौर से देखा।
वह लंड शांत था, सोया हुआ था। उसकी खाल थोड़ी ढीली थी, लेकिन उसके नीचे की नसें साफ़ दिखाई दे रही थीं।
कामिनी के मन में एक ज़िद्द जागी।
‘रमेश कहता है मैं खड़ा नहीं कर सकती? मैं दिखाती हूँ कि मैं क्या कर सकती हूँ।’
कामिनी के मन मे बदले का भाव पनपने लगा था,
उसने अपना कांपता हुआ हाथ आगे बढ़ाया।
उसकी कोमल, गोरी हथेली ने रघु के उस साँवले, भारी लंड को छुआ।

वह गरम था… बहुत गरम।
और भारी।
जैसे ही कामिनी ने अपने काँपते हाथो से उसे अपनी मुट्ठी में भरा, उसे वजन महसूस हुआ। रमेश का लंड तो रुई जैसा हल्का था, लेकिन यह… यह तो ठोस मांस का टुकड़ा था।
कामिनी की मुट्ठी पूरी नहीं पड़ रही थी, लंड का सुपारी और निचला हिस्सा अभी भी बाहर था।
कामिनी ने धीरे-धीरे अपनी मुट्ठी को कसना शुरू किया।
उसके हाथ खुद ही रघु के सोये लंड पर आगे पीछे फिसलने लगे,
उसने उसे हिलाना शुरू किया—ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर।
वह उसके सोये हुए मुंड को अपने अंगूठे के पोर से सहलाने लगी।
“उठो…” वह मन ही मन फुसफुसाई, “जागो… मै ुए कर सकती हूँ, मुझे आता है”

रघु के लंड ने कामिनी के अंतर्मन का जवाब तुरंत दिया।
कामिनी के हाथ की गर्मी पाते ही, उस बेजान मांस में खून दौड़ने लगा।
वह कामिनी की मुट्ठी के अंदर फैलने लगा, सख्त होने लगा।
कामिनी की आँखों में चमक आ गई। यह कामिनी के छुवन की ताकत थी। वह जादू कर रही थी।
जो लंड अभी मरा हुआ था, वह उसके छूने भर से ज़िंदा हो रहा था।
‘झूठा है रमेश… मैं ठंडी नहीं हूँ। मैं आग हूँ।’
लेकिन अभी परीक्षा बाकी थी।

“चूसना नहीं आता…” रमेश के कातिल शब्द कामिनी के मन मे चोट करने लगे.

कामिनी ने एक गहरी सांस ली।
रघु के लंड से एक तीखी, मर्दाना गंध उठ रही थी—पसीने, मूत्र और वीर्य की मिली-जुली गंध। यह गंध किसी इत्र से ज्यादा नशीली थी।

कामिनी ने अपना चेहरा झुकाया।
उसकी सांसें रघु के लंड पर टकराईं, जिससे वह लंड हल्का सा फड़फड़ाया।
कामिनी ने अपनी जुबान बाहर निकाली।
लाल, गीली जुबान।
उसने रघु के लंड के सुपारी पर, जो अब सख्त होकर चमक रहा था, एक लंबी चाट मारी।
स्लर्रर्रप…
उसका स्वाद नमकीन था। कसैला था।
कामिनी को घिन आनी चाहिए थी। आती भी थी, लेकिन आज…. आना उसे कोई घिन्न नहीं आई, उसकी आँखों मे आंसू थे, एक जज्बा था, वो खुद को औरत साबित कर देना चाहती थी, उसने ये भी नहीं देखा की सामने वाला आदमी नौकर है, एक शराबी, मजदूर है, जिसका लंड वो चाट रही है,

उसे घिन नहीं आई। उसे एक अजीब सा विजयी नशा चढ़ गया।
उसने अपनी जुबान की नोक से उस लंड के छेद को कुरेदा।
और फिर…
उसने अपना मुंह पूरा खोला।
उसने अपने होंठों को गोल किया और उस मोटे मुसल्ल को अपने मुंह के अंदर ले लिया। सुर्ख लाल होंठो के बीच काला गन्दा लंड घुसने को तैयार था,

ग्ल्लप…
गर्म, सख्त मांस उसके गीले मुंह के अंदर घुस गया।
कामिनी का मुंह भर गया था, लेकिन वह रुकी नहीं।
वह उसे चूसने लगी।
अपने गालों को पिचकाकर उसने वैक्यूम बनाया।
चप… चप… चप…
कमरे में सिर्फ़ उसके चूसने की गीली आवाज़ें गूंज रही थीं।
वह अपनी जीभ को लंड के नीचे वाली नसों पर फिरा रही थी, और अपने होंठों से सुपारी को चूम रही थी।
उसका सिर लय में ऊपर-नीचे हो रहा था।
उसके कानों में जो झुमके थे, वो हिल रहे थे। मांग का सिंदूर चमक रहा था।

एक सुहागन औरत, माथे पर बिंदी, गले में मंगलसूत्र… और मुंह में नौकर, शराबी मजदूर का लंड।
यह दृश्य जितना पापपूर्ण था, उतना ही कामुक।
रघु नींद में ही कसमसाया।
“उह्ह्ह…” उसके मुंह से एक भारी आवाज़ निकली।
कामिनी के मुंह का जादू चल गया था।
रघु का लंड अब अपनी पूरी ताकत के साथ खड़ा हो चुका था। वह कामिनी के गले तक जाने की कोशिश कर रहा था।
वह लोहे की रॉड बन चुका था।
कामिनी की आंखों से पानी बहने लगा (गले में लंड जाने की वजह से), लेकिन उसने छोड़ने से मना कर दिया।
वह उसे और जोर से चूसने लगी।
उसे परवाह ही नहीं थी की रघु जग गया तो क्या होगा? वो क्या सोचेगा? वो अपनी धुन, अपने गुस्से मे थी.

वह अपने पति को, शमशेर को, और पूरी दुनिया को दिखा रही थी—
‘देखो… यह खड़ा है। लोहे जैसा खड़ा है। और यह मैंने किया है। मैं रंडी नहीं हूँ, मैं जादूगरनी हूँ। मैं किसी को भी पिघला सकती हूँ। मुझमे वो अप्सरा जैसा आकर्षण है.

स्टोर रूम में सिर्फ़ चूसने की आवाज़ें गूंज रही थीं। चप… चप… ग्लप…
कामिनी पूरी शिद्दत से रघु के लंड को अपने मुंह में लिए हुए थी। वह अपनी जीभ और गालों का ऐसा इस्तेमाल कर रही थी जैसा उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। उसे एक जूनून सवार था—अपने पति को गलत साबित करने का। उसने कभी ऐसा नहीं किया था, बस आज किस आवेश मे कर गई पता नहीं.
सम्भोग कला इंसान स्वम सीखता है, उसे कोई सिखाता नहीं, इसका ताज़ा उदाहरण थी कामिनी.

रघु का लंड उसके मुंह में किसी पत्थर की तरह सख्त हो चुका था।
तभी, रघु का शरीर कसमसाने लगा।
नशे और गहरी नींद के बीच, उसे अपनी जांघों के बीच हो रही उस हलचल का एहसास होने लगा था। उसे लगा जैसे वह कोई हसीन सपना देख रहा है।

अचानक, रघु ने अपना भारी, खुरदरा हाथ उठाया और कामिनी के सिर के पीछे रख दिया।
उसने अपनी उंगलियां कामिनी के रेशमी बालों में फंसा दीं।
और फिर… एक झटके में उसने कामिनी के सिर को नीचे दबा दिया।
ग्लक…
रघु का लंबा लंड कामिनी के हलक तक उतर गया।
कामिनी की सांस रुकने को हो गई। उसकी आँखों से पानी निकल आया। वह सिर पीछे खींचना चाहती थी, लेकिन रघु की पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी।
रघु नींद में ही बड़बड़ाया—
“चूस सुगना… चूस मेरी जान… क्या चूसती है तू… आह्ह्ह…”
उसकी आवाज़ में एक तड़प थी, एक पुराना प्यार था। वह कामिनी को अपनी मरी हुई बीवी ‘सुगना’ समझ रहा था।
“मज़ा आ गया… पूरा मुंह में ले… छोड़ना मत…”
रघु अपनी कमर को ऊपर उठाने लगा, जिससे उसका लंड कामिनी के मुंह में और गहराई तक जाने लगा.

कामिनी एक पल को डर गई। उसे लगा रघु जाग गया है।
लेकिन उसकी बंद आँखें और ‘सुगना’ का नाम सुनकर वह समझ गई कि वह अभी भी नशे और नींद के आगोश में है।
इस अहसास ने कामिनी के डर को कम किया और उसकी उत्तेजना को बढ़ा दिया।
उसने विरोध करना छोड़ दिया।
उसने अपनी जीभ को और तेज़ कर दिया। उसके मुंह से थूक और लार की धार रघु के लंड और अंडकोषों पर बहने लगी।
करीब 5 मिनट की उस जंगली चुदाई के बाद…
रघु का बदन अकड़ गया। उसके पैरों की उंगलियां मुड़ गईं।
उसने कामिनी के बालों को जड़ से पकड़ लिया और उसे हिलने नहीं दिया।
“आअह्ह्ह…. सुगना… तूने मार डाला…. मैं गया…”
रघु के लंड में एक भयानक विस्फोट हुआ।
पिच… पिच… पिच…
गाढ़ा, गर्म और कसैला वीर्य की एक बाढ़ कामिनी के मुंह के अंदर छूट पड़ी।
वह फव्वारे की तरह उसके गले में, उसकी जीभ पर और उसके दांतों पर गिर रहा था।
जैसे ही वीर्य छूटा, कामिनी को होश आया।

घिन और यथार्थ का एक झटका लगा। वह मुंह हटाना चाहती थी, थूकना चाहती थी।
लेकिन रघु ने कस के उसका पूरा मुंह अपने लंड पर दबाया हुआ था। वह उसे हिलने नहीं दे रहा था।
कामिनी न चाहते हुए भी मजबूर थी।

रघु का सारा वीर्य, बूंद-बूंद करके कामिनी के मुंह में समा गया। उसका मुंह पूरी तरह भर गया था। उसे सांस लेने के लिए कुछ हिस्सा निगलना भी पड़ा।
थोड़ी देर बाद, रघु का शरीर ढीला पड़ गया। उसकी पकड़ ढीली हुई।
कामिनी ने झटके से अपना सिर पीछे खींचा।
पॉप…
एक आवाज़ के साथ लंड बाहर निकला। उसके होंठों से एक तार लार और वीर्य का जुड़ा हुआ था जो टूट कर रघु की जांघ पर गिर गया।
कामिनी हांफ रही थी।
वह जैसे-तैसे लड़खड़ाते हुए उठी। उसने एक बार रघु को देखा जो अब शांत होकर सो गया था।
वह वहां से भागी।
गार्डन पार किया, पिछला दरवाज़ा खोला और बदहवास होकर अपने बेडरूम में घुसी।
उसकी सांसें फूली हुई थीं। उसका पूरा मुंह, जीभ और गला उस कसैले, नमकीन स्वाद से भरा हुआ था।
रघु का ‘बीज’ उसके अंदर था।
उसमें कुल्ला करने या बाथरूम जाने की भी हिम्मत नहीं थी। उसका जिस्म जल रहा था—शर्म से, थकान से और उस अजीब से नशे से।
वह धम्म से बिस्तर पर गिर गई,
उसकी जाँघे बुरी तरह से गीली थी, लग रहा था जैसे किसी ने जलता कोयला अंदर राख दिया हो.
कामिनी से रहा नहीं गया, उसने हाथ अपनी जांघो के बीच डाल बहार निकाल लिया, उसकी आँखों के सामने सफ़ेद चासनी सी लकीर उसकी उंगलियों मे फसी हुई थी.

आआआहहहहह…… कामिनी कांप उठी, उसकी चुत ने इतना पानी आजतक नहीं छोड़ा था.
वो खुद नहीं जानती थी वो क्या कर रही है, क्यों कर रही है. बस अपने जिस्म की गुलाम होती जा रही थी.
उसकी नजरें अपनी ऊँगली के बीच रिसती चासनी पर थी.

उसे समझ जाना चाहिए था की वो बेइज़्ज़त हो कर भी उत्तेजित हो जाती है, लेकिन ये सामन्य घटना नहीं थी,.
भला कौन औरत अपने अपमान मे उत्तेजित होती है.
या फिर कामिनी को आदत हो गई थी रमेश की मार पिट की उसकी बेइज़्ज़ती की.
कामिनी दुविधा मे थी, भयंकर दुविधा मे.
वो कभी खुद को 18 साल की महसूस करती, जिसे भावनात्मक प्यार चाहिए होता है तो कभी खुद को प्यासी औरत महसूस करती जिसे सिर्फ लंड चाहिए भले वो किसी का भी हो, ऐसा ना होता तो वो रघु जैसे मेले कुचले शराबी आदमी का लंड चूसने की हिम्मत कर पति.
वो खुद सकते मे थी की उसने ऐसा कर कैसे लिया, उसकी अंतरात्मा इसे धिक्कार रही थी.
“साली रंडी……”

कामिनी की आंखे भर आई.

थकान इतनी ज्यादा थी कि न जाने कब उसकी आंख लग गई, उसे पता ही नहीं चला।

कुछ देर बाद (स्टोर रूम में):
स्टोर रूम में सन्नाटा था।
रघु की आंखें धीरे-धीरे खुलीं। नशा थोड़ा कम हुआ था।
उसने एक गहरी सांस ली। उसे लगा जैसे उसने एक बहुत ही प्यारा सपना देखा है—सुगना उसके पास थी, उसे प्यार कर रही थी।
लेकिन फिर उसे अपनी जांघों के बीच एक अजीब सा गीलापन और ठंडक महसूस हुई।
रघु ने उठकर देखा।
उसका लंड अभी भी आधा खड़ा था।
लेकिन वह गीला था।
वह थूक, लार और वीर्य से लथपथ था। उसकी जांघों पर सफ़ेद, चिपचिपा द्रव बिखरा हुआ था।
रघु सन्न रह गया।
उसने अपनी उंगली से उस गीलेपन को छुआ और सूंघा।
“यह क्या?” रघु का दिमाग चकरा गया।
“यह सपना था… या हकीकत?”
अगर यह सपना था, तो इतना गीलापन कहाँ से आया?
और अगर यह हकीकत थी… तो….
उसकी नजर ज़मीन पर पड़ी उसने देखा।
वहां धूल में कांच की चूड़ी का एक छोटा सा, चमकीला टुकड़ा पड़ा था।

रघु के चेहरे पर एक अजीब सी हैरानी ने जगह ले ली….
“मेमसाब…” वह बुदबुदाया।

सुबह के 8 बज रहे थे।
कमरे की खिड़की से धूप की एक तीखी किरण कामिनी के चेहरे पर पड़ी। वह हड़बड़ा कर उठी।
सिर भारी था, जैसे कोई पत्थर रखा हो।
जैसे ही उसे होश आया, उसे अपने मुंह के अंदर एक अजीब सा कसैला और बासी स्वाद महसूस हुआ।
याददाश्त का एक झोंका आया—कल रात… स्टोर रूम… रघु का वीर्य… और उसका निगलना।

“उबक…”

कामिनी को एक ज़बरदस्त उबकाई आई। उसे लगा वह उल्टी कर देगी। उसे तुरंत अपना मुंह साफ़ करना था, उस ‘गंदगी’ को खुरच कर बाहर निकालना था।
उसने बाथरूम की तरफ देखा, लेकिन अंदर से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी। रमेश अंदर था।
कामिनी के पास इंतज़ार करने का वक़्त नहीं था। उसका पेट मचल रहा था।
वह बिस्तर से उठी और भागते हुए कमरे से बाहर निकली।
वह सीधे हॉल में बने कॉमन बाथरूम की तरफ दौड़ी।

हड़बड़ाहट और उबकाई के मारे उसने यह चेक भी नहीं किया कि अंदर कोई है या नहीं। उसे लगा बंटी और रवि तो स्कूल चले गये होंगे,

उसने झटके से बाथरूम का दरवाज़ा धकेला।
कुंडी शायद ठीक से नहीं लगी थी या खुली थी, दरवाज़ा एक बार में ही खुल गया।
और सामने का दृश्य देखकर कामिनी के कदम वहीं फ्रीज़ हो गए। उसकी आंखे फटी की फटी रह गई,
सामने शावर के नीचे रवि खड़ा था।
बिल्कुल नंगा।
पानी की बूंदें उसके कसते हुए, गोरे और जवान बदन से फिसल रही थीं।
दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनकर रवि चौंक गया। वह मुड़ा।

उसकी आँखों में हैरानी थी, उसके सामने अप्सरा खड़ी थी मुँह पर हाथ रखे, रवि खुद हक्का बक्का था, उसने कभी ऐसी परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी.
उसने अपना बदन छुपाने की कोशिश नहीं की।

सामने उसके दोस्त की माँ, कामिनी खड़ी थी—बिखरे बाल, अस्त-व्यस्त साड़ी और चेहरे पर हवाईयां।
कामिनी को तुरंत भाग जाना चाहिए था। उसे चीखना चाहिए था या माफ़ी मांगकर दरवाज़ा बंद कर देना चाहिए था।
लेकिन… उसे सांप सूंघ गया।
उसकी नज़रें रवि के चेहरे से फिसलकर, उसके चौड़े सीने, सपाट पेट से होते हुए सीधे नीचे चली गईं।
और वहां जाकर चिपक गईं।

कामिनी ने अब तक अपने जीवन में सिर्फ़ दो तरह के लंड देखे थे (पति के अलावा)—रघु का और शमशेर का।
दोनों काले थे। भद्दे थे। घने, काले और जंगली बालों से घिरे हुए। उनमें एक ‘जानवर’ जैसा खुरदरापन था।
लेकिन रवि?
रवि का लंड… खूबसूरती की एक मूरत था।
वह गोरा-चिट्टा था। बिल्कुल साफ़-सुथरा।
रवि ने अपनी जांघों के बीच के बाल पूरी तरह साफ़ कर रखे थे। वहां एक भी बाल नहीं था, सिर्फ़ चिकनी, गोरी चमड़ी थी।
और उस चिकनी जगह के बीचो-बीच… उसका लंड शान से लटक रहा था।
वह इस उम्र (20 साल )में भी काफी बड़ा और मोटा था, लेकिन उसमें एक सुडौलपन था।
उसका रंग बाकी शरीर की तरह ही हल्का सांवला-गोरा था, लेकिन उसका सुपारी, वह बिल्कुल गुलाबी (Pink) था।
ताज़े खिले हुए गुलाब की तरह।
कामिनी की आँखें फटी रह गईं।
उसने कभी सोचा भी नहीं था कि एक मर्द का अंग इतना सुंदर भी हो सकता है।
रघु और शमशेर के लंड ‘हथियार’ लगते थे, डरावने लगते थे।
लेकिन रवि का लंड एक ‘फल’ जैसा लग रहा था—रसीला, साफ़ और ताज़ा।
शावर का पानी उस गुलाबी सुपारी पर गिर रहा था और फिसलकर नीचे जा रहा था।
ना जाने क्यों कामिनी के दिमाग में तुलना चलने लगी। जिस्म पर चीटिया सी रेंगने लगी.
‘इतना चिकना… इतना गोरा… रघु का तो काला नाग था… और यह? यह तो किसी राजकुमार जैसा है।’
रवि वहीं खड़ा था, पानी में भीगता हुआ।
उसका लंड, जो पहले शांत था, कामिनी की उन भूखी, ताड़ती हुई नज़रों को महसूस करके हल्का सा हिलने लगा।
उसमें हरकत हुई। वह धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा, जैसे सलामी दे रहा हो।
उस गुलाबी सुपारी का फूलना कामिनी को साफ़ दिखाई दे रहा था।
कामिनी एक भयंकर दुविधा में फंसी थी।
उसका दिमाग चीख रहा था— ‘भाग कामिनी… यह तेरे बेटे का दोस्त है… यह पाप है।’
लेकिन उसका जिस्म?
उसका जिस्म उस ‘खूबसूरत नज़ारे’ के सम्मोहन में जकड़ गया था।
वह उस चिकनेपन को छूना चाहती थी। वह देखना चाहती थी कि वह ‘गुलाबी हिस्सा’ कितना नरम होगा।
उसकी चूत, जो सुबह उठते ही शांत थी, इस नज़ारे को देखकर फिर से गीली हो गई।
एक गर्म धारा उसकी पैंटी में रिस गई।
कल रात उसने ‘काले और खुरदरे, रघु के लंड का स्वाद चखा था, वो इस हादसे से बहार निकली भी नहीं थी की, आज सुबह सुबह ही उसके सामने खूबसूरत अजूबा था, उसे लुभा रहा था.

कामिनी की सांसें फूलने लगीं। वह दरवाज़े के हैंडल को पकड़े, बस उस गुलाबी लंड को घूरे जा रही थी, जैसे किसी ने उस पर काला जादू कर दिया हो।

***************

कामिनी हक्की-बक्की थी। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था।
बाथरूम के दरवाजे पर उसके पैर जैसे फेविकोल से चिपक गए थे। न वह अंदर जा पा रही थी, न बाहर आ पा रही थी। उसकी आँखें रवि के उस ‘खूबसूरत’ अंग पर टंगी हुई थीं।
तभी…
रवि के उस खड़े लंड ने एक हल्का सा झटका लिया।

वह मांसल गुलाबी सुपारी हवा में फड़फड़ाया।
इस एक मामूली से झटके ने कामिनी को सपनों की दुनिया से खींचकर धरातल पर पटक दिया।

उसे होश आया कि वह क्या कर रही है।
वह घबराकर एक कदम पीछे हटी।
उसने हड़बड़ाहट में बाथरूम का दरवाज़ा अपनी तरफ खींचा और बंद कर दिया।
धप्प…
दरवाज़ा बंद होते ही कामिनी उसी दरवाजे से अपनी पीठ टिकाकर खड़ी हो गई।

उसकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
तभी अंदर से शावर के पानी के शोर के बीच रवि की मखमली आवाज़ आई—
“Sorry आंटी… मैं जल्दी में दरवाज़ा बंद करना भूल गया था।”
उसकी आवाज़ में शर्मिंदगी कम और एक अजीब सी ‘शरारत’ ज्यादा थी।
कामिनी का गला सूख रहा था। उसके मुंह में अभी भी रघु के वीर्य का वह कसैला और बासी स्वाद भरा हुआ था, जिसकी वजह से उसे उबकाई आ रही थी।
लेकिन रवि की आवाज़ और उस ‘गुलाबी लंड’ की छवि ने उसके दिमाग पर ऐसा असर किया कि उसने अनजाने में ही…
गटक…
उसने अपने मुंह में जमा थूक (और उस कसैले स्वाद) को निगल लिया।
हैरान कर देने वाली बात यह थी कि जैसे ही वह कड़वा घूंट उसके गले से नीचे उतरा… उसकी उबकाई गायब हो गई।
पेट की वह मरोड़, वह उल्टी आने का अहसास… सब उस ‘जवान नज़ारे’ के नशे में दब गया।
उसने अभी-अभी एक जवान लड़के का साफ़-सुथरा, गुलाबी और खूबसूरत लंड देखा था। उस दृश्य ने उसके दिमाग से ‘गंदगी’ का ख्याल ही मिटा दिया।
“क… ककक… कोई बात नहीं…” कामिनी ने दरवाजे के बाहर से हकलाते हुए जवाब दिया।
और फिर वह वहां से भागी।
जैसे कोई भूत उसके पीछे लगा हो। नंगे पैर वह हॉल पार करते हुए सीधे अपने बेडरूम में जा पहुंची।
बेडरूम में रमेश तैयार खड़ा था। वह नहा चुका था (कमरे वाले बाथरूम में) और कपड़े पहन रहा था।
कामिनी हांफते हुए अंदर आई।

उसका चेहरा पसीने से भीगा था और हवाइयां उड़ रही थीं।
रमेश ने मुड़कर उसे देखा। उसके चेहरे पर कल रात वाली हैवानियत का नामो-निशान नहीं था।
“अरे, आज कितना देर सोती रही तुम?” रमेश ने बड़े प्यार से, सामान्य लहजे में पूछा।
जैसे उसे कल रात का कुछ याद ही न हो। जैसे उसने कल अपनी बीवी को ‘रंडी’ नहीं बोला था, जैसे उसने उसे शमशेर के हवाले नहीं किया था।
यह उसका ‘ब्लैकआउट’ था या नाटक, कहना मुश्किल था।
“वो… वक… वो…” कामिनी कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन शब्द उसके गले में फंस गए। वह क्या बताती? कि वह अभी-अभी उसके दोस्त के बेटे का नंगा लंड देखकर आ रही है? या यह कि उसके मुंह में अभी भी रघु का स्वाद है?
रमेश ने घड़ी देखी।
“अच्छा सुनो, मैं निकल रहा हूँ। बहुत लेट हो रहा है। नाश्ता बाहर ही कर लूँगा।”
रमेश ने अपनी फाइल उठाई और कामिनी के पास से गुज़र गया।
उसने एक बार भी नहीं पूछा कि— तुम कांप क्यों रही हो? पसीने में क्यों हो? तुम्हारी आँखें लाल क्यों हैं?
रमेश चला गया।

कामिनी वहीं खड़ी रह गई—हैरान, पसीने से भीगी और कांपती हुई।

उसके दिमाग में अभी भी वही रील (Reel) चल रही थी—
बाथरूम का वो शावर… वो साफ़-सुथरा बदन… और वो गुलाबी, सुडौल लंड जो उसे सलामी दे रहा था।
उसकी चूत ने उस खूबसूरत नज़ारे को याद करके, एक बार फिर अपनी ‘सहमति’ की मोहर लगा दी थी।
उसकी जांघों के बीच एक ताज़ा गीलापन रिस आया था।

***********

रमेश के घर से निकलते ही कामिनी ने मुख्य दरवाज़ा बंद किया और सीधे अपने बेडरूम की तरफ भागी।
उसकी चाल में एक अजीब सी हड़बड़ाहट थी। उसकी पैंटी, जो रवि के उस ‘गुलाबी नज़ारे’ को देखकर गीली हुई थी, अब उसकी जांघों से चिपचिपे पदार्थ की तरह चिपक रही थी। वह गीलापन उसे किसी तेज़ाब की तरह जला रहा था।
वह बाथरूम में घुस गई।
उसने अपने कपड़े उतारने शुरू किए। साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज… उसने सब कुछ ऐसे नोच कर फेंका जैसे वे कपड़े नहीं, बल्कि कांटे हों जो उसके जिस्म को चुभ रहे हों।
जैसे ही आखिरी कपड़ा (गीली पैंटी) उतरा, कामिनी ने राहत की सांस ली।
उसने बाथरूम के बड़े आईने में अपने नंगे जिस्म को देखा।

और देखती ही रह गई।
आज उसका बदन सिर्फ़ नंगा नहीं था, वह बोल रहा था।
उसकी त्वचा पर एक अजीब सी, मादक चमक थी—जैसे किसी ने उसे तेल से नहला दिया हो।
उसके स्तन आज पहले से कहीं ज्यादा भारी और फूले हुए लग रहे थे।

उसके निप्पल, जो अक्सर मुलायम रहते थे, आज एकदम कड़क होकर बाहर निकले हुए थे। उनका रंग गहरा कत्थई हो गया था और वे ऐसे तने हुए थे जैसे किसी के स्पर्श के लिए भीख मांग रहे हों।
कामिनी की नज़र नीचे फिसली।
उसकी नाभि गहरी थी, और उसके नीचे… उसकी चूत।
वह किसी फूली हुई, गरम कचौरी जैसी लग रही थी।
उसके होंठ सूज कर मोटे हो गए थे, बहार को उभर आये थे और हल्के खुले हुए थे।

वहां अब छोटे-छोटे, काले बाल उग आए थे, जो उस गुलाबी दरार को एक जंगली रूप दे रहे थे। वह नज़ारा इतना कामुक था कि कामिनी को खुद अपने ही जिस्म को देखकर नशा होने लगा।
उसका हाथ अनजाने में अपनी जांघों के बीच जाने के लिए उठा।
लेकिन वह बीच हवा में ही रुक गई।
उसे डर लगा।
‘नहीं… अगर मैंने अभी खुद को छुआ… तो मैं यहीं गिर जाऊंगी। मैं दम तोड़ दूंगी।” उसकी जाँघे कांप रही थी, वो खुद अपने जिस्म की गर्मी से डर रही थी.
एक बेचैन, कामवासना मे तड़पती औरत भला कर भी क्या सकती है, खुद को छूना भी उसके लिए मुश्किल हो रहा था,

उसने तुरंत शावर का नॉब घुमाया।
छनन्नन्न…

ठंडा पानी उसके तपे हुए बदन पर गिरने लगा। ऐसा लगा हो जैसे ठंडा पानी पड़ने से उसके गर्म जिस्म से भाँप निकल रही हो.
जैसे-जैसे पानी उसके स्तनों और पेट से होकर नीचे बह रहा था, उसके जिस्म की गर्मी तो शांत होने लगी, लेकिन दिमाग का तूफ़ान तेज हो गया।
अचानक, उसे एक ज़बरदस्त आत्मग्लानि (Guilt) महसूस हुई।
कल रात की यादें किसी डरावनी फिल्म की तरह उसके दिमाग में चलने लगीं।
स्टोर रूम का अंधेरा… रघु का पसीने से भीगा लंड… और उसका मुंह में लेना।
“वेककक…”
कामिनी को एक ज़बरदस्त उबकाई आई। उसने अपना मुंह हाथों से ढक लिया।
‘छिः कामिनी… तू इतनी गिर गई? तूने एक शराबी, गंदे मजदूर का लंड चूसा?’
उसे अपने मुंह में वही कसैला स्वाद फिर से महसूस होने लगा।
‘क्या मैं सच में रंडी बन गई हूँ? रमेश सही कहता था क्या?’

उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कार रही थी। वह एक इज़्ज़तदार घर की बहू थी, एक बेटे की माँ थी। उसने यह सब कैसे किया?
और सबसे बड़ी बात— उसे यह सब आया कैसे?
उसने तो आज तक रमेश का भी ठीक से नहीं चूसा था। फिर कल रात उसने रघु के लंड को इतनी महारत से, इतनी गहराई तक (Deep Throat) कैसे लिया? जैसे वह वर्षों से यही काम करती हो।

‘किसने सिखाया मुझे? मेरे अंदर यह कौन सी औरत छिपी है?’

वह पानी के नीचे खड़ी रोती रही। आंसू और पानी मिलकर उसके गालों से बहते रहे। वह अपने पापों को धोने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वह जानती थी कि यह दाग पानी से नहीं धुलेंगे।

करीब 15 मिनट बाद वह बाहर निकली।
उसने खुद को पोंछा, लेकिन रगड़-रगड़ कर नहीं, बल्कि बहुत धीमे से। उसका जिस्म अभी भी संवेदनशील (Sensitive) था।
उसने एक सूती साड़ी पहनी और गीले बालों पर तौलिया लपेट लिया।

जब वह तैयार होकर आंगन में आई, तो रवि और बंटी स्कूल जाने के लिए तैयार खड़े थे।
कामिनी की नज़रें ज़मीन पर थीं। वह रवि का सामना नहीं करना चाहती थी।
लेकिन रवि की नज़रें उसी पर थीं।
रवि के चेहरे पर एक विजयी और शरारती मुस्कान थी। वह जानता था कि कामिनी ने उसे नंगा देखा है, लेकिन कामिनी का उस से नजर ना मिलाना क्या है?
रवि मन ही मन डर भी रहा था कहीं आंटी उस पर चिल्लाये ना.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ,

कामिनी उसे कनखियों से देख रही थी, लेकिन नज़रें मिला नहीं पा रही थी। उसका दिल ‘चोर’ की तरह धड़क रहा था।
“माँ…” बंटी ने अपनी माँ का ध्यान खींचा।
“आज प्लीज़ गाजर का हलवा बनाओ ना? रवि को बहुत पसंद है। इसने कल ही बोला था।”

कामिनी ठिठक गई।
गाजर का हलवा?
रवि को गाजर का हलवा बहुत पसंद है?
कामिनी ने धीरे से सिर उठाया और रवि को देखा।
रवि ने अपनी जीभ हल्का सा अपने होंठों पर फेरी, जैसे स्वाद ले रहा हो। यह इशारा हलवे के लिए था या कामिनी के लिए, यह समझना मुश्किल नहीं था।

“ठी… ठीक है… बेटा,” कामिनी की आवाज़ लड़खड़ा गई, “बना दूंगी।”
उसने एक बहुत ही फीकी और कमज़ोर मुस्कान दी। वह न तो ना कह सकती थी, न ही इस माहौल से भाग सकती थी।
“चलो भाई, लेट हो रहा है,” रवि ने बंटी के कंधे पर हाथ रखा और दोनों निकल गए।
दरवाज़ा बंद होते ही कामिनी ने एक गहरी, लंबी सांस छोड़ी।
“हम्म्म्म्म…”
उसने अपने सीने पर हाथ रखा। धड़कनें अब जाकर काबू में आ रही थीं।
लेकिन घर का सन्नाटा उसे खाने को दौड़ रहा था।
उसे याद आया कि बाथरूम में उसके ‘पापों की गठरी’ (गीले कपड़े) पड़ी है।
कामिनी ने बाल्टी उठाई। उसमें उसकी वह ब्रा, ब्लाउज और गीली पैंटी थी, जिसमें उसकी उत्तेजना की गंध बसी थी।
वह भारी कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
छत पर कपड़े सुखाने थे।
धूप तेज़ थी, लेकिन कामिनी का मन अंधेरे में था।

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