रात जैसे तैसे करके गुजर गई आज की रात ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिस से मां बेटे दोनों बेहद करीब आ सके,,,,, सुबह के 5:00 बज रहे थे,, सुगंधा की नींद जल्दी खुल चुकी थी वह धीरे से अपने बिस्तर पर से नीचे उतरी और अपने कमरे के बाहर आ गई बाथरूम जाने के बाद वह हाथ मुंह धोकर फ्रेश हो गई,, आज उसे अपने बेटे के कहीं अनुसार पैदल चलना था थोड़ा दौडना था ताकि उसका बदन और भी ज्यादा आकर्षक बन सके,, अंकित के कमरे पर जाकर दरवाजे पर दस्तक देने लगी,,, थोड़ी ही देर में दस्तक की आवाज सुनकर अंकित की भी नींद खुल गई लेकिन नींद में होने की वजह से ऐसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था इसलिए वह बोला।
कौन ,,,,,
अरे मैं हूं,,,,, भूल गया आज दौड़ने चलना है,,,,।
(इतना सुनते ही अंकित की नींद एकदम से उड़ गई वह बिस्तर पर से उठकर खड़ा हो गया और जल्दी से दरवाजा खुला तो देखा दरवाजे पर उसकी मां खड़ी थी जो की एकदम तरोताजा दिखाई दे रही थी यह देखकर वह बोला,,,)
तुम तो बहुत खूबसूरत लग रही हो,,,,,, रुको मैं भी तैयार हो जाता हूं,,,,(इतना कहकर वह तुरंत बाथरूम में चला गया वह जानबूझकर अपनी मां की खूबसूरती की तारीफ किया था क्योंकि वह इतना तो समझ गया था कि वह औरत क्या सुनना चाहती हैं क्या सुनना पसंद करती है,,,, सुगंधा भी हैरान थी अपने बेटे के मुंह से अपनी खूबसूरती की तारीफ सुनकर लेकिन अपने बेटे के मुझे अपनी खूबसूरती की तारीफ सुनकर वह फुले नहीं समा रही थी,,, और वैसे भी सुबह-सुबह वह अपनी साड़ी को कमर में खोंस ली थी और अपने रेशमी बालों की गुच्चो का जुड़ा बना ली थी और इसकी लत उसके गोरे गाल पर लहरा रही थी वाकई में इस समय सुगंधा कुछ ज्यादा ही खूबसूरत दिखाई दे रही थी,,,, थोड़ी देर में हाथ मुंह धो कर अंकित भी फ्रेश हो गया और फिर दोनों घर से बाहर निकल गए लेकिन घर में कोई न होने की वजह से सुगंधा घर में ताला लगा दी थी ताकि कोई चोर चोरी ना कर सके।
सुबह का समय होने की वजह से बहुत ही शीतल हवा बह रही थी जो गर्मी के महीने में बदन को शीतलता प्रदान कर रही थी,, पर वैसे भी सुबह का समय कुछ ज्यादा ही खूबसूरत दिखाई देता है अभी सूरज निकला नहीं था इसलिए चारों तरफ अंधेरा ही था लेकिन सड़क पर की स्ट्रीट लाइट जल रही थी और ईक्का दुक्का लोग जॉगिंग करते हुए नजर आ रहे थे,,, जिनमें औरतें भी थी लड़कियां भी थी,,, सुगंधा औरतों के मोटे बदन को देखकर समझ गया था कि इन लोगों को जोगिंग करने की जरूरत क्यों पड़ती होगी लेकिन पतली और तो लड़कियों को देखकर भी इतना तो समझ में आ रहा था कि यह लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति कितने जागरूक है,,,, मोटी औरतों को देखकर सुगंधा के मन में भी ढेर सारे सवाल उठ रहे थे,,, उनमें से अपने मन में उठ रहे एक सवाल को अपने बेटे के सामने ही प्रस्तुत करते हुए बोली,,,,।
बाप रे और से सच में अपने शरीर का बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखते देखो तो सही कितनी मोटी है ठीक से चला भी नहीं जा रहा है,,,।(जल्दी-जल्दी अपने कदम को आगे बढ़ते हुए सुगंधा बोली,,)
सब तुम्हारी तरह जागरूक थोड़ी होते हैं मुझे लगता है कि वह औरत तुमसे कम उम्र की होगी लेकिन उसके शरीर के हिसाब से वह कितनी बड़ी लग रही है अगर वह भी तुम्हारी तरह जागरूक होती तो वह भी आज तुम्हारी तरह दिखती,,,, एक तरफ वह औरतें हैं जो अपने शरीर का ख्याल नहीं रखती और एकदम मोटी हो गई है और एक तरफ तुम हो जो कसा हुआ बदन होने के बावजूद भी ऐसा महसूस कर रही हो कि मेरा पेट बाहर निकल रहा है,,,(अंकित अपनी मां के पेट की तरफ देखते हुए बोला जो कि एकदम चिकना और सपाट नजर आ रहा था बस हल्का सा बाहर निकला हुआ था और उसकी नाभि एकदम साफ दिखाई दे रही थी अपने बेटे की बात सुनकर वह भी अपने पेट की तरफ देखने लगे उसे भी एहसास हो रहा था कि उसकी गहरी ना अभी एकदम साफ दिखाई दे रही थी लेकिन फिर भी वह इस समय अपनी नाभि को अपने बेटे की नजर से बिल्कुल भी छुपाने की कोशिश नहीं की और उसकी बात सुनकर बोली,,)
अरे सच में मेरा पेट बाहर निकला हुआ है पहले ऐसा नहीं था,,,(जल्दी-जल्दी तेज कदम आगे बढ़ाते हुए वह बोली,,,,)
लेकिन मम्मी तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम्हारा पेट बाहर निकल गया है मुझे तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लग रहा है,,,।
अरे तुझे क्या मालूम तु क्या देखता रहता है क्या,,,?
तो क्या मैं तुम्हें देखा नहीं हूं क्या,,, तुम्हें भी अच्छी तरह से याद होगा कि मैं तुम्हें देखता हूं कि नहीं,,,(अंकित दो अर्थ वाली बात कर रहा था उसकी मां भी अपने बेटे की बात को अच्छी तरह से समझ रही थी वह भी अच्छी तरह से जानती थी कि उसका बेटा उसे बहुत बार दे नग्न अवस्था पूर्ण नग्न अवस्था और तो और उसे पेशाब करते हुए भी देख चुका है लेकिन फिर भी जानबूझकर वह ऐसा बोल रही थी,,, अपने बेटे की बात का मतलब अच्छी तरह से समझते हुए सुगंधा बोली,,,)
अरे जानती हूं तो बहुत बार देख चुका है लेकिन फिर भी मेरा शरीर है मुझे तो समझ में आता होगा ना कि मेरा शरीर बढ़ा है कि नहीं बढ़ा,,,,
चलो कोई बात नहीं अगर ऐसा है तो सही हो जाएगा और तुम और भी ज्यादा खूबसूरत दिखाई देने लगोगे अपनी उम्र से 10 साल कम,,,।
सच में,,,
तो क्या अभी भी तुम अपनी उम्र से 10 साल कमी लगती हो कोई कह नहीं सकता कि तुम्हारे दो दो जवान बच्चे हैं,,,।
अच्छा तो यहबात है,,,(सुगंधा मुस्कुराते हुए बोली उसे अपने बेटे की बातें बड़ी अच्छी लग रही थी दोनों बात करते-करते तकरीबन आधा किलोमीटर की दूरी तय कर चुके थे,,,, रास्ते में जॉगिंग करते हुए बहुत लोग दिखाई दे रहे थे ज्यादातर औरतें और औरतों का शरीर को ज्यादा ही मोटा उनकी बड़ी-बड़ी गांड की तरफ देख कर सुगंधा अपने मन में सोचती कि अगर वाकई में वह भी अपने शरीर का ख्याल ना रखती तो शायद उसका भी यही हाल हो जाता,,, अभी वह अपने मन में यही सोच रही थी कि तभी एक औरत की तरफ देखते हुए अंकित बोला,,,)
मम्मी मैं तो सोच करेंगे घबरा जाता हूं कि अगर तुम भी उस औरत की तरह हो जाती तो कैसा होता तुम्हारी खूबसूरती तो एकदम बेकार हो जाती।
(अंकित की बात सुनकर सुगंधा भी सूरज की तरफ देखने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)
ज्यादा से ज्यादा क्या हो जाता सिर्फ खूबसूरती चली जाती ना,,,।
किसी बात से कर रही हो मम्मी उसका पिछवाड़ा देखी हो,,,,(अंकित जानबूझकर इस तरह के शब्दों का प्रयोग कर रहा था और उसकी मां भी उसके मुंह से पिछवाड़ा शब्द सुनकर गनगना गई थी,,, क्योंकि उसे भी एहसास होने लगा था कि अंकित भी औरतों की गांड की तरफ देखता है,,, चलते फिर कुछ देर की खामोशी के बाद अपने शब्दों को पूरा करते हुए अंकित बोला,,,) कितना भारी भरकम है और तुम्हारा,,,,(इतना कह कर वह एकदम से खामोश हो गया,,,, ऐसा हुआ जानबूझकर किया था वह देखना चाहता था कि उसकी मां क्या कहती है लेकिन उसकी बातें सुनकर सुगंधा मन ही मन खुश हो रही थी क्योंकि वह उसऔरत के साथ-साथ उसकी भी गांड के बारे में बात कर रहा था लेकिन खुलकर बोल नहीं पाया था इसलिए उसकी अधूरी बात को सुगंधा पूरी करवाने हेतु बोली।)
तुम्हारा,,, मतलब कि मेरा,,,मेरा कैसा है,,,,।
(अंकित अच्छी तरह से समझ गया था कि अब धीरे-धीरे आगे बढ़ना है अपनी मंजिल को प्राप्त करना है अगर वह इसी तरह से शर्माता रहा तो महिना गुजर जाएगा और त्रप्ति भी वापस आ जाएगी सब कुछ नहीं हो पाएगा इसलिए वह थोड़ा हिम्मत उठाकर बोला,,,)
तुम्हारी तो बहुत खूबसूरत है उसका उठाव उसका उभार एकदम लाजवाब,, है,,,,।(सड़क पर लगी स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़े होते हुए अंकित बोला क्योंकि वह दोनों चलते-चलते काफी दूर तक आ चुके थे तकरीबन 1 किलोमीटर की दूरी दोनों ने तय कर लिया था और यह कुछ ज्यादा ही था पहले दिन के लिए,,,, सुगंधा भी वहीं पर रुक गई थी अपने बेटे की बात सुनकर उसके बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी थी क्योंकि वह वाकई में खुले तौर पर ना सही लेकिन उचित शब्दों का प्रयोग करके उसकी गांड की तारीफ कर रहा था,,, सुगंधा मुस्कुरा रही थी और अंकित की तरफ देखते हुए बोली,,,)
अच्छा तुझे औरत के पिछवाड़े के उठाव और उभार के बारे में ज्यादा मालूम पडने लगा है।
नहीं है सब कुछ भी नहीं है लेकिन औरतों का पिछवाड़ा उसे औरत की तरह तो बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए क्योंकि कितना भद्दा लगता है,,,।
तो किसकी तरह होना चाहिए,,,,(सुगंधा एकदम मुस्कुराते हुए बोली,,, अंकित अपनी मां के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उसकी मां क्या सुनना चाहती है इसलिए वह भी हिम्मत जुटा कर बोला,,,)
तुम्हारी तरह,,,, सच कहता हूं औरतों का पिछवाड़ा तुम्हारी तरह होना चाहिए ,,,, एकदम आकर्षक और खूबसूरत,,,( तिरछी नजर से अपनी मां की गांड की तरफ देखते हुए बोला सुगंधा भी अपने बेटे के मुंह से अपनी गांड की तारीफ सुनकर भाभी नजर पीछे करके अपने नितंबों के उभार को देखकर मुस्कुराने लगी,,,,, और फिर वह एकदम सहज होते हुए बोली,,,)
अब क्या करना है आगे बढ़ना है या पीछे जाना है,,,,।
अभी सुबह होने में थोड़ा समय है थोड़ा आगे ही चलना चाहिए लेकिन दौड़ते हुए दौड़ तो लोगी ना साड़ी में,,,,।
वैसे कभी दौड़ी तो नहीं लेकिन कोशिश करूंगी,,,।
ठीक है ज्यादा जोर से नहीं भागना है आराम से ऐसा लगना चाहिए कि भाग रही है लेकिन चलने जैसा ही होना चाहिए वरना कहीं गिर गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे,,,।
ओहहह मेरी बहुत फिक्र है,,,।
होगी क्यों नहीं,,, इतनी खूबसूरत मम्मी जो है,,,, और जिसके पास इतनी खूबसूरत मम्मी होगी बेटे को तो ख्याल रखना ही होगा,,,।
(अंकित बड़ी चतुराई से बहुत कुछ भूल गया था और उसकी मां भी उसकी बात को अच्छी तरह से समझ रही थी इसलिए तो उसकी बात सुनकर उसके बदन में हलचल सी होने लगी थी,,, क्योंकि एक औरत की ख्वाहिश यही होती है कि उसे भी कोई बेइंतहा चाहने वाला हो उसकी फिक्र करने वाला हो,, उसे ढेर सारा प्यार करने वाला है और अब सुगंधा को लगने लगा था कि उसकी आंखों के सामने जो मर्द खड़ा है वही एक दिन उसे बहुत प्यार देगा,,,, अभी भी अंधेरा छाया हुआ था सड़क की स्ट्रीट लाइट का भी उपयोग प्रकाश के लिए हो रहा था,,, सुगंधा को पहली बार ऐसा लग रहा था कि वाकई में लोग अपने स्वास्थ्य के लिए इतने जागरुक है,,,, मां बेटे दोनों तैयार हो चुके थे आगे बढ़ने के लिए,,,, और फिर अंकित धीरे से अपना कदम आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे दौड़ने लगा उसके साथ उसकी मां भी दौड़ने लगी इस तरह से दौड़ने का सुगंधा के लिए पहला मौका था खास करके शादी के बाद क्योंकि ऐसी कोई जरूरत ही नहीं पड़ी थी कि उसे दौड़ना पड़े,,,,।
इस तरह से दौड़ते हुए उसे अपने जवानी के दिन याद आ जाए जब वह कॉलेज में जाया करती थी ऐसे ही एक दिन कॉलेज जाने में उसे देर हो गई थी बस छूट गई थी और वह एक हाथ में बैग लिए हुए दौड़ते दौड़ते ही कॉलेज की तरफ जा रही थी,,, और इस तरह से उसे दौड़ते हुए देखकर रास्ते में कई लोग कई कई तरह की बातें बना रहे थे उनमें से कुछ उसका हौसला बढ़ा रहे थे तो कुछ गंदी फब्तियां भी शामिल थे जिसे सुनकर उसे समय तो उसके कान खड़े हो गए थे उसने कभी सोचा नहीं था कि उसके बारे में लोग इस तरह की भी बातें करेंगे आज भी उसे अच्छी तरह से याद है जब वह दौड़ते हुए जा रही थी तो,,, उसे देखकर खास करके दौड़ते समय उसकी गांड के घेराव को देखकर जो की दौड़ते समय उनमें ज्यादा थिरकन हो रही थी,,, उसे देखकर एक लड़का बोला था,,, वाह क्या गांड है कसम से एक रात के लिए मिल जाए तो दोनों टांगें फैला कर इसकी गांड मार लुं,,, यह शब्द जैसे ही उसके कानों में पड़े थे वह एकदम से स्तब्ध रह गई थी पल भर के लिए तो उसके मन में आया कि वापस लौटकर उस लड़के के गाल पर दो-तीन थप्पड़ लगा दे लेकिन इतनी हिम्मत उसमें नहीं थी,,,, जैसे तैसे करके सुगंधा उस लड़के की बात को सहन कर गई थी लेकिन जैसे ही अपने कॉलेज के गेट पर पहुंची थी तो गेट पर खड़ा जमादार जो कि अधेड़ उम्र का था,,, वह भी उस पर गंदी फब्ति कसते हुए बोला ।
वाह क्या गांड है साली की,,, अगर मिल जाए तो इसकी बुर नहीं बल्कि गांड मारने में ही मजा आएगा,,,,, यह शब्द जैसे ही उसके कान में पड़े थे उसके तो होश उड़ गए थे,,, क्योंकि वह चौकीदार उसके बाप की उम्र का था और वह कभी सपने में नहीं सोचे थे कि इस उम्र के आदमी भी लड़कियों को देखकर लार टपकाते होंगे,,,, उसकी बात सुनकर सुगंधा दौड़ते हुए ही पीछे नजर घुमा कर देखी थी और उसे चौकीदार की नजरों को जब वह अपनी गांड के इर्द-गिर्द घूमता हुआ महसूस की तो वह मारे शर्म के पानी पानी हो गई थी,,, उसके मन में हुआ कि उसे चौकीदार की शिकायत प्रिंसिपल को कर दे लेकिन फिर वह अपने मन में सोचने लगी की प्रिंसिपल को जाकर वह बोलेगी क्या किन शब्दों में शिकायत करेगी क्योंकि इस तरह के असली शब्दों का प्रयोग कभी अपने जुबान पर नहीं की थी,,, और फिर काफी सोच समझने के बाद वह कुछ बोली नहीं और अपनी क्लास रूम में चली गई।
वह दिन था और उसके बाद आज का दिन है जब वह दौड़ रही थी वैसे तो जवानी के दिनों में उसके बाद में कुछ ज्यादा ही फुर्ती थी और बदन भी छरहरा था इसलिए भागने में बिल्कुल भी दिक्कत नहीं आती थी लेकिन अब समय बदल चुका था उम्र के हिसाब से अब वह ज्यादा तेज नहीं तोड़ सकती थी लेकिन फिर भी काम चलाने के लिए वह धीरे-धीरे दौड़ लगा रही थी,,,, दौड़ लगाते हुए अंकित अपनी मां को ही देख रहा था वह तिरछी नजर से अपनी मां के ब्लाउज की तरफ देख रहा था क्योंकि भागने की वजह से उसके घर पहुंचे जैसी चूचियां उछल रही थी और अंकित को साफ एहसास हो रहा था कि उसकी मां ब्लाउज के अंदर ब्रा नहीं पहनी थी,, इसलिए उसके दोनों कबूतर एकदम बेकाबू हो चुके थे ब्लाउज की कैद से बाहर निकलने के लिए,,, अपनी मां की वह चलती हुई चूचियों को देखकर अंकित अपने मन में सोच रहा था कि नानी की चूचियों की तरह उसे अपनी मां की भी चूचियों को दबाने का मौका मिल जाता तो कितना मजा आता,,,। ऐसा सोचता हुआ वह मस्त हुआ जा रहा था,,, सुगंधा भी जब तिरछी नजर से अपने बेटे की तरफ देखी तो उसकी नजर को अपनी चूचियों के ईर्द गिर्द ही पाई तो वह एकदम से गनगना गई,,,।
वह अंदर ही अंदर एकदम खुश होने लगी थी क्योंकि उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि दौड़ने की वजह से उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां ब्लाउज में उछल रही थी,,, और उसे अभी मालूम था कि यह सब उसके ब्रा ना पहनने की वजह से हो रहा था,,,, अपने बेटे की नजर के बारे में जानने के बावजूद भी वह अपनी चूचियों के उछाल को बिल्कुल भी रोकने की कोशिश नहीं कर रही थी बल्कि वह उसी लय में आगे बढ़ रही थी,,, और अपने मन में सोच रही थी कि काश उसके ब्लाउज के सारे बटन टूट जाए और उसकी चूची एकदम से आजाद हो जाए एकदम नंगी हो जाए और उसका बेटा उसे अपने दोनों हाथों से थाम कर उसे ब्लाउज में वापस भरने की कोशिश करें और उसे जोर-जोर से दबाकर मजा ले,,,।
लेकिन यह सिर्फ उसकी सोच थी उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों का भारत के ब्लाउज के छोटे-छोटे बटन पर टिका हुआ था जो की मजबूती से एक दूसरे से हाथ मिलाकर बड़ी-बड़ी चूचियों के भार से ब्लाउज के बांध को टूटने से बचा रहे थे,,,, यह तो चुचियों का हाल था लगे हाथ अंकित अपनी मां के भारी भरकम गांड के भूगोल के बारे में भी समझ लेना चाहता था उसे अच्छी तरह से देख लेना चाहता था इसलिए अपनी मां से बात करते हुए बोला,,,।
कैसा लग रहा है मम्मी,,,?
आज तो बहुत अच्छा लग रहा है ऐसा लग रहा है कि मेरे जवानी के दिन लौट आए हो,,,।
जवानी के दिन गए ही कब थे मम्मी तो वापस आने का सवाल ही नहीं उठता,,, तुम पर तो जवानी पूरी तरह से छाई हुई है या युं कह लो की जवानी तुम पर पूरी तरह से मेहरबान है,,,,।
(अपने बेटे की आवाज सुनकर सुगंधा मन ही मन प्रसन्न हो रही थी,,, और उसे अपने बेटे की बातों में एक मर्दाना अंदाज चालक रहा था जो एक मर्द एक औरत के साथ बातें करते हुए शब्दों का प्रयोग करता है,,, अंकित की बातों से सुगंधा बहुत खुश थी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)
क्या बात है आज तो तो फिल्मी हीरो की तरह मेरी तारीफ पर तारीफ कर रहा है।
क्योंकि तुम तारीफ के लायक हो अभी तक मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी तुम्हारी खूबसूरती की तारीफ करने के लिए लेकिन बहुत हिम्मत उठाकर तुम्हारी खूबसूरती की तारीफ कर रहा हूं और यह बात तुम्हें भी अच्छी तरह से मालूम होगा कि वाकई में तुम कितनी खूबसूरत हो,,,,(अंकित अपनी मां की चूचियों की तरफ देखते हैं बोला और जब-जब सुगंध अपने बेटे की नजर को अपनी चूचियों के इर्द-गिर्द घूमती हुई पाती थी तब तब उसके बदन में सुरसुराहट सी होने लगती थी।,,, सुगंधा अपनी बेटी की बात सुनकर खुश हो रही थी लेकिन कुछ बोल नहीं पा रही क्योंकि उसके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं है लेकिन उनकी धीरे से अपनी मां से एक कदम पीछे हो गया था क्योंकि वह अपनी मां का पिछवाड़ा देखना चाहता था उसकी भारी भरकम गांड को दौड़ते समय कैसी दिखाई देती है यह देखना चाहता था। और शायद इसका एहसास सुगंधा को भी हो गया था,,, इसलिए वह बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रही थी अपने बेटे के साथ दौड़ने की,,, वह इस तरह से अपने बेटे से कदम आगे ही थी,,
अंकित को अब सब कुछ स्ट्रीट लाइट की रोशनी में एकदम साफ दिखाई दे रहा था,,, अंकित की मां की गांड दौड़ते समय कुछ ज्यादा ही उछल रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे वह खुद अंकित को इशारा कर रही हो कि लपक कर दोनों हाथों से उसे थाम ले,,,, कसी हुई साड़ी में सुगंधा की गांड कहर ढा रही थी,,, अंकित दौड़ते हुए अपनी मां की गांड को देखकर मत हो जा रहा था वाकई में उसकी मां की गांड उसने अब तक जितनी भी औरतों को देखा था उनमें से सबसे ज्यादा खूबसूरत गांड उसकी मां की ही थी,,,। अंकित तो देखता ही रह गया था सुगंधा को भी अच्छी तरह से मालूम था कि उसका बेटा क्या देख रहा होगा इसलिए वह चलते हुए तिरछी नजर से अपने बेटे की तरफ देखी तो एकदम से खुश हो गई क्योंकि जैसा वह सोच रही थी वैसा ही हो रहा था उसका बेटा उसकी गांड को ही देख रहा था,,,, तभी उसे एहसास हुआ की उसके पास से एक आदमी दौड़ता हुआ निकला जो कि उसकी तरफ ही देख रहा था,,,, और फिर तो ऐसे कई लोगों को उसने देखी जो उसे ही देख रहे थे,,, इस बात का एहसास अंकित को भी हो रहा था और वह अपनी मां की खूबसूरती से गर्व महसूस कर रहा था,,,। लेकिन इस बात का एहसास हुआ अपनी मां को करना चाहता है इसलिए वह फिर से अपनी मां के साथ दौड़ने लगा और दौड़ते हुए अपनी मां से बोला,,,,।
देख रही हो मम्मी आते जाते सभी लोग की नजर तुम पर ही है,।
नहीं तो मुझे तो नहीं लग रहा है,,,(सुगंधा जानबूझकर अनजान बनने का नाटक करते हुए बोली और तभी अंकित सामने से आ रहे हैं एक आदमी की तरफ इशारा करते हुए बोला)
वह देखो सड़क की दूसरी तरफ से जो आदमी आ रहा है तुमको ही देख रहा है,,,,।
(सुगंधा धीरे-धीरे दौड़ते हो उसे आदमी की तरह देखने लगी और वाकई में वह आदमी उसे ही देख रहा था और तभी एक आदमी फिर से उसके बगल से आगे निकल गया और उसे देखकर कर अंकित बोला)
देख रही हो यह भी तुम्हें देखता हुआ निकल गया,,,,, जो आगे से आ रहे हो तुम्हारी छाती की तरफ देख रहा है और जो पीछे से आ रहा है और तुम्हारे पिछवाड़े की तरफ देख रहा है,,,(अंकित पूरी तरह से सोच समझकर मौके की नजाकत को देखते हुए ही इस तरह की बात कहा था इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया था वह जानता था कि इस समय उसकी मां भी मस्त हो रही है इसलिए वह कुछ बोलेगी नहीं,,,, और ऐसा ही हुआ अंकित की बातों से उसकी मां पूरी तरह से मस्त हुए जा रही थी और अंकित की बातों में पूरी तरह से सच्चाई थी इस बात का एहसास सुगंधा को भी था अच्छी तरह से जानती थी मर्दों की फितरत को आगे से आते समय वह चुचई की तरफ देखते हैं और पीछे से गांड की तरफ,,,,।
दौड़ते दौड़ते दोनों काफी दूर तक आ चुके थे और अब धीरे-धीरे उजाला भी हो रहा था,,,, इसलिए सुगंधा एक जगह पर रुक गई और गहरी गहरी सांस लेने लगी उसकी सांसों की गति उसकी चूचियों में हलचल मचा रही थी और उसकी यह हलचल अंकित की नजरों से छुपी नहीं थी,,,। गहरी सांस लेते हुए सुगंधा अपने बेटे से बोली,,,।
काफी दूर आ गए हैं पहले दिन के लिए यह तो बहुत ज्यादा ही हो गया है बातों ही बातों में कहां से कहां पहुंच गए पता ही नहीं चला,,,।
सच कह रही हो मम्मी तुम्हारे साथ दौडने में मुझे भी बहुत मजा आया,,,।
मजा तो आया लेकिन साड़ी में दौड़ने में दिक्कत होती है खुलकर दौड़ नहीं सकते,,,।
तो तुम भी उसे औरत की तरह,,,(सामने सड़क से जा रही है एक औरत की तरफ इशारा करते भेजो ढीला पाजामा और कुर्ता पहने हुए थी) कपड़े पहन कर दौड़ा करो आराम रहेगा और अच्छा भी लगेगा,,,।
तू सच कह रहा है लेकिन इस तरह से कपड़े पहन कर घर से निकलने में बड़ा अजीब लगेगा आस पड़ोस के लोग देखेंगे तो क्या बोलेंगे,,,।
अरे इसमें क्या बोलेंगे बहुत से लोग पहनते हैं अच्छी नहीं जॉगिंग करते समय कितनी औरतें पहनी हुई थी क्योंकि इसमें आराम रहता है,,,।
बात तो तु सही कह रहा है,,, चल देखेंगे अब घर चलते हैं,,,,।
(इतना कहकर दोनों बातें करते हुए कब घर पहुंच गए पता ही नहीं चला)
अंकित और सुगंधा दोनों बहुत खुश थे,,, दोनों को आपस में बात करने का काफी समय मिल जा रहा था और तृप्ति के न होने की वजह से किसी भी प्रकार का डर भी नहीं था,, दोनों को इस बात की खुशी थी की तृप्ति की गैरमौजूदगी में दोनों के बीच आगे बढ़ने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ चुकी थी जिसे दोनों मौका मिलने पर भरपूर फायदा उठा लेना चाहते थे वैसे तो दोनों के बीच काफी बातें होने लगी थी,,, और सुगंधा इस बात से कुछ ज्यादा ही खुश थी की,,, कि आज बात ही बात में उसके बेटे ने उसके भरावदार नितंबों की तारीफ की थी। वैसे तो एक मां के लिए अपने बेटे के मुंह से उसके नितंबों के बारे में भले ही वह उसकी तारीफ में दो-चार शब्द ही क्यों ना हो यह पल एक मां के लिए शर्मसार कर देने वाला होता है लेकिन यहां पर हालात पूरी तरह से बदल चुके थे,, यहां पर सुगंधा खुद अपने बेटे के मुंह से इस तरह के शब्दों को इस तरह की बातों को सुनने के लिए तड़प रही थी इसलिए तो अपने बेटे के मुंह से अपनी गांड की तारीफ सुनकर वह गदगद हो गई थी और इस बात का भी एहसास उसे हो गया था कि उसके बेटे की नजर कितनी तेज है एक औरत के मामले में।
सुगंधा को यकीन नहीं हो रहा था कि आज वह अपने बेटे के साथ जॉगिंग पर गई थी,,, जॉगिंग पर जाने का अनुभव उसका बेहद रोमांचकारी रहा था,,, आते जाते सड़कों पर वह बहुत से मर्दों को अपनी खूबसूरत अंगों पर घूमती हुई महसूस की थी वैसे तो घर में वह अपने बेटे को अपने अंगों का अच्छी तरह से प्रदर्शन करके उसे सब कुछ दिखा चुकी थी लेकिन खुली सड़क पर अपने बेटे की नजरों को अपनी खूबसूरत अंगों के उभार पर घूमता हुआ महसूस करके वह उत्तेजना से गनगना गई थी। सही मायने में सुगंधा आज पहली बार खूबसूरत सुबह का एहसास की थी,,, आज पहली बार उसे पता चल रहा था कि सुबह की खूबसूरती क्या होती है सुबह की सोच क्या होती है,,यह अहसास पुरी तरह से बेहद अद्भुत रहा था,, सुगंधा के लिए भी और उसके बेटे के लिए भी,,, जॉगिंग करके घर लौटने के बाद सुगंधा बाकी के दिनचर्या में लग गई थी,,, लेकिन अब वह पूरी तरह से अपना मन बना ली थी कि चाहे जो हो जाए अपनी बेटी की गहराई में अपने बेटे के साथ संबंध बनाकर ही रहेगी क्योंकि आज जॉगिंग के दरमियान जो कुछ भी हुआ था वह उसे पूरी तरह से मदहोश कर गया था।
अंकित भी अपने बदन की गर्मी बाथरूम में जाते ही अपने सारे कपड़े उतार कर अपने हाथ से ही काम चला कर बाहर निकाल दिया था वैसे उसके पास अब संभोग का अनुभव था जो कि उसकी नानी ने उसे बराबर का दिया था। अपनी नानी के साथ के अनुभव के जोर पर वह पूरी तरह से आत्मविश्वास से भरा हुआ था कि अगर उसे मौका मिला तो वह अपनी मां को पूरी तरह से खुश कर देगा, जिसमें वह भी पूरी तरह से लगा हुआ था जॉगिंग के दरमियान बात ही बात में वह जॉगिंग करती दूसरी औरतों की बड़ी-बड़ी गांड की तुलना अपनी मां की गांड से कर दिया था और बातों ही बातों में तारीफ भी कर दिया था कि उसकी मां की गांड कितनी कसी हुई और आकर्षक है जिसे सुनकर सुगंधा उत्तेजना से गदगद हो गई थी। यह सब मंजिल तक पहुंचने की सीढ़ी थी जिस पर दोनों बराबर कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे थे,। मां बेटे दोनों नहा कर तैयार हो चुके थे स्कूल तो जाना नहीं था गर्मियों की छुट्टी जो पड़ी थी इसलिए दोनों के पास समय ही समय था।
सुगंधा नाश्ता तैयार कर रही थी वह अपने बेटे के लिए पराठा बना रही थी और वह भी घी का सुगंध को एहसास होने लगा था कि उसके बेटे को अब शारीरिक ताकत की कितनी ज्यादा जरूरत थी वैसे तो वह अपनी बेटी पर पूरा विश्वास करती थी कि उसे यह सब ना दिया जाए तो भी उसकी शारीरिक क्षमता पूरी तरह से मर्द की है। शारीरिक क्षमता में वह किसी से भी काम नहीं था लेकिन फिर भी वह दुलार के तौर पर घी के पराठे बना रही थी,,, जो कि उसकी खुशबू अंकित को अपने कमरे तक आ रही थी और वह अपने आप को रोक नहीं पाया और सीधे रसोई घर के दरवाजे पर पहुंच गया दरवाजे पर ही खड़ा होकर वह अपनी मां की तरफ देखने लगा नहाने के बाद उसकी खूबसूरती में इजाफा दिखाई दे रहा था और उसके नितंबों का आकार कसी हुई साड़ी में कुछ ज्यादा ही आकर्षक लग रहा था जिसे देखकर अंकित मन ही मन प्रसन्न और उत्तेजित हो रहा था,,, दरवाजे पर खड़े-खड़े ही वह अपनी मां से बोला।
मम्मी आज ऐसा क्या बन रहा है कि जिसकी खुशबू पूरे घर में फैली हुई है।
तेरे लिए घी के पराठे बना रही हूं,,, सुबह-सुबह नाश्ते के साथ खाएगा तो तेरी ताकत और ज्यादा बढ़ जाएगी।
(अंकित अपनी मां की बात के कहने का मतलब अच्छी तरह से समझ रहा था और उसकी बात सुनकर वह अपने मन में ही बोला कि अभी भी उसमें बहुत दम है अगर मौका दो तो इसी समय दिखा दुं,,, यह तो उसके मन का ख्याल था कि उसके जुबा तक नहीं आ पा रहा था लेकिन फिर भी वह अच्छी तरह से समझ गया था कि उसकी मां उसे घी के पराठे क्यों खिलाना चाहती है इसलिए वह अंदर ही अंदर खुश हो रहा था फिर भी वह अंजान बनता हुआ बोला,,,)
घी के पराठे इससे पहले तो तुम कभी नहीं बनाई।
अरे अब तू बड़ा हो गया है तुझे विटामिन प्रोटीन की ज्यादा जरूरत है अगर यह सब नहीं खाएगा तो काम कैसे चलेगा,,,,(ऐसा कहते हुए वहां तवे पर रखे हुए पराठे को चिमटी से पकड़कर ऊपर नीचे घूमा रही थी लेकिन इस दौरान वह जानबूझकर अपने नितंबों को कुछ ज्यादा ही मटका रही थी,, ऐसा हुआ जानबूझकर कर रही थी अपने बेटे का ध्यान अपने नितंबों की तरफ आकर्षित करना चाहती थी और ऐसा हो भी रहा था अंकित की नजरे उसकी मां की भारी भरकम गोल-गोल गांड पर टिकी हुई थी जो कि इस समय उसमें एक अजीब सा उन्माद था एक थीरकन थी,,, जिसकी लय के साथ अंकित थीरकना चाहता था,,, अपनी मां के पिछवाड़े पर अपनी मर्दाना अंग को सटाकर अपनी कमर को आगे पीछे करना चाहता था,,,, लेकिन इसमें अभी शायद वक्त था लेकिन कितना वक्त था यह वह खुद नहीं जानता था। अपनी मां की बात सुनकर वह बोला,,,)
तुम्हें ऐसा क्यों लगने लगा कि अब मुझे प्रोटीन विटामिन की ज्यादा जरूरत है मैं कल भी ऐसा ही था और आज भी वैसे ही हूं तो ऐसा बदलाव क्युं,,,?
यह तो नहीं समझेगा अब तो बड़ा हो रहा है अगर एक मां की नजर से देखेगा तो तुझे सब कुछ समझ में आ जाएगा तेरे अंदर आ रही बदलाव को एक माही अच्छी तरह से समझ सकती है तु अब कितना जिम्मेदार हो चुका है,,,।
(सुगंधा इस तरह की बातें एकदम मुस्कुरा कर कर रही थी अगर इस तरह की बातें सुगंध और अंकित के बीच औपचारिक रूप से हुआ होता तो शायद अंकित को अपनी मां के इन शब्दों में एक दुलार नजर आता लेकिन जो कुछ भी दोनों के बीच हो रहा था उसे देखकर अपनी मां की कही गई बातों के एक शब्द में मदहोशी और वासना नजर आ रही थी,,, अंकित अच्छी तरह से समझ रहा था कि उसके अंदर किस तरह के बदलाव आ रहे हैं यही बदलाव उसकी मां को भा रहे थे और अपनी मां की बात सुनकर अंकित मन में मन खुश भी हो रहा था उसे रहने की और वह एकदम से रसोई घर में दाखिल हुआ और पीछे से अपनी मां को अपनी बाहों में जागते हुए एक बेटापन दिखाते हुए दुलार में बोला,,,)
ओहहह मम्मी तुम कितनी अच्छी हो मेरा कितना ख्याल रखती हो,,,,,(ऐसा कहते हुए वह अपनी मां को पूरी तरह से बाहों में भर लिया था और अपने होठों को अपनी मां के गर्दन पर रख दिया था यह अंकित की तरफ से उसकी मां के लिए एक अद्भुत तोहफा था जिसके बारे में सुगंधा ने इस समय तो सोची भी नहीं थी इसलिए अपने बेटे के व्यवहार से वह पूरी तरह से उत्तेजना से गदगद हो गई थी पहले तो उसे ऐसा ही लगा कि उसका बेटा भावनाओं में भाकर दुलार की वजह से ऐसा कर रहा है लेकिन जैसे ही उसे अपने नितंबों के बीचों बीच अपने बेटे का लंड चुभता हुआ महसूस हुआ वह एकदम से मदहोशी के सागर में डूबने लगी,,, सुगंधा को अच्छी तरह से अपनी गांड के बीचों बीच अपने बेटे का खड़ा लंड महसूस हो रहा था। यह पल सुगंधा के लिए बेहद अद्भुत और मदहोशी भरा था उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें,,,, इस पल में वह पूरी तरह से खो चुकी थी अपने बेटे की गर्म सांसों को अपनी गर्दन और गाल पर अच्छी तरह से महसूस कर रही थी जिसे उसकी उत्तेजना और ज्यादा बढ़ती जा रही थी उसे अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार से मदन रस रीसता हुआ महसूस हो रहा था,,, यह पल वाकई में सुगंधा के लिए बेहद अद्भुत था।
अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड पर अपने लंड को महसूस करके भले ही वह साड़ी के ऊपर से था लेकिन फिर भी साड़ी के ऊपर से भी उसे अपनी मां की गांड की गर्मी एकदम साफ महसूस हो रही थी जिसे महसूस करके वह उत्तेजना के परम शिखर पर विराजमान हो चुका था और ऐसा लग रहा था कि जैसे उसका लंड उसकी मां की साड़ी सहित उसकी गुलाबी छेद में घुस जाएगा,,, सुगंधा को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें वह इस पल को इसी तरह से आगे बढ़ने देना चाहती थी वह देखना चाहती थी कि उसका बेटा क्या करता है क्योंकि वह भी पूरी तरह से उत्तेजना से ग्रस्त हो चुकी थी अगर कुछ सीमाएं कुछ बंधन ना होते तो शायद वह इस समय अपनी साड़ी को कमर तक उठा देती और अपने बेटे के आगे अपनी गांड को परोस देती कि ले डाल दे अपने लंड को,,, लेकिन कुछ मर्यादाएं थी जो भी पूरी तरह से धराशाई नहीं हुई थी और यही उसे रोक रही थी लेकिन फिर भी वह अपने बेटे को रोक नहीं पा रही थी किसी तीसरे के देखे जाने की अाशंका बिल्कुल भी नहीं थी क्योंकि तृप्ति गांव गई थी और इस समय घर में उसके और उसके बेटे के सिवा कोई नहीं था।
अंकित भी पूरी तरह से मदहोश चुका था उसे भी इतना तो समझ में आ गया था कि उसकी मां क्या चाहती है अगर वह थोड़ी और हिम्मत दिखा कर अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा देता तो शायद एक अद्भुत सुख को वह इसी समय प्राप्त कर लेता लेकिन फिर भी अपनी नानी की चुदाई करने के बावजूद भी एक अद्भुत एहसास और अनुभव प्राप्त करने के बावजूद भी हुआ इस समय अपनी मां के सामने हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था इसलिए वह ऐसा कुछ करने की सिर्फ सोच सकता था उसे अंजाम देने से डर रहा था लेकिन फिर भी इतने से ही वह पूरी तरह से मत हो चुका था। यह प्रक्रिया थोड़ी देर और आगे बढ़ती तो शायद अंकित के साथ-साथ उसकी मां की बुर से भी पानी फेंक देता लेकिन तभी तवे पर रखा हुआ पराठा उसमें से धुआं उठने लगा था वह चलने लगा था जिस पर सुगंधा का ध्यान पडते ही वह एकदम से होश में आई थी,,, और वह एकदम से चौंकते हुए बोली।
बाप रे यह तो जल रहा है,,,।(सुगंधा का इतना कहना था कि मौके की नजाकत को समझते हुए ना चाहते हुए भी अंकित को अपनी मां की खूबसूरत बदन से अलग होना पड़ा उसके पेंट में पूरी तरह से तंबू बना हुआ था उसे भी एहसास हो गया था कि इस समय अलग होना ही उचित है वरना तवे पर रखा हुआ पराठा पूरी तरह से चल जाएगा लेकिन वह जैसे ही अपनी मां से अलग हुआ तो उसकी नजर अपनी मां की बड़ी बडी भारी भरकम कसी हुई गांड पर गई,,, जिसके बीचो-बीच उसकी साड़ी अंदर घुसी हुई थी जो कि उसके लंड की वजह से ही ऐसा हुआ था,,, उस धसी हुई साड़ी को देखकर अंकित को एहसास हुआ कि उसके लंड में कितना ताकत है और वह मन ही मन खुश होने लगा लेकिन फिर भी पराठे की दशा को देखकर वह बोला,,,)
ओहहह यह तो जल गई यह सब मेरी वजह से हुआ,,,, मैं ही भावनाओं में बह गया था,,,।
चल ऐसा कुछ भी नहीं है तू बहुत अच्छा लड़का है और एक अच्छा बेटा है मैं दूसरा बना देती हुं,,,,।
(इतना सुनते ही अंकित एक बार फिर से एकदम प्रसन्न हो गया और इस बार वह अपनी मां के कल पर चुंबन कर लिया और बोला)
ओ मम्मी तुम सच में कितनी अच्छी हो,,,,(और इतना कहने के साथ ही बार रसोई घर से बाहर निकल गया लेकिन अपने बेटे के व्यवहार से वह पूरी तरह से स्तब्ध थी और मन ही मन खुश भी हो रही थी कि उसके बेटे की हिम्मत अब बढ़ने लगी थी,,,, अंकित के रसोई घर से बाहर निकलते निकलते सुगंधा की नजर अपने बेटे के पेंट में बने तंबू पर पड़ चुकी थी और उसे तंबू को देखकर वह शर्म से पानी पानी होने लगी थी,,, अपने बेटे की हरकत से उत्तेजित होते हुए वह अपने हाथ को पीछे की तरफ ले गई और साड़ी को अपने हाथ से पकड़ कर अपनी जो की उसकी गांड के बीचों बीच दासी हुई थी उसे बाहर खींच ली और अपनी साड़ी को व्यवस्थित कर ली और अपने मन में सोचने लगी की काश यह साड़ी ना होती तो उसके बेटे का लंड उसकी बुर में घुसा हुआ होता।
जो कुछ भी हो रहा था उसमें दोनों को मजा आ रहा था मां बेटे पूरी तरह से इन पलों का भरपूर मजा लूट रहे थे,,, सुगंधा अपने मन में कभी-कभी सोचती थी कि जिस तरह से उसके ख्यालात उसका नजरिया अपने बेटे को लेकर बदला था उसे दिन से लेकर आज दिन तक के बीच का सफर कुछ ज्यादा ही हो चुका था सुगंधा को लग रहा था कि वाकई में बहुत ज्यादा देर हो चुकी है इतनी देर में अगर किसी और के साथ होती तो अब तक दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो गया होता लेकिन इन सबके बावजूद भी वह अपने मन को तसल्ली इस बात से दे रही थी कि अच्छा ही हुआ कि अभी तक दोनों की भी सारी संबंध स्थापित नहीं हुआ है क्योंकि जो कुछ भी प्रदर्शन और छेड़छाड़ चल रहा था इनमें काफी मजा आ रहा था यह पल बेहद आनंददायक थे और बेहद उत्तेजित कर देने वाले थे और शायद अगर दोनों के बीच सारी संबंध स्थापित हो गया होता तो इन सब फलों का उतना मजा नहीं आता जितना कि अब आ रहा है,,,, मां बेटे तृप्ति के जाने के बाद काफी खुला खुला सा महसूस करने लगे थे,,, और यह खुलापन दोनों के लिए काफी अासास्पद और मंजिल के करीब ले जाने वाला था,,,।
जैसे तैसे करके दिन गुजर चुका था रात का खाना खाकर कुछ देर तक मां बेटे दोनों टीवी देख रहे थे,,, अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि कोई रोमांटिक मूवी चल रही होती तो कितना मजा आता दोनों साथ-साथ देखते तो शायद दोनों के बीच कुछ होने की संभावना होती लेकिन टीवी पर भी साधारण सी मूवी चल रही थी इसलिए थोड़ी ही देर में सुगंधा को नींद आने लगी और वह सीधा अपने कमरे में जाकर सो गई आज पेशाब करने के लिए ना तो बाथरूम में गई और ना ही घर के पीछे गई और वैसे भी अंकित को इस बात का इंतजार था कि उसकी मां घर के पीछे का पेशाब करने जाएं लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ इसलिए वह निराश होकर थोड़ी देर बैठे रहने के बाद अपने कमरे में जाकर सो गया,,,,। सुबह उसकी नींद तब खुली जब दरवाजे पर दस्तक हो रही थी सुबह के 5:00 रहे थे और उसकी मां जॉगिंग पर जाने के लिए उसे जग रही थी जल्दी से अंकित उठकर बिस्तर पर बैठ गया और कमरे से बाहर आकर हाथ में धोकर तैयार हो गया,,, उसे भी अच्छा लगता था अपनी मां के साथ जॉगिंग पर जाना,,, और सबसे अच्छा यह था कि वह अपनी मां के खूबसूरत बदन को देख पाता था जब वह दौड़ती थी तो उसकी भारी भरकम गांड की थिरकन मदहोश कर देती थी,,, साड़ी में दौड़ने में थोड़ी तो तकलीफ होती थी लेकिन फिर भी सुगंधा को अपने बेटे के साथ दौड़ना अच्छा लगता था वह अपने बेटे पर एकदम भारी की नजर रखती थी वह देखी थी कि उसका बेटा क्या देख रहा है और उसे यह जानकर बेहद खुशी होती थी कि उसके बेटे की नजर हर पल उसके बदन पर ही टिकी हुई थी खास करके उसके नितंबों के घेराव पर और वैसे भी घर से निकलने से पहले वह अपनी साड़ी को और ज्यादा कसके अपनी कमर पर बांध दी थी ताकि नितंबों का उभार और आकर्षक लगे,,,,
आज भी मां बेटे वही तक गए थे जहां कल तक गए थे और सुगंधा को ही स्पीच अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उसके बेटे के साथ-साथ दूसरे मर्दों की नजर भी उसके ऊपर बनी हुई थी खास करके उसकी चूची और उसकी बड़ी-बड़ी गांड की तरफ यह सब सुगंधा को बेहद प्रभावित कर रहा था उसे एहसास हो रहा था कि वाकई में अभी भी वह पूरी तरह से जवानी से भरी हुई है,,,, जोगिंग करने के बाद मां बेटे घर पहुंचे तो उसकी मां गहरी सांस लेते हुए बोली,,,,,।
सच में जिसे तू कहता है पजामा कुर्ता लेना पड़ेगा साड़ी में ठीक तरह से दौड़ा नहीं जाता और डर लगता है कि कहीं पैर लड़खड़ा ना जाए,,,,।
बात तो सही है,,,(सुगंधा के गहरी सांस लेने की वजह से उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां ऊपर नीचे हो रही थी जिस पर अंकित की नजर बनी हुई थी और इस बात का एहसास सुगंधा को भी अच्छी तरह से था और वह अपने बेटे की नजर से मस्त हो रही थी,,,, अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,) मैं तुमसे कह तो रहा हूं,,, साड़ी में ठीक तरह से दौड़ नहीं पाऊंगी ऐसा करते हैं आज शाम को ही चलकर तुम्हारे लिए पजामा और कुर्ता खरीद लेते हैं तब जोगिंग करने में बहुत अच्छा रहेगा,,,,।
सही है,,,, मुझे भी अच्छा लगेगा पजामा कुर्ता पहनने में,,,,,।
इसके बाद सुगंधा दिनचर्या में लग गई,,,,।
दोपहर के 4:00 बज रहे थे,,, अंकित अपने कमरे में आराम कर रहा था और तभी उसकी मां उसके कमरे के पास आई और बोली,,,,।
मैं मोहल्ले में अपनी पड़ोसन है उनके वहां जा रही हुं,,,।
लेकिन हमको तो मार्केट जाना है तुम्हारा कुर्ता और पैजामा खरीदने के लिए,,,।
हां जानती हूं घंटाघर में आ जाऊंगी,,,।
ठीक है जल्दी आना,,,,।
जल्दीआ जाऊंगी,,,(इतना कहकर सुगंधा घर से बाहर निकल गई गर्मी का महीना था इसलिए बिस्तर पर वापस लेटने का मन अंकित का बिल्कुल भी नहीं हुआ और वह बिस्तर पर से उठकर खड़ा हो गया गर्मी कुछ ज्यादा थी इसलिए वह दरवाजे की कड़ी बंद करके बाथरूम में घुस गया और अपने सारे कपड़े उतार कर नहाने लगा गर्मी में ठंडा पानी बदन को राहत प्रदान कर रहा था अभी वह नहा ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक होने लगी उसे लगा कि शायद उसकी मां वापस आ गई है लेकिन तभी बाहर जो आवाज सुनाई दे उसे सुनकर उसकी आंखों की चमक बढ़ गई,,,)
अरे सुगंधा दरवाजा तो खोल सो गई है क्या,,,,(सुमन की मम्मी दरवाजे पर दस्तक दे रही थी और दरवाजे पर सुमन की मां के होने का एहसास अंकित की आंखों की चमक बढा रहा था।)
सुगंधा किसी काम से पड़ोस में गई हुई थी और यह बात उसने अपने बेटे से बताई थी क्योंकि उसे शाम को बाजार जाना था अपने लिए लूज पजामा और कुर्ता लेने के लिए ताकि सुबह की जॉगिंग आराम से हो सके क्योंकि साड़ी में उसे भी उचित नहीं लग रहा था दौड़ना उसे इस बात का डर लगा रहता था कि कहीं पैर फस न जाए और वह गिर ना जाए। गर्मी का महीना होने की वजह से अंकित दोबारा बिस्तर पर नहीं लेटा और वह नहाने के लिए बाथरुम में घुस गया था घर में किसी के न होने की वजह से वह अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा ही नहा रहा था दरवाजे पर कड़ी लगाकर पहले ही वह दरवाजा बंद कर चुका था।
लेकिन जैसे ही बनना शुरू किया था वैसे ही दरवाजे पर 10 तक होने लगी थी और जब उसे एहसास हुआ कि दरवाजे पर कोई और नहीं बल्कि सुमन की मां है तो उसकी आंखों की चमक बढ़ गई पल भर में ही बीती हुई कुछ बातें कुछ यादें एकदम से ताजा हो गई उसे अच्छी तरह से याद था कि वह सुषमा आंटी के घर गया था सुमन से परीक्षा के बारे में कुछ पूछने के लिए तो वहां पर अनजाने में ही वहां बाथरूम के करीब पहुंच गया था और बाथरूम के अंदर सुमन की मां एकदम नंगी होकर नहा रही थी उसे समय उसके नंगे बदन को देखकर अंकित के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी थी,,, उसे समय सुषमा आंटी की बड़ी-बड़ी चूचियां और झांटो वाली बुर देखकर अंकित का लंड एकदम से खड़ा हो गया था,,, अंकित को अच्छी तरह से याद था कि अपनी आंखों के सामने उसे देखकर सुमन की मन एकदम से हड़बड़ा गई थी और अपने बदन को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी,, लेकिन फिर भी बिना दरवाजे पर जा सकती है वहां तक पहुंच जाने पर उसे एक शब्द नहीं बोली थी इससे अंकित की हिम्मत थोड़ी इस समय बढ़ रही थी,।
आवाज पर गौर करके खुश होते हुए अंकित अपने बदन पर ठंडा पानी डाल रहा था और बाहर से लगातार आवाज आ रही थी।
सुगंधा,,, ओ सुगंधा अरे सच में सो गई क्या दरवाजा तो खोल मुझे काम है,,,।
(सुमन की मां की आवाज सुनकर एक तरफ अंकित मन ही मन बहुत खुश हो रहा था लेकिन दूसरी तरफ थोड़ी घबराहट उसे हो रही थी क्योंकि जो कुछ भी उसके मन में चल रहा था उसे कार्य को अंजाम देने के लिए काफी हिम्मत की जरूरत थी इसलिए उसका दिन जोरों से धड़कता है उसे समझ में नहीं आ रहा था कि जो कुछ उसके मन में चल रहा है उसे करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए लेकिन फिर भी वह अपने मन में ऐसा सोच लिया था कि जो कुछ भी होगा सुषमा आंटी को ऐसा ही लगेगा कि अनजाने में हुआ है,,,, इसलिए वह तुरंत बाथरूम से बाहर आया और कुर्सी पर पड़ी चावल को अपने बदन से लपेट लिया बदन से क्या अपनी कमर से लपेट लिया लेकिन उसके टावल में भी अद्भुत तंबू बना हुआ था क्योंकि बाथरूम के अंदर वह अपनी मां के बारे में ही सोच रहा था जिसके चलते उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था। अंकित सुषमा आंटी को अपने टावल में बने हुए तंबू को दिखाना चाहता था यह एहसास दिलाना चाहता था कि उसके पड़ोस में ही एक लड़का पूरी तरह से जवान हो चुका है जो अगर वह चाहे तो उसकी ख्वाहिश उसकी इच्छा को उसकी प्यास को बुझा सकता है,,,, और किसी भी औरत की प्यास को बुझाने और उसे संतुष्ट करने का हाथ में विश्वास उसे अपनी नानी से मिला था नानी की चुदाई करके वह पूरी तरह से मर्द बन चुका था और आत्मविश्वास से भर चुका था। और यह इस आत्मविश्वास का असर था जो आज वह एक अद्भुत कार्य करने जा रहा था और वह भी किसी गैर औरत के सामने।
अपनी कमर पर टावल लपेटने के बाद वह एक नजर अपनी दोनों टांगों के बीच डालकर अपनी स्थिति का मुआयना कर लेना चाहता था और वाकई में ही समय उसका तंबू काफी आकर्षक लग रहा था उसे पूरा विश्वास था कि सुषमा आंटी अगर इसे देखेगी तो जरूर मस्त हो जाएगी मदहोश हो जाएगी। लगातार दरवाजे के बाहर से आवाज आ रही थी दरवाजे पर दस्तक हो रही थी और वैसे भी दोपहर का समय था इस समय सब लोग अपनी-अपने घरों में आराम कर रहे थे और सबसे फायदे वाली बात यह थी कि इस समय उसकी मां भी घर पर नहीं थी इसलिए वह धीरे से दरवाजे के पास पहुंचा और दरवाजे की कड़ी को खोलकर दरवाजे के दोनों पट को धीरे से खोल दिया सामने सुषमा आंटी थी जिसे देखकर वह मुस्कुराते हुए बोला,,,।)
क्या हुआ आंटी कुछ काम था क्या,,,? मैं नहा रहा था इसलिए दरवाजा खोलने में देर हो गई और वैसे भी मम्मी घर पर नहीं है,,,(अंकित एक ही सांस में उस सारे सवाल भी पूछ ले रहा था और यह भी बता दे रहा था कि घर पर इस समय उसकी मां नहीं है घर पर वह अकेला ही है अगर वाकई में सुषमा आंटी के मन में भी दूसरे औरतों वाली बात होगी तो जरूर इस मौके का फायदा उठाएगी,,, सुषमा आंटी उसकी बात तो सुन रही थी लेकिन वह दरवाजे पर अंकित को खड़ा देखकर न जाने किस एहसास में डूबने लगी थी,,, सुषमा को इस बात का अच्छी तरह से एहसास था की उसकी आंखों के सामने एकदम जवान लड़का खड़ा है जिसे देखकर उसके तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी थी वह अच्छी तरह से देख रही थी कि दरवाजे पर खड़ा अंकित नहा कर बाथरूम से पर अभी-अभी बाहर आया था और उसके कमर पर टावल लपटी हुई थी लेकिन अभी तक सुषमा का ध्यान उसके तंबू पर बिल्कुल भी नहीं किया था वह इसकी चौड़ी छाती को देख रही थी पल भर के लिए सुषमा को लग रहा था कि इसकी चौड़ी छाती में एकदम से समा जाए क्योंकि दरवाजे पर खड़ा अंकित उसे पूरा मर्द लग रहा था मोहल्ले में दौड़ता हुआ वह छोटा लड़का अब पूरी तरह से जवान हो चुका था इस बात का एहसास सुषमा आंटी को हो रहा था। कुछ देर तक सुषमा आंटी एकदम खामोश रही उसकी ख़ामोशी देखकर अंकित को इस बात का एहसास हो रहा था कि उसके जवानी का जादू उसकी मर्दानगी का असर सुमन आंटी पर थोड़ा-थोड़ा हो रहा है इसलिए वह फिर से अपनी बात को दोहराते हुए बोला,,,)
क्या हुआ आंटी कुछ काम था क्या,,,?
हां मुझे तेरी मम्मी से काम था लेकिन वह तो है ही नहीं,,,।
तो क्या हुआ आंटी मैं तो हूं ना मुझसे कहिए क्या काम है,,,,।
वह क्या है ना थोड़ा चीनी चाहिए था,,, शाम को बाजार जाऊंगी तो ले आऊंगी अभी है नहीं,,,,,(उसका इतना कहना था कि उसके हाथ से कटोरी गिर गई और वह कटोरी लेने के लिए नीचे जो की लेकिन कटोरी उठते समय उसकी नजर अंकित के टावल पर गई तो उसमे बना हुआ तंबू देखकर उसके एकदम से होश उड़ गए,,, सुषमा को समझते देर नहीं लगी की अंकित की दोनों टांगों के बीच का हथियार कैसा है वह कुछ क्षण तक टॉवल की तरफ अच्छी और फिर सहज बनने का नाटक करते हुए धीरे से उठकर बोली,,,) क्या तु मुझको चीनी देगा,,,।
(अंकित का पूरा ध्यान सुषमा आंटी पर ही था सुषमा की नजरों को अच्छी तरह से देख लिया था वह समझ गया थाकी आंटी उसके तंबू की तरफ देख चुकी हैं और जरूर उनके मन में कुछ चल रहा होगा इस बात की खुशी अंकित के चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी लेकिन वह जताना नहीं चाहता था पानी की बूंदे अभी भी इसकी चौड़ी छाती पर फिसल रही थी जिसे देखकर इस समय ऐसे हालात में जबकि सुषमा की नजरे उसके तंबू पर जा चुकी थी अब उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में हलचल होना शुरू हो गया था,,,, अंकित सुषमा आंटी की बात सुनकर बोला।)
क्यों नहीं आंटी यह तो मेरा फर्ज है और वैसे भी चीनी क्या आप यहां से चाय पी कर जाइए,,, मैं अभी बना देताहूं,,,(अंकित चाय के बहाने सुषमा आंटी को अपने घर पर रोकना चाहता था क्योंकि अभी उसकी मां के आने में बहुत समय था अपनी नानी की जी भर कर चुदाई कर लेने के बाद उसकी हिम्मत खुलने लगी थी और यह उसी का नतीजा था जो आज वह सुमन की मां से इस तरह से बातें कर रहा था वरना वह कभी हां और ना से ज्यादा जवाब ही नहीं देता था,,,, अंकित की बात सुनकर सुषमा बोली,,,)
अरे नहीं नहीं अंकित बेटा रहने दे मैं यहां चाय पीने के लिए नहीं आई हूं बल्कि चीनी लेने के लिए आई हूं,,,, और हां तुझे अगर चाय पीना है तो मेरे घर चल मैं तुझे चाय पिलाती हूं,,,,(बात करते हुए अपनी नजरों को हल्के से नीचे करते हुए वह अंकित के टॉवल की तरफ देख रही थी उसमें बने हुए तंबू को देख रही थी और अपने मन में सोच रही थी बाप रे कितना बड़ा लंड है ईसका पूरा हथियार है,,,, सुषमा की बात सुनकर अंकित बोला,,,)
फिर कभी आंटी थोड़ी देर बाद मुझे बाजार जाना है,,,, आप अंदर तो लिए कब से दरवाजे पर खड़ी है,,,,।
(अंकित की बात सुनकर धीरे से सुषमा आंटी घर में आ गई,,, और अंकित आगे बढ़कर दरवाजे के दोनों पल्लो को बंद कर दिया हालांकि उसने दरवाजे पर कड़ी नहीं लगाई,,,, पल भर के लिए सुषमा आंटी के बदन में सनसनी से दौड़ने लगी जब आगे बढ़कर अंकित दरवाजे को बंद कर रहा था तब सुषमा आंटी को ऐसा ही एहसास हो रहा था कि मानो जैसे अंकित उसके साथ कुछ करना चाहता हो इसलिए दरवाजा बंद कर रहा है,,,, दरवाजा बंद करने के बाद अंकित बोला,,)
आप रुकिए में चीनी लेकर आता हूं,,,(वह ऐसे ही जा रहा था कि सुषमा बोल पड़ी)
अरे ले कटोरी तो लेता जा,,,,।
ओहहह,,,लाईए,,,(ऐसा कहते हुए वापस सुषमा आंटी की तरफ मोडा और अपना हाथ आगे बढ़कर कटोरी लेने लगा सुषमा आंटी भी अपना हाथ आगे बढ़कर कटोरी को अंकित की तरफ बढ़ा दी और अंकित उसके हाथों में से कटोरी लेने का कटोरी लेते समय उसकी उंगलियां सुषमा आंटी की उंगलियों से स्पर्श करने लगी और यह स्पर्श सुषमा आंटी को अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार तक महसूस होने लगी सुषमा आंटी को ऐसा महसूस होने लगा कि जैसे उसकी बुर फुल पिचक कर रही हो,,,, और अंकित कटोरी लेकर रसोई घर की तरफ चल दिया जाते समय उसके पीठ सुषमा की आंखों के सामने एकदम चौड़ी पीठ कमर की तरफ एकदम आकर्षक कमर के नीचे का उसके उभरे हुए नितंब टॉवल में भी सुडौल लग रहे थे,,, जहां एक तरफ मर्द औरतों की गांड देखकर आकर्षित होते हैं वहीं सुषमा आंटी आज अंकित के कसरती बदन के साथ-साथ उसके नितंबों को देखकर भी आकर्षित हो रही थी,,, अंकित रसोई घर में जा चुका था और सुषमा आंटी अंकित के बारे में बहुत सारी बातें सोच रही थी वह अपने मन में सोच रही थी कि अंकित पूरी तरह से जवान मर्द हो चुका है और अपने बदन को आकर्षक बनाने के लिए कितना मेहनत किया है कितना कसरत किया है तभी तो उसे देखते ही उसे न जाने क्या होने लगा था ऐसा उसके साथ पहली बार हो रहा था रह रहकर उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी।
सुषमा अंकित के लंड के बारे में सोच रही थी अपने मन में सोच रही थी कि जब उसका तंबू इतना शानदार है तो बिना कपड़ों के उसका लंड तो औरतों के होश उड़ा देगा,,, काश उसके लंड को देख पाती तो कितना मजा आता,,, सुगंधा कितनी किस्मत वाली है कि उसका बेटा इतना दमदार है। वह तो दिन रात अपने बेटे को देखती होगी उसे बिना कपड़ों के भी देख चुकी है जाने अनजाने में नजर तो पड़ ही जाती होगी,,,, पल भर में सुगंधा के बारे में और बहुत सारी बातें सोचने लगी सुषमा के मन में बहुत सी बातें चल रही थी पल भर में ही सुगंध के जीवन के बारे में सोचने लगी और वह अपने मन में सोचने लगी की सुषमा को तो अपने बेटे के साथ ही शारीरिक संबंध बनाकर संतुष्ट हो जाना चाहिए,,, घर के चार दिवारी के अंदर क्या हो रहा है दूसरों को क्या पता,,,, लेकिन सुगंधा वाकई में एक संस्कारी और मर्यादा वाली औरतें इतने बरस हो गए पति के गुजरे लेकिन वह इतने दिनों में कभी भी कोई ऐसा काम नहीं की जिससे उसकी बदनामी हो वरना एक खूबसूरत और जवान औरत और वह भी जवानी से भरी हुई औरत के पैर फिसल जाते हैं लेकिन सुगंधा के बारे में आज तक ऐसी कोई भी बातें सुनने को नहीं मिली,,, अगर मुझे अंकित के साथ एक ही घर में रहना हो तो शायद एक साथ भी गुजारना मुश्किल हो जाए और ना चाहते हुए कि मुझे अंकित के साथ शारीरिक संबंध बनाना ही पड़ जाए,,,।
क्या अंकित के मर्दाना बदन और उसके अंग का ही कमाल था जो सुषमा उसके बारे में इतना कुछ सोचने लगी थी,,, सुष्मा अपने मन में यह सब बातें सोच रही थी और रसोई घर के अंदर अंकित अपनी ही जुगाड़ में लगा हुआ था अंकित या तो जान चुका था कि सुषमा आंटी उसकी टांगों के पीछे देख रही थी जरूर उनके मन में कुछ ना कुछ चल रहा था और इस समय वह पूरी तरह से सुषमा को अपने लैंड के दर्शन करना चाहता था जिसके चलते वह अपनी टॉवल को कमर पर इतनी देरी बांध लिया था कि 5 6 कदम चलने के बाद ही वह अपने आप ही कमर से छूटकर नीचे गिर जाती और फिर हाथ में चीनी की कटोरी लेकर वह रसोई घर से बाहर आ गया वह जानता था कि उसका टावल उसका ज्यादा देर तक साथ देने वाली नहीं है,,, उसकी उत्तेजना कम भी नहीं हो रही थी उसका तंबु ज्यों का त्यों खड़ा था,,, रसोई घर से बाहर आते हुए अंकित को देखकर सुषमा आंटी मुस्कुराने लगी लेकिन अभी भी उसकी नजर उसके दोनों टांगों के बीच ही थी जो की बेहद आकर्षक और मदहोश कर देने वाला लग रहा था देखते ही देखते अंकित सुषमा आंटी के करीब आ गया। ठीक उसके सामने आकर खड़ा हो गया और हाथ में चीनी की कटोरी लेकर वह अपने हाथ को आगे बढ़ाते हुए बोला।
लीजिए आंटी मैं पूरी कटोरी भरकर लाया हूं,,,( उसका इतना कहना था की वाकई में उसका टॉवल उसकी कमर से छूटकर उसके कदमों में जा गिरा और उसका टनटनाया हुआ लंड एकदम से सुषमा आंटी के सामने लहराता हुआ आ गया जिसे देखकर सुषमा आंटी के सांसे एकदम से रुक गई,,, और आश्चर्य से उसका मुंह खुला का खुला रह गया,,,, सुषमा अपना हाथ भी आगे नहीं बढ़ा पाई थी कि उसकी आंखों के सामने एक अद्भुत मंजर दिखाई देने लगा था जिसे देखकर उसकी सिटी पिट्टी गुम हो चुकी थी उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में हलचल बढ़ने लगी थी और अंकित तो यही चाहता ही था इसलिए वह पूरी तरह से सहज था वह जी भरकर सुमन की मां को अपने लंड के दर्शन करा देना चाहता था,,,, क्योंकि वह लंड के दर्शन करने की महिमा को अच्छी तरह से जानता था जिसके चलते उसकी नानी उसके साथ संभोग करने के लिए आतुर हो चुकी थी,और इस समय वह यही चाहता था,,, अंकित का आत्मविश्वास पूरी तरह से कायम था वह अपने मन में यही सोच रहा था कि जब उसकी नानी उसके साथ संभोग करने के लिए तैयार हो सकती है तो सुमन तो अभी भी उसकी मां की उम्र की है इसमें भी तो जवान कूट-कूट कर भरी हुई है जिसके दर्शन वह खुद अनजाने में कर लिया था,,,,।
अंकित दोनों हाथ में कटोरी को पकड़े हुए था और वह पूरी तरह से नंगा था उसके बदन पर टावल भी नहीं था टावल के गिरने के साथ ही उसका मर्दाना अंग पूरी तरह से प्रदर्शित हो रहा था जिसे देखकर सुषमा आंटी पूरी तरह से पानी पानी हुए जा रही थी उनकी नज़रें अंकित के लंड से एक पल के लिए भी नहीं है रही थी शायद इस तरह का वह अपने जीवन में पहली बार देख रही थी और वाकई में यह सच भी था क्योंकि वह अपने मन में यही सोच रही थी कि इस तरह का लंड तो वह गंदी फिल्म मेंदेखी थी। और कभी सोची भी नहीं थी कि उसे इस तरह का लंड देखने को मिलेगा लेकिन आज उसकी मुराद पूरी हो रही थी,,, उसकी आंखों के सामने टनटनाया हुआ लंड था जो किसी भी बुर में जाकर बुर का भोसड़ा बनाने के लिए सक्षम था। सुषमा की हालात पूरी तरह से खराब हो चुकी थी वह पागलों की तरह अंकित के लंड को देखे जा रही थी मानो कि जैसे देखकर ही उसे अपने अंदर ले लेगी,,, अंकित पूरी तरह से उसे दिखा देना चाहता था इसलिए अभी कुछ बोल नहीं रहा था लेकिन जब उसे एहसास हो गया कि आप समय को ज्यादा हाय दइया हो गया है सुषमा आंटी जी भर कर उसके लंड के दर्शन कर चुकी है इसलिए वह एकदम से बोला,,,)
बाप रे यह क्या हो गया यह टावल भी ना,,,,, जल्दी पकड़िए कटोरी आंटी,,,, मुझे शर्म आ रही है जल्दी करिए,,,,।
हाय दइया कैसी बातें कर रहा है सर में तो मुझे आनी चाहिए जो आंखों के सामने यह सब देख रही हूं,,,सहहहहहह,,,, कितना बड़ा है रे तेरा कितना मोटा और लंबा बाप रे तेरा हथियार तो गजब का है,,,,,(बिना कटोरी को अपने हाथ में पकड़े हुए ही सुषमा आंटी इस तरह की बातें बोल रही थी और यह सब सुनकर अंकीत मन ही मन प्रसन्न हो रहा था। लेकिन फिर भी जानबूझकर नाटक करते हुए बोला।)
यह कैसी बातें कर रही हो आंटी जल्दी से कटोरी पकड़ो समझो मेरी हालत को मैं पूरी तरह से नंगा हुं और मुझे शर्म आ रही है,,,,,,।
(अंकित की हालत को देखकर सुषमा के अंदर की औरत पूरी तरह से जाग गई थी वह एक कदम आगे बढ़कर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाई और अपना हाथ आगे बढ़कर तुरंत अंकित के लंड को अपने हाथ में पकड़ ली उसकी गर्माहट को अपनी हथेली में महसूस करते ही उसे अच्छी तरह से एहसास हुआ कि उसकी बुर से मदन रस की बुंद टपकने लगी थी,,,, सुषमा की सांस एकदम से गहरी चलने लगी थी पहली बार जीवन में वह इतने मोटे तगड़े लंड अपने हाथ में पड़ रही थी उसकी गर्माहट पूरी तरह से उसे पानी पानी कर रही थी,,, अपनी नानी से प्राप्त अनुभव को यहां पर थोड़ा दिखाना चाहता था इसलिए तुरंत अपने हाथ में लिए हुए कटोरी को पास में ही पड़ी कुर्सी पर रख दिया वह सुमन की मां की हरकत को देखकर इतना तो समझ ही गया था कि सुषमा आंटी भी राहुल की मां नुपुर और उसकी नानी से बिल्कुल कम नहीं थी इसलिए वह यहां पर थोड़ा अनुभव दिखा देना चाहता था,,,,,,, बस तुरंत अपना एक हाथ सुमन की मां की कमर में डालकर उसे अपनी तरफ खींच लिया और तुरंत उसके लाल लाल होठों पर अपने होंठ रख दिया,,, यह सब इतनी जल्दबाजी में हुआ था कि सुमन की मां को भी इसका बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था लेकिन वह अंकित की हरकत से पूरी तरह से उत्तेजना से गदगद हो गई थी।
उसे अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि मोहल्ले में घूमने वाला वह छोटा सा लड़का अब पूरी तरह से जवान हो चुका था सुषमा आंटी अपने आप को बिल्कुल भी रोक नहीं पा रही थी वह इस तूफान में पूरी तरह से बहाने को तैयार हो चुकी थी वह पागल हुए जा रही थी अभी भी उनके हाथ में अंकित का मोटा तगड़ा लंड था जिसकी गर्माहट उसे धीरे-धीरे पिघला रही थी। अंकित पागलों की तरह सुमन की मां की लाल लाल होठों का चुंबन का रस पीते हुए उसकी कमर में हाथ हटा लिए हुए उसे एकदम से दीवार से सटा दिया अंकित की हरकत से सुषमा आंटी की बोलती बंद हो चुकी थी वह पागल हुए जा रही थी,,, जिंदगी में पहली बार किसी जवान लड़की के साथ वह पूरी तरह से मस्ती करने के मूड में थी,,, अंकित इस मौके का पूरी तरह से फायदा उठा लेना चाहता था,,, अपनी नानी की बुर की गर्मी आई है उसे अच्छी तरह से महसूस होती थी जब भी वह अपनी नानी को याद करता था तब तक उसका लंड बुर में जाने के लिए खड़ा पड़ता था और ऐसा लग रहा था कि आज वह अपनी नानी की कमी को पूरा कर लेगा,,,,,।
सुमन की मां को दीवार से सटाकर वह उसके होठों का रसपान करते हुए अपने दोनों हाथों से उसकी साड़ी को ऊपर की तरफ उठने लगा सुषमा को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें पल भर के लिए उसे घबराहट होने लगी थी कि वह क्या कर रही है वह अंकित को रोकना चाहती थी लेकिन वह कुछ बोल पाती से पहले ही अंकित उसकी साली को कमर तक उठा दिया था और उसकी नसीब इतनी तेज थी कि उसने आज साड़ी के अंदर पेटी भी नहीं पहनी थी इसलिए वह तुरंत अपनी हथेली को उसकी नंगी बुर पर रख दिया जो पूरी तरह से झांटों के झुरमुट के घेरे में थी,,, जिस तरह से अंकित अपनी हथेली को उसकी बुर की रगड़ रहा था उसे देखकर एक बार फिर से सुषमा की बोलती बंद हो चुकी थी वह उसे रोकना चाहती थी लेकिन रोक नहीं पाई थी उसके होठों से शब्द नहीं फूट रहे थे,,,, अंकित पागलों की तरह उसकी बुर को रगड़ रहा था अपनी हथेली से गर्म कर रहा था और अभी भी सुषमा अंकित के लंड को पकड़कर उसे जोर-जोर से दबा रही थी,,,, जिंदगी में पहली बार इतना मोटा तरो ताजा लंड देखकर वह भी अपना आपा खो चुकी थी,,,, अंकित को अपनी हथेली में सुषमा आंटी की बुर से निकला हुआ मदन रस एकदम साफ महसूस हो रहा था वह पूरी तरह से अकेली होती चली जा रही थी,,,,, आगे बढ़ने से पहले फिर भी वह सुषमा आंटी से एक बार पूछ लेना चाहता था अपने मन को तसल्ली दिला देना चाहता था कि वाकई महसूस मानती क्या चाहती है इसलिए वह अपने होठों को एकदम से सुषमा आंटी के होठों से अलग करता हुआ गहरी सांस लेता हुआ सुषमा आंटी के चेहरे को फिर से अपने दोनों हाथों में लेते हुए बोला लेकिन इस दौरान दोनों हाथों को ऊपर उठने से एक बार फिर से सुषमा की साड़ी वापस अपनी स्थिति में आ चुकी थी और उसके कदम में जा गिरी थी खूबसूरत है तेरे से पर पर्दा पड़ चुका था लेकिन अभी भी उसके हाथ में उसका लंड था,,,, अंकित उत्तेजित स्वर में बोला,,,,)
तुम तो मुझे पागल कर दी आंटी बोलो अब क्या करूं,,,,,।
(अंकित का सवाल सुनकर सुषमा आंटी कुछ बोल नहीं पा रही थी,,,, वह नजर भर कर अंकित की तरफ देख रही थी अंकित के मासूम चेहरे की तरफ देख रही थी उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि मासूम चेहरा पूरी तरह से जवान हो चुका था वह कुछ बोल नहीं पाई अपने मन की बात अपने होठों पर लाने में उसे शर्म महसूस हो रही थी वह दरवाजे की तरफ देखते हुए सिर्फ इतना ही बोली।)
दरवाजे की कड़ी नहीं लगी है,,,।
(बस सुषमा का इतना कहना उसकी तरफ से पूरी तरह से इजाजत दे रहा था उसकी तरफ से निमंत्रण दे रहा था जिसे सुनकर अंकित एकदम खुश हो गया और तुरंत दरवाजे की तरफ आगे बढ़कर और दरवाजे की कड़ी लगा दिया वह भी मदहोशी में भूल चुका था कि दरवाजा का पल्ला सिर्फ बंद है उसे पर कड़ी नहीं लगी है ऐसे में उसकी मां आ सकती थी कोई भी आ सकता था वह दरवाजे पर कड़ी लग रहा था और सुषमा उसके गोल-गोल नितंबों की तरफ देख रही थी वाकई में वह अंकित के नितंबों को देखकर आकर्षित हो चुकी थी फुर्ती दिखाता हुआ अंकित दरवाजे पर खड़ी लगा चुका था और वापस अपनी जगह पर आ चुका था लेकिन इस बार वह तुरंत सुषमा आंटी को दीवार की तरफ घुमा दिया था औरउनकी पीठ को अपनी तरफ कर दिया था और पीछे से उसे अपनी बाहों में भरकर ब्लाउज के ऊपर से ही दोनों चुचियों का दबाना शुरू कर दिया था इतना तो अंकित को मालूम नहीं था कि उसके पास समय अब ज्यादा नहीं था इसलिए वह जल्दबाजी दिखाता हुआ सुषमा आंटी के ब्लाउज के निचले हिस्से के दो बटन को खोल दिया और दोनों हाथों से चुचियों को बाहर निकाल दिया,,,, सुषमा की दोनों चूचियां भी पपाया की तरह थी,,,, जिसे हम की जोर-जोर से दबा रहा था और इस तरह के स्तन मर्दन में सुषमा को भी बहुत मजा आ रहा था,,, इसदौरान वह लगातार साड़ी के ऊपर से ही सुषमा के पिछवाड़े पर अपना लंड रगड़ रहा था जिससे सुषमा की हालत और ज्यादा खराब हो रही थी वह भी जल्दी से जल्दी अंकित के लंड को अपनी बुर में ले लेना चाहती थी।
समय के अभाव को देखते हुए अंकित भी ज्यादा देर नहीं करना चाहता था वह भी जल्द से जल्द इस खेल को खत्म कर देना चाहता था आज उसके जीवन में सुषमा उसके नीचे आने वाली दूसरी औरत थी और इस पल को वह गंवाना नहीं चाहता था और वह देखते ही देखते एक बार फिर से अपने दोनों हाथों से चश्मा की साड़ी पड़कर कमर तक उठा दिया और उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर अपनी तरफ खींच कर उसकी गांड को अपने हिसाब से अपनी स्थिति में लाने लगा,,, सुषमा के मुंह से एक भी शब्द नहीं फूट रहे थे वह इस समय अंकित के हाथों की कठपुतली बन चुकी थी उसका मोटा तगड़ा लंड उसे पूरी तरह से मजबूर कर चुका था उसके सामने घोड़ी बनने के लिए,,, और फिर अंकित अपने लंड को अपने हाथ में पकड़ कर धीरे से उसे सुषमा की गांड की दोनों आंखों के बीच से अंदर की तरफ ले जाने लगा उसे सुषमा का गुलाबी छेद बराबर दिख नहीं रहा था इसलिए वह अपने हाथों से ही सुषमा की दोनों टांगों को पकड़ कर फैला दिया और अब उसे सुषमा के झांटों की झुरमुट में उसका गुलाबी छेद नजर आने लगा और वह धीरे से अपने लंड पर थूक लगाकर अपने सुपाड़े को उस छेद में प्रवेश कराने लगा।
सुषमा को अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि वाकई में अंकित का लंड कुछ ज्यादा ही मोटा है क्योंकि उसकी बुर में घुसने में थोड़ी सी मस्सकत पैस आ रही थी,,, लेकिन अंकित की नानी का अनुभव उसे आगे बढ़ने में मदद कर रहा था,,, सुषमा की हालत खराब हो रही थी और अंकित धीरे-धीरे अपने लंड की सुपाड़े को उसकी बुर की गहराई में उतर रहा था और देखते ही देखते धीरे-धीरे करके अंकित का लंड उसकी बुर में प्रवेश कर गया और फिर वह दोनों हाथों से सुषमा की कमर पकड़ कर ज्यादा जोर लगाकर बाकी काफी लंड उसकी बुर में डाल दिया और फिर दोनों कमर पकड़ कर उसे चोदना शुरू कर दिया अपनी कमर हिलाना शुरू कर दिया। सुषमा पागल हो जा रही थी मदहोश हो जा रही थी क्योंकि यह सुख उसे महीनों बाद महसूस हो रहा था महीनो बाद तो वह चुदवा रही थी बाकी अद्भुत एहसास उसे जीवन में पहली बार महसूस हो रहा था वह पूरी तरह से मत हो रही थी और अंकित जोर-जोर से धक्के लगा रहा था उसे बहुत मजा आ रहा था।
वह कभी सोचा भी नहीं था कि सुषमा आंटी को इस तरह से छोड़ने का सुख प्राप्त होगा और ना तो सुषमा कभी सोची थी कि चीनी मांगने पर उसे इतना मोटा तगड़ा लंड मिल जाएगा वह भी इस चुदाई से पूरी तरह से मत हो रही थी अंकित बार-बार उसकी कमर पकड़ ले रहा था तो कभी उसकी चूची को दबा दे रहा था वह पूरी तरह से सुषमा को मदहोश कर रहा था उसे मस्त कर रहा था,,,, और फिर देखते ही देखते सुषमा की सांसे उखड़ने लगी क्योंकि वह अपने चरम सुख के करीब पहुंच रही थी और यही हाल अंकित का भी हो चुका था वह जोर-जोर से धक्के लग रहा था और देखते ही देखते दोनों एक साथ झड़ने लगे,,,, दोनों का काम बन चुका था सुषमा पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी उसका लाल-लाल चेहरा साफ बता रहा था कि वह पूरी तरह से संतुष्टि का एहसास लेकर यहां से जाने वाली थी वह धीरे से अपने कपड़ों को व्यवस्थित की वासना का तूफान उतर जाने पर अंकित से नजर मिलाने मुझे सब महसूस हो रही थी इसलिए वह बिना कुछ बोले कुर्सी पर से चीनी की कटोरी हाथ मिला और अपने हाथ से ही दरवाजे की कड़ी खोलकर कमरे से बाहर चली गई अंकित उसे जाता हुआ देख रहा था और फिर वापस दरवाजा बंद करके मुस्कुराता हुआ बाथरुम में चला गया और नहाने लगा।
अंकित बहुत खुश था लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह सुषमा आंटी के साथ इतनी हिम्मत दिखा कर पहली बार में ही उससे चुदाई का सुख प्राप्त कर लिया था लेकिन यही हिम्मत हुआ अपनी मां के साथ क्यों नहीं दिखा पता ऐसा क्या हो जाता है कि अपनी मां के सामने वह घबरा जाता है और आगे बढ़ने से डरने लगता है और सब कुछ समय पर छोड़ देता है जबकि अगर वह भी हिम्मत दिखा कर आगे बढ़ जाए तो ऐसा ही सुख उसे अपने घर में भी मिल सकता है,,, यही सब सोचता हुआ नहा कर बाहर निकल गया और कपड़े पहन कर तैयार हो गया तब तक उसकी मां भी आ चुकी थी और दोनों तैयार होकर मार्केट के लिए निकल गए थे।
अंकित और उसकी मां बाजार के लिए निकल गए थे,,, घर पर वापस आने पर सुगंधा को इस बात की भनक तक नहीं लगी थी कि उसके पीठ पीछे घर पर क्या हुआ था उसे नहीं मालूम था कि सीधा-साधा दिखने वाला उसका बेटा दूसरी औरतों के साथ कितना बेशरम बन चुका था,,, सुमन की मां सुगंधा के घर पर आने से पहले कभी सोचा ही नहीं थी कि उसके घर पर आने पर उसे इतना अदभुत सुख प्राप्त होगा इसके बारे में उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी उसे नहीं मालूम था कि सीधा-साधा ऐसा दिखाने वाला अंकित पूरी तरह से मर्द बन चुका है,,, अगर इस बात की खबर सुगंधा हो जाए तो शायद इसी समय वाहन बाजार न जाकर अपने बेटे का हाथ पकड़ कर उसे वापस अपने घर पर ले आए और उसके साथ अपने बरसों की दबी हुई प्यास को अपनी प्यासी बंजर जमीन को हरी भरी कर ले,,, लेकिन वह जानती नहीं थी कि उसका बेटा इतना ज्यादा चालाक हो चुका है और ज्यादा नहीं केवल पांच छः दिनों में ही,,, और उसे एक सीधा-साधा लड़का से मर्द बनने वाली कोई और नहीं बल्कि सुगंधा की ही मां थी।
रास्ते भर अंकित भी इस बात से हैरान था की दूसरी औरतों के साथ वह इतना खुल कैसे जाता है जबकि उसकी मां इतना इशारा करके उसे अपने पास बुलाने की कोशिश करती है उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करती है लेकिन वहां हिम्मत नहीं दिखा पाता और अपनी मां के साथ हम बिस्तर नहीं हो पाता,,, वह अपनी मन में यही सोच रहा था कि सुषमा आंटी के साथ जो कुछ भी उसने किया और बेहद काबिले तारीफ था उसकी हिम्मत इतनी बढ़ चुकी थी जिसका अंदाजा उसे खुद नहीं था और इसी बात से वह हैरान था अगर थोड़ी हिम्मत दिखा दे तो शायद दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत उसकी बिस्तर पर होगी लेकिन इतनी हिम्मत दिखाने में न जाने कैसा डर उसके ईर्द गिर्द मंडराने लगता है कि वह आगे बढ़ने से अपने आप को रोक देता है,,, वह अपने मन में यही सोच रहा था कि अगर सुषमा आंटी उसकी हरकत पर एतराज जता देती तब क्या होता अगर उसकी हरकत सुषमा आंटी को बिल्कुल भी पसंद नहीं आती और इस बारे में उसकी मां को बता देती तब क्या होता,,,,, अपने मन में उठ रही सवाल का जवाब खुद अपने आप से ही देते हुए वह बोला कि भला ऐसे कैसे हो सकता है,,, अगर सुषमा आंटी को जरा भी ऐतराज होता तो जैसे ही उसकी कमर से टॉवल छुट कर नीचे गिरी थी तभी वह शर्म के मारे अपनी नजर को दूसरी तरफ घुमा देती लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था बल्कि बटन प्यासी नजरों से उसकी दोनों टांगों के बीच खड़े हथियार को देख रही थी और वह भी प्यासी नजरों से सुषमा आंटी की नजर में बिल्कुल भी शर्म और मर्यादा नजर नहीं आ रही थी,,,,, और वह काफी देर तक उसके लंड को ही घर रही थी और शायद उसके लंड की मोटाई और लंबाई उन्हें पूरी तरह से मजबूर कर गई थी उसे अपने हाथ में पकड़ने के लिए तभी तो अपना हाथ आगे बढ़कर बेशर्मी की सारी हद पार करते हुए उसे ज़ोर से पकड़ ली थी और यही तो इशारा था जो वह शब्दों में ना कह सकी थी अपने एक हरकत से बता दी थी कि उन्हें क्या चाहिए,,,,।
अगर मान लो कि यह सब भी सिर्फ भावनाओं में बहकर हुआ था तो,,, तब भी वह अपने आप को पूरी तरह से होश में लाकर अपनी मर्यादा की लाज रख सकती थी जब वह उसकी हरकत पर उसे अपनी बाहों में भर लिया था उसके होठों पर अपने होंठ रख दिया था। और अगर वह तब भी अपने आप को इन सबसे अलग करना चाह रही होती तो अलग कर चुकी होती लेकिन शायद यह सब सोने के बावजूद भी उन्हें मौका ना मिला हो क्योंकि उसकी अगली हरकत पूरी तरह से किसी भी औरत को बेहोश कर सकती थी मर्यादा की दीवार तोड़ने के लिए अपने संस्कारों को एक तरफ रखकर मदहोशी में डूब जाने के लिए जब वह साड़ी उठाकर उसकी बुर पर अपनी हथेली रखकर उसे रगड़ना शुरू कर दिया था तभी सुषमा आंटी एकदम बेहाल हो चुकी थी,,,, इन सबके बावजूद भी एक संस्कारी और मर्यादा वाली औरत अपने आप को अपने मान मर्यादा को बचाने के लिए अपने आप को इन सब से रोक सकती थी लेकिन वह ऐसा बिल्कुल भी नहीं की क्योंकि वह भी यही चाहती थी शायद वह भी पति से संतुष्टि और प्यार नहीं प्राप्त कर पा रही थी या उनके पति उन्हें वर्षों कब नहीं दे पा रहा था जैसा जवानी के दिनों में दिया करता था इसीलिए वह भावना में पूरी तरह से बह गई थी और अपने ही बेटे की उम्र के लड़के के साथ सारी संबंध बनाकर अपने आप को संतुष्ट कर गई थी। यह सब सो कर अंकित के चेहरे पर प्रसन्नता और संतुष्टि का भाव साफ नजर आ रहा था उसे अपने लंड पर गर्व होने लगा था,,, क्योंकि उसके लंड ने एक उम्र दराज औरत की जमकर चुदाई करके उसे संतुष्टि का एहसास कराया था और दूसरी अपनी ही मां के हम उम्र औरत के साथ शारीरिक संबंध बनाकर उसे भी पूरी तरह से संतुष्ट कर दिया था।
अंकित बहुत खुश था जी सुख के लिए वह तड़पता था मचलता था सपना देखा था और अपने मन में कल्पनाए किया करता था कल्पनाओं में अपनी मां का साथ पाकर अपने हाथ से ही अपनी जवानी की गर्मी शांत किया करता था अब वह दिन आ गया था जब वह एक औरत के साथ शारीरिक संबंध बनाकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत कर रहा था । कल्पनाओं की दुनिया से वह पूरी तरह से बाहर आ चुका था अब हकीकत से उसका सामना हो रहा था कल्पनाओं से अत्यधिक आनंद उसे हकीकत में आ रहा था। कल्पनाओं में जिस अंग के बारे में सोच सोच कर वह मदहोश हुआ करता था वह अंग वह अपनी आंखों से देखकर उसे छूकर उसे मसल कर उस गुलाबी छेद में अपने मर्दाना अंग को डालकर जिस तरह की रगड़ महसूस करके उसे आनंद आ रहा था वह शायद अपने हाथ से खिलाकर उसे कभी भी प्राप्त नहीं हो रहा था एक कमी रह जाती थी जो धीरे-धीरे पूरी हो रही थी। अंकित तो अपनी मां को चोदना चाहता था अपनी मां की चुदाई करना चाहता था उसके खूबसूरत अंगों से खेलना चाहता था उसे अपने हाथों से नंगी करना चाहता था उसके खूबसूरत अंगों को अपने हाथ में लेकर अपने मुंह में भरकर उनका रस पीना चाहता था लेकिन हम जाने में ही मां की जगह मां की मां और पड़ोस की सूषमा आंटी जवानी का मजा उसे चखा दी थी। लेकिन इन सबके बावजूद भी इसका मुख्य थे अग्रिम लक्ष्य उसकी मां ही थी। वह कीसी भी तरह से संभोग करना चाहता था और इससे पहले दो औरतों के साथ शारीरिक संबंध को वह एक अभ्यास के तौर पर ले रहा था। जैसे वार्षिक परीक्षा के पहले अभ्यास के रूप में परीक्षा होती है और अंतिम परीक्षा ही मुख्य परीक्षा के तौर पर मानी जाती है इस तरह से अभी उसकी अंतिम परीक्षा बाकी थी जिसमें उसे पूरी तरह से खराब उतरना था यह दो परीक्षा तो अभ्यास के तौर पर थे वह देखना चाहता था कि वह अंतिम परीक्षा में संपूर्ण रूप से उत्तीर्ण हो पता है कि नहीं लेकिन आप उसे पूरा विश्वास हो चुका था वह आत्मविश्वास से भर चुका था वह अपने आप से वादा कर चुका था कि जैसे ही अंतिम परीक्षा उसके जीवन में आएगी वह डंके की चोट पर पूरी तरह से अग्रिम स्थान लेते हुए उत्तीर्ण होकर दिखाएगा।
मां बेटे दोनों बाजार पहुंच चुके थे। सुगंधा का दिल जोरो से तड़प रहा था क्योंकि आज वह अपने लिए एक नए वस्त्र का चयन करने जा रही थी जिसे केवल वह फिल्मों में ही देखी थी जिसे पहनकर फिल्म की हीरोइन जॉगिंग वगैरा करती थी आज वही वस्त्र वह अपने लिए खरीदने जा रही थी जिसके लिए वह काफी उत्साहित थी क्योंकि ऐसे वस्त्र को पहनकर वह देखना चाहती थी कि वह उन वस्त्रो में कैसी लगती है और उन वस्त्र में वह अपने आपको कैसा महसूस करती है। बाजार में पहुंचकर दोनों एक बड़ी सी दुकान में जाने लगे जिसका चयन खुद अंकित नहीं किया था और जानता था कैसी दुकानों पर इस तरह के वस्त्र बड़े आराम से मिल जाएंगे लेकिन दुकान में प्रवेश करते समय सुगंधा के हाथ पैर सुन्न हो रहे थे। दोनों दुकान में प्रवेश कर चुके थे बड़ी सी दुकान में अलग-अलग काउंटर लगा हुआ था एक तरफ बच्चों के कपड़े तो दूसरी तरफ बड़ों के कपड़े एक तरफ साड़ी का काउंटर लगा हुआ था तो दूसरी तरफ औरतों के अंतरवस्त्र थे,,, जिन पर कुछ पल के लिए सुगंधा की नजर टिक गई थी लेकिन फिर उसे समझ में नहीं आया कि वह जिस तरह कपड़े लेने आई है वह किस काउंटर पर मिलेंगे इसलिए वह अपने बेटे से बोली।
अंकित मुझे समझ में नहीं आ रहा की कुर्ता पजामा मिलेगा कहां मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है तू ही जाकर पूछ,,,।
तुम चिंता मत करो मैं पूछ कर आता हूं,,,,(और अंकित एक ऐसे काउंटर पर गया जहां पर लेडी खड़ी थी वह इन सबके वस्त्रो के बारे में अच्छी तरह से जानकारी रखनी होगी इसका अंदाजा अंकित को हो गया था,,, सुगंधा दुकान के बीच में खड़ी होकर अपने बेटे को भी देख रही थी वह अपने मन में सोच रही थी कि उसका बेटा क्या बोल रहा होगा क्या पूछ रहा होगा तो समझ में नहीं आ रहा है लेकिन थोड़ी देर में वह मुस्कुराता हूं अपनी मां के पास आया और बोला,,,)
चलो उसी काउंटर पर मिल जाएगा,,,,(इतना कहकर मां बेटे दोनों उस काउंटर के पास पहुंच गए,,, सुगंधा की तरफ देखते हैं वह काउंटर वाली लेडी मुस्कुराते हुए बोली)
गुड इवनिंग मैम,,, बताइए मैं आपके लिए किस तरह के वस्त्र दिखा सकती हुं,,,,।(यह बात उसने सुगंधा से बोली थी इसलिए सुगंध पल भर के लिए एकदम से हड़बड़ा गई थी और उसके मुंह से निकला,,,)
ईईई,,, इन्होंने जो बताया ना वही कपड़ा चाहिए,,,,,(सुगंधा के शब्दों में इस तरह के शब्द थे जो औरत बड़ी इज्जत से पेश आने पर बोलती है और ऐसे मर्द के लिए प्रयोग करती है जो उसका बहुत खास हो उसका प्रेमी या पति हो इसलिए सुगंधा के इन शब्दों को सुनकर वह लेडी मुस्कुराते हुए अंकित की तरफ मुखातिब हुई और बोली,,,)
बताइए सर आपकी मैडम के लिए किस तरह के कपड़े चाहिए,,,,।
(उस काउंटर वाली लाडी की यह बात सुनते ही सुगंधा एकदम से संन्न रह गई,,, वह शर्म से पानी पानी होने लगी और शर्म के मारे वह अंकित की तरफ देखने लगी अंकित समझ गया था कि उसकी मां क्या सोच रही है इसलिए मुस्कुराने लगा और उस काउंटर वाली लेडी से बोला,,)
इन मैडम को कुर्ता और पैजामा चाहिए ताकि उसे पहनकर वह सुबह अच्छी तरह से जॉगिंग कर सकें,,,।
ओहहह यह बात है मैडम अपने आप को फिट रखने का पूरा कोशिश करती है और इसीलिए तो एकदम फिट भी है,,,, मैं समझ गई मैडम आपको क्या चाहिए,,,,।(और इतना कहकर दूसरी तरफ रखे हुए अलग-अलग कपड़ों के बीच चली गई और सुगंध का पूरा हाल था क्योंकि उसके बेटे ने जिस तरह से इन मैडम को कहा था यह शब्द उसके दिलों दिमाग के साथ साथ उसके दोनों टांगों के बीच उसकी बुर पर दस्तक दे रहे थे यह शब्द बहुत कुछ कह जा रहा था, अपने आप में ही यह दो शब्द एक तरह से किसी भी औरत को अपनापन दिखाने का सबसे अच्छा तरीका है,,,, सुगंधा जो इस समय पूरी तरह से शर्मा से पानी पानी हुए जा रही थी और एक अद्भुत एहसास में डूबती चली जा रही थी इस बात से हैरान भी थी कि उसका बेटा उसे मम्मी कहकर संबोधन क्यों नहीं कर रहा है। और यह काउंटर वाली लेडी भी कुछ और ही समझ रही है,,, यह एहसास होते ही सुगंधा का तन-बदन ऊपर से नीचे तक उत्तेजना से गनगनाने लगा था,,, वह अपने चारों तरफ देख ले रही थी की कहीं कोई पहचान का तो नहीं है लेकिन ऐसा कोई भी शख्स वहां नहीं था जो दोनों को जानता हो,,, सुगंधा बार-बार अपने बेटे की तरफ देख ले रही थी और अंकित खुशी के मारे बहुत प्रसन्न नजर आ रहा था और अपने चारों तरफ नजर दौड़ा कर देख रहा था,,,,।
तभी थोड़ी ही देर में,,, वह काउंटर वाली लेडी पांच छ सेट कुर्ता और पजामा का लेकर आई, और सबको काउंटर पर रखते हुए बोली।
देख लीजिए मैडम एक से एक कुर्ता और पैजामा है और इतना मुलायम और मखमली है कि आपके बदन पर बहुत अच्छा लगेगा,,,,, सर आप भी देख लीजिए आपकी मैडम को कौन सा कलर अच्छा लगेगा,,,,।
इन मैडम पर तो कोई भी कलर खूब जंचता है,, बस मैडम को पसंद करने की देरी है।
(अंकित पूरी तरह से मौके का फायदा उठा रहा था और सुगंधा शर्म से पानी पानी हुई जा रही थी,,, सुगंधा अपने मन में सोच रही थी कि पता नहीं काउंटर वाली लेडी उन दोनों के बीच कौन से रिश्ते को देख रही है पति पत्नी का या प्रेमी प्रेमिका का होना हो यह प्रेमी प्रेमिका वाला ही जोड़ा अपने मन में वह सोच रही है इसलिए तो बार-बार मैडम और कर कहके प्रयोग कर रही है। उस काउंटर वाली लाडी की बात सुनकर सुगंधा कुर्ते और पजामे को अपने हाथ में लेकर देखने लगी,,,, जितने भी काउंटर पर रखे हुए थे सब एक से बढ़कर एक थे और उनका कपड़ा इतना मखमल जैसा था कि इसी समय सुगंधा का मन उसे पहनने को कर रहा था वह समझ गई थी कि वाकई में इन कपड़ो में उसके बदन को कितना आराम मिलेगा,,,, काउंटर वरी लेडी बार-बार दोनों की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे अंकित भी मुस्कुरा रहा था लेकिन सुगंधा का हाल बेहाल था वह जल्द से जल्द इस दुकान से बाहर निकल जाना चाहती थी,,, इसलिए एक लाल रंग का कुर्ता और पैजामा बहुत पसंद कर ले और अंकित अपनी मां के द्वारा पसंद किए गए कुर्ते और पजामी को अपने हाथ में ले लिया और कुर्ते को सीधे उसे नापने के लिए उसके गले तक हुआ कपड़ा करके देखने लगा और उसके ऐसा करने पर उसकी उंगलियां उसकी मां की चूचियों और स्पर्श हो गई और चूचियां हल्के से अपने बेटे की उंगली का दबाव महसूस करके दब गई ऐसा लग रहा था जैसे कोई स्पंज स्पर्श हो गया हो इसका एहसास अंकित को भी हुआ था और उसकी मां को भी हुआ था और इस स्पर्श से सुगंधा की बुर में सनसनी से दौड़ने लगी,,,, और इस हरकत को काउंटर वाली लेडी भी देख चुकी थी इसलिए वह मुस्कुराने लगी,,,, और बोली,,,,)
बहुत प्यार है आप दोनों में दिखाई देता है,,,।
(काउंटर वाली लेडी के कहने का मतलब कुछ सुगंधा अच्छी तरह से समझ रही थी,,,,, वह जान गई थी कि जो कुछ भी अभी हुआ था वह उस लेडी की नजरों से बच नहीं पाया था,,, इसलिए मैं कुछ बोल नहीं पाई बस उसे काउंटर वाली लेडी को बुरा ना लगे इसलिए मुस्कुरा दी,,,,)
तो आपको यह पसंद है मैडम।
जी जी,,, मुझे यह पसंदहै,,,।
कुछ और लेना चाहेंगी,,,,
नहीं नहीं बस यही चाहिए था,,,।
सर आप कुछ और दिलाना चाहते हैं,,,(अंकित की तरफ देखते हुए वह काउंटर वाली लेडी बोली और जवाब में अंकित फिर मुस्कुराते हुए बोला)
अगर मैडम चाहेंगी तो जरूर और भी कुछ लेना चाहेंगे,,,।
ले लीजिए मैडम सर भी दिलाने के लिएतैयार है,,,।
नहीं नहीं मुझे और कुछ नहीं चाहिए बस यही चाहिए,,,,।
अगर आप बुरा ना माने तो आपके लिए,,, रुकीए में दिखा देती हूं,,,,,(इतना कहने के साथ है वह काउंटर वाली लेडी फिर से अंदर कहीं और एक पैकेट लेकर आई और उसे काउंटर पर रखकर खोलने लगी,,,, उसे खोलते ही जो वस्त्र उसमें से बाहर निकाला उसे देखकर सुगंधा के होश उड़ गए और अंकित का भी हाल बुरा हो गया वह एक गांव था जो जाऊंगा तक आता था और आगे से बिल्कुल खुला हुआ था बस एक डोरी थी उसे आपस में बांधने के लिए,,, उसे देखकर अंकित समझ गया था कि इसे पहनने के बाद तो उसकी मां स्वर्ग से होती हुई अप्सरा लगेगी,,,, वैसे तो वस्त्र होते हैं बदन को ढकने के लिए लेकिन यह जो गाउन था वह पूरी तरह से अपने खूबसूरत अंगों को दिखाने के लिए उनकी खूबसूरती बढ़ाने के लिए ही था उसे काउंटर वाली लेडिस से हाथ में लेकर सुगंधा को दिखाते हुए बोली,,,,)
यह देखिए मैडम इसे पहनने के बाद तो आप स्वर्ग से उतरी अप्सरा फिल्म की हीरोइन लगेगी सच में यह आप पर बहुत खूबसूरत लगेगा ले लीजिए सर भी खुश हो जाएंगे,,,,
(उस कपड़े का हाल सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी वह जानते थे कि उसे पहनने के बाद वह वाकई में बहुत खूबसूरत लगेगी लेकिन इस समय वह शर्म से पानी पानी में जा रही थी,,,, क्योंकि काउंटर वाली लेडी के व्यवहार से इतना तो समझ में आ गया था कि वाकई में वह काउंटर वाली लेडी उन दोनों को मां बेटा ना समझ कर कुछ और ही समझ रही थी इसलिए इस तरह का वस्त्र दिखा रही थी,,, उसे वस्त्र को देखकर कुछ पल के लिए सुगंधा भी कल्पना करने लगी थी कि वाकई में इसे पहनने के बाद वह बेहद खूबसूरत लगेगी और किसी मर्द को आकर पूरी तरह से अपने बस में करना हो तो यह वस्त्र पूरी तरह से कारगर साबित होगा लेकिन इस समय वह पूरी तरह से डर गई थी घबरा गई थी और शर्म से पानी पानी हो गई थी इस तरह का वस्त्र खरीदने में और वह भी अपने बेटे की आंखों के सामने उसे वाकई में शर्म महसूस हो रही थी भले ही वह काउंटर वाली लेडी उन दोनों को किसी और रूप में देख रही हो लेकिन फिर भी वह तो जानती थी ना कि दोनों के बीच कौन सा रिश्ता है अपने ही बेटे के सामने इस तरह का वस्त्र खरीदने में न जाने क्यों उसे ईस समय शर्म महसूस हो रही थी। इसलिए वह बोली,,,)
नहीं नहीं मुझे नहीं चाहिए,,,, रहने दो मैं जो कपड़ा लेने आई थी वह मुझे मिल गया इसके लिए शुक्रिया,,,,।
क्या सर बोलिए ना,,,,(मायूसी से अंकित की तरफ देखते हुए,,,, उस काउंटर वाली लेडी को देखकर अंकित बोला,,,)
ले लो मैडम इतना कह रही हैं तो तुम पर सही में बहुत अच्छा लगेगा,,,,।
नहीं नहीं मुझे नहीं चाहिए बस इतना पैक कर दो,,,,,।
(सुगंधा का मिजाज देखकर वह काउंटर वाली लेडी समझ चुकी थी कि वह इस कपड़े को नहीं खरीदेंगी,,,,, इसलिए वह वापस उस कपड़े को पैक करने लगी लेकिन सुगंधा की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोली,,,)
वैसे भी मैडम इतनी खूबसूरत है कि इस तरह के कपड़े की जरूरत उन्हें है भी नहीं,,,,,।
(काउंटर वाली लाडी की बात सुनकर सुगंधा मन ही मन प्रसन्न होने लगे क्योंकि वाकई में उसे काउंटर वाली लाडी ने सुगंधा की खूबसूरती की तारीफ की थी,,,,, थोड़ी देर में कुर्ता और पैजामा को पैक करके अंकित के हाथ में थमाते हुए वह लेडी बोली,,,)
जाकर काउंटर पर पैसे चुका दीजिए।
ठीक है और आपकी मदद के लिए धन्यवाद,,,।
वेलकम सर,,, आते रहीएगा मैडम को लेकर,,,
(थोड़ी ही देर में अंकित और उसकी मां काउंटर पर पहुंच कर वहां पर पैसा चुकाने के बाद दोनों दुकान से बाहर निकल गए दुकान के अंदर जो कुछ भी हुआ था उसे देखते हुए अंकित समझ गया था कि उसकी मां उसे डांटेगी या कुछ ऐसा जरुर बोलेगी,,, लेकिन इससे पहले ही दुकान की सीढ़ियां उतरते हुए अंकित एकदम से बोल पड़ा,,,)
देखी मम्मी आपकी खूबसूरती और बदन की बनावट को देखकर कोई समझ ही नहीं पता कि हम दोनों मां बेटे हैं वह काउंटर वाली लेडी भी हम दोनों को मां बेटा नहीं समझ रही थी।
यह तो मैं खूब अच्छे से समझ रही हूं और तू बहुत मजा ले रहा था ना वहां पर,,,,(आंखों को गोल-गोल घूमाते हुए सुगंधा बोली तो उसकी बात सुनकर मुस्कुराते हुए अंकित बोला,,,)
आप कर भी क्या सकते हैं वह लेडी हम दोनों को मां बेटा नहीं समझ रही थी तो मैं भी सोचा कि चलो जब वह हम दोनों को जानती ही नहीं है तो भला उसे बात कर क्या फायदा कि हम दोनों मां बेटे हैं ना कि प्रेमी प्रेमिका,,,,(अंकित जानबूझकर इस शब्द का प्रयोग किया था और इस शब्द को सुनकर सुगंध भी हैरान हो गई थी और उसकी तरफ देखते हुए बोली)
प्रेमी प्रेमिका,,,,
क्यों हम दोनों लगते नहीं है क्या,,,,?(अंकित भी मजा लेते हुए बोला)
बड़ा बेशर्म हो गया है तू,,,,।
नहीं ऐसी बात नहीं है वह तो हम दोनों को कोई जानता नहीं था इसलिए सोचा चलो जैसा वह समझ रही है वैसा ही नाटक किया जाए,,,।
अच्छा जब कोई हम दोनों के रिश्ते के बारे में नहीं समझेगा तो हम दोनों कुछ और बन जाएंगे पति-पत्नी प्रेमी प्रेमिका है ना,,,,(सुगंधा भी एकदम से यह शब्द बोल गई थी लेकिन पति-पत्नी वाली बात पर खुद ही वह शर्म से पानी पानी हो गई और अंकित अपनी मां की बात सुनकर मुस्कुराने लगा था उसकी मुस्कुराहट बहुत कुछ बयां कर रही थी,,, लेकिन यह सब बातें सुगंधा की गर्म जवानी थोड़ा-थोड़ा करके पिघला रही थी जिससे उसकी पेंटि गीली हो रही थी। और उसे बड़े जोरों की पैसाब भी लगी हुई थी लेकिन यहां कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां पर वह बैठकर पेशाब कर सके।
शाम ढलने लगी थी समय भी थोड़ा ज्यादा हो रहा था इसलिएवह बोली,,,।
आज कुछ नाश्ता खरीद लेते हैं घर पर खाना नहीं बनाऊंगी काफी देर हो गई है,,, अंधेरा हो रहा है घर पहुंचते पहुंचते और देर हो जाएगी।
ठीक है कुछ खरीद लो,,,,।
पहले तो मुझे पानी पुरी खाना है,,, तू भी खाएगा,,,,।
नहीं नहीं मैं नहीं खाऊंगा तुम खा लो,,,।
चल तू भी खा लेना,,,,।
नहीं मेरे लिए समोसे और जलेबी ले लेना,,,,।
वह तो लेना ही है लेकिन पहले पानी पुरी तो खा ले,,,,।
नहीं,,,, मुझे नहीं पसंद है जानती हो ना जब मैं खाता हूं तो आंख से पानी गिरने लगता है,,,।
चल कोई बात नहीं मैं ही खा लेती हूं,,,,।
(, इतना कहकर वह सड़क के किनारे पर लगे पानी पुरी के ठेले पर पहुंच गई पीछे-पीछे अंकित भी वही पहुंच गया और पानी पुरी खाने लगी लेकिन पानी पुरी खाने से पहले वह अपने हाथ से अपने आगे की साड़ी को दोनों टांगों के बीच फंसा कर आगे की तरफ झुक कर पानी पुरी मुंह में डालकर खाने लगी क्योंकि पानी पुरी का पानी साड़ी पर गिरने का डर रहता है इसलिए अपनी साड़ी को बचाने के लिए वह थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गई थी और उसकी इस अदा पर उसके ब्लाउज से झांकते हुए उसके दोनों जवानी एकदम से उजागर हो गई थी,,, आगे से दोनों चुचीया और पीछे से गोलाकार गांड कुल मिलाकर मर्दों को बेहाल कर रहा था,,,। अंकित अपनी मां की छलकती हुई जवान का रस अपनी आंखों से पी रहा था,,, और यह रस शायद आसपास में खड़े दूसरे मर्द भी पी रहे थे क्योंकि बार-बार उन मर्दों की नजर सुगंधा करी जा रही थी और इस बात का एहसास अंकित को भी हो रहा था लेकिन अंकित को अपनी मां की जवानी पर उसकी खूबसूरती पर गर्व महसूस हो रहा था।
सुगंधा धीरे-धीरे एक-एक करके बड़े चाव से पानी पुरी खा रही थी और उसके स्वाद से निहाल हुए जा रही थी,,,, अंकित अपनी मां की ईस अदा को प्यासी नजरों से देख रहा था और जब पानी पुरी वाले आदमी की तरफ देखा तो उसे एहसास हुआ कि वह आदमी भी,,, उसकी मां की चूचियों की तरफ ही देख रहा है जब जब वह पानी पुरी सुगंधा की तरफ ले जा रहा था तब तक नजर भरकर उसके ब्लाउज से झांकती हुई उसकी दोनों जवानी को देखकर मन मसोस कर रह जा रहा था। इस बात का एहसास होते ही अंकित अपने मन में सोचने लगा कि वाकई में उसकी मां को चोदने के लिए कितने लोग तैयार है अगर इसकी मां भी दूसरी औरतों की तरह होती तो शायद अब तक अपनी बुर में न जाने कितने लंड ले ली होती,,,, और इस बात का गर्व भी अंकित को हो रहा था कि अच्छा हुआ उसकी मां दूसरी औरतों की तरह नहीं है जब भी उसे उसकी मां की बुर मिलेगी तो उसके पापा के बाद उसके बुरे में जाने वाला लंड उसकी ही होगा इस बात को सोचकर वह मन ही मन प्रसन्न हो रहा था। तभी पास में दो आदमी खड़े थे जो इंतजार कर रहे थे अपना नंबर आने का और सुगंध की तरफ देख कर आपस में ही बात करते हुए बोले।
यार कितनी मस्त औरत है गांड तो देखो कितनी कसी हुई है ऐसा लग रहा है की साड़ी फाड़ कर बाहर आ जाएगी,,,,।
गांड तो छोड़ वह तो ढकी हुई है आगे देख दोनों चुचीया छलक रही हैं कसम से मैं अगर पानी पूरी वाला होता तो सिर्फ चूचियों को दबाने का बदले उसे जी भर कर पानी पूरी खिलाता,,,,,(उसके साथ वाला आदमी बोला दोनों की बातें सुनकर अंकित का दिमाग एकदम से सन्न रह गया उन दोनों आपस में बहुत धीरे-धीरे बात कर रहे थे सिर्फ अंकित उन दोनों के पास में खड़ा था इसलिए उसे सुनाई दे रहा था बाकी किसी को सुनाई नहीं दे रहा था लेकिन दोनों की बातें उसकी मां के बारे में थी उसकी मां की जवानी देखकर बेहद गंदे ख्यालात उन दोनों के मन में आ रहे थे शायद इस तरह के खलत दूसरे मर्दों को भी आते होंगे जब उसकी मां की जवानी को देखते होंगे इस बात का एहसास अंकित को उत्तेजित कर रहा था,,,, अभी अंकित उन दोनों के बारे में उनकी कही गई बातों के बारे में सोच ही रहा था कि तभी पहले वाला आदमी फिर से उसकी मां के बारे में बोला।)
यार कसम से एक रात के लिए मिल जाए ना तो समझ लो जन्नत का मजा मिल जाए ऐसी औरत का मैं आज तक नहीं देखा,,,।
सच कह रहा है यार तु साली जब कपड़े उतारती होगी तो नंगी होने के बाद तो गजब लगती होगी,,,।
बात तो सही है लेकिन जो लेती होगा उसकी किस्मत कितनी तेज होगी,,, मजा ही मजा देती होगी हम लोग तो सिर्फ सोच कर ही इतना मत हो जा रहे हैं लेने वाला तो बहुत किस्मत वाला होगा।
(गंदे शब्दों में ही सही वह दोनों अंकित की मां की खूबसूरती की और उसकी जवानी की तारीफ ही कर रहे थे इस बात का एहसास अंकित को अच्छी तरह से था,, इस तरह की बातें करने से वह उन दोनों को रोक नहीं सकता था अगर रोकता भी तो क्या कहकर कुछ बताने लायक भी नहीं था सबके बीच में खुद उसका ही मजाक बन जाता और यह सब कुछ चाहता नहीं था लेकिन वह जितना उन दोनों के करीब था इतना तो बताया था कि उन दोनों को भी पता होगा कि बगल वाला लड़का या सब सुन रहा होगा इसलिए वह नहीं चाहता था कि उन दोनों को पता चले की उनके बगल में खड़ा लड़का उस औरत का बेटा है,,, वरना उन दोनों को लगेगा कि बेटा पूरी तरह से निकम्मा है तभी तो यह सब सुनकर भी कुछ बोल नहीं पाया इसलिए वह तुरंत सड़क पार करके दूसरी तरफ आ गया जहां पर लोगों का आने जाना ज्यादा ही था थोड़ी देर में उसकी मां भी पानी पुरी खाकर दूसरी तरफ आ गई और दोनों घर की तरफ जाने लगे।)
घर पर चलकर मुझे पहन कर दिखाना कैसा लगता है,,,,।
(यह बात सुनते ही सुगंधा को वह पल याद आ गया जब उसका बेटा उसके लिए पेंटि खरीद कर लाया था और उसे पहन कर दिखाने के लिए बोला था और वह दिखाइए भी थी पैंटी पहनने में और दिखने में जो कुछ भी हुआ था उसे सब कुछ अच्छी तरह से याद था इसलिए उन पल को याद करके एक बार फिर से उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी। वह अपने मन में सोचने लगी कि कहीं फिर से कपड़े पहन कर दिखाते समय उसका बेटा ऐसी वैसी हरकत ना करते और यह ख्याल उसके मन में आते ही उसका पूरा बदन गनगनाने लगा।)
सुगंधा और अंकित दोनों मां बेटे मार्केट से वापस घर आ चुके थे,,,, मार्केट में जो कुछ भी हुआ था वह बेहद दिलचस्प था जिस मां बेटे दोनों आपस में कुछ ज्यादा ही खुलने लगे थे दुकान के अंदर जिस तरह से वह काउंटर वाली लेडी दोनों को प्रेमी प्रेमिका समझ रहे थे इस बात से सुगंधा पूरी तरह से हैरान थी,,, एहसास होने लगा था कि क्या वाकई में वह अपने बेटे की मन नहीं लगती क्या दोनों की उम्र में कुछ ज्यादा अंतर दिखाई नहीं देता ऐसा ही तो है तभी तो वह काउंटर वाली लेडी दोनों को प्रेमी प्रेमिका समझ रही थी एक बार भी उसने यह नहीं सोचा कि यह दोनों मां बेटे की हो सकते हैं ऐसा क्यों आखिरकार काउंटर वाली लेडी दोनों के बारे में ऐसा क्यों सोची,,,, घर आने पर सुगंधा को यही सब सवाल पूरी तरह से परेशानकर रहे थे,,, लेकिन इस परेशानी में भी राहत की बात यह थी कि उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचने के बावजूद भी उसके बदन का रखरखाव पूरी तरह से संजोया हुआ था,,, बदन में अभी भी कसावट किसी जवान औरत की तरह ही थी। तनी हुई चूचियां किसी भी तरह से जरा सी भी लचकी हुई नहीं दिखाई देती थी,,, मानसर चिकनी कमर और कमर के दोनों तरफ हल्की सी कटी हुई लकीर जो सुगंधा की खूबसूरती में चार चांद लगा देते थे। नितंबों का उभार एक अद्भुत आकार लिया हुआ था,,, जोकि कई हुई साड़ी में पूरी तरह से आकर्षण का केंद्र बिंदु बन जाता था,,, और सबसे बड़ा कारण यह था कि आज तक पति के देहांत के बाद उसने अपने शरीर को किसी भी गैर मर्द को हाथ नहीं लगाने दी थी। और यही सबसे बड़ी वजह भी थी कि अभी तक वह पूरी तरह से जवान थी,,,,।
घर का काम करते समय उसका दिल और दिमाग पूरी तरह से काबू में नहीं था वह अपने बेटे पर हैरान थी कि वह काउंटर वाली लेडी तो दोनों को प्रेमी प्रेमिका समझ रही थी लेकिन इस मौके का फायदा उसका बेटा पूरी तरह से उठा रहा था उसने एक बार भी उसे काउंटर वाली लाडी को यह नहीं बताया कि वह दोनों प्रेमी प्रेमिका नहीं बल्कि मां बेटे में बल्कि वह काउंटर वाली लेडी जो समझ रहा थीवउसे वही समझने भी दिया बार-बार उसे मैडम कहकर संबोधन कर रहा था जिससे सुगंधा की हालत और ज्यादा खराब हो रही थी। दुकान में बिताए हुए हर एक पल के बारे में हर एक बातों के बारे में सोचकर सुगंधा की सांसें ऊपर नीचे हो रही थी। कुर्ता पजामा खरीद लेने के बाद उसे काउंटर वाली दीदी ने उसके पास जो वस्त्र दिखाया था उसे देखकर तो सुगंधा के होश वाकई में एकदम उड़ गए थे और उसे वस्त्र के बारे में सोचकर इस समय सुगंधा पानी पानी हो रही थी। वह अपने मन में यही सोच रही थी कि उस छोटे से गाउन में वह सच में स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा नजर आती केवल प्रॉपर्टी और वह गाऊन,,,उफफफ,,,,, मजा आ जाता,,,,, लेकिन वह जानती थी कि उसे समय उसे खरीद पाना कितने शर्म वाली बात थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह काउंटर वाली लेडी दोनों को पहचानते नहीं से जानते नहीं तो फिर भी उसके सामने उसे न जाने क्यों शर्म महसूस हो रही थी,,, इस कारण को वह नहीं समझ पा रही थी लेकिन इसका मुख्य कारण नहीं था कि सुगंधा चाहे जो भी हो एक मां थी इसलिए एक मां होने के नाते मां का रिश्ता उसे रोक रहा था इसलिए वह अपने बेटे के सामने शर्म के मारे उस गाउन को नहीं खरीद पाई।
पहले से ही तय था कि आज रात का खाना नहीं बनेगा इसलिए मार्केट से ही खाने के लिए नाश्ता लेकर आए थे जिस मां बेटे दोनों साथ मिलकर खाए खाना न बनने के कारण मांजने के लिए बर्तन भी नहीं था,,, इसलिए केवल झाड़ू लगाकर वह कमरे की सफाई कर दी,,, इस दौरान अंकित टीवी देख रहा था जिसमें एक रोमांटिक मूवी चल रही थी। आमिर खान और जूही चावला की कोई फिल्म थी जिसका नाम अंकित को नहीं मालूम था वह केवल देख रहा था थोड़ी ही देर में उसकी मां भी टीवी देखने के लिए वहां आ गई और वह भी बैठ कर देखने लगी,,,, इस दौरान फिल्म में एक दृश्य था जिसमें नायक नायिका के खूबसूरत चेहरे को अपने दोनों हाथों में लेकर उसके लाल-लाल होठों पर अपने होंठ रखकर किस करता है और यह दृश्य देखकर मां बेटे दोनों एकदम से गनगना गए थे,,,, अंकित तो अपने मन में यही सोच रहा था कि अच्छा हुआ कि यह दृश्य उसकी मां के सामने आया और वह मन ही मन खुश हो रहा था उसे एहसास हो रहा था कि इस दृश्य को देखकर उसकी मां के मन में बहुत सी बातें चल रही होगी,,, और ऐसा ही था अपने बेटे के सामने हीरो हीरोइन के चुंबन वाले दृश्य को देखकर उसके बदन में भी कुछ-कुछ होने लगा था,,, वैसे तो अपने बेटे की मौजूदगी में यह दिल से देखने में उसे शर्म तो महसूस हो रही है कि लेकिन उसे भी अच्छा लग रहा था कि यह दिल से देखते हुए उसके साथ में उसका बेटा भी है। इस दृश्य को देखकर सुगंधा की भी हालत खराब हो रही थी वैसे तो इस विषय में कोई ऐसी ज्यादा विषय वस्तु नहीं थी जिसे देखते ही इंसान उत्तेजित हो जाए लेकिन इस समय मां बेटे दोनों एक अलग ही समय से गुजर रहे थे जिसमें इस तरह के दृश्य बदन में उत्तेजना और जवानी की गर्मी को कुछ ज्यादा ही बढ़ा देते थे और यही हाल इस समय दोनों मां बेटे का भी था,,, सुगंधा तिरछी नजर से अपनी बेटी की तरफ देख ले रही थी वह भले ही टीवी की तरफ देख रहा था लेकिन वह जानती थी कि उसका मन कहीं और भ्रमण कर रहा होगा,,,, और जरूर उसका बेटा उसकी दोनों टांगों के बीच की स्थिति का जायजा ले रहा होगा और यही देखने के लिए सुगंध भी अपने बेटे की दोनों टांगों के बीच देख रही थी तो पेंट में हल्का सा उभार बनता हुआ नजर आ रहा था जिसे देखकर सुगंधा के तन बदन में आग लगने लगी।
सुगंधा को समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे आगे बढ़ा जाए,,, वैसे तो दोनों के बीच ऐसा बहुत कुछ हो चुका था जिससे आगे बढ़ा जा सकता था लेकिन मर्यादा की दीवार बीच में रोड़ा बनकर खड़ी थी इस समय अंकित खामोश था सुगंध को लगने लगा था कि बातचीत का दौर उसी को ही शुरू करना होगा इसलिए वह टीवी की तरफ देखते हुए बोली।
देखा हीरोइन की हालत कैसे खराब हो गई।
(जैसे ही यह शब्द अंकित के कानों में सुनाई दिए उसके तन बदन में भी अजीब सी हलचल होने लगी उसे समझ में आ गया कि उसकी मां भी वही सोच रही है जैसा कि वह सोच रहा है इसलिए वह भी एकदम से उत्साहित होता हुआ बोला)
लेकिन ऐसा क्यों हीरोइन की हालत खराब क्यों हो गई,,,, चुंबन करने में ऐसा क्या हो गया? (अंकित अच्छी तरह से जानता था चुंबन के अर्थ को चुंबन के महत्व का और उसकी परिभाषा को लेकिन फिर भी जानबूझकर अपनी मां के सामने नादान बनने की कोशिश कर रहा था जैसा कि वह अपनी नानी के सामने नादान बनाकर अपनी नानी की बुर पर पूरी तरह से झंडा गाड दिया था। अंकित यहां पर भी कुछ ऐसा ही चाहता था,,,, अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा बोली,,,)
अरे बेवकूफ चुंबन का भी अपना ही अलग महत्व है,,,, प्रेमी प्रेमिका के बारे में जानता है लेकिन चुंबन के बारे में नहीं जानता,,,, उसे काउंटर वाली लाडी को इतना नहीं बोल पाएगा कि वह मेरी प्रेमिका नहीं मेरी मम्मी है,,,।
क्योंकि मुझे वहां अच्छा लग रहा था,,,, तुमको प्रेमिका के रूप में पाकर,,,,(टीवी की तरफ देखते हुए अंकित अपने मन की बात अपनी मां से बोल गया जिसे सुनकर,,, मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई और वह मुस्कुराते हुए बोली,,,)
तब तो आप तेरे साथ कहीं जाने में मुझे डर लगेगा,,,।
ऐसा क्यों,,,?
क्योंकि अगर कोई पति-पत्नी समझ लिया तो।
(पति पत्नी वाली बात सुगंधा बहुत हिम्मत करके बोल गई थी,,,, और अपनी मां की यह बात सुनकर अंकित अच्छी तरह समझ रहा था कि उसकी मां को क्या चाहिए और उसकी बात से बहुत खुश भी हो रहा था और मुस्कुराते हुए बोला,,,)
अगर सच में कोई ऐसा समझेगा तो मैं अपने आप को बहुत खुश कीस्मत समझुंगा,,,,,।
खुशकिस्मत,,,,,!(आश्चर्य से अंकित की तरफ देखते हुए बोली)
तुम्हारी जैसी पत्नी मिलना सच में बहुत किस्मत की बात है और जिसकी ऐसी खूबसूरत बीवी हो वह इंसान तो दुनिया में सबसे ज्यादा किस्मत वाला होगा,,,,।
फिल्मी डायलॉग मार रहा है,,,, इसीलिए फिल्म देखता है,,,,।
यह कोई फिल्मी डायलॉग नहीं है मैं सच कह रहा हूं तुम खुद नहीं जानती कि तुम क्या हो,,,, अच्छा तुम बता रही थी ना चुंबन करने से ऐसा क्या हो गया कि वह घबरा गई,,,,(बातों का सिलसिला किसी और तरफ जा रहा था इसलिए अंकित एकदम से बातों के दौर को पटरी पर लाते हुए बोला,,,, जिसे सुनकर सुगंधा गहरी सांस लेकर आराम से सोफे पर बैठते हुए बोली,,,)
हीरोइन की हालत को तूने शायद देखा नहीं वह कितनी घबरा गई थी उसके बदन में कंपन हो रहा था और यह शायद उसका जीवन का पहला चुंबन था तभी वह एकदम से शर्मा गई थी।
लेकिन उसके चेहरे से तो लग रहा था कि उसे अच्छा लगा मजा आया,,,,
ओहहहह मतलब औरतों के चेहरे के हाव-भाव को पढ़ना तु अच्छी तरह से जानता है,,,,।
ऐसा नहीं है फिल्म में भी देखो दोनों बहुत खुश दिखाई दे रहे हैं अगर ऐसा कुछ होता तो हीरोइन गुस्सा होकर चली जाती,,,,,।
बिल्कुल ठीक समझा,,,,(मुस्कुराते हुए) इसका मतलब तु सच में बड़ा हो गया है।
वह तो मैं हो ही गया हूं,,,, लेकिन एक बात मुझे समझ में नहीं आई की मर्द औरत को चुंबन क्यों करता है ऐसा क्या हो जाता है कि उसे चुंबन करना पड़ता है और वह भी होठों पर,,,,।
(अपने बेटे के इस प्रश्न पर सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी क्योंकि वह बेहद गहरी बातें पूछ रहा था,,, सुगंधा को भी ऐसा ही लग रहा था कि उसका बेटा शायद चुंबन के बारे में ज्यादा कुछ जानता नहीं है,,,, इसलिए इस तरह का सवाल पूछ रहा है लेकिन उसके बेटे के इस तरह के सवाल में वह मदहोश हो रही थी उसके दोनों टांगों के बीच की पतली दरार मे रीसाव हो रहा था। लेकिन वह अच्छी तरह से जानती थी की मां बेटे के बीच की दूरी खत्म करने का बस यही एक जरिया है बातचीत ,,,इस तरह की बातें ही दोनों के बीच से मां बेटे वाली झिझक को दूर कर सकती थी। इसलिए वह अपने बेटे से बोली।)
चुंबन प्यार दर्शाता है,,, मर्द और औरत के बीच का,,,, जब मरद बहुत खुश होता है तो औरत को चुंबन कर लेता है और चुंबन करने के स्थान भी अलग-अलग होते हैं कोई दुलार से चुंबन करता है तो माथे पर चुंबन करता है कोई गल पर करता है और जब आपस में बहुत गहरा रिश्ता हो तो वह उसके होठों पर चुंबन कर लेता है,,,, किसी को कोई जब अच्छा लगने लगता नहीं तो वह उसके होठों पर उसके गाल पर चुंबन करते हैं वैसे चुंबन के भी कई रूप होते हैं।
मैं कुछ समझा नहीं,,,,(वैसे तो अंकित सब कुछ समझ रहा था लेकिन जानबूझकर अपनी मां के सामने नाटक कर रहा था और अपनी मां किस तरह की बातें सुनकर उसके बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी खास करके उसके दोनों टांगों के बीच का स्थान पूरी तरह से हलचल मचा रहा था)
सामान्य तौर पर मर्द औरत की गाल पर ही जमीन करता है लेकिन जब दोनों का रिश्ता कुछ ज्यादा ही गहरा हो या दोनों के बीच कुछ होने वाला हो तो मर्द औरत के होठो पर चुंबन करता है,,,,।
(अपने बेटे के साथ इस तरह की बातें करने में सुगंधा के माथे से पसीना टपक रहा था उसकी हालत खराब हो रही थी उसके मन में घबराहट की हो रही थी लेकिन उससे ज्यादा सुगंधा के मन पर उत्तेजना दबाव बना रही थी,,ईस तरह की बातें करने के लिए,,,, इसलिए वह चाहकर भी अपने आप को नहीं रोक पा रही थी। अपनी मां की बात को अंकित अच्छी तरह से समझ रहा था लेकिन फिर भी और फिर से अनजान बनने का नाटक करते हुए बोला,,,)
कुछ होने वाला हो,,, मेरे को समझा नहीं कुछ होने वाला हो इसका क्या मतलब है,,,!
(अंकित के सवाल को सुनकर सुगंधा मन ही मन मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,,)
मैं बात नहीं सकती लेकिन समय आने पर तु खुद ही समझ जाएगा।
क्या मम्मी कैसा समय मुझे कुछ तो बताओ,,,।
कहा ना मैं नहीं बता सकती समय आने पर तु खुद समझ जाएगा,,,, आज गर्मी थोड़ा ज्यादा है क्यों ना आज छत पर चलकर सोया जाए वहां पर बहुत ठंडी हवा चलती है,,,।
मैं भी यही सोच रहा था,,,, लेकिन इससे पहले तुम्हें कुछ और पैजामा पहनकर उसका नाप चेक करना है कुछ भी गड़बड़ हुआ तो वापस हो जाएगा,,,,।
अरे हां में तो भूल ही गई रुक अभी पहन कर देखती हूं,,,,।
कहां देखोगी,,,,?
अपने कमरे में और कहां,,,
यही पहन कर देख लो ना मैं भी देख लूंगा,,,,।
(अंकित की बात सुनकर सुगंधा शर्मा गई ओर शर्माते हुए बोली,,,,)
धत् मुझे तेरे सामने शर्म आती है,,,।
अरे सर मैं कैसी सी पहन कर देखना ही तो है और भूल गई मैं तुम्हारे लिए चड्डी और ब्रा लाया था मेरे सामने ही तो पहन कर नाप देखी थी।
तू सच में बहुत जिद्दी है,,,, अच्छा रुक मैं यहीं पर लेकर आती हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही सुगंधा सोफे पर से उठकर खड़ी हो गई,,, उसकी भारी भरकम गोलाकार गांड सोफे पर जिस जगह पर बैठी हुई थी वहां पर हल्का सा गड्ढा बन गया था जिसे देखकर अंकित मुस्कुराने लगा और अपने मन में ही बोला,,, मम्मी की गांड कितनी जानता है सोफे की तो किस्मत बन जाती होगी,,,, उसका यह सोचा था की सुगंधा उस कमरे से निकल कर अपने कमरे की तरफ जा चुकी थी। अंकित का दिल अब दोनों से धड़क रहा था क्योंकि उसे एहसास हो गया था कि उसकी मां उसकी आंखों के सामने कुर्ता और पैजामा पहनकर देखेगी और अपने मन नहीं सोच रहा था कि कुर्ता पजामा पहनने के लिए उसे अपने बदन के सारे कपड़े उतारने होंगे । केवल ब्रा और पैंटी को छोड़कर काश मम्मी साड़ी के अंदर पेंटि ना पहनी हो और अनजाने में उसके सामने पेटिकोट उतार दे तो कितना मजा आ जाए यही सब सोच कर अंकित मस्त हुआ जा रहा था। और दूसरी तरफ सुगंधा का भी बुरा हाल था,,,, अपने कमरे में पहुंच चुकी थी और अलमारी में से कुर्ता पजामा निकाल रही थी लेकिन कुर्ता पजामा निकलते हुए अपने मन में अगले पल के बारे में सोच रही थी,,, उसका दिल बहुत जोरों से धड़क रहा था और मां उत्साहित था।
भले ही वह अपने बेटे के सामने कुछ भी बोल रही थी लेकिन उसका मन भी अपने बेटे के सामने कपड़े उतार कर कुर्ता और पजामा पहनने की इच्छा हो रही थी,,, अपने बेटे के सामने कपड़े बदलने का मजा ही कुछ और था इस बात का एहसास तुझे अच्छी तरह से हो गया था लेकिन इस बात का डर भी था कि कहीं उसका बेटा उसे दिन की तरह उसके बदन से छेड़खानी है ना करना शुरू कर दे क्योंकि उसे अच्छी तरह से याद था कि पेंटि का नाप लेते समय अपने बेटे को अपने पीछे महसूस करके उसके पैर लड़खड़ा गए थे और वह एकदम से गिरने को हुई थी लेकिन तभी उसका बेटा हाथ आगे बढ़ाकर उसे गिरने से तो बचा लिया था लेकिन इस मौके का फायदा उठाते हुए वह उसकी नंगी बुर पर अपनी हथेली रखकर उसे ज़ोर से मसल दिया था जिसका एहसास उसे अभी तक था,,,, उस पल को याद करके इस समय उसकी बुर पानी छोड़ रही थी,,,, भले ही वह इस बात से घबरा रही थी कि उसका बेटा उसके बदन से छेड़खानी ना करते लेकिन मन ही मन हुआ यही चाह रही थी कि उसका बेटा थोड़ी छुट-छाट उसके बदन से ले ताकि दोनों आगे बढ़ सके,,,, अलमारी में से कुर्ता पजामा निकालकर वह ड्राइंग रूम में पहुंच गई जहां पर अंकित टीवी देख रहा था लेकिन अब वह टीवी बंद कर चुका था,,, और अपने बेटे की स्थिति को देखकर उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह बड़ी बेसब्री से उसके आने का इंतजार कर रहा था तभी तो कमरे में दाखिल होते ही अंकित का चेहरा खिल उठा था।
रात के 11:30 बज रहे थे तृप्ति के घर पर न होने की वजह से दोनों पूरी तरह से निश्चित थे घर का मुख्य द्वार बंद था उसे पर कड़ी लगी हुई थी और घर में दोनों के सिवा तीसरा कोई नहीं था इस बात का एहसास दोनों के बाद में कुछ ज्यादा ही उत्तेजना का असर दिखा दे रहा था दोनों मदहोश हो रहे थे और कपड़े बदलने की बात से तो सुगंधा की मोटी मोटी जांघों में थरथराहट महसूस हो रही
थी,,,, अपनी मम्मी के हाथ में कुर्ता पजामा देखते ही वह अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया और अपनी मां के हाथ से कुर्ता पजामा को ले लिया और उसपर अपनी हथेली को फिराता हुआ बोला,,,,।
वह कितना मुलायम कपड़ा है सच में तुम्हें ऐसा ही लगेगा कि तुमने कुछ नहीं पहनी हो आज देखना तुम्हारा रूप और ज्यादा निखर कर सामने आएगा अभी तक तुम साड़ी में ही खूबसूरत लगती थी लेकिन तुम नहीं जानती कि तुम किसी भी कपड़े में खूबसूरत लगोगी।(एक बार फिर से अंकित तारीफ के पुल बांध रहा था और जिसे सुनकर सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना की फुहार उठ रही थी उसे अपने बेटे के मुंह से इस तरह की बातें बड़ी अच्छी लग रही थी वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी लेकिन चेहरे पर थोड़ी घबराहट के भाव थे क्योंकि उसे अपनी बेटी के सामने अपनी साड़ी उतारना था लेकिन ऐसा करना जरूरी भी था मंजिल तक पहुंचने के लिए,,, कुछ देर तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही अंकित अपने हाथ में कुर्ता पजामा लेकर अपनी मां की तरफ देख रहा था और उसकी मां शर्म से अपनी नजर को नीचे झुकाए खड़ी थी,,,, यह देखकर चुप्पी तोड़ते हुए अंकित बोला,,,)
क्या हुआ साड़ी उतारो खड़ी क्यों हो फिर हमें छत पर भी तो चलना है सोने आज तुम यही पहन कर सोना देखना कितना अच्छा लगता है तुम्हें भी एकदम आराम दायक लगेगा,,,,।
(अंकित की बात सुनकर सुगंधा शर्मा से पानी पानी हो रही थी क्योंकि वह एकदम खुलकर उसे साड़ी उतारने के लिए बोल रहा था ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उसे चोदने के लिए कपड़े उतारने को बोल रहा हो,,,, सुगंधा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था वह अंकित की तरफ देखते हुए बोली,,,)
शर्म आ रही है मुझे,,, तेरे सामने कैसे,,,,,(घबराहट भरे स्वर में सुगंधा बोली,,,, जिसे सुनकर अंकित उसे उत्साहित करता हुआ बोला)
क्या मम्मी तुम भी मेरे सामने पेंटी और ब्रा बदल सकती हो,,,, और कुर्ता पजामा पहनने में शर्म आ रही है और ऐसा तो तुम बंद कमरे में बहुत बार करती होगी कपड़े उतारना पहनना ऐसा समझ लो कि कमरे में कोई नहीं है,,,,, फिर आराम से हो जाएगा।
(अंकित की बात सुनकर सुगंधा अपने मन में ही बोली देखो कितना चालक है बिना कपड़ों के देखने के लिए कितना मस्का लगा रहा है,,,, लेकिन फिर भी जरूर उसके बदन में आकर्षण है कुछ ऐसी बातें तभी तो एक जवान लड़का उसे बिना कपड़ों के देखने के लिए तड़प रहा है इस बात को अपने मन में सोचकर उसका मन उत्साहित होने लगा और फिर वह धीरे से अपनी साड़ी के पल्लू को अपने कंधे पर से नीचे गिरा दी और साड़ी का पल्लू नीचे गिरते ही उसकी मदमस्त कर देने वाली चौड़ी छाती एकदम से उजागर हो गई,,,, जो की ठीक अंकित की आंखों के सामने थी और ट्यूबलाइट की दूरी और रोशनी में सब कुछ साथ दिखाई दे रहा था कपड़े उतारने से पहले सुगंधा अपने मन में सोच ली थी कि वह अपने बेटे के सामने कपड़े जरूर उतरेगी लेकिन उसकी तरफ देखेगी नहीं क्योंकि अगर वह उसकी तरफ देख लेगी तो उससे ऐसा नहीं हो पाएगा,,,, अंकित की हालात पूरी तरह से खराब होने लगी थी अपनी मां की भरी हुई छाती देखकर उसके टांगों के बीच की हलचल बढ़ने लगी थी ऊपरी हुई छाती उसके पेंट के आगे वाले भाग को उभार दे रहा था,,,, उसे इस बात की खुशी थी कि उसकी मां उसके सामने कपड़े उतारने के लिए तैयार हो गई थी,,, सुगंधा साड़ी के पल्लू को हाथ में लेकर उसे धीरे-धीरे अपनी कमर से खोल रही थी और उसकी चूड़ियों की खनक से पूरा कमरा मदहोश हुआ जा रहा था एक नशा सच्चा रहा था पूरे वातावरण में मदहोशी की रंगीनियत फैल रही थी जिसे महसूस करके मां बेटे दोनों उत्तेजित हुए जा रहे थे,,,,।
अपनी मां को कपड़े उतारते हुए देखने के लिए अंकित अपनी मां के ठीक सामने खड़ा था और उसे सब कुछ दिखाई दे रहा था इसलिए तो उसने टीवी भी बंद कर दिया था ताकि पूरा ध्यान उसकी मां पर ही रहे देखते-देखते सुगंधा शर्म से पानी होते हुए अपनी साड़ी को कमर से खोल चुकी थी और उसे सोफे पर फेंक दी थी इस समय वह अंकित की आंखों के सामने ब्लाउज और पेटीकोट में थी पेटिकोट इतना कसा हुआ था कि उसकी मां की गांड की दोनों आंखें पेटीकोट में भी एकदम उभरी हुई नजर आ रही थी और अपने आकार को अच्छी तरह से दर्शा रही थी कुछ देर पहले अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि काश उसकी मां साड़ी के नीचे पेंटिं ना पहनी हो तो कितना अच्छा हो लेकिन पेटीकोट में ही अपनी मां को देखकर उसे निराशा हाथ लगी थी क्योंकि कई हुई पेटीकोट में उसकी पैंटी की लाइन भी एकदम साफ झलक रही थी जिससे वह समझ गया था कि उसकी मां पेंटिं भी पहनी है। साड़ी का आखिरी छोर कमर से खोलते हुए सुगंधा घूम गई थी और उसकी पीठ अंकित की तरफ हो गई थी लेकिन वह ऐसा जानबूझकर की थी क्योंकि वह अपने नितंबों के आकर्षण को अच्छी तरह से जानती थी और समझती थी,,,। इसलिए वह जानबूझकर अपने बेटे की आंखों के सामने अपनी गांड परोस दी थी उसे अपनी गांड दिख रही थी कसी हुई पेटीकोट में उसे अच्छी तरह से मालूम था कि उसकी गांड की दोनों फांक एकदम साफ नजर आती थी। इसलिए वह चाहती थी कि उसका बेटा उसकी गांड को प्यासी नजरों से देखें,,,,।
और उसका सोचना सच साबित हो रहा था,,,, सुगंधा की हालत तो खराब हुई थी अंकित की भी हालात पूरी तरह से खराब हो चुकी थी वह प्यासी नजरों से अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड को देख रहा था उसका मन तो कर रहा था कि आगे बढ़कर वह पीछे से अपनी मां को अपनी बाहों में भर ले और उसकी गांड पर अपने लंड को जोर-जोर से रगड़ कर अपना पानी निकाल दे लेकिन किसी तरह से वह अपने आप पर काबू किए हुए था,,,, सुगंधा वैसे तो साड़ी उतारते समय अपने बेटे की तरफ ना देखने का अपने आप से ही वादा की थी लेकिन जिस तरह से हालात बन रहे थे वह तिरछी नजर से पीछे की तरफ अपने बेटे की तरफ देखी तो उसका सोचा एकदम सच साबित हो रहा था और वह एकदम उत्साहित होने लगी थी क्योंकि इस समय उसके बेटे की नजर उसकी गांड पर ही टिकी हुई थी और वह जी भरकर अपने बेटे को अपनी गांड के दर्शन कर भी रही थी साड़ी को सोफे पर फेंकने के बाद वह अपने दोनों हाथ को कमर पर रखकर गहरी सांस लेते हुए अपने भजन को एकदम सीधा कर ली थी जिसे उसके नितंब्बों का उभार और ज्यादा बढ़ चुका था अपनी मां की हरकत को देखकर अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि कहीं उसकी मां उसे चोदने के लिए न बोल दे क्योंकि अंकित को भी एहसास हो रहा था कि उसकी मां के बदन में जवानी छा रही थी वह मदहोश हो रहे थे और वह अपने मन में अपने आप से ही बात कर रहा था कि अगर मन हो तो चुदवाने का बोल दो इस तरह से तड़पाने से तुम्हें क्या मिलेगा ,,,,।
सुगंधा अपनी गांड का भरपूर दर्शन करने के बाद और फिर से अपने बेटे की तरफ घूम गई और फिर,,,, बिना कुछ बोले अपना हाथ आगे बढ़कर कुर्ता मांगने लगी तो यह देखकर अंकित बोल पड़ा,,,।
अरे ऐसे कैसे इसका नाप समझ में आएगा ब्लाउज भी उतार दो तभी तो समझ में आएगा कि साइज कितना है ऐसे तो तुम्हें सही माप होने के बावजूद भी कसा हुआ लगेगा और मजा नहीं आएगा क्योंकि वह काउंटर वाली लेडी सोच समझ कर रही है यही नाप निकाली है,,,,
(अपने बेटे की बात सुनकर अपनी कमर पर दोनों हाथ रख कर आंखों को तैराते हुए वह थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोली,,,,)
अब तु मेरा ब्लाउज भी उतरवाएगा,,,,।
उतारना पड़ेगा अगर सही माप का अंदाजा लेना हो और उसे पहनने का असली सुख लेना हो तो पेटीकोट भी उतरना ही होगा,,,(इतना कहने के बाद अंकित अपने मन में ही बोला अगर मेरा बस चले तो तुम्हारी ब्रा और पैंटी भी उतरवा कर नंगी कर दुं,,,,,। अपने बेटे की बातें सुनकर वह थोड़ा ऊपरी मन से नाराजगी दिखाते हुए बोली,,,)
नहीं बेवकूफ थी जो तेरे बाद में आ गई मुझे कुर्ता पजामा लेना ही नहीं चाहिए था बेवजह तेरे सामने कपड़े उतारने पड़ रहे हैं।
ऐसा मत बोलो मैं तुम्हें और भी ज्यादा खूबसूरत बना रहा हूं इसे पहनने के बाद देखना तुम खुद समझ जाओगी कि तुम कितनी खूबसूरत हो।
चल बडा आया खूबसूरत बनाने,,,(और ऐसा कहते हुए अपने दोनों हाथ की नाजुक उंगलियों को अपने ब्लाउज के बटन में उलझा ली और फिर से नजर नीचे करके अपने ब्लाउज का बटन खोलने लगी अंकित अच्छी तरह से समझ रहा था कि उसकी मां का गुस्सा झुठ मुठ का है,,, अंदर से वह भी अपने कपड़े उतारने के लिए ललाईत हो रही है,,,,, माहौल पूरी तरह से गर्म रहा था कमरे के अंदर मदहोश कर देने वाला दृश्य दिखाई दे रहा था ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में सुगंधा का खूबसूरत बदन चमक रहा था उसके चेहरे की चमक और ज्यादा बढ़ चुकी थी अंकित उत्साहित और प्यासी नजरों से अपनी मां की नाजुक उंगलियों को देख रहा था जो ब्लाउज के बटन में पूरी तरह से उलझ कर रही थी देखते-देखते उसकी मां ब्लाउज का एक बटन खोल चुकी थी और वह भी वह बहुत धीरे-धीरे बटन खोल रही थी ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने बेटे को यह सब देखने का पूरा मौका दे रही है और शायद ऐसा था भी वरना अब तक तो ब्लाउज के सारे बटन खुल चुके होते लेकिन धीरे-धीरे सुगंधा इस पल में मदहोशी का रस घोल रही थी,,,, शायद इस तरह के पल में जल्दबाजी से नहीं बल्कि समझदारी से कम लिया जाता है और इस समय उसकी मां पूरी तरह से समझदारी दिखा रही थी अपने बेटे में पूरी तरह से जवानी का रस बोल रही थी उसे पूरी तरह से सक्षम कर रही थी या एक तरह से कह लो कि वह अपने बेटे को मर्द बना रही थी लेकिन यह कार्य तो सुगंधा की मां ही कर चुकी थी। आखिरकार सुगंधा थी भी तो उसका ही अंत थोड़ा बहुत असर तो सुगंधा में भी था इसीलिए तो वह आज इस मोड पर आ चुकी थी कि अपने बेटे के सामने उसे कपड़े उतार कर अपनी जवानी की नुमाइश करना पड़ रहा था जिसमें उसे बिल्कुल भी गलत नहीं लग रहा था क्योंकि मौके की नजाकत भी यही थी उसकी जरूरत भी यही थी जिसे पूरा करना भी जरूरी था।
अंकित की आंखों में मदहोशी जा रही थी चार बोतलों का नशा एकदम साफ दिखाई दे रहा था क्योंकि धीरे-धीरे सुगंधा अपने ब्लाउज के सारे बटन खोल दी थी और अब आखरी बटन खोल रही थी लेकिन बाकी के बटन खुलने के बाद ही ब्लाउज का दोनों पट दोनों तरफ से नीचे की तरफ लुढ़क गया था जिससे लाल रंग की ब्रा दिखाई दे रही थी और उसमें छुपी हुई उसकी दोनों दशहरी आम खुलकर उजागर होने को तैयार थी अपनी मां की चूचियों के ऊपरी हिस्से पर नजर पड़ते ही अंकित का आगे वाला हिस्सा उठने लगा था जिस पर सुगंधा की चोर नजर बड़े आराम से पहुंच जा रही थी और वह अच्छी तरह से समझ रही थी कि ऐसा क्यों हो रहा है उसकी जवानी देखकर उसके बेटे का लंड खड़ा हो रहा था,,, और यह एक मां के लिए बेहद गर्व की बात थी जिससे वह भी उत्साहित हो रही थी देखते ही देखते हो अपने ब्लाउज के सारे बटन खोल चुकी थी।
एक अद्भुत एहसास सुगंधा को अपने अंदर महसूस हो रहा था,,,, इस तरह के पल मां बेटे के बीच बहुत बार आए थे लेकिन आज का यह पल बेहद मदहोश कर देने वाला था दोनों को एकदम करीब ले आने वाला था अंकित प्यासी आंखों से एक तक अपनी मां की तरफ देख रहा था उसकी दोनों जवानी की तरफ देख रहा था और ब्लाउज के दोनों पट खुल जाने की वजह से लाल रंग की ब्रा एकदम साफ दिखाई दे रही थी उसमें कैद उसकी मां की दोनों चूचियां ट्यूबलाइट की दूधिया रोशनी में एकदम साफ दिखाई दे रही थी। इस बार अंकित को कुछ बोलना नहीं पड़ा और उसकी मां खुद ही अपनी ब्लाउज के दोनों पट को दोनों हाथों से पकड़ कर अपनी बाहों से निकाल कर उसे भी सोफे के ऊपर फेंक दी थी और इस समय पेटिकोट और लाल रंग की ब्रा में तो कयामत लग रही थी जिसे देखकर अंकित पूरी तरह से मदहोश हुआ जा रहा था वह अपने आप को कैसे संभाले हुए था यह वही जानता था। अंकित की सांस ऊपर नीचे हो रही थी और अपनी मां की लाल रंग की ब्रा को देखकर वह एकदम से बोल पड़ा।
तुम्हारी साइज से ब्रा का साइज कुछ कम है,,, ऐसा नहीं लग रहा है।
(एकदम से अंकित बोल पड़ा और उसकी यह बात सुनकर खुद सुगंधा भी झेंप गई,,, और अंकित की तरफ आश्चर्य से देखते हुए बोली।)
तुझे ऐसा क्यों लग रहा है?
देखो एकदम साफ दिखाई देना है कि एकदम ठुंस कर भरा हुआ है,,,,।
(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा मुस्कुरा दी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)
एकदम सही पकड़ा है तुझे यह सब समझ में आने लगा है,,,।
देख कर कोई भी समझ जाएगा देखो तो सही अगर ठोस के ना भरा होता तो दोनों आपस में एकदम सटी हुई ना होती और लकीर देखो कितनी गहरी है,,,,,,, ऐसा तभी होता है जब दोनों आपस में एकदम सटी हुई होती है,,,,(अंकित उंगली से ही इशारा करके सब कुछ बता रहा था और उसका यह सब इशारा देखकर सुगंधा की बुर पानी छोड़ रही थी,,, अपने बेटे की समझदारी पर वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी,,,, लेकिन ऐसा लग रहा था कि अंकित की बात अभी खत्म नहीं हुई है इसलिए वह आगे बोला,,,)
मैंने तो तुम्हारे लिए तीन जोड़ी लेकर आया था वह क्यों नहीं पहनती,,,,।
अरे अभी यह सब है मेरे पास वह किसी शादी ब्याह त्यौहार के लिए रखी हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही इस बार बिना जीजा के वहां अपने दोनों हाथ को अपने पेटिकोट की डोरी की तरफ ले गई और दोनों हाथों की नाजुक उंगलियों से डोरी के दोनों छोर को पकड़ ली यह देखकर अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा,,,, क्योंकि कुछ ही देर में उसकी आंखों के सामने उसकी मां केवल ब्रा और पैंटी में होने वाली थी उसकी मां अपने पेटिकोट को उतारने जा रही थी,,,, घर के अंदर हर एक बेटा कभी कबार अपनी मां को इस हालत में देखा ही है कपड़े बदलते हुए कपड़े पहनते हुए लेकिन अंकित अपनी आंखों के सामने अपनी मां को कपड़े उतारते हुए उसके ठीक सामने खड़े होकर देख रहा था यह पल शायद हर एक बेटे के जीवन में नहीं आता लेकिन इसलिए अंकित अपने आप को भाग्यशाली समझ रहा था और अंदर ही अंदर बहुत खुश और उत्तेजित हो रहा था हालांकि इस दौरान उसके पेंट में पूरी तरह से तंबू बन चुका था,,, जिस पर सुगंधा की नजर बार-बार चली जा रही थी लेकिन वह इस बातसे हैरान थी कि उसका बेटा अपने पेट में बने तंबू को छुपाने की कोशिश क्यों नहीं कर रहा है क्या ऐसा तो नहीं कि वह जानबूझकर उसे अपने पेट में बना तंबू दिखाने की कोशिश कर रहा हूं और वह दिखाना चाह रहा हूं कि अब वह बड़ा हो चुका है किसी भी औरत को खुश करने की क्षमता रखता है या फिर उसे एहसास ही नहीं है कि उसके पेंट में तंबू बन गया है यही सब सोचते हुए सुगंधा अपने पेटिकोट की डोरी को एकदम से खींच दी और उसके पेटिकोट की गींठान एकदम से खुल गई,,,,।
अंकित की हालत खराब हो रही थी उसकी आंखों के सामने उसकी मां अपनी पेटीकोट को उतार रही थी या एक तरह से कह दो नंगी होने जा रही थी। अगले ही पल सुगंधा अपने दोनों हाथों की उंगलियों को अपनी पेटीकोट में डालकर उसे चारों तरफ से ढीला करने लगेगा वैसे ही पेटिकोट कमर से ही उसे अपने हाथों से नीचे छोड़ दिया पेटिकोट तुरंत उसके कदमों में जा गिरा और वह अंकित की आंखों के सामने निर्वस्त्र हो गई,,,, केवल दो वस्त्र ही थे उसके नंगेपन को छुपाने के लिए यह किसकी तरह और दूसरी पेंटिं जिसमें उसके दोनों अनमोल खजाने छुपे हुए थे,, अंकित तो पागल ही हो गया उसकी आंखें फटी की फटी रह गई वह अपनी मां को देखता ही रह गया,,,, ब्रा पेंटी को छोड़कर उसके बदन पर कोई भी कपड़ा नहीं था। मर्द के सामने जब एक औरत अपने सारे कपड़े उतार कर केवल ब्रा पेंटी में ही खड़ी रहे तो अभी वह मर्द के सामने नंगी ही रहती है क्योंकि फिर यह दो वस्त्र का बदन पर होने का कोई मायने नहीं रखता। कमरे का वातावरण पूरी तरह से गर्म हो चुका था सुगंधा की नजरे शर्म के मारे नीचे झुक गई थी और अंकित अपनी मां के इस रूप को पागलों की तरह देख रहा था।
एक बार फिर से वह दीन आ गया था जब सुगंधा अपने बेटे के सामने कपड़े का नाप लेने वाली थी,,,अंकित इस मामले में अपने आप को बहुत ही भाग्यशाली समझता था, क्योंकि ऐसा बहुत बार हुआ था जब उसकी मां उसकी आंखों के सामने कपड़े बदलती थी या उतारती थी या फिर उसकी आंखों के सामने ही साड़ी कमर तक उठाकर पेशाब करने बैठ जाती थी,,,अंकित अपने आप को भाग्यशाली इसलिए भी समझता था क्योंकि वह अपनी मां को अपने हाथों से अपनी जवानी की गर्मी को शांत करते हुए देखा था और वह भी बाथरुम में संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में,,, वह भाग्यशाली इस बात से भी था कि उसकी मां बेहद खूबसूरत थी किसी फिल्म की हीरोइन की तरह। उसके बदन का हर एक अंग देखना अंकित अपना किस्मत समझता था। अंकित अपने हाथों से अपनी मां को कपड़े भी पहना चुका था जब उसकी मां बीमार थी उसे बाथरूम ले जाना उसे पेशाब करवाना उसे नहलाना,,, सब कुछ अंकित कर चुका था यहां तक कीअपनी मां के नींद में होने का पूरा फायदा उठाते हुए वह अपनी मां की रसीली बुर का स्वाद भी चख चुका था जिससे सुगंधा बिल्कुल भी अनजान नहीं थी।
इतना कुछ दोनों के बीच हो जाने के बावजूद भीदोनों के बीच अभी तक शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हो पाए थे हालांकि दोनों यही चाहते भी थे दोनों की मंजिल यही थी बस रास्ताकठिन होता चला जा रहा था और लंबा होता चला जा रहा था शायद इतना संबंध किसी और मां बेटे में होता तो अब तक दोनों के भी सारे संबंध स्थापित हो चुका होता लेकिन फिर भी सुगंध और अंकित दोनों के बीच मां बेटे का रिश्ता दोनों को आगे बढ़ने में रोक रहा था। वरना ऐसा क्या नहीं हुआ था दोनों के बीच जिससे दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो सके,,, यहां तक की दोनों एक साथ पेशाब करने का भी सुख भोग चुके थे,,, उसे समय तो सुगंध की आंखों के सामने उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंबा लंड एकदम लहरा रहा था लेकिन फिर भी ना तो सुगंधा अपना कदम आगे बढा पाई और ना ही उसका बेटा,,, जबकि ऐसे नाजुक पल ही किसी भी रिश्ते कोकरीब लाने में काफी होता है मां बेटे को भी ऐसे ही नाजुक पर एकदम करीब लाते हैं जिससे दोनों के बीच शारीरिक आकर्षण होता है और शारीरिक संबंध स्थापित हो जाता है लेकिन सब कुछ होने के बावजूद भी अभी इस रिश्ते से दोनों वंचित थे और दोनों का प्रयास जारी था कि कब दोनों एकाकार हो जाए,,, जिसके चलते सुगंधा एक बार फिर से अपने बेटे के सामने कपड़े उतार कर खरीद कर लाया गया कुर्ता पजामा नापने के लिए तैयार हो चुकी थी,,, और उसने अपने बदन से सारे वस्त्र उतार चुकी थी केवल ब्रा और पैंटी को छोड़कर।
घड़ी में तकरीबन 11:30 का समय हो रहा थाटीवी पर एक रोमांटिक मूवी का खूबसूरत मदहोश कर देने वाला दृश्य देखकर मां बेटे मन ही मन में बहकने लगे थे। जिसके चलते सुगंधा भी अपने बेटे के सामने कपड़े बदलकर कपड़े नापने के लिए तैयार हो चुकी थी,,, जैसे ही कमर पर से सुगंधा अपने पेटिकोट को नीचे छोड़ी पेटिकोट उसके कदमों में जा गिरा और पल भर में ही वह अंकित की आंखों के सामने अर्धनग्न अवस्था में किसी कलाकार की मूर्ति की तरह खड़ी थी जो की बेहद आकर्षक और मदहोश कर देने वाली लग रही थी। अंकित तो अपनी मां का यह रूप देखता ही रह गया वैसे तो अंकित अपनी मां को बहुत बार पूरी तरह से नंगी देख चुका था लेकिनहर एक बार हर एक रूप में अपनी मां को देखने में उसे आनंद और उत्तेजना का अनुभव होता था और इस समय भी उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ रही थी। ट्यूबलाइट की दुधिया रोशनी मेंसुगंधा का आकर्षक भजन गोरा रंग और भी ज्यादा चमक रहा था जिसे देखकर अंकित के पेंट में पूरी तरह से तंबू बन चुका था। जिस पर सुगंधा की नजर बार-बार चली जा रही थी। ब्रा और पेंटी में होने के बावजूद भी सुगंधाएक तरह से अपने बेटे के सामने नंगी ही खड़ी थी शर्मा के मरी उसकी नजर नीचे झुकी हुई थी लेकिन बदन में कसमाशाहट और उत्तेजना का संचार पूरी तरह से अपना असर दिख रहा था।
कुछ क्षण तक यह नजर यूं ही चलता रहा। अंकित पागल हुआ जा रहा था उसका मन बावला हो रहा था मन तो उसका कर रहा था किसी समय आगे बढ़कर अपनी मां को अपनी बाहों में कस लें लेकिनमां की भावनाओं को वह ताकत प्रदान नहीं कर पा रहा था क्योंकि उसने इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह कदम बढ़ाकर अपनी मां को अपनी बाहों में जकड़ सकेजबकि वह इतना तो समझ ही गया था कि उसकी मां क्या चाहती है वरना एक मां अपने बेटे के सामने इस तरह से अपने कपड़े उतार कर नंगी होने के लिए कभी तैयार ना हो। लेकिन फिर भी अंकित की हिम्मत इससे ज्यादा नहीं बढ़ पा रही थी। लेकिन फिर भी इस दृश्य में इतनी मन रखता इतनी मदहोशी भरी हुई थी की मां बेटे दोनों का अंतर मन बस एक ही बात कर रहा था कि कब दोनों बिस्तर पर जाएं और एकाकार हो जाए,,, सुगंधा की पेंटि आगे से पूरी तरह से गीली हो चली थी,,।अंकित फटी आंखों से अपनी मां की जवानी को देख रहा था जो कि इस उम्र में भी पूरी तरह से उबाल मार रही थी,,, अपनी मां की ब्रा को देखकरवह एक साथ अपनी मां की ब्रा और उसकी चूचियों के बारे में दबे स्वर में तारीफ कर चुका था। और अब अपनी मां की पेंटी की तरफ देखकर और पेंटी में फूली हुई अपनी मां की गांड को देखकर बोला।
बाप रे कसम से पेंटि कितनी कशी हुई है अगर दोनों पर एक साथ फैला लो तो मुझे लगता है की पैंटी फट जाएगी,,,,(अंकितअपने शब्दों में उत्तेजना के रस खोलता हुआ बोला वह अपनी मां को अपने शब्दों अपनी बातों से पूरी तरह से पानी पानी कर देना चाहता था और उसकी बात सुनकर उसकी मां की हालात पूरी तरह से खराब होने लगी थी क्योंकि उसके बेटे ने बातें ही कुछ ऐसी बोल दी थी। भला अपनी मां की पेंटि की बारे में भला कोई इस तरह से कौन तारीफ करता है। इसलिए अपने बेटे की तरफ आश्चर्य से देखते हुए बोली,,,)
भला यह भी कोई बोलने की बात है और वह भी अपनी मां से।
तो क्या हो गया मैं तो खूबसूरती की तारीफ कर रहा हूं कसम से अगरमैं जो देख रहा हूं इसे देखकर कोई भी यही कहेगा कि ऐसा लग रहा है कि जैसे मूर्ति बनाने वाले कोई मूर्तिकार की कलाकारी हो इतनी खूबसूरती तो एक मूर्तिकार ही एक मूर्ति में पैदा कर सकता है।
चल रहने दे झूठी तारीफ करने को,,,(धड़कते दिल के साथ सुगंधा बोली,,,,हालात उसकी भी खराब हो रही थी लगातार बुर से उसके मदन रस टपक रहा था जिससे पेंटी का आगे वाला भाग गीला हो चुका था,,,, लेकिन अभी तक अंकित की नजर अपनी मां के उस गीलेपन पर नहीं पड़ी थी,,, वरना वह समझ जाता कि उसकी मां के मन में क्या चल रहा है,,,,क्योंकि यह ज्ञान उसकी नानी ने उसे अच्छी तरह से दे दी थी जिसे पाकर वह भी धन्य हो चुका था,,, अपनी मां की बात सुनकर अंकित बोला,,,)
अरे मैं सच कह रहा हूं,,,,इस समय सच में तुम किसी मूर्तिकार की खूबसूरत मूर्ति लग रही हो बदन का हर एक अंग ऐसा लग रहा है की कोई कलाकार ने अपने छेनी और हथौड़ी से कुरेद कुरेद कर तराशा हो,,,
(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा गदगद हुए जा रही थी लेकिन फिर भी वह अपने आप को संभाले हुए थी और एकदम सहज होते हुए बोली)
ये खूबसूरत बदन,,,(अपने बदन को ऊपर से नीचे की तरफ देखते हुए) किसी मूर्तिकार की रचना लग रही है तुझे..।
और क्या बनावट देखोकोई भी हिस्सा जरा सा भी ज्यादा निकला हुआ नहीं है जिसे देखकर भद्दा लगे सब कुछ एकदम सीमित मात्रा में है,,। आगे से देखो या,,,(अपनी मां के नितंबों की तरफ पीछे जाते हुए) पीछे से खूबसूरती ही खूबसूरती भरी हुई है,,,,
(अंकित के इस तरह से पीछे जाने परसुगंधा शर्म से लाल होने लगी क्योंकि अच्छी तरह से जानती थी कि उसका बेटा क्या देख रहा होगा वह कुछ बोल नहीं पा रही थी और अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,) पेंटि की हालत देखो ठीक तरह से तुम्हारी जवानी को छुपा नहीं पा रहा है,,,।
(इस बात को सुनकर तो सुगंधा और ज्यादा गदगद हो गई उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इस समय अपने बेटे से क्या बोले उसे इस बात के लिए डांटे या उसकी सराहना करें या उसकी बातें सुनकर खुश हो जाए,,, वह अपने मन में तुरंत फैसला नहीं ले पा रही थी और उसकी यह कसम से आहत उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थीअंकित की हालात पूरी तरह से खराब थी इतनी मदमस्त कर देने वाली जवानी से भरी हुई औरत उसकी आंखों के सामने केवल बराबर पेटी में जिसका मतलब साथ था कि यह उसकी तरफ से खुला निमंत्रण है लेकिन इस समय अंकित इस निमंत्रण को स्वीकार करने लायक नहीं था क्योंकि उसके मन में डर था घबराहट थी। सुगंधा अपने बेटे की बात सुनकर हिम्मत करके बोली,,,)
तो सच में पागल हो गया है कुछ भी बकता रहता है कोई अपनी मां से इस तरह से बात करता है क्या,,?
शायद ना भी करते हो,,,,!
तब तु क्यों करता है इस तरह की बातें मुझसे,,,(अपने बेटे की तरफ देखकर दोनों हाथ को कमर पर रखते हुए वह बोली ,,अपने बेटे की आंखों के सामने ब्रा पेंटीपहन कर खड़ी रहने में अब उसे जरा भी शर्म का अनुभव नहीं हो रहा था हालांकिवह अपने बेटे की आंखों के सामने इस अवस्था में सहज नहीं हो पा रही थी लेकिन फिर भी उसकी हिम्मत धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी,,,, अपनी मां की बात सुनकर बड़ी चालाकी से जवाब देते हुए अंकित बोला,,,)
क्योंकि मेरी मां बहुत खूबसूरत है इसलिए उसकी खूबसूरती की तारीफ करना तो बनता है और बाकी लोगों की मां खूबसूरत नहीं होगी इसीलिए वह ईस तरह की बात अपनी मां से नहीं बोल पाते,,,,।
अच्छा बच्चु,,, तो मैं अब सारी दुनिया में तुझे सबसे ज्यादा खूबसूरत लगने लगी हूं,,,,।
लगने क्या लगी हो खूबसूरत हो,,,(अपनी मां के उन्नत नितिन को उभार की तरफ देखते हुए अंकित बोला अंकित के इस नजर को सुगंधा अच्छी तरह से पहचान रही थी इसलिए उसकी हालत और ज्यादा खराब हो रही थी,,,,सुगंधा अपने आप पर काबू नहीं कर पा रही थी उसे इस बात का डर था कि अगर वह अपने आप को इस समय नहीं संभाल पाए तो शायद दोनों के बीच कुछ ना कुछ हो जाएगा और वह अपने आप को रोक नहीं पाएगी बल्कि वह चाहती भी यही थी कि दोनों के बीच कुछ ना कुछ हो जाए लेकिन फिर भी न जाने किस तरह का डर उसके मन में बैठा हुआ था कि वह आगे बढ़ने से अपने आप को रोक ले रही थी वरना यही सही मौका था दोनों को एकाकार होने का,,,, इसलिए वह एकदम से बात को बदलते हुए बोली,,,,)
चल अब रहने दे ज्यादा बातें बनाने को ला कुर्ता ला देखु तो सही इसका नाप सही है या नहीं पहनने के बाद कैसा लगता है,,,,(अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए वह बोली तो अंकित भी सोफे पर रखे हुए कुर्ते को अपने हाथ में ले लिया जो कुछ देर पहले वह खुद अपने हाथ में लिए हुआ था,,,, कुर्ते को अपनी मां की तरफ आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)
अच्छा हुआ तुम साड़ी और पेटिकोट उतार दी वरना इसका सही नाप समझ में नहीं आता,,,।
(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा अपने मन में ही बोली अगर तेरा बस चले तो बाकी के भी कपड़ों को उतार कर नीचे नंगी कर दे,,,,और ऐसा अपने मन में सोते हुए वह अपना हाथ आगे बढ़ाकर कुर्ते को ले ली और उसे पहनने लगी,,,,अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि काश उसकी मां ब्रा और पैंटी भी उतार देती तो कितना मजा आता,,,,और देखते देखते उसकी मां उसकी आंखों के सामने कुर्ते को दोनों हाथों में डालकर उसे पहन ले चौकी ठीक उसके कमर तक आ रहा था,,,,सुगंधा कुर्ते को पहन कर एकदम प्रसन्न नजर आ रही थी क्योंकि इतना मुलायम और मखमली कपड़ा था कि उसे एहसास ही नहीं हो रहा था कि उसने कुछ पहनी हुई है,,,एकदम प्रसन्न होते हुए इस अवस्था में अपने बेटे के सामने गोल-गोल घूम कर उसे दिखाते हुए बोली,,,,)
बहुत अच्छा लग रहा है अंकित एकदम हल्का और एकदम आरामदायक मुझे तो पता ही नहीं चल रहा कि मैं कुछ पहनी हूं,,,,(सुगंधा बहुत खुश नजर आ रही थी और इस अवसर पर वह गोल-गोल घूम कर अपने आप ही अपने नितंबों के उभारपन के दर्शन अपने बेटे को करा रही थी,,, जिसे देखकर अंकित के मन मेंआग लगी हुई थी वह अपनी उत्तेजना को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था बड़ी मुश्किल से वह अपनी उत्तेजना पर काबू कर पाया था,,,, अपनी मां की खुशी और उसकी बात सुनकर अंकित बोला,,,)
मैंने बोला था ना तुम पर बहुत खूबसूरत लगेगी और तुम इसे पहन कर और भी ज्यादा खूबसूरत लगने लगेगी,,,, अब जल्दी से पजामा भी पहन लो तब देखना तुम्हारी खूबसूरती में चार चांद लग जाएगा,,,।
(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंध मुस्कुराई और इस बार खुद ही सोफे तक आई और कैसे हम अपने हाथ में लेकरउसे पहनने लगी बड़ी-बड़ी से वह अपने दोनों टांग को पजामी के अंदर डालकर उसे ऊपर की तरफ खींच दी और अब वह कुर्ता पजामा पहन चुकी थी,,,,अंकित कल्पना में जिस तरह से कुर्ते और पजामे अपनी मां को सोच रहा था उससे भी कई ज्यादा खूबसूरत और आकर्षक इस समय उसकी मन लग रही थी,,,सुगंधा भी बहुत खुश नजर आ रही थी अपने दोनों हाथ को फैला कर गोल-गोल घूम रही थी उसे खूब अच्छा और आरामदायक महसूस हो रहा थाऔर अंकित उसे पजामें अपनी मां के नितंबों के उभार को देख रहा था क्योंकि काफी आकर्षक और कसा हुआ नजर आ रहा था,,,कुर्ता उसकी कमर तक आता था और नितंबों का जाकर उसके नीचे से शुरुआत होती थी और पजामी के अंदर वह उभार और भी ज्यादा आकर्षकऔर उत्तेजनात्मक दिखाई दे रहा था एकदम साफ पता चल रहा था कि नितंबों का उभार कहां से शुरू हो रहा है,,,, मानो यही दिखाने के लिए कुर्ता केवल कमर तक ही नाप का था। सुगंधा इस तरह से कविताएं घूम रही थी कभी बांए घूम रही थीऔर अपनी नजर पीछे करके अपनी नितंबों की तरफ देखने की कोशिश कर रही थी और उसे साफ दिखाई दे रहा था कि वाकई में पजामे में उसके नितंबों का होवर कुछ ज्यादा ही बड़ा लग रहा था जिसे देखकर उसे खुद मजा आ रहा था,,,, सुगंधा एकदम मुस्कुराते हुए और प्रसन्न मुद्रा में बोली)
बहुत अच्छा लग रहा है अंकित,,, बहुत आरामदायक पहली बार में इस तरह का कपड़ा पहन रही हूं सच में से पहनने में कितना अच्छा लग रहा है।
मैं तो कहता हूं कि इसे पहन कर ही सोया करो अच्छा लगेगा गर्मी में तो और अच्छा लगेगा,,,।
बात तो सही कह रहा है,,,(अपनी नजरों को नीचे करके अपनी चूचियों की तरफ देखते हुए वह बोली) लेकिन इसका बटन कुछ ज्यादा ही नीचे से शुरू हो रहा है थोड़ा अजीब नहीं लग रहा है,,,।
कुछ अजीब नहीं लग रहा है,,, अरे ये तो खूबसूरती है थोड़ा सा दिखाई दे रहा है तो क्या हो गया,,,,
(सुगंधा को समझते देर नहीं लगी कि उसका बेटा उसकी चूचियों के बीच की पतली दरार की तरफ देखकर उसी के बारे में बोल रहा है और इस बात को सुनकर वह शर्म से पानी पानी हो गई अपने बेटे को कुछ बोल नहीं पाई और अपने मन में सोचने लगी कि उसके अंगों के बारे में उसका बेटा कितना खुलकर बोल रहा है,,, सुगंधा की नजर अपने बेटे के पेंट की तरफ जा रही थी और उसमें अच्छा खासा तंबू बना हुआ था जिसे देखकर उसकी बुर कुलबुला रही थी।उसे एहसास हो रहा था कि अगर इस समय वही इजाजत है तो शायद उसके बेटे का लंड उसकी बुर में घुसकर तबाही मचा दे,,, सुगंधा घड़ी की तरफ देखी तो हम 12:05 हो रहा था कपड़े बदलने और नापने की प्रक्रिया में धीरे-धीरे एक घंटा गुजर चुका था इस बात का अहसास तक दोनों को नहीं हुआ था घड़ी की तरफ देखते हुए सुगंधा बोली,,,)
घड़ी में देखा तो सही 12:00 बज गए हैं अब हमें सोना चाहिए क्योंकि सुबह जल्दी उठना है।
तुम ठीक कह रही हो मम्मी,,, लेकिन गर्मी इतनी है कि नींद भी नहीं आ रही है,,,।
बात तो सही कह रहा है इसलिए तो आज हम दोनों छत पर चलकर सोना होगा ऊपर बहुत ठंडी हवा चलती है,,,।
हां यह ठीक रहेगा,,,,(अंकित एकदम खुश होता हुआ बोला क्योंकि वह जानता था कि अगर कमरे में सोना पड़ेगा तो अलग-अलग सोना पड़ेगा और अगर छत पर सोने चलेंगे तो एक साथ तो होंगे,,,, अंकित की बात सुनकर सुगंधा खुश होते हुए बोली,,,)
तू दो तकिया ले ले में चटाई और चादर ले लेती हूं बिछाने के लिए,,,,,(ऐसा कहकर वह चटाई लेने जानेवाली थी कितभी अंकित को न जाने क्या सोचा हुआ तुरंत अपना हाथ आगे बढ़कर अपनी मां का हाथ थाम लिया और उसे अपनी तरफ खींच कर एकदम सेअपनी तरफ खींच लिया जिससे वह एकदम से उसकी बाहों में आ गई और वह तुरंत अपने दोनों हाथों में अपनी मां का खूबसूरत चेहरा थामकर उसके लाल-लाल होठों पर अपने होंठ रख दिया और चुंबन करने लगा,,,,, सुगंधा अपने बेटे की हरकत से एकदम भौंचककी रह गई थी उसे पल भर के लिए तो कुछ समझ में नहीं आया कि यह क्या हो रहा है,,, लेकिन जब तक यह समझ में आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी उसे एहसास होने लगा था कि उसका बेटा क्या कर रहा है कुछ देर पहले टीवी में जो फिल्म चल रही थी वही फिर से उसका बेटा उसके साथ दर्शा रहा था सुगंधा भी चुंबन से पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी बरसों बाद कोई मर्द उसे अपनी बाहों में लेकर उसके होंठों का रस पी रहा था,,,, सुगंधा की गरमा गरम सांसेऔर अंकित की गरमा गरम सांसे एक दूसरे की सांसों से टकरा रही थी एक दूसरे के बदन में और ज्यादा गर्मी पैदा कर रही थी। सुगंधा का बरसो बाद का या पहला चुंबन था जो अपने ही बेटे से उसे प्राप्त हो रहा था लेकिन अंकित के जीवन का यह दूसरा चमन था जो अपनी मां से प्राप्त हो रहा था और पहला चुंबन उसे अपनी मां की भी मां मतलब की अपनी नानी से प्राप्त हुआ था,,,, मां बेटी दोनों से यह सुख उसे प्राप्त हुआ था,,,।
दोनों के साथ से ऊपर नीचे हो रही थी अंकित की हालात पूरी तरह से खराब थी वह जिस तरह से अपनी मां को अपनी बाहों में जकडे हुआ था उसके पेंट में बना तंबू सीधे उसकी बुर पर दस्तक दे रहा था,,, जिसे सुगंधा बहुत अच्छी तरह से महसूस कर रही थी और इसी वजह से उसकी बुर पानी पर पानी छोड़ रही थी।अंकित की हिम्मत आगे बढ़ रही थी वह अपनी मां की चिकनी कमर पर दोनों हाथ रखकर उसे हल्के-हल्के दबा रहा था और वह अपनी दोनों हथेलियां को अपनी मां की नितंबों पर रखना चाहता था उसे दबाना चाहता था लेकिन तभी उसकी मां उससे एकदम से अलग हो गई,,,, और गहरी गहरी सांस लेती है उसकी तरफ देख रही थी और अपनी हथेली से अपने होठों को पहुंच रही थी जिस पर उसके बेटे का लार लगा हुआ था,,, फिर वह एकदम से कमरे से बाहर निकल गई,,,अंकित कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा उसे समझ में नहीं आ रहा था कि जो कुछ भी उसने किया हुआ सही किया या गलत किया,,,, फिर अपने मन में सोचा कि जो होगा देखा जाएगा इसलिए वह अपने आप को सहज करते हुए दो तकिया ले लिया,,, और पानी भर कर जग ले लिया और थोड़ी देर बाद छत के ऊपर आ गया,,,,।
छत पर आकर देखा तो उसकी मां पहले से वहां मौजूद थी। और चटाई बिछा चुकी थी अंकित को देखकर बोली,,,,।
इतनी देर कहां लगा दिया,,,,।
(अंकित को एहसास हुआ कि उसकी मां एकदम सहज थी बिल्कुल भी गुस्सा उनके चेहरे पर नहीं उनकी बातों में दिखाई दे रहा था इसलिए वह भी थोड़ा निश्चित हुआ और जवाब दिया)
तकिया और पानी ले रहा था इसलिए देर लग गई,,,,।
देख तो सही छत पर से कितना अच्छा लगता है और कितनी ठंडी हवा चल रही हैकमरे में तो पंखा चालू होने के बावजूद भी गर्मी ही लगती है,,,,(छत की दीवार पर हाथ रखते हुए और दूर-दूर तक देखते हुए वह बोली उसकी बात सुनकर अंकित भी अपनी मां के करीब भाग्य और वह भी उसी की तरह छत की दीवार पर हाथ रखकर दूर-दूर दिखाई देते हुए घर में जलते हुए बल्ब की तरफ देखते हुए बोला,,,)
सच में मम्मी छत पर से तो अपने मोहल्ले का नजारा ही कुछ और दिखाई देता है और देखो तो सही वाकई में यहां कितनी ठंडक है हम दोनों बेवजह कमरे में गर्मी में तड़पते रहते हैं,,,।
अब गर्मी के महीने तक यही सोएंगे,,,,,,।
हां तुम सच कह रही हो यहां जब इतना सुकून है तो कमरे में सो कर क्यों परेशान हो,,,,।
अपनी छत ज्यादा ऊंची है,,,, देख दूसरों की छत को हमसे छोटी ही है,,,।
सही कह रही हो हम दूसरे की छत पर देख सकते हैं लेकिन दूसरा कोई अपनी छत पर नहीं दे सकता वह देखो,,, सामने वाली छत पर वह लोग भी सोने की तैयारी कर रहे हैं,,,,(सड़क की दूसरी ओर की छत की तरफ इशारा करते हुए अंकित बोला,,,, सुगंधा भी उस छत की तरफ देखते हुए बोली,,,)
बहुत से लोग छत पर सोते हैं सिर्फ हम लोग ही नहीं सोते थे,,,,,।
तो क्या इतनी ठंडी हवा छोड़कर पंखे की गर्म हवा ले रहे थे अब तक,,,,,।
(दोनों इसी तरह से बातें कर रहे थे लेकिन कुछ देर पहले का चुंबन दोनों के बदन में अभी भी गर्मी का एहसास दिला रहा था कुछ देर तक वहीं खड़े रहने के बाद दोनों सोने की तैयारी करने लगेअंकित इस बात से खुश था की छत पर एक ही चटाई बिछाई हुई थी मतलबी यही था कि दोनों साथ में सोने वाले थे जिंदगी में आज पहली बार उसके हाथ में हिस्सा मौका लगा था कि आज वह अपनी मां के साथ सोने जा रहा था,,,, यह अंकित के लिए बेहद खुशी की बात थीऔर जितनी खुशी अंकित कह रही थी उतनी ही खुशी सुगंधा को भी हो रही थी क्योंकि आज वह भी पहली बार अपने बेटे के साथ सोने जा रही थी,,,, सुगंधा चटाई पर दो तकिया रख दी थी और दोनों अपनी-अपनी जगह पर कुछ देर और बैठकर बातें करने लगे,,, और दोनों ही अपने मन मेंयह भी सोच रहे थे कि अच्छा हुआ कि समय तृप्ति नहीं है अगर तृप्ति साथ में होती तो शायद ऐसा मौका दोनों को कभी हाथ ना लगता दोनों एक साथ सोने का सुख कभी प्राप्त नहीं कर पाते,,,,
तभी बातों ही बातों में सुगंधा अपनी जगह पर लेटते हुए बोली,,,,)
तुझे क्या हो गया था अंकित तो इस तरह से जो टीवी में देखा था मेरे साथ क्यों कर रहा था,,,!(उत्तेजना के मारे थूक को गले में निगलते हुए बोली,,,,और अंकित भी अपनी मां के सवाल पर पूरी तरह से झेंप गया था उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या जवाब दे लेकिन फिर थोड़ी देर खामोश रहने के बाद वह बोला,,,,)
तुम ही ने तो कही थी कि,,,,जब कोई किसी को अच्छा लगने लगता है तो इसी तरह से चुंबन करता है और कुछ ज्यादा प्यार होता है तो वह होठों पर चुंबन करता है,,,,।
तो क्या मैं तुझे अच्छी लगती हूं,,,।
क्यों नहीं तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो,,,(अंकित भी चटाई पर पीठ के बल लेटता हुआ बोला,,,)
वह तो बातसही है लेकिन क्या इतनी ज्यादा अच्छी लगती हो कि तु मेरे होठों पर चुंबन करने लगा,,,,।
यह भी तुम ही कही होगी जब दो लोगों के बीच गहरा रिश्ता होता है तो होठों पर चुंबन किया जाता है क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगा।
नहीं मुझे तो बहुत अच्छा लगा कि तू मुझे इतना पसंद करता है,,,,।
(अपनी मां का जवाब सुनकरअंकित को राहत महसूस होने लगे वह इस बात से निश्चित हो गया कि उसकी मां को बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा था और अपने आप को खोजने लगा कि वह चुंबन करते समय अपनी हथेलियां को अपनी मां के नितंबों पर रखकर दबाया क्यों नहीं उसकी बड़ी-बड़ी गांड को अपने हाथों से सहलाया क्यों नहीं,,,, उसे पूरा यकीन हो गया था कि उसकी मां उसे कुछ भी नहीं बोलती और उसे अच्छी तरह से याद था कि उसके पेंट में बना तंबू साड़ी के ऊपर से ही उसकी दोनों टांगों के बीच ठोकर मार रहा था,,, और उसे पूरा यकीन था कि उसकी मां को भी लंड की ठोकर अच्छी तरह से महसूस हुई होगी लेकिन वह कुछ बोली नहीं इसका मतलब साथ था कि वह भी वही चाहती है जैसा वह चाहता है। दोनों इसी तरह से बातें करते-करते और दूसरे को समझने की कोशिश कर रहे थे काफी देर हो चुकी थी और कुछ देर तक दोनों के बीच किसी पर प्रकार की वार्तालाप नहीं हुई तो सुगंधा को लगा कि शायद उसका बेटा सो गया है उसे बड़े जोरों की पेशाब भी लगी थी,,,,,, छत पर ही छोटी सी नाली बनी हुई थी जो नीचे गटर के अंदर तक जाती थी इसलिए वह पूरी तरह से निश्चिंत थी नीचे जाने की जरूरत नहीं थी,,,, लेकिन वह चाहती थी कि उसका बेटा जाग जाए क्योंकि वह अपने बेटे को अद्भुत नजारा दिखाना चाहती थी,,,, इसलिए वह अपने बेटे को आवाज़ लगाई,,,)
अंकित,,,,ओ,,,, अंकित,,,,,,, पानी का जग कहां रखा है,,,(जबकि पानी का जब उसकी आंखों के सामने कोने में रखा हुआ था लेकिन वह जानबूझकर अपने बेटे को जगाना चाहती थी जो कि वाकई में उसका बेटा सोया नहीं था,,,,, वह अपनी मां के हलचल को पहचान गया था और सिर्फ सोने का नाटक कर रहा था,,,,उसे पूरा यकीन था कि उसकी मां को पेशाब लगी और वह पेशाब करने जाएगी लेकिन कहां जाएगी यह नक्की नहीं था,,,,, अपनी मां के जगाने से वह नींद में होने का नाटक करते हुए बोला,,,)
क्या हुआ,,,?
पानी का जग कहां है मुझे पेशाब,,,, मेरा मतलब है की प्यास लगी है,,,,,(वह खुलकर अपने बेटे के सामने पेशाब वाली बात नहीं करना चाहती थी लेकिन फिर भी अनजाने में उसके मुंह से यह शब्द निकल गया था जिसे सुनकर एक बार फिर से अंकित का लंड खड़ा होने लगा था,,,,,,और वह फिर भी नींद में होने का नाटक करते हुए अपनी आंखों को बंद किए हुए ही बोला,,,)
वह कोने में पड़ा है,,,,,,,,,,।
ठीक है मैं ले लेती हूं,,,,,(वह धीरे से अपनी जगह से उठी और पानी की जगह की तरफ जाने लगे लेकिन स्पीच वह अपने बेटे की तरफ देख ले रही थी और अंकित भी जैसे ही उसकी मां चटाई पर से उठकर खड़ी हुई थी वह अपनी आंख को खोल दिया था और यह हरकतसुगंधा देख ली थी और मन ही मन खुश होने लगी थी उसे समझ में आ गया था कि उसका बेटा जाग रहा है बस नींद में होने का शायद नाटक कर रहा है,,,, वह धीरे से पानी के चक्र के करीब कहीं और पानी के चक्कर पर रखा हुआ ढक्कन हटाकर पानी पीने लगी,,,,और फिर इधर-उधर देखने के बाद बहुत अच्छी नजर से अपने बेटे की तरफ देखी तो उसकी आंख चमक रही थी वह समझ गई कि वह अपनी आंखों को खोले हुए हैं और यह एहसास होते हैं उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी थी,,,, अंकित को लग रहा था कि उसकी मां शायद पेशाब करने के लिए नीचे जाएगी,,,, लेकिन उसके सोच के उल्टा ही हुआ हैवह धीरे से छत के कोने में पहुंच गए और जैसे ही वहां पर उसकी मां कोने में खड़ी हुई अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा और उसे अपने मामा का घर याद आ गया,, क्योंकि वह अपने मामा के घर भी इसी तरह का नजारा देख चुका था जब उसकी मांछत पर पेशाब कर रही थी साड़ी उठाकर उसकी नंगी गांड देखकर उसे समय भी अंकित का मन कर रहा था कि पीछे से अपनी मां की बुर में लंड डाल दे,,,,,।
छत के कोने में पहुंचकर सुगंधा नजर पीछे कि तरफ घूमाकर अपने बेटे की तरफ देखने लगी तो अभी भी उसकी आंखें चमक रही थीऔर उसकी आंखों की चमक देख कर उसके बदन में कसमसाहट होने लगी वह समझ गई कि उसका बेटा क्या देखना चाह रहा है,,,,,,पहले भी अपने बेटे को दिखाकर पेशाब कर चुकी थी लेकिन आज की बात को छोड़ दे क्योंकि आज वह साड़ी नहीं पहनी थी बल्कि पजामा पहनी थी और पैजामा पहनकर आज यह मूत्र त्याग करने में उसे एक अद्भुत आनंद आने वाला था जिसका एहसास उसके बदन में उत्तेजना का रस घोल रहा था वह मदहोश हो रही थी,,, वह भी ईस अनुभव को अच्छी तरह से महसूस करना चाहती थी,,, इसलिए वह धीरे से अपने पजामे पर हाथ रखी और अपने अंगूठे को अपने पजामे के अंदर की तरफ सरका दी और अपने अंगूठे से अपनी पेंटीके छोर को भी दबा ली ताकि पजामा और पेंटी दोनों एक साथ नीचे खींच सके,,,।
सुगंधा का भी दील बड़े जोरों से धड़क रहा था,,,जो एहसास सुगंधा के तन बदन को मदहोश कर रहा था वही एहसास अंकित के भी बदन में उत्तेजना की लहर भर रहा था वह भी प्यासी नजरों से अपनी मां की तरफ देख रहा था फिर देखते ही देखते सुगंध अपने पजामी को नीचे घुटनों तक खींच दी और उसकी नंगी गांड एकदम से चमक उठे जिसे देखकर अंकित से रहने की और वह अपने पेंट के ऊपर से अपने लंड को दबा दिया जो की पूरी तरह से अपनी औकात में आने लगा था,,,,वह धीरे से नीचे बैठ गई और पेशाब करने लगी अगले ही पल एक अद्भुत सीट की मधुर आवाज जिसके कानों में पढ़ने लगी जो कि इस बात का एहसास करा रहा था कि उसकी मां मुत रही है,,,,, एहसास अंकित की मदहोशी को बढ़ा रहा था उसके बदन में चुदासपन को भर रहा था,,,,पेशाब करते हुए वह एक बार फिर से नजर पीछे की तरफ करके अपने बेटे को देखने लगी तो देखी कि उसका बेटा उसी को ही देख रहा था वह एकदम से मदहोश होने लगी,,, उसकी हालत खराब होने लगीऔर थोड़ी देर में वह पेशाब कर चुकी थी और वापस अपने कपड़ों को व्यवस्थित करकेचटाई पर आकर लेट गई थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि बारे में अपने बेटे से बात करें कि ना करें।
और यही कशमकस में वह कब सो गई उसे पता ही नहीं चला,,,, जब सुबह उसकी नींद खुली तो अभी भी अंधेरा था उसे एहसास होने लगा कि सही समय पर उसकी नींद खुली थी उसे लगने लगा था कि 5:00 बज रहा है क्योंकि अभी भी अंधेरा था और सड़क पर थोड़ा वाहनों का आना-जानालगा हुआ था जिससे उसकी आवाज उसे साफ सुनाई दे रहा थालेकिन जैसे ही उसे एहसास हुआ कि उसकी दोनों टांगों के बीच कोई कड़क चीज चुप रही है तो वह एकदम से सन्न रह गईं,, और जब अपनी स्थिति पर गौर की तो एकदम हैरान हो गई,,,वह करवट लेकर दूसरी तरफ मुंह करके सो रही थी और पीछे उसका बेटा एकदम से उसे अपनी बाहों में लेकर सो रहा था और इस स्थिति में उसका लंड पूरी तरह से उसकी दोनों टांगों के बीच पजामे के ऊपर से ही उसकी बुर पर ठोकर मार रहा था उसे अपनी बुर पर अपने बेटे के लंड का कड़कपन एकदम साफ महसूस हो रहा था और यह एहसास उसकी बुर को गिला करने के लिए काफी था,,,, पल भर में ही सुगंधा की सांस ऊपर नीचे होने लगी,,,उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसका बेटा ऐसा जानबूझकर किया है कि शायद नींद में होने के कारण अपने आप ऐसा हो गया है और इस समय वह जाग रहा है कि सो रहा है यह भी उसे समझ में नहीं आ रहा था इसलिए वह कुछ देर तक इस स्थिति में पड़ी रही तो उसे एहसास होने लगा कि बाकी उसका बेटा नींद में है क्योंकि इससे ज्यादा हरकत बढ़ नहीं रही थी उसे समझ में आ गया कि जब वह नींद में होगी तो शायद वह हिम्मत दिखा कर उसे बाहों में लेकर सो गया होगा,,,,,लेकिन अपने बेटे के लंड की ठोकर अपनी बुर पर महसूस करके वह पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी एकदम से चुदवासी हो चुकी थी,,,वह अपने मन में सोच रहे थे कि अगर उसका बेटा नींद में होने का पूरा फायदा उठाकर अपने हाथों से इसके पजामी को नीचे करके पीछे से अगर उसकी बुर में लंड डाल दे तो भी वह उसे नहीं रोकेगी,,,, लेकिन ऐसाइस समय नहीं हो सकता था क्योंकि उसका बेटा पूरी तरह से गहरी नींद में था,,,,,।
सुगंधा इतना कुछ होने के बावजूद भी,, इतनी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी कि उसका बेटा नहीं आगे बढ़ पा रहा है तो क्या हुआ वही आगे बढ़कर अपनी जवानी की प्यास बुझा ले,,,, वह भी सिर्फ सोच कर ही रह जाती थी कुछ करने का समय आता था तो वह भी कमजोर पड़ जाती थी कुछ देर तक इसी तरह से लेटे रहने के बाद,,, वह धीरे से अपने बेटे की बाहों सेअलग हुई और जग के पानी से मुंह धोकर अपने आप को तरोताजा करने की कोशिश करने लगी,,,, और फिर वह अपने बेटे को जगाई,,,,।
अभी भी सड़क पर अंधेरा था और दोनों जोगिंग करने लगे थे सुगंधा को बहुत अच्छा एहसास हो रहा था कुर्ता और पैजामा में दौड़ने में,,, और अंकित अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड देखकर खुश हो रहा था । जोगिंग करने के बाद उजाला होते हैं वह दोनों वापस घर पर आ चुके थे।
तृप्ति के गांव जाने के बाद अंकित और उसकी मां के लिए हर एक रात बेहद मधुर होती जा रही थी,,,हर एक रात को कुछ ना कुछ एक दूसरे को देखने दिखाने का मौका मिल रहा था और यह मौका उन दोनों के जीवन का सबसे अद्भुत पल होता जा रहा था,,, हर एक पल में मधुरता मादकता मदहोशी छाई हुई थी,,,अंकित अपनी मां को बाहों में लेकर उसके होठों पर चुंबन करके अपने मन की मनसा को दर्शा चुका था अगर उसकी मां उससे अलग ना हुई तो शायद दोनों मंजिल तक पहुंच जाते,,, एन मौके पर सुगंधा क्यों अपने पैर पीछे खींच ली यह सुगंधा को भी समझ में नहीं आ रहा था क्योंकि सुगंधा भी तो यही चाहती थी,,,, शायद यह मां बेटे के बीच के पवित्र रिश्ते की वजह से हुआ था क्योंकिसुगंधा अपने बेटे के साथ एकाकार होना चाहती थी एक औरत के रूप में लेकिन जब कभी भी दोनों के बीच ऐसा कुछ होता है तबन जाने क्यों सुगंधा के अंदर से औरत अलग हो जाती है और वह एक मां के रूप में सामने होती है जिसकी वजह से वह अपने बेटे के साथ कुछ भी कर पाने में असमर्थ हो जाती है।
लेकिन एक चुंबन से वह समझ गई थी उसका बेटा भी वही चाहता है जैसा कि वह चाहती है। इसलिए वह बहुत खुश थी,,, और चुंबन करने की वजह भी वह खुद बताई थी इसलिए उसके बेटे को एक मौका मिल गया था इस तरह से चुंबन करने का जिसके चलते उसने रात में छत पर अपने बेटे को अपनी लंबी गांड के दर्शन कर रही थीऔर सुबह जब उठी तो उसके लंड को अपनी गांड के बीचों बीच महसूस करके वह पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी,,,,, जिसके चलते वह कुछ देर तक उसी तरह से लेटी रह गई थी,,, और आज तो उसे कुर्ता पजामा पहनकर दौड़ने में बहुत अच्छा लग रहा था वह अपने बेटे पर उसकी नजरों पर गौर कर रही थी वह उसके खूबसूरत बदन को ही निहार रहा था,,, पजामे में उसकी गांड और ज्यादा बड़ी लग रही थीजिसे अंकित प्यासी नजरों से देख रहा था और आगे एक बटन नीचे होने की वजह से उसके चूचियों के बीच की गहरी पतली लकीर एकदम साफ दिखाई दे रही थी जिसके बारे में उसका बेटा खुद पहनते समय जिक्र कर चुका था और इसमें कोई आपत्ति नहीं है यदि जता दिया था,,, और खुद चूचियों को प्यासी नजरों से देखकर मस्त हो रहा था,,, अपने बेटे की इस तरह की नजर से सुगंधा बार-बार मदहोश हो रही थी।
जोगिंग करने के बाद मां बेटे दोनों घर पर पहुंच चुके थे,,,,,,, चाय नाश्ता और खाना बना लेने के बाद वह घर की सफाई में लग गई थी,,,,, कुछ देर तक अंकित अपने कमरे में ही आराम कर रहा थालेकिन बहुत देर से अपनी मां को ना देखने के बाद बहुत धीरे से अपने कमरे से बाहर निकाला और अपनी मां के कमरे में पहुंच गया तो देखा उसकी मां कमरे की सफाई कर रही थी यह देखकर वह बोला,,,।
यह क्या कर रही हो मम्मी,,,?
अरे बहुत दिन हो गए थे कमरे की सफाई नहीं की थी तो सोची चलो आज कमरे की सफाई ही कर लुंं।
चलो मैं भी तुम्हारा हाथ बंटा लेता हूं,,,(इतना कहकर वह भी सफाई काम में लग गया,,, सुगंधा उसे इस तरह से काम करते देखकर मन ही मन में मुस्कुरा रही थी लेकिन तभी उसके दिमाग में कुछ और चलने लगा उसे याद आया की अलमारी में उसने मां बेटे वाली कहानी वाली किताब रखी हुई है जो वह किसी भी तरह से अपने बेटे को दिखाना चाहती थी ताकि उसका बेटा हुआ कहानी को पड़े और उसके मन में मां बेटे के बीच के रिश्ते को लेकर कुछ-कुछ और ऐसा वह पहले भी कर चुकी थी लेकिन शायद सुगंधा को लगता था कि उसका बेटा उस किताब पर ध्यान नहीं दिया था,,, इसलिए आज मौका अच्छा थाआज वह किसी भी तरह से अपने बेटे को वह किताब दिखाना चाहती थी इसलिए वह बोली,,,)
तू यह सब रहने दे तू अलमारी की सफाई करना उसमें बहुत सारी किताबें पड़ी है तो एक जगह पर रख दे वह सब रद्दी हो चुकी है कबाड़ी वाले को बेचने के काम आएगी,,,।
ठीक है मम्मी मैं अभी अलमारी साफ कर देता हूं,,,,(इतना कहकर अंकितअलमारी खोलकर अलमारी की सफाई करने लगा उसमें ढेर सारी किताबें रखी हुई थी जिन्हें देख-देख कर वह एक तरफ रख रहा था और जरूरी किताब को एक तरफ रख रहा था तिरछी नजर से सुगंधा अपने बेटे की तरफ देख रही थी वह देखना चाहती थी कि वह किताब उसके हाथ लगती है तब वह क्या करता है,,,, कुछ देर तक अंकित अलमारी की सफाई करता रहा लेकिन वह किताब उसे नहीं मिली थी तब उसे याद आया कि वह किताब तो उसने ड्रोवर के अंदर रखी थी,,, इसलिए वह तुरंत बोली,,,)
नीचे अगर सफाई हो गई हो तो ड्रोवर भी देख लेना,,, बहुत रद्दी किताबें पड़ी है,,, सब बेच दूं तो,,, कचरा कम हो जाए,,,।
मम्मी तुम सच कह रही हो तुम्हारी अलमारी में काम से ज्यादा तो बेकार की चीजे पड़ी है,,,,।(इतना कहते हुए वह अंदर से जूनी पुरानीतीन-चार ब्रा निकाला जो कि हर एक जगह से फटी हुई थी और उसे अपने हाथ में लेकर अपनी मां के सामने दिखने लगा उसे देखकर सुगंधा शर्म से पानी पानी हो गई और बोली,,,)
अरे यह क्या दिख रहा है मैं यह सब नहीं पहनती ये तो बहुत पुरानी है फटी हुई है,,,,।
इसलिए तो बता रहा हूं इसे पहनना भी नहीं,,,।
क्यों,,,?
अरे इतनी खूबसूरत औरत हो और फटी ब्रा पहनोगी तो कितना खराब लगेगा,,,,।
खूबसूरत,,,,(मुस्कुराते हुए सुगंधा बोली,,)
तो क्या खूबसूरत है ही तो हो मेरा बस चलता तो रोज तुम्हें नए कपड़े पहनाता लेकिन क्या करूं अभी कमाता नहीं हूं नहीं इसलिए मजबूर हूं,,,,।
तो कमाना शुरू कर दे फिर रोज मेरे लिए नए कपड़े लेकर आना,,,।
मैं भी यही सोच रहा हूं अगर कमाता होता तो रोज तुम्हारे लिए गिफ्ट लेकर आता,,,,,,।
तेरे पापा भी मेरे लिए रोज कुछ ना कुछ लेकर ही आते थे,,,,(अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा को अनायास ही अपने पति की याद आ गई थी और अपनी मां की बात सुनकर अंकित बोला,,,)
तो क्या हुआ मम्मीमैं भी तुम्हारे लिए रोज गिफ्ट लेकर आऊंगा पापा नहीं है तो क्या हुआ मैं तो हूं ना,,,।
(अंकित अपनी मां को दिलासा देते हुए बोल रहा थालेकिन उसकी इस भावुकता में एक सारे एक आकर्षक और एक पति के द्वारा पूरी करने वाली शारीरिक जरूरत भी शामिल थी जिसे वह इशारे में अपनी मां को समझा रहा था और शायदशब्दों के द्वारा दिए गए थे सारे को उसकी मां अच्छी तरह से समझ रही थी वह जानती थी कि उसका बेटा उसे एक पति की तरह शारीरिक सुख भी जरूर देगा इसलिए मुस्कुराते हुए बोली,,,)
मुझे पूरा यकीन है कि तु एकदीन तेरे पापा की ही तरह मेरी सारी जरूरतें पूरी करेगा,,,,(सुगंधा के द्वारा भी यह एक इशारा ही था,,,, और इस ईशारे को अंकित समझने की कोशिश कर रहा था और फिर से वह अलमारी की सफाई करना शुरू कर दिया,,,, देखते ही देखते वह अलमारी के ड्रोवर को खोल दियाऔर उसमें से बेकार की वस्तुओं को निकाल कर एक तरफ रखना लगा और तभी अंदर की तरफ जब हाथ डाला तो उसे वही किताब मिल गई और वह ड्रोवर में से उस किताब को बाहर निकाल कर,,,देखने लगा सुगंधा अपने बेटे की हरकत को तिरछी नजर से देख रही थी उसके हर एक हाव-भाव को देख रही थी,,, अंकित के हाथों में वह किताब आते ही उसके मुख्य पृष्ठ को देखकर अंकित के चेहरे का भाव बदलने लगा था उसे याद आ गया था कि इस किताब को वह पहले भी पढ़ चुका था औरअपनी मां के बारे में सोच रहा था किस तरह की किताब क्या हुआ सच में पढ़ती होगी अगर पढ़ती होगी तो उन्हें भी एक मां बेटे के बीच का रिश्ता इसी तरह से दिखाई देता होगा इस बात को सोचकर वह काफी खुश हुआ था,,, और इस समय भी उसके मन में यही सब चल रहा था वह धीरे से उसे किताब के पन्नों को पलटने लगा जिसमें कुछ रंगीन गंदे चित्र भी छुपे हुए थे और मां बेटे के बीच की कहानी भी थी,,,सुगंधा तिरछी नजर से अपने बेटे की हरकत पर बराबर नजर रखी हुई थी उसके चेहरे पर प्रश्न है क्या भाव नजर आ रहे थे जब उसने देखी कि उसके बेटे के हाथ में वही किताब लग गई है जिसे वह दिखाना चाहती थी लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि उसका बेटा उस किताब को पहले भी पढ़ चुका था,,,,।
मां बेटे दोनों के दिल की धड़कन तेज होने लगी थी अपनी मां से नजर बचाकर वह किताब के पन्नों को पलट कर उसमें लिखी गई कहानी के शब्दों को जल्दी-जल्दी पढ़ रहा था तभी उसकी आंखों के सामने कहानी का कुछ भाग लिखा हुआ नजर आया जिसे पढ़कर उसका लंड एकदम से टन्ना गया,,,,।
मम्मी की बड़ी-बड़ी गांड ट्यूब लाइट की दूरी और रोशनी में चमक रही थी मैंने कभी अपनी मां को पेशाब करते हुए नहीं देखा था,, लेकिन पहली बार जब अनजाने में ही मेरी नजरमां पर पड़ी तो मैं देखता ही रह गया पहली बार मां की नंगी गांड मेरे लिए किसी अजूबे से काम नहीं थी और वह भी मम्मी पेशाब कर रहे थे उनकी बड़ी-बड़ी गांड एकदम कसी हुई थी,,,, मां ने साड़ी कमर तक उठाकर पेशाब कर रही थी जिसकी वजह सेकमर के नीचे का पूरा भाग दिखाई दे रहा था उनके पेशाब की आवाज किसी मधुर ध्वनि की तरह मेरे कानों में पड़ रही थी जिसे सुनकर मैं पागल हुआ जा रहा था मैं दीवार के पीछे से यह सब नजर देख रहा था मां को इस बात का अहसास तक नहीं था कि मैं उन्हें इस हालत में देख रहा हूं,,,,मेरी टांगों के बीच अजीब सी हलचल हो रही थी जिसे महसूस करके बदन में मस्ती से चढ रही थी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं।
इतना पढ़कर तोअंकित की हालत एकदम से खराब होने लगी उसका दिल जोरो से धड़कने लगा हालांकि वह अपनी मां को बहुत बार पेशाब करते हुए देख चुका था लेकिन कहानी में पहली बार इस तरह का वर्णन पढ रहा था जिसे पढ़कर उसके बाद में सुरसुरी से दौड़ने लगी थी,,, पल भर में उसके मन में ढेर सारे सवालढेर सारे विचार जन्म लेने लगे वह अपने मन में सोचने लगा कि अगर उसकी मां इस तरह की किताब अपनी अलमारी में रखी है तो इस तरह की कहानी भी पढ़ती होगी उसे मां बेटे के बीच के रिश्ते के बारे में अच्छी तरह से समझ में आ गया होगा कि एक कमरे के अंदर मां बेटे अगर अकेले रह रहे हो तो उन दोनों के बीच क्या होना संभव है यही सोचकर उसकी हिम्मत बढ़ने लगी थी और वह उसकी किताब के बारे में अपनी मां से जिक्र करना चाहता था लेकिन इसके लिए उसे काफी हिम्मत जुटाना थाऔर तिरछी नजर से काम करते समय सुगंधा अपने बेटे को देख रही थी उसकी हरकत को देख रही थी,,,, सुगंधा मन ही मन खुश हो रही थी क्योंकि उसे एहसास हो रहा था कि किताब में लिखी हुई कहानी उसके बेटे कोपसंद आ रही थी जिसमें वह रुचि ले रहा था तभी तो वह सब कुछ भूल चुका था तभी उसका ध्यान भंग करने के लिए उसकी मां बोली,,,)
क्या हुआ जल्दी-जल्दी कर जल्दी से काम खत्म करना है अभी मैं नहाई भी नहीं हूं कपड़े भी धोना है,,,।
हां मम्मी कर रहा हूं लेकिन यह तुम्हारी अलमारी में मुझे क्या मिला है,,,?
क्या मिला है,,,?(सुगंधा अनजान बनते हुए बोली)
कोई किताब है लेकिन यह कोई स्कूल की किताब नहीं है,,,,।
क्या ऐसी कौन सी किताब आ गई कोई मैगजीन होगी सरस सलिल जैसी,,,।
नहीं मम्मी ऐसी तो कोई भी मैगजीन नहीं है,,,,।
ला अच्छा मुझे दिखा तो ऐसी कौन सी किताब मेरे अलमारी में आ गई जिसके बारे में मुझे पता नहीं है,,,।
लो तुम ही देख लो,,,, मैं तो इसके पन्ने पलट कर देखा बहुत गंदी कहानी है,,,(अपनी मम्मी की तरफ घूम कर उसे वह गंदी किताब उसके हाथ में थमाते हुए वह बोला,,,सुगंधा भी अपना हाथ आगे बढ़ाकर उस गंदी किताब को अपने हाथ में ले ली और उसके मुख्य पृष्ठ को देखकर एकदम से जानबूझकर शर्मिंदगी का नाटक करते हुए बोली,,,)
हाय दैया यह तुझे कहां मिल गई रे,,,,।
तुम्हारी अलमारी में और कहां बहुत गंदी किताब है,,,।
यह तो मैं भी जानती हूं कि बहुत गंदी किताब है,,,।
तो क्या तुमने ईसको पढ़ी हो,,,
मेरी अलमारी में है तो पढी ही होंऊंगी,,,, लेकिन तूने क्या पढ़ लिया जो एकदम हैरान हो गया है,,,,(किताब के पन्नों को पलटते हुए और वो भी अपने बेटे के सामने वह बोली,,,)
क्या बताऊं मम्मी मुझे तो बताते भी शर्म आ रही है क्या ऐसी भी किताबें होती हैं मैं तो पहली बार देख रहा हूं,,,।
मैं भी पहली बार देखी थी तब मैं भी तेरी तरह हिरण हो गई थी मुझे तो यकीन नहीं हो रहा था कि इस तरह की भी किताबें होती है और इस तरह की कहानी भी होती है जब पहली बार तेरे पापा लेकर आए थे,,,।
पापा लेकर आए थे,,,,(अंकित हैरान होता हुआ बोला क्योंकि वह किताब नहीं लग रही थी)
हां तेरे पापा लेकर आए थे लेकिन खरीद कर नहीं लाए थे यह किताब के साथ दो-तीन किताबें और थी जो कि तेरे पापा के दोस्त ने उन्हें पढ़ने के लिए दिया था,,,, और तब से यह किताब घर पर ही पड़ी थी लेकिन बस एक ही बची है,,,।
तो क्या पापा इस तरह की कहानी पढ़ते थे,,,,।
नहीं उन्हें लगा कि कोई नोवल होगा कोई जासूसीलेकिन जब पढ़ने लगे तो वो भी हैरान हो गए मैं भी उनके साथ ही बैठी थी तो मेरी नजर भी पड़ गई और मैं भी हैरान हो गई,,,, वैसे तु क्या पढ़ लिया जो तेरी हालत खराब हो गई,,,,।
नहीं जाने दो मुझसे तो बताया भी नहीं जाएगा,,,, इस तरह की कहानी तो मैं पहली बार पढ़ रहा हूं,,,
लेकिन बता तो सही ,,,,।
अरे कैसे बताऊं मुझे तो शर्म आती है,,,,।
इसमें शरम कैसी जो पड़ा है बता दे वैसे तो सबकुछ सामने ही है,,,, और तु कोई चोरी छुपे तो पढ़ा नहीं,,, वैसे तो पूरी किताब ही गजब की है लेकिन तू कौन सी लाइन पढ़ लिया जो तेरी हालत खराब हो गई बात भी दे,,,,,(सुगंधा जानबूझकर अपने बेटे को उकसा रही थी बताने के लिएऔर अंकित भी समझ रहा था कि उसकी मां क्या सुनना चाह रही है इसलिए वह अपने मन में सोचा कि जब उसे कोई एतराज नहीं है तो भला हुआ क्यों शर्मा की चादर ओढ़ कर इतने अच्छे मौके को अपने हाथ से गंवा दे,,,,। इसलिए वह हीम्मत करके अपनी मां से बोला,,,)
जो पढ़ा वह तो मेरे दिमाग को एकदम सन्न कर दिया,,,,,।
पढ़ा क्या यह तो बता,,,,,(सुगंधा लालायित हुए जा रही थी अपने बेटे के मुंह से उस गंदी किताब के शब्द को सुनने के लिए,,,,,, अपनी मां की उत्सुकता देखकर अंकित के मन में भी प्रसन्नता हो रही थी इसलिए वह हिम्मत दिखा कर बोला ,,,)
लाओ में पढ़कर ही बता दु ऐसे तो मुझसे बताया नहीं जाएगा,,,(अंकित अपनी मां की तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोला सुगंधा भी मौके की नजाकत को समझते हुए तुरंत अपने हाथ मिली हुई किताब को आगे बढ़कर अपने बेटे को थमा दी और अंकित उस किताब को लेकर उसके पन्ने पलटने लगा और जो शब्द उसने पढे थे वह बोलने लगा,,,,)
मम्मी की बड़ी-बड़ी गांड ट्यूब लाइट की दुधिया रोशनी में चमक रही थी मैंने कभी अपनी मां को पेशाब करते हुए नहीं देखा था,, लेकिन पहली बार जब अनजाने में ही मेरी नजरमां पर पड़ी तो मैं देखता ही रह गया पहली बार मां की नंगी गांड मेरे लिए किसी अजूबे से काम नहीं थी और वह भी मम्मी पेशाब कर रहे थे उनकी बड़ी-बड़ी गांड एकदम कसी हुई थी,,,, मां ने साड़ी कमर तक उठाकर पेशाब कर रही थी जिसकी वजह सेकमर के नीचे का पूरा भाग दिखाई दे रहा था उनके पेशाब की आवाज किसी मधुर ध्वनि की तरह मेरे कानों में पड़ रही थी जिसे सुनकर मैं पागल हुआ जा रहा था मैं दीवार के पीछे से यह सब नजर देख रहा था मां को इस बात का अहसास तक नहीं था कि मैं उन्हें इस हालत में देख रहा हूं,,,,मेरी टांगों के बीच अजीब सी हलचल हो रही थी जिसे महसूस करके बदन में मस्ती सी चढ रही थी मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं। मम्मी की बुर से लगातार पेशाब की धार फूट रही थी उसमें से मधुर संगीत नहीं कर रही थी और उसे मधुर संगीत ने मेरे लंड को खड़ा करने में बिल्कुल भी समय नहीं लियामैं अपनी मां की नंगी गांड को देख रहा था वह पेशाब कर रही थी और मेरा हाथ अपने आप पेंट के ऊपर से मेरे लंड को दबा रहा था,,,,।
(अंकित इस कहानी को पढ़ते समय अपनी मां की तरफ तिरछी नजर से देख ले रहा था जैसे वह उसके हवाओं को देख रही थी वैसे ही अंकित भी अपनी मां के चेहरे के हाव भाव को देखने की कोशिश कर रहा था,,,, अंकित के मुंह से निकले एक-एक शब्द मदहोशी से भरे हुए थे जो उसकी मां के कानों में घुलकर उसे मस्त कर रहे थे।यह देखकर अंकित को भी आनंद आ रहा था और वह बड़ी दिलचस्पी दिखाकर कहानी को आगे पढ़ रहा था,,,,।)
मम्मी निश्चिंत होकर पेशाब कर रही थी,,,,और उसे देखना और वह इस हालत में शायद संभावना होता अगर 2 दिन पहले ही बाथरूम का दरवाजा टूट कर अलग ना हो गया होता उसकी रिपेयरिंग करना बाकी था और उसेबाथरूम से निकाल कर दूसरी तरफ दिए थे इसलिए बाथरूम पूरी तरह से बेपर्दा हो चुका था और इसीलिए मुझे यह खूबसूरत नजारा देखने का मौका मिला,,,,मुझे पहली बार एहसास हुआ की मम्मी कितनी खूबसूरत है उसकी गांड कितनी खूबसूरत है उसका गोरा रंग उसे और भी कितना ज्यादा सेक्सी बनाता है,,,,,मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मम्मी कितना पेशाब करती है बड़ी देर से उसकी बुर से पेशाब की धार फुटते जा रही थी,,, मन तो कर रहा था कि मैं भी बाथरुम में घुस जाऊं और पीछे से मम्मी की बुर में लंड डाल दु और उनकी चुदाई कर दुं,,, लेकिन डर इस बात का था कि कहीं मम्मी शोर ना मचा दे,,,, किसी को पता चल गया तो क्या होगा लेकिन इतना तो मुझे मालूम था कि मम्मी को भी इसी चीज की जरूरत है क्योंकि बरसों से उन्होंने अपनी जवानी को संभाल कर रखी थी,,,, मैं 10 साल का था तभी पापा गुजर गए थे तब से मम्मी अकेले ही थी,,,, घर में बस में मम्मी और मेरी दो बड़ी बहनें,,, मम्मी की गदराई जवानी देखकर मुझे मालूम था उन्हें मोटे तगड़े लंबे लंड की जरूरत थी,,,,,(जब यह लाइन अंकित ने पढा तो तिरछी नजर से अपनी मां की तरफ देखने लगा अंकित को एहसास हुआ कि उसकी मां उसकी पेंट की तरफ देख रही थी और जब उसने गौर किया तो वाकई में उसके पेट में तंबू सा बन गया था लेकिन अंकित अपने पेट में बने तंबू को छुपाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रहा था और आगे की लाइन पढ़ने लगा,,,)
मेरा लंड पेंट से बाहर आने के लिए तड़प रहा था और मम्मी की बुर में जाने के लिए मचल रहा था मम्मी की तरफ से बस इशारा आना बाकी थाअगर इसी समय ऐसा हो जाता तो मैं मम्मी को बाथरूम में हीं जमकर चुदाई कर देता,,,इतना तुम्हें जानता था कि अगर मम्मी मौका देती तो मैं मम्मी की जवानी कर रहा था अपने लंड से मुझे छोड़ देता उन्हें पूरी तरह से संतुष्ट करने का दम मेरे में बहुत था बस मम्मी के इसारे की देरी थी,,,,,।
बस बस रहने दे बाप रे इतनी गंदी कहानी मैं तो कभी सोची भी नहीं थी,,,,(बीच में ही अंकित को रोकते हुए सुगंधा बोली तो अंकित अपनी मां की तरफ देखते हुए अाशचर्य से बोला,,,)
लेकिन तुमने तो पढ़ी हो ना,,,।
अरे पूरी किताब थोड़ी पढी हूं तेरी ही तरह एक दो पन्ने ही पढ़ी हूं,,,,,,।
सच में बहुत गंदी किताब है ना मम्मी मेरी तो हालत खराब हो गई,,,,।
ला ईस किताब को मुझे दे,,,, इसे तो रद्दी में बेचने में भीबदनामी हो जाएगी किसी को पता चल गया कि जिस घर से यह किताब बेची गई है तो गजब हो जाएगा,,,।
सही कह रही हो मम्मी,,,(इतना कहते हुए अंकित उसे किताब को अपनी मां की तरफ बढ़ा दिया और उसकी मां उसे किताब को अपने हाथ में लेकर बिस्तर के नीचे रख दी,,,, और अंकित की तरफ देखते हुए बोली,,,,,)
जल्दी से अब सफाई कर इस किताब ने तो मेरे पसीने छुड़ा दिए,,,,।
सच कह रही हो मेरी भी हालत खराब कर दिया इस किताब ने,,,,(ऐसा कहते हुए वह फिर से आलमारी साफ करने लगा,,,, लेकिन इस कहानी को पढ़ने के बाद मां बेटे दोनों के मन में उथल-पुथल चल रही थी अब उन दोनों के पास बात करने के लिए इस कहानी को लेकर बहुत सारे मुद्दे थे,,,, और अंकित भी अपनी मां से इस तरह की बातों की शुरुआत करना चाहता था इस कहानी को लेकर बहुत सारी बातें सवाल उसके मन में चल रहे थे।)
मां बेटे दोनों को लग रहा था कि वह गंदी किताब की कहानी दोनों के बीच की दूरी को खत्म करने के लिए मददगार साबित हो सकती थी,,,, बस उस गंदी किताब की कहानी के मुद्दे को सही तरीके से उपयोग करना था,,,, कहानी को पढ़कर अंकित के तन बदन में पूरी तरह से उत्तेजना की लहर उठने लगी थी,,, पर यही हाल सुगंधा का भी था सुगंधा किसी भी तरह से चाहती थी कि वह किताब अंकित के हाथ में लग जाए और ऐसा ही हुआ और जानबूझकर उसे कहानी को पढ़ने के लिए वह अपने बेटे से बोली अपने बेटे के मुंह से उसे कहानी के उसे क्षण को पढ़कर वह पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी,,,, सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना के लहर उठ रही थी खास करके उसके दोनों टांगों के बीच की पतली दरार की हालत पल-पल खराब होती चली जा रही थी।वह कभी सोची नहीं थी कि वह हिम्मत दिखा कर अपने बेटे को गंदी किताब की गंदी कहानी पढ़ने को बोलेगी।
कहानी में जो बैठा था वह अपनी मां को पेशाब करते हुए देख रहा था,,,, अपने बेटे को किताब का वह नजारा पढ़ते हुए देख कर अपने मन में सोच रही थी,, ऐसा पल तो उसके जीवन में बहुत बार आया था,,, बहुत बार ऐसा हुआ था कि उसका बेटा उसे पेशाब करते हुए देख रहा था,,,, और बहुत बार तो वह खुद ही अब जानबूझकर अपने बेटे को या नजारा दिखा चुकी थी,,,, लेकिन किताब के नायक के मन की दशा को पढ़कर सुगंधा अपने मन में सोच रही थी कि उसका बेटा भी बिल्कुल ऐसा ही उसके बारे में सोच रहा होगा उसे पेशाब करते हुए देखकर उसकी नंगी गांड देखकर उसका मन भी उसे चोदने को करता होगा,,,क्योंकि मन में अगर इस तरह का ख्याल ना आए तो फिर किसी भी औरत को अर्धनग्न अवस्था में या नग्न अवस्था में देखकर मर्द को कोई फायदा ना हो मर्द औरत को इस अवस्था में देख कर केवल उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने के बारे में ही सोचता है,,, तभी तो उसकी उत्तेजना केवल औरत को नग्न, अर्धनग्न अवस्था में देखकर बढ़ जाती है। कहानी के नायक की तरह उसके बेटे ने उसे बहुत बार देखा था उसके मन में भी उसे चोदने का ख्याल आता होगा तभी तो उसका लंड खड़ा हो जाता है,,, कहानी को पढ़ते समय भी उसके पेंट में तंबू बना हुआ था,,, यह सब यही दर्शाता है कि वह भी कहानी के नायक की तरह अपनी मां को चोदना चाहता है। इस बात को सोचकर ही सुगंधा का बदन गनगना गया,,,,।
सुगंधा मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रही थीक्योंकि धीरे-धीरे मां बेटे आगे की तरफ बढ़ रहे थे मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे मंजिल अब ज्यादा दूर नजर नहीं आ रही थी,,,,दोनों में से कोई एक अगर जल्दी से कदम आगे बढ़ा देता तो शायद दोनों को मंजिल भी मिल जाती लेकिन कोई भी कदम आगे बढ़ाने को तैयार नहीं था बल्कि साथ-साथ ही चल रहे थेऔर शायद इसी में असली सुख भी छुपा हुआ था धीरे-धीरे में जो आनंद है दोनों मां बेटे को प्राप्त हो रहा था वह उनकी कल्पना से भी परे था,,, अंकित भी पूरी तरह से मस्त हो चुका था वह जान चुका था कि उसकी मां के मन में क्या चल रहा है,,,, औरतों की मां की आहट को धीरे-धीरे समझने लगा था जिसने यह अनुभव उसेराहुल की मां और अपनी ही नानी से प्राप्त हुआ था दोनों दिखने में तो बहुत सीधी शादी थी लेकिन अपने अंदर एक तूफान लिए हुए थी,,,बाहर से शांत दिखने वाली दोनों औरतें नदी की तरह थी एकदम शांत लेकिन अंदर से तूफान लिए हुए एक प्यास लिए हुए जो मौका देखकर किसी भी मर्द के साथ एकाकार होने में नहीं हिचकीचाती,,,, अंकित भी अपने काम में लगा हुआ था सुगंधा भी काम में लगी हुई थी लेकिन आगे की योजना अपने मन में बना रही थी,,,,।कपड़ों को व्यवस्थित कर लेने के बाद वह धीरे-धीरे उसे अलमारी में रखने लगी,,,,मां बेटे के बीच इस समय किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थीक्योंकि कुछ देर पहले दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ था कहानी को लेकर जिस तरहके भाव दोनों के मन में जगह थे वह उन दोनों को कुछ देर के लिए एकदम शांत कर दिया था और अपने आप को ही सोचने पर मजबूर कर दिया था कि अब आगे क्या करना है।
अलमारी में कपड़े रख लेने के बाद,,, सुगंधा के मन में कुछ और चल रहा थावह अपने बेटे के सामने अपनी साड़ी को थोड़ा सा ऊपर उठकर कमर में खोज दी और घुटने के नीचे तक उसकी साड़ी जो थी अब वह घुटनों तक आ चुकी थी उसकी मांसल पिंडलियां उजागर हो चुकी थी और वह अपनी साड़ी को अपनी कमर पर कस ली थी इस रूप में उसकी साड़ी का पल्लू उसकी चूचियों के बीच से आकर नीचे कमर में फंसी हुई थी जिसे अपने हाथ से ही खोंशी थी लेकिन उसके ऐसा करने की वजह से साड़ी का पल्लू उसकी धोनी चूचियों के बीच से नीचे की तरफ और भी ज्यादा बड़ी और उन्नत लग रही थी जिस पर नजर पड़ते ही अंकित के बदन मदहोशी का रस घुलने लगा था,,,। अपनी मां को ऐसा करते हुए देखकर अंकित ऊपर से नीचे की तरफ अपनी मां को देखकर बोला,,,।
अब क्या करने जा रही हो,,,,?
(अंकित जिस तरह से प्यासी नजरों से उसके बदन को ऊपर से नीचे तक देखा था इसका एहसास सुगंध को बड़ी अच्छी तरह से हुआ था और उसके बदन में उत्तेजना की फुहार उठने लगी थी,,, क्योंकि सुगंधा को अपने बेटे की आंखों में वासना और प्यास एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,,अपने खूबसूरत अंगों के उभार के लिए उसकी आंखों में एक चमक दिखाई दे रही थी और उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि अगर अपने बेटे को वह छूट दे देगी तो उसका बेटा उसके खूबसूरत अंगों को अपनी हथेली में लेकर मसल मसल कर उसका रस निचोड़ डालेगा। और इसके लिए वह पूरी तरह से तैयार थीबहुत बार उसने इशारों ही इशारों में अपने बेटे को किया जताने की कोशिश कर चुकी थी कि वह क्या चाहती है उसका क्या इरादा है लेकिन उसका बेटा ना जाने क्यों शायद ना जाने में या सब कुछ जान कर भी आगे बढ़ने से अपने आप को रोक ले रहा था,,, लेकिन अब वह चाहती थी कि अब जो कुछ भी हो दोनों के बीच जल्दी हो जाए क्योंकि अब यह तड़प उससे भी बर्दाश्त नहीं हो रही थी,,, वह अपने बेटे की मजबूत बुझाओ में अपने आप को सिमटती हुई महसूस करना चाहती थी,,, अपने बेटे के मर्दाना अंग को अपने कोमल अंग के अंदर उसकी गर्मी को महसूस करना चाहती थी उसकी रगड़ को महसूस करके पानी पानी हो जाना चाहती थी।
इस तरह की अभिलाषा शायद उसे शादीके पहले भी नहीं हुई होगी जितना कि अब वह एक मर्द का साथ पाने के लिए तड़प रही थी,,, शायद वह इसलिए की,तब उसे नहीं मालूम था कि उसकी मंजिल कहां है उसे क्या चाहिए किस चीज की जरूरत है वह ऐसे ही अपनी जिम्मेदारी एक मां की तरह निभाते चली जा रही थी और अपने अंदर की औरत को वह अपने पति के देहांत के बाद ही मर चुकी थी लेकिन जैसे ही उसके अंदर की एक औरत जागरूक हुई उसकी मां की तरह की जिम्मेदारी एक औरत की अभिलाषा के दबाव में दबती चली गई,,, एक औरत की अभिलाषा एक औरत की प्यास एक मां पर भारी पड़ रही थी वह मजबूर हो चुकी थी अपने अंदर की हवस मिटाने के लिए अपने बदन की प्यास बुझाने के लिए,,, वह यह जानकर भी वह जो कुछ करने जा रही है वह गलत है अपने बेटे के साथ शारीरिक संबंध बनाना पाप है लेकिन वह मजबूर थी अपनी प्यास के आगे बेबस हो चुकी थी और अपने आप को अपने मन को इस बात से दीलासा भी दे चुकी थी कि एक चार दिवारी के अंदर मां बेटे क्या करते हैं यह किसी को क्या पता चलेगा,,,, समाज में समझ के आगे भले ही वह मां बेटे की तरह व्यवहार करते हो लेकिन घर की चार दिवारी के अंदर अगर पति-पत्नी की तरह व्यवहार करेंगे तो इस बारे में किसी को कैसे पता चलेगा और चोरी तब तक ही रहती है जब तक की पकड़ी ना जाए अौर सुगंधा को पूरा भरोसा था कि अगर उसके और उसके बेटे के बीचशारीरिक संबंधी स्थापित हो जाता है तो भी इस बारे में किसी को कानों कान खबर तक नहीं होगी,,,, अपने बेटे के सवाल पर मुस्कुराते हुए अपने बेटे की तरफ देख कर बोली,,,)
अलमारी की सफाई तो हो गई लेकिन कैमरे की सफाई बाकी है जा जाकर बाहर से झाड़ू लेकर आ,,,,।
ओहहह तो तुम झाड़ू लगाने जा रही हो मुझे लगा इस तरह से,,(हथेली अपनी मां की तरफ करके ऊपर से नीचे की तरफ हथेली को घुमाते हुए) क्या करने जा रही हो..
अरे कुश्ती नहीं करने जा रही हूं,,,, और वैसे भी मेरे साथ कुश्ती करेगा कौन,,,,।
मैं हूं ना तुम्हारे साथ कुस्ती करने के लिए,,,(अंकित मुस्कुराते हुए बोला तो उसकी बात सुनकर सुगंधा भी बोल पड़ी)
एक ही बार में दबा दूंगी चित्त हो जाएगा,,,,भले ही तो कसरत करता है लेकिन मुझसे ज्यादा मजबूत नहीं होगा,,,।
अगर यह बात है तो चलो कुश्ती करके देख लेते हैं कौन जीतता है,,,,।
नहीं नहीं रहने देकहीं नीचे गिरकर हड्डी टूट गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे,,,।
बस हो गया डर गई,,,।
डर तो बिल्कुल नहीं गई क्योंकि जब मैं कक्षा8 में थी तो स्कूल में कबड्डी का कंपटीशन होता था और उसमें में हीं फर्स्ट आती थी,,,।
सच में मम्मी,,,,।
तो क्या तुझे भरोसा नहीं होता क्या,,,,
मुझे तो भरोसा है लेकिन,,,,
अच्छा तो तुझे भरोसा नहीं है चल फिर एक बार एक-एक हाथ हो ही जाए,,,,।
यहां पर इस कमरे में,,,।
तो क्या बाहर जाकर कुश्ती लड़ेंगे क्या,,, मां बेटे की बीच की कुश्ती तो घर की चार दिवारी के अंदर ही होती है,,, बिस्तर पर,,,,(सुगंधा अपने बेटे से दो अर्थ वाली बातें कर रही थी और अंकित अपनी मां के कहने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था,,, और अपनी मां की अभिलाषा जानकर मन ही मन बहुत खुश हो रहा था,,,, और उसकी बात सुनकर बोला,,,)
और कहीं कुश्ती लड़ते-लड़ते पलंग टूट गई तो,,,।
पलंग तोड़ कुश्ती में ही तो मजा आता है तभी तो दोनों में कितना दम है इसका पता चलता है,,,,,,
बात तो सही है तुम्हारे साथ कुश्ती करने का मजा भी तभी है जब पलंग टूट जाए,,,,(अंकित भी अपनी मां की तरह दो अर्थ में बात करते हुए बोला और सुगंधा अपने बेटे के कहने के मतलब को समझ कर उत्तेजना से गनगना गई,,,,)
तो चल देखते हैं कौन पलंग तोड़ता है,,,।
चलो मैं तो तैयार हूं,,,,(ऐसा कहते हुए अंकित शुरुआत करते हुए अपने दोनों हाथ को ऊपर उठा दिया और अपनी मां की तरफ आगे बढ़ा दिया मानो की सच में वह कुश्ती करने के लिए तैयार हो चुका था,,, सुगंधा भीअपने दोनों हाथ को आगे बढ़ा दी और वह भी कुश्ती करने के लिए तैयार हो चुकी थी सुगंधा और अंकित दोनों के मन में कुछ और ही चल रहा था यह तो सिर्फ कुश्ती का बहाना था दोनों एक दूसरे को छूने दबाने और मसलने का मजा लेना चाहते थे,,,,
देखते ही देखते अंकितदोनों हाथ ऊपर किए हुए ही अपनी मां की हथेली को अपनी हथेली में दबोच लिया और जिस तरह से दो योद्धा कुश्ती करते हैं इस तरह से वह दोनों भी तैयार हो चुके थे दोनों जोर लगा रहे थे एक दूसरे के तरफऔर दोनों का जोर बराबर लग रहा था कभी वह एक कदम पीछे चले जा रहा था तो कभी सुगंधा एक कदम पीछे चली जा रही थी।लेकिन अगले ही पल हुआ अपनी स्थिति में आ जा रही थी अपनी मां की ताकत हिम्मत देखकर अंकित मन ही मन बहुत खुश हो रहा था अपने मन में सोच रहा था कि वाकई में पलंग पर उसकी मां के साथ कुश्ती करने में कुछ ज्यादा ही मजा आएगा,,,,ऐसा अपने मन में सोते हुए को थोड़ा सा जोर लगाया तो उसकी मां गिरने को हो गई लेकिन तुरंत अपने आप को संभाल ली,,,,
लेकिन अगले ही पल अंकित थोड़ा सा जोर लगाया और इस बार वह अपनी मां को लेकर पलंग पर जा गिरा सुगंधा पलंग पर नीचे गिरी हुई थी और अंकित उसके ऊपर गिरा हुआ था और उसे अपनी भुजाओं से दबोच कर रखा हुआ था,,,,लेकिन उसके पलंग पर गिरने से उसकी सारी घुटनों के ऊपर तक एकदम से चढ़ गई थी उसकी मोटी मोटी नंगी जांघोंका एहसास अंकित को बहुत अच्छी तरह से हो रहा था और किसी भी तरह से अपनी मां की जान को अपनी हथेली सेदबाना चाहता था मसलना चाहता था तब पूछना चाहता था उसके मखमली जांघों को छुकर महसूस करना चाहता था अपनी मां की जवानी को,,,, सुगंधा उसके नीचे दबी हुई थी और उससे छूटने की कोशिश कर रही थी,,,लेकिन अंकित उसे अपनी भुजाओं से दबोचा हुआ था और उसे पर काबू करने के बहाने अपने हाथ को पीछे की तरफ ले जाकर अपनी मां की मोटी मोटी जांघों को कस के दबोच लिया था,,,,अपनी मां की चिकनी जांघों का एहसास उसके बदन में उत्तेजना की लहर को बढ़ा रही थी,,, ओ पागल हुआ जा रहा था और उसके हाथ जांघों के ऊपरी सतह पर अपने आप फिसलते हुए चले जा रहे थे जिसका एहसास सुगंधा को बहुत अच्छी तरह से हो रहा था,,,,वह अपने बेटे की पकड़ से छोड़ना चाहती थी लेकिन अंकित की हरकत से वह मदहोश हुए जा रही थी,,,, मां बेटे दोनों जोर लगा रहे थे और दोनों का मजा भी आ रहा थाअंकित कुश्ती के बहाने अपनी मां के मखमली बदन को छू रहा था उसे अपनी हथेली में दबोच रहा था इस समय उसकी उत्तेजना परम शिखर पर थी पेंट के अंदर उसका लंड पूरी तरह से टन्ना गया था।
तभी अंकित की नजर अपनी मां की चूचियों पर पड़ी जो की ब्लाउज से बाहर आने के लिए मचल रही थी,,, क्योंकिकुश्ती का जोर लगाने की कसम काम सुगंधा के ब्लाउज का ऊपर वाला बटन अपने आप ही टूटकर गिर गया था जिसकी वजह से उसकी आधे से भी ज्यादा चूचियां ब्लाउज से बाहर झांकने लगी थी,,,जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आने लगा था और इसी मौके का फायदा उठाकर सुगंधा एकदम से अपना दांव बदली औरअपने बेटे के कंधे को पकड़ कर उसे ज़ोर से दम लगाकर एकदम से पलट दी और खुद उसके ऊपर चढ़ गईलेकिन ऊपर चढ़ने में उसकी साड़ी एकदम कमर तक उठ गई जिससे उसकी मदद कर देने वाली बड़ी-बड़ी गांड लाल रंग की चड्डी में एकदम साफ दिखाई देने लगी लेकिन इस समय अंकित अपनी मां को ही जरूरत में नहीं देख सकता था क्योंकि वह नीचे दबा हुआ था लेकिन अपने आप को ऊपर उठने की कोशिश में अपने आप को बचाने की कोशिश मेंवह अपने हाथ को अपनी मां के बदन के इधर-उधर रखकर जोर लगा रहा था और ऐसे में उसके दोनों हाथ सुगंधा के भारी भरकम गांड पर चली गई और उसे एहसास हुआ की साड़ी कमर तक उठी हुई है लेकिन पूरे नंगेपन को ढकने के लिए अभी भी उसके बदन पर चड्डी थी जिसका एहसासअंकित को अपनी हथेली पर चड्डी के स्पर्श होते ही महसूस हो रहा था और वह एकदम से मत हुआ जा रहा था लेकिन इस समय कुश्ती के खेल में सुगंधा पूरी तरह से हावी हो चुकी थी,,,।
सुगंधा जिस तरह से कुश्ती के नियम का फायदा उठाते हुए कि,, जब सामने वाले प्रति द्ववंदी का ध्यान थोड़ा सा भी भटके तो तुरंत दांव लगाकर उसे पटकनी दे दो,,,और सुगंधा को जैसे ही लगा कि उसके बेटे का ध्यान पूरी तरह से भटक चुका है क्योंकि वह अपने बेटे की नजर को देख चुकी थी और उसकी नजर उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों पर थी जो ब्लाउज के बटन टूटने की वजह से बाहर की तरफ पानी भरे गुब्बारे की तरह लुढका हुआ था तभी वहअपने बेटे की कमजोरी का फायदा उठाकर उसे नीचे पटक दीजिए लेकिन जिस तरह से वह अपने बेटे के ऊपर बैठी हुई थी उसकी गांड पर उसकी गांड के बीचों बीच कुछ कड़क चीज चुभती हुई महसूस हो रही थी और उसे समझते देर नहीं लगी कि नीचे से कौन सा अंग उसकी गांड के बीचो-बीच चुभ रहा है यह एहसास होते ही वह पानी पानी होने लगी,,,सुगंध को अच्छी तरह से एहसास हो रहा था की कुश्ती करते समय जब वह पलंग पर पटकी गई थी और जब वह उसके ऊपर चढ़ी तब उसकी साड़ी कमर तक उठ गई थी और इस समय पेट के अंदर से ही उसके बेटे का लंड उसकी पेंटि के ऊपर से उसकी बुर पर ठोकर मार रहा थायह एहसास उसका पानी निकालने के लिए काफी था वह मदहोश हो जा रही थी और गहरी गहरी सांस ले रही थी लेकिन दोनों हाथों से अपने बेटे की हथेलियां को दबोच कर बिस्तर पर दबाए हुए थी ताकि वह कोई हरकत ना कर सके,,,,।
अंकित को भी एहसास हो रहा था कि वह किस स्थिति में है अपनी मां का भारी भरकम बदन वह अपने ऊपर महसूस कर रहा था,,, और शायदयह उसके लिए एक तरह का अभ्यास था जब वह दोनों के बीच सारी मर्यादाएं खत्म होने के बाद जब दोनों संभोग सुख का मजा लेंगे तब शायद इसी तरह से वह अपनी मां को अपने लंड के ऊपर रखकर नीचे से ठोकर लगाएगा,,,और तब वह अपनी मां के भारी भरकम वजन को संभाल सकता है कि नहीं यह देखने के लिए यह पल उसके लिए बेहद जरूरी था,,,और अच्छी तरह से उसकी मां की भारी भरकम गांड का दबाव उसके लंड पर पड़ रहा था उसे देखकर अंकित को एहसास हो रहा था कि वह अपनी मां के भार को अच्छी तरह से संभाल लेगा,,,सुगंधा किस तरह से अपने नीचे उसे दबाए हुए थी वह पूरी तरह से चारों खाने चित हो चुका था और कुश्ती के नियम के अनुसार वह हार चुका था,,, और सुगंधा हल्के से अपनी गांड कोएक दो बार अपने बेटे के लंड पर गोल-गोल घुमाई जिसका एहसास अंकित को महसूस हुआ था और वह पूरी तरह से मस्त हो चुका था उसका मन तो इसी समय कर रहा था कि अपनी मां को बोल दे की बस अपनी चड्डी उतार दो मुझे रहा नहीं जा रहा है लेकिन ऐसा कह नहीं पाया,,,।
सुगंधा अपनी जीत को लेकर बेहद खुश थी और अपने बेटे की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए बोली,,,।
क्यों बच्चु हो गया ना,,, ऐसे ही चार-पांच मेडल नहीं जीती हूं अब तो तुझे यकीन हुआ ना की कुश्ती में तु मुझसे नहीं जीत सकता।
बिल्कुल सच में मैं तुमसे नहीं जी सकता तुमने जिस तरह से पटकनी लगाइ हो मैं तो सोच भी नहीं सकता,,,।
मेरे लाल यही तो कुश्ती का नियम है,,,(ऐसा कहते हुए अपने बेटे के ऊपर से उठने लगी उसकी सारी कमर तक उठी हुई थी और अपने को बेटी के सामने ही खड़ी होकर अपनी साड़ी को व्यवस्थित करने लगी उसे बेहद रोमांच का अनुभव हुआ था उसे बहुत मजा आया था,,,, अंकित भी बिस्तर पर उठकर बैठ गया और बोला,,,)
अच्छा हुआ कि तुम्हारी पलंग नहीं टूटी वरना लेने के देने पड़ जाते,,,।
सच कहूं तो मैं उतना जोर लगाई ही नहीं थी वरना सच में पलंग टूट जाती।( इतना कहते हुए वह पलंग से नीचे उतर गई,,,, अंकित भी धीरे से पलंग से नीचे उतर गया,,,, सुगंधा अपने बेटे की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)
जब जल्दी से जाकर झाडू ले आ कमरे की सफाई कर देती हुं,,,,,।
ठीक है मैं अभी लेकर आता हूं,,,,,(इतना कहकर अंकित अपनी मां के कमरे से बाहर चला गया और सुगंधा जल्दी से अपनी साड़ी कमर तक उठाकर अपनी पैंटी को जल्दी से उतारने लगी और अपनी मोटी मोटी जांघों से नीचे सरकाते हुए वह आगे की योजना बनाने लगी और अगले ही पल वह अपनी पैंटी को अपने पैरों से बाहर निकाल कर उसे बिस्तर के नीचे छुपा दी और अपनी साड़ी को पहले की तरह अपनी कमर में खोंस ली,,,)
मां बेटे दोनों को लग रहा था कि वह गंदी किताब की कहानी दोनों के बीच की दूरी को खत्म करने के लिए मददगार साबित हो सकती थी,,,, बस उस गंदी किताब की कहानी के मुद्दे को सही तरीके से उपयोग करना था,,,, कहानी को पढ़कर अंकित के तन बदन में पूरी तरह से उत्तेजना की लहर उठने लगी थी,,, पर यही हाल सुगंधा का भी था सुगंधा किसी भी तरह से चाहती थी कि वह किताब अंकित के हाथ में लग जाए और ऐसा ही हुआ और जानबूझकर उसे कहानी को पढ़ने के लिए वह अपने बेटे से बोली अपने बेटे के मुंह से उसे कहानी के उसे क्षण को पढ़कर वह पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी,,,, सुगंधा के तन बदन में उत्तेजना के लहर उठ रही थी खास करके उसके दोनों टांगों के बीच की पतली दरार की हालत पल-पल खराब होती चली जा रही थी।वह कभी सोची नहीं थी कि वह हिम्मत दिखा कर अपने बेटे को गंदी किताब की गंदी कहानी पढ़ने को बोलेगी।
कहानी में जो बैठा था वह अपनी मां को पेशाब करते हुए देख रहा था,,,, अपने बेटे को किताब का वह नजारा पढ़ते हुए देख कर अपने मन में सोच रही थी,, ऐसा पल तो उसके जीवन में बहुत बार आया था,,, बहुत बार ऐसा हुआ था कि उसका बेटा उसे पेशाब करते हुए देख रहा था,,,, और बहुत बार तो वह खुद ही अब जानबूझकर अपने बेटे को या नजारा दिखा चुकी थी,,,, लेकिन किताब के नायक के मन की दशा को पढ़कर सुगंधा अपने मन में सोच रही थी कि उसका बेटा भी बिल्कुल ऐसा ही उसके बारे में सोच रहा होगा उसे पेशाब करते हुए देखकर उसकी नंगी गांड देखकर उसका मन भी उसे चोदने को करता होगा,,,क्योंकि मन में अगर इस तरह का ख्याल ना आए तो फिर किसी भी औरत को अर्धनग्न अवस्था में या नग्न अवस्था में देखकर मर्द को कोई फायदा ना हो मर्द औरत को इस अवस्था में देख कर केवल उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने के बारे में ही सोचता है,,, तभी तो उसकी उत्तेजना केवल औरत को नग्न, अर्धनग्न अवस्था में देखकर बढ़ जाती है। कहानी के नायक की तरह उसके बेटे ने उसे बहुत बार देखा था उसके मन में भी उसे चोदने का ख्याल आता होगा तभी तो उसका लंड खड़ा हो जाता है,,, कहानी को पढ़ते समय भी उसके पेंट में तंबू बना हुआ था,,, यह सब यही दर्शाता है कि वह भी कहानी के नायक की तरह अपनी मां को चोदना चाहता है। इस बात को सोचकर ही सुगंधा का बदन गनगना गया,,,,।
सुगंधा मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रही थीक्योंकि धीरे-धीरे मां बेटे आगे की तरफ बढ़ रहे थे मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे मंजिल अब ज्यादा दूर नजर नहीं आ रही थी,,,,दोनों में से कोई एक अगर जल्दी से कदम आगे बढ़ा देता तो शायद दोनों को मंजिल भी मिल जाती लेकिन कोई भी कदम आगे बढ़ाने को तैयार नहीं था बल्कि साथ-साथ ही चल रहे थेऔर शायद इसी में असली सुख भी छुपा हुआ था धीरे-धीरे में जो आनंद है दोनों मां बेटे को प्राप्त हो रहा था वह उनकी कल्पना से भी परे था,,, अंकित भी पूरी तरह से मस्त हो चुका था वह जान चुका था कि उसकी मां के मन में क्या चल रहा है,,,, औरतों की मां की आहट को धीरे-धीरे समझने लगा था जिसने यह अनुभव उसेराहुल की मां और अपनी ही नानी से प्राप्त हुआ था दोनों दिखने में तो बहुत सीधी शादी थी लेकिन अपने अंदर एक तूफान लिए हुए थी,,,बाहर से शांत दिखने वाली दोनों औरतें नदी की तरह थी एकदम शांत लेकिन अंदर से तूफान लिए हुए एक प्यास लिए हुए जो मौका देखकर किसी भी मर्द के साथ एकाकार होने में नहीं हिचकीचाती,,,, अंकित भी अपने काम में लगा हुआ था सुगंधा भी काम में लगी हुई थी लेकिन आगे की योजना अपने मन में बना रही थी,,,,।कपड़ों को व्यवस्थित कर लेने के बाद वह धीरे-धीरे उसे अलमारी में रखने लगी,,,,मां बेटे के बीच इस समय किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थीक्योंकि कुछ देर पहले दोनों के बीच जो कुछ भी हुआ था कहानी को लेकर जिस तरहके भाव दोनों के मन में जगह थे वह उन दोनों को कुछ देर के लिए एकदम शांत कर दिया था और अपने आप को ही सोचने पर मजबूर कर दिया था कि अब आगे क्या करना है।
अलमारी में कपड़े रख लेने के बाद,,, सुगंधा के मन में कुछ और चल रहा थावह अपने बेटे के सामने अपनी साड़ी को थोड़ा सा ऊपर उठकर कमर में खोज दी और घुटने के नीचे तक उसकी साड़ी जो थी अब वह घुटनों तक आ चुकी थी उसकी मांसल पिंडलियां उजागर हो चुकी थी और वह अपनी साड़ी को अपनी कमर पर कस ली थी इस रूप में उसकी साड़ी का पल्लू उसकी चूचियों के बीच से आकर नीचे कमर में फंसी हुई थी जिसे अपने हाथ से ही खोंशी थी लेकिन उसके ऐसा करने की वजह से साड़ी का पल्लू उसकी धोनी चूचियों के बीच से नीचे की तरफ और भी ज्यादा बड़ी और उन्नत लग रही थी जिस पर नजर पड़ते ही अंकित के बदन मदहोशी का रस घुलने लगा था,,,। अपनी मां को ऐसा करते हुए देखकर अंकित ऊपर से नीचे की तरफ अपनी मां को देखकर बोला,,,।
अब क्या करने जा रही हो,,,,?
(अंकित जिस तरह से प्यासी नजरों से उसके बदन को ऊपर से नीचे तक देखा था इसका एहसास सुगंध को बड़ी अच्छी तरह से हुआ था और उसके बदन में उत्तेजना की फुहार उठने लगी थी,,, क्योंकि सुगंधा को अपने बेटे की आंखों में वासना और प्यास एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,,अपने खूबसूरत अंगों के उभार के लिए उसकी आंखों में एक चमक दिखाई दे रही थी और उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि अगर अपने बेटे को वह छूट दे देगी तो उसका बेटा उसके खूबसूरत अंगों को अपनी हथेली में लेकर मसल मसल कर उसका रस निचोड़ डालेगा। और इसके लिए वह पूरी तरह से तैयार थीबहुत बार उसने इशारों ही इशारों में अपने बेटे को किया जताने की कोशिश कर चुकी थी कि वह क्या चाहती है उसका क्या इरादा है लेकिन उसका बेटा ना जाने क्यों शायद ना जाने में या सब कुछ जान कर भी आगे बढ़ने से अपने आप को रोक ले रहा था,,, लेकिन अब वह चाहती थी कि अब जो कुछ भी हो दोनों के बीच जल्दी हो जाए क्योंकि अब यह तड़प उससे भी बर्दाश्त नहीं हो रही थी,,, वह अपने बेटे की मजबूत बुझाओ में अपने आप को सिमटती हुई महसूस करना चाहती थी,,, अपने बेटे के मर्दाना अंग को अपने कोमल अंग के अंदर उसकी गर्मी को महसूस करना चाहती थी उसकी रगड़ को महसूस करके पानी पानी हो जाना चाहती थी।
इस तरह की अभिलाषा शायद उसे शादीके पहले भी नहीं हुई होगी जितना कि अब वह एक मर्द का साथ पाने के लिए तड़प रही थी,,, शायद वह इसलिए की,तब उसे नहीं मालूम था कि उसकी मंजिल कहां है उसे क्या चाहिए किस चीज की जरूरत है वह ऐसे ही अपनी जिम्मेदारी एक मां की तरह निभाते चली जा रही थी और अपने अंदर की औरत को वह अपने पति के देहांत के बाद ही मर चुकी थी लेकिन जैसे ही उसके अंदर की एक औरत जागरूक हुई उसकी मां की तरह की जिम्मेदारी एक औरत की अभिलाषा के दबाव में दबती चली गई,,, एक औरत की अभिलाषा एक औरत की प्यास एक मां पर भारी पड़ रही थी वह मजबूर हो चुकी थी अपने अंदर की हवस मिटाने के लिए अपने बदन की प्यास बुझाने के लिए,,, वह यह जानकर भी वह जो कुछ करने जा रही है वह गलत है अपने बेटे के साथ शारीरिक संबंध बनाना पाप है लेकिन वह मजबूर थी अपनी प्यास के आगे बेबस हो चुकी थी और अपने आप को अपने मन को इस बात से दीलासा भी दे चुकी थी कि एक चार दिवारी के अंदर मां बेटे क्या करते हैं यह किसी को क्या पता चलेगा,,,, समाज में समझ के आगे भले ही वह मां बेटे की तरह व्यवहार करते हो लेकिन घर की चार दिवारी के अंदर अगर पति-पत्नी की तरह व्यवहार करेंगे तो इस बारे में किसी को कैसे पता चलेगा और चोरी तब तक ही रहती है जब तक की पकड़ी ना जाए अौर सुगंधा को पूरा भरोसा था कि अगर उसके और उसके बेटे के बीचशारीरिक संबंधी स्थापित हो जाता है तो भी इस बारे में किसी को कानों कान खबर तक नहीं होगी,,,, अपने बेटे के सवाल पर मुस्कुराते हुए अपने बेटे की तरफ देख कर बोली,,,)
अलमारी की सफाई तो हो गई लेकिन कैमरे की सफाई बाकी है जा जाकर बाहर से झाड़ू लेकर आ,,,,।
ओहहह तो तुम झाड़ू लगाने जा रही हो मुझे लगा इस तरह से,,(हथेली अपनी मां की तरफ करके ऊपर से नीचे की तरफ हथेली को घुमाते हुए) क्या करने जा रही हो..
अरे कुश्ती नहीं करने जा रही हूं,,,, और वैसे भी मेरे साथ कुश्ती करेगा कौन,,,,।
मैं हूं ना तुम्हारे साथ कुस्ती करने के लिए,,,(अंकित मुस्कुराते हुए बोला तो उसकी बात सुनकर सुगंधा भी बोल पड़ी)
एक ही बार में दबा दूंगी चित्त हो जाएगा,,,,भले ही तो कसरत करता है लेकिन मुझसे ज्यादा मजबूत नहीं होगा,,,।
अगर यह बात है तो चलो कुश्ती करके देख लेते हैं कौन जीतता है,,,,।
नहीं नहीं रहने देकहीं नीचे गिरकर हड्डी टूट गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे,,,।
बस हो गया डर गई,,,।
डर तो बिल्कुल नहीं गई क्योंकि जब मैं कक्षा8 में थी तो स्कूल में कबड्डी का कंपटीशन होता था और उसमें में हीं फर्स्ट आती थी,,,।
सच में मम्मी,,,,।
तो क्या तुझे भरोसा नहीं होता क्या,,,,
मुझे तो भरोसा है लेकिन,,,,
अच्छा तो तुझे भरोसा नहीं है चल फिर एक बार एक-एक हाथ हो ही जाए,,,,।
यहां पर इस कमरे में,,,।
तो क्या बाहर जाकर कुश्ती लड़ेंगे क्या,,, मां बेटे की बीच की कुश्ती तो घर की चार दिवारी के अंदर ही होती है,,, बिस्तर पर,,,,(सुगंधा अपने बेटे से दो अर्थ वाली बातें कर रही थी और अंकित अपनी मां के कहने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था,,, और अपनी मां की अभिलाषा जानकर मन ही मन बहुत खुश हो रहा था,,,, और उसकी बात सुनकर बोला,,,)
और कहीं कुश्ती लड़ते-लड़ते पलंग टूट गई तो,,,।
पलंग तोड़ कुश्ती में ही तो मजा आता है तभी तो दोनों में कितना दम है इसका पता चलता है,,,,,,
बात तो सही है तुम्हारे साथ कुश्ती करने का मजा भी तभी है जब पलंग टूट जाए,,,,(अंकित भी अपनी मां की तरह दो अर्थ में बात करते हुए बोला और सुगंधा अपने बेटे के कहने के मतलब को समझ कर उत्तेजना से गनगना गई,,,,)
तो चल देखते हैं कौन पलंग तोड़ता है,,,।
चलो मैं तो तैयार हूं,,,,(ऐसा कहते हुए अंकित शुरुआत करते हुए अपने दोनों हाथ को ऊपर उठा दिया और अपनी मां की तरफ आगे बढ़ा दिया मानो की सच में वह कुश्ती करने के लिए तैयार हो चुका था,,, सुगंधा भीअपने दोनों हाथ को आगे बढ़ा दी और वह भी कुश्ती करने के लिए तैयार हो चुकी थी सुगंधा और अंकित दोनों के मन में कुछ और ही चल रहा था यह तो सिर्फ कुश्ती का बहाना था दोनों एक दूसरे को छूने दबाने और मसलने का मजा लेना चाहते थे,,,,
देखते ही देखते अंकितदोनों हाथ ऊपर किए हुए ही अपनी मां की हथेली को अपनी हथेली में दबोच लिया और जिस तरह से दो योद्धा कुश्ती करते हैं इस तरह से वह दोनों भी तैयार हो चुके थे दोनों जोर लगा रहे थे एक दूसरे के तरफऔर दोनों का जोर बराबर लग रहा था कभी वह एक कदम पीछे चले जा रहा था तो कभी सुगंधा एक कदम पीछे चली जा रही थी।लेकिन अगले ही पल हुआ अपनी स्थिति में आ जा रही थी अपनी मां की ताकत हिम्मत देखकर अंकित मन ही मन बहुत खुश हो रहा था अपने मन में सोच रहा था कि वाकई में पलंग पर उसकी मां के साथ कुश्ती करने में कुछ ज्यादा ही मजा आएगा,,,,ऐसा अपने मन में सोते हुए को थोड़ा सा जोर लगाया तो उसकी मां गिरने को हो गई लेकिन तुरंत अपने आप को संभाल ली,,,,
लेकिन अगले ही पल अंकित थोड़ा सा जोर लगाया और इस बार वह अपनी मां को लेकर पलंग पर जा गिरा सुगंधा पलंग पर नीचे गिरी हुई थी और अंकित उसके ऊपर गिरा हुआ था और उसे अपनी भुजाओं से दबोच कर रखा हुआ था,,,,लेकिन उसके पलंग पर गिरने से उसकी सारी घुटनों के ऊपर तक एकदम से चढ़ गई थी उसकी मोटी मोटी नंगी जांघोंका एहसास अंकित को बहुत अच्छी तरह से हो रहा था और किसी भी तरह से अपनी मां की जान को अपनी हथेली सेदबाना चाहता था मसलना चाहता था तब पूछना चाहता था उसके मखमली जांघों को छुकर महसूस करना चाहता था अपनी मां की जवानी को,,,, सुगंधा उसके नीचे दबी हुई थी और उससे छूटने की कोशिश कर रही थी,,,लेकिन अंकित उसे अपनी भुजाओं से दबोचा हुआ था और उसे पर काबू करने के बहाने अपने हाथ को पीछे की तरफ ले जाकर अपनी मां की मोटी मोटी जांघों को कस के दबोच लिया था,,,,अपनी मां की चिकनी जांघों का एहसास उसके बदन में उत्तेजना की लहर को बढ़ा रही थी,,, ओ पागल हुआ जा रहा था और उसके हाथ जांघों के ऊपरी सतह पर अपने आप फिसलते हुए चले जा रहे थे जिसका एहसास सुगंधा को बहुत अच्छी तरह से हो रहा था,,,,वह अपने बेटे की पकड़ से छोड़ना चाहती थी लेकिन अंकित की हरकत से वह मदहोश हुए जा रही थी,,,, मां बेटे दोनों जोर लगा रहे थे और दोनों का मजा भी आ रहा थाअंकित कुश्ती के बहाने अपनी मां के मखमली बदन को छू रहा था उसे अपनी हथेली में दबोच रहा था इस समय उसकी उत्तेजना परम शिखर पर थी पेंट के अंदर उसका लंड पूरी तरह से टन्ना गया था।
तभी अंकित की नजर अपनी मां की चूचियों पर पड़ी जो की ब्लाउज से बाहर आने के लिए मचल रही थी,,, क्योंकिकुश्ती का जोर लगाने की कसम काम सुगंधा के ब्लाउज का ऊपर वाला बटन अपने आप ही टूटकर गिर गया था जिसकी वजह से उसकी आधे से भी ज्यादा चूचियां ब्लाउज से बाहर झांकने लगी थी,,,जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आने लगा था और इसी मौके का फायदा उठाकर सुगंधा एकदम से अपना दांव बदली औरअपने बेटे के कंधे को पकड़ कर उसे ज़ोर से दम लगाकर एकदम से पलट दी और खुद उसके ऊपर चढ़ गईलेकिन ऊपर चढ़ने में उसकी साड़ी एकदम कमर तक उठ गई जिससे उसकी मदद कर देने वाली बड़ी-बड़ी गांड लाल रंग की चड्डी में एकदम साफ दिखाई देने लगी लेकिन इस समय अंकित अपनी मां को ही जरूरत में नहीं देख सकता था क्योंकि वह नीचे दबा हुआ था लेकिन अपने आप को ऊपर उठने की कोशिश में अपने आप को बचाने की कोशिश मेंवह अपने हाथ को अपनी मां के बदन के इधर-उधर रखकर जोर लगा रहा था और ऐसे में उसके दोनों हाथ सुगंधा के भारी भरकम गांड पर चली गई और उसे एहसास हुआ की साड़ी कमर तक उठी हुई है लेकिन पूरे नंगेपन को ढकने के लिए अभी भी उसके बदन पर चड्डी थी जिसका एहसासअंकित को अपनी हथेली पर चड्डी के स्पर्श होते ही महसूस हो रहा था और वह एकदम से मत हुआ जा रहा था लेकिन इस समय कुश्ती के खेल में सुगंधा पूरी तरह से हावी हो चुकी थी,,,।
सुगंधा जिस तरह से कुश्ती के नियम का फायदा उठाते हुए कि,, जब सामने वाले प्रति द्ववंदी का ध्यान थोड़ा सा भी भटके तो तुरंत दांव लगाकर उसे पटकनी दे दो,,,और सुगंधा को जैसे ही लगा कि उसके बेटे का ध्यान पूरी तरह से भटक चुका है क्योंकि वह अपने बेटे की नजर को देख चुकी थी और उसकी नजर उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों पर थी जो ब्लाउज के बटन टूटने की वजह से बाहर की तरफ पानी भरे गुब्बारे की तरह लुढका हुआ था तभी वहअपने बेटे की कमजोरी का फायदा उठाकर उसे नीचे पटक दीजिए लेकिन जिस तरह से वह अपने बेटे के ऊपर बैठी हुई थी उसकी गांड पर उसकी गांड के बीचों बीच कुछ कड़क चीज चुभती हुई महसूस हो रही थी और उसे समझते देर नहीं लगी कि नीचे से कौन सा अंग उसकी गांड के बीचो-बीच चुभ रहा है यह एहसास होते ही वह पानी पानी होने लगी,,,सुगंध को अच्छी तरह से एहसास हो रहा था की कुश्ती करते समय जब वह पलंग पर पटकी गई थी और जब वह उसके ऊपर चढ़ी तब उसकी साड़ी कमर तक उठ गई थी और इस समय पेट के अंदर से ही उसके बेटे का लंड उसकी पेंटि के ऊपर से उसकी बुर पर ठोकर मार रहा थायह एहसास उसका पानी निकालने के लिए काफी था वह मदहोश हो जा रही थी और गहरी गहरी सांस ले रही थी लेकिन दोनों हाथों से अपने बेटे की हथेलियां को दबोच कर बिस्तर पर दबाए हुए थी ताकि वह कोई हरकत ना कर सके,,,,।
अंकित को भी एहसास हो रहा था कि वह किस स्थिति में है अपनी मां का भारी भरकम बदन वह अपने ऊपर महसूस कर रहा था,,, और शायदयह उसके लिए एक तरह का अभ्यास था जब वह दोनों के बीच सारी मर्यादाएं खत्म होने के बाद जब दोनों संभोग सुख का मजा लेंगे तब शायद इसी तरह से वह अपनी मां को अपने लंड के ऊपर रखकर नीचे से ठोकर लगाएगा,,,और तब वह अपनी मां के भारी भरकम वजन को संभाल सकता है कि नहीं यह देखने के लिए यह पल उसके लिए बेहद जरूरी था,,,और अच्छी तरह से उसकी मां की भारी भरकम गांड का दबाव उसके लंड पर पड़ रहा था उसे देखकर अंकित को एहसास हो रहा था कि वह अपनी मां के भार को अच्छी तरह से संभाल लेगा,,,सुगंधा किस तरह से अपने नीचे उसे दबाए हुए थी वह पूरी तरह से चारों खाने चित हो चुका था और कुश्ती के नियम के अनुसार वह हार चुका था,,, और सुगंधा हल्के से अपनी गांड कोएक दो बार अपने बेटे के लंड पर गोल-गोल घुमाई जिसका एहसास अंकित को महसूस हुआ था और वह पूरी तरह से मस्त हो चुका था उसका मन तो इसी समय कर रहा था कि अपनी मां को बोल दे की बस अपनी चड्डी उतार दो मुझे रहा नहीं जा रहा है लेकिन ऐसा कह नहीं पाया,,,।
सुगंधा अपनी जीत को लेकर बेहद खुश थी और अपने बेटे की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए बोली,,,।
क्यों बच्चु हो गया ना,,, ऐसे ही चार-पांच मेडल नहीं जीती हूं अब तो तुझे यकीन हुआ ना की कुश्ती में तु मुझसे नहीं जीत सकता।
बिल्कुल सच में मैं तुमसे नहीं जी सकता तुमने जिस तरह से पटकनी लगाइ हो मैं तो सोच भी नहीं सकता,,,।
मेरे लाल यही तो कुश्ती का नियम है,,,(ऐसा कहते हुए अपने बेटे के ऊपर से उठने लगी उसकी सारी कमर तक उठी हुई थी और अपने को बेटी के सामने ही खड़ी होकर अपनी साड़ी को व्यवस्थित करने लगी उसे बेहद रोमांच का अनुभव हुआ था उसे बहुत मजा आया था,,,, अंकित भी बिस्तर पर उठकर बैठ गया और बोला,,,)
अच्छा हुआ कि तुम्हारी पलंग नहीं टूटी वरना लेने के देने पड़ जाते,,,।
सच कहूं तो मैं उतना जोर लगाई ही नहीं थी वरना सच में पलंग टूट जाती।( इतना कहते हुए वह पलंग से नीचे उतर गई,,,, अंकित भी धीरे से पलंग से नीचे उतर गया,,,, सुगंधा अपने बेटे की तरफ देख कर मुस्कुराते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)
जब जल्दी से जाकर झाडू ले आ कमरे की सफाई कर देती हुं,,,,,।
ठीक है मैं अभी लेकर आता हूं,,,,,(इतना कहकर अंकित अपनी मां के कमरे से बाहर चला गया और सुगंधा जल्दी से अपनी साड़ी कमर तक उठाकर अपनी पैंटी को जल्दी से उतारने लगी और अपनी मोटी मोटी जांघों से नीचे सरकाते हुए वह आगे की योजना बनाने लगी और अगले ही पल वह अपनी पैंटी को अपने पैरों से बाहर निकाल कर उसे बिस्तर के नीचे छुपा दी और अपनी साड़ी को पहले की तरह अपनी कमर में खोंस ली,,, थोड़ी ही देर में अंकित झाड़ू लेकर कमरे में आ गया और सुगंधा मुस्कुराते हुए अपने बेटे के हाथ में से झाडू ले ली,,, और झुक कर झाड़ू लगाने लगी,,,।
आज वह अपने बेटे के सामने कुछ ज्यादा ही गांड मटका कर चल रही थी जिसका एहसास अंकित को अच्छी तरह से हो रहा था और अपनी मां की कई हुई साड़ी में बड़ी-बड़ी गांड को देखकर अंकित का लंड बार-बार खड़ा हो जा रहा था,, सुगंधाबार-बार उसकी आंखों के सामने एकदम से झुक कर झाड़ू लगने लगती थी पलंग के नीचे घुसकर झाड़ू लगने लगती थी ताकि उसकी भारी भरकम गांड पर उसके बेटे की नजर पड़ सके,,,और ऐसा हो भी रहा था सुगंधा घर में चारों तरफ झाड़ू लगा रही थी और उसका बेटा उसकी बड़ी-बड़ी गांड देखकर अपनी आंख सेंक रहा था,,, अंकित की हालत बहुत ज्यादा खराब हो रही थी लंड की नशे ऐसा लग रहा था कि अभी फट जाएंगी,,,,बार-बार अंकित अपनी मां की गांड को देखकर पेंट के ऊपर से ही अपने लंड को दबा दे रहा था,,,, वैसे तो अंकित अपनी उत्तेजना को दबा ले जाता था लेकिन इस समय उसकी उत्तेजना पूरी तरह से बेकाबू होचुकी थी वह अपनी उत्तेजना पर काबू नहीं कर पा रहा था बार-बार उसका मन कर रहा था कि पीछे से अपनी मां को दबोच नहीं और अपने लंड को उसकी बड़ी-बड़ी गांड पर रगड़ रगड़ कर पानी निकाल दे लेकिन किसी तरह से अपने आप को संभाले हुए था।
देखते ही देखते सुगंधा अपनी जवानी खातिर अपने बेटे के ऊपर चला कर तेरे कमरे में झाड़ू लगा दी,,,, वाकई में झाड़ू लगाने के बाद सुगंधा का कमरा एकदम साफ और चकाचक दिखाई दे रहा था,,, जिसे देखकर अंकित बोला,,,,।
वाह मम्मी तुम्हारा कमरा तो एकदम साफ हो गया,,,,।
सफाई करूंगी तो साफ़ ही होगा ना,,,, बहुत दिनों से मैंने अपना कमरा साफ नहीं की थी आज देखो कितना अच्छा लग रहा है सोने में मजा आएगा,,,।
लेकिन हमें तो छत पर सोना है,,,।
अरे हां मैं तो भूल ही गई थीफिर भी जब भी कमरे में सोना होगा तब भी एकदम सुकून मिलेगा,,, वैसे भी साफ-साफ कमरा हो तो अच्छा लगता है।
यह बात तो तुम ठीक कह रही हो,,,।
चल कमरे की सफाई तो होगी लेकिन अभी भी पंखा गंदा दिखाई दे रहा है,,,,।
तो अब,,,।
तो अब क्या पंखा भी साफ करना होगा,,,।
लाओ में पंखा साफ कर दुं,,,,,।
नहीं तू रहने दे तुझसे नहीं हो पाएगा,,, तो सिर्फ जाकर टेबल लेकर ए और एक कपड़े को पानी में भिगोकर लेकर आ मैं साफ कर देती हुं।(अंकित को हिदायत देते हुए सुगंधा बोली और अपनी मां की बात सुनकर अंकित बोला)
ठीक है मम्मी मैं अभी लेकर आता हूं,,,,,(इतना कहकर वह अपनी मम्मी के कमरे से बाहर चला गया,,, और उसके कमरे से जाते ही सुगंधा अपनी साड़ी को थोड़ा सा और ऊपर उठकर उसे कमर पर खोंस दी इस बार उसकी साड़ी घुटनों से भी ऊपर उसकी जांघों तक आ चुकी थी,,,क्योंकि वह अपने बेटे को जो चीज दिखाना चाहती थी उसके लिए ऐसा करना बेहद जरूरी था,,,, सुगंधा का दिल जोरो से धड़क रहा था। वैसे तो वह अपने बेटे को अपने खूबसूरत अंगों के दर्शन बहुत बार जानबूझकर करा चुकी थी लेकिन हर एक बार एक अलग ही अनुभव उसके बदन में महसूस होने लगता था ऐसा लगता था कि जैसे आज पहली बार ही वह अपने बेटे को अपना अंग दिखाने जा रही है। सुगंधा के बदन में मदहोशी जा रही थी वह मस्त हुए जा रही थी,,,, अपने मन में सोच रही थी कि यह वह यह सब कैसे कर पाएगी लेकिन उसे पूरा विश्वास था कि वह कर लेगी,,, सुगंधा यही सब सो रही थी तब तक उसका बेटा टेबल और हाथ में पोंछा लेकर कमरे में दाखिल हुआ,,, उसे देखकर सुगंधा मुस्कुराते हुए बोली,,,,)
टेबल को बीच में पंखे के नीचे रख दें,,,,
क्या तुम इस पर चढ़ोगी मम्मी,,,(टेबल को कमरे के बीचो-बीच ठीक पंखे के नीचे रखते हुए अंकित बोल तो उसकी बात सुनकर सुगंधा मुस्कुराते हुए बोली)
तो इसमें क्या हो गयामैं इस तरह से बहुत बार सफाई कर चुकी हूं इसमें नहीं कोई बात नहीं है,,,।
नहीं मुझे इस बात कि फिकर है कि अगर गिर गई तो,,,
नहीं गिरूंगी और वैसे भी तू किस लिए है तु क्या मुझे गिरने देगा,,,,(सुगंधा मुस्कुराते हुए टेबल के ऊपर चढ़ने लगी तो अपनी मां की बात सुनकर अंकित भी मुस्कुराते हुए बोला)
बिल्कुल भी नहीं मैं भला तुम्हें कैसे गिरने दूंगा,,,, तुम तो मेरी हीरोइन की तरह हो,,,,(अंकित एकदम से बोल पड़ा उसकी बात सुनकर उसकी मां उसकी तरफ नजर घूमते हुए आंखों को तर्राते हुई देखी और बोली,,,)
अच्छा मैं तेरी हीरोइन हूं मैं हीरोइन की तरह हुं,,।
बिल्कुल तुम किसी फिल्म की हीरोइन से कम थोड़ी लगती हैऔर मैं तुम्हारे साथ रहता हूं इसलिए मैं तुम्हारा हीरो हूं।
तुझे ऐसा क्यों लगता है कि मैं तेरे साथ ही रहती हूं स्कूल जाते समय मैं किसी के साथ भी रह सकती हूं,,,।
नहीं बिल्कुल नहीं मुझे तुम पर पूरा भरोसा है तुम किसी और के साथ रह ही नहीं सकती,,,।
ऐसा क्यों,,,?
क्योंकि तुम बहुत सीधी-सादी और संस्कारी हो,,,,।
(अपनी बेटी की बात सुनकर सुगंध अपने मन में ही बोली सीधी शादी और संस्कारी तो मैं थी लेकिन तेरे चक्कर में बेशर्म बनती जा रही हूं और एक दिन लगता है कि तेरी रंडी बन जाऊंगी,,, ऐसा अपने मन में सोचते हुए वह टेबल पर चढ़ गईऔर पंखे की तरफ देखते हुए अपना हाथ नीचे की तरफ करके अपने बेटे को हाथ से इशारा करके बोली,,,)
कपड़ा दे और इस पानी में भिगोकर लाया है ना,,,,।
हां लाया हूं,,,(ऐसा कहते हुए आप ने हाथ में लिया हुआ कपड़ा अपनी मां की तरफ आगे बढ़ा दिया और वह कपड़ा हाथ में लेकरपंखे को साफ करने लगी और इसी बीच वह अपनी टांग को थोड़ा खोल दी अभी तक अंकित की नजर अपनी मां की दोनों टांगों के बीच नहीं पड़ी थी,,,,और पंखा साफ करते हुए सुगंधा नजर हल्के से नीचे करके अपने बेटे की तरफ देख रही थी और उसे भी एहसास हो रहा था कि उसके बेटे की नजर अभी तक उसकी साड़ी के अंदर तक नहीं पहुंची है,,,, इसलिए वह अपने बेटे का ध्यान अपनी तरफ लाने के लिए बोली,,,)
टेबल ठीक से पकड़ना गिरने मत देना,,,।
तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मम्मी,,,, आराम से साफ करो,,,,,,(अंकित का इतना कहना था की सुगंधा थोड़ा सा और टांग को खोल दीऔर इस बार अंकित की नजर अपनी मां की साड़ी के अंदर तक पहुंच गई और जिस तरह से सुगंधा ने अपनी साड़ी को जांघों तक उठा रखी थी उसे अपनी मां की बुर एकदम साफ दिखाई देने लगी और जैसे ही उसकी नजर अपनी मां की बुर पर पड़ी उसकी तो आंखें फटी की फटी रह गई उसके होश उड़ गए वह अपनी मां की टांगों के बीच देखता ही रह गया,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या देख रहा हैहालांकि साड़ी के अंदर उजाला थोड़ा काम था लेकिन फिर भी इतना तो उजाला था कि वह अपनी मां की बुर को एकदम साफ तौर पर देख सके उसे ज्यादा कुछ नहीं केवल गांड की फांक की लकीर और बुर की पतली सी दरार एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, जिसे देखकर अंकित एकदम दंग रह गया था,,,अंकित अपनी मां की बुर की खूबसूरती में पूरी तरह से खो चुका था लेकिन तभी उसे एहसास हुआ कि कुछ देर पहले जब दोनों कुश्ती कर रहे थे कब बिस्तर पर उसे एहसास हुआ था कि उसकी मां चड्डी पहनी हुई थी, लेकिन यहां तो उसकी मां चड्डी नहीं पहनी थी एकदम नंगी थी साड़ी के अंदर।
अंकित का दिमाग एकदम से चक्कर आने लगा था कुछ देर पहले उसकी मां चड्डी पहनी थी और इस समय चड्डी नहीं पहनी थीयह सब क्या है यह माजरा क्या है उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था वह अपनी मां की साड़ी के अंदर ही देख रहा था और सुगंधा भी पंखा साफ करते हुए अपनी नजर को नीचे करके अंकित की तरफ देख रही थी और जैसे ही उसे एहसास हुआ कि उसके बेटे की नजर उसकी साड़ी के अंदर तक पहुंच गई है तो वह एकदम से उत्तेजना से गनगना गई,,वह अपने बेटे को पूरी तरह से पागल करने के लिए अपनी दोनों टांग को हल्के-हल्के ऊपर नीचे करके उठा बैठ रही थी जिसकी वजह से उसकी बुर की तरह आपस में रहकर खा रही थी गांड की फाग भी आपस में रगड़ खाती भी नजर आ रही थी जिसे देखकर अंकित की हालात पूरी तरह से खराब हुई जा रही थी,,, सुगंधा की बुर का गीलापन अंकित को एकदम साफ दिखाई दे रहा था अंकित समझ गया था कि उसकी मां गीली हो चुकी है बिल्कुल उसकी नानी की तरह,,,,सुगंधा अपनी जवानी का जलवा अपने
बेटे के ऊपर गिरा रही थी और उसका बेटा पूरी तरह से मस्त हुआ जा रहा था।
पंखा साफ करना तो एक बहाना था पंखा साफ करते हुए अपनी बर दिखाना ही मुख्य मकसद था सुगंधा का जिसमें वह पूरी तरह से कामयाब हो चुकी थी,,,सुगंधा बार-बार हल्की नजर से अपने बेटे की तरफ देख रही थी उसके बेटे की हर पूरी तरह से खराब हो रही थी उसकी बुर देखकर उसके बेटे की हालतकैसी हो रही है इसका एहसास सुगंधा को अपने बेटे का चेहरा देखकर ही समझ में आ रहा था जो की सुर्ख लाल होता चला जा रहा था,,,,,अंकित गहरी गहरी सांस ले रहा था उसे रहने जा रहा था इस समय उत्तेजना के परम शिखर पर था क्योंकि उसकी मां की बुर उसकी आंखों के सामने थी और धीरे-धीरे अंकित को एहसास होने लगा कि उसकी मां जानबूझकर उसे अपनी बुर दिखा रही थी,,,इस बात का अहसास होते ही अंकित एकदम से उत्तेजना से गुणगान आ गया और एक हाथ से अपने लंड को दबा दिया और उसकी यह हरकत उसकी मां ने देख ली और यह हरकत का सुगंधा पर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ा,,,, वह धीरे से अपनी टांग को और थोड़ा सा खोल दिया और इस समयअंकित को उसकी मां की बुर एकदम साफ दिखाई देने लगी थी जो की हल्की सी खुली हुई भी थी उसमें से मदन रस भी टपक रहा था,,,, जो कुछ भी हो रहा था उन सब से अनजान बनने की कोशिश करते हुए सुगंधा बोली,,,।
बाप रे पंखा कितना गंदा हो चुका था अच्छा हुआ में साफ कर दी वरना और न जाने कितना गंदा हो जाता थोड़ा समय लगेगा अंकित तु पकड़े रहना,,,।
तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मम्मी तुम आराम से साफ करो मैं पकड़ा हूं,,,(अपनी मां की साड़ी में झांकते हुए अंकित बोला और सुगंधा अपने मन में बोली,,,, इस तरह से तो तू मेरी बुर देखते हुए जिंदगी भर खड़ा ही रह जाएगा तुझे कौन सी चिंता है ऐसा नहीं की हाथ आगे बढ़कर साड़ी के अंदर डालकर मेरी बुर को मसल देमेरी बुर में अपना लंड डाल दे मेरी प्यास बुझा दे बस सिर्फ देख कर ही अपना भी तड़प रहा है और मुझे भी तड़पा रहा है,,,, सुगंधा की हालत खराब हो रही थी सुगंधाअपने नितंबों पर काबू करके उसे आपस में हल्के हल्के हिलाते हुए अपनी बुर को थिरका रही थी,,, जिसकी वजह से उसकी बुर से मदन रस की बूंद उसकी बूंद की तरह पिघल कर उसकी बुर से नीचे टपक गई जिसे अंकित बड़े ध्यान से देख रहा था और उसकी आंखों के सामने ही वह बुंद ठीक उसकी मां की टांगों के बीच नीचे कदमों में जा गिरी,,,, जिसका एहसास सुगंधा को भी था,, सुगंधा भी अपने कदमों के बीच अपनी बुर से निकली हुई बदन रस की बुंद को गिरते हुए देख रही थी,,,, यह देखकरवह एकदम से और ज्यादा गनगना गई कि उसका बेटा भी उसकी बुर से निकले हुए मदन रस की बूंद को देख रहा था,,,,।सुगंधा उत्तेजना के मारे गहरी सांस ले रही थी कुछ देर के लिए वह पंखा साफ करना भूल चुकी थी क्योंकि उसका बेटा उसके मदन रस की भूत को टेबल पर गिरा हुआ देख रहा था जो की हल्का सा फैल गया था सुगंधा देखना चाहती थी कि उसका बेटा क्या करता है,,,,।
तभी मैं तुमसे हैरान हो गई जब देखी कि उसका बेटा अपनी उंगली उसे मदद उसकी बूंद पर स्पर्श करा कर उसे जल्दी से अपनी होठों के बीच रखकर उसे चाट लिया यह सुगंधा के लिए बेहद असहनीय थावह एकदम से झड़ने वाली थी लेकिन किसी तरह से संभल गई थी वरना उसकी बुर से भल भला कर मदन रस सीधे टेबल पर ही गिरता,,,, सुगंधा को याद था किस पहले भी एक बार उसका बेटा उसके कमरे में आकर उसकी नींद का फायदा उठाते हुए उसकी बुर पर अपने होंठ लगाकर चाटा था लेकिन आज अंकित के लालच पन की हद हो गई थी,,, अंकित भी अपनी मां की बुर का नमकीन रस चाट कर मदहोश हो गया था,,,हल्का कसैला और नमकीन स्वाद पूरी तरह से उसे मदहोश कर दिया था और ऐसा करते हुए वह एक हाथ से अपने लंड को दबा भी रहा था यह सब सुगंधा की नजरों से बच नहीं पाया था और सुगंध समझ गई थी कि उसका बेटा उसे चोदने के लिए किस हद तक तड़प रहा था,,,।
पंखा साफ हो चुका था और वह धीरे से टेबल से नीचे उतरी,,, और बोली,,,।
को पंखे की सफाई तो हो गई,,,,।
तो अब,,,,,(गहरी सांस लेते हुए अंकित बोला)
अब कपड़े रह गए हैं उन्हें धोना बाकी है और फिर नहाना भी बाकी है,,,,।
पंखा साफ करते हुए जो कुछ भी हुआ था वह बेहद अद्भुत और अकल्पनीय था क्योंकि अंकित ने कभी सोचा नहीं था कि टेबल पर चढ़ी उसकी मां अपनी दूर से मदन रस की बूंद नीचे गिराएगी और वह उसे उंगली से लगाकर चाट जाएगा ना तो यह कल्पना अंकित ने किया था और ना ही उसकी मां सुगंधा ने हीं,,,, सुगंधा तो इस दृश्य को देखकर पानी पानी हो गई थी,,, वह कभी सोची नहीं थी कि उसके बेटे की लालच ईस कदर बढ़ जाएगी की,, वह उसके बुर से निकले नमकीन पानी को चाटने के लिए इस कदर व्याकुल हो जाएगा,,,, सुगंधा इतना तो समझ गई थी कि दोनों मां बेटे में एक दूसरे को पानी की जो चाहत थी वह काफी हद तक बढ़ चुकी थी आग दोनों जगह बराबर लगी हुई थी,,,, सुगंधा आज पूरी तरह से बेशर्म बन जाना चाहती थी इसीलिए तो उसने अपने बेटे से अलमारी साफ करने के लिए बोली थी और उस गंदी किताब को अपने बेटे के हाथ लगने दी थी जिसे वह पहले भी पढ़ चुका था लेकिन यह बात सुगंधा नहीं जानती थी।
सुगंधा ही अपने बेटे को इस किताब की कहानी को पढ़कर सुनाने के लिए मजबूर की थीऔर भला अंकित कहां पीछे हटने वाला था वह भी किताब में लिखा है कि एक शब्द अपनी मां के सामने पढ़कर उसे सुना दिया जिसे सुनकर उसकी मां की बुर गीली होने लगी थी और अंकित का लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा हो चुका था जिसका एहसास सुगंधा को भी अच्छी तरह से हो रहा था,,,,और फिर अलमारी की सफाई के बाद जिस तरह से वह अपनी गांड दिखाते हुए झाड़ू लगाई थी वह भी सुगंधा की सोच से कई ज्यादा हिम्मत दिखा देने वाली बातें थी और फिर जिस तरह से उसने अपनी पैंटी निकाल कर एक तरफ रख दी थी और पंखा साफ करते हुए अपने बेटे को अपनी बुर के दर्शन कराई थी यह सब कुछ मां बेटे दोनों के लिए अकल्पनिय था जिनकी दोनों ने भी कल्पना नहीं किए थे,,,। अपने बेटे को अपनी जवानी के दर्शन करने के लिए जिस हद तक उसने अपनी हिम्मत और शौर्य दिखाई थी यह बेहद काबिले तारीफ थी जिसके लिए वह खुद अपने आप को ही बधाई दे रही थी और अपने ही मन में अपने ही हिम्मत की सराहना कर रही थी क्योंकि सुगंधा के लिए यह बहुत था अपने बेटे को पूरी तरह से अपनी तरफ ललाईत करने के लिए,,, वैसे भी अब दोनों मां बेटे के बीच कुछ ज्यादा बचा नहीं थाबस जरूरत थी अंकित को थोड़ा हिम्मत दिखाने की और सुगंधा को थोड़ा और बेशर्म बन जाने की,,, अपने बेटे के पेट में बने हुए तंबू को देखकर सुगंधा की भावनाएं बेकाबू हो रही थी सुगंधा किसी भी तरह से अपने बेटे के साथ हम बिस्तर होने के लिए तड़प रही थी,,, वह मचल रही थी अपने जीवन को दोबारा एक नई राह दिखाने के लिए अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करने के लिएअपने पति के देहांत के बाद वह एक बार फिर से शरीर सुख प्राप्त करना चाहती थी वह देखना चाहती थी कि अपने बेटे से चुदवाकर उसे कैसा महसूस होता है,,, वह अपनी बुर की अंदरूनी दीवारों मेंअपने बेटे के मोटे-मोटे लंड की रगड़ को अच्छी तरह से महसूस करना चाहती थीअपना पानी झाड़ देना चाहती थी जो उसे काफी परेशान कर रहा था लेकिन शायद अभी भी इस पल के लिए कुछ पल और सबर करना था।
तृप्ति के जाने के बाद दोनों मां बेट आपस में बहुत ज्यादा खुलने लगे थे,,, दोनों के बीच ऐसी कई घटनाएं हुई थी जिससे दोनों बेहद करीब आ सकते थे लेकिन फिर भी दोनों में से कोई पहल करने को तैयार नहीं था लेकिन फिर भी मंजिल पर पहुंचने से ज्यादा मजा दोनों को सफर में आ रहा था दोनों बार-बार उत्तेजित हो रहे थे मदहोश हो रहे थे पानी निकाल रहे थे और ऐसा बहुत कुछ था जो मंजिल से पहले का सुख प्रदान कर रहा था,,,,,, सुगंधा और अंकित अपने मन में इस बात को लेकर बेहद खुश भी होते थे कि अच्छा हुआ की तृप्ति नानी की वहां चली गई है क्योंकि उसकी मौजूदगी में शायद दोनों इतना सुख और इतना खुलापन महसूस नहीं कर पाते। घर में मां बेटे दोनों अकेले थेपर दोनों ही प्यासे थे एक अपनी जवानी की पूरी उत्थान पर थी और एक अभी-अभी जवान हुआ था दोनों की आकांक्षाएं और महत्वाकांक्षा एक ही थी दोनों की मंजिल एक ही थी और रास्ता भी एक ही था दोनों एक दूसरे का साथ देते हुए साथ-साथ चल भी रहे थे इसलिए तो यह सफर बेहद मनमोहक और मदहोशी से भरा हुआ था। पंखा साफ करते हुए अंकित अपनी मां की बुर के दर्शन करके पूरी तरह से मस्त हो चुका था,,,,कुश्ती करते समय उसे अच्छी तरह से एहसास हुआ था कि उसकी मां चड्डी पहनी हुई थी लेकिन इस समय उसके बदन पर चड्डी नहीं थी,,,यह देखकर उसे अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि उसकी मां क्या चाहती है और अपनी मां की चालाकी पर उसे और ज्यादा मजा आ रहा था वह समझ गया था कि उसकी मां छिनार है ठीक अपनी मां की तरह ही बस खुलकर बोल नहीं पा रही है,,,।
एक औरत होने की नाते उसे अच्छी तरह से मालूम था कि इस समय उसे क्या चाहिएलेकिन वह सिर्फ इशारे ही इशारे में समझ रही थी मुंह से कुछ बोल नहीं पा रही थी और इसके उल्टेखुद उसकी मां खुले शब्दों में अंकित से बता दी थी कि उसे क्या चाहिए और दो दिन उससे खुलकर मजा लेने के बाद ही वह अपने घर गई थी और अंकित को एक अद्भुत सुख और एक अनुभव देकर गई थी जो उसे अब काम आने वाला था। अंकित भी इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी नानी उसे जो सुख प्रदान की है तो बेहद अद्भुत था जिसके बारे में वह सोचता भर था।लेकिन ऐसा कभी किया नहीं था इसलिए तो अपनी नानी का मन ही मन में बहुत धन्यवाद करता था। क्योंकि वह नहीं होती तो शायदचुदाई करना हुआ है इतनी जल्दी नहीं सीखा होता और उसकी नानी की ही बदौलत उसका आत्मविश्वास पूरी तरह से बढ़ गया था जिसके चलतेघर में चीनी मांगने आई सुमन की मां की भी उसने चुदाई कर दिया था और उसे पूरी तरह से संतुष्ट कर दिया था अब यही अनुभव उसे अपनी मां पर दिखाना था लेकिन कैसे या उसे भी समझ में नहीं आ रहा था।
घर की सफाई के साथ-साथ पंखे की भी सफाई हो चुकी थी,,,और अब सिर्फ कपड़े की सफाई रह गई थी,,,सुगंधा अपने बेटे को अद्भुत नजारा दिखाने के बाद मुस्कुराते हुए अपने बेटे से बोली,,,,।
बाहर कपड़े रखे हुए हैं उसे लेकर घर के पीछे रख दे वहीं पर उसे धो डालती हूं,,, तू जाकर रख दे मैं आती हूं,,,।
ठीक है मम्मी,,,,(और इतना कहकर अंकित अपनी मां के कमरे से बाहर निकल गया और कपड़ों का ढेर लेकर उसे पीछे की तरफ ले जाने लगा वहां पर भी नहाने और कपड़े धोने का अच्छा इंतजाम थाऔर वहीं पर सूखने के लिए कपड़े भी डाल दिए जाते थे इसलिए वहां ज्यादा समय व्यर्थ गवना ना पड़ता अंकित तो चला गया था लेकिन सुगंधा अपने कमरे में खड़े-खड़े मुस्कुरा रही थी,,,, वह टेबल पर देखी तो उसके बुरे से निकले नमकीन रस का धब्बा लगा हुआ था और उसे धब्बे को देखकर उसके बदन में गनगनी सी दौड़ने लगी,,, वह अपने मन में सोचने लगी कि उसका बेटा जब उसकी बुर के नमकीन रस को उंगली से लगाकर चाट सकता है तो बुर पर अपने होंठ लगाकर जब चाटेगा तब कितना मजा आएगा,,,,,, पहले भी एक बार उसके बेटे ने उसके नींद में होने का फायदा उठाते हुए पल भर के लिए अपने होठों को उसकी बुर से लगाया था लेकिन जब वह खुलकर उसकी बुर में उसकी जीभ डालकर चाटेगा तो कितना मजा आएगा ऐसी कल्पना करते ही उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी वह बेहद आनंदित हो उठी,,, उस पल का सुगंधा को बड़ी बेसब्री से इंतजार था। यह सब सोच कर बार-बार उसकी बुर गीली हो रही थी।
अंकित घर केपीछे पहुंच चुका था जहां पर उसे कपड़े धोने में उसकी मां की मदद करनी थी ऐसे तो इससे पहले अंकित अपनी मां की मदद कभी नहीं करता था बस थोड़ा बहुत हाथ बता देता था लेकिन तृप्ति के जाने के बाद वह अपनी मां का खुलकर साथ दे रहा था क्योंकि वह जानता था कि उसका साथ देने में ही उसकी भलाई थी जिसका फल उसे धीरे-धीरे मिल रहा था,,,,सुगंधा अपने कमरे से बाहर निकलने से पहले वह अपनी छतिया की तरफ देखने लगी जो की काफी उन्नत थी और उत्तेजना के मारे उसका जाकर थोड़ा बढ़ चुका था वह धीरे से ब्लाउज का ऊपर वाला बटन खोल दे और उस पर साड़ी का पल्लू लगा दीक्योंकि आगे क्या करना था उसे अच्छी तरह से मालूम था और वह धीरे से अपने कमरे से बाहर निकले और वह भी घर के पिछले हिस्से पर पहुंच गई,,,जहां पर पहले से ही अंकित टेबल पर बैठकर अपनी मां का इंतजार कर रहा था अपनी मां को देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी और वह बोला,,,।
मैं भी कपड़े धोने में मदद कर देता हूं कपड़े बहुत ज्यादा है अकेले कब तक धोओगी,,,।
बात तो तु सही कह रहा है कपड़े कुछ ज्यादा ही है,,,, ऐसा करते हैं आधा कपड़ा तु धो दें और आधा कपड़ा में धो देती हूं,,,
हां यह ठीक रहेगा,,,।
चल फिर जल्दी से टब में पानी भर दे,,,(बड़े से कपड़े धोने वाले तब को आगे की तरफ सरकाते हुए सुगंधा बोली,,,, और अंकित उसमें पानी भरने लगा और इसी बीच सुगंधा कपड़ों के ढेर को आधा करने लगी और जब उसने देखी कि उन कपड़ों के देर में उसकी पैंटी और ब्रा भी थी तो वह ब्रा और पेंटी को अपने बेटे के हिस्से वाले कपड़ों के ढेर में डाल दी,,,क्योंकि वह देखना चाहती थी कि उसका बेटा उसकी आंखों के सामने ही उसकी ब्रा और पैंटी को किस तरह से धोता हैजबकि वह जानती थी कि यह उसके लिए बेहद आम बात होगी क्योंकि वह खुद उसके लिए ब्रा पेंटी खरीद कर ला चुका था और उसे अपनी आंखों के सामने उसे पहनते हुए देखा भी चुका था लेकिन फिर भी एक अजीब सी चाह सुगंधा के मन में थी इसलिए वह ब्रा और पैंटी को अपने बेटे के हिस्से वाले कपड़ों में डाल दी,,,, देखते ही देखते अंकित पानी के टब को पानी से भर दिया था,,,, और सुगंधा कपड़े धोने की तैयारी करते हुए अपनी साड़ी फिर से घुटनों तक उठाकर उसे अपनी कमर में खोंस दी थी एक बार फिर से सुगंधा की मांसल पिंडलियां दिखाई देने लगी थी,,, जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था और वह कपड़े धोने के लिए एक लकड़ी का पाटी लेकर उस पर बैठ गई अपनी दोनों टांगें खोलकर,,,ताकि अंकित की नजर एक बार फिर उसकी साड़ी के अंदर तक पहुंच सके और वह उसकी बुर के दर्शन कर सके,,,,।
अंकित अपनी मां की हरकत को देखकर मस्त बज रहा था वह ठीक अपनी मां के सामने बैठकर कपड़े धोने लगा था कि वह भी उसे नजारे को देख सके जिसे दिखाने के लिए उसकी मां मचल रही थी। मां बेटे दोनों कपड़े धोने शुरू कर दिए थे,,, दोनों को बहुत मजा आ रहा था इससे पहले अंकित ने कभी कपड़े नहीं धोए थे लेकिन आज अपनी मां के साथ कपड़े धोने में उसे बेहद आनंद आ रहा था उसे मजा आ रहा थालेकिन इस बीच उसकी तिरछी नजर अपनी मां की साड़ी के अंदर ही थी लेकिन जिस तरह से उसकी मां बैठे थे साड़ी के अंदर अंधेरा ही था इसलिए अंकित को ठीक से कुछ नजर नहीं आ रहा था और सुगंधा को ऐसा ही लग रहा था कि उसका बेटा चोर नजरों से उसकी बुर कोई देख रहा है,,, वह कपड़े धोने में और अपनी बुर दिखाने में पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी,,, कपड़ों से उठ रहे साबुन का झाग सुगंधा के हाथों में पूरी तरह से लगा हुआ था और उसके बालों की लट उसके गालों पर आकर बार-बार उसे परेशान कर रही थी,,,जिसे वह अपने हाथ से पकड़ कर उसे अपने कान के पीछे ले गई लेकिन इस बीच साबुन का ढेर सारा झाग उसके बालों पर लग चुका था जिसे देखकर अंकित मुस्कुरा रहा था,,,,। यह देख कर सुगंधा बोली।
क्या हुआ मुस्कुरा क्यों रहा है,,?
तुम्हारे बालों पर ढेर सारा झाग लगा हुआ है,,,।
तो क्या हो गया अभी नहाना तो है,,,, साबुन कम लगाना पड़ेगा,,,।
अच्छा तो एक साथ दो-दो कम कर ले रही हो कपड़ा भी धो ले रही हो और अपने बदन पर साबुन भी लगा ले रही हो,,,।
तो इसमें क्या हो गया साबुन से झाग तो निकलता ही है अगर झाग लगा ली तो और भी अच्छा है मेहनत काम करना पड़ेगा,,,,।
ओहहहह,,, तुम्हें साबुन लगाने मे भी मेहनत लगती है क्या,,,?
तो क्या सच कहूं तो मुझे साबुन लगाने में बहुत कंटाला आता है मुझे साबुन लगाना अच्छा नहीं लगता इसलिए मैं ठीक से नहा नहीं पाती,,, पूरे बदन में साबुन नहीं लगाती,,,(सुगंधा जानबूझकर अपने बेटे से यह बात बोल रही थी वह देखना चाहती थी कि उसका बेटा क्या कहता है)
कोई बात नहीं आज कहीं तुम्हारे बदन पर साबुन लगा दूंगा और वह भी एकदम अच्छे तरीके से तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो,,,।
सच में,,,,।
तो क्या हुआ,,,
तब तो आज अच्छी तरह से नहाउंगी,,,, तु मेरा कितना ख्याल रखता है,,,(ऐसा कहते हुए एक बार वहतसल्ली करने के लिए अपनी दोनों टांगों के बीच अच्छी तो वाकई में उसे अंदर अंधेरा ही दिखाई दे रहा था इसलिए वह समझ गई कि उसके बेटे को कुछ नजर नहीं आ रहा होगा और वह बात ही बात मेंअपनी दोनों टांगों को हल्का सा और खोल दी और साड़ी को दोनों हाथों से ऊपर की तरफ खींच दी उसकी आधी जांघ के ऊपर साड़ी खींची हुई थी,,,,अंकित अपनी मां की सर को देख रहा था और अपने मन ही मन में बोल रहा था कि देखो कितनी छिनार है अपनी बुर दिखाने के लिए कितना तड़प रही हैलेकिन ऐसा नहीं कह रही है कि बेटा मेरी बुर में लंड डाल दे मेरी चुदाई कर दे,,,, बस तड़पा रही है। और ऐसा सोचते हुए उसकी नजर एक बार फिर से अपनी मां की साड़ी के अंदर गई तो इस बार उसे अपनी मां की बुर एकदम साफ दिखाई देने लगी और वह मन ही मनपसंद होने लगावह इस बात से और ज्यादा खुश था कि उसकी मां जो दिखाना चाह रही थी वह उसे दिखाने लगा था और अपने बेटे के चेहरे पर आए प्रसन्नता के भाव को देखकर वह समझ गई कि उसका काम बन गया है,,,,।
लेकिन सुगंधा अपनी हरकत से खुद ही गनगना गई थी। क्योंकि वह अच्छी तरह से जानती थी कि वह क्या कर रही है उसके होश उड़े हुए थे उसके चेहरे पर शर्म की लालीमा एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, सुगंधा का दिल जोरों से धड़क रहा थावाकई में एक मां के लिए यह कितना शर्मनाक बात होती है कि वह खुद ही अपने बेटे को अपनी बुर के दर्शन कारण उसे वह अंग देखने को मजबूर कर दे जिसे वह हमेशा ढक कर रखती है क्योंकि वह जानती थी कि कैसे हालात में एक औरत एक मर्द को अपनी बुर दिखाती हैक्योंकि एक औरत का एक मर्द को अपनी बुर दिखाने का मतलब साफ होता है कि वह उससे चुदवाना चाहती हैं,,,, और यही सुगंधा के मन में भी चल रहा था।
मां बेटे दोनों का दिल जोरो से दर्द रहा था कपड़े धोते समय अंकित अपनी मां की साड़ी के अंदर उसकी बुर को देख रहा था और पागल हुआ जा रहा था और सुगंध अपनी ही हरकत पर शर्मसार होकर मदहोश हो रही थी,,,,कुछ देर के लिए दोनों के बीच वार्तालाप एकदम से बंद हो चुकी थी दोनों के बीच खामोशी छा चुकी थी दोनों शांति से कपड़े धो रहे थे। और तभी अंकित के हाथ में उसकी मां की पेंटी आ गई जिसे देखकरअंकित के चेहरे पर भी उत्तेजना और प्रसन्नता दोनों के भाव साफ नजर आने लगे और जब सुगंधा ने अपने बेटे के हाथ में उसकी पेंटिं देखी तो उसका चेहरा भी खिल उठा।
अंकित के हाथ में उसकी मां की पेंटि आ चुकी थीऔर यह सुगंधा देख चुकी थी सुगंध बड़े प्यार से अपनी टांगें चौड़ी करके साड़ी के अंदर से अपने बेटे को अपनी बुरे दिख रही थी उसकी झलक जाकर अंकित पागल हुआ जा रहा था,,,एक तरफ उसकी मां की जवानी उसे पूरी तरह से परेशान की हुई थी और दूसरी तरफ उसके हाथ में उसकी मां की पेंटी आ चुकी थी,,,, और वह एकदम से उसे पेंटि को अपने हाथ में लेकर देखने लगा,,, मानो के जैसे उसके हाथ में उसकी मां की पेंटी नहीं बल्कि उसकी बुर आ गई हो,,, उसका दिल जोरो से धड़क रहा था और यही हाल सुगंधा का भी था सुगंधा कपड़े धोते हुए टांगे चोरी करके अपने बेटे को अपनी बुर की झलक दिखाते हुए तिरछी नजर से अपने बेटे को देख रही थी उसके चेहरे पर बदलते हाव भाव को देखकर प्रसन्न हो रही थी। वह अच्छी तरह से जानती थी कि उसके बेटे के हाथ में उसकी पसंदीदा चीज आ गई है,,,,।
अंकित मदहोशी में अपनी मां की पेटी पर जोर-जोर से साबुन लगाकर उसे मरोड़ मरोड़ कर दो रहा था यह देखकर उसकी मां एकदम से बोली,,,।
अरे अरे बेटा यह क्या कर रहा है इतनी जोर-जोर से नहीं कहीं मेरी फट गई तो,,,।
तुम्हारी इतनी कमजोर थोड़ी है मम्मी की थोड़ा सा दम दिखाने पर पड़ जाएगी मैं जानता हूं इसमें बहुत दम है चाहे जितना भी रगड़ो बिल्कुल भी नहीं फटेगी,,,(साड़ी के अंदर अपनी मां की बुर को देखते हुए अंकित बोल उसकी बात सुनकर सुगंधा मन ही मन मुस्कुराने लगी क्योंकि वह अपने बेटे सेदो अर्थों में बात कर रही थी और उसका बेटा भी उसकी बात को शायद समझ गया था तभी वह भी उसके ही जुबान में उसे जवाब दे रहा था,,,)
अरे मैं जानती हूं कि बहुत मजबूत है लेकिन एकदम मखमल की तरह है थोड़ा प्यार से,,, अभी इसे बहुत चलाना है,,,,।
चलाना है तो इसे उपयोग में लिया करो नहीं तो पड़े पड़े ही फट जाएगी ऐसा लग रहा है कि जैसे बरसों गुजर गए इसका उपयोग नहीं कि हो,,,,(अंकित अपनी मां की बुर को देखते हुए दो अर्थ में बात करते हुए बोला,,,,अपने बेटे की बात सुनकर सुगंधा शर्म से पानी पानी होने लगी वह समझ गई कि उसका बेटा किस बारे में बात कर रहा है वाकई में बरसों गुजर गए थे उसने अपनी बुर को पेशाब करने के सिवा और कोई काम में नहीं ली थी,,,उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने बेटे की बात का क्या जवाब दें लेकिन फिर भी वह बेहद सोच समझ कर जवाब देते हुए बोली,,)
क्या करूं बेटा यह तो मेरी सबसे पसंदीदा चीज है लेकिन कभी ऐसा मौका ही नहीं आया कि इसका उपयोग कर सकूं इसलिए यह बीना उपयोग किए पड़ी की पड़ी रह गई,,,,।
ऐसा बिल्कुल भी नहीं है मम्मी उपयोग करने के लिए अपने मन को मनाना पड़ता है अपने मन को मना लोगी तो अपने आप मौका निकल आएगा उपयोग करने के लिए,,,।
बात तो सही कह रहा है मैंने कभी अपने मन को मनाए ही नहीं लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि बहुत ही जल्दी इसका उपयोग होने वाला है नहीं तो सच में बिना उपयोग किया ही खराब हो जाएगी कोई काम के नहीं रह जाएगी,,,।
बहुत समझदार हो बहुत जल्दी समझ गई,,,,,(पेंटी को अच्छे से साबुन लगा लगा कर धोने के बाद उसे पास में पड़ी बाल्टी में रखते हुए वह बोला,,,, इस अद्भुत दो अर्थ वाली मदहोशी भरी वार्तालाप से मां बेटे दोनों की हालत खराब हो चुकी थी अंकित का लंड पूरे बहार में खिला हुआ था और सुगंधा की बुर उत्तेजना के मारे कचोरी की तरह फूल गई थी,,, जो कि इस समय अंकित को एकदम साफ दिखाई दे रही थी अंकित कोयह भी दिखाई दे रहा था कि उसकी मां की बुर पानी छोड़ रही थी और पानी से लबालब भरी हुई थी उसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था और वह अपने होंठ लगाकर अपनी मां के नमकीन रस को पी जाना चाहता था।वह अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां की कचोरी जैसी खुली हुई बुर में उसका मोटा तगड़ा मुसल जाएगा तो वाकई में उसकी मां की बुर फट जाएगी,,,, शायद इस बात को उसकी मां भी समझ रही थी दोनों की बातें बेहद मदहोशी भरी थी,,,।
पेटी को धो लेने के बाद,,, अंकित फिर से कपड़ों के देर में से अपनी मां की ब्रा निकाला जिसे वह देख लिया था और उसे धोने लगावह ब्रा को अच्छी तरह से जमीन पर फैला कर उसके दोनों कप को साबुन लगा लगाकर साफ कर रहा था और अपनी हथेली में उसे कब को दबोच भी ले रहा था ऐसा लग रहा था कि जैसे वह ब्रा नहीं बल्कि उसकी मां की चूची हो यह देखकर उसकी मां की बुर पानी छोड़ रही थी,,, उससे रहा नहीं गया और वह अपने बेटे की हरकत को देखकर बोली,,,,।
अरे उसके अंदर कुछ भी नहीं जो हथेली में लेकर दबा रहा है,,,,,(सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी कि उसके कहने का मतलब उसका बेटा अच्छी तरह से समझ जाएगा इसलिए उसकी बात सुनते ही अंकित अपनी नजर ऊपर उठाकर बोला,,,,)
मैं जानता हूं मम्मी की इसमें चुची नहीं है,,,(चुची शब्द अंकित एकदम से खुलकर बोल गया था,,, क्योंकि वह समझ गया था कि उसकी मां पूरी तरह से बेशर्म बन चुकी है,,,,) मैं तो बस अच्छी तरह से इसकी सफाई कर रहा हूं लेकिन मैंने कभी भी तुम्हें यह पहने हुए नहीं देखा,,,,.
अब क्या तुझे दिखा दिखा कर पहनूंगी,,,।
नहीं ऐसी बात नहीं है लेकिन फिर भी सूखे हुए कपड़ों में दिखाई देता है और इस पर मेरी नजर कभी नहीं पड़ी,,,।
बाप रे तो क्या तू सूखे हुए कपड़ों में यही सब ढूंढता रहता है,,,।
अरे मम्मी ऐसा नहीं है कपड़े सूखने के लिए पड़े रहते हैं और जब शाम को हमने कभी उतारने जाता हूं तो हर एक कपड़ा हाथ में आता है तो दिखाई तो देता है ना और इस तरह का कपड़ा कभी मेरे हाथ में नहीं आया,,,,।
बात तो तू सही कह रहा है ,,, ऐसे में पहनती नहीं हूं यह तो अलमारी में से निकली है इसलिए धोने के लिए रख दी,,,,।(कपड़े धोते हुए सुगंधा बोली,,,)
लेकिन मम्मी ब्रा बहुत खूबसूरत लग रही है,,, तुम्हारे ऊपर बहुत खूबसूरत लगेगी,,,,।
चल रहने दे इसका साइज छोटा है मुझे ठीक से हो नहीं पाएगी,,,।
तब तो और ज्यादा अच्छा लगेगा,,, क्योंकितुम्हारी उसकी साइज से कम साइज की ब्रा पहनोगी तो एकदम ज्यादा बड़ी लगेगी,,,, (मौके की नजाकत को समझते हुए अंकित अपनी बेशर्मी पर उतर आया था और उसे इस तरह की बातें करने में मजा भी आ रहा था उसकी मां उसके मुंह से इस तरह की बात सुनकर एकदम से सन्न रह गई थी,,, और अाश्चय्र से अपने बेटे की तरफ देखते हुए बोली,,,)
दैया रे दैया यह सब कहां से सीख गया तू किसका देख लिया,,,।
तुम्हारी अलमारी से जो किताब निकाली थी ना उसमें इस तरह का चित्र देखा था जिसमें उसे औरत ने काम साइज के ब्रा पहनी थी और उसकी दोनों गोलाई एकदम बड़ी-बड़ी लग रही थी। उसे देखकर मुझे लग रहा है कि तुम पर भी कम साइज की ब्रा अच्छी लगेगी,,,,।
बाप रे इतनी जल्दी तू यह सब सीख गया तुझे वह किताब पढ़ने के लिए देना ही नहीं चाहिए था,,,,पता नहीं उस किताब के जरिए तु क्या-क्या सीख जाएगा,,,,।
सच में मम्मी किताब की बड़ी दिलचस्प पढ़ने में तो मेरी हालत खराब हो गई थी,,,,,और वैसे भी ऐसा लग रहा था की पूरी किताब पढ़ लो तो जरूर कुछ ना कुछ सीख जाओगे,,,।
अच्छी बात बिल्कुल भी नहीं सीख पाएगा सब गंदी बातें ही सीखेगा उससे,,,।
हां यह बात तो है,,,, लेकिन तुम्हें पढ़ते समय कुछ अजीब सा नहीं लग रहा था बदन में कुछ सरसराहट,,,,।
अरे मैं बोली तो तेरे पापा लेकर आए थे मैं पढी नहीं हूं बस तेरे पापा की याद में उसे रखे रह गई।
अच्छा हुआ रखे रह गई वरना मुझे पता भी नहीं चलता कि इस तरह की भी किताबें मिलती हैं,,,।
चल अब रहने दे इस तरह की किताब खरीद कर मत लाना,,,।
मुझे क्या मालूम कहां मिलती है तुम्हें मालूम है कहां मिलती है,,,,।
मैं क्या जानू इस तरह की किताब कभी खरीदी हूं क्या,,,,!(इस तरह की बातें करते हुए सुगंधा कपड़ों को धो धो कर अपने हाथ में लेकर थोड़ा ऊपर उठा देती थी जिसकी वजह से पानी उसके ऊपर गिरने लगता था और धीरे-धीरे उसका ब्लाउज पूरी तरह से गिला होने लगा था जिसमें से उसके स्तन एकदम साफ दिखाई दे रहे थे,,,, जो की अंकित को भी नजर आ रहा था,,, लेकिन हैरान कर देने वाली बात यह थी कि सुगंधा ब्लाउज के अंदर ब्रा नहीं पहनी थी शायद यह कि उसकी कोई युक्ति थी जिस पर वह अमल कर रही थी और वहां युक्ति अब काम आ रही थी क्योंकि धीरे-धीरे उसकीच ब्लाउज के जिला हो जाने की वजह से पूरी तरह से उभर कर नजर आने लगी थी जिसे अंकित प्यासी नजरों से देख रहा था क्योंकि मदहोश कर देने वाली बातों से उसकी चूची के खजूर कड़क हो चुके थे और भाले की नौक की तरह ब्लाउज के बाहर आने के लिए आतुर नजर आ रहे थे। अंकित अपनी मां की बड़ी-बड़ी चूचियों को देखकर पागल हुआ जा रहा था कपड़े धोने की वजह से ब्लाउज में कैद उसके दोनों कबूतर फड़फड़ा कर बाहर आने के लिए मचल रहे थे।
अब कपड़े धोते हुए अंकित अपनी मां की चूचियों की तरफ देख रहा था क्योंकि वह बेहद लुभावनी और अपनी तरफ आकर्षित कर देने वाली लग रही थीअंकित का मन कर रहा था किसी समय आगे बढ़कर ब्लाउज के ऊपर से अपनी मां के दोनों चूचियों को अपने हथेली में भर ले उसे जोर-जोर से दबाकर उनका रस मुंह में डालकर पी जाए,,,, और शायद यह संभावित अगर वह थोड़ी और हिम्मत दिखाता तो लेकिन इससे ज्यादा हिम्मत दिखाने से न जाने क्यों वह घबरा रहा था। सुगंध को भी मालूम था कि उसका बेटा उसकी चूचियों की तरफ देख रहा है जिसका ऊपरवाला बटन पहले से ही वह खोल रखी थी जिसकी बदौलतबड़ी-बड़ी चूचियों की बीच की पतली दरार एकदम साफ दिखाई दे रही थी और इस दरार की गहराई में अंकित अपनी आपको डुबो देना चाहता था। कुछ देर के लिए फिर से मां बेटे के बीच खामोशी छा गई और वह दोनों अपने आप को कपड़े धोने में व्यस्त होने का दिखावा कर रहे थे ,,, लेकिन तिरछी नजर से एक दूसरे को देख रहे थे अंकित की आंखों के सामने उसकी मां का खूबसूरत अंग पूरी तरह से उजागर और वह भी एक साथ दो दो टांगों के बीचउसकी पतली दरार साड़ियों के अंदर से एकदम साफ दिखाई दे रही थी और ब्लाउज के अंदर उसकी दोनों चूचियां गीली हो जाने की वजह से अपनी आभा को भी कह रही थी यह सब अंकित की उत्तेजना को अत्यधिक बढ़ा रहे थे वह इतना ज्यादा उत्तेजित हुआ जा रहा था कि उसे लग रहा था कि उसके लंड की नस कहीं फट ना जाए,,, मां बेटे दोनों पागल हुए जा रहे थे,,,, सुगंधा की आंखें तब फटी के फटी रह गई जबअंकित भी अपनी मां की तरह हरकत करते हो अपने दोनों टांगों को खोल दिया और उसके पेट में उसके लंड का आकार पूरी तरह सेउभरने लगा भले ही वह पूरी तरह से नंगा नहीं दिखाई दे रहा था लेकिन उसका लंड खड़ा होने की वजह से पेट के ऊपर अपनी आभा भी कह रहा था अपने होने का एहसास दिला रहा था जिसे देखकर सुगंधा की बुर उत्तेजना के मारे फुले ने पिचकने लगी थी। यह अद्भुत नजारा वाकई में सुगंधा के लिए सब्र का बांध तोड़ देने वाला लग रहा था उसका मन बेहद आतुर था अपने बेटे के लंड को नंगा देखने के लिए वह अपने बेटे के लंड को पकड़ना चाहती थी उसकी गर्मी को महसूस करना चाहती थी,,,, लेकिन कैसे उसे समझ में नहीं आ रहा था क्योंकि इतना कुछदोनों के बीच हो रहा था और जिसमें वह खुद अग्रसर थी अपना अंग दिखाने में कोई कसर बाकी नहीं रख रही थी लेकिन फिर भी एक मां के चरित्र से वह बाहर नहीं आ पा रही थी इस बात का गुस्सा उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।
मां बेटे दोनों बेकाबू हुए जा रहे थे।लेकिन पहल करने से डर रहे थे सब कुछ उनकी आंखों के सामने था वह दोनों इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि उन दोनों के द्वारा एक कदम आगे बढ़ने का मतलब था की जन्नत का मजा लूटना वह सुख भोगने जिसके लिए दोनों ललाईत थे,,,,और उसे सुख से दोनों एक कदम पीछे थे बस एक कदम बढ़ाने की देरी थी उनके हाथ में वह सारा सुख होता जो एक मर्द और औरत अपनी सहमति से प्राप्त करते हैं,,,धीरे-धीरे मां बेटे दोनों अपने हिस्से के कपड़े को धो चुके थे और उसे साफ पानी में धोकर एक बाल्टी में रख रहे थे,,, लेकिन अंकितउसे धुले हुए कपड़े को अपने कंधे पर रख दे रहा था क्योंकि वह भी भीगना चाहता था और आज वह अपनी मां के साथ नहाने का आनंद लेना चाहता था अपने मुंह से तो वह कुछ बोल नहीं पाया था लेकिन इशारे ही इशारे में अपनी मां को बता देना चाहता था कि वह उसके साथ नहाना चाहता है,,, शायद उसकी मां उसके इशारे को समझ गई थी इसलिए वह बोली,,,।
अंकित तू भी गीला हो गया है एक काम करना तू भी नहा लेना और वैसे भी काम करके थक गया होगा नहा लगा तो थोड़ा तरो ताजा हो जाएगा,,, हल्का महसूस करने लगेगा,,,।
ठीक है मम्मी मैं भी नहा लूंगा,,(इस बात को बोलकर वह अपने मन में सोचने लगा कि एक हल्के से ही सारे को उसकी मां समझ गई थी लेकिनजो इशारा वह बेहद गहराई से कर रहा था उसे समझ नहीं पा रही थी या ना समझने का सिर्फ नाटक कर रहे थे उसके सारे को समझ जाती तो इसी समय दोनों टांगें फैला कर उसकी बुर में अपना लंड डाल देता, देखते ही देखते मां बेटे दोनों कपड़ों को धोकर एक बाल्टी में रख चुके थे कपड़ों की सफाई हो चुकी थी,,,, और सुगंधा अपनी जगह से धीरे से उठकर खड़ी होने लगीऔर कड़ी होते समय वह थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गई जिससे उसकी ब्लाउज में कैद दोनों चूचियां एकदम साफ नजर आने लगी अंकित फटी आंखों से अपनी मां की चूचियों को देख रहा था और यही तो सुगंधा दिखाना चाहती थी,, वह धीरे से अपनी जवानी का जलवा बिखेर कर खड़ी होते हुए बोली।)
एक काम कर अंकित जाकर तू छत पर कपड़े सूखने के लिए डाल दे अभी कड़ी धूप है जल्दी सूख जाएंगे,,,,।
ठीक है मम्मी मैं सारे कपड़े छत पर डाल देता हूं,,,,(इतना कहकर वह अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया लेकिन वह जानता था कि उसके साथ-साथ उसका लंड भी खड़ा हो जाएगा जो कि पहले से ही खड़ा था और वह अपने पेंट में बने तंबू को छुपाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं किया जिस पर उसकी मां की नजर एकदम साफ तौर पर पड़ रही थी जिसे देखकरसुगंधा की बुर पानी छोड़ रही थी वह इस कदर बहाल हुई जा रही थी कि उसका मन कर रहा था कि अपनी बुर में अपनी उंगली डालकर अपनी प्यास को बुझा ले,,,, लेकिन जैसे तैसे करके वह अपने आप पर बड़ी मुश्किल से काबू कर पाई थी और अंकित भी उसके मन में क्या चल रहा है यह सब अपनी मां के सामने दर्शाकर छत की तरफ चल दिया,,, छत पर पहुंचकर वह बाल्टी में से एक कपड़े लेकर उसे रस्सी पर टांगने लगा और अपनी मां के बारे में सोचने लगा वह अपने मन में ही बोला की मां कितनी छिनार हैवह अपनी बुर में लंड लेना चाहती है लेकिन अपने मुंह से बोल नहीं पा रही है कैसे बहाना कर करके अपनी बुर अपनी चूची दिखा रही है,,,, लेकिन फिर अपने आप पर ही गुस्सा दिखाते हुए वह बोला,,,।
साला मैं ही चुतीया हूं वह इतना इशारा कर रही है आगे बढ़ने के लिएलेकिन मैं ही हूं की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा हूं वह तो चाहती है कि मैं उसे चोदु अपने लंड को उसकी बुर में डालु,,,, लेकिन नहीं कुछ कर नहीं पा रहा हूंएक औरत भला अपने मुंह से कैसे रहेगी कि वह चुदवाना चाहती है वह तो ईसारे से ही सब कुछ बताएगी ना,,,,, उसकी मां दूसरी औरतों की तरह तो है नहीं की सीधा जाकर मेरा लंड पकड़ लेगी और अपनी साड़ी उठाकर अपनी बर पर सटा लेगी,,,,क्योंकि वह संस्कारी और मर्यादा में रहने वाली औरत है वह तो कुछ महीनो से उसका मन भटक गया है और उसी का तो फायदा उठाना है वरना वह भी सुमन की मां की तरह होती तो शायद अब तक ना जाने कितनों से चुदवा चुकी होती,,,क्योंकि मुझे नहीं मालूम था कि वह इतनी जल्दी तैयार हो जाएगी पहली बारी में ही अपनी टांगें खोल दी मेरे लिए कास उसकी मां भी ऐसी होती तो मजा आ जाता,,, ऐसा कहते हुए वह एक-एक कपड़े रस्सी पर टांग रहा था और तभी उसके हाथ में उसकी मां की पेंटि आ गई जिसे वह अपने हाथ में लेकर पूरी तरह से मदहोश हो गया,,,, और इस दोनों हाथों में लेकर उसे अपनी नाक पर रखकर जोर से सांस खींचने लगा जैसे की अपनी ही मा की बुर सुंघ रहा हो,,,, अंकित पूरी तरह से मस्त हो चुका था और वह अपने मन में सोचने लगा कि अगर वह कुछ नहीं किया तो कहीं ऐसा ना हो कि कोई और मम्मी की चुदाई करने लगे क्योंकि वह जानता था किराहुल जैसे लड़कों की कमी नहीं थी जो खुद की मां को चोद सकते हैं तो दूसरे की मां चोदने में उन्हें कौन सा समय लगेगा,,,, यही सोच कर वह पेंटी को भी रस्सी के ऊपर डाल दिया और बाल्टी लेकर नीचे आ गया,,,, और बाती लेकर घर के पीछे की तरफ जाने लगा जहां उसकी मां नानी की तैयारी कर रही थी लेकिन जैसे ही उसकी नजर अपनी मां पर पड़ी वह फटी आंखों से अपनी मां को देखता ही रह गया।
अंकित कपड़े डालने के लिए छत पर चला गया था,,, और वहां पर अपनी मां के बारे में अपने मन में ही विचार विमर्श कर रहा था उसे इतना तो समझ में आ गया था कि उसकी मां उससे क्या चाहती है बस दोनों आगे बढ़ने से अपने आप को रोक रहे थे,,, हालांकि दोनों ही आगे बढ़ना चाहते थे बस दोनों के बीच मां बेटे की जो दीवार थी यह रिश्ते की दीवार दोनों चाह कर भी गिरा पाने में असमर्थ हो जा रहे थे।और यही उनकी सबसे बड़ी समस्या अभी बन चुकी थी क्योंकि दोनों के बीच बहुत कुछ घट रहा था मां बेटे के रिश्ते के बीच जो एक पवित्र रिश्ता होता हैघर में काम करते समय एक दूसरे से बातें करते समय लगता ही नहीं था कि जैसे दोनों मां बेटे हो ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई आपस में गहरे दोस्त हो,,,, छत पर कपड़े डाल लेने के बाद बाल्टी हाथ में लेकर अंकित नीचे उतर आया था और जैसे ही घर के पिछले हिस्से की ओर आगे बढ़ा तो अंदर की तरफ अपनी मां को देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गई वह मंत्र मुग्ध सा अपनी मां को देखता ही रह गया,,,,।
कुछ देर पहले जिस अवस्था में वह अपनी मां को छोड़कर गया था वापस आने पर उसकी मां उस स्थिति में बिल्कुल भी नहीं थी,, अंकित की आंखों के सामने उसकी मां बेहद कामुक अवस्था में खड़ी थी इस अवस्था में उसे जो कोई भी देख लेता तो शायद बिना कहे उसके लंड से पानी फेंक देता,,,, ऐसी स्थिति में सुगंधा को देखने का मतलब था कि अपने लंड की हालत खराब कर लेना,,, इस हालत में एक औरत को देखकर कुछ भी करने को तैयार हो जाना,,, इस तरह की स्थिति में अपनी मां को देखकर वाकई में अंकित की हालत खराब हो गई थी उसकी आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गई थी मुंह खुला रह गया था और सांसों की गति मानो थम सी गई थी अपनी मां के रूप यौवन को देखकर अंकित को अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था,,,, वाकई में रूप भी ऐसा थाअदाएं भी ऐसी थी कि देखने वाला देखता ही रह जाए इसमें अंकित की कोई गलती नहीं थी दरअसल सुगंधा ने अपने वस्त्र उतार कर रूप ही एसा धारण कर ली थी कि देखने वाला मंत्र मुग्ध हो जाए पूरी तरह से मदहोश हो जाए बिना पिए ही कर बोतलों का नशा उसकी आंखों में उतर आए,,,,इसीलिए तो हाथ में बाल्टी लिए हुए अंकित सब कुछ भूल कर अपनी मां को ही देख रहा था और वह भी प्यासी और वासना भरी नजरों से क्योंकि इस तरह का नजारा कोई प्यार भरी नजर से देख ही नहीं सकता,,,आंखों के सामने जब एक जवानी से भरी हुई औरत अर्धनग्न अवस्था में खड़ी हो उसका हर एक अंग एक अद्भुत उभार लिए हुए हो,,, जिसे देखकर मन में उमंग जाग जाती हो तो भला इस तरह के नजारे को कोई प्यार भरी नजर से कैसे देख सकते हैं इस तरह के नजारे को देखते हैं आंखों में वासना और हवस जागना निश्चित ही है।
यही हाल अंकित का भी था,,,,अंकित के छत पर जाते ही सुगंधा के मन में ढेर सारी बातें चल रही थी वह आगे की युक्ति अपने मन में बना रही थी और एक मर्द को अपने जवानी के मोह पास में कैसे बांधना है यह कला शायद हर एक औरत को आती ही है इस कला में हर एक औरत पारंगत होती ही है जिसमें सुगंधा भी बिल्कुल परे नहीं थी,,,, वह पूरी तरह से अपने बेटे को अपनी जवानी के जाल में फंसा लेना चाहती थी,, इसलिए वह अंकित के छत पर जाते ही अपनी साड़ी उतार कर एक तरफ रख दी और अपने ब्लाउज का बटन खोलकर जल्दी से अपना ब्लाउज अपनी बाहों में से निकाल कर उसे भी अलग कर दी,,, ब्रा उसने पहनी नहीं थी इसलिए ब्लाउज उसके उतरते ही उसके दोनों कबूतर फड़फड़ाने लगे,,, अपनी नंगी चूचियों की तरफ बहार प्यार भरी नजर से देखकर से दोनों हाथों में भर ली और उसे हल्के से दवाई उसके मुंह से हल्की सी कराह निकल गईऔर अपने मन में सोचने लगी कि जिस दिन यह चूचियां उसके बेटे की मजबूत हथेलियां में आएंगे तो वह दबा दबा कर इनका रस निचोड़ डालेगा,,,, अपने मन में ऐसा सोचकर वह उत्तेजना से गदगद होने लगी,,, और फिर अपनी दोनों चूचियों को अपनी दोनों हथेलियां से आजाद कर कर वह अपने पेटिकोट की डोरी खोलने लगी,,,, उसका दिल जोरो से धड़क रहा था,,,सुबह में ही वह अपने बेटे को याद कर उत्तेजना के मारे पेटिकोट की डोरी को कुछ ज्यादा ही जोर से गीठान मार दी थीजिससे इस समय उसे खोलने में थोड़ी परेशानी आ रही थी लेकिन फिर भी जैसे तैसे करके वह अपने पेटिकोट की गिठान को खोल दी थी,,,, पेटिकोट की डोरी को खोलते समय उसके मन में ढेर सारी बातें चल रही थी वह क्या करना है क्या नहीं करना है इस बारे में निर्णय नहीं ले पा रही थी हमें कैसे मालूम ही था कि उसे क्या करना है लेकिन फिर भी वह थोड़ा हिचकिचा रही थी,,,।
पेटिकोट की डोरी खोलते हुए वह अपने मन में सोच रही थी कि,,, पेटिकोट उतारकर नंगी हो जाए तो मजा आ जाता,,, अंकित जब नीचे आएगा तो उसे देखेगा तो पागल हो जाएगा उसे पूरी तरह से नंगी देखकर जरूर कुछ ना कुछ करेगा लेकिन फिर अपने ही फैसले पर वह थोड़ा सोच विचारने लगीतो वह अपने आप से ही बोली नहीं इस तरह से अपने बेटे से एकदम से खुलकर सामने आ जाने का मतलब था कि उसका बेटा उसके बारे में कुछ गलत समझेगा उसे लगने लगेगा कि उसकी मां दूसरी औरतों की तरह गंदी है और शायद इस बारे में भी शंका करने लगेगा कि,,,,हो सकता है बाहर दूसरों के साथ उसके संबंध भी हो अगर इस तरह का उसके बारे में सोचने लगा तब वह तो अपने आप की नजरों में ही गिर जाएगीनहीं नहीं ऐसा नहीं होगा जैसा चल रहा है वैसे ही चलने देगी धीरे-धीरे इस खेल में आगे बढ़ेगी,,,, और यह सोचते हुए वह पेटिकोट की डोरी को ढीली करके दोनों हाथों की उंगलियों का सहारा लेकर कमर पर कसी हुई पेटीकोट को एकदम से ढीली कर दी,,,और पूरी तरह से पेटीकोट को उतार कर नंगी हो जाने के अपने ही निर्णय को स्थगित करते हुए पेटिकोट को दोनों हाथों से पकड़ कर ऊपर की तरफ ले गई और अपनी नंगी चूची यो तक लाकर उसकी डोरी को अपनी दोनों चूचियों के बीच बांधकर गिठान लगा दी,,,, सुगंधापेटिकोट की डोरी को नापतोल कर अपनी छाती से बंधी थी वह अपनी दोनों चूचियों के आदि हिस्से पर पेटीकोट कोलाकर बांध दी थी जिससे उसकी आधे से ज्यादा चूचियां एकदम साफ नजर आ रही थी और पेटीकोट के बीच का जो कटा हुआ हिस्सा था वह उसकी दोनों चूचियों के बीच आता था जिससे उसकी दोनों चूचियों की गोलाई एक तरफ से एकदम साफ दिखाई देती थी,,,जिस पर एक नजर डालकर वह पूरी तरह से संतुष्ट हो चुकी थी कि उसका बेटा अगर देखेगा तो दोनों चूचियों के बीच वाला हिस्सा उसे साफ तौर पर दिखाई देगा,,,,
इस तरह से वह अर्धनग्न अवस्था मेंआकर पूरी तरह से तैयार हो चुकी थी अपने बेटे पर अपनी जवानी का जलवा बिखरने के लिए और इस पर सोने पर सुहागा यह था कि उसने जल्दी-जल्दीदो मग पानी अपने ऊपर डाल चुके थे जिससे अपनी पकड़ उसका पेटिकोट उसके बदन से एकदम से चिपक गया था जिससे उसकी दोनों चूचियां एकदम साफ तौर पर झलक रही थी,,,, अपने इस रूप यौवन से सुगंधा पूरी तरह से संतुष्ट थी,,, अपने बदन को भिगोकरअपनी नजर को अपने पैरों से लेकर के ऊपर तक घूम कर देख रही थी अपने खूबसूरत अंगों को देख रही थी जो की देखने की वजह से पेटीकोट में होने के बावजूद भी एकदम साफ तौर पर दिखाई दे रहे थे,,,, उसे अपनी चुचियों का वह छोटा सा चॉकलेट जैसा छुहारा एकदम साफ दिखाई दे रहा था जो की गीली पेटीकोट में एकदम से ऊपस गया था,,, और उत्तेजना के मारे किसी भाले की नौक की तरह नजर आ रहा था। और अपनी कड़ी हो चुकी निप्पल का जायजा लेने के लिए वह अपने दोनों हाथ से दोनों चूचियों की निप्पल को पेटिकोट के ऊपर से ही दोनों हाथों की उंगलियों और अंगूठे के बीच लेकर उसे मसलते हुए देख रही थी और उसे थोड़ा सा औरकड़क करने की कोशिश कर रही थी ताकि उसके बेटे की नजर उसे पर बढ़िया आराम से पढ़ सके और वह अपनी मां की जवानी को देखकर पानी पानी हो जाए,,,, अपने हाथों की हरकत से वाकई में उसकी चूची की निप्पल और ज्यादा कड़क हो गई जोकि पेटिकोट के मोटे कपड़े में से एकदम साफ दिखाई दे रही थी, अपने आप को देखकर सुगंधा पूरी तरह से संतुष्ट हो चुकी थी,,,वह जानती थी कि उसका बेटा उसके रूप को देखकर उसके खूबसूरत दन को देखकर पूरी तरह से पागल हो जाएगा,,।
और वाकई में उसका सोचना ठीक भी था अंकित को नहीं मालूम था की छत परजाने और आने घर में उसकी मां का रूप इस कदर बदल जाएगा वैसे तो उसके लिए मां का रूप हर हाल में बेहद कामुक और खूबसूरत होता है लेकिन इस समय बात कुछ और ही थी,,,, अंकित को तुरंतउसके दोस्त के द्वारा दिखाई गई गंदी किताब का वह चित्र याद आ गया जिसमें एक औरत सावर के नीचे खड़ी थी और वह भी बिना कपड़ों के एकदम नंगी उसका बदन भी उसकी मां की तरह ही गदराया हुआ था,,, देखने में भीवह उसकी मां की तरह ही दिखाई दे रही थी उसे समय भी उसे चित्र को देखते हुए अंकित कुछ देर तक इस पन्ने पर ठहर गया था और आज इस अवस्था में अपनी मां को देखकर उसे गंदी किताब का वह चित्र याद आ गया था,,, दोनों में पूरी तरह से साम्यता नजर आ रही थी,,, बस कुछ चीज बदली हुई थी वह बाथरूम के अंदर थी और इस समय उसकी मां घर के पीछे जो की बाथरूम जैसा ही था लेकिन खुला हुआ था उसमें दरवाजा नहीं था और वह बिना कपड़ों की थी एकदम नंगी और इसमें उसकी मां के बदन पर केवल एक पेटिकोट ही था और वह भी पानी से भीगा हुआ। इस खूबसूरत नजारे को देखकर अंकित पूरी तरह से भौंचक्का हो गया था,,,, बहुत प्यासी नजरों से अपनी मां को देख रहा था और एकदम खामोश हो गया था ताकि उसकी मां को उसके आने की भनक तक ना लगे।
लेकिन ऐसा सोचना अंकित का था उसकी मां को सीडीओ से उतरते हुए उसके आने की आहट का एहसास हो गया था और वह तुरंत दीवार की तरफ मुंह करके खड़ी हो गई थी और नहा रही थी,,, इस समय अंकित के सामने उसकी मां की गांड थी और वह आधी दिखाई दे रही थी,,, और वह भी सुगंधा जानबूझकर अपने बेटे की आहट पाते हीअपनी पेटीकोट को हल्का सा अपनी गांड के आधे भाग तक उठा दी थी ताकि उसकी आधी गांड उसका बेटा बड़े आराम से देख सके,,,, और उसकी सारी युक्ति काम कर रही थी अंकित तो अपनी मां की मद-मस्त कर देने वाली गांड को देखता ही रह गया था। जो पानी में भीगने की वजह से और भी ज्यादा नशीली लग रही थी,,,बार-बार अपने ऊपर पानी डालने की वजह से पेटिकोट फूटी तरह से उसकी कमर के ऊपर हिस्से से चिपक गई थी जिससे उसकी मां का यह रूप और भी ज्यादा मादकता लिए हुए दिखाई दे रहा था,,,, गोरी गोरी बड़ी बड़ी गांड की फांक के बीच से गिरता हुआ पानी,,,ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी झरने से पानी गिर रहा हो अंकित का तो मन कर रहा था कि अपनी मां की गांड के नीचे बैठकर अपने होंठों को खोलकर गिरने वाले पानी को पीकर अपनी प्यास बुझाने लेकिन वह जानता था कि,,,, इस तरह से उसकी प्यास बुझने वाली नहीं है इस तरह से तो उसकी प्यास और भी ज्यादा भड़क जाएगी,,,।अंकित की हालात पूरी तरह से खराब हो रही थी उसे ऐसा लग रहा था कि उसकी मां को उसके आने के एहसास तक नहीं है लेकिन उसकी मां को सब मालूम था कि ठीक उसके पीछे खड़े होकर उसका बेटा उसके खूबसूरत गदराई जवानी के रस को अपनी आंखों से पी रहा है।
इस खूबसूरत मादकता से छलकते हुए नजारे को देखकर अंकित पेट के ऊपर से ही अपना लंड को दबा रहा था वह अपनी उत्तेजना पर काबू नहीं कर पा रहा था,,, इतना तो वह अपनी मां को देखकर ही समझ गया था कि उसकी मां अपनी साड़ीऔर ब्लाउज को उतार फेंकी थी पेंटी तो वह घर के अंदर ही ना जाने कब उतार दी थी उसे मालूम ही नहीं पड़ा था और उसने आज ब्रा पहनी ही नहीं थी,,,,और किस तरह से भीगे हुए पेटीकोट में उसकी मां का अंग झलक रहा था उसे देखकर अंकित अपने मन में ही बोल रहा था कि इससे अच्छा तो पेटीकोट भी उतार देती तो मजा आ जाता और वैसे भी पेटिकोट बदन पर डाले रहने का कोई मतलब नहीं है सब कुछ तो दिखाई दे रहा है,,,,अंकित को साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी मां अपनी पेटीकोट को अपनी छाती तक लाकर बांध दी थी और उसका पेटिकोट उसकी कमर के नीचे तक ही पहुंच रहा था पानी में भीगने की वजह से वह पूरी तरह से उसके बदन से चिपक गया था अगर वह सुख होता तो शायद उसकी बड़ी-बड़ी नंगी गांड पेटिकोट के परदे में छुप जाती लेकिन होने की वजह सेसब कुछ दिखाई दे रहा था पेटिकोट का आकार भी छोटा पड़ गया था उसकी मां की बड़ी-बड़ी गांड को ढकने में,,,, ललचाई आंखों से अपनी मां की तरफ देख कर अंकित की हालत खराब हो रही थी और वह अपने मन में सोच रहा था कि,,,, अब वह क्या करेंयह तो किसी भी औरत की तरफ से एक जवान लड़के के लिए खुला आमंत्रण है क्योंकि अगर इस तरह का आमंत्रण एक औरत अपनी तरफ से ना दे तो वह इस तरह से अर्ध नग्न अवस्था में कभी नहीं नहाएगी,,,।एक औरत एक जवान मर्द के सामने इस अवस्था में तभी आती है जब उसे उसे मर्द से कुछ लाभ मिलता हो,,,,।
और एक मां तो कभी भी इस तरह की हरकत अपनी बेटी के सामने बिल्कुल भी नहीं करेगी खासतौर पर तब जब उसका बेटा पूरी तरह से जवान हो चुका होउसका लंड बार-बार खड़ा हो जाता हो और उसका लंड पूरी तरह से सक्षम हो किसी भी औरत की प्यास बुझाने में,,,, इतना तो समझ ही गया थाअंकित की उसकी मां यह सब हरकत अनजाने में नहीं बल्कि जानबूझकर कर रही है जो कुछ भी वह उसे दिखाना चाह रही है। वह उसे खुलकर दिख रही है यह एक तरह से उसकी तरफ से इशारा है जो कि वह समझ भी रहा है लेकिन आगे बढ़ने से घबरा रहा है,,,, अपनी मां की नंगी गांड देखकर वह बार-बार पेट के ऊपर से ही अपने लंड को मसल रहा था दबा रहा था,,, और सुगंधा बार-बार पानी अपने ऊपर डाल रही थी।तभी उसकी मां जानबूझकर अपने दोनों हाथ को पीछे की तरफ लाकर अपनी गांड की दोनों आंखों पर अपनी हथेली रखकर उसे सहलाते हुए गांड को मलने का नाटक करने लगीऔर यह देखकर उत्तेजना बस अंकित की हालत और ज्यादा खराब हो गई और उसके हाथों से बाल्टी छूट गई,,,,बाल्टी की आवाज सुनकर सुगंधा के तन-बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी क्योंकि यही सही मौका था अपने बेटे की तरफ घूमने का और वह एकदम से अपने बेटे की तरफ घूमते हुए बोली,,,।
तू कपड़े डाल कर आ गया अंकित,,,,(इतना कहते ही वह अपने बेटे की तरफ घूम गई और इस ओर से अपनी मां का रूप उसकी मदमस्त जवानी देखकर अंकित की हालत फिर से खराब हो गई,,,
