आपने मेरी पिछली सहेली की चुदाई की कहानी में पढ़ा, की हम पति पत्नी दो दिन के लिए हिल स्टेशन घूमने गए. जहा उनके दोस्त डीपू अपनी बीवी पायल के साथ आये थे.
इन दो दिनों में मैंने डीपू के साथ कई बार असुरक्षित चुदाई करवाई और मेरे सर पर गर्भवती होने का भय मंडरा रहा था.
उस बात को अब एक सप्ताह हो चूका था और अभी भी मेरे संभावित पीरियड आने में दो सप्ताह बाकी थे, जो कि मेरा भविष्य तय करने वाले थे.
मैं इस बीच प्रार्थना के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी. सासुजी अभी भी हमारे साथ ही थे और दो दिन बाद अपने घर लौटने वाले थे.
रविवार की सुबह थी, छुट्टी का वो दिन जब देर तक सोने को मिलता हैं. 9 बज चुके थे और मैंने उठने का फैसला किया. बच्चा और पति अभी भी सो रहे थे. मैंने उठ कर नित्य कर्म करके रोजमर्रा सफाई में जुट गयी.
अब बच्चा उठ चुका था, तो मैंने सबके लिए नाश्ता तैयार कर दिया. दस बज चुके थे और बाजार के कुछ काम निपटाने थे, तो मैं नहाने चली गयी. पति अभी भी सो रहे थे, देर रात तीन बजे तक मैच देख रहे थे तो उनको उठाना ठीक नहीं समझा.
वैसे भी जब से हिल स्टेशन से हम लौटे थे, वो मुझे अवॉयड कर रहे थे. शायद मेरी आँखों के सामने जिस तरह उन्होंने पायल के साथ जो कुछ किया था, उस वजह से नज़रे नहीं मिला पा रहे थे.
डीपू को तो मैं पायल के पास लाने में कामयाब हो गयी थी, पर मेरा खुद का पति मुझसे जैसे दूर हो गया था.
मैं अकेले ही बाहर जाने को तैयार हो गई. जाते हुए टीवी देख रहे सासुजी को बोल दिया कि पति उठ जाए तो बता देना नाश्ता रखा हैं खा ले, मैं दो घंटे में वापिस आ जाउंगी.
मैंने अपनी स्कूटी निकाली और बाजार की तरफ चल पड़ी. महिलाए स्वतंत्र हो तो अच्छा हैं किसी पर छोटे मोटे कामो के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ता.
छुट्टी के दिन शायद सब लोग ज्यादा ही आलसी हो जाते हैं, सड़के लगभग खाली थी और बाजार में भी भीड़ नहीं थी.
घंटे भर में ही मैं सारे काम निपटा चुकी थी. वापिस घर निकलने के लिए फिर से स्कूटी के पास आयी, तभी ख्याल आया मैं जिस इलाके में हूँ वही पास में मेरी कॉलेज की सहेली मैना का फ्लैट हैं. महीने भर से ज्यादा हो गया था उससे मिले और बात किये.
अपना फ़ोन निकाला उसको फ़ोन करके पूछने के लिए और फिर यह सोच कर रख दिया की सीधा घर पहुंच कर ही उसको सरप्राइज देती हूँ, वो बहुत खुश हो जाएगी. मैं स्कूटी लेकर उसके घर की तरफ निकल पड़ी.
साल भर पहले की ही बात थी जब वो इस नए फ्लैट में शिफ्ट हुई थी. आये दिन उसकी ससुराल वालों से झड़प हो जाती थी, इसलिए वो अपने पति के साथ इस फ्लैट में अलग रहने आयी थी.
अब उसके फ्लैट की बिल्डिंग सामने ही नज़र आ रही थी, कि तभी अचानक से तेज बारिश शुरू हो गयी. बादल तो सुबह से ही छा रहे थे, पर अचानक तेज बारिश की उम्मीद नहीं थी.
मैं कुछ बचाव कर पाती उससे पहले ही अगले कुछ सेकंड में मैं पूरी भीग चुकी थी.
उसकी बिल्डिंग के अहाते में पहुंच कर वहां स्कूटी पार्क करते ही बारिश धीमी पढ़ गयी, जैसे सिर्फ मुझे भिगोने ही आयी थी.
मेरा सफ़ेद कुर्ता भीग कर मेरे शरीर से चिपक चूका था और अंदर से मेरा ब्रा साफ़ दिखाई दे रहा था. ऊपर से मैंने आज दुपट्टा भी नहीं डाला था, जिसका की आजकल फैशन ही नहीं हैं पर आज बड़ी जरुरत थी.
एक बार सोचा इस हालत में उसके घर कैसे जाऊ, वापिस अपने घर चली जाती हूँ. फिर सोचा इस हालत में आधा घंटा गाडी चलाना भी ठीक नहीं. मैना से उसके कपडे लेकर एक बार बदल लुंगी.
बिल्डिंग का वॉचमन अपने रजिस्टर में मेरी एंट्री करने लगा, बीच-बीच में वो मुझे घूर रहा था. क्योकि मेरे कपडे भीग कर मेरे बदन से चिपके हुए थे. मुझे उस पर बड़ा गुस्सा आया, ऐसे लोग औरतो की इज्जत नहीं करते और गलत नजरो से देखते हैं.
उसे थप्पड़ मारने की इच्छा हुई, पर अपने आप को नियंत्रित किया. मैं अब लिफ्ट की तरफ बढ़ी और दूसरे माले पर पहुंची जहा मैना का फ्लैट था. डोरबेल बजायी, घंटी पूरी बजी भी नहीं थी की दरवाज़ा खुल गया और उसकी छोटी बच्ची बाहर निकली.
मैं उससे कुछ कहती उससे पहले ही वह भाग कर सीढ़ियों से ऊपर के माले पे चली गयी, उसके हाथ में खिलोने भी थे. शायद छुट्टी के दिन अपने पड़ोस की सहेली के यहाँ जा रही थी. अब दरवाज़ा खुला था तो मैं अंदर चली गयी, दरवाज़ा बंद कर दिया.
अंदर कोई दिखाई नहीं दे रहा था. सामने रसोईघर भी खाली था. मैंने उसको आवाज़ लगाई. दूसरी आवाज़ देने ही वाली थी कि उसके पति संजीव बैडरूम से बाहर आये और मुस्करा कर अभिवादन किया. मैंने भी मुस्करा कर जवाब दिया.
मुझे इस भीगी हालत में देख कर चिंतित हुए और कहाँ “शायद बारिश बहुत जोर की हुई हैं”.
मैंने हां में सर हिला दिया. मुझे अब थोड़ी ठंड लगने लगी थी. मैंने हल्का ठिठुरते हुए पूछा “मैना कहा हैं”
उन्होंने जवाब दिया वो “घर पर नहीं हैं.” और मैं अवाक रह गयी.
काश सरप्राइज को छोड़ कर फ़ोन ही कर दिया होता आने से पहले. पर अब क्या हो सकता था, मैं फंस चुकी थी. मैंने अगला सवाल दागा, “वो कहा गई और कितने देर में आ जाएगी?”
उन्होंने कहाँ “सब इत्मीनान से बताता हूँ, पहले आप कपडे बदल लीजिये.”
मैंने ना मैं सर हिला दिया, उनसे कैसे कहु की मुझे कपडे बदलने हैं. मैं उनसे इजाजत लेकर वापिस जाने लगी तो उन्होंने मुझे रोका. “इस तरह आप बाहर ना जाये, सर्दी लग सकती हैं”.
बैडरूम की ओर इशारा करते हुए कहा कि वहाँ उस अलमारी में मैना के कपडे पड़े हैं, उनमे से कुछ पहन लू. वो मेरे कपडे ड्रायर में डाल कर सूखा लेंगे और वापिस पहनने को दे देंगे.
मैं भी यही चाहती थी पर थोड़ा हिचकिचाई. उन्होंने मुझे आश्वश्त किया की यही ठीक हैं और ज्यादा समय नहीं लगेगा. मैंने अपने सैंडल उतारे और स्टैंड पर रख दिए.
लिविंग रूम में कारपेट बिछा था. अब मैं बैडरूम की तरफ जाने लगी जहा कारपेट नहीं था. जैसे ही चिकने फर्श पर गीले पैर पड़े मैं फिसल कर बैठ गयी. मुझे बहुत शर्म आयी और तुरंत उठ कर खड़ी हो हुई.
उन्होने मुझे ध्यान से चलने के लिए कहाँ. मैं बिना पीछे मुड़े बैडरूम में प्रवेश कर गयी और तेजी से सामने रखी अलमारी की तरफ बढ़ गयी.
अलमारी खोली तो कुछ साड़ियां और सूट करीने से रखे थे, मैंने उन्हें बिगाड़ना ठीक नहीं समझा, आखिर कुछ देर के लिए ही तो पहनना था.
मैंने कोने में पड़े एक गाउन को उठा लिया. अब मैंने अपना लेगिंग और कुर्ता उतारा और एक तरफ रख दिया.
अंदर के कपडे भी भीग चुके थे तो उन्हें भी उतार दिया. एक तौलिया लेकर अपने बदन को पोंछने लगी. फिर तौलिया पास में रखी कुर्सी पे रखा, तभी मैंने थोड़ी रौशनी आते हुए महसूस की.
याद आया फिसलने के बाद शर्म के मारे जल्दबाजी में मैंने दरवाज़ा ही बंद नहीं किया था. मैंने दरवाज़े के उस ओर देखना मुनासिब नहीं समझा और आँखों के एक कोने से देखने की कोशिश की तो एक साया हिलता हुआ दिखा.
मैंने अनजान बने रहने का नाटक करने में ही भला समझा. बिना समय गवाए मैंने वो गुलाबी गाउन पहन लिया. वह बहुत नरम और मुलायम था, शायद अंदर कुछ नहीं पहने होने के कारण मुझे और भी नरम लगा.
मैं अपने गीले अंतवस्त्रों को कुर्ता लेगिंग के अंदर छुपाते हुए बाहर आयी. हॉल में वो नहीं थे, शायद मुझे आते हुआ देख कही अंदर चले गए, यह जताने के लिए की वो साया वह नहीं थे.
वह रसोई से बाहर निकले और बोले चाय चढ़ा दी हैं मुझे चाय पीकर थोड़ी राहत मिलेगी. मैं उनसे नज़रे नहीं मिला पा रही थी.
फिसलने की वजह से ज्यादा मेरे उस अनचाहे अंगप्रदशन की वजह से. मुझे वह अब बाथरूम की ओर ले गए जहां ड्रायर लगा था. और ड्रायर का ढक्कन खोल कर मुझे कपडे अंदर डालने को कहाँ.
मैंने बड़ी सावधानी बरती कि कपडे डालते वक़्त छुपाये हुए अंतवस्त्र बाहर न निकल जाये, किस्मत फूटी थी, मेरी उंगली में ब्रा का स्ट्रैप फंसा और मेरे हाथ के साथ बाहर आ गया और फर्श पर गिर गया.
मेरे हाथ कांप रहे थे. मैं झेप गयी और तुरन्त उठा कर उसे भी अंदर डाल दिया और ड्रायर का दरवाज़ा बंद कर दिया. अब उन्होंने कुछ बटन घुमा कर मशीन को सेट कर दिया.
अब हम लोग बाहर हॉल में आ गए, मैं वही सोफे पर बैठ गयी और वो रसोई में चाय लेने चले गए. मै जहां बैठी थी वहाँ से वो जगह साफ़ दिख रही थी जहां मैंने कपडे बदले थे, मैं अब और हिल गयी थी.
मैं उनकी पत्नी की सहेली हूँ, इन्हे इस तरह नहीं घूरना चाहिए था चोरी से. मन में कही न कही यह भी सोच रही थी कि शायद वो साया मेरा भ्रम हो तो अच्छा है. वो अंदर से चाय के दो कप में लेकर आ गए.
एक के बाद एक होती इन गलतियों की वजह से मैं अब भी नजरे नहीं मिला पा रही थी. मैंने चाय की चुस्किया ली और मुझे बहुत आराम मिला. मैंने नीची नजरो से ही उनसे पूछा “आप मैना के बारे में बता रहे थे”.
उन्होंने अब अपनी कहानी बतानी शुरू की जिसे सुन कर मुझे सदमा लगा. मैना महीने भर पहले ही उनको छोड़ कर अलग रहने लगी थी.
उन्होंने बताया कि पहले मैना के मेरी माँ से झगडे होते थे तो हम अलग हो गए. मैं अपनी माँ की मदद के लिए थोड़ी आर्थिक सहायता देता था जो मैना को पसंद नहीं था. मेरी माँ की कोई आय नहीं, बड़े भाई मदद नहीं करते इसलिए मैं ही उनको रूपये देता था.
इसी वजह से मैना से आये दिन झगडे होते थे. एक दिन यह इतना बढ़ गया कि वो बच्चों को लेकर चली गयी. जाने के बाद आज पहली बार वो छोटी बच्ची को मुझसे कुछ समय के लिए मिलाने के लिए सुबह घर पर छोड़ गयी थी.
बच्ची भी शायद पापा की बजाय अपने पुराने मित्रो के साथ खेलने आयी थी. इनके प्रति मेरे मन में अभी तक जितनी भी नफरत थी वो अब सम्मान में बदल चुकी थी. मुझे उन पर तरस आने लगा था और मैना पर गुस्सा.
वो ऐसे कैसे घर छोड़ कर जा सकती हैं, इतनी छोटी बात पर. मैंने उनको सांत्वना देते हुए कहा कि मैं मैना से बात करुँगी और मनाने का प्रयास करूंगी.
उन्होंने बताया कि पिछले एक महीने में हमारे सारे रिश्तेदारों और मित्रो ने बहुत समझाने का प्रयास किया, पर वो समझने को तैयार ही नहीं हैं.
कुछ मिनट इसी तरह वह अपनी दुःख भरी दास्ताँ बताते रहे और मैं और भी द्रवित हुए जा रही थी. मैना के लौटने की शर्त यह थी कि संजीव और उनकी माँ उससे माफ़ी मांगे, जिसके लिए संजीव तैयार नहीं थे, और वो ठीक भी थे.
जब मैं इस शहर में कुछ समय पहले आयी थी, तब इन दोनों ने मेरी बहुत सहायता की थी. मैं भी उनकी कोई सहायता करना चाहती थी, पर जानती थी की मैना बहुत ज़िद्दी हैं और किसी की नहीं सुनेगी.
फिर मैं क्या मदद कर सकती थी. पत्नी विरह क्या होता हैं वो अब मैं जान चुकी थी. यह व्यक्ति इतने समय से विरह में था फिर भी मुझे उस अवस्था में देख कर मेरा फायदा उठाने का प्रयास नहीं किया.
यह बताते हुए उनका गला रूंध गया, कि मैना अब तलाक के बारे में सोच रही हैं और उनकी आँखें भर आयी. मैंने मन ही मन निश्चय किया मुझे उनके लिए कुछ करना चाहिए. क्या मुझे उन्हें कुछ समय के लिए ही सही पत्नी सुख देना चाहिए.
तुरंत मैंने अपने आप को डांट दिया. यह मैं क्या सोच रही हूँ? इनकी शादीशुदा ज़िन्दगी अच्छी नहीं चल रही, पर मेरी तो बिलकुल सही हैं. मैं क्यों अपनी अच्छी चलती ज़िन्दगी को खराब करना चाह रही हूँ.
वो अब उठे और मेरे पास पड़े टेबल से मेरा खाली कप उठाने के लिए बढे. मेरे अंदर अब दया और करुणा की देवी प्रवेश कर चुकी थी. जिसने मुझे मजबूर कर दिया और मैं भी उठ खड़ी हुई.
मुझ पर से मेरा नियंत्रण हट चूका था. मैंने तुरंत अपने दोनों हाथों से उनकी कलाइयां पकड़ ली, ओर कुछ नहीं सुझा और उनके दोनों हाथों को अपने दोनों वक्षो के ऊपर रख दिया.
मेरे अंदर एक बिजली सी दौड़ पड़ी. काफी समय के बाद उन्होंने किसी स्त्री के नाजुक अंगो को छुआ था, तो वो भी पूरा हिल चुके थे.
मैंने अंदर कुछ नहीं पहना था और वो गाउन बहुत मुलायम और पतला था. वो मेरे अंगो को बिना वस्त्रो के जितना ही महसूस कर सकते थे.
जानिए आरती की कहानी की कैसे उसने अपनी सहेली की चुदाई देखी और खुद भी चुदाई करवाना सिख गयी.
अगले कुछ पलों में उनकी उंगलिया मेरे वक्षो पर अठखेलिया कर रही थी. तुरंत दया की देवी मुझ से बाहर आ गयी. मैं अपने होश में आ चुकी थी, और सोच रही थी की यह मैंने क्या अनर्थ कर दिया.
अपने आप को पर पुरुष के हवाले कर दिया. अब मैं क्या करूँ.
अब उन्होंने मेरे वक्षो को दबाना और मलना शुरू कर दिया था. एक औरत होने के नाते मुझे कुछ आनंद तो आ रहा था साथ ही डर भी लग रहा था.
मैं अब इस मुसीबत से कैसे बच सकती हूँ. मुझे कुछ उपाय सूझता उससे पहले ही उन्होंने मुझे पलट कर सोफे पर धकेल दिया. अब मैं घुटनो और हाथों के बल सोफे पर थी. उन्होंने मेरे गाउन को नीचे से उठाते हुए कमर के ऊपर तक उठा दिया.
अब मेरे नीचे का भाग पूरा नग्न था और उनकी तरफ खुला था. मुझे अहसास हो गया था कि आज मेरी इज्जत मेरे पति के अलावा किसी और के हाथों में भी जाने वाली थी.
मुझे कुछ और नहीं सूझ रहा था. मैं स्तब्ध हो उसी हालत में बैठी रही और सोच रही थी कि अब क्या करू.
तब तक उन्होंने अपने कपडे उतार लिए थे और अपने लिंग को मेरे नितंबो के बीच रगड़ने लगे.
क्या मैं चिल्लाऊं? मगर मैंने ही तो उनके हाथों को पकड़ कर यह सब करने की शुरुआत की थी. गलती तो सारी मेरी ही थी. वो तो विश्वामित्र बन के बैठा था. मैंने ही मेनका बनके उसकी तपस्या भंग की थी.
मेनका की तरह अब मुझे भी एक श्राप तो भुगतना ही था. ऐसा श्राप जो एक शादीशुदा औरत नहीं झेलना चाहेगी. मैं अपनी मूर्खता और किस्मत को कोसने के अलावा अब कुछ और नहीं कर सकती थी.
मैं अब तक सुन्न हो चुकी थी. अभी भी शायद कुछ नहीं बिगड़ा था. मैं कुछ हरकत करती उससे पहले ही वो मेरे पीछे आ चुके थे और अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया. उनके मुँह से एक जोर की आह निकली.
भीग कर ठंड लगने की वजह से अब तक जो शरीर में कपकपी हो रही थी. अचानक अपनी चूत में उस गरमा गरम लंड के जाते ही मेरे शरीर में दौड़ता लहू गरम हो गया.
मेरी तो साँसे ही थम गयी उन कुछ सेकण्ड्स के लिए और मेरे मुँह से सिर्फ एक गहरी आहह्ह्ह निकली.
शायद काफी समय से यह सुख नहीं मिलने पर पुरुषो का यही हाल होता होगा. अब मुझे मेरे प्रतिरोध करने का कोई फायदा नजर नहीं आया. मैं अब सब कुछ लुटा चुकी थी. अब वह आगे पीछे होकर गति करने लगे धीरे धीरे यह गति बढ़ती जा रही थी.
वो प्रेमानंद में डूबते जा रहे थे और सिसकिया निकाले जा रहे थे. मैं इस बीच अपने पति के बारे में सोच रही थी. मेरी एक छोटी सी गलती की वजह से अब मैं उनको मुँह नहीं दिखा पाऊँगी.
अब पछताये हो तो क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत. मैंने अब बाकी सब बातों के बारे में सोचना बंद कर दिया और सकारात्मक सोचने लगी.
मेरे इस कदम से मैंने एक पुरुष को जैसे नया जीवन दिया, एक तड़पते पुरुष को वो ख़ुशी दी जो वो ज़िन्दगी भर याद रखेगा.
आखिर औरत होती भी त्याग की मूर्ति हैं. मैंने अपनी आबरू का त्याग कर किसी की खुशिया खरीदी थी. वह लगातार मुझे पीछे से धक्का मारते हुए चोदने का आनंद लिए जा रहे थे, उनकी आहें और सिसकिया सुनकर मुझे अच्छा लग रहा था. जैसे कोई पुण्य कर दिया हो.
अब आखिर मैं भी कब तक अपने शरीर को रोकती. कुछ ही समय में मेरा सब्र भी टूट गया और मेरी भी आहें निकलनी लगी. उससे उनका जोश भी बढ़ गया तथा ओर भी लगन से अपना कार्य करने लगे.
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और वो रुक गए.
बाहर से उनकी बच्ची की आवाज आ रही थी. उन्होंने अपना लंड मेरी चूत से बाहर निकाल दिया और खड़े हो अपना पाजामा फिर ऊपर कर लिया. मैंने भी खड़े हो अपना गाउन नीचे कर दिया.
मुझे खुश होना चाहिए था पर थोड़ा बुरा लगा कि ऐसे में मुझे अधूरा नहीं छोड़ना था. मुझे अपनीं मम्मी के गाउन में देख बच्ची क्या सोचेगी इसलिए मैं बाथरूम की तरफ चली गयी.
तो मेरी सहेली के पति पर उसकी पत्नी की सहेली की चुदाई का क्या असर होगा. आगे क्या होगा वो आपको अब से कुछ ही देर में पता चल जायेगा!
संजीव ने दरवाजा खोला और बच्ची दौड़ते हुए अंदर गयी और थोड़ी देर में एक नया खिलौना हाथ में ले वापिस दरवाजे से बाहर निकल गयी. उन्होंने फिर से दरवाजा बंद किया. मैं बाथरूम से निकल कर फिर हॉल में आ गयी.
हम दोनों की नजरे फिर से मिली और अभी जो कुछ भी हुआ था, ये सोच मैंने अपनी नजरे नीचे झुका ली. मैंने सोचा शायद इनका जमीर भी जाग जाए और अपना इरादा बदल ले.
पर एक महीने भर से तड़पते हुए मर्द को अगर मौका मिला हो तो वो भला कैसे छोड़ेगा.
उन्होंने मुझे अपनी गोद में उठा लिया था. वो मुझे बेडरूम में ले गए. मुझे आईने के सामने खडी किया और नीचे से गाउन पकड़ कर उठाते हुए मेरे सर से बाहर निकाल दिया. उन्होंने मुझे उठाया और बिस्तर पर उल्टी लेटा दिया.
उन्होंने एक दराज से कुछ सामान निकाल लिया. अब वो मेरे करीब आये और मेरी दोनों नाजुक कलाइयां पकड़ी और उनको पीठ पर ले जाकर उन पर एक हथकड़ी बाँध ली. उस पर मखमल का कपडा चढ़ा था तो चुभ नहीं रही थी.
मुझे समझ नहीं आया वो करना क्या चाह रहे थे. मैं कोई विरोध नहीं कर थी फिर इस हथकड़ी का क्या फायदा.
उन्होंने मुझे अब सीधा लेटा दिया और अपने हाथ में एक लंबी सी पंखनुमा चीज पकड़ ली. मुझे लग गया वो मुझे गुदगुदी करने वाला हैं.
वो अब उस पंखे को मेरे निप्पल के घेरो के चारो तरफ हलके से फेरने लगा. मजे के मारे मेरी सिसकियाँ निकलने लगी. मेरी चूंचिया एकदम से तन गयी और फुल कर और बड़ी हो गयी.
मैना ने मुझसे एक दो बार जिक्र भी किया था, कि उसके पति सेक्स से पहले कुछ गेम खेल कर तड़पाते हैं, आज पता चला वो खेल क्या हैं. जो भी हो आज उसके हिस्से का खेल मैं खेल रही थी.
अब वो पंख घेरा बढ़ाते हुए मेरे पुरे मम्मो को गुदगुदी कर तड़पाने लगा. इतना रोमांटिक पति होते हुए उसको छोड़ कर जाने वाली कोई बेवकूफ पत्नी ही हो सकती हैं. पंख घूमते हुए अब मेरे नाभी और पतली कमर को गुदगुदाने लगा.
मैं अब इंतज़ार कर रही थी कि जब ये मेरी चूत पर अठखेलियां करेगा तब कैसा लगेगा.
इससे पहले की मैं उस उन्माद में सो जाऊ, डोरबेल एक बार फिर बजी और मैं उस नशे से बाहर आयी.
संजीव ने अपने सारे सामान फिर से दराज में डाले और मुझ पर एक रजाई पूरी डाल दी. ऐ.सी. से वैसे ही हलकी ठंड थी तो रजाई से थोड़ी गर्माहट मिली.
संजीव बाहर जा चुके थे और किसी महिला से बात कर रहे थे. थोड़ी देर में वो दोनों बैडरूम की तरफ बढ़ रहे थे. मेरी हालत ख़राब हो गयी, कही किसी को शक तो नहीं हो गया.
मुझे वो आवाज पहचानते देर नहीं लगी, वो मैना की ही आवाज ही थी. बातों से ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने बचे हुए कपडे लेने ही आयी थी. मेरी हालत उस वक्त क्या थी ये कोई सोच भी नहीं सकता.
मैं अपनी सहेली की गैरमौजूदगी में उसके बैड पर नंगी लेटी हुई थी, और उसके छोड़े हुए पति के साथ कुछ अनैतिक काम कर चुकी थी.
मैं सोच में पड़ गयी, क्या मुझे आवाज लगा देनी चाहिए. इससे मैं तो बच जाउंगी इस पाप को और आगे बढ़ने से पहले. पर फिर सोचा मैना पर क्या बीतेगी. उसका अपने पति पर रहा सहा भरोसा भी टूट जायेगा. उसके दोनों बच्चो का क्या होगा.
किसी और को अपने बिस्तर पर सोया हुआ देख उसने संजीव को पूछा भी था, पर संजीव ने झूठ बोल दिया कि वो उसकी माँ हैं, सो रही हैं.
मैना का तो वैसे भी उसकी माँ से छत्तीस का आंकड़ा था, तो शायद वो थोड़ी ही देर में वहा से चली गयी थी. क्यों कि आवाजे आना बंद हो गयी थी.
मैं रजाई के नीचे अभी भी इंतज़ार कर रही थी, कि अचानक मेरे ऊपर से वो रजाई हटा दी गयी. मैं डर गयी, कही सामने मैना न खड़ी हो. पर सामने संजीव को देख थोड़ी शांती मिली.
उसने बताया कि मैना आई थी अपने कपडे लेने और मेरा पहना हुआ गाउन भी लेके चली गयी. जो संजीव ने नीचे से उठा कर अंदर अलमारी में छुपा दिया था बाहर जाने से पहले.
मैंने फैसला कर लिया था कि मैं अब और वहा नहीं रुकने वाली. तब तक वो एक बार फिर वो पंख ले आया और मेरे शरीर पर फेरने लगे. उसमे पता नहीं क्या जादू था कि मुझे अपना फैसला फिर से बदलना पड़ा.
शायद संजीव के पास भी ज्यादा समय नहीं था, मुझे ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. वो नाजुक पंख मेरी चूत को सहला रहा था और मेरी चूत मजे के मारे कांप रही थी. मेरे मुँह से आह आह की आवाजे आने लगी.
मेरे पैर अपने आप ही एक दूसरे से दूर होते गए और मैंने अपनी चूत के दरवाजे खोल दिए. मुझे बस ये अहसास हो रहा था कि मैं किसी मसाज पार्लर में हूँ और सुकून भरी मसाज करवा रही हूँ. मेरी चूत में बूंद बूंद पानी भरने लगा था और छलकने को उतारू था.
इससे पहले की मेरी चूत का जाम छलक जाए, वो रुक गए और मुझे पलटी मार कर उल्टी लेटा दिया. वो अब दराज से कुछ और निकालने लगे.
तभी एक जोर की चटाक आवाज सुनाई दी और मैंने अपनी गांड पर किसी ने मारा हो ऐसा महसूस किया. उसके कुछ सेकंड्स बाद मुझे वहा हलकी जलन होने लगी जो कुछ सेकंड रही.
मैंने सर पीछे कर देखा संजीव के हाथ में एक पतली छड़ी जैसा था जिस के आगे के सिरे पर चमड़े का छोटा टुकड़ा लगा था.
अब उन्होंने मेरे गांड के दूसरे गाल पर मारा, फिर वही चटाक की आवाज और हलकी जलन. जिसके बाद पुरे शरीर में कंपन सा हुआ.
मेरे पुरे शरीर में रोंगटे खड़े हो गए और खास तौर से मेरी चूत में एक अजीब सी खुजली मचने लगी. ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई आये और मेरे अंगो को हाथ लगा कर सहलाये.
थोड़ी थोड़ी देर से वो मुझे ऐसे ही चटाके मारता रहा और मेरे मुंह से कराहने की आवाज के साथ एक प्यास भरी आह निकलती.
एक लड़के ने अपने दोस्त की मम्मी यही की अपनी रीता चाची की चुदाई कैसे करी. यह आप उसकी सेक्स की स्टोरी में जान सकते है.
जब उसने चटाके मारना पूरा बंद कर दिया, तब मुझे अहसास हुआ कि मेरी गांड पर जहा जहा पड़ी एक साथ हल्का दर्द सा हो रहा था.
वो दर्द थोड़ी देर बाद सामान्य हो गया, क्यों कि वो इतनी जोर से भी नहीं मारा था कि बहुत ज्यादा देर तक रहे. उसने मेरे हाथों से हथकड़ी खोल दी.
मुझे लगा कही इसी कारण से तो मैना इसको छोड़ कर नहीं चली गयी. पर इसमें इतना बुरा भी नहीं था. अगर ज्यादा जोर से ना मारा जाए तो ये औरत को और भी ज्यादा उकसाने के काम आ सकता हैं. मैंने तो सोच लिया था कि मैं भी अपने पति को ऐसी चीज लाने को बोलूंगी, वरना हाथ से भी चांटे मार कर काम चला सकते हैं.
मेरी चूत अब फड़फड़ा रही थी. कभी चूत की पंखुडिया सिकुड़ती तो कभी फूल कर खुल जाती.
मैं अब आबरू, नफरत, दया सब भूल चुकी थी, मैं अपने शरीर की जरुरत के आगे लाचार हो चुकी थी. पति ने वैसे भी पिछले एक सप्ताह से मुझे कोई शारीरिक सुख नहीं दिया था.
वो अपने कपडे उतार कर मेरे पास में लेट गए. शायद इतनी मेहनत के बाद थोड़ा आराम करना चाहते थे. मैंने देखा उनका लंड फुँफकार मार रहा था और रह रह ऊपर नीचे हो सलामी दे रहा था.
उनके हाथ में एक कंडोम का पैकेट था. उन्होंने वो कंडोम खोल अपने लंड को पहना दिया.
फिर उन्होंने मुझे अपनी तरफ खिंच कर मुझे अपने आप पर झुका दिया. मैं जैसे उन पर सवार हो गयी. मेरा थोड़ा शरीर उन पर झुका हुआ था. मेरे दोनों मम्मे उनके मुख पर थे.
वह अब मेरी चूँचियो को धीरे धीरे चूसने लगे. साथ ही साथ वो अपने दोनों हाथ मेरे कमर और नितंबो पर फेरने लगे.
उनका लंड नीचे से बार बार खड़ा हो कर मेरी चूत पर चांटे मार रहा था, जिसके छूते ही मुझे करंट सा लगता. मेरे शरीर में झुरझुरी छूट जाती.
थोड़ी देर इसी तरह चलता रहा. अब उन्होंने अपना लंड पकड़ कर मेरी चूत में डाल दिया. वो मेरे कूल्हे पकड़ कर मुझे आगे पीछे हिलाते हुए मेरी धक्का मशीन चालू कर रहे थे.
एक बार मजा आना चालू हुआ तो मैं उनके हाथ छोड़ने के बावजूद अब खुद ही झटके मारने लगी. अब मैं तेजी से आगे पीछे होते हुए अपने बदन से उनके बदन को रगड़ रही थी.
मेरे मम्मे उनके सीने से रगड़ खाकर और मजा दे रहे थे. थोड़ी ही देर में हम दोनों की आहें एक साथ निकलने लगी. मैं अपने चरम की और बढ़ रही थी. मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया था.
आह्ह्ह आह्ह आह्ह ओह्ह्ह यस्स्स्स उम्म उँह उँहह्ह्ह्ह आह्ह्ह आईईईइ हम्म्म्म की आवाज के साथ और कुछ हल्के धक्को के साथ अपना काम पूरा किया.
उनका अभी भी पूरा नहीं हुआ था. इसलिए थकी होने के बावजुद मैंने करना जारी रखा. पर थोड़ी ही देर में मैं थक कर रुक गयी.
अब वो नीचे लेटे लेटे ही अपने लंड को मेरे शरीर में अंदर बाहर करने लगे. मुझे फिर मजा आने लगा. थोड़ी देर में मैंने भी साथ देते हुए थोड़ा जोर लगाया.
जिससे मेरा मूड एक बार फिर बनने लगा. शायद ये सारा जादू उस खेल का हैं जो उन्होंने मेरे साथ खेला था. मैं वो पंख अभी भी अपने मम्मो और चूत पर फिरते हुए महसूस कर पा रही थी.
मैंने रुक रुक कर जोर से झटके मारने शुरू किये. मेरा थोड़ा पानी तो पहले ही निकल चूका था तो उन झटको से फच्चाक फच्चाक की आवाजे आने लगी.
हम दोनों एक दूसरे की विपरीत दिशा में एक साथ झटके मार रहे थे, जिससे उनका लंड और मेरी चूत एक दूसरे की तरफ तेजी से बढ़ते हुए एक दूजे में समा रहे थे, और झटको का वेग और भी बढ़ने से लंड गहराई में उतर रहा था.
उनकी आहें अब और भी लंबी होने लगी और आवाज भी बढ़ने लगी. अब उन्होंने जोर लगाना बंद कर दिया था शायद उनका होने वाला था. इसलिए मैंने अपना पूरा जोर लगाते हुए करना जारी रखा.
जल्द ही उनकी चीख निकली और मुझे अपने सीने से चिपका कर अंदर की ओर कुछ हलके धक्के देने लगे.
अब तूफ़ान शांत हो चूका था. मैं अपनी चूत से थोड़ा पानी रिसता हुआ महसूस कर रही थी. शायद मैंने ही दूसरी बार झड़ने के करीब होने से पानी छोड़ा होगा.
शारीरिक जरुरत पूरी होने के बाद ही इंसान को अपने सारे गुनाह नजर आते हैं. हम दोनों का हो तो गया, पर मन ही मन में पता था कि हमने क्या गलती कर दी हैं जिसका कोई प्रायश्चित भी नहीं हैं.
थोड़ी देर उसी मुद्रा में सोये रहने के बाद मैं उनसे नीचे उतर गयी. जो मैंने देखा उस पर यकीन नहीं कर पायी. मैंने देखा उनका कंडोम फट चूका था. इसका मतलब उनका सारा वीर्य मेरी चूत में जा चूका था. वो जो पानी रिसा था वो मेरा नहीं संजीव का था.
ये मेरे महीने के सबसे खतरनाक दिन चल रहे थे, जब बच्चा होने की सम्भावना सबसे ज्यादा होती हैं. शायद वो कंडोम नहीं मेरी किस्मत फटी थी.
वो उठे और कपडे पहन कर बाहर चले गए. मेरा गाउन तो जा चूका था, मेरे कपडे बाहर ड्रायर में थे तो ऐसे ही बैठ मैं इंतज़ार करने लगी. थोड़ी ही देर में वो लौट आये, उनके हाथ में मेरी ड्रायर में सुख चुकी लेगिंग कुर्ता थे. मैंने उनसे वो कपडे ले लिए.
कपड़ो के बीच में वो मेरे अंतवस्त्र छुपा कर लाये थे मेरी ही स्टाइल में. जो की मेरी लापरवाही से फिर नीचे गिर पड़े. मैं एक बार फिर शर्मिंदा हुई. उन्होंने झुककर तुरंत वो कपडे उठाये और मुझे थमा दिए.
अब उनको यह अधिकार था कि वो इन वस्त्र को भी छु सकते थे. वो बाहर चले गए और मैं फिर उसी अलमारी के पास खड़ी हो कपडे पहनने लगी.
दरवाज़ा अभी भी खुला था, पर अब मुझे परवाह नहीं थी. छुपाती भी क्या? सब कुछ तो दे ही चुकी थी. बाहर देखा तो वो सोफे पर बैठे मुझे ही कपडे पहनते देख रहे थे. शायद वो पहले वाला साया सच्चाई ही था.
मैं अब बाहर हॉल में आ गयी थी और उनसे जाने की इजाजत मांगी. वो मेरे पास आये और अपने हाथ में मेरा हाथ लेकर मुझे धन्यवाद करने लगे. अपनी आदत के अनुसार मेरे मुँह से वेलकम निकल गया.
अपनी इस आखिरी गलती पर मैंने अपनी जुबान दाँतों से काट ली. तुरंत मुड़ कर उनसे विदा लेते हुए दरवाज़े के बाहर चली गयी.
नीचे उतरते हुए यही सोच रही थी कि क्या मैंने जो भी किया सही था? मैना के पति के लिए निश्चित रूप से सही किया था.
शायद मेरे खुद के लिए भी ठीक ही किया था. मुझे आज एक नया अनुभव हुआ. मैंने कही मैना का घोंसला तो नहीं तोड़ दिया या फिर वो घोसला पहले से ही टुटा हुआ था.
फटे कंडोम को याद कर मेरा मदद करने का हौंसला भी टूट चूका था. पहले ही हिल स्टेशन पर जो डीपू के साथ किया वो काफी नहीं था जो अब ये कांड भी कर बैठी.
चार दिन के बाद मैना का फ़ोन आया, एक बार तो मैंने डर के मारे उठाया ही नहीं, कि कही उसको सब मालुम तो नहीं चल गया.
दूसरी बार आने पर मैंने उठाया, वो मुझे शुक्रिया बोल रही थी. उसके हिसाब से मैंने उसके पति को अच्छे से समझाया जिससे वो माफ़ी मांग कर उसको फिर अपने घर ले आये थे मैना की शर्तो पर.
मुझे बहुत अच्छा लगा कि मेरी इज्जत की कुर्बानी मेरी सहेली के कुछ तो काम आयी. मन में एक अपराध-बोध था वो थोड़ा कम हुआ.
पर मेरी मुसीबत अब दोहरी हो चुकी थी. अगर माँ बनी तो बच्चे का बाप कौन होगा, डीपू या संजीव !
उससे बड़ी मुसीबत अपने पति को क्या जवाब दूंगी कि ये बच्चा किसका हैं? आने वाले दो सप्ताह का इंतज़ार मेरे लिए भारी पड़ने वाला था.
उस वक्त मुझे नहीं पता था कि रंजन की हमारे ज़िन्दगी में वापसी होने वाली थी. कौन रंजन?
पिछले तीन हफ्तों में मेरे साथ बहुत कुछ हो चूका था. पहले हफ्ते असुरक्षित चुदाई में डीपू पति के दोस्त ने चोदा (“अदला बदली, संयोग या साजिश“), और फिर मैना के पति संजीव के साथ महीने के सबसे खतरनाक दिनों में चुदाई के वक़्त कंडोम का फट जाना (“मैना का घोंसला, चुदा मेरा हौंसला“).
मेरे पीरियड आने में सिर्फ एक सप्ताह बचा था और हर एक दिन के साथ मेरा डर बढ़ता जा रहा था.
अगर गर्भवती हो गयी तो मेरे पति अशोक को क्या बोलूंगी, क्या इल्जाम डीपू पर डाल दू? पर वो पूछेंगे उसने मेरे साथ कब किया तो क्या बोलूंगी? मैंने हर वक्त ये झुठलाया था कि डीपू ने मेरे साथ कुछ किया था.
सासू जी अपने घर जा चुके थे और जाते वक़्त अपने पोते को भी साथ ले गए, क्यों कि थोड़े दिन बाद हम वैसे भी वहा जाने वाले थे.
शुक्रवार की शाम को ऑफिस से लौटने के बाद अशोक एक और खबर ले कर आये. रंजन विदेश से आ चूका था और उसकी सगाई होने वाली थी. इसी सिलसिले में वो हमारे शहर कुछ खरीददारी के लिए आने वाला था और हमारे साथ रुकना चाहता था.
पहले से ही गर्भवती होने का डर ऊपर से ये और मुसीबत. खास तौर से जब अशोक को पता था कि रंजन के साथ हमने पिछली बार क्या किया था, फिर घर में ठहराना मतलब घास को आग दिखाना.
कम शब्दों कहा जाए तो जाए तो रंजन मेरे बच्चे के असली बाप के तीन उमीदवारो में से एक था. जिसको मैंने और मेरे पति ने मिलकर फंसाया था ताकि वो मुझे गर्भवती कर सके (पूरी कहानी पढ़िए “समझोता साजिश और सेक्स“).
मैंने रंजन को लेकर अपना डर पति के सामने रख दिया.
मैं: “आपको अच्छे से पता हैं उसने मेरे साथ उस रात को स्लीपर बस में क्या किया था, ये जानते हुए हुए भी उसको मेरे यहाँ होते हुए ठहराना! वो फिर से ऐसी हरकत कर सकता हैं. उसके हिसाब से तो मैं भी तैयार थी उसके साथ संबंध बनाने के लिए.”
अशोक: “वो मेरा दूर के रिश्ते में भाई हैं, उसको मैं घर आने से कैसे रोक दू? सब रिश्तेदारों को पता लगेगा मैंने उसकी ठहरने में मदद नहीं की तो कैसा लगेगा.”
मैं: “अगर उसने मुझ पर हमला कर मुझे पकड़ कर कुछ कर दिया तो?”
अशोक: “वो रविवार को सुबह आएगा और मैं उसको दिन भर शॉपिंग पर ले जाऊंगा. शाम को खाना खा कर के सो जायेगा, और मैं तो तुम्हारे साथ ही होऊंगा ना. उसकी हिम्मत नहीं होगी.”
मैं: “सोमवार को तो तुम ऑफिस चले जाओगे, जब कि वो यही रहेगा मेरे साथ अकेला, उसकी शाम को वापसी की ट्रैन तक.”
अशोक: “उसकी चिंता मत करो, मैं सोमवार की छुट्टी ले लूंगा. वो वैसे भी दोपहर में बाकी की बची शॉपिंग करेगा.”
मैं: “तुम्हे क्या लगता हैं, उसको पता चल गया होगा कि पिछली बार बस में उसने जो कुछ भी किया वो हम दोनों की दोनों की साजिश थी?”
अशोक: “नहीं, मुझे नहीं लगता, उसको ऐसे कैसे पता चलेगा? ”
मैं: “फिर भी, बहुत ध्यान रखना पड़ेगा. अगर उसने ये मान लिया कि वो बच्चा उसी का हैं तो?”
अशोक: “तुम खा-मख़ा घबरा रही हो. कुछ नहीं होगा. चिंता मत करो.”
रविवार को देर सुबह रंजन हमारे घर पहुंच गया. मैं उसके सामने आने से बचती रही. अशोक ने उसे हमेशा अपने साथ बिजी रखा. वो मौका देखते ही मुझे घूरने लगता, और मुझे डर लगता कब वो क्या कदम बढ़ा ले.
अशोक उसे बाहर शॉपिंग पर ले गए और सीधा देर शाम को ही वो दोनों ढेर साड़ी शॉपिंग कर घर लौटे. मैंने तब तक खाने की तैयारी कर ली थी. उनके फ्रेश होते ही उनको खाना भी खिला दिया था.
हमेशा मैं रात को स्लीप शार्ट पहनती हूँ, पर रंजन जरा सा भी छोटे कपडे देख भड़क ना जाए इसलिए मैंने पूरा पाजामा पहना.
वो दोनों हॉल में बैठ कर बातें कर रहे थे और मैं रसोई के बाकि के काम निपटा रही थी. थोड़ी देर में उन दोनों में कोई गंभीर चर्चा होने लगी. मैं भी अपना काम छोड़ रसोई के दरवाजे के करीब आ उनकी बात सुनने लगी.
रंजन: “अशोक तुम मानो या ना मानो पर मुझे पूरा यकीन हो गया हैं तुम भी प्रतिमा के साथ मिले हुए थे. मेरे दोस्तों को लगा मैं झूठी कहानी बना रहा हूँ. मेरी कहानी सुन उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि तुम पास में लेटे हुए थे फिर भी तुमको भनक तक नहीं लगी कि मैं और प्रतिमा क्या कर रहे थे. ऐसे कैसे हो सकता हैं.”
अशोक: “मैं फिर से कह रहा हूँ, तुम्हे कोई गलत फहमी हुई हैं. प्रतिमा जानबूझ कर ऐसा नहीं कर सकती. शायद उसे नींद में ग़लतफ़हमी हो गयी होगी और तुम्हे उसने मुझे समझ कर कुछ किया होगा. अब प्लीज उसके सामने ये बातें बोल कर हम दोनों को शर्मिंदा मत करो.”
रंजन: “आप प्रतिमा को यहाँ बुलाओ, और पूछो. मुझे सब कुछ साफ़ करना हैं. अगर कोई गलत फहमी हैं तो दूर होनी चाहिए.”
अशोक: “पुरानी बातें भूल जाओ रंजन, तुम्हारी सगाई होने वाली हैं. आगे बढ़ो.”
रंजन: “गलत फहमी एक बार हो सकती हैं. पर…”
इससे पहले की वो उस दिन बस के अंदर अगली सुबह के वक़्त हम दोनों के बीच दुबारा हुई चुदाई के बारे में बताये. जिसके बारे में अशोक को भी नहीं पता मैं हॉल में आ गयी और रंजन को आगे कुछ बोलने से रोक दिया.
मैं: “क्या हुआ, बहुत जोर की आवाज आ रही थी?”
रंजन: “देखो प्रतिमा, मैंने उस रात को बस में हमारे बीच जो भी हुआ अशोक को बताया, पर उसने आश्चर्य करने बजाय तुमको ही बचाने की कोशिश की. मुझे दाल में काला लग रहा हैं.”
अशोक: “ऐसा कुछ नहीं हैं. रंजन को कोई ग़लतफ़हमी अशोक हुई हैं.”
रंजन: “सच सच क्यों नहीं बता देते. प्रतिमा सच बताओ उस दिन बस में जो भी हुआ वो अशोक और तुमने जान बुझ कर किया था?”
मैं: “ये क्या बात कर रहे हो, साथ सोते सोते गलती से हाथ इधर उधर टच हो गया होगा.”
रंजन: “बात सिर्फ हाथ टच होने की नहीं हैं. तुम्हे अच्छे से पता हैं हमारे बीच सब कुछ हुआ था.”
मैं: “देखो, जो भी हुआ गलती से हुआ. मैंने अशोक को बाद में सब बता दिया था. अब आगे इस बारे में बात करने का कोई फायदा नहीं.”
रंजन: “गलती से कर दिया! पर मैं तो उस दिन से चैन से नहीं रह पाया. जब भी रात को सोता था तो वही घटना मेरे आँखों के सामने घूमती थी. मेरे लिए तो वो आज भी एक सपना ही हैं. मैं तुम्हे भुला नहीं पाया हूँ.”
अशोक: “तुम अपनी मंगेतर के साथ नयी ज़िन्दगी शुरू करने वाले हो. उस पर ध्यान दो. उसके बाद तुम सब भूल जाओगे.”
रंजन: “ठीक हैं, मैं वो सब भूल जाता हूँ पर मेरी भी एक शर्त हैं. एक आखरी बार मैं प्रतिमा के साथ सोना चाहता हूँ.”
अशोक: “कैसी बातें कर रहे हो? वो तुम्हारी भाभी हैं. अगर एक गलती हुई उसका ये मतलब नहीं कि तुम ब्लैकमेल करो और मज़बूरी का फायदा उठाओ.”
रंजन: “फायदा तो आप दोनों ने मेरा उठाया था. अब मैं फायदा उठा रहा हूँ तो उसमे क्या गलत हैं. आप करो तो सही, और मैं करू तो गलत कैसे?”
मैं: “देखो रंजन, भाभी एक माँ की तरह होती हैं. उसके साथ तुम ऐसा करोगे, तुम्हे शर्म नहीं आएगी.”
रंजन: “शर्म तो उस दिन बस में भी नहीं आयी थी. आप समझ क्यों नहीं रहे हो. पिछले एक साल से भी ज्यादा हो गया हैं उस बात को और मैं वो सब भुला नहीं पा रहा हूँ. कभी कभी कुछ भुलाने के लिए एक बार फिर वो सब करना पड़ता हैं. मुझे सिर्फ एक मौका दे दो.”
अशोक: “रंजन, तुम्हारा ज्यादा हो रहा है. मैं तुम्हारी माँ से शिकायत कर दूंगा.”
रंजन: “उसकी जरुरत नहीं, मैं खुद ही बोल देता हूँ माँ को, उस दिन बस में क्या हुआ था.”
मैं: “एक मिनट रुको, बात को बढ़ाने से कोई फायदा नहीं. तुम्हे किसी को कुछ कहने की जरुरत नहीं. तुम्हे क्या चाहिए बोलो?”
अशोक: “प्रतिमा, ये तुम क्या..”
रंजन: “मैं प्रतिमा को एक बार फिर से चोदना चाहता हूँ. उसके बाद मैं सब भूल जाऊंगा और कभी परेशान नहीं करूँगा.”
अशोक: “तुम्हारा दिमाग तो ठीक हैं?”
रंजन: “सोच लो, फैसला आप दोनों को लेना हैं.”
अशोक: “इसकी क्या गारंटी हैं कि तुम भविष्य में परेशान नहीं करोगे.”
रंजन: “मेरी सगाई और फिर शादी होने वाली हैं. मैं अपनी वाइफ के साथ बिजी हो जाऊंगा. फिर विदेश चला जाऊंगा.”
अशोक और मैं एक दूसरे का चेहरा ताकने लगे. हमें जिस चीज का डर तब था वही अब हो रहा था. हमारे पुराने पाप हम पर भारी पड़ रहे थे.
अशोक: “प्रतिमा क्या तुम तैयार हो इसके लिए?”
मैं: “समाज में हमेशा के लिए बदनामी हो उससे अच्छा हैं मैं बंद कमरे में बदनाम हो जाऊ.”
रंजन की तो जैसे दिल की मुराद पूरी हो गयी. खुश होकर सोफे से उछलता हुआ खड़ा हो गया और बैडरूम में चला गया. मैं वही खड़ी रह गयी और अशोक की तरफ लाचारी से देखने लगी. अशोक ने सांत्वना दी कि बस एक बार की बात हैं जैसे तैसे सहन कर लो.
मैं भारी कदमो से बैडरूम की तरफ जाने लगी. अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया, ये काम मैं अशोक की आँखों के सामने तो नहीं करवा सकती थी. रंजन बिस्तर पर पाँव चौड़े कर पसरा हुआ था. मुझे देख कर कुटिल मुस्कान बिखेर दी.
खड़े खड़े ही मेरे दिमाग में एक विचार आया. मेरी तो वैसे भी शायद डीपू या संजीव के बच्चे की माँ बनने की सम्भावना काफी प्रबल थी. अब मैं ये सारा इल्जाम रंजन पर डाल सकती थी. क्यों कि ये सब तो पति की इजाजत से हो रखा था.
मुझे अब तक लग रहा था कि रंजन एक मुसीबत लेकर आया हैं, पर अब लगा कि वो तो मेरी मुसीबत का हल बन कर आया हैं.
उसने मुझे अपने पास बुलाया. मैं बिस्तर के कोने पर जाकर बैठ गयी. वो मेरे स्लीप शर्ट से बाहर उभरते हुए सीने के उभार को ही घूर रहा था. वो उठ कर मेरे पास आया और अपने दोनों हाथ मेरे शर्ट सहित मम्मो पर रख मसलने लगा.
पिछली बार बस में अँधेरे में किया था आज तो उसको लाइट के उजाले में सब कुछ साफ़ दिखने वाला था.
थोड़ी देर मेरे मम्मो के साथ खेलने के बाद उसने मेरे शर्ट के सारे बटन खोल दिए और शर्ट को मेरे शरीर से पूरा निकाल दिया.
मैं अब ब्रा में सकुचाते हुए बैठी थी. टाइट ब्रा से मम्में बाहर झाँक रहे थे. उनको साक्षात देख कर वो पूरा देखने को मचलने लगा.
उसने मुझे घुमा कर मेरी पीठ उसकी तरफ की और मेरी ब्रा का हुक खोल दिया. फिर ब्रा को पूरा निकालने में जरा सा भी समय व्यर्थ नहीं किया. मैं अपने दोनों हाथ सीने से चिपका कर अपना स्त्रीधन छुपाने लगी. उसने मुझे फिर अपनी तरफ घुमाया.
मैं नजरे नीचे किये हुए एक दुल्हन की भाँती बैठी थी. उसने अपने दोनों हाथ मेरे एक एक कंधे पर रख दिया और अपने हाथ फिराते हुए मेरी बाजुओ से कोहनी और फिर कलाइयों तक ले आया. उसने मेरी कलाईयाँ पकड़ ली और उनको खिंच कर मेरे सीने से हटाने लगा.
उसकी ताकत के आगे मेरा क्या बस चलता, उसने मेरी दोनों कलाइयों को पकड़ कर नीचे कर दिया और मेरे दोनों मम्मे उसके सामने खुल के आ चुके थे.
मेरे हाथ पकड़े रखते हुए वह अब आगे झुका अपने होंठो से बारी बारी से मेरी दोनों चूंचियो को चूसने लगा. फिर वो मेरी चूंचियो के बीच के गुलाबी घेरो को अपनी गीली जबान से चाटने लगा.
मेरे दोनों मम्मो के आस पास के रोंगटे खड़े हो गए और छोटे छोटे दाने उभर आये. मेरे मम्मे फुलकर और बड़े हो गए और निप्पल तन गए.
उसने अपनी खुरदुरी जबान मम्मो और निप्पल पर रगड़ना जारी रखा और मैं अपनी सिसकी निकलने से नहीं रोक पायी. मेरी सिसकी सुनकर उसने और भी तेजी से अपनी जबान रगड़ते मेरे दोनों मम्मो को पूरा गीला था.
अब उसने अपने गीले होंठो को मेरे होंठो पर रख दिया और मेरे निचले होंठ को अपने होंठों के बीच में दबा कर रस लेने लगा. पिछली बार बस में वो मेरे मम्मे और होंठ को चूस नही पाया था तो इस बार वो कसर पूरी कर रहा था. मेरी तो पैंटी गीली होने लगी थी.
उसने अब मेरे होंठो को छोड़ा और मुझे बिस्तर के पास नीचे खड़ा कर दिया. मेरे आगे घुटनो के बल बैठते हुए उसने मेरे पाजामा को पैंटी सहित नीचे खिसकाना शुरू कर दिया.
पाजामा जांघो तक आया और उसको मेरी चूत के दर्शन भी हो गए. एक कुआंरे मर्द को चूत के दर्शन हो जाये तो वो पागल हो ही जाता हैं.
मेरा पाजामा को वही आधा खुला छोड़ वो मेरी चूत चाटने लगा. पाजामा आधा खुलने से मेरे पाँव चौड़े नहीं हो सकते थे, तो वो सिर्फ ऊपर से ही चाट पा रहा था. उसने अब जल्दी से मेरा पाजामा और पैंटी पैरो से पूरा निकाल दिया.
उसने अब मुझे बिस्तर के किनारे पर बैठा दिया और फिर पीछे धक्का मारते हुए बिस्तर पर लेटा दिया. मेरे पैर अभी भी बिस्तर से नीचे जमीन पर लटक रहे थे और धड़ बिस्तर पर लेटा था.
वो अब भी नीचे जमीन पर ही घुटनो के बल बैठा था और उसने मेरे पाँव चौड़े कर अपना मुँह मेरी चूत के होंठों पर रख दिया.
अब वो अपनी जबान और मुँह से खोद खोद कर मेरी चूत चाटने लगा. पानी तो पहले से ही बनने लगा था तो वो मेरे मीठे पानी का मजा ले रहा था.
मजे के मारे मेरी जोर जोर की सिसकियाँ रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. पता नहीं पति को बाहर मेरी सिसकियाँ सुनाई देगी तो क्या सोचेंगे. चूत चाटते चाटते जब उसका मन भर गया तो वो उठ कर बिस्तर पर आ कर मेरे पास बैठ गया.
उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी पैंट के अंदर के शैतान पर रख दिया. उसका लंड एकदम कड़क हो कर तैयार था. कपडे के अंदर होने के बावजूद भी मैं उसके लंड की गर्माहट अपने हाथों पर महसूस कर पा रही थी.
मेरी सिसकियाँ सुनकर अब तक उसको भी पता चल चूका था कि मुझे भी मजे तो आये थे, तो उसने मुझे अपना लंड चूसने को कहा.
मैं अब उठ कर बैठ गयी और वो लेट गया. मैंने उसका पजामा और अंडरवियर उसके पैरो से पूरा बाहर निकाल दिया. बंधन से मुक्त होते ही उसका लंड एक दम खड़ा हो गया.
मैंने उसका लंड अपने एक हाथ में भर लिया, वो एकदम गरम सलाखों के जैसा था गरम और कड़क. मैं उसके लंड की चमड़ी को ऊपर नीचे रगड़ने लगी. उसकी सिसकियाँ निकलनी शुरू हो गयी. उसने मुझे मुँह में लेने को कहा.
मैं अब आगे झुकी और उसका लंड अपने मुँह में उतार दिया. थोड़ा सा और गरम होता तो गरम चाय के जैसे मेरा मुँह जल गया होता. मैं लंड अपने मुँह में आगे पीछे धक्का मारते हुए रगड़ने लगी. इसके साथ ही उसकी सिसकियाँ और जोर से निकलने लगी.
थोड़ी देर इसी तरह उसका लंड मुँह में रगड़ने के बाद उसने कुछ बूंद पानी की मेरे मुँह में ही छोड़ना शुरू कर दिया.
पहले तो मैंने सहन किया, पर जैसे ही ज्यादा पानी निकलने लगा तो मैंने उसका लंड मुँह से बाहर निकाल दिया. उसका चिकना पानी मेरे मुँह में था और उस पर उसका लंड लौट रहा था तो बाहर निकलते ही मैंने देखा वो पानी से थोड़ा बहुत लिपट चूका था.
मैंने अपना मुँह पोछा. मैं अभी घुटनो के बल ही बैठी थी. वो उठ खड़ा हुआ और इस तरह बैठा कि उसका लंड मेरे दोनों मम्मो के बीच फंसा दिया और मुझे अपने दोनों मम्मे साइड से दबा कर उसका लंड मम्मो के बीच दबाये रखने का निर्देश दिया.
मैंने उसका कहना माना और वो मेरे मम्मो के बीच की गली में अपना लंड दबाये ऊपर नीचे रगड़ने लगा. उसका लंड तो पहले ही चिकना था, ऊपर से थोड़ा और पानी निकलने से मम्मो की दोनों घाटिया भी भीग कर चिकनी हो गयी. जिससे उसका लंड और भी आसानी से फिसलते हुए तेजी से दोनों मम्मो के बीच ऊपर नीचे रगड़ रहा था.
उसकी सिसकियाँ अब भी चालू थी. समय के साथ उसकी सिसकियाँ और भी बढ़ने लगी. उसका पेट मेरे मुँह के सामने ही था रह रह कर मेरे होंठ उसके पेट को चुम रहे थे. उसकी आहें इतनी तेज थी की बाहर अशोक को सुनाई दे रही होगी.
थोड़ी देर में तो उसके लंड से लावा फट पड़ा और मेरे सीने के दोनों पहाड़ो के बीच तैर फेल गया. मेरे सीने पर गरमा गरम पानी के छींटे हो रहे थे. वो बड़ी जोर से चीखते हुए अपने अंदर कब से जमा करके रखा सारा पानी मेरे ऊपर उँड़ेल चूका था.
वो अब मेरे ऊपर से हटा, मैंने मौका मुआयना किया. मेरे दोनों मम्मे और आस पास का इलाका पूरा उसके पानी से गंदा हो चूका था. असली काम करने से पहले ही वो झड़ चूका था.
मेरा तो आखिरी हथियार भी खाली चला गया. अब मैं रंजन पर मुझे गर्भवती होने का इल्जाम कैसे डालती. क्योकि अभी मुझे मेरे पति के दोस्त ने चोदा नहीं था.
रंजन पूरा काम करने से पहले ही बाहर झड़ गया था. मैं ठगी सी रह गयी मेरे प्लान का क्या होगा.
उसके लंड का सारा पानी मेरे सीने पर फैला हुआ था, तो मैं उसको इधर उधर फैलने से रोक रही थी. रंजन को मैंने बताया कि पेपर नैपकिन कहा पड़े हैं और उसने लाकर कुछ मुझे दिए और बाकी से अपना लंड साफ़ करने लगा.
अपनी सफाई करने के बाद हम दोनों ने अपने कपडे पहन लिए. मैं पहले वाशरूम में गयी और बाकी की सफाई कर बाहर हॉल में आ गयी तब तक रंजन वाशरूम में गया.
पति मुझसे जानकारी लेने लगे.
अशोक: “क्या हुआ, निपटा दिया उसे?”
एक बार तो मैंने सोचा कि झूठ बोल दूँ कि रंजन ने कर लिया हैं, इस बहाने अपने गर्भवती होने का ठीकरा उसके माथे फोड़ सकती हूँ.
पर फिर ये विचार त्याग दिया क्योकि रंजन बाहर आकर सब सच बता देगा तो मुसीबत हो जाएगी.
मैं: “नहीं, वो पहले ही बाहर झड़ गया.”
अशोक: “मतलब, उसने नहीं किया?”
मैं: “वो मेरे सीने पर रगड़ रहा था और उसका वही पानी निकल गया.”
अशोक: “तो अब? एक बार करने की बात हुई थी, देखा जाये तो हो गया उसका.”
मैं: “पता नहीं वो इसको मानेगा या नहीं.”
तभी रंजन वाशरूम से बाहर हॉल में आ गया.
रंजन: “सॉरी, मेरा काम पूरा होने से पहले ही मैं निपट गया. अभी मैं कल कर लूंगा. अभी फिर से करना मुश्किल हैं.”
मैं मन ही मन खुश हुई, कि मुझे एक और मौका मिलेगा कि मैं उस पर इल्जाम डाल पाऊँगी.
अशोक: “एक बार का बोला था, वो हो गया, अब क्या हैं?”
रंजन: “पर हुआ कहाँ? बात तो चोदने की हुई थी, वो तो हुआ ही नहीं. तुम चाहो तो प्रतिमा को पूछ लो. क्यों प्रतिमा मैंने पूरा नहीं किया हैं ना?”
मैं: “हां, पूरा तो नहीं हुआ.”
अशोक मुझे घूरने लगे. मुझे अपना बचाव भी करना था.
मैं: “पर, काम तो हो गया न तुम्हारा.”
रंजन: “नहीं नहीं, अभी शर्त पूरी नहीं हुई हैं. कल मेरी जब इच्छा होगी तब में बता दूंगा और आप मुझे मना नहीं करोगे. वरना हमारी डील टूट जाएगी.”
मैं और अशोक अब बैडरूम में आ गए. रंजन को बाहर ही सोने के लिए छोड़ आये. अशोक योजना बनाने लगे कि कल कैसे बचा जाए रंजन से.
सुबह मैं और अशोक उठ गए थे और रोजमर्रा के काम निपटा दिए थे. रंजन अभी भी सो रहा था.
अशोक का प्लान था कि हम सुबह ही शहर के थोड़ा बाहर पहाड़ी पर स्थित मंदिर के दर्शन को निकल जायेंगे और देर से आएंगे. तब तक रंजन अपनी शॉपिंग के लिए निकल जायेगा और हम बच जायेंगे.
शाम को वैसे भी उसको घर लौटना हैं तो उसको समय ही नहीं मिल पायेगा कुछ करने का.
मैं और अशोक बिना आवाज किये नाश्ता कर रहे थे. मुझे मेरा प्लान फेल होते हुए दिखा. नाश्ता करने के बाद मैं जान बुझ कर बर्तनो को टकरा कर आवाज निकलवाने की कोशिश कर रही थी कि रंजन हमारे जाने से पहले जाग जाए.
ऐसा ही हुआ और रंजन जाग गया. मैं मन ही मन बड़ा खुश हुई. रंजन वाशरूम में गया तब तक मैं और अशोक तैयार होने चले गए.
मुझे कुछ ऐसे कपडे पहनने थे कि मैं रंजन को उत्तेजित कर पाऊ. मैंने अपनी मरून रंग की साड़ी पहन ली और उस पर बिना ब्रा के बड़े गले वाला ब्लाउज जो की पीछे से पूरा खुला था. मेरी पूरी पीठ नंगी थी सिर्फ ब्लाउज को दो डोरियाँ थी बांधने के लिए.
मैंने अपना पेटीकोट भी नाभी से तीन इंच नीचे बाँधा था ताकि ज्यादा से ज्यादा मेरी पतली कमर दिखे.
साड़ी के बीच से झांकती मेरी पतली कमर, आईने में अपने आप को देख कर मैं खुद ही मोहित हुए जा रही थी तो रंजन का क्या होता.
अशोक तो जल्दी से तैयार हो बाहर हॉल में इंतजार करने लगे. मैं अपने साज श्रृंगार में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी. साथ ही थोड़ा समय भी व्यतीत करना था ताकि रंजन वाशरूम से बाहर आये और मुझे देख कर रोक ले.
मैं जब तैयार हो कर बाहर हॉल में आयी तो रंजन भी नहा कर वाशरूम से बाहर आया. मुझ पर नजर पड़ते ही उसकी आँखें वही ठहर गयी.
मरून साड़ी पर गहरी लाल लिपस्टिक में लिपटे मेरे होंठ देख वो वैसे ही घायल हो गया. मैंने उसकी तरफ पीठ घुमा कर पीठ के थोड़े और जलवे भी दिखा दिए.
उसको सदमे में से बाहर आने में कुछ सेकण्ड्स लगे. फिर उसने पूछा.
रंजन: “आप लोग तैयार हो कर कही जा रहे हो क्या?”
अशोक: “हां, हम लोग मंदिर जा रहे हैं. तुम्हारे लिए नाश्ता रखा हैं खा लेना और फिर तुम्हारी बची हुई शॉपिंग पर निकल जाना.”
रंजन: “आप लोग कब तक आओगे?”
अशोक: “दो तीन घण्टे में आ जायेंगे.”
ये झूठ अशोक ने पहले ही तैयार कर लिया था, असल मैं हम शाम को ही लौटने वाले थे.
रंजन: “तो ठीक हैं आप रुको, मैं भी आ जाता हूँ मंदिर दर्शन करने.”
अशोक: “अरे तुम्हारी शॉपिंग का क्या होगा फिर? मंदिर और कभी चले जाना.”
रंजन: “आज कुछ ख़ास नहीं बचा हैं, एक घंटे का ही काम हैं, मंदिर से वापिस आकर कर लूंगा.”
अशोक थोड़ी चिंता में पड़ गए. कही रंजन बीच रास्ते में ही कल रात वाली मांग ना रख दे. पर मैं खुश थी, इसलिए नहीं की रंजन मेरे साथ कुछ कर सकता था पर इसलिए कि मुझे इल्जाम डालने वाला एक बकरा मिल गया था.
अशोक के पास और कुछ विकल्प तो था नहीं तो उसको मानना पड़ा. हम लोग इंतजार करने लगे कि रंजन नाश्ता कर तैयार हो जाये. उसके तैयार होते ही हम गाड़ी से निकल पड़े.
वहा पर आपस में लगी हुई दो पहाड़िया थी, दूसरी पहाड़ी पर स्तिथ मंदिर तक पहुंचने के लिए उन पर से एक सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बनाया गया था. सोमवार का दिन था तो मंदिर पर कोई था ही नहीं. हम तीनो दर्शन कर वापिस नीचे उतरने लगे.
मंदिर वाली पहाड़ी पार कर ली थी और दूसरी वाली पहाड़ी से नीचे उतरने लगे. एक जगह आकर रंजन सीढ़ियों पर रुक गया. उसे देख हम दोनों भी रुक गए और उसकी तरफ देखने लगे.
रंजन: “अशोक मेरा अभी मूड बन गया हैं, मैं और प्रतिमा उन झाड़ियों के पीछे जाकर कर लेंगे तुम यही निगरानी रखो और कोई आये तो हमें सचेत कर देना.”
उसने सीढ़ियों के रास्ते से बीस कदम दूर एक झाड़ियों की तरफ इशारा किया. वो छोटा सा घना झाड़ था. इससे पहले कि मेरे पति कुछ बोलते, रंजन मेरी कलाई पकड़ कर मुझे उन झाड़ियों की तरफ ले जाने लगा.
रंजन आगे आगे और मैं उसके पीछे पीछे खींचते हुए चली जा रही थी. पीछे मुड़ कर अशोक को देखा, उसके चेहरे पर एक मज़बूरी थी और वो हमें उन झाड़ियों के पीछे जाता देखता ही रह गया.
वो झाड़ पांच फ़ीट ऊँचा और सात फ़ीट चौड़ा था. हम दोनों झाड़ के पीछे बैठ गए. उस झाड़ के पीछे से पत्तो के बीच की जगह से ऊपर जाने की सीढिया बड़ी मुश्किल से दिखाई दे रही थी.
अर्शदीप ने कैसे अपने पापा के साथ चुदाई के मजे लिए. यह जानिए उसकी इन्सेस्ट सेक्स स्टोरीज इन हिन्दी में उसी की जुबानी.
रंजन ने मुझे नीचे घास पर लिटा दिया और मेरी साड़ी को मेरे पेट और कमर से हटा दिया. अब वो मेरे शरीर के मध्य भाग को चूमने लगा, जिसको इतनी देर से साड़ी के बीच से देखना चाह रहा था.
कल रात की तरह काम पूरा होने से पहले ही कही झड़ ना जाए इसलिए वो आज कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. उसने मेरी साड़ी नीचे से पेटीकोट सहित ऊपर उठा दी. आगे से मेरे पाँव, फिर जाँघे और फिर मेरी पैंटी दिखने लगी थी.
उसने अब अपने दोनों हाथों से मेरी पैंटी पकड़ कर पैरो से निकाल दी. वो मेरी दोनों टांगे चौड़ी कर बीच में घुटनो के बल बैठ गया. उसने अपनी पैंट और अंडरवियर घुटनो तक नीचे कर दी.
उसका लंड तो मुझको चोदने के ख्याल से पहले से ही तैयार था, फिर भी थोड़ा सा और रगड़ कर उसको लंबा और कठोर करने लगा, जैसे कोई कारीगर अपने औजार इस्तेमाल से पहले तीखे करता हैं.
जब उसे लगा कि उसका सामान तैयार हैं, तो उसने अपना हाथ मेरी चूत पर रख मेरी खुली दरारों में अपनी ऊँगली रगड़ कर वहा चिकना करने लगा.
कुछ सेकंड में ही मेरी चूत के वहा अच्छा ख़ासा गीला हो चूका था. उसके ऊँगली करने से मेरी हलकी आहें भी निकलने लगी थी.
अब वो तैयार था मेरी चूत को भेदने के लिए. उसने मेरी टांगे थोड़ी और चौड़ी की और अपने लंड की टोपी मेरी चूत के अंदर रख दी. मेरी दोनों टांगो को ऊपर उठाते हुए पकड़ा और अंदर जोर लगाते हुए धीरे धीरे अपना लंड मेरी चूत में पूरा उतार दिया. मेरी एक जोर की आहह्ह्ह् निकली.
अब वो बिना रुके आगे पीछे धक्के मारते हुए मुझे चोदने के मजे लेने लगा. थोड़ी देर में मुझे भी मजे आने लगे और मेरी सिसकियाँ निकलने लगी.
उसने मेरे घुटने से पाँव मोड़ते हुए मेरे कंधो तक ऊपर कर दिए. मेरी पूरी चूत खुल गयी तो वो आगे झुकते हुए और भी जोर जोर से चोदने लगा.
हम दोनों ही इतनी जोर से सिसकियाँ निकाल आहें भर रहे थे कि आवाज जरूर अशोक तक पहुंच रही होगी. ये जरुरी भी था, ताकि अशोक को अहसास हो कि रंजन ने ही मुझे माँ बनाया हैं. रंजन ने तो साल भर से शायद सेक्स नहीं किया था तो वो अपनी तड़प मिटा रहा था.
मजे के मारे मैं अपनी आँखें बंद कर चुदवाती रही और आहें भरती रही. मुझे पता ही नहीं चला कब अशोक भी झाड़ियों के पीछे आ हमारे पास खड़ा हो हमे चुदते हुए देख रहा था.
अशोक की डायरी के हिसाब से तो वैसे भी उसकी इच्छा थी कि वो मुझे किसी के साथ चुदते हुए देखना चाहता था. तो इसको अभी वो मौका मिल रहा था.
रंजन को तो कोई फर्क नहीं पड़ा पर आँखें खुलते ही अशोक को वहा देख मैं झेंप गयी. सदमे से मेरी आवाज निकलना बंद हो गयी. मेरा शरीर लगातार रंजन के झटको से आगे पीछे हिल रहा था.
जैसे जैसे हम दोनों का थोड़ा थोड़ा पानी निकलता रहा मेरी चूत से फच्चाक फच्चाक की आवाजे आने लगी. जिससे जोश में आ रंजन और दम लगा के चोदने लगा.
अब मेरे से भी बर्दाश्त नहीं हुआ और उसके साथ मैं भी आवाजे निकलने लगी आह्हहह आह्हह्ह्ह ओहहह उहह्ह्ह अम्म्म सीईईइ.
तभी अशोक ने कहा कि रुक जाओ कोई सीढ़ियों से आ रहा हैं. रंजन ने झटके मारना बंद कर दिया. पर मेरे अंदर तो एक ररक उठ रही थी. मैं नीचे से ही हौले हौले अपनी गांड को हिला अपनी चूत को रंजन के लंड पर धीरे धीरे आगे पीछे रगड़ने लगी. इससे मुझे थोड़ी शांति मिली.
रंजन ने भी ये महसूस किया तो उसने धीरे धीरे से अपना लंड अंदर बाहर करना शुरू कर दिया. ताकि हम चुप भी रहे और अंदर की खुजली भी शांत होती रहे. रंजन ने आगे झुक कर लाल लिपिस्टिक में लिपटे मेरे होंठो को चूसना शुरू कर दिया.
दो तीन महिला-पुरुष बातें करते हुए सीढ़ियों से होते हुए ऊपर चढ़ गए और थोड़ी देर में उनकी आवाजे आनी भी बंद हो गयी. तो अशोक ने हमको बताया वो लोग चले गए हैं.
ये सुनते ही रंजन फिर से ऊपर उठा और जोर जोर से धक्के मारते हुए मुझे चोदने लगा और मेरी सिसकिया एक बार फिर से शुरु हो गयी.
अशोक वही खड़ा हो मुझे चुदता हुआ देखता रहा और मैं शर्मिंदा होती रही. मेरी भी कोई इच्छा तो नहीं थी कि मैं रंजन से चुदवाऊ पर बच्चे के बाप का नाम भी तो चाहिए था.
अशोक के खड़े रहने से मेरी तो सारी इच्छाएं ही मर गयी. पर एकाएक रंजन में कोई भूत घुस गया, वो जोर जोर से आवाज निकालते हुए गहरे गहरे झटके मारने लगा.
ओह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्हह्ह्ह अह्ह्हह्ह्ह्ह उम्म्मम्म करते हुए उसने अपना रात भर से जमा पानी मेरी चूत में खाली कर दिया और झड़ गया.
फिर दो चार धीमे धीमे झटके मारते हुए बाकी की बची खुची बूंदें भी मेरे अंदर टपका दी. मैं अपनी चूत को गरम गरम पानी से भरा हुआ महसूस कर पा रही थी.
उसने जब अपना लंड बाहर निकाला तो मेरी चूत से वजन थोड़ा कम हुआ. पर उसके लंड के साथ ही वो ढेर सारा पानी भी बाहर ले आया और मेरी गांड के नीचे फंसे पेटीकोट पर वो सारा पानी गिर गया. मेरा पेटीकोट उस हिस्से से गीला हो गया जो मेरी गांड पर आने वाला था.
अशोक इतना सारा पानी मेरी चूत और रंजन के लंड से से लिपटा हुआ देख शरमा गया और हमें बोल कर वापिस सीढ़ियों की तरफ चला गया, ताकि हम दोनों कपड़े पहन उधर चले जाये.
मैंने अपनी नीचे की हालत देखी और अपने पर्स में रखे नैपकिन निकाल पोछने लगी. थोड़े नैपकिन रंजन को भी दिए. वो बड़ा संतुष्ट लग रहा था.
मेरा एक काम तो हो चूका था कि बच्चे के बाप का नाम मिल गया. पर इतनी देर चुदवाने के बाद भी मैं प्यासी थी. सोचा अशोक ही आ जाये और मेरा काम पूरा कर दे पर वो तो दूर जाकर खड़ा था.
रंजन ने झड़ने के बाद बहुत सारा पानी मेरे पेटीकोट पर गिरा कर गीला कर दिया था. मैं वो गीला पेटीकोट नहीं पहन सकती थी.
मेरी दुविधा देख रंजन ने सुझाव दिया कि हम वहा धुप में पेटीकोट सूखा सकते हैं, थोड़ी देर में सुख जायेगा. पर इसके लिए मुझे भी झाड़ियों के पीछे से निकल धुप में बैठना पड़ेगा.
रंजन ने बोला कि पेटीकोट ही निकाल देते हैं और मेरी साड़ी की पटली को पेटीकोट से निकाल कर पूरी साड़ी पेटीकोट से बाहर कर दी.
मैं उसको मना ही करती रह गयी और उसने मेरे पेटीकोट का नाड़ा खोल कर मेरी टांगो से पेटीकोट पूरा बाहर निकाल दिया और झाड़ियों से थोड़ा आगे धूप में फैला दिया सूखने के लिए.
अब मैं सिर्फ एक ब्लाउज में बैठी थी. मेरे कमर और उस से नीचे का पूरा नंगा गोरा बदन उसके सामने था. वो मेरे जिस्म को घूरने लगा और मैं शर्माने लगी.
मैं अशोक को देखने के लिए झाड़ियों के बीच से देखने लगी. वो अभी भी हमारा इंतज़ार कर रहा था. तभी रंजन ने पीछे से मेरे ब्लाउज को बंधी दोनों गाँठ खोल दी. दो सेकंड में मेरा ब्लाउज ढीला हो गया.
रंजन की तरफ मुड़ते ही मैं संभल पाती उससे पहले ही उसने मेरा ब्लाउज भी मेरे शरीर से निकाल कर मुझे पूरी नंगी कर दिया.
उसने अपने होंठ मेरे निप्पल पर लगाए और चूसने लगा. मैं वैसे भी आधी अधूरी बैठी थी तो उसके चूसने से मैं फिर मदहोश होने लगी. साथ ही डर भी लग रहा था कि अशोक क्या सोचेगा. मैंने अपने आप को छुड़ाया फिर पलट कर झाड़ियों के पत्तो के बीच से अशोक को देखा.
अशोक मुझे कपडे पहने हुए छोड़ कर गया था, वो आकर अगर मुझे पूरी नंगी देखेगा तो क्या होगा?
मैंने देखा अशोक झाड़ियों की तरफ चलते हुए आना शुरू हो गया था. मैंने रंजन को बताया. उसने मुझे कहा कि मैं अशोक को यहाँ से जाने के लिए बोल दूँ और उसको कहु कि हम बाद में घर आ जायेंगे. उसके सामने चुदवाते हुए पकड़े जाने से बेहतर यही था.
मैं उठ कर खड़ी हो गयी, झाड़ के पीछे खड़े होकर मैंने अशोक को रोका. मेरा सिर्फ सर और कंधे का थोड़ा हिस्सा ही झाड़ के ऊपर था.
मैंने अशोक को वहा से जाने को बोल दिया कि मैं और रंजन बाद में आ जायेंगे. अशोक वही रुक गया और मुझे लाचारी से देखने लगा कि मैं कैसे रंजन के साथ फंस गयी हूँ.
वो वही खड़ा होकर कुछ सोच रहा था कि रंजन ने मेरा हाथ पकड़ नीचे बैठाने की कोशिश की, मैं थोड़ा झुक सी गयी और उसका हाथ छुड़ा कर फिर खड़ी हो गई.
अशोक ने इशारे से मेरे पास आकर मदद की पेशकश की, पर मैं वहा कोई बखेड़ा नहीं चाहती थी. अशोक को मैंने इशारे से बोल दिया कि मैं संभाल लुंगी और उसको जाने के लिए बोला. अशोक उलटे कदम फिर सीढ़ियों की तरफ जाकर नीचे उतरने लगा.
रंजन ने मेरा हाथ पकड़ कर फिर मुझे खिंच नीचे बैठा दिया. पेटीकोट सूखने में वैसे भी कुछ मिनट तो लगते तब तक नंगे बैठे मैं क्या करती.
मैंने रंजन को देखा वो मेरे नंगे बदन को अभी भी घूर रहा था और लार टपका रहा था. उसने मेरे पाँव चौड़े कर दिए और अपना मुँह मेरी चूत पर रख चाटना शुरू कर दिया.
उसकी जबान मेरी चूत की दरार में रगड़ खाने लगी. अपने शरीर की अधूरी पड़ी जरुरत पूरी करने के लिए मुझे रंजन को एक बार फिर से तैयार करना था.
रंजन अब नीचे घास पर लेट गया और मैंने उसकी पैंट को अंडरवियर सहित उतार दिया और उसका नरम पड़ा लंड अपने हाथ से पकड़ खींचने लगी. दूसरे हाथ से उसके लंड की थेलियो पर हाथ फेर सहलाने लगी. उसकी सिसकिया निकलने लगी.
कुछ मिनट में ही उसका लंड फिर से कड़क होने लगा था. जब मुझे लगा कि ये मेरे अंदर जाने जितना काबिल हो गया तो मैं उसके ऊपर चढ़ कर बैठ गयी.
मैंने उसका लंड अपने हाथ में लिया और अपनी चूत में घुसा दिया. मैं अब वही बैठे बैठे उछलते हुए चुदवाने लगी.
रंजन थोड़ी देर पहले ही झड़ गया था तो उसकी तरफ से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं मिल रही थी. जो भी करना था मुझे ही करना था. वो आराम से लेटे लेटे मेरी चूंचियो को दबा कर खेल रहा था. जब कि मैं सारी मेहनत कर रही थी कि अपना भी काम पूरा कर पाऊ.
मेरा आधा काम तो पहले रंजन के साथ हो ही चूका था तो मुझे ज्यादा समय नहीं लगा और मेरा पानी निकलना शुरू हो गया था.
मैं अब आगे झुक अपना सीना रंजन के सीने से लगा अपनी गांड को ऊपर नीचे धक्के मारते हुए अपने चरम की तरफ बढ़ने लगी.
मेरी सिसकिया अब बढ़ने लगी थी तो रंजन को भी मजा आने लगा, और वो भी नीचे से अपनी गांड पटकते हुए झटके मारने लगा.
मेरा मजा दुगुना होने लगा. ओह्ह्ह्ह येस्स्स्स ओह्ह्ह्ह ह्ह्ह्हह आह्ह आह्ह आह्ह ऊऊऊऊउउह ऊऊउह करते हुए मैं झड़ गयी.
थोड़ी देर मैं उसके ऊपर ही पड़ी रही, पर वो अब भी मुझे झटके मार रहा था. पर मुझ पर अब इतना असर नहीं हो रहा था.
मैं उसके ऊपर से हटी, मुड़ते वक़्त नीचे पहाड़ी की उतार में कोई नीला साया हिलता हुआ पाया. अशोक ने भी नीला शर्ट पहना था, क्या वो छुप कर हमें देख रहा था!
मैं हटी ही थी कि रंजन ने मुझे फिर से पकड़ लिया, शायद अब तक उसका दूसरी बार चोदने का मूड बन गया था. मैं दोनों हाथों और घुटनो के बल डॉगी की तरह बैठी थी.
वो मेरे पीछे आया और कूल्हों को पकड़ अपना लंड फिर मेरी चूत में डाल चोदने लगा. मेरे पास तो नैपकिन भी दो चार ही बचे थे पर पता था कि रंजन थोड़ी देर पहले ही झड़ा था तो अभी उतना पानी नहीं निकलेगा.
पर मैं ये भूल गयी कि एक बार झड़ने के बाद मर्द का लगातार दूसरी बार झड़ना थोड़ा मुश्किल होता हैं. वो सही साबित हुआ. रंजन चोदते चोदते थक गया पर झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था. मेरी चूत उसके लंड की रगड़ को सहते सहते घायल हुए जा रही थी.
इन सब के बीच रह रह के मेरी नजर पहाड़ी के उस तरफ जा रही थी जहा मुझे शक था कि अशोक छुप कर देख रहा हैं. मुझे वो नजर भी आया पर हम दोनों एक दूसरे की कोई सहायता नहीं कर सकते थे.
रंजन का होता हुआ ना देख मुझे ही कोई उपाय करना था. जैसे ही वो आगे की तरफ धक्का मारता मैं भी ठीक उसी समय अपने शरीर को पीछे की तरफ धक्का मारती जिससे झटके और प्रभावी और गहरे हो गए.
मर्दो को जल्दी झड़ाने का तरीका हैं उनको उत्तेजित बातें बोलो, तो मैंने भी वही किया. मैंने अब रंजन का नाम लेकर उसको जोर से चोदने को बोलने लगी और उसका उत्साह वर्धन करने लगी.
मैं: “कम ऑन रंजन, चोद दो मुझे, जोर से चोद दो. हां, ये वाला आह्ह आह्ह और जोर से मारो, आज तो तुम मेरी चूत फाड़ दो हां बेबी ये वाला. कम ऑन रंजन मिटाओ मेरी प्यास, मेरी प्यास मिटाओगे ना अह्ह्ह्हह्ह?”
रंजन: “हां, मैं मिटाऊंगा प्यास. ये ले, ये ले साली, और जोर से ले.”
मैं: “ओह्ह्ह्ह येस्स्स्स ओह्ह्ह्हह जोर से, चोद दे मुझे आअअअ अह्ह्ह्हह.”
रंजन: “ओह्ह्ह्हह ओह्ह्ह्हह अह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्हह्ह, ओ प्रतिमा, ये ले, ये ले मेरी जान, ये वाला ले जोर से, आह्ह्ह्ह आअहह्ह्ह.”
और रंजन एक बार फिर मेरी चूत में झड़ गया.
मैंने जल्दी से उसको अपने से दूर हटाया, और अपना सुख चूका पेटीकोट उठा कर पहन लिया. फिर पैंटी पांवो से डालकर चढ़ा ली.
तब तक रंजन ने भी अपनी पैंट पहन ली. तभी कुछ लोगो की आवाजे आयी. शायद जो लोग पहले ऊपर चढ़ कर गए थे वो वापिस उतर रहे थे.
मैं तुरंत झाड़ियों के पीछे बैठ गयी, बाल बाल बचे, थोड़ी देर पहले आते तो हमारी आवाजे सुन सकते थे.
रंजन ने मेरे ऊपर से नंगे शरीर का भी फायदा उठाया, और मेरे मम्मे चूसने लगा. मैंने पहले अपना ब्लाउज पहनने में ही भलाई समझी.
बैठे बैठे मैंने ब्लाउज पहन लिया, उसने मेरी ब्लाउज की डोरिया बांधने में मदद करने के बहाने मेरी पीठ पर अपना हाथ लगा थोड़े मजे भी लेता रहा.
वो लोग अब जा चुके थे, तो मैं अब खड़ी हो साडी पहनने लगी. इस बीच रंजन मुझे घूरता रहा और रह रह कर कभी मेरी कमर और कभी मेरी जांघो को छू छेड़ता रहा.
कपडे पहनने के बाद हम लोग सीढ़ियों से उतर नीचे आये. वहा अशोक गाड़ी के पास खड़ा हमारा ही इंतज़ार कर रहा था.
रंजन को लगा था कि अशोक चला गया होगा, पर मुझे तो पता ही था वो छुप छुप कर हमें ताड़ रहा था. हम लोग बिना बात किये गाड़ी में बैठ गए.
अगर आप मेरी चुदाई की कहानी पहली बार पढ़ रहे है, तो आपको मेरी लिखी पिछली चुदाई की कहानियां जरुर पढनी चाहिए!
रास्ते में रंजन ने बताया कि बाजार होते हुए चलते हैं ताकि बाकि की खरीददारी भी कर ली जाये. वहा उसने हमारे मना करने के बावजूद भी मेरे लिए भी एक दुल्हन की तरह वेश दिलवाया. हम लोग दोपहर में घर लौट आये.
अशोक खुश था कि रंजन को एक बार करना था वो कर चूका और रंजन खुश था कि जैसा उसने मुझे चोदने की सोची उससे कही ज्यादा ही मिला. सबसे ज्यादा खुश मैं थी कि मेरे पिछले कुछ सप्ताह के डर का समाधान हो गया था.
हम लोग दोपहर में रंजन की शॉपिंग का सामान चेक कर रहे थे, और उसके बाद रंजन ने एक और धमाका कर दिया. हम समझ रहे थे कि उसकी ट्रैन आज शाम की हैं पर उसने बताया कि ट्रैन अगले दिन की हैं.
मैं और अशोक उसकी मंशा समझ चुके थे, पर हमे ये नहीं पता था कि उसको कैसे रोके. अशोक से ज्यादा तो मैं घबराई हुई थी. रंजन से मेरा काम हो चूका था और उसकी कोई जरुरत नहीं थी.
अशोक ने रंजन से साफ़ साफ़ पूछ लिया कि वो चाहता क्या हैं. रंजन ने जो बोला वो तो बिलकुल भी गवारा नहीं था. वो अपनी मंगेतर को छोड़ कर मुझसे शादी करना चाहता था. हम पति पत्नी तो पूरा हिल गए. ये मामला तो हाथ से निकल रहा था. रायता पूरा फैल चूका था.
अशोक ने उसको समाज का और रिश्तो का डर दिखाया, माँ का वास्ता दिया और बहुत समझा बुझा कर उसको शांत किया. उसको ये यकीन दिला दिया कि उसकी एक बार शादी हो जाएगी तो वो अपनी बीवी को बिलकुल मेरी तरह ही महसूस कर पायेगा. बहुत समझाइश के बाद उसके दिमाग में ये बात बैठ गयी कि ये उसका आकर्षण मात्र हैं.
उसने अपनी ज़िद छोड़ी और हम दोनों ने चैन की सांस ली. अब रंजन ने अपना दूसरा पासा फेंका.
रंजन: “मैं शादी किसी से भी करू, पर अपनी पहली सुहागरात मैं प्रतिमा के साथ ही मनाना चाहता हूँ.”
हम दोनों अवाक रह गए, वो क्या कहना चाह रहा हैं.
अशोक: “तुम दोपहर में ही सब कुछ कर चुके हो, फिर ये सुहागरात क्या हैं?”
रंजन: “मेरी शादी के बाद पहली रात को मेरे बिस्तर पर प्रतिमा होनी चाहिए.”
अशोक: “तुम्हारी बीवी का क्या होगा, उसको पता नहीं चल जाएगा, तुम सब बर्बाद कर रहे हो.”
रंजन: “तो फिर मैं क्या करू? एक काम करो, अगले चौबीस घंटो के लिए प्रतिमा को मेरी बीवी बना दो. मैं अपनी शादी से पहले एक बार प्रतिमा के साथ सुहागरात मनाऊंगा और उसको अपनी बीवी बनाने का सपना पूरा करूंगा.”
अशोक: “तुमने वादा किया था कि सिर्फ एक बार करोगे. वो हो चूका हैं, तो दूसरे का सवाल ही नहीं पैदा होता हैं.”
रंजन: “मैं प्रतिमा से शादी करना चाहता हूँ, वो तो तुम करने नहीं दे रहे, कम से कम एक दिन के लिए मेरी बीवी तो बना दो. मुझे बस एक बार सुहागरात मनाने दो. तुम चाहो तो सिक्योरिटी के लिए तुम भी सुहागरात में मुझे ज्वाइन कर सकते हो.”
ये सुन अशोक की आँखें चमक उठी. उसकी डायरी के हिसाब से मुझे किसी से चुदता हुआ देखना तो उसका सपना था ही, हो सकता हैं मेरे साथ थ्रीसम का भी सपना देख रखा हो उसने.
मैंने उन दोनों को मना कर दिया, कि मैं कोई इस्तेमाल की चीज नहीं हूँ. एक को झेलना ही इतना मुश्किल होता हैं, तो फिर दो को एक साथ झेलना नामुमकिन सा हैं. अशोक मुझे समझाने के लिए बेडरूम में ले आया.
अशोक: “देखो, पहली चीज हमारे पास कोई विकल्प नहीं हैं. रंजन का भरोसा नहीं, मना करने पर वो क्या करेगा.”
मैं: “अपने बच्चे के लालच में हमने जब रंजन को फंसाया था वो गलत था, पर अब जो कर रहे हैं वो भी तो गलत हैं. एक गलती को छिपाने के लिए हम और गलती कर रहे हैं.”
अशोक: “मुझे पता हैं, पर तुम्हारे पास और कोई उपाय हैं? जैसे तैसे इसकी शादी हो जाने दो सब भूल जायेगा. एक दिन और सहन कर लो. ठीक हैं?”
मैं: “कुछ ठीक नहीं हैं.”
अशोक: “ये समझ कर कर लो कि हम दूसरे बच्चे की प्लानिंग कर रहे हैं. पहले के लिए भी तो किया ही था न.”
मैं: “तो तुम्हे यह भी याद होगा कि तुम्हारे दोनों ऑफिस वाले कैसे मुझ पर एक साथ टूट पड़े थे.”
अशोक: “पर अभी यहाँ एक ही हैं. मैं सिर्फ दर्शक बना रहूँगा.”
मुझे भी पता था कोई दूसरा उपाय तो हैं नहीं तो हां बोलना पड़ा.
आज रात को ही हमे सुहागरात मनानी थी. दोपहर में ही रंजन ने मुझे दुल्हन वाला वेश उपहार में दिया था वो मुझे पहनना था. दोपहर में ख़रीदे गए कपड़ो में से ही वो दोनों कुछ पहनने वाले थे.
रंजन बाजार से जाकर ढेर सारे फूल ले आया था सेज सजाने के लिए. रंजन और अशोक बेडरूम में बिस्तर को फूलो से सजाने लगे.
मैं बाहर बैठी अपनी दूसरी सुहाग रात के बारे में आश्चर्य से सोच रही थी. शाम को वो दोनों मेरे बच्चे के कमरे में तैयार होने चले गए और मैं बैडरूम में तैयार होने गयी.
बैडरूम में सौंधी सौंधी महक बिखरी हुई थी. पूरा बिस्तर असली सुहागरात की तरह सजा दिया गया था. बिस्तर के चारो और फूलो की मालाएं लटकी थी और बिस्तर पर गुलाब की पंखुडिया बिखरी थी. वहा का दृश्य देख मैं मूर्छित हो रही थी. मैंने अपनी खुद की सुहागरात भी इस तरह नहीं मनाई थी.
मैंने वो दुल्हन जैसे कपडे पहन लिए. लाल रंग का लहंगा, उस पर खुले गले और पीठ की चौली डोरी से बंधी थी. ऊपर से एक साड़ी सर पर ओढ़ ली. जो भी गहने थे वो पहन लिए. आईने में देखा तो एकदम दुल्हन की तरह मैं तैयार थी. सिर्फ दुल्हन का मेकअप बाकी था.
फिर मैंने दुल्हन की ही तरह मेकअप भी कर लिया. भौंहो के ऊपर लाल सफ़ेद बिन्दुओ की रेखाएं. लाल कपड़ो से मिलती लाल बिंदी और लिपिस्टिक.
मैं अपनी सुहागरात के लिए दुल्हन की तरह सज सवार कर तैयार हो रही थी. पुरे चेहरे के मेकअप के दौरान मेरे दोनों दूल्हे बाहर से दस्तक देते हुए अधीर हो रहे थे, कि मैं कब तैयार होउंगी और वो कब अंदर आ पायेंगे.
मुझे भी पता था कि जिस तरह से मैं दुल्हन बनी हूँ, मुझे वो लोग बुरी तरह से रगड़ने वाले हैं तो जितना देर कर सकती थी मैंने की. शायद ये गलत भी था, जितना वो तड़पेंगे मेरी उतनी बुरी खबर लेंगे.
अंत में मैं तैयार हो गयी. बैडरूम की कुंडी खोल उनको अंदर से ही आवाज लगा दी कि मैं तैयार हूँ. मैं अब आकर बिस्तर पर बैठ गयी और साड़ी से अपना चेहरा ढक घूँघट बना लिया. मैं अब इंतजार करने लगी अपनी खुद की बेंड बजवाने के लिए.
एक एक करके दोनों दूल्हों ने कमरे में प्रवेश किया. उन दोनों ने कुर्ता पायजामा पहन रखा था. एक मेरा पति और दूसरा शायद मेरे बच्चे का असली बाप था.
मेरे लिए तो वो असली सुहागरात के जैसा ही था. दोनों बिस्तर की ओर बढ़ने लगे और एक असली दुल्हन की तरह मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा.
वो दोनों मेरे सामने बिस्तर पर आकर बैठ गए. दोनों ने एक एक हाथ लगाया और मेरा घूँघट ऊपर उठाने लगे. मेरा दुल्हन की तरह सजा चेहरा देख कर दोनों की हवाइयां उड़ने लगी. एक अनार था और दो बीमार थे.
रंजन ने आगे बढ़ कर मेरे नीचे के होंठ को अपने होंठ के बीच फंसा चूसने लगा. मैं आँखें बंद कर उसको महसूस करने लगी.
दो मिनट तक चूसने के बाद उसने मुझे छोड़ा, तो अशोक ने आगे बढ़कर मेरे ऊपर के होंठ को चूसना शुरू कर दिया. उसके नीचे के होंठ मेरे मुँह में थे तो मैंने भी चूसना शुरू कर दिया, रंजन वैसे ही मेरे होंठ चूस थोड़ा मूड बना चूका था.
वो दोनों बिलकुल जल्दबाजी नहीं कर रहे थे. लग रहा था वो दोनों पुरे मूड में हैं और बहुत देर तक मेरे मजे लेने वाले हैं. अशोक ने मुझे चूसना छोड़ा और मैंने उनकी शकले देखि, दोनों के मुँह पर मेरी लिपिस्टिक लग चुकी थी.
वो दोनों मेरे आजु बाजु आकर खड़े हो गए और अपना पाजामा खोल कर नीचे कर दिया. दोनों के लंड कड़क होकर बिलकुल तैयार थे.
उन्होंने मुझे चूसने को कहा पर मेरा तो एक ही मुँह था. एक बार में मैंने एक एक का लंड अपने मुँह में ले चूसा तो दूसरे का अपने हाथ से रगड़ा.
दोनों में होड़ मची थी कि किसका लंड ज्यादा देर मेरे मुँह में रहेगा. मैंने दोनों दूल्हों से बराबर न्याय किया. कोई नहीं जीता तो कुछ मिनटों के बाद उन्होंने मुझे छोड़ दिया और नीचे लेटा दिया.
रंजन मेरी जांघो पर बैठ गया और मेरी साड़ी को पेट से हटा दिया. फिर दोनों हाथों से मेरी पतली कमर पकड़ कर आगे झुक कर मेरा पेट चूमने लगा.
वो अपने गीले गीले होंठ मेरे पेट पर घुमा मुझे चूमते हुए गुदगुदी कर रहा था और मुझे मजे आ रहे थे, जिससे हलकी सिसकिया निकलने लगी.
दूसरा दूल्हा कहा पीछे रहने वाला था. अशोक ने साड़ी को मेरे सीने से हटा दिया और मेरी चोली के ऊपर से झांकते हुए मेरे मम्मो को अपनी गीली जबान से चाटने लगा.
इस दोहरे आक्रमण से मुझे और नशा चढ़ने लगा. मेरी आहें और सिसकियाँ जारी थी और ये कह पाना मुश्किल था कि कौन सा दूल्हा ज्यादा मजे दिला रहा था.
उन लोगो ने भी थोड़ी देर चाटते चूमते हुए मेरी सिसकियों का आनंद लिया. मुकाबला अभी भी बराबर पर था, तो उन्होंने अगला कदम बढ़ाने की सोची.
उन्होंने मेरी साड़ी निकाल कर अलग कर दी. अशोक मेरी लम्बी गरदन को चुमने लगा, तो रंजन ने मेरे लहंगे के नीचे हाथ डाल मेरी पैंटी निकाल दी.
रंजन ने लहंगा थोड़ा ऊपर उठाया और अपना सर अंदर घुसा दिया. मैंने उसको जगह देने के लिए अपने पैर चौड़े कर दिए और मेरे घुटनो को मोड़ दिया और वो अब मेरी चूत चाटने लगा.
रंजन के मेरी चूत चाटना शुरू करते ही मैं अनियंत्रित होने लगी और जोर जोर से सिसकिया भरते हुए रंजन को रुकने को बोल रही थी, कि मुझे बहुत गुदगुदी हो रही हैं वो ऐसा ना करे.
पर इसमें तो उसकी जीत थी, वो अपनी जबान मेरी चूत की दरार में और भी अंदर घुसा कर लपलपाने लगा और मैं और जोर से आहें भरने लगी.
अशोक ने मेरी गरदन चूमना छोड़ अपना कुर्ता भी निकाल पूरा नंगा हो गया. मेरे चेहरे के ऊपर लगभग बैठते हुए उसने अपना लंड मेरे मुँह में घुसा दिया. मैंने उसका कड़क हो चूका लंड अपने मुँह में ले चूसने लगी.
रह रह कर मुझे उसका लंड मुँह से निकालना पड़ रहा था, क्यू कि मेरी चूत को रंजन बहुत मादक तरीके से चूस रहा था और सिसकिया निकालने के लिए मुझे मुँह खाली चाहिए था.
रंजन ने मेरे पाँव खिंच कर मुझे पूरा लेटा दिया. अशोक मेरे ऊपर से हट गया था. रंजन ने मेरे पांवो को मुड़ाते हुए मुझे उल्टा लेटा दिया. अशोक ने मेरी चोली को बंधी डोरिया खोल दी. अशोक ने मेरी चोली पूरी निकाल दी तब तक रंजन ने अपना कुर्ता खोल पूरा नंगा हो गया.
रंजन ने मेरी कमर को पकड़ अपनी तरफ खिंचा और मुझे घुटनो के बल आधा लेटा दिया. मेरे लहंगे को ऊपर उठा कर अपना लंड मेरी चूत में डाल धक्के मारना शुरू कर दिया. अशोक नीचे से हाथ डाल मेरी चूंचिया दबाता रहा.
मेरी सिसकिया निकल रही थी. रंजन भी जोर की आवाजे निकालते हुए मुझे चोदता रहा.
अशोक ने अपना हाथ चूंचियो से थोड़ा नीचे ले जाकर मेरे लहंगे का नाड़ा खोल दिया. रंजन ने मुझे चोदना छोड़ा और मेरा एक हाथ पकड़ लिया तो अशोक ने दूसरा.
फिर उन्होंने मुझे बिस्तर पर खडी होने को बोला. उन दोनों का हाथ पकड़े मैं जैसे ही खड़ी हुई, मेरा नाड़ा खुला हुआ लहंगा कमर से गिर कर मेरे कदमो में जा गिरा.
इतने भारी लहंगे से पता ही नहीं चला कब उसने मेरा नाड़ा खोल दिया था. मैं शरमा रही थी और दोनों ने मेरी शर्म मिटाने के लिए थोड़ी देर मुझे उसी हालत में खडी रखा. इस बीच कोई मेरा मम्मा दबा देता तो कोई मेरी चूत को सहला देता.
जैसे ही उन्होंने मुझे छोड़ा, तो मैं अपने घुटनो से अपना सीना छिपाये बैठ गयी. रंजन लेट गया और मुझे उस पर चढ़ने को बोला.
उन दोनों ने मुझे जबरदस्ती रंजन पर लेटा दिया. मैं जोंक की तरह उस से लिपट गयी. मेरे मम्मे उसके सीने से दब गए. उसने अपना लंड एक बार फिर मेरी चूत में घुसा अंदर बाहर रगड़ मारते हुए चोदने लगा.
थोड़ी देर में मेरे अंदर भी कुछ कुछ होने लगा, तो मैं भी आगे पीछे हिलते हुए चुदने लगी.
तभी अशोक आकर मेरे ऊपर चढ़ गया. वो अपना लंड ले मेरी गांड में घुसाने की कोशिश करने लगा. मैं उस पर चीखी कि उसने मुझे मना किया था एक साथ करने से.
उसने मुझसे कहा कि मैं दो मिनट लेकर देखु, अगर अच्छा नहीं लगेगा तो वो निकाल देगा. ये कहते हुए उसने अपना लंड मेरी गांड में घुसा धक्के मारना शुरू कर दिया.
एक बार तो मुझे दर्द हुआ, फिर अच्छा लगने लगा. कुछ सप्ताह पहले ही डीपू ने अपने लंबे चौड़े लंड से मेरी गांड का छेद बड़ा कर दिया था तो अभी इतनी तकलीफ नहीं हुई.
मोहित ने कैसे मंजू मोगे वाली की चुदाई करी और उसके मजे लिए. यह तो आप उसकी सची इंडियन सेक्स हिन्दी स्टोरी में जान पायेगे.
आगे पीछे दोनों छेदो से एक साथ चुदते हुए मुझे भी मजा आने लगा, तो मैं भी कराहने लगी और आहहह आहह्ह करते मजे लेने लगी.
रंजन हम दोनों के बोझ के तले दब गया, तो उसने अशोक को उठने के लिए कहा. कुदरत का कैसा मजाक था कि एक पराया मर्द दूसरे को अपनी बीवी को ही चोदने से मना कर रहा था, ताकि वो खुद उसकी बीवी को चोद पाए.
अशोक मेरे ऊपर से हट गया पर अपना लंड बिना बाहर निकाले पाँव झुकाये खड़े खड़े ही मेरी गांड चोदता रहा.
दो लोगो से चुदने की ख़ुशी से ज्यादा इस बात कि ख़ुशी थी, कि जिस चीज को लेकर तीन सप्ताह से परेशान थी अब मेरे पास खुला लाइसेंस था बच्चा पैदा करने का.
अशोक के मेरी गांड में पड़ते हर धक्के के साथ, मैं भी साथ ही साथ रंजन को धक्के मार उसके लंड को अपनी चूत के अंदर बाहर कर रगड़ रही थी.
वो सुहागरात का माहौल था या दो मर्दो से एक साथ चुदाई का प्रभाव कि मेरी चूत ने अपना पानी छोड़ना शुरू कर दिया था. मैंने अब रंजन के लंड को अपनीं चूत की और भी गहराई में घुसाना शुरू कर दिया. मेरी चूत की गहराइयों में उसके लंड के उतरते ही मेरे साथ रंजन की हालत भी ख़राब होने लगी.
हम दोनों मुँह खुला रख जोर से चीखते हुए आहें भर रहे थे.
मेरे और रंजन के सीने चिपके रहने से वहा पसीना पसीना हो गया. हमारी आहें सुन अशोक ने मेरी गांड मारना बंद कर दिया और अलग हो गया.
मैं भी पसीने से बचने के लिए अब बैठे बैठे ही ऊपर नीचे हो चुदने लगी, जैसे घुडसवारी कर रही हो. रंजन ने दोनो हाथो से मेरे मम्मो को मसलना शुरू कर दिया.
मजा तो बहुत आ रहा था, पर इसी स्थिति में इतनी देर तक करने से पाँव अकड़ने लगे थे. मैं ना चाहते खड़ी हुई ताकि पाँव सीधे कर सकू.
कुछ सेकण्ड्स के बाद ही मैं एक बार फिर बैठने लगी, तो रंजन ने उल्टी बैठने को बोला. मैं उसकी तरफ पीठ कर उसके लंड पर बैठ गयी.
मैंने रंजन का लंड एक बार फिर अपनी चूत में घुसा चोदना शुरू कर दिया. मैं अब ऊपर नीचे फुदकते हुए रंजन को चोद रही थी.
अशोक ने अपना लंड थोड़ा रगड़ा और मेरे मुँह में भर दिया. मैं उछलते हुए रंजन को चोद भी रही थी और अशोक का लंड चूस भी रही थी.
मेरा मुँह तो बंद था पर मेरे उस रात के दोनों पतियों की सिसकियाँ गूंज रही थी. इधर अशोक ने अपना पानी मेरे मुँह में छोड़ना शुरू किया और दूसरी तरफ रंजन और मैंने अपना पानी छोड़ना शुरू कर दिया.
अशोक अपना लंड मेरे मुँह में ही रखने की कोशिश कर रहा था, ताकि पानी ना छलके पर मेरी चूत से पानी रिसना शुरू हो गया.
अशोक ने झड़ने के बाद अपना लंड मेरे मुँह से बाहर निकाल दिया, पर उसका पानी अभी भी मैंने अपने मुँह में भर रखा था. रंजन से निपटु तो बाथरूम में जाकर वो पानी थूंक आऊ, पर रंजन अपनी पहली सुहागरात को इतना जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहता था.
मैंने नीचे देखा तो उसका लंड मेरी चूत से निकले पानी से पूरा भर चूका था था. नीचे दबी दो चार लाल गुलाब की पंखुडिया पर सफ़ेद पानी से भर दागदार हो चुकी थी. मुझे उन गुलाब की पंखुड़िया अपने जैसी लगी, मेरी तरह वो भी दागदार हो चुकी थी.
फिर मैंने अपने मुँह में अशोक का छोड़ा पानी अपमान के घूंट की तरह पी लिया. रंजन के कहने पर मैं उसके ऊपर पीठ के बल लेट गयी. उसने मेरे दोनों मम्मे दबोच लिए और मसलना शुरू कर दिया.
अब मैंने धक्के मारना बंद कर दिया था. मैंने अपने दोनों पाँव मोड़ दिए और अपनी चूत उसके लिए पूरी खोल दी और रंजन अपने घुटने मोड़ कर धक्के मारता हुआ मुझे चोदना जारी रखे हुए था.
इस बीच अशोक ने पास बैठे हुए मेरी चूत को सहलाना शुरू कर दिया. मेरी चुदाने की इच्छा फिर से जाग गयी. अंदर एक झुरझुरी सी होने लगी. रंजन के लंड की रगड़ के साथ मेरी आहें फिर से चालू हो गयी थी. हम दोनों अपने चरम की तरफ बढ़ने लगे.
रंजन: “बोल, ज्यादा अच्छा कौन चोदता हैं?”
मैं: “तुम..”
रंजन ने एक और जोर का झटका मारा बोला: “जोर से बोलो.”
मैं: “आहह्ह, रंजन ज्यादा अच्छा चोदता हैं.”
रंजन: “अब जब तक ख़त्म न हो मेरी तारीफे करती रहो.”
उसने मुझे ये बात रटते को बोली कि मेरा नया पति रंजन मुझे ज्यादा अच्छा चोदता हैं. मैं भी चूदने के आधे नशे में थी तो मैं भी ये बात जोर जोर से रटने लगी.
अशोक को तो अच्छा नहीं लगा होगा वो उसके चेहरे से पता चल गया, पर रंजन पर मर्दानगी का ज्यादा नशा चढ़ने लगा.
वो नीचे से अपनी गांड पटक पटक कर मुझे झटके मारता रहा. रंजन अब मुझे जो बोलने को कहता मैं वो बोलती, रंजन का मकसद खुद को उकसा कर ज्यादा मजे लेना था.
हम दोनों को कोई चिंता ही नहीं थी कि अशोक पर क्या बीतेगी. रंजन ने मुझे ये सब बातें बोलने को बोली और मैंने भी आधी मज़बूरी में ये सब बोला:
“आह्हह रंजन क्या चोदते हो तुम. उई माँ, आज तक तुम्हारे जैसा किसी ने नहीं चोदा. रंजन आज चोद चोद कर मेरी भौसड़ी फाड़ दो. रंजन अपना लंड और जोर से अंदर डाल कर हिलाओ. हां, ये वाला, आहह्ह्हह मेरी चूत, अपना पानी भर दो रंजन मेरी चूत में.”
रंजन अपनी तारीफे सुन सुनकर पागलो की तरह चोदे जा रहा था. दूसरी तरफ अशोक गुस्से में अपना लंड रगड़े जा रहा था.
फिर रंजन ने जोर जोर से आहह्ह्ह आहह्ह्ह करते हुए अपनी हर एक आहह्ह्ह के साथ अपने लंड से अपना पानी मेरी चूत में थूंक रहा था. अपनी आठ दस आहों के साथ ही उसने अपना सारा पानी मेरी चूत में उतार दिया. साथ ही साथ मैं भी झड़ गयी.
रंजन घायल शेर की तरह वही ढेर हो गया. मैं उस पर से उठी और मेरी चूत से जैसे सफ़ेद पानी की हलकी बौछार हुई और रंजन के लंड और गोटियो को नहला दिया.
मैं अपने आप को संभालती उसके पहले ही अशोक जो गुस्से में भरा बैठा था मेरे ऊपर टूट पड़ा. उसने मुझे वही बिस्तर पर उल्टी गिरा दिया और अपना लंड मेरी गांड में घुसा दिया. मैं तो वैसे ही थकी और भरी हुई थी तो बिना हरकत के लेटी रही.
अशोक मेरी गांड को जोर जोर से थाप थप की आवाज निकाले मारते हुए अपनी मर्दानगी साबित कर रहा था. अगर मैं चीखती तो शायद उसकी मर्दानगी साबित हो जाती.
जहा वो चोद रहा था वहा मजे से आहें तो आना मुश्किल था, पर हलके दर्द से कराह जरूर शुरू हो गयी. उसको इसी में संतोष मिल गया.
दोनों पतियों की असली मर्द होने की होड़ में मैं पीस गयी थी. उसने अगले पांच दस मिनट तक मेरी गांड मार कर अपनी भड़ास मिटाई और मैं कराहते हुए उसकी मर्दानगी को संतुष्ट करती रही.
उसके मेरी गांड में झड़ने के बाद ही उसने मुझे छोड़ा. मेरे में अब हिम्मत नहीं बची थी कि मैं उठ कर चल भी पाऊ. उन्ही दोनों ने मिल कर जितनी साफ़ सफाई करनी थी उतनी की.
मैं वही लेटी रही और मेरे दोनों पतियो ने मुझे बीच बिस्तर में लेटा मेरे आजु बाजू आकर लेट गए. इतनी मेहनत करने के बाद हम तीनो ने चैन की नींद ली.
सुहागरात की अगली सुबह मेरी आँख तब खुली जब रंजन मुझ पर चढ़ कर मुझे चोदने में लगा था. मेरी पहली नजर आस पास गयी अशोक को ढँढ़ते हुए, पर वो कही नजर नहीं आया. मैंने अपने हाथों से रंजन को पीठ पर मारते हुए रोकने की कोशिश की.
मैं: “उतर, छोड़ अशोक आ जायेगा.”
रंजन: “अरे घबराओ मत, तुम एक दिन के लिए मेरी बीवी हो. मुझे तुम्हे चोदने से कोई नहीं रोकेगा.”
वो मुझे खिसकाता हुआ पलंग के कोने तक ले आया और मेरा सर पलंग के साइड से लटक सा गया. अब उसने मुझे चार-चार सेकंड के अंतराल से एक एक बहुत गहरा झटका चूत के अंदर मारना शुरू किया.
थोड़ा पानी तो उसका बनने ही लगा था और थपाक की एक जोर की आवाज के साथ वो झटके मार रहा था.
उसके जोर के गहरे झटके के आगे मैं कराहने के अलावा कुछ ना कर सकी. हर चार सेकंड में एक झटका और उसके बाद मेरी एक आहह्ह्ह..
बाथरूम से फ्लश की आवाज आयी और मैं घबरा गयी कि अशोक आने वाला हैं, पर रंजन ने मुझे बिस्तर से लटका के रखा था और मैं उसके झटके के अलावा हिल भी नहीं पा रही थी.
इन्ही रुक रुक कर पड़ते झटको के बीच अशोक बैडरूम में आया और मुझे चुदता देख रंजन को रोकने लगा.
अशोक: “सुहागरात हो गयी, छोड़ दे अब तो.”
रंजन झटके मारते मारते ही बोला “अभी चौबीस घंटे कहा हुए. थ्प्पप्प्प [झटका] आह्हह्ह्ह.. अभी तो ये मेरी बीवी हैं, थ्प्प्पप्प्प [झटका] आह्हह्ह्ह.. बीवी को चोदने में क्या बुराई हैं.”
मैं अपने आप को अशोक की नजर में खुद को एक शिकार दिखाते हुए उससे बचाने की गुहार करने लगी.
मैं: “अशोक थ्प्प्पप्प्प [झटका] आह्हह्ह्ह्ह.. छुड़ाओ ना मुझे थ्प्पप्प्प [झटका] आह्हह्ह्ह..”
अशोक ने आगे बढ़कर रंजन को रोका और मैं उसके चंगुल से छूट कर उठ खड़ी हुई. मेरा दुल्हन का वेश वहा बिखरा पड़ा था. मैंने अपना शर्ट पाजामा निकाला और बिना पहने ही उसे लेकर बाथरूम में भाग गयी.
थोड़ी देर बाद मैं बाथरूम से निकली. अशोक सोच रहा था कि वो काम पर जाए ना जाये. एक छुट्टी वो पहले ही ले चूका था, तो आज रुकने का मुश्किल था और उसे मुझे ना चाहते हुए भी अपने टेम्पररी पति के भरोसे छोड़ कर जाना था.
अशोक ने मुझसे कल रात के व्यवहार के लिए माफ़ी मांगी. मैंने अशोक के लिए लंच पैक कर के दिया, मैंने अशोक को विदा किया ये जानते हुए कि रंजन मेरा पुरे दिन क्या हाल करने वाला था.
मैं कपड़े लेने बेडरूम में गयी तब तक रंजन अंदर बेडरूम में ऐसे ही नंगा पड़ा था. रंजन ने मुझे फिर पकड़ लिया.
मैं: “छोडो मुझे.”
रंजन: “मेरी बीवी हो, ऐसे कैसे छोड़ दूँ.”
मैं: “अपनी बीवी को नहाने भी नहीं दोगे क्या?”
रंजन: “चलो मैं भी आता हूँ, पति पत्नी आज साथ में नहाएंगे.”
मैं अपने असली पति के साथ भी आज तक बाथरूम में साथ नहीं नहाई फिर ये तो एक दिन का पति था.
रंजन मुझे ले कर बाथरूम में आ गया साथ में नहाने को. मुझे सीधा ले जाकर शॉवर के नीचे खडी कर दिया और शॉवर चालू कर दिया. मैंने शर्ट और पाजामा पहन रखा था जो थोड़ी ही देर में पूरा गीला हो गया. उसने मुझे पीछे से झकड़ कर रखा था.
उसने तो वैसे भी कपड़े नहीं पहन रखे थे, पर कपड़ो के गीले होने से मैं असहज होने लगी. उसने अब आगे से मेरे गीले शर्ट के बटन खोलना शुरू कर दिया.
एक एक बटन खुलने के साथ ही मेरा ब्रा दिखने लगा. सारे बटन खोल उसने शर्ट को मेरे कंधो और हाथों से निकाल नीचे फेंक दिया.
उसके बाद उसने मेरे ब्रा सहित मेरे बड़े मम्मो को मसलना शुरू कर दिया. मेरे मम्मे दबने से ब्रा के ऊपर से फूल फूलकर कर बाहर आ रहे थे. उसने अपने होंठ मेरे कंधो पर रख चूमना शुरू किया और मैं सिसकिया भरने लगी.
नमिता के एक आशिक ने कैसे उसकी कुवारी चूत की चुदाई करी, कैसे नमिता उसके लोडे की दीवानी हो गयी यह सब जानिए उनकी चुदाई स्टोरी में!
अगली बारी मेरे पाजामे की थी. उसने नीचे बैठते हुए मेरा पाजाम नीचे से पूरा निकाल दिया. वो तो मेरी पैंटी भी निकालने वाला था, पर मैंने उसको पकड़े रख कर नहीं निकालने दिया. वह अब फिर खड़ा हो गया और मेरे कंधे और गर्दन को चूमने लगा.
मेरी पीठ पर हाथ फेरते फेरते उसने मेरी ब्रा का हुक भी खोल दिया और नंगी पीठ पर चूमने लगा. मैं सिसकिया भरते हुए आँखें बंद रख मजे लेने लगी. उसने मेरी ब्रा के दोनों स्ट्रैप को कंधे से नीचे लुढ़का दिया, मेरी मुड़ी हुई कोहनियो पर ब्रा अटक गया.
मैंने अपने हाथ सीधे किये और ब्रा को नीचे गिरने दिया. ब्रा के नीचे गिरते ही उसने अपने दोनों हाथ आगे लाते हुए मेरे दोनों फूल कर तन चुके मम्मो को दबोच लिया.
अगले कुछ मिनट वो मेरी चूंचियो को ऐसे ही मसलता रहा.
उसने मुझे पीछे से झकड़ कर रखा था और अब तक उसका लंड कड़क हो चूका था और मेरी पैंटी के ऊपर से ही मेरे नितम्बो को छू रहा था.
अब उसने अपना एक हाथ मेरे मम्मो से हटाया और मेरे कमर और पेट पर फेराने लगा, जब कि दूसरा अभी भी मेरे मम्मो को मसल रहा था.
पेट पर हाथ फेरते फेरते मेरी पैंटी में आगे से हाथ घुसा दिया और मेरी चूत पर रगड़ने लगा. उसका एक हाथ मम्मो पर, दुसरा मेरी चूत पर तो उसका लंड मेरी गांड पर मल रहा था.
उसने मेरी गरदन के पीछे अपने होंठ रख कर मुझे चूमा और अपने होंठ चूमते चूमते रगड़ते हुए रीढ़ की हड्डी के सहारे पीठ पर फिराते हुए नीचे आता गया और साथ ही मम्मो पर रखा हाथ भी नीचे कमर पर आ गया और पैंटी में घुसाया हाथ भी निकाल कमर के दूसरी तरफ रख दिया.
अब वो चूमते चूमते अपने होंठ कमर के नीचे जहा पैंटी बंधी थी वहा तक ले आया. एक दो पल वो वही चूमता हुआ रुका. अब उसने अपने दोनों हाथ जो कमर पर रखे थे उनसे मेरी पैंटी नीचे खिसकाते हुए अपना चूमना जारी रखते हुए पैंटी के साथ ही साथ नीचे उतरता रहा.
मेरी पैंटी अब मेरी गांड को उघाड़ते हुए नीचे आ गयी और उसका चूमना मेरी गांड की दरारों पर आकर रुक गया. उसने मेरी पैंटी पूरी पाँव से निकाल दी और मेरी चूत से निकला मेरा चिकना पानी शॉवर के पानी से मिल कर धुल गया.
मैं अब बुरी तरह से थरथराते हुए तड़प रही थी. उसकी जादुई छुअन ने मुझको पूरा झकझोर दिया था. वो एक बार फिर उठ कर मेरे पीछे से चिपक कर खड़ा हो गया.
उसने शावर बंद किया. उसने साबुन उठाया और मेरे मम्मो पर प्यार से रगड़ कर झाग बना के अपने हाथ से मलने लगा. उसके हाथ मेरे मम्मो पर फिसलते हुए मालिश कर रहे थे. उसने फिर साबुन मेरे पेट और कमर और पीठ पर भी लगा कर आगे पीछे सब तरफ बारी बारी से मलने लगा. खास तौर से वो मेरे मम्मो को सहला रहा था.
अब उसने मेरी गांड जांघो और फिर मेरी चूत पर साबुन लगा दिया और रगड़ने लगा. मैं मदहोश हो कर सिसकियाँ मार रही थी.
फिर मेरी बारी आयी साबुन लगाने की. मैंने भी उसके सीने पेट और पीठ पर साबुन लगाया. उसके गांड पर साबुन लगाते वक्त मुझे बड़ी शर्म आयी. लगते लगाते ही वो घूम गया और अपना लंड आगे कर दिया. वो तो पहले से ही कड़क था तो मैंने थोड़ा साबुन अपने हाथों पर लगा कर उसका लंड अपने हाथों में लिया और प्यार से रगड़ने लगी. वो मजे के मारे अब सिसकियाँ लेने लगा.
मैंने थोड़ा साबुन उसके लंड के नीचे लटकी थैलियों पर भी मला. सारा साबुन लगा कर मै अब खड़ी हो गयी. उसने मुझे गले लगा लिया और मेरा बदन आगे से उसके बदन से चिपक कर थोड़ा फिसलने लगा. उसने अपने होंठो में मेरे गीले होंठ एक पल के लिए भरे और छोड़ दिए.
दो पलो के बाद उसने फिर मेरे होंठ अपने होंठ से पकड़ छोड़ दिए. सात आठ बार उसने ऐसे ही मेरे होंठ पकड़ कर छोड़े और मैं उसके होंठो को पकड़ने के लिए तड़पती रही. वो मुझे तरसा रहा था.
अगली बार जैसे ही वो अपने होंठ मेरे होंठो पर लाया, मैंने उसके होंठो अपने होंठो से पकड़ ही लिया और छोड़ने नहीं दिया. हम दोनों एक लम्बी चुम्बन में खो गए और एक दूसरे की जबान को मुँह में रगड़ते चुम्बन का आनंद लेने लगे.
उसका लंड धड़कता हुए आगे से मेरी चूत के ऊपर हलके धक्के मार रहा था. जब मैंने उसको चूमना छोड़ा तो उसने मुझे दीवार के सहारे पीठ कर खड़ा कर दिया और एक फ़ीट दूर खड़ा हो गया. मैंने हसंते हुए उसका लंड अपने हाथ में पकड़ा और अपनी तरफ खिंचा. वो मेरे करीब आ गया और मेरी एक टांग घुटनो के नीचे हाथ डाल ऊपर कर दी.
मैं उसका लंड अभी भी पकड़े थी, तो अपनी चूत के छेद के पास ले आयी और अंदर डालने लगी. उसने भी हल्का सा जोर लगाया और साबुन लगा लंड फिसलता हुआ मेरी चूत में उतर गया. एक बार अंदर जाने के बाद जैसे हम दोनों को करार आया.
रंजन अब ऊपर नीचे होते हुए खड़े खड़े ही मेरी चूत चोदने लगा. इतनी देर की कामुक मसाज से वैसे ही हमारा पानी निकलना शुरू हो गया था, तो उसके लंड के अंदर घुसते ही हमारा काम शुरू हो गया था और दोनों का पानी मेरी चूत के अंदर संगम करने लगा.
हम दोनों जोर जोर की आहें भरते हुए थोड़ी थोड़ी देर से अपना बून्द बून्द पानी छोड़ते हुए मजे ले रहे थे. मैंने एक हाथ से शॉवर फिर शुरू कर दिया और हम दोनों भीगते हुए चुदाई का मजा लेने लगे. इतना पानी हो गया था कि समझ ही नहीं आया कौन सा पानी शॉवर का था और कौनसा मेरी चूत से निकला हुआ था.
उसने अब अपना लंड मेरी चूत से निकाला और मुझे दीवार की तरफ मुँह कर खडी कर दिया. मैं आगे सर झुका कर दोनों हाथ दीवार पर टिकाये खड़ी हो गयी और उसने मेरी गांड के दोनों हिस्सों को चौड़ा करते हुए अपने लंड के लिए जगह ढुंडी और अपना लंड एक बार फिर मेरी चूत में घुसा कर चोदने लगा.
इस स्तिथि में वो अब और भी जोर से झटके मार पा रहा था और गिरते पानी और चूत के अंदर छूटे पानी की वजह से अंदर बाहर दोनों तरफ शरीर टकराने से जोर जोर थप्प्प्पप थप्प्पप्प्प थप्प्पप्प्प की आवाजे होने लगी. बाहर से थपाक आवाज और उसके बाद अंदर से फच्चाक की आवाज एक के बाद एक आ रही थी.
थोड़ी देर इसी तरह जोर जोर से चोदते हुए उसने अपना सारा पानी मेरी चूत में खाली करते हुए झड़ गया और मैं भी इस बीच आहें भरते और अंत में झड़ते हुए चीखने लगी. झड़ने के बाद हमने शॉवर में नहा कर अपने शरीर को साफ़ किया.
नहाने के बाद उसने मुझे कपड़े भी नहीं पहनने दिए. हम दोनों नंगे ही बाहर आये और इसी हालत में हमने नाश्ता किया. उसने मुझे सिर्फ बाल बनाने दिए और मेकअप करने दिया.
हम दोनों की शादी ख़त्म होने में कुछ घंटे ही बचे थे. हनीमून पर तो जा नहीं सकते वो मुझे मूवी दिखाने ले जाना चाहता था. घर पर रहकर उसके हाथों चुदती इससे अच्छा था कि बाहर मूवी ही देख ली जाये.
उसकी फरमाइश पर एक नई नवेली दुल्हन की तरह मुझे साड़ी पहननी पड़ी. वो मुझे एक मल्टीप्लेक्स में ले जाने की बजाय एक सिंगल स्क्रीन थिएटर में ले गया वो भी एक फ्लॉप मूवी दिखाने के लिए. वो मुझे सबसे पीछे वाली कतार में कोने वाली सीट पर ले गया.
मंगलवार की सुबह थी तो पूरा हॉल लगभग खाली था. हमारी तरह कुछ प्रेमी जोड़े जरूर थे जो एक एक कोना पकड़ कर बैठे थे. वो भी एकांत की जगह की तलाश में आये थे, ताकि अपने साथी को चुम सके और यहाँ वहा हाथ लगा कर छू सके.
शायद रंजन का भी यही प्लान था, पर वो ये काम घर पर भी कर सकता था. शायद ज्यादा रोमांच के लिए वो पब्लिक में लाकर ये सब करना चाहता था.
उसने मेरी पीठ पर हाथ ले जाकर मेरा ब्लाउज पीछे से खोल दिया और फिर आगे से ब्लाउज के नीचे हाथ घुसा कर मेरे मम्मे दबाने लगा. मैं बस हल्का सा विरोध ही कर पा रही थी. मैं थिएटर में अकेली लड़की नहीं थी, वहा बाकी लड़कियों का भी यही हाल था.
रंजन ने मुझे उसकी गोद में बैठने को कहा, मैंने मना कर दिया पर उसने जबरदस्ती मुझे खिंच कर अपनी गोद में बैठा ही दिया. एक बार बैठने के बाद तो उसने अपने दोनों हाथ आगे लाकर मेरे ब्लाउज में घुसा दिए और आराम से दबाने के मजे लेने लगा.
फिर उसने मेरी ब्रा का हुक खोल कर मेरे कंधे से स्ट्रेप निकाल दिए. फिर ब्लाउज के अंदर हाथ डाल कर ब्रा पूरा निकाल दिया और मेरी खाली सीट पर रख दिया.
मैं अपनी साड़ी से अपना सीना ढकने का प्रयास करती रही. थोड़ी देर बाद उसने मुझे अपनी गोदी से उठा कर आगे की खाली सीट के हेड रेस्ट पर झुका दिया. उसने मौका देख मेरे विरोध के बावजूद मेरी साड़ी को पेटीकोट सहित नीचे से ऊपर उठा दिया और मेरी पैंटी पकड़ कर नीचे खींच उसे भी मेरे सैंडल से होते बाहर निकाल कर पास वाली सीट पर ब्रा के पास रख दिया.
मैं घबरा कर एक बार फिर उसकी गोद में बैठ गयी. पास वाली सीट पर मेरे अंदर के कपडे पड़े हुए थे और मुझे डर लगने लगा कि ये अब क्या पूरा नंगा करेगा.
हालांकि हॉल में अँधेरा था पर स्क्रीन पर चलती मूवी से रह रह कर थोड़ा उजाला हो रहा था, आगे की कुछ सीटों पर बैठे कपल्स को आपस में चूमते हुए की झलक दिख रही थी.
रंजन ने फरमाइश रखी कि वो मुझे अभी इसी वक़्त चोदना चाहता हैं. मैंने उसको कहा कि यहाँ बहुत खतरा हैं, उसे जो भी करना हैं घर जाकर करे मैं उसको मना नहीं करुँगी. पर वो अपनी जिद पर अड़ गया.
कौनसा पति अपनी पत्नी को खुले में चोदना चाहेगा, पर वो कौनसा मेरा परमानेंट पति था जो इतना सोचता.
सिनेमा हॉल के अँधेरे में मेरा ब्रा और पैंटी रंजन पहले ही खोल कर बाहर निकाल चूका था और मेरा ब्लाउज भी पीछे से खुला था. मैं उसकी गोद में बैठे सोच रही थी कि अब वो क्या करने वाला हैं.
तभी उसने मुझे एक बार फिर आगे की सीट पर झुक कर खड़ी कर दिया और रंजन ने अपने कपडे खोल नीचे कर दिए. उसने मेरी साड़ी को पेटीकोट सहित एक बार फिर ऊपर उठाया और मुझे वो कपडे ऊपर ही पकडे रखने को कहा.
मैंने अपने कपड़े उठाये और पीछे से अपनी गांड खोल कर खड़ी हो गयी. हॉल में इतने लोगो के होते हुए चुदवाना वाकई किसी रोमांच से कम नहीं था. रंजन ने अपना लंड मेरी चुत में घुसा दिया और धक्के मारना शुरू कर दिया.
मैंने अपने एक हाथ को आगे की सीट पर रख सहारा लिए खड़ी थी और दूसरे हाथ से अपने कपड़े उठाये हुए थी. आगे बैठी एक लड़की की नजर हम पर पड़ी और वो समझ गयी कि पीछे क्या खिचड़ी पक रही हैं. उसने हँसते हुए अपने बॉय फ्रेंड को भी बताया और वो लोग अपना काम छोड़ हमें देखने लगे.
मुझे बहुत शर्म आयी और रंजन को भी बताया, पर उस पर इसका कोई असर नहीं हुआ. वो दोनों खिलखिलाते हुए लाइव चुदाई का मजा देख रहे थे.
वो तो अच्छा था कि हॉल में अँधेरा था और मूवी के अधिकतर सीन भी अँधेरे के थे तो वो लोग ज्यादा कुछ देख नहीं पाए. पर मैं वो चार अजनबी आँखें कभी नहीं भूल पाऊँगी.
बाहर निकलते वक़्त भी मुझे सचेत रहना था और मुँह ढक कर ही निकलना था, ताकि वो लोग मुझे भविष्य में कभी पहचान ना पाए. पर फिलहाल रंजन अपने रोमांच का मजा ले रहा था.
मेरा इस मुसीबत से बचने का एक ही तरीका था कि उसका जल्दी से हो जाए. इसलिए मैंने भी अपनी गांड को पीछे धक्के मारना शुरू कर दिया.
उस पर से मूवी ने भी मेरी मदद कर दी. उसमे एक गरमा गरम सीन आ गया. खूबसूरत हीरोइन के कपडे थोड़े खुल कर अंग दिखने लगे और सेक्स सीन शुरू हो गया.
इससे रंजन और गरम हो गया. वो जोर जोर से झटके मारने लगा और गरम सीन के ख़त्म होते होते तो वो मेरी चूत में ही झड़ गया.
मैंने भी चैन की सांस ली. कपडे नीचे कर मैंने अपनी पैंटी पहन ली और ब्लाउज को भी बंद कर दिया. ब्रा को तो मैंने अपने पर्स में डाल दिया, उसको अभी पहनना संभव नहीं लगा.
मूवी अभी भी चल रही थी पर रंजन का काम हो चूका था, तो हम वहा से निकलने लगे. मैंने अपनी साड़ी अपने सर पर ओढ़ ली ताकि हॉल में जिस किसी ने भी हमे चुदते देखा मेरी शकल ना देख पाए.
बाहर आकर रंजन ने मुझे वही लंच करवाया और थोड़ा बहुत घूम कर शाम होने के पहले हम घर आये.
घर आकर हमने कपड़े बदले, इस बार उसने मुझे नंगी रहने को बाध्य नहीं किया. मैं थोड़ा सोकर रेस्ट करना चाहती थी पर ये भी पता था कि वो मुझे सोने नहीं देगा उल्टा एक बार फिर चोद देगा. इसलिए मैं घर के इधर उधर के कामो में व्यस्त होने का प्रयास करती रही.
वो लगातार मेरे आगे पीछे घूम रहा था और ताड़ रहा था. टी वी पर उसने जानबूझकर रोमांटिक द्विअर्थी गाने चला दिए और साथ में गाते हुए मुझे छेड़ने लगा. गाने देखते देखते उसका तो जैसे फिर से मूड बन गया और मुझे चोदने की फरमाइश करने लगा.
मैं काम का बहाना बना उसको टालती रही ताकि तब तक पति घर आ जाये. थोड़ी देर तक उसने इंतज़ार किया और फिर जब मैं रात के खाने की तैयारी में रसोई में काम कर रही थी, तो उसने रसोई में आकर अपने सारे कपड़े खोल दिए और मेरे सामने आकर खड़ा हो मुझे उत्तेजित करने की कोशिश करने लगा.
उसका लंड ऊपर नीचे हो नाचते हुए मुझे बुला रहा था और मैं शर्म के मारे सिर्फ मुस्करा भर रही थी और अपना काम कर रही थी. उसने आकर एक एक कर जबरदस्ती मेरे सारे कपड़े खोल कर मुझे रसोई में ही नंगी कर दिया. मेरे और उसके सारे कपडे रसोई में जमीन पर बिखरे हुए थे.
उसने मुझे किचन के प्लेटफार्म पर बैठाया और पाँव ऊपर उठा कर चौड़े कर अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया और खड़े खड़े ही अंदर बाहर झटके मारने लगा. हर झटके के साथ वो आहह्ह्ह आहह्ह्ह की आवाज निकाल कर माहौल बनाने लगा.
मैं कोहनी के बल पीछे झुक कर बैठी बैठी ना चाहते हुए भी उससे चुदने का मजा लेने लगी. मुझे लग गया कि देर शाम को रंजन चला जायेगा और ये शायद मेरी उसके साथ आखरी चुदाई हैं.
उसने अब मुझे चोदना छोड़ा और हाथ पकड़ कर बाहर हॉल में ले आया और खुद सोफे पर बैठ गया और मुझे अपनी गोद में बैठ चोदने को बोला.
मैं दोनों घुटनो को सोफे पर रंजन के पावो के दोनों तरफ करते हुए बैठ गयी. उसका मुँह मेरे मम्मो के ठीक सामने था तो उसने मेरे निप्पल को चूसना शुरू कर दिया.
चूसते चूसते ही उसने अपना लंड मेरी चूत में घुसाने का प्रयास किया, तो मैंने अपना शरीर थोड़ा ऊपर उठा कर उसको जगह दी और उसने अंदर डाल दिया.
मैं अब ऊपर नीचे हो कर चुदने लगी तो उसने मेरे मम्मे चूसना छोड़ा और अपने हाथों से ही दबा कर मुझे मजा दिलाने लगा. उसने फिर दोनों हाथ मेरी गांड पर रख दिए और मेरे ऊपर नीचे होती गांड के साथ ही उसके हाथ भी ऊपर नीचे हो मेरी गांड को रगड़ रहे थे.
मैं आगे झुक कर सोफे को दोनों हाथो से पकड़ सहारा ले कर उछल रही थी. मेरे झुकने से मेरे मम्मे उसके मुँह को रगड़ रहे थे और वो अपनी जबान बाहर निकाले मेरे मम्मो को गीला कर रहा था.
हम दोनों का एक बार फिर पानी बनने लगा और मेरे उछलने के साथ ही फच्च फच्च आवाज के साथ हम नशे में उतरने लगे. चुदते चुदते समय का ध्यान ही नहीं रहा और अशोक भी जल्दी घर आ गया मेरी चिंता में. रंजन कुछ ज्यादा ही जोर से आहें भर रहा था तो मुझे भी दरवाजे के खुलने की आवाज नहीं आयी.
रंजन ने अशोक को देख लिया और उसने मन ही मन एक प्लान बना लिया. उसने मुझे दबी आवाज में कहा कि जोर से करो. मुझे लगा उसका होने वाला हैं तो मेरा भी पीछा छूटेगा तो मैं जोर जोर से उछलते हुए चोदने लगी. जिससे मेरे मुँह से सिसकिया निकलने लगी.
अचानक रंजन ने मेरे कंधे को हल्का धक्का देते हुए कहना शुरू कर दिया छोड़ो छोड़ो. मुझे लगा उसे मजा आ रहा है और झड़ने वाला हैं और सोफे पर ही पानी निकल जायेगा इसलिए छोड़ने को बोल रहा है. मगर मैं उसका काम जल्दी ख़त्म करने के चक्कर में और जोर से कर चोदने लगी.
अशोक अंदर आया और उसने जोर की आहट की, हम दोनों का ध्यान उसकी ओर गया. मैंने डर के मारे आहें भरना और उछलना बंद कर दिया पर रंजन को कोई फर्क नहीं पड़ा.
अशोक: “तुम्हारे चौबीस घंटे अभी पुरे नहीं हुए क्या?”
रंजन : “मैं क्या करू? ये प्रतिमा ही मेरे ऊपर चढ़ कर चोद रही हैं. बोल रही थी कि अशोक का लंड तुम्हारे जैसा नहीं हैं तो चुदने का मजा नहीं आता.”
एक तो रंजन सुबह से मेरे साथ जबरदस्ती कर रहा था ऊपर से मेरे ऊपर ही इल्जाम डाल कर मेरे पति के सामने मेरी बेज्जती कर रहा था. मैं तुरंत उस पर से उतरने लगी पर उसने मेरी कमर कस कर पकड़ते हुए मुझे ऊपर नीचे धक्के देता रहा.
मैं उस पर चिल्लाई कि वो मुझे छोड़ दे. अशोक ने भी जो देखा और सुना उसे भी शायद यही लगा कि रंजन सही हैं. अशोक ने आकर हम दोनों को अलग किया.
फिर मैं उसके ऊपर से उतर गयी. मेरी चुत में आधा चुदने की वजह से एक अजब सी हूल मच रही थी. पर उस पर से उतरना भी जरुरी था अपनी बची खुची इज्जत को बचाने को.
अशोक रसोई की तरफ गए अपना लंच बॉक्स रखने के लिए, वहा मेरे और रंजन के कपड़े नीचे बिखरे पड़े थे तो पता नहीं उसने मेरे बारे में क्या सोचा होगा. मैं उस वक्त अपनी सफाई रखती तो शायद अशोक को मैं ही गलत नजर आती.
फिर अशोक सीधा बैडरूम में चला गया और मैं रसोई में अपने कपड़े उठाने गयी. पीछे पीछे रंजन भी आ गया और मुझे वही रसोई में जमीन पर गिरा दिया और मुझ पर चढ़ कर चोदने लगा.
एक बार तो मुझे भी मजा आया कि मेरी आधी अधूरी चूत की प्यास मिटा रहा था. पर जैसे ही अशोक का ख्याल आया तो मैंने अपने आप को छुड़ाने का प्रयास किया.
उसने लुढ़का कर मुझे अपने ऊपर कर दिया और कहा कि अशोक को कपड़े बदलने में समय लगेगा तो कर लेते हैं, पर मैंने मना कर दिया और उसको छोड़ने को कहा.
पर उसने कहा एक शर्त पर छोड़ेगा कि मैं उसे दस झटके मारते हुए चोदु और हर झटके के बाद उसको बोलू कि रंजन आज तुझे चोदे बिना नहीं छोडूंगी.
मुझे लग गया कि वो मुझे फंसाना चाहता है, तो मैंने मना कर दिया पर उसने मुझे झकड़ कर पकडे रहा और नीचे से झटके मारता रहा. उसने मुझे कमर से इतना कस कर पकडे रखा था कि मेरी कमर दर्द होने लगी थी.
एक दिन बस में सफ़र करते हुए इलियास को एक देसी आंटी की चुदाई करना का मोका कैसे मिला, उसकी सची देसी सेक्सी स्टोरी में जानिए.
तभी दरवाजा बंद होने की आवाज आयी.
मैं: “चलो छोडो, अशोक आ गया हैं”
रंजन: “अरे वो बाथरूम के दरवाजे के बंद होने की आवाज हैं, मैंने कहा वैसा तुम दस बार करो, अशोक नहीं आ पाएगा तब तक.”
मैंने कुछ सेकंड अपने आप को छुड़ाने की कोशिश की पर उसकी पकड़ से नहीं निकल पायी और आस पास देखा अशोक नहीं था तो मुझे उसकी बात माननी पड़ी.
रंजन: “इतनी देर से मानी, अब दस की जगह बीस बार करना हैं. शुरू करो!”
वो मेरी कमर पकड़े रहा और मैंने बीस झटके मार चोदना शुरू किया और उसके कहे अनुसार उसको बोलती रही “रंजन आज तुझे चोदूंगी. आहह्ह, रंजन आज तुझे चोदूंगी. आह्हह्ह्ह रंजन आज तुझे चोदूंगी. आह्हह्ह रंजन आज तुझे चोदूंगी.” झटको के बीच मुझे मजे भी आ रहे थे तो मेरी आहें भी निकल रही थी और रंजन की भी सिसकियाँ निकलने लगी.
बीस झटके शायद हो चुके थे और मैं झड़ने के एकदम करीब थी तो जोश जोश में मैंने आठ दस झटके ज्यादा ही मार दिए और हलकी चीख के साथ मैं झड़ते हुए बोली “उह्हह्ह्ह रंजन, आज तो तुझे चोदूंगी.”
रंजन ने मेरी कमर छोड़ दी, शायद उसका भी पुरा हो गया था इस बीच.
फिर रंजन एक बार फिर अचानक चिल्लाया “अरे अब तो छोड़ दो, सुबह से आठ बार मुझे जबरदस्ती चोद चुकी हो.”
मैं उसके ऊपर से हटी अपने कपडे उठाने के लिए और पीछे अशोक खड़ा था.
पता नहीं वो कब से खड़ा था, अगर वो मेरे बीस-पच्चीस झटको के दौरान आया तो उसके हिसाब से मैं ही आगे बढ़ कर रंजन को चोद रही थी.
मैं तो हक्की बक्की होकर मूर्ति की तरह खड़ी हो गयी. मैं उसके जाल में फिर फंस चुकी थी और अपने पति की नजरो में गिर गयी.
रंजन: “अशोक, ये प्रतिमा तुम्हारे साथ भी छुट्टी के दिन यही करती हैं क्या? सुबह से आठवीं बार चोदा हैं मुझको. मैं तो मना कर कर के थक गया हूँ.”
मैंने उसको खा जाने वाली नजरो से देखा. अशोक रसोई से चला गया और मैंने अपने कपड़े उठा कर पहनना शुरू कर दिया. रंजन भी कपड़े पहनने लगा.
मैं सीधा बाथरूम में गयी और अपनी साफ़ सफाई की. वापिस आयी तब रंजन अशोक से कुछ बात कर रहा था और मेरे आते ही चुप हो गया.
पता नहीं मेरे बारे में अशोक को और कितना भड़काया होगा उसने.
मैं उस पर बरस पड़ी और खूब खरी खोटी सुनाई और वो सब सब सुनता रहा. जब मैं रुकी तब उसने बोलना शुरू किया.
रंजन: “हो गया तुम्हारा बचाव पक्ष, अगर मुझसे चुदने में मजा आता हैं तो स्वीकार कर लो, अशोक के सामने शर्माने से क्या होगा.”
मैंने सौफे पर पड़ा एक कुशन उठा कर उस पर फेंक मारा. और दूसरी कोई चीज ढूढ़ने लगी उस पर फेंकने के लिए.
अशोक ने मुझको रोका और रंजन को खाना खाकर तैयार होने को बोला ताकि वो अपनी ट्रैन के लिए लेट ना हो. अशोक का चेहरा बहुत गंभीर था. मैंने उसको समझाने की कोशिश की कि पूरा माजरा क्या हैं और रंजन की चाल हैं पर अशोक ने मुझे सफाई नहीं देने दी.
मैं परेशान हो गयी, रंजन ने मुझे एक अलग मुसीबत में डाल दिया था. जब ऐसे काण्ड किये थे तब भी नहीं पकड़ी गयी और अभी मेरी गलती नहीं थी फिर भी इल्जाम मुझ पर था. इसी तनाव में मैंने उसके लिए खाना बनाया और रंजन ने खा लिया.
वो दोनों तैयार हो गए और रंजन का सारा सामान हॉल में इकठ्ठा करने लगे. अशोक जब बेडरूम में बचा हुआ सामान लेने गया, तब रंजन ने मुझे दबोच लिया और मेरे होंठो पर अपने होंठ लगा जबरदस्ती किस करने लगा.
उसने मुझे कमर से इतना कस कर पकड़ा था कि मैं ना तो बोल पा रही थी ना छुड़ा पा रही थी. किस करते हुए ही वो दीवार के पास ले गया और खुद को पीठ के सहारे खड़ा कर दिया और चूमता रहा.
मैं तो अपने आप को छुड़ा नहीं पायी पर उसने खुद ही मुझे धक्का देते हुए अलग किया और बोला “अब तो जाते जाते छोड़ दो, अब किस भी मेरे से ही लोगी, कुछ तो अशोक से भी करवा लो.”
कोई आश्चर्य नहीं था कि पीछे अशोक के आते ही उसने मुझे धक्का देते हुए अलग किया था, ताकि अशोक को लगे कि मैं ही रंजन को जबरदस्ती चुम रही थी. मैंने रंजन को मारने के लिए आगे बढ़ते हुए अपने हाथ उठाये पर अशोक ने जाने का फरमान सुना दिया.
रंजन ने भविष्य में कभी हमें ब्लैकमेल कर परेशान नहीं करने का वादा किया और हमें उसकी सगाई और शादी में जरूर आने का निवेदन किया.
अशोक उसे स्टेशन तक छोड़ आये और मैंने चैन की सांस ली कि चुदाई का एक तूफ़ान थम गया, पर उसने जाते जाते अशोक के मन में मेरे प्रति शक के बीज बो दिए थे.
अशोक के आने तक मैं इसी तनाव में बैठी रही. सोचा अशोक के आते ही उसको सब कुछ सच सच बता दूंगी की मैं खुद शिकार हूँ.
पर अशोक ने आते ही मुझे शांत कराया और बोला कि उसको सब पता हैं ये सब रंजन की चाल हैं. रंजन मेरे सिर्फ मजे ले रहा हैं तो मैं ज्यादा चिंता ना करू. रंजन ने रास्ते में अशोक को सब सच बता दिया था. ये सुन कर मुझे इतनी राहत मिली कि मेरे आंसू छलक गए.
थोड़े दिन बाद जैसा मुझ शक था मैं दूसरी बार गर्भवती हो चुकी थी. घर पर सब खुश थे. भाभी को अशोक की सारी सच्चाई पता थी तो वो मुझे शक की निगाहो से देख रही थी कि मैंने कहा मुँह काला कराया और पता नहीं किसके बच्चे की माँ बनी हूँ.
एक बार फिर मुझे नहीं पता था कि मेरे होने वाले बच्चे का असली पिता कौन था. डीपू जिसने मुझे महीने के पहले ही हफ्ते दो दिन के अंदर छह बार चोदा था, या फिर महीने के बीच के उन सबसे खतरनाक दिंनो में संजीव के फटे हुए कंडोम की एक चुदाई या फिर रंजन के द्वारा आखिरी हफ्ते में मेरी पांच बार चुदाई.
मैं रंजन की सगाई-शादी में नहीं गयी, पता नहीं और क्या जिद कर बैठे. अशोक अकेले ही गए. डर भी था कि कही एक दिन वो फिर से हमारी ज़िन्दगी में ना आ जाये, इस बार तो उसकी बीवी भी प्रभावित होगी.
पिछले एक महीने में मैंने स्वार्थवश जो भी एक के बाद एक किया था उससे मैं अंदर कही ना कही हिल चुकी थी. अपने आप पर गिन्न आ रही थी. कुछ ठीक नहीं लग रहा था. मैं तनाव में रहने लगी, जब कि मैं खुद शायद दूसरा बच्चा चाह रही थी. पर जिस तरह से ये बच्चा मेरी कोख में आया था मुझे ठीक नहीं लगा.
इसी तनाव के कारण तीन महीनो के अंदर ही मेरा गर्भपात हो गया और मैं डिप्रेशन (अवसाद) में चली गयी. शायद पाप का घड़ा भर गया था और फूटने की ही बारी थी.
अशोक ने मेरी हालत देख मुझे मशवरा दिया कि हम लोग फिर से किसी की मदद लेकर बच्चा पैदा कर सकते हैं. रंजन तो विदेश जा चूका था पर डीपू, संजू या मेरी पसंद के किसी भी मर्द से मैं मदद लेकर माँ बन सकती हूँ इसकी छूट अशोक ने दी दी थी. पर अब मैं इन सब चीजों में नहीं पड़ना चाहती थी.
घडी में सुबह के 10:30 बज गए थे और मेरे पति अशोक बेसब्री से पियूष का इंतज़ार कर रहे थे, जिसे 10 बजे आना था अपने रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम का डेमो देने के लिए. हमको ये सिस्टम नए घर के लिए लगवाना था जिसमें कुछ समय पहले ही रहने आये थे.
जब से मेरा गर्भपात हुआ था, मैं अवसाद में चली गयी और अशोक मुझे फिर अपने होम टाउन ले आये मेरी सास के पास. पर वहा महीने भर रहने के बाद भी मेरी स्तिथि में सुधार नहीं हुआ.
तब अशोक ने इसी शहर के बाहरी भाग में एक नया घर खरीद लिया. नए घर में आने के बाद मेरी मानसिक स्तिथि में थोड़ा सुधार होना शुरु हुआ.
पियूष पुराने वाले घर का पडोसी और अशोक का मित्र भी था. अशोक ने पियूष को फ़ोन किया और पता चला की वो रास्ते में ही हैं और पहुंचने वाला हैं.
पौने ग्यारह के बाद पियूष पंहुचा, अशोक ने आते ही शिकायत शुरू कर दी कि उसका ऑफिस का कॉल हैं 11 बजे इसलिए उसे 10 बजे बुलाया था.
मेरी हालत की वजह से अशोक ने ऑफिस का काम घर से ही करना शुरू कर दिया था और कभी कभार ही ऑफिस जाता था. हमारा बच्चा अधिकतर दादी के पास ही रहता था.
मुझे इस स्तिथि से निकालने के लिए अशोक ने मुझे ये विकल्प भी दिया की हम बच्चा पैदा करने के लिए फिर से किसी की मदद ले सकते हैं. पर मैं अब इन सब झमेलों में नहीं पड़ना चाहती थी.
पियूष ने अपने सारे कागजात जल्दी से बेग से बाहर निकाले. अशोक और मैं उसके दोनों तरफ बैठ कर सुनने लगे. थोड़ी ही देर में अशोक उठे और बोले मुझे कॉल के लिए जाना हैं. मेरे से कहा तुम सब अच्छे से समझ लेना और बाद में मुझे समझा देना, मैं बाहर गार्डन के पास वाले कमरे में बैठ कर कॉल अटेंड करूँगा और मुझे डिस्टर्ब मत करना एक घंटा लगेगा.
अब पियूष ने मुझको समझाना जारी रखा कि प्लांट कैसे काम करता हैं. अब वो अपने प्लान बताने लगा तो मैंने कहा थोड़ा ब्रेक लेते हैं, मैं चाय बना देती हूँ, चाय पीते पीते समझते हैं. जैसे ही मैं उठी एक चीख के साथ अपना घुटना पकड़ कर फिर सोफे पर बैठ गयी.
पियूष घबरा गया. मैंने कहा कि मेरी नस पर नस चढ़ गयी हैं. मुझे कभी कभी ऐसा होता हैं.
पियूष ने कहा, अब ठीक कैसे होगा, अशोक को बुलाऊ.
मैंने कहा, उन्होंने डिस्टर्ब करने से मना किया था, आप थोड़ी सहायता करके मुझे अंदर बिस्तर तक छोड़ दे.
मैं एक टांग पर खड़ी हो गयी दूसरी टांग घुटने के बल मोड़ रखी थी. पियूष ने मुझ को सहारा देते हुए अंदर बिस्तर पर लेटा दिया, मैंने एक टांग लंबी लेटा दी पर दर्द वाली टांग घुटनो से मोड़ कर खड़ी रखी थी. पूरा चेहरा बेचैनी से पसीने से भीगा था. मैंने अपना साड़ी का पल्लू कंधे से निकाला और हवा करने लगी.
पियूष ने पंखा तेज गति पर चला दिया. मैंने पियूष को दराज़ में रखे बाम को लाने के लिए कहा. पियूष ने बाम लाकर मेरे हाथों में रखा और कहा कि तुम आराम करो मैं किसी और दिन आ जाऊंगा डेमो के लिए.
मैं बाम लगाने के लिए उठने लगी कि दर्द के मारे फिर लेट गयी. पियूष रुक गया.
मैंने कहाँ – आपको तकलीफ ना हो तो आप यह बाम मेरे घुटनो पर लगा देंगे.
पियूष थोड़ा हिचकिचाया पर मेरी तकलीफ देख आगे बढ़ा और बाम ले लिया. एक हाथ से मेरा पेटीकोट साड़ी सहित मुड़े हुए घुटनो पर से हटा दिया. मेरी गोरी चिकनी टांग और जांघो का कुछ हिस्सा दिखने लगा था.
अब जैसे ही उसने वो बाम लगाया, मैं दर्द से चीखी और दर्द के मारे पियूष के दूसरे हाथ की कलाई जोर से पकड़ अपनी तरफ खिंच ली, पियूष तुरंत रुक गया.
मैंने पकड़ थोड़ी ढीली की तो पियूष का हाथ मेरे पेट पर आ गया. अब वो बहुत हलके हाथ से मेरे घुटने पर बाम लगाने लगा. रह रह कर मैं दर्द से पियूष की कलाई दबा लेती और छोड़ देती जिससे पियूष का हाथ मेरे पेट पर ऊपर नीचे होता रहा.
बाम लग चूका था, मैंने अभी भी पियूष की कलाई पकड़ रखी थी.
मैंने कहा कि अब थोड़ी राहत हैं, और पियूष से कहा कि अब वो धीरे धीरे मेरे मुड़े घुटने को सीधा कर देगा.
जैसे ही पियूष ने ऐसा करना चाहा, मैंने जोर से दर्द के मारे उसकी कलाई को खींचा जिससे पियूष का हाथ अब मेरे गले पर आ गया.
पियूष ने अब बहुत ही धीरे धीरे घुटना सीधा करना शुरू किया. हर एक हलके प्रयास के बाद दर्द के मारे मैं एक करवट लेती जिससे पियूष का हाथ गले से हट कर मेरे वक्षो पर आ लगता और मेरे सीधे होते ही फिर गले पर आ जाता. मुझे दर्द के मारे इन सब चीज़ो का अहसास भी नहीं था. अब घुटना सीधा हो गया था और दर्द कम हो चूका था.
मैं बोली आज ही नयी साड़ी पहनी थी, उसको कही बाम के दाग ना लग जाये, पति नाराज़ होंगे नई साड़ी खराब हुई तो.
पियूष फिर इजाजत लेकर जाने लगा और मैं साड़ी बदलने को उठने लगी, मैं दर्द के मारे एक आहहह के साथ फिर लेट गयी.
मैंने पियूष को जाने से पहले एक आखरी मदद के लिए कहा कि वो मेरी साड़ी निकालने में मदद कर दे. पियूष फिर से सकपकाया पर एक निसहाय औरत की मदद के लिए उसने वैसा ही किया.
पियूष बोला – शायद तुम इतने कस के कपडे पहनती हो इस वजह से ही तुम्हारे नस की समस्या होती हैं, तुम्हे हमेशा ढीले कपडे पहनने चाहिए और अभी जो पहने हैं वो भी ढीले कर देने चाहिए. ऐसा कह कर वो फिर से थोड़ा बाम घुटनो पर लगाने लगा.
जब से मैं अवसाद में गयी मेरा योगा और कसरत सब छूट गया था. मैं अपने फिगर का ध्यान नहीं रख पायी इस चक्कर में थोड़ा वजन बढ़ चूका था.
अशोक भी मेरे थोड़ा ठीक होने के बाद मुझे कह चुके थे कि मैं फिर से अपना पहले वाला रूटीन शुरू कर फिट हो जाऊ. पर मुझे कोई प्रेरणा ही नहीं मिल रही थी. मेरे पहले के कपड़े थोड़े टाइट हो चुके थे.
मैंने तुरंत पियूष का कहना माना और अपने ब्लाउज के हुक खोलते हुए कहने लगी, मेरे पति कहते हैं कि मैं मोटी हो गयी हूँ, इसलिए मैं कसे हुए कपडे पहनती हूँ.
सब हुक खोलने के बाद साइड में पड़ी साड़ी से सीना फिर ढक दिया. मैंने थोड़ी करवट ली और पियूष को पीछे ब्रा का हुक खोलने को कहा, पियूष ने थोड़ी सकपकाहट से ब्रा का हुक खोलते हुए कहा कि तुम कहाँ मोटी हो, तुम दुबली ही हो.
मैं अब फिर सीधा लेट गयी और बोली, तुम मुझे सांत्वना देने के लिए ऐसे ही कह रहे हो, और पियूष का हाथ पकड़ कर अपने पेट पर फेरते हुए बोली मैं मोटी नहीं हूँ क्या?
पियूष ने ना में गर्दन हिलाई और कहा यह एकदम फिट हैं.
मैंने कहा शायद मेरे अंदर के कसे वस्त्रो की वजह से तुम्हे महसूस नहीं हो रहा होगा, रुको मैं तुम्हे बताती हूँ कह कर मैं उठने लगी. पर पियूष ने मुझे फिर लेटा दिया और बोला जो भी काम हैं मुझे बताओ.
मैं बोली, मैं अपने अंदर के कसे हुए वस्त्र निकाल कर तुमसे पूछना चाहती हूँ कि क्या में सच में मोटी हूँ.
पियूष ने कहा, इसकी कोई जरुरत नहीं तुम मोटी नहीं हो.
मुझको यह झूठ लगा, मुझे दूध का दूध और पानी का पानी करना था. मैंने आग्रह किया कि मैंने पेटीकोट पहना हुआ हैं और पियूष मेरे अंदर के कसे वस्त्रो को उतार सकता हैं जिससे मेरी शंका का समाधान हो सके.
मेरी मनोस्तिथि पहले काफी बिगड़ गयी थी और अब सुधार था, पर फिर भी कभी कभार बेवकूफी भरी गलतियां भी कर बैठती थी. शायद उस वक्त मुझे ऐसा ही दौरा पड़ा था, एक गैर मर्द मुझे सहानुभूति दिखा रहा था और मैं उसको अपना शुभचिंतक मान उस पर हद से ज्यादा भरोसा दिखा बेवकूफी करे जा रही थी.
पियूष ने मन मार कर मेरे पेटीकोट के नीचे से अंदर हाथ डाल कर मेरी पैंटी निकाल दी. फिर मेरे पेट पर हाथ फिराते हुए कहने लगा यहाँ मोटापा नहीं हैं तुम एकदम फिट हैं.
मैं उसकी बात पर चाहते हुए भी यकीन नहीं कर पा रही थी.
मैंने कहा, शायद लेटे होने की वजह से मेरा पेट अंदर दबा हुआ हैं. मैं तुरंत उल्टी लेट गयी और गाय की तरह घुटने और हथेली के बल बैठ गयी, और बोली अब चेक करो.
मैंने बताया कि मेरा घुटना अब इस स्थिति में अच्छा महसूस कर रहा हैं. पियूष ने मेरे पेट पर हाथ फेरते हुए कहा अब भी कोई ज्यादा फ़र्क़ नहीं हैं और मेरा पेट एकदम फिट हैं.
मैं बोली अब आखरी शंका, शायद पेटीकोट का नाड़ा कस के बंधा हैं इस वजह से फ़र्क़ महसूस नहीं हो रहा होगा, तुम नाड़ा ढीला करो और फिर चेक करो.
पियूष ने बिना हिचकिचाहट के मेरा नाड़ा खोल दिया और पेट पर हाथ फेरते हुए बताने लगा सबकुछ ठीक हैं, कोई मोटापा महसूस नहीं हो रहा अभी भी. मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. पियूष ने मेरी दो समस्याओ का हल करने में उसकी बहुत मदद की थी.
मैं ये भूल गयी थी कि मेरा ब्लाउज और ब्रा के हुक खुले पड़े हैं और अब मेरा पेटीकोट का नाड़ा भी खुल चूका था.
पियूष अपना एक हाथ मेरे पेट और दुसरा कमर पर फेरते हुए कहने लगा, यह एकदम सपाट हैं और किसी मोटापे की चिन्ता की जरुरत नहीं हैं.
अगर आप पहली बार मेरी चुदाई की कहानी पढ़ रहे है, तो मेरी पिछली चुदाई की सेक्सी कहानियां पढना मत भूलियेगा!
हाथ फिराते हुए थोड़ी ही देर में उसका पेट वाला हाथ अनायास ही मेरे मम्मो तक जा पंहुचा जहा ब्रा और ब्लाउज के हुक खुला होने की वजह से उसके हाथ सीधे मेरे मम्मो को छू गए और वह उन्हें दबाने लगा.
मुझे अब अहसास हुआ कि मैं किस स्थिति में हूँ. पर मैं पियूष को रोक न पायी, उसने बड़े प्यार से मेरी मदद जो की थी. जब से मैंने गर्भधारण किया और फिर गर्भपात हुआ था, अशोक मुझसे थोड़े दूर दूर ही रहते थे और हमारे बीच शारीरिक संबंध लगभग ना के बराबर थे.
अब पियूष का कमर वाला हाथ आगे बढ़कर मेरे नितंबो की तरफ बढ़ा और मेरे नाड़ा खुल चुके पेटीकोट को नितंबो से नीचे उतार दिया और उंगलिया मेरे नितंबो के बीच फेरने लगा.
हम दोनों को पता था कि अशोक को आने में काफी समय हैं, हम दोनों उस छुअन का आनंद लेने लगे. धीरे धीरे वो आनंद अनियंत्रित होने लगा.
काफी महीनो बाद मैं एक बार फिर वो महसूस कर पा रही थी जिन्हे अब तक शायद मिस कर रही थी.
पियूष ने अपने नीचे के कपड़े निकाल दिए और मेरे कूल्हों को पकड़ कर अपने लंड से मेरे नितंबो पर बाहर से ही हलके हलके धक्के मारने लगा.
उसके गरम गरम कड़क लंड की छुअन से मेरी गांड और चूत के छेद जैसे लम्बी नींद के बाद जाग से गए और पुरे खुल गए.
रह रह कर दोनों छेद बंद होते फिर खुलते और पियूष के लंड के इंतजार में बेताब हुए जा रहे थे.
पियूष ने अपना लंड पकड़ा और मेरे दोनों छेदो के ऊपर रगड़ने लगा. रगड़ते रगड़ते वो अपने लंड की टोपी को थोड़ा दोनों छेदो में से होकर भी गुजार रहा था.
वो जान बुझ कर मेरी हालत देख मुझे तड़पा रहा था और मैं तड़प के मारे अपने शरीर को हल्का सा पीछे की तरफ धक्का दे रही थी, ताकि उसके लंड की टोपी मेरे छेद में घुस मुझे थोड़ा सुकून दे सके.
मेरा पूरा शरीर कपकपा रहा था और उसने अचानक अपना लंड मेरी चूत के छेद में घुसा ही दिया. एक गहरी आहहह के साथ जैसे लहरों को साहिल मिल गया.
पर पियूष लंड अंदर डाल वही रुक गया, शायद मेरी चूत की गरमाहट महसूस करना चाह रहा था पर मेरी तड़प को ये मंजूर नहीं था.
मैं खुद ही आगे पीछे धक्का मारने लगी. महीनो बाद मिले इस सुकून को जैसे में एक झटके में पा लेना चाहती थी.
मेरे धक्को की गति एकदम से बढ़ गयी और मैं पागलो की तरह सब भुला कर लगातार तेज धक्के मारते हुए सिसकिया निकालने लगी. आह्ह आह्ह ओह्ह ओह्ह उह्ह उह्ह उम्म उम्म.
बढे हुए वजन के कारण या लम्बे समय से कसरत नहीं करने से मैं जल्द ही थकने लगी और धक्को की गति कम होने लगी और थोड़ी देर में रुक गयी.
लेकिन तब तक पियूष को आग लग चुकी थी. उसने एक जोर का धक्का मारा और मेरी चूत के बहुत अंदर तक अपने होने का अहसास कराया.
उसके बाद वो नहीं रुका, उसने एक के बाद झटके मारते हुए मुझे चोदना शुरू कर दिया.
थोड़ी देर चोदने के बाद उसकी सिसकियाँ निकलनी शुरू हो गयी थी. मेरी भी सिसकियाँ निकलनी शुरू हो गयी थी. उसके झटको से मेरे खुले पड़े ब्लाउज से मेरे मम्मे लटकते हुए आगे पीछे तेजी से हिल रहे थे.
थोड़ी देर में मुझे सच्चाई का भी आभास हुआ, कही मैं फिर से पहले वाली गलती तो नहीं कर रही.
मैं: “आह्हह पियूष रुको, कुछ हो जायेगा.”
पियूष: “अब मत रोको भाभी, अब तो पुरे मजे लेने ही दो. देखो, आपको भी मजा आ रहा हैं न? ये लो और जोर से मारता हूँ.”
मैं: “आह्हहह, रुक जाओ, उम्ममम्म मैं प्रेगनेंट हो जाउंगी, तुम समझ नहीं रहे.”
पियूष: “चिंता मत करो, दो बच्चो के बाद मैंने अपनी नसबंदी करा ली थी. अब कोई चिंता नहीं, जम के चुदवाने के मजे लो.”
मैं: “सच में?”
पियूष: “अरे हां, मैं झूठ क्यों बोलूंगा.”
मैं: “तो फिर धीरे धीरे क्यों मार रहे हो, जल्दी जल्दी से कर लो. अशोक के आने से पहले काम ख़त्म कर लो, उसने देख लिया तो मेरी शामत आ जाएगी.”
पियूष ने आव देखा ना ताव जोर से जोर से मुझे चोदने लगा. उसका और मेरा पानी बनने लगा तो उसका लंड फिसलता हुआ चप चप की आवाज करता हुआ मेरी चूत के अंदर तेजी से अंदर बाहर होता रहा.
पियूष: “भाभी, मेरा तो अब पानी निकलने वाला हैं, आपका कितना बाकि हैं?”
मैं: “तुम अपना कर लो, मेरी चिंता मत करो.”
पियूष: “रुको आपका भी करता हूँ.”
उसने अपना लंड मेरी चूत से निकाला और मुझे सीधा लेटा दिया. फिर उसने अपनी दो उंगलिया मेरी चूत में घुसा दी और तेज तेज अंदर बाहर खोदने लगा. उसकी उंगलियों की रगड़ से मेरा नशा फिर चढ़ने लगा.
अगले पांच मिनट में ऐसे ही उंगलियों से चोदते चोदते उसने मेरा पानी निकालना शुरू कर दिया था.
मैं अपने हाथ दोनों तरफ फैलाये बिस्तर के चद्दर को पकड़ खिंच कर तड़पते हुए आहें भरे जा रही थी. मुझे लगने लगा अब मैं झड़ने वाली हूँ तो मैंने पियूष को रोका.
मैं: “पियूष मेरा अब होने वाला हैं, तुम अब मेरे ऊपर आ जाओ और पूरा कर लो.”
पियूष अब मेरे ऊपर चढ़ गया और मुझसे चिपक कर लेट गया. लेटते लेटते उसने मेरा ब्लाउज और ब्रा को मेरे मम्मो से पूरा हटा दिया और अपना टीशर्ट भी निकाल दिया. उसका सीना अब मेरे मम्मो को दबा रहा था.
उसने एक बार फिर मेरी चूत में अपना लंड डाल दिया. इतनी देर से उसकी पतली उंगलियों से चुदाने के बाद उसके मोटे लंड के अंदर जाते ही मुझे ज्यादा सुखद अहसास हुआ और मेरी चूत में होती रगड़ भी बढ़ गयी थी.
दो तीन मिनट बाद ही हम दोनों बड़ी गहरी और तेज सिसकियाँ भरते हुए एक दूसरे से चुदने के मजे लेने लगे. उसने मेरे दोनों हाथों की उंगलियों में अपनी उंगलिया फंसा ली और झटके मारने की गति एक दम बढ़ा ली.
महीनो बाद झड़ने का लुत्फ़ उठाने के लिए मैंने भी अपनी दोनों टाँगे उठा कर पहले तो उसकी टैंगो पर लपेट दी.
थोड़ी देर बाद मैंने अपनी टाँगे और भी ऊपर उठा पियूष के कमर पर अजगर की तरह लपेट दी. मेरी चूत का छेद और भी खुल गया और पियूष मेरी चुत की और भी गहराइयों में उतारते हुए चोदने लगा.
आहह्ह्ह्ह आहह्ह्ह ओहह्ह्ह मम्मी ओ मम्मी आअहह्ह्ह आअह आअ जोर जोर से चीखते हुए हम दोनों एक साथ झड़ गए.
काफी समय बाद मैंने अपना काम पूरा किया था तो एक संतुष्टि हुई. हम दोनों उठ कर फिर कपडे पहनने लगे. पियूष ने जल्दी से कपडे पहने और वो बाहर हॉल में चला गया. मैं भी अपनी साड़ी फिर से पहन कर बाहर आ गयी.
सारे पछतावे गुनाह करने के बाद ही याद आते हैं. मेरे साथ भी यही हुआ. मैंने अपनी बेवकूफी में या महीनो की जरुरत पूर्ति नहीं होने से पियूष के साथ गलत काम कर लिया था. मेरी बात कही खुल ना जाये इसलिए मैंने बाहर आकर पियूष को समझाना चाहा.
मैं: “पियूष, किसी को इस बारे में बताना मत.”
पियूष: “क्या बात कर रही हो. मेरे भी बीवी बच्चे हैं, मैं क्यों बताने लगा.”
मैं: “सब कुछ कैसे हुआ पता ही नहीं चला.”
पियूष: “कोई बात नहीं, कभी कभी ऐसा हो जाता हैं. जो भी हुआ अच्छा ही हुआ.”
पियूष ने मुझे रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम के प्लान के बारे में ब्रोचर दिया, ताकि मैं अशोक को बता सकू और जाने लगा.
मैं: “पियूष, प्लीज इसे भूल जाना कि हमारे बीच कभी कुछ हुआ था. जो भी था एक गलती थी.”
पियूष ने आँखों से हां का इशारा कर मुझे सांत्वना दी और वहा से चला गया.
अशोक को मैंने वो ब्रोचर पढ़ा दिया और हमने रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम को कुछ और समय तक नहीं लगवाने का विचार किया. मैंने ही ज्यादा फ़ोर्स किया क्यों कि मैं पियूष का सामना फिर से नहीं करना चाहती थी.
जो भी हुआ गलत था, पर मैंने महसूस किया कि मेरी चेतना लौट आयी हैं. अपनी ज़िन्दगी में मैं जो कमी महसूस कर रही थी क्या वो यही था. क्या मुझे दूसरे मर्दो की आदत पड़ गयी थी, या फिर पति के मुझसे दूर रहने से मेरी जरुरत पूरी नहीं हो पा रही थी.
मैंने कसम खायी कि दो महीनो में, मैं अपना पुराना फिगर पाकर रहूंगी. अगले दिन से ही मैंने योगा और कसरत फिर शुरू कर दिए और खानपान की आदत फिर से पहले वाली कर ली. दो महीनो में ही मुझे परिणाम दिखने लगे और मेरे पुराने कपड़े अब धीरे धीरे फिट आने लगे थे.
अशोक भी अब खुश थे और बच्चे को फिर अपने साथ रख लिया था. अशोक ने इसी शहर की दूसरी खुली ब्रांच में ऑफिस जाना शुरू कर दिया था. मेरी ज़िन्दगी फिर पटरी पर लौट आयी.
पियूष के साथ हुई इस एक घटना ने मेरे जीवन को एक सही मौड़ दे दिया था. मैं वापिस उस रास्ते पर नहीं जाना चाहती थी और अशोक के साथ ही अपना तन और मन लगा रही थी.
मैं इसमें कितना कामयाब हो पाऊँगी वो तो आने वाला वक्त ही बताएगा, क्यों कि मैंने अपना सेक्सी फिगर फिर पा लिया था, तो भँवरे कब तक मुझसे दूर रहेंगे.
नए घर में मेरी पहली होली थी. मुझे अब वैसे भी होली खेलना इतना पसंद नहीं था जितना बचपन में था. हमारे मौहल्ले में ही होली का दहन हुआ और हमने उसमे हिस्सा लिया. ये होली सेक्स स्टोरी उसी दिन के बाद शुरू हुई!
अगले दिन रंगो की होली थी. मुझमे तो इतना उत्साह नहीं था पर पति हर बार की तरह उत्साही थे. उन्होंने हमारे बच्चे को भी इस उत्साह में शामिल कर लिया था.
उनका प्लान था कि यहाँ होली खेलने के बाद वो लोग अपने पुश्तैनी घर भी जायेंगे जहा मेरी सास रहती हैं. वहाँ भी पुराने पडोसी और रिश्तेदार हैं जिनके साथ हर साल होली खेलते आये हैं..
मैंने उनको पहले ही मना कर दिया कि मेरा दो दो जगह होली खेलने का कोई प्लान नहीं हैं. इस मोहल्ले में हम वैसे भी नए थे तो ज्यादा कोई रंगो से भरेगा नहीं पर पुराने घर गए तो जान पहचान की वजह से कुछ ज्यादा ही रंग भर देंगे.
होली का दिन भी आया और सुबह एक घंटे के अंदर ही हमने मोहल्ले की छोटी सी होली खेल ली. पति का पेट तो इस छोटी सी होली खेलने से जैसे भरा ही नहीं. उनका प्लान वो वैसे ही पुराने घर जा होली खेलने का था.
मैं वापिस घर पर आ कर नहा ली. पति बच्चे को लेकर पुराने घर होली खेलने निकल गए.
मैंने अपनी वो नयी साड़ी पहन ली जो होली पर पति ने उपहार में दी थी. वैसे भी अब कोई रंग तो लगाने वाला ही नहीं था और कोई दिक्कत नहीं थी.
मैंने मोतीया रंग की काम वाली साडी और उस पर सफ़ेद रंग का ब्लाउज पहन लिया और अच्छे से मेकअप कर देखने लगी, आने वाले सामाजिक कार्यक्रम में ये साड़ी कैसी लगेगी. थोड़ी देर के लिए ही पहननी थी तो मैंने ब्रा भी नहीं पहना.
अभी पूरा तैयार भी नहीं हुई थी कि डोर बेल बज उठी. कौन आया होगा ये विचार करने लगी, कही अशोक कुछ भूल तो नहीं गए जो वापिस आ गए. पीप-होल से झाँका तो देखा हमारे पुराने घर का पडोसी नितिन जो अशोक का ख़ास दोस्त भी हैं, वो खड़ा हैं.
हर साल वो और अशोक साथ में होली की मस्ती करते हैं. इस साल हम नए घर पर हैं तो शायद नितिन यहाँ अशोक के साथ होली खेलने की चाहत में आया था. पर अशोक तो खुद उसके घर के उधर ही गया हुआ हैं.
मैं सोचने लगी, दरवाजा खोलू या नहीं, कही वो मुझे रंग से ना भर दे, मेरी नयी साड़ी ख़राब हो जाएगी. ना खोलू तो उसको बुरा लगेगा की वो घर आया और दरवाजा भी नहीं खोला. कोई और रास्ता नहीं था तो मैंने अब दरवाजा खोला.
नितिन: “हैप्पी होली”
मैं: “हैप्पी होली.”
नितिन: “अरे ये क्या तुमने तो होली खेली ही नहीं, हर साल तो खेलती हो.”
मैं: “मैंने तो होली खेल भी ली और फिर मैं नहा भी ली.”
नितिन: “अशोक को बाहर बुलाओ, उसको मैं लेने आया हूँ, उसके बिना होली खेलने का मजा ही नहीं आता हैं.”
मैं: “अशोक तो तुम्हारे वही गया हैं. अभी थोड़ी देर पहले ही निकला हैं.”
नितिन: “अच्छा ठीक हैं, मैं उसे वही मिलता हूँ. अब आया हूँ तो होली मना कर ही जाऊंगा. रंग तो लगवाना पड़ेगा.”
मैं: “होली का मतलब सिर्फ रंग लगान ही तो नहीं, मुँह मीठा करके भी होली मना सकते हैं. आज मुँह मीठा कर होली मना लो, अगले साल रंग लगा देना. अंदर आ जाओ, कुछ नाश्ता कर लो होली का.”
नितिन अब दरवाजे से अंदर आ गया और मैंने टेबल पर पड़े नाश्ते से कुछ खाने को कहा.
नितिन: “क्या प्रतिमा, थोड़ी बहुत होली तो मेरे साथ भी खेलनी ही पड़ेगी. वरना होली का कैसा नाश्ता!”
मैं: “अरे मैं नहा चुकी हूँ, वरना मैं मना नहीं करती होली खेलने से. तुम नाश्ता लो.”
नितिन: “अच्छा एक काम करो एक रंग से तिलक ही लगवा लो माथे पर, वो तो चलेगा?”
मैं: “अच्छा ठीक हैं, पर संभल कर, थोड़ा सा ही रंग लेना, साड़ी पर ना गिर जाये.”
नितिन: “अरे तुम चिंता मत करो.”
नितिन ने अपने साथ लाये गुलाल की थैली को अपने एक हाथ में पकड़े दूसरे हाथ को उसमे डाला. मैंने आँखों में गुलाल ना जाये इसलिये आँखें बंद कर दी और चेहरा आगे कर दिया ताकि रंग साड़ी पर ना गिरे.
वो मेरे ललाट पर एक तिलक लगाने लगा और तेजी से मेरे पुरे चेहरे पर रंग लगा दिया. मैं एक दम से दूर हटी.
मैं: “अरे ये क्या किया? सिर्फ तिलक लगाने को बोला था.”
नितिन: “अरे सूखा रंग हैं, कुछ नहीं होगा साड़ी को, धो लेना. होली बार बार थोड़े ही आएगी.”
मैं अपनी साड़ी पर गिरा थोड़ा गुलाल झटकते हुए बोली “अच्छा अब तो नाश्ता कर लो.”
नितिन: “हर साल मैं तुम्हे पक्का कलर लगाता हूँ, इसके बिना होली पूरी कैसी होगी.”
ये कहते हुए उसने जेब से एक पक्के कलर की छोटी डिबिया निकाल ली.
मैं: “नितिन, इसको अंदर रखो. पक्का रंग नहीं चलेगा.”
नितिन: “बस थोड़ा सा मुँह पर लगवा लो, जल्दी रंग उतर जाए तो कैसी होली.”
मुझे अपनी साडी खतरे में दिखाई दी. मैं तुरंत बचने के लिए वहा से खिसकने लगी, पर नितिन ने पीछे से मेरी साड़ी पकड़ ही ली और साड़ी खींचने से मुझे रुकना पड़ा. उसने मेरी साड़ी छोड़ एक हाथ से मुझे कमर से कस कर पकड़ लिया. उसके दूसरे हाथ में कलर की डिबिया थी.
मैं: “नहीं नितिन, पक्का कलर नहीं. मेरी साड़ी हलके कलर की हैं, इस पर ये काला दाग लग जायेगा तो नहीं निकलेगा. मेरी नयी साड़ी हैं.”
नितिन: “अरे कलर तो लगाना ही पड़ेगा, होली हैं. साड़ी की चिंता हैं तो भले ही निकाल दो पर कलर तो लगाऊंगा.”
ये कहते हुए उसने दूसरे हाथ से कलर की डिबिया टेबल पर रखी और उस हाथ से मेरी साड़ी का पल्लू मेरे कंधे से निकाला और नीचे गिरा दिया.
उसने अपना हाथ जो कमर पर था उसको हटाया जिससे साड़ी का पल्लू पूरा नीचे जमीन पर गिर गया. पहला हाथ कमर से हटते ही उसने अपने दूसरे हाथ से मेरी कमर को पकड़ लिया.
अब तक उसका हाथ साड़ी के ऊपर से मेरे कमर को पकडे था, अब बिना साड़ी के मेरी नंगी पतली कमर को दबोचे हुए था. साड़ी हटने से मेरी पतली कमर के ऊपर सफ़ेद ब्लाउज के अंदर मम्मो का उभार अच्छे से दिखने लगा था. अंदर ब्रा भी नहीं था और सफ़ेद रंग के पतले ब्लाउज से मेरे गहरे गुलाबी निप्पल की झलक हलकी सी दिखने लगी थी.
उसने मुझे इतना कस के पकड़ा था कि उसके लंड का हिस्सा मेरे नितंबो से चिपका हुआ था. शायद भांग का नशा करके आया हो ऐसा लग रहा था. मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा था. उसको पूरा होश भी नहीं था कि होली की आड़ में वो क्या कर रहा हैं.
उसने अब वो पक्के कलर की डिबिया दूसरे खाली हाथ से उठाई और पहले हाथ के पास ले आया जिससे कमर को पकडे हुए था. कमर वाले हाथ की उंगलियों से उसने डिबिया का ढक्कन खोला और अब उसी हाथ में डिबिया को पकड़ लिया.
उसने थोड़ा रंग अपने एक हाथ पर लगा दिया और उंगलिया रगड़ कर कलर अपनी हथेली पर फैला दिया और मेरे दोनों गालो और ललाट पर लगा दिया. मैं ज्यादा नहीं हिली, वरना कमर वाले हाथ में पकड़ी खुली डिबिया से रंग मेरी साड़ी पर गिर सकता था.
मेरे चेहरे पर कलर लगाने के बाद मुझे लगा अब वो मुझे छोड़ देगा, पर उसने थोड़ा और कलर अपने हाथ में लिया.
मैं: “अब तो छोडो, लग तो गया मुँह पर पक्का कलर.”
नितिन: “रुको तो सही, और भी जगह लगाना हैं कलर.”
उसने अब कलर मेरी नंगी बाहों पर लगा दिया. और फिर थोड़ा कलर और ले मेरे पेट और कमर पर मलता हुआ मेरे बदन को छूने के मजे लेने लगा.
होली के दिन कैसे एक खुबसूरत इंदौर की देसी लड़की की चुदाई हुई? इस होली सेक्स स्टोरी में जानिए और मजे करिए.
फिर उसने थोड़ा कलर और निकाला और मेरे ब्लाउज के ऊपर की तरफ पीठ और गर्दन पर कलर लगाया. मैं हिल नहीं रही थी इस डर से कि कलर कही साड़ी पर ना गिर जाये और इसका फायदा उठा उसने अपनी उंगलिया पीठ पर मेरे ब्लाउज में डाल कलर लगाने लगा.
अंदर ऊँगली जाते ही मैं विरोध में थोड़ा आगे की तरफ झुकी तो झटके से खिंच कर मेरे ब्लाउज का आगे से ऊपर का एक हुक भी टूट गया और मेरा क्लीवेज दिखने लगा. मैं फिर से शांत हो गयी.
नितिन: “ऊप्स, सॉरी, हुक टूट गया, ज्यादा हिलो मत, चुपचाप कलर लगवा लो. जो जो जगह दिख रही हैं बस वहा कलर लगाऊंगा.”
ये कहते हुए वो आगे से मेरे गले और फिर मेरे सीने पर कलर लगाने लगा. कलर लगाते हुए उसने थोड़ी उंगलिया ब्लाउज के अंदर भी डाल दी थी. एक हुक खुलने से उसको ज्यादा जगह मिल गयी थी. मेरे मम्मो के उभार को थोड़ा दबाते हुए उसने कलर लगा दिया.
वो किसी भी क्षण मेरे मम्मो को दबोच सकता था. मै खुद को छुड़ाने के लिए फिर थोड़ा जोर से हिली और उसकी उंगलिया अभी भी ब्लाउज के अंदर थी जिससे मेरा एक और हूक टूट कर निकल गया.
मेरे मम्मो के बीच की घाटी और भी दिखने लगी. मैं अब कही ना कही हार मानने लगी थी. अब उसने मुझे कमर से पकडे रखा था तो छोड़ दिया और कलर की डिबिया को रख दिया.
हुक टूट निकल चुके थे तो मैं अपने ब्लाउज के दोनों हिस्सों को अपने हाथ से पकड़ खड़ी हो गयी. कुछ अनहोनी होने से पहले छूट जाने से मैं खुश थी. मैंने अपने नीचे लटके पड़े साडी के पल्लू को ऊपर उठाया.
मैं: “ये कपड़ा फाड़ होली खेलने आये थे तुम?”
नितिन: “तुम चुपचाप कलर लगवा देती तो हुक नहीं टूटता ना.”
मैं: “चलो अब नाश्ता कर लो, होली खेल ली.”
नितिन: “बिना पानी के कौनसी होली होती हैं! अभी तुमको पानी में डालना बाकी हैं. पिछले साल तो तुम कमरे में बंद हो गयी थी बचने के लिए.”
ये सुनते ही मैं चीखते हुए रसोई की तरफ भागने को हुई और उसने मुझे फिर पीछे से पकड़ लिया.
मैं: “नहीं नितिन, प्लीज. मेरी साड़ी ड्राई क्लीन की हैं, उसको पानी में नहीं भिगो सकते ख़राब जो जाएगी. अब छोड़ दो, वैसे भी बहुत होली खेल ली हैं तुमने. अब प्लीज परेशान मत करो.”
नितिन: “बुरा न मानो होली हैं. साड़ी नयी आ जाएगी.”
मैं: “नहीं, बहुत महँगी हैं, पहली बार पहनी हैं.”
नितिन: “मुझे वैसे भी तुम्हे पानी में भिगोना हैं, साड़ी को नहीं. पहले साड़ी निकालते हैं फिर तुम्हे पानी में डालूंगा.”
मैं: “नहीं, तुम ऐसा नहीं कर सकते.”
नितिन: “अरे मैं करके बताता हूँ.”
मेरी साड़ी का पल्लू गिर कर वैसे ही मेरे मुड़े हुए बाहों में आ गया था, उसने उसको वहा से हटाया. मैंने साड़ी पकड़ कर रखी थी पर मैं जहा से पकड़ती वो दूसरी जगह से साड़ी निकाल देता. उसमे मेरी पूरी साड़ी को मेरे पेटीकोट से जल्दी ही अलग कर दिया और साड़ी सोफे पर फेंक दी.
मैं अब सिर्फ एक पेटीकोट और ब्लाउज में थी जिसके ऊपर के दो हुक टूट चुके थे. उसने मुझे उठाया और बाथरूम के अंदर ले आया. मुझे टब में खडी कर उसने नल चालू कर दिया और टब में पानी भरने लगा. मैं अपने ब्लाउज के टूटे हुए हुक के हिस्से पर हाथ रखे ब्लाउज को बंद रखे खड़ी थी.
मैं: “नितिन ये क्या कर रहे हो तुम बेशर्मो की तरह. मैंने कपडे नहीं पहन रखे हैं.”
नितिन: “पहन तो रखे हैं.”
मैं: “मेरा ब्लाउज आधा खुला है, और मैंने अंदर कुछ नहीं पहना हैं, कुछ तो समझो.”
नितिन: “अब झूठे बहाने मत मारो, पहले साड़ी का बहाना बनाया अब ये. बताओ कहा नहीं पहना हैं.”
मैं: “पागल हो गए हो तुम. अब मेरे कपड़ो में झांकोगे?”
नितिन: “भूल गयी, उस दिन पिकनिक में तुम, अशोक, मैं और पूजा पानी में उतरे थे. कपड़े बदलने की जगह नहीं थी तो कार में तुम लड़कियों ने कपड़े बदले थे और हम कार की खिड़की पर पीठ कर परदे बने थे.” (नितिन की पत्नी का नाम पूजा था.)
मैं: “पानी में धक्का भी तुम लोगो ने ही मारा था उस दिन. वैसे भी अशोक मेरे साथ था उस वक्त.”
नितिन: “अब होली के दिन बुरा मत मानो, गीला तो होना पड़ेगा.”
काश मैंने बिना दरवाजा खोले उसको बाहर से ही भगा दिया होता तो मेरी ये हालत नहीं होती. गनीमत थी कि कम से कम मेरी नयी साड़ी ख़राब होने से बच गई.
आधा पानी भरने के बाद उसने मुझे टब में बैठा दिया और अपनी दोनों हथेली में पानी भर मेरे ऊपर पानी डालने लगा. वह पानी डालते जाता और शरीर के उस हिस्से पर अपने हाथ से मुझे रगड़ते हुए पानी लगा रहा था. उसके हाथ मेरे पीठ, गर्दन, सीने, पेट, कमर पर आराम से फिरते हुए मुझे जैसे नहला रहे थे.
मैं उसके हाथों को अपने मम्मो से जैसे तैसे दूर रख रही थी. थोड़ी ही देर में मैं पूरी गीली हो गयी. उसका कलर ज्यादा पक्का नहीं था तो उसकी रगड़ से मेरा कलर भी काफी निकल गया था.
अब उसने मुझ पर पानी डालना और छूना बंद कर दिया और खड़ा हो गया. मैं भी अब टब में ही खड़ी हो गयी और उसकी तरफ हाथ बढ़ाते हुए पीछे रखा टॉवेल माँगा और उस पर ताना कसा.
मैं: “तुम मुझे होली खेला रहे थे या नहला रहे थे? साबुन भी लगा ही देते तो पूरी नहा लेती.”
मैं भूल ही गयी कि मेरा ब्लाउज सफ़ेद रंग का था और अंदर ब्रा भी नहीं पहना था. मेरा ब्लाउज गीला हो मेरे मम्मो से चिपक गया था और मेरे निप्पल साफ़ नजर आ रहे थे और मेरे मम्मो का उभार पूरी तरह से नजर आ रहा था. मेरा ब्लाउज पारदर्शी बन चूका था और मैं लगभग टॉपलेस खड़ी थी.
वो मेरे सीने को ही घूर रहा था तो मेरी भी नजर पड़ी और इससे पहले की मैं संभलती वो मेरी तरफ आगे बढ़ गया.
नितिन: “जैसी तुम्हारी इच्छा, मैं अब साबुन लगा देता हूँ.”
मैं: “नहींहीहीही, मैं मजाक कर रही थी.”
नितिन: “मगर मैंने तो सीरियसली ले लिया हैं, अब तो साबुन लगाना ही पड़ेगा.”
उसने साबुन उठाया और अपनी हथेली पर लगा कर हथेली मेरे शरीर पर रगड़ साबुन लगाने लगा. मेरे अंग जहा जहा से खुले थे वहा साबुन लगी हथेली रगड़ने लगा. मैं अपने दोनों हाथ अपने सीने पर लगाए हुए थी ताकि वो मेरे गीले ब्लाउज से दीखते हुए निप्पल ना देख पाए.
एक बार फिर साबुन लगाने के बहाने सीने पर कुछ ज्यादा ही नीचे जाकर मेरे ब्लाउज में हाथ डालने की भी कोशिश की उसने. मैं अपने हाथों से ब्लाउज कस कर पकड़ उसको खदेड़ते रही.
उसने मुझे सीधी करने के लिए मेरे पेटीकोट का नाड़ा पकड़ कर खिंचा जिससे वो नाड़ा खुल गया. वैसे तो पेटीकोट गीला हो मेरे शरीर से चिपक गया था फिर भी मैंने एहतियात के तौर पर एक हाथ सीने से हटा अपना पेटीकोट पकड़ लिया.
मैं: “बेशर्म, मेरे कपड़े क्यों खोल रहे हो.”
नितिन: “मैं तो तुम्हे सीधी कर रहा था गलती से खुल गया. पेटीकोट के अंदर तो कुछ पहन रखा होगा न? क्यों चिंता करती हो.”
मैं: “नितिन, ऐसी बातें करोगे मुझ से.”
नितिन: “भूल गयी, पूजा और तुम्हे दो महीने तक मेरे दोस्त के स्विमिंग पूल में स्विमिंग सिखाने ले गया था. वहा भी तो तुम लोग बिकिनी में रहते थे मेरे सामने. तब तो शर्म नहीं आयी.”
मैं: “अभी हम स्वीमिंग नहीं कर रहे हैं.”
नितिन: “तुम्हारी सोच कितनी छोटी हैं. पिछली होली पर अशोक ने पूजा को टब में पूरा लेटा दिया था. पूजा ने तो कोई शिकायत नहीं की.”
मैं: “तुम भी तो होंगे वहा.”
नितिन: “मैं तो तुम्हारे घर पर था, तुम्हे कमरे से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था, तुम अंदर बंद जो थी. वैसे पूजा की भी गलती थी. होली पूरी ख़त्म नहीं हुई और वो नहाने चली गयी थी तुम्हारी तरह. अशोक को पता चला तो रंग लेकर बाथरूम में ही घुस गया और रंग दिया पूजा को.”
मैं: “नहीं, अशोक तुम्हारी तरह नहीं हैं.”
नितिन: “सच बोल रहा हूँ, पूजा से कन्फर्म कर लेना. तुमने तो ब्लाउज और पेटीकोट भी पहन रखा हैं. पूजा ने तो नहाने के लिए कपड़े खोल लिए थे और सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी. मैंने उसको बोला था इतना जल्दी मत नहा.”
मैं: “तुम फेंक रहे हो या सच बोल रहे हो?”
नितिन: “सच, मैंने आकर उसका टब में लेटे हुए फोटो भी लिया था.”
मैं: “पूजा के साथ इतना हुआ और तुमने अशोक को कुछ नहीं कहा!”
नितिन: “होली पर इतनी मस्ती तो चलती हैं. वो पूजा भी तो हंस रही थी.”
मैं: “तो तुम मुझसे पूजा का बदला ले रहे हो?”
नितिन: “कैसा बदला, वो पूजा तो सुबह से इंतजार कर रही हैं अशोक कब आएगा होली खेलने. अब मुझे साबुन लगाने दो.”
मैं सोच में पड़ गयी, मेरे पीठ पीछे अशोक क्या कर रहा हैं. मेरा एक हाथ पेटीकोट को पकड़े था और दूसरा मेरे ब्लाउज को. मेरा एक अकेला हाथ दोनों मम्मो को मुश्किल से ढक पा रहा था, उसने मेरे ब्लाउज में थोड़ी सी ऊँगलीया घुसा साबुन लगाना शुरू कर दिया, मैं उस पर हल्का गुस्सा करते हुए उसको मना करती रही.
मैं एक मम्मा ढकती तो वो दूसरे के तरफ साबुन लगाने लगता. उसके हौंसले बढ़ते रहे और जल्द ही अपना एक पूरा हाथ का पंजा मेरे ब्लाउज में घुसा मेरा एक मम्मा पकड़ लिया और साबुन मलने लगा.
उसकी इस हरकत पर, जिस हाथ से मैंने पेटीकोट पकड़ रखा था उससे मैंने उसको एक घुसा मार हल्का धक्का मारा. इस झटके से मेरा नाड़ा खुला पेटीकोट नीचे गिर गया और मैं पैंटी में आ गयी. मैं एक बार फिर शर्म से पानी पानी हो गयी.
वो मझ पर हंसने लगा कि मैं खुद अपने कपड़े खोल रही हूँ.
नितिन: “अब रहने भी दो, क्यों इतना शरमा रही हो? पूल में में भी तो बिकिनी पहन कर नहाते ही हैं.”
मैंने अपने दोनों हाथो से अपने ब्लाउज को पकडे रखने पर ध्यान दिया. उसने मेरे ब्लाउज को मेरे एक कंधे से निकाल उस कंधे पर साबुन लगाने लगा.
नितिन: “अब हाथ हटाओ, सिर्फ सीने पर साबुन लगाना बाकि हैं.”
मैं: “देखो, तुम अब अपनी लिमिट पार कर रहे हो. मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा हैं.”
वो मेरे करीब आ मेरे सीने पर साबुन लगाने का प्रयास करने लगा. मैंने अपने दोनों हाथो से उसको धक्का देना चाहा पर उसने मेरे हाथ पकड़ लिए और थोड़ी छीना झपटी में मेरे ब्लाउज के आगे के बाकी हुक भी खुल गए और मेरे मम्मे पुरे दिखने लगे. नितिन ने मेरे दोनों हाथ पकड़ मुझे मेरे मम्मे ढकने नहीं दिए और चिढ़ाने लगा.
नितिन : “ओ, शेम शेम.”
मेरी एक बार तो हंसी छूट गयी पर अपनी हालत देख तुरंत सुधार किया.
मैं: “मेरे हाथ छोडो, और तुरंत बाहर जाओ.”
नितिन: “अच्छा जाता हूँ, पहले तुम्हारे साबुन तो लगा लू, नयी जगह दिख रही हैं जहा साबुन नहीं लगा हैं.”
मैं: “लग गया मेरे साबुन, और नहीं लगवाना, जाओ.”
नितिन: “ठीक हैं तो नहला देता हूँ.”
उसने अब मेरे हाथ छोड़े और मैंने अपना ब्लाउज फिर अपने मम्मो के ऊपर कर दिया और हाथ से ढक दिया.
फिर उसने मेरे ऊपर पानी डालना शुरू कर दिया और मैं अपना सीना दबाये नीचे बैठ गयी.
नितिन: “और नहाना हैं या हो गया?”
मैं: “अब तुम बाहर जाओ, मेरा हो गया.”
नितिन बाथरूम से बाहर गया और मैंने चैन की सांस ली कि कुछ अनहोनी से पहले ही मैं बच गयी.
मैंने टॉवल उठाया अपने बदन को पोंछ गीले कपड़े निकाल दिए. बाथरूम के अंदर पहनने के कोई कपड़े थे नहीं तो मेरे मम्मो से लेकर जांघो तक मैं टॉवल लपेट कर ही बाहर आयी.
नितिन की इन हरकतों की वजह से मेरे हाथ पैर अभी भी कांप रहे थे, और मेरे शरीर पर मैं उसके स्पर्श महसूस कर पा रही थी, ख़ास तौर से जब उसने मेरे मम्मो पर साबुन मला था.
मैं जैसे ही टॉवेल लपेट बाहर आयी सामने थोड़ी दूर नितिन खड़ा हो कुछ खा रहा था. हम दोनों की नज़रे मिली और वो मुस्कराने लगा.
नितिन: “अरे तुमने तो आज होली खेली ही नहीं, देखो कोई रंग ही नहीं लगा.”
वो मेरी तरफ बढ़ता उससे पहले ही मैं चीखते हुए बैडरूम की तरफ भागी और वो मेरे पीछे. मैं बैडरूम का दरवाजा पूरा बंद करती उसके पहले ही वो दरवाजे पर आ गया और बंद नहीं करने दिया.
मैं: “कपड़े पहनने दो, फिर रंग लगा देना, अभी दरवाजा बंद करने दो. जाओ.”
नितिन: “पिछली होली पर भी यही बोलकर कमरे में बंद हो गयी थी. कपड़े बदलने हैं तो मेरे सामने बदलो और फिर होली खेलो.”
वो दरवाजे पर धक्का लगाते हुए अंदर आ गया. मैं मुड़ी और अंदर भागी और उसने पीछे से आकर मुझे पकड़ लिया और बिस्तर पर धक्का दे उल्टा लेटा दिया और खुद पीछे से मेरे ऊपर चढ़ कर लेट गया. मैं अपने टॉवल को कस कर पकड़े लेटी रही.
वो मेरे बालो को हटा मेरे कानो के पीछे और गर्दन और कंधे पर चूमने लगा. मेरे शरीर में मीठी सी गुदगुदी होने लगी और मैं सब सहती रही. इतनी देर की मस्तियो से उसने कही ना कही मुझे कमजोर कर दिया था.
कई बार हम नितिन के साथ पिकनिक पर भी गए हैं और उसके साथ मेरा मजाक मस्ती काफी चलता था पर इतना ज्यादा होगा ये नहीं सोचा था. हर साल होली पर रंग लगाते वक़्त ऐसी मस्ती करता था पर आज वो अकेला था तो उसने हद कर दी थी, मेरे कपड़े तक खोल दिए थे और अंदर हाथ डाल दिया था.
मैं कई बार बिकिनी में उसकी पत्नी पूजा और नितिन के साथ स्विमिंग पूल में तैर चुकी हूँ. मेरे प्रति उसकी ऐसी भावनाये होगी मुझे कभी लगा नहीं था. फिलहाल वो टॉवल के ऊपर से ही मेरी गांड पर अपने लंड को रगड़ रहा था.
थोड़ी देर में वो मेरे ऊपर से उठा और मुझे सीधा लेटा दिया. फिर मेरे टॉवल के ऊपर के हिस्से में सीने पर चूमने लगा. मैंने टॉवल को और कस के पकड़ लिया. उसको मैं लगातार मना कर हल्का प्रतिरोध कर रही थी.
मैं: “तुम्हे पता भी हैं तुम क्या कर रहे हो? अशोक को पता चलेगा तो क्या होगा पता हैं?”
नितिन: “ठीक हैं उसी से पूछ लेते हैं.”
ये कह कर उसने अपना मोबाइल निकाला और स्पीकर पर रख फोन मिलाने लगा. उसने अशोक को ही फ़ोन मिलाया था.
अशोक (फ़ोन पर): “अबे नितिन मैं तेरे घर पर होली खेलने आया हूँ, तू कहा हैं?”
नितिन: “मैं तेरे नए घर पर हूँ. प्रतिमा होली खेलने से मना कर रही हैं. उसको जरा बोल मुझे मेरे हिसाब से होली खेलने दे, मना ना करे.”
अशोक (फ़ोन पर):”अच्छा फ़ोन दो उसे.”
नितिन ने फ़ोन मेरे हाथ में थमा दिया.
मैं: “हां, हेल्लो..”
नितिन ने मेरे टॉवल को खींचना शुरू कर दिया. मैं एक हाथ से फ़ोन पकड़े और दूसरे से टॉवल पकड़े रखने का प्रयास कर रही थी. जब कि नितिन दोनों हाथों से मेरा टॉवल निकाल रहा था.
मैं: “आउच, छोड़ो, ये नितिन को समझाओ, ये मेरे साथ जबरदस्ती कर रहा हैं.”
नितिन दूर से ही जोर से चिल्लाने लगा “ये मुझे रंगने नहीं दे रही.”
अशोक (फ़ोन पर): “तुम्हे पता हैं, वो जबरदस्ती होली खेलाए बिना नहीं छोड़ेगा, तुम बाद में वापिस नहा लेना, उसको जल्दी होली खेला कर यहाँ भेज दो, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ.”
नितिन ने मेरा पूरा टॉवल खिंच कर मुझे नंगी कर दिया. मैं पूरी नंगी हो गयी थी और उसने मेरी दोनों टाँगे दबा के रखी थी. मैं एक हाथ से फ़ोन और दूसरे से अपना सीना ढके हुई थी और शरम से सिकुड़ती जा रही थी. मैंने अशोक से फ़ोन पर मदद मांगी.
मैं: “तुम समझ नहीं रहे हो. ये कुछ ज्यादा ही कर रहा हैं. हमेशा के लिए मेरे दामन पर दाग लग जायेगा.”
अशोक (फ़ोन पर): “तुमने वो नयी साड़ी पहन ली क्या! उसको बोलो पहले खोलने दे.”
मैं: “कपड़े तो सब खोल ही चूका हैं.”
अशोक (फ़ोन पर): “फिर क्या टेंशन हैं. होली हैं, थोड़ी मस्ती चलती हैं. तुम फ़ोन दो उसको.”
मैंने फ़ोन नितिन की तरफ बढ़ाया पर उसने अपने हाथों से मेरे पाँव पकड़ रखे थे, तो उसने फ़ोन ना लेकर मुंह आगे फ़ोन के पास बढ़ा कर बात करने लगा.
नितिन: “पूजा घर पर हैं ना, होली खेल ली?”
अशोक (फोन पर): “नहीं वो तेरी छोटी बच्ची को बाहर छोड़ने गयी हैं, उसके सामने पूजा को रंग रगड़ता तो वो बच्ची डर जाती इसलिए वो बाहर छोड़ने गयी हैं.”
नितिन: “हां ठीक किया, पिछली बार रगड़ा था वैसे रगड़ने वाला हैं तो बच्ची डर जाएगी.”
अशोक (फ़ोन पर): “चल पूजा आ गयी हैं, तूने खेलना शुरू किया?”
नितिन: “बस शुरू करने ही वाला हूँ”
मैंने फ़ोन अपने मुँह के पास खिंचा, मेरा एक हाथ अभी भी मेरे सीने पर मम्मो को ढके हुआ था. इस बीच नितिन ने अपनी जेब से एक कंडोम निकाल कर अपने कपड़े नीचे किये और अपने लंड को पहना दिया.
मैं आश्चर्यचकित रह गयी कि होली के दिन वो कंडॉम लेकर क्यों घूम रहा हैं, या नितिन पहले ही सोच कर आया था कि आज वो मुझे चोदने वाला हैं. वो सचमुच पूरी तैयारी के साथ ही आया था.
मैं: “तुम्हे पता हैं, तुम्हारा दोस्त क्या करने वाला हैं?”
अशोक (फ़ोन पर): “अरे क्या हुआ? होली हैं, उसको रंग लगाने दो. एक मिनट होल्ड करो.”
फ़ोन पर पीछे से फुसफुसाहट हो रही थी और पूजा की खिलखिलाहट सुनाई दे रही थी. नितिन ने मेरे पाँव चौड़े किये और अपना लंड मेरी चूत में घुसा दिया.
उसको जो चाहिए था वो ले चूका था, अब मेरे विरोध से कोई फायदा नहीं था. मैं फ़ोन पकड़े छत की तरफ शुन्य में निहार रही थी.
अशोक (फ़ोन पर): “अच्छा प्रतिमा अभी तुम ज्यादा मत सोचो, होली के मजे लो, मैं होली खेल कर आता हूँ. जरा नितिन को फोन दो.”
नितिन ने अब मुझे धक्के मार चोदना शुरु कर दिया था. मैंने फ़ोन नितिन को पकड़ा दिया.
नितिन: “हां बोल!”
अशोक (फ़ोन पर): “ज्यादा परेशान मत करना उसको, प्रोटेक्शन का ध्यान रखना.”
नितिन: “चिंता मत कर, वो मान गयी हैं, फ़ोन रख.”
फिर नितिन ने फ़ोन काट दिया और फिर अपने धक्को की गति बढ़ा दी.
उनकी बातें सुनकर मैं सन्न रह गयी, क्या अशोक को पहले से ही पता था. कही ये इन दोनों के बीच कुछ डील तो नहीं हैं कि होली के दिन एक दूसरे की बीवी के मजे लेंगे. ये इन दोनों दोस्तों की मिलीभगत हैं. हालांकि अशोक कोड लैंग्वेज में बात कर रहा था पर उसकी बातो का मतलब मैं समझ सकती थी.
मुझे शायद खुलकर अशोक को नितिन की करतूत बता देनी चाहिए थी, पर मुझे उस वक़्त बिना कपड़ो के इतनी शर्म आ रही थी कि मैंने सोचा अशोक मेरी इतनी सी बात सुनकर वैसे ही नितिन को रोक देगा. मगर वो तो उसका और भी साथ दे रहा था.
नितिन ने इतनी देर होली खेलते और नहलाते मुझे तैयार कर ही दिया था सिर्फ अशोक का डर था, वो भी इजाजत मिल ही गयी थी. मजे लेने का हक़ क्या सिर्फ पतियों को ही हैं, वो वहा पूजा के मजे ले रहा हैं तो मैं भी ले सकती हूँ.
मैंने अपना हाथ अपने सीने से हटा उसको अपने मम्मे दिखा दिए, ये मेरी सहमति थी.
नितिन ने अपनी टीशर्ट निकाल दी थी और अब आगे झूक कर मेरे मम्मो को चूसने लगा. थोड़ी देर चूसने के बाद मुझ पर पूरा लेट गया. उसके वजन से मेरे मम्मे दब गए और उसने मुझे चोदना जारी रखा.
मैं: “तुम जो मेरे साथ कर रहे हो, अशोक भी पूजा के साथ कर रहा होगा तो?”
नितिन: “मेरे हिसाब से तो उन्होंने पिछली होली पर भी किया था.”
मैं: “तुमने फिर अशोक को कुछ नहीं बोला?”
नितिन: “मैं घर पंहुचा तब तक तो वो लोग कर चुके थे.”
मैं: “तो तुम्हे कैसे पता चला?”
नितिन: “बाथरूम अंदर से बंद था. बहुत देर तक नहीं खोला बस आवाजे आ रही थी. तुम्हारी तरह पूजा बचाने के लिए आवाज नहीं लगा रही थी. सिसकियाँ भर रही थी.”
मैं: “तो तुमने उनको बाहर आने के बाद पूछा नहीं!”
नितिन: “अशोक बोला कि वो पूजा को पानी में गीला कर रहा था. शायद बाथरूम के पानी से नहीं उसके लंड के पानी से गीला किया था.”
मैं: “और पूजा ने क्या कहा?”
नितिन: “वो तो टब में पूरी रंगी पड़ी थी. पूरा मुँह रंग से काला हो गया था. सच में मुँह काला करा लिया था उसने. मेरे पास कोई सबूत तो था नहीं तो इल्जाम कैसे लगाता.”
मैं: “सच सच बताओ अशोक ने ही तुम्हे यहाँ भेजा न मुझे चोदने के लिए?”
नितिन: “मुझे तो पूजा ने कहा कि अशोक ने फ़ोन करके मुझे यहाँ बुलाया हैं. वो यहाँ नहीं था. मैं समझ गया पूजा की चाल हैं. एक विकल्प था उन दोनों को घर जाकर रंगे हाथों पकडू लू, दूसरी तरफ तुम थी. जब से तुम्हे बिकिनी में देखा था तब से ही नज़रे थी, मैंने तुम पर ट्राय मारा. उधर अशोक मेरी बीवी पूजा को चोद रहा होगा, तो मैंने सोचा मैं उसकी बीवी को चोद दूं.”
दोस्तों अगर आप मेरी देसी चुदाई कहानी पहली बार पढ़ रहे है? तो मेरी पिछली चुदाई की कहानियों को पढना मत भूलियेगा.
मैं: “तुम तीनो मुझे क्यों फंसा रहे हो?”
नितिन: “मैंने तुम्हारे सामने अशोक को फ़ोन किया, तुम्हारी गुहार के बावजूद उसने खुद ने मुझे इजाजत दी तो मुझे पता चल गया वो उधर क्या कर रहा हैं. अब तुम ज्यादा मत सोचो, मजा नहीं आ रहा क्या?”
मैं: “इतनी देर नहीं आ रहा था, अब आ रहा हैं.”
नितिन: “मैं पूजा को फ़ोन लगाता हूँ और बात नहीं करेंगे, सिर्फ फ़ोन चालू रख छोड़ देंगे. उनको हमारी चुदाई की आवाजे सुना कर जलाते हैं.”
मैं: “इसे कहते हैं बदला, लगाओ फ़ोन.”
नितिन ने फ़ोन लगाया, मैंने उससे फ़ोन लेकर चेक किया तो पूजा को ही कॉल जा रही थी. मैंने फ़ोन अपने पास में ही बिस्तर पर रख दिया.
पूजा (फ़ोन पर): “हेलो, क्या हुआ?… हेलो… हेलो… आउच.. अब इसे तो रहने दो, सारे कपड़े मत खोलो.”
उधर से पूजा की कामुक मदहोश आवाजे आने लगी और हमें उनसे तेज आवाज करनी थी.
मैं: “कम ऑन नितिन, जोर से चोदो मुझे.”
नितिन मेरी तरह आवाज नहीं कर रहा था, पर उसने मेरी आवाज सुनकर और जोश के साथ चोदना शुरू कर दिया. मैंने एक हाथ से उसको उसकी गर्दन के पीछे से पकड़ लिया और दूसरे हाथ से उसकी पीठ झकड़ ली. अपनी टांगे उठा कर उस पर लपेट दी और अब मैं भी चुदने के मजे लेने को तैयार थी.
मैंने आहें जोर जोर से आहें भरना शुरू किया आह्ह, आह्हहह आह्ह ओ नितिन, चोद दे मुझे, हां यही पे, हम्म, आउच, ऊहहह आहह्ह्ह आ मेरी चूत भर दे.
फिर मैंने महसूस किया फ़ोन से आती आवाज लगभग बंद हो गयी थी. जरूर उन्होंने मेरी आवाज सुन ली होगी और अब पछता रहे होंगे. मुझे और जोश आ गया. मैं और भी आवाज कर उन्हें चिढ़ाने लगी.
इस बीच मेरा मजे के मारे पानी छूटना शुरू हो गया था. नितिन का कंडोम लगा लंड मेरी चूत के पानी को चीरते हुए अंदर बाहर हो फच्चाक फच्चाक की आवाजे करने लगा. मैं फ़ोन उठा कर अपनी चूत के पास ले गयी और थोड़ी देर चुप हो कर उनको वो आवाजे सुनाने लगी.
मैं अपनों आहें तो रोक नहीं पा रही थी तो फ़ोन फिर नीचे रख दिया और हम दोनों चीखते हुए चुदने के मजे लेते रहे.
आह्हहह ओआह्ह आ आ आ आ अम्म आईईईई ईईहीहीहीही ऊहूऊऊऊऊ, उसने चोद चोद कर मेरा काफी सारा पानी निकाल दिया और मेरी नशीली आवाज की सिसकियों से वो खुद ही झड़ गया.
झड़ने के बाद भी वो अपना लंड मेरी चूत में डाले रखे हुए मुझ पर लेटा रहा. उसने फिर इसी तरह लेटे लेटे ही अपना मोबाइल उठाया और मैंने उससे छीन कर अपनी आखरी भड़ास निकालते हुए दूसरी तरफ फ़ोन पर लोगो को सुनाया “क्या मस्त चोदा हैं नितिन तुमने”.
पहली बार मेरा ध्यान गया फ़ोन तो म्यूट पर था. मतलब इतनी देर तक चिल्लाने का कोई फायदा ही नहीं हुआ. नितिन ने फ़ोन मुझसे छीना और कॉल काट दिया.
मैं: “ये तुमने म्यूट पर क्यों रखा?”
नितिन: “गलती से दब गया होगा. छोड़ो न, अपना काम तो हो गया न.”
मैं: “सिर्फ तुम्हारा ही हुआ हैं, मेरा नहीं.”
उसने मेरे ऊपर से हटते के बाद अपना इस्तेमाल किया हुआ कंडोम निकाला. फिर घुटनो के बल बैठ मेरे चेहरे के पास आ गया.
नितिन: “चलो मेरा लंड रगड़ कर तैयार करो, मैं तुम्हारा भी पुरा कर देता हूँ.”
मैं: “फ़ालतू मेहनत मत करवाओ, अब ये खड़ा नहीं होने वाला.”
नितिन: “तुम्हे अपने मुँह का जादू पता ही नहीं हैं. तुम्हारा चेहरा देख कर ही लोगो का लंड खड़ा हो जाता हैं, मुँह में लोगी तो मुर्दा लंड भी खड़ा हो जायेगा.”
मैं: “मैं पागल हूँ, इस गंदे लंड को अपने मुँह में लुंगी.”
नितिन: “मुँह में लेकर ही तो साफ़ करना हैं. एक बार लेकर देखो स्वाद पसंद ना आये तो निकाल देना.”
वो आगे बढ़कर अपना लंड मेरे मुँह के पास ले आया. वो नरम पड़ा लंड मेरे मुँह में डालता उसके पहले ही मैंने हाथ से पकड़ लिया और अपनी हथेली से रगड़ कर थोड़ा साफ़ कर लिया और हाथ से खिंच रगड़ने लगी. वो एक बार मुँह में डालने की ज़िद करता रहा तो मैंने उसका लंड अपने मुँह में ले चूसना शुरू किया.
वो सिसकिया भरते हुए मेरे मुँह को ही चोदने लगा. एक हाथ से वो मेरे मम्मे भी दबा रहा था और फिर उसने हाथ लंबा कर मेरी चूत पर अपनी ऊँगली रगड़ने लगा.
उसकी उंगलियों के मेरी चूत पर रगड़ से मुझे नशा चढ़ने लगा. मैंने अपने पाँव पुरे खोल अपनी गांड को हिला उसकी ऊँगली अपनी चूत में घुसाने की कोशिश की.
मेरे मुँह में उसका लंड फिर कड़क हो बड़ा हो गया था, क्यों की वो अब मेरे गले तक चोद रहा था. मैंने उसका लंड अपने मुँह से बाहर निकाला.
मैं: “चलो अब जल्दी से ख़त्म करो मेरा काम…”
वो फिर मेरे ऊपर चढ़ गया, और अपना लंड मेरी चूत में घुसा चोदना चालू कर दिया. मेरा काफी सारा काम तो उसकी पिछली चुदाई और ऊँगली करने से ही हो गया था, तो उसक लंड के अंदर घुस चोदते ही मेरे अंदर का पानी आवाज करने लगा. मैं भरी हुई बैठी थी तो मैं झड़ने को हो आयी.
मैं: “मेरा होने वाला हैं, जोर जोर से चोदो, आहहह आहहह..”
मैं खुद नीचे से अपने शरीर को ऊपर नीचे पटकते हुए झटको का वेग बढ़ा रही थी. कुछ ही क्षणों में चीखते चिल्लाते हुए झड़ गयी उह मम्मी, आईईईई उहुँहुँहुँहुँ ओ मम्मी ओ मम्मी, हां कर लो, कर लो, ऊ आ आ आ, ईशश्श्श्श्स ऊअआ.
झड़ने के बाद वही बिना हिले डुले शांत पड़ी रही. पर नितिन तो पूरा तैयार था दूसरी बार झड़ने को, मैंने उसको अपने ऊपर से गिरा दिया. आधा छूटने से उसको अच्छा नहीं लगा.
नितिन: “मेरा भी तो पूरा करने दो.”
मैं: “प्रोटेक्शन किधर हैं? माँ बनाओगे क्या मुझे? जाकर पूजा को माँ बनाना.”
नितिन: “खुद को झड़ना था तब प्रोटेक्शन याद नहीं आया.”
मैं: “तुम्हारा एक बार हो चूका हैं ना? मुझे रिस्क नहीं लेना.”
नितिन: “मैं पहले झड़ने के बाद ही चला जाता तो? तुम्हारा पूरा किया न मैंने?”
मैं: “रो मत, चलो पीछे से कर लो, आगे रिस्क नहीं ले सकती मैं.”
मैंने अब करवट ली और वो मेरे पीछे आकर लेट गया और मेरे गांड में अपना लंड ठूंस कर चोदना शुरू कर दिया. ज्यादा देर नहीं लगी और उसने अपना पानी मेरी गांड में भरते, आहें भरते हुए दूसरी बार झड़ गया.
उसने अपने कपड़े पहन लिए और मैंने भी अपना टॉवेल फिर लपेटा. मेरा शरीर अब थोड़ा हल्का महसूस कर रहा था. वो बाहर गया तो मैंने टॉवेल निकाल अपना गाउन पहन लिया. मेरे बैडरूम से बाहर आने पर वो बाथरूम से निकला और मुझसे जाने की इजाजत मांगने लगा.
मैं: “तुमने जान बूझकर तो म्यूट नहीं किया था न मोबाइल?”
नितिन: “हम दोनों ने किया वो हमारे बीच. अशोक को बताने की जरूरत नहीं इस बारे में.”
वो वहा से चला गया और मैं एक पहेली में उलझ गयी. अगर नितिन यहाँ पर पूजा के कहने पर गलती से आया था तो वो अपने साथ कंडोम लेकर क्यों आया.
अब झूठ कौन बोल रहा हैं ये पता करना मुश्किल था. हो सकता हैं अशोक ने पूजा के साथ कुछ किया ही ना हो, नितिन ने मुझे झूठ बोलकर अपने जाल में फंसाया हो.
मुझे पूजा पर भी शक था, वो नितिन के साथ मिली हो सकती हैं. दूसरी बार फ़ोन उसी ने उठाया था, अशोक की आवाज तो आयी ही नहीं. पहले भी मैं उसकी हरकते देख चुकी थी और वो मुझसे नंगी नंगी बातें करती थी.
पर एक सच तो ये भी था कि मेरी गुहार के बावजूद अशोक यही कहता रहा कि नितिन को मस्ती करने दूँ.
शाम को अशोक घर लौटा और मैंने उससे थोड़ी शंका समाधान करने की कोशिश की.
मैं: “तुम फ़ोन पर पूजा को रगड़ने की क्या बात कर रहे थे?”
अशोक: “मुझे कुछ याद नहीं मैंने क्या बोला, वो पूजा ने इस साल भी भांग पिला दी धोखे से.”
मैं: “इस साल भी मतलब, पिछले साल भी…”
अशोक: “पिछले साल पकोड़े में भांग मिलाई थी, मेरी हालत ख़राब हुई तो वो मुझे बाथरूम में ले गयी ताकि गीला होने से नशा उतर जाए, पर मुझे कुछ ज्यादा याद नहीं. उठा तब टब में था और नितिन मुझ पर पानी डाल उठा रहा था.”
मैं :”तो इस साल क्यों खाया भांग का पकोड़ा?”
अशोक: “मैंने नहीं खाया, पूजा ने मिठाई खिलाई ये बोलकर कि बाजार की हैं, पर उसमे भी भांग थी.”
मैं: “तुम तो नितिन को फ़ोन पर मेरे साथ कुछ भी मस्ती करने की छूट दे रहे थे, वो मेरे साथ कितनी जबरदस्ती कर रहा था पता हैं?”
अशोक: “क्या बदतमीजी की बताओ?”
मैं: “मेरे कपड़े फाड़ दिए थे, और नंगी कर दिया था.”
अशोक: “क्या! अभी फ़ोन लगता हूँ उस हरामी को.”
मैं: “नहीं, कोई जरुरत नहीं झगड़ा करने की.”
अशोक: “तुम झूठ तो नहीं नहीं बोल रही, बताओ फटे कपड़े.”
मैं: “कपड़े नहीं फाड़े, छीना झपटी में ब्लाउज का हुक टूट गया था. उसने मेरे साथ कुछ कर लिया होता तो?”
अशोक: “ऐसे कैसे कर लेता, बाप का माल हैं क्या. तुम बताओ क्या किया उसने, मैं उसको देख लूंगा.”
मैं: “मैं उसको कुछ करने थोड़े ही देती, उस दिन हिल स्टेशन पर डीपू को भी नहीं करने दिया था याद हैं?”
अशोक: “मैं फिर भी उससे बात करूँगा. अगली बार से वो यहाँ नहीं आएगा.”
उस वक्त तो बात आयी गयी हो गयी. कभी कभी मौन ही सबसे अच्छा उपाय होता हैं. मैंने इस होली के दिन को भुला आगे बढ़ने में ही भलाई समझी, हो सकता हैं ऐसा कुछ ना हो जो मैं समझ रही थी.
मगर अब अशोक पर भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा था. मैं इस दुनिया से बाहर आना चाहती थी और अपने जीवन की एक नयी शुरुआत चाहती थी. मैंने शपथ ले ली कि अब मै किसी गैर मर्द के चक्कर में बिलकुल नहीं फँसूँगी
