एक बुजुर्ग और शादी-शुदा औरत के बीच वासना 4

बाप बेटी

मैं सोफे पर झट से चढ़ कर कुतिया बन गई, और राजेश्वर जी को अपनी चूत के ओर इशारा करने लगी। राजेश्वर जी ने बिना कोई टाईम गवाए जल्दी से मेरे पीछे आ गए, और अपना लंड मेरी चूत पे रगड़ने लगे।

मैं: चोदोगे भी या सिर्फ रगड़ते रहोगे?

राजेश्वर जी: हां मेरी रानी, थोड़ा सब्र करना चाहिए।

मैं: मुझसे नहीं होगा। आप बस मुझे चोदना शुरु करो।

मेरे ऐसा कहते ही उन्होनें अपना लंड धीरे-धीरे मेरी चूत में घुसा दिया। उनका लंड एक-दम कड़क और गरम था। हम दोनों पर गोली का असर पूरी तरह से चढ़ चुका था। मेरी सांसें और दिल की धड़कन तेज हो गई थी। राजेश्वर जी ने फिर अपने चोदने की रफ्तार धीरे-धीरे बढ़ानी शुरु कर दी, और कुछ ही देर में वो पूरी तेजी से मेरी चूत मार रहे थे। मैं बड़े मजे से चुदाई का आनंद ले रही थी।

मेरी चीखें और सिस्कारियां पूरे घर में गूंज रही थी। मैं पूरी बेशर्म हो कर “आह्ह्ह… उन्ह्ह्ह्ह… अह्ह्ह्ह… चोदो मुझे, अपने लंड की दिवानी बना दो‌। मुझे रंडी की तरह चोदो अह्ह…” चिल्ला रही थी।

राजेश्वर जी भी मेरी बातें सुन कर जोश में आ गए, और वो भी मुझे गाली देने लगे।

राजेश्वर जी: साली तेरी चूत इतनी मस्त है कि रुकने का मन ही नहीं करता। तू सिर्फ चुदने के लिए पैदा हुई है।

मैं ये सुन कर थोड़ी हैरान हो गई,‌ मगर मुझे इससे और मजा आने लगा। ऐसे ही पूरे एक घंटे मुझे जोरदार चोदने के बाद राजेश्वर जी मेरी चूत में झड़ गए। मेरी चूत उनके गरम रस से भर गई। मैं इस दौरान कितनी बार झड गई, मुझे याद भी नहीं था। हम दोनों इतनी जबरदस्त चुदाई के बाद भी संतुष्ट नहीं थे। बल्कि अब भी हम दोनों पर उतना ही वासना का असर था जितना पहले था।

मैं: चलो अब आप नीचे लेट जाओ।

राजेश्वर जी: क्यों क्या हुआ?

मैं: आप मुझे चोद कर थक गए होंगे ना। तो अब मेरी बारी सारा काम करने की।

मेरी बात मान कर राजेश्वर जी सोफे पर लेट गए। मैं उनके पांव को चूमते हुए धीरे-धीरे उपर की ओर बढ़ने लगी। फिर उनके बड़े-बड़े सुपारे को चूमने लगी। राजेश्वर जी भी पूरा मजा ले रहे थे।

फिर मैं उनके खड़े हो चुके लंड को धीरे-धीरे हिलाने लगी। लेकिन मुंह में नहीं लिया। मैं दरअसल राजेश्वर जी को छेड़ रही थी। उन्हें जान बूझ कर तड़पा रही थी।

राजेश्वर जी: अरे दिव्या, ऐसे तड़पाओ मत। जल्दी चूसना शुरु कर दो।

मैं: ओह मेरी जान, कितने प्यारे दिखते हो तुम ऐसे।

राजेश्वर जी: दिव्या ऐसे ही करती रहोगी, तो मैं पागल हो जाऊंगा।

मैं: ठीक है में चूसना शुरु कर दूंगी। लेकिन एक इच्छा है।

रजेश्वर जी: कोई भी इच्छा मुझे मंजूर है दिव्या।

मैं: सोच लो।

राजेश्वर जी: हां बाबा मुझे कोई भी इच्छा मंजूर है।

मैं ये सुन कर खुश हो गई, और राजेश्वर जी के लंड पर किस्स करने लगी। फिर मैं उनका लंड चूसने लगी। मुझे राजेश्वर जी के लंड की इतनी आदत हो गई थी कि मैं उनका अब पूरा लंड बिना किसी परेशानी के मुंह में लेकर चूस लेती थी।

राजेश्वर जी: वाह क्या चूसती हो तुम। लेकिन तुमने मुझे अपनी इच्छा नहीं बताई?

मैं: वो में आपको बाद में बता दूंगी। फिलहाल हम चुदाई का मजा लेते है।

यह कह कर मैं उठ कर खड़ी हो गई, और राजेश्वर जी के लंड के उपर बैठ गई। मैंने राजेश्वर जी का लंड अपने हाथ में लेकर अपनी चूत पर सेट कर दिया। मेरी चूत पहले से गीली थी, और ऊपर से अन्दर राजेश्वर जी के वीर्य से भरी हुई थी, जिसके कारण उनका लंड मेरी चूत में बड़े ही आसानी से गया।

मैं फिर मजे से अपनी कमर हिला कर और उठा कर उनके लंड को मेरी चूत में से अंदर-बाहर करने लगी, और राजेश्वर जी मेरे मम्मों को अपने हाथों में लेकर मसल रहे थे। मैं और जोर-जोर से उनके लंड पर कूद-कूद कर चुदवा रही थी।

राजेश्वर जी: दिव्या मेरा निकलने वाला है।

मैं: हां मैं भी झड़ने वाली हूं।

हम दोनों एक साथ झड़ गए। राजेश्वर जी का लंड मेरी चूत में हिचकियां लेता हुआ महसूस हो रहा था, और मेरे पैर भी झड़ने की वजह से कांप रहे थे। मेरी चूत अब इतने वीर्य से भर गई थी, कि अब उसमें से वीर्य टपक रहा था। मैं ऐसी ही स्थिति में राजेश्वर जी के उपर लेट गई। वो भी मुझे अपने बाहों में भर कर मेरे साथ लेट गए।

राजेश्वर जी: दिव्या मुझे आज का दिन हमेशा याद रहेगा।

ये कह कर उन्होंने मेरे माथे पर किस्स किया।

मैं: मुझे भी ये दिन हमेशा याद रहेगा।

हम दोनों यूं ही नंगे बदन एक-दूसरे को गले लगा कर सोफे पर सो गए। सच कहूं तो मैं बहुत दिनों बाद चैन की नींद सो पाई। जब आंख खुली तो शाम हो गई थी। राजेश्वर जी अभी भी सो रहे थे। मैं उन्हें उठाने वाली थी कि मेरे मन में एक आइडिया आया।

मैं धीरे से सोफे पर से उतर गई और उनके मोटे लंड की तरफ बैठ गई। मैं उनके बड़े से लंड को निहार रही थी, और सोच रही थी कि “क्या लंड है यार, मुझे तो पूरी रंडी बना कर रख दिया है”।

मैंने फिर धीरे से उनके लंड को सहलाने लगी। मैं अब राजेश्वर जी के लंड से अच्छे से वाकिफ हो गई थी। मुझे पता था कि इनके लंड में अभी बहुत जान बाकी थी।

मैं फिर अपने दोनों हाथों से उनके लंड को हिलाने लगी, और कुछ ही पल में उनका तन कर खड़ा हो गया। मैंने फिर धीरे-धीरे उनके लंड को चूसना शुरु किया। मैं उनके लंड को मेरे मुंह के अंदर पूरी तरह से ले पा रही थी।

राजेश्वर जी की भी कुछ ही पल बाद नींद खुल गई। मैं उन्हें देख मुस्कराई और आंख मारी।

मैं: उठ गए मेरी जान।

राजेश्वर जी: अरे दिव्या, क्या कमाल हो तुम! बस इसी तरह मुझे रोज उठाया करो।

मैं: जैसी आपकी मर्जी।

मैं फिर से उनका लंड चूसने लगी। राजेश्वर जी पूरे मजे के साथ अपनी आंखें बंद करके सिसकियां ले रहे थे। “आह्ह… ओह्ह… वाह दिव्या मेरी जान, ऐसे ही मेरे लंड की सेवा करो”

ये सुन कर मैं खुश हो गई। मैं और जोर-जोर से उनका लंड चूसने लगी। मेरा पूरा चेहरा अपनी थूक और उनके लंड के वीर्य से भर गया था।

ऐसे ही थोड़ी देर बाद राजेश्वर जी ने मेरे सर को पकड़ लिया और मेरे मुंह को चोदने लगे। मैं समझ गई कि इनका अब जल्दी ही निकलने वाला था।

वो मेरे मुंह को अपना पूरा जोर लगा कर चोद रहे थे। उनका लंड मेरी थूक से चमक रहा था और जोर-जोर से मेरा मुंह चोदने के कारण मेरी आंखों से आंसू आ रहे थे। फिर उन्होनें दो-तीन जोर के धक्के दिये, और मेरे मुंह में झड़ गए।

मेरा मुंह उनके वीर्य से भर गया। मैं तो हैरान थी कि एक आदमी इतनी बर झड़ने के बाद भी इतना माल कैसे छोड़ सकता था? राजेश्वर जी अपना पूरा लंड झड़ने के बाद भी मेरे मुंह में भरे हुए थे, जिसकी वजह से मुझे सांस लेने में तकलीफ होने लगी। मैं उनके लंड को अपने मुंह से बाहर निकलने की कोशिश करने लगी।

जब मैं बहुत झटपटाने लगी, तब कहीं जा कर राजेश्वर जी ने अपना लंड बाहर निकाला। उनका लंड बाहर निकलते ही मैं जोर-जोर से खांसने लगी, और लंबी-लंबी सांस लेने लगी। उनका वीर्य मेरे मुंह में से बाहर निकल कर मेरे मम्मों पर गिर गया।

मैं (गुस्से से): ये क्या था! आपने तो मेरी जान ही लेली थी।

राजेश्वर जी हसने लगे और बोले-

राजेश्वर जी: सॉरी मेरी जान, क्या करूं जब तुम मेरे लंड पर ऐसे छटपटाने लगी, तो मुझे बहुत मजा आया।

मैं: आपको मजा आया और मेरी जान निकल गई उसका क्या?

राजेश्वर जी: अरे बाबा बोला ना सॉरी। फिर कभी ऐसा नहीं होगा।

हम दोनों कुछ देर बाद उठ गए, और मैं नाश्ता बनाने के तैयारी में लग गई। राजेश्वर जी सोफे पर बैठ कर मेरे नंगे बदन को निहार रहे थे। मैंने उन्हें मुझे घूरते हुए देखा।

मैं: क्या मुझे पहली बार ऐसे देख रहे हैं आप?

राजेश्वर जी: अरे नहीं दिव्या, मैं तो तुम्हें ऐसे नंगे बदन नाश्ता बनाते देख थोड़ा उत्तेजित हो गया।

मैं: तो आईये अपनी उत्तेजना दूर करने।

राजेश्वर जी उठ कर किचन में आने ही वाले थे कि मेरा फ़ोन बजने लगा। मैंने देखा तो मेरे पति का फ़ोन आया था।

मैंने फोन उठाया और उनसे बाते करने लगी।

मैं: हैलो जान! कैसे हो?

शेखर: हैलो! मैं बढ़िया हूं। मेरी याद आती भी है कि नहीं?

मैं: याद आती है जान, लेकिन राजेश्वर जी है तो समय कट जाता है।

शेखर: अरे वाह! बहुत अच्छा हुआ राजेश्वर जी तुम्हारे साथ है। वरना अकेली बोर हो जाती।

मैं शेखर से बातें कर ही रही थी कि मुझे मेरी पीठ पर कुछ महसूस हुआ। मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो राजेश्वर जी मेरी पीठ पर अपना हाथ सहला रहे थे। मेरी डर के मारे धड़कन बढ़ने लगी, ये सोच कर कि अब ये क्या करने की सोच रहे थे?

शेखर: हैलो दिव्या? शांत क्यों हो गई?

मैं: अरे वो कुछ नहीं, अभी नाश्ता बना रही थी, तो उसमें ध्यान था। तुम बोलो काम कैसा चल रहा है?

राजेश्वर जी अब पीछे से मेरी गांड को सहला और दबा रहे थे। मैं भी अब धीरे-धीरे फिर से उत्तेजित हो रही थी। मेरे पति फोन पर काम के बारे में कुछ बता रहे थे। लेकिन मेरा उस पर कुछ ध्यान नहीं था। मैं बीच-बीच में हां और अच्छा बोल रही थी।

फिर राजेश्वर जी ने मेरे मम्मों को दबाना शुरू कर दिया। पहले वो धीरे-धीरे दबा रहे थे। फिर उन्होंने जोर-जोर से मेरे मम्मों को दबाना शुरू कर दिया। मेरी सांसे अब तेज हो गई, और मेरी चूत में तो मानो आग सी लग गई।

शेखर: दिव्या तुम ठीक तो हो ना? तुम्हारी सांसे क्यों इतनी तेज हो गई?

मैं थोड़ी डर गई

मैं: कुछ नहीं डार्लिंग, किचन में हूं तो गर्मी लग रही है। इसी वजह से सांस फूल रही है।

मेरे चूत की हालत अब खराब हो गई थी। मेरी चूत राजेश्वर जी के लंड के लिए तड़प रही थी। राजेश्वर जी मुझे छेड़े जा रहे थे। कभी वो मेरे मम्मों को मसलते, कभी गांड पर अपना लंड रगड़ते, तो कभी मेरी गर्दन को चूमते थे।

एक तरफ मैं अपने पति से फोन पर बात कर रही थी, और दूसरी तरफ मेरे दूसरे पति यानी राजेश्वर जी मुझे चोदने की फिराक में थे। यह सोच कर मुझे बहुत मजा आ रहा था।

(मैं पति से फोन पर बात करते हुए)

मैं: जानू‌ वहां सब ठीक तो है ना? खाना-पीना अच्छे से हो रहा है ना?

शेखर: हां दिव्या तुम चिंता मत करो।

मैं: मैं तो बस…।

मैं फोन पर बोल ही रही थी कि राजेश्वर जी अपना लंड मेरी चूत पर रगड़ने लगे। मेरी चूत तो पानी-पानी हो गई।

शेखर: बस क्या? आगे बोलो।

मैं: कुछ नहीं बस तुम्हारी फिकर हो रही थी।

राजेश्वर जी ने अब अचानक से अपना लंड जोर के धक्के के साथ मेरी चूत में घुसा दिया। मेरी जोर से चीख निकल गई आह!

शेखर: क्या हुआ दिव्या?

मैं: कुछ नहीं आपसे बाद में बात करती हूं।

और मैंने फोन कट कर दिया। मेरे फोन रखते ही राजेश्वर जी ने मुझे चोदना शुरू कर दिया। मैं किचन के काउंटर को पकड़े झुक कर उनसे चुद रही थी। पता नहीं राजेश्वर जी को क्या हुआ था, वो मुझे दना दन चोदे जा रहे थे। वैसे भी वो शॉट जोर-जोर से ही मरते थे। मगर इस बार कुछ अलग ही जुनून चढ़ा था।

मैं: आह आह राजेश्वर जी, मैं कहीं भागने वाली नहीं हूं। थोड़ा आराम से चोदिए। व

मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी, कि राजेश्वर जी ने मेरे मुंह पर हाथ रख दिया, और मुझे खड़ा कर दिया, और अपने बदन से चिपका कर चोदे जा रहे थे। मैं अब खड़ी-खड़ी चुद रही थी। मेरा पर शरीर ढीला पढ़ चुका था। मैंने आज पूरे दिन बिना आराम किये चुदाई कर-कर के मेरे शरीर में अब जान नहीं बची थी, और राजेश्वर जी ने दी हुई गोली का असर भी खतम हो गया था।

मैं यहीं सोच में पड़ गई कि राजेश्वर जी अभी कैसे नहीं थके। बल्कि अभी तो मुझे अपनी पूरी ताकत के साथ चोद रहे थे। मुझे राजेश्वर जी ऐसे ही खड़े-खड़े 10 मिनट तक पूरी ताकत के साथ चोद रहे थे। फिर उन्होंने अपना लंड मेरी चूत से निकाला और मुझे छोड़ दिया। मेरे शरीर में अब खड़े होने की भी जान नहीं बची थी। मैं किचन के काउंटर को पकड़ कर उसके सहारे जैसे-तैसे अपने आप को संभाल पा रही थी।

मुझे लगा राजेश्वर जी का अब झड़ने वाला होगा, लेकिन मैं गलत थी। राजेश्वर जी ने मुझे काउंटर पर चढ़ने बोला, लेकिन मेरी हालत बहुत खराब थी। राजेश्वर जी समझ गए उन्होंने मुझे किसी गुड़िया के तरह उठाया, और किचन काउंटर पर बिठाया। राजेश्वर जी अब मेरी चूत में फिर से लंड डालने के लिए रेडी थे।

मैं: प्लीज़ इस बार आराम से करिये।

राजेश्वर जी (गुस्से में): में तेरा पति हूं। अब से तेरी ऐसे ही चुदाई होगी हर बार।

मैं ये सुन कर हैरान हो गई कि ऐसे रोज चुदाई हुई तो मेरी चूत का भोंसड़ा बन जाएगा। मैं कुछ और कह पाती इससे पहले ही उन्होंने अपना लंड फिर से मेरी चूत में एक जोरदार झटके के साथ घुसेड़ दिया। उसके बाद जो उन्होंने मेरी ताबड़तोड़ चुदाई की। मेरे तो होश उड़ गए। चूत पानी छोड़-छोड़ के और ऐसे चुदाई से टमाटर जैसे लाल हो गई थी, और सूजन से फूल चुकी थी। मेरे पैरों ने तो जान ही छोड़ दी थी, और दिमाग में बस राजेश्वर जी की चुदाई का नशा चढ़ गया था।

राजेश्वर जी बिना रुके बस मुझे चोदे जा रहे थे। उन्होंने थोड़ी सी भी रफ्तार कम नहीं की। ऐसा करीब पूरे 40 मिनट तक चला। मैं तो पूरी लाल हो गई थी, और सोच रही थी कि ना जाने कब यह चुदाई खतम होगी। फिर और पांच मिनट बाद राजेश्वर जी ने आखरी 4-5 झटके मारे, और मेरी चूत को फिर से अपना पानी पिलाने लगे। हम दोनों हाफ रहे थे, और एक-दूसरे की आंखों में देख रहे थे।

5 मिनट हम दोनों एक-दूसरे के आंखों में खो गए थे। राजेश्वर जी अब भी अपना लंड मेरी चूत में डाले ही खड़े थे। मैं कुछ महसूस किया मेरे दिल में मानो मेरा दिल राजेश्वर जी को देख जोर से धड़क रहा था। मैं झट से बोल पड़ी-

मैं: राजेश्वर जी मैं आपसे प्यार करती हूं।

राजेश्वर जी थोड़े चौंक गए लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं। बल्कि मेरी और झुके और मेरे होठों को चूमने लगे, और बोले-

राजेश्वर जी: में भी तुमसे प्यार करता हूं दिव्या।

मैंने राजेश्वर जी को गले लगाया और रोने लगी। अब हम दोनों को एहसास हो चुका था कि हम दोनों के बीच का ये रिश्ता अब वाकई में एक-दूसरे के दिल से जुड़ गया था।

ऐसी जोरदार चुदाई के बाद मेरी चूत में दर्द होने लगा था, और हम दोनों का शरीर पसीने से चमक रहा था। राजेश्वर जी ने धीरे-धीरे अपना लंड मेरी चूत में से बाहर निकाला। लंड बाहर निकलते ही मेरी चूत से राजेश्वर जी के वीर्य की धार बहने लगी।

मैंने चैन कि सांस ली, कि ये चुदाई आखिरकार थम गई। मुझे ऐसी चुदाई में मजा तो बहुत आया, मगर मेरे शरीर में अब जान नहीं थी राजेश्वर जी का लंड लेने की।

मैं (आंसू पोंछते हुए): क्या राजेश्वर जी, अपने मेरी चूत फाड़ दी।

राजेश्वर जी: सॉरी दिव्या, दिव्या मुझसे रोका नहीं गया।

मैं: ठीक है, कोई बात नहीं। मै़ आपकी पत्नी हूं और मैंने आपको वादा किया था जब चाहो चोद सकते हो।

मुझे लगा राजेश्वर जी का अब मन भर गया होगा। लेकिन ये दिन मेरे लिए बहुत लंबा होने वाला था। मैंने मुझे उठाने के लिए राजेश्वर जी के आगे हाथ बढ़ाया, ताकि उनके सहारे मैं खड़ी हो सकूं। मगर राजेश्वर जी ने ऐसी बात बोल दी कि मेरे होश उड़ा दिए।

राजेश्वर जी: कहां जा रही हो? अभी तक चुदाई खतम नहीं हुई है।

मैं ये सुन कर दंग रह गई। राजेश्वर जी इंसान है या जानवर? कोई कैसे इतनी चोदने की क्षमता रख सकता है?

मैं: आप मजाक कर रहे है? आपने मेरी चूत फाड़ दी है। मेरे शरीर में अब खड़े होने की जान नहीं है, और आपको मुझे और चोदना है?

राजेश्वर जी ये सुन कर थोड़े मायूस हो गए। मुझे उनको ऐसा देख बहुत बुरा लग रहा था। आखिर मैंने ही बड़े ताव में आकर उनको मुझे आज दिन भर चुदाई का सपना दिखाया था। मैं आगे कुछ बोलने वाली थी मगर उतने में ही राजेश्वर जी ने कहा।

राजेश्वर जी: दिव्या माफ कर दो। मगर, चाहे कुछ भी हो जाए, आज मैं तुम्हें मेरी पूरी ताकत के साथ ही चोदने वाला हूं।

मैं थोड़ी शॉक में थी। आखिर ऐसा क्या हो गया जो इतना चुदाई का जुनून इनके सर चढ़ गया? लेकिन राजेश्वर जी ने आगे जो बोला, उससे मुझे बहुत बुरा लगा।

राजेश्वर जी: आखिर अपना पति-पत्नी का रिश्ता तो नाम का है ना, तुम भला क्यों मेरा हर कहना मानोगी?

मैं: ऐसे मत बोलिये। मैंने अभी आपसे कहा के मुझे आपसे प्यार है।

राजेश्वर जी: छोड़ो दिव्या जाने दो।

ये कह कर राजेश्वर जी निराश होकर मुड़ने लग। मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने अपने प्यार को सच्चा साबित करने के लिए उनको रोक दिया और कहा-

मैं: रुकिए… आपके पास वोह चुदाई वाली गोली है ना? वो लादो प्लीज़।

राजेश्वर जी ने वो गोली का पैकेट और पानी लाकर मेरे सामने रख दिया। मैंने तुरंत उस पैकेट में से चार गोलियां खा ली।

राजेश्वर जी ने मुझे कहा: इतनी गोलियां मत खाओ एक साथ।

मगर मैंने अपने प्यार को साबित करने की ठान ली थी। मेरा शरीर अब भी ढीला था। मेरे टांगों में अभी जान नहीं थी, मगर मेरे दिमाग में जल्दी ही कामुकता से भरे खयाल आने लगे और चूत फिर से गीली होने लगी। कुछ ही पल में मेरी चूत का दर्द आनंद में बदल गया।

मेरा बदन अब धीरे-धीरे झटपटाने लगा। मैं आँखें बंद कर काउंटर पर लेट के मेरे निप्पल दबाने लगी, और फिर मेरे मुंह से लार टपकने लगी। गोली का नशा अब मेरे दिमाग में पूरी तरह से हावी हो चुका था। मेरे शरीर पूरी तरह थकने के बावजूद मुझे अब चुदाई करनी थी।
राजेश्वर जी ये सारा नजारा देख दंग रह गए थे। वो समझ गए कि मैं चुदाई के लिए फिरसे रेडी थ। वो बिना कोई समय गवाए मेरे पास आए, और मेरी चूत को चाटने लगे।

मैं मजे से सिसकियां ले रही थी अह्ह… आह्ह… फिर राजेश्वर जी अपना लंड मेरी चूत में डालने ही वाले थे कि मैंने उन्हें रोक दिया।

मैं: नहीं जान, चूत नहीं। अभी गांड मारो मेरी।

ये कह कर मैं मुस्कुराने लगी।

राजेश्वर जी: सोच लो, तेरी गांड का भरता बना दूंगा मैं।

मैं: सोच लिया, आज से मेरा सारा बदन आपके हवाले। चीर के रख दो मेरी गांड को।

राजेश्वर जी ने तेल की बॉटल ली, और ढेर सारा तेल मेरी गांड पर डाल दिया, और अपने लंड को भी तेल से लथ-पथ कर दिया। राजेश्वर जी ने लंड मेरी गांड पर सेट किया, और एक जोर के धक्के के साथ पूरा लंड एक ही बार में मेरी गांड में घुसेड़ दिया। ली हुई गोलियों के वजह से मुझे दर्द नहीं हुआ, बल्कि और मजा आने लगा।

लंड अंदर जाते ही मेरी चूत ने पानी की पिचकारी छोड़ दी, जो सीधा राजेश्वर जी के मुंह पर जाके लगी। राजेश्वर जी अब पहले के जैसे ही मुझे अपनी पूरी ताकत के साथ चोद रहे थे। मेरी गांड में उनका लंड बड़ी तेजी से और जोर से अंदर-बाहर हो रहा था।‌ मैं हर दो मिनट में झड़ रही थी। राजेश्वर जी रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उन्होंने ने मुझे अपनी गोदी में उठाया, और दनादन मेरी गांड चोदने लगे। मैं बस इस चुदाई के आंनद से चीख रही थी आहह.. आह्ह…

मैं: चोदो, और जोर से गांड को फाड़ कर रख दो। अपनी रंडी बना कर रख दो।

राजेश्वर जी (मुझे चोदते हुए बोले): हां मेरी जान, तुझे ऐसा चोदूंगा कि मेरे लंड के आगे कुछ सोच नहीं पाओगी।

राजेश्वर जी ऐसे ही मुझे गोद में लिए खड़े-खड़े 10 मिनट तक चोदते रहे। फिर उन्होंने मुझे किचन के फ्लोर पर मुंह के बल लिटा दिया, और मेरी गांड चोदने लगे। लेटे होने की वजह से उनका लंड मेरी गांड में और भी अंदर जा रहा था, और वो मुझे अपने पूरे शरीर के भार के साथ चोद रहे थे। मैं तो मानो उनके शरीर के नीचे कुचली जा रही थी। मुझे ऐसे और भी मजा आ रहा था।

करीब 2 घंटे की नॉन-स्टॉप गांड चुदाई के बाद राजेश्वर जी मेरी गांड में झड़ गए। मेरी गांड का छेद तो मानो फट गया था। राजेश्वर जी के लंड निकालने के बावजूद वो खुला का खुला था। राजेश्वर जी अब चुदाई करके थक गए थे, और गोलियां भी खतम हो गई थी। लेकिन मुझ पर अब भी चुदाई का भूत सवार था।

मैं: और चोदो प्लीज़, मैं हाथ जोड़ती हूं। आप जो बोलोगे में वो करूंगी, मगर मुझे और चोदो।

राजेश्वर जी: मेरा हो गया दिव्या, और ताकत नहीं बची।

मुझे ये सुन कर बहुत गुस्सा आया। कि मैंने इनके लिए इतनी चुदाई सही, और अब जब मेरी बारी आई तो मुझे ऐसे ही छोड़ रहे थे।

मैं: अब क्यों? मन भर गया? जब चोदना था तो गिड़गिड़ा रहे थे।

राजेश्वर जी: देखो तुम पर गोलियों का असर ज्यादा हो गया है।

मैं: मुझ पर कुछ असर नहीं हुआ है। आपको मेरे उपर प्यार नहीं है।

मैं ये कह कर जैसे-तैसे उठने की कोशिश करने लगी। बड़ी मुश्किल से मैं खड़ी हो पाई, और धीरे-धीरे फ्रिज की ओर बढ़ने लगी। मेरी टांगे लड़खड़ा रही थी, और चूत में अब भी आग लगी थी। दिमाग में अभी भी चुदाई के खयाल चल रहे थे।

मैं फ्रिज के पास पहुंच गई, और फ्रिज में से एक बड़ा खीरा लिया। वो लगभग राजेश्वर जी के लंड जितना ही होगा। मैं नीचे बैठ कर उस खीरे को मेरी चूत में डाल कर खुद को चोदने लगी। मुझे ऐसा करके बहुत मजा आ रहा था। राजेश्वर जी ये सब चुप-चाप देख रहे थे।

मैं खीरे को कभी चूत में डालती, तो कभी मेरी गांड में। ऐसे ही करीब आधे घंटे तक खुद को चोदने के बाद में ऐसी झड़ी, कि मैं जोर-जोर से कांपने लगी, और मेरी चूत का इतना बुरा हाल हो गया था कि मेरा पेशाब निकल गया। मेरा शरीर भी अब पूरी तरह से जवाब दे चुका था।

मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और मैं बेहोश हो गई। जब आँखें खुली, तो सुबह हो गई थी। मैं उठने की कोशिश कर रही थी, मगर मेरा पूरा बदन दर्द कर रहा था। बहुत कोशिश के बाद मैं बेड पर से उठ कर खड़ी हो गई। मेरी चूत और गांड दोनों बहुत दर्द कर रहे थे। मैंने आईने में देखा तो मेरी चूत लाल और फूली ही थी।

मैं अब भी नंगी ही थी। मैं धीरे-धीरे चल कर बाहर आ गई। बाहर राजेश्वर जी लिविंग रूम में सोफे पर बैठे हुए थे। मुझे बाहर देख वो बोले-

राजेश्वर जी: उठ गई दिव्या, तबियत कैसी है?

मैं: पूरा बदन दर्द कर रहा है। चूत और गांड दोनों तो मानो फट गई है, और सिर दर्द भी कर रहा है।

राजेश्वर जी: कल क्या हुआ याद है या भूल गई?

मैं: याद है बाबा, सब याद है।

मैं धीरे से आगे बढ़ने लगी। हर कदम पर मेरी चूत में दर्द हो रहा था। मैं बस कुछ कदम ही आगे बड़ी थी, कि मुझे उल्टी जैसे होने लगा। राजेश्वर जी समझ गए, और वो तुरंत मेरी तरफ आए, और मुझे गोद में उठा कर बाथरूम ले गए।

बाथरूम में जा कर मुझे नीचे रखते ही मैंने कमोड में उल्टी करना शुरू कर दिया। उल्टी करके थोड़ा हल्का एहसास हुआ और थोड़ा अच्छा लगा। मैंने उल्टी फ्लश कर दी और कमोड पर पेशाब करने बैठ गई। मैंने देखा कि राजेश्वर जी अभी भी वहीं खड़े होकर मुझे देख रहे थे।

मैं: यहां क्यों खड़े हो? मुझे पेशाब करने दो, जाओ।

राजेश्वर जी: क्यों जाऊं? कल तो तुम गोली खाने के बाद एक-दम चुदक्कड़ बन गई थी, और मेरे सामने ही किचन में पेशाब करके बेहोश हो गई थी।

मैं: अरे वोह गोलियों का असर हो गया था। मैं दिल से माफी मांगती हूं।

राजेश्वर जी हसने लगे और बोले-

राजेश्वर जी: माफी मत मांगो। मुझे तुम्हारा वो रूप अच्छा लगा। तुम ऐसे ही बेफिक्र होकर मुझसे चुदाई करो।

मैंने राहत की सांस ली। राजेश्वर जी तो जाने का नाम नहीं ले रहे थे, तो मैंने भी सोचा “वैसे भी ये मेरे पति है, इनके सामने पेशाब करने में कैसी शर्म?” मैं पेशाब करने लगी, और मुझे पेशाब करता देख राजेश्वर जी अपना लंड निकाल कर मेरे सामने हिलाने लगे। मैं ये देख कर दंग रह गई, और डर गई कि फिर ये मेरी चूत ना मार दे।

मैं: छी! ये क्या कर रहे हो? प्लीज़ अभी मत चोदना।

राजेश्वर जी: मेरा लंड पहली बार देखा है? डर मत चोदूंगा नहीं। कल की चुदाई से मेरी कमर में थोड़ा दर्द है।

मैं ये सुन कर थोड़ी खुश हुई, कि अब और नहीं चुदना था। मेरा पेशाब करके हो गया और मैं कमोड पर से उठ गई। राजेश्वर जी का हाथ पकड़ कर मैंने अपने आप को संभाल लिया। अब मैं राजेश्वर जी को पकड़ के धीरे-धीरे शॉवर की ओर बढ़ने लगी। शॉवर में जाकर मैंने नल चालू किया, और शॉवर के नीचे गरम पानी में खड़ी हो गई।

गरम पानी मेरे शरीर पर पढ़ने से मुझे सुकून मिला। बदन में दर्द भी थोड़ा कम हुआ। मैंने देखा राजेश्वर जी बाथरूम में खड़े होकर मेरा नंगा बदन घूर रहे थे, और अपना लंड हिला रहे थे। मुझे उन्हें ऐसा देख बोहोत अच्छा लगा। मैंने उन्हें इशारे से मेरे साथ नहाने के लिए बुलाया। राजेश्वर जी अपने कपड़े उतार कर मेरे साथ शॉवर में आ गए।

राजेश्वर जी ने साबुन लिया और मेरे बदन पर रगड़ना शुरू कर दिया। मुझमें खड़े होने की ताकत नहीं बची थी, तो मैं नीचे बैठ गई। राजेश्वर जी भी मेरे साथ नीचे बैठे। वो मुझे बड़े प्यार से और कोमलता से साफ कर रहे थे।

मुझे इसीलिए उनसे प्यार हो गया था, क्योंकि उन्हें पता था कब जोर लगाना है, और कब स्त्री को प्यार करना है। हम दोनों बीच-बीच में एक-दूसरे को किस्स कर रहे थे। ऐसे शॉवर करने में बहुत मजा आ रहा था। मुझे अच्छे से साफ करने के बाद राजेश्वर जी खड़े हो गए। उनका लंड मेरे चेहरे के सामने ही था। मैंने बिना कुछ सोचे उनका लंड मुह में लिया और चूसने लगी।

राजेश्वर जी: अरे ये क्या कर रही हो? तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है। आज आराम करो।

मैं: जानती हूं, मगर आपको इस हालत में छोड़ नहीं सकती। और मैं कोन सा चुदाई करने वाली हूं, बस लंड ही तो चूसना है।

मैंने दस मिनट तक राजेश्वर जी का लंड धीरे-धीरे बड़े आराम से चूसा। वह भी एक-दम संयम के साथ खड़े थे। जरा सा भी जोर नहीं लगा रहे थे। कुछ ही पल में राजेश्वर जी झड़ गए, और मेरे चेहरे पर अपना वीर्य छोड़ दिया। मेरा चेहरा उनके वीर्य से ढक गया। मैंने उठने की कोशिश की, तो राजेश्वर जी ने मुझे नीचे बैठे रहने को कहा।

राजेश्वर जी: अभी तुम्हारी शिक्षा की बारी है।

मैं: किस बात की?

राजेश्वर जी: कल तुमने किचन में पेशाब किया, वो मुझे साफ करना पड़ा।

मैं: क्या शिक्षा दोगे अब?

राजेश्वर जी: तुमने पेशाब किया तो मुझे भी पेशाब करना है।

मैं: तो करिये, रोक कौन रहा है?

राजेश्वर जी: दिव्या तुम समझी नहीं।

मैं: क्या मतलब?

राजेश्वर जी: मुझे तुम पर पेशाब करना है।

मैं ये सुन कर दंग रह गई, और घिन आने लगी।

मैं: छी! कैसी बाते कर रहे हो आप? पागल हो गए हो?

राजेश्वर जी: इसमें गलत कुछ नहीं है। जानवर अपनी चीजों पर हक जमाने के लिए पेशाब करते है। मैं भी वहीं कर रहा हूं।

मैं: जानवर और इंसानो में फरक है। ये शिक्षा नहीं चलेगी।

राजेश्वर जी: अभी क्यों घिन आ रही है? कल खुद पेशाब करने के बाद मुझे बुला कर अपने उपर मूतने तूने ही तो बोला था।

मैं: मैंने ये कब किया कल?

राजेश्वर जी ने मुझे याद करने के लिए कहा। मैंने अपने दिमाग पर जोर दिया तो मुझे याद आया जब कल मेरा मूत निकल गया था, तो मैं जोर से हंस पड़ी, और राजेश्वर जी को बुला कर उन्हें मुझ पर मूतने के लिए भी बोला, और उसके उपर उनका मूत भी पिया था।

मैं थोड़ी देर के लिए शांत हो गई, और उनकी शिक्षा को मंजूर किया। मैं आँखें बंद करके घुटनों के बल बैठी थी। राजेश्वर जी समझ गए कि में तैयार थी। उन्होंने अपने मूत की धार को मेरे चेहरे पर धीरे-धीरे छोड़ना शुरू कर दिया। मुझे शुरू के कुछ सेकंड गंदा लगा। मगर बाद में ना जाने क्यों वो गरमा-गरम मूत मेरे चेहरे पर गिरता हुआ अच्छा लग रहा था। राजेश्वर जी पूरे 30 सेकंड या शायद उससे ज्यादा मूत रहे थे, और मैं मस्त मजे में बैठी थी, और मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। जब राजेश्वर जी का पेशाब करके हो गया तो मैंने अपनी आँखें खोल दी।

राजेश्वर जी: मजा आया ना?

मैंने मुस्कुरा कर हां में सर हिलाया, और शर्म से अपना चेहरा छुपा लिया।

मैं: चलो अब बाहर जाओ। मुझे फिर से नहाना पड़ेगा अभी।

राजेश्वर जी बाहर चले गए और मैंने फिर से जल्दी से नहा लिया। मैं बाथरूम के बाहर टॉवल लपेट कर बाहर आ गई। मेरी तबियत खराब होने के कारण हम दोनों डॉक्टर के पास गए।‌ वहां डॉक्टर ने कुछ दवाइयां लिख कर दी। वो दिन हम दोनों ने चुदाई नहीं की। मैं आराम कर रही थी और राजेश्वर जी मेरे हाथ पैर की मालिश कर रहे थे।

अगले दिन मेरी तबियत ठीक हो गई। चूत की सुजन भी हट गई। लेकिन अब भी मेरी चूत फूली ही नज़र आ रही थी। शायद राजेश्वर जी का लंड ले-ले कर मेरी चूत का आकार ही बदल गया हो। हमने आने वाले दिनों में पहले जैसे चुदाई करना चालू किया, और अब तो मुझे राजेश्वर जी के पेशाब से नहाने में भी मजा आता था। ऐसे ही दिन बीतते गए।

हमने शॉवर से लेकर बालकनी तक, घर के हर कोने में चुदाई की। मुझे तो अब नंगी रहने की आदत सी पढ़ गई, और राजेश्वर जी के वीर्य के साथ-साथ उनका मूत पीने में भी मजा आता था, वो भी मेरा मूत बड़े मजे से पीते थे।

ऐसे ही एक हफ्ता कब गुजर गया मुझे पता भी नहीं चला, और आखिरकार पूजा का दिन आ गया। पूजा के दिन कुछ बड़ा हुआ, जिससे मेरे जिंदगी की सबसे बड़ी मुसीबत आई।

मैं पूजा वाले दिन सुबह जल्दी 5:30 बजे उठी, क्योंकि मुझे सारी तैयारी जो करनी थी। मैं सबसे पहले बाथरूम गई, और वहां अच्छे से नहा लिया। कल रात को हमने तगड़ी चुदाई की थी, क्योंकि हमें पता था कि आज तो हमें चुदाई का मौका नहीं मिलने वाला।

मैंने अपने मुंह और शरीर पर से राजेश्वर जी के वीर्य को साफ कर दिया, और बाकी शरीर भी रगड़ कर साफ किया। करीब आधे घंटे बाद में बाहर आ गई। मैंने एक अच्छी पारंपरिक तरीके से साड़ी पहन ली। माथे पर सिंदूर लगाया, और गले में दो मंगल सूत्र थे, एक राजेश्वर जी के नाम का, और एक मेरे असली पति के नाम का। वैसे भी दो मंगल सूत्र पहनने का आज-कल फैशन है।

फिर मैंने लीविंग रूम को अच्छे से फूलों से सजा लिया, और लीविंग रूम के बीच रंगोली बनाई जहां पर पूजा होनी थी। ये सब करने में मुझे 1 घंटा लगा। फिर मैंने किचन में जा कर आने वाले लोगों के लिए नाश्ता बनाया। आज बहुत लोग आने वाले थे। राजेश्वर जी का मित्र परिवार उनके दोस्तों के परिवार आने वाले थे।

मैंने नाश्ते में बड़े पतीले में गाजर का हलवा बनाया। मुझे इसमें एक और घंटा लग गया। फिर सब काम होने के बाद मैं चाय पीने सोफे पर बैठ गई। कुछ पल बाद राजेश्वर जी भी उठ गए, वो कमरे से बाहर आ गए और मैं उन्हें देख मुस्कुराई।

मैं: उठ गए मेरे प्यारे पति देव?

राजेश्वर जी: हां, कल रात पता है ना ज्यादा हो गया था।

ये कह कर हम दोनों हस पड़े। राजेश्वर जी ने मैंने किया हुआ इंतज़ाम देखा और बहुत खुश हो गए। उनको मेरे द्वारा की गई सजावट बहुत अच्छी लगी।

राजेश्वर जी: वाह दिव्या! तुमने तो घर को सजा कर रौनक ला दी। और तुम भी बहुत खूबसूरत लग रही हो।

मैं उनकी ये बात सुन कर शर्मा गई।

मैं (शरमाते हुए): क्या आप भी! जाइये तयारी कीजिये, लोग आते ही होंगे।

राजेश्वर जी हस्ते हुए नहाने के लिए बाथरूम चले गए, और मैं चाय पीने लगी। राजेश्वर जी के बाथरूम जाने के करीब 15 मिनट बाद दरवाजे की घंटी बजी। मैंने टाइम देखा तो लगभग 8:30 बज गए थे। मैंने दरवाजा खोला तो राजेश्वर जी के दोस्त विजय ठाकुर जी थे। मैंने उन्हें हल्की सी मुस्कान दी और अंदर बुलाया।

मैंने उन्हें सोफे पर बैठने के लिए कहा, और किचन से नाश्ता ला कर उन्हें दे दिया, और मैं भी फिर काउच पर बैठ गई। विजय जी अकेले ही आये थे। उनके साथ उनका परिवार नहीं था।

मैं: विजय जी, कैसा बना है हलवा?

विजय जी: बहुत बढ़िया बनाया है बेटा।

मैं: आप अकेले ही आये है, आपका परिवार नहीं आ रहा है?

विजय जी: हां, दरहसल मेरे बीवी की तबियत खराब रहती है, और मेरी बेटी अमेरिका में पढ़ने गई है, तो इसलिए मैं अकेला ही आ गया।

फिर उन्होंने राजेश्वर जी के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें बताया कि वो अभी नहाने गए थे। फिर हमने इधर-उधर की बातें की, और थोड़ी देर बाद राजेश्वर जी भी नहा कर तैयारी करके बाहर आ गए।

राजेश्वर जीने सफेद कुर्ता और पजामा पहना था, और गले में सोने की चेन थी। राजेश्वर जी बहुत अच्छे लग रहे थे। मन कर रहा था उन्हें गले लगाऊं। राजेश्वर जी और विजय जी अब एक-दूसरे से बातें कर रहे थे, और मैं किचन में बाकी की तैयारियां कर रही थी। अब हर 5 से 10 मिनट में कोई ना कोई आ रहा था। मैं बस विजय जी और संजय जी को ही जानती थी। बाकियों से मैं पहली बार मिल रही थी।

जैसे-जैसे लोग बढ़ते गए, मेरा काम भी बढ़ता गया‌। मगर शुक्र है कि आये हुए परिवार की औरतें मुझे मदद कर रही थी। आखिर में पंडित जी आ गए, और पूजा शुरू हुई।

पूजा के लिए राजेश्वर जी और मैं बैठे हुए थे। पूजा खतम होने के बाद हमने सारे मेहमानों को प्रशाद दे दिया। ये सब कुछ होते-होते दोपहर हो गई। मैं सुबह जल्दी उठी थी, तो मेरा सर दर्द कर रहा था। वैसे भी अब मेहमान धीरे-धीरे जा रहे थे, तो मैंने राजेश्वर जी के पास जा कर कहा कि-

मैं: सुनिये, मैं उपर कमरे में सोने जा रही हूं। आप जरा संभाल लेना।

राजेश्वर जी ने मुझे हां कहां और मैं सबसे उपर वाले कमरे में जा कर सो गई। मेरे पीछे-पीछे पंडित जी भी उपर आ गए, और मेरे कमरे में आ गए।

मैं: क्या हुआ पंडित जी? आज भी उस दिन जैसा कुछ करना है क्या?

पंडित जी: नहीं बेटा आज पूजा है। आज मैं वैसा कुछ कर नहीं सकता।

दरहसल पंडित जी बस मुझसे मिलने के लिए आये थे। पंडित जी ने मुझसे यहां-वहां की बाते की, और फिर उन्होंने कुछ ऐसी मांग की कि मैं चौंक गई।

पंडित जी: बेटा मेरी एक इच्छा है, तुम पूरी करोगी?

मैं: कौन सी इच्छा?

पंडित जी: बेटा तुम अपने कपड़े उतारो ना, मुझे तुम्हें नंगा देखना है।

मैं इस बात पर हस पड़ी और बोली-

मैं: बस इतनी सी बात? रुको यही पर।

मैं उठ कर दरवाजे के पास गई, और उसे लॉक किया ताकि कोई अंदर ना आ जाए। फिर मैंने धीरे-धीरे अपनी साड़ी उतार दी, और उनके सामने ब्लाउस और पैंटी में खड़ी थी। फिर मैंने अपने बाकी के कपड़े धीरे-धीरे उतार दिये, और उनके सामने पूरी नंगी हो गई।

पंडित जी मुझे जी भर कर देख रहे थे। करीब 10 मिनट तक मेरे शरीर के हर अंग को करीब से देखने के बाद वो चले गए। मैंने भी दरवाजा उनके जाने के बाद अच्छे से लॉक कर दिया, और नंगे बदन ही बेड पर सो गई।

शाम को मेरी आँख खुल गई और मैं साड़ी पहन कर नीचे आ गई। सारे मेहमान चले गए थे। बस राजेश्वर जी और उनके 6 दोस्त सोफा पर बैठे हुए गप्पे मार रहे थे। मुझे नीचे आते देख राजेश्वर जी मेरी तरफ आए।

राजेश्वर जी: तो दोस्तों, आज के दिन का सारा श्रेय दिव्या को जाता है। इसी ने सारा इंतज़ाम किया था।

मुझे अपनी तारीफ सुन कर बहुत अच्छा लगा। फिर राजेश्वर जी ने अपने दोस्तों से मिलवाया। मैं विजय और संजय जी को जानती थी। उनके बाकी के चार दोस्तों का नाम था प्रवीण, जो रियल इस्टेट का बिजनेस चलाते थे। दूसरे थे माधव, जो शेयर मार्केट में काम करते थे। तीसरे थे कमल, जो मिल की फैक्टरी के मालिक है। और चौथे थे प्रताप सिंह, जो एक होटल के मालिक है।

दोस्तों आप तो समझ ही गए होंगे कि राजेश्वर जी के सारे दोस्त बहुत अमीर थे‌। लेकिन सारे एक-दम अच्छे थे। किसी को भी पैसे का घमंड नहीं था। सब जन लगभग एक उमर के ही थे, और हां, सब के सब हट्टे-कट्टे थे, 6 फीट ऊंचे और तंदुरुस्त। मैं तो उन सात जन के बीच में एक-दम छोटी लग रही थी।

मैंने उन सभी के पैर छू लिए और वो फिर आपस में बात करने लगे। ऐसा लग रहा था उन सब को कुछ कहना था, लेकिन बोलने के लिए झिझक रहे थे।

मैं (राजेश्वर जी को): क्या हुआ? कुछ परेशानी है क्या?

राजेश्वर जी: नहीं परेशानी नहीं है। तुमसे कुछ अनुमती लेनी थी।

मैं: किस बात की?

राजेश्वर जी: दरहसल हम सब दोस्त सोच रहे थे कि बहुत दिनों बाद मिले है, तो क्यों ना एक हफ्ता यहीं पर रह कर थोड़ा समय बिताए।

मैं थोड़ी सोच में पड़ गई कि सात दिन अगर ये लोग घर में रहेंगे, तो मुझे और राजेश्वर जी को टाइम नहीं मिलेगा।

मैं: लेकिन सात दिन आप करोगे क्या?

विजय जी: अरे हम बूढ़े क्या ही कर सकते है? भजन कीर्तन करेंगे और क्या।

मैंने थोड़ा और सोचा फिर राजेश्वर जी की खुशी के लिए मैंने हां कर दी। सातों जन खुश हो गए, और मुझे शुक्रिया कहने लगे। मैंने रात का खाना बनाया, और हम सब डिनर कर के अलग-अलग कमरे में सो गए। मैं सबसे उपर की मंजिल के कमरे में जा कर सो गई। बहुत दिनों बाद मैं और राजेश्वर जी अलग-अलग कमरे में सो रहे थे। मुझे तो चुदाई का मूड हो रहा था, मगर जैसे-तैसे करके मैंने अपने आप को शांत किया। क्योंकि घर में बहुत लोग थे। अगर हम पकड़े गए तो अनर्थ हो जाएगा।

अगला दिन कुछ खास नहीं था। मैं सुबह जल्दी उठी। सब के लिए नाश्ता बनाया, और राजेश्वर जी भी अपने दोस्तों के साथ बातें करते रहते थे। हमारी दिन में ज्यादा बात भी नहीं हुई थी। मुझे अब गुस्सा आने लगा था। एक तो मुझे चुदाई की इतनी आदत पड़ गई थी, कि मेरा अब लंड के बिना दिमाग खराब हो गया था।

दिन भर मेरी चूत में आग लगी हुई थी। मैं जैसे-तैसे खुद को कंट्रोल कर रही थी। फिर जब रात के 12:30 बज रहे थे, तब मैं अपने कमरे में चूत में उंगली करके उसे शांत करने की कोशिश कर रही थी। आधे घंटे उंगली करने के बाद भी मेरी चूत शांत नहीं हो रही थी। मेरी चूत को अब राजेश्वर जी के लंड की आदत पड़ गई थी।

मैं अपने कमरे से बाहर आ गई, और देखा कि कोई जगा हुआ था कि नहीं। सब अपने-अपने कमरे में सो गए थे। घर में पूरा अंधेरा था। मैंने राजेश्वर जी को फोन किया।

मैं: हैलो राजेश्वर जी। सो गए थे क्या?

राजेश्वर जी: नहीं दिव्या, तुम्हारी याद आ रही थी। नींद नहीं आ रही।

मैं: मेरा भी यही हाल है जान। एक काम करो, तुम उपर आ जाओ।

राजेश्वर जी: कोई देख लेगा दिव्या।

मैं: नहीं सब सो गए है। आप जल्दी आइये मेरे कमरे में मेरी चूत तरस रही है आपके लंड के लिए।

ये कह कर मैंने फोन रख दिया, और बेड पर जाके नंगे हो कर लेट गई राजेश्वर जी के इंतज़ार में। करीब पांच मिनट बाद मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई। मैं समझ गई कि राजेश्वर जी ही थे। मैंने जल्दी से दरवाजा खोला और उन्हें अंदर खींच लिया। उनके अंदर आते ही मैं उन पर टूट पड़ी। हम दोनों एक-दूसरे को ऐसे किस्स कर रहे थे कि हम मानों बरसो बाद मिल रहे है।

ऐसे ही कुछ देर एक-दूसरे के होंठ चूसने के बाद राजेश्वर जी ने मुझे पलंग पर फेंक दिया, और मेरी चूत चाटने लगे। मैं बहुत मजे से सिसकियां ले रही थी आह… आह्ह…

फिर राजेश्वर जी उठे, और मेरी चूत में अपना लंड डालने की तयारी में थे। उन्होंने जब मेरी चूत में लंड डाला, तब जाकर मुझे सुकून मिला। वरना मेरी चूत में तो दिन भर आग लगी हुई थी। राजेश्वर जी जोर-जोर से मुझे चोद रहे थे, और मैं उस आनंद में चिल्ला रही थी “आह्ह… आह्ह… और जोर से करो बहुत अच्छा लग रहा है आह…”

हम दोनों ही इस बात को भूल गए थे कि घर में हम अब अकेले नहीं थे। हम बेफिक्र हो कर चुदाई कर रहे थे। आधा घंटा मेरी चूत मारने के बाद राजेश्वर जी ने लंड मेरी चूत से निकाल कर मेरे मुंह में घुसेड़ दिया। मेरे सर को पकड़ कर वो दना दन मेरे मुंह को चोदे जा रहे थे, और कह रहे थे-

राजेश्वर जी: ले साली लंड की भूखी। बहनचोद, तेरा मुंह चोदने के लिए ही बना है। खा मेरा लंड!

हम दोनों अब गाली-गलौच करके ही चुदाई करने लगे थे। हम दोनों को ही इसमें मजा आता था। राजेश्वर जी मुझे रंडी समझ कर चोदते और मैं उनकी रांड जैसे लंड की सेवा करती थी।

राजेश्वर जी के मेरे मुंह को चोदने के वजह से मेरे मम्मे मेरी थूक से सने हुए थे। मेरी आँखों का काजल भी आंसू बहाने के कारण मेरे चेहरे पर फैल गया था। मेरा रूप एक-दम बाजारु औरत के जैसा हो गया था। पूरे आधे घंटे तक मेरा मुंह चोदने के बाद राजेश्वर जी मेरे मुंह पर झड़ गए। मेरा चेहरा उनके वीर्य से ढक गया जिसे मैंने अपनी उंगलियों से साफ करके चाट लिया।

राजेश्वर जी का बड़ा मोटा लंड मेरी थूक से चमक रहा था। मैंने उस लंड को हल्की सी किस्स दी और राजेश्वर जी की ओर देखा। हम दोनों एक-दूसरे को देख हसने लगे। लेकिन तभी हमें तालियों की आवाज़ आइ। हम दोनों हड़बड़ा गए, और दरवाजे की और देखा तो हम दोनों की गांड फट गई। दरवाजे पर विजय ठाकुर जी खड़े थे। उन्होंने हमारा सारा खेल देख लिया था।

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