मेरे ह्ज्बेंड ने मुझे रण्डी बना दिया 1

बीवी की चुदाई

मैं नाश्ता करके सोने लगी। मेरी नींद तब खुली.. जब किसी ने जगाया।
‘अरे विनय.. तुम आ गए..?’
‘जी मेम..’
मैं बोली- तेल लाए हो?
‘जी.. गरम करके लाया हूँ।’
‘ठीक है.. फिर अब तो तुम जल्दी से मेरे सारे कपड़े निकाल दो.. और अच्छी तरह से तेल से मालिश कर दो।
विनय ने तुरन्त ही मेरे सारे कपड़े निकाल कर मुझे पूरी तरह नंगी कर दिया, मैं भी पेट के बल लेटकर चूतड़ उठा कर मालिश के लिए तैयार हो गई।
विनय रात की मेरी चुदाई के निशान को देखकर बोला- मेम.. यह सब निशान कैसे हैं?
मैं बस विनय को देखकर मुस्कुरा दी।
‘विनय.. तुम बस मेरी मालिश कर दो.. मेरी बदन टूट रहा है.. मेरी चूचियाँ.. चूत और गाण्ड की सब की मालिश कर तू.. फ्री होकर आया है ना..?’
वह बोला- जी.. मैं यहाँ आया हूँ.. ये किसी को नहीं पता।
‘वेरी गुड विनय.. तू मेरी रात की थकान मिटा दे।’
विनय मेरे चूतड़ों से होते हुए कमर.. पीठ तक तेल टपका कर आहिस्ते-आहिस्ते से मेरे जिस्म की मालिश करते हुए मेरे चूतड़ों तक.. और कभी-कभी मेरी चूत पर भी हाथ फेर देता।
‘विनय.. तुम भी अपने कपड़े उतार दो.. नहीं तो तेल लग जाएगा।’
विनय भी मादरजात नंगा होकर मेरे ऊपर सवार होकर मेरी मालिश करने लगा।
मालिश के दौरान विनय का मोटा लण्ड मेरे जिस्म पर छू कर सरक जाता था। विनय ने मेरी गाण्ड की मालिश शुरू करते हुए मेरे चूतड़ों को निचोड़ते हुए मेरी चूत को भी मुठ्ठी में भरकर दबाकर मेरे जिस्म की मालिश करते हुए अपने लण्ड को भी मस्ती करा रहा था।
मैंने भी मालिश कराते हुए पलट कर विनय का हाथ पकड़ कर अपनी छाती पर रखवा लिया साथ ही उसका दूसरा हाथ चूत पर रख लिया।
अब मैं विनय से बोली- अब यहाँ की भी मालिश करो न।
विनय अपने हाथ से मेरी चूत की गहराई को नापते हुए मेरे जिस्म को राहत प्रदान करने लगा। तभी विनय मेरी चूची को मसलते हुए अपने लण्ड से मेरी चूत की फाकों को रगड़ने लगा। मेरे बुरी तरह थके होने के बावजूद मेरी चूत फड़कने लगी।
फिर वो धीरे से अपनी एक उंगली मेरी चूत में घुसा कर चूत की फांकों की मालिश करते हुए बोला- लग रहा है मेम.. चूत बहुत ज्यादा चोदी गई है।
मैंने विनय का कोई जबाब नहीं दिया।
विनय मेरे नंगी चूचियों को मसलते हुए मेरे जिस्म की उतेजना बढ़ाने लगा। पर मेरे जिस्म में इतनी ताकत नहीं बची थी कि मैं विनय का साथ दे सकूँ, मैं लेटे हुए ही विनय के मालिश के तरीके का आनन्द ले रही थी।
विनय भी उत्तेजना में गरम हो चुका था, उसकी साँसें ऊपर-नीचे हो रही थीं।
वो दुबारा मेरी चूत के मुँह पर लण्ड लगा कर रगड़ने लगा और उसने मेरी चूचियों को मुँह में ले लिया। उसकी जोरदार चुसाई से और लण्ड की रगड़ाई से मेरी बुर पानी छोड़ने लगी।
विनय बोला- मेम आप कहें.. तो चूत मार लूँ।
मैं बोली- नहीं विनय.. अभी तुम जैसे कर रहे हो.. वैसे ही करो.. अभी मेरी चूत दुख रही है।
मैं विनय के बिल्कुल नंगे जिस्म के नीचे थी।
विनय पूरे जिस्म की मालिश और बुर के साथ छेडकानी करते हुए मुझे यौनानंद दे रहा था।
फिर 69 की पोजीशन में आकर उसने अपने लण्ड को मेरे मुँह में दे दिया और अपने मुँह से मेरी चूत को धीरे-धीरे चाटने लगा। मैं उसके मोटे लण्ड को जीभ से चाटते हुए हिलाने लगी।
फिर विनय कुछ देर बाद दुबारा मेरे जिस्म की मालिश के दौरान लण्ड का सुपारा बुर में पेलकर मेरे जिस्म की मालिश करने लगा, वो धीरे-धीरे लण्ड आगे-पीछे कर रहा था।

कुछ ही धक्कों के बाद विनय उत्तेजना में होकर तेज गति से मुझे चोदने लगा। मुझे भी मजा आने लगा.. मैं झड़ गई तभी वो भी अपने लण्ड का सारा पानी मेरे पेट, चूत और चूचियों पर डाल कर मेरे जिस्म को पकड़ कर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा।
फिर विनय ने धीरे से अपने लंड का सुपारा चूत में घुसा दिया और अपने जिस्म से मेरे जिस्म पर पड़े वीर्य को रगड़ते हुए चूमता रहा।
थकान के बाद फिर थकान चढ़ती जा रही थी पर मेरी चूत की चुदास कम होने का नाम नहीं ले रही थी।
काफी देर तक विनय मेरे जिस्म से खेलते हुए मेरी मालिश करता रहा, साथ में दोबारा विनय के लण्ड ने पानी भी छोड़ दिया।
विनय मेरी मालिश करके और लण्ड का पानी निकाल कर थक चुका था।
मैंने भी विनय को कल आने के लिए बोल कर उसको जाने दिया।
चार्ली और रिची की चुदाई से मैं इतना थक गई थी कि मैं कई दिन तक जय के द्वारा चुदाई की पेशकश को ठुकराती रही।
लेकिन दिन में विनय आता और मेरी अच्छी तरह मालिश करता और मजे लेकर मेरे जिस्म पर अपना वीर्य उड़ेल कर चला जाता।

पांच दिन बाद एक दिन जय सुबह ही आकर बोले- रानी, आज तुम्हारी मीटिंग जरूरी है.. आज एक आदमी बाहर से मथुरा घूमने आया है और उसको कोई मस्त चुदासी लड़की चाहिए। अब तो कई दिन हो गए हैं और अब तो तुम पूरी तरह से सही लग रही हो।
मैं बोली- जी जय जी.. मैं आज खुद कहने वाली थी कि मेरी चूत के लिए लण्ड खोजो.. ये बहुत मचल रही है। आज आपने मेरी दिल की बात कह दी है। मैं खुद यहाँ इतनी दूर बनारस से बैठने तो आई नहीं हूँ। जितना लोगों के लण्ड से अपनी चूत को लड़ाऊँगी.. उतना ही मेरे ह्ज्बेंड को मुनाफ़ा होगा। मैं आज ही आराम पा चुकी अपनी चूत से उस अजनबी को खुश करते हुए उसके लण्ड का सारा रस चूस लूँगी।
जय मेरी बात से खुश होकर बोले- वाह बिल्कुल सही डॉली जी.. तो बस आप रेडी हो जाओ.. साढ़े बारह बजे चलना है।
फिर जय चले गए और मैं नहा कर पूरी तरह मेकअप आदि करके.. अपनी चूत के बालों को भी साफ़ करके.. लण्ड को चूत में लेने के लिए बैठी जय का इन्तजार कर ही रही थी।
तभी जय आ गए और मैं निकल ली।
जय मुझे लेकर उस आदमी के गंतव्य स्थान पर पहुँचे और उसके दरवाजे की घंटी बजाई। कुछ ही देर बाद एक अधेड़ ने आकर दरवाजा खोला।
मैं और जय अन्दर दाखिल हुए। उसकी उम्र 56 से 59 के करीब रही होगी। उसको देखकर मेरी चूत की रही सही उत्तेजना शान्त हो गई कि यह मरियल मेरी चूत क्या लेगा, मेरे से इसे तो मजा आएगा.. पर आज तो मेरी चूत प्यासी ही रहेगी।
तभी जय की आवाज से मेरा ध्यान टूटा- डॉली.. इनसे मिलो, ये मिस्टर महमूद भाई हैं.. ये हैदराबाद से मथुरा में कुछ बिजनेस के सिलसिले आते रहते हैं, इनको हर बार मौज मस्ती का इंतजाम मैं ही कराता हूँ।
मैं भी मस्का लगाते हुए बोली- यह तो मेरी किस्मत है.. जो हुजूर की खिदमत का मौका मिला।
मेरी बातों से जय और महमूद हँस दिए।
जय ने मेरा परिचय करवाया और जय रूपया लेकर मुझे महमूद की बाँहों की शोभा बढ़ाने के लिए मुझे उनके पास छोड़ कर चले गए।
जाते वक्त जय बोलते हुए गए- मैं शाम को आउँगा.. महमूद भाई के लण्ड को अपनी बनारसी चूत से तृप्त कर देना।
जय के जाते ही महमूद ने मुझे अपने सीने से लगाकर मेरे चूतड़ों को दबाते हुए मेरी गाण्ड की गोलाई को नापते हुए मुझे किस करने लगे।
काफी देर बाद अपने से मुझे अलग करके मेरे कपड़ों को खोल कर अलग कर दिए, मैं सिर्फ़ ब्रा-पैन्टी में ही रह गई थी।
महमूद अपने ऊपरी कपड़े उतारते हुए साथ में नेकर भी निकाल कर पूरे नंगे हो लिए। मैंने देखा कि बस मेरे चूतड़ और गाण्ड की गोलाई को सहलाकर महमूद का लण्ड मेरी चूत चोदने के लिए फुंफकार उठा था।
महमूद मेरे पास आकर मुझे किस करके लण्ड को चूसने को बोले।
मैं सीधे नीचे बैठ कर महमूद का लण्ड मुँह में लेकर चूसने लगी, महमूद मेरे सर को सहलाते हुए लण्ड चुसवाने लगे।

मैं महमूद के कटे लण्ड का सुपारा मुँह में लेकर लेमनजूस की तरह खींच कर चूस रही थी। मेरा बूढ़े महमूद पर अनुमान गलत निकला.. वह तो ढलती उमर में भी बहुत जोशीला था।
मैं सोचने लगी कि बस चूत चोदकर मेरा पानी निकाल दे.. तब तसल्ली हो।
महमूद मुझे उठा कर बिस्तर पर घोड़ी बनाकर मेरी चूत चाटने लगा जैसे एक कुत्ता कुतिया की बुर चाटता है।
महमूद की चुसाई ने ही मेरी चूत से पानी निकलवाने पर मजबूर कर दिया।
मैं महमूद के मुँह पर पानी छोड़ने लगी और महमूद मेरी चूत का पानी चाट रहा था। काफी देर महमूद की चूत चुसाई से मेरी चूत चुदने को फड़कने लगी।
मैं चूत चुसवाना छोड़कर महमूद का लण्ड बुर में लेने के लिए पलटकर बोली- मेरी जान.. मेरी बुर में पेल दो अपना लण्ड..
और महमूद ने भी तुरन्त मेरी बुर में अपना फनफनाता हुआ लण्ड पेल दिया।
महमूद का लण्ड मेरी पनियाई हुई बुर में घुसते ही मेरी सिसकारी निकल गई ‘आहहह.. उहउउई.. सीईईईआह..’
मेरी सिसकारियाँ सुन कर महमूद ने मेरी चूत पर ताबड़तोड़ शॉट लगाते हुए अपना लण्ड बाहर खींच लिया।।
मैं मस्ती के नशे में चिल्ला उठी- नहीं म्म्म्त.. निनिकालो.. पेलो.. चो..चो..चोदो मम्म..ममेरी बु..बुर..
पर महमूद ने मेरी एक ना सुनी और मुझे उठाकर अपना लण्ड मेरे मुँह में देकर बोले- बेबी.. मेरा चुदाई का यही तरीका है। जब चूत ज्यादा गरम हो चुदाई बंद.. मैं अभी तो में अपना वीर्य तुमको मिलाऊँगा.. फिर तेरी बुर को पानी पिलाऊँगा…

इधर मैं बिस्तर पर बैठे हुए ही झुककर महमूद का लण्ड ‘गपागप’ चूस रही थी। महमूद पीछे से मेरी चूत मलकर मेरी प्यासी चूत की प्यास बढ़ाते हुए लण्ड चुसाई करवाता रहा।
एकाएक तभी महमूद के मुँह से सिसकारी के साथ वो अनाप-शनाप भी बोलने लगा- ले साली चाट.. मेरे लण्ड को ले.. चूस ले.. पूरा ले.. तेरी चूत मेरे लण्ड को पाकर धन्य हो जाएगी.. मैं चूत का शौकीन हूँ.. आह..सीई.. उह.. ले.. मेरी जान.. मैं गया आह सीसीसीई..
ये कहते हुए उसने ढेर सारा वीर्य मेरे मुँह में डाल कर हाँफते हुए अलग हो गया।
जब महमूद वीर्य छोड़ रहा था.. तभी उसका आधा वीर्य मेरे गले से नीचे हो गया था.. बाकी लण्ड बाहर करने पर मेरे मुँह से होते हुए मेरी चूचियों पर गिर रहा था।
मैं वैसे ही जीभ घुमाकर वीर्य चाटे जा रही थी।
पूरे वीर्य को चाट कर साफ करते हुए मैं बाथरूम में चली गई और मैं जब बाहर आई.. तो देखा कि अभी भी महमूद वैसे ही बिना कपड़ों के पड़े थे। मैं भी जाकर महमूद के बगल में लेट गई और महमूद ने मुझे खींचकर अपने जिस्म से चिपका लिया। अब वो मेरे जिस्म को सहलाने लगे। मैंने बूढ़े को देख कर जैसी कल्पना की थी.. वैसा कुछ भी नहीं था.. बल्कि महमूद तो जवान मर्दों को मात देने वाला निकला।
एक बार फिर मेरी जाँघों के बीच में दबा हुआ महमूद का लण्ड आहें भरने लगा। इधर महमूद मेरी चूत और गाण्ड की फाँकों को कस कस कर सहलाते हुए मेरी प्यासी बुर की प्यास बढ़ा रहे थे।
मैं महमूद के सीने को सहलाते हुए बोली- क्या महमूद डार्लिंग.. आपने मेरी बुर का सौदा किया है.. तो क्या केवल अपनी प्यास मिटाओगे.. मेरी नहीं.. मेरी भी चूत प्यासी है?
महमूद मेरी बात सुनकर बोला- अभी तो पूरा दिन बाकी है रानी.. और तुम इतनी हसीन हो.. कि तेरी चूत की प्यास तो बढ़ाकर ही मैं मिटाऊँगा.. मेरा बाबूराव तेरी चूत का पसीना निकाल देगा.. मत घबड़ाओ.. अगर तू विवाहित न होती.. तो मैं तेरे को अपनी रखैल बना लेता।
‘मैं भी ह्ज्बेंड के रहते भी खुशी-खुशी आप की रखैल बन जाऊँगी.. पर आप तो बहुत दूर के हैं और मैं बनारस की हूँ।’
तभी एकाएक महमूद मेरे ऊपर सवार होकर मेरी छातियाँ भींच कर मेरे होंठों को अपने होंठों से दबाकर चूसने लगे। काफी देर तक मेरी छाती और होंठों को किस करते हुए वो अपने लण्ड को मेरी चूत पर घिस रहे थे।
मुझे ऐसा लग रहा था.. जैसे कोई योद्धा जंग में जाने से पहले अपनी तलवार को धार देता है।
मैं तो काफी देर से प्यासी थी और मेरी 5 दिन से चुदाई भी नहीं हुई थी।
उस पर भी एक तो महमूद ने पहले राउंड में मेरी चूत को बहुत गरम कर दिया था। इन सब का नतीजा यह निकला कि मेरी बुर पानी-पानी हो रही थी। बुर के अन्दर से पानी बाहर तक चिपचिपा रहा था, महमूद अपने लण्ड को मेरी पानी से भिगो रहे थे।
कुछ देर बाद महमूद ने मेरा पैर ऊपर उठाकर अपने कंधे पर रख लिया और लण्ड को मेरी चूत पर टिका कर धीमी- धीमी गति से सुपारे को थोड़ा अन्दर-बाहर करते हुए मुझे चुदाई के सागर में गोते लगवाने लगे।
महमूद की इस अदा से मेरी चूत की फाँकें खुलने-पचकने लगीं। मैं कमर उछाल कर लण्ड अन्दर लेना चाहती थी.. पर महमूद बड़ी सावधानी से लण्ड को अन्दर जाने से रोककर केवल सुपारे से ही मेरी बुर की फाँकों से खेलते हुए मेरी बुर की प्यास बढ़ाते जा रहे थे।
मैं चुदने के लिए व्याकुल हो रही थी.. मैं सिसकारियाँ लेने लगी। सिसकारी के सिवा मैं कुछ कर भी तो नहीं सकती थी क्योंकि ड्राईविंग का काम किसी और के काबू में था.. वो जैसा चाह रहा था.. वैसा कर रहा था।
इधर मेरी चूत लण्ड खाने के चक्कर में फूलती जा रही थी। मैंने तड़पते हुए महमूद को भींच कर सिसियाया और आहें भरते हुए ‘आहह.. सिईईईई.. आहउ.. आह.. ससीइ..’ करते मैं बेतहाशा अपनी चूत उछाले जा रही थी।
महमूद का लण्ड अपनी बुर में लेने को मैं मचल रही थी। पर मेरा सारा प्रयास बेकार हो रहा था। मुझे लग रहा था कि महमूद मेरी बुर तड़पाने का ठान चुके थे। मेरी बुर महमूद के पूरे लण्ड को लीलने के लिए व्याकुल हो रही थी।
मेरे मदमस्त जिस्म का और बुर की तड़प बढ़ाने में महमूद एक काम और कर रहे थे, वे मेरी चूचियों को भींच कर पीते हुए अपने लण्ड का सुपारा मेरी बुर पर नचा रहे थे, कभी दाईं चूची को.. कभी बाईं चूची मुँह में भर चूसते हुए लण्ड से मेरी बुर के लहसुन को.. तो कभी मेरी बुर की फाँकों पर.. और कभी हल्का सा सुपारे को बुर के अन्दर कर देते थे।
महमूद के इस तरह के प्यार से मैं चुदने के लिए पागल हुए जा रही थी।
दोस्तो.. मैं बता नहीं सकती कि मुझे कितना आनन्द आ रहा था।
महमूद मुझे एक मंजे हुए खिलाड़ी लग रहे थे, वे ताड़ चुके थे कि मेरी चूत बहुत बड़ी चुक्कड़ है।
उसी पल महमूद ने मेरी दाईं चूची पर दांत गड़ा दिया और मैंने ‘आईईई.. आहउई..’ कहते कमर उछाल दी।
और यहीं पर मुझे थोड़ा मजा आ गया।
महमूद का दिए हुआ दर्द मेरी चूत के लिए मजा लेने का मौका बन गया और मैंने ‘आहहह.. सीईईई.. आह..ऊई..’ कह कर महमूद की कमर कसकर पकड़ ली.. ताकि लण्ड कुछ देर के लिए ही मेरी चूत में घुसा रहेगा.. पर साला महमूद भी पक्का खिलाड़ी था। उसने तुरन्त अपना एक हाथ मेरी चूत के करीब ले जाकर मेरी जांघ के पास कस कर चिकोटी काट ली।
‘आईईईउई..’ की आवाज के साथ मेरा दांव उलट गया। जो मैंने जितनी तेजी से कमर उछाल कर लण्ड को बुर में लिया था.. यहाँ यही उलटा पड़ गया, इस चिकोटी के कारण उतनी ही तेजी मुझे कमर को नीचे करना पड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि महमूद का लण्ड मेरी चूत से बाहर आ गया।
मैं महमूद की कमर छोड़ कर उनके चूतड़ों पर हाथ से मारने लगी।

महमूद मुझे चिढ़ाते हुए अपने लण्ड को मेरी गाण्ड की दरार से सटाकर मेरी गुदा के छेद को रगड़ने लगे। महमूद के ऐसा करने से तो मेरी चुदने के इच्छा और भी तेज हो गई और मैं महमूद से अपनी बुर चुदवाने के लिए मनौती करने लगी।
मेरी मनुहार से महमूद को शायद मेरे ऊपर दया आ गई, महमूद मुझे चूमते हुए मेरी नाभि से होते हुए मेरी योनि प्रदेश को चूमने और चाटने लगा, मैं चूत उठा-उठा कर महमूद से बुर चुसवाने लगी।
मेरी बुर तो चुदने के लिए तड़प रही थी, महमूद के चुसाई से भरभरा गई पूरी बुर एकदम पकोड़ा सी फूल चुकी थी और चुसाई से राहत के बजाए बुर को अतिशीघ्र चुदाई की चाहत होने लगी।
तभी महमूद ने मेरी बुर को पीना छोड़ कर मेरे होंठों को चूसते हुए अपने लण्ड को मेरी बुर पर लगा कर हलका सा दबाव देकर सुपारे को अन्दर ठेल दिया।
‘आहहह.. सीसीसी.. ईईई.. आह..’ और मैं महमूद के सीने से लिपट गई।
तभी महमूद ने एक जोर का शॉट मेरी बुर पर लगा दिया।
‘आआ.. उइइइ… सीआह..’ की आवाज के साथ महमूद का पूरा लण्ड मेरी बुर में समा गया।
महमूद एक ही सांस में गचागच लण्ड बुर में डुबोने लगा और मैं चूतड़ों को उछाल-उछाल कर बुर में लण्ड लेने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती थी। महमूद भी मेरी बुर को चोदने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। पूरी लय-ताल से मेरी बुर की चुदाई करते हुए मेरी और मेरे चूत की तारीफ के साथ मेरी बुर का भोसड़ा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे।
मेरी बुर भी महमूद के हर शॉट पर फूलती जा रही थी और साथ में पानी छोड़ कर लण्ड को बुर में लेने का कोई कसर नहीं छोड़ रही थी।
मैं मस्ती के आलम में आँखें बंद किए हुए बस बुर को उछाल कर लण्ड खाती रही।
ना जाने कैसे बूढ़े में इतनी ताकत आ गई थी.. वो मेरी बुर की धुनाई करते जा रहा था और मैं भी एक इन्च बिना पीछे रहे बुर मराती जा रही थी।
तभी महमूद ने गति तेज कर दी और ताबड़तोड़ मेरी बुर पर झटकों की बौछार करने लगा।
मैं लण्ड की लगातार मार से मेरी चूत झड़ने के करीब पहुँच चुकी थी ‘आह..सी.. और पेलो.. और मारो.. निकाल दो.. मेरी चूत की सारी गरमी.. आहह.. सीई.. आह.. ऐसे ही चोदो.. मेरे सनम.. और डालो मेरी बुर में.. लण्ड आहह.. सीई.. मैं गई रे.. आह.. आह.. उई.. चली गई.. आह.. सीसी..’
और मैं महमूद से लिपट कर बुर का पानी निकालने लगी.. पर महमूद अभी भी शॉट लगा रहा था और झड़ती बुर पर शॉट पाकर मेरी बुर का पूरा पानी निकल गया। मेरी पकड़ ढीली पड़ गई।
इधर महमूद अभी भी धक्के लगाए जा रहा था। मेरे झड़ने के 5 मिनट की चुदाई के बाद महमूद ने भी मेरी बुर में अपना पानी डाल दिया और वो शान्त हो गया.. चुदाई का तूफान भी थम गया था।
चूत और लण्ड कि लड़ाई और वासना के खेल शान्त हो चुका था और महमूद अभी मेरी चूत पर ही लदे थे कि तभी बेल बज उठी।
मैंने महमूद की तरफ देखा.. महमूद भी झुंझलाते हुए बुदबुदाए- कौन है?
यह कहते हुए वीर्य से सनी बुर से अपना लण्ड खींचकर तौलिया लपेट कर दरवाजे की तरफ बढ़े और मैंने वैसे ही अपने नंगे बदन को ढकने के लिए एक चादर खींच कर अपने जिस्म पर डाल ली।
तभी महमूद ने दरवाजा खोला तो सामने जय थे।
‘ओह जय भाई, आप..!’
‘जी महमूद भाई.. मैं हूँ.. कहीं गलत वक्त पर एंट्री तो नहीं मार दिया हूँ?’
‘थोड़ा और पहले आते तो जरूर आने की शिकायत करता..’
जय और महमूद दोनों लोग आकर बिस्तर पर बैठ गए।
जय महमूद को और मुझे देख कर सब समझ गया था कि अभी अभी यहाँ चूत और लन्ड से चुदाई करके वासना का खेल खेला गया है।
उसी समय महमूद बाथरूम चले गए और तभी जय ने मेरे चादर के अन्दर हाथ डाल कर मेरी बुर को सहलाने के लिए ज्यों ही अपना हाथ मेरी चूत पर रखा.. वैसे ही मुस्कुरा दिया क्योंकि जय का हाथ मेरे रज और महमूद के वीर्य से सन गया था।
उसी वक्त महमूद बाथरूम से बाहर आए और जय ने हाथ बाहर खींच लिया।
महमूद बोले- कैसे आना हुआ जय जी?
‘वही.. महमूद भाई.. अगर आप की इजाजत हो तो डॉली को ले जाता..’
महमूद ने कहा- जय भाई मन तो नहीं भरा है.. वैसे आप की इच्छा.. मैं तो चाह रहा था कि आज की रात डॉली जी की चूत और चोदता और चुदते देखता.. अगर आप चाहो तो कुछ और दे दूँ?
अभी जय कुछ कहते.. महमूद ने 100 के नोटों की एक गड्डी फेंक दी।
जय बिना मुझसे पूछे.. बोले- जब तक आप की इच्छा हो.. आप डॉली जी के जिस्म को भोग सकते हैं।
और जय मुझे एक बार फिर महमूद के लण्ड की शोभा बनने के लिए छोड़ कर चले गए।
मैं बिस्तर पर चूत में महमूद के वीर्य को लिए हुए बस जय को जाते हुए देखती रही। जय के कमरे से जाते ही महमूद दरवाजा बन्द करके मेरे पास आकर बोले- डार्लिंग तुम और तुम्हारी चूत मेरे को भा गई है।
अभी महमूद कुछ और कहते.. मैंने कहा- आपने जय से कहा कि डॉली की चूत और चोदता.. पर आप एक चीज और बोले थे कि चुदते हुए देखता.. इसका मतलब नहीं समझी.. यह कैसे सम्भव है?
महमूद मेरी बात सुनकर मुस्कुरा रहे थे.. पर बोले कुछ नहीं और मोबाइल से किसी को फोन करने लगे। मैं बस चुप होकर महमूद की बात सुनने लगी।
उधर किसी ने ‘हैलो’ कहा.. महमूद ने भी हैलो कहकर बोला- अरे भाई, मैं महमूद बोल रहा हूँ..
और हालचाल के बाद जो महमूद ने उससे कहा उसे मैं सुनकर सन्न रह गई।
उधर वाले ने भी शायद महमूद को कुछ बोलकर फोन रख दिया।
मैं बोली- यह आप किससे बात कर रहे थे और मेरी चूत को चुदने के लिए उससे क्यों कह रहे थे?
महमूद बोले- डॉली जी मेरा शौक है.. मैं जहाँ भी जाता हूँ.. मुझे एक ‘चुदक्कड़’ लड़की चाहिए होती है और उसे चोदने के बाद मुझे उसे चुदते देखने का भी शौक है और इसी तरह मैं जिस भी शहर में जाता हूँ.. वहाँ एक लड़के को रखता हूँ।
यहाँ भी मेरा लड़का है.. दीपक राना.. उसी से बात कर रहा था। तुम्हारी चुदाई के लिए वह आ रहा है। उसे मैंने 10.30 रात तक आने को कहा है।
आज मैं दीपक राना का लण्ड पकड़ कर तेरी चूत में डाल दूँगा और जब दीपक राना तेरी चुदाई करेगा.. मैं तेरी चूचियां मीसूंगा और तेरी चुदती बुर का पानी चाटूगा..
एक काम करो डॉली.. तुम बाथरूम जाकर अच्छी तरह फ्रेश हो लो और चलो कहीं घूम कर आते हैं.. और बाहर ही डिनर कर लिया जाएगा.. ताकि बस रात को तेरी चुदाई इत्मीनान से देख सकूँ। रानी तू ड्रिंक करती है..?
मैंने ‘ना’ में सर हिलाया..
‘लेकिन डॉली रानी.. आज तुमको मेरी खातिर पीना पड़ेगा.. प्लीज ‘ना’ मत कहना.. नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा..’
मैं बोली- महमूद.. यार मैंने कभी पी नहीं है.. और आपके कहने पर अगर पी ली.. तो मैं नशे में हो जाऊँगी.. और फिर मैं खुल कर साथ नहीं दे पाई तो?
महमूद ने कहा- कुछ नहीं होगा.. तुमको पीना पड़ेगा.. मेरी कसम है तुझे..
मैं फिर कुछ नहीं बोली और सीधे बाथरूम में चली गई, फ्रेश होकर मैंने चार्ली के द्वारा दी गई ड्रेस पहन ली.. जो कि एक शार्ट स्कर्ट था और ऊपर का बिना बाजू का एक हॉट सा दिखने वाला टॉप पहन कर तैयार हो गई।
महमूद ने जब मुझे देखा.. तो वो मुझे देखता ही रह गया और बोला- वाहह.. क्या मस्त माल लग रही है मेरी जान..
मैं मुस्कुरा दी।
और फिर हम लोग घूमने निकल गए।

घूमते हुए हम लोग एक मॉल में गए.. और वहाँ पर रेस्टोरेन्ट में बैठ कर खाने का आर्डर दिया।
मैं और महमूद आमने-सामने बैठे थे, महमूद के पीछे वाली टेबल पर एक हेण्डसम सा लड़का बैठा था। वह लड़का जब से बैठा था.. तभी से मुझे ही देखे जा रहा था।
मैंने उसकी तरफ गौर किया.. तो वह मुझे स्माइल और इशारा देने लगा। उसके इशारे पर मैं बस मुस्कुरा देती.. वह मेरे मुस्कुराने को मेरी रजामंदी समझ कर मुझे इशारे से मिलने को बोलकर एक तरफ चल दिया।
कुछ देर बाद मैंने गौर किया तो पाया कि मेरा आर्डर का टोकन नम्बर 543 था और जो नम्बर चल रहा था.. वह अभी 535 था.. इसका मतलब डिनर आने में करीब 20 मिनट लगने वाला था, तो मैं बाथरूम के बहाने महमूद से बोल कर चल दी।
मैं उसी ओर गई जिस तरफ वो गया था। वह ऊपर जाने वाली सीढ़ी के पास था। मुझे देखकर वह इशारा करके सीढ़ियाँ चढ़ने लगा और मैं उसके पीछे-पीछे चल दी। वो जिस सीढ़ी से चढ़ रहा था.. वह बैक साईड की सीढ़ी थी.. वो लड़का चौथे फ्लोर पर जाकर रूक गया। वहाँ के बाद ऊपर जाने का रास्ता बन्द था और अंधेरा भी था।
मेरे पहुँचते ही उसने मुझे अपने पास खींच लिया, मेरे होंठों को अपने होंठों में लेकर किस करने लगा।
मैं उससे छूटने को छटपटा रही थी.. पर वह एक ढीट लड़का था.. उसने सीधे मेरी बुर पर हाथ ले जाकर मेरी बुर को दबा दिया और एक हाथ से मेरे हाथ को पकड़ कर अपने लण्ड पर रख दिया।
पता नहीं.. कब उसने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया था।
साले का लण्ड बेलन की तरह गोल था।
उसका लण्ड हाथ में आते ही मेरा मन उससे खेलने को करने लगा और मैं उसके लण्ड को आगे-पीछे करने लगी।
उसने इसे मेरी रजामंदी मानकर मेरे होंठों को छोड़ कर मुझे नीचे बैठाकर अपना लण्ड मेरे मुँह में भर दिया.. और मैं भी ‘लपालप’ लण्ड चूसने चाटने लगी।
मैं चाह रही थी कि जल्दी से उसके लण्ड का पानी निकले और मैं चाटकर साफ करके नीचे जाऊँ.. कहीं देर न हो जाए।

वह लड़का भी ‘गपागप’ लण्ड मेरे मुँह में पेले जा रहा था। कुछ देर की चुसाई के बाद उसने मुझे उठाकर झुका दिया और मेरी छोटी सी स्कर्ट को ऊपर करके मेरी पैन्टी को खींचकर नीचे करके मेरी चूत को मुँह में लेकर चाटने लगा। वह जीभ लपलपा कर चाटता रहा।
मैं बोली- जो करना बे.. जल्दी कर.. मुझे देर हो रही है।
अभी मैं कुछ समझती.. उस लड़के ने तुरन्त चूत पीना छोड़कर अपने लण्ड को मेरी प्यासी बुर पर लगा दिया और एक जोरदार झटका लगाकर पूरा लण्ड एक ही बार में अन्दर डाल दिया।
अब उसने मेरी कमर पकड़ कर बिना रूके झटके पर झटका लगाते हुए मेरी बुर ऐसी-तैसी करते हुए मेरी चुदाई करने लगा।
उसके हर धक्के से मेरे मुँह से ‘ऊऊ..न.. आह.. आहहह हईईई.. आहई..ऊऊऊऊऊ’ निकलती।
मैं देश दुनिया से बेखबर बुर चुदाती रही ताबड़तोड़ चुदाई से मेरी बुर पानी छोड़ रही थी। तभी उसका लण्ड मेरी चूत में वीर्य की बौछार करने लगा। मैं असीम आनन्द में आँखें बंद करके बुर को बाबूराव पर दबाकर उसके गरम वीर्य को बुर में लेने लगी।
तभी उसने अपना लण्ड बाहर खींच लिया। सट.. की आवाज करता लण्ड बाहर था.. और मैं खड़ी होती… इससे पहले वह गायब हो गया।
मैं भी नीचे बाथरूम में जाकर चूत साफ करके मेकअप आदि ठीक करके बाहर आकर महमूद के पास बैठ गई। देखा कि डिनर भी आ चुका था। अब लण्ड खाने के बाद भूख भी जोरों से लगती है न..
डिनर करने के बाद हम लोग सीधे कमरे पर पहुँचे और महमूद ने मुझे उसी ड्रेस में रहने को बोला.. जिस ड्रेस में मैं थी।
मैं सोफे पर बैठ गई.. मेरे पास ही महमूद भी बैठकर मेरी जांघ सहलाते हुए बात करने लगे।
‘डॉली.. आज जो लड़का आ रहा है.. दीपक राना.. वो बहुत ही मस्त कद-काठी का है.. तुम देखोगी तो तेरी बुर पानी छोड़ने लगेगी.. और मैं जो ड्रिंक लेने को बोल रहा था.. वो इसलिए कि दीपक राना का लण्ड एक सामान्य लण्ड नहीं है.. जैसा कि तुमको आज तक मिला होगा और तुम चूत में ले चुकी होगी। तुम्हारी जानकारी के लिए बता रहा हूँ.. अगर तुम सब बात जानकर मना करोगी दीपक राना से चुदने के लिए.. तो मैं दीपक राना को नहीं बुलाऊँगा..
आज तक तुम बहुत मोटे लण्ड से चूत मरवाई होगी.. पर दीपक राना का लण्ड बहुत ही लम्बा और मोटा लण्ड कहना गुनाह है। दीपक के लण्ड की तुलना घोड़े के लण्ड से कर सकती हो। एक बात और जो है कि दीपक का लण्ड सुसुप्त अवस्था में भी बहुत मोटा रहता है.. जब तुम दीपक के लण्ड से बहुत खुल कर खेलोगी.. तब जाकर कहीं वह चुदाई के लिए तैयार होता है। मैं इसलिए भी बता रहा हूँ क्योंकि उसके लण्ड को देखकर लड़कियाँ चुदने से मना कर देती हैं। इसलिए बेचारे के मन से सेक्स की फीलींग ही समाप्त सी हो गई है.. बहुत जगाने पर दीपक का लण्ड बुर चोदने को तैयार होता है। मैं चाहता हूँ कि तुम मना मत करना.. मैं उसके लण्ड को तेरी बुर में देखना चाहता हूँ।’
मेरे मन में भी दीपक राना के विषय में सुनकर उसके लण्ड को देखने की इच्छा जाग उठी थी, मैं भी ऐसे अदभुत लण्ड को देखना और ट्राई करना चाहती थी।
उधर महमूद ने एक अंग्रेजी शराब की बोतल खोल कर दो पैग बना दिए।
मैं बोली- महमूद.. मैं होश में दीपक का लण्ड अपनी चूत में लेना चाहती हूँ.. नशे में मजा नहीं आएगा।
पर महमूद ने कहा- नहीं रानी.. मेरी बात मानो.. तुम होश में अगर दीपक राना का लण्ड देख लोगी.. तो तुम्हारी चूत मैदान छोड़ कर भाग जाएगी.. इसलिए तुम्हारा पीना जरूरी है।
और उसने मेरी तरफ पैग बढ़ा दिया।
मैं भी पैग उठाकर एक ही बार में पी गई.. मैंने करीब तीन-चार पैग गले से उतार लिए.. पहला पैग लेने में थोड़ी दिक्कत हुई.. फिर तो पीने में मजा आने लगा, महमूद पैग देते गए.. मैं पीती गई और मैं नशे में अपनी बुर सहलाते हुए बड़बड़ाने लगी।
तभी बेल बजी.. महमूद ने जाकर दरवाजा खोला और किसी को अन्दर लेकर आए और उसे मेरी बगल में बैठा दिया।
उस लड़के का जिस्म मजबूत कद-काठी का था।
मैं तो पहले ही नशे की हालत में होश खो बैठी थी। उस पर उस लड़के का जिस्म.. मेरी चूत की आग को नशा और भड़काने लगा।

तभी महमूद ने मुझे उस लड़के से चिपका दिया और मैं नशे की हालत में उसके होंठों को अपने होंठों में लेकर चूसने लगी। मैं अपने एक हाथ को उसके पैन्ट पर ले जाकर ऊपर से ही उसके लण्ड को सहलाने लगी। काफी देर तक यूँ ही मैं उससे चिपकी रही। मैं अलग तब हुई.. जब महमूद ने मुझे खींचकर अलग किया।
फिर महमूद ने एक-एक करके मेरे सारे कपड़े खींचकर निकाल दिए और उस लड़के को भी इशारा किया। वह भी अपने पूरे कपड़े निकाल कर मादरजात नंगा हो गया। वो मेरी तरफ बढ़ा.. मेरा ध्यान जब उसकी जाँघों के बीच में गया.. तो मैं उछल पड़ी.. यह साला मर्द है कि राक्षस है..
दैत्याकार लण्ड लिए वो मेरी तरफ बढ़ रहा था। वह मतवाली चाल से मेरे करीब आकर मुझे अपनी गोद में उठा कर बिस्तर पर पटक कर मेरे ऊपर चढ़ बैठा। मैं उसकी बलिष्ठ भुजाओं में फंस कर रह गई थी। दीपक मेरी चूचियाँ भींचने लगा और मेरे होंठों को किस करते हुए मेरी चूचियों को मुँह में भरकर खींच-खींच कर पीने लगा।
काफी देर तक वो मेरे ऊपर चढ़ा रहा। अभी भी उसका लण्ड किसी हाथी के लण्ड के समान झूल रहा था.. पर अभी भी खड़ा नहीं हुआ था।
उधर महमूद बैठ कर देखते हुए उठे.. और नजदीक आकर दीपक को पकड़ कर मुझसे अलग किया।
दीपक नीचे खड़ा हो गया और महमूद उसके बाबूराव को दोनों हाथों से पकड़ कर आगे-पीछे करने लगे, इशारा करके मुझे उसके लण्ड के पास बैठने को कहा और मैं दीपक के लण्ड के बिलकुल करीब जाकर बैठ गई।
दीपक का लण्ड मेरे नथुनों से टकराने लगा, मैंने न चाहते हुए भी दीपक के लण्ड को मुँह में लेना चाहा.. पर मेरे मुँह में दीपक का लण्ड गया ही नहीं… मैं ऊपर से ही लण्ड चाट कर संतोष करने लगी।
कुछ देर की चटाई से दीपक का लण्ड थोड़ा जोर मारने लगा। दीपक के लण्ड के जोर मारने का एक कारण और भी था। मैं बिस्तर पर से ही दीपक का लण्ड चाट रही थी और दीपक लण्ड चटाते हुए मेरी बुर को सहला रहा था।
इधर महमूद आगे-पीछे होते हुए बड़े गौर से दीपक को बुर मसकते और मुझे बाबूराव चाटते देख रहे थे।
काफी देर ऐसे ही खेल चलता रहा और दीपक का लण्ड फुंफकार उठा था। पूरी तरह खड़ी हालत में लण्ड देख कर मेरी चुदने की इच्छा खत्म होने लगी और मैं सोचने लगी कि इस लण्ड से नहीं चुद पाऊँगी।
तभी मुझे दीपक ने उठाकर बिस्तर पर पटक दिया.. मेरी चूत पर लण्ड रख कर लण्ड को अन्दर करने के लिए ताबड़तोड़ जोर देने लगा।
शायद वह समझ चुका था कि लण्ड देख कर मेरी गाण्ड फट गई है.. इसी लिए उसने मुझे जकड़ लिया था और वो मुझे छूटने का कोई मौका नहीं देना चाहता था।
महमूद यह सब देख खुश हो रहे थे.. मैं विनती करते हुए बोली- महमूद मुझे बचा लो.. मुझे इस राक्षस से नहीं चुदना..
पर महमूद मेरी तरफ कोई ध्यान ही नहीं दे रहे थे, वो तो दीपक के लण्ड पर थूक और लगाने लगे।
पहले से मेरी पनियाई बुर के मुँह को खोलकर सुपारा भिड़ा दिया और दीपक को जोर लगाने को कहने लगे। दीपक पूरी जोर से मेरी बुर पर लण्ड चांपने लगा।
‘फक..’ की एक तेज आवाज के साथ दीपक का सुपारा बुर को चीरते हुए प्रवेश कर गया।
मैं चीख पड़ी- आआ.. अरे बाप रे.. न..न..नहीं.. न..नहीं.. चचु..चुद..ना.. आहऊई..माई..
तभी महमूद ने मेरे मुँह पर हाथ रख कर दीपक को पूरा लण्ड जितना जा सके.. डालने को बोले। दीपक पूरे जोर से शॉट पर शॉट मार कर लण्ड अन्दर करता रहा। मैं बेहोश हो गई और जब होश में आई.. तो दीपक मेरी बुर पर शॉट मार रहा था।
महमूद मेरी चूचियों को चचोर रहे थे।
मेरी चूत में जलन हो रही थी.. मैं फिर छटपटाने लगी.. पर दीपक और महमूद को कोई रहम नहीं आ रहा था। न जाने कब तक दीपक मेरी बुर चोदता रहा.. और मैं नीचे पड़ी बुर में लण्ड लेती रही थी।
मेरी बुर फट चुकी थी.. मुझे मजा नहीं आ रहा था.. बस भगवान से विनती कर रही थी कि कब यह राक्षस मेरी बुर में वीर्य डाल कर मेरी बुर से उतरे और मुझे राहत हो…
पर साला घोड़े की तरह हुमुच हुमुच कर मेरी बुर के चिथड़े उड़ाते हुए लण्ड को बुर में पेले जा रहा था और मैं दर्द भरी सिसकियाँ ले रही थी ‘आह.. ऊई.. ऊफ… आआआ.. ऊऊऊउफ.. आहह..”
दीपक अनगिनत बार मेरी बुर से लण्ड को खींचता और बुर में डाल देता..
तभी एकाएक उसने चुदाई की रफ़्तार बढ़ा दी.. ठाप पर ठाप लगाते हुए अपने वीर्य से बुर को भरकर मुझे कस कर जकड़ कर झड़ने लगा।
उधर महमूद मेरी बुर और दीपक के लण्ड को चाट रहे थे और दीपक बुर में लण्ड चांप कर अन्तिम बूंद तक वीर्य बुर में गिरा रहा था। दीपक मेरी बुर को फाड़ चुका था। मेरी बुर की दीवार से दीपक का वीर्य बह रहा था.. जिसे महमूद मजे से चाट रहे थे।
सच में… दीपक से चुद कर तो जैसे मेरी माँ चुद गई थी।
दीपक का लण्ड अभी भी मेरी बुर में था और मैं.. बेजान सी बेड़ पर पड़ी थी, महमूद दीपक राना के लण्ड से निकले वीर्य को चाट रहे थे।
दीपक का लण्ड मेरी बुर में पड़ा पड़ा जब कुछ ढीला हुआ.. तो दीपक ने अपना लण्ड मेरी चूत से खींचना शुरू किया.. लण्ड जितना बाहर आता जा रहा था.. उतना ही वीर्य भी बाहर आता जा रहा था, जिसे महमूद मजे लेकर चाटते जा रहे थे।
महमूद की बुर चटाई से चूत को कुछ राहत मिल रही थी।
जैसे ही दीपक का पूरा लण्ड चूत से बाहर निकला.. वीर्य भलभला कर बाहर आने लगा.. जिसे महमूद ने मेरी गांड से लेकर चूत तक का सारा माल चाट कर साफ कर दिया।
दीपक का लण्ड निकल जाने पर भी मेरी चूत की फाँकें खुली ही रह गईं.. जैसे कोई बड़ा सा बांस बुर में डालकर निकाल लिया हो।
चूत से लण्ड निकलने के बाद मैं राहत की सांस महसूस कर रही थी।
इधर महमूद पूरी तरह चूत को चाटकर साफ करके मेरे बगल में लेट गए और दूसरी तरफ दीपक मैं उन दोनों के बीच में पड़ी रही। कुछ देर आराम करने के बाद महमूद ने गरम पानी से मेरी चूत की सिकाई की। सिकाई से मेरी चूत को राहत मिली.. पर शायद महमूद मेरी बुर की सेवा करके उसे दोबारा चोदने के लिए तैयार कर रहे थे।
फिर दीपक मुझे अपनी बाँहों में लेकर और लण्ड को बुर पर चिपका कर लेट गया। उधर पीछे से महमूद ने अपना लण्ड मेरी गान्ड पर लगा दिया और सोने लगे।
मैं दोनों तरफ से एक साथ चुदने के भय से कांप गई।
महमूद ने मुझे समझाया- डरो मत मेरी जान.. आज मैं नहीं चोदूँगा.. आज तुम्हारी चूत को दीपक के नाम कर दिया है.. आज केवल तुम्हारी चूत और गान्ड दीपक लेगा.. ओह्ह.. सॉरी गान्ड दीपक के लण्ड से तो तुम मरवा ही नहीं पाओगी दीपक केवल चूत ही चोदेगा। अभी आराम करो.. थक गई हो।
मुझे भी यूँ लेटे-लेटे नींद आने लगी और मैं सो गई।
मेरी नींद तब खुली जब आधी रात को मेरी चूचियाँ मींजी जा रही थीं और जब मैंने आँख खोली.. तो देखा कि दीपक मेरी चूचियाँ मसल रहा था।
महमूद मेरी बगल में बैठे हुए ये सब देख रहे थे।
दीपक मेरी चूचियों को मींजते हुए मेरी चूचियों को मुँह में लेकर चूसने लगा। मेरी चूचियों को दीपक दबा-दबा कर चूसते हुए मेरे चूचुकों पर जीभ फिराने लगा। दीपक के इस तरह के प्यार से मेरी चूचियां तन गईं और दीपक खूब खींच-खींच कर मेरी चूचियों को पीता रहा। वो दोनों हाथों से चूचियों को दबाते हुए धीमे-धीमे मेरी चूचियों से होते हुए मेरे पेट को चूमने लगा, साथ ही वो मेरी नाभि पर मुँह रख कर मेरी नाभि में जीभ फिराते हुए मेरी नाभि प्रदेश को जीभ से कुरेदने लगा।

इस बार दीपक मेरे जिस्म से इस तरह से खेलते हुए प्यार कर रहा था कि मेरी चूत खुद ब खुद कुलबुलाने लगी, मैं दीपक के प्यार को पाकर पिघलने लगी।
दीपक धीमे-धीमे नीचे मेरी चूत की तरफ चूमते हुए बढ़ने लगा और मेरी बुर पर जीभ नचाने लगा।
अभी भी दीपक मेरी चूचियां मींज रहा था और नीचे मेरी बुर चाट रहा था।
दीपक की बुर चटाई और प्यार को पाकर मेरी बुर दीपक का लण्ड लेने के लिए मचलने लगी जब कि मेरी पहली चुदाई में दीपक ने मेरी बुर को चोदकर सत्यानाश कर दिया था, फिर भी इस बार मैं दीपक के लण्ड को अपनी बुर में लेने के लिए मचलने लगी थी और दीपक मेरी बुर की फांकों को एक-एक कर चाटे जा रहा था और मैं कमर उचका कर बुर चटाई करवाते हुए.. मन ही मन सोच रही थी कि दीपक के लण्ड ने पहली चुदाई में मुझे बहुत तकलीफ दी थी.. पर इस बार मैं दीपक के लण्ड को अपनी बुर में मजे लेकर चूत चुदवाऊँगी।
एक बार तो दीपक का लण्ड मेरी बुर में जा ही चुका है और अन्दर जाकर मेरी बुर को ढीला कर ही दिया है.. अब चुदाई में उतनी तकलीफ नहीं होगी। नीचे मेरी बुर को दीपक खींचकर चूस रहा था और मेरी बुर दीपक का प्यार पाकर पानी छोड़ने लगी, मैं मचलते हुए कमर उचका कर चूत चटवाते हए सिसियाने लगी।
‘आह.. सिसिई.. आहहह.. सीइइ.. उई आह.. दीपक मेरी चूत आपके लण्ड के लिए तैयार है.. मेरी जान एक बार फिर मैं आपके लण्ड को चूत में लेना चाहती हूँ..’ प्यार से मेरी चूत में अपना लण्ड को उतार दो जानूँ.. तेरा प्यार पाकर मेरी बुर तेरे लण्ड के स्वागत के लिए तैयार है.. आहहह.. सीसीसीईईई.. बस अब प्यार से मेरी बुर चोद दो.. आहह..’
मेरी बेताबी देखकर दीपक मेरी चूत चाटना छोड़कर मेरे ऊपर सवार हो गया और मुझे अपनी बाँहों में दबाकर अपना मोटा लण्ड मेरी चूत पर सटाकर मेरे होंठों को किस करने लगा।
उधर मेरे और दीपक के लण्ड और चूत के खेल को महमूद बैठे हुए देख रहे थे।
तभी दीपक मेरी चूत पर दबाव बढ़ाने लगा, उसका सुपारा अन्दर जाता.. इससे पहले ही मैं छटपटाते हुए बोली- प्लीज.. नहीं ऐसे नहीं.. मैं मर जाऊँगी..
इस बार दीपक भी मुझे बेदर्दी के साथ नहीं चोदना चाहता था.. शायद इसी लिए लण्ड का दबाव कम कर दिया।
तभी मेरी चूत पर किसी की साँसों गरमाहट महसूस हुई।
बगल में महमूद नहीं थे.. एकाएक महमूद दीपक के लण्ड को और मेरी बुर को एक साथ चाट रहे थे। शायद दीपक के लण्ड को गीला कर रहे थे।
कुछ देर चाटकर महमूद ने ढेर सारा थूक निकाल कर दीपक के सुपारे पर लगा दिया और दीपक का लण्ड मेरी चूत पर सैट करके मेरे पैरों को फैलाकर चूत की फांकों को चौड़ा करके दीपक के चूतड़ों पर दबाव दे दिया, दीपक ने महमूद का इशारा पाकर लण्ड का दबाव दुबारा मेरी बुर पर बढ़ा दिए।
सुपारा अन्दर प्रवेश कर गया और मैं चीख उठी- आह्ह… उईई माँ… फट गईई… फट गई… मरर… गईई…
मेरी चीख सुन कर दीपक नी चूत पर लण्ड का दबाव कम कर दिया.. पर मैं इस बार दीपक के मोटे लण्ड को अपनी चूत में लेना चाहती थी और अपनी गरम चूत को दीपक के लण्ड से लड़ाना चाहती थी।
दीपक के लण्ड ने तो पहली चुदाई में मुझे तो केवल दर्द ही दिया था.. पर इस बार अपनी चूत दीपक के लण्ड से चुदवा कर मैं अपनी बुर का पानी निकलवाना चाहती थी।
इस चुदाई में दीपक मुझे बड़े प्यार से चोदना चाहता था.. मैं कराहते हुए दीपक से बोली- प्लीज दीपक.. रूको मत.. डालते जाओ.. मेरी बुर में लण्ड आहह..
दीपक एक बार फिर लण्ड को मेरी बुर में डालने लगा और मैं दांत भींच कर दीपक का लण्ड चूत में लेने लगी।
आहिस्ता-आहिस्ता दीपक ने मेरी चूत में अपना तीन चौथाई हिस्सा लण्ड उतार कर मेरी चूचियों को मुँह में लेकर चूसने लगा।
दीपक चूचियों को चूसते हुए मेरी बुर से लण्ड खींचता.. फिर अन्दर डाल देता। दीपक के बार-बार लण्ड अन्दर-बाहर करने से मेरी चूत ढीली होकर पानी छोड़ते हुए लण्ड लेने के लिए फूलकर कुप्पा हो गई थी, अब आसानी के साथ दीपक का लण्ड मेरी चूत में.. आने-जाने लगा और मैं भी कमर उठाकर कर लण्ड को चूत में लेने लगी।
इधर महमूद मेरी जाँघ के पास बैठ कर चुदाई देखते हुए लण्ड हिला रहे थे, दीपक मेरी चूत में लण्ड की रफ्तार बढ़ाते जा रहे थे।
मुझे अब दीपक के लण्ड से धीमे-धीमे चूत चुदाना अच्छा लगने लगा, मैं चूत में लण्ड लेते हुए सिसकारी लेने लगी- म्म्म्मीम.. ह्म्म्म्म म आआअहह.. हाआअ.. सिईम्म्मा.. मम्म्म.. हाय.. आह.. आअहह आअहह.. म्म्म्म मम..
फिर मैंने दीपक को अपनी ओर भींच लिया ‘आह्ह्ह्ह.. दीपक.. मारो मेरी चूत.. चोदो मेरी चूत..।’
अब मुझे भी मज़ा आ रहा था और मैं भी चूत उठाकर चुद रही थी, दीपक अपनी रफ़्तार बढ़ाता रहा। अब वो पूरे जोश के साथ मुझे चोद रहा था।
मैं भी मस्त हो चुकी थी, चूत पूरी तरह से गीली हो चुकी थी, मेरी चूत का खूब सारा रस दीपक के लण्ड पर भी लग गया था, मेरी चूत भी अब दीपक के लण्ड का स्वागत कर रही थी और मैं अपनी जाँघों को खोल करके लंड को पूरा रास्ता दे रही थी।
अब उसका लंड मेरी चूत में सटासट अन्दर-बाहर होने लगा था, दीपक की रफ़्तार भी अब काफ़ी तेज हो चुकी थी, मैं दीपक की चुदाई से मस्त होकर झड़ने के करीब थी, मेरा पानी निकलने वाला था और दीपक ‘गपगप.. खचखच..’ लण्ड मेरी बुर में पेले जा रहा था।
मैं इस मस्त चुदाई की मस्ती में अपनी गाण्ड उठा कर चरम पर आ गई ‘आहहह.. सीसीसीईई.. आह.. उउउउइ.. आह.. धीमे आह.. मैं गई राजा.. आह.. म्म्म्ममी.. आहसीईई..’
मैं जाँघें भींच कर झड़ने लगी। दीपक मेरी चूत में लगातार झटके मारता रहा और जब दीपक के लण्ड ने मेरी चूत में पानी छोड़ा.. तो दीपक मुझे दबोचते हुए चूत में वीर्यपात करने लगा।
उधर महमूद ने भी मेरी चुदती चूत देखकर अंतिम बार मुठ्ठ मार कर मेरे मुँह पर वीर्य छोड़ दिया। एक साथ दोनों ने मेरी बुर और मुँह को वीर्य से सान दिया।
अब पूरी तरह चुदाई का दौर शान्त हो चुका था। सुबह जय के आते ही मैं अपनी चुदी हुई चूत लेकर महमूद और दीपक को अलविदा कहकर जय के साथ कमरे पर आ गई। कमरे पर मेरे ह्ज्बेंड मेरा इंतजार कर रहे थे।
जय चाय लेकर आया, फिर हम तीनों ने बैठ कर चाय पी और मैंने उसी समय अपना एक फैसला ह्ज्बेंड और जय को सुनाया।
मैं बोली- जय जी.. मुझे अब बनारस वापस जाना है और अब आप मेरी कोई मीटिंग मत रखिएगा.. और आपने जो प्यार और मदद की.. मैं उसका धन्यवाद करती हूँ।
मैंने ह्ज्बेंड से भी पूछा- क्यों.. आपको कोई प्रॉब्लम?
ह्ज्बेंड बोले- नहीं.. मैं भी यही चाहता हूँ।
ह्ज्बेंड ने भी जय को ‘धन्यवाद’ दिया और जय से भी ह्ज्बेंड ने पूछा- डॉली का निर्णय आपको बुरा तो नहीं लगा?
जय बोले- नहीं रंगीला जी.. बुरा आप के जाने का नहीं लग रहा है.. बुरा लग रहा है बिछुड़ने का.. पर जाना जरूरी है और जब भी आप लोगों को मथुरा आने का दिल करे.. तो जय आपके स्वागत में हमेशा तैयार है। रंगीला जी.. आपको जो पैसा दिया है.. और आज की टोटल कमाई भी मैं आपको दे देता हूँ। मुझे आप लोगों से कोई दलाली नहीं लेनी और आप आज अपने सारे पैसे को बैंक में जमाकर दें.. साथ लेकर जाने की जरूरत नहीं है।
ह्ज्बेंड ने कहा- ठीक है.. ग्यारह बजे चलेगें.. तब तक आप लोग फ्रेश हो लीजिए।
जय जब चलने लगे.. तो मैं बोली- जय जी.. मैं आपका एहसान नहीं चुका सकती..
सबकी आँखों में बिछोह के कारण आँसू निकल आए थे। फिर हम लोग नहा-धोकर नाश्ता करके जय का इन्तजार करने लगे।
तभी जय भी आ गए.. जब ह्ज्बेंड और जय जाने लगे.. तो मैं बोली- मैं भी चलती हूँ आपके साथ.. आप लोग बैंक चले जाना.. और आज मैं अपनी मरजी से अकेले घूमकर शाम तक कमरे पर आ जाऊँगी।

उन लोगों के बैंक जाने के बाद मैं यूँ ही घूमते हुए ताजमहल देखने चली गई।
मैं काफी देर तक ताज देखती और घूमते हुए एक जगह बैठ गई। मुझे अकेला देखकर 42-45 साल का एक मर्द आकर मेरे करीब बैठ गया।
उसे देख कर लग रहा था कि वह मुझसे बात करना चाहता है।
फिर कुछ देर बाद वह बोल ही दिया- क्या आप अकेली ही आई है घूमने।
‘जी अकेली हूँ..’
‘ओह.. मैं भी अकेला हूँ.. आप बुरा ना माने.. तो क्या मैं आपके पास बैठ सकता हूँ?’
‘यस.. नो प्रॉब्लम..’
वह मेरे करीब आकर बैठकर बात करने लगा, मुझे भी उससे बात करना अच्छा लग रहा था, वह एक सुन्दर गठीला बदन का मालिक था। मैं उसके प्रति आकर्षित होने लगी।
मैंने उससे पूछा- आप कहाँ से हो?
वह बोला- मैं तो इलाहाबाद का हूँ मैडम..
मैं बोली- मेरा नाम डॉली है और मैं वाराणसी की हूँ..
‘अरे वाह.. आप तो मेरी तरफ की ही हो..’
‘आप यहाँ घूमने आए हो?’
‘नहीं डॉली.. मैं यहाँ नौकरी करता हूँ.. यूँ ही आज ताज देखने चला आया और देखिए आपसे मुलाकात हो गई।’
‘वो तो है.. और आपकी फैमली भी है?’
वह मायूस होते बोला- नहीं डॉली जी.. मैं अकेला हूँ।
‘तब तो सर जी आपको..’
वह बीच में बोल बैठा- मेरा नाम सर जी नहीं.. अभिजीत है..
‘जी अभिजीत.. आपको तब तो बीवी की याद सताती होगी।’
वह शरमाते बोला- याद के सिवा मैं कर भी क्या सकता हूँ डॉली जी।’
उसकी बात भी सही थी.. लेकिन मैं जानबूझ कर कुछ अश्लील मजाक करना चाहती थी, मुझे अभिजीत से बात करना अच्छा लग रहा था।
मैं बोली- बाकी का काम कैसे करते हो? जब बीवी की याद सताती होगी।
वह मुस्कुरा दिया- कुछ नहीं.. यूँ ही रह लेता हूँ..
मैं थोड़ी और बोल्ड होते हुए बोली- मैं कैसे मानूँ अभिजीत जी कि वाईफ की याद आने पर आप कुछ नहीं करते.. बताईए ना?
अभिजीत शरमाते हुए बोला- आप बुरा मान जाओगी।
मैं बोली- तुम बताओ तो सही.. मैं बुरा नहीं मानूँगी।
अभिजीत सर को झुका कर बोला- मुट्ठ मार लेता हूँ.. जब याद ज्यादा आती है।
मैंने उसको लाईन पर आता देख बात को आगे बढ़ा दिया।
‘तब तो आप बहुत गलत करते हो.. बीवी को यहीं ले आओ.. और अपनी तन की प्यास बुझाओ..’
मैंने एक साथ कुछ ज्यादा अश्लील शब्द बोल दिए।
वह बोला- वाईफ को यहाँ लाना सम्भव नहीं है।
‘तो फिर तुम किसी और के साथ क्यूँ नहीं कर लेते?’
वह बोला- डॉली यह सब किसी के साथ कैसे कर सकता हूँ.. कौन मिलेगा और मैं गन्दी जगह जाना नहीं चाहता।
मैं बोली- कोई घरेलू शादीशुदा औरत देख लो.. बहुत मिल जाएंगी।
वह मेरी बातों से समझ गया कि उसके थोड़ा आगे बढ़ने पर मैं ही वह औरत हो सकती हूँ.. पर वह भी जानबूझ कर बात घुमा रहा था।
‘आपके ह्ज्बेंड कहाँ हैं.. क्या आप अकेली आई हो बनारस से?’
‘नहीं.. अभिजीत मैं अकेली नहीं आई हूँ ह्ज्बेंड भी साथ हैं.. पर आज मैं अकेली घूमने निकली हूँ और वैसे ह्ज्बेंड को काम के सिवाए मैं दिखती ही नहीं.. उनके साथ से अच्छा मैं अकेली ठीक हूँ।’
मैं जानबूझ कर ह्ज्बेंड के बारे में झूठ बोली थी।
‘आप कब तक खाली हैं?’
मैं बोली- शाम तक या उससे भी अधिक समय है मेरे पास।
वह डरते हुए बोला- आपको बुरा ना लगे तो यहाँ बैठने के अलावा हम दोनों मेरे कमरे पर चलते.. वहीं बैठकर बातें करते और मेरे कमरे की चाय भी पी लेतीं।
मैं बोली- आपके साथ मैं आपके कमरे पर चली.. तो कहीं लोग गलत ना समझें.. कि आप मेरे साथ..
मैंने जानबूझ कर बात अधूरी छोड़ दी।
‘नहीं डॉली.. कोई कुछ नहीं सोचेगा.. क्यूँ कि मैं आज तक किसी को लाया ही नहीं कमरे पर.. और मेरा कमरे मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में है। आप जब तक चाहें.. वहाँ रुक सकती हो।’
फिर मैं बात करते हुए अभिजीत के कमरे पर पहुँची, अभिजीत ने अपने हाथों से चाय बना कर मुझे पिलाई।
अभिजीत मेरे पास चुपचाप बैठा था।
मैं बोली- आपका कमरा तो बढ़िया है.. पर यहाँ एक औरत की जरूरत है.. जो आपको और घर को सुख दे सके। मुझे लग रहा है आज तक इस कमरे में सेक्स की किलकारी नहीं गूंजी हैं।
यह सब मैं जानबूझ कर कह रही थी।
तभी वह बोला- डॉली आप चाहो तो अभी किलकारी गूँज उठें।
यह कह कर अभिजीत मुझे किस करने लगा।
मैं बोली- यह क्या कर रहे हो.. प्लीज ऐसा मत करो..
तभी अभिजीत बोला- तुम भी तो यही चाह रही थी डॉली.. अब मना मत करो। मैंने अब तक किसी गैर औरत से सेक्स किया नहीं है.. पर मेरे पास उम्र का अनुभव तो है।
यह कहता हुआ वह मेरे अंग-अंग को चूमने लगा और मैं भी एक प्यासा मर्द पाकर चुदाई के नशे में उसके आगोश में बैठकर सेक्स का खेल खेलने लगी।
मेरी चूत की प्यास भी तेज होने लगी, वह मेरी चूचियों को मसलने लगा और मैं अपने मम्मे मसलवाते जानबूझ कर एक भरपूर अंगड़ाई लेकर अभिजीत को अपनी बाँहों भर के चुदाई का खुला निमंत्रण देते हुए वहीं सोफे पर लेटे गई।
उसने मेरे बड़े-बड़े चुचों को अपनी मजबूत चौड़ी छाती के बीच दबा कर मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया और अपने होंठों को मेरे नाजुक होंठों पर कसकर.. उनका रसपान करने लगा।
मैं उसकी मजबूत बाँहों में कसमसाते हुए बोली- मैं आपकी बीवी नहीं हूँ.. एक अंजान औरत हूँ।
वह बोला- मेरे लिए दोनों एक जैसे हैं। क्योंकि बीवी को चोदने में यही फीलिंग होती है।

फिर अभिजीत ने उठकर अपने और मेरे कपड़े निकाल दिए और मेरे चूचों को पीकर मुझे लण्ड चूसने को बोला।
मैं अभिजीत का लण्ड मुँह में भर कर चूसने लगी, कुछ देर की चुसाई से अभिजीत का लण्ड फनफनाने लगा।
फिर अभिजीत ने मुझे सोफे पर लिटाकर लण्ड को पकड़ कर मेरी चूत के मुँह पर रख एक झटका दिया, मेरी चिकनी बुर में अभिजीत ने अपने लण्ड का सुपारा धकेल दिया।
मैं भी कमर उचाकर चूत में लण्ड लेने की कोशिश कर रही थी। अभिजीत झटके पर झटके देते हुए पूरा लण्ड मेरी बुर में डाल कर मेरी चूत को चोदने लगा।
‘आआह्ह.. जान.. मजा आ रहा है.. खूब चोदिए मुझे.. वाह और जोर से.. डालिए.. वाह.. बहुत अच्छे से चोद रहे हो इस्स्स्स्स् स्स्स्स.. मेरी बुर को खूब चोदो.. जम कर चोदो..’
‘ले.. चूत उठाकर चुद.. मेरे लण्ड से.. वाह.. आज तुमने बहुत मजा दिया मेरी रानी.. वाह डॉली.. तुमने अपनी चूत देकर मुझे धन्य कर दिया।’ ये कहते हुए अभिजीत मेरी चूत पर शॉट पर शॉट मारते हुए मेरी चूत का पोर-पोर हिला कर मेरी चुदाई कर रहा था।
मैं चूत और कमर उछाल कर लण्ड बुर में लेती जा रही थी ‘आह्ह.. मुझे खूब चोदो.. जम कर पेलो.. मेरे बुर में अपना लन्ड.. मेरे अजनबी सनम.. आहह.. इइइस्स्स्स्.. आह्ह्ह्ह्ह..’

अभिजीत भी जम कर मेरी बुर को चोद रहा था।
थोड़ी देर बाद अभिजीत ने मुझे पलटने को कहा और मैं पलट गई।
अब मैं कुतिया बनी हुई थी और अभिजीत कुत्ते की तरह मुझे चोद रहे थे और वैसे ही वो हाँफ़ भी रहे थे। अभिजीत का लण्ड मेरी चूत से टकरा कर ‘थप-थप’ की आवाज कर रहा था। मैं मजे से मदहोश हुई जा रही थी।
तभी अभिजीत बोले- आह डॉली.. अब मेरा निकलेगा.. तेरी गरम बुर पाकर मेरा लण्ड झड़ जाएगा.. आआह्ह्ह.. आअह्ह्ह्ह.. आआह्ह्ह्ह..।
इस तरह की मादक आवाज निकालते हुए अभिजीत ने मेरी बुर में अपना वीर्य भलभला कर छोड़ने लगे।
मैं भी अभिजीत के गरम वीर्य को पाकर झड़ गई। अभिजीत बहुत प्यासा था.. उसने शाम तक मेरी दो बार और चुदाई की और फिर भी हम दोनों का मन नहीं भरा था। मन मार कर वहाँ से मुझे आना पड़ा।
यह बात 6 महीने पहले की है। मई का महीना था, हम लोग जबलपुर के एक होटल में रुके हुए थे.. शादी में आए हुए सभी लोगों रुकने का इंतजाम ह्ज्बेंड के दोस्त की तरफ से उसी होटल में किया गया था।
हम लोगों का कमरा तीसरे माले पर था, मेरे कमरे के सामने वाले कमरे में दूल्हे के जीजाजी भी रुके हुए थे, उनसे मेरी मुलाकात संगीत कार्यक्रम में हुई.. जो शादी के एक दिन पहले यानि 10 मई को था.. और शादी अगले दिन यानि 11 मई को थी।
मैं उस दिन एक रानी कलर की साड़ी पहने हुई थी और बहुत खूबसूरत लग रही थी। क्योंकि करीब सब की निगाहें मेरे ही ऊपर घूम रही थीं.. ख़ासतौर पर उन सब में दूल्हे के जीजाजी मुझे कुछ ज्यादा ही लाइन मार रहे थे। मैं भी बार-बार उस अजनबी को देख कर मुस्कुराने लगी।
सच बताऊँ दोस्तों.. मैं उसको देखते ही.. उसकी नज़रों से नजरें मिलते ही मेरे मन में एक अलग सी मस्ती छाने लगी थी।
मुझे लगा कि कोई तो है इस महफ़िल में जो मेरी तरफ देखने वाला है। मैं भी उसको अपनी तरफ आकर्षित करने की पूरी कोशिश कर रही थी.. इसी लिए मैं भी मुस्कुराने और शरमाने लगी।
मेरे मुस्कुराने से और शरमाने की अदा से वो समझ गया कि मैं भी उसमें रूचि ले रही हूँ। बस फिर क्या था.. वो बहाने से मेरे पास आ गया और मुझसे बातें करने लगा।
मेरे लोकट ब्लाउज से मेरे उरोज यानि चूचियां काफी खुली नज़र आ रही थीं।
अब रात काफ़ी गहरा चुकी थी और शादी का मधुर संगीत चालू था। हम दोनों ऐसे ही कुछ इधर-उधर की बातें करते रहे और बात करते हुए मैं संगीत कार्यक्रम से एक तरफ हटने लगी। मैं वहाँ से सब की नजर बचा कर होटल की लाबी में बढ़ गई और साथ में अरूण मोदी जी मतलब वही दूल्हे के जीजा जी.. उनका नाम अरूण मोदी है.. मेरे पीछे-पीछे लाबी की तरफ आ गए और मुझसे बातें करने लगे।
उनसे बातों के दौरान बार-बार अरूण जी का मुझे छूना.. मुझसे सटना मेरे तन-बदन में और चूत में आग लगा रहा था। वो बातें करते जा रहे थे.. पर मेरे कानों में कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था। मैं तो अपने ख्यालों में खोई हुई अपनी जाँघों से चूत को दाबे हुए.. अन्दर उठती तरंग का मजा ले रही थी।
तभी अरूण मोदी ने कहा- भाभी जी चलिए.. कहीं बैठ कर बातें की जाएं..
मैं जैसे चौंक कर किसी ख्वाब से बाहर आई।
मैंने कहा- हाँ.. क्यों नहीं.. पर कहाँ कोई देखेगा.. तो हम लोगों के बारे में क्या सोचेगा?
अरूण जी ने कहा- इस टाईम सब कार्यक्रम में मस्त हैं कोई ध्यान नहीं दे रहा है.. आपको बुरा ना लगे तो आप मेरे साथ मेरे कमरे में चल सकती हो। आप ही के कमरे के सामने मेरा भी कमरा है। वहाँ मुझे और आपको कोई नहीं देखेगा और आपका साथ पाकर मुझे भी खुशी होगी।
मैं ना चाहते हुए भी ‘हाँ’ में सर हिला कर अरूण जी के साथ उनके कमरे की तरफ चल दी। पर एक संकोच और बेचैनी की वजह से दरवाजे पर ही रुक गई।
‘अन्दर तो आईए..’
अरूण जी की आवाज मेरे कानों में पड़ी। यह कहते अरूण मोदी ने देर नहीं लगाई.. मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अन्दर खींच लिया और मुझे सोफे पर बैठा दिया, फिर मेरा हाथ अपने हाथों में लिए हुए खुद ही मुझसे सट कर बैठ गए।
एक गैर मर्द को अपने करीब पाकर मुझे कुछ होने लगा.. मेरी चूत कुलबुलाने लगी और मुझे बस यही लग रहा था कि मैं किसी भी पल इस आदमी से मैं चुद सकती हूँ या यह मुझे किसी पल अपने बाबूराव से चोद सकता है।
तभी अरूण मोदी की आवाज से में अपनी सोच से बाहर आई, उन्होंने पूछा- तुम कहाँ से हो?
मैं बोली- बनारस उत्तर प्रदेश से हूँ.. आप?
उसने कहा- मैं सिवनी मध्यप्रदेश से हूँ और मैं दूल्हे का जीजा हूँ।
मैंने पूछा- क्या मैं आप को इतनी अच्छी लग रही थी.. जो आप मुझे ही देख रहे थे?
तो वो मुस्कुरा कर बोले- हाँ.. तुम मुझे बहुत ही सेक्सी और हॉट लग रही हो..
मैं भी कातिलाना अंदाज से मुस्कराते हुए बोली- तब तो आपकी नीयत ठीक नहीं लगती..
अरूण जी ने कहा- नहीं.. नीयत बिलकुल ठीक है.. तभी आप जैसी हसीन औरत मेरे पास बैठी है। ये तो मेरा भाग्य ही है कि आप मेरे साथ हो..
यह कहते हुए अरूण मोदी जी ने उठकर दरवाजा बन्द कर दिया.. और अगले ही पल मैं उनकी बाँहों में थी। उसने मुझे जोर से कस लिया और बेसब्री से मुझे चूमने लगा। मेरी भी हालत कुछ अलग नहीं थी। मैं भी सालों की प्यासी की तरह उसका साथ देते हुए बोली- यह आप क्या कर रहे हैं.. छोड़ दीजिए प्लीज.. ऐसा मत कीजिए.. आआह.. हहहहसी..
मेरा मन और चूत मचल उठा।
एक पराए मर्द की बाँहों में होने का मजा ले रही थी।
उसने कहा- भाभी.. तुम बहुत सुंदर हो। कब से बस पार्टी में घूम-घूम कर देख रहा था और सोच रहा था कि ऐसा क्या करूँ कि आपके हुस्न का रस पान कर सकूँ। बहुत दिल करता था कि आपको अपनी बाँहों में लेकर आपके होंठों का रसपान कर लूँ.. आप बहुत ही खूबसूरत और सेक्सी औरत हो.. मेरी जान.. तुम एक गरम और चुदक्कड़ माल हो। मैं तो तुम्हारे ह्ज्बेंड को बहुत ही खुशनसीब समझता हूँ.. जिसे तुम्हारे जैसे गरम और गदराई जवानी से भरपूर औरत मिली है।
अपनी तारीफ़ में यह सब सुनकर मैं बहुत खुश हुई, मैंने भी कहा- जब से तुम यहाँ आए हो और मैंने तुमको देखा है.. तबसे तुम्हारे बारे में सोच रही थी। मैं भी चाहती थी कि तुम्हारे जैसा कोई तगड़ा जवान मिले जो मेरी सारी इच्छाएं पूरी कर दे.. मुझे अपनी बाँहों में ले कर जम कर मेरी ठुकाई और चुदाई करे.. मेरी चिकनी चूत चाट कर मुझे पेल दे.. आह्ह.. मेरे राजा.. आज तुम मेरी वो सारी इच्छाएं पूरी कर दो..
इतना सुनते ही अरूण ने मुझे अपने बाँहों में लेकर मेरे चुचों पर हाथ फेरते हुए मेरी एक चूची को जोर से भींच लिया और वो मेरे गालों पर प्यार से अपनी जीभ फिराने लगे। अरूण जी कि हरकतों से मैं अब काफ़ी गर्म हो चुकी थी।
मैंने भी ज़ोर से एक किस करते हुए कहा- आआहहहह सीईईई.. मेरे राजा मुझे अपना बना लो.. और आज मेरी जवानी को अपने लण्ड से रौंद दो..
यह कहते हुए मैंने एक हाथ से उनके लण्ड को पकड़ लिया। वो भी धीरे-धीरे मेरे चूचों को मसलने लगे और अपना चेहरा मेरे पेट के ऊपर रख चूमने लगे।
मैंने सिहरते हुए कहा- आह्ह.. ज़रा आराम से करो.. मेरी यह चूत आपको ही चोदने को मिलेगी।
उसने मेरी साड़ी उतार दी और मैंने बस लाज से कांपते हुए अपना चेहरा हाथों से ढक लिया। वह मुझे गोदी में उठा कर बेड पर ले जाकर.. बिस्तर पर लिटा दिया। मेरा ब्लाउज और ब्रा निकाल दिए और मेरे चूचे चूसने लगे। मैं भी अब उनका पूरा साथ देने लगी थी।
दोस्तो, चुदास की आग लग चुकी थी, मेरे जिस्म में आज एक मस्त चुदाई की कामना घर कर चुकी थी.. बस मुझे यह देखना था कि अरुण मोदी का लवड़ा मुझे कितना संतुष्ट कर सकेगा।
मैंने भी हाथ बढ़ाया और उनके लण्ड को पैन्ट के ऊपर से सहलाते हुए, ज़ोर से दबा दिया। अरुण जी का लण्ड मेरे ह्ज्बेंड की ही तरह पूरा 7 इन्च लम्बा और 3 इन्च मोटा था।
अरूण ने मस्ती में बोला- जान रूको.. मैं भी कपड़े निकाल दूँ.. फिर तुम दिल खोल कर मेरे लण्ड से खेलना।
अपने पूरे कपड़े उतार कर अरूण जी ने मुझे भी पूरी नंगी कर दिया और मेरे चूचों को चूसने लगे।
फिर उसने मेरी पैन्टी भी निकाल दी और मेरी पनियाई चूत में अपनी एक उंगली डाल अन्दर-बाहर करने लगे और मैं मस्ती से सीत्कारें कर उठी- ‘सीसीसीसीई.. उईसीई.. आहसी..’ करने लगी और मैं उठ कर उनके लण्ड को प्यार से सहलाते हुए लण्ड मुँह में लेकर चूसने लगी।
अरूण जी मेरी चूत में अपनी उंगली पेले जा रहे थे। इससे मैं और भी कुछ ज्यादा ही गर्म हो गई।
अरुण जी मेरे मुँह से लण्ड निकाल कर मुझे लिटाकर अपना मुँह मेरी चूत पर ले जाकर चाटने लगे, मेरी सिसकी ‘आह.. सीसी.. आह.. सीईईसी.. आहसी..’ निकल गई और मैंने अपनी टाँगें ऊपर उठा दीं.. जिससे वो मेरी चूत को अच्छी तरह से चाट कर मुझे जन्नत की सैर करा सके।

मैं जोर-जोर से मादक सिसकारियाँ ले रही थी, मैं बोली- राजा.. अब से यह चूत तुम्हारी है.. इसका जो भी और जैसे भी चोदकर कर मुझे मेरी जवानी को आज तृप्त कर दो.. अपने लण्ड का नशा मेरे रोम-रोम में भर दो.. आज इस दासी को अपने लण्ड का गुलाम बना लो.. आह्ह.. तुम मुझे जी भरकर चोदके.. मेरी मस्ती झाड़ दो। मेरी आज रात की आग को तुम ही बुझा सकते हो।
उसने अब अपनी जीभ को मेरी बुर के और अन्दर तक ढकेल दिया.. और जोर-जोर से चाटने लगे। अपनी जीभ मेरी चूत में और भी जल्दी-जल्दी और अन्दर-बाहर करते हुए मेरा पानी निकालने लगे और अब मैं जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी। मेरे मुँह से निकली सीत्कार पूरे कमरे में गूँज रही थी।
मैं बोली- अब मुझसे नहीं रहा जाता.. अब अपने बाबूराव से मेरी खींच कर चुदाई करो.. मेरी चूत फाड़ दो.. बाबूराव मेरे अन्दर डाल कर मेरी प्यास बुझा दो.. आह.. मुझे शांत कर दो मेरे यार.. मेरी चूत के राजा..! आह्ह.. मुझे चोदो मेरे जिस्म.. मेरे शरीर के मालिक.. आज अपनी और मेरी प्यास बुझा दो.. आह्ह..!
अरुण मेरी चूत को चूमते हुए मेरी नाभि से होकर मेरे वक्षस्थल को मुँह में लेकर मेरे पनियाई हुई चूत के ठीक ऊपर अपने बाबूराव को रख कर मेरी गरम चूत पर सुपारे को आगे-पीछे करने लगे। वो अपने लण्ड का सुपारा कभी चूत में और कभी मेरे रस से भीगी चूत पर रगड़ देते..
ऐसा करने से मेरी वासना और भड़क उठी।
तभी मैंने एकाएक अरुण जी की कमर पकड़ कर अपनी चूत के ऊपर से उठा कर.. उन्हें वापस अपनी तरफ खींचा.. एक ‘फक्क..’ की हल्की सी आवाज के साथ अरुण जी का हैवी लण्ड मेरी चूत में आधा घुस गया। मेरी तो जैसे चीख भरी ‘आह’ मुँह से निकल सी गई। मैं एक कामुक सिसकारी लेकर बोली- आहसीई.. मेरे जानू.. आआहह.. सीईईई सीआहह..
इतने में अरुण जी ने एकाएक पूरा बाबूराव मेरी चूत में पेल दिया और मेरी चूत उनका मस्त लण्ड खाने को उछल पड़ी।
मैं चिल्लाई- आह्ह.. और जोर से पेलो.. मेरी बुर चोदो.. चूत फाड़ दो.. मेरी चूत के आशिक..! ज़ोर-ज़ोर से इसे अन्दर-बाहर करो.. बुझा दो प्यास मेरी.. आह्ह.. मजा आ गया.. ओह्ह..
उन्होंने अपना लण्ड तेज गति के साथ मेरी चूत में अन्दर-बाहर करते हुए एक ज़ोर से धक्का पेल दिया और उसका पूरा मोटा मस्ताना लण्ड.. मेरी चूत में जड़ तक घुसता चला गया।
मैं कराही- आह.. आह.. उउई.. ऊफफफ्फ़.. हमम्म्म.. आआ..! क्या मस्त मूसल लण्ड है आपका.. अब जब भी मैं चुदूँगी.. तब तब आपकी चुदाई याद आएगी.. आज ऐसा चोदो मुझे.. आह आह.. उउई.. ऊफफफ्फ़ सीईसीईई आह..
‘आह्ह.. मुझे भी रानी.. याद आएगी तेरी.. यह मस्त चूत.. आह्ह.. लगता है कि फाड़ डालूँ.. तेरी यह मस्त चूत..’
‘आह्ह.. मेरे राजा.. यह चूत तुम्हारी ही है.. फाड़ दो इसे.. आअहह ऊऊऊऊओ आआहह.. ज़ोर से.. और ज़ोर से.. चोदो..’
उसने अपनी गति बढ़ा दी और ज़ोर-ज़ोर से मेरी चूत की चुदाई करने लगा।
वो मेरे चुचों को मुँह में लेकर चूसते हुए मेरी चुदाई कर रहे थे। मेरी मस्त चुदाई चालू थी.. वाकयी में अरुण मोदी एक मर्द थे। उनकी चुदाई से मुझे असीम आनन्द आ रहा था। काफी देर तक ताबड़तोड़ चुदाई करते हुए उसने मेरी चूत को अपने गाढ़े वीर्य से भर दिया।
मेरी भी चूत उनका गरम वीर्य पाकर मस्त हो गई और मेरे मुँह से सिसकारी निकल पड़ी.. ‘आह.. आह.. उउई.. ऊफफफ्फ़ सीई आह..’ मैं भी झड़ गई, मैंने झड़ते हुए कस कर अरुण जी को अपनी बाँहों में भींच लिया.. सिसक-सिसक कर हिचकोले लेते हुए जोरों से झड़ती रही.. जैसे नदी में कोई बाढ़ आ गई हो..
कुछ देर बाद मेरा जिस्म ढीला सा पड़ गया.. मेरा रोम-रोम दु:ख रहा था।
किसी तरह मैं उठी और बाथरूम में साफ होने के लिए चली गई। थोड़ी देर में अरूण मोदी जी भी बाथरूम गए और फ्रेश हो कर आकर मुझे वैसे ही बिना कपड़ों के अपनी गोद में लेकर मुझसे बातें करने लगे।
करीब आधे घण्टे बाद दोबारा से अरुण ने फिर से मुझे चूमना शुरू किया। एक बार फिर मस्ती में मेरी चूत फुदकने लगी। मैं अरूण जी के साथ चूत चुदाने का मजा ले चुकी थी। अब मेरा कुछ और ही इरादा था। मुझे ऐसा हो रहा था कि बस अरूण जी चोदें और मैं चुदूँ..। इस बार मैंने सीधे नीचे जाकर पहले उनका लण्ड को अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू किया।
दस मिनट बाद में वो फिर से तैयार हो गए.. मेरी चुदाई करने के लिए।
लेकिन इस बार मैं उल्टी लेट गई और उनके लण्ड पर गाण्ड के छेद को रगड़ने लगी।
मेरी इस क्रिया से अरुण जी को समझते देर नहीं लगी कि मैं क्या चाहती हूँ। शायद वो भी मेरी गाण्ड मारना चाह रहे थे। बस मेरी इजाजत की देर थी। उनका बाबूराव फिर से अपना कमाल दिखाने को आतुर हो उठा।
मेरी गाण्ड ने भी ‘फूल-पचक’ कर इजाजत दे दी। उनके बाबूराव की रगड़ाई से मेरी चूत की आग गाण्ड में भी लग गई और मैं मस्ती के आलम में गाण्ड का दबाव लण्ड पर देने लगी। मेरे मुँह से ‘आह.. आह.. उउई.. ऊफफफ्फ़.. की आवाजें निकल रही थीं।
बस अरुण के लिए इतना इशारा काफी था। उसने अपना थूक निकाल कर गाण्ड पर और बाबूराव पर लगा कर धीरे-धीरे बाबूराव गाण्ड में पेलने लगे। यह पहली बार था जब कोई थूक लगा कर मेरी गाण्ड मार रहा था। दोस्तों थूक लगा कर गाण्ड मरवाने का मजा ही कुछ और था। अरुण जी मेरी गाण्ड मारते जा रहे थे और मैं आँखें बन्द करके.. अपनी गाण्ड मरवाते हुए मजा ले रही थी।
वो मेरी गाण्ड से बाबूराव निकालते.. फिर एक ही झटके से पेल देते। उनकी इस क्रिया से मेरे मुँह से सिसकी निकलने लगी।
‘आआहह.. आहह.. आहहह.. उहस ससी.. ईईआ आहहह..’ की आवाज निकालते हुए मैं उचक-उचक कर अपनी गाण्ड मरवा रही थी। अरुण जी गाण्ड से लण्ड खींच कर बाहर करके दुबारा मेरी गाण्ड में डाल देते।
पूरी मस्ती में गाण्ड को मराते हुए सिसकारी लेकर मैं बोली- आहह राजा.. मारो मेरी गाण्ड.. हरी कर दो.. मार मार के.. मेरी गाण्ड को..
अरूण मेरे मुँह से ऐसे शब्द सुनते ही मेरी गाण्ड की रगड़ाई और अच्छी तरह करने लगे। तूफानी गति मेरी गाण्ड चोदते हुए मुझे गाली देने लगे- ले मादरचोदी चुद.. ले साली.. मेरे बाबूराव की मार.. गाण्ड पर छिनाल.. साली बहनचोदी.. तेरी गाण्ड मार कर आज फाड़ ही दूँगा..।
मैं भी गाली देती बोली- फाड़ दे बहनचोद.. मेरी गाण्ड मार.. मेरी गाण्ड मार भड़वे..
यह कहते हुए मैं कभी अन्त न होने वाली गाण्ड मराई के मजे लेते हुए मादक सिसकारी निकालने लगी ‘आआआह.. आहहह.. आहहह.. सससीईईई.. आआह सी.. मैं गई.. मेरी चूत गई..’
मैं यानि मेरी चूत झड़ने लगी.. झड़ते वक्त गाण्ड के फूलने-पचकने से अरुण भी खुद को रोक नहीं पाए और अपना वीर्य मेरी गाण्ड में छोड़ने लगे- ‘लो रानी.. मैं भी गया.. रानी.. वाह.. सीसीई.. आह्ह.. मजा आ गया.. आहह..सी।’
यह कहते हुए मुझे दबोच कर निढाल पड़ गए, कुछ देर बाद अपना बाबूराव मेरी गाण्ड से खींच कर उठ गए। मेरी गाण्ड से वीर्य की धार बह निकली।
अपनी चूत और गाण्ड मरवा कर मैं निढाल होकर पड़ी ही थी कि कुछ देर बाद मैं बिस्तर से उठकर बाथरूम से फ्रेश होकर बाहर आई और मोबाइल में टाईम देखा तो 12:30 हो चुका था, मुझे मस्ती और चुदाई के दौरान पता ही नहीं चला कि बाहर लोग यानि मेरा ह्ज्बेंड मुझे खोज रहा होगा, उससे मैं क्या कहूँगी कि मैं कहाँ गायब हो गई थी।
मैंने अपनी इस सोच से अरुण जी को भी अवगत कराया.. तो वो मुस्कुराकर बोले- बोल देना कि सामने वाले कमरे में मेरी चूत चुद रही थी।
मैं शरमा कर रह गई- आप बाहर देखो कोई ना हो.. तो मैं निकल जाऊँ..
अरुण ने दरवाजा खोल कर देखा.. कोई नहीं था।
मैंने एक बार फिर अरुण से गले मिल कर चुम्मी ली और फिर मिलने को बोल कर बाहर निकल गई, गलियारे में कोई नहीं था.. बिल्कुल सन्नाटा था, संगीत का प्रोग्राम भी खत्म हो चुका था, सब लोग खाना वगैरह खा-पीकर अपने कमरे में सोने चले गए थे।
मैंने डरते हुए अपने कमरे के दरवाजे पर धक्का दिया कि हल्की आहट के बाद दरवाजा खुल गया।
दरवाजा खुलते ही मेरा दिल धड़कने लगा, कमरे में अंधेरा था.. कुछ दिख ही नहीं रहा था कि ह्ज्बेंड जाग रहे हैं कि सोए हुए हैं।
मैंने कमरे के अन्दर हो कर दरवाजा बंद कर लिया और बिस्तर की तरफ बढ़ी ही थी कि तभी मेरे कानों में ह्ज्बेंड की आवाज सुनाई पड़ी- कहाँ थी.. अभी तक.. और कहाँ चली गई थी.. मैं कितना खोज रहा था.. खाना भी नहीं खाया? मैंने तुमको बहुत खोजा.. मैं कितना घबरा रहा था.. मालूम है तुमको? सब लोग भी पूछ रहे थे।
एक ही सांस में इतने सारे सवाल पूछ लिए कि मेरे मुँह से बोली ही नहीं निकल रही थी कि क्या जबाब दूँ। जहाँ के तहाँ मेरे पैर जम गए थे.. जैसे कि मुझे साँप सूँघ गया हो।
लेकिन मैं सम्भलते हुए बोली- लड़की वालों के तरफ की सभी औरतों से बात करते हुए दुल्हन के कमरे में चली गई थी और खाना भी वहीं खा लिया था.. वो लोग आने ही नहीं दे रहे थे। किसी तरह बहाना करके आई हूँ.. बहुत थक गई हूँ.. मुझे नींद आ रही है। आपने खाना खा लिया था?
मैं कैसे कहती कि मैं चुद रही थी और चुदाई का खाना खाकर आई हूँ। मेरी चूत जम कर चुदी है.. मैं थक गई हूँ अब सोना चाहती हूँ।
ह्ज्बेंड बोले- हाँ मेरा खाना तो हो गया है.. आओ बिस्तर पर.. अब आराम करो..
मैं जैसे ही मैं बिस्तर पर गई ह्ज्बेंड ने मुझे अपने से लिपटा लिया और मुझे सहलाने लगे। मैं डर गई कि अगर मेरी चूत छुएंगे.. तो कहीं जान न जाएं कि मैं क्या करके आई हूँ।
मैं अभी सोच ही रही थी कि ह्ज्बेंड बोले- ऐसे ही सोओगी क्या.. नाईटी पहन लो।
मैं नाईटी पहन कर पास आई ही थी कि ह्ज्बेंड का हाथ मेरी पनियाई हुई चूत पर पड़ा.. और वे मेरी चूत को सहलाते हुए बोले- चुदने का मन है क्या.. चूत तो पानी छोड़ रही है।
मैं बोली- नहीं.. ये तो वैसे ही पानी निकल रहा है.. मैं थकी हुई हूँ.. चलो सो जाओ।
यह कह कर मैं सोने का नाटक करने लगी।
मैं क्या कहती कि यही आपके सामने वाले कमरे से चूत और गाण्ड दोनों मरवा के आई हूँ, अब और चुदने का मन नहीं है।
मैं ह्ज्बेंड से लिपट कर सो गई।

सुबह उठी फ्रेश होकर चाय वगैरह पीकर ह्ज्बेंड बाहर निकल गए। कुछ देर बाद मैं भी कमरे से बाहर निकली ही थी कि मेरा सामना अरुण जी से हो गया। हम एक-दूसरे को देख कर मुस्कुरा दिए।
‘गुड मॉर्निंग..’
अरुण जी भी बोले, “गुड मॉर्निंग..”
तभी मेरे ह्ज्बेंड आते हुए दिखाई दिए.. मैं भी ह्ज्बेंड के साथ कमरे में आ गई।
ह्ज्बेंड बोले- मुझे प्रतीक के (मेरे ह्ज्बेंड के दोस्त जिसकी शादी में हम लोग आए हुए थे) साथ बाहर जाना है.. कुछ सामान और पार्लर में काम है। मुझे 2-3 घण्टे लगेंगे।
यह कहकर ह्ज्बेंड बाथरूम मे फ्रेश होने चले गए।
पर यह सुनते ही मेरी चूत मचल उठी.. एक बार फिर मेरी चूत चुदेगी।
तभी बाथरूम का दरवाजा खुला और ह्ज्बेंड बाहर आए, मैंने उनको कपड़े दिए और ह्ज्बेंड तैयार होकर चले गए।
वे जाते हुए मुझसे बोले- तुम प्रतीक के घर वालों के पास चली जाना.. कोई काम हो तो देख लेना।
मैं बोली- ठीक है..
ह्ज्बेंड चले गए.. मैं झट से बाथरूम में घुस गई और फ्रेश होकर बाहर निकली। मैंने एक गुलाबी रंग का लहंगा और चुनरी पहन कर कमरे के बाहर निकली और अरुण जी को खोजने लगी।
भीड़-भाड़ में अरुण जी कहीं दिख ही नहीं रहे थे।
तभी मेरे पीछे से किसी ने मुझे ‘भाभी जी..’ कहकर पुकारा.. मैं चौंक कर पीछे देखने लगी।
करीब 27-28 साल का एक युवक था.. बड़ा हैन्डसम.. स्मार्ट सा.. वो मेरे करीब आया और बोला- आपको उधर अरुण भाई साहब बुला रहे हैं।
मैं बोली- किधर?
और मैं उसके साथ चल दी।
वो मुझे एक साईड ले जाकर बोला- भाभी जी मैं आप से झूठ बोला हूँ.. मैंने कल आपको अरुण जी के कमरे में जाते और सब कुछ करते हुए देखा था। मैंने ‘की-होल’ से पूरी फिल्म देखी है। कसम से भाभी आप बहुत मस्त माल हो।
इतना सुनते मेरे हाथ-पांव फूल गए और मैं घबराने लगी। मेरी गान्ड फट गई थी.. काटो तो खून नहीं मैं ‘फक्क’ आँखों से उसकी तरफ देखने लगी थी..
मेरे चेहरे का रंग बदलते हुए देख कर वो बोला- भाभी जी आप घबराइए नहीं.. मैं किसी से नहीं कहूँगा.. पर एक बार मैं भी आपको चोदना चाहता हूँ। आज रात मैं 11-12 बजे के आस-पास इसी होटल के गार्डन में आपका वेट करूँगा.. आप आ जाना.. नहीं तो..
वह बात अधूरी छोड़ कर आँख मार कर चला गया और मैं उसे देखती रही।

मैं पसीने से तरबतर हो गई थी कि अब मैं क्या करूँ? अभी मैं इसी उधेड़बुन में थी कि सामने से अरुण जी आते दिखाई दिए।
मैं नार्मल होने की कोशिश कर रही थी.. पर अरुण जी पास आकर बोले- आप इधर क्या कर रही हैं और आप कुछ परेशान सी दिख रही हैं? क्या बात है?
मैं बोली- व..वो.. मैं आप ही को खोज रही थी.. कहाँ थे आप?
कुछ नॉर्मल सा होते हुए मैं बोली।
‘मैं वो थोड़ा बाहर निकल गया था.. अभी आया तो पता चला आपके हसबेंड तो मेरे साले के साथ मार्केट गए हैं.. तो मैं भी आपको ही खोजते हुए इधर ही आ रहा था.. तो आप मिल गईं। चलो चल के एन्जॉय करते हैं। तुम सबकी निगाह बचा कर मेरे कमरे में आओ.. मैं सबसे बहाना करके कि मैं बाहर जा रहा हूँ.. कमरे में ही रहूँगा। आप वहीं आओ..’
यह कहकर अरुण जी चले गए।
मैं मन ही मन बुदबुदाई- क्या निगाह बचाऊँ.. जो होना था.. वो तो हो ही चुका है.. मेरी चुदाई का लाईव शो कोई देख चुका है.. और मुझे चोदने का निमन्त्रण दे कर चला गया है।
मैं सीधे वहाँ से चल कर अपने कमरे में पहुँच कर मुँह धोकर थोड़ा रिलेक्स हुई और कमरा खोल कर गलियारे में दोनों तरफ देख कर सीधे अरुण जी के कमरे में घुस गई, अन्दर जाते ही सबसे पहले कमरे लॉक किया और ‘की-होल’ को बन्द किया।
अरुण जी कमरे में नहीं थे, शायद बाथरूम में थे। मैं अपने सारे कपड़े निकाल कर सिर्फ ब्रा-पैन्टी में ही बिस्तर पर लेट गई और अरुण जी का इन्तजार करने लगी।
कुछ ही पलों में मेरे मन में चुदाई के सीन चलने लगे, आज मैं फिर किसी अजनबी से चुदने जा रही थी, मेरी चूत की प्यास एक बार फिर इसी बिस्तर पर अरुण जी के मोटे लण्ड से बुझेगी और आज रात उस अजनबी ने भी तो बुलाया है.. चुदने को.. ये तो मेरी किस्मत है कि मेरी चूत आज दो लौड़ों से चुदेगी।
तभी पीछे से आकर अरुण जी ने मुझे बिस्तर पर दबोच लिया तो मैं ख्यालों से बाहर निकली।
अरुण जी बोले- क्या बात है.. पूरी तैयारी से हो.. तुम कुछ ज्यादा ही गरम दिख रही हो.. तुम और तुम्हारी चूत..
इतना कहते ही उन्होंने मेरी चूत को पैन्टी के ऊपर से मसल दिया।
मेरी ‘आह..’ निकल गई।

वे मुझसे बोले- रानी.. आज तुमको चोद के अपनी रखैल बनाऊँगा.. बोलो बनोगी ना.. मेरी रखैल?
मैं मादकता से बोली- मैं तो आपके बाबूराव की दासी हूँ.. मैं तो आपके इस मस्त बाबूराव से चुदने के लिए राण्ड भी बन जाऊँगी.. आपकी रखैल भी बनूँगी.. आज मुझे ऐसा चोदो.. कि मेरी जिस्म का पोर-पोर दु:खने लगे.. पर जल्दी चोदो.. कहीं ह्ज्बेंड या कोई और आ ना जाए।
इतना सुनते वो मुझे किस करते हुए मेरी चूचियां रगड़ते हुए मेरी चूत को मसलने लगे, मेरी चूत से गरम-गरम भाप निकलने लगी। मेरी चूत के होंठ चुदने के लिए खुलने और बंद होने लगे, मेरे शरीर में इतनी आग लगी हुई थी कि मैं बस खुल कर चुदना चाहती थी।
मुझे इस चुदासी हालत में देख कर अरुण जी समझ गए कि मैं पूरी तरह से गर्म हूँ और मुझे लण्ड चाहिए।
अरुण जी ने पैन्टी को उतार दिया, फिर मेरी चूत चाटने लगे।
मैं बोली- आह.. सीई.. उफ.. चाटो.. मेरी बुर.. मैं आपका बाबूराव चाटूंगी..
वो मेरी चूत को चाटते जा रहे थे.. कभी जीभ अन्दर.. कभी बाहर कर रहे थे.. मुझे लगा कि मेरी चूत में लाखों चीटियाँ रेंग रही हों। मेरी चूत रस से गीली हो चुकी थी और बुर में चुदाई की आग भी लग चुकी थी, मेरी चूत फुदकने लगी लण्ड खाने को।
मैं अपनी कमर उठा के चूत चटवा रही थी। मेरी चूत को जितना वो चाटते जा रहे थे.. मैं उतना ही वासना की आग में जलती जा रही थी।
अरुण बोले- भाभी आपकी फूली हुई चूत का रस पीने का मजा ही अलग है..
यह कहते हुए वे मेरी चूत को कस कर चूसने लगे।
मेरे मुँह से ‘आह.. उम्म्म… सीई.. आह आआ.. अहह.. आअहह.. उफ फफ्फ़..’ मादक सिसकारियाँ निकलने लगीं।
इसमें तो और भी ज्यादा मजा आने लगा।
अरुण जी बोले- भाभी आपकी चूत तो एकदम गीली हो चुकी है.. अब तो इसे तो लण्ड ही चाहिए।
‘हाँ मेरे राजा.. मुझे लण्ड ही चाहिए.. अब पेल दो मेरी चूत में.. अपना लण्ड..’
फिर उन्होंने मेरी टांगों को ऊपर उठा दिया और मेरे फूली हुई चूत के छेद पर अपना मोटा कड़क लण्ड रखा और ज़ोर से धक्का दे दिया।
लण्ड मेरी चूत के अन्दर एक ही बार में पूरा घुस गया।
मैं तड़पने लगी और चूत ने भलभला कर पानी छोड़ दिया पर वो बिना रुके चोदे जा रहे थे, मैं चुदती जा रही थी, वो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, मैं भी चाह रही थी कि वो इसी अंदाज में मुझे चोदते रहें..
एकाएक उन्होंने मेरी चूत से लण्ड निकाल कर मुझे मुँह में लेने को कहा।
मैंने मुँह खोल कर चूत के रस से भीगे हुए मस्त लण्ड को अपने मुँह में ले लिया और उसको चूसने लगी।
मैंने लण्ड की चमड़ी को अलग किया और लण्ड के सुपाड़े को चूसने लगी।
अरुण सिसकारियाँ भरने लगे, कुछ पलों के बाद मेरे मुँह से लण्ड निकाल कर दोबारा मेरी चुदाई करने लगे।
अब हम दोनों भी चुदाई में लय से लय मिला कर सुर-ताल में एक-दूसरे का साथ देकर चुदाई करने लगे, उनके धक्के तेज होने लगे थे, पूरे कमरे में बस ‘सी.. सी.. आह.. आह..’ की आवाजें सुनाई दे रही थीं।
अब उन्होंने मुझको अपने ऊपर लिया और चूत में अपने लण्ड को डाल दिया। अब मैं उनके लण्ड को अपनी चूत में लिए हुए चोद रही थी। वो भी मेरे चूतड़ों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर नीचे से धक्के लगा रहे थे।
काफ़ी लम्बी चुदाई के बाद मेरा शरीर अकड़ने लगा, मुझे पता चल गया कि अब मैं झड़ने वाली हूँ।
उन्होंने झटके से मुझे नीचे किया और खुद मेरे ऊपर आ गए.. और ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाने लगे, उन्होंने मेरे सारे बदन को जकड़ लिया और ज़ोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए।
अब मैं भी झड़ने के करीब आ गई थी, उन्होंने मेरे दोनों चुचों को ज़ोर से पकड़ लिया और धक्के पर धक्के लगाते जा रहे थे। मैं चूत उठाए सिसकारियाँ लेते हुए भलभला कर झड़ने लगी।
मुझे झड़ते हुए देख कर अरुण जी ने धक्कों की रफ़्तार और तेज करते हुए मेरी चूत में अपने अंतिम झटके मारे और वीर्य से मेरी चूत को भर दिया। इसी के साथ उन्होंने मुझे कस कर पकड़ लिया और पूरा लण्ड चूत की जड़ तक डाल कर पड़े रहे।
दस मिनट के आराम के बाद मैं बाथरूम में फ्रेश होकर जाने के लिए तैयार हो गई। अरुण अभी भी बिस्तर पर वैसे ही मेरी बुर चोदी लण्ड लिए लेटे थे। मैं पास गई और उनके होंठों पर अपने होंठ रख कर किस कर लिया और उनके कमरे से बाहर निकल कर अपने कमरे में घुस गई।
अभी मेरे ह्ज्बेंड नहीं आए थे, मैं थोड़ी रिलेक्स होने के लिए सोने लगी।
शाम के करीब मेरी नींद ह्ज्बेंड के जगाने से खुली। मेरे अस्त-व्यस्त कपड़ों को देखकर बोले- दरवाजा खुला छोड़ कर बेखबर सो रही हो.. कोई आकर चोद देता तो.. तुम्हारे कपड़े भी उठे हुए हैं और चूत भी खुली दिख रही है। मालूम भी है कि फूली हुई बिन बालों की चिकनी चूत को देख बड़े-बड़ों का ईमान डोल जाता है.. मेरी जान..
मैं कंटीली अदा से बोली- कौन आएगा आपके सिवा.. मैं थक गई थी और आपका इन्तजार करते हुए नींद आ गई।
तभी ह्ज्बेंड ने मेरी फूली हुई चूत पर हाथ रख जोर से भींच लिया, मेरे मुँह से दर्द भरी चीख निकल गई।
मेरी गीली चूत में एक उंगली डाल कर बोले- तुम्हारी चूत बहुत गीली है.. मुझे चोदने का मन कर रहा है.. जल्दी से एक राउन्ड हो जाए।
पर मेरा मन तो था नहीं.. फिर भी ना चाहते हुए उन्हें रोक नहीं पाई।
तभी ह्ज्बेंड का मुँह मेरी चूत पर आ गया और मेरी चूत की फांकों को फैला कर मेरी चूत चाटने लगे।
बोले- डार्लिंग चूत से तो वीर्य की महक आ रही है.. किसने तुम्हारे छेद में अपना वीर्य डाल दिया है?

मेरा इतना सुनते काटो तो खून नहीं.. मैं सोचने लगी कि मैंने तो चूत को अच्छी तरह से साफ किया था.. पर कुछ घन्टों पहले ही तो अरुण जी ने चोदा था.. शायद वीर्य का कुछ अंश अन्दर रह गया हो।
मैं बात बना कर बोली- कौन चोदेगा मेरी जान.. तुम्हारे सिवा कोई चोदता तो क्या मैं बताती नहीं..
यह बोलते हुए मैं कामुक अंदाज में सिसिया दी- चाटो ना मेरी चूत..
उनके सर पर हाथ रख कर ह्ज्बेंड का मुँह चूत पर दबा दिया।
वे मेरी चूत कुत्ते की तरह चाटने लगे और मैं गर्म होने लगी, मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं- आहह… आहईसी.. सीईईईई.. आह और चाटो जानू..
ह्ज्बेंड का एक हाथ मेरी चूचियों पर आ गया था, उन्होंने हल्के हाथ से सहलाते हुए चूत चाटने में मजा दुगना हो गया..
‘उफ्फ्फ..’ मेरे मुँह से ‘सी..ई..ई.. ई.ई…’ की आवाज तेज होती जा रही थी।
तभी ह्ज्बेंड ने कहा- एक बात पूछूँ जानू?
मैं बोली- इजाजत की क्या बात है.. पूछो न..
बोले- जानू.. ना तो तुम्हारी चूत पर पैन्टी थी.. और ना ही तुम्हारी चूचियों पर ब्रा.. क्या बात है मेरी जान?
मैं बहाना कर बोली- पहनी ही नहीं थी जानू.. क्या तुम कुछ शक कर रहे हो?
ह्ज्बेंड बोले- नहीं यार.. ऐसे ही मजाक कर रहा था।
इतना कहते हुए उन्होंने मेरी चूत को जीभ से चाटना शुरू कर दिया और फिर चूमते हुए ऊपर नाभि से होते हुए मेरे दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसते हुए मेरे स्तनों को इस तरह मसलना और चूसना शुरू किया कि मैं चुदने के लिए मचल उठी, मैं एक हाथ बढ़ा कर उनका लण्ड पकड़ कर आगे-पीछे करने लगी।
तभी ह्ज्बेंड ने चूत के दाने को उंगली से दबाया- ओह्ह्ह्ह.. माँ.. सि..सि..सि.. हूऊ..
मेरे मुँह से यही आवाज़ निकल रही थी.. मेरी चूत से पानी निकल कर रिसने लगा.. मेरी कमर ऊपर-नीचे होने लगी, मेरी चूत के दाने को ह्ज्बेंड हल्के से रगड़ने लगे और मैं बेक़रार होने लगी..
फिर ह्ज्बेंड ने मेरी चूचियों को छोड़ कर मेरे पैरों को फैलाकर अपने लंड का सुपारा चूत के ऊपर रखा और मेरी चूत पर रगड़ने लगे..
मैं कमर उठाने लगी..- अब.. मत तड़पाओ.. मैं जल रही हूँ.. आह्ह्ह्ह..
मैं कमर ऊपर करने लगी.. चूत के छेद को लंड से लगाने लगी।
ह्ज्बेंड देव ने मेरी पनियाई हुई चूत के पानी से भीगा सुपारा और लंड को मेरी गुलाबी चूत पर लगाया और एक धक्का मार दिया।
‘आह्ह..’
और पूरा लंड एक ही धक्के में चूत में समा गया। मैं सिसियाते हुए बोली- आह.. सी.. चोदो मेरे राजा मेरे प्राणनाथ.. मजा आ गया अई.. माँ ओह..सीसीईई.. आहह..
मेरी मुँह से ऐसे शब्द सुन कर ह्ज्बेंड ने जोरदार तरीके से चुदाई शुरू कर दी।
मेरी चूत से ‘फच.. फच… फच..’ की आवाज़ आने लगी।
ह्ज्बेंड अपना पूरा लंड बाहर खींचते और एक जोरदार धक्का देकर अन्दर पेल देते। आज वे बहुत ही जबरदस्त तरीके से चोद रहे थे.. मुझे भी मज़ा आ रहा था.. इतनी जबरदस्त चुदाई हो रही थी.. जैसे ह्ज्बेंड बहुत प्यासे हों।
वैसे भी रोज चूत मारने वाला आदमी आज चार दिनों बाद बुर पेल रहा था। ह्ज्बेंड की चुदाई का मुझे भी मज़ा आ रहा था.. इतने में ह्ज्बेंड ने मुझे कसके पकड़ा और कहा- डॉली.. मैं झड़ने वाला हूँ..
इतना कहते हुए उन्होंने दस-पंद्रह धक्के तेज-तेज लगा कर मेरी चूत में वीर्य की एक तेज धार छोड़ दी। झड़ने के साथ ही मेरे चुचों पर अपना सर रख कर हाँफने लगे। मैंने भी ह्ज्बेंड के बाबूराव के गरम-गरम वीर्य को अपनी चूत में महसूस किया और मैं भी ह्ज्बेंड साथ एक बार और झड़ गई।
आज दिन में मेरी तीन बार चुदाई हुई। अभी एक बार रात में फिर एक अंजान और गैर मर्द की बाँहों में जाना बाकी था।
अभी तक ह्ज्बेंड का लंड मेरी चूत में ही पड़ा था और ह्ज्बेंड मेरे ऊपर ही पड़े थे। ह्ज्बेंड का लण्ड धीमे-धीमे छोटा होता जा रहा था।
मैं बोली- मेरी चूत की तो माँ चोद चुके हो.. क्या अब मेरी जान ही लोगे?
ह्ज्बेंड बोले- क्यूँ जानू?
मैं बोली- अब आप मेरे ऊपर हो.. मेरी जान निकल रही है..
तब ह्ज्बेंड- तुमने तो मुझे पूरा निचोड़ लिया है.. मैं जरा थक गया यार.. सच में तुम्हारी चूत चोदना कोई खेल नहीं है..
यह कहते हुए ह्ज्बेंड बाथरूम में चले गए, मैं बिस्तर पर पड़ी लेटी रही।
ह्ज्बेंड बाथरूम से बाहर आकर बोले- चलो जल्दी तैयार हो जाओ.. नीचे सभी लोग वेट कर रहे होगें.. शादी का फंक्शन शुरू हो गया है।
मैं भी फ्रेश होने बाथरूम गई और फिर एक बैगनी कलर का लहँगा.. जो शादी के लिए लाई थी.. पहन कर तैयार हो गई।
ह्ज्बेंड भी ब्लेजर जीन्स पहन कर तैयार हो गए थे।
फिर हम दोनों एक साथ बाहर आए.. बाहर शादी की सारी तैयारियाँ हो गई थीं। सभी लड़के और लड़कियाँ डान्स कर रहे थे और वह लड़का भी दिखा.. जो आज रात मेरी चूत चोदने वाला थाम वो खूब डान्स कर रहा था।
शादी का इंतजाम भी उसी होटल में था, बारात होटल के बाहर रोड से होते हुए पुन: होटल के लिए आ रही थी।
तभी उस लड़के की निगाह मेरे ऊपर पड़ी।
वह मेरी तरफ बढ़ा और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रिक्वेस्ट करते हुए डान्स के लिए खींचते हुए लेकर डान्स करने लगा। मैं भी उसके साथ थोड़ा डांस करने लगी। इसी दौरान उसने मेरे दूध दबाते हुए कहा- मेरी जान आज रात मेरे बाबूराव से चुदने आ रही हो ना..
मैंने बस मुस्कुराकर उससे चुदने की मौन स्वीकृति दे दी।
उस लड़के को जब भी मौका मिलता.. भरी महफिल में कभी मेरे चूतड़ों पर कभी चुचों को दबाकर चला जाता। उसकी उस हरकतों से मैं गर्म होने लगी थी और मेरी चूत पानी छोड़ कर और मेरे चूतड़ चुदने के लिए दोनों ही मचल रहे थे।
धीमे-धीमे रात गहरी हो रही थी.. अब 11:15 का समय हो रहा थाम लोग खाने पीने में मस्त थे, मेरे ह्ज्बेंड भी अपने दोस्तों में मस्त थे। मैं दुल्हन और ह्ज्बेंड के दोस्त के घर की सभी औरतों के साथ थी..
तभी वही लड़का आया, वो मुझसे बोला- भाभी.. भैया जी आपको बुला रहे हैं।
यहाँ आप सभी को बताना जरूरी है कि होटल एक रिसार्ट किस्म का था.. वाटर पार्क.. झाड़ियाँ और बच्चों के लिए छोटा सा चिड़ियाघर भी था। काफी बड़े एरिया में था।
मैं बोली- कहाँ हैं?
तो वह बोला- उधर हैं..
एक झाड़ी की तरफ उसने इशारा किया।
मैं उसके साथ चल दी.. जिधर वह ले गया, उधर कोई नहीं था.. मैं डर गई कि कहीं साला अभी तो चोदना शुरू नहीं कर देगा..
मैं बोली- इधर कहाँ हैं?
बोला- शायद कमरे की तरफ चले गए हों.. उन्हें आपसे बहुत जरूरी काम था।
मैं और आगे बढ़ती गई। शादी की तैयारी कमरे के पीछे की तरफ था। इतने में वह रूका और मुझ पर झपट पड़ा और मुझे पकड़ कर बागान की तरफ घसीटते हुए ले जाकर बोला- जान… रहा नहीं जा रहा था.. एक बार मेरा माल निकाल दो.. फिर बाद में तेरी चूत चोदूँगा.।
मैं बोली- यह क्या किया? किसी की निगाह पड़ गई होगी तो? मैंने कहा था न.. रात को तो मैं आने वाली थी न.. फिर इतनी जल्दी क्या थी?
वह बोला- मेरी जान.. जितनी जल्दी मेरे लण्ड का माल बाहर करोगी.. उतनी ही जल्दी चली जाओगी.. बात मत करो शुरू करो..
वो अपने पैंट की जिप खोल कर लण्ड निकाल कर हिला रहा था। मैं उसका लण्ड देख कर मचल उठी और सीधे नीचे बैठ कर मुँह में लेकर चूसने लगी। बहुत ही मस्त लण्ड था.. मजा आ गया। मैं सब कुछ भूल कर लॉलीपॉप की तरह लण्ड चूसने लगी।

वह मस्त होकर बोला- आह्ह.. साली आज रात तेरी चूत फाड़ ही दूँगा.. चूस मेरे लण्ड को.. आह्ह.. चूस मेरे लंड के सुपारे को.. साली.. आज की रात को अपनी चूत की खैर मना.. आज तेरी वो चुदाई करूँगा कि तू याद रखेगी कि किस लण्ड से पाला पड़ा है.. मेरे बाबूराव में वो ताकत है कि तू अरुण के बाबूराव या ह्ज्बेंड के बाबूराव को भूल जाएगी।
मैं बोली- हाँ.. उन सबसे तेरा लण्ड मस्त मोटा है रे..

इधर मेरी चूत रानी पानी छोड़ रही थी, मेरी पैन्टी गीली हो रही थी, मैं मदहोश हो रही थी, मुझे लग रहा था कि चाहे जो हो जाए मैं चुद कर ही जाऊँगी यहाँ से।
अब मेरी चूत पानी छोड़ चुकी थी और मेरा चूत रस बह रहा था। लण्ड चूसते हुए मैं एक हाथ से उसके अंडकोषों को सहलाने के साथ रह-रह कर उनको दबा भी देती थी..। मैं पूरा लण्ड से मुँह से निकाल कर बोली- मेरी चूत के मालिक, रात को तो चोदना ही.. पर उससे पहले एक बार अपना लण्ड मेरी चूत में अभी ही डाल दो।
वह बोला- आह्ह.. साली.. चूस.. मुझे तेरे मुँह में ही झड़ना है.. ले जल्दी से.. नहीं तो अभी कोई आ जाएगा।
मैं बोली- आने दो.. मुझे डर नहीं.. जब तक तीन-चार धक्के मेरी चूत में तुम्हारे लण्ड से नहीं लगवा लूँगी.. मानूंगी नहीं..
वह बोला- साली तू औरत है.. या सेक्स की भूखी है?
मैं बोली- एक बार मेरी ले लो.. ताकि मुझे भी तसल्ली हो जाए.. और तेरे लण्ड का स्वाद भी मेरी चूत को मिल जाएगा। फिर चाहे तुम मेरे मुँह में ही झड़ जाना।
वह बोला- ठीक है.. खड़ी हो साली..
यह कह कर मुझे आगे की तरफ झुका कर मेरा लहँगा उठाकर मेरी पैन्टी को निकाल कर अपनी जेब में रख लिया।
बोला- जान यह अब मेरे पास रहेगी।
यह कहते हुए मेरी चूत पर लण्ड लगा कर एक ही बार में पूरी ताकत लगा कर मेरी पनियाई हुई चूत में अपना लण्ड पेल दिया।
मेरे मुँह से सिसकारियाँ छूटने लगीं- उफ़्फ़ फफ्फ़.. अहह सीयह..
‘आह्ह.. ले साली.. मेरा पूरा लंड खा गई है.. तेरी फूली चूत.. मेरी रानी..’
मैं तेज़ी से चूतड़ आगे-पीछे करने लगी- चोद मुझको.. मेरी चूत का बाजा बजा दे.. आह्ह..
इतना सुनते ही उसने धक्के तेज़ कर दिए और मुझे चोदने लगा।
‘उहह.. अहह.. साले.. तेरा लंड मेरी बच्चेदानी से टकरा रहा है.. उफफ फफ्फ़.. अहह..।’
मैं सीत्कार करती रही और 20-25 धक्कों के बाद मेरी चूत से लण्ड निकाल कर मेरी मुँह में दे दिया।
मैं तड़फ कर रह गई.. चूत के पानी से भीगा रस मुँह से चाटने लगी।
तभी उसके लण्ड ने पिचकारी निकाली.. जो सीधे मेरे मुँह के अन्दर चली गई। वो अपना वीर्य छोड़ने लगा.. उसका लण्ड वीर्य का मोटा फव्वारा छोड़ रहा था। मैंने उसके सारे रस को निगल कर.. लण्ड को चाट कर साफ कर दिया।
वह लण्ड को सीधे अपनी पैन्ट में डाल कर बोला- अपना नम्बर दे.. मैं कॉल करूँगा कि तुमको कहाँ आना है।
मेरा नम्बर लेकर बोला- मजा आया?
मैं बोली- बहुत पर प्यासी हूँ.. और चोद जाओ ना..
पर वह मेरी बात को अनसुना करके चला गया.. मैं प्यासी ही रह गई..
अपनी प्यासी चूत पर हाथ फेर कर मन मार कर कपड़े ठीक करके चल दी।
मेरी चूत में आग लगी थी मुझसे चला नहीं जा रहा था, मेरा एक-एक पग रखना मुश्किल हो रहा था, बस मेरे मन में यह लग रहा था कि कोई यहीं मुझे दबोच ले.. और जी भर कर मुझे चोद दे।
मेरे अन्दर शर्म खत्म हो चुकी थी.. बस चूत की आग और एक मोटा लण्ड चाहिए है.. यही याद था।
तभी बगल से मुझे अरुण जी की आवाज सुनाई दी- इधर कहाँ से आ रही हो?
मैं सकपका गई.. मेरे चेहरे का रंग उड़ने लगा।
जल्दबाजी में मैं बोली- बस ऐसे ही थोड़ा मन घबरा रहा था.. तो इधर टहलने चली आई.. आप?
‘मैं कमरे से आ रहा हूँ..’ अरुण जी बोले।
वे इतना कहते हुए मेरे पास आ गए और बोले- जान बल खा रही हो.. और तुम्हारे बदन से सेक्स की महक आ रही है.. क्या इरादा है?
मैं बोली- अगर मेरे इरादे में अपने इरादे का साथ दें.. तो मैं आप पर मर जाऊँ..
यह कह कर मैं अरुण जी से कस के लिपट गई और बोली- जान.. मेरा तो चुदने का इरादा है..
तभी अरुण जी ने मेरे लहंगे में हाथ डाल कर चूत को पकड़ा और आश्चर्य चकित होकर बोले- तुम बिन पैन्टी के.. और वो भी गीली चूत.. क्या बात है?
मैं बोली- बस इसे लण्ड चाहिए.. यही बात है.. ले चलो और मुझे चोदो.. चाहे कुछ भी हो.. पर मुझे चोद दीजिए।
अरुण जी बोले- अभी नहीं.. कोई आवश्यक काम है.. कल जरूर करूँगा।
यह कहते हुए उन्होंने मेरी चूत में दो उंगलियाँ पेल दीं और दोबारा आगे-पीछे करके बाहर कर लीं.. और बोले- चलो जयमाला का कार्यक्रम खत्म होने वाला है, 12:45 शादी का प्रोग्राम शुरू होगा।
यह कह कर अरुण जी चल दिए।
मैं भी पहुँची और थोड़ी रस्म अदाएगी करके मैं ह्ज्बेंड को खोजने लगी, ह्ज्बेंड मिल गए.. वे अपने दोस्तों के साथ थे..
मुझे देखते ही बोले- अरे डॉली.. क्या बात है?
मैं बोली- मेरे सर में दर्द है।
यह बहाना करके मैं कमरे में आराम करने के लिए जाने को बोली।
ह्ज्बेंड ने खाना पूछा.. मैंने ‘हाँ’ में सर हिलाया।
ह्ज्बेंड बोले- ठीक है जाओ आराम करो.. मैं तो नहीं आ पाऊँगा.. मुझे तो शादी के मण्डप में बैठना है.. लेकिन तुम भी कुछ समय के लिए शादी के मण्डप में आ जाना.. नहीं तो हो सकता है कि मेरे दोस्त के घर वालों को बुरा लगे।
मैं ‘हाँ’ बोल कर सीधे कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट कर कुछ पल पहले जो वासना का खेल खेलकर आई थी.. उसे याद करने लगी।
क्या मजेदार लण्ड था.. क्या तगड़ा मर्द था.. पर साले ने मेरे तनबदन में आग लगा कर छोड़ दिया।
बेदर्दी साला.. हरामी.. मेरी चूत की आग मुझे जला रही है..
मेरे तन पर कपड़े भारी लग रहे थे, मैं सारे कपड़े निकाल कर एक लाल रंग का नाईट ड्रेस पहन कर चूत और चूचों को मसलने लगी। तभी दरवाजे पर खटखट की आवाज हुई।
कौन होगा इस वक्त? यही सोचते हुए मैंने थोड़ा दरवाजा खोलकर देखा..
‘अरुण जी, अरे आप इस टाईम?’
वो बोले- तुम्हारी चूत की आग बुझाने चला आया। मुझसे तुम्हारी हालत देखी नहीं गई।
मैं इतना सुनते ही वहीं उनसे लिपट कर बोली- हाँ जान.. मेरी चूत को चुदाई चाहिए.. चोद दो साली को.. अपने लण्ड से.. मेरी जान.. तृप्त कर दो मुझे..
अरुण जी मुझे गोद में उठाकर बेड पर ले जाकर पटक कर मेरे ऊपर छा गए। अब मुझे उस पल का इन्तजार था.. जब उनका लण्ड मेरी चूत में घुस जाए.. क्यूँ कि मुझे फोरप्ले नहीं चाहिए था.. सीधे चुदाई ही चाहिए थी।
शायद अरुण जी को भी जल्दी थी, अरुण ने एक हाथ से मेरे चूचों को भींचा और एक हाथ से मेरी बुर पकड़ कर मसकते हुए बोले- मेरी जान.. आज एक जल्दी वाला राऊंड हो जाए.. क्यूँकि नीचे भी बहुत काम है।
मैं बोली- हाँ.. मुझे भी जल्दी वाला ही चाहिए।

मेरी नाईटी को ऊपर चढ़ाकर अरुण ने लण्ड मेरी चूत के मुँह पर रख कर दो बार ऊपर से ही रगड़ कर एक ही झटके से लण्ड को मेरी चूत में पेल दिया और मेरी सिसकारियाँ निकलने लगीं, मैं ‘आहह.. उह्ह.. आहह..’ कर रही थी।
मेरी सिसकियों के साथ अरुण का हाथ मेरे चूचियों को जोर से दबाने लगा, मैं भी अरुण के लण्ड पर चूत उछाल कर चुदने लगी।
धीरे-धीरे अरुण मेरी चूचियाँ मसकते हुए ‘गचा-गच..’ लण्ड मेरी चूत में पेलते जा रहे थे, मेरी चूत से ‘फच-फच’ की आवाजें आती रहीं।
मेरी चूत लण्ड खाती जा रही थी।
‘ऊऊहह.. उईई.. ओम्मम्मम्मा.. आआहह.. और पेलो.. चोदो मुझे.. मारो मेरी चूत.. आह.. सीउई.. मैं गईई..’

मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया, मैं कस कर लिपट गई और मेरे बदन और चूत की गरमी पाकर अरुण भी मेरी चूत में अपना पानी डाल कर शान्त हो गए।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और हम दोनों नंगे ही उछल कर बिस्तर से नीचे आ गए।
पता नहीं कौन होगा?
एक अंजान से भय से एक-दूसरे का मुँह देखते हुए बोले- अब क्या करें?
मैं नाईटसूट को नीचे करके अरुण जी को विन्डो पर लगे परदे के पीछे छिपने को बोल कर दरवाजा खोलने चली गई। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला.. सामने वही लड़का था। मेरे तो होश ही उड़ गए.. अब क्या करूँ?
अन्दर अरुण.. सामने यह खड़ा है..
मेरे मुँह से बोल ही नहीं फूट रहा था। एक तो मेरी चूत से अरुण का वीर्य बहकर मेरी जाँघों तक आ गया था और वीर्य की एक भीनी सी महक आ रही थी।
मैं डर गई.. कहीं इसे भी यह महक ना मालूम चले.. नहीं तो क्या कहूँगी.. कि कौन चोद रहा था।
एक और डर लग रहा था.. कि कहीं ये अरुण के सामने ही मेरे साथ कुछ करने ना लगे।
वह आगे बढ़ा.. तभी मुझे ख्याल आया कि यह तो मेरे और अरुण के सम्बन्ध को जानता है कि अरुण मुझे चोदते हैं। पर अरुण जी नहीं जानते हैं कि इससे भी मेरा कोई सम्बन्ध है। किसी तरह मैं इसे बता दूँ कि अरुण कमरे में ही हैं.. नहीं तो मैं अरुण की निगाहों में गिर जाऊँगी।
मैं तुरन्त बोली- आप कौन..? क्या काम है?
यह कहते हुए उस लड़के से सट कर एक ही सांस में बोल गई कि अन्दर अरुण जी हैं.. कोई हरकत मत करना.. वो अभी-अभी मुझे चोद चुके हैं।
इतना सुनते वह एक कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोला- पूजा दी ने आपको बुलाने भेजा था..
दोस्तो.. आप सोच रहे होंगे कि अब यह कौन है.. पूजा दुल्हन की सहेली थी जो मुझसे भी घुल-मिल गई थी।
उसने बात पलटी कर जानबूझ कर पूजा का नाम लिया था।
मैं बोली- चलो.. मैं अभी आती हूँ।
पर वह जानबूझ कर भी मुझे परेशान करने के मकसद से बोला- भाभी जी कुछ स्मेल सी आ रही है.. अजीब सी?
यह कहते हुए वो कमरे में सूंघने की सी हरकत करते हुए इधर-उधर देखते हुए परदे की तरफ आगे बढ़ गया।
वो बोला- भाभी.. क्या आपको नहीं आ रही है?
मैं बोली- कैसी महक? मुझे तो नहीं आ रही..
मैं उसके करीब को गई.. कहीं वह सचमुच में वो परदा न हटा दे जिसके पीछे अरुण खड़े थे।
शायद उसका मक्सद अरुण को डराना ही था.. वो परदे के पास जाकर पलटा और मेरे करीब आकर बड़ी धीमी आवाज में बोला- बड़ी भारी चुदक्कड़ हो.. साली थोड़ा मेरे साथ बाहर तक आ..
मैं उसके साथ तक दरवाजे के पास गई.. पर वह बाहर निकल कर मुझे इशारे से गलियारे में बुलाने लगा।
मैं एक बार कमरे में देख कर बाहर निकली.. तभी उस लड़के ने मुझे पकड़ कर अपनी बाँहों में भर कर.. एक हाथ को मेरी चूत पर रख कर.. एक उंगली मेरी चूत में पेल कर बाहर निकाला और अरुण के वीर्य और मेरे रज से सने हाथ को सूँघते हुए बोला- इस महक ने मुझे पागल कर दिया है.. मन हो रहा है कि अभी गिरा को तेरे को चोद दूँ।
मैं बोली- अभी जा.. बाद में आना.. नहीं तो अरुण जी क्या सोचेगें।
वह मुझे अपनी बाँहों में कसते हुए बोला- तुझे क्या सोचने की पड़ी है! अरुण भी तुझे चोदकर जान गए होंगे कि बहुत बड़ी छिनाल है।
यह कहते हुए उसने कस कर मेरी चूचियों और चूत को दबा कर कहा- तू यहीं झुक जा.. मैं एक बार लण्ड तेरी चूत में पेल कर ही जाऊँगा.. नहीं तो मैं नहीं जाऊँगा।
मैं बोली- प्लीज कोई देख सकता है.. और अन्दर अरुण जी हैं.. वे क्या सोचेगें कि तुम्हारे साथ नाइट ड्रेस में कहाँ चली गई.. कहीं वे बाहर झांकने न आ जाएँ। यदि उन्होंने देख लिया तो?
वह बोला- चाहे जो हो जाए.. मैं बिना तेरी चूत में लण्ड डाले नहीं जाऊँगा..
यह कहते हुए वो मुझे झुकाकर जबरिया मेरी प्यारी चूत में लण्ड पेलने लगा।
अरुण के पानी से भीगी चूत में अपना लण्ड लगा कर एक ही झटके से लण्ड मेरी चूत में पेल दिया, मैं सिसिया कर रह गई ‘आहआह..हसीसी..’
वह मेरी चूत का बाजा बजाते हुए लण्ड चूत में पेलता जा रहा था। फिर वो लण्ड को पूरा बाहर खींच कर मेरी चूत पर रगड़ने लगा.. तभी एकाएक अपने लंड को चूत पर रख एक झटके में अन्दर घुसेड़ दिया।
‘उई माँ..’ मैं चीख पड़ी, ‘उईइ माँ.. मर गई रे.. उई उई उईईई.. कितना मस्त लौड़ा है तेरा.. मेरी जान..’
वो एक हाथ से मेरी चूचियों को दबाए जा रहा था और एक हाथ से मेरी कमर पकड़ कर शॉट लगा रहा था। मेरी चूत पर उसने 7-8 शॉट मार कर लण्ड चूत से खींच कर पैंट में अन्दर करके चल दिया।
वो जाते-जाते बोला- तैयार हो जा मुझसे चुदने के लिए..
मैं मन ही मन साले को गाली दे रही थी- हरामी को तड़पाने में जाने क्या मिलता है? फिर एक बार तड़पा कर चल दिया।
तभी मुझे अरुण का ध्यान आया और मैं जल्दी से अन्दर आकर दरवाजा बन्द करके पलटी, तभी अरुण जी परदे से बाहर निकल कर बोले- यार मुझे लगा कि हम पकड़े गए.. पर बच गए.. नहीं तो आज मेरी वजह से तुम्हारी इज्जत चली जाती।
मैं बोली- तो अब तो जल्दी करो.. कोई और आ जाए.. आप फ्रेश होकर यहाँ से निकलो।
अरुण सीधे बाथरूम में जाकर बाहर फ्रेश होकर निकल गए। अरुण के जाने के बाद मैं दरवाजा बंद करके बाथरूम में गई और अपनी मुनिया को रगड़ कर साफ करके और जांघ को साफ किया।
चूत साफ करते मुझे करन्ट सा लगा.. साली फिर गरम हो गई थी।
अपने हाथ से चूत के लहसुन को रगड़कर मन मार कर बाहर चली आई इस आस में.. कि अभी फिर चुदेगी.. चुदाई से चूत फूल चुकी थी।
आज सुबह से मेरे साथ क्या हो रहा था.. न चाहते मेरी चूत चुदना चाहती थी और मुझे कोई ना कोई चोद ही रहा था।
मैं बहुत थक चुकी थी.. मुझे आराम की सख्त जरूरत थी.. इसलिए मैं सीधे बिस्तर पर जा कर सो गई और अपनी चुदाई को याद करते हुए मुझे नींद आ गई।
ना जाने मैं कब तक सोती रही। मेरी नींद तब खुली.. जब ह्ज्बेंड ने मुझे कॉल करके नीचे शादी में आने को बोला।
मेरा मन नहीं हो रहा था.. फिर भी मुझे जाना तो था ही.. तो मैं मन मार कर उठकर तैयार होने बाथरूम चली गई।
मुझे बहुत तेज शूशू आई थी.. मैं नाईटी उठाकर चूतड़ और चूत खोल कर वहीं जमीन पर बैठ कर तेज धार के साथ शूशू करने लगी।
शूशू करते हुए मैंने अपनी चूत पर हाथ रखा तो मुझे उस लड़के के लण्ड से चूत लड़ाने की बात सोच कर मेरी चूत खुलने और बंद होने लगी।
मैं पूरे हाथ की गदोरी में चूत भरकर मसकते हुए खुद से बोली- मेरी रानी.. अभी तुम्हारी गरमी निकल जाएगी.. मत घबराओ.. अभी तुझे वो जवान मर्द चोदकर शान्त कर देगा।
फिर मैं मुँह-हाथ धोकर बाहर आकर तैयार हो कर शादी के मंडप में बैठने चल दी, वहाँ जाकर औरतों की तरफ बैठ गई।
दूसरी तरफ लड़के और लड़की पक्ष के लोग बैठे थे.. जिसमें मेरे ह्ज्बेंड और अरुण जी एक साथ बैठे थे और वह लड़का तो मेरे सामने ही बैठा था। मुझे शादी में बैठे अभी 30 मिनट ही हुए थे और रात के 2:30 हो चले थे।
तभी मेरे मोबाईल पर काल आई नम्बर अनजाना था.. मैं फोन उठाया.. तो उधर से सिर्फ इतनी सी आवाज आई ‘चल आ जा.. तेरी बुर चोद दूँ..’ इतना कह कर कॉल कट गई।
यह कौन था.. मैं सोचते हुए सामने देखने लगी.. तो वह लड़का कहीं नहीं दिखा। मैं समझ गई कि ये वही है।
फिर मैं.. पूजा जो मेरे पास बैठी थी.. से बोली- पूजा यार मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है.. मैं आराम करने जा रही हूँ।
ह्ज्बेंड को भी मैंने इशारे से बोल दिया और चल दी।
मैं जैसे ही ग्राउंड से होते हुए फस्ट फ्लोर पर पहुँची कि मेरे साइड का दरवाजा खुला और किसी ने मुझे अन्दर खींच लिया।
कमरे में घुप्प अंधेरा था।
यह शख्स कौन है.. किसने मुझे खींचा.. अंधेरे में कुछ नहीं दिख रहा था और ना ही मैं कुछ समझ ही पा रही थी कि कौन हो सकता था।
मैं सोचने लगी कि चली कहाँ थी.. और अटक कहाँ गई, चुदने किससे जा रही थी पहुँच कहीं और गई।
मैं डरते हुए और कांपती आवाज से बोली- कक्ककौन.. हहहै.. छोछोछोचचड़ो.. येएएए.. क्या..कककर.. रहे हो..!
मैं हाथ-पाँव चलाने लगी.. पर उस व्यक्ति की मजबूत पकड़ और उसकी बाँहों में बस छटपटा कर रह गई।
मैं अंधेरे में उस आदमी के सीने पर हाथ मारती जा रही थी.. पर उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था तो मैं कोशिश करना छोड़ कर में शान्त हो गई।
उसी वक्त वो आदमी मेरे होंठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगा.. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ.. पर उसकी बाँहों की गरमी और उसका फौलादी बदन सीने के बालों को छूने से मुझे चुदास चढ़ने लगी।
पर यह है कौन.. अगर मैं इसके साथ बिना कुछ जाने करूँगी.. तो ठीक नहीं रहेगा।
मैं एक बार फिर हिम्मत करके पूछ बैठी- आआप ककौन हैं.. मुमुझे छोड़डड दो.. प्लीज.. मैं आपकी पैर पड़ती हूँ।

तभी उसने रौबीली और मर्दाना आवाज में बोला- साली.. मेरे पैर नहीं लण्ड पकड़ जिससे तुझे और मुझे सुकून मिलेगा।
यह कहते हुए वह मुझे उठाकर बिस्तर पर पटक कर मेरे ऊपर चढ़कर मुझे अपने गिरफ्त में लेते हुए बोला- थोड़ा सा मेरा साथ दो और मुझसे चुदाकर चली जा.. मुझको भी जल्दी है.. घिस नहीं जाएगी तेरी बुर.. मेरा लण्ड जाने से..
मैं बोली- मैं तो आपको जानती भी नहीं और मैं आपके साथ क्यूँ करूँ यह सब?
वो बोला- तो नहीं मैं करूँगा तुम्हारे साथ तेरी चुदाई..
वो कपड़ों के ऊपर से ही मेरी चूचियाँ दबा रहा था, मेरे होंठों को दाँतों से काट रहा था।
तभी मेरा हाथ उसकी कमर की तरफ गया, मैं चौंक उठी.. वो तो ऊपर से नीचे तक पूरा नंगा था।
मैं बोली- छी:.. तुम बहुत गंदे हो।
वह बोला- तुम तो अच्छी हो..
और वो मेरा हाथ पकड़ कर अपने बाबूराव पर ले गया और लण्ड मेरे हाथ में पकड़ा दिया। मैं फिर चौंक उठी.. यह तो बहुत बड़ा मोटा और हब्शी किस्म का बाबूराव था।
मेरा तो मन डोल गया.. मैंने उसे कस कर पकड़ लिया और शरीर को ढीला छोड़ कर चुदने के लिए समर्पित कर दिया।
वो मुझे चूमते हुए मेरा लहँगा ऊपर कर के चूत पर हाथ लगा कर बोला- आहा.. साली.. तू तो पहले से ही पैन्टी उतार कर तैयार है।
मैं बोली- मैंने तो यूं ही पैन्टी नहीं पहनी.. पर तुम तो पहले से बिना कपड़ों के तैयार बैठे हो।
बोला- तेरे से ज्यादा जल्दी मेरे को है.. प्यार-व्यार बाद में फिर कभी.. अभी डायरेक्ट चुदाई होगी।
यह कहते हुए उसने बाबूराव मेरी चूत पर लगाया।
तभी मैं बोली- एक बार अपना लण्ड तो चुसा दे.. फिर चोदना।

वह कुछ नहीं बोला, पता नहीं क्यूँ.. मैं सारी हदें पार करके एक अजनबी से चुदवाने के लिए तड़पने लगी, किसी गर्म और चुदासी कुतिया जैसी मेरी हालत हो रही थी।
तभी उसने मेरी चूत की फाँकें अलग कर दीं।
जैसे ही उसने अपने लण्ड का सुपाड़ा मेरी चूत पर लगाया.. तो मैंने कमर उठा कर सुपाड़ा अन्दर लेना चाहा। कमर उठने के साथ ही उसने एक झटके में ही तमाम लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया।
एक पल के लिए तो मुझे लगा कि दर्द के मारे मेरी जान ही निकल जाएगी। मैं चिल्लाने लगी, ‘ओहहहऽऽऽ हायऽऽऽ अहऽऽऽऽऽ मर गई.. मैं तो आज नहीं बचूँगी.. आज तो ये हरामी मुझे मार ही डालेगा.. हायऽऽऽ प्लीज़ ज़रा धीरे-धीरे तो डालना। साले यह तेरा लण्ड है कि गधे का.. हरामी…
मेरे मुँह से गाली निकलने लगीं।
मेरी गाली साथ ही वह एक झटके से लण्ड बाहर खींचता और वापस मेरी चूत में घुसा देता।
‘हायऽऽऽ प्लीज़ ज़रा धीरे-धीरे तो चोद ना।’
पर वह अपनी धुन में चुदाई करते जा रहा था.. जैसे उसे कुछ सुनाई ही ना दे रहा हो और मैं भी बस चुदना चाहती थी।
जल्दी से जल्दी मैं भी अपनी मंजिल पाना चाहती थी क्यूँकि उसकी चुदाई की जल्दबाजी देख कर लग रहा था जैसे वो कभी भी मेरी चूत को अपने पानी से भर सकता है।
तभी उसने मेरी चूचियों को हाथ में ले लिया और अब वो मेरे निप्पलों को मसलते और चूसते हुए ‘गचागच..’ लण्ड चूत में पेलता जा रहा था।
मैं उसकी चुदाई में इतनी मस्ती में हो गई कि खुद पर काबू नहीं रख सकी और अपने जिस्म की गर्मी निकालने के लिए कमर उठा-उठा कर चुदवाने लगी।
‘हाय आहहसीई.. आह.. गई.. मेरे राजा आआहह.. सीसीई.. आह.. अब मेरा निकलने वाला है.. आहहह.. आसीसीईईई.. आह.. मेरा तो पानी छूट गया.. ऊऊहहहऽऽऽ मेरे आआहह.. सीसीईईई.. ररसऱर..’
उसे एहसास हुआ कि मेरा माल खल्लास हो रहा है… मैं झड़ रही हूँ।
फिर क्या उसने भी चोदने की रफ्तार तेज़ कर दी और चिल्लाते हुए बोला- साली कुतिया.. ले.. अब तो तेरा दिल भर गया ना.. ले.. अब.. मैं भी अपना पानी छोड़ता हूँ आहाहा.. ओहहऽ सीसीई हायऽऽऽ मेरी रानी.. आहह सीय मज़ा आ गया।
फिर उसने मेरी चूत में अपना गाढ़ा माल छोड़ दिया।
उसने मेरी चूत को अपने गरम वीर्य से भर दिया और निढाल होकर मेरे बदन पर पसर गया।
करीब 5 मिनट तक वो सांड की तरह ऐसे ही मेरी चूत और बदन पर लदा रहा.. फिर उतर कर बोला- अब तुम जा सकती हो.. और चुदना हो तो रुक सकती हो.. क्यूँकि तुम्हारा बदन और चूत बहुत मस्त है.. एक बार में मन नहीं भरा मेरी चुदक्कड़ रानी..
मैं बोली- नहीं.. मैं नहीं रुक सकती.. क्यूँकि मेरे ह्ज्बेंड मुझे खोज रहे होंगे..
मैं बहाना करके अपना लहँगा सही करके वैसे ही चुदी हुई बुर लेकर जाने को हुई.. तो एक बार मैंने फिर उससे पूछा- क्या मैं जान सकती हूँ.. मेरी बुर चोदने वाला और इस दमदार लण्ड का मालिक कौन है?
वह बोला- मैं बुर पेलता हूँ और तुम्हारे जैसी औरतों को खुश करता हूँ.. मुझे देख कर और मेरा नाम जान कर क्या करोगी?
मैं बोली- अगर मेरा फिर तुमसे चुदने का मन हुआ तो मेरी इच्छा कैसे पूरी होगी?
वह बोला- जान तुम दिल से याद करना.. मैं तुम्हें चोद दूँगा.. जैसे मैंने कुछ देर पहले अभी चोदा है।
‘पर मैं तो तुमको दिल से चाहूँगी कैसे.. तुम्हें तो मैं जानती भी नहीं हूँ.. फिर तुम कैसे मेरी चूत से लण्ड लड़ाते हुए मेरी बुर का बाजा बजा डोगे?’
वह बोला- पर तुम चूत चुदाने ही जा रही थी न.. और चूत चुदाने के लिए उतावली थी.. इसलिए मैंने चोद दिया। और अब तुम निकल लो.. नहीं कोई भी मेरे रूम में आ सकता है।
उसने दरवाजा खोल कर बाहर देख कर मुझे रूम से निकाल कर रूम बंद कर लिया। पर मेरे लिए हजारों सवाल छोड़ गया.. यह कौन था और कैसे जान रहा था कि मैं चुदने जा रही थी।
यह मेरे साथ हो क्या रहा है.. ऐसे तो मैं बदनाम हो जाऊँगी.. कहीं वह लड़का और यह आदमी दोनों आपस में मिले तो नहीं हैं। मुझे पता लगाना है.. यही सोचते हुए मैंने अपने फोन पर आए हुए कॉल को रिडायल कर दिया.. यह देखने के लिए कॉल करने वाला था?
‘हैलो कौन..?’
उधर से गाली भरी आवाज सुनाई दी- साली छिनाल.. कहाँ चूत मरा रही थी। मैं कब से वेट कर रहा हूँ कुतिया.. जल्दी आ.. मैं फोर्थ फ्लोर पर हूँ।
‘अभी आई..’ कह कर मैं तुरन्त लिफ्ट की तरफ गई। शुक्र था लिफ्ट फस्ट फ्लोर पर ही थी। मैं सीधे फोर्थ फ्लोर पर पहुँची.. पर वहाँ वह दिखाई नहीं दिया।

मैं इधर-उधर देखते हुए फोन करने ही वाली थी कि मुझे उस लड़के की आवाज सुनाई दी- चल इधर आ जा।
मैंने देखा तो वो आवाज 403 नम्बर के कमरे से आई थी। मैं सीधे उसके कमरे में घुस गई। उसने रूम बंद करते हुए मुझे बाँहों में भरते हुए पूछा- अब तक कहाँ थी.. मैं कब से तेरी बुर चोदने का वेट कर रहा हूँ और कब से मेरा लण्ड तुम्हारे चूत तेरी चूत में जाने का इन्तजार कर रहा है..।
मैं उसी की बात सुन रही थी.. पर मैं यह अंदाज नहीं लगा सकी कि जिसने मुझे अभी-अभी अपने सांड जैसे लण्ड से चोदा है.. ये दोनों मिले हुए हैं क्या?
तभी उसने मेरा लहँगा पकड़ा और खोलने लगा।
मैं बोली- नीचे मैं बिल्कुल नंगी हूँ।
वो बोला- ठीक है पैन्टी निकालने का झंझट खत्म।
उसने मेरा लहँगा झट से खोल कर निकाल दिया.. मेरी चूत और जाँघ पर हाथ फिराने लगा। मेरे अन्दर एक अजीब सी बेचैनी समा गई.. क्यूँकि रज वीर्य से मेरी जाँघ भीगी हुई थी और वह सब उसके हाथ में लग गया। उसने हाथ को नाक तक ले जाकर सूँघ कर बोला- तू तो पक्की छिनाल निकली.. किससे चुद कर आ रही है?
‘मैं चुद कर नहीं आ रही.. कोई ने मुझे जबरिया उठाकर मेरी चूत में लण्ड पेल दिया.. इसी लिए आने में देरी हुई। कौन था.. मैं नहीं जानती और यही तो मैं भी जानना चाहती हूँ कि वो कौन था? कहीं तुमने ही तो उसको मुझे चोदने के लिए नहीं भेजा था?
वह बोला- नहीं यार.. मैं क्या जानूँ.. चुद कर तुम आ रही हो.. तुमसे कहाँ मिला वह?
मैं बोली- वह रूम नम्बर 107 में था। मैं तुम्हारे पास आ रही थी.. उसने मुझे कमरे में खींच कर मेरी बुर को पेल दिया। वह एकदम सांड जैसा था और लण्ड भी साले का एकदम गदहे जैसा था।
तभी वह बोला- उस कमरे में तो लड़के के चाचा रूके हैं। वो पहलवानी करते हैं कसरती बदन है उनका..
‘हाँ हाँ.. सही कहा तुमने.. बिल्कुल ऐसा ही आदमी था वह..’ मैं बोली।
फिर अनूप खुश होते हुए बोला- चलो अच्छा ही हुआ मुझे ताजी चुदी हुई बुर जिसमें वीर्य भरा हो.. जीभ से चाटकर साफ करने बड़ा मजा आता है।
अनूप इसी लड़के का नाम है..
यह कहते हुए वो मुझे घुमाकर मेरी चूतड़ सहलाने लगा। मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो वो बड़ी बेशर्मी से मेरे वीर्य लगे नंगे चूतड़ों को घूर रहा था और पहली बार.. कोई मेरी वीर्य से भीगी चूत और चूतड़ों को अपनी जीभ से चाटने जा रहा था।
उसने बोला- सच में बड़ी मस्त चूत और गाण्ड है तेरी..
और उसने जैसे ही मेरी चूतड़ों पर अपने होंठ लगाए.. मेरा जिस्म.. मेरा मन.. मेरी चूत.. सब झनझना उठे।
वह बेतहाशा यहाँ-वहाँ बिना रूके चूमता ही जा रहा था। उसने अपने दोनों हाथ मेरे नंगे चूतड़ों पर रख कर छितराते हुए मेरी गाण्ड और बुर के छेद और जाँघों पर लगे रज और वीर्य को चाटने लगा।
उसके इस तरह से चाटने से मेरी योनि से पानी रिस कर बह निकला, मैं एक बार फिर चुदने के लिए तड़फने लगी। उसके इस तरह चाटने से मेरा अब खड़ा होना मुश्किल हो गया।
मैं सिसियाते हुए बोली- आह..सी.. जान.. मुझे लिटाकर मेरी गाण्ड और मेरी चूत चाटो.. मुझसे अब खड़ा नहीं रहा जाता।
उसने तुरन्त मुझे बिस्तर पर पेट के बल लिटा कर मेरी चूतड़ों को ऊपर उठाते हुए.. अपनी जीभ मेरी बुर के ऊपर रख कर चाटने लगा। उसकी इस हरकत से मेरी चूत की बैचैनी बढ़ उठी। उसने मेरी योनि की पंखुड़ियों को अपने होंठों में दबा लिया और बड़ी बेदर्दी से चूसने लगा। मेरी चूत और गाण्ड की तड़प चुदाने के लिए तड़फने लगी। वो अपने दोनों हाथों से मेरी चूचियाँ मसकते हुए.. मेरी गाण्ड के छेद और कभी चूत को.. कुत्ते की तरह चाटता जा रहा था।
मेरे मुँह से ‘आआह.. आहआ… आहआह.. ईईसीआह.. की आवाजें निकलने लगीं।
मैं बोली- जान अब रहा नहीं जा रहा है। अब लण्ड पेल दो मेरी गाण्ड में..
इतना सुनना था कि वह मेरी गाण्ड मारने के लिए लण्ड पर थूक लगा कर मेरी गाण्ड के छेद पर सुपारा रगड़ने लगा। अब मुझसे बर्दास्त करना मुश्किल होने लगा और मैं सिसियाते हुए बोली- आहसी.. आहहह ऊऊऊआह.. डाल दो ना..
उसने लण्ड रगड़ते हुए पूछा- कहाँ?
मैं बोली- मेरी गाण्ड में डाल दो..
इतना सुनते ही उसने एक तेज शॉट मारा और अपना आधा बाबूराव अन्दर डाल दिया।
मैं मजे ले कर बोली- आह्ह.. गाण्ड मार कर तो तूने मस्त कर दिया।
तभी उसने दूसरा शॉट लगा कर अपना पूरा लिंग मेरे अन्दर डाल दिया।
मेरे मुँह से, ‘आआआह्ह्ह.. ऊहऊऊऊसी..आह..’ निकल गई।
फिर लगातार ‘गचागच..’ लण्ड पेलता रहा.. बड़ी बेदर्दी के साथ गाण्ड मारता रहा.. मैं मेरी गाण्ड मराती रही.. बिना कुछ कहे बिना सुने.. वो लण्ड पेलता रहा, उसके हर शॉट पर मेरी ‘आह’ निकल जाती। अनूप के हर शॉट पर.. मेरी चूत भी मस्त होकर पानी-पानी हो गई। उसने अपने धक्कों की स्पीड और भी तेज कर दी। मैं आनन्द के सागर में गोते लगाते हुए मजे से गाण्ड उचका-उचका कर मराती जा रही थी।
तभी अनूप चीखते हुए, ‘आह्ह्ह्ह्ह्.. सीसी..आह.. मेरा गया तेरी गाण्ड में..’
और उसने ढेर सारा गरम-गरम पानी मेरी गुदा में छोड़ते हुए कस कर मेरी चूचियां पकड़ कर और लण्ड जड़ तक पेल कर हाँफते हुए झड़ने लगा।
अनूप के लण्ड से चूत लड़ाने वाली हूँ आप लोग अपने लण्ड को पकड़ कर बैठ जाइए ताकि मेरी चूत को याद करके मुठ्ठ मार सको.. पर पानी छोड़ते समय मेरी बुर को याद करके ही पानी (वीर्य) निकालना और निकालते समय ऐसा सोचना कि मेरी चूत में ही अपना पानी डाला हो।

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कुछ देर बाद अनूप मेरी गुदा से लण्ड निकाल कर बगल में लेट कर बातें करते हुए मेरी चूत सहलाने लगा, उसने कहा- रानी, तुम्हारी गाण्ड मारने में मजा आ गया.. बड़ी प्यारी और सुन्दर है तुम्हारी गाण्ड..
मैं बोली- मुझे भी तुमसे अपनी गान्ड मरा कर मजा आ गया.. तुम ने गाण्ड की प्यास तो बुझा दी पर मेरी चूत प्यासी है।
अनूप बोला- जान, लण्ड तुम्हारी चूत की प्यास बुझाए बिना कहाँ भागा जा रहा है।
अनूप एक हाथ से चूत.. दूसरे हाथ से मेरी चूचियों की मालिश कर रहा था। मेरी बुर तो पहले से प्यासी थी.. उस पर अनूप का मेरे बदन और बुर पर हाथ लगाना.. आग में घी का काम कर रहा था।
मैं भी अनूप का लण्ड हाथों में लेकर मुठियाने लगी और अनूप की छाती पर हाथ फिराते हुए चुदने के लिए यानी बुर मरवाने के लिए तड़फने लगी।
तभी मुझे एक आईडिया आया कि क्यूँ न अनूप का लण्ड मुँह लेकर चूसूँ.. और चाटूँ.. ताकि अनूप लण्ड जल्द से जल्द गरम होकर खड़ा हो जाए और मेरी चूत की चुदाई शुरू हो सके।
मैं अनूप के ऊपर चढ़ गई और चूमते हुए नीचे लण्ड पर पहुँच कर लण्ड को सीधे मुँह में भर लिया, अनूप के लण्ड पर लगे अपनी गाण्ड के रस और वीर्य को चाटने लगी।
फिर मैं जीभ से उसके सुपारे को चाटते हुए कभी पूरा लण्ड मुँह में भर लेती.. कभी सुपारे को चाटती।
मेरा ऐसा करना रंग लाया और अनूप का लण्ड पूरा टाइट हो कर एक डंडे के जैसा हो गया पर मैंने बाबूराव को चाटना नहीं छोड़ा।
इधर अनूप का हाथ मेरी चूतड़ और जांघ से होते हुए मेरी बुर को मसक रहा था।
फिर अनूप मेरे मुँह से लण्ड निकाल कर मुझे अपने ऊपर खींच कर.. मेरे होंठ को मुँह में लेकर.. चूसते हुए मेरे पूरे नंगे बदन को सहलाते हुए.. मेरी चूचियाँ भींचता.. तो मेरे मुँह से सिसकारी फूट पड़ती।
मैं कस कर उससे लिपटकर चूत उसकी जाँघों पर रगड़ते हुए.. सिसकारियाँ लेने लगीं, ‘आईई ईईई.. और ज़ोर से.. दबा छातियाँ.. मेरे राजा मेरी चूत और गाण्ड के मालिक.. ले..
मैं मस्ती में सिसियाते हुए उसके होंठों पर होंठ रख कर किस करने लगी।
अनूप मेरे जीभ को मुँह में लेकर चूसते हुए एक उंगली मेरी चूत में पेल कर आगे-पीछे करने लगा..
तभी उसने एकाएक मुझे नीचे लेटाकर मुँह चूत पर रख कर मेरी बुर को चाटने लगा।
जैसे एक कुत्ता एक कुतिया की चूत चाट कर उस कुतिया को गर्म कर देता है.. वैसे ही अनूप मेरी चूत चाट कर मेरी चूत को गर्म करने लगा था।
मैं अनूप की बुर चटाई से जन्नत की सैर करने लगी, मैं पूरे तेज-तेज स्वर में सिसकारियाँ लेते हुए अपनी चूत चुसवाती जा रही थी। नीचे से अपने चूतड़ों को भी उठाए जा रही थी।
‘ज़ोर से और जोर से आईई.. ई हिस्स्स्स..’ करते हुए चूत चटाई की मस्ती में अपने दाँतों से अपने होंठों को भींच रही थी। एक हाथ से अनूप का सर और एक हाथ से अपनी चूचियाँ दबाते हुए बोली- अब नहीं रहा जाता.. पेल दे.. चोद दे.. मेरी बुर को.. मेरी चूत में डाल दे बाबूराव.. और मेरी भोसड़ी को फाड़ दे..
इतना सुनते ही अनूप मेरे ऊपर चढ़ कर अपने मोटे लण्ड को मेरी चूत के मुँह पर रख कर अपने लण्ड का सुपारा रगड़ने लगा, उसके लण्ड की रगड़ाई से मैं मस्ती और मदहोशी की आवाज़ में सिसकियां लेकर बोली- आह्ह.. डार्लिंग जल्दी करो ना.. डाल दो ना.. मेरी चूत में अपना बाबूराव.. और बुझा दो मेरी चूत की आग..
तभी उसने एक जोरदार धक्के के साथ लण्ड को मेरी चूत में घुसेड़ दिया और जोरदार शॉट पर शॉट लगा कर मेरी चूत की जबरदस्त चुदाई चालू कर दी।
मैं अनूप की चुदाई की गुलाम हो कर चूत उठा-उठा कर ठुकवाने लगी। हर धक्के हर शॉट.. पर मैं चूत उठाकर और सिसियाकर ‘ओह्ह.. आह्ह्ह.. इश्ह्हह्ह्ह.. कम आन.. यससस.. सी फ़क मी..’ कहते हुए अनूप के लण्ड का स्वागत करती।
तभी अनूप ने चुदाई का आसन बदलते हुए मुझे ऊपर ले लिया और मैं चुदाई के नशे में अनूप के लण्ड पर चूत रगड़ने लगी।
मैं चुदाई का आनन्द उठाते हुए चरम सुख पाने के लिए ‘सटासट..’ लण्ड पर चूत पटकते हुए मुँह से बकने लगी- आअहह अहह.. अहहा.. सईईई.. आई.. मैं गइ सईईइईई.. आह्ह्ह मेरा निकलने वाला है..
तभी मेरी चूत का लावा फूट पड़ा और मैं चूत लण्ड पर दाबे हुए झड़ने लगी। मुझे झड़ता महसूस कर अनूप तुरन्त मुझे नीचे लिटाकर और जल्दी तेज़ी से चोदने लगा।
मेरा काम हो गया और मैं अनूप की बाँहों में ढीली पड़ने लगी लेकिन अनूप तो जोश में मेरी चूत पर ताबड़तोड़ झटके लगाते रहे।
अनूप मेरी चूत तब तक चोदते रहे.. जब तक उनका पानी निकलने को नहीं हुआ और कुछ ही पलों में अनूप ‘अह सस सईईइईई.. आह्ह्ह..’ करते हुए और कस कर मेरे होंठों को चूसते हुए मेरी चूत में लण्ड अन्दर तक डालकर वीर्य चूत में गिराते हुए झड़ने लगे।
यह कहानी अक्टूबर 2010 की है.. मैं जब मथुरा से वापिस वाराणसी आई तब की है। यह कहानी मेरे ह्ज्बेंड की फैमिली से है, मेरे ह्ज्बेंड के बड़े पिता जी के लड़के की है.. जो लखनऊ में बीडीओ के पद पर थे.. पर जब उनकी बीवी का देहान्त हो गया था.. तो उन्होंने अपनी पोस्टिंग बनारस करा ली थी, वे हमारे ही घर पर रह कर काम कर रहे थे।

बीवी के न रहने से उनकी सेक्स की भूख बढ़ गई थी। वह हमेशा मुझे घूरते रहते और वह अपने कमरे में मुठ्ठ मार कर वीर्य अपने अंडरवियर गिरा कर छोड़ देते थे।
यह उनका हमेशा का काम हो गया था। जब भी मैं उनके कमरे की साफ सफाई करती.. तो अक्सर उनकी गीली चड्डी मिलती और मैं भी उसे सूँघकर देखती.. पर मेरे दिल में जेठ जी के प्रति कभी गलत भावना या उनसे चुदने का ख्याल नहीं रखती.. मैं यह सोचकर रह जाती कि बेचारे को हाथ से करने के सिवा और क्या कर सकते हैं।
मेरी उनके प्रति सहानभूति थी।
वे कभी मुझसे बोलते नहीं थे, मैं चाय नाश्ता उनके रूम में ही पहुँचा देती और खाना भी वो कमरे में ही खाते थे.. पर जब भी मैं किसी काम से जाती.. तो वह मुझे चोर निगाहों से देखते रहते थे।
जब से मैं मथुरा से जमकर चुदवा कर आई थी.. मेरे शरीर में एक बदलाव आ गया था और मेरा फिगर पहले से भी अच्छा हो गया था। खासकर मेरे चूतड़.. जो कि किसी को भी अपना दीवाना बना डाले।
मेरे ससुराल आते ही मुझे इतना लण्ड मिल गया कि मैं मथुरा से आने के बाद ह्ज्बेंड से रोज चुदाई करवाती थी क्योंकि मेरी बुर को लण्ड खाने की आदत पड़ गई थी।
मैं अब ज्यादा गौर करने लगी कि जेठ जी का अब कुछ ज्यादा ही सेक्सी और रोमान्टिक हो रहे थे, अब वो कभी भी मौका देखकर मेरे कमरे में तांक-झाँक करते रहते।
कई बार मुझे लगा कि वे मुझे चुदते हुए देखते हैं.. पर मेरे पास कुछ सबूत नहीं था। जब भी मैं रात को सेक्स करती.. तो मुझे ना जाने क्यों महसूस होता कि जेठ जी देख रहे हैं और मेरे अन्दर उत्तेजना बढ़ जाती और मैं खूब खुल कर चिल्ला कर चुदने लगती।
एक दिन की बात है, मैं कमरे में कपड़े बदल कर रही थी और मुझे आहट सी लगी कि कोई मुझे देख रहा है।
उस वक्त घर में मेरे और जेठ के अलावा कोई नहीं था।
जैसे ही मुझे लगा कि सच में कोई है.. मेरा रोम-रोम गनगना उठा।
उस समय मैं ब्रा-पैन्टी में थी और शरीर में वैसलीन का बॉडी लोशन लगा रही थी।
मुझे थोड़ी शरम भी आ रही थी.. मैं उस वक्त अगर शरीर ढकती या पलटती तो जेठ जी समझ जाते कि मैं जान गई हूँ, इसलिए मैं जो कर रही थी.. उसी तरह करती रही ताकि उनको पता ना चले कि मैं समझ गई हूँ कि कोई देख रहा है।
मैं जेठ जी को लज्जित नहीं करना चाहती थी।
मैंने लोशन लगाते हुए थोड़ा तिरछी होकर देखा.. तो मैं शरमा उठी दरवाजे को थोड़ा खोलकर जेठ जी कमरे में मुझे देखते हुए अपना लण्ड बाहर निकाल कर हिला रहे थे।
मेरा विश्वास पक्का हो गया कि जेठ जी की नीयत मेरे पर ठीक नहीं है क्योंकि जेठ जी अपनी बहू को नंगी हालत में देखकर अपने मन में मुझे चोदने का ख्याल रखकर लण्ड पकड़ कर मेरी बुर चोदने का सोच कर मुट्ठ मार रहे थे। पर मैं बार-बार जेठ जी को अपनी भावनाओं में नहीं लाना चाहती थी।
मेरी भी सोच जवाब दे गई.. जब जेठ जी मेरे विषय में सोचकर लण्ड हिला सकते हैं.. तो मैं क्यों नहीं और मैं तो चूत, फ़ुद्दी, बुर के लिए तरसते जेठ की मदद कर रही हूँ।
जेठ जी को लण्ड हिलाते देखकर मेरी भी वासना हिलोरें मारने लगी।
क्योंकि मेरी आदत भी अलग-अलग मर्दों के लण्ड से चुदने की पड़ गई थी और मैं जब से मथुरा से आई हूँ.. मुझे केवल ह्ज्बेंड के लण्ड से चुद कर संतोष करना पड़ रहा था।
जेठ जी का लण्ड मेरे ह्ज्बेंड के लण्ड जैसा बड़ा था.. पर मोटा कुछ अधिक था, उनके लण्ड का सुपारा काफी फूला हुआ था।
जेठ जी का लण्ड देखकर मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया और फिर मैं जानबूझ कर और ज्यादा दिखाते हुए अपने जिस्म में लोशन लगाने के साथ साथ अपनी बुर की फांकों में और चूचियों में लोशन रगड़ कर चूत की मालिश करती रही।
मैं जितना जेठ को चूत दिखाना चाह रही थी उतनी अधिक मेरी चूत चुदने के लिए व्याकुल हुई जा रही थी। मैं चुदाई की वासना के नशे में अपनी पैन्टी नीचे खिसका कर चूत को नंगी करके लोशन लगाते हुए पीछे से झुककर अपनी बुर दिखाने के साथ मैं पनियाई हुई बुर को मसक देती थी। उधर जेठ जी मुठ्ठ मारे जा रहे थे.. वे इस बात से बेखबर लग रहे थे कि मैं जानबूझ कर सब दिखा रही हूँ।
अब मेरी चूत खुद चुदना चाहती थी.. मैं गरम होती जा रही थी। एक बार तो मुझे महसूस हुआ कि मैं जाकर जेठ जी का खुद ही लण्ड पकड़ कर कह दूँ कि हिलाना छोड़ो.. और मेरी बुर आपके सामने खुली पड़ी है.. अपना बाबूराव डाल कर.. इसकी फांकों में अपने बाबूराव का सुपारा फंसाकर.. अपनी गरमी मेरी चूत में डाल दो।
पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी।

मैं वासना के नशे में जलते हुए बुर को मसकते हुए दरवाजे की तरफ घूमकर बुर को रगड़ने लगी। ऐसा करने से मेरी चिकनी बुर पूरी तरह जेठ के सामने थी।
मैंने कनखियों से देखा.. तो जेठ जी की लण्ड हिलाने की स्पीड बढ़ गई थी और वह बस ‘सटासट’ सोटते हुए लण्ड पर मुठ्ठ मार रहे थे। मैं गरम और चुदासी चूत लेकर मुठ्ठ मारते देखने के सिवा कर भी क्या सकती थी।
मैंने अपनी ब्रा के हुक को खोल कर अपनी चूचियों को आजाद कर दिया। एक हाथ से मैं अपने कलमी आमों पर लोशन की मालिश करते हुए दबाकर वासना को कम करना चाहती थी। साथ ही दूसरे हाथ से अपनी चूत को मसल रही थी और बाहर मेरे जेठ जी मेरे जिस्म.. चूत और गान्ड को देखते हुए अपने लण्ड को कुचलते हुए अपना लावा निकालना चाहते थे।
वह वासना के नशे में चूर होकर बस अपना वीर्य निकाल कर शान्त होना चाहते थे।
मैं उनकी मदद करते हुए चूत को चौड़ा करते हुए बुर की गुलाबियत को पूरी तरह दिखाते हुए मालिश कर रही थी। मैं यह भी दिखाना चाहती थी कि आपके भाई की चुदाई से मेरी गरमी शान्त नहीं होती.. मुझे लण्ड की जरूरत है।
और तभी मेरी निगाह दरवाजे पर पड़ी.. जेठ जी का लण्ड वीर्य उगलने लगा था। जेठ जी सिसिया रहे थे- आहह.. सी.. डॉली.. आह.. चुद जा मेरे बाबूराव से.. आह.. सीई.. आह.. डॉली..
वे झड़ रहे थे.. जबकि उनकी आवाज मुझे सुनाई दे रही थी।
वे सब भूल कर बस अपना पूरा वीर्य दरवाजे पर गिराकर चले गए।
शायद यह सब वह उत्तेजना में बोल गए थे।
मैं भी आखरी बार अपनी चूत को मसक कर पैन्टी-ब्रा और कपड़े पहन कर सारी घटना को बैठ कर याद कर रही थी।
तभी मुझे बाहर जेठ के पुकारने की आवाज आई।
मैं कपड़े ठीक करके बाहर गई, जेठ जी अपने कमरे में थे, उनके कमरे का दरवाजा खुला था।
मैंने अन्दर जाकर पूछा- कोई काम है क्या?
भाई साहब बोले- डॉली, मुझे एक कप चाय बना दो..
मैंने एक बात पर ध्यान दिया कि कुछ देर पहले जो भाई साहब मुझे देख कर कर रहे थे। ऐसा जेठ जी से बात करते कुछ जाहिर नहीं हो रहा था।
मैं बोली- जी भाई जी..
और मैं जैसे ही कमरे के बाहर निकलने के लिए घूमी… जेठ जी की फिर आवाज आई- सुनो.. एक कप नहीं.. दो कप बनाना।
मैं बोली- भाई जी.. कोई और आने वाला है क्या?
बोले- नहीं.. क्यों?
‘आप दो कप के लिए बोले.. तो मैंने सोचा कि कोई आने वाला होगा।’
जेठ जी बोले- तुम मेरे साथ चाय नहीं पी सकती क्या.. जब से आपकी जेठानी का देहान्त हुआ.. मैं अकेले ही पीता और खाता आ रहा हूँ.. अगर तुमको बुरा ना लगे.. तो मेरे साथ बैठ कर कुछ देर चाय के लिए ही साथ दे दो..
‘नहीं भाई साहब.. आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं।’
मैं फिर चाय बनाने चली गई और दो कप चाय लेकर जेठ जी के कमरे में गई, एक कप उनको देकर मैं एक कप लेकर सोफे पर बैठ गई।
तभी जेठ अपने चाय का कप लेकर मेरी बगल में बैठ गए।
आज पहली बार जेठ के व्यवहार में बदलाव देख रही थी, जब से वह मेरे यहाँ रह रहे थे.. कभी ठीक से बात भी नहीं करते थे.. पर आज अकस्मात मेरे बगल में बैठ गए।
‘क्या हुआ डॉली.. बुरा तो नहीं लग रहा है?’
‘किस बात का बुरा भाईसाहब?’
‘यही.. जो मैं बिना पूछे आपकी बगल में बैठ गया।’
मैं शरमाते हुए बोली- नहीं..
और जेठ जी चाय पीते हुए धीरे से अपना एक हाथ मेरे पीछे कर मेरी कमर और चूतड़ों के पास रख कर हल्के से मेरी कमर को दबा कर हाथ वहीं रखकर रूक-रूक कर सहला देते।
जेठ जी के ऐसा करने से मैं पानी-पानी हो रही थी.. पर मैं जानबूझ कर अंजान बनी रही।
तभी जेठ ने पूछा- तुम्हारा और रंगीला का मथुरा का टूर कैसा रहा?
मैं बोली- बहुत बढ़िया रहा.. भाई साहब..
‘बहुत समय लगा दिया तुम लोगों ने..’
‘जी भाईसाहब.. कुछ काम भी था उनका..’
‘एक बात कहूँ.. बुरा न मानना..’
‘बोलिए..’
‘तुम्हारे जैसी बीवी पाकर रंगीला का मन तो आने का कर ही नहीं रहा होगा..’
ऐसा कहते वक्त जेठ जी ने अपना पैर मेरे पैर से सटा दिया।
एक तो कुछ देर पहले ही जो कुछ जेठ ने किया था.. उससे तो मेरी चूत गर्म थी ही.. उस पर से जेठ की हरकतें मेरे रोम-रोम में सेक्स का रोमांच पैदा कर रही थीं। मुझे लगा कि अगर मैं हटी नहीं.. तो मैं खुद जेठ जी की गोद में जा बैठूंगी।

चाय खत्म हो चुकी थी और मैं कप लेकर उठने लगी.. तभी जेठ जी ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे उठने से रोक लिया।
‘क्या हुआ.. क्यों जा रही हो.. क्या मुझ अकेले को अकेला छोड़ कर जा रही हो.. कुछ देर और बैठो ना..’
और मुझे जबरिया अपने पास बैठा लिया।
मैं भी विरोध न करते हुए बैठ गई।
‘डॉली अब मेरा कौन है.. वाईफ के बाद तुम ही तो हो..’
यह दो-अर्थी बात जेठ जी ने बोली थी।
इस बात से वे मेरी तरफ से अपनी नीयत साफ कर चुके थे.. पर मैं जानबूझ कर भी उनकी बात का मतलब नहीं समझना चाह रही थी।
मैं बोली- यह क्या कह रहे भाई साहब.. मैं भाभी जी की जगह कहाँ ले सकती हूँ? भाई साहब मैं समझ सकती हूँ कि आपका दु:ख.. आप अपनी दूसरी शादी कर लीजिए.. मैं आपको बना खिला तो सकती हूँ.. पर और काम तो आपकी वाईफ ही कर सकती है।
मैंने भी यह बात जानबूझ कर कह दी।
‘नहीं.. डॉली.. मैं अब शादी नहीं करूँगा.. वैसे भी तुम तो हो ही..’
‘मेरे होने ना होने क्या.. मैं तो आपका हर काम तो कर सकती हूँ.. पर ‘वो’ काम..’
मैंने जानबूझ कर बात अधूरी छोड़ दी।
‘कौन सा काम? जो तुम नहीं कर सकती… बोलो डॉली?’
‘आप खुद समझदार हैं.. समझ लीजिए..’
‘अगर वो काम भी तुम कर दो तो.. क्या फर्क पड़ेगा..’
यह कहते हुए जेठ जी ने मेरी जाँघों पर हाथ रख दिए और थोड़ा दबाकर बोले- तुम भी तो बड़ी खूबसूरत हो..
‘मेरी खूबसूरती तो आपके भाई के काम आएगी.. आपके नहीं..’
मैं कहते हुए एक झटके से उठ कर उनके कमरे से भाग गई और पीछे जेठ भी लपके।
मैं अपने कमरे तक पहुँच पाती.. उसके पहले मुझे जेठ ने दबोच लिया और एक हाथ मेरे चूतड़ों और एक हाथ से मेरी चूची को पकड़ने के बहाने दबाते हुए बोले- तुम क्यों नहीं कर सकती?
मैं खुद को छुड़ाने को जितना छटपटाती.. उतना ही वह मेरे जिस्म को दबोच रहे थे। वह मेरे जिस्म के लगभग सारे हिस्सों को स्पर्श करते हुए बोले- डॉली.. सच बताओ.. हर काम तुम कर रही हो तो ‘वह’ क्यों नहीं?
मैं बोली- मैं आपकी बहू हूँ.. छोटे भाई की बीवी हूँ.. कोई जेठ अपनी बहू को छूता तक नहीं है और आप तो..
मैंने फिर बात को अधूरा छोड़ दिया।
‘बोलो डॉली.. मैं तो.. क्या?’
‘मैं नहीं जानती.. छोड़ो मुझे..’
‘नहीं.. पहले बोलो..’

आखिर में मैंने एक ही सांस में बोल दिया- आपकी नीयत अपने छोटे भाई की बीवी पर खराब हो गई है.. जो नहीं होना चाहिए!
‘नहीं डॉली.. ऐसी बात नहीं है.. मैं तुमको चाहता हूँ.. प्यार करता हूँ.. नहीं तो भला आज तक कभी भी मैंने तुमको कुछ बोला.. और कहा?’
मैं बोली- सभी मर्द ऐसे ही कहते हैं.. आज तक आपने मुझे कुछ दिया?
‘मैंने कई बार सोचा कि तुम्हें कुछ दूँ डॉली.. पर मैंने सोचा कि कहीं तुम गलत ना समझो।’
मैं अब भी उनकी बाँहों की पकड़ में थी। वे कहते हुए मेरे होंठों को अपने होंठों में भर के किस करने लगे।
मैं बोली- प्लीज.. ऐसा मत करो..
पर वह मेरी छाती और चूतड़ों को मसकते हुए किस करते रहे।
मेरी साँसें अकुला उठीं.. उनकी हरकतें मेरी चुदने की चाहत को भड़का रही थीं।
जेठ का हाथ और मेरी बुर की चुदाई.. जेठ के लण्ड से.. यह सब सोचते महसूस करते हुए मेरी बुर पानी-पानी हो रही थी।
फिर भी मैं सती सावित्री बनते हुए मैंने जेठ से अपनी चूत को बचाने की कोशिश का ड्रामा करे जा रही थी।
मेरी जाँघों में जेठ का लण्ड खड़ा होकर ठोकर मार रहा था और जेठ बिना मेरी इजाजत के मेरे जिस्म से खेल रहे थे।
तभी जेठ का हाथ मेरी बुर पर पहुँच गया और जेठ ने मेरी बुर को हाथ में भरकर भींच लिया और मेरे मुँह से एक मादक सिसकी निकल गई- आहसीईई.. भाई साहब.. यह क्या कर रहे हैं छोड़डड दीजिए.. आह..सीई.. मैं आपके भाई की पत्नी हूँ और मैं भी तो तुम्हारे ह्ज्बेंड का बडा भाई हूँ।
‘मेरी भी वासना है.. कितने दिन तेरी पैन्टी पर मुठ्ठ मार कर शान्त करूँ.. मेरी जान..’
और तभी दरवाजे की घन्टी बज उठी.. हम दोनों चौंक कर अलग हुए। इस टाइम कौन होगा? मैं जैसे ही जेठ के बाहुपाश से छूटी.. सीधे अपने कमरे की तरफ भागी और अन्दर जाकर मैंने दरवाजा बंद कर लिया।
जेठ जी मेन गेट खोलने चले गए.. मैंने अन्दर पहुँच कर कपड़े और चेहरे को ठीक किया.. फिर बाहर की आहट लेने लगी।
तभी मुझे ह्ज्बेंड की जेठ जी से बात करने की आवाज सुनाई दी। मैं सीधे जाकर बिस्तर पर लेट गई ताकि लगे कि मैं आराम कर रही थी.. ऐसा ना लगे कि मैं उनके बड़े भाई से बुर चुदाने की कोशिश कर रही थी।
मैं नहीं चाहती थी कि मेरे ह्ज्बेंड को मेरे और जेठ के बीच जो हुआ.. या होगा.. उसका पता चले।
तभी ह्ज्बेंड ने दरवाजे पर दस्तक दी।
मैं नहीं चाहती थी कि मेरे ह्ज्बेंड को मेरे और जेठ के बीच जो हुआ या होगा.. उसका पता चले। तभी ह्ज्बेंड ने दरवाजे पर दस्तक की। मैंने उठकर दरवाजा खोला.. सामने ह्ज्बेंड खड़े थे.. मैं मुस्कुरा कर बगल को हो गई और जैसे ही ह्ज्बेंड अन्दर आए.. मैंने दरवाजा बंद कर दिया और उनसे लिपट गई।
मेरी चूत तो पहले से ही जेठ जी के छूने और रगड़ने से गरम थी.. मुझे चुदाई की चाहत हो रही थी। मैं उन्हें किस करते हुए उनका लण्ड पैंट के ऊपर से दबाने लगी।
‘अरे मेरी जान.. बड़ी सेक्सी मूड में हो.. क्या बात है?’
मैं बोली- जानू.. मुझे बड़ी चुदास लग रही है.. एक बार मेरी बुर पर चढ़ाई कर दीजिए और कस कर मेरी बुर चोद दो.. जानू..
ह्ज्बेंड बोले- डॉली यह मथुरा नहीं है.. यह घर है और भाई जी बाहर बैठे हैं। यह सब काम अभी नहीं हो सकता और अभी रात में तेरी चूत को दो बार चोदा है न.. और अभी दोपहर में ही तुम फिर चुदासी हो उठीं..
मैं उन्हें कैसे समझाती कि यह मेरी चूत की चुदास आपके भाई साहब की ही देन है.. पर मैं बात बना कर बोली- जानू.. जब से मथुरा से आई हूँ.. मेरी चुदने की इच्छा बढ़ती जा रही है.. मैं क्या करूँ.. मेरी क्या गलती है.. तुम तो जानते हो.. वहाँ कितने लोगों के साथ एक ही दिन में मेरी बुर चुद जाती थी और अब तो केवल आप ही चोद रहे हो शायद एक से अधिक मर्द से चुदने कि आदत पड़ गई है.. आपकी चूत को.. इसी लिए इस टाईम मेरी चूत की चुदास बढ़ गई है।
‘मत घबराओ मेरी जान.. आज रात मैं जम कर चोदूँगा और देखो अभी भाई जी बाहर बैठे हैं.. मुझे जाना भी है.. बस तुम जल्दी से लन्च करा दो और वादा करता हूँ कि रात में तुम्हारी चूत की सारी गरमी अपने लण्ड से चोदकर निकाल दूँगा।’
यह कहते हुए ह्ज्बेंड मुझे अलग करके कपड़े निकाल कर फ्रेश होने बाथरूम में चले गए।

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मैंने रसोई में जाने के लिए जैसे ही दरवाजा खोला.. सामने जेठ जी बैठे दिखाई दिए।
मेरा जेठ जी से सामना होते ही मुझे शरम आ गई और मैं निगाह नीचे किए हुए रसोई में चली गई, मैंने खाना गरम करके खाने की टेबल पर लगा दिया।
मैंने नोटिस किया कि जेठ की निगाहें अब भी मेरे जिस्म का मुयायना कर रही थीं।
तभी ह्ज्बेंड भी बाहर आ गए और एक साथ सब बैठ कर लन्च करने लगे।
मैं और ह्ज्बेंड एक तरफ थे और जेठ जी सामने बैठे थे और जेठ जी इस मौके का भी पूरा फायदा उठा रहे थे। वह टेबल के नीचे मेरे पैर से पैर सटाकर सहलाने लगे और मैं उनकी इस हरकत से डर रही थी कि कहीं ह्ज्बेंड को पता ना चल जाए.. इसलिए मैं बिलकुल शांत दिखना चाह रही थी..
पर जेठ की ढिठाई कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी, इतना सब हो जाने पर भी मैं जेठ जी से चुदना नहीं चाहती थी.. भले मेरी चूत में गैर का लण्ड लेने की इच्छा बढ़ रही थी.. परन्तु मैं अपनी ईज्जत घर में नीलाम नहीं करना चाहती थी.. बाहर अगर कोई चोदता है.. तो उससे कोई लेना-देना नहीं रहता.. बस चूत चुदाओ और वह अपने रास्ते.. मैं अपने.. पर यहाँ तो जेठ की नीयत मेरे पर ठीक नहीं थी।
पता नहीं कब से.. पर उनकी हिम्मत कभी नहीं हुई लेकिन इस सबका कारण मैं थी.. मैंने क्यों उनको अपने जिस्म को देखने दिया.. क्यों मैंने अपना बदन नहीं ढका.. और फिर मैं भी तो वासना के नशे में चूर हो कर उनकी हरकतों का कोई विरोध नहीं कर पाई।
जेठ जी तो वाईफ के न रहने के बाद से अब तक बेचारे चूत के लिए तरस रहे थे, पता नहीं कितनी बार मुझे चुदते देख कर या मेरी कल्पना करके मेरे नाम की मुठ मार चुके होगें.. पर कभी मेरे साथ छेड़खानी नहीं की थी।
इसमें जेठ जी का दोष नहीं है.. उनको भी एक जनाना जिस्म और चूत की जरूरत है.. पर मैं अपनी चूत कैसे दे सकती हूँ। यह काम मैं नहीं कर सकती.. मेरी कल्पना को शायद ह्ज्बेंड ने ताड़ लिया था।
ह्ज्बेंड बोले- क्या हुआ.. किस सोच में डूबी हो.. हम लोग खाना खा चुके हैं.. और तुम अभी वैसे ही बैठी हो।
मैं हकलाते हुए बोली- ककक..कुछ.. नननन..हहीं.. बस ऐसे ही..
और मैं खाना खत्म करके बर्तन लेकर रसोई में चली गई, फिर साफ-सफाई करके मैं बेडरूम में आकर लेट गई, ह्ज्बेंड पहले से ही बिस्तर पर लेटे थे, मैं उनके बगल में लेट गई।

कुछ देर बाद ह्ज्बेंड ने कहा- ज्यादा मन हो रहा है चुदने का?
मैं जानबूझ कर बोली- कुछ खास नहीं..
वह बोले- लेकिन तुम खाने के दौरान गहरी चिंता में थीं.. बताओ क्या बात है?
मैं बोली- कुछ नहीं..
तब ह्ज्बेंड बोले- मुझे पता है..
ह्ज्बेंड के इतना कहते ही मैं कांप गई.. क्या पता है.. कहीं मेरे और जेठ के बीच की बात तो नहीं?
मैं- क्या पता है आपको?
‘यही कि तुम्हारी इतनी चुदाई हो चुकी है कि तुम्हारी चुदने की इच्छा बढ़ गई है।’
मैंने सिर्फ ‘हाँ’ मैं सर हिला दिया और ह्ज्बेंड मुझे सहलाते हुए मेरे लहंगे को ऊपर उठाकर मेरी चूत सहलाते हुए मेरी पैन्टी को नीचे करके मेरी चूत पर मुँह लगा कर मेरी बुर चूसने लगे।
मेरी तपती चूत पर ह्ज्बेंड का मुँह पड़ते मेरी ‘आह.. उफ.. सीसी ईई..’ निकलने लगी।
कुछ देर तक मेरी चूत को पीने के बाद बोले- डॉली.. तुम्हारी चूत तो चुदने के लिए उतावली हो रही है।
ह्ज्बेंड ने मेरी पैन्टी पैर से बाहर निकाल दी और बोले- जान… अभी मैं तुम्हारी चूत में लण्ड घुसाकर कुछ राहत दे देता हूँ.. पर पूरी चुदाई रात में करूँगा।
ह्ज्बेंड ने मेरी बुर पर अपना सुपारा रख कर एक जोर का शॉट मारा और लण्ड पूरा चूत के अन्दर एक ही शॉट में घुसता चला गया।
ह्ज्बेंड अपना पूरा लण्ड मेरी बुर में डाल करके शॉट पर शॉट देने लगाने लगे।
मैं ‘आहहह आहहहह.. सिईईईई.. आहहह..’ करने लगी।
अभी आठ-दस शॉट दिए.. तभी ह्ज्बेंड का फोन बज उठा और ह्ज्बेंड ने लण्ड बुर से बाहर खींचकर फोन उठा कर ‘हैलो’ कहा और फोन रख कर बोले- डॉली मुझे जाना है.. तुम आराम करो.. कुछ राहत तो मिल ही गई होगी।
मैं बोली- आपका लण्ड जाने के बाद मेरी बेचैनी और चूत की प्यास और बढ़ गई है.. मेरी चुदाई पूरी करो.. ऐसे प्यासी पत्नी को छोड़ कर नहीं जाया जाता। मेरी चूत चुदने के लिए फड़फड़ा रही है। ऐसे में किसी ने मेरी वासना का नाजायज फायदा उठा लिया तो..
मेरी बात को ह्ज्बेंड ने मजाक में ले लिया और बोले- तब तो मेरी प्यासी रानी की चूत की प्यास बुझ जाएगी और रात मुझे तुम्हारी चूत मारने की मेहनत कम करनी पड़ेगी मेरी जान..
ह्ज्बेंड हँसते हुए चले गए और मेरी चूत चुदने के लिए चुलबुलाती रह गई।
ह्ज्बेंड के जाने के बाद मैं वैसे ही बिस्तर पर पड़ी रही, कुछ देर बाद मुझे नींद आ गई और मैं सो गई।
जब मेरी नींद खुली तो मुझे ध्यान आया कि मैं वैसे ही सो गई हूँ.. जिस हालत में ह्ज्बेंड चूत में लण्ड घुसाकर गए थे.. बिलकुल खुली चूत..
मैं अपनी प्यारी चूत को अपने हाथों से मसकते हुए ‘आहसीईई..’ कह कर उठी और बाथरूम चली गई। मैं फ्रेश होकर आई तो मैं अपनी पैन्टी खोजने लगी.. लेकिन मेरी पैन्टी कहीं दिख ही नहीं रही थी।
आखिर मेरी पैन्टी गई कहाँ.. यहीं तो ह्ज्बेंड ने निकाल कर फेंकी थी।
काफी खोजने पर भी नहीं मिली.. तो मैं फिर यूँ ही चाय बनाने चली गई। यह सोच कर कि शायद ह्ज्बेंड मुझे सताने के लिए साथ ले गए हों..

मैं जेठ जी के और अपने लिए चाय बना कर जेठ जी को देने उनके कमरे में गई। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा कि जेठ जी कमरे में सोए हुए थे, उनको सोया हुआ देख कर मैंने कमरे में चारों तरफ नजर दौड़ाई पर मेरी पेंटी यहाँ भी नहीं दिखी।
मैंने टेबल पर ट्रे रख कर जेठ जी को आवाज दी।
मेरी आवाज सुनकर जेठ जी चौंकते हुए उठ बैठे।
मैंने कहा- आप बहुत सो रहे हैं।
‘नहीं यार, बस थोड़ी नीद आ गई और सो तो तुम भी रही थी!’
‘आप फ्रेश होकर आइए और चाय पी लीजिए, नहीं तो चाय ठंडी हो जाएगी।’

जेठ जी जैसे ही बाथरूम गए, मैं पेंटी खोजने लगी, मुझे ज्यादा शक जेठ पर ही था, पर पेंटी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।
तभी मेरी निगाह बेड के नीचे गई… और यह क्या… मेरी पेंटी तो यहाँ है!
और मैंने लपक कर जैसे ही पेंटी उठाई, मेरी उंगली में कुछ गीला सा लगा।
यह क्या पूरी पेंटी जेठ जी के वीर्य से सनी हुई थी और एक मादक गंध उसमें से निकल रही थी।
मैंने ना चाहते हुए पेंटी को मुँह के पास ले जा कर जीभ से चाट ली और मेरा इतना करना कि मेरे जिस्म में एक रोमांच और जेठ जी के लण्ड से निकलते वीर्य की कल्पना घूमने लगी।
तभी मुझे बाथरूम से जेठ के निकलने की आहट हुई और मैं घबराकर पेंटी वहीं फेंक कर साँसों को नियंत्रित करने लगी।
और जैसे जी जेठ जी बाहर आए, मैं जेठ जी को चाय देकर तुरन्त वहाँ से भाग आई।
अब मेरे दिमाग में वही सब नजारा चलने लगा, मेरी पेंटी जेठ के रूम में मिलना यह साबित कर रहा था कि जेठ जी मेरे रूम में आए थे और मेरी खुली चूत का दर्शन करके मेरी पेंटी को जानबूझ कर यहाँ से लेकर गए, और फिर वासना के नशे में लण्ड को मुठ मार कर वीर्य मेरी पेंटी में गिराकर लण्ड को राहत दिलाई।
मैं यही सोच रही थी कि तभी दरवाजे पर आहट हुई, मैंने देखा तो जेठ जी खड़े थे।
मुझे देख कर बोले- क्या सोच रही हो?
मैं हड़बड़ा कर बोली- कुछ नहीं, आप कब आए? और चाय पी ली?
‘मैंने तो चाय पी ली, पर तुमने शायद चाय नहीं पी क्योंकि तुम चाय को मेरे रूम में ही छोड़ कर चली आई। तुम किस ख्याल में खोई हो? क्या बात है?’
मैं कैसे कहती कि मेरी पेंटी आप के रूम में कैसे पहुँची और आपने मुझे पूरी नंगी देख लिया है, मैं बोली- जी, वो मैं भूल गई थी, मेरे सर में थोड़ा दर्द था तो मैं दवा लेने चली आई।
मैं जेठ जी को ऐसा बोल कर उनके रूम में कप लेने गई और जेठ भी मेरे पीछे ही अपने रूम में आए।
और मैं जैसे ही कप लेकर घूमी, मेरे जेठ अपने हाथ में मेरी पेंटी घुमा रहे थे- डॉली, तुम्हारा यह सामान मेरे पास है, शायद इसी की तलाश में हो?
‘न न् न् ने नहीं प्प्प्प्प् पर… यह आप के पास कैसे आई?’ हकलाते हुए मैं बोली।
तभी जेठ जी मेरे पास आकर मेरी बांह पकड़ कर बोले- मेरी जान, तुम जब अपनी चूत खोल कर सोई हुई थी, तब मैं तुम्हारे कमरे में गया था और तुम्हें उस हाल में देखकर मेरा मन तुम्हारी चूत चोदने का किया पर मैं मन मारकर तुम्हारी चूत छोड़ कर तुम्हारी पेंटी
को ही लेकर अपना काम किया और मन की तसल्ली कर ली।
‘आप यह क्या कह रहे हैं? आपको शर्म नहीं आई? आप मेरे जेठ हैं!’
मैं कुछ और कह पाती तभी जेठ जी ने मेरी बाजू पकड़ कर मुझे खींच कर अपने सीने से लगा लिया और बोले- मुझे क्यूँ तड़पा रही हो डॉली प्लीज? मैं बहुत प्यार करता हूँ तुमसे!’ कहते हुए मेरी लबों को चूमने लगे।
मैं किसी तरह अलग हुई- यह आप मेरे साथ क्या कर रहे हैं? मैं आपके छोटे भाई की पत्नी हूँ!
मैं जान बूझ कर त्रिया चरित्र फैला रही थी, जबकि मेरा मन खुद चुदने का कर रहा था, मेरी चूत सुबह से पानी पानी हो रही थी और
जब से मैंने अपनी पेंटी जेठ जी के रूम में देखी थी, मेरी चूत की कुलबुलाहट बढ़ गई थी।
पर मैं इतने आसानी से जेठ जी के हाथ नहीं आना चाह रही थी, और मैं वहाँ से पलट कर भागने लगी पर आज शायद मेरी चूत जेठ के लण्ड से बच नहीं पाएगी।
मुझे जेठ जी ने अपनी बाजुओं में दबोच लिया।
‘आहह्ह्ह… मुझे छोड़ो!’
पर आज जैसे कसम खा कर आए थे जेठ जी अपने भाई के पत्नी के बुर में लण्ड डालने की!
मैं छटपटाती रही पर मेरी एक नहीं चली और जेठ ने मुझे ले जा कर बेड पर पटक दिया, और मेरे ऊपर छा गए।
‘आहह्ह्ह छोड़ो ना… आप मुझे बरबाद ना करो!’
पर मेरी एक ना सुनी और सिर्फ इतना कहा- डॉली, मेरी पत्नी के गुजरने के बाद मैं चूत के लिए तरस रहा हूँ, मेरे ऊपर कृपा करो, मैं कोई जबरदस्ती नहीं करूँगा, पर आज तुम अपनी चूत मुझे देकर मेरे तड़पते लण्ड को कुछ राहत दो प्लीज!
उनका इतना कहना था कि मैं झूठा प्रतिरोध जो कर रही थी, बंद कर दिया लेकिन मैं शर्म के कारण जेठ का साथ नहीं दे पा रही थी, बस जिस्म को ढीला छोड़ दिया।
मेरे ऐसा करने से जेठ जी को लगा कि मैंने उनको अपनी चूत चोदने की अनुमति दे दी है।
वो बोले- मैं तुमको अच्छा नहीं लगता?
मैं बोली- ऐसी कोई बात नहीं है, आप मुझे अच्छे लगते हो लेकिन मैंने कभी आपके बारे में ऐसा कुछ सोचा नहीं है, और ऊपर से मैं आपके छोटे भाई की बीवी हूँ, हमारा आपका रिश्ता जेठ-बहू का है।
वो बोले- तुम मेरे छोटे की बीवी हो तो मुझे तुमसे प्यार करने का हक नहीं है?
ऐसा कहते हुए जेठ ने मुझे बाहों में भर कर मेरे होंठों का रसपान करने लगे और बोले- मैं तुमसे प्यार करता हूँ, इसलिए मुझे तुम्हारी चूत चोदने का पूरा हक है। इसमें कुछ बुरा नहीं है, बस जान, आज मुझे अपनी चूत दे दो।
यह सुन कर मैंने भी जेठ जी को अपने बाँहों में भीच लिया।
मेरे ऐसा करते जेठ जी ने खुश होकर एक हाथ से मेरी चूत दबा दी।
‘आहह्ह्ह सिई… और मैंने जेठ जी की बाहों में कसमसाते हुए अपनी पकड़ ढीली छोड़ दी।

जेठ जी ने अपना चेहरा ऊपर करके मेरे होठों को चूम लिया और हमारी साँसें आपस में टकराने लगी, मेरे अंदर एक अजीब सा नशा होने लगा था, मैं अपनी आँखें बन्द करके अपने होंठ खोल कर जेठ से चुदने के लिए उतावली होकर अपने होठों का अमृतपान कराने लगी। नीचे मेरी बुर के होठ खुल बंद होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, लग रहा था मानो कह रहे हो ‘जेठ जी, आओ और चूम लो मुझे!’
तभी जेठ जी अपने कपड़े निकालकर नंगे हो गए और मेरे भी कपड़े निकालने लगे।
जैसे ही मेरे नीचे के भाग को नंगा किया, मेरी मस्त बिना पेंटी के चिकनी बुर देखकर जेठ जी मेरी चूत पर मुँह रख कर चाटने लगे और बोले- डॉली, क्या मस्त चूत है तेरी, सालों के बाद चूत के दर्शन हुए!
और मेरी बुर को खींच-खींच कर चूसने लगे।
और मैं जेठ का साथ और एहसास करके सिसकारने लगी, आहह्ह्ह सिईईई आहह्ह्ह करती रही और जेठ जी मेरे चूतड़ों को भींच कर मेरी चूत पी कर मेरी बुर की प्यास बढ़ाने लगे।
कुछ देर बाद जेठ जी मेरी बुर को चाटना छोड़कर ऊपर की तरफ मेरी नाभि पेट और छाती को चूमते हुए मेरे गले को चूमने लगे।
इधर नीचे उनका लण्ड मेरी बुर को छू रहा था और मैं सेक्स की खुमारी में अपनी चूत उठाकर लण्ड पर रगड़ते हुए बोलने लगी ‘आहह्ह्ह सिईईई… अब मत तड़पाओ… डाल दो मेरी बुर में अपना लण्ड और बना लो मुझे अपनी बीवी… आहह्ह्ह जान पेलो मुझे!
फिर जेठ ने अपना थूक निकाल कर अपने बाबूराव के सुपारे पर लगाया और अपने लण्ड के फ़ूले सुपारे को मेरी चूत पर लगा कर मेरे ऊपर लेट गए और मैं भी अपने पैर खोल कर ऊपर उठा कर जेठ जी के लण्ड को लेने के लिए दांत भींच कर धक्के का इंतजार करने लगी।
तभी जेठ जी ने एक जोर का धक्का मार कर लण्ड का सुपारा अंदर कर दिया।
‘आहह्ह्ह सीसी… आहह्ह्ह उफ मारो मेरी चूत… पूरा बाबूराव मेरी चूत में डाल दो…’
और जेठ ने शॉट पर शॉट लगा कर पूरा लण्ड मेरी चूत में डाल मेरी चूत चोदने लगे और मैं जेठ जी के हर शॉट पर चूत उठाकर लण्ड लेते हुए चिल्लाने लगी- चोद और जोर जोर से चोद… आज छोड़ना नहीं मेरी चूत को… अहह्ह्ह सी… सी सी आहह्ह्ह… मेरी जान, तेरे बाबूराव ने मेरी चूत को पसंद किया है, चोऊऊ… चोद इसको आज, इसकी गर्मी अपनी बाबूराव से निकल दो, फाड़ दे मेरी चूत को हाह्हआआ!
और जेठ भी लण्ड पेलते हुए ‘ले मेरी जान… खा मेरा लण्ड, तू रानी है मेरी, आहह्ह्ह ले मेरी जान चूत में लण्ड… आहह्ह्ह’ और पलट कर मुझे ऊपर कर लिया और मैं जेठ जी के लण्ड पर उछल उछल कर चुदने लगी।
मैं झरने के करीब पहुँच कर उनसे चिपक कर झड़ने लगी- आहह्ह्ह सीसी सीईईईई आहह्ह्ह… मैं गई आहह्ह्ह… सीसी!
मैं झड़ कर चिपक गई।
तभी जेठ मुझे नीचे लेकर शॉट लगाकर लण्ड पेलते हुए वीर्य मेरी चूत में गिराने लगे- आहह्ह्ह डॉली, मैं भी गया!
आहह्ह्ह सीसीई कहते हुए हम दोनों चिपक कर आराम करने लगे!

मैं चूत में लण्ड लिए हुए अभी लेटी थी और जेठ जी बड़े प्यार से मेरी पीठ सहला रहे थे, जेठ के चेहरे पर भी एक असीम आनन्द और संतुष्टि के भाव थे।
वासना का एक दौर तो खत्म था पर हमेशा के लिए जेठ से सेक्स का खेल शुरू हो चुका था और मैं भी जेठ जी से चुदा कर खुश थी, मुझे एक और बात की खुशी थी, घर में मेरी चूत को नया लण्ड मिल गया था।
तभी जेठ जी ने कहा- डॉली, तुमने मुझे आज जो खुशी दी है मैं इसका एहसान नहीं चुका सकता, आज से तुम मेरी बीवी हो, आज
तुमको चोद कर डॉली, मेरा लण्ड निहाल हो गया मेरी जान!
‘क्या भाई साहब? यह आप क्या कह रहे हो? इसमें एहसान की क्या बात है, आप मुझसे प्यार करते हो तो यह मेरा भी फर्ज है कि मैं भी आप को हर खुशी दूँ! आपको मेरी चूत कैसी लगी?’
‘बहुत अच्छा मेरी जान, मेरी रानी, अब तो तुम्हारी चूत हमारी है! बोलो है ना हमारी?’
‘हाँ भाई साहब यह आपकी है, जब चाहो आप इसे चोद सकते हो, पर मेरे पति के सामने वैसे रहना जैसे पहले थे, मैं नहीं चाहती कि उनको कुछ पता चले!’
मैं भी यही चाहता हूँ मेरी रानी!’ कहते हुए जेठ जी मुझे अपनी छाती से लगाकर चूमने लगे, तभी मेन डोर की घन्टी बज उठी और हम दोनों उछल पड़े, मैं बोली- आप जाकर दरवाजा खोलो, मैं अपने कमरे में जाती हूँ।
यह कहते हुए मैं अपने कपड़े लेकर भागी और रूम में पहुँच कर सीधे बाथरूम में घुस गई, जल्दी से फ्रेश होकर बाहर आई, फिर पूरी तरह तैयार होकर जब मैं रूम से निकली तो देखा कि जेठ जी से कोई मिलने आया है, उनके साथ का कोई अफसर था।
मैंने चाय नाश्ता ले जा कर टेबल पर रख दिया पर वह व्यक्ति बहुत हेन्डसम था, उसे देखते ही एक बार फिर मेरी चूत मचल उठी, मैं जितनी देर तक चाय निकालती रही उससे नयना चार करती रही।
वह भी कम नहीं था, वह भी जेठ जी से निगाह बचा कर मुझे घूर रहा था।
तभी किसी काम से जेठ जी अंदर रूम में गए कि वह एकाएक मेरी तारीफ कर बैठा- आप बहुत सुन्दर हो भाभी जी!
वह मुझे जेठ जी की पत्नी समझ रहा था शायद!
उसे जब चाय देने लगी तो उसका ध्यान केवल मेरी चूचियों पर था, मैं उसे ऐसा करते देख मुस्कुरा करके वहाँ से किचन में चली आई।
कुछ देर बाद मुझे जेठ जी ने बुलाया तो मैं वहाँ गई तो जेठ जी बोले- डॉली, आकाश कब आ रहा है? उसे फोन कर दो कि आज जल्दी आ जाए, आज मेरे अजीज दोस्त डिनर यहीं करेंगे!
‘जी भाई साहब!’ मेरे मुख से ये शब्द सुन कर वह मेरी तरफ प्रश्न वाचक निगाह से देखने लगा।
मैं वहाँ से जाने लगी, तभी जेठ जी ने कहा- डॉली, ये मिस्टर नायर है, इनका तबादला इसी शहर में हुआ है, अभी यह यहाँ नए हैं, जब तक इनका इंतजाम नहीं हो जाता, यहीं रहेंगे!
‘नायर जी, यह मेरे छोटे भाई की वाईफ है!’
मैंने नमस्ते कहा, उन्होंने भी नमस्ते कहा।
फिर मैं वहाँ से रूम में आकर पति को फोन कर के जानकारी दी, वे बोले- तुम सब्जी वगैरह लेकर खाना तैयार करो, मैं आता हूँ।
मैंने किचन में जाकर देखा कि क्या है और क्या नहीं है। फिर मैं भाई साहब से बोली- मैं सब्जी लेने जा रही हूँ।
मेरे जेठ बोले- तुम किचन में जाओ, मैं सामान ले आता हूँ।
मैं जेठ जी को बैग देकर चली आई, जेठ जी सामान लेने चले गए और मैं किचन का काम करने लगी।
इस समय मैं और नायर घर में अकेले थे, नायर की निगाह में मैं अपने लिए वासना के डोरे देख चुकी थी और यह भी महसूस किया था कि नायर एक रंगीन मिजाज के शख्स हैं, उनका व्यक्तित्व उनकी निगाह किसी को आकर्षित कर सकती है, मैं तो लण्ड चूत में लेते – लेते लण्ड की दीवानी ही हो चुकी थी, मेरा देर तक उनका देखना मेरी चूत कि आग भड़का रही थी, मैं इन्हीं ख्यालों में डूबी थी कि नायर ने मेरे पीछे से आवाज दी- मिस डॉली!
और मैं आवाज सुन कर चौंकते हुए पीछे हुई!
पर यह क्या? नायर बिल्कुल मेरे करीब था और मैं उससे पूरी तरह सट गई एक और झटका खा गई।
और जैसे ही मैंने दूर होना चाहा, मेरा पैर फिसला और मैं गिरने लगी पर मैं इस बार नायर की बाहों में थी, नायर ने मुझे पकड़ लिया था और मैं जैसे सुध बुध खोए नायर से चिपकी रही।
मेरा ध्यान तब टूटा जब नायर का लण्ड फुफकार कर मेरी चूत पर चुभने लगा, वैसे ही मुझे अपनी दशा का ध्यान आया, मैं नायर से छुट कर दूर खड़ी होकर गुस्से से बोली- नायर जी, यह क्या है? आप यहाँ क्या करने आए हैं? और कोई ऐसे पीछे खड़ा होकर पुकारता है? मैं हड़बड़ा गई, गिर जाती तो?
मैं जैसे ही चुप हुई, नायर बड़ी मासूमियत से बोला- मेरे रहते आप कैसे गिर जाती डॉली? पर मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं था,
मैंने दो तीन बार बाहर से ही पुकारा, पर आप पता नहीं किस ख्याल में डूबी थी, आपने सुना ही नहीं तो मुझे करीब आकर कहना पड़ा और आप मेरी वजह से डर गई, आई एम सो सॉरी डॉली! मुझे पानी चाहिए था!
कह कर नायर बाहर चला गया।
जब मैंने पानी ले जा कर दिया तो वह बोला- नाराज हो क्या? आप हो ही इतनी खूबसूरत कि हर कोई आपको किसी बहाने देखना चाहे मैं भी अपने को रोक नहीं पाया था!
मैं कुछ नहीं बोली और वहाँ से हटने लगी।
तभी उसकी एक आवाज और कान में पड़ी- तुम बहुत हॉट हो… पर मेरी किस्मत में कहाँ?
ये शब्द बोल कर नायर ने छुपे तौर पर सब जाहिर कर दिया, अब तो मुझे पूरा मौका मिल गया उसका जवाब देने का- नायर साहब, लक्ष्य पाने से पहले हार मान लेने वाले का किस्मत साथ नहीं देती… सफलता पाने के लिए प्रयास किया जाता है!
मैं वहाँ से चली आई, तब तक जेठ जी सामान लेकर किचन में आ गए और बैग मुझे देते हुए बोले- जान, रात में आ जाना, तुमको चोदने का बहुत मन कर रहा है, एक बार तुम्हारी बुर चोदने से तुमको चोदने की लालसा बढ़ गई है। मैं रात को इंतजार करूँगा।
मैं कुछ कहती, जेठ जी बाहर चले गए, मैं मन मार कर खाना तैयार करने लगी, पति भी आ चुके थे, सबने एक साथ खाना खाया और नायर की सोने की व्यवस्था जेठ जी के रूम में की गई।
मैं मेन गेट को लॉक करके जैसे ही रूम में जा रही थी, मुझे जेठ जी एक तरफ ले गए और बोले- मैं इंतजार करूँगा, तुम आना!
‘पर नायर है, कैसे होगा?’
जेठ जी बोले- तुम चुपचाप आधी रात को आना, हो जाएगा!
और जेठ जी चले गए।
मैं अपने रूम जाकर पूरी तरह नंगी होकर पति के बगल में लेट गई, पति तो मेरी चूत पेलने के लिए पहले से ही बिना कपड़ों के लेटे थे।
फिर हम लोग एक दूसरे से गुत्थम गुत्था होकर चूमने चाटने लगे, मैं पति का लण्ड मुँह में लेकर चूसने लगी और पति एक हाथ से मेरी चूत मसकते हुए लण्ड लालीपाप की तरह चुसवा रहे थे।
एकाएक पति ने कहा- लग रहा है कि किसी ने तुम्हारी चूत चोदकर गरमी निकाल दी है?
उनके इतना कहने से मैं डर गई पर बात बना कर बोली- आपके सिवा है ही कौन जो मेरी चूत की गरमी निकाले?
उसी समय पति ने मुझे नीचे लेकर मेरी चूत थोड़ी चाट कर मेरी बुर पर सीधे चढ़ाई कर दी, मेरी बुर पर लण्ड रखकर एक ही बार में लण्ड मेरी बुर में पेल दिया।
और मैं सोचने लगी कि मेरी पति से चुदाई के बाद जेठ से फिर चूत चुदेगी और वो भी नायर के रहते!
तो इस सोच से मैं ज्यादा गर्म होकर बुर उछालते हुए ‘आहह्ह सीसीसीइइइ आहह्ह्ह… चोद मेरे सनम, दिन की अधूरी चुदाई को मेरी चूत चोद कर पूरा करो… आहह्ह्ह ले पेल मेरी बुर… आहह्ह्ह!
और पति भी खूब गर्मजोशी से मेरी चूत पर शॉट लगा रहे थे और मैं बुर उठाकर पूरी कोशिश कर रही थी, लण्ड मेरी चूत की पूरी दीवार भेद कर मेरी बुर को चोद रहे पति भी मेरी चूची हाथों से गूंथते हुए मेरी चूत पर थाप पर थाप लगा रहे थे और मैं हर थाप को यही सोच रही थी कि यह जेठ जी का, अब नायर का थाप है!
मेरी चूत लण्ड खाते खाते भलभला कर झड़ने लगी- आहह्ह्ह सीइइइ उइइइ मम्म्म्मा आहह्ह्ह!
और मैं पति को भींच कर झड़ते हुए बुर पर लण्ड के धक्के खाती रही।

तभी पति ने बुर से लण्ड बाहर खींच कर मेरे मुँह में दे दिया और मैं लण्ड चाटने लगी और लण्ड मेरी मुँह में ही फायर हो गया।
पति ने झड़ते हुए लण्ड को गले तक सरका कर के वीर्य पूरा मेरे गले से नीचे कर दिया!!
पति मेरे मुँह में झड़ने के बाद बेड पर सोकर अपनी सांसों को नियंत्रित करने लगे, मैंने पति के वीर्य की एक बूंद को भी बर्बाद नहीं की, सब चाट कर साफ करके पति से चिपक कर सोने लगी।
कुछ देर बाद मैं एक बार फिर पति के लण्ड से खेलने लगी पर पति मेरी पहली चुदाई से थक चुके थे, बोले- जान सो जाओ, मुझे नींद आ रही है!
‘प्लीज जानू, एक बार और मेरी चूत चोदो, मैं एक बार और चुदना चाहती हूँ।’
‘नहीं मेरी जान, मुझे जोर की नींद आ रही है! प्लीज सो जाओ!’
मैं पति को दोबारा चोदने के लिए जानबूझकर कर कह रही थी, मुझे भी पति से चूत चुदवाने का मन नहीं था, मुझे तो जेठ जी का
लण्ड भा गया था, मैं भी पति के ना कहने पर थोड़ा नाराजगी जाहिर करके सोने की एक्टिंग करने लगी।
काफी रात बाद मैं उठकर बाथरूम गई और सुसू करने लगी।
शर्र… शर्र… की तेज आवाज जब मेरे कानों में पड़ी तो मेरी सेक्स भावना जागने लगी और मैं सुसू करने के बाद बुर को हाथ से सहलाते हुए बाहर निकली और नाईट गाउन पहन कर पति को देखा, वो गहरी नींद में सोए थे, मैं खुली चूत लिए- बिना ब्रा, पेंटी के ही दरवाजे की तरफ बढ़ी और सावधानी के साथ बाहर निकल कर दरवाजे के बाहर से बंद कर के मैं जेठ के रूम की तरफ चली गई, और मेरा हाथ जैसे ही दरवाजे पर पड़ा दरवाजा खुलता चला गया।
कमरे में एकदम घुप अंधेरा था कुछ दिख नहीं रहा था, पर मेरा घर होने के कारण मैं जानती थी कि कौन सी चीज कहाँ पर है और रूम में जेठ के और नायर के सोने की व्यवस्था अलग की थी, चारपाई पर नायर जी को और बेड पर जेठ जी!
वैसे भी जेठ रोज बेड पर सोते हैं !
मैं बेड की तरफ बढ़ी, शायद जेठ जी मेरा इंतजार करते सो चुके थे, मैं भी उनके पास जाकर लेट गई, जेठ जी भी पूरे कपड़े निकाल कर लोअर पहन कर सो रहे थे, मैं बड़ी सावधानी से बिना कोई आहट किए लोअर के ऊपर से जेठ जी के लण्ड को सहलाते हुए जेठ जी को
चूमने लगी।
जेठ जी नींद से जाग चुके थे पर अपनी तरफ से कोई हरकत नहीं कर रहे थे। मैं पागलों की तरह चूत जेठ जी की जांघ से रगड़ने लगी और फुसफुसा कर बोली- क्या हुआ मेरे जानू? गुस्सा हो गए क्या? देखो ना तुम्हारी बुर कितनी प्यासी है, इसको आपका लण्ड चाहिए जान, मेरी चूत में लण्ड डाल कर मेरी चुदाई करो, देखो ना मैं सबको छेड़कर इतनी रात बुर पेलवाने आई हूँ, चोदो ना आहह्ह जानू, लो मेरी छातियाँ पियो!
और मैंने अपना एक स्तन जेठ जी के मुँह में दे दिया।
जेठ जी खींच खींच कर चूसने लगे और मैं जेठ के बालो को सहलाते हुए चूची चुसाई करती रही।
तभी जेठ ने मुझे पलट कर मेरे ऊपर आकर बैठ गए।
मैं तो पहले से ही पूरी नंगी थी, बस एक गाउन पहने थी, जेठ जी मेरी चूची मसलते हुए अपना मुँह मेरी चूत पर लगा कर मेरी चूत का रसपान करने लगे।
और जैसे ही जेठ के होंठ मेरी प्यासी चूत पर गए, मैं मचल उठी ‘आहह्ह सीइइइ’ मेरी मादक सिसकारी कुछ तेज निकल गई, जेठ जी ने अपना हाथ मेरे मुँह पर रख कर इशारा किया कि उनके और मेरे सिवा कोई और है!
और फिर मेरी चूत को चपड़ चपड़ चाटने लगे और मैं चूत उठकर चटवाती रही।
मैं सिसकारियों को अपने होठों से दबाकर जेठ से अपनी बुर की सन्तरे की सी फांकों चुसवा रही थी।
तभी जेठ चूत चाटना छोड़कर नीचे खड़े हो गए और मुझे खींच लण्ड को मेरे मुंह में दे दिया, मैं मुँह खोल कर जेठ के लण्ड के सुपारे पर जीभ फिराते हुए लण्ड पूरे मुँह में भरकर आगे पीछे करके चूसती रही, कभी अंडे को चाटती तो कभी सुपारे को और कभी पूरा लण्ड मुँह में ले लेती और जेठ जी मुँह में ही धक्का लगा देते, जैसे मेरा मुंह नहीं चूत हो!
और मैं ‘गुग्ग्ग्ग्गुगू’ करते हुए लण्ड चूसती रही। लण्ड चाटते हुए मुझे जेठ का लण्ड कुछ मोटा लग रहा था।
और तभी जेठ ने अपना लण्ड मेरे मुँह से निकाल कर मुझे बेड पे लिटा कर मेरी टाँगें खोल कर और उनके बीच बैठकर अपने बाबूराव को
मेरी गर्म चूत पर रखकर ऊपर नीचे करते हुए रगड़ने लगे।
मैं सिसयाते हुए बोली- आहह्ह्ह सीईई मेरे चूत राजा, आपका लण्ड तो मेरी एक ही चुदाई करके फ़ूल कर मोटा हो गया है।
पर जेठ जी ने मेरी बातों पर ध्यान दिये बिना मेरी चूत को चौड़ा कर के एक धक्का मारा और आधा लण्ड मेरी गर्म चूत में घुसा दिया।
‘आहह्ह सीइइ उउफ्फ़’ करते हुए मैं अपने चूतड़ उछालने लगी और जेठ ही ने एक और तेज शॉट मार कर अपना पूरा लण्ड अंदर कर दिया और मैं आहह्ह कर उठी।
पर जेठ जी ने मेरे मुँह पर हाथ रख दिए और मेरी आहह्ह अंदर ही रह गई और जेठ जी पेलाई चालू करके मेरी बुर की नस नस को चटकाते हुए मेरी बुर चोदते हुए जब अपनी बाहों में लिया तो मुझे कुछ अजीब सा लगा पर मुझे चुदाई के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा
था।
जेठ जी मेरे गालों को चूमते हुए लण्ड बुर में पेले जा रहे थे, मेरी चूत जेठ जी के लण्ड के हर शॉट के साथ पानी फेंक रही थी और मैं मदहोश होकर अपनी चूत उठा उठा कर चुदवाने लगी, मेरे हिलते उरोजों को जेठ जी बेरहमी से मसलते हुए लम्बे-लम्बे धक्के मारते हुए मेरी चूत को चोदते जा रहे थे और मैं ‘आहह्ह्ह सीई चोदो मेरे राजा… अब तो मैं आपकी बीवी बन गई हूँ, चोद चोद कर मुझे अपनी रखैल बना लो आहह्ह्ह आआहहह चोद बहू की चूत… ले मेरे राजा मेरी चूत चोद आहह्ह्ह याआआ राजाआ और घुसाआ अपनाआआ लण्ड’
और जेठ जी बिना कुछ बोले मेरी चूत चोदे जा रहे थे।
और फिर मुझे घोड़ी बना कर मेरी चूत में लौड़ा पेलने लगे, मैं हर शॉट पर करहाते हुए चूत मरवाती रही।
तभी एकाएक मेरी चूत पानी छोड़ कर झड़ने लगी और मैं घोड़ी बनी चूत में जेठ जी के लण्ड से चुदाते हुए जांघें भींचकर झड़ने लगी ‘आहह मैं गईइई आहह्ह सीईईई उफ्फ्फ…’
और मेरी झड़ती बुर पर जेठ के लण्ड के झटके बढ़ते गए और वो भी पंद्रह बीस शॉट मारते हुए एक शॉट घोड़े की तरह लगा कर हिनहिनाते हुए अपना बीज मेरी चूत में बोने लगे।
घोड़ी की चूत चुद कर शान्त हो गई थी, मेरा घोड़ा भी झड़कर मेरी चूत में आखिरी बूंद भी छोड़कर बेड पर लेट गया।
फिर मैं उठी और जेठ के लण्ड को चाट कर साफ किया और गाऊन पहन कर जेठ का माथा चूम कर अपने रूम में जाकर पति से चिपक कर सो गई !!
रात में जेठ से चुदने का नतीजा सुबह मेरी नींद पति के जगाने पर खुली.. और मैं सीधे बाथरूम में घुस गई और नहाकर फ्रेश होकर मैं रसोई में चली गई।
क्योंकि पति को ऑफिस जाने के लिए देरी हो रही थी और उधर जेठ के लिए भी चाय-नाश्ता बनाना था।
तभी जेठ जी किसी काम से रसोई में आए.. पर वह जैसे मुझसे गुस्सा हों.. क्योंकि वह कुछ बोल नहीं रहे थे।
मैं बोली- क्या हुआ मेरे जानू.. रात में तो खूब मस्ती से मेरी..
तभी मेरे नजदीक आकर जेठ जी मेरी बात को बीच में काटते हुए बोले- मत कहो मुझे जानू.. रात को मैं इन्तजार करते-करते थक गया और फिर ना जाने कब मुझे नींद आ गई.. पर तुम तो आई ही नहीं?
‘ओ माई गाड.. फिर मुझे रात में किसने चोदा.. और अगर जेठ जी मेरी बात को रोककर यह बात ना कहते.. तो मैं यही बोलने जा रही थी कि रात में मेरी चूत चोदकर फुला दिए हो तो.. अब क्यों मुँह फुलाकर घूम रहे हो.. और अगर मैं ऐसा बोल देती तो क्या होता.. यानि मेरी बुर को नायर ने चोदा.. साला बोला भी नहीं बस मेरी चूत चोदता रहा।’
फिर मैं बात बनाते हुए बोली- भाई साब.. मैं बस डर के मारे नहीं आई.. कमरे में नायर जी भी सो रहे थे.. जाग जाते तो क्या होता? और मैं यह भी तो नहीं जानती थी कि आप कहाँ सोए थे।
मैं यह जानबूझ कर बोली ताकि शक को कन्फर्म कर लूँ..
‘मैं तो वहीं दरवाजे के पास ही चारपाई पर सोया था कि तुम को चोदकर इधर से ही बाहर निकाल देता.. बिस्तर की तरफ जाना ही नहीं पड़ता.. इसलिए मैंने नायर को बिस्तर पर सुला दिया था।’
मैं बात को बनाकर बोली- लो अच्छा ही हुआ जो मैं नहीं आई.. नहीं तो आप की जगह नायर मेरी चूत चोद देता.. मैं तो बिस्तर पर ही जाती और वहाँ तो नायर थे।
अब मैं कैसे कहती कि मेरी चूत की चुदाई आप के गफलत में नायर ने कर दी है।
जेठ- हाँ यह तो मैं सोचा ही नहीं और मैंने बताया भी नहीं कि मैं कहाँ सो रहा हूँ.. तुम ठीक नहीं आई.. नहीं तो नायर चोद देता और मेरी तुम्हारी पोल खुल जाती.. कि मैं तुमको चोदता हूँ।
मैं मन ही मन बड़बड़ाई कि पोल और चुदाई दोनों खुल गई है.. बचा ही क्या है..
‘जी भाई साब.. मैं इसी लिए नहीं आई.. आज आप एक काम कीजिए.. आज आप बाहर सोना और नायर जी को अन्दर सुलाना.. कोई डर भी नहीं रहेगा और हम लोग खुल कर चुदाई का मजा भी ले लेगें..’
‘ओके मेरी जान.. आज मैं बाहर ही सोऊँगा..’ यह कहते हुए जेठ जी बाहर निकल गए।

मैंने नाश्ता टेबल पर लगा दिया, पति पहले से ही बैठे थे.. तभी जेठ और नायर भी आ गए।
मैंने नाश्ता लगाते हुए गौर किया कि नायर कुछ ज्यादा ही खुश था..
सब लोगों ने नाश्ता कर लिया और पति के जाने के बाद नायर जेठ से निगाह बचाकर मेरे करीब आकर बोला- डॉली जी रात के लिए थैंक्स..
और फिर नायर और जेठ दोनों किसी काम से बाहर चले गए।
मैं घर में बैठ कर रात की नायर की चुदाई को याद कर रही थी कि ये साला नायर तो मस्त है.. उसे देख कर तो मेरी बुर चुदने के लिए सरसरा रही थी.. पर मैं नायर का लण्ड इतना जल्दी बुर में घुसवा लूँगी.. यह मैंने सोचा तक नहीं था।
नायर ने मेरी बुर की तो मस्त चुदाई की.. पर यह ठीक नहीं हुआ। वह मेरे और जेठ के सम्बन्ध को जान चुका था कि मैं उससे नहीं जेठ से चुदने गई थी.. गफलत से उससे चुद गई।
अब देखो नायर करता क्या है?!
मैं कोशिश करके उसे यह बताना चाहूंगी कि मैं तुमको देख कर रह नहीं पाई और रात चुदने चली आई.. यानि नायर जी आपके लण्ड से मैं खुद चुदी हूँ.. मेरा जेठजी से कोई सेक्स सम्बन्ध नहीं है।
बस यही सब सोचते हुए मुझे हल्की झपकी लग गई।
घन्टी की आवाज सुन कर उठी और गेट खोला तो जेठ और नायर थे, नायर मुझे देख कर मुस्कुराते हुए अपने होंठ पर जुबान फेर रहा था।
मैं वहाँ से हट गई और लंच तैयार करके जेठ और नायर को खाना खिलाकर फ्री होकर अपने कमरे में बैठ कर मोबाइल पर गेम खेल रही थी.. तभी आहट से मेरा ध्यान दरवाजे की तरफ गया।
नायर अन्दर आ रहा था.. वह सीधे मेरे बिस्तर के पास आकर मुझे एक पैकेट थमाकर बोला- डॉली जी.. यह आपका गिफ्ट है और हाँ आज रात मैं फिर इंतजार करूँगा।
मैंने आपके जेठ से बोल दिया कि बाहर मेरा बेड लगा देना.. मैं अकेला रहूँगा.. आप आएंगी ना.. मैं इंतजार करूँगा..
यह कहकर नायर बाहर चला गया.. मैंने पैकट खोल कर देखा कि दो सैट ब्रा-पैन्टी के थे, बिल्कुल लेटेस्ट डिजाइन के थे और साथ में एक कागज था जिस पर लिखा था- आज रात अपनी चूचियाँ और चूत पर.. इसमें से कोई एक जरूर पहन कर आना.. आई लव यू.. आपकी चूत का दीवाना- नायर।
मैं बस मुस्कुरा दी..
रात सब खा-पीकर जब सोने जाने लगे और मैं लाईट ऑफ कर रही थी.. तभी मेरी बगल से जेठ जाते हुए बोले- मैं कमरे में रहूँगा.. नायर बाहर रहेगा..
वे कहते हुए चले गए.. मैं कैसे कहती कि नायर सब बता चुका है और आपकी बहू की बुर पेल चुका है और आज रात दुबारा अपने लण्ड को आपकी बहू की बुर में डालना चाहता है।
मैं भी कमरे में गई तभी पति का फोन आया- मैं आज नहीं आ पाऊँगा.. तुम मेरा इन्तजार मत करना।
वे बोले और फोन रख दिया।
मैं कुछ देर बाद जेठ के कमरे में जाकर बोल आई- मैं आऊँगी.. पर आप अन्दर-बाहर मत करना.. नहीं तो नायर को शक होगा।
मैं इतना कहकर चली आई और आराम करने लगी।
अब मैं यही सोच रही थी कि पहले किसके पास जाऊँ.. क्या नायर से फिर से चुदना ठीक रहेगा?
यही सोचते हुए मुझे ना जाने कब नींद आ गई। फिर अचानक मेरी नींद खुलने का कारण बना किसी का हाथ… जो मेरे जिस्म पर चल रहा था।
‘कक्क्क्कौन.. हह्ह्ह्ह्है?’
‘मम्म्मैमैं.. ह्ह्ह्हूं.. नायर..’
‘अरे आप.. मेरे जेठ जी ने देख लिया.. तो..?’
‘नहीं मेरी रानी.. वह सो रहे हैं!’ और मेरी नाईटी ऊपर करके मुझे चूमने लगे और मैं भी कुछ देर बाद नायर का साथ देने लगी।
नायर ने मेरी नाईटी को निकाल दिया।
मैंने नायर के द्वारा लाए हुए ब्रा-पैन्टी को पहन लिया था। नायर भी अपने कपड़े उतार कर और अंडरवियर को भी निकाल कर एक गमछा लपेट कर आया था।
वह गमछा भी मेरे साथ मस्ती करते हुए छूट गया और नायर का लण्ड बाहर झूलने लगा। मैं नायर के मोटे-तगड़े लण्ड को पकड़ कर मुठियाते हुए मुँह में भर कर चूसने लगी, काफी देर तक मैं उसका लवड़ा चूसती रही।

तभी नायर ने लण्ड मुँह से निकाल कर मुझे बिस्तर पर लिटा कर मेरी जाँघों के बीच मेरी चूत पर मुँह रख कर मेरी चूत को चूम लिया।
‘आहह्ह्ह…’
नायर ने मेरी दोनों टांगों को कंधे पर रख लिया और वो अपनी जीभ लपलपाते हुए मेरी चूत में मुँह मारने लगा, अगले ही पल मेरी चूत की फांकों को कस कर चूसने लगा।
मैं नायर की चूत चटाई से गर्म होकर सिसकारियों को निकालते हुए चिल्लाने लगी- आआह्ह्ह.. मेरे राजा.. यसस्स स्स्सस्स.. चूसो मेरी चूत को अहह.. साले नायर.. भेनचोद.. चाट मेरी चूत को.. पूरा चाट.. इसको.. लवड़े.. आहह सीसीसीइइ.. उंउंउंउआह्ह्ह्ह..
और नायर मेरी चूत की फांकों को अलग करके मेरी बुर में जीभ डाल कर मेरी चूत की प्यास को बढ़ाते हुए काफी देर तक मेरी बुर की चुसाई करता रहा।
फिर अपने लण्ड के सुपारे को मेरी बुर पर लगा कर और पैरों को अपने कंधों पर रख कर.. शॉट लगाते हुए मेरी बुर में अपना पूरा लण्ड जड़ तक डाल कर मेरी बुर चोदने लगा।
मैं भी नायर के हर शॉट पर बस कराह रही थी ‘आह.. उई.. आह.. ऊंऊंह… ऊंऊएस्स्स्स्स.. आह..’
मैं सीत्कार करती रही और नायर मेरी चूत की धज्जियां उड़ाता रहा.. हर शॉट पर मेरी छातियां भींच लेता।
नायर का लण्ड मेरी चूत में फूल गया था और नायर हर बार स्पीड बढ़ाकर दुगनी ताकत से लण्ड को मेरी बुर में पेल रहा था। मेरी हरामिन बुर भी लौड़े के शॉट खाकर पानी-पानी हो रही थी, इसी पानी में मेरी कामवासना का पानी भी करीब आता रहा।
अब तो मैं भी ‘आहें’ भरने लगी ‘आहह्ह्ह.. मजाआाआअ.. आह..सीईई.. और पेलो.. साले सांड.. लो मारो मेरी चूत..’
तभी नायर ने चुदाई का आसन बदल लिया। नायर ने बिस्तर के नीचे उतर कर मुझे बिस्तर के किनारे खींच लिया और पलट दिया। अब वो मेरी बुर में पीछे से लण्ड घुसाकर बुर चोदने लगा।
मेरी बुर एक आखिरी शॉट पर ही ‘फलफला’ उठी और मैं चादर भींच कर नायर के शॉट पर चूत दबाते हुए उसके लण्ड पर झड़ने लगी ‘आहसीईई.. आहह्ह्ह्.. मैं गई..’
पर नायर भी मेरी झड़ी हुई चूत की चुदाई काफी देर तक करता रहा।
फिर एक दौर ऐसा आया.. जब नायर मेरी पीठ से सट कर मेरी चूत में झड़ने लगा ‘ले डॉली.. साली छिनार.. आहह्ह्ह्.. मैंने भी तेरी चूत में अपना बीज डाल दिया.. आह्ह..’ वो यह कहकर हाँफने लगा।
नायर मेरी धकापेल चुदाई करके और मेरी बुर को वीर्य से भर दिया। अब वो निढाल होकर मेरी बगल में लेट गया और मेरे चूतड़ों को सहलाते हुए बोला- जानेमन वाकयी आप एक गरम और जबरदस्त चुदक्कड़ माल हो.. अगर आप इजाजत दें तो आप की करारी गदराई गांड को भी चोद लूँ.. एक बार फिर आप के हुस्न के नशे को जज्ब करना चाहता हूँ।
‘अभी नहीं.. क्योंकि वैसे ही आपने मेरी चूत चोदकर मुझे पस्त कर दिया.. और अन्दर जेठ भी हैं… अगर उन्होंने हमें एक साथ देख लिया.. तो मेरे घर पर आपकी यह आखरी रात साबित होगी.. और फिर आप मेरे हुस्न के दीदार के लिए तरसते रह जाओगे।’
मैंने बिस्तर से उठकर नायर को जबरदस्ती कमरे से निकाल कर नायर को चेतावनी दे दी.. कि अगर हर रात और दिन मुझे भोगना है.. तो अब मेरे कमरे में मत आना और जब मैं इशारा दिया करूँ.. तभी मेरे करीब आना और जाकर अब सो जाओ।
यह कहते हुए मैं अन्दर से दरवाजा बंद करके साँसों को नियंत्रित करने लगी। मैंने नायर को जानबूझ कर यह कही थी.. क्योंकि अभी मुझे जेठ के पास जाना था और अगर नायर से ऐसा ना कहती तो हो सकता था कि वह फिर कमरे में आ जाता और मुझे ना पाकर खोजता और मैं जेठ से चुदते पकड़ी जाती..
मैं कुछ देर आराम करने के बाद कमरे से निकली और नायर के करीब जाकर देखा.. नायर जाग रहा था। मुझे देख कर बोला- क्या जान.. चूत फिर चुदने को फड़क रही है क्या?
मैं हड़बड़ा उठी.. पर बात बना कर बोली- मैं यह देखने आई थी कि कुछ चाहिए तो नहीं.. और इधर की लाईट भी जल रही थी।
यह कहते हुए मैं स्विच ऑफ करके ‘गुडनाइट’ कहकर अपने कमरे की तरफ चल दी.. पर कुछ आगे जाकर जेठ की तरफ घूम गई।
मैं यह सब जान कर कि नायर को भ्रमित करने को कर रही थी। मैं जेठ के सामने वाले दरवाजे से न जाकर मैं गलियारे की तरफ बढ़ गई.. क्योंकि जेठ वाले कमरे में दो दरवाजे लगे थे। एक सामने से.. दूसरा गलियारे की तरफ से खुलता था.. जो बाहर से ही बंद था। जिसे मैं आसानी से खोल कर बिना आहट अन्दर जा सकती थी।
यही मैंने किया भी.. मैं अन्दर पहुँच कर दरवाजा बंद करके बिस्तर की तरफ बढ़ गई। मैंने अंधेरे में टटोल कर देखा तो जेठ बिलकुल नंगे लेटे थे और शायद सो भी गए थे क्योंकि मेरे छूने से कोई हरकत नहीं हुई। मैं सीधे उनके मुरझाए लण्ड को मुँह में भर कर चूसने लगी।
मेरे ऐसा करने से जेठ जी उठ गए.. और मेरे सर पर हाथ रखकर मेरा सर अपने लण्ड पर दबाते हुए बोले- आ गई डॉली.. आह.. मेरी जान.. मैं तो तुम्हारी इसी अदा का तो गुलाम हूँ.. तुम किसी एक के लिए नहीं हो.. तुम्हारी चूत और हुस्न केवल मेरे छोटे भाई के लिए ही नहीं बना है.. यह मेरे जैसे हुस्न के जौहरियों के लिए भी है.. इसे लोग जितना भोगेंगे.. उतना ही निखरेगी..
मैं उनका लण्ड चूसते हुए जेठ की बात सुन रही थी, मैं सुपारे को खींचकर चूसते हुए लण्ड मुँह से निकाल कर बोली- आप तो नाहक ही मेरी तारीफ कर रहे हैं.. क्या मैं सच में इतनी मस्त हूँ?
‘यस मेरी जान.. तुम्हारी हर एक अदा जान मारने के लिए काफी है..
‘ओह.. तो देखिए.. अब मेरी हॉट अदा..’ और मैं खड़ी होकर जेठ के मुँह को खींच कर अपनी चूत पर लगाकर फांकों को फैलाकर बोली- लो.. इसे चाटो..

मेरा इतना कहना और करना जेठ के लिए जैसे खजाना खुलना जैसा हो गया और वो मेरी चूत को चूसने-चाटने लगे।
जेठ जी मेरी बुर को पूरी तरह से मुँह में भरकर चूस रहे थे। कुछ देर चूसने के बाद मेरी बुर के ऊपर से चूमते हुए मेरी नाभि को चाटते हुए मेरी चूचियों के निप्पलों को चाटते हुए मेरे होंठों को मुँह में लेकर अपने जीभ को मेरी मुँह में भर दिए। मुझे जेठ के मुँह का स्वाद कुछ कसैला सा लगा।
‘यह कैसा स्वाद है?’
मेरे ध्यान में आते ही मेरे दिल कि धडकन बढ़ गई.. कहीं जेठ भी इस स्वाद को समझ ना चुके हों.. और समझ गए हों.. अभी वे पूछेंगे तो मैं क्या कहूँगी?
तभी उन्होंने मेरा किस करना छोड़ दिया.. और बोले- डॉली क्या हुआ.. कहाँ खोई हो?
‘कहीं नहीं..’ मैं कहते हुए जेठ के होंठ को किस करने के लिए आगे हुई.. तभी जेठ जी बोल उठे- कैसा स्वाद है मेरे होंठों का.. और मुँह का.?
मैं उनके ये पूछते ही सन्न रह गई.. क्या कहूँ..?
‘अच्छा है.. जैसा सेक्स में होता है..’ मैं यह एक ही सांस में बोल उठी।
पर शायद जेठ जी संतुष्ट नहीं हुए.. जेठ जी बोले- मैं बताऊँ.. यह मर्द के वीर्य का स्वाद है.. सही कहा ना मैंने?
‘नहीं.. ऐसा तो नहीं है.. आपका शक गलत है.. कौन चोदेगा मुझे?
‘शायद नायर ने चोद दिया हो?’
‘यह आप क्या कह रहे? मैं थोड़ा गुस्से में बोल उठी।
‘ऐसा कुछ नहीं है.. मैं जाती हूँ यहाँ से..’ ये कहकर मैं छूटने की कोशिश करने लगी।
‘कहाँ जाओगी मेरी जान.. क्या फिर नायर से चुदने का मन है क्या?’
मैं बस चुप हो गई.. कुछ नहीं बोली।
तभी जेठ ने कहा- मैंने सब देख लिया है जब नायर तेरी बुर चोद रहा था.. डॉली यह ठीक नहीं कि घर की इज्जत बाहर वाले के हवाले कर दी जाए। वह क्या सोचता होगा हम लोगों के विषय में?
तभी मुझे बोलने का मौका मिल गया- सही कह रहे हैं आप.. कल रात मैं आई और बिस्तर पर गई आपसे चुदने.. और चोद नायर ने दिया.. मुझे जानकारी सुबह हुई जब आपने पूछा कि रात क्यों नहीं आई तो मेरे होश ही उड़ गए कि फिर रात में कौन ने मेरी बुर की चुदाई की.. पर मैंने आपसे यह बात छिपा ली लेकिन नायर यह जान चुका था कि मैं आपसे चुदती हूँ और वह मुझे बोला कि डॉली मैं आपके राज को राज रख सकता हूँ.. अगर तुम चाहो.. मैं उससे बोली कैसे तो नायर ने बोला कि जब मैं चाहूँ तुमको मेरे लण्ड के नीचे आना पड़ेगा.. नहीं तो मैं आप के पति से सब बता दूँगा..
मैं पहले तो डिसाईड नहीं कर पाई.. लेकिन वह अभी कुछ देर पहले मेरे कमरे में आकर पूछने लगा कि क्या सोचा है.. तो मैं कुछ नहीं बोली.. तो नायर को लगा कि मैं उसके लण्ड के नीचे चूत देने को तैयार हूँ..फिर नायर ने मेरी चुदाई की.. जिसमें ना चाहते हुए मैं भी साथ दे रही थी।
अब आप ही बताओ अगर नायर से नहीं चुदती तो क्या होगा.. आपको पता ही है.. आपको यहाँ से जाना होगा सो अलग.. और अपने भाई से ऑख नहीं मिला पाते इसी लिए मैंने चूत देकर नायर का मुँह बंद कर दिया। अगर गलत है तो अब नहीं जाऊँगी।
मैंने जानबूझ कर बात को बढ़ाकर बताया ताकि मेरे और नायर के सेक्स सम्बन्ध को जानकर जेठ नायर को घर से निकाल देते। मैं जेठ की निगाह में मैं गिरना नहीं चाहती थी।
मेरी बातों का जेठ पर गहरा प्रभाव पड़ा, वे बोले- सॉरी डॉली.. मैं गलत समझा तुमको.. तुम्हारा कोई दोष नहीं है.. तुमको मैंने ही नायर के रहते बुलाया था जो कि नहीं बुलाना चाहिए था। तुम तो आई थी मुझे अपने बुर का सुख देने.. पर नायर ने तुम्हें चोदकर सुख ले लिया और मेरी तुम्हारी चुदाई की पोल भी जान गया।
मैं बोली- लेकिन आप यह बात नायर से मत करना कि तुमको भी जानकारी है, आप अनजान बने रहना..
‘ओके मेरी डार्लिंग…’
और फिर मैं एक बार जेठ के आगोश में थी। जेठ मेरी योनि को कुचलकर अपनी वासना को शान्त करना चाहते थे।
मैं भी एक बार फिर गरम हो कर पनियाई चूत को जेठ के लौड़े से रौंदवाने के लिए जेठ से लिपट कर अपनी छाती को जेठ के मुँह में देकर और हाथ से लण्ड को सहलाते हुए बोली- मैं आपकी हूँ.. आपके लिए कुछ भी कर सकती हूँ.. चाहे इसके लिए कितने भी नायरों से क्यों ना चूत चुदानी पड़े।
तभी जेठ ने भी मेरी छाती की घुंडी को जोर से मसक दिया और मैं सीतकार उठी- आहह्ह्ह्… आहसीईई..
मैं भी खड़े-खड़े ही जेठ के लण्ड को पकड़ कर मस्ती भरी सिसकारी लेकर चूत पर रगड़ते हुए फनफनाते लौड़े का आनन्द ले रही थी।
जेठ जी मेरी चूचियाँ और चूतड़ों को दबा सहला रहे थे, वे बोले- नायर से चूत चुदाने पर कैसा लगा?
‘नायर से चुदने में बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा.. मैंने तो बस बात को आगे बढ़ने से रोकने के लिए उसके लण्ड से अपनी चूत का सामना कराया था.. नहीं तो नायर के लण्ड पर मैं मूतती तक नहीं..’
तभी जेठ बोल उठे- लेकिन जानू मैं जब खिड़की से देख रहा था.. तो लग रहा था कि तुम भी पूरी तरह अपनी चूत को नायर को देकर खुलकर नायर के लण्ड से अपनी चूत की ऐसी-तैसी करा रही हो?
‘मैं बस उसका दिल रखने के लिए ऐसा कर रही थी और मैं खुल नायर के लण्ड से इसलिए खेल रही थी ताकि जल्दी उसका लण्ड वीर्य उगले और उससे पीछा छुड़ा कर मैं आपके पास आकर आपके मस्त लौड़े से अपनी बुर का कचूमर निकलवाऊँ।’
जेठ जी ने इतना सुनते ही मेरी चूचियों को कस कर भींच लिया।
‘आहह्ह.. सिईईई.. थोड़ा धीरे हार्न बजाओ ना.. उफ्फ्फ्फ आहसी!’
मैं भी जेठ जी के लौड़े से खेलती हुई बात कर रही थी।
तभी जेठ मेरी चूत पर हाथ फेरते हुए मुझे लेकर बिस्तर पर बैठ गए और मेरे अधरों का रसपान करने लगे। मैं बस जेठ की चौड़ी छाती से चिपकी हुई जेठ द्वारा किए जा रहे यौन आनन्द का सुख ले रही थी।
फिर जेठ ने मुझको अपनी गोद में लिटा लिया और झुक कर मेरे नाभि वाले हिस्से पर अपने तेज दांत गाड़ते हुए मेरी नाभि को चाटने लगे.. ‘आहह्ह्ह्.. उफ्फ..’ करते हुए मैं बस जेठ की गोद में मचल रही थी।
‘उइअम्म्मा.. सिइइइईई.. क्या आज आपका इरादा मेरी जान लेने का है.. जानू मेरी चूत भभक रही है.. आपके लौड़े को अन्दर लेने के लिए.. और आप मुझे केवल तड़पा रहे हो..’
‘मेरी जान, तुम्हारे जिस्म को बस चूमने चाटने का मन कर रहा है.. और वैसे भी अभी रात तो पूरी बाकी है मेरी जान..’ कहते जेठ जी मेरी नाभि को चाटते हुए मेरी बुर से लेकर नाभि तक जीभ घुमा रहे थे।
जब उनकी जीभ मेरी बुर तक पहुँचती तो मैं कमर को और ऊपर उठा रस छोड़ती बुर को ज्यादा से ज्यादा उनकी जीभ पर रगड़ना चाहती.. पर जेठ जी मेरी फड़कती योनि को तड़पाने की कसम खा हुए थे।
तभी जेठ धीरे-धीरे चूमते हुए.. जब वो मेरी चूत तक पहुँचे और मेरी चूत पर जीभ घुमाते हुए मेरी चिकनी बुर को बेदर्दी से चाटने लगे। मैं तड़प उठी और फिर जैसे ही जेठ जी मेरी बुर से मुँह हटाना चाहा.. मैं जेठ के सर पर हाथ रख कर अपनी बुर पर दबा कर सिसियाने लगी।
‘आआआ आआअहह.. ओह माय गॉड.. चूसो मेरी बुर.. आआअहह..’
मेरी मस्ती से अब जेठ ने भी मेरी चूत के निकलते रस को चाटते हुए जैसे ही मेरी चूत के फांकों को मुँह में भर कर खींचकर चूसा.. मैं दोहरी हो उठी।
‘आहसीईई.. ऐस्स्स्से.. ही चाटो आहह्ह.. खा जाओ.. मेरी बुर..’
मैं सिसयाते हुए जेठ का हाथ पकड़ कर अपने चूचियों पर रखकर दबाने लगी।
मेरा इशारा समझ कर जेठ मेरी चूचियाँ भींचते हुए मेरी बुर को पूरी तरह खींच खींचकर चाट रहे थे।
मेरी वासना चरम पर थी..
आज जेठ के प्यार का अंदाज कुछ निराला था, वे मुझे पलटकर मेरे चूतड़ों और गांड के चारों तरफ चाटते हुए पीछे से मेरी योनि को जब चाटते.. तो मैं सीत्कार उठती और उनका हाथ मेरी पीठ को सहलाता.. तो कभी मेरी छाती को दबाते और नीचे मेरी बुर के निकलते योनि रस का पान करते।
अब उन्होंने मुझे उठने का इशारा किया… मैं जैसे ही उनकी गोद से उठी.. वह बिस्तर पर पीठ के बल लिटाकर मेरे ऊपर लेटकर अपने शरीर से और नीचे लौड़े से मेरी गाण्ड और बुर की मालिश करने लगे।
मैं बोली- भाई सा.. अब आप मेरी बुर को चोद दीजिए.. मैं चुदने के लिए पागल हो गई हूँ.. बस अब आप अपने मोटे लण्ड को मेरी बुर में फंसाकर मेरी योनि को कुचल दीजिए.. अब नहीं रहा जाता.. मेरी बुर को आपके लण्ड की सख्त जरूरत है।
जेठ ने अपना हाथ नीचे ले जाकर मेरी चूचियों को पकड़ कर दबाते हुए कहा- मेरी जान.. अभी कुछ देर पहले नायर ने तुम्हारी चूत का पानी निकाल दिया था और तुम भी नायर के लण्ड पर झड़ गई थीं.. पर साली तेरी चूत फिर से लण्ड के लिए फड़फड़ा रही है..
मैं बोली- जी भाई सा.. मेरी चूत फड़फड़ा रही है.. अपने जेठ का लण्ड लेने को..
वो- मेरी बहू रानी.. जरूर.. मैं तेरी बुर में लण्ड पेलूँगा.. क्योंकि तू तो अब मेरी रखैल है..
यह कहते हुए जेठ जी ने अपना लण्ड पीछे से ही मेरी चूत में लगा कर मुझे चूतड़ों को उठाने को कहा और मैंने जैसे ही चूतड़ उठाए.. भाई साहब ने एक जोरदार शॉट मार कर अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में उतार दिया।
भाई साहब का लण्ड मेरी योनि को चीरता हुआ मेरी बच्चेदानी से जा टकराया और मैं चीख उठी- आआआ आआहह.. मार डाला रे.. भाई साहब.. आप का लण्ड.. ओह माई गॉड..
और जेठ जी लण्ड जड़ तक पेले हुए मेरी पीठ और गले पर चूमने लगे, अपना मुँह मेरे कान पर लगा कर गरम-गरम साँसें छोड़ते हुए मेरी बुर में लौड़ा ठोकने लगे।
मैं भी उनके हर शॉट पर चूतड़ उठा कर जेठ जी का लण्ड चूत में उतार लेती।
जेठ के लौड़े के अंडों की हर मार जब मेरे चूतड़ों और लण्ड की मार चूत पर पड़ती.. तो ‘थपथपथप’ की आवाज से कमरा गूँज उठता।
मेरे जेठ जी काफी देर पीछे से लण्ड पेलते रहे और मैं चूतड़ उठाकर लण्ड लेते हुए झड़ती रही।
‘आहह्ह.. उइइइइ.. आहसीईई.. मैं गग्गईईई.. आह राजा.. चोदो..’
लेकिन तभी जेठ जी ने मेरी झड़ती चूत से लण्ड को बाहर खींच लिया.. मेरी चूत अभी पूरी झड़ी नहीं थी। मैं उनकी इस हरकत से बौखला उठी- न..न.. न्नहहीं.. यहह्ह.. क्क्क्क्या कर रहे हैं.. चोदो.. मैं झड़ रही हूँ…
पर जेठ को जैसे सुनाई ही नहीं दे रहा था और जेठ जी ने मुझे पीठ के बल पलट दिया।

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