मैं सुनीता हूँ। कद-काठी से अच्छी हूँ। सही जगह पर सही मांश है। बहुतों से सुना है कि मेरे बदन में बहुत आकर्षण है। चाल ढाल में ग्रेस है। कई लोगों की निगाहें अपनी और उठती हुई देखती हूँ। उम्र है जब सेक्स की तरफ खुलापन आ जाता है और झुकान बढ़ जाता है। अच्छे घर से हूँ और अच्छे घर में व्याही गई हूँ। पति राकेश का अच्छा कारबार है। एक जानी मानी कालोनी में दूसरे माले के अपने फ्लैट में रहती हूँ। पहनने ओढ़ने का शौक है। मेरा विश्वास है कि हर स्त्री को सज सवंर के रहना चाहिये। मैं सेक्स से संतुष्ट हूँ। पति हफ्ते में कम से कम दो बार चुदाई करते हैं। कभी मेरी तबीयत होती है तो पहल करके चुदवाती हूँ।
सामने ही गली के उस पार मिस्टर और मिसेज़ मलहोत्रा का दुमंजिला घर है। सयाने बच्चे होने के बावजूद भी मिसेज़ मलहोत्रा कितनी सजी धजी रहती है। साथ वाले फ्लैट की मिसेज़ अग्रवाल की उम्र भी कम नहीं है, एक बड़ा लड़का है लेकिन अब भी छरहरी और चुस्त हैं। मेरे नीचे फ्लैट में मेरी जेठानी रहती हैं, उम्र ज्यादा नहीं है पर कैसी ढीली ढाली है न बनाव की और ध्यान न कपड़ों की परवाह।
करीब एक महीने से ऊपर की खाली मंजिल में मलहोत्रा लोगों ने एक किरायेदार रख लिया है। बेटी की शादी हो गई है और बेटा पढ़ाई के लिये बाहर चला गया है। किरायेदार दो ही जने हैं। सामने के फ्लैट में होने से उनकी जोर से कही बातें साफ सुनाई देती हैं। पति का नाम शिशिर है। लंबा और सुदर्शन है। सुना है एम॰बी॰ए॰ है किसी प्राइवेट कम्पनी में बड़ा आफिसर है। पत्नी का नाम कुमुद है। वह भी लंबी और सुंदर है, बैंक में काम करती है।
इधर कुछ दिनों से मैं देख रही हूँ कि शिशिर मुझे घूरता रहता है।
रात में जब भी मेरी चुदाई होती है तो राकेश अंदर ही झड़ जाता है। मैं अपनी चड्ढी से ही उसका वीर्य पोंछ लेती हूँ। सुबह जब उठती हूँ तो बिना चड्ढी के ही पेटीकोट पहना होता है। कभी-कभी तो ब्रा भी नहीं डाली होती है। जल्दी-जल्दी ब्लाउज़ डाला होता है जिसमें से मेरी चूचियां दिखाई पड़ती हैं। सुबह राकेश को जाने की जल्दी होती है तो उसी हालत में मैं उसका नाश्ता बनाती हूँ, फिर तैयार होती हूँ।
शिशिर जब उसके बेडरूम से लगी छत पर आकर खड़ा होता है तो सामने ही मेरा किचेन पड़ता है। उसका इस तरह मुझे अधनंगी हालत में देखना बहुत खराब लगता है। कई बार सोचा कि मिसेज़ मलहोत्रा से शिकायत करूं लेकिन थोड़ी शर्म खाकर रह जाती हूँ।
उस दिन रात में पहल करके मैंने चुदाई कराई थी लेकिन राकेश बहुत ही जल्दी झड़ गया। सुबह उठी तो तबीयत शांत नहीं हुई थी, बदन में शुरूर था।
सामने देखा तो शिशिर एकटक घूर रहा था। उस समय उसका इस तरह देखना बुरा नहीं लगा। सोचा मेरी बला से देखने दो। मैं भी ठीक उसके सामने बगैर चड्ढी और ब्रा के पेटीकोट और ब्लाउज़ में वैसे ही खड़ी रही। देखती क्या हूँ कि उसने अपने गाउन के बटन खोलकर दोनों हाथों से सामने से गाउन खोल दिया। उसने कुछ भी नहीं पहना था। सामने उसका लण्ड तन्ना के खड़ा था। बदन उसका बहुत सुडौल था। पेट बिल्कुल भी नहीं निकला था। उसका लण्ड राकेश से काफी बड़ा और मोटा था। गर्म तो मैं थी ही आदतन मेरा हाथ मेरी चूत पर चला गया और मैं पेटीकोट के ऊपर से सहलाने लगी।
अचानक होश वापिस आ गया तो बड़ी ग्लानि हुई। खीझकर अंदर भाग गई। मेरी सांसें बड़े जोरों से चल रही थीं। तबीयत फिर भी न मानी। उसके लण्ड को फिर देखने के सम्मोहन को न रोक सकी। बेडरूम की खिड़की से छुपके देखा तो मेरे अचानक भाग जाने से उसका मुँह खुला का खुला रह गया था। नीचे से कुछ आवाज आई और वह गाउन बंद कर नीचे चला गया।
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उस घटना के बाद मैं शिशिर के सामने नहीं गई। मन में चोर होने से किसी से कहने की हिम्मत नहीं हुई। मेरी झिझक भी खत्म हो गई। पेटीकोट में घूमती रहती, कभी-कभी तो जानबूझ कर और उघाड़ लेती। कभी ऐसा पोज बनाती कि चूचियां, चूतड़ या यहां तक कि चूत उभर के सामने आ जाये। छुप-छुप करके देखती कि वह नंगा तो नहीं हो गया है। इस तरह के खेल में मुझे मजा आने लगा था। इऩ दिनों मैं राकेश से चुदवाती भी बहुत थी।
एक सुबह शिशिर ने छत पर खड़े-खड़े ऊँची आवाज में कहा- “आज रात दस बजे तमाशा होगा खिड़की खोल के रखना…” बात जानबूझ के कही गई थी।
मैंने निश्चय कर लिया कि खिड़की नहीं खोलूंगी, राकेश के सामने कुछ ऐसी वैसी बात हो गई तो? राकेश साढ़े दस के करीब खर्राटे लेने लगा। मुझसे नहीं रहा गया। मैंने शिशिर के बेडरूम के सामने की खिड़की खोल दी। ठीक सामने उसकी खिड़की खुली थी। खिड़की के सामने पलंग पड़ा हुआ था जिसका सिरहाना खिड़की की ओर था। पलंग पर नंगी कुमुद लेटी थी। वह खिड़की की तरफ नहीं देख सकती थी। उसकी चूचियां साफ नजर आ रही थीं, छोटी-छोटी सख्त बादामी फूले हुये चूचुक। उसने अपनी टांगें चौड़ी कर रक्खी थीं। टांगों के बीच में पूरा नंगा लण्ड ताने शिशिर बैठा था और उसकी निगाहें खिड़की पर जमी हुई थीं।
मैं खिड़की खोलकर पलंग पर लेट गई। उसकी खिड़की मेरी आँखों के सामने थी। उसने सीधा मेरी आँखों में देखा और हाथ से लण्ड पकड़कर कुमुद की चूत में पेल दिया। कुमुद ने अपनी चूत उठाकर पूरा ले लिया। शिशिर सीधा मेरी आँखों में देख रहा था और कस-कस के कुमुद की चूत में पेल रहा था। चोद कुमुद को रहा था लेकिन मुझे लग ऐसा रहा था जैसे चोटें मेरी चूत में पड़ रही हों।
कुमुद भी हर चोट पर अपनी चूत आगे कर देती थी।
पता नहीं मेरा हाथ कब मेरी चूत पर पहुँच गया। बगल में मेरा पति लेटा था और मैं साड़ी उठाये चड्ढी एक तरफ किये अपनी चूत में उंगलियां अंदर बाहर कर रही थी। जैसे शिशिर की रफ्तार बढ़ने लगी तो मैं इस बुरी तरह से अपने को ही चोदने में लीन हो गई कि शिशिर के झड़ने के पहले ही मैं खलास हो गई। उस रात जब मैं सोई तो ऐसा लगा जैसे शिशिर के द्वारा चोदी गई हूँ।
पता नहीं मेरा हाथ कब मेरी चूत पर पहुँच गया। बगल में मेरा पति लेटा था और मैं साड़ी उठाये चड्ढी एक तरफ किये अपनी चूत में उंगलियां अंदर बाहर कर रही थी। जैसे शिशिर की रफ्तार बढ़ने लगी तो मैं इस बुरी तरह से अपने को ही चोदने में लीन हो गई कि शिशिर के झड़ने के पहले ही मैं खलास हो गई। उस रात जब मैं सोई तो ऐसा लगा जैसे शिशिर के द्वारा चोदी गई हूँ।
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कल रात की बात पर मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि मैंने अपना हाथ चूत पर रखा हो… जरूरत ही नहीं पड़ी थी। लेकिन शिशिर पर नाराजी नहीं थी। उसके बाद तो तबीयत होती कि वह सब फिर देखने को मिले। रात में खिड़की बार-बार खोल-खोल के देखती लेकिन उसकी खिड़की बंद होती।
शायद उसने यह सब करते देख लिया था। एक सुबह फिर ऊँची आवाज में जैसे अपने से ही बात कर रहा हो बोला- “पहले तमाशा दिखाओ फिर देखने को मिलेगा…”
मैंने सोचा मियां बड़े ऊँचे उड़ रहे हैं। भूल जाओ कि मैं यह सब करूंगी और मैं अपने रूटीन में लग गई। शिशिर अब इतना घूर घूर के नहीं देखता था। अच्छा लगने कि जगह कुछ सूना सा लगता था। जब अपने अंदर डलवाती थी तो शिशिर की बात को सोचकर लाल हो जाती थी और बड़ी, रोमांचित भी।
उस दिन राकेश का जनमदिन था। सुबह से ही मन प्रसन्न था। शाम को सज सवंर के हम बाहर खाना खाने जाते थे और रात में राकेश तबीयत से हमें चोदता था। शिशिर को छत पर देखा तो मन ने जोर मारा और उसको देखकर मैंने खिड़की खोल दी जैसे रात का संकेत दे दिया। सोचा आज देखो हमारा मजा।
हम लोग रात को देर से लौटे। मेरी खिड़की और सामने शिशिर की खिड़की खुली हुई थी। शिशिर अपनी तरफ का लैंप जलाकर कुछ पढ़ रहा था। कुमुद शायद सो गई थी। अंदर आते ही राकेश ने मुझे बांहों में ले लिया और मेरे होंठों पर कस के अपने होंठ रख दिये।
सामने मैंने देखा तो शिशिर उठकर खिड़की पर खड़ा हो गया और उसने अपनी लाइट आफ कर दी।
मुझे जोश आ गया। मैं राकेश को साथ लिये पलंग पर आ गिरी। राकेश ने ब्लाउज़ के ऊपर ही मेरे दांयें स्तन पर अपना मुँह रख दिया और बांयें स्तन को मुट्ठी में जकड़ लिया। मैंने पैंट के ऊपर से ही उसके लण्ड पर हाथ रखा और सहलाने लगी। उसको जैसे करेंट लग गया हो। उसने जल्दी से मेरे ब्लाउज़ के बटन और ब्रा के हुक खोल डाले। मेरी भरपूर गोलाइयां बाहर निकल आईं, जिन पर मुझे बड़ा नाज़ था। इसके पहले कि वह एक चूची को मुँह में लेता मैंने कहा- “इतनी अच्छी साड़ी पहनी है इसको तो उतार दो…”
राकेश के ऊपर बहसीपन सवार था बोला- “साड़ी में इतनी खूबसूरत लग रही हो आज साड़ी में ही करूंगा…” इसके साथ ही उसने मेरी साड़ी और पेटीकोट को पूरा उलट दिया।
इसके पहले कि वो मेरी पैंटी उतारता मैंने उसके पैंट के बटन खोल डाले और एक झटके में अंडरवेर समेत पैंट उतार फेंका। उसका एकदम तना हुआ लण्ड स्प्रिंग जैसा बाहर निकल आया। कमीज फेंक कर वह मेरे ऊपर आ गया। मुँह में एक चूची ले ली और चूचुक चूसने लगा। मैं पूरी तरह पिघल चुकी थी। यह जानकर कि शिशिर यह सब कुछ देख रहा है मैं बहुत ही उत्तेजित हो गई थी। मेरी चूत बुरी तरह रिसने लग गई थी। मैंने कस के उसका सिर अपनी चूची पर और दबा लिया और नीचे हाथ डालकर लण्ड पकड़ लिया।
कस के मुट्ठी लण्ड पर फेरते हुये बोली- “अब डालो भी न…”
ऊपर उठकर राकेश ने मेरी पैंटी उतार फेंकी। मैंने टांगें चौड़ी कर ली। चिकनी सुडौल टांगों के बीच अब मेरी चूत मुँह खोले इंतेजार कर रही थी, एकदम चिकनी। मैं पूरी तरह साफ करके रखती हूँ। जब राकेश ने लण्ड का अगला सिरा चूत के मुँह पर रखा तो मेरी आँखों के सामने शिशिर का चेहरा आ गया कि कैसे मुँह बाये वह सब कुछ देख रहा होगा। चूत में फुरेरी हो आई। राकेश ने मेरी दोनों गोलाइयों को दोनों हथेलियों में कस के जकड़ लिया और लण्ड को अंदर पेला। मेरी चूत एकदम गीली थी। उसका पूरा का पूरा लण्ड एकदम घुस गया। पहले तो अंदर जाने में थोड़ा समय लगता था। मेरे मुँह से ‘सी’ निकल गई। मैंने उसकी छाती के दोनों ओर हाथ डालकर उसको कस के जकड़ लिया।
पूरा बाहर करके राकेश ने लण्ड फिर पेल दिया।
मैं कह उठी- “आह्ह…”
अब की बार वह लण्ड चूत के बाहर दूर तक ले गया और एकदम जोर लगा के घुसा दिया। चूत के ऊपर लण्ड की जड़ धप्प से पड़ी। मैं ‘आआह्ह’ कह उठी। उसने दो तीन बार ऐसा ही किया। मेरा मजा बढ़ रहा था ‘आह्ह’ ऊँची होती जा रही थी।
अचानक वह बोला- “मैं झड़ रहा हूँ…” और वो मेरे ऊपर ढेर हो गया, ढेर सारा गाढ़ा पदार्थ चूत मेरी में भर दिया। कभी-कभी राकेश के साथ ऐसा हो जाता था। मुझे यह सोचकर झेंप सी हो रही की कि शिशिर क्या सोचता होगा।
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अगले दिन शनिवार को मिसेज़ मलहोत्रा ने एक पार्टी रखी थी। पास पड़ेस के आठ दस लोगों को बुलाया था। शिशिर से मेरा और राकेश का परिचय मिसेज़ मलहोत्रा ने कराया। कितनी अजीब बात थी की हम लोगों को एक दूसरे के अंदर का सब कुछ मालूम था और हम एक दूसरे को जानते तक न थे। शिशिर की आँखों में शरारत झांक रही थी। मैं दबंग होने के बावजूद भी झिझक रही थी। मिलते ही राकेश और शिशिर एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। ऐसे घुल मिल के बातें कर रहे थे जैसे अरसे से एक दूसरे को जानते हों।
शिशिर और कुमुद का स्वभाव सरल था। आसानी से सबसे घुल मिल गये। थोड़ी ही देर में एक ग्रुप सा बन गया जिसमें राकेश, मैं, शिशिर, कुमुद, मिसेज़ अग्रवाल और मिसेज़ मलहोत्रा शामिल थे। मिस्टर अग्रवाल अभी आये नहीं थे। पार्टी में आना जाना उनका ऐसा ही होता था, हर समय धंधे की धुन सवार रहती थी। मिस्टर मलहोत्रा मेजबानी में सबसे मिलने में ही व्यस्त थे। ग्रुप में खूब हँसी मजाक चल रहा था। जोकस सुनाये जा रहे थे जिनमें सेक्स का पुट था। मिसेज़ अग्रवाल बढ़ चढ़ के भाग ले रही थीं।
मिसेज़ अग्रवाल कुछ-कुछ भारी बदन की गदराई जवानी की प्रौढ़ औरत थीं। पीलापन लिये गोरा रंग, फैले हुये चूतड़, जो चलते समय बड़े मादक तरीके से हिलते थे, और भरी हुई खरबूजे सी छातियां। सेक्स की बात करती थीं तो नथुने फड़कने लगते थे, छातियां और फैल जाती थीं। सब एक दूसरे को सहज तरीके से संबोधित कर रहे थे। राकेश कुमुद को भाभी कह रहा था। केवल मैं और शिशिर एक दूसरे को सीधा संबोधित नहीं कर रहे थे। शिशिर अकेले मौके की तलाश में था जो नहीं मिल पा रहा था और न ही मिल पाया। पार्टी से जाते समय उसने मेरी आँखों में झांका तो उसके चेहरे पर निराशा थी। जाते-जाते उन लोगों को राकेश ने दूसरे दिन अपने यहां निमंत्रित कर लिया।
जिस मौके की उसे तलाश थी दूसरे दिन उसको मिल गया। अकेले पाते ही वह मेरे से चिपट गया। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। घबड़ा के मैं पीछे हट गई, मेरा चेहरा पीला पड़ गया। मेरा चेहरा देखकर उसने एकदम से मेरा हाथ छोड़ दिया। बोला- “सारी, मैंने सोचा तुम मेरा लेना चाहती हो…”
उसके बाद उसका वर्ताव एकदम शालीन हो गया और सहजता से उस शाम से वह मुझे भाभी कहकर बुलाने लगा। दोनों घरों में बहुत निकटता हो गई। अक्सर मिलना-जुलना होने लगा। लेकिन मैं अभी तक उसे ठीक से संबोधित नहीं कर पा रही थी।
ग्रुप भी आये दिन मिलने लगा। कभी मलहोत्रा के यहां, कभी अग्रवाल के यहां, कभी शिशिर के यहां, तो कभी मेरे यहां। अब खुलकर सेक्स की बातें होने लगी थीं। मिसेज़ मलहोत्रा जितनी छुपा-छुपा के कहती थीं, मिसेज़ अग्रवाल उतनी ही साफ-साफ जबान में जिनमें हाव भाव और चेष्टायें भी सामिल होती थीं। राकेश और शिशिर अब बेधड़क बोलने लग गये थे, जिसमें मजाक भी करने लग गये थे। कुमुद अनसुनी सी करती थी, लेकिन मैं बड़े ध्यान से सुनती थी। मुझे बड़ा ही आनंद आता था।
शिशिर सचमुच में मेरा और अपनी बीवी का बड़ा ख्याल रखता था। दोनों परिवार साथ जाते तो मेरे उठने बैठने चाय पानी और जरूरतों के लिये तैयार रहता। वो मुझे भाभी-भाभी कहता और उसी तरह मानने लगा था। एक बार हम ग्रुप में बैठे थे।
किसी बात पर मेरा ध्यान बटाने के लिये वो पुकार उठा- “भाभी भाभी…”
मेरे मुँह से अचानक निकल पड़ा- “हाँ बोलिये देवर जी…”
सबने तालियां बजाई- “अब सही माने में देवर भाभी हुये…”
उसके बाद मैं उस देवर कहकर ही बुलाने लगी। पहली बार की हाथ पकड़ने की घटना के बाद उसने फिर कोई चेष्टा नहीं की।
लेकिन अब मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे वह अनजाना शिशिर ही भा रहा था। मैं उसका लण्ड देखने को तरस रही थी। उसके द्वारा कुमुद की चुदाई देखना चाहती थी। जब भी वह सेक्स की बात करता था तो मैं गरम हो जाती थी।
आखिर मेरे से न रहा गया और एक दिन दबी जबान से कह दिया- “देवरजी तमाशा दिखाओ न…”
वह चौंक गया। देर तक मेरी तरफ देखता रहा लेकिन बोला कुछ नहीं।
उस रात उसकी खिड़की के पट खुले हुये थे। देर रात कमरे की बत्ती जली तो शिशिर पलंग के किनारे नंगा खड़ा था। मोटा लंबा लण्ड मुँह बाये सामने तन्नाया हुआ था और सामने टांगें चौड़ी किये हुये कुमुद पलंग के किनारे पड़ी हुई थी। उसकी चूत का मुँह खुला हुआ था। शिशिर ने झुक कर लण्ड उसकी चूत में लगा के जैसे ही पेला, मैं धक्क से रह गई। उधर शिशिर पेले जा रहा था और कुमुद चूत उठा-उठा करके उसको झेल रही थी और मैं छटपटा रही थी। फिर राकेश को जगा करके मैं अपनी चूत खोल करके उसके ऊपर सवार हो गई और उससे कस-कस कर झटके लगाने को कहा। झड़ जाने के बाद भी मैं पूरी तरह शांत नहीं हुई थी।
उसके बाद मैं शिशिर की तरफ झुकान दिखाने लगी। जानबूझ कर आंचल गिरा देती और अपना ब्लाउज़ ठीक करने लगती, कामुक पोज बना देती, उसके सेक्स के जोक पर मुँह बना देती और आये दिन ‘तमाशा’ दिखाने की मांग करती।
मिसेज़ अग्रवाल के यहां ग्रुप की महफिल जमी हुई थी। आदत के अनुसार मिस्टर अग्रवाल आकर के काम धंधे पर चले गये थे। मिसेज़ मलहोत्रा का जोक चल रहा था-
एक दिन अकबर बादशाह ने पूछा- बीरबल मिसेज़ अग्रवाल जैसी गोरी औरत की अंदर की चीज़ क्यों काली है?
राकेश बोल उठा- “मिसेज़ मलहोत्रा तुम्हें कैसे पता कि काली है?”
शिशिर ने तुरंत जोड़ा- “हाँ भाई यह तो केवल मिस्टर अग्रवाल या फिर राकेश को पता है…”
मिसेज़ मलहोत्रा भी पीछे रहने वाली नहीं थीं- “हाथ कंगन को आरसी क्या? मिसेज़ अग्रवाल दिखा दें अपनी…”
मेरे को सब्र नहीं था बोली- “अब जोक भी कहो न…”
मिसेज़ मलहोत्रा ने आगे कहा- “अकबर बादशाह ने एक हफ्ते का समय दिया और कहा कि अगर न बताया तो देश निकाला…”
बीरबल बड़े परेशान। उन्हें जवाब ही नहीं सूझता था।
उनकी पत्नी ने यह हालत देखी तो पूछा- “आप इतने परेशान क्यों हैं?”
ज्यादा जोर देने पर बीरबल ने बादशाह का प्रश्न दोहराया।
प्रश्न सुनकर पत्नी हँसने लगी और बोली- “बस इतनी सी बात है? आप बादशाह से कहिये मेरी पत्नी इसका जवाब देगी…”
दूसरे दिन मिसेज़ बीरबल अकबर के दरबार में पहुँची। बादशाह के जवाब मांगने पर उन्होंने एक जोर का चांटा अकबर के गाल पर लगाया। अकबर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। सब लोग सन्नाटे में आ गये।
मिसेज़ बीरबल बोलीं- “जहांपनाह एक चोट से ही आपका चेहरा काला पड़ गया। हमारी इसको तो कितनी चोटें खानी पड़ती हैं…”
शिशिर बोला- “कितनी इश्तेमाल हुई है, जानने का अच्छा तरीका पता चल गया…”
मिसेज़ अग्रवाल भी जोक में कहां पीछे रहने वालीं थीं, कहने लगीं- “बात उस समय की है जब मिसेज़ मलहोत्रा जनरल स्टोर्स को संभालती थीं। ग्राहक को खुश रखने का उन्हें काफी जोश था। एक बार एक ग्राहक आया। उसे निजी चीजें खरीदनी थीं। सबसे पहले उसने अच्छी ब्रेजियर मांगी…”
मिसेज़ मलहोत्रा ने पूछा- “क्या साइज़ है?”
ग्राहक ने कुछ देर सोचा फिर चटखारे लेकर हाथ की एक-एक उंगली चूसने लगा फिर अंगूठे को दिखा के बोला इस साइज़ की।
मिसेज़ मलहोत्रा- “नहीं भाई, कप साइज़ क्या है?”
ग्राहक की समझ में नहीं आया।
मिसेज़ मलहोत्रा ने कहा- “देखो इधर…” फिर अपना आंचल गिरा के अपने उभार सामने करती हुई बोलीं- “इतने बड़े हैं या इनसे छोटे?”
ग्राहक- “इस तरह खड़े नहीं होते…”
मिसेज़ अग्रवाल आगे कुछ कहतीं उसके पहले ही मिसेज़ मलहोत्रा बोल पड़ीं- “हाँ याद पड़ता है मिस्टर अग्रवाल आये थे। उन्होंने सबसे बड़ी साइज़ की ब्रेजियर ली थी। लेकिन दूसरे दिन वापिस ले आये थे कि यह तो बहुत छोटी है…”
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मिसेज़ अग्रवाल आगे कुछ कहतीं उसके पहले ही मिसेज़ मलहोत्रा बोल पड़ीं- “हाँ याद पड़ता है मिस्टर अग्रवाल आये थे। उन्होंने सबसे बड़ी साइज़ की ब्रेजियर ली थी। लेकिन दूसरे दिन वापिस ले आये थे कि यह तो बहुत छोटी है…”
लेकिन मिसेज़ अग्रवाल चुप रहने वाली नहीं थीं- “सुनो-सुनो फिर ग्राहक ने कंडोम मांगा जिसमें अपनी मिसेज़ मलहोत्रा एक्सपर्ट हैं…”
मिसेज़ मलहोत्रा ने फिर पूछा- “क्या साइज़ है?”
ग्राहक के मुँह पर हवाइयां उड़ने लगीं।
मिसेज़ मलहोत्रा ने सुझाया “स्टोर के पीछे जाओ। वहां एक जंगला है। उसमें तीन छेद हैं। उनमें बारी-बारी से अपना डालकर देखो किसमें फिट होता है?”
जैसे ही ग्राहक जंगले की तरफ गया मिसेज़ मलहोत्रा अंदर के रास्ते से जंगले के पीछे पहुँच गईं और नाप लेने के लिये साड़ी उठाकर उन्होंने अपनी रसभरी जंगले के पीछे बारी-बारी से हर छेद से सटा दी।
ग्राहक के लौटने के पहले ही वह वापिस स्टोर पहुँच गईं और उसके लिये कंडोम निकाल ही रही थीं कि ग्राहक बोला- “कंडोम छोड़िये मेरे को 15 फिट जंगला दे दीजिये…”
इस पर खूब हंगामा मचा।
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मिसेज़ अग्रवाल ने चालू रखा- “एक बार एक ग्राहक का मन मिसेज़ मलहोत्रा की ‘खास चीज़’ पर ही आ गया। उसकी चाह पूरी करने के लिये वह उसे अंदर के कमरे में ले गईं। उसको खुश करने में या खुद खुश होने में उन्हें समय का ध्यान ही न रहा। देखा तो मिस्टर मलहोत्रा के आने का समय हो गया था। जल्दबाजी में भागीं तो पैंटी पहनना ही भूल गईं। एक टैक्सी रोकी और निढाल होकर पड़ रही। होश संभाला तो देखा कि बगैर पैंटी के अंदर का सारा नजारा रियरब्यू मिरर में दिख रहा था और टैक्सी ड्राइवर घूरे जा रहा था।
बात बनाने के लिये ड्राइवर बोला- “मैडम पेमेंट कैसे करेंगीं?”
मिसेज़ मलहोत्रा अभी भी मस्ती में थीं, शरारत से अंदर की चीज़ और दिखाते हुये कहा- “इससे कैसा रहेगा?”
ड्राइवर ने जवाब दिया- “और छोटी साइज़ का नोट नहीं है?”
मिसेज़ अग्रवाल ने ट्रम्प कार्ड छोड़ दिया था। वह इसी तरह उलझती रहती थीं। कभी मेरा और कुमुद का नाम ले आतीं थीं।
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अब शिशिर की बारी थी।
शिशिर ने कहा- राजू राजी पति पत्नी थे। राजी की बहन की शादी थी। काफी पहले से दोनों को वहां जाना पड़ा। राजी का भरा पूरा परिवार था। नजदीक के मेहमान भी आ गये थे। घर में अच्छी खासी रौनक हो गई थी। ऐसे में सब औरतों को एक कमरे में और मर्दों को दूसरे कमरों में सोना पड़ता था। राजू राजी मजा नहीं ले पा रहे थे। उन्होंने एक तरीका निकाला।
राजी ने कहा- “मैं हीरे की अंगूठी पहनकर सोया करूंगी। अंगूठी रात के अंधेरे में चमकेगी। जब तुम्हारी तबीयत हो तब देर रात में आ जाया करो और बगैर आवाज किये मेरी खोलकर अपनी प्यास बुझा लिया करो। लेकिन ध्यान रहे चुपचाप करना क्योंकी अगल बगल में और औरतें सोई होंगी…”
राजू ने कहा- “काम बन गया…” आये दिन जाता और तबीयत से मज़े उड़ाता।
राजी उसकी बेजा हरकत पर आवाज भी नहीं उठा सकती थी। उन्होंने अपने इस प्लान का कोडनाम रखा था ‘परांठे खाना’, राजी या राजू एक दूसरे से शरारत करने के लिये कहते ‘रात को दो परांठे खाये’।
एक सुबह राजू खुश था। राजी को देखा तो बोला- “पहले तो तुमने कल रात बड़ी आना-कानी की फिर बड़े मज़े लेकर दो परांठे खाये…”
राजी बोली- “नहीं तो… मेरी तो कल से अंगूठी ही नहीं मिल रही है…”
सामने से इठलाती हुई मोहिनी भाभी आकर बोलीं- “बीवी जी अपनी यह अंगूठी लो, कल बाथरूम में रखी छोड़ आईं थीं…” फिर बोलीं- “मेरी अंगीठी गरम थी तो सोचा कि दो परांठे मैं भी सेंक लूं…”
फिर मक्कारी से राजू की तरफ देखती हुईं- “क्यों लाला जी परांठे ठीक सिके थे?”
शिशिर का जोक सुनकर सब की नजरें बचाकर मदभरी आँखों से मुँह बिचकाकर मैंने अपनी आशक्ति जता दी। शिशिर से सेक्स की बातें सुनती थी तो ‘तमाशे’ याद आ जाते थे और मेरी चूत में खुजली होने लगती थी, और उसकी मेरी तरफ वह आत्मियता। उसे मैं अपना समझने लगी थी। मैं पके आम की तरह उसकी झोली में गिरने को तैयार थी। लेकिन शिशिर था कि दूरी ही बनाये हुये था। आज तो मौका देखकर हँसी के बहाने दो बार मैं उसके ऊपर गिर चुकी थी।
इस बार मेरी हरकत का उसके ऊपर असर हुआ।
उसी दिन अकेला पाकर जोक का माध्यम इश्तेमाल करता हुआ शिशिर बोला- “ओ भाभी अपनी अंगीठी पर मुझे भी परांठे खिलाओ न…”
मनचाही बात सुनकर मैं शोख अदा से बोली- “मैंने कब मना किया है जब चाहे खालो…”
शिशिर- “लेकिन मैं जूठा नहीं खाता…”
मैं- “जूठी तो हो ही गई हूँ देवर जी…”
शिशिर- “मेरा मतलब वह नहीं है भाभी… 24 घंटे तक कम से कम जुठराई नहीं होनी चाहिये…”
मैं- “आजकल यह मुश्किल है। होली का समय है राकेश छोड़ते ही नहीं। अच्छा देखती हूँ…”
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फाग का दिन… सेक्स भरा माहौल, पूरी मस्ती वाला दिन। सुबह से दोपहर तक रंग गुलाल से होली चहेतियों के साथ। मौका मिलते ही चहेती पर जितना हाथ साफ कर सके किया। फिर नहा-धो कर घर-घर जाकर गुझिया पपड़ियां। शाम को एक जगह जमावड़ा जहां भांग की तरंग में खुलकर तानाकसी, छेड़-छाड़, खुले आम सेक्स की बातें। रात तक पति पत्नी दोनों ही आनंद में होते और जम कर मस्त-मस्त चुदाई करते। यह है होली का मदभरा त्योहार।
कालोनी में औरतें अपना ग्रुप बना लेतीं थीं और आदमी लोग अलग इकट्ठे हो जाते थे। फिर बेझिझक दोनों अलग से होली खेलते रहते थे, फागें और अश्लील गाने गाते रहते थे और मनमानी हरकतें करते रहते थे। मालूम पड़ा था कि औरतें ऐसे गाने गातीं थीं और ऐसी-ऐसी हरकतें करतीं थीं कि आदमी भी दांतों तले उंगली दबा लें। औरतों की लीडर एक मिसेज़ वर्मा थीं, बिहार की। मिस्टर वर्मा थुलथुल थे और अपनी इंजीनियरी के रोबदाब में रहते थे। मिसेज़ वर्मा चुस्त थीं, बिहार का सांवला रंग और प्रौढ़ अवस्था में भी छरहरी देह, आगे को उभरे हुये जोबन और पीछे को उभरे हुये कूल्हे। सब मिला के बड़ी सेक्सी फीगर और उतनी ही सेक्सी उनकी बातें। उनको देखे बिना अंदाजा भी नहीं हो सकता कि औरत में कितना सेक्स भरा हो सकता है और उसको वह कितने खुलेआम प्रदर्शित कर सकती है।
औरतों और आदमियों के अलग इकट्ठे होने के पहले मिसेज़ मलहोत्रा ने अपने पिछवाड़े आपस में होली खेलने का प्रोग्राम बनाया। उनके यहां एक पूरानी नाद थी जिसमें उन लोगों ने पानी भरकर रंग मिला दिया। जैसे-जैसे लोग आते गये उनको रंग से सराबोर कर दिया गया और गुलाल से चेहरा मला दिया गया। लिहाज़ का पर्दा उठ गया था। आदमी लोग भाभियों को यानि कि दूसरों की बीवियों को पकड़-पकड़कर रंग मल रहे थे।
कुमुद अपने को बचाये हुये दूर खड़ी थी। उसने नई धानी साड़ी पहन रखी थी जो शिशिर के कहने पर नहीं बदली थी। काफी खूबसूरत लग रही थी। राकेश का मन उसके ऊपर था। वह गुलाल लेकर उसकी ओर बढ़ा। कुमुद भागी, राकेश उसके पीछे भागा।
दीवाल के पास राकेश ने उसे पकड़ लिया। गुलाल से बचने के लिये कुमुद मुँह यहां वहां कर रही थी। राकेश ने कस के उसको चिपका लिया, यहां तक कि उसकी चूचियों का दबाव वह महसूस कर रहा था। रानों से रानें चिपक गई थीं। उसने तबीयत से कुमुद के गालों पर मुँह से मुँह रगड़कर अपना गुलाल छुड़ाया। मुट्ठी का गुलाल उसके दोनों उभारों पर मला और नीचे हाथ डालकर टांगों के बीच गुलाल का हाथ रगड़ दिया। गुलाल की लाली में उसकी शर्म की लाली छुप गई। दूर से लोगों ने सब कुछ नहीं देखा। न जाने क्यों कुमुद को राकेश पर गुस्सा नहीं आ रहा था बल्की इस सब से उसके मन में मिठास भर गई थी।
सुनीता ने बहैसियत भाभी के शिशिर को खूब गुलाल मला लेकिन सबसे घाटे में वही रही। क्योंकी उसके और शिशिर के मन में जो था, सबके देखते कुछ न कर पाये। मिसेज़ अग्रवाल वापिस जाने लगीं क्योंकी गाँव से उनकी भौजी आई हुई थीं, जिनको वह घर में छोड़कर आई थीं।
सबने कहा कि भौजी को यहीं ले आओ। मिसेज़ मलहोत्रा मिसेज़ अग्रवाल को पकड़कर ले गईं और वह लपक कर भौजी को खींच लाये। भौजी अच्छी जवान थीं, गदराया शरीर था, चेहरे पर लुनाई थी, मांसल थीं लेकिन मोटापा नहीं था, मेहनती देह थी, हाथों पैरों में बल था, सीने पर भी अच्छा मांस था। भौजी ने अग्रवाल जी को देखा तो घूँघट खींच लिया और उनकी तरफ पीठ करके खड़ी हो गईं।
मलहोत्रा ने अग्रवाल को उकसाया- “पलट दो घूँघट… अपनी सलहज के संग होली नहीं खेलोगे?”
भौजी सिर हिलाती रही पर अग्रवाल ने उनका घूँघट उघाड़ दिया और यह कहते हुये- “भौजी हमसे होली नहीं खेलोगी?” और उनके दोनों गालों पर ढेर सा गुलाल मल दिया। मलहोत्रा ने उन्हें रंग से भिगो दिया।
भौजी बोलीं- “बस हो गई होली?”
वह उस क्षेत्र की थीं जहां औरतें कोड़ामार होली खेलतीं हैं। पानी में भिगो-भिगोकर आदमियों पर कोड़े मारती है। भौजी ने अग्रवाल को उठा लिया और सीधा ले जाकर नांद में गिराती हुई बोलीं- “लाला जी होली का मजा तो लो…”
सब लोगों में खुशी भर गई।
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कुमुद दौड़ी-दौड़ी आई और भौजी के कान में राकेश की तरफ इशारा करती हुई बोली- “भौजी उनको घसीटो…”
भौजी और कुमुद दोनों ने दौड़कर राकेश को पकड़कर नांद में गिरा दिया। उसके बाद तो सब की बारी आ गई। आदमी लोग भी पीछे रहने वाले नहीं थे। सुनीता, कुमुद, मिसेज़ अग्रवाल, मिसेज़ मलहोत्रा सब पानी में तरबतर हो गईं। कपड़े उनके बदन से चिपक गये थे। उभारों पर साड़ी चिपकी थी, चूतड़ों की दरार में साड़ी फँस गई थी, रानों से पेटीकोट साड़ी चिपक गये थे जिससे टांगों की आकृति और गहराई दिख रही थी। सब कपड़ों में भी नंगी थीं।
सब ललचाई नजरों से देख रहे थे। फिर गुलाल मलने का दौर चला। सबने सब औरतों के अंग छुये। उनको चिपका कर उनके बदन की आग ली। जिनकी आपस में रजामंदी थी उन्होंने लण्ड चूत पर भी हाथ फेरे। कुमुद ने राकेश का लण्ड साहला दिया। सुनीता ने अपनी रानें एकदम सटाकर शिशिर के लण्ड पर अपनी चूत दबा दी। मिसेज़ अग्रवाल और मिसेज़ मलहोत्रा ने तो सबके लण्ड का लुफ्त लिया। पूरे चेहरे रंग गुलाल में सन गये। वह भूतनियों जैसी लग रही थीं।
अग्रवाल और मलहोत्रा ने भौजी को पकड़कर नांद में धकेला तो भौजी अग्रवाल को भी अपने संग खींच ले गईं। उनकी साड़ी उघड़ गई थी और उन्होंने अपनी दोनों टांगें अग्रवाल की कमर के ऊपर बाँधकर उनको पानी में जकड़ रखा था। उन्होंने न तो चड्ढी पहन रखी थी न ही अंगिया। अगर अग्रवाल भी चड्ढी न पहने होते तो उनका लण्ड भौजी की चूत में घुस गया होता। अग्रवाल जब पानी से निकले तो उनका लण्ड तना हुआ था जिससे पैंट में टेंट बन गया था।
मिसेज़ अग्रवाल ने उसको देखा, सबने देखा। वास्तव में सभी आदमियों की यही हालत हो रही थी। गीले पैंटों से उनके लण्ड सर उठा रहे थे जिनको वह बड़ी मुश्किल से पैंट में हाथ डालकर दबा पा रहे थे।
भौजी जब पानी से निकलीं तो उनकी चूचियां तन गई थीं, गीले ब्लाउज़ से दो नुकीली चोंचें निकल रही थीं। साड़ी ऊपर तक चिपक गई थी, दो पुष्ट जांघें दिख रही थीं। वह बड़ी मादक दिख रही थीं। दोंनों हाथों में गुलाल भर के वह अग्रवाल से चिपक गईं उनको तबीयत से गुलाल मला।
मुश्कुराकर आँख नचाकर बोलीं- “लाला फिर खेलियो होली…”
अकेला मिलने पर वह अग्रवाल से बोलीं- “लाला तुम को शरम नईं आवत अपना खूंटा हमरी ऊके मुँह पे लगा दिये। तुमारे सारे से हम का कहैं तुमने तो हमें खराब कर दियो…”
अग्रवाल- “कहो तो हम माफी मांग लेहैं पर का करें भौजी तुम हो ही ऐसी कि हमहूं वो काबू में नई रहे…”
भौजी इतरा के- “सबर रखो ननदी से अच्छी हम थोड़े ही हैं…”
अग्रवाल- “तुमारे से उनका का मुकाबला। भौजी जब मुँह पर रख ही लियो तो भीतर भी ले लो न…”
भौजी आँखें दिखाते हुये- “लाला तुम बहुत बदमाश हो मैं ननदी से कहूँगी…”
अग्रवाल- “भौजी आप जो चाहो करो, हम तो दिल की बात कह दई…”
भौजी मस्ती से आँख नचाकर बोलीं- “रात में जबई मौका मिले आ जइयो, तुमरी इच्छा पूरी कर देंहैं…”
इस बीच औरतों का ग्रुप जमा हो गया था तो औरतें उधर चली गईं। कुछ औरतें बातचीत से, हाव-भाव से हरकतों से बेकाबू हो रही थीं, फूहड़ से फूहड़ बातें कर रही थीं। बदन खोल-खोलकर के दिखा रही थीं। इन सबमें आगे मिसेज़ वर्मा थी। वह एक बहुत बड़ा डिल्डो लिये थीं। हरकतों से ऊपर से अपने में लगा कर दिखाती थीं। किसी औरत से चिपक जाती थीं, उसको चूमने लगती थीं, ऊपर से डिल्डो लगाने लगती थीं।
ढोलक पर थाप पड़ने लगी। कोई स्वांग भर रहा था, कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था। मिसेज़ वर्मा की मंडली ने सामूहिक गाना शुरू किया-
“झड़ते हैं जिसके लिये चूत को याद करके,
ढूँढ़ लाया हूँ वही लण्ड मैं तेरे लिये,
बुर में रख लेना इसे हाथों से ये छूटे न कहीं,
पड़ा रहेगा यूँ ही झांटों के बाल तले,
झड़ते हैं जिसके लिये रोज ही उठ-उठ के।
लण्ड मोटा है मेरा चूत पे फिसले न कहीं,
कसके ले लेना इसे चूत उठा-उठाकर के,
लगाये जायेगा यही धक्के धकाधक से,
झड़ते हैं जिसके लिये मूठ मल-मल के,
मिसेज़ वर्मा ने शेर सुनाना चालू किया:
दिला तो दिया है तुझे पर एक शर्त लगाई है,
लेनी है वो चीज़ जो तूने टांगों में छिपाई है।
और उन्होंने टांगों के बीच में हाथ कर लिया। फिर…
बेदर्द जामाना क्या जाने क्या चीज़ जुदाई होती है,
मैं चूत पकड़कर बैठी हूँ घर-घर में चुदाई होती है।
चूत को उन्होंने मुट्ठी में जकड़ लिया। फिर…
मुड़कर जरा इधर भी देख जालिम, कि तमन्ना हम भी रखते हैं
लण्ड तेरे पास है तो क्या, चूत तो हम भी रखते हैं।
यह कहते हुये उन्होंने साड़ी ऊपर उठा दी, नीचे कुछ भी नहीं पहने थीं।
शेर कहे शायरी कहे या कहे कोई खयाल,
बीवी उसकी चूत उठाये चोदे उसका यार।
यह कहकर टांगें फैलाकर उन्होंने ऐसी हरकत की जैसे चुदवा रही हों।
अचानक भौजी ने जोर से कहा- “ऐसी गरम हो रई है तो खोल के सड़क पे खड़ी हो जा कोई लगा देगो…”
मिसेज़ वर्मा को ऐसी उम्मीद नहीं थी, उन्होंने चौंक कर भौजी को देखा और बोलीं- “लगता है तुम सड़क पर ही लगवाती होगी, तेरा आदमी नामर्द होगा…”
भौजी ने जावाब दिया- “मेरा आदमी तेरी जैसी चार को एक साथ करे और तेरा आदमी तेरी भी भूख न मिटा पाये…”
मिसेज़ वर्मा भौजी के पास आ गईं बोली- “तू कितनों का एक साथ ले सकती है? ला देखूं क्या छिपाया है?” यह कहते हुये उन्होंने धक्का देकर भौजी को चित्त गिरा दिया और आदमी की तरह उन पर पसर गईं।
भौजी ने चट से पलटी खाकर मिसेज़ वर्मा को अपने नीचे कर लिया। एक हाथ से उनकी दोनों कलाइयां जकड़ लीं।
मिसेज़ वर्मा ने छुड़ाने की बड़ी कोशिश की पर भौजी की मजबूत जकड़ से न छूट सकीं।
मिसेज़ वर्मा की साड़ी पलटते हुये भौजी ने कहा- “बछिया जैसी गरमा रही है, ले मैं लगाती हूँ बैल का तेरे में…” अपने दोनों घुटने फँसाकर भौजी ने मिसेज़ वर्मा की टांगें चौड़ा दी। चूत मुँह खोले सामने थी। अच्छा खासा बड़ा सा छेद था, भोसड़ी हो गई थी। लगता था खूब इश्तेमाल की गई थी। भोसड़ी गीली हो रही थी। गुलाबी नरम गहराइयों में पानी और गाढ़ी सी सफेदी चमक रही थी। मालूम होता था हाल में ही लण्ड का रस चखा था जो थोड़ा अंदर रह गया था। पानी बाहर रिस रहा था। सब लोग गौर लगाकर मज़े लेकर देख रहे थे। भौजी ने सुपर साइज़ का डिल्डो उठा लिया।
मिसेज़ वर्मा घिघिया उठीं- “इसे मत करो मैं नहीं ले पाऊँगी सही में मैं नहीं ले सकती इसे प्लीज़्ज़…”
भौजी बोली- “लेगी कैसे नई? इतना डलवाने के लिये शोर जो मचाबे है…” उन्होंने डिल्डो को चूत के छेद में घुसेड़ा तो बड़ी मुश्किल से अंदर गया। उन्होंने घुमा करके और भीतर करना चाहा।
तो मिसेज़ वर्मा तड़पने लगीं। वह सिर यहां वहां पटक रही थीं और बोले जा रही थीं- “मत करो प्लीज़्ज़…”
भौजी ने जोर लगाके डिल्डो को आधा अंदर कर ही दिया।
मिसेज़ वर्मा के मुँह से एक चीख निकली। अब भौजी डिल्डो को आगे पीछे कर रही थीं साथ ही चूत की घुंडी पर अंगूठा फेरती जा रही थीं। धीरे-धीरे मिसेज़ वर्मा को मजा आने लगा। वह आनंद में भर कर ‘सी सी’ करने लगीं थीं। बोले जा रही थीं “घुसेड़ दो उसको और अंदर लगाओ जोर कस के…” लेकिन डिल्डो उनके अंदर उससे ज्यादा और नहीं घुस सकता था।
वह भौजी को अपने ऊपर खींचना चाहती थीं आदमी जैसा कस के प्यार पाने के लिये।
भौजी ने कहा- “लो अब कौन इनको संभालेगा?”
और मिसेज़ वर्मा की एक सहेली चूत खोल के उनके ऊपर लेट गई। सेर को सवा सेर मिल गया था।
होली की महफिल
होली की शाम को सब लोग नहा-धोकर शिशिर के यहां इकट्ठे हुये। मलहोत्रा परिवार न आ सका, उनके यहां मेहमान आ गये थे। कुमुद ने सेब, पापड़ी, गुझिया, भांग की बरफी और भांग मिली ठंडाई का इंतेजाम कर रखा था। होली के माहौल का असर था ऊपर से भांग का शुरूर, सब बहक रहे थे। राकेश ने सुझाया कि सब लोग अपने-अपने पहले सेक्स का अनुभव सुनायें।
सब एक साथ बोले- हाँ सब लोग अपनी अपनी बीती बतायें। सबसे पहले मेजबान शिशिर से कहा गया कि वह अपना अनुभव बाताये।
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Next update “होली की महफिल”
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होली की महफिल
होली की शाम को सब लोग नहा-धोकर शिशिर के यहां इकट्ठे हुये। मलहोत्रा परिवार न आ सका, उनके यहां मेहमान आ गये थे। कुमुद ने सेब, पापड़ी, गुझिया, भांग की बरफी और भांग मिली ठंडाई का इंतेजाम कर रखा था। होली के माहौल का असर था ऊपर से भांग का शुरूर, सब बहक रहे थे। राकेश ने सुझाया कि सब लोग अपने-अपने पहले सेक्स का अनुभव सुनायें।
सब एक साथ बोले- हाँ सब लोग अपनी अपनी बीती बतायें। सबसे पहले मेजबान शिशिर से कहा गया कि वह अपना अनुभव बाताये।
***** ***** शिशिर की कहानी
होली का दिन था। मैं इंटरमीडियेट मैं रहा हूँगा। मेरी भाभी मुहल्ले में होली खेलकर आईं। वह बड़ी खुश थीं, कुछ गुनगुना रही थीं। मैं यह बता दूं कि भाभी मेरे से छः-सात साल बड़ी थीं, मेरे से बड़ा लाड़ करतीं थीं, जिसमें सेक्स बिल्कुल नहीं था। जब वह ब्याह के आईं तो मैं दस साल का रहा हूँगा। वह बिल्कुल भीग गईं थीं, साड़ी बदन से चिपक गई थी। उनके उभार और कमर की गोलाइयां पूरी तरह उभर आईं थीं। मेरी भाभी में बहुत ग्रेस था। अच्छी उंचाई की आकर्षक मुखछबि थी और शादी के छः-सात सालों में बदन बड़ी समानता से सुडौल हो गया था।
आते ही वह बाथरूम में चली गईं। बाथरूम में दो दरवाजे थे, एक उनके कमरे की तरफ खुलता था एक मेरे कमरे की ओर जो अक्सर बंद रहता था क्योंकी मैं नीचे का बाथरूम इश्तेमाल करता था। लेकिन इस समय मेरी तरफ का दरवाजा खुला हुआ था।
उन्होंने भी ध्यान नहीं दिया क्योंकी होली के लिये मुझे अपने दोस्त के यहां जाना था और दूसरे दिन वापिस आना था। लेकिन मेरा प्रोग्राम ऐन मौके पर कैंसिल हो गया था। मैं यहीं होली खेलकर वापिस आ गया था और उसी बाथरूम में नहा धो लिया था। गलती से अपनी तरफ का दरवाजा खुला छूट गया था। मैं कमरे मैं आराम से लेटा हुआ था जहां से बाथरूम का नजारा साफ नजर आ रहा था।
भाभी ने सबसे पहले अपनी साड़ी उतार के फेंक दी फिर पेटीकोट के अंदर हाथ डालकर अपनी पैंटी खींच ली। वह रंग से तर हो रही की जैसे उसपर ही निशाना लगाकर रंग फेंका गया हो। जैसे-जैसे वह ब्लाउज़ के बटन खोल रही थीं मेरी सांसें गरम होती जा रही थीं। ब्लाउज़ उनके शरीर से फिसलकर नीचे गिर गया। वह मेरे सामने केवल ब्रेजियर और पेटीकोट में खड़ी थीं। ब्रेजियर उनके सीने से चिपक गई थी बादामी शहतूत से चूचुक और उनके घेरे साफ नजर आ रहे थे। पेटीकोट आगे से उनकी रानों से बुरी तरह चिपक गया था और चूतड़ों के बीच में दरार अ फँस गया था। सामने झांट के बाल नजर आ रहे थे। उत्तेजित होकर मेरा लण्ड एकदम खड़ा हो गया।
उन्होंने पीछे हाथ करके जैसे ही हुक खोलकर ब्रेजियर अलग की कि स्प्रिंग की तरह दो सफेद गेंदें सामने आ गईं। बहुत ही मतवाले भरे हुये जोबन थे। भाभी ने अपना हाथ पेटीकोट के नाड़े की तरफ बढ़ाया तो मेरा लण्ड और ऊपर होकर हिलने लगा। उन्होंने एक झटके में नाड़ा खींचा और पेटीकोट नीचे गिर गया। माई गोड मेरे सामने भाभी पूरी नंगी खड़ी थीं। बड़े-बड़े उभार, बादामी फूले-फूले चूचुक, चिकनी सुडौल जांघें, भरे-भरे उभार लिये चूतड़ों की गोलाइयां और जांघों के ऊपर तराशे हुये बादामी बाल। मैंने अपना लण्ड पकड़कर लिया नहीं तो वह हिल-हिल के बुरा हाल कर देता।
भाभी की जांघों और चूतड़ों पर रंग के धब्बे लगे हुये थे। चूत के बाल भी रंग में चिपक गये थे। उन्होंने साबुन से मलकर रंग को छुड़ाया। इसके बाद उन्होंने जो कुछ किया मैं उठ के खड़ा हो गया।
भाभी ने साबुन का ढेर सारा झाग बनाया और अपनी टांगें चौड़ी करके उंगली से साबुन का झाग अपनी चूत के अंदर बाहर करने लगीं। मेरे सामने उनकी चूत का मुँह खुला हुआ था। छेद के ऊपर फांकों के बीच की और अंदर की साबुन मिली लाल गहराई मेरे सामने थी। लगता था वह रात के लिये तैयारी कर रही थीं। मेरे से न रहा गया और मैं दरबाजे के सामने जा खड़ा हुआ, लण्ड एकदम तना हुआ।
भाभी ने मुझे देखा और उनके मुँह से चीख निकली- “उई माँ…” फिर एक हाथ से उन्होंने अपनी चूत ढंक ली और दूसरे से अपनी चूचियां छिपाते हुये बोलीं- “ऐसे क्या देखते हो जाओ न…” फिर खुद ही भागकर अपने कमरे में चली गईं।
मैं बहुत गरम हो चुका था। उत्तेजना मैं मेरा लण्ड फड़फड़ा रहा था। आँखों के सामने भाभी का नंगा बदन नाच रहा था। मैं बाथरूम में घुस गया। पैंट उतारकर लण्ड को कस-कस के झटके दिये जि कि गाढ़ा गाढ़ा सफेद पदार्थ काफी देर तक उगलता रहा। भाभी की पैंटी उठा के उससे पोंछा। पता नहीं भाभी ने यह सब देखा या नहीं।
शाम को भाभी मिलीं तो शर्म से लाल हो रही थीं। आँखें नहीं मिला रही थीं।
हिम्मत करके मैंने उनसे से कहा- “भाभी, आप अंदर से भी उतनी सुंदर है जितनी बाहर से…”
भाभी बोलीं- “तुम बहुत बेशरम हो गये हो, जल्दी तुम्हारी शादी करना पड़ेगी…”
उसके बाद बहुत दिनों तक वह मुझसे शर्माती रही। मैं भी उनसे बहुत दिनों तक सहज न हो पाया।
सुनीता सोच रही की कि शिशिर उसमें अपनी भाभी को देखता है और इसीलिये शुरू से उसको ताकता है और भाभी-भाभी कहता है। जैसे अपनी भाभी के सामने न बढ़ा उसी तरह उसके आगे भी नहीं बढ़ता है। सुनीता ने निश्चय कर लिया कि इसका यह बैरियार तोड़ना ही पड़ेगा।
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कुमुद की कहानी
मेजबान के रूप में अगली बारी कुमुद की थी। कुमुद ने पहले सेक्स वाली बातें महफिल में नहीं सुनाई थीं। पहले तो झिझकी लेकिन फिर कहने लगी:
“होली मनाने मेरी दीदी मैके आई थीं। उनकी शादी को एक साल से कम हुआ था। होली वाले दिन जीजाजी भी आ गये। जीजाजी बड़े खुले और मजाकिया किश्म के हैं। मेरी भाभियों ने उनसे छेड़खानी की, गंदे मजाक किये। जिनका उन्होंने तुरंत बढ़कर जवाब दिया, उनके संग होली खेली जिसमें मर्यादा को ध्यान में रखते हुये उन्होंने एक दूसरे के अंग छुये। मेरे साथ भी जीजाजी ने होली खेली लेकिन उस समय वह मर्यादा भूल गये। रंग लगाने के बहाने उन्होंने मेरे दोंनों उरोजों को मसला और हाथ बढ़ाकर चूत के ऊपर भी रगड़ दिया…” यह कहकर कुमुद ने सबेरे की होली को निशाना बना करके दबी आँखों से राकेश की ओर देखा।
कुमुद ने कहना चालू रखा- “मेरी दीदी ने देख करके भी अनदेखी कर दी। भाभियां हँसती रही। मेरे ऊपर कुछ शुरूर आ गया। रंग बाजी खतम हुई तो कहा गया कि सब लोग नहा धोकर तैयार हो जाओ क्योंकि जीजाजी के चाचा जी ने सबको बुलाया है जो उसी शहर में रहते थे।
एक भाभी ने ताना कसा कि मेरी ननद यानी दीदी के संग तो होली मनाई ही नहीं है।
तो वह मुश्कुराके बोले अभी मनाऊँगा।
मैं नहाने के लिये गुसलखाने में घुस गई। कपड़े उतार के नीचे की ओर देखा जहां जीजाजी ने हाथ लगाया था तो सिहरन हो आई। मैंने वहां पानी की तेज धार छोड़ दी। साबुन उठाने के लिये ताक पर हाथ बढ़ाया और ऊपर देखा जहां से छत साफ नजर आती थी। वहां जीजाजी दीदी को पकड़े हुये थे। छत की सीढ़ियों का दरवाजा उन्होंने बंद कर रखा था।
दीदी रंग से सराबोर हो रही थीं। दीदी अपने को छुड़ा के भागीं। जीजाजी ने छत की मुड़ेर पर दीदी को पकड़ लिया और सामने से चिपका लिया। दीदी मुड़ेर पर झुकतीं गईं और जीजाजी उनकी चूचियों को चूमने लगे। दीदी ने उनके सिर के ऊपर हाथ रखकर और जोर से सिर चूचियों पर दबा लिया और दूसरे हाथ से जीजाजी का लण्ड टटोलने लगीं। जीजाजी को जैसे करेंट लग गया हो। वह दीदी से अलग हो गये और पेटीकोट समेत उनकी साड़ी उलट दी।
गीले अंडरवेर को नीचे खींच कर उतार लिया फिर उंगली में घुमाते हुये नीचे सड़क पर फेंक दिया। अपने हाथ से पैंट के बटन खोलने लगे। इस बीच दीदी अपने ब्लाउज़ के बटन खोल चुकी थीं और उन्होंने ब्रेजियर के हुक खोलकर उसको अलग कर दिया। उनके भरे जोबन मुँह बाये खड़े थे। मुझे नहीं मालूम था कि उनकी गोलाइयां इतनी बड़ी थीं। जीजाजी ने अपनी पैंट गिरा दी। उनका मोटा लण्ड एकदम तनकर में खड़ा था। उस बीच मैंने साबुन घिस-घिस के बहुत सारा झाग बनाया, तभी जीजाजी का लण्ड सामने दिखा तो अपने आप मेरा हाथ चूत के छेद पर चला गया और मैंने सारा का सारा झाग चूत में घुसेड़ लिया।
दीदी ने अपने आप टांगें चौड़ा दीं। वह चूत का मुँह फैलाये मुड़ेर से टिकी झुकी हुई थीं, पीठ मुड़ेर पर पसरी हुई थी। दीदी का सिर मुड़ेर से बाहर निकला हुआ था। साड़क पर जाने वाला कोई भी ऊपर देखे तो उनकी पोजशिान को देख सकता था लेकिन इस समय उनको इसकी फिक्र नहीं थी। जीजाजी ने खड़े-खड़े ही लण्ड को हाथ से पकड़कर उनकी चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे अंदर डालना चालू किया। दीदी की चूत उसको लीलती गई। दीदी ने कस करके दोनों बाहें जीजाजी की पीठ पर बाँध लीं। पहले तो जीजाजी धीरे-धीरे आगे-पीछे करते रहे फिर उन्होंने धकाधक-धकाधक चालू कर दी। दीदी भी चूत उठा-उठाकर के झेल रही थीं।
इस बीच पता नहीं कब मैं गुसलखाने में रखी कपड़े डालने की रैक से टिक गई थी और उसकी खूंटी की घुंडी को अपनी चूत में घुसेड़ लिया था। जब जीजाजी धकाधक लगा रहे थे तो मैं भी खूंटी पर उसी लय से आगे पीछे हो रही थी। मैं मज़े में पूरी तरह डूबी थी कि दरवाजा खटखटाने से होश में आई।
बड़ी भाभी कह रही थी- अब निकलोगी भी बाहर या नहाती ही रहोगी सबको तैयार होना है।
मैंने जल्दी से अपनी सफाई की और बाहर निकल आई। जीजाजी अभी भी दीदी को लगाये जा रहे थे।
उसी दिन शाम को जीजाजी के चाचा जी के यहां मेरी शिशिर से मुलाकात हुई। वास्तव में हम लोगों को मिलाने के लिये ही यह आयोजन किया गया था। कहानी खत्म होने पर बड़े कामुक तरीके से राकेश ने कुमुद को देखा।
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राकेश की कहानी
अब बारी राकेश की थी। उसने कहा:
मेरी शादी की तैयारियां हो रही थीं। कालेज के मेरे दोस्त जमा हो गये थे। शादी के कामों में नाइन का काफी रोल होता है, बहुत सारे नेगों में नाइन का अहम काम होता है। भाभी ने उबटन की रश्म की तो मेरे को हल्दी बेसन और चंदन से अच्छी तरह उबटन लगाने के लिये नाइन बैठी। कलावती उसका नाम था। कलावती दुबली पतली थी, सांवला रंग था, बड़ी बड़ी आँखों वाले उसके चेहरे में बेहद आकर्षण था। कामकाजी शरीर एकदम चुस्त और छरहरा था कहीं भी बेकार की चर्बी नहीं थी। उसके लंबे बदन की कशिश किसी को भी बाँध लेती थी। वह एकदम जवान थी।
उबटन लगाते हुये जब मेरे दोस्तों ने देखा तो कइयों का दिल उस पर आ गया। शाम को जब हम सब लोग बैठे तो रमेश ने जो शादीशुदा था कहा- “वह नाइन की लेना चाहता है…”
उसके बाद तो एक-एक करके सब शादीशुदा और कुँवारे दोस्तों ने अपनी मंशा जता दी कि वह कलावती को चोदना चाहते हैं। डर था कि नाइन कहीं उनकी बात सुनकर भड़क न उठे और जंजाल खड़ा कर दे।
रमेश बोला- “मैं रह नहीं सकता मैं नाइन से बात करूंगा…”
मेरे को बड़ा डर लगा कि कहीं बवंडर न उठ खड़ा हो। रमेश ने समझाया कि तुम मत घबड़ाओ मैं सीधे पूछ लूंगा, वो नहीं चाहेगी तो बात खतम।
नाइन को एक नौकरानी के जरिये यह कहकर बुलाया गया कि दूल्हे राजा बुलाते हैं। मैं और सब दोस्त अंदर के दूसरे कमरे में बैठ गये। केवल रमेश उस कमरे में रहा। कलावती आई तो मुझे पूछने लगी।
रमेश बड़ी नम्रता से बोला- “कलावती दूल्हे राजा तुमसे शर्मा रहे हैं। मुझसे कहा है कि तुमसे बात करूं। देखो कलावती मेरी बात तुम्हें अच्छी न लगे तो नाराज न होना। मैं दूल्हेराजा की तरफ से तुमसे माफी मांग लूंगा लेकिन बात आगे मत बढ़ाना…”
कलावती सहम गई- “आप क्या बात करते हैं, बाबूजी बोलिये क्या है?”
रमेश- “कलावती तुम बहुत अच्छी हो तुम्हारा घरवाला बहुत ही भाग्यवान है। बात यह है कि तुमने हम लोगों का दिल जीत लिया है। हम लोग चाहते हैं कि तुम हमें शुख दे दो कि हम हमेशा तुम्हें याद करते रहें…”
कलावती कुछ समझी कुछ नहीं, बोली- “मैं क्या सेवा कर सकती हूँ?”
रमेश को सीधा कहना पड़ा- “हम लोग तुमको भोगना चाहते हैं…”
मेरा दिल धकधक कर रहा था।
कलावती के चेहरे पर लाजभरी खुशी दौड़ गई। मस्ताकर बोली- “सबसे पहले दूल्हेराजा को करना होगा। अपनी दुल्हन से पहले मेरे साथ सुहागरात मनांयें। उनसे सोने का गहना लूंगी, फिर तुम सब लोगों की तबीयत खुश कर दूंगी…”
शर्त बड़ी टेढ़ी थी। शादी शुरू हो गई थी नेग हो रहे थे। मैं सुनीता के लिये बेकरार था। कलावती से संभोग नहीं कर सकता था। उसको बहुत समझाया ज्यादा पैसे का लालच दिया लेकिन वह टस से मस न हुई। यहां मेरे दोस्त मेरे ऊपर दबाव डाल रहे थे, वह कलावती को चोदने को उतावले थे। कहने लगे कि नाम के लिये डाल देना बस। उतने सारे दोस्तों का मन रखने के लिये मुझे उनकी बात मानना पड़ी।
तय हुआ कि बारात उठने के पहले जब मुझे तैयार होने के लिये एक कमरे में अकेला छोड़ दिया जायेगा तब कलावती चुपचाप कमरे में आ जायेगी। नाइन होने से उसका आना जाना आसान था। शादी के बाद जब मैं सुनीता के साथ रात रंगीन कर कहा हूँगा, उस समय मेरे दोस्त भी कलावती के संग आनंद मनायेंगे।
जब कलावती कमरे में आई तो मैं उसे देखता ही रह गया। लगता है उसने अपना भी उबटन कर डाला था। चेहरे पर गजब की लुनाई थी। बहुत कीमती न सही लेकिन उसने एक अच्छी साड़ी और राजस्थानी चोली पहन रखी थी जो उसके ऊपर खूब फब रही थी। आते ही उसने मेरे पैर छुये।
मैंने यह कहते हुये कि ये क्या करती हो, अपने से चिपका लिया। उसकी कमनीय देह बेला की लता सी मेरे से चिपक गई। उसका बदन मेरे वदन के उतार चढ़ाव में फिट हो गया था। मेरी रानों में उसकी जांघें समा गईं थीं। लण्ड के ऊपर चूत फिट हो गई थी। सीने पर उसके सख्त स्तनों और चूचुकों की चुभन महसूस कर रहा था। वह और भी चिपकती हुई खड़ी रही। जल्दी से निपटने के लिये मैंने चूत छूने के लिये साड़ी में हाथ डालना चाहा।
तो वह बोली- “राजाजी इत्ते बेसब्र न हो। लो इनसे खेलो…” हाथ पीछे करके उसने चोली की डोरी खींच दी। नीचे उसने कुछ भी नहीं पहन रखा था।
लपक कर मैंने दोनों गोलाइयों को मुट्ठी में दबा लिया। उसकी छातियां छोटी पर सख्त थीं। छातियों को मसलते ही कलावती ‘आह आह’ कर उठी। मैंने सिर झुका कर उसकी बाईं चूची मुँह में ले करके धीरे से दांतों से दबा ली।
कलावती जोर-जोर से ‘उइईईईई‘ कर उठी। जल्दी ही वह गरम हो गई थी। उससे अब रहा न गया तो लण्ड को पकड़ के हिलाते हुये बोली- “इसे निकालो न…”
मैंने पाजामा और अंडरवेर का नाड़ा खोलकर नीचे गिरा दिया।
उसने मेरा तना हुआ लण्ड देखा तो मुँह से निकल गया- “उई दैय्या… इत्ता बड़ा हथियार है… मेरी लिल्ली मैं कैसे घुसेगा?”
मैंने कहा- “तो फिर अपनी लिल्ली दिखाओ न…” और उसके पेटीकोट का नाड़ा खींच दिया तो साड़ी समेत पेटीकोट नीचे गिर गया।
जैसे ही वह नंगी हुई भाग के बिस्तर पर लेट गई। मैं भी पूरा नंगा होकर उसके ऊपर जा गिरा। कलावती ने मेरे से पूछा- “राजाजी, तुमने पहले किसी को चोदा है?”
मैंने झूठ बोला- “नहीं तो…”
कलावती का चेहरा चमक उठा- “ओ मइया… मैं ही इसका पहला रस लूंगी। मैं ही आपकी सही औरत बनूंगी…” फिर बोली- “इसका प्रसाद चखना होगा…”
मेरे को पलटा कर वह दोनों टांगों के बीच बैठ गई। दोनों हाथों से लण्ड को छूकर हाथ माथे पर लगा लिये जैसे यह भी कोई पूजा की चीज़ हो। दांईं मुट्ठी में लण्ड को बंद करके उसके मालिश के अभ्यस्थ हाथों ने मुट्ठी पूरे लण्ड पर इस तरह आगे पीछे की कि मैं हवा में तैरने लगा। फिर अगले हिस्से की खाल हटाकर सुपाड़ा उसने मुँह में ले लिया और उसे चूसने लगी। मेरा लण्ड फड़फड़ाने लगा। फिर वो पूरे लण्ड को चचोरने लगी।
मैं बेकाबू हो गया। चूतड़ उठा-उठाकर लण्ड उसके मुँह में ही पेलने लगा।
मेरे से उसने कहा- “जब झड़ो तो रुकना नहीं। ज्यादा से ज्यादा आने देना…” इसके बाद उसने जो लय चालू की कि मेरे चूतड़ हवा में ही उठे रह गये और बढ़-बढ़ के धकाधक धक्के मारने लगे।
कलावती भी मुँह से पसंदगी जता रही थी- “उऊं ऊं ऊं ऊं…”
मेरे से रुका न गया। लण्ड ने एक झटका दिया और जैसे ही वीर्य उगलना चालू किया तो उसने फिर सुपाड़े को दांतों में थाम लिया और निकलते हुये रस को पीती गई।
जब लण्ड ठंडा हो गया तो आखिरी बार चाटती हुई बोली- “अपने मर्द के अलावा बस मैंने तुम्हारा प्रसाद लिया है। उनका भी बस चखा भर था। आपके किसी भी दोस्त का नहीं चखूंगी…”
मैंने खींच करके उसको अपने सीने से चिपका लिया।
कलावती ने मेरे सीने की चूचुक को मुँह में ले लिया और हाथ नीचे ले जाकर मेरे लण्ड के ऊपर ढक लिया। सीने से चिपके-चिपके ही वह धीरे-धीरे मेरी चूचुक चूसने लगी और बड़े अच्छे तरीके से लण्ड सहलाने लगी। मेरा लण्ड बढ़ता ही गया और थोड़ी ही देर में पत्थर की तरह सख्त हो गया।
कलावती- “लो अपनी सुहागरात मना लो…” कहकर पलट कर चित्त लेट गई। फिर बोली- “मैं बाताती हूँ, कल अपनी दुल्हन की सील कैसे तोड़ोगे?”
टांगें चौड़ा करके उनके बीच में मुझे घुटनों के बल बैठा लिया। फिर अपनी टांगें मेरे दोनों कंधों पर रख लिये। उसके चूतड़ हवा में उठ गये थे। मेरे सीधे सामने चूत का मुँह खुल गया था। छेद अंदर तक दिख रहा था। अंदर तक चूत गीली थी और पानी रिसकर रानों पर फैल रहा था।
कलावती ने अपनी मुट्ठी से लण्ड पकड़कर चूत के मुँह से सटा दिया और बोली- “इसे धीरे-धीरे घुसेड़ दो…”
मैंने जोर लगाया। उसकी चूत टाइट थी पर मेरा पूरा लण्ड आसानी से उसमें चला गया। चूत की पकड़ में उसको बहुत आनंद मिल रहा था।
कलावती कहने लगी- “राजाजी, हमारी इसमें तो आराम से चला गया लेकिन कल ऐसा नहीं कर पाओगे। दुल्हन की फुद्दी में घुसेगा नहीं और फिसलकर ऊपर खिसक जायेगा। और जब घुसने लगेगा तो दुल्हन अपनी फुद्दी पीछे हटाती जायेगी क्योंकी उनको दर्द होगा। इस आसान में तुम दुल्हन पर पूरा काबू रख सकते हो। अगर टांगें कस के जकड़ लोगे तो वह पीछे नहीं हट पायेगी। रुक-रुक करके डालना लेकिन वह मना करें, चीखें भी तो मत रुकना, पूरा अंदर कर ही देना…”
मैं इस बीच धीरे-धीरे अंदर बाहर कर रहा था।
कलावती कहने लगी- “मेरी इसको तो कूटो न कसके कि इसकी सारी गरमी निकल जाये…”
मैंने लण्ड को बाहर तक निकाला और झटके से पूरा अंदर कर दिया।
कलावती के मुँह से निकला- “हाय राजा क्या लौड़ा है… अंदर तक हिला दिया और लगाओ कस के…”
उसके मुँह से खुला-खुला सुनकर मैं और उत्तेजित हो गया। पिस्टन की तरह धकम-पेल करने लगा। बड़ी दूर तक बाहर निकालता और खड़ाक से अंदर कर देता।
उसने कस के बांहों से मेरी पीठ को जकड़ रखा था। हर चोट पर वो पीठ में नाखून गड़ा देती और जोर से चिल्लाती- “ओ रज्जा फाड़ दो इसको छोड़ना नहीं…” उसकी जबान गंदी से गंदी होती जा रही थी- “रज्जा इसकी भोसड़ी बना दो आज, बड़ा सताती है मुझे…”
मेरे को उसकी गंदी बातें बुरी नहीं लग रही थीं बल्की मैं आनंदित हो रहा था और अपनी चोटें बढ़ाता जा रहा था।
अचानक उसने कसके चूत चिपका दी- “ओ ओ ओ रज्ज्जा मैं… मैं तो झ्झड़ गईईई…” और अपने दांत मेरे सीने में गड़ा दिये। मैंने भी लण्ड अंदर रहते हुये ही उसकी क्लिटोरिस के ऊपर लण्ड की जड़ को कस के रगड़ा और सारा का सारा वीर्य छोड़ दिया।
काफी देर तक हम लोग वैसे ही पड़े रहे। फिर वह उठी। उकड़ू हो करके उसने अपना सिर मेरे पैरों पर रखा दिया। मैंने उठकर के एक सोने का हार उसके गाले में डाल दिया।
वह बोली- “राजाजी मेरे को भूल मत जाना। मैं भी आपकी औरत की तरह हूँ। सुहागरात आपने मेरे साथ मनाई है…” और वह कपड़े पहनकर चली गई।
कहां तो मैं जल्दी निपटना चाहता था और कहां एक घंटे से ऊपर उसके साथ हो गया।
कुमुद अपना क्षोभ न छुपा सकी, कहा- “हाउ इनसेंसिटिव… बेचारी सुनीता…”
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सुनीता की कहानी
अब सुनीता की बारी थी। सुनीता ने कहा:
मेरा पहला और आखिरी सेक्स बस राकेश से ही है। लेकिन मैं अपनी कहानी तब कहूँगी जब राकेश यहां से चले जायेंगे।
राकेश ने जाने से मना कर दिया। सब लोगो के जोर देने पर आखिर राकेश को वहां से जाना ही पड़ा।
सुनीता ने कहना शुरू किया:
राकेश से मेरी मुलाकात की शुरूआत देखने दिखाने के सिलसिले मैं औपचारिक रूप से हुई थी। हम लोग एक ही शहर में रहते थे। बाद में मेरी एक सहेली के जरिये जो उनकी कालोनी में रहती थी हम लोंगों का संपर्क बन गया था। हम लोग मिलते रहते थे लेकिन एक दूसरे को बांहों में लेने या चुंबन लेने से आगे नहीं बढ़े थे। मैंने ही नहीं बढ़ने दिया था।
यह प्रसंग मेरी और राकेश की शादी का ही है। राकेश के रिश्तेदार और दोस्त इकट्ठे हो गये थे। मेरे यहां भी मेरी सहेलियां और मेहमान जमा थे। विवाह के पहले के नेग हो रहे थे।
बारात आने के एक दिन पहले सहेली के जरिये मुझे राकेश का एक गुप्त नोट मिला- “आज रात होटल ताज के इस रूम में जरूर से हमसे मिलो…”
हल्दी बगैरह चढ़ने के बाद मैं घर से कैसे निकल सकती थी लेकिन जरूर मिलो की खबर सुनकर जाना तो था ही। बड़ी मुश्किल से अकेले कमरे में आराम करने का बहाना करके सहेली की सहायता से छुप छुपा कर बाहर निकल पाई। होटल पहुँची तो सिहरन होने लगी। ऐसा लग रहा था कि इस राकेश से मैं पहली बार मिलने जा रही हूँ। मिलन की कामना से शरीर गरम हो गया। कमरे में पहुँची तो शर्म से दुहरी हो रही थी। गहने और शादी के जोड़े के अलावा मैं सब तरह से दुल्हन थी।
कमरे में पहुँचते ही राकेश ने मुझे दबोच लिया और कसकर होंठों पर अपने होंठ रख दिये। मैंने भी उसे कस कर जकड़ लिया। वैसे ही ले जाकर उसने मुझे बेड पर गिरा दिया और खुद मेरे ऊपर गिर गया। ब्लाउज़ के ऊपर से ही दायें उरोज पर उसने मुँह रख दिया और बांयें को मुट्ठी में दबोच लिया। मुझे न करने की इच्छा ही नहीं हुई। वह धीरे-धीरे बात करता रहा और मेरे बटन और हुक खोलता रहा। फिर उसने जो बताया मैं शर्म से गड़ गई।
दो दिन पहले मेरे यहां मेंहदी की रश्म हुई थी। मैं एक चौकी पर बैठी मेंहदी लगवा रही थी घुटनों पर हथेलियां फैलाये, तभी राकेश और उसके दोस्त वहां आ गये थे। उस दिन रिवाज के अनुसार मैंने लहंगा पहना था। आदत न होने के कारण लहंगे का ऊपर का हिस्सा मुड़े हुये घुटनों के ऊपर चढ़ गया था और नीचे का हिस्सा जमीन पर गिर गया था। टांगों के बीच का नजारा साफ दिख रहा था। मैंने गुलाबी सिल्क की पैंटी पहन रखी थी। शायाद मैं आने वाली रंगीनियों को याद करके बहुत गरमा रही थी क्येांकि पैंटी पर चूत के ठीक ऊपर एक बड़ा गीला धब्बा फैला हुआ था।
उसके सब दोस्तों ने उसको देखा। मेंहदी लगाने वाला भी बार-बार वहां देख रहा था। राकेश ने आँखों से इशारा किया लेकिन मैंने ध्यान ही नहीं दिया था। राकेश ने उठे लहंगे को नीचे करने की कोशिश भी की थी लेकिन सबके सामने छू भी नहीं सकता था और सबने देख तो लिया ही था।
यह सही है कि इन दिनों दिमाग में राकेश की याद करके मेरी चूत रिस रही थी और मैं लगवाने के लिये बेकरार थी। मैंने राकेश से कहा- “मुझे माफ कर दो मैं…”
पूरा बोलने के पहले ही राकेश कहने लगा- “डार्लिंग, क्या बात करती हो… तुमने जानबूझ कर थोड़ी किया। चलो उसी बहाने दोस्तों को भी मजा मिल गया, वैसे तो तुम दिखाती नहीं…”
मैंने कहा- “धत्त बेशरम…”
राकेश फिर बोला- “एक बात है कि उस दिन मेरा लण्ड एकदम खड़ा हो गया था और अब रोज खड़ा हो जाता है। उसी का इलाज करने के लिये तुम्हें बुलाया है…”
मैंने कहा- “कल शादी की रश्म तो पूरी हो जाने दो…”
राकेश ने प्रश्न किया- “मान लो मैं तुमको आज करना ही चाहूँ तो?”
मैंने सहज भाव से कहा- “मैं तुम्हारी हूँ, यह शरीर तुम्हारा है, जो चाहे करो। लेकिन रीति निभाने के लिये एक दिन का सब्र रखो न…”
तब राकेश ने कलावती और दोस्तों की सब बात मुझे बता दी और कहा- “मैं तुमसे पहले किसी को नहीं भोगूंगा। सुहागरात तो तुम्हारे साथ ही मनेगी। बोलो क्या कहती हो?”
मैंने बाहें और टांगें फैला दी और कहा- “लो मनाओ अपनी सुहागरात…”
राकेश धीरे-धीरे चूमता हुआ आगे बढ़ने लगा।
मैंने उसके कान में कहा- “मुझे जल्दी से जल्दी वापिस पहुँच जाना चाहिये। मैं तो तैयार ही हूँ। मेरी यह गीली ही बनी रहती है। लगा दो न इसमें…”
राकेश ने एक झटके में पेटीकोट और साड़ी खींच दी। फिर अपने कपड़े उतार फेंके। मैं उसके मजबूत लण्ड से खेलना चाहती थी, वह भी मेरी चूचियों से और चूत से खिलबाड़ करना चाहता था लेकिन समय नहीं था।
मैंने उसका लण्ड पकड़ करके चूत से सटाया और जैसे ही उसने जोर लगाया मैं चिल्ला उठी। मेरी तबीयत हो रही थी, लेकिन लण्ड का घुसना इतना आसान नहीं था जितना मैं समझ रही थी। जब भी वह लगाता मैं चिल्ला उठती और वह हटा लेटा।
मैं कहने लगी- “बस रहने दो लण्ड चूत का मिलना तो हो ही गया है…”
इस बार राकेश ने अपने थूक से लण्ड को गीला किया, अपने हाथ से पकड़कर घुमाकर सुपाड़ा थोड़ा छेद में फँसाया और मेरी कमर पकड़ करके पूरे जोर से पेल दिया। मैं चिल्लाती रही लेकिन वह रुका नहीं… जब तक पूरा लण्ड अंदर तक नहीं घुस गया। मैं रोने लग गई थी।
उसने मेरे आंसू पोंछते हुये कहा- “डार्लिंग तुमको जो सजा देना हो दे लो…”
लण्ड के आगे पीछे होने से अब भी चूत के भीतर छुरी जैसी चल रही थी। मैंने कहा- “अब और मत सताओ…”
वह बोला- “अच्छा…” और घुसे हुये लण्ड पर ही जोर लगाकर अपनी इच्छा शक्ति से उसने पानी छोड़ दिया। पानी निकलने के पहले उसने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया।
जब मैं उठी तो बेड पर ख़ून देखकर घबड़ा उठी। राकेश ने समझाया कोई बात नहीं होटल वाले को वह चादर के पैसे दे देगा और उसने वह चादर लपेटकर अपने पास रख ली जो आज भी हमारे पास है। जब मैं होटल से निकली तो शादी के पहले ही लुट चुकी थी।
कुमुद की भावना अब राकेश के बारे में बदल चुकी थी। वह उसे और भी सराहने लगी थी।
सुनीता ने आगे कहा:
जहां तक कलावती का सवाल है, कलावती ने खुद सुनीता को सब बता दिया और कभी अपना हक नहीं जताया। सुनीता उसकी सहायता करती रहती थी। तीज त्योहार पर उसको साड़ी गहने आदि भी देती रहती थी। होली दिवाली वह राकेश के साथ मनाती थी। उस समय वह राकेश से चुदवाती भी थी। एक होली को जब राकेश उसको चोद रहा था तो राकेश का लण्ड फच्च-फच्च कर रहा था।
राकेश ने पूछा- “क्या बात है?”
तो कलावती ने बताया- “यहां आने के पहले उसने अपने मर्द से होली मनाई की जो अंदर ही झड़ गया था…”
राकेश ने कहा- “अगली बार से वह होली दिवाली उसके संग पहले मनाये फिर अपने मर्द के साथ…”
आखिरी बारी मिसेज़ संगीता अग्रवाल की थी।
मिसेज़ संगीता अग्रवाल की कहानी:
यह घटना शादी के काफी बाद की है। शादी के पहले मैं गाँव में पली बढ़ी। वहां ऐसा कुछ खास नहीं घटा सिवाये इसके कि मेरी बगल में एक लड़का रहता था। जब मैं छत पर जाती थी तो वह अपना लण्ड खोलकर के खड़ा हो जाता था। शादी होने के बाद मैं शहर में आ गई। संयुक्त परिवार था।
सास ससुर थे, दो जिठानियां थीं। मैं सबसे छोटी थी, सबसे सुंदर और सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी। परिवार मैं सब लोग मेरी सुनते, थे लाड़ भी करते थे, खासतौर पर बड़ी जेठानी। पति भी बात मान लेते थे क्योंकी चुदाई में मैं उनको खुश कर देती थी। मैं बहुत सेक्सी थी। सेक्स की कहानियां पढ़कर मन बहलाती थी। मैं काफी दबंग हो गई थी। जो चाहती थी कर लेती थी।
गर्मियों के दिन थे। बड़ी जेठानी के मैके में उनके छोटे भाई की शादी थी। बड़ी जेठानी मैके जाने के लिये बहुत उत्साहित थीं। उनको लिवाने उनके भाई आ रहे थे। हमारे यहां का रिवाज था कि शादी व्याह के मौके पर खास रिश्तेदारों को लिवाने के लिये उनके मैके से कोई आता था। उनका वही भाई आया जिसका व्याह था। ऊँचा अच्छा खासा गबरू जवान, नाम था प्रदीप। मैके जाने के उत्साह मैं सीढ़ियां उतरते हुये जेठानी का पैर फिसला और उनके पैर की हड्डी टूट गई। अब वह तो जा नहीं सकतीं थीं, इसलिये तय हुआ कि उनकी जगह मैं जाऊँगी।
हम लोगों के यहां यह भी रिवाज है बल्की इसको अच्छा भी माना जाता है। इससे यह भावना बनती है कि परिवार की सब बहुयें बहनें हैं। उनका अपना घर ही मायका नहीं है बल्की देवरानियों जिठानियों के घर भी उनके मायके हैं।
ट्रेन का लंबा सफर था। ग्वालियर से दोपहर में ट्रेन चलती थी और दूसरे दिन दोपहर में जबलपुर पहुँचती थी। मेरे मन में शरारत सुझी कि क्यों न सफर का मजा लिया जाये। सबसे पहले मैंने संबोधन ठीक किया। कहा- “मैं तुमसे छोटी होऊँगी, मुझे संगीता कहकर पुकारो…” और खुद मैं उसे प्रदीप जी कहने लगी।
टू-टियर में हम दोंनों का रिजर्वेशन था लेकिन दिन में तो हम लोग नीचे की बर्थ पर ही बैठे। जगह ज्यादा थी फिर भी मैं उससे सटकर बैठी। गरमी होने का बहाना करके मैंने अपना पल्लू गिरा दिया। सामने की बर्थ पर बूढ़े आदमी औरत बैठे थे जो आराम कर रहे थे। वैसे भी मुझे उनकी चिंता नहीं थी। मेरे बड़े-बड़े मम्मे ब्लाउज़ को फाड़ते हुये खड़े थे। मैंने नीचे तक कटा ब्लाउज़ पहन रखा था जिसमें से मेरी गोलाइयां झांक रही थीं। वह दबी आँखों से मेरे गले के अंदर झांक रहा था। मुझे छका कर मजा आ रहा था। सामान उठाने रखने के लिये झुकने के बहाने मैं अपनी चूचियां उससे चिपका देती थी।
पहले तो वह सिमट जाता था। पर थोड़ी देर में प्रदीप की झिझक जाती रही कि मैं उसकी बहन की देवरानी हूँ और उसकी बहन की जगह जा रही हूँ। उससे मेरी रिश्तेदारी तो थी नहीं। उसे भी मजा आने लगा और वह अपनी बांहों से ही मेरी चूचियां रगड़ने लगा। सोने का बहाना कर उसने आँखें बंद कर रखी थीं।
उसकी आँखें खोलने के लिये मैंने कहा- “ओह कितनी गरमी है…” और ब्लाउज़ के ऊपर का बटन खोल दिया। अब मेरे फूले-फूले चूचुक भी दिखाई देने लगे थे।
वह टकटकी लगाकर मेरे हिलते हुये मम्मे देख रहा था। उसकी टांगों के बीच में भी हलचल दिखाई दे रही थी। और ज्यादा चिढ़ाने के लिये मैंने कहा- “प्रदीप जी मैं तो अंदर तक भीग गई हूँ…” और उसके सामने ही साड़ी में हाथ डालकर चड्ढी बाहर खींच ली।
वह अचकचा गया। गोद में हाथ रखकर उसने अपने लण्ड के उठान को छुपा लिया।
मैं भी मानने वाली नहीं थी। जब उसने हाथ हटा लिये तब हाथ में पकड़ी मैगजीन को उसकी गोद में गिराकर उठाने के बहाने उसके मोटे लण्ड को अच्छी तरह टटोल लिया। अब स्थिति साफ थी। उसके खड़े पोल से टेंट जैसा बन गया। मैंने इशारा करते हुये कहा- “ये क्या है? अपने को काबू में भी नहीं रख सकते, ऐसी बेशरमी करते हो…”
झेंपने के बजाये उसने चट से जवाब दिया- “जब उसकी अपनी चीज़ सामने हो तो मिलने को बेकरार तो होगा ही…”
मैंने चोट की- “उसकी चीज़ 16 तारीख तक दूर है…” 16 तारीख को उसकी शादी थी।
उसने कहा- “उससे भी अच्छी चीज़ सामने है…”
मैंने कहा- “मुँह धोकर रखो…”
लेकिन हम छूने छुलाने का उपक्रम करते रहे। रात के करीब आठ बजे गाड़ी बीना पहुँची। प्रदीप सामान उठाते हुये बोला- “यहां उतरना है…”
मैंने सोचा यहां ट्रेन बदलानी है। हम लोग नीचे उतर आये। कुली से सामान दूसरे प्लेटफार्म पर ले जाने की बाजाये प्रदीप सामान स्टेशन से बाहर निकाल ले गया। एक आटो से हम लोग कहीं चल दिये। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। जब आटो एक होटल के सामने रूका तो मेरी समझ में कुछ आया।
प्रदीप बोला- “आज की रात यहीं रुकेंगे…” उसने अचानक प्रोग्राम बदल दिया था। नहले पर दहला लगा दिया था। कहां तो मैं मजा चखा रही थी अब वह मजा चखा रहा था।
मैंने पूछा- “यहां क्यों रुक गये हैं?”
तो मुश्कुराके बोला- “तुमको ज्यादा गरमी लग रही है, उसको निकालना है…”
मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि प्रदीप ऐसा कर सकता है। कमरा उसने मिस्टर और मिसेज़ प्रदीप के नाम से बुक कराया। खाना कमरे में ही मंगाया। अपने लिये शराब भी।
मैंने शराब के लिये मना कर दिया। मैंने कहा- “मैं नहा लूं…”
तो बोला- “संगीता डार्लिंग एक राउंड नहाने के पहले हो जाये फिर नहाने के बाद में। आज तो रात भर जश्न मनायेंगे…” फिर मुझे पकड़कर मम्मे दबाते हुये बोला- “तुम्हारे इन रस कलसों ने ट्रेन में बड़ा तड़पाया है इनसे तृप्ति तो कर लूं…”
उसने मेरा ब्लाउज़ और अंगिया उतार फेंकी। कस-कस के चूची मर्दन करने लगा। मैं धीमी धीमी आवाजें करने लगी। चूचियां मेरी कमजोरी हैं। उन पर मुँह रखते ही मैं काबू में नहीं रहती। कोई भी मेरी इस कमजोरी को जानकर मुझे चोद सकता है। प्रदीप ने मेरे चूचुक मुँह में लिये तो मैं उत्तेजना से ‘उंह उंह’ करने लगी और उसका लण्ड थाम लिया। उसने नाड़ा खींचकर मुझे पूरा नंगा कर दिया। और खुद ही अपने सब कपड़े उतार फेंके।
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उसका लण्ड देखकर मैं दंग रह गई। खीरे की तरह मोटा और लंबा तना हुआ खड़ा था। अग्रवाल साहब से दोगुना। कमर में हाथ डालकर वह मुझे बेड पर ले गया। चित्त लिटाकर मेरी टांगें खोल दीं। मैंने सोचा अब वह डालेगा। मैं लेने को उत्सुक हो गई।
लेकिन वो मेरी चूत की तरफ देखता ही रह गया। उसके मुँह से निकला- “ओ माई गाोड क्या डबलरोटी की तरह फुद्दी है और ये चूतड़ों की गोलाइयां… मैंने तुम्हारी जैसी औरत देखी ही नहीं है…”
मैंने पूछा- “प्रदीप जी, कितनी देखी है इस तरह?”
वह हँसने लगा- “होने वाली बीवी की देखी है, दो भाभियों की देखी है और ऐसी ही एक दो और देखी हैं…”
संगीता जान गई कि वह खेला खाया हुआ है।
मैंने इस बीच उसका लण्ड पकड़ लिया था जो मुट्ठी में भी नहीं आ रहा रहा था। चूत की तरफ उसे खींचा तो वह बोला- “इसकी पहली जगह तो यहां है…” और उसने लण्ड उसके होठों से सटा दिया।
मैंने मुँह एक तरफ फेर लिया, बोली- “यहां नहीं लूंगी…”
प्रदीप बोला- “चलो तुम नहीं लेकिन मैं तो अमृतपान करूंगा…” वह बेड के नीचे ही बैठ गया। दोनों टांगें कंधों पर धर लीं और अपना मुँह मेरी चूत के छेद पर रख दिया। मुझे उसकी भी आदत नहीं थी। मैंने उसका मुँह हटाना चाहा तो उसने और जोर से चिपका लिया।
मैं छुड़ाने के लिये टांगें उसकी पीठ पर मारने लगी और कहा- “ये मत करो…”
वह मार सहता गया। उसने मेरी क्लिटोरिस को अपने होठों में दबोच लिया और चूसने लगा।
मैं एकदम आनंद में भर गई। टांगों का मारना बंद हो गया। मैं बुदबुदाये जा रही थी- “ओ माँ इस तरह मत करो… ओ प्रदीप इस तरह…”
मेरे शब्दों का उल्टा ही मतलब था। मैं आनंद में भरी हुई थी और चाहती थी कि वह करता ही रहे। उसने अपनी जीभ छेद में डाल दी तो मैंने चूत हवा में उठा दी। प्रदीप के सिर पर हाथ रख के कसके दबा लिया और अपनी चूत उसके मुँह से रगड़ने लगी। मेरे सारे शरीर में करेंट दौड़ रहा था। मैं बोले जा रही थी- “प्रदीप चाटो इसे और कस के चाटो… पूरी जीभ अंदर कर दो… करते रहो न…”
प्रदीप ने जीभ निकाल के एक उंगली अंदर पूरी डाल दी और अंदर बाहर करने लगा।
मैं एकदम से झड़ गई, चिल्ला उठी- “ओओह्ह… माँआं… क्या कर दियाआ?” बड़ी देर तक झड़ती रही। यह मेरा पहला अनुभव था। मैं खलास हो चुकी थी। प्रदीप का अभी भी तना हुआ था।
प्रदीप मेरी बगल में आकर लेट गया। उसने मेरी चूची पर हाथ रखा तो मैंने हटा दिया। अब मेरी तबीयत नहीं थी। मैं एक रात में एक बार ही चुदाई कराती थी। प्रदीप ने धीरे-धीरे बाताना चालू किया कि किस तरह उसने अपनी बड़ी भाभी की ली थी। जब कहानी चरम पर पहुँची तो मैंने महसूस किया कि मेरी चूत में सुरसुरी होने लगी है और मैं प्रदीप के लण्ड से खेल रही हूँ।
प्रदीप चाहता था कि मैं उसके लण्ड से खेलती रहूँ। लेकिन मैं उसके उस बड़े हथियार को अपनी चूत में लगवाना चाहती थी जो बड़ा गरम हो रहा था। आखिर वह मान गया। मैंने घुटने मोड़कर टांगें इतनी फैला लीं जितनी फैल सकती थीं। हाथ से पकड़कर सुपाड़ा चूत के अंदर किया तो बड़ी मुश्किल से घुसा। उसने जोर लगाया तो थोड़ा और अंदर घुसा। मैं मना कर रही की कि प्रदीप ने और धकेल दिया। लेकिन लण्ड पूरा न जाकर बीच में फँस गया। यह चूत कितनी बार चुद चुकी थी लेकिन उस लण्ड को नहीं ले पा रही थी। उसका लण्ड खूब गरम हो रहा था। मुझे तकलीफ हो रही थी लेकिन मैं झेलने को तैयार थी।
मैंने कहा- “क्या देखते हो राजा कर दो पूरा अंदर एक बार में…”
और कहने की जरूरत नहीं थी। प्रदीप ने मेरे घुटने थामे और एक झटके में जड़ तक घुसेड़ दिया। मैं चाहती थी कि वह थोड़ा ठहरे लेकिन उसने मौका ही नहीं दिया। उसने निकाला और फिर अंदर कर दिया। चूत की दीवालों को रगड़ता हुआ उसका लण्ड घुसता था तो मैं आनंद से भर जाती थी। निकलता था तो फिर लेने के लिये चूत उठा देती थी। वह धकाधक पेल रहा था। मैं उसे उत्साहित कर रही थी।
हर चोट पर मेरी सीत्कार निकल जाती थी- “ऊंऊंह्ह ऊंह्ह… माँ… इतने जोर से क्यों मारते हो?”
वह भी कहता- “ले ऐऐऐ बहुत गरमी लग रही थी न तुझको ओओ…”
फिर चोट पर मैं सिसकी- “ओओ मइया… मैं तो मर जाऊँगीईई…”
और प्रदीप कस के धपाक- “ले इसको ले… तेरी रिस रही चूत की गरमीइ निकल जायेगी…”
मेरी चूत ने न जाने कितनी चोटें खाईं। अचानक एक चोट ऐसी पड़ी कि चूत हवा में उठ गई। मैंने कस के उसको जकड़ लिया- “ओओह्ह… मैं क्या करूं… मैं तो गईई…”
प्रदीप- “लेऐऐ मैं भी आया…” उसने आखिरी धक्का दिया और अपना गाढ़ा-गाढ़ा रस छोड़ दिया।
इसके बाद मैं नहाने चली गई। प्रदीप भी साथ ही नहाया। नहाते समय फिर हम लोग चुदाई किये। उस रात कई बार मैं चुदी यहां तक की पीछे वाले छेद में भी उसने डाला।
सुबह उठे तो मैंने प्रदीप को चिढ़ाया- “हाय राम… तुमने मुझे खराब कर दिया…”
दूसरे दिन बगैर रिजर्बेशन के बड़ी मुश्किल से हम लोगों को ट्रेन में घुसने भर की जगह मिली लेकिन मुझे कोई शिकायत नहीं थी।
जब मौका मिलता मैं उससे कहती- “हाय राम… तुमने मुझे खराब कर दिया…”
आने के पहले मैं एक बार और उसके सुपर-डुपर लण्ड का आनंद लेना चाहती थी। उसको भी कोई ऐतराज नहीं था। अपनी नवेली से तो वह सुहागरात मना ही चुका था और प्रदीप के ही शब्दों में उसकी बीवी के मुकाबाले मैं सुपर थी। लेकिन शादी की भीड़ में कोई सुनसान जगह नहीं मिल पा रही थी।
एक दिन उसने बताया कि साथ वाले उसके घर में भूसा भरा रहता है। अगर मैं चाहूँ तो वहां हो सकता है। भूसा क्या मैं तो उससे लगवाने के लिये कहीं भी तैयार थी। आने के एक दिन पहले भूसे पर लिटाकर उसने मेरी मस्त चुदाई की।
सुनीता और शिशिर की कहानी
होली के दूसरे दिन शिशिर जब लंच से लौटा तो सुनीता भाभी का फोन पर मेसेज था- “जितनी जल्दी हो सके घर आ जाओ…” शिशिर सब सुभ हो की कामना करते हुये सुनीता के घर जल्दी से जा पहुँचा। सुनीता भाभी ने दरवाजा खोला तो वह खूबसूरत साड़ी में सजी धजी खड़ी थीं।
शिशिर ने पूछा- “क्या बात है भाभी?”
तो बड़ी अदा से मैं बोली- “देवरजी तुम कह रहे थे कि भाभी होली नहीं मनाओगी तो मैंने सोचा चलो तुम होली मना लो। तुम्हारी शर्त पूरी करने के लिये बड़ी मुश्किल से कल अपने को तुम्हारे भइया से बचा के रक्खा है। आज तो वह छोड़ेंगे नहीं इसलिये अभी मना लो…” और एक प्लेट में से मुट्ठी में गुलाल लेकर मैं आगे बढ़ी।
शिशिर बोला- “भाभी इतनी मंहगी साड़ी खराब करोगी?”
लेकिन इसके पहले ही मैंने शिशिर के चेहरे पर गुलाल मला दिया। शिशिर ने मुझको पकड़ लिया और अपना गुलाल लगा गाल मेरे गुलाबी गालों पर रगड़ने लगा। फिर उसने मुझे बाहों में लेकर मेरे रसीले होंठों पर चूमा और अपने होंठ गड़ा दिये। फिर मुझे प्यार से चूसने लगा। सुनीता भाभी उससे चिमत गईं और चुंबन का जवाब पूरे जोर से देने लगीं। कुछ देर वह ऐसे ही चिपके रहे फिर भाभी ने उसकी पीठ के ऊपर हाथ ले जाकर शिशिर का सिर पकड़कर उसे नीचे को खींचा।
शिशिर का मुँह उनके कंधों को चूमता हुआ सीने पर जा पहुँचा। वह अपने गालों का गुलाल सुनीता भाभी के उभारों के ऊपर रगड़कर ब्लाउज़ पर लगाने लगा। सुनीता को करेंट सा लगा, वह उत्तेजित हो उठी, चूचुक सख्त हो गये। शिशिर को एकदम पता लग गया। उसने दायां हाथ सुनीता की कमर में डालकर सामने से चिपका लिया और बांयें हाथ से उनके ब्लाउज़ के बटन खोल दिये। सुनीता ने पीछे हाथ करके ब्रा की हुक खोलकर के उसको अलग कर दिया। उसके सुडौल गदराये उरोज सामने थे जिनके ऊपर गहरे गुलाबी रंग के फूले हुये चूचुक तने खड़े हुये थे। शिशिर उनको देखता ही रह गया।
सुनीता भाभी ने टोका- “क्या देख रहे हो?”
शिशिर सच बोला- “भाभी इतनी खूबसूरत गोलाइयां नहीं देखी…”
सुनीता ने चोट की- “कितनों की देखी है?”
शिशिर का खड़ा हुआ लण्ड सुनीता की चूत को चुभ रहा था। उसने हाथ बढ़ाकर उसको पकड़ लिया। प्रतिक्रिया के रूप में शिशिर ने सुनीता भाभी की दाईं चूची मुँह में ले ली। सुनीता के मुँह से सीत्कार निकल गई। उन्होंने सारा भार शिशिर के ऊपर डाल दिया।
शिशिर ने उन्हें बाहों में संभाल न लिया होता तो गिर जातीं। सहारे से बेडरूम में ले जाकर शिशिर ने पलंग पर लिटा दिया। सुनीता ने गले में बाहें डालकर अपने ऊपर खींचा।
शिशिर ने कहा- “पहले अपने नीचे का खजाना तो दिखाओ…”
शोख अदा से सुनीता बोलीं- “पहले हम खजाने की चाभी देखेंगे…” इसके साथ ही सुनीता ने पैंट के बटन और जिपर खोल डाले और अंडरवेर समेत पैंट पैरों के नीचे गिरा दिया।
कमीज उतार कर वह एकदम नंगा हो गया। उसका लण्ड फनफनाकर कर खड़ा था।
“उईईई माँ… इतना बड़ा और मोटा है? कैसे समायेगा?” उत्तेजना में सुनीता भाभी की जबान लड़खड़ा रही थी।
शिशिर ने साड़ी की ओर हाथ बढ़ाया और एक झटके में साड़ी खींच दी और सिलिकन पेटीकोट का नाड़ा खोल लिया। सुनीता ने कुछ कहे बगैर अपने चूतड़ उठा दिये और आसानी से खींच करके पेटीकोट नीचे गिर दिया। उसने कीमती पैंटी पहन रखी थी। एक बड़ा सा धब्बा चूत के पानी से फैल गया था।
शिशिर पैंटी उतारने लगा तो सुनीता बोली- “इसे पहने रहने दो…” लेकिन उतरवाने में विरोध नहीं किया।
क्या नजारा था। संगमरमरी बदन सामने था। भाभी की पतली कमर, मांसल चूतड़, फूली हुई चूत, बड़ी-बड़ी गोल-गोल ऊंचाइयां और मदहोश मुश्कान आमंत्रित कर रही थीं। शिशिर मतवाला सा सुनीता भाभी की ओर बढ़ा और उन्होंने हाथ फैलाकर उसको समेट लिया। उसने उनकीे दांयें चूचुक को मुँह में ले लिया और बायीं चूची को हाथ से मसलने लगा।
भाभी “सी सी” कर उठीं। उन्होंने मुट्ठी में लण्ड थाम लिया और चूत के ऊपर फेरने लगीं। शिशिर ने पोजीशन बदल दी और बांयें चूचुक को मुँह में ले लिया तो भाभी ने एक लंबी आवाज की- “आआआह” और कानों में फुसफुसाईं- “देवरजी अब क्यों तड़पा रहे हो?”
साथ ही दोनों हाथों से उसका सिर पकड़कर नीचे को खींचने लगी। शिशिर नीचे खिसकता गया। भाभी ने लण्ड की उत्सुकता में अपनी टांगें चौड़ी कर ली। लेकिन शिशिर खिसकता ही गया। वह जांघों तक खिसक आया। भाभी की टांगें दोनों कंधों पर आ गईं। उसने भाभी की चूत पर मुँह रख दिया।
>सुनीता भाभी अचकचा उठीं- “देवरजी ये क्या करते हो?” और उन्होंने अपनी हथेली चूत के ऊपर रख ली। उनके लिये यह नई बात थी।
शिशिर ने एक हाथ से बल के साथ उनका पकड़ा और हटा दिया। दूसरे हाथ से उनकी चूत की फांकें खोली और अपना मुंह गड़ा दिया। भाभी ऐतराज में अपनी दोनों टांगें उसकी पीठ पर मारने लगीं और हाथ से शिशिर का सिर उठाने लगीं। लेकिन शिशिर का मुँह उनकी चूत से चिपक गया था तो हटा ही नहीं। वह चटखारे लेकर उनकी चूत के रस को पी रहा था। जैसे ही उसने अपनी जीभ भाभी की क्लिटोरिस के ऊपर रक्खी उनका पैर मारना एकदम रुक गया।
वो आवाज करने लगीं- “ओओफ्फ्फ… ओ माईई…” और उठाने की जगह उन्होंने उसके सिर को कस के चूत में दबा लिया।
शिशिर ने भाभी की क्लिटोरिस को दोनों होंठों के बीच ले लिया।
सुनीता- “ओह्ह… मैं अब और नहीं रुक सकती… मुझे कसके दबा लो लो… लो मैं तो गई…” सुनीता भाभी ने चूत उठाकर के जोर से उसके होंठों से चिपका दी और काफी देर तर उनकी चूत में कंपकंपि बनी रही। शिशिर भाभी की बगल में एक करवट लेट गया और हाथ बढ़ा के उनको खींच लिया। भाभी उससे चिपक गईं और उसके सीने में सिर छुपा लिया।
शिशिर ने उनके सिर पर हाथ रखकर और कसके चिपका लिया। थोड़ी देर वह इसी तरह पड़े रहे एक दूसरे में मगन।
भाभी फुसफुसाईं- “देवरजी, तुम्हारे प्यार करने का तरीका भी निराला है…”
“हाँ, इसमें लातें पीठ पर खानी पड़ती हैं…”
भाभी ने सिर उसकी छाती पर रगड़ा- “चलो हटो, कहीं ऐसा भी कोई करता है…”
“आपको मजा आया?”
भाभी ने हाँमी में सिर हिला दिया। बोलीं- “देवरजी, ये बाताओ कि कुमुद इतनी अच्छी, लंबी और सुंदर है फिर तुम मेरे पीछे क्यों पड़े रहते थे?”
शिशिर तुरंत बोला- “भाभी, आपने अपने को पूरे आईने में देखा है आप में ना रुक पाने वाली कशिश है। मैं काबू में ही न रह पाता था। फिर कुमुद सेक्स में चुलबुली नहीं है…” वह फिर बोला- “भाभी आपकी कशिश में कितने लोग खिंचे रहते होंगे…”
सुनीता भाभी बोलीं- “जानती हूँ लेकिन मैं राकेश को पूर्ण समर्पित हूँ, तुम्हारे अलावा…”
शिशिर ने आनंद से उन्हें भींच लिया। धीरे से एक चूचुक मुँह में लेना चाहा तो उन्होंने मना कर दिया- “अब नहीं…” और वह शांत हो गई थीं।
शिशिर बोला- “बस भाभी, सीने पर मुह रख के लेटने दो…”
वह चित्त हो गई और बड़े प्यार से उसका गाल अपने बायें उभार पर दबा लिया।
शिशिर गाल को और दबाता गया फिर धीरे-धीरे रगड़ने लगा। थोड़ी देर बाद उसने बगैर दबाव के अपनी दाईं हथेली उनके बायें सीने पर रख दी। भाभी ने मना नहीं किया। उन्हें अच्छा लग रहा था। वह अब अपनी तरफ से उसके सिर पर दबाव बढ़ाती जा रही थीं। शिशिर ने धीरे से अपने होंठ खोलकर दांयें चूचुक को अंदर कर लिया। भाभी ने झुक कर उसके माथे को चूम लिया। सुनीता भाभी अब गर्माने लगीं थीं। मैंने होंठों में चूचुक कसके दबोच लिया और चूसने लगा।
वह कराही- “उईईईई… माँ… तुम तो काटते हो…” लेकिन सिर को कस के चूची पर दबा लिया।
अब मैं दांयीं चूची को मज़े से चूस रहा था और बांयीं को कसके मसल रहा था। वह अब चूतड़ हिलाने लगी थीं। शिशिर ने दांयां हाथ चूची से हटाकर उनकी चूत पर रख दिया। उन्होंने दोनों जांघों से कस के दबा लिया। उसका सिर दूसरी चूची की तरफ करतीं हुई बोलीं- “इसको चूसो न…”
शिशिर ने दूसरी चूची मुँह में ले ली और दो ऊँगालियों से चूत की दरार को खोलते हुये तीसरी उंगली छेद में डाल दी। चूत गीली हो रही थी।
भाभी ने चट से अपनी जांघें खोल दी, बोलीं- “पूरी अंदर डाल दो…”
भाभी ने अपने दांयें हाथ से उसका फड़फड़ाया हुआ लण्ड मुट्ठी बंद कर लिया और कहा- “ओ माई गोड ये तो मेरे हाथ में भी नहीं आ रहा है…”
शिशिर उंगली अंदर बाहर करने लगा। उनकी चूत बुरी तरह रिसने लगी थी। बाहर पानी निकल रहा था।
“हाय अंदर तक घुसेड़ दो न जल्दी से…” वह पूरी तरह उत्तेजित थीं। वह कसकस के उसके लण्ड पर मुट्ठी चलाने लगीं थीं।
शिशिर बोला- “भाभी इसकी जगह कोई और भी होती है?”
भाभी- “तो डालो न उस जगह…” फिर शिशिर के कुछ कहने के पहले उन्होंने पलट के अपनी चूत उसके लण्ड के ऊपर कर ली और हाथ से लण्ड पकड़कर सुपाड़ा चूत में घुसेड़ लिया।
अब शिशिर के पास और कोई चारा नहीं था। उसने सुनीता भाभी को पलटा। उनकी टांगों के बीच में घुटनों के बल बैठ गया। उन्होंने उतावली में टांगें पूरी चौड़ा दी और चूत ऊपर उठा दी। चूत की पंखुड़ियां अलग-अलग थीं, गुलाबी छेद खुला हुआ था, अंदर पानी चमक रहा था। शिशिर ने लण्ड का सुपाडा चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे घुसाने लगा।
सुनीता भाभी की सहमी सी आवाज निकली- “देवरजी धीरे से डालियेगा, आपका बहुत बड़ा और मोटा है…” लेकिन उनकी चूत लण्ड को पूरा का पूरा लील गई। भाभी के मुँह से निकला- “हाय…”
उसने लण्ड बाहर किया और घच्च से अंदर… वह और जोर से “हाय…” कर उठीं। उसने फिर बाहर किया फिर और जोर से घच्च… उनकी सीत्कार और ऊँची हो गई। शिशिर का सीधा खड़ा लण्ड सुनीता भाभी की चूत में सड़ाक से पूरा घुस जाता था।
जैसे-जैसे घच्च-घच्च की गति बढ़ती गई भाभी की- “हायय… उईईई… माँ मरी…” की सीत्कार भी।
कुछ देर तक झटके लगाने के बाद शिशिर पलंग के नीचे खड़ा हो गया। सुनीता भाभी को दोनों टांगों से खींचकर पलंग के किनारे कर लिया। उनकी टांगें चौड़ी करके उनके बीच में खड़ा हो गया। अब खड़े-खड़े उसका लण्ड भाभी की चूत के सामने था। उसने लण्ड चूत के मुँह पर लगाया और कहा- “अपनी दोनों टांगें मेरी कमर पर बाँध लो…”
भाभी की दोनों चूचियों को दोनों हाथों से मसलाते हुये शिशिर ने एक चोट में सड़ाक से लण्ड अंदर कर दिया तो भाभी हिल गईं और मुँह से चीख निकल गई। शिशिर ने चूत के सामने काफी बाहर तक लण्ड निकालकर एकदम से चोट मारी।
भाभी और जोर से चीखीं- “ओ माँ… मैं मर जाऊँगी…” उन्होंने कस के शिशिर के कंधे दोनों हाथों से जकड़ लिये और अपना मुँह उसकी छाती में गड़ा लिया।
शिशिर ने जब चोट मारी तो वह बुदबुदाईं- “शिशिर ये तुम्हारी है, जैसे चाहे लो इसको…” पहली बार उन्होंने उसे शिशिर कह के बुलाया था।
शिशिर धकाधक चोद रहा था। उसका लण्ड चूत की गहराइयों तक जा रहा था। हर चोट में लण्ड की जड़ चूत के ऊपर धप्प से पड़ती थी।
भाभी आपे मैं नहीं थीं- “आआह्ह… आआह्ह… ऊंऊंह्ह… हाय ऊईईईइ… ओ शिशिर ये तुम्हारी है फाड़ डालो इसको उफ्फ्फ… ओ शिशिर…”
हर झटके में उसी वेग से सुनीता भाभी बढ़-बढ़ के लण्ड को झेल रही थीं। जोरों से चूत से फच्च-फच्च की आवाज निकल रही थी। अचानक भाभी ने उसकी कमर में टांगें एकदम जकड़ लीं- “ओह्ह… मैं और नहीं ले सकती… मैं तो गईईई मेरे शिशिर…” और भाभी ने अपना ज्वालामुखी उगल दिया।
उनकी चूत इतनी जोर की कांपी कि शिशिर भी न ठहर पाया- “भाभीईई… मैं भी आया… ये लोओ…” उसने गहराई तक ले जाके पानी छोड़ दिया और देर तक छोड़ता रहा। जब उसने अपना लण्ड बाहर निकाला तो भाभी की चूत से गाढ़ा-गाढ़ा सफेद फेन सा फैलता रहा।
भाभी ने पैंटी से उसे पोंछा भी नहीं जैसी उनकी आदत थी, बस निढाल पड़ी रही।
शिशिर ने उनका हाथ पकड़ा।
तो भाभी शिकायत के लहजे में बोलीं- “देखो तुमने इसकी क्या हालत कर दी है? हथौड़ा सा चलाते हो, अब मैं अब राकेश को रात मैं कैसे दूंगी। इसे देखकर उन्हें शक हो गया तो?”
शिशिर ने कोमलता से उनका हाथ थाम लिया। सुनीता भाभी ने उसे दोनों बाहों में लाड़ से भर लिया और अपने सीने में छुपा लिया।
होली के आनंद के बाद जब भी शिशिर की मुझे भोगने की तबीयत होती तो कह देता- “भाभी, परांठे सेंकने हैं 24 घंटे का उपवासा रखना…”
जब मेरी तबीयत मचलती तो मैं शिशिर से कहती- “हथौड़ा लूगीं…” मैं पूरी तरह संतुष्ट थी। राकेश भरपूर चोदता था। स्पेशल चुदाई शिशिर से कराती रहती थी। ग्रुप की महफिल के बाद खासतौर पर मुझे हथौड़े की जरूरत पड़ती थी। शिशिर का व्यवहार मेरी तरफ कोमल बना हुआ था केवल चोदते समय वह कोई लिहाज़ नहीं करता था। मैं बहुत खुश रहती थी।
गर्मियां शुरू हो गईं थीं। गर्मियों में 10 या 15 दिन के लिये या तो हम लोग रजनी के यहां जाते थे या रजनी और रूपेश हमारे यहां आ जाते थे। इस बार वह लोग हमारे यहां आये। रजनी और मैं कालेज़ के जमाने की सहेलियां थीं, पक्की दोस्त। एक दूसरे के बारे में सब कुछ जानती थीं। हम दोनों ही खूबसूरत समझी जाती थीं। रजनी मेरे से ज्यादा लंबी थी और दुबली भी। मेरा शरीर शुरू से ही सांचे में ढला हुआ था। रजनी तबीयत की मस्त थी। खुलकर सेक्स की बातें करती और आगे बढ़ने के लिये भी तैयार। मैं इस बारे मैं बिल्कुल पक्के खयालों की।
अब रजनी के सीने और कूल्हों पर मांस चढ़ गया था लेकिन बदन उसका इकहरा ही था, आकर्षक। मेरी शादी रजनी से दो साल पहले हो गई थी। रजनी की शादी हुई तो उसके पति रूपेश मेरे ऊपर दीवाने हो गये। हमें चोदने के लिये बेचैन रहने लगे। रजनी को भी उन्होंने तैयार कर लिया। शादी के थोड़े दिनों बाद ही रजनी ने मेरे से कहा- “रूप तेरी चूत की सैर करना चाहता है बदले में राकेश को मैं अपनी नई नवेली का रस चखा दूंगी…”
मैंने दो टूक जवाब दिया- “मैं राकेश को पूरी तरह समर्पित हूँ ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी…” जानबूझ कर मैंने पता नहीं किया कि राकेश को रजनी ने रसपान कराया या नहीं। रजनी के आने पर राकेश की खुशी देखकर लगता था कि वह स्वाद चख चुके थे। इस बात पर इसके बाद पर्दा पड़ गया था।
जैसे ही रजनी मुझसे मिली तो कह उठी- “लगता है तुम्हें यह जगह रास आ गई है, बड़ी खुश दिखती हो…”
जल्दी ही रजनी और रूपेश सबसे घुलमिल गये। शिशिर से रूपेश की भी पटने लगी। ग्रुप की महफिलों में भी दोनों ने खूब बढ़-बढ़ के भाग लिया। रजनी ने तो ऐसे किस्से सुनाये कि उस रात जरूर लोगों ने बीवियों से जम कर कसर निकाली होगी। ज्यादा दिन तो सैर सपाटों में ही निकल गये। जब तब शिशिर और कुमुद या अकेला शिशिर भी सामिल हो जाते थे।
जो बात कोई न जान पाया था रजनी इतनी जल्दी भांप गई, बोली- “अब तुम्हारी खुशी का राज समझ में आया। शिशिर से इश्क लड़ाया जा रहा है…”
मैं लाल हो गई, बोली- “तुम भी रजनी गजब हो… शिशिर मेरा देवर है…”
रजनी बोली- “सब जानती हूँ…”
उसके बाद मैं कुछ चोकन्नी रहने लगी।
लेकिन इस बीच ही शिशिर परांठे सेंकने की फरमाइश कर बैठा। मैंने समझाया कि अभी रजनी रूपेश हैं। लेकिन वो नहीं माना। दिन में ही समय निकालकर उसने मुझे बहुत ही जबरदस्ती से चोदा। मैं त्राहि-त्राहि कर उठी। चूत पर इतनी चोटें पड़ी थीं कि मैं ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। अपनी दोनों टांगें फैला- फैलाकर चल रही थी। शाम को रजनी ने देखा तो मेरी चूत पर चिउंटी काटी।
मेरे मुँह से जोर से ‘ओह्ह’ निकल गई।
रजनी बोली- “इसकी कसके रगड़ाई हुई है क्या?” लेकिन राकेश तो ऐसा नहीं करता। क्या बात है शिशिर से लगवा के आई हो…”
उसने मेरी चोरी पकड़ ली थी। मैं बोली- “क्या करूं रजनी, वह माना ही नहीं…”
रजनी ने उलाहना देते हुये कहा- “जब रूप ने मांगी थी तो साफ मना कर दिया था कि मैं तो बस राकेश को ही देती हूँ…”
मैं- “हाँ… मैं केवल राकेश की हूँ। शिशिर स्पेशल है हमारा ही…”
रजनी- “अरे जाओ, ऐसे लोग जिस किसी पर भी फिसलाते रहते हैं…”
मैं- “न रजनी, यह केवल मेरा और शिशिर का संबंध है, भाभी और देवर का…”
रजनी- “अगर मैंने शिशिर को फँसा के दिखा दिया तो?”
मैं- “तो जो चाहोगी दूंगी। लेकिन क्या सबूत दोगी?”
रजनी- “शिशिर का अंडरवेर दूंगी मेरी चूत के रस से पोंछा हुआ चाहो तो सूँघ के देख लेना…” रजनी को अब एक मिशन मिल गया था, शिशिर को बहकाने का।
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सुनीता को उकसाना तो एक बहाना था। सुनीता को देखकर मेरी चूत भी शिशिर से चुदवाने के लिये बेकरार हो रही थी। शर्त के बाद मुझे खुला मौका मिल गया। डोरे डालने के लिये मैंने स्त्री सुलभ हथियारों का इश्तेमाल किया जिसमें शरीर की भाषा, नैनों की भाषा और प्रेम की भाषा शामिल थी। मैं बड़ी सेक्स भरी आवाज में उससे बातें करने लगी। आँखों में रस भर के कहती- “मैं भी तो तुम्हारी भाभी हूँ। सुनीता जैसा मेरा भी तो अधिकार है…”
कभी बदन को ऐंठकर कुटिलता से कहती- “रात को तो मेरी हालत खराब हो गई…” आफिस फोन कर देती कहीं ले जाने या लंच पर ही ले जाने के लिये। रेस्टोरेंट में बड़े टाइट कपड़े पहनकर जाती जिनसे मेरे चूचुक के आकार साफ दिखाई देते, चूतड़ के उभार साफ नजर आते। बात-बात पर उस पर गिर पड़ती, कंधे पर सिर रख देती, साथ मैं सेक्स भरी बातें भी करती जाती। इन सबका असर यह हुआ कि शिशिर मेरे से बहुत खुल गया। दो मतलब लिये हुये सेक्स भरा मजाक भी करने लगा। जल्दी ही एक दिन शिशिर के आफिस में ही मैंने हाव-भाव से साफ जाहिर कर दिया कि अब क्यों देर करते हो लगाओ न मुझमें और उससे सटकर मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। ले
किन शिशिर पीछे हट गया। उसने एकदम हाथ नहीं झटका न ही मुझे। धकेला बल्की बाहर चलते हुये बोला- “चलो घर चलें, कुमुद इंतजार कर रही होगी…”
मैं समझ गई कि लोहा पूरी तरह गरम करने के लिये शारीरिक तरीके से बढ़ने की जरूरत है। मैं शरीर का मजा देने के लिये मौके की तलाश में थी और वह मौका मुझे मिल गया। शहर में नुमायश लगी थी। सुनीता, राकेश, शिशिर, कुमुद, मैं, रूप सब लोग गये।
मैं टाइट सलवार-सूट में थी। एक जगह स्टेज पर गाने बजाने हो रहे थे। लोग घेरा बना के जमा थे। अंथेरा हो रहा था और वह जगह ज्यादा ही अंधेरी थी। हम सब लोग भी गाने सुनने के लिये खड़े हो गये। मैं शिशिर के सामने खड़ी हो गई। अनजानी सी पीछे हुई और अपने पीछे का हिस्सा उसके सामने से चिपका दिया। मेरी चूतड़ों की गोलाइयां उसकी जांघों में पूरी तरह फिट हो गईं थीं।
मैं चूतड़ों की दरार में उसके सख्त होते हुये लण्ड को महसूस करने लगी थी कि तभी वह वहां से हट गया और सुनीता के पीछे जाकर खड़ा हो गया। सुनीता के चेहरे पर एक मुश्कान उभरी जो मुझे चिढ़ाने के लिये भी थी और शिशिर की उसको लण्ड लगाने की मक्कारी पर भी।
मैंने सीधी खुराक देने की ठान ली क्योंकी मेरे वहां रहने में कुल छह दिन और रह गये थे जिनमें मुझे अपनी मनमानी करनी थी। अगले ही दिन पिकनिक थी। मैंने उस दिन साड़ी पहनी लेकिन अंदर पैंटी नहीं पहनी। पिकनिक में चादर पर मैं शिशिर के सामने बैठी थी, घुटनों को ऊपर करके। जब देखा कि लोग नहीं देख रहे हैं तो मैंने अपनी टांगें थोड़ी चौड़ी कर दीं जिससे अंदर का नजारा दिख सके। मैंने नोट किया कि शिशिर के ऊपर असर पड़ा है।
शिशिर दबी आँखों से मेरी साड़ी के अंदर झांक रहा था। ऐसा मैं कभी-कभी ही कर पा रही की क्योंकी इतने लोगों के बीच में बैठी थी, लेकिन उनको शक भी नहीं हो सकता था कि मैंने पैंटी नहीं पहनी है। अबकी बार मौका मिला तो मैंने टांगें पूरी खोल दी, इतनी कि मेरी चूत का मुँह भी खुल गया होगा। अब नजारा उसके सामने था और वह भी जैसे सब कुछ भूलकर आश्चर्य से घूरे जा रहा था। मैं भी उसकी तरफ देखकर मक्कारी से मुश्कुरा रही थी।
शिशिर सोच रहा था- “ओ माइ गोड कैसी फूली-फूली रसभरी चूत है… सुनीता भाभी से कम नहीं…”
सुनीता की नजरों से यह खेल छुपा न था। जब सुनीता ने शिशिर को रजनी की चूत को घूरते हुये देखा तो हैरानी भी हुई और शिशिर पर गुस्सा भी आया। उसने आवाज देकर शिशिर को कार से खेल का सामान लाने को भेज दिया।
जब अकेले में शिशिर भाभी-भाभी करता हुआ सुनीता के पास आया तो सुनीता बोली- “देवरजी बड़ी लार टपक रही थी। ये समझ लेना कि कहीं और मुँह मारा तो अपनी भाभी से परांठे कभी भी नहीं खा पाओगो…”
मैंने सुनीता की चालाकी जान ली थी, जब उन्होंने शिशिर को हटा दिया। उसके बाद उन लोगों को कुछ घुसपुस करते हुये भी देखा। समझ गई कि मान मनौवल चल रही होगी, क्योंकी सुनीता को अपना कंट्रोल खतम होते हुये दिख रहा है। मुझे अपनी चूत की ताक़त पर भरोसा था। जानती थी कि ऐसी चूत देखने के बाद कोई भी अपने को काबू में नहीं रख सकता। उस रात मैंने उथेड़बुन करके कैसे भी शिशिर से अकेले में मिलने का समय निकाला।
मैं शिशिर से झूठी नाराजी दिखाती हुई बोली- “क्या देखे जा रहे थे। आज मैं पैंटी पहनना भूल गई तो तुमको शर्म नहीं आती, अंदर ताक-झाँक करते हो…”
शिशिर- “जब देखने लायक चीज़ होगी तो आँखें अटकेंगी ही…”
मैं- “तो फिर चाहिये है उसको?”
शिशिर- “उसके दावेदार तो और भी हैं। आप मेरी भाभी की सहेली हैं हमें आपकी इज्जत करनी है…”
मैं कुछ बौखला सी गई, बोली- “सुनीता और हम एक हैं। तुममें और सुनीता में क्या है मुझे सुनीता ने सब बता दिया है फिर हमको लेने में क्यों परहेज करते हो?”
शिशिर मेरा हाथ पकड़कर अनुनया भरे स्वर में बोला- “जब आप सब जानती ही हैं तो इन संबंधों को हम लोगों के बीच में ही रहने दीजिये न। सेक्स छोड़ दीजिये बाकी सब बातें मैं आपकी सुनीता भाभी की ही तरह मानूंगा। आप को कोई शिकायत नहीं होगी…”
उसकी तरफ देखकर कहने को कुछ और नहीं रह गया था। मैं सोच भी नहीं सकती की कि मेरी जैसी औरत देने को तैयार हो और कोई आदमी लेने से मना कर दे।
सुनीता भी शायाद नहीं सोच सकती थी क्योंकि जब मैंने बताया तो अचानक खुशी से वह उछल पड़ी और मेरे गले लग गई।
सब कुछ बता देने के बाद मैंने सुनीता से कहा- “अच्छा भाई, मैं भाभी भक्त देवर को मान गई लेकिन जाने के पहले उसका मजा तो चखा दो जिसने मेरी सहेली की यह हालत कर दी है…”
सुनीता पहले तो मुकर गई। जब बहुत मिन्नतें की तो बोली- “अच्छा देखेंगे…”
उसी दिन शाम को शिशिर और कुमुद सुनीता के यहां डिनर पर आये। शिशिर का बर्ताव मेरी तरफ बड़ा नरम था जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैंने सुनीता को उकसाया तो अकेला पाकर उसने शिशिर से बात की।
सुनीता- “तुम बाकई भाभी के हकदार हो। तुमको अपने को सौंपकर मैंने कोई भूल नहीं की। रजनी वापिस जा रही है। वह मेरी बड़ी अंतरंग है। उसकी तमन्ना पूरी कर दो। समझो मेरी तरफ से यह तोहफा है…”
शिशिर आश्चर्य से- “भाभी क्या बात करती हो? मैं तुम्हारे और कुमुद के अलावा किसी को नहीं छुऊंगा फिर तुम्ही तो उस दिन मुझ पर लांछन लगा रही थी और मेरे से अलग हो जाना चाहती थीं…”
सुनीता- “वह तो तुमको समझने के लिये कहा था। अब उसकी अच्छी तरह से मरम्मत कर दो कि शर्त लगाने की हेकड़ी भूल जाये…”
शिशिर- “भाभी मैं तो तुम्हारे बगैर किसी को नहीं करूंगा…”
सुनीता हँस के- “तो फिर कुमुद को क्यों लगाते हो?”
शिशिर- “कहो तो करना छोड़ दूं…”
सुनीता- “नहीं नहीं… तुम कहां बात ले जाते हो। मैं कह रही हूँ कि तुम रजनी को करो बस…”
शिशिर- “तो आपको भी मौजूद रहना पड़ेगा…”
सुनीता- “यह कैसे हो सकता है? रजनी मेरे सामने कैसे करायेगी?”
शिशिर- “क्यों नहीं करायेगी? जब आपकी अंतरंग है और आपसे फरमाइश कर सकती है…”
सुनीता- “अच्छा देवरजी, अब समझी तुम्हारी चालाकी दोनों को एक साथ लगाना चाहते हो…”
शिशिर- “जाओ मैं नहीं करूंगा…”
सुनीता- “अच्छा भाई, हम दोनों हाजिर हो जायेंगी…”
