रजनी की कहानी
सुनीता को उकसाना तो एक बहाना था। सुनीता को देखकर मेरी चूत भी शिशिर से चुदवाने के लिये बेकरार हो रही थी। शर्त के बाद मुझे खुला मौका मिल गया। डोरे डालने के लिये मैंने स्त्री सुलभ हथियारों का इश्तेमाल किया जिसमें शरीर की भाषा, नैनों की भाषा और प्रेम की भाषा शामिल थी। मैं बड़ी सेक्स भरी आवाज में उससे बातें करने लगी। आँखों में रस भर के कहती- “मैं भी तो तुम्हारी भाभी हूँ। सुनीता जैसा मेरा भी तो अधिकार है…”
कभी बदन को ऐंठकर कुटिलता से कहती- “रात को तो मेरी हालत खराब हो गई…” आफिस फोन कर देती कहीं ले जाने या लंच पर ही ले जाने के लिये। रेस्टोरेंट में बड़े टाइट कपड़े पहनकर जाती जिनसे मेरे चूचुक के आकार साफ दिखाई देते, चूतड़ के उभार साफ नजर आते। बात-बात पर उस पर गिर पड़ती, कंधे पर सिर रख देती, साथ मैं सेक्स भरी बातें भी करती जाती। इन सबका असर यह हुआ कि शिशिर मेरे से बहुत खुल गया। दो मतलब लिये हुये सेक्स भरा मजाक भी करने लगा। जल्दी ही एक दिन शिशिर के आफिस में ही मैंने हाव-भाव से साफ जाहिर कर दिया कि अब क्यों देर करते हो लगाओ न मुझमें और उससे सटकर मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। ले
किन शिशिर पीछे हट गया। उसने एकदम हाथ नहीं झटका न ही मुझे। धकेला बल्की बाहर चलते हुये बोला- “चलो घर चलें, कुमुद इंतजार कर रही होगी…”
मैं समझ गई कि लोहा पूरी तरह गरम करने के लिये शारीरिक तरीके से बढ़ने की जरूरत है। मैं शरीर का मजा देने के लिये मौके की तलाश में थी और वह मौका मुझे मिल गया। शहर में नुमायश लगी थी। सुनीता, राकेश, शिशिर, कुमुद, मैं, रूप सब लोग गये।
मैं टाइट सलवार-सूट में थी। एक जगह स्टेज पर गाने बजाने हो रहे थे। लोग घेरा बना के जमा थे। अंथेरा हो रहा था और वह जगह ज्यादा ही अंधेरी थी। हम सब लोग भी गाने सुनने के लिये खड़े हो गये। मैं शिशिर के सामने खड़ी हो गई। अनजानी सी पीछे हुई और अपने पीछे का हिस्सा उसके सामने से चिपका दिया। मेरी चूतड़ों की गोलाइयां उसकी जांघों में पूरी तरह फिट हो गईं थीं।
मैं चूतड़ों की दरार में उसके सख्त होते हुये लण्ड को महसूस करने लगी थी कि तभी वह वहां से हट गया और सुनीता के पीछे जाकर खड़ा हो गया। सुनीता के चेहरे पर एक मुश्कान उभरी जो मुझे चिढ़ाने के लिये भी थी और शिशिर की उसको लण्ड लगाने की मक्कारी पर भी।
मैंने सीधी खुराक देने की ठान ली क्योंकी मेरे वहां रहने में कुल छह दिन और रह गये थे जिनमें मुझे अपनी मनमानी करनी थी। अगले ही दिन पिकनिक थी। मैंने उस दिन साड़ी पहनी लेकिन अंदर पैंटी नहीं पहनी। पिकनिक में चादर पर मैं शिशिर के सामने बैठी थी, घुटनों को ऊपर करके। जब देखा कि लोग नहीं देख रहे हैं तो मैंने अपनी टांगें थोड़ी चौड़ी कर दीं जिससे अंदर का नजारा दिख सके। मैंने नोट किया कि शिशिर के ऊपर असर पड़ा है।
शिशिर दबी आँखों से मेरी साड़ी के अंदर झांक रहा था। ऐसा मैं कभी-कभी ही कर पा रही की क्योंकी इतने लोगों के बीच में बैठी थी, लेकिन उनको शक भी नहीं हो सकता था कि मैंने पैंटी नहीं पहनी है। अबकी बार मौका मिला तो मैंने टांगें पूरी खोल दी, इतनी कि मेरी चूत का मुँह भी खुल गया होगा। अब नजारा उसके सामने था और वह भी जैसे सब कुछ भूलकर आश्चर्य से घूरे जा रहा था। मैं भी उसकी तरफ देखकर मक्कारी से मुश्कुरा रही थी।
शिशिर सोच रहा था- “ओ माइ गोड कैसी फूली-फूली रसभरी चूत है… सुनीता भाभी से कम नहीं…”
सुनीता की नजरों से यह खेल छुपा न था। जब सुनीता ने शिशिर को रजनी की चूत को घूरते हुये देखा तो हैरानी भी हुई और शिशिर पर गुस्सा भी आया। उसने आवाज देकर शिशिर को कार से खेल का सामान लाने को भेज दिया।
जब अकेले में शिशिर भाभी-भाभी करता हुआ सुनीता के पास आया तो सुनीता बोली- “देवरजी बड़ी लार टपक रही थी। ये समझ लेना कि कहीं और मुँह मारा तो अपनी भाभी से परांठे कभी भी नहीं खा पाओगो…”
मैंने सुनीता की चालाकी जान ली थी, जब उन्होंने शिशिर को हटा दिया। उसके बाद उन लोगों को कुछ घुसपुस करते हुये भी देखा। समझ गई कि मान मनौवल चल रही होगी, क्योंकी सुनीता को अपना कंट्रोल खतम होते हुये दिख रहा है। मुझे अपनी चूत की ताक़त पर भरोसा था। जानती थी कि ऐसी चूत देखने के बाद कोई भी अपने को काबू में नहीं रख सकता। उस रात मैंने उथेड़बुन करके कैसे भी शिशिर से अकेले में मिलने का समय निकाला।
मैं शिशिर से झूठी नाराजी दिखाती हुई बोली- “क्या देखे जा रहे थे। आज मैं पैंटी पहनना भूल गई तो तुमको शर्म नहीं आती, अंदर ताक-झाँक करते हो…”
शिशिर- “जब देखने लायक चीज़ होगी तो आँखें अटकेंगी ही…”
मैं- “तो फिर चाहिये है उसको?”
शिशिर- “उसके दावेदार तो और भी हैं। आप मेरी भाभी की सहेली हैं हमें आपकी इज्जत करनी है…”
मैं कुछ बौखला सी गई, बोली- “सुनीता और हम एक हैं। तुममें और सुनीता में क्या है मुझे सुनीता ने सब बता दिया है फिर हमको लेने में क्यों परहेज करते हो?”
शिशिर मेरा हाथ पकड़कर अनुनया भरे स्वर में बोला- “जब आप सब जानती ही हैं तो इन संबंधों को हम लोगों के बीच में ही रहने दीजिये न। सेक्स छोड़ दीजिये बाकी सब बातें मैं आपकी सुनीता भाभी की ही तरह मानूंगा। आप को कोई शिकायत नहीं होगी…”
उसकी तरफ देखकर कहने को कुछ और नहीं रह गया था। मैं सोच भी नहीं सकती की कि मेरी जैसी औरत देने को तैयार हो और कोई आदमी लेने से मना कर दे।
सुनीता भी शायाद नहीं सोच सकती थी क्योंकि जब मैंने बताया तो अचानक खुशी से वह उछल पड़ी और मेरे गले लग गई।
सब कुछ बता देने के बाद मैंने सुनीता से कहा- “अच्छा भाई, मैं भाभी भक्त देवर को मान गई लेकिन जाने के पहले उसका मजा तो चखा दो जिसने मेरी सहेली की यह हालत कर दी है…”
सुनीता पहले तो मुकर गई। जब बहुत मिन्नतें की तो बोली- “अच्छा देखेंगे…”
उसी दिन शाम को शिशिर और कुमुद सुनीता के यहां डिनर पर आये। शिशिर का बर्ताव मेरी तरफ बड़ा नरम था जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैंने सुनीता को उकसाया तो अकेला पाकर उसने शिशिर से बात की।
सुनीता- “तुम बाकई भाभी के हकदार हो। तुमको अपने को सौंपकर मैंने कोई भूल नहीं की। रजनी वापिस जा रही है। वह मेरी बड़ी अंतरंग है। उसकी तमन्ना पूरी कर दो। समझो मेरी तरफ से यह तोहफा है…”
शिशिर आश्चर्य से- “भाभी क्या बात करती हो? मैं तुम्हारे और कुमुद के अलावा किसी को नहीं छुऊंगा फिर तुम्ही तो उस दिन मुझ पर लांछन लगा रही थी और मेरे से अलग हो जाना चाहती थीं…”
सुनीता- “वह तो तुमको समझने के लिये कहा था। अब उसकी अच्छी तरह से मरम्मत कर दो कि शर्त लगाने की हेकड़ी भूल जाये…”
शिशिर- “भाभी मैं तो तुम्हारे बगैर किसी को नहीं करूंगा…”
सुनीता हँस के- “तो फिर कुमुद को क्यों लगाते हो?”
शिशिर- “कहो तो करना छोड़ दूं…”
सुनीता- “नहीं नहीं… तुम कहां बात ले जाते हो। मैं कह रही हूँ कि तुम रजनी को करो बस…”
शिशिर- “तो आपको भी मौजूद रहना पड़ेगा…”
सुनीता- “यह कैसे हो सकता है? रजनी मेरे सामने कैसे करायेगी?”
शिशिर- “क्यों नहीं करायेगी? जब आपकी अंतरंग है और आपसे फरमाइश कर सकती है…”
सुनीता- “अच्छा देवरजी, अब समझी तुम्हारी चालाकी दोनों को एक साथ लगाना चाहते हो…”
शिशिर- “जाओ मैं नहीं करूंगा…”
सुनीता- “अच्छा भाई, हम दोनों हाजिर हो जायेंगी…”
मुझे यह जानकर बड़ी खुशी हुई कि सुनीता ने शिशिर को तैयार कर लिया है। सुनीता का साथ रहना भी मुझे भा रहा था। सुनीता ने जब प्रश्न उठाया कि- लेकिन राकेश और रूप से बचाकर मिलोगी कैसे?
तो मैंने उसको चैलेंज जैसा लेते हुये कहा- “तुम इसकी फिक्र न करो, मेरे ऊपर छोड़ दो…” लेकिन यह बड़ी समस्या थी। हम लोग छुट्टियों में थे और सब लोग साथ ही निकलते थे। उनसे अलग रहकर एक रात निकल पाना टेढ़ी खीर था। मैंने एक प्लान बनाया। सुनीता को नहीं बताया नहीं तो वह मना कर देती। मैंने सोचा कि रूप और राकेश को किसी और के संग लगा दें। ठीक भी था जब हम लोग मज़े ले रहे थे तो उनको भी मज़े ले लेने दें। सबके ऊपर नजर दौड़ाई तो मिसेज़ अग्रवाल ठीक लगीं। अच्छा भरा बदन था। खूब उभार लिये सीने थे, भारी सेक्सी चूतड़ थे, और उनके जल्दी राजी हो जाने की उम्मीद भी थी। मैंने प्लान पर काम करना चालू कर दिया।
सबसे पहले मिसेज़ अग्रवाल का तैयार करना था। मैं उनसे अकेले में मिली तो सेक्स की बातों के साथ उनके सेक्सी शरीर की बड़ी तारीफ कर दी और कहा- “बुरा न मानो तो एक बात कहूँ… रूप तो तुम्हारे ऊपर मर मिटा है। जब भी मुझे करता है तो तुम्हारा नाम ले-लेकर ही लगाता है…”
मिसेज़ अग्रवाल शर्माती हुई बोलीं- “ओ माँ… बड़े बुरे हैं वो…”
मैंने उनके हाथ को दबाते हुये कहा- “बुरे नहीं, जब तुम्हारे नाम का लगाते हैं तो मुझे तारे नजर आ जाते हैं। तुम लगवाके देख लो न…”
मिसेज़ अग्रवाल- “तुम उन्हें परमिशन दे दोगी?”
मैं- “वो जिस शुख को लेना चाहते हैं, मैं क्यों रोकूं। तुम अपनी बाताओ तुम्हें मंजूर है?”
उन्होंने आँखों से हामी भर दी।
उसी रात मैंने रूप से चुदाई कराई। उसकी मन की बात करके तबीयत खुश कर दी। जब वह धक्के लगा रहा था तो मैंने बात छेड़ी- “रूप, मिसेज़ अग्रवाल का दिल है तुम्हारे ऊपर… तुमसे मजा लेना चाहती हैं…”
रूप ने पूछा- “तुमको कैसे मालूम हुआ?”
मैंने कहा- “खुद उन्होंने मुझसे इशारों में कह दिया। तुमसे कहने की हिम्मत नहीं हुई कि तुम मना न कर दो…”
यह बातें करते हुये रूप के धक्के की रफ्तार बढ़ गई।
मैंने बात जारी रखी- “लेकिन रूप एक बात है, उनका ज्यादा माल खाने का मन है। तुम्हारा और तुम्हारे दोस्त राकेश दोनों का साथ-साथ खाना चाहती हैं…”
रूप का मन थोड़ा बुझ गया- “पता नहीं राकेश का? वह उसकी बीवी पता नहीं…”
मैंने चूत कस कर लण्ड पर जमाते हुये उसको उकसाया- “तुम्हारा दोस्त है तैयार करो उसको। तर माल खाने को मिल रहा है…”
रूप ने जवाब में पूरा पेलते हुये कहा- “करता हूँ उसको तैयार…”
मैंने चूत उसकी झांटों से रगड़ते हुये कहा- “डार्लिंग जल्दी करना, वह मुझसे पूछेगी…”
उसके बाद रूप के चोदने में बहुत उत्साह आ गया।
दूसरे दिन ही जवाब मिल गया। राकेश बाखुशी तैयार हो गया। मुझे अब फिर से संगीता अग्रवाल से बात करनी थी। मैं पुराने जमाने की कुटनी का रोल कर रही थी। पत्नियां चुदवाना चाहती थीं, पति चोदने को बेकरार थे, लेकिन कितनी अजीब बात थी की दोनों ही किसी और के लिये दीवाने हो रहे थे। किसी और को चूत देने के नशे मैं मैंने कैसी-कैसी चालें चलीं थीं।
मिसेज़ अग्रवाल से मिली तो अलग ले जाकर चिउंटी काटती हुई मैं फुसफुसा के बोली- “तेरे मज़े हैं, रूप और राकेश दोनों ही लगाना चाहते हैं…”
संगीता अग्रवाल समझी नहीं बोली- “अभी तो एक बार मिलना बहुत है…”
मैंने कान में कहा- “एक साथ ही दोनों हाँ…” और मैंने उसका हाथ दबा दिया।
संगीता के चेहरे पर घबड़ाहट थी बोली- “न बाबा न… ऐसा कैसे हो सकता है?”
मैं झूठ बोली- “बड़ा मजा आता है, मैं तो कई बार करा चुकी हूँ। सोचे दो लण्डों का अलग-अलग स्वाद मिलेगा…”
संगीता के चेहरे पर वासना नाचा उठी- “सच… क्या मैं करा पाऊँगी?”
मैंने हाथ दबाकर उसके तसल्ली दे दी। वह भी लगवाने के लिये उत्तेजित हो गई। भाग्य से मिस्टर अग्रवाल को दो दिन बाद बाहर जाना था। उस दिन की रात मिसेज़ अग्रवाल के यहां रूप और राकेश के लिये बुक हो गई। मिसेज़ अग्रवाल खाना बड़ा जायकेदार बनाती थीं और खुद भी जायकेदार थीं। रूप और राकेश की बड़ी दावत पक्की थी। हम लोगों के लिये मैदान साफ हो गया।
मैंने सुनीता को सुझाया कि वह घर में इंतेजाम न करे। किसी भी कारण से रूप और राकेश वापिस आ पहुँचे तो हम लोग रंगे हाथों पकड़े जायेंगे। सुनीता ने शिशिर को खबर कर दी।
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सुनीता, रजनी और शिशिर
शिशिर ने एक आलीशान होटल मैं रूम रिज़र्व कर दिया। सुनीता और रजनी आठ बजे रात को होटल पहुँची शिशिर को साढ़े आठ बजे आना था। कमरे को देखकर दोनों दंग रह गईं। शिशिर ने पांच-सितारा होटल का एक पूरा सूट बुक कर दिया था। खाने के लिये डाइनिंग टेबल, बैठने के लिये सोफा, चमचमाता बाथरूम, क्वीन साइज़ बेड और उसके सामने ढेर सारी खुली जगह। शिशिर साढ़े आठ बजे के पहले ही पहुँच गया। बेल दबाने पर दरवाजा खुला तो सुनीता और रजनी सामने खड़ी थीं, एकदम सजी धजी।
सुनीता ने दूध सी सफेद साड़ी पहन रखी थी। उसका गोरा रंग उससे मिल गया था। गले में मोतियों का हार, कानों में हीरे के बड़े-बड़े थाप, सुर्ख लिपिस्टिक, रचे होंठ और कमान सी आँखें।
रजनी ने धानी कुर्ता, सफेद चूड़ीदार, हाथों में ढेर सारी हरी-हरी चूड़ियां, मैचिंग कीमती हार, इयरिग और सुघड़ मेकप।
शिशिर उनको ताकता ही रह गया।
सुनीता शर्मा के बोली- “अब आओगो भी या ऐसे ही खड़े रहोगे?”
शिशिर जैसे सोते से जाग गया हो। उसने हाथ के बैग से एक सफेद मोगरे की माला निकाली और सुनीता से बोला- “भाभी ये आपके लिये…”
सुनीता उसकी ओर पीठ करके खड़ी हो गईं, उसने माला उसके जूड़े में बाँध दी। मोगरा महक उठा। पलट कर सुनीता ने उसके गले में बाहें डाल दी। शिशिर ने उन्हें खींचकर अपने से चिपका लिया। दोनों ऐसे ही जुड़े थोड़ी देर खड़े रहे। सुनीता ने एक चुंबन उसके होठों पर लेकर अपने को अलग किया।
फिर शिशिर रजनी की तरफ बढ़ा और बैग से सुर्ख गुलाब का बुके उनकी ओर करके बोला- “रजनी जी ये आपके लिये…”
रजनी बोली- “रजनी नहीं, भाभी…”
शिशिर ने अपने को सुधारते हुये कहा- “रजनी भाभी, यह आपके लिये…”
रजनी ने बढ़ के दोनों बाहें उसके गाले में डाल दी और अपने होंठ कसके उसके होंठों पर गड़ा दिये। शिशिर उनको चूमता रहा।
इस बीच सुनीता डाइनिंगा टेबल पर जार में रखी सुगंधित मोमबत्ती जला दी थी और उसकी भीनी-भीनी खुशबू कमरें में भरने लगी थी। साफ्ट म्यूजिक लगा दिया था। सुनीता ने लाइट बंद कर दी। शिशिर ने सुनीता की ओर देखा। मोमबत्ती की मंद-मंद रोशनी में वह परी सी लग रही थी। रजनी की कमर में हाथ डाले हुये शिशिर सुनीता की ओर बढ़ा और उसको अपने से चिपका लिया।
रजनी उसके बायें कंधे से चिपकी थी और सुनीता दांयें से। इसी हालत में वह लोग थिरकते रहे। शिशिर कभी सुनीता को चूमता था कभी रजनी को। शिशिर का लण्ड गरमाने लगा था। रजनी उस पर हाथ फेरने लगी थी। उसने झुक कर सुनीता के दांयें उभार को ब्लाउज़ के ऊपर से ही मुँह में ले लिया।
सुनीता सी सी कर उठी। सुनीता ने फुसफुसा के कहा- “देवरजी, पहले रजनी को शुख दीजिये, मैं तो आपके पास ही हूँ आज की रात उसकी है…”
शिशिर ने रजनी को प्यार से चूम लिया- “रजनी भाभी भी तो अपनी हैं…” फिर सुनीता को और भींचते हुये बोला- “भाभी शुरूआत तो मैं आप से ही करूंगा लेकिन तुम दोनों इतनी अच्छी लग रही हो कि मैं कुछ भी नहीं उतारना चाहता…”
लेकिन रजनी उसका पैंट उतार चुकी थी। अंडरवेर खींचकर रजनी ने उसके लण्ड को मुट्ठी में बांधा तो जैसे लोहे की गरम राड पर हाथ रख दिया हो। शिशिर का बड़ा मोटा और लंबा लण्ड सांप की तरह ऊपर मुँह बाये खड़ा था। पत्थर की तरह सख्त। उसको देखते ही रजनी के मुँह से निकल गया- “ओ माई गुडनेश… अब समझी कि सुनीता इतनी दिवानी क्यों हो रही थी…” फिर रजनी शिशिर की बांहों से खिसक कर नीचे घुटनों के बल बैठ गई। मुट्ठी में बाँधकर उसका लण्ड सीधा अपने सामने कर लिया और मुँह खोलकर अपने नरम होंठ उसके ऊपर रख दिये।
शिशिर ने रजनी को प्यार से चूम लिया- “रजनी भाभी भी तो अपनी हैं…” फिर सुनीता को और भींचते हुये बोला- “भाभी शुरूआत तो मैं आप से ही करूंगा लेकिन तुम दोनों इतनी अच्छी लग रही हो कि मैं कुछ भी नहीं उतारना चाहता…”
लेकिन रजनी उसका पैंट उतार चुकी थी। अंडरवेर खींचकर रजनी ने उसके लण्ड को मुट्ठी में बांधा तो जैसे लोहे की गरम राड पर हाथ रख दिया हो। शिशिर का बड़ा मोटा और लंबा लण्ड सांप की तरह ऊपर मुँह बाये खड़ा था। पत्थर की तरह सख्त। उसको देखते ही रजनी के मुँह से निकल गया- “ओ माई गुडनेश… अब समझी कि सुनीता इतनी दिवानी क्यों हो रही थी…” फिर रजनी शिशिर की बांहों से खिसक कर नीचे घुटनों के बल बैठ गई। मुट्ठी में बाँधकर उसका लण्ड सीधा अपने सामने कर लिया और मुँह खोलकर अपने नरम होंठ उसके ऊपर रख दिये।
होंठ लगते ही शिशिर की वासना एकदम जाग उठी। हाथ बढ़ाकर शिशिर ने रजनी को उठा लिया और सुनीता की कमर में हाथ डालकर उन्हें खींचता हुआ बेड तक ले गया। रजनी को बेड के पैताने कारपेट पर बैठा दिया और सुनीता को बेड पर चित्त गिरा दिया। शिशिर ने सुनीता की साड़ी ऊपर तक उलट दी। बाहर के ही नहीं अंदर के कपड़े भी उसने कीमती पहन रखे थे। लेस लगी डिजाइनर पैंटी पर चूत के पानी से एक बड़ा धब्बा बन गया था। शिशिर ने पैंटी अलग की तो सामने दो चिकनी सपाट जांघें थीं, संतरे की रसभरी फांक की तरह सूजी-सूजी चूत की पंखुड़ियां थीं जिनके भीतर से गुलाबीपन झांक रहा था, अर्ध-गोल सुडौल नितम्ब थे जिनके बीच में गहरी दरार थी।
उसके मुँह से निकल गया- “भाभी तुम बाकई बहुत खूबसूरत हो…”
दोनों हाथों से उसने सुनीता को खींच लिया और उसकी जांघें अपने कंधों पर धर लीं। सुनीता का धड़ पलंग पर था, नितम्ब पलंग से ऊपर उठे हुये थे और मुँह खोले चूत शिशिर के मुँह से सटी हुई। सुनीता की चूत से मदमस्त सुगंध निकल रही थी। शिशिर ने अपने होंठ सुनीता की चूत की पंखुड़ियों से सटा दिये और चूतड़ आगे करके अपना लण्ड पलंग से टिकी बैठी रजनी के होंठों से लगा दिया।
रजनी ने सिर ऊंचा करके उसका लण्ड अपने होठों में ले लिया।
जैसे ही शिशिर ने चूत के अंदर के उभार को होंठों में दबोचा, सुनीता के मुँह से एक सीत्कार निकल गई और वह तनकर के धनुष की तरह हो गई। वह चूत की उठान को होंठों से इस तरह चूसने लगा जैसे संतरे की फांक चूस रहा हो।
नीचे बैठी रजनी शिशिर के लण्ड को जड़ से दायें हाथ की मुट्ठी में बांधे लालीपोप की तरह चटखारे लेकर चूस रही थी।
शिशिर दोहरे मज़े ले रहा था।
रजनी ने मुट्ठी को लण्ड के सिरे तक फिसलाकर उसके ऊपर की खाल को हटा दिया तो लण्ड का सुपाड़ा निकल आया। जैसे लालीपोप खा रही हो, उसने सुपाड़ा अपने मुँह में लेकर हलके से दांत लगा दिये।
शिशिर उत्तेजना से कराह उठा और उसने सुनीता की चूत की उठान पर हलके से दांत लगा दिये।
सुनीता के मुँह से चीख निकल गई, बोली- “ओ देवरजी तुम तो काटते हो…”
शिशिर क्लिट पर जीभ फेरने लगा। सुनीता की सिहरन बढ़ गई। उसने शिशिर के सिर पर हाथ रखकर और कस के उसका मुँह चूत पर दबा लिया। शिशिर ने साथ ही चूतड़ आगे करके और जोर से लण्ड चूत के मुँह में पेला। रजनी ने चूत के होंठों की पकड़ और बढ़ा दी।
जब रजनी जोर बढ़ा देती थी तो शिशिर सुनीता की चूत पर कसर निकालता था और जब सुनीता रगड़ बढ़ा देती की तो शिशिर रजनी पर कसर मिटाता था। शिशिर सुनीता और रजनी के बीच माध्यम बन हुआ था।
सुनीता जोरों से- “उईईई… आआआह्ह…” करे जा रही थी।
रजनी के मुँह से निकल रहा था- “उहूँहूँहूँ हूँहूँहूँ हूँ…” जैसे बड़ी स्वादिष्ट चीज़ चाट रही हो।
शिशिर की जीभ चूत की गहराइयों तक घुस जाती थी और सुनीता तड़प-तड़प जाती थी। शिशिर दोनों हाथों से सुनीता की दोनों चूचियों को मसल रहा था। उसके दोनों चूचुक ब्लाउज़ के ऊपर ही एक-एक इंचा उभर आये थे।
रजनी उंगली और अंगूठे की रिंग बना के शिशिर के लण्ड को उसमें ले रही थौ साथ ही मुँह से चूसती जाती थी।
काफी देर तक वे मज़े लेटते रहे। सुनीता की गुलाबी तितली तनकर सख्त हो गयी थी। शिशिर ने उसके ऊपर अंगूठा रखा।
सुनीता एकदम कांप गई- “ओओ माँ अंअंअं अंआंआं आआआ आआआ मैं तो गईईईई… … …” उसने कसके चूत शिशिर के मुँह से चिपका दी और जोरों से दोनों हाथों से उसका सिर टांगों में दबा लिया।
शिशिर बड़ा उत्तेजित हो उठा। उसने लण्ड पेलने की गति बढ़ाई और उसके लण्ड ने वीर्य उगलना चालू कर दिया। रजनी ने मुँह से लण्ड निकाल लिया। लण्ड से गाढ़ा रस निकलता ही जा रहा था। रजनी ने सुनीता की पैंटी उठा ली और ढेर सारा वीर्य उस पर ले लिया।
रजनी उठी और खड़े होकर शिशिर से चिपक गई। शिशिर के वीर्य से भरे अपने होंठ, सुनीता के रस से गीले शिशिर के होठों से सटा दिये। रजनी ने उठकर सुनीता की ओर देखा तो वह निढाल पड़ी हुई थी। साड़ी उलटी हुई थी। बड़ी ही चिकनी और सुडौल टांगों के बीच चूत की फांकें तराशी हुई डबलरोटी की तरह फूली हुईं थी। उनके ऊपर बड़े सलीके से कतरे हुये सुनहरे बालों का तिकोन सा बना था। दोनों फांकें फैल गईं थीं। अंदर का गुलाबीपन दिखाई दे रहा था जिसके अंदर से नमी झांक रही थी। बुरी तरह चूसने से चूत लाल हो गई थी। पेट और टांगों पर जरा सा भी ज्यादा मांस नहीं था। सब कुछ एकदम अनुपात में। ब्लाउज़ बुरी तरह से मसला हुआ था जिसमें से सुडौल गोलाइयां उभरी हुई थीं। सफेद साड़ी में चूत खोले कोई अप्सरा पड़ी थी। रजनी पहली बार अपनी अंतरंग सहेली के अंदर के भागों को देख रही थी।
इस बीच शिशिर बाथरूम चला गया था। रजनी की चूत में आग लगी हुई थी। रजनी ने एक झटके से अपनी सलवार का नाड़ा खोल लिया और चूत के रस से गीली हो गई पैंटी को खींचकर निकाल फेंका। अपना कुर्ता भी निकाल फेंका और बिल्ली की तरह चलती हुई सुनीता के ऊपर आ गई। वह सुनीता के ब्लाउज़ के बटन खोलने लगी। रजनी पहली बार ऐसा कर रही थी।
सुनीता भौचक्की रह गई, बोली “रजनी… ये क्या करती हो?”
रजनी तब तक उसका ब्लाउज़ और ब्रेजियर अलग कर चुकी थी। बड़े-बड़े गोले स्प्रिंग से उछलकर बाहर आ गये थे। रजनी ने देखा तो बोल पड़ी- “सुनीता, तू बाकई बहुत खूबसूरत है…”
रजनी ने सुनीता का बायां उभार चूचुक सहित मुँह में भर लिया और अपनी चूत सुनीता की चूत के ऊपर बैठा दी। जब रजनी की चूत की पंखुड़ियों ने सुनीता की चूत के अंदर रगड़ा तो सुनीता को बहुत अच्छा लगा। उसने रजनी की पतली कमर अपनी दोंनों टांगों के बीच भर ली और अपनी टांगें उसकी कमर पर कसकर उसकी चूत को और कसकर अपनी चूत में घुसा लिया।
रजनी ने अपनी दाईं चूची उसके मुँह में दे दी।
शिशिर जब बाथरूम से आया तो उसने देखा कि सुनीता चित्त लेटी है, रजनी उसके ऊपर लेटी है। रजनी सुनीता की एक चूची चूस रही है और सुनीता रजनी की चूची पर पिली पड़ी है। सुनीता की नारंगी की तरह रस से भरी हुई सुनहरे तराशे बालों वाली चूत रजनी की लंबी फांक वाली रसीली सफाचट चूत में लाक है। सुनीता की चूत का एक होंठ रजनी की चूत में घुसा है और रजनी की चूत का एक होंठ सुनीता की चूत के भीतर। दोनों एक दूसरे की चूत के अंदर के दाने को रगड़ रही हैं। चूत को ज्यादा से ज्यादा खुला रखने के लिये सुनीता ने अपनी टांगें रजनी की कमर पर कस रखी हैं और रजनी ने टांगें फैला रखी हैं। दोनों कस-कस के आवाजें निकाल रही हैं।
यह देखकर शिशिर का लण्ड तनकर उत्तेजना से हिलने लगा। वह आगे बढ़ा और पलंग के पैताने जाकर उसने उन दोनों को वैसे ही गुथी हालत में पलंग के किनारे तक खींच लिया। पैताने खड़े-खड़े ही उसने अपना लण्ड हाथ से पकड़ा, सुनीता की चूत के मुंह पर रखा और एक झटके में ही पूरा अंदर कर दिया।
सुनीता के मुँह से निकला- “उईई माँ…”
उसने दो तीन बार उसको अंदर बाहर पेला। फिर अपना लण्ड बाहर खींच लिया। फिर से मुट्ठी में पकड़ा और अबकी बार रजनी के सुराख से मिलाया और जोर लगा के घुसाता ही गया।
रजनी कराह उठी- “ओ माई गोड…”
दो तीन बार उसने उसकी चूत में ही अंदर बाहर किया फिर खींच लिया। फिर उसने सुनीता की बुर पर लगाया और बोला- “लो भाभी अब तुम लो…” और सारा का सारा अंदर कर दिया।
सुनीता बनावटी शिकायत से- “देवरजी, तुम तो अंदर तक हिला देते हो…”
बाहर खींचकर शिशिर ने रजनी की बुर में एक झटके में पूरा भीतर ओर कहा- “लो रजनी भाभी तुम लो…”
रजनी- “हाँ… लगाओ तुम्हारे लण्ड में जोर है तो मेरी चूत भी कम नहीं…”
शिशिर एक बार सुनीता को चोदता था और एक बार रजनी को। दोनों के अंदर उसका लण्ड एक की चूत से निकलता तो दूसरी की चूत में घुस जाता।
उसको दुहरा स्वाद मिल रहा था। एक बार सुनीता की मांसल, स्पंजी, लण्ड को जकड़ने वाली बुर का और दूसरी बार पतली, लंबी, गरम सुरंग का जिसमें लण्ड गहराई तक घुस जाता था। जब वह रजनी पर चोट करता तो रजनी झेलते हुये अपनी चूत सुनीता की चूत पर रगड़ देती। जब वह सुनीता पर जोर लगाता तो सुनीता टांगों की जकड़ और बढ़ा देती कि उसकी चूत रजनी की बुर पर रगड़ मार देती। शिशिर की रफ्तार बहुत बढ़ गई थी। धखाधक-धकाधक वह लगाये जा रहा था- सुनीता में, रजनी में, फिर सुनीता में। सुनीता रजनी एक दूसरे की चूचियों को कस के जकड़े हुये थीं। उनका सिसकना बढ़ गया था।
जैसे ही चोट लगती सुनीता बुदबुदाती- “ओओह्ह शिशिर मैं क्या करूं हुहूँ…”
सुनीता जब ज्यादा आनंद में आ जाती थी तो शिशिर का नाम लेकर पुकारने लगती थी।
रजनी का चुनौती वाला रुख अब भी बना हुआ था, हालांकि उसमें रहम जैसा भाव आ गया था। उसके अंदर धक्क से जाता तो रजनी कराह उठती- “ओ मेरे राम्म्म… हाँ हाँ काट डालो इसको आज… इसे छोड़ना नहीं…”
शिशिर ने सुनीता की जांघें को दोनों हाथों से थाम रखा था जो रजनी की कमर पर कसी हुईं थीं। खड़े-खड़े वह एक के बाद एक दोनों को पेले जा रहा था जैसे पिस्टन शंट कर रहा हो।
सुनीता मैं घुसता तो सुनीता तड़पती- “ओओ… ओओओ… आआआ… ओ मेरी मम्मीई… ओ माईई गोड… उईईई म्माँ मैं मरीई…”
रजनी झेलती तो दांतों के ऊपर दांत जकड़े हुये अंदर लंबी सांस खींचती- “ऊऊऊऊऊऊ…” जब चोट पड़ चुकती तो जोर से सांस बाहर करती- “ओफ्फ्फ्फ…”
सुनीता की बुर बुरी तरह से रिस रही थी। जांघों तक पानी फैल गया था। रजनी की बुर भी पूरी गीली हो रही थी। दोनों की चूत गुत्थम-गुत्था थीं और एक दूसरे के पानी से लथफथ हो रही थीं।
शिशिर का लण्ड उनकी चूत से फच्च-फच्च की आवाज निकाल रहा था।
सुनीता और रजनी की कराह बढ़ती जा रही थी- “ओओ… ओओओ… आआआ… ओ मेरी मम्मीई… ओ माईई गोड… उईईई म्माँ मैं मरीई…” “ऊऊऊऊऊऊ… ओफ्फ्फ्फ”
शिशिर ने और गति बढ़ाई तो रजनी ने सुनीता की चूची को छोड़कर अपने होंठ उसके होंठों पर गड़ा दिये। शिशिर ने हाथ बढ़ाकर सुनीता की दोनों चूचियां हथेलियों में थाम लीं और शंटिंग चालू रखी। दोनों होंठ चूसती जातीं थीं और “ऊंऊं” की आवाज करती जाती थीं। जैसे ही शिशिर ने चूचियों की घुंडियों को ऊँगलियों में मसला तो सुनीता चिल्ला उठी- “ओ शिशिर मैं तो गईईई… मत निकालो बाहर…”
इसके साथ ही अपनी कमर उठाकर उसने रजनी की चूत से इतने कस के सटा ली कि रजनी हिल न सकी। उसकी रगड़ से रजनी का पानी भी छूट गया- “आआआ… मैं क्या करूं? माँ मेरी मैं झड़ीईई…”
शिशिर ने जल्दी से पूछा- “रजनी भाभी, आपने बर्थ कंट्रोल की गोली ली है?”
रजनी के हाँ कहते ही शिशिर ने रजनी की बुर में अपना पूरा लण्ड अंदर किये हुये ही सारा वीर्य उगलना चालू कर दिया। करीब-करीब एक साथ तीनों लोग सिहरते रहे। जब शिशिर ने लण्ड बाहर किया तो रजनी की मसली चूत के अंदर से गाढ़ा-गाढ़ा सफेद द्रव बाहर निकलकर सुनीता की चूत पर गिर रहा था।
रजनी ने उठकर अपनी चूत को पोंछा।
सुनीता ने हाथ से खींचकर शिशिर को अपनी बगल में लिटा लिया।
शिशिर ने हाथ बढ़ा के रजनी को अपनी दूसरी तरफ लिटा लिया। दोनों ने शिशिर के एक-एक कंधे पर सिर रख लिया।
रजनी बोली- “थैंक यू शिशिर, मैं पूरी तरह संतुष्ट हो गई हूँ, खासतौर पर तुमने मेरी सहेली से मेरी जान पहचान करवा दी…”
सुनीता लाजाती हुई बोली- “धत्त… ऐसा भी कोई करता है?”
शिशिर बोला- “रजनी भाभी, अभी कहां? अभी आपसे अकेले की मुलाकात तो करनी है…”
रजनी- “न बाबा… और मैं न ले सकूंगी…”
सुनीता- “शिशिर इसको मत छोड़ना। इतनी इठलाती थी, हैकड़ी तो बंद हो इसकी…”
शिशिर ने सुनीता को भिंचकर चूम लिया फिर रजनी को भींचकर उसको चूम लिया।
मिसेज़ संगीता अग्रवाल राकेश और रूपेश
जब सुनीता और रजनी शिशिर से मुलाकात का बेसबरी से इंतेजार कर रही थीं, ठीक उसी समय राकेश और रूपेश मिसेज़ अग्रवाल के घर पर दस्तक दे रहे थे। मिसेज़ अग्रवाल ने दरवाजा खोला। एकदम सजी-धजी, पूरा श्रिंगार किये। कमनीय तो थीं ही और मादक हो उठी थीं। पूरे उठे हुये जोबन, उभरे गोल-गोल चूतड़, दमकता रंग, आँखों में शुरूर, मोटी नहीं थी पर शरीर अच्छा भरा हुआ।
उन्होंने राकेश का हाथ पकड़ते हुये कहा- “आइये देवर जी…”
फिर रूपेश की ओर देखते हुये- “आइये रूपेश जी…”
कोई हिचकिचाहट नहीं थी, न शर्मा रही थीं। अंदर आकर राकेश ने कीमती परफ्यूम भेंट की तो वह उससे सटकर खड़ी हो गईं, बोली- “लीजिये लगा दीजिये…”
राकेश उनके उभार की नजदीकी महसूस करने लगा था। उसके शरीर में झनझनाहट सी लगने लगी थी।
वह बोलीं “बैठिये…”
लिविंग रूम में शानदार सोफे पड़े हुये थे। खुशहाली और शुरूचि चारों ओर नजर आ रही थी। राकेश और रूपेश बड़े से सोफे पर बैठ गये।
मिसेज़ अग्रवाल ने पूछा- “आप लोग कुछ हार्ड ड्रिंक लेना चाहेंगे? मैं तो लेती नहीं…”
राकेश- “अगर आप साकी बनेंगी तो जरूर लेंगे…”
मिसेज़ अग्रवाल- “आप बनाइये तो सही मैं सब कुछ बनूंगी। आज की रात आपके नाम है, अगर कुछ कमी रह गई तो सुनीता और रजनी शिकायत करेंगी…”
>राकेश और रूपेश दोनों ड्रिंक बना लाये और मिसेज़ अग्रवाल के लिये कोक। मिसेज़ अग्रवाल बड़ी बेतकल्लुफी से उनके सामने लवो सीट पर बैठ गईं। दोनों टांगें चौड़ाई हुई थीं। अगर साड़ी से न ढकी होती तो सामने चूत का पूरा मुँह खुला दिखता। उन दोनों को नमकीन देने को ठीक उनके मुँह के सामने इस तरह झुकती थी कि उनकी छातियां चूचुक तक दिखाई देती थीं।
रूपेश से न रहा गया तो उनको पकड़ा तो उसके ऊपर इस तरह गिरीं कि हाथ उसके लण्ड पर रख दिया फिर उठती हुई बोलीं- “तसल्ली रखो लाला जी…”
अबकी बार सामने और बेतकल्लुफी से बैठीं। टांगें चौड़ाये दोनों पैर सोफे पर रख लिये। टांगों के ऊपर की साड़ी ऊपर हो गई की नीचे की नीचे गिर गई थी। सामने चूत को केवल सिलिकन अंडरवेर ढके हुये थी जिसके ऊपर एक धब्बा उभर आया था। दो एकदम फक्क गोरी सुडौल रानें उनके बीच फँसी हुई पतली खाली पट्टी… वह दोनों उत्तेजित होने लगे थे। लण्ड उठने लगे थे जिनको वह बड़े ध्यान से देख रही थीं।
राकेश कहने लगा- “भाभी, तुम गजब हो, ऐसी चीज़ को अग्रवाल कैसे छोड़कर चले जाते हैं?”
मिसेज़ अग्रवाल- “जाने के पहले अपनी पूरी कसर निकाल लेते हैं, बाकी आने पर पूरी कर लेते हैं। हाथ लगाने से दुख रही है। पहले से तुम लोगों से वायदा न किया होता तो आज मैं आराम कर रही होती…”
रूपेश ने कहा- “भाभी ऐसा भी क्या तड़पाना? ना ही छुपाते हो ना ही मुँह दिखाते हो…”
मिसेज़ अग्रवाल ने आँख नचाई- “मुँह दिखाई की रश्म होती है…”
राकेश उठते हुये- “लो मैं रश्म पूरी किये देता हूँ…”
अबकी बार सामने और बेतकल्लुफी से बैठीं। टांगें चौड़ाये दोनों पैर सोफे पर रख लिये। टांगों के ऊपर की साड़ी ऊपर हो गई की नीचे की नीचे गिर गई थी। सामने चूत को केवल सिलिकन अंडरवेर ढके हुये थी जिसके ऊपर एक धब्बा उभर आया था। दो एकदम फक्क गोरी सुडौल रानें उनके बीच फँसी हुई पतली खाली पट्टी… वह दोनों उत्तेजित होने लगे थे। लण्ड उठने लगे थे जिनको वह बड़े ध्यान से देख रही थीं।
राकेश कहने लगा- “भाभी, तुम गजब हो, ऐसी चीज़ को अग्रवाल कैसे छोड़कर चले जाते हैं?”
मिसेज़ अग्रवाल- “जाने के पहले अपनी पूरी कसर निकाल लेते हैं, बाकी आने पर पूरी कर लेते हैं। हाथ लगाने से दुख रही है। पहले से तुम लोगों से वायदा न किया होता तो आज मैं आराम कर रही होती…”
रूपेश ने कहा- “भाभी ऐसा भी क्या तड़पाना? ना ही छुपाते हो ना ही मुँह दिखाते हो…” [/b]
मिसेज़ अग्रवाल ने आँख नचाई- “मुँह दिखाई की रश्म होती है…”
राकेश उठते हुये- “लो मैं रश्म पूरी किये देता हूँ…”
मिसेज़ अग्रवाल जल्दी से उठते हुये- “ना ना पहले दूल्हे मियां को तो देखने दो…” वह रूपेश और राकेश के बीच मैं सटकर बैठ जातीं है। दोनों तरफ हथेलियों से दोनों लण्ड थाम लेती हैं।
राकेश कमर में हाथ डालकर अपनी तरफ खींच लेता है।
वो सामने से छातियां पूरी गड़ा के कस के चिपक जाती हैं, उसके होंठों को अपने होठों से दबा लेती हैं और नीचे हाथ डालकर उसका लण्ड बाहर निकाल के फुसफुसाती हैं- “ये तो बहुत ज्यादा दबंग है…”
राकेश पीठ पर ब्लाउज़ के बटन और ब्रेजियर के हुक खोल देता है। रूपेश उठकर के उनकी साड़ी खींच लेता है और आगे हाथ डालकर नाड़ा खोल के पेटीकोट खींच लेता है। वह उतारने के लिये पैंटी पकड़ता है कि मिसेज़ अग्रवाल उठकर के खड़ी हो जाती हैं- “इसको अभी रहने दो…”
उनका पूरा बदन दमकता है। उम्र के बावजूद उनकी भरी-भरी छातियां गोल-गोल और सख्ती से खड़ी हुई हैं। खाली घुंडियां तन करके आधा इंचा ऊँची हो गईं। बदन पर कोई थुलथुल मांस नहीं। वो बोलीं- “पहले आप लोगों की बारी है…”
इसके साथ ही वह राकेश का पैंट उतारने को बढ़ती हैं लेकिन इसकी जरूरत नहीं पड़ती। वह दोनों अपने-अपने कपड़े उतार फेंकते हैं। दोनों का तन्नाया लण्ड खड़ा होता है।
मिसेज़ अग्रवाल के मुँह से निकल जाता है- “हे मां, आप दोनों तो एक दूसरे से होड़ ले रहे हैं मैं कैसे लूगी ये?”
उत्तेजना में राकेश उनको बांहों में बाँध लेता है। वह राकेश को लिये हुये सोफे पर गिर जाती हैं फिर फिसला कर नीचे कालीन पर घुटने के बल बैठ जाती हैं। राकेश के लण्ड की सुपाड़ी खोलकर अपने होठों मैं दबाकर उसको चूसने लगती हैं। राकेश का शरीर एकदम तन जाता है।
रूपेश पीछे से उनकी चूचियां जकड़ लेता है तो दूसरा हाथ बढ़ाकर वह उसका लण्ड पकड़ लेती हैं और लण्ड पकड़े हुये राकेश के बगल में बैठा लेती हैं। राकेश को अब पूरा का पूरा निगलती जाती हैं और रूपेश के लण्ड की मुट्ठी मारती जाती हैं। मिसेज़ अग्रवाल ने दोनों गोलाइयां राकेश के पैरों पर दबा ली हैं। राकेश हाथ डालकर उनकी चूचियों को मुँह और हथेलियों में ले लेता है और अपने होंठ उनकी चिकनी सुडौल पीठ पर चिपका देता है।
मिसेज़ अग्रवाल की घुटी-घुटी चीख निकल जाती है। वह बुदबुदाती जाती है जिसमें आनंद मिला हुआ है। वो पीछे से पैंटी के अंदर हाथ ले जाके बीच की उंगली उनकी चूत के अंदर कर देता है जो तर हो रही है। मिसेज़ अग्रवाल एकदम उछल जाती हैं, राकेश के लण्ड पर दांत गड़ा देती हैं, रूपेश का लण्ड बहुत कस के मुट्ठी में जकड़ लेती हैं। वह दोनों चीख उठते हैं। मिसेज़ अग्रवाल की रफ्तार बहुत तेज हो जाती है साथ ही वह अपनी चूत भी रूपेश की उगली पर ऊपर नीचे करती जाती हैं, क्योंकी रूपेश उंगली ज्यादा अंदर नहीं कर सकता है। तीनों लोग जोर-जोर से आवाजें निकाल रहे हैं।
सबसे पहले मिसेज़ अग्रवाल चिल्लाती हैं- “ओ मांँ… मैं तो गइई…” वह बड़ी जोर से राकेश के लण्ड को चूसती हैं। रूपेश के लण्ड पर कस के मुट्ठी मारती है। वह बड़ी देर तक झड़ती रहती हैं साथ ही जोरों से सीईई… की आवाज करती रहती हैं।
राकेश अपना गाढ़ा रस उनके मुँह में उगल देता है।
रूपेश की धार हवा में फौवारे की तरह छूट जाती है।
मिसेज़ अग्रवाल अपना मुँह हटा लेती हैं। रिस-रिस करके सफेदी नीचे गिरती जाती है। मिसेज़ अग्रवाल ने सोफे पर दोनों के बीच बैठकर उनके सिर को अपनी छातियों से चिपका लिया। तीनों देर तक निढाल से पड़े रहे। फिर दोनों को चूमकर उन्होंने बेडरूम में चलने को कहा।
बेडरूम में शानदार किंग साइज़ का बेड पड़ा था और एक दीवाल पर सोफे लगे हुये थे। मिसेज़ अग्रवाल बाथरूम से आकर बोलीं- “अब मैं अपनी दिखाने को तैयार हूँ… लेकिन दूंगी तब जब आप अपनी मस्त चुदाई की कहानी सुनायेंगे…”
राकेश और रूपेश वैसे ही नंग-धड़ंग सोफे पर बैठ गये थे। उनके सामने पलंग पर बैठकर मिसेज़ अग्रवाल ने एक झटके से अपनी कच्छी खींचकर उतार दी। वह उनके जूस से तर हो रही थी। फिर उन्होंने उंगली में घुमाकर उन लोगों की ओर फेंका।
वह रूपेश के मुँह पर पड़ी। उसने बड़े प्यार से मस्ती से उसे चूमा और लंबी सांसों से सूँघा।
मिसेज़ अग्रवाल ने टांगें चौड़ी कर दीं। माई गोड… डबलरोटी की तरह फूली उनकी फुद्दी थी एकदम सफाचट… पैर फैलाने से संतरे की फांक से होंठ खुल गये थे, बीच में तितली सी क्लिटोरिस उठी हुई थी और उसके नीचे चूत का छेद खुला हुआ था, एकदम गुलाबी, गहराई तक गीला और चमकता हुआ। एकदम पकी हुई प्रौढ़।
रूपेश के मुँह से निकल गया- “ओ माई गोड ऐसी चूत तो मैंने आज तक नहीं देखी…”
दोनों के लण्ड जो उठे हुये थे तन्नाकर सीधे ऊपर हो गये। उठकर वे पलंग की तरफ बढ़े।
मिसेज़ अग्रवाल ने टोका- “पहले सुनीता और रजनी की चुदाई की बातें…”
“अभी बताते हैं…” उन्होंने कहा।
पर राकेश ने उनको पलंग पर खींच लिया और टांगें दोनों ओर कर अपना मुँह उनकी चूत के ऊपर रख दिया। होठों के बीच क्लिट लेकर चूसने लगा।
मिसेज़ अग्रवाल के मुँह से किलकारी निकल गई। रूपेश ने सिरहाने पहुँचकर उनकी एकं चूची मुँह में ले ली और दूसरी हथेली में कस के दबा ली। उसका बड़ा सा लण्ड मिसेज़ अग्रवाल के मुँह के सामने लाटक रहा था जो उन्होंने आगे बढ़कर मुँह में ले लिया। राकेश उनकी चूत को बहुत बुरी तरह से चूस रहा था। उनकी रानों को दोनों हाथों के जोर से पूरा फैला लिया था और अपना मुँह जितना घुसा सकता था घुसा लिया था। बीच-बीच में जीभ उनकी चूत में करता था।
मिसेज़ अग्रवाल अपनी चूत उठा-उठा दे रही थी। रूपेश का लण्ड काफी बड़ा था जो वह पूरा नहीं ले पा रही थीं। लेकिन जब राकेश चूत को चाटता था तो वो सिर ऊंचा करके रूपेश का लण्ड पूरा गपक लेती थीं। गाय की बछिया की तरह चटखारे लेकर चूस रही थीं। चूतड़ बेचेनी से रगड़ रही थीं।
जब राकेश ने फिर से जीभ चलाई तो उन्होंने रूपेश के लण्ड से मुँह खींच लिया- “हुहु ऊऊऊऊ ओ माँ तुमने तो आग लगा दी है। लण्ड डाल दो अपना…”
राकेश- “पर वो चुदाई की कहानी तो…”
“कहानी फिर कभी… पहले मेरीई चुदाई…” और उन्होंने खुद उसका लण्ड पकड़कर चूत पर लगाया और चूतड़ उठाकर के गप्प से अंदर ले लिया। फिर बोलीं- “लगाओ धक्के कस-कस के…”
राकेश ने तीन चार बार उनको कस-कस के पेला। हर झटके पर वह और जोर से लगाने को उकसाती थीं। राकेश ने लण्ड बाहर निकाल लिया और उनसे कहा- “आप घुटनों के बल उकड़ू हो जाइये, मैं पीछे से लगाऊँगा। आगे से आप रूपेश का लण्ड ले लीजिये…”
मिसेज़ अग्रवाल पलट के घुटनों और बांहों के बल उकड़ू हो गईं। पीछे से राकेश ने लण्ड लगाया। जैसे ही पेला वह सड़ाक से उनकी चूत में घुस गया। उसने हाथ डालकर उनकी दोनों चूचियां पकड़ लीं। रूपेश उनके ठीक मुँह के सामने लण्ड तन्नाके खड़ा था।
मिसेज़ अग्रवाल ने एक मुट्ठी में लण्ड पकड़ के मुँह में ले लिया। राकेश चूचुकों को ऊँगालियों में रगड़-रगड़ के लण्ड अंदर-बाहर शंट कर रहा था। हर चोट पर मिसेज़ अग्रवाल का धड़ आगे हो जाता था और रूपेश का लण्ड उनके तालू तक घुस जाता था। जितनी चूत पर चोट पड़ती थी उतनी ही तेजी से वह रूपेश के लण्ड को मुँह में ले रही थीं। रूपेश अपने दोनों हाथों से उनके दोनों गोल-गोल चूतड़ मजबूती से जकड़े था और अपना लण्ड ऐसे पेल रहा था जैसे चूत में धकापेल कर रहा हो। उसकी जकड़ से मिसेज़ अग्रवाल की पीछे की दरार फैल गयी थी। आगे पीछे गति से सटासाट हो रहा था।
मिसेज़ अग्रवाल पूरी तरह आनंद में थीं- “ओ मेरी मां… दो-दो लण्ड मेरे अंदर हो रहे हैं। इतना मजा ता मैंने कभी नहीं लिया…”
राकेश और रूपेश के ऊपर वासना का भूत सवार था। राकेश पूरा लण्ड घच्च से घुसेड़ता और आवाज निकालता- “ले, पूरा ले ले…”
रूपेश आगे बढ़ के मुँह में घुसेड़ देता- “ले, मेरा ले अब…”
मिसेज़ अग्रवाल अलग से चिल्ला रही थीं- “हाँ हाँ लगाओ, छोड़ना नहीं आज इसको फाड़ के रख दो पूरा…”
राकेश ने गति बढ़ा दी। एकाएक चिल्लाया- “मैं झड़ा… लो लो लो और लो…”
मिसेज़ अग्रवाल- “नहीं नहीं, अभी मत झड़ना। इस को फाड़ के रख दो… मेरे को बीच में मत छोड़ो…”
लेकिन राकेश ने सफेदी उगलना चालू कर दी थी।
मिसेज़ अग्रवाल ने जल्दी से अपनी चूत बाहर खींच ली।
राकेश को किसका कर रूपेश तेजी से उस ओर आया। कमर में हाथ डालकर उसने मिसेज़ अग्रवाल को चित्त कर दिया और अपना लण्ड धपाक से पेल दिया। राकेश ने जबर्दस्त चुदाई की थी। वह बुरी तरह पशीने से लथफथ था। वो बाथरूम में घुस गया।
मिसेज़ अग्रवाल ने रूपेश को कखींचकर कसके भींच लिया। दोनों बाहें उसकी पीठ पर बाँध लीं और टांगें उसकी कमर के इर्द-गिर्द जकड़ लीं, और बोलीं- “ओ मेरे लाला, अब मेरी इसकी पूरी मरम्मत कर दो…”
रूपेश ने बाहर करके अचानक धक्के से अंदर करते हुये कहा- “लो भौजी, तुम भी क्या याद रखोगी किस लौड़े से पाला पड़ा था…”
बिसात बिछी हुई थी, खेल चालू था। दोनों एक दूसरे से चिपके हुये चुदाई किये जा रहे थे और बतिया रहे थे।
मिसेज़ अग्रवाल- “हाँ, लौड़ा तो तुम्हारा जबर्दस्त है। अंदर तक धुनाई कर देता है। आज तो मजा आ गया, पहले वनीला अब चाकलेट आइसक्रीम…”
रूपेश- “और अग्रवाल साहब क्या हैं?”
मिसेज़ अग्रवाल- “इटैलियन बार क्रंची और मजेदार…”
रूपेश- “और कितने स्वाद चखे हैं?”
मिसेज़ अग्रवाल- “बहुत पहले चखा था देसी बरफ, पत्थर की तरह। बड़ी तकलीफ हुई थी…”
रूपेश- “कम आन भौजी, इतनी चटोरी चीज़ और स्वाद न ले…”
>मिसेज़ अग्रवाल के चेहरे पर झेंप फैल गई- “जाओ भी तुम बहुत तेज हो। चख लेतीं हूँ दूसरा स्वाद कभी-कभी। लेकिन दो स्वाद एक साथ कभी नहीं चखे। पर खाती मज़े से हूँ और खूब खाती हूँ…”
रूपेश- “हाँ… मैं तो चीज़ देख के ही जान गया हूँ बेमिशाल। मैंने तो ऐसी कभी नहीं चखी…”
मिसेज़ अग्रवाल- “ऐसे कितनी चखी हैं?”
रूपेश “चख लेता हूँ कभी-कभी…”
मिसेज़ अग्रवाल- “बहुत शातिर हो…” और उसको कस के चूम लेती हैं फिर कहतीं हैं- “लेकिन ये चाकलेट क्यों पिघल रही है?”
रूपेश- “ना भौजी, इसमें बड़ा दमखम है…” उसने उकड़ू बैठ के दूर तक लण्ड बाहर करके गप्प से घुसेड़ दिया। हर वार पर उसका पेड़ू धप्प से खुली चूत पर पड़ने लगा। उसने दोनों हथेलियों में दोनों उभारों को भर लिया और बुरी तरह गूंधने लगा।
मिसेज़ अग्रवाल की उत्तेजना आने में देर नहीं लगी। उन्होंने सिसकना शुरू कर दिया।
रूपेश का लण्ड और तेजी से चूत में होने लगा।
मिसेज़ अग्रवाल हिस्टिरिक हो चुकी थीं। उन्होंने जोरों से रूपेश के सीने में सिर छुपा लिया। अपने दांत रूपेश के उभरे चूचुक पर गड़ा दिये। वह जोर-जोर से आवाज निकाल रही थीं- “हाँ हाँ लगाओ… और मारो… फाड़ डालो मेरी बुर को… देखें कितना जोर है लौड़े में…”
रूपेश भी जावाब दे रहा था- “ले और ले आज तक तुमने इटालियान बरफ ही खाई है आज जंबो चाकलेट का मजा चख…”
दोनों का बहसीपन बढ़ता ही गया। रूपेश लगाता गया मिसेज़ अग्रवाल लेती गई। रूपेश ने अंगूठा ले जाके जैसे ही क्लिटोरिस पर रखा, मिसेज़ अग्रवाल झड़ गईं। वो चिल्लाईं- “ये लाला, ये क्या किया? ऊऊऊऊ… मैं तो… हे राम मैं क्या करूं?” और उनकी चूत हवा में उठ गई।
रूपेश ने उनकी कमर पकड़ के बड़ी तेजी से लण्ड चूत में आगे पीछे किया। फिर वह भी चिल्लाया- “लो भौजी, मैं भी ख़लास्स हुआ…”
मिसेज़ अग्रवाल ने हाथ से पकड़ के उसका लण्ड बाहर खींच दिया। वह उनकी चूत के ऊपर बड़ी देर तक रस उगलता रहा।
राकेश बाथरूम के दरवाजे से यह नजारा देख रहा था उत्तेजित भी थोड़ा हो रहा था।
मिसेज़ अग्रवाल निढाल पड़ी थीं। बोली- “तुम लोग तो गजब के चोदू हो। लगता है सुनीता और रजनी भी बड़ी चुदैल हैं…” फिर अपनी चूत पर हाथ रखते हुये वह बोलीं- “ओ माँ ये तो भुस बन गई है हाथ लगाने से दुखती है। मैं तो अब पूरी तरह संतुष्ट हो गई हूँ। कुछ दिन इसको छेड़ूंगी भी नहीं। तुम लोग फ्रेस हो लो। चलो मैं तुम लोगों के लिये गरमा-गरम काफी बनाती हूँ। फिर तुम्हारी कहानी सुनेंगे…”
संगीता अग्रवाल की कहानी
राकेश और रूपेश को चिपकते हुये मिसेज़ अग्रवाल बोलीं:
मैं अपनी कहानी सुनाती हूँ। यह मेरी पहली खराबी की कहानी तो नहीं है लेकिन मेरी प्यार की पहली चुदाई की कहानी है जिससे शरीर और मन को बड़ी संतुष्टि मिली थी। बात उन दिनों की है जब हम लोगों को पैसे की काफी तंगी थी। इन्होंने अपना नया काम शुरू किया था। अमित बेटा करीब 6 साल का था। हम लोग दिल्ली में तीसरे मंजिल की एक बरसाती में रहते थे। कुल एक कमरा था और बस खुली हुई छत जिस पर किचेन और बाथ। सास-सासुर साथ में रहते थे। चुदाई का मौका ही नहीं मिल पाता था। कभी कभार ही चुदाई हो पाती थी वह भी जल्दी-जल्दी।
शरीर में सेक्स की भूख सी भरी रहती थी जिसको अग्रवाल साहब और उभार देते थे। वह सेक्स में माहिर थे और चुदाई में मज़ा करने की उन्होंने आदत डाल दी थी।
मकान मालिक एक बूढ़े दंपति थे जो नीचे की मंजिल पर रहते थे। दूसरी मंजिल काफी हवादार थी। तीन कमरे थे, छत थी। इस मंजिल में एक कम्पनी का बड़ा आफिसर रहता था। जवान मियां बीवी थे, बीवी दूसरे शहर में काम करती थी। छुट्टी में वह आ जाती थी या फिर मियां वहां चला जाता था। वह भी अग्रवाल ही थे, नाम थे शेखर और माया। शेखर सुदर्शन था, कद-काठी से अच्छा, देखने में खूबसूरत, लंबा। माया भी ठीक थी लेकिन ऐसी कोई खास बात नहीं। दोनों ही खुशमिजाज थे।
मकान मालिक और शेखर माया से हम लोगों की अच्छी मेल मुलाकात होती रहती थी। साथ-साथ ताश खेलते थे। एक दूसरे से खुलकर मजाक करते रहते थे।
शेखर मुझे संगीता भाभी और मेरे पति को भाई साहब कहकर बुलाता था। मेरे सास-ससुर का आदर करता था, उन्हें आये दिन घुमाने ले जाता था क्योंकी मेरे पति का काम नया होने से काफी व्यस्त रहते थे। अमित के लिये भी चाकलेट और गिफ्ट लाता था। अमित उससे काफी घुलमिल गया था। मेरे सास-ससुर उसको बड़ा पसंद करते थे। जब भी घर में कोई खास चीज़ बनती थी तो उसको भिजवाते थे। मैं देने जाती थी तो वह काफी हिचक दिखाता था। मैं खाना अच्छा बनाती थी और उसको मेरा खाना बेहद पसंद था।
लेकिन एक बात मैं देखती थी। जब मैं छत पर कपड़े डालने या किसी और काम के लिये होती थी तो शेखर मुझे घूरता रहता था। उसके कमरे की खिड़की से छत एकदम सामने पड़ती थी। उसकी आँखों में वासना साफ नजर आती थी। वह भी भूखा ही रहता था।
मैं जानबूझ कर लापरवाह रहने लगी जैसे मुझे मालूम ही न हो। अपना पल्लू गिरा देती और रस्सी पर कपड़े डालने के लिये पंजों के बल खड़ी होकर दोनों हाथ ऊपर तान देती जिससे मेरी चूचियां उसके सामने एकदम खड़ी हो जातीं। कभी मैं अकेले पेटीकोट में आ जाती और उसकी तरफ चूतड़ करके पैर फैलाकर झुक जाती जिससे मेरी दोनों गोलाइयां और बीच की दरार उसके सामने आ जाये।
इस तरह से खिझाने में तो मुझे हमेशा से मजा आता है। जितनी ही उसकी वासना भड़काती उतना ही ज्यादा मजा आता था। मेरी तबीयत खुश रहती थी। जब कभी इनसे चुदाई कराती थी तो उसमें भी ज्यादा मजा आता था। कई बार तबीयत होती कि नंगी ही छत पर आ जाऊँ या कम से कम ब्रा और पैंटी में चली जाऊँ लेकिन इतनी हिम्मत नहीं पड़ती थी। जब भी मिलते थे तो अब ज्यादा मजाक करने लगे थे। मजाक में सेक्स का पुट भी आने लगा था।
अग्रवाल साहब को भी यह सब कुछ बुरा नहीं लगता था। वह शेखर को पसंद करते थे। मैं भी ज्यादा खुल गई थी। जब तब सेक्स का तीर छोड़ देती थी। जैसे एक शाम मकान मालिक के यहां सब लोग ताश खेल रहे थे। पड़ोस के और भी मियां-बीवी आ जाते थे।
बाजी हारने पर मेरे मुँह से निकल गया- “मैं लूज हो गई…”
शेखर शरारत से बोला- “अरे भाई साहब ने इतनी जल्दी लूज कर दिया…”
मैं भी कहां चूकने वाली थी- “तुम्हारे बस का तो है नहीं किसी को लूज करना…”
और सब हँस दिये जिनमें मेरे पति भी शामिल थे।
खेल में मैं और शेखर पार्टनर रहते थे। खूब घुलमिल गये थे, खुलकर हँसी मजाक करते थे। लेकिन मैं शरारत से बाज नहीं आती थी। जितना मैं शेखर को निसहाय पाती उतना ही मैं बोल्ड होती जा रही थी। खेल में उसके सामने बैठती। जब मौका पाती सबकी निगाह बाचाके अनजानी बनकर पल भर के लिये अपनी टांगें इस तरह खोल देती कि उसे मेरी कच्छी तक दिख जाये। कभी-कभी तो मैं कच्छी भी न डालती और फट्ट से टांगें चौड़ा देती कि उसे अंदर का नजारा दिख जाये, लेकिन सेंटर पीस न दिखे।
उसके चेहरे पर तनाव उभर आता, आँखें जलने लगती और वह ताव खाकर रह जाता। अजीब बात थी कि पति बगल में बैठा होता था और मैं चूत किसी और को दिखाती थी। लेकिन देर सबेर जब पति से चुदवाने को मिलता था तो ज्यादा आनंद आता था।
इन दिनों शेखर के लिये मुझे तरह-तरह का खाना बनाना बहुत अच्छा लगता था। कभी-कभी जो कम चीज़ हो तो खुद न खाती थी उसको दे देती थी। मैं खाना लेकर कम जाती थी क्योंकी जब मैं उसके सामने अकेली होती थि तो इतनी उत्तेजित हो उठती थी कि मेरी चूत गीली हो जाती थी। ज्यादातर मैं अमित से खाना भिजवा देती थी। चूत की जब प्यास मिटी होती थी तब ही जाती थी और जल्दी से वापिस आ जाती थी। उसका ख्याल रखने में मुझे कुछ-कुछ सेक्स का शुख मिलता था।
ताश के समय बड़ा ही हलका-फुलका माहौल रहता था। किसका बर्थ-डे है, किसकी हालगिरह है सब बातें होती रहती थीं, साथ में वधाइयां भी और पार्टी का इसरार भी। ऐसे ही एक बार मेरी बर्थ-डे पर सबने खूब वधाइयां दी, शेखर ने जिद की कि मैं तो पार्टी लेकर ही रहूँगा।
शेखर की बात रखने के लिये दूसरे दिन मैंने खीर पकवान बनाये। सबसे पहले उसके लिये ही लेकर गई। शेखर के सामने खाना रखते हुये मैं बोली- “लो बर्थ-डे की पार्टी…”
वह बोला- “भाभी तुम्हारे जैसा नहीं देखा… फाइव स्टार रोस्टोरेंट में पार्टी होना चाहिये…”
जैसे उसने मेरी दुखती नश पर हाथ रख दिया हो, मेरी आँखों में आंसु आ गये- “लाला तुम जानते हो कि तुम्हारी भाभी गरीब है इसलिये मजाक उड़ाते हो…”
शेखर ने अपने दोनों कान पकड़ लिये- “भाभी, ये क्या कहती हो? इतनी खूबसूरती की मालकिन इतने गु्णों वाली कैसे गरीब हो सकती है? तुम्हारे देवर में जब शामर्थ है तो तुम कैसे गरीब हो? मुझे अपना देवर मानती हो तो आगे से अपने को गरीब मत समझना…”
आगे बढ़ कर भावना में मैंने उसे अपने से चिपका लिया। वह कुर्सी पर बैठा था। उसका सिर मेरी दोनों टांगों के बीच में फँस गया… ठीक मेरी बुर के ऊपर। मुझे ध्यान आया तो मैं वहां से भाग आई।
इसके बाद हम लोगों का रवैया बदल गया। शेखर अमित के लिये ढेर सारी चीजें लाता। अमित उसके वहुत नजदीक हो गया। उसके घर में ही एक कमरे में पढ़ने का ठिकाना बना लिया। एक चाभी उसने हमें दे दी थी। मेरे लिये भी शेखर तरह-तरह की गिफ्टे लाता। मैं भी उसका ख्याल रखने लगी थी। घर साफ कर देती, चीजें जमा देती, बिस्तर बदल देती जिसकी तरफ से वह लापरवाह था और माया ही आने पर कुछ-कुछ कर पाती थी। अब मुझमें सकुचाहट आ गई थी और उसमें खुलापन।
एक बार उसने एक पैकेट मुझे दिया और कहा- “भाभी तुम्हारे लिये…”
अपने बाथरूम में जाकर खोला क्योंकी वही एक अकेली जगह होती थी। बड़ी मंहगी और खूबसूरत ब्रेजियर और पैंटी के 6-6 आइटम थे। मन तो बहुत खुश हुआ लेकिन नीचे आकर मैंने शेखर से कहा- “भाभी को ऐसी गिफ्ट दी जाती है कहीं…”
वह बोला- “भाभी आपके पास अच्छी ब्रा और पैंटी नहीं है इसलिये सोचा दे दूं…”
बाकई मेरे पास बहुत ही सस्ती ब्रेजियर थीं। इसका मतलब है उसने सूखने डाले अंदर के कपड़े अच्छी तरह देख लिये थे। तब तो उसने यह भी देख लिया होगा कि मेरी पैंटियों का चूत के सामने वाला भाग कैसा काला हो गया है। सोचकर बड़ी शरम सी आई।
उसने पूछा- “आपको अच्छा नहीं लगा?”
मेरे मुँह से निकल गया- “बहुत अच्छी गिफ्ट है…”
वह शरारत से बोला- “क्या पता? अगर पहन कर दिखाओ तब पता लगे…”
मैंने आँखें ततेर कर कहा- “क्या?”
वह पीछे हट गया- “सारी भाभी…”
लेकिन मेरे बदन में सिहरन दौड़ गई चूत में फुरफुरी हो आई फिर भी बोल गई- “वो मैं अग्रवाल साहब के अलावा किसी को नहीं दिखाने वाली…”
एक दिन सोचा कि उसके गद्दे को झाड़ दूं। गद्दे को उठाया तो कई मैगजीन रखी थीं। कवर पर ही औरत की नंगी फोटो। एक को उठा के देखा तो आँखें खुली की खुली रह गईं। दूसरे पेज पर ही एक पूरी नंगी औरत दोनों ऊँगालियों से चूत खोले हुये लेटी थी और सामने एक नंगा आदमी खड़ा था जिसका बड़ा सा लण्ड तनकर खड़ा था। आगे वाले पेज में तो इससे भी बढ़कर था। औरत आदमी का आधा लण्ड लील चुकी थी। पूरी मैगजीन में एक से बढ़ कर एक दृश्य थे। ओ मां साथ में जो कहानियां थीं चुदाई का पूरा सचित्र वर्णन। सोचा मैगजीन को वहीं रख दूं। लेकिन छोड़ी ही नहीं गई। मैं वहीं शेखर के बेड पर लेट गई। पढ़ते-पढ़ते न जाने कब अपनी चूत सहलाने लगी। मैगजीन पूरी भी न कर पाई। जब एक कहानी का नायक बुरी तरह से नायिका को पेल रहा था और वह चिल्ला रही थी।
तो मैं अपनी चूत को बुरी तरह से रगड़ रही थी। शरीर ऐंठ गया था। चूचियां तन गई थीं। मैं अपनी बुर में लण्ड चाहती थी। उसी वक्त लण्ड लेने को छटपटा रही थी। उस रात मेरी चुदाई न होती तो मैं शायद अपने को न रोक पाती और रात मैं ही शेखर के पास आ जाती।
जब अग्रवाल साहब ने अपना लण्ड घुसेड़ा तो मैंने उन्हें कस के भींच लिया और खलास हो गई। ऐसा बहुत कम होता था। मुझे झड़ने में बड़ा समय लगता था। कई बार तो बगैर झड़े रह जाती थी। उनको भी बड़ा ताज्जुब हुआ।
यह शेखर के बारे में नई बात जानी थी। मुझे भी उन नंगी फोटो और चुदाई की कहानियां पढ़ने की लत लग गई। बहुत सोचती नहीं पढ़ूँगी लेकिन जब भी बेड ठीक करने जाती तो उसी के बिस्तर पर लेकर बैठ जाती। उसके बाद चूत में जो आग लगती उसे बुझाने के लिये अग्रवाल साहब का लौड़ा लेने के लिये जतन करने पड़ते। तबीयत होती शेखर के पास जाकर प्यास बुझा आऊँ।
जब कभी नई मैगजीन न पा पाती तो बड़ी बेचैन रहती। सेाचा शेखर के अंडरवेर बनियान भी क्यों न धोकर डाल दूं पूरे हफ्ते के जमा हो जाते हैं। जब अंडरवेर साफ कर रही की तो देखा कइयों पर झड़ा हुआ वीर्य सूख गया है। उस पर साबुन लगाते समय कंपकंपी आ गई।
यह शेखर के बारे में नई बात जानी थी। मुझे भी उन नंगी फोटो और चुदाई की कहानियां पढ़ने की लत लग गई। बहुत सोचती नहीं पढ़ूँगी लेकिन जब भी बेड ठीक करने जाती तो उसी के बिस्तर पर लेकर बैठ जाती। उसके बाद चूत में जो आग लगती उसे बुझाने के लिये अग्रवाल साहब का लौड़ा लेने के लिये जतन करने पड़ते। तबीयत होती शेखर के पास जाकर प्यास बुझा आऊँ।
जब कभी नई मैगजीन न पा पाती तो बड़ी बेचैन रहती। सेाचा शेखर के अंडरवेर बनियान भी क्यों न धोकर डाल दूं पूरे हफ्ते के जमा हो जाते हैं। जब अंडरवेर साफ कर रही की तो देखा कइयों पर झड़ा हुआ वीर्य सूख गया है। उस पर साबुन लगाते समय कंपकंपी आ गई।
शाम को जब उसने देखा कि मैंने अंडरवेर बनियान भी धोये हैं तो उसे बहुत खेद हुआ। उसने बड़ा जोर लगाया कि मैं ऐसा हर्गिज न करूं, लेकिन मैं भी जिद पर अड़ गई कि इसमें कोई बुराई नहीं। जब भी मैं अंडरवेर साफ करती किसी न किसी पर झड़ने के दाग होते। बेचारा वाकई औरत के लिये भूखा था। मैं उससे बाहर-बाहर के मजाक के लिये तो तैयार थी लेकिन चुदवाना केवल अग्रवाल साहब से चाहती थी। मैं उसके लिये कुछ नहीं कर सकती थी।
संबंध दोनों परिवारों में गहरे हो गये थे। माया और मेरे परिवार के सब लोग एक दूसरे को पसंद करते थे। लेकिन मैं शेखर की तरफ रोमांटिक तौर पर महसूस करती थी और शायद वह भी। एक बार उसके दफ्तर में पार्टी थी। उसने अग्रवाल साहब के सामने ही मुझसे पूछा- क्या मैं उसके साथ पार्टी में चल सकती हूँ?
अग्रवाल साहब ने ही कहा- इसमें पूछने की क्या बात है?
शेखर के साथ पहली बार अकेली जा रही थी पार्टी के लिये के लिये तो मैं अच्छी तरह से सजी-संवरी। नीचे आई तो शेखर टकटकी बाँधकर देखता ही रह गया। उसने मेरा हाथ थाम लिया। दबाते हुये धीरे से बोला- “भाभी तुम बाकई बहुत खूबसूरत हो…”
सुनकर बड़ा प्यारा लगा। मैं उससे और सट गई।
आलीशान पार्टी थी एकदम भव्य। मेरा हाथ पकड़कर खींचता प्रेसिडेंट, वाइस-प्रेसिडेंट के पास ले गया। बड़े अधिकार से बोला- “ये संगीता है…”
मैं मुँह देखती रह गई। कहां तो भाभी-भाभी कहते जबान नहीं थकती थी अब सीधा संगीता पर उतर आया लेकिन भाया बहुत। अपने साथियों से बड़ी बेतकल्लुफी से उसी तरह मिलवाया- “संगीता से मिलो…”
जल्दी ही समझ में आ गया कि पार्टी में पति-पत्नियों को बुलाया गया था और शेखर मुझे अपनी पत्नी की तरह मिलवा रहा है हालांकि मुँह से नहीं कह रहा है। अकेला होने पर मैंने उससे कहा- “मुझसे क्यों झूठ कर रहे हो?”
वह बोला- “मैं सबको दिखाना चाहता हूँ कि मेरी बीवी भी किसी से कम खूबसूरत नहीं है…”
मैं- “लेकिन मैं तो शायद उम्र में भी तुमसे बड़ी हूँ, एक बच्चे की मां हूँ…”
शेखर- “तुम्हें देखकर कौन कह सकता है। देखो वह औरतें तुमसे ज्यादा बड़ी दिख रही हैं। तुम बिल्कुल कमसिन हो…”
मेरे बदन में रोमांचा हो आया। तबीयत हुई कि उसको जकड़ के चूम लूं। बस हाथ पकड़कर उससे सथ गई। शेखर की पोजीशन अच्छी थी। उसके जूनियर की बीवियां मेरे आगे पीछे घूम रही थीं। मैं बड़ा गौरव महसूस कर रही थी।
पार्टी तो मेरी जान है। मुझे माहौल मिल गया था और मैं बहुत ईजी महसूस कर रही थी। डांस चालू हुआ तो उसमें खूब भाग लिया। लोग तारीफ कर रहे थे। पार्टनर के संग डांस में शेखर से एकदम चिपक गई, दूसरी बीवियों से भी ज्यादा। मेरी छातियां उसके सीने में घुसी जा रही थीं। मैंने अपनी दोनों रानें उसकी जाघों से चिपका दीं। टांगों के बीच के गड्ढे को उसकी टांगों के ऊपर के उभार से सटा दिया और डांस की थिरकन के साथ रगड़ने लगी।
शेखर के लण्ड मियां रंग लाने लगे थे और मेरी बुर के दरवाजे पर दस्तक देने लगे थे। लेकिन समय की नजाकत को देखते हुये सब्र करके मैंने अपने बीच थोड़ा फासला कर लिया। पार्टी खतम होने तक मेरी हिचकिचाहट जाती रही थी। घर लाने की जगह वह कहीं और ले जाकर पति का अपना असली हक वसूला करना चाहता तो मैं तैयार थी। लेकिन उसने जरूरत से ज्यादा सराफत दिखाई और मैं रात भर तड़पती रही। पर पार्टी से मैं खुश थी, मेरा सजना-सवंरना सार्थक हो गया था।
दूसरे दिन मैंने निश्चित कर लिया कि मैं शेखर से लगवाऊँगी, आखिर वह अपना है। दूसरे दिन खाना लेकर गई तो मेरा स्वागत करता हुआ वह बोला- “आइये भाभी…”
मैंने व्यंग से कहा- “अब भाभी कहते हो, कल तो संगीता-संगीता रटे जा रहे थे…”
शेखर- “वह तो ड्रामा था…”
मैंने चिढ़कर कहा- “हाँ तुम बड़े ड्रामेबाज हो… ढोंगी पति बनते हो पर रोल भी पूरा नहीं करते…”
शेखर- “हाँ तुम्हारे जैसी एक्टिंगा जो नहीं कर सकता…”
मैं बार बार उसे हिंट दे रही की और वह आगे ही नहीं बढ़ रहा था।
कभी पूरे जोबन सामने कर देती- “आज मैंने तुम्हारी चीज़ पहनी है…” कभी- “ओहो आज तो बेहद गरमी है, मैंने तो नीचे भी कुछ नहीं डाला है…” यहां तक की अपनी पहनी हुई पैंटी भी उसके बिस्तर पर छोड़ आई जिस पर रिसती चूत का पानी लगा था।
लेकिन शेखर ने तो जैसे कशम ले ली थी। जितना वह अंजान बन रहा था उतना ही मैं बेकाबू होती जा रही थी। मैंने सीधा वार करने का सोच लिया।
एक शाम जब वह आफिस से आया तो मैं उसी के बिस्तर पर अधलेटी होकर नंगी मैगजीन पढ़ रही थी। केवल ब्लाउज़ पहन रखा था जिसके नीचे ब्रेजियर नहीं थी और पेटीकोट डाला था जिसके नीचे पैंटी नहीं थी। टांगें मोड़ रखी थीं, जिससे अंदर का काफी कुछ दिखता था। दरवाजा खोलकर शेखर अंदर आया। कुछ देर तक मैं वैसे ही लेटी रही। फिर उठकर खड़ी हो गई। गुस्से से एक फोटो दिखाते हुये बोली- “छीः कैसी गंदी किताबें पढ़ते हो…”
थोड़ी देर के लिये वह सहम गया, धीरे से बोला- “भाभी, मेरी अपनी भी तो जरूरत है…”
मैंने पोज बनाते हुये कहा- “तुम्हारी भाभी क्या इनसे कम है?”
उसकी बोली मैं तलखी आ गई- “भाभी तुम हमेशा खिझाती हो। पहले फ्लर्ट करती हो, फिर पीछे हट जाती हो। पार्टी में भी तुमने यही किया। तुम्हारी वजह से ही मैं भड़का रहता हूँ। ऊपर से कहती हो कि भाई साहब के अलावा आप किसी को भी नहीं दिखा सकतीं…”
मैंने चकित होकर कहा- “जब तुम कह सकते हो कि जब तक देवर है मैं किसी चीज़ की कमी महसूस न करूं तो मैं क्यों नहीं कह सकती कि भाभी भी तुम्हारी हर जरूरत के लिये है…”
शेखर का चेहरा चमक उठा- “तो भाभी फोटो में जो है दिखाओ…”
“मेरी बला से…” और मैं बाथरूम की तरफ भागी।
वह बोला- “अब मैं नहीं छोड़ूंगा…” और दौड़कर बाथरूम में पहुँचने के पहले ही उसने मुझे दबोचा लिया। शेखर ने मुझे पीछे से पकड़ लिया था। उसने दोनों हथेलियों में मेरे दोनों उभार कस के दवा लिये थे और कसके चिपक गया था।
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मैं उसका लण्ड चूतड़ों की दरार पर महसूस कर रही थी। मैंने मुँह पीछे करके उसको चूम लिया। उसने घुमाकर मुझको सामने कर लिया। अपने होंठ मेरे होंठों पर जोर से गड़ा कर चूसने लगा और इतने जोर से जकड़ा कि मेरी पसलियां चरमरा उठीं। फिर एक हाथ सामने लाकर मेरा ब्लाउज़ खोलने लगा।
मैंने कहा- “इसको मत उतारो…”
लेकिन उसने बटन खोलकर उसे अलग कर दिया। अब उसने हाथ पेटीकोट के नाफै पर बढ़ाया।
मैंने मिन्नत की- “प्लीज़्ज़ इसको रहने दो…”
वह बोला- “तुमने मुझे इतना सताया कि अब कोई दया नहीं…” और नाड़ा खींचकर उसने मेरा पेटीकोट नीचे गिरा दिया।
अब मैं बिल्कुल नंगी की। शर्म से एक हाथ से अपने दोनों सीनों को ढक लिया और एक हाथ जहां टांगें मिलती है उसके ऊपर रख लिया। उसने सख्ती से मेरे दोनों हाथ अलग कर दिये। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। जब कुछ देर तक कुछ न हुआ तो मैंने अपनी आँखें खोलीं। वह एकटक मेरे को निहारे जा रहा था।
मैंने कहा- “क्या बात है पहले माया को नहीं देखा क्या?”
लेकिन शेखर तो भरपूर गोलाइयों में डूबा था। दोनों उभार छोटे सख्त खरबूज से जो आगे से मोड़ लेकर ऊपर हो गये थे, जिनके ऊपर चूचुक गहरे बादामी सहतूत से उठे हुये थे। नीचे तराशी जांघें केले के तने सी, उसके बीच में चूत का जबर्दस्त उभार डबलरोटी सा, बाल अच्छी तरह तराशे गये थे एकदम सेव नहीं किये गये थे। बीच से झांकती दो रसभरी नारंगी की फांकें। उसके सामने पूरी औरत खड़ी थी। बाहर से छरहरी अंदर से भरपूर। दमकते शरीर पर पूर्ण गोलाइयां अर्ध-गोल उठे हुये भरे-भरे मांसल नितम्ब जो गद्दे की तरह आदमी का बोझ संभाल सकते थे और सफाचट तने पेट के नीचे जांघों के बीच फूली-फूली खुलने को आतुर जगह।
शेखर सम्मोहित सा मुंह बाये देख रहा था।
संगीता ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखकर झझोड़ा तो उसे सुध हुई। मुँह से निकल गया- “अद्भुत… भाभी तुम बाहर से जितनी खूबसूरत हो अंदर से उससे भी ज्यादा खूबसूरत हो…” और फिर चुंबक सा चिपक गया और चिकनी मांशल कमर में हाथ डालकर ले जाकर बेड पर बिठा दिया। वो अभी भी पूरे कपड़े सूर्तटाई पहने हुये था।
चूमने को झुका तो संगीता ने टाई से पकड़कर खींचते हुये कहा- “मेरे को तो निर्लज्ज कर दिया और खुद बाबूजी बने हुये हैं…” संगीता तो उतारने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
शेखर ने खुद सब कपड़े निकालकर एक तरफ फर्श पर फेंक दिये। अब वह संगीता के सामने एकदम नंगा था। संगीता ने उसकी ओर देखा। अच्छी सुदर्शन देह थी। अग्रवाल साहब की तो थोड़ी सी तोंद थी लेकिन शेखर का पेट सफाचट था। अग्रवाल का लण्ड अच्छा खासा था लेकिन शेखर का भी उनसे कम नहीं था, मोटाई में ज्यादा ही होगा। झांट के बाल जरूर बेतरतीब हो रहे थे, जैसे वहां ध्यान न दिया गया हो। शेखर ने बढ़ करके उसे बांहों में ले लिया और धकेलता हुआ उसको बेड पर अपने नीचे गिरा लिया। पहले मुँह पर सब जगह चूमा फिर संगीता के रसीले होंठ अपने होंठों में दबोच लिये।
संगीता ने अपनी बांहों में उसका सिर जकड़ लिया और टांगें थोड़ी चौड़ी कर दीं जिससे शेखर के नीचे के भाग को जगह मिल जाये। शेखर का लण्ड उसको गड़ रहा था।
शेखर नीचे को खिसक गया। संगीता की छोटी-छोटी उभरी चूचियां शेखर को बहुत अच्छी लग रही थीं। वह उनको पूरी मुट्ठी में सहलाने लगा फिर उनको भींचने लगा। संगीता के शरीर में बिजली सी दौड़ गई जो उसकी चूत तक चली गई। वह सिसकने लगी। उसके चूचुक एकदम सख्त हो गये थे। जब शेखर न घुंडियों को ऊँगलियों में मसला।
तो संगीता सीत्कार कर उठी- “उइइईई…” उसकी चूत से पानी निकलने लग गया था।
शेखर ने मुँह नीचे करके एक चूचुक को मुँह में लेकर चूसने लगा और दूसरे को ऊँगलियों से मसल रहा था। यह संगीता के लिये ज्यादा था। वह तो पूरी तरह गर्मा चुकी थी। उसने नीचे हाथ डालके उसका लण्ड पकड़ लिया और खींचकर अपनी चूत पर लगाने लगी।
लेकिन शेखर इतनी जल्दी उसको देना नहीं चाहता था, पहले उसकी चूत से खेलना चाहता था। वह अपने को पीछे कर लेता था। वह सिगीता को खिझा रहा था।
जब वह खींचकर अंदर डालने में कामयाब नहीं हुई तो संगीता ने पलटी खाई। शेखर नीचे आ गया और वह उसके ऊपर। उसने एक हाथ से उसका लण्ड पकड़करके अपनी चूत के छेद पर लगाया और धप्प से उसके ऊपर बैठ गई और पूरा का पूरा लण्ड लील लिया। जैसे चैन मिल गया हो सांस बाहर निकाली- “हुऊऊऊऊऊ…” फिर चूत को ऊपर किया फिर धप्प से पूरा लण्ड अंदर- “हिईईईईईईई…”
शेखर आनंद ले रहा था। उसने दोनों हथेलियां बाँध के सिर के नीचे रखकर सिर ऊपर कर लिया था और पैर सीधे तान लिये थे, जिससे लण्ड और उठ गया था।
संगीता शेखर की जांघें पर बैठी थी। दायें हाथ का कप जैसा बनाकर उसने बेड का सहारा लिया था और बायें हाथ से चूत के ऊपर का हिस्सा दबा रखा था। वह कमान जैसी तन गई थी और ऊपर नीचे हो रही थी। छातियां ऊपर नीचे हो रही थीं। चूत लण्ड के बाहर कर लेती थी फिर एक झटके में पूरा अंदर कर लेती थी। अब उसकी गति काफी बढ़ गई थी। वह चूत पर लण्ड से चोटें लेने लगी थी। साथ ही तेज आवाजें निकालने लगी थी- “हिंहिमांहिं आंहिं आंहूँ आांहु हूँ आंहूँआंहूँहूँ…”
चूत लण्ड के बहुत ऊपर तक उठा लेती और सीधी लण्ड के ऊपर गिरती। लण्ड चूत में धक्क से चोट करता। बड़ी तेजी से सांस होठों से- “हुहुहु ऊऊहुहुहुऊऊऊहु रोरोऐै…” फिर एक बार जो चूत धप्प से गिरी तो कस के चिपक गई। उसने अपना सिर शेखर के सीने में गड़ा लिया। बांहों से उसे जकड़ लिया- “उईईई माँ मरीईईईई… मैं क्याआ करूंरू मैं मैं मैं…” वह बड़ी देर तक झड़ती रही।
उसने अपना सिर शेखर के सीने में गड़ाया तो फिर उठाया ही नहीं। शेखर उसको चूमना चाहता था।
लेकिन नहीं में सिर हिलाते हुये संगीता बोली- “पता नहीं आप मेरे बारे में क्या सोचते होंगे?”
शेखर बड़े प्यार से उसके बालों में उंगलियां फेरता हुआ बोला- “ऐसा कुछ नहीं। सोचता हूँ बहुत भूखी थी…” फिर उसने दोनों हथेलियों में सिर उठाते हुये पूछा- “है न?”
संगीता ने हाँमी में सिर हिला दिया।
शेखर ने शरारत से कहा- “लेकिन तुम्हारी एपेटाइत बहुत अच्छी है…”
संगीता का चेहरा लाल हो गया।
शेखर फिर बोला- “लेकिन यह तो अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है…”
वह फिर से शेखर से चिपक गई। शेखर ने उसे बांहों में बाँध लिया। उसके होंठ संगीता के होंठों पर चिपक गये। शेखर का लण्ड उसकी चूत में ही था। वह उसे बहुत धीरे-धीरे अंदर बाहर कर रहा था। वह वैसे ही पड़ी रही। थोड़ी देर में उसकी गाण्ड हिलने लगौ। शेखर थोड़ी जल्दी-जल्दी लण्ड आगे पीछे करने लगा, साथ ही उसके होंठों को जोर से चूसने लगा।
संगीता को मजा आने लगा था और उसकी चूत ने भी साथ देना चालू कर दिया। जब शेखर अंदर करता तो वह अपनी चूत लण्ड पर दबा देती और जब बाहर करता तो उसको आगे बढ़ा देती। शेखर बाकायदा लय से चोदने लगा। संगीता भी अब गर्मा चुकी थी। वह उसी लय से जवाब दे रही थी।
अब शेखर ने संगीता को बांहों में लिये हुये ही पलटा खाया। संगीता चित्त नीचे आ गई और वह उसके ऊपर था। लण्ड अभी भी अंदर था। शेखर खिसक कर उकड़ू बैठ गया। हथेलियों में उफनते हुये जोबनों को भर कर दबाते हुये लण्ड को गहराइयों तक पेलने लगा।
संगीता सी सी कर उठी। उसने दोनों हाथों से शेखर की कमर को जकड़ लिया। वह बेकाबू थी। चूत पानी-पानी हो रही थी। जब लण्ड चूत की दीवारों को चीरता गहराई में घुसता तो वह भी चूत को अपनी तरफ से धकेलती। संगीता जोरों से सांसें निकाले जा रही थी- “ऊ हुहुहु… हुहुहु… ओह्ह ऊऊऊऊ… हुह… हुऊ… ऊऊऊ… रिरिरीईई…” साथ ही बुदबुदा रही थी- “लगा तो पूरे जोर से… कचूमर निकाल दो इसका… शेखर देखें तुम्हारा जोर… आज छोड़ना नहीं इसे…”
शेखर और जोर से शंटिंग करता था- “लो भाभी, ये लो तुम भी क्या याद रखोगी… लो भाभी ये लो पूरा अंदर तक…” और एक कस के धक्का और लण्ड की मुठ चूत पर बैठ गई।
संगीता बोल उठी- “भाभी नहीं, तुम्हारी संगीता उसी दिन जैसी…”
शेखर- “भाई साहब का वह हक मैं नहीं लूंगा। तुम तो मेरी प्यारी सी भाभी डार्लिंग हो, इतनी खूबसूरत। लेकिन भाभी तुमने चूत के दर्शन का तो मौका ही नहीं दिया…”
उसने लण्ड बाहर खींच लिया। संगीता ने टांगें जितनी खोल सकती थी खोल दी थीं। लण्ड ने चूत का छेद फैला दिया था। चूत का भाग फूला हुआ बड़ा मस्त लग रहा था। चूत के होंठ रसीली फांकों से मुँह फैलाये थे। चूत की तितली ने उत्तेजना में पंख फैला दिये थे। गहराई तक छेद खुला हुआ था, एकदम गुलाबी पर्त-दर-पर्त भरपूर स्पंज की तरह नरम, भरा हुआ। छेद से रस टपक रहा था, गहराई तक पानी चमक रहा था। शेखर तो पागल हो गया- “हुऊऊ माई गोड… भाभीई मैंने तो ऐसी चूत नहीं देखी… इसको तो चूसूंगा। देखें तुम्हारी झड़ी हुई चूत का क्या स्वाद है?”
संगीता जल्दी से बोल पड़ी- “शेखर, नहीं चूसना नहीं…” और उसने चूत पर अपना हाथ रख लिया।
शेखर ने जोर लगाकर उसका हाथ एक तरफ कर दिया और अपना मुँह खुली चूत पर रख दिया। संगीता हाथ पैर झटक कर अलग होने की कोशिश करने लगी। लेकिन शेखर ने उसकी जांघें को कस के जकड़ रखा था और मुँह चूत पर कसके जमा रखा था। उसके दोनों पैर अपने कंधों पर ले रखे थे। संगीता अपनी दोनों टांगें पटक-पटक कर उसकी पीठ पर मारने लगी- “नई नई चूसो मत न… हटो मुँह हटाओ…”
लेकिन शेखर ने उसकी क्लिटोरिस को होठों में दबाकर चूसना शुरू कर दिया।
संगीता के ऊपर एकाएक असर पड़ा। वह एकदम आनंद में भर गई। उसने टांगें पटकना बंद कर दीं। चिल्ला उठी- “ओ माई ईईई ऊऊऊ हुहुहु ये क्या करते हो ओओओह्ह…”
शेखर ने मुँह अंदर बैठा लिया था। चूत की दोनों फांकें उसके गाल से सटी थीं। वह चटखारे लेकर संतरे की तरह चूस रहा था। चूत का रस उसके होठों, गाल, नाक पर फैल गया था। संगीता की चूत का अरोमा उसे पागल बना रहा था। संगीता ने टांगें उसके कंधे पर कसके बाँध ली थीं। दोनों हाथों से उसके सिर को जकड़ कर चूत की तरफ दबा रही थी। साथ ही तन करके चूत भी धकेल रही थी। जोरों-जोरों से आवाज निकाल रही थी। बीच-बीच में शेखर उसकी किरकिरी पर दांत लगा देता तो वह जोरों से चीख उठती। हथेलियों से वह उसकी दोनों चूचियां मसला रहा था उससे भी वह चीख उठती थी। इतनी उत्तेजना में थी कि सिर को इधर उधर पटक रही थी, छटपटा रही थी।
शेखर ने एक उंगली ले जाकर मुँह के नीचे की जगह से छेद में की तो उसने चूतड़ हवा में उठा दिये।
उसका सारा शरीर ऐंठ गया। चूत दिखने लगी। वो बोले जा रही थी, आवाज में कंपकंपी भरी थी- “ओ आआरे मैं मरीईईइ माँ आआंआं माऱ डाला तुमने ओओ मेरे शेखर मैं तो आआआ गईईई… कभीई भी तो नहीं चुसवाईई…” वह झड़ी तो झड़ती ही गई।
फिर शिथिल होकर हवा में उठा भाग नीचे आ गया। धीमे से उसने कहा- “ये क्या किया शेखर तुमने?”
शेखर के चेहरे पर संगीता का चूतरस लिपट गया था। चूत दो बार झड़ने के बाद भी मुँह बाये खिली हुई थी। गुलाबी नरमी अंदर से झांक रही थी। छेद से पानी रिस रहा था, संगमरमरी मस्त गोलाइयां गर्व से उठी हुई थीं। शेखर का लण्ड बहुत ही गरमाया हुआ था। उसने सुपाड़े का मुँह छेद पर लगाया और पूरा का पूरा पेल दिया। साथ ही संगीता के होंठों पर उसी की चूत के रस से सने होंठ जमा दिये।
लेकिन संगीता ने अपना मुँह घुमा लिया।
फिसलकर शेखर के होंठ उसके गाल पर आ गये जहां उनको रगड़कर वह रस उसके गाल पर मलता हुआ बोला- “भाभी अब चेहरे पर और रौनक आ जायेगी…”
उसका लौड़ा चूत को फाड़ने के लिये बेताब था। उसने तेजी से चुदाई चालू कर दी लेकिन संगीता की चूत ने उसी गरमी से जवाब नहीं दिया। शेखर ने सिर खिसका कर संगीता की दांईं चूची पर रख लिया। संगीता ने दांयें हाथ से सिर को जोरों से दबा लिया। शेखर ने होंठ खोलकर उसकी भरी और तनी घुंडियों को मुँह में ले लिया।
संगीता अचानक उछल गई- “उई री…”
शेखर अब दाईं चूची को चूसने लगा था और बांईं चूची के चूचुक को मसल रहा था।
संगीता के शरीर में गर्मी भर गई थी, उसकी चूत फड़कने लगी थी। उसने टांगें शेखर के कूल्हे पर बाँध ली थी। चूत को सिकोड़कर उसके लौड़े को अपनी पकड़ में ले लिया था।
शेखर का लण्ड संगीता की सुरंग में दीवालों को रगड़ता हुआ पूरा अंदर तक जाता और बाहर आता था। संगीता आनंद में भरपूर थी। जिसका इजहार वह आवाजें निकाल के कर रही थी। वह अपने नाखून शेखर की पीठ पर गड़ाने लगी थी। शेखर अपने घुटनों के बल उठ गया था और दोनों से कस के चूचियां पकड़ रखी थीं जिससे पूरे जोर से पेल सके।
लण्ड की चोट चूत पर पड़ती तो संगीता और जोश देती- “हाँ शेखर लगाओ न पूरो दम से…”
शेखर- “ले मेरा… पूरी बुर को चीर के रख देगा…”
संगीता- “हाँ हाँ लगाओ देखें कितना दम है…”
शेखर- “अच्छा तो अब लो…” चोट से संगीता के चूतड़ पीछे हट गये। बेड चरमरा उठा।
संगीता- “हाँ शेखर रख दो फाड़ के इसको। बना दो भुर्ता इसका…”
“उसको आज मजा चखाता ही हूँ…” कहकर शेखर उतरकर बेड के बगल में खड़ा हो गया। दोनों जांघें खींचकर उसकी चूत को एकदम किनारे पर कर लिया। और संगीता की टांगें चौड़ी करके खड़े-खड़े ही छेद पर लण्ड लगा के पूरा पेल दिया।
संगीता ने टांगें उसके कूल्हे के इर्द-गिर्द बाँध लीं।
अब शेखर बड़ी ताक़त से सटासट चोदने लगा।
संगीता कुछ ही झटके झेल पाई। फिर कराह उठी लेकिन उसे बहुत ही मजा आ रहा था। जैसे-जैसे लौड़ा धकापेल कर रहा था उसकी कराह बढ़ रही थी। चूत पानी-पानी हो रही थी- “ओओ ओओओ आआआ ओ मेरी मम्मी ओ माईई गोड उईईई माँ मैं मरीईई… उउउउइइइइ रीईईइ…”
शेखर बाहर तक बाहर खींचता।
संगीता दांतों के ऊपर दांत जकड़े हुये अंदर खींचती लंबी सांस- “ओ मेरे शेखर ऊऊऊऊऊ हुहुहु…”
और शेखर सीधा खटाक से अंदर कर देता।
जब चोट पड़ चुकती तो जोर से संगीता की सांस बाहर होती- “उफ्फ्फ्फ…”
शेखर भी चरम आनंद में भर गया था- “ओ मेरी संगीता डार्लिंग… मेरा और ले ले… तुम्हारे जैसी चूत कोईईई नहींईइ…” उसने लण्ड को मुट्ठी मैं पकड़ा और लण्ड घुसेड़ा तो साथ में एक उंगली भी छेद में डालता ही गया।
संगीता और न ठहर सकी- “ओ मेरी माँ… मैं तो गईई… लगा दोओ कस के…” उसकी चूत फड़क उठी चूत के ज्वालामुखी ने लावा छोड़ दिया और छोड़ती गई।
शेखर बहुत कस-कस के झटके लगाते हुये बोला- “ओ मेरी संगीता मैं भी झड़ा… अब लो मेरे को…”
मैंने जल्दी से कहा- “शेखर, अंदर मत झड़ना…”
और शेखर ने लण्ड बाहर खींच लिया। उसका सफेद लावा उफन-उफन कर मेरी चूत पर फैलता रहा और वह मेरे ऊपर ढेर हो गया। काफी देर तक हम एक दूसरे की बांहों में लेटे रहे। मैंने उसे बड़े प्यार से हटाया।
तो बोली- “बहुत देर हो गई है गनीमत है कि वो देर से आते हैं…” फिर अपनी पैंटी से चूत के ऊपर से शेखर का रस साफ किया और कपड़े पहनकर जाने के पहले उसकी तरफ देखकर शरारत से बोली- “लाला जी आपका आज रात का खाना हमारे यहां है जिसकी दावत देने के लिये ही मैं यहां आई थी…”
मैं चुदी थी, चुदी थी और खूब चुदी थी। न चुदाई कराके भागने की जल्दी थी और न आवाज करने, चिल्लाने पर बंदिश जो मुझे वर्षों से नशीब नहीं हुआ था।
जब मैं ऊपर जा रही थी तो एकदम हल्की थी जैसे हवा में उड़ रही हूँ।
उस दिन के बाद शेखर से हमरो संबंध और गाढ़े हो गये। मैं उसकी भाभी और वह मेरा देवर था सिवाय उस समय के जब वह मुझे पकड़ के अपनी कसर निकालता था। उस समय वह मुझे संगीता कहता था। कम से कम महीने में एक दिन तो ऐसा आता ही था। इसमें कोई पछतावे की बात नहीं थी। वह सच्चे देवर की तरह वर्ताव और कर्तव्य करता था। मैं उसे चाहती थी।
***** THE END समाप्त *****
