सवेरे सर्वप्रथम 5 बजे मेरी आंखें खुलीं और कमरे का मंजर देख कर रात की सारी घटनाएँ चलचित्र की तरह मेरी आंखों के सामने घूमने लगीं। अभी भी सारे लोग रात की वासना के तांडव की थकान से चूर, दीन दुनिया से बेखबर अस्त व्यस्त मादरजात नंगे इधर उधर पड़े हूए थे। गजब का नजारा था। मैं अलसाई सी उठ कर खड़ी हुई तो मेरे पैर कांपने लगे। पंडित जी ने रात में मुझे इतनी बुरी तरह रौंदा था, असर अब पता चल रहा था। रात में वासना के तूफान और कामुकता के अतिरेक में मुझे होश ही कहाँ था। अभी मैं ठीक से खड़े होने की कोशिश कर ही रही थी कि मेरी कमर पकड़ कर पंडित जी ने अपने ऊपर खींच लिया। मैं भरभरा कर उनके ऊपर गिर पड़ी।
“क्या करते हो, रात में तो निचोड़ डाला, मन नहीं भरा क्या?” मैं घबरा कर छटपटाते हुए फुसफुसाई।
मैं उनकी बनमानुषी बांहों में छटपटाती रह गई। अभी वह दरवाजे तक पहुंचा ही था कि पीछे से दादाजी की आवाज सुनाई पड़ी, “कहाँ ले जा रहा है बे साले चोदू पंडित हमारी बीवी को। चोदना है तो यहीं चोद मादरचोद, सवेरे सवेरे तू ही अकेले नाश्ता करने चला है? हमारी बीवी हमें भी तो नाश्ता कराएगी ना।”
पंडित जी वहीं खड़े रह गए। दादाजी की आवाज सुन कर सभी जग गए और हमारी ओर देखने लगे। सभी नंग धड़ंग अवस्था में थे लेकिन इसकी उन्हें कोई परवाह नहीं थी। जब सारी स्थिति सबको पता चली तो सारे मर्द एक स्वर में बोल उठे, “हमें भी नाश्ता चाहिए।” मैं कांप उठी, यह अहसास करके कि अब सारे मर्दों की एकमात्र निशाना मैं हूँ।
“कल रात हमें इन भेड़ियों के हवाले करके खुद पंडित जी के साथ ऐश कर रही थी ना साली कुतिया। चलो अब सारे मर्दों को झेलो। देख क्या रहे हो हरामजादो, सब मिलकर हमारे सामने ही इसकी गुडमॉर्निंग कर दो।” चाची जोर से बोली और फिर क्या था, सभी मर्द एक साथ मुझ पर टूट पड़े। इससे पहले कि मैं संभल पाती, सबने मिलकर मुझे वहीं फर्श पर पटक दिया और मेरे शरीर का जो भाग जिसके हिस्से आया, उसी पर लगे हाथ साफ करने।
“हाय राम, मार ही डालिएगा क्या आप लोग। रात मे पंडित जी ने मुझे जी भर के भंभोड़ दिया और अब आप सब लोग एक साथ ओह्ह्ह्ह मां हाय उफ्फ्फ,” मैं विरोध करने की असफल कोशिश करती रही मगर उन जंगली जानवरों की वहशियाना ताकत के आगे बेबस थी।
“चुप कर हरामजादी, हमें सब समझ आ गया, तू पंडित जी से चुदवाने के लिए मरी जा रही थी ना। ले अब पंडित जी के साथ साथ हम सब भी तेरी गरमी उतारते हैं।” नानाजी खूंखार लहजे में गुर्राए। मैं समझ गई कि अब मेरी खैर नहीं। सभी मर्द मादरजात नंगे थे और सबके फनफनाते लिंग अपने पूरे शबाब पर मुझे सलामी दे रहे थे। सब के सब वहशी जानवरों की तरह लार टपकाते हुए मेरी तिक्का बोटी करने को बेताब दिख रहे थे।
“ठीक ठीक, अब इस कुतिया के साथ सही होने जा रहा है। खूब गरमी चढ़ी थी ना। सब मिल कर इस छिनाल की गरमी उतार दो। हम भी इस रांड की रंडीपनई का दीदार करने को मरी जा रही थीं। नोच डालो, निचोड़ डालो इस कमीनी को, हमें चुदवाते हुए देखने का बहुत शौक चढ़ा था हरामजादी को।” मेरी मां भी चाची का समर्थन कर रही थी। मेरे बचने की रही सही आस भी खतम हो गयी। मैं ने अपने मन को कड़ा किया और अपने आप को परिस्थिति के हवाले कर दिया। बलात्कार का यह स्वरूप अपने आप में अनूठा था। घबराहट मे मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करूँ। अभी सवेरे सवेरे फ्रेश भी नहीं हो पाई थी कि यह मुसीबत। पेशाब लग रहा था और शौच का प्रेशर भी। छूटने के लिए थोड़ा संघर्ष कर रही थी किंतु शरीर साथ नहीं दे रहा था। मैं समझ गई कि विरोध बेमानी है। समर्पण मेंं ही भलाई है।
“आह मुझे फ्रेश तो हो जाने दो प्लीज।” मैं गिड़गिड़ाने लगी। मगर उनपर तो जैसे भूत सवार था,
“अब कहाँ जाओगी फ्रेश होने, हम ही फ्रेश कर देते हैं।” बड़े दादाजी बोले।
“देख कुतिया, मेरे, तेरे नाना और रघु के लंड में तेरी मां के चूत की मलाई अभी भी लगी हुई सूख गयी है। उसके चूत की गंध अभी भी हमारे लौड़े पर मौजूद है, इन्हीं जूठे लौड़ों से हम अभी तेरी पंडित जी के लंड से कुटाई हुई जूठी चूत का नाश्ता करेंगे।” बड़े दादाजी अपनी खींसे निपोरते हुए बड़े ही भद्दी आवाज़ में बोले।
“और हमारे लौड़ों पर तेरी चाची की बुर का रस लिथड़ कर सूख गया है। हम ऐसे ही तुम्हें चोदने वाले हैं।” हरिया बोल उठा।
“बहुत बढ़िया, अब हम सही मायने में एक ही थैले के चट्टे बट्टे बन जाएंगे।” करीम की बातें सुनकर सभी खिलखिला कर हंस पड़े, मुझे छोड़कर। मैं तो अपने ऊपर हो रहे आक्रमण से ही हलकान थी।
“पंडित, तूने दो दिन हमारी बीवी की चूत की चुदाई की है। आज तू इसकी गांड़ चोद कर संतोष कर। हम सब अभी बारी बारी से इसके चूत में डुबकी लगाएंगे।” दादाजी ने घोषणा की और सारे मर्दों ने एक स्वर से उनका समर्थन किया। मैं कांप उठी, यह सोच कर नहीं कि पांच लोग पंडित जी के विकराल लिंग से चुद चुद कर फूली हुई मेरी योनी में बारी बारी से डुबकी लगाएंगे, बल्कि यह सोच कर कि पंडित जी के विकराल लिंग से मेरी गुदा की दुर्गति हो जाएगी।
“नहीं््ईईंं््ईईंं, मेरी गुदा में पंडित जी का लिंग! ओह्ह्ह्ह मा्म्म्मा, मर जाऊंगी, प्लीज नहीं।” मैं घिघियाते हूए बोली।
“चुप साली कुतिया, हमसे धोखा और बेवफाई की सजा तो मिलेगी ही तुझे।” नानाजी गुर्राए।
पंडित जी को क्या फर्क पड़ना था। उनके लिए तो जैसी मेरी योनी वैसी ही मेरी गुदा थी। योनी मैथुन मेंं उन्होंने जो मजा लिया उससे कम मजा नहीं मिलने वाला था क्योंकि मेरे चिकने गोल गोल भरे हुए नितंबों में अलग ही आकर्षण था। उन्हें ठीक पता था कि मेरी कसी हुई गुदा से मैथुन का कैसा आनंद मिलने वाला था। वह सहर्ष राजी हो गया और पता नहीं सभी मर्दों ने आंखों ही आंखों में क्या इशारा किया कि सर्वप्रथम पंडित जी ही मुझ पर टूट पड़े किसी जंगली भालू की तरह और सीधे मुझे पीछे से अपने फौलादी बाजुओं में जकड़ लिया। मुझे झटके से कुतिया की तरह सामने झुका दिया और पलक झपकते अपने गधे जैसे लिंग पर ढेर सारा थूक लसेड़ा और मेरे मलद्वार पर टिका कर एक प्रलयंकारी आघात कर दिया। मैं इस आकस्ममिक आघात के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी, यह सब इतनी जल्दी हुआ कि जब तक मैं मसझ पाती, पंडित जी का आधा लिंग मेरी संकीर्ण गुदा मार्ग को चीरता हुआमेरी गुदा में प्रविष्ट हो चुका था। मेरी दर्दनाक चीख पूरे कमरे में गूंज उठी। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह्……ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह…..मर गई मैं अम्म्म्म्म्आ्आ्आ्आ आह” मगर किसे मेरी चीख पुकार की परवाह थी। सभी दरिंदे बन चुके थे। यहां तक कि मेरी मां और चाची भी दर्शक बनी दृष्य का आनंद लेते हुए तालियां बजा रही थीं। मैं कातर निगाहों से कभी मम्मी की ओर और कभी चाची की ओर देख रही थी, किंतु उनकी आंखों में मेरे लिए कोई सहानुभूति नहीं थी, उल्टे मेरी बेबसी पर वे हंस रही थीं ओर तालियां बजा रही थीं, तालियां बजाते हुए उनकी बड़ी बड़ी थल थल करती चूचियां हिचकोले खा रही थीं।
“आह्ह्ह्ह्ह तेरी गांड़ कितनी मस्त है रे। तेरी चूत से भी ज्यादा मजेदार।” कहते कहते “हुम्म्म्म्मा्ह्ह्ह्ह” और एक भीषण प्रहार कर दिया जालिम ने।
“आह्ह्ह्ह्ह म्म्म्म्म्आ्आ्आ्आ” मेरी मर्मांतक चीख भी किसी के दिल मेंं दया नहीं उपजा पाई। पंडित जी को तो मानो मुहमांगी मुराद मिल गई थी। पंडित जी का नौ इंच का गरमागरम विकराल लिंग पूरा का पूरा मेरी गुदा में समा गया था और इतनी सख्ती से धंस गया था कि मैं हिलने में भी असमर्थ हो गई थी। एक तो रात्रि की कमरतोड़ थकान भरी चुदाई से टूटता मेरा तन, ऊपर से पंडित जी की दानवी सख्त पकड़, परकटी पंछी की मानिंद अपने ऊपर हो रही निर्दयता का विरोध मेरे लिए संभव भी नहीं था। दर्द की अधिकता से मेरी सांसें मानो रुक गई थीं और मेरी आंखें फटी की फटी रह गयीं।
“शाबाश पंडित, अब तू इस कुतिया की गांड़ में लौड़ा फंसाए रख और पलट जा, ताकि हम बारी बारी से इस बुरचोदी की बुर का नाश्ता कर सकें।” दादाजी के मुख से वासना भरी खरखराहट निकली। पंडित जी ने बिल्कुल वैसा ही किया और ऐसा करते करते अपनी कमर की चार पांच बार घपाघप जुंबिशें भी दे डाली। पीड़ा की लहर मेरे सारे शरीर में दौड़ पड़ी और मेरी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। अब शुरू हुआ मेरे साथ वासना का तांडव। सर्वप्रथम उम्र के लिहाज से सबसे उम्रदराज बड़े दादाजी ऊंचे कद के आड़े टेढ़े शरीर वाले, मेरे पैरों को फैला कर बिना एक पल गंवाए अपने फन फन करते लिंग को एक ही करारे धक्के से मेरी योनी में जड़ तक ठोक दिया, “ले मेरी रानी मेरा लौड़ा अपनी बुर मे,” ऊं्ऊं्ऊं्ऊह्ह्ह्ह” और बिल्कुल मशीनी अंदाज में धकाधक चोदने मेंं मशगूल हो गए। मेरे मुह से आह्ह्ह्ह्ह निकल गई। एक तो नीचे से मेरी गुदा में समाए पंडित जी के लिंग की पीड़ा और ऊपर से मेरी चुद चुद कर फूली हुई योनी पर बर्बर हमला, मैं हलकान थी।
“आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह धीरे बाबा, हाय मार ही डालोगे क्या ओह” इतना ही कह सकी थी मैं। चोदने का अंदाज ऐसा था कि मैं कहीं भागी जा रही हूं। बेतहाशा, बेताबी के साथ, मेरी चूचियां को बेदर्दी से मसलते हुए और अपने बिना मुह धोए बदबूदार मुह से मेरे होंठों को चूसते हुए धाड़ धाड़ धक्के पे धक्का लगाने लगे। कुछ ही पलों बाद जैसे ही मैं थोड़ी अभ्यस्त हुई, मुझे भी आनंद की अनुभूति होने लगी और शनैः शनैः मैं और भी उत्तेजित होने लगी। अब तक जो हो रहा था वह मेरे लिए एक दु:स्वप्न था, सचमुच का बलात्कार था जिसके अनुभव के लिए मैं ललायित थी, लेकिन अब जो कुछ हो रहा था, वह देखने में तो मुझ पर अत्याचार था किंतु मुझे अत्यंत आनंद से सराबोर कर रहा था। गुदा का दर्द छू मंतर हो गया था और इस दोतरफे संभोग के सुख में मैं डूबने उतराने लगी।
“आह्ह्ह्ह्ह राजा, ओह भगवान, उफ्फ्फ इतना सुखद, चोद सालों हरामजादों, आज मुझे रंडी बना दो कुत्तों, कुतिया बना दो, अपनी रानी को रांड बना दो डियर,” और न जाने क्या क्या अनाप शनाप बके जा रही थी बावली की तरह। करीब पंद्रह मिनट बाद बड़े दादाजी ने मुझे कस के दबोच लिया और फचफचा कर अपना वीर्य से मेरी कोख को सींचने लगे। आह्ह्ह्ह्ह और लो, मैं भी उसी वक्त खलास होने लगी, उफ्फ्फ। बड़े दादाजी जैसे ही मुझे चोद कर निवृत्त हुए दादाजी ने मोर्चा संभाला। आव देखा न ताव, सीधे अपने लिंग को मेरी चुदी लसलसाई योनी में भक्क से पेल दिया और ठीक बड़े दादाजी के अंदाज मेंं ही संभोगरत हो गये। करीब बीस मिनट बाद उन्होंने भी मेरी योनी में अपना वीर्य छोड़ा और किसी भैंसे की तरह हांफते हुए पसीने से सराबोर मुझ पर से हटे। मैं भी इस दौरान दो बार स्खलित हुई और पसीने से नहा गई थी। आश्चर्य था कि पंडित जी अभी भी डटे हुए थे। वे भी रुक रुक कर नीचे से कमर उचका उचका कर चोदे जा रहे थे।अब बारी थी हरिया की। नानाजी को सबसे अंत में मौका मिलने वाला था क्योंकि उनकी कुत्तों वाली खासियत के बारे में सबको पता था। हरिया ने ज्यों ही मेरी योनी में लिंग प्रवेश कराया, अबतक बमुश्किल रोका गया पेशाब छरछराकर मेरी योनी से बाहर निकलने लगा और फर्श पर गिरने लगा। हरिया की बेसब्री का आलम यह था कि उसी हालत मे वह छपाछप मुझे चोदने लगा। उफ, मैं बता नहीं सकती कि उस वक्त मुझे कैसा लग रहा था। एक अलग ही तरह का मजा मुझे मिल रहा था। हरिया भी करीब बीस मिनट बाद खलास हुआ और करीम ने धावा बोला। अबतक मेरी योनी का सारा कस बल निकल चुका था और करीम बड़े आराम से मुझे सटासट चोदने लगा। करीब पच्चीस मिनट तक करीम मुझे चोदता रहा। जब उसके खलास होने का समय आया तो उसने इतनी जोर से मुझे जकड़ा, जैसे मेरी पसलियों का चूरमा बना डालेगा। “आह आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह्,” काफी लंबा स्खलन था उसका। मेरी योनी में जैसे बाढ़ आ गया हो। वैसे भी अबतक की चुदाई के दौरान मेरी योनी वीर्य से लबालब हो चुकी थी। अब वीर्य मेरी योनी से नीचे बह कर मेरी गुदा से होते हुए पंडित जी के लिंग को भिंगा रही थी। उनका थैलानुमा अंडकोश भी गीला हो चुका था। करीम के फारिग होने पर मुझे कुछ पलों के लिए सांस लेने का समय मिला था। इन चार लोगों ने कुल मिलाकर करीब डेढ़ घंटे तक मुझे जी भर के नोचा खसोटा था और इस दौरान मैं कम से कम पांच बार स्खलन के सुखद दौर से गुजर चुकी थी, हालांकि चार मुस्टंडों को झेलते झेलते मेरी हालत खस्ता हो चुकी थी। मेरे पांव अकड़ने लग गये थे, लेकिन अभी नानाजी की श्वान चुदाई बाकी थी जिसे झेलना बाकी था। नानाजी से चुदने के लिए मुझे कुतिया बनने की जरूरत थी किंतु पंडित जी अभी भी नीचे से मेरी गुदा की कुटाई किए जा रहे थे।
“पंडित, तू जल्दी चोद कर हट, मुझे अभी इसे कुतिया बना कर चोदना है” नानाजी के सब्र का पैमाना छलक उठा था। उनके ऐसा कहने मात्र की देर थी, पंडित जी मुझे लिए दिए पलट गए और बिना लिंग निकाले पीछे से मेरे ऊपर चढ़ गए दनादन मेरी गुदा की ठुकाई करने में जुट गए। उनकी भीषण चुदाई और मेरे मलाशय के अंदर के दबाव के कारण मलद्वार से पीले पीले रंग मेंं मल पतले द्रव के रूप में बाहर निकलने लगा जिसे चाह कर भी रोकना मुश्किल था। यह देख कर नानाजी ने पंडित जी से कहा, “इसे जल्दी टॉयलेट में ले जा, नहीं तो यहीं हग देगी साली कुतिया।”
“हा हा हा हा” सभी ठहाके मार कर हंसने लगे।
पंडित जी मेरी गुदा से बिना लंड निकाले मुझे उठा कर टॉयलेट ले गये। वहां घुस कर भी पंडित जी मुझे कुतिया की तरह करीब और पांच मिनट तक छपाछप चोदते रहे। मल निकलता रहा, और मेरे मल से लिथड़े लिंग से ही पंडित जी ने गुदा मैथुन द्वारा अपने हवस की पूर्ति की। अंत में छरछराकर अंतहीन स्खलन। बाप रे बाप, वह सामान्य आदमी तो बिल्कुल ही नहीं था। इतना सारा वीर्य उसके लिंग से निकलने में करीब दो मिनट लगा होगा। फिर टॉयलेट के फर्श में फैले मेरी गुदा से निकलते वीर्य और मल के मिस्रित दुर्गंधयुक्त तरल पर ही धड़ाम से लुढ़क कर किसी जंगली भैंस की तरह डकारते हुए लंबी लंबी सांसे लेने लगे मानो मीलों दौड़ कर आए हों। गजब का चुदक्कड़ था पंडित। गजब की स्तंभन क्षमता और अथक मैथुन का दम। उनका लिंग तो खैर अद्वितीय था ही। तभी तो उसके शरीर की बेढबता और तमाम कुरूपता के बावजूद मैं उस पंडित पर फिदा थी। इधर पंडित जी लुढ़के और उधर मैं थकान से बेदम दूसरी ओर लुढ़क गयी। मेरे पैर कांप रहे थे। सारा शरीर निचुड़ चुका था। मैं यह सोच सोच कर हलकान हो रही थी कि अब नानाजी की कुतिया बन कर उनकी हवस मिटाने की जिम्मेदारी भी पूरी करनी है।
“क्या रे मादरचोद पंडित, हमारी बीवी को मार कर ही छोड़ेगा क्या। जल्दी ला साली कुतिया को। मेरे लौड़े का बहुत देर से भूख के मारे बुरा हाल है।” तभी नानाजी की बेसब्र आवाज मुझे सुनाई पड़ी। किसी तरह लड़खड़ाते हुए मैं उठी और पानी ढाल ढाल कर खुद को साफ किया और पंडित जी को उसी हालत में छोड़ कर लड़खड़ाते कदमों से फिर उसी कमरे मेंं जा घुसी। मेरे घुसते ही नानाजी किसी बाज की तरह मुझ पर झपटे “आजा मेरी कुतिया” और आनन फानन में मुझे कुतिया की तरह झुका दिया। “मेरी प्यारी कुतिया, ले अब मेरे लौड़े का भी स्वाद चख” कहते हुए चुद कर भोंसड़ा बन चुकी योनी मेंं किसी कुत्ते की तरह पिल पड़े। मेरे हलक से हल्की सी आह्ह्ह्ह्ह निकल पड़ी। नानाजी भी मुझ पर भूखे भेड़िये की तरह बर्बरता दिखाने में पीछे नहीं थे। उत्तेजना के आवेग में पीछे से मेरे उन्नत उरोजों को इतनी जोर से दबोचा कि मेरी दर्दनाक चीख निकल पड़ी।
“चोप्प्प कुतिया, इतने लोगों से चुद गई और हमीं से चिल्ला रही है बुरचोदी रंडी। चुपचाप चुदती रह मेरी अच्छी कुतिया की तरह।” नानाजी खूंखार लहजे में बोले।
“आह आहिस्ता नानाजी, ओह सॉरी, पतिदेव जी। प्लीज आराम से, ओह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह्ह,” मैं मरी मरी सी आवाज में घिघियाती रह गई, किंतु नानाजी तो बावले हो चुके थे, उतावलेपन में मेरी आहों की आवाज को दरकिनार कर एक ही करारे प्रहार से अपना पूरा का पूरा लिंग मेरी योनी में उतार दिया और लग गये किसी जंगली कुत्ते की तरह मुझे चोदने।
“आह्ह्ह्ह्ह मेरी कुतिया बहुत इंतजार करवाई हो। ओह्ह्ह्ह मेरी प्यारी बुरचोदी रानी, ले मेरा लौड़ा, ओह हुम्म्म्म्मा्ह्ह्ह्ह हुम्म्म,” और न जाने पागलों की तरह क्या क्या बके जा रहे थे और मुझे झिंझोड़ झिंझोड़ कर चोदते जा रहे थे। उनकी कामुक बातों और जंगली हरकतों का परिणाम यह हुआ कि थकान से चूर होने के बावजूद मेरे अंदर जैसे नवजीवन का संचार होने लगा। कुछ ही मिनटों में मेरे अंदर कामुकता की अग्नि भड़क उठी और मैं जो अब तक ढीली ढाली चुदाई को सिर्फ झेल रही थी, सक्रिय हो गयी।
“आह्ह्ह्ह्ह राजा, ओह्ह्ह्ह राजा, ओह मेरे स्वामी, चोद अपनी रानी को, मेरे कुत्ते, चोद अपनी कुतिया को, चोद मादरचोद, मेरे लंडराजा,” मैं भी जोश में आ गयी थी और अश्लील शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए नानाजी की चुदाई का भरपूर लुत्फ उठाने लगी। मैं भी कमर उचका उचका कर नानाजी के ठापों का जवाब देने लगी। नानाजी मेरे इस अंदाज से निहाल हो गए और दुगुने जोश से जुट गए चोदने।। “ओह मेरी कुतिया, ओह मेरी रानी, खूब मजा आ रहा है आह, तू तो पूरी रंडी बन गई रे, हमारी रंडी बीवी,” खुश हो गए थे नानाजी। करीब बीस मिनट चुदने के पश्चात मुझे महसूस होने लगा कि मेरी योनी के अंदर विशाल गांठ आकार ले रहा है। इस वक्त नानाजी पूरी शक्ति से मेरी कमर अपनी गिरफ्त में लिए हुए थे। उस वक्त मैं हिल भी नहीं पा रही थी। जबतक नानाजी ने मुझे छोडते, तबतक उनके लिंग का गांठ पूरा आकार ले चुका था, एक टेनिस बॉल से भी काफी बड़ा। मैं फंस चुकी थी। अब हम दोनों कुत्ते कुतिया की तरह एक दूसरे से जुड़ गए थे। नानाजी कुत्ते की तरह पलट गए और हांफने लगे। मैं भी थक कर चूर सर फर्श पर रख कर सुस्ताने लगी। इस करीब दस मिनट बाद नानाजी के लिंग से मदन रस का पतन होने लगा जिसका कतरा कतरा मेरी योनी के अंदर ही जज्ब होने लगा। मैं आनंदातिरेक से विभोर हो उठी। इसके कुछ ही पलों के पश्चात नानाजी का लिंग फट्ट की आवाज से मेरी योनी के बाहर निकल आया और मैं ने राहत की लंबी सांस ली। थकान के मारे मैं अपने स्थान से उठ भी नहीं पा रही थी। वहीं पर लस्त पस्त पसीने से सराबोर लुढ़क गयी। नानाजी के आठ इंच लंबे लिंग से अभी भी टप टप मदन रस चू रहा था। वे भी थक कर चूर वहीं पर लुढ़क गए।अविश्वसनीय, किंतु इतनी थकी होने के बावजूद मैं इस दौरान दो बार स्खलित हुई। मैं इस पूरी सामुहिक चुदाई में छ: मर्दों की अकेली भोग्या थी और सबको सफलतापूर्वक झेलकर विजयी भाव से मम्मी और चाची को देख रही थी। कोई विश्वास करे या न करे, लेकिन यह सच था कि इस थकान भरी चुदाई में भी मैंने भरपूर स्वर्गीय सुख का स्वाद चखा। मेरी मां और चाची भी ईर्श्या भरी निगाहों से मुझे देखती रह गयीं।
“बहुत बड़ी छिनाल बन गई है तेरी बेटी तो,” चाची मेरी मां से कह रही थी।
“हां, पता नहीं इस लड़की की किस्मत में क्या लिखा है” मेरी मां ने सिर्फ इतना ही कहा।
“चलो कोई बात नहीं, अब जो होना है वह तो भविष्य ही बताएगा। फिलहाल तो यह मान लो कि यह भी हमारी जमात में शामिल हो चुकी है। अब हमारे बीच कोई पर्दा भी तो नहीं रह गया है।” चाची बोली। इतने में पंडित भी आ गया। अब तक सभी मादरजात नंगे ही थे।
“आईए पंडित जी। आप भी आ जाईए।” दादाजी ने पंडित जी से कहा। पंडित जी का नग्न शरीर इस वक्त किसी बनमानुष से कम नहीं लग रहा था। वे भी आकर हमारे बीच बैठ गए। किसी को अपने कपड़ों की कोई चिंता नहीं थी। हम सभी आदि मानवों की तरह नंग धडंग बेशर्मी के साथ एक दूसरे से बातें कर रहे थे। मां को आज ही वापस लौटना था। वह चाहती थी कि मैं भी उनके साथ वापस चलूं किंतु नानाजी ने साफ मना कर दिया।
“हमारी पत्नी अब हमारे साथ ही रहेगी।” उन्होंने घोषणा की।
“पापा, कल इसे कॉलेज में अडमीशन लेना है। इसे तो चलना ही पड़ेगा।” मम्मी बोली।
“कॉलेज यह यहां पर ही रह कर करेगी। कोई जरूरत नहीं है वहां जाने की।” नानाजी ने अंतिम फैसला दिया। मम्मी को कुछ कहते नहीं बना।
वह मेरी ओर मुखातिब हो कर बोली, “तुम क्या बोलती हो?” मैं नानाजी की बातों से सहमत थी, अतः मैंने घर लौटने से मना कर दिया। दादाजी और बड़े दादाजी को भी हजारीबाग लौटना था। वहां का काम भी रुका हुआ था। अंततः यह तय हुआ कि मम्मी और दादाजी, बड़े दादाजी आज ही अपने अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करेंगे।
जैसा कि तय हुआ था, नहा धो कर नाश्ता करने के पश्चात मां घर लौट गयी। दादाजी और बड़े दादाजी हजारीबाग चले गए। पंडित जी भी अपने घर चले गये, लेकिन जाते वक्त आंखों ही आंखों में पंडित जी मुझ से काफी कुछ कह गए। मेरा दिल बाग बाग हो उठा, यह जान कर कि हमारी मुलाकातें जारी रहेंगी। बाकी सारे लोग अपने अपने काम में व्यस्त हो गए। चाची भी अपने घर चली गयी। वह यहां से ज्यादा दूर नहीं थी, सो पैदल ही जाने को तत्पर हो गई थी, लेकिन नानाजी ने करीम से कहा कि उसे घर छोड़ दे। करीम ने गाड़ी निकाली और चाची को उनके घर छोड़ आए। यहां तक की कहानी सुनाने के बाद कामिनी रुक कर मेरे चेहरे की ओर गौर से देखने लगी। दर असल कामिनी जब अपनी जीवनी के पन्ने मेरे सामने पलट रही थी उस वक्त उसने जिस तरह पंडित जी का जिक्र किया था उसे सुन कर मैं भी रोमांचित हो उठी थी। हालांकि मैं, रजनी, एक पारिवारिक, पतिव्रता, शादीशुदा, दो बच्चों की मां हूं, किंतु हूं तो एक इंसान ही। इंसानी कमजोरियों से युक्त, जिसके मन के चाह की कोई सीमा नहीं होती। सामाजिक बंधनों से बंधे होने के बावजूद सभी के मन में काफी कुछ अनैतिक चलता रहता है, जिसे हर इंसान को दबा कर जीना पड़ता है वरना यह समाज रुपी संस्था कब का छिन्न भिन्न हो गया होता। मैं कितनी कामुक हूं यह सिर्फ मेरे पतिदेव राजेन्द्र जी को ही पता है। मेरी वासना की आग को मेरे पति कभी कभी अनबुझा छोड़ देते थे, लेकिन फिर भी मुझे कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि कम से कम मुझ जैसी स्त्री के लिए एक पति और परिवार रुपी सुरक्षा तो थी। अपनी तमाम कमजोरियों और यौनेच्छा के बावजूद मैं कामिनी की तरह इतनी आजाद खयाल भी नहीं हूं (समाज का भय, जिसकी जंजीर में जकड़ी 95% भारतीय स्त्रियां जी रही हैं) कि किसी भी मर्द के सम्मुख अपनी काम पिपाशा शांत करने हेतु बिछ जाऊं, किंतु पंडित जी के बारे में कामिनी के मुख से जो कुछ सुना, उसके विस्तृत चित्रण ने मेरी योनी को गीला होने मेंं मजबूर कर दिया। मैं तन्मयता से कामिनी की कामगाथा सुनते हुए सोफे पर बैठी बैठी कसमसाने लगी। मैं खुद पर चकित थी कि पर पुरुष के बारे में सुन कर मुझ जैसी सीधी सादी 40 वर्षीय गृहिणी को यह क्या हो रहा है। मेरे शरीर पर मानो चींटियां रेंग रही हों। मेरा चेहरा लाल भभूका हो गया और मेरी सांसें धौंकनी की तरह चलने लगी थी। अनायास और बेध्यानी मेंं मेरा हाथ सलवार के ऊपर से ही मेरे गुप्तांग के स्थान पर चला गया। कामिनी की अनुभवी आंखों से मेरी हालत छिपी न रह सकी और उसके होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान थिरकने लगी। इस वक्त हम कामिनी के वृद्धाश्रम में बैठे बातें कर रहे थे। (दरअसल आज की तारीख में कामिनी एक वृद्धाश्रम चला रही थी और उसके नाना, दादा, बड़े दादा गुजर चुके थे। माता पिता भी बूढ़े हो चले थे। एकमात्र भाई अपने आवारा दोस्तों की सोहबत में पड़कर अपराध की दुनिया में कदम रख चुका था और दो बार जेल की हवा भी खा चुका था। हरिया और करीम भी काफी बूढ़े हो चुके थे और यहीं वृद्धाश्रम की देख भाल मेंं कामिनी का हाथ बंटा रहे थे।)
“नहीं ऐसी बात नहीं, दरअसल…..” इसके आगे मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या बोलूं। मैं समझ गई कि कामिनी ने मेरी स्थिति को भांप लिया है। झेंप कर मैंने नजरें झुका लीं।
(कामिनी से मेरी दोस्ती के सिर्फ दो ही साल हूए थे। मैं कामिनी के नानाजी के घर से कुछ ही दूर में रहती थी, अपने छोटे से परिवार के साथ। यह एक संयोग था जब मैं बाजार से घर आने के लिए किसी वाहन का इंतजार कर रही थी और उसी वक्त कामिनी वहां से अपनी कार में गुजर रही थी, उसने मुझे लिफ्ट दिया और वहीं से हमारी दोस्ती परवान चढ़ती गई। कामिनी और मेरे व्यक्तित्व में कोई समानता नहीं थी। कहाँ वह 51 वर्ष की उम्र में भी दपदपाती 35 वर्षीय दिखने वाली खूबसूरत, तेज तर्रार, स्मार्ट, स्वछंद विचारों वाली, आत्मविश्वास से ओतप्रोत स्त्री और कहां मैं 40 वर्षीय, सांवली, 5′ 4″ कद की भरे बदन वाली घरेलु औरत। हालांकि मेरे नाक नक्श आकर्शक थे, फिर भी मेरी कामिनी के साथ कोई तुलना ही नहीं थी। इन दो सालों में हम दोनों काफी घुल मिल गई थीं। हमारे बीच उम्र का फासला ग्यारह साल का था लेकिन हम दोनों के बीच सहेलियों वाला खुला रिश्ता पनप चुका था, इस कारण कामिनी ने अपने जीवन के एक एक पन्ने को मेरे सामने खोल कर रख दिया था। उसे मुझ पर पूरा विश्वास था। मैं अक्सर उसके वृद्धाश्रम में जाती रहती थी। करीब पैंतीस वृद्ध बेघर स्त्रियां और पुरुष वहां रहते थे। जिनमें दस स्त्रियां और पच्चीस पुरुष थे। कामिनी ने अपनी सोच के अनुसार सबको खुली आजादी दे रखी थी स्वतंत्रता पूर्वक जीने के लिए। कोई सामाजिक बंधन नहीं था। यौनाचार मेंं सक्षम जितने भी लोग वहां थे, आपस में खुल कर यौन संबंध का आनंद लेने को स्वतंत्र थे। उनमें से करीब सभी मर्दों के साथ कामिनी के शारीरक संबंध थे। कुछ को कामिनी ने खुद अपने आकर्षण के जाल में फंसा कर अपना तन परोसा और कुछ वृद्धों की लार टपकाती कामलोलुप नजरों में अपने लिए अव्यक्त भूख को भांप कर, न चाहते हूए उनकी इच्छा का मान रखने के लिए उनकी हवस मिटाना अपना कर्तव्य समझ कर। वृद्धा स्त्रियों (ढलती उम्र की गठी हुई या थुलथुल देह वाली) को भी अपनी कामक्षुधा शांत करने के लिए किसी भी मर्द की हमबिस्तर होने में कोई संकोच नहीं था। सबके रहने की काफी अच्छी व्वस्था थी। बिल्कुल घर वाला माहौल बना कर रखा था कामिनी ने। यह वृद्धाश्रम उसके नानाजी के बड़े से भूभाग पर बना हुआ था, कामिनी के प्रभाव के कारण किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप या संकटों से निरापद।)
इसके बाद की घटनाएं इस तरह थीं, कामिनी की जुबानी –
मेरा एडमीशन महिला कॉलेज रांची में हो गया। मैं कॉमर्स की पढ़ाई करने लगी। बीच बीच में दादाजी और बड़े दादाजी मुझसे मिलने आ जाते थे और अपनी वासना की भूख मिटा कर लौट जाते थे। यहां नानाजी के साथ हरिया और करीम तो थे ही मेरे साथ पति धर्म निभाने को। बीच बीच में मैं पंडित जी से भी रंगरेलियां मना लेती थी। तभी एक अनहोनी हो गई जिसने मेरी जिंदगी में एक नया मोड़ ले आया। अभी दो ही महीने हुए थे यहां रहते हुए कि मेरी माहवारी बंद हो गई। शंका के समाधान के लिए मेरा चेकअप हुआ तो पता चला कि मैं गर्भवती हो चुकी हूं। हालांकि मैं नानाजी के यहां सामुहिक पत्नी के रुप में रह रही थी किंतु समाज इस शादी को अनैतिक मान कर खारिज कर देता। फलस्वरूप बदनामी के डर से नानाजी ने सबसे सलाह मश्वरा करके भरे मन से मुझे एक सरकारी क्लर्क के पल्ले बांध दिया। मात्र सात महीने बाद ही मैं ने एक पुत्ररत्न को जन्म दिया जिसे डाक्टर ने प्री मैच्योर बेबी कह कर मुझे कलंकिनी कहलाने से बचा लिया। इसके बाद की कहानी आप लोग कहानी की शुरुआत में पढ़ चुके हैं। पति की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात सास की प्रताड़ना से आजिज आ कर मैं ने ससुराल छोड़ दिया और नानाजी के यहां आ कर रहने लगी और अपनी पढा़ई लिखाई पूरी की। नानाजी के घर से वैसे भी मेरा नाता पहले से था। अब मैं कहीं नौकरी ज्वॉईन करके अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी साथ ही साथ मेरी कामुकता को यथाशक्ति नियंत्रण मेंं रखना चाहती थी जो समय के साथ साथ और भी धधकती जा रही थी। मेरी वासना की भूख पहले से और बढ़ गई थी जिसे बूढ़े होते जा रहे मेरे तथाकथित पतियों और पंडित जी से मिटाती आ रही थी।
फिर एक और संयोग ने मेरी जिंदगी में एक और नया मोड़ ला दिया। मेरी कॉलेज की पढा़ई खत्म होने के तुरंत बाद ही एक दिन बाजार में उसी हब्शी से मुलाकात हो गई जिसकी अंकशायिनी बनने के लिए एक कमीने सरदार ने मुझे ब्लैकमेल करके मजबूर किया था।
मैं बच कर निकलना चाहती थी कि उन्होंने मुझे टोक दिया, “Hi, how are you baby?” (हाय कैसी हो बेबी)
“I’m fine sir.” (मैं अच्छी हूं श्रीमान) मैं झिझकते हुए बोली।
“What happened? Don’t be afraid of me. I kicked the sardar out of my office, when I came to know about the whole story of that night. I don’t like to exploit the helpless person. I regret for that incident) ” (क्या हुआ? मुझसे डरो मत। जब मुझे सरदार से उस रात की बात पता चली तो उसे नौकरी से निकाल दिया। मुझे किसी की मजबूरी का फायदा उठाना पसंद नहीं। मुझे उस दिन की घटना पर खेद है)
मैं थोड़ी आश्वस्त हुई। उनके चेहरे पर खेद और अपराधबोध का भाव था। “No need to feel sorry for that incident sir. I had already taught him the lesson for his act” (उस घटना के लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है स्रीमान। मैं ने उसी वक्त उसके कुकृत्य के लिए उसे सबक सिखा दिया था) मैं बोली।
फिर उन्होंने मेरे चेहरे को गौर से देखते हुए मुझ से कहा, “You look a bit worried. What’s the matter? It would be my pleasure if I could help you.” (तुम कुछ चिंतित नजर आ रही हो। क्या बात है? अगर मैं किसी तरह तुम्हारी सहायता कर सकूं तो मुझे खुशी होगी।)
मैं ने जवाब दिया, “Sir, I’m desperately searching a job to lead independent life.” (श्रीमान मैं स्वावलंबी होने के लिए बड़ी शिद्दत से एक नौकरी की तलाश में हूं।)
“What a coincidence, I also need an office assistant. It will be my pleasure to give you that post.” (क्या संयोग है, मुझे भी एक ऑफिस असिस्टेंट की जरूरत है। यह पद तुम्हें देकर मुझे खुशी होगी)
इस तरह एक सुखद संयोग ही था जिससे मुझे एक अच्छी नौकरी भी मिल गई। मैं ऑफिस असिस्टेंट से तरक्की करते करते उपप्रबंधक के पद तक पहुंच गई। इसमें मेरी काबीलियत के साथ साथ मेरी कमनीय काया और मेरी कामुकता का भी बड़ा योगदान था। वह हब्शी रिचर्ड ऐग्न्यू तो मुझ पर खासा मेहरबान था, हालांकि मेरी काबीलियत पर उसे जरा भी संदेह नहीं था, जिसका प्रमाण मैंने कई मौकों पर दिया। मैं कई बार उनकी हमबिस्तर बनी और खुशी खुशी बनी, पूरी रजामंदी से। उन्होंने कभी भी मुझसे जबर्दस्ती नहीं की। वे मुझसे आग्रह करते और मैं खुशी खुशी उनकी आगोश में चली जाती थी और पूरे समर्पण के साथ उनकी और खुद की हवस की आग बुझाती थी। कई बार तो हमने उनके ऑफिस में ही वासना का खेल खेला। वे अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठे रहते थे, वे मुझे अपनी गोद में बैठा कर चूमते थे। मेरी टॉप के बटन खोल कर मेरी चुचियों को सहलाते थे। अपने मुंह में भर कर मेरी तनी हुई चूचियों को चूसते थे। मैं उनके पैंट की जिप खोल कर अपने हाथ से उनके गधे सरीखे लिंग को पकड़ कर सहलाती थी और खेलती थी। जब कमाग्नि दोनों तरफ बराबर भड़क चुकी होती थी तो मेरी स्कर्ट को धीरे धीरे से ऊपर उठा लेते थे और मेरी पैंटी को नीचे खिसका कर पनिया चुकी योनी में अपने विशाल लिंग को प्रवेश कराने के पश्चात मुझे किसी गुड़िया की तरह कमर से पकड़ कर बैठा लेते थे। तब तक का सबसे विशाल खौफनाक लिंग, जिससे उन्होंने पहली बार उस कमीने सरदार की ब्लैकमेलिंग के माध्यम से परिचित कराया था, पहली बार जो भारतीय स्त्री देख ले वही खौफजदा हो जाए, (हब्शी लिंग से उस दर्दनाक प्रथम संभोग, जिसके स्मरण मात्र से कई दिनों तक मेरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ जाती थी) ऐसे लंबे और मोटे लिंग को अपनी योनी में पूर्णतयः समा लेती थी और उसी कुर्सी पर संभोग में लीन हो जाती थी। पीछे से मेरे उरोजों को सहलाते हुए, दबाते हुए, वे मेरी कमनीय काया का भोग लगाते थे। मैं इन सबमें पूरे दिल और मन से उनका सहयोग करती हुई संभोग के अखंड आनंद में डूब जाती थी। मैं उसके विशाल शरीर और विकराल दस इंच लंबे और गधे जैसे मोटे लिंग से मैथुन की अभ्यस्त हो चुकी थी।
ऐसा नहीं था कि मेरे आकर्षक व्यक्तित्व और हमारे अनैतिक संबंधों की वजह से ही मुझे आज इस महत्वपूर्ण पद पर आसीन होने का अवसर मिला, बल्कि मेरी कुशाग्र बुद्धि और कुशल प्रबंधन का लोहा भी मैं मनवा चुकी थी। इन्हीं कारणों से वे हमेशा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग अटेंड करने के लिए वह मुझे ही लेकर जाते थे। होटलों में एक ही कमरे में हम ठहरते और पूरी स्वतंत्रता के साथ, दिल खोल कर, विभिन्न तरीकों से वासना की प्यास बुझाया करते थे। हमारे बीच एक ऐसा संबंध था जो व्यवसायिकता के साथ भावनात्मक भी था। हम दोनों एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते थे।
अबतक आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह कामिनी एक प्रतिष्ठित संस्थान में उपप्रबंधक के पद तक पहुंची। उसने परित्यक्त और असहाय वृद्धों के लिए स्वर्गीय नानाजी के नाम पर “स्व.माधव सिंह वृद्धाश्रम” खोल लिया था जहां रहने वाले वृद्धों की सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखा जाता था। उन्हें बिल्कुल भी इस बात का अहसास नहीं होने दिया जाता था कि वे परित्यक्त और असहाय हैं। उनमें से तीन लोग तो विकलांग भी हैं। एक का दाहिना पैर बचपन से लकवा ग्रस्त था जिस कारण, वह पैर छोटा रह गया था और नकारा हो गया था। एक का बांये हाथ की कलाई कोढ़ के कारण गल चुकी थी। इलाज के बाद कोढ़ तो ठीक हो गया मगर बांयें हाथ में ठूंठ केवल रह गया। एक का एक आंख नहीं था। बीस साल पहले चेचक के कारण उसे एक आंख से हाथ धोना पड़ा था। एक मानसिक रोगी था, जिसे मनोरोग चिकित्सालय से चिकित्सा के उपरांत इसी आश्रम में रख लिया गया था क्योंंकि उसके रिश्तेदारों का अता पता ही नहीं था। बाकी ऐसे वृद्ध थे, या तो उनका कोई ठौर ठिकाना नहीं था, या परित्यक्त थे। एक वृद्ध को उनके घर से मार पीट कर घर से निकाल दिया गया था, जिनके बारे में मैं ने सुना था कि वे अपनी बहु पर गंदी नजर रखते थे। क्या सच था क्या गलत यह तो उस वक्त पता नहीं था किंतु उनकी दयनीय स्थिति देख कर उन्हें वृद्धाश्रम मेंं रख लिया गया था। इसी तरह सबकी अपनी अपनी कहानी थी। सभी बेसहारा थे। उनमें स्वावलंबन की भावना बनी रहे इस बात का भी पूरा ध्यान दिया जाता था। वे किसी न किसी कार्य में अपनी उपयोगिता साबित भी करते थे। बागवानी से लेकर गृह उद्योग तक में उनकी भागीदारी थी, जैसे फूलों के पौधों की देखरेख, सब्जियों की खेती, पापड़ बनाना इत्यादि। मैं जब वहां जाती तो सबसे मिलकर बहुत अच्छा लगता था। उनके बीच आपसी प्रेम और सहयोग देखते ही बनती थी। उनमें हिन्दू, मुस्लिम सिख, इसाई, सभी धर्म के लोग थे, जिनके बीच सौहार्दपूर्ण मधुर संबंध स्थापित हो चुका था। उनके लिए धर्म से ज्यादा आपसी प्रेम का महत्व सबसे ज्यादा था। वृद्धाश्रम की सारी व्यवस्था की देख रेख के लिए हरिया और करीम तो थे ही, उनकी सहायता के लिए और चार लोगों को नियुक्त कर रखा था, दो ससुराल से प्रताड़ित और उपेक्षित विधवा स्त्रियां करीब पैंतीस चालीस की उम्र के और एक युवक राजेश करीब तीस साल का, जो अविवाहित था और विवाह संबंध में उसकी कोई रुचि भी नहीं थी, सारा हिसाब किताब देखता था और एक आदमी रफीक, जो मुस्लिम था, संतान विहीन विधुर, करीब पैंतालीस साल का, मार्केटिंग देखता था। साफ सफाई मेंं, खाना बनाने में और भी अन्य कार्यों में सभी एक दूसरे का हाथ बंटाते थे और वे दो स्त्रियां, पानमती और कुनीबाई इन सब कार्यों में उनकी मदद किया करती थीं। इन चारों को काम पर रखने की भी अलग अलग रोचक घटनाएं थीं, जिनके बारे में मैं आगे बताऊंगी। ये चारों यहां के माहौल में रम गये थे, घुलमिल गये थे और यहां जितने भी लोग थे उनके आपसी संबंधों के बारे में जानकर, (खुले आपसी यौन संबंधों के बारे में भी) इन्हीं में से एक हो गए थे। ये भी बुजुर्गों से यौनाचार में बराबर शरीक हुआ करते थे। इन चारों को वृद्धाश्रम में काम पर रखने के पीछे की कहानियां भी कुछ कम रोचक नहीं हैं।
उन कहानियों से पहले मैं यह बता दूं कि कामिनी को वृद्धाश्रम खोलने की बात उसके दिमाग में कहां से आई। आईए हम इसके बारे मेंं जानने के लिए कामिनी की पिछली जिंदगी के पन्ने पलटते हैं और उसी के संस्मरण के रुप में सुनते हैं।—–
यूं तो सामान्यत: क्लाईंट्स के साथ सारे डील हमारी कुशल और प्रभावी प्रस्तुति से ही हो जाया करते थे, तथापि कुछ कुछ शौकीन मिजाज हवस के पुजारी क्लाईंट्स की कामलोलुप नजरें मेरी कमनीय देह पर चिपकी रहतीं थीं और डील को अंतिम रुप देने में बहाने बाजी करते थे। कारण स्पष्ट नहीं बता कर टाल मटोल करते थे। ऐसे किस्म के क्लाईंट्स अक्सर रस्मी तौर पर व्यवसायिक मीटिंग के पश्चात फाईनल एग्रीमेंट से पहले मुझसे व्यक्तिगत तौर से मिलने की ख्वाहिश जाहिर करते और जब मैं अकेले में उनसे बातचीत करती तो एग्रीमेंट की शर्त के तौर पर मेरे सामने हमबिस्तर होने का खुला प्रस्ताव रखते थे।
पहली बार जब एक ऐसे ही क्लाईंट से मेरा पाला पड़ा तो मुझे स्पष्ट तौर पर कुछ समझ नहीं आया, हालांकि उनकी नजरों में अपने लिए हवस की भूख अच्छी तरह देख सकती थी। शुरुआत सीधे तौर पर न हो कर मेरी अनभिज्ञता मेंं हुआ।
उनके साथ शुरूआती बातचीत कुछ इस प्रकार थी।
उन्होंने मेरे बॉस रिचर्ड साहब से कहा, “मैं इस डील पर ऊपरी तौर पर सहमत हूँ लेकिन इस पर हस्ताक्षर करने के पहले मैं इस प्रोजेक्ट का बारीकी से अध्ययन करना चाहता हूं और मैं चाहता हूं कि आप अपने असिस्टेंट के हाथों में शाम को होटल अशोका भेज दीजिए। मैं वहीं कमरा नं 10 में ठहरा हूं।”
“Do you have time in the evening Kamini? (कामिनी, क्या तुम्हारे पास समय है शाम को?)” बॉस ने प्रश्नवाचक दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए पूछा।
“Yes boss, I will manage to spare time for this. (जी हां सर, मैं इसके लिए समय निकाल लूंगी)” मैं तनिक झिझकते हुए बोली।
“OK, done Mr. Mehta, you will get the file in the evening today itself as your wish. (ठीक है मि. मेहता, आपको आज ही शाम आपकी इच्छा अनुसार फाईल मिल जाएगी।” बॉस ने कहा। सिर्फ मैं ओर मेहता जी ही
शाम को ठीक छ: बजे, जैसा कि तय हुआ था, मैं प्रोजेक्ट की फाईल लेकर होटल अशोका पहुंच गई। मैं ने गहरे नीले रंग की खूबसूरत शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी और उसी से मैच करती हुई लो कट ब्लाऊज। मैं दिल ही दिल में सशंकित भी थी। तनिक घबराहट भी थी, पहली बार मुझे किसी क्लाईंट से इस तरह अकेले कमरे में व्यवसायिक अनुबंध के लिए मिलना हो रहा था। वैसे भी मेहता जी की नजरों से और उनके हाव भाव से उनके के बारे में मेरे दिल में कोई अच्छी राय नहीं थी, किंतु मेरे लिए अनुबंध पर मेहता जी का हस्ताक्षर ज्यादा महत्वपूर्ण था, अतः मैं ने अपने मन से झिझक और घबराहट को झटक दिया और कमरा नं. 10 के दरवाजे पर दस्तक दी। कुछ ही पलों में दरवाजा खुला, मगर दरवाजा खोलने वाला मेहता जी के बदले कोई विशाल डील डौल शख्शियत वाला छ: फुटा, अर्द्धगंजा, कंजी आंखों और तोते जैसी नाक वाला, होंठों पर बड़ी ही भद्दी मुस्कुराहट लिए कोई अजनबी अधेड़ था। मैं असमंजस में थी, तभी पीछे से मेहता जी की आवाज आई, “अंदर आ जाईए कामिनी जी, ये राधेश्याम जी हैं, हमारे बिजनेस पार्टनर। इन्हें भी हमारे प्रोजेक्ट की डिटेल देखने के लिए मैंने बुलाया है।”
“ओह” मैं ने सिर्फ इतना ही कहा और अंदर आ गई। पीछे से उस व्यक्ति ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। अंदर मैं ने देखा बड़े से कमरे के एक तरफ लंबे सोफे पर मेहता जी बैठे हुए थे। उनके होठों पर भी कामुकता भरी मुस्कुराहट खेल रही थी। मैं तनिक असहज महसूस करने लगी।
मेरी झिझक को ताड़ कर मेहता जी ने कहा, “आप घबराईए मत, यहां आ कर सोफे पर रिलैक्स हो कर बैठ जाईए और अपनी फाईल सामने सेंटर टेबल पर रख कर हमें प्रोजेक्ट की बारीकियों को विस्तार से समझाईए। राधेश्याम जी आप भी आ जाईए।” कहकर उन्होंने मुझसे अपने दाहिने बगल में बैठने के लिए बुलाया। मैं झिझकते हुए उनके बगल में उसी सोफे पर थोड़ी सिमट कर बैठ गयी। इधर राधेश्याम जी भी उसी सोफे पर मेरी दाहिनी ओर आ कर बैठ गए। मैं और तनिक सिमट गई। अब मैं ने ज्यों ही फाईल खोला, राधेश्याम जी और मेहता जी मुझ से और सट कर बैठ गए, फाईल को ध्यान से देखने के बहाने। अभी मैं ने फाईल खोल कर बताना शुरू ही किया था कि राधेश्याम जी ने अपना बांया हाथ मेरी दांयी जांघ पर रख दिया।
मैं घबरा कर बोली, “राधेश्याम जी, यह आप क्या कर रहे हैं। अपना हाथ हटाइए यहां से।” मैं ने उनका हाथ हटाने की कोशिश की, किंतु उन्होंने हाथ हटाने की बजाय मेरी जांघ को सहलाना शुरू कर दिया।
“अरे उस फाईल को मारो गोली, हम तो पहले इस ‘फाईल’ को खोल कर ‘पढ़ेंगे’ फिर अपनी ‘कलम’ से ‘साईन’ करेंगे।” अपनी भोंड़ी आवाज में राधेश्याम जी ने कहा।
मैं हड़बड़ा कर उठने को हुई, तभी मेहता जी ने मेरी कमर पर हाथ डाल दिया और वासना से ओतप्रोत आवाज में बोले, “जाती कहाँ हो मेरी जान, हम दोनों पार्टनर जबतक अच्छी तरह से ‘इस खूबसूरत फाईल’ को नहीं पढ़ लेते, तब तक उस फाईल में हस्ताक्षर नहीं करेंगे। जब से तुझे देखा है, यह मेरा लंड है कि सो ही नहीं रहा है।” अब उन्होंने अपनी मंशा खुल कर जाहिर कर दी।
“देखिए मैं उस तरह की औरत नहीं हूं। प्लीज मेरे साथ ऐसा मत कीजिए।” मैं ने रुआंसी आवाज में विरोध जताया।
“तू किस तरह की औरत है उससे हमें कुछ लेना देना नहीं है। हमें तो सिर्फ इतना पता है कि तू एक खूबसूरत सेक्सी औरत है, जो खुद चल कर हमारे पास आई है और हम ठहरे खूबसूरत औरतों के रसिया, हम तुम्हें ऐसे ही कैसे जाने दें।” बोलते हुए राधेश्याम जी अपने थूूूथन से मेेेरे गालोंं पर चुुंबनों की बौछार करने लगे। इसी दौरान उन्होंने जबरदस्ती मेरी साड़ी को घुटनों से ऊपर उठा दिया और मेरी योनी पर पैंटी के ऊपर से ही हाथ रख दिया। मैं चिहुंक उठी। मैं दोनों हवस के पुजारियों के बीच सैंडविच बनी कसमसाती रह गई।
“प्लीज मुझ पर रहम खाईए। मुझे छोड़ दीजिए ना।” मैं मरी सी आवाज में बोली। अब अंदर से मेरा विरोध कमजोर होता जा रहा था लेकिन बाहरी तौर पर विरोध जारी था। “मैं शरीफ घर की एक शरीफ औरत हूं, मुझे बरबाद मत कीजिए प्लीज।”
“अरे बावली, हम तुझे कहां बरबाद कर रहे हैं। खुद मजे ले और हमें भी मजे लेने दे। तेरी जैसी खूबसूरत औरत तो हम मर्दों को मजे देने और खुद मजे लेने के लिए बनी है।” कहते हुए मेहता जी नें मेरी साड़ी का पल्लू गिरा कर मेरे ब्लाऊज के ऊपर से ही मेरे कसे हुए उन्नत उरोजों को बेदर्दी से मसलना शुरू कर दिया। धीरे धीरे वे मुझ पर छाते जा रहे थे। उनकी कामुक हरकतों से अब मैं भी उत्तेजित होने लगी थी किंतु दिखावे के लिए मैं छटपटाती रही, कसमसाती रही, विरोध का नाटक करती रही।
“मैं चिल्लाऊंगी, छोड़िए मुझे प्लीज।” मैं परकटी पंछी की तरह असहाय उन वहशियों के चंगुल से निकलने की व्यर्थ कोशिश करती हुई बोली।
“चिल्लाओगी, चिल्लाओ साली हरामजादी,” कहते हुए दानव राधेश्याम जी ने मुझे सोफे पर ही पटक दिया और मेरे ऊपर सवार हो गया।
“इस साऊंड प्रूफ कमरे से बाहर तुम्हारी आवाज किसी को सुनाई भी नहीं पड़ेगी। चुपचाप हमारा साथ दे।” मेहता जी गुर्राए। मेरे शरीर से खिलवाड़ करते हुए वे भी एक एक करके अपने वस्त्रों से मुक्त होते गए। उन दोनों ने मेरे विरोध की परवाह किए बगैर मेरी साड़ी उतार दी, मेरे पेटीकोट का नाड़ा, जो कि खुल नहीं रहा था, राधेश्याम जी ने एक ही झटके में तोड़ डाला और पेटीकोट को एक तरफ उतार फेंका। उसी तरह आनन फानन में मेहता जी ने मुझे ब्लाऊज से मुक्त कर दिया। अब मैं सिर्फ पैंटी ओर ब्रा में थी। उस अवस्था में मेरी संगमरमरी काया को देख कर उनकी आंखें फटी की फटी रह गयीं।
“वाह मेहता जी क्या माल है। तेरी पसंद की दाद देता हूँ। कसम से मजा आएगा आज।” कहते हुए राधेश्याम जी ने मेरी पैंटी भी खींच ली। उत्तेजना के मारे मेरा बुरा हाल था लेकिन मैं ने बनावटी लज्जा से अपनी जांघें सटा लीं। राधेश्याम जी ने जबर्दस्ती मेरी जांघों को अलग किया और मेरी चिकनी फकफकाती और पनिया उठी योनी को देख कर मुस्कुरा उठा। “अहा, मेहता जी, इसकी चूत तो चुदने के लिए पहले से पानी छोड़ने लगी है। साली रंडी, झूठ मूठ के नखरे कर रही थी मां की लौड़ी।” राधेश्याम जी लार टपकाती आवाज में बोले। मेरी हालत बहुत बुरी थी। अपनी उत्तेजना को छिपाने की सारी कोशिशें बेकार हो गयी थीं। मेरी गीली योनी मेरी दशा की चुगली कर रही थी। इधर मेरे उन्नत उरोजों को भी अब तक मेहता जी ब्रा के बंधन से मुक्त कर चुके थे। अब मैं पूर्णतया नग्न हो चुकी थी। इधर ये दोनों कामुक भेड़िये भी अपने वस्त्रों से मुक्त हो चुके थे। गजब का नजारा था। जहां ठिंगने कद के मोटे ताजे, गोरे चिट्टे मेहता जी की जुबान से लार टपक रही थी वहीं उनका छ: इंच लंबा किंतु तीन इंच मोटा लिंग फनफना कर मेरी योनी में तहलका मचाने को बेताब लार टपका रहा था। उधर राधेश्याम जी तो ऐसा लग रहा था जैसे कोई कई दिनों का भूखा काला भुजंग दानव अपने स्वादिष्ट भोजन को अपने सम्मुख पा कर नोच डालने को बेताब हो। उनका काला मोटा ताजा किसी सुमो पहलवान की तरह विशाल तोंद वाला भयावह शरीर और सामने झूलते अपने 10″ लंबे और चार इंच मोटे टनटन करते लिंग का दर्शन करके मेरी तो घिग्घी बंध गई थी। बहुत बुरी फंसी थी मैं। हालांकि मैं इससे पहले मैं कई अलग अलग लोगों के साथ अकेले या सामुहिक रुप से संभोग का लुत्फ ले चुकी थी लेकिन इस समय इस तरह की परिस्थिति में मैं खुद को पहली बार पा रही थी जब अपने व्यवसाय से सम्बंधित मुलाकात में क्लाईंट्स की कुत्सित इच्छा की पूर्ति के लिए मुझे मजबूर होकर यह करना पड़ रहा था। अब जब बात यहां तक बढ़ चुकी थी तो खैर उन्हें तो अपनी मनमानी करनी ही थी, मैं तनिक आतंकित होते हुए भी खुद को अंदर ही अंदर तैयार कर रही थी, अपने साथ होने वाले इस वासनात्मक खेल के लिए। सशंकित भी थी कि पता नहीं वे किस तरह से मेरे शरीर का उपभोग करेंगे।
“हाय राम, आपलोग मुझे कहीं की नहीं छोड़िएगा। मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगी। प्लीज मुझे खराब मत कीजिए।” यह प्रात्यक्षतः एक प्रकार से अंतिम आर्त निवेदन था। मैं भी कम ड्रामेबाज नहीं थी। मैं ने रोना शुरू कर दिया और मेरी आंखों से झर झर आंसुओं की धार बहने लगी। आंतरिक रूप से तो अब तक मैं चुदने के लिए पूर्ण तैयार हो चुकी थी।
“नखरे मत कर साली हरामजादी। देख तेरी चूत, इतनी बड़ी और फूली हुई। पता नहीं कितने लोगों से चुद चुकी है बुरचोदी। हम तुम्हें क्या खराब करेंगे। तेरी चूत तो चुदने के लिए पहले ही गीली हो चुकी है” राधेश्याम जी खौफनाक लहजे में बोल पड़े। इतना कह कर उन्होंने मेरे पैरों को फैला दिया और अपना लपलपाता लिंग मेरी योनी द्वार पर टिका दिया। अब विरोध का नाटक व्यर्थ था। मैं गनगना उठी। “ले मेरा लौड़ा अपनी चूत में, हुम्म्म।” कह कर एक करारा जल्लादी प्रहार कर दिया।
“हाय मर गई मां, उफ्फ्फ” मेरी हाय निकल गई। उनका पूरा लिंग एक ही धक्के में पूरा का पूरा मेरी योनी में ठुंक गया। मुझे उसी अवस्था में किसी खिलौने की तरह उठा कर खड़ा हो गया और तभी पीछे से मेहता जी मेरी गुदा पर हमला बोल बैठे। पहले उन्होंने मेरी गुदा का द्वार अपनी जीभ से जी भर कर चप चप चाटा।
“छि:, यह क्या कर रहे हैं मेहता जी” मैं राधेश्याम जी की बांहों में छटपटाती हुई बोली।
अभी मैं ने इतना ही कहा था कि “अब ले मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में साली रंडी, हुम्म्म आह्ह्ह्ह्ह,” दन से मेहता जी ने अपना लिंग मेरी लसलसाई गुदा में उतार दिया।
“आह्ह्ह्ह्ह” मेरी आह निकल पड़ी। मेहता जी अपने पैरों के नीचे दो कुशन को रख कर खड़े थे। बस अब शुरू हो गया मेेेरे शरीर के साथ उनकी मनमानी। पीछे से मेहता जी मेरी गुदा के मैथुन में लीन हो गए और अपने हाथों से मेरी चूचियों को बुरी तरह नोच खसोट रहे थे, दबा रहे थे और मेरी गर्दन और कंधों को चूम रहे थे।
“उफ्फ्फ साली की गांड़ कितनी मस्त है राधे, ओह्ह्ह्ह बहुत मजा आ रहा है भाई” कहते हुए धकाधक चोदने लगे।
“अरे यार मेहता जी, इसकी इतनी बड़ी चूत भी सिर्फ देखने में बड़ी है, साली कुतिया की चूत है बड़ी टाईट। ओह्ह्ह्ह ऐसा लग रहा है जैसे इसकी चूत मेरा लौड़ा चूस रही है।” कहते हुए राधेश्याम जी भी अपनी पूरी शक्ति से जकड़े मुझे हवा में उठाए हुए ही फचाफच चोदने लगे। करीब पांच ही मिनट में मैं एक लंबी आह के साथ झड़ गई। मेरे ढीले पड़ते शरीर को अपनी पकड़ से ढीला नहीं होने दिया कमीनों ने। लगे रहे भूखे भेड़ियों की तरह नोचने खसोटने। करीब उसके दस मिनट बाद मैं फिर भयानक थरथराहट के साथ झड़ने लगी। मेरी स्थति से अनभिज्ञ नहीं थे वे माहिर चुदक्कड़। लगे रहे। करीब पच्चीस मिनट बाद जाकर पहले मेहता जी फचफचा कर अपना वीर्य मेरी गुदा में भरने लगे और खलास होते ही सोफे पर धम से गिर कर लंबी लंबी सांसे लेने लगे। मेहता जी के अलग होते ही राधेश्याम जी मुझे लिए दिए बिस्तर पर चले गए और पूरे जोश खरोश और पूरी निर्ममतापूर्वक मेरे नग्न देह का मर्दन करने लगे। मैं अपनी पूरी क्षमता से उनके मोटे कमर के ईर्दगिर्द अपने पैरों को लपेटे उनकी कामक्षुधा को शांत करने का भरपूर प्रयास करती रही।ठाप का जवाब ठाप से देने लगी। मस्ती में मैं भी सराबोर हो चुकी थी अब। पागलपन मुझपर भी सवार हो चुका था।
“हाय ओह्ह्ह्ह राजा, उफ्फ्फ मेरी मां, आह आह,” बरबस मेरे मुह से आनंदमयी सिसकारियां निकल रही थीं।
“हुम्म्म्म्मा्ह्ह्ह्ह आह, देखा साली रंडी, आ रहा है न मजा, बोल रही थी खराब मत कीजिए, बुरचोदी, अब बता, छोड़ दें तुझे अभी।” कमीना बोला।
तड़प कर मैं पूरी बेशर्मी के साथ बोली, “हाय नहीं, अभी नहीं मादरचोद, अभी नहीं, प्लीज चोदिए राजा ओह्ह्ह्ह मेरे चोदूजी, मेरे लंडराजा आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह।”
चोद चोद कर निढाल थका मांदा मेहता भी हमारी बात सुनकर ठठाकर हंसने लगा। इसके कुछ ही पलों के बाद, यानी कुल मिला कर आधे घंटे तक धुआंधार चुदाई के पश्चात राधेश्याम जी ने मुझे कस कर अपने राक्षसी शरीर से चिपका लिया और फचफचा कर करीब डेढ़ मिनट तक स्खलित होते रहे। “आह्ह्ह्ह्ह मेरी रानी, ओह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह” उसी दौरान मैं भी तीसरी बार झड़ने लगी, “आह उऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ मा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह” अद्भूत, अनिर्वचनीय।
जो भी हुआ, जैसा भी हुआ, उन्होंने मेरे तन से जी भर के आनंद उठाया और मुझे भी खूब आनंदित किया। दो घंटे में दो बार दोनों ने संभोग किया। वीर्य से लिथड़े लिंग को मेेेरे मुह से साफ करवाया। मैं ने भी बड़े प्यार से चाट चाट कर उनके लिंग को साफ किया। उसी नंग धडंग अवस्था में मुझे अपनी गोद में बिठाकर उन्होंने अनुबंध पर हस्ताक्षर किया। वे मेरी कमनीय काया का भोग लगा कर पूरी तरह संतुष्ट हुए और मेरा तो कहना ही क्या। उन्होंने मुझे अपनी कामपिपासा शांत करने का एक और रास्ता दिखा दिया। नौकरी का नौकरी और मजा का मजा। उस चुदाई क्रिया से निवृत्त हो कर हमने अपनी हुलिया दुरुस्त की, फिर मुझसे फिर मिलते रहने का वादा ले कर मुझे विदा किया। उस समय रात का नौ बज रहा था।
उस दिन होटल अशोका में हरीश मेहता और राधेश्याम जी से जो डील फाईनल करके मैं आई थी वह पच्चीस लाख का था। वह डील उनके ट्रांसपोर्ट बिजनेस को बढ़ाने के संबंध में था। हमने उसकी पूरी रूपरेखा, आर्थिक सहायता के लिए ऋण उपलब्ध कराने एवं कार्य में किसी प्रकार की कानूनी अड़चनों से महफूज रखने संबंधी सारा प्रवधान शामिल किया था। उस डील से उन्हें जो लाभ होना था वह अलग बात थी, इधर जो तत्कालिक ‘लाभ’ मेहता जी और राधेश्याम जी हासिल किया, उससे ही वे बेहद खुश थे। मैं भी अपनी सफलता पर बेहद खुश थी। डील हासिल करने की खुशी के साथ साथ अपनी वासना की भूख मिटाने का नया मार्ग पाने की खुशी और इस तरीक़े से अपने कार्य के नये मनोरंजक ढंग से सफलतापूर्वक अंजाम देने की अपनी क्षमता पर गर्व भी था। इससे मेरे आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई।
दूसरे दिन जब मैं ऑफिस गई तो मेरी सफलता पर बॉस बेहद खुश हुए कि मैं ने कुशलता पूर्वक क्लाईंट्स को हमारे प्लान पर सहमत किया और यह अनुबंध हासिल किया। “Congratulations baby. You deserve a treat for this success. (बधाई हो बेबी। इस सफलता के लिए तुम्हें एक पार्टी बनती है)” उन्होंने मुझे बधाई दी और अपनी ओर से होटल सनशाइन में डिनर पार्टी का आयोजन किया, जिसमें ऑफिस का मेरा एक सहयोगी कमलेश और एक मैनेजर शेखर सिन्हा जी शामिल थे। उन्हें क्या पता था कि इस सफलता के लिए मैं ने क्या कीमत अदा की। खैर यह और बात है कि जो भी कीमत मैं ने अदा की उसका मुझे तनिक भी मलाल नहीं था बल्कि इसके उलट मैं ने खुद भी इस पूरी प्रक्रिया के दौरान सुखद अनुभव और आनंद प्राप्त किया। यह तो शुरुआत थी। इसके बाद फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कई डील मैं ने इस तरह सम्पन्न करने में अपना योगदान दिया। मेरी मुलाकात अक्सर मेहता जी एवं राधेश्याम जैसे क्लाईंट्स से होती थी। मैं आज तक कई क्लाईंट्स के साथ हमबिस्तर हुई और डील फाईनल करने में सफल रही। मैं हमेशा इस बात का ख्याल रखती थी कि क्लाईंट्स को यह अहसास न हो कि मैं सस्ती किस्म की औरत हूं। प्रथम भेंट में मैं ने हमेशा यही जाहिर किया कि मैं एक शरीफ औरत हूं और सिर्फ क्लाईंट्स की खुशी के लिए मजबूरी में उनकी अंकशायिनी बनने को विवश हूं। अपने व्यवसायिक कार्य के सिलसिले में क्लाईंट्स की हवस पूर्ति हेतु अब अपने को समर्पित करने में मुझे अंदर से कोई झिझक नहीं होती थी। इसी तरह दिन प्रतिदिन सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गई। हां, किंतु प्राथमिकता मैं व्यसायिक लाभ को ही देती थी, क्लाईंट्स की कुत्सित कामक्षुधा शांत करते हुए अपनी देह की भूख मिटा लेना मेरे लिए अतिरिक्त लाभ था। मैं धीरे धीरे इस फन में माहिर होती जा रही थी। जो क्लाईंट्स रूप के रसिया थे, उनमें विभिन्न प्रकार के लोग थे। रूप रंग, शारीरिक बनावट और रुचि में भी भिन्न। कुछ तो विकृत सेक्स पसंद करने वाले भी थे। ऐसे लोगों से भी निपटना मैं सीख गई थी।
मेरी आवाज सुनकर जैसे उनका ध्यान भंग हुआ और उसी तरह मुस्कुराते हुए घरघराती आवाज मेंं बोले, “गुडमॉर्निंग मैडम। मेरा नाम रूपचंद है।”
यह सुनते ही मैं समझ गयी कि ये ही वे क्लाईंट हैं जिनके साथ मुझे मीटिंग करनी है। तपाक से मैं उठ खड़ी हुई और विनम्रता से बोली, “ओह आईए, यहां आपका स्वागत है।”
वे बोले, “मैं अपने इंडस्ट्री के एक्सपैंशन के सिलसिले में आपकी सेवा लेना चाहता हूं। सुना है आप का ऑर्गानाईजेशन इस मामले में काफी एक्सपर्ट है।”
मैं अब थोड़ी सामान्य हो गई और उनकी कामलोलुप नजरों और घटिया मुस्कान को नजरअंदाज कर पूरे पेशेवर अंदाज में बोली, “आपने बिल्कुल सही सुना है। हमारी संस्था इस प्रकार के मामलों में हर संभव मदद करती है और हमारा रेकॉर्ड है कि हमारे किसी भी क्लाईंट को आज तक हमसे कोई निराशा नहीं हुई। आईए बैठिए।” मैं ने अपने सामने की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। मेरी टेबल के दूसरी ओर तीन कुर्सियां खाली थीं, जिसमें से दो पर रूपचंद जी और उनके सहयोगी आसीन हो गए।
“हां तो अब अपने एक्सपैंशन प्लान के बारे में बताईये। प्रोडक्ट, कस्टमर्स, डिमांड बढ़ने की संभावनाओं के बारे में विस्तार से। जरूरत पड़ी तो हम साईट विजिट भी करेंगे।” मैं ने कहा।
इसपर उन्होंने अपने सहयोगी की ओर मुखातिब हो कर कहा, “ऋतेश, मैडम को हमारी कंपनी के बारे मेंं बताओ।” ऋतेश भी मेरे व्यक्तित्व के आकर्षण से अछूता नहीं था। इतनी ही देर में मैं ने महसूस किया कि उसकी तीक्ष्ण दृष्टि मेरे अंग प्रत्यंग को मेरे कपड़ों के ऊपर से ही भेदती हुई मुआयना कर रही है। उसकी दृष्टि की ताब न ला सकी मैं और तनिक संकोच का अनुभव करने लगी। उसने जब बोलना आरंभ किया तो उसकी धीर गंभीर आवाज ने मुझे सम्मोहित कर लिया। एक तो उसका आकर्षक व्यक्तित्व, उसपर उसकी ठहरी हुई गंभीर आवाज और बोलने का अंदाज मुझे प्रभावित कर गया। उसकी आवाज में गजब का आकर्षण था। बोलते वक्त उसकी नजरें मेरे चेहरे पर ही टिकी हुई थीं। ऐसा लग रहा था मैं भीतर ही भीतर पिघल रही हूं। उसकी नजरों में पता नहीं ऐसा क्या था या ऐसी अपील थी कि मेरे शरीर में रक्त संचार की गति बढ़ने लगी। वही आदमजात शरीर की प्राकृतिक भूख, पुरुष संसर्ग की, मेरे अंदर जागने लगी। मैं उस दिन स्कर्ट ब्लाऊज में थी। मेरे उरोज लो कट बिना बांहों के ब्लाऊज में सख्त होने लगे, चुचुक खड़े हो गए। ऐसा लग रहा था मानो दो कबूतरियां कसे हुए ब्रा और ब्लाऊज के पिंजरे से तड़प कर बाहर निकल पड़ने को बेताब हों। मैं ने अपनी दोनों जांघों को कस कर सटा लिया लेकिन कुछ ही मिनट बाद मैं अपनी कुर्सी पर ही कसमसा कर जांघ पर जांघ चढ़ा कर बैठने को मजबूर हो गई। मेरी योनी पैंटी के अंदर फकफक करती हुई लसलसा पानी छोड़ने लगी, नतीजतन मेरी पैंटी के सामने का हिस्सा भीग गया। मेरी स्थिति से धूर्त रूपचंद और ऋतेश अनभिज्ञ नहीं थे। रूपचंद जी के हाव भाव से ऐसा लग रहा था मानो अगर उनका वश चलता तो वहीं पटक कर मुझे भोगने लग जाते। ऋतेश काफी धैर्यवान लग रहा था, सबकुछ समझते हुए भी सिर्फ हौले हौले मुस्कुराते हुए अपनी बात रखता जा रहा था। बीच बीच में मैं रोक कर कुछ सवालों द्वारा जानकारी लेती जा रही थी लेकिन मेरी आवाज मेंं मेरी जुबान की हल्की लड़खड़ाहट मेरी स्थिति की चुगली कर रही थी। जब ऋतेश अपनी बात पूरी करने ही वाला था कि उसी वक्त मेरे बॉस आ गये।
“Sorry Mr. Roopchand, I’m joining late in this meeting (माफ कीजिएगा रूपचंद जी, मैं इस मीटिंग में देर से शामिल हो रहा हूँ)” उन्होंने कहा।
“It’s OK. We are about to finish describing about our expansion plan. If you wish, I can explain again, (कोई बात नहीं। हम अपने औद्योगिक विस्तारीकरण योजना के बारे में बताना समाप्त करने ही वाले थे। अगर आप चाहें तो मैं दुबारा बता सकता हूँ।)” ऋतेश ने कहा।
“No need to repeat again. Kamini is competent enough to handle any project. Anyway if I feel necessary, I can get details from Kamini. You carry on. (दुहराने की कोई आवश्यकता नहीं। कामिनी किसी भी प्रोजेक्ट को संभालने के लिए सक्षम है। फिर भी अगर मुझे आवश्यक लगा तो मैं कामिनी से जानकारी ले लूंगा। आप जारी रखिए।)” उन्होंने कहा।
पूरी बातें तो करीब करीब हो ही चुकी थीं और बॉस के आ जाने के बाद माहौल भी तनिक बदल गया था अतः मैं भी सहजता पूर्वक बोली, “रूपचंद जी, वैसे तो मैं आपके उद्योग के बारे मेंं काफी अच्छी तरह जान चुकी हूं और उसे किस तरह से आगे बढ़ाना है इसके बारे में मैं बॉस और हमारी टीम की एक मीटिंग करना चाहती हूं ताकि एक्सपैंशन के सम्बंध में हम एक अच्छी योजना तैयार कर सकें।” कहकर मैं ने बॉस की ओर समर्थन के लिए देखा।”
“Yes Kamini, you are right. Fix a meeting at 3:00 O’clock evening. We will discuss and finalize the plan. Mr. Roopchand, we will let you know about our plan today evening itself. If you like it then we will work on it and our final lay out of the plan will be ready by the end of this week. (हां कामिनी, तुम सही हो। आज शाम तीन बजे एक मीटिंग बुलाओ। हम उस पर विचार विमर्श करके योजना को अंतिम रूप देंगे। मि. रूपचन्द जी, हम आज ही शाम तक आपको योजना के बारे में जानकारी दे देंगे। अगर आपको हमारी योजना पसंद आई तो हम उसपर काम करेंगे और योजना की अंतिम रूपरेखा इसी सप्ताह के अंत तक तैयार हो जाएगा)”
“ठीक है हमें मंजूर है” रूपचंद जी ने कहा, फिर मेरी ओर अर्थपूर्ण नजरों से देखते हुए कहा, “योजना की अंतिम रूपरेखा के बारे में हमें विश्वास है कि आप जो भी तैयार करेंगे वह बढ़िया ही होगा लेकिन आज आप का जो मोटा मोटी प्रारूप तैयार होगा वह कामिनी के हाथों होटल राज में भेज दीजिएगा। हम वहीं देख भी लेंगे और समझ भी लेंगे।”
“Will you get some time to do this Kamini? You can explain better. (क्या तुम समय निकाल कर यह काम कर दोगी कामिनी? तुम अच्छी तरह समझा सकती हो)” बॉस ने मुझसे पूछा।
“It’s ok sir” मैं बोली। हालांकि मुझे आभास था कि मेेेरे साथ क्या होने वाला है लेकिन ऋतेश के सम्मोहन में बंधी हां कर बैठी। शाम को पूर्व निर्धारित समय के अनुसार 6:00 बजे मैं ने, हमारी मीटिंग में हमने जो निर्णय किया था, उसकी फाईल ले कर होटल राज के कमरा नं 5 (जैसा कि उन्होंने बताया था) के दरवाजे पर दस्तक दी। तुरंत ही दरवाजा खुला और ऋतेश ने, जो कि पजामे और कुर्ते में था, मुझे देखकर अर्थपूर्ण मुस्कुराहट के साथ मेरा स्वागत किया और सामने सोफे की ओर इंगित करते हुए बैठने का आग्रह किया। उसकी भेदती नजरों ने मेेेरे दिल की धड़कन बढ़ा दी। मैं धड़कते दिल के साथ सोफे पर बैठ गई। कमरे में मुझे ऋतेश अकेला ही दिखा। मेेेरे अंदर आते ही ऋतेश ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। अभी मैं सोफे पर बैठी ही थी कि ऋतेश भी आ कर मेेेरे बगल में बैठ गया और मेरे हाथों से फाईल ले कर देखने लगा। मैं योजना की रूपरेखा के बारे में बताती गई जिसे ऋतेश सुनता जा रहा था और बीच बीच में सवाल भी करता जा रहा था। मैं उसके हरेक सवाल का जवाब देती गई और अंततः ऋतेश संतुष्ट हुआ। इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई और दरवाजा खुलने पर रूपचंद जी का चौखटा नजर आया।
“ऋतेश, तूने सब कुछ देख लिया ना?” आते ही रूपचंद जी ने सवाल किया।
“हां सर, वैसे तो इनकी योजना काफी प्रभावशाली है, देखते हैं योजना की अंतिम रूपरेखा क्या होती है।” ऋतेश ने कहा।
“अंतिम रूपरेखा कैसी होगी वह बाद की बात है। फिलहाल तो हमें इसकी रूपरेखा ही दिखा दे।” अभी रूपचंद जी की बात खत्म हुई ही थी कि ऋतेश बिना किसी पूर्वाभास दिए ही मुझे अपनी बांहों में दबोच लिया और मुझ पर चुंबनों की झड़ी लगाने लगा, बिल्कुल मशीनी अंदाज में। मैं इस आकस्मिक हमले के लिए तैयार नहीं थी। उसके मजबूत बांहों में कैद हो कर रह गई और छटपटाने लगी।
“छोड़ो मुझे छोड़ो, यह क्या करते हो?” मैं छटपटते हुए बोली।
“छोड़ देंगे मेरी जान, लेकिन पहले तेरी रूपरेखा तो देख लें। रूपरेखा देखने के बाद तेरी जवानी का रस भी चख लें। देखें तो तू हमें खुश कर सकती है कि नहीं।” कहते हुए रूपचंद जी का भोंड़ा चेहरा और भी वीभत्स हो उठा।
“देखिए मैं उस तरह की औरत नहीं हूं। प्लीज मुझे छोड़ दीजिए।” अंदर ही अंदर ऋतेश की बांहों में पिघलती हुई मेरा विरोध जारी रहा।
“बंद कर अपनी बकवास। हमें खूब पता है तू किस किस्म की औरत है। ऑफिस में ही हमने तेरी हालत देख ली थी साली छिनाल। खुशी खुशी मान जा वरना वैसे भी तू यहां से बिना चुदे तो जाने से रही।” रूपचंद जी अब खुंखार हो उठे थे। ऋतेश तो लगा हुआ था मुझे हर तरह से उत्तेजित करने के लिए। वह मुझे चूमते हुए ब्लाऊज के ऊपर से ही मेरे उरोजों को मसलना चालू कर दिया था।
ऋतेश जहां मुझे अपनी मजबूत बांहों में जकड़े हुए कपड़ों के ऊपर से ही मेरे अंग प्रत्यंग से खिलवाड़ करता जा रहा था वहीं रूपचंद जी सामने बेड पर बैठ कर ऋतेश का उत्साह वर्धन कर रहे थे। “अच्छी तरह से गरम कर साली को ऋतेश, फिर इसे ऐसे चोदेंगे कि यह भी क्या याद करेगी।”
“आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह मां, छोड़िए ना मुझे प्लीज। देखिए मुझे खराब मत कीजिए, मैं आप लोगों के पांव पड़ती हूं। मैं बरबाद हो जाऊंगी। प्लीज मुझे जाने दीजिए।” मैं अब तक गरम हो चुकी थी लेकिन मुझे भी शराफत का ढोंग तो करना ही था। मेरी योनी पानी छोड़ने लगी थी और पैंटी योनी के लसलसे द्रव्य से भीग चुकी थी। मेरे उरोज उत्तेजना के मारे सख्त हो कर तन गए थे।
“आह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह, मार ही डालोगे क्या? अब …..” मैं बेसाख्ता बोल पड़ी।
अभी मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि रूपचंद जी बोल पड़े, “अब क्या? तू तो अभी से मरने की बात कर रही है, पहले मेरा लौड़ा खड़ा तो होने दे फिर दिखाता हूं तुझे चुदाई का जलवा। ले साली मेरा लंड अपने मुह में और चूस चूस कर खड़ा कर दे।” इतनी देर में रूपचंद पूरे निर्वस्त्र हो कर कब हमारे पास आ पहुंचे थे मुझे पता ही नहीं चला। मैं ने चौंक कर सामने देखा, उनका जिस्म उनके चेहरे की तरह ही बेढब और बेडौल था। ठिंगना होने के साथ ही साथ विकराल तोंद और पूरा शरीर रीछ की तरह बालों से भरा हुआ। जहां ऋतेश के गठे हुए कसरती शरीर और उसके मजबूत बांहों के बंधन में मुझे अद्वितीय सुख का अहसास हो रहा था वहीं रूपचंद के नग्न शरीर को देखकर किसी का भी मन वितृष्णा से भर जाता, किंतु मेरी स्थिति ऋतेश ने ऐसी कर दी थी कि अब मैं सिर्फ पुरुष संसर्ग के लिए मरी जा रही थी। वह पुरुष, कैसा है, मोटा, पतला, सुंदर, कुरूप, बेढब या लंगड़ा लूला, मुझे परवाह नहीं था। सामने से रूपचंद का लिंग सोई हुई अवस्था में ही करीब छ: इंच लंबा झूल रहा था। ऐसा लग रहा था मानो कोई सांप सोया हुआ है और उसके ऊपर झुर्रियों भरा चमड़े का आवरण ऐसा लग रहा था मानो कोई सांप अपनी केंचुली छोड़ने वाला हो। उनका अंडकोश भी काफी बड़ा था करीब आधा किलो के जैसा। इसके विपरीत ऋतेश अब तक पूरे वस्त्रों में था। वह मेेेरे साथ जो कुछ कर रहा था वह बिल्कुल मशीनी अंदाज में था, बिल्कुल भावहीन, एकदम किसी हुक्म के गुलाम रोबोट की तरह। अब मुझे ऋतेश से खीझ होने लगी थी। इतनी देर में तो कोई भी पुरुष अपना संयम खो कर मेरी मदमाती काया पर टूट पड़ता। पता नहीं किस मिट्टी का बना था वह, मर्द भी था कि नहीं। तब उस समय ऋतेश के आश्चर्य का पारावार न रहा जब उतावलेपन में मैं ने एक झटके से अपने को उसके मजबूत बंधन से आजाद किया और किसी भूखी कुतिया की तरह रूपचंद जी के सोये हुए छ: इंच लिंग पर टूट पड़ी और गप्प से अपने मुंह में ले लिया। फिर मैं लग गई जी जान से उनके लिंग को चपाचप चूसने ताकि वह जल्द से जल्द खड़ा हो सके और मेरी प्यासी योनी की धधकती ज्वाला को बुझा सके।
मेरे उतावलेपन को देख कर रूपचंद जी खुशी के मारे बोले, “वाह रे साली सती सावित्री की औलाद, आ गई ना रास्ते में। साली शरीफ औरत की चूत। चूस मेरा लौड़ा, मजे से चूस, फिर मैं दिखाता हूँ तुझे इस लौड़े का कमाल। आह ओह कितनी मस्त है रे तू। सच में तुझे चोदने में बड़ा ही मजा आएगा” कहते हुए एक हाथ से मेरी चूचियां सहलाने लगे और दूसरे हाथ से मेरे गुदाज चिकने नितंबों को सहलाने लगे। करीब दो मिनट बाद ही मैंने महसूस किया कि रूपचंद जी का लिंग सख्त हो रहा है, बड़ा हो रहा है, लंबा हो रहा है और मोटा भी। अगले एक मिनट बाद तो मैं उनके लिंग को मुंह में रखने में असमर्थ हो गई। जैसे ही मैं ने उनके लिंग को चूसना छोड़ कर मुह से निकाला मैं चौंक उठी। हे भगवान! इतना भयावह और दहशतनाक मंजर था। मेरे चेहरे के सामने करीब साढ़े ग्यारह इंच लंबा और करीब चार इंच मोटा किसी काले सांप की तरह फनफनाता रूपचंद जी का अमानवीय लिंग मेरे मुह के लार से लिथड़ा, अपने पूरे जलाल के साथ झूम रहा था। कोई कितनी भी बड़ी छिनाल हो, ऐसे लिंग का दीदार ही काफी था भयभीत करने के लिए। मैं कोई अपवाद तो थी नहीं, उस दहशतनाक मंजर को देख कर मेरी भी घिग्घी बंध गई।
“हाय राम, इत्ता बड़ा!” मेरे मुंह से अनायास निकल पड़ा। मैं दो कदम पीछे हट गई।
“डर मत पगली, बाकी औरतों की बात और है, मेरा लंड देख कर ही भाग जाती हैं। जिन्हें मैं ने चोदा, उनकी चूत फट गई, फिर कभी मेेेरे पास दुबारा नहीं आई कोई। मगर तू घबरा मत, तुझमें दम है। तेरी चूत ठीक मेरे लौड़े के लिए ही बनी है। तेरे जैसी चूत को मेरे जैसे लौड़े की ही जरूरत है। तू एक बार चुद के देख, कसम से बार बार चुदवाना चाहोगी।” रूपचंद जी मुझे डरा रहे थे कि हौसला बढ़ा रहे थे, मुझे समझ नहीं आ रहा था।
“नहीं नहीं प्लीज मैं मर जाऊंगी।” मैं घबरा कर बोली।
तभी, “चल साली कुतिया, सामने जा रूपचंद जी के, खूब मजा करेगी” कहते हुए अचानक पीछे से ऋतेश ने मुझे एक धक्का दिया और मैं अपना संतुलन खो कर सामने गिरने लगी कि रूपचंद जी ने मुझे थाम लिया।
मैं ऋतेश पर विफर पड़ी, “साले नामर्द, खाली औरत को गरम करना जानते हो। मर्द हो खाली देखने में ही। मुझ पर ताकत दिखा रहे हो हिजड़े कहीं के।”
“अरे उस पर क्यों बिगड़ती हो मेरी जान, वह सही में हिजड़ा है। हट्ठा कट्ठा खूबसूरत हिजड़ा। मेरे लिए माल पटाता है। जिस दिन कोई माल नहीं मिला उस दिन मैं उसकी गांड़ चोद कर काम चला लेता हूँ। तुम औरतों से बढ़िया गांड़ है इसका। लंड भी बहुत बढ़िया चूसता है साला। अभी देख लेना, जब मेरा भाई आएगा तब इसकी करामात।” रूपचंद जी मुझे सख्ती से थामे हूए मुझे बोल ही रहे थे कि कॉल बेल बज उठा। ऋतेश तपाक से दरवाजे की ओर लपका। कुछ ही पलों में मेरे सामने एक और रूपचंद खड़ा मुस्कुरा रहा था। दो दो रूपचंद। कद में रूपचंद जी से थोड़ा कम करीब सवा चार फुट का था, चेहरे की बनावट एक ही तरह की थी किंतु रंग बिल्कुल काला। हां उनके चेहरे पर रूपचंद जी की तरह चेचक का दाग नहीं था। मैं हैरान, अवाक देखती रह गई।
“वाह भाई, इतना मस्त माल मिली कहाँ से? लगता है आसमान से कोई हूर उतर आई हो।” ज्ञानचंद बोला। बोलने का अंदाज भी रूपचंद की तरह ही था।
“किस्मत से भाई किस्मत से। आजा भाई तू भी शामिल हो जा। कामिनी मेरी जान, यह है मेरा जुड़वा भाई ज्ञानचंद। यूं ताज्जुब से मत देख। हम दोनों भाई जिस तरह से बिजनेस पार्टनर हैं उसी तरह कोई भी चीज हम दोनों भाई मिल बांट कर खाते हैं। आज भी हम दोनों भाई मिलकर तुझे जन्नत की सैर कराएंगे।” रूपचंद जी मुस्कुराते हुए बोले। ज्ञानचंद अपने भाई का आमंत्रण भला कैसे ठुकरा सकता था। उसका स्वभाव अपने भाई से अलग थोड़ी ही था। उसका मुझे देखने का अंदाज ठीक अपने भाई की तरह ही था, आंखों में वही वासना की भूख, शिकारी कुत्ते की तरह आंखों में चमक, मुह से लार टपकती। आनन फानन में वह भी मादरजात नंगा हो गया। ओह भगवान, बदन बिल्कुल अपने भाई की तरह गोल मटोल, रीछ की तरह बालों से भरा हुआ। लिंग का आकर प्रकार एक जैसा। ऋतेश के चक्कर में कहाँ फंस गई मैं। दो गोलमटोल बौने चुदक्कड़। मन ही मन भगवान से दुआ मांग रही थी कि मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं इन कामुक भेड़ियों को झेल सकूं। भगवान मेरी आर्त निवेदन क्यों सुनते भला, वे भी, लगता है, आज मेरी दुर्दशा अपनी आंखों से दीदार को ललायित थे। मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था। इन दोनों की आंखों में मैं ने वहशीपन को स्पष्ट पढ़ लिया था। लेकिन अब तो मेरा सिर ओखल में जा चुका था और मूसल का प्रहार बाकी था।
ज्ञानचंद भी ठीक मेरे सामने आ खड़ा हुआ और अपने 6″ लंबे सोए हुए सांप की तरह झूलते काले लिंग को मेरे मुह के पास ला कर बोला, “चल री लौंडिया, चूस मेरा लौड़ा, खड़ा कर दे इसे भी मेरे भाई की तरह।” पता नहीं मुझे क्या हो गया था उस वक्त, शायद पुरुष संसर्ग की पुरजोर तलब का ही थी कि मैं ने आव देखा न ताव, हिम्मत बांधा और लपक कर ज्ञानचंद जी का भी लिंग अपने मुह में ले कर गपागप चूसने लग गई। मेरी बेताबी देख कर रूपचंद जी ठहाका मार कर हंसने लगे।
“साली कुतिया कुछ देर पहले कैसे कह रही थी मर जाऊंगी, अब देख कैसे गपागप ज्ञान का लंड चूस रही है। चल ऋतेश तू भी आ जा और जब तक यह लौंडिया ज्ञान का लौड़ा चूस कर खड़ा करती है तबतक तू भी मेरा लौड़ा चूसता रह, लेकिन पहले तू भी अपने कपड़े उतार ले गांडू।” रूपचंद जी बोले। आज्ञाकारी गुलाम की तरह ऋतेश आनन फानन में नंगा हो गया। गोरा चिट्टा, हृष्टपुष्ट शरीर वाला ऋतेश सचमुच में हिजड़ा ही था। सीना आम पुरुषों की तुलना में कुछ अधिक ही उभरा हुआ। ऐसा लग रहा था मानो किसी जवान होती लड़की की अर्द्धविकसित चूचियां हों। उसका लिंग था ही नहीं, सिर्फ एक छेद नजर आ रहा था जो मूत्र विसर्जन का मार्ग था। अंडकोश नदारद। लेकिन उसके नितंब! ओह बेहद खूबसूरत, गोल गोल और चिकने। पूरे शरीर में एक भी बाल नहीं था। सच ही कहा था रूपचंद जी ने, उसके शरीर को देख कर और खास कर उसके नितंबों की खूबसूरती देख कर लड़कियां भी शर्मा जाएं। वह भी किसी रोबोट की तरह रूपचंद जी का विशाल लिंग को हाथों में ले कर किसी लॉलीपॉप की तरह चाटने और चूसने लगा। अजीब समां था। इधर मैं ज्ञानचंद के लिंग को चूस चूस कर लिंग में तनाव लाने की पुरजोर कोशिश कर रही थी और उधर ऋतेश रूपचंद जी के लिंग को चाटने चूसने में लिप्त था। कुछ ही मिनटों में ज्ञानचंद का लिंग भी अपने भाई की तरह ही तनतना उठा। उफ्फ्फ, कितना भयानक था वह मंजर। अपने भाई के लिंग से थोड़ा छोटा, करीब करीब ग्यारह इंच का और वैसा ही मोटा। अब मैं सचमुच में दहशत में थी। ये जालिम तो आज मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ थी।
तभी रूपचंद जी की आवाज आई, “ले चल ज्ञान इसे बिस्तर पर, फिर हम इसके साथ खेलते हैं खुला खेल फरुक्काबादी। पहले तू खेल ले फिर मैं आता हूँ मैदाने जंग में। आह्ह्ह्ह्ह साले ऋतेश, ओह्ह्ह्ह मेरी जान उफ्फ्फ, तेरी इसी अदा पर तो फिदा हूँ साले गांडू। ओह ऋतेश मजा आ रहा है आह आह, बस अब बस कर, अभी इस कुतिया को चोदने दे, फिर तेरी चिकनी गांड़ की भूख भी मिटा दूंगा।”
“आह मेरी जान, ऐसी बड़ी बड़ी और सख्त चूचियों को चोदने का मजा ही कुछ और है। हुम्म्म हुम्म्म आह्ह्ह्ह्ह ओह” ज्ञानचंद मस्ती में भर कर बोला। अभी यह हमला ही मानो काफी नहीं था, रूपचंद अपने भाई ज्ञानचंद के पीछे उछल कर आ गया और मेरे दोनों पैरों को उठा दिया। मेरे दोनों पैरों को अपने कंधों पर चढ़ा लिया। फिर उसने मेरे आव देखा न ताव, तपाक से मेरी पनिया उठी फकफकाती योनी के द्वार पर अपना दानवी हथियार सटा दिया। ओह, उसके मूसल का स्पर्श ज्यों ही मेरी योनी द्वार पर हुआ, मेरा पूरा शरीर गनगना उठा। कब से तरस रही थी मैं अपनी योनी में पुरुष लिंग के लिए। मेरा दिल इधर धाड़ धाड़ धड़क रहा था इस आशंका में कि उनका इनका विकराल लिंग को मैं अपनी योनी में झेल पाऊंगी कि नहीं। मगर मेरी उत्तेजना अब तक इस कदर बढ़ गई थी कि भय के बावजूद मैंने अपनी प्यासी योनी को उस जालिम भेड़िये के सम्मुख समर्पित कर दिया। भय मिश्रित रोमांच का अद्भुत अनुभव कर रही थी मैं। ज्ञानचंद ने जैसे ही अपने थूथन से मेरे होंठों को मुक्त किया, मैं, सिसिया उठी, “इस्स्स्स्स आह्ह्ह्ह्ह”।
तभी, “ले मेरा लौड़ा अपनी चूत में, हुम्म्म्म्मा्ह्ह्ह्ह,” कहते हुए रूपचंद जी ने किसी निर्दयी कसाई की तरह अपने लिंंग का भीषण प्रहार मेरी योनी में कर दिया।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह्, मर गई मैं, ओह्ह्ह्ह मां, फाड़ दिया मादरचोद,” मैं चीख पड़ी। एक ही करारे प्रहार से रूपचंद जी ने करीब एक तिहाई लिंग मेरी योनी में घोंप दिया था। उफ्फ्फ, उनका मोटा लिंग मेरी योनी को अपनी सीमा से भी ज्यादा फैला कर किसी कसाई के खंजर की तरह ऐसा घुसा कि मेरी हालत हलाल होती बकरी की तरह हो गई। मैं छटपटा भी नहीं पा रही थी। दोनों भाईयों ने मुझे इतनी कुशलता के साथ बेबस कर रखा था कि मैं हिलने से भी मजबूर थी।
“निकाल साले कुत्ते अपने लंड को, आह, मार ही डालिएगा क्या। ओह मा्म्म्म्म्आं्आ्आ्आं।” मैं लगातार चीखती जा रही थी। मेरी सारी उत्तेजना हवा हो गई थी। अकथनीय पीड़ा से दो चार हो रही थी मैं।
“चुप साली बुरचोदी, ड्रामा मत कर हरामजादी, ले मेरा लौड़ा थोड़ा और हुम्म्म्म्म्म्म” एक और करारा प्रहार कर दिया उस कमीने ने। उफ्फ्फ, ऐसा लग रहा था उनका लंड सीधा मेरी बच्चेदानी तक पहुंच गया हो। अब मैं पूरी तरह बेबस हो गई। मुझे हिलने में भी कष्ट हो रहा था। हिलने की कोशिश में मैं और अधिक दर्द का अनुभव कर रही थी अतः मुझे समझ आ गया था कि शांत रह कर चुदने में ही मेरी भलाई है।
करीब दस इंच लिंग मेरी योनी के अंदर प्रवेश कर चुका था। मैं दांत भींच कर अपनी पूरी सहन शक्ति को एकत्रित करके तत्पर हो गई थी उनके लिंग को अपनी योनी में समाहित करने के लिए। अब रूपचंद जी धीरे धीरे लिंग बाहर निकालने लगे। करीब दो इंच निकाल कर दुबारा गच्च से अंदर घुसा दिया कमीने ने। यह क्रम तीन चार बार दुहराता गया और तब मेरे आश्चर्य का पारावार न रहा जब मुझे अहसास हुआ कि उनका पूरा का पूरा लिंग मेरी योनी के अंदर समा गया। आरंभ का वह अकथनीय दर्द धीरे धीरे कम होता जा रहा था और करीब दो मिनट बाद तो उस पीड़ा का स्थान अद्वितीय आनंद ने ले लिया। उफ्फ्फ वह अहसास। उनका लिंग मेरे गर्भ का द्वार खोल कर गर्भगृह में खलबली मचा रहा था। मेरी योनी से गर्भगृह तक का संकरा मार्ग उनके विकराल लिंग से बड़ी सख्ती से चिपक कर मुझे अखंड आनंद से सराबोर कर रहा था। बेसाख्ता मेरे मुह से आनंदमयी सिसकारियां निकलने लगीं, “आह ओह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स, मां, ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह्ह,”।
“भैया, इस रंडी को अब मजा आ रहा है। देख कैसे सिसकारियां मार रही है साली कुतिया।” ज्ञानचंद बोला।
“मुझे पता है। इस हरामजादी की चूत देखकर ही मैं समझ गया था कि यह हमारा लौड़ा आराम से ले लेगी। हमारी तो किस्मत खुल गई रे ऐसी लौंडिया चोदने को मिली है। क्यों री छमिया, मजा आ रहा है ना? खूब नखरे कर रही थी।” रूपचंद जी की आवाज आई। अब वे चोदने की अपनी रफ्तार बढ़ा चुके थे। गचागच लगे चोदने।”हुम्म्म हुम्म्म हुम्म्म हुम्म्म आह ओह”
उत्तेजना और आनंद की पराकाष्ठा थी वह, जब मुझसे और बर्दाश्त नहीं हुआ। “आह्ह्ह्ह्ह मैं गई राजा” एक दीर्घ निश्वास के साथ मेरा पूरा शरीर थर्रा उठा और मैं उसी वक्त खल्लास होने लगी। मैंने ज्ञानचंद के मोटे शरीर को कस के जकड़ लिया और झड़ गई। ज्ञानचंद मुस्कुरा उठा और मेरे होंठों को फिर से अपने थूथन से चूमने लगा और मेरे उरोजों को जकड़े हुए दनादन चोदने में मशगूल हो गया। मेरे स्खलन का अहसास रूपचंद जी को भी हो गया था, वे गचागच मेरी योनी की कुटाई अपने मूसल से करते रहे। नतीजा यह हुआ कि मैं दुबारा उत्तेजित हो कर इस सम्मिलित अजीबोगरीब संभोग का आनंद लेने लगी। अंततः करीब पंद्रह मिनट बाद सर्वप्रथम ज्ञानचंद के लिंग से फचफचा कर गरमागरम वीर्य निकलना शुरू हुआ। बिना कोई मौका गंवाए उसने वीर्य उगलते अपने लिंग को मेरे मुह में ठूंस दिया। यह वही आनंदमय पल था जब मैं दुबारा स्खलित होने लगी और उस आनंद के आवेग में मैं ज्ञानचंद का पूरा नमकीन, कसैला व प्रोटीनयुक्त वीर्य अपनी हलक में उतारती चली गई। इधर ज्ञानचंद झड़ कर निवृत हुआ उधर मैं झड़ कर निढाल हुई। ज्ञानचंद ने ज्यों ही मुझे छोडा़, रूपचंद जी को पूरी आजादी मिल गई।
“चल मेरी रानी अब मैं दिखाता हूँ तुझे मेरे लंड का जलवा,” कहते हुए ज्ञानचंद जी अपनी पूरी शक्ति से मेरे ढीले पड़ते शरीर को अपनी मजबूत बाजुओं में दबोच कर धाड़ धाड़ चोदने लगे। इसका परिणाम वही हुआ, मेरे ढीले पड़ते शरीर में पुनः नवजीवन का संचार हो गया। अब मैं भी बेशर्मी में उतर आई और उनके मोटे कमर को अपनी लंबी टांगों से लपेट लिया और अपनी कमर उचका उचका कर खूब मस्ती से चुदवाने लगी। “आह्ह्ह्ह्ह राजा, ओह मेरे रूप, ओह्ह्ह्ह साले हरामी मादरचोद, चोद साले कुत्ते, चोद मुझे जी भर के, रंडी बना दे, कुत्ती बना दे, ओह्ह्ह्ह मार डाल राजा््जजा्आ्आ्आ्आह……” और न जाने क्या क्या बकती जा रही थी मैं पागलों की तरह।
ज्ञानचंद एक बार खलास हो कर वहां से हटा जरूर था, किंतु उसने ऋतेश को अपनी ओर बुलाया और कहा, “चल ऋतेश तू मेरा लौड़ा चूस। चूस चूस कर दुबारा खड़ा कर।” ऋतेश किसी आज्ञाकारी गुलाम की तरह अब ज्ञानचंद का लिंग चूसने लग गया। पता नहीं क्या इरादा था उसका। शायद इस बार ऋतेश के साथ ही गुदा मैथुन का आनंद लेना चाहता हो। खैर मुझे उससे क्या, मैं तो इस वक्त रूपचंद जी की भीषण चुदाई के आनंद में डूबी जा रही थी।
“आह आह बड़ी मस्त है रे तू हरामजादी। अह अह तेरे जैसी लौंडिया जिंदगी में पहली बार मिली है चोदने को। तुझे सच में हम दोनों भाई भूल नहीं पाएंगे। ओह्ह्ह्ह रानी तेरी चूत चोदने में स्वर्ग का सुख है। चल तुझे कुतिया ही बना लेता हूँ,” कहते हुए मुझे कुतिया की तरह ही पलट दिया और पीछे से मुझ पर सवार हो गया। उसके बाद उसने मेरी ज्ञान चंद के मोटे लंड से चुद चुद कर लाल और फूली हुई चूचियों को बेदर्दी के साथ मसलते हुए करीब और दस मिनट तक चोदता रहा। गजब की स्तंभन क्षमता थी उसकी। करीब आधा घंटा तक चोदने के बाद जाकर उनका झड़ना शुरू हुआ। “आह्ह्ह्ह्ह मेरी रानी ओह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स,” करीब एक मिनट तक झड़ते रहे।
पूरी शक्ति से मेरी चूचियों को दबोच रखा था कमीने ने, लेकिन उसी वक्त मैं भी तीसरी बार स्खलन के सुख में डूबी अपने होशोहवास में नहीं थी, “आह्ह्ह्ह्ह राज्ज्ज्ज्जा, मैं गयी््य््य््यय्ईई््ईई््ईई”। पूरा बच्चादानी भर दिया था शायद उस ठिंगने चुदक्कड़ ने। जब रूपचंद जी मुझे चोद कर बिस्तर पर ही लुढ़क गये तो मैं भी थक कर चूर पसीने से तरबतर वहीं लुढ़क गयी। उनका लिंग सिकुड़ कर छ: इंच का हो गया था। मेरी योनी से अभी भी उनका वीर्य रिस रिस कर बाहर निकल रहा था और बिस्तर गीला होता जा रहा था। रूपचंद जी किसी सूअर की तरह निढाल पड़े लंबी लंबी सांसें ले रहे थे और मैं चुद निचुड़ कर लस्त पस्त निर्जीव प्राणी की भांति पेट के बल ही पड़ी हुई थी। मेरी योनी का तो मानो भुर्ता ही बना डाला था कमीने ने। फूल कर कचौड़ी बन गई थी मेरी योनी। मीठा मीठा दर्द भर दिया था रूप चंद जी ने। मेरी चूचियों को इस बेदर्दी से शायद पहली बार नोच खसोट से गुजरना पड़ा था। लाल हो गयीं थीं दोनों चूचियां। शायद सूज भी गई थीं। पूरे शरीर को मानो तोड़ कर रख दिया हो, ऐसा महसूस हो रहा था।
तभी मैंने अर्द्धचेतन अवस्था में अपने चिकने नितंबों पर किसी के हाथों के स्पर्श को महसूस किया। मैं चौंक कर छिटकना चाहती थी, किंतु मेरा थका मांदा शरीर मेरे इरादे का साथ देने में पूरी तरह सक्षम नहीं था। मैं पलटना चाहती थी, लेकिन पूरी तरह पलट नहीं पाई। किसी तरह कमर से ऊपर के हिस्से और गर्दन को घुमा कर देखा तो पाया कि ज्ञान चंद दुबारा मुझ पर चढ़ाई करने को तत्पर था। जब तक मैं कुछ समझ पाती, ज्ञान चंद ने मेरी कमर को अपने मजबूत हाथों से कस कर पकड़ा और मेरे नितंबों के फांक में अपना थूथन भिड़ा दिया। कुछ पल मेरे नितंबों को चाटा फिर मेरे गुदा द्वार को पागलों की तरह चपाचप चाटने लगा।
“उफ्फ्फ, क्या करते हो, छि:, छोड़ो मुझे” मैं अलसाई सी बोली।
ज्ञानचंद अपना सर उठाया और बोला, “तेरी गोल गोल चिकनी गांड़ कब से मुझे ललचा रही है रानी। तेरी चूचियां बहुत मस्त थीं, चोदने में बड़ा मजा आया। तेरी गांड़ की खूबसूरती तो गजब ढा रही है। अब बताओ भला, ऐसी गांड़ को बिना चोदे कैसे छोड़ दें।” इतना कह कर दुबारा अपना मुह मेरी गांड़ के छेद पर भिड़ा दिया और पागलों की तरह चाटने लगा। बीच बीच में वह मेरी गांड़ की छेद में भी अपनी लंबी जीभ घुसा घुसा कर चाट रहा था। यह शुरू में बड़ा अटपटा लग रहा था किंतु कुछ ही समय बाद मैं खुद ही छटपटाने लगी। “ओह आह, हाय आह” ये थे मेरे मुह से निकलने वाले उद्गार। मेरे अंतरतम को तरंगित कर रहा था उसका यह घृणित मगर उत्तेजक कार्य। कुछ मिनटों में ही मैं मानो पगला गई थी। “ओह राजा, आह्ह्ह्ह्ह मां, आह डियर, अब चोद भी डालो ना,” मैं उत्तेजना के मारे मानो अपना होश खो बैठी थी। भूल ही गई थी कि उसका लिंग मेरी गुदा का क्या हाल करने वाला है। बस अब और क्या था, ज्ञान आनन फानन में मेरे ऊपर चढ़ गया। दोनों हाथों से मेरी गुदा का फांक खोला और अपना तनतनाया हुआ गधा का लिंग मेरी गुदा द्वार पर रख कर दबाव देने लगा।
उसके लिंग का विशाल सुपाड़ा मेरी गुदा के संकीर्ण मार्ग को फैला कर जैसे जैसे अंदर प्रविष्ट होता गया, “आह्ह्ह्ह्ह मरी रे मरी मैं, ओह्ह्ह्ह धीरे बाबा धीरे हाय फाड़ ही डालोगे क्या ओह मा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह” दर्द के मारे मैं चीखने लगी।
“चुप कर साली रंडी, अभी बोल रही थी चोद डालो, अभी कुतिया की तरह कांय कांय कर रही है। चुपचाप चोदने दे बुरचोदी। इतनी सुंदर गांड़ को बिना चोदे छोड़ दूं, ऐसा कैसे हो सकता है। ले ले मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में, आह्ह्ह्ह्ह हुम्म्म्म्म्म्म,” कहते कहते मेरी दर्दाई चूचियों को पीछे से कस के दबोच कर बेरहमी से घुसाता चला गया अपना गधे सरीखा लंड। “ओह कितना टाईट और गरम है रानी तेरी गांड़, उफ्फ्फ ऐसा लग रहा है मेरा लौड़ा किसी संकरी भट्ठी में घुस रहा हो, आह्ह्ह्ह्ह”, कहते कहते धीरे धीरे पूरा का पूरा लिंग मेरी गुदा में जड़ तक उतार दिया हरामी ने। दर्द से मेरा बुरा हाल हो रहा था। मेरी गुदा का हाल अब फटी तब फटी वाली हो रही थी। मैं छटपटाने से भी बेबस थी, इस बुरी तरह से उसने मुझे दबोच रखा था। पीछे हाथ लगाया तो एक बार तो मुझे भी यकीन नहीं हो रहा था। उसके लिंग का एक सेंटी मीटर भी बाहर नहीं था। मलद्वार में ऐसा लग रहा था मानो किसी ने खंजर से चीर दिया हो। अंदर ऐसा लग रहा था मानो उसके लिंग का अगला भाग मेरी अंतड़ियों को फाड़ ही डालेगा।
“निकाल मादरचोद अपना लंड, आह्ह्ह्ह्ह साले कुत्ते की औलाद,” पीड़ा की अधीकता से मैं चीख पड़ी। मैं सिर्फ चीख ही सकती थी, हिलने डुलने में मुझे असमर्थ कर दिया था उस ठिंगने पहलवान ने।
“चूऊ्ऊऊ््ऊऊप्प्प्प्प्प्प छिना्आ्आ्आ्आल, पूरा लौड़ा तो खा ही ली, अपनी गांड़ में, अब काहे चिल्लाती हो।” मेरी चूचियों को पूरी ताकत से भींचते हुए बेहद खौफनाक आवाज में ज्ञान चंद बोला। अब उसकी वहशियत खुल कर सामने आ चुकी थी। मेरा चीखना चिल्लाना बेमानी था। जो हो रहा था उसे रोक पाना मेरे वश में नहीं था। चुपचाप गांड़ चुदवाने में ही मेरी भलाई थी। अब उसने मेरी कमर के नीचे से मेरे पेट की तरफ हाथ डालकर एक झटके से उठा कर चौपाया बना दिया और सर्र से आधा लिंग बाहर निकाल कर पुनः सटाक से ठोंक दिया जड़ तक। अब यह क्रम चल निकला। सटासट मेरी गांड़ की संकरी गुफा को अपने मूसल से कूट कूट कर ढीला करने लगा। धीरे धीरे सच में मेरी गांड़ की संकरी गुफा ढीली होने लगी और यह फैल कर बड़ी गुफा में तब्दील हो गई। अब उसका विकराल लिंग अविश्वसनीय रूप से बड़ी सुगमता से मेरी गांड़ के अंदर बाहर हो रहा था। ओह उस घर्षण का आनंद, जो पहले पहल अत्यंत पीड़ा दायक था, अब अद्भुत सुख प्रदान कर रहा था।
“आह आह इस इस उफ ओह चोद राजा ओह चोदू, आह मेेेरे गांड़ के रसिया, आह मजा आ रहा है साले बहनचोद,…..” मैं मस्ती में भर गई थी। मेरी चूत में सुरसुरी होने लगी। मैं एक हाथ की उंगली से अपनी चूत रगड़ने लगी।मेरी हालत वहां उपस्थित सभी लोग बड़े मजे से देख रहे थे। अब तक रूपचंद जी का लिंग फिर से जागृत हो कर फनफना उठा था। वे भी पुनः कूद पड़े इस मैदाने जंग में। वे घुस गये मेरे नीचे से, मेरे हाथ को मेरी चूत से हटाया और अपने फनफनाते लंड को मेरी चूत मेंं टिका कर बिना किसी कष्ट के सटाक से एक ही बार में चूत के अंदर कर दिया। “आह मेरी जान, तेरी चूत स्वर्ग का द्वार है। ओह्ह्ह्ह जितनी बार भी चोदो, साला मन ही नहीं भरता। ले मेरा लौड़ा आह” कहते हुए भिड़ गये गपागप चोदने। मेरी चूचियों को बारी बारी से कभी चूसते कभी हाथों से दबाते और कभी मेरे निप्पल्स को दांतों से हल्के से काट लेते थे।
“उई मां, दर्द होता है, आह,” मैं चीख पड़ती। मगर उस वक्त मेरी सुनने वाला कौन था वहां। नीचे से रूप चंद जी ऊपर से ज्ञानचंद, दो ठिंगने राक्षस, लगे हुए थे मुझे भंभोड़ने, नोचने, चोदने। उनकी जालिमाना हरकतों से अब मुझे दर्द के साथ साथ जो मजा मिल रहा था वह अवर्णनीय था। दर्द मिश्रित आनंद, अद्वितीय आनंद, जिसमें मैं डूबती उतराती चुदती जा रही थी।
“आह्ह्ह्ह्ह मेरे चुदक्कड़ राजाओ, ओह्ह्ह्ह रूप, आह ज्ञान, हाय हाय रंडी बना दिया ओह मुझे जन्नत की सैर करा रहे हो उफ्फ्फ साले मां के लौड़ों…..” पागल कर दिया था उन दोनों ने। धमाधम उधम मचा दिया था दोनों कामुक भेड़ियों ने।
“साली कुतिया, मां की लौड़ी, अब आ रहा है ना मजा, चूत मरानी….” रूपचंद अपने पूरे वहशी बन चुके थे। चोदते हुए मेरे शरीर को पागलों की तरह नोचते खसोटते रहे।
“भाई, ये तो अब हमारे लंड की हो गयी दीवानी। उफ्फ्फ ऐसा माल फिर कहां मिलेगा। साली कितने मजे से चुदवा रही है। मैं तो इसकी गांड़ और चूचियों का दिवाना हो गया हूं, ओह्ह्ह्ह” ज्ञान चंद भी पागलों की तरह लगा हुआ था मुझे चोदने। मेरे अंदर ऐसा लग रहा था मानो भूचाल आ गया हो। करीब आधे घंटे तक इस बार उन दोनों ने जी भर कर मुझे भोगा। इस आधे घंटे में उन्होंने मिलकर मेरे शरीर का सारा कस बल निकाल दिया था। अविश्वसनीय रूप से इस दर्दनाक चुदाई में भी मैं ने भरपूर आनंद का उपभोग किया। इस दौरान मैं तीन बार झड़ कर बिल्कुल बेजान सी हो गई थी। एक एक करके उन दोनों ने भी अपने मदन रस से मेरी गुदा और योनी को सराबोर कर दिया। मेरे दोनों यौन छिद्रों का तो कचूमर ही निकाल दिया था कमीनों ने। हम तीनों थक कर निढाल उसी बिस्तर पर लस्त पस्त पसर गये थे। तीनों पसीने से तर बतर। कोई भी देखता तो उन्हें विश्वास नहीं होता कि मुझ जैसी कमनीय काया वाली खूबसूरत स्त्री इन बदसूरत ठिंगने सूअरों जैसे गोल मटोल पुरुषों के साथ इस तरह कामलीला कैसे कर सकती है। मगर मैं ही जानती हूं कि इनके साथ संभोग में मैं ने कितना आनंद उठाया था। मेरी चूचियों को इस बुरी तरह से नोचा था कि वे लाल हो गयीं थीं। सूज गयीं थीं। मेरी योनी का तो भोसड़ा ही बना डाला था। ज्ञान का लिंग जब मेरी गुदा से बाहर आ रहा था तो ऐसा लग रहा था मानो मेरी अंतड़ियाँ भी बाहर निकल पड़ेंगी। कुल मिलाकर कहूँ तो अपनी कामक्षुधा शांत करते करते मुझे पूरी तरह निचोड़ डाला था उन कमीने भाईयों ने। मैं भी कहां कम कमीनी थी। जीवन में पहली बार ऐसी चुदाई का सामना करना पड़ा था, यादगार चुदाई, यादगार लिंग, अविस्मरणीय दर्द मिश्रित आनंद का अनुभव।
“वाह रानी, मजा आ गया। कमाल की चुदक्कड़ हो।अब जब भी हमें चोदने का मन करेगा, हम रांची आ जाएंगे। बिजनेस तो होता ही रहेगा, मगर तुम्हारे साथ बिजनेस का मजा ही कुछ और है।” कहकर रूपचंद जी ने मुझे बांहों में भर के चूम लिया।
“सही कहा भाई, ऐसी लौंडिया बड़े नसीब वालों को ही नसीब होती है। अब तो हमें बार बार रांची आना पड़ेगा। कमाल की गांड़, कमाल की चूचियां। गजब हो तुम मेरी रानी।” ज्ञान चंद बोला और मेरे नितंबों और चूचियों को सहला दिया।
“हाय मेरे प्यारे चोदुओ, आज आपलोगों ने पहली बार चुदाई का ऐसा सुख दिया है जिसे मैं जीवन भर नहीं भूल पाऊंगी। जब मर्जी चले आईएगा, मैं आप लोगों के लिए हमेशा उपलब्ध रहुंगी।” कहकर मैंने बारी बारी से उन दोनों को चूम लिया। ऋतेश को तो मैं क्या कहूं, चलो उसके आकर्षण में बंधी इन दोनों चुदक्कड़ों के जाल में फंसी और यादगार संभोग का सुख प्राप्त किया, इसलिए उस हिजड़े को भी शुक्रिया अदा किया। फिर करीब ग्यारह बजे रात को मैं वहां से निकली अपने घर की ओर। ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। मेरी चाल देख कर दोनों चुदक्कड़ मुस्कुरा रहे थे। मैं खिसियानी सी मुस्कान के साथ वहां से रुखसत हुई। दूसरे ही दिन सवेरे ऑफिस खुलते ही रूपचंद जी फिर आ धमके। मेरी हालत वैसे ही बेहद खराब हो चुकी थी। पूरा बदन टूट रहा था, लेकिन फिर भी बीती रात को जो कुछ हुआ था उसकी मीठी मीठी कसक पूरे बदन में तारी थी। रूपचंद जी वही पूर्व परिचित लार टपकाती नजरों से मुझे देखते हुए मुस्कुरा रहे थे। मैं ने भी व्यवसायिक मुस्कुराहट के साथ उनका स्वागत किया। एक हफ्ते की बात तो छोड़िए, बॉस के आते ही उसी वक्त हमारा डील फाईनल हो गया। बॉस की खुशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने मुझे बधाई दी और साथ ही एक सरप्राईज गिफ्ट, एक प्रोमोशन के रूप में। वाह, मेरी तो निकल पड़ी थी। हां, एक बात और, जाते जाते रूपचंद जी ने वापस लौटने से पहले मुझसे मिलने की इच्छा जताई उसी होटल में। हालांकि मैं पिछली रात की नोच खसोट और धींगा मुश्ती से मेरी हालत कोई अच्छी नहीं थी, किंतु उनका आमंत्रण अस्वीकार नहीं कर पाई। नतीजा वही, फिर पिछली रात की तरह कामुकता के एक और तूफानी दौर से मुझे गुजरना पड़ा। इस बार शुरू में ही उन्होंने मुझे व्हिस्की का एक पैग पिला दिया और जी भर के मनमाने ढंग से मेरे शरीर से खेला। चुदाई के एक दौर के पश्चात फिर दूसरा पैग पिलाया और बड़े ही गंदे तरीक़े से मेरे जिस्म को भोगा। मुझे नशे की हालत में उठा कर बाथरूम ले गए और जबतक मैं कुछ समझ पाती, बाथरूम के फर्श पर ही लिटा कर रूपचंद जी और ज्ञानचंद मेरे ऊपर छरछराकर मूतने लगे। उनके गरमागरम मूत्र से मैं पूरी तरह भीग गई थी। मैं विरोध करना चाह रही थी लेकिन पता नहीं क्यों मुझे भी यह सब अच्छा लग रहा था। यह भी काफी उत्तेजक था मेरे लिए। शायद नशा का भी असर रहा हो। मेरी उसी अवस्था में मूत्र से भीगे शरीर के साथ ही उन्होंने मनमाफिक ढंग से अपनी कुत्सित कामेच्छा शांत की। क्या नहीं किया उन्होंने। लंड चुसवाया, अंडकोश चटवाया, गांड़ चटवाया, लंड हाथ में थमा कर मूठ मरवाया, मेरी कांख में लंड डाल कर चोदा, जांघों को सटा कर जांघों के बीच चोदा, चूची चोदा, चूत की कुटाई की, गांड़ की कुटाई की, हर संभव तरीक़े से मेरे शरीर का भरपूर इस्तेमाल किया। करीब चार घंटे तक यह निहायत ही घिनौने तरीक़े का वासना का तांडव होता रहा। उफ पता नहीं क्या हो गया था मुझे भी। पागलों की तरह उनकी हर क्रिया में सहयोग करती गई। वे तो खुश हुए ही, मेेेरे जीवन में भी खुशी का एक नया मार्ग दिखा दिया उन हरामियों ने। नहा धोकर जब मैं वहां से निकलना चाह रही थी, मेरे कदम साथ देने से इन्कार करने लगे। मजबूरन मैं रात भर वहीं रुकी रही, रात भर चुदते रहने के लिए। गनीमत थी कि बीच बीच में ऋतेश भी अपनी गांड़ प्रस्तुत कर देता था। सवेरे तक मैं चलने फिरने लायक भी नहीं रही थी। किसी तरह मुझे सहारा दे कर उन्होंने घर तक अपनी गाड़ी में छोडा़ और टाटा निकल गए। दो दिन तक मेरी हालत खराब थी।
अबतक की कहानियों से आपलोगों को पता चल ही गया होगा कि आज जो मेरी स्थिति है और आज तक मेरे साथ जो कुछ भी हो रहा था, उन सब में शुरुआती दौर से मेरे अपने ही निज कामुक बुजुर्गों द्वारा मेरी नादानी का लाभ उठाने से लेकर परिस्थितियां तथा मेरी नादान उत्कंठा का जितना हाथ था उतना ही हाथ बाद में मेरी खुद की वासना की अदम्य भूख का भी था। मेेेरे बुजुर्गों ने मेरी नादानी का फायदा उठाया अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए और उन्होंने कमसिन उम्र में ही मुझे एक कली से फूल बना दिया था, उस पर तुर्रा यह कि अपने अंदर के अपराधबोध को छुपाने के लिए मुझे तथाकथित तौर पर अपनी सामुहिक पत्नी भी बना लिया था। उन्होंने मेरे अंदर वासना की जो आग भर दी थी उसके कारण मैं अपना भला बुरा सबकुछ भूल कर उनकी कठपुतली बन इठलाती रही। मैं नादान उनकी द्रौपदी बन कर उनकी कामक्रीड़ा को उनका प्यार समझती रही और अपना पत्नी धर्म पूरी निष्ठा से निभाया भी, किंतु मेरे गर्भवती होते ही समाज के भय से उन्होंने मुझे एक सीधे सादे क्लर्क के पल्ले बांध दिया। उसके पश्चात भी हमारा अनैतिक संबंध जारी था। सामाजिक रूप से जायज अल्प वैवाहिक संबंध के दौरान मैंने एक स्वस्थ पुत्र रत्न को जन्म दिया जो कि आज बत्तीस साल का गबरू जवान बन चुका है, जिसका नाम है क्षितिज, प्यार से हम उसे क्षितु बुलाते हैं। साढ़े छ: फुट लंबा, खूबसूरत, हट्ठा कट्ठा, एम बी ए करके एक प्रतिष्ठित बैंक में प्रबंधक के पद पर कार्यरत है। पता नहीं किसके (हब्शी बॉस, हरिया, करीम, नानाजी, दादाजी, बड़े दादाजी या पंडित जी, या फिर उन सबके मिश्रित) वीर्य की उपज है वह। गेहुंआ रंग, सुतवां नाक, लंबोतरा चेहरा, घने घुंघराले बाल। मेेेरे पति की अकाल मृत्यु के पश्चात ससुराल से अलग रहकर भी नौकरी ज्वॉईन करके ससुराल का पूरा ख्याल रखा। बेटे की परवरिश मेंं कोई कोताही नहीं बरती। एक एक करके नानाजी, दादाजी और बड़े दादाजी का स्वर्गवास हुआ और उधर मेरे सास ससुर के वृद्धावस्था का ख्याल रखने के लिए एक नौकरानी को रखना पड़ा। क्षितिज की पोस्टिंग कलकत्ता में हो गई इसलिए वह हर शनिवार आ जाता और फिर रविवार शाम को वापस चला जाता है। शादी विवाह की बात से ही दूर भागता है, इसलिए अभी तक अविवाहित है। उसका स्वभाव बिल्कुल मेरे तथाकथित पतियों की तरह ही है, एक नंबर का सेक्सी, आजाद ख्याल। हां उसकी रुचि सिर्फ बड़ी उम्र की महिलाओं पर ही है, जिससे मैं भी अछूती नहीं हूं। उसके बारे में मैं बाद में बताऊंगी, फिलहाल मैं बता रही थी कि नौकरी ज्वॉईन करने के बाद मैं ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। सफलता की सीढ़ियां फलांगती हुई रांची शाखा की प्रबंधक बन गई। हब्शी बॉस रिटायर हो कर स्वदेश अमेरिका लौट गये। जबतक मेेेरे तथाकथित बुजुर्ग पतियों की क्षमता थी, मुझे जी भर कर भोगा और जाने अनजाने मैं कामवासना की दीवानी बन गई। मेरी अंदर कामुकता कूट कूट कर समा गयी थी। ऐसा लगता था मानो मेरे अंदर वासना का ज्वालामुखी धधक रहा हो। नौकरी करते करते मैं कई लोगों, ऑफिस स्टाफ से लेकर क्लाईंट्स मिलती रही और जितने भी कामलोलुप पुरुष मिले, उनके बिस्तर गरम करने में कोई हिचक नहीं हुई। जिनकी अंकशायिनी बनी उनमें 95% पुरुष बुजुर्गों की श्रेणी के थे, बाकी 5% युवा थे। अपनी वासना की आग बुझाने के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकती थी। मुझमें अब तक इतना आत्मविश्वास आ चुका था कि कामक्रीड़ा के किसी भी स्वरूप का लुत्फ उठाने में मुझे कोई परेशानी नहीं होती थी। हां, मेरा नाटक, नखरा बदस्तूर जारी था ताकि कोई मुझे सस्ती औरत न समझे। मेरे साथ जो कुछ होता था या जो कुछ होने देती थी, उसपर मेरा पूरा नियंत्रण रहता था। मेरी इच्छा के विरुद्ध जब भी किसी ने जबर्दस्ती करने की जुर्रत की, उन्हें अच्छी तरह से सबक सिखाने का माद्दा भी था मुझमें और कुछ ऐसे अवसरों पर इसका प्रदर्शन भी किया था।
उदाहरण के तौर पर मैं पहले भी एक घटना का जिक्र कर चुकी हूं जब पार्क में मेरे बूढ़े आशिकों और मेरे साथ कुछ गुंडों ने बद्तमीजी की थी, जिनकी अच्छी खासी पिटाई की थी मैं ने। उसके बाद अगर आप लोगों को याद होगा, कि एक बार एक सरदार जी ने जब मुझे ब्लैकमेल करके अपने बॉस (जो बाद में मेरा बॉस बना) के सामने परोस दिया था फिर मुझसे मनमानी करनी चाही थी, तब मैं ने कैसे उसकी दुर्दशा की थी। उसी की अगली कड़ी में अब मैं एक और घटना का जिक्र करना चहती हूं। यह आज से करीब दस साल पहले की घटना है, जब मैं यहां नौकरी कर रही थी। उस दिन ऑफिस में काफी काम था और मैं काफी थकान महसूस कर रही थी। मुझे पता नहीं उस समय क्यों थकान मिटाने के लिए पुरुष संसर्ग की बड़ी तलब महसूस हो रही थी। मुझे चाची की बताई हुई घटना याद आ गई, कि किस तरह एक ऑटो वाले कालीचरण ने नामकुम के पास ही झाड़ियों के पीछे ले जा कर चाची का बलात्कार किया था और फिर उसके साथी मंगू के साथ कालीचरण के घर में सामूहिक संभोग। मेरे जेहन में बिजली सी कौंध उठी। मैं जानबूझकर फिरायालाल चौक के ऑटो स्टैंड में गई और कोई ऐसा ही मर्द तलाश करने लगी। चौक के पास ऑटो स्टैंड मेंं मेरी नजर एक ऑटो वाले पर मेरी नजर टिक गई। ऑटो वाला करीब पैंतालीस साल का एक अधेड़ व्यक्ति था। शक्ल सूरत में कोई खास नहीं था, काला रंग, बिना शेव किए हुए बेतरतीब दाढ़ी मूछ, घने घुंघराले अधपके बाल बिखरे हुए, मोटी भौंहें और हल्की लाल आंखें। हल्का पेट निकला हुआ, ऊंची कद काठी का गठीले शरीर वाला आदमी था। मेरी समझ से शरीफ आदमी तो बिल्कुल ही नहीं था और मुझे ऐसे ही आदमी की तलाश भी थी। मटमैले कुर्ते और पैजामे में था। वह भी शायद मुझे पहले से ही घूर रहा था। उसकी आंखों में मैंने अपने लिए अव्यक्त भूख पढ़ ली थी। थोड़ा अटपटा सा आदमी था किंतु मुझे जंच गया। मैं सीधे उसके ऑटो के पास गई और बोली, “रामपुर चलोगे?”
“रामपुर तो हियां से काफी दूर है मैडम, लौटने में हमको बहुत रात हो जाएगा, कोई सवारी भी नहीं मिलेगा, खाली वापस आना पड़ेगा।” बोलते हुए मुझे अपनी नजरों से तौल भी रहा था और मेरे इसरार की आशा भी कर रहा था।
“तुम सीधे सीधे भाड़ा बोलो, कितना लोगे।”
“जी तीन सौ रुपये।”
“ठीक है चलो”, कहकर मैं ऑटो में बैठ गई। उसकी आंखों से ऐसा लग रहा था कि उसने पिया हुआ है। जैसे ही ऑटो वहां से चली, मेरे दिमाग में उसे फांसने की योजना बड़ी तेजी से चलने लगी। मैं जानती थी कि मेरे लिए उसके मन में किस प्रकार की भावना थी, लेकिन मैं अपनी ओर से उसे खुल कर आमंत्रण नहीं देना चाहती थी। मैं उसे ललचा कर खुद पर आक्रमण करने के लिए उत्तेजित करना चाहती थी। उसने ऑटो का रीयर व्यू आईना इस प्रकार रखा था कि मुझे अच्छी तरह देख सके। गर्मी का मौसम था मगर उतनी गर्मी नहीं थी, फिर भी मैंं बोली, “उफ्फ्फ कितनी गर्मी है” कहते हुए मैंने अपने कुर्ते के ऊपरी तीन बटन खोल दिए, परिणामस्वरूप मेरे सीने के उभार आधे नग्न हो कर बाहर झांकने लगे। अब ऑटो चलाते चलाते उसकी नजरें बार बार मेरे सीने के उभारों पर आ कर टिक जाती थीं। उसकी आंखों में वासना की भूख मैं अच्छी तरह पढ़ पा रही थी। उसकी आंखों में एक शिकारी की तरह चमक आ गई थी। वह ड्राईविंग सीट पर बैठे बैठे कसमसा रहा था। मैं सब समझ रही थी। उसके अंदर की वासना की चिंगारी को मैं और हवा देना चाहती थी। मैंने महसूस किया कि खाली सड़क पर भी ऑटो चलाने की उसकी रफ्तार काफी कम थी, शायद पंद्रह से बीस कि. मी. की रफ्तार से चला रहा था वह। सामलोंग पहुंचने में ही हमें आधा घंटा से ऊपर लगा। अभी यहां से नामकुम फिर रामपुर करीब पांच कि. मी. और था। नामकुम पार करते समय मैं ने अपने एक हाथ से कुर्ते के ऊपर खुले हिस्से को थोड़ा और खोल दिया और दूसरे हाथ से रुमाल पकड़ कर हवा करती हुई ऑटो वाले का ध्यान आकर्षित करने हेतु बोली, “बाप रे कितनी गरमी है आज।” ऑटो वाले के लिए अब और बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया। जैसे ही नामकुम पार करके सुनसान सड़क पर पहुंचे, अचानक ही ऑटो बांयी ओर मुड़ा और घनी झाड़ियों को चीरता हुआ दूसरी ओर निकल गया। उस सुनसान स्थान में चारों ओर घनी झाड़ियां थीं और जहां ऑटो रुका हुआ था वहाँ करीब बीस फीट के दायरे में सपाट जमीन पर घास बिछा हुआ था। चांदनी रात में सब कुछ स्पष्ट देख सकती थी मैं। उस वक्त रात का आठ बज रहा था।
“यह कहां ले आए तुम मुझे?” मैं घबराने का अभिनय करती हुई बोली। मगर उसने कोई उत्तर नहीं दिया। तुरंत ऑटो से बाहर निकल कर मेरी ओर बढ़ा और बिना कुछ बोले हुए मुझे खींच कर बाहर निकाला।
“तुम कुछ बोलते क्यों नहीं, यहां क्यों ले कर आए हो मुझे?” मैं डरती हुई ऑटो से बाहर खिंची चली आई, खुले आसमान के नीचे।
“अभी बताते हैं, हियां काहे लाए हैं तुमको” बेहद वहशियाना अंदाज मे वह बोला। उसके मुह से शराब की बू आ रही थी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, उस आदमी ने मुझे उस घसियाले जमीन पर पटक दिया और मुझ पर चढ़ गया। काफी ताकतवर था वह।
“छोड़ो मुझे। यह क्या कर रहे हो मेरे साथ? चिल्लाऊंगी मैं।” मैं घबराई आवाज में बोली।
“चिल्लाएगी? चिल्ला, जोर जोर से चिल्ला। पहली बात, यहां तेरी आवाज सुन कर अगर कोई आएगा नहीं। अगर कोई आएगा भी तो वह भी उसी काम से आएगा जो अभी हम करने जा रहे हैं।” इतना कह कर उसने मेरी कुर्ती को ऊपर उठा दिया और मेरे ब्रा के ऊपर से ही मेरी बड़ी बड़ी चूचियों को दोनों हाथों से दबाने लगा। फिर एक झटके में ब्रा को नोच कर मेरे उरोजों पर से आवरण हटा दिया।
“आह्ह्ह्ह्ह, छोड़िए प्लीज, ओह्ह्ह्ह मां, मत करो ना मेरे साथ यह सब। हाय, मैं शरीफ औरत हूँ। छोड़ो मुझे।” मैं विरोध का नाटक करने लगी। अपने आप को अबला, असहाय और कमजोर औरत दिखाने लगी।
“छोड़ देंगे मैडम, आधा एक घंटे बाद। आपको देख कर और आपकी सुंदरता देख कर मेरा मन डोल गया है। आपकी चूचियां बड़ी मस्त हैं। आपने दिखाया और देखिए मेरा लौड़ा कैसे उठक बैठक करने लगा। जबतक यह शांत नहीं होगा, कैसे छोड़ दें।” कहते हुए अपना पैजामा खोल फेंका। अंदर अंडरवीयर भी नहीं पहना था उसने। काला तना हुआ, सात इंच का बेहद मोटा लिंग मेरे सामने फनफना रहा था। मैं इतने मस्त लिंग को देखकर अंदर तक गनगना उठी।
“हाय राम, जंगली कहीं के, शर्म नहीं आती। छोड़िए मुझे, बरबाद ना कीजिए मुझे।” मैं गिड़गिड़ाते हुए रोनी सी आवाज में बोली।
“देखो मैडम, आप ने ऑटो में बैठकर अपनी चूचियां दिखा कर खुद ललचाया है। मेरा लौड़ा मेरे वश में नहीं है। अब हम इसको कैसे रोकें। आपको चोदे बिना मानेगा नहीं, इसलिए चुपचाप चोदने दे। वैसे भी आपके जैसी औरत हमारी किस्मत में कहां। आज तो ऐसी सुंदर औरत हाथ लगी है।” कहते कहते मेरी इलास्टिक वाले ढीली पैजामी को एक झटके में मेरी पैंटी समेत नीचे खींच लिया। अब मेेेरे नीचे का हिस्सा बिल्कुल नंगा था जो चांदनी रात में चमक रहा था।
“हाय राम, मुझे छोड़ दो । छि: छि: कैसी गंदी बात कर रहे हो। मुझे जाने दो प्लीज।” मैं अपनी योनी को अपने हाथों से ढंकने की असफल कोशिश करती रही। लेकिन अब उस ऑटो वाले को रोक पाना असंभव था, मैं रोकना चाहती भी नहीं थी। मेरी दपदपाती चांदनी रात मे चमकती योनी का दर्शन करने के बाद तो वह पागल ही हो गया। एक झटके में मेरे नीचे के कपड़े को पैरों से निकाल फेंका। इससे पहले कि मैं कुछ कहती, वह मुझ पर सवारी गांठ चुका था। मेरे दोनों पैरों को जबरदस्ती फैला कर अपने लिंग का सुपाड़ा मेरी योनी छिद्र के ऊपर रख कर एक ही भीषण प्रहार से सड़ाक से पूरा लिंग उतार दिया।
“ओह्ह्ह्ह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ,” मैं चीख पड़ी। दर असल मैं चीखने में मजबूर हो गई थी, चूंकि उसने बड़ी ही बेरहमी और जल्दबाजी में यह सब किया था। सच में उसका यह कृत्य पीड़ादायक था। मेरे गोल गोल सख्त उरोजों के ऊपर खड़े निप्पल्स को देखकर उसकी हैवानियत और बढ़ गई थी। अपने मुह में भर कर दांत गड़ा दिया।
“आह्ह्ह्ह्ह, मार डाला रे हरामी” मैं फिर चीखी। लेकिन उस पर तो भूत सवार हो चुका था। इधर मेरी चूचियों पर अपनी हैवानियत का निशान छोड़ता जा रहा था और उधर दनादन मेरी योनी में अपने मोटे लिंग का आक्रमण पर अक्रमण किये जा रहा था। मेरी चीख पुकार का उसपर कोई असर नहीं हुआ। कुछ पलों की पीड़ा के पश्चात मैं उसके मशीनी अंदाज में संभोग से अजीबोगरीब स्थिति में पहुंच गई। एक तरफ दर्द, दूसरी तरफ सुखद अहसास।
शनैः शनैः मैं उसके बलात संभोग से सुख के गहरे सागर में डूबती चली गई और बेसाख्ता मेरे होठों से, “आह, ओह्ह्ह्ह, मां मां, ओह उफ्फ्फ, इस्स्स्स्स,” आनंद से परिपूर्ण सिसकारियां निकलने लगीं। मैं ने अपने पैरों से उसकी कमर को लपेट लिया था और उसकी गर्दन को अपने हाथों से लपेट कर सुखद संसार में झूले झूलने लगी। करीब पैंतीस मिनटों तक वह ऑटोवाला मुझे झिंझोड़ता रहा।
“आह ओह रानी, ओह मैडम, ले मेरा लौड़ा, ओह साली, मजा आ रहा है ना मेरी रानी, आह ऐसी औरत को चोदने का मजा, अहा, ओहो, तेरी चूत, ओह तेरी बुर, मस्त मस्त,….” बोलता जा रहा था और दनादन चोदता जा रहा था। इस दौरान मुझे दो बार झाड़ चुका था। मेरी सारी थकान उतार कर तरोताजा कर दिया था। मैं दुगुने जोश से कमर उछाल उछाल कर चुदवाती रही। फिर अचानक पूरी ताकत सी मुझे अपने से चिपका कर फच फच अपना मदन रस मेरी चूत में भरता चला गया। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह्,” डकारता हुआ खल्लास हो गया, तभी मैं भी एक लंबी आह्ह्ह्ह्ह के साथ उसके शरीर से चिपकी, झड़ने के अद्भुत अहसास से सराबोर हो उठी। अभी खल्लास हो कर मुझे छोड़ कर खड़ा हो ही रहा था कि, अचानक किसी आघात से वह एक दर्दनाक चीख के साथ औंधे मुंह गिर पड़ा। मैं घबरा कर सामने देखने लगी, दो काले भुजंग दानवाकार गुंडे खड़े थे।
“साला हरामी अकेले अकेले इतनी खूबसूरत लौंडिया को हमारे इलाके में लाकर चोद रहा है मादरचोद।” एक खौफनाक आवाज मुझे सुनाई पड़ी। मैं समझ गई कि मैं इन गुंडों के बीच फंस चुकी हूं। मैं ने पल भर में स्थिति को समझ लिया, और खड़ी होना चाह रही थी तभी उस गुंडे ने कहा, “कालिया, पकड़ साली कुतिया को। अब हम चोदेंगे, उठ कहाँ रही है हरामजादी।” जैसे ही कालिया नामक गुंडा मुझे पकड़ने के लिए मुझ पर झुका, मैंने अपने दाहिने पैर के घुटने का एक करारा प्रहार उसके जांघों के बीच जड़ दिया। “आह्ह्ह्ह्ह,” एक लंबी दर्दनाक चीख के साथ वह अपने गुप्तांग को पकड़ कर दोहरा हो गया। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, मेरे बांये घुटने का प्रहार उसके थोबड़े पर हुआ। वह अचेत हो कर वहीं भरभरा कर गिर पड़ा।
“मादरचोद, हराम का माल पाया है? जा के अपनी मां बहन को चोद भड़वे”, मैं चीखी, अब मैं रणचंडी बन चुकी थी। पूरी तरह नंगी उस दूसरे गुंडे के सामने खड़ी हो गई। “आ, साले, चोदना तो दूर, हाथ लगा के दिखा मां के लौड़े।”
मेरा रौद्र रूप देख कर एकबारगी वह सहम गया। फिर भी हिम्मत बांध कर मेरी ओर बढ़ा। तभी मेरे दायें पैर का करारा किक उसके पेट पर पड़ा।
“आह्ह्ह्ह्ह” कराह कर ज्यों ही वह पेट पकड़ कर झुका, उसकी गर्दन कर मेरे दायें हाथ का चाप पड़ा। वह भी ढेर हो गया। अब तक संभल चुका ऑटो वाला ठगा सा यह सब देख रहा था।
मैं हाथ झाड़ते हुए अपने कपड़ें पहनते हुए बोली, “इस तरह आंखें फाड़कर देख क्या रहे हो, मुझे घर नहीं छोड़ना है क्या?” वह जैसे नींद से जागा। फिर फटाफट अपने कपड़े पहन कर ऑटो स्टार्ट किया। मैं कूद कर ऑटो में सवार हो गई। वह ऑटो वाला पूरे रास्ते चुप रहा।
जब मैं ऑटो से उतरी और पैसे देने लगी, शर्मिंदा होते हुए मुझ से पूछ बैठा, “मैडम, आपने दो गुंडों को मार गिराया, आप चाहती तो मुझे भी मार सकती थीं, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, क्यों?”
“तू अपने काम से काम रख, वैसे नाम क्या है तुम्हारा?” मैं बोली।
“जी श्यामलाल” वह अब भी शर्मिंदा था।
“तो श्याम बाबू साहब, तू मुझे चोद सका, क्योंकि मैं ऐसा चाहती थी, समझ गये? तुम मुझे पसंद आए। आगे भी तुम मुझे चोद सकते हो। एक बात समझ लो, जिसे मैं पसंद नहीं करती, वह मुझे छू भी नहीं सकता है। अब देख क्या रहे हो, फूटो यहां से। कभी चोदने का मन करे तो बोल देना। यह रहा मेरा नंबर।” इतना कहकर मैं ने उसे अपना नंबर दे दिया। उसके बाद मैं कई बार उससे मिली और मजा किया। उसका एक और पार्टनर था, बलराम, पचास साल का एक स्थानीय आदिवासी, कद करीब पांच फुट ग्यारह इंच, बिल्कुल कोयले की तरह काला, गंजा, साधारण सा दिखने वाला, पेट थोड़ा निकला हुआ, किंतु लिंग आठ इंच का और लिंग की मोटाई भी उसी के अनुपात में। वह पूरा अनुभवी चुदक्कड़ था, स्त्रियों की कामक्षुधा को तृप्त करने की कला में माहिर और स्तंभन क्षमता अद्भुत। श्यामलाल की तुलना में कई गुना दक्ष खिलाड़ी। मैं श्यामलाल की शुक्रगुजार हूं ऐसे वासना के पुजारी से मिलाने के लिए। मेरे जैसी वासना की अदम्य भूखी औरत के लिए कुछ गिने चुने व्यक्तियों की सूचि में उसका नाम भी आता है। श्यामलाल के साथ साथ उसके साथ कई बार सामुहिक संभोग का लुत्फ भी उठाया। कभी अपने घर में, कभी उसके घर में और कभी बलराम के घर में। बलराम वाला किस्सा मैं बाद में बताऊंगी। कहने का तात्पर्य यह है कि मेरी मर्जी के बगैर कोई मुझे हाथ भी नहीं लगा सकता था, उस समय भी और आज भी।
