एक बुजुर्ग और शादी-शुदा औरत के बीच वासना 3

बाप बेटी

दरवाज़े की घंटी बजते ही हम दोनों थोड़े हड़बड़ा गए।

राजेश्वर जी: सुबह-सुबह कौन हो सकता है?

मैं: जी आप जा कर देखिये, मैं जल्दी से कपड़े पहनती हूं।

राजेश्वर जी पैंट पहन कर दरवाजा खोलने गए, और मैं भी जल्दी से अपने कपड़े पहनने लगी। मैंने अलमारी में से सलवार-कमीज निकाली, और वो पहन ली। वो थोड़ी टाइट थी, मगर ज्यादा नहीं। राजेश्वर जी ने दरवाजा खोला, और जोर से खुश होकर बोले-

राजेश्वर जी: अरे तुम! कैसे हो मेरे भाई?

वो आदमी: मैं ठीक हूं। अब अंदर भी बुलाओगे या बाहर ही रोकोगे?

राजेश्वर जी: आजा यार, क्या तू भी।

ये बातें सुन कर में बाहर आ गई और देखा तो एक लंबा गोरा आदमी था। वो भी राजेश्वर जी की उम्र का होगा। राजेश्वर जी ने मुझे देख लिया और अपने पास आने का इशारा किया। मैं उनके पास गई, और चुप-चाप खड़ी थी।

राजेश्वर जी: ये है दिव्या, बहुत प्यारी बच्ची है। ये घर इसके पति का है।

वो आदमी: शुक्रिया दिव्या बेटी मेरे दोस्त की मदद करने के लिए।

राजेश्वर जी: और दिव्या, ये मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। विजय ठाकुर नाम है इनका। ठाकुर इंडस्ट्री के मालिक है।

मैं तो दंग रह गई कि इतनी बडी इंडस्ट्री के मालिक हमारे घर आए थे। मैंने जल्दी से उनके पैर छू लिए, और उन्होनें भी मुझे आशीर्वाद दिया “सदा सुहागन रहो”।

मैं: आप दोनों बाते कीजिये, मैं चाय-नाश्ते का इंतज़ाम करती हूं।

मैं सबसे पहले बाथरुम गई, और मुंह धो कर और ब्रश करके बाहर आ गई। फिर मैं सीधा किचन में चली गई, और चाय-नाश्ता बनाने लगी। राजेश्वर जी और विजय जी दोनों सोफा पर बैठ कर बातें कर रहे थे। दोनों बहुत हंसी मज़ाक कर रहे थे। मैं भी यह देख कर खुश हो गई थी।

कुछ देर बाद मेरा चाय-नाश्ता बना कर हो गया, और मैं उन्हें वो देने के लिये किचन में से बाहर आ गई। मैंने उन दोनों को चाय-नाश्ता दिया और साइड में खड़ी हो गई।

विजय जी: अरे बेटा तुम भी चाय-नाश्ता कर लो।

मैं: जी शुक्रिया, लेकिन मैं बाद में खा लूंगी।

विजय जी: अरे क्या बेटी, तुम भी जाओ, और अपने लिये भी चाय-नाश्ता लेकर आओ।

मैं जल्दी से अपने लिये भी चाय-नाश्ता लेकर आ गई, और उनके साथ में बैठ कर खाने लगी।

विजय जी: अरे राजेश्वर एक बात बताना भूल गया, संजय आ रहा है पंडित को लेकर।

राजेश्वर जी: पंडित को लेकर क्यूं?

विजय जी: अरे मुहुर्त निकलवाना है ना।

मैं: राजेश्वर जी आप दोनों कब से एक-दूसरे के दोस्त हैं?

वो दोनों हस पड़े और राजेश्वर जी ने कहा।

राजेश्वर जी: बचपन से दोस्त है हम। मेरे दोस्त बहुत कम है। गिन कर 6 दोस्त है। मगर जितने भी है, हम एक-दूसरे को भाई मानते है।

विजय जी: हां, अगर किसी पर मुश्किल आए तो हम बाकी के दोस्त मिल कर उसकी मदद करते है।

ऐसे ही कुछ देर हम बातें कर रहे थे। राजेश्वर जी ने और विजय जी ने उनके बचपन के बहुत किस्से सुनाए। मुझे भी उनसे बातें करके बहुत मजा आ रहा था। फिर एक बार दरवाज़े की घंटी बजी।

मैं उठ कर दरवाजा खोलने गई। मैंने दरवाज़ा खोला तो दो लोग खड़े थे। एक पंडित था, और दूसरा राजेश्वर जी की उम्र का आदमी था। मैं समझ गई कि ये कौन था।

वो आदमी: बेटा राजेश्वर जी है?

मैं: आपका नाम संजय है?

संजय जी: हां।

मैं: जी अंदर आईये, राजेश्वर जी और विजय जी अंदर बैठे है।

संजय जी पंडित को लेकर अंदर आ गए। फिर राजेश्वर जी ने मेरी और उनकी पहचान कराई, और मैं उनके लिये चाय लाने किचन में चली गई। संजय जी का पूरा नाम संजय प्रसाद रॉय था। वो बहुत बड़े हार्ट सर्जन थे। वो सोफे पर बैठे थे, और मैंने उन्हें चाय दे दी। पंडित राजेश्वर जी से कुछ बात कर रहा था। फिर पंडित जी मेरी तरफ आए और बोले-

पंडित: बेटा मुझे अपने घर के पूरे दर्शन कराओ।

मैं: लेकिन क्यूं पंडित जी?

पंडित: जिस घर में पूजा होने वाली है, उस घर का अच्छे से दर्शन करना होगा। और वास्तु के हिसाब से मुहरत निकालना होगा।

मैंने आगे कुछ और सवाल नहीं पूछे, और उन्हें अपना घर दिखाने लगी। हमारा बंगला बहुत बड़ा है। कुल मिला कर 8 कमरे है। 2 नीचे, 4 उपर, और 2 दूसरी मंज़िल पर, और उसके उपर टेरेस है। मैंने पंडित जी को पूरे घर के दर्शन करा दिए, और आखिर में हम टेरेस पर पहुंच गए।

मैं: ये है हमारा घर।

पंडित जी: अच्छा घर है।

फिर हम नीचे जाने लगे, लेकिन पंडित जी ने मुझे रोक लिया।

पंडित जी: बेटी तुम्हें कोई तकलीफ या बुरा लग रहा है?

मैं: नहीं पंडित जी, वो बस नींद आ रही है।

असल में राजेश्वर जी और मेरी चुदाई अधूरी रहने के कारण मेरा मूड खराब था। तभी मेरी नज़र पंडित जी की धोती पर गई और देखा कि उनका लंड पूरा खड़ा हो चुका था, और तड़प रहा था। मैं पंडित जी के धोती को इशारा करते हुए बोली-

मैं: मेरी तकलीफ छोड़िये, आप तो बहुत तकलीफ में हो।

पंडित जी ने जल्दी से अपना हाथ धोती पर रखा और बोले-

पंडित जी: माफ कर दो बेटी, वो गलती से हो गया।

मैं: अगर आप चाहें तो में आपकी तकलीफ दूर कर सकती हूं।

पंडित जी और शर्मा गए, और मना करने लगे।

पंडित जी: नहीं-नहीं बेटी, ऐसा मत करो, नहीं तो पाप हो जाएगा!

मैं: मतलब?

पंडित जी: मैंने पंडित बनने से पहले शपथ ली थी कि में कभी किसी स्त्री से शारिरीक संभोग नहीं करूंगा, और ब्रम्हचारी रहूंगा।

मैं: मैंने कब कहा कि मैं आपके साथ शारिरीक संभोग करूंगी?

पंडित जी: छोड़ो बेटी, में खुद इस तकलीफ को दुर करता हूं।

मैं: कैसे करेंगे? हस्तमैथुन से?

पंडित जी ने हां में सर हिलाया।

मैं: मेरे पास ऐसा तरीका है कि जिससे आपकी शपथ भी नहीं टूटेगी, और आपको अपनी तकलीफ से छुटकारा भी मिलेगा।

पंडित जी: कैसा तरीका?

मैं: आप कुर्सी पर बैठ जाईये और धोती उतारिये।

पंडित जी बहुत शर्मा गए, और उनका चेहरा भी एक-दम लाल हो गया था। इतना सब होने के बाद भी पंडित जी का लंड खड़ा ही था।

पंडित जी: बेटी क्या कह रही हो?

मैं: आप चिंता मत कीजिये। आप बताओ स्त्री और पुरुष के बीच शारीरीक संभोग का मतलब क्या है?

पंडित जी: शारीरिक संभोग मतलब जब स्त्री और पुरुष आपस में प्रजनन की क्रिया करते है उसे कहते है।

मैं: और अगर में आपके साथ वो क्रिया ना करूं तो?

पंडित जी: तो फिर उसे संभोग नहीं कहा जा सकता।

मैं: यहीं बात तो मैं आप से कब से कह रही थी, कि मैं आपके साथ संभोग नहीं करूंगी!

पंडित जी: फिर ठीक है।

पंडित जी धोती उतार कर कुर्सी पर बैठ गए, और मैंने जल्दी से जा कर टेरेस का दरवाजा बंद कर दिया। मैं उनकी तरफ मुड़ी, तो देखा कि उनका लंड 7 इंच बड़ा और काफी चौड़ा था। मैं उनके सामने खड़ी हो गई, और उनके लंड को घूर रही थी।

पंडित जी: बेटा तुम ये सब क्यूं कर रही हो?

मैं: तांकि आपकी तकलीफ दूर हो जाए और आप हमारे घर को और मुझे आशीर्वाद दें।

मैं घुटनों के बल बैठ गई और उनके लंड को हाथ में लेकर हिलाने लगी। उन्हें भी अच्छा लग रहा था। वो आंखें बंद करके बैठे हुए थे।

फिर मैं धीरे से उनके लंड पर अपनी जुबान हल्के से फेरने लगी और उनके टट्टों को एक हाथ से सहलाने लगी। फिर उनका लंड मैंने धीरे-धीरे अपने मुंह में लिया और चूसना शुरु कर दिया।

पंडित जी मेरे सामने 5 मिनट भी नहीं टिके, और वो मेरे मुंह में ही अपना पानी छोड़ने लगे। वो इतना वीर्य छोड़ रहे थे कि मेरा पूरा मुंह उनके वीर्य से भर गया।

उनका रस बहुत गरम था और दूध के समान सफेद था। उसका स्वाद बहुत अच्छा था। मैंने आज तक इतना स्वादिष्ट वीर्य नहीं पिया था। मैंने उनका सारा वीर्य निगल लिया, एक बूंद भी नहीं गिरने दी।

मैं: वाह पंडित जी, आपका प्रसाद तो बहुत स्वादिष्ट है, और आप प्रसाद भी बहुत सारा देते हो।

पंडित जी समझ गए कि मैं किस प्रसाद की बात कर रही थी।

पंडित जी (शर्माते हुए): ध… धन्यवाद बेटी।

मैं: आपने आखरी बार हस्तमैथुन कब किया था?

पंडित जी: बहुत साल हो गए, लगभग सात साल हो गए।

मैं: बाप रे! सात साल! इतने साल तक आपने कुछ नहीं किया?

पंडीत जी: हां। मेरे मन में वैसे कुछ भावना आई ही नहीं।

मैं: लेकिन आप इतनी जल्दी क्यों झड़ गए? मुझे लंड चूसने का मजा भी नहीं मिला।

पंडित जी: ये मेरा पहली बार था।

मैंने देखा कि पंडित जी का लंड अब तक बैठा नहीं था। बल्कि अब भी उतना ही खड़ा था जितना पहले था।

मैं: आपका लंड अब भी नहीं बैठा?

पंडित जी: नहीं वो आसानी से नहीं बैठता है।

मैं: शायद आपके लंड को पूरा निचोड़ना होगा, और सारा वीर्य बाहर निकालना पड़ेगा।

मैंने अब ठान ली थी कि मैं अब पंडित जी का लंड शांत करके ही मानूंगी। मैंने अपने कपड़े जल्दी से उतर दिये, और सिर्फ पैंटी में खड़ी थी।

पंडित जी: बेटा अपने कपड़े क्यूं उतर रही हो?

मैं: आप चलिये मेरे साथ।

मैंने पंडित जी का हाथ पकड़ा, और नंगे बदन ही उन्हें टेरेस के नीचे वाले कमरे में ले गई।

मैं: आप अपने भी कपड़े उतार दीजिये।

पंडित जी: नहीं-नहीं… बेटी।

मैं: आप मेरी बात मानो पंडित जी।

पंडित जी ने अपना थैला बाजू में रखा, और अपने कपड़े उतार दिये। अब हम दोनों एक-दम नंगे थे।

उस कमरे में एक छोटा सोफा रखा था। मैंने पंडित जी को सोफे पर लिटा दिया, और तेल की बॉटल जो कि कमरे में पहले से ही थी, उसे लेकर आ गई, और पंडित जी के लंड को बहुत सारा तेल लगा दिया।

अब खेल शुरु हुआ। मैंने पंडित जी के लंड को हिलाना शुरु कर दिया, और साथ ही साथ मुंह में लेकर चूसना शुरु कर दिया। लंड चूसने की आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी। मैं पूरे जोश में लंड चूसे जा रही थी, और फिर दस मिनट बाद उनका लंड मेरे मुंह में फिरसे झड़ने लगा।

हैरानी की बात यह थी कि पंडित जी ने अब भी बहुत सारा वीर्य मेरे मुंह में छोड़ दिया, पहले जैसा ही गाढ़ा, सफेद और स्वाद में भी उतना ही बढ़िया। पंडित जी को बहुत ही अच्छा महसूस हुआ। मुझे लगा कि अब खेल खतम हो गया था, लेकिन नहीं। कुछ मिनट बाद ही उनका लंड फिरसे खड़ा हो गया। मैं ये देख कर बहुत हैरान थी।

मैं: अरे बाप रे! अपका लंड फिर खड़ा हो गया।

पंडीत जी: हां… सात साल की पूरी कसर आज निकालनी है।

पंडित जी अब थोड़े खुल चुके थे, और मेरे साथ बिना शर्माए बात कर रहे थे, और मुझे भी बहुत अछा लग रहा था। पंडित जी मेरे मुंह में अपना लंड डालने ही वाले थे कि मैंने उन्हें रोक दिया।

पंडित जी: क्या हुआ बेटी?

मैं: इस बार सिर्फ मुंह में नहीं लूंगी।

पंडित जी: फिर?

मैंने उनका लंड मेरे मम्मों के बीच में रखा, और उसे ऊपर-नीचे करने लगी। पंडित जी अब मानो सातवें आसमान पर थे। वो अपने आप अपनी कमर हिला कर मेरे मम्मों के बीच लंड रख कर चोदने लगे। 15 मिनट बाद उनका लंड फिर पानी छोड़ने वाला था।

पंड़ीत जी: बेटी मेरा फिर निकलने वाला है। कहां छोडूं?

मैं: जहां आपका मन करें।

पंडित जी ने अपना सारा पानी मेरे चेहरे पर और मेरे मम्मों पर छोड़ दिया। मेरा चेहरा और मेरे बूब्स उनके वीर्य से कवर थे।

मैं (हस्ते हुए): अरे वाह, अपका वीर्य तो कम होने का नाम ही नहीं लेता। अब भी उतना ही वीर्य छोड़ा आपने। मेरे चेहरे और बूब्स को पूरा भिगो दिया।

पंडित जी शर्मा गए। मुझे लगा कि पंडित जी के लंड में अब भी बहुत दम बचा था। तो मैंने उनके लंड को पकड़ कर हिलाना शुरु कर दिया।

पंडित: ये क्या कर रही हो बेटा… बस हो‌ गया।

मैं: आप चुप रहिये, मैं जानती हूं आपके लंड में अब भी दम है। और ये बेटी-बेटी क्या लगा रखा है? दिव्या नाम है मेरा।

कुछ देर में मुझे जो लग रहा था वहीं हुआ। उनका लंड फिर खड़ा हो गया।

मैं: पहली बर ऐसा मर्द देखा है जिसका लंड तीन बार लगातार झड़ने के बाद भी खड़ा रहता है।

पंडित जी: शुक्रिया दिव्या बेटी।

मैंने उन्हें सोफे पर से उठाया, और खुद सोफे पर लेट गई।

मैं: देख क्या रहे है, आप आईये और मेरा मुंह चोदिये।

बस कहने की देरी थी। पंडित जी जल्दी से अपना लंड मेरे मुंह में डाल कर मेरा मुंह दना-दन चोदने लगे। वो इतने जोर-जोर से मेरा मुंह चोद रहे थे कि मुझे सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी। ऐसे ही मेरा मुंह चोदते-चोदते वो झड़ गए। उन्होने अपना लंड मेरे मुंह में ही जमाए रखा जिसके कारन मुझे उनका वीर्य फिरसे पीना पड़ा। पंडित जी ने मुझे सांस लेने का भी मौका नहीं दिया, और मेरा मुंह फिर चोदना शुरु कर दिया।

हमारा ये खेल पूरे एक घंटे तक चला। पंडित जी लगातार 7 बार मेरे मुंह में झड़ गए। आखिरकार पंडित जी का लंड शांत हो गया।

मैं सोफे से उठ गई, और अपना चेहरा आईने में देखा। मेरे पूरे चेहरे पर वीर्य लगा हुआ था, और मेरे बाल पूरे बिखरे हुए थे। ना-जाने क्यों मुझे मेरा यह रुप देख कर बहुत अच्छा लगा। मुझे ऐसा लग रहा था कि मानों मैं कोई रंडी हूं।

उस कमरे में एक बाथरूम था, तोह मैं उसके अंदर अपना मुंह धोने के लिए जाने ही वाली थी कि राजेश्वर जी ने नीचे से आवाज दी “दिव्या! अरे कहां रह गई हो तुम?”

राजेश्वर जी की आवाज से हम दोनों डर गए। मैंने जैसे-तैसे अपने आप को शांत किया और उन्हें उपर से ही आवाज दी।

मैं: आ रहें है राजेश्वर जी रुकिये।

राजेश्वर जी (नीचे से): ठीक है, जल्दी आओ।

मैंने चैन की सांस ली और सोचा “अच्छा हुआ वो उपर नहीं आए”। मैंने पंडित जी की ओर देखा तो उनके पसीने छूट रहे थे। मैंने उन्हें गले लगाया और शांत कर दिया।

फिर मैं बाथरुम में चली गई और अपना चेहरा अच्छे से धो लिया, और अपने बाल फिर ठीक कर दिये। मैं बाहर आई तो पंडित जी मुझे देख रहे थे।

मैं: क्या हुआ, अब भी मन नहीं भरा क्या?

पंडित जी: नहीं बेटी, बस तुम्हारी खुबसूरती देख रहा था।

मैं शर्मा गई, और अपने कपड़े पहनने लगी। मैं कपड़े पहन ही रही थी कि पंडित जी ने मुझे रोक दिया।

मैं: क्या हुआ पंडित जी? कपड़े तो पहन लेने दो मुझे।

पंडित जी: दिव्या बेटी तुम मेरे सामने ऐसे ही नंगी कुछ और देर खड़ी रहो।

मैंने उनकी बात मान ली, और उनके सामने ऐसे ही नंगी खड़ी हो गई। पंडित जी मुझे देखे जा रहे थे और मेरी खुबसूरती निहार रहे थे।‌ मैं तो पूरी शर्म से लाल हो गई थी।

पंडित जी (मुझे देखते हुए): सच में तुम्हें भगवान ने अप्सरा का रूप दिया है।

मैं शर्मा गई और बोली-

मैं: आपको भी भगवान ने लगातार झड़ने का वरदान दिया है। सच में अपका वीर्य पीकर मेरा तोह पेट भर गया।

पंडित जी ने मुझे शुक्रिया कहा और अपने झोले में से एक माला निकाली‌। उन्होंने उस माला को पकड़ कर कुछ मंत्र बोला, और वो माला मुझे पहना दी।

मैं: ये क्या है?

पंडित जी: ये माला पहनने से तुम हमेशा खुश रहोगी, और तुम पर कोई बड़ा संकट नहीं आएगा।

मैं: शुक्रिया पंडित जी।

पंडित जी ने फिर एक धागा निकाला, और मंत्र पढ़ते-पढ़ते मेरे हाथ में बांध दिया।

मैं: अब ये क्या है?

पंडित जी: इस धागे से तुम्हें शारिरीक सुख की कमी नहीं होगी, और तुम गर्भवती होने की शक्यता बढ़ जाएगी।

मैंने नंगे बदन ही पंडित जी के पैर छू लिए और उन्होनें मुझे आशीर्वाद दिया। मैंने उन्हे माला और उस धागे के लिये शुक्रिया कहा।

मैं: वैसे पंडित जी, पूजा का मुहूर्त निकला कि नहीं।

पंडित जी: हां दिव्या बेटा, अगले हफ्ते का ही मुहूर्त है।

मैं: पंडित जी, मेरी एक इच्छा है, जो आप पूरी करने में मेरी मदद कर सकते है।

पंडित जी: हां बेटी बोलो। कौन सी इच्छा है?

मैं: मुझे शादी करनी है।

पंडित जी ये सुनते ही चौंक गए और बोले-

पंडित जी: ये क्या कह रही हो? तुम तो पहले से ही शादी-शुदा हो, और किससे शादी करना चाहती हो?

मैं: सब बताती हूं। आप पहले शांत हो जाईये।

मैं पंडित जी को अपनी कहानी बताने लगी।

मैं: मेरे पति हमेशा काम से बाहर रहते है, तो मुझे शारिरीक सुख की कमी थी, और उस कमी को मेरे मुंह बोले पति राजेश्वर जी ने पूरा किया।

पंडित जी: वो नीचे बैठे हुए है, वो?

मैं: हां। लेकिन आप यह मत सोचिये कि मेरा मेरे असली पति पर प्यार नहीं है।

पंडित जी: तो फिर राजेश्वर जी से शादी क्यूं करनी है?

मैं: मेरा मेरे असली पति पर जितना प्यार है, उतना ही मेरा राजेश्वर जी पर भी प्यार है। इसलिये मुझे उनको भी अपना पति बनाना है।

पंडित जी: लेकिन फिर भी दूसरी शादी?

मैं: ये शादी बस मेरे समाधान के लिये होगी, कानूनी तैर पर नहीं।

पंडित जी: फिर ठीक है। लेकिन कब करनी है शादी?

मैं: परसो।

पंडित जी: इतनी जल्दी तो मुश्किल है। लेकिन मैं परसो आ जाऊंगा। तुम बस सारा सामान लाकर रख देना।

फिर हम दोनों ने कपड़े पहन लिए, और नीचे आ गए। नीचे वो तीनो बातें कर रहे थे। राजेश्वर जी ने मुझे देखते ही पूछा-

राजेश्वर जी: अरे कहां रह गई थी तुम?

मैंने झूठा कारन दे दिया-

मैं: वो पंडित जी उपर मंत्र पढ़ रहे थे, तो मैं उनके साथ रुक गई।

राजेश्वर जी: ठीक है। लेकिन कैसा मंत्र पढ़ रहे थे?

मैं: वो मैं बाद में बताती हूं, और हां, मुझे पंडित जी ने प्रसाद भी दिया।

यह कह कर मैंने पंडित जी की तरफ देख कर हल्की सी मुस्कान दी। फिर राजेश्वर जी ने पंडित जी से पूजा के मुहूर्त के बारे में पूछा, तो पंडित जी ने उन्हें बता दिया कि मुहूर्त अगले हफ्ते का ही था।

कुछ देर बाद पंडित जी चले गए और फिर राजेश्वर जी और उनके दोस्त भी बाहर चले गए पूजा का सामान लाने के लिए ।

मैं फिर एक बार घर में अकेली थी। मैंने अपने पति को कॉल किया, और उन्हें पूजा के मुहूर्त के बारे में बता दिया और फ़ोन रख दिया।

मैं भी अब घर में अकेले-अकेले बोर हो रही थी। मैंने सोचा “परसों मेरी राजेश्वर जी के साथ शादी थी, तो क्यों ना मेरी शादी की शॉपिंग की जाए”। और मैं तैयार होकर मेरी शादी की शॉपिंग करने बाहर निकल गई।

मैंने अपना क्रेडिट कार्ड साथ ले लिया, और बहुत सारी कैश लेली। लगभग 80 हज़ार रुपए थे, और क्रेडिट कार्ड की तोह लाखों में लिमिट थी। अमीर घर का होने का यही फायदा है, पैसों की कभी चिंता नहीं रहती। मैं अपनी कार में बैठ कर सोनार की दुकान में गई। वहां मैंने अपने लिये एक बढ़िया सा मंगल सत्र और हार खरीद लिया। दोनों की कीमत मिला कर लगभग 2 लाख तक होगी।

फिर मैं साड़ी की दुकान में गई, और वहां मैंने अपने लिये दुल्हन का जोड़ा खरीद लिया जो पचास हजार का था। चापल, अंगूठियां, चैन और बाकी सब खरीद लिया। आखिर में मैंने राजेश्वर जी के लिये  शेरवानी खरीद ली। मैंने अपने लिये बहुत सारे गहने भी खरीद लिये थे, और आखिर में मैंने फूलों की दुकान में जाकर शादी का हार परसों मेरे घर भेजने बोला।

शाम के 7 बजे मैं घर वापस आ गई, और सारा हिसाब-किताब करने लगी। मैंने कुल मिला कर 6 लाख की शॉपिंग की। मैंने ज्यादातर गहने ही खरीदे थे। मैंने ये सब सामान मेरी अलमारी में सजा कर रख दिया।

कुछ ही देर बाद राजेश्वर जी घर आ गए उनके साथ कुछ और लोग भी थे, जिनके हाथ में पूजा का सामान था। उन्होंने वो सामान स्टोर रूम में रखा, और वहां से चले गए।

वो लोग जाते ही राजेश्वर जी ने मुझे अपनी ओर खींच लिया और मुझे जोर से किस्स करने लगे। मैं भी उनका पूरा साथ दे रही थी।

रजेश्वर जी: चलो दिव्या, मुझसे रहा नहीं जाता। मुझे तुम्हें अभी चोदना है।

मैं: नहीं। आप दो दिन मुझे नहीं चोद सकते। और छू भी नहीं सकते।

राजेश्वर जी थोड़े चिंतित हो गए और बोले।

राजेश्वर जी: क्या हुआ दिव्या? तुम्हारी तबियत तो ठीक है?

मैं: मुझे कुछ नहीं हुआ है।

राजेश्वर जी: तो फिर क्या हुआ?

मैं: जी वो, मुझे आपसे कुछ कहना है।

राजेश्वर जी: क्या कहना है, बोलो?

मैं: मैंने हम दोनों की शादी फिक्स कर दी है।

राजेश्वर जी चौंक गए।

राजेश्वर जी: क्या! कब? और कैसे?

मैं: हां! हमारी परसों शादी है, और मैंने सारी शॉपिंग भी कर ली है।

राजेश्वर जी: लेकिन तुम पहले से ही शादी-शुदा हो।

मैं: अरे ये शादी बस मेरे मन की शांती के लिए होगी। सच-मुच की नहीं।

फिर भी राजेश्वर जी थोड़ा हिचकिचा रहे थे। मैंने जैसे-तैसे करके उन्हें मना लिया और राजेश्वर जी मुझसे शादी करने के लिए राजी हो गए। मैं बहुत खुश हो गई, और और उन्हें कस कर गले लगा लिया। राजेश्वर जी मेरी गांड दबाने लगे, तो मैं झट से उनसे अलग हो गई और बोली-

मैं: नहीं शादी से पहले कोई बदमाशी नहीं।

राजेश्वर जी: अरे यार मैंने तुझे चोदने के कितने प्लान बनाए थे।

मैं: थोड़ा सब्र रखिये, बस दो दिन की बात है।

राजेश्वर जी थोड़े नाराज होकर सोफे पर बैठ गए। कुछ देर बाद हम दोनों ने डिनर कर लिया, और हम अलग-अलग कमरे में जा कर सो गए। मुझे राजेश्वर जी के चुदाई की आदत पड़ गई थी, जिसके कारण मुझे नींद नहीं आ रही थी। मेरी चूत उनके विचार से ही गीली होने लगी। ऐसा लग रहा था कि अभी उनके कमरे में जाकर उनसे चुदवा लूं।

लेकिन मैंने ठान लिया था कि शादी से पहले मैं चुदाई नहीं करूंगी। मैं अपने आप को शांत करने के लिए चूत में उंगली करने लगी और झड़ने के बाद सो गई। अगले दिन की सुबह कुछ खास नहीं थी। हम दोनों ने एक-दूसरे को छुआ भी नहीं। लेकिन अन्दर ही अन्दर हम दोनों चुदाई के लिये तड़प रहे थे। वो पूरा दिन बहुत बोरियत भरा था, लेकिन अगले ही दिन हमारी शादी थी, इसलिए यह एक दिन सहना पड़ा।

मैं उस दिन ब्यूटी पार्लर गई और अपना फेशियल और वेक्सिंग करा लिया। मेरी त्वचा एक-दम कोमल हो गई थी। अगला दिन हम दोनों के लिये खास था। मैं सुबह जल्दी उठ गई, और तैयार हो गई। फिर थोड़ी देर बाद राजेश्वर जी भी उठ गए, और अपने कपड़े पहन कर वो भी तैयार हो गए।

8:30 बजे पंडित जी आ गए, और हमारी शादी की विधि शुरू हो गई। राजेश्वर जी ने मेरे गले में मंगल सूत्र पहनाया, और मेरी मांग भर दी। साथ फेरों के सात वचनों के बाद हम सात जनम के लिये एक-दूसरे के हो गए।

फिर हम दोनों ने पंडित जी के पैर छू लिए, और उनका आशीर्वाद ले लिया। मैंने पंडित के पास अपना फ़ोन दिया, और उन्हें हमारी तस्वीर लेने के लिए कहा। हम दोनों ने अलग-अलग पोज दे कर कई फोटोज ले लिये। आखिर में हमने पंडित जी को उनकी दक्षिणा दे दी, और वो चले गए। पंडित जी के जाने के बाद-

राजेश्वर जी: अब तो खुश हो ना तुम दिव्या?

मैं: हां मेरी जान, अब तो में बहुत खुश हूं। आपकी बीवी जो बन गई हूं।

ये कह कर मैंने राजेश्वर जी के गाल पर किस्स दे दी।

राजेश्वर जी: हां दिव्या, लेकिन फिर भी मुझे ये कुछ ठीक नहीं लग रहा है।

मैं: अरे बाबा… आप क्यूं इतना टेंशन ले रहें है? ये शादी बस हमारे प्यार की निशानी है, और कुछ नहीं।

राजेश्वर जी: ठीक है दिव्या। अगर तुम मुझे अपना पति मानती हो, तो मेरा सारा कहना मानना होगा।

मैं: जी मुझे मंजूर है आप कहिये आपकी ये नई-नवेली पत्नी आपके क्या काम आ सकती है?

राजेश्वर जी: मुझे तुम्हें अभी के अभी चोदना है। तुम्हारी चूत के बिना एक दिन भी एक साल जैसा लगता है।

मैं: बस इतनी सी बात। अरे मैं तो आपकी पत्नी हूं। आपका जब मन करे तब मुझे चोद डालो। और मैं भी आपके लंड के लिए प्यासी हूं।

राजेश्वर जी: तो चलो अपने कपड़े उतारो। आज तो तुझे पूरे दिन चोदूंगा। देख तुझे अपने लंड के लिए पागल कैसे बनाता हूं।

मैं मुस्कुराई और बोली: अरे मैं तो आपको और आपके लंड को देखते ही पागल हो गई थी।

मैंने अपनी शादी का जोड़ा उतार फेंक दिया, और मेरे बदन पर बस शादी के गहने थे। राजेश्वर जी किचन में जा कर दो ग्लास पानी लेकर आए, और तेल की बोतल लेकर आए। उन्होनें पानी और तेल टेबल पर रख दिया। मैं उनके सामने बिल्कुल नंगी खड़ी थी। मेरे शरीर पर बस शादी के गहने थे। राजेश्वर जी मुझे उपर से नीचे तक अच्छे से देख रहे थे।

राजेश्वर जी: अरे वाह दिव्या, बिल्कुल कमाल लग रही हो।

मैं: शुक्रिया।

राजेश्वर जी: हम्म… चलो फिर आज और अभी से तुम को मेरी एक बात और माननी पड़ेगी।

मैं: अब और क्या बाबा?

राजेश्वर जी: जब-जब हम दोनों घर में अकेले होंगे, तब-तब तुम्हें इस तरह से नंगी ही रहना पड़ेगा। अगर कपड़े पहनने होंगे तो मेरी अनुमती लेनी पड़ेगी।

शादी के बाद राजेश्वर जी मुझ पर अपना हक जमा रहे थे। मैं उनका ये रुप देख कर थोड़ी हैरान थी, मगर मुझे यहीं तो चाहिये था, कि राजेश्वर जी मुझे अपनी समझे, और मुझ पर हक जमा ले।

मैं: ठीक है मेरी जान। अब चोदोगे भी या बस यूं ही खड़े रहोगे?

राजेश्वर जी ने अपनी जेब में से दो गोलियों के पैकेट्स निकाले और एक पैक मुझे दिया। उन्होंने अपने पैक में से 1 गोली खा ली।

राजेश्वर जी: दिव्या तुम अपने पैक में से दो गोली खा लो।

मैं: ये किस चीज की गोली है?

राजेश्वर जी: चुदाई की है। आज हम दोनों बस चुदाई करेंगे, और कुछ नहीं। इसलिए ये गोलियां लाया हूं, तांकि हम दोनों को दिन भर चुदाई करने की ताकत मिले।

मैंने ये बात सुन कर दो गोलियां खा ली। शुरु में कुछ नहीं हुआ, लेकिन धीरे-धीरे गोली का असर शुरु हो गया। मेरे दिमाग में बस लंड और चुदाई के खयाल थे। मैं पसीने से लथ-पथ हो गई और मेरी चूत भी गीली हो गई।

मैं: चोदो मुझे प्लीज। मुझे आपका लंड चाहिये। आप जो बोलोगे मैं वो करूंगी, बस मुझे चोदना शुरु कर दो।

मैं राजेश्वर जी के सामने घुटनों पर बैठ कर भीख मांग रही थी, और राजेश्वर जी के चेहरे पर मुस्कान थी। उनका लंड एक दम कड़क हो गया था, मानों जैसे कोई लोहा या पत्थर हो। मैं समझ गई कि आज हम दोनों एक-दूसरे को निचोड़ने वाले थे।

मैंने जल्दी से राजेश्वर जी का लंड अपने हाथ में ले लिया। लंड एक दम गरम था। मैं लंड को आगे-पीछे करने लगी और राजेश्वर जी आंख बंद करके मजा ले रहे थे।

फिर मैं उनका लंड चूसने लगी। मैं उनका पूरा लंड चूस रही थी, और जब तक मेरी सांस नहीं फुल जाती, तब तक लंड मुंह में रख रही थी। मेरी आंखों से लगातार लंड चूसने के कारन आंसू आ गए, और मेरा काजल बहने लगा। मेरा चेहरा और मेरे बूब्स अपने ही थूक और राजेश्वर जी के वीर्य से लथ-पथ थे। मैं मानो कोई रंडी की तरह से राजेश्वर जी का लंड चूस रही थी।

कुछ देर ऐसे ही लंड चूसने के बाद राजेश्वर जी मेरे बाल पकड़ कर अपना लंड मेरे मुंह में जोर-जोर से आगे-पीछे करने लगे। वो मेरे मुंह को जोर-जोर से चोदे जा रहे थे। मैं समझ गई कि उनका अब झड़ने वाला था।

फिर 4-5 जोर के धक्कों के बाद राजेश्वर जी मेरे मुंह में अपनी मलाई छोड़ने लगे। मेरे पूरे मुंह में उनका एक-दम सफेद और गाढ़ा वीर्य भर चुका था। मैंने एक बूंद भी नहीं गिराई, और उनका वीर्य एक झटके में पी गई। मम्मम, क्या स्वाद था उनके वीर्य का वाह!

राजेश्वर जी: ओहो… दिव्या क्या मस्त हो तुम। पूरा पानी पी गई मेरा।

मैं: ये तो बस शुरुआत है मेरी जान। असली खेल तो अब चालू होगा।

यह कह कर मैं हसने लगी। राजेश्वर जी का लंड झड़ने के बाद भी खड़ा था और कड़क था।

राजेश्वर जी: चल फिर सोफे पर। अब शुरु होगी चुदाई।

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