हां तो मैं बता रही थी कि श्यामलाल के साथ मेरा जो शारीरक संबंध दस साल पहले एक बार जो शुरू हुआ वह तो फिर चलता ही रहा। वह तो दीवाना हो गया मेरा। बार बार मेरे साथ संभोग के लिए ललायित रहता। अब उसकी दिनचर्या हो गयी थी, मेरा इंतजार करना ऑटो स्टैंड मेंं। फिर किसी सुनसान जगह में अपने तन की प्यास बुझा लेते थे हम। इसी दौरान करीब दो हफ्ते बाद एक दिन ऐसे ही मैं ऑटो स्टैंड पहुंची तो देखा कि श्यामलाल एक स्कॉर्पियो के पास खड़ा है।
“क्या हुआ, आज तुम्हारा ऑटो कहाँ है?”
“ठीक है चलो” मेरे मन में अबतक उसने विश्वास जमा लिया था, कोई शंका की बात नहीं थी। मैं सामने की सीट पर बैठ रही थी तभी उसने मुझे पीछे सीट पर बैठने का आग्रह किया, जिसे मैंने सहज भाव से लिया और ड्राईविंग सीट के पीछे वाली सीट पर बैठ गई।
“हम ग्लास चढ़ा कर ए सी चला देते हैं, आपको “गर्मी” बहुत लगती है ना” वह अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुरा रहा था।
“बहुत शैतान हो गये हो” मैं ने उसे मीठी झिड़की दी। वहां से जैसे ही हम लोआडीह चौक पहुंचे, एक काले से आदीवासी आदमी ने स्कॉर्पियो रुकवाया। श्यामलाल शायद उसका पूर्व परिचित था।
“मैडम, यह बलराम है, इस स्कॉर्पियो का मालिक। इन्हें भी रामपुर ही जाना है। वहीं रहता है यह भी। इनका घर वहीं पर है।” श्यामलाल बोला। इससे पहले कि मैं कुछ कहती, वह आदीवासी आदमी मेरी ही सीट पर आ बैठा। गाड़ी के अंदर आते ही मेरे नथुनों में शराब का तेज भभका टकराया। ऐसा लग रहा था वह बहुत शराब पिए हुए था। मैं तनिक असहज हो उठी और तनिक मायूस भी कि आज मेरी चुदाई प्रोग्राम का भट्ठा बैठ गया। मन मसोस कर रह गई। उसके तन से भी पसीने की बदबू आ रही थी। पता नहीं क्या था उस पसीने और शराब की मिली जुली दुर्गंध में कि मेरे अंदर पुरुष संसर्ग की कामना भड़क उठी।
मेरी मायूसी को भांपते हुए श्यामलाल तनिक झिझकते हुए बोला, “मैडम, बलराम को हमारे बारे में सब पता है। आज ही मुझ से कह रहा था कि एक बार मुझे भी मैडम की दिला दो। क्या कहती हैं आप?”
“तुम सब मर्द एक ही जैसे हो। बता दिया सब कुछ इन्हें? शर्म नहीं आई? आखिर फंसा ही दिया मुझे। तुम्हारी जगह कोई और होता तो तुम्हें पता है कि मैं उसका क्या हस्र करती। तुम्हारी बात कुछ और है इसलिए तुम्हारी बात रखने के लिए…..(मैं चुदने को तैयार हूँ इस बेवड़े से, मन ही मन तो खुश हो रही थी)” मैं बेबसी का नाटक करती हुई बोली। मेरे उत्तर से उन दोनों के चेहरे खिल उठे।
“ओह मैडम, दिल खुश कर दिया,” कहते हुए मुझ से सट गया और अपने दायें हाथ से मुझे समेट लिया और सीधे मेरी दायीं चूची पर हाथ रख दिया, सिर्फ हाथ ही नहीं रखा, तीन चार बार दबा भी दिया। “क्या मस्त चूची है, वाह मैडम” वह बोला, साथ ही अपने होठों से मेरे गालों, गले, होठों को चूमने लगा।
“छोड़ो मुझे, इस तरह रास्ते में कोई देख लेगा।” मैं छिटक कर अलग होने का नाटक करने लगी।
“कोई नहीं देखेगा मैडम, गाड़ी के काले शीशे के बाहर से कोई अंदर नहीं देख सकता है। अंदर से बाहर सब कुछ दिखता है।” कहते हुए बलराम ने अपनी बायीं हाथ मेरी जांघ पर रख कर तीन चार बार दबा दिया। मैं उसका हाथ हटाने की असफल कोशिश करती रही मगर धीरे धीरे जबरदस्ती, वह मेरी साड़ी के ऊपर से ही मेरी जांघों के बीच हाथ ले आया और ठीक मेरी योनी के ऊपर सहलाने लगा। उफ्फ्फ, मैं अपने शरीर पर से नियंत्रण खोती जा रही थी। मेरी वासना की भूख को हवा दे दिया था उस खड़ूस नें। कामदेव नें मुझे बेबस कर दिया और मैं कामदेव के तीर से घायल, मदहोश होती जा रही थी।
“उफ्फ्फ, छोड़ो मुझे प्लीज,” मेरे विरोध में छिपे आमंत्रण को बलराम ने बखूबी पढ़ लिया था। उसकी हरकतें बढ़ती जा रही थीं। उसने मेरी साड़ी धीरे से उठा दी और अब सीधे मेरी पैंटी के ऊपर से मेरी पहले से पानी छोड़ती हुई योनी को सहलाना शुरू किया। “आह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ,” मैं अपनी उत्तेजना को छिपा पाने में असमर्थ हो गई, सिसिया उठी मैं। वह धीरे धीरे मुझ पर पूरी तरह हावी हो गया।
“मैडम जी, आप तो गजब की चुदक्कड़ हो। आपकी चूत तो बिल्कुल पावरोटी की तरह फूली हुई है। चूचियां गजब की बड़ी बड़ी। खूबसूरत तो हो ही, मगर एक नंबर की चुदक्कड़ भी हो। श्यामलाल जैसा बोला था, एकदम वैसी ही हो। आज मजा आएगा चोदने का।” अब बलराम खुल कर मेरे शरीर से खेलने लगा। गाड़ी धीरे धीरे चल रही थी, म्यूजिक सिस्टम में सेक्सी गाने एक के बाद एक बजते जा रहे थे। हाईवे पर कब नामकुम पार हुआ, कब रामपुर पार हुआ पता नहीं। एक एक करके मेरे कपड़े खुलते गए और अंततः मैं पूरी मादरजात नंगी हो गई। मेरे नग्न शरीर की छटा देख कर वह तो मानो पगला गया। गाड़ी की सीट को ऐसा एडजस्ट किया कि ड्राईविंग सीट के पीछे का हिस्सा बिस्तर में तब्दील हो गया। आनन फानन वह भी अपने कपड़ों से मुक्त हो कर मादरजात नंगा हो गया।
“ओह्ह्ह्ह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ, हाय राम इत्त्त्त्त््त्त्आ्आ्आ्आ्आ््आआ मोटा्आ्आ्आ्” इतना बड़ा लिंग था उसका। आठ इंच लंबा, मगर गधे की तरह फनफनाता करीब चार इंच मोटा। फिर वही, मेरा घबराने का नाटक। भीतर ही भीतर तो मैं पुलकित हो रही थी, आखिर मैं भी पूरी चुदक्कड़ हूँ ना। उसका पूरा शरीर काला भुजंग, हब्शियों की तरह। शरीर की बनावट, गठा हुआ, मजबूत, बनमानुष की तरह, पेट निकला हुआ। मुझे उसके शरीर की बनावट की वजह से पता नहीं क्यों कुछ अधिक ही उत्तेजक लग रहा था। एक अलग अनुभूति हो रही थी।
“साली छिनाल मैडम, तेरी चूत के लिए तो ऐसा ही लौड़ा ठीक है। साली बुरचोदी मैडम, पता नहीं कितना लौड़ा खा चुकी है इस भोंसड़ा में। नाटक कर रही है हरामजादी मैडम।” मेरी फूली हुई चिकनी पनिया उठी चूत को देख कर अब वह पूरी तरह समझ चुका था कि मैं किस किस्म की औरत हूँ। “अरे श्यामलाल यह तो पूरी रंडी है रे रंडी, इतना बड़ा्आ्आ्आ्आ चूत, साली ऐसा लग रहा है मानो किसी भैंस की चूत है” बलराम मेरी चूत को देखकर अचंभे में पड़ गया।
“अरे बलराम भाई, जरा चोद के तो देखो, ऐसा चूत पहले कभी नहीं चोदा होगा, कसम से, मजा नहीं आया तो मेरा नाम श्यामलाल से चूतलाल रख देना।” ड्राईव करते करते श्यामलाल बोला। उसकी बात सुनकर कोई भूमिका बांधे बिना सीधा मुद्दे पर आ गया। मेरे पैरों को फैलाया और अपनी एक उंगली मेरी योनी में घुसा दिया और उंगली निकाल कर चाट लिया।
“वाह, टेस्टी है” वह चटखारे ले कर बोला।
“छि: छि:” मेरे मुंंह से निकला। उसने फिर वही क्रम दुहराया, लेकिन इस बार उसने दो उंगलियां घुसा दीं। “आह्ह्ह्ह्ह, क्या करते हो” मेरे मुह से निकला। लेकिन अब वह दनादन दो उंगलियां अंदर बाहर करने लगा और करीब दो मिनट तक वह तूफानी रफ्तार से ऐसा ही करता रहा जिसके कारण मैं अपने को रोक नहीं पाई और “ओह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह्” करती हुई मैं उसी वक्त झड़ गई। मेरी थरथराहट और मेरे मुख से निकले निश्वास से उसे पता चल गया कि मैं झड़ रही हूँ।
“इतनी जल्दी ढीली मत पड़ो मैडम, अभी तो जी भर के चोदुंगा तुम्हें। रोज कोई न कोई मिल जाती थी चोदने के लिए, लेकिन आज कोई औरत मिली नहीं और किस्मत से मिली भी तो इतनी मस्त चुदक्कड़ औरत। सच में मजा आ गया” कहते हुए उसने मेरी चूचियों को चूसना और चाटना शुरू कर दिया। उंगलियां निकाल कर मेरी चूचियों पर मेरे चूत रस को मल दिया और बदस्तूर चाटता रहा चूसता रहा। फिर उसने अपनी उंगलियां मेरी चूत में डालकर उंगलियों से चोदना जारी रखा, उसकी इन हरकतों ने मुझे दुबारा जागृत कर दिया। मेरे बदन को ऐंठते देख कर वह समझ गया कि तवा गरम है, बिना एक पल गंवाए अपने विशालकाय लंड का सुपाड़ा मेरी चूत के मुहाने पर रख कर, मेरी कमर को कस के पकड़ा और एक करारा ठाप लगा दिया।
“ले साली कुतिया मैडम मेरा लौड़ा, ओह्ह्ह्ह हुम्म्म्म्म्म्म, ओह, साली इतना बड़ा भोंसड़ा मगर इतना टाईट? ओह्ह्ह्ह मजा आएगा अब सचमुच में चोदने में। सच बोला श्याम, साले मादरचोद, ऐसी माल को अकेले अकेले इतने दिन से चोदता रहा। हमें भूल गया था गांडू।” बलराम आनंदित होता हुआ बोला।
“हा्आ्आ्आ्आय्य्य्य्य्य्य रा्आ्आ्आ्आ्आम, फट्ट्ट्ट्ट गई््ईई््ईई््ईई््ईई,” सचमुच में इस प्रहार से दर्द के मारे बेहाल हो गई। मेरे अंदाज से कुछ ज्यादा ही मोटा था उसका लंड। ऐसा लग रहा था फट गई मेरी चूत। अपनी सीमा से बाहर फैल गई थी और मेरी चूत ने उसके लिंग को कस कर जकड़ लिया था।
“चिल्लाओगी हरामजादी, चिल्ला, जी भर के चिल्ला। पता नहीं कितने लोगों का लंड अपनी चूत में डलवाई है, अब मेरा लौड़ा गया तो गांड़ फट रही है, साली रंडी।” खूंखार हो गया था वह, मानो शेर को खून का स्वाद मिल गया हो। अब वह मेरी चीख पुकार की परवाह किए बगैर मेरी कमर को सख्ती से अपनी दानवी गिरफ्त में ले कर गचागच चोदने में मशगूल हो गया। उफ्फ्फ, उसके चोदने का वह वहशियाना अंदाज, मेरी चूचियों पर अपने दांत गड़ा दिया, मेरे गालों को दांतों से काटने लगा था, मेरी गर्दन पर अपने दांतों का निशान लगाता जा रहा था। मेरे शरीर को किसी वहशी जानवर की तरह भंभोड़ता रहा करीब चालीस मिनट तक। शुरू में मैं उसकी पाशविक प्रवृत्ति से घबरा गई थी, किंतु कुछ मिनट पश्चात वही पीड़ा दायक पाशविक संभोग मुझे बेहद आनंदित करने लगा, “ओह्ह्ह्ह राजा, आह्ह्ह्ह्ह मेरे बल्लू (बलराम), ओह्ह्ह्ह चोदू, उफ्फ्फ मेरी मां, ओह मेरे कामदेव, ऐसा सुख पहले कभी नहीं मिला रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, मार डालो मुझे ओह्ह्ह्ह भगवान, मां के लौड़े, ओह्ह्ह्ह मादरचोद, आह्ह्ह्ह्ह बहनचोद, रंडी बन गई रे तेरी ओह मैं कुतिया बन गई रे साले चूत के लौड़े,” आनंद के अतिरेक से बेहद गंदे अल्फाज निकल रहे थे मेरे मुह से। दूसरी ही दुनिया में पहुंच गई थी।
“हां मेरी रानी, मुझे भी ऐसी खूबसूरत चुदक्कड़ औरत से पहली बार पाला पड़ा है, ओह साली बुरचोदी रानी, आह रंडी, साले मादरचोद श्याम, ऐसी खूबसूरत छिना्आ्आ्आ्आल को कहां से पाया रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए ओह्ह्ह्स्स्स्साली्ई्ई्ई् की मस्त टाईट चूत, ओह्ह्ह्ह बुरचोदी की मस्त चू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊचियां्आं्आं्आं” वह भी अनाप शनाप कुछ भी बोले जा रहा था और मैं भी तो ऐसी अवस्था में बिल्कुल जंगली बन जाती हूँ, बेहद गंदे अल्फाज मेरे मुह से भी निकल रहे थे। करीब चालीस मिनट की अंतहीन पाशविक चुदाई के बाद जब वह खलास हुआ, तबतक मैं दो बार झड़ चुकी थी, तीसरी बार अभी झड़ने ही वाली थी कि वह खलास होकर लुढ़क गया।
“उफ्फ्फ, चोदते रहो प्लीज मैं भी झड़ने वाली हूं” मेरी आवाज पता नहीं वह सुन पा रहा था कि नहीं, अचानक गाड़ी रुकी और श्यामलाल ने मानो मेरा उद्धार कर दिया।
कूद कर मेरे ऊपर आया और बदहवास, बेसब्री से चोदने का अधूरा काम पूरा करने में जुट गया, “साली कुतिया मैडम जी, बहुत देर बर्दाश्त किया साली बुरचोदी मैडम, ले अब मेरा लौड़ा खा मां की लौड़ी मैडम,” लगा धकाधक चोदने।
“आजा साले बहनचोद, तू भी आ जा,” मैं नीचे से उछल उछल कर चुदवाने लगी। पल भर में ही मैं झड़ गई। मगर श्यामलाल तो अभी शुरू ही हुआ था। वह भी करीब आधे घंटे तक मुझे झिंझोड़ता रहा। पूरा निचोड़कर रख दिया उन दोनों ने मुझे। ओह्ह्ह्ह ऐसा मजा जो उस दिन मुझे मिला वह अकथनीय था। जहां गाड़ी खड़ी थी वह रामपुर पार करके करीब अस्सी किलोमीटर की दूरी पर थी। मैं उन दोनों की दीवानी हो गयी थी और उनके साथ मस्ती का जो सिलसिला आज से दस साल पहले जो शुरू हुआ, वह आज तक जारी है। बलराम ने अपनी चुदाई कला और क्षमता से काफी प्रभावित किया था जिस कारण मैं सदैव उसके लिए उपलब्ध रहने की पूरी कोशिश करती थी। वह भी मुझसे काफी प्रभावित था जिस कारण मुझे चोदने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहता था। बलराम के पास चार और गाड़ियां थीं जिन्हें वह भाड़े पर चलाता था। उसके पास चार ड्राईवर थे जो उसकी गाड़ियों को ऑर्डर पर ले कर जाते थे। यह तो संयोग था कि उस दिन उसका एक ड्राइवर नहीं आया था जिसके कारण श्यामलाल उसके स्कॉर्पियो को सर्विसिंग के लिए ले कर गया था और आगे जो कुछ हुआ मैं बता चुकी हूं। बलराम के संपर्क में आने के साथ ही साथ उसके ड्राईवरों के संपर्क में भी आई और एक बूढ़े शरीफ ड्राईवर को छोड़ कर बाकी तीन ड्राइवरों के साथ मेरा शारीरिक संबंध स्थापित हो चुका था जिससे बलराम अनभिज्ञ नहीं था। कुछ अवसरों में उन्होंने सामूहिक संभोग के लिए भी बाध्य किया, बाध्य क्या, यह समझ लीजिए कि मुझे राजी किया और मैं अपनी अदम्य कामुकता के वशीभूत उनके सम्मिलित संभोग का रसास्वादन करने को मजबूर हुई। फिलहाल अब वैसा रोजाना नहीं होता है, कभी दो हफ्ते में एक बार या कभी महीने में एक बार। अब तो वैसे भी मैं काफी व्यस्त हो गई हूं। ऑफिस का काम काफी बढ़ गया है और साथ ही साथ वृद्धाश्रम का काम भी देखना पड़ता है।
मेरी इस उम्र में भी (मैं अब 51 साल की हूँ) वे अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए मेरे आकर्षण में खिंचे चले आते थे। हालांकि उनका संबंध कई स्त्रियों के साथ रह चुका था और आज भी अपनी हवस बुझाने के लिए किसी भी उम्र की, किसी भी स्तर की, किसी भी रूप रंग, आकर प्रकार की स्त्रियों के पीछे कुत्तों की तरह पड़े रहते थे लेकिन उनकी स्वीकारोक्ति के अनुसार आजतक जितनी औरतों के साथ संभोग किया, मुझसे बेहतर संभोग की संतुष्टि और आनंद कहीं प्राप्त नहीं हुआ, शायद मेरे शारीरिक गठन के बावजूद लचीलेपन के कारण विभिन्न मुद्राओं में कामक्रीड़ा हेतु सक्षम होने की वजह से। यह स्वीकारोक्ति मेरी झूठी प्रशंसा भी हो सकती है, जिससे मैं इनकार नहीं कर सकती हूं, लेकिन मैं तो खूब आनंद उठा रही थी और अब भी उठा रही हूं।
पिछली कड़ी में मैंने जिक्र किया था कि बलराम के ड्राइवरों के साथ भी मेरा शारीरक संबंध स्थापित हो चुका था। यह किस तरह हुआ वही मैं बताने जा रही हूं।
बलराम के चार ड्राइवरों में एक पचपन साल का आदमी धर्मेश यादव जी को पारिवारिक संबंध से इतर सेक्स में कोई रुचि नहीं थी लेकिन बाकी तीन लोग अपने मालिक बलराम की जूठन चाटने में पीछे नहीं थे। अपने मालिक की मेहरबानी से ऐसी कई स्त्रियों से उन्होंने परिचय बढ़ा कर उनपर हाथ साफ किया और करते आ रहे हैं। उन्हीं स्त्रियों की श्रेणी में मैं भी आती हूँ। यह बात अलग है कि उनमें से किसके साथ और कब, अकेले या सामूहिक रूप से मैं अपने शरीर की कामपिपासा शांत करूंगी, इसे मैं खुद तय करती थी। इसकी शुरुआत बलराम के संपर्क में आने के करीब दो महीने बाद हुई। उन तीन लोगों में, साहिल 55 साल का छरहरे बदन का सांवला, साधारण शख्शियत वाला, लंबोतरा चेहरा, लंबी नाक, आधे बाल सफेद, छ: फुटा मुसलमान, तेजेन्द्र सिंह 50 साल का करीब साढ़े पांच फुट का हट्ठा कट्ठा, गोरा चिट्टा पंजाबी, एक नंबर का पियक्कड़ और तीसरा एक स्थानीय आदीवासी, घासीराम, काला, गंजा, नाटा सा करीब साढ़े चार फुट का मोटा ताजा 60 वर्षीय खड़ूस, तीनों में सबसे अधिक कुरूप, बेढब शरीर वाला किंतु अत्यधिक कामुक।
एक दिन पूर्वनियोजित योजना के अनुसार ऑफिस से निकलने के बाद, करीब साढ़े सात बजे श्यामलाल मुझे लेकर बलराम के घर आया। बलराम घर में हमारा ही इंतजार कर रहा था। उसका घर हमारे घर से करीब आधा कि. मी. आगे बस्ती से बाहरी छोर पर है। काफी बड़ा दोमंजिला घर है जो करीब तीन हजार वर्गफुट में फैला हुआ है। घर का मुख्य द्वार पूरब की ओर है। उत्तर की ओर एक काफी बड़ा गैराज है जिसमें उसकी चारों गाड़ियों के लिए पार्किंग का समुचित स्थान है। गैराज से सटा हुआ 12/12 का एक बड़ा सा कमरा, जिसे प्रायः विश्रामगृह के रूप में उपयोग किया जाता है, उससे जुड़ा हुआ एक स्नानगृह और शौचालय है।
वैसे तो मैं अपने व्यवसायिक कार्यों के सिलसिले में यहां वहां जाकर क्लाईंट्स से मिलते और कई अवसरों पर पार्टियां अटेंड करते करते थोड़ा बहुत पीना सीख गई थी। कुछ पियक्कड़ क्लाईंट्स की रातें रंगीन करते करते मुझे भी शराब की लत लग गई थी। उस दिन बलराम कुछ अधिक ही बेसब्र हो रहा था। मैं जब श्यामलाल के साथ उसके घर पहुंची तो दरवाजा बलराम ने ही खोला और बड़ी बेसब्री से मुझे बाहों में भींच कर ताबड़तोड़ चुम्बनों की बरसात कर बैठा। एक पल के लिए तो मैं घबरा गई थी। मेरे संभलने के पहले ही मुझे अपनी बांहों में उठा कर सीधे बिस्तर पर ला पटका।उसके बाद जो हुआ, क्या बताऊँ, खूब जम कर मेरी कुटाई हुई। कामांध श्यामलाल भी बलराम के साथ मिलकर इस दो घंटे की कमरतोड़ संभोग के दौरान मुझे भंभोड़ता रहा, झिंझोड़ता रहा, निचोड़ता रहा। इस पूरी कामलीला के दौरान उनके साथ तीन पैग शराब का चढ़ा गई थी। जब पूरी तरह निचुड़ कर लड़खड़ाते कदमों से बाहर निकल रही थी तो मेरी हालत देखकर बलराम ने घासीराम को आवाज दी जो उस वक्त विश्रामगृह में आराम कर रहा था। वह करीब एक घंटे पहले ही पटना से लौटा था और कमरे में शराब पी कर अपनी थकान उतार रहा था।
“घासीराम, क्या कर रहे हो? मैडम को जरा घर तक छोड़ दो।”
“आया साहब” कहते हुए वह कमरे से बाहर आया, सिर्फ लुंगी और बनियान में था वह। मेरे लड़खड़ाते कदमों और मेरी अस्त व्यस्त हालत को देखकर सब कुछ समझ गया था वह। मुझे अपनी बांहों का सहारा दे कर कार की ओर ले चला लेकिन कार में बैठाने की जगह गैराज से सटे विश्रामगृह में ले आया।
“आप बैठिए मैडम, जरा कपड़े तो पहन लें।” कहकर मुझे सामने बिस्तर पर बैठा दिया और कमरे का दरवाजा बंद कर दिया।
“दरवाजा क्यों बंद कर दिया?” मैं सशंकित हो उठी, क्या उस खड़ूस की नीयत डोल गई मुझ पर?
“जी कपड़े बदल रहा हूं ना”
“बेशरम, मैं तो सामने हूँ ना।” मैं बोली। लेकिन तबतक वह अपनी लुंगी उतार चुका था। हे भगवान! अंडरवीयर उसका विशाल तंबू बना हुआ था। साफ दिख हो रहा था कि वह उत्तेजित है। तंबू का आकार बता रहा था कि काफी बड़े लिंग का स्वामी है वह, मगर कितना बड़ा? मैं उत्सुक हो उठी। पिछले दो घंटे के नोच खसोट से मेरे शरीर का सारा अंग अंग टूट रहा था किंतु शराब का नशा अब भी सर चढ़ कर बोल रहा था। एक नंबर की वासना की पुतली तो थी ही, उस ठिंगने आदीवासी के अंडरवियर का इतना विशाल तंबू मुझे फिर से आकर्षित कर रहा था। लेकिन मेरी कमीनगी तो देखिए, चेहरे से जाहिर नहीं कर रही थी कि मैं उसके लिंग के दीदार को ललायित हूं। मैं तिरछी नजरों से ही देख रही थी। वह खड़ूस भी कम खेला खाया नहीं था। मेरी नजरों को पढ़ चुका था कमीना। मैं खड़े होकर दूसरी ओर मुड़ने की कोशिश में जानबूझकर लड़खड़ाई और गिरने का नाटक करने लगी। तभी घासीराम ने झपट कर मुझे थाम लिया।
“अरे आप खड़ी क्यों हो रही हैं। बैठिए, अभी हम ले चलते हैं।” मुझे थाम कर फिर से बिस्तर पर बैठा दिया, लेकिन इस क्रम में उसने मेरी चूचियों को हाथ लगा दिया था। मैं गनगना उठी। उसके तंबू के अंदर से उसका लिंग भी मेरी जांघों के बीच दस्तक दे दिया था। अब मेरा धैर्य जवाब देने लगा। मेरी योनी पानी छोड़ने लगी।
“मुझे पता नहीं क्या हो रहा है?” मैं नशे का अभिनय करते हुए बोली।
“आप थोड़ी देर लेट जाईए, कुछ देर में जब ठीक लगेगा तो हम पहूंचा देंगे।” कहते हुए मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। आंखें बंद करके मैं पांव फैला कर पसर गई। घासीराम लार टपकाती नजरों से मुझे सर से पांव तक घूरता रहा। शायद झिझक रहा था मुझ पर हमला करने से। मैं अधमुंदी आंखों से उसकी हालत देख रही थी। उसे ललचाने के लिए मैंने अपने दोनों हाथ फैला दिए, साड़ी का पल्लू एक तरफ हो गया, मेरी दोनों बड़ी बड़ी चूचियां छोटे से ब्लाऊज को फाड़कर बाहर निकल पड़ने को बेताब थे। कुछ पलों के बाद जब उसे लगा कि मैं सो गयी, वह मेरे करीब आया और आहिस्ते से मेरे बगल में बैठ गया। उसकी सांसे धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसने धीरे से मेरे सीने की ओर हाथ बढ़ाया और ब्लाऊज के ऊपर से ही मेरी चूचियों को सहलाना शुरू किया। उफ, मेरी चूचियों पर उसके हाथों की छुअन से मेरा शरीर अंदर तक तरंगित हो उठा। मैं अपनी उत्तेजना को बमुश्किल काबू में रख पा रही थी। अब वह थोड़ा और हिम्मत बटोर कर मेरे ब्लाऊज को खोलना शुरू किया। किसी तरह मेरे कसे हुए ब्लाऊज को सामने से खोल तो लिया, लेकिन अब मेरी ब्रा को कैसे खोलता। ब्रा के ऊपर से ही मेरी चूचियों को सहलाने लगा। मेरा दिल भी उत्तेजना के मारे धाड़ धाड़ धड़क रहा था। मैं गहन निद्रा का ढोंग करती हुई करवट ले कर पलट गई। घासीराम झट से अपना हाथ खींच लिया। उसने कुछ पलों तक इंतजार किया, फिर दुबारा अपना हाथ मेेेरे ब्लाऊज को पूरी तरह खोलने की कोशिश करने लगा। मैंने अपने हाथ ढीले छोड़ रखे थे जिस कारण उसे मेरे ब्लाऊज को पूरी तरह खोलने में कोई परेशानी नहीं हुई। अब उसने मेरी ब्रा का हुक पीछे से खोल कर मेरी चूचियों को बंधन से मुक्त कर दिया। जैसे ही मुझे अहसास हुआ कि मेरी ब्रा का हुक खुल गया है मैं पुनः करवट बदल कर पूर्ववत हो गई, गहरी निद्रा का ढोंग करती हुई। एक पल के लिए वह चौंक कर अपने स्थान से खिसक गया। मेरे चेहरे को गौर से देखने लगा कि मैं जाग तो नहीं रही हूं। जब उसे विश्वास हो गया कि मैं सचमुच में नशे की जोर से नींद में ही हूं, वह पुनः मेरे पास आया और आहिस्ते से मेरी ब्रा को हटाने लगा। जैसे ही मेरी ब्रा का आवरण मेरी चूचियों पर से हटा, उसका मुह खुला का खुला रह गया। शायद अश्चर्य से कि इतनी बड़ी बड़ी चूचियां इस ब्रा से कैसे संभली हुई थीं। मेरी उत्तेजक चूचियों की खूबसूरती खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे तने हुए बड़े बड़े निप्पल्स। पहले वह धीरे धीरे सहलाया मेरी नग्न चूचियों को, निप्पल्स को चुटकियों में पकड़ कर शायद अपनी नजरों के विश्वसनीयता की ताकीद कर रहा था। अब उसे थोड़ी और हिम्मत आ गई थी। वह धीरे धीरे मेरी चूचियों को दबाने लगा। कुछ मिनटों के बाद अपने मुह से पहले मेरी चूचियों को चूमा, फिर हौले हौले मेरे निप्पल्स को चूसने लगा। इधर मेरी हालत बद से बदतर होती जा रही थी। वे पल मेरे लिए बेहद मुश्किल भरे थे। इस उत्तेजक क्रिया से भड़कती अपनी काम ज्वाला को नियंत्रित करना अब असंभव होता जा रहा था मेरे लिए। मेरे शरीर का ऊपरी भाग निर्वस्त्र हो चुका था। उसका एक हाथ अब धीरे धीरे नीचे खिसकते हुए मेरी नाभी से नीचे पहुंच चुका था। धीरे धीरे कमर में खोंसी हुई मेरी साड़ी को खोला और मेरे पेटीकोट के नाड़े की गांठ तलाशने लगा। ज्यों ही नाड़े का गांठ हाथ लगा, एक हल्के झटके से पेटी कोट ढीला कर दिया। अब उसके लिए समस्या थी कि इस अवस्था में मेरे शरीर से साड़ी और पेटीकोट अलग कैसे किया जाय।
वैसे भी अब उस बौने चुदक्कड़ के सब्र का पैमाना भर चुका था। जल्दी जल्दी किसी प्रकार खींच खांच कर अंततः मुझे साड़ी और पेटीकोट से मुक्त कर दिया। वह बार बार मेरे चेहरे को देखता जा रहा था कि कहीं मैं जाग तो नहीं रही हूँ, मगर मैं भी एक नंबर की नौटंकी बाज, उसे अहसास तक नहीं होने दिया कि मैं पूरे होशोहवास में हूं। अब सिर्फ रह गयी मेरी पैंटी। उधर उसकी हालत खराब और इधर मेरी। उफ्फ्फ, इंतजार की घड़ियां कितनी लंबी होती हैं, इसका अहसास मुझे अब हो रहा था। पैंटी के ऊपर से ही मेरी फूली हुई योनी को बड़े ही अविश्वसनीय नजरों से एकटक देखता रह गया। मेरी योनी के रस से भीगी पैंटी देख कर शायद उसे कुछ कुछ आभास होने लगा कि मैं जाग रही हूं। आखिर वह भी एक नंबर का चुदक्कड़ जो ठहरा, लेकिन मैं भी कम कमीनी नहीं थी, अब नींद का ढोंग छोड़ कर नशे का ढोंग करने लगी।
नशे से बोझिल अधमुंदी आंखों से देखती हुई लड़खड़ाती आवाज में बुदबुदाई, “क्क्क्क्य्य्य्य्आ्आ्आ क्क्क्क्र्र्र्र्र र्र्र्र्रहे होओ्ओ्ओ्ओ” बोलना अभी खत्म भी नहीं हुआ कि घासीराम एक ही झटके में मेरी पैंटी को नोच फेंका और लो, विस्मय से उसकी आंखें फटी की फटी रह गयीं, मुह खुला का खुला रह गया।
“बाप रे, बाप, ऐसी चूत!” अनायास उसके मुह से निकला।
“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्ह्, नंगी क क क्योंओंओं कककर्र्र््र दिया कमीनेए्ए्ए्ए?” मैं अब भी नशे में टुन्न होने का दिखावा कर रही थी।
“मैडमजी, आप का तो कहना ही क्या। चूची तो चूची, इत्त्त्त्त््त्त्आ्आ्आ्आ्आ चिकना और मालपुवे जैसा बूर पहली बार देखा। साली चुदक्कड़।” अब वह खुल कर मैदाने जंग में कूद पड़ने को उतावला हो उठा था। फटाफट अपने बनियान और अंडरवियर को उतार फेंंका। अब चौंकने की बारी मेरी थी। मादरजात नंगा मोटा ताजा, काला कलूटा, ठिंगना, तोंदू बदन किसी जंगली भालू की तरह दिख रहा था, उस पर आठ इंच का लंबा, जांघों के बीच झूलता, लपलपाता काला लिंग!
“ओह्ह्ह्ह भगवान, यह ततततुम ममममेरे साथ ककक्या्आ्आ कककककरने जजजजा्आ्आ रहे हो?” मैं हकलाहट का प्रदर्शन करते हुए घबराई आवाज बना कर बोली।
“इतना भी भोली मत बनो मैडम जी। आप की भीगी चूत और मेरा टनटन करता लौड़ा, अब आगे क्या होने वाला है यह भी बताना पड़ेगा क्या?” उसकी हिम्मत की कायल हो गई मैं।
“बबबबताआआने की जजजजरू्ऊ्ऊ्ऊरत नहीं है, लेकिन पपपपप्लीईईईज, मेरे साथ ऐसा मत ककककरो। मैं ऐसी औरत ननननहींईंईंई हूँ, छोड़ दो मममुझे, जजजजानेएएए दो।” मैं उठने की कोशिश करती हुई अपना ड्रामा जारी रखे हुए थी।
“क्या बोली? ऐसी औरत नहीं हैंं आप? साली कुतिया, सत्तर चूहे खाके बिल्ली चली हज को? आपकी चूत किसी गधी की चूत से कम है क्या? किसी औरत की चूत ऐसी होती है क्या? मां की लौड़ी। पता नहीं कितने मर्दों का लौड़ा घुस चुका है इस चूत में साली शरीफ की चूत। अब चोदने दे चुपचाप हरामजादी।” खूंखार लहजे में बोला।
“नहीं पपपप्लीईईईज” प्रत्यक्षतः मैं गिड़गिड़ाने लगी किंतु अंदर से तो ऐसे लंड को देखकर चुदने के लिए बेकरार हो रही थी।
“अब ना नुकुर करने से कोई फायदा नहीं। चल तैयार हो जा मेरा लौड़ा खाने के लिए, साली रंडी।” बड़ी उतावली से उसने मेरे पैरों को फैला कर ठीक मेरी चूत के मुहाने पर अपने लंड का सुपाड़ा टिकाया। मैं इधर उधर होने की बेमतलब कोशिश करती दांत भींच कर उसके हमले का इंतजार कर रही थी। तभी उसने मेरी कमर को सख्ती से पकड़ कर गच्च से अपने लिंग का एक हौलनाक प्रहार मेरी योनी पर कर दिया, “हुम्म्म्म्मा्ह्ह्ह्ह”।
“”आह, मर गई मैं, ओह मां निकालो, हाय रे मेरी फटी,” मैं चीखी। एक ही करारे धक्के से उसने मेरी पनियायी योनी में अपना पूरा लिंग उतार दिया था।
“आह्ह्ह्ह्ह, तेरी चूत इतनी टाईट कैसे है मैडम? ओह साली देखने में इतना बड़ा गधी के बूर जैसा, ओह मगर अंदर इतना टाईट! तेरी चूत के अंंदर तो गरमागरम भट्ठा है। कमाल की चूत है। वाह मजा आ गया लंड घुसा कर।” वह बड़ी प्रसन्नता से बोला।
“ओह्ह्ह्ह हरामी, यह क्या कर दिया रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए। हाय हाय, माआआआआर्र्रररररर डाआआआलाआआआ। बरबाद कर दिया मुझे” मैं छटपटाते हूए बोली। अंदर ही अंदर तो खुश हो रही थी कि चलो अंततः इंतजार की घड़ियां खत्म हुई।
“चुप हरामजादी कुतिया। हम तुझे क्या बरबाद करेंगे। तू तो पहले से खेली खाई चुदक्कड़ है। तेरी मालपुवे जैसी चूत को देखकर सब समझ में आता है। नाटक मत कर मैडम, चोदने दे आराम से।” ऐसा कहते कहते अब पूरी तरह शुरू हो गया। उसका मुह मेरी चूचियों तक पहुंच रहा था, फलस्वरूप वह मेरी चूचियों पर अपना मुंंह लगा दिया। उसकी जीभ किसी कुत्ते से कम नहीं थी। लंबी जीभ से चपर चपर मेरी चूचियों को चाटने लगा।
“आह्ह्ह्ह्ह” मैं अब और अपना नाटक कायम नहीं रख सकी। आनंदमयी सिसकारी निकाल बैठी।
“अब आ रहा है ना मजा। सब समझ में आ गया साली चुदक्कड़ औरत। अब देख कैसे चोदते हैं तुम्हें।” अब वह पिल पड़ा मुझ पर और दनादन दनादन पूरी रफ्तार से चोदने लगा। पूरे कमरे में फच्च फच्च की आवाज गूंजने लगी। मेरी चूचियों को चूसते हुए बीच बीच में अपने दांत गड़ा देता था जिससे मैं चिहुँक उठती थी।
अब मैं भी पूरे रंग में आ गई थी। अपने पैरों को उसकी कमर को लपेट कर पीठ पर चढ़ा बैठी थी और अपनी चूतड़ उछाल उछाल कर उसके हर ठाप का जवाब ठाप से देने लगी। “आह राजा, ओह चोदू, हाय मेरे ठिंगने बलम, चोद अहा चोद, मुझे बना दिया रे रंडी, ओह्ह्ह्ह मेरी चूत की मस्ती उतार दे साले मां के लौड़े, प्यारे मादरचोद, आह”, मैं असलीयत पर उतर आई थी।
“हां रे रंडी मैडम, साली कुत्ती मैडम, लंडखोर मैडम, ले ले और ले हरामजादी मैडम, बुरचोदी मैडम, हुम्म्म्म्म्म्म हुम्म्म्म्म्म्म, हुम्म्म्म्म्म्म” धकाधक भीषण चुदाई किए जा रहा था। करीब बीस मिनट तक घमासान चुदाई से मुझे निहाल कर दिया।
“आ्आआह्ह्ह्ह” मैं संभोग के चरम पर पहुंच कर झड़ने लगी तभी वह भी झड़ने को हुआ। उसका लिंग अकड़ कर और बड़ा रूप ले चुका था, अचानक ही उसने अपना लिंग मेरी चूत से निकाल कर कूद कर मेरे मुह के पास ले आया। मैं आह्ह्ह्ह्ह भर ही रही थी कि मेरे खुले मुह में अपने लिंग को ठूंस दिया और अपना नमकीन और कसैला प्रोटीनयुक्त वीर्य मेरे हलक में उतारता चला गया। उत्तेजना के आवेग में मैं भी गटगट पीती चली गई उसका गरमागरम लावा। पूरी तरह खलास हो कर ही वह मेरे ऊपर से हटा।
“आह्ह्ह्ह्ह, इतनी मस्त हो मैडम तुम, ओह्ह्ह्ह मजा आ गया चोदकर” चटखारे लेता हुआ वह बोला।
“ओह मेरे बौने बलम, तूने भी कुछ कम सुख दिया क्या, ओह राजा, दिल खुश कर दिया मेरे राजा,” मैं बेसाख्ता उसके बेढंगे शरीर से चिपट गई और उसके कुरूप चेहरे पर चुंबनों की बौछार कर बैठी।
“तो कसम खाओ मैडम कि अब से हमें भी अपनी चूत खिलाती रहोगी,” वह बोला।
“अरे हां रे हां मेरे चोदू,” मैं बोली।
तभी हम चौंक पड़े, “साले मादरचोद, इतनी मस्त माल को अकेले अकेले चोद लिया।” एक अजनबी आवाज पीछे से आई। सर उठा कर देखा तो एक हट्ठा कट्ठा, करीब 50 साल का सरदार खड़ा था। इससे पहले कि घासीराम कुछ बोलता, सरदार बोलने लगा, “साले हरामी, आज तक मजदूर रेजा, कोयला चुनने वाली औरतों और भिखमंगी औरतों को चोदने वाले कमीने, आज एक खूबसूरत औरत मिली तो अकेले अकेले हाथ साफ कर लिया भैणचोद।”
मैं पूरी नंगी अवस्था में अपने को ढंक सकने में अक्षम थी। मेरे कपड़े फर्श पर पड़े मुझे मुह चिढ़ा रहे थे। मैं हड़बड़ा कर उठना चाह रही थी कि सरदार ने मुझे दबोच लिया। “जाती कहाँ है मेरी जान, अभी तो मैं बाकी हूँ। कुछ देर में साहिल भी आ जाएगा। साली भैण की लौंडी, जब तक हम तुझे चोद नहीं लेते तू यहीं पड़ी रह। अबे ओ कलुए, मादरचोद, ग्लास में दारू डाल, अब मेरे साथ मैडम भी पिएगी। फिर मैं अपने लौड़े का जलवा दिखाऊंगा इस मैडम को। पहली बार ऐसी मस्त माल मिली है।” हाय राम, मैं यह कहाँ फंस गई थी।
अभी घासीराम के साथ मेरी कामलीला खत्म ही हुई थी कि हम चौंक पड़े, “साले मादरचोद, इतनी मस्त माल को अकेले अकेले चोद लिया।” एक अजनबी आवाज पीछे से आई। सर उठा कर देखा तो एक हट्ठा कट्ठा, करीब 50 साल का सरदार खड़ा था। इससे पहले कि घासीराम कुछ बोलता, सरदार बोलने लगा, “साले हरामी, आज तक मजदूर रेजा, कोयला चुनने वाली औरतों और भिखमंगी औरतों को चोदने वाले कमीने, आज एक खूबसूरत औरत मिली तो अकेले अकेले हाथ साफ कर लिया भैणचोद।”
मैं पूरी नंगी अवस्था में अपने को ढंक सकने में अक्षम थी। मेरे कपड़े फर्श पर पड़े मुझे मुह चिढ़ा रहे थे। मैं हड़बड़ा कर उठना चाह रही थी कि सरदार ने मुझे दबोच लिया। “जाती कहाँ है मेरी जान, अभी तो मैं बाकी हूँ। कुछ देर में साहिल भी आ जाएगा। साली भैण की लौंडी, जब तक हम तुझे चोद नहीं लेते तू यहीं पड़ी रह। अबे ओ कलुए, मादरचोद, ग्लास में दारू डाल, अब मेरे साथ मैडम भी पिएगी। फिर मैं अपने लौड़े का जलवा दिखाऊंगा इस मैडम को। पहली बार ऐसी मस्त माल मिली है।” हाय राम, मैं यह कहाँ फंस गई थी। सरदार काफी हृष्ट पुष्ट आदमी था। रग्बी खिलाड़ियों की तरह उसके कंधे काफी चौड़े थे। हाथों की कलाईयाँ मेरी कलाईयों से करीब तीनगुना मोटी थीं। कद मुझसे करीब एक इंच छोटा ही होगा किंतु शरीर बेहद फैला हुआ और कुश्ती करने वाले पहलवानों की तरह गठा हुआ। सर पे सिर्फ फटका बांधा हुआ था। तेल मोबिल के दागों वाली गंदी शेरवानी पहने था।
“प्लीज सरदार जी अब मुझे जाने दीजिए। मैं बहुत थक चुकी हूं।” मैं सरदार जी की मजबूत पकड़ में छटपटाती हुई घिघियाते हुए बोली।
“ऐसे कैसे जाने दूं कुड़िए। इतनी खूबसूरत नंगी औरत सामने हो और न चोदूं, ऐसा कैसे हो सकता है। तेरी थकान का इलाज तो मैं अभी करता हूँ। अबतक घासीराम तीन ग्लास में देसी दारू भर कर ले आया। एक ग्लास सरदार लिया, एक ग्लास घासीराम लिया और तीसरा ग्लास मुझे देने लगा, “ले ले कुड़िए, पी जा, फिर देख तेरी सारी थकान कैसे गायब हो जाएगी।”
“नहीं, मैं नहीं पियूंगी,” मैं मना करने लगी। देसी दारू की तीखी महक मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी।
“ओए कुड़िए, नखरे न कर। चुपचाप पी ले, तभी तू मजे ले सकेगी, नहीं तो हम तो वेसे भी तुझे बिना चोदे छोड़ेंगे नहीं, जो तू बर्दाश्त नहीं कर पाएगी।” सरदार मेरे अंग अंग को ललचाई नजरों से घूरते हुए गुर्राया। उसके तन से दुर्गंध का भभका आ रहा था, पता नहीं कितने दिनों से नहाया नहीं था। जब उसने देखा कि मैं ऐसे नहीं मान रही हूँ, एक हाथ से मुझे दबोच कर दूसरे हाथ से दारू का ग्लास उठाया और मेरे मुह से लगा दिया। न चाहते हुए भी मुझे मजबूरन उस तीखे महक वाली देसी शराब अपनी हलक में उतारनी पड़ी, ऐसा लगा मानो मेरे गले को जलाती हुई मेरे पेट के अंदर पहुंची हो। कुछ मेरे होठों से होते हुए मेरी गर्दन, चूचियों, पेट और योनि तक बह गयी। इतनी कड़ी शराब मैंने जिंदगी में पहली बार पी थी। शराब तुरंत ही अपना असर दिखाने लगा। मेरे शरीर की धमनियों में रक्त का संचार तूफानी गति से होने लगा। सारी थकान, और बदन की पीड़ा मानो कुछ ही पलों में छूमंतर हो गयी। नशे से मेरी आंखें बोझिल होने लगी किंतु ऐसा लग रहा था जैसे मेरे अंदर पुनः वसना की ज्वाला भड़क उठी हो। मेरी हालत सरदार की अनुभवी आंखों से छिपी न रह सकी। अब वह मेरे नंगे बदन के उतार चढ़ाव को बड़ी भूखी आंखों से देखने लगा। उसकी नशे से सुर्ख आंखों में किसी भूखे भेड़िये सी चमक आ गई।
“वाह कुड़िए, आ गयी न जान तेरे बदन में?” मेरे नंगे बदन को अब भूखी नजरों से घूरने लगा। एक हाथ से मुझे थामे हुए था और दूसरे हाथ से मेरी चूचियों को मसलते हुए बोला “एक ग्लास दारू और दे घासीराम, फिर इस लौंडिया से मस्ती करूँगा।”
“ओह्ह्ह्ह, मुझे ददर्रर्द होता है, ऐसे मत दबाआआईईएएए नाआआआह्ह्ह” मैं नशे से बोझिल आवाज में बोली।
“दर्द होता है, दर्द होता है? साली जब घासीराम नोच रहा था तो दर्द नहीं हो रहा था?” सरदार बेरहमी से मेरी चूचियों को दबाते हुए बोला। मैं समझ गई कि मेरा कुछ बोलना या विरोध करना बेमानी है। मैंने अपने शरीर को उस जालिम के रहमो करम पर समर्पण की मुद्रा में ढीला छोड़ दिया। चलो अब जो होना है, हो ही जाय तभी मुझे मुक्ति मिलेगी। उसने मेरी समर्पण की मुद्रा को भांप कर मेरे नग्न शरीर को अपने बंधन से मुक्त किया और अपने कपड़े उतारने लगा। जब वह पूरी तरह से नंगा हुआ तो उसके भीमकाय कसरती शरीर को देखकर मेरी रगों में बिजली सी कौंध गई। मैं भीतर ही भीतर सनसना गई। सारा शरीर गर्दन से नीचे बालों से भरा हुआ था। उसका तनतनाया हुआ लिंग बहुत लंबा नहीं था, करीब सात इंच रहा होगा लेकिन मोटा इतना कि मेरी घिग्घी बंध गई। किसी घोड़े के लिंग की तरह मोटा। “आज तो तेरी चूत का भुर्ता बनने से कोई नहीं बचा सकता साली कामिनी”, मैं मन ही मन भगवान को याद करने लगी। अबतक घासीराम दारू का दूसरा ग्लास ला चुका था। सरदार एक ही सांस में पूरा ग्लास गटक गया। उसकी नशे से सुर्ख आंखों को देखकर मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। अब तक मैं अपने मन को तैयार कर चुकी थी, अपने ऊपर आने वाली कयामत के लिए।
दारू का ग्लास गटकने के पश्चात वह मेरे कामोत्तेजक तन को कुछ पलों तक निहारा और अपनी खुरदुरी हथेलियों को मेरे गालों, मेरी गर्दन, मेरी उत्तेजना से फूलती पिचकती बड़ी बड़ी चूचियों से होते हुए मेरी कमर और फिर ओह मां््आआंंआं, धीरे धीरे मेरी चूत के पास ले आया, मेरी योनी पर उसकी खुरदरी हथेलियों का स्पर्श मुझे अंदर तक तरंगित करने लगा। मेरे अंदर उत्तेजना का मानो सैलाब आ गया।
“ओय छिना्आ्आ्आ्आल, तेरी चूत है कि घोड़ी का भोसड़ा? साली इतनी बड़ी चूत तो पहली बार देख रहा हूं रे घासीराम। कितने लोगों से चुदी है रे रंडी? बिल्कुल कुत्ती है साली मां की लौड़ी। चलो कोई नहीं, अच्छा ही है, मेरा लौड़ा आराम से ले लेगी।” सरदार लार टपकाती नजरों से मेरी पावरोटी जैसी चूत को देख कर बोला।
“अरे तेजू, इसके भोंसड़े की साईज पर मत जा। बहुत टाईट है साली की चूत। चोद के तो देख, मजा न आए तो कहना। लगती है घोड़ी के चूत जैसी, लेकिन मजा देती है सोलह साल वाली लौंडिया के चूत जैसी। जब मेरा लौड़ा लेने में रो रही थी तो तेरी तो बात ही और है। हमसे भी डबल मोटा, साले घोड़े लंड वाले सरदार।” घासीराम तेजेन्द्र को उकसाता हुआ बोला। देख कर ही सिहर उठी थी मैं, उसपर घासीराम की भयभीत करने वाली बातें। सरदार उसकी बात पर ऐसे कैसे विश्वास करता हरामी, अपने हाथों से मेरी योनी को सहलाते सहलाते अचानक उसने अपनी एक उंगली मेरी रसीली यौन गुहा में उतार दिया, “आह्ह्ह्ह्ह” मेरे मुह से आनंद भरी सिसकी निकल पड़ी।
“उफ्फ्फ, सच्ची रे घासीराम, टाईट भी है और गरम भी। वाह, मजा आएगा इसकी चूत चोदने में। चल मैं तूझे कुत्ती की तरह चोदुंगा,” कहते हुए मुझे किसी हल्की फुल्की गुड़िया की तरह पलट दिया। “अरे वाह, इसकी गांड़ तो गजब की है रे घासीराम, इतनी मस्त, गोल गोल, चिकनी और बड़ी बड़ी।” मेरे नितंबों पर चपत लगाते हुए बोला। “इसकी गांड़ चोदने का तो मजा ही कुछ और होगा, लेकिन पहले इसकी चूत का मजा तो ले लूं।”
कांप उठी मैं उसकी बातें सुनकर, “तो क्या इतने मोटे लिंग से मेरी गुदा का हाल बेहाल करने की सोच रहा है कमीना?” मैं भयभीत हो उठी, लेकिन मेरे भय पर मेरी कमीनी कामुकता हावी हो गई। “अब मेरी चूत चोदे या गांड़, परवाह नहीं, ट्राई करने में हर्ज ही क्या है,” मैं सोचने लगी। भय, उत्सुकता और उत्कंठा के मिले जुले भाव के साथ झिझकते हुए मैं उसकी कुतिया बन गई। वह मेरे पीछे आया और अपने घोड़े जैसे लिंग का विशाल सुपाड़े पर थूक लगाकर मेरी योनि के प्रवेश द्वार से सटा दिया। उफ्फ्फ उसके लिंग का वह स्पर्श मेरी योनी पर, सनसना उठी मैं, मेरी सांसे धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसने मेरी कमर को बेहद सख्ती से थामा और धीरे धीरे अपने लिंग पर दबाव देने लगा। जैसे ही उसका सुपाड़ा मेरी योनी को चीरता हुआ फच्च से अंदर घुसा, ऐसा लगा मेरी योनी फट गई हो।
अकथनीय पीड़ा से मैं चीख पड़ी और जिबह होती बकरी की तरह छटपटाने लगी, “आह्ह्ह्ह्ह मैं मरी ओह प्लीज सरदार जी, छोड़ दीजिए मुझे, आह”, मेरा सारा नशा काफूर हो गया। बाप रे बाप, इतना मोटा लिंग आज तक मैं ने झेला नहीं था। मेरी चीख पुकार का उस सरदार पर कोई असर नहीं हुआ, उल्टे मेरी कमर और जोर से पकड़ कर अपने विशाल लिंग को जबर्दस्ती घुसाता चला गया।
“चीखो मत साली कुतिया। तुझे कुछ नहीं होगा मैडम। आराम से चोदने दे। देख मेरा पूरा लंड चला गया।” सरदार को मेरी चूत का स्वाद मिल गया था। “अहा, इतनी टाईट चूत? साली मजा आ गया। अब मजा आएगा चोदने में। तू मेरी कुतिया बनी रह, तुझे भी मजा आएगा।”
“नहीं प्लीज, कुछ मजा वजा नहीं, मेरी चूत का बाजा बजा दिया हाय रा्आ्आ्आ्आ्आम” मैं दर्द से बिलबिला रही थी।
“तू ऐसे नहीं मानेगी हरामजादी। पूरा लौड़ा अपनी चूत में खा कर रो रही है बुरचोदी। तेरी चूत देख कर तो कोई भी बता सकता है कि तू कितनी बड़ी चुदक्कड़ है। हां ये बात और है कि मेरा लौड़ा औरों से ज्यादा मोटा है, लेकिन देख, कितने आराम से चला गया तेरी चूत में। रो मत मैडम, तेरी टाईट चूत को मैं ने अपने लंड के हिसाब से बना दिया है। फटी नहीं है। तू इसी तरह कुतिया बनी रह, फिर देख कितना मजा आता है मेरे लौड़े से चुदवाने में,” कहते हुए धीरे धीरे कुछ देर अपने लिंग को अंदर बाहर करता रहा। एक दो मिनट में ही चमत्कारी रूप से मेरी चूत का दर्द कहाँ छू मंतर हो गया मुझे पता ही नहीं चला। मेरी कमीनी चुदासी चूत भी अपने हिसाब से फैल कर उसके लिंग को अपने अंदर ग्रहण कर ली। उसके बाद तो फिर मुझे भी मजा आने लगा।
“उफ्फ्फ आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह” दर्द भरे वे प्रारंभिक क्षण कब आनंद के क्षणों में तब्दील हो गए इसका मुझे पता ही नहीं चला और मेरे मुंह से आनंद भरी आहें उबलने लगीं।
“आ रहा है ना मजा अब? साली छिना्आ्आ्आ्आल, ओह्ह्ह्ह मेरी जान, ऐसी गजब की लौंडिया है तू। तेरी ऐसी मस्त चूत से पहले कभी पाला नहीं पड़ा। चूत के अंदर जैसे गरमागरम भट्ठी हो। ऐसा लग रहा है जैसे अपनी चूत से मेरा लौड़ा चूस रही है।” वह मुझे चोदता हुआ बोला। उसके घने बालों से भरा हुआ बदबूदार भीमकाय शरीर का संपर्क मेेेरे शरीर के अंदर की कामुकता को और भड़का रहा था। मेरे शरीर की सारी इन्द्रियाँ मानों तरंगित हो उठी हों। “आह मेरी जान, ओह मेरी रानी, खा मेरा लौड़ा साली लंडखोर” ज्यों ज्यों उसके चोदने की रफ्तार बढ़ती जा रही थी त्यों त्यों मैं मदहोश होती जा रही थी और अब मैं भी खुल कर अपनी गांड़ उछाल रही थी और कुतिया की तरह चुदी जा रही थी।
“वाह वाह, क्या नजारा है। साली बुरचोदी अब आई अपने रंग में। ठीक ऐसा लग रहा है मानो कोई भालू किसी बकरी को चोद रहा है फिर भी बकरी बड़े मजे से चुदवा रही है।” घासीराम हमारी चुदाई को देख कर मजा लेते हुए बोला।
“वाह साले तेजू, अकेले अकेले इतनी खूबसूरत लौंडिया को चोद रहे हो हरामियों”, एक अजनबी आवाज से मैं चौंक उठी। सर घुमा कर देखा तो सामने एक छरहरी काया वाला छ: फुटा आदमी खड़ा आंखें बड़ी बड़ी करके हमारी चुदाई देख रहा था। इधर सरदार उस आदमी के आगमन की परवाह किए बिना कुत्ते की तरह धकाधक चोदने में मशगूल था।
“आजा मां के लौड़े साहिल, तू भी आ जा, बड़ी किस्मत से आज ऐसी खूबसूरत लौंडिया हाथ लगी है। तू भी डुबकी लगा ले।” सरदार उस आगंतुक को आमंत्रित कर बैठा।
सरदार की चुदाई से निहाल, सुख की अथाह गहराई में डूबी पागल हुई जा रही थी मैं। किसी प्रकार का व्यवधान नहीं चाहती थी इन सुखद पलों में, “आह ओह उफ्फ्फ, चोद सरदार चोद, तू भी आ जा मादरचोद,” उस आगंतुक की ओर मुखातिब हो कर बोली, “आजा, तू भी मुझ कुतिया को चोद ले। साले घासी मादरचोद, ओह्ह्ह्ह हरामी, तू काहे खड़ा तमाशा देख रहा है बौने, तू भी आ जा। ओह मेरी मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, तुम तीनों मिल के मुझे रंडी बना दो, कुत्ती बना दो।” मैं बिल्कुल जंगली बन चुकी थी अबतक। फिर क्या था। वह साहिल नामक लंबा व्यक्ति भी आनन फानन नंगा हो गया। उफ्फ्फ, कितना खूबसूरत लिंग था उसका। सात इंच लंबे लिंग का चमड़ा विहीन गुलाबी सुपाड़ा चमचमा रहा था।
“हां री लौंडिया, आ गया मैं” कहते हुए वह कूद कर बिस्तर पर चढ़ गया और सीधे अपना लिंग मेरे मुंह के पास ले आया। “ले मेरा लौड़ा चूस।” कहते हुए साहिल ने अपना लिंग मेरे मुह में ठूस दिया। मैं मस्ती के आलम में किसी भूखी कुतिया की तरह साहिल के लिंग को चपाचप चूसने लगी।
“हां ओह आह चूस, अहा, कहां से मिली ऐसी मस्त चुदक्कड़ औरत भाई, यह तो गजब की छिना्आ्आ्आ्आल है उफ्फ्फ” साहिल खुशी के मारे बोल उठा। घासीराम भी अब बिस्तर पर आ चुका था। अब तीन खड़ूस चुदक्कड़ मेरे शरीर की तिक्का बोटी करने को पिल पड़े थे। सरदार अब मुझे अपने ऊपर ले कर खुद नीचे आ गया और नीचे से ही तूफानी रफ्तार से गचागच चोदने लगा। इधर बौना घासी मेरे पीछे आया और आव देखा न ताव, अपने लंड पर थूक लसेड़ कर मेरी गुदा की संकरी गुफा मेंं जबर्दस्ती घुसाता चला गया, “ले मेरा लवड़ा अपनी मस्त मस्त गांड़ में।”
“ओह्ह्ह्ह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ,” मैं एक पल के लिए तड़प उठी, किंतु अगले ही पल जब सटासट घासी का लंड अंदर बाहर होने लगा तो इधर मेरी चूत के अंदर सरदार के मोटे लिंग का घर्षण, उधर मेरी गुदा में बौने के लिंग का घर्षण, आनंद के सागर में गोते खाने लगी मैं और इन्हीं आनंद की रौ में मैं साहिल के लिंग को बेहताशा चपाचप चूसती चली गई। साहिल मेरे चूसने के इस अंदाज से निहाल हो उठा। वह मेरे सर को पकड़ कर अपनी कमर चला चला कर मेरे मुह को चोदने लगा और मै उसकी इस क्रिया में उसे और आनंद देने के लिए चूसना छोड़ कर अपने होठों से उसके लिंग को जकड़ कर होठों को ही चूत बना बैठी।
“ओह साली की होंठ है कि चूत, उफ्फ्फ अल्लाह, आह्ह्ह्ह्ह मजा आ रहा है वाह” साहिल खिल उठा मेरी इस अदा से। मैं गिनना भूल गई कि उन तीनों की सम्मिलित चुदाई के दौरान कितनी बार झड़ी। करीब पैंंतालीस मिनट तक तो सरदार नें ही चोदते चोदते मेरी चूत का भोसड़ा बना दिया। वह जब झड़ने लगा तो मुझे इतनी सख्ती से जकड़ा कि मानो मेरी सारी पसलियां कड़कड़ा उठी हों। उसके झड़ने के कुछ पलों पश्चात ही घासीराम भी फचफचा कर मेरी गुदा में ही अपने गरमागरम वीर्य का पिचकारी छोड़ने लगा। जैसे ही सरदार किसी जंगली भालू की तरह मुझे चोद कर हांफते हुए हटा, साहिल ने मोर्चा संभाल लिया। मेरे मुह से अपना लिंग निकाल कल सीधे मेरी चूत मे सट्ट से घुसा दिया। इधर घासी भी मेरी गुदा में अपना मदन रस सींच कर मैदान छोड़ चुका था। अब साहिल पूरी स्वतंत्रता के साथ मेरे शरीर से खिलवाड़ करने लगा। मेरी चूचियों को अपने विशाल पंजों से बीच बीच में भींचते हुए मुझे चीखने के लिए मजबूर करता करता। चोदने के अंतहीन ठापों से मुझे बेहाल कर दिया उसनें। झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। लंबे कद और छरहरे बदन का होने के साथ ही साथ काफी लचीला भी था वह। अलग अलग मुद्राओं में उलट पलट कर, तोड़ मरोड़ कर, मेरी चुदाई किए जा रहा था। उसके खतना किए हुए लिंग का भी असर रहा हो शायद, जो उसकी स्तंभन क्षमता इतनी अधिक थी। पानी पानी कर दिया था मुझे। घासीराम, फिर सरदार, और अब साहिल की अंतहीन चुदाई ने मुझे पूरी तरह निचोड़ कर रख दिया था कितनी बार झड़ती रही पता नहीं। बलराम, श्यामलाल के चक्कर में पड़कर मैं कहां से कहाँ पहुंच गई थी मैं। पूरी रंडी बन गई थी मैं उस रात।
“उफ्फ्फ मेरे चोदू, मार ही डालोगे क्या आज? आह्ह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह, ओह्ह्ह्ह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ”, मैं अपनी पूरी कोशिश करती रही कि किसी तरह इस चुदक्कड़ जानवर की हवस पूरी करके निजात पाऊं। शायद उसके अल्लाह को मुझ पर तरस आ गया, अंततः, करीब एक घंटे की अथक चुदाई के पश्चात स्खलित हुआ वह कमीना। मैं पूरी तरह नुच चुद कर किसी बेजान गुड़िया की तरह बिस्तर पर फैल गई। वे तीनों मुझे चोदकर बेहद खुश हो रहे थे। मेरे बेजान पड़े शरीर के करीब आ कर पुनः मेरे अंग प्रत्यंग का दीदार कर रहे थे। अपनी किस्मत पर शायद उन्हें भी यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी खूबसूरत चिड़िया का शिकार किया था उन लोगों ने। उस वक्त रात का करीब बारह बज रहा था।
“चल घासीराम, एक एक ग्लास और दारू दे। इस मैडम को भी पिला। थोड़ी जान आ जाएगी इस मैडम के शरीर में भी। साली अभी इतनी रात को कहाँ जाएगी। सवेरा होने में अभी बहुत समय है। तबतक हमलोग और थोड़ी मस्ती करते हैं। ऐसी लौंडिया हमें मिलती कहाँ है।” सरदार मेरे शरीर को लार टपकाती नजरों से देखते हुए बोला।
“नहीं नहीं प्लीज, मर जाऊंगी मैं। बहुत हो गया, अब आज और नहीं।” कांप उठी थी मैं।
“अब तू कुछ न बोल रंडी। हमने देख ली तेरी हिम्मत और ताकत। चुपचाप यह दारू पी और हमारे साथ मस्ती करने के लिए तैयार हो जा। तेरे जैसी खूबसूरत चुदक्कड़ औरत हमें और कभी मिलेगी भी या नहीं पता नहीं। आज तो जिंदगी में पहली बार तू हमारी किस्मत से मिली है। ऐसे कैसे छोड़ दें।” सरदार बोला। मैं समझ गई कि आज बड़ी बुरी फंसी हूं मैं। छुटकारे का कोई और मार्ग नहीं था। फिर मन ही मन सोचने लगी कि चलो झेल ही लिया जाय। आखिर मैं भी एक नंबर की चुदक्कड़ जो ठहरी। वैसे भी कल रविवार है, पूरा दिन आराम ही तो करना है।
“ठीक है बाबा ठीक है, लाओ दारू लाओ हरामियों, थोड़ा मेरे बदन में भी जान आने दो, फिर चोदते रहना मादरचोदो। रंडी तो बना ही दिया साले कमीनो, अब जब चुदना ही है तो खुल के क्यों न चुदूं।” मैं खुल कर एकदम रंडीपन पर उतर आई। घर में हरिया को फोन कर दिया कि रात को मैं नहीं आऊंगी, मैं आवश्यक कार्य में व्यस्त हूँ। तीनों कमीनों की बांछें खिल उठी। उसके बाद उस कमरे में वासना का जो नंगा नाच हुआ, वह सवेरे तक चलता रहा। मुझे चलने फिरने तक भी नहीं छोडा़ कुत्तों ने।
“वाह मैडम, दिल खुश कर दिया आपने, वरना आप जैसी खूबसूरत औरतें हमें तो घास तक नहीं डालतींं। यहां की जवान बूढ़ी गरीब मजदूर औरतों से काम चलाना पड़ता है। आपकी दरियादिली का तहे दिल से शुक्रिया।” मुझे छोड़ते वक्त साहिल बोला। उसकी बातों से ऐसा लग रहा था मानो मैंने उन पर बड़ा उपकार किया हो। बेचारगी भी झलक रही थी उसकी बातों में।
“अरे शुक्रिया मत बोल कमीने, सिर्फ तुमलोग ही मजे नहीं लिए हो, मैं भी तुम लोगों के साथ साथ खूब मजा ली हूं। गजब के चुदक्कड़ हो तुमलोग। आती रहूंगी बीच बीच में, और हो सका तो मेरे जैसी और भी औरतें, जिनके पति उन्हें खुश नहीं कर सकते, वैसी औरतें तुम्हारे पास भेज दिया करूंगी,” उनके चेहरों पर बेचारगी और मौन निवेदन को पढ़ कर अपनी दुर्दशा के बावजूद मैं बोली, वैसे भी मैं भी तो पूरी रात उनके साथ पूरी मस्ती करती हुई आनंद का उपभोग करती रही थी।
मेरी कच्ची नादान उम्र में पुरुष संसर्ग के सुख से परिचित होने के बाद फिर मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेरे शरीर की भूख दिन ब दिन बढ़ती ही चली गई। उन पुरुषों के नामों की फेहरिस्त काफी लंबी है जिन लोगों के साथ मैंने अपनी रातें रंगीन की। मेरे इन संबंधों से मेरे तथाकथित पति, हरिया (वास्तविक पिता) और करीम चाचा अनभिज्ञ नहीं थे, किंतु मेरी चढ़ती जवानी की अदम्य कामुकता को बुझा पाना उनके जैसी ढलती उम्र वाले पुरुषों के वश की बात नहीं थी। पंडित जी भी उम्र जा रही थी। फलस्वरूप अपने तन की प्यास बुझाने के लिए मेरे आकर्षक शरीर पर लार टपकाते मर्दों की बांहों में समाने को वाध्य हो कर वासना के दलदल में आकंठ डूबती चली गई। आरंभ में हरिया ने जब कभी मुझे टोका, तो मैं ने उन्हें टका सा जवाब दे दिया। एक बार ऐसी ही देर रात होटल के कमरे में एक क्लाईंट से नुच चुद कर करीब ग्यारह बजे अस्त व्यस्त हालत में जब मैं घर पहुंची तो मेरी हालत देख कर सब कुछ भांपते हुए हरिया ने पूछ लिया, “इतनी रात को कहां से आ रही हो?”
“झूठ मत बोलो। तेरी हालत बता रही है कि तू क्या गुल खिला कर आ रही है।” हरिया बोला।
“जब पता ही है कि मैं क्या गुल खिला कर आ रही हूं तो पूछते क्यों हैं?” मैं झुंझला कर बोली।
“देखो बेटी यह सब ठीक नहीं है,” वह तनिक अधिकार से बोला।
“साले बुड्ढे,” मैं तैश में आ गई, “अब तू मुझे समझाएगा कि क्या ठीक है क्या गलत? बेटी बोलता है बेटीचोद। अपनी बेटी को बीवी बना कर चोदता रहा इतने साल, तब बेटी नजर नहीं आई। पांच पांडव बन कर रंडी की तरह चोदता रहा मादरचोद, तब बेटी नजर नहीं आई। अपनी आंखों के सामने पंडित जैसे जंगली जानवर से चुदते देखता रहा भड़वे, तब बेटी नजर नहीं आई। अब जब चोद चोद कर मुझे असमय जवान बना दिया और मेरे शरीर में चुदाई की आग धधक उठी तो बेटी नजर आ रही हूं साले मादरचोद। बड़ा बेटी का बाप बन रहा है मां के लौड़े। अपने काम से काम रख। आईंदा मेरी जीवनशैली पर सवाल मत करना।” मैं ऊंची आवाज में बोल उठी। मेरी बातें सुनकर करीम भी वहां आ चुका था। उन दोनों की बोलती बंद हो चुकी थी। चुपचाप सर झुकाए खिसक लिए दोनों। उस दिन के बाद इस संबंध में उन्होंने फिर कभी नहीं टोका, समझ गए कि चिड़िया हाथ से निकल चुकी है। निर्बाध, स्वछंद, अपने ढंग से जीने लगी मैं।
अपने ससुराल से तो मैं अलग थी लेकिन अपने पुत्र क्षितिज को मैंने एक अच्छे विद्यालय के हॉस्टेल में डाल दिया था ताकि मैं अपना कैरियर संवार सकूं। इधर मैं नौकरी ज्वॉईन करने के बाद तरक्की की सीढियां फलांगती हुई शाखा प्रबंधक के पद पर पहुंच गई और उधर क्षितिज, हॉस्टेल में रह कर प्लस टू तक की पढा़ई समाप्त कर एन आई टी दुर्गापुर में प्रवेश के लिए चुन लिया गया। अच्छी रैंकिंग की बदौलत उसे विषय मिला आई टी। मेरे और क्षितिज के बीच बहुत अच्छा संबंध था। मेरे संघर्ष से बखूबी परिचित था इसलिए मेरी बड़ी इज्जत करता था। वह मेरा बड़ा अच्छा दोस्त भी था। अपनी सारी बातें मुझसे साझा करता रहता और सलाह लेता रहता था। छुट्टियों में जब भी आता, अपने दादा दादी से जरूर मिलने जाता था किंतु अधिकतर समय मेरे पास ही बिताना पसंद करता था। मैं पूरी कोशिश करती थी कि मेरे ऑफिस के कार्यों के कारण उसकी छुट्टियों का बहुमूल्य समय बरबाद न होने दूं। इसके अलावा मेरे परपुरुषों से अंतरंग संबंधों की भनक तक मैं ने उसे लगने नहीं दी। वैसे तो 19 साल तक में ही वह पूर्ण रूप निखर चुका था, छ: फुटा, गोरा रंग, घुंघराले बाल और अच्छी खासी सेहत वाला युवक, लेकिन 21 साल की उम्र होते होते पूरा विकसित व्यक्ति में तब्दील हो चुका था। पता नहीं मेरे पांचों पांडवों और पंडित जी में से किसके वीर्य की उपज था वह, या फिर मेरी कोख में उन लोगों के मिश्रित वीर्य का फल था।
एक बार यूं ही पूजा की छुट्टियों में जब वह घर आया तो मैं उसकी खूबसूरती देख कर दंग रह गई। संध्या करीब साढ़े चार बजे उसके आने के पहले ही मैं उस दिन घर पहुंच गयी। उसे स्टेशन से लाने के लिए मैंने राजेश को नानाजी की कार से भेजा था। उसके कार से उतरते ही अपलक देखती रह गई थी मैं। लंबोतरा चेहरा, सुतवां नाक, गहरी भूरी आंखें और घनी भौंहें, अपने स्थान पर जड़ रह गई थी मैं, उसकी खूबसूरती देख कर। नीली टाईट जींस और काले टाईट टी शर्ट में उसकी खूबसूरती गजब ढा रही थी। टी शर्ट की बांहें उसके बाजूओं की मछलियों पर कसी हुई थीं। मेरे अंतरतम के कपाट पर कामुकता का शैतान दस्तक दे रहा था। छि:, यह कुत्सित सोच मेरे मन में आ कैसे रहा था। झटक कर दूर कर दिया इस शैतानी सोच को।
“हाय मॉम, कहाँ खो गयीं आप?” उसकी आवाज सुनकर चौंक उठी और जैसे गहरी नींद से जागी मैं।
“ओह माई लव, बहुत हैंडसम हो गए हो। कहीं मेरी नजर न लग जाए मेरे बेटे को।” ढेर सारा प्यार उमड़ पड़ा उस पर। उसने लपक कर मुझे अपनी मजबूत बांहों में भर लिया और बेसाख्ता मेरे गालों को चूम लिया।
“जिसकी मॉम इतनी खूबसूरत हो उसका बेटा हैंडसम नहीं होगा तो और क्या होगा।” मुझे गुड़िया की तरह उठा कर एक चक्कर घुमा दिया।
“ओह्ह्ह्ह, छोड़ो मुझे शैतान, मस्का मत मारो। बताओ, कितने दिनों की छुट्टी है?” मैं पुलकित होती हुई बोली।
“सिर्फ एक हफ्ते की छुट्टी है मॉम।” वह मुझे फर्श पर उतारते हुए बोला।
“चलो कोई बात नहीं, एक हफ्ता ही सही, कम से कम छ: महीने बाद अपने बेटे का दर्शन तो हुआ। एक हफ्ता बहुत है बेटा मुझ मां के लिए। तरस गई थी मैं तुझे देखने के लिए।” मैं बोली। करीम चाचा और हरिया भी अबतक आ चुके थे।
“अरे क्षितिज बेटा, कितना बड़ा हो गया है रे तू”, हरिया बोला।
क्षितिज आगे बढ़ कर हरिया और करीम चाचा के पैर छू कर बोला, “बड़ा तो होना ही था नाना जी (वह उन्हें नाना ही कहता था, उसे क्या पता था कि इन्हीं की करतूतों की उपज है वह), कब तक बच्चा रहता।”
“हां बेटा, खूब कहा तुमने, खुश रहो,” करीम चाचा बोले। राजेश क्षितिज का बैग लेकर उसके कमरे में रख आया। फिर क्षितिज वहीं ड्रॉइंग रूम के सोफे पर बैठ गया। हरिया तुरंत कोल्डड्रिंक का ग्लास ले आया।
“अरे नाना जी, आपने क्यों कष्ट किया। मैं खुद ही ले लेता।” क्षितिज उसके हाथ से ग्लास लेते हुए बोला। मैं वहीं क्षितिज के पास बैठ कर उससे बातें करने लगी। वैसे तो हम मां बेटे फोन पर हमेशा बातें करते रहते थे किंतु इस तरह एक दूसरे के सामने बैठ कर बातें करने का कुछ अलग ही महत्व होता है।
क्षितिज मुझे गौर से देखते हुए बोला, “मॉम, आप तो बड़ी खूबसूरत हो गई हो। क्या बात है? आप की नजर मुझे क्या लगेगी, कहीं मेरी नजर ही न लग जाए आपको।”
“चुप बदमाश।” उसके गाल पर प्यार से चपत लगाते हुए बोली। वैसे मैं अपनी प्रशंसा सुन कर तनिक लाल हो उठी थी।
“वाह मेरी मम्मी डीयर, आपका चेहरा तो लाल हो गया। कसम से आप इस तरह शरमाती हुई और खूबसूरत लग रही हो।” क्षितिज के मन मेंं क्या भाव था पता नहीं, किंतु मैं तो अंदर तक लरज उठी।
“अब तू बस कर। सताने के लिए मैं ही मिली हूं क्या? तू बहुत बोलना सीख गया है। जा कर अपनी गर्लफ्रैंड से ऐसी बात कर बदमाश।” मैं झिड़कते हुए बोली।
“छि:, कैसी बात करती हो मॉम? जिसके पास आप जैसी खूबसूरत गर्लफ्रैंड हो उसे और किसी गर्लफ्रैंड की जरुरत है क्या? कसम से, मेरी कोई गर्लफ्रैंड नहीं है, न ही मुझे कोई रुचि है गर्लफ्रैंड बनाने में।” मुझसे लिपटते हुए बोला। उसकी इन बातों और हरकतों में प्रत्यक्षतः मां के प्रति प्यार ही लग रहा था, अपनापन लग रहा था। वैसे भी मुझसे इस प्रकार का व्यवहार वह लाड़ जताने के लिए करता ही रहता था। हमारे बीच पहले से ही जो रिश्ता था वह दोस्तों की तरह ही था किंतु पता नहीं इस बार उसकी बातों में क्या था, मैं अंदर ही अंदर पिघलती जा रही थी, अच्छा भी लग रहा था और भय भी महसूस कर रही थी खुद अपने अंदर की शैतानी भूख से।
फिर भी बनावटी नाराजगी जाहिर करते हुए छिटक कर अलग हुई और बोली, “हट शैतान, इतना बड़ा हो गया लेकिन अभी भी मुझे सताने से बाज नहीं आ रहा है। चल पहले जा कर फ्रेश हो जा फिर इतमिनान से बातें करते हैं” कह कर अपनी भावनाओं को किसी प्रकार काबू में रख कर उठ खड़ी हुई। मैं सीधे अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर धम्म से बैठ गई। हे भगवान, यह मुझे क्या हो रहा है? मेरे अपने बेटे के लिए मेरे मन में यह क्या चलने लगा? उसकी बातों से मेरे अंदर की कामुकता का जहरीला सांप फन उठा रहा था। बड़ी मुश्किल से मैं अपनी भावनाओं को काबू में रखने में सक्षम हो पाई।
संध्या के समय जब हम चाय पीने के लिए ड्राईंग रूम में आए तबतक मैं अपनी भावनाओं पर काबू पा चुकी थी।
हरिया चाय किचन में चाय बना रहा था, तभी क्षितिज भी किचन के अंदर जा कर उससे बोला, “नानाजी, आज मैं चाय बनाऊंगा, आप चलिए ड्राइंगरूम में, मैं खुद चाय ले कर आता हूं।”
हरिया जानता था कि उसके सामने उसकी एक नहीं चलने वाली। वह चुपचाप ड्राइंग रूम में आ कर बैठ गया और बोला, “आज क्षितिज बाबा चाय बना रहा है।”
“क्या? अरे बाबा उसे चाय बनानी आती भी है?” मैं चौंक कर बोली और किचन में जा घुसी। देखा तो वह चाय बना चुका था और कपों में चाय डाल रहा था।
“हाय हैंडसम, यह क्या? आते आते किचन में? चाय बनानी आती भी है?” मैं बोली।
मुझे देखते ही बोला, “अरे मॉम, अपने बेटे पर इतना भी विश्वास नहीं है? देख लो, चाय बन चुकी है।” मैं अविश्वास से कभी चाय को और कभी क्षितिज को देख रही थी। वह नहा धो कर फ्रेश हो कर एक काले रंग के बरामूडा और सफेद ढीली टी शर्ट में बेहद आकर्षक दिख रहा था।
“लो मॉम, टेस्ट करके देखो कैसी बनी है चाय?” कहते कहते एक कप उठा कर वह मेरी ओर ज्यों ही मुखातिब हुआ, देखता ही रह गया वह। मैं भी ऑफिस से आकर फ्रेश नहीं हुई थी, सो चाय के समय से पहले नहा धोकर फ्रेश हो कर आसमानी रंग के गार्डन सिल्क वाली ढीली नाईटी पहन कर आई थी। गला काफी खुला हुआ था इस नाईटी का। ठगा सा मुझे सर से पांव तक अपनी गहरी आंखों से चमत्कृत देखता रह गया। उसकी नजरें मेरी आंखों के रास्ते मानो मेरे अंदर भेद रही थीं। “ओह्ह्ह्ह माई गॉड! यह हुस्न की परी कहाँ से टपक पड़ी। ओह मॉम, आप तो बिल्कुल कयामत हो कयामत।” उसके मुंंह से बोल फूटे।
“चल हट शैतान, अपनी मां से कोई ऐसा बोलता है क्या?” मैं किसी प्रकार उसकी बातों के दुष्प्रभाव से बच कर बोली।
“कसम से मॉम, आप बड़ी हॉट हो।” कहते हुए उसने चाय का कप मेरे हाथ में थमाया, लेकिन उसकी बातों से मैं अंदर तक थरथरा उठी थी, मेरे कांपते हुए हाथ से चाय छलक कर मेरी नाईटी के सामने सीने के उभारों के बीचोंंबीच गिर कर भिगो दिया। मैं हड़बड़ा कर चाय का प्याला किचन के स्लैब पर रखने जा ही रही थी कि क्षितिज भी जल्दबाजी में मेरे हाथों से चाय का प्याला लेने आगे बढ़ा और उस चक्कर में हम एक दूसरे से टकरा गये, नतीजा यह हुआ कि रही सही चाय भी मेरी नाईटी के ऊपर गिर गई। गनीमत था कि चाय सिर्फ मेरे कपड़े पर गिरा, जिस कारण गरम चाय के सीधे संपर्क में न आ कर मेरा चमड़ा जलने से बच गया, फिर भी गरम चाय के ताप को महसूस कर मेरे मुंह से “आह” निकल पड़ी। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, क्षितिज ने आव देखा न ताव, आनन फानन मेरी नाईटी को उतार फेंका। मैं भक्क, हक्की बक्की रह गई। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि मैं संभल भी नहीं पाई। अनजाने में उसने तो सिर्फ मेरी सुरक्षा के लिए शायद यह किया था। अंदर मैं सिर्फ पैंटी और ब्रा में थी।
“हाय यह क्या किया” मैं अपने जवान बेटे के सामने इस अवस्था में अपने आपको पा कर शर्म से पानी पानी हो उठी। बड़ी ही अजीबोगरीब स्थिति हो गई थी मेरी। इधर क्षितिज की आंखें बड़ी बड़ी हो गयीं यह दृश्य देख कर। मानो उसकी आंखों के सामने बिजली सी कौंध गई हों। मेरे जिस्म से उसकी नजरें मानो चिपक सी गयीं थीं। मुह खुला का खुला रह गया। क्षितिज के लिए किसी इतनी खूबसूरत दपदपाती काया की स्वामिनी के आकर्षक, उत्तेजक, अर्धनग्न जिस्म को इतने समीप से दर्शन का शायद यह पहला अवसर था। उसकी मांं थी तो क्या हुआ, आखिर थी तो एक मादा ही। उसकी आंखों में मैं वही मादा के प्रति वाली आदमजात, पुरुषजनित चमक स्पष्ट देख पा रही थी, जिसे मैं खूब पहचानती थी। उसके बरमूडा के सामने का हिस्सा हौले हौले उभर रहा था। कुछ पलों के लिए मैं सन्न रह गई, किंकर्तव्यविमूढ़।
“हाय, अब देख क्या रहे हो, मैं यहाँ से निकलूंगी कैसे, जल्दी से मेरी दूसरी नाईटी ले कर आ,” अपने आप को किसी प्रकार संभाल कर लरजती आवाज में बोली मैं। वह जैसे गहरी नींद से जागा और भाग कर मेरे कमरे से दूसरी नाईटी ले आया। मैं ने जल्दी से अपने ऊपर नाईटी डालकर अपनी अर्धनग्न देह को ढंक लिया और झट से अपनी चाय से भीगी नाईटी समेट कर किचन के बाहर निकल आई और सीधे अपने कमरे में चली गई। मेरी सांसे धौंकनी की तरह चल रही थीं। लज्जा के मारे मैं कामना कर रही थी कि काश धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं।
“मॉम, चाय के लिए आ जाओ।” क्षितिज की आवाज किसी गहरे कुंए से आती हुई प्रतीत हुई। मैं अपने आप को किसी प्रकार संभालती हुई बैठक में आई। हरिया, करीम और क्षितिज मेरा इंतजार कर रहे थे। जहां क्षितिज की नजरें मेरे कपड़ों को भेदती हुई मुझ पर ही जमी हुई थीं वहीं मुझमें हिम्मत ही नहीं थी कि मैं उससे नजरें मिला पाऊं।
पिछले चार पांच मिनट में हमारी भाग दौड़ को देख कर सवालिया नजरों से देखते हुए हरिया नें पूछा, ” ऐसा क्या हुआ था कि तुम दोनों मां बेटे दौड़ भाग कर रहे थे?”
“कुछ नहीं नाना, मम्मी के कपड़े पर चाय गिर गया था।” क्षितिज बोला। मैं शरम के मारे क्षितिज से नजरें भी नहीं मिला पा रही थी। छि:, मेरे अधनंगे तन को देख कर क्या सोच रहा होगा इसका कोई अंदाजा नहीं था मुझे। उसके कहने का अंदाज बिल्कुल सामान्य था और चेहरे पर वही पूर्ववत मासूमियत विराज रही थी। मैं ही बिना वजह असहजता का अनुभव कर रही थी। मैं अपने मन की सारी आशंकाओं और ग्लानि को झटक कर सामान्य होने की कोशिश करने लगी। शनैः शनैः मैं सामान्य रुप से उनके वार्तालाप में शामिल हो गई। किचन वाली घटना अब भी मेरे मन को अशांत कर रही थी किंतु उस घटना से उपजे दुश्प्रभाव से मैं मुक्त हो गई थी। चाय पीते पीते और इधर उधर की बातें करते हुए कब सात बज गया मुझे पता ही नहीं चला। इसी बीच हरिया उठ कर किचन की ओर बढ़ा रात के खाने की व्यवस्था करने के लिए। करीम चाचा भी उठ कर वृद्धाश्रम का कुछ सामान लाने के लिए बाजार चले गये। बैठक में रह गये सिर्फ हम मां बेटे।
“और बताओ क्षितु, कैसी चल रही है तेरी पढा़ई?” मैं पूछी।
“मॉम, पढ़ाई लिखाई की बात मत पूछो। छुट्टी है, छुट्टी कैसे इंज्वॉय करूँ, उसकी बात करो।” क्षितिज बोला।
“ठीक है बाबा ठीक है। तू ही बता तू छुट्टियों में क्या करना चाहता है। शॉपिंग, मूवी, घूमना, तुम्हें क्या पसंद है? मैं उसी के हिसाब से ऑफिस से छुट्टी कर लूंगी।” मैं बोली।
“वह सब कुछ तो होगा ही लेकिन उन सबके अलावा आपके साथ अधिक से अधिक टाईम बिताना चाहता हूं मॉम।” वह मेरे करीब आ कर मेरे हाथों को अपने हाथों में ले कर बोला।
“मेरे साथ समय बिताने की जगह अपने दोस्तों के जा कर मस्ती क्यों नहीं करता? हां शॉपिंग और मूवी हम साथ जा सकते हैं। घूमने के लिए अपने दोस्तों के साथ चला जा।”
“आईडिया बुरा नहीं है लेकिन मेरी किसी से घनिष्ठता नहीं है। यहां के जो तीन चार दोस्त हैं, सारे बड़े कमीने हैं, इसलिए मैं उनसे ज्यादा मिलना जुलना पसंद नहीं करता हूँ।”
“क्या करते हैं? आखिर तुम्हारे बैचमेट ही तो हैं ना।”
“अरे कुछ पूछो मत ममा। छिछोरे हैं एक नंबर के। जहां लड़कियां देखी तो लाईन मारना शुरू।”
“अरे यह तो तुम्हारी उम्र में सभी करते हैं। इसमें क्या नयी बात है।” मैं मजाक में बोली।
“मजाक मत करो ममा। तुम नहीं जानती उनके बारे में। अजय और सुजीत तो बड़ी उम्र की औरतों से भी फ्लर्ट करते हैं। एक नंबर के कमीने हैं।”
“ओह, ऐसा?” मैं बोली। “ठीक है, फिर मैं तीन दिन की छुट्टी कर लेती हूं। मैं खुद भी चाहती हूं कि तुम्हारे साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिता सकूं, लेकिन मजबूरी है, तीन दिन से अधिक ऑफिस नहीं गई तो काफी काम पेंडिंग हो जाएगा। उसके बाद कोशिश करूंगी कि ऑफिस के काम की मॉनिटरिंग घर से ही कर सकूं।” मैं बोली।
“ओह्ह्ह्ह माई स्वीट मॉम। आई लव यू।” मुझे बांहों में भर कर चूम लिया। मैं भीतर तक गनगना उठी उसकी इस हरकत पर। आखिर अब वह बच्चा तो रहा नहीं। पूरा मर्द बन चुका था। मुझे उसकी बांहों में अपने बेटे के स्थान पर एक मर्द की बांहों का आहसास हुआ।
“चल हट। तू बच्चा का बच्चा ही रहेगा। अरे जवान हो गया है तू।” मैं छिटक कर अलग होती हुई बोली।
“ओह मॉम, जवान हो गया तभी तो अपनी खूबसूरत गर्लफ्रैंड के साथ मस्ती कर रहा हूँ।” वह दुबारा मुझे अपनी बांहों में जकड़ कर मेरे गाल पर एक भरपूर चुंबन दे बैठा। हे भगवान, इस नादान को कैसे समझाऊंं। मैं अंदर तक हिल गई।
“छि:, शैतान, अपनी मां के साथ ऐसी बात करते हुए शर्म नहीं आती?”
“शर्म कैसी? मैं अपनी गर्लफ्रैंड से ही तो ऐसी बात कर रहा हूँ। ओ माई स्वीटी, मैं कैसे बताऊँ कि आपको कितना प्यार करता हूँ।” उसकी आंखों में मैं अपने लिए बेइंतहां प्यार का सैलाब उमड़ता देख रही थी। मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। यह उसके बचपने वाला प्यार नहीं था। एक स्त्री के लिए एक मर्द की चाहत वाला प्यार था। यह उसकी नादानी भरी चाहत थी जिसे मुझे बड़ी होशियारी से संभालना था। मुझे अपनी जहरीली कामुकता को नियंत्रण में भी रखना था और बड़ी बुद्धिमानी से उसे समझाना भी था कि मां बेटे के बीच का प्यार और स्त्री पुरूष के जोड़े के बीच के प्यार में फर्क क्या है, लेकिन मेरी खुद की पुरुष संसर्ग की भूख रुपी सांप का फन कब उठ जाए, उसी भय से परेशान हो रही थी। अबतक तो मैं खुद को किसी प्रकार नियंत्रित रख पाने में कामयाब थी।
“देख क्षितु, मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, लेकिन एक मां की तरह। तू मुझसे गर्लफ्रैंड की तरह व्यवहार करता है और अपने विचार खुल कर मुझसे बांटा करता है यह अच्छी बात है, लेकिन यह कभी न भूलना कि तू मेरा बेटा है और मैं तेरी मां हूं।” मैं तनिक गंभीरता पूर्वक बोली। यह सुनकर उसके चेहरे पर मायूसी सी छा गई। उसकी मायूसी मुझसे देखी नहीं गई, मैं उसे गले लगा कर बोली, “छि: पगले, उदास हो गया। अच्छा बाबा अच्छा, मैं तेरी गर्लफ्रैंड और तू मेरा ब्वॉय फ्रेंड, अब खुश?”
किसी बच्चे की तरह खुश हो गया वह, जैसे किसी बच्चे को उसका मनपसंद खिलौना मिल गया हो और मुझे अपनी मजबूत बांहों में भींच कर हवा में उठा लिया, “ओह मॉम, यू आर ग्रेट।”
“अरे अब छोड़ मुझे बदमाश, तेरे नाना देखेंगे तो क्या सोचेंगे।” मैं उसकी बांहों में मचल उठी, लेकिन मैं अब अपना नियंत्रण खोने लगी थी।
“ओके माई डार्लिंग, लो छोड़ दिया।” कहकर मुझे फर्श पर उतार दिया। किसी प्रकार मैं अपनी सांसों पर काबू पा सकी।
“अच्छा अब ये सब छोड़ो, जरा देखती हूँ हरिया डिनर के लिए क्या बना रहा है,” इतना कहकर मैं वहां से खिसक ली। अगर वहां कुछ पल भी और रहती तो मेरे संयम का बांध टूटने का खतरा था। अपनी सांसे दुरुस्त करती हुई किचन में जा घुसी। रात करीब नौ बजे हम सब खाने की मेज पर इकट्ठे हुए। उस वक्त तक मैं काफी हद तक संभल चुकी थी। खाना खाने के बाद हम कुछ देर इधर उधर की बातें करते रहे। करीब साढ़े दस बजे हरिया और करीम सोने चले गए।
“क्षितिज तू भी सोने चल।” मैं बोली।
“थोड़ी देर और बैठिए न मॉम” क्षितिज बोला।
“नहीं मुझे नींद आ रही है, मैं जा रही हूं सोने,” कह कर मैं उठ गयी। मेरे उठते ही क्षितिज भी उठ खड़ा हुआ और मेरे पीछे पीछे चल पड़ा। यह देखकर मैं बोली, “मेरे पीछे कहाँ आ रहा है, जा तू अपने कमरे में।”
“ओ मॉम, आप बड़ी निर्दयी हो। एक तरफ तो बोलती हो अधिक से अधिक समय मेरे साथ स्पेंड करूंगी और इतनी जल्दी सोने चली।” मायूसी से बोला वह।
“तू मुझे बड़ा इमोशनल ब्लैकमेल करता है। मुझे सच में बड़ी नींद आ रही है लेकिन तेरी खातिर रुक रही हूँ। चल बैठक रूम में।” कहकर मैं ड्राइंग रूम में आ गई। हम दोनों सोफे पर बैठकर बातें करने लगे। मैं अपने ऑफिस, घर और वृद्धाश्रम की बातें बताती रहीऔर वह अपने कॉलेज के बारे में बताता रहा। करीब एक घंटे तक हम बातें करते रहे, फिर मुझे जम्हाई आने लगी, नींद के मारे मेरी आंखें बोझिल होने लगीं।
मेरी हालत देख कर क्षितिज बोला, “चलिए मॉम, आपको सच में नींद आ रही है। चलते हैं सोने। बाकी बातें कल करेंगे।” मैं उठ कर अपने कमरे के दरवाजे के पास पहुंची, तभी क्षितिज ने मुझे पीछे से पकड़ कर अपनी ओर घुमा लिया और मेरे गाल पर एक चुंबन जड़ते हुए बोला, “गुड नाईट स्वीटहार्ट, स्वीट ड्रीम्स”। मैं हक्की बक्की रह गई। यह क्या था? एक बेटे का स्नेह भरा चुंबन या, एक प्रेमी का प्रेम प्रदर्शन?
अनिश्चय की अवस्था में मेरे मुंह से भी निकला, “गुड नाईट बेटा”
“ओह बेटा मत बोलिए मॉम, अपने ब्वॉयफ्रेंड को कोई बेटा बोलता है क्या?” वह तनिक मायूसी से बोला। उसके चेहरे पर मायूसी देखकर मुझे दुख हुआ।
“ओके माई डार्लिंग, गुड नाईट” मैं उसके मायूस चेहरे को हथेलियों में भर कर बोली।
“ये हुई न बात गर्लफ्रैंड वाली।” खुश हो गया वह और खूब सख्ती से मुझे अपनी बांहों में जकड़ कर एक भरपूर चुंबन दे कर अपने कमरे की ओर बढ़ गया। ओह मां, थरथरा उठी मैं और लड़खड़ाते कदमों से अपने कमरे में दाखिल हुई। यह मैं क्या कर रही थी मैं। सख्ती से उसे मना क्यों नहीं कर पा रही थी मैं, यह जानते हुए भी कि यह अनैतिक है। क्या मेरी इच्छा शक्ति कमजोर हो रही थी? शायद हां। मेरे अंदर का वही पूर्वपरिचित शैतानी सर्प अपना फन उठा रहा था और धीरे धीरे मुझे अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा था, मुझे बेबस करता जा रहा था।
मैं सीधे अपने बिस्तर पर धम्म से गिर पड़ी। मेरे सारे शरीर पर मानो चींटियां चल रही हों। जब उसने मुझे कस लिया था अपनी बांहों में और चुंबन अंकित कर रहा था तो वह क्या था? मैं उसकी बांहों में जकड़ी पिघलती क्यों जा रही थी? उसके सीने से दबे हुए मेरे उरोज मचल क्यों रहे थे? ठीक मेरी योनी के ऊपर किसी कठोर वस्तु का आभास क्यों हो रहा था? यह सिर्फ मेरा वहम था या वास्तविकता? अगर यह वास्तविक था तो क्या, तो क्या…. पारिवारिक, सामाजिक रिश्ते नातों से इतर पुरुष प्रकृति के अनुसार उसकी नर प्रवृत्ति थी? नारी शरीर के लिए उसके शरीर का स्वत: जागृत पौरुष था? मादा के प्रति नर का प्राकृतिक आकर्षण था? हाय, अब मेरे नादान बेटे को कैसे नियंत्रित करुं, जबकि मैं अपने अंदर जागती जा रही कामुकता के वशीभूत, खुद अपनी मां रुपी बेड़ी को टूटती महसूस कर रही थी। मेरे जैसी वासना की पुतली, इतने करीब से आती पुरुष गंध के आकर्षण से कब तक अपने को बचा कर रख सकती थी यह तो भविष्य के गर्त्त में था। मैं अपनी ओर से भरसक प्रयास कर रही थी कि मैं चाहे जैसी भी हूँ, मेरा नादान पुत्र रिश्ते की मर्यादा को न लांघे। अब आगे भगवान की क्या मर्जी है यह तो भगवान ही जाने। देर रात तक मैं इसी उधेड़बुन में पड़ी रही।
रात के वक्त अचानक ऐसा लगा कि कोई दानवाकार व्यक्ति मेरे कमरे में है। ठीक मेरे बिस्तर के करीब। नाईट बल्ब ठीक उसके पीछे था, अत: वह एक काले साये की तरह दिख रहा था। मेरी आंखें खुल गयीं थीं और आंखें फाड़े नाईट बल्ब की मद्धिम रोशनी में उसका चेहरा पहचानने की कोशिश कर रही थी किंंतु साफ साफ देख पाने में असमर्थ थी। वह आहिस्ते आहिस्ते मेरे करीब आया और मेरी नाईटी को धीरे धीरे ऊपर उठाने लगा। मैं विरोध करना चाह रही थी किंतु हिलने डुलने में असमर्थ थी। ऐसा लग रहा था मानो मुझे लकवा मार गया हो। पूरा शरीर मानो निश्प्राण हो गया हो। मेरी जुबान तालू से चिपक गई थी। धीरे धीरे मेरी नाईटी मेरे शरीर से अलग हो गयी। अब मैं सिर्फ पैंटी और ब्रा में थी। कुछ पलों तक वह व्यक्ति मेरे अर्धनग्न शरीर को घूरता रहा फिर वह मेरी ब्रा को खोलने लगा। मैं नि:शक्त, बेबसी के साथ अपने ऊपर होने वाले इस कृत्य को सिर्फ देखती रही। मेरी ब्रा को खोलने के बाद वह बुत बना कुछ पलों तक मेरे उन्नत उरोजों की खूबसूरती निहारता रहा। मेरी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसने अपने विशाल खुरदुरे पंजों से पहले मेरे उरोजों का स्पर्श किया, फिर हौले से दबाया। उफ्फ्फ, भयमिश्रित उत्तेजना का वह आहसास अवर्णनीय था। उसका हाथ मेरे उरोजों से होते हुए मेरे पेट, फिर नाभि और, और…ओह्ह्ह्ह मेरी योनि की तरफ जाने लगा। हाय राम, यह मेरे साथ क्या हो रहा था। मैं इतनी बेबस क्यों हो गई थी। चाह कर भी विरोध क्यों नहीं कर पा रही थी। अब तक मेरे अंदर भी धीरे धीरे वासना का कीड़ा कुलबुलाने लगा था। वह व्यक्ति पहले मेरी पैंटी के ऊपर से ही मेरी योनि को सहलाने लगा। मैं थरथरा उठी। मेरा जिस्म वासना की अग्नि में झुलसने लगा। मेरी योनि पानी छोड़ने लगी थी। मेरी हालत उस व्यक्ति से छुपी हुई नहीं थी। वह मेरे बिस्तर पर आ कर ठीक मेरे बगल में लेट गया, पैंटी को उतारने के लिए जब वह पैंटी नीचे खींचने लगा और इस क्रम में उसका चेहरा ठीक नाईट बल्ब की ओर हुआ, तभी मैं इतने करीब से उस व्यक्ति की सूरत देख पाई, ओह्ह्ह्ह भगवान, इतना वीभत्स चेेेहरा! कोयले की तरह काला रंग, भिंची भिंची सुर्ख आंखें, बिखरे बेतरतीब खिचड़ी बाल, किसी जंगली भेड़िये की तरह शक्ल, बड़े बड़े कान बाल से भरे हुए, बेहद पतले होंठ, जबड़े बाहर की ओर उभरे हुए, नाक के स्थान पर सिर्फ दो नसिका छिद्र दिखलाई पड़ रहे थे। सुर्ख आंखों में भूखे भेड़िए सी चमक थी। मैं घबरा कर चीख पड़ी, “नहींईंईंईंईंईंईं” और तभी मेरी आंखें खुल गयीं। हे भगवान, तो यह एक दु:स्वप्न था। मैं पसीने से नहा गयी थी। मैं कांपते हुए बिस्तर से किसी प्रकार उठी और अपने सूखे हलक को तर करने पानी पीने के लिए लड़खड़ाते कदमों से ज्यों ही दरवाजा खोली, सामने क्षितिज खड़ा था, जो मेरी चीख सुनकर बदहवास दौड़ा चला आया था। वह एक टी शर्ट और बरमूड़ा पहने हुए था।
उफ्फ्फ भगवान, वह भयावह वीभत्स चेहरा अब भी मेरे जेहन में समाया हुआ था। भयाक्रांत, पसीने से लतपत, थरथर कांपती, बेख्याली में मैं सामने खड़े क्षितिज से लिपट गई। क्षितिज मुझे अपनी बांहों में समेट कर बोला, “ओह माई डार्लिंग, क्या हुआ? इतनी डरी हुई क्यों हो?”
अचानक जैसे मुझे होश आया, “कककुच्छ नननहींईंईंई” हकलाते हुए मैं बोली और उसकी बांहों से निकलने की कोशिश करने लगी, लेकिन उसने मुझे और सख्ती से जकड़ लिया, “छोड़ो मुझे, मुझे कुछ नहीं हुआ, मैं सिर्फ एक बुरा सपना देख कर डर गई थी” मैं हकबका कर खुद को बमुश्किल संभालते हुए बोली।
“देखिए मॉम, तुम अब भी डरी हुई हो। मैं तुम्हें ऐसी हालत में अकेला नहीं छोड़ सकता, जबतक तुम नॉर्मल नहीं हो जाती।” कहते हुए मुझे बांहों का सहारा दिए हुए मेरे साथ मेरे कमरे में दाखिल हुआ। “चलिए आप आराम से लेट जाईए, मैं आपके लिए पानी ले कर आता हूं” कहता हुआ मुझे बिस्तर पर लिटा दिया और पानी लाने चला गया। उसकी बांहों में मैं राहत और सुरक्षा अवश्य महसूस कर रही थी किंतु मेरे अंदर का बांध भी दरकने लगा था। मैं उसके नर गंध से अवश होती जा रही थी। वह ग्लास में पानी लाकर अपनी बांहों का सहारा देकर मुझे बिठा दिया और मुझे पानी पिलाने का उपक्रम करने लगा।
मैं ने उसके हाथ से ग्लास लेने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन नर्वसनेस के चलते कांपते हाथ के कारण मेरे हाथ से ग्लास छूट गया और सारा पानी मेरी नाईटी पर गिर पड़ा। मेरी नाईटी पानी से सराबोर हो गई।
“तू जा, मैं नाईटी बदल लूंगी।” मैं बोली।
“नहीं मैं यहां से कहीं जाने वाला नहीं। आप बदल लीजिए, वरना मैं खुद बदल दूंगा।” वह बोला।
“ठीक है बाबा ठीक है।” कहते हुए मैं उसके हाथ से नाईटी ले कर बाथरूम में चली गई। जब मैं बदल कर वापस कमरे में आई तो काफी लज्जा महसूस कर रही थी। नाईटी के अंदर मेरे अंग वस्त्र स्पष्ट नुमाया हो रहे थे। क्षितिज मेरे इस रूप को आंखें फाड़े देखता रह गया।
“वाऊ माई डियर, यू आर लुकिंग सो गॉर्जियस।” वह बोला। यह मेरे पुत्र की आवाज नहीं थी, एक आम पुरुष की एक स्त्री के लिए प्रशंसात्मक अल्फाज थे।
“चुप बदमाश।” लरज कर रह गई मैं।
वह मेरे करीब आ कर मेरे कंधों को पकड़ कर मुझे बिस्तर पर बिठा दिया और पानी का ग्लास ला कर बोला, “लीजिए पानी पी लीजिए।” इतना कहकर ग्लास मेरे मुह से सटा दिया। उसका बांया हाथ मेरी पीठ पर था और दायें हाथ से मुझे पानी पिलाने लगा।
पानी पी कर मैं बोली, “अब तू जा मैं अब ठीक हूं।”
“नहीं, आज मैं यहीं सोऊंगा। आप आराम से सो जाईए।” मुझे सुलाता हुआ बोला। उसका बायां हाथ अब भी मेरी पीठ पर था।
“लेकिन तू सोएगा कहाँ?” मैं बोली।
“और कहां, इसी बेड पर।” पूरे अधिकार से वह बोल रहा था।
“अरे अब तू जवान हो गया है, अभी भी अपनी मां के साथ सोएगा?” मै हड़बड़ा कर बोली।
“मैं कुछ नहीं जानता। सिर्फ इतना जानता हूँ कि आप इस वक्त डरी हुई हैं और एक बेस्ट फ्रेंड होने के नाते मैं इस हालत में आपको अकेला नहीं छोड़ सकता हूँ,” कहते कहते वह भी मेरी बगल में लेट गया। मैं ने अब और कुछ बोलना मुनासिब नहीं समझा, लेकिन थोड़ी खिसक कर उससे दूरी रखना चाहती थी क्योंकि उससे ज्यादा मुझे अब खुद पर से भरोसा उठता जा रहा था। यह वास्तव में मेरा इम्तिहान था। अगर मेरा बेटा, और पुरुषों की तरह स्त्री संसर्ग से वाकिफ रहता और प्रणय निवेदन करता तो शायद मैं अबतक अपनी देह उसे सौंप चुकी होती, किंतु मैं जानती थी कि यह नादान है, स्त्री पुरुषों के बीच दैहिक संबंध से नितांत अनभिज्ञ। इसकी नादानी में इसके कौमार्य को भंग कर मैं पाप की भागी नहीं बनना चाहती थी।
“यह क्या डियर? आप मुझसे दूर क्यों जाना चाहती हो?” कहते हुए वह मुझे अपनी बाईं बांह से मुझे अपने से सटा लिया। एक प्रकार से मुझे अपने बायें हाथ से जकड़ रखा था।
“छोड़ मुझे, यह क्या कर रहे हो?” मैं लगातार कोशिश कर रही थी कि उसके बंधन से छूट जाऊं किंतु उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि मैं सिर्फ छटपटा कर रह गई।
“क्यों छोड़ दूं? समस्या क्या है आपकी माई गर्लफ्रैंड? आप को मैं पसंद नहीं?”
“ऐसी बात नहीं है बेटे। एक जवान बेटा अपनी मां के साथ इस तरह नहीं सोता है।”
“यह क्या मॉम, आप ने बार बार मां बेटा, मां बेटा क्यों लगा रखा है? आप मां से ज्यादा मेरी गर्लफ्रैंड हो। इस बात को आप भी मानती हो ना? फिर समस्या क्या है?”
“समस्या है। तू बड़ा नादान है। मैं तुम्हें कैसे समझाऊं?” मैं अब भी पूरी कोशिश में थी कि किसी तरह उसे रोक पाऊं, उसे दुखी और मायूस किए बिना। लेकिन वह मुझ पर हावी होता जा रहा था और मैं कमजोर पड़ती जा रही थी।
“ठीक है जान, अगर आपको मेरा साथ पसंद नहीं है तो चला जाता हूँ,” वह मायूसी से बोला। उसके चेहरे पर मायूसी मैं बिल्कुल भी नहीं देख सकती थी, यह मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी।
फौरन उससे लिपट गई और बोली, “छि: पगले, उदास हो गया इतनी सी बात पर। चल अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ही सो जा। मैं तुझे इस तरह मायूस नहीं देख सकती माई स्वीटहार्ट।” मेरी बात सुनकर खुश हो गया वह। मुझे अपनी बांहों में ले कर चूम लिया। मेरा सारा प्रतिरोध पिघल कर बर्फ से पानी हो गया। मैंने खुद को परिस्थिति के हवाले कर दिया। मुझे मालूम नहीं था कि वह नादान अब आगे क्या करने वाला है लेकिन अब मेरी सारी झिझक हवा हो गई थी। मेरे अंदर का शैतान जाग उठा था, जिसे अबतक बड़ी मुश्किल से नियंत्रित रख पाई थी। मेरे अंदर वासना की चिंगारी जल उठी थी और मैं अपने अंदर के हवस की अग्नि में तपने लगी। मैं चुंबन के प्रतिदान में बिना कुछ आगा पीछा सोचे उसके होंठों पर अपने होंठों का गरमागरम चुंबन दे बैठी। यह चुंबन पूर्णतयः एक हवस की भूखी स्त्री का कामुक चुंबन था। बेचारा क्षितिज, उसके लिए तो यह बिल्कुल नया अनुभव था। रोमांचित हो उठा वह और मुझे कस कर अपनी बांहों में जकड़ कर पुनः मेरे होंठों पर अपने होंठ रख कर मेरी आंखों की गहराई में डूब गया। बेहताशा पागलों की तरह चूमने लगा वह, होंठों को चूसने लगा वह। उसकी इस बेताबी से मैं घबरा सी गई। वह उत्तेजित हो चुका था और उसे इस तरह के गमागरम चुंबन के आनंद का परिचय मिल चुका था। वह बेहताशा मुझे चूमे जा रहा था और मैं पागल हुई जा रही थी।
“हाय, उफ्फ, पागल हो गये हो क्या?” मैं घबरा कर किसी प्रकार बोली।
“हां, पागल हो गया हूँ मेरी जान। आपके इन रस भरे होठों को चूमने का आनंद ही कुछ और है। उफ्फ माई डार्लिंग, आपके पूरे शरीर में एक नशा है, जिसे आज मैं पहली बार महसूस कर रहा हूँ। आप चेहरे से बेहद खूबसूरत तो हो ही, लेकिन जब से आपको किचन में पैंटी ब्रा में देखा, आपके शरीर की खूबसूरती मेरी आंखों में बस गयी है और अब यह चुंबन, ओह माई स्वीटी, मैं बहुत भाग्यवान हूँ जो आप जैसी गर्लफ्रैंड मुझे मिली है। आप नाईटी उतार ही दीजिए, आपके खूबसूरत शरीर को दुबारा देखने और महसूस करने के लिए मरा जा रहा हूँ।” वह अब पूरी तरह मुझ पर आसक्त हो चुका था।
“तुम्हें पता है तुम क्या कह रहे हो?” मैं बोली, हालांकि अब मैं भी यही चाह रही थी कि वह खुल कर मेरे साथ एक परिपक्व पुरुष की तरह व्यवहार करे। मां बेटे के पवित्र रिश्ते की वैसे भी मेरी नजर में कोई खास अहमियत नहीं थी। मुझे सिर्फ इस बात की फिक्र थी कि उसका कौमार्य मेरे हाथों भंग न हो। लेकिन अब इस फिक्र को मैने झटक फेंका और खुल कर खेलने का मन बना चुकी थी। परेशानी सिर्फ यह थी कि उस नादान को स्त्री संसर्ग का कोई अनुभव नहीं था। मैं पहल कैसे करूँ समझ नहीं पा रही थी। इस प्रकार की समस्या आज तक मेरे सामने कभी नहीं आई थी। आज तक मेरे साथ जो कुछ हुआ था, सब खेले खाए मर्दों के साथ हुआ था। इस तरह किसी अनाड़ी मर्द से पहली बार पाला पड़ा था, और अनाड़ी भी कौन? अपना खुद का बेटा, जिसे मैं खुल कर बता भी नहीं सकती थी कि ऐसा करो वैसा करो। मुझे बड़ी सावधानी से आगे कदम बढ़ाना था, ताकि उसे आहसास भी न हो कि मैं इतनी बड़ी मर्दखोर हूं और इस तरह उसकी नजरों में मेरी इज्जत भी बनी रहे। मैं एक एक कदम फूंक फूंक कर बढ़ा रही थी।
“हां मुझे पता है मैं क्या कह रहा हूं।” वह बोला, मैं चौंक उठी, कहीं वह अनाड़ी बनने का नाटक तो नहीं कर रहा है? “अपनी खूबसूरत गर्लफ्रैंड की खूबसूरती देखना चाहता हूं, महसूस करना चाहता हूं।”
“क्या मतलब है तुम्हारा, महसूस करना चाहता हूं से?” मैं असमंजस में थी।
“अरे मेरी जान, सबसे पहले तो मैं यह बता दूं कि आजतक आपसे खूबसूरत लड़की मैंने कहीं नहीं देखी है। जब भी किसी लड़की को देखता हूँ तो आपसे तुलना करता हूँ और पाता हूँ कि आप उनसे कहीं ज्यादा खूबसूरत हो। यही कारण है कि मुझे आजतक कोई लड़की आकर्षित नहीं कर पाई है और मेरी कोई गर्लफ्रैंड नहीं है। आपके बदन को पैंटी और ब्रा में देखने के बाद मैं आपका दीवाना बन गया हूं, इतना खूबसूरत है आपका शरीर। हालांकि मैंने आजतक किसी लड़की को उस हालत में नहीं देखा है, लेकिन मेरा पूरा विश्वास है कि आप के तरह खूबसूरत बदन की मालकिन दिया ले कर ढूंढने पर भी नहीं मिल सकती। मैं आपके इस खूबसूरत बदन के हर एक अंग को छूना चाहता हूं, प्यार करना चाहता हूं। उतारो ना अपनी नाईटी डियर, वरना मैं खुद उतार दूंगा।” बड़ी बेसब्री से वह बोला।
“हाय राम, यह कैसी फरमाइश है तुम्हारी? तुझे लाज नहीं लगती है बेटा, अपनी मां से ऐसी फरमाइश करते हुए?अपने जवान बेटे के सामने कोई मां ऐसी नंगी होती है क्या?” मैं लरजती आवाज में बोली।
“फिर वही मां बेटा। हां, हूँ मैं आपका बेटा, तो क्या हुआ? भगवान ने मुझे आपका बेटा बनाया है तो इसमें हमारी क्या गलती है। मेरे मन में आपके लिए चाहत भी तो उसी ने पैदा किया है। शायद मेरी सूरत या शरीर में वह आकर्षण नहीं है जिस कारण आपके मन में मेरे लिए वह चाहत नहीं पैदा हो सकी और बार बार आप मां बेटे वाले रिश्ते की दुहाई दे कर मुझसे दूर रहने की कोशिश करती रहती हो।” उसकी आवाज में फिर वही मायूसी छा गई।
“छि: पगले, कैसी कैसी बातें करते हो? तुझे भगवान ने इतना नादान क्यों बनाया है रे पागल? तुझसे मैं दूर क्यों रहना चाहूंगी भला? तुझ जैसा इतना खूबसूरत मर्द मेरे लिए एक कीमती तोहफा है मेरी जान। चल, अपने दिल से यह ख्याल निकाल दे कि मैं तुझे पसंद नहीं करती। तेरे जैसे लड़के पर तो हजारों लड़कियां मर मिटने को तैयार होंगी, फिर मैं भला अपवाद कैसे रह सकती हूं? चल जिसमें तेरी खुशी है वही करूंगी।” मैं उसके चेहरे पर मायूसी देख कर अपने आप को कोसने लगी, “कैसी औरत है तू? न जाने किन किन तरह के मर्दों के बिस्तर गरम करती रही और अब अपने ही बेटे के सामने शराफत का नाटक करके उसे दुखी कर रही हो। लानत है तुझ पर।” अब सारी शर्मोहया छोड़ कर मैं उसके होंठों को चूमते हुए बोली, “चल तू ही उतार दे मेरी नाईटी और जो तू चाहता है वही कर मेरे ब्वॉयफ्रेंड, लेकिन यह सच्चाई है कि तू मेरा बेटा है, जिसे हम चाह कर भी बदल नहीं सकते, इसलिए चाहे हमारे बीच में ब्वॉयफ्रेंड और गर्लफ्रैंड वाला रिश्ता स्थापित हो, समाज के सामने हम मां बेटे ही रहेंगे, इस बात को कभी मत भूलना। चल अब तू मायूस न हो, आ जा माई लवर, मुझे प्यार कर, जैसा तू चाहता है, मैं भी तेरी दिवानी हूं मेरी जान।” मैं उसके चेहरे पर चुंबनों की झड़ी लगा बैठी। “ओह माई लव, आई लव यू टू मच।”
“उफ मेरी रानी, ये हुई न बात।” कहकर देखते ही देखते मेरी नाईटी पर बड़ी बेसब्री से टूट पड़ा।
“अरे धीरे रे पागल। मेरी नाईटी फाड़ डालोगे क्या?”
“ठीक है मेरी जान। दरअसल मैं आपके नंगे जिस्म की खूबसूरती का दीदार करने के लिए मरा जा रहा हूँ।” बड़े प्यार से मेरी नाईटी को उतारा और कुछ पलों के लिए सर से पांव तक मेरे जिस्म को निहारता रह गया। मेरे धीरज की परीक्षा थी यह।
“कहाँ खो गए मेरे रसिया?” मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था।
“आह, गजब की खूबसूरत हो माई स्वीटी,” जैसे वह नींद से जागा। उसके बाद तो वह मानो पागल ही हो गया। मेरे सारे शरीर को चेहरे से चूमना शुरू किया और आंखों, होठों, गालों, गले से होते हुए ओह, मेरे उन्नत उरोजों तक पहुंचा। मैं उत्तेजना के मारे बेहाल होने लगी। “ओ मेरी जान, मैं आपका ब्रा खोल कर आपके नंगे ब्रेस्ट्स, (चूचियों) सीने के उभारों को भी महसूस करना चाहता हूं” वह बोला।
“अरे तो खोल न पगले। मैं सारी की सारी तुम्हारी हूँ। पूछ मत, जो करना है कर मेरे राजा।” मैं कंपकंपाती हुई बोली। उसने पल भर में मेरे सीने के उभारों को बंधन मुक्त कर दिया। ओह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ। उसकी नजरों में मैंने ऐसी चमक पहले कभी नहीं देखी थी। अपने बेटे की आंखों में पुरुषों की तरह नारी देह की भूखी स्वभाविक चमक।
“वाऊ मॉम, आपके ब्रेस्ट्स (सीने के उभार) इतने बड़े और खूबसूरत हैं। इतने छोटे ब्रा में किस तरह संभालती हो इन बड़े बड़े………” उसे शब्द नहीं मिल रहे थे। “चूचियों को” मैंने वाक्य पूरा किया। “हां हां चूचियों को” वह दुहराया और अपनी उगलियों से हौले से छुआ। उसके स्पर्श ने मेरी वासना की आग में घी का काम किया। “आ्ह्ह्आआ मेरे राज्ज्ज्ज्जा” मेरे मुख से आह निकल पड़ी। मेरे उत्तेजना से लाल चेहरे के देखा उसने और पता नहीं क्या सोचा होगा। अब उसने मेरी नग्न चूचियों पर बड़े प्यार से हाथ फिराने लगा। मेरे सख्त हो चुके चुचुकों को उंगलियों से पकड़ा, फिर अपने होंठों का चुम्बन उन पर अंकित कर दिया। “ओ्ओ्ओ्ओ्ओ्ह्ह्ह्ह्ह भगवान,” मैं थर्रा उठी।
“क्या हुआ मेरी रानी?” उसकी आवाज में उत्तेजना का पुट था।
“पूछो मत डार्लिंग, करते जाओ जो कर रहे हो, इस्स्स्स्स अच्छा लग रहा है।” मैं अपन सांसों को संभालती हुई बोली। अब उसकी हरकतें बढ़ती जा रही थीं। अपनी हथेलियों में मेरी चूचियों को भर के दबाने लगा, मसलने लगा। मैं कामुकता के अथाह सागर में गोते खाने लगी। सिसकारियां निकलने लगीं मेरे मुख से। अब वह मेरी चूचियों को बारी बारी से मुह में भर कर चूसने लगा। “आह ओह चूस मेरे बेटे, बचपन की सारी कसर निकाल ले डार्लिंग।” मैं बोलती जा रही थी।
इधर उसका हाथ मेरे सपाट पेट पर खेल रहा था। उसने धीरे धीरे अपना हाथ मेरी नाभी से नीचे खिसकाना शुरू किया। ओ मां, जैसे जैसे उसका हाथ मेरी योनि की ओर पहुंच रहा था, मेरी सांसें धौंकनी की तरह चलने लगी थीं। अंततः उसके दाहिने हथेली का स्पर्श पैंटी के ऊपर से ही मेरी योनी पर हुआ। सारा शरीर गनगना उठा, “ऊ्ऊ्ऊ्ई्ई्ई्ई… मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ,” मेरे अपने बेटे के हाथ का स्पर्श मेरी योनी पर! “उफ्फ भगवान” मेरे शरीर के अंदर मेरी धमनियों में रक्त का संचार उफान पर था। धधकने लगी मेरी कामाग्नि। झुलसने लगी मैं उस धधकती कामाग्नि में। मेरी योनि के अंदर से लसलसा द्रव्य निकलने लगा जिसके कारण मेरी पैंटी गीली होने लगी। ज्यों ही क्षितिज को मेरी पैंटी के गीलेपन का अहसास हुआ, वह बोल उठा, “यह क्या मॉम, आपकी पैंटी तो गीली हो गई है। इसे भी उतार दीजिए।” उसकी आंखों में एक मैं जो कुछ देख रही थी उसमें एक जिज्ञासा थी और उसकी आवाज में उत्तेजना की झलक।
“छि: छि: गंदे। यह क्या कह दिया? वहां कहाँ हाथ लगा रहा है? उफ्फ मेरे बच्चे, यह क्या कर रहे हो? हाय राम, लाज से मर जाऊंगी मैं।” मेरी आवाज में कोई विरोध नहीं था और न ही मेरा कोई प्रयास। मेरी बातों से फिर मेरे बच्चे के मन में कोई मायूसी न आए यह सोच कर तुरंत बोली, “तू उतारे बिना थोड़ी न मानेगा? चल खुद ही उतार दे, कर दे अपनी मां को नंगी और जी भर के अपनी मां के नंगे जिस्म का दीदार कर। उफ्फ मेरे प्यारे ब्वॉयफ्रेंड, मेरे बेटे, मेरे बच्चे, देख ले अपनी गर्लफ्रैंड का मादरजात नंगा बदन, जी भर के महसूस कर, प्यार कर, जो मर्जी वह कर माई डार्लिंग।” मैं उत्तेजना के आवेग में बोलने लगी। मुझसे अब रहा नहीं जा रहा था। जो होना है हो ही जाय भगवान।
“लो मेरी जानेमन मॉम, उतार दिया आपकी पैंटी। आह, यह क्या मॉम, आपकी चिकनी मुत्तू…..,” आगे शायद उसे शब्द नहीं मिल रहा था, तनिक रुका,
“आह्हह मेरे नादान बलम, मुत्तू नहीं रे शैतान, योनि बोल, चूत बोल, बुर बोल, मुनिया बोल” तुरंत मैं बोल पड़ी।
“हां हां आपकी चिकनी मुनिया कितनी खूबसूरत है मॉम, लेकिन यह लसलसा सा रस क्यों निकल रहा है?” वह मेरी चमचमाती फूली हुई योनि को अचंभे से देखते हुए बोला।
“अब मैं तुझे क्या बताऊँ मेरे बच्चे? अभी तू कैसा महसूस कर रहा है ये बता?”
“उफ्फ डियर, अजीब सा फील कर रहा हूँ। ऐसी फीलिंग पहली बार हो रही है। ऐसा लग रहा है आपसे कस के लिपट जाऊं। आपके जिस्म में समा जाऊं। मेरा मुत्तू…..” फिर रुका वह,
मैं समझ गई वह अपने लिंग को मुत्तू कह रहा है, “मुत्तू नहीं रे बुद्धू रसिया, लिंग बोल, लंड बोल, लौड़ा बोल, पपलू बोल” तुरंत मैं बोल पड़ी।
“हां हां वही, मेरा पपलू हार्ड हो गया है, उफ्फ मेरी जादूगरनी मॉम, क्या हो रहा है मेरे साथ?” वह उत्तेजना के आवेग में बोला।
“बस बस मेरे बच्चे, यही हाल मेरा भी हो रहा है इसीलिए मेरी मुनिया से यह पानी निकल रहा है, आह मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ” मैं बमुश्किल बोल पा रही थी। अब मैं पूरी तरह नंगी हो चुकी थी। अबतक मैं अपनी ओर से कोई पहल नहीं कर रही थी, जो भी कर रहा था वह मेरा नादान बेटा कर रहा था, किंतु अब मैं भी धीरे धीरे उसके सीने को सहलाने लगी।
“हाय मेरे बेटे, धीरे धीरे अपनी गर्लफ्रैंड को तो नंगी कर दिया और मेरे बदन को देख लिया, अब अपने कपड़े उतार कर अपनी गर्लफ्रैंड को भी अपने खूबसूरत बदन का दर्शन करा दे पगले। कब से मरी जा रही हूँ अपने ब्वॉयफ्रेंड के नंगे जिस्म को देखने के लिए।” मैं बदहवासी के आलम में बोली।
“ओके मॉम, लो, आप भी देख लो अपने ब्वॉयफ्रेंड का जिस्म” कहते न कहते पलक झपकते खड़ा हो गया और मुक्त हो गया अपने कपड़ों से। उफ्फ भगवान, इतना खूबसूरत जिस्म दिया था भगवान ने उसे। बिल्कुल कामदेव का अवतार लग रहा था। गठा हुआ शरीर, चौड़ा चकला सीना, सीने पर हल्के रोयें, मांसल मांसपेशियों वाली भुजाएँ और और ओ मेरी मां, उसका उफान मारता फनफनाता करीब आठ इंच लंबा और उसी के अनुपात में मोटा, बेहद सुंदर चिकना लिंग, अपलक देखती रह गयी मैं।
“हाय राम, इतने खूबसूरत हो मेरे बच्चे। आ जा अपनी गर्लफ्रैंड को अपनी बांहें में ले ले।” मैं अपने बांहें खोल कर आमंत्रण दे बैठी। वह बेचारा, अनाड़ी, उत्तेजना का मारा, कूद कर आ गया मेरी बगल में और मुझे बांहों में ले कर दुबारा चूमना आरंभ किया। उफ्फ भगवान, मेरा नंगा जिस्म, मेरे अपने कोख जाए बेटे के नंगे जिस्म से चिपका, मेरे अंतरतम को अजीब सा सुखद अनुभव प्रदान कर रहा था। अभी भी मेरे अंदर अंतरद्वंद चल रहा था, उचित अनुचित का। भगवान मानो मेरी मन:स्थिति पर हंस रहा था। मैं मन ही मन बोल रही थी, “हंस रहे हो भगवान? यह सब कुछ तो तेरा ही किया धरा है।”
“पगली, मैंने क्या किया? जो कुछ आज तक तेरे साथ हुआ और अभी हो रहा है, उसकी जिम्मेदार तुम खुद हो।” भगवान मानो मुझ से कह रहे थे।
“लेकिन परिस्थितियां तो तूने ही पैदा की थी।”
“मैं ने मनुष्य को बुद्धि दी है। विवेक दिया है। अपना निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान की है। मुझे क्यों दोष देती हो?”
“विवेक का सवाल तो तब आता है जब मुझे अच्छे बुरे का ज्ञान हो। मेरी नादानी में एक बूढ़े द्वारा मेरा कौमार्य भंग हो रहा था उस वक्त तुम कहाँ थे? जबतक मुझे सही गलत की जानकारी होती, तबतक तो मैं वासना के दलदल में धंस चुकी थी। अब जब मेरे अंदर कामुकता की अदम्य ज्वाला धधकती रहती है, उसके लिए क्या तुम दोषी नहीं हो?”
“नहीं बिल्कुल नहीं। अभी जब तुम्हारे अंदर यह संघर्ष चल रहा है, क्या यह तुम्हारे विवेक का परिचायक नहीं है? अब इसमें अच्छाई की जीत होती है या बुराई की जीत होती है, यह तो तुम्हारी मानसिक दृढ़ता पर निर्भर करता है।”
“देखो, इस वक्त मैं बहस के मूड में नहीं हूं। हो सके तो अपने कामदेव को समझाओ, जिसने मुझे गुलाम बना रखा है। वरना मेरी हालत पर हंसो मत, न ही इस वक्त हमारे बीच दखल दो।”
“तुझे जो करना है कर कुलटा अपने बेटे के साथ, मुझे बीच में मत घसीट।”
“हां, इस वक्त वैसे भी तुम्हारे उपदेश और तर्क की मुझे कोई परवाह भी नहीं है। भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारा उपदेश।” मन ही मन बोली और सारे अंतरद्वंद को तिलांजलि दे कर कूद पड़ी कामदेव के खेल में अपने खुद के बेटे के साथ, जो अब तक मेरे शरीर को चूमते हुए सर से मेरी योनि तक पहुंच चुका था।
ज्यों ही उसके होंठों का स्पर्श मेरी योनि पर हुआ, सारा शरीर झंकृत हो उठा। तड़प उठी मैं, “उ्ऊ्ऊ्ऊ्ई्ई्ई्ई्ई…… मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ” सीत्कार निकल गई मेरे मुख से। उस अनाड़ी को तो पता भी नहीं था कि एक व्यस्क स्त्री की योनी कैसी होती है। मेरे जैसी सेक्स की आदी स्त्री की योनि के दर्शन का, जो न जाने कितने पुरुषों के विभिन्न प्रकार और नाप के लिंग का स्वाद चख कर फूल कर पावरोटी की तरह कुप्पा थी, मेरे बेटे के लिए पहला अवसर था। उसकी उत्सुक नजरों में यही अति चित्ताकर्षक लग रहा था। हालांकि उसे अभी तक सिर्फ यही पता था कि यह एक स्त्री का मूत्रमार्ग है, लेकिन प्रकृति की लीला तो देखिए, वह प्राकृतिक तौर पर ही मेरी योनि को विशेष आकर्षण का केंद्र समझ लिया था। बिना यह जाने कि रतिक्रिया में इसी की विशेष भूमिका है, वह बेहताशा चूमे जा रहा था, चाटे जा रहा था और मैं पागल हुई जा रही थी, उसके सर को सहला रही थी, अपने नितंबों को उछाल उछाल कर उसके मुंह से अपनी योनि का संगम करा रही थी। इसी दौरान उसे पता नहीं क्या हुआ, अचानक चाटते चाटते अपनी जीभ मेरी यौन गुहा के अंदर भी घुसा दिया। उफ भगवान, स्वर्ग अगर कहीं है तो यहीं है यहीं है। मेरे भगांकुर से उसकी जीभ का संपर्क मुझे जन्नत दिखा रहा था। यह सब वह अनजाने में, बिल्कुल पशुओं की तरह स्वभाविक तौर पर कर रहा था, जिसे हम पाशविक प्रवृत्ति के रूप में जानते हैं।
“आह राजा, ओह बेटा, ओह मेरे ब्वॉयफ्रेंड, उफ्फ मेरी जान, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” यह सब इतना उत्तेजक था कि कुछ ही मिनटों में मैं थरथराने लगी और खुद को संभाल नहीं सकी, उसके सर को अपनी योनि से कस कर चिपका लिया, अपनी जांघों के बीच उसके सर को कस लिया और अद्वितीय स्खलन सुख में डूबती चली गयी।
जैसे ही मेरा बदन शिथिल हुआ, मेरी दमघोंटू पकड़ से क्षितिज छूटा और लंबी लंबी सांसें लेते हुए घबराई आवाज में बोला, “क्या हुआ मॉम?”
“क्क्क्कककुच्छ नननहींईंईंई मेरे बच्चे, तेरे प्यार करने का अंदाज इतना आनंददायक था कि मैं पागल हो गई थी,” किसी प्रकार अपनी सांसों पर नियंत्रण करते हुए बोली, “चल, तूने तो मेरी मुनिया से प्यार कर लिया, अब मुझे अपने पपलू से प्यार करने दे।” मैं जानती थी कि वह बेचारा भी उत्तेजना के जिस दौर से गुजर रहा है, तत्काल अगर उसे राहत न मिले तो बेचैनी में छटपटाता रहेगा। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, मैं उसके ऊपर चढ़ गई और उस पर चुंबनों की बौछार करने लगी। उसके माथे को चूमा, उसकी आंखों को चूमा, उसके गालों को चूमा, उसके होंठों पर गरमागरम चुम्बन दिया, उसके गले से होते हुए उसके सीने को चूमने लगी। उसके सीने से नीचे बढ़ती गई और उसके पेट को चूमते हुए नीचे जाने लगी। क्षितिज की उत्तेजना अपने चरम पर थी। उसकी सांसे धौंकनी की तरह चल रही थीं।
“ओह्ह मॉम, आह डियर, नीचे जाओ मेरी जान मेरे पपलू के पास, और पास, और पास, उफ्फ” वह उत्तेजना के आवेग में मेरे सर को पकड़ लिया और सीधे अपने लिंग के पास ले गया। उसकी बेचैनी मुझसे देखी नहीं जा रही थी। उसकी हालत उत्तेजना के मारे बेहद खराब थी। उसने मेरा सर पकड़ कर ठीक अपने लिंग के पास ले आया। अब मैं ठीक उसके आठ इंच लंबे और करीब तीन इंच मोटे, बेहद खूबसूरत, चिकने लिंग के पास थी। सख्त, काले नाग की तरह फनफनाता हुआ। इस बेचारे कुंवारे बेटे के लिंग के सुपाड़े के ऊपर का चमड़ा अभी तक पलटा भी नहीं था। उसका अंडकोश ढीला नहीं हुआ था, शायद आजतक उसके अंडकोश में अब तक की सारी जमा पूंजी गाढ़े वीर्य के रूप में एकत्रित थी। क्या करूं मैं, हाथों से बाहर निकाल दूं, या अपने हलक में उतार लूं या अपनी भूखी योनि के अंदर जज्ब कर लूं। इसी उधेडबुन में थी, कि उसने मेरा सर नीचे दबा कर मेरा मुह अपन तनतनाए लिंग से सटा दिया और बेसब्री से बोला, “क्या सोच रही हो मॉम? प्यार कर मेरे पपलू को, ओह मेरी जान, कब से तड़प रहा है मेरा पपलू।” मेरी सारी दुविधा पल भर में छूमंतर हो गई। मैं समझ गई कि जिस तरह उसने मेरी नग्न देह के संपर्क में आकर अपने प्रथम कामक्रीड़ा का शुभारंभ मुखमैथुन से किया, अनाड़ीपन में ही सही, मगर मुझे अद्वितीय आनंद प्रदान किया, अब उसी के प्रतिदान का समय आ गया है, अपने बेटे को इस बेचैनी भरी पीड़ा से मुक्ति प्रदान करने का। उसे भी इस आनंद से परिचित कराने का। मैंने उसके लिंग के चमड़े से ढंके सुपाड़े पर गरमागरम चुंबन अंकित कर दिया।
“आ्ह्ह््आआह्ह्ह्, ममा, ओ्ओ्ओह्ह्ह् माई स्वीटहार्ट, यस्स्स्स्, प्यार करो ओह मेरे पपलू को।” आनंदित हो कर बोला वह। अब मैंने अपने जीभ से उसके लिंग को सुपाड़े से लेकर जड़ तक चाटना शुरू किया। लिंग के जड़ के पास पहुंच कर मैं रुकी नहीं, नीचे जा कर उसके अंडकोश को चाटने लगी। “आ्आ्आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, ऐसे ही, उफ्फ हां मेरी जान ऐसे ही” वह खुशी के मारे बोले जा रहा था। मैं उसके आनंद भरे उद्गार से उत्साहित हो कर उसके सुपाड़े को अपने होंठों के बीच ले कर चुभलाने लगी। अपनी जीभ को उसके सुपाड़े के ऊपर के चमड़े के अंदर डाल कर चलाने लगी। फिर धीरे धीरे उसके विशाल सुपाड़े को मुह में भर कर चूसना आरंभ किया। अभी मैंने चूसना आरंभ ही किया था कि क्षितिज ने उत्तेजना के आवेश में मेरे सर को कस कर पकड़ लिया और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, उसनें अपनी कमर को ऊपर की ओर उछाला और अपना पूरा आठ इंच लंबा गधे सरीखा लिंग मेरे हलक में उतार दिया। यह इतना आकस्मिक हुआ कि मैं संभल भी नहीं पाई। उसका लिंग और अधिक मोटा हो कर मेरे गले को अवरुद्ध कर दिया। उसके मुंह से आनंद भरी लंबी आह निकलने लगी।
“आ्आआ््आआ््हह्ह, ओ्ओ्ओह्ह्ह् मेरी जा्आ्आ्आ्आन, इस्स्स्स्स।” मेरे सर को इस कदर सख्ती से पकड़ रखा था कि मैं सर हिलाने या पीछे करने में भी असमर्थ हो गयी, मेरी सांसें जैसे थम गईंं, और तभी उसके लिंग से गरमागरम गाढ़े वीर्य का फौव्वारा फूट पड़ा। घुटती सांसों के बीच मैं उसके इतने सालों से जमे वीर्य का कतरा कतरा अपने हलक में उतारती चली गई। शायद यह उसके जीवन का प्रथम स्खलन था। करीब एक डेढ़ मिनट की दमघोंटू स्खलन के पश्चात जब उसकी पकड़ ढीली हुई, मैं हकबका कर उसके ढीले पड़ते लिंग को अपने मुख से निकाल कर लंबी लंबी सांसें लेने लगी। उधर वह भी अपने जीवन के प्रथम स्खलन के अनिर्वचनीय आनंद में डूब कर अपनी आंखें बंद किए लंबी लंबी सांसें ले रहा था। काफी देर से बेचारा बेचैन था इस आनंद भरे स्खलन के सुख से। इस सुखद अनुभव से अबतक वह वंचित था। मैं सर उठा कर उसके चेहरे को देख रही थी, ओह, मेरा बेटा कितना खुश दिख रहा था, पूरी तरह संतुष्ट। मुझे उस पर ढेर सारा प्यार उमड़ पड़ा और मैं उसके माथे को, गालों को होंठों को बेहताशा चूमने लगी, फिर बोली, “ओह मेरे प्यारे राजा, तुम्हारा पपलू बड़ा मस्त है रे, लेकिन बड़ा जालिम भी। मेरी तो जान ही निकाल डाली थी इसने।”
“ओह मेरी रानी मॉम, यू आर ग्रेट। पहली बार मैंने ऐसे आनंद को फील किया। मेरे पपलू को पता नहीं आपने क्या कर दिया, मेरा तो पूरा शरीर आनंद में डूब गया। सारा तनाव दूर हो गया। आपकी मुनिया, उफ मेरी जान, ऐसा महसूस हुआ जैसे स्वर्ग का द्वार हो। मन नहीं भरा। पता नहीं क्यों? कुछ तो और खास है आपकी मुनिया में जो मुझे पता नहीं है। ऐसा लग रहा है आपकी मुनिया मेंं कोई बहुमूल्य खजाना छिपा है, मगर उस खजाने को हासिल कैसे किया जाय यह मुझे पता नहीं है।” वह अनाड़ी नौजवान इस तरह अपने मनोभावों को व्यक्त कर रहा था कि मुझे उस की मासूमियत पर तरस आ रहा था। अब उसे कैसे बताऊँ मैं कि जिसे वह स्वर्ग का द्वार महसूस कर रहा है वह सचमुच में स्वर्ग का द्वार ही है। कैसे बताऊँ उसे कि मेरी योनि में क्या खजाना है? खजाना भी कैसा, अखंड, अवर्णनीय, आनंद का स्रोत।
“हाय मेरे भोले बलम, सच में तू बड़ा भोला है रे। बलिहारी जाऊं तेरे इस भोले पन पर।” मैं उसकी भोली बातें सुनकर हंस पड़ी। बड़ा प्यार उमड़ आया उसकी मासूमियत पर। उसके कामदेव स्वरूप नंगे तन से चिपक गई और उसके होठों को बेसाख्ता चूमने लगी।
मैं अब नैतिकता और अनैतिकता के बीच के द्वंद्व से पूरी तरह मुक्त हो चुकी थी। जब बात इतनी दूर तक बढ़ चुकी है तो अब और किस बात की झिझक। सिर्फ उसके कुवांरे लिंग को अपनी योनि में समाहित करना ही तो बाकी रह गया था। यौन क्रिया का असली सुख तो लिंग और योनि के मिलन में ही निहित है, अतः संसर्ग के वास्तविक सुख से इस नादान को वंचित रखने का कोई औचित्य भी नहीं था। मैं उसके नंगे जिस्म से चिपकी हुई उसके सारे अंगों पर अपने हाथ फेरती रही। यही काम क्षितिज भी अब मेरे साथ करने लगा था। वह मेरे चुंबन के प्रतिदान में मुझे अपनी मजबूत बांहों में दबोचे मेरे होंठों को चूम रहा था, मेरे गालों को चूम रहा था, मेरी गर्दन को चूम रहा था। इस वक्त मैं उसके नग्न शरीर पर चढ़ी हुई थी। उसके नंगे बदन से चिपका मेरा नंगा बदन मुझमें एक खुमारी सा भर रहा था। एक ऐसा आहसास, जिसे मैं आज तक महसूस नहीं कर पाई थी, ऐसे आहसास को महसूस कर रही थी। मैं उस पर निछावर हुई जा रही थी। मैं पुनः उत्तेजित होने लगी थी। मेरे बड़े बड़े स्तन उसके चौड़े चकले सीने से दबे हुए मुझे उकसा रहे थे कि मैं अपने बच्चे को अपनी कामुकता की भट्ठी में झोंक दूं। अपने साथ लिए दिए उसे भी वासना के सैलाब में डुबो दूं। पूरी तरह अपनी कामुक कमनीय देह को अपने बेटे को समर्पित कर दूं। उस अनजाने स्वर्गीय सुख से परिचित करा दूं जो उस अनाड़ी, नादान, सीधे सादे बच्चे के लिए बिल्कुल नया है। अपने हाथों से उसके सिर को बड़े प्यार से सहला रही थी। उसके गालों पर हाथ फिरा रही थी। यह सब करते करते करीब पांच मिनट बीत चुका था तभी मुझे आभास हुआ कि मेरी योनि के ठीक पास क्षितिज के मुरझाये हुए लिंग का स्पर्श हो रहा है जो शनैः शनैः सर उठा रहा था, सख्त हो रहा था, जाग रहा था। मैं गनगना उठी, प्रसन्न हो उठी उसके लिंग को पुनः जागता देख कर। मेरी योनि भी फड़फड़ा उठी। मेरा रोम रोम सिहर उठा। मेरे स्तन कठोर हो गये और चुचुक तन गये, शायद उनकी चुभन को क्षितिज ने भी अपने सीने पर महसूस कर लिया था। क्षितिज के हाथ खुद ब खुद मेरे सख्त हो चुके उरोजों पर अठखेलियाँ करने लगे।
“आह मॉम, मेरा पपलू फिर आपके प्यार का भूखा हो रहा है। ओह्ह मेरी जादूगरनी डार्लिंग, क्या जादू कर दिया आपने मॉम?” उसके चेहरे पर अब उत्तेजना स्पष्ट झलकने लगी थी।
“हाय मेरे राजा, जादूगरनी सिर्फ मैं नहीं हूं रे, तू भी कम बड़ा जादूगर नहीं है। देख मेरी चूचियां कैसे तन गयी हैं। देख मेरी मुनिया कैसे फड़फड़ा रही हैं, ओह मेरे नादान बेटे, जो हाल तेरे पपलू का हो रहा है वही हाल मेरी मुनिया का भी हो रहा है।” मैं जानती थी कि अब मुझे क्या करना है। जो भी मैं करने जा रही थी उसे मैं इस तरह करना चाहती थी कि क्षितिज को ऐसा आभास हो कि यह सब अपने आप हो रहा है, बिना किसी के पहल के। मैं कसमसाती हुई किसी प्रकार अपनी योनि छिद्र को अबतक पूर्ण रूप से तन चुके उसके लिंग के सुपाड़े के ऊपर स्थापित कर लिया था।
“ओह मेरी मां, यह क्या, उफ्फ, आपकी मुनिया तो लगता है मेरे पपलू को चूम रही है। आह्हह कितना अच्छा लग रहा है मैं बता नहीं सकता।” उसने उत्तेजना के आवेश में अपने हाथ का दबाव मेरे नितंबों पर बढ़ाना शुरू कर दिया। “ओह मॉम, अपनी मुनिया को मेरे पपलू से चिपकने दो, कस के चूमने दो, उफ्फफ, आने दो मेरी रानी अपनी मुनिया को।”
मैं ने अपनी ओर से सिर्फ इतना ही किया था कि मेरी योनि को उसके लिंग पर स्थापित कर दिया और नतीजा मेरे मनोनुकूल निकला। अनजाने में आवेशित क्षितिज मेरे नितंबों पर दबाव बढ़ाता जा रहा था, परिणाम स्वरूप धीरे धीरे मेरे लसलसे योनि छिद्र को फैलाता हुआ उसके लिंग का विशाल सुपाड़ा मेरी योनि में प्रवेश करने लगा। “आह्ह् मेरे बेटे, ओह यह क्या कर रहे हो, ओह मा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, उफ्फ तेरा पपलू मेरी मुनिया के अंदर घुस्स्स्स्आ्आ्आ्आ्ह्ह चला जा रहा है, ओह।”
“आह्ह्ह् मॉम, यह मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मेरे पपलू को आपकी मुनिया के इसी रास्ते की तलाश थी। ओह मॉम जाने दो मेरे पपलू को, शायद यहीं वह खजाना है जिसकी तलाश मुझे थी।” धीरे धीरे मुझे अपने बंधन में कसता जा रहा था। इसी क्रम में उसके सुपाड़े के ऊपर का चमड़ा कब पलट गया उसे पता ही नहीं चला। शायद उत्तेजना की अधिकता और आनंद के उन पलों में चमड़ा पलटने की हल्की सी पीड़ा का उसे आभास तक नहीं हुआ था। सरकता सरकता धीरे धीरे घुसता चला जा रहा था उसका कुवांरा लिंग, मुझ जैसी खेली खाई रंडी की फूल कर कुप्पा बनी फकफकाती योनि में, जो उस समय तक वासना की अग्नि में झुलस झुलस कर धधकती ज्वालामुखी का कुआं बन चुका था। फिर भी अपने खुद के बेटे के लिंग को अपनी योनि में ग्रहण करने का एक अलग ही आहसास हो रहा था। समाज की दृष्टि से अनैतिक इस दैहिक संबंध के रोमांच को महसूस करने का एक निहायत ही अलग अनुभव था यह। मैं नैतिक अनैतिक की लक्ष्मण रेखा को पार कर चुकी थी।
इस वक्त तो मैं पूरी तरह अपने बेटे के चंगुल में फंस चुकी थी, जिसकी नादानी को मैंने वासना के उस फिसलन भरे गर्त में गोता खाने के लिए ढकेल चुकी थी, जहां से निकलना उसके वश की बात नहीं थी। उसे तो मानों मुहमांगी मुराद मिल चुकी थी। शेर को खून का स्वाद मिल चुका था, वह भला अब पीछे कैसे हट सकता था। दबाता चला गया दबाता चला गया तबतक, जबतक उसका पूरा का पूरा आठ इंच का लिंग मुझ रंडी की योनि चीरता हुआ जड़ तक समा नहीं गया। “ओह्ह्ह्ह्ह्ह मा्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, कककक्य्य्आ्आ्आ्आ कर दिया मेरे बेटे, उफ्फ्फ, तेरा पपलू मेरी मुनिया को चीईईईईईर्र्ररररर दिया रे, आह।” मैं बेसाख्ता बोल पड़ी।
“आह्ह् ओह्ह, चुप शैतान, हाय रे मेरी मुनिया” मुझे बींध कर मेरा बेटा कितना खुश था। सारी लाज शरम को तिलांजलि दे कर मैं कूद पड़ने को तत्पर हो गई इस कामुक खेल में। मैंने दर्द का बनावटी दिखावा करते हुए अपनी कमर को पीछे की ओर उचकाया, लेकिन क्षितिज ने पुनः अपनी पूरी शक्ति से मेरे नितंबों को अपनी ओर खींच लिया। फिर से उसका लिंग मेरी योनि में पैबस्त हो गया। मैंने भी ठान लिया कि आज अपने बेटे को इस आनंद से पूरी तरह रूबरु करा दूंगी। मैंने सप्रयास अपनी योनि को संकुचित करके उसके विशाल लिंग को अपनी योनि से कस लिया। मेरी कसी हुई योनि में उसके लिंग के अंदर जाने और बाहर आने से घर्षण का जो आनंद उसे प्राप्त हुआ, उसका का परिणाम यह हुआ कि उसने अनजाने में ही बिना किसी मार्गदर्शन के अपने लिंग का प्रहार पहले धीरे धीरे फिर धकाधक मेरी योनि में करना शुरू कर दिया।
“आह ओह अहा मजा आ रहा है मेरी जान, उफ अबतक यह सब क्यों नहीं हुआ, आह मेरी मॉम, मेरी स्वीट मॉम, मेरी प्यारी रानी, ओह ओह अद्भुत।” वह मेरी कमर पकड़ कर ठाप पर ठाप लगाये जा रहा था और बुदबुदाता जा रहा था, मुझे चूमे जा रहा था, उत्तेजना के आवेग में मेरे गालों पर अपने दांत भी गड़ा दे रहा था।
“ओह मेरे पागल रसिया, मेरी मुनिया के दीवाने, आह्ह् ओह्ह्ह्ह्ह्ह मार ही डालोगे क्या अपनी रानी को, उफ्फ्फ जालिम, इतनी खुशी से कहीं मर ही न जाऊं, ओह मेरे बच्चे, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी जान,” मैं उसकी मजबूत बांहों में बंधी अपनी कमर उचकाती हुई उसके ठाप का जवाब ठाप से देने लगी थी। ओह अपने बेटे से पहली बार चुदने के वे रोमांचक अविस्मरणीय पल, अखंड आनंद, उफ्फ्फ, सच में कहीं मैं पागल न हो जाऊं। मेरा रोम रोम तरंगित हो उठा।
“ओह मेरी जान, हम जो कर रहे हैं यह क्या है मॉम?” हांफते हुए वह बोला।
“संभोग है मेरे बच्चे, यह संभोग है। चुदाई है, चुदाई मेरे प्यारे नादान चुदक्कड़। जैसे ही तूने अपने पपलू, अपने लंड को मेरी मुनिया में डाला, मेरी चूत में डाला, तू बन गया मेरा चुदक्कड़।” मैं हांफते हुए उत्तेजित स्वर में बोली। वह मेरी बातें सुनकर पल भर रुका, जो मुझे बेहद नागवार गुजरा, तुरंत बोली, “चोद मेरे बच्चे चोद, अपनी मम्मी को चोद, जम के चोद, निकाल ले अपनी कसर, आह मेरे रज्ज्ज्ज्ज्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह, बना ले मुझे पूरी तरह अपनी गर्लफ्रैंड, बना ले मुझे अपनी रंडी,” अब मैं अपनी असली औकात में आ रही थी।
“हां मेरी रानी, चोद रहा हूँ, आपको आज पूरी तरह मेरी गर्लफ्रैंड बना लूंगा, रानी बना लूंगा, रंडी बना लूंगा, ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरी जान,” बोलता जा रहा था और चोदता जा रहा था। पूरी ताकत से ठोके जा रहा था। बहुत जल्दी सीख रहा था मेरा बेटा, आखिर रंडी मां की औलाद जो ठहरा। इतनी अधिक उत्तेजित थी कि मैं दस मिनट में ही मैं छरछरा कर झड़ने लगी, “आ्आआ््आआह्ह्ह्ह,”। मैं छिपकली की तरह उसके शरीर से चिपक कर थरथराने लगी।
“क्या हुआ मॉम?” वह हांफता हुआ बोला।
“कुछ नहीं रे, बहुत सुख दे रहे हो अपनी मां को बेटे, बर्दाश्त नहीं हो रहा है, तू चोदता रह।” किसी तरह अपनी सांसों पर काबू पाकर बोली।
मेरी बातों से आश्वस्त हो कर अपनी सुविधा के अनुसार अब उसने मुझे नीचे कर दिया था और मेरे ऊपर चढ़ गया था। मैं दुबारा उत्तेजित हो उठी। मैं भी साली छिना्आ्आ्आ्आल, बिछी जा रही थी अपने बेटे के नीचे, अपनी टांगों को फैला कर उसकी कमर में लपेटे मगन हो चुदी जा रही थी। बेड रूम में फच फच चट चट की आवाज गूंज रही थी और साथ ही हमारी सम्मिलित कामुकतापूर्ण “आह उह इस्स्स्स्स उस्स ओह्ह्ह्ह्ह्ह,” आहें और सिसकियां। बीस मिनट तक हम मां बेटे का यह कामुकतापूर्ण आनंददायक, घिनौना खेल चलता रहा। गुत्थमगुत्था होते रहे, एक दूसरे के शरीर में समा जाने की जद्दोजहद करते रहे। अंततः, उसके शरीर में तनाव आने लगा, ठोकने की रफ्तार तूफानी हो गई और तभी, उसने मुझे इतनी जोर से जकड़ लिया कि मेरी पसलियां कड़कड़ा उठीं। उसका लिंग मेरी योनि के अंदर और भी विशाल आकार लेने लगा और तब ऐसा लगा मानो गरमागरम लावा मेरी योनि में फच्च फच भरता जा रहा हो। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह मेरी जा्आ्आ्आ्आन,” कहता हुआ उसका शरीर शिथिल होने लगा। तभी मैं भी झड़ने लगी, “ओह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे राजा, मेरे चोदू बेटे, आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह, मैं गई रे्ए्ए्ए्ए्ए्ए,” कहते हुए उसके शिथिल पड़ते शरीर से चिपक कर लंबी लंबी सांसें लेने लगी। हम दोनों ऐसे हांफ रहे थे मानो बड़ी लंबी दूरी की दौड़ पूरी करके मंजिल तक पहुंंचे हों। उसके चेहरे पर पूर्ण संतुष्टि और प्रसन्नता देख कर मैं निहाल हो गई। हम एक दूसरे की बांहों में समाये दूसरी ही दुनिया में पहुंच चुके थे।
“ओह माई स्वीट मॉम, आई लव यू,” कहते हुए मुझे बड़े प्यार से चूम लिया उसने।
“आई लव यू टू मेरे चोदू डियर। कैसा लगा?”
“बहुत ही अच्छा। बता नहीं सकता। आज तक मुझे इस सुख से वंचित कैसे रखा आपने, बताओ न मॉम।”
“देख बेटे, मां बेटे के बीच के ऐसे शारीरक संबंध को समाज अपराध के रुप में देखता है, इसलिए मैं डरती थी। वैसे भी मैंने कभी सोचा नहीं था कि हमारे बीच ऐसा कभी होगा। मैंने आज तक तुझे सिर्फ एक बेटे के रूप में देखा था।”
“तो अब किस तरह देख रही हो मॉम?”
“हट बदमाश, मारूंगी हां। अब तो तू न सिर्फ मेरा ब्वॉयफ्रेंड रह गया है, बल्कि मेरे तन मन का मालिक भी बन गया है। मालूम है तुझे कि जब एक बेटा अपनी मां के साथ संभोग करता है तो उसे क्या कहते हैं?”
“नहीं मालूम।”
“तो सुन, उसे कहते हैं मदर फकर, याने मादरचोद।” कहकर मैं खुद शरमा गई और उसके सीने पर चेहरा छुपा लिया।
“ओह मेरी जान, अपने प्यारे मादरचोद से शरमा गई? हाय, तेरी इस अदा पर तो फिदा हूं मॉम डियर।” मुझे अपनी बांहों में समेट कर बोला। उस रात क्षितिज को जो चुदाई का चस्का लगा, रात भर न खुद सोया न मुझे सोने दिया। जवान हट्ठा कट्ठा लड़का था, रात भर में पांच बार चोदा मुझे। चोद चोद कर मेरी हालत खराब कर दी उसने। मेरे गालों पर, गर्दन पर, चूचियों पर उसके दांतों के लाल लाल निशान उभर आए थे। चूचियों को दबाया, चूसा, काटा। चूत को चूसा, चाटा, चोदा, फुला दिया। मैं भी रंडी की तरह आनंद मगन खुल कर चुदती रही। सवेरे तक छोड़ ही नहीं रहा था मुझे। पूरी तरह आसक्त हो गया था मुझ पर। साय बजे सवेरे मुझे होश आया कि सात बज गये हैं। जबरदस्ती किसी प्रकार मना बुझा कर उठी मैं।
हाय राम, अभी इस वक्त क्षितिज मेरे कमरे से निकलेगा और हरिया या करीम में से किसी ने देख लिया तो क्या सोचेंगे? मेरी शरीर की हालत खुद रात भर के नोच खसोट की चुगली कर रही थी। मैं किसी तरह उठी, कपड़े पहन कर दरवाजे के बाहर झांका और रास्ता साफ देखकर क्षितिज को जबरदस्ती कमरे से बाहर धकेलते हुए बोली, “भाग यहाँ से जल्दी, वरना किसी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा।”
क्षितिज अपने कपड़े पहन चुका था, लेकिन उसकी लाल लाल आंखें रात भर के जागरण और काली करतूतों की चुगली कर रही थीं। “ठीक है मॉम, अभी तो जाता हूँ, लेकिन आज रात फिर आऊंगा।” कहते हुए मुझे बांहों में ले कर चूम लिया।
अब जो हो गया सो हो गया, जो भी हुआ मेरी नजर में कुछ खास बुरा भी नहीं हुआ, सब कुछ बड़ा ही आनंददायक था। अपने जवान बेटे के नंगे तन से अपनी नंगी देह का संपर्क होने देना, खुद की नग्न देह को अपने जवान बेटे के नंगे जिस्म के सम्मुख परोस देना और उसे अपने यौनांगों से खेलने देना, उसे अपनी प्यासी यौन गुहा में गोते लगाने देना, सब कुछ कितना रोमांचक था, कितना अभूतपूर्व था, कितना अनिर्वचनीय था, यह कोई मुझ जैसी वासना के दलदल में धंसी बेहया छिनाल मर्दखोर से पूछे, जो अपनी अदम्य कामपिपासा के वशीभूत न जाने अबतक कितने मर्दों के बिस्तर गरम कर चुकी थी। सच में, यह बताने की नहीं बल्कि खुद से करके महसूस करने की, अनुभव करने की चीज है जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। अब आगे मुझे इस रिश्ते के कारण आने वाली दुश्चिंताओं के झंझावत से मुक्त होने का मार्ग तलाश करना था। पहली और प्रमुख दुश्चिंता यह थी कि जिस पागलपन की हद तक क्षितिज मुझ पर आसक्त था, कहीं यह उसकी पढ़ाई और उसके कैरियर बनाने के मार्ग में रोड़ा न बन जाए। दूसरी दुश्चिंता यह थी कि हमारे इस रिश्ते की भनक किसी और को कहीं लग न जाए। अगर हरिया, करीम जैसे घर के लोगों को पता चल भी जाए तो मुझे कोई खास परेशानी नहीं थी, किंतु यदि किसी बाहरी व्यक्ति को हम मां बेटे के इस (तथाकथित) अनैतिक रिश्ते के बारे में पता चल गया तो “तथाकथित सभ्य समाज” में जिस छीछालेदरी का सामना करना पड़ेगा उसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी। सर उठा कर जीना दुश्वार हो जाता हमारा।
“क्या हुआ बेटी? (मुझे बेटी ही कहते थे क्षितिज के सामने हरिया और करीम) तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है क्या?” मेरी थकान से शिथिल शरीर, बुझी बुझी सूरत और अनिद्रा के कारण लाल लाल आंखें देख कर नाश्ते की टेबल पर हरिया ने टोका।
“कुछ नहीं चाचा जी (मैं भी उन्हें चाचा ही कहती थी उनको, भले ही मुझ नादान बाला के कमसिन तन को भोग भोग कर, खींच तान कर असमय ही छिनाल औरतों की श्रेणी में ला खड़ा कर दिया था हवस के इन पुजारियों ने), बस यूं ही, रात को ठीक से नींद नहीं आई थी ना, इसलिए।” मैं ने जवाब दिया।
“ओके मॉम, नाश्ता करके आप कुछ देर सो लीजिए, फिर हम आज शॉपिंग के लिए चलेंगे, फिर आईलेक्स में मूवी देख कर आएंगे।” अबतक सर झुकाए चुपचाप नाश्ता करता हुआ क्षितिज बोला।
अतः उसके कमरे के दरवाजे पर पहुंच कर आवाज दी, “क्षितु बेटा, जरा सुनो तो।”
“क्या हुआ मॉम?” जब वह दरवाजा खोला तो रात भर के जागरण के कारण उसकी आंखें लाल और नींद से बोझिल थीं। “अंदर आओ न मॉम”
“अरे मेरी जान अंदर तो आईए।” कहते हुए मुझे कमर से पकड़ कर अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया। वही रात वाली प्यास दृष्टिगोचर हो रही थी उसकी आंखों में।
“अरे क्या करते हो? छोड़ो मुझे शैतान।” घबराहट में छटपटाते हुए बोली।
“छोड़ दूंगा मॉम, छोड़ दूंगा, पहले एक पप्पी तो ले लूं।” कहते कहते मुझे संभलने का मौका दिए बिना अपनी मजबूत बांहों में कस कर जकड़ लिया और अपने होंठों को मेरे होठों से चिपका दिया। यह एक गरमागरम चुंबन था जो मेरे अंदर की वासनामयी नागिन को जगाने के लिए काफी था। मेरे अंदर की कामुकता भरी ज्वालामुखी का लावा खौल उठा। मैं उसकी बांहों में कसी तड़प उठी। करीब एक मिनट के लंबे चुंबन के बाद जब उसने मुझे छोड़ा तो मेरी हालत बद से बदतर हो चुकी थी। सांसें मेरी धौंकनी की तरह चल रही थीं। उरोज मेरे तन चुके थे। योनि मेरी फड़फड़ा कर पानी छोड़ने लग गई थी। एक ऐसी मछली की तरह हो गयी थी मेरी हालत जिसे पानी से निकाल कर सूखे पर रख दिया गया हो।
“बदमाश, यह क्या कर दिया रे, ओह मेरे रसिया?” कहकर मैं अपनी सारी निद्रा और थकान भूल कर दुबारा उसके बदन से चिपक गई और अपनी बांहों में भर कर उसके होंठों को बेहताशा चूमने लग गयी। भड़क उठी थी मेरी कामुक शैतानी भावनाएं। कैसे अपनी भावनाओं पर काबू रख सकती थी भला। हो सकता है उसने बिना कुछ सोचे समझे अपने स्वभाविक लगाव का प्रदर्शन किया हो लेकिन मेरी प्रतिक्रिया अस्वभाविक तौर पर कुछ अधिक ही आक्रामक थी, खुद को रोक सकने में नि:शक्त, असमर्थ। इतना काफी था उस नये नये स्त्री संसर्ग का स्वाद चखे हुए नवयुवक के लिए। पिल ही तो पड़ा वह पागल मुझ पर।
“उफ्फ्फ मेरी प्यारी मुनिया की मालकिन मॉम, पपलू मेरा गोता लगाने को बेताब हो गया है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह माई स्वीटी।” फिर कहां रुक सकता था वह पागल रसिया। मेरी प्रतिक्रिया, जो एक प्रकार से मेरे समर्पण का संकेत था, जिसे समझने में उसने पल भर भी देर नहीं की, मुझे सीधे उठा कर बिस्तर पर पटक दिया और आनन फानन मेरे कपड़ों से मुझे मुक्त कर दिया।
“ओह मेरे राजा, पागल रसिया, मेरे अनाड़ी बेटे, मुझे भी पागली बना दिया शैतान, अब देख क्या रहा है, आ भी जा अपनी मां के तन में डुबकी लगा ले, देख मेरी मुनिया को तेरे पपलू के लिए कैसे फकफका दिया है तूने मेरे कामदेव।” अपनी बांहें फैला कर अपनी नग्न देह को परोस देने को तत्पर हो गयी। छिनाल तो थी ही एक नंबर की, नि:संकोच, पूर्ण निर्लज्जता के साथ, पूर्ण समर्पिता बनी पसर गयी थी।
“आया जानेमन, आया।” वह भी बिना एक पल गंवाए पूरी तरह नंगा हो गया और कूद कर मेरी नग्न देह पर छा गया। बेकरारी से मेरे उरोजों को चूसने लगा, मसलने लगा, उससे मन नहीं भरा तो सीधे 69 पोजीशन में आ गया और मेरी योनि को पागलों की तरह चाटने लगा।
“उफ्फ्फ राजा बेटा, मेरा चोदू बेटा, ओह मादरचोद बबुआ,” मेरे मुख से बेसाख्ता निकलने लगा, इतने उत्तेजक आनंदमय लम्हे थे वे। उसका शरीर जिस स्थिति में था उस स्थिति में जहां उसका मुंह मेरी योनि पर चिपका हुआ था, वहीं उसका निहायत ही खूबसूरत लिंग अपने पूरे जलाल के साथ मेरे मुख के पास चिकने सिंगापुरी केले की तरह झूल रहा था। मैं बेगैरत, बेशरम छिनाल, मां बेटे के पावन रिश्ते को शर्मसार करती हुई, निर्लज्जता की पराकाष्ठा को पार करती हुई, बेहयाई पर उतर आई और बदहवासी के आलम में गपागप उसके तनतनाए पपलू को मुंह में ले कर चूसने में मशगूल हो गयी। कुछ देर इसी तरह चूसने चाटने का दौर चलता रहा। आह्ह्ह्, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, स्वर्गीय सुख की अनुभूति हो रही थी। वासना का तूफान सर चढ़ कर बोल रहा था। विहंसता शैतान अपनी विजय पर इठला रहा था और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले फरिश्ते शर्म के मारे सर छुपाने के लिए स्थान तलाश कर रहे थे।
“ओह मेरे मादरचोद बेटे, अब और नहीं, अब चोद भी डाल कमीने अपनी मां की चूत।” उत्तेजना के आवेग में मैं पूरी तरह रंडी बनी हांफती कांपती बोल उठी।
“हां मेरी चूतमरानी मॉम, अब ये ले मेरा पपलू अपनी मुनिया के अंदर,” उसने पैंतरा बदल कर आव देखा न ताव, ठूंस दिया भक्क से पूरा का पूरा लंड मेरी चूत में और मेरे नितंबों को कस के दबोच कर किसी स्वचालित यंत्र की तरह भच्च भचाभच चोदने में मशगूल हो गया। “आह, ओह मेरी प्यारी मॉम, माई स्वीट मॉम, चूतमरानी मॉम, मस्त मॉम, आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह, स्वर्ग का सुख है मेरी बुरचोदी मॉम आपकी मुनिया में”, कहते हुए चोदे जा रहा था मुझे, भंभोड़े जा रहा था मुझे, निचोड़े जा रहा था मुझे, और मैं कमीनी कुतिया, उसके शरीर से चिपटी, अपनी टांगों को उठाए कमर उछाले जा रही थी, गुत्थमगुत्था हुई जा रही थी, अपने बेटे को पूरी तरह अपने अंदर समा लेने की जद्दोजहद कर रही थी। सारी शर्मोहया को तो पहले ही त्याग चुकी थी, वो तो जैसे घुस कर अंतर्ध्यान हो गई थी मेरी कामुक देह की वासना से धधकती चूत में। मेरा नादान बेटा, नैतिकता अनैतिकता के ज्ञान से मरहूम, सीख गया था, कर गया था, कर रहा था, ऐसा गंदा काम, जिसे हमारा सभ्य समाज घृणा की दृष्टि से देखता है। व्याह पूर्व नारी देह से संसर्ग की कला और नारी देह भी किसकी? अपने खुद की मां की और मैं कुलटा, उसे अपनी कामुकता की भट्ठी में झोंकती मुदित हो रही थी।
“ओह राजा, ओह्ह्ह्ह्ह्ह बेटा, हां हां हां हां, चोद अपनी मां को मादरचोद, चोद अपनी गर्लफ्रैंड को चोदू डियर, जी भर के प्यार कर, खेल मेरे अंग अंग से मां के लौड़े।” मैं असहनीय उत्तेजना में तड़फड़ाती, बड़बड़ाती जा रही थी, पूरी बेहयाई पर उतर आई थी मैं। ऐसा भीषण तूफान उठा था वासना का कि हम एक दूसरे से लिपटे चिपटे कमर चलाते इधर उधर लुढ़क रहे थे। कभी वह ऊपर कभी मैं ऊपर।
करीब आधे घंटे की कमरतोड़ चुदाई के पश्चात स्खलन का उस बेहद सुखद, स्वर्गीय अहसास से दो चार होते हुए हम एक दूसरे से चिपके निढाल हो गये। “आह्ह्ह् मेरी प्यारी मॉम, जन्नत है जन्नत तेरे बदन में, उफ्फ्फ मेरी स्वर्ग की अप्सरा, भगवान करे इसी तरह लिपटे रहूं, चिपटे रहूं, तुझ में समाया रहूं।” वह अनंत सुख में डूबे आंखें बंद किए बोला।
“हां मेरे बच्चे, मेरी हालत भी कुछ ऐसी ही है। हम एक दूसरे की बांहों में समाए रहें, सदा सदा के लिए। खेलते रहें एक दूसरे के तन से। लेकिन इसके साथ साथ कई और भी बातें ऐसी हैं जिसका हमें निर्वाह करना है मेरे बच्चे, जैसे दिखावे के लिए ही सही, समाज की नजरों में हमारे मां बेटे के संबंध का निर्वाह, हमारी जीविका के लिए मेरा कार्य, जैसे तुम्हारी पढ़ाई और अपने स्वर्णिम भावी कैरियर की तैयारी। इन सब चीजों का भी उतना ही ख्याल रखना है मेरे बच्चे।” मैं बड़े लाड़ से उसके सीने पर सर रख कर बोली।
“ओके मॉम डन। ऐसा ही होगा मेरी जान। तुम देखोगी कि तुम्हारे प्यार में पागल यह बंदा न तुम्हारे ऊपर, न ही अपने ऊपर किसी को उंगली उठाने का मौका देगा। बस तू अपना प्यार इसी तरह मुझ पर लुटाती रह। आप टेंशन न लो मॉम, मैं अपने जीवन में सफलता का झंडा गाड़ दूंगा, फिलहाल तो एक बार और मुझे अपनी मुनिया में डंडा गाड़ने दे। देख कैसे खड़ा होकर तेरी मुनिया को सलाम कर रहा है, साला मानता ही नहीं मादरचोद।” अपने टनटनाए लिंग को दिखाते हुए वह बोला।
उसकी बातों में आत्मविश्वास का पुट देख मन प्रसन्न हो उठा। मुदित मन से बोली, “गुड ब्वॉय। खुश कर दिया तूने। इसी बात पर एक और चुदाई तो बनती है। चोद ले मेरे बच्चे अपनी मम्मी को, आजा मेरे तन मन के रसिया, मेरे प्यारे मादरचोद बेटे।”
बस मेरे कहने की देर थी कि एक और चुदाई का दौर चालू हो गया, गचागच, फचाफच, चपाचप, ओह्ह्ह्ह्ह्ह अंतहीन आधे घंटे की घमासान चुदाई। फिर नुची चुदी, थकान से लस्त पस्त, अस्त व्यस्त, मैं हांफती कांपती, किसी प्रकार खुद को संभालते, थरथराते कदमों से अपने कमरे में आकर पसर गई। पता नहीं दोपहर के खाने के लिए उठुंगी भी या नहीं, फिर शाम को शॉपिंग भी तो करनी है, यही सोचती हुई कब मेरी आंख लग गई पता ही नहीं चला।
रात भर हमारे बीच वासना का जो नंगा नाच हुआ, उसकी खुमारी अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि दिन के उजाले में भी क्षितिज के कमरे में हमने फिर उसी कुकृत्य को दुहराया। काफी देर तक मेरे दरवाजे को भड़भड़ाने से मेरी निद्रा भंग हुई। मैंने देखा एक बज रहा था। हड़बड़ा कर उठी और दरवाजा खोला तो दरवाजे पर चिंतित मुद्रा में हरिया को पाया। “तबीयत कैसी है तुम्हारी अब?”
“फिर ठीक है, आ जाओ खाने की मेज पर, खाना तैयार है”
“ठीक है, आती हूं”, कहकर मैं खाने की मेज पर आ गई। अभी तक थकान पूरी तरह उतरी नहीं थी, किंतु मैं सामान्य होने की कोशिश कर रही थी। जब मैं डाईनिंग हॉल में पहुंची तो देखा, क्षितिज पहले से वहां मौजूद था।
“कैसी है तबीयत मॉम?” अपनी मुस्कुराहट छिपाते हुए पूछा क्षितिज।
“ठीक हूं अब” संक्षिप्त सा उत्तर था मेरा। बनावटी रोष के साथ मैं घूर कर उसे देखी। मन ही मन बोल रही थी, “साले मादरचोद, चोद चोद कर बेहाल कर दिया, अब पूछ रहे हो कैसी हो, मां के लौड़े।” जल्दी जल्दी खाना खा कर उठते हुए बोली, “खाना खा कर थोड़ा आराम कर ले, फिर शाम को शॉपिंग चलना है ना।”
“ठीक है मॉम” कहकर वह खाना खाने लगा। मैं डाईनिंग टेबल से अपने कमरे की ओर जाने लगी तो ऐसा लग रहा था कि क्षितिज की नजरें मुझ पर ही टिकी हों। पलट कर देखी तो पाया कि वह मुझे ही घूरे जा रहा था, उसकी भेदती नजरों से ऐसा लग रहा था मानो मेरे शरीर पर अभी भी कोई वस्त्र नहीं हों। लरज कर रह गई मैं। कमीना कहीं का। अपने कमरे में आ कर धम्म से बिस्तर पर गिरी और नींद के आगोश में चली गई।
शाम को पांच बजे हम मां बेटे बाजार की ओर चल पड़े। जहां क्षितिज फॉर्मल ड्रेस में था, नीली जींस और काले टी शर्ट में वहीं मैं आसमानी रंग की सलवार कमीज पहने थी। काफी फ्रेश और तरोताजा दिख रहे थे हम दोनों। कार मैं ही चला रही थी। क्षितिज मेरे बगल में बैठा शैतानी कर रहा था। अपने दायें हाथ से बार बार मेरी बांयी जांघ पर हाथ फेरता जा रहा था। पूरे रास्ते मैं उसके हाथ को झटकती हुई झिड़कती रही। “हाथ संभालो अपना शैतान, मारूंगी हां।”
“हां, वो तो देख लिया कितना मारती हो। इतने प्यार से मारोगी तो मर ही जाऊंगा मेरी जान।”
“हट बदमाश।”
“हाय मॉम, तेरी इसी अदा पर तो मरता हूं।” मैं समझ गयी कि इसे कुछ कहना बेकार है। चुपचाप कार चलाती रही और वह मेरी जांघ सहलाता रहा। बाजार पहुंच कर शॉपिंग किया, कुछ नये कपड़े वगैरह लिए फिर हम आईलेक्स में मूवी देखने घुसे। सीट हमें सबसे पीछे से सामने वाली कतार में दाहिने किनारे की मिली थी। मैं दायीं ओर और क्षितिज बांई ओर बैठा था। फिल्म थी “मर्डर”। हालांकि मुझे थ्रिलर फिल्में पसंद नहीं थीं लेकिन क्षितिज की जिद के कारण मैं तैयार हो गयी। वैसे तो यह रहस्य रोमांच से भरी फिल्म थी किंतु उसमें नायक नायिका के कुछ अंतरंग दृश्य भी थे। उन दृश्यों के आते ही क्षितिज मुझसे सट जाता था और अपना दायां हाथ मेरे कंधे पर रखकर अपनी ओर खींच लेता था। एक बार तो उसने मुझे चूम ही लिया। मैं छिटक कर अलग होने की कोशिश करती थी किंतु उसकी पकड़ काफी मजबूत थी। कभी कभी उसका हाथ मेरी जांघ पर होता था और सरकता हुआ मेरी योनि की ओर बढ़ता था जिसे मैं बार बार हटाती रहती थी।
“क्या करते हो? पीछे वाले देख रहे होंगे, शैतान।”
“अरे कोई नहीं देखता है मॉम, सब फिल्म देख रहे हैं।” मेरे कानों में फुसफुसाया वह। फिल्म हम क्या देखते, पूरी फिल्म खत्म होने तक यही सब चलता रहा। फिल्म समाप्त होते होते मुझे काफी गर्म कर चुका था बदमाश। फिल्म हॉल से निकलते वक्त मुझे पीछे से आवाज सुनाई पड़ी, “साले लौंडे को तो जबरदस्त माल हाथ लगी है, हॉल में खूब मस्ती कर रहा था साला।” मैंने पीछे मुड़कर देखा, 22 – 23 साल के और करीब 25 – 26 साल के दो युवक, शक्ल सूरत, कद काठी और कपड़ों से अच्छे भले घर के दिखने वाले, लेकिन उनके होंठों पर शोहदों वाली मुस्कुराहट खेल रही थीं। मैं समझ गई कि हॉल के अंदर क्षितिज की हरकतों को इन लोगों ने देख लिया है। मैंने किसी प्रकार अपने गुस्से को नियंत्रण में रखा। क्षितिज इन सब बातों से बेखबर मुझसे आगे आगे चल रहा था। जब मैं कार का दरवाजा खोल कर अंदर घुसने ही वाली थी कि मेरे भरे पूरे नितंब पर एक हाथ पड़ा और दबा दिया किसी ने, साथ ही आवाज सुनाई पड़ी, “क्या मस्त गांड़ है मेरी जान, इस लौंडे को छोड़, चल हमारे साथ।” गुस्से का पारावार न रहा मेरा। पीछे मुड़ कर देखा तो वही दोनों खड़े अश्लील मुस्कुराहट के साथ मुझे देख रहे थे।
गुस्सा मेरा सातवें आसमान पर था, “साले कुत्तों, तुम लोगों की मां बहन नहीं है क्या घर में?” जोर से चीखते हुए बोली। मेरी आवाज सुनकर आसपास के सभी लोग हमारी ओर देखने लगे।
“क्या हुआ मॉम?” क्षितिज भी मेरी आवाज सुनकर कार से उतरकर मेरे पास आ गया।
“साले लौंडे मॉम बोलता है, हॉल में तो…..” पच्चीस छब्बीस साल वाला कद्दावर युवक क्षितिज की ओर बढ़ते हुए बोला, लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही मेरे दायें हाथ का भरपूर घूंसा उसके मुंह पर पड़ा। उसके लिए यह अप्रत्याशित था। वह लड़खड़ा कर एक कदम पीछे हो गया। उसका निचला होंठ फट गया था और खून छलक आया।
उसका दूसरा साथी जैसे ही आगे बढ़ा, क्षितिज उसे देख कर बोला, “अरे सुजीत तुम?” वह युवक चौंक कर क्षितिज को देखने लगा। लेकिन शर्मिंदा होने की जगह बेशर्मी से बोला, “साले क्षितिज बड़ा छुपा रुस्तम निकला रे तू तो। कॉलेज में तो बड़ा शरीफ बना फिरता है मादरचोद। इतनी जबरदस्त माल…..” इससे आगे वह भी बोल नहीं पाया, मेरे बांये हाथ का जन्नाटेदार झापड़ उसके बांये गाल पर पड़ा। सर घूम गया उसका, इतना जबरदस्त प्रहार हुआ था। आश्चर्य से उसकी आंखें फटी की फटी रह गयीं। अपना गाल पकड़ कर जड़ हो गया था अपने ही स्थान पर।
“कौन है यह?” मैं गुस्से से क्षितिज की ओर मुखातिब हुई।
“यह सुजीत है मॉम, एन आई टी में मेरा सीनियर।” क्षितिज घबराहट में बोला, मेरा रौद्र रूप पहली बार देख रहा था वह।
“चल भाग मां के लौंडे यहां से, वरना मार मार के हुलिया बिगाड़ दूंगी, साले लौंडीबाज हराम के जने कमीने।” मैं गुस्से से चीखी। लेकिन तबतक पहले वाला युवक संभल कर फिर मेरी ओर बढ़ा, उसका चेहरा बता रहा था कि इतने लोगों के बीच एक औरत से मार खाने की बेइज्जती से तिलमिलाया हुआ था।
“साली कुतिया, अभी बताता हूं तुझे।” वह खूंखार लहजे में बोला। क्षितिज भी आगे बढ़ा मगर मैंने उसे पीछे ढकेल दिया और उस युवक को और कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया मैंने। मेरी एक करारी लात उसके पेट पर पड़ी। “आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह,” कहते हुए पेट पकड़ कर दोहरा हो गया, तभी मेरे दायें घुटने का प्रहार उसके चेहरे पर हुआ, वह वहीं उलट कर धराशायी हो गया। इधर रोहित उसे उठाने के लिए बढ़ा और क्षितिज की ओर खूंखार नजरों से देखते हुए धमकी भरे अंदाज में बोला, “साली तुम्हें देख लूंगा और साले क्षितिज, तुझे तो कॉलेज में समझाऊंगा।” यह सुनकर क्षितिज आगे बढ़ा तो मैं क्षितिज को किनारे ढकेल कर राहुल के सामने गई, “क्या बोल रहा था कमीने? मुझसे बात कर साले।”
“साली रंडी तुझे तो…” उसकी बात अधूरी रह गई। मेरे दाएं हाथ का भरपूर मुक्का उसके जबड़े पर पड़ा। वह पीछे की ओर गिर पड़ा, फिर तो मैंनें उसे अपनी लातों में रख लिया और मारते मारते बेदम कर दिया।
“कमीने कुत्ते, धमकी किसी और को देना, फिर कभी तू या तेरा यह घटिया दोस्त, क्षितिज या मुझे, कोई नुकसान पहुंचाने की सोच रहे हो तो भूल जाओ, जिंदा दफन कर दूंगी। तम लोगों को पता नहीं तुम्हारा पाला किससे पड़ा है।” फुंफकारते हुए मैं बोली। फिर क्षितिज को घसीटते हुए कार के अंदर ढकेल कर कार स्टार्ट करके वहां से चल पड़ी। वहां खड़ी मूकदर्शक हिजड़ों की फौज में से न ही कोई हमें बचाने आगे आया, न ही कोई उनके समर्थन में आगे आया।
