कामिनी की कामुक जीवन गाथा 5

बाप बेटी

“उस दिन मैं विद्यालय के वार्षिकोत्सव में दिनभर व्यस्त रही और शाम को करीब साढ़े छः बजे जब घर आने के लिए गेट से जैसे ही बाहर निकली, वही ऑटो वाला अपने ऑटो के साथ फिर से हाजिर हो गया। “आईए मैडम, आपको घर तक छोड़ देता हूं।” मुस्करा कर बोला। मैं समझ गई कि उसके मुंह में खून लग गया है और मेरी चूत के लालच ने उसे फिर से यहां खींच लाया है। अवश्य ही मुझे चोदने की मंशा से ही आया था। इतने सालों बाद लंड का स्वाद पुनः पा कर मेरी चूत में भी चुदास जाग उठी थी और अब मैं भी खुल कर और इत्मिनान से चुदना चाहती थी, मगर अपनी इस कामना को मैं सार्वजनिक भी नहीं कर सकती थी, इस तरह अपने विद्यालय के विद्यार्थियों और सहयोगी शिक्षकों के समक्ष तो बिल्कुल ही नहीं।

इसलिए मैं ने ऑटो वाले को आंखों के इशारे से आगे बढ़ने का इशारा किया और करीब पचास गज आगे जाकर उसके ऑटो में बैठते हुए बोली, “कमीने, इस तरह स्कूल गेट पर आकर बेशर्मों की तरह खड़े हो कर मुझे बदनाम करने का इरादा है क्या? कल तो मेरे साथ जबरदस्ती किया, अब जबरदस्ती नहीं, आराम से। किसी को भनक नहीं लगना चाहिए समझे। तू घर में अकेला रहता है या परिवार के साथ?”

उसकी बांछें खिल गयीं। “परिवार तो है, मगर बीवी दो हफ्ते के लिए मायके गई हुई है। अभी मैं अकेला हूं। आप अभी चलिएगा क्या?” खुशी से झूम कर वह पूछा।

“पहले तू अपना नाम बता।” मैं पूछी।

“मैडम मेरा नाम कालीचरण है, मगर लोग मुझे कालिया के नाम से जानते हैं।” वह बोला।

“तेरा घर कहां है? अगर दूर नहीं है तो मैं आ जाऊंगी” मैं अपने रोमांच और खुशी को दबा कर बोली।

“दूर नहीं है मैडम, आपके घर के रास्ते में ही मेरा घर है। अभी चलिए।” वह बेताबी से बोला।।

“नहीं, पहले मैं घर जाकर फ्रेश हो जाऊं फिर आ जाऊंगी। तुम मुझे अपना घर दिखा दो।” मैं बोली।

“ठीक है,” कहता हुआ ऑटो एक छोटे से मिट्टी से बने खपरैल मकान के सामने रोका और बोला, “यही मेरा घर है। शायद आपको पसंद न आए।”

“कोई बात नहीं, चलेगा” मैं अपनी उत्तेजना को बमुश्किल नियंत्रित करती हुई बोली। “मैं ठीक नौ बजे आ जाऊंगी।”

“ठीक है मैडम ठीक है” कहते हुए उसकी आंखों में वासना की भूख, बेताबी और खुशी चमक उठी। फिर वह मुझे घर छोड़ कर वापस अपने घर लौट गया।

बेटे को खाना खिला कर और सुला कर नौकरानी से कहकर कि मैं एक डेढ़ घंटे में आऊंगी, मैं धड़कते दिल से रात के अंधेरे में सुनसान रास्ते पर कालिया के घर की ओर चल पड़ी। जैसे ही मैंने दरवाजा खटखटाया, कालिया तुरंत दरवाजा खोल कर बेताबी से बोला, “आईए मैडम, अंदर आ जाईए।” उस के मुंह से निकलती फिर वही परिचित देशी शराब की दुर्गन्ध का भभका मेरे नथुनों से टकराया। मुझे उस महक से आज कोई घृणा नहीं हुई। चौंक तो मैं तब पड़ी जब मैं ने उस खपड़ैल मिट्टी के घर के छोटे से कमरे में एक कुर्सी पर हमारे घर के सामने से रोजाना सब्जी का ठेला ले कर गुजरने वाले मंगू को बैठे देखा। उसके सामने स्टूल पर एक शराब की बोतल और दो ग्लास रखे हुए थे। मैं तुरंत कालिया से बोली, “यह यहां क्या कर रहा है?”

“मैडम, यह मेरा पड़ोसी है। बगल में ही रहता है। अचानक आज बोतल ले कर आ गया और बोलने लगा, आज यहीं पिएंगे। मेरे मना करने पर भी माना नहीं।” कालिया जवाब दिया।

“ठीक है तुम लोग पियो, मैं जा रही हूं।” मैं नाराजगी भरी आवाज में बोली और वापस पलटी।

“अरे जाती कहां हैं मैडम जी, मंगू कोई गैर थोड़ी ना है। कल आपने मुझसे अकेले मज़ा लिया, आज हम दोनों से ले लीजिए। कसम से बहुत मजा आयेगा।” कालिया ने मेरी बांह पकड़ कर मुझे वापस खींच कर वासना से ओत-प्रोत नजरों से मुझे देखते हुए कहा।

मंगू, जो तीस पैंतीस साल का हट्ठा कट्ठा सांवले रंग का जवान था, वासनामय दृष्टि से मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था, बोल उठा, “मैडम जी, कालिया और हम कोई अलग नहीं हैं। जैसा कालिया वैसा हम। थोड़ा हमको भी मज़ा दे दीजिए ना। इसने हमको सब बता दिया है। सच में आप बहुत मस्त चीज़ हैं।”

“कितने हरामी हो कालिया। मुझे रंडी समझ लिया है क्या?” मैं विरोध करती हुई बोली, “छोड़ दो मुझे कमीने, मैं सोची कि…..” बाकी बातें मेरे मुंह में ही रह गई।

मेरी बात काटते हुए बीच में ही कालिया बोला, “क्या कि कि? चुदवाने ही तो आप आई हैं ना? क्या मेरा लौड़ा क्या मंगू का लौड़ा? क्या फर्क पड़ता है? हम दोनों अच्छी तरह आपको चोदेंगे। खुश हो जाइएगा आप। आप भी क्या याद रखियेगा। चलिए अब नखरे मत कीजिए,” कहते हुए उसने मुझे जबरदस्ती अपनी बांहों में कस लिया और बेहताशा चूमने लगा। उसके चुम्बनों से धीरे धीरे मेरा विरोध कम होने लगा और कुछ ही देर में मेरे अंदर कामुकता का नाग जाग कर फुंफकारें मारने लगा। इतने सालों से दबी वासना की भूख, जिसे कालिया ने कल ही अपनी चुदाई से एक बार फिर से जगा दिया था, वह भूख अब मेरे नियंत्रण से बाहर हो गया था जिसके आगे मैं अपना भला बुरा सब भूल गयी। अब कालिया हो या चंगू मंगू, क्या फर्क पड़ता है? मैं ने विरोध छोड़ कर अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और उनके साथ पूरे मन से सहयोग कर यौवन का आनंद प्राप्त करने हेतु समर्पित हो गई।

मेरी स्थिति को भांप कर कालिया खुश हो गया और बोला, “यह हुई ना बात। चल मंगू, मैडम को बिस्तर पर ले चल और हम मैडम जी को करवाते हैं जन्नत की सैर। मैडम जी, एक एक पैग हम और पिएंगे मगर हमारे साथ आप भी एक पैग ले लीजिए, फिर आपको इत्ता मजा आएगा कि पूछिए ही मत।”

मैं घबरा कर बोली, “नहीं बाबा नहीं, मैं दारू नहीं पीती, फिर तुम दोनों के साथ? सामुहिक चुदाई? ना बाबा ना, एक साथ नहीं, एक एक करके करो ना, मैं कहीं भागी जा रही हूं क्या?”

“मंगू, चल बना एक पैग मैडम के लिए भी, कैसे नहीं पीती है साली, अरे मेरी जान पहले पीजिए, फिर हम दोनों एक साथ आपको चोदेंगे, और ऐसा चोदेंगे कि आप भी क्या याद रखियेगा। घबराईए मत। आज के बाद आप खुद हम दोनों को घर बुला कर चुदवाने के लिए तड़पिएगा, जैसा कि इस मुहल्ले की कई औरतें तड़पती हैं।” कालिया बोला।

“अच्छा, तो तुम लोग इस मुहल्ले की और भी औरतों की चुदाई करते रहते हो?” मैं चकित हो कर पूछ बैठी।

“हां मैडम जी, हम लोग यहां की इक्कीस औरतों को चोद चुके हैं। आप नाम पूछिएगा तो एक एक औरत का नाम भी बता सकते हैं। जिन औरतों को हमने एक बार चोद लिया वे चुदवाने के लिए हमें बुलाती रहती हैं। लेकिन आपकी बात और है। उन सब औरतों में कोई भी आप जैसी मस्त नहीं हैं।आपको तो देखते ही लंड अपने आप खड़ा हो जाता है। कई दिनों से आपको चोदने की फिराक में था, कल जा कर मौका मिला, सच में बड़ा मज़ा आया।” अब इसे मैं अपनी प्रशंसा समझूं कि कालिया का मस्का, मैं निर्णय नहीं कर पा रही थी और न ही करना चाहती थी। खैर, चुदने की बेकरारी में सोची कि एक पैग लेने में क्या हर्ज है, मंगू के हाथ से पैग ले कर दारू की दुर्गन्ध से बचने के लिए सांस रोक कर ही सांस में हलक उतार दिया। ऐसा लगा मानो किसी ने मेरे गले में तेजाब डाल दिया हो। इस बीच कालिया मेरी चूचियां मसलता रहा। मुझ पर तुरंत ही नशा चढ़ने लगा और साथ ही चुदास की बेकरारी भी। उस बात को ज्यादा तूल देना आवश्यक नहीं समझी कि ये एक नहीं दो हैं। चलो एक मर्द का मज़ा तो ले ही चुकी हूं, आज दो दो मर्दों का मज़ा भी ले कर देख लेती हूं।

जैसे ही मेरा पैग खत्म हुआ, उन लोगों ने भी एक सांस में फटाफट अपने पैग डकार लिए और मंगु अपनी मजबूत बाहों से मुझे गोद में उठा कर दूसरे कमरे की ओर बढ़ा। वह कमरा भी काफी छोटा सा था, करीब आठ बाई आठ का होगा। एक सिंगल तख्तपोश और उसपर बिछा गंदा सा चादर। कमरे में सीलन की बदबू और 60 वाट के एकलौते बल्ब की रौशनी। मंगू ने मुझे उसी गंदे बिस्तर पर लिटा दिया।

“आज हम आपको पूरा नंगा कर के चोदेंगे। कल तो सिर्फ साड़ी उठा के चोदा था।” कहते हुए उन लोगों ने मिलकर मेरे शरीर से सारे कपड़े उतार दिए और मेरे कामोत्तेजक तन को कुछ पल एक टक देखते रह गए। दोनों की आंखों में भूखे भेड़ियों सी चमक आ गई थीं। मंगू से और बर्दाश्त नहीं हुआ और फटाफट अपने कपड़े उतार कर पूरा नंगा हो गया। उसका छः फुटा गठा शरीर और ओह ओ्ओ्ओ्ओह मां, लंड करीब आठ इंच लम्बा फनफनाता हुआ, गजब का मोटा। कालिया के लंड से भी बड़ा। अगर मैं हल्के नशे में नहीं रहती तो अवश्य दहशत में आ जाती। मगर इस वक्त तो मैं नशे और चुदास के मारे पागल हुई जा रही थी।

“कसम से यार, आज तक इतना मस्त माल चोदने को पहली बार मिला है। क्या मस्त चूची है, ओह क्या मस्त चूत है, उफ्फ और गांड़ इतना बड़ा और चिकना। आज मजा आएगा चोदने का।” मेरे शरीर के हरेक अंग को छू छू कर मंगू बोल रहा था। मैं उसके स्पर्श से उत्तेजित होती जा रही थी। अब तक कालिया भी नंगा हो चुका था।

” मैं बोला था ना, मस्त माल मिलेगी चोदने के लिए। अब देख क्या रहा है साले, चल शुरू कर चुदाई, देख नहीं रहे मैडम की चूत कैसे पनिया कर फक फक कर रही है।” कालिया बोला। सच में मेरी चूत पानी छोड़ने लगी थी। मंगू तुरंत मेरे पैरों को फैला कर जांघों के बीच आ गया और अपने फुंफकार मारते लंड का सुपाड़ा मेरी चूत के मुहाने पर रख कर रगड़ना चालू किया। “आह्ह्ह ओ्ह्ह्ह्ह, इस्स्स्,” मैं सिसक उठी। लोहा गरम था, हथौड़ा मारने की देर थी। फिर मंगू अपने लौड़े पर दबाव बढ़ाने लगा, धीरे धीरे उसका मोटा लौड़ा मेरी चूत को फैलाता हुआ अन्दर घुसा जा रहा था और मेरी सांसें जैसे रुक सी गई थी। धीरे धीरे उसने पूरा लौड़ा मेरी चूत में घुसेड़ ही दिया। ऐसा लग रहा था मानो उसके लंड का सुपाड़ा मेरी कोख में दस्तक दे रहा हो।

“आ्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह्ह मां्आ्आ्आ्आ, म्म्म्आ्आ्आ्आर्र्र्र्र डा्आ्आ्आल्आ्आ्आ रे मंगू्ऊ्ऊ्ऊ्ऊ” मेरे मुंह से दर्दनाक कराह निकल पड़ी।

“मैडम जी यह मंगू का लौड़ा है, कोई ऐरे गैरे नत्थू खैरे का नुनी नहीं, थोड़ा धीरज रखिए,” कहते हुए एक पल रुका और फिर लंड बाहर निकालने लगा। सुपाड़ा अन्दर ही रहने दिया और इसके बाद तो मानो क़यामत ही ढा दिया। एक झटके में एक करारा ठाप मार कर फिर से जड़ तक ठोक दिया।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” मैं दुबारा कराह उठी। अगर शराब का नशा नहीं होता तो मैं चीख पड़ी होती। लेकिन एक अद्भुत आनंद भी मिल रहा था मेरी चूत में उसके मोटे लंड के घर्षण का। इसके बाद तो फिर मंगू कहां रुकने वाला था, दनादन आठ दस ठाप लगा कर जैसे मेरे दर्द को छू मंतर कर दिया। मैं मस्ती में भर कर मंगू के होंठों को चूमने लगी। मंगू अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल कर चुभला रहा था। फिर मंगू मुझे लिए दिए पलट गया और सरक कर फिर बिस्तर के बीच में आ गया। अब मंगू नीचे था और मैं ऊपर। इसी समय मैं ने पीछे से मेरी गांड़ में दस्तक महसूस किया। मैं ने सर घुमा कर देखा तो पाया कि कालिया मेरे पीछे आ चुका था और अपना लौड़ा मेरी गांड़ की छेद पर रख रहा था।

मैं घबरा गई और बोली, “मत कर कालिया, मेरी गांड़ में मत कर, प्लीज, मर जाऊंगी मैं।” मैं हटना चाहती थी, बचना चाहती थी कालिया के लौड़े से मेरी गांड़ में होने वाले हमले से, लेकिन मंगू ने मुझे इस कदर जकड़ रखा था कि मैं हिल भी नहीं पा रही थी। इधर कालिया अपने लौड़े पर थूक लगा कर मेरी गांड़ में दबाव बढ़ाने लगा और देखते ही देखते मेरी कसी हुई गांड़ के सुराख कोई चीरता हुआ अन्दर घुसाता चला गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी गांड़ में चाकू घुसेड़ दिया हो। दर्द के मारे मेरी आह निकल पड़ी और नशे में होने के बावजूद मेरी आंखों से आंसू बह निकले।

“ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह फाड़ दिया मेरी गांड़ मादरचोद हाय राम” मैं सिर्फ कराह कर रह गई। चीख भी नहीं सकती थी।

“चुप हो जा रंडी, अभी देता हूं तुझे मजा। ले मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में, क्या मस्त गांड़ है ओह ओ्ओ्ओ्ओह मस्त टाईट है आह, मजा आ रहा है मैडम, ऐसा गांड़ जिंदगी में कभी नहीं चोदा।” बड़ी बेशर्मी और बेरहमी से मुझे दबोच कर चोदते हुए कालिया बोला। पूरा लंड अन्दर घुसा कर एक पल के लिए कालिया रुका और फिर तो मुझ पर जैसे क़यामत बरपा हो गया। कालिया भी मेरी कमर पकड़ कर कुत्ते की तरह पीछे से दनादन मेरी गांड़ का भुर्ता बनाने लग गया। कुछ ही क्षण की वेदना के बाद मुझे जो मजा मिलने लगा उसे बता पाना मुश्किल था। चूत में मंगू का लौड़ा और गांड़ में कालिया का लौड़ा घमासान हलचल मचा कर मुझे स्वर्ग में पहुंचा दिया था। करीब आधे घंटे तक दोनों ने मुझे चोद चोद कर मस्ती के सागर में गोते लगाने पर मजबूर कर दिया। फिर कुछ ही पलों के अंतराल में दोनों झड़ने लगे और मुझे पूरी तरह से तृप्त कर दिया। मैं इस दौरान दो बार झड़ चुकी थी।

“आह राजा मजा आ गया, तुम दोनों सच में बहुत मस्त चुदक्कड़ हो जी। मुझे फिर से औरत होने का अहसास करा दिया।” जैसे ही वे खलास हो कर निवृत्त हुए, मैं उनके नंगे बदन से बारी बारी से लिपट लिपट कर उन्हें अपने चुंबनों से सराबोर कर बैठी। वे भी प्रतिदान में मुझे अपने बीच भींच कर चुंबनों की झड़ी लगा बैठे।

“हमने कहा था ना कि खूब मज़ा देंगे हम। कैसा लगा?” कालिया पूछा।

“उफ्फ राजा, स्वर्ग का सुख दे दिया तुम दोनों ने तो।” मैं बोली। करीब पांच मिनट बाद ही फिर से चुदाई का दूसरा दौर शुरू हुआ और यह भी करीब आधे घंटे तक चला। इस बार कालिया मेरी चूत का भोग लगाया और मंगू मेरी गांड़ का। मुझे तो निहाल कर दिया दोनों ने। करीब बारह बजे मैं उनके घर से थक कर चूर, लस्त पस्त, लड़खड़ाते हुए निकल कर अपने घर तक आई और दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खोल कर मेरी हालत देख कर मेरी नौकरानी के मुख पर रहस्यमयी मुस्कुराहट खेलने लगी। वह पैंतीस साल की एक विधवा औरत थी और शायद उसकी अनुभवी आंखों ने मेरी हालत देख कर सब कुछ समझ लिया था। उसका नाम कमला था। मुझे तो बाद में पता चला कि कालिया और मंगू की चुदाई लिस्ट में कमला का भी नाम शामिल है। अब जो भी सोचना है सोचती रहो, भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारी सोच, मुझे तो स्वर्गीय सुख का रास्ता मिल गया था। बिना कुछ बोले सीधे अपने बिस्तर पर धम्म से गिर कर लंबी हो गई। उस दिन के बाद मैं कालिया और मंगू से मिलती रहती थी और उनके साथ साथ हमारी बस्ती के और भी कई लोगों से चुदवाने लगी थी। परचून की दुकान वाला पचपन साल का छद्दू सेठ, कोने में रहने वाले सिंह जी का अठारह साल का लड़का समीर, हमारे घर की लाईन में चौथे घर के चालीस साल के श्रीवास्तव जी, गली का टेलर मास्टर, 60 साल का दढ़ियल अंसारी, उसी के बगल वाले दुबले पतले काले 45 साल के मोची, हमारे गांव का मुखिया नाटा मोटा काला कलूटा सुखराम हांसदा और हमारे थाने का दरोगा ठाकुर साहब, सबसे मैं चुदती रहती हूं। इनके अलावे मेरे स्कूल के 55 साल के हेडमास्टर और उनका बूढ़ा चपरासी भी कभी कभी चोदते रहते हैं, आप लोग भी तो बहती गंगा में डुबकी लगाते रहते हैं। यह सब कुछ भगवान की दया से अब तक ढका छिपा ही है और आशा करती हूं कि भविष्य में भी मैं सफलता पूर्वक इसी तरह जिंदगी बिता लूंगी। यही मेरी चुदाई भरी सुखद जिंदगी है और मैं इस जिंदगी में बहुत खुश हूं। जो मेरी चुदाई के राजदार हैं वे इज्जतदार लोग मेरे सेक्सी शरीर का रसपान भी करते रहते हैं इसलिए राज खुलने का भय भी नहीं है और समाज के लोगों के बीच शराफत का चोला ओढ़कर आराम से जी रही हूं।”

“वाह रमा, बहुत खूब। चलो तुम खुश हो इस जिंदगी में तो हमें क्या। तुम खुश रहो बस।” दादाजी बोले। मैं सोच रही थी कि सच में औरत होना कितने नसीब की बात है। अगर औरत खूबसूरत हो तो फिर बात ही क्या है। सिर्फ एक ही खास बात हमारे अंदर होनी चाहिए, और वह है खुद पर विश्वास और नियंत्रण, वरना समाज की नजरों में सार्वजनिक रुप से छिनाल का धब्बा लगने में देर नहीं लगती है और उस औरत का जीना दुश्वार हो जाता है। चाची की कहानी सुनते हुए एक घंटा कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। कहानी काफी उत्तेजक था। सभी उत्तेजित हो चुके थे किंतु 11 बज रहे थे और हरिया को खाना भी बनाना था, अतः हरिया उठा और किचन की तरफ बढ़ा, लेकिन जाने से पहले मुझे सबके सामने बांहों में भर कर एक जोरदार चुम्बन दिया और बोला, “मन तो कर रहा है अभिए चोद लूं, मगर खाना भी बनाना है।”

“हरिया, अब कामिनी हमारी पत्नी है, कहीं भागी नहीं जा रही है। खाना खाने के बाद कामिनी की मां अर्थात हमारी सासू मां से हमारे ससुर अर्थात कामिनी के पापा की गांडूपनई के बारे में सुनेंगे और हमारी दुल्हन के साथ रासलीला भी करेंगे। जा तू खाना बना।” दादाजी बोले।

“मैं भी चलती हूं किचन में, हरिया के साथ खाना बनाने।” मैं बोली और उठ कर किचन की तरफ बढ़ी।

मेरा जीवन दर्शन भी कुछ इसी तरह का था। अपनी जिंदगी अपने अंदाज में अपने शर्तों पर, स्वतंत्रता पूर्वक जीने का, यदि इससे किसी को तकलीफ़ न हो तो।

दोपहर खाने के पश्चात जब हम इकट्ठे बैठे थे उसी दौरान दादाजी ने मेरी मां से कहा, “अब तू बता लक्ष्मी क्या बता रही थी अपने पति, मेरे बेटे और कामिनी के पिता अशोक की नामर्दी और गांडूपन के बारे में।”

“छि: मैं कैसे बताऊं?” मेरी मां बोली।

“अरे बता कर अपने दिल का बोझ हल्का कर ले सासू मां, अब हमसे का पर्दा।” दादाजी बोले।

“ठीक है, तो मैं बताती हूं उसकी नामर्दी के बारे में, लेकिन उसके गांडूपन के बारे में कामिनी के बड़े दादाजी बेहतर जानते हैं, वही बताएंगे।” मेरी मां बोली।

“ठीक है, वह मैं बताऊंगा।” बड़े दादाजी बोले।

“तो सुनिए। हमारे सुहागरात में जब कामिनी के पापा मेरे पास आए तो ज्यादा खुश नहीं दिख रहे थे। उन्होंने मुझसे सिर्फ इतना ही कहा “तुम बहुत थक गई होगी, काफी रात हो गई है, तुम आराम से सो जाओ, मैं भी सो जाता हूं।” फिर वे सुहाग सेज पर एक तरफ लेट गये। मेरे तो सारे सपने एक पल में चूर चूर हो गये। मैं फिर भी हिम्मत नहीं हारी। बेशर्मी से घूंघट हटा कर उनके चेहरे की ओर देखा। कितना खूबसूरत चेहरा था। गोरा रंग, घुंघराले बाल, मासूम सा चेहरा, लाल लाल होंठ, जैसे लिपस्टिक लगाया होगा। मुझे उनपर बहुत प्यार आ रहा था।

फिर मैं बेशर्मी से उनके पास आई और बोली, “क्या हुआ जी? मैं थकी हुई नहीं हूं। आप को कोई प्रॉब्लम है क्या?”

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।” वे बोले।

“फिर ऐसी बेरुखी क्यों? मुझसे कोई समस्या है क्या?” मैं पूछी।

“नहीं तो” उन्होंने कहा।

मैं ने हौले से उनके सीने पर सर रख दिया और हाथ उनके सीने पर फेरने लगी। धीरे से उनका हाथ भी मेरी पीठ पर आ गया और वे भी मेरी पीठ पर हाथ फेरने लगे। धीरे धीरे वे खुल रहे थे। फिर मैं अपना चेहरा उनके चेहरे की ओर उठाई, वे एकटक मेरी खूबसूरती को निहारने लगे। फिर उन्होंने दोनों हाथों में मेरा चेहरा लिया और मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और पहले हौले से चूमा, जिसके प्रत्युत्तर में मैं भी अपने होंठ खोल दी और उसके बाद वे मुझे बेहताशा चूमने लगे। अब मैं समझ गई कि वे उत्तेजित हो रहे हैं। अब वे एक हाथ से मेरे ब्लाऊज खोलने लगे। मैं उन्हें सहयोग करने लगी और उनकी शेरवानी की बटन खोलने लगी। इधर मेरी ब्लाऊज खुली तो फिर मेरी ब्रा के ऊपर से ही मेरे उन्नत उरोजों को सहलाने लगे। मुझे बेहद खुशी हो रही थी कि अंततः मैं अपनी ओर आकर्षित कर उन्हें उत्तेजित करने में कामयाब हो रही थी। फिर धीरे धीरे एक एक करके मेरी ब्लाऊज खुली, ब्रा खुली, साड़ी खुली, पेटीकोट खुली और अन्ततः पैंटी भी उतर गई। मेरी खूबसूरत देह को देख कर उनकी आंखों में प्रशंसा मिश्रित प्रसन्नता नृत्य करने लगा। वे मेरी नंगी देह को सर से लेकर पांव तक चूमने लगे। मैं रोमांचित हो उठी। मैं भी बेकरारी में उनकेे सारे कपड़े उतारने में सहयोग करने लगी। कुछ ही पलों में वे भी मादरजात नंगे हो गए। वाह क्या बदन था उनका। पूरा चिकना छरहरा शरीर। गोरा चिट्टा। बदन में एक भी बाल नहीं और न ही कोई दाग। लेकिन मुझे थोड़ी निराशा इस बात की थी कि उनका शरीर स्त्रियों की तरह कोमल था और लिंग सिर्फ चार इंच लम्बा। सीना भी करीब करीब स्त्रियों की तरह अर्धविकसित चूचियों की तरह। खैर फिर भी आकर्षक व्यक्तित्व था और अब वह मेरा पति था। चेहरे की मासूमियत ने भी मेरा मन मोह लिया था। फिर वह पल भी आ गया जो पल एक स्त्री को स्त्रीत्व की संपूर्णता का अहसास कराता है। वे थोड़ा झिझक रहे थे किंतु मैं ने अब कमान अपने हाथ में संभाल लिया था, आखिर मैं भी खेली खाई औरत थी, इस हरिया के हरामीपन की वजह से।”

“चुप साली रंडी, तुझे मजा नहीं आ रहा था क्या?” हरिया बीच में ही बोल उठा।

“साले कुत्ते, मैं तो नादान थी उस वक्त। तूने ही ना मेरी नादानी का फायदा उठाकर कर मुझे चुदाई का रास्ता बताया।” मेरी मां विफर उठी।

“अरे हरामखोरो अब लड़ना बंद करो और चुपचाप लक्ष्मी का किस्सा सुनो” दादाजी डांटे।

“ठीक है तो सुनिए। फिर मैं उनके ऊपर चढ़ गई और अपने दोनों पैरों को फैला कर उनके चार इंच के टनटनाए लिंग के सुपाड़े पर अपनी चूत का मुंह रख दिया और धीरे-धीरे नीचे दबाव देने लगी। मैं किसी कुंवारी कन्या की तरह आह आह करते हुए दर्द का नाटक करने लगी और अशोक भी मस्ती में आ गया और उनके मुख से भी आनंद भरी सिसकारी निकल पड़ी। जब पूरा लिंग मेरी चूत में घुस गया तो मैं धीरे धीरे कमर ऊपर नीचे करने लगी। ऐसा करते करते दो मिनट बाद मैंने ने उन्हें अपने ऊपर ले लिया और मैं नीचे हो गई। अब अशोक के लंड को चुदाई का मज़ा मिल गया था, वे ऊपर से धकाधक चोदने लगे। करीब तीन मिनट बाद ही उन्होंने मेरी चूचियों को जोर से पकड़ लिया और एक लंबी सांस छोड़ते हुए खलास हो गये। उफ्फ, मेरी निराशा का पारावार न रहा। मैं झुंझला उठी। अभी तो मैं जोश में आ ही रही थी। वे ढीले हो कर एक ओर लुढ़क गये। शायद शर्मिंदा भी थे। मैं ने उनकी अवस्था को समझा और उन्हें सान्त्वना देते हुए उनके सीने पर हाथ फेरने लगी और उनके एक हाथ को मेरी चूत पर रख दिया और रगड़ना शुरू किया। उन्होंने मेरा इशारा समझ लिया और मेरी चूत के भगांकुर को अपनी उंगली से रगड़ना चालू किया और कुछ ही मिनटों में मैं भी स्खलन के करीब पहुंच गयी, पूरा बदन थरथरा उठा, मैं अकड़ने लगी और तभी मेरा स्खलन होने लगा। करीब एक मिनट तक मैं उनके नंगे जिस्म से कस कर चिपकी रही फिर निढाल हो गई। मैं ने उन्हें एक प्याार भरा चुम्बन दिया और हम एक दूसरे से लिपट कर सो गए। दूसरे दिन वे मुझसे नज़रें नहीं मिला रहे थे किंतु मैं ने परिस्थिति से समझौता कर लिया था और मान लिया था कि भगवान ने मेरी किस्मत में यही

लिखा है और इसे मैं नहीं बदल सकती। मैं ने हालात से समझौता करना ही अच्छा समझा। दूसरी रात के लिए मैं ने कुछ अलग ही सोच रखा था। जब हम बिस्तर पर आए, उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा और दूसरी ओर मुंह फेर कर सोने का नाटक करने लगे। पिछली रात के अनुभव के कारण शायद वे शर्मिंदा थे। मैं ने फिर अपनी ओर से पहल करने की ठानी।

मैं उनके पीछे से लिपट गई और बोली, “क्या हुआ जी, आप नाराज़ हैं मुझसे?”

“नहीं तो। मैं शर्मिंदा हूं खुद से कि मैं तुम्हें पूरा सुख नहीं दे पाया।” उन्होंने कहा।

“छि: कैसी बातें करते हैं जी। इसमें शर्मिंदा होने की क्या बात है। आप दूसरी तरह से कोशिश तो कर के देखिए।” मैं ने हिम्मत बंधाते हुए कहा। वे मेरी ओर मुड़े और प्रश्नवाचक निगाहों से मुझे देखने लगे। मैं उस समय पूरी बेशरम हो उठी थी। मैं ने उन्हें बांहों में भर लिया और उनके होंठों पर गरमागरम चुम्बनों की बौछार करने लगी। धीरे धीरे वे फिर से जोश में आने लगे। मैं उस वक्त नाईटी में थी। वे भी मुझे बांहों में जकड़ कर चूमने लगे। धीरे धीरे हम फिर से निर्वस्त्र हो गये और एक दूसरे से गुंथ गये। लेकिन मैं आज कुछ और करना चाहती थी। मैं उनके नंगे जिस्म को चूमते हुए उनके लंड तक पहुंच गई और उनके लंड को चाटने लगी। फिर मैंने उनके लंड को मुंह में ले कर लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी। उस वक्त मैं जान बूझ कर उनके साथ 69 की पोजीशन में आ गई थी और अब मेरी चूत उनके चेहरे के सामने थी जिसे मैं धीरे धीरे नीचे करके ठीक उनके मुख के पास ले आई और हौले हौले उनके होंठों पर रगड़ना शुरू कर दिया। अशोक अब तक जोश में आ चुका था और उनका चार इंच का लंड करीब करीब पांच इंच का हो चुका था जो कि शायद पूर्ण उत्तेजित अवस्था में अधिकतम था। अब अशोक भी अपनी जीभ निकाल कर मेरी चूत को चाटने में मग्न हो गया। मैं गनगना उठी और तुरंत ही झड़ने के करीब पहुंच गई। यह खेल सिर्फ पांच ही मिनट चला। अशोक तो वैसे भी तुरंत झड़ने वाला था। उनके लंड की स्थिति से ही मैं समझ गई कि वह कुछ ही सेकेंड का मेहमान है, मैंने तुरंत पोजीशन बदला और गप्प से उनके लंड को अपनी चूत में समा लिया और लो, छरछरा कर दोनों एक साथ झड़ने लगे।

“आह रानी ओह मेरी जान” वे सिर्फ इतना ही बोल पाए। “हां राजा ओह मेरे स्वामी उफ्फ मां मैं गई” कहते कहते हम दोनों एक दूसरे से चिपक गये और एक साथ स्खलन के अभूतपूर्व आनंद में डूब गये। एक बार खलास हो कर वे तो निढाल हो कर लुढ़क गए और कुछ ही देर में निद्रा की आगोश में चले गए जबकि मेरी आंखों से निद्रा कोसों दूर थी। कहां मैं एक ही चुदाई में दो दो तीन तीन बार झड़ने वाली, इस एक पांच मिनट की चुदाई में कहां मन भरता भला। खैर किसी तरह मन मसोस कर दिन काटती रही। फिर हरिया से चुद कर मां बनी और फिर आप लोगों ने मुझे चोद चोद कर मेरी चुदास की आग में घी डालने काम किया। कामिनी के पापा के मानसिक संतोष के लिए उनसे भी चुदवाती रहती थी, हालांकि मुझे यह सिर्फ रस्म अदायगी ही लगता था। इसी दौरान कामिनी के बड़े दादाजी से मुझे पता चला कि अशोक को गांड़ मरवाने की आदत है। मैं समझ गई कि यही कारण है कि वे औरतों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते हैं। उन्हें औरतों के बनिस्पत मर्द बहुत पसंद हैं। बड़े ससुरजी ही उनके समलैंगिक होने की कहानी अच्छी तरह बता सकते हैं, क्योंकि इनको अशोक के गांड़ मरवाने की आदत का ठीक ठीक पता है और जिसका इन्होंने खूब मज़ा भी लूटा है, अत: आगे की कहानी उन्हीं के मुंह से सुुुनिए।” इतना कहकर मेरी मां चुप हो गई और बड़े दादाजी की ओर देखने लगी।

“ठीक है, अशोक के गांडूपन की बात मुझसे सुनो।” इतनी देर चुप रहने के बाद बड़े दादाजी ने मुह खोला। सब उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगे।

“मैं जब दस साल पहले जमशेदपुर आया था एक शादी में शरीक होने के लिए उस समय मुझे पता चला कि अशोक को गांड़ मरवाने का बहुत शौक है और गांड़ मरवाने में उसे बहुत मज़ा आता है। वह शादी थी अशोक की ममेरी बहन रेखा की। तुम भी तो आए थे।” दादाजी की ओर मुखातिब हो कर बड़े दादाजी बोले।

“हां मुझे याद है, आगे बोलिए” दादाजी बोले।

बड़े दादाजी ने आगे बोलना शुरू किया, “अशोक उस दिन बहुत ही सुन्दर दिख रहा था। भीड़ में भी बिल्कुल अलग। उसका बदन, जैसा कि अभी लक्ष्मी ने बताया और सबको पता भी है कि बिल्कुल लड़कियों की तरह है। मुझे करीब दस दिनों से किसी औरत को चोदने का मौका नहीं मिला था। वहां जा कर लक्ष्मी को देखा कि वह बहुत व्यस्त है, किसी और औरत को फंसा कर चोदने का सारा प्रयास व्यर्थ हो रहा था, मैं बेहद व्याकुल था चोदने के लिए। किसी भी औरत को देख कर मेरा लौड़ा खड़ा हुआ जा रहा था, तभी मेरी नज़र अशोक पर पड़ी। उस दिन पता नहीं मुझे क्या हुआ कि अशोक को देख कर ही मेरा लौड़ा टाइट हो गया। अशोक भीड़ में खड़ा हो कर शादी की रस्म देखने में मग्न था। मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और भीड़ को चीरते हुए ठीक अशोक के पीछे सट कर खड़ा हो गया। मेरा खड़ा लन्ड ठीक अशोक की गांड़ की दरार पर सटा हुआ था और मैं हल्के हल्के उसकी गांड़ पर दबाव दे रहा था। उसका कद करीब करीब पांच फुट छः इंच का होगा, इसलिए मैं हल्का सा घुटना मोड़ कर खड़ा ठीक उसकी गांड़ के छेद पर दस्तक दे रहा था। वह चूड़ीदार पाजामा पहना हुआ था इसलिए जरूर उसने मेरे लंड को अपनी गांड़ में चुभता हुआ अनुभव कर लिया होगा और तब मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उसने भी हौले हौले अपनी गांड़ पीछे ठेलना शुरू किया। फिर धीरे से सिर घुमाकर पीछे देखा और मुझे देख कर थोड़ा शरमा गया लेकिन उसके होंठों पर मुस्कान थी। मेरा मन बढ़ गया। मैं अपने हाथों से उसकी गोल गोल गांड़ को सहलाने लगा।

“यह क्या कर रहे हैं बड़े पापा?” वह मेरे कान में फुसफुसाया।

“अच्छा नहीं लग रहा है?” मैं उसकी कान में फुसफुसाया। वह बोला कुछ नहीं लेकिन सिर्फ सिर हिला कर जता दिया कि उसे अच्छा लग रहा है। फिर वह धीरे से दाहिना हाथ पीछे ले कर धोती के ऊपर से ही मेरा लौड़ा सहलाने लगा। मैं समझ गया कि अशोक को यह सब पसंद आ रहा है।

मैं धीरे से उसके कान में फुसफुसाया, “बेटा, चलो थोड़ा बाहर घूम आते हैं।”

अशोक की सांसें बहुत जोर जोर से चल रही थीं, “चलिए” वह बोला।

जब हमलोग बाहर निकल रहे थे तो अशोक के दोस्तों में से किसी की हल्की सी आवाज सुनाई दी, “साला बूढ़ा हमारा माल खाने के चक्कर में है।” मैं अनसुना करते हुए अशोक के साथ बाहर निकल कर घर के बगल में घनी झाड़ियों के पीछे चला गया। मैं ने दिन में देखा था कि वहां घास से भरा हुआ एक छोटा सा मैदान है। वहां पहुंच कर मैंने चारों तरफ देखा, सुनसान जगह थी, चांदनी रात में वह जगह काफी महफूज थी उस काम के लिए जो मैं करने जा रहा था।

मैं सीधा उससे पूछ बैठा, “बेटा तुझे मालूम है ना हम यहां क्यों आए हैं?”

“हां बड़े पापा, मुझे खूब पता है आप क्या चाहते हैं।” वह बोला। मुझे और कुछ सुनने की जरूरत नहीं थी। मैं सीधे उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख कर उसके रसीले होंठों को चूमने लगा। उसकी छाती पर जैसे ही हाथ लगाया, ऐसा लगा मानो किसी चौदह साल की लड़की की तरह छोटी छोटी चूचियां हों। उसकी गांड़ तो मैं पहले ही पकड़ कर देख चुका था, जो किसी लड़की की तरह मस्त गोल गोल थी। मैं और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। फटाफट उसके कपड़े उतारने लग गया और वह भी मेरी धोती खोलने लगा। कुछ ही पलों में हम बिल्कुल नंगे हो गए। उसके लड़कियों की तरह शरीर को देख कर मेरा लौड़ा तो एकदम फनफना कर खड़ा हो गया। मैं धोती बिछा कर उसे लेकर सीधे जमीन पर लेट गया और उसकी चूचियां दबाने लगा। वह मस्ती में आह उह कर रहा था।

फिर मैंने अपना टन टन करता लौड़ा उसके हाथ में दिया तो एक बार तो घबरा गया, “बाप रे बाप, इतना बड़ा लंड! उफ्फ बड़े पापा, आपका लौड़ा तो बहुत बड़ा है। फाड़ ही दीजियेगा आज तो आप मेरी गांड़।”

“अरे नहीं बेटा कुछ नहीं होगा, चिंता मत करो। सभी पहली बार यही कहते हैं, फिर खूब मजे से चुदवाते हैं।” मैं उसके डर को समझ कर बहलाने फुसलाने लगा। मैं जानता था कि 7″ लंबा लंड औसत से थोड़ा ही ज्यादा है लेकिन 3″ मोटा वाकई औसत से काफी मोटा है। मैं यह भी जानता था कि मीठी मीठी बातों में उलझा कर किसी तरह एक बार उसकी गांड़ में लंड घुसा लूं तो फिर धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।

फिर मैंने उससे कहा, “ले बेटा मेरा लौड़ा थोड़ा मुह में ले कर चूसो, डरो मत, मजा आएगा, तुझे भी और मुझे भी।” वह मेरे लंड को मुंह में लेकर चूसने लगा। जिस ढंग से वह चूस रहा था, मैं समझ गया कि वह लंड चूसने में काफी माहिर है। जिस लंड से वह डर रहा था, उसी लंड को करीब तीन चौथाई मुंह में ले कर बहुत मज़े से चूसने लगा। आज तक सिर्फ अशोक और कामिनी ने ही मेरे लंड को इतनी अच्छी तरह से चूसा है। उफ्फ, ऐसा खूबसूरत गांड़ मैंने आज तक नहीं देखा था, उसके अलावे अगर और किसी की गांड़ इतनी खूबसूरत है तो वह है कामिनी की। इस बीच मैं उसके पैरों को फैला कर उसकी चिकनी और चमकदार गोल गोल मस्त गांड़ को चाटने लगा और उसकी गांड़ के छेद में जीभ डाल कर अंदर-बाहर करने लगा। उसकी गांड़ लड़कियों की गांड़ से भी कहीं ज्यादा सुंदर थी, बिल्कुल कामिनी की गांड़ की तरह चिकनी मक्खन की तरह। उसकी गांड़ औरउसके गांड़ के छेद को चाटते चाटते मुझे अहसास हुआ कि वह अब तक काफी लंड ले चुका है।

करीब पांच मिनट बाद मैंने उसे कुतिया की तरह चार पैरों में खड़ा किया और उसके पीछे आ गया। फिर उसकी गांड़ के छेद के पास अपने लंड का सुपाड़ा टिकाया तो उसने फिर कहा, “प्लीज आराम से डालिएगा, बहुत मोटा है आपका लौड़ा।”

“तू चिंता मत कर बेटा, तुझे पता ही नहीं चलेगा कि मेरा लौड़ा कितने आराम से तेरी गांड़ में जा रहा है।” मैं झूठ मूठ ही उसे तसल्ली देते हुए और आश्वस्त करते हुए बोला। मेरा लौड़ा तो उसने पहले ही अपने मुंह से गीला किया हुआ था और मैं भी उसकी गांड़ को गीला कर चुका था, धीरे धीरे लंड में दबाव देने लगा। जैसे ही मेरे लंड का सुपाड़ा उसकी गांड़ के सुराख में घुसा, उसकी आह निकल पड़ी।

मैं फिर भी रुका नहीं और दबाव बढ़ाता गया, वह दर्द के मारे छटपटाने लगा और बोला,” ओह ओ्ओ्ओ्ओह पापा जी दर्द हो रहा है आह धीरे धीरे प्लीज फट जायेगी ओह,” बिलबिला उठा था वह। मैं अब थोड़ा रुका, अब तक मैं आधा किला फतह कर चुका था। जैसे ही उसका छटपटाना बंद हुआ मैं पूरी ताकत से एक करारा ठाप मार कर पूरा लौड़ा उसकी गांड़ में पेल दिया।

“आह्ह्ह्ह्ह मार डाला पापा आप ने ओ्ओ्ओ्ओ्ओह्ह्ह्ह” किसी हलाल होते बकरे की तरह कराह उठा। मैं तो किला फतह कर चुका था। उफ्फ उसकी चुदी चुदाई गांड़ थी फिर भी मेरे लंड के लिए बहुत टाइट थी। ऐसा लग रहा था मानो उसकी गांड़ ने मेरे लंड को जकड़ लिया हो। कुछ पल मैं रुका और फिर जैसे ही मैंने देखा कि वह शांत हो गया है, मैं फिर कहां रुकने वाला था, दनादन दनादन चोदने लगा। उसकी चूचियों को कस कस के दबाने लगा और खूब मज़े से रगड़ रगड़ कर चोदने लगा।

अब उसे भी मज़ा आने लगा और वह मस्त हो कर बोलने लगा, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह पापा आह्ह्ह्ह्ह पापा, चोदिए राजा ओह चोदिए मेरी गांड़ ओह ओ्ओ्ओ्ओह मां मज़ा आ रहा है”।

मैं भी मस्ती में भर कर धक्के पर धक्का लगाने लगा और बोलने लगा, “मस्त गोल गोल गांड़ है रे बेटा ओह मेरी जान आह आह मेरी चिकनी, ओह ओ्ओ्ओ्ओह साले गांडू, ऐसा गांड़ आज तक नहीं चोदा।” करीब दस मिनट उसी तरह चोदने के बाद मैं ने उसे लिटा दिया और उसके दोनों पैरों को फैला कर उठाया और अपने कंधों पर चढ़ा लिया फिर उसकी गांड़ में पुनः लौड़ा पेल दिया और भकाभक चोदने में मशगूल हो गया। करीब पच्चीस मिनट तक खूब जम के उसकी गांड़ की चुदाई किया और फिर अंत में जब झड़ने का समय आया तो उसे कस के दबोच लिया और फचफचा के लंड का पूरा रस उसकी गांड़ में डाल कर खलास होने लगा। उस वक्त ऐसा लग रहा था मानो वह अपनी गांड़ से मेरा लौड़ा दबोच कर चूस रहा हो। ओह मैं बता नहीं सकता कि कितना गजब का अहसास था वह। मैं तो मानो जैसे स्वर्ग ही पहुंच गया था और वह तो जैसे पागल ही हो गया था। मुझसे लिपट गया और बोलने लगा, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह पापा, आज आपने तो मुझे निहाल कर दिया। ऐसा तो आज तक किसी ने नहीं चोदा था। मैं आपके लंड और आपकी चुदाई का दीवाना हो गया।” मुझसे ऐसे लिपट कर चूमने लगा जैसे मुझे छोड़ना ही नहीं चाहता हो।

किंतु मैं ने उससे अलग होते हुए कहा, “अरे बेटा मैं खुद भी तेरा दीवाना हो गया हूं। जबतक यहां हूं, कसम से तेरी गांड़ मारता रहूंगा। जब भी तेरे यहां आऊंगा, बिना तेरी गांड़ चोदे नहीं जाऊंगा। फिलहाल हमें यहां से चलना चाहिए, वरना कोई आ जायेगा तो हम मुश्किल में पड़ सकते हैं।” इतना कहकर हमने अपने कपड़े पहने और फिर शादी की महफ़िल में आ गए। उसी समय फिर किसी की आवाज मेरे कानों में टकराई, “खा लिया हमारा माल साला बूढ़ा।” मैं ने नजर घुमा कर आवाज की दिशा में देखा तो एक 25 – 30 साल का नौजवान हमारी ओर देख कर मुस्कुरा रहा था। मैं भी उसकी ओर देख कर मुस्कुरा उठा। बाद में पता चला कि वह भी अशोक की अॉफिस में काम करने वाला उसका सहकर्मी रमेश था। उस समय करीब ग्यारह बज रहे थे। शादी की रस्म पूरी होते होते एक बज गया।

एक बजे अशोक फिर मेरे पास आया और मुझ से सट कर मेरे लौड़े को धोती के ऊपर से ही सहलाते हुए बोला, “चलिए ना फिर एक बार और हो जाय, अभी तो बहुत देर है बिदाई में।” उसके हाथ लगाते ही मेरा लौड़ा फिर तन कर मेरी धोती फाड़ कर बाहर निकलने को मचलने लगा। मैं और बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसके साथ फिर उसी स्थान पर चला गया जहां हमने चुदाई का खेल खेला था। इस वक्त हम दोनों बिना एक पल गंवाए सीधे नंगे हो कर एक दूसरे से गुंथ गये और फिर एक बार वही चुदाई का दौर चालू हुआ। इस बार तो हम बेहद गंदे तरीके से खुल कर चुदाई में डूब गए थे। एक दूसरे में समा जाने की जी तोड़ धकमपेल में मग्न।

“ओह साली कुतिया, ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरे लंड की रानी, गांडू साले मां के लौड़े तेरी गांड़ का गूदा निकालूं ओह ओ्ओ्ओ्ओह” मैं गंदी गंदी गालियों की बौछार कर रहा था और वह मस्ती में चुदते हुए बोल रहा था, “हाय हाय हरामी मादरचोद पापा, साले कुत्ते, मेरी गांड़ के राज्ज्ज्जा, चोद हरामजादे मेरी गांड़ का भुर्ता बना दीजिए, मझे अपनी रंडी बना लीजिए, कुतिया बना लीजिए, ओह ओ्ओ्ओ्ओह आह मजा दे दे स्वर्ग दिखा दे, ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा।”

इधर हम इतने बेखबर हो गये थे कि वही व्यक्ति, जिसने हम पर कमेंट पास किया था, कब वहां आ पहुंचा हमें पता ही नहीं चला। “ओह तो साले बुढ़ऊ अकेले अकेले मज़ा लूट रहे हो? साले मादरचोद अशोक, हमारा ख्याल नहीं आया?” उसकी आवाज सुनकर हम चौंक पड़े।

अशोक तुरंत बोला, “अभी नहीं, प्लीज अभी नहीं, पहले पापा को चोदने दे फिर तुम चोद लेना।”

“ठीक है साले बुढ़ौ चोद ले चोद ले, इसके बाद मेरा नंबर है।” कहता हुआ फटाफट कपड़े खोल कर नंगा हो कर अपनी बारी का इंतजार करने लगा। करीब साढ़े पांच फुट ऊंचा गठीले बदन का युवक था वह। उसका लंड मुश्किल से साढ़े छः इंच लम्बा और दो इंच मोटा रहा होगा। जैसे ही मैं झड़ कर हांफते हुए अलग हुआ झट से रमेश मेरी जगह ले लिया और फिर उनके बीच घमासान छिड़ गया।

“साले हरामजादे मादरचोद, मुझे छोड़ कर बुड्ढे का लौड़ा खाने अकेले अकेले आ गया, ले साले मेरा लौड़ा खा” कहते हुए चोदने लगा और ताज्जुब तो मुझे यह देखकर हो रहा था कि मुझसे चुदने के बाद भी अशोक बड़े आनन्द से रमेश से भी चुदवाने में मग्न था। लेकिन रमेश सिर्फ दस मिनट में ही झड़ गया और लुढ़क गया।

“साला चोद चोद के तेरा गांड़ भी ढीला कर दिया तेरे पापा ने, सॉरी पापा जी, फिर भी मज़ा आ गया। तेरी गांड़ चोदने से मन ही नहीं भरता है। लगता है जैसे लंड डाल कर पड़े रहें।” कहते हुए वह उठा और अपने कपड़े पहनने लगा।फिर हम तीनों वापस शादी की भीड़ में आ गए। मुझे अशोक ने बताया कि यह रमेश है, उसकी अॉफिस का सहकर्मी। रमेश के अलावा और भी तीन लोग उसके अॉफिस में थे जिनके साथ उसका समलैंगिक संबंध था। उनमें एक उसके अॉफिस का पचपन साल का बॉस भी था।उस वक्त दो बज रहा था। मैं ने उससे पूछा, “तुझे गांड़ मरवाने का शौक कब से है?”

वह बोला, “जी मुझे यह शौक स्कूल के समय से है।”

मैं आश्चर्यचकित हो गया। पूछ बैठा, “कैसे शुरू हुआ यह सब?”

“ठीक है, बताऊंगा, शादी तो हो चुकी है, विदाई सवेरे है। चलिए कमरे में तब तक हम एक नींद मार लेते हैं, फिर विदाई के बाद, इत्मिनान से मैं पूरी बात बताऊंगा।” इतना कहकर उस कमरे की ओर बढ़ा जहां हम ठहरे हुए थे। हमारे साथ रमेश भी चला आया। सवेरे जब विदाई होने लगी तब किसी ने हमें उठा दिया। विदाई के बाद फिर हम अपने कमरे में आ गए। फ्रेश होकर जब हम बैठे तो मैंने कहा, “हां, अब बताओ”।

“ठीक है तो सुनिए” वह बोलना शुरू किया। हमारे साथ रमेश भी था।

मैं बचपन से ही काफी खूबसूरत था, इसलिए स्कूल के सभी शिक्षक मुझे बहुत प्यार करते थे। कुछ मेरे गाल को नोचते थे तो कुछ मेरे गाल को चूम लेते थे। मैं बहुत शर्मीला किस्म का लड़का था। लड़के भी मुझे लड़कियों की तरह छेड़ते रहते थे इसलिए मैं लड़कों से दूर ही रहना पसंद करता था और लड़कियों के साथ ही रहना पसंद करता था। यह उस समय की बात है जब मैं नौवीं क्लास में पढ़ता था। मेरी उम्र उस समय पंद्रह साल थी। मेरे पापा ने कहा था कि अगर वार्षिक परीक्षा में मैं 85% से कम नंबर लाया तो उनसे बुरा कोई नहीं होगा। मुझे बदकिस्मती से सिर्फ 84% नंबर मिला। मैं पिताजी के डर से छिप कर घर में घुसा और स्कूल बैग घर में रख कर अपने गुल्लक में जो भी पैसे थे, ले कर चुपचाप बाहर निकल आया और सीधे स्टेशन पहुंच गया और ट्रेन से हावड़ा चला गया। हावड़ा पहुंचते-पहुंचते मुझे जोरों की भूख लगी तो मैं सड़क पार करके सामने जो होटल मिला, उसके सामने खड़ा हो कर सोच रहा था कि क्या खाऊं। उस समय रात हो चुकी थी और करीब आठ बज रहा था। मैं वहां खड़ा सोो ही रहा था कि इतने में मेरी ही उम्र का एक लड़का, जो शायद उसी होटल में काम करता था, मेरे पास आया और बोला, “ओय, तू यहां क्या देख रहा है? चल तुझे मालिक बुला रहा है।” मैं ने नजर उठा कर सामने देखा, मिठाईयों के शोकेस के ठीक पीछे कुछ ही दूर अंदर में टेबल के पीछे एक कुर्सी में एक करीब पचास साल का काला कलूटा मोटा आदमी बैठा हुआ था और इशारे से मुझे बुला रहा था। टकला, खुरदुुुुरी दाढ़ी, पकोड़े जैसी नाक, गुब्बारे जैसे फूले हुए गाल, कानों पर लंबे लंबे बाल, पान खा खा कर लाल मोटे मोटे होंठ और आड़े टेढ़े पीले पीले दांत, कुछ मिला कर निहायत ही कुरूप और अनाकर्षक।

मैं डरते डरते उनके सामने गया तो बड़े प्यार से पूछा, “बेटे कहां से आए हो?”

“जी मैं घाटशिला से आया हूं”, मैं बोला।

“अकेले हो?” उन्होंने पूछा।

“जी,” मैं बोला।

“क्या नाम है बेटा?” उन्होंने पूछा।

“जी अशोक”, मैं बोला।

“कहां जाना है?” वह पूछा, जिसपर मैं चुप रहा। वह शायद समझ गया कि मैं घर से भाग कर यहां आया हूं। फिर बड़े प्यार से पूछा, “भूख लगी है?”

“जी,” मैं बोला।

“क्या खाओगे?” उसने पूछा जिस पर मैं फिर चुप रहा।

फिर वह उसी लड़के की ओर मुखातिब हुआ जो मुझे बुलाया था और बोला, “अरे मुन्ना, अशोक को ले जा कर गरमागरम रोटी और तड़का खिलाओ। जाओ बेटा मुन्ना के साथ,” ऐसा कहते हुए उसकी आंखें चमक रही थीं।

मुन्ना मुझे लेकर एक कोने वाले खाली टेबल पर आया और मुझे वहां बैठा कर गरमागरम रोटी और तड़का ला कर मेरे सामने देते हुए कहा, “क्या बात है भाई, मालिक तुम पर बहुत मेहरबान है? क्या वे तुम्हें पहले से जानते हैं?”

मैं ने उसकी ओर देखा और बोला, “नहीं तो।”

“फिर क्या बात है भाई?” वह अब मुस्करा रहा था।

“पता नहीं।” मैं बोला और खाने पर टूट पड़ा, मुझे भूख ही इतनी लगी थी।

जब मैं पेट भर कर खा चुका तो होटल का मालिक उठ कर मेरे पास आया और बोला, “अब तुम कहां जाओगे बेटे?”

मैं असमंजस में था कि क्या बोलूं, तभी वह बोल उठा, “कोई बात नहीं, तुम यहीं रह जाओ, तुम्हारे रहने की व्यवस्था मैं यहीं कर देता हूं। मेरा नाम छगनलाल है। तुम मुझे छगन अंकल बोल सकते हो। मुन्ना, कल्लू और रामू यहां इसी होटल में रहते हैं, तुम भी यहां रह सकते हो। अरे मुन्ना, जरा कल्लू को बोलो, अशोक के सोने की व्यवस्था ऊपर वाले तल्ले में कर दे, मेरे बिस्तर के बगल में ही एक बिस्तर और लगा देना इसके लिए।” मुन्ना तुरंत वहां से चला गया और कुछ ही देर में अपने नाम के अनुरूप काला सा छरहरे बदन का मेरी ही उम्र का लड़का कल्लू आ कर बोला, “मालिक, बिस्तर तैयार है।”

“ठीक है, तुम अशोक को ऊपर ले जा कर उसका बिस्तर दिखा दो, जाओ बेटा कल्लू के साथ।” वह मुझसे बोला। मैं कल्लू के पीछे पीछे चल पड़ा और लकड़ी की सीढ़ियों से होता हुआ ऊपर वाले तल्ले पर पहुचा तो देखा, ऊपर वाला तल्ला कोई कमरा नहीं बल्कि पूरा का पूरा तल्ला बड़ा सा हॉल की तरह था जिसके उत्तर की ओर दो चौकियां आस पास पूरब पश्चिम दिशा में लगी हुई थीं जिन पर साफ चादर बिछे हुए थे। सिरहाना पूरब की ओर था। उत्तर पूर्व कोने में एक टेबल और कुर्सी था।

सबसे किनारे वाले बिस्तर की ओर इशारा करके वह बोला, “यह मालिक का बिस्तर है और बगल वाला बिस्तर तुम्हारा है। तुम उस पर सो जाओ, मालिक इस बिस्तर पर सो जाएंगे” इतना कहकर वह नीचे चला गया। जाते वक्त मुझे ऐसा लगा मानो वह अपनी मुस्कराहट छिपाने की कोशिश कर रहा हो। । खैर मैं ने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और अपने बिस्तर पर लेट गया। थका हुआ तो था ही, लेटने के तुरंत बाद ही मुझे गहरी नींद आ गई। रात को करीब दस बजे अचानक मुझे ऐसा लगा मानो किसी ने मेेे गांड़ में चाकू घुसेड़ दिया हो। दर्द के मारे मैं तड़प उठा और मेरी नींद खुल गई। मैं दर्द के मारे चीखने के लिए मुंह खोला लेकिन चीख मेेे मुंह में ही दबी रह गई, क्यों कि मेेंरा मुंह किसी के मजबूत हाथों से बंद था। मुझे इस बात का भी आश्चर्य हो रहा था कि मेरे बदन में कोई कपड़ा नहीं था और मैं बिल्कुल नंगा था। मैं पेट के बल लेटा हुआ था और मेरे ऊपर कोई चढ़ा हुआ था जिसने एक हाथ से मेरा मुंह बंद कर रखा था और दूसरे हाथ से मेरी कमर को जकड़ रखा था। मैं अपने हाथों से मेरे मुंह में सख्ती से कसे हुए हाथ को हटाने की कोशिश करने लगा लेकिन वह हाथ जैसे किसी दानव का हाथ था, टस से मस नहीं हुआ। मैं बेबसी में पैर पटकने लगा और मेरी गांड़ से उठते हुए अकथनीय पीड़ा से मेरी आंखों में आंसू आ गए।

उसी समय मेरे कानों में आवाज आई, “शांत रहो बेटा, छटपटाओ मत, कुछ ही देर में तेरा दर्द खत्म हो जाएगा।” यह होटल के मालिक की आवाज थी। मैं कांप उठा। तो इसका मतलब मेरे ऊपर छगन अंकल चढ़ा हुआ था। मैं एक हाथ मेरी गांड़ की तरफ ले गया तो मेरा दिल धक्क से रह गया। उस भैंस जैसे छगन अंकल का करीब तीन ढाई इंच मोटा लंड मेरी गांड़ में आधा घुसा हुआ था। मुझे कुछ चिपचिपा सा महसूस हुआ, शायद वैसलीन जैसा कुछ तैलीय पदार्थ का इस्तेमाल उसने मेरी कसी हुई कुंवारी गांड़ में अपना मोटा लंड डालने के लिए किया था। वह पूरा नंगा मुझ पर इस तरह सवार था कि मैं हिल भी नहीं पा रहा था। ऐसा लग रहा था मानो कोई भैंस किसी बकरी को चोद रहा हो। मैं अपनी बेबसी पर सिर्फ आंसू बहा सकता था। गनीमत यह था कि उसने अपने बदन का पूरा बोझ मुझ पर नहीं डाला था, वरना उसके राक्षस जैसे शरीर के बोझ से मैं तो मर ही जाता। कुछ देर वह उसी तरह स्थिर रहा तो मुझे थोड़ी राहत मिली लेकिन अभी भी मेरी गांड़ फटने फटने को हो रही थी।

“देखो बेटे, मैं अपना हाथ तेरे मुंह से हटा रहा हूं लेकिन तुम चिल्लाना मत वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।” उसने कहा और अपना हाथ मेरे मुंह से हटा लिया। मैं पूरी तरह दहशत में आ गया और अपना हाथ पैर ढीला छोड़ दिया। “ओह मां, आह्ह्ह प्लीज अपना लंड मेरी गांड़ से निकाल लीजिए, मैं मर जाऊंगा।” मैं कराहता हुआ बोला।

“तू शांत रहेगा तो तुझे कुछ नहीं होगा। थोड़ा दर्द बर्दाश्त कर ले फिर तुझे बहुत मजा आएगा बेटा।” कहते हुए वह मेरी गांड़ में लंड फंसाए हुए मेरी कमर पकड़ कर मुझे थोड़ा ऊपर उठा लिया और हाथों और घुटनों के बल चौपाए की तरह करके मेरे पीछे से आपने लंड का दबाव बढ़ाने लगा।

जैसे जैसे उसका लंड घुसता जा रहा था मेरी गांड़ का सुराख फैलता जा रहा था और मैं दर्द की अधिकता से रोने और गिड़गिड़ाने लगा, “और नहीं डालिए ओह ओ्ओ्ओ्ओह मां मर जाऊंगा, आह मेरी गांड़ फट रही है, छोड़ दीजिए ना प्लीज।” मेरे रोने गिड़गिड़ाने का उस जालिम पर कोई असर नहीं हुआ और पूरा लंड मेरी गांड़ में घुसा ही दिया। ऐसा लग रहा था मानो उनका लंड मेरे गुदा द्वार से लेकर अंतड़ियों तक ठोंक दिया गया हो। “देख बेटा, मेरा पूरा लौड़ा तेरी गांड़ में घुस गया है, तेरी गांड़ फटी क्या? नहीं ना? थोड़ा सब्र कर, सब ठीक हो जाएगा।” वह मुझे सांत्वना देते और पुचकारते हुए बोला। मुझे तो अभी भी मेरी जान निकली सी महसूस हो रही थी, मेरी आंखों से अभी भी आंसुओं की धारा बह रही थी। पूरा लंड घुसा कर वह कुछ पलों के लिए रुक गया, फिर धीरे धीरे बाहर करने लगा। जैसे जैसे बाहर निकल रहा था ऐसा लग रहा था मानो मेरी गांड़ के अंदर खालीपन (शून्यता) आ गई हो और मैं ने राहत की लंबी सांस लेने लगा किंतु यह अहसास क्षणभंगुर था। पुनः उस कसाई ने वही क्रिया दोहराई और पूरा लंड दुबारा डाल कर रुक गया। इस बार उसने मुझे एक हाथ से संभाला हुआ था और दूसरे हाथ से पहले मेरे सीने के उभारों को सहलाने लगा और फिर धीरे धीरे दबाने लगा। फिर वहां से हाथ हटा कर मेरे लंड को सहलाने लगा और मुट्ठी में लेकर मूठ मारने लगा। मुझे यह सब बहुत अच्छा लग रहा था और मैं धीरे धीरे मस्ती में भर गया और भूल गया कि उनका लौड़ा मेरी गांड़ में घुसा हुआ है।

“आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह उफ्फ” मैं मस्त हो कर आहें भरने लगा। उस कमीने की समझ में आ गया कि अब मैं दर्द को भूल कर मूठ मरवाने के आनंद में डूब गया हूं तो फिर एक बार लौड़ा निकाल कर घप्प से लंड का प्रहार कर दिया। “आह्ह्ह्ह्ह्” इस बार मैं ने थोड़ा सा ही दर्द महसूस किया। फिर वही क्रिया बार बार दुहराने लगा, पहले धीरे धीरे, फिर वह धक्कों की रफ़्तार बढ़ाता चला गया। अब मैं सारा दर्द भूल गया था। मैं मूठ मरवाने के आनंद में इतना खो गया कि कब मेरी गांड़ चुदते चुदते ढीली हो गई मुझे पता ही नहीं चला। करीब पांच मिनट में ही थरथराने लगा और आंखें बंद कर आनंद के सागर में गोते खाने लगा और “आ्मैंआ्आ्आ्ह्ह्ह्ह” चरमोत्कर्ष के अकथनीय आनंद में सराबोर होकर झड़ने लगा, फिर खल्लास हो कर ढीला पड़ गया। मेरे जीवन का वह पहले स्खलन का अद्भुत चिरस्मरणीय आनंदमय अहसास। अब तक तो वह कसाई मुझे आराम से भंभोड़ना चालू कर दिया था। मेरे सीने के उभारों को मसलने लगा, दबाने लगा ओह, और मेरी गांड़ को चोद चोद कर मुझे दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया।

अजीब अजीब शब्दों के साथ अपने उद्गार प्रकट करता रहा, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरी जान, आह्ह्ह्ह मेरे प्यारे चिकनी गांड़ वाले गांडू, मस्त गांड़ है रे हरामी, तेरी तरह गांड़ जिंदगी में नहीं चोदा मेरी रंडी कुतिया, उफ़ उफ़ आह आह।” करीब बीस मिनट तक मुझे बुरी तरह चोदा और फिर जब खलास होने का समय आया तो मुझे इतनी जोर से जकड़ लिया कि ऐसा लगा मानो मेरी सांस ही रुक जाएगी। करीब एक मिनट तक मेरी गांड़ में अपना वीर्य फचफचा के डालता रहा फिर किसी भैंसे की डकारते हुए मुझे लिए दिए लुढ़क गया। मैं चकित था कि शुरू शुरू में इतना भयानक दर्द अंत अंत में कैसे छूमंतर हो गया मुझे पता ही नहीं चला। उनका लंड करीब करीब साढ़े छः इंच लम्बा था, जिससे पहली ही बार में चुदने में सक्षम हो गया था।

“ओह बेटा मजा आ गया। बहुत सुन्दर गांड़ है रे तेरा। तुझे मजा आया ना?” उसने कहा।

“ओह अंकल” मैं शरमा गया और उनके काले कलूटे तोंदियल शरीर से लिपट कर उनके सीने पर सिर रख कर सिर्फ इतना ही बोल पाया, “हां अंकल”।

“आज से मैं तुम्हें अपनी रानी बना कर रखूंगा मेरी जान। आज से पहले तेरे जैसा इतना सुंदर और मस्त लौंडा मुझे कभी नहीं मिला। कल से तू भी इस होटल का मालिक है। तुझे जो चाहिए बोल देना मेरी छमिया, तेरे कदमों में लाकर डाल दूंगा। अब से तू मेरी रानी और मैं तेरा राजा। मुझे छोड़ कर कहीं और जाने की सोचना भी मत मेरी जान। मुझे तुमसे प्यार हो गया है मेरे लंड की रानी।” वह भावनाओं में बहकर बोला और मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में लेकर मेरे होंठों पर अपने मोटे-मोटे होंठों को रख कर भरपूर चुम्बन दिया। इधर मैं सोच रहा था कि हर्ज ही क्या है यहां इनके साथ रहने में। मुझे रानी बना कर रखेगा, मेरी सारी सुख सुविधा का ख्याल रखेगा, आराम ही आराम, राज ही राज। जिस मासूमियत और इमानदारी से उसने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया, मैं उसका कायल हो गया। मैं उनके कुरूप चेहरे की सारी कुरूपता भूल कर उनके होंठों पर अपने होंठों को चिपका दिया और उनके प्रेमरस में सराबोर होता रहा।

फिर मैं किसी लौंडिया की तरह शरमाते हुए उनके नंगे शरीर से चपके चिपके बोला, “मैं कहां जाऊंगा भला आपके जैसे प्यारे प्यारे महबूब को छोड़कर। आज आपने मुझे एक नये सुख से परिचित कराया। नयी दुनिया का दर्शन कराया। मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाने वाला हूं। आज से आप मेरे राजा हो और मैं आप का वही हूं, जिस भी संबोधन से मुझे पुकारिए, रानी, प्यारी, चिकना, लौंडा या कुछ भी।” मैं भी भावनाओं में बहकर कच्ची उम्र की नादानी में बोल उठा। फिर उसी सुखद अहसास के साथ एक दूसरे के नंगे तन से लिपटे नींद की आगोश में चले गए।

उस दिन के बाद उस होटल के मालिक द्वारा रोज मेरे साथ यही क्रम दुहराया जाने लगा, नतीजा यह हुआ कि धीरे धीरे गुदा मैथुन मेरी आदत बन गई। करीब दस दिनों बाद एक दिन मेरे मामा ने मुझे वहां देख लिया और अपने साथ ले जाने लगे। होटल के मालिक ने जबरन रोकने की कोशिश की तो मेरे मामा ने पुलिस की सहायता ली और मुझे अपने साथ घर ले आए। हावड़ा में दस दिन की अवधि में मैं गुदामैथुन का अभ्यस्त हो गया और आज तक जारी है। मैं शादी करने का भी इच्छुक नहीं था, किंतु घर वालों की इच्छा को टालना मेरे वश में नहीं था, मजबूरी में मुझे शादी करनी पड़ी। मुझे इस बात का दुख है कि मैं लक्ष्मी को पूरी तरह पत्नी सुख नहीं दे सकता हूं। पर-पुरुषों से उसके अंतरंग संबंधों के बारे में भी मुझे पता है लेकिन अपनी कमजोरी के कारण मैं चुप रहता हूं। वह अब भी सोचती है कि मुझे उसकी इन कारगुज़ारियों की जानकारी नहीं है। अपनी वासना की भूख शांत करने के लिए उसने कई पुरुषों से अंतरंग सम्बन्ध कायम कर लिया है, इससे वह खुश है और हमारे परिवार में भी बिखराव का कोई खतरा नहीं है, इसलिए मैंने अपना मुंह बंद रखना ही बेहतर समझा।” इतना कह कर वह चुप हो गया।

यही है अशोक की कहानी।” बड़े दादाजी इतना कहकर चुप हो गये। सभी लोग खामोशी के साथ पूरी कहानी सुनते रहे। सभी के चेहरों पर अलग-अलग भाव थे। दादाजी के चेहरे पर ग्लानी स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी, क्योंकि उनकी कठोरता के कारण मेरे पापा को इस हादसे का शिकार होना पड़ा और मेरे पापा इस रास्ते पर बढ़ते चले गए। मेरी मां के भीतर क्या चल रहा था अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था। जहां मेरे पापा के वर्तमान स्थति के लिए सहानुभूति थी वहीं इस बात की ग्लानि भी थी कि पर-पुरुषों से गुप्त अंतरंग संबंध स्थापित करके अपनी वासना पूर्ति के बारे में, जैसा कि वह सोच रही थी कि मेरे पापा अनभिज्ञ हैं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं था, बल्कि मेरे पापा को मेरी मां के बारे में सबकुछ पता था। मैं अपने बारे में क्या कहूं। मेरे परिवार के हर एक सदस्य के बारे में एक एक करके जो रहस्योद्घाटन हो रहा था, अब मुझे कुछ भी आश्चर्य नहीं हो रहा था। मैं ने भी मन में ठान लिया कि जैसे सभी अपने अपने ढंग से जी रहे हैं और जीने का लुत्फ उठा रहे हैं, मैं भी अपने ढंग से जिऊंगी और जीवन का भरपूर आनंद उठाऊंगी। अपने पांचों बुजुर्ग पतियों के संग खुल कर रंगरेलियां मनाते हुए अपनी ही शैली में जीवन का भरपूर आनंद लूंगी।

मेरी मां के मुख से मेरे पापा की नामर्दी और बड़े दादाजी के मुख से पापा की समलैंगिकता के बारे में सुनते सुनते काफी समय हो चुका था। मैं उठकर शाम की चाय बनाने के लिए किचन की ओर बढ़ी और हरिया भी मेरे पीछे पीछे उठ कर चला आया। जैसे ही मैं किचन में घुसी, हरिया ने मुझे पीछे से पकड़ लिया और मेरी चूचियों को दबाने लगा। “ओह रानी, तेरी मक्खन जैसी मस्त चूचियां।”

“अरे क्या करते हो राजा?” मैं आहिस्ते से बोली।

“कुछ नहीं रानी, तू चाय बना, मैं अपना काम करता हूं,” कहते हुए उसने मेरा लहंगा कमर तक उठा दिया और झट से मेरी पैंटी को नीचे खिसका दिया। पता नहीं उसने कब अपने पैजामे को नीचे गिरा दिया था। अपना तना हुआ लिंग सीधे मेरी पनियाई हुई योनि में पीछे से एक ही झटके में घुसेड़ दिया।

“हाय दैया, कितने बेशरम हो जी। इतनी भी क्या बेसब्री?” मैं हकबका उठी।

“तू है ही इतनी मस्त कि बर्दाश्त ही नहीं होता है। तुझे तो पता ही नहीं कि कहानी सुनते सुनते मेरा लौड़ा कैसा अंगड़ाई ले रहा था। चल तू अपना काम कर, मेरे लंड की प्यास भी बुझ जाएगी और तुझे चाय बनाने में मज़ा भी आएगा।” हरिया बड़ी बेशर्मी से बोला और मेरी चूचियों को मसलते हुए चोदने लगा।

“ओह राजा, ठीक है तू मुझे चोदता रह, मैं चाय बनाती हूं” मैं भी मस्ती में भर कर बोल उठी। जब तक चाय तैयार हुआ, हरिया ने चुदाई का एक दौर पूरा कर लिया और मैं भी उसके साथ ही झड़ गई, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा साले चोदू मादरचोद, झड़ गई आ्आ्आह ओ्ओ्ओ्ओह रे मैं।”

“आह रानी ओह ओ्ओ्ओ्ओह मजा आ गया, मैं भी गया ओह मेरी चूतमरानी, जितना भी तुझे चोदूं मन ही नहीं भरता, इतनी मस्त है तू, क्या किस्मत पाया है हम लोगों ने, उफ़ क्या लौंडिया है तू मेरी जान” हरिया बोला।

“अब ज्यादा प्रशंसा मत कीजिए मेरे स्वामी, चलिए चाय लेकर बैठक में।” मैं बोली और फटाफट हम अपना अपना हुलिया दुरुस्त कर के चाय लेकर बैठक में आ गए, मगर मेरे चेहरे की रंगत ने किचन के अंदर की लीला का पर्दाफाश कर दिया। “साले मादरचोद, अकेले अकेले चोद लिया ना।” दादाजी मुस्कुरा कर बोले। मैं शर्म से लाल हो उठी। बैठक में उपस्थित सारे लोग हंसने लगे।

“बहुत बेशरम हो गई है कमीनी,” मेरी मां बड़बड़ाई।

“आखिर बेटी किसकी हूं” मैं ने भी पलटवार किया।

सभी खिलखिला कर हंसने लगे।

“अरे भाई हम सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। कोई किसी से कुछ कम बेशरम थोड़ी है।” नानाजी बोले।

“हां भई हां। चलो मान लिया, एक सुखी परिवार बेशरमों का। आज का क्या प्रोग्राम है?” बड़े दादाजी बोले।

“आज का प्रोग्राम मेरे अनुसार होगा।” मैं बोली।

“कैसा प्रोग्राम?” सभी प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगे।

“वो आपलोग आठ बजे रात को देख लीजिएगा” मैं ने रहस्यात्मक अंदाज में उत्तर दिया।

सवेरे सभी लोग नहा धो कर फ्रेश होकर बैठक में बैठे गप मार रहे थे, इधर नाश्ता बनाने के लिए मैं और हरिया किचन में व्यस्त थे। अचानक हरिया ने मुझे पीछे से अपनी बाहों में दबोच लिया। मैं हड़बड़ा गई और छूटने की कोशिश का नाटक करने लगी।

“छोड़ो मुझे, रात में मां और मुझे चोद कर मन नहीं भरा क्या?” मैं बनावटी गुस्से से बोली।

“तेरे जैसी बीवी पाकर तो हम धन्य हो गये रानी। इतनी मस्त लौंडिया हमारी बीवी होगी इसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। तुझे एक बार चोदने के बाद मन ही नहीं भरता है, ऐसा लगता है तुझे चिपका कर रखूं। देखो अभी भी मेरा लौड़ा कैसा फनफना रहा है।” वह बोल रहा था और मेरी चूचियों को बेरहमी से मसलना शुरू कर दिया। मेरी नाईटी कमर से ऊपर तक उठा दिया और पैंटी को नीचे खिसका दिया।

मुझे भी मज़ा आ रहा था लेकिन बनावटी गुस्से में बोली, “छोड़िए ना, कैसे आदमी हैं, अभी कोई आ जायेगा तो?”

“कोई आ भी गया तो क्या? सभी तो तेरे पति हैं।” बेशर्मी से बोला।

“मां या चाची आ गई तो?” मैं बोली।

“आने दो, तेरी मां भी तो मुझ से चुद चुकी है। हां तेरी चाची को चोदने की तमन्ना मन में रह गई। मुझे और करीम को तो घास ही नहीं डालती है। मौका मिला तो साली को ऐसा चोदूंगा कि वह भी क्या याद रखेगी।” बोलते बोलते उसने मुझे किचन के स्लैब पर ही झुका दिया और बिना किसी पूर्वाभास के अपना तना हुआ लिंग एक ही करारे ठाप से मेरी योनि में पैबस्त कर दिया।

“उफ्फ” मेरे मुख से आनंद की सिसकारी निकल पड़ी। एक पल रुक कर फिर जो उसने चोदना शुरू किया तो मानो भूचाल आ गया। “आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह उफ्फ” में मस्ती में डूबती चली गई।

“आह रानी कितनी मस्त चूत है ओह मेरी जान।” धकाधक, फचाफच कुत्ते की तरह चोदने लगा और करीब दस मिनट में ही मुझे स्वर्ग की सैर करा दिया। अपने वीर्य को मेरी योनि में उंडेल कर मुझसे अलग हुआ और हम दोनों अपने कपड़े दुरुस्त कर पुनः नाश्ता बनाने में जुट गए।

नाश्ता बनाते बनाते मैं ने हरिया से कहा, “अभी आप कह रहे थे कि चाची ने कभी आप लोगों को घास नहीं डाला। अगर चाची मान जाए तो?”

“क्या? ऐसा हो जाए तो मजा ही आ जाएगा। मैं और करीम तो कई दिनों से इस ताक में हैं। ऐसा चोदेंगे कि वह भी क्या याद रखेगी।” तपाक से हरिया ने कहा।

“ठीक है फिर आज रात को तैयार रहिए।” मैं मुस्कुरा कर बोली।

“ओह मेरी जान, अगर ऐसा हुआ तो मैं तेरा गुलाम हो जाऊंगा।” मुझे बांहों में भर कर चूम लिया।

“अब ज्यादा मस्का मारने की जरूरत नहीं है। रात का इंतज़ार कीजिए।” मैं छिटक कर अलग होते हुए बोली।

इतने में चाची और मां भी किचन में आ गयीं।

“क्या हो रहा है कामिनी?” चाची बोली।

“कुछ नहीं बस नाश्ता तैयार कर रहे हैं।” मैं बोली, लेकिन मेरा चेहरा चुगली कर चुका था।

“तुम लोगों को देख कर तो लगता है नाश्ता कर चुके हो।” चाची मुस्कुरा कर बोली। हम दोनों को तो मानो सांप सूंघ गया।

“जैसा आप सोच रही हैं वैसा कुछ नहीं है चाची।” मैं ने किसी तरह से बात को संभालने की कोशिश की किन्तु असफल रही।

“सब समझती हूं री। नयी नयी शादी है। नया नया स्वाद मिल चुका है। रात को तो बड़ी बेशर्मी से सबके सामने चुद रही थी और अब काहे की शर्म।” चाची बोली।

“छोड़ो ये सब बातें और नाश्ता जल्दी तैयार करो। इन कमीनों के मुंह लग के कोई फायदा नहीं। इसने तो अपनी जिंदगी बर्बाद कर ही ली है। पांच पांच मर्द, छि:, द्रौपदी बनने चली है। भगवान जाने इसका क्या होने वाला है। इनको इनके हाल पर छोड़ दो। नाश्ता करने के बाद शॉपिंग के लिए जाऊंगी। अगर तुझे चलना है तो तू भी मेरे साथ चल।” मेरी मां के कहने के लहजे में तल्खी मैं महसूस कर सकती थी।

“मम्मी तुम मेरी चिंता तो छोड़ ही दो। मैं अपने इस हाल में बेहद खुश हूं। मैं अपनी जिंदगी अपने तौर पर जी कर अपना कैरियर भी बना कर दिखा दूंगी। तुम अपने बेटे को संभालने की चिंता करो।” मैं भी उसी लहजे में बोली।

“तुम लोग शुरू हो गये। अब बस करो। ” कहते हुए चाची ने बात खत्म कर दिया और हम फटाफट नाश्ता तैयार कर खाने की मेज पर आ गए। सबने मिलकर नाश्ता किया और मां चाची को लेकर शॉपिंग के लिए चली गई। इधर रात के लिए मेरे दिमाग में शैतानी कीड़ा चलने लगा। दोपहर खाना खाने से पहले मां और चाची शॉपिंग करके आ गयीं। खाना खाते वक्त हमारे बीच चुहलबाज़ी होती रही लेकिन तब भी मम्मी निरपेक्ष थीं। खैर मुझे क्या। मेरे दिमाग में तो आज रात का प्रोग्राम घूम रहा था।

खाना खाने के बाद आराम करने के लिए मम्मी और चाची अपने अपने कमरों में चले गए लेकिन मेरे पांचों पांडव मेरे साथ मस्ती के मूड में थे। मेरे पीछे पीछे सभी मेरे कमरे में आ गए और आनन फानन में सबने मुझे नंगी कर दिया। मैं झूठ मूठ की ना नुकुर करती रही लेकिन शनै: शनै: अपने आपको उनकी कामुकता के हवाले कर दिया। कौन क्या कर रहा था इससे मुझे कोई लेना देना नहीं था। मेरे होंठों को चूमा जा रहा था, चूसा जा रहा था, मेरे उरोजों को मसला जा रहा था चूसा जा रहा था, मेरी योनि और गुदा द्वार चाटी जा रही थी और मैं आंखें बंद कर मस्ती के आलम में सिसकारियां भर रही थी। इसी क्रम में कब सभी मादरजात नंगे हो गए मुझे पता ही नहीं चला।

मेरी उत्तेजना के चरमोत्कर्ष को भांप कर दादाजी ने मेरी पनियायी योनि में अपने लिंग को सट्टाक से ठोंक दिया “ले मेरा लौड़ा मेरी रानी” और करवट ले कर बड़े दादाजी के लिए मेरी गुदा का द्वार उपलब्ध कर दिया।

बड़े दादाजी ने मौके पर चौका जड़ दिया और “अब मेरा लंड खा” कहते हुए एक ही करारे प्रहार से अपने लिंग को मेरी गुदा में पैबस्त कर दिया। फिर दोनों ओर से मुझे लगे झकझोरने और मैथुन में रम गए। हरिया अपने मूसल सरीखे लिंग को मेरे मुंह में डाल कर मुखमैथुन में लीन हो गया। मेरे दोनों उरोजों पर नानाजी और करीम टूट पड़े और चूस चूस कर लाल कर दिया। करीब पंद्रह बीस मिनट बाद ज्यों ही दादाजी और बड़े दादाजी मुझ पर अपनी पहलवानी दिखा कर फारिग हुए, नानाजी और करीम ने उनका स्थान ले लिया और शुरू हो गये अपनी जोर अजमाइश में।

“अब मेरे लंड का स्वाद चख बुरचोदी साली कुतिया,” कहते हुए करीम ने अपने मेरी योनि में हमला बोला वहीं नानाजी ने “मेरा लौड़ा भी ले मेरी गांड़ मरानी रानी” कहते हुए मेरी गुदा पर। हालांकि मैं दादाजी के लिंग से अपनी योनि कुटवा चुकी थी किंतु करीम के विशाल लिंग ने मुझे चीख निकालने पर विवश कर दिया, आखिर उन लोगों के बीच सबसे लंबा और मोटा लिंग उन्हीं का तो था। मेरे मुंह में हरिया का लिंग अब फूल कर झड़ने के कागार पर था, अतः मेरी चीख हलक से बाहर नहीं निकल सकी, घुट कर रह गई।

“ले पी मेरे लंड का रस आ्मैंआ्आ्आह्ह्ह्” कहते हुए हरिया मेरे मुंह में ही झड़ने लगा और मैं उसी अवस्था में हरिया के वीर्य का एक एक कतरे को हलक से उतारती चली गई। हरिया के फारिग होते ही नानाजी और करीम पूरी स्वतंत्रता के साथ मेरे तन पर पिल पड़े थे ऐसा लग रहा था मानो दोनों के बीच घमासान संग्राम छिड़ गया हो, जिनके बीच मैं पिसती जा रही थी। करीब पच्चीस मिनट बाद करीम ने मुझे छोड़ा और निढाल हो गया। इधर नानाजी मुझे कुतिया बना कर अपने लिंग गांठ को मेरी गुदा के अंदर फंसा कर पलट गये और कहने लगे, “आह मेरी कुतिया, ओह मेरी लंड रानी,” उसी स्थिति में हम एक दूसरे से करीब दस मिनट और लटके रहे। आहिस्ता आहिस्ता नानाजी का लिंग गांठ संकुचित हो हुआ और फच्चाक की जोरदार आवाज के साथ बाहर निकल आया।

“ओह अम्म्म्म्म्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” मैं पसीने से पूरी तरह तर बतर हो चुकी थी। इस दौरान मैं कम से कम चार बार खल्लास हुई। उतेजना के आलम में कितनी बेहिसाब गन्दी गन्दी गालियों का प्रयोग हुआ पता नहीं। इन पांचों ने तो मिलकर मुझे पूरी तरह निचोड़ डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। मैं तो जैसे दूसरी दुनिया में ही पहुंच चुकी थी। नुच चुद कर निढाल आंखें बंद किए मैं लंबी लंबी सांसें ले रही थी। यह सब कुछ मेरे लिए बेहद सुखद था, स्वर्गीय, अवर्णनीय।

“ओह ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरे स्वामियों, कितना आनन्द, उफ़, धन्य कर दिया आप लोगों ने मुझे।” मैं बड़ बड़ कर रही थी। मेरे चारों ओर मेरे पति तृप्त हो कर पसरे हुए थे। मेरी कब आंख लग गई पता ही नहीं चला। शाम को करीब पांच बजे मेरी नींद खुली तो देखा हम सब अभी तक उसी तरह नंग धड़ंग अवस्था में बेतरतीब ढंग से पसरे हुए थे। मैं हड़बड़ा कर उठी और टूटते शरीर के बावजूद बाथरूम में जाकर फ्रेश हो गई और रात के कार्यक्रम के लिए तैयारी करने लग गयी।

आशा करती हूं कि आप लोगों ने “कामिनी की कामुक गाथा का (भाग 23)” अवश्य पढ़ा होगा। उस कड़ी के बाद मेरे पापा के साथ और भी काफी कुछ हुआ था उसी होटल में, जिसके बारे में मैं बताना भूल गयी थी। उस कड़ी में आप ने पढ़ा कि मेरे पापा अपने स्कूली जीवन में ही किस तरह समलैंगिक संबंध से परिचित हुए। दादाजी के डर से घर से भाग कर किस तरह हावड़ा के एक होटल के मालिक के चंगुल में जा फंसे जिसने मेरे पापा की सुंदरता पर मोहित हो कर उन्हें अपने होटल में पनाह दी और उनका कौमार्य भंग किया या यों कहें कि उनकी कुंवारी गुदा का उद्घाटन कर दिया। यह मेरे पापा के जीवन में समलैंगिकता का प्रथम अनुभव था और आश्चर्यजनक रूप से उन्हें इसमें अद्भुत आनंद भी प्राप्त हुआ। प्रथम रात्रि में ही संभोग सुख से परिचित हो कर वे होटल मालिक के दीवाने हो गए। इसके आगे की कहानी उन्हीं की जुबानी सुनिए: –

“सुबह जब मेरी नींद खुली तो देखा कि मैं अभी भी नंगे, पूरी बेहयाई के साथ उस मोटे भैंसे के शरीर से चिपका और उनके मजबूत बांहों में सिमटा हुआ था। अब मैं ध्यान से उनके पूरे शरीर का मुआयना करने लगा। पूरा शरीर काले भैंस की तरह था और उसके सारे शरीर पर बाल ही बाल भरा हुआ था। बड़ा सा तोंद उनके सांसों के साथ फूल पिचक रहा था। बांहें मेरी जांघों की तरह मोटे मोटे थे। उनकी जांघें मेरी कमर की मोटाई के बराबर थे। उनका कद करीब करीब छः फुट के करीब रहा होगा। उनका लंड इस वक्त सोई हुई अवस्था में भी पांच इंच के करीब लंबा रहा होगा। मैं कल्पना करने लगा कि तनाव की स्थिति में यही लंड कम से कम छः से साढ़े छः इंच तो अवश्य रहा होगा या फिर सात इंच रहा होगा। लंबाई के हिसाब से भी उसकी मोटाई भी रही होगी जिसके प्रहार को मैं ने अपनी संकीर्ण गुदा मार्ग में झेला और उस प्रथम गुदा मैथुन के द्वारा मेरी गांड़ का कुंवारापन छिन गया था। मैं इस बात पर भी चकित था कि इस भैंसे सरीखे मर्द की काम पिपासा को किस तरह शांत कर सका। मेरे साथ जो भी हुआ वह आकस्मिक था, दर्दनाक था, किंतु अंततः इस घटना ने मुझे अत्यंत सुखद अनुभव भी प्रदान किया। मेरी गांड़ में अभी भी मीठा मीठा दर्द हो रहा था और मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था कि मेरी गुदा का द्वार फूल गया है। मेरा हाथ अनायास ही मेरी गांड़ पर चला गया और मैं यह महसूस कर चौंक पड़ा, हाय राम, सचमुच में मेरी गुदा का द्वार काफी फूल गया था। खैर जो भी हो, मैं गुदा मैथुन के अनिर्वचनीय आनंद से परिचित हो गया था और इसके लिए मैं इस जंगली भैंसे का अहसानमंद था। मेरे लिए इस सुबह का सूरज एक नया दिन और नये सुखद अध्याय को लेकर उदय हुआ था। मैं कृतज्ञ था इस भैंसे का और अपनी कृतज्ञता जताने के लिए उस होटल के मालिक के नग्न देह से चिपक कर उनके बदशक्ल चेहरे पर बेसाख्ता चुंबनों की बौछार कर बैठा।

वह भैंसा भी मुझे अपनी बाहों में भर कर मेरे होंठों को चूम लिया और बोला, “मेरी जान, मेरी रानी, रात में तूने मुझे इतनी खुशी दी कि मैं तेरा गुलाम बन गया। आज से यहां के जितने नौकर हैं, सब तेरे नौकर हैं। तू इस होटल की मालकिन है। जा ऐश कर।” मैं उठ कर ज्यों ही बाथरूम की ओर जाने के लिए कदम बढ़ाया, गांड़ के दर्द से बेहाल हो उठा। बड़ी मुश्किल से एक एक कदम उठाते हुए बाथरूम गया और ज्यों ही टॉयलेट में बैठा, मेरे फैले हुए मलद्वार से होटल मालिक के वीर्य से लिथड़ा मल भरभरा कर निकलने लगा और पूरा पेट साफ़ हो गया। मैं फ्रेश होकर किसी प्रकार ऊपर तल्ले से जैसे ही नीचे आया, मेरी बदली हुई चाल के कारण मुन्ना और कल्लू गहरी नजरों से मुझे देखने लगे और मुस्कुराने लगे। मेरी हालत देख कर छगन अंकल ने मुझे कल्लू के साथ फिर वापस ऊपर तल्ले में भेज दिया और कल्लू को हिदायत दी कि वह पूरे दिन मेरे साथ रहे और मेरे आराम का पूरा ख्याल रखे।

कल्लू जब मेरे साथ ऊपर तल्ले पर आया तो मुझ से पूछा, “क्या हुआ भाई कल रात?”

“कुछ भी तो नहीं” मैं शरमाते हुए बोला।

“अरे हमसे क्या छिपाना। हमें सब पता है कल रात तेरे साथ क्या हुआ। तेरी चाल ही सबकुछ बता रही है। हमें पता है ऊपर वाले तल्ले में मालिक किसी को क्यों सुलाता है। हमारे साथ भी यह हो चुका है। तू तो हमसे कई गुना खूबसूरत है। तुझ पर तो लगता है लगता है मालिक पूरा फिदा हो गया है। जिस तरह वह तेरा पूरा ख्याल रख रहा है, ऐसा लगता है तू यहां पर राज करेगा।” वह बोला। मैं मारे शरम के पानी पानी हो गया।

फिर कालू मुझे आराम से सुला कर बोला, “तू बढ़िया से आराम कर ले, मैं चलता हूं,” कहकर वह नीचे चला गया। मैं पूरे दिन आराम किया और रात के वक्त जब छगन अंकल सोने के लिए आया तो एक खास किस्म का मलहम उसके हाथ में था, मेरे कपड़ों को उतार कर उस मलहम को बड़े प्यार से मेरी गांड़ में लगाया। कुछ ही मिनटों में मेरा दर्द गायब हो गया। मैं उनसे लिपट गया और अपने नंगे बदन को उनकी बांहों में समर्पित कर दिया। “ओह मेरे स्वामी, कर रात की तरह आज मुझे फिर वही सुख दे दीजिए ना राजा।” मैं बेसब्री से उनके लुंगी को खोल कर नंगा कर दिया और उनके लंड को पकड़ लिया।

छगन अंकल ने बड़े प्यार से मुझे बांहों में लेकर चूमा और कहा, “वही मज़ा आज भी और आने वाले समय में भी देने वाला हूं मेरी रानी। आज तू पहले मेरे लौड़े से जी भर कर खेल। अपने मुंह में लेकर अच्छी तरह से चूस। फिर मैं तुझे जन्नत की सैर कराऊंगा मेरी रानी।” मैं पहले उनके फनफनाए लौड़े को हाथों में लेकर सहलाने लगा, फिर मुंह से चूमा और फिर मुंह में ले कर लॉलीपॉप की तरह चूसने लगा। उफ्फ, उस वक्त मेरे अंदर वासना की भयंकर आग धधकने लगी थी। अब उसने मुझे बड़े प्यार से लिटा दिया और मेरे दोनों पैर फैला कर अपने कंधों पर उठा लिया और अपना लौड़ा मेरी गांड़ में घुसाने लगा।

“आह राजा, ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरे स्वामी, ओह मेरे गांड़ के रसिया।” मेरे मुंह से आनन्द के मारे सिसकारियां निकलने लगीं। हल्का हल्का मीठा मीठा दर्द जरूर हो रहा था किन्तु आनंद भी उतना ही मिल रहा था। धीरे उसने पूरा लौड़ा मेरी गांड़ में ठेल दिया।

“आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह रानी, ओह मेरी जान, मेरी प्यारी रंडी कुतिया उफ़, मजा आ रहा है,” वह मस्ती में भर कर बोल उठा। आज मुझे आरंभ में हल्की पीड़ा हुई किंतु कुछ ही पलों में गायब हो गया और फिर कुछ भी तकलीफ का अनुभव नहीं हो रहा था, या तो उस मलहम का असर था या कामोत्तेजना का असर था, मैं अपनी गांड़ में उनके लंड के घर्षण से आनंद विभोर हो रहा था। वह पूरे जोश से घपाघप चोदे जा रहा था और करीब आधे घंटे बाद मुझे कस के जकड़ कर मेरी गांड़ में अपना मदन रस उगलने लगा। उसका गरमागरम लावा मेरी गांड़ में छर्र छर्र भरता गया और मुझे कर सराबोर कर दिया। इस दौरान उन्होंने मेरे लंड को भी मूठ मार कर मुझे झाड़ दिया था। हम दोनों ने आज चुदाई का भरपूर लुत्फ उठाया। फिर मैं सुखद अहसास के साथ उनके बनमानुषि नग्न देह से छिपकली की तरह चिपक कर निद्रा के आगोश में चला गया।

अगले दिन मुझे काफी राहत थी और चलने फिरने में भी कोई खास कष्ट नहीं हो रहा था। तीसरी रात को खाना खाने के बाद उन्होंने एक पैकेट ला कर मुझे दिया और कहा, “इसमें कुछ कपड़े हैं तुम्हारे लिए, यह लड़कियों के कपड़े हैं। मैं चाहता हूं कि आज तुम ये कपड़े पहनो और लड़कियों की तरह सज जाओ। तुम लड़कियों के कपड़ों में लड़कियों से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत दिखोगे। आज मैं तुम्हें इन्हीं कपड़ों में प्यार करूंगा।” फिर वे नीचे चले गए। मैं रोमांचित हो उठा। मैं फटाफट कपड़े निकाला तो देखा, लहंगा, चोली और चुन्नी था। अपने सारे कपड़े उतार कर जब मैं लहंगा चोली पहनने लगा तो मुझे ऐसा अहसास हो रहा था कि मैं सचमुच की लड़की हूं। कपड़े ठीक मेरी ही साईज के थे। चोली पहनने में थोड़ी दिक्कत हुई किंतु अंततः ठीक-ठाक पहनने में सफल हो गया। फिर जब मैं ने दर्पण में खुद को देखा तो शर्म के मारे पानी पानी हो उठा। सचमुच में मैं बहुत खूबसूरत लड़की में परिवर्तित हो चुका था। पैकेट में पाउडर और लिपस्टिक भी था, जिसे मैं ने बड़ी सावधानी से इस्तेमाल किया और मैं अब क़यामत ढा रहा था। उस समय हिप्पी कट लंबे बालों का प्रचलन था इसलिए घुंघराले बालों के बावजूद करीने से अपने लंबे बाल संवारने के बाद तो मैं पूरी तरह बिजली गिराने को तैयार हो गया। करीब साढ़े नौ बजे छगन अंकल ऊपर आए तो मुझे देख कर उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उन्हें अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी खूबसूरत लड़की उनका इंतजार कर रही है। मैं किसी नयी नवेली दुल्हन की तरह लजा रहा था।

धीरे धीरे वे मेरे पास आए और मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में लेकर कर कुछ पल अविश्वसनीय नजरों से देखते रहे, “ओह मेरी रानी, कितनी खूबसूरत हो। मैं कितना खुशनसीब इनसान हूं कि मुझे तुझ जैसी परी मिल गई।” फिर धीरे से अपने मोटे-मोटे होंठों से मेरी गुलाब की पंखुड़ियों की तरह होठों पर अपना प्रेम चिन्ह अंकित कर दिया। मैं विभोर हो गया। मेरी पलकों पर चुम्बन अंकित किया। आहिस्ता आहिस्ता मेरी चोली को खोलने लगे और मेरी कमर के ऊपरी हिस्से को निर्वस्त्र कर दिया। फिर मेरे सीने के उभारों पर अपने होंठ रख कर चूसने लगे।

“ओह, ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा, उफ़ उफ़ आह मां” मैं सिसक उठा। फिर चूमते हुए मेरे पेट से हो कर नाभि की ओर चले गए। मैं बता नहीं सकता कि उस वक्त मैं किस तरह भयानक वासना की आग में जल रहा था। धीरे धीरे उन्होंने मेरा लहंगा भी उतार दिया। मैं जान बूझ कर अंदर कुछ नहीं पहना था। मैं बिल्कुल नंगा हो गया। पहले उन्होंने मेरे लंड को चूसना शुरू किया फिर धीरे धीरे मुझे पलट दिया और मेरी गांड़ की गोलाईयों को चूमने लगे। फिर मेरे पैरों को फैला कर मेरी गुदा द्वार पर होंठ रख कर चूमने लगे और धीरे धीरे अपनी जीभ गुदा मार्ग में डाल कर अंदर-बाहर करने लगे। यह सब मेरी बर्दाश्त के बाहर था, उफ्फ ओह ओ्ओ्ओ्ओह वह आनंद का सागर, जिसमें मैं डूबता जा रहा था। मैं भी उत्तेजित हो कर अपनी गांड़ ऊपर उछालने लग गया था। उसके बाद जो हुआ वह तो मेरे लिए यादगार रात बन कर रह गया। उन्होंने उस रात तीन बार मेरे साथ संभोग किया, कोई भी मुद्रा नहीं छोड़ा। करीब सवेरे तीन बजे तक जी भर कर हमने चुदाई का भरपूर मजा लिया और निढाल हो कर इतनी गहरी नींद में सोए कि सीधे दस बजे बड़ी मुश्किल से नींद खुली। ओह ओ्ओ्ओ्ओह इतनी खुशी, शब्दों में बयां करना असंभव था।

सवेरे उठते उठते जगन अंकल ने मुझे बांहों में भर कर जी भर के चूमा और बोले, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह मेरी जान, तूने मुझे पागल कर दिया, उफ़ अब तक मुझे तू क्यों नहीं मिला मेरी छम्मकछल्लो।”

“ओह राजा, मेरे रसिया, आपने मुझे नयी दुनिया का दर्शन करा दिया, मैं तो निछावर हो गया। आप ही मेरे बलमा, आप ही मेरे स्वमी हो,” मैं भावावेश में बोल उठा।

उसके बाद मैं एक हफ्ते में ही छगन अंकल की चुदाई से पूरा माहिर गांडू बन गया। वहां रहते रहते मुझे गांड़ मरवाने की आदत हो गई। मुन्ना, कल्लू और रामू को तो पता ही था कि मेरे साथ क्या हो रहा है, मेरे हाव भाव से भी उन्हें पता चल रहा था कि मैं गांड़ मरवाने का अभ्यस्त हो चुका हूं और मेरे साथ जो कुछ हो रहा है उससे मैं अत्यंत खुश था।

दो तीन दिनों में ही मैं मुन्ना, कल्लू और रामू से काफी घुल मिल गया था। तीनों अनाथ थे जिन्हें छगन अंकल ने सड़क से उठा कर पालन पोषण किया था और अपने होटल में काम के लिए रख लिया था। वे तीनों वहीं रहते थे और होटल के निचले तल्ले में उत्तर की ओर बने एक बड़े से कमरे में सोते थे। करीब एक हफ्ते बाद छगन अंकल किसी काम से शाम के समय कलकत्ता गये और जाते जाते बोल गये कि वे दूसरे दिन सुबह वापस आएंगे। कल्लू को खास तौर से हिदायत दे कर गए कि मेरा ख्याल रखे। उनके जाते ही कल्लू मेरे पास आया और मुझसे कहा, “अशोक भाई, तू तो मालिक को खूब मज़ा दे रहा है, हमें भी कभी अपनी गांड़ चोदने दे ना। जब से तुम्हें देखा है, चोदने का बहुत मन करता है मगर मालिक के डर से हिम्मत नहीं हो रहा था।”

मैं थोड़ा शरमा गया और बोला, “तुम लोग भी ना बस?”

“हां अशोक भाई, तू है ही इतना सुंदर कि कोई भी तुझे एक बार देख लेगा तो देखता ही रह जाएगा। लड़कियां भी तेरे सामने फेल हैं। मालिक के सामने हमारी हिम्मत नहीं हो रही थी। आज मौका मिला है तो हम अपने मन की बात तुझे बता रहे हैं। अगर तू ना कहेगा तो कोई बात नहीं, लेकिन यह बात मालिक को मत बताना कि मैं ने तुमसे ऐसा बोला था, वरना हमें वह यहां से भगा देगा।” इतना कह कर आशापूर्ण नजरों से मुझे देखने लगा। अब तक मुन्ना और रामू भी वहां आ चुके थे। उन्हें भी पता था कि हमारे बीच क्या बातें हो रही थीं। मुझे चुप देख कर मुन्ना तपाक से बोला, “बोल ना अशोक, हां तो हां या ना तो ना।” मैं उन तीनों के चेहरों को देखा, कैसी बेकरारी भरी आशा के साथ मुझे देख रहे थे। वैसे भी हफ्ते भर में रोजाना चुदाई से जैसे मुझे चुदवाने की आदत सी पड़ गई थी और ऐसी हालत में आज रात छगन अंकल का बाहर रहना मुझे बहुत खल रहा था। मैं कुछ पल सोचा और मन ही मन बोला कि चलो आज छगन अंकल न सही, क्यों न इन्हीं के साथ मजा लिया जाए।

“हां भाई हां,” मैं शरमाते हुए इतना ही बोला और ऊपर तल्ले की ओर भागा। इतना सुनते ही उनकी खुशी का पारावार न रहा। रात को खाना खाने के लिए नीचे आया और सिर झुका कर खाना खाता रहा और खाना खत्म कर सीधे ऊपर भाग गया। ऊपर जा कर जब तक वे बर्तन वगैरह धो धा कर होटल बंद कर ऊपर आते, मैं लहंगा चोली में सज संवर कर बैठ कर उनका इंतजार करने लगा। जैसे ही वे ऊपर आए और उनकी नजर मुझ पर पड़ी, वे भौंचक रह गए कि एकाएक इतनी खूबसूरत लड़की यहां पर कैसे आ गई है। रामू उनमें सबसे बड़ा था, करीब बीस साल का लड़का, सांवला, उनकी तुलना में थोड़ा मोटा और कद करीब पांच फुट आठ इंच रहा होगा। बाकी दोनों मुन्ना और कल्लू करीब पांच पांच फुट के छरहरे बदन के लड़के थे। कल्लू अपने नाम के अनुरूप काला और मुन्ना गेहुंआ रंग का था। वे तीनों धीरे धीरे मेरे पास आए और गौर से मुझे देखने लगे, उनकी आंखों में वासना की लहरें हिलोरें मार रही थीं। वे तीनों सिर्फ छोटे छोटे हाफ पैंट और बनियान पहने हुए थे। मुन्ना और कल्लू के सीने सपाट थे लेकिन रामू का सीना मर्दों की तरह चौड़ा और उभरा हुआ था।

“अरे ये तो अपना अशोक है” मुन्ना के मुह से निकला।

“अशोक मत बोल रे, अशु बोल, देख नहीं रहा, हमारे लिए यह अशोक से अशु बनी है, ओह मेरी जान, तू इतनी खूबसूरत है हमें तो पता ही नहीं था।” रामू मेरी पारदर्शक चुन्नी को एक हाथ से ऊपर उठाता हुआ बोला। फिर आहिस्ते से मेरे बगल में बैठ गया और मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में भर कर मेरे गुलाबी होंठों को चूमने लगा। मैं भी अपने होंठों को हल्के से खोल कर उसके चुंबन का रसास्वादन करने लगा। मुन्ना और कल्लू तो इतने उत्तेजित हो गए थे कि आव देखा न ताव, पलक झपकते ही अपने पैंट बनियान खोल कर मादरजात नंगे हो गए। उन दोनों के लंड करीब पांच पांच इंच लंबे और डेढ़ इंच मोटे रहे होंगे, टनटनाए हुए खड़े मुझे सलामी दे रहे थे। वे भी अब मेरे पास आ चुके थे। मैं ने खुद को पूरी तरह उनके हवाले कर दिया और उनके हर कृत्यों के लिए अपने मन को तैयार कर लिया था। मेरे पीछे मुन्ना आया और मेरे सीने के उभारों को चूचियों की तरह सहलाने और दबाने लगा। मेरे एक हाथ में कल्लू ने अपना लौड़ा पकड़ा दिया और हस्तमैथुन करने लगा। इधर धीरे धीरे रामू मेरी चोली खोलने लगा और कुछ ही देर में मेरी चोली खोल कर अलग कर दिया। अब मैं कमर के ऊपर पूरा नंगा था। मेरे चूचियों सरीखे सीने के उभार उत्तेजना के मारे तन गये थे। इधर कल्लू मेरे हाथ में अपना लौड़ा आगे पीछे कर रहा था और मैं अपने हाथ का छल्ला बना कर उसे हस्त मैथुन का पूरा मज़ा देने की कोशिश कर रहा था। रामू अब मेरे लहंगे को उतारने लगा। धीरे धीरे उसने मुझे पूरी तरह नंगा कर दिया। अब मुन्ना मेरी चूचियों को दबाना छोड़ कर अपना लौड़ा मेरे मुंह के पास ले आया। मैं समझ गया कि उसे मुझसे मुख मैथुन की अपेक्षा है। मैं ने अपना मुंह खोल कर एक ही बार में गप्प से पूरा लंड अंदर कर दिया और लॉलीपॉप की तरह गपागप चूसने लगा।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह” एक लंबी आह मुन्ना के मुह से निकल पड़ी और उसने मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़ कर मेरे मुंह में अपना लौड़ा अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। इधर रामू धीरे धीरे मेरी तनी हुई चूचियों को चूसने लगा और मुझे आनंद के समुंदर में गोते खाने पर मजबूर कर दिया। उफ्पफ गजब का सुखमय खेल उस वक्त वे तीनों मेरे जिस्म से खेलने में मशगूल हो गए थे और मेरा पूरा शरीर आनंदातिरेक से थरथरा रहा था। अब रामू भी अपने कपड़े खोल कर पूरा नंगा हो गया। मैं उसका लौड़ा देख कर एक बार तो घबरा ही गया। बाप रे बाप, सात इंच लंबा और वैसा ही करीब दो इंच मोटा लौड़ा किसी काले नाग की तरह फन उठाए फुंफकार रहा था। इतनी देर में माहौल इतना गरम हो गया था जिसकी तपिश से सभी जल उठे थे। रामू जो अब तक मेरे साथ बड़ी नरमी से पेश आ रहा था, अचानक ही मानो उस पर पागलपन सवार हो गया। मुझे बड़ी बेरहमी से बिस्तर पर पटक दिया और मेरे दोनों पैरों को फैला कर मेरी गांड़ के छेद में थूक लगाया और अपने लौड़े को भी थूक से लसेड़ कर सीधा मेरी गांड़ में धावा बोल दिया।

“आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, मार डाला रे आ्आ्आह” मैं मुन्ना के लंड को मुंह से निकाल कर पीड़ा के मारे चीख पड़ा। “चुप साली रंडी, इतनी मस्त चिकनी गांड़ क्या सिर्फ मालिक से चुदने के लिए है मादरचोद, ले मेरा लौड़ा खा अपनी गांड़ में साली कुतिया, आज तेरी गांड़ का भुर्ता बनाता हूं।” रामू किसी जंगली जानवर की तरह मेरी कमर को पकड़ कर दनादन चोदने लगा। इसी के साथ कल्लू और मुन्ना भी मेरे तन पर पिल पड़े। कोई मेरी चूचियों को बेरहमी से मसलने लगा तो कोई मेरे मुंह में भकाभक लंड ठोकने लगा। कुछ पलों की पीड़ा के पश्चात मैं मस्ती में डूब कर पूरी तरह रंडी बन कर उन्हीं के रंग में रंग गया। करीब दस मिनट बाद मुन्ना ने मेरे सिर को कस कर पकड़ लिया और फचफचा कर अपने लौड़े का वीर्य मेरे मुंह में ही उगलने लगा। मैं उत्तेजना के वशीभूत उसके लंड से निकलने वाले कसैले और नमकीन वीर्य का कतरा कतरा अपने हलक में उतारता चला गया। जैसे ही मुन्ना झड़ कर हांफते हुए अलग हुआ झट से कल्लू ने अपना लौड़ा मेरे मुंह में ठूंस दिया और लगा धकाधक चोदने। करीब दो मिनट में ही कल्लू भी खलास होने लगा। उसके वीर्य का स्वाद थोड़ा फैंटा अॉरेंज जैसा था, शायद उसने वही पेय पिया था। उसके वीर्य को भी मैं किसी प्यासी कुतिया की तरह पी गया और उसके स्वादिष्ट वीर्य का कतरा कतरा चाट चाट कर साफ़ कर दिया। इधर रामू किसी भूखे भेड़िए की तरह मेरी गांड़ में लंड कचकचा कर पेले जा रहा था और मेरी चूचियों को मसल मसल कर मलीदा बना रहा था।

मैं किसी पगली की तरह गांड़ उछाल उछाल कर चुदवाने में मग्न हो बोले जा रहा था, “ओह ओ्ओ्ओ्ओह राजा उफ़ आह आह मेरी गांड़ के रसिया हाय हाय क्या मस्त चुदाई कर रहे हो ओ बाबा, आ्आ्आ ह चोद साले कुत्ते मादरचोद आह”। करीब पच्चीस मिनट बाद उसने मेरा लंड पकड़ कर जोर से मूठ मारना शुरू किया और अचानक उसके चोदने की रफ़्तार बहुत तेज हो गई, फच फच चट चट की आवाज जोरों से आ रही थी। फिर उसने मुझे इतनी जोर से पकड़ लिया कि कुछ पलों के लिए मुझे लगा कि मेरी सांस ही रुक जाएगी।

“ले आह साली हरामजादी कुतिया मेरे लौड़े का रस ओ्उओ्सीओ्ह्ह्ह्” कहते हुए उसी वक्त छरछरा कर वह मेरी गांड़ में अपना वीर्य छोड़ने लगा और इधर मेरे लंड ने भी वीर्य उगलना शुरू कर दिया। उफ़ क्या आनन्द भरा अहसास था वह। वह खलास हो कर मुझे चूमने लगा और बोला, “ओह मेरी जान, कहां थी अब तक, बहुत मस्त गांड़ पाई हो, तू इतने सुन्दर बदन की मालकिन हो हमें अब तक पता ही नहीं था। मालिक के आने के बाद हमें भूल मत जाना छमिया।”

“हाय राम कैसी बात करते हो जी, इतना आनंद तुम लोगों ने आज पहली बार दिया।। मैं कैसे भूल जाऊं। जब मौका मिले चोद लेना मेरे आशिकों।” मैं आनंद के सागर में डूब कर बोला। उसके लुढ़कते ही हम चारों उसी छोटे से बिस्तर पर एक दूसरे से चिपक कर सो गए। सवेरे जब मेरी नींद खुली तो देखा वे तीनों वहां से नदारद थे। मैं अकेला नुचा चुदा अस्त व्यस्त बिस्तर पर पसरा हुआ था। बिस्तर की सिलवटें रात की कारगुज़ारियों की चुगली कर रहे थे। एक तरफ मेरा लहंगा, दूसरी तरफ मेरी चोली पड़े हुए मुझे मुंह चिढ़ा रहे थे। जालिमों ने मेरी चूचियों को इतनी बुरी तरह मसला था कि अभी तक दर्द कर रहे थे। लाल कर दिया था कमीनों ने। रामू ने चोद चोद के मेरी गांड़ का सुराख और भी बढ़ा दिया था। उस दिन के बाद तो मैं जैसे रंडी ही बन गया। किसी को भी जब मौका मिलता मुझे चोद लेता था और मैं भी चुदाई का भरपूर लुत्फ उठाने लगा।

लेकिन यह सब ज्यादा दिन नहीं चल पाया। करीब दस दिन बाद मेरे मामा नें, जो किसी काम से कलकत्ता आए हुए थे, मुझे उस होटल में देख लिया। फिर कल्लू, मुन्ना, रामू और होटल मालिक छगन के विरोध के बावजूद स्थानीय पुलिस की सहायता से मुझे लेकर घर चले आए। आज भी उनकी बड़ी याद आती है।” इतना कहकर वह चुप हो गया।”””” बड़े दादाजी मेरे पापा के बारे में इतने विस्तार से और रोचक ढंग से बता रहे थे कि हम सब खो गये थे उस किस्से मेंं। जब किस्सा खत्म हुआ तब जाकर हमारी तंद्रा भंग हुई। इसके बाद सबके दिल में मेरे पापा के लिए भावनाएं बदल गयीं। खासकर मेरी मम्मी के दिल में। मम्मी के दिल में उनके लिए सहानुभूति थी।

इस किस्से के खत्म होने के पश्चात यहां आगे जो कुछ हुआ, उसे आपने भाग 24 में पढ़ा।

मेरी शादी को लेकर मेरी मां की असहमति और नाराजगी मुझसे छुपी नहीं थी, किंतु मुझे उसकी परवाह कतई नहीं थी। मैं अपने निर्णय से बेहद खुश थी और मैंने जो अद्भुत सुख का स्वाद चखा, उससे मैं पूणतय: संतुष्ट थी। मेरी जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हो चुका था। अब आगे पढ़िए:

उसी शाम जब आठ बजा तो मैंने सबको बैठक में इकट्ठा किया और एक नये खेल का आरंभ किया। इस खेल को शुरू करने के पहले मैंने दादाजी के साथ मश्वरा किया था और इसको रोचक बनाने के लिए उनसे सलाह भी ली थी। मेरे खुराफाती दिमाग की दाद देते हुए उन्होंने मेरा साथ देने और सभी को इस खेल में शरीक करने के लिए सहमत करने का जिम्मा भी लिया। मैं ने खेल के बारे में तो बताया था किन्तु उसमें मैं ने धूर्तता पूर्वक अपने ढंग से तैयारी की थी ताकि खेल से सभी उपस्थित मर्दों की इच्छा पूर्ति के साथ ही साथ मेरी खास ख्वाहिश की पूर्ति भी हो। मैं पूरी तैयारी कर चुकी थी खेल को रोमांचक, रोचक और कामुकता पूर्ण बनाने की। मम्मी और चाची के लिए तो चौंकाने वाला खेल होने वाला था। खेल मजेदार था और माहौल के हिसाब से काफी उत्तेजक भी। ठीक उसी समय दरवाजे की घंटी बजी और जब दरवाजा खुला तो दरवाजे पर झक्क सफेद कुर्ते और धोती में पंडित जी को खड़ा पाया। पंडित जी को देख कर मैं ने चकित होने का नाटक किया और दादाजी की ओर असमंजस भरी निगाहों से देखा। दरअसल मैं ने पंडित जी को फोन करके पहले ही इस कार्यक्रम के बारे में बता दिया था और यह भी कह दिया था कि इस बात की किसी को भनक भी न लगने पाए कि उन्हें इस कार्यक्रम के बारे में कुछ भी पता है।

दादाजी पंडित जी को कबाब में हड्डी की तरह देख कर चौंक उठे और बोले, “अरे पंडित जी आप अचानक यहां?”

“मैं इधर से गुजर रहा था तो सोचा क्यों न आप लोगों से मिलता चलूं, सो आ गया।” पंडित जी मुझे लार टपकाती नजरों से देखते हुए बोले।

मैं सवालिया नज़रों से दादाजी को देखने लगी, “अब?”

पल भर मौन रहकर बड़े दादाजी बोले, “अरे पंडित जी आईए, आप भी इस खेल में शामिल हो जाईए, ठीक मौके पर आप आए हैं” अनजाने में बड़े दादाजी ने उन्हें निमंत्रण दे डाला। दादाजी कुछ बोल नहीं पाए। दरअसल दादाजी को और मुझे ही पता था कि इस खेल में क्या गुल खिलने वाला है। इधर दादाजी की अनभिज्ञता में मैं ने पंडित जी को राजदार बना कर खुद अपनी वासना पूर्ति के लिए पहले ही योजना बना चुकी थी।

दादाजी ने लाचारी में बड़े दादाजी की इच्छा का सम्मान करते हुए पंडित जी को भी इस खेल में शामिल करने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। पंडित जी के दिल में तो लड्डू फ़ूटने लगे। मैं भी अंदर ही अंदर अत्यंत खुश थी कि आज फिर से पंडित जी जैसे बदशक्ल, बेढब ही सही मगर दानवी लिंगधारी, कामक्रीड़ा में निपुण तथा अद्भुत अदम्य स्तंभन क्षमता वाले व्यक्ति के हवस की शिकार बन कर पिछली रात वाले अभूतपूर्व अनिर्वचनीय सुख का भोग लगाने का अनमोल सुअवसर प्राप्त होने वाला है।

प्रकटतया अनिच्छा से मैं बोली, “ठीक है पंडित जी आप भी हमारे इस खेल में शामिल हो जाईए। आईए और सामने सोफे पर बैठ जाईए।” उनके बैठते ही पंडित जी का नाम भी लिख कर नाम वाले डिब्बे में डाल दिया। बैठने की व्यवस्था वृत्ताकार थी। मध्य में 8’x10′ का कालीन बिछा हुआ था। मैंने दो डिब्बे निकाले और खेल का नियम बताने लगी। “अभी जो खेल होगा वह पिछली रात की तरह ही होगा लेकिन पार्टनर पर्चियों के द्वारा निर्धारित होगा। चूंकि यहां तीन ही नारियां हैं और छः नर, अतः हो सकता है कि मजबूरी में एक नारी को एक से अधिक मर्दों की प्यास बुझानी पड़े, जैसा कि कल रात मेरे और मम्मी के साथ हुआ था। इन दो डिब्बों में से एक में हम सब के नामों की पर्ची है जिसमें से नाम निकलेंगे और उसी के अनुसार पार्टनर बनेंगे। दूसरे डिब्बे में क्रिया। जिसका नाम निकलेगा, उसके लिए दूसरे डिब्बे से उसके लिए कुछ कुछ छोटे मोटे कार्य निकाले जाएंगे और उस व्यक्ति को वही कार्य सब के सामने पूरा करना होगा। मंजूर है?”

सारे पुरुष एक स्वर में बोल उठे, “मंजूर है, मंजूर है” मर्दों के लिए क्या है, तीनों स्त्रियों में कोई भी चलेगी, तीनों अपने आप में कम नहीं थीं। किंतु मम्मी और चाची असमंजस में थीं। सशंकित होते हुए भी अंततः उन्होंने भी अपनी मंजूरी दे दी। मैं ने डिब्बों से पुर्जी निकालने के लिए पंडित जी को आमंत्रित किया। पहली ही पर्ची में चाची जी का नाम “रमा” निकला। सभी तालियां बजाने लगे। चाची झिझकते हुए सबके सामने आई। दूसरे डिब्बे से पर्ची निकाली। लिखा था “कपड़े उतारो”।

चाची विरोध करते हुए बोली, “यह चीटिंग है।”

“चीटिंग कैसा? हां, पर्ची में लिखा मैंने है, किन्तु पर्ची निकालने वाला तो पर्चियों को पहचानता नहीं है। वैसे भी पंडित जी तो इस खेल में संयोग से ही शामिल हुए हैं, इनको पर्चियों के बारे में क्या पता है।” मैं बोली और सभी ने एक स्वर से मेरा समर्थन किया, क्योंकि अब सभी को आभास हो चुका था कि खेल बड़ा ही मनोरंजक होने वाला है। हां चीटिंग तो मैं कर रही थी, क्योंकि पंडित जी को मैं ने पहले ही फोन पर पर्चियों की पहचान (अलग अलग रंगों के मार्कर के मार्क) के बारे में सब कुछ बता दिया था।

चाची मजबूर थी। पहले उन्होंने साड़ी उतारी। “पूरे कपड़े, पूरे कपड़े।” सभी बोल उठे। सभी पुरुषों के लिंग सिर उठाने लगे थे। फिर ब्लाऊज खुला। उफ्फ क्या नजारा था, ब्रा से बमुश्किल कसे हुए विशाल उरोज बाहर छलक पड़ने को आतुर। मर्दों के मुख से लार टपकने लगे थे। खास कर हरिया का लिंग तो तन कर पैजामा फाड़ कर बाहर निकल आने को बेताब हो रहा था। फिर नंबर आया पेटीकोट का। झिझकते हुए चाची ने पेटीकोट का नाड़ा खींच दिया और लो, एक झटके में पेटीकोट कालीन को चूमने लगा। ओह गजब का दृश्य था। कसी हुई पैंटी में भी चाची की फूली हुई योनि का उभार और योनि के मध्य का दरार स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था। कमरे की दूधिया रोशनी में मझोले कद से तनिक कम, करीब पांच फुट की चाची की उत्तेजक काया दमक रही थी। केले के थंभ की मानिंद जंघाएं और गोल गोल अनुपात से बड़े-बड़े नितंबों की छटा देखते ही बन रही थी। पिछली रात सबके सामने पंडित जी के कामुकता की भीषणता झेल चुकने के बावजूद इस वक्त लाज से दोहरी हुई जा रही थी। अब बारी थी ब्रा और पैंटी की। सभी सांस रोके इंतजार कर रहे थे।

“बस बस और नहीं प्लीज।” चाची ना नुकुर करने लगी। “चुप साली रंडी, कल रात को सब के सामने बेशरम कुतिया की तरह पंडित जी का लौड़ा खा रही थी तब कुछ नहीं हुआ और अब नखरे कर रही है। चल उतार जल्दी।” नानाजी अब बेहद उत्तेजित हो चुके थे। चाची मजबूर थी, खेल के नियम के अनुसार उसे कार्य को पूरा करना ही था। उसने धीरे से अपनी ब्रा का हुक खोल दिया और अपनी बड़ी बड़ी कबूतरियों को बंधन से मुक्त कर दिया। चाची के बड़े बड़े उरोज बेपर्दा हो कर कमरे की रोशनी में दमक उठे। सबके मुंह खुले के खुले रह गए। कल रात को वासना की आंधी में किसी ने इतनी अच्छी तरह चाची के इन विशाल गोल गोल दर्शनीय उरोजों का दीदार नहीं किया था। वहां उपस्थित मर्दों का वश चलता तो चाची पर टूट ही पड़ते, किंतु खेल के नियम से बंधे, अपने अपने स्थान पर बैठे कसमसा कर रह गए। अब बारी थी बहुप्रतीक्षित योनि के बेपर्दा होने की। इतनी देर में शनै: शनै: चाची भी भीतर ही भीतर उत्तेजित होती जा रही थी, जिसकी चुगली उनके खड़े हो चुके चूचक और पैंटी के अग्रभाग में आ चुकी नमी कर रहे थे। चाची ने अब तक अपने को पूर्ण रूप से परिस्थिति के हवाले कर दिया था और एक ही झटके में पैंटी से मुक्त हो गई। इस्स, क्या ही रसीली योनि थी चाची की। फूली फूली योनि, योनि के ऊपर काले काले रोयें और योनि की दरार के निकट चिकना तरल स्पष्ट दिखाई दे रहा था। पूर्णतय: नग्न चाची की दपदपाती कामोत्तेजक काया मानो माहौल में आग लगा डालने को बेताब थी। माहौल में अब एक चिंगारी दिखाने की देर थी, फिर तो क़यामत ही आ जाना था।

“लो हो गया ना। अब?” चाची ने फौरन पूछा।

“अभी आप वहीं उसी तरह खड़ी रहिए। अभी हम खेल आगे बढ़ाते हैं।” मैं फौरन बोली और चाची के सारे कपड़े समेट कर और कमरे के एक कोने में रख दी।

अब मैं ने पंडित जी को पहले डिब्बे से पर्ची निकालने का निर्देश दिया जिसका पालन उन्होंने तत्काल ही किया। नाम निकला “हरिया”। हरिया के शरीर में तो मानो बिजली दौड़ गई। पल भर में उछल कर सीधे बीच में आ गया। उसकी स्थिति देख कर सभी ठठा कर हंस पड़े। हालांकि उत्तेजना के मारे सभी मर्दों की हालत ऐसी ही थी। हरिया के लिए कार्य निकला, “बुत बन कर खड़े रहो।” हरिया खिसिया गया लेकिन खेल के नियम के अनुसार उसे बुत बन जाना पड़ा। “ये हैं चाची के पहले पार्टनर” मैं बोली। चाची विरोध करने की स्थिति में नहीं थी, चुपचाप खड़ी रही। फिर नाम निकला, “रमा”।

चाची तुरंत बोली, “यह क्या? मेरा नाम दुबारा कैसे निकला?”

“जितनी बार आपका नाम निकलेगा उतनी बार आपके लिए काम भी मिलेगा और आप के लिए पार्टनर का नाम भी निकाला जाएगा। पार्टनर एक से ज्यादा कितने होंगे यह लॉटरी से पता चलेगा।” मैं बोली।

चाची निरुत्तर हो गई। अब उनके लिए काम निकला, “अपने पार्टनर के कपड़े उतारो।”

“नहीं नहीं। मैं हरिया के कपड़े नहीं उतारूंगी।” चाची ने फिर विरोध किया।

“कैसे नहीं उतारेगी, चल शुरू हो जा,” दादाजी डांटे।

अनिच्छा से चाची हरिया के कपड़े उतारने लगी। जैसे ही हरिया का अंतिम वस्त्र कच्छा खुला, चाची तो एक कदम पीछे हो गयी और विस्फारित नेत्रों से देखती रह गई, कुलांचे भरता हुआ टनटनाया आठ इंच लम्बा काला मोटा लिंग नामुदार हुआ ऊपर नीचे होते हुए सलामी देने लगा। ऐसा लग रहा था मानो सिग्नल मिलते ही चाची की फूली दपदपाती योनि का तिया पांचा कर डालने को बेताब हो। छ: फुटा गठा शरीर और आठ इंच का झूमता हुआ लिंग। चाची की हालत देख कर सभी मुस्कुरा उठे। दर असल कल रात को किसी ने एक दूसरे के शरीर को इतने ध्यान से नहीं देखा था, आज सभी कमरे की दूधिया रोशनी में बड़ी फुर्सत से और इत्मिनान से एक दूसरे को बखूबी देख पा रहे थे। अब नाम निकला “लक्ष्मी”, उसे भी उठ कर सबके सामने आना पड़ा। कार्य वही, ” अपने कपड़े उतारो”। मम्मी ने बेझिझक अपने कपड़े उतार दिए। असल में माहौल धीरे धीरे गरम हो रहा था और काम वासना का नशा धीरे धीरे सभी पर चढ़ता जा रहा था, अतः सभी बेसब्री से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। मम्मी ने बिना एक पल गंवाए अपने वस्त्रों से मुक्ति पा ली और लो, उनका पूर्ण व्यस्क, विकसित और कामोत्तेजक नग्न शरीर न सिर्फ आकर्षित कर रहा था बल्कि बाकी बचे मर्दों को आमंत्रण देता प्रतीत हो रहा था। उनके भाग्य में जो पहला नाम निकला वह था नानाजी, अर्थात उनके पिता जी का। नानाजी भी बिना समय गंवाए मम्मी के पास पहुंचे और फिर वही हुआ जो हरिया के साथ हुआ था। मम्मी ने स्टैचू बने हुए नानाजी के शरीर के सारे वस्त्र उतार फेंके और उनका नाटा गैंडे की तरह मोटा तोंदियल शरीर अपने अकड़े हुए फनफनाते विशाल लिंग के साथ गजब का दृश्य प्रस्तुत कर रहे था। फिर नाम निकला रमा चाची का। चाची घबराई अब यह दूसरी बार नाम निकला, पता नहीं इस बार उसका दूसरा पार्टनर कौन होगा। इस बार पूर्वनियोजित नाम करीम चाचा का नाम था। करीम चाचा उछल कर चाची के पास जा खड़े हुए। उनके साथ भी वही हुआ। उनका गठा हुआ लंबे कद का आकर्षक शरीर और उस पर उनका आठ इंच का लंबा और वैसा ही गधे सरीखे मोटा लिंग, चर्मरहित गुलाबी सुपाड़े के साथ अद्भुत नजारा प्रस्तुत कर रहा था। इसी तरह बारी बारी से सबका नाम निकलता गया और अन्ततः चाची के भाग्य में हरिया और करीम, मम्मी के भाग्य में दादाजी, नानाजी और बड़े दादाजी, मेरे भाग्य में काला भुजंग तोंदियल भालू सरीखा पंडित मिला। कहां मेरी दपदपाती सुगठित कमनीय काया और कहां पंडित जी जैसा बनमानुष, निहायत ही बेमेल जोड़ी। मेरे भाग्य पर पंडित जी को छोड़ कर सभी मर्द हंस रहे थे किन्तु मेरी मम्मी और चाची को ही पता था कि मैं ने क्या हासिल कर लिया था, वे ईर्ष्या भरी नजरों से मुझे देखे जा रहे थे। उनकी नजरें मानो कह रही थी, “साली कमीनी कुतिया की तो लॉटरी लग गई।” पंडित जी भी अपनी किस्मत पर अंदर ही अंदर बेहद खुश हो रहे थे, “नयी नकोर, इतनी कमसिन और कमनीय लौंडिया को दूसरी बार भोगने का सौभाग्य जो मिल गया था”। सभी मादरजात नंगे हो चुके थे। सभी कामातुर, बेताबी अपनी चरम पर थी। मैं अपने भाग्य पर मायूसी का नाटक कर रही थी किंतु अंदर ही अंदर बेहद खुश थी कि मेरी योजना कारगर रही। सभी मर्द बेकरारी से सिग्नल का इंतजार कर रहे थे कि कब हरी झंडी मिले और अपने शिकार पर टूट पड़ें। इस वक्त मैं बड़े गौर से स्टैचू बने पंडित जी के पूरे शरीर का मुआयना कर रही थी। उफ्फ कितना वीभत्स रूप था उनका। शारीरिक रूप से तो पूरा बनमानुष ही था। उनके विशाल लपलपाते काले मोटे लिंग के करीब आधे हिस्से पर भी काले काले घुंघराले घने बाल उगे हुए थे इसलिए उनके लिंग की निश्चित लंबाई स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी। तो इसका मतलब यह हुआ कि उनके घुंघराले घने बालों से भरे लिंग का पिछला आधा भाग भी कल मेरी योनि में प्रविष्ट हुआ था जिसके घर्षण से मेरी योनि के भीतरी नाजुक संवेदनशील मार्ग में अद्भुत हलचल मच रही थी। उनके भयावह लिंग के नीचे थैले की शक्ल में वृहद अंडकोष झूल रहा था जिसमें उनका अथाह वीर्य संचित था। कल रात को इतनी अच्छी तरह से मैं पंडित जी के अंग प्रत्यंग का दर्शन नहीं कर पाई थी। मैं बेहद रोमांचित हो उठी थी। मेरी खुुुुद की योनि पनिया रही थी।इस पूरे खेल की सूत्रधार मैं ही थी और मैं अपनी मर्जी से सबको नचा रही थी।

मैंने एक मिनट बाद का अलार्म सेट किया और घोषणा की, “अलार्म बजते ही सभी मर्द अपने शिकार पर टूट पड़ेंगे, पूरी स्वतंत्रता के साथ जैसी मर्जी, पूरी छूट है।” अब तक उत्तेजना के चरम पर पहुंच चुके थे। जैसे ही अलार्म बजा, मानो कमरे में भूचाल आ गया।

मेरी मम्मी पर तीन बूढ़े मर्द पिल पड़े, “ओह बाबा, धीरे, हाय, आराम से कीजिए ना प्लीज़।” मम्मी लगभग चीख पड़ी।

“चुप साली हरामजादी, बुरचोदी कुतिया, चीख मत। कल रात मैंने पहली बार तेरी रंडीपनई देखी है। सारी दुनिया में अपनी चूत बांटती फिरती रही और मैं, जिसके लंड से तू पैदा हुई, वही इतने समय से तेरी चूत की भूख से अनजान रहा। चुपचाप चोदने दे। चल रघु केशू, आज हम तीनों मिलकर इस छिनाल को बताते हैं कि हम किस मर्ज की दवा हैं।” नानाजी अपनी वहशी अंदाज में बोले और तीनों बूढ़े मेरी मम्मी की नग्न देह पर शिकारी कुत्तों की तरह टूट पड़े।

“आह ओह ओ्ओ्ओ्ओह मर गई” सिर्फ इतना ही कह पाई मेरी मां। दादाजी ने अपना लिंग मेरी मम्मी के मुंह में जबरदस्ती ठूंस दिया और मम्मी की आवाज़ घुट कर रह गई। नानाजी ने मेरी मम्मी की बड़ी बड़ी दूधिया उरोजों को अपने बनमानुषी पंजों से पकड़ कर बेदर्दी से मसलना शुरू कर दिया। बड़े दादाजी ने अपनी एक हाथ की उंगली मेरी मम्मी की योनि में और दूसरे हाथ की उंगली उनकी गुदा में भच्च से घुसा कर मशीनी अंदाज में अंदर बाहर करने लगे। बेबस मम्मी तड़प उठी लेकिन तीनों बूढ़े पूरे वहशियाना तरीके से अपनी मनमानी करते रहे। यह तो क़यामत की शुरुआत थी।

कुछ ही मिनट बाद बड़े दादाजी मेरी मम्मी की पनियायी योनि में अपने लिंग से हमला बोला और एक ही करारे धक्के से पूरा का पूरा लिंग उतार दिया, “ले रानी मेरा लौड़ा अपनी बुर में, ओह साली रंडी, तेरी चूत चोदने का मजा ही कुछ और है, हुम,हुम,हुम,” और मम्मी को लिए दिए पलट गये।

नानाजी ने मौका ताड़ा और सीधे मेरी मां की गुदा में अपने लिंग का प्रहार कर दिया, “ले अब मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में कुतिया, न जाने कितने मर्दों से कुतिया की तरह चुदवाती रही बुरचोदी,” और किसी कुत्ते की तरह पीछे से गुदा मैथुन में ऐसे लिप्त हो गये मानो कई दिनों से संभोग सुख से वंचित होंगे, जबकि कल रात ही उन्होंने मेरी मम्मी के साथ प्रथम बार संभोग का लुत्फ उठाया था। उनकी वहशियाना नोच खसोट वास्तव में उनकी खीझ की अभिव्यक्ति थी, उनकी अपनी पुत्री होने के बावजूद इतने वर्षों से उसके इतने अनगिनत पुरुषों के शारीरिक संबंधों से अनभिज्ञ रहने की खीझ। ऐसा लग रहा था मानो वे कल रात की कसर पूरी करने को पूर्ण रूप से कृत-संकल्प हों।

इधर दादाजी लगे हुए थे मेरी मम्मी के मुह में लिंग अंदर बाहर करने में, “चूस हरामजादी, मेरा लौड़ा चूस साली मां की लौड़ी,” और मेरी मां के मुंह से सिर्फ गों गों की आवाज ही सुनाई पड़ रही थी। मैं अभी मम्मी की दुर्गति देख ही रही थी कि मेरी चाची की हौलनाक चीख ने मेरा ध्यान चाची की ओर आकृष्ट किया। हरिया और करीम, दो हट्ठे कट्ठे मर्द, एक साथ चाची की नग्न देह पर किसी शिकारी कुत्तों की तरह टूट पड़े थे और उतावलेपन में चाची की भरी पूरी मांसल देह की तिक्का बोटी करने पर उतारू थे। इतने सालों बाद इस सुनहरे मौके को पा कर लग रहा था कि आज ही पूरी कसर निकाल लेने को आमादा थे।

“ओह हरामियों, हाय हाय, मार ही डालोगे क्या मुझे?” चाची चिचिया रही थी। हरिया जहां चाची की बड़ी बड़ी चूचियों को बेरहमी से मसलते हुए उनके रसीले होंठों, गालों और गले को पागलों की तरह चूम रहा था वहीं करीम चाचा उनकी पावरोटी की तरह फूली हुई योनि में मुंह लगा कर कुत्ते की तरह चाट रहा था और उनकी उंगली मशीनी अंदाज में चाची की गुदाज गुदा के अंदर बाहर हो रही थी। दो पहलवानों के बीच चाची परकटी पक्षी की तरह छटपटा रही थी।

“आज मौका मिला है साली रंडी को चोदने का। हाय हाय मत कर बुरचोदी। बहुत तड़पे हैं हम। करीम, चल इस हरामजादी को अपने लौड़े का कमाल दिखाते हैं।” हरिया के मुख से किसी वहशी दरिंदे की तरह उद्गार निकले।

“ठीक कहा हरिया। आज ऐसा चोदना है कि इस कुतिया को जिंदगी भर याद रहे। आज तक इस रंडी को किसी ने ऐसा नहीं चोदा होगा।” करीम चाचा भी कामोत्तेजना के आवेश में पूरे जानवर बन चुके थे। चाची बेचारी के पास उन दरिंदों की धींगामुश्ती को झेलने के अलावा और कोई चारा नहीं था। फंस चुकी थी हमारे बिछाए जाल में, हरिया और करीम को तो हमारी पूर्वनियोजित षड़यंत्र के तहत मुंहमांगी मुराद मिल चुकी थी, अब वे जी भर के मेरी चाची के शरीर से मनमाने ढंग खिलवाड़ करने को स्वतंत्र थे, जो वे कर भी रहे थे। उनके कामुक हरकतों के फलस्वरूप चाची अपने ऊपर हुए आकस्मिक आक्रमण के आरंभिक खौफ से उबर चुकी थी और उत्तेजना के मारे उनका शरीर अकड़ने लगा, थरथराने लगी वह।

“अब चोद भी डालो हरामजादों” उत्तेजना के आवेग में अंततः चाची सके मुंह से बेसाख्ता निकल ही पड़ा।

“हां री कुतिया, आज तो पूरी कसर निकालनी है, देख हमारे लौड़े कैसे फनफना रहे हैं” कहते कहते हरिया ने आव देखा न ताव, सीधे चाची की टांगों को फैला कर उनकी पनियायी फूली हूई योनिद्वार में अपने आठ इंच लंबे बेलन सरीखे लिंग का सुपाड़ा टिकाया और एक ही भीषण प्रहार से पूरा का पूरा लिंग चाची की योनि में पैबस्त कर दिया।

“आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह्” एक दर्दनाक चीत्कार चाची के मुंह से उबल पड़ी।

“ऐसे चीख मत बुरचोदी। अभी कह रही थी चोद भी डालो, अभिए से चिचिया रही है, यह तो शुरुआत है, अभी तो लौड़ा सिर्फ घुसा है, चोदना तो अब शुरू होगा साली चूतमरानी।” कहते कहते चाची की हालत को नजरंदाज करते हुए लगातार पंद्रह बीस धुआंधार ठापों की झड़ी लगा बैठा “हुं हुं हुं हुं हुं हुं, अब ठीक है, करीम अब तू भी आ जा भाई,” कहते हुए चाची को लिए दिए पलट गया और चाची की गुदा ऊपर हो गई।

इससे पहले कि चाची को सांस लेने का मौका मिलता, करीम पल भर में ही चाची के ऊपर सवार हो गया और अपने तनतनाए लिंग को एक ही झटके में चाची की गुदा द्वार में प्रविष्ट करा दिया, “ले साली कुतिया मेरा लौड़ा अपनी गांड़ में, ओह ओ्ओ्ओ्ओह कितना टाईट गांड़ है ओह ओ्ओ्ओ्ओह मजा आ गया,” कहते हुए उसने भी दनादन कई झटके मार डाला।”

“आह्ह्ह्ह्ह मार डाला रे हरामी ओह्ह्ह्ह फाड़ दिया मादरचोद हाय मेरी गांड़ फट गई हाय हाय हाय।” चाची की करुण चीत्कार से पूरा कमरा गूंज उठा, किंतु यह चीखें कुछ ही पलों में आनंद भरी सीत्कारों में परिवर्तित हो गईंं, “आह ओह चोदो हरामियों, आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह खा जाओ मुझे, रगड़ डालो मुझे, मसल डालो मुझे, आह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह इस्स्स्स्स” और फिर क्या था, वासना का तूफान ही उठ खड़ा हो गया। धकमपेल, धींगामुश्ती, एक दूसरे में समा जाने की जद्दोजहद और साथ ही साथ बेहद गंदी गंदी वासना से ओत प्रोत अल्फाज उबलने लगे उनके मुंह से।

मैं वहां के माहौल को मंत्रमुग्ध निहार रही थी, उत्तेजना के मारे मेरा भी बुरा हाल हो गया था, पूरे शरीर पर चींटियां दौड़ रही थीं और तभी गजब हो गया, मेरे खुद का चुना हुआ बनमानुष नुमा मर्द, बिना एक पल गंवाए मुझ पर किसी जंगली जानवर की तरह टूट पड़ा था और मेरी नंगी देह को किसी गुड़िया की तरह अपने दैत्याकार बाजुओं में दबोच कर अपने सूअर जैसे थूथन से मेरे चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा रहा था। मैं उनके इस अचानक हमले के लिए तैयार नहीं थी, हकबका उठी। उफ्फफ, ऐसा लग रहा था मानो मेरी पसलियां चरमरा उठी हों। मेरी सांस ऊपर की ऊपर ही रह गई किंतु अब मैं पूरी तरह पंडित जी के चंगुल में थी, परकटी पंछी की तरह छटपटाने के सिवा कुछ कर भी नहीं सकती थी। सच तो यह था कि मैं कुछ करना चाहती भी नहीं थी। उस जंगली जानवर के वहशीपन का पूरा अनुभव करना चाहती थी। उनकी हर वहशियाना हरकतों को झेलने के लिए अपने मन को कड़ा करके सिर्फ दिखावे की छटपट करते हुए, “आह्ह्ह्ह्ह छोड़िए, ओह्ह्ह्ह मार ही डालिएगा क्या, उफ्फ्फ हाय राम,” कहती कहती समर्पित होती चली गयी। पंडित जी पूरे जोश में थे। पूरी बेदर्दी से मेरी चुचियों को मसलने लगे। मेरे मुंह के अंदर अपनी लंबी मोटी जीभ डाल चुभलाने लगे। उनका भीमकाय लिंग मेरी योनी के अंदर पैबस्त हो कर फाड़ डालने को बेताब, बार बार मेरी योनी द्वार पर ठोकर मार मार कर मेरे अंतरतम को आंदोलित किए जा रहा था। मेरी उत्तेजना पूरे चरम पर थी। योनी फकफका रही थी। पनिया उठी थी। पंडित जी ने अपनी एक उंगली मेरी योनी के लसलसे पानी से भिगोकर मेरी गुदा मे ठोंक दिया। मैं चिहुँक उठी और अनायास ही झटके से बेध्यानी मे और आगे बढ़ गयी, परिणाम स्वरूप मेरी पनिया उठी योनी खुद ही उनके तनतनाये हुए लिंग का एक तिहाई हिस्सा विशाल सुपाड़े समेत अपने अंदर समाने को विवश हो उठी। पंडित जी की धूर्तता काम कर गई। एक प्रकार से उन्होंने मुझे अपने लिंग से बींध दिया था। “आह्ह्ह्ह्ह” मेरी आह निकल पड़ी। एक झटका मेरी ओर से था तो दूसरा झटका उनकी ओर से था।, जिससे उनका आधा लिंग मेरे अंदर समा गया। उफ्ईफ्फ्फ, गजब का अहसास था वह। मगर यह तो आरंभ था। पंडित जी मुझे लिए दिए फर्श पर लुढ़के और साथ ही एक और करारा ठाप जड़ दिया। “आ्आ्आ्आ्आ्आह,” बेसाख्ता मेरी लंबी चीख निकल पड़ी। सभी मेरी ओर देखने लगे।

“चीख रही है साली रंडी, चोद पंडित इस कुतिया की चूत फाड़ दे। बुरचोदी बहुत स्मार्ट बन रही थी।” चाची दोनों पहलवानों के बीच सैंडविच बनी चीख पड़ी।

“हां हां, ठीक कह रही हो रमा, मेरी बेटी होकर मुझे रंडी की तरह चुदते हुए देख कर कितनी खुश हो रही थी कुतिया। अब पाला पड़ा है ठीक चुदक्कड़ से। पंडित जी, इसे आज ऐसा चोदो कि होश ठिकाने आ जाए। रगड़ रगड़ के चोदो साली को, ठीक कुतिया की तरह।” मेरी मां को अपने दिल की भंड़ास निकालने का अवसर मिल गया। मगर उसे क्या पता था कि मैं क्या अनुभव कर रही थी।

प्रारम्भ मेंं मैं असहाय भाव से इधर उधर सिर झटकने लगी। तभी एक और करारे ठाप से पंडित जी ने अपने 9″ का पूरा लिंग मेरी योनी में उतार दिया। दर्दनाक था वह हमला। ऐसा लगा मानो मेरी योनी में मूसल डाल दिया हो। उफ्फ। कुछ पलों की असह्य पीड़ा को झेल लेने के पश्चात मुझे अद्भुत आनंद की अनुभूति होने लगी। ऐसा लग रहा था कि उनका लिंग मेरे गर्भाशय में समाने को बेताब हो। अगले ही पल उन्होंने सर्र से करीब पूरा लिंग बाहर निकाल लिया और सटाक से फिर घोंप दिया। उफ्फ, मेरी योनी की दीवारों पर उनके मोटे लिंग का घर्षण मुझे पागल किए जा रहा था। पहले धीरे धीरे, फिर धक्कों की रफ्तार बढ़ाने लगा वह कमीना। हालांकि यह मेरे साथ दूसरी बार था लेकिन शायद पंडित जी अधिक जोश में थे और उनकी अदम्य जंगली कामुक नोच खसोट से मैं थोड़ी असहज हो गई थी, किंतु उनकी हर हरकतों से मुझे अलग ही आनंद की अनुभूति हो रही थी। अबतक मैं भी पूरी तरह उनके लिंग पूरी तरह आराम से ले सकने में सक्षम हो चुकी थी। मैं अपने पैरों को अपनी पूरी क्षमता के अनुसार फैला कर उनके भैंस जैसे मोटे कमर के ईर्द गीर्द लपेट कर किसी छिपकिली की तरह चिपकी उनके हर ठाप का जवाब देने की भरसक कोशिश कर रही थी। आनंद के अतिरेक मेंं मेरी आंखें बन्द हो गयीं थीं। आह वह अकथनीय आनंद, अवर्णनीय सुखद अहसास। मैं सुथ बुध खो कर भैंस जैसे पंडित जी के हर वहशियाना हरकत से विभोर होती जा रही थी।

“आह पंडित जी, ओह राजा, हाय ओह्ह्ह्ह चोदिए आह उफ इस्सस,” मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल रहे थे।

“आह मेरी चूत मरानी कुतिया, ओह्ह्ह्ह क्या मस्त बुर है रे बुरचोदी, आह चोदने मेंं इतना मजा आ रहा है, आह्ह्ह्ह्ह साली रंडी की चूत,” बोलते हुए मुझे रौंदते हुए चोदे जा रहा था। इस सामुहिक चुदाई में सबके मुह से एक से एक अश्लीलता भरे अल्फाज, चुदाई की फच फच, चट चट की आवाजों सी पूरा कमरा भर गया था। बाकी लोग क्या कर रहे हैं और हमारे आस पास क्या हो रहा है इन सबसे बेखबर मैं दूसरी दुनिया में पहुंच गई थी। करीब एक घंटे की कमरतोड़ घमासान चुदाई के बाद एकाएक पंडित जी ने मुझे इतनी जोर से जकड़ लिया मानो मेरी जान ही निकाल देगा और उसी के साथ उनका अंतहीन स्खलन शुरू हुआ। ऐसा लग रहा था मानो मेरी कोख में गरमागरम लावा भरता जा रहा हो। मैं भी उसी वक्त खलास होने लगी। ओह्ह्ह्ह वह अद्भुत अनुभव, बयान से बाहर। पंडित जी ने इस एक चुदाई में ही मुझे चार बार झड़ने को मजबूर कर दिया। करीब एक मिनट तक पंडित जी का वीर्य मेरी कोख में भरता गया और उनके वीर्य के एक एक कतरे को अनमोल धरोहर की तरह मेरी योनी ने अपने अंदर समाहित कर लिया। तत्पश्चात पंडित जी किसी तृप्त भैंस की तरह डकारते हुए लुढ़क गए। मैं नुच चुद कर निढाल आंखें मूंदे तृप्ति की लंबी लंबी सांसें लेने लगी। फिर सारी शक्ति बटोर कर “आह्ह्ह्ह्ह राजा खुश कर दिया” कहते हुए मैं करवट ले कर पंडित जी के काले तोंदियल भैंस सरीखे बेढब शरीर से लिपट गई और उनके कुरूप चेहरे और थूथन पर चुम्बनों की बौछार कर बैठी, आखिर इतने अकथनीय सुख से मुझे लबरेज जो कर दिया इस कमीने ने। पंडित जी के चेहरे पर तृप्ति की मुस्कान खेल रही थी। फिर मैं ने चारों ओर दृष्टि फेरी तो यह देख कर मुस्कुरा उठी कि सभी लोग नंग धड़ंग बेतरतीब छितराए हुए बेखबर आंखें बंद किए लंबी लंबी सांसें ले रहे थे। मां और चाची की बड़ी बड़ी चूचियां लाल हो चुकी थीं। उनकी योनियों के ईर्द गीर्द मर्दों के वीर्य लिथड़े हुए थे। खास कर चाची की योनी की हालत बता रही थी कि किस बुरी तरह से हरिया और करीम नें भंभोड़ा था। पावरोटी की तरह फूल गई थी और लाल भी कर दिया था कमीनों ने। मेरी खुद की हालत भी क्या कम बुरी थी। मेरी चूचियों का इतनी बुरी तरह से मर्दन हुआ था कि लाल हो कर सूज गई थी। मीठा मीठा दर्द उठ रहा था। मेरी योनी की इतनी भयानक चुदाई आज पहली बार हुई थी, फुला दिया था कमीने पंडित जी ने। पंडित जी ने मुझ पर पूरी तरह जोर आजमाईश कर ली थी और मेरा शरीर निचोड़ कर रख दिया था। मेरे शरीर का एक एक पुर्जा ढीला कर दिया था हरामी ने। मेरा पूरा शरीर टूट रहा था। पूरे शरीर में मीठा मीठा दर्द तारी हो चुका था। इतनी बुरी तरह से मुझे नोचा खसोटा था किंतु अपने अदम्य संभोग क्षमता से संभोग के अद्वितीय आनंद से रूबरू करा दिया। मैं पूर्णरूपेण संतुष्ट हो गई थी और दीवानी बना दिया था मुझे अपनी चुदाई का। थक कर चूर मैं ने अपना सिर फिर से पंडित जी के बालों से भरे चौड़े चकले सीने पर रख दिया और पंडित जी ने मुझे अपनी बनमानुषी बांह से समेट लिया। मैं अनंत सुख के अहसास के साथ पल भर में गहरी निद्रा के आगोश में चली गई।

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