मैं हूँ आभा।
मैं और रजनी हमउम्र हैं – 21 की। एक ही कालेज में पढ़ती हैं और हॉस्टल के एक ही कमरे में रहती हैं।
कमरा ही नहीं और भी हम एक दूसरे का बहुत कुछ सांझा करती हैं – एक दूसरे के कपड़े, खाना, बिस्तर और राज़ भी – और कभी कभी तो एक दूसरी के बॉय फ्रेंड का लंड भी । और अगर कभी लंड की तलब आ जाये और लंड ना मिले तो एक दूसरी की चूत भी चाट लेती हैं, या फिर उंगली कर लेती हैं – “काम ही तो चलाना है”।
रजनी के 52 वर्षीय पिता रोशन लाल, रजनी के सौतेले पिता हैं। उनकी पहली पत्नी का चार साल पहले देहांत हो चुका है। उनका पहली पत्नी से 22 साल का बेटा दीपक है जो अभी तक कुंवारा है – पढ़ाई पूरी करके तीन महीने पहले ही अपने घर करनाल वापस आया है, अभी फ़िलहाल नौकरी की तलाश कर रहा है। पुश्तैनी अमीरी के कारण नौकरी की कोइ जल्दी नहीं है।
करनाल शहर के बाहरी भाग में उन लोगों का एक एकड़ में बना फार्म हाउस है। करनाल से सात किलोमीटर दूर उनके खेत हैं और एक बड़ा डेयरी फार्म है। वहां भी उनका एक बड़ा घर है।
रजनी की 41 वर्षीय तलाकशुदा मां उषा रोशन लाल की दूसरी पत्नी है – सुन्दर और स्वस्थ – उनकी शादी तीन साल पहले हुई थी। रजनी के सौतेले पिता रोशन लाल अक्सर खेतों वाले घर में ही रहते हैं, सप्ताह के अंत में ही करनाल आते हैं। रजनी ने मुझे बताया था की उसके सौतेले पिता को चूत और चुदाई में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है – शादी उन्होंने इस लिए की थी की घर संभालने वाली कोइ घर में आ जाएगी और उसके बेटे को मां मिल जाएगी।
करनाल वाला फार्म हाउस बहुत बड़ा है – रसोई के सामने बड़ा हाल है जो ड्राइंग रूम की तरह प्रयोग होता है। रसोई की बाईं तरफ का कमरा रजनी की माँ और उसके सौतेले पिता का है। रसोई की दाईं तरफ दो कमरे हैं – एक रजनी के सौतेले भाई दीपक का, दूसरा रजनी का। दो कमरे और हैं जो मेहमानों के लिए काम आते हैं।
हाल से ही एक गलियारा बाहर की तरफ जाता है जहां 25 वर्षीय नौकर संतोष ( जो घर का सदस्य ही है ) का कमरा है। संतोष हायर सेकंडरी पास है और बाहर के सारे काम करता है। कई बार दिन में डेरी फार्म पर भी चला जाता है। संतोष की 22 वर्षीय पत्नी है सरोज। सरोज घर के अंदर का काम संभालती है। सरोज साफ़ सुथरी सुन्दर और BA के “पहले साल” तक पढ़ी है – मतलब कालेज क्या होता है उसे मालूम है।
संतोष का एक 23 वर्षीय छोटा भाई भी है – सरोज का देवर – राकेश। करनाल में ही नौकरी करता है। अभी तक कुंवारा है। जब कभी चुदाई की तलब लगती है तो भाभी सरोज को चोदने आ जाता है – सरोज का प्यारा देवर है, मगर गांड का शौक़ीन है।
पिछले हफ्ते जब दो महीने की छुट्टियां काट कर रजनी वापस आयी तो कुछ ज़्यादा ही खुश थी। बात बात पर हंसना मेरी चूचियों पर हाथ फेरना या मेरी चूत या गांड पर हाथ लगाना – पहले वो ऐसी नहीं थी।
लड़की इतनी खुश तभी होती है जब या तो उसके मनपसंद लड़के के साथ उसकी शादी हो रही हो या फिर डाक्टरी के कोर्स के लिए मेडिकल कालेज में दाखला मिल गया को। तीसरा कारण है की लड़की की बढ़िया मस्त चुदाई हुई हो।
रजनी की ना तो सगाई हुई थी ना ही मेडिकल कालेज में दाखला ही मिला था – मतलब करनाल से मस्त चुदाई करवा कर आयी थी। सोच सोच कर मेरी तो अपनी चूत ही गीली होने लग गयी।
बस, फिर तो मैं रजनी की खुशी का राज़ जानने के लिए उसके पीछे ही पड़ गयी की। पहले तो हंस हंस कर रजनी ने टाला मगर फिर बोली “ठीक है, आज रात को तुम्हें सारा किस्सा बताऊंगी।”
मगर मैं तो सुनंने के लिए बेताब हो रही थी, “रात को क्यों, अभी क्यों नहीं “।
“अरी क्यों बेचैन हो रही है, किस्सा गरमा गरम और मस्त भी। ऐसे किस्से रात को ही सुने सुनाए जाते हैं। अगर हमारी भी गरम हो गयी तो ठंडी कैसे करेंगे” ?
अब तो मेरी जिज्ञासा और भी बढ़ गयी – मैं जानने के लिए बेचैन हो गयी की आखिर रजनी के साथ क्या और कैसे हुआ है। ये तो मैं समझ गयी की थी लड़की मस्त चुद कर आयी है – मगर किससे और कैसे। दिन भर मैं रात होने का ही इंतज़ार करती रही।
रात आयी, हम दोनों एक ही बिस्तर पर लेट गयीं। रजनी बुदबुदाई, ” क्या छुट्टियां कटीं, कभी ना भूलने वाली छुट्टियां “।
जिज्ञासा के मारे मेरी हालत खराब थी, “अब बताओ भी, रहा नहीं जा रहा”।
और फिर जो किस्सा रजनी ने सुनाया, वाकई सेक्सी, गरम करने वाला और मस्त था।
बकौल रजनी –
मैं (रजनी) जब करनाल पहुंची तो मेरी माँ बड़ी खुश हुई । सब से मेरा परिचय करवाया – दीपक, सरोज, सरोज का पति संतोष। सभी बड़े ही प्यार से मिले – मेरा तो बड़ा ही अच्छा स्वागत हुआ। दीपक को देख कर तो मेरा मन कुछ और ही सोचने लगा। सोचने लगी क्या डील डौल है – लंड भी बढ़िया होगा।
तभी ख्याल आया की वो मेरा भाई है। मगर दिल के एक कोने से आवाज़ आई भाई तो है, मगर है तो “सौतेला” ही। ख्याल आते ही फिर उसके लंड के बारे में सोचने लगी। तीन चार दिन यों ही निकल गए।
एक दिन रात को प्यास लगी तो मेरे जग में पानी नहीं था। मैं रसोई में से पानी लेने निकली। रसोई जाने के लिए दीपक का कमरा लांघना पड़ता है। जब उसके कमरे के सामने से गुज़री तो उसके कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।
मैंने उत्सुकतावश अंदर झाँका तो दीपक कमरे में नहीं था – सोचा शायद टॉयलेट गया होगा। पानी ले कर जब वापस आयी, तब भी दीपक कमरे में नहीं था और दरवाजा वैसे ही खुला था। मैं बड़ी हैरान हुई की इतनी रात को दीपक कहाँ जा सकता है – घर के सारे दरवाजे तो बंद हैं।
मैं सोच ही रही थी की ऐसा लगा की मेरी माँ के कमरे से कुछ आवाजें आ रही हैं। मैं देखने के लिए गयी और थोड़ी सी खुली खिड़की में से झांका – अंदर का नज़ारा देख कर मेरे तो होश ही उड़ गए। दीपक पूरी तरह से नंगा बिस्तर पर लेता हुआ था और मेरी माँ उसके ऊपर बैठी थी – पूरी तरह नंगी। साफ़ पता लग रहा था की दीपक का लंड मेरी माँ की चूत में है और मेरी माँ दीपक का लंड चोद रही है।
मेरी माँ ऊपर नीचे हिल हिल कर झटके लगा रही थी और दीपक नीचे से झटके लगा रहा था। कुछ ही देर में माँ नीचे उतर गयी। दीपक का लंड खूटे की तरह खड़ा था। माँ बिस्तर पर लेट गयी और दीपक माँ की टांगें उठा कर ऊपर से माँ को चोदने लगा।
“अजीब नज़ारा था। मेरी सगी माँ मेरे ही सौतेले भाई से चुद रही थी और मैं देख रही थी “।
मुझ से और नहीं देखा गया और में भाग कर अपने कमरे में चली गयी। मेरी साँस फूल रही थी। दीपक का खूंटे जैसा लंड मेरी आँखों के सामने घूम रहा था। मेरी तो अपनी चूत ही गरम हो गयी। बड़ी मुश्किल से उंगली से रगड़ रगड़ कर चूत का पानी छुड़ाया, मगर आँखों के आगे वही नज़ारा था दीपक नीचे, माँ ऊपर। माँ नीचे दीपक ऊपर – और दीपक का मोटा लम्बा लंड।
अगले दिन मैंने देखा माँ और दीपक बिलकुल सामान्य हैं मगर मैं ना माँ से ना ही दीपक से नज़रें नहीं मिला पा रही थी। मुझे तो सरोज से भी शर्म आ रही थी। मैं सोच रही थी की क्या सरोज भी इस माँ बेटे की चुदाई के बारे में जानती है ? पूरा दिन ऐसे ही गुज़र गया। रात को नींद ही नहीं आ रही थी। बार बार उठ कर देखती थी की दीपक मेरी माँ को चोदने उसके कमरे में गया या नहीं – मगर उस रात वो नहीं गया। मेरी रात जागते जागते ही कट गयी।
अगले दिन मेरे चेहरे से साफ़ लग रहा था की मैं रात भर नहीं सोई। माँ ने एक दो बार पूछा भी, मगर मैंने टाल दिया। माँ ने भी सोचा होगी कोइ बात, रात ढंग की नींद नहीं आयी होगी। दीपक ने सरसरी नज़र मुझ पर डाली लेकिन बोला कुछ नहीं।
सरोज ने ज़रूर हँसते हुए कहा, ” क्या बात है जीजी रात को डरावना सपना देखा या कोइ भूत देख लिया”। मुझे उसकी ये भूत वाली बात कुछ अजीब लगी। मुझे लगा की ये दीपक और माँ के चूत चुदाई के रिश्ते के बारे में जानती है या मेरा वहम है। खैर !!
नींद मुझे अगली रात भी नहीं आयी। मैं तो जानना चाहती थी की दीपक माँ के पास जाता है की नहीं। उस रात दीपक आधी रात को माँ के कमरे में गया। मैं तो इस ताक में ही थी। फिर खिड़की की तरफ गयी। खिड़की आज भी थोड़ी सी खुली थी। खिड़की का पल्ला या तो खराब था या जान बूझ कर खुला रखा गया था।
अंदर देखा तो दीपक आज माँ को पीछे से चोद रहा था। माँ फर्श पर खड़ी थी और पलंग पर झुकी हुई थी। दीपक ने माँ की कमर पकड़ी हुई थी और दबा कर चुदाई कर रहा था।
तभी माँ ने सिर घुमा कर दीपक को कुछ कहा। दीपक ने भी हाँ में अपना सिर हिलाया और लंड चूत में से बाहर निकल लिया। मैंने सोचा की अब माँ पलंग पर लेटेगी और दीपक ऊपर से चोदेगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। माँ वैसे ही झुकी हुई खड़ी रही। दीपक आया, उसके हाथ में कुछ ट्यूब जैसा कुछ था। दीपक ने ट्यूब में से सफेद सफेद कुछ निकाल कर माँ की गांड के छेद पर लगाया।
“ओह !! तो क्या अब दीपक माँ की गांड चोदेगा ” ?
मैं समझ गयी दीपक माँ की गांड के छेद को चिकना करने के लिए जैल – क्रीम लाया था। दीपक ने क्रीम लगा कर अपने लंड का टोपा माँ की गांड के छेद पर रखा और धीरे धीरे लंड अंदर डालना शुरू किया। कुछ ही पलों में दीपक का मोटा लंड माँ की गांड के अंदर था।
मैं हैरान थी इतना मोटा लंड गांड में चला कैसे गया – लेकिन हक़ीक़त में दीपक का लंड माँ की गांड के अंदर ही था। मेरी तो अपनी गांड में खुजली होने लग गयी। चूत तो पानी छोड़ ही रही थी। माँ की गांड की चुदाई शुरू हो चुकी थी। तभी माँ ने सिर घुमा कर दीपक से कुछ कहा। दीपक ने भी सिर हिलाया और लंड पूरा बाहर निकाल कर पूरे जोर से अंदर पेला, अब गांड चुदाई फुल स्पीड पर चल रही थी।
माँ एक पक्की चुदक्क्ड़ की तरह चुदाई करवा रही थी।
मुझ से और नहीं देखा गया, मेरी हालत खराब हो रही थी। कमरे में आ कर फिर अपनी चूत को उंगली से रगड़ा – एक उंगली अपनी गांड में भी डालने की कोशिश की। रात ऐसे निकल गयी।
अगले दिन माँ ने तो कुछ नहीं कहा, दीपक मुझे अजीब नज़रों से देख रहा था। “हे भगवान कहीं इसको भनक तो नहीं लग गयी की मैंने इसे माँ को चोदते देख लिया है, कहीं खिड़की जान बूझ कर तो नहीं खुली छोड़ी गयी जिससे मैं सारा नज़ारा देख सकूं”? उधर सरोज भी मुझे देख देख कर मुस्कुरा रही थी। मैं हैरान थी की आखिर ये हो क्या रहा है ?
दस दिन गुज़र गए। मैं जान चुकी थी की दीपक हर दुसरे दिन माँ को चोदता है। मुझे भी हर चुदाई देखने का चस्का लग गया था। सरोज अब अजीब अजीब सी बातें करने लगी थी, बात को घुमा कर मुझसे जाना चाहती थी मेरा कोइ बॉय फ्रेंड है क्या ? कहाँ तक है हम लोगों की दोस्ती – मैं मतलब समझती थी।
सरोज जानना चाहती थी की क्या मैंने चूत चुदवाई है या नहीं ? मगर क्यों ? कहीं इसने मुझे खिड़की में से चुदाई देखते हुए देख तो नहीं लिया ? क्या ये सरोज माँ और दीपक की चुदाई के बारे में जानती है ?
एक दिन तो कमाल ही हो गया। मैं माँ और दीपक की चुदाई देख कर अपने कमरे की तरफ जा ही रही – जैसे ही रसोई के दरवाजे के सामने से गुज़री अंदर से सरोज ने दबी आवाज में मुझे अंदर बुलाया। मेरे तो पसीने छूट गए। तो मेरा शक ठीक ही था। सरोज जान गयी थी की मैं छुप छुप कर दीपक और माँ की चुदाई देखती हूँ।
मैं रसोई में गयी। सरोज ने पूछा, “क्या देखा ?” मेरी तो आवाज ही नहीं निकल रही थी। वो बोली, “चलो तुम्हारे कमरे में चलते हैं।” मैंने सरोज से पूछा ये कब से चल रहा है।
“क्या कब से चल रहा है “? उसने पूछा। यही सब, मैंने माँ के कमरे की तरफ इशारा करके कहा।”
ओह तुम्हारा मतलब बीबी जी (सरोज माँ को बीबी जी बुलाती थी) और दीपक बाबा की चुदाई का चक्कर”? मैं हैरान हुई की ये कैसे बात कर रही है।
“अरे जीजी ये तो शुरू से – जब से दीपक घर आये हैं तब से ही चल रहा है। बाबू जी को काम से फुर्सत नहीं। ये चूत चुदाई उनके लिए बेमानी है और बीबी जी अभी जवान हैं, उनको लंड चाहिए – वो उनको दीपक बाबा से मिल रहा है “।
मुझे सुन कर बड़ी ही हैरानी हुई। अगर दीपक को चूत ही मारनी है तो सरोज की क्यों नहीं ? सच्चाई तो यही है माँ की चूत 41 साल की उम्र में तो अब भोसड़ा बन चुकी होगी – या फिर वो सरोज को भी चोदता होगा या फिर माँ को चुदाई से मना नहीं कर पाता होगा।
“जो भी हो, घर मैं चुदाई का खेल तो चल ही रहा था”।
मैंने सरोज से पूछ ही लिय। अगर दीपक को चूत ही चाहिए तो तुम भी तो हो। तुम तो जवान भी हो। सरोज ने मेरे गाल पर चिकोटी काटी,”हाँ मैं भी हूँ मगर मेरा काम संतोष बढ़िया चलाता है – आगे और पीछे, दोनों छेद चोदता है। इस लिए जरूरत नहीं पड़ती”। मैं हैरान तो थी, मगर मुझे सरोज की बात पर विश्वास नहीं हुआ।
तभी अचानक सरोज ने मेरी सलवार के अंदर हाथ डाल कर मेरी चूत में उंगली डाल दी और बोली, “अरे इसमें तो बरसात हो रही है। लंड मांग रही है ये”।
बात तो सरोज ठीक ही कह रही थी। लंड तो मांग ही रही थी मेरी चूत। मगर मैं बोली कुछ नहीं – बोलती भी तो क्या बोलती।
ज़रा सा रुकने के बाद सरोज बोली, “चलो”।
मैंने पूछा, “कहाँ” ?
“चलो तो, आज तुम्हारी चुदाई का इंतज़ाम करते हैं “। मैं एक दम ठिठक गयी, “क्या “? मेरे मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी।
सरोज बोली, “अरे जीजी घबराओ नहीं, चलो “।
“मगर कहाँ “, मैं हैरान थी।
“हमारे कमरे में, संतोष के पास। उसे बोलूंगी तुम्हारी चूत को ठंडा करे “।
“मगर”, सरोज मेरी बात काट कर बोली, “कोइ अगर मगर नहीं, चलो”।
“मगर माँ, दीपक ?” मैंने दबी आवाज मैं पूछा।
सरोज बोली, “दीपक तड़का होने से पहले बाहर नहीं आने वाला, ना ही बीबी जी। दूसरे दीपक तुम्हाई चूत चोदने वाला नहीं जब तक बीबी जी घर में हैं। अगले हफ्ते बीबी जी और बाबू जी तीन दिनों के लिए अम्बाला एक शादी में जाने वाले हैं। दीपक घर पर ही होगा तब उससे चुदवा लेना – अब चलो संतोष का लंड ट्राई करो “। बात करते करते सरोज का कमरा ही आ गया।
मुझे बाहर ही रुकने के लिए बोल कर सरोज अंदर चली गय। कुछ देर बाद बाहर आयी और बोली, “जाओ जीजी अंदर जाओ और मौज लो”। इतना कह कर सरोज ने मुझे अंदर धकेल दिया। मैं दरवाजे के पास ही खड़ी हो गयी। संतोष चारपाई पर बैठा मुस्कुरा रहा था – वो उठा और मुझे पकड़ कर बिस्तर की तरफ ले गया।
संतोष ने मेरी चूचियां पकड़ ली और दबाने लगा। उसने मेरी सलवार का नाड़ा खोला और बिस्तर पर लिटा दिया। मेरी टांगें चौड़ी कर के मेरी चूत चाटने लगा I फिर संतोष ने अपनी जीभ मेरे चूत के दाने भग्नाशा – क्लोरिटिस – पर फेरनी शुरू कर दी। मेरी तो सिसकारियां निकल रही थी। मैंने संतोष का सर चूत से हटाया और दबी आवाज में बोली, मुंह में डालो।
वो एक सेकण्ड के लिए रुका फिर उलटा मेरे ऊपर लेट गया – अब उसका लंड मेरे मुंह में था और वह मेरी चूत चाट रहा था। लंड वाकई मोटा था। लग रहा था चुदाई का सही मजा आने वाला है। अगले पांच सात मिनट तक यही चलता रहा।
फिर संतोष ने अपना लंड मेरे मुंह में से निकला और उठ गया, लगता था गर्म हो गया है। मैं भी तैयार ही थी। संतोष ने मेरे चूतड़ों के नीचे तकिया रख कर मेरी चूत ऊंची की – टांगें फैलाई, लंड मेरी चूत पर रक्खा और फच्च – फच्च की एक आवाज़ के साथ आधा लंड मेरे अंदर था।
कुछ सेकण्ड रुक कर संतोष ने पूरा लंड चूत के अंदर डाल दिया और चुदाई शुरू कर दी। क्या चुदाई थी। हालांकि मैं अपने बॉय फ्रेंड से भी चुदी थी और तुम्हारे (उसने मेरी और इशारा कर के कहा) बॉय फ्रेंड से भी चुदी – लेकिन वो चुदाई जल्दबाज़ी वाली थी – यहाँ संतोष मस्त चोद रहा था – न कोई जल्दी न कोई डर। लगभग बीस मिनट की चुदाई के बाद संतोष ने अचानक ही धक्कों के स्पीड बढ़ा दी लगता था झड़ने वाला था। मैं खुद भी झड़ने के लिए तैयार थी।
अचानक संतोष के मुंह से एक आवाज़ निकली ओ… ओ… आह… आह… मजा आ गया आह… आह… और मेरी चूत उसने अपने गरम गरम वीर्य से भर दी। मैं भी झड़ चुकी थी। मन तृप्त हो गया। दो मिनट के बाद संतोष उठा कपडे उठा कर टॉयलेट में चला गया। मैंने अपनी सलवार से ही चूत साफ़ की – संतोष का लेसदार वीर्य बाहर तक आ गया था। कपड़े पहने और अपने कमरे की तरफ चल पड़ी।
सरोज मेरे कमरे में ही बैठी थी। मुझे उससे शर्म सी आ रही थी – आखिर उसके पति से चुदवा कर आ रहे थी। मेरी नज़रें नीचे की तरफ थी। सरोज उठी और मेरे पास आ कर बोली, “शर्माओ मत जीजी, जब तक यहां हो संतोष से चुदवा सकती हो। मुझ से पूछने की भी ज़रूरत नहीं है। बस जब मौक़ा मिले जाओ और मजे ले कर आ जाओ”।
यह कह कर सरोज जाने लगी, मगर दरवाजे पर रुकी, “और हाँ याद रखना बीबी जी और बाबू जी तीन दिन के लिए अम्बाला जा रहे हैं, दीपक बाबा अकेले होंगे”। इतना कह कर सरोज चली गयी।
मैं भी टॉयलेट में गयी कपड़े उतारे और छह फुट लम्बे शीशे में अपने नंगा जिस्म देखा।संतोष का वीर्य अभी भी मेरी चूत से निकल कर टांगों पर बह रहा था। मैं टॉयलेट सीट पर बैठ गयी और जोर लगा कर सारा वीर्य बाहर निकाला पेशाब किया, स्नान किया और सो गयी। क्या नींद आयी सुबह जब नींद खुली तो नौ बज चुके थे। मुंह धो कर बाहर निकली तो सामने ही माँ थी, “क्या बात है, लगता है आज थकान दूर हुई है, आज तो बड़ी तरोताजा लग रही हो”, कह कर वो चली गयी, मैं शर्मा गयी, सरोज पीछे खड़ी हंस रही थी।
शुक्रवार को मेरे पिता जी (सौतेले) आ गए, माँ तैयार ही थी। अम्बाला अपनी कार से ही जा रहे थे – 80 किलोमीटर ही तो सफर था। जाते जाते माँ बोली अच्छा रजनी तीन या चार दिन लगेंगे। मेरा मन तो हुआ की कहूँ तीन या चार ही क्यों ? चार या पांच क्यों नहीं, पांच या छः क्यों नहीं। मेरी चूत तो दीपक के खूंटे के लिए बेचैन थी।
खैर शाम हुई और सब खाना खा कर इधर उधर समय बिताने लगे। जल्दी सोने की दिनचर्या थी। साढ़े आठ बजे सरोज अपने कमरे की तरफ जाने लगी। जाते जाते बोल गयी, “जीजी एक बात बोलूं मैंने दीपक को बीबीजी की चुदाई करते देखा है। बढ़िया चोदता है। लंड चुसवाने का बड़ा शौक़ीन है, वहीं से शुरू करना”। और वो चली गयी।
मुझे यकीन हो गया दीपक ने सरोज की भी चुदाई की है, वार्ना इसे कैसे पता की दीपक को लंड चुसवाने मैं मज़ा आता है।
मैं भी अपने कमरे में आ गयी और टीवी देखने लगी। साढ़े दस बजे मैं उठी और पानी का जग ले कर पानी लेने के बहाने बाहर निकली। जग रसोई में रख क़र, धीरे से दीपक के कमरे की तरफ गयी। दरवाजे को धीरे से धक्का दिया, दरवाजा खुला ही था। नाईट लैंप में दीपक बिस्तर पर लेटा दिखाई दे रहा था। बनियान और वेस्ट (कच्छे) में। लंड का उभार साफ़ दिखाई दे रहा था।
मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी। दीपक और माँ की चुदाई आखों के आगे आ गयी – बढ़िया चुदाई करता था। मैं आगे बढ़ी और जा कर घुटनों के बल पलंग के साथ बैठ गयी। मेरा मुंह दीपक के लंड के बिलकुल सामने था।
थोड़ी देर मैं ऐसे ही बैठी रही, फिर सोचा जब चुदाई की करवानी है तो शर्म कैसे और डर कैसा। मैंने दीपक का लंड धीरे से उसकी वेस्ट से बाहर निकाला और अपने मुंह में ले कर चूसना शुरू कर दिया।
दीपक कच्ची नींद में था , या फिर बहाना बना रहा था, “अरे रजनी” ? मैंने लंड मुंह से बाहर निकल दिया और दीपक की तरफ देखने लगी की देखें क्या कहता है। वो बोला, “नीचे क्यों बैठी हो ऊपर आओ “। मैं पलंग के ऊपर बैठ गयी। दीपक ने अपना लंड अपने हाथ में लिया और बोला, ये लो आराम से चूसो। मैंने लंड पकड़ा और अपने मुंह में डाल कर चूसने लगी। संतोष के लंड की तरह का ही मोटा लंड ।
पांच सात मिनट की चुसवाई के बाद दीपक ने लंड मेरे मुंह से निकाल लिया। मुझे पूरी तरह नंगा करके, मेरी चूचियां चूसने लगा। साथ ही मेरी चूत में उसने उंगली डाल दी। जब उसे लगा की मेरी चूत अब लंड मांग रही है तो उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया और मेरी टांगें उठा दी।
मुझे संतोष की चुदाई याद आ गयी – कैसे संतोष ने मेरे चूतड़ों के नीचे तकिया रख कर मेरी चूत ऊपर उठाई थी। मगर दीपक ने तो ऐसा कुछ नहीं किया – मगर जो दीपक ने किया वो वाकई अलग था। दीपक ने मेरी टांगें अपने कंधों पर रख दी। मेरी हालत ये थी की मैं अपने चूतड़ हिला भी नहीं पा रही थी।
दीपक ऊपर की तरफ खिसका और मेरी चूत खुदबखुद ऊपर उठ गयी। मेरी चूत का छेद दीपक के लंड के बिलकुल सामने था। बस फिर क्या था एक दो और तीन – लंड चूत के अंदर था और चुदाई शुरू थी। दस मिनट धक्कों के बाद दीपक हटा और बोला “अब ज़रा चुदाई का ढंग बदलते है। पीछे से चुदाई करूँ “?
मुझे अपनी माँ की चुदाई याद आ गयी जिसमे दीपक माँ को पीछे से चोद रहा था। मैंने सर हिला कर हामी भरी और पलंग से नीचे उतर गयी। मेरी माँ की ये वाली चुदाई मेरी आखों के आगे घूम गयी। अपनी माँ की तरह ही मैं पलंग पर झुक गयी, अपनी टांगें चौड़ी कर दी और दीपक के लंड का इंतज़ार करने लगी।
अब सबर नहीं हो रहा था। दीपक ने अपना लंड मेरी चूत पर फेरना शुरू किया। बीच बीच में वो अपना लंड मेरी गांड के छेद पर भी रख देता था। आनंद के मारे मेरी तो सिसकारियां निकलनी शुरू हो गयी और मैं हिलने लग गयी। दीपक समझ गया भट्टी गर्म है। उसने एक ही बार में पूरा लंड अंदर कर दिया और मेरी चूत की चुदाई शुरू कर दी। मैं सोच रही थी क्या लंड है और क्या चुदाई है।
अगले आठ दस मिनट तक ऐसी ही चुदाई चली, फिर दीपक ने अपना लंड मेरी चूत में से निकाल लिया और बिस्तर पर सीधा लेट गया और बोला, ” बैठो मेरे लंड पर और अंदर लो इसको “। मेरी आँखों के आगे माँ का दृश्य घूम गया, जब वो दीपक के खूंटे जैंसे लंड पर बैठी थी और जोर जोर से ऊपर नीचे हो रही थी।
अब वही “खूंटा ” मेरी आँखों की सामने था और मेरी चूत में घुसने के लिए बेताब था। मैंने एक टांग उठाई, दीपक के दूसरी ओर रखी, लंड को एक हाथ से पकड़ कर चूत पर रखा और उसकी ऊपर बैठ गयी। लंड पूरी गहराई तक अंदर था – मजा ही आ गय। यही जन्नत थी। थोड़ी और चुदाई के बाद दोनों झड़ गए।
मेरी चूत एक बार फिर सफ़ेद गर्म लेसदार वीर्य से भर गयी थी। कुछ देर मैं ऐसे ही बैठी रही। जैसे ही मैं टांग उठा कर दीपक के ऊपर से उतरी, ऐसा लगा जैसे आधा कप वीर्य मेरी चूत में से निकल कर दीपक के लंड और अंडकोषों (टट्टों) पर फ़ैल गया।
ना जाने मेरे मन में क्या आया, मैं झुकी और वीर्य चाटने लगी – और तब तक चाटती रही जब तक दीपक का लंड और टट्टे बिलकुल साफ़ नहीं हो गए। दीपक भी वैसे ही पड़ा रहा। जब सारा काम हो गया तो बोला,”रजनी तुम बहुत अच्छा चुदवाती हो। मजा आ गया।”
मैं कपड़े पहनते हुए बोली, “चुदाई तो तुम भी कमाल की करते हो। अच्छा एक बात बताओ माँ के तो तुमने पीछे भी डाला था।”
वह हंसा और बोला, “ओ ओ ओ तो तुमने पूरी फिल्म देखी है !”
अब कहने को कुछ नहीं था। मस्त चुदाई हो चुकी थी। अब पीछे की छोड़ आगे का सोचना था – कल क्या होगा ? मैंने दीपक से कहा, “माँ और बाबू जी तो सोमवार को वापस आने वाले हैं – मतलब दो दिन और ” I
दीपक ने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और बोला ,” हाँ दो दिन चुदाई के और। एक बात और – कल तुम्हारे लिए एक सरप्राइज भी होगा “।
मैं अपने कमरे में आ गयी, चूत और मन दोनों की तसल्ली हो गयी थी। पूरी चुदाई एक फिल्म जी तरह आखों के आगे थी। फिर ना जाने कब आँख लग गयी। ।
आँख खुली तो सरोज चाय का कप ले कर सामने खड़ी मुस्कुरा रही थी। “जीजी कैसी कटी रात ? ”
मुझे तो शर्म ही आ गयी। सरोज बोली, “अच्छा चाय पी लो तरो ताज़ा हो कर आ जाओ, बातें करने लिए सारा दिन पड़ा है।”
मैंने चाय का प्याला पकड़ा, चाय पी और टॉयलेट में घुस गयी। नहाते हुए जब चूत पर हाथ फेर रही थी तो पाया चूत अभी भी चिप चिप कर रही थी – दीपक का सफ़ेद लेसदार वीर्य था या फिर पूरी रात चूत मस्ती में पानी छोड़ती रही थी ?
नहा धो कर बाहर आयी, दीपक करनाल शहर जा चुका था। संतोष खेतों में गया हुआ था। घर में मैं और सरोज अकेली ही थी। सरोज फिर पूछने लगी, “जीजी रात का किस्सा तो बताओ।”
मैं सोचने लगी, अब सरोज से क्या शर्माना। सरोज के पति संतोष से चुदने के बाद तो मैं सरोज के सामने नंगी ही थी। मैंने पूरी की पूरी चुदाई सरोज को बताई। सरोज ने अपनी चूत पर हाथ फेरते हुए कहा, “जीजी बाकी तो सब ठीक है, इस सरप्राइज़ वाली बात का क्या मतलब है ?”
मैंने कहा, “मुझे भी नहीं पता,मैं भी हैरान हूँ। अब क्या सरप्राइज़ है ये तो रात को ही पता चलेगा “।
सरोज ने अपना हाथ अपनी चूत से हटाया और बोली, “अच्छा मैं भी चलूँ , काम पड़ा है “- वो हमारे कमरे की तरफ बढ़ गयी ।
अब वहाँ उसको क्या काम ? मेरी चुदाई सुन कर गरम हो गई होगी, ज़रूर चूत में उंगली करेगी।
दिन गुज़र गया। दीपक शाम को लौटा। काफी सामान ले कर आया था। घर का सामान वही लाता था। मेरे पास से गुज़रा तो मुझे देख कर मुस्कुराया। सब अपने अपने काम में व्यस्त थे। बाबू जी नहीं थे इसलिए संतोष रात को डेरी वाले घर में ही रुकने वाला था।सरोज खाना बना रही थी, मैं पास ही खड़ी थी। वो बोली, “जीजी, रात की तैयारी पूरी है ?” साथ ही हंस पड़ी। मैं थोड़ी शरमाई लेकिन चुप रही।
संतोष बोली, “जीजी एक बात बोलूं, मानोगी “?
“हाँ हाँ बोलो, इसमें ना मानने वाली क्या बात है “? मैंने कहा।
संतोष ने मेरे हाथ अपने हाथ में लिए और बोली, “मुझे आप की चुदाई देखनी है “।
मैं हैरान हो गयी। इस बात की तो मुझे उम्मीद नहीं थी। पर फिर भी मैं बोली, “ठीक है, पर देखोगी कैसे “?
“बस दीपक के कमरे की खिड़की थोड़ी खोल कर रखना”।
मैंने सरोज की तरफ देखा और हाँ में सर हिला दिया, “खिड़की थोड़ी खोल कर रखना”। तो क्या माँ के कमरे की खिड़की भी जान बूझ कर खुली रखी गई थी ?
रात हुई, जब सब लाइटें बंद हो गयी तो मैं उठी और दीपक के कमरे की तरफ जाने लगी। सरोज बाहर ही खड़ी थी – बोली , “तुम चलो जीजी अपना खेल खेलो, बस खिड़की थोड़ी खोल कर रखना”।
मैं आगे बढ़ी और दीपक के कमरे में चली गयी। दीपक मेरा इंतज़ार ही कर रहा था। आज तो नंगा ही बिस्तर पर लेता हुआ था। लंड उसके हाथ में था, उसके साथ खेल रहा था। एक पल के लिए मैं रुकी फिर मैं भी उसके साथ ही लेट गयी और उसका लंड सहलाने लगी। जल्दी ही लंड फनफनाने लगा। दीपक बोला, “मैं पेशाब करके आता हूँ “, वो टॉयलेट की तरफ चला गया। मैं उठी और खिड़की थोड़ी सी खोल दी और वापस आ कर बिस्तर पर लेट गयी।
दीपक पांच मिनट के बाद आया, और मेरे साथ ही लेट गया। मेरी चूचियों के साथ खिलवाड़ करने लगा। मैंने भी उसका लंड हाथ में ले लिया। दोनों एक दुसरे की बाहों में समा गए। मेरी चूचियां उसकी छाती से लग रही थी और उसका लंड मेरी चूत पर रगड़ खा रहा था। जल्दी ही दोनों गरम हो गए।
दीपक ने मुझे सीधा लिटा दिया और मेरे होंठ अपने होठों में ले कर चूसने लगा। मैंने भी नीचे से उसके चूतड़ अपने हाथों में ले लिए और दबाने लगी। जल्दी ही दोनों को चुदाई की तलब होने लगी।
कल रात की ही तरह दीपक ने मेरी टांगें अपने कंधों पर रखी और ऊपर की तरफ होने लगा। मेरी चूत ऊपर उठने लगी। दीपक का लंड और मेरी चूत आमने सामने थे। दीपक ने लंड चूत पर रखा और थोड़ा खिलवाड़ करने के बाद अंदर पेल दिया। बस फिर चुदाई शुरू हो गयी।
आज चुदाई की गाड़ी सुपर फ़ास्ट थी – बिना रुके दीपक ने दबा कर मुझे चोदा। इतना मजा आ रहा था की चूतड़ उठा उठा कर झटके दे दे कर पूरा लंड अंदर ले रही थी। दीपक भी समझ गया होगा कि “ये तो गयी”, उसने आठ दस लम्बे धक्के लगाए और बड़ी तेज़ आवाज़ के साथ लेसदार वीर्य मेरी चूत में छोड़ दिया। मेरा तो दिमाग़ ही सुन्न पड़ गया – होश तब आया जब मैं झड़ गयी। घर में कोइ था नहीं इसलिए हम दोनों पूरे जोर शोर के साथ मजे ले रहे थे।
मैं सोच रही थी सरोज अगर चुदाई देख रही होगी तो क्या सोच रही होगी क्या कर रही होगी।
कुछ देर लेटने के बाद मेरी चूत ठंडी हो गयी। मेरा मन तृप्त हो गया। उठ कर टॉयलेट गयी, पेशाब कर के चूत को धो कर वापस आयी और कपड़े पहनने लगी।
“अरे ये क्या कर रही हो”, दीपक बोला। मैं रुक गयी और उसकी तरफ देखा और हंस कर कहा – “क्या एक बार और चोदना है “? वो बोला, “याद नहीं, अभी तो सरप्राइज़ बाकी है “।
“कैसा सरप्राइज़ “? मैंने पूछा, कपड़े मेरे हाथ में ही थे।
“वही, जो मैंने कल कहा था कि आज सरप्राइज़ दूंगा “, दीपक बोला।
मुझे याद आ गया, मैं तो भूल ही चुकी थी कि दीपक ने ऐसा कुछ कहा था। मैंने कपड़े फिर से बिस्तर पर रख दिए और पूछा, “क्या सरप्राइज़ है? ”
“अभी पता लग जाएगा, आ जाओ “। मैं उसके साथ लेट गयी। ट्रेलर फिर शरू हो गया। उसके हाथ मेरी चूचियों पर और मेरी चूत पर और मेरा हाथ उसके लंड पर। दस बारह मिनट के बाद दीपक उठा और बोला, “चलो अब पीछे से करेंगे”। गरम तो मैं हो ही चुकी थी। जिस चूत को थोड़ी देर पहले साफ़ कर के तौलिये के साथ पोंछ कर आयी थी वो फिर गीली हो चुकी थी।
मैं उठी और कोहनियां बिस्तर पर टिका कर टांगें चौड़ी करके खड़ी हो गयी और दीपक के लंड का इंज़ार करने लगी। “दीपक लंड अंदर डाल क्यों नहीं रहा, क्या कर रहा है ” !
तभी मुझे लगा कि दीपक मेरी गांड के छेद पर कुछ लगा रहा है – कुछ चिकना चिकना ठंडा ठंडा। मैंने सर घुमा कर पूछा, “क्या कर रहे हो दीपक “? “तुम्हें सरप्राइज़ देने की तैयारी कर रहा हूँ। आज तुमही गांड चुदाई करूंगा “।
“तो ये था सरप्राइज़ “। मैंने कभी गांड नहीं चुदाई थी। मगर इतना पता था कि चूत में से चुदाई से पहले जो लेसदार पानी निकलता है वो असल में कुदरत का करिश्मा है जिससे लंड फिसल चूत में चला जाता है। गांड में से ऐसा कुछ नहीं निकलता इस लिए गांड के छेद पर ढेर सारी चिकनी जैल या क्रीम लगानी पड़ती है ।
दीपक गांड पर जैल लगा रहा था। थोड़ी जैल उंगली से गांड के अंदर भी लगा रहा था। गांड कि इस मालिश और गांड के अंदर उंगली ने मुझे बेसबर कर दिया। मन कर रहा था कि डाले लंड अंदर, एक नया तजुर्बा होने वाला था – गांड मरवाने का, गांड चुदवाने का।
आखिर दीपक ने अपना लंड गांड के छेद के ऊपर रक्खा और थोड़ा सा अंदर किया। मुझे बड़ी दर्द हुई। मैं आगे की तरफ हुई। दीपक ने अब मेरी कमर पकड़ ली जिससे मैं आगे ना जा सकूं और लंड अंदर जाये। दीपक ने लंड फिर अंदर धकेला। मुझे सच में हे दर्द हो रहे थी। मैंने दीपक से कहा, “दीपक ये तो बड़ा दर्द करता है “।
दीपक ने मुझे समझाया, “शुरू शुरू में थोड़ा दर्द होता ही है। पहली गांड चुदाई में ढेर सारी जैल लगानी पड़ती है और लंड को थोड़ा थोड़ा अंदर डालते हैं। पहली बार पूरा अंदर करने में आठ दस मिनट भी लग जाते हैं “।
अब मुझे कुछ हिम्मत हुई। दीपक ने वैसा ही किया जैसा कहा था। लंड थोड़ा अंदर डाला, फिर बाहर निकल कर खूब सारी जैल लगाई और लंड थोड़ा और अंदर किया। थोड़ी ही देर में दीपक का आधा लंड अंदर था। दीपक जरा भी जल्दी नहीं कर रहा था।
” आखिर मैं कहीं भागी तो जा नहीं रही थी “।
अगले दस मिनट में लंड पूरा अंदर था। मुझे दर्द तो हो रहा था और मैं महसूस भी कर रही थी कि मेरी गांड का छेद चौड़ा हो गया है – गांड की छेद के प्रवेश द्वार के ऊपर ही रगड़ाई का मजा आता है। जितना मोटा और लम्बा लंड, गांड के प्रवेश द्वार की उतनी ज़्यादा रगड़ाई, उतना ज़्यादा मजा। बस जैल खूब सारी लगी होनी चाहिए। मैंने अपना सर अपनी बाहों में रख लिया और गांड चुदाई का मजा लेने लगी।
“चूत चुदाई, गांड चुदाई – ये चुदाई भी क्या मस्त चीज़ है। क्या होता अगर चूत और लंड दोनों में से कोइ एक ना होता”।
तभी दीपक की आवाज़ आयी, “अरे सरोज तुम ” ?
मैंने सर उठाया और पीछे मुड़ कर देखा, सरोज खड़ी थी, बिकुल नंगी। तो सरोज चुदाई देख ही रही थी ? वो बोली, “तुम लोग करते रहो”। वो बिस्तर पर आयी और अपनी चूत मेरे मुंह के आगे कर के लेट गयी और अपनी टांगें चौड़ी कर दी। सरोज की चिकनी चूत मेरे सामने थी। सरोज ने अपने हाथों से अपनी चूत चौड़ी कर दी। गीली गुलाबी फुद्दी मेरी आँखों के सामने थी। मैंने अपने होठ सरोज की चूत पर लगा दिए और जबान से ऊपर नीचे चूत चाटने लगी।
दीपक मेरी गांड चोद रहा था और मैं सरोज की चूत चाट रही थी। मेरी गांड दुखने लग गयी थी। मैंने दीपक को कहा, “दीपक मेरी गांड दुःख रही है “।
दीपक ने लंड बाहर निकल लिया और खड़ा हो गया। सरोज उठी और कुहनियां बिस्तर पर रख कर टांगें चौड़ी कर के खड़ी हो गयी। अब मेरी और सरोज की जगह बदल गयी थी। सरोज मेरी जगह थी और मैं सरोज की जगह – मतलब दीपक का लंड सरोज की गांड में था और सरोज मेरी चूत चाट रही थी।
थोड़ी चुदाई के बाद दीपक बोला अब दोनों आ जाओ। अब मैं बारी बारी से दोनों की गांड की चुदाई करूंगा। हम दोनों पलंग पर कुहनियों रख के खड़ी हो गयी और गांड चौड़ी कर दी। दीपक हम दोनों की गांड बारी बारी से चोद रहा था। मैं तो एक बार चूत की चुदाई का मजा ले चुकी थी, फिर से अपनी उंगली चूत में डाल कर चूत का दाना – भग्नाशा – रगड़ना शुरू कर दिया। सरोज पूरी गरम हो चुकी थी – वो लम्बी लम्बी साँसें ले रही थी। लगता था हमारी चुदाई देखते हुए अपनी चूत काफी रगड़ चुकी थी।
दीपक बोला, अब तैयार हो जाओ। तुम दोनों की गांड के ऊपर वीर्य निकालूँगा। मैंने अपनी चूत जोर जोर से रगड़ने शुरू कर दी। सरोज भी यही कर रही थी। दीपक अपने लंड को कभी मेरी गांड के साथ लगाता था कभी सरोज की गांड के साथ और हाथ से मुठ मार रहा था। जल्दी ही दीपक ने एक बड़ी हुंकार भरी – “आह… ओह… आ… मजा आ गया” – और उसने बारी बारी से लंड मेरी और सरोज की चूत के साथ सटाया। उसका गरमा गरम वीर्य मेरी और सरोज की गांड पर भल भल करके गिरा और नीचे कि तरफ बहने लगा।
“ये भी क्या अनुभव था। गांड के छेद पर गर्म वीर्य और नीचे की तरफ बहता हुआ। इस अनुभव ने ही हमारी चूत का पानी निकल दिया। हम तो निहाल हो गयीं ”।
चुदाई खत्म हो चुकी थी। हम तीनो ही बाथरूम में चले गए। तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
सरोज मुझ से बोली, “बैठ जाओ।” मैंने पूछा “क्यों ?” उसने कहा “बैठो तो सही ” ?
मैं घुटनों के बल बैठ गयी। मेरे पास ही सरोज भी घुटनों के बल बैठ गयी।
सरोज दीपक से बोली, “चलो दीपक शरू हो जाओ।” दीपक ने लंड हाथ में लिया और हमारे ऊपर मूत की धार डाल दी। एक बार तो मैं सकपकाई, मगर जब सरोज कि तरफ देखा तो हैरान रह गयी। सरोज ने मुंह खोला हुआ था और दीपक के लंड से गर्म मूत सरोज के मुहं में जा कर बाहर निकल कर बह रहा अनायास ही, मैंने भी मुँह खोल दिया। दीपक अब मेरे ऊपर भी पेशाब कर रहा था।
ये हो क्या रहा था। आधा घंटा हम यही कुछ करते रहे। जब चलने लगे तो दीपक बोला, ” याद रखना, परसों तो माँ और बाउजी आ जायेंगे “।
“माँ !!!” ,मेरी तो हंसी छूट गयी – करता है चुदाई, और बोलता है माँ – पर मैं ही कौन सी कम थी। दीपक मेरा भी तो भाई ही था, क्या हुआ जो सौतेला था “।
मैंने सरोज को कहा, सरोज आज मेरे साथ ही मेरे कमरा में सो जाओ, अकेले कहाँ सोवोगी”। वो हंस कर बोली, “हाँ ठीक है क्या पता रात को फिर मन कर आये और उंगली करनी पड़े “।
मैं भी हंस पडी, और हम दोनों मेरे कमरे में चले गए, कपड़े उतरे और नंगे ही बिस्तर में घुस गयीं। लेकिन पूरी रात हम सोई नहीं, ऐसी ऐसी चूत और गांड चुसाई की क्रीड़ा की कि कोइ कल्पना भी नहीं कर सकता।
सुबह जब मैं उठी तो सरोज पहले ही उठ चुकी थी। में रात के किस्से याद करके मुस्कुरा पडी। मैंने कपड़े पहने और रसोई में गयी सरोज काम कर रही थी। मैंने पीछे से सरोज की चूचियों को पकड़ा और बोली, “मज़ा आ गया।” सरोज घूमी और मेरे होठों को अपने होठों मैं पकड़ कर चूसने लगी।
उस रात हमने फिर दीपक के साथ चूत और गांड की चुदाई की।
ये सिलसिला मेरी छुट्टियां खत्म होने तक चलता रहा। अगर माँ कहीं बाहर होती तो दीपक, अगर माँ घर पर ही होती तो संतोष।
रजनी आपबीती सुनाने के बाद चुप हो गयी – लगता था कुछ सोच रही है। “अपनी चुदाई के बारे में ही सोच रही होगी “।
मेरी हालत बड़ी खराब थी। चुदाई की इच्छा होने लगी थी । मगर अब इस वक़्त लंड कहाँ। मैंने रजनी से ही कहा, “रजनी तुम्हारी छुट्टियों के कहानी सुन कर चूत गर्म हो गई है। लंड मांग रही है – क्या करें ”
वो बोली, ” मेरी भी यही हालत है, पर इस वक़्त तो कुछ नहीं होगा, कल देखते है “।
मगर मुझ से नहीं रहा जा रहा था। मैंने कहा, ” पर अभी क्या करें ” ?
रजनी ने कुछ देर सोचा और बोली, “चलो आज हम वही करते हैं जो सरोज और मैं आपस में करती थी “।
हम दोनों ने कपड़े उतार दिए। फिर जो हुआ उसकी मुझे कल्पना नहीं थी। हमने एक दुसरे की चूत चाटी, गांड के छेद में जुबान घुसाई और अंत में बॉथ रूम में पहले वो बैठ गई और टांगें चौड़ी करके मैंने उसके ऊपर मूता फिर मैं बैठी और उसने मेरे ऊपर मूता।
“पूरे जिस्म पर गरमा गर्म मूत – ये बताने वाली नहीं खुद किसी के साथ करके महसूस करने वाली चीज़ है। ”
हल्की हो कर हम फिर लेट गयी।
“रजनी, अगली बार कब जाओगी करनाल “?
” छुट्टियों में। वैसे मैं सरोज को नंबर दे कर आयी हूँ। मां और बाबू जी पंद्रह दिन के लिए रामेश्वरम जायेंगे। सरोज मुझे फोन करेगी तब जाऊंगी।
मेरी तो चूत में खजली छिड़ गयी और गांड का छेद खुलने बंद होने लगा। मैंने बड़े ही दबे स्वर में पूछा, “रजनी, मुझे भी ले जाओगी ” ? मुझे भी चूत और गांड ,,,,,,,,,” , उसने मुझे बीच में ही टोक दिया, अरी मेरी जान आभा, मैं तुझे कैसे छोड़ दूंगी ? अगर तू ना भी कहती तो भी मैं तुझे ले कर जाती। तीन लड़के तीन लड़कियां “।
मैंने पुछा, “तीसरा कौन ” ?
रजनी ने मेरी चूत में उंगली डाल कर कहा – “सरोज का देवर राकेश, वो नहीं था वहाँ। सरोज कह रही थी क्या गांड की पिलाई करता है। इस बार वो नहीं था वहां, तो उससे गांड नहीं चुदवा पाई “।
मैं तो सोच सोच कर ही मस्ती में आ गई। मैंने रजनी को कहा, “गांड में भी उंगली करो रजनी “।
रजनी हंसी, “ये ले मेरी ठरकी आभा ” – और पूरी उंगली रजनी ने मेरी गांड के छेद में डाल दी।
मैं भी हंसी ,”मजा आ गया ठरकी रजनी – यही है ज़िंदगी”।
और हम दोनों हंसने लगी।
“सच ही तो है। बढ़िया चुदाई भी ज़िंदगी में ज़रूरी है – चुदाई बढ़िया न हो तो ज़िंदगी बेमानी है “।
आपको इंतज़ार होगा की मैं आपको बताऊँ की मैं (आभा) और रजनी कब करनाल गयी और कैसा हमारा वक़्त गुज़रा, कैसी रही हमारी चूत और गांड की चुदाई ।
वो कहते हैं न की अभी दिल्ली दूर है – हमारे लिए भी करनाल जाने से पहले अच्छा खासा चुदना लिखा था। करनाल जाने से पहले जो हमारी चूत और गांड की रगड़ाई हुई वो भी कम दिलचस्प नहीं है।
लेकिन जिस रात रजनी ने अपनी आप बीती सुनाई, उस रात क्या हुआ, ये भी अपने आप में बहुत ही दिलचस्प किस्सा है।
रजनी की आपबीती सुन कर मेरी चूत में आग लग गयी थी और गांड का छेद फड़क रहा था। हालत रजनी की भी कुछ ऐसी ही थी। रात को लंड मिल नहीं सकता था इसलिए हमने आपस में ही एक दूसरे की चूत और गांड को ठंडा करना का फैसला किया।
“ये साला चुदाई का चस्का भी अजीब है “।
नंगी हो कर एक दुसरे के ऊपर 69 का पोज़ बना कर लेट गयी – मतलब मेरी चूत उसके चेहरे पर और उसकी चूत मेरे चेहरे पर। एक दुसरे की चूत हम चाटने लगी और पीछे गांड में उंगली घुसेड़ने लगी।
रजनी बोली, “आभा कुछ और करें, चाटने वाटने और उंगली बाज़ी से कुछ नहीं होने वाला, आज रात की ही तो बात है कि कैसे चूत की आग बुझाई जाए। कल तो लंड मिल ही जायेंगे “।
मन तो मेरा भी ऐसा ही हो रहा था। हम इधर उधर तलाश करने लगी की कुछ ऐसा मिल जाये जो लंड से मिलता जुलता हो और उसे अपने अंदर करके रात गुजार लें।
तभी मुझे याद आया की हम इम्पोर्टेड बालों में कंघी करने वाले ब्रश लायीं थी जिनके हैंडल लंड से मिलते जुलते थे। ढाई इंच मोटे, साढ़े पांच इंच लम्बे और हैंडल के नीचे वाले हिस्से पर उभरा हुआ गोल सिरा जो कहने को तो ब्रश को हाथ से छूटने से रोकने के लिए था मगर लंड के टोपे की तरह दीखता था – पूरी तरह खड़े लंड की तरह ही था। काम चलने के लिए बढ़िया जुगाड़ – यों भी ढाई तीन इंच लम्बी उंगली से तो अच्छा ही था।
मैंने रजनी को ब्रश के बारे में बताया, और रजनी उछल पड़ी, “अरे आभा कमाल का दिमाग है तेरा, अभी का काम तो चल गया”।
हम उठी, नंगी ही थी। उठ कर ब्रश लाई और साथ ही क्रीम भी ले आयी – चूत कि लिए तो क्रीम की ज़रूरत नहीं पड़ती, गांड में पिलाई के लिए क्रीम चाहिए ही होती है।
वो बात अलग है की कोइ गांड मरवाने का ज़्यादा ही शौक़ीन हो तो उसकी गांड का छेद ढीला हो जाता है – मगर थोड़ी क्रीम तो फिर भी लगानी ही पड़ती।
“लड़कियों कि ऐसा ऐसा विदेशी माल है मार्किट में कि हर चीज़ दो दो काम करती है – बनाया ही इस तरह जाता है ।
अब लिपस्टिक को ही लो। लिपस्टिक के ऊपरी खोल को हटाने वाले ढक्कन का सिरा गोल उभरा हुआ और नरम रबड़ का बनाया जाता है। ऊपर छोटे छोटे दाने उभरे होते हैं – मतलब जब टॉयलेट करने बैठो तो ये रबड़ वाला सिरा अपने बुर – भग्नाशा या चूत के दाने पर रगड़ो। क्या मज़ा देती है।
मेरे पास भी ऐसी एक लिस्टिक है। बड़ा मजा देती है – मैं तो कहती हूँ सब लड़कियों को यह रखनी चाहिए “।
सारी तैयारी कर के हम बिस्तर पर आ गयी।
“अब”, मैंने रजनी से पूछा ?
रजनी बोली, “अब क्या, शुरू करते हैं। तू बिस्तर पर लेट जा, मैं तेरे ऊपर लेटती हूँ और फिर करते हैं आगे का काम “।
मैं बिस्तर पर लेट गयी, मेरा ब्रश मेरे हाथ में था। रजनी मेरे ऊपर इसतरह लेट गई की उसकी चूत मेरे चेहरे के ऊपर थी और उसका चेहरा मेरी चूत के ऊपर था। रजनी ने ब्रश को मेरी चूत के अंदर घुमाया, मेरी चूत के लेसदार पानी से हैंडल गीला हो गया। रजनी ने धीरे धीरे हैंडल मेरी चूत में डाल दिया।
जैसे ही ब्रश पूरा अंदर गया, आनंद आ गया। मैंने भी हैंडल रजनी की चूत में डाल दिया। दोनों एक दुसरे को हैंडल से चोदने लगी।
थोड़ी देर में मैंने कहा रजनी, “गांड में डालो ना “। जहां मेरी गांड रजनी की आँखों के सामने थी, वहीं नीचे लेटी होने के कारण मेरी गांड रजनी की आँखों के सामने नहीं थी, उसे मेरी गांड में हैंडल डालने में परेशानी आ रही थी।
मैंने कहा ,”ठहरो। मैंने मोटा तकिया अपनी कमर के नीचे रखा, अब मेरी गांड उठ गयी थी और रजनी उसे देख सकती थी। इस सारे क्रियाकर्म के दौरान हैंडल मेरी चूत में ही रहा। रजनी ने हैंडल चूत में से निकाला और क्रीम लगा कर मेरी गांड में घुसेड़ दिया।”आअह”, सच कहूँ बड़ा ही मज़ा आया ।
मैंने रजनी से पूछा, “रजनी तेरी गांड में भी डालूं ” ?
“डाल दे आभा, नेकी और पूछ पूछ “? मैंने भी हैंडल पर क्रीम लगाई और रजनी की गांड कि अंदर में हैंडल पेल दिया।
मैंने रजनी से पूछा, ” रजनी कैसा लग रहा है, दीपक के लंड जैसा ? ”
बोली, “अरे कहाँ, दीपक के लंड की तो बात ही कुछ अलग है। इस बार जब हमारे बॉय फ्रेंड आएंगे तो उन्हें ही कहेंगे गांड चोदने को। साले चूत मार कर चलते बनते हैं, गांड की तरफ देखते भी नहीं “।
“साले चूत मार कर चलते बनते हैं, गांड की तरफ देखते भी नहीं “। रजनी की ये बात सुन कर मेरी हंसी छूट गयी।
खैर , काफी देर ऐसे की करते रहे हम, कभी ब्रश चूत में कभी गांड में। थोड़ी देर की रगड़ा पच्ची के बाद मुझे मज़ा आने लगा, उस समय ब्रश मेरी गांड में था। मैंने रजनी को कहा, “रजनी मैं छूटने वाली हूँ, ब्रश चूत में डाल कर चूत की चुदाई कर “।
रजनी ने वही किया। पांच सात मिनट की घिसाई चुदाई के बाद मेरा पानी छूट गया। मैंने रजनी का हाथ पकड़ कर ब्रश चूत से बहार निकाल लिया।
पता नहीं रजनी के दिमाग में क्या आया, रजनी ने वो ब्रश भी मेरे हाथ में पकड़ा दिया।
मैं समझ गयी रजनी क्या चाहती है – ”अपने दोनों सूराख, चूत और गांड, दोनों बंद चाहती है। एक ब्रश गांड में गया ही हुआ था दूसरा मैंने उसकी चूत में घुसेड़ दिया।
एक ब्रश चूत में एक गांड में, मैं दोनों अंदर बहार कर रही थी। रजनी की चूत का पानी मेरे मुंह पर गिर रहा था – गरम गरम, नमकीन नमकीन।
“अब समझ आया लड़की को नमकीन भी क्यों कहते हैं “।
थोड़ी ही देर में रजनी भी झड़ गयी।
दोनों निढाल हो कर बिस्तर पर लेट गयी। पंद्रह मिनट के बाद दोनो उठी और बाथ रूम में पेशाब करने गयीं।
मैं सीट पर बैठ पेशाब करने ही वाली थी की रजनी बोली , “रुक”।
मैंने निकलता पेशाब रोक लिया। “क्या हुआ “, मैंने पूछा।
हुआ कुछ नहीं, सरोज की याद आ गयी (पिछली कहानी **आप बीती – रजनी की चुदाई, उसी की जुबानी ** भाग एक और भाग दो पढ़ें )।
एक सेकण्ड को तो मैं नहीं समझी, फिर सरोज और रजनी की मूत वाली बात याद आ गया – मैंने पुछा,”पहले मैं कि पहले तुम “।
” तू बैठ जा “। रजनी बोली। और मैं बैठ गयी – अपना चेहरा ऊपर की तरफ उठा दिया। रजनी ने अपनी दोनों टांगें चौड़ी की, अपनी चूत को बिलकुल मेरे मुंह के ऊपर लाई, और सरररररर , पूरा मूत सीधा मेरे मुंह के अंदर जा कर मेरी चूचियों से होता मेरी चूत पर गिरने लगा। दो मिनट तक रजनी पेशाब करती रही। “कितना पेशाब किया, कोइ हिसाब नहीं “।
फारिग हो कर रजनी हटी और नीचे बैठ गयी। अब मेरी बारी थी। मैंने भी गरम गरम पेशाब धार उसके ऊपर छोड़ दी।
नहा धो कर बाहर निकली और एक ही बिस्तर पर नंगी ही सो गयी। क्या पता रात को फिर मूड बन जाए। कौन कपड़े उतारने चढ़ाने का झंझट करे। मगर हम दोनों रात की सोई सुबह ही उठी।
एक बार फिर नहा कर तैयार हो कर कालेज जाने की तैयारी करने लगी।
“दिमाग में तो चुदाई घूम रही थी, पढ़ाई पता नहीं कैसे होगी “।
रजनी की करनाल वाली आपबीती, और रात को जो हम ने अपनी चूत और गांड के साथ किया, उसने तो दोनों की चूत और गांड में खुजली मचा दी थी। अब ये जब तरह अच्छी तरह चुद ना जाएँ – बिना पूरी चुदाई रगड़ाई के – इनको चैन नहीं आने वाला था।
इस एहम मौके पर हमें अपने बॉय फ्रेंड्स याद आ गए। अब तो वही हमारी चूत और गांड की खुजली दूर कर सकते थे।
अब मैं अपने बॉय फ्रेंड्स का परिचय भी करवा दूँ।
मेरा बॉय फ्रेंड पंकज एक कंप्यूटर कंपनी में काम करता है और रजनी का बॉय फ्रेंड कुणाल एक मेडिकल रिपेरजेन्टटिवे है।
हम अपने बॉय फ्रेंड्स के साथ बाहर घूमने जाती रहती हैं। कभी कभी किसी होटल में जा कर चुदाई भी करा लेती हैं।
वो हमारे घर भी आते हैं – मगर कभी इक्क्ठे नहीं आये। कभी एक दूसरे से मिले नहीं। जब भी किसी एक का बॉय फ्रेंड आता है तो वह दूसरी को भी ज़रूर चोदता है। जब रजनी का बॉय फ्रेंड कुणाल आता है तो रजनी को चोदने के बाद मुझे जरूर रगड़ता है और जब मेरा बॉय फ्रेंड पंकज आता है तो मुझे चोदने के बाद रजनी को ज़रूर चोदता है।
असल में बात ये है की जब एक की चुदाई चल रही होती है तो दूसरी ड्राइंग रूम या दूसरे कमरे में बैठी या तो टी वी देख रही होती है या अपनी चूत में उंगली कर रही होती है। उंगली करते करते उसकी चूत लंड की प्यासी हो जाती है – बस यही प्यास बुझाने के लिए दूसरी की चुदाई होती है।
हमारे घर में एक बड़ा सा ड्राइंग रूम है। एक तरफ छोटी किचन और स्टोर हैं। दूसरी तरफ बाथ रूम है। बाथ रूम के कोने में टॉयलेट सीट है, दूसरे कोने में शावर – नहाने का जुगाड़ है। बीच में सिंक है जिसके ऊपर बड़ा सा शीशा लगा है। ड्राइंग रूम के साथ दो कमरे हैं जिनके दरवाज़े ड्राइंग रूम में ही खुलते हैं। एक कमरा बड़ा है जिसमें डबल बेड लगा है – हम दोनों इसी पर सोती हैं – चुदाई भी इसी बेड पर होती है। दूसरा कमरा छोटा है, इसमें छोटा बेड है, इसे कम ही प्रयोग किया जाता है।
रजनी और मेरा रात भर की चूत और गांड के खेल और एक दूसरे के ऊपर मूत का फव्वारा छोड़ने के बाद से हम कुछ अलग से चुदाई करवाना चाहती थीं। अब हमारा मन था की अब हमारी गांड में भी लंड की एंट्री हो ही जानी चाहिए ।
रजनी ने जिस तरह गांड चुदाई का गुणगान किया था, मेरा तो मन बड़ा ही चंचल हो रहा था और गांड का छेद रह रह कर फड़क रहा था। हालत रजनी की भी कुछ ऐसी ही था।
अब एक ही रास्ता ताकि किसी तरह पंकज और कुणाल को इक्क्ठे बुलाया जाये और चुदाई का खेल खेला जाय। इसी में कुछ ऐसा किया जाये की दोनों हमारी गांड चोदने को तैयार हो जाएँ।
इसमें मुश्किल ये थी की अभी तक हमारे बॉय फ्रेंड्स, पंकज और कुणाल कभी इक्क्ठे हमारे घर हमारी चुदाई करने नहीं आये थे ।
आख़िरकार चूत और गांड चुदाई की प्यासी रजनी और मैंने और रजनी ने मिल कर एक प्लानिंग बनाई। हम पंकज और कुणाल दोनों को अलग अलग समय पर बुलाएंगी।
जब एक चुद रही होगी तो दूसरा आ जाएगा और यहीं से असली खेल चालू होगा I
चुदाई के दौरान या बाद दोनों का आमना सामना हो जाएगा और फिर कुछ भी छुपाने के लिए नहीं रहेगा,और हम इक्क्ठी चुदाई के लिए उनको उकसाएंगी। इसी बीच मौक़ा देख गांड चुदाई की भी बात छेड़ देंगे। अगर बात बन गई तो मजे ही मजे, नहीं तो फिर देखेंगे आगे क्या करना है।
दुसरेलड़कों से हम चुदाई नहीं करवाना चाहती थी। एक तो हम चुदाई को पढ़ाई के ऊपर हावी नहीं होने देना चाहती थीं I
“पढ़ाई अपनी जगह और चुदाई अपनी जगह – हम पढ़ाई में भी अव्वल रहना चाहती थीं और चुदाई में भी “I
“और फिर हमने अपनी भोसड़ी का भोसड़ा थोड़े ही बनवाना था , आखिर को तो हमारी भोसड़ी और गांड हमारे पतियों की अमानत थी “I
तो हो गया फैसला दोनों को इक्क्ठे बुलाने का – तो अब शुभ काम में देर कैसी ?
हमने आने वाले शनिवार को ही उनको बुलाने का फैसला कर लिया। अगला दिन ऐतवार था, सोचा रात भर की मेहनत की थकान उतारने के लिए अच्छा रहेगा ।
प्लानिंग के अनुसार पंकज को मैंने चार बजे बुला लिया। कुणाल शहर से बाहर था और शनिवार को ही लौटने वाला था, उसे रजनी पांच बजे आने को कह दिया।
ठीक चार बजे पंकज आ गया I
“चूत चोदने का चक्कर ही ऐसा होता है। इसमें लेट वेट की गुंजाईश नहीं होती गाड़ी लेट हो सकती है चुदाई नहीं “।
हम तीनो ड्राइंग रूम में ही बैठे गप शप कर रहे थे। लगता था पंकज को चुदाई की तलब होने लगी थी । उसकी पैंट में से लंड का उभार साफ़ दिखाई दे रहा था। मेरे और रजनी के लिए ये लंड का उभार कोइ नया नज़ारा नहीं था।
“इनका बस चले तो ये चुदक्कड़ लंड निकल कर ही सोफे पर बैठें। उल्टा मुझे तो लग रहा था की अगर हमारी प्लानिंग सही रही तो वो समय भी आने ही वाला है”।
पंकज बोला,”चलें आभा” ? लग रहा था चुदाई के लिए बेचैन था।
हमारी प्लानिंग थी की कुणाल के आने से ज़रा सा ही पहले ही हम कमरे में जायें।
अभी साढ़े चार ही हुए थे – पांच बजने में आधा घंटा था। मैंने कहा, “अभी चलते हैं”।
गपशप फिर शुरू हो गयी। पंकज रह रह कर अपने आधे खड़े लंड की पोज़िशन बदल रहा था। मैं और रजनी एक दुसरे को देख कर मुस्कुरा रहीं थी।
जब पांच बजने में पांच सात मिनट थे – मैंने कहा, “चलो पंकज”।
वह तो तैयार ही था। हम उठे – जाते जाते मैंने रजनी को आँख मारी, “अच्छा रजनी “।
रजनी ने भी आँख दबाई, और हाँ में सर हिला दिया “।
दरवाजा बंद करते ही पंकज ने मुझे अपने बाहों में ले लिया। मेरे होठ चूसते हुए मेरी चूचियां दबानी शुरू कर दी। मेरी चूत पानी छोडने लगी थी। गांड में सनसनाहट हो रही थी मैंने पंकज की पैंट की ज़िप खोल कर उसका मोटा लंड अपने हाथ में ले लिया । हाथ में लेते ही वो कड़क हो गया। मैं घुटनों के बल बैठ गयी और उसका लंड अपने मुंह में ले लिया और अपनी जुबान उसकी लंड के टोपे के छेद के ऊपर फेरने लगी। पंकज के मुंह से आनद की एक सिसकारी निकली और उसने मुझे उठा लिया और फिर से मेरे होंठ चूसने लगा
पंकज कपड़े उतार कर बेड पर लेट गया। “खूंटे की तरह सीधा खड़ा लंड “। मेरी तो चूत में झुरझुरी होने लगी।
अपने कपड़े उतारते हुए मैंने पूछा, “पंकज, तुमने कभी गांड चोदी है ” ?
पंकज हैरान हुआ, “क्या ” ?
मैंने फिर पूछा, “तुमने कभी गांड चुदाई की है ” ?
उसने जवाब दिया, क्या बात है आभा आज गांड चुदाई की बात क्यों कर रही हो ” ?
“यों ही”, और मैं उसके लंड के ऊपर बैठ गयी थी। पूरा का पूरा लंड मेरी चूत के अंदर था। एक दो बार ऊपर नीचे होने के बाद जब लंड पूरी तरह मेरी चूत में चला गया तो मैंने फिर पुछा, “पंकज तुमने बताया नहीं, तुमने कभी गांड चोदी है ” ?
अब पंकज से नहीं रहा गया, ” क्या बात है आभा क्या हो गया, क्या आज गांड चुदवाने का मन है ” ?
मैंने, जवाब नहीं दिया उल्टा पूछा, “बताओ तो सही क्या चोदी है ” ?
” हाँ आभा दो तीन बार लड़कियों की चोदी है – और बचपन में तो लड़कों की चोदी भी है और चुदवाई भी है “। और वो हंसा दिया।
“अरे तो क्या तुम गे हो, समलिंगी – लौंडे”। मैंने हैरानी से पूछा।
“नहीं आभा ना तो मैं गे हूँ ना समलिंगी या लौंडा। कभी कभार गांड मरवाने या मारने से कोइ गे समलिंगी या लौंडा नहीं बन जाता। लड़कियां भी कभी कभी मस्ती में आ कर एक दूसरी की चूत चूस लेती हैं, चूत में उंगली कर देती हैं, एक दूसरी की गांड चाट लेती हैं या कभी कभी कुछ और कर लेते हैं जैसे की एक दूसरी के ऊपर मूतना। इससे तो वो लेस्बियन या समलैंगिक नहीं हो जाती ”
“मुझे तो अपना और रजनी का एक दुसरे पर मूतना याद आ गया”।
और जो बचपन में गांड मारने और मरवाने की बात ” ? मैंने फिर कुरेदा।
पंकज हंसा, “बचपन में तेरह चौदह पंद्रह बरस के बच्चों को चूत क्या होती है ये समझ आ जाती है और लुल्ली भी खड़ी होने लग जाती है – इस उम्र के बच्चों की लुल्ली ही होती है लौड़ा तो ये अट्ठारह साल की उम्र के बाद बनता है। अब जब भी उन बच्चों को जब लड़की की चूत का ध्यान आता है और लुल्ली खड़ी हो जाती है, तो एक दुसरे की गांड में ही लुल्ली डाल कर अपनी ठरक पूरी कर लेते हैं। लुल्ली छोटी होने के कारन गांड के छेद पर थूक लगाने से ही गांड के अंदर चली जाती है। बस हो गया काम”।
” इस सारे कार्यक्रम में अदलाबदली चलती है। पहले एक लड़का ऊपर दूसरा नीचे, फिर नीचे वाला लड़का ऊपर, ऊपर वाला नीचे – सब खुश और खेल खत्म। बस ऐसी ही गांड बचपन में मैंने मारी है और मरवाई भी है ” ?
ये सुन कर मेरी तो गांड में भी खुजली मच रही थी।
मन कर रहा था की अभी बोल दूं पंकज को, “मार साले मेरी गांड, रगड़ मेरी गांड को अभी की अभी आग ठंडी कर इसकी – पर फिर ख्याल आया रजनी भी तो है “।
पर आज मैं कहां छोड़ने वाली थी मैंने फिर पूछा, ”और किसी लड़की की गांड नहीं चोदी ” ?
” चोदी है, पांच या शायद छः बार – वो भी जब उन्होंने गांड चोदने को कहा तब”।
” मगर आभा आज तुम गांड की बात कुछ ज़्यादा ही कर रही हो, बताओ तो सही क्या गांड में लंड लेने का मन है ? बताओ मुझे मुझसे क्या छुपाना” ?
मैं चुप चाप चुदाई में मस्त रही। नीचे से आवाज़ें आ रही थी फच…….फच……फच…..फच…..।
पंकज की गांड वाले बातें सुन कर मेरी तो गांड में ही खुजली मचने लग गयी।
मन कर रहा था की अभी बोल दूं पंकज को, “मार साले मेरी गांड, रगड़ मेरी गांड को अभी की अभी आग ठंडी कर इसकी – पर फिर ख्याल आया रजनी भी तो है “।
जब मैंने बार बार गांड की बात की तो पंकज बोल ही पड़ा। “आभा क्या बात है आज तुम गांड की बात कुछ ज़्यादा ही कर रही हो, बताओ तो सही क्या गांड में लंड लेने का मन है ? बताओ मुझे मुझसे क्या छुपाना”?
पर अब मैं चुप चाप चुदाई का आनद ले रही थी । नीचे चूत में से आवाज़ें आ रही थी फच…….फच……फच…..फच…..।
अब आगे की कहानी :–
फच…….फच……फच…..फच…..।
तभी बाहर के कमरे से बातों की आवाज़ सुनाई दी। “शायद कुणाल आ गया था”। मुझे तो पता ही था।
पंकज ने पूछा, ” बाहर कोई आया है, किसी ने आना था क्या “?
“हमारे घर तो दो ही मर्द आते हैं, एक तुम और दूसरा रजनी का बॉय फ्रेंड कुणाल “। मैंने कहा।
पंकज हैरानी से बोला, “रजनी के बॉय फ्रेंड का नाम कुणाल है तुमने कभी बताया नहीं ” !!
“ये मैं क्या बोल गयी – अब क्या होगा “?
मैंने बात संभाली, “तुमने कभी पूछा ही नहीं, मगर कुणाल नाम में ऐसा क्या है जो तुम हैरान हो गए ?
“मेरा भी एक दोस्त है कुणाल, मेडिकल रिपेरजेंटेटिव है “।
मैं हैरान हो गयी, “हे भगवान ये तो फिर वही कुणाल है। अब क्या होगा” ?
फिर मैंने सोचा अब क्या हो सकता है – “अब तो वही होगा जो मंज़ूरे खुदा होगा”।
मगर इधर हमारी चुदाई चालू थी।
बाहर ड्राइंग रूम से बातों की आवाजें आनी बंद हो गई थी – मगर साथ के छोटे कमरे से सिसकारियों की आवाजें आ रहीं थी। मतलब रजनी और कुणाल की चुदाई शुरू हो चुकी थी।
मगर आज मेरे दिमाग में चूत चुदाई से भी आगे बहुत कुछ चल रहा था। गांड में लंड की एंट्री, गर्मागर्म मूत चूचियों ऊपर – मुंह पर और ना जाने कहाँ कहाँ
“एक दूसरे के ऊपर मूतने भी एक अजीब मजा है – अब किसी दिन पंकज से भी अपने ऊपर मूतवाऊंगी”।
“किसी दिन क्यों आज ही क्यों नहीं ?
मैं अब नीचे थी और पंकज मुझे ऊपर से चोद रहा था। टांगें मेरी फ़ैली और ऊपर की और उठी हुए थी, पंकज का लौड़ा पूरा मेरे अंदर था। पंकज ने कस कर मुझे पकड़ा हुआ था। जोर जोर से धक्के लग रहे थे – चूत निहाल हो रही थी – गर्मागर्म लेसदार नमकीन पानी से भरी हुई I मजा आने ही वाला था।
पंकज की एक आदत थी, जब मजा आने वाला होता था तो पूछता था, “आभा तुम्हारा होने वाला है ? मतलब मेरी चूत पानी छोड़ने वाली है क्या ” ?
और जब तक मैं हाँ ना कहूँ मेरी चुदाई जारी रहती थी। जब मैं कह देती थी की ‘हाँ अब मेरा होने वाला है’ यानी मेरी चूत में बाढ़ आने वाली है तो पंकज के धक्कों की रफ्तार दुगनी हो जाती थे मानो वो पहली बार चूत मIर रहा है – या यूं कह लो की खुद ही पूरा का पूरा चूत में ही घुस जाना चाहता हो।
उस दिन ताबड़तोड़ चुदाई करते हुए मेरे कान में फुसफसाया ,”आभातुम्हारा होने वाला है क्या – झड़ने वाली हो ? ” मेरे मुंह से हूँ हूँ की आवाज़ निकली और पंकज ने धक्को की स्पीड बढ़ा दी। लंड पूरा बाहर निकाल निकाल कर अंदर डाल रहा था। आवाज़ें आ रही थी फच फच फच और मेरी चूत से निकलता हुआ पानी छिटक मेरी जाँघों और पंकज के लंड और टट्टों पर फैल रहा था .
मैं सोच रही थी, “क्या मस्त चोदता है “।
तभी मैंने एक लम्बी सिसकारी भरी , “आअह …. आअह…. “और मेरा पानी निकल गया – झड़ गयी मैं “।
पंकज को भी पता लग गया होगा की मेरी चूत में एकदम बरसात हो गई है, उसने भी पांच सात लम्बे लम्बे तेज धक्के लगाए और सारा वीर्य मेरे अंदर छोड़ दिया।
“भर गयी मेरी चूत पंकज के सफ़ेद लेसदार गरम गरम वीर्य से ,क्या स्वर्ग जैसी अनुभूति थी “।
उधर साथ वाले कमरे से सिसकारियों की आवाज़ें लगातार आ रही थी। “रजनी की मस्त चुदाई चल रही थी “।
मैं और पंकज झड़ने के बाद बिस्तर पर ही लेट गए। पंकज बोला, “आवाजें साथ वाले कमरे से आ रही हैं, रजनी के बॉय फ्रेंड ही होगा “।
“लगता तो है “। मैं क्या कहती – मुझे तो पता ही था।
“मस्त चुदाई हो रही है रजनी की भी ” पंकज हंस कर बोला “। मैं भी हंसी, “लगता तो ऐसा ही है “।
पंकज बोला, “अच्छा एक बात बताओ आभा, इस कुणाल ने तम्हें चोदा है ” ?
“हाँ चोदा है, तुम भी तो रजनी की चूत चोदते हो। लेकिन मेरे बॉय फ्रेंड तुम ही हो, कुणाल मेरे लिए खाली मजे लेने के लिए। बॉयफ्रेंड वो रजनी का ही है।
“एक बात सोचो पंकज, जब एक घर में एक लड़की चुद रही हो तो दूसरी की क्या हालत होती होगी “।
“एक चुद रही होती है, दूसरी चूत में उंगली चला रही होती है और लंड के सपने देख रही होती है। यही कारन है की जिसका भी बॉय फ्रेंड आता है वो दूसरी की चूत की प्यास बुझाता है और चूत को ठंडा करता है I
“ये दुनिया ऐसे ही चलती है। चुदाई जितनों से भी मगर दोस्ती और प्यार एक से ही होता है। तुम मेरे बढ़िया दोस्त हो, चूत तुमसे चुदवाने में ही असली मजा मिलता है “।
पंकज ने भी हाँ में सर हिलाया। “हमारी चुदाई पूरी हो चुकी थी दोनों झड़ चुके थे ”।
” मैं चलूँ ? कुणाल रजनी की चुदाई खत्म होने से पहले निकल लेता हूँ “।
मैंने कहा,” अरे पर क्यों ? आज मिल ही लो, इसमें क्या है। अब कुछ छुपा थोड़ा है “। क्या पता वो तुम्हारे वाला ही कुणाल निकले – “मैं हंसी ”
पंकज थोड़ा हिचकिचाया, “फिर भी, अच्छा लगेगा क्या “?
मैं समझ गयी की वो कुछ असहज महसूस कर रहा है मैंने उसको थोड़ा सहज करने की कोशिश क। “देखो पंकज तुम जानते ही हो रजनी का भी एक बॉय फ्रेंड है। तुम मेरे साथ साथ रजनी को भी चोदते हो। कुणाल भी जनता है की मेरा एक बॉय फ्रेंड है, फिर भी वो जब भी आता है तो रजनी के साथ साथ मेरी चूत भी रगड़ता है। अब इसमें शर्म और हिचकिचाहट के लिए कहाँ गुंजाईश बची है “।
पंकज समझ गया और हम कपड़े पहन कर ड्राइंग रूम में आ गए।
थोड़ी देर तक सामने वाले छोटे कमरे से आवाजें आनी बंद हो गयी – लगता था चुदाई खत्म हो गयी थी । कुछ देर बाद कुणाल और रजनी भी कपड़े पहन कर बाहर आ गए।
जैसे ही पंकज और कुणाल ने एक दुसरे को देखा, वो चिल्ला पड़े ,”अबे कुणाल तू ? ……… अबे पंकज तू “?
मतलब दोनों एक दूसरे को जानते थे ?
मैंने और रजनी ने लगभग इक्क्ठे ही पूछा, “तुम एक दुसरे को जानते हो “?
“अरे हम बीएससी तक इक्क्ठे पढ़े हैं “। पंकज बोला, ” फिर ये मेडिकल लाइन में चला गया और मैं कंप्यूटर लाइन में “।
कमाल का इत्तेफाक था I मगर मैं सोच रही थी की क्या इन्होने हमारे बारे में एक दुसरे को बताया है ? क्या रजनी भी यही सोच रही थी ?
“क्या इन दोनों ने हम दोनों को चोदने की बात भी आपस में शेयर की है”?
हमे चुप देख कर कुणाल बोला क्या हुआ, तुम लोग चुप क्यों हो ? ये तो नहीं सोच रही की हम तुम लोगों के बारे में एक दुसरे से बात करते हैं की नहीं – तो सुनो हम एक दुसरे से एक दुसरे की गर्ल फ्रेंड की सारी बातें शेयर करते हैं, मगर मुझे ये नहीं पता था की आभा, तुम, इस पंकज की गर्ल फ्रेंड हो “। पंकज बोला, “और हाँ मुझे भी नहीं मालूम था की ये रजनी इस कुणाल की गर्ल फ्रेंड है ” हम तो तुम एक दूसरी के बॉय फ्रेंड का नाम तक भी नहीं जानते थे।
जब हम कुछ देर और नहीं बोली तो बात पंकज ने ही शुरू की, “देखो खुल कर बात करते हैं, छुपा छपाई का कोइ फायदा नहीं। हम ये तो नहीं जानते थे की हमारी एक दुसरे की गर्ल फ्रेंड तुम हो , मगर हम ये शेयर करते थे की हम में से जो जब भी अपनी गर्ल फ्रेंड को चोदने जाता ही तो वह उसकी सहेली को भी चोदता है”।
हमारी हिचकिचाहट दूर करने के लिए पंकज ने मेरे होंठ अपने होठों में लिए और चूसने लगा – कुणाल ने भी रजनी की चूचियां पकड़ ली और दबाने लगा।
असल में तो मैं और रजनी भी यही चाहती थी आज रात दोनों को रोक कर चुदाई का फुल मजा लिया जाए, मगर इस तरह से होगा ये नहीं सोचा था। खैर पंकज और कुणाल की चूसा चुसाई ने हमारी शर्म और हिचकिचाहट कम कर दी।
कुणाल और पंकज ये जानते ही नहीं थे की हम लोगों की प्लानिंग उनको रात भर रोक कर पूरी चूत और गांड चुदाई करवाने की थी।
कुछ देर बातें करने के बाद राजन बोला, “बहुत देर हो गयी है – अब चलें पंकज ” ?
“पंकज भी बोला, “हाँ, चलो आभा, रजनी चलते हैं”।
अब रजनी ने बात संभाली, “सुनो तुम दोनों, अब जब सारी बात खुल ही गयी है तो रात यहीं रुको “।
पंकज और कुणाल ने एक दुसरे की तरफ देखा। पंकज ने कुणाल से कहा, “क्यों कुणाल,आईडिया तो बुरा नहीं ” !! कुणाल ने भी हाँ में सर हिलाया और दोनों बैठ गए।
और हम सोच रहीं थीं “दो लंड दो चूतें और दो ही गांड के छेद – क्या मज़ा रहेगा “।
सब अभी भी हिचकिचा से रहे थे
तभी रजनी ने एक बड़ी ही अक्लमंदी वाला काम किया। वो कुणाल की बगल से उठी और मेरे पास बैठे पंकज का लंड पैंट से निकल अपने मुंह में ले लिया। ये मेरे लिए भी एक संकेत था।
मैं भी उठी और कुणाल के सामने नीचे बैठ कर राजन का लंड पैंट से निकल कर अपने मुंह में ले लिया। अब हम दोनों एक दुसरे के बॉय फ्रेंड का लंड अपने अपने बॉय फ्रेंड के सामने चूस रहे थी। सबकी हिचकिचाहट खत्म हो गयी।
पंकज ने कहा, “एक काम करते हैं, देर बहुत हो गयी है, भूख भी लगी है, कुछ हल्का खाने के लिए ले आते हैं “।
कुणाल ने भी कहा, “चलो सारे ही चलते हैं, हमारी तरफ देख कर कहा, “तुम लोग भी चलो क्या करोगी घर बैठ कर”।
“ठीक है”। और हम सब चल पड़े। गाड़ी पंकज की थी, वही चला रहा था, कुणाल आगे बैठा था। रजनी और मैं पीछे बैठी थी। रजनी ने एक हाथ मेरी चूत पर रखा हुआ था और चूत को सेहला रही थी साथ ही मुस्कुरा भी रही थी। दोनों रात भर चुदने भर के ख्याल से मस्त थी।
” मैं भी रात भी की चुदाई के ख्याल में डूबी हुई थी “।
रास्ते में पंकज ने गाड़ी एक वाइन शॉप पर रोक दी, “मैं बियर ले कर आता हूँ “। हमारी तरफ देख कर बोला, “तुम लोगी कुछ जिन या कुछ और “।
“कुणाल बोला बियर ही ले आ इनके लिए भी “। पंकज बोला, “चल यार तू भी चल, मैं अकेला उठाऊंगा कैसे ”।
उनके जाने के बाद रजनी बोली, “आभा आज लगता है धुआंधार चुदाई होने वाली है”।
मैंने जवाब दिया, “लगता तो ऐसा ही है, मेरी तो चूत में आग लगी हुई है, अभी से पानी पानी हुई जा रही है “।
रजनी हंसी, “चूत में आग लगी हुई है और पानी पानी हुई जा रही है – ये क्या बात हुई “।
मैंने कहा , “चुदाई के ख्याल से ऐसा ही होता है मेरी जान रजनी, देखें तेरी चूत का क्या हाल है “। मैंने उसकी सलवार में हाथ घुसेड़ने की कोशिश की मगर तभी पंकज और कुणाल आ गए “। बियर की बोतलें आगे रख कर गाड़ी स्टार्ट की।
आगे जा कर खाना पैक करवाया। खाना गाड़ी में छोड़ कर पंकज बोलै, “पंकज तू यहीं रुक, मैं सामने केमिस्ट से देसी वियाग्रा – ‘सुहागरा’ ले कर आता हूँ”।
कुणाल बोला “वियाग्रा क्या करनी है, मेरा लौड़ा तो अभी से फनफना रहा है”।
पंकज ने समझाया, “अरे भाई लंड खड़ा करने के लिए वियाग्रा नहीं लेनी – देख खूंटा बढ़िया से गड़ा हो तो चाहे चार गायें बाँध दो, हिलता नहीं।
आज हमने वियाग्रा खड़ा करने के लिए नहीं बल्कि खड़ा रखने के लिए खानी है, क्यों आभा, रजनी”।
“मुझे पहली बार शर्म आयी “।
पंकज जाने लगा तो मैंने बुलाया, “पंकज जैल भी लेते आना “। पंकज रुका, हंसा और चला गया।
कुणाल और रजनी हैरान हो गए, “जैल किस लिए” – कुणाल बोला, “क्या गांड चुदाई का भी प्रोग्राम है” ?
मैंने कुणाल से पूछा, “तुम गांड चोदते हो” ?
“अरे चोदता हूँ ? गांड चुदाई में तो मेरी पी.एच.डी है”।
अब रजनी बोली, अगर ऐसा है तो आज तक तो हमारी गांड की तरफ तो तुमने कभी देखा तक नहीं”।
“तुमने लोगों कभी गांड मारने का न्योता ही नहीं दिया ”
“अगर हमने गांड चोदने का न्योता नहीं दिया तो तुम ही बोल देते की तुमने हमारी गांड भी रगड़नी है – हम मना थोड़े ही करती, क्यों आभा “रजनी ने मेरी तरफ देख कर पूछा”।
“और क्या”, मैंने भी रजनी की हाँ में हाँ मिलाई।
सब हंस पड़े, तब तक पंकज भी आ गया, दो बड़ी बड़ी ट्यूब मुझे दे कर बोला, “ये लो जैल”।
“मैं बोली तुम लोग ही रखो, लगानी तो तुम लोगों ने ही है”। सब लोग जोर से हंस पड़े।
घर पहुँच कर सब ड्राइंग रूम में बैठ गए। मैंने कहा मैं कुछ हल्का नमकीन लाती हूँ, बियर के साथ खाने के लिए”। पंकज और कुणाल दोनों मेरे पीछे ही आ गए। दोनों ने एक एक गोली ‘सुहागरा’ खाई, गिलास लेकर वापस ड्राइंग रूम में चले गए।
एक एक बियर पीने के एक दौर खत्म हुआ । मुझे और रजनी को बियर की आदत नहीं थी। हमे तो एक बोतल बियर में ही सुरूर होने लगा।
रजनी उठी और सारे कपड़े उतार दिए और बोली, “सालो पढ़ाई करने आये हो या चुदाई करने, उतरो अपने अपने कपड़े”।
सब हंसने लगे। सब ने कपड़े उतार दिए।
हम ने तो एक बियर के बाद दूसरी बियर धीरे धीरे पीनी शरू की। कुणाल और पंकज दो दो बियर खत्म कर चुके थे।
उधर वियाग्रा ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। दोनों के लंड फनफना रहे थे।
कुणाल अपना लंड पकड़ कर हमारी तरफ देख कर बोला, “थोड़ा चूसो”।
मैं उठी और कुणाल का लौड़ा अपने मुंह में डाल लिया। पंकज रजनी के सामने जा कर खड़ा हो गया और अपना लंड उसके मुंह के सामने लहराने लगा। रजनी ने भी पंकज का लंड अपने मुंह में ले लिया। हम दस मिनट तक उनका लंड चूसती रही। हमारी चूतें गर्म हो चुकी थी और लंड मांग रही थी, मगर पंकज और कुणाल पर कोइ असर ही नहीं था।
“तो ये है विआग्रा की करामात, लगता है आज हमारी चूतों की तौबा होने वाली है।
पंकज बोला, “देखो देवीओ आज हमारे लंड न तो जल्दी झड़ने वाले हैं ना ही ढीले पड़ने वाले हैं, इस लिए अपनी तैयारी पूरी करलो। चलो चलें और चढ़ाई चुदाई शुरू करें”।
सब उठे और बड़े कमरे की और बढ़ गए। एक ही बेड पर हम दोनों चुदने वालीं थी।
कुणाल बोला, “किससे शुरू करें, कौन किसका लंड लेगी ?”
पंकज बोला, “एक दुसरे की गर्लफ्रेंड से शुरू करते हैं “।
बस तो होगया फैसला। मैंने कुणाल का लंड पकड़ लिया और रजनी ने पंकज का।
कुणाल से लगता था रहा नहीं जा रहा था। उसने मुझे झुकाया, घोड़ी बना कर मेरी कमर पकड़ी और बड़ी ही बेदर्दी से सख्त लंड मेरी चूत के अंदर धकेल दिया। मेरे मुंह से हल्की सी सिसकारी निकली, “आह मजा आ गया पूरा गया कुणाल, एक बार और करो ऐसे ही “।
कुणाल ने अपना लंड बाहर निकाला और दुबारा एक ही झटके से मेरी चूत में डाल दिया। निहाल हो गई मैं तो। कुणाल ने आठ दस बार फिर ऐसे ही किया। पूरा लंड बाहर निकल कर झटके से पूरा अंदर घुसेड़ दिया।
अगले दस मिनट कुणाल ने बिना रुके मेरी चूत की चुदाई की। उधर अब रजनी को लिटा कर उसकी टांगें उठा कर पंकज धुआधार चुदाई कर रहा था। दोनों हर धक्के के साथ बेड आगे पीछे हिल रहा था।
“लगता था आज हमारी चूतों के साथ साथ बेड की भी खैर नहीं थी”।
मेरा और रजनी, दोनों का पानी छूट चुका था। चुदाई का एक दौर खत्म हो चूका था। पंकज और राजन ड्राइंग रूम में सोफे पर नंगे बैठे बियर की चुस्कियां ले रहे थे।
“लंड उनके ऐसे खड़े थे की चाहें तो बियर से भरे गिलास उन पर रख लें “।
हम दोनों निढाल पड़ी थी। मैंने रजनी से पूछा, “रजनी और कितनी बार चुदाई करेंगे ये आज “।
वो बोली,” दो बार और तो कहीं नहीं गए। आखिर के ट्रिप में गांड चुदवाएंगे “। वो बुदबुदाई।
“एक बात बोलूं आभा, लड़की को शादी से पहले लड़के की खाली शकल ही नहीं देखनी चाहिए, उसका खड़ा लंड भी देखना चाहिए। अगर लंड मोटा लम्बा और कड़क ना हो तो वहीं मना कर देना चाहिए। अगर लंड ठीक तो चुदाई आजमानी चाहिए – बेकार में सारे ज़िंदगी तो इधर उधर मुंह नहीं मारने पड़ेंगे”। और रगड़ाई तभी बढ़िया होती है अगर लंड मोटा और सख्त हो – और अगर लम्बा भी है तो फिर सोने पर सुहागा।
असल में तो मैं भी इस बात से सहमत थी। आखिर चूत बच्चे पैदा करने के लिए ही तो नहीं बनी। अगर ऐसा होता तो चूत रगड़ाई का इतना आंनद ही ना आता।
असल में तो ज़िंदगी में दो ही तो चीज़े चाहिए होती हैं, “अच्छी कमाई और अच्छी चुदाई “।
अब हम में दम आ चुका था। ड्राइंग रूम से गुज़र कर हम दोनों बात रूम चली गयी। पेशाब किया – चूत धोने का तो सवाल ही नहीं था। गीली लेसदार हुई पड़ी थी।
रजनी बोली, “अब मैं कुणाल के साथ और तू पंकज के साथ ”?
“हाँ ठीक है, अब चुसवाने का मन है “।
वापस कमरे में जाते हुए हम दोनों से बोली, “आ जाओ अब”।
कमरे हम टांगें उठा कर और चौड़ी कर के लेट गयी।
दोनों अंदर आये, “क्या हुआ, एकदम सीधे चुदाई ? अरे लंड को मुंह में तो लो “।
मैं बोली, “हम चुदाई नहीं चुसवाने के लिए लेटी हैं “।
उन्होंने आव देखा ना ताव – हमारी टाँगें चौड़ी कर के अपना मुंह हमारी चूत में घुसेड़ दिया और लपड़….. लपड़….. चपड़…. चपड़….. सपड़ ….सपड़ …..की आवाज़ों के साथ चूत चटनी शुरू कर दी। जल्दी ही हम फिर गरम हो गयीं। रजनी बोली, “कुणाल उल्टा लेटो और अपना लंड मेरे मुंह में डालो “। कुणाल उठा और अपना लंड रजनी की मुंह में डाल दिया और चूत चाटने लगा।
मैं पंकज से बोली ,”क्या तुम्हें अलग से बोलना पडेगा ” ? वो हंसा और अपना लंड मेरे मुंह में डाल कर मेरी चूत चूसे लगा।
थोड़ी देर में कुणाल बोला, “रजनी अभी अभी तो तुम्हारी चूत चाट चाट कर सुखाई थी, ये तो फिर पानी छोड़ गयी – तैयार है क्या ” ?
“हाँ कुणाल तैयार है, करो जरा इसकी रगड़ाई “।
कुणाल पेलने के लिए खड़ा हो गया, पंकज भी उठ गया। मैंने पूरी मस्ती में पूछा, “अभी और कितने दौर चलेंगे चुदाई के ”?
पंकज बोला, “एक ये और इसके बाद हो सकता है दो और “- वो अपने खड़े लंड की तरफ इशारा करके बोला, “जब तक ये खड़ा है चुदाई चलती रहेगी। चोदते चोदते कहीं हमारी कमर का ही कचरा ना हो जाये”। दोनों हँसे।
इतनी चुदाई और वो भी एक ही रात में ? “हमे तो जन्नत मिल गयी” ?
मैं बोली, “तो फिर ठीक है, गांड इस चुदाई के दौर में चोदोगे कि अगले दौर में “।
दोनों ने एक दुसरे को देखा और कुणाल बोला, “अगले – आखरी दौर में “।
रजनी बोली, “ठीक है मगर तुम दोनों अदल बदल कर हमारी गांड मारना – हमे तुम दोनों के लंड अपनी गांड में भी ट्राई करने हैं ”।
“गांड ही ट्राई के लिए बची थी – मुंह में और चूत में तो दोनों के लंड जाते ही थे ”
“हमें भी तो दोनों कि गांड ट्राई करनी है – चूत में तो ये लंड जाते ही रहते हैं “, कुणाल ने कहा।
चुदाई फिर शुरू हो गयी – आधा घंटा चली इस चुदाई ने हमें निचोड़ कर रख दिया।
“ये वियाग्रा भी कमाल की की बनाई है बंनाने वाले ने”।
पंकज और कुणाल फिर ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ कर बियर की चुस्कियां लेने लगे। लंड उनके वैसे ही तने हुए थे।
हम लेटे लेटे बातें करने लगी। रजनी बोली, “आभा, अब क्या इरादा है, मतलब चूत गांड की चुदाई और फिर बाद में ” ?
मैंने कुछ सोचा और बोली,” देख रजनी इस बार जब ये दोनों अपना लेसदार सफ़ेद पानी हमारी चूत में छोड़ देंगे उसके बाद हम एक दूसरी के ऊपर लेट कर, एक दूसरी की चूत चाटेंगी। ये भी कर के देख ही लें। इस दौरान इन दोनों चुदक्क्ड़ों को बोल देंगी की मूतेंगे नहीं, हम भी नहीं मूतेंगी – ये हमारे ऊपर मूतेंगे हम इनके ऊपर मूतेंगे “।
रजनी बोली, “अरी आभा, तूने तो पूरी बढ़िया प्लानिंग बना रखी है “।
इस बार कि चुदाई के बाद हम मूतने नहीं गयीं।
थोड़ी देर में दोनों फिर अपने खड़े लंडों के साथ आ गए, “क्या हुआ तुम मूतने नहीं गयी ? अगली चुदाई का महूरत तो आ गया है “। पंकज बोला।
“महूरत आ गया है ” !! हम दोनों की हंसी छूट गयी। मैंने हंस कर कहा, “महूरत आ गया है तो आ जाओ फिर – सोच क्या रहे हो चढ़ो हमारे ऊपर और शुरू करो चुदाई “।
कुणाल बोला, “मूतने नहीं जाना क्या ” ?
“लड़के लड़कियों को चुदाई के बाद अक्सर मूतने की इच्छा होती है”।
मैंने कहा, “नहीं, बाद में एक बार ही मूतेंगे तुम भी और हम भी “। और हम हंस दी।
हमें हँसता देख उन दोनों के चेहरे पर असमंजस के भाव आये।
“गर्मागर्म मूत्र स्नान”। सोच सोच कर ही मेरे शरीर में झुरझुरी हो रही। मेरा तो पहली बार होना था, रजनी तो दीपक के साथ ये भी कर आयी थी।
पंकज और कुणाल तो कुछ समझ ही नहीं पा रहे थे। हमारी नंगी चूतें और चूतड़ देख कर वैसे ही उनके दिमाग काम नहीं कर रहे थे।
कुणाल बोला, “तो फिर ठीक है तो आ जाओ और गांड हम लोगों की तरफ करके खड़ी हो जाओ – गांड चोदने से ही शुरू करते हैं। वैसी भी गांड की चुदाई बहुत देर तक नहीं करवाई जा सकती। लंड और गांड दोनों दुखने लग जाते हैं। जब जिसकी गांड दुखने लग जाए और गांड चुदवाने की तस्सली हो जाए तो बता देना और चूत चुदवाने की तैयारी कर लेना। आज एक एक कप गर्मागर्म माल झड़ेगा तुम्हारी फुद्धियों के अंदर।
“फुद्धियों के अंदर” बड़ा ही अच्छा लगा “फुद्दी” शब्द सुन कर। मैंने पंकज की तरफ देख कर कहा “पंकज चूत मत कहा करो, फुद्दी ही कहा करो”।
कुणाल की एक एक कप गर्मागर्म मॉल की बात पर हम दोनों ने एक दूसरी की तरफ देखा – “तो आज तो ढेर सारा लेसदार गरम पानी चाटने का मज़ा आ जाएगा”।
हम टांगें चौड़ी कर के गांड उठा कर खड़ी हो गयी,”आओ जी मारो हमारी गांड, रगड़ो हमारी गांड के छेद को “।
पंकज और कुणाल, दोनों ने एक एक जेल की ट्यूब ली और जेल गांड के छेद पर लगा शुरू कर दिया। बीच बीच में गांड के अंदर भी उंगली घुसेड़ कर जैल लगा रहे थे । कौन पहले किसकी गांड चोदने वाला है ये नहीं पता था। मैंने सर घुमा कर देखा, कुणाल था मेरे पीछे – तो कुणाल चोदेगा मेरी गांड पहले। ये मेरी पहली गांड चुदाई थी। रजनी तो करनाल से गांड चुदवा कर आयी थी (रजनी की चुदाई – उसीकी जुबानी भाग -1 पढ़ें ) I
“मेरा मन घबरा सा रहा था”।
मगर फिर सोचा कुणाल ने कहा था गांड चुदाई उसकी स्पेशिएलिटी है – ‘पीएचडी’ की हुई है उसने गांड चुदाई में। मैं उसका लम्बा मोटा लंड लेने के लिए तैयार हो गयी।
गांड के अंदर बहार अच्छी तरह जैल लगा कर कुणाल ने अपने लंड का टोपा गांड के छेद पर रखा।
“रजनी ने बताया था की गांड में लंड को धीरे धीरे डाला जाता है, कम से कम जब गांड की पहली दूसरी चुदाई हो”।
ठीक ही कहा था रजनी ने। कुणाल ने लंड घुसेड़ने की कोशिश की, मगर लंड गांड में गया ही नही। कुणाल ने लंड हटा कर खूब सारी जैल लगाई और फिर जोर लगाया लंड अंदर करने का। पांच छै बार ऐसे ही अन्दर डालने की कोशिशों के बाद आखिर लंड का टोपा मेरी गांड के छेद के अंदर बैठ गया।
“आभा लगता है तुम्हे गांड अभी चुदी नहीं है – आज ही सील टूटेगी”। कुणाल के मोटे लंड का टोपा मेरी गांड के अंदर था। कुणाल बोला, “आभा ताला खुल चुका है बस दरवाजा खोल कर अंदर ही जाना है”।
कुणाल ने वहीं टोपा हिलाया डुलाया, फिर बाहर निकाला – जैल लगाई और टोपा फिर अंदर कर दिया। इस बार टोपा आसानी से अंदर चला गया। मुझे भी बड़ा ही मज़ा आया। मैंने अपने चूतड़ आगे पीछे करने शुरू कर दिए। मेरा मन था की बस अब कुणाल पेल दे अपना लंड मेरी गांड में। मगर कुणाल ऐसा नहीं कर रहा था।
“आखिर ‘पीएचडी’ जो था गांड चुदाई में “।
रजनी की आवाज़ आयी उई माँ उई माँ क्या कर रहे हो पंकज “? लगता है रजनी की गांड दुःख रही थी। पंकज का लंड पूरा रजनी की गांड में था। पंकज ने एक बारगी लंड बाहर निकाला, ढेर सारी जैल लंड पर लगाई – थोड़ी गांड के अंदर भी डाली और एक बार में ही पूरा लंड अंदर कर के चुदाई शुरू कर दी। शुरू में तो रजनी थोड़ा चिल्लाई, मगर पंकज रुका नहीं चोदता रहा चोदता। रजनी की दर्द वाली सिसकारियां मजे की सिसकारियों में बदल गयी, “आह… आह… आह… आह… आ… आ… आ… आह… वाह पंकज वाह क्या चुदाई है “।
मेरा ध्यान अपनी गांड की तरफ गया। कुणाल के लंड का टोपा मेरी गांड अंदर था बोला, “आभा ताला खुल खुल गया है, तैयार हो ” ?
रजनी की मस्ती भरी सिसकारियां सुन कर मैं भी मस्त हो चुकी थी। मेरा मन भी लंड को गांड में महसूस करना चाहता था I
मैंने कहा, “कुणाल अगर ताला खोल लिया है तो दरवाजा खोल कर घुस जाओ अंदर, देर किस बात की ” ?
मेरी बात पर कुणाल ने लंड का टोपा बाहर निकाला, गांड के बाहर अंदर और अपने लंड पर जैल लगाई लंड के टोपे को गांड के छेद पर रखा।
“मगर इस कुणाल ने तूपा अंदर बार टोपा अंदर नहीं किया”।
मैं अभी सोच ही रही थी कब राजन अंदर करेगा, कि तभी एक ही झटके से कुणाल ने लंड पूरा अंदर कर दिया।आवाज आयी “पट…..”। राजन के टट्टे मेरे चूतड़ों से टकराये थे और आवाज़ आयी थे “पट”। एक बार को तो लगा कि मेरी गांड फट गई है, इतना दर्द हुआ था। मगर अब कुणाल नहीं रुका। धक्के लगाता रहा, लंड को अंदर बाहर करता रहा। जैल लगाने के लिए भी चुदाई नहीं रोकी। चलती चुदाई में ही जैल अपने लंड और मेरी गांड पर लगा दी। अब गांड का छेद लंड का अभ्यस्त हो गया था और जैल से मुलायम भी हो गया था।
पट… पट… पट… पट … I पट पट की आवाजें दोनों तरफ से आ रही थी। लंड गांड के अंदर करने पर जब पंकज और कुणाल के टट्टे हमारे चूतड़ों से टकराते थे तो आवाज आती थे पट पट पट – “क्या सेक्सी आवाज थी “। पट पट पट पट पट I
पट पट की आवाज़ों के साथ हम दोनों की गांड चुद रही थी। कुणाल और पंकज ने हमें कमर से पकड़ा हुआ था जिससे उनके लंड के लम्बे धक्कों से हम आगे ही ना गिर जाएँ। इस दौरान दोनों ने अपनी ‘सवारियां’ भी दो बार बदली। कुणाल शुरू में मुझे चोद रहा था I फिर पंकज आ गया। थोड़ी देर में पंकज फिर से रजनी के पीछे था और कुणाल मेरे पीछे। फिर पंकज का लंड मेरी गांड में था और कुणाल का रजनी की गांड में। ऐसे ही अदल बदल कर हमारी गांड चुद रही थी।
कुणाल और पंकज के लंड तो एक से ही मोटे और लम्बे थे, मगर चुदाई में फरक था। जहां कुणाल लगातार तेज रफ्तार से धक्के लगाता था, वहीं पंकज लंड को बाहर तो धीरे से निकलता था मगर अंदर बड़ी ही तेज स्पीड से डालता था। कभी कभी पूरा बाहर भी निकल लेता था और फिर अंदर करता था।
“चुदाई का हर एक का अपना अपना तरीका है। मगर चुदाई का असल मकसद एक ही है मजे देना और मजे लेना “।
कुणाल और पंकज के लंड तो एक से ही मोटे और लम्बे थे, मगर चुदाई में फरक था। जहां कुणाल लगातार तेज रफ्तार से धक्के लगाता था, वहीं पंकज लंड को बाहर तो धीरे से निकलता था मगर अंदर बड़ी ही तेज स्पीड से डालता था। कभी कभी पूरा बाहर भी निकल लेता था और फिर अंदर करता था।
“चुदाई का हर एक का अपना अपना तरीका है। मगर चुदाई का असल मकसद एक ही है मजे देना और मजे लेना “।
दस मिनट की गांड चुदाई के बाद मेरी तो बस हो गई। मैंने पंकज से कहा, “पंकज, चूत पानी छोड़ रही है, लगता है लंड मांग रही है”।
मैंने रजनी से पूछा, “रजनी तुम्हारा क्या हाल है “।
रजनी बोली “मैं अभी पांच मिनट और गांड मरवाउंगी”।
पंकज पीछे हट गया और मैं बिस्तर पर लेट गयी। खुद ही अपने चूतड़ों के नीचे तकिया रक्खा और टांगें उठा कर चौड़े कर दी।
पंकज से रहा नहीं गया। एक दम से आया और उसने लंड मेरी चूत में डाल दिया। मैंने अपनी टाँगे से उसकी कमर को पर कैंची की तरह पकड़ लिया। उसने अपने बाजू मेरी कमर के पीछे कर के मुझे अपनी छाती के साथ भींच लिया। मेरी चूचियां उसके छाती के साथ लगी थी। लंड कड़क था और नीचे से धुआँधार जबरदस्त धक्के लग रहे थे।
“पक्का वियाग्रा का असर था”।
रजनी भी अब चूत चुदवा रही थी।
हमारी चूतें लेसदार पानी छोड़ रहीं थीं। चूत में लंड लगातार अंदर बाहर हो रहा था। रगड़ाई से चूत अंदर से गरम हो चुकी थी। मेरी चूत का पानी तो किसी भी पल छूट सकता था।
धक्के चालू थे। पंकज का मुंह मेरे कान के पास था। हर धक्के के साथ आवाज़ आ रही थी ,”आह…. ओह…. ओह…. आह…. ओह ………. और फिर उसने इतने ज़ोर से धक्के लगाए जैसे मेरी चूत में ही घुस जाना चाहता हो।
चुदाई की आवाजें भी सुनी जा सकती थी फच….. फच…… फच….. फच…..। गीली चूत पर लंड का अंतिम सिरा टकराता था तो आवाज़ आती थी फच….. फच….. फच…..।
और फिर आ……आ……आह……आह……ओह…..आ……आ….आह की आवाज़ के साथ पंकज ने मेरी चूत में पिचकारी छोड़ दी। गरमगरम गाढ़ा पानी मेरी चूत में क्या गिरा की मेरा भी पानी निकलने को हो गया आ….आ…..ओ…..गयी मैं…….गयी……. मैं गयी……आ…. आ…. आ….और मेरी चूत ने भी पानी छोड़ दिया।
अब हमारी आवाजें सुन कर कह लो या फिर वैसे ही – कुणाल और रजनी की भी पूरी चुदाई हो चुकी थी, वो भी एक आह…..आह…. आह… आह…की आवाज़ों के साथ उसी समय छूट गये।
मेरी चूत पूरी की पूरी मेरेअपने लेसदार नमकीन पानी से और पंकज के गाढ़े सफेद पानी से भर गयी थी – रजनी कुणाल भी झड़ चुके थे ।
पांच मिनट दोनों, पंकज और कुणाल हमारे ऊपर ही पड़े रहे , फिर उठे और बात रूम की तरफ जाने लगे।
रजनी के कहा, “रुक जाओ कहाँ जा रहे हो। पिक्चर अभी पूरी कहाँ हुई है – पूरी पिक्चर तो देख कर जाओ “, और मेरी तरफ देख कर “बोली आओ आभा, तुम ऊपर आओ”।
कुणाल और पंकज दोनों हैरान दिख रहे थे समझ नहीं पा रहे थे की ये क्या होने जा रहा है।
रजनी ने मेरे चूतड़ पकड़ कर चूत को बिलकुल अपने मुंह के ऊपर कर लिया और बोली, “चलो आभा खोल दो अपनी फुद्दी”। और मैंने अपनी चुत ढीली कर दी। सारा सफदे सफ़ेद गाढ़ा वीर्य रजनी के मुंह के अंदर चल गया। रजनी मेरी चूत चाटने लगी। उधर मैंने अपनी उँगलियों से रजनी की चूत खोल दी और अंदर से सफ़ेद वीर्य चाटने लगी सपड़… सपड़… सपड़… सपड़…।
ऊपर होने के कारण, मेरी चूत के अंदर से वीर्य रजनी के मुंह में गिर रहा था। उधर रजनी ने जोर लगा कर सारा वीर्य बाहर की तरफ धकेला। मैं आखरी बूँद तक चाट गयी।
जब चूत पर लगा सारा वीर्य खत्म हो गया तो मैं रजनी के ऊपर से उतर गयी। पंकज और कुणाल बात रूम की तरफ चलने लगे। अपने लंड उन्होंने पकड़ रखे थे। लगता था फिर जोश मार रहे हैं।
रजनी पीछे से बोली , ” बात रूम जा रहे हो मगर मूतना मत करना हम भी आ रही हैं “।
उन दोनों ने सोचा होगा की हो सकता है इक्क्ठे मूतेंगे और एक दुसरे को पेशाब करते देखेंगे। मगर हमारी तो प्लानिंग ही कुछ और थी।
बाथ रूम पहुंच कर हम नीचे बैठ गयी और दोनों चोदुओं को बोलीं – “मूतो अब”।
हम पास पास ही सट कर बैठी थी। दोनों हमारे सामने खड़े हो गए और हमारे ऊपर मूतने लगे। मैं धार को अपनी चूचियों पर और मुंह में ले रही थी मगर रजनी केवल अपने मुँह में ले रही थी।
पता नहीं कितनी बियर पी थी उन्होंने – पेशाब खत्म ही नहीं होने को आ रहा था। गर्म गर्म मूत से हम पूरे नहा गयीं।
जब उनका मूतना बंद हुआ तो मैंने कहा, “हमे अपनी गोदी में उठाओ”। हम दोनों उनसे लिपट गयीं। हमारी बाहें उनकी गर्दन से लिपटी थी और टांगें कमर से पीछे कर के उनके चूतड़ जकड़ लिए। हमारी चूतें उनके लंडों को छू रही थी। हमने भी अपनी फुद्दियों में से मूत की धार छोड़ दी। ढेर सारा मूत उनके लंडों के ऊपर गिर कर उनकी टांगों से होता हुआ नीचे की तरफ बह रहा था।
मूत कर के जब हम नीचे उतरी तो देखा उनके लंड फिर से खड़े हो गए हैं।
पंकज बोला चलो अब हमे भी अपनी चूत चटवाओ। हम आगे आगे और वो दोनों पीछे पीछे।
हम बिस्तर किनारे पर गयीं। टाँगें हम ने खोल कर खड़ी कर दी ऊपर की ओर, और पूरी फैला दी। वो दोनों आये और नीचे बैठ कर हमारी फुद्दियों की चुसाई करने लगे। मेरे तो मजे के मारे आँखें बंद थी, पता नहीं कौन मेरी चूत चूस रहा था।
सच कहूँ तो मेरी चूत फिर गर्म हो चुकी थी। फिर वो उठा – मैंने देखा कुणाल था। उसने मेरी टांगें पकड़ी लंड चूत पर रखा और एक ही झटके में अंदर धकेल दिया।
“ये क्या, फिर से चुदाई ”?
पंकज अभी भी रजनी की चूत चूस रहा था। थोड़ी और चूसने के बाद वो भी उठा और रजनी की टांगें चौड़ी करके लंड उसकी चूत में डाल दिया।
चुदाई फिर शुरू हो चुकी थी। ऐसे ही लेटे पंकज ने रजनी के चूतड़ों के नीचे तकिया रख कर उसकी गांड पर जैल लगाई और लंड गांड में डाल दिया।
मेरी भी गांड फड़फड़ाने लगी। मैंने कुणाल की तरफ देखा। वो सब समझ गया। उसने भी मेरे चूतड़ों के नीचे तकिया रखा और मेरी गांड ऊंची की – जैल लगाई और एक ही बार में लंड अंदर घुसेड़ दिया।
अब हमारी गांड और चूत दोनों चुद रही थी। लंड कभी गांड में जा रहा था तो कभी चूत में। लंड पूरा सख्त था। मेरी तो चूत पानी छोड़ने लगी। ऐसा लगा मजा ही आ जाएगा। मैं चूतड़ हिला हिला कर लंड अंदर लेने लगी।
कुणाल ने मेरी चूत में लंड डाला हुआ था की मुझे लगा की मेरा पानी छूटने वाला है। तभी कुणाल ने लंड चूत से निकाला और गांड में डाल दिया और उधर मेरा पानी निकल गया। मैंने अपनी टांगों से कुणाल के चूतड़ जकड लिए और उंगली से चूत का दाना रगड़ने लगी ।कुणाल अपना लंड मेरी गांड से निकाल नही पा रहा था मगर मुझे बड़ा ही मजा आ रहा था I
अचानक मुझे फिर से मजा आ गया ओह… ओह… आह… आह… “इतना मज़ा” !!
कुणाल ने मेरी गांड में पिचकारी डाल दी। गर्म गर्म लेसदार वीर्य मेरी गांड के अंदर।अजीब ही अनुभूति थी लेकिन मस्त थी।
” कभी कभी गांड में भी मर्द का लेसदार सफ़ेद पानी छुटाने में कोइ हर्ज नहीं ”
कुणाल उठा और बात रूम में चला गया। मेरी अब हिम्मत नहीं थी की उठूं और उसके पीछे जाऊं। मुड़ कर देखा तो रजनी गांड ही चुदवा रही थी और चूत को उंगली से रगड़ रही थी। जल्दी उन दोनों का काम भी हो गया। रजनी का पानी भरपूर मजे के साथ निकला और पंकज का लेसदार वीर्य रजनी की गांड के अंदर निकल गया।
पंकज भी उठा और बाथ रूम की तरफ चला गया। मैं उठ कर बैठ गयी और रजनी की गांड देखने लगीं जिसमें से सफ़ेद सफ़ेद पानी धीरे धीरे बाहर बह रहा था।
कोइ और मौक़ा होता तो हम ये सफ़ेद लेसदार पानी हाथ से पोंछ कर चाट लेती, लेकिन अब इतनी चुदाई करवाने के बाद हिम्मत नहीं बची थी।
पंकज और कुणाल बात रूम से बाहर आ गए थे और कपड़े पहन रहे थे।
हम भी उठ कर बाथ रूम गयी चूत धोई, जोर लगा कर गांड में से वीर्य बाहर निकाला। गांड की धुलाई की और फटाफट वाला स्नान करके नंगी ही बाहर आ गयी। कमरे में जा कर कपड़े पहने और पंकज और कुणाल के पास ही बैठ गयी। रात के दो बज चुके थे।
पंकज बोला, “चलते हैं। कुणाल चलो तुम्हें भी छोड़ दूंगा”। कुणाल भी खड़ा हो गया।
हमने कहा, “इतनी रात कहाँ जाओगे, कल संडे ही तो है “।
दोनों बोले, “नहीं बहुत थक गए हैं”।
थक तो हम भी बहुत गयी थी, मेरी तो चूत ही दर्द कर रही थी इतना चुदने के बाद । रजनी का पता नहीं क्या हाल था।
उन लोगों ने खाली बियर की बोतले एक प्लास्टिक के थैले में डाल ली। कुणाल बोला, अब कब का प्रोग्राम है। पंकज भी हमारी तरफ देखने लगा।
रजनी बोली, “पढ़ाई भी करनी है खाली चुदाई ही नहीं करनी। पंद्रह बीस दिन तो आराम करो। मैं फोन कर दूंगी। इस बार इक्क्ठे ही आना “।
हंस कर दोनों ने हमारे होंठ चूमे और जाने के लिए मुड़े।
मैंने पीछे आवाज़ लगा कर कहा “पंकज जैल ले कर आना “।
इस बार उन दोनों के साथ साथ रजनी की भी हंसी छूट गयी।
अब हमें इंतज़ार था करनाल से सरोज के फोन का कि कब रजनी के मां बाबू जी रामेश्वरम जायेंगे। अब अगला चुदाई का दौर करनाल में होना था।
करनाल के नाम से मुझे कुछ याद आ गया। मैंने रजनी से पूछा,”रजनी एक बात बताओ, हम दोनो ने पंकज और कुणाल के लंड चूसे चाटे भी अपनी चूत में भी लिए और गांड में भी लिए, तुमने तो दीपक और संतोष से भी चूत की चुदाई करवाई। तुम्हें किसकी चुदाई सब से बढ़िया लगी ” ?
रजनी ने एक पल को सोचा फिर बोली, “आभा चुदाई तो सारे एक जैसी ही करते हैं, बहुत थोड़ा ही फरक होता है। कोइ लम्बे धक्के लगाता है, कोइ पूरा बाहर निकल कर फिर अंदर डालता है।
कोइ ऐसे धक्के लगाता है मनो चूत कहीं भाग जाएगी फिर मिलेगी नहीं। कोइ कोइ तो लंड चूत या गांड में डाल कर रुक जाता है, कुछ नहीं करता – बस लड़की ही अपनी चूत और गांड को कभी टाइट करती है कभी खोलती है। मतलब तो एक ही होता है चूत के अंदर की खुजली को को दूर करना। इसी खुजली को दूर करवाने को ही चुदाई या मजा आना कहते हैं। और इस खुजली को मोटा और सख्त लंड ही दूर करता है।
“ऐसे ही मोटे लौड़े को पाने के लिए लड़कियां सोमवार के व्रत रखती हैं – बाकी सब, आमदन शक्ल सूरत वो तो सब दिख ही जाता है – नहीं दिखता तो वो है खड़ा लंड “।
रजनी ने होनी बात जारी रक्खी, ” हाँ मगर दीपक लौड़ा थोड़ा सा अलग है “।
“वो कैसे”, मैंने हैरान हो कर पूछा।
“वो ऐसे की दीपक के लंड का टोपा लंड से कुछ ज़्यादा ही बड़ा और उभरा हुआ है। दीपक लंड जब मुंह में डाल कर लंड को मुंह के अंदर बाहर करता है तो इस उभार के कारण पूरा मुंह भर जाता और होठों पर जो रगड़ आती है उससे तो मजा ही आ जाता है। यही मजा चूत में भी आता है जब दीपक लंड बहार निकलता है और अंदर डालता है। चूत की एंट्री एक दम चौड़ी हो जाती है और जब टोपा अंदर चला जाता तो फिर से सिकुड़ होती है – क्या मज़ा आता है कसम से “।
“गांड में तो इसका और भी ज़्यादा मज़ा आता है। गांड का तो सारा मजा ही गांड की छेद के शुरू में होता। लंड बाहर निकलते समय या डालते गांड का छेद एकदम फ़ैल जाता है – हे भगवान वही असली जन्नत है “।
मेरी तो चूत और गांड में खलबली मच गयी, ”पता नहीं और कितने दिन हैं जब दीपक का ये आठवां अजूबा मेरी चूत और गांड में जाएगा”।
करनाल में पहला दिन
उस रात की पंकज और कुणाल के साथ ताबड़तोड़ चुदाई के बाद चूत, गांड और आत्मा, तीनो की तृप्ती चुकी थी। अब पढ़ाई की ओर ध्यान लगाने का समय था। कभी भी करनाल से सरोज का फोन आ सकता था की रजनी के माता पिता रामेश्वरम के लिए रवाना हो चुके हैं। फिर होगी चूत गांड की सिकाई चुदाई वो भी आठ दस दिन लगातार।
बीस दिनों के इंतज़ार के बाद आखिर सरोज का फोन आ गया। एक हफ्ते बाद रजनी के माँ, बाबू जी रामेश्वरम जाने वाले थे।
मैंने और रजनी ने इन बीस दिनों में एक बार भी चुदाई नहीं करवाई थी – ना ही अगले आठ दस दिन दिन तक चुदाई का प्रोग्राम था।
“अब जो होना था करनाल जा कर ही होना था “।
“आखिर संयम भी कोइ चीज़ होती है, ज़िंदगी में चुदाई पिलाई ही तो सब कुछ नहीं होता, वो अलग बात है कि रात को सोने से पहले एक दूसरी की चूत गांड चटाई कर लेते हैं”।
आ गया वो दिन भी – एक दिन बाद हमने करनाल के लिए रवाना होना था ।
हमने एक दूसरी की चूतों कि अच्छी तरह सफाई की, एक भी बाल नहीं रहने दिया। चिकनी कर दी एकदम।
करनाल पहुँचते ही दीपक और सरोज ने हमारा बहुत ही अच्छे से स्वागत किया। रजनी के पिता जी क्यों कि बाहर थे इस लिए संतोष डेरी का काम देखने खेतों में गया हुआ था।
सतोष बोली, ” जीजी आप और ये “, उसने मेरी ओर इशारा कर के कहा, ” उस बीबी जी बाबू के बड़े वाले कमरे में ही सो जाओ। आराम रहेगा”। साथ ही वह हंस भी पड़ी।
“ठीक है सरोज, और हाँ, इसका नाम आभा है। करनाल शहर देखने आयी है, मैंने तुम्हें बताया ही था “। रजनी ने मेरा परिचय करवाया।
“हां जीजी बढ़िया से करनाल दिखाएंगे इनको भी, ऐसा कि वापस जाने का मन नहीं करेगा ” ये कह कर सरोज ने मेरी ओर देखा और हंस पड़ी।
” मुझे तो लगा कि मेरी चूत पानी पानी हुई जा रही है। गांड का छेद फड़कने लगा सो अलग”।
सरोज ने कहा,”जीजी आप और आभा जीजी आप नहा कर फ्रेश हो जाओ। मैं नाश्ता बनाती हूँ। फिर बात करेंगे कि करनाल कैसे देखना है “।
सरोज और रजनी हंस पड़ी, मैं थोड़ी शरमाई। सरोज सच में ही मुझे बड़ी अच्छी लगी।
“चूत और गांड चुदवाने से समय मिला तो मैं, रजनी और सरोज भी चुसाई क्रीड़ा करेंगे “।
हम दोनों एक ही बाथ रूम में घुस गयीं। एक दूसरी की चूत और गांड को मल मल कर धोया, उंगली भी की और चाटा भी।
नहाते नहाते मैंने रजनी से पूछा, “रजनी अब क्या प्रोग्राम है”। मतलब साफ़ था कि चुदाई कब से शुरू होगी।
रजनी ने कहा, देखो आभा, इस मामले में सरोज सब से अच्छी राये दे सकती है। जैसा वो कहेगी वैसा ही करेंगी, दिन बढ़िया गुज़र जाएंगे”।
नहा धो कर हम बाहर आये, नाश्ता मेज पर लगा हुआ था। हम सब बैठ गयी। रजनी ने सरोज को भी साथ ही बैठा लिया। सरोज ने बताया दीपक अभीअभी शहर गया है। और संतोष आज खेत पर ही सोयेगा।
थोड़ा खाने के बाद रजनी ने पूछ ही लिया, “सरोज, अब क्या प्रोग्राम रहेगा”।
सरोज ने बड़ी ही मस्ती में पुछा “क्यों जीजी खुजली हो रही है क्या नीचे “।
“हो तो रही है सरोज”।
“और आपके आभा जीजी ” ? सरोज ने मेरी ओर देख कर पूछा।
मैं शर्मा गयी – कुछ नहीं बोली।
रजनी ने ही कहा, “अरे आभा अब शर्माना छोड़ो, सरोज से कुछ नहीं छुपा। तुम्हें तो सब मालूम ही है “। फिर वो दबी आवाज में बोली – जैसे कोइ राज़ कि बात बताने जा रही हो, ” सरोज की राय चुदाई के मामले में बिलकुल सटीक और सही होती है – क्यों सरोज “। रजनी ने सरोज कि तरफ हंस कर देखा।
सरोज भी हंसी, अच्छा जीजी ये बताओ कितने दिन का प्रोग्राम है, उसी हिसाब से आप कि दिनचर्या बनाएंगे।
“दिनचर्या वह – मतलब कब कब किसकी चूत कि चुदाई होगी, कब गांड मारी जाएगी, कब मूतने का प्रोग्राम बनेगा और कब हम तीनों कन्याओं की आपस में चूत चटाई और उंगलीबाजी होगी “।
सरोज ने बात चालू रखी, “जीजी दीपक शहर गया है शाम तक आएगा, गांड चुदाई का सामान भी ले कर आएगा। कल दीपक ने मेरी गांड चोदी, उसमें सारी जैल लग गयी। आज रात आभा जीजी को दीपक के लिए छोड़ देते हैं। संतोष आज खेतों पर ही सोयेगा इस लिए मैंने अपने देवर राकेश को बुला लिया है। उसको आप लोगों के बारे में भी बता दिया है”।
फिर उसने रजनी कि तरफ इशारा कर के कहा, “आप आज राकेश का लंड ले लेना, बढ़िया गांड चुदाई करता है I पिछली बार आप राकेश से नहीं चुदवा पाई,और शाम तक जैल भी आ जाएगी I राकेश मेरी गांड चोदने ले लिए अपनी जैल क्रीम ले कर आता है।”।
“साफ़ पता लग रहा था कि रजनी कि चूत और गांड दोनों प्यासी हो रही थी। हालत तो मेरी भी कुछ ऐसी ही थी “।
रजनी ने पूछा, ” और सरोज तुम “?
सरोज ने जवाब दिया, “अरे मेरी छोड़ो, मुझे लंडों कि कमी नहीं। दीपक है, राकेश है और संतोष तो है ही”।
रजनी बोली ,”फिर भी तुम भी आ जाना। तीनो रहेंगे – तुम मैं और राकेश”।
सरोज मान गयी, “ठीक है जीजी, मगर चुदाई खाली आप ही करवाना, मैं आप से चूत चटवाऊंगी जैसे दीपक के साथ चटवाई थी जब वो आप की गांड चोद रहा था “।
रजनी हंसी ,” बड़ी खुदगर्ज हो सरोज, मैं क्यों ना तुम्हारी चूत का स्वाद लूं “।
सब हंस पड़े।
रजनी ने पूछा, “ये तो हो गया आज का। इसके बाद” ?
“इसके बाद कल राकेश तो चला जाएगा और अगर संतोष घर पर आ गया तो आप दीपक के पास चली जाना। आभा जीजी को संतोष से चुदाई का मौका दे देंगे। फिर जिस दिन संतोष का प्रोग्राम खेतों पर रुकने का होगा तो राकेश को बुलवा लेंगे। बीच में अगर मौक़ा लगा तो मैं और आप या मैं और आभा जीजी इक्क्ठी दीपक से चूत और गांड का प्रोग्राम बना लेंगी”।
रजनी का दिमाग तो कुछ और ही सोच रहा था – शायद पंकज और कुणाल की इक्क्ठी चुदाई याद आ रही थी। उसने पूछा, “मगर सरोज हमसब, मतलब मै तुम, आभा, दीपक ,संतोष और राकेश क्या सब एक साथ ये चूत गांड चुदाई का खेल नहीं खेल सकते ” ?
सरोज थोड़ा संजीदा हुई, ” नहीं जीजी आखिर को तो दीपक मालिक ही है। संतोष या राकेश ऐसा करने के लिए नहीं मानेंगे। उधर संतोष हालांकि मेरी और राकेश कि गांड चुदाई के बारे में जानता है, मगर वो भी इक्क्ठे चुदाई नहीं करते “।
“मैं सोच रही थी बात तो सही है, भाई भाई में इतना लिहाज और आदर तो होना ही चाहिए। अब रजनी ही कहाँ अपनी माँ के साथ दीपक से चूत चुदवा सकती है”।
सरोज कह रही थी, “पर जीजी निराश होने कि जरूरत नहीं। मुझे मालूम है, जब कभी बीबी जी घर पर नहीं होती तो दीपक अपने कुछ दोस्तों के साथ ग्रुप चुदाई के लिए जाता है – जिसमे दीपक के कुछ दोस्त होते हैं और साथ उनकी गर्ल फ्रेंड्स होती हैं। सब एक दुसरे की गर्ल फ्रेंड को चोदते है। जिस दिन संतोष खेतों पर रुकेगा उस दिन राकेश को ना बुला कर दीपक को कहेंगे अपने दो या तीन दोस्तों को बुला लेगा। हम तीन होंगी और वो भी तीन – या फिर चार होंगे, मज़ा ही आ जाएगा “।
क्या बढ़िया स्कीम थी सरोज की। ठीक ही कहा था रजनी ने, “सरोज की राय चुदाई के मामले में बिलकुल सटीक और सही होती है “।
रजनी उठी और सरोज के होंठ चूसने लगी, “सरोज चलो थोड़ी मस्ती करती हैं “।
“लगता है सरोज भी गर्म हो गई थी। मेरी भी चूत पानी पानी हुई जा रही थी, गांड का छेद फड़क रहा था “।
सरोज उठ खड़ी हुई, “चलो – आओ आभा जीजी”।
” मेरे तो मन में लड्डू फुट रहे थे, पहला दिन और क्या चूत गांड चटाई होगी। और रात को दीपक से साथ जो होगा वो अलग “।
हम तीनो हमारे वाले कमरे की ओर चल पड़ी।
“उसके बाद तो जो हुआ वो कमाल ही था”। सरोज हालांकि हम से बड़ी थी मगर उसका जिस्म कड़क था – मेहनत का नतीजा था। चूचिया तनी पड़ी थी। चूतड़ हमारे चूतड़ों से भारी थे मगर सख्त थे।
“जिस तरह वो हम लोगों की चूतें चाट रही थी और जैसे चटवा रही थी, अपनी गांड में उगली ले रही थी और हमारी गांड में उंगली डाल कर गोल गोल घुमा रही थी, लग ही रहा था की सेक्स का पूरा मजा लेने में विश्वास रखती है ”
अगली बार मैंने भी रजनी की गांड में उंगली डाल कर सरोज की तरह गोल गोल घुमाई तो रजनी हं कर बोली, “आभा बड़ी जल्दी सीख गयी तू तो ” !!
मैं हंस पड़ी।
“अगले डेढ़ घंटे तक हमने जो किया वो हर लड़की को अपने ख़ास सहेली के साथ जरूर करना चाहिए”।
एक दूसरी की चूत चाट चाट लाल कर दी। गांड में उंगली कर कर के वो हालत कर दी की अब अगर गांड की चुदाई ना हुई तो क़हर आ जयेगा। और आखिर में जो मूता मुताई हुई वो अलग। दो बैठती थी और एक अपनी चूत उनके मुंह पर लगा कर पानी छोड़ती थी। सर..र..र..र..र..र..र की आवाज के साथ गर्म मूत जब चेहरे पर गिरता था तो मजा ही जाता था।
हर खेल से पहले खिलाडी “वार्म अप” करते हैं, थोड़ी उछल कूद करते हैं जिससे उनके जोड़ खुल जाए और जब असली खेल में जाएं तो बढ़िया नतीजे लाएं।
“हम तीनों का भी ये वार्म अप था। अब आगे की चुदाई बढ़िए होने की संभावना थी ”
थक कर हम तीनो एक ही बेड लेट गयी। लेटे लेटे भी हम एक दूसरी कि गांड और चूत सहलाती रही।
ऐसे ही शाम हो गयी।
दीपक आ चुका था, सरोज का देवर राकेश भी आ गया था। हमे नमस्ते करने आया। मैं और रजनी तो उसे देख कर हैरान ही रह गयी। लम्बा चौड़ा, बिलकुल खिलाड़ी लग रहा था। मेरा तो मन आया की मैं ही इससे गांड मरवा लूं। फिर सोचा की नंबर तो मेरा भी आएगा ही। आज दीपक का मोटे टोपे वाला लंड लेती हूँ। रजनी कह रही थी चूत और गांड के अंदर बाहर होते हुए स्वर्ग की अनुभूति होती है। रजनी तो राकेश को देख कर मस्त थी। सोच रही होगी, “ये चोदेगा आज मुझे ” ? उसके चेहरे पर बड़ी ही तसल्ली के भाव थे।
दीपक और राकेश से सरोज ने ही बात कि। हम तो नए थे क्या बात करते। सरोज तो इन दोनों से चुदाई करवाती ही रहती थी।
रात का खाना खाने के बाद मैं बड़े कमरे में चली गयी। सरोज ने मुझे बता दिया था कि दीपक थोड़ी देर में पहुंच जाएगा। रजनी को ले कर वो अपने कमरों की तरफ चली गयी।
मैं बिस्तर पर लेट गयी और दीपक के आने का इंतज़ार करने लगी। लाइट मैंने बंद कर दी। रात वाली हल्की रौशनी वाली लाइट जल रही थी। दस मिनट ही गुज़रे होंगे की दरवाजा खुला और दीपक अंदर आ गया और मेरे पास ही लेट गया।
बात उसने शुरू कि, “सफर की थकान दूर हो गयी ” ?
मैंने हूँ में ही जवाब दिया। वो सीधा लेता हुआ था। मुझे लगा की वो थोड़ा हिल डुल रहा है।
असल में वह अपना लंड बाहर निकाल रहा था। उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपना लंड मेरे हाथ में पकड़ा दिया। मैंने महसूस किया कि रजनी ठीक ही कह रही थी। लंड का टोपा लंड से बड़ा थाऔर यह महसूस भी होता था। मैंने लंड को धीरे धीरे सहलाना शुरू कर दिया और दबाने लगी। लंड एकदम सख्त हो गया।
दीपक ने दबी आवाज में कहा,”आभा चूसो इसे”।
मैं तो इसी पल के इंतज़ार में थी।
मैं उठी और घुटनों के बल बैठ कर उसका लंड चूसने लगी।
थोड़ी देर चुसवाने के बाद दीपक बोला, “कपड़े उतार लो”।
मैं उठी और सारे कपड़े उतार लिए। दीपक भी अब नंगा था। मैं फिर उसका लंड मुंह में लेने के लिए झुकी किउसने मुझे कहा, ” ऐसे नहीं आभा। उलटा लेटो और अपनी चूत मेरे मुंह की तरफ करो “। मैंने वैसा होई किया। अब मेरी चूत उसके मुंह पर थी और उसका मोठे टोपे वाला लंड मेरे मुंह में था। सच ही जब लंड को मुंह में आगे पीछे करती थी तो मोटा टोपा क्या एहसास देता था। सोच रही थी ये मोटा टोपा जब चूत और गांड में जाएगा फिर तो मज़ा ही आ जाएगा।
“धन्यवाद रजनी इतना मस्त लंड दिलवाने के लिए “।
कुछ देर की चुसाई के बाद मेरी चूत तो पानी छोड़ने लगी। दीपक के लंड में से कुछ नमकीन नमकीन निकल रहा था। मैं तो चाटती जा रही थी जो भी ये नमकीन नमकीन था।
दीपक ने कहा, “आभा तुम्हारी फुद्दी तो तैयार लग रही है, शुरू करें ” ?
अब मैंने भी खुल कर बोलना ही ठीक समझा, “हाँ दीपक चूत लंड तो मांग रही है ”।
“गांड कब चुदवाओगी”। दीपक ने पूछा, “सरोज कह रही थी तुम्हारी गांड की चुदाई जरूर करूं “।
अब शर्माने से कुछ नहीं होना था। मैंने कहा, “मैंने तो दोनों ही की ही चुदाई करवानी है। अब तुम जैसे मर्ज़ी रगड़ो”।
दीपक ने कुछ सोचा फिर बोला,” ठीक है बन जाओ घोड़ी, करो गांड मेरी ओर। दोनों का ही बैंड बजाएंगे “।
“दोनों का ही बैंड बजाएंगे, मजा आ गया “।
मैंने आव देखा ना ताव, बिस्तर से उतर कर, गांड पीछे कर के चूतड़ उठा कर खड़ी हो गयी।
दीपक ने मेरी गांड चाटनी शुरू की। जब वो अपनी जुबान गांड के छेद में करता था तो बड़ा ही मजा आता था।
फिर उसने थोड़ा थूक लगा कर उंगली मेरी गांड में की। अंदाज़ा लगा रहा होगा की जैल कितनी लगानी पड़ेगी।
मेरा अंदाज़ा ठीक ही था। दीपक बोला, “आभा तुम्हारी गांड भी रजनी की तरह टाइट है। या तो गांड चुदाई नहीं करवाती या बहुत कम कभी कभी करवाती हो “।
मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना वो कहीं गया। शायद जैल लेने गया होगा।
“वैसे भी उसने मुझसे पूछा थोड़े ही था, उसने तो मुझे बताया था की या तो मैं गांड चुदाई नहीं करवाती या कभी कभी करवाती हूँ “।
अगले ही मिनट बाद ही मुझे गांड के छेद पर कुछ ठंडा ठंडा लगा। “मेरा अंदाज़ा ठीक ही था, दीपक जैल ही लेने गया था ”
गांड के छेद के ऊपर और उंगली घुसेड़ कर गांड के अंदर दीपक ने खूब सारी जैल लगाई जिससे उसके लंड का फूला हुआ टोपा आसानी से
अंदर चला जाए। “मैं तो उसका लंड अपनी गांड में महसूस करने के लिए मरी जा रही थी”।
जैल लगाने के बाद दीपक ने लंड गांड के छेद पर रखा और धीरे धीरे अंदर धकेला।
“पहली बार में लंड अंदर नहीं गया “। शायद और जैल की ज़रुरत थी।
दीपक ने फिर से जैल लगाई। “इस बार गांड के अंदर की तरफ ज़्यादा जैल लगाई “।
दीपक लंड को गांड पर रखा। जब आधा टोपा अंदर चला गया तो उसने मेरी कमर पकड़ी और जोर लगाना शुरू किया। ढेर सारी जैल और दीपक के जोर का कमाल था की लंड का टोपा अंदर की तरफ फिसलने लगा। अब दीपक नहीं रुका और लंड अंदर धकेलता गया। मुझे गांड पर दर्द हो रहा था।
“पर गांड पर दर्द तो तब भी हुआ था जब कुणाल ने पहली बार मेरी गांड मारी थी “। आगे आने वाले मजे का सोच कर मैं दर्द सहती गयी।
तभी फूला हुआ टोपा फिसला और गांड के अंदर बैठ गया। गांड का छेद जो फूले हुए टोपे के हिसाब से फ़ैल गया था एक दम थोड़ा सा बंद हुआ और लंड को जकड़ लिया।
दीपक अब कुछ रुका और टोपा बाहर निकला।
“हे भगवान, तो इस मजे के बारे में कह रही थी रजनी” ?
जैसे ही दीपक ने लंड पीछे खींचा तो गांड का छेद थोड़ा फ़ैल गया। टोपे का नीचे का सिरा छेद के साथ रगड़ खाता बाहर निकला और आवाज आयी “पप्प” और जो सुखद अनुभूति हुई उसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता – जन्नत थी ये।
दीपक ने फिर टोपा अंदर किया – फिर बाहर निकला। सात आठ बार उसने ऐसे ही किया फिर थोड़ी जैल क्रीम और लगाई।
“लग रहा था पूरा पेलने के चक्कर में था। “कुणाल और पंकज भी ऐसा ही करते थे “।
मैंने दीपक से कहा, “दीपक थोड़ा और ऐसे ही करो ना “।
“कैसे” ? शायद वो समझा नहीं ।
“यही – लंड का टोपा अंदर करो फिर बाहर करो और फिर अंदर, जैसे अभी कर रहे थे “।
“टोपा ? तुम्हारा मतलब लंड का सुपाड़ा ” ?
“इसे सुपाड़ा कहते हैं ? मैं और रजनी तो इसे टोपा ही बोलते हैं ” ?
“इसे टोपा भी बोलते हैं और सुपाड़ा भी। तुम्हारा मतलब टोपा कुछ देर अंदर बाहर करूं ” ?
“हाँ “, मैं बोली, “और अब इसे सुपाड़ा ही कहो। अच्छा लगता है। बोलते हुए लगता है पूरा मुंह इससे भर गया है। मैं रजनी को भी बोलूंगी अब इसे लंड का टोपा नहीं लंड का सुपाड़ा बोला करे “।
“दीपक ने मेरी कमर पकड़ी और टोपा, नहीं नहीं सुपाड़ा अंदर बाहर करने लगा”।
“मैं तो आनंद सागर में गोते लगा रही थी’। सोच रही थी क्या ऐसा भी लंड होता है ? फूला हुआ सुपाड़ा।
दीपक पांच मिनट तक ऐसे ही करता रहा। पांच मिनट में ज़्यादा नहीं तो सौ बार तो सुपाड़ा गांड अंदर बाहर हुआ ही होगा। जब मेरी तस्सल्ली हो गयी तो मैंने दीपक से कहा, ” मजा आ गया दीपक, अब गांड चुदाई कर सकते हो “।
सुपाड़ा अंदर ही था, दीपक ने एक धक्का लगाया और पूरा लंड गांड के अंदर बैठ गया।
“आह आह “। मुझे थोड़ी दर्द हुई, पर ठीक था।
मेरी दर्द वाली “आह आह ” से दीपक रुका नहीं। उसने धक्के लगाने शुरू कर दिए। उसने हर बार लंड गांड से बाहर निकाला और फिर गांड के अंदर डाला।
“शायद वह समझ गया था कि जब उसके लंड का सुपाड़ा बाहर निकलता है गांड के छेद में फैलाव आता है, मुझे उससे मजा आ रहा है “।
दस मिनट कि पूरी गांड चुदाई ने मेरी बस कर दी। अब और नहीं रहा जा रहा था। एक तो गांड दर्द कर रही थी, दूसरा चूत पानी छोड़ रही थी।
मैंने दीपक से कहा, “दीपक अब चूत को भी रगड़ो, मगर ऐसे ही करना – पूरा लंड बाहर, फिर एक ही बार में अंदर “।
इस बार जो दीपक ने लंड गांड से बाहर निकाला तो सीधा चूत में घुसेड़ दिया। गीली चूत में फिसलता हूआ लंड अंदर चला गया। और जब दीपक ने इसे पूरा निकला तो आवाज आयी “पप्प” – जैसे पेप्सी की बोतल का ढक्कन खुला हो। जब दीपक ने गांड से अपना लंड निकला था तब भी यही आवाज हुई थी “पप्प”। दीपक ने जब पूरा लंड जब चूत के अंदर झटके से डाला तो आवाज आयी “फच” और जब उसके टट्टे मेरी गीली चूत से टकराये तो आवाज आई “पट्ट “।
“जब दीपक लंड निकलता था तो पप्प और जब घुसेड़ता था तो फच और जब पूरा बैठता था तो पट्ट”।
“पप्प…फच…पट्ट —— पप्प…फच…पट्ट —— पप्प…फच…पट्ट —— पप्प…फच…पट्ट ” मेरी तो छूट की चुदाई भी संगीतमयी हो रही थी। कितनी ताल से लंड मेरी चूत में चोद रहा था।
“पप्प फच पट्ट —- पप्प फच पट्ट —- पप्प फच पट्ट —- पप्प फच पट्ट”।
क्या मस्त चूत चुद रही थी मेरी।
