हैलो.. मेरा नाम अनीता है। मैं २६ साल की एक शादीशुदा औरत। गोरा रंग और खूबसूरत नाक नक्श। कोई भी एक बार मुझे देख लेता तो बस मुझे पाने के लिये तड़प उठता था। मेरा फिगर, ३६-२८-३८, बहुत सैक्सी है। मेरी शादी को कोई 8-9 महीने हुए हैं। जब भी मैं कहीं बाहर जाती हूँ तो सभी मर्द मुझे कामुक नज़रों से देखते हैं। मुझे भी ये बहुत पसंद है कि सभी मर्द मुझे देखें मेरे पति का नाम चेतन है.. वो मेरे ऑफिस में मेरे साथ ही काम करते थे.. लेकिन शादी के बाद मैंने जॉब छोड़ दी और घर पर ही रहने लगी हूँ।
चेतन कोई बहुत ज्यादा अमीर आदमी नहीं हैं। उसकी फैमिली शहर के पास ही एक गाँव में रहती है.. उधर थोड़ी सी ज़मीन है.. जिस पर उसके घर वाले अपना गुज़र-बसर करते हैं। गाँव में उसके बाप.. माँ.. बहन और एक छोटा भाई रहते हैं। उसका छोटा भाई अपनी बाप के साथ जमीनों पर ही होता है। गाँव के स्कूल में ही बहन पढ़ रही थी.. वो बहुत ही प्यारी लड़की है.. डॉली.. यानि वो मेरी ननद हुई।
मैं अपने पति चेतन के साथ शहर में ही रहती हूँ। हमने एक छोटा सा मकान किराए पर लिया हुआ है.. इसमें एक बेडरूम मय अटैच बाथरूम.. छोटा सा टीवी लाउंज और एक रसोई है।
घर के अगले हिस्से में एक छोटी सी बैठक है.. जिसका एक दरवाज़ा घर से बाहर खुलता है.. और दूसरा टीवी लाउंज है.. घर के पिछले हिस्से में एक छोटा सा बरामदा है। बस.. तक़रीबन 3 कमरे का घर है.. ऊपर की छत बिल्कुल खाली है।
मेन गेट के अन्दर थोड़ी सी जगह गैराज के तौर पर जहाँ पर चेतन अपनी बाइक खड़ी करता है।
मैं और चेतन अपनी शादी से बहुत खुश हैं और बड़ी ही अच्छी जिंदगी गुज़र रही थी। अगरचे.. चेतन का बैक ग्राउंड गाँव का था.. लेकिन फिर भी शुरू से शहर में रहने की वजह से वो काफ़ी हद तक शहरी ही हो गया था। रहन-सहन.. ड्रेसिंग वगैरह सब शहरियों की तरह ही थी.. और वो काफ़ी ओपन माइंडेड भी था।
घर पर हमेशा वो मुझसे फरमाइश करता के मैं मॉडर्न किस्म के कपड़े ही पहनूं.. इसलिए घर पर मैं अक्सर टाइट लैंगिंग्स और टॉप्स.. स्लीव लैस शर्ट्स और हर किस्म की वेस्टर्न ड्रेसस पहन लेती थी।
मैं अक्सर जब भी बाहर जाती.. तब भी मेरी ड्रेसिंग काफ़ी मॉड ही होती थी।
मैं अक्सर जीन्स और टी-शर्ट पहनती थी या सलवार कमीज़ पहनती तो.. वो भी फैशन के मुताबिक़ ही एकदम चुस्त और मॉडर्न ही होती थी।
घर से बाहर भी वो मुझे अक्सर लेगिंग पहना कर ले जाता था.. घर आ जाता तो मुझसे सिर्फ़ ब्रेजियर और लेगिंग में ही रहने की फरमाइश करता था..
चेतन मेरे हुस्न और मेरे जिस्म का दीवाना था। हमेशा मेरी गोरे रंग और खूबसूरत जिस्म की तारीफ करता था।
जब भी मौका मिलता.. वो मेरी चूचियों को मसल देता था.. और मेरे खुले गले में हाथ डाल कर मेरी चूचियों को सहलाता रहता था।
अपने पति को खुश करने और उसे लुभाने के लिए मैं भी हमेशा डीप और लो नेक की कमीजें सिलवाती थी.. जिसमें से मेरी चूचियों भी नजर आती थीं और मम्मों का क्लीवेज तो हर वक़्त ही ओपन होता था।
दिन में जब भी मौका मिलता.. हम लोग सेक्स करते थे.. बल्कि सच बात तो यह है कि मैं शादी से पहले ही अपना कुँवारापन चेतन पर लुटा चुकी थी।
जी हाँ.. चेतन ही मेरी पहली और आखिरी मुहब्बत था और यह चेतन की मुहब्बत ही थी.. जो के मुझे शादी से पहले ही उसके बिस्तर तक उसकी बाँहों में ले आई थी।
शादी के 8-9 महीने बाद भी जब हमारी सेक्स जिंदगी और हवस से भरी हुई ज़िंदगी पूरे सिरे पर थी.. तो एकदम इसमें एक ब्रेक सी लग गई और एक टकराव सा आ गया।
इसकी वजह यह थी कि मेरी ननद डॉली… ने स्कूल का आखिरी इम्तिहान पास कर लिया था और उसने कॉलेज में एडमिशन लेने का शौक़ ज़ाहिर किया.. तो मेरे ससुर जी ने पहले तो इन्कार कर दिया.. लेकिन जब उसके चहेते बड़े भाई चेतन ने भी अपने बाप से बात की.. तो मेरे ससुर जी ने हामी भर ली कि अगर चेतन उसकी जिम्मेदारी उठा सकता है.. तो ठीक है।
अब दिक्कत यह थी कि गाँव में कोई कॉलेज नहीं था और उसे शहर में आना था। जब डॉली ने कॉलेज में एडमिशन लिया.. तो वो गाँव से शहर में आ गई। अब ज़ाहिर है कि उसे हमारे साथ ही रहना था तो डॉली शहर में हमारे साथ उस छोटे से मकान में ही शिफ्ट हो गई।
डॉली की आने से और हमारे साथ रहने से मुझे और तो कोई दिक्कत नहीं थी.. लेकिन सिर्फ़ एक मसला था कि हमारी सेक्स जिंदगी थोड़ी बंदिशों वाली हो जाने थी।
अब हमें जो भी करना हो.. तो अपने कमरे में ही करना था। वैसे डॉली बहुत ही अच्छे नेचर की लड़की थी.. अभी क़रीब 19 साल की ही थी.. बहुत ही सुंदर और खूबसूरत लड़की थी। बिल्कुल दूध की तरह गोरा रंग.. और मक्खन की तरह से नरम-नरम जिस्म था उसका..
उसके सीने की उठान.. यानि चूचियों उभर चुकी थीं.. लेकिन अभी बहुत बड़ी नहीं थीं। जाहिर सी बात है कि मुझसे तो छोटी ही थी.. बहुत ही सादा और मासूम सी लड़की थी।
मुझसे बहुत ही प्यार करती थी और बहुत ही इज्जत देती थी।
जब से घर में आई.. तो रसोई में भी मेरा हाथ बंटाती थी.. और मेरे साथ घर का काफ़ी काम करती थी। मैं भी डॉली की शक्ल में एक अच्छी सी सहेली को पाकर खुश थी।
उसके सोने का इंतज़ाम उस छोटी सी बैठक में ही एक सिंगल बिस्तर लगवा कर.. कर दिया गया था। वो वहीं पर ही पढ़ती थी और वहीं पर ही सोती थी। बाथरूम उसे हमारा वाला ही इस्तेमाल करना पड़ता था.. जिसका एक दरवाज़ा छोटे से टीवी लाउंज में खुलता था और दूसरा हमारे बेडरूम में खुलता था।
बस रात को सोते वक़्त हम लोग अपने बेडरूम वाला बाथरूम का दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लेते थे.. ताकि डॉली बाहर से ही उसे इस्तेमाल कर सके।
डॉली वैसे तो बहुत ही खूबसूरत लड़की थी.. लेकिन सारी ज़िंदगी गाँव में रहने की वजह से बिल्कुल ही ‘डल’ लगती थी। उसकी ड्रेसिंग भी बहुत ज्यादा ट्रेडीशनल किस्म की होती थी। सादा सी सलवार-कमीज़ पहनती थी.. कभी भी मॉड किस्म के कपड़े नहीं पहनती थी।
मुझे घर में लेगिंग पहने देखना शुरू किया.. तो वो बहुत ही हैरान हुई.. तो मैंने हंस कर कहा- अरे यार क्यों हैरान होती हो.. यह सब आज के वक़्त की ज़रूरत और फैशन है.. इसके बिना ज़िंदगी का क्या मज़ा है.. वैसे भी तो घर पर सिर्फ़ तुम्हारे भैया ही होते हैं ना.. और जब भी बाहर जाती हूँ.. तो उनके साथ ही जाती हूँ.. तो फिर मुझे किस चीज़ की फिकर है।
डॉली- लेकिन भाभी बाहर तो बहुत से लोग होते हैं.. वो आपको अजीब नजरों से नहीं देखते क्या?
मैं- अरे यार देखते हैं.. तो देखते रहें.. मेरा क्या जाता है.. वैसे इन लोगों की कमीनी नज़रों का भी अपना ही मज़ा होता है।
मैंने एक आँख मार कर डॉली से कहा.. तो वो झेंप गई।
मैं उसे हमेशा ही मॉड और न्यू फैशन के कपड़े पहनने को कहती.. लेकिन वो इन्कार कर देती।
‘मुझे शरम आती है.. ऐसी कपड़े पहनते हुए.. और फिर मुझे इन कपड़ों में देख कर भैया बुरा मान जाएंगे..’
शहर में आने के बाद चेतन ने उसे खूब शहर की सैर करवाई। हम लोग चेतन की बाइक पर बैठ कर घूमने जाते.. मैं चेतन के पीछे बैठ जाती और मेरे पीछे डॉली बैठती थी।
हम लोग खूब शहर की सैर करते.. और डॉली भी खूब एंजाय करती थी।
बाइक पर बैठे-बैठे मैं अपनी चूचियों को चेतन की बैक पर दबा देती और उसके कान में ख़ुसर-फुसर करती जाती- क्यूँ फिर फील हो रही हैं ना मेरी चूचियां तुमको?
मेरी कमर पर चेतन भी जानबूझ कर अपनी कमर से थोड़ा-थोड़ा हरकत देता और मेरी चूचियों को रगड़ देता। कभी मैं उसकी जाँघों पर हाथ रख कर मौका मिलते ही उसकी पैन्ट के ऊपर से ही उसके लण्ड को सहला देती थी.. जिससे चेतन को बहुत मज़ा आता था।
हमारी इन शरारतों से बाइक पर पीछे बैठे हुई डॉली बिल्कुल बेख़बर रहती थी।
चेतन अपनी बहन से बहुत ही प्यार करता था.. आख़िर वो उसकी सबसे छोटी बहन थी ना.. कम से कम भी उससे 18 साल छोटी थी.. और वो मुझसे 10 साल छोटी थी।
रोज़ाना चेतन खुद ऑफिस जाते हुए डॉली को कॉलेज छोड़ कर जाता और वापसी पर साथ ही लेता आता था। मुझे भी कभी भी इस सबसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी। जैसा कि ननद-भाभी में घरों में झगड़ा होता है.. मेरे और डॉली कि बीच में ऐसा कभी भी नहीं हुआ था.. बल्कि मुझे तो वो अपनी ही छोटी बहन लगती थी।
फिर एक दिन वो वाकिया हुआ जो इस कहानी के आगे बढ़ने की वजह बना, उससे पहले ना कुछ ऐसा-वैसा हुआ हमारे घर में, और ना ही किसी के दिमाग में था.. लेकिन उस वाकिये के बाद मेरा दिमाग एक अजीब ही रास्ते पर चल पड़ा और मैंने वो सब करवा दिया जो कि कभी नहीं होना चाहिए था।
वो इतवार का दिन था और हम सब लोग घर पर ही थे। दोपहर के वक़्त हम सब लोग टीवी लाउंज में ही बैठे हुए टीवी देख रहे थे कि चेतन ने चाय की फरमाइश की.. इससे पहले कि मैं उठती.. आदत के अनुसार.. डॉली फ़ौरन ही उठी और बोली- भाभी आप बैठो.. मैं बना कर लाती हूँ।
मैंने उसे ‘थैंक्स’ बोला और दोबारा टीवी देखने लगी, चेतन भी मेरा पास ही बैठा हुआ था।
अचानक ही रसोई से डॉली की एक चीख की आवाज़ सुनाई दी और साथ ही उसके गिरने की आवाज़ आई। मैं और चेतन दोनों ही फ़ौरन ही उठ कर रसोई की तरफ चिल्लाते हुए भागे।
‘क्या हुआ है डॉली?’
जैसे ही हम लोग अन्दर गए तो देखा कि डॉली नीचे रसोई कि फर्श पर गिरी हुई है और अपने पैर को पकड़ कर दबा रही है और वो दर्द के मारे कराह रही थी।
हम फ़ौरन ही उसके पास बैठ गए और मैं बोली- क्या हुआ डॉली.. कैसे गिर गई?
डॉली- बस भाभी.. पता ही नहीं चला कि कैसे मेरा पैर मेरी पायेंचे में फँस गया और मैं नीचे गिर पड़ी।
चेतन- अरे यह तो शुक्र है कि अभी इसने चाय नहीं उठाई हुई थी.. नहीं तो गर्म-गर्म चाय ऊपर गिर कर और भी नुक़सान कर सकती थी।
मैंने आहिस्ता-आहिस्ता डॉली को पकड़ कर उठाना चाहा.. उसका दूसरा बाज़ू चेतन ने पकड़ा और हमने डॉली को खड़ा किया.. तो वो अपना बायाँ पैर नीचे ज़मीन पर नहीं रख पा रही थी। बड़ी ही मुश्किल से वो अपना एक पैर ऊपर उठा कर मेरी और अपने भैया की सहारे पर लंगड़ाती हुई टीवी लाउंज में पहुँची।
इतने से रास्ते में भी वो कराहती रही- भाभी नहीं चला जा रहा है.. बहुत दर्द हो रहा है।
टीवी लाउंज में लाकर हम दोनों ने उसे सोफे पर ही लिटा दिया और मैं उसके पास बैठ गई।
चेतन- लगता है कि इसके पैर में मोच आ गई है।
मैंने डॉली को सीधा करके सोफे पर लिटाया और उसके पैर की तरफ आकर उसके पैर को सहलाती हुए बोली- हाँ.. लगता तो ऐसा ही है..
मैंने चेतन से कहा- आप डॉली के बेडरूम में जाकर मूव तो उठा लायें.. ताकि मैं इसके पैर की थोड़ी सी मालिश कर सकूँ।
मेरी बात सुन कर चेतन फ़ौरन ही कमरे में चला गया और मैं आहिस्ता-आहिस्ता उसके पैर को सहलाती रही। अभी भी डॉली दर्द के मारे कराह रही थी।
चंद लम्हों के बाद ही चेतन वापिस आया और उसने मूव मुझे दी। मैंने थोड़ी सी ट्यूब से मलहम निकाली और उसे डॉली के पैर के ऊपर मलने लगी।
फिर मैंने चेतन से कहा- जरा रसोई में जा कर रबर की बोतल में पानी गरम करके ले आओ.. ताकि थोड़ी सी सिकाई भी की जा सके।
चेतन भी अपनी बहन के पैर में मोच आने की वजह से बहुत ही परेशान था। इसलिए फ़ौरन ही रसोई में चला गया।
डॉली के पैर के ऊपर मूव लगाने के बाद मैंने उसकी सलवार को थोड़ा ऊपर घुटनों की तरफ से उठाया.. ताकि उसकी टांग के निचले हिस्से पर भी मूव लगा दूँ।
डॉली ने उस वक़्त एक बहुत ही लूज और खुली पाएचों वाली सलवार पहनी हुई थी और शायद यही वजह थी कि वो रसोई में इसके पाएंचे से उलझ कर गिर गई थी।
जैसे ही मैंने डॉली की सलवार को उसकी घुटनों तक ऊपर उठाया तो डॉली की गोरी-गोरी टाँगें मेरी आंखों के सामने नंगी हो गईं।
उफफ्फ़.. डॉली की टाँगें कितनी गोरी और मुलायम थीं.. जैसे ही मैंने उसकी नंगी टाँग को छुआ.. तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैंने मक्खन में हाथ डाल दिया हो.. मैं उसकी टांग की मालिश का भूल कर आहिस्ता-आहिस्ता उसकी टाँग को सहलाने लगी।
धीरे-धीरे अपना हाथ उसकी नंगी टाँग पर फेरने लगी। कभी पहले ऐसा नहीं हुआ था.. लेकिन आज मुझे एक अलग ही मज़ा आ रहा था। मुझे उसकी मखमली टाँग को सहलाने का मौका जो मिल गया था।
फिर मैंने अपने ख्यालों को झटका और उसकी टाँग पर मूव लगाने लगी।
थोड़ी ही देर में चेतन गरम पानी की रबर की बोतल ले आया और मेज पर रख दी।
अब वो दूसरी सोफे पर बैठ कर दोबारा से टीवी देखने लगा.. डॉली की टाँग पर मूव लगाते हुए अचानक ही मेरी नज़र चेतन की तरफ गई.. तो हैरानी से जैसे मेरी आँखें फट सी गईं। मैंने देखा कि चेतन की नजरें टीवी की बजाय अपनी सग़ी बहन की नंगी टाँगों को देख रही हैं।
मुझे इस बात पर बहुत ही हैरत हुई कि चेतन कैसे अपनी छोटी बहन की नंगी टाँग को ऐसे देख सकता है।
उसकी आँखों में जो हवस थी.. वो मैं अच्छी तरह से पहचान सकती थी.. आख़िर मैं उसकी बीवी थी।
यह देख कर एक लम्हे के लिए तो मेरे हाथ डॉली की टाँग पर रुक से गए.. लेकिन मुझमें हिम्मत ना हुई कि मैं अपने पति से नजरें मिलाऊँ या उसको रोकूँ या टोकूँ.. मैंने अपनी नजरें वापिस डॉली की टाँग पर जमा दीं और आहिस्ता-आहिस्ता मूव मलने लगी।
डॉली को किसी बात का होश नहीं था.. वो तो बस अपनी आँखें बंद किए हुए पड़ी हुई थी। डॉली की नंगी गोरी टाँग को सहलाते सहलाते मेरे दिमाग में एक शैतानी ख्याल आया.. कि क्यों ना मैं इसकी टाँग को थोड़ा और एक्सपोज़ करूँ और देखूँ कि तब भी चेतन अपनी बहन की गोरी टाँगों को नंगा देखता रहता है या नहीं..
यही सोच कर मैंने आहिस्ता से डॉली की सलवार उसके घुटनों के ऊपर सरका दी.. और अब उसकी खुली पायेंचे वाली सलवार उसके घुटनों से ऊपर आ गई थी.. जिसकी वजह से डॉली का घुटना और उसकी जाँघ का थोड़ा सा निचला हिस्सा भी नंगा हो गया था।
मैंने उसके घुटनों पर भी आहिस्ता-आहिस्ता मूव लगानी शुरू कर दी और मसाज करती हुई.. मैंने तिरछी नज़र से अपने पति की तरफ देखा.. तो पता चला कि अब भी वो चोर नज़रों से अपनी बहन की नंगी टाँग की ओर देख रहे थे।
मैं दिल ही दिल में मुस्करा दी।
>कितनी अजीब बात थी कि एक भाई भी अपनी सग़ी छोटी बहन की नंगी टाँग को ऐसी प्यासी नज़रों से देख रहा था.. जैसे कि वो उसकी बहन ना हो.. बल्कि कोई गैर लड़की हो!
मुझे इस गंदे खेल में अजीब सा मज़ा आ रहा था और मैं इसलिए इस मसाज को एक्सटेंड करती जा रही थी.. ताकि चेतन ज्यादा से ज्यादा अपनी बहन के जिस्म से अपनी आँखों को सेंक सके।
अब मेरे दिमाग में एक और शैतानी ख्याल आया। जिससे मैं चेतन को और भी क़रीब से उसकी बहन की नंगी मुलायम टाँगें दिखा सकती थी। मैंने अपने पास ही सोफे पर रखी हुई मूव नीचे फर्श पर गिरा दी। थोड़ी देर के बाद मैंने चेतन को आवाज़ दी- सुनो.. जरा मुझे मूव नीचे से उठा कर दें..
मैंने यह बात बिना चेतन की तरफ देखते हुए कही.. और वो ऐसे चौंका जैसे किसी ख्वाब से जगा हो..
फिर वो हमारी तरफ बढ़ा। इतनी देर में मैंने डॉली की दूसरी टाँग भी नंगी कर दी थी और उसको भी मैं मजे से सहला रही थी। डॉली को जैसे अब दर्द से कुछ सुकून मिल रहा था.. जिसकी वजह से वो आँखें मूंदे लेटी हुई थी।
चेतन मेरे क़रीब आया और नीचे फर्श पर से मूव उठा कर मेरी तरफ बढ़ाई लेकिन मैंने अपनी स्कीम की मुताबिक़ बिना उसकी तरफ देखते हुए कहा- थोड़ी सी यहाँ पर लगा दो..
मैंने डॉली की दूसरी टांग की तरफ इशारा करते हुए उससे कहा.. दिल ही दिल में मैं मुस्करा रही थी और देखना चाहती थी कि अपनी बहन की नंगी टाँग के इतने क़रीब होते वक्त चेतन का क्या रिएक्शन होता है।
दूसरी तरफ मासूम डॉली आँखें बंद करके चुपचाप लेटी हुई थी… उसे नहीं अंदाज़ा था कि उसकी भाभी क्या गेम खेल रही है और उसका अपना सगा बड़ा भाई किस नज़र से उसके नंगे जिस्म को देख रहा है..
आहिस्ता से चेतन ने हाथ बढ़ाया और डॉली की एक नंगी टाँग के ऊपर से हाथ गुज़ार कर दूसरी तरफ वाली टाँग पर मूव लगाने लगा। मेरी नज़र उसके हाथ पर ही थी.. जिसमें मुझे हल्की-हल्की कंपकंपाहट महसूस हो रही थी।
दूसरी टाँग की तरफ हाथ ले जाते हुए उसका हाथ डॉली की पहली टाँग को टच करने लगा। मैंने आहिस्ता से उसकी चेहरे की तरफ देखा.. तो उसका चेहरा लाल हो रहा था और नजरें तो जैसे अपनी बहन की मखमली गोरी-गोरी नंगी टाँगों से चिपकी ही पड़ी थीं।
मूव लगा कर चेतन ने हाथ पीछे हटाया और मूव को टेबल पर रख कर वापिस दूसरे सोफे पर जा कर बैठ गया और टीवी देखने की एक्टिंग करने लगा। जबकी उसकी नज़र अब भी चोरी-छिपे डॉली की नंगी टाँगों को ही देख रही थीं।
थोड़ी देर चुप रहने की बाद चेतन बोला- आख़िर तुमको हुआ क्या था.. जो नीचे ऐसी गिर पड़ीं?
डॉली बोली- भैया वो मेरा पैर पायेंचे में फँस गया.. तो गिर गई..
मुझे तो जैसे मौका ही मिल गया.. मैंने फ़ौरन ही कहा- गिरना ही पड़ेगा ना तुमको.. जो इतने पुरानी फैशन की खुले-खुले पायंचों वाली सलवारें पहनती हो। मैंने कितनी बार कहा है कि माहौल और फैशन के मुताबिक़ ड्रेसिंग किया करो।
मैंने उसे प्यार से डाँटते हुए कहा।
चेतन भी बोला- हाँ.. ठीक ही तो कह रही है तुम्हारी भाभी.. वैसे यह तुम्हारा ही काम है ना.. कि तुम इसे समझाओ कि शहर में कैसे रहना होता है..
मैं- मेरे पर क्यों गुस्सा होते हो.. पूछ लो इससे.. कितनी बार कहा है इसे.. कि मेरी तरह की ड्रेसिंग किया करो.. लेकिन यह नहीं मानती है.. यह तुमसे डरती है.. कि पता नहीं भैया बुरा न मान जाएं।
चेतन- लो.. इसमें मेरे बुरा मानने वाली कौन सी बात है.. आख़िर वक़्त कि मुताबिक़.. एक हद में रह कर.. तो चलना ही होता है ना..
मैं- यही तो मैं इसको समझाती हूँ कि देखो मैं भी तो लेटेस्ट कपड़े पहनती हूँ ना.. तो क्या कभी तुम्हारी भाई ने मुझे रोका है.. या कभी बाहर कुछ ऐसा-वैसा हुआ है.. जो तुम डरती हो?
डॉली शरमाते हुए बोली- अच्छा भाभी अब बस भी करो न.. क्यों भैया के सामने मेरी वाट लगाने में लगी हुई हैं।
डॉली की इस बात पर मैं और चेतन दोनों हँसने लगे। मैं महसूस कर चुकी थी कि चेतन को अपनी सग़ी बहन की नंगी टाँगों को देख कर बहुत अच्छा लगा था।
मैं सोच रही थी कि अगर डॉली भी मेरे जैसे ही कपड़े पहने.. तो चेतन की तो फट ही जाएगी और फिर मैं देखूँगी कि अपनी बहन पर नज़र डालने से कैसे वो खुद को रोकता है। मेरे दिल में सिर्फ़ और सिर्फ़ शरारत थी कि मैं एक भाई को उसकी बहन की जरिए से टीज़ करूँ और देखूँ कि आख़िर एक भाई कितना ज़ब्त कर सकता है.. या अपनी बहन कि जिस्म को किस हद तक देख सकता है।
कुछ दिन की लिए डॉली को अपनी कॉलेज से छुट्टी करनी पड़ी और इन दिनों वो घर पर ही रहती थी।
मैं उसकी रोज़ाना मूव लगा कर मालिश करती थी.. लेकिन हमेशा ही मेरी यही कोशिश होती थी कि मैं उसकी टाँगों की मालिश उसके भाई के सामने ही करूँ.. ताकि उसे अपनी बहन के जिस्म से आँखें सेंकने का मौका मिल सके। उधर चेतन का भी यही हाल था कि जब भी मैं डॉली को क्रीम लगाती.. तो वो आस-पास ही भटकता रहता था।
इसी दौरान मैंने डॉली को एक जीन्स लाकर दी और उसने बहुत ही शरमाते हुए एक लोंग शर्ट के साथ पहनी।
मैंने भी उसको टी-शर्ट पहनने पर जोर नहीं दिया कि चलो शुरू तो कराया.. तो एक दिन इसको सेक्सी कपड़े भी पहना दूँगी।
जब चेतन जॉब से वापिस आया तो डॉली उस जीन्स में बाहर ही नहीं आ रही थी। बड़ी मुश्किल से वो बाहर आई तो उसका चेहरा शर्म से सुर्ख हो रहा था और वो नजरें ऊपर नहीं कर पा रही थी।
हालांकि उसकी शर्ट ने उसकी पूरी जीन्स को छुपाया हुआ था और उसकी जीन्स सिर्फ़ घुटनों से नीचे से ही नज़र आ रही थी।
वो बाहर आई तो वो अपनी कमीज़ को अपने जिस्म के साथ चिपका रही थी और नीचे को खींच रही थी.. जैसे कि अपनी जीन्स को छुपाना चाहती हो।
चेतन ने उसे देखा तो पहली तो हैरान हुआ और फिर जोर-जोर से हँसने लगा.. जिसे देख कर मैं भी हँसने लगी।
उधर डॉली का और भी बुरा हाल हो गया.. शर्म से उसका चेहरा रोने वाला हो रहा था।
मैं- देख लो चेतन.. आज बड़ी मुश्किल से तुम्हारी इस चहेती बैकवर्ड माइंडेड बहन को जीन्स पहनाई है और इसकी तो शरम ही नहीं जा रही है.. देखो तो सही क्या कोई खराबी है इसमें.. जो इसने पहनी हुई है?
चेतन ने डॉली की तरफ ऊपर से नीचे तक देखा और बोला- नहीं यार.. बिल्कुल परफेक्ट है। डॉली तुम तो ऐसे ही घबरा रही हो.. अरे अनीता तुमने इसे कोई शर्ट ले कर नहीं दी क्या?
मैं- यार.. मैंने इसके लिए वो भी ले देनी थी.. लेकिन इसने साफ़-साफ़ इन्कार कर दिया कि मैं टी-शर्ट नहीं पहनूंगी… इसलिए मैं नहीं ले कर आई।
चेतन- चलो फिर किसी दिन ला देना… जस्ट रिलेक्स करो डॉली.. क्यों परेशान हो रही हो.. यह तो आजकल सब लड़कियाँ कॉलेज में और बाहर भी पहनती हैं।
फिर हम सबने खाना खाया और अपने-अपने कमरों में आ गए।
धीरे-धीरे डॉली को जीन्स की आदत होने लगी और वो फ्रीली घर में जीन्स पहनने लगी.. लेकिन अभी भी उसने कभी भी टी-शर्ट नहीं पहनी थी।
अब मेरा अगला कदम उसको लेगिंग पहनाने का था.. जिसमें उसके जिस्म के निचले हिस्से की पूरी गोलाइयाँ उसके भाई की नज़रों के सामने आ जातीं।
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काफ़ी बार मैंने उससे कहा.. लेकिन वो शर्मा जाती थी और मेरी बात मानने को तैयार नहीं होती थी।
एक रोज़ मैं और डॉली दोनों घर पर अकेले थे। चेतन के जाने के बाद जब हम काम से फारिग हुए.. तो मेरे दिमाग में एक ख्याल आया। मैंने अपनी एक ब्लैक कलर की लेगिंग निकाली और डॉली को अपने कमरे में बुलाया।
वो आई तो मैंने उससे कहा- डॉली देखो इस वक़्त तो तुम्हारे भैया भी घर पर नहीं हैं.. तो तुम एक बार मुझे यह लेगिंग पहन कर तो दिखाओ।
डॉली शरम से सुर्ख हो गई और इन्कार करने लगी.. लेकिन मैंने भी आज.. उसकी बात ना मानने का पक्का इरादा कर लिया हुआ था।
जब मैं उससे इसरार करती रही तो फिर वो मानी और मेरी ब्लैक लेगिंग लेकर बाथरूम में चली गई।
कुछ देर के बाद डॉली अपनी सलवार उतार कर मेरी वाली ब्लैक टाइट लेगिंग पहन कर बाथरूम से बाहर आई और बाथरूम के दरवाजे के पास ही खड़ी हो गई।
उस देख कर मेरी आँखें चमक उठीं.. वो टाइट ब्लैक लेगिंग डॉली की खूबसूरत और सुडौल टाँगों पर बेहद प्यारी और सेक्सी लग रही थी।
उसकी टाँगों का हर एक कर्व उसमें बहुत ही प्यारा और अट्रॅक्टिव लग रहा था। डॉली मुझसे दूर अपनी नजरें झुका कर खड़ी हुई थी और उसके चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कान थी।
मैंने उसे अपने पास आने को कहा.. वो आहिस्ता-आहिस्ता चलती हुई मेरी पास आई.. तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपने पास बिस्तर पर बैठा लिया।
ऊपर से उसने अभी भी अपनी लंबी सी कमीज़ पहनी हुई थी। मैंने अपने पास बैठा कर अपना हाथ उसकी टाँग के ऊपर रखा और आहिस्ता-आहिस्ता सहलाने लगी और बोली- देखो इस लेगिंग में तुम कितनी खूबसूरत लग रही हो।
डॉली शर्मा कर बोली- लेकिन भाभी इस लेग्गी में तो पूरे का पूरा जिस्म जैसे नंगा ही लग रहा है।
मैं मुस्करा कर बोली- अरे पगली ऐसा क्यों सोचती हो तुम.. यह तो बन्दी की खुद महसूस करने की बात है ना.. अब मुझे देखो.. मैं तो यह पहन कर बाहर भी चली जाती हूँ और तुम्हारे भैया कोई ऐतराज़ भी नहीं करते हैं।
डॉली मेरी तरफ देख कर शरमाती हुई बोली- भाभी आपने तो हद ही की है.. भला इतनी खुले गले के कपड़े भी कोई पहनता है क्या?
डॉली ने मेरे डीप और लो-नेक गले की तरफ इशारा करते हुए कहा.. जिसमें से मेरी चूचियों का ऊपरी हिस्सा और क्लीवेज साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था।
मैंने मुस्करा कर अपनी गले की तरफ देखा और अपना हाथ डॉली की टाँग पर ऊपर की तरफ.. जो उसकी टाइट लेग्गी में साफ़ नज़र आ रही थी.. पर ले जाते हुए बोली- अरे यह सब तेरे भैया की ही फरमाइश तो है.. वो ही मुझे घर में ऐसी सेक्सी हालत में ही देखना चाहते हैं.. तो फिर मैं क्या कर सकती हूँ।
मेरी बात पर डॉली हँसने लगी।
डॉली- भाभी क्या आपको ऐसे कपड़ों में कुछ गलत फील नहीं होता क्या.. या कोई परेशानी तो नहीं होती.. जब बाहर लोग आपको देखते हैं तब?
मैं मुस्कुराई और बोली- अरे बस शुरू-शुरू में होता था.. लेकिन अब मैं आदी हो गई हूँ। अब तो हर लड़की ही ऐसा ही ड्रेस पहनती है.. फैशन ही इस चीज़ का है.. तो अब क्या कर सकते हैं.. अगर फैशन के साथ ना चली.. तो ‘पेण्डू’ ही लगूँगी ना.. इसलिए अब मुझे दूसरों की गंदी नजरें भी बुरी नहीं लगतीं.. बल्कि सच पूछो तो मुझे मज़ा भी आता है.. जब कोई मेरे जिस्म को ऐसी नजरों से देख रहा हो.. पता है इससे औरत को संतुष्टि होती है कि उसका जिस्म इतना अट्रॅक्टिव है कि वो मर्दों की नज़रों को अपनी तरफ खींच सकी।
डॉली मेरी बातें हैरान होकर सुन रही थी लेकिन आज उसका दिमाग कुछ-कुछ.. जैसे मेरी बातों को समझ भी रहा था।
मैंने उसे तसल्ली से समझाया- देख तू मेरी बहन की तरह है.. तो मुझे ही तेरा ख्याल रखना है ना.. कि तू वक़्त के साथ-साथ चले.. ताकि कल को तेरा भी किसी अच्छी जगह पर रिश्ता हो जाए और तू अपने पति के साथ अपनी ज़िंदगी एंजाय कर सके। अरे यह जो थोड़ा बहुत जिस्म को शो करना होता है ना.. यह तो बस ऐसे ही है और अब तो एक रुटीन ही बन गया है.. इस बात को कोई भी माइंड नहीं करता।
डॉली- लेकिन भाभी वो भैया?
मैं- तू क्या समझती है कि यह जो लड़कियाँ बाहर इतनी टाइट जीन्स और लेग्गी पहन कर फिरती हैं.. तो क्या उनके घर में उनके बाप या भाई नहीं होते क्या? अरे पगली सब ही होते हैं.. लेकिन वो लोग अब इस चीज़ को माइंड नहीं करते और वक़्त कि मुताबिक़ चलते हैं.. ऐसे ही तू भी बस अपने भाई से डरती रहती है.. मैं तुमको यकीन दिलाती हूँ कि वो कुछ नहीं कहेंगे तुझे. और अगर कोई ऐसी-वैसी बात की.. तो मैं खुद उनको सम्भाल लूँगी.. और फिर अपना घर तो इस सबकी प्रैक्टिस करने के लिए सबसे अच्छी जगह है..
डॉली शायद मेरी बात समझ गई थी.. मैंने उससे कहा- अभी आज तू मेरी वाली यही लेग्गी पहन ले.. फिर मैं तुझे तेरी साइज़ की और भी प्यारी प्यारी सी नई ला दूँगी।
डॉली शर्मा गई लेकिन कुछ बोली नहीं। फिर मैं उसे लेकर रसोई में आ गई और हम लोग खाना तैयार करने लगे.. क्योंकि चेतन के आने का टाइम भी हो रहा था। काम करते हुए डॉली थोड़ा घबरा भी रही थी.. एक-दो बार उसने मुझसे कहा भी कि भाभी मैं चेंज करना चाहती हूँ.. लेकिन मैंने बड़ी मुश्किल से उसे मना ही लिया कि वो आज अपने भाई के सामने भी यह लेग्गी पहनेगी।
जैसे ही डोर पर चेतन की बेल बजी.. तो डॉली ने मुझसे कहा- जाओ दरवाज़ा आप ही खोलो।
खुद वो रसोई मैं ही रुक गई। मैंने मुस्करा कर उसे देखा और फिर दरवाजा खोलने बाहर आ गई। मैंने दरवाज़ा खोल कर जैसे ही चेतन अपनी बाइक पार्क कर रहा था.. तो मैंने उसे बताया।
मैं- चेतन.. देखो आज डॉली ने बहुत मुश्किल से हिम्मत करके लेग्गी पहनी है.. तुम से बहुत डर रही थी.. बस तुम को उसकी तरफ कोई तवज्जो नहीं देनी और ना ही उससे कुछ कहना.. ना कोई कमेंट देना है.. और उसकी तरफ ऐसे ही नॉर्मल रहना है.. जैसे कि रोज़ उससे व्यवहार करते हो.. ताकि वो थोड़ी सामान्य हो जाए और आहिस्ता-आहिस्ता इस नई ड्रेसिंग की आदी हो सके। अगर तुमने कोई ऐसी-वैसी बात की.. तो फिर वो दोबारा से अपनी पहली वाली जिंदगी में चली जाएगी।
मुझे पता था कि चेतन के लिए अपनी बहन की टाँगों को टाइट लेगिंग में देखने से खुद को रोकना बहुत मुश्किल हो जाएगा.. लेकिन मैं तो खुद ही उसे थोड़ा और तड़पाना चाहती थी और दूसरी बात यह भी है कि सच में मैं डॉली को थोड़ा कंफर्टबल भी करना चाहती थी ताकि आइन्दा भी उसे ऐसे और इससे भी थोड़ा ज्यादा ओपन कपड़े पहनने में आसानी हो सके।
बहरहाल चेतन ने मेरी बात मान ली और बोला- अच्छा ठीक है।
अन्दर आ कर चेतन ने अपने कमरे में जाकर चेंज किया। फिर वो फ्रेश होकर वापिस आया और लंच करने कि लिए बैठ गया।
मैं रसोई में गई और कुछ बर्तन ले आई और फिर डॉली को भी खाना लेकर आने का कहा। मैं चेतन के पास बैठ गई और डॉली का वेट करने लगी।
थोड़ी देर के बाद डॉली खाने की ट्रे लेकर आई.. तो उसका चेहरा शर्म से सुर्ख हो रहा था.. लेकिन जैसे ही वो बाहर आई तो चेतन ने उसकी तरफ से अपनी नज़र हटा लीं और अख़बार देखने लगा।
फिर डॉली ने खाना टेबल पर रखा और मेरे साथ ही बैठ गई। हम तीनों ने हमेशा की तरह खाना खाना शुरू कर दिया और इधर-उधर की बातें करने लगे।
चेतन डॉली से उसकी पढ़ाई और कॉलेज की बातें करने लगा।
आहिस्ता-आहिस्ता डॉली भी नॉर्मल होने लगी। उसके चेहरे पर जो परेशानी थी.. वो खत्म होने लगी और वो काफ़ी रिलेक्स हो गई.. क्योंकि उसे अहसास हो गया था कि उसका भाई उससे कुछ नहीं कह रहा है।
सब कुछ वैसा ही हो रहा था.. जैसे कि यह सब एक रुटीन में ही हो।
खाने के दौरान मैंने एक-दो बार डॉली को पानी और कुछ और लाने के लिए रसोई में भी भेजा.. ताकि चेतन का रिस्पॉन्स देख सकूँ और वो भी अपनी बहन को पहली बार चुस्त लेग्गी में देख सके।
हुआ भी ऐसा ही कि जैसे ही डॉली उठ कर गई.. तो फ़ौरन ही चेतन की नजरें उसकी तरफ चली गईं और वो अपनी बहन की लेग्गी में नज़र आती हुई टाँगों को देखने लगा।
मैं दिल ही दिल में मुस्कुराई और बोली- अच्छी लग रही है ना.. इस पर लेग्गी.. यह तो मैंने उसे अभी अपनी पहनाई है.. अब एक-आध दिन में मैं उसे उसकी साइज़ की ही ला दूँगी।
चेतन थोड़ा सा चौंका और बोला- हाँ ला देना उसे भी..
वो ज़ाहिर यह कर रहा था कि उसे इसमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है कि उसकी बहन ने क्या पहना हुआ है.. लेकिन मैं जानती थी कि उसे भी अपनी बहन को ऐसी ड्रेस में देखने का कितना शौक़ है।
मैंने सारी बातें अपनी और चेतन की कल्पनाओं में ही रहने दीं और खाना खाने लगी.. तभी डॉली भी वापिस आ गई।
खाना खाकर मैं और चेतन अपने कमरे में आ गए और डॉली अपने कमरे में चली गई।
शाम को हम कमरे से बाहर आए तो डॉली चाय बना चुकी हुई थी। वो चाय ले आई और हम लोग टीवी देखते हुए चाय पीने लगे। एक चीज़ देख कर मुझे खुशी हुई कि डॉली ने लेग्गी चेंज नहीं की थी और अभी भी उसी लेग्गी में थी। शायद अब वो कंफर्टबल हो गई थी कि इस ड्रेस को पहनने में भी कोई मसला नहीं है।
जब वो टीवी देख रही थी तो उसकी शर्ट भी बेख़याली में उसकी जाँघों तक आ गई थी और मैं नोट कर रही थी कि चेतन की नज़र भी बार-बार उसकी लेग्गी की तरफ ही जा रही थी.. और वो उसकी टाँगों और जाँघों को देखता जाता था।
मैं दिल ही दिल में मुस्करा रही थी कि कैसे एक भाई अपनी बहन के जिस्म को ताक रहा है और इस चीज़ को देख कर मेरे अन्दर एक अजीब सी लज़्ज़त की लहरें दौड़ रही थीं।
मैं इस चीज़ को इसी तरह आहिस्ता-आहिस्ता और भी आगे बढ़ाना चाहती थी। मैं देखना चाहती थी कि एक मर्द की लस्ट और हवस दूसरी औरतों की लिए तो होती ही है.. तो अपनी सग़ी बहन के लिए किस हद तक जा सकती है।
कुछ दिन में डॉली अब घर में लेग्गी और जीन्स पहनने की आदी हो गई और बहुत रिलेक्स होकर घर में डोलती फिरती थी। उसके भाई चेतन की तो मजे हो गए थे.. वो अपनी बहन और मुझसे नज़र बचा कर वो डॉली की स्मार्ट टाँगों को देखता रहता था।
मैंने डॉली को 3-4 लैगीज उसकी साइज़ की ला दी थीं.. जिनमें से एक स्किन कलर की थी.. एक ब्लैक एक रेड और एक वाइट थी।
जब डॉली ने अपनी साइज़ की लेग्गी पहनी.. तो वो उस कि जिस्म पर और भी फिट आई और उसमें वो और भी सेक्सी लग रही थी। लेकिन मैंने उसे कुछ भी अहसास नहीं होने दिया। पहले दिन के बाद से अब तक कभी भी मैंने चेतन से दोबारा इस टॉपिक पर बात नहीं की थी और ना ही उसने कोई बात की.. बस वो छुप कर सब कुछ देखता रहता और अपनी बहन के जिस्म के नज़ारे एंजाय करता था।
एक रोज़ मैंने डॉली को अपनी एक टी-शर्ट निकाल कर दी कि इसे पहन लो। बहुत इसरार करने की बाद जब उसने वो शर्ट पहनी.. तो वो उसको जरा ढीली थी और उसके चूतड़ों को भी कवर कर रही थी। लेकिन उससे नीचे उसकी जाँघों को बिल्कुल भी नहीं ढक रही थी।
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उसने मेरे कहने पर नीचे लेग्गी पहन ली, उसकी चुस्त लैगी में फंसे हुए उसके चूतड़ों को तो मेरी शर्ट ने कवर कर लिया थी.. लेकिन उससे नीचे उसकी जाँघों और टाँगें और भी सेक्सी और अट्रॅक्टिव लग रही थीं।
उसे देख कर मैंने उसकी तारीफ की और कहा- डॉली अब तुमको मैं तुम्हारी साइज़ की फिटिंग वाली टी-शर्ट लाकर दूँगी.. फिर मेरी ननद रानी और भी प्यारी लगेगी।
मैंने जानबूझ कर सेक्सी की बजाय प्यारी का लफ्ज़ इस्तेमाल किया था.. ताकि उसे बुरा ना लगे और मेरी बुलबुल मेरे हाथों से ना निकल जाए।
आज मेरी टी-शर्ट पहन कर उसने अपने भाई का भी जिक्र नहीं किया था.. क्योंकि उसे भी अब पता चल गया था कि उसके भैया भी उसकी ड्रेसिंग पर कोई ऐतराज़ नहीं करते हैं। इसी सोच कि चलते आज उसने लेग्गी के साथ टी-शर्ट पहन कर एक काफ़ी बोल्ड क़दम उठा लिया था।
जब चेतन घर आया.. तो आज जब उसने अपनी बहन को देखा.. तो उसका मुँह खुला का खुला ही रह गया।
जब वो रसोई में काम करती हुई अपनी बहन को देख रहा था.. मैं बेडरूम से छुप कर देखते हुए उसके चेहरे के भावों को देख रही थी।
कुछ देर तक तो वो ऐसे ही चुपचाप देखता रहा.. फिर अचानक ही इधर-उधर मुझे देखने लगा.. जैसे कि उसे पकड़े जाने का डर हो।
मैंने खुद को पीछे हटा लिया ताकि उसे अपने गलती का अहसास या शर्मिंदगी ना हो।
खाने के दौरान भी डॉली थोड़ी सी अनकंफर्टबल थी.. लेकिन चेतन भी चुप-चुप सा था और चोरी-चोरी डॉली की टाँगों की तरफ ही देख रहा था।
शाम को जब हम लोग टीवी देख रहे थे.. तो भी चेतन की नजरें अपनी बहन के जिस्म के निचले हिस्से पर ही भटक रही थीं.. क्योंकि आज उसके जिस्म का पहले से ज्यादा हिस्सा नज़र आ रहा था और उसी से अंदाज़ा हो रहा था कि उसकी बहन की जाँघों की शेप कितनी प्यारी है।
चेतन अपनी बहन के जिस्म को देख कर मजे ले रहा था और मैं चेतन की हालत को देख कर एंजाय कर रही थी।
मैं इस अलग किस्म की हवस का नज़ारा कर रही थी।
अब तो जब भी चेतन इस तरह अपनी बहन के जिस्म को देख रहा होता था.. तो मेरे अन्दर भी तड़फ और गर्मी सी पैदा होने लगती थी।
चेतन की नज़र अपनी बहन के जिस्म पर होती थीं.. लेकिन गीलापन मेरी चूत कि अन्दर होने लगता था।
अब मैंने डॉली को नए सलवार कमीज़ भी सिलवा कर दिए। उसकी शर्ट्स अब लेटेस्ट फैशन की मुताबिक़ थीं.. जो कि शॉर्ट लेंग्थ और बहुत ही टाइट सिली हुई थीं।
उसके सीने की उभारों पर बहुत टाइट फिटिंग थीं.. जिसकी वजह से उसकी चूचियां बहुत ज्यादा उभर गई थीं।
कमर पर पीछे ज़िप होने की वजह से उसकी शर्ट उसके जिस्म पर बहुत ही फँस कर आती थी. और शर्ट की लम्बाई भी सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी हाफ जाँघों तक होती थी।
मैंने उसकी रुटीन से हट कर उसके गले को भी थोड़ा डीप और लो नेक करवा दिया था। गला ज्यादा डीप नहीं था.. लेकिन उसका खूबसूरत गोरा-गोरा सीना नंगा नज़र आता था.. लेकिन क्लीवेज या चूचियां नज़र नहीं आती थीं।
ज़ाहिर है कि अभी वो इतनी बोल्ड नहीं हुई थी कि अपनी चूचियों को मेरी तरह से शो करती.. लेकिन यह बात ज़रूर थी कि जब वो झुकती थी.. तो अनायास ही उसकी चूचियां और क्लीवेज का कुछ हिस्सा ज़रूर नज़र आ सकता था।
मुझे तो नज़र आ भी जाता था।
अब अक्सर मैं उसे घर में टाइट कुरती और लेग्गी ही पहनाती थी.. जिसमें उसका जिस्म और भी खिल उठता था। उसका खूबसूरत और सुडौल जिस्म बहुत ज्यादा उभर कर आ जाता था। नीचे उसकी जाँघें और चूतड़ चिपकी हुई लेग्गी में मानो नंगे ही नज़र आ रहे होते और ऊपर से उसके कुरते में फंसे हुए उसके चूचे भी बहुत ही खूबसूरत लगते थे।
आहिस्ता-आहिस्ता मेरी तरह ही उसने भी घर में दुपट्टा लेना छोड़ दिया था। इस तरह की टाइट ड्रेस में अपनी बहन को देख कर तो चेतन की ईद हो जाती थी और उसकी नजरें अपनी बहन के जिस्म पर से हटती ही नहीं थीं।
मुझे महसूस होने लगा था कि आहिस्ता-आहिस्ता डॉली को भी पता चल रहा है कि उसका भाई उसके जिस्म को देखता है.. लेकिन कोई ऐतराज़ नहीं करता।
तो उसे भी काफ़ी हद तक रिलेक्स फील होता और वो भी कोई ऐतराज़ ना करती कि भाई देख रहा है तो क्यों देख रहा है।
मैंने यह भी महसूस किया था कि चेतन अपनी बहन के नीचे झुकने का मुंतजिर रहता था.. चाहे वो उसकी आगे को हों या पीछे से.. क्योंकि उसे इस तरह थोड़ी बहुत अपनी बहन की चूचियों की झलक भी नज़र आ जातीं थी।
एक रोज़ ऐसा हुआ कि कॉलेज से आकर डॉली ने एक सफ़ेद रंग की कुरती और स्किन कलर की लेगिंग पहन ली। चेतन अभी तक नहीं आया था..
मौसम भी कुछ खराब लग रहा था और इसलिए डॉली कॉलेज से खुद ही पहले ही आ गई थी।
मैंने चेतन को भी कॉल कर दी थी कि डॉली घर आ गई है.. तो वो भी आ जाएं।
तो चेतन आज ड्यूटी ऑफ करके सीधा ही घर आ गया।
डॉली ने जो सफ़ेद कुरती पहनी थी उसके नीचे उसने काली ब्रेजियर पहन ली थी।
गर्मी का मौसम होने की वजह से कुरती भी बहुत ही पतले कपड़े की थी.. लेकिन उसमें से जिस्म सीधे तौर पर नज़र नहीं आता था.. बस हल्की सी झलक ही दिखती थी कि नीचे का बदन कैसा गोरा है।
उसकी बैक और फ्रंट पर उसकी ब्लैक ब्रेजियर की स्ट्रेप्स भी हल्की-हल्की नज़र आती थीं। उसकी कुरती की लम्बाई भी ज्यादा नहीं थी.. हस्ब ए मामूल सिर्फ़ उसकी हाफ जाँघों तक ही थी। नीचे स्किन कलर की लेग्गी में उसकी खूबसूरत टांगें और जाँघें बहुत ही प्यारी लग रही थीं और सेक्सी भी..
अपना ड्रेस चेंज करके डॉली हस्ब ए मामूल मेरी साथ रसोई में आकर लग गई। अब मैं उससे ज्यादा ड्रेसिंग की बारे में बात नहीं करती थी.. ताकि वो ईज़ी फील करे और किसी प्रेशर या ज़बरदस्ती की वजह से कोई भी काम ना करे।
यही वजह थी कि कॉलेज के माहौल और मेरे सपोर्ट की वजह से वो काफ़ी हद तक खुल चुकी थी।
सुबह सबके जाने के बाद मैंने कपड़े धो कर बाहर बरामदे में सूखने के लिए लटका दिए थे। बारिश का मौसम हो रहा था.. मुझे ख्याल आया कि मैं कपड़े उतार लाऊँ.. कहीं और ना भीग जाएं।
जैसे ही मैं डॉली को बाहर से कपड़े उतार कर लाने का कहने लगी.. तो एकदम एक शैतानी ख्याल मेरे दिमाग में कूदा और मैं हौले से मुस्करा कर चुप होकर खामोश ही रह गई।
वो ही हुआ कि थोड़ी देर में बारिश शुरू हो गई.. लेकिन डॉली को नहीं पता था कि बाहर कपड़े सूखने के लिए लटक रहे हैं.. इसलिए उसे उनको उठाने का ख्याल नहीं था.. बारिश थी भी काफ़ी तेज.. थोड़ी देर में ही घंटी बजी.. तो मैंने फ़ौरन ही जा कर गेट खोला और चेतन अपनी बाइक समेत अन्दर आ गया। बारिश की वजह से चेतन पूरी तरह से भीग चुका था। उसकी जीन्स और शर्ट भीग चुकी थी।
वो बोला- आज तो बारिश ने भिगो ही दिया है।
मैं भी मुस्कराई और हम दोनों अन्दर आ गए।
चेतन ने अपनी शर्ट उतारी और एक तरफ रख दी और कुर्सी पर बैठ गया।
अब मैंने डॉली को आवाज़ दी- पानी लाओ अपने भैया के लिए।
वो फ़ौरन ही रसोई से पानी का गिलास भर कर ले आई।
जैसे ही चेतन की नज़र अपनी बहन की सेक्सी ड्रेस पर पड़ी.. तो एक लम्हे के लिए तो वो चकित ही हो गया.. लेकिन फिर उसने खुद को सम्भाला और फटाफट पानी का गिलास डॉली से पकड़ कर पीने लगा।
डॉली वापिस रसोई की तरफ बढ़ी.. तो पानी पीते हुए चेतन की नजरें अपनी बहन के मटकते चूतड़ों और जाँघों पर ही थीं।
मैं हौले-हौले मुस्करा रही थी।
जैसे ही डॉली रसोई में जाने लगी.. तो मैंने उसे आवाज़ दे कर रोका और कहा- डॉली मुझे याद आया.. मैंने तो कपड़े धोकर बाहर डाले हुए हैं.. जल्दी से जाओ और इनको उतार लाओ.. वर्ना सारे कि सारे भीग जाएंगे।
‘जी भाभी..’ कह कर डॉली बाहर सहन की तरफ चली गई और अब मैं अपनी स्कीम के मुताबिक़ हो रहे ड्रामे के अगले हिस्से की मुंतजिर थी।
बाहर तेज बारिश हो रही थी.. गर्मी कि इस मौसम में मेरी ननद डॉली अपनी पतली सी कुरती और लेग्गी पहने हुई बाहर से कपड़े उतार रही थी और उसका भाई अन्दर बैठा हुआ था और शायद वो भी मुंतजिर था कि अब उसके सामने क्या सीन आने वाला है।
क़रीब 5 मिनट बाद डॉली कमरे के अन्दर आई तो उफ्फ़.. क्या हॉट मंज़र था.. कपड़े तो वो उतार लाई थी.. लेकिन उसके अपने कपड़े पूरी तरह से भीग चुके थे, सफ़ेद रंग की पतली सी कुरती बिल्कुल भीग कर उसके गोरे-गोरे जिस्म से चिपक चुकी थी, उसका गोरा गोरा बदन कुरती के नीचे से बिल्कुल साफ़ नंगा नज़र आ रहा था, उसकी चूचियों पर पहनी हुई काली रंग की ब्रेजियर भी बिल्कुल साफ़ दिखने लगी थी।
वो ब्रेजियर उसकी चूचियों से चिपक कर ऐसे दिख रही थी.. मानो उसने वो काली ब्रेजियर अपनी शर्ट के ऊपर से ही पहनी हुई हो। उसकी लेग्गी भी थी तो मोटी जर्सी कपड़े की.. मगर वो भी भीग कर और भी उसकी मोटी जाँघों और टाँगों से चिपक चुकी हुई थी।
मेरी नजरें तो उसके जिस्म पर ही चिपक गई थीं।
वो मुड़ कर एक टेबल पर कपड़े रखने लगी.. उसकी कमर हमारी तरफ थी। उसकी कमर पर उसकी ब्रेजियर की स्ट्रेप और हुक बिल्कुल साफ़ नज़र आ रहा था और उसकी कमर भी कमीज़ में से भीगी हुई साफ़ दिख रही थी।
साफ़ पता चल रहा था कि उसका जिस्म किस क़दर गोरा-चिट्टा है।
डॉली को इस हालत में देख कर मेरी हालत ऐसी हो रही थी.. तो उसके अपने सगे भाई का हाल तो और भी पतला हो रहा था। उसकी नज़रें अपनी बहन के जिस्म पर से नहीं हट रही थीं और मैंने भी बिना उसको डिस्टर्ब किए.. उसे अपनी बहन के इस तरह नंगे हो रहे जिस्म का नज़ारा करने दिया।
जैसे ही डॉली कपड़े रख कर मुड़ी तो चेतन मेरी तरफ देखने लगा और बोला- यार मुझे कोई कपड़े दो पहनने के लिए..
मैंने महसूस किया कि उसकी आवाज़ काँप रही थी।
डॉली अपने कमरे की तरफ बढ़ी तो मैंने उससे पूछा- कहाँ जा रही हो?
वो बोली- भाभी मैं डॉली चेंज करके आती हूँ.. पूरे कपड़े भीग गए हैं..
लेकिन मैं उसको इतनी आसानी से जाने दे कर उसके भाई का मज़ा खराब नहीं करना चाहती थी, मुझे उसे इसी हालत में रोके रखना था और उसे रुकने पर मजबूर करना था।
मैंने एक शर्ट पकड़ी और उससे कहा- डॉली, तुम जल्दी से अपने भैया की यह शर्ट प्रेस कर दो.. मैं सालन देख लेती हूँ.. चूल्हे पर पड़ा है.. कब से नहीं देखा.. कहीं जल न जाए।
डॉली इन्कार करना चाहती थी.. लेकिन फिर अपनी आदत की चलते चुप ही रही। उसने एक नज़र अपने भैया पर डाली.. जो कि वहीं चेयर पर बैठा.. अब एक मैगजीन देख रहा था.. और फिर डॉली टीवी लाउंज के एक कोने में पड़े हुए इस्तती स्टैंड की तरफ बढ़ गई।
मैं रसोई में आ गई ताकि चेतन भी खुल कर अपनी बहन के जिस्म का दीदार कर सके।
जहाँ डॉली खड़ी होकर शर्ट प्रेस कर रही थी.. वहाँ पर उसकी पीठ चेतन की तरफ थी।
मैं छुप कर दोनों को देख सकती थी.. मैंने बाहर झाँका तो देखा कि चेतन की नज़रें अपनी बहन के जिस्म पर ही थीं और उसका एक हाथ अपने लंड को जीन्स के ऊपर से दबा रहा था।
मैं समझ गई कि अपनी बहन के जिस्म को इस हालत में देख कर वो अपने लंड को खड़ा होने से नहीं रोक पा रहा है।
मैं दिल ही दिल में मुस्करा दी..
इतने में चेतन उठा और एक पजामा उठा कर डॉली की तरफ बढ़ा। मैं समझ गई कि अब वो और क़रीब से अपनी बहन के जिस्म को देखना चाहता है।
पास जाकर उसने वो पजामा भी इस्तरी स्टैंड पर रखा और बोला- डॉली इसे भी प्रेस कर दो..
यह कहते हुए उसकी नजरें अपनी बहन की चूचियों पर थीं.. जो कि गीली सफ़ेद कुरती में काली ब्रेजियर में साफ़ नज़र आ रही थीं।
एक भरपूर नज़र डाल कर चेतन वापिस अपनी जगह पर आकर बैठ गया और जब तक डॉली कपड़े प्रेस करती रही.. वो उसके जिस्म को ही देखता रहा।
जैसे ही डॉली ने कपड़े प्रेस कर लिए तो अपने भाई से बोली- भाई, ले लें.. कपड़े प्रेस हो गए हैं..
अब मुझे पता था कि वो वापिस अपने कमरे में अपनी कपड़े बदलने के लिए जाएगी.. लेकिन मैं उसे रोकना चाहती थी इसलिए जैसे ही उसने अपने कमरे की तरफ क़दम बढ़ाए.. तो मैंने उसे आवाज़ दे दी- डॉली.. जरा इधर तो आओ रसोई में थोड़ी देर के लिए..
जैसा कि मुझे पता था कि वो मेरी बात को नहीं टालेगी.. वो ही हुआ.. डॉली सीधी उसी हालत में मेरे पास रसोई में आ गई।
मैंने उसे थोड़ा सा काम बताया तो वो बोली- भाभी मुझे चेंज कर आने दें..
मैंने उसके जिस्म की तरफ एक नज़र डाली और बहुत ही बेपरवाही से बोली- अरे अब क्या चेंज करना है.. कपड़े तो सूख ही चुके हैं.. अभी कुछ ही देर में पंखे के नीचे बिल्कुल ही खुश्क हो जाने हैं.. छोड़ो कपड़ों की फिकर.. तुम जल्दी से सलाद बना लो.. तो फिर हम लोग खाना खाते हैं.. पहले ही बहुत देर हो गई है..
डॉली भी थोड़ी सी बेफिकर होकर रसोई के काम में लग गई और मैं दिल ही दिल में अपनी कामयाबी पर मुस्करा दी कि मैं आज एक भाई को उसकी बहन का नंगा जिस्म थोड़ा सा छुपी हुई हालत में दिखाने में कामयाब हो गई हूँ।
मुझे हँसी तो चेतन पर आ रही थी कि कैसे अपनी बहन के नंगी हो रहे जिस्म को देख रहा था।
अब मुझे इस पर हैरत नहीं होती थी.. बल्कि खुशी होती थी और मज़ा भी आता था। मेरा तो बस नहीं चल रहा था कि मैं कब डॉली को उसके भाई के सामने बिल्कुल नंगी कर दूँ।
कुछ ही देर मैं हम सब लोग बैठे खाना खा रहे थे। डॉली के कपड़े सूख चुके थे.. लेकिन उसकी काली ब्रेजियर अभी भी गीली थी.. जिसकी वजह से वो अब भी साफ़ नज़र आ रही थी। अब डॉली को कोई फिकर नहीं थी.. उसे महसूस ही नहीं हो रहा था कि उसका अपना सगा भाई.. अपनी बीवी की मौजूदगी में भी.. उसकी नज़र बचा कर.. उसके जिस्म और उसकी ब्रेजियर और उसकी चूचियों को देख रहा है।
मेरी नज़रें तो चेतन की हर हरकत पर थीं कि कैसे खाना खाते हुए.. वो अपनी बहन की चूचियों को देख रहा है।
खाना खाने के बाद मुझे गरम लोहे पर एक और वार करने का ख्याल आया और मैंने अपने इस नए आइडिया पर फ़ौरन अमल करने का इरादा कर लिया।
बारिश रुक चुकी हुई थी और बाहर हल्की-हल्की हवा चल रही थी.. जिसके वजह से मौसम बहुत ही प्यारा हो रहा था, मैंने चेतन से कहा- आज मौसम बहुत अच्छा हो रहा है.. चलो मुझे और डॉली को बाहर घुमाने लेकर चलो।
मेरी बात सुन कर डॉली भी खुशी से उछल पड़ी और बोली- हाँ भैया.. भाभी ठीक कह रही हैं.. बाहर चलते हैं।
चेतन ने एक नज़र अपनी बहन की चूचियों पर डाली और फिर प्रोग्राम ओके कर दिया और बोला- बस तैयार हो जाओ.. फिर चलते हैं।
चेतन अपने कमरे में चला गया.. मैं और डॉली ने बर्तन समेट कर रसोई में रख कर काम ओके किया और बाहर आ गए।
मैं डॉली के साथ उसके कमरे में गई और उसे एक उसकी टाइट सी जीन्स और एक नई टी-शर्ट निकाल कर दी।
मैं बोली- आज तुम यह पहन कर चलोगी बाहर.. नहीं तो मैं तुमको लेकर भी ना जाऊँगी।
डॉली मेरी बात सुन कर मुस्कुराई और बोली- ठीक है भाभी.. जैसा आप कहो।
मैंने उसके गाल पर एक हल्का सा किस किया और बोली- शाबाश मेरी प्यारी ननद रानी..
फिर मैं अपने कमरे में आ गई।
मैंने भी जीन्स और कुरती पहन ली.. कुरती तो हाफ जाँघों तक ही थी और जीन्स भी टाइट थी।
चेतन भी तैयार हो चुका हुआ था।
हम दोनों तैयार होकर टीवी लाउंज में आ गए और मैं चाय बनाने लगी।
जैसे ही मैं चाय लेकर आई तो डॉली भी आ गई।
उसे देख कर तो मेरा और चेतन दोनों का मुँह खुला का खुला रह गया।
उसकी टाइट टी-शर्ट में उसकी खूबसूरत चूचियों बहुत ज्यादा गजब ढा रही थीं उसकी चूचियाँ बहुत ही सख़्त और अकड़ी हुई और जानदार शानदार लग रही थीं।
टी-शर्ट उसकी जीन्स की शुरुआत तक ही थी और नीचे टाइट जीन्स में डॉली की गाण्ड बहुत ज्यादा उभर रही थी।
उसकी जीन्स और टी-शर्ट उसके जिस्म पर बिल्कुल फंसे हुए थे.. लेकिन वो बहुत ही प्यारी लग रही थी।
हमने चाय पी और मैं बोली- चेतन आज तुम्हारी बहन को कोई नहीं कह सकता की यह पेण्डू है.. यह तो आज पूरी की पूरी शहरी लड़की लग रही है।
मेरी बात सुन कर डॉली शर्मा गई। फिर हम तीनों सैर के लिए घर से बाहर निकले और चेतन ने अपनी बाइक निकाल ली।
घर को लॉक करके जब चेतन ने बाइक स्टार्ट की.. तो मैंने उसके पीछे बैठने की बजाए अपने प्रोग्राम के मुताबिक़ डॉली को कहा कि वो अपने भाई के पीछे बैठे।
डॉली को अंदाज़ा नहीं था कि मैं क्या सोच रही हूँ.. इसलिए वो चुप करके चेतन के पीछे बाइक पर बैठ गई।
यह तो मुझे ही पता था ना कि अब डॉली का पूरा जिस्म अपने भाई के जिस्म से चिपक जाएगा और उसकी चूचियाँ पूरी तरह से चेतन की कमर से प्रेस हो जाना थीं और यही चीज़ मैं चाहती थी।
आज मैं पहली बार चेतन को उसकी बहन के बदन का और उसकी चूचियों का स्पर्श महसूस करवाना चाहती थी।
डॉली के बैठने के बाद मैं भी उछल कर बाइक पर पीछे बैठ गई और बैठते ही मैंने डॉली को थोड़ा सा और आगे की तरफ दबा दिया।
अब मैं और डॉली दोनों ही एक ही तरफ टाँगें करके बैठे हुई थीं और डॉली का पूरे का पूरा जिस्म का अगला हिस्सा यानि उसकी चूचियाँ अपने भाई की पीठ के साथ चिपकी हुई थीं।
डॉली ने अपना एक हाथ अपने भाई के कंधे पर रखा हुआ था और दूसरा एक साइड पर था। मैंने एक हाथ डॉली की तरफ से डाल कर अपने पति चेतन की जाँघ पर रख दिया हुआ था।
जैसे ही बाइक चली तो मैंने आहिस्ता-आहिस्ता चेतन की जाँघ को अपने हाथ से सहलाना शुरू कर दिया।
एक-दो बार चेतन ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख कर मुझे रोकने की कोशिश की.. लेकिन मेरा हाथ नहीं रुका और मैंने आहिस्ता-आहिस्ता अपना हाथ चेतन की पैन्ट के ऊपर से उसके लण्ड पर रख दिया। मुझे फील हुआ कि उसका लंड थोड़ा-थोड़ा अकड़ा हुआ है।
ज़ाहिर है कि अपनी बहन की सॉलिड चूचियों का टच अपनी पीठ पर फील करके वो कैसे बेखबर रह सकता था।
मैंने भी अब आहिस्ता-आहिस्ता उसके लण्ड पर उसकी पैन्ट के ऊपर से हाथ फेरना शुरू कर दिया.. जिससे उसका लंड और भी सख़्त होने लगा।
एक बार तो उसने मेरा हाथ अपने लंड पर अपनी हाथ के साथ भींच ही दिया। मेरी इन तमाम हरकतों से डॉली बिल्कुल बेख़बर थी और पूरी तरह से बाइक की सैर और मौसम को एंजाय कर रही थी।
अब मैंने अपनी तवज्जो डॉली की तरफ की और अपना चेहरा आहिस्ता से उसकी कंधे पर रख दिया.. जैसे सिर्फ़ रुटीन में ही रखा हो। धीरे-धीरे मैं उसकी गर्दन को अपने होंठों से सहलाने लगी।
डॉली को भी जैसे थोड़ी गुदगुदी सी फील हुई.. तो वो कसमसाने लगी।
मैंने थोड़ा सा और आगे को खिसकते हुए उसे और भी अपने भाई की कमर के साथ चिपका दिया, फिर मैंने धीरे से उसके कान में कहा-
डॉली देख लड़कियाँ तुझे कैसे देख रही हैं..
डॉली ने मुस्करा कर थोड़ी सी गर्दन मोड़ कर मेरी तरफ देखा और बहुत धीरे से बोली- भाभी आपको भी तो देख रही हैं।
वो इतनी आहिस्ता से बोली थी.. ताकि उसका भाई उसकी आवाज़ ना सुन सके।
मैंने दोबारा से उसकी गर्दन पर अपनी गरम-गरम साँसें छोड़ते हुए कहा- आज तो तू क़यामत लग रही है।
डॉली बोली- और भाभी आप तो हर रोज़ और हर वक़्त ही क़यामत लगती हो..
मैंने धीरे से अपना दूसरा हाथ थोड़ा ऊपर को किया.. डॉली की कमर पर रख दिया.. उसकी चूची के पास.. जस्ट उसकी ब्रा के लेवेल पर.. इस तरह हाथ रखने से मेरा हाथ उसकी चूची को छू रहा था और चेतन की कमर पर भी चल रहा था।
मेरा दूसरा हाथ अभी भी चेतन की पैन्ट के ऊपर उसके लण्ड पर ही था। मैं महसूस कर रही थी कि जैसे-जैसे मैं और डॉली धीरे-धीरे बातें कर रही थीं.. तो ज़रूर उसे भी हमारी आवाजें जाती होंगी.. जिसकी वजह से उसके लण्ड में हरकत सी हो रही थी। मैं इस बात को बिना किसी रुकावट के महसूस कर रही थी।
जैसे ही एक पार्क के पास चेतन ने बाइक रोकी.. तो मैंने हाथ हटाने से पहले उसके लण्ड को अपनी मुठ्ठी में लेकर जोर से एक बार दबा दिया.. ताकि वो बैठने ना पाए।
क्योंकि आपको तो पता ही है.. कि लंड है ही ऐसी चीज़ कि इसे जितना भी दबाओ.. यह उतना ही उछल कर खड़ा होता है.. और अकड़ता जाता है।
पार्क के गेट पर हम दोनों बाइक पर से उतर आईं और चेतन बाइक पार्किंग स्टैंड पर पार्क करने चला गया।
डॉली बोली- भाभी मुझे तो बहुत ही अजीब लग रहा है.. इस ड्रेस में बड़ी ही शर्म सी महसूस हो रही है।
मैं- अरे पगली बिल्कुल ईज़ी होकर रहना और किसी किस्म की भी कोई बेवक़ूफों वाली हरकत ना करना और ना ही ऐसी शक़ल बनाना.. कुछ भी नहीं होगा.. बस तू देखती रहना कि दूसरी लड़कियों ने भी कैसे-कैसे कपड़े पहने हुए हैं.. फिर तुझे कोई भी शर्म महसूस नहीं होगी और ना ही अजीब लगेगा।
इससे पहले कि डॉली कुछ और कहती चेतन भी हमारे पास आ गया और हम तीनों ही पार्क में चले गए।
अभी हम लोग थोड़ी ही दूर गए थे कि मैंने जानबूझ कर डॉली का हाथ पकड़ा और चेतन से आगे-आगे चलने लगे उसे लेकर.. मक़सद मेरा इसमें यही था कि चेतन की नज़र अपनी बहन की ठुमकती गाण्ड पर पड़ती रहे और वो सिर्फ़ और सिर्फ़ यही देखता रहे और उसके दिमाग पर अपनी बहन के जिस्म के छूने से जो नशा सा हुआ है.. वो नशा ना उतर सके।
मैंने महसूस किया कि हो भी ऐसा ही रहा था कि चेतन की नजरें अपनी बहन की टाइट जीन्स में फंसी हुई गाण्ड पर ही घूम रही थीं।
मैं और डॉली इधर-उधर की बातें करते हुए चलते जा रहे थे। इधर-उधर जो भी लड़की किसी सेक्सी ड्रेस में नज़र आती.. तो मैं उसकी तरफ भी इशारा करके डॉली को बताती जाती थी।
इस तरह इशारा करने से चेतन की नज़र भी उस लड़की की तरफ ज़रूर जाती थी और उसे भी कुछ ना कुछ अंदाज़ा हो जाता था कि हम क्या बातें कर रहे हैं और किस लड़की के लिबास की बात हो रही हैं।
डॉली मुझसे बोली- भाभी ड्रेस तो आपने भी बहुत ओपन पहना हुआ है.. देखिए जरा इस कुरती का गला कितना खुला और डीप है.. जो आपने पहना हुआ है।
मैं उसकी तरफ देख कर हँसी और बोली- अरे यार.. फिर क्या हुआ.. इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है.. कोई देखता है तो देखे.. जब मेरे पति को किसी के देखने से तो ऐतराज़ नहीं है.. फिर मुझे क्या?
मेरी बात सुन कर डॉली हँसने लगी और मैं भी हँसने लगी।
फिर हम लोग तीनों जा कर एक बैंच पर बैठ गए और इधर-उधर की बातें करने लगे। वहाँ से थोड़ी ही दूर पर एक कैन्टीन थी। कुछ देर के बाद चेतन ने अपना पर्स निकाला और उसमें से कुछ पैसे निकाल कर डॉली को दिए और बोला- जाओ डॉली.. वहाँ कैन्टीन से कुछ खाने-पीने की चीजें ले आओ।
डॉली अकेले कैन्टीन की तरफ जाते हुए झिझक रही थी.. मैंने उसे उत्साहित किया- हाँ हाँ.. जाओ.. कुछ नहीं होता.. हम लोग यहीं तो तुम्हारे सामने बैठे हैं।
डॉली उठी और कैन्टीन की तरफ बढ़ गई। चेतन जाते हुए उसकी गाण्ड को ही देख रहा था.. जो कि पूरी तरह इधर-उधर मटक रही थी।
कुछ देर चेतन उसी को देखता रहा फिर मुझसे बोला- यह तुम बाइक पर बैठे क्या शरारतें कर रही थीं।
मैं मुस्कुराई और अंजान बनते हुए बोली- कौन सी शरारत?
चेतन- वो जो मेरे लण्ड को दबा रही थी।
मैं हंस कर बोली- मैंने सोचा कि आज मैं अपनी चूचियों को तुम्हारी पीठ पर रगड़ नहीं सकती.. तो ऐसी ही थोड़ा सा तुम को मज़ा दे दूँ।
मैंने जानबूझ कर डॉली की चूचियों के उसकी पीठ पर लगने का जिक्र नहीं किया.. क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि वो शर्मिंदा हो। लेकिन एक बात हुई कि जैसे ही मैंने अपनी चूचियों की उसकी पीठ पर लगाने का जिक्र किया.. तो फ़ौरन ही उसकी नज़र डॉली की तरफ उठ गई.. जैसे उसे एक बार फिर से याद आ गया हो कि कैसे डॉली अपनी चूचियों को उसकी पीठ के साथ लगा कर बैठी हुई थी।
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उसी वक़्त डॉली कैन्टीन से स्नैक्स और कोल्ड-ड्रिंक्स लेकर मुड़ी.. तो चेतन की नजरें डॉली की टाइट टी-शर्ट में उभरी हुई नज़र आ रही चूचियों पर घूम गईं।
मैंने भी कोई बात करके उसको डिस्टर्ब करना मुनासिब ना समझा और इधर-उधर देखने लगी।
हम तीनों ने बैठ कर स्नैक्स और ड्रिंक्स से एंजाय किया और फिर जब थोड़ा अँधेरा होने लगा.. तो हम लोग घर की तरफ वापिस लौटे। मैंने दोबारा डॉली को चेतन के पीछे बैठाया।
पूरे रास्ते फिर मेरी वो ही हरकतें चलती रहीं और डॉली अपनी चूचियों को अपने भाई की पीठ पर दबा कर बैठे रही। मैं भी चेतन का लंड आहिस्ता-आहिस्ता दबाती और सहलाती रही।
घर आकर मैंने अपने कपड़े बदल लिए। आज रात मैंने चेतन का एक बरमूडा पहन लिया था.. जो कि मेरे घुटनों तक का था और ऊपर से मैंने एक टी-शर्ट पहन ली।
कभी-कभी मैं घर में यह ड्रेस भी पहन लेती थी। अब मेरी गोरी-गोरी टाँगें घुटनों तक बिल्कुल नंगी हो रही थीं।
चेतन ने चाय के लिए कहा तो डॉली चाय बनाने चली गई और मैं चेतन के बिल्कुल साथ लग कर बैठ गई और टीवी देखने लगी।
चेतन भी जब से आया था.. तो वो गरम हो रहा था, उसने मौका मिलते ही मुझे अपने पास खींच लिया और मेरे गालों को चूमने लगा।
मैंने अपना हाथ उसकी पजामे के ऊपर से उसके लण्ड पर रखा और बोली- क्या बात है.. आज बड़े गरम हो रहे हो?
चेतन ने भी मेरा बरमूडा थोड़ा सा घुटनों से ऊपर को खिसकाया और मेरी जाँघों को नंगी करके उस पर हाथ फेरने लगा।
थोड़ी देर मैं जैसे ही डॉली चाय बना कर वापिस आई तो चेतन ने अपना हाथ मेरी नंगी जाँघों से हटा लिया। लेकिन मैं अभी भी उसके साथ चिपक कर बैठे रही।
डॉली ने हम पर एक नज़र डाली और जब मेरी नज़र से उसकी नज़र मिली.. तो वो धीरे से मुस्करा दी और मैंने भी उसे एक स्माइल दी।
फिर हम सब चाय पीने लगे और मैं उसी हालत मैं अपने पति के साथ चिपक कर बैठे रही। मेरी जाँघें अभी भी नंगी थीं लेकिन मुझे कोई फिकर नहीं थी कि मैं अपनी नंगी जाँघों को कवर कर लूँ।
डॉली भी मेरी नंगी जांघ और मेरे हाथों को अपने भाई की जाँघों पर सरकते हुए देखती रही।
फिर हम दोनों रसोई में गईं तो डॉली मुझे छेड़ती हुए बोली- भाभी आपको तो बिल्कुल भी शरम नहीं आती.. कैसे चिपक कर बैठे हुई थीं आप.. भैया के साथ?
मैं मुस्कुराई और बोली- जब तेरी शादी होगी ना.. तो देखना तेरा पति तुझे हर वक़्त अपनी साथ चिपका कर रखेगा।
डॉली- नहीं जी.. भाभी जी.. मैं आपकी तरह बेशर्म नहीं हूँ.. जो हर वक़्त चिपकी रहूँगी।
मैं- अरे तू ना भी चिपकेगी.. तो भी तेरी जैसे चिकनी लड़की को कौन सा मर्द होगा.. जो अपने साथ ना चिपकाना चाहेगा.. सच कहूँ.. यह तो तू चेतन की बहन है.. तो बची हुई है.. वरना चेतन ही कब का तुझे…
मैं यह बात कह कर हँसने लगी।
डॉली का चेहरा सुर्ख हो गया और वो शर्मा कर बोली- भाभी क्या है ना.. आप कुछ भी बोल देती हो.. कुछ तो शरम करो ना.. वो मेरे भैया हैं और आप उनकी बारे में ऐसी बातें कह रही हो।
मैं मुस्कुराई और उसकी गाल पर हाथ फेरती हुई बोली- क्या करूँ.. जो सच है वो कह दिया.. तू बहन है उसकी.. लेकिन फिर तू इतनी खूबसूरत है कि वो तेरा भाई होकर भी तुझे देखता रहता है, मैं तो खुद तुझ से जलने लगी हूँ।
मैंने प्यार से उसकी चूची पर चुटकी काटते हुए कहा।
डॉली शर्मा गई.. मैं डॉली के दिल में भी हल्की सी चिंगारी जलाना चाहती थी.. ताकि वो भी चेतन की तरफ थोड़ा ध्यान दे और उसे भी अंदाज़ा हो सके कि उसका भाई उसकी तरफ देखता है।
मैं अपने मक़सद में कामयाब भी हो गई थी। डॉली को शरमाती देख कर मैं धीरे से मुस्कुराई और अपने बेडरूम की तरफ बढ़ते हुए बोली- अच्छा भई.. मैं तो अब चली अपनी जानू के साथ एंजाय करने..
मेरी बात पर डॉली मुस्करा दी और मैं अपने बेडरूम की तरफ बढ़ गई।
अपने बेडरूम में आई तो चेतन पहले से ही लेट चुका हुआ था, मैं भी उसके साथ ही लेट गई। बिस्तर पर लेटते साथ ही चेतन ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया और अपनी बाँहों में लेकर चूमने लगा।
मैं भी सुबह से एक भाई की अपनी बहन के लिए हवशी नजरें देख-देख कर गरम हो रही थी.. इसलिए कोई भी विरोध नहीं किया और उसका साथ देनी लगी।
जैसे ही मैंने उसके लण्ड पर हाथ रखा तो मुझे वो पहले से ही तैयार मिला.. पता नहीं अभी तक उसके ज़हन में शायद अपनी बहन का जिस्म घूम रहा था.. जो वो अकड़ा हुआ था।
मैं दिल ही दिल में मुस्कराई और उसका पजामा नीचे उतार कर उसका लंड बाहर निकाल लिया.. अब मैं उसे अपने बरमूडा के ऊपर से ही अपनी चूत पर रगड़ने लगी।
चेतन ने मेरा बरमूडा भी उतारा और फ़ौरन ही मेरी ऊपर को सरका कर अपना लंड मेरी चूत में ‘खच्च’ से डाल दिया। मेरी चूत पहले से ही गीली हो गई थी।
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धीरे-धीरे चेतन ने मुझे चोदना शुरू कर दिया… वो मेरे होंठों और मेरे गालों को चूमते हुए अपना लंड मेरी चूत में अन्दर-बाहर कर रहा था और मैं भी उसकी नंगी कमर पर हाथ फेरते हुए उसको सहला रही थी।
अचानक ही मैं बहुत ही मस्त आवाज़ में बोली- यार तुम तो डॉली का भी ख्याल नहीं करते.. हर वक़्त तुमको मुझे चोदने का ही ख्याल रहता है..
मैंने यह बात सिर्फ़ और सिर्फ़ उसके दिमाग में उसकी बहन का अक्श लाने के लिए कही थी।
अजीब बात यह हुई कि.. हुआ भी ऐसा ही.. जैसे ही मैंने डॉली का नाम लिया तो चेतन की आँखें बंद हो गईं और उसके धक्कों की रफ़्तार में तेजी आ गई।
वो मेरे होंठों को अपने होंठों में लेकर चूसने लगा।
मैं समझ गई कि इस वक़्त वो अपनी बहन का चेहरा ही अपनी आँखों के सामने देख रहा है। मैंने भी उसे डिस्टर्ब करना मुनासिब नहीं समझा और भी जोर से उसे अपने साथ लिपटा लिया।
अभी भी उसकी आँखें बंद थीं और वो धनाधन अपना लंड मेरी चूत में अन्दर-बाहर कर रहा था.. बल्कि शायद अपनी ख़यालों में अपनी बहन की चूत चोद रहा था।
थोड़ी देर बाद चेतन ने अपना माल मेरी चूत में ही छोड़ दिया और धीरे से मेरी बगल में ही ढेर हो गया।
उसकी आँखें अभी भी बंद थीं और वो लंबी-लंबी साँस ले रहा था, चुदाई के बाद उसकी ऐसी हालत पहली कभी नहीं हुई थी।
मैंने भी उसकी तरफ करवट ली और धीरे-धीरे उसकी सीने पर हाथ फेरते हुए मुस्कराने लगी। मेरा तीर ठीक निशाने पर लगा था और मेरा पति अभी भी अपनी बहन के बारे में ही सोच रहा था।
अगले दिन चेतन ने ऑफिस से छुट्टी कर ली और घर पर ही था। डॉली कॉलेज के लिए तैयार हुई तो चेतन ने बाइक निकाली और उसे कॉलेज छोड़ आया।
उसके वापिस आने के बाद हम दोनों ने नाश्ता किया और कुछ देर के बाद मैं नहाने चली गई। चेतन वहीं टीवी लाउंज में ही टीवी देख रहा था।
नहा कर मैंने बाथरूम का टीवी लाउंज वाला दरवाजा खोला और चेतन से बोली- यार यहाँ टेबल पर जो धुले हुए कपड़े पड़े हैं.. उन में से मेरी ब्रेजियर तो उठा दो प्लीज़..
चेतन- ओके डार्लिंग..
यह कह कर वो कपड़ों की तरफ बढ़ा और उसे जाता हुआ देख कर मैं मुस्कराने लगी.. क्योंकि सब कुछ मेरी स्कीम के मुताबिक़ ही हो रहा था। दरअसल मैंने चेतन और डॉली के जाने के बाद उन कपड़ों के ढेर में से अपनी ब्रेजियर निकाल ली हुई थी और अब वहाँ पर सिर्फ़ और सिर्फ़ डॉली की ही एक ब्रेजियर पड़ी हुई थी।
वो ही हुआ.. कि चेतन कपड़ों के ढेर के पास गया और उसमें से कपड़े उलट-पुलट करने लगा। उसे उस कपड़ों के ढेर में से सिर्फ़ एक ही काली रंग की ब्रेजियर मिली और वो उसे उठा कर मेरे पास ले आया और बोला- यह लो डार्लिंग..
मैंने ब्रेजियर ली और चेतन वापिस जा कर सोफे पर बैठ गया। जैसे ही वो वापिस गया तो मैंने उसे दोबारा बुलाया।
मैं- अरे यार यह क्या है… यार.. यह तो तुम डॉली की ब्रेजियर उठा ले आए हो.. मेरी लाओ ना निकाल कर.. तुमको पता नहीं चलता कि क्या.. कि यह कितनी छोटी है?
चेतन ने चौंक कर मेरी तरफ देखा और मैंने खुले दरवाजे से उसकी बहन की ब्रेजियर उसकी हाथ में पकड़ा दी।
चेतन ने एक नज़र मेरी नंगी चूचियों पर डाली और मैंने जानबूझ कर बाथरूम का दरवाज़ा थोड़ा बंद कर दिया ताकि वो मुझे ना देख सके… लेकिन मैं छुप कर उसे देखने लगी कि वो क्या करता है?
जैसे कि मुझे उम्मीद थी.. चेतन अपनी हाथ में पकड़ी हुई अपनी बहन की ब्रेजियर को देखने लगा। उसने वो ब्रा फैलाई और आहिस्ता आहिस्ता उसको फील करने लगा।
मेरी नज़रें उसकी चेहरे पर पड़ीं.. तो उसका चेहरा अजीब सा हो रहा था।
वापिस कपड़ों के तरफ जाते हुए उसने जो हरकत की.. उसे देख कर तो मेरी चूत ही गीली हो गई।
चेतन ने अपनी बहन की ब्रेजियर को अपनी चेहरे पर फेरा और उसे अपनी नाक से लगा कर सूंघा भी। हालांकि धुली हुई ब्रेजियर में से कहाँ उसकी बहन के जिस्म की खुशबू आनी थी।
थोड़ी देर के बाद वो वापिस आया और बाथरूम का बन्द दरवाजा खोल कर बोला- नहीं यार.. वहाँ पर कोई नहीं है.. दूसरी ब्रेजियर यहीं पड़ी हुई होगी।
मैंने कहा- अच्छा ठीक है.. मैं आकर देख लेती हूँ।
अभी भी उसकी हाथ में डॉली की ब्रा मौजूद थी.. जिसे देख कर मैं मुस्कराई और उसके हाथ से ब्रा को ले लिया। फिर मैं एक तौलिया अपनी नंगे जिस्म पर लपेट कर बाथरूम से बाहर लाउंज में ही निकल आई।
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चेतन दोबारा से सोफे पर बैठ कर टीवी देख रहा था। मैंने जैसे बेखयाली में वो डॉली की ब्रेजियर दोबारा से उसके पास ही सोफे पर फेंक दी और बोली- क्या है ना यार.. एक काम भी नहीं होता तुम से मेरा..
यह कह कर मैं अपने बेडरूम में चली गई, अपने कमरे से मैं दोबारा बाहर झाँक कर देखने लगी.. ऐसे कि चेतन मुझे ना देख पाए।
मैंने देखा कि चेतन ने एक-दो बार बेडरूम की तरफ देख कर मेरी तरफ से तसल्ली की और फिर अपने क़रीब ही सोफे पर पड़ी हुई अपनी बहन की ब्रेजियर को दोबारा से उठा लिया।
जैसे ही उसने उसे ब्रा को उठाया.. तो मेरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
चेतन ने दोबारा से अपनी बहन की ब्रेजियर उठा ली हुई थी और उस पर आहिस्ता आहिस्ता हाथ फेरते हुए उसे फील कर रहा था.. जैसे कि उसमें अपनी बहन की चूचियों को सोच रहा हो।
मैं कुछ देर उसे अपने बहन की ब्रेजियर से खेलती हुए देखती रही और फिर मुस्करा कर उसे ब्रा से एंजाय करते हुए छोड़ कर.. अपनी अल्मारी की तरफ बढ़ गई।
मैंने अपनी ब्रेजियर निकाल कर पहनी और फिर नीचे से एक लेग्गी पहन ली लेकिन ब्रा के ऊपर टॉप नहीं पहना और फिर बाहर आ गई।
जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला तो चेतन ने डॉली की ब्रा फ़ौरन ही सोफे पर फेंक दी। मैंने देख तो लिया था.. लेकिन शो ऐसे ही किया.. जैसे मैंने कुछ भी ना देखा हो।
फिर मैंने कपड़ों में से डॉली के कपड़े और सोफे पर से उसकी ब्रेजियर उठाई और उसकी अल्मारी में रख आई।
पहले तो चेतन थोड़ा सा घबराया था लेकिन जब उसने देखा कि उसकी इस हरकत का मुझे कुछ भी पता नहीं चला.. तो वो काफ़ी रिलेक्स हो गया था।
मैं तो खुद भी उसे अहसास करवा कर अपना काम और मज़ा खराब नहीं करना चाहती थी ना.. और उसे अपने ही बहन की तरफ जाने का पूरा-पूरा मौका देना चाहती थी।
दो दिन के बाद सुबह जब चेतन ऑफिस के लिए कमरे में ही तैयार हो रहा था.. तो मैंने उससे कहा- चेतन.. प्लीज़ आज ऑफिस से आते हुए थोड़ी शॉपिंग तो करते आना..
चेतन- क्या मंगवाना है?
मैं- यार 3-4 सैट लेटेस्ट और खूबसूरत डिज़ाइन वाली ब्रेजियर के तो ले ही आना।
चेतन- ओके डार्लिंग.. लेता आऊँगा।
मैं- ओह हाँ.. याद आया.. वो ना साइज़ तुम 34 इंच लेकर आना।
चेतन ने हैरान होकर मेरी तरफ देखते हुए बोला- क्यों.. 34 क्यों.. तुम्हारा साइज़ तो 36 है.. फिर छोटा नंबर क्यों मंगवा रही हो?
मैंने उसके उतारे हुए कपड़े समेटते हुए बड़े ही साधारण अंदाज़ में कहा- वो 34 की साइज़ की ब्रेजियर डॉली के लिए मंगवानी हैं ना.. उसकी ब्रा सबकी सब पुरानी हैं और पुरानी डिज़ाइन की हैं.. उसके लिए कुछ अच्छी डिज़ाइन की ब्रेजियर ले आना।
मैंने इतनी नॉर्मल अंदाज़ में कहा था.. जैसे कि उससे बाज़ार से कोई सब्ज़ी या घर की कोई और चीज़ मंगवा रही हूँ।
लेकिन मेरी इस बात से चेतन चकित हो चुका था। उसे इसे हालत में छोड़ कर मैं मुस्कराती हुई कमरे से बाहर आ गई और रसोई में जाकर नाश्ता तैयार करने लगी।
जब चेतन और डॉली भी नाश्ते के लिए आ गए.. तो हम सब नाश्ता करने लगे।
मैंने नोट किया कि आज चेतन बड़ी ही अजीब नज़रों से डॉली को देख रहा था। आज भी उसकी नजरें बार-बार उसकी चूचियों पर जा रही थीं.. जैसे कि वो खुद भी अपनी बहन की चूचियों की साइज़ का अंदाज़ा करना चाह रहा हो।
उसकी यह हालत देख कर मैं दिल ही दिल में मुस्करा रही थी।
इतने दिनों में अब यह तब्दीली आ चुकी हुई थी कि डॉली को भी कुछ-कुछ फील होने लगा था कि उसके भाई की नजरें उसके जिस्म की इर्द-गिर्द ही घूमती रहती हैं.. लेकिन वो भी कुछ बुरा फील नहीं करती थी और उस बात को साधारण सी बात ही समझती थी।
मैंने कभी भी उसे बुरा मानते हुए या खुद को छुपाते हुए नहीं देखा था।
शाम को चेतन घर वापिस आया तो उसके हाथ में एक शॉपिंग बैग था। जिसे उसके हाथ में देख कर ही मेरे चेहरे पर मुस्कान फैल गई। लेकिन मैंने अपनी मुस्कराहट चेतन से छुपा ली।
अपने कमरे में आकर चेतन ने मुझे वो शॉपिंग बैग दिया और बोला- यह ले आया हूँ.. जो तुमने मँगवाया था.. देख लेना और अगर कुछ चेंज-वेंज करना हो तो भी करवा लाऊँगा।
मैंने भी बड़े ही साधारण तरीके से उससे बैग लिया और उसे कमरे में एक तरफ ‘ओके’ कह कर रख दिया.. जैसे मुझे कोई ख़ास दिलचस्पी ना हो और यह एक आम सी बात ही हो।
लेकिन अन्दर से मैं बहुत उत्सुक थी कि देखूँ कि चेतन अपनी बहन के लिए किस किस्म की ब्रा सिलेक्ट करके लाया है।
अगले दिन डॉली घर पर ही थी तो चेतन के जाने के बाद मैंने वो शॉपिंग बैग उठाया और बाहर आ गई। जहाँ पर डॉली बैठी टीवी देख रही थी।
मेरे हाथ मैं नया शॉपिंग बैग देख कर खुश होती हुए बोली- वाउ भाभी.. शॉपिंग करके आई हो.. कब गई थीं आप.. और क्या लाई हो.. दिखाओ मुझे भी?
मैं मुस्करा कर बोली- नहीं यार मैं तो नहीं गई थी.. कुछ चीजें तुम्हारे भैया से ही मँगवाई हैं और वो भी तुम्हारे लिए..
मैं अब डॉली के पास ही बैठ चुकी थी और उसका भी पूरा ध्यान अब मेरी तरफ ही था।
डॉली- अरे भाभी मेरे लिए क्या मंगवा लिया है.. दिखाओ ना मुझे भी?
मैंने बैग मैं से चारों बॉक्स निकाल कर बाहर टेबल पर हम दोनों की सामने रख दिए। बॉक्स पर ब्रा पहने हुई मॉडल्स की फोटो थीं.. जिनको देखते ही डॉली चौंक उठी।
डॉली- भाभी यह क्या है?
मैं- अरे यार तुम्हारे लिए कुछ नई ब्रा मँगवाई हैं मेरा तो मार्केट में चक्कर लग ही नहीं पा रहा था.. इसलिए तुम्हारे भैया से ही कहा था कि ला दो.. आओ खोल कर देखते हैं कि तुम्हारे भैया कैसी डिज़ाइन्स लाए हैं अपनी बहना के लिए।
मेरी बात सुन कर डॉली का चेहरा शरम से सुर्ख हो गया.. वो झेंपती हुई बोली- भाभी.. आपको भैया से मंगवाने की क्या ज़रूरत थी.. पता नहीं वो मेरे बारे में क्या सोचते होंगे..
मैं मुस्कराई और बोली- अरे इसमें ऐसी कौन सी बात है.. मेरे लिए भी तो खरीद कर ले ही आते हैं ना वो.. तो तुम्हारे लिए ले आए.. तो कौन सी गलत बात हो गई है यार..
मैंने सब लिफ़ाफ़े खोले और उनमें से ब्रा निकाल कर देखने लगी।
उनमें से 2 तो कढ़ाई वाली थीं.. बहुत ही खूबसूरत डिज़ाइन की महंगी वाली ब्रा.. जिनमें से एक ब्लैक और दूसरी स्किन कलर की थी। तीसरी ब्रेजियर नेट वाली थी.. जिसको पहनने पर सब कुछ नज़र आता था। चौथी वाली ब्रा हाफ कप वाली थी.. जिसकी स्ट्रेप पारदर्शी प्लास्टिक की थीं।
मैंने एक-एक ब्रा खोल कर डॉली के हाथ में दीं और बोली- यार तेरे भैया बहुत ही सेक्सी ब्रा लाए हैं तुम्हारे लिए।
डॉली उन सभी ब्रा को हाथों में लेकर देख भी रही थी और शरम से लाल भी हो रही थी।
मैं- अरे यार इस नेट वाली में तो तुम्हारी चूचियाँ बिल्कुल ही नंगी ही रह जाएंगी।
मैंने हँसते हुए कहा।
डॉली शर्मा कर मुझे जवाब देते हुए बोली- भाभी आपके पास भी तो हैं ना.. नेट वाली ब्रा.. आप भी तो पहनती हो ना..
मैं फ़ौरन बोली- मेरी पहनी हुई नेट वाली ब्रा तो तुम्हारे भैया को दिखाने के लिए होती है.. तुमको भी क्या यह पहन कर अपने भैया को दिखाना है।
मेरी इस बात पर तो डॉली उछल ही पड़ी और बोली- भाभी कैसी बातें करती हो आप.. मैं क्यों पहन कर दिखाऊँगी भैया को?
उसका चेहरा शरम से सुर्ख हो गया।
मैं मुस्करा कर बोली- वैसे उसने लाकर तो तुमको इसलिए दी है ना.. शायद तुम्हारे भैया तुमको इसमें देखना चाहते ही हों..
डॉली बोली- भाभी क़सम से.. आप बहुत खराब बातें करती हो।
मैं भी उसके साथ मिल कर हँसने लगी।
फिर डॉली वो बैग लेकर अपने कमरे में चली गई.. मैंने भी उसे कोई इसरार नहीं किया कि वो मुझे नई ब्रा पहन कर दिखाए।
शाम को चेतन घर आया तो आज भी हमेशा की तरह उसकी नज़रें अपनी बहन की चूचियों पर ही थीं.. जैसे अब वो यह जानना चाहता हो कि उसने नई ब्रा पहनी है कि नहीं।
मैंने महसूस किया कि अपने भाई की नज़रों को फील करके डॉली भी थोड़ा शर्मा रही थी और मैं उन दोनों भाई-बहन की दशा का मजा ले रही थी।
चेतन की अपनी बहन पर तांक-झाँक ऐसे ही चलती रहती थी। गर्मी का मौसम चल रहा था और हमने काफ़ी महीनों से ही एसी लगवाने के लिए पैसे इकठ्ठे करने शुरू किए हुए थे।
अब जाकर हमारे पास इतने पैसे हुए थे कि हम एक एसी लगवा सकें.. तो फिर आख़िरकार हमने अपने बेडरूम में एसी लगवा ही लिया। उस रोज़ हम लोग बहुत खुश थे.. आख़िर हम जैसे मिडिल क्लास के लिए एसी का लग जाना भी एक बहुत बड़ी बात थी।
रात को मैं और चेतन अब एसी में सोने लगे।
लेकिन जल्दी ही मुझे और चेतन को डॉली का ख्याल आया।
मैं- चेतन.. यार यह बात तो ठीक नहीं है कि हम लोग तो एसी चलाकर सो जाते हैं और उधर डॉली गर्मी में ही सोती है।
चेतन- हाँ.. कहती तो तुम ठीक हो लेकिन अब कैसे करूँ..? हमारा कमरा भी इतना बड़ा नहीं था कि उसमें कोई और बिस्तर लगाया जा सके और ना ही उसमें कोई भी और सोफा वगैरह ही पड़ा हुआ था।
काफ़ी सोच विचार के बाद मेरे शैतानी दिमाग ने एक अनोखा आइडिया दिया जिससे मेरा काम भी आगे बढ़ने की उम्मीद थी।
मैं चेतन से बोली- चेतन एक बात हो सकती है कि हम डॉली को अपने साथ ही बिस्तर पर सुला लें।
चेतन चौंक कर बोला- लेकिन यह कैसे हो सकता है.. इस तरह तो हमारी प्राइवेसी खत्म हो जाएगी यार.. और कैसे हम उसे अपने बिस्तर पर सुला सकते हैं?
मैं- यार कोई परेशानी नहीं होगी.. बस मैं बीच में लेट जाया करूँगी.. इसमें कौन सी कोई दिक्कत है यार.. बस उसे आज इधर ही सोने का कह देते हैं। इस तरह गर्मी में उसको सुलाना तो ठीक नहीं है ना..
चेतन मेरा फ़ैसला सुन कर खामोश हो गया और कुछ सोचने लगा।
शाम को खाने के वक़्त हमने डॉली को यह बता दिया। उसने बहुत इन्कार किया.. लेकिन मैंने उसकी कोई भी बात सुनने से इन्कार कर दिया और आख़िर डॉली को मेरी बात माननी ही पड़ी।
रात हुई तो मैं और चेतन अपने कमरे में आकर लेट गए.. एसी चल रहा था और कमरा काफी ठंडा हो रहा था।
थोड़ी देर तक पढ़ने के बाद डॉली भी आ गई.. मैंने कमरे में जलता हुआ नाईट बल्व भी बंद कर दिया और अब कमरे में घुप्प अँधेरा था। कमरे में सिर्फ़ एसी की जगमगाते हुए नंबर्स की ही रोशनी हो रही थी।
डॉली हमारे बिस्तर के पास आई तो मैंने थोड़ा सा और चेतन की तरफ सरक़ कर डॉली के लिए और भी जगह बनाई और वो झिझकते हुए मेरे साथ लेट गई।
अब मेरी एक तरफ मेरा पति सो रहा था और दूसरी तरफ उसकी बहन.. यानि मैं दोनों बहन-भाई के दरम्यान लेटी हुई थी।
चेतन की आदत थी कि वो मेरे साथ चिपक कर मुझे अपनी बाँहों में समेट कर सोता था।
अब जब डॉली कमरे में आई तो चेतन सो चुका हुआ था और मेरी करवट दूसरी तरफ थी.. लेकिन वो पीछे से मुझे चिपका हुआ था।
जैसे ही डॉली की नज़र हम दोनों पर इस हालत में पड़ी.. तो उसके चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कराहट फैल गई।
मैं भी उसकी तरफ देख कर मुस्कराई और उसे चुप करके अपने पास लेटने का इशारा किया। वो खामोशी से मेरे साथ सीधी ही लेट गई।
मैंने आहिस्ता से उसके कान में कहा- अरे यार कुछ फील ना करना.. तुम्हारे भैया की मेरे साथ ऐसे ही चिपक कर सोने की आदत है.. बहुत चिपकू हैं तेरे भैया..
मेरी बात सुन कर डॉली भी मुस्कराने लगी। मैंने अपनी बाज़ू उठाई और डॉली के पेट पर रख कर उसे एक झटके से थोड़ा और अपनी करीब खींच लिया।
इस तरह वो मेरे साथ चिपक गई थी लेकिन साथ ही चेतन का हाथ भी उसके जिस्म से टच हो रहा था।
चेतन तो सो रहा था.. लेकिन उसकी बहन को ज़रूर उसके हाथ अपनी कमर की साइड पर महसूस हो रहा था.. जिसकी वजह से वो थोड़ा सा बैचेन सी हो रही थी। लेकिन फिर भी वो आराम से लेटी रही.. क्योंकि मैंने उसके जिस्म पर से अपना हाथ नहीं हटाया था।
अब पोजीशन यह थी कि चेतन मेरे साथ चिपका हुआ था और मैं उसकी बहन के साथ चिपक कर सोने लगी थी।
मैंने आहिस्ता से दोबारा उसके कान के क़रीब अपनी होंठ लिए. जाकर कहा- शर्मा क्यों रही हो.. कल को तुम्हें भी तो ऐसी ही सोना है ना..
डॉली ने चौंक कर मेरी तरफ देखा तो मैंने उसके गोरे-गोरे गाल की एक पप्पी ली और बोली- हाँ.. तो क्या तुम अपने पति के साथ चिपक कर नहीं सोया करोगी क्या?
मेरी बात सुन कर डॉली शर्मा गई और अपनी आँखें बंद कर लीं।
एसी की ठंडी-ठंडी हवा में कुछ ही देर में हम सबकी आँख लग गई। मैंने भी करवट ली और अपने पति के साथ चिपक कर एक बाज़ू उसकी ऊपर डाल कर सो गई।
बहुत सुबह जब मेरी आँख खुली तो हमारी हालत यह थी कि मैं डॉली की तरफ मुँह करके लेटी हुई थी। मेरा एक हाथ उसके सीने पर था। उसकी चूचियाँ मेरी बाज़ू के नीचे थीं। चेतन का बाज़ू मेरे ऊपर से होकर मेरी चूची को थामे हुए था। उसकी एक टाँग मेरी टाँगों के ऊपर से गुज़र रही थी और डॉली की टाँग पर पहुँची हुई थी।
इस हालत को देख कर मैं मुस्करा दी.. दोनों बहन-भाई अभी तक सोए हुए थे। कमरे से बाहर हल्की-हल्की रोशनी हो रही थी.. अभी लेकिन दिन नहीं चढ़ा था।
मेरी नींद टूट चुकी थी.. मैंने आहिस्ता से अपने हाथ को हरकत दी और सोई हुई डॉली का एक मुम्मा अपनी हाथ में ले लिया.. उसे आहिस्ता से सहलाने लगी।
डॉली ने नीचे से ब्रा भी पहनी हुई थी उसकी चूची बहुत ही सॉलिड लग रही थी। आहिस्ता-आहिस्ता मैं उसे सहलाने और दबाने लगी। उसकी चूची को दबाना मुझे अच्छा लग रहा था।
उसका खूबसूरत गोरा-चिट्टा चेहरा मेरी आँखों के सामने और मेरे होंठों के बहुत ही क़रीब था। मैं ज्यादा देर तक खुद पर कंट्रोल ना कर सकी और उसकी चिकने गाल को एक किस कर लिया।
मेरे जागने के साथ ही मेरे अन्दर का शैतान भी जाग चुका था.. मुझे एक शैतानी ख्याल आया और साथ ही मेरी आँखें कमरे के उस अँधेरे में भी चमक उठीं।
ुमैंने एक नज़र डॉली के चेहरे पर डाली.. वो सो रही थी। चेतन के सोने का तो उसके खर्राटों से ही कन्फर्म हो रहा था।
अब मैंने अपनी चूचियों पर लटक रहा चेतन का हाथ अपने हाथ में लेकर उठाया और बहुत ही आहिस्ता से उसे डॉली की चूची पर रख दिया.. हाथ तो मैंने चेतन का रखा था.. डॉली की चूची पर.. लेकिन इस चीज़ के मजे की वजह से सिसकारी मेरी मुँह से निकल गई “’सस्स्स्स्स्…’
राज शर्मा स्टॉरीज पर पढ़ें हजारों नई कहानियाँ !
चेतन का हाथ डॉली की चूची पर रखने के बाद मैंने फ़ौरन ही डॉली के चेहरे की तरफ देखा.. लेकिन वो बेख़बर सो रही थी।
चेतन का हाथ भी अपनी बहन की चूची के ऊपर बिल्कुल सटा हुआ था। उस बेचारे को तो पता भी नहीं था कि उसके हाथ में उसके ख्वाबों की ताबीर मौजूद है।
मैं धीरे से मुस्करा दी..
अब मैंने अपना हाथ चेतन के हाथ के ऊपर रखा और आहिस्ता-आहिस्ता उसके हाथ को डॉली की चूची के ऊपर फेरने लगी।
यह खेल मैं ज्यादा देर तक ना खेल सकी क्योंकि एक बार फिर मेरी आँख लग गई।
सुबह जब मेरी आँख खुली तो उस वक़्त चेतन ने दूसरी तरफ करवट ली हुई थी और मैं उसकी कमर के साथ उसी की तरफ मुँह करके उससे चिपक कर लेटी हुई थी.. मेरा बाज़ू उसके ऊपर था।
डॉली उठ कर जा चुकी हुई थी। मैं सीधी होकर लेट गई और रात जो कुछ हुआ.. उसके बारे में सोचने लगी।
मेरे चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट फैली हुई थी।
इतनी में डॉली ट्रे में चाय के तीन कप ले आई।
उसे देख कर मैं मुस्कुराई और वो मेरे पास ही बिस्तर पर लेटते हुए बोली- भाभी आप तो भैया के साथ चिपक कर बहुत ही बेशर्मी के साथ सोती हो.. सुबह भी आप उनके साथ चिपकी हुई थीं।
मैंने उसे आँख मारी और बोली- सारी रात तो तेरा भाई मेरे साथ चिपका रहा है.. थोड़ी देर के लिए मैंने चिपक लिया तो क्या हो गया यार?
मेरी बात सुन कर वो हँसने लगी। फिर मैंने चेतन को भी उठाया और हम तीनों ने चाय ली और गप-शप भी करते रहे।
ऐसे ही इसी रुटीन में 3-4 दिन गुज़र गए। रात को डॉली हमारे ही कमरे में हमारे बिस्तर पर हमारे साथ सोने लगी।
एक रात जब डॉली लेटने के लिए आई.. तो हम दोनों भी अभी जाग ही रहे थे।
हम तीनों लेट कर बातें करने लगे। थोड़ी ही देर गुज़री कि मैंने करवट बदली और चेतन की तरफ मुँह करके लेट गई और साथ ही उसके ऊपर अपना बाज़ू डालती हुए उसे हग कर लिया।
चेतन आहिस्ता से बोला- यार डॉली है, तेरे पीछे लेटी हुई है।
लेकिन मैंने उसका ख्याल किए बिना ही अपनी टाँग भी उसके ऊपर रखी और मज़ीद उससे लिपटते हुए बोली- कुछ नहीं होता.. उसे क्या पता.. वो तो अभी बच्ची है।
मैंने मुड़ कर डॉली की तरफ देखा तो उसकी चेहरे पर शर्मीली सी मुस्कराहट थी।
कुछ देर के बाद मैंने डॉली की तरफ अपना मुँह किया और उसे हग कर लिया और बोली- सॉरी डॉली डियर.. तुमने माइंड तो नहीं किया ना?
वो मुस्करा दी और बोली- नहीं भाभी इट्स ओके..
मैंने चेतन का भी हाथ खींचा और अपने ऊपर रख लिया।
अब वो पीछे से मुझे हग किए हुए था और मैंने सीधी लेटी हुई डॉली को हग किया हुआ था, चेतन का हाथ डॉली के पेट को छू रहा था।
मैंने महसूस किया कि डॉली को अपने भाई का हाथ थोड़ा बेचैन कर रहा है।
मुझे एक शरारत सूझी.. मैंने चेतन का हाथ पकड़ कर डॉली के पेट पर रखा और बोली- देखो चेतन डॉली का पेट कितना सपाट है.. और मेरा पेट कितना मोटा हो गया है.. देखो डॉली इसे फील करके..
मेरी इस हरकत से दोनों बहन-भाई ही चौंक पड़े.. लेकिन मैंने चेतन को हाथ हटाने का मौका दिए बिना ही उसके हाथ को डॉली के पेट पर फेरना शुरू कर दिया।
डॉली का चेहरा शरम से सुर्ख हो गया था। चेतन का भी मुझे पता था कि वो ऊपर से तो संकोच दिखा रहा है.. लेकिन अन्दर से वो अपनी बहन के पेट को छूना ज़रूर चाहता है।
लेकिन चंद लम्हों के बाद मैंने चेतन के हाथ पर से अपना हाथ हटाया तो फिर भी चेतन ने कुछ देर तक के लिए अपना हाथ डॉली के पेट पर ही पड़ा रहने दिया।
उस रात को मेरी आधी रात को आँख खुली तो मुझे टॉयलेट जाने की ज़रूरत पड़ी। मैं अपनी जगह से उठी और उन दोनों बहन-भाई के बीच में से निकली और उठ कर वॉशरूम में चली गई।
जब मैं वापिस आई तो अचानक ही मेरे ज़हन में एक ख्याल आया। मैंने डॉली को देखा.. तो वो गहरी नींद में थी। मैंने आहिस्ता से उसे करवट दी तो वो घूम कर बिस्तर पर मेरी वाली जगह पर अपने भाई चेतन के क़रीब आ गई।
मैं मुस्कराई और डॉली को अपनी जगह पर करके खुद उसकी वाली जगह पर लेट गई।
अब मुझे सोना नहीं था बल्कि आगे जो होने वाला था.. उसका इंतज़ार करना था।
थोड़ी देर के बाद वो ही हुआ जिसका अन्दाजा था.. चेतन ने करवट बदली और डॉली की तरफ मुँह कर लिया। लेकिन उसे नहीं पता था कि वहाँ पर मैं नहीं.. बल्कि उसकी अपनी बहन डॉली लेटी हुई है। इसलिए उसने अपनी नींद में ही आदत के मुताबिक़ ही अपना बाज़ू डॉली के ऊपर डाला और उसे बाँहों में भरते हुए अपने क़रीब खींच लिया.. जैसे कि वहाँ पर डॉली नहीं बल्कि मैं हूँ।
मैं धीरे से मुस्कराई और डॉली को थोड़ा और आगे को पुश कर दिया।
अब डॉली की चूचियाँ चेतन के सीने के साथ चिपक गई थीं लेकिन अभी तक दोनों बहन-भाई नींद में ही थे अगरचे दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए थे।
मैंने अपना हाथ डॉली के ऊपर से आगे बढ़ाया और चेतन के पजामे के ऊपर से ही उसका लंड पकड़ कर आहिस्ता आहिस्ता सहलाने लगी।
मैं चेतन के लंड को खड़ा करना चाहती थी और नींद में ही चेतन का लंड आहिस्ता आहिस्ता खड़ा होने लगा।
जैसे ही चेतन का लंड खड़ा हुआ.. तो उसने अपनी एक टाँग भी डॉली की जाँघों के ऊपर डाली और अपना लंड उसकी जाँघों के दरम्यान घुसाते हुए उससे चिपक गया।
मैं मुस्कराई और अपना हाथ पीछे खींच लिया। मेरा काम काफ़ी हद तक हो चुका था।
चेतन का इस तरह से डॉली को अपने साथ चिपकाने और दबाने की वजह से डॉली की आँख खुल गई।
जैसे ही वो थोड़ा सा कसमसाई तो मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और थोड़ी सी आँख खोल कर उसे देखने लगी।
डॉली ने जल्दी से करवट ली और सीधी होकर मेरी तरफ देखने लगी कि यह कैसे हुआ है कि वो मेरी जगह पर है। लेकिन मैं सोती हुई बन गई।
वो हैरत से मेरी तरफ देख रही थी.. फिर उसने आहिस्ता से अपने भाई का हाथ अपने जिस्म पर से उठाया और पीछे कर दिया। अब वो बिल्कुल सीधी लेटी हुई थी और थोड़ी सी कन्फ्यूज़ लग रही थी। चेतन के खर्राटों की आवाज़ अभी भी आ रही थी।
दोबारा थोड़ी देर में वो ही हुआ जिसकी चेतन को आदत पड़ी हुई थी। उसने दोबारा अपना हाथ फैलाया और डॉली के सीने पर रख कर इस बार उसकी छोटी सी चूची को अपनी हाथ में ले लिया। डॉली ने घबरा कर पहले चेतन की तरफ देखा और फिर मेरी तरफ.. लेकिन जब उसे तसल्ली हो गई कि हम दोनों ही सो रहे हैं और किसी को भी होश नहीं है।
डॉली की चूची के ऊपर उसके भाई का हाथ था.. जिसने मुठ्ठी में अपनी बहन की चूची को लिया हुआ था। डॉली ने आहिस्ता से अपना हाथ अपने भाई के हाथ पर रखा और उसे पीछे को हटाने लगी। एक लम्हे के लिए यूँ अपनी चूचियों पर किसी का टच उसे भी अच्छा ही लगा था.. लेकिन फिर उसने अपने भाई का हाथ हटा दिया।
लेकिन अभी एक मुसीबत और भी तो थी ना.. चेतन का अकड़ा हुआ लंड उसकी जाँघों से लड़ रहा था। डॉली थोड़ी सी मेरी तरफ सरकी और मेरी तरफ करवट लेकर लेट गई.. मुझे थोड़ी मायूसी हुई।
अब डॉली का रुख़ मेरी तरफ था। उसने अपना बाज़ू मेरे पेट पर रखा और मुझे अपने आगोश में लेकर के लेट गई। लेकिन अगले ही लम्हे वो उछल ही पड़ी। मैं भी हैरान हुई और फिर थोड़ा सा देखा.. तो चेतन अपनी नींद में अपनी टाँग डॉली के चूतड़ों के ऊपर ला चुका हुआ था और ज़ाहिर है कि उसका लंड पीछे से आकर कर डॉली की गाण्ड में घुस गया हुआ था। जैसे कि वो मेरी गाण्ड में पीछे से घुसा देता था।
अभी भी उसे यही पता था कि वो अपनी बीवी के साथ ही है.. क्योंकि अगर उसे पता चल जाता कि यह मैं नहीं.. उसकी बहन है.. तो वो ज़रूर पीछे हो चुका होता।
मैंने देखा कि मेरे पेट के ऊपर रखा हुआ डॉली का हाथ पीछे को गया.. तो मेरी चूत ही जैसे पानी छोड़ गई।
ज़ाहिर है कि डॉली ने पीछे हाथ ले जाकर अपने भाई का लंड पीछे को करने की कोशिश की थी.. लेकिन उसका हाथ काफ़ी देर तक वापिस नहीं आया था।
शायद वो अपने भाई के लंड को फील कर रही थी।
फिर उसने अपना हाथ वापिस आगे किया और मेरे पेट पर रख कर मुझे हिलाते हुए आवाज़ देने लगी- भाभी.. भाभी.. उठो मैं डॉली..
मैंने जैसे नींद में आँखें खोलीं और बोली- हाँ.. क्या मसला है.. इतनी रात को क्यों जाग रही हो?
वो बोली- भाभी.. यह मैं आपकी जगह पर कैसे आ गई हूँ?
मैंने अब आँखें खोलीं और बोली- अरे यार मैं बाथरूम में गई थी.. वापिस आई तो तुम घूमती हुई मेरी जगह पर पहुँची हुई थीं.. तो मैं यहीं पर तुम्हारी जगह पर लेट गई।
वो बोली- अच्छा भाभी.. चलो आप वापिस आओ अपनी जगह पर..
मैंने नींद में होने की एक्टिंग ही करते हुए दूसरी तरफ करवट ली और बोली- सो जा यार.. क्यों मेरी भी नींद खराब कर रही हो।
डॉली बेबस होकर वहीं लेटी रह गई। लेकिन अब वह मेरे साथ और भी चिपक गई ताकि उसके भाई से उसका फासला हो जाए।
फिर मैंने डॉली को सीधी होते हुए महसूस किया। लेकिन अगले ही लम्हे मुझे अपनी कमर के पास चेतन का हाथ महसूस हुआ। मेरे चेहरे पर मुस्कराहट आ गई.. क्योंकि एक बार फिर से उसका हाथ अपनी बहन की चूचियों पर आ चुका हुआ था।
थोड़ी ही देर में मुझे डॉली की आवाज़ सुनाई दी- भाई… उठो जरा.. यह मैं हूँ.. भाभी नहीं हैं..
फिर मुझे चेतन की बौखलाई सी आवाज़ सुनाई दी- अरे तू यहाँ कैसे आ गई.. और तेरी भाभी कहाँ है?
डॉली आहिस्ता से बोली- भैया वो उधर चली गई हुई हैं।
फिर चेतन की आवाज़ आई- सॉरी डॉली.. मैं समझा था कि अनीता है।
इसके साथ ही चेतन ने दूसरी तरफ करवट ली और दोबारा से सोने लगा। लेकिन मैं जानती थी कि दोनों बहन-भाई को काफ़ी देर तक नींद आने वाली नहीं थी।
मुझे यह भी पता था कि अब कुछ और नहीं होगा.. इसलिए मैंने भी अपनी आँखें मूँदीं और सो गई।
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सुबह जब मेरी आँख खुलीं तो दोनों बहन-भाई पहले ही उठ चुके हुए थे। मैं भी उठ कर बाहर आई और नाश्ता तैयार करने लगी।
जब मैंने नाश्ता टेबल पर लगाया और दोनों बहन-भाई को बुलाया तो मैंने महसूस किया कि वो दोनों एक-दूसरे से नजरें नहीं मिला पा रहे थे।
डॉली के चेहरे पर शर्म की लाली थी.. उसकी नजरें शरम से नीचे झुकी हुई थीं और चेतन भी अपनी नजरें चुरा रहा था और शर्मिंदा सा लग रहा था।
थोड़ी ही देर में वो दोनों घर से चले गए।
चेतन दोपहर में ही घर आ गए, उनके दफ्तर में किसी कारण से छुट्टी हो गई थी..
कुछ देर बातचीत होने के बाद चेतन कमरे में आराम करने चले गए।
मैंने और डॉली ने भी इस गरम दोपहर में एसी में सोने का सोचा और मैं और डॉली बिस्तर पर आकर लेट गई पर मुझे नींद नहीं आने वाली थी तो मैंने चेतन की तरफ देखा, वो आँखें मूंदे लेटे हुए थे।
फिर मैंने डॉली की ओर देखा, उसकी आँखें भी बंद हो गई थीं। मुझे नहीं पता था कि वो सो रही है या जाग रही है लेकिन एक बात पक्का थी कि चेतन अभी तक जाग रहा था।
मैं भी आँख बन्द करके सोने का ड्रामा करने लगी..
तभी मैंने देखा कि चेतन ने अपना हाथ मेरे ऊपर से होता हुआ डॉली की नंगी बाज़ू के ऊपर रख दिया और आहिस्ता-आहिस्ता उसकी बाज़ू को सहलाने लगा।
मेरी पीठ चेतन की तरफ ही थी.. इसलिए मुझे उसका लंड अकड़ता हुआ महसूस हो रहा था.. जो कि मेरी गाण्ड में चुभ रहा था।
अचानक ही डॉली ने करवट बदली और दूसरी तरफ मुँह करके लेट गई। चेतन ने फ़ौरन ही अपना हाथ पीछे खींच लिया.. लेकिन ज्यादा देर तक चेतन खुद को ना रोक सका।
अब डॉली की कमर हमारी तरफ थी, उसकी शर्ट के नीचे पहनी हुई उसकी काली ब्रेजियर साफ़ नज़र आ रही थी।
थोड़ी देर इन्तजार करने के बाद चेतन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और अपनी एक उंगली डॉली की ब्रेजियर के हुक पर फेरने लगा।
यह सब देख कर मेरी चूत गीली होती जा रही थी।
चेतन डॉली की ब्रेजियर के हुक्स और स्ट्रेप्स पर अपनी ऊँगली फेरने लगा और धीरे-धीरे उनको महसूस कर रहा था।
चेतन का खड़ा हुआ लंड पीछे से मेरी गाण्ड में घुस रहा था। अब मुझसे भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मैं चेतन को थोड़ा और तड़फाना चाहती थी और उसे यहीं तक ही रोक लेना चाहती थी इसलिए मैंने नींद का नाटक ही करते हुए करवट ली और चेतन से लिपट गई।
अब मैं चेतन को आवाज करते हुए चूमने लगी.. चेतन भी अब जल्दी से सीधा होकर सम्भल कर लेट गया।
तभी डॉली उठी और कमरे से बाहर निकल गई जिससे मुझे समझ आ गया कि ये भी जागते हुए ही चेतन का हाथ महसूस कर रही थी।
कुछ देर बाद में उठने के बाद मैं जब रसोई में गई तो डॉली भी वहीं थी।
मुझे देख कर बोली- भाभी यह आप कमरे में क्या हरकतें कर रही थीं?
मतलब अब वो ये जाहिर कर रही थी या शायद उसे नहीं मालूम था कि उसकी ब्रेजियर में कौन ऊँगली कर रहा था।
मैंने भी हँसते हुए उसकी बात को घुमा दिया और बोली- मैं कर रही थी या तुम्हारे भैया.. वो ही तो मुझे तंग कर रहे थे।
मैंने जानबूझ कर ऐसी बात बोली ताकि यह साफ़ हो सके कि वो किसके बारे में ये सब कह रही थी।
डॉली भी समझ गई और उसने भी बात को घुमाते हुए थोड़ा शरमाती हुए बोली- लेकिन आपको इतना शोर तो नहीं मचाना चाहिए था ना..
मैं हँसने लगी और अब मैंने भी बात को अपने ऊपर ही लेने के इरादे से कहा- यार तुझे क्या पता.. मियाँ-बीवी में इस तरह के खेल चलते ही रहते हैं.. ऐसे ना करो तो ज़िंदगी में मज़ा ही कहाँ आता है।
डॉली- लेकिन भाभी.. आपको कुछ तो ख्याल करना चाहिए ना..
मैं हंस कर बोली- यार तेरे भैया ने ख्याल करने का मौका ही नहीं दिया.. इसलिए तो मैं चिल्ला रही थी और तुझे अपनी मदद के लिए बुला रही थी.. लेकिन तूने भी आकर मेरी कोई मदद नहीं की और वैसे ही भाग गई।
डॉली शर्मा कर बोली- मैं भला क्या मदद कर सकती थी आपके.? आप दोनों मियां-बीवी का मामला है.. मैं क्यों बीच में रुकावट बनती।
हम दोनों हँसने लगे और फिर चाय बना कर रसोई से बाहर आ गए और हम तीनों चाय उसी बेडरूम में बैठ कर पीने लगे।
उस रात जब हम लोग सोने के लिए लेटे.. तो जल्दी ही चेतन ने दूसरी तरफ करवट ले ली और बोला- अब मैं सो रहा हूँ..
मैं भी खामोशी से डॉली की तरफ करवट लेकर लेट गई।
थोड़ी देर हम दोनों ने बातचीत की और फिर हमारी भी आँख लग गई। अभी मेरी आँख लग ही रही थी कि कुछ पलों के बाद.. मुझे थोड़ी सी हलचल अपने पीछे महसूस हुई।
उसी के साथ.. चेतन का बाज़ू मेरे ऊपर आ गया। मैंने अपनी आँखें थोड़ी सी खोलीं तो देखा कि चेतन आहिस्ता-आहिस्ता डॉली के कन्धों पर हाथ फेर रहा था।
मैं मन्द मन्द मुस्करा दी और उसकी हरकतों को देखने लगी, नींद तो मेरी फ़ौरन ही गायब हो गई।
चेतन का हाथ आहिस्ता आहिस्ता फिसलता हुआ डॉली के कंधे से नीचे को आने लगा। जैसे ही चेतन ने डॉली की चूची को छुआ.. मेरी चूत में एक करेंट सा दौड़ गया।
बहुत ही आहिस्ता से चेतन ने अपना हाथ डॉली की चूची पर रखा और कुछ देर तक अपना हाथ वैसे ही पड़ा रहने दिया। जब उसने देखा कि डॉली के जिस्म में कोई हरकत नहीं हुई.. तो उसे यक़ीन हो गया कि वो सो रही है।
चेतन ने आहिस्ता आहिस्ता अपने हाथ को हरकत देते हुए अपनी बहन डॉली की चूची को सहलाना शुरू कर दिया।
मेरी चूत यह मंज़र देख कर गीली होती जा रही थी कि एक भाई अपनी सोई हुई बहन की चूचियों को सहला रहा है।
मैं देख रही थी कि चेतन अपने पूरे हाथ में उसका पूरे का पूरा चीकू ले लिया और अब वो आहिस्ता-आहिस्ता उसे दबा रहा था।
डॉली की छोटी सी चूची उसकी मुठ्ठी में आराम से पूरी आ रही थी.. लेकिन डॉली को शायद कोई होश नहीं था.. क्योंकि वो सोई हुई थी।
थोड़ी देर में चेतन का हाथ थोड़ा सा ऊपर को गया और उसने अपना हाथ डॉली के सीने के नंगे हिस्से पर रख दिया और अपनी उंगली आहिस्ता आहिस्ता उसकी नंगी छाती पर गले के नीचे फेरने लगा।
‘
मेरे पीछे चेतन अपनी कोहनी के बल उठ चुका हुआ था और बड़े आराम से अपनी बहन की चूचियों और जिस्म पर हाथ फेर रहा था।
कभी उसके हाथ अपनी बहन की चूचियों को सहलाने लगते और कभी उसके पेट के ऊपर हाथ फेरने लगता। फिर चेतन ने थोड़ा सा और ऊपर होकर मेरे ऊपर से झुकते हुए अपनी बहन के गाल पर एक किस कर ली, हाथ तो चेतन अपनी बहन की चूचियों और जिस्म पर घूम रहा था लेकिन वो अपना लंड मेरे अन्दर ठोकता जा रहा था।
मुझे भी इससे मज़ा ही आ रहा था।
वैसे भी पिछले कुछ रोज़ से मैं चेतन के साथ छेड़-छाड़ करके उसे उत्तेजित तो कर ही देती थी.. लेकिन उसे अपनी चूत दिए हुए मुझे 15 दिन से ऊपर हो चुके थे, इसलिए भी वो इतना बेक़ाबू हो रहा था।
डॉली की चूची दबाते दबाते शायद चेतन ने जज़्बाती होकर कुछ ज्यादा ही मसक दिया था.. जिसकी वजह से डॉली थोड़ा सा कसमासाई और फिर उसने मेरी तरफ करवट ले ली।
जैसे ही डॉली हिली तो चेतन ने फ़ौरन ही अपना हाथ पीछे खींच लिया और दूसरी तरफ मुँह कर करते हुए लेट गया।
तभी मैंने अपनी आँखें हल्की सी खोल कर देखा तो देखा कि डॉली ने आहिस्ता आहिस्ता अपनी आँखें पूरी खोल ली हैं और मेरी तरफ देख रही है।
फिर उसने थोड़ा सा ऊपर होकर अपने भाई की तरफ देखा और धीरे से मुस्करा कर फिर लेट गई, उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी और आँखें खुली हुई थीं।
मैं दिल ही दिल मैं सोच रही थी कि क्या डॉली को भी पता था कि उसका भाई उसकी चूचियों को दबा रहा है।
अगर ऐसा था तो उसने कोई ऐतराज़ क्यों नहीं किया और अगर उसने सब कुछ जानते हुए भी कोई ऐतराज़ नहीं किया तो फिर तो यह मेरी बहुत बड़ी कामयाबी थी कि मैं दोनों बहन-भाई को इतना क़रीब लाने में कामयाब हो गई थी और मैं अपनी इस कामयाबी पर दिल ही दिल में बहुत खुश हो रही थी।
अगली शाम डॉली ने मेरी कहने पर एक स्किन कलर की टाइट्स और टी-शर्ट पहन ले. टी-शर्ट उसके चूतड़ों को आधा ढांप रही थी लेकिन उसकी जाँघों की पूरी पूरी शेप और टाँगें उस टाइट्स में बिल्कुल साफ़ दिख रही थीं।
डॉली बहुत ही सेक्सी लग रही थी.. जैसे ही चेतन ने उसे देखा तो उसकी चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई।
डॉली की नज़रें उससे टकराईं तो डॉली ने शर्मा कर अपना सिर झुका लिया। मैं देख रही थी कि जिधर-जिधर भी डॉली जा रही थी.. चेतन की नजरें उसी के जिस्म पर रह रही थीं। ऊपर टाइट टी-शर्ट में उसकी चूचियाँ बिल्कुल फंसी हुई थीं और उसका गला भी थोड़ा डीप था.. जिसकी वजह से उसका खूबसूरत गोरा-चिकना सीना भी काफ़ी खुला सा नज़र आ रहा था। लेकिन चूचियाँ या क्लीवेज तो नहीं दिख सकता था। सोने के वक़्त तक भी डॉली अपने जिस्म की जलवे बिखेरती रही और अपने भाई पर अपनी हुस्न की बिजलियाँ गिराती रही।
रोज़ की तरह आज भी सोने के लिए मैं और चेतन पहले ही कमरे में आ गए।
अब जो आग डॉली ने अपने भाई के जिस्म और दिमाग में लगाई थी.. उसकी वजह से चेतन ने अन्दर आते ही मुझे खींचा और अपने सीने से लगा लिया।
मैंने भी कोई मज़ाहमत नहीं की और उसे और भी गर्म करने के लिए उससे लिपट गई और उसके बोसे का जवाब बोसे से देने लगी।
नीचे मैंने उसके बरमूडा में हाथ डाला और उसका लंड पकड़ लिया.. जो धीरे-धीरे मेरे हाथ में फूलने लगा। मैं भी उसके लण्ड को अपने हाथ में दबाते हुए आगे-पीछे करते हुए और भी खड़ा करने लगी।
चेतन बोला- जान जल्दी से एक बार चोद लेने दो ना..
मैंने कहा- नहीं… अभी नहीं.. तुम्हारी बहन ने आ जाना है।
चेतन बोला- नहीं.. तुम थोड़ी देर के लिए सिटकनी लगा कर आओ।
मैंने उसके लण्ड को सहलाते हुए कहा- नहीं.. जब वो सो जाएगी.. तो तुम खामोशी से जो भी करना चाहो.. मेरे पीछे लेटे-लेटे कर लेना।
आख़िर में चेतन मान गया।
तभी दरवाज़ा खुला और डॉली अन्दर आई.. तो उसे देख कर हम दोनों अलग हो गए। जैसे ही डॉली बिस्तर के क़रीब आई.. तो मैं फ़ौरन ही उसकी जगह पर होकर लेट गई और बोली- डॉली आज तुम दरम्यान में सोओगी।
डॉली चौंकी और हैरान होकर बोली- लेकिन क्यों भाभी?
चेतन भी हैरत से मेरी तरफ देख रहा था।
मैं मुस्कुराई और हँसते हुए बोली- तुम्हारे भैया.. मुझे बहुत तंग करते हैं.. इसलिए आज मैं इस तरफ सोऊँगी और तुमको दरम्यान में सोना पड़ेगा।
‘
डॉली का चेहरा सुर्ख हो गया.. लेकिन मैंने उसका हाथ पकड़ कर उसे घसीटा और उसे अपने और चेतन के दरम्यान अपनी वाली जगह पर लिटा दिया।
डॉली के चेहरे पर ऊहापोह और घबराहट के साथ शरम के आसार साफ़ नज़र आ रहे थे.. और वो मेरी तरफ देख रही थी।
मैं मुस्करा कर बोली- थैंक्यू माय डियर ननद..
मैंने महसूस किया था कि चेतन के चेहरे पर पहले वाली मायूसी के बाद अब थोड़ी उत्तेजना आ गई थी।
आज इस नई स्थितियों की वजह से हम में से कोई भी बोल नहीं रहा था।
मैंने ही थोड़ी सी बातें कीं और उन दोनों ने ‘हूँ.. हाँ..’ में जवाब दिया।
फिर मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
हमारा बिस्तर इतना बड़ा नहीं था कि हम सब लोग एक-दूसरे से दूर-दूर होकर सो सकें.. इसलिए डॉली का जिस्म अपने भाई के जिस्म से टच कर रहा था।
मेरी देखते ही देखते डॉली ने भी आँखें बंद कर लीं और शायद इस सारी सूरते-हाल को हज़म करने की कोशिश करते हुए सोने लगी।
लेकिन उसके जिस्म से टच होता हुआ उसके भाई का जिस्म भी उसे शायद बेचैन कर रहा था।
ज़ाहिर है कि मैं सो नहीं रही थी और चेतन के हरकत में आने का इन्तजार कर रही थी। कुछ ही देर गुज़री कि वो ही हुआ जिसका मुझे इन्तजार था।
चेतन ने अपनी बहन की तरफ करवट ली और आहिस्ता से अपना हाथ उठा कर डॉली के पेट पर रख दिया।
मेरी नज़र फ़ौरन ही डॉली के चेहरे की तरफ गई। मैंने महसूस किया कि उसके चेहरे के हाव-भाव एकदम से थोड़े से चेंज हो गए.. लेकिन फ़ौरन ही उसने दोबारा से अपनी चेहरे को सपाट कर लिया। अब वो खुद को संम्भालते हुए दोबारा से आँखें बंद करके पड़ी रही।
मेरे जिस्म के पास पड़े हुए उसके हाथ में मुझे थोड़ी सी हरकत सी भी फील हुई थी.. जैसे की एकदम किसी के छूने से वो उसका जिस्म काँप उठा हो।
मैं दिल ही दिल में मुस्करा उठी।
चेतन का हाथ कुछ देर के लिए एक ही जगह पर डॉली के पेट के ऊपर पड़ा रहा। फिर आहिस्ता आहिस्ता उसका हाथ हिलने लगा और उसने अपने हाथ को अपनी बहन के पेट के ऊपर हौले-हौले हरकत देते हुए उसके पेट को उसकी शर्ट के ऊपर से सहलाना शुरू कर दिया।
चेतन का हाथ आहिस्ता आहिस्ता अपनी बहन के पेट पर हरकत कर रहा था और उसके चेहरे के हाव-भाव बदल रहे थे.. लेकिन उसकी आँखें अभी भी बंद थीं।
पेट पर हाथ फेरने की बाद चेतन ने अपना हाथ थोड़ा सा नीचे लिए जाते हुए डॉली की जांघ पर रख दिया। डॉली की जाँघें उसकी चुस्त लैगी में फंसी हुई थीं।
राज शर्मा स्टॉरीज पर पढ़ें हजारों नई कहानियाँ !
डॉली के जिस्म से चिपकी हुई उसकी चमड़ी के रंग की लेग्गी ऐसी ही लग रही थी.. जैसे कि उसकी चमड़ी ही हो। चेतन ने अपना हाथ आहिस्ता आहिस्ता डॉली की जाँघों पर फिराना शुरू कर दिया और उसकी जाँघों को सहलाने लगा।
चेतन का हाथ नीचे उसके घुटनों तक जाता और फिर ऊपर को आ जाता। उसे अपनी बहन की जाँघों पर हाथ फेरने में शायद बहुत ही अच्छा लग रहा था।
मैंने भी महसूस किया कि वो थोड़ा सा ऊपर को उठा और उसने बहुत ही आहिस्ता से डॉली के गाल की तरफ अपनी मुँह कर बढ़ाया और उसके गोरे-गोरे गाल को चूम लिया।
मैं यह सब कुछ अपनी अधखुली आँखों से देख रही थी। एक भाई को इस तरह से अपनी बहन के जिस्म से मजे लेते हुए और उसे किस करते हुए देख कर मेरी अपनी चूत भी गीली हो रही थी।
अब मेरा ख्वाहिश हो रही थी कि जल्दी से चेतन अपनी बहन की चूत को छुए लेकिन मुझे लग रहा था कि वो इस हद तक जाने से डर रहा है।
चेतन ने थोड़ा सा ऊपर होकर अब मेरी तरफ देखा और फिर उसका हाथ अपने पजामे की ऊपर से ही अपने खड़े हुए लंड पर चला गया। उसने अपने लंड को अपने हाथ में पकड़ लिया और आहिस्ता आहिस्ता अपने लंड को डॉली की रानों के साथ रगड़ने लगा।
मेरा दिल कर रहा था कि जल्दी से अपनी चूत को अपने हाथ से सहलाते हुए उसे ठंडा करना शुरू करूँ.. लेकिन मैं चेतन के सामने खुद को एक्सपोज़ करके उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी कि उसे पता चले कि उसकी बीवी को पता चल गया है कि वो अपनी ही सग़ी बहन को इस तरह से छू रहा है।
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एक बात का मुझे थोड़ा-थोड़ा यक़ीन होता चला जा रहा था कि हो ना हो.. डॉली भी जाग रही है और अपने भाई के अपने जिस्म पर टच करने का मज़ा ले रही है।
वो भी शायद अपनी झिझक और शर्म की वजह से ही उसे रोक नहीं पा रही थी।
जब डॉली को अहसास हुआ कि उसका भाई हद से गुज़रता जा रहा है.. तो उसने इससे बचने के लिए एकदम अपना रुख़ बदला.. और मेरी तरफ करवट ले ली। अब उसने मेरे ऊपर अपनी बाँहें डाल लीं।
इस अचानक हुई हरकत से चेतन भी थोड़ा बौखला गया और फ़ौरन ही पीछे हट कर लेट गया।
लेकिन मुझे पता था कि इस वक़्त चुस्त लैगी में डॉली के खूबसूरत चूतड़ चेतन के बिल्कुल सामने होंगे और उसके लिए खुद को रोकना मुश्किल होगा।
उसे छूने से जैसे ही डॉली ने मुझे हग किया.. तो मुझे उसका नर्म ओ मुलायम जिस्म इस क़दर प्यारा लगा कि मैंने भी फ़ौरन ही उसे हग कर लिया और खुद भी उससे चिपक गई।
अब चेतन के लिए कुछ और कर पाना मुश्किल था.. शायद इसलिए उसने भी जल्दी से दूसरी तरफ करवट ले ली और जल्द ही सो गया।
अगले दिन जब मैं सुबह नाश्ता बना रही थी तो डॉली रसोई में आई।
मैंने ऐसे ही उसे तंग करने के लिए कहा- रात को कब सोई थी तुम?
मेरी बात सुन कर डॉली घबरा गई और थोड़ा हकलाकर बोली- भाभी… आपके साथ ही तो आँख लग गई थी मेरी.. कककक.. क्यों पूछ रही हो आप यह?
मैंने उसे आँख मारी और बोली- इसलिए पूछ रही हूँ कि तेरे भैया ने तुझे तो तंग नहीं किया रात को?
मेरी बात सुनते ही डॉली के चेहरे का रंग ही उड़ गया और उसकी आँखें फैल गईं।
फिर वो बोली- भाभी भला मुझे भैया क्यों तंग करेंगे?
मैं मुस्कराई और उसके गोरे-गोरे चिकने लाल होते हुए गाल पर एक चुटकी लेते हुए बोली- इसलिए तो मैंने तुझे दरम्यान में अपनी जगह पर सुलाया था.. मैं होती तेरी जगह.. तो सारी रात ही मुझे तंग करते रहते तेरे भैया..
‘
डॉली कुछ सोच मैं डूबी हुई थी जैसे याद कर रही हो कि कैसे उसके भाई ने रात को उसके जिस्म को टच किया था।
मैंने उससे कहा- अरे किस सोच में डूब गई हो.. तैयारी करो.. कॉलेज नहीं जाना क्या?
मेरी बात सुन कर उसे तो जैसे मौका मिल गया तो वो फ़ौरन ही रसोई से भाग गई। नाश्ते की टेबल पर दोनों आए तो डॉली की नजरें आज भी नीचे को झुकी हुई थीं और हमेशा की तरह चेतन की नज़र उसके जिस्म पर ही बहक रही थी।
डॉली ने अपना कॉलेज का सफ़ेद यूनिफॉर्म पहना हुआ था और शर्ट के नीचे उसने ब्लैक ब्रेजियर पहन रखी थी। अभी उसने दुपट्टा नहीं लिया हुआ था।
जब वो उठ कर रसोई की तरफ गई तो चेतन की नज़र फ़ौरन ही उसकी पीछे गई उसकी बैक पर उसकी ब्लैक ब्रा की स्ट्रेप्स और हुक्स पर गई.. जो बिल्कुल साफ़ नज़र आ रही थी।
चेतन की प्यासी नजरें देख कर मुझे बहुत मज़ा आ रहा था। जब वो दोनों बाइक पर जाने लगे.. तो मैं हमेशा की तरह उन दोनों को सी-ऑफ करने की लिए गेट पर ही थी।
मैंने महसूस किया कि डॉली आज अपने भाई के पीछे बैठती हुई थोड़ा झिझक रही थी। ज़ाहिर है कि उसे याद आ गया था कि रात को उसका भाई उसके जिस्म को कैसे-कैसे छू रहा था।
मैं उन दोनों की हालत पर मुस्करा रही थी। फिर आख़िर डॉली चेतन के पीछे बैठे और दोनों निकल गए।
दोपहर को चेतन से पहले ही डॉली जल्दी कॉलेज से वापिस आ गई। आज मैंने सोच रखा था कि इसे इसके भाई की सामने कुछ और एक्सपोज़ करना है। इसलिए जैसे ही वो अपने कमरे में अपना यूनिफॉर्म चेंज करने की लिए जाने लगी.. तो मैंने उसको कहा- ठहरो.. मैं अभी आती हूँ।
मैं अपने कमरे में गई और उसके भाई का एक बरमूडा और अपनी एक स्लीबलैस टी-शर्ट उठा लाई और बोली- डॉली.. आज से तुम घर में यह भी पहना करोगी.. देखो ना कितनी गर्मी है..
डॉली ने हैरत से उस बरमूडा की तरफ देखा और बोली- भाभी मैं यह कैसे पहन सकती हूँ.. वो भी भैया की सामने।
मैं बोली- अरे इसमें शरमाने वाली कौन सी बात है.. देखो तो मैंने भी तो रात से यही पहना हुआ है और वैसे भी हमारे घर पर कौन से कोई मेहमान आते हैं जो हमें फिकर होगी।
डॉली- लेकिन.. भाभीईई..
मैं- लेकिन वेकिन कुछ नहीं.. बस मुझे नहीं पता.. अगर नहीं पहना ना मेरी मर्ज़ी के मुताबिक़.. तो इसे फेंक दो सोफे पर.. और अपनी मर्ज़ी का पहन लो जो पहनना है.. लेकिन फिर मुझसे बात ना करना तुम..
यह कह कर मैं मुड़ी और रसोई की तरफ बढ़ी।
मैंने भावुक होते हुए अपना तीर चलाया और मेरी उम्मीद के मुताबिक़ मेरा तीर लगा भी ठीक निशाने पर..
डॉली ने फ़ौरन ही आगे बढ़ कर मुझे पीछे से हग कर लिया और अपनी बाँहें मेरे गले में डाल कर पीछे से अपना मुँह आगे लाते हुए मेरे गाल को किस किया और बोली- मैं अपनी प्यारी सी भाभी को कैसे नाराज़ कर सकती हूँ.. अरे भाभी तू कहे तो मैं कुछ भी नहीं पहनूंगी.. लेकिन तू मुझसे नाराज़ ना होना।
मैंने मुस्करा कर डॉली की बालों में हाथ फेरा और बोली- यह हुई ना मेरी प्यारी सी ननद वाली बात.. सच में डॉली तू तो बहुत ही प्यारी और मासूम है.. हाँ.. तू मेरी मासूम सी ननद है मेरी जान..
मैं दिल ही दिल में अपने शैतानी खेल पर मुस्कराती हुई रसोई में आ गई और डॉली चेंज करने के लिए अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
कुछ देर के बाद डॉली अपने कमरे से मेरा दिया हुआ लिबास पहन कर मेरे पास रसोई में आई तो बहुत ही शर्मा रही थी। मैंने उसे देखा तो हमेशा की तरह उससे मज़ाक़ करने की बजाए उसको उत्साहित करने लगी कि तुम सच में बहुत ही प्यारी लग रही हो।
डॉली ने अपने भाई वाला जो बरमूडा पहना था.. वो उसके घुटनों तक आ रहा था.. उससे नीचे उसकी गोरी-गोरी टाँगें बिल्कुल नंगी थीं.. बिल्कुल ही साफ़ गोरी-गोरी चिकनी टाँगें जिन पर एक भी बाल नहीं था.. मतलब किसी को भी उसकी चिकनी टाँगें देखते साथ ही मज़ा आ जाए।
ऊपर से उसने मेरी स्लीवलैस शर्ट पहन ली थी, यह शर्ट उसको काफ़ी ढीली थी, उसकी दोनों बाँहें बिल्कुल नंगी थीं, बिल्कुल गोरे और चिकने कन्धों पर उसकी ब्रेजियर की तनियाँ एकदम साफ़ नज़र आ रही थीं।
स्लीवलैस शर्ट होने की वजह से डॉली ने प्लास्टिक की पारदर्शी स्ट्रेप्स वाली ब्रेजियर पहन ली थी। ताकि कम से कम नज़र आ सकें… लेकिन कन्धों पर सब मर्दों की नजरें तो ब्रा की स्ट्रेप्स पर ही होती है ना..
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शर्ट की स्ट्रेप्स तो चौड़ी थीं.. लेकिन फिर भी थोड़ी सी भी चलने-फिरने के साथ ही वो पीछे को हट जाती थीं और ब्रेजियर की स्ट्रेप्स नजर आने लगती थीं।
मैंने बिना कुछ ज्यादा बात किए डॉली को काम पर लगा दिया.. ताकि उसे भी कोई अहसास ना हो।
काम करते हुए डॉली आहिस्ता से बोली- भाभी वो भैया.. मेरा मतलब है कि वो भैया नाराज़ हो गए तो.. मुझे ऐसी ड्रेस में देख कर.. मेरा मतलब था!
मैं- अरे पगली तू तो इतनी प्यारी लग रही है.. तो तेरा भाई तुझे देख कर क्यों नाराज़ होगा.. कोई भी भाई अपनी बहन पर नाराज़ नहीं होता।
शाम में जब चेतन घर आया तो खाने की टेबल पर पहुँचने तक उसकी मुलाक़ात डॉली से नहीं हो सकी। चेतन टेबल पर बैठा था और जैसे ही डॉली खाने की ट्रे लेकर आई तो चेतन की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उसकी नजरें अपनी बहन की नंगी टाँगों पर जमी हुई थीं। जो कि उसके बरमूडा के नीचे बिल्कुल नंगी थीं।
मैं चेतन की नज़रों को ही देख रही थी लेकिन शो ऐसा ही कर रही थी। जैसे कि मैं उन लोगों को नहीं देख रही होऊँ।
डॉली बुरी तरह से शर्मा रही थी और चेतन की नजरें न चाहते हुए भी अपनी बहन के जिस्म पर से नहीं हट पा रही थीं। कभी वो उसकी नंगी बाँहों को देखता और कभी चिकनी टाँगों को देखने लगता।
मैंने देखा कि डॉली के कन्धों पर उसकी ब्रेजियर के स्ट्रेप्स भी साफ़ नज़र आ रहे हैं।
डॉली ने बड़ी ही मुश्किल से खाना खाया.. मैं इधर-उधर की बातों से उसकी तवज्जो हटाने की कोशिश करती रही लेकिन वो अपनी ड्रेस में बहुत ही परेशानी महसूस कर रही थी।
खाने के बाद चेतन ने कुछ देर बैठ कर टीवी देखा.. रात हो रही थी तो वो अपने बेडरूम में सोने चला गया।
मैंने रसोई से सामान समेटा और फिर चाय बना कर मैंने और डॉली ने पी। चाय पीने के बाद मैं उससे बोली- आओ एसी में सोने चलते हैं..
डॉली ड्रेस चेंज करने की कहना चाहती थी लेकिन कह ना पाई और खामोशी से मेरे साथ हमारे बेडरूम में आ गई।
हम दोनों कमरे में आए तो चेतन सो रहा था.. उसकी हल्के-हल्के खर्राटे कमरे में गूँज रहे थे।
लेकिन मुझे शक़ था कि वो सो नहीं रहा होगा.. लाजिमी है कि वो अपनी बहन के आने का इन्तजार कर रहा होगा।
कमरे में आकर मैंने दरवाजा बन्द किया और बिस्तर पर जाने की बजाए टॉयलेट में चली गई.. ताकि डॉली बिस्तर पर आराम से लेट सके और कुछ दिमाग की उलझन से मुक्त हो सके।
थोड़ी देर बाद मैं बाथरूम से बाहर निकली तो डॉली अपनी ही वाली तरफ को लेटी हुई थी। मैंने बिस्तर के क़रीब आकर उसे आगे को होने को कहा.. पहले तो वो चुप रही.. फिर आहिस्ता से अपने भैया की तरफ सरक़ गई।
मुझे खुशी इस बात की थी कि अगर वो कल रात जाग रही थी और उसे अपने भाई के हाथों से खुद के जिस्म को छूने का पता चला था.. तो उसके बावजूद भी उसने अपने भाई के साथ लेटना क़बूल कर लिया था। शायद उसे भी इस खेल में कुछ मज़ा आने लगा था।
ज़ाहिर है कि वो एक नौजवान झूबसूरत लड़की थी.. जिसे आज तक कभी भी किसी मर्द ने नहीं छुआ था और जब कोई उसे छू रहा था.. तो उसे उसका छूना अच्छा लग रहा था।
अब उसका बदन इस चीज़ को मानने के लिए तैयार नहीं था कि वो उसका भाई है.. तो यह गलत है।
लेकिन उसका दिमाग उसे अभी भी समझाता था.. जिसकी वजह से उसके अन्दर अभी भी थोड़ी झिझक बाकी थी।
दूसरी वजह उसकी उस झिझक का कारण मैं थी। उसके ख्याल में मुझे इन सब बातों कुछ भी इल्म नहीं था.. और अगर इल्म हो जाएगा.. तो ऐसा लगता था कि इस बात का मैं बहुत बुरा मान जाऊँगी.. कि वो मेरे पति के साथ जिस्मानी मजा लेना चाह रही है।
हालांकि उसे इस बात का इल्म नहीं था कि यह सारा गेम मेरा ही था.. जिस पर वो दोनों बहन-भाई ना चाहते हुए भी आगे बढ़ रहे थे और एक-दूसरे के क़रीब आते जा रहे थे.. बिना यह सोचे समझे कि यह एक गुनाह है.. और गलत बात है।
चेतन दूसरी तरफ मुँह करके लेटा हुआ था और डॉली बिल्कुल सीधी.. अपनी पीठ के बल लेटी हुई थी।
मैंने डॉली की तरफ करवट ली और उससे बातें करने लगी। हम दोनों ने बरमूडा ही पहना हुआ था और दूसरी तरफ चेतन ने भी अपना शॉर्ट्स पहन रखा था, हम दोनों की नंगी टाँगें एक-दूसरे से टच हो रही थीं।
मैंने अपनी टाँग ऊपर करके डॉली की टाँग पर रखी और उसकी टाँग को आहिस्ता-आहिस्ता सहलाते हुए बोली- डॉली तुम्हारा जिस्म बहुत ही मुलायम है।
डॉली शरमाई और बोली- भाभी आप का भी तो ऐसा ही है..
मैं- डॉली जो भी लड़का तुम्हें हासिल करेगा ना.. वो बहुत ही लकी होगा..!
डॉली शर्मा कर बोली- क्या मतलब भाभी?
मैं- अरे तेरे जैसे खूबसूरत लड़की जिसको अपने नीचे लिटाने को मिलेगी.. उसकी तो समझो कि लॉटरी ही निकल पड़ेगी।
डॉली मेरी बात सुन कर शर्मा गई। मैं ऐसी बातें इसलिए कर रही थी ताकि अगर चेतन सो नहीं रहा है.. तो वो भी मेरी बातें सुन सके और मैं उसको उत्तेजित करने की लिए ऐसी बातें कर रही थी।
ऐसी उत्तेजित बातें करते समय मेरी खुद की चूत में रस निकलने लगा था।
ऐसी ही थोड़ी देर तक बातें करने के बाद मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं.. जैसे कि मैं सो गई हूँ। काफ़ी देर तक खामोशी रही.. मुझे नींद भला कहा आने थी। थोड़ी सी आँख खोल कर मैंने देखा तो डॉली की आँखें भी बंद थीं।
ऐसी ही क़रीब-क़रीब एक घंटा गुज़र गया.. तो मुझे डॉली की दूसरी तरफ चेतन हिलता हुआ महसूस हुआ। उसने जैसे नींद में ही करवट ली और सीधा अपनी बाज़ू और टांग को अपनी बहन के ऊपर रख दिया।
मैंने देखा की डॉली ने फ़ौरन ही आहिस्ता से आँखें खोलीं और सबसे पहले अपने भाई की तरफ देखा और फिर मेरी तरफ देख कर मेरा पक्का किया कि मैं सो रही हूँ या जाग रही हूँ।
अपनी तसल्ली करके डॉली ने आराम से अपनी आँखें बंद कर लीं। मैं हैरान हुई कि उसने अपने भाई का बाज़ू या टांग हटाने की कोई कोशिश नहीं की। उसके भाई की बाज़ू उसकी चूचियों से बिल्कुल नीचे लगी पड़ी थी और टांग उसकी जाँघों पर थी।
मैं समझ गई कि डॉली भी आज मजे लेने के चक्कर में है।
अब मेरी तरह से डॉली भी सोती हुई बनी हुई थी.. लेकिन उसे यह नहीं पता था कि मैं जाग रही हूँ।
कुछ ही देर गुज़ारने के बाद मुझे चेतन के हाथ में हल्की-हल्की हरकत महसूस हुई। चेतन का अपनी बहन के जिस्म के ऊपर रखा हुआ हाथ आहिस्ता आहिस्ता हरकत में आ रहा था।
उसने आहिस्ता आहिस्ता अपना हाथ अपनी बहन की टी-शर्ट के ऊपर से ही उसके पेट पर फेरना शुरू कर दिया।
जब उसे महसूस हुआ कि उसकी बहन के जिस्म में कोई भी हरकत नहीं हो रही है.. तो उसको यक़ीन हो गया कि वो सो रही है.. अब उसकी हिम्मत बढ़ चली और उसके हाथ का डॉली के सीने की पहाड़ियों पर चढ़ने का सफ़र शुरू हुआ।
चेतन ने आहिस्ता आहिस्ता अपने हाथ से डॉली की चूचियों के निचले हिस्से को छूना शुरू कर दिया। चेतन का हाथ अपनी बहन की चूचियों को नीचे से छू रहा था।
आहिस्ता आहिस्ता उसने अपने हाथ को हरकत देते हुए डॉली की चूचियों की ऊपर रख दिया और हाथ ऊपर रख कर वहीं पर कुछ देर के लिए ठहर गया।
जैसे वो डॉली की प्रतिक्रिया देखना चाह रहा हो।
मुझे मज़ा आ रहा था.. लेकिन उससे बढ़ कर डॉली के संयम पर हैरत हो रही थी कि कैसे वो खामोश अपने चेहरे के हाव-भाव को कंट्रोल करके लेटी हुई है।
चेतन ने आहिस्ता आहिस्ता अपने हाथ को डॉली की चूचियों पर गोल-गोल घुमाना शुरू कर दिया।
एक भाई के हाथ के नीचे उसकी बहन की चूची देख कर मेरी तो अपनी चूत गीली होने लगी थी। मेरा दिल कर रहा था कि मैं अपने हाथ अपनी चूत पर ले जाऊँ और अपनी चूत को सहलाने लगूँ लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकती थी।
डॉली ने जो शर्ट पहन रखी थी.. वो स्लीबलैस थी और उसका गला भी काफ़ी बड़ा था.. जिसमें उसकी सीने का काफ़ी हिस्सा साफ़ नंगा नज़र आता था।
दोनों चूचियों पर हाथ फेरते हुए चेतन के हाथ आहिस्ता आहिस्ता डॉली के नंगे सीने पर आ गए और उसने अपनी उंगलियों को अपनी बहन के नंगे और गोरे-गोरे उठे हुए सीने पर रख दिए।
अब आहिस्ता आहिस्ता वो अपना हाथ अपनी बहन के गले के नीचे छातियों पर फेरने लगा।
चेतन का हाथ आहिस्ता-आहिस्ता डॉली के सीने पर फिसलता हुआ मेरी तरफ को आने लगा और उसने अपना हाथ डॉली की शर्ट की स्ट्रेप्स को नीचे को सरका दिया और फिर वापिस अपना हाथ ऊपर की तरफ ले गया।
डॉली के सीने पर हाथ फेरते हुए उसका हाथ आहिस्ता आहिस्ता नीचे को जाने लगा।
अब इस तरह लेटने की वजह से डॉली की चूचियों का क्लीवेज भी साफ़ नज़र आ रहा था। चेतन ने अपनी एक उंगली उस खूबसूरत क्लीवेज में घुसेड़ दी और आहिस्ता आहिस्ता उसे आगे-पीछे करने लगा।
चेतन की एक टाँग अभी तक डॉली की टाँगों पर ही थी।
अपनी बहन की चूचियों की क्लीवेज में कुछ देर अपनी उंगली फेरने के बाद मेरे पति ने अपने हाथ की बाक़ी उंगलियां भी आहिस्ता आहिस्ता डॉली की टी-शर्ट के अन्दर को घुसेड़ना शुरू कीं और अपना पूरा हाथ डॉली की चूचियों पर ले गया।
अभी शायद वो डॉली की चूचियों पर उसकी ब्रा की ऊपर से ही हाथ फेर रहा था। उसका हाथ डॉली की ब्रेजियर के ऊपर से ही उसकी चूचियों को छू रहा था।
चेतन के हाथ डॉली की नंगी चूचियों को भी छू रहे थे.. जो कि उसकी ब्रा के आधे कप में से बाहर निकल रही थीं।
मेरी नज़र डॉली के चेहरे की तरफ गई.. तो उसकी आँखें हल्की-हल्की सी हिल-डुल रही थीं.. जैसे की वो खुद को पूर सुकून में रखने की कोशिश कर रही हो।
उस अँधेरे कमरे में जहाँ सिर्फ़ एसी की जलते-बुझते नंबर्स की बहुत ही मद्धिम सी रोशनी फैली हुई थी। उस रोशनी में कोई भी किसी की चेहरे के हाव-भाव नहीं देख सकता था। किसी को नहीं पता था कि दूसरा जाग रहा है.. या सो रहा है।
हर कोई दूसरी को सोता हुआ ही समझ रहा था। हम तीनों के तीनों उस बिस्तर पर एक-दूसरे के क़रीब लेटे हुए भी जाग रहे थे लेकिन चेतन समझ रहा था कि मैं और डॉली दोनों सो रहे हैं।