माँ का दुलारा 1

माँ की चुदाई

मेरा और मा का संभोग शुरू होकर एक साल होने को आ गया था. एस.एस.सी की
फाइनल परीक्षा चल रही थी इसलिए चुदाई भी मा ने कम कर दी थी कि मेरी
पढ़ाई मे खलल न पड़े. बस रात को एक बार वह मुझे चोदने देती. मेरे
करियर के बारे मे वह बहुत सावधानी बरतती थी और मैं भी उसकी बात
मान कर पढ़ाई करता था. मा अब मेरी सब कुछ थी, मेरी मा, मेरी प्रेमिका,
मेरी देवी, मेरी मालकिन और मैं उसका पुत्र, गुलाम, पुजारी और प्रेमी था.
मेरी फरमाइश पर आज कल मा ने झान्टो को शेव करना बंद कर दिया था.
मुझे उसकी चिकनी बुर भी अच्छी लगती थी. पर मन होता था कि उसकी घनी
झान्टो मे मूह छुपा कर मा की बुर चूसने का मज़ा भी लेलू. मा ने झान्टे
काटना बंद कर दिया और एक महीने मे उसकी इतनी घनी झाँटे हो गयी जैसी
इंटरनेट पर ‘हेरी’ साइट मे दिखाते है. मैं तो नहाते समय वो गीली झाँटे मूह
मे लेकर उनसे टपकता पानी चुसता था. मूह मे भरकर चबा डालता था.
ऐसा करने मे मा की बुर का एकाध बाल मूह मे आ जाता था, वह भी मुझे
अच्छा लगता था.
कुछ दिनों से मा थोड़ी परेशान लगती थी. रात को भी अक्सर देर से आती थी.
मैने पूछा तो कुछ बोली नही, बस कह दिया कि काम ज़्यादा हो गया है. मा को
कंपनी के मॅनेजिंग डाइरेक्टर के स्टाफ मे ट्रांसफर कर दिया गया था. उसके
कारण काम का बोझ ज़्यादा हो गया था.

एक दिन मा ज़्यादा ही परेशान लग रही थी. रात को जब मैने उसे चोदा तो रोज की
तरह मस्त होकर नही चुदवा रही थी, बस मुझे खुश करने को आह आह कर
रही थी. उसकी आँखे खोई खोई थी जैसे कुछ और सोच रही हो. मैने झड़ने
के बाद उसे चूम कर कहा “मा, कुछ तो बात है, तुम परेशान हो, मुझे
बताओ मेरी कसम”
मा बोली “अब क्या बताउ बेटे और कैसे बताउ, तू समझ ही गया है तो बताना
पड़ेगा, वैसे बात बड़ी अजीब सी है, मुझे भी समझ मे नही आता क्या करू.
सोच रही हू कि नौकरी छोड़ कर और कोई पकड़ लू”

“क्यों मा, इतनी अच्छी नौकरी है तुम्हारी” मैने पूछा.
“हां पर वो मेरे नये बॉस है ना, मिसटर अशोक माथुर, वो …” मा चुप हो
गयी. मैं समझ गया. मन मे अजीब सा लगा. मैं कब से सोच रहा था कि शायद
मा को अब एक और पुरुष की ज़रूरत लग रही होगी. क्या मा ने भी इस बारे मे
सोचना शुरू कर दिया था! मा खूबसूरत और सेक्सी थी और ऐसा कुछ होगा
इसका अंदेशा मुझे पहले ही हो गया था. पर मेरे अलावा मा को कोई इस तरह
से देखे यह भी मुझे गवारा नही हो रहा था “क्यों उन्होने कोई हरकत की
क्या मा?”
मा हंस पड़ी “अरे वैसी कोई बात नही है. वे तो काफ़ी सीधे सादे इंसान है.
उनकी बेटी शशिकला भी वही है ऑफीस मे. सारा प्राब्लम उसी की वजह से है”
मैने मा से पूछा तो धीरे धीरे उसने सारी बात बताई. बड़ी अजीब सी पर
मजेदार बात थी. कंपनी के मॅनेजिंग डाइरेक्टर अशोक माथुर करीब सैंतीस
साल के थे. उनकी सौतेली बेटी शशिकला करीब पच्चीस साल की थी और वही
ऑफीस मे मनेजर थी. उसकी शादी नही हुई थी. मा की बॉस वही थी.
“अशोक माथुर की इतनी बड़ी सौतेली बेटी, बाप बेटी की उमर मे सिर्फ़ बारह साल का
अंतर?” मैने अस्चर्य से पूछा. मा ने बताया कि अशोक माथुर ने शशिकला
की मा ललिता से पंद्रह साल पहले प्रेमविवाह किया था. ललिता कंपनी की
मालकिन थी और अशोक माथुर से दस साल बड़ी थी. अशोक माथुर ललिता की
कंपनी मे मॅनेजर थे. उनका अफेर एक दो साल चला और उसके बाद ललिता ने
बिना किसी की परवाह किए उनसे शादी कर ली. उस समय ललिता की तेरह साल की बेटी
थी, शशिकला.

दो साल पहले ललिता की एक दुर्घटना मे मृत्यु हो गयी थी, मा की नौकरी
लगने के कुछ दिन पहले. सही मायने मे शशिकला कंपनी की मालकिन थी
पर शशिकला ने मॅनेजिंग डाइरेक्टर बनने से इनकार कर दिया था और अपने
सौतेले डॅडी को वह पद दे दिया था. बाप बेटी मे काफ़ी प्यार था, सौतेले होने
के बावजूद. वैसे असली पावर सब शशिकला के ही हाथ मे थी. उससे पूछे बिना
अशोक माथुर कुछ नही करते थे.

मा ने ये सब बताया पर मुझे अब भी समझ मे नही आ रहा था. मैने फिर
पूछा कि शशिकला का क्या प्राब्लम है? मा ने आख़िर असली बात बताई. वह अब
शरमा भी गयी थी.

“अरे वो लड़की शशिकला मेरे पीछे पड़ी है एक महीने से” मा ने कहा “अब
तक मैं दूसरे डिविषन मे थी इसलिए मेरा उससे लेना देना नही था. पर अब तो
वह मेरी बॉस है. वह पिछले एक महीने से अजीब अजीब हरकते करती है मेरे
साथ.”

“याने क्या करती है मा” अब मुझे भी उत्सुकता होने लगी थी. मैं कुछ समझ
भी रहा था और मेरा लंड यह सोच कर ही कुलबुलाने लगा था.

“मुझे लगता है कि वह लेस्बियान है. पहले तो बस मुझे घुरति थी, मेरी
नज़र बचा कर. अब सीधे मेरी ओर टक लगाकर देखती है. मुझे बार बार अपने
कमरे मे बुलाती है काम से. मैं पास खड़ी होती हू तो मेरे बदन को अनजाने
मे छू लेने का नाटक करती है. पिछले हफ्ते तो उसने एक बार बात बात मे मेरे
स्तन को छू लिया था. मैं पीछे हट गयी तो लगता है उसे गुस्सा आ गया. एक दो
दिन रूठी सी रही फिर मुझे जान बुझ कर ज़्यादा काम देने लगी कि मुझे रात को
रुकना पड़े”

मैने कहा “मा, लगता है तुम्हारी सुंदरता का जादू सिर्फ़ मर्दों पर ही नही,
औरतों पर भी होने लगा है. हो ही तुम इतनी सेक्सी. पर इसमे नौकरी छोड़ने
की क्या बात है?”

मा बोली “बेटे, मैने कभी उसे एंकरेज नही किया फिर भी वह मेरे पीछे पड़ी
है. मुझसे मीठा मीठा बोलती है, कभी मुझे अकेले मे दीदी कहती है, नज़र
गढ़ाकर मुझे अकेले मे देखती है जब मैं उसके सामने होती हू, मेरी छाती
और पेट को घुरति रहती है. अपना आकर्षण अब मुझसे छुपाने की भी
कोशिश नही करती. आज बोली कि बहुत काम है, इस शनिवार और रविवार को भी
करना पड़ेगा. फिर साजेस्ट करने लगी कि मैं शनिवार को सुबह उसके घर पर
आ जाउ और रविवार तक वही रहू. मैने पूछा कि अशोक माथुर भी होंगे तो
बोली कि वे महीने भर को अमेरिका जा रहे है. फिर उसने अचानक खेल खेल मे
मेरे गाल को छुआ और फिर अपने मूह को, मानो मुझे फ्लाइयिंग किस कर रही हो.
जब मैं चुपचाप खड़ी रही तो बदमाश ने मेरे गाल को चूम लिया और
हँसते हुए मीटिंग मे चली गयी”

कुछ देर चुप रह कर मा बोली “मुझे उसकी नियत ठीक नही लगती. मुझे
मालूम है कि वह वीकेंड मे क्या काम करना चाहती है, अब नौकरी
छोड़ने के अलावा मैं क्या कर सकती हू, आख़िर कंपनी उसी की है और वो बड़ी
जिद्दी किस्म की लड़की है, एक बार सोच ले तो ठान लेती है. और उसे भी न जाने क्या
पड़ी है कि ऑफीस की बाकी सब सुंदर जवान लड़कियों को छोड़कर मेरे पीछे
पड़ी है, सब एक से एक चालू लड़कियाँ है, उनमे से कई तैयार हो जाएँगी उसके
साथ मज़ा करने को”

मा की परेशानी को मैं समझ सकता था. पर मुझे एक अजीब सी गुदगुदी भी
होने लगी थी. मा और एक जवान युवती आपस मे लिपटे है, उन किताबों के
चित्रों जैसे, यह कल्पना ही इतनी मादक थी कि अभी अभी चोदने के बावजूद
मेरा खड़ा हो गया. मा को लिपट कर मैने कहा “मा, नौकरी छोड़ना है तो
छोड़ दो पर एक बात सच बताओ, मेरी कसम, शशिकला दिखने मे कैसी है?”
मा बोली “अच्छी स्मार्ट है, मिस वर्ल्ड भले ना हो पर एकदम अट्रॅक्टिव है. पर
उससे क्या फरक पड़ता है, क्यों पूछ रहा है?” मा का चेहरा अब लाल हो
गया था.

“मा, सच बताओ, तुझे वो अच्छी लगती है क्या, अगर उसने सच मे तेरे साथ
ऐसा किया तो तुझे बुरा लगेगा क्या?” मैने मा के स्तन दबाते हुए पूछा. मा
चुप रही, हा उसकी आँखों मे एक खुमारी सी भर आई थी.

मैं समझ गया. मा को भी वह भा गयी थी. पिछले दो तीन हफ्ते मे मैने
देखा था कि जब हम कभी वे सेक्सी किताबे देखते तो उसका ध्यान लेस्बियन
चित्रों पर ज़्यादा होता था. वैसे आज कल चुदवाने के बजाय अब वह चूत
चुसवाना ज़्यादा पसंद करती थी, आँखे बंद करके सिसकिया भरती रहती,
शायद एक स्त्री से बुर चुसवाने की कल्पना करती हो. शायद मैं क्या कहुगा इस
डर से वह मन की बात नही कह पा रही थी. मैं मा की हालत समझ गया था.
मेरे साथ, अपने सगे जवान बेटे के साथ चुदाई शुरू होने के बाद मा की
वासनाए जो अब तक दबी थी, भड़क उठी थी. मैं चाहता था कि मा मन भर
कर अपनी इच्छाए पूरी कर ले. अगर कोई गैर पुरुष होता तो मैं ज़रूर फिर से
सोचता. वैसे मुझे अब तक यही लग रहा था कि मा का ध्यान अगर बाहर कही
जाएगा तो वो किसी हॅंडसम नौजवान पर. पर यहाँ तो एक जवान सेक्सी और
खानदानी औरत की बात थी. और शायद मा का भी झुकाव था उस तरफ.

मैने मा की बुर मे उंगली डाली और अंदर बाहर करने लगा “मा, तू सोच कि
शशिकला ऐसे तेरे सामने बैठी है और तेरी चूत चूस रही है, अपनी जीभ
तुम्हारी इस रसीली बुर मे डाल डाल कर तुम्हारे अमृत का पान कर रही है और तू
झाड़ झाड़ कर सेक्स की भूखी उस युवती को अपनी बुर का शहद चटा रही है,
मज़ा आता है की नही इस ख़याल से? और रही बात जवान लड़कियों को छोड़कर
तुम्हारे पीछे पड़ने की, मैं समझ सकता हू, मा तुझे मालूम नही है कि
तुझमे कितनी सेक्स अपील है और उस अपील मे तुम्हारी इस गदराई उम्र और मासल
शरीर का भी एक बड़ा हिसा है! कई लेस्बियन लड़कियों को अपनी उम्र से बहुत
बड़ी औरतों से सेक्स मे बहुत मज़ा आता है. अब सच बोलो मम्मी, शशिकला
के साथ सेक्स के ख़याल से मज़ा आता है कि नही?”

मा सिसक उठी. अपनी टाँगे सटा कर मेरी उंगली को बुर मे क़ैद करके बोली
“बहुत मज़ा आता है बेटे. न जाने मुझे क्या हो गया है, मेरे बदन की आग अब
शांत ही नही होती, तूने तो मेरी बुर की वासना के जिन्न को जैसे अपने लंड की चाबी
से आज़ाद कर दिया है. मालूम है, जब शशिकला ने मुझे किस किया था तो मुझे
बड़ा मीठा लगा था वह किस. सच बेटे, अगर तुझे कोई आपत्ति नही है तो मैं इस
कन्या के साथ अपने मन की मुरादे पूरी करना चाहती हू, बहुत प्यारी लड़की
है, उसे देखकर ममता और प्यार भी आता है और एक अजीब सी भूख भी लग आती
है, उसे भोगने की भूख”

मैने मा को विश्वास दिलाया कि मुझे खुशी होगी अगर मा को चुदाई का हर
तरह का सुख मिले. मेरे मन मे यह भी छुपी इच्छा थी कि शायद इस चक्कर
मे मुझे भी कुछ करने का मौका मिल जाए. मा तो अप्सरा थी पर अब मेरी
वासना भी ऐसी धधकती थी की खूब चुदाई करने का मन होता था, अगर और
कोई भी मिल जाए तो क्या बात थी, हा मा की पसंद से, उसकी अनुमति के बिना
नही.

“मा, मेरे एग्ज़ाम तो कल ख़तम हो जाएँगे. तुम चली जाओ शनिवार रविवार के
लिए. पर मुझे दिखाओ तो कि मेरी मा की वह पुजारन कैसी दिखती है” मैने
मा से प्रार्थना की.

मा अब बहुत खुश थी. उसके मन का बोझ उतर गया था.
“देखो बेटे, इस ऑफीस की मॅगज़ीन मे है उसका फोटो फ्रंट पेज पर. मेरे लाल,
तूने मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया. मुझे सिखा दिया है कि सेक्स से बढ़ कर
कोई सुख नही है, यहा एक ही जीवन मिलता है और उसमे सब को अपनी हर इच्छा
पूरी कर लेना चाहिए. तेरा भी कही मन लगा हो तो मुझे बता, मैं भी यही
चाहती हू कि तू खूब सुख पाए, सिर्फ़ अपनी इस मा के आँचल से न चिपका रहे,
तेरी तो उमर है मज़ा लेने की”

मैने मा को विश्वास दिलाया कि अभी तक तो कोई ऐसा नही था जो उसके सामने
मुझे सेक्सी लगे. मा ने लाई मॅगज़ीन मे मैं देखने लगा. अशोक माथुर और
उसके साथ शशिकला का एक चित्र था. अशोक माथुर एक काफ़ी हॅंडसम आदमी
थे, तीस बत्तीस के आस पास के ही लगते थे. शशिकला को देख कर मेरा भी खड़ा
होने लगा. उसने स्लीवलेस ब्लॉज़ और नभिदर्शना साड़ी पहन रखी थी.
एकदम गोरी चित्ति थी. बाल छोटे बाब कट थे. सामने पारदर्शक पल्लू मे से
उसके उरोजो का उभार दिख रहा था. है हिल की स्टिलेटो सॅंडल पहने थी जिसमे
उसके गोरे पाव खूब फॅब रहे थे. चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास था, आख़िर
करोड़ों की मालकिन थी.

“माल है मा, तू फालतू परेशन होती है. चल कल ही उसे बता दे कि तू
शुक्रवार रात को ही आ जाएगी, आख़िर काम ख़तम करना ज़रूरी है.” मैने
कहा. अब तक मा की चूत फिर से इतनी गीली हो गयी थी कि उसे कुछ और नही सूझ
रहा था. मैने तुरंत मा के प्रति बेटे का कर्तव्य निभाया, पहले उसकी बुर
चूस कर उसका सारा पानी निकाल लिया और फिर उसे इतनी देर और इतने ज़ोर से चोदा कि
वह सुख से बेहोश सी हो गयी.

सुबह मा तैयार हो रही थी तो मैने कहा “मा, तू बदल बदल कर सलवार
कमीज़, पॅंट सूट और साड़ी पहनती है. शशिकला को क्या अच्छा लगता है कुछ
अंदाज़ा है”

मा हंस कर बोली “अरे यह तो मुझे कब का मालूम है. जब भी मैं स्लीवलेस
ब्लॉज़ और साड़ी पहनती हू, उसकी आँखे चमक उठती है. मेरा पेट, पीठ,
कमर, बाहे उसमे से साफ दिखते है ना! जब सलवार कमीज़ या पॅंट सूट
पहनती हू तो उसकी नाक चढ़ जाती है”

“बस मा, अब इन बचे दो दिनों मे तुम एक से एक साड़ियाँ पहनो. देखो कैसे
परेशान हो जाएगी शशिकला.”

दूसरे दिन मेरा आखरी पेपर था. मैं दोपहर को पेपर देकर आया और सो गया.
आज शाम मेरे लिए मुरदों की शाम थी. बहुत दिनों के बाद मा के साथ रात
भर रति करने वाला था, पिछले एक महीने से एग्ज़ाम के कारण बस रात मे एक
बार का राशन था.

मा आज जल्दी आ गयी. बहुत खुश लग रही थी. मैं चिपट गया. उसे ठीक से
कपड़े भी नही बदलने दिए, वैसे ही धक्के देकर अंदर ले गया और उसकी
साड़ी मे घुस गया. मा की चूत के रस को मन भर पीने को मैं तरस रहा
था.

“अरे रुक तो, सुन ना आज क्या हुआ” वह कहती रह गयी पर मैने उसे पलंग पर
पटका, उसकी साड़ी उपर की और जुट गया. चूत को चूस कर कई घुट बुर का रस
निकालकर ही दम लिया. फिर मा पर चढ़ कर कस के चोद डाला, तब शांति मिली.
मेरी हालत देखकर मा भी पड़ी रही और मुझे मनमानी करने दी.

जब लस्त होकर मा पर गिर पड़ा तब मा ने मेरे बालों मे उंगलिया चलाते हुए कहा
“इतना दीवाना है मा का मेरे लाल? तेरा यह हाल है तो इस शनिवार रविवार क्या
करेगा? मैं तो नही रहूगी”

“तो मा पक्का हो गया क्या? शशिकला ने क्या कहा? आज तेरी यह गुलाबी साड़ी
उसे कैसी लगी?” मैने उत्सुकता से पूछा.

मा ने हँसते हुए कहा “अरे आज तो वह पागल सी हो गयी. आज मैने उसे खूब
सताया. पहले तो मेरी यह साड़ी और लो काट ब्लॉज़ देखकर ही वह मचल उठी
थी पर कुछ कह भी नही सकती थी क्योंकि उसके केबिन मे काम चल रहा है
इसलिए वह भी बाहर बैठी थी. मैं उसके सामने से गुजरती तो अपना पल्लू
ठीक करने के बहाने से उसे मेरे स्तनों की वैली दिखा देती. एक बार तो मैने
झुक कर नीचे से कागज उठाए, तब जान बुझ कर आँचल गिरा दिया, उसे मेरे
स्तनों का पूरा दर्शन हो गया होगा. बेचारी की आँखे पथरा गयी. आख़िर जब
एक मीटिंग के बाद हम कन्फरेन्स रूम मे अकेले थे तब वह बोली “रीमा दीदी, आज
तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो, ज़रा हम भी तो साड़ी देखें” कहकर मेरे
पल्लू पर का डिज़ाइन देखने के बहाने उसने मेरे स्तनों को छू लिया और मेरे
ब्लॉज़ मे भी तान्क झाक कर ली.”

“मा, उसकी बुर बहने लगी होगी तेरा रूप देखकर, तुम्हारी ये मासल
छातियाँ देखकर कोई भी पागल हो जाएगा, उस लड़की की तो हालत खराब हो
गयी होगी” मैने मा के स्तनों मे मूह घुसकर कहा.

“और क्या, है ही तेरी मा इतनी मादक की उसका सगा बेटा उसपर मर मिटा है”
मा ने गर्व से कहा. “आगे तो सुन, मैने आज मुस्काराकर उससे कहा कि मैंडम,
इस वीकेंड को काम का आप बोल रही थी तो मैं ऐसा सोच रही हू कि शुक्रवार
रात को ही आपके घर आ जाती हू. उसे विश्वास ही नही हुआ, एकदम चुप हो गयी.
फिर किसी तरह बोली कि हां यही ठीक रहेगा, सोमवार को सुबह घर चली जाना, उस
दिन ऑफ भी ले लेना. फिर बड़ी सीरियस होकर बोली कि रीमा दीदी, तुम मुझ से इतनी
बड़ी हो, मुझे मैंडम न कहो, कम से कम अकेले मे तो शशिकला कहो. मैं
बस मुस्कराती हुई उसकी ओर देखती रही तो उसने मुझे किस कर लिया. आज जम के
मेरे होंठों पर मूह लगा कर किस किया उसने.”

“मीठा लगा मम्मी?”

“हाँ बेटे, बहुत मीठा था, वह वो इंपोर्टेड स्ट्राबेरी के स्वाद का लिपस्टिक लगाती
है, बहुत मज़ा आया. उसकी हालत खराब थी, मुझे तो लगा कि वह शायद वही
मुझसे लिपट जाएगी पर किसी तरह उसने अपनी वासना को लगाम दी, उसे एक
मीटिंग मे भी जाना था. मैने कहा कि मैं घर जा रही हू जल्दी तो उसने तपाक
से हाँ कह दी. बोली आराम करो, वीकेंड मे बहुत काम करना है. मुझपर
बहुत मेहरबान है”

“मा, अब तुझे बस काम वाला काम करना पड़ेगा, ऑफीस का काम नही” मैने
मा की चुटकी ली. मा बहुत खुश थी, आज उसकी बुर ऐसी रिस रही थी कि जैसे
बहुत दिनों की भूखी हो. उस रात मैने और मा ने इतनी चुदाई की कि जैसे
महने भर की कसर पूरी हो गयी.

दूसरे ही दिन शुक्रवार था. मा को सुबह ही शशिकला का फ़ोन आया. वह अभी
अभी नहा कर आई थी और नंगी मेरे सामने खड़ी होकर कपड़े पहन रही
थी. फ़ोन पर बाते करते करते मा का चेहरा खिल उठा. एक दो बार वह बोली
“यस मैंडम– मैं ओवरनाट बैग ले आउन्गि — अच्छा ठीक है” फिर हँसकर बोली
“सॉरी शशिकला, अब मैंडम नही कहुगी” मैं मा से चिपट कर उसके नंगे
नितंबों पर अपना लंड घिस रहा था. सुबह सुबह नहाने के पहले मैने
मा को बाथरूम मे चोदा था पर अब फिर से लंड खड़ा हो गया था.
फ़ोन रखकर मा बोली “वह कह रही थी कि ऑफीस से ही सीधे घर चलते है,
घर पर ही डिनर करेंगे. मैं बोली कि मैं कपड़े ले आती हू तो शैतानी से बोली
कि वैसे ज़रूरत नही पड़ेगी-बोली वही दे देगी चेंज करने को कपड़े. और फिर
डाँट रही थी कि मैं उसे मैंडम क्यों कहती हू”

मैं मा को लिपटाकर बोला “मा, तुझे वह कपड़े पहनने ही नही देगी
देखना दो दिन”

मा ने अचानक पूछा “अनिल बेटे, इन बालों का क्या करूँ? काट लू क्या? तुझे
बहुत अच्छे लगते है मुझे मालूम है, पर उस लड़की को …. मालूम नही क्या
सोचेगी!” मा का हाथ अपनी घनी झान्टो मे उलझा था, वह उन बालों के
बारे मे कह रही थी.

मैने मना कर दिया “मा, ऐसी ही झान्टे लेकर जाओ उसके पास. और
वो इनपर मर मिटे तो कहना. तुम्हारी झान्टे असल मे इतनी काली, घनी, घूंघराली और
रेशमी है कि इनमे मूह छुपाने मे किसी सुंदरी की ज़ुल्फों मे मूह छुपाने
से ज़्यादा मज़ा आता है!”

“चल शैतान, पर यह बता बेटे तू क्या करेगा, मुझे ज़रा बुरा लग रहा है
तुझे अकेले छोड़ कर जाने को. सच बता तुझे कोई आपत्ति तो नही है मेरे लाल?”

“मा, मेरी चिंता मत करो, तुम मज़ा करो. तुम इतनी सेक्सी हो, इतने साल तुमने
अपनी यह जवानी वेस्ट की है, अब अपने मन की हर मुराद पूरी कर लो, यही मैं
चाहता हू. मैं दोस्तो के साथ दो दिन मथेरन हो आता हू, यहाँ रहुगा तो
मूठ मार मार कर परेशान हो जाउन्गा यह कल्पना कर के कि तुम और
शशिकला क्या कर रहे हो. हाँ फ़ोन करना मा ज़रूर मेरे सेल पर, मैं सोमवार
सुबह आ जाउन्गा घर.”

मा को चूम कर मैने बिदा किया. मा बहुत सुंदर लग रही थी उस काली साड़ी
मे. आख़िर वह एक अभिसारिका बन कर निकली थी नये सुख को भोगने.
—-
मैं दोस्तो के साथ मथेरन गया, खूब घुमा. बार बार मन होता था कि मा
को सेल पर फ़ोन लगाऊ, पर फिर सब्र कर लिया, सोचा उन दोनों नारियों को ऐसे मे
डिस्टर्ब करना ठीक नही है. न जाने क्या कर रही होंगी.

आख़िर मेरा मन नही माना और रविवार दोपहर को मैने मा के सेल पर फ़ोन
किया. मा ने फ़ोन उठाने मे दो मिनिट लग गये. मेरी आवाज़ सुनकर खुश
होकर बोली “कैसा है बेटे?”

मैने कहा “मा मैं मज़ा कर रहा हू यार दोस्तो के साथ. तुम कैसी हो?” असल
मे पूछना चाहता था कि मा, तेरी वह रसीली चूत, मेरा खजाना, कैसी है
पर सोचा कि शायद शशिकला पास ही हो.

मा बोली “एकदम ठीक हू बेटे, बहुत काम चल रहा है, सोने को नही मिला ज़्यादा.”
वह रुक रुक कर बोल रही थी जैसे कोई काम कर रही हो, पर उसके स्वर मे
शैतानी भरी थी. मैं समझ गया. मा की आवाज़ कांप भी रही थी. बाते करते करते
“अया अया ओह्ह्ह” की आवाज़ आई.

मैने पूछा “मा क्या हुआ? ऐसे कर क्यों रही हो?”

मा बोली “कुछ नही बेटे, इतना अच्छा लग रहा है कि रहा नही जा रहा. वह
यहाँ एक बिल्ली है, बार बार मेरे पैरों को चाटती है, बड़ी गुदगुदी होती है,
बहुत अच्छा लगता है”
फ़ोन पर मुझे दबी आवाज़ मे एक मीठी हँसी की आवाज़ आई. शायद शशिकला थी.
“अरे ज़रा रुक ना, क्यों तंग कर रही है. छोड़ती ही नही है, ओह ओह ओह आहह ओइइ
मा” मा फिर सिसक कर बोली.

मुझे कुछ समझ मे नही आया. “क्या हुआ मा, ऐसे क्यों बार बार कर रही
हो?”

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मा फिर बोली “तू चिंता ना कर मेरे लाल, मैं ठीक हू, यह बिल्ली मानती ही नही है,
अब मुझपर चढ़ने की कोशिश कर रही है, कैसा जादू है इसकी जीभ मे, इसे
भगाना पड़ेगा नही तो बहुत तंग करेगी. तू ठीक है ना मेरे लाल? अपना
ख़याल रखना – हाँ & य & अरे रुक ना & अब देख तेरा क्या हाल करती हू”
कहकर मा ने फ़ोन बंद कर दिया.”

मा की उस सिसकी मे जो मादकता थी उससे मैं उत्तेजित हो उठा. मैं समझ गया
कि कौनसी बिल्ली थी और क्या कर रही थी. कई बार मैने खुद मा के मूह से ऐसी
आवाज़ सुनी थी, जब वह ज़ोर की झड़ती थी. मा के नंगे बदन को आँखों के
सामने ला कर वही जंगल मे जाकर मूठ मारी तब शांति मिली. बुरा भी लगा,
मा के लिए मैं अपनी वासना बचा कर रखना चाहता था, कि जब सोमवार को
मिलू तो ऐसे चोदु की मिन्नते करने लगे पर कोई चारा नही था, मा और
शशिकला के बारे मे सोच सोच कर लंड पागल सा हो गया था.

उसके बाद न मैने फ़ोन किया न मा ने. मैं रविवार रात घर पहुँचा, थका
था इसलिए तुरंत सो गया.

सोमवार सुबह नींद तब खुली जब मा ने चाय के साथ जगाया. सूरज चढ़
आया था और नौ बज गये थे.
मा को देखकर मैं खुशी से झूम उठा “अरे मम्मी, तुम कब आई? मुझे
लगा सीधे शाम को आओगी. बेल भी नही बजाई” मैने उससे लिपट कर पूछा.

“अभी आठ बजे आई हू बेटे, शशिकला को सुबह सुबह दिल्ली जाना था इसलिए
मैं भी निकल आई. वह होती तो शायद आज भी नही आती, वह आने ही नही देती
मुझे. मेरे पास चाबी थी इसलिए बिना बेल बजाए दरवाजा खोल कर आ गयी कि
तेरी नींद न खुले.”

मैने मा को देखा. वह एकदम खुश लग रही थी. उसकी आँखों मे एक असीम
तृप्ति और कामना के मिले जुले भाव थे. काफ़ी ताकि भी लग रही थी, जैसे सोई न
हो.
क्या हुआ मा, बता ना?” मैने अनुरोध किया. मा और शशिकला के वीकेंड
के बार मे सुनने को मैं बेचैन था. लंड भी खड़ा था. मा को खींच कर
मैने पलंग पर लिटा दिया और उसकी साड़ी खोलने लगा.

“रुक बेटे, अभी नही. सब बताउन्गि तेरे को, नहा तो लेने दे. आज तो शशिकला ने
मुझे ऑफ दे दिया है ऑफीस से” मा ने मेरा हाथ अलग करते हुए कहा.

मैं उसकी बुर टटोल रहा था. मैं न माना और मा की चूत मे उंगली डाल दी. चूत
एकदम गीली थी फिर भी मा को दर्द हुआ और वह सिसक उठी, मेरा हाथ
ज़बरदस्ती बाजू मे करती हुई बोली “मत कर राजा, मेरी ये बुर दो दिन मे ऐसी
हो गयी है कि छूने पर भी कसकती है. एक मिनिट चैन नही मिला है बेचारी
को, उस शशि की बच्ची ने हालत कर दी है निचोड़ निचोड़ कर, छोड़ती ही नही
थी”

मैं मस्त हो गया. “मा, तुम्हारी रसीली और हरदम चुदने को तैयार रहने
वाली चूत की ऐसी हालत की है उसने तो बड़ी चालू चीज़ होगी वो”

“हाँ बेटे, क्या गजब की लड़की है, जितना सुख उसने मुझे दिया इन दो दिनों
मे, मैं तो सोच भी नही सकती थी कि कोई औरत दूसरी औरत को दे सकती है. पर
अब रुक बेटे, सच कहती हू, मेरी बुर को दिन भर आराम कर लेने दे. मैं तेरा
हाल जानती हू, चल मेरे साथ नहाने चल, मैं तुझे अभी खुश कर देती हू”

हम साथ साथ नहाने गये. मा ने कपड़े उतारे. उसका गोरा शरीर कई जगह से
लाल हो गया था. ख़ासकर चुचियाँ, नितंब और झांघे. मेरी नज़र को
देखकर मा मुस्काराई और बोली “बहुत मसला है मुझे उसने, उसका मन ही
नही भरता था, मेरे पूरे शरीर को भोगना चाहती थी. तू अब यहाँ दीवाल से
टिक कर खड़ा हो जा और मुझे अपना काम करने दे.”

मा मेरे सामने बैठ गयी और मेरा लंड चूस डाला. इतनी देर के खड़े लंड
को राहत मिली. मा ने भी मज़े से मेरा वीर्य निगला. ख़तम करके उठाते हुए
बोली “तेरे वीर्य से स्वाद तो बदला, दो दिन तक तो बस मुझे दूसरा ही स्वाद मिलता
था, पर था वो भी गजब का.”

मैने फिर मा से कहा कि बता तो कि क्या हुआ. मा ने बताना शुरू किया. उस दिन
भर उसने एक एक करके मुझे सब बताया. दोपहर को वो सो गयी और मैं भी
सो लिया. शाम को वह उठी तो काफ़ी संभाल गयी थी. हमने घर मे ही आराम
किया, मा कही नही जाना चाहती थी.

उस रात भी हम जल्दी बेडरूम मे आ गये. मा ने अब भी मुझे चोदने नही
दिया, बस एक बार बर चूसने दी. एक ही चम्मच रस निकाला, हमेशा तो कितना
निकलता था, लगता है मा की बुर के रस को किसीने ख़तम कर दिया था. उसकी
बुर के प्रसाद को पाकर मैं खुश हो गया. मुझे समझाते हुए मा बोली “आज
की रात और आराम कर लेने दे मेरी बुर रानी को, कल से तेरी मा अपने बेटे को
पूरा रस देगी अपने शरीर का”

“मा, मैं क्या करूँ? मेरा लंड तो पागल कर देगा मुझे. फिर चुसोगी क्या?
मुझे हचक हचक कर चोदना है अब, तुमपर चढ़ कर चोदना है”
मैने मचल कर कहा.

“बड़ा आया चोदने वाला, तेरी मा के पास और अंग भी है ना? जैसे तू सिर्फ़ मेरी
चूत चोदता है, और कुछ नही करता” मा पेट के बल लेटते हुए अपने
नितंब हिला कर बोली. मैं समझ गया. मा कितनी कामुक हो गयी थी इसका भी
यह संकेत था, खुद ही मुझे कह रही थी कि उस की गान्ड मार लू. मन मस्त हो
गया. मैं तुरंत मा पर चढ़ गया और उसकी गान्ड मे लंड उतार दिया.
उस रात मैने मा की तीन बार मारी. गान्ड मरवाते मरवाते मा ने उस मतवाले
वीकेंड की बची हुई पूरी कहानी सुनाई. वही कहानी नीचे पेश है.
********************

मा ऑफीस के बाद सीधी आठ बजे शशिकला के घर पहुँची तो शशिकला
ने ही दरवाजा खोला. जुहू मे उनका एक आलीशान फ्लाइट था.
मा अंदर आई. इधर उधर देखा और पूछा “मैंडम, आप घर मे अकेली है?
नौकर नही है क्या?”

“है ना, आज छुट्टी दे दी है, कल और परसों एक दो घंटे को आकर काम कर
जाएँगे. मैने सोचा हमे काम बहुत है, कोई डिस्टर्ब न करे तो अच्छा है. है
ना रीमा दीदी? और तुमने फिर मुझे मालकिन कहा!”
शशिकला की आँखे चमक रही थी, उनमे एक अनुरोध था. वह मा का हाथ
पकड़कर सोफे तक ले गयी.

“मज़ाक कर रही थी शशि, मेरा मतलब है शशिकला. तुम चिढ़ती हो तो बड़ी
सुंदर लगती हो, इसलिए मैंडम कहने मे मज़ा आता है” मा ने हँसते हुए
कहा.

“मुझे शशि ही कहो, अच्छा लगता है. मा भी शशि कहती थी, डॅडी भी
कहते है. वैसे आज बहुत खूबसूरत लग रही हो दीदी. ये काली साड़ी पहले
कभी नही पहनी तुमने?” मा को वह ऐसे देख रही थी जैसे मा के रूप को
आँखों से पी जाना चाहती हो.

“थैंक यू शशि, तुम भी बहुत खूबसूरत लग रही हो इस स्कर्ट मे. अच्छा है कि
ऑफीस मे नही पहनती नही तो लोग काम करना भूल जाएँगे” मा ने
शशिकला की ओर देखकर कहा.
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शशिकला एक लाल रंग का मिनी ड्रेस पहने थी. उसके गोरे अंग पर वह गजब
ढा रहा था. ड्रेस उपर से कंधों पर खुला था और उसमे बस दो पतले
नूडाल स्ट्रेप्स लगे थे. स्ट्रेप्स को छोड़कर शशिकला के गोरे गोरे कंधे
नंगे थे और स्तनों का उपर का भाग खुला था. उसके स्तनों के बीच की खाई
दिख रही थी जिसमे एक सुनहरी चेन लटक रही थी. ड्रेस उसके घुटनों के
छः इंच उपर ख़तम हो जाता था, और उसकी गोरी चिकनी छरहरी जांघे
गजब ढा रही थी. शशिकला ने मॅचिंग लाल रंग के उँची हील के नाज़ुक
सॅंडल पहन रखे थे. मा को उन्हें देख कर मेरी याद आ गयी. मैं यहाँ
होता तो अब तक सिर्फ़ उन संडलों मे लिपटे उन गोरे नाज़ुक पाँवों को देखकर
मेरा खड़ा हो गया होता, ऐसा उसने मुझे बाद मे बताया.

“हा दीदी, मेरी पोज़ीशन की वजह से मुझे यह पहनने नही मिलते इसलिए
घर मे ही पहन लेती हू. चलो डिनर कर लेते है, फिर काम करेंगे” कहकर
शशिकला मा को डाइनिंग टॅबेल पर ले गयी.

डिनर पर खूब बातें हुई. डिनर मे रेड वां थी. मा पहले नही पीना चाहती
थी पर शशिकला के आग्रह से उसने एक ग्लास वाइन ले ली.
डिनर ख़तम होते होते मा उत्तेजित हो गयी थी. एक तो शशिकला का वह रूप,
दूसरे उसकी आँखों मे दिखता अतः कामना का सागर.

आख़िर शशिकला बोली “चलो रीमा दीदी काम का समय हो गया”
मा उठी और पर्स संभाल कर बोली “चलो, कहा है तुम्हारा लॅपटॉप? उसीमे
सब फ़ाइल होंगी है ना?”

“हां, मेरे बेडरूम मे रखा है, मैं वही काम करती हू, तुम चलो दीदी, मैं
सब लक करके आती हू.” शशिकला बोली.

मा को बेडरूम मे छोड़कर शशिकला चली गयी. मा का दिल धड़क रहा
था. वह समझ गयी थी कि बेडरूम मे काम का क्या मतलब है. बेडरूम
बड़ा आलीशान था. एक बड़े डबल बेड पर सॅटिन की चादर बिछी थी. पास मे एक सोफा
भी था. उसके सामने एक बड़े स्क्रीन का टी वी था. टेबल पर लॅप टॉप भी रखा था.
मा सोफे पर बैठकर लॅपटॉप आन करने लगी. तभी शशिकला वापस आई और
भी उसके पास बैठ गयी. टी वी आन कर के बोली. “ये डी वी डी लगाकर मूवी देख रही
थी दीदी तुम्हारे आने के पहले, बस दस मिनिट की मूवी और बची होगी, तुम भी
देखो, फिर काम करेंगे” मा की तरफ शैतानी भरी निगाह से देख कर वह बोली.

मा ने जब मूवी देखी तो उसका चेहरा लाल हो गया और सांस चलने लगी.
लेस्बियन फिल्म थी, दो बहुत मादक खूबसूरत औरतों मे सेक्स चल रहा था, एक
बड़ी पैतालीस के करीब की औरत थी और एक एकदम जवान थी. उस समय वह जवान
युवती उस अधेड़ औरत के मूह पर बैठकर उससे अपनी चूत चुसवा रही थी.

अनजाने मे मा ने अपनी जांघे आपस मे सटा ली और रगड़ने लगी, उससे रहा
नही जा रहा था. शशिकला उसके पास सरक आई और उसकी जांघों पर हाथ
रखकर बोली. “दीदी तुमने भी देखी होंगी है ना ऐसी मूवीज़? आज कल तो
बच्चे भी देखते है, मुझे यह वाली बहुत पसंद है, कई बार देखती हू.
मालूम है क्यों दीदी! ये बड़ी वाली हीरोइन, क्या रूप है उसका! वैसे दीदी सच
बताऊ, इसे देखकर हमेशा मुझे तुम्हारी याद आ जाती है. उस लड़की से बड़ी
जेलसी होती है कि उसे कितना सुख मिल रहा है उसकी मा की उम्र की उस औरत से!
असल मे इस फिल्म की कहानी यही है, एक मा और बेटी के आपस के सेक्स के रिश्ते की”
अब तो शक का कोई सवाल ही नही था. शशिकला साफ कह रही थी मा से कि उसे क्या
करना है उसके साथ!

मा अब तक पूरी कामतुर हो चुकी थी. सारी झिझक और लज्जा ख़तम हो गयी थी.
शशिकला की मादक जवानी की गरमी अब उसे सहन नही हो रही थी.

शशिकला ने मा के कंधे पर हाथ रखा और उससे बिलकुल चिपट कर बैठ गयी.
“देखा दीदी, कितनी सुंदर है ये दो औरतें!”

मा ने शशिकला का चेहरा अपने हाथों मे लिया. उसकी आँखों मे देखती
हुई मा बोली “शशि, वैसे तुम भी बहुत सुंदर हो, इस खूबसूरत युवती से कम
नही हो जो उस औरत से रति कर रही है. मैं कब से जानती हू कि तुमने मुझे
क्यों बुलाया है. मैं तुम्हें इतनी अच्छी लगती हू यह मेरे लिए बड़े गर्व की
बात है. तुम जैसी जवान और खूबसूरत युवती, वह भी एक कंपनी की बस, तुम
अगर चाहती तो किसी और जवान लड़की को भी चुन सकती थी, पर तुमने मुझे
चुना है जो उम्र मे तुमसे इतनी बड़ी है. तुम भी समझ लो कि मैं यहा कोई
इस लिए नही आई हू कि तुम मेरी बस हो बल्कि इसलिए कि तुम भी मुझे उतनी ही
अच्छी लगती हो. आओ शशि, दीदी की बाहों मे आ जाओ, अपनी दीदी को ज़रा प्यार
करने दो उसकी इस नन्ही बहन से” कहकर मा ने उसके होंठ चूम लिए.

शशिकला खुशी से मा से लिपट गयी और मा के चुंबनो का जवाब देने
लगी. “ओह दीदी, थैक यू, आज तुमने मुझे मन की मुराद दे दी, पिछले कई
दिनों से मेरा हाल बहुत बुरा है, जब तुमने पहली बार मुझे मना कर दिया
था तो मैं पागल सी हो गयी थी. आख़िर मैं भी तुम्हें पसंद आ ही गयी” और
मा के होंठों को अपने होंठों मे लेकर वह चूसने लगी.

दोनों अब चुंबन लेते हुए एक दूसरे के बदन को सहला रही थी. शशिकला
तो अब मा की गोद मे ही बैठ गयी थी और मा के स्तनों को हाथ मे लेकर ब्लॉज़
पर से ही दबा रही थी. मा उसके मिनिस्कार्ट के नीचे हाथ डालकर उसकी
चरहरी मसल जांघे सहला रही थी.

कुछ देर की चूमा चाटी के बाद दोनों की वासना चरम सीमा पर आ गयी थी.
दोनों अब आपस मे कुश्ती सी खेल रही थी, एक दूसरे को नीचे गिराकर चढ़ने
की कोशिश कर रही थी कि अपनी मन मुराद पूरी कर ली जाए. मा की जीत हुई, उसके
खाए पिए मासल शरीर की शक्ति के आगे शशिकला की नाज़ुक जवानी नही टिक
पाई, शायद शशिकला भी मा से हारना चाहती थी. मा ने शशिकला को
सोफे पर लिटाकर उसका स्कर्ट उपर किया और उसकी जांघे चूमने लगी.
शशिकला ने गुलाबी नाइलोन की पैंटी पहन रखी थी. पैंटी की क्रैच अब तक गीली
हो गयी थी.

माने उसे चूमा और बोली.
“शशि, मुझे दीदी मानती है ना, अब ज़रा आराम से पड़ी रह, अपनी दीदी को अपनी
इस छोटी सी रानी बहना से प्यार करने दे. सच कितनी खूबसूरत है तू! तेरी इस
पैंटी मे तो करोड़ों का खजाना छुपा है, मेरे जैसी सीधी सादी औरत को भी
तूने पागल कर दिया है” कहकर मा ने खींच कर शशिकला की पैंटी उतार दी.
शशिकला की बुर एकदम चिकनी थी, गोरी गोरी बिना बाल की. उस बचकनी बुर को
देखकर मा के मूह मे पानी भर आया. मेरे साथ मॅगज़ीन देखते समय
मा ने कई बार रति करती लेस्बियनो की चिकनी चूते देखी थी. मुझसे एक
बार उसने कहा भी था कि अगर मैं चाहू तो वह फिर से शेव कर लेगी पर मैने
मना कर दिया था. मा की घूंघराली झान्टो मे मूह छिपा कर सोने का
आनंद मैं नही खोना चाहता था.

आज एक चिकनी बुर देख कर आख़िर मा के रहे सहे सब्र का बाँध भी टूट गया,
उसने शशिकला की बुर को चूमा और फिर उसकी जाँघो अलग करके उंगलियों
से चूत को खोला और जीभ से चाटने लगी. चूत चूसने की यह पहली बार थी
मा के लिए पर उसने मेरे साथ इतने चित्र देखे थे और सी डी देखी थी की किसी
साधी लेस्बियन जैसे वह उस जवान बुर के रस का पान करने लगी. शशिकला जैसी
अनुभवी लेस्बियन भी मा की जीभ के जादू के आगे न टिक पाई. मा के सिर को अपने
हाथों मे पकड़कर अपनी बुर पर दबाते हुए वह सीत्कारने लगी “दीदी, बहुत
अच्छा लग रहा है दीदी, और करो ना, तुम्हारी जीभ तो जादू कर रही है दीदी,

मैने सोचा भी नही था कि मैं अपनी दीदी को इस तरह अपना सेक्स जूस पिलाउन्गि”
मा ने शशिकला की बुर को इतने प्यार से चाटा की वह पाँच मिनिट मे ढेर
हो गयी. असल मे मा उस युवती की बुर को इतनी ममता से चाट रही थी कि वासना
और प्रेम के उस अद्भुत मिश्रण के आगे वह लड़की टिक न सकी.

मा को बुर का पानी बहुत प्यारा लगा. वैसे चोदने के बाद मेरा लंड चुसते
हुए उसने कई बार खुद की बुर के रस को चखा था पर किसी दूसरी औरत की झड़ी
चूत से बहते रस को चाटने का यह पहला मौका था. शशिकला के
तड़पने की परवाह न करते हुए मा ने अपनी जीभ से उसकी बुर का कोना कोना
चटा, जीभ अंदर डाल कर भी चाटा जैसा मैं मा के साथ करता था.

कुछ देर पड़ी रहने के बाद शशिकला उठ बैठी. वासना तृप्त होने से वह अब
कुछ शांत हो गयी थी. मा को चूमते हुए बोली “दीदी, सच बताओ, तुम्हारी भी
गर्ल फ्रेंड्स है क्या? लगता नही कि आज पहली बार तुम औरतों के साथ लव
मेकिंग कर रही हो. मेरी बुर बहुतों ने चाटी है पर तुम्हारे जैसी कला बहुत
कम मे थी”

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मम्मी कुछ शरमा गयी “अरी नही, अब तक मैं बिलकुल सीधी सादी हेतेरोसेक्सुअल
औरत थी. हाँ सेक्स मुझे बहुत अच्छा लगता है. ऐसी किताबें देखने का भी
शौक है” मा अब अपनी जांघे एक दूसरे पर रगड़ रही थी. साड़ी मे से दिख
तो नही रहा था पर मा की जांघों को बाहों मे लेकर पड़ी शशिकला को
इसका पता तुरंत चल गया. साड़ी मे हाथ डालकर मा की बुर को पुचकार कर
वह बोली “अकेले अकेले मे मज़ा चल रहा है दीदी, पर ऐसे नही, हमे भी शामिल
करो, बल्कि अब तुम आराम करो और अपनी इस लाडली छोटी को अपना काम करने दो.

शशिकला उठ बैठी और अपने कपड़े पूरे निकाल दिए. उसके उस गोरे चिट
छरहरे बदन को देखकर मा उसके रूप को ताकती रह गयी. शशिकला के
स्तन बहुत बड़े नही थे, बस ड्रेस के नीचे पहनी वायर ब्रा से वे उभर कर
दिखते थे. पर वे छोटे उरोज भी रसीले फलों से मीठे थे.

मा टक लगाकर शशिकला के रूप को देखते हुए बोली “शशि, क्या कसा
चिकना बदन है तेरा? माडल बन जाए तो हज़ारों रुपये घंटे के मिलेंगे
तुझे, लगता है काफ़ी वर्क आउट करती है, जिम मे रोज जाती होगी ना? मुझे देख,
कैसी मोटी पीलापीली सी लगती हू तेरे आगे”

शशिकला ने मा को खड़ा किया और खींच कर पलंग तक ले गयी. “दीदी, ऐसा
कभी मत कहना, तुम्हारा शरीर किसी पके फल सा मीठा है, तुझे देखते ही
लगता है कि खा जाउ. बहुत रस होगा दीदी तेरे इस बदन मे, अब बिना चखे
वहाँ मैं नही रह सकती. मेरे ख़याल से कुछ रस तो निकलना शुरू भी हो गया
है दीदी, मेरा रस निकलते निकलते. है ना?”

मा कुछ नही बोली क्योंकि सच मे अब उसकी बुर से इतना पानी निकल रहा था कि
उसकी जांघे गीली हो गयी थी. शशिकला मा को नंगा करने लगी. एक एक
करके जैसे जैसे मा के कपड़े निकलते गये, शशिकला की साँसें तेज होती
गयी. जब मा के जिस्म पर सिर्फ़ ब्रा और पैंटी बचे तो शशिकला थोड़े पीछे
हटाकर उसे ऐसे देखने लगी जैसे कोई चित्रकार अपनी पैंटिंग देखने को
पीछे हटता है.

“दीदी, तुम मार डालगी मुझे. ओह गॉड, क्या सेक्सी बड़ी है तेरी, मैने सोचा था
उससे ज़्यादा ज्यूसी. और क्या लिंगरी पहनती हो दीदी. एकदम टॉप, कौन सी है? वो
वेनिटि फेयर का ब्लैक पीस लगता है, तुम्हारे गोरे रंग पर बहुत जचता है
दीदी, और कप भी एकदम मस्त है, सिमलएस” कह कर वह मा से लिपट गयी और
उसके उरोज प्यार से दबाते हुए उसे चूमने लगी. चूमते चूमते मा को
धकेलकर उसने पलंग पर गिरा दिया और उस पर चढ़ बैठी. मा की ब्रा
निकालकर वह सीधे मा का एक निपल मूह मे लेकर चूसने लगी.

मा ने उसे लिपटा लिया और प्यार से स्तनपान करने लगी. शशिकला आँखे बंद
करके मा का स्तनगार चूसने मे मग्न थी, मानों किसी बच्चे को
मनपसंद चीज़ मिल गयी हो, अपनी जांघों मे उसने मा की एक टांग पकड़
ली थी और अपनी बुर उस पर घिस रही थी.

शायद वह बहुत देर चुसती पर मा अब बहुत कामतूर हो गयी थी, उसके
निपल मे से चुदासी की ऐसी मिठास निकलकर उसके सारे शरीर मे दौड़ रही थी
कि उसके मूह से एक आह निकल पड़ी. शशिकला तुरंत उठाकर मा की टाँगों के
बीच बैठ गयी और मा की पैंटी उतार दी. मा की घनी झान्टो पर उसकी नज़र
टिक गयी.

मा तोड़ा शरमा गयी “बहुत बाल है ना शशि? मैने कई बार सोचा कि निकाल
दूं पर वो मानता ही नही ….” और अचानक चुप हो गयी जब उसे ख़याल आया कि
वह मेरे बारे मे याने अपने बेटे के बारे मे कहने ही वाली थी.

“बहुत अच्छे बाल है दीदी, घने और घूंघरले, रेशमी, मुझे अच्छे लगते
है पर सिर्फ़ बड़ी उमर की औरतों मे. किसके बारे मे बोल रही थी दीदी तुम, किसे
झान्टे अच्छी लगती है तुम्हारी? बताओ ना? अरे ऐसे शरमा रही हो जैसे नयी
दुल्हन! खैर, बाद मे बता देना, उई & मा & कितनी गीली है दीदी तुम्हारी बुर,
इतनी मस्त हो गयी है मेरी दीदी मेरे पास आकर!” मा की बुर मे उंगली करते
हुए शशिकला ने कहा. उंगली निकालकर चाटी, मा की आँखों मे आँखे
डालकर शैतानी से आँखे बड़ी करके और गर्दन मटकाकर कहा कि लाजवाब
है और फिर झुक कर मा की बुर मे मूह डाल दिया.

मा की चूत पर शशि घंटे भर लगी रही, उससे खेला, खोल कर देखा,
चूमा, चाटा, मूह मे लेकर चूसा, उंगलियाँ अंदर बाहर की और जीभ अंदर
डाली, हर तरह से मा की बुर का स्वाद लिया. मा इतनी बार झड़ी की उसे याद ही नही
रहा. सुख के शिखरों पर वह चढ़ती रही, एक से एक उँचे वासना के
शिखर!

दर्जनों बार झड़कर आख़िर मा तड़प कर शशिकला को अपने से दूर करके
सिमट कर लेट गयी, उसे अब यह सहन नही हो रहा था. “बस कर शशि, मार
डालेगी क्या!” कहकर मा लस्त होकर पड़ी रही. शशिकला उसके पीछे लेटकर
उसकी ज़ुल्फों मे मूह छिपा कर उसके स्तनों को सहलाते हुए लेट गयी.
सम्हलने के बाद मा तृप्त थके स्वर मे बोली “तू जादूगरनी है मेरी बच्ची,
क्या करती है, पागल हो जाउन्गि मैं”

“अच्छा लगा दीदी अपनी छोटी का प्यार?”

“बहुत अच्छा लगा रानी, आ मेरे आगोश मे आ जा” कहकर मा ने पलटकर
शशिकला को बाहों मे ले लिया. मा और शशिकला की वह पहली रात एक
धुन्द कर देने वाली रति मे गुज़री. एक दूसरे के शरीर को उन्होने हर तरह से
भोगा, एक दूसरे के अंगों का स्वाद लिया और प्यार की बातें की. सोने मे रात के
तीन बज गये. फिर भी वे ठीक से नही सोई क्योंकि उनकी वासना धधक रही थी.
मा की नींद तड़के खुली तो देखा कि शशिकला उसकी बाहों से निकलकर फिर
उसकी जांघों के बीच मूह दिए पड़ी है “ओ मा तू शुरू हो गयी फिर से,
तेरी जीभ है या बिजली मेरी बच्ची, ओह ओह मत कर ना, चल शैतान, कम से कम
ऐसी सिकसती नैन मे तो आ जा, दीदी को भी ज़रा फिर से अपनी बुर का शहद
चखने दे” कहकर मा ने उसे पलटकर उसकी बुर से मूह लगा दिया. एक
दूसरे की बुर चूस कर दोनों औरतें फिर सो गयी.

जब मा की नींद सुबह खुली तो दस बज गये थे. शशिकला गहरी नींद मे
सो रही थी. मा उठाकर चाय बना लाई और शशिकला को उठाया. वह अंगड़ाई
देते हुए उठी “वह दीदी तुमने चाय बनाई? मा की याद आ गयी, वह भी ऐसे ही
चाय बनाकर लाती थी मेरे लिए, और किसी को नही बनाने देती थी.”
प्यार से कुछ देर चूमा-चाटी करके दोनों नहाने गयी. साथ साथ नहाई, एक
दूसरे को नहलाया, शरीर पर साबुन लगाया और प्यार से एक दूसरे को लिपट लिपट
कर खूब किस्सिंग की. मा का मन हो रहा था की फिर से वही घुटनों के बल
बैठ जाए और उस सुंदर युवती की टाँगों के बीच के खजाने को फिर चूसना
शुरू कर दे. पर उसने मन को समहाल लिया, सोचा ज़रा आराम के बाद दोपहर
को फिर से शुरू करेंगे.

बदन पोंछ कर वे बाहर आई. शशिकला बोली “दीदी, तुम बैठो, मैं नाश्ता
बनाती हू, ब्रंच, सीधे लंच ही कर लेंगे, फिर दोपहर को ‘काम’ करना है.
रात को काफ़ी काम हुआ पर अभी पूरा नही हुआ. वैसे यह काम कभी पूरा नही
होगा लगता है, उसके लिए सालों लग जाएँगे दीदी” मा की ओर देखकर शोखी
से वह बोली. फिर वैसे ही नंगी किचन मे जाने लगी.

मा को अटपटा लग रहा था. “अरे गाउन तो पहन ले हम दोनों, कोई आ जाएगा!”
“दो दिन कोई नही आएगा दीदी. मैने सब को छुट्टी दे दी है. इसीलिए तो मैने कहा
था कि कपड़े लाने की ज़रूरत नही है. और मैं चाहती हू कि मेरी दीदी ऐसी ही
अपनी पूरी नेचारल ब्यूटी मे मेरे पास रहे, जब मन होगा मैं इस ब्यूटी को चख
लुगी, कौन कपड़े उतारे बार बार!”

“ठीक है शशि, मैं ज़रा घर मे घूम कर देख लू, तेरे ड्रेस भी देखना है,
बहुत अच्छे ड्रेस है तेरे पास”

“शौक से देखो दीदी, घर तुम्हारा ही है” शशिकला बोली.

मा ने उस आलीशान घर को देखा, शशिकला के बेडरूम का मुआयना किया.
शशिकला की सब ड्रेस बड़ी खूबसूरत थी, और ब्रा और पैंटी के तो दर्जनों सेट
थे, हर तरह के, और हर रंग के. और उसकी चप्पले और शुज़, बड़ा सेक्सी
कलेक्शन था. एक से एक है हिल के नाज़ुक सॅंडल, पतले सोल, पतले स्ट्रैप और है
हिल की चप्पले. मा को मेरी याद हो आई. मैं होता तो पागल हो जाता.
एक द्रावार मे उसे डीवीडी का बड़ा खजाना दिखा. सब ब्ल्यू फिल्म थी, अधिकतर
लेस्बियन, वो भी बड़ी छोटी औरत-औरत संभोग की याने मिच्योर यंग लेज़्बीयन
वाली. कुछ पुरुष स्त्री और गे फ़िल्मे भी थी. पर डिल्डो कही नही दिखे. सेक्स की
भूखी इस लड़की के यहा डिल्डो न हो, यह बड़ा आश्चर्य था.

मा ने जाकर शशिकला को पीछे से बाहों मे भरके चूमा और बोली “बहुत
सेक्सी कपड़े है तेरे. और शशि, तेरे पैर कितने खूबसूरत है, और उतने ही
सेक्सी सॅंडल है, वो देखता तो पागल …” फिर मा चुप हो गयी. चेहरा लाल हो
गया कि ग़लती से फिर अपने बेटे का नाम उसके मूह से निकलने वाला था.
“अब तो बताना पड़ेगा दीदी, कौन है वो तेरा दीवाना? मैं जानती हू कि तुम
डाइवोर्स हो, शादी भी नही की है. बताओ कौन है दीदी, मेरी कसम” शशिकला
हाथ करते हुए बोली.

मा ने बात बदलने की कोशिश कि “अरे शशि, सब है यहाँ, इतनी ब्ल्यू फ़िल्मे
भी है पर डिल्डो नही है. क्यों, तुझे मज़ा नही आता फेकिंग मे, चूत मे लंड
डालकर मस्त चुदवाने का मज़ा ही और है, और तेरी जैसी जवान गरम कन्या
इसका मज़ा न ले ये मैं मान ही नही सकती.”

“बहुत मज़ा आता है मा … मेरा मतलब है दीदी, पर असली लंड से, इन रबर के
लन्डो से नही, वैसे है मेरे पास, अंदर रखे है, दो तीन तरह के, आज या कल
रात को दिखाउन्गि. उनका उपयोग मैं चुदवाने के बजाय चोदने मे ज़्यादा
करती हू. पर अब बताओ, बात बदलो नही, कौन है तेरा चाहने वाला?”

मा शरमाती हुई चुप रही तो हँसती हुई शशिकला बोली “मुझे मालूम है,
मैं बताती हू, तुम्हारा वो खूबसूरत बेटा. बोलो सच है या नही?”

मा को शक लगा. “तुझे कैसे मालूम?”

“मैने गेस कर लिया दीदी, सीधी बात है, तू हमेशा इतनी तृप्त दिखती है, खूब
सेक्स का मज़ा लेती होगी यह साफ है, चेहरे की यह चमक सिर्फ़ सेक्स से ही आती है.
बेटे पर बहुत प्यार है, ऑफीस मे अक्सर उसका ज़िक्र करती है, उसका फोटो तेरे
पर्स मे है, कही घूमने नही जाती बेटे के सिवाय, मुझे सब मालूम है, तुझे
घर बुलाने के पहले मैने पूरी जानकारी निकाली है, आख़िर जो औरत मेरी मा की
जगह ले रही है, उसके बारे मे पूरा मालूम करना ज़रूरी है मेरे लिए”

मा भोंचक्की हो कर चुप हो गयी. एक तो उसका चेहरा अब भी लाल था की
शशिकला को उसके और मेरे बारे मे पता चल गया है. अब मा की जगह वाली
बात से वह और अचरज मे पड़ गयी. फिर उसे कुछ कुछ समझ मे आया, क्यों
अचानक शशिकला ने उसे दीदी की बजाय मा कहा था अभी अभी; उसकी बुर मे
अजीब सी गुदगुदी होने लगी.

मा का चेहरा देख कर शैतानी से हँसती हुई शशिकला बोली “क्यों दीदी, जब
मा बेटे मे प्यार हो सकता है तो मा बेटी मे क्यों नही?” मा की शरमाई
बौखलाई हालत पर तरस खा कर फिर शशिकला बोली “चलो दीदी, लंच कर
लो और मुझे सब बताओ अपने बेटे के बारे मे. फिर मैं सब बताती हू, मा के बारे
मे और डॅडी के भी!”

“डॅडी के बारे मे? याने माथुर साहब? क्या कह रही है शशि?” मा ने पूछा.

“तो और क्या? मा और मेरे प्यार के बारे मे भी बताउन्गि और डॅडी और मेरे
भी, क्या दीदी, तुम बहुत भोली हो, जब मैं कह रही थी कि मुझे डिल्डो नही, सच
के लंड से चुदवाना अच्छा लगता है तो तुझे क्या लगा किस के लंड के बारे मे
बोल रही थी? वे मेरे सौतेले डॅडी है, वैसे असली होते तो भी मुझे फरक नही
पड़ता, बल्कि और मज़ा आता. अब चलो, मैं बेताब हू मा बेटे के प्यार की कहानी
सुनने को”

मा ने खाना खाते हुए मेरे और उसके बारे मे सब बताया. मेरी चप्पल फेटिश
के बारे मे भी बताया.

सुनकर शशिकला की आँखे चमकने लगी “बड़ा रसिक
लड़का लगता है, मालूम है डॅडी को भी इसका शौक है कुछ कुछ. मेरी
चाइस कितनी सही निकली दीदी, कैसे मैने तुझे ढूढ़ निकाला, है ना कमाल? अब
तू बैठ, मेरा खाना हो गया है पर स्वीट डिश बाकी है, वो मैं ले लेती हू” और
टेबल के नीचे घुस कर वह मा की बुर पर टूट पड़ी.

मा ने जब तक खाना ख़तम किया, शशिकला ने अपनी स्वीट डिश हासिल कर ली.
आख़िर मा ने उसे पकड़कर टेबल के नीचे से निकाला. “चल, कितना चुसेगी, अब
मुझे बता क्या बताने वाली थी. ऐसा कर, मेरी गोद मे आ जा, और आराम से बता”

मा शशिकला गोद मे लेकर सोफे मे बैठ गयी और उससे लिपटकर
चुम्बनो का आदान प्रदान करते हुए शशिकला ने अपनी कहानी सुनाई.
शशिकला की मा ललिता बाइसेक्सुअल थी. स्वाभाव बहुत कामुक था. पति से
डाइवोर्स के बाद कोर्ट ने ललिता को मा के नाते शशिकला की कस्टडी दे दी.
बचपन से ललिता अपनी बेटी को अपने पास सुलाती थी. शशिकला के उमर मे आते
आते ललिता का अपनी सुंदर कमसिन बेटी से ही चक्कर चल गया और मा बेटी मे
रति होने लगी. बेटी का जवान किशोर शरीर उसे इतना भा गया कि वह अपना सारा
खाली समय बेटी के साथ गुजरने लगी, बाहर की साथिनो से सेक्स उसने बंद
कर दिया.

शशिकला भी पूरी लेस्बियन बन गयी. ललिता के मासल स्तनों मे मूह छुपा
कर उसे जो सुकून मिलता था उससे वह मा की पूरी गुलाम हो गयी थी. पर मा के
समान ही उसकी कामुक बेटी को भी लंड की चाह थी. अपनी संपत्ति के कारण
ललिता बाहर के किसी ऐसे वैसे युवक के साथ अपनी बेटी का संभोग नही होने
देना चाहती थी. उसे भी बीच बीच मे लंड की भूख लगती थी. उसने सीधे
शादी कर ली, अपने से दस साल छोटे एक युवक, अशोक के साथ जो उसी की कंपनी
मे अभी अभी मैनेजर लगा था और जिसके साथ ललिता ने चक्कर चलना शुरू
कर दिया था.

अशोक जवान था, हॅंडसम था और ललिता की बहुत इज़्ज़त करता था. करीब करीब
अपनी मा से थोड़ी ही कम उमर की औरत से शादी करने मे उसे कोई
हिचकिचाहट नही हुई क्योंकि एक तो ललिता बहुत सेक्सी थी, दूसरे करोड़ों की
मालकिन थी और तीसरे ललिता ने शादी के पहले उसे साफ बता दिया था कि उसे ललिता
और उसकी बेटी शशिकला, दोनों की वासना पूर्ति करनी पड़ेगी. अशोक जैसे
युवक को और क्या चाहिए था!

शादी के बाद उनका यौन जीवन ऐसे निखारा की धरती पर स्वर्ग उतर आया.
हनीमून मे भी ललिता शशिकला को स्विट्ज़र्लॅंड साथ ले गयी थी. और उस किशोरी
की पहली चुदाई उसके सौतेले डॅडी ने ही की. अब हर रात मा , बेटी और डॅडी
एक पलंग पर सोते थे और कामदेव की पूजा करते थे.

दो साल पहले ललिता की आक्सिडेंट मे मौत के बाद शशिकला को सदमा
पहुँचा. पर अस्पताल मे मरने के पहले ललिता ने उसे कहा कि वह किसी अच्छी
सेक्सी ज़्यादा उमर की औरत को चुन ले जो उसे मा का प्यार भी दे सके और जिस्म की
भूख भी मिटा सके. अब तक शशिकला ने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नही दिया था
पर मा को देखने पर शशिकला को लगा जैसे उसकी खोज पूरी हो गयी है.

सुनते सुनते मा की बुर चूने लगी थी. वह जब कल्पना करती कि पलंग पर एक
मा अपने पति से चुदवा रही है और अपनी बेटी की बुर चूस रही है तो
चुदासी से सिसक उठती. इस बारे मे उसने कभी सोचा भी नही थी. आवेश मे
आकर उसने अपनी उंगली अपनी गोद मे बैठी शशिकला की बुर मे घुसेड दी और
कस के उसका मूह चूमने लगी.

चुंबन ख़तम होने पर शशिकला बोली “बिलकुल मा जैसे करती हो दीदी तुम,
वह भी ऐसे ही मुझे दबोच लेती थी, कभी कभी ज़बरदस्ती मुझे पलंग पर
पटक देती थी और मेरे मूह पर चढ़ जाती थी. घंटे भर मुझसे अपनी बुर
चुसवाती थी तब छोड़ती थी. कहती थी कि उसकी बुर मे इतना रस बनता है वह
सब उसकी बेटी के लिए है, और जब तक ख़तम नही होता, वह मुझे नही
छोड़ेगी. पर दीदी, अब तुम्हें दीदी कहना अच्छा नही लगता. मैं मा कहु
तुम्हें आज से? सबके सामने दीदी कहुगी”

मा की सांस तेज चल रही थी. उसने शशिकला को सोफे पर लिटाया और उसके सिर के
दोनों ओर घुटने टेक कर बैठ गयी. “मैं मा ही हू तेरी बेटी, मा का तरह प्यार
करूँगी आज से, और मा की तरह हुक्म भी चलाउन्गि. अब अच्छी बच्ची जैसे
अपना मूह खोल और जीभ निकाल. अपनी मा की चूत चूस, उसमे जीभ डाल. मेरे
बेटे का यह फ़ेवरेट आसान है, अब मेरी बेटी से भी करवाती हू. और खबरदार
उठने की कोशिश की तो, जब तक मैं न कहु, चुसते रहना. मा बड़े प्यार से
यह रस दे रही है तुझे, पूरा ख़तम करके ही उठना”

शशिकला मा का यह रूप देखकर खुशी से झूम उठी. उसे ऐसी ही मा
चाहिए थी. मा की चूत मे जीभ डालकर वह मा की बुर से रसते रस को पीने
लगी और मा अपनी कमर हिला हिलाकर उसके मूह को और जीभ को चोदने लगी.
मा ने आधे घंटे शशिकला को नही छोड़ा, लगातार उसके मूह को चोदति
रही. शशिकला ने भी मन लगाकर मा की बुर चूसी. आख़िर मा जब लस्त हो गयी
और सोफे पर लुढ़क गयी तो शशिकला उठकर एक ड्रॉयर से एक कमर मे
बाँधने वाला डिल्डो उठा लाई. डिल्डो के दो भाग थे, छोटा भाग उसने अपनी
बुर मे खोंसा और पट्टे से अपनी कमर मे बाँध लिया. वह अब बहुत मस्त हो
गयी थी.

“मा, अब मेरी बारी है, तू सुबह लंड या डिल्डो के बारे मे पूछ रही थी ना, ले अब
तेरी बेटी का लंड हाजिर है. समझ ले तेरे बेटे का लंड है, तेरा बेटा चोदता है
ना तुझे घंटों? अब मुझसे चुदवा ले, मैं भी अच्छा चोदति हू, मा तो
दीवानी थी मेरे चोदने की”

मा थक गयी थी, बुर भी शांत हो गयी थी, पर अब भी उसमे मीठी मीठी कसक
हो रही थी. सुबह की बातों से उसका सिर घूम गया था, मा बेटी की इस कथा से
उसकी वासना के रहे सहे बंधन भी टूट गये थे. फिर भी उसने हल्का विरोध
किया “अरे शशि बेटी, रुक ना, अभी मत चोद, थक गयी हू”

मा पर चढ़कर उसकी बुर मे डिल्डो घुसेड़ते हुए शशिकला बोली “एकदम
चुप मा, तुमने अपनी कर ली, अब मेरी बारी है. और थक गयी हो तो कौनसी
तुम्हें मेहनत करनी है. आराम से पड़ी रहो और अपनी बेटी से चुदने का लुत्फ़
उठाओ” और मा आगे कुछ कहती इसके पहले उसने मा पर झुक कर अपने
होंठों से मा का मूह बंद कर दिया और चोदने लगी.

इसके बाद तो मानों वहाँ कामुकता का भूचाल सा आ गया. दोनों औरतें
अब वासना के शिखर पर थी. पूरे दिन और रात उनका संभोग चलता रहा, बस
खाना खाने और कुछ देर आराम करने को वे रुकी, उनकी आग शांत होने का नाम
ही नही ले रही थी.

मा ने बताया की जब मैने रविवार को फ़ोन किया था तब उस शैतान शशिकला ने
उसे एक कुर्सी मे बिठा कर उसकी टाँगे हाथों पर फँसा दी थी कि उसकी चूत
पूरी खुल जाए और फिर मा को वह एक डिल्डो से चोद रही थी. बीच बीच मे जीभ से
मा के क्लिट को गुदगुदा रही थी. बेचारी मा को मेरा फ़ोन आया तो मा लेना नही
चाहती थी, पर शशिकला को पता चल गया और उसने मा से ज़िद की कि फ़ोन ले ले.
वह तो मा को इशारे से बोल रही थी कि अपने बेटे को बता दो कि क्या चल रहा
है पर मा ने मुझे यह बता कर टरका दिया था कि बिल्ली पैर चाट रही है
इसलिए गुदगुदी हो रही है. वैसे बात सच थी, शशिकला किसी बदमाश बिल्ली
से कम नही थी.

रविवार को भी दिन भर औरतों की रति चली. दोनों ने मिलकर सोफे पर लिपटे
हुए बैठकर दो तीन डी वी डी देखी और देखते देखते एक दूसरे के शरीर की
गरमाहट का स्वाद लिया. खूब गप्पें लगाई. मा ने विस्तार से शशिकला को
बताया कि मैं याने उसका बेटा उसके साथ साथ क्या क्या करता हू, कैसे मा की
सेवा करता हू. शशिकला ने अपनी मा के किस्से सुनाए, यह भी बताया कि
डॅडी के साथ उसका कैसा इश्क चलता है, डॅडी अपनी प्यारी बेटी की
फरमायशे कैसे पूरी करते है और खुद कैसे अपने मन की चाहत उससे
पूरी करवाते है.

रात को शशिकला फिर से चोदने के मूड मे आ गयी. “मा, चलो आज रात भर
तुझे चोदति हू, सब आसनों मे, बहुत दिन हो गये ये आसन आजमा कर, प्रैक्टिस
भी हो जाएगी, तुम भी बेटे के लंड के बिना कुलबुला रही होगी. मालूम है? मा
के साथ मैं अक्सर ऐसा करती थी खास कर जब डॅडी यहा नही होते थे”
रात भर उसने मा को डिल्डो से चोदा, एक पुरुष की तरह उसके अंग अंग को
मसला, सुबह तक मा की हालत खराब कर दी. आख़िर जब मा सुबह निकलने को
तैयार होने लगी तब उससे चला नही जा रहा था, शरीर लस्त सा हो गया था. तब
शशिकला ने उसे अपनी कार से घर छोड़ दिया.

माँ को यह सब बताने मे रात हो गयी. मैं सुन सुनकर पागल हो जाता था तो
मा की गान्ड मारने लगता था. मा की बुर की हालत देखकर मैने उसे चोदा
नही, हाँ रात भर गान्ड मारी और बीच बीच मे चूत चूसी. मन मे मुझे
बहुत संतोष था कि आख़िर मा को अपनी पूरी वासना पूरी करने का खूबसूरत
साधन मिल गया.

मा के दिन अब बड़े मस्ती मे गुजरने लगे. शशिकला ने उसे पर्सनल अस्सिटेंट
बना लिया. अब वह मा को हर जगह अपने साथ रखती. बिज़नेस के लिए जब बाहर
जाती तो मा को भी ले जाती. दोनों साथ साथ होटल मे रुकती, दो अलग कमरे लेती
पर रात एक ही कमरे मे गुज़ारती. शनिवार रविवार को तो अक्सर मा गायब
रहती.

एक मायने मे मेरा बुरा हाल हुआ, मा अब आधे दिन घर मे नही होती. उसके
रूप का दीवाना मैं उसके शरीर को तरस कर रह जाता. रोज रति की आदत पड़ गयी थी,
एक दिन भी खलल पड़ जाने पर मेरी हालत खराब हो जाती. वैसे मा यह कसर
पूरी कर देती थी जब यहाँ होती. स्त्री स्त्री संभोग के बाद अपने बेटे से स्त्री
पुरुष संभोग के लिए वह आतुर रहती और मुझे ऐसे अपने आगोश मे लेती
जैसे बिछड़ी नायिका अपने प्रेमी से चिपट जाती है. और मुझे किस्से सुनाती कि
शशिकला के साथ क्या क्या किया.

यह सब ज़्यादा दिन ऐसे . चलना संभव नही था. एक दिन रात को मा थोड़ी
गंभीर लगी. शशिकला काम से दो दिन को बाहर गयी थी, इस बार मा को बिना
लिए. मैं खुश था कि अब दो तीन दिन मा सिर्फ़ मेरी है. वैसे मा से उसकी और
शशिकला की चुदाई के किस्से सुन सुन कर मेरा भी मन मचल उठता था कि उस
मादक युवती के उस जवान शरीर को भोगने मिले तो क्या बात है.

मा को मैने पूछा कि क्या बात है, क्या सोच रही हो?

मा बोली “बेटे, शशिकला कह रही थी कि शायद समय आ गया है कि हमारे
दो परिवार आपस मे मेल जोल बढ़ा ले.”

“कौन से दो परिवार मा? तुम्हारा मतलब है शशिकला और माथुर साहब का
परिवार और अपना परिवार?” मैने पूछा.

“हा बेटे, देख, इन दोनों परिवारों मे बहुत सेम है. यहाँ एक मा और बेटे
का आपस मे इश्क है, वहाँ एक बाप और बेटी का है, भले ही सौतेले हों. अब
तक दोनों परिवारों को जोड़ने वाली कड़ी सिर्फ़ मैं और शशिकला हू. वह कह
रही थी कि अब अनिल और उसके डॅडी अशोकजी भी इसमे शामिल हो जाएँ तो अच्छा
है. दोनों को मालूम है ही. तुझे मालूम है कि मेरा और शशिकला का आपस
मे चलता है और माथुर साहब को भी मालूम है. फरक सिर्फ़ इतना है कि तूने
अभी तक उन दोनों को देखा नही है, सिर्फ़ फोटो देखा है. तेरी फोटो भी मैने
शशिकला को दिखाई है”

“माथुर साहब को मालूम है याने माँ? वे तुझसे कैसे पेश आते है? और
शशिकला क्या बोली” मैने उत्सुकता से पूछा.

“वे मुस्काराकर निकल जाते है, बड़े अदब से पेश आते है, और कुछ नही बोलते.
पर शशिकला बोल रही थी कि …… ” मा का चेहरा लाल हो गया और वह चुप हो
गयी. फिर बोली “शशिकला तो तुझपर फिदा है, कहती है मा, मेरे छोटे भाई से
मेरी पहचान करा दो, अपनी मा की इतनी सेवा करता है, बहुत अच्छा बेटा है,
शायद बड़ी बहन की भी इतनी ही अच्छी सेवा करेगा. कह रही थी कि कितना
चिकना लड़का है”

मेरा खड़ा हो गया. शशिकला के उस जवान खूबसूरत रूप को भोगने का
मौका शायद मुझे मिल जाएगा यह सोच कर लंड उछलने लगा. वह मुझे
चिकना कह रही थी इस बात से भी मन मे एक अजीब सा संतोष हुआ. माँ मेरे
लंड को पकड़कर सहला रही थी, मेरी हालत पर मुस्करा दी. अब भी कुछ
कहना था उसे पर हिचक रही थी.

“मा तू क्या बता रही थी, बोल ना? रुक क्यों गयी”

“बेटे, वो बदमाश शशिकला बोल रही थी कि उसके डॅडी याने माथुर साहब
को मैं बहुत अच्छी लगती हू. शशिकला बोल रही थी कि क्यों न सब अगले
शुक्रवार को उनके घर मे मिले और शनिवार रविवार वही बिताएँ. पर बेटे,
तुझे ये चलेगा? माथुर साहब और मैं …. याने वह शैतान लड़की हमे ऐसे ही
नही बुला रही है. ज़रूर वह खुद तुझे पकड़ लेगी और मुझे अपने डॅडी के
हवाले कर देगी” मा किसी तरह बोली.

“तो क्या हुआ मा? मज़ा करो. माथुर साहब तुझे अच्छे लगते है या नही?”
मैने मा के उरोज दबाते हुए पूछा.

“हाँ, अच्छे हॅंडसम आदमी है. वह बदमाश कह रही थी कि उसकी मा
माथुर साहब के हथियार की याने …” मा फिर शरमा कर रुकी तो मैं बोला “लंड
की” और हँसने लगा.

“हा रे नालयक, वही, कह रही थी कि बड़ा शानदार है, उसकी मा और वह
दोनों दीवाने थे उसके, कह रही थी कि दीदी अब तुम मालकिन बन जाओ उस हथियार
की. डॅडी वैसे ही दीवाने है तेरे, उन्हें भी उमर मे बड़ी औरतें बहुत अच्छी
लगती है, और तेरे सौंदर्य पर तो मरते है वे, तेरी गुलामी करेंगे जैसे मेरी
मा की करते थे, उनसे जो चाहे करवा लेना.” मा की आँखे चमक रही थी.

“चलो मा, हम ज़रूर चलेंगे, मज़ा करेंगे, मैं भी अपनी उस बहन का प्यार
पाने को आतुर हू”

उस रात हमने जो चुदाई की, वह पागलों जैसी चुदाई थी. हमारी हवस ठंडी
ही नही होती थी. आगे के बारे मे सोच सोच कर हम ऐसे बहकते थे कि फिर शुरू
हो जाते थे. हम रात भर जुटे रहे, मा ने दूसरे दिन छुट्टी ले ली. बोली शशि ने
कहा है कि आराम करो.

मैं खुश था. आख़िर मा को भी एक अच्छा हॅंडसम जवान आदमी मिलने वाला
था. और मुझे एक बेहद खूबसूरत जवान युवती.

फिर मा के कहने पर ही हमने निश्चय कर लिया कि बचे दो दिन सब संभोग
बंद रहेगा. शशिकला और अशोक माथुर से मिलने के समय यह ज़रूरी था कि
हम ताजे तवाने हों, ठीक से परिवारों की आपस की मुलाकात के लिए पूरे ज़ोर मे
हों. दो दिन कैसे गये यह पता ही नही चला.

इस बार कपड़ों पर हमने ज़्यादा ध्यान नही दिया. मा ने वही काली साड़ी,
स्लीवलेस ब्लॉज़ और काली ब्रा और पैंटी पहनी और मैने सादा टी शर्ट और जींस. हम
साथ कपड़े भी नही ले गये. मा को पहले ही अनुभव था “बेटे, घर मे घुस
कर जब कपड़े निकलोगे उसके बाद सिर्फ़ सोमवार को सुबह ही ज़रूरत पड़ेगी
उनकी.”
टैक्सी मे बैठकर हम दोनों अपने दूसरे परिवार से मिलन के लिए चल दिए

टैक्सी मे बैठकर मा ने शशिकला को फ़ोन लगाया “बेटी, हम आ रहे है,
आधे घंटे मे पहुँच जाएँगे” शशिकला ने कुछ पूछा. मा बोली “हाँ
हाँ, अनिल भी है, बहुत खुश है, अपनी दीदी से मिलने के लिए बेताब है” मा
फिर कुछ देर सुनती रही, फिर शरमा कर हंस दी “चल बदमाश, आकर खबर
लेती हू तेरी. क्या कहा? फिर से बोल, सुना नही ठीक से.”

शशिकला बहुत देर उसे कुछ बताती रही. मा बीच बीच मे मेरी ओर देखकर
हंस पड़ती. अब उसकी नज़रों मे भी शैतानी भर गयी थी. “अच्छा, तू कहती
है तो यही करेंगे, बेचारों की हालत खराब हो जाएगी पर, इन्हें इतना
तरसाना ठीक नही है” शशिकला ने फिर कुछ कहा और मा ने हार मान ली
“मेरी बच्ची, तू कहती है वही होगा. तू मानेगी थोड़े!” कहकर मा ने फ़ोन
बंद कर दिया. मैने पूछा तो मुसकाराकार बोली “पता चल जाएगा तुझे, बड़ी
बदमाश लड़की है, क्या क्या सोचती रहती है!”

हम उनके फ्लैट पर पहुँचे. मैं देखता रह गया. क्या आलीशान बिल्डिंग थी.
दरवाजा एक नौकर ने खोला. अंदर शशिकला और अशोकजी बैठे थे. उठकर
उन्होने हमारा स्वागत किया. मैं शशिकला को देखता रह गया. क्या रूप था
उसका. आज वह भी साड़ी पहने थी, बिलकुल मा जैसी, दोनों एक सी पोशाक मे
थी. मा की साड़ी काली थी और शशिकला की गहरी गुलाबी. शशिकला की गोरी
चिकनी बाहे, पारदर्शक पल्लू मे से दिखता ब्लॉज़, उसके लो कट मे से
उभर आए उसके स्तनों के बीच की खाई, उसमे फँसी एक सोने की चेन, गोरे
चिकने पेट की नाभि और उसके वे खूबसूरत पाँव, एक नाज़ुक कली है हील की
सॅंडल मे लिपटे हुए. देखकर मुझे नशा सा चढ़ने लगा.

अशोक माथुर लगते नही थे कि सैंतीस साल के होंगे, याने मुझसे उन्नीस बीस
बरस बड़े. बस तीस के आसपास के लगते थे. गोरा छरहरा मजबूत बदन और
चेहरे पर एक आत्म विश्वास. उन्होने हँसके मुझसे हाथ मिलाया, फिर मा को
देखने लगे. उनकी नज़र मे वो प्यास थी कि मैं समझ गया कि मा के उस
लुभावने रूप को देखकर उनकी क्या हालत हो रही होगी. मुझे विश्वास हो
गया कि मेरी तरह ही वे भी उमर मे बड़ी मिच्योर औरतों के भक्त है.

शशिकला बोली “दीदी, पहले डिनर कर लेते है, फिर नौकर को छुट्टी दे देते है,
हम फिर आराम से बातें करेंगे”

डिनर मे बस इधर उधर की बातें होते रही. मुझे शशिकला के पास बैठाया
था और मा माथुर साहब के पास बैठी थी. वाइन बहुत अच्छी थी, मुझे भी
उन्होने पिलाई. डिनर ख़तम होते होते मुझपर हल्का सा नशा छा गया.

“रामू, तुम अब जाओ, कल मत आना” कहकर शशिकला ने उसे छुट्टी दे दी. फिर हमे
बोली “मेरे बेडरूम मे चलते है, मैने एक बहुत अच्छे मूवी खरीदी है, वह
देखेंगे.”

शशिकला के बेडरूम का पलंग मैं देखता रह गया, करीब सात फीट चौड़ा
और आठ फीट लंबा था. दो जोड़े आराम से उसमे सो सकते थे. टीवी के अलावा
वहाँ सोफे और कुर्सियाँ भी थी.

मैं और अशोकजी एक एक कुर्सी मे बैठ गये. मा और शशिकला सोफे मे पास
पास बैठ गयी, सहेलियों की तरह. शशिकला ने पिक्चर शुरू की. पाँच
मिनिट मे मेरा खड़ा हो गया.

एक बड़ी ही कामुक पिक्चर थी, एकदम क्लियर प्रिंट था. आक्ट्रेस और आक्टर भी
एकदम सुंदर थे. एक चुदैल फैमिली की कहानी थी. माता पिता, उनकी दो
लड़किया और उनके पति, एक किशोर बेटा, एक नौकरानी और एक नानी. जल्द ही वे
जोड़ियाँ बना बना कर शुरू हो गये. किशोर बेटा मा पर चढ़ा था. दोनों
जमाई मिलकर अपनी बीवियों की नानी को एक साथ आगे पीछे से चोद रहे थे,
डॅडी अपनी एक बेटी के साथ इश्क फर्मा रहे थे और नौकरानी दूसरी बेटी से
लिपटी थी.

मेरी सांस चलने लगी. अशोक साहब भी लंबी साँसें लेते हुए देख रहे थे
“शशि कहाँ से लाई ये, कितनी अच्छी प्रिंट है!”

शशिकला अब मा से लिपट कर उसे चूम रही थी. “आपको अच्छी लगी डॅडी,
मैने पेंट हाउस मे एड देखा था, कोरियर से मॅंगा ली.” मा भी अब शशिकला
को बाहों मे लेकर उसके होंठ चूमते हुए धीरे धीरे उसकी जांघे सहला
रही थी. मा बेटी का इश्क यहाँ भी शुरू हो गया था.

मैं कभी पिक्चर देखता, कभी मा और शशिकला को. समझ मे नही आ
रहा था कि कौन सा दृश्य ज़्यादा सेक्सी है. अशोकजी भी मा को बार बार देख
रहे थे. उनके पॅंट मे तंबू तन गया था, मेरी तरह. धीरे से उन्होने अपने
तंबू पर हाथ फेरा. मुझसे नही रहा गया. अपने आप मेरा हाथ जींस के उपर से
मेरे लंड को सहलाने लगा. मुझे यह तो मालूम था कि आज रात क्या होगा पर
कैसे होगा इसका अंदाज़ा नही था. शायद हम जोड़ियाँ बनाकर दो कमरों
मे चले जाएँगे, यही मुझे लगता था. बहुत कर मेरी और शशिकला की जोड़ी
बनने वाली थी और उधर मा और अशोक माथुर की.

जब दो मिनिट बाद मैने अपने तंबू पर हाथ फेरा तो शशिकला बोली “चलो
मा, टाइम हो गया, अब इन्हें ऐसे खुला छोड़ना ठीक नही है.” वह उठकर
अशोकजी के पास पहुँची और उन्हें चूम कर उनके कपड़े उतारने लगी. “मज़ा
आ रहा है डॅडी? और मज़ा लूटेंगे आप, ज़रा सब्र कीजिए”

अशोक साहब चुपचाप कपड़े उतरवाते रहे. जल्द ही वे हमारे सामने नग्न खड़े थे.
उनका गोरा छरहरा गठा शरीर मा बड़ी उत्सुकता से देख रही थी.

शशिकला ने उनका जंघिया उतारा और मेरे मुँह से भी एक आश्चर्य का उद्गार
निकल आया. क्या खूबसूरत लंड था, और कितना बड़ा और शक्तिशाली! एकदम
गोरा डंडा था, नसों से भरा हुआ, थरथराता हुआ. लाल सुपाडा किसी रस
भरे टमाटर जैसा लग रहा था. करीब करीब नौ इंच का ज़रूर होगा. अब तक
मैने ब्ल्यू फिल्मों मे बहुत गोरे मस्त लंड देखे है पर जब अपने अलावा एक
और असली लंड, मुझसे बहुत बड़ा, प्रत्यक्ष मे देखा तो बहुत रोमाच
हुआ.

मा की साँसें तेज चलने लगी. मैं भी बहुत उत्तेजित था, न जाने क्यों एक दूसरे
पुरुष के लंड को देखकर मुझे इतने उत्तेजना क्यों हुई! पर मैं खुश भी
था, मा के मतवाले शरीर को भोगने के लिए इससे अच्छे लंड की मैं कल्पना
भी नही कर सकता था. मा के सौंदर्य के लिए परफ़ेक्ट जोड़ था यह.
मा की अवस्था देखकर शशिकला गर्व से बोली “पसंद आया मा? मेरे डॅडी
लाखों मे एक है. पर तुम भी तो अपने इस खूबसूरत लाड़ले को नंगा करो,
मुझे देखना है कपड़े निकाल कर कैसा दिखता है? अंदर से भी क्या इतना
ही नाज़ुक है जितना वैसे दिखता है”

मा मेरे पास आई और मेरा चुंबन ले कर मेरे कपड़े उतारने लगी. वह
बेहद उत्तेजित थी. मुझे बार बार चूमते हुए उसने मेरे सब कपड़े उतार दिए.
बड़े शान से मुझे उसने शशिकला को दिखाया जैसे अपनी बनाई कोई कलाकृति
दिखा रही हो.

मुझे देखकर शशिकला ने सीटी बजा दी, एकदम मस्त सीटी. बड़ी चालू चीज़
थी. मैं शरमा गया पर अच्छा भी लगा “अरे क्या चीज़ है मा, एकदम गुड्डा
है, प्यारा खिलौने जैसा, कितना चिकना है, मुझे लगता है कि इससे चिकनी
तो लड़किया भी कम मिलेगी. और इसका यह लंड, मैं मर जाउ, एकदम रसीले
गाजर जैसा है, लगता है अभी खा जाउ, इसके पीछे लड़किया बहुत लगती
होंगी मा? मेरे ख़याल से तो मर्द भी लग जाएँ ऐसा शरीर है इसका.”

मा भी बड़ी शान से बोली “तो? आख़िर मेरा बेटा है, मेरी आँखों का तारा, मुझे
इतना सुख दिया है इसने जो किसी बेटे ने अब तक अपनी मा को नही दिया. और मा
के बदन के रस मे ऐसा डूबा रहता है कि और कही देखने की फुरसत ही नही
है इसे.”

शशिकला जाकर अपनी अलमारी से बहुत सी ब्रेसियार उठा लाई. तीन चार उसने मा
को दे दी. “मा, अपने लाड़ले को ज़रा कुर्सी मे आराम से बिताओ और ठीक से हाथ
पैर बाँध दो, मैं डॅडी की खबर लेती हू. ये मर्द बड़ी जल्दी मे होते है,
इनका कंट्रोल भी नही होता. इन्हें बाँधा नही तो आज की इस खूबसूरत रात का ये
कबाड़ा कर देंगे. कुछ नही तो जल्दी मे मूठ मार लेंगे”

“बहुत प्यारी ब्रसियर है तेरी शशि, उन्हें छूकर ही मेरा बेटा बेहाल हो
जाएगा.” मा ने मुझे बिठाकर मेरे हाथ और पैर ब्रा से बाँधते हुए कहा.

मुझे रोमांच हो आया, शशिकला की ब्रसियर से मेरे हाथ पैर बँधे थे.

“और ये बड़ी ब्रेसियार किसकी है?” अशोक साहब बोले. उनकी आँखों मे असीम
वासना थी. मैं पहचान गया, शशिकला के हाथ मे मा की पुरानी ब्रेसियर
थी, मा शायद पहले ही उन्हें यहाँ ले आई थी.

“ठीक पहचाना अनिल, मैने मम्मी से पिछले हफ्ते ही मँगवा ली थी, डॅडी
के काम आएँगी मुझे मालूम था.” शशिकला अशोकजी के लंड को प्यार से
चूमते हुए बोली. वे अब कुर्सी मे बँधे थे और हिल डुल भी नही सकते थे,
लंड को हाथ लगाने की बात तो दूर रही.

हमे बाँध कर मा और शशिकला एक दूसरे की ओर देखकर हँसी. “चलो, इन
दोनों शैतानों का इंतज़ाम तो हो गया, नही तो ये परेशान कर देते, अब आओ
मा, हफ़्ता हो गया तेरे आगोश मे आए. चलो, मुझे प्यार करो, इन दोनों को भी
देखने दो कि मा बेटी का प्यार कैसा होता है? रात भर इन्हें दिखाएँगे कि
दो औरतें आपस मे कितना मीठा और तीखा प्यार कर सकती है” शशिकला मा
के कपड़े उतारते हुए बोली.

मुझे गश आ गया. यहाँ अब इंद्रासभा होगी, इन दो खूबसूरत नारियों मे
बिना किसी सीमा की रति होगी और हमे मन मार कर उसे सिर्फ़ देखना पड़ेगा.
शशिकला शायद इसी का प्लान बता रही थी मा को फ़ोन पर. क्या दुष्ट लड़की
थी! मैने अशोकजी की ओर देखा, उनके चेहरे पर भी वही भाव थे पर साथ
मे एक मीठी मुस्कान भी थी, शायद उनके साथ यह पहले भी हो चुका था,
शशिकला और उसकी मा के बीच!

जब दोनों औरतें अर्धनग्न हो गयी तो रुक गयी. “डॅडी की आँखे देखो मा,
कैसी चौड़ी हो गयी है तेरा रूप देख कर” शशिकला मा को खींचकर
अशोकजी के सामने ले गयी और मा की कमर पकड़कर उसे घुमा घुमा कर
उसका शरीर चारों ओर से उन्हें दिखाने लगी, जैसे खरीददार को माल दिखा
रही हो. अशोकजी बेचारे गहरी साँसें लेते हुए तड़प कर बोले “शशि बेटी,
प्लीज़, ऐसे नही तरसाओ आज, रीमा जी तो अप्सरा है अप्सरा, तुम्हारी मा के
समान. आज तो इस अप्सरा का प्रसाद मुझे मिलने दो.”

“मिल जाएगा डॅडी, ज़रा अप्सरा को देख तो लो पहले, बड़ी मुश्किल से ढूँढा है
मैने. आपको चखाने के पहले मैं फिर से चखुगी इनके प्रसाद को” मा
भी मज़े से हाथ उपर करके इस तरह घूम रही थी जैसे लिंगरी की माडल
फैशन शो मे दिखती है. इतनी बार मैने मा को ब्रा और पैंटी मे देखा था
फिर भी उसे देखकर मेरा दिल धड़कने लगा. आज परपुरुष के आगे ऐसे
अपने सुंदर जिस्म की नुमाइश करते हुए मा और भी नमकीन लग रही थी.
उसके उन उँचे हिल की संडलों पर वह ऐसे लचक लचक कर इधर उधर
चल रही थी कि अगर मेरे हाथ पैर न बँधे होते तो वही ज़मीन पर लेटकर मा
के पैर चूमने लगता.

शशिकला भी परी जैसी लग रही थी. छरहरा गोरा शरीर, एकदम स्लिम
जांघे, गुलाबी रंग की नाज़ुक है हिल सॅंडल और लाल रंग की लेस लगी ब्रा और
पैंटी. मा से मुझे एक पल के लिए ईर्ष्या हो गयी, इस सुंदरी के साथ मा ने
इतनी रातें बिताई, उसके सौंदर्य को तरह तरह से भोगा! फिर मन मे आया कि
शशिकला भी कोई कम भाग्यवान नही थी कि मेरी मा की तपती मादकता का
स्वाद उसे लेने का मौका मिला.

मा हमारे सामने पड़े सोफे मे बैठ गयी और खींच कर शशिकला को
अपनी गोद मे बिठा लिया. “आ बेटी, मा की गोद मे आ जा. इतने दिन हो गये अपनी
बेटी को प्यार भी नही कर पाई, आ एक किस दे प्यारा सा, तेरे होंठों का शहद
चखने को मैं तरस गयी.” और शशिकला को चूमने लगी. शशिकला भी
बड़े लड़ से मा की गोदी मे बैठ कर मा के स्तन दबाती हुई मा के
चुंबनो का जवाब देने लगी. जल्द ही यह चूमा चाटी गरमा गयी.
एक दूसरे की जीभ से जीभ लड़ते हुए, मूह चुसते हुए वे एक दूसरे के शरीर को
टटोल कर, सहला कर और दबा कर वे आपस मे ऐसी लिपटी थी जैसे प्रेम मे डूबे
प्रेमी करते है, फरक यह था कि दोनों औरतें थी, वह भी कम ज़्यादा उमर
की!

हमे और कुछ देर अपने अर्धनग्न खेल से जान बूझकर तड़पा कर आख़िर
दोनों ने एक दूसरे की ब्रा और पैंटी उतार दी और वही पलंग पर लेटकर सीधे
सिक्सटी नाइन मे जुट गयी. शशिकला का पूरा नग्न रूप मुझे बस एक झलक दिखा
क्योंकि वह लेट कर मा की बाहों मे समा गयी थी. जल्द ही वे दोनों वासना की
आहें भरती हुई अपनी अपनी साथिन की चूत के रस को चाटने मे ऐसी मशगूल
हो गयी की हमे भूल गयी.

मेरा बुरा हाल था. मैने अशोकजी की ओर देखा. वे अब कसमसा रहे थे. उनका
लंड झंडे जैसा तन कर खड़ा था. मुझे देखकर बोले “अनिल, बुरा मत
मानना पर तुम्हारी मा का यह रूप सहन नही होता, अभी मेरे हाथ पैर खुल
जाएँ तो उन्हें दिखाऊ कि उनके इस रूप की पूजा मैं कैसे करूँगा.”

“अशोक साहब, मैं बिलकुल बुरा नही मानता. बल्कि मा को आप जैसा चाहने
वाला मिल जाए तो मुझे अच्छा लगेगा, बेचारी ने बहुत दिन प्यासे गुज़ारे है”
मैने कहा “वैसे शशिकला जी को देखकर मुझे ऐसा लग रहा है कि अभी
उनके आगे घुटने टेक दूं और उनकी उस प्यारी चूत … मेरा मतलब है … सारी
अशोक साहब … याने वहाँ मूह छुपा दूं”

“सारी की कोई बात नही, मेरी बेटी की चूत है ही इतनी रसीली, पर अनिल, तुम्हारी मा
की चूत ज़रूर पकवान होगी पकवान, शशि कैसे मूह मार रही है देखो. और
मुझे अंकल कहो बेटे, अब फारमलिटी का कोई मतलब नही है. शशिकला को तुम
दीदी कह सकते हो, अगर तुम्हारी मा उसे बेटी कहती है तो यही रिश्ता हुआ.
वैसे तुम्हारी इस दीदी की बुर चोदने मे, चूसने मे तुम्हें बहुत मज़ा आएगा”
उन्होने कहा

“अंकल आप का मा से क्या रिश्ता है इस हिसाब से?” मैने शैतानी से पूछा. अशोक
अंकल अपनी कुर्सी मे धीरे धीरे उपर नीचे होकर अपने लंड को मुठियाने की
कोशिश कर रहे थे. मेरी ओर देखकर बोले “मैं भी उन्हें मम्मी कहना
चाहता हू, उमर मे बड़ी औरतें मेरे लिए देवी माता जैसी है. वैसे उनकी
उमर मेरी दीदी जितनी है पर वे मानें तो मैं उन्हें मम्मी या आंटी कहना
ज़्यादा पसंद करूँगा. ओह ओह वहाँ देखो अनिल, मेरी बेटी कैसे तुम्हारी मा के
स्तन गूँध रही है और उनकी चूत से मूह लगाए पड़ी है. क्या लकी लड़की
है”

हम दोनों मा और शशिकला की रति क्रीड़ा देखने लगे. उनका सिक्सटी नाइन
पूरे निखार पर था. मा नीचे थी और शशिकला उसके उपर उलटी बाजू से
चढ़ि थी. मा के सिर को जांघों मे दबाकर मा के मूह को चोद रही थी,
साथ ही अपना मूह उसने मा की टाँगों के बीच डाल दिया था. मा अपनी टाँगे
हवा मे उठाकर हिला रही थी, शशिकला के सिर को फ़ुटबाल की तरह जकाड़कर
मसल रही थी.

आख़िर एक दो बार झड़कर मा और शशि सुसताने लगी. मैने मा से मिन्नत की
“मा, प्लीज़ हमे अब मत तरसाओ. खोल दो ना”

“क्यों रे क्या हो गया? मा का स्वाद तो इतनी बार लिया है, आज ज़रा सब्र कर”
शशिकला मुझे चिढ़कर बोली.

मैं न रुक सका “दीदी, मैं तो आपके बारे मे सोच रहा था, आपका स्वाद मैं कब
चख सकूँगा इसके बारे मे सोच सोच कर मैं पागल हो रहा हू”

शशिकला उठकर मेरे पास आई. सामने से उसका नग्न शरीर मैने पहली
बार ठीक से देखा. उसके स्तन मा से काफ़ी छोटे थे पर एकदम सेब जैसे गठे
हुए थे. निपल छोटे किसमिस के दानों जैसे थे. और जांघों के बीच का त्रिकोण
एकदम चिकना था. किसी बच्ची जैसी दिख रही वह फूली गोरी बुर ऐसी लग रही थी
कि लगता था कि चबा चबा कर खा डालु.

शशिकला ने मेरे लंड को पकड़कर हिलाया और मेरी आँखों मे आँखे डाल
कर बोली. “और एक दो घंटे रुकना पड़ेगा अनिल, मैं देखना चाहती हू कि
तुझमे पेशंस कितनी है, इस खेल मे पेशंस ज़रूरी है पूरा मज़ा लेने के लिए.
है ना डॅडी? मा तो डॅडी को रात रात भर सताती थी ऐसे ही”

उसके हाथ के कोमल स्पर्श से मेरा लंड उछलने लगा. वह हंस दी, दो
उंगलियों से सुपाडे को घेर कर दबाने लगी. मेरी आँखों मे देखते हुए
वह शैतानी से हंस रही थी.

“अरे शशि, न सता उसे बेटी, बेचारा वैसे ही परेशान है तेरे इस बदन को
देखकर” मा ने शशिकला को समझाया पर वह मुस्कराती हुई मुझे
तड़पाती ही रही. जब मैं झड्ने को आ गया तो हाथ हटाकर उठ खड़ा हुई.
अपने स्तन को मेरे गालों से एक बार लगाकर वह मा के पास चली गयी.

“बहुत मज़ा आता है दीदी मुझे तो, और झूठ मत बोलो, तुम्हे भी आता होगा. हर
औरत को आता है अपने गुलामों को ऐसे तड़पाने मे. जाओ मम्मी, तुम भी
डॅडी को थोडा परेशान करके आओ, बेचारे तब से तुम्हारे इस बदन को देख
देख कर पागल हुए जा रहे है” शशिकला मा की जांघों मे अपना हाथ
डालकर बोली.

मा मूड मे थी. उठाकर अशोक अंकल के पास गयी और उनके सामने खड़ी हो
गयी “सच है क्या अशोकजी? मैं सच मे आपको अच्छी लगती हू?” थोड़े
छेड़खानी के अंदाज मे मा ने कहा. अशोकजी पास से मा के रूप को एकटक
देख रहे थे. कभी वे नज़र उठाकर मा के उन विशाल स्तनों को देखते और
कभी उनकी नज़र नीची होकर मा के पेट के नीचे के बालों मे जा टिकती.

“रीमाजी आप परी है, बस अपने इस दस पर कृपा कीजिए, मैं सह नही पाउन्गा
ज़्यादा देर” अशोक अंकल तड़प कर बोले. उनका लंड अब फिर से उपर नीचे हो रहा
था, जैसा मुठियाते वक्त होता है.

“कितना प्यारा है, पर बहुत बड़ा है. बाप रे, किसी बच्चे के हाथ जैसा है
आपका यह हथियार. मुझे तो मार ही डालेगा.” मा ने अपने होंठो पर जीभ
फेरकर अशोक अंकल के लंड को धीरे से मुठ्ठी मे ले लिया और सहलाने लगी.
“कैसा उछल रहा है, नाग की तरह फूफकार रहा है, काट खाएगा लगता है”

“आंटी, वह फूफकार नही रहा, मिन्नत कर रहा है अपनी मम्मी से, आंटी से की
इस मीठी अगन से छुटकारा दिलवो. प्लीज़ रीमाजी प्लीज़ …” अशोक अंकल ने
वासना भरी आवाज़ मे कहा. मा उनका लंड सहलाती रही. लंड की नसों पर
उसकी उंगलियाँ ऐसी चल रही थी जैसे सितार के तारों पर वादक की उंगलियाँ.
अचानक झुक कर मा ने लंड को चूम लिया. अशोक अंकल ऐसे तड़पे जैसे
करेंट मार गया हो. मा मुस्कराती हुई उनके गाल को चूम कर बोली “बस एक दो
घंटे और. वैसे आप को इतना तरसाकर मैं खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी
मार रही हू, आप छूटने के बाद मेरी क्या हालत करेंगे ये मैं जानती हू”

“अब आओ भी दीदी, उनको छोड़ो, वे कहाँ जाते है बच के. ज़रा उन्हे तड़पने दो.
इस इंद्रासभा मे शामिल होने को अप्सराओं की, मेनका और उर्वशी की, मेरी और
तुम्हारी अनुमति ज़रूरी है, हम न कहे तब तक इन्हे तड़पना ही पड़ेगा. तुम अब
आओ और इसका स्वाद लो, तुम्हे मेरा हनी चखती हू फिर से. ज़रा स्वाद ले लेकर
चटाना, देखु कितना शहद निकाल पाती हों मेरी जांघों के बीच के शहद
के घड़े से” शशिकला गर्व से मा को चैलेज करती हुई बोली.

अगले आधे घंटे मे मा ने शशिकला का इतना शहद निकाला कि वह रोने को
आ गयी. मा ने उस गर्विलि लड़की की वो हालत की की मज़ा आ गया. उसे कुर्सी मे
बिठाकर उसके सामने नीचे बैठ गयी और उसे वास्ता दिया कि अगर सच मे खुद
को ऐसी रंगीली शेरनी समझती है तो अपने हाथ अलग रखे. फिर शशिकला की
जांघे फैलाकर हमे दिखा दिखा कर उसके उस रसीले गुप्ताँग का मा ने
भरपूर स्वाद लिया. बिना झड़ाए उसे इतना सताया कि आधे घंटे मे शशिकला
रोने को आ गयी. कभी उसकी बुर को पूरा चाटती, कभी उंगली से मूठ मारती
और रिसते शहद को चाट लेती, कभी क्लिट को दाँतों मे लेकर जुट जाती.

मैं और अशोक अंकल तो पागल होने को थे. मा खुद भी नही झड़ी थी, बस
अपनी जांघे आपस मे रगड़ रही थी. अंत मे जब वह खड़ी हुई तो मैने देखा
कि उसकी आँखे वासना से गुलाबी हो गयी थी. सिसकती शशिकला को उठाकर
चूमते हुए वह बोली “निकाला ना तेरा शहद? तुझे अब मेरा बेटा ही झड़ाएगा.
और तुम्हारे डॅडी मेरी सेवा करेंगे. देखती हू कि ये दोनों मर्द आख़िर
कितना प्यार करते है हमे, कितनी पूजा करते है हमारी! पर शशि, इनके ये
लंड तो देख, मूह मे पानी आ रहा है, इनमे इतना ज्यूस होगा अभी, और ये सब
हमे चोद कर हमारी चूत के अंदर बहा देंगे, सब वेस्ट हो जाएगा, इनका
स्वाद लिए बिना कैसे इन्हे छोड़ दे!”

शशिकला अब तक थोड़ी सम्भल गयी थी, अपनी झाड़ झाड़ कर लस्त हुई चूत को
सहला कर शांत कर रही थी. “मम्मी तुम कमाल करती हो, मुझे लगा था
कितनी सीधी साधी है मेरी मम्मी, तुम मेरी भी गुरु निकली.”

फिर मेरे पास आकर मेरे लंड को मुठ्ठी मे पकड़कर शशिकला बोली “बात ठीक
है मम्मी, बहुत प्यारा है ये लंड, और इतनी ज़ोर का खड़ा है, कटोरी भर
मलाई होगी. चलो ऐसा करते है हम इन गन्नों को चूस लेते है, अभी ऐसे ही
बँधा रहने दो इन्हे, बाद मे छोड़ देंगे. मम्मी तुम डॅडी की ओर ध्यान
दो, आख़िर तुम्हारे गुलाम बन ही रहे है तो समझ ले कि गुलामों का क्या फ़र्ज़
है. मैं अनिल को देखती हू, इतना प्यारा चिकना लड़का है, इसे तो मैं चबा
चबा कर खा जाउन्गि. मम्मी, तुम भी डॅडी को ज़रा तड़पाओ. मज़ा ले लेकर
चूसो, एम डी साहब को ज़रा अपनी बेटी की सेक्रेटरी के आगे गिडगिडाने दो.”
मम्मी बोली “बिलकुल चिंता न कर, तेरे डॅडी की मैं पूरी खबर लेती हू” मा
जाकर अशोक अंकल के पास खड़ी हो गयी. “कहिए अशोकजी, क्या सेवा करूँ आप
की?”
अशोक अंकल तारथराते स्वर मे बोले. “आंटी, आप के ये मम्मे चूसने का
मन हो रहा है. इतने फूले हुए मुलायम और गुदाज मम्मे मैने कभी नही
देखे, और ये निपल! इतने मोटे, जामुन जैसे और ये गोले, आप के मम्मे तो सिर्फ़
चूसने को बने है मम्मी.”

मा अपनी छाती उनके मूह के पास ले आई. वे जब उसपर लपके की मूह मे लेकर
चूस सके तो मा खिलखीलाकर पीछे हो गयी. “अभी नही अशोकजी, पहले अपनी
मलाई खिलाइए हमे. मैं भी आपको शहद चखाउन्गि. बहुत अच्छा है, मैं
फालतू मे घमंड नही कर रही हू, मेरा बेटा और आपकी बेटी, दोनों दीवाने
है इसके.” कहते हुई मा ने एक पैर उठाकर अशोक अंकल बैठे थे उस कुर्सी
के हत्थे पर रख दिया. अब उसकी चूत खुलकर साफ दिख रही थी. चूत ठीक
अशोक अंकल के मूह के पास थी.

घने काले बालों मे घिरी मा के वह लाल रिसति बुर देखकर उनका जो हाल
हुआ, वह देखते ही बनता था. बेचारे लपक कर मा की जांघों के बीच मूह
डालने की कोशिश करने लगे. मा हंस कर पीछे हो गयी, उनके बालों मे
उंगलियाँ चलाती हुई बोली. “रुक जाइए अशोकजी, मैं कही भाग थोड़े ही रही हू,

आपको बहुत सा शहद चखाना चाहती हू, अभी बन तो जाने दीजिए, आपकी
बेटी ने जितना था, सब ले लिया है, पर आपको मैं तरसाउन्गि नही, लीजिए, चख
लीजिए स्वाद कैसा है”

मा ज़रा सा आगे हुई, बस इतना की अशोक अंकल की जीभ उसकी बुर तक पहुँचे.
अशोक अंकल की जीभ की नोक मा की बुर से छूटे रस से लगी और वे आँखे बंद
करके लंबी साँसे लेते हुए उसे चखने लगे. मा ने बड़े प्यार से उनके सिर
को पकड़कर उन्हे कुछ देर बुर चटाई और फिर अलग हो गयी.

“मम्मी, दीदी …. प्लीज़, मत तरसाओ मुझे” अशोक अंकल बोले. मा कुछ नही
बोली, मुस्काराकर उनके सामने नीचे बैठ गयी. उसकी आँखे अब अशोक अंकल
के फनफनाते लंड पर टिकी थी. “कितना अच्छा और जानदार है. शशि तूने तो
बहुत मज़ा किया होगा अपने डॅडी के साथ, क्या करती थी इसके साथ? चुसती तो
ज़रूर होगी!”

“सब कुछ किया है मम्मी इस के साथ. अपने शरीर के हर भाग मे इसे लिया है.
इसकी मलाई खाओगि तो सब भूल जाओगी. वैसे अब डॅडी को ज़्यादा मत परेशान
करो, बेचारे रो देंगे. अनिल तो रोने को है, है ना मेरे राजा?” शशिकला मेरे
लंड को होंठों से चूमते हुए बोली. पिछले पाँच मिनटों मे उसने मेरी
वे हालत की थी कि मैं सच मे रोने को आ गया था. उसने अपनी चूत तो मुझे
नही दिखाई पर उसमे उंगली डालकर मुझे अपना रस चखाया. मा से अलग
रस था, मा की रज काफ़ी तेज स्वाद की और मसालेदार है, उमर के साथ अच्छी पक
गयी है, शशिकला की रज भीनी भीनी खुशबू की थी और मा से भी ज़्यादा
गाढ़ी थी.

मेरा लंड जब ज़ोर से उछलने लगा तो वह मेरे कान मे बोली “देखो अपनी प्यारी
मा को, कैसे मेरे डॅडी के लंड पर मर मिटी है, देखना अब ऐसे चुसेगी
जैसे ब्ल्यु फिल्म की वे स्लॅट करती है. तुम अपनी सीधी साधी मा के कारनामे
देखो, मैं तो अब तुम्हारे इस प्यारे गन्ने का रस पिए बिना नही रह सकती.”

“दीदी, पहले मुझे तो अपना अमृत पिला दो प्लीज़” मैने शशिकला से मिन्नत
की. वह मुस्कर कर बोली “रात भर पिलाउन्गि, दो दिन पिलाउन्गि, तुझे प्यासा नही
रखुगी, पर अभी चुप रह मेरे छोटे से मुन्ना” मेरे सामने बैठकर उसने
मेरे लंड से खेलना शुरू कर दिया. उसे पकड़ा, हथेली मे लेकर गोल घुमाया,
उसका चुंबन लिया, अपने गालों और होंठों पर फिराया और फिर मूह मे
सुपाडा लेकर चूसने लगी. उपर देखती हुई वह मेरी आँखों मे आँखे डाल
कर आँखों आँखों मे मुझे छेड़ रही थी.

मैने कमर उचका कर भरपूर कोशिश की कि लंड उसके मूह मे और पेल
दूं, यह मीठी छेड़खानी सहना मेरे लिए असंभव था, पर वह बड़ी
चालाकी से अपना मूह दूर ले जाती जिससे बस सुपाडा ही उसके मूह मे रहता. वह
अब सुपाडे को अपनी जीभ से रगड़ रही थी, कभी अपनी जीभ की नोक मेरे सुपाडे
की नोक पर रखकर गुदगुदाने लगती. मैं क्या करता, तड़प्ता रहा.

शशिकला ने कनखियों से इशारा किया कि मा को तो देखो.
मा ने अशोक अंकल का इतना बड़ा लंड अब तक पूरा निगल लिया था. उसके होंठ
उनके पेट पर उनकी झान्टो मे जा छुपे थे.गाल फूल गये थे जैसे कोई बड़ी
चीज़ मूह मे हो, और अशोक अंकल के नौ इंच लंबे और अधाई इंच मोटे
लंड से ज़्यादा और बड़ा क्या हो सकता था. मैने मॅगज़ीन और ब्ल्यू फिल्मों मे
देखा था, बिलकुल वैसे ही कौशल से मा उनका लंड चूस रही थी.
अशोक अंकल भी कुर्सी मे हिल डुल कर कमर उठाकर मा का मूह चोदने की
कोशिश कर रहे थे. मा ने उन्हे वैसा करने दिया फिर अचानक लंड मूह से
निकाला और जीभ से निचला हिस्सा चाटने लगी. अशोक अंकल तिलमिला कर “ओह ओह ओह
दीदी प्लीज़” करने लगे. उनकी आँखे पथरा गयी थी. पर मैं समझ रहा था,
सुख के जिस सागर मे वे गोते लगे रहे थे वहाँ से उनका बचना मुश्किल था.
मा की उस कारीगरी को देखकर मुझे गर्व भी हुआ और ईर्ष्या भी हुई. क्या
गरम और सेक्सी थी मा मेरी, जो अशोक अंकल का ये हाल कर दिया. क्या मेरा लंड
कभी इतना बड़ा होगा? और मा को क्या मज़ा आ रहा होगा, कितना प्यारा लंड
है, ऐसे लंड को चूसने के लिए भी भाग्य चाहिए.

अचानक शशिकला ने मेरा लंड पूरा निगल लिया और जीभ से निचले भाग को
सहलाने लगी. मैं तुरंत झाड़ गया. “ओह दीदी ओह ओह मेरी मा &” बस इतना ही बोल
पाया. लंड के झाड़ते ही शशिकला ने लंड मूह से आधा निकालकर सुपाडा जीभ
पर लिया और बड़े चाव से चटखारे ले लेकर मेरा वीर्य खाने लगी. पूरा वीर्य
निगल कर भी वह बदमाश मेरे लंड को चुसती रही, मुझे सहन नही हुआ
पर वह हंस हंस कर जानबूझ कर मेरे लंड को सताती रही. मुझे तभी छोड़ा
जब मैं बिलकुल लस्त हो गया.

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