रात की स्याही गाँव की हवेली पर छाई हुई थी। चारों तरफ खेतों में सरसों के पीले फूल हल्की हवा में लहरा रहे थे, लेकिन अंदर का माहौल कुछ और ही था। मैं राधिका हूँ। मेरी उम्र अट्ठाईस साल, शादी को छह साल हो चुके हैं। मेरा पति अजय दिल्ली में नौकरी करता है, महीने में एक-दो बार आता है। घर में अब सिर्फ ससुर जी रामलाल और नई देवरानी पूजा रहते हैं। पूजा की शादी को अभी चार महीने भी नहीं हुए। वो बीस-बाईस की होगी, लेकिन बदन में वो परिपक्वता है जो देखकर मन डोल जाता है। गोरी चिट्टी त्वचा, भरी हुई चूचियाँ जो साड़ी के ब्लाउज में मुश्किल से समा पाती हैं, कमर पतली और गांड गोल-मटोल। वो शर्मीली है, लेकिन जब अकेले में बात करती है तो आँखों में एक चमक आ जाती है।
ससुर जी रामलाल की उम्र पचपन के आसपास है। लेकिन उनका बदन अभी भी मजबूत है। खेती-बाड़ी करते हैं, सुबह शाम खेतों में रहते हैं। सास जी के जाने के बाद से घर में एक अजीब-सी खामोशी है। ससुर जी दिन भर काम में व्यस्त रहते हैं, लेकिन रात को जब सब सो जाते हैं, उनकी आँखें हम दोनों पर टिक जाती हैं। मैंने कई बार महसूस किया है कि जब मैं कपड़े बदलती हूँ या नहाकर निकलती हूँ, उनकी नजरें मेरे बदन पर रुक जाती हैं। पहले तो मुझे गुस्सा आता था, लेकिन धीरे-धीरे वो नजरें मुझे अजीब-सी गुदगुदी देने लगीं। पूजा को भी मैंने देखा है—वो भी शरमाती है, लेकिन कभी विरोध नहीं करती।
उस रात सर्दी बहुत तेज थी। पाला पड़ रहा था। बिजली कई घंटों से गई हुई थी। लालटेन की पीली रोशनी में घर का आँगन रोशनी से भर रहा था। मैं और पूजा रसोई में बैठे थे। चूल्हे पर चाय उबल रही थी। पूजा ने धीरे से कहा, “भाभी, आज ससुर जी कुछ उदास लग रहे थे। पूरे दिन खेत से लौटकर चुप-चुप रहे।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “अकेलेपन का असर है पूजा। सास जी नहीं हैं, बेटे दोनों शहर में। हम दोनों ही तो हैं उनके साथ।” पूजा ने नजरें झुकाकर कहा, “हाँ भाभी… लेकिन कभी-कभी उनकी नजरें… मुझे डर लगता है।” मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, “डरने की क्या बात है? वो हमारे ससुर हैं।”
आँगन में आग जल रही थी। लपटें ऊपर उठ रही थीं। पूजा भी वहाँ बैठी थी। शायद ससुर जी ने उसे पहले बुलाया था। हम तीनों आग के इर्द-गिर्द बैठ गए। सन्नाटा था। सिर्फ लकड़ियों की फटने की आवाज और हमारी साँसें। ससुर जी ने हुक्का गुड़गुड़ाया, फिर धीरे से बोले, “दोनों बहुएँ इतनी सुंदर हैं। घर में रोशनी है तुम दोनों की वजह से। लेकिन मैं अकेला हूँ। सास तुम्हारी माँ जैसी थीं, लेकिन अब…” उनकी आवाज रुक गई। पूजा ने नजरें नीची कर लीं। मैंने कहा, “ससुर जी, आप अकेले नहीं हैं। हम हैं ना।”
मैं पास खड़ी देख रही थी। मेरा बदन जल रहा था। ससुर जी ने मुझे बुलाया। “राधिका, आ। पूजा की चूत चाट।” मैंने झुककर चाटना शुरू किया। पूजा की चूत गीली, मीठी। उसकी सिसकारियाँ बढ़ गईं। ससुर जी ने पीछे से मेरा पल्लू खींचा। मेरी गांड पकड़ी, दबाई। “तुम दोनों की गांड कितनी गोल है। आज दोनों में डालूँगा।” उन्होंने अपना लंड मेरी चूत पर रगड़ा। मैं काँप उठी। “ससुर जी… धीरे…” लेकिन वो धक्का मारकर अंदर चले गए। दर्द हुआ, लेकिन मजा भी। “आह… कितना मोटा है आपका लंड…” मैं कराह रही थी।
रात भर यही सिलसिला चला। कभी ससुर जी मुझे पीछे से पकड़कर चोदते, पूजा नीचे लेटी उनकी गेंदें चूसती। कभी पूजा को कुत्ते की तरह चोदते, मैं उनके मुंह में अपनी चूत देती। ससुर जी की ताकत कम नहीं हो रही थी। वो हमें थका रहे थे। “दोनों की चूत कितनी गरम है… आह… पानी आने वाला है…” आखिरकार उन्होंने पहले पूजा में झड़ दिया। गरम पानी पूजा की चूत में भर गया। फिर मुझे पलटा, मेरी चूत में डाला और जोर से झड़ गए। हम तीनों थककर लेट गए। पूजा मेरे सीने पर सिर रखे, ससुर जी बीच में। उनकी साँसें अभी भी तेज थीं।
सुबह होने से पहले ससुर जी ने कहा, “ये हमारा राज रहेगा। लेकिन जब मन करे, मैं बुलाऊँगा। तुम दोनों तैयार रहना।” हमने चुपचाप हाँ में सिर हिलाया। वो रात हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई। अब जब अजय और विक्रम शहर जाते हैं, हम दोनों ससुर जी के कमरे की तरफ देखती हैं। वो आग कभी नहीं बुझती। कभी-कभी वो हमें अलग-अलग बुलाते हैं, कभी साथ। लेकिन वो पहली रात की याद हमेशा ताजा रहती है—वो गर्माहट, वो चाहत, वो अपराध और वो मजा जो हमें बाँधे रखता है।
