लखनऊ की पुरानी हवेली जैसी गलियों में बसा वो बड़ा-सा घर, जहां दीवारें सदियों की गवाह थीं। नाम था ‘शिवानी विला’। बाहर से देखने में शांत, लेकिन अंदर एक तूफान पनप रहा था। शीतल देवी, उम्र ४२, विधवा। उसके पति की मौत को पांच साल हो चुके थे। वो एक स्कूल टीचर थीं, लेकिन घर में उनका रुतबा मां से ज्यादा एक औरत का था – सुंदर, गोरी, भरी-भरी देह, लंबे काले बाल जो कमर तक लहराते, और आंखें ऐसी कि कोई एक बार देख ले तो भूल न सके।
उसके दो बच्चे थे – बेटी आराधना, २२ साल की, एमए फाइनल की छात्रा। गोरी, स्लिम लेकिन कर्वी, कॉलेज में सबसे ज्यादा फोटोज आने वाली लड़की। और बेटा विक्रम, २४ साल का, इंजीनियरिंग पास, अब घर पर ही छोटा-सा बिजनेस चला रहा था। लंबा, चौड़ा कंधा, जिम की वजह से छाती फूली हुई, और चेहरा ऐसा कि लड़कियां पीछे मुड़कर देखतीं। लेकिन उसकी नजरें घर के अंदर ही अटकी रहतीं – कभी मां पर, कभी बहन पर।
सर्दियों की शुरुआत थी। शाम को कोहरा छा जाता, और घर की पुरानी लकड़ी की सीढ़ियां चरमरातीं। शीतल रसोई में खड़ी चूल्हे पर दाल चढ़ा रही थीं। उनकी साड़ी हल्की गुलाबी, ब्लाउज टाइट, जिससे उनकी भरी छाती का उभार साफ दिखता। वो सोच रही थीं, “आराधना आज लेट आएगी, विक्रम तो सुबह से बाहर है। घर कितना खाली लगता है।” लेकिन मन में एक बेचैनी थी। पिछले कुछ महीनों से विक्रम की नजरें बदल गई थीं। वो उसे देखता ज्यादा, बातें कम करता। और आराधना… वो भी कुछ अलग-सी लगती। रात को कभी-कभी दोनों भाई-बहन हंसते-बातें करते, लेकिन शीतल को लगता, वो हंसी में कुछ और छुपा है।
रात के ९ बजे विक्रम घर लौटा। कोट उतारते हुए बोला, “मां, आज बहुत ठंड है। कुछ गरम बना दो ना।” शीतल ने मुस्कुराकर कहा, “आ जा बेटा, अदरक वाली चाय बना रही हूं।” विक्रम किचन में आया, पीछे से खड़ा हो गया। उसकी सांस शीतल की गर्दन पर लगी। “मां, तुम आज भी इतनी खूबसूरत लग रही हो।” शीतल का हाथ कांपा, लेकिन वो हंसकर बोली, “अबे शैतान, मां से ऐसी बातें?” लेकिन दिल में एक मीठी सी सिहरन हुई। विक्रम ने हल्के से उसकी कमर को छुआ, जैसे सहारा ले रहा हो। शीतल ने कुछ नहीं कहा। वो चाय बनाती रही, लेकिन उसका शरीर गर्म हो रहा था
आराधना भी आ गई। जींस और टाइट टॉप में, बाल खुले। “मां, भाई, क्या हो रहा है?” वो हंसकर बोली। तीनों किचन में खड़े। विक्रम की नजर आराधना की छाती पर गई, जहां टॉप से ब्रा की लाइन दिख रही थी। आराधना ने नोटिस किया, मुस्कुराई। “भाई, आंखें नीचे रखो।” विक्रम शरमा गया, लेकिन शीतल ने देख लिया। रात का खाना साथ हुआ। बातें पुरानी यादों की। लेकिन हवा में कुछ था – एक अनकही चाहत।
रात गहरी हुई। शीतल अपने कमरे में लेटी थीं। पुरानी चारपाई पर, मोटी रजाई ओढ़े। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। मन में विक्रम का स्पर्श घूम रहा था। “वो मेरा बेटा है। लेकिन उसकी आंखों में वो आग… मेरे लिए?” वो करवट लेतीं, लेकिन शरीर में एक अजीब सी उत्तेजना। तभी दरवाजे पर हल्की खटखटाहट। “मां?” विक्रम की आवाज। शीतल उठीं, दरवाजा खोला। विक्रम अंदर आया, सिर्फ ट्रैक पैंट में। “नींद नहीं आ रही। बात कर लें?” शीतल ने हामी भरी। दोनों बिस्तर पर बैठे। कमरे में मद्धम लाइट। विक्रम ने कहा, “मां, तुम अकेली हो ना? मैं भी अकेला हूं।” शीतल की आंखें नम हो गईं। “हां बेटा। लेकिन हम परिवार हैं।” विक्रम ने उसका हाथ पकड़ा। “परिवार में भी प्यार होता है ना?” उसकी उंगलियां शीतल की हथेली में खेल रही थीं। शीतल का दिल तेज धड़का। वो हाथ नहीं छुड़ाई।
धीरे-धीरे बातें गहरी हुईं। विक्रम ने कहा, “मां, तुम्हारी ये साड़ी… कितनी अच्छी लगती है।” उसने साड़ी का पल्लू हल्का सा सरकाया। शीतल कांपीं। “विक्रम… ये गलत है।” लेकिन विरोध कमजोर था। विक्रम करीब आया। उसका चेहरा शीतल के चेहरे के पास। “मां, मैं तुम्हें चाहता हूं। बहुत दिनों से।” शीतल की सांस रुक गई। विक्रम ने होंठ उसके होंठों पर रख दिए। नरम, गर्म। शीतल ने आंखें बंद कर लीं। चुंबन लंबा हुआ। जीभें मिलीं। शीतल का शरीर पिघल रहा था। “ओह बेटा…” वो फुसफुसाईं।
तभी दरवाजा खुला। आराधना खड़ी थी। “मां… भाई?” उसकी आंखें चौड़ी। लेकिन चेहरे पर गुस्सा नहीं, एक अजीब सी मुस्कान। “तुम दोनों…?” विक्रम और शीतल अलग हुए। शीतल डर गईं। “आराधना, ये…” लेकिन आराधना अंदर आई, दरवाजा बंद किया। “मां, मैं जानती हूं। मैंने देखा है। भाई की नजरें तुम पर, और मेरे पर भी।” वो करीब आई। “और सच कहूं? मुझे भी अच्छा लगता है।” शीतल स्तब्ध। आराधना ने शीतल का हाथ पकड़ा। “हम तीनों अकेले हैं। बाहर दुनिया अलग, यहां हमारा अपना राज है।”
विक्रम ने आराधना को देखा। “तू भी?” आराधना ने हामी भरी। वो शीतल के पास आई, गाल पर हाथ फेरा। “मां, तुम कितनी नरम हो।” फिर विक्रम की तरफ मुड़ी। “भाई, अब डर मत।” आराधना ने अपना टॉप उतारा। ब्रा में उसकी छोटी लेकिन गोरी छाती। विक्रम की सांस तेज। शीतल देखती रहीं। मन में संघर्ष, लेकिन शरीर में आग। आराधना ने शीतल की साड़ी खींची। “मां, आज रुकना मत।” शीतल ने विरोध किया, लेकिन कमजोर। ब्लाउज खुला। उनकी भरी छाती नंगी। विक्रम ने देखा, आंखें फटीं। “मां… कितनी खूबसूरत।” वो झुका, चूसा। शीतल कराहीं। “आह… विक्रम…” आराधना ने भी शामिल होकर मां के दूसरे स्तन को छुआ। “मां, तुम्हारी चूचियां कितनी गरम हैं।”
कपड़े एक-एक करके गिरे। तीन नंगे शरीर। विक्रम का लंड खड़ा, मोटा। आराधना ने छुआ। “भाई, कितना बड़ा है।” शीतल ने देखा, मन में लालसा। विक्रम ने मां को लिटाया। उंगलियां उनकी चूत पर। गीली, तैयार। “मां, तुम भी चाहती हो ना?” शीतल ने हामी भरी। “हां बेटा… डालो।” विक्रम ने धीरे से लंड अंदर किया। “आह… मां, कितनी टाइट।” धक्के शुरू। शीतल चीखीं, “चोदो मुझे… जोर से।” आराधना देखती रही, अपनी चूत में उंगली डालकर। फिर वो विक्रम के पीछे आई, उसकी गांड पर हाथ फेरी। “भाई, मुझे भी।” विक्रम बाहर निकला, आराधना को लिटाया। उसकी चूत में लंड डाला। “आह… भाई… फाड़ दो मुझे।” शीतल देखती रहीं, उंगली अपनी चूत में।
रात भर चुदाई। कभी मां-बेटा, कभी भाई-बहन, कभी तीनों साथ। चुंबन, चाटना, चोदना। “मां, तुम्हारी गांड… मैं चाहता हूं।” विक्रम ने कहा। शीतल ने पलटीं। विक्रम ने पीछे से डाला। “आह… दर्द हो रहा है… लेकिन अच्छा लग रहा है।” आराधना मां के मुंह में अपनी चूत रखकर चटवाती। “मां, चाटो… अच्छे से।” सुबह तक तीनों थक गए। लिपटे हुए लेटे। शीतल बोलीं, “ये हमारा राज रहेगा।” विक्रम और आराधना ने हामी भरी। “हां मां। हमारा अंधा प्यार।” घर की दीवारें चुप रहीं, लेकिन अब वो राज रखने लगी थीं।
