मा ने अशोक अंकल को इतना सस्ते मे नही छोड़ा , दस मिनिट उनसे खेलती
रही. एक बार पूरा लंड मूह से निकालकर खड़ी हो गयी और जाकर उनके सिर को
हाथों मे पकड़कर उनका किस लेने लगी. अशोक अंकल ने मा के होंठ ऐसे
चूसे जैसे जनम जनम के भूखे हों. मा ने अपनी जीभ जब उन्हे दी तो
मुझे ऐसा लगा कि वे उसे खा जाएँगे, इतनी उत्तेजना से उन्होने मा की जीभ को
मूह मे लेकर चूसा. मा ने फिर उनका सिर अपनी स्तनों पर दबा लिया. मा के
मोटे मोटे स्तनों मे सिर छुपाकर अशोक अंकल मानों एक बच्चे जैसे हो
गये, उसके निपल बारी बारी से चूसने लगे.
पाँच मिनिट उन्हे मस्त करके मा फिर उनके लंड पर जुट गयी. इस बार अपनी
हथेली उनके सुपाडे पर रखकर इधर उधर घुमा कर रगड़ने लगी. अशोक
अंकल कुर्सी मे ऐसे उछलने लगे जैसे कोई हलाल कर रहा हो. मुझे पता था
अंकल पर क्या बीत रही होगी, आज कल मा मुझे कई बार ऐसा करता था जब सताने
के मूड मे होती थी. जब उनकी हिचकियाँ निकलने लगी, तो मा ने उनके लंड
को अपने उरोजो के बीच दबा लिया और अपने स्तन उपर नीचे करके उनके लंड
को स्तनों से ही चोदने लगी. जब अंकल अपना सिर उधर उधर हिलाने लगे तो
मा ने फिर से उनका लंड मूह मे ले लिया.
अशोक अंकल जब झाडे तो उनके मूह से ऐसी ज़ोर सी हिचकी निकली जैसे जान निकल
गयी हो. तब मा का मूह खुला था और सुपाडा मा की जीभ पर टिका था. इतना
सफेद और गाढ़ा वीर्य मा की जीभ पर निकला जिसके बारे मे मैं सोच भी नही
सकता था कि कोई लंड इतना सारा वीर्य निकाल सकता है. बड़े बड़े सफेद मलाई
जैसे लौंदे मा की जीभ पर उगलने लगे. मा ने पूरा वीर्य मूह मे भर जाने
दिया. चुपचाप मूह खोले बैठी रही. जब लंड लस्त हुआ तब तक मा का मूह
पूरा सफेद मलाई से भर गया था जैसे किसीने कटोरी उडेल दी हो. मा फिर उसे
निगलने लगी. उसकी आँखों मे एक अजीब तृप्ति थी.
शशिकला तुरंत उठकर उसके पास गयी और उसके गाल चूमने लगी. मा ने
आधा वीर्य निगल कर शशिकला के होंठों पर अपने होंठ रख दिए. काफ़ी वीर्य
उसने शशिकला के मूह मे दे दिया. बाकी का खुद निगल गयी. दोनों औरते एक
गहरे आलिंगन और चुंबन मे बँध गयी. दो मिनिट बाद जब वे अलग हुई तो
हँसते हुए शशिकला बोली “थैक्स मम्मी मलाई शेयर करने के लिए पर आज
वह पूरी तुम्हारे लिए निकली थी डॅडी, इतने दिन हो गये जब इतनी सारी मलाई
निकली है, तुम्हारे रूप का जादू चल गया है डॅडी पर लगता है”
मा अब भी चटखारे ले रही थी “हाँ शशि पर सोचा अब तो बहुत मलाई मिलेगी
मुझे, मेरी बेटी को क्यों तरसाऊ, तेरे प्यारे मीठे मूह का भी स्वाद ले लू ऐसा
लगा मुझे. तेरे डॅडी का लंड सचमे बहुत जानदार है. और मेरे बेटे ने
तुझे कुछ खिलाया या नही?”
“एकदम अमृत मम्मी, जवान लड़कपन का स्वाद लिए अमृत. अब इसे मैं ऐसा
निचोड़ूँगी की बस …. तुम कुछ कहना नही मम्मी.”
“अरे नही, तेरा ही भाई है, कुछ भी कर, तेरा हक है, तू दीदी है उसकी.” मा ने
शशिकला से कहा.
अशोक अंकल ने हाफते हुए कहा “रीमा जी आप जादूगरनी है, आप का जवाब नही,
मैं पागल हो जाउन्गा आप के साथ रहकर. पर मुझे मंजूर है”
“कैसी मम्मी चुनी है मैने डॅडी, मान गये ना? आख़िर मेरी चाइस है,
उसकी दाद देनी पड़ेगी” शशिकला ने इठलाते हुए कहा.
“अरे पर अब ज़रा मेरी भी सुनो प्लीज़, मुझे और अनिल को भी अपना रस
चखाओगि या नही, या प्यासा ही रखोगी?” अशोक अंकल अपनी बेटी से मिन्नत
करते हुए बोले.
“बस अब चलो, आप की ही बारी है. बस एक शर्त है डॅडी, आपके हाथ पैर हम
खोल देते है पर जैसा मम्मी कहेगी वैसा ही करना, वे जब तक नही कहे
उन्हे चोदने की कोशिश नही करना. आप के लंड को इसी लिए चूसा है कि अब तीन
चार घंटे बिना झाडे मम्मी की सेवा करे. और तूने भी सुना ना मुन्ना. अब ये
दीदी कहेगी तभी मुझपर चढ़ना. तब तक चुपचाप हमारी बुर रानी की
पूजा करना.” शशिकला शोख अंदाज मे मुझसे बोली.
मेरे और अशोक अंकल के हाथ पैर खोल दिए गये. शशिकला और मा सोफे पर
एक दूसरे से चिपट कर बैठ गयी और अपनी टाँगे फैला दी “आ जाओ दोनों बच्चो,
आओ और अपनी देवियों की पूजा करो. उनका प्रसाद लो. देवियों ने देख लिया है
कि उनके बेचारे भक्त कितनी देर से तरस रहे है” मा ने खिलखीलाकर कहा.
मैं झट से शशिकला के आगे बैठ गया और उसकी टाँगों के बीच घुस गया.
मा ने जब से शशिकला की चिकनी बुर का वर्णन किया था, उसके दर्शन के
लिए मैं व्याकुल था. आज वह खूबसूरत चूत मेरे सामने थी. एकदम गोरी, एक
भी बाल नही, बालों की जड़े तक नही दिख रही थी. गोरी फूली बुर के बीच की गहरी
लकीर मे से चिपचिपा पानी बाहर आ रहा था. मैने उंगलियों से बुर खोली तो
मज़ा आ गया, उसकी बुर का छेद एकदम गुलाबी था, मखमल सा कोमल.
भगोश्ठ छोटे थे, मा से काफ़ी छोटे पर एकदम गोरे चिट्टे. और क्लिटॉरिस,
उसकी नाज़ुक बुर के हिसाब से उसका क्लिट अच्छा बड़ा था, मा से भी बड़ा. मा का
अनार के दाने जैसा था, शशिकला का क्लिट किसी रसीले अंगूर जैसा था.
“अनिल बेटे, देखता ही रहेगा या स्वाद भी लेगा? इधर देख, शशिकला के डॅडी
तो अंदर घुस गये है मेरे, ऐसे चूस रहे है जैसे कभी औरत का रस पिया न
हो” मा की मीठी झाड़ से मैं होश मे आया. बाजू मे झाका तो अशोकजी ने
अपना मूह मानों मा की बुर मे घुसेड दिया था. ज़ोर ज़ोर से चूसने की आवाज़
आ रही थी. मेरे देखते देखते उन्होने थोड़ा सिर पीछे किया, फिर जीभ से मा की
पूरी बुर उपर से नीचे तक चाटने लगे. उन्हे और कुछ नही सूझ रहा था. मेरी
ओर उन्होने क्षण भर देखा, आँखों मे मुझसे कहा कि यार क्या खजाना है
तेरी मा की चूत और फिर जुट गये.
शशिकला की बुर को चूम कर मैने कहा “मा, इतनी खूबसूरत है दीदी की यह
चूत, मुझे समझ मे ही नही आ रहा है कि कहाँ से चूसना शुरू करूँ”
मैने शशिकला की बर का एक चुम्मा लिया और फिर पपोते फैला कर चाटने
लगा. अंदर झलक रहे रस की एक एक बूँद मैने जीभ से टिप ली, फिर धीरे से उसके
क्लिट को चाटने लगा. शशिकला मस्ती मे “अया अया अया” कर उठी. अपनी
जांघे और फैला कर उसने मेरे सिर को पकड़ लिया. “अच्छा कर रहा है अनिल, और
कर ना”
मैने उसके क्लिट को जीभ से रगड़ा और फिर मूह मे अंगूर की तरह लेकर चूसने
लगा. शशिकला ने सिसक कर मेरे सिर को अपनी बुर पर दबा लिया और मा से
लिपटकर उसके स्तन को चूसने लगी. मा ने उसके बाल चूमते हुए अपनी
चूंची और उसके मूह मे दे दी. अशोक अंकल का सिर पकड़कर मा ने जांघों
मे दबा लिया और धीरे धीरे अपनी जांघे कैंची की तरह उपर नीचे करने
लगी. “चूसीए शशिकला के डॅडी, मेरा रस और चूसीए. आप को आज मैं खुश
कर दूँगी, मेरा बेटा तो दीवाना है इसका”
मैने अपनी जीभ शशिकला की बुर मे डाली और अंदर से चाटने लगा. मानों
चासनी बह रही थी उसमे से! उस मादक स्वाद के रस से मेरा लंड भी फिर से
खड़ा हो गया था. शशिकला ने भी अब मेरे सिर को अपनी जांघों मे भींच
लिया था.
आधे घंटे तक हम दोनों उन खूबसूरत औरतों की बुर के रस को पीते रहे. वे
कई बार झड़ी. लगातार हमारे सिर को अपनी बुर पर दबा दबा कर वे
हस्तमैन्थुन करती जाती और झाड़ झाड़ के अपनी बुर का पानी हमे पिलाती जाती. साथ
मे आपस मे लिपट कर एक दूसरे को प्यार करते हुए, एक दूसरे के मम्मे
चुसते हुए, चूमा चाटी करते हुए मज़ा लेती जाती. दोनों आख़िर झाड़ झाड़ कर
ढेर हो गयी और अपने पैर उठाकर वही सोफे पर एक दूसरे से लिपट कर हाफ़ती
हुई लेट गयी.
मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया था, तन्ना कर उछल रहा था. बाजू मे देखा तो
अशोक अंकल भी अपने तनतनाए लंड को हाथ मे लेकर सहला रहे थे. मेरी
ओर देखकर प्यार से हंस दिए. “अनिल, तेरे जैसा लकी लड़का इस जग मे नही होगा,
अपनी इस अप्सरा जैसी मा के शरीर का, उसकी चूत के इस अमृत का तुझे रोज भोग
मिलता है. इतनी बला की खूबसूरत नारी मैने नही देखी आज तक”
मैने कहा “अशोकजी ….”
वे बोले “फिर कहा मुझे अशोकजी, प्लीज़, अब यह अशोकजी कहना छोड़ दो.
चाहे तो अंकल कह लो”
मैने कहा “अंकल, शशिकला कितनी सुंदर है, इतनी जवान और बला की हसीन,
आप भी तो इतने सालों से, जब से ये छोटी थी तब से इसके रूप को चख रहे
है”
वे बोले “हाँ, मेरी बेटी बहुत खूबसूरत है. मैं बात कर रहा था उमर मे बड़ी
पूरी तरह से परिपक्व मेस्योर औरतों की और तुम्हारी मा जैसी मेस्योर औरत
मिलना मुश्किल है. अब रहा नही जाता यार, इन्हे अगर अब चोदा नही तो मैं मर
जाउन्गा” कहकर वे मा के शरीर को चूमने लगे, कभी पीठ, कभी कमर
कभी जांघे! मैने भी शशिकला के जवान शरीर को सहलाना शुरू कर
दिया.
जब दोनों औरतों का हाफना बंद हुआ और उनकी सांस मे सांस आई तो वे भी
उठ बैठी. मा अंगड़ाई ले कर बोली “शशि बेटी, लगता है हमारा रस इन्हे
बहुत रास आया है, देखो दोनों, फिर तन कर तैयार है हमारी सेवा मे” अशोक
अंकल के लंड को पकड़कर मा बोली “क्यों अशोकजी …”
अंकल तड़प कर बोले “प्लीज़ दीदी, मेरी इंसल्ट मत कीजिए, मैं आप का गुलाम हू,
उमर मे भी आप से बहुत छोटा हू, मुझे अशोक ही कहिए” अपने लंड पर मा
के हाथ के दबाव से वे बहुत गरमा गये थे. मा की चूंची पकड़कर दबा
रहे थे.
“अच्छा अशोक, अब क्या करना है बोलो? मेरा तो मन हो रहा है कि फिर चूस लू
इसे, कितना रसीला गन्ना है! क्यों शशि, तू क्या करती है इसके साथ? मेरा बस
चले तो इस जवान को बाँध कर रखू और बस खूब चुसू, सारी मलाई खा
जाउ.”
शशि मेरे लंड को अपनी छातियों के बीच रगड़ती हुई बोली “अरे नही मम्मी,
ऐसा ज़ुल्म न करो डॅडी पर, वैसे तुम्हारा हक है, मेरी तो ये सुनते नही,
पटककर शुरू हो जाते है, अलत पलट कर मेरा रेकार्ड बजाते रहते है”
मुझे रोमाच हो आया. अलत पलट कर याने! इतने मोटे लंड से इस दुबली पतली
नाज़ुक कन्या की गांद भी मारते है अंकल? और शशिकला सह लेती है! मेरी
आँखों मे देखकर शशिकला बोली “तुझे क्यों अचरज हो रहा है? तुझे
भी तो शौक है अपनी मा का रेकार्ड दूसरी तरफ से बजाने मे! सब मर्दों का
यही शौक होता है. अच्छा चलो, आगे का काम करो. सब लोग पलंग पर चलो.
मम्मी हम दोनों ने बहुत मेहनत कर ली, अब इन्हे करने दो, आख़िर गुलाम
होते किस लिए है!”
हम सब उस बड़े पलंग पर आ गये. शशिकला ने मा को एक तरफ लिटाया और
उसके नितंबों के नीचे तकिया रखा. अपने डॅडी के लंड को पकड़कर
खींच कर उन्हे उसने मा की टाँगों के बीच बैठाया. “चलिए डॅडी, शुरू
हो जाइए. और ज़रा ठीक से मेरी मम्मी को चोदिये, मेरी इज़्ज़त का सवाल है, नही
तो आप धासद पसद बहुत करते है. जब तक रीमाजी बस न बोले, आप इन्हे
चोदेन्गे, बिना झाडे, ठीक है ना?”
अंकल तो रह ही देख रहे थे. कानों को पकड़कर बोले “कसम ख़ाता हू, मैं
तो गुलाम हू इनका, मालकिन जैसे कहेंगी मैं वैसा ही करूँगा”
मा ने शशिकला से कहा “तू नही चुदवायेगि अनिल से बेटी? लगे हाथ तू भी
इससे सेवा करवा ले. बहुत प्यारा बेटा है मेरा, तेरे उपर मर मिटेगा. मुझे
इतना प्यार करता है, देखो कितना खुश है अपनी मा की सेवा के लिए तैयार इस
भारी भरकम हथियार को देखकर” अशोक अंकल के लंड को पकड़कर मा
बोली.
शशिकला बोली “बिलकुल मम्मी, तुम्हारी और डॅडी की फिट करा दूं, फिर इसे
देखती हू. इसे मैं चोदुन्गि, छोटा है ना, मेरा हक है इसपर चढ़ने का.
अनिल, मज़ा आ रहा है? अपनी मा को चुदवाते देखना कितने बेटों को नसीब
होता है?”
मैने कहा “दीदी, आप सच कहती है, अशोक अंकल के लंड से अच्छा लंड हो ही
नही सकता मेरी मा को सुख देने के लिए”
अंकल मा की टाँगों के बीच बैठते हुए बोले “अनिल यार, चिंता मत करो,
तुम्हारी मा को मैं ऐसा चोदुन्गा कि इन्हे शिकायत का मौका नही मिलेगा”
शशिकला ने अपने डॅडी के लंड को मा की चूत पर रखा. प्यार से मा की
चूत अपनी उंगलियों से चौड़ी की और मा का चुंबन लेती हुई बोली “पेलिए
डॅडी, प्यार से, मम्मी को तकलीफ़ न हो. अब तक वह अनिल के लंड से चुदवाती
रही है, आपका तो डबल है उससे” और अपने मूह से उसने मा का मूह बंद
कर दिया.
अशोक अंकल लंड पेलने लगे. उनका मोटा मूसल मा की बुर मे घुसने लगा.
आधा लंड घुसने पर मा का शरीर कांप उठा. वह शशिकला से चिपट गयी
और अपने बंद मूह से एयेए एयेए करने लगी. अंकल रुक गये. शशिकला ने
इशारा किया कि रूको मत, पेल दो एक बार मे. अंकल ने फिर से ज़ोर लगाया और सट से
पूरा लंड मा की बुर मे उतर गया.
मा का शरीर कड़ा हो गया. वह पैर फटकारने लगी तो अंकल ने उसके पैर
पकड़ लिए. मुझे बोले “क्या चूत है तेरी मा के बेटे, इस उमर मे भी इतनी
मस्त टाइट है. और इतनी गीली और गरमागरम, मखमल से कोमल” शशिकला अब
मा के मूह को अपने मुँह से चुसते हुए धीरे धीरे उसके स्तन भी सहला
रही थी, उसके निपल उंगली मे लेकर रोल कर रही थी.
मा शांत हो गयी तो शशिकला ने मा का मूह छोड़ा “क्यों मम्मी, मज़ा
आया? दर्द हुआ क्या? वैसे मेरे डॅडी का ऐसा है कि अच्छी अच्छी खेली हुई
औरतों के छक्के छुड़ा दे. पर मैने सोचा बार बार के दर्द से अच्छा है कि
एक बार मे ले लो, फिर मज़े ही मज़े है”
मा सिसक कर बोली “हाँ बेटी, दर्द हुआ पर बड़ा मीठा दर्द था, मैं तो भूल ही
गयी थी सुहागरात के दर्द को, अशोक ने मुझे उसका आनंद दे दिया. सच मे
कितना बड़ा है अशोक का, ऐसा लगता है मेरे पेट मे घुस गया है. पर बहुत
अच्छा लग रहा है मेरी रानी”
शशिकला हट कर अशोक अंकल को बोली “चलिए डॅडी, शुरू कीजिए, मेरी बात
याद है ना!”
अशोक अंकल धीरे धीरे लंड मा की बर मे अंदर बाहर करने लगे. “ठीक है
ना रीमा जी? कि और धीरे करूँ”
मा को अब मज़ा आ रहा था. “नही नही, और ज़ोर से करो अशोक, ऐसे नही, आख़िर
चोद रहे हो, मालिश थोड़े कर रहे हो कि धीरे धीरे की जाए, कस के चोदो.
मेरे बेटे को भी देखने दो कि उसकी मा कैसे चुदति है ऐसे मतवाले लंड
से” और मा ने अपनी टाँगे उठाकर अशोक अंकल की कमर के इर्द गिर्द जाकड़ ली.
अशोक अंकल मा पर लेट गये. मा को चूमते हुए वे मा को एक लय से चोदने
लगे. अब उनका लंड कस के मा की बुर के अंदर बाहर हो रहा था.
“चल, मा तो शुरू हो गयी, अब तू आ जा मैदान मे. अभी तू उपर से आ, देखती हू
कितनी देर टिकता है मेरा मुन्ना” लड़ से मेरे बाल बिखरा कर शशिकला टाँगे
खोल कर मेरे सामने लेट गयी. मैने उसकी बुर मे लंड डाला और उसपर लेट कर
उसे चोदने लगा. बहुत चिपचिपी और गीली बुर थी, लगता है वह कामतूर
कन्या कभी भी तृप्त नही होती थी.
मैने शशिकला के गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रखे, थोड़ा शरमाते
हुए. उसने मेरे चुम्मे के जवाब मे हंस कर कहा “चल, चोद अब, पर
झड़ना नही” और अपना मूह खोल कर मेरे होंठ अपने मूह मे भर लिए और
चूसने लगी. अपनी टाँगों और बाहों से उसने मेरे बदन को भींच लिया था
और कमर उचका उचका कर चुदवा रही थी. मैने भी कस कर हचक
हचक कर उसे चोदना शुरू कर दिया.
क्या समा था, मैं अशोक अंकल की बेटी को चोद रहा था, और उसी पलंग पर
हमसे एक फुट दूर लेटकर वे मेरी मा चोद रहे थे. उनकी चुदाई अब पूरे
निखार पर थी, मा की बुर कितनी गीली हो गयी थी इसका अंदाज़ा मुझे मा की
चूत से निकलती ‘फॅक’ ‘फॅक’ ‘फॅक’ की आवाज़ से आ रहा था. मा ने वासना के आवेश मे
आकर अंकल को कहना शुरू कर दिया “मैं गाढ अशोक, कितना अच्छा चोदते हो,
तुम्हारा लंड अंदर घुसता है तो मेरी चूत ऐसे फैलती है कि लगता है फट
जाएगी, ऐसा लगता है कोई मेरी बुर मे हाथ डालकर चोद रहा है, चोदो
मुझे मेरे राजा, मेरे प्यारे, कस के चोदो …” अंकल ने मा के मूह को अपने
मूह से पकड़कर मा की आवाज़ ही बंद कर दी. उसे बाहों मे कस के वे अब ऐसे
मा को चोद रहे थे जैसे उसे रात भर के लिए खरीद लिया हो और पैसा वसूल
कर रहे हों.
मेरा हाल बुरा था. मा की ऐसी चुदाई देखकर मेरा ऐसा तन्ना गया था कि मैं
झड़ने को आ गया. शशिकला मस्त चुदवा रही थी, उसे पता चल गया, उसने
तुरंत पलटकर मुझे पलंग पर चित किया और मुझपर चढ़ बैठी. बिना
धक्का लगाए वह मुझे दबोच कर बैठी रही. जब मेरा उछलता लंड थोड़ा
शांत हुआ तो मेरे गाल पर चपत मार कर झूठ मूठ के गुस्से से बोली “झडने
वाला था ना तू? मैने मना किया था ना? मालूम है ना तू मुझे क्यों चोद रहा
है? मुझे तू चोद रहा है मुझे सुख देने को, खुद के आनंद के लिए नही.
जैसे डॅडी चोद रहे है तेरी मा को. अब चुप पड़ा रह, मैं छोड़ूँगी तुझे,
देख कैसे तरसा तरसा कर तेरा काम तमाम करती हू. पहले ज़रा दीदी की बुर
मे भरे पानी को पी ले, बहुत गीली हो गयी है”
मेरे लंड को चूत से निकालकर वह मेरे मूह पर बैठ गयी. मुझसे अपनी
बुर चटवाई. मेरा लंड जब कुछ संभला तो मेरे लंड को बुर मे
घुसेड कर मेरे पेट पर बैठकर मुझे चोदने लगी.
इतनी देर यह चुदाई चली कि मैं रोने को आ गया. शशिकला माहिर खिलाड़ी थी.
खुद कई बार झड़ी पर मुझे नही झड़ने दिया. मैं झड़ने को आता तो रुक जाती
या लंड को बुर से निकाल डालती.
उधर मा को अंकल ने ऐसे चोदा की मैं उनकी कामकला का कायल हो गया.
शशिकला को उन्हे उलाहना देने की ज़रूरत नही पड़ी. वे लगातार मा को चोद
रहे थे. कभी छोटे धक्के लगाते, बस ज़रा सा लंड मा की बुर मे अंदर बाहर
करते, कभी हचक हचक कर चोदते, पूरा लंड मा की चूत से बाहर
खींचते और सटाक से फिर पेल देते. मा जब ज़्यादा मस्ती मे चिल्लाने लगती तो
उसके मूह को अपने मूह से बंद कर देते. बीच बीच मे मा के मम्मे
पकड़कर प्यार से मसलने लगते.
आख़िर मा झाड़ झाड़ कर लास्ट हो गयी पर अशोक अंकल ने चोदना नही छोड़ा.
मा बोली “बस अब हो गया अशोक, तुमने मेरी कमर तोड़ दी, इतना आज तक नही
चुदि मैं, बिलकुल तृप्त कर दिया तुमने मेरी बुर को, पर अब छोड़ दो, अब मत
चोदो, मैं नही सह पाउन्गी”
अशोक अंकल ने अपनी प्यारी बेटी की ओर देखा. शशिकला पूरे जोश मे थी. उसकी
वासना अब धधक रही थी. मुझे चोदते हुए वह कई बार झड़ी थी पर अब भी
गरमाई हुई थी. शायद मुझे ऐसे तरसा तरसा कर चोदने मे उसे बहुत
मज़ा आ रहा था. उसने अपने डॅडी से कहा “क्या डॅडी आप भी मम्मी की
बातों मे आ गये. उस जैसी गरम औरत की भूख इतने मे कैसे मिटेगी! वो तो
ऐसे ही कह रही है. आप मत सुनिए, चोदिये और, ज़्यादा नखरा करे तो मूह
बंद कर दीजिए, ज़रा ज़ोर से चोदिये, आपका लंड उसके बच्चेदानी मे घुस
जाना चाहिए तब उसे तृप्ति मिलेगी. मैं नही चाहती कि मम्मी मुझे कहे कि
शशिकला, बड़ी उम्मीद से आई थी तेरे घर कि मुझे चोद चोद कर बिलकुल
मस्त कर देंगे तेरे डॅडी पर उन्होने तो आधे मे छोड़ दिया. मुझे देखो,
कितना मज़ा दे रही हू अनिल को. बेचारा मस्ती से पागल होने को है पर मैं इसे
नही छोड़ने वाली. याद रखेगा हमेशा अपनी दीदी की चुदाई”
मा को दबोच कर उसके मूह को अपने होंठों मे पकड़कर चुसते हुए अब
अशोक अंकल ने जैसा मा को चोदा उसकी मैं कल्पना भी नही कर सकता था.
क्या स्टेमिना था उनका. लगातार घचघाच घचघाच उनका लंड मा की
बुर को चीरता रहा. मा अब तड़प तड़प कर उनके चंगुल से निकलने की
कोशिश कर रही थी, हाथों से उनकी पीठ पर वार कर रही थी, उन्हे धकेलने
की कोशिश कर रही थी पर वे थे कि जुटे हुए थे. ऐसा लग रहा था जैसे बलात्कार
कर रहे हों.
दस मिनिट बाद मा ने एक गहरी सांस ली और आँखे बंद करके लुढ़क गयी,
उसका शरीर लास्ट पड़ गया. “लगता है बेहोश हो गयी मम्मी. अब ठीक है, अब
हम कह सकते है कि आपने मम्मी को चोदा है. शाबास डॅडी, आपने मेरी
लाज रख ली. अब आप भी झाड़ ले तो मैं कुछ नही कहुगी” शशिकला ने अपने
डॅडी को शाबासी दी. वे अब मा को ऐसे चोदने लगे जैसे उसके शरीर मे
अपना शरीर घुसा देना चाहते हों. मेरे अंदाज मे लोग रंडियो को पैसे
वसूल करने को ऐसे ही चोदते होंगे. दो मिनिट मे वे झाड़ गये और मा के
शरीर पर लस्त होकर लुढ़क गये.
शशिकला की आँखों मे एक अजीब चमक थी. अब वह भी मुझ पर तरस खा कर
नीचे लेट गयी और मुझे उपर ले लिया. “चोदो अब अनिल, चोद लो दीदी को, कसर
निकाल लो पूरी. काफ़ी तड़पाया है मैने तुझे. पर मज़ा आया ना? सच बोल!” मैं
कुछ बोलने की स्थिति मे नही था, बस कस कर शशिकला को चोदा और झाड़ कर
लस्त हो गया.
हम सभी पाँच मिनिट पड़े रहे. शशिकला मा को चूम चूम कर जगाने
मे लगी थी. मा होश मे आई तो पहला काम यह किया कि अंकल को बाहों मे
लेकर चूम लिया “अशोक, तुम आदमी हो या घोड़ा, कैसे चोदते हो? मार ही
डालोगे मुझे लगता है. और तू शशि, मुझे बचाने के बजाय अपने डॅडी
को शह दे रही थी कि और चोदो!”
“मम्मी, तुम्हारे जैसी सेक्सी सुंदर औरत को ऐसे ही चोदना चाहिए, नही तो
यह तुम्हारे रूप का अपमान होगा. ऐसे हचक हचक कर अगर तुम्हे नही
चोदा तो डॅडी के इस लंड का क्या फ़ायदा? वैसे नाराज़ मत हो, तुम हो भी इतनी
सुंदर कि मैं कहती तो भी डॅडी नही छोड़ते” शशिकला बोली.
“सच है शशि, इतना गुदाज नरम बदन कभी बाहों मे लेने को नही मिला.
मेरे लंड को आज जैसा नशा चढ़ा है वो बरसों बाद नसीब हुआ है. असल
मे मेरा लंड भी आज पूरी खुमारी मे था, झड़ने के मूड मे नही था,
मम्मी के सुंदर बदन का पूरा रस लेना चाहता था” अशोक अंकल मा को
चूमते हुए बोले. फिर मुझे पूछा “अनिल, कुछ मज़ा आया तेरी चुदाई मे? वैसे
मेरी ये बेटी काफ़ी दुष्ट है, बहुत तरसाती है पर स्वर्ग पहुँचा देती है”
मैं क्या कहता, मुझे दीदी ने बहुत तड़पाया था पर सुख भी उतना ही दिया
था. मैं उसका एक मुलायम स्तन मूह मे लेकर चूसने लगा.
“चलो अब नहा लेते है, फिर आराम करेंगे.” शशिकला ने कहा.
मा बोली “देख, मेरी बुर मे कितना वीर्य भर गया है, बेकार जाएगा, मैं अशोक
का लंड चूस लेती तो सब मुझे मिल जाता”
“तुम्हारे नही, यह मेरे भाग्य मे था मम्मी. और तेरे बेटे की जो मलाई है
मेरे अंदर वो तेरे लिए है, ज़रा चख ले, बेटी और बेटे का मिला जुला रस” कहकर
शशि उठाकर मा के पास गयी और डॅडी को उठाकर मा पर सिक्सटी नाइन के
अंदाज मे लेट गयी. मा समझ गयी और शशि की बुर से बह रहे मेरे वीर्य को
चाटना शुरू कर दिया. शशि तो पहले ही मा की बुर से चूस चूस कर अपने
डॅडी की मलाई खा रही थी.
हम सब नहाने लगे. बहुत थक गये थे पर खुश थे. सब ने एक दूसरे को
साबुन लगाया. साबुन लगाते समय मेरा हाथ एक बार अशोक अंकल के लंड पर पड़
गया. वह आधा खड़ा हो गया था. बड़ा अजीब सा लगा. मैने हाथ हटा लिया, वे
भी कुछ नही बोले, बस मुझे देख कर हंस दिए.
नहाने के बाद हमने आराम किया. रात के दो बज गये थे. आपस मे लिपट कर
हम सो गये. मा और शशि लिपट कर सोई थी और एक तरफ से मैं और एक तरफ से
अशोक अंकल उन्हे चिपटे थे.
सुबह उठे तो लंड ऐसे मस्त तन्नाए थे कि हमने तुरंत एक चुदाई कर ली. मैं
दीदी पर चढ़ गया और अंकल फिर मा पर सवार हो गये. यह बड़ी मीठी हौले
हौले मज़ा ले कर की गयी चुदाई थी. तृप्त होकर हम उठ बैठे.
चाय नाश्ते और नहाने मे दो तीन घंटे लग गये. तब तक मैने घर का
चक्कर लगाया. बड़ा आलीशान घर था. मुझे उत्सुकता थी शशिकला का
बेडरूम ठीक से देखने की. जब तक बाकी सब लोग तैयार हो रहे थे, मैने
शशिकला का वार्डरोब खोल कर देखा. एक से एक ड्रेस वहाँ थी. मेरा ध्यान
उसकी ब्रा और पैंटी पर था. शशिकला के पास चालीस पचास जोड़े थे, एक से एक
खूबसूरत. उन तरह तरह की ब्रा और पैंटी को देखकर ही मेरा लंड खड़ा हो
गया. लग रहा था कि उनसे खेलने लग जाउ, लंड मे लपेट लू पर शायद वहाँ
बाकी के लोग मेरा इंतजार कर रहे होंगे यह सोच कर मैने कोई गड़बड़ नही
की.
अब मैने शशिकला के सॅंडल रखने के रैक को खोला. वहाँ बीस पचीस
संडलों के और स्लीपरों के जोड़े थे. एक से एक खूबसूरत सॅंडल थे. मेरा
उछलने लगा. ऐसा लग रहा था जैसे अलादीन का खजाना देख रहा होऊ.
मुझसे नही रहा गया. सफेद रुपहले रंग की एक नाज़ुक सॅंडल मैने हाथ मे
ली और उसपर उंगलियाँ फेरी. बहुत मुलायम और चिकने सोल थे. नाक के पास ले
जाकर मैने सूँघा, शशिकला के शरीर की सौंधी सौंधी खुशबू आ रही
थी. मन न माना तो मैने जीभ निकालकर सॅंडल के पत्ते और पैर रखने का
चिकना भाग चाट लिया.
किसी ने मेरे कान पकड़कर मरोड़े तो घबरा कर मैने सॅंडल वापस रखी.
देखा तो शशिकला थी, शैतानी से मुस्करा रही थी. “क्या कर रहा है रे
बदमाश? मेरी चप्पलो से खेल रहा है? खानी है क्या? खिलाऊ?”
मैं चुप रहा. बड़ी शरम आ रही थी. लंड बैठने लगा तो शशिकला ने हाथ
मे पकड़ लिया. फिर से बोली “शरमाता क्यों है? किस कर रहा था ना? बोल
खाएगा क्या? मैं खिलाउन्गि अपनी चप्पल तुझे” और एक रबर की चप्पल
उठाकर धीरे से मेरी पीठ पर जड़ दी. “वैसे भी खिलाउन्गी …” और फिर उसे मेरे
मूह से सटा कर बोली “और ऐसे भी खिलाउन्गी”
फिर मुझे चूम कर बोली “शौकीन लगता है इनका, सच बोल. डॅडी भी शौकीन
है, घबरा मत, वैसे सच मे तुझे इसमे मज़ा आता है?”
“हाँ दीदी, मैं मा की चप्पलो का भी दीवाना हू, उसके पैर इतने खूबसूरत
है. और दीदी तुम्हारे तो और भी प्यारे है, कल से मुझे लग रहा है कि तुम्हारे
पैरों को चुमू, उन प्यारे संडलों को चाटू” मैने सिर नीचे करके बता
दिया.
शशिकला बोली “सब करने मिलेगा. तू ऐसे स्वर्ग मे आ गया है जहा कोई भी
इच्छा पूरी होगी. चल अब बाहर, देख तेरी मम्मी क्या कर रही है, क्या औरत है,
गरम की गरम है, ठंडी ही नही होती”
वापस बाहर आया तो देखा कि अशोक अंकल सोफे पर लेटे हुए थे और मा उनपर
चढ़ि हुई थी. अंकल के लंड को अपनी चूत मे लेकर मा उन्हे चोद रही थी.
अंकल ने अपने हाथों मे मा की चुचियाँ पकड़ी हुई थी और दबा रहे थे.
मा आराम से मज़े ले लेकर चोद रही थी. उसके उपर नीचे उछलने से उसके
स्तन इधर उधर डोल रहे थे और उनके बीच की सोने की चेन भी हिल रही थी.
“ए शशि, तेरे डॅडी को अब मैं घंटा भर तो ज़रूर चोदुन्गि, कल रात को तो
खूब जोश दिखा रहे थे, आज देखती हू कितने दम मे है. अगर घंटे भर
टिक गये तो इनाम दूँगी” मा ने कहा.
“क्या इनाम देंगी मम्मी? आपके शरीर के रस से बढ़ कर क्या इनाम हो सकता
है मेरे लिए” अपने होंठों को दाँत से काट कर अपनी वासना दबाने की
कोशिश करते हुए अंकल बोले.
“खुद अपनी बुर का शहद पिलाउन्गि, ऐसे ही लिटाकर, तुम्हारे मूह पर बैठ कर.
पर है तुम्हारा लंड बहुत जानदार अशोक! अंदर लेकर लगता है कैसी मोटी
ककड़ी अंदर ले ली है. अरी शशि, मेरे बेटे को भूखा ही रखेगी या कुछ देगी
उसे?” मा ने शशि को फटकारा.
मा की वासना देख कर मैं बहुत खुश था. मा अब ऐसे लग रही थी जैसे
जनम जनम की भूखी औरत को पकवानों का भोग मिल जाए, उसे तृप्ति ही नही
हो रही थी.
शशिकला ने कहा. “अनिल, आ जा, अलग अलग मज़ा बहुत हो गया, चल हम भी
शामिल हो जाए इसमे. तूने भी मा को कल से छुआ भी नही है, आ मज़ा कर ले,
मैं डॅडी की थोड़ी खबर लेती हू” और वह जाकर सीधे अंकल के मूह पर बैठ
गयी. “डॅडी, मम्मी चखाएगी तब चखाएगी, अभी अपनी बेटी का रस चख
लीजिए. पड़े पड़े मज़ा ले रहे है, कुछ काम भी कीजिए, आपकी जीभ तो खाली
है ना, उसी से कहिए कि मेरी सेवा करे” और अपने डॅडी के सिर को जांघों मे
दबा कर शशिकला उपर नीचे होकर उनका मूह चोदने लगी.
मम्मी ने झुक कर उसे पीछे से बाहों मे भर लिया और उसका सिर अपनी ओर
घूमाकर उसका चुंबन लिया “ये अच्छा किया शशि, मेरा बहुत मन हो रहा
था कि कुछ चखने को मिले, मेरी रानी बिटिया के मूह से मीठा क्या हो सकता
है मेरे लिए” कहकर मा उसे चूमते हुए उसकी चूंचियाँ दबाने लगी.
दो औरतों को एक मर्द पर चढ़ कर इस तरह से चोदते देख कर मेरा ऐसा
खड़ा हुआ कि क्या काहु. मैं अपने आप को नही रोक सका और जाकर उन दोनों से
लिपट गया. कभी मा के स्तन दबाता कभी शशिकला के. वे एक दूसरे के मूह
को छोड़ कर बीच बीच मे मुझे चूमने लगती. मैने लंड मा की कमर पर
रगड़ना शुरू कर दिया.
शशिकला बोली “अनिल, ऐसा मत कर, आ सामने आकर खड़ा हो जा, डॅडी अगर
शहद चख रहे है तो हम भी मलाई तो खा ही सकते है” मैं तुरंत पलंग
पर चढ़ कर अंकल के दोनों ओर पैर जमाकर खड़ा हो गया. शशिकला का
चेहरा मेरी कमर के सामने था. मा से चूमा चाटी बंद करके वह मेरा
लंड चूसने लगी.
मा बोली “अकेले अकेले बेटी? मुझे भी तो चखने दे मेरे लाल को, कितना
समय हो गया. ये मिठाई मिल कर खाएँगे”
शशिकला बोली “मम्मी, कितना प्यारा है ये, मुझे तो लगता है कि चबा
चबा कर खा जाउ. तुम अच्छी आज तक अकेले इसका मज़ा लेती रही, अब ये नही
चलेगा”
मा बोली “तो तू नही अकेले अकेले अपने डॅडी के इस मतवाले सोंटे का मज़ा लेती
रही?” मीठी नोक झोंक करते करते दोनों बारी बारी मेरे लंड को चुसती
रही. जब मैं झाड़ा तो दोनों ने मेरा वीर्य पिया, शशिकला ने पूरा वीर्य मूह मे
लिया और फिर मा के मूह से मूह लगा कर आधा उसे दे दिया.
एक घंटे तक मा ने अंकल को चोदा और उन्होने भी बड़ी मस्ती से बिना झाडे
मा की चूत को पूरा तृप्त किया. जब आख़िर मा थक गयी तो वायदे के अनुसार
उसने अंकल के मूह पर बैठ कर अपनी चूत का पानी उन्हे चुसावया. अंकल
ऐसे चटखारे ले लाकर उसे पी गये जैसे अमृत पी रहे हों. शशिकला और
मा ने फिर मिल कर उनका लंड चूस डाला. शशिकला अपने डॅडी के लंड से
चुदने को बेताब थी पर मा ने नही सुना, उसे उस मतवाले लंड की मलाई की
भूख थी.
बीच मे खाना खाने और कुछ देर सोने के अलावा हम लगातार रति करते रहे.
अब सब मिलकर चुदाई कर रहे थे. झाड़ झाड़ कर हमारे लंड थक गये थे
इसलिए मुँह से चूत पूजा ज़्यादा हुई. मैं और अशोक अंकल उन दोनों औरतों की
बुर से चिपके रहे, अदल बदल कर चुसते रहे.
मैं देख रहा था कि अंकल बार बार मा से लिपटकर उसे चूमते और खास कर
उसकी चुचियों के पीछे लग जाते. उनके हाथ सदा मा के मोटे नितंबों पर
होते जिन्हे वे बड़े प्यार से सहलाते और दबाते. जब मा और शशिकला पलंग
पर आजू बाजू लेट कर सिक्सटी नाइन कर रही थी तब हम दोनों सोफे पर बैठ कर
देख रहे थे. दोनों औरतों के गोल मटोल गोरे नितंब देख देख कर उनके
पीछे चिपकने का मन हो रहा था.
अंकल ने मुझे आँख मारी. जब मैं अपना सिर उनके पास लाया तो कान मे बोले
“यार अनिल, यही मौका है, इन औरतों की इस मतवाली गान्ड को प्यार कर लेने का.
मैं तो मरा जा रहा हू तुम्हारी मम्मी की इस गोरी गुदाज गान्ड मे मूह मारने
को. तुम भी शशि के इन गोरे चूतडो का मज़ा ले लो. बहुत प्यारे है. वैसे
एक बात बताओ, नाराज़ मत होना पर तुमने अपनी मा को पीछे से … याने मेरा
मतलब है …”
मैं समझ गया. फुसफुसा कर बोला “बिल्कुल अंकल, मैं तो दीवाना हू उसका. मा की
गान्ड मारने मे मुझे जो आनंद आता है वो मैं बयान नही कर सकता. वह भी
मरवा लेती है पर हफ्ते मे बस दो तिन बार. क्या आपने कभी शशिकला दीदी
…?”
“हाँ, वह तो बड़े चाव से मरवाती है. छोटी थी तब से मारता हू ना, उसकी मा
ने ही पहली बार अपने सामने मुझसे अपनी बेटी की गान्ड मरवाई थी. कुछ
औरतों को यह बहुत पसंद है, शशिकला की मा और शशिकला दोनों को
यह शौक था” अंकल बोले.
मैं आश्चर्य से बोला “आपका इतना बड़ा यह लंड, कैसे उसकी नाज़ुक गान्ड मे
जाता है? उसे दुखता नही है?”
अंकल अपना लंड सहला रहे थे. गान्ड मारने की बात से ही उनका खड़ा होने
लगा था. “आराम से लेती है. तू भी मार कर देख, क्या मुलायम छेद है मेरी बेटी
का. पर यार, तुम्हारी मा को मनाना पड़ेगा. मैं तो गुलाम हो जाउ उनका, अगर
मुझे अपनी वह मोटी फूली गान्ड मारने दे.”
पलंग पर लिपटे उन दोनों गोरे शरीरों को देखकर वे बोले “चलो ट्राइ
करते है. कम से कम इन मतवाले चूतडो का स्वाद तो ले ले, फिर गान्ड
मारने को भी मनवा लेंगे. शशि जानती है मैं रीमाजी की गान्ड का कितना
मतवाला हू. ऑफीस मे ही साड़ी के नीचे से दिखते उन चौड़े कुल्हों को
देखकर मेरा खड़ा हो जाता था. शशि मेरा बहुत मज़ाक उड़ाती थी, वह मदद
करेगी. अभी ऐसा करो तुम शशि से चिपक जाओ और मैं तुम्हारी मा के
नितंबों की पूजा करता हू. अभी वो दोनों मस्ती मे है, कुछ नही कहेंगी.”
प्लान अच्छा था. मैं उठाकर शशि से उलटी बाजू से चिपक गया. उसके
नितंबों को सहलाने लगा. उसकी जांघों के बीच से मा मुझे देख रही थी.
उसका मूह शशिकला की बुर मे घुसा हुआ था. धीरे से मैं शशिकला के गोरे
चिकने नितंब चूमने लगा. फिर उसके नितंबों को थोड़ा अलग करके देखा.
उसकी गान्ड का छेद एकदम गुलाबी था और काफ़ी खुला हुआ. अंकल से गान्ड
मरवाने का नतीजा था. मुझे रोमाँच हो आया. मैने छेद मे जीभ डाली और
चाटने लगा. शशिकला को मज़ा आ गया, मा की बुर चुसते हुए उसने मूह से
बस ‘आआ’ ‘आआ’ किया और कमर हिला कर मेरे चेहरे से अपनी गान्ड सटा दी कि
और चूसो. मैं उसका छेद चूसने मे लग गया.
उधर अंकल भी पीछे नही थे. उन्होने तो अपना चेहरा मा के चूतडो के
बीच छुपा दिया था और ‘लॅप’ ‘लॅप’ ‘लॅप’ चाटने की आवाज़ आ रही थी. मा सिर
उठाकर बोली “अरे ये क्या कर रहे हो अशोक? पागल हो गये हो? चलो छोड़ो.
चूसना ही है तो मैं तुम्हे रस भरी चीज़ चुसवाती हू”
अंकल मिन्नत करते हुए बोले “मम्मी, प्लीज़ चूसने दीजिए ना, बहुत अच्छी
है आपकी गान्ड, इतनी मोटी डनलॉप के तकिये जैसी गान्ड बहुत दिनों मे नसीब
हुई है. शशि की मा की ऐसी ही थी पर आप की तो और भी गुदाज है”
शशिकला ने मा के सिर को वापस अपनी जांघों मे खींच कर उसका मूह
अपनी बुर से बंद कर दिया “तुम क्यों फिकर करती हो मम्मी, चूस ही तो रहे
है बेचारे, चूसने दो. अभी अपनी बेटी की बुर पर ध्यान दो, इतना रस बहा रही
है अपनी मम्मी के लिए, उसे ज़रा चखो”
आख़िर जब झाड़ कर दोनों अलग हुई तब हम चिपके ही हुए थे. गान्ड से ऐसे
लगे थे जैसे घुस जाना चाहते हों. मा की गान्ड का तो मैं दीवाना था ही,
खूब जानता था कि अशोक अंकल की क्या हालत है. शशिकला की गान्ड भी बहुत
प्यारी थी, मा जितनी मोटी ताजी भले ही न हो, पर बहुत मीठी थी.
शशि हँसने लगी “अब आए ये दोनों असली रास्ते पर, मम्मी ये हमारी गान्ड
मारना चाहते है”
मा बोल पड़ी “ना बाबा ना, मैं नही मराउन्गि. ये मेरा बेटा भी ना जाने क्यों
पागल रहता है इसके पीछे, मैं दो तीन दिन मे इसे दे देती हू, बेचारा बहुत
प्यार करता है मुझे, इसका तो मैं सह लेती हू, पर अशोक का यह सोंटा! ना बाबा
ना! मार डालेगा मुझे. अशोक, तुम बस चुपचाप मेरी बुर रानी की सेवा करते
रहो, उसके लिए मैं तुम्हे कभी नही नही रोकूंगी”
शशिकला बोली “नही दीदी ऐसा न करो, मेरे डॅडी आस लगाए बैठे है, वे पागल
हो जाएँगे, मैं जानती हू कितने दीवाने है तुम्हारे इन गोल मटोल चूतडो के.
पर ऐसे ही नही मिलेगी यह अनमोल चीज़ इन्हे. कीमत देनी पड़ेगी. कीमत मैं तय
कर लुगी. मम्मी तुम मान जाओ प्लीज़, बाकी मुझ पर छोड़ दो”
मा ना नुकुर करती रही पर शशि ने उसे प्यार से मानना शुरू कर दिया. मा
के कन मे कुछ कहा. मा का चेहरा गुलाबी हो गया. “चल हट, ऐसा कैसे
होगा?”
शशि बोली “ऐसा ही होगा मम्मी, मेरा कब से प्लान है. डॅडी, इतनी अनमोल
चीज़ खास लोगों को ही मिलती है, किसी पास के रिश्ते वाले को, आप को कैसे इतनी
आसानी से मिल जाएगी?”
फिर मेरा और अंकल का लंड पकड़कर बोली “चलो मेरे दोनों मरदाने
मजनुओ, ज़रा मेहनत करो. मम्मी को खुश करना है, मम्मी का एक
सेकंड भी वेस्ट नही होना चाहिए. डॅडी, आप यहा लेटिये. मम्मी, तुम डॅडी
के लंड से मलाई निकाल लो. और तू अनिल, मा को कल से नही चोदा है ना, चल आ जा
, मा की सेवा कर. डॅडी, आप के लिए अब मेरी बुर मे शहद ही शहद है. सब
आराम से मज़ा ले लेकर चोदो, जल्दबाजी की कोई ज़रूरत नही है, अभी पूरी रात
पड़ी है.
अगले आधे घंटे हम चारों के शरीर एक बड़े प्यारे और मतवाले आसान मे
जुड़े रहे. शशिकला अपने डॅडी के मूह पर चूत जमा कर उनके सिर को
जांघों मे जाकड़ कर हल्के हल्के मज़े ले लेकर चोद रही थी. मा झुक कर
अशोक अंकल के लंड को मन लगाकर चूस रही थी. पूरा लंड उसने गन्ने जैसा
मूह मे ले लिया था. उसके चूतड़ हवा मे उठे हुए थे. मैं उसके पीछे
घुटनों के बल बैठकर पीछे से उसे चोद रहा था. पास से मा को अंकल का
महके लंड चुसते हुए देख रहा था. मा की आँखों मे जो तृप्ति थी उसे
देख कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. मूह मे अच्छा बड़ा रसीला लंड था
और उसका बेटा पीछे से उसे मन लगाकर चोद रहा था, किसी नारी को इससे ज़्यादा
क्या चाहिए! उस गोरे रसीले लंड को मा के मूह मे देखकर मुझे थोड़ी जलन
भी हुई. क्या मज़ा आ रहा होगा मा को, इतने खूबसूरत लंड बहुत कम लोगों
के होते है.
झड़ने के बाद मैं तो लुढ़क कर सो गया, बहुत थक गया था. लंड और
गोटियाँ भी दुखने लगे थे. मेरे झड़ने के बाद शायद कुछ देर चुदाई
और चली क्योंकि आँख लगाने के बस ज़रा से पहले अंकल के मूह से निकलती
“ओह्ह्ह ओह्ह्ह्ह आअहह” आवाज़ मैने सुनी, वे शायद मा के मूह मे झाड़ गये
थे.
