“मैं, कानपुर से मालिनी अवस्थी, फिर से आपकी सेवा में एक बार फिर एक नए केस, एक नई कहानी के साथ हाजिर हूं”।
“आपने मेरी नसरीन और असलम के बीच पनपे मां बेटे की चुदाई के रिश्तों की दास्तान तो पढ़ी ही होगी”।
“उससे पहले मैंने लखनऊ में एक गांडू युग त्रिपाठी की पत्नी चित्रा की समस्या सुलझाई थी। गांडू युग त्रिपाठी अपनी पत्नी चित्रा की चुदाई नहीं करता था, नतीजन चित्रा की चुदाई अपने ससुर देस राज त्रिपाठी और युग त्रिपाठी के दोस्त राज के साथ शुरू हो गयी थी”।
“खैर ये गांडू युग त्रिपाठी वाली बात तो अब पुरानी बात हो चुकी है”।
“हां तो मैं बता रही थी कि नसरीन मुझे असलम की शादी का कार्ड देने आगरा से कानपुर आयी थी। कार्ड तो जो दिया सो दिया ही, नसरीन ने असलम के साथ मेरी चुदाई भी करवा दी। असलम के साथ हुई अपनी उस चुदाई मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी”।
“असलम की शादी में आगरा गयी थी। मेरे शादी में पहुंचने से नसरीन बड़ी खुश हुई थी”।
“असलम की नई नवेली दुल्हन निकहत से भी मुलाकात हुई थी। निहायत ही खूबसूरत लड़की थी निकहत। असलम को निकहत को चोदने का खूब का मजा आ रहा होगा। और निकहत को भी असलम का कलाई जितना मोटा और आधे हाथ जितना लम्बा लंड ले कर मजे ले रही होगी”।
“शादी के दौरान ही नसरीन ने मेरे कान में फुसफुसाते हुए उस रबड़ के लंड का बहुत शुक्रिया अदा किया था। बता रही थी उसके बहुत काम आता है”।
“खैर ये तो हो गयी आगरा में असलम और निकहत की शादी की बात। अब वापस आते हैं कानपुर में एक ऐसे ही नए केस के साथ, जिसके लिए आज मैं यहां आपके आमने आयी हूं”।
“ये केस भी एक अजीब सा केस था, जिसमें अनजाने में बाप और बेटी के बीच चुदाई के रिश्ते पनप गए, और मामला यहां तक बढ़ा और बिगड़ा कि बात मुझ तक पहुंच गयी”।
“जहां मां बेटे में चुदाई किसी मजबूरी के चलते शुरू होती है, जैसे नसरीन और असलम के बीच शुरू हो गई थी। बाप बेटी की चुदाई के कई कारण हो सकते हैं, जैसे मां बेटी के बीच हर वक़्त किसी ना किसी बात को लेकर तकरार रहना। या मां का ज्यादा वक़्त घर पर ना रहना और बेटी का बाप के बीच अलग तरह का रिश्ता बन जाना”।
“या फिर बाप की नशे की आदत और नशे की हालत में बाप का बेटी को चोद देना। अब चुदाई चाहे रजामंदी से हो या जबरदस्ती से। चुदाई तो चुदाई ही होती है, और इसमें मजा भी आता है। बेटी को एक बार की चुदाई में मजा गया तो आगे से उसका मन भी चुदाई का होने लगता है और बाप बेटी में चुदाई के रिश्ते बन जाते हैं”।
“अब देखते हैं कि बाप बेटी के चुदाई के रिश्तों का जो केस मेरे पास आया उसमे बाप बेटी में चुदाई क्यों, किन कारणों के चलते, कब और कैसे शुरू हो गई”।
“उस दिन मैं अपने क्लिनिक में बैठी हुई थी कि मुझे एक फोन आया I मैंने फोन उठाया तो उधर से आवाज आयी, “हेलो क्या मालिनी जी बोल रही हैं? डॉक्टर मालिनी अवस्थी, साइकाइट्रिस्ट”?
मैंने कहा, “जी हां साइकाइट्रिस्ट मालिनी ही बोल रही हूं। आप कौन”?
“उधर से आवाज आयी , “जी मैं रागिनी कश्यप। मैं आपसे मिलती रही हूं जब आप जीवन ज्योति हॉस्पिटल के साथ जुड़ी हुई थी। तब मैं जीवन ज्योति हस्पताल में नर्स थी, अब मैं इस हस्पताल में नर्सिंग सुपरवाइजर हूं”।
“मैं सोचने लगी। नाम कुछ पहचाना सा लग रहा था, “रागिनी कश्यप जीवन ज्योति हॉस्पिटल”।
“मुझे याद आ गया। बहुत पहले, शायद बीस साल पहले जब मैं जीवन ज्योति हॉस्पिटल में बतौर एक मानसिक चिकित्स्क काम करती थी, तब वहां एक नर्स हुआ करती थी रागिनी कश्यप”।
“उस वक़्त रागिनी एक चुलबुली जवान लड़की होती थी, जो नर्सिंग का कोर्स करने के बाद हस्पताल में नई नई भर्ती हुई थी”।
“रागिनी ने आते ही हस्पताल में धूम मचा दी। रागिनी कश्यप की ख़ूबसूरती के चर्चे ऐसे थे कि सारे डॉक्टर उस पर मरते थे। सीधी भाषा मैं कहें तो चोदना चाहते थे उसे”।
“फिल्मों की एक्टिंग और मॉडलिंग के बाद नर्सिंग ही एक ऐसा पेशा है जिसमें समझा जाता है कि लड़की को फ़साना और उसे चोदना आसान होता है। ये ऐसा शायद इस लिए भी है कि इन तीनों पेशों से जुड़ी लड़कियों को काम के सिलसिले में रात रात भर घर से बाहर रहना पड़ता है, और काम के ही सिलसिले में अपने शहर से बाहर भी जाना पड़ता है”।
“अब बाहर लड़की क्या कर रही है, किसके नीचे लेट रही है, किसका लंड चूत में या फिर गांड में ले रही है, किसके लंड पर छलांगें लगा रही है, ये किसी को को क्या पता चलता है”।
“अब तो खैर बड़े शहरों में कॉल सेंटर खुल गए हैं जहां लड़के-लड़कियां रात रात भर काम करते हैं। इन कॉल सेंटरों में भी खुल कर चूत और गांड चुदाई का खेल होता है। दो-तीन लड़के और दो-तीन लड़कियां की इकट्ठे मिल कर चुदाई के मजे लेते हैं जिसे ग्रुप सेक्स कहा जाता है। ऐसी खुली चुदाई में नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियों को ज्यादा मजा आता है”।
“रागिनी के एक अपने साथ काम करने वाली एक दूसरी नर्स के साथ, मुझे अब उसका नर्स का नाम याद नहीं आ रहा था, समलैंगिक सम्बन्ध हुआ करते थे, और उनके इन संबंधों के भी खूब चर्चे भी थे। दोनों एक-दूसरे की खूब चूत चुसाई करती थीं”।
“हॉस्पिटल के अंदर वो कभी एक-दूसरे की चूत चुसाई नहीं करती थीं, इसलिए किसी को भी उनके इन चूत चुसाई वाले संबंधों से कोइ एतराज नहीं था”।
“हस्पताल के पीछे ही दो-दो कमरों वाले कोइ आठ-दस घर बने हुए थे, जिनमें नर्सें और नए डाक्टर जिन्हें रेजिडेंट डाक्टर या ट्रेनिंग वाले डाक्टर भी कहा जाता है, वो रहते थे”।
“जब भी किसी को चूत, गांड चूसने या चुदवाने की ठरक लगती थी वो उन घरों में चला जाता था, और चुसाई, चुदाई की ठरक पूरी करके आ जाता था”।
“उन्हीं दिनों में फिर सुनने में आया था कि रागिनी ने किसी लड़के के साथ प्रेम विवाह कर लिया था”।
“उसके बाद मैंने जीवन ज्योति हस्पताल छोड़ दिया था। बाद में जब कभी भी जीवन ज्योति हॉस्पिटल जाना होता था, तो कभी कभी रागिनी से आमना सामना हो जाता था। मगर बात-चीत कम ही होती थी”।
मैंने फोन पर जवाब दिया, “रागिनी? जीवन ज्योति हॉस्पिटल वाली? तुम तो नर्सिंग में थी ना। कुछ साल पहले भी शायद मुलाक़ात हुई थी जब मैं एक केस के सिलसिले में जीवन ज्योति गयी थी”।
रागिनी बोली, “जी हां मालिनी जी मैं अब भी नर्सिंग में ही हूं, अब मैं नर्सिंग सुपरवाइजर हो गयी हूं”।
मैंने हंसते हुए कहा, “हां याद आ गया रागिनी। तुम्हारी ख़ूबसूरती के चर्चे तो सब तरफ हुआ करते थे। डाक्टर बहुत जान छिड़कते थे तुम पर। तुम्हारी तो एक सहेली भी हुआ करती थी, जिसके साथ तुम्हारा ‘वो’ वाला चक्कर था”।
फिर मैंने हंसते हुए पूछा, “रागिनी, क्या अभी भी मरते हैं डॉक्टर तुम पर? और वो तुम्हारी सहेली, नाम नहीं याद आ रहा, वो अभी भी वहीं है क्या”?
रागिनी हंसते हुए बोली, “मालिनी जी आपको भी कैसी-कैसी बातें याद हैं। वो तो पुराने दिन थे। उन बातों को तो बहुत साल बीत गए”।
मैंने कहा, “चलो छोड़ो, ये बताओ आज ये मनोचिकित्स्क कैसे याद आ गयी, अचानक कैसे फोन किया? सब ठीक तो है”?
रागिनी बोली, “मालिनी जी सब ठीक ही तो नहीं है। मैं आपसे मिलना चाहती हूं, मुझे एक अजीब सी घरेलू समस्या के सिलसिले आपकी मदद चाहिए”।
मैंने कहा, “ठीक है, कल या परसों में कभी भी आ जाओ। उसके बाद एक हफ्ते के लिए मैं एक सेमिनार के सिलसिले में जापान जा रही हूं”।
रागिनी बोली, “फिर तो मैं कल ही आती हूं मालिनी जी। मिल कर बात करते हैं”।
“रागिनी मुझे बड़ी जल्दी में लग रही थी। मुझे लगा समस्या जरूर गंभीर ही होगी। मैंने कहा “ठीक है कल ग्यारह बजे आ जाओ, में इंतज़ार करूंगी”।
– चुदक्कड़ नर्स रागिनी की डाक्टर मालिनी अवस्थी के साथ मुलाकात
अगले दिन ग्यारह बजे रागिनी कश्यप मेरे क्लिनिक में आ गयी। गाड़ी की चाबी और पर्स मेज पर रख कर नमस्ते करके रागिनी खड़ी हो गयी।
“रागिनी जैसी खूबसूरत अपनी जवानी में हुआ करती थी, उससे कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही थी। जिस्म भर गया था। मम्मों और चूतड़ों के उभार रागिनी को और भी ज्यादा खूबसूरत और सेक्सी बना रहे थे”।
रागिनी को देखने से लग नहीं रहा थी कि 41 साल की औरत होगी। रागिनी 30-31 से ज्यादा नहीं लग रही थी।
“फ़िल्मी सितारों और मॉडलों की तरह डाक्टर और नर्सें भी फिट ही रहती हैं, या कह लो उन्हें अपने आप को फिट रखना ही पड़ता है। रागिनी भी पूरी तरह से फिट थी। वैसा ही कड़क जिस्म वैसी ही खूबसूरत”।
रागिनी आयी, और आते ही मुस्कुराते हुए बोली, “नमस्ते मालिनी जी। पहचाना मुझे”?
“देखते ही मुझे रागिनी के बारे में सब कुछ याद आ गया। उसके डाक्टरों के साथ चुदाई के चक्कर, अपने साथ काम करने वाली नर्स के साथ चूत चुसाई के समलिंगी सम्बन्ध”।
“चुदाई के मामले में रागिनी इतनी खुले दिमाग की थी की स्मार्ट डाक्टरों को उसे पटाने और चोदने में कोइ ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती थी। मगर एक बात तो थी रागिनी चुदवाती सिर्फ डाक्टरों से ही थी। लाइन तो उस पर कम्पाउंडर और वार्ड बॉयज़ भी मारते थे, मगर रागिनी उनको घास नहीं डालती थी”।
“ऐसे लोग जिनकी रागिनी को चोदने की हसरत पूरी नहीं होती थी वो अक्सर उसके बारे में अच्छी बात नहीं बोलते थे। मुझे पूरा यकीन है, ऐसे लोग मन ही मन खिसियाते हुए कहते होंगे “चुदक्कड़ साली, डाक्टरों के नीचे लेटती है, हमें घास भी नहीं डालती”।
“वैसे जिस तरह की चुदाई रागिनी तब करवाती थी, थी तो वो चुदक्कड़ ही – मेरी ही तरह”।
“अपनी जवानी में बड़ी चर्चित थी रागिनी की ख़ूबसूरती और उसकी बिंदास आदतें। रागिनी को देखते-देखते मैं सोच रही थी, क्या रागिनी की चुदाई वाली आदतें अभी भी वैसी ही थीं जैसी जवानी में हुआ करती थी”?
“वैसे इस तरह की चुदाई की ऐसी आदतें जाती तो नहीं”।
”जब मेरी ही चुदाई की आदतें पचास पार करने के बाद नहीं गयी, तो इस 41 साल वाली रागिनी की कैसे जाएंगी”।
मैंने कहा, “बिल्कुल पहचाना रागिनी। तुम तो अब भी वैसी ही दिखती हो जैसी उन दिनों में दिखती थी”।
रागिनी मेरी तरफ देखते हुए कहा, “मालिनी जी आप भी तो अभी भी वैसी ही हैं जैसी बीस साल पहले थी – बिल्कुल भी नहीं बदली। बहुत ध्यान रखती हैं आप अपना। सुनने में आया था शादी भी नहीं की आपने”।
मैंने भी नमस्ते का जवाब दे कर कहा, “बदली तो तुम भी नहीं रागिनी, वैसी ही हो जैसी उन दिनों में थी”। और फिर हंसते हुए कहा, “अभी भी डाक्टर लाइन मारते हैं तुम पर”?
और फिर मैंने एक आंख दबा कर पूछा, “तुम्हारी उस सहेली का क्या हाल है? मिलती है या नहीं? उन दिनों में तो बड़े चर्चे थे तुम दोनों के”।
रागिनी भी हंसते हुए बोली, “मालिनी जी सब कुछ अभी पूछ लेंगी क्या”?
“हम दोनों हंसी और अंदर क्लिनिक में चली गयी। मैंने प्रभा – अपनी काम वाली को चाय और कुछ नाश्ता लाने के लिए बोल दिया”।
“जब प्रभा ट्रे लेकर आ गयी तो मैंने रागिनी से पूछा, “बोलो रागिनी, आज कैसे? ऐसी क्या समस्या आ गयी है कि जो आज एक साइकाइट्रिस्ट – मनोचिकित्स्क की जरूरत पड़ गयी”?
फिर मैंने थोड़ा रुक कर रागिनी से कहा, “वैसे रागिनी, एक महिला मनोचिकित्स्क तो तुम्हारे जीवन ज्योति में भी है – मुकुल पांडेय। मैं जानती भी हूं उसे। मेरी स्टूडेंट रह चुकी है”।
रागिनी थोड़ी चुप सी हुई और बोली, “मालिनी जी समस्या ऐसी है कि मैं हर किसी से इस बारे में बात नहीं कर सकती। मुझे आपकी याद आयी और मुझे आपके पास आना ही ठीक लगा”।
मैंने कहा, ”ऐसा है क्या? कुछ ज्यादा ही गंभीर व्यग्तिगत समस्या लग रही है। खैर बताओ, फिर देखते हैं क्या हो सकता है”।
रागिनी बोली, “मालिनी जी पहले मैं अपनी निजी जिंदगी के बारे में बता दूं। इससे आपको मेरी समस्या समझने मैं आसानी रहेगी”।
फिर रागिनी बोली, “आप तो जानती ही हैं , जब आप जीवन ज्योति में बतौर मनोचकित्सक काम करती थी, मैं वहां नर्स थी। तब जीवन ज्योति इतना बड़ा हस्पताल नहीं था जितना बड़ा अब है”।
मैंने कहा “हां रागिनी जानती हूं। जीवन ज्योति छोड़ने के बाद भी जीवन ज्योति वालों की कंसल्टेंट हूं, बतौर सलाहकार मैं वहां जाती रहती हूं। कोइ सेमीनार हो तो वो मुझे अभी भी बुलाते है। आगे बताओ”।
रागिनी बोली, “जी हां मालिनी जी मुझे ये मालूम है कि आप अभी भी वहां जाती हैं”।
फिर कुछ रुक कर रागिनी बोली, “मालिनी जी मुझे ये बताने में कोइ शर्म नहीं कि उन दिनों में डाक्टर मेरी ख़ूबसूरती पर फ़िदा रहते थे, मुझ पर मरते थे। मैं सुन्दर ही इतनी थी। कई डाक्टरों के साथ मेरे जिस्मानी सम्बन्ध बने थे। साफ़ ही बात करें तो चुदाई के संबंध”।
“और जिस नर्स की आप बात कर रही हैं उसका नाम प्रवीणा था। वो भी मेरी तरह ही नयी-नयी नर्स का कोर्स करके आयी थी।
“असल में उन दिनों में हमारी एक स्टाफ नर्स थी संध्या, जो हम सब नर्सों की इंचार्ज थी। संध्या की एक अजीब शौक था। संध्या स्टाफ की खूबसूरत नर्सों से होठ चूचियां और चूत चुसवाया भी करती थी और खुद भी उन नर्सों के होंठ और चूत चूसा करती थी”।
“संध्या मुझसे भी वो ये सब चुसवाया करती थी और मेरा भी सब कुछ अगली-पिछली चूत गांड खूब चूसती थी”।
“संध्या ने ये चूत चुसाई की आदत लगभग सभी नर्सों को डाल दी। इसी चूसा चुसाई में प्रवीणा आ गयी और मेरे प्रवीणा के साथ मेरे लेस्बियन वाले पक्के रिश्ते बन गए”।
“हम दोनों ने आपस में तो चूत चुसाई की ही, हमने डाक्टरों से खूब चूत चुदवाई। हस्पताल के साथ लगते डाक्टरों और नर्सों के रिहाइशी मकानों में बड़ा मजा किया हमने उन दिनों में”।
“यहां तक कई डाक्टर तो मेरे साथ शादी करना चाहते थे”।
“मगर हालात कुछ ऐसे बन गए कि मेरी शादी आलोक के साथ हो गयी। हम लोगों का प्रेम विवाह था, लव मैरिज”।
“आलोक असल में हमारा दूर का रिश्तेदार है और CA है, कामयाब चार्टर्ड अकाउंटेंट। शादी ब्याह की पार्टियों में मिलते मिलाते हममें प्यार हो गया, और एक ही चुदाई के बाद मैं उसके कुछ ज्यादा ही लम्बे लंड की दीवानी हो गयी”।
“मेरे और आलोक के बीच खूब चुदाईयां हुई। इन्हीं चुदाईयों के चलते मुझे बच्चा ठहर गया, और मैं प्रेग्नेंट हो गयी। बदनामी से बचने के लिए हमने कोर्ट मैरिज कर ली और नौ महीने बाद ही मेरी बेटी मानसी पैदा हो गयी”।
“सब कुछ फिर ठीक चलने लगा। शादी के बाद भी डाक्टरों के साथ मौज मस्ती और प्रवीणा के साथ चूत की चूसा-चुसाई सब चल रहा था”।
“जब मेरी बेटी मानसी छह साल की थी, तो मेरे ससुर का देहांत हो गया। जब वो ग्यारह साल की हुई तो मेरी सास भी गुजर गयी। इस बात को भी नौं साल हो चुके हैं”।
“अब तो मानसी बीस पार कर चुकी है – पढ़ाई में बड़ी होशियार है और वो भी CA ही कर रही है”।
“सास के देहांत के बाद हमे ग्यारह साल की कच्ची उम्र मानसी की परवरिश में दिक्कत आ रही थी। आलोक का अपना अकाउंटैंसी का बिज़नेस था। सुबह का गया वो शाम को ही लौटता था। अब हमारी समस्या थी कि मानसी का दिन भर कौन उसका ध्यान रखे”।
“किसी गैर पर भरोसा किया नहीं जा सकता और रिश्तेदारों के पास कहां वक़्त होता है कि किसी दूसरे के बच्चे का ध्यान रखे। मैं नौकरी छोड़ नहीं सकती थी। मेरी तरक्की हो चुकी थी, हस्पताल भी बड़ा हो चुका था और मेरी तनख्वाह भी एक लाख रूपये माहवार से ऊपर थी”।
“लिहाजा नौकरी छोड़ना ठीक नहीं लगा, और मैंने अपनी रात की शिफ्ट करवा ली। दिन भर मैं घर रहती और शाम को या रात को हस्पताल चली जाती। आलोक शाम को आ जाता इस तरीके से घर ठीक-ठाक चलने लगा। मानसी की पढ़ाई भी ठीक चल रही थी”।
फिर कुछ रुक कर रागिनी बोली, “मालिनी जी इन सब में एक बात ये हुई कि मेरी और आलोक की चुदाई लगभग बंद हो गयी। मैं हस्पताल से ड्यूटी करके आती तो आलोक सो रहा होता। सुबह मैं खाना वगैरह तैयार करके सो जाती”।
“एक दूसरे की नींद खराब ना हो, इसलिए हम सोते भी अलग-अलग कमरों में थे, और अब अलग-अलग सोना हमारी आदत ही बन चुकी थी”।
“इस अलग-अलग सोने की आदत के चलते मेरे और आलोक के बीच चुदाई बहुत कम हो गयी थी। कभी चुदाई होती भी थी तो चुदाई के बाद हम फिर से अपने अपने कमरों में चले जाते”।
रागिनी बता रही थी, “वैसे तो मालिनी जी मेरी चुदाई की इच्छा भी अब पहले जैसी नहीं रही थी। इसके बावजूद हस्पताल में किसी डॉक्टर के साथ कभी कभार चुदाई हो ही जाती थी। प्रवीणा के साथ चूत चुसाई तो जारी ही थी”I
“बस यहीं, इसी बात पर मैं मार खा गयी। मैंने समझा था जैसे मेरा चुदाई का पहले जैसा मन नहीं होता, वैसे ही आलोक का भी चुदाई का मन नहीं होता होगा। मगर ये मेरी गलती थी”।
रागिनी अपनी और आलोक की और अपनी डाक्टरों के साथ चुदाई के बारे में बता कर थोड़ा चुप हो गयी। मैंने ही फिर पूछा, “रागिनी तुम बता रही हो उस प्रवीणा के साथ अभी भी तुम्हारे चूत चुसाई वाले रिश्ते हैं? वो अभी भी वहीं है, तुम्हारे साथ? उसने शादी नहीं की”?
रागिनी बोली, “शादी तो की थी मालिनी जी उसने। मगर शादी के बाद उसे पता चला की वो पूरी तरह से ही लेस्बियन है। चूत चुदाई से ज्यादा उसकी दिलचस्पी चूत चुसाई में है, अब मालिनी जी मर्दों के पास तो चूत होती नहीं, जहां औरतों के चूत होती है, वहां मर्दों का लंड और टट्टे लटक रहे होते है। लिहाजा बात कुछ बनी नहीं और शादी के एक साल के बाद ही उनका तलाक हो गया”।
“अब प्रवीणा हस्पताल के पीछे वाले घरों में ही रहती है और वहीं हमारी चूत चुसाई की मस्ती होती है। हस्पताल की बाकी नर्सें भी इस चूत और चूतड़ चुसाई के मजे लेने के लिए उसी के घर पर जाती हैं”।
“अब तो जो नयी-नयी नर्सें जीवन ज्योति में ट्रेनिंग या नौकरी के लिए आती हैं प्रवीणा उनके साथ खूब चूत चुसाई गांड चुसाई का खेल खेलती है। कोइ ही नयी नर्स बचती होगी जो प्रवीणा के इस चूत चुसाई के खेल का हिस्सा ना बनती हो। अब आपसे क्या छुपाऊं, मैं भी ऐसे अक्सर ऐसे चूत गांड चुसाई के खेल में भाग लेती रहती हूं”।
रागिनी की चूत चुसाई वाली बातें सुन कर कर मेरी चूत मैं भी खुजली होने लगी।
पानी तो मेरी चूत ने तभी छोड़ गयी थी जब रागिनी ने कहा था, “आलोक के लम्बे लंड की मैं कुछ ज्यादा ही दीवानी हो गयी”।
जब मैंने अपनी चूत दो-तीन बार खुजाई तो ये बात रागिनी से छुपी नहीं रही। वो हल्का सा मुस्कुराई और बोली, “मालिनी जी क्या बात है, लगता है”, और फिर मेरी चूत की तरफ इशारा कर के बोली, “इसमें कुछ कुछ होने लगा है क्या”?
मैंने भी कह ही दिया, “होने तो लगा है रागिनी। तुम तो जानती ही हो, कि मैंने अब तक शादी नहीं की – शादी मैं करना ही नहीं चाहती थी। बस मुझे ऐसे ही काम चलाने में मजा आता है। कौन बंधे एक खूंटे से। अब तुम्हारी बातों इन चूत चुदाई और चुसाई वाली बातों ने इसे गीला कर दिया है”। ये बोल कर मैंने दुबारा चूत खुजलायी।
मुझे दुबारा चूत खुजलाते देख रागिनी यकायक बोली, “मालिनी जी मेरी मानिये तो आपको इसका अभी की अभी कुछ कर लीजिये”। फिर कुछ रुक कर रागिनी बोली, “मेरे पास इसके इलाज का एक आडिया है, कहें तो बताऊं”?
“मैंने कोइ जवाब नहीं दिया। लेकिन बात तो रागिनी की ठीक ही थी। मेरी चूत गीली तो हुई ही पड़ी थी। कुछ तो जाना ही चाहिए था इसमें, कुछ तो होना ही चाहिए था इसका”। रागिनी के इतना कहने पर मैं रागिनी की तरफ देखने लगी।
मैं अभी कुछ सोच ही रही थी कि थोड़ा आगे की तरफ झुकते हुए बोली, “मालिनी जी सोच क्या रही हैं? चुसवानी है”?
– मालिनी और रागिनी की चूत चुसाई
“मेरी चूत में तो झनझनाहट हो ही रही थी मगर रागिनी की बात सुन कर मुझे कुछ हैरानी सी हुई”।
“रागिनी मुझे सालों बाद मिली थी, और इस तरह से आमने-सामने बैठ कर तो हम पहली बार ही बात कर रहे थे। और रागिनी इस पहली मुलाक़ात में ही चूत चुसाई तक जा पहुंची थी”?
मैंने मन ही मन में कहा, “बिल्कुल नहीं बदली तुम रागिनी, वैसी ही हो पहले जैसी – चुदक्कड़”।
मैंने अपनी हैरानी पर काबू रखते हुए कहा, “अभी? रागिनी पहले तुम्हारी पूरी बात तो सुन लें। तुम्हारी समस्या तो समझ लें जिसके लिए तुम आज यहां आयी हो”।
रागिनी बोली, “समस्या कहीं भागी तो नहीं जा रही मालिनी जी, और ना ही ये एक दिन की समस्या है। चलिए पहले ये काम कर लें। सब काम अपनी-अपनी जगह जरूरी होते हैं”।
फिर थोड़ा आगे झुक कर रागिनी बोली, जैसे बड़े राज की बात बताने जा रही हो, “मालिनी जी मैं दोनों चूत और चूतड़ों का छेद, दोनों को बढ़िया चूसती हूं। एक बार चुसवा कर देखिये। याद रखेंगी आप भी, ऐसी चुसाई करूंगी। प्रवीणा तो मेरी गांड चुसाई की दीवानी है”।
“जैसा कि मैं रागिनी को जानती थी, रागिनी चुदाई के मामले में तेज तो पहले से ही थी, मगर ऐसी तेज होगी कि पहली ही मीटिंग में वो मेरी चूत चुसाई पर पहुंच जाएगी, ये नहीं सोचा था”।
“जैसे ही रागिनी ने कहा “मालिनी जी मैं दोनों चूत और चूतड़ों का छेद, दोनों को बढ़िया चूसती हूं। एक बार चुसवा कर देखिये”, मेरी चूत की तो हालत खराब हो गयी। रागिनी की बातों ने मुझे पागल कर दिया। मेरी चूत फुर्र-फुर्र पानी छोड़ने लगी। अब रुकने की ना कोई गुंजाइश नहीं थी”।
मैंने उठते हुए कहा, “चलो”।
“हम दोनों क्लिनिक के पीछे वाले कमरे मैं चले गए। जैसे ही मैंने क्लिनिक वाला दरवाजा बंद किया, रागिनी ने एक मिनट भी नहीं लगाया और अपने पूरे कपड़े उतार कर नंगी खड़ी हो गयी”।
“रागिनी का जिस्म इस उम्र में भी कड़क था। तने हुए मम्मे, उभरे हुए मुलायम चूतड़”।
रागिनी के खड़े मम्मे देख कर मुझसे रहा नहीं गया I मैंने हाथ में रागिनी के मम्मे पकड़े और जोर-जोर से मसलने लगी।
“रागिनी सिसकारियां लेने लगी और अपने मम्मों को मेरे मम्मों के साथ रगड़ने लगी”।
“जल्दी ही हम दोनों मस्ती में आ गईं”।
रागिनी बोले, “मलिनी जी आप भी तो कपड़े उतारिये, ऐसे मजा नहीं आ रहा”।
मैंने भी अपने कपड़े उतार दिए और रागिनी को बाहों में ले कर पीछे हाथ करके रागिनी के चूतड़ दबाने लगी। हम दोनों के मम्मे आपस गुत्थम-गुत्था हुए पड़े थे।
रागिनी बोली, “तो मालिनी जी बताईये क्या करना है? चुसवानी है या चूसनी है”? मैंने रागिनी की चूत की दरार में में ऊंगली ऊपर नीचे करते हुए कहा, “तुम बताओ”।
रागिनी बोली, “ऊपर नीचे हो जाते है। एक दूसरी के चूत और गांड दोनों की चुसाई हो जाएगी”।
“मैंने कहा, ठीक है चलो तुम लेटो, मैं ऊपर आती हूं”।
रागिनी लेट गयी और चूतड़ों के नीचे तकिया लगा कर चूत उठा दी।
रागिनी के ऊपर लेटते हुए मैंने धीमी आवाज में पूछा, “रागिनी एक बात बताओ, वो जो तुम कह रही हो आलोक का लंड कुछ ज्यादा ही लम्बा है – “ज्यादा ही” से क्या मतलब? मतलब कितना लम्बा”?
रागिनी ने मुस्कुराते हुए अपनी कलाई से नीचे हाथ रखते हुए कहा, “लगभग इतना”।
“जितना रागिनी बता रही थी ये तो आठ इंच से भी ज्यादा लम्बाई वाला लंड था। मेरी चूत में फिर खुजली मच गई। एक पल को तो ऐसा लगा जैसे आलोक का लम्बा लंड मेरी चूत में चूत के आख़री हिस्से तक पहुंचा हुआ है”।
“मुझे तभी कुछ याद आया। मैंने कहा, “रागिनी चलो पहले एक दूसरी की चूत चूसते हैं, फिर तुम्हें कुछ और चीज दिखाऊंगी। बढ़िया मजा दूंगी तुम्हें”।
“रागिनी ने हूं हूं किया और मैंने रागिनी की चूत खोल कर अपने होठों में रागिनी की चूत का दाना ले लिया और चूसने लगी। रागिनी की चूत में से मस्त खुशबू आ रही थी”।
“रागिनी मेरी चूत पर अपनी जुबान फेर रही थी, और साथ ही एक उंगली मेरी गांड में डाल कर अंदर बाहर कर रही थी”।
“मानने वाली बात थी कि रागिनी चूत चूसने में माहिर थी। मजा आ गया उसकी चुसाई में। लग ही रहा था रागिनी और प्रवीणा खूब मस्ती करती हैं”।
“जब दोनों की चूतें पानी छोड़ गयी, और हम दोनों को ही मजा आ गया तो मैंने कहा, “चलो रागिनी उठो तुम्हें आज जन्नत का मजा देती हूं”।
रागिनी हैरानी से बोली, “ऐसा क्या है मालिनी जी? मजा तो आ चुका है। अब क्या गधे के लंड जैसे लंड वाला कोइ मर्द छुपा के रक्खा है यहां”? ये बोलती हुई रागिनी हंस दी।
मैंने हंस कर जवाब दिया, “अरे नहीं रागिनी। मजे लेने के लिए मैं मर्दों की मोहताज नहीं”।
“फिर रागिनी की तरफ देखते हुए एक आंख दबा कर बोली, “हां अगर कोइ ऐसे लंड वाला मर्द”, मैंने अपने हाथ से रागिनी के हाथ वाला इशारा दोहराया, “सामने हो तो फिर बात कुछ और हो जाती है”।
“अब इतनी भी नासमझ नहीं थी रागिनी। रागिनी एक मिनट में समझ गयी कि मेरा इशारा आलोक के लंड की तरफ था”।
रागिनी बोली, “मालिनी जी एक बात बताऊं, जैसा लम्बा लंड आलोक का है, ऐसे लंड से चूत चुदाई का मजा तो आता ही है, गांड चुदाई का और भी ज्यादा मजा आता है। जब लम्बा लंड गांड में पूरा अंदर तक जाता है तो गांड के साथ-साथ चूत में भी कुछ-कुछ होने लगता है”।
रागिनी ने फिर एक ज्ञान की बात बताई, “मालिनी जी ज्यादा मोटा लंड चूत के लिए तो थो ठीक रहता है गांड चुदाई में तो गांड छील कर रख देता है। ऐसी गांड चुदाई भी किस काम की जिसमें गांड का कचरा ही हो जाये”।
मगर रागिनी के गांड छीले जाने वाली बात पर मुझे आगरा वाले असलम के साथ हुई गांड चुदाई याद आ गयी। असलम के मोटे लंड से गांड चुदवाने से मेरी गांड का भी तो कुछ ऐसा ही हाल हुआ था”।
“रागिनी ने इशारों-इशारों में सब समझा दिया था मुझे। बस इतना ही नहीं कहा “मेरी मानिये तो आप भी एक बार ट्राई कर लीजिये आलोक का लम्बा लंड”।
ये कहते हुए रागिनी हंस दी। मैंने भी हंसते हुए कहा, “चलो देखते हैं क्या होता है, कब और कहां मिलेगा ऐसा लंबा लंड”।
“रागिनी की बातों से मैंने सोचा रागिनी को तो चूत चुसाई के अलावा गांड चुदाई का भी अच्छा तजुर्बा लगता है। मैंने कह ही दिया, “रागिनी तुम तो गांड का छेद भी मस्त चूसती चाटती हो। क्या बात है, सारे शौक पाल रखे हैं क्या”?
“इतना कह कर मैं उठी और मैंने अपने ड्रेसिंग टेबल के दराज में से अपनी तीनो चुदाई के खिलौने निकाल लाई। मोटा लम्बा लंड, चूत का दाना चूसने वाला खिलौना और गांड और चूत में इकट्ठा डालने वाला और साथ ही चूत का दाना चूसने वाला अंगरेजी के “C” शब्द जैसा खिलौना। मैंने तीनो खिलौने रागिनी के सामने रख दिए”।
– रबड़ के लंड हमारी चूत और गांड में।
“रागिनी एक सीनियर नर्स थी। उसे इन खिलौनों के बारे मैं पूरा पता था। फिर भी वो बोली, “मालिनी जी आप तो कमाल हैं। क्या आप इनका काफी इस्तेमाल करती हैं”?
“मैंने कहा, “रागिनी वैसे तो मेरी कोशिश रहती है कि इनका कम से कम इस्तेमाल किया जाए। असली लंड का मुकाबला ये रबड़ के लंड लौड़े नहीं कर सकते, मगर अगर कभी चूत या गांड में आग लग ही जाए तो फिर मैं ज्यादा नहीं सोचती। अब बताओ तुमने अभी कौन सा लेना है”।
“रागिनी ने चूत और गांड वाला “C” जैसा खिलौना उठा लिया और बोली, “यही लेती हूं मालिनी जी। ऐसा, चूत और गांड वाला कभी पहले नहीं डलवाया”।
मैंने कहा ,”चलो ठीक है। तुम लेटो मैं इसे तुम्हारे गांड और चूत में डाल कर चालू कर देती हूं। तुम्हारी गांड, चूत और चूत के दाने का काम ये अकेला ही कर देगा।
रागिनी बोली, “ठीक है मालिनी जी, और आप क्या करेंगी “?
मैंने रागिनी से कहा, “मैं चूतड़ तुम्हारे मुंह की तरफ करके तुम्हारे ऊपर उल्टा लेट जाऊंगी। तुम वो मोटा वाला लंड मेरी चूत ने डाल कर उसका वाइब्रेशन चालू कर देना। बस फिर दोनों लेंगे जन्नत के मजे”।
ये बोल कर मैंने रागिनी के ऊपर उल्टा लेटते हुए रागिनी के हाथ में असलम के मोटे लंड जैसा रबड़ का लंड रागिनी के हाथ में पकड़ा दिया और कहा, “ये लो तुम ये लंड मेरी चूत में डाल कर मेरी चूत की चुदाई करना और साथ मेरी गांड का छेद चाटना। ठीक”?
रागिनी बिस्तर पर लेटते हुए बोली, “बिल्कुल ठीक”।
“फिर हंसते हुए रबड़ के लंड पर हाथ फेरते हुए बोली, “एक बात तो है मालिनी जी, आप भी अच्छे खासे मोटे लंड की शौकीन हैं। बस अब एक बार आप लम्बा लंड भी ट्राई करिये हैं”। अब तो मुझे पक्का विश्वास हो गया की रागिनी का इशारा आलोक के लंड के तरफ ही था।
“और ये कहते हुए रागिनी ने अपने चूतड़ों के नीचे तकिया रख कर गांड और चूत दोनों उठा दिए और टांगें उठा कर फैला दी। रागिनी की चूत का गुलाबी छेद साफ़ दिखाई दे रहा था – छेद थोड़ा सा खुला हुआ था।
“मैंने रागिनी की इस बात का कोई जवाब नहीं दिया और खिलौने के गांड में जाने वाले हिस्से पर जैल लगाई और और उस खिलौने को रागिनी की गांड में जड़ तक बिठा दिया। रागिनी ने एक हल्की सी सिसकारी ले, “आअह मालिनी जी”।
“फिर मैंने रागिनी की चूत का दाना को थोड़ा-थोड़ा हल्का-हल्का रगड़ा। जब रागिनी की चूत ने चिकना-चिकना पानी छोड़ दिया। चूत लंड लेने के लिए तैयार थी। मैंने खिलौने का दूसरा हिस्सा चूत में आखिर तक बिठा दिया”।
“खिलौने के लंड वाले हिस्से के अंत में उंगली के बराबर एक और हिस्सा लगा हुआ था, आगे से थोड़ा सा खाली था। जब लंड चूत में पूरा बैठ जाता था तो ये उंगली जैसा हिंसा चूत के दाने के ऊपर आ जाता था”।
“जैसे ही खिलौने के तीनो हिस्से रागिनी की चूत, गांड और चूत के दाने पर ठीक से बैठ गए तो मैंने खिलौने का स्विच दबा दिया। खिलौने के तीनो हिस्से जो गांड और चूत के अंदर और दाने पर बैठे थे वाइब्रेट – कम्पन करने लगे”।
“रागिनी के मुंह से बस इतना ही निकला, “अअअअअह मालिनी जी मजा ही आ गया”।
“रागिनी की चूत और गांड का काम करने के बाद मैं उठी, अपनी दोनों टांगें रागिनी के दोनों तरफ कर के उल्टा लेट गयी। मेरे चूतड़ रागिनी के मुंह के आगे थे”।
“मेरी चूत तो चिकनी हुए ही पड़ी थी। रागिनी ने रबड़ का मोटा लंड मेरी चूत में एक ही झटके से दबा कर डाल दिया और उसका वाइब्रेटर चालू कर दिया और इसके साथ ही मेरे गांड के छेद पर जुबान फेरने लगी”।
“रागिनी को कुछ भी बताने की जरूरत नहीं थी। रागिनी वैसे ही चुसाई की उस्तादनी थी”।
“उधर मैंने रागिनी की चूत से खिलौने का उंगली वाला हिस्सा रागिनी की चूत के दाने से हटाया और रागिनी की चूत का दाना चूसने चाटने लगी”।
“चूत और गांड में खिलौनों का खेल चालू हो चुका था। बस अब मजे ही मजे थे”।
“अगला आधा घंटा हम ऐसे ही लेटे रहे और सेक्स के खिलौने हमारी गांड और चूत में अपना काम करते रहे। चूतड़ हिलाने से पता लग रहा था कि मेरी और रागिनी की चूतें कम से कम दो दो तीन तीन बार पानी छोड़ चुकी थीं”।
“जब दोनों की तसल्ली हो गयी तो मैंने रागिनी से कहा, “रागिनी, मेरा तो हो गया, लंड निकाल लो मेरी चूत में से”।
“रागिनी ने मेरी चूत में से मोटा लंड निकाल लिया। मेरी गीली चूत में से जब लंड बाहर निकला तो आवाज आयी प्लप”।
“रागिनी के ऊपर से उतर कर मैंने रागिनी से पुछा, “रागिनी निकाल लूं या अभी और करना है “?
रागिनी बोली, “बस मालिनी जी बड़ी बार पानी छोड़ चुकी मेरी चूत। कमाल का खिलौना है ये”।
“मैंने रागिनी की चूत और गांड में से वो सेक्स टॉय निकाल दिया और दोनों टॉयज की बैटरी निकाल कर बाथरूम के सिंक में धोने के लिए रख दिया”।
“इसके बाद हम दोनों ने उठ कर कपड़े पहने और क्लिनिक में वापस आ गए। अब वो काम शुरू करना था जिसके लिए रागिनी मेरे पास आयी थी”।
रागिनी ने मुझसे कहा, “मालिनी जी आप तो ऐसे चूत चूसती और चटवाती हैं कि कोइ पक्की लेस्बियन भी क्या चूत चूसेगी और क्या चूत चुसवायेगी। क्या आप भी मेरी तरह नार्मल और लेस्बियन हैं या प्रवीणा की तरह पूरी लेबियन ही हैं”?
मैंने हंसते हुए कहा, “रागिनी मैं कोइ लेस्बियन नहीं हूं। खूब लंड लेती हूं और अच्छे मोटे लम्बे लंड मुंह में चूत और गांड दोनों सब जगह लेने की शौक़ीन भी हूं”।
“मगर रागिनी औरत के अंदर एक लेस्बियन छिपी होती है। हर औरत कभी ना कभी चूत चूसने चुसवाने, गांड चाटने चटवाने की और किसी लड़की के होंठ चूसने या चुसवाने की इच्छा रखती है”।
“तुम और मैं बिल्कुल नार्मल – सामान्य हैं, कोइ लेस्बियन नहीं। मैं भी चूत और गांड चुदवाने का मजा लेती हूं तुम भी लेती हो। कभी-कभी औरतों को आपस में ये सब करने का मजा आता है”।
रागिनी बोली, “मालिनी जी ऐसा मोटा लंड तो चूत में पहले भी ले रक्खा है, मगर ये गांड और चूत वाला पहली बार लिया है। मजा आ गया। मैं भी मंगवाती हूं ऐसा”।
मैंने कहा, “मगर रागिनी ये तो हम जैसियों के लिए है जिनके पास हर वक़्त मर्द नहीं होते। तुम्हारे पास तो लम्बे लंड वाला आलोक है”।
इस बात का रागिनी ने कोइ जवाब नहीं दिया, मगर मेरी तरफ देख कर मुस्कुरा दी।
अगले भाग में रागिनी की कहानी, उसी की जुबानी।
– रागिनी बता रही थी डाक्टर मालिनी को अपने आने का कारण
फिर मैंने रागिनी से कहा, “चलो रागिनी एक काम तो पूरा हो गया। अब दूसरा काम शुरू करते हैं जिसके लिए तुम मेरे पास आयी हो”।
“मैंने प्रभा को बुला कर फिर से चाय लाने के लिए बोल दिया”।
“चाय आने तक रागिनी कुछ नहीं बोली। प्रभा चाय लेकर आयी और चाय का एक कप उसने रागिनी को पकड़ा दिया”।
“चाय का कप पकड़ कर रागिनी चाय की चुस्कियां ले रही थी। लग रहा था सोच रही थी कि कहां से और कैसे बात की शुरूआत करे”।
रागिनी बोली, “मालिनी जी समझ नहीं आ रहा कैसे बताऊं, कहां से शुरू करूं”।
मैंने कहा,”रागिनी क्या बात है। तुम तो खुद इस डाक्टरी के पेशे से अच्छी तरह वाकिफ हो। जब यहां मेरी पास आ ही गयी हो तो फिर हिचकिचाना किस बात से। मुझे खुल कर अपनी समस्या बताओ, जिससे मैं ढंग से तुम्हारी मदद कर सकूं”।
रागिनी ने खंखार कर गला साफ़ किया और बोली, “मालिनी जी बात दरअसल ये है कि हमारी बीस साल की बेटी मानसी का जिस्मानी रिश्ता यानी चुदाई का रिश्ता, आलोक यानि मेरे पिता के साथ बन गया है। मानसी आलोक से चुदाई करवाने लगी है। आलोक का लम्बा लंड अपनी चूत में लेने लगी है”।
ये कह कर रागिनी चुप कर गयी।
“वैसे तो रागिनी जब मेरे पास आयी ही थी मुझे तभी से लगने लगा था कि मामला कुछ ऐसा ही होगा। एक मनोचिकित्स्क के पास कोइ अपनी बवासीर या अपने पेट दर्द या खांसी जुकाम का इलाज करवाने तो आएगा नहीं”।
मैंने कहा, “रागिनी मुझे पहले ही कुछ एहसास हो गया था कि तुम्हारी समस्या कुछ ऐसी ही है। खैर परसों तो मैं जापान जा रही हूं छह सात दिन के लिए। अब जो आगे होगा वो तो आने के बाद ही होगा। अभी फिलहाल तुम मुझे अपनी तरफ की पूरी बात बताओ। बाद में ये वक़्त बच जाएगा। तुम्हारी बात सुनने के बाद देखेंगे आगे किससे और कैसे बात करनी है”।
रागिनी बोली, “ठीक है मालिनी जी”।
मैंने कहा, “और हां रागिनी तुम तो जानती ही हो हर मनोचिकित्स्क पूरी बात रिकॉर्ड करते हैं, जिससे अगर जरूरत पड़े तो बाद में भी सारी बात दुबारा सुनी जा सके। जब तुम्हारी समस्या का हल निकल जायेगा तो ये रिकॉर्ड की हुई टेप तुम्हें दे दूंगी”।
रागिनी ने कहा, “मुझे ये सब मालूम है मालिनी जी आप रिकॉर्डिंग चालू करिये”।
– रागिनी की कहानी, उसी की ज़ुबानी।
“जैसे ही रागिनी तैयार हुई, मैंने टेप रिकॉर्डर का बटन दबाया और – क्लिक की एक आवाज के साथ रिकॉर्डिंग चालू हो गयी”।
“रागिनी ने बोलना शुरू कर दिया। रिकार्डिंग चालू ही थी”।
रागिनी बोल रही थी, “मालिनी जी, मेरे बारे में तो आप सब कुछ जानती ही हैं। मैं सीधा अपनी बेटी मानसी और उसके पिता आलोक की चुदाई से ही शुरू करती हूं”।
“नौ साल पहले जब मेरी सास का देहांत हुआ तब मानसी 11 साल की थी। जवानी की कच्ची उम्र। मानसी में शरीर में बदलाव अभी शुरू ही हुए थे”।
“वैसे तो मानसी जब से तीन चार साल की थी तभी से अपनी दादी यानि मेरी सास ने उसे अपने साथ सुलाना शुरू कर दिया था, शायद ये सोच कर कि मेरी और आलोक की चुदाई बिना किसी रोक-टोक के चलती रहे। और ऐसा हो भी रहा था। मेरी और आलोक की चुदाई मस्त चालू थी”।
“मेरी सास के देहांत के बाद 11 साल की मानसी हमारे कमरे में फोल्डिंग बेड लगा सोने लगी। आलोक तो सुबह अपने ऑफिस जाता और शाम को आता था। मेरी हस्पताल में दिन की शाम की और रात की शिफ्टें लगती थी”।
“जब मेरी दिन की शिफ्ट होती तो मानसी अपने फोल्डिंग बेड पर सो जाती और जब मेरी रात की शिफ्ट होती तो वो कभी अपने फोल्डिंग बेड पर और कभी आलोक के साथ सो जाती”।
“मगर हमे इसमें मानसी के स्कूल को लेकर एक समस्या आ रही थी”।
“जब मेरी दिन की शिफ्ट होती तो मानसी स्कूल छूटने के बाद कैसे घर आये, हमें ये समस्या आ रही थी। कुछ दिन तो मानसी साथ वाले त्यागी के घर रुक जाती, कभी आलोक उसे स्कूल से ऑफिस ले जाता। मगर ये मामला हमें कुछ जम नहीं रहा था। अब आज की बदलते जमाने में ग्यारह की उम्र भी कोइ कम नहीं होती”।
“ग्यारह बारह साल की लड़की किसी पड़ोसी के यहां छोड़ना कुछ सही नहीं लग रहा था। यही सोच कर मैंने शाम और रात की शिफ्ट करवा ली, जिससे दिन भर मैं घर पर रुक सकूं”।
“अब मानसी मेरे घर रहते-रहते ही मेरे सामने ही स्कूल जाती और दोपहर बाद मेरे घर रहते रहते ही स्कूल से वापस आ जाती”।
“उधर मानसी के हमारे कमरे में सोने की कारण मेरी और आलोक की चुदाई लगभग बंद सी हो गयी थी। हमे डर सताता था कि कहीं ऐसा ना हो कि इधर आलोक का लंड मेरी चूत के अंदर घुसा हुआ हो और उधर मानसी जाग जाए”।
“उन दिनों मैं तो फिर भी कभी-कभी जब ज्यादा मन करता तो हस्पताल में किसी डाक्टर से चुदवा लेती थी या प्रवीणा के साथ चुसाई के मजे ले लेती थी। मगर आलोक उस तरह का आदमी नहीं था। लम्बे लंड वाला आलोक चुदाई तो मस्त करता था, मगर लड़कियां औरतें पटाना और पटा कर उन्हें चोदना उसके बस की बात नहीं थी”।
“मानसी जब तक स्कूल में रही तब तक स्कूल की बस में आती-जाती थी। जब कालेज में पहुंचीं तो कालेज जाने के लिए सुबह आलोक के साथ चली जाती थी, और कालेज खत्म होने पर दोपहर बाद ऑटो से घर आ जाती थी”।
“कालेज में मानसी की हफ्ते में चार दिन क्लास होती थी, वो भी चार घंटे। एक डेढ़ घंटा मानसी का कालेज आने-जाने में लग जाता था। इस दौरान भी मेरी शाम और रात की शिफ्ट चालू थी”।
“मालिनी जी मैं अपने घर की बारे में भी कुछ बता दूं। हमारे घर में दरवाजे से अंदर जाने पर बीच में एक गलियारा है। घर में चार कमरे हैं। दो एक तरफ दो दूसरी तरफ। एक कमरा ड्राइंग रूम है। बाकी के तीन कमरों में एक में डबल बेड है – ये हमारा कमरा है बाकी के दो कमरों में से एक खाली है – गेस्ट रूम कह लो। तीसरे कमरे में मेरी सास ससुर सोया करते थे”।
“बाहर के में दरवाजे की चाबियां मेरे और आलोक के पास रहती थी – अब उसकी एक चाबी मानसी के पास भी है”।
“मैं अगर शाम को हस्पताल जा कर रात को लौटती हूं हमारे कमरे में ना जा कर दूसरे कमरे में चली जाती हूं, जिससे आलोक और मानसी की नींद में खलल ना पड़े।
“वक़्त गुजर रहा था। मानसी का शरीर हल्का-हल्का भरने लगा था। छोटी-छोटी छातियां दिखने लगी थी और चूतड़ों पर भी मांस चढ़ने लगा था। मानसी अब शीशे के आगे खड़ी हो कर अपने आपको आधा-आधा घंटा निहारती रहती थी”।
“एक इतवार को छुट्टी वाले दिन मानसी अपनी सहेली के घर गयी हुई थी, और शाम को आने वाली थी। दोपहर को आलोक और मेरा चुदाई का प्रोग्राम बन गया। आलोक को रात के खाने से पहले दो तीन व्हिस्की के पेग लगाने की आदत है और ये आदत कई सालों से है और कभी कोइ परेशानी नहीं हुई”।
“उस दिन जब हमारा दोपहर को चुदाई का प्रोग्राम बना तो आलोक ने दिन में ही तीन पेग व्हिस्की के लगा लिए”।
जब मैंने पूछा, “क्या बात है आलोक आज दिन में ही”?
आलोक बोला, “रागिनी कई दिन हो गए ना तुम्हारी चूत देखी ना चूसी। आज मस्त चूत चूसने और चुदाई का मन है। इसलिए व्हिस्की पी है जिससे मस्त चुदाई हो। आज मेरा तुम्हारी मस्त चुदाई करने का मन है”।
“मुझे भी इसमें कोइ बुराई नजर नहीं आयी। कभी-कभी ऐसा भी करना चाहिए। मुझे भी कई दिन हो गए थे आलोक का लम्बा लंड नहीं चूसा था, ना ही चूत में लिया था, ना गांड में। मेरी तो आदत थी कि मैं महीने में एक बार आलोक का लम्बा लंड गांड में जरूर लिया करती थी”।
“उस दोपहर को हमारी मस्त चुदाई हुई। आलोक ने खूब रगड़-रगड़ कर मुझे चोदा”।
“मुझे आलोक की उस दिन वाली चुदाई कुछ अलग सी लगी। इस तरह की रगड़ाई वाली मेरी चुदाई तो आलोक तब किया करता था जब हमारी नई-नई मुलाकात हुई थी और नई-नई चुदाई शुरू हुई थी”।
“तब तो हम चुदाई के दौरान दुनिया भर की सेक्सी बातें, दुनिया भर की गंदी बातें भी बोला करते थे”।
“पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा था जैसे आलोक चोद तो मुझे रहा है, मगर उसके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। फिर मैंने सोचा हो सकता है मेरा वहम हो। आलोक को कई दिनों के बाद चूत चोदना नसीब हुआ है, शायद इस कारण इस तरह जबरदस्त चुदाई कर रहा हो। डेढ़ घंटे की चुदाई से मेरी और आलोक की दोनों की तसल्ली हो गयी”।
हम बिस्तर पर लेटे ही हुए थे कि आलोक ने कहा, “रागिनी कई दिनों से तुमसे कुछ बात करने की सोच रहा था”।
“मैं थोड़ा हैरान हुई। पहले तो आलोक ने मेरी जबरदस्त चुदाई की थी, और अब आलोक इस तरह मुझसे बात कर रहा था। इस तरह पहले कभी नहीं हुआ था। तब मुझे लगा जरूर कुछ बात है जो आलोक को परेशान कर रही है”।
मैंने पूछा, “क्या बात है आलोक, ऐसी क्या बात है जो तुम्हें ऐसे बोलना पड़ रहा है”?
आलोक बोला, “रागिनी तुम्हें याद है जब एक बार मैंने तुम्हें मानसी की एक बात बताई थी – जब वो 11 साल की थी”?
मुझे आलोक की पूरी बात याद आ गयी , जब अलोक ने कहा था, “रागिनी, मानसी अब बड़ी हो गयी है – 11 की हो चुकी है। रात को मेरे साथ सोती है तो कुछ अच्छा नहीं लगता”।
“उस वक़्त आलोक की इस बात पर मैंने फिर पूछा था, “क्या बात है आलोक, मानसी अभी बच्ची है ,11-12 साल की और फिर तुम्हारे बेटी ही तो है। साथ सोती है तो उसमें क्या बात है, साफ़-साफ़ बताओ बात क्या है। कुछ हुआ है क्या”?
आलोक थोड़ा रुक कर बोला था, “रागिनी तुमने देखा ही है मानसी का शरीर विकसित हो रहा है। उसकी छातियां बढ़ रही हैं” – अलोक शायद चूचियां बोलने में शर्मा रहा था – “रात को कई बार मानसी अपनी छातियों को मेरे शरीर के साथ रगड़ती है जैसे उसे ऐसा करने में मजा आ रहा हो। मेरे हटाने पर वो हट तो जाती है मगर थोड़ी देर के बाद ही वो फिर ऐसा ही करने लगती है।
एक दिन मैंने मानसी से कहा, “मानसी ये अच्छी बात नहीं बेटा”।
“मानसी कुछ नहीं बोली और दूसरी तरफ मुंह करके सो गयी।
“अगली रात जब मानसी मेरे साथ सोने आयी तो मैंने उससे कहा ,”मानसी अब तुम बड़ी हो गयी हो, तुम अपने फोल्डिंग बेड पर सो जाओ”।
“इसके बाद मानसी ने फोल्डिंग पर सोना शुरू कर दिया। रात में कभी-कभी मानसी उठ कर मेरे पास आ जाती, लेकिन उसने फिर वो पहले जैसी हरकत नहीं की”।
“मालिनी जी मुझे आलोक की कही हुई सारी बातें याद आ गयी।
मैंने सोचा कि ये बात तो कुछ साल पुरानी है फिर आज अचानक से आलोक मुझे ये सब क्यों बता रहा है। क्या फिर कुछ ऐसा ही हुआ है”?
मैंने आलोक से ही पुछा, “आलोक ये जो तुम आज बता रहे हो, ये तो बहुत पहले की बात है, तुमने मुझे या बात बताई भी थी फिर आज क्यो दोहरा रहे हो? कुछ और भी हुआ है क्या”?
“आलोक आगे बोला, “हां रागिनी, उस बात को अब सात साल हो चुके हैं। आज की 18 साल की मानसी अभी भी मेरे साथ ही कमरे में फोल्डिंग लगा कर सोती है, और पहले की ही तरह कभी-कभी मेरे साथ आ कर लेट जाती है और मुझे इसमें कभी कुछ अजीब भी नहीं लगा”।
– मानसी ने छुड़ाया हाथ से अपनी चूत का पानी।
यहां आलोक थोड़ा रुका और हिचकिचाता सा बोला, “रागिनी दो दिन पहले की बात है। मानसी हमारे कमरे में फोल्डिंग लगा कर सोई हुई थी। तुम तो जानती ही हो मैं रात को रोज तीन चार पेग लगा कर सोता हूं। आधी रात को ऐसे ही मानसी मेरे पास आ कर लेट गयी। मेरी नींद हल्की सी खुली तो मुझे लगा कि मानसी ने मेरा हाथ पकड़ा हुआ है और अपने शरीर पर कहीं रगड़ रही है”।
“मेरी नींद पूरी तरह से खुली तो समझ आया मानसी मेरे साथ लेटी हुई थी। मानसी ने अपना पायजामा उतारा हुआ था और मेरा हाथ अपनी चूत पर रगड़ रही थी। मुझे मानसी की चूत के छोटे-छोटे मुलायम बाल साफ अपनी हथेली पर महसूस हो रहे थे। अनजाने ही मेरा लंड खड़ा हो गया”।
मैंने फिर मानसी से कहा, “क्या बात है मानसी क्या कर रही हो? नींद नहीं आ रही क्या”?
मानसी कुछ नहीं बोली और मेरा हाथ अपनी चूत पर जोर-जोर से रगड़ने लगी। मैंने मानसी का हाथ जबरदस्ती हटाया तो मानसी का हाथ मेरे खड़े लंड पर आ गया। मानसी ने मेरा लंड कस कर पकड़ लिया और दूसरे हाथ से अपनी चूत जोर-जोर से रगड़ने लगी।
मानसी के मुंह से हल्की-हल्की आवाजें निकल रही थी जैसे चुदाई के मजे की सिसकारियां ले रही हो, “हह… हह ….आआह…आआ… आहहह… आह”।
“मुझे पहले तो समझ ही नहीं आया कि मानसी ये कर क्या रही है। फिर मुझे एक-दम ध्यान आया क्या मानसी चूत रगड़ कर अपनी चूत का पानी निकल रही है? मैंने सोचा क्या मानसी चूत का मजा ले रही है”?
“हैरानी और परेशानी के कारण मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करुं। मानसी ने इतनी कस के मेरा हाथ पकड़ा हुआ था कि मैं अपना हाथ छुड़ा ही नहीं पा रहा था। पांच छह मिनटों में ही मानसी ने जोर से अपनी चूत रगड़ी और कस कर मेरे लंड को पकड़ा और आअह आह उन्ह उन्ह की आवाज की एक लम्बी सिसकारी ली और ढीली हो कर लेट गयी”।
“फिर मुझे एक-दम ध्यान आया कि मानसी ने अपने चूत को मेरे हाथ से रगड़-रगड़ कर अपनी चूत का पानी छुड़ाया था। क्या मानसी की चूत पानी छोड़ गयी थी? क्या मानसी को चुदाई जैसा मजा आ गया था? क्या मानसी जवान हो गयी थी? ये सारे सवाल मेरे दिमाग में घूम रहे थे”।
“इसके बाद मानसी ने मेरा हाथ अपनी चूत से हटा लिया और मेरा लंड भी छोड़ दिया और चुपचाप उठ कर फोल्डिंग जा कर लेट गयी”।
“मालिनी जी, आलोक बता रहा था, “रागिनी उस वक़्त मुझे बड़ी शर्म आ रही थी। रागिनी मेरी बेटी, और मेरा हाथ मानसी की चूत पर और मेरा लंड मानसी के हाथ में”?
“सुबह जब मानसी से मेरा सामना हुआ तो वो बड़े खुश लग रही थी जैसे रात को कुछ हुआ ही ना हो। रात की बात को या तो भूल चुकी थी, या फिर उसे याद करके उसे मजा आ रहा था और उसी मजे के मारे वो खुश हो रही थी”।
“अगले दिन जब मानसी फोल्डिंग ले कर बिछाने लगी तो मैंने कह दिया, मानसी अब तुम उधर दूसरे कमरे में सोया करो”।
“मेरे ऐसा कहने के बाद मानसी कुछ नहीं बोली और चुप-चाप दूसरे कमरे में चली गयी”।
“मालिनी जी ये कह कर आलोक तो चुप हो गया मगर मैं भी परेशान हो गयी। अगर सच में ही मानसी ने अपने चूत का पानी छुड़ाया है और मजे के लिए आलोक का हाथ अपनी चूत पर रगड़ा है तो फिर मानसी जवान हो रही है। मानसी ने अभी छह महीने पहले ही अपना अट्ठारहवा जन्मदिन मनाया था”।
“मगर मालिनी जी अठारह-उन्नीस की ऐसी कच्ची जवानी में लडकियां लड़कों की इच्छा करने लगती हैं और कुछ भी कर लेती हैं। मैंने कुछ सोच कर आलोक से कहा, “आलोक छोड़ो, तुम टेंशन मत लो, मैं बात करूंगी मानसी से। तुम भी ध्यान रखना”।
“बात खत्म हो गयी। अलोक रिलैक्स हो गया। अलोक के सर से लगता था एक बड़ा बोझ सा उतर गया था। आलोक उठा और उठ कर मेरी चूत चूसने लगा। मेरी चूत भी फिर से चुदाई के लिए तैयार हो गयी और फिर हमारे एक धुआंधार चुदाई और हुई”।
इतना बोल कर रागिनी चुप हो गयी – शायद थक गयी थी ।
रागिनी चुप हुई तो मैंने भी हाथ के रिमोट से टेप रिकार्डर बंद कर दिया। प्रभा को बुलाया और चाय के लिए बोल दिया।
रागिनी की ये बातें सुन कर मैं भी सोचने लगी जो कुछ आलोक और मानसी के बीच हुआ ये बात तो कोई बड़ी बात नहीं।
कुछ देर की चुप्पी के बाद मैंने पूछा, “रागिनी ये जो बात तुमने अभी-अभी बताई है, मानसी का हाथ से रगड़ कर अपनी चूत का मजा लेने वाली बात, ये बात भी तो चार पांच साल पुरानी बात है। वैसे भी इसमें तो कोई परेशानी वाली बात मुझे नहीं लगती। आज-कल के माहौल में तो कम उम्र की लड़कियां भी ये सब शुरू कर देती हैं”।
“अब इसमें दिक्क्त ये है रागिनी कि ये सब उसने आलोक के साथ किया, मतलब आलोक का हाथ अपनी चूत पर रगड़ा और चूत का पानी छुड़ाया, और साथ ही आलोक का लंड पकड़ लिया। यही बात है ना”?
“रागिनी ने हां में सर हिला दिया”।
“मैंने रागिनी को कहा, “रागिनी मेरी, एक मनोचिकित्स्क की नजर में तो इसमें भी कोइ परेशानी वाली बात नहीं। ये भी स्वाभाविक है। अगर इस उम्र की लड़की अपने पिता या भाई के साथ लेटे, वो भी रात को, अंधेरे में, तो ऐसा हो सकता है, क्योंकि इस उम्र में बच्चे अक्सर विपरीत सेक्स की तरफ आकर्षित होने लगते है। उनमें लंड देखने की, पकड़ने की इच्छा जागने लगती है”।
फिर मैंने रागिनी से कहा, “रागिनी अभी तुमने कहा कि आलोक के समझाने के बाद मानसी ने अलग सोना भी शुरू कर दिया और कोइ शिकायत भी नहीं आयी”।
रागिनी जब कुछ नहीं बोली तो मैंने पूछा, “अब ये बताओ रागिनी कि जब मानसी अलग सोना शुरू हो गयी तो फिर आलोक के साथ चुदाई कब और कैसे शुरू हो गयी? और तुम्हें उनकी इस चुदाई का कैसे पता चला”?
— जब रागिनी ने देखा आलोक को अपनी बेटी मानसी की चुदाई करते हुए।
रागिनी ने फिर से बोलना शुरू किया, “मालिनी जी, कुछ महीने पहले की बात है। एक दिन मैं हस्पताल में शाम की शिफ्ट में थी, जो शाम पांच बजे से रात एक बजे तक चलनी थी। रात दस साढ़े दस बजे के करीब मेरी तबीयत खराब सी हुई और सर दर्द होने लगा”।
“मैंने छुट्टी ली हुए घर आ गयी। बाहर के दरवाजे की चाबी तो हम सब के पास होती ही है। दरवाजा खोल कर मैं अन्दर गयी और अपने कमरे की तरफ बड़ी जिससे आलोक और मानसी की नींद में खलल ना पड़े”।
“मेरे और आलोक के कमरे के सामने ही वो कमरा है जिसमें मैं रात को हस्पताल से आने के बाद सोती हूं। हमारे कमरे के सामने से गुजरते हुए मैंने देखा अलोक के कमरे की लाइट जल रही है। मैं रुक गयी। मुझे अंदर से कुछ अजीब सी आवाजें आती सुनाई दीं”।
“मैं ठिठक कर वहीं खड़ी हो गयी। ध्यान से सुना तो अंदर कमरे में से मानसी की आवाजें आ रही थी, सिसकारियों की आवाजें। वैसी सिसकारियों की आवाजें जैसी लड़कियां चुदाई करवाते वक़्त निकालती हैं। वो सिसकारियां जो लंड के चूत के अंदर रगड़े लगने के मजे के कारण मुंह से अपने आप निकलती हैं, “आह पापा, और जोर से आअह पापा आह बड़ा मजा आ रहा है। हां पापा ऐसे ही करो आआह। पापा पूरा निकाल कर डालो पापा आआआह”।
“मेरा दिमाग सुन्न हो गया। ये कमरे में क्या हो रहा है? क्या मानसी आलोक से चुदाई करवा रही है”?
“दरवाजा थोड़ा सा खोला तो देखा मानसी नीचे थी, चूतड़ों के नीचे तकिया लगाए हुए। आलोक ने मानसी को बाहों में ले जकड़ा हुआ था। मानसी की टांगें आलोक की कमर पर कैंची तरह चिपकी हुई थी और आलोक जोर-जोर से मानसी को चोद रहा था मानसी नीचे से चूतड़ ऊपर-नीचे करती हुई बड़बड़ा रही थी, “हां पापा ऐसे ही आआह पापा पूरा निकाल कर डालो पापा आअह”।
“बाप बेटी में होती चुदाई देख कर मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। मुझसे और नहीं देखा गया। ऐसा लगा कि अगर मैं ऐसे ही खड़ी रही तो मुझे चक्कर आ जायगा। मैं बिना कोइ आवाज किये अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी, और जा कर लेट गयी”।
“नींद तो उड़ ही चुकी थी। आँखों के आगे आलोक और मानसी की चुदाई घूम रही थी, और कानों में मानसी की सिसकारियां आआह पापा पूरा निकाल कर डालो पापा आआआह”।
“कोइ आधे घंटे के बाद हमारे कमरे का दरवाजा खुलने की आवाज सुनाई दी, और साथ ही मानसी के कमरे का भी दरवाजा खुला”।
“मतलब बाप बेटी की चुदाई खत्म हो चुकी थी, और मानसी अपने कमरे में चली गयी थी”।
“ना जाने रात कब आंख लगी। मैं जब सुबह जब उठी तो दस बजे हुए थे। अलोक जा चुका था और मानसी जाने के लिए तैयार थी”।
“मुझे जागा देख मानसी मेरे लिए चाय बना कर लाई और मेरी और देख कर बोली, “क्या हुआ मम्मी, तबीयत तो ठीक है? आपकी आंखों से लगता है आप रात सोई नहीं”?
“मैंने मानसी के हाथ से चाय का कप पकड़ कर मानसी को अपने पास बिठा लिया, और उसकी पीठ पर हाथ फेर कर बोली, “मानसी तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है? कोइ परेशानी तो नहीं”?
मानसी बोली, “नहीं मम्मी कोइ परेशानी नहीं, पढ़ाई बिल्कुल ठीक चल रही है। CA की पढ़ाई पूरी होते ही पापा के ऑफिस जाना शुरू कर दूंगी”।
“मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं मानसी से बात करूं भी तो क्या बात करूं”।
मैंने ऐसे ही बोल दिया, “मानसी तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है”?
मानसी ने जवाब दिया, “ठीक चल यही है मंम्मी, अभी तो बता कर हटी हूं”। ये बोल कर मानसी चुप हो गयी।
मैंने फिर कहा, “मानसी तेरी तबीयत ठीक है”?
मानसी ने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा, “मेरी तबीयत को क्या हुआ है मम्मी, आप अपनी चिंता करो। चेहरे का बैंड बजा हुआ है। क्या रात को सोयी नहीं”? ये बोल कर मानसी जाने के लिए उठ खड़ी हुई।
“अब मैं मानसी को क्या जवाब देती कि बाप बेटी की चुदाई देखने के बाद मुझे कैसे नींद आ जाती”।
“मानसी तो इतना बोल चली गयी, लेकिन मानसी के इस रवैये से एक बात तो मेरी समझ में आ गयी, कि मानसी और आलोक की चुदाई मानसी की मर्जी से हो रही थी। इसमें आलोक की तरफ से कोइ जो जबरदस्ती या दबाव नहीं था, और मानसी को इस चुदाई का कोई अफ़सोस या पछतावा भी नहीं था। उल्टा मानसी इस चुदाई का मजा ले रही थी”।
“मेरे दिमाग से आलोक और मानसी की चुदाई वाला सीन हट ही नहीं रहा था। अगले दिन और उससे अगले दिन भी मैं उसी तरह जल्दी आयी ये देखने के लिए कि अब तो मानसी आलोक से चुदाई नहीं करवा रही? दोनों दिन कुछ भी ऐसा नहीं हुआ। घर में सब पहले जैसा ही चल रहा था, जैसे बाप बेटी की चुदाई जैसी कोइ अनहोनी हुई ही ना हो”।
“आलोक और मानसी तो ऐसे पेश आ रहे थे जैसे कुछ हुआ ही ना हो। उन दोनों के बर्ताव से ऐसा कुछ भी नहीं लग रहा था जिससे लगे कि दोनों में से किसी एक को भी इस चुदाई का कोइ पछतावा है”।
“इसके बाद भी मैं कई बार बीच में आयी ये देखने कि आलोक और मानसी फिर से चुदाई तो नहीं कर रहे, लेकिन मुझे ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला”।
“हालांकि घर में सब पहले की तरह ही चल रहा था, मगर मेरा चैन उड़ चुका था”।
“मैं आलोक और मानसी की चुदाई भूल नहीं पा रही थी जब मानसी नीचे थी, चूतड़ों के नीचे तकिया लगाए हुए। आलोक ने मानसी को बाहों में ले जकड़ा हुआ था। मानसी की टांगें आलोक की कमर पर कैंची तरह चिपकी हुई थी, और आलोक जोर-जोर से मानसी को चोद रहा था। मेरे कानों में मानसी के वही शब्द गूंजते थे “आह पापा और जोर से आअह पापा आह बड़ा मजा आ रहा है, हां पापा ऐसे ही लगाओ आआह हां पापा ऐसे ही आआह पापा पूरा निकाल कर डालो पापा आअह”।
“मैं जब भी बिस्तर पर लेटती, मेरी आंखों के आगे वही सीन आ जाता था। मानसी चूतड़ों के नीचे तकिया लगाए हुए लेटी हुई और ऊपर लेटे आलोक ने मानसी को बाहों में लेके जकड़ा हुआ था। मानसी की टांगें आलोक की कमर पर कैंची तरह चिपकी हुई थी, और आलोक जोर-जोर से मानसी को चोद रहा था”।
“दो महीने बीत गए आलोक पहले की ही तरह था। मानसी बड़ी खुश रहती थी। मानसी का जिस्म और भर रहा था और चेहरे पर भी निखार आ रहा था। चेहरे पर ऐसे नूर और निखार का मतलब था कि मानसी की चुदाई अभी भी हो रही थी। क्या आलोक से? अगर आलोक से नहीं तो किससे”?
“मानसी की चुदाई से मुझे कोइ एतराज नहीं था। चुदाई लड़कियां और औरतें ही करवाती हैं, लेकिन बाप बेटी में चुदाई”?
“मेरे दिमाग में बस यही बात आती थी आलोक और मानसी की चुदाई ठीक नहीं। मैं केवल इतना चाहती थी कि बाप बेटी में चुदाई का चक्कर ना चले, क्योंकि ये एक बहुत ही खतरे वाला रिश्ता पनप रहा था। इसमें किसी में भी अपराध भावना आ सकती थी और मामला कहीं तक भी जा सकता था”।
“मेरी टेंशन कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। बार-बार शिफ्ट बीच में छोड़ कर घर आना मुश्किल था। मुझे लगा कि मुझे इस बारे में आलोक और मानसी सी बात किये बिना मुझे चैन नहीं आएगा”।
“मानसी से पहले बात करना मुझे सही नहीं लगा, और मैंने आलोक से ही बात करने का फैसला किया”।
– रागिनी ने की आलोक से उसकी अपनी बेटी के साथ चुदाई की बात।
“एक दिन मानसी फिर अपनी किसी सहेली के घर गयी थी, और शाम को आने वाली थी। मैंने बात का माहौल बनाने के लिए आलोक से कहा, “अलोक मानसी तो शाम को आएगी, चलो दो तीन पेग लगाओ और मस्त चुदाई करो मेरी, उस दिन की तरह”।
“आलोक तो जैसे चुदाई का प्यासा हुआ पड़ा था। आलोक ने एक मिनट नहीं लगाया फ़ौरन तैयार हो गया और फ़ौरन ही पेग बना कर ले आया”।
मैंने आलोक से कहा, “आलोक कपड़े उतार लो नंगें हो कर पेग लगाओ, मैंने तुम्हारा लंड चूसना है। मैंने अपने कपड़े उतार दिए और आलोक के पायजामे का नाड़ा खोल कर घुटनों के बल बैठ आलोक का लंड मुंह में ले लिया। मुंह में लेते ही आलोक का लंड डंडे की तरह खड़ा हो गया”।
“जितनी जल्दी आलोक का लंड मेरे मुंह में लेते ही खड़ा हुआ था, मुझे लगा आलोक चुदाई के लिए कुछ ज्यादा ही उतावला हो रहा है। उस वक़्त मुझे ये ख्याल आया कि हम दोनों के बीच चुदाई कम हो रही है, ये ज्यादा होनी चाहिए”।
“उस वक़्त ऐसे ही मेरे जहन में ख्याल आया कहीं हमारे बीच कम हो रही चुदाई ही तो आलोक और मानसी के बीच के इस नए चुदाई वाले रिश्ते कि जड़ नहीं? कहीं आलोक इसी कारण तो मानसी की चुदाई नहीं करने लग गया, क्योंकि मेरी और आलोक की चुदाई कम हो रही थी। आलोक को चूत चाहिए थी, जो रातों को उसके सामने होती थी। अपनी ही बेटी मानसी की चूत”।
“जवान होती हुई मानसी को चुदाई के लिए आसानी से लम्बा लंड और आलोक को चोदने के लिए आसानी से चूत मिल रही थी – वो भी जवान और टाइट चूत”।
“मैंने सोचा अगर यही कारण है दोनों के बीच चुदाई होने का, तब तो पता नहीं कब से आलोक मानसी को चोद रहा है”।
“आलोक का लंड मेरे मुंह में था, मगर मेरे दिमाग में वही सीन घूम रहा था, मानसी और आलोक की चुदाई वाला सीन। पता नहीं कितनी देर मैंने आलोक का लंड चूसा”।
“तभी आलोक ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा, “क्या हो गया रागिनी और कितना चूसोगी? क्या मुंह में निकलवाना है”?
“आलोक के ये कहने पर हड़बड़ा कर ख्यालों से बाहर आयी मैं, और उठ कर बिस्तर पर लेट गयी। मैंने अपने चूतड़ों के नीचे तकिया लगा कर टांगें उठा कर चौड़ी कर दी और चूत की फांकें खोल दी”।
“चूत चुसाई के शौक़ीन आलोक के लिए ये आलोक को चूत चुसाई का बुलावा था। आलोक ने पागलों के तरह मेरी चूत चूसी। मुझे यकीन हो गया कि आलोक को ज्यादा चुदाई चाहिए”।
“मुझे अपने पर गुस्सा आने लगा कि मैं क्यों इतनी खुदगर्ज़ हो गयी कि खुद तो मैं हस्पताल में डाक्टरों से चुदाई करवाती रहती थी और प्रवीणा के साथ चूत और गांड चुसाई के भी मजे लेती रहती थी, और आलोक को भूल गयी थी। और इस बीच जैसे ही मानसी और आलोक को मौक़ा मिला, उन्होंने चुदाई का खेल खेलना शुरू कर दिया”।
दस मिनट तक मेरी चूत चूसने के बाद आलोक बोला, “रागिनी क्या बात है तुम्हारा ध्यान किधर है? मेरे इतनी चूत चूसने के बाद भी आज तुम्हारी चूत ने पानी नहीं छोड़ा। लंड चूसते हुए भी तुम किन्हीं ख्यालों में खो गयी थी”।
“मैंने हड़बड़ा कर कहा, “नहीं आलोक, ऐसा तो कुछ नहीं, ऐसे ही कुछ सोच रहे थी। एक बार थोड़ी चूत और चूसो”।
“आलोक फिर से मेरी चूत चूसने लगा। इस बार मैंने पूरा ध्यान चुदाई की तरफ लगाया और फर्रर से मेरी चूत ने ढेर सारा पानी छोड़ दिया”।
“आलोक बोला हां, अब निकला तुम्हारी चूत का पानी रागिनी – कुछ खट्टा, कुछ नमकीन खुशबूदार। और ये बोल कर आलोक ने और भी जोर-जोर से मेरी चूत चूसनी शुरू कर दी”।
“मैंने मन ही मन सोच लिया आज आलोक को चुदाई में जन्नत का मजा दूंगी”।
“जैसे ही आलोक ने लंड मेरी चूत में डाला मैंने अपने टांगें आलोक के पीछे चूतड़ों पर डाल कर आलोक को अपनी टांगों में जकड़ लिया और अपने चूतड़ घुमाने शुरू कर दिए”।
“पांच मिनट के चुदाई का बाद ही मैं बड़बड़ाने लग गयी, जिससे आलोक को और मस्ती आये, “आआह आलोक, आज दबा कर चोदो, अंदर तक डालो अपना लम्बा लंड ऐसी चुदाई करो कि याद रहे, घुस जाओ मेरी फुद्दी में”।
“मेरा इतना ही बोलना था कि आलोक ने धक्कों की स्पीड बढ़ा दी। मुझे भी चुदाई का मजा आने लगा”।
“अब चुदाई के मजे में मेरे मुंह से अपने आप ही निकलने लगा, “आअह आलोक रगड़ो मेरी चूत, झाग निकाल दो इसकी, इस फुद्दी की। फाड़ डालो इसको आआह। इतना मजा दो अलोक कि याद रहे आअह अलोक मेरे आलोक आअह और दबा कर चोद आआह मेरे राजा मेरे आलोक फाड़ दे मेरी चूत फाड़ मेरी फुद्दी”।
“मेरी ये बातें सुनते ही आलोक के धक्कों की स्पीड और बढ़ गयी। अब आलोक भी कुछ-कुछ बोलने लगा, “ले रागिनी, ले गया तेरी फुद्दी में अंदर तक मेरी जान रागिनी। ले बना दिया तेरे चूत का भोसड़ा आआआह आआह रागिनी मेरी जान लेले, और लेले, और ले, आअह रागिनी और ले”।
“कुछ देर की चुदाई के बाद हम दोनों ने आआआह आआह वाली लम्बी सिसकारियां निकाली, और हम दोनों झड़ गए। हमारा दोनों का पानी छूट गया। हम दोनों को इकट्ठे मजा आ गया। एक चुदाई हो गयी और हम दोनों, थके हुए ढीले हो कर लेट गए”।
– रागिनी ने आलोक से पूछी मानसी को चोदने की बात।
“मालिनी जी उस दिन मेरे और आलोक के मस्त चुदाई हुई थी। बहुत दिनों के के बाद ऐसा मजा आया था। चुदाई के बाद मैं और आलोक दोनों ढीले हो कर लेट गए”।
“जब चुदाई का नशा थोड़ा उतरा तो मैंने आलोक से पूछा, “आलोक तुमसे एक बात करनी है”।
आलोक ने मेरा हाथ पकड़ कर कर अपने लंड पर रख दिया और मेरे मम्मों पर हाथ फेरते हुए पूछा, “क्या बात है रागिनी, कुछ खास बात है क्या, जो अभी ही करनी है”?
मैंने भी आलोक का ढीला पड़ा गीला-गीला लंड हाथ में ले लिया और बोली, “आलोक जो मैं पूछने जा रही हूं, उसका सच-सच जवाब दोगे? कुछ छुपाओगे तो नहीं”?
“आलोक थोड़ा हैरान सा हुआ। मेरी तरफ मुंह करते हुए आलोक बोला, “क्या बात है रागिनी? कुछ ख़ास बात है क्या”?
आलोक का मानना था कि मानसी समझ रही थी कि उसकी और रागिनी की चुदाई उतनी नहीं हो रही जितनी एक पति-पत्नी की होनी चाहिए, और इसीलिए मानसी ने अपने पापा से चुदाई करवाने का फैसला ले लिया। अब ये फैसला कितना सही था, कितना गलत ये पता लगना अभी बाकी था।
-आलोक और मानसी की चुदाई के बारे में रागिनी के आलोक से सवाल और आलोक के जवाब।
अब तक अपने पढ़ा, चुदाई के बाद आलोक और रागिनी दोनों ढीले हो कर लेट गए। मानसी के साथ आलोक की चुदाई रागिनी भूल ही नहीं पा रही थी। कुछ चुप्पी के बाद रागिनी ने आलोक से कहा, “आलोक जो मैं पूछने जा रही हूं, उसका सच-सच जवाब दोगे? कुछ छुपाओगे तो नहीं”?
आलोक ने रागिनी की इस बात का क्या जवाब दिया, ये पढ़िए कहानी के इस भाग में।
“जब मैंने आलोक से पूछा, “आलोक जो मैं पूछने जा रही हूं, उसका सच-सच जवाब दोगे? कुछ छुपाओगे तो नहीं? तो आलोक ने भी हैरान होते हुए मुझसे पूछ लिया, “क्या बात है रागिनी? कुछ ख़ास बात है क्या”?
मैंने कहा, “हां आलोक, ख़ास ही है”। फिर कुछ रुक कर मैं बोली, “आलोक सच-सच बताना क्या तुम्हारा मानसी के साथ कुछ और भी चल रहा है? मेरा मतलब है क्या तुम मानसी को चोदते हो? मानसी चुदाई करवाती है तुमसे”?
“आलोक ने एक बार मेरी और देखा, और चुप हो कर छत की तरफ देखने लगा। आलोक के चेहरे पर हैरानी साफ़ दिखाई दे रही थी”?
मैंने हाथ से आलोक का चेहरा अपनी तरफ घुमाते हुए आलोक की आंखों में देखते हुए कहा, “आलोक मैंने मानसी को तुमसे अपनी चूत चुदवाते हुए देखा है। मैंने तुम दोनों की चुदाई होते हुए देखी है”।
आलोक ने फिर भी कोइ जवाब नहीं दिया।
मैंने फिर कहा, “आलोक जवाब क्यों नहीं दे रहे, चुप क्यों हो। बताओ मुझे, क्यों चोद रहे हो अपनी बेटी मानसी को”?
कुछ देर आलोक चुप रहा, और फिर धीरे से बोला, “हां रागिनी, मानसी चुदवाती है मुझसे, मैं चोदता हूं मानसी को”। ये कह कर आलोक फिर छत की तरफ देखने लगा।
पहले तो मैं हैरान हुई कि आलोक ने कितनी आसानी से अपनी और मानसी की चुदाई की बात मान ली थी। क्या इसका मतलब ये था कि आलोक को अपनी ही बेटी को चोदने का जरा सा भी पछतावा नहीं हो रहा था”?
“उसके इस रवैये से मुझे बड़ा गुस्सा आ गया। मैंने लगभग चिल्लाते हुए कहा, “मगर क्यों आलोक? मानसी तुम्हारी बेटी है तुम्हारी अपनी बेटी। तुम अपनी बेटी को ही चोदते हो? जानते भी हो इसका मतलब? ये समाज की नजरों में गलत है, पाप है”।
“आलोक ने कोइ जवाब नहीं दिया, बस ऐसे ही लेटा रहा। आलोक का हाथ अभी भी मेरे मम्मों पर ही था”।
“फिर कुछ चुप रहने के बाद मैंने ही पूछा, “कब से चल रहा है बाप-बेटी की इस चुदाई का सिलसिला? और मैं कहां थी? तुम्हारी अपनी चूत, तुम्हारी अपनी फुद्दी। मुझे तो तुम जब चाहते, जैसे मर्जी चाहते चोद सकते थे। फिर अपनी ही बेटी मानसी क्यों? बोलो आलोक”।
“आलोक तब भी चुप ही रहा”।
रागिनी डाक्टर मालनी को बता रही थी। “मालिनी जी जब अलोक ने मान ही लिया कि वो मानसी को चोदता है तो मैंने फिर आलोक से पूछा, “जवाब दो आलोक क्यों? क्यों चोदते हो तुम अपनी ही कुंवारी बेटी को? और कब से चोद रहे हो उसे? मानसी की चूत की तो सील भी तोड़ दी होगी तुमने तो अपना ये आठ इंच का लंड उसकी चूत में डाल कर”?
फिर आलोक धीरे से बोला, “रागिनी, पहले मैं तुम्हारे इस क्यों का जवाब देता हूं, कि क्यों चोदता हूं मैं मानसी को, और क्यों हो रही है हम दोनों बाप-बेटी में चुदाई”।
आलोक बोला, “रागिनी पहली बात तो ये है कि ये चुदाई मानसी की पहल से शुरू हुई है, मेरी पहल से नहीं। मैंने तो मानसी को कभी भी चोदने का सोचा भी नहीं था”।
आलोक कुछ देर के लिए चुप हुआ, और फिर बोला, “मगर रागिनी, अगर मैं कहूं कि एक तरह से बाप-बेटी के बीच हो रही चुदाई के रिश्ते की जिम्मेदार बहुत हद तक तुम हो तो ये गलत नहीं है”।
“आलोक की ये बात सुन कर मेरा पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। मुझे बड़ा गुस्सा आ गया, बाप बेटी में हो रही के चुदाई की जिम्मेदार आलोक मुझे ठहरा रहा था”?
मैंने लगभग चिल्ला कर गाली देते हुए कहा, “मैं? मैं जिम्मेदार हूं भोसड़ी के आलोक? तुम बाप-बेटी में हो रही चुदाई की जिम्मेदार मैं हूं? मैं कैसे जिम्मेदार हूं”?
गुस्से में मैं बोलती जा रही थी, “चूत में जाने के लिए लंड का खड़ा होना जरूरी है। क्या मैं तुम्हारा लंड पकड़ कर खड़ा करती हूं? क्या मैं तुम्हारा लंड पकड़ कर मानसी की चूत में डालती हूं? क्या मैं तुम्हारे लंड को मानसी की चूत में आगे-पीछे, अंदर-बाहर करती हूं, जिससे तुम्हारा लंड मानसी की चूत की चुदाई करे”?
“आलोक तुम दोनों बालिग हो। तुम दोनों को दुनियादारी की समझ है। और फिर लंड तुम्हारा, चूत मानसी की। चुदाई तुम दोनों के बीच, और जिम्मेदार मैं? वाह क्या खूब कह रहे हो आलोक तुम”।
“मेरे इस तरह बोलने से आलोक की बोलती बंद हो गयी। मैंने फिर उसी तरह ऊंची आवाज में कहा, “अब क्यों नहीं बोलते आलोक, बताओ मुझे, तुम दोनों बाप-बेटी में हो रही चुदाई की जिम्मेदार मैं कैसे हो गयी”।
आलोक बड़ी मरी हुई सी आवाज में बोला, “रागिनी पहले तो अपना ये गुस्सा थूको और अपने दिमाग को हल्का करो, और मेरी पूरी बात शांति से सुनो”।
“ये जो मैं कह रहा हूं कि हमारे बीच हो रही चुदाई की जिम्मेदार तुम हो, ये मेरी नहीं मानसी की सोच है। जब से तुमने वो रात वाले शिफ्ट करवाई थी मैं रातों को अकेला होता हूं, और ये मानसी को भी दिखाई देता है”।
“पहले तो मानसी भी मेरे साथ ही सोती थी। बाद में वो अलग सोने भी लग गयी थी। अब मैं रात को अपने कमरे में अकेला होता हूं। अब तुम ही बताओ रागिनी क्या जवान होती हुई लड़की मानसी को दिखाई नहीं देता था कि हम पति-पत्नी रात इकट्ठे नहीं सोते। दिन की तो बात ही छोड़ दो, दिन में तो हम साथ-साथ होते ही नहीं”।
“रागिनी अब मानसी जवान हो गयी है। पति-पत्नी के रिश्ते का मतलब समझती है और चुदाई क्या होती है ये वो जानने, समझने लग गयी है। वो हमारे या कह लो मेरे इस अकेलेपन को अपने इस चुदाई वाले नजरिये से देखने लगी है”I
“मतलब उसकी नजरों में रातों को मैं घर पर अकेला होता हूं और तुम मेरे साथ नहीं सोती। मेरी तुम्हारे साथ चुदाई नहीं होती। उसे लगता है तुम मेरा वैसा ध्यान नहीं रखती जैसा एक पत्नी को पति का रखना चाहिए, मतलब तुम मुझसे चुदाई नहीं करवाती, या उतनी नहीं करवाती जितनी की पति पत्नी में होनी चाहिए”।
फिर आलोक धीरे से बोला, “वैसे रागिनी तुम खुद ही सोच कर देखो, अगर जवान मानसी के दिमाग में ये बात कभी आयी भी होगी तो ये बात गलत तो नहीं है। तुम खुद ही सोच कर बताओ कि पिछले कुछ सालों से मेरी और तुम्हारे बीच चुदाई होती रही है”?
“मालिनी जी हालांकि आलोक की बात ठीक थी। पिछले कुछ सालों में मेरी और आलोक के बीच चुदाई बहुत कम हो गयी थी। मगर फिर भी ये तो कोइ कारण नहीं था कि एक बाप बेटी को ही चोदना शुरू कर दे, वो भी जो कुंवारी थी”।
मैंने उसी गुस्से से कहा, “आलोक अगर मेरी तुम्हारी चुदाई नहीं होती थी, या कम होती थी, तो इसका ये मतलब तो नहीं कि तुम मानसी को ही पकड़ कर चोद दो। और फिर जब जब तुमने मुझे चुदाई के लिए कहा तो मैंने चुदाई तो करवाई ही तुमसे, मना तो नहीं किया मैंने”।
आलोक ने जवाब दिया, “हां रागिनी जब भी मैंने तुमसे कहा या तुमने मुझसे कहा, हमारे बीच चुदाई हुई। लेकिन मेरे तुम्हारे बीच की बात है। तुम अलग कमरे में सोती हो। जिस दिन हमारा चुदाई का मन होता है मैं तुम्हारे कमरे में जा कर तुम्हे चोद कर वापस अपने कमरे में आ जाता हूं। लेकिन मानसी को तो ये नहीं पता। मानसी को तो लगता था हम अलग ही सोते हैं उससे उसकी ये सोच बनती जा रही थी कि मेरे और तुम्हारे बीच चुदाई नहीं हो रही, या बहुत कम हो रही है। और इसके लिए वो तुम्हें जिम्मेदार मानने लगी है”।
आलोक फिर कुछ रुक कर बोला, “रागिनी मैंने मानसी को अपनी मर्जी से नहीं चोदा। मानसी ने ही मुझे उसकी चुदाई के लिए मजबूर कर दिया”।
रागिनी आगे बोली, “मैंने आलोक से फिर पूछा- फिर वही बात? कैसे मजबूर कर दिया आलोक, तुम्हें मानसी ने चुदाई के लिए? क्या उसने तुम्हारा लंड पकड़ कर खड़ा किया, और फिर अपनी चूत में डाल लिया? कैसे मजबूर कर दिया मानसी ने तुम्हें उसकी चुदाई के लिए, बताओ”।
“मालिनी जी एक तरह से देखा जाये तो ये सब बहानेबाजी भी तो हो सकती थी आपस में चुदाई का रिश्ता बनाने की। भला ये क्या बात हुई कि एक पति पत्नी में चुदाई कम हो रही थी या नहीं हो रही थी, इसलिए बेटी ने ही बाप से चुदवानी शुरू कर दी”।
“मैंने आलोक को बोल ही दिया, “अलोक मेरी तुम्हारी चुदाई कम होती है इसलिए मानसी तुमसे चुदवाने लग गयी, ये सब बहाना है। अगर यही कारण है तुम बाप-बेटी में चुदाई होने का फिर तो आधे से ज्यादा परिवारों में बाप अपनी बेटियों को चोदने लग जायेंगे। खरबूजे के ऊपर छुरी रखो, या छुरी के ऊपर खरबूजा – बात तो एक ही है”।
“मेरी इस बात से आलोक थोड़ा परेशान हुआ और फिर बोला, “रागिनी अगर ये बहाना भी है, तो भी ये बहाना मानसी की तरफ से ही है मेरी तरफ से नहीं। मैंने कभी मानसी को नहीं चोदना चाहा, कभी मानसी को उस नजर से नहीं देखा”।
आलोक ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “रागिनी ये तो तुम भी जानती ही हो, जब रात को तुम घर पर नहीं होती तो मैं अपनी, मतलब हमारे कमरे का दरवाजा अंदर से बंद नहीं करता। ये इसलिए नहीं कि मानसी मेरे पास आये, बल्कि इसलिए कि रात को मानसी को कोइ प्रॉब्लम, कोइ दिक्क्त हो तो मुझे बता सके”।
आलोक ने बताया, “कोइ एक साल पहले, एक रात मानसी मेरे पास आयी और मेरे पास बैठ गयी। मैं जाग रहा था। असल में मैं अपने मोबाइल पर चुदाई की फिल्म देख रहा था। मेरा लंड आधा खड़ा था। मैं लंड की मुट्ठ मारने की तैयारी में था। गनीमत थी की लंड पायजामे में ही था और कमरे नाईट बल्ब की हल्की रोशनी ही थी”।
“मानसी कुछ देर ऐसे मेरे ही पास बैठी रही और फिर बोली, “पापा क्या बात है आप अभी तक सोये नहीं? नींद नहीं आ रही? मम्मी का ख्याल आ रहा है क्या? मम्मी भी आपका कुछ ध्यान नहीं रखती, बस अपने मैं ही मस्त रहती है”।
“पहले तो मैं समझा नहीं कि मानसी क्या यही बात करने इतनी रात को कमरे में आयी थी? ये बात तो दिन में भी हो सकती थी। और फिर तुम्हारा ये मेरा ख्याल ना रखने वाली बात उस समय, इस तरह इतनी रात को क्यों कर रही थी। मगर फिर मुझे लगा की मानसी का इशारा तुम्हारी और चुदाई की तरफ था जो बहुत कम हो रही थी, लगभग ना के बराबर”।
“मेरे मन में के तरह के सवाल उठने लगे। पहला सवाल तो यही थी कि इतनी रात को मानसी आयी ही क्यों, किस नीयत से आयी थी? और आयी भी थी, तो लाइट क्यों नहीं जलाई”?
“तब मेरे शक की कोइ गुंजाईश नहीं रही जब मानसी ने मेरे लंड से जरा सा ऊपर मेरे पेट पर हाथ रख कर कहा, “पापा मेरी बात सच है ना। मम्मी भी आपका कुछ ध्यान नहीं रखती, बस अपने मैं ही मस्त रहती है”।
“मैंने मानसी का हाथ अपने पेट से हटाने की कोशिश की मगर मानसी ने हाथ नहीं हटाया। मैंने फिर मानसी से कहा, “ऐसी बात तो नहीं मानसी। तुम्हारी मम्मी ध्यान तो रखती है। तुमसे किसने कहा वो मेरा ध्यान नहीं रखती”?
“अब जो मानसी ने जो किया और जो कहा, वो सुनने के बाद मेरे दिल में कोई शक नहीं रहा कि मानसी का इशारा मेरी और तुम्हारी चुदाई कि तरफ था और मानसी मुझे चुदाई करवाने की बात इशारों इशारों में कर रही थी”।
“मानसी ने मेरे पेट पर रखा हाथ थोड़ा सा नीचे सरका दिया, मेरे आधे खड़े लंड से सिर्फ दो इंच कि दूरी पर और बोली, “पाप मैं बीस साल की हूं अब, और सब समझती हूं। अब तो मैं भी आपका ख्याल रख सकती हूं। आप कहो तो मैं आपका ध्यान रख दिया करूं मम्मी की तरह”।
“मैं मानसी का इशारा तो समझ गया, मगर ये सोच कर हैरान भी हुआ और परेशान भी की मानसी किस हद तक जा चुकी थी। मानसी मुझसे चुदाई करवाने की बात कह रही थी”।
“मैंने मानसी का हाथ अपने पेट से जबरदस्ती हटाया और बोला, “मानसी ये तुम क्या कह रही हो? तुम अपनी मम्मी की तरह मेरा ध्यान रखोगी? जो तुम कह रही हो मैं समझ रहा हूं। मानसी ये बात समझ लो, ये कभी नहीं हो सकता, ऐसा कभी सोचना भी मत। ये गलत है”।
“और जहां तक तुम्हारी मम्मी का मेरा ध्यान रखने वाली बात है, वो मेरा ध्यान वैसा ही रखती है जैसा पहले रखती थी। वक़्त के साथ-साथ हालात और जरूरतें बदलती रहती हैं। इसलिए हो सकता है तुम्हें ऐसा लग रहा हो कि तुम्हारी मम्मी मेरा पहले जैसा ध्यान नहीं रख रही। मगर मानसी अगर ऐसा है भी तो इससे मुझे कोइ शिकायत नहीं। जाओ और अपने कमरे में जा कर सो जाओ”।
आलोक बता रहा था, “उस रात मानसी चली गयी। दो तीन महीने और गुज़र गए। फिर मानसी ने इस तरह की कोइ बात नहीं की”।
– मानसी चुद गयी अपनी सहेली स्नेहा के बॉय फ्रेंड प्रभात से
“आलोक ने अपनी बात अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “एक दिन मानसी सुबह सुबह अपनी किसी सहेली के घर गयी। तुम रात की शिफ्ट कर के आयी थी और सोई हुई थी। शाम पांच बजे मानसी वापस आयी। तब तक तुम हस्पताल जा चुकी थी। मानसी आते ही अपने कमरे में चली गयी”।
“ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। मानसी जब भी बाहर से आती थी मुझे दो बातें करने के बाद ही अपने कमरे में जाती थी”।
“जब काफी देर तक मानसी कमरे से बाहर नहीं आयी तो मुझे चिंता हुई कि मानसी की तबीयत तो खराब नहीं? मैं मानसी के कमरे में गया। मानसी लेटी हुई थी। मैंने मानसी से पूछा, “क्या बात है मानसी? तबीयत तो ठीक है”?
मानसी उठ कर बैठ गयी मगर कुछ भी नहीं बोली।
मैंने ही दुबारा पूछा, “मानसी क्या बात है? ऐसे चुप-चुप क्यों हो, तबीयत तो ठीक है?
मानसी मुझसे नजरें नहीं मिला पा रही थी। कुछ देर चुप रहने के बाद मानसी बोली, “पापा मुझे आपसे कुछ बात करनी है”।
मैंने कहा, “बोलो मानसी क्या बात है”?
मानसी कुछ देर चुप रही और फिर धीरे से बोली, “पापा मुझे i-pill चाहिए, प्लीज आप ला दो”।
मैंने हैरानी से पूछा, “i-pill? i-pill तुमने क्या करनी है मानसी”?
मानसी नजरें झुका कर बैठी रही मगर कुछ नहीं बोली।
मैंने मन ही मन सोचा i-pill? i-pill तो चुदाई के बाद लड़कियां खाती हैं, जिससे उनको बच्चा ना ठहरे। मानसी को i-pill क्यों चाहिए? तभी मेरे दिमाग में ये बात बिजली की तरह कौंधी। तो क्या मानसी चुदाई करवा कर आयी?
मैंने मानसी सी पूछा, “मानसी i-pill? तो क्या तुम…”? मुझे समझ ही नहीं आ रहा था की मैं क्या कहूं।
“फिर भी मैं कहा, “मानसी i-pill तो सेक्स करने के बाद लड़कियां लेती है जिससे प्रेगनेंसी ना हो” I
मानसी ने वैसे ही सर झुकाये हुए जवाब दिया, “हां पापा आज मैं अपनी सहेली स्नेहा के घर गयी थी। वहीं स्नेहा के बॉयफ्रेंड प्रभात के साथ मेरा सेक्स हुआ है – दो बार। दोनों बार प्रभात का डिस्चार्ज मेरे अन्दर ही निकला है”।
“मैं एक-दम बेड से खड़ा हो गया। मेरे पैरों के नीचे से जमीन निकल गयी। ये मानसी क्या कह रही थी। मानसी चुदाई करवा कर आयी थी? एक बार तो मन में आया एक थप्पड़ लगाऊं मानसी को, मगर फिर ध्यान आया मानसी बीस की हो चुकी थी, बालिग थी। अगर चुदाई करवाई भी तो ऐसा क्या हो गया”।
“रागिनी, मानसी में मुझे उस वक़्त अपनी बेटी नहीं एक जवान लड़की दिखाई देने लगी जो चुदाई करवा कर आयी थी। ना चाहते हुए भी मेरी आंखो के आगे मानसी का नंगा जिस्म आ गया। मुझे मानसी की चूत दिखाई देने लगी, जिसमें लंड गया हुआ था”।
“जवान लड़की की चुदाई की बात सुन कर मेरे लंड में भी हरकत होनी लगी। मैंने इतना ही पूछा, “कौन है वो, तुम जानती हो उस लड़के को”?
मानसी बोली, “हां पापा जानती हूं I पापा उसका नाम प्रभात है। प्रभात मेरी सहेली स्नेहा का बॉयफ्रेंड है। पहले एक दो बार मिली भी हूं उससे। आज जब मैं स्नेहा के घर गयी तो प्रभात भी आया हुआ था”।
“मुझ हैरानी हुई। प्रभात स्नेहा का बॉयफ्रेंड था, और मानसी के साथ चुदाई हो गयी? बात कुछ समझ नही आ रही थी”।
मैंने मानसी से ही पूछा, “मानसी अगर प्रभात स्नेहा का बॉयफ्रेंड है तो तुम्हारे साथ उसने ये सब कैसे किया वो भी स्नेहा के ही घर पर, स्नेहा के सामने”?
मानसी धीमे से बोली, “सब कुछ अचानक से हो गया पापा”।
मानसी बताने लगी, “पापा आज जैसे ही मैं स्नेहा के घर पहुंची, प्रभात पहले से ही वहां बैठा हुआ था। प्रभात और स्नेहा के आपसी रिश्तों के बारे में मुझे पता था। मुझे उस वक़्त वहां रुकना अच्छा नहीं लगा। मैंने स्नेहा से कहा, स्नेहा मैं चलती हूं, फिर आ जाऊंगी”।
स्नेहा ने कहा, “नहीं मानसी तुम बैठो, प्रभात अभी थोड़ी देर में चला जाएगा”।
“मैं वहीं बैठ गयी। मुझे लगा प्रभात जाने ही वाला था। मगर सामने बैठे स्नेहा और प्रभात आपस में एक-दूसरे को अजीब अजीब तरीके छू रहे थे। उन्हें ये सब करते देख मुझे शर्म भी आ रही थी”।
“थोड़ी देर बाद ही दोनों में कुछ इशारा सा हुआ और स्नेहा बोली, “मानसी तुम बैठो हम अभी आते हैं”।
“ये बोल कर दोनों दूसरे कमरे में चले गए, और कमरे का दरवाजा बंद कर दिया। पहले तो मैं हैरान हुई, कि ये क्या बात हुई, मुझे बैठा कर स्नेहा उठ कर प्रभात के साथ दूसरे कमरे में चली गयी है”।
“मैं ऐसे ही बैठी-बैठी उनके बाहर आने का इंतजार करने लगी”।
“कुछ ही देर में कमरे में से अजीब-अजीब आवाजें आने लग गयीं – सिसकारियों की आवाजें। दोनों कुछ ऐस ऐसा बोल रहे थे, आआह प्रभात, आआह स्नेहा। साफ़ लग रहा था वो दोनों सेक्स, चुदाई कर रहे थे। मेरे वहां पहुंचने से पहले ही उनका सेक्स का प्रोग्राम बना हुआ था”।
आलोक बोला, “रागिनी मेरे साथ बात करते हुए पहली बार मानसी ने ‘चुदाई’ शब्द का प्रयोग किया था”।
आलोक रागिनी को बता रहा था, “मानसी मुझे बता रही थी, थोड़ी ही देर में कमरे में से आने वाली आवाजें ऊंची हो गयी। उनकी आवाजें सुन कर मुझे अजीब-अजीब सा लगने लगा। पापा मेरी अपनी इसमें”, मानसी ने अपनी चूत को हल्का सा छू कर कहा, “कुछ-कुछ होने लगा। ऐसा लगा जैसे इसमें से कुछ गीला-गीला निकल रहा है। मैंने सलवार के अंदर हाथ डाल कर इसमें उंगली अंदर-बाहर करनी शुरू कर दी। उंगली अंदर-बाहर करते ही मुझे अजीब सा मजा आने लगा”।
“कोइ दस बारह मिनट तक अंदर सी ऐसी ही आवाजें आती रहीं। फिर कमरे से आवाजें आनी बंद हो गयी। लगता था उनकी चुदाई खत्म हो चुकी थी। कुछ देर के बाद कमरे का दरवाजा खुला और स्नेहा और प्रभात दोनों वापस कमरे में आ गए”।
“मेरा हाथ तब भी सलवार के अंदर ही था”।
“स्नेहा ने जैसे मेरी तरफ देखा तो वो बोली, “मानसी ये क्या कर रही हो”?
“मैं अपना हाथ सलवार के अंदर से निकालना ही भूल गयी, और चुप-चाप स्नेहा और प्रभात की तरफ देखने लगी”।
“फिर स्नेहा ने साफ़ ही बोल दिया, “मानसी चूत में उंगली ले रखी है क्या? चुदाई करवाने का मन हो रहा है क्या”?
“मैं चुप रही। मन तो मेरा कुछ कुछ चुदाई का मजा लेने का हो ही रहा था”।
“स्नेहा मेरे पास आयी और मेरा हाथ पकड़ कर बोली, “मानसी बोलो, क्या चूत में लंड लेने का मन हो रहा है? क्या चुदाई करवानी है”?
“मैं जब फिर भी चुप रही तो स्नेहा ने प्रभात कि तरफ मुड़ कर बोली, “प्रभात लगता है मानसी की चूत लंड मांग रही है। ले जाओ मानसी को और लंड इसकी चूत में डाल कर इसे भी चुदाई का बढ़िया मजा दो”।
“स्नेहा की इस बात से प्रभात भी हैरान था। मैं कई बार प्रभात से मिली थी, बात भी हुई थी। मगर इस तरह चुदाई की बात ना तो कभी मैंने सोची थी ना ही शायद प्रभात ने। स्नेहा के कहने पर भी प्रभात अपनी जगह से नहीं हिला”।
“फिर स्नेहा प्रभात की पास गयी, और प्रभात का हाथ पकड़ कर उसे मेरे पास ले आयी”।
“स्नेहा फिर प्रभात को बोली, “प्रभात मैं कह रही हूं, मानसी की चूत लंड मांग रही है। देख नहीं रहे मानसी का हाथ कहां है? मानसी ने चूत में ऊंगली ले रक्खी है। जाओ अंदर ले जाओ और चुदाई का मजा दो मानसी को”।
“स्नेहा की बात सुन कर जैसे मैं नींद से जागी। मैंने एक-दम अपना हाथ अपनी सलवार में से निकाल लिया”।
“स्नेहा के दुबारा कहने प्रभात ने मुझे बाहों से पकड़ कर खड़ा किया, उठाया, और मुझे उस दूसरे कमरे में ले जाने लगा”।
“पापा, उस वक़्त मेरा दिमाग सुन्न हो चुका था। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। मेरे पैर मेरा साथ नहीं दे रहे थी। प्रभात मुझे कमरे की तरफ ले जा रहा था और मैं प्रभात के साथ खिचती चली जा रही थी”।
आलोक बता रहा था, “मैंने मानसी से पूछा, “मानसी तुमने ये पहली बार किया क्या”? मानसी चूत चुदाई जैसे शब्द बोल रही थी, मगर मुझे ये सब बोलने में शर्म आ रही थी”।
“मानसी ने अपने चूत की तरफ इशारा करते हुए कहा, “हां पापा पहली बार किया और इसमें से थोड़ा ब्लड भी निकला था”।
आलोक बता रहा था, “रागिनी अब तुमसे क्या छुपाऊं, जिस वक़्त मानसी मुझे ये सब बता रही थी उस वक़्त मेरी आंखों की आगे नंगी मानसी प्रभात के नीचे लेटी दिखाई दे रही थी, जिसे प्रभात चोद रहा था। मेरा लंड हरकत करने लगा था”।
“जब मानसी मुझे अपनी और प्रभात की चुदाई की बात बता रही थी, तो मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था। मुझे लग रहा था जैसे कि मेरे सामने नंगी मानसी और खड़े लंड के साथ प्रभात खड़ा था”।
“मैंने बड़ी मुश्किल से अपने लंड को खड़ा होने से रोका हुआ था। मैं जल्दी से जल्दी मानसी की सामने से हट जाना चाहता था कि कहीं मानसी की नजर मेरे खड़े होते हुए लंड पर ना पड़ जाए। तुम तो जानती ही हो रागिनी मेरा लंड जब खड़ा हो जाता है तो पेंट के ऊपर से भी लंड का उभार साफ़ दिखाई देता है”।
“मैंने जल्दी से मानसी से कहा, “मानसी तुम्हें ये बात मुझे नहीं अपनी मम्मी को बतानी चाहिए, अपनी मम्मी से बात करनी चाहिए। तुम्हारी मम्मी एक ट्रेंड नर्स है, आधी डाक्टर। हो सकता है वो तुम्हें कुछ बताना या समझाना चाहे “।
“मानसी मेरी बात बीच में ही टोक कर एकदम से बोली, “नहीं पापा, मम्मी से नहीं। मम्मी के पास कहां टाइम है। मुझे मम्मी से इस बारे में बात नहीं करनी। आप भी मम्मी को मत बताना, आपको मेरी कसम। आप बस जा कर मुझे i-pill ला दो। चौबीस घंटों के अंदर खानी है”। ये बोल कर मानसी बाथरूम में चली गई।
“मैं आगे मेरे लिए कहने के लिए कुछ नहीं था। मैंने कार निकाली और i-pill लेने निकल गया”।
“कार चलाते हुए भी मैं यही सोच रहा था कि एक बाप की बेटी की पहली चूत चुदाई हुई है और वो बाप अपनी बेटी के लिए बच्चा ना ठहरने की दवा लेने जा रहा है। कार में बैठे-बैठे भी मेरी आखों के सामने मानसी का नंगा जिस्म ही घूम रहा था जिसे प्रभात ने बाहों में ले रखा था और उसकी चुदाई कर कहा था”।
आलोक ने फिर बताया, “रागिनी मैं चार पैकेट i-pill के लाया और मानसी को दे दिए। मैंने सोचा हो सकता है एक बार चुदाई का मजा लेने के बाद मानसी दुबारा चुदाई करवाना चाहे”।
आलोक ने मुझे कहा, “रागिनी तुम्हें तुम्हारे सवालों का जवाब मिल गया? मानसी की पहली चुदाई मैंने नहीं की। मानसी की चूत की सील मैने नहीं तोड़ी। मगर एक बात बताओ रागिनी, जो बात मानसी को तुमसे करनी चाहिए थी मानसी को मुझसे करनी पड़ी। क्यों? तुम्हें पता भी है, मानसी मुझे ये सब बता रही थी, तो मुझे कितनी शर्म आ रही थी, और मानसी भी मुझसे नजरें नहीं मिला पा रही थी” I
“मालिनी जी, आलोक की बात सुन कर मुझे अपने आप पर बड़ा ही गुस्सा आया। आलोक सच ही कह रहा था, कि एक बेटी को जो बात अपनी मां को पहले बतानी चाहिए, वो बात बेटी को बाप को बतानी पड़ रही थी। और बेटी समझ रही थी कि जिस औरत को अपने पति की फ़िक्र नहीं वो अपनी बेटी की क्या फ़िक्र करेगी”।
“मैं और आलोक बिस्तर पर लेटे-लेटे ही बात कर रहे थे। फिर आलोक बोला, “रागिनी अब आते हैं तुम्हारी दूसरी बात पर जो तुम पूछ रही हो कि मेरी और मानसी की चुदाई कब से शुरू हुई”।
अलोक बता रहा था, “मानसी की प्रभात के साथ उस पहली चुदाई को दो हफ्ते गुज़र चुके थे। मानसी बिल्कुल नार्मल थी। सब फिर वैसा ही चलने लगा था। एक बात जरूर हुई, हर रात को जब मैं बिस्तर पर लेटता मुझे मानसी की चुदाई दिखाई देती। मैं सोचता रहता कैसे प्रभात ने मानसी को पकड़ा होगा, कैसे मानसी की कुंवारी चूत में लंड डाला होगा। कैसे मानसी को चोदा होगा I कैसे नीचे से चूतड़ घुमा-घुमा कर मानसी ने चुदाई करवाई होगी”।
“ये सोच-सोच कर मेरा लंड खड़ा हो जाता और मुट्ठ मारे बिना काम नहीं चलता था। पहले तो मैं तुम्हारी और अपनी चुदाई का सोच-सोच कर मुट्ठ मार कर लंड का पानी निकालता था, मगर अब मुट्ठ मारते हुए मेरी आंखों के आगे उस प्रभात की और मानसी की चुदाई का सीन ही नाचता रहता”।
“और फिर एक दिन कुछ अजीब सा हुआ। कुछ ऐसे हालात बन गए कि मानसी उस रात मेरे कमरे में आयी, और मेरे ना चाहते हुए भी मेरी और मानसी की चुदाई हो गयी”।
“मानसी को चोदने की बाद मुझे बहुत पछतावा हुआ, कि ये मैंने क्या कर दिया, मगर चुदाई तो हो ही चुकी थी। मानसी चुदाई करवा कर वापस अपने कमरे में चली गई। मानसी की जाने की बाद उस रात मुझे नींद नहीं आयी”।
“अगले दिन मानसी बिल्कुल ही नार्मल थी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं था”।
“इसके बाद पंद्रह दिन, एक महीने बाद, जब भी मानसी का चुदाई का मन करता वो मेरे पास आ जाती। मैं हर बार उसे समझाता के ये बाप बेटी की चुदाई ठीक नहीं। मगर मानसी की पहल और जिद के आगे मेरी कुछ नहीं चलती थी। मानसी कपड़े उतार कर टांगें उठा कर लेट जाती थी, और मैं कमजोर पड़ जाता था। उस वक़्त मेरे पास उसे चोदने के अलावा कोइ चारा नहीं होता था”।
“सब से बड़ा डर मुझे यही लगा रहता कि अगर मैंने सख्ती से मना किया तो कहीं मानसी कोइ गलत कदम ही ना उठा ले”।
“मालिनी जी मुझे आलोक की इस बात से कुछ हैरान हुई, कुछ परेशानी भी हुई। गलत कदम ना उठा ले, इसका क्या मतलब हुआ? किस तरह के गलत कदम की बात कर रहा था आलोक”?
मैंने आलोक से पूछा, “गलत कदम ना उठा ले? क्या ऐसी कुछ बात कही थी मानसी ने”?
अलोक ने जवाब दिया, “हां रागिनी ऐसा एक बार हुआ था। एक रात मानसी चुदाई के इरादे ऐसे हमारे कमरे में आयी। हमेशा की तरह मेरा उसे चोदने का मन नहीं था। मानसी ने हमेशा की तरह चुदाई की जिद की और कपड़े उतार कर मेरे पास लेट गई”।
“उस रात मैंने मन बना लिया था कि अब ये बंद होना चाहिए। मैंने मानसी को चुदाई के लिए मना कर दिया। मानसी कुछ देर वैसे ही लेटी रही। जब मैं चुदाई की लिए नहीं उठा तो मानसी गुस्सा हो गयी और कुछ देर वहीं बेड की पास खड़ा रहने के बाद उसने अपने कपड़े उठाए और अपने कमरे में चली गयी”।
“उस वक़्त मुझे तुम्हारा वहां ना होना बहुत खल रहा था। मुझे तुम्हारी कमी महसूस हो रही थी। तब ऐसा लग रहा था कि अगर तुम घर पर ही होती तो शायद ये नौबत ही ना आती। मैं अपने आप को बहुत कमजोर सा समझ रहा था”।
“आधा घंटा हो गया। मुझे मानसी की फ़िक्र होने लगी, जवान लड़की है, गुस्से में कुछ गलत ही ना कर बैठे”।
“मैं मानसी को देखने उसके कमरे में गया तो देखा मानसी बिस्तर पर लेटी हुई है। मैं मानसी के पास बैठा, मगर मानसी ने मुझसे बात भी नहीं की। मैंने उसे कंधे से पकड़ा ही था, कि उसने मेरा हाथ झटक दिया”।
“मैं समझ गया कि मेरे उसे ना चोदने के कारण मानसी नाराज हो गयी थी। अब ऐसा तो था नहीं कि हममें पहले चुदाई ना हुई हो। आखिरकार मैंने मानसी को उसके ही कमरे में चोद दिया। बेमन से हुई ये चुदाई पांच सात मिनट ही चली, मगर इतना हुआ हम दोनों का पानी छूट गया और दोनों को मजा आ गया”।
“मानसी को चोदने के बाद मैं चुप-चाप उठा, और अपने कमरे में जा कर बिस्तर पर लेट गया। लेटा-लेटा मैं यही सोच रहा था कि क्या मानसी को चुदाई का चस्का लग चुका था, और अब वो चुदाई के बिना नहीं रह सकती”?
“मेरे दिमाग में ये बातें चल ही रही थी कि मानसी कमरे में आ गयी और आ कर बिस्तर के पास खड़ी हो गयी। मैं हैरान परेशान सा मानसी को देख रहा था। मानसी के जिस्म पर एक कपड़ा नहीं था। मानसी बिलकुल नंगी खड़ी थी”।
“साफ़ ही था कि मानसी दुबारा चुदाई करवाने आयी थी। शायद मानसी को पहली वाली बेमन की चुदाई में पूरा मजा नहीं आया था”।
“मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा था। मानसी बेड पर बैठ गई। मानसी ने मेरे पायजामे का नाड़ा खोला और मेरा लंड मुंह में लेकर चूसने लग गयी। मैं मानसी को हटाना चाहता था, मगर मुझे कुछ समय पहले वाली बातें याद आ गयी, जब मानसी नाराज हो कर अपने कमरे में चली गई थी”।
“मानसी बहुत जोर जोर से मेरा लंड चूस रही थी और हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। मेरा लंड मानसी की चुसाई से खड़ा और सख्त हो चुका था। मानसी मेरा लंड चूसती ही जा रही थी। शायद मानसी को इंतजार था कि मैं उसके मुंह में से लंड निकालूं और उसकी पहले जैसी रगड़ाई वाली चुदाई करूं”।
“रागिनी उस वक़्त मेरे सामने कोइ चारा नहीं था। अंत में मैंने मानसी का सर पीछे की तरफ किया। मानसी ने लंड मुंह से निकाला और बिस्तर पर लेट गयी। जब मैं मानसी को चोदने की लिए उठने लगा तो मानसी ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली, “पापा इस बार अच्छे से करना, जैसे पहली पहली बार किया था”।
“अच्छे से करना – जैसे पहली-पहली बार किया था”?
“मतलब मेरा सोचना ठीक ही था। मानसी को थोड़ी देर पहले हुई उस बेमन वाली चुदाई का पूरा मजा नहीं आया था। मैंने भी सोचा, जब चोदना ही है तो फिर जैसी चुदाई मानसी चाहती है, वैसी चुदाई की करता हूं”।
“फिर मैं भी उठा मगर इस बार मानसी के चूतड़ों के नीचे तकिया नहीं लगाया। पहली बार की चुदाई की तरह मैंने मानसी की टांगों के नीचे अपने बाजू डाले और ऊपर की तरफ होने लगा। मानसी की चूत ऊपर उठती चली गयी”।
“मानसी की चूत में लंड ऊपर-नीचे करते हुए जैसे ही लंड चूत के छेद पर अटका, मैंने एक झटके से लंड मानसी की चूत के अंदर डाल दिया और जोर-जोर से लम्बे-लम्बे धक्के लगाने लगा। बीच-बीच में मैं पूरा लंड बाहर निकाल कर झटके से अंदर डाल रहा था”।
“मानसी जोर-जोर से चूतड़ घुमाते हुई बोल रही थी, “आआआह पापा, हां पापा, ऐसे ही किया करो”।
“मुझे उस वक़्त लगा कि कहीं मानसी को मेरी लम्बे लंड से चुदाई की आदत तो नहीं पड़ गयी? अगर ऐसा था तो ये बहुत गलत था। मैंने उसी वक़्त सोच लिया था कि अब ये सब बंद हो जाना चाहिए। उस दिन की बाद से मैं यही सोचता रहता कि क्या किया जाए कि मानसी मुझे चुदाई की लिए कहे ही ना”।
“इसके बाद मानसी जब भी चुदाई के लिए मेरे पास आती मैं हर बार मानसी को चुदाई के लिए मना करता। हर बार उसे समझाता कि बाप बेटी के बीच ये रिश्ता सही नहीं है। एक दिन तो मैंने उसे यहां तक कह दिया कि अगर वो चाहे तो प्रभात से चुदाई करवा सकती है”।
“मगर पता नहीं मानसी के दिमाग में क्या था। मैं समझाता रहता और मानसी सुनती रहती। मेरे समझने पर हर बार मानसी यही कहती, “पापा आप ये सोचते ही क्यों हो की आप अपनी बेटी की चूत चोद रहे हो? आप बस इतना ही सोचो कि आप के सामने एक चूत है और आप उसे चोद रहे हो। किसकी चूत चोद रहे हो ये सोचो ही मत”।
ये बोल कर मानसी खुद ही अपने चूतड़ों के नीचे तकिया लगा लेती और अपनी टांगें उठा कर अपने हाथों से चूत खोल कर बिस्तर पर लेट जाती। मानसी की गुलाबी चूत देख कर आलोक का लंड फनफनाने लगता, और वो बेकाबू हो जाता। उसके सामने कोइ चारा नहीं रहता और चुदाई हो जाती।
अब आगे।
रागिनी डाक्टर मालिनी को बता रही थी, “मालिनी जी, आलोक की बातें सुन-सुन कर मुझे अपने पर ही शर्म और गुस्सा आने लगा। मैं आलोक और मानसी के बीच हो रही इस चुदाई के लिए अपने को ही जिम्मेदार मानने लगी”।
“मेरी बेटी मानसी अपने पापा के साथ इसलिए चुदाई करवा रही थी, क्योंकि उसके पापा को चुदाई के लिए चूत नहीं मिल रही थी। मैं, उसकी मां, उसके पापा, अपने पति अलोक के साथ चुदाई नहीं करती थी? मानसी को तो लग रहा था कि वो तो बस अपने पापा का ध्यान रख रही थी। मेरे लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती थी”।
“बाप बेटी की इस चुदाई में आलोक और मानसी के साथ-साथ मुझे अपना भी कुसूर लगने लगा”।
रागिनी बोलती जा रही थी।
“मालिनी जी आलोक की इन बातों से मेरा गुस्सा काफी हद तक खतम हो चुका था। मेरा दिमाग अब आगे की सोचने लगा”।
मैंने आलोक से पूछा, “आलोक तुम मानसी को चोद तो रहे ही हो, अब ये बताओ मानसी को चोदते वक़्त अपने लम्बे लौड़े पर कंडोम भी चढ़ाते हो या नहीं। या ऐसे ही चोद देते हो उसे बिना कंडोम के ही”।
“मलिनी जी मेरी हैरानी का तो कोइ अंत ही नहीं रहा जब आलोक बोला, “रागिनी, मानसी लंड पर कंडोम चढ़ाने ही नहीं देती”।
“ये मेरे लिए एक और नई बात थी। बीस साल की कालेज जाने वाली मानसी, और कंडोम के बिना चुदाई करवा रही थी? माना प्रभात के साथ उसकी बिना कंडोम के चुदाई हुई थी पर वो चुदाई तो अचानक हो गयी थी। आलोक के साथ तो मानसी की चुदाई तो पूरे होश में हो रही थी”।
मैंने आलोक से पूछा, “क्या मतलब है तुम्हारा आलोक? मानसी लंड पर कंडोम चढ़ाने नहीं देती? लंड पर कंडोम तुमने चढ़ाना है या मानसी ने चढ़ाना है”?
“आलोक ने मेरी इस बात का भी जवाब नहीं दिया”।
मुझे फिर से गुस्सा आ गया। मैंने बिफरते हुए आलोक से पूछा, “ये हो क्या रहा है आलोक? पहली बात तो ये कि तुम अपनी बेटी को ही चोद रहे हो। अब बोल रहे हो चुदाई से पहले लौड़े पर कंडोम भी नहीं चढ़ाते। सोचो अगर मानसी को भी बच्चा ठहर गया, जैसे मुझे ठहर गया था तो”?
“मालिनी जी अलोक तो कुछ बोल ही नहीं रहा था। मैंने ही पूछा, “पहली बात तो ये आलोक की मानसी की चुदाई करके ही तुम बहुत बड़ा गुनाह कर रहे हो, और ऊपर से ये कंडोम ना चढ़ाने वाला चक्कर? इतना बड़ा रिस्क ले रहे हो तुम आलोक। क्या मैं पूछ सकती हूं आलोक अपने बेटी को चोदते हुए लंड पर कंडोम चढ़ाने क्या परेशानी है?
मुझसे नजरें मिलाये बिना आलोक बोला, “रागिनी अब मैं क्या बताऊं। मेरी और मानसी की पहली चुदाई तो बिना कंडोम के ही हुई थी। उस चुदाई की बाद तो मैंने मानसी को i-pill ला दी थी। उसके बाद एक बार जब मानसी फिर कमरे में आयी तो मैंने किसी तरह लंड पर कंडोम चढ़ा लिया। मानसी को इस कंडोम चढ़ाने का पता नहीं चला”।
“चुदाई की बाद जब मानसी को और मुझे मजा आ गया तो मानसी ने पूछा, “पापा आज आपने लंड में से वो वाला गर्म-गर्म कुछ नहीं निकला। ऐसा क्यों हुआ पापा”?
“मैंने बता दिया कि मानसी आज की चुदाई कंडोम चढ़ा कर हुई है, जिससे मेरे लंड का पानी उसकी चूत में ना निकले और बच्चा ठहरने का खतरा ना रहे”।
“मानसी कुछ देर तो चुप-चाप लेटी रही फिर बोली, “पापा आगे से कंडोम मत चढ़ाना। आपके लंड का गर्म पानी मेरी चूत में ही निकलना चाहिए। जब चूत की अंदर गर्म-गर्म लगता है और चूत भर जाती है तब ज्यादा मजा आता है। और पापा फिर ‘वो’ वाला खतरा कैसा? आप i-pill ला दो, मैं चुदाई की बाद वो खा लिया करूंगी”।
“अब बताओ रागिनी, कंडोम चढ़ा कर कैसे चोदूं मानसी को। मेरी और मानसी की चुदाई में तो वैसे भी मर्जी मानसी की ही चलती है”।
रागिनी बता रही थी, “मालिनी मुझे तो एक के बाद एक हैरानी वाली बातें पता चल रही थी। पहले बाप बेटी की चुदाई, वो भी बेटी की पहल से। अब बिना कंडोम की चुदाई हो रही थी वो भी इसलिए क्योंकि बेटी को अपनी चूत में गर्म-गर्म कुछ लगना चाहिए और साथ ही उसकी चूत लंड की पानी से भर जानी चाहिए”।
“मालिनी जी उस वक़्त मैं तो बस यही सोच रही थी, “हद्द ही है ये मानसी ! इतना आगे चली गयी और मुझे, उसकी मां को, कुछ भी पता ही नहीं चला”?
आलोक सब कुछ बता कर चुप हो गया। मैंने आलोक से ही पूछा, “आलोक अब क्या करें। चाहे जैसे भी हो रहा है, हो तो ये गलत ही रहा है”।
आलोक बोला, “रागिनी सोचते हैं। कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ेगा। पहले तो मानसी को ही ये बात समझ आनी चहिये कि बाप बेटी में हो रही ये चुदाई का रिश्ता गलत है और अब ये चुदाई बंद होनी चाहिए”।
आलोक जैसे फिर अपने आप ही बोला, “रागिनी वैसे भी मेरी और मानसी की चुदाई होती जरूर है, मगर इस तरह की बातें हममें नहीं होती। यहां तक की चुदाई के दौरान जैसे सिसकारियां तुम लेती हो या जैसी मैं लेता हूं या जो कुछ हम बोलते हैं फाड़ दो चूत, रगड़ दो मेरी फुद्दी – ऐसा हमारी चुदाई में कुछ नहीं होता”।
“चुदाई के दौरान भी हम बाप बेटी ही रहते हैं और हमारे बीच हो रही चुदाई औरत मर्द की नहीं, बाप बेटी की चुदाई होती है। ज्यादा से ज्यादा मानसी यही बोलती है हां पापा ऐसे ही करो, आआह पापा, आह पापा, बस पापा हो गया, आआआह पापा निकल गया मेरा। मैं तो वो भी नहीं बोलता। यहां तक कि जब मेरे लंड का पानी निकलता है हुए मुझे मजा आता है, तब भी मैं चुप ही रहता हूं”।
“फिर आलोक बोला, “रागिनी मैं तो शुरू से ही इस चुदाई के रिश्ते के खिलाफ था। मुझे बस यही डर लगा रहता था कि मानसी कालेज जाने वाली बीस साल की जवान लड़की है। अगर कहीं उसकी बात ना मानी गयी तो कोई गलत फैसला ना ले बैठे”।
– रागिनी को हुआ अपनी गलती का एहसास I
“मुझे आलोक की बातें सुन कर महसूस होने लगा कि मैंने कितनी बड़ी गलती कर अलोक से चुदाई करवाने में लापरवाही करके”।
“आलोक चुप हो गया और मैं भी चुप-चाप लेट गयी”।
अलोक बोला, “रागिनी फ़िलहाल मेरी और मानसी की चुदाई के बारे में इतना सोचना बंद करो। मुझे मानसी की नहीं बस तुम्हारी चूत और गांड ही चाहिए। मानसी को भी अपनी उम्र के लड़के से ही चुदाई करवानी चाहिए। मानसी मुझसे चुदाई इसलिए करवाती है क्योंकि उसे लगता है मुझे चुदाई करवा के वो एक बेटी का फ़र्ज़ निभा रही है”।
आलोक बोल रहा था, “हम दोनों को ही इस बारे में संजीदगी से सोचना पड़ेगा कि कैसे मानसी मुझसे चुदाई करवाना बंद करे और अपने हम उम्र दोस्तों से चुदाई करवाए। रागिनी, बीस साल की लड़कियां आजकल चुदाई करवाती ही हैं”। ये कह कर अलोक ने पूरी उंगली मेरी चूत में डाल दी”।
“दो तीन बार उंगली मेरी चूत में अंदर-बाहर करने के बाद आलोक पलट कर मेरे ऊपर आ गया और उसने मेरे होंठ अपने होठों में ले लिए। मुझे अपनी बाहों में लेकर आलोक लंड मेरी चूत पर रगड़ने लगा”।
“वैसे तो मालिनी जी हममें जब भी चुदाई होती थी, हम एक से ज्यादा बार ही चुदाई करते थे। एक बार चुदाई करने के बाद हम अक्सर आधा घंटा रुक जाते और एक-दूसरे के साथ मस्ती करते रहते। फिर कुछ देर के बाद हममें एक चुदाई और हो जाती थी”।
“उस दिन भी हमारी एक चुदाई तो हो ही चुकी थी। मगर एक तरफ शराब का नशा दूसरे अपनी और मानसी की चुदाई की बातें बताते-बताते आलोक का लंड जल्दी ही खड़ा होने लगा था”।
“इतना कुछ सुनने के बाद और आलोक के मेरी चूत में उंगली डालने के बावजूद भी मेरा मन चुदाई का नहीं हो रहा था। मेरी चूत पानी भी नहीं छोड़ रही थी। मेरे दिमाग में बस यही बात चल रही थी, कि मेरी वजह से बाप बेटी में चुदाई का रिश्ता बन गया है और अब ये चुदाई बंद होनी चाहिए”।
“जब आलोक ने देखा कि मैं चुदाई में कोइ दिलचस्पी नहीं दिखा रही तो आलोक उठा और एक गिलास और उठा लाया, और दोनों गिलासों में बड़े-बड़े पेग बना दिए। एक गिलास मेरे हाथ में देकर आलोक बोला, “लो रागिनी आज तुम्हें भी इसकी जरूरत है”।
“मैं व्हिस्की पीती तो नहीं, मगर ऐसा भी नहीं की कभी पी ही ना हो”।
“मेरा अपने आप पर गुस्सा कम ही नहीं हो रहा था कि क्यों मैंने आलोक से चुदाई कम की और और अपनी चूत की आग ठंडी करने के लिए इधर-उधर मुंह मारती रही”।
“मैंने आलोक के हाथ से गिलास पकड़ा और दो घूंट में ही गिलास खाली कर दिया। बड़ा सा पैग पी कर मेरा दिमाग कुछ हल्का होने लगा। मैंने सोचा जो होना था वो तो हो चुका, अब उसे ठीक करने के जरूरत है”।
“मैंने खुद ही व्हिस्की की बोतल उठाई और एक बड़ा सा पैग बना लिया। दूसरा पेग भी मैंने दो घूंट में खाली कर दिया। दो बड़े-बड़े पैग अंदर जाते ही दिमाग से मानसी और आलोक की चुदाई हट गयी, और उसकी जगह मेरी और आलोक की चुदाई ने ले ली। मैंने मन ही मन सोचा आज आलोक से ऐसे चुदाई करवाऊंगी आलोक याद रखेगा”।
– रागिनी ने चुदाई करवाई शराब पी कर।
गिलास में तीसरा बड़ा पेग डालते हुए मैंने आलोक को कहा, “चलो अलोक आज चुदाई का तुम्हें ऐसा मजा दूंगी कि तुम सारी चुदाईयां भूल जाओगे”।
“ये सुनते ही आलोक का लंड तन गया। मैंने मन ही मन सोच लिया आज आलोक का लम्बा लंड गांड में भी लूंगी। बहुत अरसा हो गया था अलोक का लंड गांड में नहीं डलवाया”।
फिर मेरे दिमाग में आया, “गांड क्या मैंने तो अलोक का लंड ढंग से चूत में भी नहीं डलवाया”।
“अलोक ने भी अपना गिलास भी खाली किया और एक बड़ा सा पैग बना कर दो घूंट में ही गिलास खाली कर दिया”।
“बड़े-बड़े पैग लगाने के बाद नशा हमारे सर पर चढ़ गया और हम दोनों ही चुदाई के लिए बेकरार हो गए”।
आलोक नशे में बोला, “रागिनी लेट जा और वो तकिया रख अपनी गांड के नीचे और चूत ऊपर उठा। तेरी चूत चूसूं और ये लम्बा लंड डालूं तेरी चूत में। साली चुदवाती भी नहीं। मेरा लंड प्यासा ही रह जाता है। रागिनी तेरा मन नहीं करता साली चुदाई करवाने का? क्या चक्कर है”?
“नशा मुझे हो ही चुका था। मैंने भी तकिया अपनी गांड के नीचे रख के अपनी चूत उठा दी और बोली, ” आजा आलोक चढ़ जा मेरे ऊपर। डाल मेरी चूत में लंड और चोद मुझे। फाड़ दे मेरी चूत आज। जैसे चोदना है चोद आज। कर ले हर हसरत पूरी चुदाई की। अब रोज चोदना मुझे मेरे राजा। आजा रगड़ मेरी चूत। झाग निकाल दे इसकी। निकाल दे इसकी अकड़ साली इस चूत की। तेरे लंड का ध्यान नहीं रखती ये मेरी मादरचोद फुद्दी”।
“व्हिस्की के सरूर में आये आलोक ने लंड मेरी चूत के छेद पर रखा एक झटके से लंड मेरी चूत में पूरा अंदर तक बिठा दिया, और चुदाई चालू कर दी”।
“चुदाई का जूनून और शराब का नशा – मेरी चूत ने सच में ही झाग छोड़ दी। आलोक के हर धक्के के साथ खच्च फच्च खच्च फच्च की आवाज आ रही थी। मेरी चूत में से पानी निकल कर मेरी जांघों पर भी फ़ैल गया था। खच्च फच्च के साथ अब ठप्प ठप्प की आवाजें भी आ रही थीं”।
आलोक बोले जा रहा था, “ले रागिनी आज फाड़ ही दूंगा तेरी चूत। निकाल दूंगा अकड़ इस मादरचोद फुद्दी की। साली तेरी ये चूत? मेरे लंड से दूर भागती है? भाग कर जाएगी कहां? आज चोद-चोद कर फुला दूंगा तेरी ये फुद्दी”।
“आलोक पागलों की तरह चोद रहा था मुझे और मेरी छूट फर्रर्र फर्रर्र पानी छोड़ रही थी। तभी मुझे मजा आने वाला हो गया”।
मैं बोली , “आह आलोक मेरी चूत पानी छोड़ने वाली है, लगा दबा कर धक्के, रंडी की तरह चोद आज मुझे, कुतिया की तरह चोद, फाड़ डाल मेरी फुद्दी, फाड़ मेरी, फाड़ दे, आआह आआह। और मेरी चूत पानी छोड़ गयी”।
आलोक का भी निकलने लगा। आलोक जोर-जोर से कुछ बोल रहा था, ” ले, ले निकला मेरा, मेरी जान, आज आया चुदाई का असली मजा। कहां थी तू इतने दिन मेरी जान? मेरी चुदक्कड़ रागिनी, ले भर दी तेरी चूत ले आआह आआआह निकल गया तेरी फुद्दी में”।
“और इसके साथ ही आलोक के लंड का गर्म-गर्म पानी मेरी चूत में निकला गया। आलोक ने लंड मेरी चूत में से निकला, और मेरे ऊपर ही लेट गया”।
“दो मिनट बाद आलोक ने पलटी ली और मेरी बगल में आ कर लेट गया और बोला, “मजा आ गया आज तो”।
“मजा तो मुझे भी बहुत आया था। मेरी तो चूत भी आलोक के गर्म पानी से भरी पडी थी। मैंने आलोक का लंड पकड़ लिया। लंड आलोक के और मेरी चूत के पानी से चिप-चिप कर रहा था। मुझे इस चिपचिपाहट में भी मजा आ रहा था”।
मैं आलोक के लंड को दबाती जा रही थी और बीच-बीच में आगे-पीछे भी कर रही थी। जल्दी ही अलोक का लंड फिर खड़ा होने लग गया। आलोक ने मेरे ऊपर आ कर मेरी होठ अपने होठों में ले लिए, और चूसने लगा। लगातार की होठ चुसाई ने मेरी चूत फिर तैयार कर दी।
मैंने आलोक से पूछा, “ये क्या आलोक? तुम्हारा लंड तो फिर से खड़ा हो गया है। अब क्या करना है”?
– रागिनी की गांड चुदाई
आलोक बोला, “अब तेरी गांड फाड़ने की बारी है रागिनी। सालों साल हो गए तेरी गांड चोदे। आज सूखी ही रगडूंगा – सुजा दूंगा तेरी गांड का छेद”। ये बोलते-बोलते अलोक का लंड एक-दम सख्त हो गया।
आलोक बोला, “आजा हो जा उल्टी तेरी गांड चोदूं, फाड़ूं तेरी गांड, भुर्ता बनाऊं आज तेरी गांड का”।
“उस दिन गांड चुदवाने का तो मेरा भी मन था। जैसे ही आलोक ने गांड चुदाई की बात की, मैं बेड के किनारे पर उलटा लेट गयी – घुटनों और कुहनियों के बल। मेरी चूत तो आलोक के लेसदार पानी से भरी ही पडी थी। मैंने नीचे हाथ करके चूत में बाहर की तरफ जोर लगाया। ढेर सारा लेसदार पानी मेरी हथेली पर आ गया। मैंने हाथ पीछे करके, सारा पानी अपनी गांड के छेद पर लगा दिया”।
“आलोक पीछे ही खड़ा। आलोक ने वो लेसदार पानी और अच्छी तरह गांड के छेद पर मला, थोड़ा थूक छेद पर डाला और लंड छेद पर रख के एक झटके से गांड के अंदर डाल दिया”।
“मेरी चूत के पानी और आलोक के थूक से भी मेरी गांड का छेद ज्यादा चिकना नहीं हुआ था। लगभग सूखी गांड में जैसे ही आलोक का लंड झटके के साथ अंदर गया तो दर्द के मारे मेरी चीख ही निकल गयी। मैंने कहा, ” ये क्या कर रहे हो अलोक, सच में ही गांड फाड़ोगे क्या”?
आलोक बोला, ” हां रागिनी आज सच में फाड़ूंगा तेरी। बदला लूंगा तुझसे इतने दिन मुझसे दूर रहने का – सालों से गांड ना चुदवाने का, ये ले, और ले”।
“इतना कहता ही आलोक ने मेरी गांड चोदनी शुरू कर दी। जल्दी ही मेरी गांड का छेद अलोक के लंड के हिसाब से खुल गया और मुझे चुदाई का मजा आने लगा। उधर मैंने अपनी चूत का दाना रगड़ना शुरू कर दिया”।
“आलोक जिस स्पीड से अपना लंड मेरी गांड के अंदर-बाहर कर रहा था, उतनी ही स्पीड से जोर-जोर से मैं अपने चूत का दाना रगड़ रही थी। मुझे चूत रगड़ने का इतना मजा आ रहा था कि मैं बता नहीं सकती”।
“मालिनी जी सच पूछो तो गांड चुदाई तो बस एक फितूर सा है। आदमी के लिए भी और औरत के लिए भी। चुदाई तो असली चूत की ही होती है”।
