एक फैमिली ऐसी भी

माँ की चुदाई

ये कहानी केवल शुद्ध मनोरंजन के लिए लिखी गयी है, वास्तविकता से इसका कोइ लेना-देना नहीं है।

भूमिका:- दो शब्द मेरे परिवार के बारे में।

हां तो पाठको, मैं हूं इस कहानी का नायक धीरज राठी, इक्कीस साल का, खासम-खास हरियाणा का रहने वाला।

हमारा परिवार हरियाणा के शहर करनाल का रहने वाला है। करनाल में हमारा पुश्तैनी मकान हुआ करता था जो अब भी है। मगर अब उसमें कोइ रहता नहीं है।

मेरे दादा नफे सिंह राठी हरियाणा पुलिस में सीनियर सुपरिंटेंडेंट पुलिस थे। पुलिस में सीनियर सुपरिंडेंटेंड पुलिस और उसकी धाक ना हो? मेरे दादा जी की भी इलाके में पूरी धाक थी।

उनकी पोस्टिंग हरियाणा के अलग-अलग शहरों में होती रहती थी। मेरे दादा जी को हरियाणा के सब शहरों में से गुड़गांव सब से ज्यादा पसंद था। शायद इसलिए कि एक तो ये दिल्ली की नज़दीक है और गुडगाँव के आस-पास साठ सत्तर के दशक से ही डेवेलपमेंट बहुत तेज़ी से होना शुरू हो गया था।

अब पुलिस में इतने सीनियर अफसर को किसी भी चीज़ कमी तो होती नहीं। दादा जी को भी कोइ कमी नहीं थी। सो दादा जी ने पुराने गुडगाँव शहर में सेक्टर ग्यारह में तीन सौ गज़ में बना हुआ एक पुराना मकान खरीद लिया जो बड़ी ही जर्जर हालत में था। दादा जी ने इस मकान को तुड़वा कर नया दुमंजिला मकान सब सुविधाओं से लैस आज के डिज़ाइन के हिसाब से बनवाया।

जब मैं अभी छोटा ही था, तो हम सब करनाल से गुडगाँव के इस मकान में शिफ्ट हो गए। मेरे दादा जी का देहांत 2021 में हो गया। दादी जी पहले ही गुज़र चुकी थी।

मेरे पिता यशपाल राठी गुडगाँव हरयाणा में डिस्ट्रिक्ट ब्लॉक डेवलपमेंट अफसर हैं – जिला विकास अधिकारी। ये नौकरी भी उनको दादा जी की बदौलत ही हासिल हुई थी। पापा की इस जॉब में तबादला होता रहता है, मगर उनकी पोस्टिंग अक्सर गुडगाँव के आस-पास ही रहा करती है, इसलिए हम – मैं, मेरी बहन दिव्या और मेरी मम्मी यहां ही, गुडगाँव के इसी घर में रहते रहे हैं।

मम्मी भी गुडगाँव के सरकारी स्कूल में टीचर थी और कुछ साल पहले उन्होंने रिटायरमेंट ले ली। पापा यशपाल राठी अड़तालीस साल के हैं, लम्बे-चौड़े तंदरुस्त हैं मगर अब शरीर से थोड़े भारी शरीर हो गए हैं। भारी शरीर के कारण वो अपनी उम्र से ज्यादा के दिखाई देते हैं।

मेरी मम्मी सुधा राठी चवालीस की है। शरीर स्लिम और कसा हुआ है। देखने में सुन्दर आकर्षक है इसलिए लगती अड़तीस चालीस से कम ही है। अगर चाहे तो अब भी चोदने वालों की भीड़ इक्क्ठा कर सकती है। मगर संस्कारी है इसलिए इस चुदाई-वुदाई के चक्करों में नहीं है।

गुडगाँव वाले हमारे इस घर में नीचे की मंजिल में तीन कमरे हैं। दो कमरे बैडरूम की तरह इस्तेमाल होते हैं हुए एक कमरा ड्राइंग रूम के तरह इस्तेमाल होता है। इसी तरह ऊपर के मंजिल में भी तीन कमरे हैं, दो बेडरूम और बड़ा सा खुला कमरा है जिसमें किचन और डाइनिंग हाल इकट्ठे हैं।

पहले नीचे एक कमरे में मैं और दूसरे कमरे में मेरी छोटी बहन दिव्या सोया करते थे। मेरे मम्मी पापा शुरू से ही ऊपर के कमरे में रहते रहे हैं। पहले ऊपर एक कमरा खाली रहता था।

चार-पांच साल पहले जब मैं सोलह सत्रह साल का हुआ तो मम्मी पापा ने फैसला किया कि अब दिव्या को नीचे नहीं रहना चाहिए और मम्मी-पापा के साथ अब ऊपर उनके बगल वाले कमरे में रहना चाहिए।
कारण साफ़ ही था, मैं जवान हो रहा था। लंड के आस-पास छोटे-छोटे बाल उगने लगे थे। और उधर दिव्या भी जवान हो रही थी।

दिव्या के मम्मे और चूतड़ उभरने लगे थे। दिव्या का शरीर भरने लगा था। दिव्या घंटो शीशे के सामने खड़ी अपने आप को देखती रहती थी। अगर मेरी झांटे उगने लगी थी तो पक्की बात है दिव्या की भी फुद्दी के आस-पास नरम-नरम रेशमी बाल आने लग ही गए होंगे।

मजे के लिए लंड की मुट्ठ मारनी तो मैं दो साल पहले ही शुरू कर चुका था, अब मजे के लिए दिव्या भी कुछ ना कुछ करती ही होगी। अब क्या करती होगी, ये मुझे पता नहीं।

वैसे सभी जवान होती हुई लड़कियां मजे के लिए कुछ ना कुछ तो करती ही हैं।
मम्मी-पापा को लगा होगा कहीं ऐसा ना हो नई-नई आती जवानी के जोश में मैं किसी दिन अपनी बहन दिव्या को ही चोद दूं, या फिर दिव्या ही बहक कर मुझसे चुदाई ना करवा ले।

घरों में अक्सर इस तरह के रिश्ते बन जाते हैं, ये कोइ बड़ी बात भी नहीं है। मगर दिव्या ने ऊपर के कमरे में जाने से साफ़ मना कर दिया। कारण?

एक तो दिव्या को तेज़ आवाज में म्यूजिक – गाने – सुनने की शौक़ीन थी। दूसरे दिल्ली से हमारी मौसी की बेटी माधवी जब भी उनके यहां आती थी तब दिव्या और माधवी, दोनों मिल खूब धमा-चौकड़ी करती थी। दिव्या को लगा होगा अगर वो ऊपर शिफ्ट हो गयी तो उसका “ये” शोर शराबा नहीं हो पायेगा। लिहाजा उसने ऊपर के कमरे में शिफ्ट होने से मना कर दिया और ऊपर मैं शिफ्ट हो गया।

मेरे लिए ये कोई बड़ा इश्यू – मुद्दा – नहीं था। रात को सोना ही तो होता है, क्या ऊपर क्या नीचे।

ये तो थी भूमिका, अब आगे चलते हैं – “एक फैमिली ऐसी भी” की असली कहानी की तरफ।

तो दोस्तों अब मैं इक्कीस साल का हो चुका हूं और बाईसवें में चल रहा हूं – दिव्या उन्नीस पूरे कर चुकी है, और भरपूर जवानी की दहलीज़ पर खड़ी है।

मैं गुडगाँव के सरकारी इंजीनियरिंग कालेज से इंजीनरिंग की डिग्री कर रहा हूं और इस डिग्री के तीसरे साल में हूं। मेरी ये ये डिग्री का कोर्स अगले साल जुलाई में खत्म हो जाएगा।

दिव्या कालेज जाती है और बी.ए. के आख़री साल में है। दिव्या खूबसूरत है – जवान तो वो है ही। खुले दिमाग की भी है – इंग्लिश में अगर कहा जाए तो “बोल्ड एंड ब्यूटीफुल।”

मेरी एक मौसी है – कौशल्या – मेरी मम्मी से दो साल छोटी जो दिल्ली रोहिणी सेक्टर 32 में रहती है। कौशल्या मौसी का लम्बा चौड़ा दुमंजिला बड़ा सा घर है – ऊपर-नीचे मिला कर सात आठ कमरे हैं।

मौसी कालेज की पढ़ी लिखी है मगर घर पर ही रहती है – शुरू से ही नौकरी नहीं की। मेरे मौसा मनोहर लाल सांगवान को मौसी की नौकरी करना पसंद नहीं था। मौसी भी मम्मी की तरह खूबसूरत और सेक्सी है – ख़ूबसूरती में अगर कहा जाए तो मम्मी से कुछ इक्कीस ही होगी, उन्नीस तो नहीं है।

मौसा जी – मनोहर लाल सांगवान पुश्तैनी अमीर हैं। बवाना में उनके दो इंडस्ट्रियल शेड हैं पांच-पांच सौ गज के – जिनमें एक में उनकी फैक्ट्री है, जहां ऑटोमोबाइल पार्ट्स – ट्रकों और कारों कि कल पुर्जे बनते हैं।

मौसा जी की फैक्ट्री बहुत बढ़िया चल रही है – टॉप क्लास।

फैक्ट्री का सारा काम कैश पर होता है। साउथ के डीलर ट्रक और कारों के पार्ट्स आकर ले जाते हैं बिना पैकिंग करवाए – और फिर जिस तरह की मार्किट हो, जिस कम्पनी का मॉल ज्यादा बिकता हो, उसका ठप्पा लगा कर उसी कम्पनी की पैकिंग बना कर माल सप्लाई करते हैं।

हमारे देश में बिज़नेस ऐसे ही होते हैं।
दूसरा शेड खाली है और फ़िलहाल गोदाम की तरह इस्तेमाल होता हैं।

मौसा जी के परिवार और हमारे परिवार का अच्छा तालमेल है। मौसी और मौसा जी को छोड़ सब एक-दूसरे को नाम से ही बुलाते है। मम्मी पापा को यश बुलाती हैं, मौसी मौसा जी को मनु बोलती है। पापा मौसी को नाम से बुलाते है – कौशल्या, और मौसा जी और मौसी मम्मी को जीजी कह कर बुलाते हैं। उधर मम्मी मौसा जी को नाम से यानि मनोहर या मनु बुलाती है और मौसी मेरे पापा को जीजा जी। पापा और मौसा जी एक-दूसरे का नाम से ही बुलाते हैं – यश, मनोहर।

मौसा मनोहर, पापा यश को कई बार कह चुके हैं कि जब धीरज की डिग्री और ट्रेनिंग पूरी हो जाएगी तो उनके बवाना वाले खाली शेड में धीरज को फैक्ट्री लगा देंगे। आज कल CNC मशीनों का जमाना है। मौसा जी कहते हैं, ताइवान से मशीनें आ जाएंगी और ऑटोमोबाइल पार्ट्स का चला चलाया बिज़नेस तो है ही, उसी को धीरज आगे बढ़ाये और मौज करे।

अब तक मेरे पापा यश ने “हां” नहीं की – शायद कोइ हिचकिचाहट है।

एक दिन दोनों परिवार – मम्मी-पापा और मौसा-मौसी – इकट्ठे बैठे थे तो मौसा जी ने फिर से बात छेड़ दी।

मौसा मनोहर ने पापा से कहा, “यश देखो, माधवी मेरी इकलौती बेटी है। बहुत पैसा जायदाद है मेरे पास, जिंदगी भर खत्म नहीं होने वाला। मुझे इतनी कमाई किसके लिए करनी है? मैं चाहता हूँ धीरज बवाना के मेरे दूसरे वाले पांच सौ गज के शेड में ही फैक्ट्री लगा ले। फिर भी अगर धीरज को बवाना में बिजनेस करवाने में तुम्हें अगर कोइ हिचकिचाहट है कि धीरज मेरे शेड में मशीनें लगा रहा है तो मैं दूसरा वाला शेड धीरज के नाम “गिफ्ट” ही कर दूंगा – धीरज के नाम ही कर दूंगा।”

“धीरज अपना काम चलाये बढ़िया सुपरवाइजर रखे और मेरी वाली फैक्ट्री का भी काम देखे। और फिर यश तुमने भी तो रिटायर होना है, तुम ही कब तक काम करते रहोगे, और क्या रिटायर होने के बाद घर बैठोगे? चलता-फिरता आदमी हमेशा फिट और ठीक रहता है? रिटायर होने के बाद फैक्ट्री आओ और धीरज की हेल्प करो, मैं भी आ जाया करूंगा। मैं और तुम बैठ फैक्ट्री में बैठ कर गप्पें हांका करेंगे।”

मौसा मनोहर बोले, “यश, मैंने कौशल्या से बात की है, उसे इसमें कोइ एतराज नहीं है।”

फिर मनोहर मौसा जी मम्मी की तरफ देखते हुए बोले, “जीजी आप बताइये आपको जमता है आईडिया?”

मम्मी बोली, “भाई एक ही परिवार का मामला है, मुझे तो इसमें कोई बुराई नहीं लगती।” फिर मम्मी पापा की तरफ इशारा करके बोली, “फिर भी इनसे पूछ लो।”

पापा ने कहा, “मनोहर अभी तो एक साल पूरा पड़ा है – पहले डिग्री पूरी होगी, फिर ट्रैनिंग होगी, फिर फैसला करेंगे।”

मौसा जी पापा से बोले, “यार यश मुझे मालूम है तुम अभी भी हिचकिचा रहे हो – अब इसमें इतना भी क्या सोचना है। और मुझे मालूम है तुमने गुड़गांव में भी डेढ़ कनाल – एक हजार गज – का इंडस्ट्रियल प्लॉट ले रखा है। मेरे भाई, उसमे भी लगाने दो धीरज को फैक्ट्री।आजकल पढ़े-लिखे मैनेजर, सुपरवाइजर मिल जाते हैं, बस अच्छी सैलरी दो और सब काम ठीक चलता है।”

खैर पाठको मेरे परिवार का ये किस्सा अभी तो मैंने वैसे ही सुना दिया, लेकिन इस किस्से का इस कहानी के साथ बाद में बड़ा ज़बरदस्त लिंक बनने वाला है।

मौसा-मौसी की एक ही बेटी है – माधवी – लगभग दिव्या की उम्र की ही या फिर छह आठ महीने छोटी। दिव्या के साथ माधवी की खूब पटरी खाती है। छुट्टियों में या तो वो हमारे यहां आ जाती है या फिर दिव्या वहां माधवी के घर चली रोहिणी जाती है।
मगर दिव्या ने दिल्ली मौसा के यहां जाना हो या माधवी ने धीरज यहां आना हो, ये लाने ले जाने वाला काम हमारा होता है। हम सब शुक्रवार को रोहिणी चले जाते है और सोमवार सुबह वापस आते है।

मम्मी पापा जब भी मौसा जी के यहां जाते हैं, दो तीन रात रुक कर ही आते हैं। मौसा के घर कमरे बहुत हैं। मम्मी पापा, मौसा-मौसी के साथ वाले कमरे में ठहरते हैं, बाकी हम लोग यानी, मैं, दिव्या, माधवी जिस भी कमरे में रुकना चाहे रुक जाते हैं। वैसे दिव्या और माधवी हमेशा एक ही कमरे में ठहरती हैं – चाहे रोहिणी वाला मौसा जी का घर हो या गुडगाँव वाला हमारा घर हो।

मौसा जी के साऊथ इंडिया के ट्रिप काफी लगते रहते हैं – वहीं उनका माल सब से ज्यादा बिकता है।

अब चलते हैं वापस गुडगाँव।

गुडगाँव के अपने इस इंजीयरिंग कालेज में में अच्छा खासा पॉपुलर हूं, लेकिन मेरे इस पॉपुलर होने का कारण बड़ा ही अजीब है।
हुआ यूं कि जब मैंने यहां एडमिशन लिया तो हॉस्टल में पहली ही रात को रैगिंग के दौरान कालेज के सीनियर स्टूडेंट नए दाखिल हुए लड़कों को पकड़ कर कालेज की कैंटीन में ले गए और एक लाइन में खड़ा करके कहा, “बच्चो, चलो अपनी अपनी पैंटें, पायजामे, कच्छे उतारो और दिखाओ तुममें से कोइ हिजड़ा तो नहीं है – सब मर्द ही हैं ना। ये कालेज या तो मर्दों के लिए है या नाज़ुक-नाज़ुक लड़कियों के लिए, हिजड़ों को इस कालेज में एडमिशन नहीं मिलती। चलो भोसड़ी वालो जल्दी उतारो अपनी अपनी पेंटें।”

जब मैंने यहां एडमिशन लिया तो हॉस्टल में पहली ही रात को रैगिंग के दौरान कालेज के सीनियर स्टूडेंट नए दाखिल हुए लड़कों को पकड़ कर कालेज की कैंटीन में ले गए और बोले, “बच्चो, चलो अपनी अपनी पैंटें, पायजामे, कच्छे उतारो और दिखाओ तुममें से कोइ हिजड़ा तो नहीं है – सब मर्द ही हैं ना। ये कालेज तो मर्दों के लिए है। हिजड़ों को इस कालेज में एडमिशन नहीं मिलती। चलो भोसड़ी वालो, जल्दी उतारो अपनी अपनी पेंटें।”

अब सब कालेजों में रैगिंग तो चलती ही है। इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेज में ये कुछ ज्यादा ही चलती है। सीनियर हुक्म देते हैं और नए-नए लड़के-लड़कियों को उन हुक्मों का पालन करना होता है आँखें बंद करके। ये गाली गलौच – “मादरचोद भोसड़ी वालो”, ये आम बातें हैं। रैगिंग करते हुए सीनियर ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल करते है।

अगर रैगिंग वाले दिन सीनियर का कहा ना माना जाए तो पिटाई भी हो जाती है, और सुनने में तो ये भी आया कि गांड चुदाई भी हो जाती है। मगर अब ऐसा नहीं होता। क्योंकि‌ सरकार की तरफ से सख्ती हो गयी है।

तब भी… सीनियर का डर तो रहता ही है।
सो सब लड़कों ने देर और नहीं अपनी पैंटें, पायजामे और अंडरवियर सब उतार दिए।
जब सीनियर लड़के सब का मजाक बनाते हुए कुछ-कुछ बोल रहे थे, तो मेरे सामने आ कर एक लड़का, महेंद्र नाम था उसका, मेरे लंड को देखते हुए बोला, “अबे भोसड़ी के, ये क्या है बे?”

असल में बात ये है कि मेरा लंड 3XL साइज़ का है। बैठा हुआ पांच इंच का और खड़ा आठ इंच का और ढाई इंच मोटा। महेंद्र ने सब को आवाज़ लगाई, “रामबीर, महेश, भूदेव, अशोक, अबे भोसड़ी के भाटिये इधर आओ, ये देखो ये क्या है यहां, इस मादरचोद के पास?”

सारे लड़के मेरे सामने आ गए। मेरे लंड को देखते हुए एक सीनियर बोला, “अबे नाम क्या है साले तेरा और ये क्या है बे? भैंस बांधने का खूंटा?”

मैने धीरे से कहा, “जी धीरज राठी।”

दूसरा बोला, “अबे भोसड़ी वाले, नाम पूछा था तेरी कास्ट नहीं। फिर मेरे लंड की तरफ इशारा करते हुए एक लड़का बोला, “धोबनों का कपड़े पीटने वाला डंडा है क्या ये?”

तीसरा बोला, “अबे बेटीचोद धीरज, किसी लड़की की चूत में डाला है क्या इसे अब तक या नीचे से अपनी ही गांड में लेता है इसे?”

सब सीनियर लड़के मेरे लम्बे लंड का मजाक बना रहे थे। लेकिन इसका फायदा ये हुआ कि उस रात के बाद मेरी की रैगिंग नहीं हुई और सब सीनियर लड़कों के साथ मेरी दोस्ती हो गयी, महेंद्र से तो खास कर के।

काम वाली सुमन की चुदाई-

एक दिन महेंद्र मेरे पास आया और बोला, “धीरज, अबे किसी लड़की की चूत चोदी है?”

ईमानदारी की बात तो ये कि मैंने तीन बार ही लड़कियों की चुदाई की थी, जब वो कालेज में था, तीनों बार हरियाणा के होटलों में जा कर। कभी होटल में, कभी फ़रीदाबाद और कभी सोहना में। वो भी अपने इस लम्बे मोटे लंड और एक रईस दोस्त की बदौलत। तीनों बार पैसे उस दोस्त ने ही खर्च किये थे। तीनों बार लड़कियां अलग-अलग थी और बला की खूबसूरत थी और पढ़ी-लिखी फैशनेबल भी। मेरा लंड देखते ही उछलने लगती थी, और हट-हट – मतलब चूतड़ घुमा-घुमा कर, झटका-झटका कर फुद्दी मरवाती – मतलब चुदवाती थी।

अब तक मैं खुद से एक भी लड़की पटा नहीं पाया था। कारण ये था कि गुडगाँव में हमेशा मैं उसी स्कूल में पढ़ा जहां उसकी मम्मी पढ़ाती थी, उसके बाद कालेज और फिर मैं सीधा यहां आ गया।

मैंने ने जवाब दिया, “हां चोदी है, तीन बार।”

महेंद्र मुझसे बोला, “अब यहां चोदेगा?”
अब भला लड़की चोदने से कौन मना करेगा? मैंने कहा, “हां चोदूंगा, कौन है लड़की?”

महेंद्र बोला, “ये छोड़ कौन है। बढ़िया लड़की है बीस इक्कीस साल की। मस्त चुदवाती है, चूतड़ झटका-झटका कर। कल दोपहर बाद तैयार रहना, चलेंगे।”

अगले दिन आख़िर का पीरियड मिस करके मैं महेंद्र के साथ हो लिया। महेंद्र के पास बुलेट मोटर बाइक है। महेंद्र मुझे जहां ले कर गया वो उसका ही घर था।

उस वक़्त महेंद्र के घर कोइ नहीं था। महेंद्र के मम्मी-डैडी किसी शादी में गए हुए थे। ताला खोल हम लोग घर अंदर चले गए और ड्राईंग रूम में बैठ गए।

मैंने महेंद्र से पूछा, “महेंद्र ये तो तेरा घर है, यहां आएगी लड़की? यहां कैसे आ जाएगी?”

महेंद्र अपनी घड़ी की तरफ देखते हुए बोला, “हां मेरा घर ही है, यहीं आएगी लड़की। अभी पंद्रह-बीस मिनट में आ जाएगी।”

मैंने महेंद्र से पूछा, “भाई अब तो बता दे है कौन, और तेरे घर में कैसे आ जाएगी?”

महेंद्र बोला, “हमारी मेड है – काम वाली। सुमन नाम है – बाहरवीं पास है, मेड है मगर लगती नहीं मेड है। गोरी चिट्टी है, चुदाई बढ़िया करवाती है। मेरे साथ फंसी हुई है। जब भी मौक़ा मिलता है महीने दो महीने में हमारी चुदाई हो जाती है। पिछले एक साल से चोद रहा हूं उसे। चुदाई करवाते हुए खूब चूतड़ घुमाती है।”

फिर महेंद्र बोला, “बात ये है धीरज, एक दिन चुदाई के दौरान ऐसे ही बातों-बातों मैंने तेरे लम्बे मोटे लंड का ज़िकर कर दिया, बस तब से मेरे पीछे पड़ी है कि उसे भी एक बार तेरा लंड लेना है अपनी चूत में। मैंने भी सोचा, ठीक है मेरा क्या जाता है। अब पांच दिनों के लिए घर खाली है मम्मी-पापा किसी शादी में गए हुए हैं। अगर मौक़ा लग गया तो इन तीन चार दिनों में बढ़िया चुदाई हो जाएगी। इसलिए मैं तुझे भी ले आया हूं।”

तभी दरवाजे के घंटी बजी। महेंद्र ने दरवाजा खोला और सुमन अंदर आ गयी। सुमन सच में ही मेड तो नहीं लगती थी। जैसा महेंद्र ने बताया था, गोरी-चिट्टी थी, साफ़ सुथरी। अच्छे कपड़े पहने हुए थे।
अंदर आते ही महेंद्र ने दरवाजा बंद किया और सुमन के मम्मे दबाने लगा। सुमन ने भी कोइ ऐतराज नहीं किया और हंसती रही। फिर महेंद्र सुमन से बोला, “सुमन ये है धीरज। इसकी बात की थी मैंने तुमसे। इसका लंड ही है – अपने हाथ से बताता हुआ महिंदर बोला, “इतना लम्बा।”

सुमन मेरी तरफ देखती हुई बोली, “नमस्ते धीरज।”

सुमन और महेंद्र सोफे पर बैठ गए और एक-दूसरे के साथ मस्तियां करने लगे। तभी महेंद्र ने पैंट से लंड निकाल कर सुमन के हाथ में पकड़ा दिया। सुमन कुछ देर ऐसे ही महेंद्र का लंड दबाती रही। फिर झुक कर लंड मुंह में ले लिया और चूसने लगी।
थोड़ा चूसने के बाद सुमन उठी और मेरी तरफ इशारा करते हुए महेंद्र से बोली, “इनको भी बोलो लंड पैंट से बाहर निकालें।

महेंद्र मुझसे बोला, “धीरज निकाल के दिखा भाई अपना लौड़ा सुमन को। मैंने तो बड़े गीत गाये हैं तेरे लौड़े की तारीफ़ में।”

मैं खड़ा हुआ और पैंट की ज़िप खोल कर अपना लंड बाहर निकाल लिया। लंड खड़ा तो था लेकिन अभी सख्त नहीं हुआ था। वैसे भी मेरा लंड लम्बा और मोटा होने के कारण खड़ा होने के बाद भी थोड़ा नीचे की तरफ ही रहता है।

मेरे लंड के लिए सब बोलते हैं भारी लंड है इसका। आगे से कम मोटा, मगर पीछे से कुछ ज्यादा ही मोटा है। खड़ा होते ही लंड के टोपे से स्किन अपने आप ही पीछे की तरफ सरक जाती है और गुलाबी टोपा बाहर निकल आता है।

सुमन तो मेरा खड़ा लंड देख कर ही मस्त हो गयी और महेंद्र से बोली, “महेंद्र ठीक ही कहा था तुमने, इनका लंड में तो सच में ही बहुत बड़ा है।” ये बोल कर सुमन मेरे सामने आ गयी और नीचे बैठ कर मेरा लंड मुंह में ले कर चूसने लगी।

थोड़ा चूसने के बाद सुमन महेंद्र से बोली, “महेंद्र चलें?”

महेंद्र बोला, “चलो।”

और फिर महेंद्र मेरी तरफ देखता हुआ बोला, “आजा भाई धीरज, चल अंदर और डाल अपना ये भैंस बांधने का खूंटा सुमन की फुद्दी में।”

“भैस बांधने का खूंटा” ये दोहराते हुए सुमन हंस पड़ी।

हम तीनों अंदर महेंद्र के कमरे में आ गए। अंदर आ कर महेंद्र ने अपने कपड़े उतार दिए और सुमन की सलवार का नाड़ा खोल दिया। सलवार नीचे खिसक गयी। सुमन ने नीचे चड्ढी नहीं पहनी हुई थी। सुमन की फुद्दी गहरे काले घुंघराले बालों से ढंकी हुई थी – फुद्दी का कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था ना फुद्दी के फांकें, ना फांकों के बीच की लाइन।

ये काम वालियां, धोबनें अपनी झांटें नहीं साफ़ करती। उनका कहना है कि उनके मर्दों को बिना झांटों वाली फुद्दीयां पसंद नहीं l बिना झांटों वाली फुद्दी को ना चूसने का मजा नहीं आता और ना ही चोदने का।

फिर महेंद्र ने सुमन की कमीज भी उतार दी और घुमा कर पीछे से सुमन के ब्रा का हुक खोल कर ब्रा भी उतार दी। सुमन के मम्मे बिलकुल खड़े थे – तने हुए। महेंद्र सुमन के मम्मे चूसने लग। मम्मे चूसने कि साथ साथ महेंद्र सुमन के चूतड़ों मैं उंगली भी अंदर बाहर कर रहा था।

थोड़ी देर महेंद्र सुमन के मम्मे चूसने के बाद हटा और मुझसे बोला, “चल भाई धीरज उतार अपने कपड़े और चढ़ जा सुमन पर।”

सुमन बिस्तर पर लेट गयी। सुमन ने अपने चूतड़ों के नीचे तकिया रखा, अपनी टांगें फैला दी और मेरी तरफ देखने लगी। सुमन की काली झांटों से ढकी फुद्दी देख कर मेरा लंड भी सख्त होने लगा था। मैंने भी अपने कपड़े उतार लिया और बिस्तर पर चला गया।

सुमन मस्ती से मेरी तरफ देख रही थी, जैसे कह रही हो, “अब आओ भी।”

मैंने अपना लंड सुमन की फुद्दी पर रखा और हल्का सा अंदर धकेला। तभी सुमन ने अपने चूतड़ों को जोर का एक झटका दिया और अगले ही पल मेरा पूरा का पूरा लंड सुमन की फुद्दी के अंदर था।

मस्त चुदाई करवाई सुमन ने। चुदाई के दौरान खूब चूतड़ घुमाती थी सुमन। दो बार सुमन की फुद्दी पानी छोड़ चुकी थी। जब तीसरी बार सुमन को मजा आया तो साथ ही मेरा लंड भी पानी छोड़ गया। कुछ टाइम बाद जब मेरा लंड ढीला हुआ तो मैं सुमन के ऊपर से उतारा और जा कर साथ लगे सोफे पर बैठ गया।

सुमन लेटी ही हुई थी। अब उसे चोदने की बारी महेंद्र की थी। महेंद्र उठा और जा कर सुमन की फुद्दी में लंड डाल कर सुमन को चोदने लगा। जैसे ही सुमन की चूत ने एक बार और पानी छोड़ा, महेंद्र का लंड भी पानी छोड़ गया।

पांच मिनट सुमन के ऊपर ही लेटा रहने के बाद महेंद्र ने पल्टी ली और सुमन के पास ही लेट गया। सुमन उठी और टांगें चौड़ी कर के चूत पर हाथ रख कर बाथरूम में चली गयी। सुमन की चूत दो-दो जवान लड़कों के लंड के पानी से भरी पड़ी होगी। सुमन ने सोचा होगा कहीं फुद्दी में से गाढ़ा-गाढ़ा पानी निकल कर टांगों पर ही ना बहने लगे।

सुमन फुद्दी की धुलाई करके बाहर आयी और बोली, “महेंद्र मजा आ गया आज। धीरज के साथ जैसी चुदाई हुई ऐसी चुदाई तो मेरी कभी भी नहीं हुई थी।”

फिर कुछ रुक कर सुमन बोली, “महेंद्र कल फिर लाओगे धीरज को, अंकल आंटी तो पांच दिनों के लिए गए हैं?”

महेंद्र बोला, “क्या हुआ, कल फिर चुदवानी है?”

सुमन बोली, “महेंद्र कल मैं अपनी भाभी को निर्मला को भी लेकर आऊंगी। उसको भी धीरज के लंड का मजा दिलवाती हूं एक बार। हमेशा बोलती रहती है, “सुमन तुम्हारे भैया के लंड में दम नहीं है।”

महेंद्र हंसते हुए बोला, “ठीक है।” और फिर महेंद्र मेरी तरफ देखता हुआ बोला, “तू क्या बोलता है, चोदनी है सुमन की भाभी निर्मला?”

अब मुझे भला क्या ऐतराज़ होना था। मैंने कहा, “ठीक है।”

तभी सुमन बोली, “धीरज निर्मला भाभी गांड चुदवाने की भी शौक़ीन है। मस्त गांड चुदवाती है, चूतड़ झटका-झटका कर। तुम्हारा मस्त मोटा लंड गांड में लेकर खुश हो जायेगी।”

सुमन की बात सुन कर धीरज ने सुमन के चूतड़ों को पकड़ते हुए सुमन से कहा, “और तुम सुमन? तुम नहीं लेती गांड में?”

सुमन बोली, “मैं भी लेती हूं,अगर कोइ डालना चाहे तो।”

सुमन की चुदाई महेंद्र के घर हुई। मस्त चुदाई के बाद सुमन हमें उसके भाभी निर्मला को भी चोदने के लिए बोलने लगी। सुमन ने बताया कि निर्मला गांड चुदाई की शौक़ीन थी।

सुमन महेंद्र से बोली, “महेंद्र कल निर्मला जब आएगी आगे-पीछे दोनों का मजा ले लेना।” फिर मेरी तरफ देखते हुए सुमन बोली, “धीरज जब निर्मला की गांड चोदोगे, तब मेरी गांड भी चोद लेना।”

मैंने हैरानी से महेंद्र की तरफ देखा। महेंद्र ने लंड खुजलाते हुए कहा, “यार धीरज मुझे तो ये गांड वाली बात का तो पता ही नहीं था, नहीं तो मैं तो गांड ही चोदता सुमन की। गांड चुदाई में लंड पर लगने वाले रगड़ों की तो यार बात ही अलग होती है।”

ये बोल कर उसने भी सुमन को पकड़ लिया और बोला, “साली एक साल से तुझे चोद रहा हूं। तूने अब तक तो नहीं बताया कि तू गांड भी चुदवाती है। मन तो कर रहा है अभी की अभी ही डाल दूं तेरी गांड में लंड। मुझसे अब नहीं रहा जा रहा तेरी ये बातें सुन-सुन कर।”

ये कह कर महेंद्र सुमन को बेड की तरफ ले जाते हुए सलवार का नाड़ा दुबारा खोल कर बोला, “चल सुमन चूतड़ पीछे करके लेट जा, आज ही गांड चोदूंगा तेरी।”

सुमन बोली, “महेंद्र कल तक सबर कर लो, गांड चुदाने के लिए मना थोड़े ही कर रही हूं। बोल तो रही हूं गांड चुदवा लूंगी। आज अगर गांड चुदाई के चक्कर में पड़ गए तो देर हो जाएगी और बेकार में ही किसी को शक हो जाएगा। लेने के देने ही ना पड़ जाए कहीं। कल मेरे साथ मेरे साथ मेरी भाभी निर्मला भी आएगी, तुम दोनों बारी-बारी से जितनी चाहो हमारी गांड चोद लेना।”

महेंद्र को भी बात समझ में आ गयी और वो बोला, “ठीक है सुमन तो फिर कल गांड ही चोदेंगे।”

अगले दिन फिर हम दोनों कालेज का एक पीरियड छोड़ कर महिंदर के घर पहुंच गए। उनके पहुँचने के दस-पंद्रह मिनट के बाद ही सुमन और निर्मला भी आ गयी।

निर्मला उम्र की बड़ी थी – होगी कोइ पच्चीस-सत्ताईस साल की, मगर थी दुबली पतली। देखने में भी सुन्दर थी। माथे पर बड़ी सी बिंदी लगाई हुई थी। होठों पर हल्की लिपस्टिक थी। सुमन ने तो सलवार कमीज ही पहनी हुई थी, मगर निर्मला ने साड़ी पहनी हुई थी।

नमस्ते-नमस्ते के बाद सुमन धीरज की तरफ इशारा करके बोली, “भाभी ये धीरज है।” फिर हाथ का इशारा करके – उंगली और अंगूठे से गोलाई बना कर सुमन बोली, “भाभी, ये मस्त लंड मोटा लंड है धीरज का। तुम्हारी सारी शिकायत दूर हो जाएगी धीरज से चुदाई करवा के – भाभी धीरज से भले ही गांड चुदवा लेना, मगर एक बार धीरज का लंड फुद्दी में जरूर लेना, मजा आ जाएगा चुदाई का। मस्त चोदता है और लंड जल्दी पानी भी नहीं छोड़ता।”

फिर महेंद्र की तरफ इशारा करके सुमन बोली, “और भाभी ये महेंद्र है, इसके बारे में तो आप जानती ही हैं। ये घर इसी का है। मस्त चोदता है ये भी। कह रहा था आज हम दोनों की गांड ही चोदेगा।”

निर्मला बोली कुछ नहीं और हंस दी और बोली, “चलो देखते हैं कितने गुणी हैं ये दोनों, कितना दम हैं इनमें। आज मैं आगे-पीछे दोनों जगह लूंगी इनके लंड।”

सुमन महेंद्र से बोली, “तो महेंद्र चलें? टाइम क्यों बर्बाद करना है। अदल-बदल कर गांड चुदाई करो दोनों तुम। दोनों दो दो गांडों का मजा लो, कर लो गांड चुदाई की हसरत पूरी।

हम चारों फिर से कमरे में आ गए। सुमन ने अपने कपड़े उतार दिये, और निर्मला से बोली, “चलो भाभी तुम भी उतारो और लेट जाओ – फुद्दी चुदवानी है तो सीधी लेट जाओ, अगर गांड चुदवानी है तो उल्टी हो कर चूतड़ उठा कर लेट जाओ। मैं तो आज गांड ही चुदवाऊंगी।”

ननद-भाभी दोनों मस्त चुदाई के मूड में लग रहीं थी। मैंने और महिंदर ने भी अपने कपड़े उतार दिये। सुमन बेड के किनारे पर उल्टी लेट गयी और निर्मला सीधी लेट गई और चूतड़ों के नीचे तकिया सरका लिया।

सुमन मुझसे से बोली, “धीरज तुम पहले निर्मला को अपने मोटे लंड का मजा दे दो। मैं तब तक महेंद्र से गांड चुदवाती हूं। फिर अदल-बदल करेंगे।”

महेंद्र की बदौलत सुमन और उसकी भाभी निर्मला के साथ मेरी मस्त चुदाई हुई। चूत, फिर गांड, फिर चूत और फिर से गांड। चुदाई का मजा आ गया।

ये सिलसिला चलता ही रहा। महीने में एक बार तो मौक़ा मिल ही जाता था सुमन को चोदने का। सुमन के साथ अब उसकी भाभी निर्मला भी आने लग गई थी।
मगर सुमन कभी-कभी किसी और लड़की को भी ले आती थी, सरोज नाम था उसका – बीस साल की होगी, मगर लंड मस्त लेती थी – आगे-पीछे सब जगह। सब एक से बढ़ कर एक चुदक्कड़ थी और ये सब हो रहा था मेरे 3XL लंड की बदौलत। जो भी लड़की एक बार मेरा लंड अपने चूत में डलवा लेती थी, बस उसके बाद तो समझो वो महीने, दो महीने में एक बार नीचे लेटती ही थी।

मम्मी ने मुझे चुदाई के लिए उकसाया।
इसी बीच कुछ ऐसा हुआ, जो मेरी समझ से परे था, मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। हुआ ये कि किसी त्यौहार के सिलसिले में मेरा कालेज पांच दिन के लिए बंद था। मतलब पूरे हफ्ते की छुट्टी। हमेशा की तरह मैं गुडगांव अपने घर चला गया।

मम्मी अकेली ही घर पर थी। फोन पर पापा के बारे में तो मम्मी ने बताया ही था कि किसी सरकारी काम से चंडीगढ़ गए हुए थे, और दिव्या, दिल्ली – रोहिणी गयी हुई थी मौसी के यहां।

रात हुई तो खाना खा कर मैं ऊपर अपनी मम्मी-पापा के साथ वाले कमरे में बैठा टीवी देख रहा था। तभी मम्मी आयी और ज़रा सा दरवाजा खोल कर बोली, “धीरज बेटा जरा बात सुनना।”

मैंने कहा, “जी मम्मी अभी आया।”

मैं मम्मी के कमरे में गया तो देखा मम्मी बिस्तर पर लेटी हुई थी – अजीब सी ड्रेस पहन कर। नीचे सलवार और ऊपर ढीली ढाली कुर्ती। कुर्ती पूरा पेट भी नहीं ढक पा रही थी – कुर्ती मम्मों से जरा सी ही नीचे थी।

मम्मी की ड्रेस मुझे कुछ अजीब तो लगी, मगर फिर उसने सोचा अब रात को सोना ही तो है, कपड़ों से क्या फर्क पड़ता है।
मुझे कमरे में आया देख लेटे-लेटे ही मम्मी बोली, “धीरज जरा मेरी पीठ की मालिश कर दे बेटा और जरा सी कमर दबा भी, दे थोड़ी दुःख सी रही है।” ये बोल कर मम्मी उल्टी हो गयी और कुर्ती जरा सी ऊपर और सलवार खींच कर थोड़ी नीचे कर दी।
मैं मम्मी के पास ही बिस्तर पर बैठ गया और हल्के हाथों से मम्मी की पीठ पर मालिश करने लगा। मालिश करते हुए मैंने मम्मी से पूछा, “मम्मी कब से दुःख रही है आपकी कमर?”

मम्मी बोली, “हल्की-हल्की दर्द तो साल डेढ़ साल से है।”

इस पर मैंने कहा, “तो मम्मी डाक्टर को दिखाया?”

मम्मी बोली, “बेटा इस दर्द का इलाज डाक्टरों के पास नहीं है।”

ये कहते हुए मम्मी ने अपने चूतड़ थोड़े ऊपर उठाए और हाथ नीचे करके सलवार का नाड़ा खोल दिया और सलवार थोड़ी और नीचे कर दी और बोली, “धीरज थोड़ी और नीचे कर मालिश बेटा।”

जैसे ही मम्मी ने सलवार नीचे की, मम्मी की सलवार चूतड़ों के उभार तक पहुंच गयी – यहां तक कि चूतड़ों की लाइन भी जरा सी दिखाई देने लग लगी। मम्मी ने सलवार के नीचे चड्ढी भी नहीं पहनी हुई थी।

मैं थोड़ा और नीचे मालिश करने लगा। मेरा हाथ चूतड़ों के उभार को छू रहा था।
बाईस साल का नया-नया जवान हुआ मैं, और मेरे सामने एक इस तरह आधी नंगी औरत – भले ही वो मेरी मम्मी ही थी – पर तो थी तो एक औरत ही। एक फुद्दी और मुलायम-मुलायम चूतड़ों वाली औरत।

मेरे इतना नीचे मालिश करने पर मम्मी थोड़े कसमसाई और हल्का सा आगे होती हुई बोली, “हां धीरज बेटा ऐसे ही। बड़ा आराम मिल रहा है। जैसे ही मम्मी थोड़ी आगे की तरफ हुई, मम्मी की सलवार और नीचे खिसक गयी। मम्मी ने हाथ पीछे करके सलवार थोड़ी और नीचे कर दी।

मम्मी ने जैसे ही सलवार पीछे की तरफ खींची, तो सलवार आधे चूतड़ों तक जा पहुंची। मम्मी ने कहा, “हां बेटा जरा नीचे के तरफ मालिश कर दे।”

जब मम्मी ने कहा, “बेटा जरा नीचे के तरफ मालिश कर दे”, तब तो मैं हैरान ही हो गया – सलवार पहले ही आधे चूतड़ों तक जा चुकी थी, थोड़ा और नीचे? थोड़ा और नीचे तो चूतड़ों का छेद ही था, और उसके नीचे फुद्दी।

चूतड़ों की तकरीबन पूरी लाइन साफ दिखाई दे रही थी। मम्मी के चूतड़ बिलकुल गोल-गोल और मुलायम थे। मुझे सुमन और निर्मला के चूतड़ याद आ गए। मम्मी के चूतड़ सुमन और निर्मला के चूतड़ों सी कहीं ज्यादा नरम और मुलायम थे।

मम्मी का इस तरह से चूतड़ नंगे करना – मुझे अब कुछ अजीब सा लगने लगा था। मैं सोचने लगा मम्मी ऐसा मेरे सामने चूतड़ नंगे क्यों कर रही है, आखिर चाहती क्या है मम्मी?

जो भी था अपनी मम्मी के गोल मुलायम चूतड़ देख कर मुझे भी मस्ती आने लगी थी। मेरे लंड में थोड़ी हरकत सी होने लगी थी। मेरा हौसला बढ़ने लगा और लंड खड़ा होने लगा।

मुझसे अब रहा नहीं रहा गया और मैंने भी मम्मी के पूरे चूतड़ों पर हाथ फेर ही दिया।
मम्मी थोड़ी कसमसाई और मम्मी ने चूतड़ हिला दिए, मगर मम्मी बोली कुछ भी नहीं।

जब मैंने मम्मी के चूतड़ों पर हाथ फेरा और मम्मी कुछ नहीं बोली, तो कमर के मालिश तो मैं भूल ही गया और चूतड़ों पर ही हाथ फेरने लगा। मम्मी के चूतड़ तो पहले ही नंगे थे, मैंने सलवार की अंदर से मम्मी के चूतड़ जरा से दबा दिए। मम्मी फिर भी कुछ नहीं बोली।

मैंने हाथ थोड़ा और नीचे किया तो सलवार थोड़े और नीचे खिसक गयी। मैंने धीरे से मम्मी के चूतड़ों की लाइन में उंगली डाली और उंगली ऊपर-नीचे करने लगा। जब मैं उंगली ऊपर-नीचे कर रहा था, तभी मेरी उंगली मम्मी के चूतड़ों के छेद पर जा अटकी। मैंने थोड़ी सी उंगली मम्मी की गांड के अंदर डालने की कोशिश की, मगर सूखी उंगली और सूखी ही गांड का छेद। उंगली जरा सी ही गांड के अंदर गयी।
मम्मी तब भी कुछ नहीं बोली।

मम्मी के चुप्पी से मेरा हौंसला बढ़ता जा रहा था। मैंने उंगली पर ढेर सारा थूक लगाया और उंगली मम्मी की गांड में डाल दी। थूक से सनी हुई उंगली फिसल कर मम्मी की गांड में चली गयी। ये करते हुए मुझे डर भी लगा, मगर मम्मी ने “आह धीरज” के अलावा कुछ भी नहीं कहा।

इसके बाद तो मेरी झिझक जाती रही और मैंने उंगली मम्मी की चूतड़ों के अंदर-बाहर करनी शुरू कर दी। मम्मी ने भी अपनी टांगें थोड़ी फैला दी। ये एक तरह का यही कहना था कि “धीरज और करो ऐसे ही अंदर-बाहर।” मेरी उंगली पूरी मम्मी की गांड के छेद में जा रही थी। मैं उंगली मम्मी की गांड के अंदर-बाहर करने लगा।

मम्मी को इस तरह देख कर मुझे मस्ती आ गयी। मैं झुका और मम्मी के चूतड़ चाटने लगा। इतना कुछ हो रहा था, मगर मम्मी चुप थी। मम्मी की चूतड़ों से नीची सलवार, नीचे चड्ढी भी नहीं और इतनी ढीली कुर्ती और मम्मी का मुझे इस तरह चूतड़ चाटने के बावजूद भी कुछ ना कहना – ऊपर से घर में हम दोनों अकेले।

मैं अभी मम्मी की गांड चाट रहा था और साथ ही मम्मी की गांड में उंगली कर रहा था कि मम्मी एक-दम पलट कर सीधी हो गयी। मम्मी की सलवार इतनी नीचे हो चुकी थी कि सलवार मम्मी की फुद्दी को ढक भी नहीं पा रही थी। मुझे मम्मी की झांटों के छोटे-छोटे बाल भी साफ़ दिखाई दे रहे थे।

मम्मी ने अपनी सलवार और थोड़ी नीचे की और मेरी तरफ देखने लगी। मैं समझ गया कि मम्मी क्या चाहती थी। मम्मी अब अपनी फुद्दी में मेरी उंगली लेना चाहती थी।

इतना कुछ होने के बावजूद मेरी झिझक पूरी तरह से दूर नहीं हुई थी और मुझे डर भी लग रहा था। मैं धीरे-धीरे मम्मी की फुद्दी पर हाथ फेरने लगा। मम्मी ने आंखें बंद कर ली और लम्बे-लम्बे सांस लेने लगी और मम्मी ने अपने टांगें थोड़ी और फैला दी। ये सारा इशारा था कि मैं मम्मी की फुद्दी में उंगली डालूं या फिर फुद्दी का दाना रगडूं।

इतना कुछ होने से मेरा लंड बेकाबू होने लगा था। मुझे अब फुद्दी चोदनी थी। फुद्दी में लंड डालना था, चाहे वो फुद्दी मेरी मम्मी की ही क्यों ना हो।

गांड में उंगली और फिर नंगी फुद्दी – मम्मी को इस हालत में देख कर मेरा लंड बेकाबू होने लगा था। मुझे अब फुद्दी चोदनी थी – फुद्दी में लंड डालना था, चाहे वो फुद्दी किसी की भी हो।

मैंने सोचा, “देखते हैं क्या होता है” और मैंने अपनी उंगली मम्मी की फुद्दी में डाल दी। मम्मी की फुद्दी चिकने पानी से भरी पड़ी थी। फ़ैली हुई टांगों के कारण मम्मी की चुदी हुई फुद्दी वैसे ही थोड़ी सी खुल गयी थी। जैसे ही मेरी उंगली मम्मी की फुद्दी के छेद पर पहुँची, मैंने जरा सी उंगली आगे की मेरी उंगली फिसल कर मम्मी की फुद्दी के अंदर चली गयी।

अब मैंने ही मम्मी की सलवार खींची और मम्मी के घुटनों तक नीचे कर दी। मम्मी की पूरी नंगी फुद्दी और मेरी उंगली मम्मी की फुद्दी में – मम्मी का अपनी फुद्दी को ना ढकना और साथ ही मुझे भी कुछ ना कहना। मेरे दिमाग में एक-दम मम्मी की बात आ गयी। मम्मी कह रही थी इस दर्द का इलाज डाक्टर के पास नहीं, उसका क्या मतलब था? और मम्मी का इस तरह नंगा होना, मैं सोचने लगा कहीं मम्मी मुझसे चुदाई करवाने के चक्कर में तो नहीं?

जैसे ही मैंने उंगली चार-पांच बार फुद्दी के अंदर-बाहर की मम्मी की, मम्मी अपनी कुर्ती उतार दी और साथ ही अपनी सलवार भी। मम्मी अपने मम्मों के निप्पल मसलने लगी।

अब मम्मी पूरी नंगी थी। अब शक की कोइ गुंजाइश ही नहीं थी कि मम्मी का इरादा क्या था। अब फैसला मुझसे करना था कि अब मुझे क्या करना है। मम्मी अपनी कुर्ती और सलवार उतार ही चुकी थी। मम्मी – मेरे सामने बिस्तर पर बिलकुल नंगी लेटी हुई थी, और मम्मी की आखें बंद थी। मम्मी लम्बे-लम्बे सांस ले रही थी।

मैं मम्मी के नंगे जिस्म की तरफ देख रहा था। मम्मी का नंगा जिस्म देख कर मेरा लंड मेरा लंड अब सख्त हो चुका था। मैं उठा और मम्मी के मम्मे मुंह में लेकर चूसने लगा। मम्मी ने मेरा सर अपने मम्मों ओर दबा दिया। मेरा मुंह मम्मी के मम्मों पर था और मेरी उंगली मम्मी की फुद्दी में।

अब मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मैंने अपना पायजामा उतारा और आनन-फानन में मम्मी के चूतड़ों के नीचे तकिया लगाया और एक ही झटके से लंड पूरा मम्मी की फुद्दी में डाल दिया। मम्मी ने बस इतना ही कहा, “आह धीरज।”

मैंने इसके बाद देरी नहीं की और मम्मी की चुदाई चालू कर दी। जल्दी ही मम्मी हूं हूं आह आह की आवाज के साथ अपने चूतड़ घुमाने लगी। मैं समझ गया मम्मी को मजा आने वाला था। मैं भी अपनी मम्मी की फुद्दी जोर-जोर से चोदने लगा।

तभी मम्मी ने जोर से चूतड़ घुमाये और मेरा लंड मुंह में से निकाल कर जोर से बोली, “धीरज मजा गया मुझे, फुद्दी पानी छोड़ गयी मेरी, आह धीरज।” और यह बोल कर मम्मी ढीली हो गयी। मैं मम्मी के ऊपर से उतरा और उनके पास ही लेट गया। मम्मी की आंखें बंद थी, वो अभी भी मजे में थी।

फिर जब मम्मी ने आंखें खोल कर मेरी तरफ देखा और बोली, “मजा आ गया, तेरा लंड तो बहुत बड़ा है धीरज।”

मम्मी की बात अनसुनी करके मैंने मम्मी से पूछा, “मम्मी ये क्या हो गया? आपने मुझे ये सब क्यों करवाया?

इतना कुछ होने के बाद मम्मी अब मेरे साथ खुलने लगी थी। मम्मी बोली, “धीरज बेटा, मैं भी क्या करती डेढ़ साल हो गया है तेरी मम्मी की इस फुद्दी की एक बार भी ढंग से चुदाई नहीं हुई है।

मैंने पूछा, “मम्मी डेढ़ साल? ऐसा क्या हुआ मम्मी? और पापा?

मम्मी ने मेरा खड़ा लंड पकड़ लिया और बोली, “बेटा क्या बताऊं, तेरे पापा का लंड खड़ा तो होता है, ढीला ही रहता है, फुद्दी में भी जाता है मगर सख्त नहीं होता। तेरे पापा चोदते भी हैं मुझे, फुद्दी में लंड का गर्म-गर्म पानी भी गिरता है, मगर धीरज जब तक फुद्दी में रगड़े ना लगें, तो चुदाई किस काम की? चुदाई का मजा ही नहीं आता?”

“तेरे ऊपर लेटे अनमने से ढीले वाले लंड की साथ मुझे चोद रहे होते है, मगर मुझे मस्ती ही नहीं आती। मेरी फुद्दी गीली ही नहीं होती, मेरे चूतड़ घूमते झटकते ही नहीं।”

“बीस मिनट आधा घंटा चुदाई के बाद उनका लंड पानी छोड़ देता है – मेरी फुद्दी भी पानी छोड़ देती है। मगर धीरज बेटा असली मजे के लिए फुद्दी की रगड़ाई होना जरूरी होता है, और रगड़ाई तभी होती है, जब लंड सख्त हो – जैसे उनका लंड पहले हुआ करता था – लकड़ी की तरह सख्त – जैसे तेरा लंड अभी है।”

“धीरज तेरे तो लंड को तो पकड़ कर ही मजा आ गया। एक बार और अच्छे से मेरी फुद्दी में डाल कर मस्त चुदाई कर दे बेटा, बहुत मन कर रहा है।”

अच्छे से, मतलब मैं अपना लंड मम्मी से चुसवाऊँ, मम्मी की फुद्दी चूसूं और फिर चुदाई करूं।

नंगी फुद्दी देख कर मस्ती में तो मैं था ही। मैंने मम्मी की फुद्दी पर हाथ फेरते हुए कहा, “मगर मम्मी आप पापा को किसी डाक्टर के पास जाने के लिए क्यों नहीं बोलती? आज कल तो हर मर्ज का इलाज है।”

मंम्मी ने जवाब दिया, “धीरज बेटा मैंने एक दो बार उनसे कहा भी के किसी डाक्टर को दिखा लें। मगर ये समस्या ऐसी है कि मर्द डाक्टर के पास जाने से भी शरमाते हैं। अब मैं भी इस बारे में उनसे कुछ नहीं कहती यही सोच कर कि कहीं वो डिप्रेशन में ही ना आ जाएं।”

मम्मी बोल रही थी, “धीरज बेटा, तेरे पापा की उम्र इतनी भी नहीं कि उनका लंड सख्त ही ना हो और फुद्दी के रगड़ाई ही ना कर पाएं। डेढ़ साल पहले तक मस्त चोदते रहे हैं मुझे। पर अब प्रॉब्लम हो ही गयी है, अब इसका क्या हल है। मेरी उम्र भी तो इतनी नही कि मेरी फुद्दी गर्म ही ना हो, लंड की रगड़ाई ही ना मांगे। अब तुम ही बताओ धीरज बेटा मैं क्या करूं?”

मम्मी की एक चुदाई करने के बाद मेरा मन फिर से मम्मी को चोदने का होने लगा। मम्मी के फुद्दी में उंगली डालते हुए मैंने कहा, “ठीक है मम्मी जो आप कहेंगी मैं करूंगा।”

ये कह कर मैंने अपनी मम्मी को बाहों में ले लिया और मम्मी के होंठ चूसने लगा। थोड़ी ही देर में मम्मी ने मुझे अपने से अलग किया और बोली, “धीरज बेटा तूने मेरी तो चिंता ही खत्म कर दी।” इतना कह कर मम्मी उठी और मेरे खड़े सख्त लंड पर बैठ गई और लंड पर ऊपर नीचे होने लगी। जिस तरह से मम्मी मेरे लंड पर जोर-जोर से ऊपर नीचे होते हुए मेरा लंड अपनी फुद्दी में ले रही थी, उससे पता ही लग रहा था कि मम्मी की सालों से ढंग से चूत नहीं चुदवाई थी।

ऊपर-नीचे होते हुए मम्मी के मम्मे भी ऊपर-नीचे हो रहे थे। हम मां-बेटे में माहौल अब मस्ती वाला हो चुका था। मैंने अपने हाथों से अपनी मम्मी के मम्मे पकड़ लिए और मम्मों के निप्पल मसलने लगा। मम्मी अब ऊपर नीचे होती हुए “आअह धीरज उह धीरज” बोलने लगी।

मम्मी की फुद्दी कभी भी पानी छोड़ सकती थी। तभी मम्मी ने हाथ नीचे किया और उंगली से अपनी चूत का दाना रगने लगी। अगले पांच मिनट में मम्मी को मजा आ गया। मम्मी ने एक सिसकारी ली, “आअह धीरज, मजा आ गया बेटा, पानी छोड़ गयी तेरी मम्मी की फुद्दी एक बार और, मेरा बेटा।”

मम्मी मजे में मेरे लंड के ऊपर ही बैठी हुई थी। दो मिनट के बाद जब मजे की मस्ती उतरी तो मम्मी को महसूस हुआ कि मेरा लंड तो अभी भी खड़ा ही है। अपनी फुद्दी में मेरा खड़ा लंड महसूस करके मम्मी ने पूछा, “धीरज क्या हुआ बेटा, अभी भी नहीं निकला तेरे लंड का मक्खन?”

मैंने कहा, “मम्मी मेरा लंड जल्दी नहीं झड़ता। एक-एक डेढ़-डेढ़ घंटा चुदाई कर सकता है ये।”

मम्मी ने बस इतना ही बोली, “कमाल है? चल बेटा एक बार चुसवा अपना लंड और अच्छे से, तसल्ली से चुदाई कर दे।”

ये कह कर मम्मी बोली, “बेटा मैं बाथरूम हो कर आती हूं, मुझे पेशाब लग रहा है। ये कह कर मम्मी बाथरूम चली गयी और खड़े लंड के साथ मैं उठ कर सोफे पर बैठ गया।

मम्मी बाथरूम से आई और सीधे मेरे सामने नीचे बैठ कर मेरा का लंड मुंह में ले कर चूसने लगी। मेरा लंड थोड़ा चूसने के बाद, मम्मी उठी और बोली, “चल धीरज जरा मेरी फुद्दी चूस।”

मैं जैसे ही उठा, मम्मी ने मुझे बाहों में ले लिया और मेरे के मुंह के साथ अपना मुंह लगा दिया और ऊँ ऊँ करने लगी। मैं समझ गया मम्मी क्या चाहती थी। मैंने अपनी जुबान अपनी मम्मी के मुंह में डाल दी।

थोड़ी देर के बाद मेरी जुबान मम्मी ने छोड़ दी। मेरा मुंह अपने आप ही खुल गया। अब मम्मी की जुबान मेरे मुंह में थी और मैं मम्मी की जुबान चूस रहा था। कुछ देर ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा, और फिर मम्मी बोली, “चल धीरज, अब जरा फुद्दी चूस और फिर कर दे चुदाई।”

मैं भी बोला, “ठीक है मम्मी, लेटो आपकी फुद्दी चूसूं फिर अच्छे से चुदाई करूं आपकी। ऐसी चुदाई जिसे आप भी याद रखेंगी।”

मम्मी बेड के किनारे पर चूतड़ों के नीचे तकिया लगा कर लेट गयी। तकिये के कारण मम्मी की फुद्दी ऊपर उठ गयी। जब मम्मी ने टांगें उठा कर चौड़ी की, तो मम्मी की फुद्दी हल्की सी खुल गयी। फुद्दी के अंदर का गुलाबी नजारा मस्त कर रहा था। मैंने सोचा कि आखिर को मम्मी ने चौबीस साल लंड भी तो लिया था फुद्दी में और फिर दो-दो बच्चे भी तो निकाले हैं इसमें से।

वैसे तो मैंने इतने ध्यान से कोइ फुद्दी देखी भी नहीं थी। मम्मी की गुलाबी फुद्दी का नजारा देख कर मेरा लंड फुंफकारे मारने लगा। जो कॉल गर्ल्स होटलों में चोदी भी थी, या महेंद्र के घर में जो काम वालियां चोदी भी थी, उसमें उनकी फुद्दी देखने का टाइम ही नहीं मिलता था। यहां तो मेरी अपनी मम्मी की फुद्दी मेरे सामने थी – जितनी चाहो देखो, जितनी चाहो चूसो, जितनी चाहो चोदो।

मैंने मम्मी की फुद्दी की फांकें और भी खोल दी। अब तो अच्छे से फुद्दी दिखाई दे रहे थी। फुद्दी का छेद हल्का सा खुला हुआ था। मैंने जुबान मम्मी की फुद्दी के छेद में डाल दी और जुबान से चूसने चाटने लगा। मम्मी की फुद्दी नमकीन पानी से भरी पड़ी थी। मैं फुद्दी चूसता-चाटता जा रहा था और मम्मी की फुद्दी पानी छोड़ती जा रही थी। मैंने सोचा मम्मी तो बोल रही थी अब जब पापा मम्मी की फुद्दी में लंड डालते हैं, तब उनकी फुद्दी गीली ही नहीं होती।

तभी मम्मी बोली, “बेटा अब आजा नहीं तो फिर मेरी फुद्दी का पानी ऐसे ही निकल जाएगा। आजा बेटा फुद्दी में अपना ये मोटा लम्बा लंड डाल कर मस्त रगड़ाई कर आज अपनी मम्मी की।

मैंने फुद्दी से मुंह निकाल लिया, मगर जिस तरीके से मम्मी लेटी हुई थी – टांगें ऊपर करके, मम्मी के चूतड़ों के छेद का नजारा भी मुझे पागल कर रहा था। मैंने एक बार चूतड़ों के गुलाबी छेद को जुबान से चाटा और खड़ा हो कर बोला, “मम्मी आपकी गांड भी चोदनी है।”

मम्मी बोली, “धीरज जो चाहे चोद फुद्दी चोद, गांड चोद, मुंह में डाल, जो करना है कर। अब मैं सात दिन समझ ले तेरी रंडी तेरी रखैल हूं और तू मुझे पैसे देकर चोदने की लिए ही लाया है।”

मैं हैरान था कि मम्मी ये कैसी बातें कर रही थी, वो भी मुझसे। अपनी मम्मी के मुंह से ऐसी बातें सुन कर मुझसे से रहा नहीं गया और मम्मी को उठा कर बिस्तर पर सीधा लिटा दिया और बिना देरी किये मम्मी की फुद्दी में लंड डाल कर जोरदार चुदाई चालू कर दी।

मम्मी ने मुझे टांगों में जकड़ लिया। लंड के लिए तरसी हुई मम्मी की फुद्दी मेरे लम्बे मोटे लंड से दस मिनट की चुदाई भी नहीं झेल पायी और मम्मी की फुद्दी पानी छोड़ गयी। मम्मी जोर से चिल्लाई, “क्या रगड़ता है धीरज तू, क्या चोदता है, आज तो मजा ही आ गया। बड़े देर के बाद ऐसा मजा आया है।”

इतना बोल कर भी मम्मी ने मेरी कमर से अपनी टांगें नहीं हटाई। मतलब मम्मी अभी और चुदाई करवाना चाहती थी। मेरा लंड तो खड़ा ही था। अपनी मम्मी की चुदाई में मुझे मजा भी बहुत आ रहा था। आखिर फुद्दी तो फुद्दी ही होती है चाहे किसी की भी हो। यहां तो हालत ये बने हुए थे कि फुद्दी तो सामने थी ही, चोदने की भी कोइ जल्दी थी और ना ही कोइ खटका ही था।

मस्ती से जितनी देर चाहो चुदाई करते रहो जैसे मर्जी चुदाई करते रहो – जब तक लंड ही मलाई ना छोड़ दे। और बड़ी बात मम्मी तो गांड चुदवाने के लिए भी तैयार ही थी। फुद्दी और गांड – दोनों सामने थे।

मेरी और मम्मी की पहली चुदाई के बाद ही हमारे बीच अब मां-बेटे वाली शर्म खत्म हो चुकी थी। अब हम सिर्फ मर्द और औरत थे – एक चुदाई की प्यासी औरत, जिसकी डेढ़ साल से ढंग से चुदाई नहीं हुई थी और एक 3XL लंड वाला नया-नया जवान हुआ लड़का, जिसका लंड फुद्दी की चुदाई के ख्याल भर से ही खड़ा हो जाता था।

इस बार मैंने आधा घंटा मम्मी की रगड़-रगड़ कर चुदाई की। चुदाई करवाते वक़्त मम्मी खूब बोल रही थी, “आह मेरे राजा, क्या मस्त लंड है राजा, चोद और जोर से चोद बेटा। फाड़ दे अपनी मम्मी की फुद्दी, बड़ी तरसी है ये लंड लेने के लिए, आज तो पूरी रात ही चुदवाऊंगी धीरज, पूरी रात।”

मम्मी की बातों में मुझे मस्ती तो आ रही थी। मन तो कर रहा था मैं बह कुछ ऐसी ही सेक्सी बातें करूँ। मगर एक झिझक तो थी ही। आखिर को तो मैं अपनी मम्मी को ही चोद रहा था। मैं भी कुछ भी बोल नहीं रहा था – बस चुप-चाप मम्मी को चोद रहा था।

लंड की प्यासी मम्मी मस्त चुदाई करवा रही थी। मम्मी को एक बार फुद्दी चुसाई से और एक बार फुद्दी चुदाई से मजा आ चुका था। मगर मम्मी अभी और चुदाई के मूड में थी।

मुझे तो कोई प्रॉब्लम ही नहीं थी। ऐसी मस्त चुदाई तो मैं भी पहले बार ही कर रहा था, जिसमें चुदाई करवा रही लड़की या औरत को कही भी जाने की जल्दी ही नहीं थी। अपना घर, अपना बिस्तर और अपना बेटा।

मैंने फिर से मामी की चुदाई शुरू कर दी। इस बार आधा घंटा मेरी और मम्मी की चुदाई हुई। चुदाई करवाते वक़्त मम्मी मजे में वही बातें बोल रही थी, “आह मेरे राजा, क्या मस्त लंड है राजा, छोड़ और जोर से चोद बेटा फाड़ दे अपनी मम्मी की फुद्दी, बड़ी तरसी है ये लंड लेने के लिए, आज तो पूरी रात ही चुद वाऊंगी धीरज, पूरी रात।”

मम्मी को एक बार फिर मजा आ गया, मगर लंड अभी भी खड़ा ही था। इस वाले मजे के बाद मम्मी ने अपनी टांगें मेरी कमर से हटा ली। मतलब अब थोड़ा आराम करना था इंटरवल – मध्यांतर।

मैंने खड़ा लंड मम्मी की फुद्दी से निकाला और मम्मी के पास ही लेट गया। कुछ देर बाद मम्मी उठी और बोली, “धीरज तेरा लंड तो कमाल ही है – ये कभी ढीला पड़ता भी है या नहीं या हमेशा खड़ा ही रहता है?”

ये बोल कर मम्मी मेरा लंड मुंह में लेकर चूसने लगी। थोड़ा चूसने के बाद मम्मी बोली, “धीरज चूस कर मजा दे दूं बेटा या एक बार और चोदेगा?

“मम्मी चुदाई ही करूंगा आपकी, आज फुद्दी के मजे लो आप।”

फिर मैं बोला, “मम्मी एक सवाल घूम रहा है मेरे दिमाग में।”

मम्मी ने पूछा, “क्या धीरज?”

मैंने कहा, ” मम्मी चलो पापा को प्रॉब्लम हो गयी – किसी को भी हो सकती है। मगर मम्मी आज-कल तो तो लंड सख्त रखने के लिए कई तरह की गोलियां आती है, जैसे वियाग्रा, सुहागरा। पापा वो खा कर क्यों नहीं चोदते आपको?”

मम्मी बोली, “बेटा तेरे पापा का एक केमिस्ट दोस्त है। यश ने उससे बात की थी। उसने कहा था कि ये वियाग्रा, सुहागरा हफ्ते दस दिन में एक बार ही कहानी चाहिए। ज्यादा खाने से दिल पर बुरा असर हो सकता है। अब धीरज मुझे तो हर रोज़ – या एक दिन छोड़ कर चुदाई की आदत पड़ी हुई है। यश का लंड सख्त नहीं होता, मगर फिर भी मैं उनका लंड तकरीबन रोज़ फुद्दी में तो डलवाती ही हूं।”

मैं हैरान हुआ की कमाल है मम्मी – अभी भी इनकी फुद्दी इतनी गरम रेहती है, अभी भी रोज़ इनको फुद्दी में लंड चाहिए।”

मैंने मम्मी की बात सुन कर सोचा, “अगर इस उम्र में मम्मी की ये हालत है तो मैं तो बाईस का ही हूं। फिर मैंने सोचा जब मम्मी बाईस तेईस की होगी, तब कितनी चुदाई करवाती होगी?”

मेरा लंड तो ये सोचने भर से ही सख्त होने लग गया।

मैं मम्मी से बोला, “मम्मी, चलो अब पीछे से चोदता हूं। पूरा लंड अंदर जाएगा फुद्दी में अंदर तक।”

मम्मी बोली, “वो तो मुझे भी मालूम है धीरज, बहुत चुदवाई है मैंने पीछे से।”

ये बोल अम्मी उल्टा हो कर बिस्तर पर ही घुटनों के बल लेट गयी। मैंने मम्मी से कहा, “मम्मी ऐसे पूरा नहीं जाएगा लंड आपकी चूत में। बेड के किनारे पर लेटो, मैं खड़ा हो कर पीछे से चुदाई करूंगा।”

मम्मी बोली, “पीछे से? खड़ा हो कर? मतलब जैसे कुत्ता कुतिया को जकड़ कर पीछे से चोदता है?”

मैंने हंसते हुए कहा, “हां मम्मी, जैसे कुत्ता कुतिया को चोदता है। अपनी अगली टांगों में जकड़ कर। हिलने भी नहीं देता कुतिया को – ऐसी ही चोदूंगा इस बार आपको, हिलने भी नहीं दूंगा।”

मम्मी हंसती हुई बोली, “ठीक है धीरज इस बार समझ एक कुतिया ही है तेरे नीचे – कुत्ते की तरह ही चोद इस इस कुतिया को। डेढ़ साल की प्यास बुझा दे अपनी इस कुतिया की फुद्दी की। फाड़ दे इसकी फुद्दी, सुजा दे चोद-चोद कर।”

मम्मी की इस तरह की बातें मुझे पागल कर रही थी – चुदाई के लिए इतना पागलपन? इतनी बेसब्री?

“क्या सच में ही मम्मी की फुद्दी की डेढ़ साल से रगड़ाई नहीं हुई है। अगर नहीं भी हुई है तो क्या मम्मी ने किसी और से भी नहीं चुदवाई?”

मैंने सोचा किसी और से नहीं ही चुदवाई होगी, वरना इस तरह अपने ही बेटे से क्यों चुदवाती?

मैंने नीचे बैठ कर फिर से मम्मी की फुद्दी चूसी और मम्मी के चूतड़ चौड़े करके गांड का छेद चाटने लगा। मम्मी की गांड का छेद अभी भी गुलाबी-पन किये हुए हल्का-हल्का भूरा था। इसका मतलब था मम्मी या तो गांड चुदवाती ही नहीं थी, या बहुत ही कम चुदवाती थी।

मैंने खड़ा होकर मम्मी की फुद्दी में लंड डालते हुए पूछा, “मम्मी आपकी गांड देख कर लगता है, या तो आपकी गांड बहुत कम चुदी है या बिलकुल ही नहीं चुदी है। ऐसा ही है क्या?”

मम्मी बोली, “हां बेटा, तेरे पापा को गांड चोदने का शौक नही, वो नहीं चोदते मेरी गांड।”

मैंने फिर पूछा, “तो मम्मी क्या एक बार भी लंड नहीं गया आपकी गांड में?”

मम्मी बोली, “नहीं धीरज ऐसा तो नहीं है। कभी-कभी तो लंड डलता ही है इसमें, गांड चुदाई होती है मेरी।”

मम्मी की बात पर मुझे थोड़ी हैरानी सी हुए। अभी तो मम्मी कह रही थी तेरे पापा को गांड चोदने का शौक नहीं, वो नहीं चोदते मेरी गांड, और अब कह रही है कभी कभी तो लंड डलता ही है गांड में।”

खैर मैंने मम्मी की इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और मैं मम्मी की फुद्दी में लंड डाल कर मम्मी को चोदने लगा। मगर मैंने कहा, “मम्मी किसी दिन आपकी गांड भी चोदनी है।”

मम्मी पीछे सर करके बोली, “धीरज बेटा अगर सच में ही तेरा गांड चोदने का मन है तो फिर किसी दिन क्यों, आज ही क्यों नहीं – आज ही, अभी ही चोद ले। मेरी फुद्दी और गांड दोनों तेरे सामने हैं, जिसमें चाहे, जब चाहे लंड डाल दे। जितनी चाहे चोद ले, जैसे चाहे चोद ले। अब तू ही तो है जो मुझे आगे-पीछे से लंड का मजा देगा।”

मतलब मम्मी ने इस डेढ़ साल में मम्मी ने पापा के अलावा किसी और से फुद्दी नहीं चुदवाई।

आखिर को थी तो संस्कारी औरत ही मेरी मम्मी। घर की बात बाहर ना जाये इसलिए बेटे से चुदवा रही थी।

औरत हो तो ऐसी।

फिर मम्मी जैसे अपने आप से बोली, “तेरे पापा का ढीला पड़ चुका लंड चूत में तो ढंग जा नहीं पाता, गांड में कहां से जाएगा?”

उस दिन तो मम्मी की गांड चुदाई तो नहीं हुई, मगर फुद्दी मम्मी ने खूब चुदवाई, चूतड़ झटका-झटका कर, चूतड़ घुमा-घुमा कर। बस इसके बाद तो रोज़ मेरी और मम्मी की मस्त चुदाई होने लग गयी।

गुड़गांव का मेरा का पूरे सात दिन का प्रोग्राम था। में तो ये सोच-सोच कर ही बड़ा खुश था था कि वो सातों दिन फुद्दी और गांड की मस्त चुदाई करूंगा – वो भी आराम से, तसल्ली से – अब तो मुझे अपनी मम्मी एक ऐसी औरत नज़र आने लगी थी जो हर वक़्त चुदाई के लिए तैयार थी, और मैं तो लड़का था, लड़कों को चुदाई से क्या परहेज?

गुड़गांव आये मुझे तीन दिन हो चुके थे। तीनों दिन मैंने मम्मी को रगड़-रगड़ कर चोदा। पूरा मजा दिया मम्मी को चुदाई का और पूरा मजा लिया भी मम्मी को चोदने का। रोज़ तीन-तीन चार-चार बार चुदाई हुई। चुदाई से मन ही नहीं भर रहा था हम दोनों का – मेरा भी और मम्मी का भी।

मम्मी अब चुदाई के दौरान बहुत बोलने लग गयी थी। मम्मी की सेक्स से भरी हुई बातें सुन-सुन कर मैं भी वैसी ही बातें बोलने लग गया था।

काम वाली के जाने के बाद दोपहर बाद को शुरू होती चुदाई आधी रात तक चलती थी, जब तक हम दोनों थक नहीं जाते थे और हमें नींद नहीं आ जाती थी। चुदाई के प्यासी मम्मी तो जैसे चुदाई के मजे ले ले कर थक ही नहीं रही थी।

चौथे दिन दिव्या भी दिल्ली से लौट आयी।
अक्सर दिव्या को मौसी के घर से लेने पापा जाते थे, मगर इस बार चूंकि पापा थे नहीं तो दिव्या को मौसी का ड्राइवर कार में छोड़ गया था। दिव्या के आने भी से मेरी और मम्मी की चुदाई में कोइ फर्क नहीं पड़ने वाला था। में तो कई सालों से ही ऊपर वाले कमरे में सोता था और दिव्या नीचे ही सोती थी।

चौथे दिन रात को भी मेरी और मम्मी की मस्त चुदाई हुई। मेरा मन मम्मी की गांड चोदने का हो रहा था। मैंने मम्मी को कहा, “मम्मी आज तो आपकी गांड में डालने का मन हो रहा है।”

मम्मी बोली, “डाल ले बेटा। मैंने तो उस दिन ही कहा है, मेरे आगे-पीछे मुंह में जहां भी डालना है डाल बस मस्त मजा दे मुझे। बहुत तरसी हूं इस डेढ़ साल में मैं ढंग की चुदाई के लिए।”

ये बोल कर मम्मी चूतड़ ऊपर करके लेट गयी और हाथों से चूतड़ खोलते हुए बोली, “ले धीरज, ये रही तेरी मम्मी की गांड, आजा चोद ले आज इसे भी।”

मैंने मम्मी के चूतड़ों पर ढेर सारा थूक लगा कर चूतड़ों के छेद में लंड डालने की कोशिश की मगर लंड का सिर्फ आगे का टोपा ही गांड ले छेद में जा पाया। मम्मी की गांड का छेद टाइट था और मेरा लंड बहुत मोटा।

मम्मी बोली, “क्या बात है धीरज जा नहीं रहा? चल छोड़ धीरज, तेरा लंड है ही बड़ा मोटा, इतनी आसानी से नहीं जा पायेगा। फिर कभी चोद लेना अपनी मम्मी की गांड। एक क्रीम आती है। वो लाना उससे जाएगा लंड आसानी से। चल अब फुद्दी में लंड डाल और चोद दबा-दबा कर, फुद्दी चुदवाने का बड़ा मन कर रहा है।”

उस रात भी मैंने अपनी मम्मी की दो बार चुदाई की और जब दूसरी बार की चुदाई के बाद भी मेरे लंड का पानी नहीं निकला तो मम्मी बोली, “क्या हुआ धीरज आज फिर अटक गया क्या? चूस कर निकालूं क्या?”

मैंने कहा, “नहीं मम्मी, चूस कर नहीं, आज मेरा भी फुद्दी चोदने का ही मन है। मम्मी मैं लेटता हूं, आप चढ़ो मेरे लंड पर और अपनी मन मर्जी की चुदाई करो उस दिन की तरह। बड़ा मजा आता है जब आप मेरी लंड पर बैठ ऊपर-नीचे होती हो।”

मम्मी बोली, “ठीक है धीरज, चल फिर लेट जा आज मैं ही देती हूं तुझे मजा – निकालती हूं तेरे लंड की मलाई।”

में बिस्तर पर लेट गया। मेरा लंड सीधा खड़ा था। मम्मी आयी और टांगें मेरे दोनों तरफ करके मेरे लंड पर बैठ गयी और बिना एक भी सेकंड गंवाए ऊपर-नीचे होने लगी। मम्मी बीच-बीच में पूरी उठ जाती थी – पूरा लंड मम्मी की फुद्दी में से बाहर निकल जाता था और फिर मम्मी झटके के साथ लंड पर बैठ जाती थी। जब मम्मी ऐसा करती थी, तो मेरे लंड का आगे का हिस्सा मम्मी की फुद्दी में किसी नरम सी चीज़ से टकराता था। शायद मम्मी की फुद्दी का आखिर का हिस्सा था नरम-नरम नाजुक-नाजुक।

जो भी था इस तरह की चुदाई में भी मुझे मजा बहुत आ रहा था। ऊपर-नीचे होते हुई मम्मी के मम्मे भी ऊपर-नीचे हो होते थे। बड़ा ही मस्त सेक्सी सीन बन रहा था।
मैंने पहले ही की तरह अपनी मम्मी के मम्मे पकड़ लिए और मम्मों के निप्पल मसलने लगा। मम्मी को अब मजा आने लगा था। मम्मी ने हाथ नीचे करके उंगली से अपनी चूत का दाना रगड़ना शुरू कर दिया। मम्मी के मुंह से मजे की सिसकारियां निकलने लगी।

मम्मी अब पूरी तरह से चुदाई में मस्त हो चुकी थी और उनके मुंह से ऊंची-ऊंची आवाजें निकल रहीं थी, ”आह धीरज बेटा मजा आ गया, बड़ा मजा आए रहा है धीरज मुझे। आह क्या मस्त लौड़ा है धीरज तेरा, क्या मस्त चुदाई हो रही है आज। आह धीरज बस बेटा मेरी फुद्दी पानी छोड़ने ही वाली है।”

मैं नीचे लेटा था और मम्मी मेरे लंड पर छलांगें लगाते-लगाते कुछ भी बोल रही थी।

मस्ती में फुद्दी का दाना रगड़ती हुई मम्मी जोर-जोर से ऊपर-नीचे होने लगी। ऊपर-नीचे होते हुए मम्मी बोल रही थी, “आअह धीरज पूरा अंदर तक जा रहा है तेरा मस्त लंड। बस धीरज अब निकलेगा, आह… ओह… आह…‌ ले बेटा निकल गया, छोड़ गयी मेरी फुद्दी पानी। आह धीरज, पूरा अंदर तक जाता है तेरा लम्बा लंड बेटा। ऐसे ही चोदते रहना बेटा अपनी मम्मी को। क्या मस्त चुदाई करता है तू बेटा, आह धीरज, आह आह, इतना मजा भी आता है चुदाई का?”

मम्मी अभी भी ऊपर-नीचे हो रही थी, और तभी मेरे लंड से भी गर्म-गर्म मलाई निकल कर मम्मी की फुद्दी में जाने लगी। मजे के मारे मेरे चूतड़ अपने आप ही ऊपर-नीचे होने लगे और मेरे मुंह से भी निकला, “लो मम्मी निकला मेरा भी आपकी फुद्दी में। मजा आ गया मम्मी आज तो – मस्त मजा दिया आपने मेरा लंड अंदर लेकर। आह मम्मी लो, अभी भी निकल रहा है मेरे लंड में से। आह मम्मी निकल रहा है, जा रहा है आपकी फुद्दी में। आह मम्मी, आह मम्मी।” मुझे तो जैसे उस वक़्त जन्नत का मजा आ रहा था।

हम दोनों को मजा आ चुका था। ढीली पड़ी मम्मी अभी भी मेरे लंड पर ही बैठी हुई थी। कुछ देर के बाद मम्मी मेरे के लंड से ऊपर उठी और नीचे हाथ कर के अपनी चूत की फांकें चौड़ी कर दी। मेरे लंड की मलाई मम्मी की फुद्दी से निकल कर मेरे लंड पर और मेरे टट्टों पर टपकने लगी।

मम्मी मेरे ऊपर से उतरी और झुक कर मेरा लंड चाटने लगी। मम्मी ने चाट-चाट कर पूरी तरह से मेरा का लंड और टट्टे साफ़ कर दिए, मजा ही आ गया।

मेरा लंड साफ़ करके ममी मेरे ऊपर से उत्तरी, और मैं उठा और बाथरूम चला गया। लंड की धुलाई करके वापस आया और कपड़े पहन कर अपनी मम्मी से बोला, “मम्मी अब मैं अपने कमरे में चलता हूं। आज तो दिव्या भी यहीं है।”

जाने से पहले मैंने मम्मी को बाहों में लिया, मम्मी के होंठ जरा से चूसे और बोला, “मेरी प्यारी मम्मी, बड़े ही मस्त चुदाई करवाती हैं आप – मस्त मजा आता है आपको चोदने में। आज जैसे चुदाई का मजा तो मुझे आज तक नहीं आया।”

मम्मी को छोड़ मैं अपने कमरे के तरफ जाने लगा तो देखा कमरे का दरवाजा अंदर से बंद ही नहीं था।‌

मेरी और मम्मी की चुदाई में मेरी बहन दिव्या की एंट्री-

चुदाई की थकान से सुबह मैं लेट उठा। बाहर आया तो दिव्या डाइनिंग टेबल पर बैठी चाय पी रही थी। पापा मम्मी के कमरे का दरवाजा खुला था मगर मम्मी अंदर नहीं थी। मैंने दिव्या से पूछा , “दिव्या मम्मी कहां है?”

दिव्या बोली, “मम्मी मंदिर गयी है। बोल कर गयी है एक घंटे में आएगी।”

फिर दिव्या उठी और बोली, “मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं।”

दिव्या चाय बना लाई और मेरे सामने बैठ गयी। कुछ देर हम दोनों में से कोइ भी कुछ नहीं बोला।

फिर दिव्या बोली, “धीरज एक बात पूछूं?”

मैंने कहा, “पूछो दिव्या क्या बात है।”

दिव्या बोली, “धीरज तुम कल रात को मम्मी के कमरे में क्या कर रहे थे?”

जैसे ही दिव्या ने ये कहा – ये सुन मेरी तो जैसे गांड फट गयी। मेरे के मुंह से एक मिनट के लिए तो आवाज ही नहीं निकली।

हकलाते हुए मैंने ने कहा, “मम्मी के कमरे में? मैं? नहीं तो।”

दिव्या हंसते हुए बोली, “अब छोड़ो धीरज। मैंने बहुत कुछ देख सुन लिया है। तुम और मम्मी क्या-क्या कर रहे थे मुझे मालूम है। अब बच्ची भी नहीं हूं मैं, और ना ही फुद्दू। सब समझ है मुझे क्या गुल खिला रहे थे तू और मम्मी?”

मैंने उसी घबराहट में पूछा, “क्या? क्या कर रहा था, क्या देखा तुमने?”

इसे बाद तो दिव्या ने मुझे बताया उससे तो मेरा दिमाग ही घूम गया।

“यही कि तुम मम्मी के बिस्तर पर लेटे हुए थे – बिना कपड़ों के, और मम्मी तुम्हारे ऊपर बैठी हुई, ऊपर-नीचे हो रही थी। क्या मतलब है इसका? क्या ये भी मैं ही बताऊं कि मम्मी ऊपर-नीचे होते हुए क्या कर रही थी? साफ़-साफ़ बताओ मुझे ये क्या चल रहा है तुम्हारे और मम्मी के बीच और कब से चल रहा है?”

मैं समझ गया कि रात दिव्या ऊपर आयी होगी और कमरे का दरवाजा तो अंदर से बंद ही नहीं था और दिव्या ने मेरी और मम्मी की चुदाई देख ली थी। अब छुपाने से कोइ फायदा नहीं था।

हिम्मत करके मैंने दिव्या से पूछा, “दिव्या तुम ऊपर क्या करने आयी थी?”

दिव्या बोली, “मैंने तो ऊपर आना ही नहीं था। वो तो मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैंने टीवी लगाया हुआ था और मेरे कमरे का दरवाजा भी बंद नहीं था। आधी रात को जब मुझे नींद सी आई तो मैंने टीवी बंद किया और बाहर का दरवाजा चेक करने गयी की देखूं कुंडी लगी है या नहीं।”

“तभी मुझे ऊपर से कुछ आवाजें आती सुनाई दी। मैं ऊपर गयी – ये देखने कि ये आवाजें क्या हैं।”

“देखा तो आवाजें मम्मी के कमरे में से आ रही थी। मैंने तुम्हारे कमरे का दरवाजा खोला, तो देखा तुम कमरे में नहीं थे।”

“मैंने मम्मी के कमरे का दरवाजा जरा सा धकेला देखा तो वो खुला हुआ था। अंदर छोटा बल्ब जल रहा था।”

“मम्मी तुम्हारे ऊपर बैठी हुई थी और तुमने मम्मी के मम्मे पकड़े हुए थे। मम्मी का एक हाथ नीचे था और मम्मी अपनी ये नीचे वाली में – मतलब फुद्दी में, कुछ उंगली सी कर रही थी। मम्मी तुम्हारे इस पर (दिव्या मेरे लंड की तरफ इशारा करके बोली) तुम्हारे लंड पर बैठी ऊपर-नीचे हो रही थी। तभी मम्मी जोर से चिल्लाई थी, ”आह धीरज बेटा मजा आ गया, बड़ा मजा आ रहा है धीरज मुझे। आह क्या मस्त लौड़ा है धीरज तेरा, क्या मस्त चुदाई हो रही है आज। आह धीरज बस बेटा मेरी फुद्दी पानी छोड़ने ही वाली है।”

“धीरज और भी पता नहीं मम्मी क्या-क्या बोल रही थी। मम्मी की बातें सुन कर तो मेरा दिमाग ही घूम चुका था। और धीरज ये तो मैंने साफ़ सुना। धीरज, ये सब करते हुए और बोलते हुई मम्मी चीखी ही इतनी जोर से थी।”

फिर दिव्या बोली, “और भोसड़ी के धीरज, तुम ही कौन से कम थे। नीचे लेटे तुम भी तो जोर-जोर से अपने चूतड़ ऊपर-नीचे कर रहे थे और तुम्हारे मुंह से भी निकल रहा था, “लो मम्मी निकला मेरा भी आपकी फुद्दी मैं। मजा आ गया मम्मी आज तो – मस्त मजा दिया आपने मेरा लंड अंदर लेकर, आह मम्मी लो, अभी भी निकल रहा है मेरे लंड में से, आह मम्मी निकल रहा है, जा रहा है आपकी फुद्दी में। आह मम्मी, आह मम्मी।”

दिव्या बोल रही थे, “अब बताओ धीरज, मम्मी को नंगी होकर तुम्हारे ऊपर बैठ कर कौन सा मजा आना था, और तुम भी तो बिना कपड़ों के ही लेटे हुए थे।”

और फिर दिव्या बोली, “और बेटा धीरज, तुम दोनों मां-बेटे का खेल यह खत्म नहीं हुआ। कुछ देर के बाद मम्मी तुम्हारे लंड से जरा सी ऊपर उठी और नीचे हाथ करके मम्मी ने अपनी फुद्दी में कुछ-कुछ किया और फिर झुक कर तुम्हारा लंड चाटने लगी।”

मैं समझ गया वो मम्मी का मेरा लंड चाटने का सीन था जो मम्मी ने देख लिया था।

दिव्या हंसते हुए बोली, “अब धीरज, अब ये भी बताऊं मम्मी ने नीचे हाथ करके क्या किया होगा और तुम्हारे लंड से क्या चाटा होगा?”

“तुम्हारा और मम्मी का ड्रामा देख कर मेरी फुद्दी तो गर्म हो ही चुकी थी। मेरा मन कर कहा था अभी ककी अभी फुद्दी मैं उंगली डाल लूं। फिर भी मैं खड़ी ही रही, ये देखने की लिए कि देखूं अब क्या होता है, अब क्या करोगे तुम दोनों मां बेटा?”

“तुम बाथरूम चले गए और मम्मी ने उठ कर कपड़े पहन लिए। फिर तुम बाथरूम से बाहर आए और मम्मी को बाँहों में कर मम्मी के होंठ चूसे और फिर कुछ ऐसे बोले, “मेरी प्यारी मम्मी, बड़ी ही मस्त चुदाई करवाती हैं आप – बड़ा ही मस्त मजा देती हैं आप।”

मैं चुप-चाप दिव्या को देख रहा था। दिव्या बोली, “इसके बाद जैसे ही तुम दरवाजे की तरफ आने लगे तो मैंने हल्के से दरवाजा बंद किया और नीचे आ गई – अपने कमरे में।”

“तुम्हारी और मम्मी की ये उठा-पटक देख कर मेरी फुद्दी गीली हो चुके थी। मैं नीचे अपने कमरे में गयी और किसी तरह फुद्दी में उंगली डाल कर फुद्दी का पानी छुड़ाया और सो गई।”

दिव्या को तो सब कुछ ही पता चल गया था। दिव्या ने तो सब कुछ ही देख लिया था। मगर मेरी असली परेशानी ये थी कि अब में दिव्या को बोलूं भी तो क्या बोलूं। क्या कहूँ दिव्या से कि मैं मम्मी की चुदाई क्यों कर रहा था। मैं परेशान सा सोच रहा था उसे मम्मी के साथ इतना कुछ करते दिव्या ने देख लिया था, अब क्या दिव्या करेगी? दिव्या की बातों से में परेशान हो चुका था, मगर दिव्या इतना कुछ जान कर भी नार्मल थी।

दिव्या बोली, “धीरज, मम्मी चुदाई के लिए पूरी तरह से फिट है। चवालीस की उम्र ऐसी भी नहीं होती कि फुद्दी लंड ही ना मांगे। सीधी सी बात जो मुझे समझ आ रही है अगर मम्मी ने तुम से चुदाई करवाई है तो इसका एक ही कारण मुझे समझ आ रहा, और वो ये कि पापा मम्मी को चोद नहीं पा रहे होंगे। वरना मम्मी ऐसी नहीं कि अपने बेटे से ही चुदाई करवा ले l

दिव्या बड़ी ही समझदारी वाले बातें का रही थी। मगर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं आखिर कहूं भी तो क्या कहूं। मुझे यूं गुमसुम बैठे देख गुमसुम चुप देख कर दिव्या ही बोली, “क्या हुआ धीरज तुम इतने चुप और परेशान क्यों हो। चोद दिया तो चोद दिया अब क्यों तुम्हारी फटी पडी है? मैं मम्मी कि चुदाई के लिए तुम्हें दोष थोड़े ही दे रही हूं।”

मैं फिर भी चुप रहा। बोलता भी तो क्या बोलता? जब काफी देर तक में कुछ नहीं बोला, तो दिव्या ही बोली, “धीरज इतना भी मत सोचो मेरे भाई। जो हो रहा है ठीक हो रहा है। जैसा चल रहा है चलने दो। कहीं ऐसा ना हो मम्मी अपनी फुद्दी की आग बुझाने के लिए किसी बाहरी मर्द से चुदाई करवा ले।

फिर दिव्या जो बोली, उसने तो धीरज के होश ही उड़ा दिए। दिव्या बोली, “धीरज चलो छोड़ो, अब मुझे एक बात बताओ। चवालीस साल की मम्मी को तुम चोद रहे हो, जिसकी तो फुद्दी भी अब चुदाई करवा करवा कर दो-दो बच्चे पैदा करके तक खुल चुकी होगी। और धीरज जिस तरीके से नीचे लेटे तुम बोल रहे थे, इसका मतलब मम्मी की ऐसे ढीली-ढाली फुद्दी चोदने का मजा तुम्हें भी आ ही रहा था।”

दिव्या इसके बाद कुछ चुप हुई और फिर बोले, “धीरज मम्मी की आधी उम्र से भी कम उम्र की लड़की की फुद्दी चोदोगे? एक दम कुंवारी, टाइट फुद्दी, सील बंद। किसी भी लड़के का लंड फुद्दी के अंदर नहीं गया – फुद्दी के अंदर क्या किसी लंड ने उस फुद्दी को अब तक छुआ तक नहीं। बोलो? बोलो चोदोगे? बिलकुल कुंवारी सील बंद फुद्दी है, मजा आ जाएगा ऐसी टाइट फुद्दी में लंड डालने का और टाइट फुद्दी चोदने का।”

मैं हैरान-परेशान तो पहले ही था, दिव्या की बात सुन कर मेरी हैरानी और बढ़ गयी। मैंने दिव्या से पूछा, “मम्मी की उम्र से आधी से भी कम उम्र की लड़की, एक दम कुंवारी सील बंद, टाइट? किसकी दिव्या? किसकी फुद्दी?”

दिव्या बोली, “अबे गधे चूतिये धीरज, फुद्दी तो तुम्हारे सामने बैठी है। तुम्हारी बीस साल की जवान बहन दिव्या l मेरी फुद्दी, धीरज मेरी फुद्दी। अब तक बिलकुल अनछुई है, बिलकुल कुंवारी सील बंद – एक-दम टाइट होगी।”

फिर दिव्या अपनी फुद्दी को छू कर बोली, “धीरज लंड डालोगे इसमें तो मजा आ जाएगा तुम्हें, लंड रगड़ कर जाएगा अंदर। ऐसी कुंवारी फुद्दी चोदने लिए तो मर्द तरसते हैं और चुदाई के लिए लाखों खर्च करने तक भी तैयार हो जाते हैं। मैं तो अपनी कुंवारी फुद्दी तुम्हें प्लेट में सजा कर दे रही हूं। बोलो चोदोगे?”

दिव्या ने मेरी और मम्मी की चुदाई देख ली थी और अब दिव्या मुझ से चुदाई करवाना चाहती थी। दिव्या ने साफ़ ही बोल दिया, “धीरज लंड डालोगे इसमें तो मजा आ जाएगा तुम्हें, लंड रगड़ कर जाएगा अंदर। ऐसी कुंवारी फुद्दी चोदने लिए तो मर्द तरसते हैं और चुदाई के लिए लाखों खर्च करने तक भी तैयार हो जाते हैं। में तो अपनी कुंवारी फुद्दी तुम्हें प्लेट में सजा कर दे रही हूं। बोलो चोदोगे?”

मेरी घिग्गी तो बंधी ही हुई थी। मेरे मुंह से तो पहले ही आवाज नहीं निकल रही थी, मैंने हकलाते हुए पूछा, “मगर दिव्या तुम्हारी फुद्दी, और मैं? ये कैसे दिव्या, ये क्या कह रही हो?”

दिव्या वैसे ही बोली, “क्यों धीरज मेरी फुद्दी में क्या है? जब अपनी मम्मी की फुद्दी तुम चोद रहे हो, तो फिर मेरी – अपनी बहन की फुद्दी क्यों नहीं चोद सकते? पहले मम्मी और अब बहन। और फिर धीरज मम्मी की फुद्दी में तो तुम्हारा लंड फिसल कर चला गया होगा। मेरी फुद्दी में लंड डालने के लिए तो तुम्हें थोड़ी बहुत मेहनत भी करने पड़ेगी – रगड़ कर जाएगा लंड फुद्दी में। चुदाई का असली मजा मिलेगा तुम्हें मुझे चोदने में। मैंने अब तक चुदाई नहीं करवाई, मगर इतना तो मुझे पता ही है कि कुंवारी फुद्दी में लंड कैसे जाता है, और चुदी हुई फुद्दी में कैसे जाता है।”

दिव्या की इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। दिव्या की बात तो ठीक ही थी। अपनी मम्मी की फुद्दी तो में चोद ही रहा था, और वो भी अच्छी खासी चुदी हुई फुद्दी, तो फिर कुंवारी फुद्दी चोदने में इतना क्या सोचना?”

लेकिन में अब भी चुप ही था। तभी दिव्या उठी और उठ कर मेरे पास आ गयी। दिव्या बोली, “धीरज, अब यार ज्यादा सोचो मत। तुम्हारी और मम्मी की चुदाई का “लाइव शो” देख कर मेरी फुद्दी ठंडी ही नहीं हो रही। अब इसे लंड चाहिए, और हर हाल में चाहिए, आज ही, अभी के अभी।”

मेरे सामने खड़े हो कर मेरी गालों को हाथों में लेकर दिव्या बोली, “चलो मेरे भाई, जरा अपना लंड दिखाओ। अब तक पोर्न फिल्मों – चुदाई की फिल्मों को छोड़ कर किसी मर्द का लंड नहीं देखा। मैं भी तो देखूं, ऐसा भी क्या है तेरे लंड में कि मम्मी इतनी चीख-चीख कर चुदाई करवा रही थी। आज तुम्हारा लंड जरूर देखूंगी।”

में हैरान परेशान सा बैठा था कि ये आज हो क्या रहा था। मुझे हिलता ना देख कर दिव्या बोली, “लगता है मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।” ये बोल कर दिव्या ने मेरे पायजामे का नाड़ा पकड़ा और खोलने लगी।

दिव्या की बातों से मेरा लंड हरकत तो करने ही लगा था। मुझे लगा कि अब कोइ चारा नहीं। दिव्या उसकी और मम्मी की चुदाई देख चुकी है, चुदाई के दौरान हुई मेरी और मम्मी की “ऐसी ऐसी बातें” सुन चुकी है – यहाँ तक की दिव्या उससे से भी कई सारी लंड, फुद्दी जैसी बातें बोल चुकी थी। मैं समझ गया कि अब कुछ नहीं हो सकता। मेरे सामने दिव्या की बात मानने के अलावा कोइ रास्ता नहीं था।

कोइ और चारा ना देख में खड़ा हुआ और बोला, “मैं करता हूं दिव्या, और मैंने अपने पायजामे का नाड़ा खोल दिया। पायजामा नीचे ढलक गया। मेरा का आधा खड़ा हुआ छह इंच का लंड दिव्या बड़े ही ध्यान से देख रही थी। तभी दिव्या ने अपने छोटे से नरम हाथ में मेरा लंड पकड़ लिया।

दिव्या की नाजुक नाजुक उंगलियों ने जैसे ही मेरा लंड को छुआ, दिव्या की सील बंद कुंवारी फुद्दी मेरी आंखों की आगे घूम गयी। दिव्या की फुद्दी का ध्यान आते ही मेरा लंड दिव्या के हाथ में एक-दम ही खड़ा हो गया।

दिव्या लंड को ध्यान से देखते हुए बोली, “ओह माय गॉड, इतना बड़ा लंड? इतना बड़ा लंड भी होता है? और धीरज कितना मोटा कितना सख्त और गर्म है ये?”

और दिव्या ने इतना कहते ही मेरा का लंड को मुंह में ले लिया। दिव्या की मुंह में लेते ही मेरा लंड एक-दम और भी सख्त हो गया।

दिव्या ने लंड मुंह में से निकाला और बोली, “धीरज मेरी फुद्दी में डालोगे अभी? सच में धीरज, बहुत मन कर रहा है फुद्दी में डलवाने का। मेरी फुद्दी तो गीली भी हो चुकी है।”

मैंने दिव्या से कहा, “फुद्दी में, अभी? लेकिन अभी कैसे होगा दिव्या? दिव्या सीधी सादी फुद्दी चोदने में भी आधा पौना घंटा लगता है – मतलब बिना लंड चूसे, बिना फुद्दी चूसे सीधा लंड फुद्दी में डालने से चुदाई का क्या मजा आएगा, और फिर मम्मी के आने का खटका? ऐसी चुदाई में मजा नहीं आएगा दिव्या – मैं अपने मजे की नहीं तुम्हारे मजे की बात कर रहा हूं। तुमने पहली बार फुद्दी में लंड लेना है, पहली बार चुदाई करवानी है। तुम्हें तो पूरा मजा आना चाहिए। वो मजा तभी आएगा दिव्या, जब बिना किसी डर के बिना जल्दबाजी के चुदाई हो। दिव्या अगर तुमने मुझसे चुदाई करवानी ही है तो मैं वादा करता हूं, तुम्हारी मस्त चुदाई कर दूंगा। ऐसी चुदाई जिससे तुम्हारी और तुम्हारी फुद्दी की पूरी तसल्ली हो जाएगी। चुदाई का मजा आ जाएगा तुम्हे।”

दिव्या बोली, “लेकिन धीरज, अभी मैं क्या करूं? मेरी फुद्दी तो गरम हुई पड़ी है, मजा चाहिए इसे – अभी, इसी वक़्त।”

अपनी छोटी बहन दिव्या को इस तरह की बातें करते देख मुझे शर्म सी भी आ रही थी। मगर जिस तरह अपनी नाजुक नाजुक उँगलियों में दिव्या ने मेरा लंड पकड़ा था, मुंह में लिया था, अब तो मैं भी दिव्या की कुंवारी फुद्दी चोदने का मजा लेना चाह रहा था।

मैंने कहा, “चल दिव्या, अभी तो मैं तेरी फुद्दी चूस कर तुझे मजा दे देता हूं – चुदाई जब भी मौक़ा मिला तब कर दूंगा। चल सलवार उतार और लेट जा इस डाइनिंग टेबल पर।”

दिव्या सलवार का नाड़ा खोल रही थी, कि मैंने दिव्या से पूछा, “दिव्या नीचे दरवाजे की कुंडी लगी हुई है या नहीं, ऐसा ना हो, मेरा मुंह तेरी फुद्दी में हो और मम्मी आ जाए।”

दिव्या बोली, “धीरज, दरवाजा अंदर से मैं बंद करके आयी हूं, बस तुम अब देर मत करो।”

दिव्या ने सलवार उतारी और उछल कर डाइनिंग टेबल पर टांगें उठा कर लेट गयी। मैं खड़ा था और दिव्या की फुद्दी बिल्कुल मेरे लंड के सामने थी। एक बार तो मेरा का मन किया, डाल ही दूं दिव्या की कुंवारी फुद्दी में लंड, ले ही लूं दिव्या की कुंवारी फुद्दी चोदने का मजा। मगर फिर मैंने सोचा, जब दिव्या ने चुदाई करवाने के लिए तैयार ही थी, तो फिर तसल्ली से ही चुदाई करने चाहिए। पूरा मजा लेना चाहिए टाइट, सील बंद फुद्दी में लंड डालने का।

मैं कुर्सी पर बैठ गया और दिव्या के फुद्दी को देखने लगा। दिव्या की फुद्दी सच में ही चुदी हुई नहीं थी। फुद्दी कि फांकें एक-दम आपस में जुड़ी हुई थी – बस एक लाइन सी दिखाई दे रही थी – मम्मी की फुद्दी की तरह हल्की खुली हुई नहीं थी। फुद्दी के ऊपर हल्की भूरे रंग कि नरम मुलायन झांटें थी। दिव्या कि दूधिया सफ़ेद सफ़ेद जाँघे, और जांघों के बीच कुंवारी फुद्दी – फुद्दी क्या थी सिर्फ एक लाइन सी थी – अनछुई, कुंवारी। मुझे तो फुद्दी देखने में ही बहुत मस्ती आ रही थी।

मैंने दिव्या कि फुद्दी कि फाकें खोली और जुबान से दिव्या कि फुद्दी चूसने-चाटने लगा। दिव्या मेरी ये चुसाई पांच मिनट भी नहीं झेल पायी और मेरा सर अपने फुद्दी पर दबाते हुई बोली, “ओह धीरज ये क्या हुआ यार, मझे तो मजा भी आने वाला है।”

फिर चूतड़ घुमाते हुए दिव्या बोली, “ओह धीरज निकल गया – ओह गॉड, ऐसा मजा?” और जल्दी ही दिव्या ढीली हो गयी।

मैंने अपना मुंह दिव्या की गीली फुद्दी में से निकाला और खड़ा हो कर दिव्या को भी खड़ा कर दिया। दिव्या ने सलवार पहन ली और सलवार पहनते पहनते बोली, “धीरज ये तो बड़ा मजा आता है, ये फुद्दी चुसाई तो मैं और माधवी भी आपस में करती हैं, मगर ऐसा मजा कभी नहीं आया। आज तो मजा ही अलग सा आया है। जब तुम मेरी फुद्दी चूस रहे थे, तो मेरी आंखों की आगे तुम्हारा लंड घूम रहा था – शायद इसलिए भी ज्यादा मजा आया है।”

मैंने कहा दिव्या, “लड़की-लड़की की फुद्दी चुसाई और लड़की-लड़के की फुद्दी चुसाई में फर्क तो होता ही है।”

दिव्या की फुद्दी चूसने बाद अब मेरी शर्म अब खत्म हो चुकी थी। मैंने अपना सख्त हुआ पड़ा लंड पकड़ कर कहा, “दिव्या जब इसे अपनी फुद्दी में डलवा कर चुदाई करवाओगी, तब पता चलेगा चुदाई का असली मजा क्या होता है। फुद्दी के असली मजे का पता तो तब चलेगा।”

दिव्या मेरे के सामने कुर्सी पर बैठ गयी और कुछ सोचने लगी। फिर दिव्या बोली, “धीरज अभी अप्रैल चल रहा है। मई जून में तुम्हारा तीसरा साल पूरा होने वाला है। तब तुम्हारी लम्बी छुट्टियां होंगी। उन्हीं दिनों मम्मी-पापा किसी ग्रुप के साथ तीर्थ पर जाने का प्रोग्राम बना रहे हैं। दस-बारह दिनों का प्रोग्राम है। तुम तो यहां ही होंगे।
मैं रोहिणी से माधवी को भी बुला लूंगी। उसकी फुद्दी भी अब तक मेरी फुद्दी की तरह कुंवारी है। किसी लड़के का लंड नहीं गया उसमें भी। अब तक फुद्दी की सील नहीं टूटी। दस-बारह दिन तुम हम दोनों की खूब चुदाई करना। खुद भी मजे लेना, और हमें भी मजे देना।”

ये बोल कर दिव्या उठी और बोली, “चलूं नीचे दरवाजा खोलूं मम्मी के आने का टाइम होने वाला है।” और फिर दिव्या बोली, “और हां धीरज, मम्मी आज भी पक्का चुदाई करवाएगी तुमसे। आज कमरे का दरवाजा खुला रखना। पूरी चुदाई देखूंगी तुम्हारी और मम्मी की – “लाइव शो।”

अब तो मुझे भी दिव्या के बातें सुन-सुन कर मस्ती आने लगी थी। मैंने कहा, “दरवाजे को छोड़ो दिव्या, खिड़की डाइनिंग हाल की तरफ वाली खिड़की खुली रखूंगा, वो बंद ही रहती है, उसकी तरफ किसी का ध्यान भी नहीं जाता। वो है भी बेड की साइड की तरफ। बढ़िया से सब दिखाई देगा। कोशिश करूंगा आज की चुदाई में लाइट भी जलती रहे। अगर चुदाई देखने का मजा लेना ही है तो फिर पूरी तरह से लो। मगर दिव्या, अगर तुम्हारी फुद्दी गरम हो गयी तो फिर क्या करोगी?”

दिव्या बोली, “अगर-मगर क्या धीरज, सामने चुदाई होती देख कर फुद्दी तो गर्म होगी ही होगी। मैं और माधवी जब कम्प्यूटर पर पोर्न – चुदाई की फिल्में देखती हैं, हमारी फुद्दीयां तो तब भी गर्म हो जाती हैं, ये तो चुदाई फिर सामने हो रही होगी।”

मैंने कहा, “तो फिर क्या करोगी? उंगली से काम चलाओगी?”

दिव्या बोली, “नहीं धीरज, उसके लिए मेरे पास एक पतला सा रबड़ का लंड है बढ़िया मजा देता है। माधवी भी ऐसे ही एक लंड से काम चलाती है। इन्हें हम चूत में भी डालती है और गांड में भी।”

मैं हैरान था कि ये आज कल की लड़कियां क्या-क्या करती हैं।

मैंने कहा, “तो दिव्या उस रबड़ के लंड से फुद्दी की सील नहीं टूटती?”

दिव्या बोली, “अरे धीरज सील का मतलाब ये थोड़े ही होता है कि फुद्दी के छेद पर कोइ ढक्कन लगा होता है, कोइ कुंडी ताला लगा होता है। लड़कियां उंगली भी तो डालती ही हैं फुद्दी में। फुद्दी की सील का मतलब होता है कि फुद्दी का छेद – जहां से फुद्दी शुरू होती है – कुंवारी, बिना चुदी हुई फुद्दी का छेद वहां से बहुत छोटा होता है और फुद्दी के छेद के आस-पास पतली सी झिल्ली होते है। जब सख्त मोटा लंड पहली पहली बार फुद्दी में जाता है तो फुद्दी का छेद वहां से एक-दम से खुल जाता है और ये पतली झिल्ली टूट जाती है, जिससे उससे उसमें दर्द भी होता है और कई बार खून भी निकलता है।”

“जिस रबड़ के लंड नहीं मैं बात कर रही हूं इतना मोटा नहीं है कि वो झिल्ली ही तोड़ दे। उंगली से जरा सा ही मोटा है, मगर लम्बा छह इंच का है, फुद्दी के अंदर तक चला जाता है। हमारी फुद्दियों की सील तो अब तुम्हारा ये हाथी की सूंड जैसा लंड ही तोड़ेगा – छुट्टियों में। ये बोल कर दिव्या जाने के लिए मुड़ी, और हँसते हुए नीचे जाने लगी।

तभी जैसे दिव्या को कुछ याद आ गया। दिव्या मेरे पास आयी और मेरे होंठों को चूमते हुए बोली, मेरा प्यारा भाई, मम्मी का प्यारा बेटा। क्या मस्त लौड़ा है धीरज तेरा, मेरी आँखों के आगे से हट ही नहीं रहा।

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