सोकर उठा तो रात के बारह बजे थे. मैं पाँच घंटे सोया था! बाकी सब पहले ही
जाग गये थे. सब वैसे ही नंगे किचन मे चाय पीते हुए गॅप शॅप कर रहे थे.
मैं भी पहुँचा. कुछ सीरियस बात हो रही थी. मा का चेहरा थोड़ा लाल था,
जैसे शरम से नववधू का होता है. मुझे देखकर शशिकला बोली “आओ
भैया, तुम्ही से बात कर लेते है, अब तुम्हारी मा का और तो कोई है नही, आख़िर
शादी ब्याह का मामला है”
मैं चकरा गया. उसकी ओर देखने लगा. मा बोल पड़ी “शशि कितनी बदमाश
है तू, उससे क्यो पूछती है, वो बेचारा तो कितना छोटा है अभी”
“हमारे काम लायक बड़ा तो है मा, तुम्हारा काम कर रहा है साल भर से, कल
रात से जुटा है, हमारा भी खूब काम किया है” शशिकला ने चुटकी ली. मा
चुप रही, मेरी ओर देख कर हंस दी. वैसे मन मे बहुत खुश लग रही थी.
“बात यह है अनिल कि डॅडी तुम्हारी मा पर इतने फिदा है कि कहते है मैं तो
शादी करूँगा इनसे. मैं भी यही चाहती हू, जब से मम्मी को देखा है मेरी
मा की याद आती है. वह भी मुझे ऐसे ही प्यार करती थी. और अब मा के साथ
मुझे एक प्यारा भाई मिल जाएगा जिसे मैं खूब सताया करूँगी” शशिकला बोली.
मैं चकरा गया. खुश भी हुआ. मा की शादी, वो भी इतने बड़े परिवार मे! इस
खूबसूरत मर्द के साथ! पर कुछ समझ मे नही आया. मैने पूछा “पर दीदी,
शादी क्यो? मेरा मतलब है हम सब वैसे ही आनंद उठा रहे है, मा ने तो
नही कहा कि शादी करो, तभी चोदने दूँगी. वो तो वैसे ही चुदवाने को तैयार
है”
अशोक अंकल बोले “हां, तू सच कहता है अनिल, पर तेरी मा को मैं पूरी अपनी कर
लेना चाहता हू. इनके इस रूप को मैं नही दूर कर सकता, मुझे ये हमेशा साथ
चाहिए. मैं जहा भी जाउन्गा इन्हे ले जाउन्गा. बिना शादी के यह मुमकिन नही
होगा. तुम चिंता न करो, तुम्हारे सुख पर कोई आँच नही आएगी. मा तुम्हारी ही
रहेगी. हम सब एक बड़े प्यारे परिवार जैसे रहेंगे.”
मा बोली “मेरे मन मे भी यही था. तू मान गया मेरे दिल का बोझ उतर गया.
असल मे इस अशोक ने मुझे कल रात ऐसा चोदा की ये मेरा गुलाम होने के बजाय
लगता है मैं ही इसकी गुलाम हो गयी.”
शशिकला बोली “अब गान्ड मरवा लो मम्मी, अब कोई हर्ज नही है, आख़िर तुम्हारे
होने वाले पति है मेरे डॅडी. अपने पति को उसका हक तो देना पड़ेगा. यही मैं
डॅडी से कह रही थी कि मम्मी से शादी करो तभी मिलेगी उसकी यह गोरी गुदाज
गान्ड . ये इतने फिदा है तुम्हारी गान्ड पर कि झट से तैयार हो गये, सिर्फ़ तुम्हारी
गान्ड पाने को.”
अशोक अंकल ज़मीन पर बैठ गये और मा का एक पैर अपने सीने से लगा लिया
“प्लीज़ रीमाजी, मान जाइए, मैं आप के चरणों का गुलाम बन कर रहूँगा. इतने
खूबसूरत चरण, इनके लिए तो मैं कुछ भी करूँगा” और मा के पैरों को वे
चूमने लगे.
मा शरमा कर पैर हटाने लगी “अरे यह क्या कर रहे हो अशोक,
उठो, मैने कहा तो कि मैं तैयार हू”
शशिकला हँसने लगी “अरे चूमने दो दीदी, ये तो कब से करने को मरे जा
रहे है, पैरों की फेटिश है इन्हे, खूबसूरत पैर देखे कि फिदा हो जाते है,
तुम्हारे रूप के साथ साथ तुम्हारे इन हसीन पैरों का भी तो मैं दीवाना हूँ अशोक
माँ के पैरों के पास बैठ गया और उन्हे गोद मे लेकर सहलाने लगा. फिर अपने
गालों पर उन्हे सटा कर चुंबन लेने लगा.
शशिकला बोली “देखो कैसे दीवाने है दोनों, अब इन्हे
इनका इनाम देना चाहिए, है ना मम्मी, अब आएगा इस नशीली रात का मज़ा”
मेरा लंड आधा खड़ा हो गया था. उसमे बड़ी मीठी गुदगुदी हो रही थी पर दिन
भर चोद चोद कर लंड की जान निकल गयी थी, ठीक से तन्ना कर खड़ा नही हो
रहा था. यही हाल अंकल का था. उनका भी आधा खड़ा हो कर इधर उधर डोल रहा था
पर लोहे के डंडे जैसा नही खड़ा था जैसा कल रात मा को चोदते समय
खड़ा था.
अशोक अंकल के गालों को अपने पैरों के अंगूठे से सहलाते हुए मा ने बड़ी
शोखी से पूछा “सच मे मेरी गान्ड के दीवाने हो तुम अशोक? वैसे मुझे
मराना ज़्यादा अच्छा नही लगता, मेरा बेटा भी मारता है तो मुझे दुखता
है थोड़ा, काफ़ी टाइट है ना मेरा छेद, पर वह मुझे इतना प्यार करता है कि
उसके दिल की हर बात मैं पूरी करती हू. अब तुम मेरे पति बनाने वाले हो तो
तुम्हे भी प्यासा नही रखूँगी. पर एक बात कहे देती हू, पूरी गुलामी करवाउन्गि,
जो कहूँगी करना पड़ेगा, मेरी हर बात मानना पड़ेगी”
मा के तलवे चाटते हुए अशोक अंकल भाव विभोर होकर बोले “मम्मी, आंटी,
रीमाजी, मुझसे जो चाहे गुलामी करवा लो, बस इस खूबसूरत गान्ड को मुझे दे
दो”
मेरे मूह मे अपने पैरों की उंगलिया घुसेड़ते हुए शशिकला बोली “ले चूस
अनिल, ठीक से चूस, फिर न कहना कि दीदी ने स्वाद नही लेने दिया. पर मम्मी,
तुम्हारे इस टाइट छेद को खोल कर घुसने के लिए लंड मे मस्त ताक़त होनी
चाहिए, डॅडी के ऐसे आधे खड़े लंड के बस की बात नही है यह. अनिल, तेरा भी
ठीक से खड़ा करना पड़ेगा, नही तो मेरी गान्ड मे ये ऐसे ही पक पक करेगा,
तुझे भी मज़ा नही आएगा और मुझे भी नही.”
मा भी बोली “बात ठीक है बेटी पर अब क्या करे, बेचारे दोनों ने बहुत
मेहनत की है कल रात से. चलो इन्हे रात भर आराम कर लेने दो, सुबह
देखेंगे. वैसे अगर अशोक को मेरी मारनी है तो अभी मार ले, मुझे ज़रा आराम
मिलेगा, ऐसे नरम लंड से मुझे ज़्यादा तकलीफ़ भी नही होगी”
“सुबह क्यो दीदी, अभी आज रात मज़ा लेंगे हम. और गान्ड मारने का असली मज़ा
तो तभी है जब लंड कस के खड़ा हो. आख़िर तुम्हारी कुँवारी गान्ड है, बस अनिल
के इस प्यारे लंड से मरवाई हुई. मेरी मम्मी की गान्ड मारने वाला लंड पूरा
तना होना चाहिए. तकलीफ़ तो होगी मम्मी पर मज़ा भी आएगा. मुझे याद है
जब डॅडी ने मेरी मारी थी मा की मदद से, और तब मैं कितनी छोटी थी, मुझे
ऐसा लगा था जैसे लंड नही हाथ डाल दिया हो किसीने अंदर. मैं तो भाग जाती पर
मा ने पकड़ कर रखा था. मैं तो बेहोश हो गयी थी” शशिकला ने मा की
चूंची दबाते हुए कहा. वह अब काफ़ी मस्ती मे थी. मा की गान्ड मे अपने
डॅडी का मतवाला सोंटा घुसता देखने को वह बेताब थी.
मा घबरा रही थी पर उत्तेजित भी थी. होंठों पर जीभ फेरते हुए अशोक अंकल
के लंड को देख रही थी और कल्पना कर रही थी कि कैसा लगेगा जब वह अंदर
जाएगा. उसने एक बार और टालने की कोशिश की “पर बेटी, मैं यह चीज़ अशोक को
सुहागरात मे देना चाहती हू. आख़िर मेरा पति बनने वाला है और उसे कोई तो
कुँवारी चीज़ देनी चाहिए मुझे. चूत तो चोद चोद कर उसने अभी से ढीली
कर दी है.”
“उसकी फिकर मत करो दीदी. सुहागरात को नयी नयी करने जैसे बहुत सी बाते
होंगी” मेरी ओर कनखियों से देखकर शरारत से हँसती हुई वह बोली. “अब सब
नहाने चलो, ताजे तवाने हो जाओ. फिर मैं बताती हू कि कैसे इन दोनों को मस्त किया
जाए. इन जैसे मस्ताने छोरो को गरम करना कोई मुश्किल काम नही है,
मुझे अचूक नुस्ख़ा मालूम है”
नहा कर हम जब बाहर आए तो शशिकला ने हम दोनों को बाहर सोफे पर
बैठकर इंतजार करने को कहा. खुद वह मा को अंदर बेडरूम मे ले गयी.
हम दोनों उनकी रह देखने लगे. अंकल तो बेताब हो रहे थे “अनिल यार, मैं तो
इस कल्पना से ही मरने को आ जाता हू कि तुम्हारी मा के उन गोरे चित्ते पहाड़
से चूतडो के बीच अपना लंड गाढ रहा हू. पर शशि की बात ठीक है, काश
मेरा लंड वैसा खड़ा हो जाए जैसा कल रात था. तुम्हारी मा को भी ज़रा फील होना
चाहिए कि उनकी गान्ड की सेवा एक हलब्बी लंड कर रहा है, कोई छोटा मोटा
नही”
मैं चुप था. मा की गान्ड आज दूसरा पुरुष मेरे सामने मारेगा इस विचार से
ही मैं मस्त हो रहा था. शशिकला की उस सुंदर गान्ड मे लंड डालने को मिलेगा
यह विचार भी मुझे मुग्ध कर रहा था.
मा और शशिकला जब बीस मिनिट बाद बाहर आए तो हम देखते रह गये. दोनों
बला की खूबसूरत लग रही थी. उन्होने बाल जुड़े मे बाँध लिए थे और मेकअप कर
लिया था. लाल लिपस्टिक लगाकर दोनों का रूप निखार आया था. पर असली मारू बात थी
उनका अर्धनग्न रूप. दोनों ब्रा और पैंटी मे थी और दोनों ने उँची ऐईडी की
सॅंडल पहन रखी थी.
शशिकला ने काले रंग की एकदम छोटी तंग और स्ट्रेप्लेस्स ब्रा पहनी थी,
कांचुकी स्टाइल मे. उसके पुश्ट स्तन बिना स्ट्रॅप के भी शान से सिर उठाए हुए
थे. पैंटी एकदम पतली बिकिनी स्टाइल की थी. उसने काले रंग की चार इंच हील की
पतले पतले पत्तों वाली सॅंडल पहनी थी. उन्हे देखते ही मन होता था कि
उन्हे छाती से लगा लू और चाटने लगू.
मा ने सफेद रंग की साड़ी ब्रा पहनी थी पर उस सादगी का ऐसा जादू था कि मा के
रूप को चार चाँद लग गये थे. सफेद कों जैसे नुकीले कपों मे मा के उरोज
भरे हुए थे और तो पर्वतों जैसे विशाल लग रहे थे. पैंटी एकदम पतले
सफेद नाइलोन की थी और इतनी टाइट थी कि उसमे से मा की बुर की गहरी लकीर और
उसकी घनी झांट दिख रही थी. और मा के सॅंडल, वही सफेद रुपहले सॅंडल
जो आज मैने शशिकला की अलमारी मे देखे थे. उनकी हील कम से कम चार इंच
की थी और उस उँची हील पर बॅलेन्स करते हुए लचक लचक कर चलती हुई मा
जब कमरे मे आई तो मेरा लंड सिर उठाने लगा. अशोक अंकल की भी हालत ऐसी ही
कुछ थी, वे मंत्रमुग्ध होकर मा एक उस रूप को देख रहे थे. मेरे सामने
ही उनका लंड एक इंच और बड़ा हो गया.
शशिकला हंस कर मा से बोली “देखा दीदी, दोनों कैसे पागल हो गये है, अरे
इनकी मैं नस नस पहचानती हू. चलो दीदी थोड़ा डॅन्स करते है, फिर इन्हे
देखेंगे. और सुनो तुम दोनों, इस बार मैने तुम्हे बाँधा नही है पर याद
रखना, अपने लंड को हाथ भी लगाया तो आज रात का प्रोग्राम कैंसल. समझे
ना?” अंकल और मैने सिर हिलाया, उन दोनों अप्सराओं के आगे हमारी क्या चलने
वाली थी.
एक म्यूज़िक की सी डी लगाकर दोनों डॅन्स करने लगी. एक दूसरे से लिपट कर
चुंबनो का आदान प्रदान करते हुए उन्होने ऐसा डॅन्स किया कि हमारी जान
निकाल दी. उँची ऐईडी के संडलों पर अपने आप को संभालते हुए जब वे घूमती
तो उनकी कमर लचक लचक जाती. वे बार बार एक दूसरे के नितंबों को सहलाती,
हमे दिखा दिखा कर अपनी साथिन के चुतडो को दबाती जैसे कह रही हों,
देखो, ये माल देखो!
दस मिनिट के बाद ही हमारा बुरा हाल हो गया. अशोकजी तो एकदम रीरियाने लगे
“रीमा जी प्लीज़, बस अब मत सताइए. बेटी बोलो ना अपनी मम्मी को, अपने दीवाने
को ऐसे न हलाल करे प्लीज़ बेटी दया करो …” उनका लंड अब तन कर खड़ा हो
गया था.
दो मिनिट के बाद वे दोनों समझ गयी कि हम अब पूरी तरह से मस्त है. मा
बोली “शशि, ये दोनों तो फिर से ऐसे हो गये है कि कोई कह नही सकता कि कल रात
से ये हमारी सेवा मे लगे है”
शशिकला बोली “मम्मी, अभी तो और मतवाला बनाना है इन्हे. मैने बताया था
ना? चलो अब वैसे करते है, देखो कैसे हमारे कदमों मे आ गिरेन्गे”
वे दोनों डॅन्स ख़तम करके हमारे पास आई और एक एक कुर्सी मे बैठ गयी.
मा ने अपनी एक टाँग उठाकर दूसरी पर रख ली और हिलाने लगी. उसका हिलता
सॅंडल बहुत प्यारा लग रहा था. अशोकजी तो उसकी ओर ऐसे देख रहे थे जैसे
भूखा खाने को देखता है.
उनकी ये हालत देखकर शशिकला उन्हे मज़ाक से पुचकार्ते हुए बोली “आइए
पतिदेव, ज़रा अपने होने वाली पत्नी के चरणों की पूजा कीजिए. जैसे चाहिए
कीजिए, घबराईए नही, मन भर कर मज़ा लीजिए. बस झाड़िएगा नही. आपकी पत्नी
की ये गुदाज गान्ड आपको मिलने वाली है एडवांस मे शादी के पहले, उसके लायक
अपने लंड को खड़ा कीजिए” फिर मेरी ओर मुड़कर बोली “और अनिल, उधर कमरे मे
छुप छुप मेरी चप्पल चाट रहा था ना? ले अब खुलकर चाट, मज़ा कर. ऐसे
मामलों मे शरमाया नही करते” और अपनी एक सॅंडल आधी उतारकर वह
अपनी उंगलियों पर नचाने लगी. जो लोग औरतों के पैरों और उनकी
चप्पलो के रसिक होते है उनके लिए इस से ज़्यादा मादक और कोई दृश्य नही
हो सकता कि कोई औरत अपनी चप्पल आधी पंजे से निकालकर अपनी उंगलियों
पर नचाए.
मैं शशिकला के सामने बैठकर बेतहाशा उसके उस खूबसूरत पाव और
सैंडल को चूमने लगा. जीभ से उसे चाटा और शशिकला के पैर की उंगलिया
मूह मे लेकर चूसने लगा. बड़ी गोरी और नाज़ुक उंगलिया थी, मोतिया नेल पालिश
से और सुंदर लग रही थी. उसके सॅंडल के पत्ते मूह मे भर लिए. ऐसा लग
रहा था कि चबा डालु. लंड अब तना तन उछल रहा था.
कनखियों से मैने अशोक अंकल की ओर देखा. वे तो पागल से हो गये थे, मा
के पैर से लिपट कर उसे ऐसे चूम और चाट रहे थे जैसे खा जाना चाहते हों.
मेरे देखते देखते उन्होने मा की सॅंडल आधी उतारी और उसका अगला भाग मूह
मे ले लिया. सॅंडल चूस कर मन नही भरा तो मा के पैर का तलवा चाटने
लगे.
पाँच मिनित के बाद वे सीधे हुए और मा के पैर को हल्का सा मोड़ा. मा की ऐईडी
अब उनकी ओर थी. सॅंडल को मा के पैर से थोड़ा अलग करके उन्होने धीरे से अपना
लंड मा के तलवे और सॅंडल के चिकने सपाट तलवे के बीच घुसेड दिया. फिर
दोनों को दबा कर अपने लंड को उनमे सैंडविच कर लिया और धीरे धीरे
चोदने लगे. उनकी नज़र ऐसी गुलाबी हो गयी थी जैसे जन्नत की सैर कर रहे हों.
मेरे चेहरे के भाव देखकर शशिकला खिलखिला उठी “अरे मेरे डॅडी बहुत
रसिक है, पैरों के और लेडीज़ चप्पालों के दीवाने है. ये क्या क्या खेल खेलते
है इनके साथ, तूने सोचा भी नही होगा. अभी वे मम्मी के पैर को चोद रहे
है. तू भी करके देख, ले मैं सॅंडल उतारती हू” उसके मुलायम तलवे और
चिकनी सॅंडल के बीच दबाकर मेरा लंड ऐसा खड़ा हुआ कि मुझे लगा कि मैं
झाड़ जाउन्गा.
उधर मा को भी मज़ा आ रहा था. वह खुद अपनी सॅंडल को अपने पैर से
चिपका कर पैर आगे पीछे करके अंकल के लंड को चोद रही थी. “अशोक, छोड़ो
मेरे पैरों को. अरे मुझे मालूम होता कि तुम भी दीवाने हो इस चीज़ के मेरे
बेटे जैसे तो अपनी कुछ खास चप्पले साथ ले आती, मेरा बेटा तो बहुत खेलता
है उनसे”
अचानक शशिकला ने मुझे दूर किया और उठ खड़ी हुई. मा के पास जाकर अशोक
अंकल को खींच कर अलग किया और बोली “क्या डॅडी, आप भी मम्मी के झाँसे मे
आ गये! अरे ये तो चाहती है कि आप उनके पैरों मे ही झाड़ जाए. देखिए
आपका लंड कैसा शानदार खड़ा हो गया है! चलिए अब, मम्मी की गान्ड
मारिए.”
मा बोली “क्या शशि, अपने डॅडी से ज़्यादा लगता है तू ही मेरे पीछे पड़ी है,
वे तो बेचारे भूल ही गये थे. वैसे इनका इतना मस्त खड़ा है कि लगता है
चूत चुदवा लू, मेरी चूत बुला रही है अपने यार को”
“चुदवाने को तो अब जिंदगी पड़ी है दीदी. चलिए डॅडी, मम्मी वैसे आप ठीक
कहती है, डॅडी तो भोले है, उनकी फिकर मुझे ही करनी पड़ती है और तुमने
ठीक समझा है, मैं देखना चाहती हू कि मेरी प्यारी मम्मी की गोल मटोल
गान्ड मे कैसे यह मतवाला सोंटा अंदर जाता है. आज सुहागरात है यही
समझ लो, सुहागरात मे पत्नी को कुछ तो दर्द होना चाहिए नही तो क्या मज़ा
आएगा”
माको उठाकर वह पलंग पर ले गयी. मा को पट सुलाया और चूम कर बोली.
“फिकर मत करो मम्मी, क्रीम लगा दूँगी, अच्छी इम्पोर्तेड क्रीम, एकदम
चिकनी है, आराम से डॅडी को अंदर ले लोगि”
वह जाकर क्रीम की शीशी उठा लाई. मा के गुदा मे क्रीम चुपडति हुई बोली “अनिल
तुम मेरे डॅडी के लंड मे क्रीम लगा दो. शरमाओ नही, मैं देख रही हू कि
तुम अब भी बहुत शरमाते हो. अब एक बेटा अपनी मा के होने वाले पति का लंड
क्रीम से चिकना करेगा जिससे उसकी मा की गान्ड अच्छे से मारी जा सके. और मैं
अपनी होने वाली मा की गान्ड चिकनी करूँगी. है ना मज़े की बात, चलो जल्दी
करो.”
मैने कुछ शरमाते हुए क्रीम ली और अशोक अंकल के लंड मे चुपडने लगा.
अजीब सा लग रहा था, पहली बार थी जब किसी और के लंड को हाथ मे लिया था. अंकल
का लंड अब घोड़े जैसा हो गया था. मेरी दो मुत्थियो मे किसी तरह समा पा
रहा था. नसे भी फूल गयी थी. किसी जिंदा जानवर की तरह थरथरा रहा था.
मन ही मन मुझे बहुत उत्तेजना हुई, क्या खूबसूरत लॉडा है! जब मा की गान्ड
मे जाएगा तो वह बहाल हो जाएगी. मेरी मा के लिए ऐसा ही पुरुष चाहिए था जो
उसके शरीर को पूरी तरह से भोग सके. अंकल को भी मेरे हाथों का स्पर्श
अच्छा लग रहा था, वे आँखे बंद करके लंबी लंबी साँसे ले रहे थे.
शशिकला ने हाथ पोंछे और मा के बाजू मे लेट गयी. मा के सिर को अपने
स्तनों पर लेकर उसने एक चूंची मा के मूह मे दे दी. “मम्मी, ये लो, इसे
चूसो, कम से कम मूह भरा रहेगा तो चिल्लाओगी नही. अब अनिल, तुम डॅडी की
मदद करो, उन्हे अपना लंड सम्हलाना पड़ेगा, धीरे धीरे मम्मी की गान्ड
मे डालने को. तुम अपनी मा के चूतड़ फैलाओ, ज़रा मा की गान्ड मारने मे
मदद करो मेरे डॅडी की. एक बेटे का कर्तव्य पूरा करो”
मैं भी हाथ पोंछकर मा के पास जाकर बैठ गया. उसके गोरे चूतड़
पकड़कर मैने फैलाए. बीच का भूरा छेद दिखाने लगा. अंकल अब बहुत उत्तेजित
थे. उनका शरीर पूरा एकदम तना हुआ था. वे मा की टाँगो को फैलाकर उनके
बीच बैठ गये और एक हाथ से लंड पकड़कर झुका कर मा के छेद पर अपना
सुपाडा रखा. वह फूला हुआ छोटे सेब सा सुपाडा देखकर मुझे पूरा विश्वास हो
गया कि मा की गान्ड आज ज़रूर फट जाएगी, इतना बड़ा लंड उसकी गान्ड मे जाना
असंभव लग रहा था. फिर याद आया कि शशिकला की नाज़ुक गान्ड वे रोज मारते
थे.
अंकल ने मुझे आँख मारी और लंड को पेलने लगे. सुपाडा सटकने लगा तो
मैने मा के चूतड़ और फैलाए और सुपाडे को छेद मे वापस धकेल दिया.
तुरंत आधा सुपाडा अंदर चला गया. ‘आम’ ‘आम’ ‘आम’ करती हुई मा छटपटा
उठी. शशिकला तैयार थी. उसने अपनी चूंची और मा के मूह मे ठूंस कर
उसकी बोलती बंद कर दी और मा के हाथ पकड़ लिए. अंकल ने और ज़ोर लगाया और
‘पक’ की आवाज़ के साथ सुपाडा मा के चुतडो के बीच समा गया.
मा का पूरा शरीर काँप उठा. शशिकला उस बाहों मे दबोचे पड़ी रही.
मेरी ओर देखकर अंकल मुस्काराए “थॅंक यू अनिल, काम हो गया, अब कोई मुश्किल
नही होगी. अब आराम से जाएगा. तू घबरा गया था क्या? अरे तेरी मा की गान्ड
मेरा खजाना है, उसे मैं क्यो फाड़ुँगा? जिंदगी भर मज़ा लेना है मुझे. अब
तू जा और मा को प्यार कर, चूतड़ फैलाने की अब कोई ज़रूरत नही है, अब तो तेरी मा
चाहेगी तो भी लंड झड़ने के पहले बाहर नही निकलेगा, सुपाडा मस्त लॉक हो
गया है अंदर”
शशिकला मा के बाल चूमती हुई उसे पुचकार रही थी. मैने मा के शरीर के
नीचे हाथ डाला और उसकी बुर को सहलाने लगा. बुर एकदम गीली थी. मा चाहे
जितनी तड़प रही हो, उसे मज़ा ज़रूर आ रहा था. दूसरे हाथ से मैं मा के
मम्मे दबाने लगा.
मा जब थोड़ी शांत हुई तो अंकल ने लंड फिर पेलना शुरू किया. बड़े प्यार से इंच
इंच करके उन्होने लॉडा मा के चुतडो के अंदर उतारा. मा थरथराती तो
वे रुक जाते. जब उनका पूरा मूसल जैसा लंड अंदर उतर गया और उनका पेट मा
के चुतडो से ठीक गया तो उन्होने गहरी साँस ली “हो गया, अब तुम बच्चो जाओ
और मज़ा करो. अब मम्मी को मैं सम्हाल लूँगा.”
मा के मूह से जब शशिकला ने चूंची निकाली तो वह कराह कर बोली “अशोक, तुम मार डालोगे आज़ मुझे ऐसा लग
रहा है जैसे किसी ने पूरा हाथ डाल दिया हो. अब तक मेरी गान्ड फट गयी होगी, देखो खून तो नही निकला?”
शशिकला मा के नीचे से निकलकर उसके बाजू मे पट लेट गयी. “मा, तुम
मत घबराओ, डॅडी बहुत मस्त मारते है, ये इनका खास शौक है. बस पाँच
मिनिट मे दर्द कम हो जाएगा. तेरी गान्ड एकदम सलामत है” फिर मुझे बोली “आ
जा अनिल, अब तू मज़ा कर ले” अपने नितंब हिलाते हुए वह बोली.
मैं क्रीम उठाने लगा तो बोली “अरे रहने दे, डॅडी का मूसल मैं रोज लेती हू, तेरा
तो ऐसे ही निगल लूँगी. वैसे अगर चाहे तो मूह से गीला कर सकता है” उसकी आवाज़
मे एक चॅलेंज था. मैं तुरंत उसके नितंब चूमने लगा और फिर उन्हे फैलाकर
उसके गुलाबी गुदा को चूसने मे लग गया. जीभ अंदर डाली और स्वाद लिया. मूह
हटाने का मन ही नही हो रहा था. शशिकला मस्ती से सिसकारियाँ भरती हुई
बोली “बहुत अच्छे अनिल, बहुत मन लगाकर गान्ड चूसता है तू, बिना हिचके,
असली रसिक लोगों की पहचान यही है कि गान्ड मे मूह लगाते है कि नही, चूत
तो सब चूस लेते है.”
तभी मेरे लंड को किसीने हाथ मे ले लिया. देखा तो अंकल थे, थोड़ी सी क्रीम लेकर
मेरे लंड मे चुपड रहे थे. “थोड़ी लगा देता हू अनिल, नही तो तू जल्दी झाड़
जाएगा. अब ज़रा मज़ा ले घंटे भर, ये मेरी बेटी महा शैतान है, ऐसे गुदा
सिकॉड़ेगी कि तू झाड़ जाएगा. लंड चिकना रहेगा तो मस्त घुसेगा इसकी गान्ड
मे, ये पकड़ नही पाएगी”
वे बड़े प्यार से मेरे लंड को क्रीम लगा रहे थे. बीच मे उन्होने एक ख़ास
अंदाज से अंगूठे से मेरे लंड के निचले भाग को दबाया तो मैं झड़ने को आ
गया. वे मेरी ओर देखकर प्यार से मुस्काराए जैसे कह रहे हों अब तो और भी
मज़े करने है मेरे यार.
मेरा लंड फनफना रहा था. मैं शशिकला पर चढ़ गया. उसकी गान्ड मे
लंड पेला तो लंड एक बार मे पूरा धँस गया. गान्ड क्या थी, नरम नरम चूत
थी. आख़िर अंकल के उस मूसल से रोज मरवाती थी. मैं शशिकला पर लेट गया और
उसके स्तन हाथ मे लेकर गान्ड मारने लगा “अरे यह तो शुरू भी हो गया! बड़ी
चालू चीज़ है मम्मी तुम्हारा बेटा. मेरे डॅडी देखो अब तक वैसे ही बैठे
है” शशिकला चहकि.
मा कराहती हुई बोली “अरे बैठे है पर लंड को देखो कैसे मुठिया रहे है,
मेरी गान्ड मे उपर नीचे कर रहे है, क्या कंट्रोल है इनका, मान गयी अशोक
मैं तुझे”
“मम्मी, बस थोड़ा खेल रहा था आपकी इस लाजवाब गान्ड से, अब मारता हू. आपकी
गान्ड की ऐसी सेवा करूँगा कि आप को शिकायत का मौका नही आएगा” अंकल बोले और
मा पर लेट कर उसके मासल बदन को बाहों मे भरकर गान्ड मारने लगे.
अगले आधे घंटे मे मैने खुद देख लिया कि वे क्या मँजे खिलाड़ी थे. गान्ड
मारने का वह मानों एक तजुर्बा था, हर तरह से उन्होने मा की मारी.
कभी धीरे धीरे प्यार से, बस एक इंच अंदर बाहर करके. कभी धीरे धीरे पर
पूरे लंड के साथ, धीरे धीरे अपना लंड सुपाडे तक बाहर खींचते और फिर धीरे
से अंदर गाढ देते. साथ साथ मा की चूंचियाँ दबाते जाते और उसके कंधों
और बालों को चूमते जाते. कभी अचानक ज़ोर से मारने लगते, वहशी की तरह
सपासप अपना लंड मा की पूरी गान्ड मे तेज़ी से अंदर बाहर करते. जब मा
छटपटा उठती तो एकदम धीमे होकर मा की बुर को उंगली से मस्त करने
लगते. बीच मे मा के चूतड़ पकड़ लेते और आपस मे दबाकर फिर मारते जिससे
मा की गान्ड उनके लंड के आस पास और कस जाती.
मा तीन चार बार झड़ी. वह लगातार कराह और सिसक रही थी जैसे कोई उसे रेप करा
हो. पर मुझे समझ मे नही आया कि दर्द से कराह रही थी या मस्ती से. शायद
दोनों. कभी मा अंकल को रुकने को कहती “बस अशोक, प्लीज़, अब नही, बहुत
दुख रहा है, मैं मर जाउन्गि, सच मे अशोक, निकाल लो ना, मेरी कसम” और कभी
ज़ोर से चोदने को कहती “हे अशोक, और ज़ोर से चोदो ना प्लीज़, मैं मर जाउन्गि,
बहुत अच्छा लग रहा है, प्लीज़ मुझे झड़ो ना प्लीज़” पर मा ने कभी
मुझे नही कहा कि अनिल मेरे बेटे, मुझे बचा या अंकल को रोक. मैं उसीसे
समझ गया कि मा मज़े मे है.
मैने भी शशिकला की मखमली गान्ड का पूरा आनंद लिया. गान्ड ढीली होने से
मैं सतसत मार रहा था, गान्ड मे लंड ऐसे चल रहा था जैसे गान्ड न हो,
चूत हो, शशिकला बीच बीच मे गान्ड सिकोड लेती, बला की कलाकार थी, अपनी ढीली
गान्ड को कस लेती और मेरे लंड को ज़ोर से पकड़ लेती. पर अंकल ने यह काम अच्छा
किया था कि मेरे लंड को क्रीम लगा दी थी, मेरा लंड उसकी गुदा की पकड़ाई मे
नही आता था, फिसलता रहता, नही तो मैं ज़रूर दो मिनित मे झाड़ जाता.
मैं आख़िर झाड़ ही गया, पंद्रह मिनित से ज़्यादा मैं इसे मीठे आनंद को नही सह
पाया. पर बाद मे पड़ा पड़ा मा की गान्ड मारी जाती हुई देखता रहा. अंकल ने
पूरी जान लग दी, आधा घंटा नही झाडे और लगातार मारते रहे, साथ ही मा की
चूत मे पूरे समय उंगली करके मा की मूठ मारते रहे. आख़िर मा ने
झाड़ झाड़ कर सिर डाल दिया और लस्त हो गयी तब अंकल झाडे.
दस मिनित सब पड़े रहे जैसे जान निकल गयी हो. फिर अंकल और मैं उठे. लंड
एकदम साफ थे, पूरा वीर्य उन प्यासी गान्डो ने सोख लिया था. मेरा कुछ वीर्य
शशिकला की गुदा मे दिख रहा था पर मा का गुदा एकदम साफ था, बस खुल
गया था लाल मूह जैसा. बहुत गहरे जाकर अंकल ने वीर्य छोड़ा था, शायद मा के
पेट मे गया होगा सीधा.
कुछ कहने की ज़रूरत नही थी. हम सब एक दूसरे को लिपटाकर सो गये, इतने
थक गये थे पता ही नही चला कि कब नींद लग गयी.
रविवार सुबह सब देर से उठे. सुबह सुबह कोई चुदाई नही हुई. नौकर आ गया
था. मा और शशिकला नहाने और तैयार होने मे लग गये. ब्रांच करके
नौकर को छुट्टी दे दी गयी. मुझे लगा कि अब फिर खेल शुरू होगा. पर
शशिकला ने मा को तैयार होने को कहा. “चलो मम्मी, यहाँ माल मे होकर
आते है. बहुत अच्छी कलेक्शन है वहाँ लिंगरी की. मैने कुछ देख रखी है
तुम्हारे लिए, डॅडी ने भी कैटालोग देखकर तुम्हारे इस गदराए बदन के लिए
कुछ स्टाइल पसंद की है, अब तो उनकी पसंद की लेना ही पड़ेंगी, आख़िर तुम्हारे
पति बनने वाले है”
मा बोली “चलो, मैं तैयार हू, वैसे अशोक जितना मस्त रहता है हमेशा, उससे
और क्या मस्त होगा मेरी लिंगरी देख कर!”
शशिकला मा की चूंची दबाकर बोली “अरे अच्छी चॉकॅलेट का रॅपर भी
खूबसूरत होना चाहिए, आधा मज़ा तो रैपर निकालने मे ही है. और एक बात
मम्मी, वहाँ कुछ सॅंडल और बाथरूम स्लीपर्स भी लेना है, मेरे और तुम्हारे
लिए. बहुत ज़रूरी है. ये दोनों जैसे शौकीन है हमारे पैरों और चप्पलो
के, उसके हिसाब से उनका भी इंतज़ाम करना पड़ेगा. इन दोनों की तो चाँदी है
अब”
मीठी नोंक झोंक करती हुई दोनों शॉपिंग को चली गयी. मैं और अंकल अकेले
थे. अंकल और मैं अब तक नहाए नही थे. अंकल बोले “अनिल, तुम नहा लो, मैं तब
तक कुछ ईमेल देख लू, आफ़िस का कम निपटाता हू जब तक ये दोनों पारियाँ वापस
आती है. तुम देखो वहाँ टी वी के नीचे वाले ड्रेवार मे बहुत सी सी.डी और डी.वी.डी है,
मज़ा करो, पर और कुछ नही करना, ज़रा अपने लंड पर काबू रखना,
शशिकला आकर डान्टेगी नही तो.”
मैं जाकर नहाया. नाहकार वैसे ही सिर्फ़ जंघिया पहनकर बाहर आया. अब
अच्छा लग रहा था. फिल्म देखने का मूड भी हो रहा था. ड्रेवार खोल कर सी डी
उठाकर देखने लगा. तरह तरह का कलेक्शन था. समझ मे नही आ रहा था कि
क्या देखु. मुझे कुछ डी.वी.डी दिखी गे सेक्स की. अब तक मैने कभी नही देखी थी,
मा के साथ तो सिर्फ़ लेस्बियन या ग्रूप सेक्स की ही देखता था.
एक डी.वी.डी पर बने चित्र मुझे बहुत अच्छे लगे, मैने उसे लगाया बैठकर
देखने लगा. कुछ ही देर मे मेरी हालत खराब हो गयी. लंड ऐसा सनसनाया कि
समझ मे नही आ रहा था कि क्या करू. उस डीवीडी मे एक भी औरत नही थी, सब
मर्द थे, वे भी हॅंडसम गोरे चिकने मर्द. एक से एक जवान और सबके लंड
बड़े बड़े और तन कर खड़े हुए. आपस मे वे जवान तरह तरह के संभोग कर
रहे थे. चूमा चाटी से शुरू करके एक दूसरे के लंड चूसना और फिर गुदा
संभोग, गान्ड मारना! पहले वे जोड़ियाँ बनाकर रति कर रहे थे पर बाद मे
सब एक दूसरे से मिल कर संभोग करने लगे. पास से क्लोज़प मे दिखते वे गोरे
लाल लंड, उन्हे चूसते हुए होंठ और बिलकुल पास से उनकी गान्ड मे घुसते
लंड!
मेरा ऐसा तना की अंकल की हिदायत को नज़र अंदाज करके मैं जंघीए के उपर से
ही अपने तंबू को सहलाने लगा. साथ ही मन चाहे जहाँ दौड़ने लगा. अंकल का
रूप बार बार मेरे सामने आ जाता, उनके लंड का आकार आँखों के सामने आ
गया. मा की चूत और गान्ड मे घुस कर उन्हे चोदते हुए वह कैसा दिख रहा
था वह द्रुश्य याद आ गया. और कितना गाढ़ा वीर्य निकला था उसमे से,
एकदम सफेद मलाई जैसा! अब तक समलिंगी संभोग के बारे मे मैने सोचा
नही था पर दो दिन हुई चुदाई से मन आज़ाद हो गया था, हर चीज़ के बारे मे
सोचने लगा था.
अचानक पीछे से मेरे कंधे पर ज़ोर से किसीने हाथ रखा. मैं चौंक गया और
शरमा गया. अशोक अंकल थे, अभी अभी नहा कर आए थे. तौलिए से सिर पोंछ
रहे थे. वे एकदम नंगे थे, बस मेरी तरह अंडरवेर पहने थे.
“तेरी मा और शशि आती ही होंगी इसलिए मैने सोचा कि तैयार रहा जाए, वे गरम गरम
आएँगी, कपड़े उतारने मे क्यो समय बरबाद किया जाए. क्या देख रहा है
यार? ओहो, ये वाली डी.वी.डी! मज़ा आया?” शैतानी से मुसकाराकार वे मेरे बाजू मे
ही बैठ गये.
मैं कुछ सकुचा रहा था पर लंड अब भी तना था. मेरी जाँघ पर हाथ रखकर
अंकल बोले “लगता है पसंद आ गयी डी वी डी तुझे. चलो अच्छा हुआ, मैं भी कई
बार देखता हू” वे मेरे बिलकुल पास बैठकर पिक्चर देखने लगे. उनके
जंघीए मे भी अब तंबू तनने लग गया था. मेरी ध्यान बार बार उधर जाता.
कितना बड़ा था उनका लंड! क्या मेरा कभी इतना बड़ा होगा! उनके शरीर से बड़ी
भीनी भीनी खुशबू आ रही थी, शायद नहाते समय लगाए इंपोर्टेड साबुन की.
थी डीवीडी पर अब तीन जवान मिलकर एक जवान के पीछे पड़े थे. एक ने उसकी गान्ड मे
लंड घुसेड कर उसे गोद मे बिठा रखा था और उसके निपल सहलाते हुए उसकी
पीठ का चुंबन ले रहा था. एक सामने बैठकर उसका लंड चूस रहा था और
तीसरा सामने खड़ा होकर अपना लंड उसे चुसवा रहा था.
“लकी बस्टर्ड! है ना अनिल, क्या मज़ा आ रहा होगा उसे!” अंकल बोले. उनके स्वर
मे अजीब सी मादकता थी. बड़े सहज ढंग से उन्होने मेरी जाँघ पर हाथ रख
दिया. मैं कुछ नही बोला पर मेरे तन मे एक लहर सी दौड़ गये, रोमाच हो आया.
मेरा लंड खड़ा हो गया और मेरे मूह से एक हल्की से आह निकल पड़ी. अंकल ने
तुरंत मुझे पास खींचा और मेरा गाल चूम लिया. मुझे अजीब सा रोमांच हो
आया. मैने विरोध नही किया. मैं चुपचाप हू देखकर अब अंकल ने सीधे मेरा
सिर अपनी ओर मोड़ा और मेरा चुंबन ले लिया. मेरी आँखों मे वे तक रहे थे.
उनकी आँखों मे ढेर सा प्यार और सेक्स का खुमार था. पहले मैं वैसे ही रहा,
फिर धीरे धीरे उनके चुंबन का जवाब देने लगा. उनकी साँसों मे से आफ्टर शेव
की खुशबू आ रही थी.
अंकल ने मुझे बाहों मे भर लिया और बेतहाशा चूमने लगे. मैने भी
अपनी बाहे उनके गले मे डाल दी. अब मैं होशोहवास खो बैठा था, मुझे कोई
फिकर नही थी कि कोई क्या कहेगा. बस लंड मे होती अटीटिवर गुदगुदी का अहसास था.
“तुम बड़े सेक्सी जवान हो अनिल, तुम्हे जो देखे वो फिदा हो जाए. कोई ताज्जुब नही की
शशि तुमपर भी मर मिटी है” मेरे होंठों को चूसते हुए वे बोले.
मैने उनके जंघीए मे बने तंबू पर हाथ डाला और पकड़ लिया. कल भी मा
की गान्ड मारने के लिए लंड को तैयार करते हुए मैने उसे हाथ मे लिया था पर
तब की बात और थी, तब मैं मा के लिए कर रहा था, आज खुद की प्यास बुझाने को
मैं उस खूबसूरत लंड को पाना चाहता था. मेरी चाहत देखकर अंकल ने
जंघिया नीचे सरकाया और लंड मेरे हाथ मे दे दिया. मेरी जंघिया उतार कर
उन्होने मेरे लंड को मुठ्ठी मे पकड़ लिया.
मेरे लंड को वे बड़े प्यार से सहलाने लगे. साथ मे कुछ इस तरह से मेरे लंड
के निचले भाग को अपनी उंगलियों से सहलाते हुए अपनी हथेली उन्होने मेरे
नंगे सुपाडे पर गोल गोल रगड़ी की मेरे मूह से उत्तेजना से एक सिसकी निकल आई.
उनके हाथ मे जादू था. मैने उनका लंड कस कर पकड़ लिया. बस एक ही इच्छा
थी, उस रसीले लंड को मूह मे ले लू, उसे गन्ने जैसा चूसू, अंकल की सारी मलाई
निकाल लू. अब कुछ कुछ समझ मे आ रहा था की लंड चूसने को मा इतनी
उत्सुक क्यो रहती थी.
मैने उनसे कहा “अंकल … आप गे भी है क्या? ऐसा सेक्स किया है अपने पहले?”
वे मुझे खींचकर गोद मे लेते हुए बोले “गे होने या न होने की बात नही है
अनिल, मैं उस हर व्यक्ति से प्यार कर सकता हू जो मुझे अच्छा लगता है. तेरी मा
पर तो मैं देखते ही मर मिटा था. उसका एक बेटा है जो उसे चोदता है यह
मुझे शशि ने बताया था पर वह बेटा इतना खूबसूरत और चिकना है यह
मुझे परसों ही पता चला जब तुझे देखा. तब से मुझे लगता था कि अगर
तुझसे भी प्यार मुहब्बत करने को मिले तो सोने मे सुहागा हो जाए. पर मैं
ज़बरदस्ती नही करना चाहता था. जब तुझे मेरे लंड की ओर देखते देखा तो
मैं समझ गया की मेरी दाल गल जाएगी. शशि को भी मालूम है, मेरी आँखों
मे देखकर वह कल ही समझ गयी थी. आज जानबूझकर हमे अकेला छोड़ कर
गयी है, वैसे शापिंग भी ज़रूरी थी. मुझे जता कर गयी है शैतान की डॅडी
सिर्फ़ चख कर देखना, पूरा नही खाना नही तो मैं कभी आप से नही बोलूँगी.”
मैं अंकल की गोद मे बैठा था जैसे छोटे बच्चे बड़ों की गोद मे बैठते
है. उनका लंड अब मेरे चुतडो के बीच की लकीर मे धँस कर मेरी पीठ पर
धक्के दे रहा था. अंकल मेरे निपल दबा रहे थे और कस के मेरे होंठ चूस
रहे थे. उनकी जीभ ने मेरे होंठों को खोला और मेरे मूह मे घुस गयी.
मेरे मूह को अंदर से ठठोलती वह गरम गरम जीभ मुझे मदहोश कर
गयी. मैं उसे चूस कर ऐसा मदहोश हुआ कि तड़प कर उनकी गोद मे से उतर
गया.
“क्या हुआ अनिल, अरे …” वे बोले पर तब तक मैं उनके सामने नीचे बैठकर
उनके लंड को हाथ मे लेकर चूमने लगा. पास से वह लंड इतना रसीला लग रहा
था कि मैने मूह खोला और उनके उसे लाल लाल सेब से सुपाडे को मूह मे लेने की
कोशिश करने लगा.
“नही अनिल, … रुक जा यार, शशि देखेगी तो ….” “बहुत नाराज़ होगी, हंटर से मारेगी!
ये क्या चल रहा है? मैने मना किया था ना डॅडी?”
शशिकला की आवाज़ सुनकर मैं चौंक कर अलग हो गया. सामने
शशिकला और मा खड़े थे. शशिकला नाराज़ होने का नाटक कर रही थी पर
उसकी आँखे चमक रही थी. मा भी पास खड़े खड़े मुस्करा रही थी, शायद
उसे पहले ही शशिकला ने बता दिया था.
“मैने कहा था ना मम्मी, इन दोनों को अकेले छोड़ना ठीक नही है. देखो
कैसे कबूतरों के जोड़े जैसे गुतरगु कर रहे है. चल अनिल, अलग हो, ये सब
क्या चल रहा था?” शशिकला ने कान पकड़कर मुझे उठाते हुए कहा.
“छोड़ो ना दीदी, दुखता है” मैने शिकायत की “मा और तुम कल से मज़ा ले रही
हो, मैं और अंकल क्यो नही ले सकते?” सब की आँखों मे दबी हँसी देखकर
मेरा उत्साह अब बढ़ गया था.
“हन अनिल ठीक कह रहा है बेटी. तुमने और मम्मी ने कितनी मज़ा की आपस मे,
हमने कुछ नही कहा, अब ज़रा हमे भी करने दो. क्या हॅंडसम छोकरा है
आपका मम्मी, मुझे पूरा घायल कर दिया. कल से मैं तड़प रहा हू” अशोक
अंकल बोले.
मा इतराती हुई बोली “अशोक, ये तो तुम्हे एक तीर से दो शिकार मिल गये. मेरे पीछे
पड़े थे, अब मेरे बेटे पर भी हाथ साफ करना चाहते हो. वैसे चीज़ ही ऐसी
है, मैं तो कब से जानती हू कि कितना खूबसूरत बेटा है मेरा. पर मुझे ये नही
मालूम था कि तुम्हारा झुकाव इस तरह भी है. वैसे मैं तो बहुत खुश हू कि
मेरे बच्चे को हर तरह का सुख मिले जैसे मुझे शशिकला के साथ मिला”
शशिकला बोली “मम्मी, डॅडी तो परसों से फिदा है उसपर. आपको और उसे एक
साथ देखा तो मुझे कान मे बोले कि मा बेटे, दोनों को साथ साथ लिटा कर उनसे
इश्क करूँगा. पर मैने जता दिया था कि अनिल को हाँ कहने दो पहले. क्यो रे
अनिल, डॅडी पसंद आए? कल से लंड को हाथ लगाया तब से तू इनके इस मूसल का
दीवाना हो गया है, है ना?”
मैने अंकल से लिपट कर कहा “हाँ दीदी, अशोक अंकल सच मे बहुत हॅंडसम
है, हम तीनों को प्यार करने वाला इतना सजीला मर्द घर मे ही हो इससे खुशी
की बात और क्या सकती है”
अंकल मुझे पकड़कर सोफे पर बिठाते हुए बोले “अनिल यार, अब नही तरसा, मैं
तेरी मलाई चखे बिना नही रह सकता. मम्मी, आप सच कहती है, अनिल को हर
तरह का सुख मिलना चाहिए. मैं तो यही विश्वास करता हू कि कभी मन को
पिंजरे मे नही डालना चाहिए, जिस पर दिल आ जाए चाहे वह स्त्री हो या पुरुष,
जवान हो या उमर मे ज़्यादा, बस उससे प्यार कर लेना चाहिए, उसके शरीर को
भोग लेना चाहिए. आ अनिल, तेरा स्वाद देखु” और मेरे लंड को पकड़कर उसकी ओर
झुके.
शशिकला ने खीच कर अपने डॅडी को मुझसे अलग किया “डॅडी, मैं मना कर
रही हू फिर भी आप सुन नही रहे है! अभी आप को और अनिल को राह देखनी पड़ेगी.
अरे कुछ तो छोड़िए सुहागरात के लिए. मम्मी की गान्ड तो अपने मार ली. अब कम
से कम अनिल के साथ अभी मैं आप को कुछ नही करने दूँगी. सुहागरात की राह
देखिए”
“अरे पर सुहागरात तो मेरी और रीमाजी की होगी” अशोक अंकल बोले.
“नही, सुहागरात होगी हमारे परिवारों की, सब शरीर आपस मे ऐसे मिल जाएँगे
कि एक हो जाएँगे. मैने प्लान बनाए है, आप बस देखिएगा” शशिकला ने जवाब
दिया.
तभी बेल बजी. मैं और अंकल नंगे थे इसलिए अंदर चले गये. शशिकला ने
दरवाजा खोला. कुछ बात करने की आवाज़ आई. फिर दरवाजा बंद होने की आवाज़ आई तो
हम बाहर आए. देखा कि दो बड़े पैकेट पड़े थे, सूटकेस की साइज़ के. शायद
अभी अभी कोई डिलीवरी दे गया था.
मैने मा और शशिकला की ओर देखा. वे हँसने लगी. “अरे ये हमारी आज की
शापिंग है.”
“दिखाओ ना मा” मैने कहा. अंकल भी बोले “हन भाई, हम भी तो देखे”
शशिकला धकेल कर हमे अंदर ले गयी “तुम दोनों के देखने लायक चीज़े
नही है. वैसे है तुम दोनों के लिए ही, तुम दोनों मर्दों के लिए यह
हनीमून एकदम मतवाला और न भूलने वाला मौका बनने का समान है,
समझ लो हम दोनों अप्सरए है जो उसे दिन तुम दोनों को स्वर्ग मे ले जाएँगी.
अप्सराओं के सजने धजने का समान है. और भी बहुत कुछ है पर बच्चों
के लायक नही है” मा हँसने लगी.
अशोक अंकल बोले “तो क्या हम बच्चे है? माना अनिल छोटा है पर बच्चा तो
नही है, कल से प्रूव कर रहा है. और मैं, मैं तो बच्चा नही हू”
“तुम दोनों जिस तरह से हमे देखकर बहक जाते हो, उससे तो यही लगता है कि
एकदम बच्चे हो. और हमे पसंद भी है ऐसे बच्चे. इसीलिए खास तैयारी की
है. अब यह बाते बंद करो, बस समझ लो कि आज ये चीज़े आप लोग नही देख
सकते” शशिकला उँचे स्वर मे बोली. अब वह अपनी साड़ी उतार रही थी.
बाकी बचे उस दिन और रात को हमारी रति मे जो मिठास और उत्तेजना थी उसने
हमे रात भर जगाया. तरह तरह से हमने एक दूसरे को भोगा. सब एक दूसरे
से लिपट कर चुदाई करते रहे. मुझे और अंकल को शशिकला ने कुछ नही
करने दिया, बस मेरे हट करने पर एक दो बार किस करने दिया. न रहा जाता तो
हम मौका मिलते ही एक दूसरे के लंड पकड़ लेते.
अंकल जब मा को चोद रहे थे तो मैं मा के बाजू मे बैठकर उंगली से उसके
क्लिट को सहलाने लगा. अंकल का लंड जब मा की बुर के अंदर बाहर होता तो मेरी
उंगली से घिसता. बीच मे झुक कर मैने जब मा के क्लिट पर अपनी जीभ रख दी
तो शशिकला जो मा को अपनी बुर चुसवा रही थी चिल्लाई “क्या हो रहा है अनिल,
दूर हट”
अंकल बोले “अरे बेटी, वह अपनी मा के क्लिट को चूम रहा है उसकी
मस्ती बढ़ाने को, करने दो उसे.”
शशिकला मुस्करा कर बोली “ठीक है ठीक है, बनो मत, मैं जानती हू क्या हो
रहा है, पर चल अनिल, जीभ लगाकर रख मा के क्लिट पर, देख कैसे चूस रही
है मेरी बुर को, झड़ने को है. पर डॅडी के लंड से दूर रहना.” मैं मा के
क्लिट पर जीभ लगाकर बैठ गया. जैसे अंकल का लंड अंदर बाहर होता, वैसे मा
की बुर से रस निकल निकल कर मेरी जीभ पर आता. बीच मे मैं शशिकला की नज़र
बचाकर अंकल के लंड पर जीभ लगा देता. अशोक अंकल भी मुझे आँखों मे
शाबासी देते कि मज़ा करो, मेरी जीभ लगने से उनके लंड मे भी सनसनाहट
दौड़ जाती.
अंकल मा को चोद कर उठे तब मैं मा की चूत चूस रहा था. इसके पहले कि
अंकल के वीर्य का स्वाद ले सकु, शशिकला ने कान पकड़कर मुझे अलग कर
दिया. वह एकदम तैयार बैठी थी “चल हट बड़ा आया, मम्मी की बुर के इस
खजाने पर आज मेरा हक है, तुझे रुकना पड़ेगा. अब शादी दो दिन बाद ही तो है
है.” और झुक कर मा की बुर पर टूट पड़ी.
मम्मी और मैं दोनों चौंक गये. “इतनी जल्दी शादी! अभी तो तैयारी भी नही
हुई”
“तुम्हे कुछ करने की ज़रूरत नही है अनिल. शादी एकदम प्राइवेट होगी, बस हम
लोग ही होंगे. किसी को अभी बताने की ज़रूरत नही है. रजिस्टर्ड मैरिज करेंगे पर
अभी यह गुप्त रखी जाएगी. कारण बात मे बताउन्गा. अनिल, तुम्हारी मा के नाम मैं
यहाँ बाजू का फ्लैट किराए पर देने का एग्रीमेट बना रहा हू, किराया कंपनी
देगी. वैसे है यह फ्लैट हमारा ही पर लोगों को दिखाना है कि तुम लोग यहाँ
अलग से रहते हो. दोनों फ्लॅटो के बीच एक दरवाजा है इस वार्डरोब के अंदर
से. इस तरह से हम अलग अलग रहने का नाटक करेंगे पर रहोगे तुम लोग यही,
हमारे साथ. मैं रीमाजी के नाम से बीस लाख रुपये उसके ऐकाउन्त मे रख रहा
हू. परसों शादी होगी और शुक्रवार को हम सब एक हफ्ते के हनीमून के लिए
गोआ चलंगे. वहाँ हमारा एक बंगला है, एकदम प्राइवेट” अशोक अंकल
बोले.
“अंकल, मा की नौकरी? वह क्या अब भी आफ़िस जाएगी?” मैने पूछा.
“मम्मी को नौकरी की अब क्या ज़रूरत है, अब वह तो मालकिन है. वैसे मैं अब
मम्मी को एक अलग केबिन देने वाली हू. वह हमारी, याने मेरी और डॅडी की खास
कन्सल्टेंट हो कर रहेगी. जब भी हमे सलाह की ज़रूरत होगी तब हम उसके केबिन
मे चले जाया करेंगे. मम्मी जैसी खूबसूरत औरत की कन्सलटेन्सी की ज़रूरत तो
हमे दिन भर पड़ेगी” शशिकला ने मुझे आँख मारते हुए कहा.
शादी के पहले की उस आखरी रात सोने से पहले हमने एक घंटे की एक पिक्चर
देखी. उसमे बहुत पिक्चरो के सीन थे, एक से एक बढ़कर अश्लील, हर तरह के
जायज़ और नाजायज़ संभोग से भरे हुए. तब अंकल ने कहा “मम्मी और अनिल, आओ
अब तुम्हे मेरा प्रिय आसान दिखाऊ. पिक्चर देखने के लिए हम दोनों इसका
उपयोग करते है. अब आगे दो जोड़ी बनाकर देखा करेंगे, तुम लोग भी देख कर
रखो”
उन्होने शशिकला को अपने सामने खड़ा किया और उसके गुदा पर अपना लंड
टीका कर उसकी कमर पकड़ी और खींच कर गोद मे बिठा लिया. शशिकला अपने
डॅडी का पूरा लॉडा गान्ड मे लेती हुई उनकी गोद मे बैठ गयी. पिक्चर भर वे
शशिकला को गोद मे लिए बैठे रहे और उपर नीचे होते रहे. शशिकला भी
आराम से अपनी गान्ड मे अंकल का मूसल घुसाए बैठी थी और मूड मूड कर उन्हे
किस कर रही थी. अंकल ने अपने एक बाजू मे मा को बिठा लिया और एक बाजू मे
मुझे. हम सब पिक्चर देखने लगे.
मैं बार बार शशिकला को चूमता और उसके मम्मे दबाता. उसकी बुर मे
उंगली करता. मा और अंकल चुमचाटी कर रहे थे. अंकल मा की चूंची
मूह मे लिए थे. इतनी गंदी पिक्चर के बावजूद अंकल एक घंटे नही झाडे, बस
उपर नीचे होकर शशिकला की गान्ड मारते रहे. हमे भी उन्होने नही झड़ने
दिया.
पिक्चर ख़तम होते होते हम सब मस्ती मे डूब गये थे. पिक्चर ख़तम होते
ही मा झट से अंकल के सामने नीचे बैठ गयी और शशिकला की बुर चूसने
लगी. शशिकला ने मुझे सामने खड़ा कर लिया और मेरा लंड चूसने लगी.
शशिकला को हम सब तीनों तरफ से चोदने मे लग गये. उसे बहुत मज़ा आया.
वह इतनी बार झड़ी कि मा को उसने अपनी बुर से आधा कटोरी रस तो पिला ही दिया
होगा. मेरा लंड चूस कर शशिकला ने मुझे झड़ाया और मेरा सारा रस पी गयी.
शशिकला जब पूरी तृप्त होकर लस्त पड़ गयी तो अंकल ने उसकी गान्ड मे से अपना
लंड खींचकर शशिकला को चूम कर कहा “मज़ा आया बेटी? आज कितने दिनों
बाद ऐसा आसान किया है, अकेले मे तो यह ठीक से होता नही, आज अनिल और मम्मी थे
तो आख़िर एक साथ तेरे तीनों अंगों को आनंद मिला.”
शशिकला कुछ बोलने की स्थिति मे नही थी, बस सोफे पर लुढ़क गयी. मैं भी आज
इतनी बार झाड़ा था कि वही फर्श पर ढेर हो गया.
अंकल का अब भी खड़ा था और कस के खड़ा था. उनकी वासना चरम सीमा पर थी
जो शायद उन्होने मा के लिए बचा कर रखी थी. मा भी तब से सिर्फ़ शशिकला
की वासना पूर्ति मे जुटी थी, खुद को बस अपनी बुर को सहला सहला कर गरम
रखे हुए थी.
मा अशोक अंकल को बोली “बच्चे तो लुढ़क गये अशोक, बस हम दोनों बचे
है. आओ, आते हो मैदान मे? आज हो ही जाए मेरी तुम्हारी जुगलबंदी, देखे हम
मियाँ बीबी की कैसी जमती है.” और वही फर्श पर अपनी टांगे पसारकर कर
चूत को अशोक अंकल के सामने खोल कर लेट गयी. उसकी आँखों मे बड़ी
मादक छटा थी, चेहरे पर भी ऐसे भाव थे जैसे रंडियों के होते है
अपने ग्राहकों को रिझाने या उकसाने के लिए.
अंकल उठे और मा पर चढ़ गये. एक बार मे ही उन्होने अपना लंड मा की बुर
मे उतार दिया और मा पर सो कर उसे चोदने लगे. “आइए रीमाजी, आइए, आज आपको
दिखाता हू की आपका यह होने वाला दास, आपका पति क्या चीज़ है. अब तक तो मैं
आपको चोदते समय आपकी सुंदरता और शालीनता का लिहाज कर रहा था, आज अब
दिखाता हू कि असली चुदाई क्या होती है, आप जैसी मतवाली नारी मिल जाए तो उसे कैसे
चोदा जाता है. अनिल देख ले बेटे, तेरी मा को मैं आज ऐसे चोदुन्गा जैसा तूने अब
तक नही चोदा होगा”
मा चूतड़ उछल उछल कर चुदवाते हुए बोली “बिलकुल चोदो अशोक, ऐसे चोदो
कि मैं कल उठने के लायक न रहू. और मुझे अब डार्लिंग भी कहा करो प्लीज़, ये
आप आप क्या लगा रखी है. मैं अब तुम्हारी पत्नी होने वाली हू, मेरे शरीर पर अब
तुम्हारा पूरा हक है कि कैसे भी इसे भोगो.”
धुआँधार चुदाई शुरू हो गयी. अंकल ने पहले तो मा को सधी लय मे चोदा,
धीरे धीरे पूरा लंड अंदर बाहर करते हुए. जब मा दो बार झाड़ गयी तब वे
अपने रंग मे आए. मा को बाहों मे दबोचा, उसके होंठों को अपने
होंठों मे दबाया, अपनी छाती से मा की छातियाँ पिचका दी और हचक
हचक कर चोदने लगे. मा की बुर इतनी गीली थी कि फ़चक फ़चक फ़चक आवाज़
आने लगी.
अंकल ने अगले बीस मिनित मा को चोदा. एक पल भी नही रुके. गजब का स्टेमिना
था उनमे. पसीने पसीने हो गये पर उनकी कमर लगातार उपर नीचे होती रही.
कभी मा का मूह वे पल भर को चोदते तो मा वासना से कराह उठती. वह इस
जंगली किस्म की रति मे उनका पूरा सहयोग दे रही थी. अपनी कमर और चूतड़
उचका उचका कर चुदवा रही थी. अपनी बाहों मे अशोक अंकल को जकाड़कर
उनकी पीठ खरोंच रही थी.
आख़िर जब अंकल झड़ने के करीब आए तो हाँफने लगे. मा ने उन्हे शाबासी दी.
“बहुत अच्छे अशोक, बस ऐसे ही चोदो, और ज़ोर से धक्के नही लगा सकते क्या?
मेरी कमर नही तोड़ी अब तक! अरे मुझे लगा था कि तुम ऐसे पेलोगे कि मेरी कमर
लचका दोगे. प्लीज़, लगाओ ना ज़ोर से और” मुझे बड़ा गर्व हो रहा था. मा आज
अपने पूरे अंदाज मे थी. आज मुझे पता चल रहा था कि मा की वासना कितनी
गहरी थी. अशोक अंकल के हर वार का उसने मुकाबला किया था.
अंकल अब मा को ऐसे चोदने लगे कि हर धक्के से संगमरमर के फर्श पर
मा का शरीर तीन चार इंच आगे फिसल जाता. चोदते हुए सरक सरक कर दोनों
आख़िर जब सोफे के करीब पहुँचे तब मा ने सहारे के लिए सोफे का पैर पकड़
लिया. अंकल ने करारे धक्के लगाना शुरू किए जैसे मा को मार डालना चाहते
हों. वे अचानक झाडे और जोश मे ऐसे चिल्लाए जैसे रोलर कोस्टर मे बैठे
हों. उनका शरीर एकदम तन सा गया और वे मा के शरीर पर गिर पड़े.
मा भी झाड़ गयी थी पर उसमे अब भी गरमी बाकी थी. वह अब भी कमर चला
चला कर अंकल को चोद रही थी. उनके झाडे लंड को वह सहन नही हो रहा था
और वे ‘ओह’ ‘ओह’ ‘बस डार्लिंग प्लीज़’ ‘ओह मत करो ना’ कहते हुए ढेर हो गये.
मा ने उन्हे अलग किया और प्यार से चूमा. वह बहुत खुश लग रही थी.
शशिकला जो पड़े पड़े यह तमाशा देख रही थी, बाहे फैला कर बोली ‘वाह
मम्मी, डॅडी को आज पहली बार अपनी जोड़ का साथी मिला है. इधर आओ ना, मुझे
अपने आगोश मे ले लो, मुझे प्यार करो, तुम तो हमारे लिए अब कामना की देवी हो,
यह घर अब तुम्हारे प्रसाद पर ही चलेगा”
मा उठाकर सोफे पर आई और अपनी टांगे फैलाकर शशिकला के सिर को कैंची की
तरह फाँसती हुई बोली “इसीलिए तो आई हू बेटी तेरे पास, ले इतना प्रसाद है यहाँ,
भोग लगा ले जितना मन चाहे.” शशिकला मा की बुर मे मूह डाल कर मग्न हो
गयी. उधर अंकल इतने थक गये थे की वैसे ही फर्श पर पड़े पड़े सो गये. मा
के गोरी जांघों मे फँसा शशिकला का सिर देखते देखते मेरी भी आँख लग
गयी.
सुबह हम उठाकर सिर्फ़ चाय पी कर घर चल दिए. अंकल तो अब भी सो रहे थे,
उन्हे नही जगाया, आख़िर बेचारों ने बहुत मेहनत की थी कल रात की कुश्ती मे.
शशिकला का चुंबन ले कर मा ने उससे बीड़ा ली. “मम्मी, मैं तैयारी करती
हू शादी की. इसी गुरुवार को है. वहाँ से सीधे गोआ चलंगे. तुम पचाड़े मे
नही पड़ना, बस आराम करो, और अनिल तुम भी. ज़रा अच्छे बच्चे बन कर
रहना. हफ्ते भर अब ब्रह्मचारी बने रहो, मा को भी आराम करना. ज़रा
हनीमून के लिए अपने आप को मस्त करो. मैं भी डॅडी का सब काम बंद करा देती
हू. उन्हे अगले हफ्ते बहुत मेहनत करना है मम्मी की सेवा मे. वैसे अनिल, अब
तुम उन्हे डॅडी कह सकते हो” मुस्करा कर शैतानी से वह बोली.
तीन चार दिन हमने सच मे आराम किया. मा ने भी मुझे अलग सुलाया. कसम भी
दी की मैं मूठ नही मारूँगा. वैसे दो दिन के बाद ही मैं ऐसा ताज़ा हो गया था
कि मा से अलग नही रहा जा रहा था. पर उसने मुझे समझाया कि इतनी मीठी
घड़ी आ रही है, इतनी बड़ी दावत पर ताव मारना है तो भूखा रहना ज़रूरी है.
गुरुवार को हम बस कुछ कपड़े लेकर शशिकला के यहाँ आ गये. वह तो बोल
रही थी कि कुछ मत लाओ, सब यहाँ तैयार है पर मा ने उसके कुछ खास कपड़े,
चुनी हुई ब्रा और पैंटी और अपनी सब सॅंडल और चप्पले ले ली. मैने ही उसे
कहा था, एक तो वे मेरी प्रिय चीज़े थी, दूसरे अशोक अंकल को भी वे बहुत
पसंद आएँगी मुझे मालूम था.
शादी एकदम प्राइवेट हुई. बस एक कोर्ट का आफिसर आया था. उसने दस्तख़त लिए और
मा और अंकल ने एक दूसरे को हार पहनाए. जब वह आफिसर चला गया तो अंकल
मा से लिपट कर उसे चूमने लगे. बहुत जोश मे लग रहे थे, लगता था कि दो
तीन दिन के आराम से उनके लंड को फिर पूरा जोश आ गया था. जिस तरह से वे मा को
बाहों मे भींच कर उसे किस कर रहे थे, मुझे लगा कि अभी पटक कर चढ़
जाएँगे. मा कुछ कुछ शरमा रही थी पर उनके चुंबनो का प्यार से जवाब
दे रही थी.
शशिकला ने उन दोनों को अलग किया “मैने कहा था ना? अभी सब बंद! कल ही
दोपहर को गोआ जाना है. वहाँ कल रात है हमारा हनीमून, फिर देख लूँगी कि
कौन कितने जोश मे है”
फिर मुड़कर मुझे बोली “अनिल, अपने डॅडी के पैर छुओ, मैं भी अब अपनी
मम्मी के पैर पड़ूँगी.”
हम दोनों जैसे ही झुके, अशोक अंकल ने मुझे बाहों मे जाकड़ लिया “अरे ये
तो मज़ाक कर रही है, अनिल, तेरी जगह मेरी बाहों मे है. ये शशि ने
ज़बरदस्ती की नही तो उसी दिन मैं दिखा देता कि तू मुझे कितना अच्छा लगता है”
उनका लंड कस के खड़ा था, कपड़ों के नीचे से ही मेरे पेट पर दब रहा था.
मा ने भी शशिकला को बाहों मे भर लिया और चूमने लगी. “मेरी बेटी,
तुझे मैं बहुत सुख दूँगी, आज जो यह सब सुख मुझे और मेरे बेटे को मिला है,
सब तुम्हारी वजह से है”
हम सब बेहद उत्तेजित थे, ऐसा लगता था कि अभी कपड़े उतार कर शुरू हो जाए.
पर शशिकला मानने के मूड मे नही थी. हम दोनों को उसने जाकर आराम
करने को कहा. “अब सीधे एयरपोर्ट पर मिलेंगे मम्मी. तुम्हारा समान यही
छोड़ जाओ, हम ले आएँगे. खूब आराम करो, कल रात सब मुझे फ्रेश और तैयार
चाहिए”
अगली दोपहर को हम गोआ मे थे. अशोक अंकल का बंगला परवरीम मे एकदम
अंदर जाकर करीब करीब जंगल मे था. आस पास बस पेड़ और घनी झड़ी थी. दूर दूर
तक और कोई घर नही था. बंगले मे एक बूढ़ा नौकर केयरटेकर था.
बंगला आलीशान था. चार बेडरूम थे. उनमे से एक बहुत बड़ा था, वहाँ वैसा
ही बड़ा पलंग था जैसा शशिकला के बेडरूम मे था.
शशिकला ने सब को फिर से जाकर सो लेने को कहा. “अभी दो तीन घंटे और सो लो. अब
रात भर मैं सोने नही दूँगी किसी को. बहुत मेहनत करना है, खास कर तुम
दोनों मर्दों को”
शाम को हम सब तैयार हो कर बाहर गये. फ़ोर्ट अग्वाडा मे खाना खाया, कुछ
वाइन ली, गप्पे लगाई. हम सादे कपड़ों मे ही थे, कोई कह नही सकता था कि
हनीमून पर आए है.
आठ बजे हम वापस आए. नौकर बंगले के गेट के पास बने अपने घर मे
चला गया था. हम आकर बड़े बेडरूम मे बैठ गये. शशिकला ने अंगड़ाई ले
कर कहा “चलो, अब काम की बात शुरू करे. ऐसा करो, तुम दोनों उन दोनों
कमरों मे जाओ, नहा लो और कपड़े बदल लो. तुम्हारे कपड़े वही रखे है.
मैं और मम्मी इस बेडरूम मे कपड़े बदलेंगे. जब मैं आवाज़ दूं तो आ जाना.
और ज़रा संभालना अपने आप को, आज तो मुरदों की रात है”
मैने जाकर नहाया. बाहर आया तो कपड़ों के नाम पर सिर्फ़ एक सफेद एकदम तंग
जंघिया रखा था, और कुछ नही. जंघिया बहुत अच्छी क्वालिटी का था और
खास मेल माडल्स पहनते है वैसा था. मैने खूब ढूँढा, और कोई कपड़े
नही दिखे. मैं समझ गया कि शशिकला यही चाहती है. मेरा लंड अब तन
गया था. बड़ी मुश्किल से मैने वह जंघिया पहना, अपना लंड उसके अंदर
खोंसा. जंघीए की क्रैच मे टाइट इलेस्तिक था जिसने लंड को दबा कर रखा
था. फिर भी जंघीए मे तंबू दिख रहा था. कसे जंघीए के मुलायममेटिरियल
के स्पर्श से लंड और उत्तेजित हो गया था. मुझे समझ मे नही आ
रहा था कि कपड़ा है, कि नायालन या रबड़ है! मैं शशिकला के बुलाने की राह
देखने लगा. दिल उत्तेजना से धड़क रहा था. मैं जानता था कि आज की रात सेक्स के
सारे बंधन टूट जाएँगे.
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शशिकला ने आवाज़ दी तो मैं बड़े बेडरूम की ओर चल दिया. करीडार मे अंकल मिले.
वे भी मेरे जैसा ही जंघिया पहने थे. वे बेचारे और तकलीफ़ मे थे, उनका
बड़ा लंड तो अंदर समा ही नही रहा था. जांघिया नीचे से तन गया था और
लंड बड़ा होकर उसे स्त्रेच कर रहा था. अंकल बहुत हॅंडसम दिख रहे थे.
उनका वह नहाया हुआ दमकता सुडौल गोरा शरीर देखकर मुझे अजीब सा
लगने लगा. मुझे अंदाज़ा होने लगा था कि मा को भी वे कितने अच्छे लगते
होंगे.
मुझे देखकर . “अनिल, तू इतना चिकना लग रहा है कि अगर ये दोनों
अप्सराएँ हमारी राह न देखती होती तो तुझे मैं उठाकर सीधे अपने बेडरूम मे
ले जाता और खूब प्यार करता.” मैं थोड़ा शरमा गया, समझ मे नही आ रहा
था कि क्या जवाब दूं.
हम जब बड़े बेडरूम मे पहुँचे तो हमारी आँखे चौंधिया गयी. मा और
शशिकला सज धज कर वहाँ खड़ी हमारी राह देख रही थी. आज दोनों ने
अर्धनग्न रूप सजाया था. मा हल्के गुलाबी रंग की पैंटी और ब्रा पहने थी.
दोनों बिकिनी मे थी याने एकदम छोटी. ब्रा के कप सिर्फ़ मा के निपलो और
नीचे के आधे स्तनों को ढके थे. उपर के स्तन खुले थे. ब्रा पुशप
होने से मा के गदराए उरोज तन गये थे और उसकी ब्रा मे से उफान कर बाहर आ रहे थे.
पैंटी भी तंग स्टाइल की थी, बस एक पतली पत्ती थी जिससे मा की बुर की लकीर
भर छिप गयी थी. बाकी मा की बुर के बाल दोनों तरफ से दिख रहे थे. मा के
गोरे विशाल नितंब भी करीब करीब पूरे खुले थे. मा ने एक गुलाबी रंग की ही
है हील स्लिपर पहन रखी थी. स्लिपर भी बहुत नाज़ुक थी, एकदम पतले सोल और
पतले पत्तों वाली, हिल भी एकदम पतली थी, गुलाब के पौधे की छड़ी जैसी!
शशिकला का भी यही रूप था. बस उसने गहरे आसमानी रंग की ब्रा और पैंटी
पहनी थी. सॅंडल एकदम सफेद रंग के थे. शशिकला ने मुस्काराकर मुझे
पास बुलाया. मैं उसके पास गया तो उसने मुझे बाहों मे भर लिया और मेरी
आँखों मे आँखे डालकर मुझे चूमने लगी. “मेरा छोटा भाई! अपनी दीदी की
सेवा करेगा ना अब जिंदगी भर?” मैं क्या कहता, मेरी आँखों से उसे पता चल
गया होगा कि उसके गुलामी करूँगा जीवन भर!
अंकल मा के आगे घुटने टेक कर बैठ गये. “दीदी, मम्मी, आप जैसी अप्सरा
मेरी पत्नी बनी है मुझे विश्वास ही नही हो रहा है. आज तो मैं मर जाउन्गा, इतना
आपका रूप मुझे सता रहा है. इस गुलाम को आज प्लीज़ पूरी छूट दीजिए कि वह
आपके रूप का चाहे जैसे पान करे.” और मा की कमर मे बाहे डालकर अपना
चेहरा उसकी बुर मे दबा दिया.
मा ने उन्हे उठाया और गले मे बाहे डाल दी. “आज से तुम मेरे पति हो अशोक,
तुम्हारी हर इच्छा को पूरा करना मेरा फ़र्ज़ है. मेरे शरीर का हर भाग
तुम्हारा है, भोगो जैसे चाहे, मैं नही रोकूंगी”
शशिकला मुझे चूमकर उनके पास ले गयी “मम्मी, आपके शरीर का एक और
भाग है जो डॅडी को बहुत पसंद है, बल्कि मरते है उसपर. अब तक बोलते
नही थे, आज से उसे भी वे प्यार करना चाहते है. वो भाग आपके शरीर का है पर
अब अलग है आपसे”
मा बोली “मैं समझी नही बेटी”
शशिकला मुझे आगे करते हुए बोली “अनिल. अनिल की बात कर रही हू मैं, डॅडी आज
तुम दोनों से प्यार करना चाहते है”
मा मुस्करा दी “बिलकुल करो अशोक, मैं कब की समझ गयी थी, जिस तरह से तुम
अनिल को देखते थे उससे मुझे इसका अंदाज़ा हो गया था. अनिल मेरा बेटा है और
मुझे बहुत अच्छा लगा कि वो इतना खूबसूरत है कि तुम्हे भी अच्छा लगता
है. मैं चाहती हू कि आज तुम अपने मन की हर मुराद पूरी कर लो. अनिल, तुझे
अंकल … मेरा मतलब है डॅडी अच्छे लगते है ना? मैं चाहती हू कि तुझे
भी हर तरह का यौन सुख मिले, जैसा मुझे मेरी बेटी के साथ मिला”
मैं थोड़ा शरमा रहा था. अंकल मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे खा जाएँगे.
उनकी निगाहों मे बेहद प्यार और वासना थी. मैं बोला “हाँ मा, अंकल बहुत
हॅंडसम है, मुझे मंजूर है अगर वे मुझसे भी …. मैं तैयार हू.”
अंकल ने खुश होकर मुझे और मा को पकड़ा और सोफे पर बैठ गये. उनके एक
तरफ मा थी और एक तरफ शशिकला. मुझे उन्होने गोद मे ले लिया. “ये सब से
छोटा है, मेरी गोद मे बैठेगा.” उनका खड़ा लंड मेरी पीठ पर दब गया. वे
बारी बारी से हम तीनों को चूमने लगे. कभी मा के होंठ चूमते, कभी
अपनी बेटी के और कभी बीच मे मेरे होंठ अपने होंठों मे लेकर किस
करने लगते. मेरे तने लंड पर उनका पूरा ध्यान था, उसे वे मुठ्ठी मे
पकड़कर धीरे धीरे उपर नीचे कर रहे थे.
चूमाचाटी के साथ साथ हमारी वासना बढ़ती गयी. हम चारों आपस मे
लिपटे थे. कोई किसी को किस करने लगा, कोई किसी को. सबके हाथ उन मुलायम
स्तनों और जांघों पर घूम रहे थे. मैने बीच मे हाथ पीछे करके अंकल
का लंड पकड़ लिया. एकदम लोहे के डंडे जैसा सख़्त हो गया था.
बीच मे मेरा हाथ मा की ब्रा पर लगा. बहुत मुलायम ब्रा थी, लगता था जैसे
पतले रबड़ की बनी हो. मैने शशिकला की पैंटी को छुआ तो वो भी वैसी ही थी.
मैने पैंटी उतारने की कोशिश की तो शशिकला ने मेरे हाथ पर चपत मार दी.
मा के मूह से मूह अलग करके बोली “हाथ मत लगाना! ये अभी नही उतरेगी.”
मैने चुदासी से व्याकुल होकर कहा “आज नही उतारोगी दीदी तो कब उतारोगी? आज की
रात का तो मैं कब से इंतजार कर रहा हू!”
शशिकला ने जवाब दिया. “जब भूख लगेगी तब उतरेगी ये. पर तू फिकर मत कर,
तेरे काम के लिए इसे उतारना ज़रूरी नही है, खास इसीलिए तो पहनी है ये तंग
स्टाइल की पैंटी, देख!” और उसने पैंटी की पत्ती हाथ से अलग करके दिखाई. सच
मे इतना सी पत्ती थी, रीबन जैसी कि दो इंच खिसकते ही शशिकला दीदी की बुर
दिखने लगी.
“देखा?” मुस्काराकर दीदी बोली “काम रुकेगा नही हमारा. मम्मी की भी ऐसी ही
है”
डॅडी … अशोक अंकल…अब तक व्याकुल हो गये थे. मा को उठाकर बिस्तर पर ले
जाते हुए बोले “डार्लिंग, पहले ज़रा स्वाद तो चखा दो अपने अमृत का, हफ़्ता हो
गया. मैं तो तरस गया इस शहद के लिए”
मा ने लेटते हुए अपनी टांगे फैलाई और बड़ी शोख अदा से अपनी पैंटी की
पत्ती बाजू मे की “लो अशोक, जितना चाहे पी लो मेरा रस. हफ्ते से जमा हो रहा
है इस अमृत कुंड मे, सब तुम्हारे लिए है, सुहागरात की भेंट मेरे प्यारे पति
को”
अशोक अंकल तुरंत मा की बुर मे मूह डाल कर पेट पूजा मे जुट गये.
मैने भी शशिकला दीदी की बुर से मूह लगा दिया. इन कुछ दिनों मे न झड़ने
से उसका रस और गाढ़ा हो गया था, चासनी की तरह रिस रहा था.
दस मिनिट दीदी की बुर चूसने के बाद मुझसे नही रहा गया. मैं उठकर
उसपर चढ़ गया. वह हंस कर मुझे बाहों मे लेती हुई बोली “इतने मे ही
पेशंस चला गया मेरे भैया! चलो कोई बात नही, आओ, चोद लो पर एक बात.
झड़ना नही! झड़ने के लिए मैं कहूँगी तुझे एक खास मौके पर. अपनी इस
मलाई को बचा कर रख ज़रा. डॅडी…आप तैयार है ना?”
अशोक अंकल भी मा की जांघों के बीच बैठकर अपना जंघिया उतार रहे थे.
“डॅडी, भूल गये, मैने उतारने को मना किया ना था? सामने के फ्लैप मे से
निकाल लीजिए ना, उतारने की ज़रूरत नही है. मैं उतरवाउन्गा जब मुहूरत आएगा”
अशोक अंकल ने बड़ी मुश्किल से जंघीए के फ्लैप मे से अपना लंड निकाला. वह
इतनी ज़ोर से खड़ा हो गया था कि मूड कर फ्लैप मे से निकल ही नही रहा था. किसी
तरह मा की मदद से उन्होने आख़िर लंड निकाला और तुरंत मा की बुर मे
घुसेड कर उसपर लेट कर अपने अंदाज मे चोदने लगे. शशिकला ने प्यार से
मेरा लंड बाहर निकाला और खुद ही अपनी चूत मे डाल लिया. मैं शशिकला को
चोदने लगा.
हनीमून की इस चुदाई मे मज़ा आ रहा था. पर मुझे बार बार लग रहा था कि आज
कुछ खास होगा, ऐसी चुदाई तो हमने कई बार की थी.
कुछ देर बाद जब मैं झड़ने को आ गया तो शशिकला ने मुझे रोक दिया. अशोक
अंकल से बोली ” क्यो डॅडी? चोदते ही रहेंगे या आगे भी कुछ करेंगे? हम
लोगों को भी आना है आप दोनों के साथ”
डॅडी हाम्फते हुए बोले “हा बेटी, अब आ जाओ, तुम्हारी मम्मी आज बला की
नमकीन है, मैं झाड़ जाउन्गा. चूत मैं बहुत चोद चुका, अब उसे आराम देना
चाहता हू कि बाद मे चूस सकु. मेरी जान …” मा को वे बोले “अब ज़रा गान्ड मार
लेने दो प्लीज़, आज की हनीमून की रात मे तुम्हारी गान्ड मारने मे बहुत मज़ा
आएगा.”
“आप गान्ड मारिए डॅडी, मैं रीमा मम्मी की चूत चूसति हू.” शशिकला
उठाकर मा के पास जाकर सो गयी.
मा उसे बाहों मे लेकर बोली “आ जा बेटी पर दूसरी तरफ से आ. मुझे प्यासा
रखेगी क्या? मुझे भी तो ज़रा शहद चखने दे अपने बदन का”
शशिकला चित लेट गयी. मा उसपर उलटी तरफ से लेट गयी. शशिकला ने
जंघे खोलकर मा का सिर उनके बीच ले लिया और अपनी बुर पर उसका मूह दबा
लिया. खुद उसने मा की जंघे फैलाई और प्यार से उंगलियों से मा की बुर
खोलकर चाटने लगी. “बढ़िया माल बनाया है आज मम्मी ने, मुझे तो घंटे
भर की फुरसत हो गयी डॅडी. चलिए आप अपने मन की कर लीजिए.”
मई लंड हाथ मे लिए बाजू मे बैठा था. समझ मे नही आ रहा था की क्या
करू. मुझे देखकर शशिकला मुस्काराई “धीरज रखो मुन्ना भैया. अभी
तेरा और डॅडी का साथ मे इंतज़ाम कर देती हू. तू डॅडी की मदद कर मा की
गान्ड मारने मे. पहले जाकर वहाँ फ़्रिज़ मे से वो सफेद कृमि बटर का डिब्बा ले
आ. आज से अब क्रीम के बजाय मख्खन लगाया जाएगा चुदाई के लिए. क्रीम मूह मे
जाती है तो बड़ा कड़वा मूह हो जाता है. और आज तो अब मम्मी के बदन की हर
जगह का स्वाद लेना है”
मैं मखखां ले आया. डॅडी बस अपनी लंड सहलाते हुए बैठे रहे. छोटा
होने की वजह से सारी तैयारी मुझे ही करनी पड़ी. मैने बुरा नही माना, बल्कि
काफ़ी मस्ती का अनुभव कर रहा था. पहले मैने मा की पैंटी की पत्ती बाजू मे
की और गान्ड मे प्यार से मख्खन चुपडा. फिर हथेली पर लेकर डॅडी के लंड
पर लगाया. डॅडी के मस्त हुए शिश्न को मख्खन लगाने मे बड़ा मज़ा आ रहा
था. मैं मख्खन चुपड रहा था तभी उन्होने प्यार से मुझे बाहों मे ले
लिया और मुझे चूमने लगे. बार बार मेरे होंठों, गालों और आँखों को
चूमते हुए बोले “अनिल मेरे बेटे, बहुत प्यारा है तू, इतना सुख दे रहा है
मुझे. बहुत रसीला भी है तू, अब मन लगाकर तेरा रस चखूँगा”
वे पीछे से मा पर चढ़े और मैने मा के चूतड़ फैलाकर मा की गान्ड मे
लंड डालने मे उनकी मदद की. शशिकला जो मा के नीचे दबी हुई मा की बुर
चाट रही थी, हँसकर बोली “वाह, मुझे क्या व्यू मिला है! बिलकुल पास से देख
रही हू मेरी मम्मी की गान्ड मे घुसते डॅडी के लंड को”
डॅडी मा की गान्ड मारने लगे. मख्खन से चिकनी गान्ड मे सपासाप उनका
लंड अंदर बाहर होने लगा. इस बार मा बिलकुल नही कराही, पिछली बार मारने
पर काफ़ी सिसकी थी. पर आज एक तो उसकी गान्ड को अब आदत हो गयी थी, दूसरे
शशिकला के साथ सिक्स्टी नाइन करने मे उसे वह लुत्फ़ आ रहा था कि और कोई
परवाह उसे नही थी. शशिकला बीच बीच मे मा की बुर से मूह हटकर डॅडी
के अंदर बाहर होते लंड पर जीभ लगा देती.
मैं वैसे ही बैठा यह मस्ती देख रहा था. लगता था मैं भी चढ़ जाउ और किसी
को चोद डालु पर समझ मे नही आ रहा था, दोनों औरतों की चुते और मूह
व्यस्त थे. शशिकला की गान्ड ज़रूर खाली थी पर वह मा के नीचे दबी होने से
उसे चोदने की कोई गुंजाइश नही थी.
शशिकला ने मुझसे चुटकी ली “अब तू क्या करेगा अनिल?” मैं बस देखता रहा.
डॅडी थोड़े तिरछे हुए और बोले “मेरे अनिल को मत तंग करो. इतना प्यारा लड़का
है. अनिल, आओ बेटे, यहाँ मा के बाजू मे लेटो. मैं तुम्हारा ये जवान रसीला लंड
चूसना चाहता हू”
शशिकला हंस पड़ी “हाँ अनिल, हमने कब से ये आसान सोच रखा था, शादी के
बाद की चुदाई का पहला आसन. आ जा, शरमा मत, डॅडी तो कब से प्यासे है तेरी
जवानी के”
धड़कते दिल से मैं मा के बाजू मे लेट गया. डॅडी ने झुक कर प्यार से मेरे
सुपाडे को चूमा, जीभ से चाटा और फिर मूह मे ले लिया. ज़्यादा खिलवाड़ के लिए
उनके पास समय नही था. मूह खोल कर मेरा पूरा लंड उन्होने निगल लिया और
चूसने लगे. चूसते चूसते फिर से मा की गान्ड मारने लगे.
बीस पचीस मिनित बाद जब वे झाडे तो सभी सुख के चरम शिखर पर पहुँच
गये थे. मा और शशिकला दीदी तो कई बार झाड़ चुकी थी. मुझे भी यह सुख
सहन नही हो रहा था. डॅडी … अशोक अंकल … बहुत मस्त चूस रहे थे, बाद
बाद मे तो मैं सब शरम भूल कर उनके सिर को पकड़कर नीचे से धक्का दे
देकर चूतड़ उछाल उछाल कर उनका मूह चोद रहा था. इधर वे झाडे और उधर
मेरा वीर्य भलभलाकर उनके मूह मे उबल आया. डॅडी ने हान्फते हुए चूस
चूस कर मेरा वीर्य निगला, एक बूँद नही छोड़ी. मेरा लंड सिकुड कर ज़रा सा हो
गया पर डॅडी चोदने के मूड मे नही थे, उसे मूह मे लेकर चाकलेट की
तरह चूसते ही रहे.
जब डॅडी मा पर से उतरे तो शशिकला ने गर्दन आगे करके मा की गान्ड का
छेद चूम लिया. उसमे से डॅडी का वीर्य बह रहा था. मा के उस गुलाबी चुदे
हुए छेद मे से बहता वह गाढ़ा सफेद वीर्य बहुत स्वादिष्ट दिख रहा था.
शशिकला पड़े पड़े उसे चाटने लगी. मैं तक लगाकर देख रहा था.
शशिकला ने मुझे भी बुलाया “अलग क्यो पड़ा है अनिल? नही चाहिए कामदेव
का यह प्रसाद? आ ना, चख ले, शरमा मत, अरे इसी रस के लिए तो असली रसिक
मरते है.”
मैं उठकर मा के चुतडो पर झुक कर चाटने लगा. शशिकला ने मूह
हटा लिया “फिफ्थी फिफ्थी भैया, आधा तुम, आधा मैं” बारी बारी से हम दोनों
अशोक अंकल का वीर्य चाटने लगा. मुझे स्वाद अजीब सा लगा, कसैला, खरा सा पर
एकदम मादक . मैने मन भरके मा की गान्ड चूसी. मा की गान्ड का
सौंधा सौंधा स्वाद उसमे लग गया था. बाहर निकलता वीर्य ख़तम हो गया
तो फिर मैने मा की गान्ड चौड़ी की और अंदर जीभ डालकर चाटने लगा. मुझे
लगा था कि दीदी अब बंद कर देगी पर वह तो उस्ताद निकली. “अनिल, मम्मी की गान्ड
खोल कर रख और मुझे भी स्वाद लेने दे, मन नही भरा अब तक” और जीभ अंदर
डाल दी.
कुछ देर सब पड़े रहे. आख़िर डॅडी उठे और बोले “आज सच मे लग रहा है कि
हमारे दो परिवार एक हो गये है. मुझे तो मज़ा आ गया. मम्मी, मेरा मतलब
है रीमा आंटी … याने मेरी डार्लिंग वाईफ की ये गुदाज गान्ड मारन को मिली और साथ
साथ इस मतवाले नौजवान बेटे की मलाई मिल गयी चखने को. किसी को और क्या
चाहिए हनीमून की रात मे. डार्लिंग, ये जो अनिल का वीर्य था, याने उसकी क्रीम,
सच मे एकदम स्वाद आ गया, मर्दानी जवानी का यह असली स्वाद बहुत दिनों मे
मिला मुझे. अनिल बेटे, तुझे मज़ा आया या नही”
मैं कुछ नही बोला, बस मुसकाराता रहा. मा बोली “अरे उससे क्या पूछते हो,
उसका चेहरा बता रहा है कि वह कितना खुश है. शशि बेटी, मान गये तेरे
इस आसन की कल्पना को”
शशिकला बोली “इसमे कुछ नही है मम्मी, अब तो मिल जुलकर नये नये तरीके
ढूंढ़ेंगे, चार लोगों मे न जाने कितने कंबिनेशन बन सकते है” उठकर
वह वाइन ले आई. हमने वाइन पी और गप्पे लगाते हुए कुछ देर आराम किया. वाइन के
उस नशे से धीरे धीरे सब को फिर से खुमारी चढ़ गयी.
डॅडी बोले “मेहनत करके कुछ भूख लग आई है शशि, तूने कुछ इंतज़ाम
नही किया” वे शैतानी से मुस्करा रहे थे. मा भी मुस्करा रही थी. शशिकला
ने कनखियों से मेरी ओर देखते हुए कहा “अभी इतनी जल्दी, दो चार और
कुश्तिया हो जाने दीजिए, फिर खाएँगे. खाना थोड़ा और स्पाइसी हो जाएगा” मुझे
लगा कि मेरे सिवाय सब जानते थे कि क्या बाते हो रही है पर मैने नही पूछा.
सोचा वैसे ही पता चल जाएगा.
हम फिर झूठ गये. इस बार डॅडी ने दीदी को चोदा और मैने मा को. चोदते
चोदते आपस मे लिपत कर हम चुमाचाटी करते रहे. कभी डॅडी गर्दन
बढ़ाकर मा को चूम लेते या बारी बारी से मा और शशिकला की चूंची को ब्रा
के उपर से ही चूसने लगते. मैं हाथ बढ़ाकर दीदी के मम्मे दबा रहा था.
बहुत मज़ा आ रहा था, मैने जानबूझ कर अपने आप को लगाम दी कि झाड़ न जाउ.
डॅडी जल्दी झाड़ गये. मैं मा को लगातार चोद रहा था. जब डॅडी शशिकला
पर से अलग हुए तो मैने देखा कि उसकी चूत से डॅडी का सफेद गाढ़ा वीर्य बह
रहा है. अशोक अंकल के लंड पर भी उनका वीर्य और दीदी की बुर का चिपचिपा
पानी लगा हुआ था. मेरा मन हुआ की फिर से दीदी की बुर मे मूह मार दूं. उसके उस
शहद को चाटने का मन तो था ही, साथ मे यह भी आस थी कि फिर से डॅडी का वह
अनोखा वीर्य चखने मिल जाएगा.
मा के मन मे और कुछ था. मेरे कान पकड़कर बोली “चल बड़ा आया. ये मेरे
हिस्से का प्रसाद है, पिछली बार तुम दोनों ने चख लिया, अब मेरी बारी है.” और
लेट कर शशिकला की बुर से बह रहे पानी और वीर्य को चाटने लगी. चाटते
चाटते वह मुझसे चुदवा भी रही थी, अपनी कमर हिला हिला कर मेरा लंड
अंदर ले रही थी.
शशिकला मुझे बोली “अनिल, तू फिकर मत कर, डॅडी का लंड चाट ले. मूह मे
लेकर देख, मज़ा आएगा! अब तक तूने लंड मूह मे नही लिया होगा ना? देख ले,
मज़ा आ जाएगा!”
मैं मस्ती मे था. मा की चूत मे मैने लंड पेलना जारी रखा और मूड कर
डॅडी के लंड को हाथ मे ले लिया. अब वह सिकुड कर छोटा हो गया था. मैने उसे
पूरा मूह मे भर लिया. अच्छा लग रहा था, नरम नरम लंड मूह मे लेकर
मन हो रहा था कि चबा कर खा जाउ. मैं चूसता रहा, दीदी और डॅडी के
मिलेजुले स्वाद का लुत्फ़ उठाता रहा.
अशोक अंकल ने मेरा सिर पकड़कर मेरा चेहरा अपने पेट पर दबा लिया. मेरे
बालों मे प्यार से उंगलियाँ फेरते हुए बोले “ओह ओह मेरे राजा, कितना अच्छा लग
रहा है तेरे मूह का यह गरम गीला दबाव मेरे लंड पर. चूस बेटे, चूस ले,
तुझे निराश नही करूँगा मैं”
जल्दी ही उनका लंड कड़ा होने लगा. दो बार झड़कर भी फिर तैयार होते उस लंड को
देख कर मैने मन ही मन डॅडी की दाद दी, क्या रसिक पुरुष है! और इतने
हॅंडसम! मा मुझे अब भी चोद रही थी. उसने डॅडी से लिपटकर
चुमाचाटी शुरू कर दी. बोली “पसंद आया मेरा बेटा अशोक? कैसा लगा अपना
ये बेटा? मैं जानती थी कि तुम दोनों की खूब जमेगी. इसलिए मुझे शादी मे
कोई हिचकिचाहट नही हुई”
“रीमा डार्लिंग, तुम्हार बेटा, हमारा यह बेटा तो हीरा है, अब देखना हमारा
परिवार इस सेक्स के आनंद मे कहाँ से कहाँ जाता है” डॅडी मस्ती भरी आवाज़ मे
बोले.
इस बीच शशिकला उठकर अपने डॅडी के पीछे आकर लेट गयी थी. उसने
अशोक अंकल के चुतडो को प्यार से सहलाया और चूमा. फिर उनकी गान्ड
चाटने लगी. कुछ देर बाद उसने हाथों मे उनके चूतड़ पकड़कर उन्हे अलग
किया और उनके गुदा के छेद पर मूह लगा कर चूसने लगी.
“ओह ओह बेटी, बहुत अच्छा लगता है, और कर ना, जीभ अंदर डाल” वे सिसक कर
बोले. उनका लंड अब फटाफट लंबा होने लगा था.
मा बोली “शशि, तू तो बहुत पहुँची हुई निकली! ये पहली बार नही कर रही है
डॅडी के साथ ऐसा लगता है”
शशिकला सिर उठाकर बोली “हाँ मम्मी, डॅडी को बहुत अच्छा लगता है.
उनकी गान्ड बहुत सेन्सिटिव है. मैं हमेशा मूह लगाकर चाट्ती हू, वे
एकदम बहक जाते है. इसी तरीके के बल पर मैं रात रात भर उनसे अपनी सेवा
करवाती हू. वैसे डॅडी की गान्ड काफ़ी प्यारी सी है, गोरी चिकनी और भरी हुई, कोई
गान्ड का पुजारी हो तो झूम उठेगा इसे पाकर”
अब डॅडी का लंड पूरा खड़ा हो गया था. मैं उस आठ इंची लंड को पूरा नही
निगल पाया. थोड़ा निकालकर आधा मूह मे लेकर चूसता रहा. उसका सुपाडा अब
फूल कर थिरक रहा था. “बहुत अच्छा चूस रहा है मेरे लाल. चूस, जैसा चाहे
चूस, पूरा लेकर चूसता तो मैं निहाल हो जाता पर अभी तू छोटा है, पहली बार
है, मैं सिखा दूँगा, या फिर तेरी ये मा या दीदी सिखा देंगी कैसे लंड चूसा जाता
है, ये दोनों तो पहुँची हुई है” डॅडी बोले.
मा ने उन्हे अपनी ओर खींचा और अपनी चूंची उनके मूह मे दे दी. “बहुत
पाटर पाटर कर रहे हो अशोक, चलो मेरा स्तन पान करो. ब्रा के उपर से ही करो,
ब्रा पतली है, निपल को आराम से महसूस होगा तुम्हारे मूह का दबाव.”
अगले कुछ मिनिट मस्ती मे गये. मैं मा को चोदते हुए अशोक अंकल का लंड
चूस रहा था. अशोक अंकल … डॅडी … मा के उरोज को उस ब्रा के उपर से ही चूस
रहे थे और मेरे सिर को अपने पेट पर दबाते हुए कमर हिला हिला कर हौले
हौले मेरे मूह को चोद रहे थे. उनकी बेटी उनके पीछे से उन्हे चिपटी थी
और उनके चुतडो को पकड़कर अलग करके बड़े प्यार से अपनी जीभ अंदर डाल
डाल कर उनका गुदा चूस रही थी.
बीच मे डॅडी ने मा की चूंची से मूह उठाकर उसके कान मे कुछ कहा. मा
मुस्काराकर बोली “हाँ ठीक है पर उसे वैसे भी अच्छा लगेगा”
उसके बाद मा ने मुझे चोदने की रफ़्तार कम कर दी. मैं धक्के लगाता तो
टाँगो मे मेरी कमर पकड़कर रोक देती. डॅडी मन लगाकर मेरे मूह मे
लंड पेल रहे थे. मैं भी प्यार से चूस रहा था. अब डॅडी का लंड सख़्त होकर
थरथराने लगा था. जब डॅडी का शरीर अचानक तन सा गया तो शशिकला ने
तुरंत उनकी गान्ड मे उंगली डाल दी और ज़ोर से अंदर बाहर करने लगी. “अनिल,
तैयार रहना, डॅडी अब तुझे अपनी क्रीम खिलाने वाले है”
डॅडी एकाएक मेरे मूह मे झाड़ गये. मैं इतनी मस्ती मे था की लपलप वह
गाढ़ा गरम गरम वीर्य पी गया, एक दो घूँट के बाद मैने उसे निगलना बंद
करके मूह मे भरके जीभ पर घूमाकर स्वाद लेना शुरू कर दिया. पहली बार
डॅडी का वीर्य मैने डायरेक्ट पिया था, बहुत अच्छा लगा. जिस तरह से अपने बंद
मूह से वे सिसकारियाँ निकाल रहे थे उससे साफ था कि उन्हे भी कितना आनंद आया
होगा. मुझे बहुत अच्छा लगा कि मैने उन्हे इतना सुख दिया. मा ने मेरी
कमर से टांगे हटा ली और मैने फटाफट उसे चोद डाला और झाड़ गया.
मा बोली “अच्छी लगी बेटे डॅडी के लंड की क्रीम?”
मैने हाँ कहा. मा बोली “डॅडी चाहते थे कि उनके झड़ने के पहले तू न
झाडे जिससे उनके लंड का पूरा स्वाद ले सके मस्ती से. मेरे कान मे बोले कि अनिल
को अभी मत झड़ने दो. अगर तू पहले झाड़ जाता तो शायद उतने चाव से वीर्य
नही पीता. है ना?”
मैने जोश से मना किया. “नही मा, मैं तब भी मन लगाकर स्वाद लेता. अंकल …
याने डॅडी की मलाई बहुत अच्छी है. तुम्हारी चूत भी तो मैं झड़ने के बाद
भी चूसता हू. असल मे मुझे स्वाद ही बहुत पसंद है.”
डॅडी खुश होकर बोले “मेरा बेटा है असली रसिक फिर भी मैने सोचा कि पहली
बार है, ज़रा मस्ती मे रहने दो. अच्छा डार्लिंग, अब ज़रा टांगे अलग करो तो
अपने बेटे की मलाई मैं तुम्हारी बुर मे से चख लू”
शशिकला तैश मे आकर बोली “बिलकुल नही डॅडी. अब मेरी बारी है, आप और अनिल
तब से मज़ा ले रहे है क्रीम का, ये सब मेरी है” और उसने चाट चाट कर मा की
बुर पूरी साफ कर दी.
सब थक गये थे और भूख भी लगी थी. अंकल फिर बोले “अब तो इंतज़ाम करो
शशि, कुछ खाना पीना हो जाए.”
शशिकला बोली “आप को तो मालूम है डॅडी, क्यो नखरा करते है? इंतज़ाम
यही है. मैने मम्मी को भी बता दिया था, उसकी भी यह पहली बार है.
बेचारे अनिल को कोई अंदाज़ा नही है. अनिल, तू बता, यहाँ पलंग पर ही हम बिना
उतरे खा सकते है ऐसा कोई स्नैक है?”
मैने इधर उधर देखा. कुछ नज़र नही आया. शशिकला हँसने लगी. “तुझे
नही समझ मे आएगा. हम शुरू करते है, तू भी देख और आ जा. आइए डॅडी,
मम्मी से ही शुरू करते है. सीधे उसके बदन से ही खाएँगे, उतरने की
ज़रूरत नही है, ऐसे ही मज़ा आएगा.”
”
हाँ हाँ चलो, मैने तो थोड़ा टेस्ट कर भी लिया” कहकर डॅडी मा के पास
गये और उसकी ब्रा के कप को बाजू से मूह मे भर कर चबाने लगे. मैने
ध्यान से देखा तो मा के स्तन पर चढ़ि ब्रा के एक कप की नोक गायब थी, उसमे
से अब मा का निपल दिखने लगा था. मुझे याद आया कि यह वही चूंची थी जिसे
मूह मे लेकर डॅडी पिछली चुदाई के वक्त चूस रहे थे.
डॅडी ने मा की ब्रा का एक ठुकड़ा दाँतों से काट लिया और चबाने लगे. वहाँ
शशिकला मा की पैंटी पर टूट पड़ी थी. मा की बर को ढकने वाली पत्ती को
मूह मे लेकर उसने एक ठुकड़ा तोड़ा और चबाने लगी.
मैं देखता रह गया. मुझे कुछ समझ मे नही आ रहा था. ये लोग कैसे ब्रा
और पैंटी खा रहे है? शशिकला ने इशारे से मुझे पास बुलाया कि तू भी शुरू
हो जा. मा बस मंद मंद मुस्करा रही थी, प्यार से डॅडी और शशिकला के
बालों मे उंगलियाँ फेर रही थी.
मैं मा के पास गया और उसकी दूसरी चूंची ब्रा के कप सहित मूह मे लेकर
चूसने लगा. एकदम मीठा स्ट्रॉबरी जैसा स्वाद था. मैने दाँत से मा की ब्रा
के कप का एक ठुकड़ा तोड़ा और चबाने लगा. रबर जैसा था पर सात आठ बार
चबाने के बाद मूह मे टूटने लगा. चुइंग गम जैसा था पर बाद मे मूह मे
चॉकलेट जैसा घुल जाता था. उसमे मा के बदन की महक भी थी.
मैने मा की ओर देखा और पूछा “मा तुम्हे मालूम था? पर ये है क्या? किस
चीज़ का बना है? बहुत स्वादिष्ट लगता है”
“बेटे, ये एडाइबॉल अंडरवीअर है, बाहर के देशों मे बहुत चलती है. ब्रा और
पैंटी की फेटिश रखने वाले इसका इस्तेमाल करते है, क्योकि साड़ी कपड़े या
नायालन की ब्रा या पैंटी खाई नही जा सकती ना! ये शशिकला अक्सर ये एदिबल
अंडरवईयर इस्तेमाल करती है, अशोक को पसंद है इसलिए. इसी ने कहा कि अनिल को
सरप्राइज़ देंगे. बता ना शशि ठीक से अनिल को” मा ने मुझे चूमते हुए कहा.
वह उत्तेजित थी. तीनों मिलकर उसकी ब्रा और पैंटी खा रहे थे, ये बात उसे बहुत
मादक लग रही थी.
शशिकला ने मूह मे का ठुकड़ा निगलते हुए कहा “अरे डॅडी के लिए खास ये
चीज़ ढूंढी मैने एक साल पहले. मेरी ब्रा और पैंटी पर बहुत फिदा है ये,
मूह मे लेकर चूसते थे, नायालन के कपड़े को कभी कभी चबा कर फाड़ देते
थे, खा भी नही सकते थे इसलिए झल्लाते थे. एक बार मैं जब न्यूयार्क गयी तब
वहाँ फर्टी सेकंड स्ट्रीट पर ये मिली, बहुत फ्लेवर मे आती है. अब मैं यही
मँगवा लेती हू. डॅडी मुझे ये पहनकर रात भर इश्क करते है और फिर खा
जाते है, उन्हे बहुत मज़ा आता है. फिर मैने भी ट्राई की, डॅडी के लिए भी ऐसी ही
मँगवाई. मुझे भी अच्छी लगने लगी. इसलिए जब हनीमून का प्लान बनाया तो
साथ ये ढेरों ले ली. अब हर रात को एक जोड़ी पहनेंगे.”
”
तो ये जो डॅडी और मैने पहनी है वह भी … ?” मैने भोंचक्का होकर
पूछा. अब मुझे समझ मे आया कि मेरा जंघिया इतना मुलायम और चिकना
क्यो था.
“और क्या, तुझे क्या लगा? अब हम लोग भी खाएँगे” शशिकला बोली. अब तक डॅडी
मा की ब्रा का एक कप खा चुके थे और बाजू के स्ट्रीप पर जुटे थे. मैने भी
जल्दी जल्दी मूह चलाना शुरू किया. पाँच मिनित मे मम्मी की ब्रा और पैंटी
ख़तम हो गयी. खास कर मा की बुर के सामने की पत्ती लाजवाब थी, मा की
चूत के रस से भीग कर उसका स्वाद गजब का हो गया था.
शशिकला ने मुझे पलंग पर गिरा कर कहा “अब तेरी बारी है, आओ मम्मी, आइए
डॅडी, अनिल का स्वाद ले”
डॅडी ने मेरे जंघीए के पिछले भाग मे मूह लगाया और मेरे नितंब पर का
एक ठुकड़ा तोड़ कर मूह मे ले लिया. “वाह” मूह चलते हुए बोले “मेल अंडरवीअर
का अलग स्वाद रखा है इन्होने, थोड़ा पीयर जैसा”
मा और शशिकला मेरे जंघीए को आगे से खाने मे जुट गयी थी. खाते खाते
खेल खेल मे बार बार मेरा लंड मूह मे ले लेती. मेरा जंघिया ख़तम होते होते
मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया.
मेरे बाद सब ने शशिकला की ब्रा और पैंटी खाई और अंत मे हम डॅडी पर जुट
गये. मेरे हिस्से मे डॅडी के लंड को ढकने वाला भाग आया. लंड से निकले वीर्य
से भीग कर वह महक रहा था. डॅडी का लंड भी अब खड़ा था.
हँसते खेलते सब ने फिर से वाइन पी, सब अगले राउंड के लिए तैयार थे. अशोक
अंकल मूड मे थे, पाठ पड़े कमर उचका कर अपना लंड बिस्तर पर रगड़ रहे
थे जैसा पुरुष अकेले मे अक्सर करते है. शशिकला उनके गोरे गोरे चूतड़
सहलाने लगी. “अनिल देख, कैसी है डॅडी की गान्ड? अगर कोई सिर्फ़ इतनी ही देखे तो
ये नही कह सकता कि औरत की है या मर्द की. यही कहेगा कि कितने प्यारे चिकने
गोरे चूतड़ है!”
मैने हाँ कहा. वाकई मे अंकल के चूतड़ पुष्ट चिकने और गोरे थे.
शशिकला आगे बोली “अब के आसन मे तू डॅडी की गान्ड को प्यार कर. उन्हे अब तीनों
ओर से सुख मिलना चाहिए, मूह से, लंड से और गान्ड से. तेरे जवान लंड से
बढ़िया क्या हो सकता है डॅडी की गान्ड को सुख देने के लिए.”
याने प्लान यह था कि मैं अशोक अंकल … डॅडी … की गान्ड मारूँगा! सुनकर
मुझे अजीब तो लगा पर मज़ा भी आया. क्या बात है! अंकल की उस कसी हुई गान्ड
मारने का लुत्फ़ ही कुछ और होगा. मेरा लंड और तन गया. देखकर अंकल खुश
हो गये. “देखा, कितना प्यार करता है मेरा बेटा मुझे, चलो शशि, रीमा
डार्लिंग, जल्दी आओ, मुझे अब सहन नही होता.”
”
डॅडी, पहले आप ऐसे आइए और झुक कर खड़े होइए. अनिल आप की गान्ड मारेगा.
हम भी तो ज़रा देखे कैसे दो खूबसूरत मर्द एक दूसरे पर चढ़ते है. फिर
हम लोग भी बिस्तर पर आप के साथ आ जाएँगे” शशिकला ने हुक्म दिया.
अशोक अंकल उसका कहा मानकर बिस्तर पर से उठे और मुझे ज़ोर से चूम लिया.
मेरे तन्नाये लंड को मुठ्ठी मे लेकर सहलाते हुए बोले “क्या मस्त खड़ा है ये
सुंदर हथियार तेरा अनिल! मेरी गान्ड को यह ज़रूर मस्त कर देगा. आ जा बेटे”
वे बिस्तर के सिरहाने को पकड़कर झुक कर खड़े हो गये. शशिकला मेरा हाथ
पकड़कर मुझे उनके पीछे ले गयी. मेरे लंड को मख्खन लगाकर बोली “चल
अनिल, शुरू हो जा”
मैने पूछा “दीदी, डॅडी की गान्ड मे मख्खन नही लगाओगि? उन्हे दर्द होगा”
वह शैतानी से मुस्काराकर बोली “अरे नही, कोई ज़रूरत नही है, उन्हे आदत है
मरवाने की. ऐसे क्यो देख रहा है? तू समझ रहा है वो बात नही है, आज तक
उन्होने किसी मर्द से इश्क नही किया है, वे और किसी से नही मरावाते, मैं ही कभी
कभी डिल्डो लगाकर डॅडी को खुश कर देती हू. चल अब, देर मत कर”
मा सोफे पर बैठकर अशोक अंकल के चुंबन लेने लगी. शशिकला उनके
सामने नीचे फर्श पर बैठ गयी और उनका लंड मूह मे ले लिया. अंकल मस्ती से
अपने चूतड़ हिलाने लगे, कमर हिला कर शशिकला के मूह को चोदने की
कोशिश करने लगे. मुझे बोले “अनिल बेटे, प्लीज़, जल्दी आ जा, मैं तुझे अंदर
लेना चाहता हू”
मैने उनकी गुदा पर सुपाडा रखा और पेल दिया. पक्क से वह आराम से अंदर
चला गया. सिसक कर डॅडी बोले “ओह ओह मज़ा आ गया बेटे, काफ़ी बड़ा है, डिल्डो
का सुपाडा नही होता ना, सुपाडे का मज़ा और ही है. डाल और अंदर”
मैने उनके चूतड़ पकड़कर पूरा लंड अंदर घुसेड दिया. आराम से पूरा लंड
डॅडी की गान्ड मे समा गया. काफ़ी नरम और तपि हुई म्यान थी. किसी पुरुष की
गान्ड मार रहा हू, वह भी अपने सौतेले डॅडी की, यह भावना भी बहुत
कामुक थी. मैने उनकी कमर को पकड़ा और चालू हो गया जैसा ब्ल्यू फिल्मों मे
देखा था. लंड अंदर बाहर करते हुए डॅडी की गान्ड मारने लगा. मा ने
उनका मूह अपने मूह से धक दिया और उनके होंठ चूसने लगी. शशिकला
ने उनका पूरा लंड निगल लिया और ज़ोर से चूसने लगी.
पाँच मिनिट के बाद जब डॅडी झड़ने को आ गये तब शशिकला अचानक मूह
से लंड निकाल कर खड़ी हो गयी. “बस, अब सब पलंग पर चलो, वहाँ आराम से
मज़ा करना. अनिल, ज़रा संभाल के भैया, जल्दी नही झड़ना, बहुत दिनों के बाद
उनकी यह ख्वाहिश पूरी हुई है, जब से तुझे देखा था, इस मौके की ताक मे थे
वे”
शशिकला पलंग पर पट लेट गयी. मैं और डॅडी चिपके हुए सावधानी से
पलंग पर चढ़े. मेरा लंड अब भी डॅडी की गान्ड मे गढ़ा था. डॅडी
शशिकला पर चढ़ गये और उसकी गान्ड मे लंड उतार दिया. फिर वे उसके बदन
पर सो गये, मुझे अपनी पीठ पर लिए हुए. मम्मी उनके सामने टांगे खोल
कर लेट गयी और डॅडी का चहरा अपनी बुर पर दबा लिया. डॅडी मम्मी की बुर
चूसते हुए शशिकला की गान्ड मारने लगे. उनकी कमर हिलाने से मेरा लंड
अपने आप उनकी गान्ड मे चलने लगा. मैं कुछ देर चुपचाप पड़ा हुआ मज़ा
लेता रहा, फिर लय मे डॅडी की मारने लगा. वे जब चूतड़ उपर करते तो मैं अपना
लंड कस के उनकी गान्ड मे पेल देता, वे जब नीचे को धक्के मारते तो मैं लंड
आधे से ज़्यादा बाहर निकाल लेता. इस तरह डॅडी की गान्ड मे मेरा लंड पूरा अंदर
बाहर होने लगा.
उन्हे बहुत मज़ा आ रहा था. जिस तरह से वे हचक हचक कर अपनी बेटी की
गान्ड चोद रहे थे और मा की बुर चूस चूस कर मानों उसमे घुस जाने की
कोशिश कर रहे थे उससे उनकी उत्तेजना जाहिर थी. अपने गुदा का छल्ला वे बार
बार सिकोड कर मेरे लंड को पकड़ लेते. डॅडी की गान्ड अच्छी ख़ासी कोमल थी,
बहुत टाइट भी नही थी, शशिकला सच कह रही थी, लगता है उसने डिल्डो से
मार मार कर उनकी गान्ड काफ़ी खोल दी थी.
जब आख़िर मुझसे नही रहा गया तो मैने डॅडी के बदन को कस के बाहों मे
भींचा और हचक हचक कर चोद डाला. झड़ने के बाद मैं डॅडी पर पड़ा
रहा. डॅडी पूरे ज़ोर से शशिकला की गान्ड चोदते रहे और दस मिनिट बाद जाकर
झाडे.
कुछ सम्हलने के बाद डॅडी पलटे और मुझे बाहों मे भरकर चूमने
लगे “बहुत अच्छा चोदा तूने अनिल, मुझे मज़ा आ गया. जब से तुझे देखा था,
तब से दिमाग़ मे था कि तेरे इस कसे जवान लंड को अंदर लू. आज मुझे हर तरह का
सुख मिल गया. अब बस एक और सुख चाहिए आज की रात, मैं पूरा तृप्त हो जाउन्गा.”
शशिकला बोली. “मुझे मालूम है आप किस सुख की बात कर रहे है. उसके लिए कल
तक रुक क्यो नही जाते डॅडी? आराम करने के बाद आपका लंड फिर से मजबूत
खड़ा होगा और मज़ा आएगा.”
मा बोली “अरे कर लेने दो अशोक को उसकी हर मुराद पूरी. हनीमून नाइट का पूरा
लुफ्त उठाने दो. कौन सा सुख चाहिए तुम्हे अशोक?”
अशोक अंकल मुझे बाहों मे लेकर मेरे नितंबों को सहलाते हुए बोले. “अनिल
के चूतड़ भी बड़े प्यारे है. ये एकदम कुँवारा है इस मामले मे. मैं इसकी इस
चिकनी गान्ड को चोदना चाहता हू”
मुझे पहले से अंदाज़ा था कि क्या हो सकता है. पर फिर भी सुनकर मिलेजुले
ख़याल दिल मे आए. एक तो थोड़ा डर लगा, मेरी गान्ड मे अब तक मैने उंगली
छोड़कर कुछ नही डाला था. उंगली भी मैं अक्सर नहाते समय साबुन लगाकर
डाला करता था. अब लंड जाएगा तो कैसा लगेगा! वह भी अशोक अंकल का मस्त
मूसल! पर डर के साथ साथ मन मे गुदगुदी भी हुई. जब मैं उंगली करता था
तो लंड खड़ा हो जाता था. लंड जाएगा तो और मज़ा आएगा शायद!
मेरे चेहरे को देखकर अंकल बोले “घबरा मत अनिल, दर्द नही होगा. तभी तो
आज ही कर रहा हू, अब तक तीन बार झड़कर लंड भी काफ़ी नरम हो गया है, तुझे
तकलीफ़ नही होगी.” वे अब मेरे लंड को प्यार से मुठिया रहे थे. अच्छा लग रहा
था.
मा ने पूछा ” क्यो बेटे, क्या कहता है? वैसे मेरी मान तो डॅडी की यह
इच्छा पूरी कर दे देख कितना प्यार करते है तुझे”
मैं मान गया, सोचा जो होगा देखा जाएगा. “हाँ मम्मी, मैं जानता हू. मैने
भी तो डॅडी की गान्ड मारी है, बहुत मज़ा आया. अब वे मार ले, मैं मना नही
करूँगा.”
“चलो सब एक बार नहा लेते है, ज़रा फ्रेश हो जाएँगे. फिर आज का यह आखरी पर
सबसे प्यारा, डॅडी के लिए खास आसन करेंगे.” शशिकला बोली.
हमसब जाकर फ्रेश हुए, साथ साथ नाहया, हँसी मज़ाक किया. नहाते समय
मैने और डॅडी ने मिलकर मा और दीदी की बुर चूसी, बेचारी बहुत देर से सिर्फ़
हमे सुख देने के लिए आसन कर रही थी. डॅडी मम्मी को बोले “डार्लिंग, कल
सिर्फ़ तुम्हारा होगा. तुम्हे कल इतना चोदुन्गा की छोड़ने की मिन्नत करने लगोगी.
एक बार भी गान्ड नही मारूँगा.और शशि, तू कल अनिल को संभाल, मन भर कर
गुलामी करवा ले उससे. और कल पहनने वाली ब्रा और पैंटी आज ही सेलेक्ट कर लो, आज
सोने के पहले पहन भी लेना, ज़रा स्वाद तो लगे उनमे हमारी इन दोनो खूबसूरत
परियों के बदन का”
बाथरूम से वापस आकर हमने काफ़ी पी. अब तक मेरे और डॅडी के लंड फिर से तन
गये थे. वे बस मुझसे चिपटे थे. बार बार मेरे नितंब सहलाते और गुदा को
एक उंगली से टटोलते. मैने भी उनके लंड को हथेली मे ले लिया था. लंड
खड़ा था पर वैसा सख़्त नही जैसा हमेशा होता था, किसी रसीले कच्चे केले
जैसा आधा नरम और आधा कड़ा था.
“शशि बेटी, अनिल की गान्ड मे खूब सा मख्खन लगा दो, मैं नही चाहता कि
उसे ज़रा सी भी तकलीफ़ हो. और रीमा डार्लिंग, तुम ज़रा अपने इस गुलाम के लंड को
मख्खन चुपड दो. आख़िर तुम्हारे प्यारे बेटे की उस प्यारी गान्ड मे घुसने
वाला है, जितना मख्खन लगओगि, उतना उसे कम दर्द होगा.”
मख्खन लगाने के बाद डॅडी एक आराम कुर्सी मे बैठ गये. उनका लंड तन कर
खड़ा था. “आजा बेटे, डॅडी की गोद मे आ जा.”
“अच्छा तो यह आसान कर रहे है डॅडी” शशिकला चहकि.”
हाँ, तेरी तो अच्छी पहचान का है, आख़िर बचपन से बैठती है तू ऐसे मेरी
गोद मे. अनिल को तकलीफ़ नही होगी, आराम से मेरी गोद मे बैठेगा. नही तो अगर मैं
इस पर चढ़ा तो मेरा वजन सहना पड़ेगा. वह बाद मे कर लेंगे, अब तो समय
ही समय है हमारे पास” अंकल बोले.
उन्होने टांगे फैला दी. मैं जाकर उनकी ओर पीठ करके उनकी टाँगो के बीच
खड़ा हो गया. डॅडी ने झुक कर मेरे नितंब चूम लिए, फिर मूह लगाकर मेरी
गान्ड का छेद चूसने लगे मानों सारा पिघला मख्खन निगल जाना चाहते
हों. “क्या गान्ड है मेरी जान तुम्हारे बेटे की, तुम्हारे जितनी ही खूबसूरत है”
वे मम्मी को बोले.
मा बोली “मुझसे भी अच्छी है, मेरी तो अब उमर हो चली है, मेरा बच्चा तो
एकदम ताज़ा जवान है”
“अनिल बेटे, ज़रा झुक और बैठ मेरी गोद मे, एक मिनिट… बस … ऐसे .. शाबास, अब
बैठ” डॅडी मेरे गुदा पर अपना सुपाडा जमाकर बोले.
गुदा पर उनके फूले चिकने सुपाडे को महसूस करके मेरा और खड़ा हो गया,
डर भी लगा, काफ़ी बड़ा था. फिर मुझे याद आया कि एक किताब मे पढ़ा था कि गान्ड
मारने के पहले ज़ोर लगाने से, जैसे सुबह टॉयलेट मे करते है, गुदा खुल
जाता है और आसानी होती है. मैने ज़ोर लगाया और डॅडी की गोद मे बैठने लगा.
पॅक की आवाज़ के साथ सुपाडा मेरी गान्ड मे समा गया. दर्द की एक टीस उठी पर
दर्द के साथ एक अलग सुख की लहर मेरे रोम रोम मे दौड़ गयी.
“वाह शाबास बेटे, क्या बात है, तुझे कुछ बताना भी नही पड़ा और तूने अंदर
ले लिया. रीमा डार्लिंग, यह लड़का तो सच का हीरा है, बहुत आगे जाएगा इस मामले
मे. पर गान्ड टाइट क्यो कर ली बेटे? वैसे ही ढीली छोड़ आराम से पूरा लंड ले
लेगा तू” डॅडी ने मुझे शाबासी दी.
मैने गुदा की मसल ढीली की और बैठने लगा. डॅडी का लंड इंच इंच करके
मेरी गान्ड मे घुसता गया. बहुत अनोखा अनुभव था, गान्ड भारी भारी लग
रही थी. बीच मे मैं रुक गया, दर्द ज़रा ज़्यादा हो गया था.
मा मुझे चूमते हुए बोली “बस कुछ ही देर और है मेरे लाल, डॅडी को देख, कितने खुश है”
यह मुझे भी महसूस हो रहा था. जब शुरू किया था तब डॅडी का लंड बहुत
कड़ा नही था. अब शायद मेरी गान्ड मे लंड पेलने की क्रिया से वे इतने उत्तेजित हो
गये थे कि उनका लंड काफ़ी कस के खड़ा हो गया था.
डॅडी ने अचानक प्यार से मुझे भींच लिया और मेरी पीठ चूमते हुए मुझे
खींच कर अपनी गोद मे बिठा लिया. सॅप की आवाज़ से पूरा लंड मेरी गान्ड मे
समा गया और मेरे चूतड़ डॅडी की जांघों पर टिक गये. मेरी गुदा पर
उनकी झान्टे महसूस हो रही थी.
अचानक हुए दर्द से मैं चिहुक पड़ा था. डैडी मुझे बेतहाशा चूमते हुए
बोले “सारी मेरे राजा, पर मुझसे रहा नही गया, इतनी टाइट है तेरी मखमली
गान्ड कि लगता है कि हचक हचक कर चोद डालु. बस, एक मिनिट, तेरा दर्द
बिलकुल कम हो जाएगा.” और मेरे सिर को अपनी ओर मोड़ कर उन्होने मेरे होंठ
अपने होंठों मे दबा लिए और चूसने लगे. उनकी गुलाबी आँखों मे
मुझे प्यार और दहकति वासना दिखी.
शशिकला अपनी ही चूत मे उंगली कर रही थी. वह भी काफ़ी उत्तेजित थी, शायद
अपने डॅडी के लंड से मेरी गान्ड की वर्जीनीटी ख़तम किए जाने का कब से
इंतजार कर रही थी. “अनिल, बहुत अच्छा किया भैया, डॅडी तो अब सातवे आसमान
पर होंगे. क्यो डॅडी, हो गया काम? कब से मेरे पीछे पड़े थे कि बेटी, इस
खूबसूरत बच्चे अनिल की गान्ड दिला दो”
अशोक अंकल कुछ नही बोले, वे तो बस मेरी गान्ड मे लंड धीरे धीरे मुठियाने मे लगे थे
और मेरा मूह चूस रहे थे जैसे खा जाना चाहते हों.
फिर शशिकला मेरे सामने नीचे बैठ गयी और मेरा लंड चूसने लगी. बोली
“डॅडी अब इतनी जल्दी नही छोड़ने वाले. तब तक मैं भी ज़रा तेरे लंड का मज़ा ले
लू, आज ठीक से चूसा ही नही”
मा मेरे पास खड़ी थी. उसने झुककर हम दोनों को अपनी छाती से लगा लिया.
डॅडी ने मन भर कर मेरा मूह चूसा और फिर मेरे मूह को छोड़कर मा की
चूंची चूसने मे लग गये. मैने भी मा का दूसरा स्तन मूह मे ले लिया.
अशोक अंकल अब धीरे धीरे नीचे से मेरी मारने लगे. बस एक दो इंच उपर नीचे
होते और लंड मेरी गान्ड मे अंदर बाहर करते. लंड मेरी गान्ड मे चलाने से
एक अलग अजीब सा आनंद मेरी रगों मे भर गया. मेरा और कस कर खड़ा हो गया
और दीदी का सिर पकड़कर मैने पेट पर दबा लिया और उसका मूह चोदने लगा.
मा भी अपने बेटे की पहली ठुकाई देखकर उत्तेजित थी. वह सीधी खड़ी हो गई
और एक टाँग उठाकर सोफे के उपर रख दी. उसकी चूत अब खुल गयी थी. मैने
झुक कर उसमे मूह लगा दिया. तीन तरफ से अब मुझपर सुख की बरसात हो रही
थी, गान्ड मे डॅडी का लंड चल रहा था, लंड दीदी के मूह मे था और मुँह मे
मा की बुर के रस का झरना बह रहा था.
मैं ज़्यादा देर नही टिक पाया, कसमसा कर झाड़ गया. शशिकला ने चूस
चूस कर मेरा सारा वीर्य निगल लिया. मा भी दो बार मुझे बुर का पानी पिला चुकी
थी. डॅडी अब पूरे ज़ोर मे थे. उनका लंड भी अब कस कर खड़ा हो गया था और
पिस्टन जैसा मेरी म्यान मे चल रहा था. अब मेर दर्द भी कम हो गया था, आदत
हो गयी थी, मख्खन अंदर तक जाकर मेरी गान्ड को चिकना भी कर गया था.
झड़ने के बाद मैं लस्ट हो गया था पर मज़ा अब भी आ रहा था. डॅडी तैश मे
थे “मेरे राजा, बहुत मज़ा आ रहा है मेरे बेटे, अब नही रहा जाता, चल अब ज़रा ठीक
से तेरी मार लू नही तो मुझे चैन नही पड़ेगा.” कहते हुए उन्होने मुझे
वैसे ही गठरी जैसा उठाकर पलंग पर रखा और मेरे उपर चढ़ गये. मेरे
बदन को बाहों मे भींच कर, अपनी टांगे मेरे इर्द गिर्द जकाड़कर वे साथ
साथ हचक हचक कर मेरी गान्ड चोदने लगे. मुझे थोड़ा दर्द हो रहा था
पर मन मे एक अलग सा समाधान था कि डॅडी को मेरा बदन इतना अच्छा लगता
है कि वे इस तरह से जम के उसे भोग रहे है.
जब वे झाडे तो उनके मुँह से भी एक हल्की हुंकार निकल गयी. दो मिनिट मे
उनका लंड सिकुड कर अपने आप मेरी गान्ड से निकल आया. वे पलंग पर लुढ़क
गये. उनके चेहरे पर असीम तृप्ति थी. मुझे चूम कर बोले “थॅंक यू अनिल,
तूने आज मुझे वह सुख दिया है जिसके लिए मैं कब से तरस रहा था!”
हम बहुत थक गये थे इसलिए मेरी आँख लगने लगी. डॅडी भी सोने को थे.
आधी नींद मे मैने सुना कि मा शशिकला को कह रही थी “बेटी, ये दोनों तो
गये काम से. पर अशोक को देख, कितना आनंद मे है, जैसे किसी बच्चे को उसका
मन पसंद खिलौना मिल गया हो. अनिल भी कैसा शांत पड़ा है, मुझे लगा उसे
दर्द होगा पर लगता है काफ़ी मज़ा आया है उसे”
“मम्मी, वह भी पक्का रसिक है डॅडी जैसा. डॅडी की तो हर मुराद पूरी हो
गयी. ये दोनों अब गये काम से मम्मी. चलो हम भी सो जाए. पर मम्मी,
ज़रा …” शशि बोली.
“हाँ बेटी, मैं समझ गयी, इन दोनों की यह कुश्ती देखकर मेरी भी कुलबुला
रही है, नींद नही आएगी, आ जा, ऐसे आ जा …” मा बोली. आधी नींद मे मैने
देखा कि वे एक दूसरे से लिपट कर सिक्सटी नाइन करने लगी. उसके बाद मुझे
कुछ याद नही क्योकि मेरी आँख लग गयी.
अगले दो दिन ऐसे ही आनंद मे गुज़रे. हनीमून की रात की निरंतर चुदाई से सब
थके थे इसलिए उस दिन सबने आराम किया. रात को फिर आगे काम शुरू हुआ और रात
भर चलता रहा. हमारा मन ही नही भरता था, अदल बदल कर हर
कंबिनेशन मे हमने सेक्स किया. हां, डॅडी ने उस रात के बार मेरी फिर से नही
मारी. हमने एक दूसरे के लंड ज़रूर चूसे. पहली रात डॅडी की थी, अब उसके
बाद बारी बारी से हमने मा को और फिर दीदी को सुख दिया. खूब चोदा जब तक
उनका मन नही भर गया. हर दिन मा और दीदी एक नया सेट पहनते एडाइबॉल ब्रा
और पैंटी का. लगता है शशिकला ने दर्जनों मँगवा कर रखी थी. सब का
स्वाद अलग अलग था, कोई वनीला, कोई स्ट्रॉबरी, कोई चाकलेट. और उनमे उन दोनों
अप्सराओं के बदन का स्वाद और खुशबू मिल कर वे और स्वादिष्ट हो जाती थी.
तीन दिन बाद सब इतने थक गये कि एक पूरे दिन हमने सिर्फ़ आराम किया, खूब सोए,
पास के जंगल मे घूमने गये. हनीमून के तीन चार दिन और बचे थे.
सुबह देर से उठने के बाद हमने नाहया. मा और दीदी तैयार होने लगे. दोनों
बाहर जाने के कपड़े पहन रही थी. मा ने सलवार कमीज़ पहनी थी और
शशिकला ने जींस. मुझे अचंभा हुआ, मुझे लगा था कि कल के आराम के बाद आज
हम अपनी रति क्रीड़ा आगे जारी रखेंगे.
जब मैं भी तैयार होने लगा तो मा ने रोक दिया. “अरे तू मत चल, यही आराम कर,
मैं और शशि जा रहे है घूमने, ज़रा गोआ देख तो ले. डॅडी भी यही घर पर
रहेंगे”
“पर तुम दोनों नही हो तो मैं क्या करूँगा? मैं भी चलता हू” मैने
शशिकला से चिपट कर कहा. मेरा लंड फिर से मस्त खड़ा हो गया था. आराम के
बाद जैसे उसमे फिर जान आ गयी थी.
” क्यो अनिल बेटे, मैं तो हू! ज़रा आराम से गॅप शॅप करेंगे, थोड़ा इश्क विश्क भी
कर लेंगे” अशोक अंकल तौलिए से बाल पोछते हुए बोले. वे अभी अभी नहा कर
बाहर निकले थे, बिलकुल नंगे थे. उनका लंड अच्छा खड़ा था.
मैने मा की ओर देखा. वह मंद मंद मुस्करा रही थी. शशिकला बोली “आज बस
हम औरते जाकर सैर करेंगी. तुम दोनों यही रहो. डॅडी की बहुत इच्छा है कि
तुम्हारे साथ अकेले पूरा दिन बिताए.”
मैं कुछ कुछ समझने लगा. डॅडी की ओर देखा. वे लंड को सहलाते हुए मेरी
ओर देख रहे थे. मेरा भी खड़ा होना शुरू हो गया. मैने डॅडी के साथ कई
बार संभोग ज़रूर किया था पर सबके साथ मिलकर ग्रुप मे. अकेले कभी उनके
साथ नही रहा था.
शशिकला मेरे मन की बात ताड़ गयी. बोली “देखो अनिल भैया, सीधी बात है.
हम लोगों का मेल जोल जैसे हुआ था? मैने और मम्मी ने मिल कर आपस मे प्यार
करना शुरू किया था, और कोई नही था. जैसा हम औरतों को अकेले मे मौका
मिला बिना किसी मर्द के वाहा रहते तो तुम दोनों को भी यही मौका मिलना
चाहिए. बिना किसी हिचक के तुम लोग जो करना हो कर सकते हो, है ना!”
डॅडी मुस्करा दिए, उनकी आँखों मे खुमारी भर आई थी, ज़रूर उन्होने प्लान
बना कर रखे होंगे मेरे साथ करने के. मेरा दिल धड़कने लगा पर लंड और
खड़ा हो गया. मज़ा आएगा मैने मन ही मन सोचा.
मा अशोक को बोली “ज़रा ख़याल रखना मेरे बेटे का, तैश मे कुछ भी ना कर
बैठना. ”
डॅडी बोले “अरे मेरी आँखों का तारा है, मेरा प्यारा है, फूल जैसा सहेज कर
रखूँगा”
“और डॅडी, ज़रा जोश बचा कर भी रखिए, नही तो हम जब तक शाम को आएँगे,
अपना पूरा दम गवाँ बैठोगे तुम दोनों.” शशिकला ने अशोक अंकल की
चुटकी ली.
”
वह मैं नही प्रॉमिस कर सकता. आख़िर अनिल अकेले मे मिला है, उसके साथ हर पल
एंजाय करने का इरादा है मेरा.” अशोक अंकल बोले.
“ठीक है, बाद मे देख लेंगे, मुआवज़ा देना पड़ेगा” शशिकला मचल कर बोली.
“जो तुम कहो बेटी”
नोंक झोंक के बाद मा और शशिकला चली गयी. जाते जाते हमारी ओर देखकर
मुस्करा रही थी. मैं और डॅडी अकेले बच गये. मुझे थोड़ा अटपटा लग रहा
था. डॅडी ने मुझे सीधे बाहों मे भर लिया और चूमने लगे. “बेटे, सच
बता, तुझे ये अच्छा लगता है ना? याने पिछले दो दिनों मे हमने जो किया,
ख़ासकर आपस मे?” उनकी आँखों मे प्रश्न था. शायद वे अब भी पूरे
निश्चिंत नही थे मेरे मन के बारे मे. अब वे धीरे धीरे मेरा लंड भी
मुठिया रहे थे. उनके हाथों मे जो जादू था वह मैं पहले भी अनुभव कर
चुका था. लंड को एक खास तरह से सहलाना सिर्फ़ मर्दों को ही आता है. वे मेरा
लंड जिस तरह से चूसते थे उसमे भी एक अलग ही सुख था.
मैने मस्ती मे भरकर उन्हे चिपकाते हुए कहा “हां अंकल … मेरा मतलब
है डॅडी. मुझे बहुत अच्छा लगा. बहुत मज़ा आया. मैने कभी सोचा भी नही
था कि सेक्स के इतने तरह के आनंद हो सकते है”
मुझे पकड़कर अपने पास सोफे पर बिठाते हुए अंकल बोले “अरे अभी तूने देखा
ही क्या है, ये दुनिया बहुत रंगीन है. आज दिन भर तुझे प्यार करूँगा यार”
हम लिपट कर चूमा चाटी करने लगे. दोनो के लंड कस कर खड़े थे. डॅडी
सहसा इधर उधर देखने लगे. कुछ खोज रहे थे, फिर उनकी आँखे दीदी और
मा की उन हाई हिल स्लीपरों पर पड़ी जो उन्होने हनीमून की रात को पहनी थी और
जिन्हे वे घर मे हरदम पहनती थी.
उठाकर वे उन्हे उठा लाए “यही ढूँढ रहा था कि शशिकला ने कहाँ रख दी.
उसे याद था, देखो हमारे सामने वाले टेबल पर ही छोड़ गयी हमारी सहूलियत
के लिए. आ तुझे एक चीज़ दिखाता हू” मा की एक स्लीपर लेकर उन्होने उसे प्यार से
चूमा, लंड पर रगड़ा, फिर उसकी हील पकड़कर खींची. हील अलग हो गयी, उसके
साथ स्लीपर के निचले भाग पर लगी पूरी एक काली प्लास्टिक की परत निकल आई. अब
उनके हाथ मे सिर्फ़ एक पतला सोल और उसपर लगे पतले पतले स्ट्रेप थे.
“ये प्लास्टिक की हील है, प्लास्टिक का ही निचला सोल है. ये हमारे किसी कम का नही,
क्योकि ये नीचे ज़मीन से लगते है. अब जो असली भाग बचा है वह है हमारा
खजाना. यह पहनने वाले के तलवों से लगा रहता है. इसे देख, कितनी प्यारी
और नाज़ुक है. तू समझा ना, यह भाग है जिसमे तेरी मा के तलवों का स्वाद लग
चुका है. अब ज़रा चख के देख”
कहते हुए उन्होने स्लीपर का पँजा मूह मे लिया और दाँतों से एक चोथा
टुकड़ा काट लिया. उसे मूह मे लेकर चूसते हुए बोले “तू भी ट्राई कर. समझ
मे आ रहा है ना? तुझे इसलिए बता रहा हू कि तू भी औरतों की चप्पलो का
रसिक है मेरे जैसा. जिसे इनकी फेटिश है वे मस्ती मे अक्सर सोचते है कि इन्हे
खा जाउ. अब रबड़ या लेदर की चप्पले तो खाई नही जा सकती ना. इसलिए अब इस तरह
के स्लीपर निकाले है. खास इस तरह की मस्ती के लिए”
मैने मा की स्लीपर ली और हील का एक ठुकड़ा तोड़ा मूह मे जाते ही समझ मे आ
गया. ये भी एडाइबॉल स्लीपर थी, इन्हे भी खाया जा सकता था, वही स्वाद, बस मा के
पैरों की खुशबू से और मस्त हुआ स्वाद था. मेरा सिर चकरा गया.
मेरी खुशी पर हँसते हुए डॅडी बोले “ये हमारा आज का स्नैक मैने इन्हे कहा
था कि तीन चार दिन पहनो, फिर स्वाद आएगा.”
मेरा लंड अब तन कर उछल रहा था. मा और दीदी की वे खूबसूरत स्लीपरे सिर्फ़
देखने, चूमने और चाटने की नही थी, उन्हे खाया भी जा सकता था. मैं
मस्त हो गया. डॅडी ने मा की दूसरी स्लीपर की हील भी निकाल दी. मैने शशिकला
की स्लीपरों को सोल से अलग किया. उन्हे सूँघा और चाटा. लग रहा था कि अभी खा
जाउ, लंड बहुत तकलीफ़ दे रहा था.
“अभी नही अनिल, जब मस्ती मे आपस मे काम करेंगे तब खाएँगे. इन्हे मूह मे
भरके गान्ड मारने मे या मरवाने मे बहुत मज़ा आता है. पिछले महीने
मे ही पहली बार शशिकला ऐसी स्लीपरे लाई थी. मज़ा आ गया अनिल, मेरी बेटी की
स्लीपर मेरे मूह मे थी और मैं उसकी गान्ड मार रहा था. खाने मे आधा घंटा
लगा, ये काफ़ी मोटी होती है, उस आधे घंटे मे स्वर्ग हो आया मैं. दूसरी स्लीपर
शशिकला ने मेरे मूह मे अगले दिन दी जब वह डिल्डो से मेरी मार रही थी. जब
तुम्हारी मा से उसका चक्कर चालू हुआ, तभी से उसने तुरंत दो दर्जन
मँगवा कर रखी है, उसे मालूम था कि मुझे लगेंगी. अब तेरे भी काम आएँगी,
तू भी मेरी तरह ही भक्त निकला लेडीज़ स्लीपरों का”
एक मिनिट रुक कर अंकल आगे बोले “मेरे बेडरूम मे चलते है. वहाँ ठीक
रहेगा. मेरा कब का सपना था कि तुझे अपने बेडरूम मे ले जाउ. पहले एक और
चीज़ दिखाता हू” कहकर वे उठे और जाकर अपने बैग मे से एक एलबम ले आए.
मुझे देखने को दिया.
एलबम मे एक खूबसूरत औरत के चित्र थे. चेहरा बहुत जाना पहचाना था पर
समझ मे नही आ रहा था. पहले चित्र मे उस स्त्री ने साड़ी पहनी थी. फिर एक एक
कपड़ा निकाल कर फोटो थे. आख़िरी के फोटो मे बस वह औरत ब्रा और पैंटी मे
थी. अच्छे फूले हुए ब्रा मे कसे हुए स्तन और गोरा अधनन्गा बदन. आखरी फोटो
मे जिसमे पैंटी पूरी दिख रही थी, उसमे पैंटी आगे से गजब की फूली थी, तंबू
बना था, जैसे अंदर बड़ा लंड हो.
“पहचाना कौन है?” डॅडी ने कहा और अचानक मेरे दिमाग़ मे बिजली सी
कौंध गयी “कितनी खूबसूरत है …अंकल चेहरा तो आप जैसा है, क्या आप की कोई
बहन … पर यह तो शीमेल है या कोई पुरुष … पर अंकल याने ये …?”
अंकल मुस्काराए “हां मैं ही हू, मस्ती मे मुझे कभी कभी औरतों जैसा
सजना अच्छा लगता है, और किसी ने मेरा यह रूप नही देखा है, शशिकला ही
मेरी मदद करती है. हम ऐसे ही संभोग करते है, वह कहती है कि इसमे
उसे दोनों तरफ का याने हेटारो और लेस्बियन सेक्स का आनंद आता है”
मैने फिर गौर से देखा. डॅडी ही थे. डॅडी हॅंडसम थे पर कई हॅंडसम
पुरुषो का चेहरा अगर औरत पर लगाया जाए तो अजीब सा लगता है. यहाँ ऐसा
नही था, डैडी एकदम खूबसूरत लग रहे थे, उनका मेकअप बहुत अच्छा किया
था, उनके शरीर पर बाल न होने से भी इसकी सहूलियत थी. एकदम लाल लिपस्टिक,
गालों पर रूज, कानों मे बाली, लंबे बाल, शायद एक विग लगाया था पर एकदम
सच्चे बाल लगते थे. ऐसी कोई बात नही थी जिससे उस फोटो मे अंदाज़ा हो कि यह
औरत नही पुरुष है, सिवाय पैंटी मे बने उस तंबू के.
मेरा लंड अब उछलने लगा था. अंकल हँसने लगे. मुझे बाहों मे लेते हुए
बोले “मेरा यह रूप पसंद आया लगता है. तुझे ज़रूर चखाउन्गा, अभी नही
अगले हफ्ते, ठीक से तैयार होने मे समय लगता है. अब तो समय ही समय है
हमारे पास मौज करने को. शशिकला ने बेचारी ने बहुत मेहनत की है, मेरे
नाप की खास पैडेड ब्रा बनवाई है, मेरे पास अब दस ब्रा और पैंटी का स्टाक है
और चार तरह के विग वैसे तू भी बहुत अच्छा लगेगा अनिल इस रूप मे”
मैं कल्पना करने लगा कि शशिकला की ब्रा और पैंटी पहना हू और विग लगाया
हू. मन भटकने लगा.
अंकल बोले “अब तो हर तरह से ट्राइ करेंगे. कभी तू दुल्हन बनना, कभी मैं.
कभी हम दोनों औरते बनकर सिर्फ़ लेस्बियन सेक्स कर सकते है मम्मी और
दीदी के साथ. असल मे अनिल, पैसा बहुत हो तो फिर ये चीज़े आसान हो जाती है.
आदमी कुछ भी कर सकता है, सबसे छिपाने मे भी आसानी होती है. मैं और
शशि कब से यह सुख भोग रहे है, अब तुम और रीमा भी आ गये हो, अब तो हर
तरह के कॉंबिनेशन बन सकते है.”
हम दोनों अब बहुत उत्तेजित थे. अंकल ने मा की चप्पले मेरे लंड मे अटका
दी और शशिकला की मेरे हाथ मे दे दी. फिर मुझे गोद मे उठा लिया. “आज तू मेरी
दुल्हन है अनिल, तुझे दुल्हन सा उठा कर अपने बेडरूम मे ले चलता हू, देख
अपनी दुल्हन को आज कैसे भोगता हू मैं, फिर दोपहर को तू मेरा दूल्हा बन जाना”
कहकर डॅडी मुझे उठाकर बेडरूम मे ले गये. जाते जाते अचानक मुझे
याद आए वह दिन जब मैं छुप छुप कर मा की कामना किया करता था. मा का
यह दुलारा आज कहाँ से कहाँ आ गया था!!!
समाप्त
