रागिनी डाक्टर मालिनी को बता रही थी।
“थोड़ी देर गांड चुदवाने के बाद मैंने आलोक से कहा, “आलोक बस, बहुत हो गयी मेरी गांड की रगड़ाई। अब गांड में से लंड निकालो, और चूत में डाल कर चूत की भी ऐसे ही रगड़ाई करो जैसी रगड़ाई गांड की की है”।
“ये सुनते ही आलोक ने जरा सा मेरे चूतड़ों को ऊपर की तरफ किया। मेरे चूतड़ ऊपर उठते ही मेरी चूत का छेद आलोक के लंड के बिल्कुल सामने आ गया। आलोक ने लंड चूत के छेद पर रखा, और एक ही बार में झटके से लंड चूत में डाल दिया”।
“पीछे से इस तरह से आलोक का लम्बा लंड पूरा जड़ तक चूत में बैठ रहा था। आलोक के जोरदार धक्के मेरी मस्ती बढ़ा रहे थे। जब आलोक का लंड एक झटके के साथ मेरी चूत में घुसता था, तो अलोक के बड़े-बड़े लटकते हुए टट्टे मेरी गीली चूत पर पट्ट पट्ट फट्ट फट्ट फच्च फच्च की आवाज करते हुए टकराते थे। मुझे जन्नत का मजा आ रहा था। मैं चूतड़ आगे-पीछे करके आलोक का पूरा लंड चूत में ले रही थी”।
मेरे मुंह से पता नहीं क्या-क्या निकल रहा था, “आआह आलोक ये होती है चुदाई , रगड़ दे आलोक मेरी चूत। कर दे आज इसका कचरा। बड़ा तरसाया है मेरी इस निकम्मी चूत ने तुझे, फाड़ इसको, दिखा तारे इसको आआह मेरी राजा आलोक लगा जोर से”।
“आलोक भी नशे में बोल रहा था , “आह मेरी जान, कैसे चुदवाती है साली तू हट हट कर। फिर आलोक ने पूरा लंड बाहर निकाल लिया और बोला “ले साली रागिनी गया तेरी चूत में”। और फिर वैसी ही पट्ट फट्ट फच्च की आवाज करता हुआ लंड अंदर तक चूत में बैठ गया”।
“पता नहीं मालिनी जी उस दिन की चुदाई में मुझे बहुत ही ज्यादा मजा आ रहा था। मैं बोलती जा रही थी, “आह राजा, ऐसे ही चोद, पूरा लंड निकाल कर डाल मेरी गांड में, मेरी चूत में आआह। आलोक चोद मुझे चोद, और चोद, फाड़ मेरी चूत आआआह आअह आलोक निकलने वाला है मेरी चूत का पानी। लगा जोर लगा आलोक। अअअअअह आआआह आआह निकला आलोक निकला मेरा आह आलोक आआह”।
“मेरे चूतड़ अपने आप ही जोर से हिले और मेरी चूत का पानी निकल गया, और मैं ढीली हो गई”।
“आलोक ने पांच-सात मिनट कस के धक्के लगाए और धक्के लगाने के बाद रुक गया। आलोक के लंड ने पानी नहीं छोड़ा था, और आलोक का खड़ा लंड मेरी चूत में ही था। मेरी चूत तो ऐसे लग रहा था, जैसे आलोक के लंड से भरी हुई थी”।
“उस वक़्त शराब के सुरूर और चुदाई के मजे की मस्ती में आलोक से पूछा, “क्या हुआ आलोक, साले लगता है तेरा तो अभी खड़ा ही है, निकला नहीं माल तेरे लंड में से”?
“आलोक का लंड तो मेरी चूत में ही था। आलोक ने मेरी गांड में पूरी उंगली घुसेड़ दी। गांड का छेद आलोक के लंड की चुदाई से फ़ैल चका था। आलोक की उंगली फिसलती हुई गांड के छेद में चली गयी। और फिर आलोक उसी मस्ती में बोला, “अभी नहीं निकला मेरे लंड का पानी, मेरी रानी अभी तो तेरे से लौड़ा चुसवाना है”।
“मालिनी जी वैसे भी हमारा एक रूटीन होता था। चूत या गांड चुदाई के बाद अक्सर मैं आलोक का लंड मुंह में लेकर चूसती थी, और आलोक मेरे मुंह में ही लंड का पानी निकालता था”।
“उसके बाद मालिनी जी, हमने थोड़ा आराम किया। एक-एक पैग हम दोनों ने और लगाया, और फिर आलोक ने मुझे नीचे लिटा कर मेरे मुंह के बिल्कुल ऊपर अपने लंड की मुट्ठ मरने लगा। मेरा मुंह खुला था, और आलोक बोलता जा रहा था, “रागिनी मेरी जान अब निकलेगा शहद तेरे मुंह में”।
“जैसे ही आलोक का लंड पानी छोड़ने को हुआ आलोक जोर से बोला, “रागिनी चूस”।
“मैं समझ गयी कि आलोक का लंड पानी छोड़ने को था। मैंने लंड मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। दो ही मिनट में आलोक के मुंह में से सिसकारी निकली, “आआह मेरी रागिनी, ले निकला”। और इसके साथ ही भल-भल करते आलोक के लंड के गर्म-गर्म पानी से मेरा मुंह भर गया। मैंने पानी का एक-एक कतरा गले से नीचे उतार लिया”।
“मैं आलोक का लंड तब तक चूसती रही जब तक आलोक का लंड पूरी तरह बैठ नहीं गया”।
“पहले चूत चुदाई, फिर गांड चुदाई, और अब गर्म-गर्म मलाई मुंह में। सच ऐसा और इतना मजा मुझे बहुत दिनों से नहीं आया था। आलोक का लंड तो वैसे भी पानी बहुत छोड़ता है”।
“जब इस ताबड़-तोड़ चुदाई से हम दोनों की तसल्ली हो गयी, तो हम दोनों अगल-बगल ही लेट गये”।
“कुछ सोचते-सोचते मुझे मानसी और प्रभात की चुदाई का ध्यान आ गया। मैंने आलोक से पूछा, “आलोक क्या मानसी फिर चुदी उस लड़के से – क्या नाम था, प्रभात से”?
अलोक ने फिर कुछ रुक कर कहा, “रागिनी, इस बारे मुझे नहीं पता। ना मैंने मानसी से इस बारे में पूछा ही, ना ही उसने ही मुझे कुछ बताया। लेकिन मुझे लगता है नहीं चुदी होगी। अगर मानसी उस लड़के प्रभात के साथ चुदाई का मजा ले रही होती, तो फिर मेरे पास चुदाई के लिए ना आती”।
आलोक फिर बोला, “चलो रागिनी एक मिनट के लिए मान भी लेते हैं कि मानसी प्रभात के बीच अभी भी चुदाई होती है, और मेरे पास भी मानसी चुदाई के लिए आती है। तो फिर भी तो मानसी मुझे बता ही देती”।
“अब मुझसे इतनी भी नहीं शर्माती मानसी, कम से कम चुदाई करवाते वक़्त तो नहीं ही शर्माती”। फिर आलोक जैसे अपने आपसे ही बोला, “जिस तरीके से मानसी खुद अपनी टांगें उठा कर चूत की फांकें खोल कर मेरे सामने लेटती है, वहां शर्म की गुंजाईश ही कहां बचती है”।
– डॉक्टर मालिनी के क्लिनिक में रागिनी की बात पूरी हुई, और साथ ही हुई चूत गांड की चुसाई।
“अपनी आलोक से हुई चुदाई की पूरी दास्तान सुना कर रागिनी चुप हो गयी”।
“मैंने भी टेप रिकार्डर बंद कर दिया”।
“रागिनी की बातों से मेरी गांड में खुजली मच गयी और चूत पानी छोड़ने लगी। अगर आलोक सामने होता तो मैंने भी रागिनी वाली गाली देकर आलोक को बोलना था, “चल इधर आ भोसड़ी के आलोक, चल आजा और मेरी गांड में अपना लम्बा लंड डाल”।
“मगर आलोक तो था नहीं, मैंने कुर्सी पर ही अपनी गांड रगड़ी, और साथ ही चूत पर खुजली की। रागिनी ने ये देखा तो बोली, “क्या हुआ मालिनी जी आपका भी गांड चुदवाने का मन आ गया क्या”?
“रागिनी तो अब मेरे सामने पूरी तरह ही खुल चुकी थी”।
“जब मैं कुछ नहीं बोली, तो रागिनी ने ही कहा, “मालिनी जी एक बात बोलूं? जिस दिन आलोक आपसे बात करने आएगा, आप एक बार चुदवा लेना उससे। आलोक चूत तो मस्त चोदता ही चोदता है, गांड भी मस्त चोदता है”।
“कुछ पल चुप रहने के बाद रागिनी बोली, “वैसे भी सच बताऊं मालिनी जी, लम्बे लंड से चूत में लेने का मजा तो आता ही आता है, गांड में लेने का भी बहुत मजा आता है। जब लंड का सुपाड़ा गांड के आख़री हिस्से से टकराता है, तब चूत में भी कुछ-कुछ होता है। गांड चुदवानी हो तो लम्बा लंड ही ढूंढना चाहिए। आलोक के लंड जैसा लम्बा”।
“मैं बोली तो कुछ नहीं, मगर मन ही मन मैंने फैसला कर लिया, अगर मौक़ा मिला आलोक से गांड चुदवाउंगी जरूर”।
“मैंने रागिनी से कहा, “रागिनी, आलोक तो जब आएगा तब आएगा – तब की तब देखेंगे, अभी भी तो कुछ करें। तेरी कहानी ने तो मेरी चूत फिर से गरम कर दी। आजा एक बार और चूत चाट कर मजा ले लें”।
“रागिनी हंसते हुए बोली, “चलिए मालिनी जी, इस चूत चुसाई के लिए तो में हमेशा तैयार रहती हूं”।
“मैं उठी, साथ ही रागिनी भी उठ गयी। अंदर आ कर कपड़े उतार दिए। इस बार मैं नीचे थी, और रागिनी ऊपर। रागिनी के चूतड़ खोल कर मैंने ऐसे गांड चुसाई की, कि रागिनी मजे के मारे आआआह मालिनी जी ओह मालिनी जी ही बोलती जा रही थी। फिर एक-दूसरे के ऊपर उल्टा लेट कर एक-दूसरे की चूत चूस-चूस कर पानी छुड़ाया और वापस क्लिनिक वाले कमरे में आ गयीं”।
“मैंने प्रभा को बुला कर चाय मंगवाई। चाय पीते-पीते रागिनी बोली, “मालिनी जी चूत का मजा लेने में तो आप भी कम नहीं हैं, पूरा मजा लेती हैं आप”।
“मैं बस हंस दी और रागिनी की इस बात का कोइ जवाब नहीं दिया”।
“बात जारी रखते हुए मैंने रागिनी से पूछा, “रागिनी आलोक ने अपनी और मानसी की चुदाई के बारे में तुम्हें इतना सब कुछ तुम्हें बता दिया, फिर भी तुमने आलोक से ये नहीं पूछा कि आलोक की मानसी की पहली बार की चुदाई कब और किन हालात में हुई? मेरे लिए ये जानना बहुत जरूरी है कि आलोक और मानसी की सब से पहली चुदाई कैसे शुरू हुई और किसकी पहल से शुरू हुई? मानसी की पहल से फिर या आलोक ने पहल की”?
रागिनी बोली, “सच बात तो ये है मालिनी जी, कि मेरी आलोक से ये पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई। वैसे तो आलोक बोलता है उसके और मानसी के बीच मानसी की पहल से चुदाई शुरू हुई, मगर मुझे अभी भी आलोक की इस बात पर विश्वास नहीं आता”।
रागिनी आगे बोली, “मालिनी जी मुझे आलोक की इस बात पर कैसे विश्वास होता कि मानसी ने आलोक को चुदाई के लिए मजबूर किया, आलोक ने मानसी को नहीं। आप ही बताईये कोइ नई-नई जवान हुई बेटी अपने बाप को चुदाई के लिए कैसे मजबूर कर सकती है? ऐसा तो है नहीं कि आलोक ने कभी चूत देखी ही ना हो। मुझे तो ये बात कुछ जमती नहीं लगती”।
“या फिर ऐसा भी तो हो सकता है कि आलोक ने मानसी के साथ उसकी और प्रभात की चुदाई की बातें पूछते-पूछते मानसी की चूत गर्म कर दी, और उसको उकसा कर खुद ही उसे चुदाई के लिए पटा लिया हो”।
“और मालिनी वैसे भी आलोक रोज रात को शराब पीता ही है। क्या पता शराब के नशे में मानसी के जबरदस्ती चुदाई कर दी हो। उधर मानसी को भी इस जबरदस्ती वाली चुदाई में आलोक के लम्बे लंड से चुदने का मजा आया हो, और वो बाप बेटी के इस चुदाई के रास्ते पर चल पड़ी हो”।
“मालिनी जी सच्चाई तो यही है कि चुदाई अगर जबरदस्ती भी हो तो भी लंड अंदर जाते ही चूत तो पानी छोड़ती ही है। चुदाई का मजा तो आता ही है। उस पर आलोक का लम्बा लंड। मैंने इतने लंड चूत में लिए, आलोक जैसा लम्बा लंड मुझे एक भी नहीं मिला। क्या पता मानसी को एक बार आलोक का लम्बा लंड चूत में लेने के बाद आलोक के लम्बे लंड का चस्का ही लग गया हो”।
रागिनी आगे बोली, “या फिर ऐसा हो सकता है कि मानसी एक बार प्रभात से चुदाई का मजा लेने के बाद वैसा मजा लेना चाहती हो और जवानी के जोश में चूत खोल कर आलोक के आगे लेट गयी हो। मानसी जैसी जवान लड़की की खुली चूत सामने देख कर किसी का भी मन भी चुदाई का हो सकता है, फिर चाहे वो बाप हो या भाई”।
“अब चूत देख कर कोइ इंसान कैसे अपने पर काबू रख सकता है। आलोक भी तो इंसान ही है, कोइ भगवान तो है नहीं।
“मालिनी जी, ये सारी बातें सोच-सोच कर मेरी आलोक से आगे बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई।
“रागिनी कुछ चुप हुई और बोली, “मालिनी जी असल में यही वो बातें हैं जिनके चलते तो मुझे आपकी याद आयी। एक मनोचिकित्स्क को समझने और उसे सुलझाने का अपना ढंग होता है। मानसी की अपने पापा के साथ चुदाई जैसे हालात के चलते शुरू हुई होगी उसका हल भी वैसा ही होगा”।
“रागिनी की ये बात बिल्कुल ठीक थी। हस्पताल में काम करने के कारण रागिनी बहुत सारी चीजों को अच्छे से समझती थी”।
“मैंने रागिनी से कहा, “मैं तुम्हारी बात समझ रही हूं रागिनी। मगर चुदाई कैसे भी शुरू हुई हो रागिनी, मगर पूरी बात समझने के लिए ये जानना तो बहुत जरूरी है कि चुदाई की शुरूआत आलोक ने की या मानसी ने की”।
“चुदाई में तो कुछ भी हो सकता है रागिनी, वो भी तब जब रातों में सामने बीस साल की जवान लड़की लेटी हो और आस-पास कोइ भी ना हो”।
फिर कुछ सोचते हुए मैंने रागनी से पूछा, “और रागिनी, तुमने आलोक और मानसी के बीच हो रही इस चुदाई के बारे में मानसी से बात की”?
रागिनी इस बार थोड़ा चुप से हुई और फिर उसने जवाब दिया, “जी मालिनी जी की। असल मे जिस दिन मेरी आलोक से वो व्हिस्की वाली चुदाई हुई थी, मानसी से बात करने का फैसला तो मैंने तभी कर लिया था। मैं तो ये जानने के लिए उतावली हुई पड़ी थी कि आखिर ऐसा भी क्या हुआ होगा की बाप-बेटी की चुदाई शुरू हो गयी”।
“वैसे मालिनी जी बात करने के अलावा कोइ और चारा भी तो नहीं था”।
“मैंने एक मिनट के लिए सोचा कि आलोक अगर सच में ही आलोक मानसी को चोदने से मना करता है, मगर मानसी नहीं मानती तो मेरे समझाने से मानसी समझ जाएगी और उन दोनों की चुदाई बंद हो जाएगी”।
“इसके बाद मैं मानसी से बात करने का मौक़ा ढूढ़ने लगी, और आखिर एक दिन मौक़ा मिल ही गया”।
मैं रागिनी से पूछा, “तो रागिनी क्या निकला मानसी से बात करके। क्या लगा तुम्हें उसकी बातों से”।
रागिनी बोली, “मालिनी जी मानसी से बात करके कुछ निकलना-निकालना तो दूर, मेरी उम्मीद से उल्ट मानसी ने अपनी बातों से मुझे ही लाजवाब कर दिया, और मेरी बोलती ही बंद कर दी। मानसी ने जिस तरीके से मुझसे बात की, उससे मुझे ये तो यकीन हो गया कि चुदाई जिसकी भी पहल से शुरू हुई हो मानसी को इस चुदाई का रत्ती भर भी पछतावा नहीं है”।
“और फिर मालिनी जी मानसी से बात करने के बाद तो मुझे कुछ भी नहीं सूझा सिवाए इसके कि जितना भी जल्दी हो सके मैं आपसे मिलूं और आपसे इस बारे में सलाह लूं”।
मैंने रागिनी से पूछा, “रागिनी, ऐसा भी क्या कह दिया एक बीस साल की लड़की ने कि तुम्हारी बोलती बंद हो गयी”?
– मानसी की अपनी मम्मी के साथ गुफ्तगू
रागिनी ने जैसे ही अपनी और मानसी के बीच हुई बातें बताने के लिए बोलना शुरू किया, मैंने टेप रिकार्डर फिर से चालू कर दिया।
रागिनी बता रही थी, “जिस दिन आलोक और मेरी शराब पी कर चुदाई हुई थी और जिस दिन आलोक ने मुझे अपनी और मानसी की चुदाई के बारे मैं बताया था, मैंने उसी दिन ये फैसला कर लिया था कि मानसी से जल्दी से जल्दी बात करनी ही पड़ेगी, और इस चुदाई वाले मामले को और आगे बढ़ने से रोकना होगा। मैं बस मौक़ा ढूढ़ रही थी, कि कब और कैसे मानसी से बात करूं”।
“एक दिन आलोक घर पर नहीं था। मैं और मानसी ड्राइंग रूम में बैठे थे। मानसी कोइ किताब पढ़ रही थी, और मैं TV देख रही थी। मुझे लगा यही सही टाइम था, अब मानसी से बात करनी चाहिए”।
“मैंने मानसी को कहा, “मानसी मुझे तुमसे कुछ बात करनी थी”।
मानसी ने कहा, “करो मम्मी इसमें पूछने की क्या बात है”? ये कह कर मानसी फिर किताब पढ़ने लगी।
“मैं कुछ रुकी। मेरे कुछ ना बोलने से मानसी मेरी तरफ देखने लगी”।
“मैंने हिम्मत बटोर कर कहा, “मानसी सच बताना, क्या तुम्हारे और तुम्हारे पापा के बीच जिस्मानी रिश्ते बन चुके हैं”?
“मेरे इतना पूछने पर जिस तरह से मानसी ने मुझे जवाब दिया, उसकी उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी। मानसी ने बड़ी ही तल्खी के साथ जवाब दिया, “जिस्मानी रिश्ते? आपका मतलब चुदाई के रिश्ते? मम्मी आप मुझसे ये पूछ रही हैं या बता रही हैं”?
“मुझे मानसी की बेशर्मी पर हैरानी हुई और मुझे गुस्सा भी बहुत आया। मानसी को मेरा, अपनी मम्मी का भी लिहाज नहीं था”?
“फिर भी मैंने अपने गुस्से पर काबू रखा और कहा, “हां बेशर्म लड़की – मैं तेरे और तेरे पापा में चुदाई के रिश्तों की बात कर रही हूं। मैं तुझसे ये पूछ रही हूं, अब बता ऐसे रिश्ते बन चुके हैं क्या”?
मानसी ने उसी ऊंची आवाज में जवाब दिया, “हां बन चुके हैं। होती है हममें चुदाई। तो”?
मानसी ने जिस अंदाज में चुदाई वाली बात मानी थी, उससे एक बार तो मुझे समझ ही नहीं आया ये हो क्या रहा था। फिर भी मैंने पूछा, “मानसी ये तू क्या बोल रही है? जानती भी है पिता और बेटी में इस तरह का चुदाई का रिश्ता गलत होता है”।
“मानसी ने मेरी इस बात का कोइ जवाब नहीं दिया, और किताब की तरफ देखती रही”।
मैंने ही मानसी से पूछा, “मानसी क्या आलोक तुम्हें चुदाई के लिए मजबूर करता है? तुम्हें चुदाई के लिए उकसाता है या जबरदस्ती तुम्हारी चुदाई करता है”?
मानसी उसी बेशर्मी की साथ किताब से सर उठा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा, “नहीं मम्मी, ऐसा कुछ नहीं होता जैसा आप समझ रही हैं। पापा मेरे चाहने और मेरे कहने पर ही मेरी चुदाई करते हैं”।
मैंने पूछा, “मगर क्यों मानसी? क्यों तुम ऐसा चाहती हो? क्यों करवाती हो अपने पापा से चुदाई”?
मानसी की बेशर्मी बढ़ती जा रही थी। वो बोली, “क्यों का क्या मतलब मम्मी? चुदाई किस लिए करवाई जाती है”?
मानसी की इस तरह वाली बेशर्मी वाली बातों से तो मुझे ही शर्म आने लग गयी। मुझे गुस्सा भी आ रहा था, मगर मैंने अपने आप पर काबू किया हुआ था।
मैंने दुबारा मानसी से पूछा, “क्यों तुम अपने ही पापा से चुदाई करवाती हो? क्या कभी बाप-बेटी में भी चुदाई होती है”?
अब जो मानसी ने कहा, उसने मेरे होश उड़ा दिए। मानसी ने किताब मेज पर पटक दी और बोली, “मम्मी, बाप-बेटी में चुदाई होती है और हो रही है, और ये इसलिए हो रही है क्योंकि एक बीवी को अपने पति से चुदाई करवाने की फुर्सत नहीं है। आपके पास पाप से चुदाई करवाने का टाइम नहीं है”।
“लग ही नहीं रहा था कि ये सब बातें एक मां-बेटी कि बीच हो रही थी”।
“मानसी की इस बात का जवाब मैंने उसी अंदाज में दिया, “ये तुमसे किसने कहा कि मेरे पास उनसे चुदाई करवाने का वक़्त नहीं और मैं आलोक से चुदाई नहीं करवाती? आलोक जब भी चाहता है, कहता है, मैं आलोक से चुदाई करवाती हूं”।
मानसी उसी ऊंची आवाज में बोली, “हां करवाती हैं चुदाई आप, मगर दो-दो, तीन-तीन, चार-चार महीने में एक बार। क्या आपकी उम्र में इतनी चुदाई बहुत है? आप क्या समझती हैं मुझे कुछ पता नहीं है – मुझे कुछ पता नहीं चलता? क्या आपने कभी ये समझने की कोशिश की, कि जब कभी पापा का चुदाई का मन होता होगा तो वो क्या करते होंगे”?
“आप और पापा एक-दम तंदरुस्त हो। आपकी उम्र की हर तंदरुस्त इंसान को अच्छी मस्त चुदाई चाहिए होती है। पापा को भी चाहिए, आपको भी चाहिए”।
फिर जो मानसी ने कहा, उसने तो मेरे पैरों कि नीचे से जमीन ही सरका दी। मानसी बोली, “मम्मी वैसे एक बात बोलूं? आपकी चुदाई का तो मुझे पता नहीं, मगर पापा के बारे में मैं जानती हूं, पापा को आज-कल चोदने के लिए चूत नहीं मिल रही”।
मुझे लगा मानसी मुझ पर इल्जाम लगा रही है। मैंने चिल्ला कर कहा, “तुम्हें मेरी चुदाई का पता नहीं? क्या मतलब है तुम्हारा? तुम्हारा मतलब है मैं तुम्हारे पापा के अलावा कहीं और चुदाई करवाती हूं”?
मानसी भी वैसे ही बोली, “ये तो आप बताओ मम्मी। ये सवाल आप अपने आप से करो। पापा के साथ तो आपकी चुदाई जल्दी-जल्दी नहीं होती, ये तो आप भी जानती हैं, और मैं भी जानती हूं। एक छत के नीचे ही हम रहते हैं, इतना तो पता चलता ही है”।
“अब आप ही जवाब दो और मुझे समझाओ कि दो जिन दो-तीन-चार महीनों में पापा की आपके साथ चुदाई नहीं होती, तो क्या उन दो-तीन-चार महीनों में आपकी भी चुदाई नहीं होती”?
“ये तो मानसी मुझ पर साफ़ ही इलज़ाम लगा रही थी। हैरान परेशान मैं सोच रही थी कि मानसी को इस बात का क्या जवाब दूं”।
“तभी मानसी एक पल रुक कर ताना कसते हुए बोली, “कम से कम अब सच बोलना मम्मी”।
मेरे पास मानसी की इस बात का कोइ जवाब नहीं था। चुदाई तो मैं करवाती ही थी। और फिर प्रवीणा और दूसरी नर्सों के साथ चूत चुसाई भी भी होती रहती थी”।
“फिर भी मैंने कहा, “ये क्या बेहूदा सवाल हैं मानसी”?
“मानसी भी उसे तल्खी के साथ बोली, “बेहूदा? मेरे हिसाब से ये बहुत ही आसान और सीधा सवाल है। आपको हां या ना ही तो कहना है। यही तो बताना है कि हां आप चुदाई करवाती हैं, या नहीं आप चुदाई नहीं करवाती है। अब बताईये मम्मी हां या ना”।
“मुझे मानसी से ये उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी कि मानसी ऐसा सीधा सवाल भी कर देगी”।
“मैंने बात संभालने कि लिए फिर कहा, “मानसी बात चुदाई की नहीं, रिश्तों में चुदाई की हो रही है। मुझे तुम्हारी चुदाई से कोइ एतराज नहीं, मुझे एतराज है बाप-बेटी की चुदाई से – जो गलत है कानूनी तौर पर भी और सामाजिक तौर पर भी”।
“मानसी ने फिर कहा, “गलत है? अच्छा तो फिर ये बताओ कि अगर आप पापा से चुदाई ना करवा कर बाहर से चुदाई करवाती हो, वो ठीक है? वो गलत नहीं है”?
“मानसी की बातें मुझे परेशान करने लगी। मेरा पसीना छूटने लगा। मैंने फिर कहा, “मानसी बाप-बेटी की चुदाई कानून के खिलाफ है, और समाजिक मान्यताओं के भी खिलाफ है। कभी सोचा है अगर बात बाहर चली गयी तो क्या होगा? क्या हो सकता है”?
“मानसी तो जैसे आलोक के साथ अपनी चुदाई को सही ठहरने पर तुली हुई थी। वो बोली, “मम्मी हो सकता है मेरी और पापा की चुदाई कानून के खिलाफ हो और गलत हो, मगर ये सब तो तब होगा ना जब किसी को पता चलेगा”।
“दूसरे ये गलत तब होगा, अगर किसी एक की तरफ से जोर जबरदस्ती, जिसे बलात्कार कहते हैं, वो होता हो। मेरी और पापा की चुदाई में पापा की तरफ से किसी तरह की कोई जोर जबरदस्ती नहीं होती। पापा के साथ मेरी चुदाई मेरी मर्जी से होती है”।
“मैं परेशान सी मानसी की तरफ देख रही थी। मानसी की बातों का कोइ जवाब ही मुझे नहीं सूझ रहा था”।
“जब मैं आगे कुछ नहीं बोली तो मानसी उसी अंदाज में बोली, “अभी भी समझ में आया या नहीं मम्मी”।
“मानसी की बातों का मेरे पास कोइ जवाब नहीं था, फिर भी मैंने कहा, “मगर मानसी हो सकता है ये चुदाई तुम्हारी मर्जी से हो, मगर ये चुदाई आलोक की मर्जी से नहीं हो रही”।
“मानसी वैसी ही आवाज, वैसे ही अंदाज में आगे बोली, “अच्छा? अब आप कह रही हैं कि पापा मेरी चुदाई मर्जी से नहीं करते, तो बताईये चुदाई कैसे हो जाती है”?
“चुदाई के लिए लंड का खड़ा होना जरूरी होता है या नहीं? पापा का लंड खड़ा कैसे हो जाता है? चलो मान लिया मैं चूत चौड़ी करके लेट जाते हूं, तो पापा का लंड मेरी चूत के अंदर कैसे चला जाता है? क्या अपने आप चला जाता है”?
“मैं तो कभी पापा के लंड पर नहीं बैठी। पापा ही लंड मेरी चूत में डालते हैं। पापा खड़ा हुआ लंड मेरी चूत में डालते हैं, तब लंड चूत के अंदर जाता है। और जो पापा लंड मेरी चूत में डाल कर कमर ऊपर-नीचे करते हैं, झटके लगाते हैं, अपने लंड का पानी मेरी चूत में निकालने के लिए, वो क्या पापा की मर्जी से नहीं होता”?
“मानसी ने तो बेशर्मी की सारी हदें ही पर कर दी थी। मानसी की ऐसी बेशर्म बातों से मैं चुप ही रह गयी”।
“जो बात मानसी बोल रही थी, यही बात मैंने आलोक से भी पूछी था, जब मेरी आलोक से बात हुई थी, “कैसे मजबूर कर दिया आलोक तुम्हें मानसी ने चुदाई के लिए? क्या उसने तुम्हारा लंड पकड़ कर खड़ा किया, और फिर अपनी चूत में डाल लिया? कैसे मजबूर कर दिया मानसी ने तुम्हें उसकी चुदाई के लिए, बताओ”?
फिर मानसी कुछ चुप हुई और थोड़ी धीमी आवाज में बोली, “मम्मी आपको पता भी है, रातों को पापा आपका नाम ले-ले कर, रागिनी रागिनी रागिनी बोलते हुए अपना लंड हाथ में लेकर कुछ-कुछ करते हैं, और अपने लंड का पानी निकालते हैं। बस यही मुझसे नहीं देखा जाता”।
“मैंने पूछा, “तुम्हें ये सब कैसे पता कि तुम्हारे पापा मेरा नाम ले-ले कर कुछ-कुछ करते हैं और अपने लंड का पानी निकालते हैं? क्या ये सब तुम्हें दिखा कर करते हैं, तुम्हारे सामने करते हैं”?
मानसी बोली, “नहीं मम्मी, पापा ना तो ये सब मुझे दिखा कर करते है, ना मेरे सामने करते हैं। ये मुझे इस लिए पता है क्योंकि रातों को मैं घर पर होती हूं। मैंने कई बार पापा को रागिनी-रागिनी बोलते हुए हाथ से ये करते हुए देखा है”।
“मानसी की तर्कों से मैं हैरान थी। मगर मुझे इसका कोइ सही जवाब नहीं सूझ रहा था। मगर फिर भी मैंने कहा, “और मानसी अगर आलोक ही तुम्हें चोदने से मना कर दे तो”?
मानसी ने बस इतना ही कहा, “मैं पापा को जानती हूं, वो कभी मना नहीं करेंगे। जितना ख्याल मुझे पापा का है उतना ही ख्याल पापा को मेरा भी है”।
“इतना कह कर रागिनी चुप हो गयी”।
“रागिनी की सारी बातें सुन कर मुझे दो बातें लगी। पहली बात तो ये कि हो सकता है आलोक से एक बार चुदाई करवा कर मानसी को आलोक के लम्बे लंड से चुदाई करवाने का चस्का लग गया हो, और अब वो आलोक के लंड के बिना नहीं रह सकती”।
“दूसरे ये कि वो अपने पापा से अलग ही तरह का प्यार करने लगी हो – ऐसा प्यार जो बचपन में पनपता है और फिर उम्र के साथ-साथ और बढ़ता चला जाता है, और फिर बात किसी भी हद तक चली जाती है – जैसे चुदाई तक”।
“हालांकि रागिनी की बातों से मुझे मानसी और अलोक के रिश्तों में ये दूसरी वजह ही सही सी लग रही थी, मगर किसी नतीजे पर आलोक और मानसी से बात करने के बाद ही पहुंचा जा सकता था”।
“जहां तक लम्बे लंड का सवाल है, तो लम्बे लंड का चूत चुदाई में कोइ ख़ास मतलब नहीं होता। लम्बे लंड से चुदाई सिर्फ एक दिमागी फितूर होता है, एक तरह की ठरक। चुदाई की फिल्मों में लम्बे गधे जैसे लंड देख कर लड़के-लड़किया यहीं सोचने लग जाते हैं कि लम्बे लंड की चुदाई ही असली चुदाई होती है”।
“चूत का तो चार से पांच इंच का हिस्सा ही ऐसा होता है जहां लंड की रगड़ाई महसूस होती है। उसके आगे चूत के अंदर लंड की रगड़ महसूस ही नहीं होती”।
“यही कारण है कि डाक्टरों के अनुसार साढ़े चार इंच का लंड भी वही काम करता है जो छह सात या उससे ज्यादा लम्बा लंड करता है। चूत की चुदाई के लिए लंड सख्त रहना चाहिए और चुदाई लम्बी चलनी चाहिए”।
ये सब बातें सोचते हुए मैंने रागिनी से कहा, “रागिनी, मैंने तुम्हारी बातें सुन ली हैं और काफी हद तक समझ भी ली हैं। अब मैं जापान से वापस आने के बाद पहले अलोक से भी बात करती हूं। आलोक की बात सुनने समझने के बाद मानसी से बात करूंगी। देखते हैं क्या नतीजा निकलता हैं”।
“एक बात तो लग ही रही है कि मानसी के साथ इस चुदाई में कोइ जोर जबरदस्ती नहीं हुई – ये चुदाई मानसी की मर्जी से ही होती है। फिर भी एक बार आलोक से बात करने के बाद ही समझ आएगा कि आखिर ऐसा भी क्या हुआ होगा कि बाप-बेटी में चुदाई शुरू हो गई”।
“फिर मैंने रागिनी से कहा, “मैं ये भी जानना समझना चाहती हूं आलोक का इस नाजायज से रिश्ते के बारे में क्या कहना है। आलोक से एक बात हो जाये फिर ही आगे का कुछ सोचेंगे कि मानसी से क्या बात करनी है, और कैसे बात करनी है”।
“मैंने बात जारी रखते हुई रागिनी से कहा, “पहले तो ये पता चलना चाहिए कि क्या आलोक सच में ही चाहता है कि मानसी उससे चुदाई ना करवाए, या फिर उसे ही मानसी की जवान टाइट चूत चोदने का चस्का लग चुका है, और अब बहाने बना रहा है”।
“या शराब कि नशे में ही कभी रात को आलोक ने मानसी को जबरदस्ती चोद दिया, और इस जबरदस्ती वाली चुदाई में एक बार मजा आने के बाद मानसी को ही चुदाई का चस्का लग गया”।
मैंने फिर कहा, “रागिनी एक बात बताओ, क्या अलोक जानता है कि तुम मेरे पास आयी हो इस बारे में बात करने”?
रागिनी ने जवाब दिया, “मालिनी जी उस दिन जब मैंने अलोक से उसकी और मानसी की चुदाई के बारे में बात की थी। तब मुझे आलोक की बातों से तो यही लगा था कि मानसी को नहीं चोदना चाहता, मगर इसलिए चोदता है कि उसे डर लगता है कि अगर वो मानसी को चोदने से मना करेगा, तो मानसी कोइ गलत कदम ही ना उठा ले”।
“तब आलोक ने ही कहा था कि हमें किसी मनोचिकित्स्क की मदद लेनी चाहिए जो मानसी को समझा सके और उसकी और मानसी की चुदाई हमेशा के लिए बंद हो जाये। लेकिन मालिनी जी आपके पास आने का फैसला मेरा था, और मैंने आलोक को इस बारे में बता दिया था”।
रागिनी की ये बात सुन कर मैंने कहा, “चलो फिर तो देखते हैं आगे क्या करना है। हो सकता है आलोक सच में ही चाहता हो कि मानसी उससे चुदाई बंद कर दे। अब असलियत क्या है, ये तो आलोक और मानसी से बात करने के बाद ही पता चल सकेगा”।
फिर मैंने रागिनी को सलाह दी, “रागिनी इस बीच तुम ये करो कि जीवन ज्योति में अपनी शिफ्ट फिर से दिन की करवा लो। कम से कम कुछ महीनों के लिए जब तक हम इस पूरे मामले को सुलझा नहीं लेते। इसके लिए अगर किसी से रिक्वेस्ट करनी पड़े तो कर लो। यहां तक कि अगर अपना डिपार्टमेंट बदलवाना पड़े, तो वो भी बदलवा लो”।
“रात भर घर पर रहोगी तो मानसी को लगेगा बंद कमरे में पति-पत्नी की चुदाई हो रही है। मानसी की ये शिकायत दूर हो जाएगी कि तुम्हारी और आलोक की चुदाई नहीं होती या कम होती है”।
“फिर मैंने कुछ सोचते हुए कहा, “अगर किसी तरह मौक़ा पा कर मानसी आलोक से चुदाई करवाती भी है तो करवाने दो। फिलहाल इसे आलोक और मानसी पर छोड़ दो। एक साल पहले बना चुदाई का रिश्ता इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाला”।
रागिनी उठते हुए बोली, “ठीक है मालिनी जी, जैसे आप ने बताया मैं वैसा ही करूंगी। हफ्ते बाद फोन करूंगी। फिर जब आप कहेंगी आलोक को आपसे मिलवाऊंगी”।
ये बोल कर रागिनी ने अपना पर्स और गाड़ी की चाबी उठाई, और मुझसे विदा ले कर जाने लगी।
जाते-जाते रागिनी फिर हंसते हुई बोली, “मालिनी जी आलोक आये तो फिर आप उससे अच्छे से सवाल-जवाब करना”। ये कहते हुए रागिनी ने अपनी चूत भी खुजला दी।
“मेरा जापान का सात दिन का ट्रिप कामयाब रहा। भारतीय मनोचकित्स्कों की धूम है जापान में”।
“रागिनी को मेरे वापस आने का प्रोग्राम पता ही था। मेरे वापस पहुंचने के तीसरे दिन रागिनी का फोन आ गया”।
“मैंने रागिनी को अगले दिन आलोक को साथ लाने को कह दिया”।
“आलोक का ध्यान आते ही आलोक लंड मेरी आखों के आगे घूम गया – ऐसा लगा लंड जैसे मेरी गांड में ही घुसा हुआ है। “मैं ही कौन सी कम ठरकी हूं – लम्बे लंड की शौक़ीन”।
मेज की दराज खोल कर देखा, गांड चुदाई में इस्तेमाल होने वाली जैल की ट्यूब है या खत्म हो गयी। मेरी पूरा इरादा था कि आलोक का लम्बा लंड गांड में लेना ही लेना है। लम्बे लंड से गांड चुदवाने का मजा ही अलग होता है।
मनोचकित्सा और चुदाई, सब काम साथ साथ चलने चाहियें।
– आलोक का आना डाक्टर मालिनी के क्लिनिक में
“अगले दिन ठीक ग्यारह बजे आलोक और रागिनी मेरे क्लिनिक में पहुंच गए। कुछ रस्मी बातों के बाद रागिनी उठ खड़ी हुई और बोली, “मलिनी जी आज तो मेरा यहां कोई काम नहीं, मैं चलती हूं मुझे हस्पताल पहुंचना है। आलोक यहीं है, आप इससे बात कर लीजिये। फिर आगे जैसा आप कहेंगी वैसा करेंगे”।
“ये बोल कर रागिनी ने अपनी चूत खुजलाई और पीछे से साड़ी खींची जिसे गांड में से फसी हुई साड़ी निकल रही हो”।
“मैं सब समझ रही थी। अगर नीचे अंडी पहनी हो तो साड़ी गांड में फंस ही नहीं सकती। और ऐसा हो ही नहीं सकता था कि रागिनी ने नीचे अंडी ना पहनी हुई हो”।
“घरेलू काम वालियों और धोबनों को छोड़ दें तो लगभग सब औरतें अंडी पहनती हैं, नौकरी करने वाली तो ख़ास करके अंडी पहनती हैं। अगर वो नीचे अंडी ना पहनें तो उठते-बैठते साड़ी या दूसरा कोइ भी कपड़ा बार-बार गांड में ही फंसता रहेगा। ऐसे में साथ काम करने वाले लंगोट के कच्चे मर्द क्या करेंगे जिनके लंड चूत और गांड का ध्यान आते ही खड़े होने लग जाते हैं”।
“काम वालियों और धोबनों का तो चक्कर ही दूसरा होता है। वो तो इस लिए अंडी नहीं पहनती की चुदाई के वक़्त झंझट होता है। पहले अंडी उतारो फिर पहनो। अंडी उतारने पहनने का झंझट ही तो होता है। अंडी ना पहनी हो तो धोती चूतड़ों से ऊपर कमर तक उठाई और फटाफट वाली चुदाई हो जाती है”।
“असल में रागिनी ने मुझे आलोक से चूत और गांड चुदवाने का इशारा किया था”।
“वैसे तो रागिनी ना भी इशारा करती, तो भी मैंने आलोक का लम्बा लंड चूत और गांड में लिए बिना जाने नहीं देना था। मुझे भी लम्बे लंड से चुदाई करवाने की पूरी ठरक लगी हुई थी”।
“आलोक और रागिनी दोनों अपनी-अपनी गाड़ी से आये थे। रागिनी चली गयी, अब क्लिनिक में मैं और आलोक ही थे”।
“44 का आलोक, पांच फुट ग्यारह इंच लम्बा, बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व वाला मर्द था। रागिनी जवानी में आलोक के साथ फंसी थी तो ठीक ही फंसी थी। आलोक को देखते ही मेरी आंखों के सामने आलोक का लम्बा लंड घूम गया, और मेरी अपनी चूत एक-दम से गीली हो गयी”।
“अलोक भले ही लम्बे लंड का मालिक था और चुदाई का उस्ताद भी, मगर मुझे आलोक देखने में शर्मीला आदमी लगा। रागिनी ने ठीक ही कहा था, कि लड़की पटाना और पटा कर चोदना आलोक के बस की बात नहीं थी। मैंने आलोक को सहज करने के लिए पहले उसकी CA वाले कारोबार से बात की। इधर-उधर की बातें करने के बाद मैं सीधा मुद्दे पर आ गयी”।
“मैंने आलोक से पूछा, “आलोक एक बात बताओ, रागिनी से तुम्हारी क्या बात हुई है? रागिनी तुम्हें क्या बोल कर यहां मेरे पास लाई है”?
“आलोक ने जवाब दिया, “मालिनी जी हम मानसी के बारे मैं बात करने के लिए आपके पास आये हैं। हमारी समस्या कुछ इतनी घरेलू और निजी है कि इसके बारे में हर किसी से बात नहीं की जा सकती। हमारी समस्या का हल कोइ मनोचिकित्स्क ही कर सकता है। रागिनी आपको पहले से जानती थी, इसलिए रागिनी ने आपसे मिलना ठीक समझा, और हम यहां आ गए”।
मैंने कहा, “अच्छा आलोक अब मुद्दे पर आते हैं। अब बताओ, जो कुछ भी मानसी और तुम्हारे बीच जो भी हो रहा रहा है वो किसकी मर्जी और किसकी पहल के साथ शुरू हुआ”।
आलोक बोला, “मालिनी जी बड़े ही अजीब से हालात में मेरे और मेरी बेटी मानसी के बीच जिस्मानी रिश्ते बन गए। जिस दिन हममें पहले-पहल ये सब हुआ, वो सब कुछ इस तरह हुआ कि मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आया। और जब समझ आया तो सब कुछ हो चुका था। लेकिन इतना था कि जो कुछ भी मेरे और मानसी के बीच हुआ, उसका मुझे तो पछतावा था, मगर मानसी को कोइ पछतावा नहीं था”।
“झिझक के कारण आलोक बड़ी ही ढकी छुपी भाषा में बात कर रहा था। इस तरह से बात करने से कई बार बातों के अलग मतलब भी निकल जाते हैं। मुझे आलोक से साफ़-साफ़ भाषा में सारी बात सुननी थी जिस तरह रागिनी ने मुझे पूरी बात बताई थी”।
“आलोक की झिझक दूर करने के लिए मैंने आलोक को रागिनी की आवाज वाले टेप का कुछ हिस्सा सुनाने का फैसला किया”।
मैंने आलोक से कहा, “आलोक तुम साफ़-साफ़ लफ्जों में मुझे बताओ कि तुममे और मानसी में मर्द और औरत वाला चुदाई का रिश्ता कैसे बन गया? और जो तुम ये कह रहे हो कि बड़े ही अजीब से हालात में मेरे और मेरी बेटी मानसी के बीच जिस्मानी रिश्ते बन गए। जिस दिन हममें पहले-पहल ये सब हुआ वो सब कुछ इस तरह हुआ कि मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आया। और जब समझ आया तो सब कुछ हो चुका था, या तुम्हें पछतावा था मानसी को नहीं। इन सब बातों क्या मतलब है”?
मैंने बात जारी रखते हुए कहा, “आलोक मुझे लग रहा है, तुम साफ़ बात करने से कुछ झिझक रहे हो। ऐसा होता है। अपनी बहुत ही निजी बातें साफ़ शब्दों में बताने में दिक्कत होती ही है। लेकिन हम मनोचिकित्स्क साफ-साफ शब्दों का इस्तेमाल ही करते हैं, और ये इसलिए भी होता है जिससे किसी भी बात के दो या ज्यादा मतलब ना निकाले जा सकें”।
“आलोक हालांकि पति-पत्नी की चुदाई” – मैंने जान बूझ कर चुदाई शब्द का इस्तमाल किया – “चुदाई के दौरान होने वाली बातें किसी तीसरे को नहीं सुननी चाहिये फिर भी मैं तुम्हें रागिनी से हुई मेरी बात की टेप का एक छोटा सा हिस्सा सुनाती हूं जिससे तुम्हे पता लगे कि मनोचिकित्सक किस तरह की साफ़-साफ़ बात सुनने की उम्मीद करते हैं”।
“ये कह कर मैंने रागिनी की टेप थोड़ी आगे की और रिमोट का बटन दबा टेप रिकार्डर चालू कर दिया”।
क्लिक की आवाज के साथ टेप चलनी शुरू हो गयी।
रागिनी की आवाज आ रही थी, “मैंने भी आलोक का ढीला पड़ा लंड हाथ में ले लिया कर बोली, “आलोक सच सच बताना क्या तुम मानसी को चोदते हो? मानसी चुदाई करवाती है तुमसे”?
आलोक ने एक बार मेरी और देखा, मगर हैरानी से नहीं। उल्टा आलोक ने मुझी से सवाल किया, “तुम्हें क्या लगता है रागिनी”?
मैंने आलोक के आंखों में देखते हुए कहा, “आलोक मैंने मानसी को तुमसे अपनी चूत चुदवाते हुए देखा है। मैंने तुम दोनों की चुदाई होते हुए देखी है”।
कुछ देर आलोक चुप रहा, और फिर बोला, “हां रागिनी, मानसी चुदवाती है मुझसे, मैं चोदता हूं मानसी को”।
पहले तो मैं हैरान हुई कि आलोक को ये बताते हुए जरा सा भी पछतावा नहीं हो रहा कि वो अपनी ही बेटी को चोदता है? उसके इस रवैये से मैंने लगभग चिल्लाते हुए कहा, “मगर क्यों आलोक? मानसी तुम्हारी बेटी है तुम्हारी अपनी बेटी। तुम अपनी बेटी को ही चोदते हो? जानते भी हो इसका मतलब? ये समाज की नजरों में गलत है, पाप है”।
“आलोक ने कोइ जवाब नहीं दिया, बस ऐसे ही लेटा रहा। आलोक का हाथ अभी भी मेरे मम्मों पर ही था। फिर कुछ चुप रहने के बाद मैंने ही पूछा, “कब से चल रहा है बाप बेटी की इस चुदाई का सिलसिला? और मैं कहां थी? तुम्हारी अपनी चूत, तुम्हारी अपनी फुद्दी। मुझे तो तुम जब चाहते, जैसे मर्जी चाहते चोद सकते थे। फिर मानसी क्यों? बोलो आलोक”।
“यहां मैंने रिमोट से क्लिक की एक आवाज के साथ टेप रिकार्डर बंद कर दिया”।
“मर्द होने के बावजूद शर्म से आलोक के चेहरे का रंग गुलाबी हो गया था। मैंने ही बात आगे बढ़ाई, “अलोक, अब समझे किस हद तक साफ़ बात की उम्मीद करती हूं मैं”।
“आलोक ने हां सर हिलाया, और इसके बाद उसने भी चूत चुदाई जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया”।
मैंने आलोक से कहा, “तो आलोक फिर बताओ तुम जो कह रहे थे कि बड़े ही अजीब से हालात में मेरे और मेरी बेटी मानसी के बीच जिस्मानी रिश्ते बन गए या जो भी तुमने कहा, इसका क्या मतलब है”?
“आलोक थोड़ा सा हिला और फिर साफ़ शब्दों में ही बोला, “मालिनी जी मेरी और मानसी की पहली चुदाई बड़े ही अजीब हालात में हुई। कम से कम उस चुदाई से पहले मेरे मन में तो कभी भी मानसी को चोदने का ख्याल भी नहीं आया था”।
“आलोक जब ये बोल कर चुप हुआ तो मैंने ही कहा, “अगर तुम्हारे मन में मानसी को चोदने का कभी ख्याल भी नहीं आया, तो भी आलोक मानसी की चुदाई तो तुमसे हुई ही”।
आलोक बोला, “यही तो मैं भी कहना चाह रहा हूं मालिनी जी। मेरे ना चाहने के बावजूद मेरी और मानसी की चुदाई हो गयी”।
फिर आलोक थोड़ा रुका और बोला, “मालिनी जी रागिनी ने प्रभात और मानसी की चुदाई के बारे में तो आपको बता ही दिया होगा”।
मैंने कहा, “हां आलोक रागिनी ने बताया है और ये भी बताया है कि मानसी ने तुम्हें i-pill लाने के लिए कहा था”।
आलोक बोला, “बस मालिनी जी, मेरी और मानसी की चुदाई का बीज उसी दिन डल गया था जिस दिन मानसी ने अपनी और प्रभात की चुदाई की बात मुझे बताई थी और मुझे i-pill लाने के लिए बोला था”।
“मानसी की प्रभात के साथ चुदाई और मानसी के लिए i-pill लाने वाले दिन के बाद तो मानसी से आमना-सामने होते ही मेरी आंखों के आगे मानसी और प्रभात के चुदाई घूमने लगती। मानसी नंगी लेटी हुई और नंगी मानसी के ऊपर लेटा हुआ दिखाई देता। मुझे तो ख्यालों में प्रभात का लंड भी मानसी की चूत में गया हुआ दिखाई देता था”।
“मानसी और प्रभात की चुदाई के ख्याल से ही मेरा लंड खड़ा होने लग जाता मगर, इतना सब होने के बावजूद भी मैंने मानसी को चोदने का कभी नहीं सोचा था”।
फिर आलोक थोड़ा चुप हुआ और फिर बोला, “मालिनी जी, ये तो एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि बस चुदाई हो गयी”।
“ये बोल कर आलोक फिर चुप हो गया”।
“मैंने भी आलोक को सोचने का मौक़ा दया और आगे के बात का इंतजार करने लगी”।
“दो तीन मिनट के बाद फिर आलोक ने बोलना शुरू किया”।
“मालिनी जी मैं रोज रात को व्हिस्की के तीन-चार पेग पीता हूं और ये मेरी बरसों पुरानी आदत है।
“एक दिन रात को TV पर क्रिकेट का मैच आ रहा था और मैं ड्राईंग रूम में बैठा TV देख रहा था और साथ साथ व्हिस्की पी रहा था। ड्राइंग रूम के साथ वाला कमरा मानसी का है। ड्राईंग रूम के साथ लगे बाथरूम का एक दरवाजा मानसी के कमरे में खुलता है, दूसरा ड्राईंग रूम में खुलता है”।
“उस दिन मैच देखते-देखते व्हिस्की के चार पेग मैं पी चुका था और पांचवां पेग मेरे हाथ में था। साढ़े दस बज चुके थे। मुझे नींद आने लग गयी थी। मुझे पेशाब भी लग रहा था। मैंने व्हिस्की से भरा गिलास मेज पर रखा, और ड्राईंग रूम के साथ लगे बाथरूम में पेशाब करने चला गया”।
“पेशाब करके हाथ धो कर जब मैं तौलिये के साथ हाथ पोंछने लगा, तो तौलिये के साथ ही मानसी का पायजामा लटका हुआ था। तौलिया उतारते ही पायजामा नीचे गिर गया।
मैंने पायजामा उठाया और जब मैं पायजामा खूंटी पर टांगने लगा तो मुझे पायजामा में से कुछ महक सी आयी। बिल्कुल वैसे महक आ रही थी जैसी रागिनी की चूत में से आया करती है”।
“इतना सुनना था कि मैंने मन ही मन सोचा, “अबे गधे आलोक, हर लड़की और औरत की चूत से वैसी ही महक आती है I मानसी अभी नयी-नयी जवानी में आयी है, इस लिए चुदाई के ख्याल से उसकी चूत ज्यादा पानी छोड़ रही होगी।”। ये सोचते-सोचते मैंने अपनी चूत खुजलाई”।
आलोक बोल रहा था, “मानसी के पायजामे में से उठ रही चूत के पानी और पेशाब की मिली-जुली गंध से मेरी आंखों के आगे मानसी और प्रभात की चुदाई घूम गयी। फिर से वही सीन मेरे आंखों के आगे आ गया। प्रभात मानसी के ऊपर लेटा हुआ है। प्रभात का लंड मानसी की चूत में गया हुआ है। इन ख्यालों ने मेरा लंड खड़ा कर दिया”।
“ना जाने क्या हुआ मैंने पायजामा उठा लिया। ड्राईंग रूम में आ कर व्हिस्की का गिलास खाली किया, TV बंद किया, और अपने कमरे में चला गया”।
“बिस्तर पर लेटा तो मेरी नींद गायब हो चुकी थी। मेरी आंखों में आगे से मानसी और प्रभात की चुदाई हट ही नहीं रही थी। मेरा लंड सख्त होता जा रहा था। मैंने लंड पकड़ लिया। अब मुट्ठ मार कर पानी छुड़ाने के अलावा कोइ चारा नहीं था”।
“मैंने अपने पायजामे का नाड़ा खोल कर पायजामा थोड़ा नीचे किया, और एक हाथ से लंड की मुट्ठ मारने लगा। दूसरे हाथ से मैंने मानसी का पायजामा अपनी नाक से लगा लिया और उसमें से उठती हुई चूत के पानी और पेशाब की मिली-जुली की गंध सूंघने लगा”।
“क्या बताऊं मालिनी जी, मुझे तो बताते हुए शर्म आ रही है, मगर मुट्ठ मारते हुए मेरी आंखों के आगे मानसी का नंगा जिस्म ही तैर रहा था। उस दिन मानसी का पायजामा सूंघते-सूंघते मुझे मुट्ठ मरने का मजा भी बड़ा अजीब आ रहा था”।
“थोड़ी देर में लंड की मस्ती शुरू हो गयी। पहले तो मुट्ठ मारते हुए मैं आआह रागिनी आआह रागिनी बोलने लगा। मगर मेरी आंखों के आगे उस दिन रागिनी नहीं मानसी थी। जल्दी ही मेरे मुंह से आआह रागिनी की जगह आअह मानसी आआह मानसी निकलने लगा”।
“मुट्ठ मारते हुए मेरा लंड जल्दी नहीं झड़ता। मेरी आखें बंद थी, और मुट्ठ मारना जारी था”।
“तभी मुट्ठ मारते-मारते मुझे कोई आवाज सी सुनाई पड़ी जैसे कोई कह रहा हो “ये क्या कर रहे हो पापा”? मैंने सोचा ये मेरा वहम होगा, यहां इस वक़्त कौन आएगा। मैंने आंखें नहीं खोली, और मुट्ठ मारना जारी रखा”।
“तभी दुबारा मुझे फिर वही आवाज सुनाई दी, “ये क्या कर रहे हो पापा”?
मैंने आंखें खोली तो देखा मानसी खड़ी थी। नीचे से नंगी, बिना पायजामें के”।
“कुछ पल के लिए तो मुझे जैसे सांप सूंघ गया। मुझे समझ ही नहीं आया कि ये क्या हो गया है। मेरा खड़ा लंड मेरे हाथ में था और मानसी नंगी मेरे सामने खड़ी थी। मैं तो मुट्ठ मारना ही भूल गया”।
मैं कुछ बोलने ही वाला था कि मेरे बोलने से पहले मानसी बोल पड़ी, “ये क्या कर रहे हो पापा? मेरा पायजामा क्यों सूंघ रहे हो? मैं कहां थी? मुझे बुला लेते”।
“ये बोल कर मानसी ने मेरे हाथ से पायजामा छीन कर बिस्तर पर फेंक दिया। मानसी कुछ सेकण्ड के लिए रुकी, और फिर अपनी दोनों टांगें मेरे मुंह के दोनों तरफ करके अपनी चूत की फांकें खोल कर मानसी घुटनों के मेरे मुंह के ऊपर ही बैठ गयी”।
मानसी के चूतड़ मेरे सर की तरफ थे, और मानसी का मुंह मेरे लंड की तरफ था। मानसी की खुली चूत मेरे मुंह के ऊपर थी। मानसी ने जरा सा सर घुमाया और बोली, “लो पापा, अब जो भी करना है करो”।
“जैसे ही मानसी मेरे ऊपर बैठी, मैं तो हैरान ही रह गया कि ये क्या हो रहा था। मेरी बेटी नंगी मेरे मुंह पर बैठी थी। एक बार तो मन में आया मानसी को हटा दूं, लेकिन ये ख्याल मेरे मन से जल्दी ही निकल गए और मेरा मन भी मानसी की चूत चूसने का होने लगा”।
“मानसी चुदाई के मामले मैं अनाड़ी थी। मानसी मेरे मुंह पर सीधी बैठे हुई थी। मेरे मुंह से कुछ ही ऊपर मानसी की चूत नहीं चूतड़ थे। लेकिन मानसी की चूत लग रहा था बहुत पानी छोड़ रही थी। मानसी की चूत से पानी टपक-टपक कर मेरे मुंह में जा रहा था। चूत के पानी में से मस्ती भी गंध आ रही थी”।
“मुझे भी मस्ती आने लगी। मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि मेरा लंड सख्त होने लगा है। मैंने मानसी के चूतड़ों पर हाथ फेरने शुरू कर दिए। मानसी के चूतड़ बहुत ही मुलायम थे, रेशमी कपड़े की तरह”।
“फिर अचानक से ना जाने क्या हुआ, मैंने मानसी की बाहों के नीचे से हाथ करके मानसी की छोटी-छोटी सख्त चूचियां पकड़ ली और चूचियों के निप्पल मसलने लगा। मानसी के मुंह से ऊंह आह ऊंह आह की सिसकारियां निकलने लगीं”।
“मानसी की चूत के पानी की महक और मेरे हाथों में मानसी की चूचियां। मुझ से और नहीं रहा नहीं जा रहा था”।
“मैं मानसी की चूत चूसना चाहता था। मगर जिस तरह मानसी मेरे मुंह पर बैठी हुई थी मेरे मुंह के ऊपर मानसी के चूतड़ थे चूत नहीं। मैंने मानसी की चूत अच्छे से चूसने के लिए मानसी को आगे की तरफ झुका दिया”।
“आगे की तरफ झुकी हुई मानसी की चूत बिल्कुल मेरे मुंह पर थी और मानसी का चेहरा मेरे लंड के ऊपर था। मानसी की चूत के आस-पास छोटे-छोटे नरम झांटों के बाल थे जो मेरे होठों को छू रहे थे”।
“आगे झुकाने पर शायद मानसी ने सोचा होगा कि मैंने मानसी को लंड चूसने के लिए झुकाया है। मानसी ने मेरा खड़ा लंड मुंह में ले लिया और चूसने लगी”।
“व्हिस्की का सुरूर, मानसी की चूत में से उठ रही खुशबू और हल्के नमकीन पानी का स्वाद – ना जाने क्या हुआ मैं जो जोर से मानसी की चूत चूसने लगा”।
“उस वक़्त मैं भूल गया कि मानसी मेरी बेटी है। मेरा मन मानसी को चोदने का होने लगा। चुदाई के ख्याल से ही जल्दी ही मेरा लंड फटने को हो गया। मुझसे और रहा नहीं गया। मैंने मानसी को चूतड़ों से पकड़ कर अपने ऊपर से उठाया और इतना ही कहा, “बस मानसी”।
“इतना कह कर मैंने मानसी को बिस्तर पर लिटा दिया। मैंने मानसी के घुटनों के नीचे अपने कुहनियां फंसाई और मानसी आगे की तरफ कर दिया। मानसी के चूतड़ और चूत ऊपर उठती चली गयी”।
“टांगें चौड़ी होने के कारण मानसी की चूत का छेद मेरे लंड के बिल्कुल सामने था। एक-दो बार चूत की फांक में लंड थोड़ा ऊपर-नीचे करने से मेरा लंड मानसी की चूत के छेद पर सटीक बैठ गया”।
“मैंने नीचे लेटी मानसी को कंधो को पकड़ा और एक झटका लगाया। मेरा सख्त हुआ पड़ा लंड मानसी की चूत में बिल्कुल अंदर तक चला गया। मानसी की चूत का छेद बिलकुल टाइट था। मेरा खड़ा लंड रगड़ा खाता हुआ मानसी की चूत में बैठा”।
मानसी के मुंह से हल्के दर्द और मजे की एक सिसकारी निकली, “उह पापा आअह पापा”।
“इसके बाद जो मैंने मानसी को जो चोदना शुरू किया, कि फिर मैं नहीं रुका”।
आलोक डाक्टर मालिनी को बता रहा था, “मालिनी जी जिस तरह मानसी नीचे चूतड़ झटका-झटका कर घुमा-घुमा आकर चुदाई करवा रही थी – मेरा लंड चूत के अंदर ले रही थी लग रहा था मानसी को चुदाई का बहुत मजा आ रहा था”।
“चूतड़ हिलाते-हिलाते मानसी सिसकारियां ले रही थी,” आआह पापा आअह आअह पापा बड़ा अच्छा लग रहा है आआह पापा”।
“तभी मानसी ने जोर से चूतड़ ऊपर-नीचे किये और आआआह पापा बोल कर कस कर मुझे पकड़ लिया। मैं समझ गया मानसी की चूत का पानी निकल गया था, और मानसी की चूत झड़ चुकी थी। मानसी को मजा आ चुका था”।
आलोक डाक्टर मालिनी को बता रहा था। “मालिनी जी, मैं और रागिनी जब भी चुदाई करते हैं, हममें एक से ज्यादा बार चुदाई होती है। मानसी को चोदते बार भी यही हुआ। मानसी को मजा आ चुका था, मगर मेरा लंड वैसे का वैसे ही खड़ा था”।
“एक तो शराब का सुरूर, दूसरी जवान मानसी की टाइट चूत। मेरे सर पर चुदाई का भूत सवार हो चुका था। मानसी को मजा आने के बावजूद मेरा चुदाई बंद करने का मन नहीं था। टाइट चूत की चुदाई की मस्ती में मैंने इतना भी नहीं सोचा कि ऐसी चुदाई क्या मानसी झेल भी पाएगी या नहीं”।
“मैं मानसी को चोदता ही जा रहा था। कुछ ही देर में मानसी ने फिर वही किया और आआह पापा आअह आअह पापा बड़ा अच्छा लग रहा है आआह पापा बोल कर मुझे फिर से वैसे ही पकड़ लिया”। मानसी को दुबारा मजा आने वाला था।
“तभी मानसी ने जोर से चूतड़ घुमाए और एक सिसकारी ली, ” आआआह पापा”। मानसी को एक बार और मजा आ गया था। चुदाई होते हुए तकरीबन बीस मिनट हो चुके थे। तभी मुझे भी मजा आया और मेरे लंड में से ढेर सारा पानी मानसी की चूत में निकल गया। मेरे मुंह से बस यही निकला, “ले मानसी ले”।
“कुछ देर मैं मानसी के ऊपर ही लेटा रहा। जैसे ही मेरा लंड ढीला हुआ, तो मैं मानसी के ऊपर से उतरा और मानसी के साथ ही लेट गया। कुछ देर में जब मेरे सर से चुदाई का भूत उतरा तो समझ आया कि ये क्या हो चुका था”।
“मैंने नशे की हालत में मानसी को, अपनी बेटी को ही चोद दिया था”।
“मैं शर्म से उठ कर बैठ गया। मैंने जल्दी से पायजामा पहना और अपना सर पकड़ कर मानसी से बोला, “मानसी ये क्या हो गया? ये तो बड़ी गड़बड़ हो गयी। ये नहीं होना चाहिए था। तू क्यों आई इस तरह हमारे कमरे में? हे भगवान मुझसे ये क्या पाप हो गया”।
मानसी भी उठते हुए बोली, “कैसी गड़बड़ और कैसा पाप पापा? ऐसा भी क्या हो गया जो आप ऐसे बोल रहे हो? जो भी हुआ है ठीक ही तो हुआ। आप भी तो मेरा पायजामा सूंघते-सूंघते यही तो चाह रहे थे। तभी तो आपने अपना पायजामा सूंघते हुए लंड हाथ में ले रखा था। आपका लंड चूत ही तो मांग रहा था, वो मिल गयी उसको”।
“मानसी एक चुदाई के बाद ही लंड चूत खुल कर बोल रही थी”।
फिर मैंने मानसी से कहा, “मानसी जाओ अपने कमरे में और भूल जाओ जो हुआ है। अब दुबारा ये नहीं होना चाहिए। ये गलत है बेटा। बाप-बेटी में ये रिश्ता गलत है”।
मानसी ने अपना पायजामा उठाते हुए कहा, “पापा आप सोचते ही क्यों हो ये आपकी बेटी की चूत है? बेटी वाली बात भूल कर बस इतना सोचो कि एक चूत आपके सामने है और आप उसे चोद रहे हो। मानसी को मेरे साथ हुई इस चुदाई का कोइ पछतावा या अफ़सोस नहीं लग रहा था”।
“कुछ देर मानसी ऐसे ही खड़ी रही, अपना पायजामा हाथ में लिए हुए कमरे से निकल गयी”।
“अगले दिन सुबह शर्म के कारण मैं मानसी के सामने भी नहीं जा रहा था। मगर मानसी जब भी मेरे सामने आती वो नार्मल ही थी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो”।
“हालंकि मानसी को चोदने का मुझे पछतावा था, मगर फिर भी मैं मानसी के साथ हुई चुदाई भूल नहीं पा रहा था। पहले जब भी मैं खाली बैठता या लेटता तो जैसे पहले मेरी आंखों के आगे प्रभात और मानसी की चुदाई घूमा करती थी, अब मेरी आंखों के आगे उनकी नहीं, मेरी अपनी और मेरी बेटी मानसी की चुदाई घूमने लगी थी”।
“सोचते-सोचते मेरा लंड खड़ा होने लगता और मुझे लगता जैसे मानसी की टाइट चूत ने मेरा लंड जकड़ा हुआ है”।
आलोक डाक्टर मालिनी को बता रहा था। “इसके बाद तो जब भी मानसी से आमना-सामना होता मुझे मेरी और मानसी की चुदाई याद आ जाती। रातों को मानसी और अपनी चुदाई का सोचते-सोचते मेरा लंड खड़ा हो जाता था”।
“रातों में रागिनी पास होती नहीं थी और मानसी को मैं चोदना नहीं चाहता थ। ऐसे में फिर मुट्ठ मार कर लंड का पानी निकालने के अलावा कोइ रास्ता नहीं रहता था”।
“मैं मानसी की छोटी-छोटी चूचियां अपने हाथों में महसूस करता था। मुझे लगता था मानसी की चूत के छोटे मुलायम झांटों के बाल मेरे होठों को छू रहे हैं”।
“और फिर एक दिन मैं ऐसे ही मानसी के साथ हुई चुदाई का सोचते-सोचते मुट्ठ मार रहा था कि मानसी आ गयी और आ कर मेरे पास आ कर लेट गयी”।
मैंने हड़बड़ाहट में मानसी से पूछा, “क्या हुआ मानसी यहां क्यों आई हो इस वक़्त, जाओ अपने कमरे में”?
“मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि मेरी आवाज कांप रही थी। मैं मानसी को जाने के लिए तो बोल रहा था, मगर मानसी को अपने पास से हटा नहीं रहा था। मानसी के साथ लेटने से मेरे लंड की सख्ती बढ़ रही थी”।
“मानसी ने अचानक मेरा लंड हाथ में पकड़ लिया और दबाने लगी। मेरा लंड मानसी का हाथ लगती ही सख्त हो गया। मैंने मानसी का हाथ अपने लंड पर से नहीं हटाया। कुछ देर बाद मानसी उठी और मेरा लंड मुंह में लेकर चूसने लगी”।
“मेरे मन में फिर से मानसी को चोदने का ख्याल आने लगा। मैंने सोचा आज आख़री बार और मानसी को चोद लेता हूं, आज के बाद फिर कभी भी मानसी को नहीं चोदूंगा”।
“मैंने मानसी के मुंह से अपना लंड निकाला, उसके कपड़े उतारे, और पहले की तरह ही मानसी को लिटा कर उसकी चुदाई कर दी। पहले दिन वाली चुदाई की तरह ही ये चुदाई भी बीस-बाईस मिनट चली और इसमें मानसी की चूत का पानी पहले की ही तरह दो बार छूटा”।
“चुदाई पूरी होने के बाद मैं मानसी के ऊपर से उतरा और चुप-चाप मानसी के पास लेट गया। मुझे मानसी की चुदाई का इतना पछतावा हो रहा था कि समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलूं”।
“हम दोनों ही चुप थे। कुछ देर बाद मानसी उठी और अपने कपड़े उठा कर कमरे से बाहर निकल गयी”।
“मेरे मन में फिर वही ख्याल आया, “ये ठीक नहीं हो रहा। बाप-बेटी में चुदाई ठीक नहीं”। यही सोचते-सोचते मैं सो गया।
“लेकिन इसके बाद ये सिलसिला शुरू हो गया। पंद्रह बीस दिन या महीने के बाद जब मानसी का चुदवाने का मन होता रात को मानसी हमारे में आ जाती, और मेरे पास लेट जाती। कुछ देर बाद मानसी उठती, अपने पकड़े उतारती, मेरा लंड मुंह में लेकर चूसती और कुछ देर बाद ही हमारी चुदाई हो जाती। चुदाई करवा कर मानसी चुप-चाप उठती और अपने कमरे में चली जाती”।
“ये सोचते-सोचते भी कि मेरी और मानसी की चुदाई ठीक नहीं, मैं मानसी को चोद देता। जवान मानसी जब मेरे साथ नंगी लेटी तो मेरा दिमाग ही काम नहीं करता था। हर चुदाई से पहले मैं यही सोचता आज मानसी को चोद देता हूं आज के बाद नहीं चोदूंगा, और चुदाई हो जाती”।
“ये बिल्कुल ऐसा ही था मालिनी जी जब नए-नए जवान होते लड़के मुट्ठ मरना शुरू करते हैं तो वो भी यही सोचते हैं। उनके दिमाग में टीचर और कई बार मां बाप ये भूसा भर देते हैं कि वीर्य जीवन का मूल है, अनमोल मोती है, वीर्य को मुट्ठ मार नष्ट नहीं करना चाहिए, वगैरह-वगैरह। तब लड़के भी मुट्ठ मारते हुए यही सोचते है, “आज आखरी बार मुट्ठ मार लेता हूं, आगे से नहीं मारूंगा”।
“मेरी हंसी छूट गयी। आलोक की ये बात बिल्कुल सही थी, ऐसा ही होता है”।
आलोक बता रहा था, “मालिनी जी, हर चुदाई के बाद मैं मानसी को समझाता, “मानसी ये ठीक नहीं बेटा, मुझे नहीं अच्छा लगता। तू समझती क्यों नहीं मानसी। तुझे नंगी देख सामने देख कर मैं कमजोर पड़ जाता हूं और अपना आपा खो देता हूं, और तुझे चोद देता हूं। पर ये गलत है मानसी, ये ठीक नहीं है। ये नहीं होना चाहिए”।
“हर बार मानसी वही बात दुहराती, “पापा आप ये सोचते ही क्यों हो कि आप अपनी बेटी को चोद रहे हो। आप सोचो आप एक चूत को चोद रहे हो बस किसकी चूत चोद रहे हो ये सोचो ही मत”।
“इसके बाद एक दो बार चुदाई से मैंने मना किया तो मानसी ने जिस तरह से चुदाई के लिए जिद की, मुझे उससे हैरानी सी हुई”।
मैंने आलोक से पूछा, “ऐसा क्या कहा मानसी ने आलोक”?
आलोक बोला, “मालिनी जी जब मैंने मानसी को चुदाई के लिए मना किया तो मानसी बोली, प्लीज़-प्लीज़ पापा, आज कर लो आगे से नहीं कहूंगी”। मानसी के चुदाई के लिए इस तरह ‘प्लीज़’ कहने मैंने सोचा चुदाई के लिए इतनी पागल हो चुकी है मानसी? मानसी के इस तरह ‘प्लीज़’ कहने से मुझे महसूस हुआ कि बात हाथ से निकल रही है”।
“मैं सोचने लगा कहीं मानसी को चुदाई करवाने का चस्का ही तो नहीं लग गया? ऐसे में तो अगर मैंने मानसी को चोदने से मना किया तो क्या पता किस-किस से चुदाई करवाएगी या फिर कोइ गलत कदम भी उठा सकती है”।
“कई बार मेरा मन हुआ कि रागिनी से बात करूं, मगर फिर वही बात याद आ जाती जब i-pill लाते हुए मानसी ने मुझसे कही थी, “पापा मम्मी को मत बताना आपको मेरी कसम”।
“फिर एक दिन मैंने सोच ही लिया कि बहुत हो गयी बाप बेटी की चुदाई, अब और नहीं”।
“एक दिन वो चुदाई के लिए मेरे पास आयी और मैंने उसे चोदने से मना कर दिया। उसके बहुत कहने के बाद भी जब मैंने उसे नहीं चोदा तो उसने मुझे साफ़ कह दिया की अगर मैंने उसे नहीं चोदा तो वो कुछ कर लेगी”।
“जब मानसी के ये कहने के बाद भी मैं मानसी को चोदने के लिए नहीं उठा तो मानसी उठी, उसने अपने कपड़े उठाये और पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गयी”।
“मुझे वही डर सताने लगा कि कहीं मानसी कुछ कर ही ना ले कोइ गलत कदम ही ना उठा ले। कुछ देर बाद मैं उठा और मानसी के कमरे में गया। मानसी लाइट बंद करके लेटी हुए थी”।
“मैं मानसी के पास बैठ गया और बोला, “क्या हुआ मानसी ऐसे क्यों आ गयी? तुम ठीक तो हो? नाराज हो गयी हो क्या”?
“मानसी कुछ नहीं बोली, बस चुप-चाप लेटी रही”।
“मैंने मानसी को कंधे से पकड़ कर हिलाया तो मानसी ने मेरा हाथ अपने कंधे से झटक दिया और गुस्से से बोली, “पापा जाईये आप, आपको मेरी नाराजगी की चिंता करने की जरूरत नहीं। मैं ठीक हूं”।
“उस वक़्त मुझे लग रहा था रागिनी का वहां होना बड़ा ही जरूरी था। मुझे लगा अगर रागिनी की रात वाली शिफ्ट शुरू ना हुई होती तो शायद मेरी और मानसी की मेरे साथ चुदाई भी शुरू ना होती”।
मैं परेशान सा हो गया था। मैंने मानसी की चूचियों पर हाथ फेरने शुरू किये और मानसी से दुबारा पूछा, “मानसी क्या बात है, गुस्सा हो गयी हो क्या”?
“कुछ देर तो मानसी कुछ नहीं बोली। मैं अपना हाथ मानसी की चूचियों पर फेरता रहा। तभी मानसी ने अपना एक हाथ मेरे हाथ पर रख दिया और मेरा हाथ अपनी चूची पर दबाने लगी”।
“मेरा हाथ मानसी की चूचियों पर ही घूम रहा रहा था। जल्दी ही मानसी लम्बी-लम्बी सांसें लेने लग गई। तभी मानसी ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपनी तरफ खींचा। मानसी मुझे अपने पास लेटने के लिए बोल रही थी”।
“मैं वहीं मानसी के साथ ही लेट गया। कुछ देर हम ऐसे ही लेटे रहे। फिर मानसी ने अपना हाथ मेरे लंड पर रख दिया और आअ पापा आअह पापा बोलने लगी”।
“मानसी के हाथ में मेरा लंड खड़ा होने लग गया”।
“मानसी ने मेरे पायजामे का नाड़ा पकड़ा कर नाड़ा खोलने की कोशिश करने लगी। अंधेरे में नाड़ा खुल नहीं रहा था। आखिर मैंने ही अपने पायजामे का नाड़ा खोल दिया”।
“मानसी ने मेरा सख्त होता हुआ लंड पकड़ा और आगे-पीछे करने लगी जैसे लंड की मुट्ठ मार रही हो। दस मिनट मानसी ने ऐसे ही किया फिर मानसी उठी और सलवार नीचे करके मेरे ऊपर उल्टा लेट गयी। मानसी की चूत मेरे मुंह पर थी, और मैं मानसी की चूत चूस रहा था। उधर मानसी मेरा लंड चूस रही थी”।
“चूत चुसाई से मानसी की चूत भी पानी छोड़ रही थी। जल्दी ही मानसी ने चूतड़ घुमाने शुरू कर दिए। मानसी की चूत लंड मांग रही थी”।
“मैंने अपना मुंह मानसी की चूत से हटाया और मानसी के चूतड़ों को ऊपर की तरफ किया। मानसी समझ गई कि मैं मानसी को अपने ऊपर से उतरने का लिए इशारा कर रहा हूं”।
“मानसी उठी और उठ कर बाथरूम चली गयी। पांच मिनट के बाद मानसी आयी तो मानसी के जिस्म पर एक कपड़ा नहीं था। मानसी आयी और आ कर मेरे पास लेट गयी, और मेरा लंड फिर से पकड़ लिया और बस इतना ही बोली “अअअअअह पापा”।
“मेरे सामने कोइ दूसरा रास्ता नहीं था। मैं भी उठा, मानसी के चूतड़ों के नीचे तकिया लगा कर मानसी की चूत ऊपर उठाई, और टांगें खोल कर लंड मानसी की चूत में डाला और चुदाई चालू कर दी”।
“बेमन से हुई वो चुदाई पांच-सात मिनट ही चली लेकिन हम दोनों को मजा आ गया। मानसी ने इस चुदाई के दौरान बस एक, “आह पापा निकल गया” की सिसकारी ली और ढीली हो गयी”।
“मैं भी उठा और अपना पायजामा उठा कर अपने कमरे में चला गया। मैं बिस्तर पर लेटा था मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी। मैं यही सोचता जा रहा था कि मानसी कैसे मुझसे चुदाई करवाना बंद करेगी”?
“मैं इन्हीं ख्यालों में ही उलझा हुआ था कि मानसी दुबारा आ गयी, वैसी ही बिना कपड़ों के। आ कर मानसी मेरे पास ही लेट गयी और बोली, “पापा आप नाराज तो नही हो”?
“मानसी को इस तरह बिना कपड़ों के देख मैं एक बार तो हैरान रह गया। मैंने सोचा अभी-अभी तो मानसी की चुदाई हो कर हटी है, और अब मानसी दुबारा ऐसी नंगी क्यों आ गयी है। मेरे मुंह से बस इतना ही निकला, नहीं मानसी नाराज नहीं हूं, क्या बात है”?
“मेरा मतलब था कि मानसी अभी तो तुम्हारी चुदाई हुई है, फिर अब क्यों आई हो”?
“मानसी ने बिना कुछ बोले पयजामे के ऊपर से मेरा लंड फिर से हाथ में ले लिया। मेरी मानसी को मना करने की हिम्मत ही नहीं हुई”।
“कुछ देर ऐसे ही लेटने बाद मानसी ने मेरे पायजामे का नाड़ा खोला और उठ कर लंड फिर से मेरे मुंह में ले लिया और चूसने लगी”।
“मानसी की चुसाई से जल्दी ही फिर से मेरा लंड दुबारा खड़ा हो गया। मानसी ने लंड मुंह से निकला और बिस्तर पर लेट गयी। मानसी ने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी चूत पर रखा और बोली, “पापा इस बार अच्छे से करना, जैसे पहले करते थे”।
“अच्छे से करना, जैसे पहले करते थे? ये मानसी क्या बोल रहे थी? मतलब मानसी को भी उस बेमन वाली चुदाई का पूरा मजा नहीं आया था। मानसी पूरी रगड़ाई वाली चुदाई चाहती थी”।
“उस वक़्त मैंने भी सोचा, जब मानसी को चोदना ही है तो फिर जैसी चुदाई मानसी चाहती है, वैसी चुदाई ही करनी पड़ेगी – रगड़ाई वाली चुदाई”।
“फिर मैं भी उठा। इस बार मानसी के चूतड़ों के नीचे तकिया नहीं लगाया। पहली बार की चुदाई की तरह मैंने मानसी की टांगों के नीचे अपने बाजू डाले और ऊपर की तरफ होने लगा। मानसी की चूत ऊपर उठते चली गयी”।
“मैंने लंड मानसी की चूत पर ऊपर-नीचे किया। जैसे ही लंड चूत की छेद पर जरा सा रुका, मैंने एक झटके से लंड मानसी की चूत के अंदर डाल दिया।
“मानसी ने आअह पापा की आवाज के साथ जोर से चूतड़ घुमाये और बोली, “हां पापा ऐस ही”।
“इतना सब होने के बाद चुदाई का भूत मेरे सर पर भी सवार हो चुका था। इसके बाद मेरी और मानसी की जोरदार चुदाई हुई। मानसी “आअह पापा मजा आ गया आअह पापा और जोर से आह पापा आह पापा ” बोलती जा रही थी साथ ही अपने चूतड़ घुमा रही थी”।
“कोइ पंद्रह मिनट चली इस चुदाई मानसी एक बार झड़ चुकी थी, और लगातार चूतड़ घुमा रही थी। मानसी को दुबारा मजा आने वाला था। तभी मुझे मजा आ गया। मैंने मानसी को कस कर पकड़ा और तीन-चार जोर-जोर के धक्के लगाये और, “ले मानसी निकला तेरे अंदर” के आवाज के साथ ढेर सारा गरम पानी मानसी की चूत में डाल दिया”।
“कुछ देर ऐसे ही लेटने के बाद मैं मानसी के ऊपर से उतर गया। पल्प की आवाज के साथ मेरा लंड मानसी की चूत में से फिसल कर बाहर निकल गया”।
“कुछ मिनटों के बाद मानसी उठी और इतना ही बोली, “थैंक यू पापा, आप बहुत अच्छे हो”। इतना बोल कर मानसी चली गयी”।
“मानसी जिस तरह एक बार चुदाई करवा कर दुबारा चुदाई करवाने आयी, उससे मैं हैरान था। मानसी को सीधी सादी चुदाई से मजा ही नहीं आया था। मानसी ने तो एक बीस साल की लड़की की तरह नहीं बल्कि एक चुदक्कड़ औरत की तरह चूतड़ झटका-झटका कर चुदाई करवाई थी”।
आलोक डाक्टर मालिनी को बता रहा था, “मालिनी जी मुझे ये उम्मीद नहीं थी कि मानसी को इस तरह की रगड़ाई वाली चुदाई की आदत पड़ चुकी थी। तभी मैंने ये सोच लिया कि बहुत हो चुका। इससे पहले कि अब बाप-बेटी में चुदाई के इस खेल में मानसी कुछ ज्यादा ही आगे निकल जाए, चुदाई के मजे का ये खेल तमाशा बंद होना चाहिए”।
“अगले दिन मैं ऑफिस से आया और फ्रेश हो कर ड्राइंग रूम में ही मानसी को बुला लिया”।
“मैंने मानसी को कहा, “मानसी मुझे तुमसे कुछ बात करनी है”।
“मानसी मेरे सामने ही बैठ गयी, और मेरी तरफ देखने लगी”।
मैंने बिना कुछ लाग-लपेट के मानसी को साफ़ ही बोल दिया, “मानसी जो कुछ भी हमारे बीच हो रहा इस बारे में खुल कर बात करना चाहता हूं”।
मानसी को जैसे इसी बात की उम्मीद थी। बिना परेशान हुए मानसी बोली “जी पापा बोलिये”।
“कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने मैंने कहा, “मानसी, जो कुछ मेरे और तुम्हारे बीच रातों को छुप-छुप कर, चोरी-चोरी चल रहा है, ये ठीक नहीं है”।
“पहली बात तो ये कि बाप-बेटी में इस तरह का चुदाई का रिश्ता गैर कानूनी है, सामाजिक तौर पर अमान्य है। अगर किसी को इस रिश्ते का पता चल जाए तो गजब हो सकता है, हमारे लिए भी और हमारे परिवार के लिए भी। दूसरी बात, चलो मान भी लिया किसी को पता नहीं चलेगा, मगर हमें तो मालूम ही है कि ये जो कुछ भी हो रहा है, गलत ही है”।
मैं बोल रहा था, और मानसी सुन रही थी। मैंने ही फिर कहा, “मानसी जरा सोचो अगर रागिनी को ये पता चल गया कि मेरे तुम्हारी बीच क्या चल रहा है, तो उस पर क्या बीतेगी? वो मेरे बारे में क्या सोचेगी? तुम्हारे बारे में क्या सोचेगी? बाप-बेटी के रिश्ते में चुदाई की कोइ जगह नहीं होती बेटा”।
मानसी चुप-चाप सुन रही थी। मैंने ही बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “मानसी हम जो कर रहे हैं ये ठीक नहीं है। तुम नंगी हो कर चूत खोल कर मेरे सामने लेट जाती हो, और मैं रह नहीं पाता, और तुम्हारी चुदाई कर देता हूं। मगर मानसी तुम्हारी चुदाई करने के बाद मैं हमेशा यही सोचता हूं, ये मैं क्या कर रहा हूं? चुदाई करने के बाद मुझे अपने आप से नफरत होने लगती है”।
मानसी कुछ देर तो चुप रही फिर बोली, “पापा आप ऐसा क्यों बोल रहे हो? मगर मैं तो सिर्फ आपका ध्यान रख रही हूं। मम्मी जो इतने इतने दिन आपसे चुदाई नहीं करवाती और जब आप लंड हाथ में लेकर मुट्ठ मारते हो, तो मुझसे आपने मुट्ठ मारना नहीं देखा जाता। मुझसे ये बर्दाश्त नहीं होता”।
मैंने कहा, “मानसी मुट्ठ मारना एक अलग बात है। सभी शादी शुदा औरतें और मर्द सब ही ये करते हैं। जरा सोचो, मैं 44 साल का हूं। मेरी उम्र बढ़ रही है। मुझे अब चुदाई की उतनी तलब नहीं होती। तुम्हारी मम्मी को भी शायद चुदाई की उतनी तलब नहीं होती होगी। अगर मेरे और तुम्हारी मम्मी के बीच एक महीना भी चुदाई नहीं होती, तो भी इससे अब हम दोनों को ही कोई फरक नहीं पड़ता”।
“फिर मैंने मानसी को समझाया, “मानसी तुम अब जवान हो, बालिग हो, तुम्हारी अपनी जिंदगी होनी चाहिए। तुम्हारे अपने दोस्त होने चाहियें। तुम अपने दोस्तों के साथ घूमो फिरो, मौज मस्ती करो। जिस तरह का रिश्ता तुम अपने और मेरे बीच रखना चाहती हो, ऐसा रिश्ता अपने दोस्तों के साथ बनाओ। जिंदगी ऐसे ही चलती है”।
“इशारों-इशारों में मैं मानसी को समझा रहा था कि जिस तरह का चुदाई का रिश्ता वो मेरे साथ रखना चाह रही है, इस तरह का चुदाई का रिश्ता वो अपने दोस्तों के साथ रखे”।
मानसी कुछ देर चुप रही फिर बोली, “लेकिन पापा मुझे आपसे चुदाई करवाना अच्छा लगता है। आपको बाहों में लेना, आपके नीचे लेटना, आपका लंड चूसना, आपका लंड अपनी चूत में लेना, सब कुछ अच्छा लगता है। मैं आपसे चुदाई करवाए बिना नहीं रह सकती”।
आलोक थोड़ा चुप हुआ और फिर बोला, “मालिनी जी मानसी की ये वो बात थी जिसने मुझे चिंतित कर दिया। मानसी अपना कोइ दोस्त बना कर उसके साथ चुदाई नहीं करना चाहती थी, और मेरे साथ ही चुदाई जारी रखना चाहती थी”।
“मुझे लगने लगा मानसी बाप-बेटी की चुदाई को एक अलग ही नज़रिये से देखने लग गयी थी। मानसी बाप-बेटी में हो रही चुदाई को प्रेमी प्रेमिका की चुदाई, पति पत्नी की चुदाई की तरह देख रही थी”।
आलोक फिर बोला, “मैंने फिर मानसी से कहा, चलो मान लेते हैं मानसी की तुम्हें मुझसे चुदाई करवा के अच्छा लगता है। मगर मानसी तुम कब तक मुझ से चुदाई करवाती रहोगी? आखिर को तो तुम्हारी भी अपनी जिंदगी होगी। तुम्हारा कोइ लड़का दोस्त, फिर तुम्हारी शादी”।
“मानसी चुपचाप रही थी और मैं बोल रहा था, “मानसी मैंने तुम्हें बताया ही है, इस उम्र में मेरे मन में अब पहली जैसी चुदाई के इच्छा भी नहीं है। क्या पता कुछ दिनों के बाद तुम्हारी नंगी चूत देख कर भी मेरे मन में तुम्हें चोदने की इच्छा पैदा ना हो। फिर क्या होगा? तुम तो उस दिन की तरह नाराज हो जाओगी”?
“ये कह कर मैं चुप हो गया। मानसी भी चुप हो कर कुछ सोचने लगी। फिर मानसी उठते हुए बोली, “पापा आप अपनी उम्र की फ़िक्र ना करो, आपसे जितना होता है उतना ही उतना ठीक है, मैं आगे से नाराज नहीं होऊंगी”।
आलोक बोला, “मालिनी जी मानसी की इस बात से मैं समझ गया कि मानसी मुझसे चुदाई बंद करने वाली नहीं। हमारी उस दिन की बात से इतना जरूर हुआ कि मेरी और मानसी की चुदाई बहुत कम तो हो गयी, लेकिन बंद फिर भी नहीं हुई”।
“कभी-कभी मुझे लगता है अब मानसी मुझे मजा देने ले लिए नहीं खुद मजा लेने के लिए मुझसे चुदाई करवाने आती है – मेरे लम्बे लंड से चुदाई का मजा। तब मुझे लगा कि अब रागिनी से इस बारे में बात करना ही ठीक रहेगा। शायद वो ही कोई रास्ता निकल पाए”।
आलोक बोल रहा था, “मालिनी जी मैं सोच ही रहा था कि रागिनी से कैसे बात करूंगा। वो भी मेरे और मानसी के बीच चल रही चुदाई के रिश्ते के बारे में क्या सोचेगी? मैं इसी उलझन में रागिनी से बात करने का मन बना ही रहा था कि एक रात रागिनी ने मुझे मानसी को चोदते हुए देख लिया”।
“और उसके बाद जो हुआ वो तो रागिनी ने आपको बताया ही होगा”।
“ये बोल कर आलोक चुप हो गया”।
“मैंने अपने हाथ में पकड़े रिमोट से टेप रिकार्डर बंद कर दिया। आलोक के मुंह से मानसी की चुदाई का ऐसा विवरण सुन कर मेरी अपनी चूत पानी छोड़ चुकी थी”।
“आलोक जिस तरह से अपने लम्बे लंड का जिक्र कर रहा था, मेरा मन कर रहा था एक बार देखूं तो सही, कैसा है आलोक का ‘लम्बा’ लंड? क्या सच में ही इतना लम्बा है जितना रागिनी बता रही थी, और जैसा कि आलोक बता रहा था”?
“मैंने हाथ से अपनी चूत खुजलाई। आलोक से भी ये बात छुपी नहीं रही। मुझे इस तरह चूत खुजलाता देख कर आलोक की नजरें मेरी चूत पर अटक गयी”।
“मानसी से अपनी चुदाई की बातें बताते बताते उसका लंड भी हरकत करने लगा था। आलोक के खड़े होते हुए लंड का उभार पेंट के ऊपर से साफ़ दिखाई दे रहा था। आलोक ने भी अपना लंड पेंट में ठीक से बिठाया”।
“आलोक को ये सब करते देख कर मुझसे भी नहीं रहा जा रहा था”।
“मैंने अपनी पहियों वाली कुर्सी थोड़ी आगे सरका कर धीरे से कहा, “आलोक एक बात बताओ, क्या सच में तुम्हारा लंड इतना लम्बा है”?
“मेरी बात सुन आलोक जरा सा सकपकया। उसे उम्मीद ही नहीं थी, कि मैं ऐसा भी कुछ पूछ लूंगी। आलोक बस इतना ही बोला, “जी? मालिनी जी ये क्या पूछ रही हैं”?
“मैने हंसते हुए कहा, “हां भई, यही पूछ रही हूं कि तुम्हारा लंड क्या सच में ही बहुत लम्बा है”?
“मैंने आलोक के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा, “जब रागिनी से मेरी बात हुई थी तो बातों-बातों तुम्हारे औसत लम्बाई से ज्यादा लम्बे लंड के बारे में भी बात निकल गयी थी। और जो तुमने अभी-अभी कहा कि तुम्हें लगता है कि मानसी मुझे मजा देने ले लिए नहीं खुद मजा लेने के लिए मुझसे चुदाई करवाने आती है – मेरे लम्बे लंड से चुदाई का मजा”।
“आलोक तो चुप था। मैंने ही हंसते हुए कहा, “आखिर मुझे भी तो पता चले कितना लम्बा लंड है तुम्हारा”?
“आलोक मेरी इस बात पर कुछ बोला नहीं। मगर उसकी आंखों में शरारत थी”।
“मैं फिर हंसी, “चलो तुम मत बताओ मैं ही देख लेती हूं। चलो निकालो पेंट में से मैं भी देखूं कितना लम्बा है तुम्हारा ये लंड, या फिर रागिनी या तुम ही गप्प मार रहे हो”।
“आलोक ना कुछ बोला, ना हिला”।
“मैंने अपनी कुर्सी और आगे की ओर आलोक की पेंट की ज़िप पर हाथ लगाया और बोली, “अब लड़कियों की तरह मत शर्माओ, आज कल तो लड़कियां भी इतना नहीं शर्माती”।
“ये कह कर मैंने ज़िप खोलने की कोशिश की। हाथ लगते ही पता लग रहा था कि लंड खड़ा होना शुरू हो गया है”।
“अब आलोक भी आखिर कोइ संत महात्मा तो नहीं था। मेरे पेंट की ज़िप को हाथ लगाते ही आलोक बोला, “नहीं मालिनी जी मैं करता हूं”। ये कह कर आलोक ने कुर्सी से खड़े हो कर पेंट की ज़िप खोली और आधा खड़ा लंड पेंट से बाहर निकाल लिया”।
-आलोक का लम्बा लंड और डाक्टर मालिनी के साथ आलोक के चुदाई
“आलोक का आधा खड़ा लंड भी छह इंच से ज्यादा लम्बा था। मैंने आलोक का लंड अपने हाथ में पकड़ा और धीरे-धीरे दबाने लगी। आधे मिनट में ही लंड पूरा खड़ा हो गया। सच में ही लंड अच्छा खासा लम्बा था, कम से कम मैंने जितने लंड अब तक अपनी चूत में लिए थे, उस सबसे तो लम्बा ही था”।
“मेरे मन में ऐसे ही ख्याल आया कहीं इसी कारण तो नहीं मानसी आलोक से चुदाई नहीं छोड़ पा रही”?
“मैंने आलोक का लंड हाथ में पकड़े हुए ही कहा, “आलोक जरा मेरे पास आओ”।
“आलोक समझ गया होगा कि क्या होने वाला है। एक औरत लंड हाथ में पकड़ कर पास बुला रही है, तो कुछ ना कुछ तो होगा ही – कहीं ना कहीं तो लंड अब जाएगा ही”।
“आलोक आया और मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया। मैंने एक बार आलोक की तरफ नजर उठा कर देखा, और आलोक का लंड मुंह में लिया और चूसने लगी। बत्तीस साल के लंड चुसाई के तजुर्बे ने आलोक के छक्के छुड़ा दिए। जल्दी ही आलोक आआह आह करने लगा और मेरा सर लंड पर दबाने लगा”।
मैंने आलोक से पूछा, “आलोक चोदोगे”?
“हड़बड़ाए आलोक के मुंह से इतना ही निकला, “जी”?
मैने कहा, “आलोक मैंने पूछा है मुझे चोदोगे? चूत, गांड। चोदोगे मेरी”?
“आलोक के मुंह से बस इतना ही निकला, “जी? आपकी चूत? मालिनी जी आप चुदवायेंगी? अभी? यहां”?
“मैंने भी कहा, “हां मेरी चूत, अभी, यहां I फिर मैंने आलोक का हाथ पकड़ा और पीछे कमरे की तरफ ले जाती हुई बोली,”चलो उठो”।
“आलोक मेरे साथ खिंचता चला आया। पीछे कमरे में पहुंच कर मैंने अपने कपड़े उतारते हुए आलोक से कहा, “आलोक तैयार हो जाओ उतारो कपड़े”।
“आलोक अभी अपने कपड़े उतारने के लिए बटन ही खोल रहा था, तब तक मैं अपने कपड़े उतर चुकी थी। रोज की कसरत और योगा करने से मेरा कसा हुआ शरीर देख कर आलोक ने एक बार अपना लंड पकड़ा और और बस इतना ही बोला, “मालिनी जी आप तो एक-दम कड़क हैं”।
“मैंने भी हंस कर कहा, “अच्छा? किसकी जैसी कड़क? तुम्हारी बीवी रागिनी जैसी कड़क या तुम्हारी बेटी मानसी जैसी कड़क”?
“आलोक कुछ नहीं बोला, बस मेरी चिकनी चूत की तरफ देखता रहा, जिस पर झांट का एक भी बाल नहीं था”।
“मैं बेड के किनारे पर बैठ गयी और आलोक को अपनी तरफ खींच कर उसका लंड फिर से मुंह में ले कर जोर-जोर से चूसने लगी”।
“पांच मिनट की लंड चुसाई की बाद ही आलोक बोला, “बस मालिनी जी, अब और मत चूसिये। आपकी चुसाई मैं तो मानो जादू है। अब बताईये क्या करना है, चूत चुदवानी है या गांड में लेना है”?
“मैंने भी कहा, गांड ही चोदो, चूत का काम मैं कर लूंगी। ऐसे भी इतने लम्बे लंड से गांड ही चुदवाने का मजा है। इतना कह कर मेज की दराज में से रबड़ का मोटा लंड निकाल लिया”।
“सीधे सादे आलोक ने शायद ऐसा रबड़ का लंड पहली बार देख रहा था।आलोक ने मुझसे पूछा, “मालिनी जी ये क्या है जरा दिखाईये मुझे, ये तो लंड जैसा ही दिखाई दे रहा है”।
“मैंने लंड आलोक के हाथ में दे दिया। आलोक ने उलट-पलट कर लंड देखा और नीचे के स्विच को दबा कर चालू किया। रबड़ के लंड में वाइब्रेशन होने लगा। लंड का कम्पन, वाइब्रेशन महसूस करके बोला, “ये तो कमाल है मालिनी जी, ये तो जब चूत में जा कर इस से तरह वाइब्रेशन करता होगा तब तो बड़ा मजा देता होगा, असली लंड से भी ज्यादा”।
“इतना कह कर रबड़ के लंड की तरफ देखते हुए आलोक कुछ सोचने लगा”।
मैंने उसे इस तरह सोचते देख पूछा, “क्या हुआ आलोक, क्या सोच रहे हो? मानसी के लिए मंगवाना है”?
“आलोक हैरान हुआ और बोला, “कमाल है मालिनी जी, आप तो विचारों को पढ़ने में माहिर हैं। मैं बिल्कुल यही सोच रहा था। रागिनी के पास तो मेरा ये वाला लंड है ही। मानसी को लंड की जरूरत है जिसके लिए वो मेरे पास चुदाई के लिए आती है”।
“मालिनी जी मानसी का काम इस लंड से चल सकता है, कम से कम फिलहाल के लिए। हो सकता है इससे काम चलाने के बाद मानसी मुझसे चुदाई बंद ही कर दे”।
“आलोक के इतना कहने से मैं ये तो समझ गयी कि मानसी और आलोक की चुदाई में आलोक मानसी के साथ चुदाई बंद करना चाहता है।
“अब मुझे मेरा काम आसान लगने लगा”। मैंने आलोक से कहा, “आलोक मुझे एक बार मानसी से बात कर लेने दो, अगर जरूरत होगी तो मैं ही ऐसा एक लंड मानसी के लिए भी मंगवा दूंगी। मानसी अभी छोटी है उसे अभी ऐसे लंड की जरूरत नहीं। इस तरह के मोटे लंड हम जैसी चुदक्कड़ों के लिए हैं।
“मैंने आलोक के हाथ से रबड़ लंड ले लिया। जैल की टयूब आलोक के हाथ में देते हुए पूछा, “आलोक दारू के दो पैग लगाने हैं? चुदाई का मजा आ जाएगा”।
आलोक हैरानी से बोला, “मालिनी जी दारू? दिन में दारू”?
“मैंने हंस कर कहा, “आलोक क्या बात है? दिन में कोइ पहली बार तो दारू नहीं पियोगे। रागिनी को भी तो दिन में दारू पी कर चोद चुके हो”।
“आलोक फिर बोला, “मालिनी जी रागिनी ने आपको ये वाली बात भी बताई है”?
“मैंने जवाब दिया, “बिल्कुल बतायी है आलोक, क्योंकि उसी दिन तो रागिनी ने तुमसे तुम्हारी और मानसी की चुदाई की बात की थी”।
आलोक इस पर कुछ नहीं बोला।
मैंने ही कहा,” आलोक वैसे विआग्रा भी है मेरे पास। बोलो क्या करना है? दारू या वियाग्रा”?
“आलोक ने इतना ही कहा, ” विआग्रा नहीं मालिनी जी, वियाग्रा खाने के बाद मेरा लंड पानी ही नहीं छोड़ता और खड़ा ही रहता है। यहां तक कि दुखने लग जाता है। व्हिस्की ही ठीक रहेगी”।
“मैंने कोने की बार में से शिवाज़ रीगल की बोतल निकाली। दो गिलास लिए। बार में पड़े छोटे फ्रिज में से सोडा निकाला, और दो बड़े पैग बना लिए”।
“एक गिलास आलोक के हाथ में देकर बोली, “लो आलोक एक ही सांस में गटक जाओ, ताकि दिमाग घूमे जरा। चुदाई से पहले अगला पैग आराम से पिएंगे। ये बोल कर एक ही सांस में मैंने गिलास खाली कर दिया”।
“आलोक मेरी तरफ ही देखता जा रहा था। सोच रहा होगा, कैसी औरत है ये? चुदाई की शौक़ीन तो है ही ऊपर से दारू की भी शौक़ीन है”।
“मुझे एक ही बार में गिलास खाली करते देख कर आलोक ने भी अपना गिलास खाली कर दिया। मैंने आलोक के हाथ से गिलास पकड़ा, और फिर उतनी ही स्कॉच उसमें डाल दी”।
“अब हम दोनों सोफे पर बैठ कर आराम से छोटे-छोटे घूंट भर रहे थे। आलोक ने सोफे पर बैठे-बैठे ही मेरी टांगें थोड़ी सी चौड़ी की और एक उंगली मेरी चूत में डाल दी, और मेरी चूत के दाने को मसलने लगा। अब ये दारू का असर था या नंगी चूत देख कर आलोक मस्ती में आ चुका था”।
“आलोक ने जैसी ही मेरी चूत में उंगली डाली मेरी चूत ने फर्रर्र से पानी दिया। आलोक मेरी तरफ देखते हुए बोला, मालिनी जी कमाल है। आपकी चूत तो मानसी की चूत की तरह पानी छोड़ती है।
“असल में आलोक का मतलब था कि मालिनी जी आपकी चूत तो बीस साल की लड़की की तरह पानी छोड़ती है”।
“मैंने आलोक से कहा, “आलोक चुदाई के मामले में मैं मानसी से कम नहीं। मुझे भी रगड़ाई वाले चुदाई में ही मजा आता है। ये बोल कर मैंने आलोक का लंड हाथ में ले लिया और लंड के टोपे से चमड़ी आगे-पीछे करने लगी। आलोक का लंड सख्त होता जा रहा था और ये सख्ती मैं अपने हाथ में महसूस कर रही थी”।
डाक्टर मालिनी का आलोक के साथ चुदाई का प्रोग्राम बन चुका था। लंड चुसाई और चूत में ऊंगली-बाजी जारी थी। बातों-बातों में मालिनी ने आलोक की बात का जवाब देते हुए कहा कि चुदाई के मामले में वो भी मानसी से कम नहीं, तो आलोक मुस्कुरा दिया।
“मैं बैठी हुई आलोक के लंड के टोपे की चमड़ी आगे-पीछे कर रही थी, और आलोक मुझे अपने लंड के साथ खिलवाड़ करते हुए देख रहा था। आलोक को भी मेरे लंड के टोपे की चमड़ी आगे-पीछे करने से मजा आ रहा था”।
“हमारा दूसरा पैग भी खत्म हो चुका था। तीसरा बड़ा सा पैग पीने के बाद अचानक आलोक ने मेरी चूत से उंगली निकाल ली, और दारू के सुरूर में बोला, “चलिए उठिये मालिनी जी, आपकी गांड में डालूं अपना लम्बा लंड। रागिनी को तो बड़ा मजा आता है गांड चुदवाने का। आपको भी बड़ा मजा आएगा”।
“शिवाज़ रीगल के तीन पैग का सुरूर तो मुझे भी हो चुका था। मैं भी उठी। गिलास की बची स्कॉच पी, और बेड के किनारे पर उल्टा हो कर लेट गयी, चूतड़ पीछे करके उठा दिए और अलोक से कहा, “लो आलोक कर दी गांड तुम्हारे हवाले। अब जैसे मर्जी रगड़ो इसे”।
“ये सुनना था कि आलोक ने जैल की ट्यूब उठा कर जैल मेरी गांड के छेद पर लगाई और उंगली पूरी गांड में डाल दी। मैंने पीछे सर करके आलोक को देखा और हंस दी”।
“गांड में उंगली करना भी एक तरह का ठरक ही है। चूत में या गांड में उंगली डालने से मजा तो किसी को भी नहीं आता”।
“कुछ देर उंगली अंदर-बाहर करके आलोक ने खूब सारी जैल मेरी गांड के छेद पर और अपने लंड पर लगाई। फिर लंड गांड के छेद पर रखा, और मेरी कमर पकड़ कर एक ही झटके से पूरा का पूरा लंड गांड के अंदर तक बिठा दिया”।
“आलोक का लंड रगड़ खाता हुआ मेरी गांड में बैठा था। हल्की सी दर्द और मजे से मेरे मुंह से एक सिसकारी सी निकली ‘आह’। इस आह में दर्द काम और मजा ज्यादा था”।
“गांड में पूरा लंड अंदर डालने के साथ ही आलोक बोला, “मालिनी जी आपकी गांड तो अभी भी टाइट है, आज रगड़े लगाने का मजा आएगा, आपको भी और मुझे भी। ऐसे गांड चुदाई करूंगा आपकी, कि आप भी याद रखेंगी कि किसी ने गांड चोदी थी”।
“शायद आलोक का मतलब था कि रागिनी की गांड का छेद आलोक की गांड चुदाई से खुल चुका था”।
“मैं भी सर पीछे के तरफ मोड़ कर कहा, “आलोक ये इसलिए है कि मैं गांड चुदाई की शौक़ीन जरूर हूं, मगर इतनी भी नहीं। छह महीने या साल में एक बार ही मेरी गांड चुदाई होती है। ये तो आज तुम्हारा लम्बा लंड गांड में लेने का हो गया – चलो अब शुरू हो जाओ”।
“आलोक ने मेरे चूतड़ों पर एक धप्पड़ जमाते हुए कहा, “तभी मालिनी जी, रागिनी तो पंद्रह दिन में जब तक एक बार गांड ना चुदवा ले उसकी तो तसल्ली नहीं होती”।
“ये कह कर आलोक ने मेरी गांड चुदाई चालू कर दी”।
“गांड में लंड के धक्के लगाते हुए फिर जैसे आलोक अपने आप से ही बोला, “आज आएगा असली गांड चुदाई का मजा आआह। लंड और गांड दोनों की ही बढ़िया रगड़ाई होगी आज”।
“आलोक की ऐसी गांड लंड की बातें मेरे मजे को दुगना कर रही थी। दारू से दिमाग तो मेरा भी घूमा ही हुआ था। मैंने भी कहा, “आलोक रगड़-रगड़ कर फुला दे आज मेरी गांड। चल अब चुदाई की तरफ ध्यान दे, ऐसे धक्के लगा, जैसे धक्के कुत्ता कुतिया को चोदते हुए लगाता है – कुतिया की कमर पकड़ कर दीन दुनिया से बेखबर”।
“इसके बाद तो आधा घंटा आलोक ने जो मेरी गांड की रगड़ाई की वो मुझे ही पता है। मेरी चूत में रबड़ का मोटा लंड घुसा हुआ था, और गांड में आलोक का लम्बा लंड। दो बार मेरी चूत का पानी निकल चुका था, और अब हालत ये थी कि चूत में मजा आना बंद ही नहीं हो रहा था”।
“उधर आलोक मेरी गांड में लंड के धक्के लगा रहा था। उधर चूतड़ आगे-पीछे करके, चूतड़ झटका झटका कर मैं भी आलोक का लंड पूरा अंदर ले रही था”।
“आलोक के लम्बे लंड के धक्के गांड में लग रहे थे, मगर मजा चूत में आ रहा था”।
“तभी आलोक के लंड के धक्कों की स्पीड एक-दम बढ़ गयी, और साथ ही उसके बोल भी। अलोक बोल रहा था, “आआआह आआह मालिनी मेरी जान आअह मेरी जान आआआह ले निकला आअह ले निकला आआआह आआहअब निकलेगा गांड के अंदर”।
“और इसके साथ ही आलोक ने गर्म पानी का फव्वरा मेरे गांड में छोड़ दिया”।
“लम्बे लंड की ऐसी चुदाई और आलोक की वो मस्त कर देने वाली बातें – मुझे नहीं याद अब तक मेरी गांड की ऐसी चुदाई भी कभी हुई थी। गांड चुदवा कर मैं बिस्तर पर निढाल हो गयी, और मेरे साथ ही आलोक भी लेट गया”।
“रबड़ का लंड अभी भी मेरी चूत में ही था। आलोक उठा, रबड़ का लंड मेरी चूत में से बाहर निकाल कर मेरी टांगें उठा कर चौड़ी कर दी और मेरी चूत चाटने लगा”।
“जब चुदाई का मजा सर से उतरा तो आलोक बोला, “मालिनी जी गांड चुदाई का इतना मजा तो मुझे कभी भी नहीं आया”। और ये कह कर वो मेरे ऊपर ही लेट गया और मेरे होंठ जोर-जोर चूसने लगा”।
“मैंने भी आलोक को अपने होंठ चूसने से मना नहीं किया”।
कुछ देर में जब आलोक के सर से गांड चुदाई के मजे का भूत उतरा तो वो उठा और कपड़े पहन लिए। मैं भी उठी और मुंह हाथ और गांड, चूत की धुलाई करके, मेकअप ठीक कर के तैयार हो कर क्लिनिक में आ गयी”।
“मैंने प्रभा को बुलाया और कुछ ठंडा लाने के लिए बोल दिया”।
मैंने आलोक से पूछा, “आलोक रागिनी की चुदाई को तो मैं समझ सकती हूं, मुझे ये बताओ मानसी को भी तो तुम ऐसे ही चोदते होंगे”?
आलोक बोला, “जब भी मेरी और मानसी की चुदाई होती है, तो ऐसे ही चोदना पड़ता है मालिनी जी”।
“एक दिन की बात है, मानसी को चोदने का मेरा मन नहीं था तो मैंने मानसी को चोदने से मना कर दिया। खैर मालिनी जी मना करने के बावजूद भी उस दिन मानसी के कमरे में ही चुदाई तो हुई मगर बेमन की वो चुदाई लम्बी नहीं चली”।
“मानसी को चोद कर मैं अपने कमरे में आ गया। अभी मुझे बिस्तर पर लेटे हुए कुछ ही टाइम हुआ होगा कि मानसी आ गयी। बिल्कुल नंगी। मानसी दुबारा चुदाई करवाने आये थी, रगड़ाई वाली चुदाई”।
“तब मानसी की पहल से हम दोनों में दुबारा चुदाई हुई, रगड़ाई वाली चुदाई। ऐसी चुदाई से मानसी की तसल्ली हुई”।
“चुदाई करते हुए मैंने मानसी को बाहों में जकड़ा हुआ था। मानसी की छोटी-छोटी सख्त चूचियां मेरी छाती के साथ चिपकी हुई थीं। मतलब वो चुदाई पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका वाली चुदाई की तरह की चुदाई थी। शायद तभी मेरी बीस साल की बेटी ने चुदाई के बाद लंड मुंह में कर लंड को प्यार किया था और बोली थी, “थैंक यू पापा”।
“मानसी के चुदाई के बाद “थैंक यू पापा” बोलने से मैं तभी समझ गया कि मानसी को ढीली-ढाली बेमन वाली चुदाई नहीं, अच्छी खासी रगड़ाई वाली चुदाई चाहिए। उसी दिन मैंने सोच लिया कि या तो बाप बेटी में चुदाई या तो बिल्कुल नहीं होनी चाहिये, और अगर होनी है तो फिर ऐसी होनी चाहिए जैसी उस वक़्त हुई थी”।
“मालिनी जी उस दिन की जैसी चुदाई हुई थी, उस चुदाई में सब कुछ था, बस एक गंदी बकवास-बाज़ी ही नहीं थी। जबरदस्त धक्के, पूरा लंड बाहर निकाल कर झटके से चूत में डालना, सब कुछ था। उस दिन के बाद मानसी को कुछ कहने की जरूरत नहीं हुई। उस दिन के बाद हमारी चुदाई उसी तरह होती थी – रगड़ाई वाली चुदाई”।
मैंने अलोक हंस कर से पूछा, “आलोक मानसी की गांड में अपना ये डंडा तो नहीं डाला अब तक? गांड तो नहीं चोदी मानसी की अब तक”?
आलोक बोला, “नहीं मानसी जी। मानसी ने अब तक गांड चोदने के लिए तो नहीं कहा, और वैसे भी मानसी की गांड चुदाई की मेरी कोइ मंशा नहीं। मेरी तो मानसी की चूत चुदाई में ही कोई दिलचस्पी नहीं, गांड चुदाई तो दूर की बात है। मगर आप ये क्यों पूछ रही हैं”?
मैंने जवाब दिया, “आलोक भूल कर भी मानसी की गांड में अपना ये लम्बा लंड मत डालना, अगर मानसी कहे भी तब भी नहीं। लम्बा लंड चूत में उतना मजा नहीं देता, जितना गांड में देता है। अगर कहीं मानसी क गांड में तुम्हारा ये बम्बू जैसा लौड़ा एक बार चला गया, तो मानसी जोंक की तरह चिपक जाएगी और फिर मैं तो क्या कोइ भी उसे तुमसे चुदाई करवाने से रोक नहीं पायेगा”।
“आलोक ये सुन कर चुप हो कर बैठ गया”।
फिर मैंने कहा, “अच्छा एक बात बताओ अलोक, रागिनी नौ या शायद दस दिन पहले आयी थी मेरे पास, मेरे जापान जाने से पहले। रागिनी बता रही थी उसने अपनी हस्पताल की शिफ्ट दिन की करवा ही ली है। अब रागिनी रात को घर पर ही होती है। क्या इस दौरान तुम्हारी और मानसी की चुदाई हुई”?
अलोक ने कहा, “हुई तो नहीं मालिनी जी”।
मैंने फिर पुछा, “क्या उसके बर्ताव से ऐसा लगा कि उसे रागिनी की अपनी शिफ्ट बदलवाने का गुस्सा है”?
अलोक बोला, “नहीं मालिनी जी ऐसा लगा तो नहीं। मानसी तो पहले भी रागिनी के साथ कम ही बात करती थी। अब भी वैसा ही है। दोनों में कम ही बात होती है”।
मैंने फिर आलोक से कहा, “आलोक अब मेरी बात ध्यान से सुनो। रागिनी को बोलना परसों मानसी को मेरे पास लेकर आये। रागिनी को ये भी बोलना मानसी को यहां छोड़ कर चली जाए। मैं उससे अकेले में ही बात करूंगी”।
“इस बीच अगर मानसी चुदाई करवाना चाहे तो मना मत करना। मानसी को चोद देना पहले ही की तरह। एक-दम की बंद चुदाई कहीं उसे डिप्रेशन में ही ना डाल दे”।
“यह बता कर मैं चुप हो गयी। आलोक समझ गया कि मेरी और से काम पूरा हो गया था”।
“आलोक बोला, “मालिनी जी वो रबड़ का लंड कहां से मिलेगा”?
मैंने कहा, “आलोक तुम उसकी चिंता मत करो, वो तुम मुझ पर छोड़ दो। पहले मुझे मानसी से बात करने दो। मानसी से बात करने के बाद ही देखूंगी उसे ऐसी रबड़ के लंड की जरूरत है भी या नहीं। और अगर जरूरत है तो कैसे लंड की जरूरत है – कितने मोटे लंड की जरूरत है”।
“मानसी अभी छोटी है, ज्यादा मोटा लंड उसके लिए ठीक नहीं। और साथ ही ये भी देखूंगी कि मानसी को फिर सिर्फ चूत में डालने वाला लंड ही चाहिए या दूसरा वाला, गांड और चूत में डालने वाला सेक्स टॉय भी चहिये। जैसी भी उसकी जरूरत होगी तो मैं ही मंगवा दूंगी”।
आलोक ने कहा, “मालिनी जी ये महंगे तो होंगे, आप मुझे बता देना मैं पेमेंट कर दूंगा”।
मैंने हंसते हुए कहा, “उसकी भी चिंता तुम मत करो आलोक। एक बार सेक्स टॉयज आने दो फिर तुम्हें बुलाऊंगी। टॉयज भी लेते जाना और”, अलोक के लंड की तरफ इशारा करके मैंने कहा, “उनकी कीमत भी देते जाना”। ये कह कर मैं हंस दी।
आलोक चलने के लिए उठा तो मैंने उसे अपने पास बुलाया, “आलोक,जरा इधर आओ”।
“आलोक मेरे पास आ गया। मैंने उसे बाहों में लेकर आलोक के होंठ अपने होठों में ले लिए। पांच मिनट उसके होठ चूसने के बाद मैंने आलोक को छोड़ा और कहा, “आलोक बढ़िया गांड चुदाई के लिए थैंक्स”।
“आलोक ने भी पीछे हाथ करके मेरे चूतड़ दबाये और चूतड़ों की दरार में उंगली डालता हुआ बोला, “मालिनी जी मस्त टाइट गांड है आपकी। चुदाई करवाने में भी आपका कोइ मुकाबला नहीं”। ये कह कर आलोक चला गया।
“उधर मैं सोच रही थी संदीप सोलंकी से बात करती हूं। अब गांड में लेने के लिए आठ इंच लम्बा रबड़ का लंड मगवाना ही पड़ेगा”।
“आलोक के जाने के बाद मैंने सोचना शुरू किया कि अपने से तीस-बत्तीस साल छोटी मानसी से लंड चूत गांड वाली भाषा में कैसे बात करूंगी, और इस तरह खुल कर बात किये बिना बात भी बनने वाली नहीं थी। फिर मैंने सोचा, आने देते हैं मानसी को, फिर जैसा मौक़ा और माहौल बनेगा, वैसी ही बात कर लूंगी”।
— मानसी की मुलाक़ात डाक्टर मालिनी के साथ।
“दो दिन बाद रागिनी अपनी बेटी मानसी को ले कर आ गयी”।
“रागिनी से कोइ एक इंच लम्बी बेहद खूबसूरत मानसी बिल्कुल रागिनी पर गयी थी। साथ-साथ खड़ी दोनों बहनें ही लग रही थी”।
“रागिनी ने मुझे नमस्ते की मगर मानसी की नमस्ते करने से पहले ही हंसी छूट गयी”।
“मानसी बहुत हंसमुख लड़की थी, हमेशा हंसने वाली। मानसी के चेहरे की चमक से लग रहा था कि मानसी चुदाई करवाती तो है, मगर चुदक्कड़ नहीं है”।
“हमेशा चुदाई के चक्कर में रहने वाली चुदक्कड़ औरतों के चेहरे पर ऐसी चमक, ऐसा गुलाबीपन नहीं होता, जैसा मानसी के चेहरे पर था, मगर रागिनी के चेहरे पर नहीं था”।
“नमस्ते-नमस्ते के बाद रागिनी मानसी से बोली, “मानसी ये मालिनी जी हैं। कभी जीवन ज्योति में थी। आजकल जीवन ज्योति की कंसलटेंट – सलाहकार हैं। मालिनी जी तुमसे अकेले में कुछ बात करना चाहती हैं”।
“फिर रागिनी मेरी तरफ देख बोली, “अच्छा तो मालिनी जी मैं चलती हूं। आप अपना समय लीजिये। मानसी मेरे साथ आयी है, यहां का काम पूरा होने पर मानसी खुद ऑटो या टैक्सी करके चली जाएगी”।
“मैंने कहा, “उसकी चिंता मत करो रागिनी, मेरा ड्राइवर शंकर इसे छोड़ आएगा”।
“रागिनी चली गई। मानसी मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गयी। मैंने मानसी से पूछा, “कैसी हो मानसी”?
मानसी ने फिर से हंसते हुए जवाब दिया, “मैं ठीक हूं आंटी”।
फिर मैंने मानसी से कहा, “मानसी मैं तुम्हे अपने बारे में और अपने काम के बारे में बता दूं। पहले ये बताओ क्या पियोगी, चाय, कॉफी या कुछ और”?
मानसी बोली, “कॉफी ही पी लूंगी आंटी”।
“मैंने फोन करके प्रभा को कॉफी लाने के लिए बोल दिया”।
कॉफी पीती हुई मानसी से मैंने कहा, “मानसी बेटा, मैं एक साइकैट्रिस्ट हूं मनोचिकित्सक मेरे नाम के आगे डॉक्टर जरूर लगा हुआ है लेकिन मैं किसी भी तरह की शारीरिक या मानसिक बीमारी का इलाज नहीं करती। एक मनोचिकित्सक को बातों से लोगों के विचार को गहराई से जानने के लिए ट्रेंड किया जाता है”।
“कई बार लोग हमारे पास आते हैं अपनी समस्याएं बताते हैं, और उनका हल हमसे पूछते हैं। हैरानी की बात ये होती है उनकी समस्या का कारण उनको खुद समझ में नहीं आता। मगर एक मनोचकित्सक को बातों से ही उनकी समस्या का करण समझ आ जाता है”।
ये कह कर मैंने मानसी की तरफ देखा और हंसते पूछा, “मानसी मैंने कुछ मुश्किल तरीके से तो अपने बारे में नहीं बताया”?
मानसी हंसी और बोली, “नहीं आंटी, मैं ये जानती हूं। ये भी जानती हूं कि आप मम्मी को बहुत पहले से जानती हैं। आप मम्मी और पापा से मिल चुकी हैं। मम्मी जान-बूझ कर मुझे आप के पास अकेला छोड़ कर गयी है, ताकि आप मुझसे खुल कर बात कर सकें”।
मैंने कहा, “अच्छा मानसी ये बताओ, अब जब कि तुम ये कह रही हो तुम्हारे मम्मी तुम्हें यहां मेरे पास क्यों लेकर आये है, तो एक बात का जवाब और दो – मगर पूरी सच्चाई के साथ”।
“मानसी खुल कर हंसते हुए , “आंटी मैं सब कुछ सच ही बताऊंगी। मझे ना कुछ छुपाने के जरूरत है ना झूट बोलने की। मुझे पता है मैं जो कर रही हूं वो कुछ लोगों के लिए गलत हो सकता है, मगर मैं तो उसे गलत नहीं समझती। अब पूछिए क्या पूछना है”?
“मैंने मानसी की साफ़ बातें सुन कर अच्छा लगा। ऐसे लोगों की मानसिक समस्याएं सुलझाना एक चैलेंज होता है। सालों बाद मुझे ये चैलेंज मिला था। मुझे अफ़सोस हुआ कि जापान जाने से पहले मेरी मानसी से बात क्यों नहीं हुई”।
“मानसी हंसमुख और खुले स्वभाव से मुझे ये भी समझ आ गया कि मानसी से बात करने में कोइ मुश्किल पेश नहीं आने वाली। मैंने मानसी को भी बता दिया कि मैं सारी बात-चीत रिकार्ड करती हूं और एक बार समस्या का समाधान निकल जाए तो टेप वापस कर देती हूं”।
“मेरी बातें सुन कर मनसी बोली, “मुझे ये सब मालूम है आंटी, आप पूछिए जो भी पूछना है”।
मैंने टेप रिकार्डर का रिमोट हाथ में लेते हुए मानसी से कहा, “एक बात और मानसी, जो भी बात करना साफ़-साफ़ शब्दों में करना। ढके छुपे शब्दों से बात करने से कई बार बातों का कुछ अलग मतलब भी निकल जाता है। समझ गयी”।
मानसी जोर से हंसी और बोली, “आंटी आपका मतलब लंड, चूत, चुदाई, सब साफ़-साफ़ बोलूं”?
“और इससे से पहले कि मैं मानसी की इस बात का जवाब देती, मानसी ही बोल पड़ी, “आंटी मैं सब कुछ साफ़-साफ़ ही बोलूंगी। मम्मी तो मुझे आपके पास लाई ही इस लिए है कि मेरी और पापा के बीच जो चुदाई होती है वो आप किसी तरह बंद करवा दें। अब आपसे क्या छुपाना और कैसा शर्माना”।
“कहां तो मैं सोच रही थी कि अपने से इतनी छोटी मानसी से कैसे साफ़-साफ़ बात करूंगी। मगर यहां तो मानसी ने लंड चूत चुदाई जैसे शब्द बोल कर मेरी समस्या ही हल के दी। सुन्दर होने के साथ-साथ मानसी समझदार भी थी”।
“मानसी अपनी बात बताने के लिए तैयार थी। मैंने टेप रिकार्डर तैयार किया और मानसी को बोला, “हां तो मानसी शुरू से शुरू हो जाओ।
मैंने क्लिक की एक आवाज के साथ टेप रिकार्डर चालू कर दिया।
उधर मानसी भी शुरू हो गई, “आंटी शुरू करते हैं”।
“ये सब शुरू हुआ जब मैं छोटी थी। मैंने जब से होश संभाला मैं अपनी दादी जी के साथ ही सोती थी। दादी जी के गुजर जाने के बाद मैं मम्मी-पापा के कमरे में उनके साथ ही सोने लगी। उधर मम्मी ने हस्पताल में अपनी शिफ्ट बदलवा कर रात की शिफ्ट करवा ली, जिससे वो दिन भर घर में रहे और मैं अकेली ना रहूं”।
“वक़्त गुजर रहा था। मैं भी बड़ी हो रही थी। मेरे शरीर में बदलाव आ रहे थे। मेरी चूचियां बड़ी हो रही थी। मेरे चूतड़ों पर मांस चढ़ रहा था और चूत के आस-पास बारीक-बारीक भूरे बाल आने लग गए थे”।
“सोती मैं पापा के साथ ही थी। पापा गहरी नींद में सोये होते और मैं पापा के साथ लेटे-लेटे पापा के शरीर के साथ अपनी चूचियां रगड़ती रहती ही। कई बार मैंने तो पापा के लंड को भी छू लिया और पापा को पता भी नहीं चला। आंटी मुझे ये सब करके बड़ा ही अच्छा लगता था”।
“एक रात को जब मैंने अपना हाथ पापा के लंड पर रखा तो मुझे लगा पापा का लंड बाकी दिनों से कुछ ज्यादा ही लम्बा था”।
“पता नहीं मुझे क्या हुआ मैंने पापा का लंड पायजामे के ऊपर से हाथ में ही पकड़ लिया। पापा की नींद तो नहीं खुली, मगर पापा का लंड सख्त होना शुरू हो गया। मैं पापा का लंड हाथ से दबाने लगी। और तभी पापा की नींद खुल गयी”।
“पापा ने मेरा हाथ अपने लंड से हटाने की कोशिश की तो मैंने पापा का हाथ ही झटक दिया”।
“पापा का लंड मेरे हाथ पूरी तरह सख्त हो चुका था। मेरे हाथ में पापा का लंड इतना बड़ा हो चुका था कि लंड के साइज़ से मुझे हैरानी सी हो रही थी। मैं सोच रही थी कि क्या लंड इतना बड़ा भी होता है”?
“तभी पापा ने मेरे हाथ से लंड छुड़ाया और थोड़ा गुस्से से कहा, “मानसी ये क्या कर रही हो? हटाओ अपना हाथ – छोड़ो इसे”।
“पापा के लंड को हाथ में लेकर मुझे अच्छा लग रहा था। मैंने हाथ हटाने के बजाए पापा से कहा, “पापा पकड़ने दो ना, अच्छा लगता है”।
“पापा ने मेरे हाथ से जबरदस्ती लंड छुड़ा कर कहा, “मानसी ये अच्छी बात नहीं बेटा”।
“मैं कुछ नहीं बोली और लंड छोड़ कर चुप-चाप दूसरी तरफ मुंह करके सो गयी। अगली रात जब मैं पापा के साथ सोने के लिए गयी, तो पापा ने मुझसे कहा ,”मानसी अब तुम बड़ी हो गयी हो, मैं फोल्डिंग ला देता हूं उस पर सो जाओ”।
“मैं कुछ नहीं बोली। पापा ने फोल्डिंग बेड बिछा दिया और मैं फोल्डिंग पर सोने लगी। रात को कभी-कभी जब मन करता तो मैं पापा के साथ सोने चले जाती। ऐसे ही चलता रहा।
— मानसी ने बताया मालिनी को कैसे उसने लिया पहला मजा चूत में उंगली करके।
“मुझे माहवारी शुरू हुए भी दो साल हो चुके थे। चूत में भी कभी-कभी अजीब से खुजली होने लगी थी। नहाते वक़्त जब चूत साफ़ करती तो मन करता चूत में उंगली करके चूत को रगड़ती ही जाऊं। चूत में उंगली करते-करते कई बार पापा का लंड हाथ में लेने का मन करता था”।
“एक रात चूत में बड़ी ही अजीब सी खुजली मची। मन किया कि जोर-जोर से चूत रगडूं I मैं उठी और जा कर पापा के साथ लेट गयी”।
“पापा रोज रात को ड्रिंक करके सोते हैं। उस रात भी ड्रिंक की होगी। पापा गहरी नींद में थे। पापा और मैं करवट से लेटे हुए थे। मेरा और पापा का मुंह आमने-सामने था। मैंने अपने पायजामे का नाड़ा खोला और अपनी उंगली अपनी चूत दाने पर रगड़ने लगी”।
“फिर ना जाने क्या हुआ मैंने पापा का हाथ पकड़ा और पकड़ कर अपनी चूत पर धीरे-धीरे रगड़ने लगी”।
“मेरे चूत में जल्दी ही कुछ-कुछ होने लगा। मैंने पापा का हाथ जोर-जोर से ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया”।
“कुछ देर मैं पापा का हाथ अपनी चूत पर रगड़ती रही, मगर पापा सोये ही रहे। जैसे ही मैंने पापा का हाथ कुछ ज्यादा ही जोर से अपनी चूत पर रगड़ना शुरू किया, तो अचानक पापा की नींद खुल गयी और वो बोले, “क्या बात है मानसी, क्या कर रही हो? नींद नहीं आ रही क्या”?
“मैं कुछ नहीं बोली और पापा का हाथ अपनी चूत पर जोर-जोर से रगड़ने लगी। पापा ने हाथ झटके से हटाया तो मैंने पापा का हाथ अपनी चूत पर दबा दिया। इसी कश्मकश के चलते मेरा दूसरा हाथ पापा के लंड पर आ गया”।
“मैंने एक हाथ से पापा का लंड कस कर पकड़ लिया और दूसरे हाथ से अपनी चूत जोर-जोर से रगड़ने लगी। उधर पापा का लंड मोटा होना शुरू हो गया। मुझे मजा सा आ रहा था और मुंह से हल्की-हल्की आवाजें निकल रही थी, जैसे चूत में कुछ कुछ होने लगा था। मेरी चूत में से कुछ लेसदार पानी भी निकल रहा था”।
“फिर पता नहीं क्या हुआ कि अपने आप ही मेरे मुंह से आह आह की आवाजें सी निकलनी शुरू हो गयी। मुझे चूत में कुछ अजीब सा लग रहा था और मुझे मजा भी बहुत आ रहा था”।
“पापा उसके बाद चुप-चाप लेटे रहे और मैं एक हाथ में पापा का लंड पकड़े, पापा का दूसरा हाथ अपने चूत पर रगड़ती रही”।
“तभी मुझे लगा मुझे कुछ हो रहा था। मेरी आखें अपने आप बंद हो गयी। मेरा शरीर अकड़ने लगा। मेरी चूत में अजीब सा कुछ होने लगा”।
“मैंने पापा का हाथ जोर-जोर से अपनी चूत पर ऊपर-नीचे करने लगी। दूसरे हाथ से मैंने पापा का लंड कस कर पकड़ लिया, और तभी मुझे लगा मैं हवा में थी, और मुझे मजा आ गया। जन्नत का मजा। मेरी जिंदगी का पहला मजा – मेरी चूत पानी छोड़ गयी थी। एक ही मिनट में मैं ढीली हो कर लेट गयी और फिर मैंने पापा का लंड भी छोड़ दिया”।
“कुछ देर के बाद मैं उठी और जाके फोल्डिंग पर जा कर सो गयी। अगले दिन जब मैं पापा के कमरे में फोल्डिंग बिछाने लगी तो पापा ने कह दिया, “मानसी, अब तुम छोटी नहीं, दूसरे कमरे में सो जाओ”।
“मैं कुछ नहीं बोली और दूसरे कमरे में सोने चली गयी। इसके बाद ये हुआ कि जब भी कभी चूत में कुछ-कुछ होता, तो मैं उंगली चूत रगड़ कर मजा ले लेती, मगर मुझे हमेशा लगता कि मेरे दूसरे हाथ में पापा का लंड है – सख्त और मोटा लंड”।
“आंटी सच बताऊं, चूत में उंगली करते हुए पता मेरा मन करता था कि काश पापा का लंड मेरे हाथ में होता”।
“वक़्त और गुजर गया। मैं बीस की होने वाली थी कॉलेज जाने लगी और साथ CA की पढ़ाई करने लगी थी”।
“एक रात मैं टॉयलेट जाने के लिए उठी तो देखा पापा के कमरे का दरवाजा खुला था। पापा अपने मोबाइल पर कुछ देख रहे थे। पापा ने पायजामे के ऊपर से ही अपना लंड पकड़ा हुआ था और लंड को कुछ कुछ कर रहे थे। मेरा मन हुआ कि जा कर पापा का लंड अपने हाथ में ले लूं। मैं कमरे में गयी और पापा के पास बैठ गयी”।
“पापा ने लंड छोड़ दिया और बोले, “क्या बात है मानसी। कुछ काम है क्या”?
“मैं कुछ देर ऐसे ही पापा के पास बैठी रही और फिर बोली, “पापा क्या बात है आप सोये नहीं? नींद नहीं आ रही? मम्मी की याद आ रही है क्या? मम्मी भी आपका ध्यान नहीं रखती” I
“मेरे ये कहने पर पापा हड़बड़ा कर बोले, “ऐसी बात तो नहीं मानसी। तुमसे किसने कहा वो मेरा ध्यान नहीं रखती”? मैंने चुप-चाप अपना हाथ पापा के पेट पर रखा और हाथ थोड़ा सा नीचे किया – लंड से सिर्फ दो इंच कि दूरी पर और बोली, “पाप मैं बीस साल कि हूं अब। आप कहो तो मैं आपका ध्यान रख दिया करुं मम्मी की तरह”।
“पापा ने मेरा हाथ अपने पेट से हटाया और बोले, “मानसी ये तुम क्या कह रही हो? रागिनी की तरह तुम मेरा ध्यान रखोगी? क्या मतलब है तुम्हारा”?
“पापा फिर कुछ चुप हुए और बोले, “मानसी ये बात समझ लो, ये कभी नहीं हो सकता, ऐसा कभी सोचना भी मत। तुम्हारी मम्मी हो सकता है मेरा पहले जैसा ध्यान ना रख पाती हो जितना पहले रखती थी। मगर मानसी इससे मुझे कोइ शिकायत नहीं। वक़्त के साथ-साथ हालात और जरूरतें बदलती रहती हैं। जाओ और अपने कमरे में जा कर सो जाओ”।
“मैं उठी और अपने कमरे में चली गयी” I
“इसके बाद मैं रातों को पापा को छुप-छुप कर देखने लगी कि देखूं आज पापा क्या कर रहे हैं I
“कई रातें ऐसी ही गुजर गयी। रातों में मैं उठ कर चुपके-चुपके पापा के कमरे में झांकने लगी ये देखने के लिए कि पापा अपने लंड के साथ कुछ कर तो नहीं रहे”?
“ऐसे ही एक रात को मैं चुपके से पापा को देखने गयी तो जो मैंने देखा, उसे देख कर मेरी चूत में से फर्रर्र से पानी निकला और चूत में कुछ-कुछ होने लगा”।
– जब मानसी ने आलोक को मुट्ठ मारते देखा।
मानसी बता रही थी, “पापा लेटे हुए थे और पापा का लम्बा सारा लंड पापा के हाथ में था और पापा लंड को जोर-जोर आगे-पीछे कर रहे थे। पापा कुछ-कुछ बोल भी रहे थे, जो मुझे सुनाई नहीं दे रहा था। एकाएक पापा का हाथ लंड पर जोर-जोर से आगे-पीछे होने लगा। पापा की आवाज ऊंची हो गयी। पापा आआआह… रागिनी… आअह…रागिनी… आआह… रागिनी… मेरी रागिनी बोल रहे थे”।
“पापा जरूर मम्मी का ध्यान कर के मुट्ठ मार रहे थे। मेरा हाथ अपनी चूत पर पहुंच गया और मैं पायजामे के ऊपर से ही अपनी चूत रगड़ने लगी”।
“तभी पापा जोर-जोर से कमर ऊपर-नीचे करने लगे। तभी अचानक पापा जोर से बोले आअह रागिनी। पापा ने जोर से कमर हिलाई और पापा के लंड में से ढेर सारा कुछ सफ़ेद-सफ़ेद सा निकला और पापा के हाथ से होता हुआ पापा के लंड के आस पास फ़ैल गया”।
“मैं वहीं जड़ हो गयी थी और अपने चूत जोर-जोर से रगड़ रही थी। पापा अब निढाल से थके हुए लेटे हुए थे। पापा ने पास ही रखा हुआ तौलिया उठाया, और हाथ और लंड साफ़ कर लिया। तौलिया पास रखने का मतलब था पापा का उस दिन मुट्ठ मारने का पहले से ही मन बना हुआ था। पापा ने पूरी तैयारी करने के बाद ही मुट्ठ मारी थी”।
“लंड साफ़ करके पापा उठने लगे तो मैं भाग कर अपने कमरे में चली गयी। बिस्तर पर लेट कर मैंने पायजामा उतारा और अपनी चूत रगड़ने लगी। मेरी आखों के आगे पापा का लम्बा लंड घूम रहा था”।
“मैंने रगड़-रगड़ कर अपनी चूत का पानी छुड़ा दिया। जैसे ही मेरी चूत का पानी छूटा, मेरी आंखों के आगे पापा के लंड से निकलता सफ़ेद-सफ़ेद पानी घूम गया। मुझे लगा वो सफ़ेद पानी पाप के लंड पर नहीं मेरी चूत पर गिरा था”।
“इसके बाद जब भी मैं अपनी चूत का पानी छुड़ाती, मुझे जब भी मजा आता पापा के लंड से निकलता सफ़ेद पानी भी साथ ही दिखाई देता। ऐसा लगता जैसे मेरी चूत का पानी और पापा के लंड से सफ़ेद पानी इकट्ठे निकल रहे हों। मुझे लगता पापा के लंड का पानी मेरी चूत पर फ़ैल गया है”।
“और इसके दो तीन महीने के बाद ही मेरी चुदाई हो गयी, मेरी जिंदगी की पहली चुदाई। वो चुदाई जिसमें मेरी चूत की सील भी फटी और चूत में से खून भी निकला”।
“इसके बाद मानसी ने मुझे उसकी और प्रभात की चुदाई के बारे में सब कुछ बता दिया”।
“मैंने मानसी से पूछा, “मानसी इस पहली चुदाई से पहले क्या तुम्हारी किसी लड़के के साथ इस तरह की दोस्ती थी”?
मानसी बोली, “नहीं आंटी, मेरी इस तरह की दोस्ती किसी भी लड़के साथ नहीं थी। मेरी तो उस लड़के के साथ भी दोस्ती नहीं थी जिसके साथ मेरी पहली चुदाई हो गयी। असल में आंटी कालेज में मेरे साथ ही एक लड़की पढ़ती है स्नेहा। मेरी अच्छी सहेली भी है, और मेरी ही तरह CA कर रही है। स्नेहा मुझे अपनी सारी बातें बताती है”।
“स्नेहा का एक बॉयफ्रेंड है प्रभात। स्नेहा ने मुझे ये भी बताया था कि प्रभात उसे चोदता था I दरअसल स्नेहा के मम्मी पापा हर महीने दो दिनों के लिए इलाहाबाद जाते हैं संगम में स्नान करने। सुबह-सुबह वाली गाड़ी से चले जाते है, और अगले दिन रात को आते हैं।
“इन्हीं दो दिनों में कभी-कभी उनका चुदाई का प्रोग्राम बन जाता है और प्रभात स्नेहा के घर जा कर ही उसकी चुदाई करता है। ऐसे ही एक दिन जब मैं स्नेहा के घर चली गयी तो देखा स्नेहा के मम्मी पापा इलाहाबाद गए हुए थे। मुझे इस बात का ध्यान ही नहीं था स्नेहा के मम्मी पापा घर पर नहीं हैं”।
“मैं स्नेहा के घर पहुंची तो देखा प्रभात आया हुआ था। मुझे कुछ बुरा सा लगा। मैं तो जानती ही थी कि प्रभात वहां स्नेहा को चोदने आया था। अब उस वक़्त या तो स्नेहा की चुदाई कर चुका था, या फिर करने वाला था”।
“में प्रभात और स्नेहा की मस्ती में बीच का बिच्छू नहीं बनना चाहती थी। मैंने स्नेहा को कहा, “स्नेहा, मैं चलती हूं”।
“स्नेहा बोली, अरे मानसी तू बैठ, प्रभात अभी चला जाएगा”।
“मैं सोफे पर बैठ गयी। प्रभात और स्नेहा आपस में मस्ती कर रहे थे। जिस तरीके से वो दोनों एक-दूसरे को छू रहे थे, मुझसे तो उनकी तरफ देखा भी नहीं जा रहा था। मुझे बड़ी ही शर्म आ रही थी। तभी दोनों ने कुछ इशारा सा किया और स्नेहा मुझसे बोली, “मानसी तुम बैठो, हम अभी आते हैं”। ये बोल कर दोनों उठे और साथ लगते कमरे में चले गए और दरवाजा बंद कर लिया। उनका ऐसा करना मुझे बड़ा अजीब सा लगा”।
“कुछ ही देर में कमरे में से आआह … आआह… उन्ह… उन्ह की अजीब-अजीब आवाजें आने लग गयी। साफ़ लग रहा था वो दोनों चुदाई कर रहे थे। थोड़ी ही देर में आवाजें और ऊंची हो गयी। मेरी अपनी चूत में कुछ-कुछ होने लगा। मुझे लगा मेरी चूत गीली-गीली सी हो रही थी”।
“मैंने सलवार के अंदर हाथ डाल कर चूत में उंगली करनी शुरू कर दी, और मजा लेने लगी। कुछ देर कमरे में से वैसी ही आवाजें आती रही। फिर एक-दम से आवाजें आनी बंद हो गयी। लग रहा उनकी चुदाई खत्म हो चुकी थी”।
“कुछ देर बाद दरवाजा खुला और दोनों कमरे में आ गए। मेरा हाथ तब भी सलवार के अंदर ही था”।
“स्नेहा ने ये देखा तो बोली, मानसी ये क्या कर रही हो? चूत में उंगली कर रखी है क्या? चुदाई का मन हो रहा है क्या”?
“मैं चुप रही मगर मैंने अपना हाथ अपनी सलवार में से नहीं निकाला। सच पूछो तो आंटी चुदाई का मन तो मेरा हो ही रहा था”।
“स्नेहा मेरे पास आ गयी और बोली, “मानसी बोलो, क्या चुदाई करवानी है”?
“मैं जब फिर भी चुप रही तो स्नेहा ने प्रभात को कहा, “प्रभात मानसी को ले जाओ। मानसी को भी चुदाई का मजा लेना है”।
“प्रभात का मेरे साथ ऐसा कोइ चक्कर ही नहीं था। हमने कभी एक-दूसरे को इस तरह से देखा ही नहीं था। स्नेहा के कहने पर भी प्रभात अपनी जगह से नहीं हिला”।
“फिर स्नेहा ने प्रभात का हाथ पकड़ा और मेरे पास खींच कर ले आयी और बोली, “प्रभात देख नहीं रहे मानसी की चूत कुछ मांग रही है, ले जाओ और चुदाई करके इसकी भी चूत का पानी निकालो”।
“इस पर प्रभात ने मुझे उठाया, स्नेहा के सामने ही मेरी चूचियां जोर से दबायी, और होठों पर एक किस किया, और मुझे उस दुसरे कमरे में ले जाने लगा”।
“मेरे पैर मेरा साथ नहीं दे रही थे, और मैं प्रभात के साथ खिचती चली जा रही थी। स्नेहा पीछे से बोली, “आराम से करना प्रभात, मानसी कुंवारी है – मानसी की चूत की सील अभी नहीं फटी।
“प्रभात मुझे कमरे में ले गया, और मेरे कपड़े उतार कर खुद भी नंगा हो गया। प्रभात का लंड खड़ा था। प्रभात ने अपना लंड मेरे हाथ में पकड़ा दिया। मुझे प्रभात का खड़ा लंड पकड़ कर बड़ा ही अच्छा लग रहा था”।
“कुछ देर हम ऐसे खड़े रहे। प्रभात मेरी चूचियां दबाता रहा और मैं प्रभात के लंड के साथ कुछ-कुछ करती रही”।
“प्रभात ने मुझे बेड पर बिठाया, और लंड मेरे मुंह के सामने कर दिया। जब मैंने लंड को कुछ नहीं किया तो प्रभात ने अपना लंड मेरे होठों पर फेरना शुरू कर दिया और बोला, “मुंह में लो मानसी चूसो इसे। प्रभात का लंड मुंह में लेने के ख्याल से ही मुझे तो उल्टी होने को हो गई। मैंने प्रभात के लंड को पकड़ जरूर लिया, मगर मुंह में नहीं लिया”।
प्रभात ने कहा दुबारा कहा, “मुंह में लो मानसी चूसो इसे, बड़ा मजा आएगा”।
