मैं हूं 52 साल की मालिनी अवस्थी, कानपुर निवासी।
52 तो कहने की बात है, अपनी संतुलित दिनचर्या और ठीक खानपान के कारण मैं 35 से ज्यादा की नहीं लगती।
वैसे जहां तक मेरी आदतों का सवाल है, आदतें तो मेरी 25 वाली हैं। चूत चटवाना, चुदवाना। ये सब काम तो कोई 25 वाली भी क्या करती होगी, जैसे मैं करती हूं।
पेशे से मैं डाक्टर हूं, एक साइकाइट्रिस्ट। साइकाइट्रिस्ट थोड़ा मुश्किल सा शब्द है। सीधी देसी भाषा में बोला जाए तो मनोचिकित्सक। मनोचिकित्स्क मानसिक रोगों यानि दिमाग़ी बीमारियों का इलाज करते हैं। यहां मैं एक बात और बताना भी जरूरी समझती हूं, और वो ये है कि मनोचिकित्स्क अपने मरीजों का इलाज दवाईयों से नहीं बातों से करते हैं।
वैसे मेरी आप सब से मुलाक़ात पहले भी हो चुकी है, जब मैं लखनऊ गयी थी एक सेमीनार के सिलसिले में। लखनऊ में मैं अपने एक महिला मित्र डाक्टर कृष्णा सोबती के घर पर रुकी थी।
कृष्णा के क्लिनिक में ही मुझे एक गांडू युग त्रिपाठी की नयी ब्याही पत्नी चित्रा की समस्या सुलझाने का मौक़ा मिला था (“अजब गांडू की गजब कहानी” पढ़ें)।
औसत से छोटे लंड वाला गांडू युग त्रिपाठी अपनी पत्नी चित्रा की सही चुदाई नहीं कर पा रहा था, और इसी सिलसिले में मुझे गांडू युग त्रिपाठी की पत्नी चित्रा से मिलने और बात करने का मौक़ा मिला था।
मेरे बात करने के बाद चित्रा की चाची सुभद्रा (जो चित्रा के पति युग की बुआ भी थी ) की रजामंदी से चित्रा की चुदाई उसके ससुर देसराज त्रिपाठी के साथ शुरू हो गयी। कुछ दिनों के बाद चित्रा युग के दोस्त राज से भी चुदाई करवाने लग गयी।
कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा। वक़्त गुजरने के साथ युग भी अब ठीक हो गया, और चित्रा की चुदाई करने लग गया। फिर मुझे पता चला कि युग तो चित्रा को अब चोदता ही है, चित्रा अपने ससुर और युग के दोस्त राज से भी चुदाई करवाती है। अब चित्रा, चित्रा का पति युग, चित्रा के ससुर देस राज और युग का दोस्त राज, सब अपनी-अपनी जगह खुश हैं।
खैर ये तो हुई हमारी लखनऊ की मुलाक़ात की बात।
अब बात करते हैं यहां की, कानपुर की। कानपुर के सब से मंहगे इलाकों में से एक सिविल एवेन्यू में मेरा घर हुए मनोचिकित्सा का क्लिनिक है। सिविल एवेन्यू के मेरे इस दुमंजिले घर में नीचे की मंजिल में पांच कमरे हैं जिनमें दो कमरों में मेरा क्लिनिक है।
मेरे इस क्लिनिक में मेज कुर्सियों के आलावा एक बड़ा टेप रिकॉर्डर है, जिसमें एक बार एक से ज्यादा कैसेट एक बार में चलाने की व्यवस्था है। मेरे पास जो टेप रिकार्डर है उसमें एक बार में चार कैसेट चल सकते हैं। इस क्लिनिक के आगे के कमरे का दरवाजा बाहर की तरफ खुलता है, जहां से सलाह लेने वाले लोग आते हैं ।
क्लिनिक वाले इस कमरे के साथ लगता एक और कमरा है जिसके एक कोने में एक बेड लगा हुआ है। आटोमेटिक बेड, बिजली से ऊपर-नीचे होने वाला बेड। ये बेड मरीज के मुआइने के लिए इस्तेमाल होता है।
क्लिनिक वाले इस कमरे के दो दरवाजे हैं जो पीछे की तरफ खुलते हैं । एक दरवाजा एक कमरे में खुलता है जो गेस्ट रूम की तरह इस्तेमाल होता है। इस गेस्ट रूम में और भी कई काम होते हैं। मेरे खास, निजी काम।
इस कमरे का दूसरा दरवाजा एक दूसरे कमरे में खुलता है जिसमें कसरत करने मशीनें लगी हुई हैं, मतलब इसमें एक छोटा सा जिम है । इसी नीचे की मंजिल में एक पैंट्री- रसोई भंडार घर है जिसमें चाय नाश्ते का जुगाड़ रहता है। मेरी बाकी की रिहाइश, मेरा बेड रूम, ड्राइंग रूम, रसोई घर, सब इस घर की ऊपर की मंजिल पर हैं।
घर में मेरे अलावा अक्सर तीन लोग और होते हैं। छियालीस साल की प्रभा मेरी काम वाली। साफ़ सुथरी, कम बोलने वाली प्रभा विधवा है। कई सालों से मेरे पास है और अब यही उसका घर है। ऊपर की मंजिल में अलग से एक कमरा उसके लिए है।
प्रभा के एक बेटा एक बेटी हैं। दोनों शादी शुदा हैं। तीज त्योहार पर उसकी मां प्रभा का हल चाल पूछने आते हैं। प्रभा कभी उनके यहां नहीं जाती। एक सिक्योरिटी गार्ड है, जो किसी एजेंसी की तरफ से आता है और एक अड़तीस चालीस साल का शंकर है – मेरा ड्राइवर।
गाड़ी में मेरे साथ शंकर का मुश्किल से पूरे दिन में कहीं बाहर का एक आध ही चक्कर लगता है। बाकी का वक़्त शंकर दूसरे काम, जैसे बाजार से कुछ लाना हो या बिजली, पानी का बिल जमा करवाना हो, बैंक का छोटा-मोटा काम हो, ये सारे काम करता है। बाकी बचे टाइम में शंकर हथेली पर तम्बाकू रगड़ता रहता है और सिक्योरिटी गार्ड के साथ गप्पे हांकता रहता है।
एक सफल मनोचिकिस्तक बनना आसान नहीं। इसके लिए पढ़ाई और मेहनत दोनों बहुत करनी पड़ती हैं। पहले पांच साल डाक्टरी की पढ़ाई यानि MBBS, फिर दो साल मनोचकिस्तक का कोर्स और उसके बाद एक सफल तजुर्बेकार मनोचिकिस्तक के पास एक साल की ट्रेनिंग। कुल मिला कर हुए ये हुए आठ साल।
मैंने अब तक शादी नहीं की। अब सीधी सी बात है – आठ साल की पढ़ाई कम नहीं होती। अब इस सब के बीच कोइ पढ़ाई की सोचे या चुदाई की सोचे। वैसे भी मेरी अपनी सोच है कि शादी निक्क्में, चूतिये किस्म लोग करते हैं जिनको एक खूंटे से बंध कर रहना पसंद आता है। मैं उनमें से नहीं हूं। मुझे एक आज़ाद पंछी की तरह ज़िंदगी गुज़ारने में ही आनंद आता रहा है।
मैं बड़े-बड़े नामी गिरामी हस्पतालों में बतौर मनोचिकिस्तक काम कर चुकी हूं। नाम और पैसा दोनों बनाये हैं। अब हस्पतालों में काम करने की आवश्यकता नहीं, घर में ही मनोचिकित्सा का क्लिनिक चलाती हूं जिसके बारे में मैं ऊपर बता चुकी हूं।
ये क्लिनिक चलाने के अलावा अब मैं मनोचिकिस्ता की सलाहकार भी हूं जिसे अंगरेजी में कंसल्टेंट कहते हैं । बड़ी-बड़ी स्वयंसेवी संस्थाएं जिन्हे अंग्रेजी मैं NGO कहा जाता है, और बड़े-बड़े हस्पताल मुझे मनोचिकित्सा के विषय पर लेक्चर देने के लिए बुलाते हैं। इस तरह के एक दिन के लेक्चर या भाषण का मैं पंद्रह से बीस हजार रुपया लेती हूं।
कई बार ऐसे भाषणों के सिलसिले में कानपुर से बाहर शहरों में भी जाना पड़ता है, जैसे दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी, आगरा, इलाहाबाद, बंगलुरु या मुंबई I ऐसे शहरों में व्याख्यानों के लिए बुलाये जाने पर मेरा आना-जाना और ठहरना अव्वल दर्जे का होता है ।
मनोचिकिस्ता विषय पर मैंने कुछ पुस्तकें भी लिखी हैं। कहने का मतलब ये है कि ज़िंदगी बढ़िया चल रही है। पैसे की कोइ चिंता नहीं है।
मैं उत्तर प्रदेश की कई NGO के साथ जुड़ी हुई हूं। ये संस्थाएं जो उन लोगों की मदद करती है जो मानसिक तौर पर परेशानी का सामना कर रहे होते हैं। कभी-कभी ये NGO ऐसे मानसिक रोगियों को इलाज के लिए मेरे पास भी भेज देते हैं।
कई बार जब दूसरे शहरों में लेक्चर के लिए जाती हूं तो ये NGO मुझे अपने मरीजों के बारे में बात करने और उनकी मदद करने के लिए भी बुला लेते हैं। गांडू युग त्रिपाठी की पत्नी चित्रा से मुलाक़ात भी ऐसे ही हुई थी जब मैं लखनऊ मनोचिकित्सा विषय पर एक लेक्चर देने के लिए गए थी।
NGO द्वारा भेजे इस तरह के मानसिक रोगियों का इलाज करने का मैं कोइ पैसा नहीं लेती। मेरा ये काम धर्मार्थ होता है। आखिर मुझे अपना परलोक भी तो संवारना है।
ये तो हो गयी मेरे कारोबार की जानकारी। अब क्यूंकि मेरे पास खाली समय बहुत होता है तो सोचने वाली बात है कि मैं इस खाली समय में क्या करती हूं?
औरतों की बेफिजूल की किट्टी पार्टियों में मेरी कोइ दिलचस्पी नहीं है जिसमें औरतें मेज पर बैठ कर हाथ में ताश के पत्ते पकड़ कर चूतिया किस्म की बातें करती हैं, “तूने कभी रिक्शा वाले या धोबी से चुदवाई है? ये साले मस्त चुदाई करते हैं। सूखी ही रगड़ देते हैं चूत, साले थूक भी नहीं लगाते।”
ऐसी ही चूतिया किस्म की बातें करते-करते अपनी या एक दूसरी औरत की गांड या चूत में उंगली घुसा कर मौज मस्ती करती हैं।
अपने इस खाली समय में मैं अपने कंप्यूटर पर ब्लू फ़िल्में या चुदाई की फ़िल्में देखती हूं, या फिर चुदाई की कहानियां पढ़ती हूं। सविता भाभी की दस-दस पंद्रह-पंद्रह मिनट की चुदाई की फिल्में मेरी मनपसंद की फिल्में हैं।
अब अगर आप में से कोइ ये सोचता है कि 52 साल की उम्र में सेक्स के मजे लेने की इच्छा खत्म हो जाती है या चूत लंड नहीं मांगती तो वो गलत सोचता है। चूत तो साठ बासठ तक भी मस्त लंड के मजे लेती है, बस इतना करना होता है कि संतुलित खान-पान और नियमित कसरत से जिस्म और चूत दोनों कड़क रखने होते हैं।
मेरी अपनी चूत भी ऐसी कमुक चुदाई की कहानियां पढ़ते-पढ़ते या अपने कम्प्यूटर पर सविता भाभी की चुदाई देखते-देखते गीली हो जाती है। फिर मुझे अपनी इस चूत का इलाज करना ही पड़ता है।
इसके लिए मेरे पास अलग-अलग तरह के कई जुगाड़ हैं जिनके बारे में मैं आगे बताऊंगी।
चुदाई के मामले में मैं कोइ रिस्क नहीं लेती, यहां कानपुर में तो विशेष कर। जानकार मर्दों से तो तब तक चुदाई नहीं करवाती जब तक ये सुनिश्चित ना हो जाए कि सामने वाला एक बार चुदाई करने के बाद चूत का पिस्सू बन कर पीछे ही नहीं पड़ जाएगा।
सबसे बढ़िया रहता है ऐसे मर्दों से चुदाई करवाने में जो अपनी या अपने परिवार के किसी सदस्य की किसी दिमागी बीमारी के बारे में सलाह लेने आते हैं। ऐसे लोग अक्सर पढ़े लिखे और अमीर परिवारों से होते हैं। लेकिन चुदाई इनके साथ तभी होती है अगर देखने भालने में अच्छे हों और मुझे समझ आ जाए कि ये पीछे एक बार चुदाई करवाने के बाद पीछे पड़ने वाला नहीं है।
चूत चुदाई के अलावा मुझे चूत चूसने का और चूत चुसवाने का भी शौक हैं। क्या मस्त खुशबू होती है चूत की। मगर इस चूत चुसाई के खेल में शर्त बस इतनी सी है कि लड़की या औरत खूबसूरत और साफ़ सुथरी होनी चाहिए।
लंड चुसाई भी खूब करती हूं मैं। हर चुदाई से पहले लंड मुंह में जरूर लेती हूं मैं। लंड मुंह में लेते ही मेरी चूत फर्रर्र से पानी छोड़ देती है और आगे के कामों के लिए तैयार हो जाती है। अगर कभी कोइ चूतिया चूत चोदते-चोदते गांड चोदने के मूड में आ जाये और गांड में लंड डालने की जिद ही कर बैठे तो फिर गांड भी चुदवा लेती हूं। गांड में लंड लेने में भी मुझे कोइ परहेज नहीं है।
कहने का मतलब ये कि जब बिस्तर में होती हूं तो सब जगह लंड लेती हूं, ऊपर नीचे, आगे, पीछे। इस तरह लंड लेने में मैं ज्यादा नख़रेबाजी या ना नुकर नहीं करती। चुदाई ही करवानी है तो फिर नख़रेबाजी का क्या काम?
वैसे चूत का पानी छुड़वाने के लिए मैं मर्दों की मोहताज नहीं। असली चुदाई जैसे मजे लेने के लिए मेरे पास विदेशी जुगाड़ भी हैं, वो भी हर तरह के। जैसे कि रबड़ का सात इंच लम्बा मोटा लंड I बिल्कुल असली के लंड जैसा। ऊपर की तरफ असली लंड के टोपे की तरह हल्की सी गोलाई लिए हुए। चूत की अलग से रगड़ाई के लिए असली लंड के टोपे से इस रबड़ के लंड का टोपा थोड़ा बड़ा है।
इस रबड़ के लंड पर उभरी हुई धारियां भी हैं, जैसे असली के लंड पर उभरी हुई नसें होती हैं। जब ये लंड चूत के अंदर होता है तो ये उभरी हुई धारियां चूत के अंदर अलग से रगड़ाई का काम करती हैं।
इस लंड में नीचे की तरफ एक बैटरी डलती है। इस बैटरी को चालू करने से लंड कम्पन या वाइब्रेट करने लगता है। इस लंड को चूत में डालो, वाईब्रेटर चालू करो और लंड को चूत में आगे-पीछे करो, और असली लंड जैसे मजे लो। जुगाड़ विदेशी हैं लेकिन यहां कानपुर में भी मिलते हैं, बस जान पहचान होनी चाहिए।
यहीं कानपुर में एक शोरूम है जिसका मालिक है संदीप सोलंकी। मेरा जानकार है और साथ ही मेरा बड़ा भी मुरीद है। संदीप ही ये चुदाई के मजे लेने वाले खिलौने मंगवाता है।
संदीप कहता है कि वो मेरी मदद का बड़ा एहसानमंद है। वैसे मुझे तो याद भी नहीं कि कब और कैसे मैंने उसकी मदद की थी। संदीप से जान पहचान का फायदा ये है कि जब भी चुदाई का कोइ भी नया खिलौना आता है तो संदीप मुझे जरूर बताता है।
खैर बात चुदाई के खिलौनों की हो रहे थी। जैसा मैं बता रही थी ये रबड़ के लंड चूत में लेते हुए अगर चूत ज्यादा ही गरम हो जाए तो लंड की बैटरी का स्विच चालू करो। बैटरी चालू करते ही लंड कम्पन भी करने लगेगा, और चूत का मजा दुगना हो जाएगा।
इस लंड के साथ एक चड्ढी की तरह का कमरबंद भी है। इस चड्ढी में एक छेद है, जिसमें अंदर की तरफ से रबड़ का सात इंची लंड इस चड्ढी में फिट हो जाता है। इस लंड लगी हुई चड्ढी को पहन लो तो चड्ढी के आगे रबड़ का लंड असली लंड जैसा सात इंच का कड़ा लंड दिखाई पड़ता है।
इसी चड्ढी के आगे की तरफ दो लटकते हुए टट्टे भी हैं, बिल्कुल असली टट्टों जैसे बड़े-बड़े और लम्बे। ये टट्टे रबड़ के लंड की जड़ में ऐसे बैठ जाते हैं जैसे असली लंड के असली टट्टे हों।
ये जुगाड़ दो लड़कियों में आपस में चुदाई का मजा लेने के काम आता है। मतलब एक लड़की लंड लगी हुई चड्ढी पहन लेती है हुए दूसरी लड़की की चूत में रबड़ का लंड डाल कर चुदाई उसकी करती है। इसमें चोदने वाली लड़की को मजा नहीं आता चुदाई करवाने वाली लड़की को असली चुदाई जैसा ही मजा आता है।
जब एक लड़की ये लंड लगी हुई चड्ढी पहन कर लंड दूसरी लड़की की चूत में डाल कर धक्के लगती है तो असली टट्टों की तरह ये टट्टे भी चूत से पट्ट पट्ट पट्ट पट्ट की आवाज के साथ टकराते हैं और असली चुदाई जैसा मजा देते हैं। चड्ढी में लगे हुए इस लंड को देख कर ऐसा लगता है जैसे असली लंड खड़ा है और चूत में घुसने के लिए तैयार है।
मैंने अभी तक इस लंड को इस तरह इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि मुझे इसकी जरूरत ही नहीं पडी I ये तो संदीप ने मुझे भिजवा दिया था और वो बुरा ना मान जाए, इसलिए मैंने ये रख लिया था। बड़ा ख्याल रखता है ये संदीप सोलंकी मेरा।
32 साल का संदीप सोलंकी, जब भी मुझसे मिलने आता है, मुझे देखते ही उसकी आखों में गुलाबी डोरे आ जाते हैं और हाथ लंड पर पहुंच जाता है। लेकिन अभी तक उसने मुझे चोदने की इच्छा नहीं जाहिर की।
जिस दिन ऐसा कुछ करने का बोलेगा तो देखेंगे क्या करना है।
मैं तो बस इस लंड को चूत में डाल कर वाईब्रेटर चालू कर देती हूं, और आंखें बंद कर लेती हूं और चुदाई के मजे लेती हूं। फिर आंखों के आगे भले कोइ फिल्म एक्टर ले आओ या कोइ सुपरमैन।
मेरे पास एक चूत का दाना सहलाने वाला बैटरी से चलने वाला सेक्स टॉय – खिलौना – भी है जो चूत का दाना ऐसे चूसता है कि कोइ मर्द भी क्या दाने की चुसाई कर सकता है।
एक और ऐसा ही बैटरी से चलने वाला खिलौना है जिसके दोनों तरफ मोटे सात-सात इंच लम्बे दो इंच मोटे दो लंड जैसे कुछ हैं जो गांड और चूत में एक ही बार इकट्ठा डाले जाते हैं। इसमें भी बैटरी डलती है। गांड और चूत में डाल हर जब इसे चालू किया जाता है तो ये चूत और गांड दोनों में वाइब्रेट या कम्पन करते हुए जन्नत का मजा देता है।
वो एक एक्ट्रेस है, नाम कुछ सुरा भास्कर है या शायद हरा भास्कर है। उसने भी ये वाईब्रेटर एक फिल्म में अपनी चूत पर रगड़ा था। फिल्म थी शायद वीरे की शादी, या वीरे का विवाह।
साइंस की तरक्की का तो ये हाल है कि रबड़ के लंड ही नहीं, रबड़ की चूत, रबड़ की गांड, रबड़ के मम्मे, रबड़ के होंठ – चुदाई के मजे लेने के लिए सब कुछ मिलता है।
सच में, साइंस ने बड़ी कमाल की तरक्की कर ली है।
हां तो हम बात कर रहे थे साईंस की तरक्की की। तरक्की का आलम तो ये है कि रबड़ के लंड ही नहीं, रबड़ की चूत, रबड़ की गांड, रबड़ के मम्मे, रबड़ के होंठ – चुदाई के मजे लेने के लिए सब कुछ मिलता है – बस जान पहचान होनी चाहिए।
वैसे जो मजा सच-मुच के लंड से आता है वो इन नकली रबड़ के लंडों में कहां। वैसे मेरी तो कोशिश होती है इन चुदाई के खिलौनों का कम से कम इस्तेमाल किया जाये जाए, इमरजेंसी में। इमरजेंसी, हिंदी में कहा जाये तो आपातकालीन में। अब अगर आधी रात को चूत गरम हो ही जाए, और लंड मिलने की कोइ सूरत ना हो, तो कोइ कर भी क्या सकता है? ऐसे ही मौके पर ये लंड और दूसरी चीजें काम आती हैं।
मैं जब कभी कानपुर से बाहर जाती हूं और किसी होटल में रुकती हूं तो कभी-कभी वहां भी चुदाई करवा लेती हूं।
मगर वहां चुदाई करवाते वक़्त मैं ये नहीं देखती कि चोदने वाला कौन है। बस ये देखती हूं कि देखने में बढ़िया होना चाहिए और उसका लंड मेरे रबड़ के लंड की टक्कर का होना चाहिए। सात इंच लम्बा और दो इंच मोटा। कई बार तो होटल के कमरे की सफाई करने वाले से भी चुदवा लेती हूं। एक बार के मजे, उसके बाद राम राम। तू अपने रास्ते, मैं अपने रास्ते।
यही वो सब कारण हैं जिनके चलते कम से कम चूत की आग बुझाने के लिए मैंने शादी जैसे बंधन में बंधने की जरूरत कभी नहीं समझी । वैसे भी बहुत लंड ले लिए पढ़ाई करने के दौरान और पढ़ाई पूरी करने के बाद।
MBBS के बाद जब मैं MD और मनोचिकित्सक का कोर्स कर रही थी। मेरा सीनियर डाक्टर, जिसके मातहत मैं ट्रेनिंग कर रही थी, मुझे मेरी एक भी समस्या का हल तब तक नहीं बताता था जब तक वो मेरे होंठों की चुम्मी ना लेले, और मैं उसका लंड ना पकड़ लूं।
मेरी मनोचिकित्सा की पढ़ाई की कापियों पर हस्ताक्षर करने के बदले में ये अधेड़ उम्र के खस्सी सीनियर डाक्टर मुझे चोदते थे विआग्रा की गोलियां खा-खा के।
अब मैं भी उम्र के उसी पड़ाव पर अधेड़ और अब इन MBBS पास नए-नए जवान लड़कों से, जो मनोचिकित्सक बनना चाहते हैं और मनोचिकित्सा की पढ़ाई कर रहे होते हैं, जब मेरे पास सलाह के लिए आते हैं तो मैं इन जवान लड़कों को साफ़ बोलती हूं, “सलाह चाहिए? हस्ताक्षर चाहिये? पहले मेरी चूत की प्यास बुझाओ। चोदो मुझे पहले फिर मिलेगी सलाह और साथ मिलेंगे हस्ताक्षर।”
इसको कहते हैं जैसे को तैसा। ये दुनिया ऐसी ही है।
अब कोइ ये ना पूछे के 52 साल की पढ़ी-लिखी औरत, और ये सब क्यों? क्या 52 साल की औरतों की चूत नहीं होती? क्या पढ़ी-लिखी औरतों की चूत नहीं होती? क्या उनकी चूत पानी नहीं छोड़ती? क्या उनकी चूत में आग नहीं लगती ?
बस यही कमी है हम हिन्दुस्तानियों में। बालों में सफेदी क्या आनी शुरू हुई कि अपने आप को हद्द दर्जे का बूढा और खस्सी समझने लगते हैं। जा कर देखो अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रेलिया में। पचास-पचास, पचपन-पचपन साल की औरतें मस्त चुदाई करवाती हैं वो भी जवान लड़कों से।
वहां के अखबारों में तो इस आशय के विज्ञापन भी छपते हैं। हस्पताल की नौकरी के दौरान जब कभी हस्तपाल वाले एडवांस ट्रेनिंग के लिए मुझे इन देशों में भेजते थे, मैं तो खुद चुदाई करवाती थी जवान लड़कों से।
चलिए वापस आते हैं रिश्तों में चुदाईयों पर जिसके बारे मैं मैंने विशेष रूप से बात करनी है।
चुदाई की जो कहानियां मैं पढ़ती हूं, उन कहानियों में मुझे रिश्तों में चुदाई की कहानियां मुझे बहुत प्रभावित करती हैं। बाप-बेटी की चुदाई। मां-बेटे की चुदाई। भाई-बहन की चुदाई और दो बहनों के समलिंगी सम्बन्ध।
इसका कारण है कि एक मनोचिकित्सक होने कि नाते मैं खुद ऐसे संबंधों कि बारे में बहुत कुछ जानती हूं, और मुझे ऐसे लोगों से दो-चार होना पड़ता है। जिनमें किन्हीं कारणों से ऐसे रिश्ते बन जाते हैं। कभी-कभी इस तरह के रिश्ते जैसे बाप-बेटी में, मां-बेटे में, या भाई बहन में चुदाई के रिश्ते बन तो जाते हैं, मगर ना तो ऐसे रिश्ते ज़्यादा समय तक चलते है, और ना ही ऐसे रिश्तों का अंत सुखद ही होता है।
कई बार तो वक़्त गुजरने के साथ ये रिश्ते एक समस्या का रूप ले लेते हैं और फिर ऐसे रिश्तों का अंत पागलपन या आत्महत्या के प्रयास से होता है। ऐसे ही मौके पर लोगों को मेरी, मालिनी अवस्थी की, एक मनोचिकित्सक की जरूरत पड़ती है। ऐसे लोगों की मदद करने के बदले में मैं उनसे कोइ फीस नहीं लेती I ऐसे लोगों की मदद करना मेरे लिए धर्मार्थ काम है।
लेकिन हां, वो बात अलग है कि अगर कभी मन हुआ तो और इन आने वाले लोगों में से आने वाला या आने वाली देखने में बढ़िया हुई तो फिर मेरा क्लिनिक के पीछे वाला कमरा बड़ा काम आता है। मैं उन्हें अपने क्लिनिक के पीछे वाले अपने प्राइवेट कमरे में लेजा कर अपनी फीस वसूल कर लेती हूं।
परिवार में चुदाईयों की कहानियां मैं शुद्ध मनोरंजन की खातिर पढ़ती हूं, वरना ये अक्सर ये कहानियां सच्चाई से कोसों दूर होती हैं और केवल उन लोगों के मनोरंजन के लिए लिखी जाती हैं। वैसे मुझसे पूछो तो होना भी यही चाहिए।
इन कहानियों में लंड, चूत, फुद्दी, चूतड़, गांड, चुदाई जैसे शब्दों का प्रयोग खूब होता है और यही पढ़ने वाले को मजा भी देते हैं। कहानियां पढ़ते-पढ़ते लड़के मुट्ठ मार लेते हैं और लड़किया चूत में उंगली कर लेती हैं।
मैं तो खुद भी इन कहानियों को पढ़ते-पढ़ते अपना रबड़ का लंड चूत में डाल कर चालू कर देती हूं और कहानी भी पढ़ती रहती हूं और चूत में लंड का मजा भी लेती रहती हूं। इन कहानियों को पढ़ने का एक कारण और भी है। मैं ये कहानियां इसलिए भी पढ़ती हूं, जिससे मुझे ये मालूम पड़ सके कि कहानी लिखने वालों का इन पारिवारिक संबंधों में चुदाईयों के प्रति क्या नज़रिया है।
वैसे जिस तरीके से कहानियों में रिश्तों में चुदाई का जिक्र होता है वास्तविक जीवन में रिश्तों में चुदाई ऐसे नहीं शुरू होती। एक दिन मैं ऐसी ही कहानी पढ़ रही थी। मां बेटे की चुदाई। बड़ी अजीब सी कहानी लिखी थी लेखक ने। जिस घर की ये कहानी थी, उस कहानी वाले घर में सब कुछ सामान्य चल रहा था।
एक दिन अचानक मां अपने बेटे के कमरे में गयी और उसका लंड चूसने लगी और बोली, “मुझे तेरी रखैल बनना है। चोद मुझे और मुझे रंडी बना दे,भोसड़ा बना दे मेरी इस चूत का। मुझे तेरे बच्चे की मां बनना है वगैरह वगैरह।”
बेटे ने पहले थोड़ी ना-नुकर की, लेकिन मां ने बेटे को चुदाई कि लिए मजबूर कर दिया। बेटे ने भी मां की चूत चूसनी शुरू कर दी और फिर उनमें चुदाई चालू हो गयी।
असल जिंदगी में चुदाई के रिश्ते ऐसे नहीं बनते।
असल जिंदगी में तो पारिवारिक रिश्तों में चुदाईयों के पीछे या तो कोइ मजबूरी या किसी तरह के बदले की भावना होती है I या फिर कोइ नशा, जिसे चलते इंसान होश खो बैठता है, और वो सब कर देता है जो वो होश में रहते हुए नहीं कर सकता, मतलब चुदाई। बाप-बेटी में मां-बेटे में या फिर सगे भाई बहन में।
कई बार तो कुछ हालात इस तरह के बन जाते हैं कि पता ही नहीं चलता और रिश्ते पनप जाते हैं और फिर चुदाई हो कर ही रहती है। ऐसी ही मां-बेटे की चुदाई की एक कहानी पढ़ते-पढ़ते मेरे दिमाग में आया कि क्यों ना मैं ऐसे परिवार में चुदाईयों के अपने अनुभव इन कहनियों के पाठकों के साथ सांझा करूं।
मैंने ऐसे परिवार चुने जिनमें बाप-बेटी, मां-बेटा, भाई-बहन, दो बहनों में रिश्ते बने और चुदाई तक पहुंच गए। रिश्तों में ऐसी चुदाईयां हुई तो जरूर, मगर अंत में हालात ऐसे बने कि उन्हें मेरे जैसे मनोचिकित्सक की शरण में जाना पड़ा। तो शुरू करते हैं किन्हीं हालातों के चलते मां-बेटे में बने चुदाई के रिश्तों की ऐसी ही एक कहानी से।
ये आगरा के एक अंसारी परिवार की कहानी है जिसमे नसरीन अंसारी और उसके बेटे असलम अंसारी के बीच चुदाई के रिश्ते पनप गए और चार साल तक चले। इस रिश्ते में अंत में हालात ऐसे बन गए कि उन लोगों को मेरी – एक मनोचिकित्सक की जरूरत आन पड़ी।
नसरीन और उसके बेटे असलम का ये केस मेरे पास ये केस आगरा के एक ” रोशनी” नाम के NGO ने भेजा था। नसरीन अंसारी का बेटा असलम अंसारी असलम 24 साल का हो चला था, और उसकी अम्मी नसरीन अंसारी अब उसकी की शादी करना चाहती थी। उधर असलम का शादी के लिए मान नहीं रहा था।
असलम का शादी के लिए इनकार करना दीवानगी की हद तक पहुंच चुका था। हालात ये हो चुके थे असलम ने अपनी अम्मी नसरीन को धमकी तक देनी शुरू कर दी थी कि अगर उसने ने दुबारा से उसे शादी के लिए कहा तो वो या तो कहीं चला जाएगा या अपनी जान ले लेगा।
घबराई हुई नसरीन आगरा में ही अपने एक जानकार डाक्टर के पास मदद कई लिए गयी। नसरीन की बातों से डाक्टर को कुछ ठीक से समझ नहीं आया और उसने नसरीन को आगरा की ही एक NGO “रोशनी” के पास मदद के लिए भेज दिया।
जब नसरीन आगरा की उस “रोशनी” नाम की NGO को कुछ बता नहीं पाई तो उस NGO ने मुझसे सम्पर्क किया और नसरीन की मदद करने की गुजारिश की ।
मैंने रोशनी NGO वालों को दोनों मां-बेटे – नसरीन और असलम को कानपुर भेजने के लिए कह दिया।
अब तीन दिन पहले नसरीन और असलम कानपुर पहुंच चुके थे, और एक होटल में रुके हुए थे।
मैंने दोनों से अलग-अलग बात करने का फैसला किया और नसरीन को पहले बुलाया ताकि मुझे समझ में आ सके कि आखिर दोनों मां-बेटे में ऐसा क्या हुआ है कि बेटा इस तरह से शादी के लिए इंकार कर रहा है, और हालात धमकी देने तक आ पहुंचे हैं।
नसरीन जब मेरे क्लिनिक में आई तो मुझे पहली नजर में वो निहायत ही शरीफ और एक घरेलू किस्म की औरत लगी। गोरी सुन्दर और तंदरुस्त। हल्के गुलाबी गाल, खड़ी चूचियां, भरे-भरे उभरे हुए चूतड़ और कसे हुए शरीर वाली औरत। खुद को बयालीस साल का बता रही थी मगर देखने में और शरीर के कसावट के कारण बत्तीस-तैंतीस से ज्यादा नहीं लग रही थी।
नसरीन की फाइल के हिसाब से पांच साल पहले दिल का दौरा पड़ने से नसरीन के शौहर बशीर की मौत हो गयी थी। कायदे से नसरीन की चूत में पिछले पांच साल में लंड नहीं गया था। लेकिन नसरीन के चेहरे पर फैले हुए नूर से नहीं लग रहा था कि वो एक विधवा जैसा जीवन जी रही थी, जो चुदाई के लिए तरसती रहती हैं। नसरीन को देखने से ऐसा लग रहा था कि उसे चुदाई में कहीं कोइ कमी नहीं। उसकी चुदाई नियमित भी होती थी और मस्त भी होती थी।
मैंने NGO रोशनी द्वारा भेजी फाइल को ध्यान से पढ़ा और फिरसे पूछा, “नसरीन इस फाइल से जो मैंने समझा है वो ये है कि तुम्हारे शौहर पांच साल पहले गुजर गए। तब तुम सैंतीस साल की थी, और तुम्हारा बेटा असलम उन्नीस साल का था और कालेज में था। ठीक है?”
नसरीन ने कहा “जी हां।”
मैंने बात जारी रखते हुए कहा, “उस बात को पांच साल गुजर चुके हैं और अब जब कि असलम चौबीस साल का है। तुम उसकी शादी करवाना चाहती हो, मगर वो मान नहीं रहा। यही बात है ना?”
नसरीन बोली, “जी हां।”
मैंने पूछा, “क्या कहता है, क्यों शादी नहीं करना चाहता? तुम्हें देखने के बाद मैं ये सोच सकती हूं असलम भी देखने में अच्छा सुन्दर और तंदरुस्त होगा। क्या किसी के साथ – किसी के भी साथ मतलब ‘किसी के भी साथ’ उसका कोइ प्यार-व्यार का चक्कर चल रहा है? या फिर दूर-दराज की रिश्तेदारी में या आस-पड़ोस में किसी लड़की के साथ उसके जिस्मानी रिश्ते बन चुके हैं, जिनके चलते वो शादी नहीं करना चाहता?”
नसरीन ने कहा, “नहीं डाक्टर ऐसा नहीं है, अगर ऐसा होता तो मुझे जरूर पता होता। घर में हम दो जन ही तो हैं, मैं और असलम।”
ये बोल कर नसरीन जरा असहज हुई जैसे कुछ ऐसा कह दिया हो जो नहीं कहना चाहिए था। नसरीन धीरे से बोली, “अगर ऐसी कोइ बात होती, तो मुझे पता होता। असलम मुझसे कोइ बात नहीं छुपाता।”
मैंने पूछा, “अच्छा नसरीन ये बताओ असलम के साथ तुम्हारा रिश्ता कैसा है?”
नसरीन ने कहा, “जी ठीक है, अच्छा है जैसा एक मां बेटे का होता है।”
मैंने नसरीन की आंखों में देखते हुए पूछा, “मां बेटे जैसा या औरत मर्द जैसा?”
नसरीन सकपकाई, और बोली, “जी? मैं समझी नहीं।”
मैंने नसरीन को कहा, “देखो नसरीन, मैं एक मनोचिकित्स्क हूं। लोगों के चेहरे पढ़ना, उनके दिमाग में क्या चल रहा होता है, ये जानना मेरे पेशे का हिस्सा है। तुमने बताया की तुम्हारी उम्र अभी 42 साल की है और पांच साल पहले तुम्हारे शौहर गुजर गए जब तुम 37 की थी। ठीक है?”
नसरीन बोली कुछ नहीं मगर उसने ने हां में सर हिलाया।
मैंने बात जारी रखते हुए कहा, “नसरीन मैंने रोशनी NGO की तरफ से भेजी तुम्हारी फाइल पढ़ी है। इसने मुताबिक, तुम एक शरीफ घरेलू औरत हो जिसकी दुनिया उसके घर की चार दीवारी के अंदर ही सिमटी रहती है, जिसका घर ही उसकी दुनिया होती है।”
मैंने बात जारी रखते हुए कहा, “लेकिन नसरीन, तुम्हारे चेहरे पर जो चमक और नूर है वो एक ऐसी बात की तरफ इशारा करते हैं कि तुम्हें उस चीज की कोइ कमीं नहीं जो एक विधवा औरत को होती है – चुदाई की कमी। चूत में लंड ना जाने की कमी। ऐसी औरत जो लंड और चुदाई के लिए तरसती रहती है, अक्सर वक़्त से पहले ही बूढ़ी हो जाती है। लेकिन तुम में तो ऐसी कोइ बात नहीं है। तुम तो एक दम कड़क हो और तुम्हारे चेहरे पर भी पूरा निखार है।”
मेरी ये बात सुनते ही नसरीन का चेहरा गुलाबी हो गया। नसरीन मुझसे से नजर चुराने लगी।
मैंने बात जारी रखते हुए नसरीन के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, “मैं दावे के साथ कह सकती हूं नसरीन कि तुम्हारी चुदाई मस्त होती है, बढ़िया होती है, बिना किसी रूकावट के और बिना किसी डर के होती है I एक बढ़िया, तुम्हारा मनपसंद का लंड है जो तुम्हारी मनमर्जी की चुदाई करता है और मस्त तुम्हारी चूत का पानी छुड़ाता है और तुम्हें चुदाई का पूरा मजा देता है।”
नसरीन ना कुछ बोल रही थी, ना मुझसे नजरें ही मिला रही थी।
मैंने नसरीन का हाथ दबाते हुए पूछा, “अब बताओ नसरीन, कि असलम के साथ तुम्हारा कैसा रिश्ता है?”
मेरे ये कहते ही नसरीन सुबक-सुबक कर रोने लगी।
मैंने नसरीन को रोने दिया। जब नसरीन चुप हुई तो मैंने प्रभा को बुला कर दो चाय लाने के लिए बोल दिया। प्रभा चाय लेकर आ गयी। मैंने एक कप नसरीन के हाथ में दिया और बोली, “नसरीन मुझे अपने और असलम के बारे में सब कुछ साफ-साफ और तफ्सील से बताओ।
मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “नसरीन ये तो मैं अमझ चुकी हूं कि अपने बेटे असलम के साथ तुम्हारे जिस्मानी रिश्ते हैं, अब मुझे ये बताओ कि तुम्हारे असलम के साथ जिस्मानी रिश्ते कब और कैसे शुरू हुए, और कहां तक पहुंच गए? इससे मुझे ये समझने में आसानी होगी कि क्या कारण है कि असलम शादी के लिए इस तरह इनकार कर रहा है। कहीं तुम लोगो में पनप चुके ये जिस्मानी रिश्ते – चुदाई के रिश्ते ही तो इसके पीछे नहीं?
इस पर नसरीन कुछ देर चुप-चाप कुछ सोचती रही और फिर बोली, “ठीक है मैडम, मैं सब कुछ शुरू से साफ़-साफ़ बताती हूं।” नसरीन बोलने के लिए तैयार हो गयी।
मैंने नसरीन को कहा, “एक बात और नसरीन, तुम जो भी कहोगी, मैं वो रिकार्ड करूंगी। कई बार समस्या को समझने के लिए पूरी बात बार-बार सुननी पड़ती है। और ये भी हो सकता है कि तुम्हारी बात-चीत की ये टेप पूरी या इसके कुछ अंश मुझे असलम को भी सुनानी पड़े।
लेकिन हां, इस बात का एतबार रक्खो, असलम को मैं टेप का वह हिस्सा नहीं सुनाऊंगी जो मैं समझूंगी उसे, एक बेटे को नहीं सुनना चाहिए। जब तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी, तब ये टेप मैं तुम्हें दे दूंगी या तुम्हारे सामने इसे डैमेज कर दूंगी।”
आगरा की नसरीन अंसारी की फ़ाइल जो रौशनी नाम की NGO ने भेजी थी, उसके अनुसार नसरीन के पति का इंतकाल हुए पांच साल गुजर चुके थे। मगर नसरीन को देख कर मुझे ऐसा नहीं लगा कि नसरीन एक विधवा का जीवन जी रही थी, बिना चूत चुदाई वाला जीवन।
नसरीन के चेहरे का नूर बता रहा था कि नसरीन की मस्त चुदाई होती थी। वो भी बिना रोक-टोक के। जब मैंने अपने मन की ये बात नसरीन को बताई, तो नसरीन फूट-फूट कर रोने लगी। मैंने नसरीन को रोने दिया। जब नसरीन का मन कुछ हल्का हुआ, तो चुप होने के बाद नसरीन अपनी कहानी सुनाने के लिए तैयार हो गयी।
मैंने टेप रिकार्डर में टेप डाली, रिमोर्ट अपने हाथ में ले लिया और नसरीन को कहा, “हां तो नसरीन शुरू हो जाओ।”
क्लिक की आवाज के साथ मैंने टेप रिकार्डर चालू कर दिया।
नसरीन एक बार बोलना शुरू हुई तो बोलती ही गयी। उसकी सारी बातें रिकार्ड हो रही थी। नसरीन की लगभग पचास-पचपन मिनट की आप-बीती ने काफी चीजें मेरे सामने साफ़ कर दी।
— नसरीन अंसारी की कहानी
नसरीन की आवाज थी, “मैं हूं 42 साल की नसरीन अंसारी, आगरा की रहने वाली। हम लोग पुश्तों से आगरा में रहते हैं। 24 साल पहले मेरी शादी हुई थी बशीर अंसारी के साथ जब मैं 18 साल कि थी। बशीर ने भी 22 ही पार किये होंगे। बशीर खिलाडियों की तरह का दिखने वाला तंदरुस्त मर्द था। ऐसा दिलकश मर्द, जैसे मर्द को हर लड़की अपने शौहर के रूप में पाना चाहती है।”
“मेरे पिता आगरा में हकीम थे, और हमारे घर का माहौल कुछ पुराने किस्म का था। लड़कियों की पढ़ाई लिखाई जरूरी नहीं समझी जाती थी। माहवारी आते ही लड़की की शादी के बारे में सोचना शुरू कर दिया जाता था। यही कारण था कि मैंने अभी कालेज जाना शुरू ही किया था कि बशीर के साथ मेरी शादी तय हो गयी।”
“उधर बशीर का परिवार खुले विचारों वाला था। मेरी सास फातिमा बेगम बड़ी ही हंसमुख औरत थी। मेरी सास ने मेरा खुल कर स्वागत किया और पहली चुदाई की रात के लिए अपने हाथों से कमरा सजाया।
“अठारह की मैं और तकरीबन तेईस-चौबीस का बशीर – चुदाई की असली और बढ़िया उम्र यही होती है।”
“पहली रात को बिस्तर पर बैठी मैं बशीर का इंतजार कर रही थी। मुझे तो इतना ही पता था कि पहली रात मर्द औरत की चूत में लंड डाल कर उसे अंदर-बाहर करता है जिसे चुदाई कहते हैं, और इस चुदाई में लड़की को जन्नत का मजा आता है।”
“मेरी भाभी ने मेरी चूत पर उगे झांटों के छोटे-छोटे बाल साफ कर दिए थे। मेरी चूत एक-दम चिकनी हुई पड़ी थी।”
“बशीर आया और मेरे पास बैठ गया। पहले मेरे हाथ को अपने हाथ में लिया और चूमने लगा। फिर मेरी चूचियों पर हाथ फेरे। इतने में ही मेरी चूत में झनझनाहट होने लगी। मेरी पहली बार चुदाई होनी थी। अब तक मैंने किसी मर्द का खड़ा लंड भी नहीं देखा था। मैं तो बस यही सोच रही थी कि बशीर का लंड कैसा होगा, जब बशीर का लंड मेरी चूत में जाएगा तो मुझे कैसा लगेगा।”
“बशीर ने कमरे की लाइट बंद कर दी, बस एक छोटा रात वाला बल्ब जल रहा था। बशीर ने धीरे-धीरे मेरे सारे कपड़े उतार दिए और खुद भी नंगा हो गया। बशीर मेरी चूचियां चूस रहा था। मुझे मजा सा आने लग गया।”
“तभी बशीर उठा और मेरे चूतड़ों के नीचे तकिया रख कर मेरे चूतड़ उठा दिए। मैंने सोचा क्या अब बशीर क्या करेगा? चूत में लंड डालेगा?”
“मगर बशीर ने मेरी टांगें खोली और मेरी चूत चाटने लगा। ये मेरे लिए नई बात थी। बशीर मेरी चूत के दाने को चूस रहा था और मुझे बड़ा मजा आ रहा था। चूत गीली होती जा रही थी। मुझे किसी ने नहीं बताया था कि मर्द औरत की चूत चाटते भी हैं। जैसे जोर-जोर से बशीर मेरी चूत को चूस रहा था।”
“जिस तरह से बशीर मेरी चूत चाट रहा था, लग रहा था उसे इसमें बड़ा मजा आ रहा था। उधर मैं सोच रही थी, चूत चूसने चाटने में भी भला क्या मजा?”
“अभी मैं सोच ही रही थी कि अब बशीर क्या करेगा – बशीर ने मेरे चूतड़ उठा कर खोल दिए और अपनी ज़ुबान मेरी गांड के छेद पर फेरने लगा।”
“कहां तो मैं सोच रही थी कि क्या मर्द औरत की चूत भी चूसते चाटते हैं, और यहां तो बशीर मेरी गांड के छेद पर जुबान फेर रहा था। जो भी था, मुझे इन सब में मजा बड़ा आ रहा था।”
“अब तक तो मैं यही समझती थी कि चूत चुदवाने के लिए होती है और लंड चोदने के लिए – और फिर इन चुदाईयों के दौरान ही औरत को बच्चा ठहर जाता है और फिर इस चूत में से औलाद पैदा होती है।”
“तभी बशीर उठा और लंड मेरे हाथ में पकड़ा दिया। बशीर का खड़ा मोटा गरम लंड – मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गयी। मैं लंड को हल्का-हल्का दबा रही थी कि बशीर ने लंड मेरे होंठों से लगा लिया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करना है।”
“बशीर ने बड़े ही धीरे से कहा, “नसरीन मुंह में लो।”
लंड? मुंह में? ऐसा भी करते हैं लोग? मगर हमें तो बचपन से ही सिखाया गया था कि शौहर जो भी कहे उसे मानना ही है।”
“बशीर ने जैसे ही कहा नसरीन मुंह में लो – मैंने लंड मुंह में ले लया। बशीर के मोटे लंड से मेरा मुंह भर गया। जाने क्या हुआ, मैंने बशीर का लंड चूसना शुरू कर दिया। बशीर के लंड में कुछ खट्टा नमकीन लेसदार सा कुछ निकल रहा था, जिसे मैं चाटती जा रही थी।”
“उधर मेरी चूत फर्रर-फर्रर करके पानी छोड़ रही थी। बशीर का लंड बांस की तरह सख्त हो चुका था।”
“बशीर ने लंड मुंह में से निकाला और मेरी चूत की तरफ चला गया। बशीर ने मेरी टांगें चौड़ी की और अपना अंगूठा मेरी चूत के दाने पर फेरा। मेरे चूतड़ अपने आप ही थोड़े से हिले।”
“बशीर ने मेरी चूत के पानी से चिकनी हुई चूत में थोड़ी थूक डाली, लंड मेरी चूत के छेद पर रख दिया। मेरी जिंदगी का वो पल आने वाला था जिसका हर लड़की बेसब्री से इंतजार करती है। मेरे शौहर का लंड मेरी चूत में जाने वाला था। मैं चुदने वाली थी। मेरी चुदाई होने वाली थी। मेरे जिंदगी की पहली चुदाई।”
“यही सोच रही थी कि कैसी होगी ये चुदाई कि बशीर ने एक झटके से लंड चूत में डाल दिया। मेरे मुंह से जो की चीख निकली “आह मर गयी मां।” मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी चूत में गरम-गरम लोहा डाल दिया हो। मुझे बड़ी दर्द हो रही थी।”
“बशीर ने मुझे पकड़ लिया और मेरी चुदाई करने लगा। मैंने तो सुना था कि चुदाई में बड़ा मजा आता है। मगर यहां तो मजे नाम की चीज ही नहीं थी, बस चूत के अंदर जलन ही जलन हो रही थी।”
“मैं मुंह दबा कर दर्द के कारण चीख रही थी, मगर इन सब से बेखबर बशीर मुझे ऐसे चोद रहा था जैसे पहली बार चूत चोदने को मिली हो। ऐसा हो भी सकता था। जब मेरी पहली चुदाई हो रही थी, तो हो सकता है बशीर की भी पहली चुदाई हो।”
“पता नहीं कितनी देर चोदा मुझे बशीर ने। दर्द के मारे मेरा बुरा हाल था। बशीर अब कुछ श-कुछ बोल रहा था, “आह मेरी जान नसरीन, मजा आ रहा है, क्या टाइट चूत है। लगता है नसरीन चूत का पर्दा फट गया है। आआह… आअह… और फिर एक जोरदार आअह… “निकल गया मेरे लंड का पानी नसरीन… निकल गया तेरी चूत में” के साथ बशीर के लंड में से कुछ गरम-गरम निकला और मेरी चूत उससे भर गयी।”
“बशीर कुछ देर ऐसे ही लेटा रहा और फिर उठ कर बाहर चला गया। शायद गुसलखाने चला गया। तब कमरों के साथ जुड़े बाथरूम तो होते नहीं थे। मैं उठी, मेरी चूत में बड़ा दर्द और जलन हो रही थी। मैंने कपड़े पहने और बिस्तर पर ही बैठ गयी – लाइट भी नहीं जलाई।”
“तभी मेरी सास, फातिमा बेगम, अंदर आयी और लाइट जला कर मेरे पास बैठ गयी और मेरे सर पर हाथ फेरने लगी। फिर मेरी सास ने मुझे उठाया और बिस्तर की चद्दर देखी। चूत वाली जगह पर बहुत बड़ा खून का धब्बा था।”
“मेरी चूत का पर्दा फट गया था। अब मैं कुंवारी नहीं थी।”
“मेरी सास ने मुझे बाहों में ले लिया, जैसे कह रही हो, “बड़ा किस्मत वाला है बशीर जिसे ऐसी बिना चुदी चूत मिली।”
“मेरी सास ने मुझे कहा, “नसरीन जाओ कपड़े बदल लो मैं गरम पानी की बोतल लाती हूं – सिकाई के लिए। ये कहते हुए मेरी सास ने बिस्तर की चद्दर उठा ली और दूसरी चद्दर बिछा दी। मेरी सास गयी और तब बशीर भी आ गया।
बिस्तर पर बिछी दूसरी चद्दर देख कर मुझसे पूछा, “नसरीन ज्यादा दुःख रहा है?”
“दर्द तो मुझे हो ही रहा था। लेकिन मैं क्या बोलती? मैं चुप रही।”
“तभी मेरी सास गरम पानी की बोतल लाई और मेरे हाथ में दे कर बिना बशीर की तरफ देखे बशीर से बस इतना ही कहा, “ध्यान से बशीर।” इतना कह कर मेरी सास अपने कमरे में चली गयी।”
“अगले चार-पांच दिन बशीर ने बस मुझे चूमा, चाटा, मेरी चूत चूसी, गांड चाटी, लंड चुसवाया, मगर चुदाई नहीं की। पांच दिन बाद मेरी चूत अब ठीक थी, और बशीर का लंड मांग रही थी।”
“उस रात जब बशीर ने लंड मेरी मुंह में डाला तो मैंने लंड जोर-जोर से चूसना शुरू कर दिया और साथ ही नीचे चूतड़ हिलाने लगी। बशीर समझ गया मेरा चुदने का मन हो रहा है।”
“कुछ देर की चुम्मा चाटी के बाद जब बशीर ने मेरी चूतड़ों के नीचे तकिया रखा, तो मैंने खुद ही टांगें चौड़ी कर दी। बशीर ने फिर से मेरी चूत चूसी अपने लंड का सुपाड़ा मेरी चूत के दाने पर रगड़ा, और मेरी चूत ने फिर से फर्र-फर्र कर पानी छोड़ दिया। मुझे अब लंड चाहिए था। शर्म का पर्दा तो पहली चुदाई के बाद से ही हट गया था।”
“मैंने बस इतना ही कहा, “बशीर।”
“बशीर समझ गया मैं लंड मांग रही थी।”
“नई-नई बीवी को बशीर ने पांच दिनों से नहीं चोदा था। मेरे बशीर कहते ही बशीर ने लंड चूत पर रक्खा और एक झटका लगाया। चिकने पानी से भरी चूत में लंड रगड़ खाता हुआ अंदर बैठ गया। मुझे थोड़ी दर्द हुई, मगर दर्द से ज्यादा मजा आया।”
बशीर ने मुझे बाहों में ले किया और चुदाई चालू कर दी। दस मिनट की चुदाई के बाद मेरी चूत पूरी तरह गरम हो गयी और पानी छोड़ने को तैयार हो गयी।”
चुदाई करते-करते बोल रहा था, “मेरी नसरीन मेरी जान आआह आअह मजा आ गया। मेरी मुंह से भी हल्की मजे के सिसकारियां निकल रहीं थी आह…. बशीर… आअह… बशीर.. आआह… और तभी अपने आप मेरे चूतड़ जोर से घूमे और मेरा पानी छूट गया।”
“चुदाई का पहला असली मजा आ गया। मजा क्या था जन्नत थी। बशीर वैसे ही मेरी ऊपर लेटा रहा।”
“तभी मुझे लगा, मेरी चूत अभी भी किसी चीज से भरी हुई है। फिर मुझे समझ आया बशीर का लंड अभी भी खड़ा ही है और मेरी चूत के अंदर ही है”।
“बशीर कुछ देर लंड को चूत में हिलाता रहा। मुझे लगा मेरी चूत में फिर से कुछ हो रहा है। मेरी चूत फिर झनझनाने लगी। मेरा मन करने लगा की बशीर फिर से पहले की तरह लंड अंदर बाहर करे – मेरी चुदाई करे। मजे के मारे मैं फिर चूतड़ हिलाने लगी।”
बशीर ने मेरी कान में धीरे से कहा, “नसरीन एक बार और करूं?”
“मन तो चूत चुदवाने का मेरा कर ही रहा था। मेरा मैंने भी धीरे से “हूं” कर दिया – मतलब हां करो।”
“फिर बशीर ने मुझे कस कर अपने बाहों में जकड़ लिया और मेरी एक चुदाई शुरू कर दी।”
“इस बार की मस्त चुदाई में हम इक्ट्ठे झड़े और मुझे जो मजा आया वो जन्नत का मजा था।”
“फिर तो अगले कुछ महीने रोज हम दो बार तीन बार चुदाई करते – बस मेरी माहवारी वाले चार दिन ही छूटते थे। उन चार दिनों में भी मैं बशीर का लंड जरूर चूसती थी। बशीर थोड़ी देर की लंड चुसाई के बाद मुझ से लंड की मुट्ठ मरवा कर अपना पानी छुड़ा लेता था। लंड चुसाई में भी मुझे मजा आने लग गया था।”
“एक दिन मुझे माहवारी आई हुई थी और मैं बशीर का लंड चूस रही थी। बशीर का पानी छूटने वाला था, बशीर ने लंड मुंह से निकलना चाहा जिससे वो मुट्ठ मार कर लंड का पानी निकाल ले, मगर ना जाने क्या हुआ, मैंने बशीर को रोक दिया। मुझे लंड चूसने में इतना मजा आ रहा था कि मन कर रहा था की लंड चूसती ही जाऊं चूसती ही जाऊं।”
“तभी बशीर ने एक जोर की हुंकार ली… आआह… नसरीन निकल गया… और बशीर के लंड के पानी से मेरा मुंह भर गया।”
“बशीर ने लंड मुंह में से निकाला। मैंने भी सारा पानी मुंह से निकाल कर कपड़े से मुंह साफ़ किया और बाहर बाथरूम चली गयी।”
“पहली बार बशीर के लंड का पानी मुंह में छूटा था। मैंने बशीर का लेसदार हल्का नमकीन गरम पानी निगला तो नहीं, मगर मुझे उसमें से हल्की-हल्की मस्त कर देने वाली महक जरूर आ रही थी।”
“ये भी शादी के बाद का एक नया तजुर्बा था। पता नहीं ऐसे और कितने तजुर्बे होने बाकी थे।”
अब हम चुदाई करते वक़्त बोलने की बेशर्मी की सब हदें पार कर चुके थे। मुझे चोदते वक़्त बशीर बोला करते थे, “आआआह… मेरी जान नसरीन… ले मेरा लौड़ा… मेरी जान… ले मेरा लंड गया तेरी फुद्दी के अंदर… जड़ तक बैठ गया तेरी चूत में… ले… और ले, और ले, ले… आज तो चोद-चोद कर तेरी चूत में से झाग निकाल दूंगा।”
उधर मैं भी बोलती, “आअह… बशीर… मेरे राजा… और चोदो… और जोर से चोदो… बशीर घुस जाओ मेरी चूत में… और दबा कर चोदो बशीर… डालो पूरा लंड मेरी चूत में… निकाल ही दो आज मेरी फुद्दी में से झाग… और दबा कर चोदो मेरी चूत… आआह।”
“चुदाई ऐसे ही चलती रही और साल बाद असलम पैदा हो गया। चालीस दिन तक तो मेरी सास मेरी साथ सोती थी। चुदाई तो दूर की बार थी, इन चालीस दिनों में बशीर का मेरे पास आना भी मना था।”
“चालीस दिन के बाद मेरी सास अपने कमरे में सोने गयी और बशीर फिर से हमारे कमरे में सोने आ गया। असलम को मैंने अपने बेड के पास ही एक पालने में सुला दिया।”
“चालीस दिनों के बाद उस रात जो हम दोनों में चुदाई हुई वो शानदार मस्त चुदाई थी। चूत चुदाई का प्यासा बशीर, और उतनी ही लंड की प्यासी मैं। उस रात हम दोनों की शानदार चुदाई हुई। एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार। हर बार हम दोनों इकट्ठे झड़े।
“जब असलम एक साल का हुआ तो मेरी सास यानी असलम की दादी असलम को अपने कमरे में अपने साथ सुलाने लगी। इससे तो मेरी और बशीर की चुदाई और भी खुल कर होने लगी।”
“सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था – जिंदगी की गाड़ी हंसी खुशी चल रही थी।”
यहां नसरीन एक पल के लिए चुप हुई और फिर बोली, “मालिनी जी मैं बशीर के काम के बारे में बताना ही भूल गयी। वो भी मैं भी बता दूं। मेरी जिंदगी मैं जो भी हुआ जैसा भी हुआ वो इसी काम के कारण हुआ।”
मैंने भी हाँ में सर हिला दिया।
नसरीन अपनी और अपने शौहर की चुदाई की कहानी सुना रही थी। तभी नसरीन को ध्यान सा आया कि उसने अपने कारोबार के बारे में तो मुझे कुछ बताया ही नहीं। इस कारोबार से ही तो नसरीन के असली कहानी जुड़ी हुई थी।
नसरीन ने अपने आगरा के कारोबार के बारे में बताना शुरू किया।
नसरीन बताने लगी, “हम लोगों की आगरा के सदर बाजार में अपनी किताबों की दुकान है, शाह जी बुक स्टोर। दुकान ऊपर नीचे बनी हुई है। ऊपर का कमरा पहले गोदाम के तरह इस्तेमाल होता था। अब ये कमरा काम के दौरान दोपहर को आराम करने के लिए इस्तेमाल होता है।”
“ये दुकान मेरे शौहर बशीर के दादा नवाब शाह अंसारी के जमाने से है। उन्हीं के नाम पर ये दुकान का नाम है। पहले ये एक प्रिंटिंग प्रेस हुआ करती थी। पुराने तरीके की हाथ से लिखे और हाथ से चलने वाली उर्दू भाषा की प्रिंटिंग प्रेसें।”
“वक़्त बदला और हाथ से चलने वाली प्रिंटिंग प्रेसों का जमाना लद गया। फिर मेरे शौहर के पिता – मेरे ससुर – सिताब खान अंसारी ने यहां अखबारों और किताबों की दुकान खोल ली। नाम हो गया शाह जी बुक स्टोर। दुकान में स्कूलों की कापियां किताबें, मैगजीन और अखबार रखे जाते थे। बाजार में पुरानी दुकान होने के कारण दुकान ठीक चलती थी।”
“वक़्त फिर बदला। जब से बशीर ने दुकान संभालना शुरू किया तो स्कूल वालों ने कापियां किताबें स्कूल से ही देना शुरू कर दिया। तब से बशीर ने जासूसी उपन्यास, अखबार, और मैगजीन रखने शुरू कर दिए।”
तभी फ़िल्मी कैसेटों का चलन शुरू हो गया। अब उपन्यास, मैगजीन के साथ साथ बशीर ने फिल्मों की कैसेटें तभी रखनी शुरू कर दी। ये कैसेटें दुकान से बेची भी जाती थी और किराये पर भी दी जाती थी। अब दुकान का नाम भी अंगरेजी हो गया – शाह जी वीडिओ पार्लर।”
“दुकान पुरानी होने के कारण ग्राहक भी बंधे हुए थे, किसी तरह की कोइ दिक्क्त नहीं थी। सुबह का गया बशीर शाम को ही घर लौटता था।”
“दिन भर बशीर दुकान पर काम करते हुए थक जाता था। रात को मैं बशीर की पूरी थकान उतार देती थी। कभी उसका लंड चूस कर और कभी चूत चुसवा कर। चुदाई तो पहले की ही तरह रोज ही होती थी।”
“एक दिन बशीर शाम को घर आते-आते एक कैसेट ले आया। चुदाई की फिल्म की कैसेट। रात को हमने अपने कमरे में ये कैसेट चलाई – मर्द औरत की चुदाई की फिल्म थी। मैं पहली बार इस तरह की फिल्म देख रही थी।”
“उस फिल्म में जिस तरह की चुदाई लड़का-लड़की कर रहे थे वो सब देखते देखते मेरी चूत पानी-पानी हुई जा रही थी। चुदाई के दौरान जो जो कुछ फिल्म में लड़का-लड़की आपस में कर रहे थे, वो सब हमने भी किया, और चुदाई का बहुत मजा लिया। उस दिन उस फिल्म को देखते-देखते हम दोनों ने बड़ी मस्ती में चुदाई के मजे लिए।”
“अब जब भी बशीर का चुदाई का मन होता, बशीर कैसेट ले आता, और हम फिल्म देखते-देखते चुदाई करते और खूब मजे लेते”।
“कई बार तो बशीर ऐसी कैसेट लाता जिसमें लड़का-लड़की चुदाई करते-करते अजीब-अजीब काम करते दिखाई देते थे। जैसे पीछे चूतड़ों के छेद में लंड डालना। एक-दूसरे के मुंह के ऊपर, मुंह के अंदर ऊपर पेशाब करना वगैरह-वगैरह।”
“एक दिन जब बशीर ऐसी ही एक कैसेट लाया तो कैसेट देखते-देखते मैंने बशीर से पूछा, “बशीर ये कैसी फिल्में हैं? क्या ऐसा भी करते है औरत और मर्द? वो देखो, वो लड़की के पीछे वाले छेद में लंड डाल रहा है। और ये क्या है लड़की-लड़के के ऊपर खड़ी हो कर पेशाब कर रही है, और लड़का-लड़की के मुंह में पेशाब की धार डाल रहा है।”
“बशीर बोला, “नसरीन ये फ़िल्में मजे के लिए होती हैं। इनको देख कर मर्द का लंड खड़ा हो कर चूत ढूढ़ने लग जाता है और औरत की चूत गरम हो कर लंड मांगने लग जाती है। आम जिंदगी में ऐसी चीजें नहीं होती। हां कभी-कभार के मजे के लिए कई बार लोग ऐसी चीजें भी कर लेते हैं।”
“और फिर बशीर कुछ रुक कर बोला, “हां नसरीन एक बात है, वो जो पीछे यानी चूतड़ों के छेद में लड़का लंड डाल रहा है, ऐसा अक्सर होता है। दो लड़के भी आपस में ऐसा करते हैं और कई बार औरत और मर्द ऐसा करते हैं।”
“मैं चुदाई की फिल्म देख कर मस्त तो हुई ही पड़ी थी। मैंने बशीर से कहा, “लड़के? आपस में? कमाल है। मगर बशीर, आपने तो कभी मेरे पीछे चूतड़ों के छेद में लंड नहीं डाला।”
“बशीर बोला, “नसरीन सब लोग ऐसा नहीं करते। ये अपने अपने शौंक की बात है। मुझे ये शौक नहीं है I और फिर जब मर्द का खड़ा मोटा लंड औरत की गांड के छेद में जाता है तो औरत को दर्द भी बहुत होता है I ये गांड चुदाई मर्दों का शौक होता है, बहुत कम औरतों को इसमें मजा आता है।”
“फिर कुछ रुक कर बशीर बोला, “फिर भी आप तो कह रहे हो बहुत सी औरतें शौक शौक गांड भी चुदवाती हैं।”
“मेरे हाथ में बशीर का लंड था। मैं बशीर की ये बात तो समझ रही थी, कि ये सिर्फ फिल्म है सच्चाई नहीं। मगर मेरे चूतड़ों के छेद – मेरी गांड में भी कुछ झनझनाहट जैसा हो रहा था। मेरा मन भी बशीर का लंड गांड में लेने का कर रहा था।”
“मैंने बशीर का लंड हल्के से दबाते हुए कहा, “मगर बशीर, उस फिल्म में तो उस लड़की को बड़ा मजा आ रहा है।”
“मेरा इतना कहते ही बशीर समझ गया कि मैं भी गांड चुदवाना चाहती थी। बशीर ने मेरी चूत सहलाते हुए पूछा, “नसरीन तुम्हें लेना है पीछे वाले छेद में?”
“मैं कुछ नहीं बोली। मेरी चुप्पी मेरी हां ही थी। बशीर बोला, “देखो नसरीन अगर तुम्हारा मन है तो मैं करता हूं। अगर जरा सा भी दर्द हुआ तो मुझे बता देना। फिर मैं नहीं करूंगा।”
“अब मैं धीरे से बोली, “ठीक है बशीर।”
“बशीर उठा और मेज से क्रीम की टयूब उठा लाया। मैंने सोचा, फिल्म में तो लड़के ने कोइ क्रीम वगैरह नहीं लगाई, फिर बशीर क्रीम क्यों लाया है।”
“बशीर ने कहा, ” नसरीन उस लड़की की तरह बेड के किनारे पर चूतड़ पीछे करके उलटा लेट जाओ।”
“मैं धीरे से बोली, “ठीक है बशीर।” मैंने वैसा ही किया और बेड के किनारे पर चूतड़ उठा कर उल्टी लेट गयी। बशीर की बातों से इतना तो मैं समझ गयी थी कि बशीर को पीछे चूतड़ों के छेद में लंड डालने में कोइ ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। मगर मैं ही कौन सी चुदाई की बहुत बड़ी खिलाड़ी थी। बशीर के लंड को छोड़ मैंने तो किसी बारह साल के लड़के की भी लुल्ली नहीं देखी थी।”
“मुझे क्या पता था कि मेरी चूतड़ों के छेद, मेरी गांड के छेद की क्या हालत होने वाली थी। ये तो मुझे तब पता चला जब बशीर ने अपना लंड मेरी गांड के छेद में थोड़ा सा डाला, और मुझे लगा आज का दिन मेरी जिंदगी का आख़री दिन है। इतना दर्द हुआ मुझे कि मैं बता नहीं सकती। मगर फिर मैंने सोचा, चूत की पहली चुदाई में भी तो दर्द हुआ ही था। मैं कुछ नहीं बोली, बस वैसे ही चूतड़ उठा कर लेटी रही।”
“अपना मोटा लंड मेरी गांड के छेद में डालने से पहले बशीर ने मेरे चूतड़ खोले और मेरी गांड का छेद अपनी जुबान से चाटने लगा। मजे के मारे मेरे चूतड़ अपने आप ही हिलने लगे। मैं सोच रही थी, ये चुदाई का मजा भी क्या मजा होता है।”
“कुछ देर मेरे चूतड़ चाटने के बाद बशीर ने क्रीम मेरी गांड के छेद के अंदर और शायद अपने लंड पर लगाई और थोड़ा सा लंड मेरे चूतड़ों के छेद में डाला और फिर रुक गया। बशीर कोइ पांच मिनट से ज्यादा ऐसे ही लंड मेरे चूतड़ों के छेद में डाले रुका रहा। बीच-बीच में बस लंड को थोड़ा सा छेद के अंदर और बाहर कर देता था, मगर पूरा लंड अंदर नहीं डाल रहा था।”
बशीर का लंड मेरी गांड के छेद में ही था। कुछ ही देर में मुझे लगा की दर्द कम हो गया है। बशीर ने मुझसे पूछा, “नसरीन ठीक हो ना।”
“मैंने बिना पीछे देखे ही कहा “हां बशीर ठीक हूं।”
“बशीर ने लंड मेरी गांड के छेद में से बाहर निकाल लिया। जब बशीर ने लंड बाहर निकाला मुझे अजीब सा ही मजा आया। तब मुझे लगा मेरी गांड का छेद खुल गया है। मैंने छेद बंद किया, तब मुझे महसूस हुआ कि छेद सच में थोड़ा सा फ़ैल सा गया था।”
“बशीर ने उंगली से क्रीम मेरी गांड के अंदर लगाई। कहां बशीर का मोटा लंड और कहां बशीर के उंगली। मगर जब बशीर की उंगली मेरी गांड में घुसी तो मुझे जन्नत का मजा मिला और मेरे मुंह से सिसकारी निकली ,”अअअअअह बशीर।”
“बशीर ने खूब सारी क्रीम अपने लंड और मेरी गांड में लगाई और लंड गांड के छेद पर रख कर अंदर की तरफ धकेला। थोड़ा लंड तो आराम से गया। मगर जैसे ही बशीर ने लंड थोड़ा कर अंदर किया तो मुझे फिर दर्द हुआ और मैंने कहा, “नहीं बशीर रहने देते हैं। मुझसे नहीं होगा। बड़ा दुखता है।”
“बशीर रुक तो गया, मगर लंड बाहर नहीं निकाला। कुछ देर में ये दर्द भी कम हो गया। बशीर का लंड मेरी गांड में शायद आधा ही गया था। जब बशीर ने कुछ नहीं किया तो मुझे लगा शायद अब बशीर लंड और अंदर नहीं डालेगा।”
“बशीर ने फिर लंड बहार निकाला और फिर से क्रीम से सनी हुई उंगली मेरी गांड के छेद में डाल दी। बशीर के उंगली आराम से मेरी गांड में चली गयी और मुझे बड़ा ही अच्छा लगा।”
“मैं अभी सोच ही रही थे कि अब बशीर क्या करेगा कि बशीर ने फिर लंड मेरी गांड के छेद पर रख दिया। बशीर कुछ रुका और धीरे-धीरे करके आधा लंड गांड में बिठा दिया। मुझे दर्द भी हो रहा था और हैरानी भी हो रही थी कि ये कैसी गांड चुदाई है। फिल्म में तो ऐसा कुछ नहीं था। फिल्म में तो लड़का-लड़की कि गांड में एक झटके के साथ पूरा लंड छेद के अंदर तक बिठा देता था और चुदाई चालू हो जाती थी।”
“बशीर ने लंड थोड़ा बाहर की तरफ किया, मगर गांड में से निकाला नहीं। बशीर ने लंड पर और क्रीम लगाई और मुझे कमर से पकड़ लिया। मुझे तब भी समझ नहीं आया कि क्या होने वाला था।”
“बशीर कुछ सेकंड के लिए रुका और एक ही झटके से लंड पूरा मेरी गांड में डाल दिया। मेरी दर्द के मारे बिलबिलाते हुए बोली, “नहीं बशीर, बस मुझे नहीं करवानी गांड चुदाई। निकाल लो लंड बाहर बशीर, मेरी जान निकल रही है।”
“मगर अब बशीर नहीं रुका और मेरे गांड में लंड जोर-जोर से अंदर बाहर करने लगा। दर्द के मारे मेरा बुरा हाल था। मेरी आंखों से आंसू आ गये। मैंने बशीर को कहा, ” बशीर बस करो। मत करो। मुझे बड़ा दर्द हो रहा है।”
“मगर बशीर नहीं रुका, उल्टा और जोर जोर से लंड अंदर बाहर करने लगा। जल्दी ही मेरी गांड का छेद सुन्न हो गया। बशीर ने मेरी कमर से हाथ हटा लिए और दोनों हाथ नीचे करके मेरी चूचियां मसलने लगा। फिर बशीर ने एक हाथ पीछे से नीचे किया, और मेरी चूत का दाना रगड़ने लगा। कुछ ही देर में मेरी चूत पानी छोड़ने लगी।”
“गांड का छेद तो सुन्न ही था। अब तो बशीर का लंड गांड में महसूस ही नहीं हो रहा था। बशीर के मुंह से आवाजें आ रहीं थी, “ले मेरी नसरीन… मेरा लौड़ा गया तेरी गांड के अंदर… आज तेरी गांड भी चुद गयी… आआआआह नसरीन… आआआह… अअअअअह। बशीर जोर-जोर से आगे-पीछे हो रहा था।”
“मेरी चूत कभी भी पानी छोड़ सकती थी। मैंने बशीर का हाथ अपनी चूत पर से हटा दिया, और अपने हाथ से अपनी चूत का दाना रगड़ने लगी।
मैं अब अपनी चूत का दाना में खुद रगड़ रही थी।”
“बशीर ने दोनों हाथों से मेरी कमर फिर से पकड़ ली थी। अब मेरे चूतड़ों के छेद में सही धक्के लग रहे थे बशीर के लंड के। बशीर के हर धक्के के साथ मैं आगे की तरफ होती, मगर बशीर मुझे आगे जाने ही नहीं दे रहा था। जल्दी ही मुझे लगा मेरी चूत का पानी निकलने वाला है।”
“मैं जोर जोर से चूत का दाना रगड़ने लगी और चूतड़ हिलाने लगी। गांड के छेद पर तो कुछ भी महसूस ही नहीं हो रहा था। तभी बशीर ने एक ऊंची आवाज निकाली, “आआआआह… नसरीन… ले निकला तेरी गांड में… आआआह और एक जोरदार धक्का लगाने के बाद बशीर रुक गया।”
“मुझे साफ़ महसूस हो रहा था कि बशीर के लंड का गरम-गरम पानी मेरे चूतड़ों के छेद में गिर कर अंदर तक जा रहा था।”
“कुछ रुकने के बाद कब बशीर ने लंड मेरी गांड में से बाहर निकाला मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ। मैं ऐसे ही आगे की तरफ हो गयी और सीधी हो कर चूत का दाना रगड़ती रही। जल्दी ही मेरी चूत का पानी निकल गया। बशीर मेरे साथ ही लेट गया।”
“पंद्रह मिनट गुजरने के बाद लगा मेरी गांड दुःख रही है। मैंने बशीर से कहा, “बशीर मेरी गांड का छेद बड़ा दुख रहा है।”
बशीर ने कहा, “चलो चूतड़ इधर करो, देखता हूं।”
“मैं बिस्तर पर कुहनियों और घुटनों के बल लेट गयी और चूतड़ बशीर की तरफ कर दिए। बशीर ने हाथों से चूतड़ खोले और मेरी गांड के छेद को देख कर बोला, “कुछ नहीं नसरीन ये थोड़ी फूल गयी है, अभी ठीक कर देता हूं।”
“ये कह कर बशीर मेरी गांड के छेद पर जुबान फेरने लगा। बशीर के जुबान जब मेरे चूतड़ों के छेद पर लगी तो मुझे बड़ा ही सुकून सा मिला।”
“फिर बशीर उठा और कोइ क्रीम ला कर गांड के छेद पर लगा दी और कहा, “नसरीन दो तीन दिन ये क्रीम लगानी पड़ेगी, ठीक हो जाएगा।”
“मेरी पहली गांड चुदाई का तजुर्बा अच्छा नहीं था। मैंने थोड़ा गुस्से से बशीर से पूछा, “बशीर जब मैंने तुम्हें कहा था मुझे दर्द हो रहा है, तो तुम रुके क्यों नहीं। चुदाई बंद क्यों नहीं की, लंड बाहर क्यों नहीं निकाला?”
“बशीर ने कहा, “नसरीन कोइ भी काम पहले पहल करो तो थोड़ी बहुत तकलीफ तो होती ही है। जब शादी के बाद तुमने पहली बार मुझ से चूत चुदवाई थी तब भी तो ऐसा ही हुआ था।”
“मैं चुप रही मगर बशीर ही जरा सा हंसते हुए बोला, “नसरीन मुझे तो ऐसा मजा आ रहा था जैसा मजा तुम्हारी कुंवारी सील बंद टाइट चूत की पहली चुदाई करते हुए आया था। तुम्हारी गांड के छेद ने मेरा लंड जकड़ा हुआ था। मेरे सर पर चुदाई का भूत सवार था। मैं क्या करता? अब मुझे समझ आया की कई मर्द गांड चुदाई में इतनी दिलचस्पी क्यों लेते हैं।”
“फिर बशीर थोड़ा रुक कर बोला, ” लेकिन नसरीन अगर तुम्हें ये गांड चुदाई अच्छी नहीं लगी तो आगे से नहीं करेंगे।”
“ये कह कर बशीर ने मेरे होंठ अपने होठों में ले लिए और अपनी उंगली मेरी चूत में घुसेड़ दी।”
“बशीर के इतना कहने और करने से ही मेरा गुस्सा काफूर हो गया। लेकिन इसके बाद हमारी गांड चुदाई नहीं हुई।”
“हमारी जिंदगी हंसी खुशी कट रही थी। अच्छी सास और बढ़िया लंड और बढ़िया चोदने वाला शौहर। और क्या चाहिए होता है एक औरत को।”
नसरीन बोलती जा रही थी, “असलम दस साल का था – अचानक मेरी सास फातिमा बेगम का इंतकाल हो गया। ये हमारे लिए बड़ी ही दुःख कि घटना थी। मुझे तो मेरी सास का बड़ा सहारा था। लेकिन मौत पर किसका जोर चलता है। सास के इंतकाल के बाद भी दस साल असलम अपनी दादी के कमरे में ही सोता था।”
“जिंदगी कि गाड़ी चलती जा रही थी – वक़्त गुजरता जा रहा था।”
“आठ साल देखते देखते गुजर गए। असलम अट्ठारह का हो गया था और कालेज जाना शुरू हो गया था। मेरी और बशीर की चुदाई पहले की ही तरह जारी थी।”
“तभी एक अनहोनी हुई जो कहर बन कर हम पर टूट पड़ी। बशीर को एक दिन हार्ट अटैक आया और वो चल बसा।”
जब असलम अट्ठारह साल का हुआ तो नसरीन के शौहर बशीर की दिल के दौरे से इंतकाल हो गया। नसरीन की कहानी जारी थी।
नसरीन बता रही थी, “बशीर के मौत ने मुझे और असलम को तोड़ कर रख दिया। वक़्त के साथ असलम ने बड़ी हिम्मत से काम लिया और और अपने आप को संभाल लिया। मगर मैं अपने को नहीं संभाल सकी।”
“मुझे बशीर के साथ गुजारा वक़्त याद आता – बशीर की चुदाई याद आती। वो रातें याद आती जब बशीर और मैं वो चुदाई कि फ़िल्में देखते हुए चुदाई करते थे। वो वक़्त याद आते ही मेरी चूत पानी छोड़ देती और मेरा चुदाई का मन होने लगता। लेकिन अब हालात ऐसे बन चुके थे कि लंड तो था नहीं, उंगली भी चूत में लेने का मन नहीं करता था।”
“बशीर के साथ हुई अनगिनत मस्त चुदाईयों की यादें मुझे और उदास कर देती थी। बशीर का मेरी चूत चूसना, बशीर का लंड मेरे मुंह में – ये बातें याद कर-कर के मेरी चूत में बरसात होने लगती। एक दिन तो मुझे अपनी पहली और आख़री गांड चुदाई याद आ गयी। मैं सोचने लगी क्यों मैंने बशीर से दुबारा गांड नहीं चुदवाई। मुझे दर्द हुआ था तो क्या हुआ, बशीर को तो मजा आया ही था।”
“असलम अब कालेज जाना शुरू हो चुका था। असलम खुले शरीर का लड़का निकल रहा था। लाल रंग की बशीर की बुलेट मोटर साइकिल अब असलम चलाने लग गया था। असलम जब बुलेट पर बैठता तो मुझे उसमें बशीर के झलक दिखाई देती थी। सदर के मेन बाजार में जमी हुई हमारी दुकान जमाल के भरोसे पर थी और अच्छी चल रही थी।”
“25-26 साल का जमाल बशीर का बहुत कि भरोसेमंद नौकर था। बशीर कई बार काम से दो-दो तीन-तीन दिन के लिए आगरा से बाहर चला जाता था, तब दुकान जमाल ही संभालता था। बशीर के ना रहने पर भी हमारी दुकान जमाल ने अच्छे से संभाली हुई थी। जमाल शादी-शुदा था और एक बेटी का पिता भी। जमाल की शादी में मैं भी गयी थी। जमाल की बीवी सायरा बड़ी ही अच्छी लड़की थी।”
“ऐसे ही एक साल और गुजर गया। असलम ने अपने आप को पूरी तरह से संभाल लिया था, मगर मेरी उदासी दूर नहीं हो रही थी। बशीर के साथ गुजरा वक़्त और उसके साथ हुई चुदाईयों के यादें मुझे बेचैन कर देती थी।”
“एक दिन जमाल आया और उसने असलम से कहा, “असलम भैया, भाभी कब तक ऐसे ही उदास रहेगी। भाभी को भी अपने को संभालना चाहिए।”
असलम भी क्या जवाब देता। वो कुछ सोचने लगा। फिर जमाल ही बोला, “भैया मैं एक बात बोलूं?”
असलम जमाल की तरफ देखने लगा। जमाल ने कहा, “असलम भैया, भाभी क्यों नहीं दूकान पर आना शुरू करती। अब तो ज़माना भी बदल चुका है। बशीर भाई के बाद अब भाभी ही तो दुकान की मालिक है। मालिक दुकान पर बैठेगा तो अच्छा रहेगा। भाभी का भी मन बहल जाएगा। जब भी मुझे छोटे-मोटे काम के लिए कहीं जाना होता है तो मुझे दुकान बंद कर के जाना पड़ता है। भाभी रहेगी तो दुकान बंद नहीं करनी पड़ेगी।”
जमाल कह रहा था, “भाभी दस ग्यारह बजे तक दुकान पर आ जाया करें। दोपहर एक से तीन बजे तक दो घंटे के लिए बाजार बंद सा ही रहता है और दूकान में भी कारोबार ना के बराबर होता है। मैं ऊपर का कमरा ठीक करवा दूंगा। एक बजे से तीन बजे तक दो घंटे भाभी ऊपर आराम करे। चार बजे आप कालेज से आ ही जाते हो, तब भाभी घर लौट जाये।”
“असलम को भी जमाल की बात जची। फिर असलम ने मुझ से बात की।”
“मुझे असलम की ये मेरे दुकान पर जाने की बात बड़ी अजीब से लगी।”
मैंने असंजस से कहा, “असलम मैं तो कभी घर से ही बाहर नहीं गई, दुकान पर मैं कैसे बैठूंगी – क्या करूंगी।”
असलम बोला, “अम्मी हालत भी तो बदले हैं। आप कब तक ऐसे ही उदास रहोगी। जो होना था, वो तो हो चुका। अब आपको अपने को संभालना चाहिए। मुझसे भी आपका ऐसे चुप-चाप रहना देखा नहीं जाता। दूकान पर जाने से रोज नए-नए लोग दिखाई देंगे, उनसे बात-चीत होगी तो आपका मन भी बहल जायेगा।”
फिर असलम थोड़ा रुक कर बोला, “जमाल कह रहा था वो ऊपर का कमरा ठीक करवा देगा। बेड लगा ही हुआ है – एक छोटा बाथरूम भी ऊपर बना हुआ है। मैं जमाल से बोल कर एक छोटा TV और कैसेट प्लेयर भी लगवा दूंगा। दुकान फ़िल्मी कैसटों से भरी पड़ी है। जब ऊपर जाओ तो मनमर्जी की फिल्म लगा लो”।
“असलम के फ़िल्मी कैसटों के बारे में कहते ही मेरी आखों के आगे चुदाई की वो फ़िल्में घूम गयी, जो मैं और बशीर इकट्ठे देखा करते थे और चुदाई किया करते थे। मगर फिर ध्यान आया जमाल के होते ऐसी फिल्में कैसे देखूंगी? जल्दी से मैंने ये ख्याल अपने दिमाग से झटक दिया।”
“असलम हर दो दिन बाद यही दुकान पर जाने वाली बात छेड़ देता। धीरे-धीरे मुझे भी लगने लगा असलम ठीक ही कह रहा है। कब तक ऐसे ही घर पर मायूस बैठी रहूंगी। मुझे दुखी देख कर असलम भी दुखी हो जाता है।”
“मैंने दूकान पर जाना शुरू कर दिया। असलम कालेज जाते जाते दस साढ़े दस बजे मुझे दुकान पर छोड़ देता। मैं जमाल को काम करते हुए देखती रहती। कोई लड़की या औरत आती तो दो बातें उनके साथ भी हो जाती थी।”
“दोपहर एक बजे से तीन बजे ऊपर कमरे में चली जाती। साथ या तो कोइ मैगज़ीन ले जाती या कोइ नयी फिल्म की कैसेट ले जाती। शाम चार बजे असलम कॉलेज से सीधा दुकान पर आ जाता, तो मैं घर आ जाती और घर के कामों में लग जाती।”
“सब ठीक था। फिर मैंने दुकान की किताबों के बारे में जानना शुरू किया। वही थे जासूसी नॉवल, फ़िल्मी मैगज़ीन, कुछ धार्मिक किताबें, जंत्रिया औरतों के घरेलू मैगज़ीन और फिल्मों की कैसेट।”
“एक दिन जमाल कहीं गया हुआ था, मैं ऐसे ही कोने वाली मैगज़ीन की अलमारी के सामने खड़ी थी, तो मेरी नजर एक छोटी सी किताब पर पड़ी। ऊपर लिखा था ‘कच्ची जवानी के चस्के’। मुझे नाम कुछ अजीब सा लगा। मैंने एक मैगज़ीन उठाई तो नीचे की दूसरी मैगज़ीन का नाम था ‘कमसिन हसीना की हवस”।
“मुझे बड़े अजीब से नाम लगे। और देखा तो वो अलमारी पूरी ऐसे ही मैगज़ीन, किताबों से भरी पड़ी थी। ‘एक हसीना सुनसान हवेली में’, ‘पहली रात के ताबड़-तोड़ किस्से’, ‘जीजा की प्यारी साली कुंवारी।”
“मैंने एक मैगज़ीन उठाई और अपनी कुर्सी पर आ कर पढ़ने लगी। मैगज़ीन में बस चूत लंड और चुदाई ही नहीं लिखा था, बाकी सब था। फिर मुझे ध्यान आया कि कुछ कच्ची उम्र के लड़के-लड़कियां जमाल को बड़े धीरे से कुछ बोलते थे और जमाल उनको अलमारी में से छोटी सी मैगज़ीन निकाल कर पकड़ा देता है। बहुत से लड़के-लड़कियां ये किताबें ले जाते हैं।”
“खैर इस बात की तरफ मैंने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, जमाना तो बदल ही रहा था।”
“मैंने अलमारी में से एक मैगज़ीन निकाली और बैठ कर कहानियां पढ़ने लगी। मैगजीन में कई छोटी-छोटी कामुक कहानियां थी। कहानियां पढ़ते-पढ़ते मेरी चूत गीली होने लग गयी। मन तो कर रहा था चूत में उंगली करूं, मगर कोइ भी कभी भी आ सकता था। तभी जमाल आ गया और मैंने वो मैगज़ीन मेज की दराज में बाकी कागज़ों के नीचे डाल दी।”
“शाम चार बजे असलम दूकान पर आया तो मैं रिक्शा लेकर घर वापस आ गयी। घर जाते हुए मैं उस मैगज़ीन के बारे में भूल सी गयी। अगले दिन दुकान पर गयी तो उस मैगज़ीन का ध्यान आया। मेज की दराज खोली तो देखा वो मैगज़ीन दराज में नहीं थी।”
“मैगज़ीन दराज में ना देख कर मेरी हालत खराब हो गयी।”
“मैं सोचने लगी क्या असलम के हाथ वो मैगज़ीन पड़ गयी थी, या जमाल ने वो वहां से उठाई थी।”
“उधर एक बार ये कामुक कहानियां पढ़ने के बाद मुझे अब इन कामुक कहानियों को पढ़ने का चस्का लग गया था। मैं अक्सर मौक़ा पा कर जमाल के नजर बचा कर अलमारी में से वो मैगज़ीन निकालती और छुप-छुप कर पढ़ने लग जाती।”
“मुझे अच्छी तरह मालूम था कि जमाल भी मुझे ये कहानियां पढ़ते देख चुका था – मगर हम दोनों इस बारे में अनजान होने का नाटक कर रहे थे।”
“एक दिन मेरे हाथ जो मैगज़ीन लगी, उसमें एक कहानी थी ‘देवर ने भाभी पटाई, रात के अंधेरे में बनी लुगाई’। कहानी कुछ ज्यादा की कामुक थी। जवान देवर और हमउम्र भाभी की चुदाई की कहानी थी। कहानी पढ़ते-पढ़ते मेरी चूत ने खूब पानी छोड़ा। मेरा मन चूत में कुछ डालने का होने लगा।”
“मगर मैं क्या करती। दुकान में बैठे-बैठे तो चूत में कुछ डाल कर मजा लेना नामुमकिन था। मन मार कर मैंने वो मैगज़ीन दराज में ही कागजों के नीचे रख ली। ये सोच कर कि अगले दिन दुबारा इसकी कहानियां पढूंगी और सोचूंगी कि चूत का पानी छुड़ाने के लिए क्या किया जा सकता है।”
“अगले दिन मैं फिर वही मैगजीन पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते जल्दी ही मेरी चूत ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया। मेरा मन किया मैगजीन ऊपर कमरे में ले जाऊं और पढ़ते-पढ़ते चूत में उंगली करके ही मजा ले लूं। घड़ी पर नजर गयी तो अभी साढ़े ग्यारह ही बजे थी। मेरा ऊपर कमरे में जाने का टाइम तो एक बजे का था।”
“मैंने फिर उसी मैगजीन की कहानियां पढ़नी शुरू कर दी। कहानियां इतनी कामुक थी, कि मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मेरी चूत कुलबुला रही थी। आखिर दोपहर बारह बजे मैं उठ गयी और मैगजीन चुन्नी के नीचे छुपा कर जमाल से बोली, “जमाल, मेरा लेटने का मन कर रहा है, मैं ऊपर जाती हूं।”
“जमाल ने खाली हां में सर हिला दिया और अपने काम में लग गया।”
“ऊपर के कमरे में जा कर मैंने कहानी पढ़नी शुरू की। कहानी इतनी कामुक थी की मेरा मन फिर से अपनी चूत में कुछ डालने का होने लगा। बशीर के मोटा लंड ले चुकी मेरी चूत में उंगली का तो कोइ असर ही नहीं होता था। चूत का दाना रगड़ कर पानी तो छूट जाता, मगर वो मजा नहीं आता था जो चूत में मोटा सा लम्बा सा लंड जाने से आता है।”
“मैंने इधर-उधर देखा कि चूत में डालने के लिए लंड जैसी कोइ चीज़ मिल जाए और उसी मैं अपनी चूत में डाल कर चूत का पानी छुड़ा लूं।”
“तभी मुझे एक मेज पर एक मोटा सा प्लास्टिक का गोल कवर दिखाई दिया। ये एक गिफ्ट पैकेट था और इसके अंदर गिफ्ट देने के लिए दो पेनों का एक सेट था।”
“मुझे चूत में लेने के लिए बिल्कुल सही लगा। कवर डेढ़ इंच, दो इंच मोटा था और छह इंच के करीब लम्बा था। कवर का आगे का हिस्सा गोल था, बिल्कुल लंड की तरह।”
“ये पैन का कवर बशीर के लंड जैसा तो नहीं था, मगर कम से कम उंगली से तो अच्छा ही था।”
“मैंने कहानी पढ़नी शुरू की, और थूक लगा कर पैन का कवर चूत में डाल लिया और उसे आगे-पीछे करना शुरू कर दिया।”
“कामुक कहानी और मेरी चूत की लंड की प्यास। पैन के कवर के झटके मेरी चूत ज्यादा नहीं झेल पायी और दस मिनट में ही चूत पानी छोड़ गयी और मुझे मजा आ गया। बड़े अरसे के बाद अच्छा सा मजा आया था।”
“मुझे लगा ये पैन का कवर चूत में डाल कर पानी छुड़ाना भी ठीक ही था, मजा तो आया ही था। जब चूत के मजे का जूनून सर से उतरा तो मैं मैगज़ीन अपनी चुन्नी में छुपा कर नीचे उतरी। जमाल ने एक नज़र मेरी तरफ देखा और ग्राहकों के साथ व्यस्त हो गया। मौक़ा पा कर मैंने वो मैगज़ीन अलमारी में रख दी।”
“दुकान में बैठे-बैठे मैं जमाल के सामने तो ये कामुक कहानियां पढ़ने लग ही गयी थी। मैं कामुक कहानी पढ़ती रहती और बीच-बीच में चूत को खुजला भी लेती। जमाल अनजान बना अपना काम करता रहता और मैं चुपके से कामुक कहानियां पढ़ती रहती।”
“कहानियां पढ़ते-पढ़ते जिस दिन चूत में कुछ डालने का मन होता, उस दिन मैं एक बजने का भी इंतजार नहीं करती थी, और जमाल को बोल देती, “जमाल मेरा आराम करने का मन हो रहा है।” जमाल भी सर हिला देता और मैं मैगजीन साथ ही ऊपर ले जाती और पेन के कवर को चूत में डाल कर मजा ले लेती।”
“ऐसा तो हो ही नहीं सकता था कि जमाल को मालूम ना हो कि वक़्त बेवक़्त मैं मैगजीन अपने साथ ऊपर लेकर जाती हूं। जान कर भी अनजान बने जमाल ने कभी मुझे ये एहसास नहीं होने दिया कि वो ये जानता था। शायद वो बशीर के ना होने के कारण मेरी मजबूरी समझता था। जब मैं ऊपर कमरे में होती थी, तो जमाल कभी ऊपर नहीं आता था।”
“एक दिन ऐसी ही मैगज़ीन ‘कच्ची कमसिन जवानी के किस्से’ मेरे हाथ लगी। इस मैगज़ीन में भी बहुत ही कामुक कहनियां थी। पढ़ते-पढ़ते मेरी चूत उस दिन की तरह गीली हो गयी और उसी वक़्त पेन का कवर चूत में लेने का मन करने लगा।”
“घड़ी की तरफ देखा तो अभी बारह ही बजे थे। मेरा ऊपर कमरे में जाने का टाइम अभी नहीं हुआ था। मगर मेरी चूत की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि मेरा उसी वक़्त चूत में कुछ डालने का मन हो रहा था। मैंने मैगज़ीन उठाई और एक बजे जमाल से बोली, “जमाल मैं जरा ऊपर आराम कर लूं।”
जमाल ने एक बार घड़ी की तरफ देखा और कहा। “ठीक है भाभी।” और साथ ही अख़बार में लिपटी मैगज़ीन जैसी कुछ चीज़ मेरे हाथ में दे दी और बोला, “इनको भी देख लेना भाभी।”
“इनको भी देख लेना भाभी?”
मैं सोचने लगी “इनको भी देख लेना भाभी”, इसका क्या मतलब हो सकता है? तो क्या ये भी वैसी ही मैगज़ीन थी जैसी मैं अलमारी में रखी थी और जिन्हें मैं पढ़ा करती थी?”
“ऊपर जाकर मैंने अखबार में से मैगज़ीन निकाली तो कोइ विदेशी मैगज़ीन थी। चुदाई की रंगीन फोटोएं थी। लंड चूत में गया हुआ, गांड में गया हुआ मुंह में लिया हुआ। लंड में से निकला ढेर सारा सफ़ेद-सफ़ेद पानी चूचियों पर फैला हुआ। मैंने सोचा जमाल ने मुझे ये मैगज़ीन क्यों दी।”
“मैगज़ीन के साथ एक छोटी सी तीस पैंतीस पन्नों की किताब थी। मस्त राम मस्ताना के लिखी हुई।”
“खोल कर पढ़ा तो हैरान हो गयी। पहली ही कहानी का शीर्षक था ‘सेठानी की रगड़ाई वाली चुदाई’। अगली कहानी थी ‘जीजा ने तोड़ी साली की सील’। उससे अगली कहानी थी ‘आओ गांड-गांड खेलें’।”
“मेरा माथा घूम गया। अब तक मैं जो कहानियां पढ़ती थी वो तो इन कहानियों के सामने कुछ भी नहीं थीं।”
“मैंने एक के बाद एक कहानी पढ़नी शुरू कर दी। पढ़ते-पढ़ते मेरी चूत इतनी गरम हो गयी कि मुझे पेन का कवर चूत में लेने की जरूरत महसूस होने लगी। मैंने पेन का कवर उठाया और थूक लगा कर अपनी चूत में डाला और आगे-पीछे करने लगी।”
“आधी कहानी पढ़ने के बाद मेरी चूत पूरी तरह गीली हो गयी और मजा आने को हो गया। मैंने किताब बिस्तर पर रख दी और आँखें बंद करके पेन के कवर को चूत में जोर-जोर से आगे-पीछे करके अपनी चूत चोदने लगी।”
“मेरी बंद आंखों के आगे बशीर था। ऐसा लग रहा था जैसे मेरी चूत में पेन का कवर नहीं बशीर का लंड गया हुआ है और मेरी चुदाई कर रहा है। मेरे मुंह से आआह आह आअह की आवाजें निकल रही थी।”
“तभी मुझे कुछ आवाज सी सुनाई दी, जैसे किसी ने मुझसे कुछ कहा हो। पहले तो मुझे लगा मेरा वहम था, मगर वही आवाज फिर से आई।”
“मैं कुछ मदद करूं?”
“चौंक कर मैंने आखें खोली तो मुझे कोइ भी दिखाई नहीं दिया। वो आवाज शायद मेरा वहम ही था। मैं आंखें बंद करके फिर से पेन के कवर को चूत में आगे-पीछे करने लगी।”
“अब ये अक्सर होने लगा। जिस दिन मैं मैगजीन उठा कर ऊपर जाते हुए जमाल को बोलती, “जमाल मैं चलूं थोड़ा आराम कर लूं”, तो जमाल मुझे अखबार में लपेट कर कुछ और मैगजीन का बंडल पकड़ा देता। हम दोनों जानते थे कि बंडल में किस तरह के मैगजीन हैं, मगर दोनों ही अनजान से बने हुए थे।”
“ऐसे ही चलता जा रहा था। जमाल मुझे मैगजीन देता मैं ऊपर जा कर चुदाई के तस्वीरें देखती, चुदाई की कहानियां पढ़ती और पेन का कवर चूत में ले कर बशीर से चुदाई के ख्यालों से चूत का पानी छुड़ा लेती।”
“ऐसे ही एक दिन कहानी पढ़ते-पढ़ते पेन का कवर चूत में डाल कर मैं बशीर से चुदाई के ख्यालों में खोई हुई थी कि मुझे फिर वही आवाज सुनाई दी – “मैं कुछ मदद करूं।”
“पहले तो मैंने सोचा उस दिन की तरह मेरा वहम ही होगा।”
“मगर मुझे वही आवाज सुनाई दी, “मैं कुछ मदद करूं? इस बार ऐसा लगा जैसे आवाज मेरे बिल्कुल पास से आयी हो।”
“मैंने आंखें खोली तो मैं हैरान रह गयी। सामने जमाल खड़ा था।”
मेरी सलवार घुटनों तक उतरी हुई थी। पेन का कवर मेरी चूत में था। और जमाल सामने था।”
नसरीन बता रही थी, “जमाल को उस वक़्त इस तरह देख कर मेरी तो आवाज ही बंद हो गयी। मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था। मेरी चूत पूरी तरह गर्म थी। पैन का कवर मेरी चूत के अंदर ही था। मैं बस जमाल की तरफ देखती रही, और पैन का कवर चूत में आगे पीछे करती रही।”
“मुझे कुछ ना बोलते हुए देख जमाल आगे आया और धीरे से पैन का कवर मेरी चूत से निकल दिया। खड़े-खड़े जमाल ने अपनी पेंट और अंडरवेअर दोनों उतार दिए। जमाल का मोटा लंड डंडे की तरह एक-दम सीधा खड़ा था।”
“जमाल खड़े लंड के साथ एक कदम आगे आया और जो सलवार मैंने घुटनों तक सरकाई हुई थी, उसे पूरा उतार दिया।”
“जमाल का खड़ा लंड बशीर के लंड जैसा ही मोटा और लम्बा था। मन तो कर रहा था उठ कर जमाल का लंड मुंह में ले लूं। एक अरसा ही हो गया था लंड चूसे हुए।”
“लेकिन मेरा दिमाग सुन्न था, आवाज बंद थी और मुझे तो जैसे लकवा मार चुका था। ना मैं बोल रही थी ना ही हिल-डुल रही थी।”
“जमाल ने आगे आ कर मेरी टांगें चौड़ी की और अपना मुंह मेरी चूत में घुसेड़ दिया और अपने होठों से मेरी चूत का दाना चूसने लगा – बिल्कुल वैसे ही जैसे बशीर चूसा करता था।”
“जमाल के चूत चूसते ही मैं मस्त हो गयी। फर्रर से मेरी चूत ने ढेर सारा पानी छोड़ा और मेरे चूतड़ अपने आप ही हिलने लग गए।”
“जमाल के लिए ये एक इशारा था कि आओ जमाल और डालो मेरी चूत में जो कुछ भी है तुम्हारे पास।”
“मगर जमाल था कि मेरी चूत चूसता ही जा रहा था, चूसता ही जा रहा था।”
“मेरी चूत चिकने पानी से भर चुकी थी। जब जमाल को लगा कि मैं अब चुदाई के लिए पूरी तरह तैयार हूं। तो कुछ और चूत चुसाई के बाद जमाल हटा, उसने मेरी टांगें उठा कर अपने कंधों पर रखी और आगे की तरफ होने लगा। मेरी चूत अपने आप ही ऊपर उठती चली गयी।”
”जमाल ने लंड चूत की दरार में ऊपर-नीचे किया और चूत का छेद ढूंढ कर लंड छेद पर टिका दिया। जमाल कुछ सेकंड के लिए रुका और “लो भाभी गया अंदर” बोलने के साथ एक ही झटके से फच्च के आवाज के साथ लंड मेरी चूत में बिठा दिया।”
“क्या लंड था। एक अरसे के बाद ऐसा सच-मुच का लंड मेरी चूत में गया था।”
“जमाल का लंड जैसे ही मेरी चूत में गया, पहली बार मेरी आवाज निकली ”आआह बशीर।”
“मैंने आंखें बंद कर ली, और चुदाई का इंतजार करने लगी। मुझे जमाल का लंड बशीर का लंड लग रहा था। मुझे लग रहा था ये बशीर था जिसने मेरी टांगें उठा कर अपने कंधों पर रखी हुई थी और मुझे बांहों में जकड़ कर चोदने जा रहा था।”
“जमाल ने लंड के धक्के लगाने शुरू कर दिए। जमाल के सख्त मोटे लंड के चुदाई के धक्के मेरी प्यासी चूत बहुत देर नहीं झेल पाई। एक लम्बे अरसे के बाद हो रही चुदाई में पांच सात मिनट में ही चूत पानी छोड़ गयी।”
“मेरे मुंह से अब निकला “अअअअअह… जमाल… निकल गया मेरा… मजा आ गया मुझे।”
“मैं झड़ चुकी थी, मगर जमाल का लंड खड़ा था और वैसा ही बांस की तरह का सख्त। मेरी चूत जमाल के खड़े लंड से भरी पड़ी थी।”
“जमाल चाहता तो उसी वक़्त एक बार मुझे और चोद लेता। लेकिन जमाल वैसे ही मेरे ऊपर लेटा रहा।”
“कुछ मिनटों के बाद जब जमाल को लगा कि मेरी चूत पूरा पानी छोड़ चुकी है, और मुझे पूरा मजा आ चुका है, तो जमाल अपना खड़ा लंड मेरी चूत में से निकालने लगा।”
“एक अरसे के बाद मेरी चुदाई हुई थी। मेरा मन एक बार और चुदाई करवाने का हो रहा था। जैसे ही जमाल लंड मेरी चूत से बाहर निकलने लगा मैंने जमाल को पकड़ लिया और बोली, “नहीं जमाल, अभी नहीं।”
“जमाल समझ गया कि मुझे एक चुदाई और चाहिए। जमाल रुक गया और लंड वापस मेरी चूत में डाल दिया।”
“इस बार जमाल ने मुझे अपनी बाहों में कस कर जकड़ कर लिया। फिर जो जमाल ने मुझे रगड़-रगड़ कर चोदा, मेरी चूत की परतें खोल कर रख दी I मेरे जिस्म के सारे जोड़ ढीले कर दिए I इस बार सही चुदाई हुई। मैं और जमाल इकट्ठे झड़े। मेरी चूत भर गयी जमाल के लंड के गर्म पानी से। इस चुदाई में जन्नत का मजा मिला मुझे – जैसा बशीर के साथ चुदाई में मिला करता था।”
“कुछ देर ऐसे ही मेरे ऊपर लेटने के बाद जमाल ने ढीला होता लंड चूत में से बाहर निकाला और कपड़े पहन कर बिना कुछ बोले नीचे चला गया।”
“सालों बाद चुदाई करवा के मुझे सुस्ती आ गयी थी। आधे घंटे के बाद मैं नीचे उतरी। जमाल ग्रहकों के साथ बिज़ी था, मैं जा कर कुर्सी पर बैठ गयी और वो मैगज़ीन मेज पर रख दिए।”
“जमाल के साथ तसल्ली के साथ हुई चुदाई के बाद मुझे ये मैगज़ीन बेकार लग रहे थे।”
“जमाल अपने काम में मसरूफ था, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। जमाल ने मेज पर से वो किताबें उठाई और अलमारी में रख दी। साढ़े चार बजे असलम आ गया और मैं घर चली गयी।”
“एक बार शुरू हुआ जमाल और मेरी चुदाई का ये सिलसिला फिर बंद नहीं हुआ। इसमें ख़ास बात बस यही थी, कि जमाल ने मुझे कभी मुझे चुदाई के लिए नहीं कहा। जब भी मेरा मन चुदाई का करता, मैं कोइ मैगज़ीन उठाती और चुप-चाप ऊपर कमरे में ना जा कर ये बोलती हुई जाती, “जमाल मैं ऊपर जा कर ज़रा आराम कर लूं।”
“मेरे ऐसा बोल कर जाने से जमाल समझ जाता कि मेरा उस दिन चुदने का मन है। जमाल अठारह बीस मिनट के बाद ऊपर आ जाता और हमारी चुदाई शुरू हो जाती।”
“शायद जमाल अठारह बीस मिनट का ये वक़्त भी मुझे अपनी चूत गरम करने के लिए दे देता था। बाकी का काम जमाल की मस्त चूत चुसाई पूरा कर देती थी।”
“इस दौरान ये और हुआ कि हम दोनों के बीच मालिक और नौकर की शर्म और लिहाज का एक पर्दा था वो पूरी तरह हट गया।”
“चुदाई के साथ साथ हमारी चुदाई के वक़्त होने वाली गंदी-गंदी सेक्सी बातें भी बढ़ती चली गयी।”
चुदाई करवाते हुए मजे के मारे मेरे मुंह से अब ये लफ्ज़ निकलते थे, “चोदो जमाल दबा कर चोदो – और रगड़ा लगाओ मेरी चूत को। झाग निकल दो मेरी फुद्दी में से। आआआह… और जोर से… जमाल मेरे राजा – चोद… चोद और चोद… आआआह… अअअअअह… जमाल मुंह में डालो मेरे… गांड चोद लो मेरी… दिन रात चोदा करो अपनी इस भाभी नसरीन को… फाड़ दो मेरी फुद्दी… सुजा दो फुला दो मेरी गांड चोद-चोद कर।”
जमाल भी कौन सा कम था। चुदाई करते हुए वो भी यही कुछ बोलता था, “आअह भाभी… मेरी नसरीन… ये लो मेरा लौड़ा – ये गया तुम्हारी फुद्दी में। आह भाभी मेरी जान जब तक कहोगी चोदता रहूंगा… गांड चोदूंगा… मुंह में डालूंगा… अअअअअह… चूसो मेरी नसरीन… चूसो मेरा लौड़ा… मजा आ गया। तेरी चुदाई के बिना नहीं रहा जाता। आअह… नसरीन… ले मेरा लौड़ा… गया तेरी फुद्दी में नसरीन… अअअअअह… ये ले निकल गया मेरे लंड का पानी तेरी चूत में।”
“लेकिन एक बात तो थी, चुदाई करते हुए हमारी ये चूत, लंड, फुद्दी, लौड़ा गांड चुदाई और मुंह में डालने वाली बातों से चुदाई का मजा दुगना-तिगुना हो जाता था।”
“मगर ये सारी बातें चुदाई के दौरान ही होती थी। आगे-पीछे ना तो जमाल ने मुझे कभी मेरे नाम नसरीन से बुलाया ना तो कभी अपना लंड चुसवाया। यहां तक कि जमाल चुदाई करते हुए मुझे बाहों में तो लेता था, मेरी चूत भी चूस लेता था मगर जमाल ने कभी मेरे होठों को भी नहीं चूसा। गांड चोदना, मुंह में लंड डालना और मुंह में लंड का पानी छुड़ाना तो दूर की बात थी।”
“जमाल कभी मेरी चूत चुसाई और चुदाई से आगे नहीं बढ़ा।”
“कभी-कभी तो ऐसा लगता था जमाल बशीर के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। लेकिन अगर ऐसा था भी तो जमाल बखूबी अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा था।”
“हर तीसरे-चौथे दिन की चुदाई से मेरे और जमाल के बीच जो भी रहा सहा शर्म लिहाज का पर्दा था, वो भी खत्म हो गया।”
“अब हम चुदाई वाली फिल्म टीवी पर लगा कर चुदाई करते, बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं और बशीर किया करते थे।”
“जो भी चुदाई की फ़िल्में मैं देखती थी, उनमें चूत चुसाई और लंड चुसाई खूब होती थी। एक दिन मैं जमाल से चुदने के लिए ऊपर कमरे में बैठी और एक मैगज़ीन देख रही थी, और जमाल आ गया। जमाल ने मेरे और अपने कपड़े उतार दिए। जमाल मुझे चोदने के लिए बिस्तर पर लिटाने ही वाला था की मैंने कहा, “जमाल आज खूब सारी चूत चूसो मेरी, कुछ ज्यादा ही चुसवाने का मन कर रहा है।”
जमाल ने कहा, “अगर ये बात है भाभी तो फिर आज आप को चूत चुसाई का वो मजा देता हूं, आप कभी भूलेंगी नहीं।”
“यह कह कर जमाल ने मुझे बेड के किनारे पर ही सीधा लिटा दिया। मेरी टांगें हवा में उठा दी और चौड़ी करके मेरी चूत की फांकें खोल दी और खुद फर्श पर बैठ कर मेरी चूत का दाना मुंह में ले कर चूसने लगा। चूत तो मेरी बशीर भी बड़ी चूसता था, और जमाल ने भी खूब चूत चूसी थी, मगर जमाल की इस तरह की चूत चुसाई ने तो जन्नत ही दिखा दी। जल्दी ही मेरी चूत फर्रर्र फर्रर्र करके पानी छोड़ने लगी।”
“मैने जमाल को कहा, “बस जमाल अब लंड डालो चूत में और चोदो अपनी नसरीन भाभी को, निकालो मेरी चूत का पानी।”
“मैंने सोचा जमाल मुझे बिस्तर पर लिटायेगा, मेरे चूतड़ों के नीचे तकिया रख कर मेरी चूत का छेद उठाएगा और लंड चूत में डाल कर चुदाई करेगा – जमाल हमेशा ऐसी ही चोदता था मुझे। लेकिन उस दिन जमाल ने मुझे वैसे ही लेटा रहने दिया। मेरी टांगें तो हवा में उठी ही हुई थी, और चूत भी सामने ही थी।”
“जमाल फर्श पर खड़ा हुआ और एक ही झटके में लंड मेरी चूत में अंदर तक बिठा दिया। इस तरह से लंड चूत में जाने का तो मजा ही बड़ा आया। मेरे मुंह से निकला, “आआह जमाल ये कैसे डाला है लंड, पूरा अंदर गया है तुम्हारा लंड मेरी चूत में। ऐसे ही चोदा करो मुझे।”
“जमाल ने उस दिन जो मेरी चुदाई की कि मजा ही आ गया। इस तरह से चुदाई में ना सिर्फ लंड पूरा बैठ रहा था, लंड के धक्के भी खूब जोरदार लग रहे थे। जमाल के टट्टे जब धक्के लगाते हुए मेरी चूत के निचले हिस्से से टकराते थे तो ठप्प ठप्प की आवाज के साथ अजीब सा ही मजा आता था।”
“ऐसे ही एक दिन मैं जब बेड के किनारे पर बैठी थी और जमाल मेरी चूत चूसने के लिए मुझे लिटाने ही वाला था, ना जाने मुझे क्या हुआ – जमाल का लंड जो बिल्कुल मेरी मुंह के सामने था, मैंने लंड अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगी।”
“कुछ देर के बाद जमाल ने मेरा सर पकड़ कर पीछे की तरफ करने लगा, जैसे लंड मेरे मुंह में से निकालना चाहता हो। मैं जमाल का लंड अभी और चूसना चाहती थी। मैंने जमाल के पीछे हाथ करके जमाल को चूतड़ों से पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया।”
“जमाल समझ गया कि मैं अभी और लंड चूसना चाहती हूं। जमाल ने बस इतना ही कहा, “आआआह भाभी, कैसे मस्त चूसती हैं आप। बड़ा मजा आ रहा है।”
“मैं लंड चूसती रही और एक हाथ से चूत का दाना रगड़ती रही। तभी जमाल ने मेरा सर पकड़ कर लंड मेरे मुंह से निकलने कि कोशिश की। जमाल को शायद मजा आने वाला हो गया होगा। मगर मैंने जमाल के चूतड़ों को दबा कर रखा और जमाल का लंड मुंह से नहीं निकलने दिया।”
“आखिर जमाल ने भी मेरा सर छोड़ दिया। फिर अचानक से जमाल बोलने लगा, “अअअअअह क्या चूसती हो भाभी अअअह… क़्या मजा आ रहा है भाभी तुम्हारी लंड चुसाई का… आआआह… आज तक क्यों नहीं चूसा मेरी जान? आआह क्या चूसती है तू आआआह… नसरीन निकलेगा तेरे मुंह में आज… अअअअअह… मेरी जान और जोर से… और जोर से चूस नसरीन… मेरी जान जोर से… अअअअअह नसरीन… निकाल ले जो भी मेरे लंड में है चूस, चूस और चूस… आआआआह… “, और जमाल का ढेर सारा गरम पानी मेरे मुंह में निकल गया।”
“मैंने जमाल के लंड से निकले पानी का एक-एक कतरा पी लिया, मगर जमाल लंड फिर भी नहीं छोड़ा। मैं जमाल का लंड चूसती रही, चूसती रही।”
“जल्दी ही जमाल का लंड फिर खड़ा होने लगा और सख्त हो गया – चूत चोदने के लिए तैयार।”
“मैंने लंड मुंह से निकाला और और कहा, “आओ जमाल, अब दिखाओ अपनी भाभी को जन्नत”, और ये बोलते हुए मैं पीछे की तरफ लुढ़क गयी और अपनी टांगें हवा में उठा दीं।”
“जमाल ने मेरी टांगों को सहारा दे कर थोड़ा और ऊपर किया, लंड चूत पर रक्खा और एक ही झटके में लंड चूत के अंदर डाल कर मेरी चुदाई चालू कर दी।”
“बीस मिनट चली इस चुदाई में मजा ही आ गया। मैं और जमाल, दोनों का इकट्ठे पानी निकला।”
“चुदाई पूरी होने के बाद जमाल ने मुझे उठाया और मेरे होंठ अपने होठों में ले कर कुछ देर चूसने के बाद बोला, “भाभी आज तो मजा ही आ गया।”
“जमाल ने उस दिन पहली बार मेरे होंठ चूसे। अब ये होंठ चुसाई, चूत चुसाई, लंड चुसाई हर चुदाई से पहले होने लगा।”
“कभी-कभी जब मेरा मन करता मैं जमाल का पानी मुंह में छुड़ा लेती। कभी जब जमाल का मन करता तो जमाल कह देता, ” भाभी आज मुंह में ही निकालना है।”
“कभी कभी जब जमाल का मन मुझे बाहों में ले कर चोदने का होता तो मैं बिस्तर पर लेट कर चूतड़ों के नीचे तकिया रख लेती और फिर जमाल मेरे ऊपर लेट कर मुझे अपनी बाहों में ले कर मेरे चुदाई करता। बशीर मुझे हमेशा ऐसे ही चोदा करता था।”
“ये सिलसिला पूरे डेढ़ साल तक चला। मेरे बेटे असलम का कालेज खत्म होने को था। तभी एक और चीज़ हुई जिसने मुझे हिला कर रख दिया।”
“जमाल को उसके मौसा ने दुबई बुला लिया था। ये खबर जब जमाल ने मुझे सुनाई तो मैं परेशान हो गयी I
“जमाल भी समझ गया कि उसके जाने की खबर सुन कर मैं परेशान हो गयी थी।”
“जमाल बोला, “भाभी ये दुबई जाना मेरे लिए जरूरी है। इस तरह के मौके बार-बार नहीं आते।”
“मैं चुप रही। बोलती भी तो क्या बोलती। मेरे मन में बस एक ही सवाल था, “अब मेरी चुदाई कैसे होगी? मेरी चूत की आग कौन ठंडी करेगा?”
“जमाल ने मेरा हाथ पकड़ा और बोला, “भाभी आपको अपने को समझाना पड़ेगा। वैसे तो मैं अपने चचेरे भाई उस्मान को यहां रखवा जा रहा हूं। मेरी ही उम्र का है। मगर मुझे लगता है आपको उससे चुदाई नहीं करवानी चाहिए।”
“अपनी बात जारी रखते हुए जमाल बोला, “भाभी मेरी बात और थी। मुझ पर बशीर भाई के बहुत एहसान थे। वरना आज कल जमाना बड़ा ही खराब है। कहीं ऐसा ना हो उस्मान एक बार आपको चोदने के बाद अपने यारों दोस्तों से भी आपको चुदवा दे। असलम भाई अभी नए-नए हैं, अगर ऐसा हो गया तो वो कुछ नहीं कर पाएंगे। ऐसे नाजुक हलातों का सामना करने और जमाने को को समझने में उन्हें वक़्त लगेगा।”
“जमाल की बात मुझे ठीक लगी और मुझे याद आया जिसका अपना खसम नहीं रहता उसके हज़ार खसम पैदा हो जाते हैं। सबकी नज़र चेहरे से फिसलती हुई, मम्मों से होती हुई चूत पर जा कर अटक जाती है।”
“मैंने कहा, “शायद तुम ठीक कहते हो जमाल। मगर मैं अपनी इस”, और फिर अपनी चूत की तरफ इशारा करके कहा, “इस चूत का क्या करूंगी जिसे तुम्हारे लंड की आदत पड़ चुकी है?”
“जमाल ने मेरे मम्मों को दबा कर कहा, “भाभी, थोड़ा इंतजार करिये वक़्त आने पर इसका भी कुछ हो जाएगा।” मुझे जमाल की ये बात समझ नहीं आई, “भाभी, थोड़ा इंतजार करिये वक़्त आने पर इसका भी कुछ हो जाएगा।”
“मैंने जमाल से पुछा, “जमाल कब जाना है तुम्हें?”
“जमाल ने कहा, “भाभी अगले हफ्ते असलम भाई के सालाना पेपर खत्म हो जायेंगे। अगले हफ्ते से ही उस्मान भी आ जाएगा। उसके बाद एक हफ्ते में असलम और उस्मान को सारा काम समझा दूंगा। और फिर अलीगढ, मेरठ की तरफ के रिश्तेदारों को मिलने निकल जाऊंगा। फिर वहीं से दिल्ली से जहाज से दुबई चला जाऊंगा।”
“मैंने मन ही मन हिसाब लगाया मतलब दो हफ्ते ही थे जिसमें चुदाई हो सकती थी। मैंने कहा, “मतलब जमाल पंद्रह दिन ही हैं हमारे पास।”
“जमाल ने मेरा हाथ दबा कर कहा, “हां भाभी, दो हफ्ते। इन पंद्रह दिनों में मैं आपको रोज़ चोदूंगा। जैसे आप कहेंगी वैसे चोदूंगा।” ये कहते हुए जमाल ने मेरी चूत सहला दी।”
“मैंने जमाल को कहा, “जमाल अब जब भी चुदाई करना, चुदाई की कोइ अलग सी फिल्म चला कर चुदाई करना। हम फिल्म देखते हुए चुदाई करेंगे।”
“जमाल बोला, “जब भी क्यों भाभी, आज ही, अभी ही ऐसा करेंगे।”
