मेरी नई कहानी “पापा की परी प्रीती” पाठकों के लिए हाजिर है। उम्मीद है पाठकों को पसंद आएगी। कहानी हमेशा की तरह पूरी तरह से काल्पनिक है और केवल मनोरंजन के लिए लिखी गयी है। लेकिन कहानी का स्थान और समय दुरुस्त और सही हैं।
पाठक इसे उद्घृत यानी किसी को बताना चाहें तो बता भी सकते हैं। यही मेरी कहानियों की विशेषता होती है। कहानी के किरदार – कैरेक्टर – पात्र, काल्पनिक होते हैं, मगर समय और स्थान नहीं – समय और स्थान हमेशा सही और दुरुस्त होते हैं। तो चलिए शुरू करते हैं कहानी “पापा की परी प्रीती।”
कहानी के भुमिका – कहानी का समय है 2023-2024
मैं हूं इस कहानी का नायक, और ये हैं मेरे बारे में दो शब्द: मैं हूं अवतार सिंह रंधावा – 6’ का – 91 किलो वजन वाला और 7.5 इंच लम्बे और 2.25 इंच लम्बे मोटे लंड वाला लम्बा तगड़ा, क्लीन शेव पंजाब का जट्ट सिक्ख। मैं अमीरी में पैदा हुआ आज से 52 साल पहले 1972 में, चंडीगढ़ के एक उस समय के एक करोड़पति परिवार में।
चंडीगढ़ – 1950 में जिस जगह बसाया गया था, यहां पहले खेत हुआ करते थे और यहीं हमारी भी पुश्तैनी खेती की लगभग 39 एकड़ जमीन थी। इसमें हमारे कुछ खेत आज की सुखना झील के पास थे, जिसे पहले सुकना चोए या चोब कहा जाता था।
चोए या चोब मतलब जहां बारिश का पानी जमा होता है। कसौली, धर्मपुर, सोलन की शिवालिक पहाड़ियों से बारिश का पानी आ आ और सुकना चोए – या चोब में जमा हो जाता था।
1958 में इस सुकना को एक व्यवस्थित सुन्दर झील बना दिया गया और नाम रक्खा गया सुखना झील। इसके अलावा बाकी हमारी जमीनें यहीं इसी इलाक़े में अलग-अलग जगहों पर थी।
जब चंडीगढ़ बसा तब मेरे पिता हकीकत सिंह 14-15 बरस के थे। मेरे दादा बलकार सिंह की उम्र उस वक़्त 36 साल थी, और परदादा करतार सिंह उस वक़्त 60 साल के थे।
मेरे परदादा ही इस इलाके के अकेले ऐसे किसान हुआ करते थे जिनके घर में अपनी घोड़ा बग्घी यानि तांगा हुआ करता था। उस समय मेरे परदादा ही थे जिनके पास एक बड़ा सा कैमरा होता था जिसमें फ़्लैश के लिए बल्ब का इस्तेमाल होता था – मतलब इलाके के अमीरों में उनका नाम आता था।
इस खेती की जमीन का जब अधिग्रहण किया गया तो मुआवजे में हमें अच्छी खासी रकम मिली थी, जिसे अगर आज के हिसाब से देखा जाए तो तकरीबन साढ़े तीन सौ चार सौ करोड़ बनेगी।
मेरे दादा बलकार सिंह बहुत सुलझे और समझदार इंसान थे। उन्होंने मुआवजे की रकम का बहुत ही अच्छे तरीके से इस्तेमाल किया। उन्हें समझ आ गया था के फ्रांस के एक वास्तुकार द्वारा डिज़ाइन किया हुआ ये शहर चंडीगढ़, पूरे हिन्दुस्तान का एक अनूठा शहर बनने जा रहा था। मेरे दादा ने चंडीगढ़ में और आस-पास जमीन खरीद ली।
जब चडीगढ़ में सेक्टर बन गए और रिहायशी सेक्टरों की जमीन बिकनी शुरू हुई तो मेरे दादा ने सेक्टर पांच में लगभग 1200 गज का प्लाट ले लिया। जहां ये सेक्टर बना है – सेक्टर पांच – यहां पहले राम नगर हुआ करता था और राम नगर में हमारी जमीन भी थी। इसलिए इस जगह से हमारा लगाव भी था।
सुखना झील से सटा होने के कारण ये सेक्टर पांच आज चंडीगढ़ का सब से मंहगा सेक्टर है। इसके अलावा जब चडीगढ़ में दुकानों की नीलामी शुरू हुई तो मेरे दादा ने सेक्टर 17 में दो दुमंजिला दुकाने खरीद लीं। जिनकी कीमत आज पचास साठ करोड़ से अधिक की आंकी जाती है।
अब ये दुकानें किराये पर हैं। जिनमे एक में कोइ अमरीकी फ़ास्ट फ़ूड वाले हैं जिनके पास ऊपर-नीचे की दोनों मंजिलें हैं। इनका किराया दो लाख महावार आता है। दूसरी दूकान में वाइन शॉप है। इसका किराया एक लाख माहवार है, और इस वाइन शॉप की ऊपरी मंजिल में अब मेरा ऑफिस है।
अब कुछ मेरे बारे में –
1981 में चंडीगढ़ की पांचवीं की पढ़ाई की बाद शाह जी – शाह जी यानी मेरे पापा – सब लोग उन्हें शाह जी और मेरी को मम्मी को झाई जी बोलते थे। इसलिए मैं भी उन्हें इसी नाम से बुलाता था। तो शाह जी ने मुझे कसौली की खूबसूरत पहाड़ियों के एक मशहूर स्कूल में भिजवा दिया।
जब 1930 के आस-पास जब ये स्कूल शुरू हुआ था, उस वक़्त ये एशिया का पहला को-एजुकेशन यानी सहशिक्षा वाला स्कूल था। आज भी ये स्कूल देश के अवल्ल स्कूलों में शुमार होता है। कई आर्मी अफसर, टॉप के एक्टर, एक्ट्रेसेस, उद्योगपति यहां पर अपनी शुरू की पढ़ाई कर चुके हैं।
कानपुर की दुनियां की जानी-मानी मनोचिकित्स्क मालिनी अवस्थी भी यहीं से पढ़ी है, और हम दोनों एक ही क्लास में थे। हम दोनों की पटती भी बहुत थी। आज भी जब मालिनी आराम करने के लिए कसौली जाती है तो मेरे ही कसौली वाले घर – हॉलिडे होम में रुकती है।
मालिनी ने अब तक शादी नहीं की। मालिनी चुदाई की खूब शौकीन है। चूत, गांड, मुंह में सब जगह लंड लेती है। मैं भी उसे कसौली वाले अपने घर में चोद चुका हूं। लेकिन वो किस्सा फिर कभी सही। अभी तो हम “पापा की परी प्रीती” की बात करने वाले हैं।
1988 में इस स्कूल से बाहरवी पास करने के बाद मैं वापस चंडीगढ़ आ गया और 1992 में यहां से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। सब जानते थे के मैंने अंत में संभालना अपना घर का बिज़नेस ही था, मगर क्योंकि मैं पढ़ने में तेज़ था, इसलिए पढ़ता चला गया।
1996 में 24 साल की उम्र में 21 साल की भूपिंदर कौर से मेरी शादी हो गयी। भूपिंदर कौर भी चंडीगढ़ की ही लड़की थी – कालेज की पढ़ी-लिखी, हंसमुख, बिंदास और खूबसूरत, हर वक़्त चुदाई के लिए तैयार। भूपिंदर का पूरा परिवार सालों से कनाडा में ही रहता है।
1998 में जब मैं 26 साल का था, मेरी बेटी हरप्रीत कौर – प्रीती – “पापा की परी” का जन्म हुआ – जो जवान हो कर बला की खूबसूरत निकली। पांच फुट दस इंच लम्बी प्रीती का फिगर 36-24-36 का है – कई मशहूर एक्ट्रसों को मात देता हुआ।
प्रीती के बड़े-बड़े गोल मम्मे, “E” या “DD” साइज़ के कप वाली ब्रा में भी मुश्किल से फिट होते हैं। समझना हो तो पोर्न स्टार – चुदाई की फिल्मों की एक्ट्रेस – मिस्टी माउंटेन जैसे बड़े-बड़े मम्मे देख लें। प्रीती के उभरे हुए चूतड़ ऐसे हैं जैसे दो बास्केट बॉल बीच में काट कर इकट्ठे रख दिए हों।
कुल मिला कर प्रीती की ख़ूबसूरती किसी का भी लंड खड़ा करने की लिए काफी है। आधों का लंड तो खड़ा होने पहले ही पानी छोड़ देता है ये सोच कर कि अगर इस लड़की का रंग ऐसा गुलाबी है, इसके बड़े-बड़े मम्मे और चूतड़ ऐसे तने हुए हैं, तो इसकी फुद्दी अंदर से कितनी गुलाबी और टाइट होगी।
2021 में प्रीती की शादी हुई है सुखचैन सिंह के साथ जो एक मिलिट्री अफसर है।
हट्टा-कट्टा सुखचैन भी जट्ट ही है, चंडीगढ़ के पास एक छोटे शहर खरड़ का रहने वाला। सुखचैन का परिवार भी कई सालों से कनाडा में ही रहता है। वो लोग साल में एक बार इंडिया आते हैं दिवाली के आस-पास, और गुरुद्वारों के दर्शन करके वापस चले जाते हैं।
मेरी बीवी भूपिंदर हर साल दो-तीन महीने के लिए कनाडा जाती है, वो आज-कल भी कनाडा गयी हुई है। मुझे बहुत कहती है कि मैं भी उसके साथ जाया करूं, मगर मेरा कनाडा में मेरा मन नहीं लगता।
मैं एक बार कनाडा गया था, बस उसके बाद मैं कनाडा नहीं गया। मुझे तो ये कनाडा एक झंडू देश लगता है। वहां हिन्दुस्तानी लड़के या तो ट्रक ड्राइवरी करते हैं, या टैक्सियां चलाते हैं या फिर बड़े-बड़े मॉल्स की टट्टियां – टॉयलेट्स साफ़ करते हैं।
अब तक प्रीती के पति सुखचैन की आर्मी में जहां-जहां तैनाती हुई है, वो फैमिली स्टेशन रहे हैं। मतलब वहां बीवीयों को साथ रखा जा सकता है, चोदने के लिए।
इस बार सुखचैन की तैनाती ढुबरी आसाम में हुई है, जहां परिवार को साथ रखने की इजाजत नहीं है। सुखचैन अपना परिवार कम से कम तीन महीने तक साथ नहीं ले जा सकता। अब चूंकि सुखचैन का परिवार इंडिया में नहीं है, तो सुखचैन के ढुबरी जाने के बाद तक प्रीती हमारे यहां ही रहेगी।
पक्के पंजाबियों की तरह सुखचैन भी मीट शराब और शबाब का शौक़ीन है। खा पी कर सुखचैन और प्रीती कमरे में बंद हो जाते हैं, और आधी-आधी रात तक शोर-शराबा करते हुए चुदाई करते हैं। उनकी आवाजें बाहर भी कोइ सुन सकता है, मगर इससे उन्हें कोई मतलब नहीं – कोइ सुनता है तो सुने – नहीं तो जाए जा के अपनी मां चुदाये।
इन पंजाबियों की चुदाई ऐसी ही होती है, शोर-शराबे वाली – “कोइ सुनता है तो सुने – नहीं तो जाए जा के अपनी मां चुदाये।”
अभी तीन-चार दिन पहले की बात है। रात को मैं अपने कमरे में बैठा “छड़ा लंड गिरधारी” – जिसकी बीवी कैनेडा में बैठी है – व्हिस्की की चुस्कियां ले रहा था। मेरा गिलास खाली हुआ तो मैंने देखा बोतल में भी व्हिस्की नहीं है। मैं आगे लाउन्ज में बनी बार से विह्स्की लेने चला गया।
गलियारे में से गुजरते हुए देखा तो सुखचैन प्रीती के कमरे का दरवाजा थोड़ा सा खुला है। अंदर से “उह, आह, आआह, हां ऐसे ही” जैसी मिली-जुली आवाजें आ रही थी। मैंने दरवजा थोड़ा सा धकेला। देखा तो सुखचैन लेटा हुआ था और प्रीती उसके खड़े लंड पर छलांगें लगा रही थी। प्रीती के 36 इंच के मम्मे सुखचैन के हाथों में थे। प्रीती के नरम-नरम मोटे चूतड़ प्रीति के ऊपर-नीचे होने के साथ-साथ मस्त हिल रहे थे।
अब ये पता नहीं के ये मेरा वहम था या क्या – प्रीती ने जरा सा सर घुमा कर दरवाजे की तरफ देखा और फिर से वापस सुखचैन के लंड पर छलांगें लगाने लगी।
मैं एक-दम से वहां से हट गया। मैंने बार से व्हिस्की की बोतल उठाई और वापस कमरे में आ गया। मैंने दरवाजा अंदर से बंद किया, व्हिस्की गिलास में डाली और चेयर पर बैठ कर मुट्ठ मारने लगा। मेरे ख्यालों में मेरी बीवी भूपिंदर नहीं बल्कि मेरी बेटी प्रीती थी – “पापा की परी प्रीती।”
वैसे ऐसी शोर-शराबे वाले चुदाई पंजाबियों के लिए कोइ नई बात नहीं। शादी के कुछ सालों तक मेरी और भूपिंदर की चुदाई होती थी, तब भी यही कुछ होता था, “उह, आह, आआह, हां ऐसे ही, लगाओ जोर से और जोर से।”
21-22 साल का मेरा बेटा अमनदीप एक नंबर का चूतिया किस्म का लड़का है। दो साल पहले अपनी ननिहाल कनाडा चला गया था। कहता था पढ़ाई करके वहीं सेटल होगा। करोड़ों की जायदार यहां है, लाखों की महीनें की आमदन और वो भोसड़ी का मादरचोद कनाडा में, या तो टैक्सी चलाएगा या फिर ट्रक ड्राइवरी करेगा अगर वो भी ना हुआ तो बड़े-बड़े मॉल्स में गोरों की टट्टियां साफ़ करेगा।
ये पंजाबी लड़के-लड़कियां बाहर जा कर यहीं कुछ करते हैं। करोड़ों की जायदादें यहां होती हैं और अमरीका, कनाडा जाते हैं गोरों के चूतड़ चाटने।
चंडीगढ़ का सेक्टर पांच वाला हमारा दोमंजिला घर बहुत आलिशान है। अंदर जाते ही बहुत बड़ा लाऊंज है जिसमें दो सोफे, एक बड़ी सी गोल मेज और आठ कुर्सियां रखी हैं। एक तरफ कोने में बार है जो हमेशा दारू की बोतलों से भरी रहती है।
बार की बगल में फ्रिज रखा है, जिसमें सिर्फ सोडे की बोतलें और बियर के कैन रखे जाते हैं। इस लाऊंज के बीचो-बीच से एक गलियारा निकलता है। गलियारे के एक तरफ एक बड़ा गेस्ट रूम है, जिसमें एक बेड, सोफा, ड्रेसिंग टेबल मेज कुर्सी सब कुछ है। ये गेस्ट रूम अपने आप में ही एक छोटा सा घर है। सुखचैन और प्रीती जब भी आते हैं इसी गेस्ट रूम में रहते हैं।
इस गेस्ट रूम के आगे किचन है और किचन के साथ लगा हुआ डाइनिंग हॉल है। आगे सीढ़ियां हैं जो ऊपर की मंजिल की तरफ जाती हैं। गलियारे की दूसरी तरफ दो कमरे और हैं। एक कमरा बड़ा है और दूसरा थोड़ा छोटा है। इस छोटे कमरे को छोड़ कर सब कमरों के साथ बाथरूम जुड़े हुए हैं। एक बाथरूम लाऊंज के साथ भी है और एक छोटा बाथरूम डाइनिंग हाल के साथ भी है।
ऊपर की मंजिल बिलकुल ऐसी ही बनी हुई है जैसे नीचे की। मगर ऊपर की मंजिल में नीचे के लाउंज की जगह खुला बरामदा है, जहां बैठ कर अक्सर घर के लोग दारूबाजी करते हैं, और भोसड़ी के, मादरचोद, बहनचोद जैसी गालियां बकते हुए गप्पें हांकते हैं।
हमारी काम वाली मेड, अड़तालीस साल की शकुंतला गठिये के कारण अब काम नहीं करती। जवानी में शकुंतला जवान में ग़ज़ब की खूबसूरत हुआ करती थी, मुझे अवतार भैया बोला करती थी।
शकुंतला का बेटा तेइस-चौबीस साल का जुगनू, हट्टा-कट्टा लड़का है। जुगनू अब मेरा ड्राइवर भी है और बॉडीगार्ड भी। जुगनू की इक्कीस-बाईस साल की बीवी कांता अब शकुंतला की जगह हमारे यहां काम करती है।
स्लिम ट्रिम कांता पढ़ी-लिखी शहरी लड़की है। हमारे घर में कांता जुगनू की वजह से काम करती है, वरना वो घरों में काम करने वाली किस्म की लड़की नहीं है। कांता मेरी बीवी भूपिंदर को बीजी बोलती है। जुगनू और कांता दोनों को मैंने स्कूटियां लेकर दी हुई हैं। कांता सुबह जल्दी आ जाती है और दस बजे तक काम निबटा कर चली जाती है, और फिर जा कर अपने घर का काम-काज करती है।
उसके बाद कांता शाम चार बजे आती है और रात का खाना तैयार करती है। जो कुछ भी हमारी रसोई में बनता है, वही शकुंतला का परिवार भी खाता है। शाम को कांता जाते हुए दाल, साग, सब्जी जो भी हमारी रसोई में बना होता है लेकर जाती है।
अभी तक कांता ने ऐसा कोइ इशारा तो नहीं किया कि वो मुझसे चुदाई करवाना चाहती है – असल में मुझे मौक़ा भी नहीं मिला, ना मेरी ऐसी कोइ मंशा ही है। वैसे भी घर पर कोइ ना कोइ होता ही है – मेरी पत्नी, जो आज-कल वो कनाडा गयी हुई है, तो प्रीती जो यहां पर है क्योंकि दो-तीन महीने के लिए अब उसने यहां ही रहना है।
लेकिन अगर, लेकिन अगर, कभी कांता की रज़ामंदी हुई तो मैं कांता को चोद दूंगा। स्लिम शरीर वाली कांता को चोदने में मजा भी बहुत आएगा।
जुगनू सुबह दस बजे आता है और बाहर ही इंतजार करता है, अंदर नहीं आता जब तक मैं उसे ना बुलाऊं। अगर मैंने फार्म पर जाना हुआ थो ठीक, वरना जुगनू जा कर फार्म से दूध, सब्ज़ियां, अंडे, मीट ले आता है। इसके बाद दोपहर को मैं सेक्टर सत्रह अपनी दुकानों पर चला जाता हूं। वाइन शॉप के ऊपर वाले ऑफिस में बैठ कर अपने जैसे ही करोड़पति दोस्तों को बुला लेता हूं।
हर रोज़ का एक ही रूटीन है। जुगनू सुबह दस बजे आता है और बाहर ही इंतजार करता है। अंदर नहीं आता जब तक मैं उसे ना बुलाऊं। अगर मैंने फार्म पर जाना हुआ तो ठीक, वरना जुगनू जा कर फार्म से दूध, सब्ज़ियां, अंडे, मीट ले आता है। इसके बाद दोपहर को मैं सेक्टर सत्रह अपनी दुकानों पर चला जाता हूं।
वाइन शॉप के ऊपर वाले ऑफिस में बैठ कर अपने जैसे ही करोड़पति दोस्तों को बुला लेता हूं। इस ऑफिस में इकट्ठे बैठ कर हम दुनिया भर की बेमतलब की वाहियात बातें करते हैं, खुशवंत सिंह के नॉन वेज चुटकुले सुनते है और बियर पी कर टाइम पास करते है।
अब कोइ ये भी ना पूछे के ये खुशवंत सिंह कौन था। पूरी की पूरी नई दिल्ली – कनाट प्लेस का सारा इलाका, लुटियन, जहां हमारे भाग्यविधाता राजनीतीज्ञी, उच्चतम न्यायालय के जज रहते हैं और जनता के पैसे मौज करते हैं, सारा का सारा खुशवंत सिंह के फादर (पापा) “सर सोभा सिंह” का बसाया हुआ है। उन्हीं की बदौलत आज भी दिल्ली इतनी खूबसूरत है। वरना अब तो यहां ऐसी बस्तियां बस रही होती और उनमें में तो जाने में भी डर ही लगता।
खैर छोड़ो इन सब बातों को, अब चलते हैं अपने ऑफिस में।
अगर कोइ यार दोस्त ना आये तो ऑफिस में ही लगे दीवान पर मैं आराम करता हूं। चार पांच बजे मेरी घर वापसी हो जाती है और घर आ कर सात बजे मैं व्हिस्की की बोतल खोल कर बैठ जाता हूं, हमेशा की तरह।
जिंदगी हो तो ऐसी। मस्त ज़िंदगी है मेरी। परदादा, दादा, बाप मेहनत कर गए और मैं उसका फल खा रहा हूं। सच में ही ज़िंदगी हो तो ऐसी ही हो।
चंडीगढ़ की सबसे महंगे सेक्टर पांच में हमारा घर तो है ही, जैसा की मैंने आप भाईयों को बताया है, हमारा चंडीगढ़ के पास मुल्लनपुर में एक फार्म भी है – बारह एकड़ का।
ये भी मेरे दादा ने इन्वेस्टमेंट करने के लिया था, मगर अब ये गोल्ड माईन है, बोले तो सोने की खान।
मुल्लनपुर एक तरह से न्यू चंडीगढ़ की तरह विकसित हो रहा है, और हमारे फार्म की जमीन की कीमत आसमान छू रही है।
मगर ये बिकाऊ ना कभी थी और ना ही अब है।
पहले इस फार्म को खरीदने वाले बहुत बिल्डर आते थे। मैं बोल-बोल कर थक गया कि भाई ये जमीन बिकाऊ नहीं है, मगर साले मानते ही नहीं थे। रोज़ आ जाते थे। मगर जब से मैंने गले में इटली की बनी “ब्रेटा” पिस्तौल लटका कर उनसे बात करनी शुरू की, उसके बाद से खरीदार आना बंद हो गए। मेरा लम्बा चौड़ा शरीर और गले में “ब्रेटा” पिस्तौल देख कर ही गांड फट जाती थी उनकी।
इस फार्म में एक घर भी है जिसे “फार्महाउस” कहा जाता है। ये घर भी हमारे सेक्टर पांच के बंगले जैसा ही बना हुआ है, मगर ये है एक मंजिला ही। हमारे इस फार्म में चार लोग काम करते हैं, पचपन साल का शराबी पूरन, उसकी तेईस चौबीस साल की बीवी बिशनी और दो लोग और हैं जिन्हें पूरन ही लाया हुआ है।
फार्म हाउस के बाहर की तरफ छह कमरे बने हैं, सबमें TV है, फ्रिज है – टॉयलेट सब बने हैं – जिनमें ये सब लोग रहते हैं। घर के अंदर केवल बिशनी ही आती है और कोइ नहीं, या कभी-कभी पूरन आता है वो भी अगर मैं बुलाऊं तो।
मेरी तरफ से से पूरी तनख्वाह पूरन को दी जाती है। बाकी दो लोगो के साथ पूरन कैसे और क्या करता है, मुझे उससे कोइ सरोकार नहीं।
पूरन भरोसे वाला आदमी है। पिछले कई सालों से – शायद अठ्ठारह या उन्नीस सालों से पूरन हमारे यहां है। प्रीती जब छोटी थी तब पूरन उसे कंधों पर उठा कर फार्म में घुमाया करता था।
प्रीति बड़ी हो गई मगर उसका फार्म पर जाना नहीं छूटा। शादी के बाद भी प्रीती और सुखचैन जब भी चंडीगढ़ आते हैं, फार्म पर जरूर जाते हैं। सुखचैन भी पूरन के साथ बहुत गप्पबाजी करता है। सुखचैन को पूरन की शराब की आदत का पता है, इसलिए जब भी आता है पूरन के लिए मिलिट्री कैंटीन से विलायती शराब की बोतल लाना नहीं भूलता।
ये अधेड़ पूरन, इस तीखे नैन नक्शों वाली जवान बिशनी को पता नहीं कहां से ब्याह लाया है। ये भी पता नहीं बिशनी का पूरा या असली नाम क्या है – बिशन कौर या फिर कुछ और। पूरन ने ही हमें बताया के उसका नाम बिशनी है। वैसे बिशनी बात ठेठ पंजाबी में करती है, इसका मतलब वो रहने वाली तो पंजाब की ही है।
बिशनी मुझे सरदार जी और मेरी बीवी भूपिंदर को बीजी बोलती है। फार्म में दो विदेशी गायें हैं और शायद तीस पैंतीस देसी मुर्गे मुर्गियां हैं।
जुगनू – मेरा ड्राइवर, रोज दूध अंडे, सब्जियां फार्म से घर लाता है। कभी हमारा मुर्गा खाने का मन हो तो पूरन देसी मुर्गा काट देता है। दूध से देसी घी बनाना ये भी पूरन ही करता है। हमारे घर में शुद्ध देसी घी का ही इस्तेमाल होता है। घर में रिफाइन्ड तेल का इस्तेमाल नहीं होता, रिफाइन्ड से घुटनों की ग्रीज़ खत्म हो जाती है और घुटने दर्द करने लगते हैं।
फार्म में जो कुछ भी पैदा होता है वो या तो हमारे घर पर आ जाता है या पूरन और उसके साथी रख लेते हैं – बेचते हैं, या क्या करते हैं, मुझे कोइ मतलब नहीं। पूरन, बिशनी और बाकी दोनों लोगों को खाने-पीने की पूरी छूट है, बस देसी मुर्गा वो नहीं काट सकते अपने खाने के लिए। अगर मीट मुर्गा खाना ही है तो वो बाजार से लाते हैं।
अधेड़ पूरन की जवान बीवी बिशनी हर वक़्त बन ठन कर रहने की शौक़ीन है। साफ़ सुथरी है और अच्छे कपड़े पहनने की भी शौक़ीन है। बिशनी चुदाई भी मस्त करवाती है – पंजाबी में कहें तो हट-हट कर फुद्दी मरवाती है। बिशनी को मेरा लंड चूसने का बड़ा मजा आता है। एक बार कह रही थी पूरन का लंड मेरे लंड से आधा भी नहीं है और जब खड़ा होता भी है तो सख्त नहीं होता, ढीला-ढाला सा रहता है।
बिशनी को मैं हमेशा लंड पर कंडोम चढ़ा कर चोदता हूं।
वैसे तो मैं फार्म पर हर दूसरे-तीसरे दिन जाता हूं और जब मन करता है बिशनी को पकड़ कर चोद देता हूं। अगर कभी फार्म गए हुए ज्यादा दिन हो जाएं तो बिशनी खुद ही आ कर मेरा लंड पकड़ लेती है, और बोल देती है, “सरदार जी आज तो ‘करो’, बड़े दिन हो गए ‘किया’ नहीं।
बिशनी की चुदाई में एक खासियत ये है कि बिशनी हमेशा नीचे लेट कर ही चुदाई करवाती है। चुदाई करवाते वक़्त चोदने वाले को बाहों और टांगों में जकड़ लेती है और मिनट भी चुप नहीं रहती।
जब मैं बिशनी की चुदाई करता हूं तो पूरी चुदाई के दौरान बोलती रहती है, “आह सरदार जी क्या मस्त लौड़ा है आपका, आअह क्या मस्त फुद्दी मारते हो। रगड़ो सरदार जी, और जोर से रगड़ो, फाड़ो मेरी फुद्दी आज, आह मजा आ गया आ गया, बस सरदार जी अब मत रुकना, आअह मजा आने वाला है।”
बातों के साथ-साथ बिशनी चूतड़ भी घुमाती रहती है। कई बार तो बिशनी इतनी जोर-जोर से चूतड़ घुमाती है कि चोदने वाला लंड को आगे-पीछे ना भी करे तो भी लंड को रगड़े लगते ही लगते हैं। खैर ये तो थी फार्म की बात।
वैसे हिंदुस्तान भी अजीब ही देश है। चंडीगढ़ के एक करोड़पति – यानी मेरा – करोड़ों का फार्म है – जहां खेती घंटे की भी नहीं होती मगर “किसानी” के नाम पर सरकार ना बिजली का बिल भेजती है ना पानी का – सब कुछ मुफ्त।
अब वापस आते हैं चंडीगढ़ के घर पर।
सुखचैन ने चौथे दिन – तीन रातों के बाद – दिल्ली के लिए रवाना होना था, जहां से मिलिट्री के स्पेशल प्लेन से उसे आसाम जाना था। इन तीन दिनों में सुखचैन और प्रीती में चुदाई ही चुदाई हुई – चुदाई के सिवा कुछ नहीं हुआ।
दिन में भी कमरे का दरवाजा बंद ही रहता था – रात में तो रहता ही रहता था। इन तीन दिनों में मेरी भी रात की नींदें मुझसे दूर ही रही। मेरी आंखों आगे से सुखचैन के लंड पर छलांगे लगाती प्रीती हट ही नहीं रही थी। नींद मुझे आ नहीं रही थी, मैं गलियारे में कभी इधर कभी उधर घूम रहा था कि गलती से शायद गेस्ट रूम का दरवाजा खुला रह जाए और मुझे प्रीती और सुखचैन की चुदाई देखने को मिल जाए।
पहली रात मेरी बेकार गई, मैं कुछ नहीं देख पाया। और दूसरी रात को तो ‘पोपट’ ही हो गया।
उस दिन मैं अंडरवेयर बनियान में आधा खड़ा लंड लिए गलियारे कि चक्कर लगा रहा था कि किसी तरह प्रीती सुखचैन की चुदाई देखने को मिल जाए।
जैसे ही मैं गेस्ट रूम कि दरवाजे के पास पहुंचा, गेस्ट रूम का दरवाजा खुला और प्रीती बाहर निकली। गाऊन उसने खाली लपेटा ही हुआ था, बटन भी बंद नहीं थे। हाथ में पानी की खाली बोतल थी – शायद पानी लेने रसोई मैं जा रही थी। मगर एक फ्रिज तो गेस्ट रूम में भी था। तो फिर प्रीती रसोई में क्यों जा रही थी? क्या प्रीती को मेरे वहां होने की भनक, कोइ आवाज सुनाई दे गई थी?
मेरी तो जैसे गांड ही फट गयी थी। मैं ठिठक कर खड़ा हो गया। मगर प्रीती ने एक नज़र मुझ पर डाली और एक मेरे आधे खड़े लंड पर – और हंसती हुई किचन की तरफ चली गई। मैं भी खिसयाया हुआ लाउन्ज में गया और बियर का एक कैन निकाला और अपने कमरे में चला गया।
अगले दिन शर्म से मेरी तो मेरी ये हालत थी कि मेरा लंड हरकत भी नहीं रहा था।
प्रीती जब भी मेरे सामने से गुजरती, मुझे देखती हुई हंसती हुई निकल जाती थी।
सुखचैन की अगले दिन की दिल्ली के लिए फ्लाइट थी, जहां से स्पेशल मिलिट्री प्लेन से उसने गुवाहाटी के लिए जाना था। मुझे मालूम था कि आज पूरी रात प्रीती और सुखचैन सोने वाले नही, पूरी रात उनकी चुदाई चलने वाली है।
मन तो बहुत कर रहा था कि जा कर उनकी धुआंधार चुदाई देखूं,मगर हिम्मत ही नहीं हो रही थी। डर लग रहा थी कहीं प्रीती पिछली रात की तरह मुझे रंगे हाथ ना पकड़ ले।
रात को बड़ी मुश्किल से आधी बोतल पीने कि बाद मुझे नींद आयी। सुखचैन की अगले दिन दोपहर बाद की चंडीगढ़ से दिल्ली के लिए फ्लाइट थी। प्रीती जुगनू के साथ सुखचैन को एयरपोर्ट छोड़ने गयी थी। सुखचैन को छोड़ कर प्रीती आयी तो लग ही नहीं रहा था कि सुखचैन दो तीन महीने कि लिए गया है।
प्रीती पहले की तरह ही चहक रही थी। मैं देख रहा था जिस तरह से सुखचैन और प्रीती चुदाई करते थे, प्रीती को तो ये सोच कर ही थोड़ा सा उदास होना चाहिए था कि अब चुदाई नहीं हो पाएगी। मगर ऐसा था नहीं।
शाम के छह बजने वाले थे। कांता खाना बना रही थी। मैं और प्रीती लाऊंज में बैठे टीवी देख रहे थे। कांता ने देसी मुर्गे का मीट और साथ में चावल बनाये। खाना बना कर कांता ने डाइनिंग टेबल पर रख दिया और अपना मीट पैक करके अपने घर चलने की तैयारी करने लगी।
जातेतजाते कांता प्रीती से बोली, “दीदी तीन दिन मैं नहीं आ पाऊंगी, मेरी ननद की डिलीवरी होने वाली है। आपको परेशानी ना हो इस लिए तीन सब्ज़ियां और दाल बना कर फ्रिज में रखी हैं। दो मुर्गे भी मसाले लगा कर – मैरीनेट करके – फ्रिज में रक्खे हैं, बस ओवन में रोस्ट करने हैं। कुछ और चाहिए होगा तो जुगनू यहीं होगा, वो नहीं जा रहा।”
प्रीती बोली, “अरे कांता इतना सामान बना दिया तूने? निश्चिन्त हो कर जा, तीन दोनों की ही तो बात है कोइ परेशानी नहीं होगी। मैं और पापा ही तो हैं। कुछ और मंगवाना होगा तो मार्किट से जुगनू से मंगवा लेंगे।”
कांता चली गयी।
शाम की साढ़े छह बजने वाले थे। प्रीती अपने कमरे में फ्रेश होने चली गयी और मैं भी अपने कमरे में फ्रेश होने के लिए चला गया। फ्रेश हो कर मैंने रात वाली ड्रेस पहनी।
आधी बाजू का कुर्ता और ढीला-ढाला पायजामा। कपड़े बदल कर मैं लाऊंज में आ गया। बार में शीज़ रीगल की बोतल निकाली, फ्रिज में से सोडा निकाला और पेग बना कर टीवी चालू करके बैठ गया।
थोड़ी ही देर में प्रीती भी आ गयी। प्रीती ने हलके गुलाबी गाऊन पहना हुआ था और गाऊन कि नीचे काले रंग की ब्रा और पैंटी पहनी हुए थी, जो गाऊन के ऊपर से साफ़ दिखाई दे रही थी।
प्रीती के बड़े-बड़े मम्मे और चूतड़ गाऊन फाड़ कर बाहर आने को बेताब थे। प्रीती के बाल खुले थे, और प्रीती बड़ी ही सेक्सी लग रही थी। प्रीति को देखते ही मुझे उसकी और सुखचैन की चुदाई याद आ गयी और एक-दम से मेरे लंड में हरकत सी हुई। मैंने जरा सा लंड पायजामे ठीक किया।
प्रीती ने ये देखा और जरा सी मुस्कुराई और उसने भी अपनी चूत को हल्का सा छुआ और भारी चूतड़ मटकाती झटकाती ‘बार’ की तरफ चली गयी। मुझे थोड़ी हैरानी सी हुई कि प्रीती ने ऐसी ड्रेस क्यों पहनी थी जिसमें मम्मों और चूतड़ों के उभार इतना साफ़-साफ़ दिखाई दे रहे थे।
प्रीती ने बार से वाइन की बोतल निकाली और मेरे सामने ही गिलास में वाइन डाल कर हल्के-हल्के घूंट भरने लगी। बातें प्रीती ही कर रही थी, मेरे मुंह से तो आवाज ही नहीं निकल रही थी।
बातें करते करते प्रीती कम से कम दस बार आगे की तरफ झुकी। प्रीती की सेक्सी पादर्शी ड्रेस और इस तरह बार-बार आगे झुकना – मुझे लग रहा था कि प्रीती जान-बूझ कर मुझे उकसाने, उत्तेजित करने की कोशिश कर रही थी।
प्रीती, “पापा की परी” – मेरी बेटी, ऐसा क्यों कर रही है? बात मेरी समझ में अब भी नहीं आ रही थी।
स्कॉच और वाइन पीने कि बाद हमने खाना खाया और बर्तन समेट कर अपने-अपने कमरों में चले गए। प्रीती गेस्टरूम में चली गई और मैं अपने कमरे में चला गया।
बड़ी मुश्किल से मुझे नींद आयी। सुबह उठा बाथरूम गया और फ्रेश हो कर बाहर आया।
मेरे कमरे कि सामने ही किचन है। प्रीती चाय बना रही थी। प्रीती को देखते ही मेरे लंड में एक करंट सा दौड़ गया और लंड में सख्ती आ गई, लंड खड़ा हो गया। प्रीति ने कल रात वाला ही हल्के रंग का गुलाबी गाऊन पहना हुआ था, मगर गाऊन की नीचे ना कल वाली काली ब्रा पहनी थी और ना ही पैंटी पहनी थी।
प्रीती के पीठ मेरी तरफ थी। प्रीती के चूतड़ों की बीच की लाइन साफ़ दिखाई दे रही थी। पक्का ही मम्मों का भी यही हाल था। मन किया कि अभी किचन कि शेल्फ पर ही लिटा कर चोद दूं प्रीती को। मगर वही बात – प्रीती थी तो मेरी बेटी ही। लेकिन प्रीती ऐसी ड्रेस पहन कर मेरे सामने आई ही क्यों?
मैं प्रीती की पीछे खड़ा हो गया। प्रीती मुड़ी और मुझे देख कर बोली, “गुड मॉर्निंग पापा।”
सुखचैन के जाने के अगले दिन ही सुबह जिस तरह का पारदर्शी गाऊन प्रीती ने पहना हुआ था, और गाऊन के नीचे जिस तरह से ना ब्रा पहनी थी और ना पैंटी, ये मेरे लिए हैरानी की बात थी। प्रीति के चूतड़ों के बीच की लाइन साफ़ दिखाई दे रही थी। मैं सोच रहा था अभी कल ही सुखचैन गया था और प्रीति इस तरह की ड्रेस पहन कर मेरे सामने हंसती हुई खड़ी ह
थी।
क्या प्रीती सुखचैन की चुदाई को जरा सा भी मिस नहीं कर रही? प्रीती को ऐसी ड्रेस में देख कर मेरा लंड हरकत में आने लगा था। अब मेरे लंड के साथ-साथ मेरा हौंसला भी बढ़ने लगा था। मैं अपना आपा खोने लगा था। मैं प्रीती के पीछे गया और प्रीती के चूतड़ों के जरा सा ऊपर उसकी कमर पर हाथ फेरते हुए बोला, “गुड मॉर्निंग स्वीटी।”
मेरे हाथ प्रीती के चूतड़ों के ऊपरी हिस्से को छू रहे थे, जहां से चूतड़ों का उभार और चूतड़ों की गोलाई शुरू होती है। प्रीती मुड़ी और मादक नज़रों से मेरी तरफ देखा कर मुस्कुरा दी, क्या कातिल मुस्कुराहट थी।
मैं किचन के सामने डाइनिंग टेबल पर ही बैठ गया। प्रीती भी चाय की ट्रे लाई और मेरे सामने ही बैठ गई। इधर की बेमतलब के बातें करने के बाद प्रीती बोली, “पापा पूरन चाचा का क्या हाल है?”
मैंने भी चाय के चुस्की लेते हुए सोचा अब सुबह के चाय के वक़्त पूरन का जिक्र कहां से आ गया।
मैंने कहा कहा, “ठीक है। जैसी उसकी आदत है दोपहर से ही शराब पीना शुरू कर देता है और रात तक बोतल खत्म कर देता है। बस यही एक बुराई है उसमें, बाकी काम में कोई शिकायत नहीं। ईमानदार और मेहनती है, कभी कोइ शिकायत नहीं आयी।”
प्रीती ने दोनों हाथों से अपने मम्मे जरा से ऊपर की तरफ किये और बोली, “और पापा, पूरन चाचा की जवान घरवाली बिशनी? वो कैसी है। पूरा फार्महाउस संभाला हुआ है उसने।” ये कह कर प्रीती ने अपने मम्मे गाऊन के नीचे से ऊपर किये और साथ ही अपनी चूत भी खुजला दी।
बिशनी का जिक्र आते ही मुझे भी बिशनी की चुदाई याद आ गयी। मेरा लंड हरकत करने लगा। मैंने भी लंड थोड़ा हिला कर पायजामें में ठीक से बिठाया और बोला, “ये बात तो है, बिशनी ने फार्महाऊस तो सही में ही अच्छे से संभाला हुआ है।”
प्रीति हंसते हुए बोली, “पापा कितने ही साल भी तो हो गए बिशनी को हमारे पास – किसको क्या चाहिए अब वो सब जान समझ चुकी है।”
फिर प्रीति थोड़ा आगे की तरफ ज्यादा ही झुकी और मेरी तरफ देखते हुए बोली, “क्यों पापा ठीक है ना?”
आगे झुकने के कारण प्रीती के जम्बो साइज़ मम्मों का आधा हिस्सा गाऊन में से बाहर आ रहा था। प्रीती के मम्मों के हल्के से भूरे नुकीली निप्पल गाऊन में से साफ़ दिखाई दे रहे थे।
मगर प्रीती की ये बात, “पापा कितने ही साल भी तो हो गए बिशनी को हमारे पास – किसको क्या चाहिए अब वो सब जान समझ चुकी है।”
और फिर प्रीति का आगे की तरफ झुकना और बोलना, “क्यों पापा ठीक है ना?” प्रीती की इस तरह की बातें – मुझे ये सब अजीब सा लग रहा था।
सुखचैन के जाने के अगले दिन ही प्रीती का इस तरह के कपड़े पहन कर मेरे सामने आना, वो भी तब जबकि घर में मेरे और उसके अलावा कोइ भी नहीं? और अब तो तीन दिन कांता ने भी नहीं आना था, हम दोनों ही घर में अकेले रहने वाले थे। एक चुदाई का शौक़ीन मैं, और एक बला की खूबसूरत और सेक्सी मेरी बेटी। ये सोच कर मेरा लंड तकरीबन पूरा खड़ा हो चुका था।
प्रीती की हर एक हरकत मुझे बेचैन कर रही थी। प्रीती के मन में पक्का ही कुछ पक रहा था। मगर क्या? प्रीती की सेक्सी ड्रेस और उसकी बातों से मेरी आंखों के आगे अब तक की चोदी हुई फुद्दीयां घूमने लगी थी। मैं बस यही सोचने लग गया था की इतनी खूबसूरत मेरी बेटी प्रीती की फुद्दी कैसी होगी? कितनी टाइट होगी? लंड फुद्दी में कैसे रगड़ा लगाता हुआ जाएगा?
मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था। मुझे अब चूत चाहिए थी। मुझे बिशनी के साथ होती मेरी चुदाई याद आने लगी और मेरा लंड सख्त होने लगा। मैं सोचने लगा आज जा कर बिशनी की फुद्दी मारनी ही पड़ेगी। प्रीती के कपड़े, उसकी बातें और बिशनी की चुदाई का ख्याल – मेरी बेटी मेरे सामने थी, मगर चाह कर भी मेरा लंड ढीला नहीं हो रहा था।
मैं पायजामे में लंड के पूरे उभार के साथ ही कुर्सी से उठा और लंड खुजलाते हुए बोला, लंड के आगे हाथ रख कर लंड की सख्ती छुपाते हुए बोला, “ये तो है प्रीती, बिशनी को अब सब की जरूरतों की अच्छे से समझ आ गई हैं।”
हाथ से ढंके होने बावजूद मेरे खड़े लंड का उभार पायजामें में छुप नही रहा था – खड़ा लंड साफ़ दिखाई पड़ रहा था। प्रीती कुछ बोली नहीं, एक नजर प्रीती ने मेरे लंड के आगे रखे हाथ को देखा और हंस दी। फिर मैंने लाऊंज की तरफ चलते हुए कहा, “चलो देखूं आज के अखबार क्या कहते हैं।”
प्रीती भी हंसी और बास्केट बॉल जैसे चूतड़ मेरी तरफ कर के चाय के खाली बर्तन समेटने लगी। प्रीती तो आज जैसे मेरा ईमान खराब करने का ठान ही चुकी थी। मैं लाउंज की तरफ चला गया। बाहर से अखबार लाया और बाहर का दरवाजा बंद करके अखबार पढ़ने लगा।
पंद्रह मिनट के बाद प्रीती आयी। प्रीति के हाथ में बड़ा तौलिया था। आते ही उसने अपन मम्मे नीचे ऊपर के तरफ किये और बोली, “पापा मैं नहाने जा रही हूं।”
मुझे समझ नहीं आ रहा था प्रीती नहाने की लिए लाऊंज के बाथरूम में? जबकि गेस्टरूम में, जिसमे प्रीति रह रही थी, उसमें भी अच्छा खासा बड़ा बाथरूम था। प्रीती की ये लाऊंज वाले बाथरूम में नहाने वाली बात कुछ समझ नहीं आयी।
फिर प्रीती मुस्कुराते हुए बोली, “पापा आप तो अभी यहीं बैठोगे ना?” और मेरे जवाब का इंतजार किये बिना प्रीती चूतड़ हिलाती मटकाती बाथरूम में चली गयी।
ओह माई गॉड – प्रीती के चूतड़! मेरे लंड की हालत इतनी खराब थी कि मेरा मुट्ठ मारने का मन होने लगा था। और फिर, वो “पापा आप तो अभी यहीं बैठोगे ना!” इसका क्या मतलब था? क्या प्रीती ने इशारा किया था कि मैं वहीं बैठा रहूं?
अखबार मेरे सामने था, मगर मैं पढ़ नहीं पा रहा था। मुझे प्रीति की बातें – उसकी ड्रेस। उसका गाऊन के नीचे कुछ भी ना पहनना और फिर बिशनी वाली बात और मेरे लंड को बार-बार देखना। कुछ तो था तो मझे पूरी तरह अभी समझ नहीं आ रहा था।
पंद्रह मिनट में बाथरूम का दरवाजा खुला और प्रीति बाहर आयी। खाली तौलिया लपेटे हुए। तौलिया प्रीटी के आधे मम्मों को ही ढक रहा था। मम्मों की दो गोलाईयों के बीच की लाइन अजीब ही नजारा पेश कर रही थी। उधर तौलिया प्रीती के घुटने से छह इंच ऊपर था – फुद्दी से सिर्फ चार इंच नीचे।
मेरी नजर आधी नंगी प्रीति से हट नहीं रही थी। प्रीती ने एक हाथ से पीठ के पीछे से तौलिये को पकड़ा हुआ था। प्रीती बिना कुछ बोले, मुझे एक-टक देखते हुए खड़ी थी, अपने कमरे में जा भी नहीं रही थी।
बला की खूबसूरत और सेक्सी मेरी बेटी प्रीती को इस तरह देख मेरा लंड पूरी सख्त हो चुका था। पांच-सात मिनट ऐसे ही गुज़र गये और फिर उसके के बाद वो हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
प्रीटी के बदन पर लिपटा तौलिया नीचे सरक गया।
प्रीटी का एक हाथ अभी भी पीठ के पीछे ही था। प्रीटी ने जान-बूझ तौलिया छोड़ा था या फिर गलती से गिर गया था? प्रीती ने ना तो अपने मम्मे ही ढंके, और ना ही हल्के छोटे रोएंदार बालों वाली फुद्दी। प्रीटी ने नीचे गिरा तौलिया भी नहीं उठाया, मतलाब साफ़ था, प्रीती ने जान-बूझ कर तौलिया गिराया था।
गजब की सुन्दर सेक्सी प्रीती मेरे सामने नंगी खड़ी थी। प्रीती के बड़े-बड़े खड़े मम्मे, 24 इंच की पतली कमर के नीचे अलग से दिखाई देते उभरे हुए चूतड़ और हल्की झांटों वाली चूत। दुनिया भर के पोर्न फिल्में – चुदाई के फिल्में देखने वाला ये अवतार सिंह रंधावा। मेरी आंखों के आगे पोर्न एक्ट्रेसेस – चुदाई की फिल्मों की हीरोइनों की शक्लें घूम गयी।
अब बिना प्रीती को चोदे रहना मेरे लिए मुश्किल था। लंड फटने को हो रहा था। मेरा लंड पूरे तरह खड़ा था और पायजामें में से साफ़ दिखाई पड़ रहा था।
मैं उठा और प्रीती की तरफ गया और प्रीती के सामने खड़ा हो गया। प्रीती वैसे ही खड़ी रही, बिना हिले डुले, बिना कुछ भी बोले।
मैंने प्रीती के मम्मे हल्के से दबाये, उसके चूतड़ों पर हाथ फेरा और अचानक से मैंने प्रीती को बाहों में उठा लिया और अपने बैडरूम में ले गया। मैंने प्रीती को बिस्तर पर लिटा दिया और अपने कपड़े उतार दिए।
मेरा लंड सीधा खड़ा था। प्रीती मेरे सीधे खड़े लंड की तरफ ही देखे जा रही थी।
मैंने प्रीती की चूतड़ों के नीचे तकिया रखा, प्रीती की टांगें उठा कर फैला दी। प्रीती की गुलाबी चूत मेरे सामने थी। कोइ और दिन होता तो मैं चूत को जरूर चूसता चाटता। मगर प्रीती के ऐसे मस्त सेक्सी जिस्म और बड़ी-बड़ी फांकों वाली गुलाबी फुद्दी को देख कर मुझसे रहा ही नहीं जा रहा था।
मैंने लंड प्रीती की फुद्दी के छेद पर रखा और एक ही झटके से पूरा लंड बिठा दिया। प्रीती बस इतना ही बोले, “आह पापा।”
बस इसके बाद मैंने प्रीती को बाहों में जकड़ा और चोदना शुरू कर दिया। दो मिनट की चुदाई के बाद ही प्रीती पूरे जोश में आ गयी। प्रीती ने भी मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और अपनी टांगों से मेरी कमर को कैंची की तरह जकड़ लिया।
अब प्रीती नीचे से चूतड़ हिला घुमा रही थी। मजे के मारे प्रीती की सिसकारियां निकलने लगी, “आह पापा क्या मस्त लंड है आपका, क्या रगड़ाई कर रहा है मेरी फुद्दी की। पापा बड़ा मजा आ रहा है, आह पापा चोदो और जोर से चोदो।”
प्रीती की बातों ने मेरी मस्ती बढ़ा दी और मैंने और भी जोर-जोर से प्रीती की चुदाई शुरू कर दी। जवान सेक्सी प्रीती की टाइट फुद्दी को इस तरह चोदने का मुझे भी अजीब सा मजा आ रहा था। प्रीति के बड़े-बड़े मम्मे मेरी छाती पर चिपके हुए था।
मेरी लगातार वाली चुदाई से प्रीती की चूत ने एक बार पानी छोड़ा, मगर मेरा लंड खड़ा ही था। मेरी चुदाई चालू थी। फिर प्रीती की चूत एक बार और पानी छोड़ गयी, मगर मेरा लंड तब भी खड़ा ही था।
इस ताबड़-तोड़ चुदाई से जब प्रीती की चूत ने तीसरी बार पानी छोड़ा, तब मुझे भी मजा आ गया। मेरे लंड का गर्म-गर्म गाढ़ा पानी मेरे लंड से निकल कर प्रीती की चूत में चला गया।
प्रीती ने एक बार मुझे कस कर पकड़ा और बोली, “आह पापा गया गर्म-गर्म मेरी फुद्दी में, आज तो आपके साथ कमाल का मजा आया है” और इसके साथ ही प्रीती ने अपने टांगें मेरे कमर से हटा ली और मेरे पीछे से अपने बाहें भी हटा ली।
मैंने प्रीती की चूत में से लंड निकाला और बिना प्रीती की तरफ देखे बाथरूम में चला गया। कुछ भी हो, जितनी भी प्रीती सेक्सी थी, मगर थी तो मेरी बेटी ही – वो भी शादी-शुदा, सुखचैन की अमानत। मुझे लगा प्रीती इतने दिनों से सुखचैन से लगातार चुदाई करवा रही थी, इसलिए उससे रहा नहीं गया और उसने मुझसे चुदाई करवा ली।
मैं नहा कर बाथरूम से बाहर आया। प्रीती भी शायद अपने कमरे में जा चुकी थी।
मैं सीधा बाहर गया और जुगनू के साथ फार्म पर चला गया। फार्म से वापस आया तब भी मैं बाहर गाड़ी में ही बैठा रहा। जुगनू अंदर सब्ज़ी अंडे दूध देकर आया और मैं उसके साथ सेक्टर सत्रह चला गया।
पांच बजे मैं वापस आया और लाउंज में ही बैठ गया। प्रीती मेरे लिया चाय बना लाई। प्रीती उस वक़्त सलवार कमीज में थी।
प्रीती से नज़र मिलाने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी। चाय पी कर मैं बाथरूम चला गया।
फ्रेश हो कर मैं वापस लाउंज में आ गया और शिवाज़ रीगल का पेग बना कर मैंने टीवी चालू कर दिया और व्हिस्की के हल्के हल्के घूँट भरने लगा।
थोड़ी ही देर में प्रीती भी आ गयी। प्रीती कपड़े बदल चुकी थी। प्रीती ने वही सुबह वाली ड्रेस पहनी हुई थी – हल्का ग़ुलाबी झीना गाऊन। गाऊन के नीचे ना ब्रा, ना पैंटी।
प्रीती ने भी बार की अलमारी में से जिन की बोतल निकाली और नींबू पानी और सोडे में जिन मिला कर पीने लगी। प्रीती अक्सर वाइन ही पीती थी, मगर उस दिन प्रीती ने जिन की बोतल निकाली। खैर ये कोइ बड़ा मुद्दा नहीं था।
मेरा एक पेग खत्म हो चुका था। मैंने दूसरा पेग बना लिया। प्रीती का पेग भी खत्म होने को था। अपना पेग खत्म करके प्रीति ने दूसरा पेग बनाया और उठ कर टीवी बंद करके सीधा आ कर मेरी गोद में बैठ गयी।
प्रीती का इस तरह मेरी गोद में बैठना वो भी इतनी सेक्सी ड्रेस पहने हुए? मेरी हैरानी की कोइ सीमा नहीं रही। मेरे गले में बाहें डाल कर प्रीती बोली, “पापा क्या बात है नाराज़ हो? सुबह भी आप बिना बताये फार्म पर चले गए, फिर ऑफिस चले गए – क्या बात है?
मैंने ना प्रीती को उठने के लिए कहा, ना मैंने प्रीती के बात का जवाब ही दिया। प्रीती मेरी छाती पर हाथ फेरती रही। फिर अचानक प्रीती ने अपने गाऊन के बटन खोल दिए और अपने मम्मे बाहर निकाल लिए।
क्या मम्मे थे गोल-गोल बड़े-बड़े आगे से नुकीले। मम्मों के गुलाबी भूरे निप्पल अलग ही दिखाई दे रहे थे। मन तो कर रहा था चूस लूं, पर वही बात। अपनी बेटी के मम्मे कैसे चुसूं? अब वो बात अलग थी कि सुबह ही मैंने उसकी चुदाई की थी। मैंने सोचा, मगर वो तो एक एक्सीडेंट सा था।
प्रीती ने मेरा हाथ पकड़ा और उठा कर अपने मम्मे पर रख दिया।
मैंने कह ही दिया, “प्रीती क्या ये ठीक क्या बेटा?”
प्रीती बोली, “क्या ठीक है पापा? किसकी बात कर रहे हो?”
मैंने हिम्मत जुटाते हुये कहा, “यही प्रीति जो सुबह हममें हुआ।”
प्रीती ने मेरा हाथ अपने मम्मे पर दबाया और बोली, “पापा क्या हुआ? क्या सुबह वाली चुदाई की बात कर रहे हो आप?”
इतने पर भी ना तो मैंने प्रीती का मम्मा दबाया और ना ही उसकी बात कोइ जवाब दिया।
सुबह प्रीती की चुदाई के बाद मैं सीधा फार्म पर चला गया। फार्म से आया तो घर के अंदर भी नहीं गया और सत्रह सेक्टर चला गया। शाम को सत्रह से वापस आया तो लाउंज में बैठ गया। प्रीती का सामना करने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
जब मैं आया था और प्रीती ने दरवाजा खोला था, तो प्रीती सलवार कमीज पहनी हुए थी। मगर जब प्रीती लाउंज में आई तो उसने वही सुबह वाला झीना गाऊन पहना हुआ था। गाऊन के नीचे ना ब्रा और ना पैंटी।
सुबह की चुदाई के कारण मैं प्रीती से नज़र नहीं मिला पा रहा था। मैं व्हिस्की पी रहा था और प्रीती जिन के घूँट लगा रही थी। मुझे इस तरह चुप देख कर प्रीती उठी और आ कर मेरी टांगों पर बैठ गयी और बाहें मेरे गले मैं डाल कर आगे से गाऊन के बटन खोल दिए। प्रीती के बड़े-बड़े मम्मे गाऊन से बाहर निकल आये।
प्रीती ने मेरा एक हाथ पकड़ा और अपने मम्मे पर रख दिया। ना तो मैं प्रीती के मम्मे दबा रहा था, ना ही कुछ बोल रहा था।
मुझे इस तरह चुप देख कर प्रीती ही बोली, “पापा एक बात बताओ, मुझे ये खूबसूरत शरीर, मुझे ये बड़े-बड़े मम्मे, ये मुलायम चूतड़, ये बड़ी-बड़ी फांकों वाली फुद्दी किसने दी?”
मैं तो चुप ही था। मगर जब प्रीती बोली शुरू हुई तो फिर बोलती ही गयी।
“पापा आपने मम्मी को चोदा, उनकी चूत में अपने लंड से बीज डाला और आपकी ये बेटी इस दुनिया में आ गयी। मेरे इस जिस्म पर, मेरे मम्मों पर, मेरे चूतड़ों पर, मेरी फुद्दी पर पहला हक़ आपका है, सुखचैन से भी बहुत पहले का।”
“पापा आप तंदरुस्त हो। आपके लंड में बहुत दम है। कोइ भी लड़की आपके लंड को अपनी फुद्दी में लेने को तैयार हो जाएगी। और पापा मुझे मालूम है आप फुद्दी चोदने के बहुत शौक़ीन भी हो, हर तंदरुस्त इंसान होता है – पापा इसमें बुराई क्या है? तंदरुस्त आदमी ही फुद्दी चोदते हैं।”
“पापा मुझे मालूम है आप अम्मी को रोज़ चोदते रहे हो, मम्मी की फुद्दी चूसते रहे हो। अब मम्मी यहां नहीं है, और आपको फुद्दी चाहिए – चूसने के लिए, चोदने के लिए, मजे लेने के लिए। और पापा अब जब सुखचैन यहां नहीं है और मुझे भी तो लंड चाहिए अपनी फुद्दी में, चूतड़ों के छेद में, चूसने के लिए मुंह में। मुझे भी तो मजे लेने हैं।”
“पापा मुझे तो ये भी मालूम कि है आप बिशनी की फुद्दी भी चोदते हो। पूरन चाचा के लिए बिशनी जैसे जवान लड़की को चुदाई मजा देना जरा मुश्किल सा लगता है। उधर आप तो एक-दम तंदरुस्त हो, एक-दम मस्त लंड है आपका। भला बिशनी कैसे आप का लंड लिए बिना रह सकती है?”
“लेकिन पापा मैं आपको जानती हूं, आपके शौंक भी जानती हूं। आप बिशनी को चोद कर अपने लंड का पानी तो निकाल सकते हो लेकिन आप बिशनी की फुद्दी नहीं चाट सकते, बिशनी के चूतड़ नहीं चाट सकते। बिशनी के साथ आपकी चुदाई बस एक तरह से चुदाई की ठरक पूरी करने के होती होगी, बिस्तर पर लिटाया या घोड़ी बनाया, लंड चूत में डाला, धक्के लगाए, लंड का पानी निकाला और हो गयी चुदाई। ऐसी चुदाई में असली मजा नहीं आता पापा।”
“चलो ये भी छोड़ो, अब मम्मी यहां नहीं है और आप फार्म में जा कर बिशनी को चोद कर मजा ले लेते हो, मगर बताईये अगर मैं आपसे ना चुदवाऊं कहां?”
प्रीती बोलती जा रही थी, “और फिर पापा ये एक दो दिन की बात तो है नहीं, पूरे दो-तीन महीने की बात है। मम्मी कम से कम दो महीने से पहले आने वाली नहीं, और सुखचैन भी समझो कम से कम तीन महीने तो ढुबरी में रहेगा ही। तो बताओ पापा कैसे हम दोनों रहेंगे बिना चुदाई के मजे लिए?”
“पापा आपको तो पता ही है, आप तो देखते भी रहे हो मेरे और सुखचैन की चुदाई। आप जानते ही हो मुझे रोज़ लंड चाहिए होता है अपनी फुद्दी में – मुझे क्या पापा, हर जवान लड़की को ही चाहिए होता है, और आप भी तो फुद्दी चोदने और चूसने के शौक़ीन हो। आपके लंड में भी पूरा दम है। पापा ये हिचकिचाहट छोड़ो और खुल कर मेरी टाइट चूत और गांड के मजे लो और मुझे भी अपने मोटे लम्बे लंड का मजे दो।”
फिर प्रीती धीरे से बोली, जैसे बड़े ही राज की बात बताने जा रही हो, “पापा एक बात बताऊं?”
प्रीती के मम्मी मेरे छाती को छू रहे थे। प्रीती के साँसों की गर्माहट मुझे अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी। मैंने प्रीती की तरफ देखा। प्रीती बोली, “पापा मेरी शादी तो दो ही साल पहले ही हुई है। आपका ये लम्बा मोटा लंड तो मैंने उससे भी कई साल पहले अपनी चूत में महसूस किया है, जब भी मैं आपकी और मम्मी की चुदाई देखती थी। जब भी आप मम्मी की चूत में ये मोटा लंड डालते थे, मुझे आपका ये लंड मुझे अपनी चूत में जाता महसूस होता था।”
मैं हैरान हुआ। क्या प्रीती सच में ही मेरी और भूपिंदर की चुदाई देखती रही है। मैंने पूछ ही लिया, “प्रीती तुम कब से मेरी और अपनी मम्मी की चुदाई देखती रही हो?”
प्रीती बोली, “कई सालों से पापा, कई सालों से। अब तो मुझे याद भी नहीं कितने साल हो गए। तब कुछ ऐसे हालात बने थे के मैंने आपकी चुदाई एक बार देख ली और बस फिर तो मैं हमेशा आपके और मम्मी की चुदाई देखने के मौके ढूढ़ती थी।”
“पापा आपको तो मम्मी की चूत चूसने में भी बड़ा मजा आता है। आप मम्मी की फुद्दी चूतड़ खूब चूसते-चाटते हो। पापा अब ये मजे देने के लिया मम्मी यहां है नहीं तो फिर बताईये मजे के लिए आप क्या करेंगे? जब ये मजे लेने के लिया अब घर में ही एक बढ़िया गुलाबी टाइट फुद्दी मौजूद है, तो आप मजे क्यों ना लो? यही बात मेरे साथ भी है। मैं भी चुदाई के मजे के लिए कहीं बाहर क्यों जाऊं जब और इतनी सख्ती वाला मस्त मोटा लम्बा लंड घर में मौजूद है, मेरे पास? चलिए आज मैं आपको अपनी फुद्दी का रस पिलाती हूं – बिलकुल शुद्ध शहद जैसा गाढ़ा, हल्का गर्म, हल्का नमकीन।”
“मैं अभी भी सकते की हालत में था कि ये हो क्या रहा है। मेरा लंड खड़ा होने लग गया था। मगर मैं कुछ बोल नहीं रहा था।”
“मुझे इस तरह चुप बैठा देख कर प्रीती बोली, “पापा अभी भी सोच ही रहे हो?”
और फिर अपना मम्मा ऊपर करके मेरे होठों से लगाते हुए प्रीती बोली, “पापा मस्त मजा लो मेरी फुद्दी का और मस्त मजा दो मुझे अपन इस लंड का। आपका मोटा लंड मेरे टाइट फुद्दी मैं रगड़े खाता हुआ जाएगा, जन्नत का मजा आएगा आपको मेरी फुद्दी चोदने में।”
“पापा भला क्यों तरसें हम दोनों चुदाई के लिए जब एक मस्त लंड और एक टाइट फुद्दी एक ही छत, बल्कि एक ही कमरे में, एक ही बिस्तर पर मौजूद हैं। पापा मैं तो मम्मी के आने के बाद भी आपसे चुदाई जारी रखूंगी।”
प्रीती की बातें सुन कर मेरा लंड हरकत में आ चुका था। मेरी टांगें बंद थी और टांगों पर प्रीति बैठी थी। मेरा खड़ा होता हुआ लंड मेरी टांगों में जकड़ा पड़ा था। मैंने कसमसा कर अपनी टांगें थोड़ी से खोल दी और नीचे पायजामे में ही लंड ऊपर की तरफ हो गया और प्रीती के चूतड़ों को छूने लगा।
प्रीती की बात सुन कर कि “पापा मैं तो मम्मी के आने के बाद भी आपसे चुदाई जारी रखूंगी।” मेरे मुंह से निकल गया, “भूपिंदर के आने के बाद भी? ये कैसे होगा प्रीती?”
प्रीती बोली, “ये आप मुझ पर छोड़ो पापा। मैं अपनी मम्मी को जानती हूं। मम्मी जवानी में रोज आपका लंड लेती थी। मम्मी को पता है जवानी में है फुद्दी को लंड की कैसी जरूरत होती है। मम्मी मेरी फुद्दी की जरूरत भी समझेगी। आप बताओ पापा क्या मम्मी को ये मंजूर होगा कि उनकी खूबसूरत जवान बेटी बाहर होटलों में ऐरे-गैरे लड़कों से चूत चुदवाने जाये?”
“चलिए पापा उठिये। आपका लंड नीचे मेरी फुद्दी का छेद ढूंढने लग गया है। चलिए आज आपको अपनी फुद्दी का रस पिलाती हूं – भरी पड़ी चिकने पानी से।”
ये कह कर प्रीती मेरी गोद से उतरी और मेरे पायजामें का नाड़ा खोल दिया। पायजामा ढीला होते ही मेरा खड़ा लंड पटाक से सीधा हो गया। प्रीती नीचे बैठ गयी, लंड को पकड़ा और मुंह में ले लिया। प्रीती के नाजुक होठों की कुछ ही चुसाई ने मेरे लंड में एक-दम से सख्ती ला दी।
मेरे दिमाग से कन्फ्यूज़न, भ्रम के बादल काफी हद तक छंट चुके थे। प्रीती की बोली सारी बातें मुझे ठीक लगने लगी थी। मैंने प्रीती को कंधों से पकड़ कर उठाया और गाऊन ऊपर करके उसके चूतड़ों में उंगली डालते हुए कहा, “चलो प्रीती अंदर चलते हैं।”
प्रीति उठी और मेरे कमरे की तरफ चल दी। पीछे-पीछे मैं था, मेरी उंगली उसकी गांड के छेद में ही थी। अंदर जा कर प्रीती ने अपना गाउन उतारा और बिस्तर पर लेट गयी। मैंने भी अपने कपड़े उतारे और प्रीति के साथ ही लेट गया।
मैंने थोड़ी सी करवट ली और प्रीती की चूत मैं उंगली ऊपर नीचे करने लगा, सच में ही प्रीती की फुद्दी गीली हुई पड़ी थी। मैंने प्रीती की तरफ देखा जैसे कह रहा होऊं, “प्रीती फुद्दी चुसवाओ।”
प्रीती ने मुझे बाहों में ले लिया और अपनी एक टांग उठा कर और मेरी कमर रख दी – मतलब प्रीती फिर से मुझे अपनी गांड में उंगली डालने का इशारा कर रही थी। मैंने हाथ पीछे किया और प्रीती के चूतड़ों की दरार में उंगली ऊपर नीचे करते हुए गांड का छेद ढूंढने लगा। क्या नरम मुलायम चूतड़ थे प्रीटी के प्रीती के।
मैंने प्रीती के कान मैं कहा, “प्रीती तुम्हारे चूतड़ तो बड़े नरम मुलायम हैं।”
प्रीती ने हंसते हुए बोली, “पापा चूतड़ों का छेद और भी मुलायम है, मगर एक-दम टाइट। चोदोगे तो लंड पर ऐसे रगड़े लगेंगे कि मजा ही आ जाएगा।”
अब मेरी शर्म हट चुकी थी। मैंने भी हल्का सा हंसते हुए कहा, “एक-दम टाइट है? सुखचैन नहीं डालता इसमें अपना लंड? इतने मुलायम चूतड़ देख कर कैसे मन मार लेता है सुखचैन?”
प्रीती बोली, “पापा वो बात नहीं है। सुखचैन गांड चोदने का शौक़ीन नहीं है। चार छह महीने में जब कभी उसका बहुत मन करता है लंड पर रगड़े लगवाने का, तो मुझे बोल देता है, “प्रीती आज गांड में डालने का मन है।”
“पापा गांड चुदवाने का शौक मुझे भी नहीं, मुझे भी फुद्दी चुदवाने का ही शौक है, चाहे सारी-सारी रात चोदते रहो। मगर जब कभी सुखचैन का गांड चोदने का मन करता है, मैं मना नहीं करती, और मैं भी गांड चुदाई के मजे लेती हूं।”
“पापा आपका भी जब मन करे मेरी गांड में लंड डालने का, मुझे बता देना है।” और फिर प्रीती मेरे होंठ चूमती हुई बोली, “पापा आप तो चाहे रोज ही डालो मेरी गांड में लंड, आपके लिए मना नहीं है।”
मेरी एक उंगली प्रीटी की गांड के अंदर ही थी। प्रीटी की बातें सुन-सुन कर मेरा लंड अब सख्त होने लगा था। मैंने उंगली प्रीती के चूतड़ों के छेद में थोड़ी और अंदर की और प्रीती से पूछा, “प्रीती मेरा मोटा लंड तुम्हारी गांड के इस टाइट छेद में चला जाएगा?”
जब मैंने ‘इस टाइट छेद’ बोला तो मैंने उंगली जोर से प्रीटी की गांड में अंदर-बाहर की।
प्रीती बोली, “पापा अगर ना भी जाए तब भी एक बार ट्राई करने में क्या हर्ज है? मुझे भी अगर ज्यादा दर्द होगा तो मैं बता दूंगी। अगर मजा आता हो तो थोड़ी बहुत दर्द सहने में क्या जाता है? और पापा एक दिन नहीं जाएगा, दूसरे दिन नहीं जाएगा, मगर कब तक? कभी ना कभी तो जाएगा ही।”
“सुखचैन ने भी जब पहली बार मेरी फुद्दी को चोदा था तो उसका लंड भी फुद्दी में बड़ी मुश्किल से जा पाया था। और जब सुखचैन का लंड गया था मेरी फुद्दी में और तब मुझे भी दर्द हुआ था थोड़ा खून भी निकला था, इसका ये मतलब तो नहीं हुआ पापा कि मैं सुखचैन से फुद्दी ही ना चुदवाती?”
प्रीटी बोली, “चलिए उठिये आपको अपनी फुद्दी का रस पिलाऊं, मेरी फुद्दी में बरसात शुरू हो चकी है और इसमें बाढ़ आयी हुई है।”
मैंने प्रीती की गांड में से उंगली निकाल ली। प्रीती ने भी अपनी टांग मेरी कमर से हटा ली। मैं उठ कर खड़ा हो गया और इंतजार करने लगा कि प्रीती मुझे अपने ऊपर उल्टा लेटने को कहेगी और या फिर वो मेरे ऊपर उल्टा लेटेगी।
वैसे तो कोई फर्क नहीं पड़ता। कैसे भी लेट जाओ मर्द औरत की फुद्दी चूसता है और औरत मर्द का लंड चूसती है। ये तो वहीं वाली बात है खरबूजा छुरी के ऊपर हो या छुरी खरबूजे के ऊपर, काम तो एक ही होता है।
मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रीती ने एक तकिया उठाया और बेड की साइड पर रख दिया और उस पर बैठ गयी।
प्रीती के चूतड़ तकिये पर थे, प्रीती ने एक तकिया पीछे रखा और तकिये पर सर रख कर पीछे की तरफ लेट गयी। प्रीती की टांगें बेड से नीचे लटक रही थी। प्रीती ने टांगें उठाई और हाथ नीचे करके अपनी फुद्दी की फांकें चौड़ी कर दी और बोली, “लो पापा, ये रही आपकी बेटी की फुद्दी, आ जाओ।”
प्रीती की फुद्दी बिलकुल भूपिंदर और मालिनी अवस्थी की फुद्दी जैसी थी, उभरी हुई फांकों वाली, ऊपरी फुद्दी। प्रीती की गुलाबी फुद्दी चिकने पानी से भरी पड़ी थी और पानी की चिकनाई के कारण वजह से चमक सी रही थी।
मेरी आंखें प्रीती की जवान गुलाबी फुद्दी से हट नहीं रही थी। मुझे इस तरह फुद्दी की तरफ देखते हुए देख कर प्रीती बोली, “आ जाओ पापा, चूसो मेरी चूत का मस्त गर्म नमकीन पानी। पता नहीं कब मम्मी आएगी – कनाडा से और कब आपको फुद्दी मिलेगी चूसने को, बिशनी की फुद्दी तो आप चूसोगे नहीं।”
मैं नीचे बैठा और मैंने अपना मुंह “पापा की परी प्रीती” की फुद्दी में घुसेड़ दिया।
